Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Kowtliya Arthashastra Haindi Anuvad Sahit
Front matter
उपोद्यात कौटलीय अर्थशास्त्र, संस्कृत साहित्य में, अपने विपयका इञ्चकोटिका ग्रन्थ है। सबसे प्रथम इस ग्रन्थको सन् १९०९ ई० में, मैसूर राज्यकी ग्रन्थशालाके अध्यक्ष श्रीयुत शामशास्त्रीने प्रका. शित कराया । तथा अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगोंके सुभीतेके लिये उन्होंने इस ग्रन्थका इंग्लिश भाषामें अनुवाद भी करदिया । उसी • समयसे इस दुरूह ग्रन्थको समझने के लिये विद्वजन पर्याप्त परि. थम कररहे हैं। शामशास्त्रीने पहिले पहिल इस ग्रन्थका इंग्लिश अनुवाद किया; इसलिये उनका प्रयत्न प्रशंसनीय है, परन्तु यह कहे बिना नहीं रहा जासकता, कि उस अनुवादमें अनेक स्थलॉपर स्खलन हैं। जिनका यहां उल्लेप करना अनावश्यक है । इस कार्य के अनन्तर इस विषयपर अनेक साप्ताहिक मालिक पत्र पत्रिकाओं में लम्बे चौड़े विचारपूर्ण लेख समय २ पर प्रकाशित होतेरहे, परन्तु पुस्तकके रूपमें कोई महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित नहीं हुआ। अबसे पांच वरस पहिले में यह विचार कररहा था, कि इस ग्रन्थका अनुयाई फरूं, जिससे सर्वसाधारणके सन्मुख यह विषय उपस्थित किया जासके, तथा इसपर और भी अच्छा विचार होसके। कुछ ही समयके अनन्तर मेंने सुना कि प्राणनाथ विद्यालद्वार इस ग्रन्थका अनुवाद कररहे हैं, मैं चुप होगया । और सन् १९२३ ई० में वह अनुवाद प्रकाशित होगया । उस अनुवादके देखनेपर, मैं इसका अच्छीतरह निर्णय करसका, कि मुझे भी थपने विचार कार्यरूपमें परिणत करदेने चाहिये । * अनुवाद के समय, किसी २ स्थलपर, हमने शास्रीजीके श्रमका दिग्दर्शन कराया है। पाठक वहींपर देखेंगे।
यद्यपि प्राणनाथ विद्यालङ्कारने अपने निवेदनमें एस यातको बड़े जोरोंपर लिखा है, कि 'डाक्टर शामशास्त्रीके यांग्लभाषाके, भापान्तरको संमुस रखकर यह अनुवाद नहीं दियागया' 1 परन्तु दोनोंका मुकाबला करनेपर हमसे यह दावा, कुछ गलत साधित हुआ है । यद्यपि विद्यालङ्कारजीने कहीं २ अपने अनुवादकी टिप्प- णियोंमें शामशास्त्रीके अनुवादको अशुद्ध करनेका यन किया है। परन्तु वहांपर मूलके अर्थको न समझकर आप स्वयं ही मुंहमी खा गये हैं । इसके अतिरिक्त स्वयं अनुवाद करते हुए आपने पद पदपर सवलन किया है। यदि आपके सम्पूर्ण अनुवादको सामने रखकर कहाजाय, तो बलात्कार मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं, कि यह अनुयार थपूर्ण तथा मूलक विपरीत और विलित भावोंसे भरा हुआ । हमारा विचार था, कि इसतरह कुछ स्थलोंको यहां उद्धृत करदिया जाय, परन्तु स्थानाभाय और कुछ अप्रासंगिक होनके कारण हमको अपना यह विचार शान्त करना पड़ा। परन्तु यह निश्चय है, कि भासनभविष्य में, इस ग्रन्थकी विस्तृत समालोचनाके अवसरपर, चे सर ही बातें, पाठकों के सन्मुख उपस्थित कीजासकेंगी। अस्तु, जब हमारा यह विचार होरहा था, उसी समय ह को कौटलीय अर्थशास्त्रकी एक प्राचीन टीका 'नयचन्द्रिका' उपलब्ध हुई । इस टीकाको हमने ही सम्पादन किया, और सन् १९२४ में लाहौरसे ही यह टीका प्रकाशित होगई । यद्यपि यह टीका सम्पूर्ण अर्थशास्त्रपर मान नहीं हुई, पर जितनी मी प्राप्त हुई उतनी महत्वपूर्ण है; उसके पढ़ने और सम्पादन करनेसे, इस प्रन्थकी यहुतसी उलझी हुई ग्रन्थि सुलझ गई, और हमें पूर्ण विभ्यास हुआ, कि अय इस मूलग्नन्य का अनुवाद सरलता से हो सकेगा। इसी समयमें 'अनन्तशयन संस्कृत ग्रन्थावलि' में कौट मर्थशास्त्र की, संस्कृत भाषामें एक विशद व्याख्या प्रकाशि यह व्याख्या महामहोपाध्याय गणपति शास्त्रीने प्राचीन टीव आधार पर लिखी है । आपने अपने इसी प्रन्थ की भूमिकामे लिखा है कि उन्होंने कुछ भागपर नयचन्दिका, और कुछ भागपर भट्टस्वामीकी व्याख्याका अवलम्ब लेकर, तथा उनकी अपनी मातृभापाके एक प्राचीन सम्पूर्ण अर्थशास्त्रके व्यारयान का अवलम्म लेफर, इस मूला' नामकी विशद व्याख्याको लिया है। इस सम्पूर्ण प्राचीन सामग्रीके आधारपर हमने इस अनु. वादको पूरा करनेका विचार किया। इसी समय लाहौरके प्रसिद्ध संस्थत पुस्तक विता-मेहरचन्द्र लक्ष्मणदासने, हमको यह कार्य बहुत जल्दी करदेनेके लिये प्रेरित किया । उसका फलस्वरूप यह अनुवाद पाठकोंकी भेंट है। इसकी उपयोगिता स्वयं पढ़कर ही पाठक जान सकेंगे। हमारा विचार था, कि इस ग्रन्थके रथ एक विस्तृत उपोद्धात लिसाजाय; परन्तु कौटलीय अर्थशास्त्र के सम्बन्धमें अपने उन सय विचारोंको प्रकट करनेके लिये हमें ये उपोद्धात पने कुछ थोड़े प्रतीत हुए । अब विचार होगया है, कि मूल अर्थशास्त्र पर एक विस्तृत स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखाजाय । उस हमें ग्रन्थकर्ता के समय, स्थान, ग्रन्थकी विशेषताएं. तथा अन्य आलोचना, प्रत्या- लोचना आदिका समावेश होगा। फिर भी इस ग्रन्थके सम्बन्धम इतना जानलेना आवश्यक है कि यह मूलमन्थ विष्णुगुप्त कौटल्य (चाणक्य ) का लिया हुआ है। चाणक्य, सम्राट चन्द्रगुप्तका प्रधान अमात्य था। इसने मगधके राजा महानन्द पद्मको, अपना तिरस्कार करने के कारण मारकर चन्द्रगुप्त मौर्यको राज्यसिंहासनपर बिठाया था । यदि अंग्रेजी गज़से नापा जाय, तो मौर्य चन्द्रगुप्तका समय ईसवी सन्से पहिले तीसरी सदी है ! वही समय चाणक्यका भी समझना 'चाहिये। इसमें कोई सन्देह नहीं, कि यह कौटलीय अर्थशास्त्र कठिन स्य है। इसमें अनेक अप्रसिद्ध पारिभाषिक शब्द हैं। विषय . कृट २ कर भरा हुआ है। इस ग्रन्थ ऐसे भी अनेक - 'मा है, जिनका विचार, वर्तमान पराधीन बूढ़े भारत के बालकांके 'हृदयमें, स्वममं भी स्थान नहींपासकता तथाजोपर्तमान परिस्थिति (') के अनुसार हमसे सर्वथा परोक्ष होचुके हैं। यह सब कुछ होनेपर भी मैं अपनी उस पूजनीया मातृसंस्था ( महाविद्या- लय ज्वालापुर) का अत्यन्त कृतज्ञ हूं, जिसके स्वतन्न वातावरण में रहकर, तथा दश वर्ष तक उसकी प्रेममयी गोदमें शिक्षा प्राप्तकर, इस दुरूह कार्यके करनेमें भी सरलतासे समर्थ होसका। अन्तमें मैं अपने परम मित्र साहित्यभास्कर पं. रामस्वरूप शास्त्री का यतीर्थ (हरदुआगंज निवासी). पं० यलदेव शास्त्री बी०ए० (लाहौर निवासी), तथा श्रीयुत प्यारेलाल दुग्गल पी० ए० (कप्रथला नियासी ) का अत्यन्त कृतश हूं। और इनका हार्दिक धन्यवाद करता हूं, इन्होंने अनेक स्थलोपर प्रन्थफे समझने में, मुझे, बहुत सहायता दी है। लाहौर श्रावण शुल्ला सप्तमी मंगलवार सं० १९८२ चिकमी विनीत- - . उदयवीर कौटलीय अर्थशास्त्र प्रथम भाग।
S विषयानुक्रमणिका ARARNI विषय र संगया १-८८ १ ८ ११ १६ ३-विनयाधिकारिक प्रफरणाधिकरणनिश विधा-समुदेश प्रयीस्थापना याता और दण्डनीति की स्पर्धापना सुंग संयोग इन्द्रियजय राजर्षिका ययद्वार (अमात्यों की नियुक्ति मन्त्री और पुरोदित की निमुक्ति गुरीति से समात्यों के हार्दिक, सरल तथा पुटिल मावों की परीक्षा -गुप्तचर पुराण की स्थापना १५ गुप्तचरों की कार्यों पर नियुक्ति अपने देश कृत्य तथा असत्य पक्ष की रक्षा शत्रु के देश में सत्य तथा अफरय पक्ष के पुगों • का संग्रह मन्त्राधिकार २३ ३२ . दूत प्रणिधि ६० राजयुमों से राजा की रक्षा अवद्ध राजकुमार का व्यवहार, तथा अवरुद्ध राजकुमार के प्रति राजा का व्यवहार राज प्रणिधि विपय पृष्ठ संख्या . ७६ 20 निशान्त प्रणिधि २१आत्मरक्षा ८९-३४३ ९६ १०७ - ११७ १३९ १४६ २--अध्यक्ष प्रचार जनपद निवेश भूमिच्छिन्द्र विधान दुर्गविधान दुर्गनिवेश सनिधाता का निचयकर्म समादती का कर संग्रहकार्य अक्ष पटल में गाणनिफ्याधिकार थध्यक्षों के द्वारा अपहत धनका प्रत्यानयन उपयुक्त परीक्षा शासनाधिकार कोशमें प्रवेश करने योग्य रनों की परीक्षा सान के फायों का सञ्चालन अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष का कार्य विशिखा में सौयर्णिक का व्यापार कोष्ठागाराध्यक्ष पण्याध्यक्ष कुप्याध्यक्ष vथायुधागाराध्यक्ष तोल माप का संशोधन देश तथा फाल का मान शुल्काध्यक्ष शुल्कव्यवहार म्याध्यक्ष सीताध्यक्ष सुराध्यक्ष - १९३ २०४ २१४ २१९ २२३ २२९ २३७ २४६ २६७ विपय संख्या ३०० ३१२ सूनाध्यक्ष गणिकाध्यक्ष नावध्यक्ष गोऽध्यक्ष अश्याध्यक्ष दस्यध्यक्ष हस्तिप्रचार रथाध्यक्ष पत्यध्यक्ष तथा सेनापति प्रचार मुद्राध्यक्ष और विवीताध्यक्ष समाहर्ताका कार्य, गृहपति पदेशक तथा तापसके वर्षमै गुप्तवर नागरिक का कार्य ३-धर्मस्थीय ३२३ ३२६ १-९८ व्यवहार की स्थापना और विवाद का लेखन विवाद धर्म स्त्रीधन, और भाधियेदनिक विवाहित के विषय में शुश्रूषा, मर्म, पारुष्य, द्वेष, अतिचार और उपकारच्यवहार प्रनिषेध विवाह संयुक्त मनिप्पतन, पश्यनुसरण हस्व-प्रयास और दीर्घ प्रवास माय विभाग मंश विभाग पुम विभाग ३२ विक्रय • चरागाह और खेत के मागों को रोकना, तथा नियम का उल्लंघन (४) विषय पृष्ठ संख्या ५० ऋण लेना औपनिधिक दासकल्प कर्मकरकल्प, सम्भूय समुत्थान क्रय विक्रय तथा अनुशय प्रतिशत घनका अप्रदान, अस्वामिविझप, स्पस्वामि सम्बन्ध साहस वास्यास्थ्य दण्डपारुष्य द्यत समाहूप और प्रकीर्णक ८३ ८५ ६३ ४-कण्टक शोधन ९९-१६२ कारकरक्षण व्यापारियों से रक्षा १०६ दैवी आपत्तियों का प्रतीकार गूढा जीधियों का प्रतीकार सिद्धयेप के द्वारा दुष्टों का प्रकाशन शका, चोरी का माल, तथा संघसे चोरों का कहना १२२ आशुमृतक परीक्षा पाक्य कर्मानुयोग सब अधिकारी तथा उनके स्थानों की देखभाल एकानयघ और उसका निष्क्रय शुद्ध और चित्रदण्ड कन्या प्रकर्म थतियार दण्ड ५-योगत्त त . १६३-२०३ दण्ड प्रयोग १५) विपय एम संख्या कोशका अधिक संग्रह १७१ मृत्यों का भरणपोषण १८१ मन्त्री मादि राज कर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार व्यवस्था का पालन राज्य का प्रतिसन्धान और एकैश्वर्य ६-मण्डलयोनि २०४-२१५ प्रकृतियों के गुण २०४ शास्ति और उद्योग २०F ७-पाड्गुण्य २१५--३३८ छ: गुणों का उद्देश्य और क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय संश्रय वृत्ति २२२ सम, हीन तथा अधिक के गुणों की स्थापना ओर हीन के साथ सन्धि विशेष भासन योर यान २३१ याम विषयक विचार, प्रकृतियों के क्षय, लोभ तथा, चिरागके हेतु, और विजिगीषुके अनुगा- मियोका विचार २३६ एकसाथ प्रयाप और परिणित, अपारंपर्णित तथा अपहत सन्धि २४४ वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम ૨૨ यातव्य सम्बन्धी व्यवहार तथा अनुग्राहा मिनाके विशेष मित्रसन्धि और हिरण्य सन्धि २६४ भूमिसन्धि २७२ सनयसित सन्धि विषय पृष्ठ संख्या कर्मसन्धि ૧૮૫ पारिणमाहचिन्ता हीनशक्ति पूरण प्रवल शत्रुके साथ विरोध करके दुर्गप्रवेशके कारण, और विजित शनुका व्यवहार ३०५ विजेता विजिगीपुका व्यवहार सन्धिका दृढ़करना और विश्वासके लिये रखेहुए राजपुत्र आदिका छुढ़ाना मध्यम, उदासीन और अन्य राजमण्डल के प्रति विजिगीपुका व्यवहार ३२९ -व्यसनाधिकारक ३३९-३८६ प्रकृति व्यसनवर्ग ३३९ राजा और राज्यके व्यसनांका विचार ३४९ पुरुपव्यसनवर्ग पीडनवर्ग, स्तम्भनवर्ग, और कोशक्षणवर्ग ३६५ बलव्यसनवर्ग और मित्रव्यसनवर्ग -पभियास्यत्कर्म ३८७-४५६ शक्ति, देश-कालके पलायलका ज्ञान, और यात्राकाल २८७ सेनाओंके तैयार होनेका समय, सन्नाह गुण और प्रतिवलकर्म ३९७ पश्चात्कोपचिन्ता, शह और आभ्यन्तर प्रतिके कोपका प्रतीकार ४०७ क्षय व्यय तथा लाभता विचार ४१८ याद्य तथा आभ्यन्तर आपत्तियां. ४२५ दूप्य तथा शभुजन्य आपत्तियां अर्थ अनर्थ तथा संशय सम्बन्धी यापत्तियां और उन भापत्तियोंके प्रतीकारके लिये सामा आदि उपार्योंके प्रयोगविशेपसे होनेवाली सिद्धियां विषय पृष्ठ संख्या १०--सांग्रामिक ४५७-४९९ स्कन्धावार निवेश स्कन्धावार प्रयाण, तथा यलच्यसन और अव. स्कन्द कालसे सेनाकी रक्षा कूटयुद्ध के भेद, अपनी सेनाका प्रोत्साहन, तथा अपनी और पराई सेनाका व्यवस्थापन युद्ध योग्य भूमि, और पदाति, अश्व, रथ, तथा हाथी आदिके कार्य पक्ष, कक्ष तथा उरस्य इत्यादि व्यूहविशेषोंका, सेनाके परिमाणके अनुसार व्यूद विभाग, सार तथा फल्गु बलका विभाग, और पदाति, अश्य, रथ, तथा हाथियों का युद्ध ૪૮૨ दण्डब्यूह. भोगव्यूह, मण्डलव्यूह, असंहतन्यूह, इनके प्रकृति व्यूहों और विकृतिव्यूहोंकी रचना, तथा उपर्युक्त दण्डादि न्यूहोंके प्रतिव्यूहकी स्थापना ४९३ ११-संघवृत्त ५००-५१० भेदके प्रयोग और उपांशुदण्ड ५०० १२- आपलीयस ५११-.५४३ मन्त्रयुद्ध सेनापत्तियोंकायध और मित्र आदि राजमण्डलका पोत्साहन शस्त्र, अग्नि तथा रसांका गूढ प्रयोग और वोषध, आसार तथा प्रसारका नारा योगातिसन्धान, दण्डातिसन्धान और एकविजय ५२९
.
पृष्ट संख्या
(८)
विषय
१३-दुर्गलम्भोपाय
५१४-५८५
उपजाप
योगवामन
गूढपुरुषोंका शत्रुदेशमें निवास
शत्रुके दुर्गको घेरना, तथा शत्रुके दुर्गका अवमर्द ५६९
विजित दुर्ग आदिमें शान्ति स्थापित करना
५८०
१४-औपनिपदिक
५८६-६२०
परयात प्रयोग
प्रलम्भनम अद्भुतोत्पादन
५९६
प्रलम्भनमें भैपज्यमन्त्रयोग
शत्रुके द्वारा अपनी सेनापर कियेगये घातक प्रयोगों
का प्रतीकार
१५--तन्त्रयुक्ति
६२१-६२७
तन्त्रयुक्ति
६२१
ॐ कौटलीय अर्थशास्त्र विनयाधिकारिक-प्रथम अधिकरण पृथिच्या लामे पालन च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचायः प्रस्तावितानि प्रायशस्तानि संहृत्यफमिदमर्थशास्त्रं कृतम् ॥ १॥ तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ॥२॥ पृथिवीके पास करने और प्राप्तकी रक्षा करनेके लिये जितने अर्थ. शास्त्र प्राचीन भाचायान लिव, प्राय उन सबको ही सगृहीत करके यह एक अर्थशास्त्र बनाया गया है। सबसे प्रथम यह उसके प्रकरण और अधिकरणका निरूपण किया जाता हें ॥ २ ॥ विद्यासमुद्देशः ॥३॥ धृद्धसंयोगः ॥४॥ इन्द्रियजयः ॥ ५॥ अमात्योत्पत्तिः ॥६॥ मन्त्रिपुरोहितोत्पतिः ॥ ७॥ उपधाभिः शौचाशोचज्ञानममात्यानाम् ।। ८ ॥ गूढपुरुषोत्पत्तिः ॥ ९॥ गूढपुरुपप्रणिधिः ॥ १० ॥ स्वविपये कृत्याकृत्यपक्ष- रक्षणम् ।। ११॥ परविपये कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः ॥१२॥ मन्त्रा- 'धिकारः ॥ १३ ॥ दूतमणिधिः॥ १४ ॥ राजपुत्ररक्षणम् ॥१५॥ अवरुद्धवृत्तम् ।। १६ ॥ अवरुद्ध च वृत्तिः ॥१७॥ राजप्रणिधिः ।।१८।। निशान्तप्रणिधिः ।। १९ ।। आत्मरक्षितकम् ।। २० ॥ इति विनयाधिकारिकं प्रथममधिकरणम् ॥ २१ ॥ -विद्यासमश २-वृधरायोग ३-इन्द्रियजय ४-अमात्योंकी नियुक्ति ६-मन्त्री भार पुरोहितों की नियुक्ति ६-गुरुरीतिसे अमात्यांके सरल तथा टिस- (२) कौटलीय अर्थशास्त्र ११ अधिक भावको परीक्षा -गृढ पुरुषोंकी स्थापना ८-गुरुसरॉकी कार्योंपर नियुक्ति ९-अपने देशम कृत्य और भकृस्य पक्षको रक्षा १०-शत्रु देशके कृत्य और भकृस्य पक्षको वशमें करना -मन्त्राधिकार १२-दूतप्रणिधि ३-राजपुत्रकी रक्षा 18-अवरुद्ध राजकुमारका म्यवहार १५-अवरुद्ध राजकुमारके विषयमें राजाका व्यवहार 14-राजप्रणिधि १७-माज भवनकी स्थापनाका विचार १८-अपनी रक्षा १९-ये अठारह प्रकरण विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें है ॥३-२१॥ जनपदविनिवेशः ॥ २२॥ भूमिच्छिद्रावधानम् ।। २३ ।। दुर्गविधानम् ॥ २४ ॥ दुर्गविनिवेशः ॥ २५ ॥ संनिधानिच- यकर्म ॥ २६ ॥ ममाहर्डसमुदयप्रस्थापनम् ॥ २७ ॥ अक्षपटले गाणनिक्याधिकारः ॥ २८ ॥ समुदयस्य युक्तापहवस्य प्रत्यानय- नम् ।। २९ ।। उपयुक्तपरीक्षा ॥ ३० ॥ शासनाधिकारः ॥३१॥ कोशप्रवेश्यरतपरीक्षा ॥ ३२ ॥ आकरकर्मान्तप्रवर्तनम् ।। ३३ ।। अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षः ॥३४॥ निशिसायां सौवर्णिकप्रचारः ॥ ३५ ॥ कोष्ठागाराध्यक्षः ॥ ३६॥ पण्याध्यक्षः ॥ ३७ ।। कुप्याध्यक्षः ॥ ३८ ॥ आयुधागारध्यक्षः ॥३९॥ तुलामान- पौतवम् ।। ४ । देशकालमानम् ॥४१॥ शुल्काध्यक्षः ॥४२।। सूत्राध्यक्षः ॥ ४३ ॥ सीताध्यक्षः ॥ ४४ ॥ सुराध्यक्षः ॥४५॥ सूनाध्यक्षः ॥ ४६॥ गणिकाध्यक्षः ॥४७॥ नायध्यक्षः॥४८॥ गोऽध्यक्षः ॥ ४९ ।। अश्वाध्यक्षः ॥५०॥ हस्त्यध्यक्षः ॥५१॥ रथाध्यक्षः ॥ ५२ ॥ पस्यध्यक्षः ॥५३॥ सेनापतिप्रचारः॥५४॥ मुद्राध्यक्षः ॥ ५५ ॥ विवीताध्यक्षः ॥ ५६ ॥ समाहर्दप्रचारः ॥ ५७॥ गृहपतिवैदेहकवापसव्यञ्जनाः प्रणिधयः ॥ ५८ ॥ नागरिकप्रणिधिः।।५९॥ इत्यध्यक्षप्रचारो द्वितीयमधिकरणम् ॥६० 11 जनपदनिवेश २ भूमिच्छिन विधान ३-दुर्गविधान ४-दुर्गविनिवेश ५-सनिधाताका निचयकर्म ६-समाहाके द्वारा राज्यकरका एकत्रित करना , -अक्षपटलमें गाणनिक्यका अधिकार ८ अपहृत राज्य धनका पुन प्राप्त करना ९-उपयुक्त परीक्षा 1- शासनाधिकार "-कोशमें रखने योग्य रत्नोंकी परीक्षा १२-पानके कार्योंका सचालन ३-अक्षशाराम स्वाध्यक्षका कार्य -विशिखामें सौवणिकको व्यापार १५-कोटगाराध्यक्ष १६-पण्याध्यक्ष .
१ अध्या०] पिनयाधिकारिक (३) १७-कृप्याध्यक्ष १८- आयुधागाराभ्यक्ष १९-तोल माएका सशोधन २०-देश तथा कालका मान १२-शुल्काध्यक्ष २२-सूत्राध्यक्ष २३-सीताध्यक्ष २४- सुराध्यक्ष २५-सूनाध्यक्ष २६-गणिकाध्यक्ष २७ नायध्यक्ष २८-गोध्यक्ष २९- अश्वाध्यक्ष ३०-हस्यध्यक्ष ३१-स्थाध्यक्ष ३२-पायध्यक्ष ३३-सेनापतिका कार्य ३४-मुद्राध्यक्ष ३५-विवीताध्यक्ष ३६-समाहतोका कार्य ३७-गृहपति, वैदेहक तमा तापसके वेशमें गुसचर ३८-नागरिकका कार्य ये सर भदीप्त प्रकरण अध्यक्ष प्रचार द्वितीय अधिकरण में हैं ॥२२-६०॥ व्यवहारस्थापना विवादपदनिनन्धः ॥६॥ विवाहसंयुक्तम् ॥ ६२ ॥ दायरिमागः ॥ ६३ ॥ वास्तुकम् ॥६४॥ समयस्सा- नपाकर्म ॥ ६५ ॥ ऋणादानम् ॥ ६६ ॥औपनिधिकम् ॥६७॥ दासकर्मकरकल्पः ॥ ६८ ॥ संभूयसमुत्थानम् ॥ ६९ ॥ विक्रीत- क्रीतानुशयः ।। ७० ।। दत्तस्थानपाकर्म ॥७॥ अस्वामिविक्रयः ॥७२॥ वखामिसंबन्धः ॥ ७३ ॥ साहसम् ॥ ७॥ ॥ वाक्पा- रुभ्यम् ॥ ७५ ) दण्डपारुष्यम् १७६॥ द्यूतसमाह्वयम् ।। ७७ ॥ प्रकीर्णकानि ।। ७८ ॥ इति धर्मस्यीयं तृतीयमाधिकरणम् ॥७९॥ १-व्यवहारको स्थापना २-विवाद पदॉका विचार ३-विवाह सम्बन्धी विचार ४दायविभाग ५-बास्तुक ६-समय (प्रतिज्ञा) का न छोडना ७-ऋण लेना-औपनिधिक ९-दास तथा अन्य सेवकोंका विधान १०-सम्भूय समुस्थान ११-प्रय विक्रय विषयक भनुशय १२-धन देनेका पचन देकर फिर न देना १३-अस्वामिविधिय १४-स्वस्वामिसम्बन्ध १५-साहस १६-वारपारच्य ५७-दण्डपारुष्प १८-यूत समाइर १९-त्रकोणक ये उन्नीस प्रकरण धर्मस्त्रीय तृतीय अधिकरणम है ॥ ६-७९ ॥ कारुकरक्षणम् ।। ८० ॥ देहकरक्षणम् ॥ ८१ ॥ उपनि- पातप्रतीकारः ।। ८२ ।। गूढाजीगिनां रक्षा ॥८३।। सिद्धव्यत. नर्माणवप्रकाशनम् ॥ ८४ ॥ शङ्कारूपकर्माभिग्रहः ॥ ८५॥ आशुमृतकपरीक्षा ।। ८६ ॥ वाक्यकर्मानुयोगः ॥ ८७ ॥ सर्वा- धिकरणरक्षणम् ॥ ८८ ॥ एकाझवधानष्क्रयः॥ ८९ ॥ शुद्धचि- वथ दण्डकल्पः ॥ ९० ॥ कन्याप्रकर्म ॥ ९१ ॥ अतिचारदण्ड: ॥ ९२ ॥इति कण्टकशोधनं चतुर्थमधिकरणम् ॥ ९३ ॥ - [१ अधिक १ (४) कोटलीय अर्थशास्त्र १-शिल्पियोंसे देशकी रक्षा २-व्यापारियों से देशकी रक्षा ३-देवी भापत्तियोंका प्रतीकार ४-गृढाशिवयोंसे प्रजाकी रक्षा ५-सिद्धवेष पुरुषोंके द्वारा प्रलोभन विद्याओंका प्रकाशन ६-सन्देह, वस्तु तथा कार्यके द्वारा चोर भादिको पकडना -अशुमृतक परीक्षा ८-वाश्य कर्मानुयोग ९-सय राजकीय विभागोंकी रक्षा'10-एक भगक छेदनका निष्क्रय ११-शुद्ध और चित्र दण्ड विधान १२-कन्या प्रकर्म १५-अतिधार दण्ड। ये प्रकरण कण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरण में हैं ॥ ८०-९३॥ दाण्डकर्मिकम् ॥ ९४ । कोशाभिसंहरणम् ॥१५॥ भृत्या- भरणीयम् ॥ ९६ ॥ अनुजीनिवृत्तम्।।। ९७॥ सामयाचारिकम् ॥ ९८॥ राज्यप्रतिसंधानमेकैश्चर्यम् ॥ ९९ ॥ इति योगवृत्तं पञ्चममधिकरणम् ।। १०० ॥ -दाण्डक्रर्मिक २-कोशका संग्रह ३-मृत्यभरणीय -नाश्यकर्म चारियों का वर्ताव ५-सामयाचारिफ ६-राज्यभीतसन्धान ७-एकैश्वर्य । ये सात प्रकरण योगवृत्त नामक पचम अधिकरणम है ॥ ९४-1.. प्रकृतिसंपदः ॥ १०१ ॥ शमव्यायामिकम् ॥ १० ॥ इति मण्डलयोनिः पष्ठमधिकरणम् ॥ १०३ ।। १-अमात्य भादि प्रकृतियोंके गुण २-शम और व्यायाम (उद्योग) ये दो प्रकरण मण्डलयोनि नामक पष्ठ अधिकरणमें है ॥101-1०३ ॥ पागुण्यसमुद्देशः क्षयस्थानतिनिधयः!! १०४॥ संश्रय- पृत्तिः ॥ १०५ ॥ समहीनज्यायसां गुणामिनिनेशः हीनसंधयः ॥ १०६ ।। विगृह्यासनम् संधायासनम् विगृह्य यानम् संघाय पानम् संभूय प्रयाणम् ॥ १०७॥ यातव्यामिश्योरभिग्रहचिन्ता क्षयलोमविरागहेतवः प्रकृतीना सामवायिकविपरिमर्शः ॥१०८॥ संहितप्रयाणिकम् परिपणितापरिपणितापसृताच संधयः ॥१०९।। इंघीमाविकाः संधिविक्रमाः ॥ ११० ।। यातव्यपृत्तिः अनुग्राह्य- मिनविशेपाः ॥ १११ । मिहिरण्यभूमिकर्मसंधयः ॥ ११२ ।। फाभिप्राचिन्ता ॥११३ ॥ होनशक्तिपूरणम् ॥ ११४ ।। बलवता विगृह्योपरोधहेतवः दण्डोपनतवृत्तम् ।। ११५ ।। दण्डो- पनायियत्तम् ।। ११६ ।। सधिकर्म सधिमोक्षः ॥ ११५ ।। मध्य- सी
१अध्या०] विनयाधिकारिक
मचरितम् उदासीनचरितम् मण्डलचरितम् ॥११८॥ इति पाड्गुण्यं
सप्तममधिकरणम् ।। ११९ ॥
1-पागुपयका उद्देश २-क्षय,स्थान ओर वृद्धिका निश्चय ३ सप्रयवृत्ति
४-सम, हीन और अधिकके गुणोका अभिनिवेश ५-हीनसन्धि ६-विग्रह
करके भासन -सन्धि करके भासन ८-विप्रद करके यान ९-सम्धि करके
ग्राम १०-सम्भूय प्रयाण २१-पातम्प और मधुके प्रति गानका निर्णय १२--
प्रकृतियोंके क्षय, लोभ और विरागके हेतु १३-सामवायिक राजाका विचार
१४-मिर कर आक्रमण १५-परिपणित, अपरिपाणित ओर अपस्त सन्धि
१६-वैधीमाय सम्बन्धी सन्धिविग्रह १७-यारव्ययति १८-अनुग्राह्य मिनपिरोप
१९-मिग्रसन्धि, हिरण्यसन्धि, भूमिसम्धि और फर्मसन्धि २०-पाणिE
चिन्ता ११-हानशक्ति पूरण २२-अपल के साथ विप्रा करके दुर्ग मधेशके
कारण २३-दादोपमत वृत्त २५-दण्ढोपनायित्त २५-सन्धिकम २६-सम्धि
मोक्ष २५-मध्यमचारित २८-उदासीन धरित २९-मण्डल वरित । ये उन्तीस
मकरण पाडगुप्यनामक सप्तम अधिकरणमें हैं ॥१०-११९॥
प्रकृतिव्यसनवर्गः ॥ १२० ॥ राजराज्ययोपसनचिन्ता
॥१२॥ पुरुषव्यसनवर्गः पीडनवर्गः स्तम्भनवर्गः कोशसंगवर्ग:
।। १२२ ।। बलव्यसनवर्गः मित्रव्यसनवर्गः ॥ १२३ ।। इति
व्यसनाधिकारिकमष्टममधिकरणम् ॥ १२४ ।।
१-प्रकृतिव्यसनवर्ग २-राजा भार राज्यके व्यसनीका विचार -
पुरुपयसमवर्ग ४-पीडनवर्ग-स्तम्भनर्ग ६-कोशमगवर्ग ७-परख्यमनवर्ग
4-मितव्यसनयर्ग। ये सब आठ प्रकरण व्यसनाधिकारिक अटम अधिकरणम
शक्तिदेशकालमलाबलज्ञानम् यात्राकालाः ।। २२५ ॥ बलो.
पादानकाला संनाहगुणाः प्रतियलकर्म ॥ १२६ ॥ पश्चात्कोप-
चिन्ता बाह्याभ्यन्तरप्रकृतिकोपातीकारः ॥ १२७ ॥ क्षयव्यय-
लाभविपरिमः ॥ १२८ ॥ बाह्याभ्यन्तराश्चापदः ॥ १२९ ॥
दुष्यशत्रुसंयुक्ताः ।। १३० ।। अर्थानर्थसंशययुक्ताः तासामुपाय-
विकल्पनाः सिद्धयः ।। १३२ ।। इत्यभियास्यत्कर्म नवममधिकर-
माम् ॥ १३२ ॥
कोटलीय अर्थशास्त्र [१ मधिः A T --वाक्ति, देश और कालके पलायलका ज्ञान २-यात्राकाल ३-सेनाओं के तैयार होने का समय ४-समाहगुण ५-प्रतिवलकम ६-पश्चात्कोपचिन्ता -बारा भार अभ्यन्तर प्रकृतिके कोपका प्रतीकार -क्षय व्ययं तथा लाभका विचार ९-याद्य तथा अभ्यन्तर आपत्तियां १०-दूप्य तथा शत्रुजम्य आपत्तियां ११-अर्थ, भन तथा संशय सम्बन्धी आपत्तियो १२-उन आपत्तियोंके प्रती. कारके लिये साम आदि उपायोंके प्रयोग भेदसे टरपन्च होनेवाली सिद्धियां। ये सर यारह प्रकरण अभियास्पकर्म नामक नवम अधिकरणमें हैं ॥ १२५- १३२ ।। । - स्कन्धानारनिवेशः ॥ १३३ ।। स्कन्धानगरप्रयाणम्॥१३४॥ पलव्यसनापस्कन्दकालरक्षणम् ॥ १३५ ।। कूटयुद्धविकल्पाः ॥ १३६ ।। स्वसेन्योत्साहनम् ॥ १३७ ॥ स्वपलान्यवलव्यायोगः ॥ १३८ ॥ युद्धभूमयः पत्यश्वरथहस्तिकर्माणि ।। १३९ ॥ पक्ष- कशोरस्यानां बलायतो व्यूहविभागः सारफल्गुषलविभागः पत्त्य- श्वरघहस्तियुद्धानि ।। १४० ॥ दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनम् तस्य प्रतिव्यूहस्थानम् ॥१४१॥ इति सांग्रामिकं दशममधिकरणम् ।। १४२॥ -स्कन्धावारनिवेश २-स्कन्धावारप्रयाण ३-दएर ३-बएव्यसन, भवस्क- न्दकालसे सेनाका सरक्षण ४-कूटयुद्धके भेद ५-ससैन्योत्साहन ६-खसेना और परसनाका व्यवस्थापन -युयोग्य भूमि ८-पदाति, भव, रथ सपा हायी भादिके कार्य ९-पक्ष कक्ष तथा उरस्थ इत्यादि प्यूह विशेषांका सेनाके परिमाणके अनुसार म्यूह विभाग 10-सार तथा फाल्गु यलका विमाग - पदाति, मध, रथ तया हाथियोंका युद्ध १२-दण्डम्यूह, भोगव्यूह, मण्डलव्यूह, असहतप्यूर, इनके प्रकृतिट्यूह और विकृति म्यूहोंकी रचना १३-उपर्युनक दण्डादि म्यूहके प्रतिष्यहकी स्थापना । ये तेरह प्रकरण सानामिक दशम अधिकरण में है।।१३-१४२॥ भदोपादानानि उपांशुदण्डः ॥ १४३ ॥ इति संवृत्तमेका- दशमधिकरणम् ॥ १४४॥ 1-भेदक उपादान २-उपांशुण्ठाये दो प्रकरण मघत नामकरयारहवें क्षधिकरणमें है । ४३-१४ ॥
१ मध्या०] विनयाधकारिक दूतकर्म ॥ १४५ ॥ मन्त्रयुद्धम् ॥ १४६ ॥ सेनामुख्यवधः मण्डलपोत्साहनम् ।। १४७ ॥ शस्त्रानिरसप्रणिधयः वीवधासार- प्रसारपधः ॥ १४८ ।। योगातिसंधानम् दण्डातिसंधानम् एक- विजयः ॥ १४९ ॥ इत्याबलीयसं द्वादशमधिकरणम् ॥ १५० ॥ १-दूतकर्म २-मन्न युद्ध .३-सेनापतियोंका यध ४-मिन आदि राज. मण्डलका पोरसाहन ५-शस्त्र, शनि तथा रसोका गूढप्रयोग ६-धीवध आसार तथा प्रसारका नाश ७-योगातिसन्धान - दण्डातिसन्धान ९-एक विजय । ये नामकरण आयलीयस नामक चारहये अधिकरणमें ॥ १४५-१५० ॥ उपजापः ॥ १५१॥ योगवामनम् ॥ १५२ ॥ अपसर्पप्र- णिधिः ॥ १५३ ।। पर्युपासनकर्म अवमर्दः ॥ १५४ ।। लब्ध- प्रशमनम् ॥ १५५ ॥ इति दुर्गलम्भोपायत्रयोदशमधिकरणम् १-उपजाप २-योगयामन ३-गूढ पुरुषोंका शव देशमे निवास ४- शनुके दुर्गको घेरना ५-शत्रुके दुर्गका भयमई ६-विजित दुर्ग आदिम शान्ति स्थापित करना । ये छ: प्रकरण दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में है । "१५१-१५६॥ परयातप्रयोगः ।। १५७ ।। प्रलम्भनम् ।। १५८ ।। स्वबलो- पघातप्रतीकारः ॥ १५९ ।। इत्योपनिपदिकं चतुर्दशमधिकरणम् १-परघातमयोग २-प्रलम्भन ३-शत्रुके द्वारा अपनी सेनापर किये गये घातक प्रयोगाका प्रतीकार । ये तीन प्रकरण औपनिषदिक चौदह अधिकरणगई तन्त्रालयः॥ १६१॥ इति तन्त्रयुक्तिः पञ्चदशमधिकर- णम् ॥ १६२ ॥ -त्रयुक्ति । यह एक प्रकरण तन्नयुक्ति नामक पन्द्रहवे अधिकरण में है ॥ १६ ॥ १६२॥ शास्त्रसमुद्देशः पञ्चदशाधिकरणानि सपश्चाशदध्यायशतं सा- शीति प्रकरणशतं पदश्लोकसहस्राणीति ॥ १६३ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण कौटलीय अर्थशास्त्रमें १५ अधिकरण, एकसौ पचास (१५०) अभ्याय, एकसी अस्सी (160) प्रकरण, भौर : पजार सोक हैं।
1 (८) कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक (एक श्लोकमें ३२ अक्षर होते हैं, उनका समुदाय एक अन्य कहाता है, इस प्रकार यह कौटलीय अर्थशान कुल छः हजार प्रन्य है। अर्थात् इसके अक्षरोंको यदि मनुष्टुप् छन्दमें वांधदिया जाय, तो छ. हज़ार लोक पनजाते हैं)॥३॥ सुखग्रहणविज्ञेयं तत्वार्थपदनिश्चितम् । कौटल्येन कृतं शास्त्रं विमुक्तग्रन्थविस्तरम् ॥ १६४ ॥ इति कौटलीये ऽर्थशाचे विनयाधिकारिक प्रथमाधिकरणे राजवृत्तिः प्रथमोऽध्यायः ॥॥ • सुकुमारमति पुरुपभी इस शास्त्रको सरलतासे समझ सकते हैं, क्योंकि इस शानमें इस प्रकार यथार्थ भर्य और पदोंका प्रयोग किया गया है, जिससे किमी तरहका भी सन्देह नहीं होता। ग्रन्थका व्यर्थ विस्तार भी नहीं किया अर्धार किसी भी अनावश्यक या अनपेक्षित वातका उल्लेख नहीं कियागया। इस अर्थशास्त्रको कोटरयने बनाया है ॥१६॥ घिनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें पहिला अध्याय समाप्त ।। है " गया, दूसरा अध्याय पहिला प्रकरण विद्या-समुद्देश आन्वीक्षकी यी वार्ता दण्डनीतियेति विद्याः॥१॥ अयी वार्ता दण्डनीतियेति मानवाः ॥ २॥ त्रयीनिशेपो ह्यान्वी- कति ॥ ॥ विद्या चार है.-आन्वीक्षकी, प्रयी, वार्ता और दण्डनीति ॥ ॥ मनुके अनुयायी कहते हैं, कि विधा हीन हो है -ययो, घर और दण्डनीति ॥२॥ भान्वीक्षक विधा प्रयोके अन्र्तगत ही समझी जाती है, वह उससे पृयक् - .. वार्ता दण्डनीतिश्चेति पार्हस्पत्याः । संवरणमात्रं हि त्रयी लोकयात्राविद इति ॥५|| दण्डनीतिरेका विद्यत्याशनसाः ॥६॥ तस्यां हि सर्व विद्यारम्भाः प्रतिबद्धा इति ॥ ७॥ वृहसत्तिके अनुगामा करते हैं, कि विधा दो ही है-वानी और नीति ॥ ४ ॥ क्योकि लोकयात्रायित् अर्थात् पाती और दण्डनीति में निपुण, अपतुर संसारी पुरपके लिए, नयी, केवट संयरण (नास्तिकतासे बचानेयारा २ अध्या०] विनयाधिकारिक आवरणमा अर्थात् लोग उसे प्रयोके न माननेपर नास्तिक न कहने लग जाय, इसीलिए प्रयोकी सत्ता ) है । यह पृथक् विद्या नहीं है ॥ ५॥ शुक्राचार्यके सम्प्रदायके विद्वान् कहते हैं कि केवल दण्डनीति ही एक विद्या है ॥ ६ ॥ पयोंकि उसहीमें अन्य सय विद्याओंके योगक्षेमका निर्भर है ॥७॥ चत एव विद्या इति कौटल्यः ॥८॥ ताभिधर्मार्थी यद्विद्यात्तद्विद्यानां विद्यात्वम् ।। ९ ।। सांख्य योगो लोकायतं चेत्यान्त्रीक्षकी ॥ १० ॥ परन्तु कौटल्प भाचार्यका मत है, कि विद्या चार ही हैंक्योंकि विद्याओंकी वास्तविकता यही है कि उनसे धर्म और अधर्मके यथार्थ स्वरूपका पोष होता है ॥२॥ सांख्य, योग और लोकायत ये आन्धीक्षकी विद्या है ॥१०॥ धर्माधौ त्रय्यामर्थानों वार्तायां नयापनयौ दण्डनीत्याम् नयीमें धर्म और अधर्मकी, वार्नामें उचित समयपर कृपि मादिके मोनेसे सुफल और न योनसे फुफल आदिका, तथा दण्डनीतिमें सन्धि विग्रह भादिके उचित उपयोगीका प्रतिपादन किया गया है ॥ ११ ॥ बलापले चैतासां हेतुभिरन्वीक्षमाणा लोकस्योपकरोति व्यसने ऽभ्युदये च बुद्धिमवस्थापयति प्रज्ञावाक्यक्रियावैशारधं च करोति ॥ १२॥ श्रयी धादि विद्या की प्रधानता और भप्रधानताको युक्तियोंसे निर्धारित करती हुई आन्धीक्षकी विद्या लोक का उपकार करती है। दुःख और सुराम पुद्धिको ठीक रसती है। सोचने, विचारने, पोलने और कार्य करनेमें चतुराईको पेदा करती है ॥ २॥ प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षकी मता ॥ १२ ॥ इति विनयाधिकारिक प्रयमेऽधिकरणे विद्यास मुद्देशे भान्धीक्षकीस्थापना नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥१॥ यह आन्धीक्षकी विधा, सब विद्याओंका प्रदीप, सब कार्योका साधन- भूत तथा सर धर्माका सदा आश्रयभूत मानी गई है ॥ १३॥ पिनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त ।
कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक . तीसरा अध्यायः त्रयी स्थापना सामर्यजुदायस्त्रयी ॥शा अथर्ववेदेतिहासदी च घेदाः ॥ २ ॥ शिक्षा कल्पो व्याकरण निरुक्तं छन्दोपिचितिज्योतिप मिति चोङ्गानि ।।३॥ सामवेद, ऋग्वेद और यजुर्वेद ये तीनों प्रयी कहाते हैं ॥ १॥ अथर्ववेद और इतिहासर्वदको घेद कहते हैं ॥२॥ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरन, छन्दोविचिति और ज्योतिष ये छ अङ्ग हैं ॥ ३ ॥ एप प्रयीधर्मश्चतुर्णा वर्णानामाश्रमाणां च स्वधर्मस्थापनादौ- पकारिकः ॥४॥ खधों ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यजन याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति ।। ५॥ यह वयोम निरूपण किया हुआ धर्म, धारों वर्ण और चारों भाश्रमों को अपने धर्ममें स्थित रखने के कारण लोकका अत्यन्त उपकारक है॥॥ मााणका अपना धर्म, पवना पाना, यज्ञ करना कराना, तथा दान देना और नियस्याध्ययन एजनं दानं शस्त्राजीयो भूतरक्षणं च ॥६॥ येश्यस्याध्ययनं यजनं दानं कपिपाशुपाल्ये पाणिज्या च ॥७॥ शूद्रस्य द्विजातिशुपा वार्ता कारुकुशीलयकर्म च ॥ ८॥ क्षत्रियका अपना धर्म पढना यज्ञ करना, दानदेना, शस्त्रासे जविन निर्वाह करना, तथा प्राणिशंशी रक्षा करना है ॥६॥ वैश्यका अपना धर्म पदना, यश करना, दान देना, खेती और पशुओकी रक्षा करना, तथा व्यापार करना है॥ ॥ शुद्रका अपना धर्म, ग्रामग, क्षत्रिय, वैश्यकी सेना मुश्रूषा करना, खेती, पशुभाका पालन तथा व्यापार करना, शिस्मा गाना, पजाना तया माद धरण आदिका कार्य करना है। गृहस्थस्य स्वामीजीयस्तुल्यैरसमानर्षिभिर्ववाह्यमृतगामित्वं देवपिनतिथिभृत्येपु त्यागः शेपभोजनं च ॥९॥ गृहस्थका अपना धर्म, अपन वर्गके प्रमुफूल कार्यों से भाजीविका करना, भपने कुल मादिष समान और भिर गोरयालोंके साथ धियाह कार्य करना, अनुगामी होमा, देष, पितर, अतिथि तथा मृत्य भादि सपशे देकर पिर पइिंस स्वप भोजन करना है।
३ अध्या०] विनयाधिकारिक (११) ब्राह्मचारिणः स्वाध्यायो ऽग्निकार्यामिपको भैक्षवतत्वमाचार्य प्राणान्तिकी धृत्तिस्तदभाचे गुरुपुत्रे समाचारिणवा ॥१०॥ ब्रह्मचारीका अपना धर्म, वेदाध्ययन करना, अग्निहोत्र तथा नित्य स्नान करना, भिक्षाचर्या, तथा मैटिक ब्रह्मचारीका जीधन पर्यन्त गुरुके समाप रहना, गुरके न रहनेपर गुरुपुत्र अथवा अपमे किसी समान शाखाध्यायी के समीप रहना है ॥१०॥ वानप्रस्थस्य ब्रह्मचर्य भूमौ शय्या जटाजिनधारणमग्निहोत्रा- भिपकी दयतापित्रतिधिपूजा वन्यथाहारः ॥ ११ ॥ वानप्रस्थका अपना धर्म, ब्रह्मचर्य पूर्वक रहना, भूमिपर शयन करना, जटा तथा मृग चर्म आदिका धारण करना, अग्निहोन तथा नित्य स्नान करना, देव, पितर तथा अतिथियोंकी पूजा करना, और जंगल में होनेबारे कन्दमूल फल आदिका आहार करना है,। ११ ॥ परिव्राजकस्य संयतेन्द्रियत्वमनारम्भो निष्किंचनत्वं सङ्ग- त्यागो भैक्षमनेकधारण्ये 'वासो बाह्यमाभ्यन्तरं च शौचम् ॥१२॥ सर्वेपामहिंसा सत्यं शौचमनसूयानृशंस्यं क्षमा च ॥ १३ ॥ TI सन्यासीका अपना धर्म, जितेन्द्रिय होना, कामनारक्षित होना, किसी परतुपर अपना अधिकार न रसना, और शरीर, याणी तथा मनकी अच्छी सरह शुद्धि करना है॥ १२ ॥ मन, वचन, कर्मसे किसी तरह मी हिसा न करना, सत्य बोलना, पवित्र रहना, किसीसे ईप्यां न करना, निष्ठुर न होना भीर क्षमाशील होना, ये सब वर्ण और आश्रमाके लिये साधारण धर्म है। इनका प्रत्येकका पालन करना चाहिये ॥ १३ ॥ स्वधर्मः सर्गायानन्त्याय च ॥ १४ ॥ तस्यातिकमे लोका संकरादुच्छियेत ॥ १५॥ अपने धर्मका पालन करना वर्ग और मोक्षमालिका साधन है।४॥ शपने धर्मका उखान फरनेपर, कर्मसाङ्क और वर्णसार्य होनेसे लोक सधा उभिन्न हो जाता है ।॥ १५ ॥ तस्मात्स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत् ।, स्वधर्म संदधानो हि प्रेत्य चेह च नन्दति ॥ १६ ॥ - । r (१२) कौटलीय अर्थशास्त्र [१ माघ व्यवसिवायमर्यादः कृतवर्णाश्रमस्थितिः। वय्या हि रक्षितो लोकः प्रसीदति न सीदति ॥१७॥ इति गियाधिकरिके प्रथमे ऽधिकरणे विद्यासमुद्देशे प्रयोस्थापना तृतीयोऽध्याय ॥३॥ इसलिये राजाका कर्तव्य है कि वह प्रजाको धर्ममार्गसे भ्रष्ट न होने देवे । अपने र धर्मका पालन कराता हुआ राजा, यहा और परलोकमें सुखी होता है॥१६॥ श्रेष्ठ मर्यादाके व्यवस्थित होनेपर, वर्ण और आश्रमकी ठाकर परिस्थिति रहनेपर, इस प्रकार प्रयी प्रतिपादित धर्मके द्वारा रक्षाकी हुई प्रजा सदा सुखा रहती है, कभी केशको प्राप्त नहीं होती ॥ १७ ॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त । चौथा अध्याय। वार्ता और दण्डनीतिकी स्थापना । कृपिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता ॥ १ ॥ धान्यपशुहि- रण्यकुप्यविष्टिप्रदानादोपकारिकी ॥ २ ॥ तया स्वपक्षं परपक्षं च वशीकरोति कोशदण्डाभ्याम् ॥ ३ ॥ कृषि, पशुपालन और मापार, यह पाती है । अर्थात् वाती नामक विधाम इन विषयोंका प्रतिपादन किया जाता है । यह चा विद्या, धान्य, पशु, हिरण्य, तांबा आदि अनेक प्रकारकी धातु और नौकरचाकर भादिके देनेसे राजा प्रजाका भरयन्त उपकार करनेवाली होती ह॥२॥ वार्ता विद्याके द्वार' उत्पन्न हुए २ कोश और सेनासे, अपने और पराये सपको, राजा पशमें करलता है॥३॥ आन्वीक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः ॥ ४॥ तस्य नीतिर्दण्डनीति ॥५॥ अलब्धलाभार्था लब्धपरिरक्षणी रक्षित- निवर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादनी च ॥६॥ भान्वीक्षकी, प्रयी भीर वात्तो इन सबके योग और क्षमका साधन दण्डही है ॥५॥ उसकी (दण्डकी) नीति अर्थात् यथार्थ स्वरूपका प्रतिपादन कानेवाला शास्त्रही दण्डनीति कहाता है । यह दण्डनीतिही अप्राप्त पस्तुओं को प्राप्त करानेवाली, प्राप्त पदापोंकी रक्षा करनेवारी, सुरक्षित पदार्थोमें ४ अध्या० बिनयाधिकारिक वृद्धि करनेवाली, और वृद्धिको प्राप्त हुए पदार्थीको उचित स्थानों में लगाने चाली होती है॥६॥ तस्यामायत्ता लोकयात्रा ॥ ७॥ तस्माल्लोकयात्रार्थी नित्य- मुद्यतदण्डः स्यात् ।। ८ ।। न घेवंविधं पशोपनयनमस्ति भूतानां यथा दण्ड इत्याचार्याः ॥९॥ संसारका निर्वाह इसीके ऊपर निर्भर है।॥७॥ इसलिये संसारको ठीक २ रातोपर चलानकी इच्छा रखनेवाला रागा सदा उघतदण्ड रहे ॥ ८ ॥ क्योंकि दण्डके अतिरिक्त इस प्रकारका और कोई भी साधन नहीं है, जिससे सबही प्राणी शर अपने चशम होसकें, यह आचार्यों का मत है॥ ९ ॥ नेति कौटल्यः ।।१०।। तीक्ष्पादण्डो हि भूतानामुद्वेजनीयः ॥ ११ ॥ मृदुदण्डः परिभूयते ॥ १२ ॥ परन्तु कौदल्य ऐसा नेहा मानता ॥ १० ॥ क्योकि वह कहता है कि तीक्ष्णदण्ड (निष्टुरतापूर्वक दण्ड देनेवाले) राजासे सबही प्राणी खिन्न होजाते है ॥ ११ ॥ तथा जो दण्ड देने में कमी करता है, लोग उसका तिरस्कार करते यथार्हदण्डः पूज्यः ॥ १३ ॥ सुविज्ञातमगीतो हि दण्डः प्रजा धर्मार्थकाम-जयति ॥ १४ ॥ इसलिये राजा उचित दण्ड देनेवाला होना चाहिये। इस प्रकार दण्ड देनेवाला राजा सदाही पूजा जाता है ॥१३॥ क्योकि विधिपूर्वक शानस जानकर प्रयुक्त किया हुभा दए, मजाभाको धर्म, अर्थ और कामसे युक्त करता है ।। १४ ॥ दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाहानप्रस्थपरिग्राजकानपि कोपपति किमङ्ग पुनहसान M२ अाणरितो हि माल्या- न्यायमुद्भावयति ॥ १६ ॥ अज्ञानतापूर्वक काम और क्रोधके पशोधूत होकर अनुचित दंगसे प्रयुक्त किया गया दण्ड, वानप्रस्थ और परियाजक जैसे नि:स्पृह ग्यक्तियाँको भी कुपित कर देता है, फिर गृहस्थाका तो कहनाही श्या? ॥ १५ ॥ यदि दण्ड का प्रयोग सर्वथा रोक दिया जाय तो जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछलि- योंको साजाती है, इसी तरह पसवान् व्यक्ति निवलॉको कर पहुंचाने लगें :
। कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक पलीयानरलं हि ग्रसते दण्डधराभाने ॥ १७ ॥ तेन गुप्तः प्रभवतीति ॥ १८ ॥ भण्डधारण करनेवाले राजाके न होनेपर सर्वत्र भराजकता फैल जाती है। भार सवल नियंलाको सताने स्गते है ॥ 101 परन्तु दण्डके द्वारा सुरे. क्षित हुआ २ निर्यल भी सबल या समर्थ हो जाता ह ॥ १८ ॥ चतुर्वर्णाश्रमो लोको राज्ञा दण्डेन पालितः । खधर्मकर्मामिरतो वर्तते स्वेषु वर्त्मसु ॥ १९ ॥ इति विनयाधिकारिक प्रथमे ऽधिकरणे विद्यासमुद्देशे वातास्थापना दण्डनीतिस्थापना १ चतुर्थो ऽध्याय ॥ ४ ॥ । विद्यासमुन्रा समाप्त । दण्डके द्वारा राजाम पालन किये हुए चारोवण और भाधमाके सम्पूर्ण लोग, भपन धर्मकमा लग हुए, बराबर उचित मार्गपर चरते रहते है ॥१९॥ विनवाधिकारिक प्रथम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त । पांचवां अध्याय । २प्रकरण। वृद्ध-संयोग। तसादण्डमूलास्तिस्रो विद्याः ॥१॥ विनयमूलो दण्डः प्राण- ) भृतां योगक्षेमारहः ॥२॥ कृतकः स्वाभाविकच पिनयः ॥३॥ इसीलिये आयक्षकी, अपी और वा इन तीनों विधाओं की स्थिति दण्डके ही अधीन है ॥ ॥ शास्त्रमानपूर्वक उचित रीतिमे प्रयुक्त किया हुभा दण्ट, प्रनाभीके योग भार समका साधन होता है ॥ २ ॥ पिनय दो प्रकारका होता है। एक कृतक अर्थात् नैमितिक और दूसरा स्वाभाविक । (जो परिश्रम करके किती कारणीसे प्राप्त किया गया हो घातक और यो बसनावशाही स्वत सिद्ध हो, उसे स्वाभाविक समझना चाहिये) ॥३॥ क्रिया हि द्रव्यं पिनयति नाद्रव्यम् ॥४॥ शुश्रूपाश्रवण- प्रहणधारणाविज्ञानोहापाहतच्चाभिनिविष्टधुद्धि विद्या विनयति ने. तरपना ५ो जिस प्रकार भच्ची विस्मके पत्थर आदि दम्पही शानार रख जानेसे सहन होते हैं, मामूली परधर आदि नई ॥ ४ ॥ इसी प्रकार शिक्षा लिये ५ अध्या०] विनयाधिफारिक (१५) किया हुआ,धमभी, शुश्रूषा, प्रयण, प्रहण, धारण, विज्ञान, उही, अवाह और तवाभिनिवेश आदि सुद्धिगुणोंसे युक्त सुपात्र व्यक्तिको ही शिक्षित या विनीत बना सकता है, उपर्युक्त गुणोंसे रहित कुपान ध्यक्तिको नहीं ॥ ५ ॥ विद्यानां तु यथास्त्रमाचार्यप्रामाण्याद्विनयो नियमच ॥ ६ ॥ वृत्तचौलकर्मा लिपि संख्यानं चोपयुञ्जीत ।। ७ ।। वृत्तोपनयन- नयीमान्वीक्षकी च शिष्टेभ्यो वार्तामध्यक्षेभ्यो दण्डनीति वक्तृ- प्रयोक्तभ्यः ॥ ८॥ भिा २ विद्याओं अपने २ आचायोंके अनुसारही शियका शिक्षण भीर नियम होना चाहिये ॥ ६॥ मुण्डन संस्कारके अनन्तर अक्षराभ्यास तथा गिनने आदिका विधिपूर्वक अभ्यास करे ॥ ७ ॥ उपनयनके अनन्तर सदाचारी विद्वान आचार्योस यी और आन्धीक्षकीको, तथा उन २ विभागोंके अध्यक्षा (सीताध्यक्ष आदि) से याताको, इसी प्रकार यता और प्रयोक्ता अर्थात् सन्धि- विरह भादिके यथार्थ जामकर, तथा इनको उचित स्थानों पर प्रयोग करनेवाले अनुभवी विद्वानोंसे दण्डनीतिको सीखे ॥ ८॥ ब्रह्मचर्य चापोडशाद्वीत् ॥ ९॥ अतो गोदानं दारकर्म चास्य ।। १० ।। नित्यश्च विद्यावृद्धसंयोगो विनयवृद्धयर्थं तन्मूल- स्वाद्विनयस्य ॥ ११ ॥ सोरहवर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्यका यथावत् पालन करे ॥ ९ ॥ इसके अनन्तर गोदानविधि (समावर्तन सम्कार केशान्तकर्म) पूर्वक विवाह करे ॥ १०॥ विवाहके बाद अपने विनयको वृद्धि के लिये सदाही विद्यायुद्ध पुरुपोंका सहयास कियाकरे, क्योंकि अनुभवी विद्वान् पुरुषांकी संगति ही विनय का मूल पूर्वमहर्भाग हस्त्यश्वरथग्रहरणविद्यासु विनयं गच्छेत् ॥१२॥ पश्चिममितिहासश्रवणे ॥ १३ ॥ पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकी- दाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चतीतिहासः ॥ १४ ॥ दिनके पहिले भागको हाथी घोपे रथ और अस्त्र शरन आदि विद्या सम्बन्धी शिक्षामि व्यतीत करे ॥ १२॥ दिनके पिछले भागको इतिहास आदि सुनने में व्यतीत करे ॥ १३ ॥ पाहा आदि पुराण, रामायण महाभारत आदि इतिहास, आरयायिका, उदाहरण मीमांसा, आदि मन्वादि धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र ये सबही इतिहास शब्दसे समझने चाहि ॥ १५॥' . ६॥23॥ ana
[१ अधिक
कौटलीय अर्थशास्त्र
शेपमहोरात्रभागमपूर्वग्रहणं गृहीतपरिचयं च कुर्यात् ॥१५॥
अगृहीतानामाभीक्ष्ण्यश्रवणं च ॥ १६ ॥ श्रुताद्धि प्रज्ञोपजायते
प्रन्नया योगो योगादात्मपति विद्यासामर्थ्यम् ॥ १७ ॥
दिन और रातके शेष भागोंको नवीन ज्ञान प्रहण, और गृदीत ज्ञान
के मनन या चिन्तन में व्यय करे ॥ ५॥ो पदार्थ पवार धवश करनेपर
पुद्धिस्य न हो, उस पार २ श्रवण करें। क्योंकि शास्त्र प्रवर्गल धुद्धिका
विकास होता है, उससे येग अर्थात् शाखामें श्रद्धा, आर योगसे मनस्थिता
प्रास होता है, यहा विद्याका पल है॥७॥
विद्यारिनीतो राजा हि प्रजानां निनये रतः ।
अनन्यां पृथिनी मुइक्त सर्वभूतहिते रतः ॥ १८ ॥
इति विनयाधिकारिक प्रथमे ऽधिकरण वृद्धसयोग
पञ्चमोऽध्याय ॥५॥
सुशिक्षासे शिक्षित या विनात राजा, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा
हुमा, तया प्रजाभोक शिक्षण में तत्पर रहता हुआ निष्कण्टक थियोका चिर
साल तक उपमाग करता है॥1॥
विनयाधिशारिक प्रथम अधिकरणमें पाचर्चा अध्याय समाप्त ।
छठा अध्याय
३ प्रकरण
इन्द्रियजय । (काम आदि छः शत्रुओंका त्याग)
विद्यापिनयहेतुरिन्द्रियजयः कामक्रोधलोभमानमदहर्पत्या-
गात्कार्यः ॥ १॥ कर्णत्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रियाणां शब्दस्पर्शरू-
परसगन्धेष्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजयः ॥ २ ॥
काम, मोष, रोम, मान, मद और इपके त्यागसे इन्द्रियोंका जयकरे,
क्योंकि इन्द्रियोंका उपही विद्या और विनयका इन है ॥ ॥ कर्ण, वा, पक्षु
रसन, और प्राण इन्द्रियाका शम्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषयाम मवृत्त
न हानेदेना ही इन्दिय जय कहाता है॥२॥
६ अध्या०] विनयाधिकारिक शास्त्रार्थानुष्ठान वा ||३|| कृत्सं हि शाखमिदमिन्द्रियजयः ॥४॥ तद्विरुद्भवृत्तिरवश्यन्द्रियश्चातुरन्तो ऽपि राजा सद्यो विन- श्यति ॥५॥ अथवा शास्त्रों में प्रतिपादित कर्तव्योंके अनुष्ठानको भी इन्द्रियजयका कारण समझना चाहिये ॥ ३॥ क्योकि सम्पूर्ण शास्रों में प्रतिपादित विधेय अर्थ इन्द्रियजयके कारण कहे गये हैं ॥ ४ ॥ शाश्न विहित फत्तव्यों के विरुद्ध अनुष्ठान करने वाला, इन्द्रिय परायण (इन्द्रियोको घशमें न करनेवाला) राजा, सम्पूर्ण पूधियीका अधिपति होता हुभा भी शीघ्र ही नष्ट होजाता हे ॥५॥ यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद्राह्मणकन्यामभिमन्य- मानः सवन्धुराष्ट्रो विननाश ॥६॥ करालश्च वैदेहः ॥७॥ कोपाजजनमेजयो ब्राह्मणेषु विक्रान्ततालजवश्व भृगुपु ॥ ८॥ जैसे कि भोज वशका ६ पदका नाम राजा तथा विदेह देशका कराल नामक राजा कामके यशीभूत होकर याह्मगही कन्याका अपहरण करके उसके पिताके शापसे यन्धु यान्धव और राष्ट्र के सहित नाशको मात होगया ॥ ६ ॥७॥ कोपके वशीभूत होकर जनमेजय पाहागोंके साथ कलह करके उनके शापसे नष्ट होगया, तथा ताल जस भृगुओंपर मुन्न होकर उनके शापये मारा गया॥4॥ .. लोभादैलश्चातुर्वर्ण्यमत्याहारयमाणः सोनीरवाजविन्दुः ।।९।। मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन् ॥ १०॥ दुर्योधनो राज्यादेशं रोमके वशीभूत होकर इला का पुग्न पुरूरवा नामक राजा चारों वर्षों से अत्याचार पूर्वक धन अपहरण करता हुआ उनके शापसे नाशको प्राप्त हुआ, और इसी प्रकार सीधीर देशका राजा भजयिन्दुमी ॥९॥ अभिमानके वशी- भूत होकर रावण परस्त्रीको उसके स्वामीके लिये न देता हुआ तथा दुर्योधन राज्यके हिस्से को अपने भाईयोंके लिए न देता हुआ नाशको पास हो गया "१०-"" मदाडम्भोद्भवो भूताबमानी हैहयश्वार्जुनः॥१२॥ हर्षाद्वातापि- रगस्त्यमत्यासादयन्वृष्णिसङ्घश्च द्वैपायनमिति ॥ १३ ॥ मदके वशीभूत होकर दम्मोदय नामका राजा सम्पूर्ण प्रजाभाका तिर स्कार करता हुभा नरनारायणके साथ युर करके मारा गया, और इसी कौटलीय अर्थशास्त्र [१अधिक मकार माके कारण हय देशका राजा मर्डन, परशुरामके हापसे मारा गया ॥१२॥ हपके वशीभूत होकर वातापि मामा भसुर भगस्त्य मपिके साथ और यादव समूह द्वैपायन ऋषिके साथ पधना करता हुआ उनके शापसे नाशको प्राप्त होगया ॥ १३ ॥ एते चान्ये च वहनः शत्रुपड्वर्गमाश्रिताः । सबन्धुराष्ट्रा राजानो विनेगुरजितेन्द्रियाः ॥ १४ ॥ ये उपयुक्त और इसी प्रकारकै अन्य बहुतेरे राजा, कामादि शत्रु षड्वर्ग के वशाभूत होकर, अपनी इन्द्रियों को वश में न रखी हुए पन्धु बान्धवों भऔर राष्ट्रके सहित नाशको प्राप्त हो गये १५॥ शत्रुपवर्गमुत्सृज्य जामदग्नयो जितेन्द्रियः । अम्बरीपश्च नाभागो युमुजाते चिरं महीम् ।। १५ ।। इति विनयाधिकारिके प्रथम ऽधिकरणे इन्द्रियजये भरिपवर्गस्याग पष्ठो उपाय ॥६॥ और हम शनु पर्नाकी का, जितेन्द्रिय, जमदग्नि पुग्न परशुरामने, तथा परीप और नाभाग (नभाग राजा का पुन) ने चिरकाल तक इस पृथिवीका निकण्टक उपभोग किया ॥१५॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें छठा अध्याय समाप्त । सातवां अध्याय (राजर्षिका व्यवहार) तस्मादरिपड्वर्गत्यागेनेन्द्रियजयं कुर्भात ११॥ युद्धसंयो- गेन प्रज्ञां चारेण चक्षुरुत्थानेन योगक्षमसाधनं कार्यानुशासनेन स्वधर्मस्थापनं पिनयं विद्योपदेशेन लोकप्रियत्वमर्थसंयोगन हितेन वृत्तिम् ॥ २॥ इस लिये इन काम आदि छ भत्रुआका सर्वधा परिश्याग काक इन्द्रियोंका जयको विद्वानोंके सहपास बुद्धिको विकसित करे, गुप्तचरोंकेशरा अपने और पराये राष्ट्रकी व्यवस्थाको देखे, Tोग द्वारा योग भौर क्षेमका सम्पादन को, राजकीय नियमों (कानूनों) के द्वारा अपने २ धर्म में प्रजाका नियन्त्रण करे, विधाके प्रचारके द्वारा प्रजा को विनीत भोर शिक्षित बनाव, उचित पात्रामें धन आदिके देनेसे प्रजाका प्रिय बनारहे, अर्थात् ७ अध्या] धिनयाधिकारिक प्रजाको अपना भनुगामी पनाये रक्से; और प्रज्ञाओंके हित के साथी पानी लोकयात्रा को, भयात् अपने निजू व्यवहारों में भी मजाके हितका मान रक्स ॥२॥ एवं वश्येन्द्रियः परस्त्रीद्रव्याहिंसाश्च वर्जयेत् ।। ३ ।। स्वमं लौल्यमनृतमुद्धतवेपत्यमनर्थसंयोगं च ॥४॥ अधर्मसंयुक्तं चा- नर्थसंयुक्तं च व्यवहारम् ॥ ५ ॥ इस प्रकार इन्द्रियों को बरामे रखता हुआ परस्त्री, परम्प, तमा पर दिसाका सर्वथा परित्याग करे ॥३॥ भनुचित निद्रा, चपलता, मिमामायण, उतरेप, अनर्थकारी सम्पूर्ण कार्यों और इस प्रकारके पुरुषोंके सहयासको सर्वधा छोड़ देपे ॥ ४॥ अधर्म और अनर्यसे युफ व्यवहार को भी छोड़ देवे ॥५॥ धर्मार्थाविरोधेन काम सेवेत ॥६॥ न निःसुखः स्यात् ॥७॥ समं वा त्रिवर्गमन्योन्य नुबन्धम् ॥ ८॥ एको हत्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति ॥ ९॥ धर्म और अर्थके अनुसार ही कामका सेवन करे ॥६॥ सुखरक्षित अर्थात् फाटके साथ जीवन निर्वाह न करे ॥ ७ ॥ अथवा परस्पर अनुबद्ध धर्म अर्थ और कामका बराबर २ सेवन करे ॥८॥ क्योंकि यसम पूर्वक अत्यधिक सेवन किया हुआ इनमेंसे कोई एफ, भारमाको तथा शेष क्षेनोंको बहुत कष्ट पहुंचाता अर्थ एव प्रधान इति कौटल्यः ॥१०॥ अर्थमूलौ हि धर्मकामा- विति ॥ ११॥ मर्यादां स्थापयेदाचार्यानमात्यान्या ॥ १२ ॥ इन तीनों में ही प्रधान है, यह कौटल्य आचार्यका मत है ॥१०॥ क्योंकि म और कार मथ मूलकही होते हैं। अधार भी इन दोनोंका कारण है 9n भाचाय और समात्यो हो अरती मर्यादा अयोत सीमा बनारे ॥१२॥ य एनमपायस्थानेम्पो वारयेयुः ॥ १३ ॥ छायानालिका- प्रतोदेन वा रहसि प्रमाद्यन्तमभितुदेयुः ।। १४ ।। जो कि आचार्य आदि इसको घुराईयोंकी भोरसे रोक स॥१३॥ भक्तपुर आदि एकान्त स्थानों में प्रमाद करते हुए रामाको, आचार्य भमास आदि, छाया सया नाटिका (देखो अध्याय १९ सून ३-१ नक) आदि विभागपे सनपका अपम्यय दिखाकर व्यथित करें ।1 ॥
[१ अधिक (२०) कौटलीय अर्थशास्त्र सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेन वर्तते । कुर्मत सचिवांस्तसाचेपांच शृणुयान्मतम् ॥ १५ ॥ इति विनयाधिकारी प्रयमे ऽधिकरणे इन्द्रियजये राजर्पिवृत्त सप्तमो ऽध्याय ॥ ॥ इन्द्रियजय' समाप्त। जिस प्रकार गादीका एक पहिया दूसोको सहायताके बिना अनुपयुक्त होता है, इसी प्रकार राज्य चक भी अमात्य भादिकी सहायताके बिना एकाकी राजाके द्वारा नहीं चलाया जासकता । इसलिये राजाको उचित है कि वह योग्य अमात्योंको रक्खे, और उनके मतको बराबर सुने ॥१५॥ चिनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें सातवां अध्याय समाप्त । आठवां अध्याय। ४प्रकरण। । अमात्योंकी नियुक्ति। सहाध्यायिनो मात्यान्कुति दृष्टशौचसार्थ्यत्वादिति भार- द्वाजः ॥ १॥ ते ह्यस्य विश्वासा भान्तीति ॥२॥ भारद्वाज आचार्यका मत है कि राजा अपने सहाध्यापियों में से ही किन्हीं को अमात्य नियुक को । क्योंकि इनके हृदयकी पवित्रता और कार्य करने की शक्ति, साप पडने के समय में अच्छी तरह जानली जाती है और इसी लिये वे मन्त्री इस राजाकै विश्वासपात्र भी होते हैं ॥ २ ॥ नेति विशालाक्षः ॥३॥ सहक्रीडितत्वात्परिभवन्त्येनम् ॥४॥ ये ह्यस्य गुणधर्माणस्तानमात्यात समानशीलव्यसनत्यात् ॥५॥ ते ह्यस्य मर्मज्ञल्वभयानापराध्यन्तीति ॥ ६॥ विशालाक्ष इस मतको ठीक नहीं मानता ॥३॥ वकाता है कि, अध्ययन कालमें साय नोके कारण वे लेग राजाका तिरस्कार कर सकते हैं॥४॥ इसलिये जो लेग, राज के छिरे हुए आवाग समान ही भाचरण करनेवाले हों, उन्हींको, स्वभाव मसनके समान होनके कारण, अमात्य बनाना चाहिये ॥५॥ क्योंकि वे लोग, इस भयस कि राजा हमारे सब ममको जानता है. कभी राजाका अपराप न करेंगे।
८ अध्या०] विनयाधिकारिक साधारण एप दोष इति पराशरः ॥ ७॥ तेपामपि मर्मज्ञत्व- भयात्कृताकृतान्यनुवर्तेत ॥ ८॥ यावद्भयो गुह्यमाचष्टे जनेभ्यः पुरुषाधिपः । अवशः कर्मणा तेन वश्यो भवति तावताम् ॥९॥ परन्तु आचार्य पराशर कहते हैं कि यह दोष राजा और अमात्य दोनों के लिये समान है।॥ ७ ॥ रामा भी, इस भपसे कि भमास मेरे सत्र मौको जानते हैं, उनके अरछे या बुरे सभी सरहके कार्योका अनुसरण करेगा ॥ क्योंकि राजा जिसने भी आदमियोंके सामने अपनी छिपी हुई याताको करदेता है इस कार्यसे अधीर हुभा २, वह उतनेही मनुष्योंके वश होजाता है ॥ ५॥ य एनमापत्सु प्राणायाधयुक्तास्वनुगृह्णीयुस्तानमात्यान्कुति ॥ १० ॥ दृष्टानुरागत्वादिति ॥ ११ ॥ इसलिये जो पुरुष, इसकी ऐसी भयावा आपत्तियों में सहायता करें जिनमें प्राणों का भी भय हो, उन्हीं पुरुषोंको अमात्य बनाया जाये ॥१०॥ क्योंकि इस कार्य करनेसे राजाके प्रति उनके भनुराग का ठीक र पता लगजाता है परन्तु आचार्य नेति पिशुनः ।। १२ ।। भक्तिरपा न बुद्धिगुणः ॥ १३ ॥ 'नारद इस सिद्धान्तको भी नहीं मानते ॥ १२ ॥ उनका कहना है कि अपने प्राणों की भी परवाह न करके राजाझी सहायता करना, यह केवल भक्ति या सेवाधर्म है, इससे अमात्योंकी बुद्धिमत्ता प्रकट नहीं होती, और बुद्धिसम्पन होना अमात्यका सर्व प्रथम गुण है ॥ १३ ॥ संख्यातार्थेषु कर्मसु नियुक्ता ये यथादिष्टमर्थ सविशेष या कुर्युतानमात्यान्कुर्वीत ॥ १४ । दृष्टगुणत्वादिति । १५ ॥ इसलिये ऐसे पुरुपोको अमात्य बनाना चाहिये, जो कि बताये हुए राज- कीय कामि नियुक्त होकर उन कार्योंको उचित रीतिसे पूरा का, या उससे भी कुछ विशेष काके दिसा ॥१५॥ क्योंकि ऐसा करने से उनके बुन्द्रिगुण ठीक २ परीक्षा होजाती है ॥ १५॥ नेति कौणपदन्तः ॥ १६ ॥ अन्यैरमात्यगुणैरयुक्ता येते ॥१७॥ पितृपैतामहानमात्यान्कुति ॥१८॥ दृष्टापदानत्वात् ॥१५॥ परन्तु भाचार्य कागपदन्त (मीम ) नारदके इस सिद्धान्तको नहीं मानते ॥ १६ ॥ क्योकि वे कहते हैं कि ऐसे अमात्य, अन्य अमात्योचित गुणोंसे .
[१ अधिक
.
1
(२२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
रहित ही रहते हैं। 101 इसलिये अमाय उन्हीं को बनाया बाय, जिनके पिता,
पितामह भादि इस पदपर कार्य करते चले आये हैं ॥१८५ क्योंकि वे पहिले.
सेही अमात्य पदके सम्पूर्ण व्यवहारोसे परिचित होजाते हैं ॥ १९ ॥
ते धेनमपचरन्तमपि न त्यजन्ति सगन्धत्वात् ॥ २० ॥
अमानुषेष्वपि चैतदृश्यते ॥ २१ 1 गावो ह्यसगन्ध गोगणमति-
क्रम्य सगन्धेवेवावतिष्ठन्त इति ॥ २२ ॥
और इसीलिए दे अग्ना अपकार किये जाने पर भी, अपने मासिकको
सम्पन्धो या परिचित होने के कारण कभी नहीं छोड़ते ॥ २० ॥ यह बात पशु.
में भी देखी जाती है । ३॥ ॥ गोएं भरने अपरिधी गो समूहको छोड़कर
परिचित समूहम ही जाकर ठहरती हैं ॥ २२ ॥
नेति वातव्याधिः ॥ २३ ।। से ह्यस्य सर्वमपगृह्य स्वामिव-
त्प्रचरन्तीति ॥२४॥ तसानीतिविदो नानमात्यान्कुर्वीत ॥२५॥
नवास्तु यमस्थाने दण्डधरं मन्यमाना नापराध्यन्तीति ॥ २६ ॥
परन्तु प्राचार्य उद्धव इस सिद्धान्तको भी नहीं मानते ॥ २३६ उनका
कहना है कि इसप्रकारके मन्त्री, राजाके सर्वस्वको अपने अधीन करके, राजाके
समान स्वतन्त्र वृत्ति होजाते हैं ॥ २४ ॥ इसलिये नीति शाछमें निपुण, नवीन
पुरषोंको ही अमात्य नियुक्त करे ॥ २५ ॥ इसप्रकारकै पहिलेसे अपरिचित भमा-
त्य, दण्ड धारण करनेवाले राजाको यमके स्थानमें समझते हुए, कभी उसका
कोई अपराध नहीं करते ॥ २६ ॥
नेति पाहुदन्तीपुत्र. ।। २७ । शास्त्रविददृष्टकर्मा कर्मसु
विषादं गच्छन् ॥ २८ ॥ अभिजन प्रज्ञाशौचार्यानुरागयुक्तान-
मात्यान्कुति ।। २९ ।। गुणप्राधान्यादिति ॥३०॥
परन्तु भाचार्य बाहुदन्तीपुत्र ( इन्द्र ) इस मतको भी नहीं मानते
॥ २८ ॥ उनका कहना है, कि नोति मादियों में निपुग भी पुरुष, ममात्यो
कार्योस अपरिचित होने के कारण, उनमें मसफल होसकता है ॥२८॥ इम.
लिये ऐसे पुरुषों को ही अमात्य नियुक्त किया जादे, जो कि कुलीन, बुद्धिमान,
पवित्र हृदय, शूर और स्वामी में अनुराग रखनेवाले हो॥ २९ क्योंकि अमात्य में
गुले की प्रधानता होनी ही अत्यन्त आवश्यक है ॥३०॥
सर्वमुपपन्नामिति कौटल्यः ॥३शा कार्यसामर्थ्यादि पुरुष-
सामयं फलप्यते सामर्थ्यतश्च ॥ ३२ ॥
५ अध्या०] विनयाधिकारिक (२३) कौटल्य भाचार्यका मत है कि भारद्वाजके सिद्धान्तसे लगाफर अभीतक जो कुछ अमात्यके सम्बन्धमें कहा गया है यह सबही ठीक है ।। ३१ ॥ क्योंकि पुरुपके सामर्थ्यकी व्यवस्था, उनके किये कार्य सफल होनेपर तथा उनके विद्या बुद्धिफे यलपरही की जाती है ॥ ३२॥ विभज्यामात्यविभवं देशकालौ च कर्म च । अमात्याः सर्व एवैते कार्याः स्युन तु मन्त्रिणः ॥३३॥ इति विनयाधिकारिके पयमे ऽधिकरणे अमास्योत्पत्तिः अष्टमो ऽध्याय: इसलिये राजा,महाध्यायी आदिका भी सर्वधा परित्याग न करे, किन्तु इन सपको ही, उनको कार्य करनेकी शक्ति के अनुसार, उनके बुद्धि भादि गुण, देश, काल, तथा कार्याको अच्छी तरह विवेचन करके भमास्य पदपर नियुक्त करे | परन्तु इनको अपना मन्त्री कापि न बनाये। तारपर्य यह कि सहाध्यायी भादिको उनके योग्य कार्यापर तो नियुक्त करदे, पर उन्हें अपना मन्त्री अर्थात् सलाहकार न बनावे, मन्त्री वे ही हो जो सर्वगुण सम्पन्न हो ॥३३॥ विनयाधिकारिक प्रथम आँधकरणमें गाठयां अध्याय समाप्त । -- प्रकरण नौवां अध्याय मन्त्री और पुरोहितकी नियुक्ति । जानपदो ऽभिजातः स्त्रवग्रहः कृतशिल्पचक्षुष्मान्प्राज्ञो धार- विष्णुर्दक्षो वाग्मी प्रगल्भः प्रतिपतिमानुत्साहप्रभावयुक्तः क्लेश- सहः शुचिमैत्रो दृढभक्तिः शीलपलारोग्यसत्त्वसंयुक्तः स्तम्भचा- पल्यवर्जितः सप्रियो वैराणामकतेत्यमात्यसंपत् ।। १ ।। अपने देशमें उत्पन हुभा २, कुलीम; जो युराईयोंसे हाट हटाया जासके, अथवा सिमके बन्धु पान्धव भी श्रेष्ठ हो; जो हाथी घोड़े आदिपर चढ़ने, रथ चलाने युद्ध करने तथा गाने बजाने आदिको विद्यामि भी निपुण हो; अर्थ शासको जानने वाला; स्वाभाविक बुद्धिमे युक्त; स्मरण शक्तिसम्पन्न, धतुर; मर; और युक्त बोलने याला, प्रगल्भ (दपंग); प्रतीकार और प्रतिवाद करने में समर्थ उत्साही तथा प्रभावशाली शो सहन करने वाला; सयके साथ मधुर व्यवहार करने वाला; स्वासोम हद अनुरागरस्नेवाला; शील, बल, आरोग्य तथा धैर्यशाली, निरभिमान तथा धिा स्वभाष घाला; सौम्य पवित्र हदयः [१ अधिक कोटलीय अर्थशास्त्र भाकृति, तथा स्त्री भूमि मादिशे निमित्त शत्रुता न करने वाला पुरुष प्रधान- मन्त्री होना चाहिये ॥३॥ अतः पादागुणहीनो मध्यमावरौ ॥ २॥ तेषां जनपद- मवग्रहं चाप्ततः परीक्षेत ॥ ३॥ समानविद्येभ्यः शिल्पं शास्त्र- चक्षुम्मनां च ॥४॥ इन सब गुणों से चौथाई गुण जिसमें नहीं, वह मध्यम, और माधे गुण जिसमें नहीं, यह निष्ट प्रधानामात्य समझा जाता है ॥ २ ॥ राजा, इन सब गुणमिंस, मन्त्री के निवास स्थान (उत्पत्ति स्थान) और बन्धु बान्धर आदि का पता आत पुरुषों के द्वारा लगाये ॥ ३ ॥ हाथी भादिकी सवारी और शास्त्र मैपुण्यकी परीक्षा उनके सहपाठियोंके द्वारा करे ॥ ॥ कारम्भपु प्रज्ञां धारयिष्णुतां दास्यं च ।।५।। कथायोगेषु वाग्मितं प्रागल्य प्रतिमानपत्रं च ॥ ६॥ आपगुत्साहप्रभावी केशसहत्त्वं च ॥ ७॥ संव्यवहाराच्छौचं मैत्रतां दृढभक्तित्वं च ॥८॥ संपामिम्यः शीलयलारोग्यमचयोगमस्तम्भमचापल्यं च ॥९॥ प्रत्यक्षतः संनियत्वमरित्वं च ॥१०॥ अज्ञा, स्मरण शनि ओर चतुराईकी परीक्षा कार्योंके करने में ॥५॥ वाक्पटुता, प्रगल्भता तथा प्रतिभाकी जांच व्याख्यानों या सभाओं में ॥ ६॥ उत्साह, प्रभाव और सहन शक्तिको परीक्षा, आपत्ति के समय ॥ ॥ हृदयकी प्रशिनता, सपो मैत्रीभाव और इद भक्ति की परीक्षा व्यवहारसे ॥ ॥ शील, बल, आरोग्य, धर्य, निरभिमानिता और स्थिर स्वभावकी परीक्षा सहवासी पुरु. पोंके द्वारा ॥ ९॥ सौम्प आकृति तथा प्रीतिकी परीक्षा, स्वयं अपने अनुभवसे राजा करे ॥१०॥ प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजपत्तिः ॥१५॥ स्वयंदृष्टं प्रत्यक्षं परोपदिष्टं परोक्षम् ।। १२ ।। योकि राजाका मवहार प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमेय तीनोंही प्रकारका होता है, इसलिये पिउले सूमि, तीनाही प्रमाणों से परीक्षा करने का विधान किया है॥1॥ अपने भाप देखा हुआ व्यवहार प्रत्यक्ष, तथा दूसरों से यत- लाया हुआ परोक्ष कहाता है ॥ २ ॥ कर्मसु कृतेनाकतावेक्षणमनुमेयम् ॥ १३ ॥ अयोगपद्यात्तु कर्मणामनेकत्वादनेकस्थत्याच देशकालात्ययो मा भूदिति परो.
कार्यों में, d २.अध्या चिनयाधिकारिक क्षममात्यैः कारयेदित्यमात्यकर्म ॥ १४ ॥ किये कार्यसेन किये कार्यका समझना या देखना अनुमेय हाजाता है ।। १३ ॥ क्योंकि राजकीय कार्य एक साथ नहीं किये जा- सकते, घे बहुत 'प्रकारके और अनेक स्थानों में होनेवाले होते हैं, ठीक २ स्थान और समर्यो में अकेलाही राजा.उन सब कायाको नहीं कर सकता, इसलिये जिससे कि उन कार्योंके उचित देश और कालका अति क्रमण नहो, इसप्रकार राजा-अमावोंके द्वाराही परोक्ष रूपमें उन सब कायाँको करपावे, इसी लिये उपर्युक्त भमायाकी परीक्षा और नियुक्तिका विधान किया गया है ॥ १४ ॥ पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं पडङ्गे वेदे देवे निमित्ते दण्ड- नीत्यां चाभिविनीतमापदां दैवमानुपीणामभिरुपायैश्च प्रति- कर्तारं कुर्वीत ॥ १५॥ तमाचार्य शिष्यः पितरं पुत्रो स्वामिनमिव चानुवर्तेत ॥ १६ ।। शाम्त प्रतिपादित विद्या भादि गुणोसे युक्त; उसत मुलशील, पउन वेदमें, ज्योतिष शाबमें, शकुन, शान में, क्या दण्डनीति शास्त्र में अत्यन्त निपुण; देवी और मानुपी मापत्तियोंका अथर्ववेद आदिमें बताये हुए उपायोंसे प्रतीकार करनेवाले व्यकियोंको पुरोहित नियुक्त किया जाये ॥ १५ ॥ और राजा, उस पुरोहितका इसपकार अनुगामी यना रहे, जैसे कि शिम भाचार्यका पुन पिसाका और भृत्य स्वामीका मनुगामी होता है ॥ १६ ॥ ब्राह्मणेनधितं क्षत्रं मन्त्रिमन्त्राभिमन्त्रितम् ।' जयत्यजितमत्यन्तं शास्त्रानुगतशस्त्रितम् ॥ १७ ॥ इति विनयाधिकारिके प्रथमे ऽधिकरण मन्यिपुरोहितोरपास नवमो ऽध्यायः॥५॥ इसप्रकार ब्राह्मण पुरोहितमे प्रदाया हुआ, तमा उपर्युक्त गुणी मन्त्रियों की ससाहसे संस्कृत हुआ २, शासों के अनुसार आचरण करने पाला क्षत्रियकुल; मिनाही युद्धके भय और अलभ्य वस्तुओको भी अवश्यही अपने पशम कर हेता है॥१७॥ । बिनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमे नौवां अध्याय समाश !
[१ आधि० . (२६) कौटलीय अर्थशास्त्र दसवां अध्याय । ६ प्रकरण। गुप्तरीतिसे अमात्योंके हार्दिक सरल तथा कुटिल भावोंकी परीक्षा। मन्त्रिपुरोहितसखः सामान्यप्यधिकरणेषु स्थापयित्वामात्या- नुपधाभिा शोधयेत् ॥ १॥ पुरोहितमयाज्ययाजनाध्यापने नियु- क्तममृष्यमाणं राजावक्षिपेत् ॥ २॥ साधारण अधिकार पदोपर भमास्योको नियुक्त करके, मन्त्री और पुरो. हितके सहित राजा. उनके मनको पवित्रताका परीक्षण वक्ष्यमाण गुरु शतियोंसे करे ॥ ॥ राजा, नीच कुलोरपा किसी अस्पृश्य व्यक्ति के यहां यज्ञ करानेके लिये था उसे पढाने के लिये पुरोहितको नियुक्त करे, जब पुरोहित इस बातसे रए हाये तो उसको उसके अधिकार पदसे गिरादेव ॥ २ ॥ स सत्चिभिः शपथपूर्वमेकैकममात्यमुपजापयेत् ॥ ३॥ अ. धार्मिको ऽयं राजा साधुधार्मिकमन्यमस्य तत्कुलीनमवरुद्धं कुल्य- मेकप्रग्रहं सामन्तमाटविकमीपपादिकं या प्रतिपादयामः ॥ ४ ॥ इसप्रकार तिरस्कृत हुभा पुरोहित, सप्रिया (गुप्तचरका कार्य करने वाले पुरुष या स्त्रियों) के द्वारा शपथ-पूर्वक एक २ अमात्यको राजासे इसप्रकार भिन्न करे ॥ ३ ॥ "देखो यह राजा बरा अधार्मिक है, इसके हो वंशमें उत्पन्न हुए किसी अन्य Uष्ठ सयंम धार्मिक ग्पक्तिका; अथवा समीप देशके किसी सा- मन्तको; या भाविक (जंगलके स्वामी) भयवा जिसको हम सब मिलकर निअप करल उसे, इस राजाके स्थानपर नियुक्त करना चाहिये ॥ ४ ॥ सर्वेपामेतद्रोचते कथं वा तवेति ॥ ५॥ प्रत्याख्याने शुचिः रिति धर्मोपचा ॥६॥ यह सात और सत्र शंगोंको अच्छी एगो है, उन्होंने इसको स्वीकार कर लिया है, अब पताश्री सुम्हारी इसमें क्या सम्मति है" ॥५॥ यदि यह इस वासका समधन न करे, तो उसे शुचि भयान् पविग्रदूरप समझा जाये। यह धोपा अधात् धर्मके क्षरा गुप्तरोतिस भमायाको पवित्रताका पता लगाना
१० अंध्या०] विनयाधिकारिक
(२७)
सेनापतिरसत्प्रतिग्रहणाक्षिप्तः सत्रिभिरेकैकममात्यमुपजाय-
येल्लोभनीयनार्थेन राजविनाशाय ॥ ७॥
इसीप्रकार राजा,
किसी अपूज्य व्यक्तिका साकार करने के लिये सेनापतिसे
कहे, इस पातसे सेनापति जब रष्ट होने लगे तो राजा पूर्वाक रीतिसे उसका
सिरस्कार करे, और यह सत्रियों के द्वारा एक २ अमात्यको धनका रोम देकर
राजाका नाश करने के लिये, राजासे उनका भेद डाल देवे ॥ ७ ॥
सर्वेपामेतद्रोचते कथं वा तवेति ॥ ८॥ प्रत्याख्याने शुचि-
रित्यर्थोपधा ॥९॥
और फिर पूर्वोक्त रीतिसे कहे कि इस यातको सपने स्वीकार करलिया
है, तुम्हारी इसमें क्या सम्नति ह ॥ ८ ॥ यदि वह इस बात का समर्थन न करे
तो उसे शुचि समझा जाब । यह अाफ्धा अर्थात् धनका लोम देकर गुसरीतिगे
अमात्योंके हृदयको पवित्रताका पता लगाना कहा जाता है।
परिव्राजिका लब्धविश्वासान्तःपुरे कृतसत्कारा महामात्रमे
कैकमुपजपेत् ।। १० । राजमहिपी त्वां कामयते कृतसमागमा.
पाया महानर्थश्च ते भविष्यतीति ॥११॥ प्रत्याख्याने शुचिरिति
कामोपधा ।। १२ ॥
किसी ग्यश्वम्त साधुवैपधारिणी स्त्रीको अन्त. पुरम लेजाकर उसका
अच्छी तरह सरकार करे, भार फिर वह महामाया (अमात्यो) के पास अलहदा २
जाकर उन्हें राजासे भिश करदेये ॥१०॥ और कहे कि महारानी तुम्हे चाहती
है, तुम्हारे साथ समागम करने के लिये सब तरहके उपाय किये हुए है। इससे
तुमको धनमी बहुत मिल जायेगा ॥ ११॥ यदि यह इस बातका प्रत्याख्यान
करदे तो उसे शुचि समझा जाये । इसका नाम कामोपधा है ॥ १२ ॥
प्रवहणनिमित्तमको ऽमात्यः सर्वानमात्यानावाहयेत् ॥१३॥
तेनोद्वेगेन राजा तानवरुन्ध्यात् ॥ १४ ॥ कापाटिकच्छात्रः पूर्या-
चरुद्धस्तेपामर्थमानावक्षिप्तमेकैकममात्यमुपजपेत् ।। १५ ।।
नौका आदिकी सैर करने के लिये जप कोई एक अमात्य, अन्य सब
अमात्यों को इकट्ठा करे ॥१३॥ तो राजा उनके इस कार्यसे अपने उद्वेगको दिखाकर
उनपर जुरमाना करके अथवा पदसे उतारकर उनका अपमान करे ॥ १४॥
सदनन्तर राजाले, पहिले अपन हुआ २ कपदयेपी सास (हायके येपमें गुस-
घर) अ और मानसे तिरस्कृत हुए एक एक अमात्यके पास जावे, और उन्हे
राजा से इसप्रकार मित्र करे ॥ १५॥
.
-
कौटलीय अर्थशास्त्र
माधि
असत्प्रवृत्तो ऽयं राजा ॥१६॥ सहसनं म्हत्वान्यं प्रतिपाद-
यामः ॥ १७ ॥ सर्वेषामेतद्रोचते कथं वा तवेति ॥१८॥ प्रत्या-
ख्याने शुचिरिति भयोपधा ।। १९ ।।
यह राजा अत्यन्त असन्मार्गम प्रवृत्त हुआ २ हैं॥ १६॥ इसे सहसा
मार कर, इसके स्थानपर किसी दूसरे धार्मिक राजाको गद्दीपर बिडाना चाहिये
॥१७॥इस बातको अन्य सभी अमात्याने स्वीकार किया है, तुम्हारी इसमें
क्या सम्मति है men यदि वह इस प्रस्तावको स्वीकार नको तो उसे शुषि
समझा जाये । इसका नाम भयोपधा है॥ १९॥
तत्र धर्मोपचाशुद्धान्धर्मस्थीयकण्टकशोधनेपु स्थापयेत् ॥२०॥
अर्थोपधाशुद्धान्समाहर्ट संनिधानिचयकर्मसु ।। २१ ।। कामोप-
धाशुद्धान्याह्याभ्यन्तरविहाररक्षासु ॥ २२ ॥
इसप्रकार परीक्षा किये हुए इन भमायाम से जो धर्मोपधारो परीक्षा
किया गया हो, उसे धर्मस्थ (खे तृतीय अधिकरण) तथा कटकशोधन
(देखो-चतुर्थ अधिकरण ) कार्योपर नियुस किया जाये ॥ २० ॥ जो अोपमा
शुद हों, उनको समासा (कर वसूल करने वाले) और । समिधाता ( कोर
यक्ष) आदिके पदोंपर नियुक्त किया जावे।। २. जो कामोपधा' शुद्ध हों, उन्हें
पाहर भीतरके राजकीय कोड स्थानों तथा पियों की रक्षापर नियुक्त किया जाय
-
॥२२॥
भयोपधाशुद्धानासन्नकार्येषु राज्ञः ॥ २३ ।। सर्वोपधाशुद्धा.
न्मन्त्रिणः कुर्यात् ॥ २४ ॥ सत्राशुचीन्सनिद्रव्यहस्तिपनकर्मा-
न्तेपूपयोजयेत् ॥ २५॥
भयोपधा शुद्ध भम सोको रामा अपने समीपही किन्हीं कार्योपर नियुक्त
करे ॥ २३॥ जो सवताहस परीक्षा किये गये हों, उन्हें मन्त्री बनाये ॥२४॥
तया जो सर सरहकी परीक्षाममि भाचि सिद्ध हुए हाँ, उन्हें, खान की
आदिके जगल, हाधीके अगलॉम जहां परिश्रम अधिक करना पड़े, नियुग
करे ॥ २५॥
त्रिवर्गमयसंशुद्धानमात्यान्स्वेषु कर्मसु ।
अधिर्याद्यथाशौचमित्याचार्या व्यवस्थिताः ।। २६ ।।
यह सव अन्य भश्चार्योने व्यवस्थाकी है कि धर्म भर्थ काम और भयके
धारा परीक्षा लिये पुए अमावों को उनकी पवित्रताके भनुसार अपने कार्योपर
नियुक्त किया जावे ॥ २६॥
११ अध्या] दिनयाधिकारिक (२६) न वेय कुर्यादात्मानं देवीं या लक्षमीवरः । शौचहतारमात्यानामेतत्काटल्यदर्शनम् ॥ २७ ॥ आचार्य कौटल्यका सो अपना यह मिळाग कि राजा, समालों की परीक्षा के लिये वीवो महारानी या याने आपको कभी न दाल ।। २. न पणमदुएस विपणेयाम्मममरेत् । कदाचिद्धि प्रदुष्टस नाधिगम्यंत भेषजम् ॥ २८ ।। श्योकि किमी दोष रदिश अमाल मधित गुस सिगास इमा- कार गे'जाना, की २, जलग पिप गिलादेन के बराबर होता है। यह अधिक सम्माकिकिर, पिगड़ा दुभा अमल किमी प्रकार की न धारा जाग।। २८ कृता च कलुषा युद्धिरुपधाभिचतुर्विधा । नागत्वान्तनिवर्तत स्थिता मत्वतां पुती ।। २९ ॥ सर्षक गुण उपायोमे मदको मात कराई पर पुपकी पुषि, निषित भभिमेश पालो प्रासको बिना किरकी धिराम नहीं मेती ॥२९॥ तस्मादाममधिष्ठानं कृत्वा कार्य चतुर्विधे। शौचाशीचमगात्यानां राजा मार्गत गचिभिः ॥ ३० ॥ इति पिनाधिकारिक प्रपमै धिकरण उपधानिधानापमानममा पानी दामो पाम: 100 इसनि गुंगा प्रसाफ गुप्त उपायों में, राजा हिमी मार परयको हो पर बनाये । और इसमकार गुलमरोंके द्वारा अमायॉ बोर भान्तरिक बयाभले भायोंको अम्मा भग्ता रई ॥३०॥ पिनयाधिकारिफ प्रथम अधिकरण दसवां अध्याय ममास । - ७प्रकरण। ग्यारहवां अध्याय। गुप्तचर पुरुपोंकी स्थापना। उपधाभिः शुद्धामात्ययाँ गृढपुरुषानुत्पादयेत् ।। १ ।। का- पदिकोदासितगृहपतिकवदहकतापसव्यानान्सचितीक्ष्णरसदमि- शुकीम ॥१॥ - - [१ अधिः कौटलीय अर्थशास्त्र जिस राजाने धर्मोपधा आदि छलमूलक उपायांसे अपने अमात्य वर्गकी अच्छी तरह जांच करलो हो, वह गुप्तचर पुरपॉकी नियुक्ति करे ॥ ॥ गुप्तच- रॉके कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक, तापस, सत्री, ताक्षण, रसद और भिक्षुकी आदि अनेक भेद है ॥ २ ॥ परमर्मज्ञः प्रगल्भः छात्रः कापटिकः ॥३॥ तमर्थमाना- भ्यामुत्साह्य मन्त्री ब्रूयात् ॥ ४ ॥ राजानं मां च प्रमाणं कृत्वा यस्य यदकुशलं पश्यसि तत्तदानीमेव प्रत्यादिशेति ॥ ५॥ दूसरोंके गुप्त रहस्योंको जानने वाला, बड़ा प्रगल्भ तथा मानवेपमें रहने पाला गुप्तचर काराटिक' कहाता है ॥ ३ ॥ उसको बहुतसा धन देकर भोर सत्कार के द्वारा उत्साहित करके मन्त्री कहे ॥ ४ ॥ कि "तुम राजाको और मुझको प्रमाणभूत मानकर, जिसकी जो कुछ हानि होती देखो, उसी समय मुझे भाकर बतलाओ" ॥५॥ प्रवज्याप्रत्यवसितः प्रज्ञाशाचयुक्त उदास्थितः ॥ ६ ॥ स वार्ताकर्मप्रदिष्टायां भूमौ प्रभूतहिरप्यान्तवासी कर्म कारयेत् ॥७॥ बुद्धिमान् , पवित्र तथा सन्यासी वपमें रहने वाले गुप्तचरका नाम उदा- स्थित है ॥ ६ ॥धा अपने साथ बहुत से विद्यार्थी और धन रेकर, जहां कृषि, पशुपारन तथा व्यापार के लिये स्थान नियत किया गया हो यहां जाकर, विचा- थियोंके द्वारा उपयुक्त इन कार्योको करवावे ॥ ७ ॥ कर्मफलाच सर्वप्रनजितानां ग्रासाच्छादनावसथान्प्रतिविद- ध्यात् ॥ ८ ॥ चिकामांचोपजपेत् ॥ ९॥ एतेनैव वैपेण राजा. धचरितव्यो भक्तवतनकाले चोपस्थातव्यमिति ॥ १० ॥सर्वप्रव- जिताश्च स्वं स्वं वर्गमुपजपेयुः ॥ ११॥ उस कार्य के परनेसे जो कुर आमदनी हो, उससे सब तरह के सग्या- सियाँके भोजन यख और निवास स्थानका प्रबन्ध करे ॥८॥जो सन्यासी नित्यही इस प्रकार भोजन घरा आदि ऐनकी इस प्रस्ट कर उन्हें सब तरह घाम करके समझा देवे, कि ॥ ९॥'सही घेपसे तुम्हे राजाका कार्य करना चाहिये; भार जव मुम्हारे मत्से और पेननका समय आवे, तो यहां उपस्थित होजाना ॥10॥ इसी प्रकार प्रत्येक वर्गके संन्यासी, अपने २ वर्गके संन्यासि- योको समझा फर्मको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशांचयुक्तो गृहपतिकव्यञ्जनः॥१२॥ स इपिकर्मप्रविष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण ।। १३ ॥ .
११ अध्या०] विनयाधिकारिक बुद्धिमान, पविन हृदय गरीय किसान के वेषों रहने वाले गुप्तचरको 'गृहपतिक' कहा जाता है ॥ १२॥ यह कृषि कार्य के लिये निद्दिष्ट कोहुई भूमि में जाकर 'उदास्थित' नामक गुप्तचरक समागही सर कार्य करावे ॥१३॥ वाणिजको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो वैदेहकव्यञ्जनः ॥१४॥ स वणिकर्मप्रदिष्टायां भूमापिति समानं पूर्वेण ॥ १५ ॥ बुद्धिमान , पविन हृदय, गरीय व्यापारीक थेपमे रहने वाले गुप्तचरका माम 'वैदेहक' है ॥ १४ ॥ वह व्यापार कार्यके लिये निर्दिष्ट काहु है भूमिमें जाकर, भन्म सय कार्य उदास्थित' नामक गुप्तचरके समानही करावे ॥ १५॥ मुण्डो जटिलो वा वृत्तिकामस्तापसव्यञ्जनः ॥ १६ ॥स नगराभ्याशे प्रभूतमुण्डजटिलान्तवासी शाकं यवसमुष्टिं वा मास- द्विमासान्तरं प्रकाशमश्नीयात् ॥ १७॥ गूढमिष्टमाहारम् ॥१८॥ मुण्ड अभवा जटिल वेपमें रहकर, जीविका लिये राजाका काम करने पाला गुप्तचर 'तापस' कहाता है ॥ १६ ॥ वह कहीं नगरके पासही रहकर, बहुतसे मुण्ढ अथवा जटिल विद्यार्थियोंको लेकर, हराशाक या मुट्टीमर नाज महीने दो महीनेतकम प्रकाश रूपमै साता रहे ॥ १७ ॥ और छिप तौरपर जो अपना रचिकर आहार ही उसे सता रहे ॥१८॥ वैदेहकान्तेयासिनचैनं समिद्धयोगैरर्चयेयुः ॥ १९ ॥ शिष्या. थास्यावेदययुरसौ सिद्धः सामेधिक इति ॥ २०॥ समेधाशस्ति- भिश्वामिगतानामङ्गविद्यया शिष्यसंज्ञाभिश्च कर्माण्यभिजने वसि- तान्यादिशेत् ॥ २१ ॥ KRE तथा व्यापारी गुप्तचरके समीप रहने वाले कार्यकर्ता, इसको खूप अरडी तरह धन आदि देकर इसको पूजा करें ॥ १९॥ और इसके शिष्य चारों ओर इस बातको प्रसिद्ध करदें, कि देवमहामारेगी है, तशा भविष्यमे होने वाली सम्पत्तियोको भी यता देते है॥ २०॥ अपनी भाषी सम्पतिको जाननेकी अभिलापासे आये हुए पुरुषोंझे कुटुंबम सम्पन्न हुए कार्यों को, उनके शरीर आदि के चिन्हांको देसकर, तथा अपने शिष्यों के इशारोंके मुताविक टॉक २ यतका देवें॥२१॥ अल्पलाभमसिदाहं चोरभयं दृष्यवधं तुष्टदानं विदेशमवृत्ति- ज्ञानामिदमध धो या भविष्यतीदं राजा करिष्यतीति ॥ २२ ॥ : तदस्य गूढाः सत्त्रिणश्च संपादयेयुः ॥ २३ ।। .
अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र तान्तिकमन्त्रिपरिपदध्यक्षदण्डदुर्गान्तपालाटविके श्रद्धेयदेशवेष शिल्पभाषाभिजनापदेशान्भक्तितः सामर्थ्ययोगाचापसर्पयेत् ॥८॥ इन सत्री आदि गुप्तचर पुरको राजा, अपनेही देशमें मन्त्री, पुरो- हित, सेनापति, युवराज, प्रतीहारी (दावारिक ), अन्त पुर रक्षक, छावनी का सस्थापक, कलक्टर, कोपाध्यक्ष, प्रदेश ( कण्टकशोधनका अधिकारी पुरुष- कमिश्नर), सूबेदार, नगरका मुखिया अथवा वकील, खानोंका निरीक्षक, मन्त्रि सभाका अध्यक्ष, सेनारक्षक, दुर्गरक्षक, सीमारक्षक, और जगलका अधिपति इन लोगोंके समाप, विश्वसनीय देश देषभूषा कारीगरी भाषा तथा अभिजन (खन्दान) से युक्त होने पर, इनकी भक्ति और सामर्थ को देखकर ही रवाना करें ॥८॥ तेषां बाह्यं चारं छत्रभृङ्गारव्यजनपादुकासनयानवाहनोपग्रा- हिणा तीक्ष्णा विद्युः ॥९॥ वं सत्रिणः संस्थाम्वर्पयेयुः ॥ १० ॥ उनमें से तीक्षा नामक गुसचर पुरुप, बाहरी उपकरण-उन, घमर, पर्जन, पादुका आसन, कोही ( पान दोलिका ) और घोडे भादिको पद फर पा लेकर अमात्य आदिकी सेवा करें, और उनके व्यवहाराको जानें ॥१॥ सया नामक गुप्तचर पुरप, इस प्रकार तक्षिण पुरषके द्वारा जाने हुए सब पथद्वारोंको, स्थानिक कापटिक आदि गुप्तचरोंको पतला द॥१०॥ सूदारालिकलापकमंगाहकास्तरक कल्पकप्रसाधकोदकपरिचार- का रसदा, कुब्जामनकिरातमूकनधिरजडान्धच्छानो नटनर्त- फगायनगदकाजीपनकुशीलपाः स्त्रियथाभ्यन्तरं चारं विद्युः . मात्रा भादिक घरक, सम व्यवहारोंको सूद (पाचक); श्रारालिक (मांस आदि पकाने घाला), स्नान कराने वाला, हाथ पैर मादि दबाने वाला, विस्तर पिशान वाल , गाई, कपद भादि पहनाने वाला, जल भरने पाला, इनके भसम रसद नामक गुप्तचर पुरुष, और कुबडे, यौन, फिराव (जगी भादमी ), गूग, बहर, मुम्ब, अन्य भादिक भेसमें गुप्तचर पुरष, तथा नट, नाचने गाने मंजान पाल, किस्से कहानी कहने वाले, धूदने फांदने, आदि परने वाले, भीर सुफिया औरत अच्छा तरह जान, अर्थात् प्रत्यक धातका पता सगा - मिथुक्या मस्खास्तर्पयेयुः ॥ १२ ॥ संस्थामामन्तेषासिमा तमाशा
17
.
१२ अध्या०] चिनयाधिकारिक
(३)
संज्ञालिपिभिचारसंचारं कुर्युः ॥ १३ ॥ न चान्योन्य संस्थास्ते
वा, विशुः ॥१४॥
और भिक्षुकी, उस जाने हुए सय व्ययहारको, स्थानिक कापटिक आदि
गुप्तचरॉके पास निवेदन करदें ॥१२॥ संस्थानों ( कापटिक आदि गुप्तचरों) के
विद्यार्थी, अपने निजी संकेतके अनुसार बनाई हुई लिपियोंके द्वारा, उस जाने हुए
प्यवहारको राजासक पहुंचा ॥१३॥ इस बातका पूरा ध्यान रखना चाहिये कि पर-
स्पर एक दूसरेको सस्था या सचार, तथा सस्थाको संघार और संचारोंको संस्था
न जानने पावें । अर्थात् गुप्तचरका कार्य करने घाला पुरुष अनावश्यक अन्य गुप्तचर
व्यक्तिको न जान सके ।। १४॥
भिक्षुकीप्रतिषेधे द्वारस्थपरम्परा मातापित्यञ्जनाः शिल्पका-
रिकाः कुशीलवा दास्यो या गीतपाट्यपाद्यभाण्डगूढलेख्यसंज्ञाभि-
र्या चार निर्हारयेयुः ।। १५॥
यदि अमात्य आदिके भीतर घरों में भिक्षुकीके जानेकी मनाई हो, तो
द्वारपालों के द्वारा (पहिला द्वारपाल दूसरेको, दूसरा तीसरेको, इसी प्रकार सबसे
थादरका द्वारपाल भिक्षुकीको प्रतादेवें) वह समाचार थाहर लाया जावे । यदि
यहभी सम्भव न होसके, तो अन्त पुरके परिचारकोंके माता पिता बनकर घुड़े
स्त्री पुरष भीतर चले जावे, और ये पता हगावें। या रानियोंके यार आदि
संवारन पाली नियां, गाने बजाने याली, तथा अन्य दासियोंके द्वारा, अथवा
शारीसे भरहुए गीत, श्लोक पाठ, पाजे तथा यतन या टोकरियों में गूंद लेख
सालकर, या अन्य प्रकारके सकेतोंसे मीलरके समाचारको वाहर लाया जाने
दीर्घरोगोन्मादागिरसविसर्गेण चा गूढनिर्गमनम् ।। १६ ।।
प्रयाणामेकवाक्ये संप्रत्ययः ॥ १७ ॥
श्रया किसी भयर रोग या पागलपनके याने, पाय Pawar या जहर
देकर (जिससे कि अन्त गुरमें गया होजावे, उसी समय ) धुपचाप गूढगुरु
पाहर निकल जावे ॥ १६ ॥ यदि तीन गूढ पुरप, जो कि आपसमें एक दूसरेको.
न जानते हों, किसी समाचारको एक तरहसे ही पता, तो उसे ठीक समझना
चाहिये ॥ १७ ॥
तेपामभीक्षणविनिपाते तृष्णींदण्डः प्रतिषेधो वा ॥१८॥
कण्टकशोधनोक्ताथापसा परेपु कृतवेतना बसेयुः संपातानिवा-
रार्थम् ॥ १९ ॥ व उभयचेतनाः ॥ २० ॥
१॥ १५॥
१ अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र यदि थे यार यार परस्पर विस्व समाचार ही लावें, तो उन्हें उपाशु दण्ड दिया जाय, अर्थात् अकेले में चुपचाप पिटवाया जाय । अथवा नौकरीस प्पा कर दिया जाय ॥ १८ ॥ इन उपर्युक्त गुप्तचर पुरपॉके अतिरिक्त कण्टक शोधन धिकरणमें बताये हुए गूढ पुरप भी नियुक्त किये जावें । उनको दूसरे देशाम वहीं अमात्य आदिके पास भेजा जाये, व उनसे वेतन लेकर उनके पासही निवास करें और उनकी सेवा करें, जिससे कि उनके सबही गुप्त समा चार सरबतासे बाहर निकाले जासकें।। ११ये गूद पुरफ दोनाही ओरसे पूरा घेतन लेने वाले होते हैं। अर्थात् विजिगीषु और शत्रु दोनोंको ओरसे श्नको घेतन मिलता है। २०॥ गृहीतपुरदारांश्च कुर्यादुभयचेतनान् । " तथारिग्रहितान्निधानेपां शौचं च तद्विधैः ।। २१ ।। जिन व्यक्तियाँको दोनों ओरसे वतन दिया जाने उनके पुत्र और खियों- को विजिगीषु राजा, सस्कार पूर्वक भपने अधीन रखे । शकी ओरसे भेजेहुए उभय वेतन (दोनों ओरसे वेतन लेने वाले) व्यक्तियों को, राजा अच्छी तरह जाने, भौर उनक द्वारा अपन उभयवेतन गूद पुरोकी पवित्रताको भी जाने एवं शत्रौ च मित्रेच मध्यमे चावपेञ्चरान् । उदासीने च तेषां च तीर्थेष्पाटादशसपि ॥ २२ ॥ इसप्रकार शत्रु, मित्र, मध्यम और उदासीन राजाओं तथा उनके मनी, पुरोहित, सनापति पदे अठारह प्रकारके अनुचरोंके पास, सपही स्थानोंपर गुसपरों को नियुक करे ॥ २२ ॥ अन्तर्ग्रहचरास्तेषां कुन्जनामनवञ्चका । " शिल्पवत्यः स्त्रियो मुकाविनाश्च म्लेच्छजातयः ॥२३॥ शत्रु, मिन भादिक घरों तथा उनके मन्त्री पुरोहित आदि सहारह प्रकारके अनुचरोंके भीतर घोंमें खुफिया काम करने वाले कुबडे, पाने, नपुसक, कारीगर स्त्रियां, गूग, तथा अन्य नाना प्रकारक यहानोंको सकर म्लच्छ भातिक पुरष नियुक्त किये जाय ॥ २३ ॥ 'दुर्गेषु वणिजः संस्था दुर्गान्ते सिद्धतापसाः । कर्पकोदास्थिता राष्ट्र राष्टान्ते नजनासिनः ॥ २४ ॥ दुगाम, टहरकर काम कान धारे व्यापारियोंको, दुर्गका सामापर सिद्ध तापसोका, रायके अन्य स्थानाने हपक और उदारियत पुरपाको तथा जिय की सीमापर गोपालॉको गुप्तचरका कार्य सौंपा जाय ॥ २५ । १ १ १ - - १३ मध्या०] विनयाधिकारिक (३७) पने यनचराः कार्याः श्रमणाटविकादयः।- परप्रवृत्तिज्ञानार्थ शीघ्राचारपरंपराः ।। २५ ॥ चनमें, शत्रुकी प्रत्येक गति विधिको जानने के लिये चतुर, शीघ्र काम करने वाले श्रमण (वानप्रस्थ वृत्तिसे रहने वाले) और आटयिक (अन्य जगल पासी ) पुरपाको, गूदपुरपाका कार्य करने के लिये परावर नियुक्त किया जाय ॥२५॥ परस्य चेते योद्धन्यास्तादृशैरेव तादृशाः । चारसंचारिणः संस्था गूढाश्च गूढसंज्ञिताः ॥ २६ ॥ इसप्रकार छिपे हुए भी खुले तौरपर रहते हुए, ये लोग शत्रुकी औरसे नियुक्त किये हुए सत्री तथा तांदा आदि गृह पुरषोंको, तथा कापटिक, उदास्थित भादि सस्था नामक गुप्तचर पुरयाको, समानही सुफिया पुलिस के पास पहचानें। अर्थात् सस्था सस्थाओंको भार सञ्चार सम्बारोंको जाननेका यस करें ।। २६ ॥ अकृत्यान्कृत्यपक्षीयैर्दर्शिताकार्यहेतुभिः । परापसर्पज्ञानार्थ मुख्यानन्तेषु वासयेत् ॥ २७ ॥ इति विनयाधिकारिके प्रथमे ऽधिकरणे गूहपुरपारपसी सथारोपत्ति गूदपुरपप्रणिधि द्वादशोऽध्याय ॥ १२ ॥ शाके वशम अथया उसके बहकाने में न आने वाले अपने राष्ट्र के मुख्य पुरुषोंको, शत्रुके गुप्तचरोंको जाननेके लिये राष्ट्रफी सीमापर नियुक्त को, और उनको यह समझा देवे कि शत्रुके जो आदमी हमारे पशमें आसकते है, उन्हें इन उपायोंसे अपने पक्ष में कर लिया जाये। , विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें बारहया अध्याय समाप्त । । - a करया। तेरहवां अध्याय। 'अपने देश में कृत्य तथा अकृत्य पक्षकी रक्षा। अपने राष्ट्रके जो पुरस शत्रुके घशम आजाने वाले हो वे कृत्यपक्ष फे, भार जो शत्रुरे यश न भासकें, वे अकृत्यपक्षके कहाते हैं, राजाको उचित है कि वह अपने देशके दोनों पक्षोंके मनुष्गीकी इमप्रकार देस भाल रखत, या उनकी रक्षा करे, जिससे कि ये शधुके यश कदापि न शास। ma
[१अधिक
A
कौटलीय अर्थशास्त्र
कृतमहामात्रापसर्पः पौरजानपदानपसर्पयेत् ॥१॥ सचिणो
द्वंद्विनस्तार्थसमांशालापूगजनसमरायेषु विवादं कुर्युः ॥२॥
प्रधान अमाल, मन्त्री, पुरोहित भादिके समीप गुप्तचरों को नियुक्त करके
फिर नगर वासी तथा जनपद निवासी पुरषोंके अनुराग और अपरागको जाननेके
लिये वहांपर भी गुप्तचर पुरुषोंको नियुक्त करे In गुप्तचर पुरप आपसमें झगप
परें, और नदी भादिक तीर्थ स्थानाम, ब्राह्मण आदिको सभाभोम, भोजन तथा
पीने भादिकी दुकानों में राजकीय कर्मचारियों के समूहमें, तथा अन्य नाना प्रकारके
पुरुषोंके झुण्डोंमें, निम्नालेखत रीतिसे आपसम विवाद करना प्रारम्भ करें ॥२॥
सर्वगुणसंपन्नश्वार्य राजा श्रूयते ॥ ३॥ न चास्य कधि-
द्गुणो दृश्यते यः पौरजानपदान्दण्डकराम्यां पीडयतीति ।। ४ ।।
तत्र ये ऽनुप्रशंसयुस्तानितरस्तं प्रतिपेधयेत् ॥ ५॥
'यह राजा सवंगुणसम्पप सुना जाता है, ॥३॥ परन्तु इसका कोई
गुण वाखता तो है नहीं, भीर उल्टा, नगर निवासी तथा जनपद निवासी
पुरपाको दण्ड देकर भार अच्छा तरह कर वसूल करके पीश पहुंचाता है।'
इत्यादि ॥ ४ ॥ तदनन्तर उन तीर्थ आदि स्थानो पर, उपर्युक्त निन्दाके मनु
सार राजाका निन्दा करने वाले भन्य पुरुपोंको, तथा उस पूर्वनिन्दक गुप्तचर
को रोककर दूसरा गुसचा कहे कि ॥५॥
मात्स्यन्यायाभिभूताः प्रज्ञा मर्नु वैवस्वतं राजानं चक्रिरे
॥६॥ धान्यपहभागं पण्यदशभागं हिरण्यं चास्य भागधेयं प्र.
कल्पयामासुः॥७॥
देखो, पहिले प्रजामें यह अवस्था थी कि जैसे वो महली छोटी
मालीको सा जाती है, इसी प्रकार शक्तिशाली ग्यक्ति निर्दल पुरुषको सग
करते थे, तब सम्पूर्ण प्रजाने मिलकर विवस्वान्के पुर्व मनुको अपना राजा
पनपाखेतीका ठा हिस्सा, व्यापारकी आमदनीका दसवा हिस्सा
सपा कुछ सुवर्ण, राजाके लिये इतना भाग नियत कर दिया।
तेन भृता राजानः प्रजानां योगक्षेमवहास्तेषां किल्विपमद-
ण्डकरा हरान्त अयोगक्षेमवहाय प्रजानाम् ॥ ८॥ तस्मादुञ्छ-
पहभागमारण्यका अपि निवपन्ति तस्यैतद्भागधेयं यो ऽस्मानगो-
पामतीति ॥९॥
(३९), १३ अध्या० विनयाधिकारिक उस हिस्सेको ग्रहण करते हुए राजाओंने प्रजाके योग क्षेमका भार अपने उपर लिया इस प्रकार राजा प्रयुक्त किये गये दण्ड और कोंसे प्रजाकी पुराइयाँको नष्ट करते है, तथा प्रजाके योग क्षेमका सम्पादन करते हैं ॥ ८॥ इसीलिये जगलमें रहने वाले ऋषि मुनिजन भी, अपन पीने हुए नाज का भी छठा हिस्सा राजाको दे देते है, कि यह उस राजाका ही हिस्सा है, जो हमारी रक्षा करता है ॥९॥ इन्द्रयमस्थानमेतद्राजानः प्रत्यक्षहेडप्रसादाः ॥१०॥ ता- नवमन्यमानान्दैयो ऽपि दण्डः स्पृशति ॥ ११॥ तस्माद्राजानो नावमन्तव्या इति क्षुद्रकान्प्रतिपेधयेत् ॥ १२ ॥ ये राजा लोग प्रत्यक्षही प्रजाओका निग्रह और उनपर भनुप्रद करने घाले होते हैं, इसलिए ये इन्द्र और यमके समान हैं ॥ १० ॥ अतएय जो उनका तिरस्कार करता है, उसपर देवी विपत्ति भी अवश्य माती है ॥ ११ ॥ इसलिय राजाओंका कभा तिरस्कार नहीं करना चाहिये, इत्यादि बातें कहकर साधारण जनताको राजाकी निन्दा करने से रोक देव ॥ १२ ॥ किंवदन्ती च विद्युः ॥ १३ ॥ ये चात्य धान्यपशुहिरण्या- न्याजीवन्ति तेरुपकुन्ति व्यसने ऽभ्युदये वा कुपितं बन्धुं राष्ट्रं वा व्यावर्तयन्त्यमित्रमाटविकं वा प्रतिपेघयन्ति तेषां मुण्डजटिल- व्यञ्जनास्तुष्टातुष्टत्वं निशु. ॥ १४ ॥ गुप्तचर पुरप किंवदन्ती अर्थात् अफवाहोंको भी जानें,॥३॥ जो पुरप धान्य, पशु तथा हिरण्य आदि पदार्थोको राजाके लिए देते हैं, या व्यसन अथवा अभ्युदयके समयम धान्य आधिके द्वारा राजाका उपकार करते है, या कुपित हुए बन्धु पान्धय तथा अन्य जनताको क्रोध करने से रोका देते हैं। इस प्रकार के लोगोंकी प्रसपता और भप्रसरताको भी, गुण्ड अथवा जटिल घेपमें रहने वाले गुप्तचर जानें ॥ १४ ॥ तुष्टानर्थगानाम्यां पूजयेत् ॥ १५ ॥ अतुष्टांस्तुष्टिहेतोस्त्या- गेन साम्ना च प्रसादयेत् ॥ १६ ॥ परर न्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धेभ्यश्च ॥ १७ ॥ जो राजासे सन्तुष्ट अर्थात् मसा न हो, उन्हें धन और सरकार भादिसे भोर भाषिक सरहत करे ॥ १५॥ तथा जो प्रसप्त न हो, उन्हें प्रसस करनेके लिए घम मादि देवे और साम भात् मायनासे भी उन्हें प्रसर करे। परस्पराद्वा भेदयेदेनान्साम- (४०) कौटलीय अर्थशास्त्र . [भिधि ६॥ अथवा इन अप्रसन्न व्यक्तियों में परस्पर हा भेद दाल, और सामन्त भाटावक तथा उनक खान्दानो भार मिलने जुलने वाले लोगोंसे भी इनका भेद करवा दे । जिससे कि ये सन्तुष्ट पुरुष सामन्त मादिका वहका न सकें। 7 ॥७॥ . ४ F- तथाप्यतुभ्यतो दण्डकरसाधनाधिकारेण वा जनपदविद्वेषं. ग्राहयेत् ॥ १८ ॥ पिद्विष्टानुपांशुदण्डेन जनपदकोपेन वा साघ- येत् ॥ १९ ॥ यदि फिर भी ये अप्रसपी है, अपने वशमें न आवै, तो दण्ड स- मन्धी अधिकारोंक दारा, अथवा कर सम्बन्या अधिकारोंक द्वारा सम्पूर्ण 1 जनपद के साथ इनका देष करा दवें ॥ १८॥ जव जनपद निवासी लोग इनसे दूप करने लगे, ता इनका चुपचाप वध करवा दिया जाय अथवा १६ जनपदक फांधके द्वाराही इनका दमन किया जाय । तात्पर्य यह है कि प्रान्त निवासी जनही अपना विरोधी होनके कारण इसको मार डालें ॥१९॥ गुप्तपुनदारानाकरकर्मान्वेषु वा यासयेत् ॥ २० ॥ परेपामा- स्पदभयात् ॥२१॥ ऋद्धलुब्धभीतावमानिनस्तु परेपां कत्याः॥२२॥ अथवा हम अतुष्ट पुरषोंक पुत्र और स्त्रियोंको भपने अधिकारमें करके, उ खानके काम करन नियुक्त कर दवें ॥ २०॥ क्योंकि सम्प्रय है, ऐसा न करने पर ये लाग शत्रुसे जाकर मिल जाय ॥२॥ोधी, लोभी, डोक और तिरस्कृत पुरणही शत्रु घमें आजाने के योग्य होते है ॥२२॥ तेपा कान्तिकनैमित्तिकमोहूर्तिकव्यञ्जनाः परस्परामिछ- पन्धममिनाटरिकप्रतिसंवन्ध या विद्युः ॥ २३ ॥ इस प्रकार छागाँके भाषसके सम्बन्धका, और आधुके साथ किये गपे सम्बन्धका कातान्तिक (पहिल कर्माको जानने वाला) नमिसिक (शुभ अशुभ शकुनाको जानन पाटल) और मोहतिक (तीनों कारोंके वृत्तान्तोंको आनने वाला) के वपमें रहने धाले गुप्तचर पुरप जानें ॥ २३ ॥ तुष्टानर्थमानाम्यां पूजयेत् ॥ २४ ॥ अतुष्टान्सामदानभेद- दण्डै? साधयेत् ।। २५॥ जो म्याक्त पम प्रसव हो, उन्हें भयं भौर सस्कार के द्वारा सस्कृत को १५ और अपनसे भप्रसय व्यक्यिोंको सामदाम दण्ड भेद इन चारों उपायोसे ही भपमे पशमें करे ॥२५॥ ३ ३४ अध्या०] -विनयाधिकारिक (४१) एवं स्वविपये कृत्यानकृत्यांच विचक्षणः । परोपजापात्संरक्षेत्मधानान्क्षुद्रकानपि ॥ २६ ॥ इति विनयाधिकारिक प्रथमे ऽधिकरण स्त्रधिपये वृत्याकृत्यपक्षरक्षणं प्रयोदशो ऽध्यायः ॥ १३ ॥ इस प्रकार बुद्धिमान् राजा, अपने देशम छोटे बड़े सभी कृत्य (शमुके यशमें आने वाले, फ्रोधी लोभी आदि) और अकस्य (फिप्ली सरह भी वात्रुके घशमें न आने वाले ) पुरुपोंको, शके यह माने जानेसे चाये ॥ २६ ॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें तेरहवां अध्याय समा। चौदहवां अध्याय । १०प्रकरण। शत्रके देशमें कृत्य तथा अकृत्य पक्षके पुरुषों का संग्रह । कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः स्वविपये व्याख्यातः॥ १ ॥ परविपये वाच्यः ॥२॥ अपने देश में कृस्य तथा अकृत्य पुरपाका संग्रह कह दिया गया है ॥१॥ मम शत्रुके देश में, उसके कृयापूरय पक्षके पुरषोंको अपने वशमें फैसे करना चाहिये, इसका निरूपण किया जायगा ॥२॥ संश्रुत्यान्विपलब्धस्तुल्याधिकारिणो शिल्पे वोपकारे वा चिमानितो बल्लभावरुद्धः समाहूय पराजितः प्रचासोपतप्तः कृत्वा व्ययमलब्धकार्यः स्वधर्मादायाद्याद्वापरुद्धो मानाधिकाराभ्यां भ्रष्टः कुल्यरन्तर्हितः प्रसभाभिमृष्टस्त्रीकः कारादिन्यस्तः परोक्तदण्डितो मिथ्याचारवारितः सर्वस्वमाहारितो बन्धनपरि लिएः प्रवासित. पन्धुरिति क्रुद्धवर्गः ॥३॥ मोधी, लोभी, भौत (डरे हुए) और मानी पुरपही कृत्य कहाते हैं, यह पात पहिले कही जाचुकी है। उगममे पहिले पोधी वर्गको यसारो है, भात् उन २ विशेष अवस्थाओंका निरूपण परते हैं, जिन अपमाके उपस्थित होने पर कोई पुरुप, राजा या राज्यसे शुरु हो सकता:-जिसको धन दमेकी : ..
-- [१ अधिक (४२) कौटलीय अर्थशास्त्र प्रतिज्ञा करके फिर धन न दिया गया हो (अर्थात् पहिले राजान बचन दिया कि हम तुमको धन देंगे, परन्तु फिर उस धन दिया नहीं गया, ऐसा पुरुष, राजासे क्रुद्ध होसक्ता है, इसा प्रकार भागे भो समझना चाहिय), किसी प्रकारके शिल्प या उपकारके कायम समान रोतिसे काम करने वाले दो पुर- पोमस एकका अधिक सरकार करके दूसरेका अपमान किया गया , राजाके विश्वस्त नाकरोने जिसको रामकुरम प्रवेश करनेसे रोक दिया हो, पहिले स्वय घुलाकर फिर जिसका तिरस्कार किया हो, राजाको आज्ञासे अत्यधिक प्रयास करनेक कारण ली हुआ २, व्यय करके मी (रिश्वत-घूस देकर भी जिसका कोई सरकारी काम पूरा न किया गया हो, जो अपने कुलझमागत किसी माघार (जसे दाक्षिगारर कुलोंमें अपने मामाका लडोसे विवाह कालेने का आधार है) के करनेसे, अथवा दायभाग लेनेसे रोक दिया गया हो, सरकार या अधिकार पदसे जिसको गिदिया गया हो, राजकुदके अन्य पुरषों से जो बदनाम किया गया हो, बलात्कार जिसकी वो छान लागई हो, जिसको कारागारमें डारदिया गया हो, विना विचार दूसरे कथनमाल जिसको दण्ड दिया गया हो,मिथ्या बात कहकर धर्मदा भाचरण करनसे जिसको रोका गया हो, जिसका पर्वत अपहरण कर लिया गया हो, अशक्य कार्यों पर नियुक करके जिसको कर दिया गया हो, जिसके पुत्र या बन्धु यान्धव आदिको देशसे निकाल दिया गया हो, इसप्रकारके पुरए राजासे क्रुद्ध होजाते हैं। इसी लिये उन्हे घड़ी आसानीसे फोा जासकता है। अर्थात् शत्रुले भेदकर अपनी ओर मिलाया जासकता स्वयमुपहतो विप्रकृतः पापकर्माभिख्यातस्तुल्यदोपदण्डेनो- 1द्विमः पर्यात्तभूमिदण्डेनोपनतः सर्वाधिकरणस्थःसा (स ) हसो. पचितार्थस्तरकुलानोपाशंसुः प्रद्विष्टो राजा राजदेवी चेति भीतवर्गः “॥४॥ इसके भनन्तर अप भीतवर्ग अर्थात् विजिगीपुस डरे हुए पुरुषोंको पतात,'-ओ धनके रिये स्वय किसीकी हिसा करके क्षित होचुका हो, (ऐमा पुरष विजिगीषुमे इसलिये डरता रहता है, कि कहीं विजिर्ग पु या खयाल न कर करे, कि जिसतरह इसने मुझसे रूपया देकर दूसरे आदर्माको मार दाहा है। इसी प्रकार शत्रुपक्षसे और अधिक रुपया लेकर कहीं मुझे न मार डाले। क्योकि विजिगीषुके दिलमें ऐया खपास होने पर वह भवश्यही मेरा ध करादेगा, इसलिये दरता रहता है), भन्त पुर आदिमें विजिगीषुके विस्व कार्य करने वारा, प्रमहरया आदि पार कर्मों के कारण बदनाम हुभा २० १४ मध्या०] विनयाधिकारिक अपने समान अपराध करने वाले पुरुषको दण्डित हुमा देखकर घबडाया हुआ, भूमिका अपहरण करने वाला, दण्डके द्वारा पशमें किया हुभा, सय राजकीय विभागोंपर अधिकार रसने वाला, जिसके पास अकस्मात् ही अथवा अपने परिधमसे बहुत सम्पत्ति इकट्ठी होगई हो, राजकुलके दायभागी किसी व्यकिके पास कुछ कामनासे आश्रित हुआ २, राजा जिसके साथ द्वेष करता हो, अधना राजासे जो द्वेष करता हो, इसप्रकार के व्यक्ति सदर विजिगीपुसे डरते रहते हैं, शनकोभी सरलतासे अपनी ओर मिलाया जासकता है ॥ ४ ॥ परिक्षीणो ऽत्यात्तस्नः कदयों व्यसन्यत्याहितव्यमहारथेति लुब्धयर्गः ॥५॥ जिसका सब वैभव नष्ट होगया हो, राजाने दण्डरूप या कररूपमें जिसका धन लेलिया दौ, कृपण, श्री तथा मद्यादि पानेका व्यसनी, और अप व्ययी पुरप लोभी होता है, ऐसे पुरपाको धन देकर बी सरलतासे वशमें किया जासकता है॥५॥ आत्मसंभावितो मानकामः शत्रुपूजामर्पितो नीचैरुपाहितस्ती- क्ष्णः साहसिको भोगेनासंतुष्ट इति मानिर्गः ॥ ६ ॥ 'मैं पटा विद्वान् या यहादुर हु । इस प्रकार अपने आपको बहुत कुछ समझने वाला, भपनी पूजा कराने की अभिलाषा रग्बने पाला, शत्रुकी पूजाको सहन न करने वाला, नीच पुरुषों के द्वारा बड़ाई कर २ के किसी कार्य में लगाया हुशा, अपनी जानकी भी कुछ परवाह न करने वारा (तीक्ष्ण ), सहसा किसी कार्य में प्रवृत्त हो जाने वाला, प्राक्ष धन आदि भोग्य पदार्थों से सन्तुष्ट न होने वाला, पुरप मानी होता है। ऐसे पुरष सत्कारके ही द्वारा सरलता पूर्वक परामें कर लिए जासकते हैं ॥६॥ तेषां मुण्डजटिलव्यञ्जनयों यद्भक्तिः कृत्यपक्षीयस्तं तेनोप- जापयेत् ॥ ७॥ उन मुद भादि कृत्यपक्षके पुर मेंसे सो मिस मुण्ट या अटिल वेषधारी गुप्त पुरुपका मन हो, उसही मुण्ड या जटिल व्यक्ति द्वारा उन २ उपायोंसे उसको वशम करे। अधार गनुस भित करके उसे अपनी भार मिलाने का मन करे ॥ ७॥ यथा मदान्धो हस्ती मत्तेनाधिष्ठितो यद्यदासादयति तत्सर्व प्रमृगात्येवमयमशास्त्रचक्षुरन्यो राजा पीरजानपदयधायाम्युत्थितः ।
[१ अपिल कौटलीय अर्थशास्त्र प्रतिज्ञा करके फिर धन न दिया गया हो (अर्थात् पहिले राजाने बचन दिया कि हम तुमको धन देंगे, परन्तु फिर उस धन दिया नहीं गया, ऐसा पुरुष, राजासे त्रुन्छ होसक्ता है, इसा प्रकार आगे भी समझना चाहिय), किसी प्रकारके शिल्प या उपकारके कार्यमे समान रीतिसं काम करने वाले दो पुरु पोमसे एकका अधिक सरकार करके दूसरेका अपमान किया गया हो, राजाके विश्वस्त नोकरोने जिप्सको राजकुलमे प्रवेश करनेसे रोक दिया हो, पहिले स्वयं बुलाकर फिर जिसका तिरस्कार किया हो, राजाको आज्ञासे अत्यधिक प्रयास करने के कारण दुःखी हुआ २, व्यय करके भी (रिधत-चूंस देकर भी) जिसका कोई सरकारी काम पूरा न किया गया हो, जो अपने कुलकमागत किसीभाचार (जैसे दाक्षिगार कुलों में अपने मामाको लड़हीसे विवाह कालेने का आधार है) के करनेसे, अथवा दायभाग लेनेसे रोक दिया गया हो, सरकार या अधिकार पदसे जिसको गिरादिया गया हो, राजकुलके अन्य पुरषोंसे जो बदनाम किया गया हो, बलात्कार जिसकी तो डॉन होगई हो, जिसको कारागारमै दालदिया गया हो, विना विचार दूसरके कपनमास जिसको दण्ड दिया गया हो,मिया पात कहकर धर्मदा भाचरण करनेसे जिसको रोका गया हो, जिसका सर्वस्व अपहरण कर लिया गया हो, अराश्य कार्योपर नियुक करके जिसको कर दिया गया हो, जिसके पुत्र या बन्धु पान्धव आदिको देशसे निकाल दिया गया हो, इसप्रकारके राजासे बुद्ध होजाते हैं। इसी लिये उन्दे बड़ी भासानीसे फोड़ा जासकता है। अर्थात् शत्रुसे भेदकर अपनी ओर मिलाया जासकता हे ॥३॥ स्वयमुपहतो विकतः पापकर्माभिख्यातस्तुल्यदोपदण्डेनो- द्विग्नः पर्यात्तभूमिदण्डेनोपनतः सर्वाधिकरणस्यःसा (स) हसो- पचितार्थस्तरकुलानापाशंसुः प्रद्विष्टो राधा राजदूपी चेति भीतवर्ग: ॥४॥ इसके भनन्तर अब भीतर्ण भयात् विजिगीपुसे दरे हुए पुरु पता:~ो धनके रिये स्वयं किसीकी हिंसा करके दूगिर होचुका हो, (ऐसा पुरष विजिगीपुझे इसलिये उरता रहता है, कि कहीं विजिगीषु या नयाल न कर हेरे, कि जिस तरह इसने मुझसे रूपया कर दूसरे आदमीको मार डाला है। इसी प्रकार शत्रुपक्षसे और अधिक रुपया लेकर कहीं मुझे न मार डाले, क्योंकि विजिगीषु के दिशमे ऐसा सयाल होनेपर वह भवश्यही मेरा पय कादिगा, इसलिये दरता रहता है); भन्त पुर आदिमें विजिगीषुके विख्य कार्यको करने वाला, प्रात्या भादि पाप कर्माके कारण बदनाम हुआ । -
१४ अध्या०] घिनयाधिकारिक
(४३)
अपने समान अपराध करने वाले पुरपको दण्डित हुभा देखकर घरढ़ाया हुआ,
भूमिका अपहरण करने वाला, दण्डके द्वारा वशमें किया हुभा, सब राजकीय
विभागोंपर अधिकार रखने वाला, जिसके पास अकस्मात् ही अथवा अपने
परिश्रमसे बहुत सम्पत्ति इकट्ठी होगई हो, राजकुलके दायभागी किसी व्यक्तिके
पास कुछ कामनासे आधित हुआ २, राजा जिसके साथ द्वेष करता हो, अथवा
राजासे जो द्वेष करता हो; इसप्रकारके व्यक्ति सदा पिजिगीपुसे डरते रहते हैं,
इनकोभी सरलतासे अपनी ओर मिलाया जासकता ।॥ ४ ॥
परिक्षीणो ऽत्यात्तस्वः कदर्यो व्यसन्यत्याहितव्यवहारथेति
लुब्धवर्गः ॥ ५॥
जिसका सब वैभव नष्ट होगया हो, राजाने दण्डरूप या कररूपमें
जिसका धन ले लिया हो, कृपण, स्त्री तथा मयादि पीनेका व्यसनी, और अप
ग्ययी पुरप लोभी होता है, ऐसे पुस्पोको धन देकर बड़ी सरलतासे वशी
किया जासक्ता है॥५॥
आत्मसंभावितो मानकामः शत्रुपूजामर्पितो नीचरुपहितस्ती-
क्ष्णः साहसिको भोगेनासंतुष्ट इति मानिवर्गः ॥ ६ ॥
'मैं बड़ा विद्वान् या यहादुर है। इस प्रकार अपने आपको बहुत कुछ
समाने वाला, अपनी पूजा कराने की अभिलाशा रखने वाला, शत्रुको पूजाको
सहन न करने वाला, नीच पुरुषों के द्वारा यमाई कर २ के किसी कार्य में लगाया
हुभा, अपनी जानकी भी कुछ परवाह न करने वाला (तीक्ष्ण ), सहसा
किसी कार्य में प्रवृत्त हो जाने वाला, मास धन आदि मोग्य पदार्थों से सन्तुष्ट
न होने वाला, पुरुष मानी होता है। ऐसे पुरप सस्कारके ही द्वारा सरलता
पूर्वक पशमें कर लिए जासकते हैं॥ ६ ॥
तेपां मुण्डजटिलव्यञ्जनेयर्यो यद्भक्तिः कृत्यपक्षीयस्तं तेनोप-
जापयेत् ॥ ७॥
उन मुद् आदि कृत्यपक्षके पुरुष मेंसे नो जिस गुण्ड या जटिल
पंपधारी गुप्त पुरुषका भक्त हो, उसहो मुण्ड या जटिल व्यक्ति द्वारा उन २
उपायांसे उसपो पराम करे। अर्थात् शत्रुस भिन्न करके उसे अपनी और
मिलाने का परन करे ॥७॥
यथा मदान्धो हस्ती मत्तेनाधिष्ठितो यद्यदासादयति तत्सर्व
प्रमृदात्येवमयमशास्त्रचक्षुरन्धो राजा पौरजानपदवधायाम्युस्थितः
॥८॥
कौटलीय अर्थशास्त्र
[१ अधिक
गुप्त पुरा हुन वर्ग के पुरपको यह कहकर उसके स्वामीसे भेदं डाले
कि 'देखो जैसे मस्त हाधी, प्रमादी पालरानमे चलाया हुआ, जो कुछ अपने
सामने पाता है उसेही कुचल डालता है, इसी प्रकार यह, शास्त्र रूपी धासे
होन अन्धा राजा, अपनी सरहके अन्धे मन्त्री के साथ रहता हुभा, नगरनिवासी
सया जनपद निवासी पुरषाको नष्ट करने के लिये तैयार हो रहा है ॥८॥
शक्यमस्य प्रतिहस्तिप्रोत्साहनेनापकर्तुममर्पः क्रियतामिति
बुद्धवर्गमुपजापयेत् ॥ ९॥
इसके साथ शत्रुना रखने वाले पुरपोंको प्रोत्साहन देनेसे अवश्यही
इसका कुर भपकार किया जासकता है। इसलिये राजाके प्रति प्रकोप उत्पा
करो, यह कहकर मुद्ध वर्गका राजासे भेद दलवावे ॥ ९ ॥
यथा भीतः सर्पो यस्माद्यं पश्यति तत्रं विषमुत्सृजत्येवमयं
राजा जातदोपाशङ्कस्त्वयि पुरा क्रोधविषमुत्सृजत्यन्यत्र गम्यता-
मिति भीतवर्गमुपजापयेत् ॥ १०॥
भीत वर्गके पुरपका इस प्रकार उसके स्वामीसे भेद दलवावे, गुप्त पुरुष
उससे कह कि देखो, जिस प्रकार डरा हुभा, सांप, जिधरसे भय देखता है, वहीं पर
अपना विष उगल देता है, इसी प्रकार इस राजाको तुम्हारी भोरसे कुछ शंका
हो गई है, और यह तुम्हारे ही ऊपर सबसे प्रथम क्रोध रूपी विप उगलने
पाला है, असा यही है कि तुम यहाँसे और कहीं चले जाओ। इस प्रकार
भात वर्गका भेद दलवाये । १०॥
यथा श्वगणिनां धेनुः श्वभ्यो दुग्धे न ब्राह्मणेभ्य एवमयं
राजा सत्चप्रज्ञावाक्यशक्तिहीनभ्यो दुग्घे नात्मगुणसंपन्नेभ्यः
१
लोभी पुरुष मो इस प्रकार मिस करे, गुप्त पुरुष उससे कई कि जिस
प्रकार चाहालों की गाय रन्होको दूध दे सकती है, प्राह्मणों के लिए नहीं दे
•सकती, इसी प्रकार यह राजा बर बुदे मोर यास्यक्ति हीन पुरुषों के लिए
ही फल दायक (या बामदायक ) हो सकता है, जो आरमगुणोंसे सम्पन्न
पुरप है, उनके हिय नहीं॥1॥
असौ राजा पुरुषविशेषज्ञस्तत्र गम्यतामेति लुब्धवर्गमुपजा-
पयेत् ॥ १२॥
4 १४ अभ्या०] चिनयाधिकारिक (४५) किन्तु वह अमुक राजा विशेष पुरपाको सूद अाहे, तुम्हें उसी की सेवा करनी चाहिये । इस प्रकार कहकर लुब्ध को उसके स्वामी से भिस करे ॥ १२ ॥ यथा चाण्डालोदपानश्चण्डालानामेवोपना नान्येषामेव- मयं राजा नीचो नीचानामेनोपभोग्यो न नामार्याणाम् ॥ १३ ॥ मिस प्रकार चाण्डालीफा कुक्षा चाण्डालोंके लिये, धाका साधन होता है, अन्य पुरुषों के लिये नहीं, इसी प्रकार यह नीचे। बीच पुरुपोंके लिये ही उपयोग अर्थात् सुसका साधन है, तुम्हारे सात सुवका साधन नहीं हो सकता ॥ १३॥ असौ राजा पुरुपनिशेपजस्तन गम्यतामिति मानि पयेत् ।। १४ ॥ किन्तु पह अमुक राजा विशेष पुष्पोको खूब समझता है, तुम चले जाओ । इस प्रकार कहकर मानिवर्गके पुरपाको उसके स्वामीसे मिलकर तथेति प्रतिपनांस्तान्संहितान्पणकर्मणा । योजयेत यथाशक्ति सापसान्स्वकर्मसु ॥ १५ ॥ इस प्रकार अपने स्वामीसे मिस हो जाने वाले पुरपाको, सस्य शपथ भादिके द्वारा उनसे सन्धि कर, गुप्त पुरपों साथ २, उन्हें यथाशक्ति अपने . कार्यों पर लगा देवे । अर्थात् जिन २ कार्यों पर वे पहिले रानाके पास लगे हुए थे, उन्हीं कार्यों पर लगा देये, परन्तु उनके साथ गुप्त पूरपाको अवश्य रक्खे, जिससे उनकी प्रवृत्तिका पूरा २ पता लगता रहे ॥ १५ ॥ लभेत सामदानाम्यां कृत्यांश्च परभूमिषु । अकृत्यान्भेटदण्डाभ्यां परदोपांश्च दर्शयेत् ॥ १६ ॥ इति चिनयाधिकारिके प्रथमे ऽधिकरणे परनिपये कृत्याकृत्यपशोपग्रह चतुर्दशो ऽध्याय ॥ १४ ॥ इस तरह शनुकी भूमिमें कृत्य पक्षक पुरुषोंको साम और दानके द्वारा अपनी ओर मिलाये । परन्तु जो अकृत्य पक्षके पुरप हों, उन मद और दण्ड के द्वारा अपने घशमें करनेका प्रयान करे, और उनके सामने शत्रुके दोपोंको परावर दिखाता रहे, जिससे कि ये सररतासे भिन्न हो सकें॥ १६॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें चौदहवां अध्याय समाप्त ।। ॥१७॥ न - 1 १५ अध्या विनयाधिकारिक (४९) फिसीका तिरस्कार न करे, प्रत्येकके मतको अच्छी तरह सुने। यहां तक कि बालकके भी सारगर्भित याक्यको, विचारशील राजा स्वीकार कर लेवे ॥२४॥ एतन्मन्त्रज्ञानं नैतन्मन्त्ररक्षणमिति पाराशराः ।। २५ ।। य- दस्य कार्यमभिप्रेतं तत्प्रतिरूपकं मन्त्रिणः पृच्छेत् ॥ २६ ॥ पराशर मतानुयायी आचार्य विशालाक्षक इस उपर्युक्त मतको मी स्वीकार नहीं करते। वे कहते हैं कि जो कुछ विशालाक्षने कहा है, उससे केवल मन्त्र का ज्ञान हो सकता है मन्त्रको रक्षा नहीं हो सकती ॥ २५॥ इसलिये राजा को जो कार्य अभिप्रेत, हो उसके समान ही किसी दूसरे 'कार्यकै सम्बन्ध मन्त्रियों से पूछे ॥ २६ ॥ कार्यमिदमेवमासीदेचं वा यदि भवेत्तत्कथं कर्तव्यमिति ॥ २७ ।। ते यथा युस्तत्कुर्यात् ।। २८ ।। एवं मन्त्रोपलब्धिः संवृतिथ भवतीति ॥ २९ ॥ पूछनेका प्रकार यह है किसी ऐतिहासिक घटनाको सामने रखकर कहे, कि यह कार्य पहिले इसप्रकार किया गया था, यदि यह इसप्रकारसे करना होता, तो कैसे करना चाहिये था ॥ २७ ॥ इस विषयमें मन्त्री जो कुछ कहें, उसहीके अनुसार अपना कार्य करे ॥ २८॥ ऐसा कानेसे मन्त्रका ज्ञान भी होजाता है, और मन्त्रको रक्षा भी रहती है ॥ २९ ॥ नेति पिशुनः ॥ ३० ॥ मन्त्रिणो हि व्यवहितमर्थ वृसमवृत्त वा पृष्टमनादरेण अवन्ति प्रकाशयन्ति वा ॥ ३१ ॥ परन्तु पिशुन (नारद) आचार्य पराशरके इस मतको प्राय नहीं सम. शता ॥ ३० ॥ क्योंकि इसतरह प्रकारान्तरसे मन्त्रियोंके सम्मुख किसी यातके पूछे जानेपर, वे यही समझाते है कि हमारे द्वारा किये जाने वाले कार्यों में भी राजा हमपर विधास नहीं रखता । इसलिये वे व्यवहित, पहिले हुई २ या न हुई घटनाक विषयमें पूछेजानेपर अनादरसे अर्थात् उपेक्षा पूर्वक ही उत्तर देते है। और उस मन्त्रको प्रकाशित भी करदेते हैं ॥ ३१ ॥ स दोपः ॥३२॥ तसाकर्मसु येपु येऽभिप्रतास्तैः सह मन्त्र- येत् ॥३३॥ तैर्मन्त्रयमाणो हि मन्त्रवृद्धिं गुप्तिं च लभत इति ॥३४॥ यह मन्त्रके लिये एक दोप है.॥ १२ ॥ इसलिये राजाको उचित है, कि जो पुरुष जिन २ कार्योंपर नियुक्त किये हुए है, तथा विचार करने के लिये राजाको आभिमस भी है, उही पुरषोके साथ राजा मनसा रे ॥३३॥ धयोंकि १ कौटलीय अर्थशास्त्र [१अधिक उनके साथ गुह्य मन्त्रोंको विचारता हुआ राजा मन्त्र पृद्धिको भी प्राप्त करता है, और मन्त्रको रक्षामा अछीताद कर सकता है ॥ ३५ ॥ नति कौटल्यः ॥ ३५ ॥ अनास्था होपा ॥३६ ॥ मन्त्रि- भित्रिभिश्चतुर्भिर्वा सह मन्त्रयेत ॥ ३७॥ परन्तु कोटत्य आघाय भारदके भी इस मतको प्राश नहीं समझता ॥३५॥ क्याकि वह कहता है कि यह नारद आचार्यने जो कुल ऊपर कहा है, इसक अनुसार मन्त्र कभा व्यवस्थित नहीं होसकता । राजकार्य बहुत प्रकार के होते हैं, उन कार्योंपर पृथक् २ नियुक्त हुए २ अधिकारी भी बहुत होते है, प्रत्येकके साथ विचार करनस कभी मन्त्रको व्यवस्था नहीं होसकती ॥ ३६ ।। इसलिये इसी कार्यपर नियुक्त हुए २ तीन या चार मन्त्रियोंके साथ मिलकर ही मन्त्रणा करनी चाहिये ॥ ३७ ॥ मन्त्रयमाणो टेकेनार्थकृच्छेपु निश्वयं नाधिगच्छेत् ॥ ३८॥ एकश्च मन्त्री यथेष्टमनवग्रहश्चरति ॥ ३९॥ द्वाम्यो मन्त्रयमाणो द्वाभ्यां संहताम्यामवगृह्यते ॥४०॥ क्योंकि एकहा मन्त्राके साथ मन्त्रणा करता हुभा राजा, कठिनतासे निश्चय करने योग्य कार्योक भापडने पर अर्थका निश्चय नही कर सकता ॥३०॥ और भकले मन्त्री अपना इच्छाक भनुसार राजाका प्रतिद्वन्दी बनकर प्रत्येक कार्यको करलेता है ॥ ३९ ॥ यदि कचल दामन्त्रियोंकही साथ राना विचार करता है, तो यह पहुत सम्भव है कि वे दानों आपस में मिलकर राजाको अपने प्रशों करहे॥४०॥ निगृहीताभ्यां विनाश्यते ।। ४१ ॥ त्रिपु चतुर्पु वा नैकान्तं करदेणोपपद्यते महादोपम् ॥ ४२ ॥ उपपन्नंतु भवति ॥४३॥ अपवा यदि मापसमें उनका झगडा हो जाय, तो कायंका ही सर्वधा नाश हो जाय । क्योंकि ये दोना ही भापसमें अगडा करके मंग्रको फोर दें, या कार्यको उचित रीतिपर, झगरेक कारण, को ही नहीं ॥४१॥ परन्तु तीन या चार मन्त्रियों के सलाहकार हानपर, इस प्रकारका बाई मी अनर्थकारी महानदीप कदापि उत्पन्न नही हा सकता। यदि किसी तरह हो भी जाये तो कठिनतासे ही होता है, अचानक नहीं ॥ ४२ ॥ फिर भी कार्यमें कोई प्राधा नहीं पड़ती। यह ठीक तौर पर होता ही रहता है |॥ ५३॥ ततः परेषु कृष्णार्थनियो गम्यते ॥४४॥ मन्नो वा E । १५ अध्या०] विनयाधिकारिक रक्ष्यते ॥ ४५ ॥ देशकालकार्यवशेन त्वेकेन सह द्वाभ्यामेको वा यथा सामर्थ्य मन्त्रयेत ॥ ४६॥ यदि चारसे अधिक मंत्री हो जाये, तो फिर कार्यका निश्चय कठिनता से ही होता है । क्योंकि बहुतसे व्यक्तियोंकी सम्मति भिन्न २ होनेपर निर्णय करना कठिन हो जाता है ॥४४ ॥ तथा मन्त्रको रक्षा करना भी कठिन होता है । क्योकि मन्त्रका बहुत आदमियों को पता होने पर उसके फूट जानेकी अधिक सम्भावना रहती है ॥ १५॥ देश, काल और कार्यके अनुसार, एक या दो मन्त्रियोंके साथभी राजा मन्त्रणा करे । सामयंक अनुसार स्वयं अकेला भी किसी कार्यका विचारकर निर्णय कर सकता है ॥ १६॥ कर्मणामारम्भोपायः पुरुपद्रव्यसंपदेशकालविभागो विनिपा- तप्रतीकारः कार्यसिद्धिरिति पञ्चाङ्गो मन्त्रः ॥४७॥ तानेकेकशः पृच्छेत् समस्तांश्च ॥ ४८ ॥ मन्त्र के पांच अङ्ग होते है-(१-कायोंके प्रार: करनेका उपाय (अपने देशर्म साई परकोटा आदिक द्वारा दुर्ग आदि धनाना, तथा दूसरेके देशमे सन्धि निमह आदिके लिये दून आदिको भेजना ये कार्य कहाने हैं। इनके प्रारम्भ कर. नेका साधन या प्रकार, यह मन्त्रका पहिला अह है। इसी प्रकार), (२;-पुरुष ओर द्रव्य सम्पत्ति (पुरए अपने देशम, दुर्ग आद चनानम अत्यन्त चतुर यदई लुहार आदि और द्रव्य लकड़ी पत्थर आदि; दृमरकै देशम पुस्प, सन्धि आदि करनेमे कुशल दूत तथा सेनापति आदि और द्रव्य रत्न सुवर्ण आदि), (२)-देश भौर कालका विभाग (अपने देशम, देश दुर्ग आदिक यनानेके लिये जनपदके पीचर्म अथया जालंक किनार परका कोई उपयोगी प्रदेश, और काल सुभिक्ष दुर्भिक्ष तथा पपी आदि, दूसरेके देशमे, देश, सन्धि आदि करनेपर कोई उप- जाऊ प्रदेश, और काल आक्रमण करने या न करनेको अवस्था, कहाता है। इनका विमाग अर्थात् वियंचन करना मन्त्रका तासरा अग है ।, (४)-विनिपात प्रतीकार (अपने दुर्ग आदिपर आने वाले या आये हुए विधाका प्रतीकार करना चौथा भज), तथा (५)-कार्य सिन्धि (उन्नति अपनति और सम अवस्था ये तीन प्रकारकी ही सिद्धि अथात् पिसी कार्यके फल निकल सकते है। अर्थात् उपयुक्त प्रकारसे कार्य करनेपर अपनी उत्ति, उत्रुको अनयति, अथवा दोनोंकी सम भवस्थाका होनाही कार्यसिद्धि पहाजाता है ।) इसप्रकार मन्त्रके ये पांच अङ्ग होते है ॥ ५७ ॥ इसतरह मन्त्रक विषयमें राजा पृथर २ एक २ मन्त्रीको पुलाकर भी पूछ सकता है, अभवां सभामे समस्त मन्त्रियों को बुलाकर पूछ सकता है, कि इस कार्यको किसमकार किया जाय ॥४८" .
है (५२) कौटलीय अर्थशास्त्र १ अधिक हेतुमिथैषां मतिप्रविवेकान् विद्यात् ॥ ४९ अवाप्सार्थः कालं नातिकामयेत् ॥ ५० ॥ युक्ति पूर्वक इनके भिस २ अभिप्रायोको समझे। (किसी २ पुस्तकमें "हंतुभिश्चकक मतं प्रविशेद विद्वान्" इस प्रकारका सूत्र पाठ है । उसका अयं इस तरह करना चाहिये-विचारशील राजा प्रत्येक मतको समझे। अर्थ दोनो पाठोंमें एकहा है ) ॥ ४९ ॥ अर्थका निश्चय करके उसको शीघही. कार्यमें पारणत करनका यरन करे । समयको व्यर्थ विता देना भच्छा नहीं होता ॥५०॥ न दीर्घकालं मन्त्रयेत ॥५१॥ न च तेषां पश्यैर्येपामपकु- र्यात् ।। ५२ ॥ किसी एक कार्यको यहुत समय तक विचारते जाना भी भरला नहीं होता। तात्पर्य यह है, जो कुछ करना हो, उसे शान विचार पूर्वक निश्चय करके भारम्भ कर देना चाहिये । बटुन विचारतही रहने में मन्त्र फूट जाता है, और कार्य पूरा नहीं होता ॥ ॥ जिा पुस्पाका कभी कुछ अपकार किया हो. ऐसे पुरपाके साथ या इनक पक्षको मानने पाले पुरुपोंके साथ भी कभी मन्त्रणा न करनी चाहिये। क्याकि एस पुरप कमा मन्त्रको गुप्त नहीं रख सकते । (५. और ५२ इन दो सूत्राक स्थान पर किसी २ पुस्तकमे एकही सूत्र है, वह कुछ पाठ भेद से इस प्रकार है-'न दीर्घकाल मन्नयेत व संगा च रक्षेपामपपुर्यात्"। भयं इस प्रकार है-दोघंकाल तक मन्त्रणा न करे, भार उन लोगास मन्त्रको रक्षा करे, जिनका पहिल कभी कुछ अपकार कर चुका हो ।' अभिप्राय दोनों पाठाम समारहा है।) ॥५२॥ मन्त्रिपरिषदं द्वादशामात्यान्तुतिति मानवाः ॥ ५३ ॥ पोडशेति पार्हस्पत्याः ॥ ५४ ॥ विंशतिमित्याशनसाः ॥ ५५ ॥ ममुके अनुयायो कहते हैं कि एक मन्त्रिपरिषद्म दारह अमात्योंको नियुक्त करे । अर्थात् बारह अमात्यकी मन्त्रिपरिषद् होनी चाहिये ॥ ५३॥ पृहस्पनिक भनुयायो कहते हैं कि पर मन्त्रिपरिषद्म से पद अमात्य होने चाहिये ॥ ५५ ॥ उशना (शुष) भात्रर्यके अनुयायियोंका सिद्धान्त है कि पीस भमात्यों की एक मन्त्रिपरिषद् होनी चाहिये ॥ ५५ ॥ यथामामर्थ्यमिति कौटल्यः ॥ ५६ ।। ते यस्य स्वपक्षं पर- पक्षं च चिन्तयेयुः ।। ५७ ॥ अकृतारम्भमारधानुष्ठानमनुष्ठित- विशेष नियोगर्मपदं च फर्मणां कुर्युः ॥५८ ।।
पूरा करावे, , १५ अध्या० विनयाधिकारिक (५३), परन्तु फौटल्य कहता है, कि कार्य करने वाले पुरपोंके सामर्थ्य के अनु- सारही उनकी संख्या नियत होनी चाहिये ॥ ५६ ॥ उत्तनेही पुरुष, विजिगीषुके अपने पक्ष भौर परपक्षका विचार करें ।। ५७ ॥ और जो कार्य अभीतक प्रारम्भ न किये गये हों उनका प्रारम्भ कराव; प्रारम्भ किये कार्याको जो कार्य पूरे होचुके हो उनमें और कुछ विशेषता (सफेदी कराना, तरह २ की चित्रकारी कराना आदि करानी हों, तो यह भी कराधे । तात्पर्य यह है कि जिस २ तरहके भी कार्य हों, उन २ विमागोके कार्यकत्तां अपने कार्योको अन्त तक पहुत अच्छी तरह करवावे ॥ ५८ ॥ आसन्नैः सह कार्याणि पश्येत्, अनासत्रः सह पत्त्रसंप्रेषणेन मन्त्रयेत ।। ५९ ॥ जो मन्त्री राजाकै समीपही रहते हो, राजा उनके साथ मिलकर कार्यो- को देखे । परन्तु जो दूर रहते हों, उनके पास लिखित पत्र आदि भेजकर कार्य- का निश्चय करे ॥ ५९॥ इन्द्रस्य हि मन्त्रिपरिपपीणां सहस्त्रम् ।। ६० ॥ स तचक्षुः ॥६१ ॥ तस्मादिम यक्षं सहस्राक्षमाहुः ॥ ६२ ॥ इन्द्रकी मन्त्रिपरिपर्दो एक हजार ऋषि थे ॥ ६० ॥ ये ही कार्योके दिसाने वाल होने के कारण इन्द्र के चक्षुके समान थे ।। ६१ ॥ इसलिये इस दो आंपवाल. इन्द्र को भी महनाक्ष (हजार आँखाला) कहाजाता है। इसीप्रकार प्रलोक राजाको अपनी मनिपरिपम सरमध्यानुसार अनेक मन्त्रियोंको नियुक्त कराना चाहिये ॥ १२॥ आत्ययिक कार्य मन्त्रिणो मन्त्रिपरिपदं चाहूय घूयात् ॥६३!! तत्र यभूयिष्ठाः कार्यसिद्धिकरं वा युस्तत्कृर्यात् ॥६४॥ जब कोई कठिन समस्या आपड़े, या प्राणों तकुका भय हो, तो मन्त्रियों और मन्त्रिपरिषदको बुलाकर राजा उनसे सब कुछ कहे, और उनकी सम्मति को ॥ ६३॥ उनमें अधिक मन्त्री जिस बातको क्रे, अयना जिम उपायको शीघही कार्यकी सिद्धि कराने याला प्रतायें, राजाको चाहिये कि उमही उपायका अनुष्टान करे ॥ ६ ॥ कुर्वतश्चः-- 'नास्य गुझं परे विद्युः छिद्रं विद्यात्परस्य च । गृहेत्कूर्म इवाङ्गानि यत्स्याद्विवृतमात्मनः ।। ६५ ।।
[१अधिक (५७) कौटलीय अर्थशास्त्र इसप्रकार अपने कार्योंको करते हुए राजाके गुह्य मन्त्रोंको कोई दूसरे पुरप नहीं जान सकते, प्रत्युत वह दूसरोंके दोषोंको जान लेता है । जिसपकार कटुवा अपने अङ्गाको संकुचित करके रखता है, उन्हें फैलने नहीं देता, इसीप्र- फार राजाको चाहिये कि अपने आन्तरिक मागेको फलने न देवे। पन्न पूर्वक उमको छिपाकर रक्तं ॥ ५ ॥ यथा ह्यश्रोत्रियः श्राद्धं न सता भोक्तमर्हति । एवमश्रुतशासार्थो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ।। ६६ ॥ इति विनवाधिकारिके प्रथमे ऽधिकरण मन्त्राधिकारः पादशोऽध्यायः ॥१५॥ जिसरकार वेद में पड़ने वाला माहाण, श्रेष्ठ पुरुषों के यहां श्राद्ध नहीं खासकता, इसीमकार जिसने शास्त्र के अभिप्रायको नहीं मुमा या जाना है, यह मन्त्रको नहीं सुन सकता । अर्थात् राजनीति शास्त्र भावि में भसन्त निपुण विद्वानोको ही मन्त्राधिकारपर नियुत करना चाहिये । ६६॥ विनयाधिशारिस प्रथम अधिकरणमै पन्द्रयां अध्याय समाप्त । । सोलहवां अध्याय। १२ करण। दूतप्रणिधि। उद्धतमन्त्री दूतमणिधिः ॥ १॥ अमात्यसंपदोपेतो निस. पार्थः ॥ २ ॥ पादगुणहीनः परिमितार्थः ॥ ३ ॥ अर्धगुणहीना शासनहरः॥४॥ मन्त्र के निश्चित होजानेपर ही दूतको भेजना चाहिये ॥ १॥ दूत तान प्रकार होते है--निसष्टार्थ, परिमिताय और शासनहर । अमात्य जो गुण पहिले पतलाये गये है, वे सम्पूर्ण गुण जिसमें हों वह निष्टा नामक दूत पहाता है। इन गुणमेस धीधाई गुण विप्लमें फग हो वह परिमिवार्थ, और जिसमे माध कम हो व शासनहर कहाजाता है। २,३,५॥ सुप्रतिविहितयानवाहनपुरुपपरियापः प्रतिष्ठेत ॥ ५ ॥ शा. सनमेवं पाच्यः परः, स वक्ष्यत्येवं, तस्पैदं प्रतिवाश्यमेभति- संघातच्यमित्यधीयानो गच्छेत् ॥ ६॥ पालको आदि सवारी, घोहे भादि वाहन, नौकराकर और साने विधाने मादिक सामानका अच्छीतर प्रवन्ध करकेही, दूनको शत्रु देशकी और जाना १६ अध्या०] विनयाधिकारिक चाहिये ॥ ५॥ अपने स्वामीका सन्देश शत्रुसे इसप्रकार कहना चाहिये, वह इसका इसतरह उत्तर देगा, मुझे उसका इसप्रकार प्रत्युसर देना चाहिये, और अमुक २ प्रकारोंसे उसे पशमें करना चाहिये, इत्यादि बातोंका विचार करता हुआ ही दूत शत्रुके देशकी ओर जावे ॥ ६ ॥ अटव्यन्तपालपुरराष्ट्रमुख्यैश्च प्रतिसंसर्ग गच्छेत् ॥ ७ ॥ अनीकस्थानयुद्धप्रतिग्रहापमारभूमीरात्मनः परस्य चावेक्षेत ॥८॥ आरविक, अन्तपाल (सीमारक्षक), नगर तथा राष्ट्र में निवास करने वाले अन्य मुरण २ व्यक्तियोंमे मित्रता उत्पन्न करे ॥ ७ ॥ अपनी और शत्रुकी, येनाओंके ठहनके लिये युद्धोग्य भूमि तथा अवसर आनेपर भागे जासकने योग्यभी भूमियोंका निरीक्षण करे ।। ८॥ दुर्गराष्ट्रप्रमाणं सारवृत्तिगुप्तिच्छिद्राणि चोपलभेत ॥९॥ और इस यातका जानना भी आवश्यक है, कि दुर्ग कितने हैं, राज्यकी लम्बाई चौडाई कितनी है, किस २ विभागसे कितनी २ आमदनी हे, धान्य या सुर्वण आदिकी उत्पत्ति कैसी होती है, सर्वसाधारण लोगोंकी जीविका क्या है, राष्ट्र की रक्षा किस प्रकार कीजाती है, और शत्रुके अन्दर क्या २ दोष हैं। इत्यादि सबही यातोका दूसको पता लगाना चाहिये ॥ ९॥ पराधिष्ठानमनुज्ञातः प्रविशेत् ॥ १०॥ शासनं च यथोक्तं घूयात् ॥ ११ ॥ प्राणाबाधे ऽपि हटे ॥ १२ ।। श के स्थानमें उसकी स्वीकृति रेकरही प्रवेश करे ॥ १०॥ प्राणीका भय उपस्थित होने पर भी, अपने स्वामीके सन्देशको ठीक २ कहे ।। 12-१२ ॥ परस्य वाचि वक्त्रे दृष्टयां च प्रसादं वाक्यपूजनमिष्टपरि- प्रश्नं गुणकथासङ्गमासन्नमासनं सत्कारमिष्टेषु स्मरणं विश्वासगमनं च लक्षयेत्तुष्टस्य ॥ १३ ॥ यदि शत्रुकी याणीमे मुसमें, ओर दृष्टि में प्रसन्नता देखे, भपमे (दूतमे). कयनका सरकार, अपनी इच्छानुसार प्रश करना या अपना अभीष्ट (जैसा प्रश्न किया जाना दूत चाहता है, वैसाही ) प्रश्न काना, अपने स्वामीका (दूत- के स्वामीका पुशल प्रश पूना, उसके गुणोका वर्णन किये जानेपर उसे ध्यान पूर्वक सुनना, अपने समीपदी बटनके रिये आसन देना, सरकार करना, विशेष उत्सव आदिम दूतको याद करना, और दूतके कार्योंपर विश्वास करना, इत्यादि पातीको दानुम देरी, तो दूतको समझ रेगा चाहिये कि शत्रु मुशपर प्रसा ।
वै । ' कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक विपरीतमतुष्टस्य ॥ १४ ॥ तं घूयात् ॥ १५ ॥ दूतमुसा राजानस्त्वं चान्ये च ॥१६॥ इससे विपरीत भाव होनेपर उसको अपनेमे अप्रसन्न समझे ॥ १५ ॥ दूत उसको (अप्रसन्न हुए शनुको) कहे, कि ॥ १५॥ आप और दूसरे सपही राजाजन दूत मुखही होते हैं । अर्थात् दृतहो उनके मुग्य होते हैं, घे उन्हीं के द्वारा अपनी सब बातोंको एक दूसरेको सुनाते है ॥ १६॥ तसादुयतेप्यपि शस्त्रेषु यथोक्तं वक्तारस्तपामन्तावसायिनो ऽप्यपध्याः ॥ १७ ॥ किमङ्ग पुनर्ब्राह्मणाः ॥ १८ ॥ परस्यैत- द्वाक्यमेप दूतधर्म इति ॥ १९ ॥ इसलिये उन्हें वध करनेके लिये शस्त्र उठाये जानेपर भी, वे (दूत) ठोक २ वासको कहने वारेही होते है। उनमें यदि कोई चाण्डाल भी इस का. यको करने वाला हो, तो घइभी अवघ्यही होता है। फिर ब्राह्मणका तो कहना ही क्या अर्थात् दूतका कार्य करने वारा चाहे नीच चाण्डाल भी हो, पह । भी पथ्य नहीं होता। १७-१८॥ क्योंकि जो कुल घे कहते हैं, यह उनका वाक्य नहीं होता, किन्तु दूसरेका हो होता है। यहांतक दूतधर्मका निरूपण किया गया ॥ १९॥ वसेदविसृष्टः प्रपूजया नोसिक्तः ॥ २० ॥ परेषु चलित्वं न मन्येत ॥ २१ ॥ वाक्यमनिष्टं सहेत ॥ २२ ॥ स्त्रियः पानं च वर्जयेत् ।। २३ ॥ एकः शयीत ॥ २४ ॥ जबतक शत्रु राजा उसे जानकी आज्ञा न दे, तबतक वहीं निवास करे। 'शत्रुके द्वारा किये गये सत्कारसे गर्वित न होजावे ॥ २० ॥ शनुओंके बीच अपने आपको बहुत बलवान् न समझे ॥ २५ ॥ यदि कोई बुरा वाक्य भी अपनेमे कहते, तो उसे सहन करले ॥ २२ ॥ खीसंग तथा मद्य आदिका पीना सर्वथा छोट देने ॥ २३ ॥ अपने स्थानमें अकेलाही शयन करे ॥ २५ ॥ सुप्तमत्तयोहि भावज्ञानं दृष्टम् ॥ २५ ॥ क्योंकि मच भादि पीनेसे भादमी पागल होजाता है और अपनी गुप्त बातों को भी उगल देता है । इसीतरह सोते समय कभी २ भादमी अपने हार्दिक भावोंके अनुसार मनमाने लगता है, यदि यहां कोई दूसरा भादमी होवे, तो गुप्त रहस्याको जान जाता है । इसलिये दूतको मध पीना और किसीके साथ सोना भत्यन्त वर्जित है ॥ २५॥ .
१६ अभ्या०] विनयाधिकारिक कृत्यपक्षोपजापमकृत्यपक्षे गूढप्रणिधानं रागापरागी भर्तरि रन्धं च प्रकृतीनां तापसपैदेहकव्यञ्जनाभ्यामुपलभेत ।। २६ ॥ शत्रुके देशके कृत्यपक्ष (देसो-अधि , अध्या १४) को शत्रुसे मिन करदेने का वाय, अकृस्य पक्षमें गुढपुरषों (सक्षिण, रसद आदि) का प्रयोग, अमात्य आदि प्रकृतियोका राजाम अनुराग या अपराग तथा राजाके दोषोंकों, सापस और वदेहक (व्यापारी ) के येपमें यहा रहने वाले अपने गुप्तचरॉके द्वारा जाने ॥२६॥ तयोरन्तेवासिभिश्चिकित्सकपापण्डव्यञ्जनोभयतनैर्वा ॥२७॥ तेपामसभापायां याचकमत्तोन्मत्तसुप्तप्रलापैः ।। २८॥ अथ तापस और वैदेवकके शिके शमा चिकित्सक तथा पापड के वेशमें रहनेवाले गुप्तचरके द्वारा अथवा उभयवेतन गुप्त पुरपोंके द्वारा, शत्रु के सय कार्योंका पता लगावें ॥ २०॥ यदि इन लोगोंके साथभी यातचीत करनेका अवसर न मिलसके, तो शिघुक, मत्त, उन्मत्त तथा सुप्तप्रलापीके द्वारा जितनाभी मालम होसके शत्रुके कायौंका पता लगाये ॥२८॥ पुण्यस्थानदेवगृहचित्रलेख्यसंगाभिर्वा पारमुपलभेत ॥२९॥ उपलब्धस्योपजापमुपेयात् ॥ ३० ॥ मतद भाविक पावन तीर्थ स्थानो, देवालयो, भरके चित्रों तथा अन्य लिपित इशारोके द्वारा, यहाके समचार जाने ॥ २९॥ डाक २ समाचारों के गारम हो जाने पर, उनके अनुसार यथावश्यक भेद रूप उपाय का प्रयोग करे ॥ ३०॥ परेण चाक्तः खासां प्रकृतीनां परिमाणं नाचक्षीत !! ३१ ।। सर्व वेद भवानिति श्रूयात् ।। ३२ ॥ कार्यसिद्धिकरं वा ।। ३३ ।। शत्रुके पुराने पर भी, अपनी अमात्य भादि प्रकृतियोंकी टीका र अवस्था को न यताये ॥ ३१ ॥ केवल इतना कहदे कि, आप सब कुछ जानते ही हैं, मैं आपके सामने और अधिक क्या कह सकता ह ॥ ३२ ॥ यदि इतने उत्तरसे शत्रु सन्तुष्ट न हो, तो अपने अमात्य भादिकी उतनी ही हालत पतला देवे, जितनीसे कि अपनो कार्य सिद्धि होजाय । भान् जिपये अपने कार्य में किसी प्रकारको पाधा उपस्थित न हो ॥ ३३ ॥ कार्यस्यसिद्धायुपरुध्यमानस्तर्कयेत् ॥ ३४ ॥ किं भर्तु में व्यसनमामन्नं पश्यन् ॥ ३५ ॥ खं ना त्र्यसनं प्रतिकर्तुकामः है H . (५८) कोटलीय अर्थशास्त्र [भिधि ॥ ३६॥ पाणिग्राहासारान्तिःकोपमानिक या समुत्थापयितु- कामः ॥३७॥ मित्रमाक्रन्दं वा व्यापादयितुकामः ॥ ३४ ॥ खं वा परतो निग्रहमन्तः कोपमाटपिकं वा प्रतिकर्तुकामः ॥३९॥ 'संसिद्धं में भर्तुर्यानाकालममियन्तुकामः सस्यकुप्यपण्यसंग्रहं दुर्ग- कर्म पलसमुत्थानं वा कर्तुकामः ॥ ४० ॥ स्वसैन्यानां या व्या- यामदेशकालाकांक्षमाणः ॥४१॥ परिभवप्रमदाम्यां वा ॥४२॥ 'संसंगीनुबन्धार्थी या ॥ ४३ ॥ मामुपरुणद्धीति ॥४४॥ कार्यके सिद्ध होजानपर यदि शत्रु राजा दूत को अपने यहा ही रोक- लेता ह, अर्थात् उस अपने देशम चल जाने की अभी अनुमति नहीं देता, तो - दूतको विचारना चाहिये, कि यह मुझे क्यों रोक रहा है ॥ ३४ ॥ क्या इसने मेरे स्वामीपर, समीपमें ही आनेवाली किसी विपत्तिको जान लिया है ॥३५॥ या मेरे जानेस पहिल ३ अपने किसी व्यसनका प्रतीकार करना चाहता है ॥३६॥ अथवा पाणिग्राह (भपने स्वामीका शत्रु, अर्थात् शत्रु राजाका मिरभूत) और आसार (पाणिपाहका मित्र, अर्थात् शत्रुके मिश्रका मित्र, इन) को मेरे स्वामी के साथ युद्ध करने के लिये उभारना चाहता है। या मेरे स्वामीके अमात्य "आदिको उसस कुपित कराना चाहता ह, या किसी भाटाविकको संराने के लिये संथार करना चाहता है ॥ ३० ॥ अथवा मित्र (विजिगीषुके सामने की आरका मिश्रा और आनन्द (विजिगरपुके पीछकी भोरका मित्र । यह आगे पीछेकी कल्पना, शत्रुके देशको आगे समाकर उसी के अनुसार करनी चाहिये) को मारना चाहता है। किसी पुस्तकों मित्रमाक्रन्दाभ्यां इस तरहका भी पाठ 'है, उसका अर्थ इस प्रकार करना चाहिये -अपवा भकिन्दार द्वारा मिनको मरवाना चाहता है ॥ ३८ ॥ अधा दूसरेसे अपन जारी किये हुए आक्रमगका "अपडे भन्न कोंप (भमाय आदि अपनी प्रकृतियोंके कोप) का, या अपने आट विकका प्रतीकार करना चाहता है ॥ ३९॥ अथवा मेरे स्वामीक, इसपर, इस रचित यक्रमणके समय को टालना चाहता है, या इसमें रुकावट दारना चाहता है। अथवा अपन धान्य, लोहा तांबा, सथा इसी मकारकी अन्य आच 1 इयक वस्तुओका सह, दुर्ग आदि पनवाना, तथा सनाओंका संग्रह करना चाहता है ॥ ४॥ अथवा अपनी सेनाओंकी क्वायद, तथा उनकी स्थितिके लिये उचित देश और कारकी आकांक्षा कर रहा है ॥ अथवा किसी प्रकारक तिरस्कार, या सइयासको प्रतिके कारण ॥ ४२ ॥ अथवा विवाद आदि किसी सम्बन्धक निमित्त या मेरे विश्यमें किमा प्रकारको दोष उत्पन्न करने के P4 १६ अध्या दिनयाधिकारिक निमित्त ॥ १३ ॥ मुसे रोक रहा है । दूत अपने रोके जानेके इन सप उपयुक्त कारणों का भरठी तरह विचार करे ॥४४॥ ज्ञात्वा वसेदपसरेद्वा ॥४५॥ प्रयोजनमिष्टमवेक्षेत वा ॥१६॥ शासनमनिष्टमुरुत्वा पन्धवधभयादविसृष्टो ग्यपगच्छेत् ।। ४७ ।। अन्यथा नियम्येत ॥४८॥ जब ठीक २ रोकने के कारणका पता लग जावे, तो उसके अनुसार अपनी अनुकूलता देखकर वहीं निवास करे, अथवा प्रतीफूल होने पर वहासे चलाजावे ॥१॥ अथवा अपने स्वामीके किसी अभीष्ट प्रयोजनका विचार करता हुआ, शत्रुके नगरम ही रहे, और गृढ पुरपीके द्वारा अपने सब समाचारोको राजातक पहुचाकर, राजा के द्वारा हरी इन सब बातोका प्रतीकार करावे ॥४६॥ शनु राजाको सर्वथा अप्रसग कर देनेवाले, अपने (मालिक) सन्देश को सुना कर, दूत, भपने पकड़े जाने, या मारे जानेके भयसे शगु राजाकी अनुमति के मिनाही यहासे चला जाये ॥ १७ ॥ ऐसा न करनेपर, दूत पकर लिया जाता है॥१८॥ प्रेपणं संधिपालत्वं प्रतापो मित्रसंग्रहः । उपजापः सुहडेदो गृढदण्डातिसारणम् ॥ ४९ ॥ शत्रुके देशमे अपना सन्देश सुनाने ओर शत्रुका सन्दश सुननेके रिय भेजना, पहिरो कोहुई सन्धिको रक्षा करना, असर आनेपर अपने प्रतापमा प्रकाशन करना, मित्रोंका सग्रह करना, शत्रुके कृत्यपक्षक पुरपोम भेद डारना, शत्रु के मित्रीको उससे भिन्न फरना, तदिग, रसद आदि गृठपुरपी तथा सेनाका भगा देना ॥ ४९॥ अन्धुरतापहरणं चारज्ञानं पराक्रमः । समाधिमोक्षो दूतस्य कर्म-योगस्य चाश्रयः ॥ ५० ॥ बन्ध (अर्थात् शक) राधा रस्नाका अपहरण करना, अर्थात् उह अपने अधीन करना, शत्रुके देशम रहते हुए गुप्तचरोंके कार्योंको टीक २ जानना, भामर आनेपर पराक्रम दिसाना, सन्धिकी रदताके रिथे भाषि (जमानत) रूपमे रखे हुए राजकुमार आदिका छुगाना, औपनिषदिक प्रकरणमें बताये हुए मारण भादिका प्रयोग करना, ये सब दूतके कर्म है ॥७॥ स्वदूतैः कारयेदेतत्परदूतांच रक्षयेत् । प्रतिदूतापसीभ्यां दृश्यादृश्यैश्च राशिमिः ॥ ५१॥ इति पिनाधिकारिक प्रयो, ऽधिकरणे शिभिः पदो या " १ अघि कौटलीय अर्थशास्त्र राजाको उचित है कि इन सब उपयुंफ कार्योंको अपने दूतोंसे करवावे । भौर शभुके दूतोंके पीछे अपने और दूत लपादेवे,अथवा गृढपुरमोंको लगादेवे। अपने देशमें तो वे उस दूतके प्रत्येक कार्यका प्रकट रूपमे रहते हुएही पता लगाते रहें, शत्रु देशम उसके सेवक बनकर अरश्य रूपमें उसकेही पास रहे, भौर उसके प्रत्येक कार्यमा पता रगावे। इसप्रकार इन पुरपाक द्वारा राजा शत्रुके दूतोंके प्रत्येक कार्यकी गरेरणा करता रहे ॥ ५ ॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें सोलहवां अध्याय समाप्त । सत्रहवां अध्याय। (३प्रकरण राजपुत्रोंसे राजाकी रक्षा । रक्षितो राजा राज्यं रक्षत्यासत्रेभ्यः परेभ्यश्च ॥ १॥ पूर्व दारेभ्यः पुत्रेभ्यश्च ॥ २॥ अपने समीप रहने वले पुत्र पन्धु बान्धव आदि तथा शत्रुओंसे रक्षा किया हुआही राजा, राज्यकी रक्षा कर सकता है । 1॥ राजाके लिये सबसे प्रथम विपत्तिस्थान, उसकी स्त्रियां भौर पुनही है, इसलिये प्रथम उनसेही रक्षाका उपाय करना चाहिये ॥२॥ दाररक्षणं निशान्तप्रणिधौ वक्ष्यामः ॥३॥ पुत्ररक्षणम् ।।४।। बियोंसे राजाकी रक्षा किस प्रकार करनी चाहिये, इस बातका निरूपण 'निशान्त प्रणिधि' (१७ प्रकरण) नामक प्रकरणमें किया जायगा ॥ ३॥ यही पर पुत्रोंसे रक्षाका प्रहार बताया जाता है ॥ ४ ॥ जन्मप्रभृति राजपुत्रानक्षेत् ।। ५ ॥ कर्ककटसधर्माणो हि ज- नकमक्षा राजपुत्राः ॥६॥ शाजाको उचित है कि जन्मसे एंकर, राजपुगेकी निगरानी रक्खें, भर्थात् उनको स्वतन्त्र न होने दे, किमी प्रकारके बन्धन आदिमें ही उन्हें रक्खे # क्योंकि राजपुत्र, करटव (कुलीर-कदा) के समान अपने पिताकोही खाने वाले होते है । यह एक प्रसिद्ध है, कि कैकदा अपने पिताको साता हुआ ही जीवित राता है, इसानदार राजपुत्र भी अपने पिताको नष्टकर अपना ऐश्व चादा करते हैं॥६॥ तेपामजातलेहे पितर्युपांशुदण्डः धेयानिति भारद्वाज : 150 .
१७ अध्या०]. पिनयाधिकारिक भारद्वाज आचार्यका मत है, कि यदि पुत्रों में, पिताके प्रति स्नेह उपसा न हो, तो उनका उपांमुग्ध कर देनाही श्रेयस्कर है ॥ ७ ॥ नृशंसमदृष्टयधः क्षत्रवीजविनाशथेति विशालाक्षः ॥ ८॥ तसादेकस्थानावरोधः श्रेयानिति ॥ ९॥ परन्तु इसके विरद विशालाक्ष आचार्य कहता है कि निरपराध पयों- का इसप्रकार चुपचाप मारदेना घोरपाप और पूरता है, तथा ऐसा करसे क्षत्रिय वाका नाश होजाना भी निश्चित है ॥ ८ ॥ इसलिये यही उचित है कि पुनीको पिताके प्रति प्रीति उत्पन्न न होने पर समीपके किमी स्थानमें कैद करके रक्खा - जाचे ॥१॥ अहिभयमेतदिति पाराशराः ॥१०॥ कुमारो हि विक्रमम- यान्मां पिता रुणद्धीति ज्ञात्वा तमेवाड़े कुर्यात् ॥ ११ ॥ तसा. दन्तपालदुर्गे वासः श्रेयानिति ॥ १२ ॥ परन्तु इमके विरुद्ध पाराशर भाचार्य कहत हेकि ऐमा करना तो सपिके भयके समान है। अर्थात् जस साप,घरमे रहता हुआ भयावह होता है, इसीप्रकार, पुरका अपने पास कदम रखना भा भयारद समझना चाहिय ॥ १०॥ क्योकि कुमार यह समझकर सि पिता अपन पधरु भयसे मुझको कैद करके रखता ह, घरम रहता हुभा सररतामे हा उसके वध करनका यस कर सकता है॥१॥ इसलिये उचित यही है कि राजकुमारको राज्यकी सीमाके किसी दूरस्थित दुर्गम रपसा जाये । फ्याकि वहा दूर रहता हुआ वह सररतासे पितापर आक्रमण नही कर सकता ॥ १२॥ औरभ्रक भयमतदिति पिशुनः ॥ १३ ॥ प्रत्यापत्तेहि तदेव कारणं ज्ञात्वान्तपालससः स्यात् ।। १४ ॥तसात्स्वविपयादपकृष्टे सामन्तदुर्गे वामः श्रयानिति ॥ १५ ॥ नारद माचार्यका मत है कि सीमास्थित दुर्गमे राजपुत्रका रखना मटेके भयके समान है, जमे रेडा दूसरेपर भाममण करनके लिये पीकी और कुछ दूर हटजाता है, इसीप्रकार सीमादुर्गस्थित राजपुत्र भा अवसर पाव र राजा. पर आक्रमण कर सकता ॥१३॥ क्योकि जब उसे यह मालूम होजाय कि पिताने मुझे अपने वध भयके कारणही यहा फैद करके रक्षा है, तो अपनी कैदके इस कारणको सासकर वह अपने कार्यको पूरा करने के लिये भन्तपालके साथ मित्रा कर सकता है । भयात् अन्तपाल (सीमा दुगंझा रक्षक) की सहायतासे यह विवापर फिरभी भाक्रमण काही सकता है। इसलिये , कौटलीय अर्थशास्त्र अनि राजकुमारको अपने देशसे निकालकर सामन्त (भपने समीप देशका राजा) के दुर्गमें, उसका निवास करनाही श्रेयस्कर है ॥ १५ ॥ वत्सस्थानमेतदिति कोणपदन्त ॥ १६ ॥ वत्सेनेव हि धेनुं पितरमस्य सामन्तो दुयात् ॥ १७ ॥ तस्मान्मातबन्धुपु चास: श्रेयानिति ॥ १८॥ T ! परन्तु भाचार्य कागपदन्त (भीम) इस मतको भी मार नहीं सम- शता । यह कहता है कि राजकुमारको सामन्तके दुर्गम बसाना, गायक बछड़े को दूसरेके हाथ मे देने के समान है । अर्थात् जैसे बछडेके, दूसरेके हाथ धलेज नेपर, वह बछडेके द्वारा जब चाहे गायको दुह सकता है। इसीप्रकार सामन्त भी उस पुत्र के द्वारा जब चाहे विजिगीषुसे इच्छानुसार धन भादि लेसकता है ॥६-१७ ॥ इसलिये राजकुमारकी माताके बन्धुओंके पामही राजकुमारका वास कराना प्रेयस्कर है॥१८॥ ध्वजस्थानमेतदिति वातव्याधिः ॥ १९ ॥ तेन हि धजेना- दितिकोशिकादस्य मातरान्धमा भिक्षरन् ॥२०॥ तस्माद्ग्राम्य- धर्मेवेनमवसृजेयुः ।। २१ ।। सुसोपरुद्धा हि पुत्राः पितरं नाभि- मुह्यन्तीति ॥ २२॥ परन्तु भाचार्य बातम्याधि (उदव) इस मतको भी हेय समझता है।। पर कहता है कि राजकुमारको उसके मातृ कुरुमे रखना एक चाके समान है।। १९ क्योंकि जिसप्रकार घमा (चिन्ह विशेष) को दिखाकर, अदिति (भिम २ देवताओंकी प्रतिकृति दिखाकर भिक्षा एकाग्रत करने वाली भिक्षुकी) और कोकि (सरे, सौपको पकडकर, उस दिन्वा २ कर जीविका करने वाले) अपनी जीविका निर्वाह करने के लिये भिक्षा एकत्रित करते हैं, इसीपकार राज कुमारके मातृकुलके पुरष भी उसे दिखा २ कर लोगोंसे'धर इकट्ठा कर सकते हैं ॥ २०॥ इसलिये इस राजकुमारको प्राम्यधर्म अर्थात् स्त्रीसग आदिमें उस. की हत्यानुसार हगा रहने दे ॥ २१॥ क्योंकि वैषयिक मुस्खॉमें रुके अपने पिताके साथ कमी होह नहीं करते ॥ २२॥ जीवन्मरणमेतदिति कोटल्यः ।। २३ ।। काष्ठमिव हि घुण- जाधं राजकुलमपिनीतपुत्रमभियुक्तमात्रं भज्येत ॥ २४ ॥ परम्नु आचार्य कोटक्ष्य इस सिद्धान्तको कदापि उपादेय नहीं समझता, पहाता है कि पुरोको इस प्रकार विषयों में फंसाकर रखना तो उन्हें जीतही मापदेना है। प्रात् उना इसपकारका जीवन सया, मरगोही, समान है ও আ০] विनयाधिकारिक (६३) ॥ २३ ॥ क्योंकि जिसप्रकार घुण (एक प्रकारका कीडा, जो लकको भीतरसे 'काट २ का निस्तव करदेता है), से काटी हुई एकडी शीघ्र नष्ट होजाती है, इसीप्रकार जिस राजकुर के राजकुमार शिक्षित नहीं यनाय जाते, यह राजकुल बिना किसी युद्धादिके ही स्वय नष्ट होजाता ह ॥ २४ ॥ तसाहतुमत्यां महिष्यां ऋत्विजश्ररुमैन्द्रयाहस्पत्यं निर्वयेयुः ॥ २५॥ आपनसत्वायां कौमारभृत्यो गर्भमर्मणि प्रजनने 'च वियतेत ॥ २६ ॥ इसलिये राजाको यह आवश्यक है कि वह इसका प्रयन्ध करदे, कि जय महारानी नतुमती होवे, तय करिव , इन्द्र और वृहस्पति देवताके उद्दे श्यमे चरुको सिद्ध करें । इन्द्रको ऐश्वर्यके लिये और गृहस्पतिको विधा बुद्धिके लिये हेविका देना कहागया है ॥ २५ ॥ जय महाराणी गर्भवती होगाये, तो शिशुचिकित्सक ( कौमारभृत्य ), गर्भके पुष्ट करने और सुखपूर्वऊ प्रसव होने के लिये पूर्ण यदा करे ॥ २६ ॥ प्रजातायाः पुत्रसंस्कारं पुरोहितः कुर्यात् ।। २७ ॥ समर्थ तद्विदो विनयेयुः ॥ २८ ॥ महाराणीके प्रसूता होनेपर अर्थात् पुन उत्पन्न होजानेपर, विद्वान् पुरोहित पुत्रका यथोचित सस्कार को ॥ २७ ॥ तदनन्तर राजकुमारके समर्थ होजानेपर, ठन विषयोंक निपुण विद्वान्, उसका मिझ २ प्रकारको उचित शिक्षा देवें ॥ २८॥ सत्रिणामेकश्चैनं मृगयागतमद्यस्त्रीभिः प्रलोभयेत् ॥ २९ ॥ पितरि विक्रम्य राज्यं गृहाणेति ॥ ३० ॥ तदन्यः सत्ती प्रति. पेधयेदित्याम्मीयाः ॥३१॥ बाग्म भाचार्यक्रे अनुयायियापा मत है कि सत्रियोंमेंस एक इस रोज कुमारको मृग्या ( शिकार ), घुत (जुभा), गद्य और स्त्रियों का प्रलोमन देवे ॥ २९॥ और कहे कि पितापर आपमण करके अपना राज्य ले लो। फिर मौज उडामागे ॥ ३०॥ और दूसरा सत्री यहे कि ऐसा करना यहुत बुरा है। इस प्रकार ये सय काम करने का राजकुमार को प्रतिषेध करे ॥३॥ महादोपमंयुद्धबोधनमिति कोटल्यः ॥ ३२ ॥ ननं हि द्रव्य येन येनार्थजातेनोपदिह्यते तत्तदायूपति ।। ३३ ।। एवमयं नव- घुद्धियद्यदुच्यते तत्तच्छास्रोपदेशमिवाभिजानाति ॥ ३४ ॥ तणा- दर्ममर्थ चास्योपदिशेनाधर्ममनर्थ च ॥ ३५ ।।
[१अधिः कौटलीय अर्थशास्त्र परन्तु आम्म आचार्यके अनुयायियोंके इस मत को कोटख्य सवर्य हेय समझता है, वह कहता है, कि साल स्वभाव वालकों को पिताके साथ द्रोह करना सिख ना महादोष है ॥ ३२ ॥ क्योंकि जिस प्रकार नया मृमाण्ड (मही का वर्तन ) भादे प्रय, जिस २ जल, घृत आदि वस्तुओं के साथ छुभाया जाता है, उन सबको ही यह चूसता जाता है ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार इस सरलबुदि बालकको जो २ कुछ कहाजाता है, उन २ सय वाताको यह शाखक उपदेश की तरह समझता है ॥३४॥ इसलिये इस सरलयुद्धि वालकको सदा धर्म और अर्थ का ही उपदेश करना चाहिये, अधर्म भार अनर्थ का कदापि नहीं ॥ ३५॥ मत्रिणस्त्वेनं तर म इति वदन्तः पालयेयुः ॥ ३६ ।। यौवनोत्सेकात्परस्त्रीपु मनः कुर्वाणमार्याव्यञ्जनामि स्त्रीभिरमे- ध्याभिः शून्यागारेपु रागावुद्वैजयेयुः।। ३७ ॥ और सस्त्री लोग, हम तेरे ही है, इस प्रकार कहते हुए इसकी पालना 'फरें ॥ ३६॥ यदि रानकुमार यौवन मइसे परशियोंमें अपने मन को लेजाता है, ता राना, या उसके रक्षकोंको चाहिये, कि वे सदा अपवित्र रहने वाली, आयर्या (अष्ट लीक समान ) वेष बनाये हुई प्रियाके द्वारा, रात्रिके समय एकान्त स्थानम उसे उद्विग्न कराने । जिससे कि खिन्न होकर वह फिर कभी अपने मनको परखियाकी और न लेजावे ॥३०॥ मधकाम योगपानेनोद्वेजयेयुः ॥ ३८ ॥ द्यूतकामं कापटिकैः ज 'पुरुषरुद्वैजयेयुः॥ ३९ ॥ यदि राजकुमार, मच भादि पानझी कामना करे, तो उसे मधमें कोई विरस (जिसका रस बहुत खराय, चित्तको उद्विग्न करदेने वाला हो, ऐसी) वस्तु मिलाकर पिलावें, जिससे यह सिष होकर फिर कभी मद्य न पीवे ॥३८॥ यदि राजकुमार, जुआ खेलनेकी कामना करता हो, तो उसे कापरिक अर्थात छल पूर्वक तुझा खलने में अत्यन्त चतुर पुरपाके साथ जुआ खिलवाकर खूब उदित करें, जिससे कि वह पिर शुभा खलनका नाम न ले ॥ ३९॥ मृगयाकामं प्रतिरोधकव्यञ्जनत्रासयेयुः ॥ ४० ॥ पितरि विक्रमयुद्धिं तथेत्यनुप्रविश्य भेदयेयुः ॥४१॥ यदि यह मृगया अर्थात् शिकारकी कामना रसता हो, तो उसे, चोरों वर धारण किय हुए पुरपाके द्वारा अरछी तरह खिन्न करे, जिससे किच होकर, फिर भी वह गृप याकी ओर ध्यान न द॥ ५० ॥ो राजकुमार + ग .
३ १७ अध्या०] चिनयाधिकारिक अपने पितापरही आक्रमण करनेका विचार करे, तो पहिले उसके साथ मिलकर, अर्थात् ऊपरसे यह कहकर, कि हममी तुम्हारे साथ है, जैना नुम चाहते हो कर सकते हो, फिर उसको वह काम करनेसे रोक ॥ ११ ॥ अप्रार्थनीयो राजा विपन्ने घातः संपन्ने नरकपातः संक्रोशः प्रजामिरेकलोप्टवघश्चेति ।। ४२ ॥ उस कार्य से रोकने के लिये उसको यह कई, कि देसी राजाके साथ कभी द्वेष नहीं करना चाहिये, यदि तुम अपने कार्यमें सफल न होसके तो यह निश्चय रश्पो, कि तुम्हें मार दिया जायगा, यदि तुम अपने कार्य में सफल हो- गये अर्थात् तुमने धोखेसे राजाको मारडाला तो निश्चयही तुम नरकमे पढोगे, सम्पूर्ण प्रजाजन तुम्हारी निन्दा करेंगे, और यह भी सम्भव है कि प्रजाजन आप. समें मिलकर दुर्गतके साथ तुम्हें मारदालें । इमलिये तुम्हें पितृपध रूपी घोर. पाप कदापि न करना चाहिये ॥ ४२ ॥ विरागं प्रियमेकपुत्रं वा बनीयात् ॥ ४३ ॥ बहुपुत्रः प्रत्यन्त मन्यविपयं वा प्रेपयेद्यन गर्भः पण्यं डिनो या न भवेत् ॥४४॥ आत्मसंपन्नं सैनापत्य यौवराज्ये वा स्थापयेत् ॥ ४५ ॥ पिताम नेह न रखने वाला, किन्तु पिताका पारा एकही पुत्र यदि हो, तो उसे कैद काले ॥ ४३ ॥ यदि पुन बहुत हों, तो उसे सीमा प्रान्त अथवा दूसरेही देशमें भेजदेवे, जहापर कि राजपुनके उचित अस, तथा अन्य सुन्दर पन्न आदि सामान न मिरसके । ओर जहाकी प्रजा, राजपुरके निमिति किसी प्रकारका विप्लव करने को तैयार न हो ॥ ४५ ॥ जो पुन आत्मसपतिस (योग्य उचित गुणोसे) युक्त हो, उसको सेनापति पदपर भयया योयराज्य पदपर स्था. पित करे ॥ ४५ ॥ बुद्धिमानाहार्यबुद्धिबुद्धिरिति पुत्रविशेषा. ॥४६ ॥ शि- प्यमाणो धर्मार्थावुपलभते चानुतिष्ठति च बुद्धिमान् ॥ ४७॥ उपलभमानो नानुतिष्ठत्याहार्यबुद्धिः ॥४८॥ अपायनित्यो धर्मार्थ- द्वेपी चेति दुर्बुद्धिः ।। ४९ ॥ राजपुग्न तीन प्रकारके होते हैं, १ युद्धिमान् , २ आहार्य धुद्धि, ३ दुद्धि ॥४६॥ यसलाय जानेपर, जो धर्म और अधको अच्छी तरह समझ रेता है, या फिर उसपर आचरण भी करता है, यह युद्धिमान् कहाता है॥ ४० ॥ जो धी थोर भर्थको रामझ तो ऐता है, परन्तु उसपर फिर भाचरण नहीं करता, [१ अघि - ' कोटलीय अर्थशास्त्र उसे माहार्यवृद्धि कहते हैं ॥ १८॥ सदा दुराइयों में लगे रहने वाले तथा धर्म और असे द्वेप करने वाले पुत्रको दुर्बुद्धि कहागाता.है ॥ १९ ॥ स योकपुत्रः पुत्रोत्पचावस्य प्रयतेत ॥५०॥ पुत्रिकापुत्रा- नुत्पादयेद्वा ।। ५१॥ यदि राजाका, एकही दुर्युद्धि पुत्र हो, तो उसके पुनकी उत्पत्ति में विशेष चरन करे । अर्थात् ऐसा यरन को कि उसका पुत्र राज्यके योग्य बनसके ॥५०॥ यदि यह सम्भव न होसके, तो अपनी पुत्री पुनको इस कार्य के लिये तैयार करे । तारपर्य यह है, कि अपनी कन्याका विवाह जिसके साथ करे, उससे यह शर्त करले कि जो पहिला पुग्न इससे होगा, उसे मैं लेगा, इस प्रकार उमे लेकर राज्यके योग्य यनावे ॥५॥ वृद्धस्तु व्याधितो या राजा मावयन्धुकुल्यगुणवत्मामन्ता- नामन्यतमेन क्षेत्रे वीजमुत्पादयेत् ।। ५२ ॥ न चैकपुत्रमविनीतं राज्ये स्थापयेत् ॥ ५३॥ अथवा यदि राजा बूढ़ा होगया हो, या सदा बीमार रहता हो, तो अपने मातृकुलके या अपने बन्धु कुलके किसी पुरपसे, या गुणवान् सामन्तसे नेयोग के द्वारा अपनी स्त्रीमे पुत्र उत्पन्न करावे, और उसको राज्य लिये तैयार करे ॥ ५२ ॥ किन्तु भाशक्षित दुर्बुद्धि एक पुत्रको राजा कदापि राज्यपर स्था- पित न करे।। ५३॥ बहूनामेकसंरोधः पिता पुत्रहितो भवेत् । अन्यत्रापद ऐश्वयं ज्येष्ठभागि तु पूज्यते ॥ ५४ ॥ यदि बहुतमे पुबॉमसे एक दुर्बुन्दि हो, तो उसे अवश्यही किसी दूसरे देशमें निकालकर रोक कर रखे। यदि राजापर कोई भारति न हो, तो वह सदा अपने पुफी दितामनाही करता रहे । अर्थात् पुगोंके द्वारा पितापर कोई भापति न आनेपर, पिनाका भी कर्तव्य है कि वह पुत्रोंका हित करे, जय बहु. तसे पुत्र रामाको पारे हों, तो उनमें सबसे ज्येष्ठ पुत्रकोही राज्यासनपर स्थापित काना प्रशस्त समझा जाता है ।। ५ ।। कुलस्य वा भवेद्राज्यं कुलमो हि दुर्जयः । अराजव्यसनायाधः शश्वदायसति क्षितिम् ॥ ५५ ॥ इति विनवाधिकार प्रयमे अधिकरणे राजपुत्ररक्षणं सप्तदशो ऽध्यायः ॥१७॥ अथवा सम्पूर्ण कुलकाही राज्यपर अधिकार होवे, अर्थात् के सय मिल- कन्ही,साय सासन कार्यको परावें । क्योंकि कुलसमुराय राज्यका नेता हुआ । १८ श्राया०] विनयाधिकारिक (६७) । सके द्वारा सरल नासे जीता नहीं जासकता। एक और भी बात है, यदि एक ही व्यक्ति राजा होता है, तो उसपर व्यसन आनेपर प्रजाका ठीक पारन नहीं होता, और प्रशा अत्यन्त पीड़ित होने लगती है, परन्नु समुदायके राजा होने. पर, यदि एकमें कोई व्यसन हो भी जाय, तो भी दूसरे व्यक्ति राज्य कार्यको यथा. घिधि चलाते रहते है, और प्रजाझी सुखमय अरस्था पृथिमीपर निरनार यनीही रहती है ॥५५॥ चिनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणम सत्रहवां अध्याय समास । अठारहवां अध्याय। १४-१५ प्रकरण। अवरुद्ध ( अपने समीपसे हटकर कहीं दूसरे स्थानपर रक्खे हुए) राजकुमारका व्यव- हार, तथा अवरुद्ध राजकुमारके प्रति राजाका व्यवहार राजपुत्रः कृच्छत्तिरसदृशे कणि नियुक्तः पितरमनुवर्तेत ॥१॥ अन्यत्र प्राणायाधकप्रकृतिकोपकपातकेभ्य ॥२॥ अपने अननुरूप (जो अपनी हैसिपतके मुताबिक न हो, ऐसे) कार्यमें लगाया हुआ, इसीलिये बड़ी कठिनतासे जीवन निर्वाह करने वाला राजपुग्न, अपने पिताके कथनानुसार वर्ताव करता रहे ॥ १॥ परन्तु यदि उस कार्यके परनेमें प्राणीका भय हो, अमात्य आदि प्रकृतियोंके कुपित होजानेका भय हो, या कोई पातक (घोरपाप) हो, तो पिताकी आज्ञाका अनुपरण कदापि न करे ॥२॥ पुण्यकर्मणि नियुक्तः पुरुषमधिष्ठातारं याचेत ॥ ३ ॥ पुरु- पाधिष्ठितच संविशेषमादेशमनुतिष्ठेत् ॥ ४ ॥ अभिरूपं च कर्म- फलमापायनिकं च लाभं पितुरुपनाययेत् ॥ ५ ॥ किसी पुण्पकार्यमें नियुक्त किया हुआ राजपुन, एक अधिष्ठाता (अपने नीचे रहकर सम्पूर्ण कार्योकी देग रेस करने वाले) पुस्पको राजासे मांग मेरे ॥ ३ ॥ उम पुरवसे युक्त हुमा २, राजाकी आज्ञाको विशेष रूपमे पालन को ॥ ४ ॥ कार्य करनेपर जो फ्छ भनुरूप पळ मात हो, नया प्रजाजन जो (६८) कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक भेट आदि उसे लाकर देव, वह उस सम्पूर्ण सामग्रीको.अपने पिताके पास भिजवा देवे ॥५॥ तथाप्यतुप्यन्तमन्यस्मिन्पुत्रे दारेषु वा निहन्तमरण्याया- च्छेत् ॥ ६॥ वन्धवधभयाद्वा यः सामन्तो न्यायवृत्तिर्धार्मिकः सत्यवागविसंवादकः प्रतिग्रहीता मानायता चाभिपन्नानां तमा- श्रयेत ॥७॥ यदि फिरभी पिता सन्तुष्ट या प्रसन्न न होबे, और अपने दूसरे पुनों सया स्त्रियों में ही स्नेह करता रहे, तो उस राजकुमारको चाहिये, कि यह जंगल में तपस्या आदि करनेको चलेजानेके लिये अपने पितासे आज्ञा लेलेवे ॥६॥ अथवा यदि अपने बाधेजाने या मारे जानेका भय हो, तो जो सामन्त, न्याय पूर्वक व्यवहार करने वाला, धार्मिक, सत्यवादी, अवञ्चक (धोखा न देनेवाला), शरणमें प्राप्त हुए पुरुषोंको आश्रय देनेवाला, तथा उनका सत्कार करनेवाला हो, उसका भाश्रय लेलेवे ॥७॥ - " तत्रस्थः कोशदण्डसंपन्नः प्रवीरपुरुषकन्यासंबन्धमटवीसंवन्धं कृत्यपक्षोपग्रहं वा कुर्यात् ॥ ८ ॥ एकचरः सुवर्णपाकमणिराग- हेमरूप्यपण्याकरकर्मान्तानाजीवेत् ॥९॥ वहाँ स्थित हुआ २, धन और सेनासे युक्त होकर, यहाँक किसी वीर पुरएकी कन्याके साथ विवाह सम्बन्ध करके, और अपने पिताके देशके आटविक पुरषों के साथ मित्रता भादिका सम्बन्ध जोड़के, वहाँके कृत्यपक्षके पुरपोंको अपनी भोर मिलानेका यन्त्र करे ॥ ८॥ यदि राजकुमार अकेलाही रहे, भर्यात उसे धन और सेनाकी सहायता कहाँसे भी न मिलसके, तो सुवर्णपाक (लोहे आदिको पुटपाक देकर सोना यनाना-सतन्त्र प्रयोग करना आदि) कर्मके द्वारा, मणि, रग, सुवर्ण, चांदी आदि विक्रय पदार्थोके व्यापार भयवा अन्य खनिज पदार्थों के व्यापारके द्वारा अपनी जीविका करे ॥९॥ पापण्डसद्धद्रव्यमश्रोत्रियभोग्यं देवद्रव्यमाढ्यविधवाद्रव्यं वा गूढमनुप्रविश्य सार्थयानपात्राणि च मदनरसयोगेनातिसंधायाप- हरेत् ॥ १०॥ अथवा पाखण्डी अधर्मी पुरुषोके सगृहीत द्रव्यको, धोत्रियसै भतिरिक पुरुषों के भोग्य दायको, देषताके निमित्त रक्खे हुए द्रष्यको, या किसी धनं सम्पा विधयाके दम्य को, छिपकर इनके घरमे घुसकर अपहरण करले । अर्थात् हक प्रकार के धनको चोरी भादि करके अपने अधिकारमें करले । और जहाजसे . krte
१८ अध्या
विनयाधिकारिक
व्यापार करने वाले पुरुषों के धनको भी, यहोया करने वाली औषधि आदिका
प्रयोग करके, उन्हें धोखा देकर अपहरण करलेवे ॥ १० ॥
पारग्रामिकं या योगमातिष्ठेत् ॥ ११ ॥ मातुः परिजनोपन-
हेण या चेप्टेत ॥ १२॥
अथवा पारग्रामिक (विजिगीषु गर कहीं दूसरे गांवको जाना चाहे,
तय यह यहाँपर अपना कार्य करले । देखो:-दुर्गलम्भोपाय अधिकरण) उपायका
अनुष्ठान करे ॥ १॥ अथया अपनी माता सेवक जनाको अपने अनुकूल
बनाकर, उनके द्वारा अपनी युतिका याकरे ॥ १२ ॥
कारुशिल्पिकुशीलपचिकित्सकवाग्जीवनपापण्डछाभिर्वा न.
प्ररूपस्तद्वयञ्जनसखश्छिद्रे प्रविश्य राज्ञः शखरसाभ्यां प्रहृत्य
ब्रूयात् ।। १३ ॥
अथवा यदई लुहार, चित्रकार, गाने बजाने वाले, चिकित्सक (घेघ),
कथा कहकर जीविका करने वाले, तथा वेदयाह्य पासण्डी पुरषोंके वेषके साथ
अपने असली रूपको छिपाकर, लुहार वई आदि पुरुपोके सम नही हुआ २,
अपने पिता (राजा) के किसी छिद्र (दोप-कमजोरी) को देखकर उसकेही
द्वारा, शख अथवा विष आदि रसका प्रयोग करके अर्थात् इसतरह राजाको
मारकर, अमात्य आदिसे कहे, कि ॥ १३ ॥
अहमसौ कुमारः सहभोग्यमिदं राज्यमेको नार्हति भोक्तुं
तत्र ये कामयन्ते भर्तु तानहं द्विगुणेन भक्तवतननोपस्थास्य इति
।। १४ ।। इत्यवरुद्धवृत्तम् ॥ १५ ॥
मैं ही यह कुमार हूं । साथ,२ भोगने योग्य इस राज्यको कोई अकेला
नहीं भोग सकता । इसलिये जो अमात्य आदि राजकर्मचारी पूर्ववर अपने
अधिकारोंपर रहना चाहते हैं, ये शान्त पूर्वक रहें, मैं अपने राज्यकालमें उनको
दुगना घेतन और भत्ता दूंगा ॥ १५ ॥ यहांतक अवरुद्ध राजकुमारके व्यवहार-
का निरूपण किया गया ॥ १५ ॥
अवरुद्धं तु मुख्यपुत्रमपसर्पाः प्रतिपाद्यानयेयुः ॥१६॥ माता
या प्रतिगृहीता ॥ १७ ॥
अवरुद्ध राजकुमारको, अमात्य आदि मुख्य पुरषोंके पुत्र गुप्त पुरपके भेसमें
जाकर यह समझाकर लेगावै कि यदि तुम राजाके अनुकूल रहोगे, तो यह अवश्य ही
सुम्दै युरराज बनालेगा ६ ॥ अथवा राजामे सरकृत हुई २ उसकी अपनी
माता ही उसे पापस लेआये ॥ १७॥
(७०) कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक त्यक्तं गूढपुरुपाः शस्त्ररमाभ्यां हन्युः ॥ १८ ॥ अत्यक्तं तुल्यशीलाभिः स्त्रीभिः पानेन मृगयया वा प्रसज्य रात्रावुपगृह्या- नयेयुः ॥ १९॥ यदि वह राजकुमार किसी तरहसे भी राजाके अनुकूल न होसके, तो राजाकी ओरसे परित्याग किये हुए उस राजकुमारको गूढपुरष शस्त्र अथवा विप आदि रसौके द्वारा मार डालें ॥१८॥ यदि राजाने उसको ममीतक परित्याग न किया हो, तो उसके ही समान स्वभाववाली नियोंके द्वारा, मद्य भादि पिलाकर, अथवा मृगया (शिकार) में आसक्त कराके, रात्रिमें पकडकर बांधकर राजाके समीप लेआवें ॥१९॥ उपस्थितं च राज्येन ममोर्ध्वमिति सान्त्वयेत् । एकस्थमथ संरुन्ध्यात्पुत्रवान्वा प्रवासयेत् ॥ २० ॥ इति विमयाधिकारिके प्रथमे ऽधिकरणे ऽबरवृत्तमवरद्धे च वृत्ति अष्टादशोऽध्याय ॥१८॥ जिस समय वह राजकुमार राजाके पास आवे, तो राजा उससे कहे कि यह राज्य मेरे बाद तुम्हारा ही होगा । अर्थात् धार्मिक राजपुत्रको भविष्यमे राज्य मिल जाने के कारण सान्त्वना देवे , यदि एक ही पुन अधार्मिक हो तो उसे कैद करके रक्खे, और अन्य पुत्रोंके होने पर उसे प्रवासित करदे, अर्थात् अपने देशसे बाहर करदे या मरया बाले ॥२०॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें अठारहवां अध्याय समाप्त । उन्नीसवां अध्याय। १६ प्रकरण। राजप्रणिधि । राजानमुत्तिष्ठमानमत्तिष्ठन्ते भृत्याः ॥ १॥ प्रमाद्यन्तमनु- प्रमाद्यन्ति ॥ २॥ कर्माणि चास्य भक्षयन्ति ॥ ३ ॥ द्विपद्भि- वातिसंधीयते ॥ ४ ॥ तसदुस्थानमात्मनः कुर्भात ॥ ५॥ राजाक उन्नतिशील होने पर उसके अमाय आदि भृत्ययर्ग भी उमति- शीर होते हैं। यदि राजा प्रमादी होजावे, तो मृत्यवर्ग भी राजकार्यों में प्रमाद करने लगते हैं ॥ २ ॥ और इसके कार्योको साजाते है । अर्थात् राज कार्यको सर्वथा नष्ट करदेते हैं ॥३॥ इस प्रकारका राजा शत्रुओंसे सदा १९ मध्या०] चिनयाधिकारिक धोसा साता है ॥ ५ ॥ इसलिये राजाको उचित है कि वह सदा अपने आपको उन्नतिशील बनाने का यख करता रहे ॥ ५ ॥ नाडिकाभिरहरप्टधा रात्रिं च विमजेत ॥६॥ छायाप्रमा. णेन वा ॥ ७॥ कार्य-विभाग सुभीते के लिये दिन और रातको आट आठ नाड़ियों के द्वारा विभक्त करे । अर्थात् आठ नाड़ी (घड़ी) दिनकी और भाट रातकी॥ ६ ॥ अथवा डायाफे प्रमाणसे दिनका विभाग करे । अर्थात् पुरुषकी छाया जैसे २ लम्बी या छोटी होती जाय, उसहोके अनुसार दिनका दिमाग करे ॥ ७ ॥ त्रिपौरुषी पौरुपी चतुरङ्गुला चछाया मध्याह्न इति पूर्वे दि- वसस्याटभागाः॥८॥ उसका प्रकार यह है-प्रातःकाल जय सूर्य उदय हो, उस समयस लगाकर जयतक पुरुष की छाया तीन पुरुषों के बरावर लात्री रहे, यह दिनका पहिला आठवां हिस्सा है, इस छायाको विपीरुपी छाया कहते हैं, इसके मनन्तर जय छाया एक पुरषकी बराबर लम्पी रहजाय, उसे पौरुपी या एकपौरपी छाया कहते हैं, यह दूसरा भाग है । इसके अनन्तर जन पुरुषकी छाया चार अंगुलकी रहजाय, उमे चतुरहुला छाया कहा जाता है । यह सासरा भाग है। इसके बाद के ममयको मध्यान्ह कहते है । यह चौथा भाग है । इस प्रकार आधे दिन ये पहले चार भाग है, यह प्रत्येक सम्पूर्ण दिनका आठ आठषां हिस्सा है॥८॥ तैः पश्चिमा व्याख्याताः ॥९॥ इसही समान पिटले आथे दिनके भी हिस्से करलेने चाहिये। उनका प्रकार यह है:--मध्यान्हके अनन्तर जय पुस्पकी छाया फिर चार अंगुलकी होजाय, यह चनुरंगुला छाया, पहिला भाग समझना चाहिये । इसी प्रकार उस छायाके बढ़ते २ एक पुरुषकी बराबर होजानेपर पौरुषी और फिर सीन पुरुषको बराबर होजानेपर विपौरुषी, ये दिनके दूसरे तीसरे भाग है। इसके बावका चौथा हिस्मा दिनान्त कहाता है । इस प्रकार दिनके कुल आठ हिस्से होजाते हैं ॥ ९ ॥ तत्र पूर्व दिवसस्याप्टमागे रक्षाविधानमायव्ययौ च शृणुयात् ॥ १०॥ इम साय विभागमें से दिनके पहिले आठवें हिस्सेम, राजा रक्षा विधान (रातिमें नियुक्त किये हुए रक्षा पुरुपोंके फार्म, कदाचित रात्रि में कोई [१ अधिक 3 . कौटलीय अर्थशास्त्र विशेष घटना तो नहीं होगई । इसलिये सबसे पहिले इसका जानना आवश्यक है) और गत दिवसके आय व्ययको सुने, अर्थात् उसका निरीक्षण करे ॥१०॥ द्वितीये पौरजानपदानां कार्याणि पश्येत् ॥ ११ ॥ तृतीय सानभोजन सेवेत ॥ १२ ॥ स्वाध्यायं च कुर्वीत ॥१३॥ चतुर्थे हिरण्यप्रतिग्रहमध्यक्षांश्च कुर्वीत ॥ १४ ॥ दिनके दूसरे हिस्से में नगर तथा जनपद निवासियोंके कायोंका निरी- क्षण करे ॥11॥ सोसरे हिस्से में स्नान तया भोजन आदि करे ॥१२॥ और कुछ स्वाध्याय मी इसी समयमें करे ॥ १३॥ दिनके चौधे हिस्से में गत दिवसके शेष धनको संभाले और भिन्न २ कार्योपर अध्यक्ष आदिकी नियुक्ति करनी हो तो करे ॥ १४ ॥ पञ्चमे मन्त्रिपरिषदा पत्रसंप्रेपणेन मंत्रयेत ॥ १५ ॥ चार- गुह्ययोधनीयानि च बुद्धथेत ॥ १६ ॥ पठे खरविहारं मंत्रं या सेवेत ॥ १७॥ दिनके पांचवें हिस्से मन्त्रिपरिपके साथ, पन आदि भेजकर भावभ्यक विपयोंपर विचार करे ॥ १५ ॥ गुप्तचरोंके कार्य तथा अन्य जानने योग्य गुह्य पातीको भी इसी समयमें सुने या जाने ॥ १५॥ छठे हिस्सेमें इच्छानुसार पिहार भपया मन्यणा करे ॥10॥ सप्तमे हस्त्यश्वरथायुधीयान्पश्येत् ॥१८॥ अष्टमे सेनापति- ससोविक्रमं चिन्तयेत् ॥१९॥ प्रतिष्ठितेऽहनि संध्यामुपासीत॥२०॥ सातवे हिरसमें हाथी घोड़े रथ तथा हथियारोंका निरीक्षण करे ॥१॥ भाठ हिस्संग सनापतिको साथ रेकर युद्ध भादिक सम्मन्धमें विचार करे ॥ १९॥ इस प्रकार दिनके समाप्त होजानपर सायकाल के समय सध्योपासना करे ॥२०॥ प्रथमे रात्रिभागे गूढपुरुपान्पश्येत् ॥ २१॥ द्वितीये स्नान- भोजनं कुर्वीत स्वाध्यायं च ।। २२ ॥ तृतीये तूर्यपोपेण संविष्ट. चतुर्थपञ्चमी शयीत ॥ २३ ॥ दिनम यथोचित विभागके अनुसार कार्याका कपन करके राग्रिक पृथक् २ भागामे क्या २ कार्य करने चाहिये, भय इस पातका निरूपण किया aar :-निक प्रथम भाग गृहपुरपॉयो देखे ॥ २॥ दूसरे भागमे पान भोउन तथा स्वाध्याय भो को ॥ २२ ॥ तीसरे भागमें गाने बजाने । . १९ अध्या विनयाधिकारिक (७३) मादिको सुनसा हुआ, सो जाये, तथा पूरे चौधे और पांच भागमें शयन करे ।। २३ ॥ पष्ट तूर्यघोपेण प्रतियुद्धः शास्त्रमितिकर्तव्यतां च चिन्तयेत् ॥ २४ ॥ सप्तमे मंत्रमध्यासीत गूढपुरुषांश्च श्रेपयेत् ॥ २५ ॥ पुनः रात्रिके छठे मागम बाजे आदिके शब्दसे उठाया गया हुभा, शाख ( अर्थशास्त्र) तथा इसिसच्यताका ( जो कुछ कार्य दिनम करने हों, उनका ) चिन्तन करे ॥ २४ ॥ रात्रि के सातवें विभाग, मंत्र अर्थात् गृढ बातों पर विचार करे । भौर गृढ पुरपाको जहां भेजना हो, वहां भेजे ॥ २५ ॥ अष्टम ऋत्विगाचार्यपुरोहितसखः स्वस्त्ययनानि प्रतिगृही- यात् ॥ २६ ॥ चिकित्सकमाहानमिकमोहर्तिकांच पश्येत् ॥२७॥ इसके अनन्तर आठ हिरसेमें, कवि, आचार्य और पुरोहितोंके साथ २ म्बम्तिवाचन, तथा मांगलिक मन्त्र पाठोंके सहित आशीर्वाद ग्रहण करे ॥ २६ ॥ और चिकित्सक (पैय), माहानसिक (पाकशालामें कार्य करने धाले रसोईयोंका निरीक्षक) तथा मोहूर्तिक (शुभाशुभ मुहूर्त आदिका बताने बाला=जयोसिपी) को देरी। अपनी शारीरिक अवस्थाको जानने के लिये वैद्यका, सभीष्टभोजन आदि बनानेके लिये माहानसिकका और उस दिनके कार्यके शुभाशुभका पता लेने के लिये ज्योतिषीका प्रातः कारही राजामे मिलना अत्यन्त मावश्यक होता है।॥ २७ ॥ सवत्सां धेनुं वृषभं च प्रदक्षिणीकृत्योपस्थानं गच्छेत् ॥२८॥ आत्मवलानुकूल्येन वा निशाहर्भागान्प्रविभज्य कार्याणि सेवेत यो सहित गाय और बलकी प्रदक्षिणा करके दरबार में जाये ॥ २० ॥ दिनरातका जो कार्य विभाग ऊपर निर्दिष्ट किया गया है, उसे साधारणही सम- झना चाहिये, इसलिये राजा अपनी शक्ति और भनुकूलताके अनुसार दिन भौर रातके कार्योको विभक्त करके यथारचि उनका अनुष्ठान कर सकता है ॥ २९॥ उपस्थानगतः कार्यार्थिनामद्वारासङ्गं कारयेत् ॥ ३० ॥ दु- देशी हि राजा कार्याकार्यविपर्यासमासन्नैः कार्यते ॥३१॥ तेन प्रकृतिकोपमरिवशं वा गच्छेत् ।। ३२ ॥ राजा, जर दरवारमें उपस्थित हो, तो किसी कार्य के लिये आने याले पुरपको मुले तौरपर आनेदे । अर्थात् ऐसे अवसरपर दरवारमें आनेके लिये पुर- पीको किसी तरहकी भी रसायन होनी चाहिये । जिससे कि प्रत्येक पुस्प स. - १यधिक (७४ कोटलीय अर्थशास्त्र लतासे राजाका दर्शन करसके ॥ ३० ॥ क्योंकि जो राजा दर्शन नहीं देता, या सही कठिनतासे दर्शन देता है, उसके समीप रहने वाले सेवकोंके द्वारा, उसके कार्य उलट पुलट कर दिये जाते है । अर्थात् राजाके स्वय दर्शन न देनेके कारण, उसके कार्य उसके समीप रहने वाले सेवकोंके द्वाराही कराये जासकते हैं, और घे इतने योग्य न होनेके कारण कार्यो में विपर्यास करदेते हैं ॥ ३१ ॥ इसका परिणाम यह होता है, कि उस राजाके अमात्य आदि प्रकृतिजन उससे प्रकु पित हो उठते हैं। राजवार्य शिधिर होजाते हैं । अथवा राजा अपने शत्रुके धशम घरा जाता है । अर्थात् राजाके प्रकृतिव्यसनको देखकर इसके शत्रु इसे अपने अधीन कर लेते है ॥३२॥ तस्माद्देवताश्रमपापण्डश्रोत्रियपशुपुण्यस्थानानां चालवृद्धव्या- धितव्यसन्यनाथानां स्त्रीणां च क्रमेण कार्याणि पश्येत् ॥ ३३ ।। कार्यगौरवादात्ययिकाशेन वा ॥ ३४ ॥ इसलिये राजाको उचित है, कि रंगतास्थान (देवालय आदि), भाभ- मस्थान (मुनि आदिके रहने के स्थान), पपण्डस्थान (धूत्तो या वयकों के निवास स्थान), नियस्थान (वेद पढ़ने वालोंके स्थान), पशुस्थान (गाय, घोड़ा हाथी आदिक स्थान) तथा इसीप्रकार के अन्य पुण्यस्थानोके कार्योका, और पालक, यूरे, रोगी, दुखी अन ध, तथा खियो भी सब कार्योका प्रमपूर्वक, वय जाकरही निरीक्षण करे । अपने आप जाकर देखनेसे राना, उन कार्याको विकुल ठीक २ हाल में जान सकता है ॥ ३३ ॥ यदि इन कार्योंमसे कोई कार्य अत्यन्त महाप पूर्ण हो, भयरा जिला समय बहुत पीतगया हो, ऐसे मार्य के लिये राजा, उपर्युक्त कार्य दर्शनके क्रमको तोड सकता है, अर्थात् पहिले इन कार्योको देखकर अन्य कार्यों को देख सकता है ॥ ३४ ॥ सर्वमात्ययिक कार्य शृणुयानातिपातयेत् । कृच्छ्रसाध्यमतिक्रान्तमसाध्यं वाभिजायते ।। ३५ ॥ राजाको उचित है कि जिप्त कार्यके लिये बहुत समय बीत चुकाहो ऐसेही कार्यको पहिले सुन, उसका और अधिक काल अतिक्रमण न करे, क्योकि इसप्रकार उचित कार्यकालके बीत जानेपर फिर वह कार्य कष्टसाध्य (ब कठिनतामे पूरा होने वाला) अथपा सर्वथा असाध्यही होजाता है ॥ ३५॥ अमन्यगारगतः कार्य पश्यद्वैद्यतपखिनाम् । पुरोहिताचार्यमरः प्रत्युत्थायामिवाध च ॥ ३६ ॥ .
.
१९ अध्या०] विनयाधिकारिक
(७)
राजा, पुरोहित तथा आचार्य के साथ २ अग्निहोत्रशाला (यज्ञशाला ) में
उपस्थित होकर, वंद्य अर्थात् विद्वान् पुरुपोंके और तपम्बियोंके कार्योको उन्हें
(विद्वान् तथा सपस्त्रियोंशो) अभ्युत्थान (आदरार्थ उनके आनेपर उठकर सड़े,
होजाना) देकर तथा अभिवादन (प्रणाम ) करके, दो ॥ ३६॥
तपसिनां तु कार्याणि विद्यैः सह कारयेत् ।
मायायोगविदां चैव न स्वयं कोपकारणात् ॥ ३७ ॥
तपस्वियों सथा माया प्रयोगांको जानने याले पुरुषों के कार्योंका निर्णय,
राजा, सम्पूर्ण घेदोंके विद्वानों के साथ बैठकरही करे, त्रय अकेलाही इनका नि.
गंय कभी न करे, क्योंकि यह सम्भा है कि यह निर्णय उन लोगों के विरुद्ध हो,
और ये इसके कारण राजास कुपित होता, तथा राजाको किसी प्रकारको हानि
पहुंचानेका यस्न फरें । वैद-विद्वानों के साथ रहनेपर उस निर्णयका उत्तरदायित्व
राजाके ऊपर नहीं रहता, और वह इसीलिये उनके कोपरी रक्षित रहता है ॥३७॥
१ राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम् ।
दक्षिणा घृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिपेचनम् ॥ ३८ ॥
उद्योग करना, यश करना, व्यवहारांका निर्णय करना, दक्षिणा अर्थात्
दान देना, शत्रु और मिनाम गुण दोपोंके अनुमार उचित समान वत्तीय करना,
तथा यज्ञादिकी दीक्षा लेकर उसे पूर्ण करके पिर पवित्र स्नान आदि करना, ये
सय राजाके मत भयात् नियम हैं । राजाको पाहिये कि वह इन सब कार्यों का
यथोचित अनुष्ठान करे ॥ ३८॥
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥ ३९ ॥
मजाके सुसमेही राजाका मुप और प्रजाभाके हितमही राजाको अपना
हित समझना चाहिये । अपने आपको प्रिय लगने वाले कार्याका करमा राजाका
हित नहीं, फिन्तु प्राओके प्रिय कार्योंका करनारी राजाका अपना सयस यता
हित है ॥ ३९॥
तसान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादानुशासनम् ।
अर्थस मूलगुत्थानमनर्थस विपर्ययः ॥ ४० ॥
इमलिये राजाको चाहिये, शिवह सदा उद्योगी हुआ २, ध्ययहार पदो-
का निगंय तथा अन्य राज्य सम्बन्धी कार्यों को उचित रीतिपर करे । उद्योग
हो सम्पत्तियों का मूल कारण है, और उद्योगी न होना, हर तरह के अनाको
उत्पस करदेता है॥१०॥
कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अपिल ८ अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च । प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभेत चार्थसंपदम् ॥ ४१ ॥ इति विनयाधिकारिके प्रथमे ऽधिकरणे राजप्रणिधिः एकोनविंशो ऽध्यायः ॥3॥ सजाके उद्योगी न होनेपर, पहिले प्राप्त किये हुए अयोका तथा मदि- प्यमें प्राप्त होने वाले अोंका भी निश्चयही सर्वथा नाश होजाता है। परन्तु जो राजा उद्योगी होता है, वह अपने उद्योगसे, शीघ्रही अपने कार्यों के मोटे फलको प्राप्त करलेता है, और इच्छानुसार अर्थसम्पत्तियोंको लाभ करता विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें उन्नीसवां अध्याय समाप्त । वीसवां अध्याय। १७ प्रकरण। निशान्तप्रणिधि । राजभवनका नाम निशान्त है । उसके सम्बन्धमे क्या कुछ करना चाहिये, इसोका निरूपण इस प्रकरण में किया गया है। वास्तुकप्रशस्ते देशे सप्राकारपरिखाद्वारमनेककक्ष्यापरिगत- मन्तःपुरं कारयेत् ॥ १॥ वास्तु विद्याको जाननेवाले (गृहनिर्माण आदिको जामनेवारे-इशिनियर) पुरप जिस स्थानको प्रशंसा करें, उसही स्थानमें प्राकार (परकोटाचारों ओर को बड़ी दीवार), परिखा चारो ओरकी खाई), द्वार और अनेक कक्षाओं (इढ़ियाँ या परिक्रमाओ) से युक्त भन्तःपुरका निर्माण कराया जावे ॥१॥ कोशगृहविधानेन या मध्ये वासगृहं गूढभित्तिसंचार मोहन- गृहं तन्मध्ये या वासगृहं भूमिगृहं वासन्नकाप्ठेचत्यदेवतापिधान- द्वारमनेकसुरुङ्गासंचारं प्रासादं या गूढभित्तिसोपानं सुपिरस्तम्भ- प्रवेशापसारं या वासगृहं यन्त्रयद्धतलावपातं कारयेत् ॥ २ ॥ अथवा कोशागारके निर्माणके अनुसार (देखा-समिधातृनिचयकर्म मामक प्रकरण, अधि. २ अध्या ५) अन्त.पुरके चीचमें, राजा अपने रहने भर धनयावे अथवा पहिले चारों ओर ऐसा मकान बनवावे, जिसकी भी २० भध्या०]. चिनयाधिकारिक (७७). और रात के सिलसिलंका टोक २ पता न हो, इसीको मोहनगृह (भूलभुलया) कहा जाता है । इसके योधमें अपने निवासका मकान बनवाये । अथवा भूमि खुदवाकर उसके भीतर मोहनगृहके बीच अपना वासगृह पनवाये । उस भूमिगृहके दरवाजेपर, समीपही किमो दिशाके देवालयकी प्रसिद्ध देवता दुर्गा आदिकी मूर्ति अवश्य होनी चाहिये, तथा उसमें जाने भानके लिये भनेक सुर भी यनी हुई होनी चाहिये । अपया ऐसा महल बनवाये, जिसकी दीक भीतर छिप तौरपर माने जानेका रास्ता हो, अथया पोले खम्भोंके भीतरसे चढ़ने उतरने या याहर आने जाने का मार्ग हो । अथवा पंसा वासगृह पनवावे, जिसका नीचे का भाग यन्योंके आधारपरही आश्रित हो, अपात् यन्योंके अपने हाथमें रहने के कारण उसे इच्छानुसार रमया या नीचे गिराया जासकता हो॥२॥ आपत्प्रतीकारार्थमापदि या कारयेत् ।। ३ । अतो ऽन्यथा वा विकल्पयेत् ।। ४ ।। सहाध्ययिभयात् ।। ५ ।। इस प्रकार के पासगृह आपत्तिके निवारणके लियेही बनाये जाते है। इसलिये भापत्ति आने पदिलेही ऐसे स्थानोंका निर्माण राजाको करा रसना चाहिए । अपवा यदि पहिलैमै निर्माण कराया हुभा न हो तो आपत्तिके उपस्थित होनेपर भी यह कार्य करालिया जावे ॥३॥ यदि रानाको इस यातका भय हो कि दूसरा मे समानही शास्त्रोंके तरवका जानने पाला शत्रुराजा भी इन यातोंको जानकर इसीके अनुसार कार्य करसकता है, तो यह अपनी प्रतिभा के अनुसार इससे पर्वथा भिन्न प्रकारके पासगृहकी कल्पना करके, उसके अनुसारही कार्य करावे । तात्पर्य यह है कि यह कोई आवश्यक नहीं कि जो कुछ ऊपर यासगृहके सम्बन्धमें लिया गया है, उसीके अनुसार कार्य करे, प्रत्युत यद अपनी युद्धिके अनुसार इसमें परिवर्तन कर सकता है॥४.५॥ मानुपणामिना घिरपसव्यं परिगतमन्तःपुरमनिरन्यो न दहति ॥ ६॥ न चात्रान्यो ऽग्निर्चलति ।। ७ ।। वैयुतेन भस्मना मृत्संयुक्तेन कनकधारिणावलिप्तं च ।। ८ ।। मनुष्यकी हट्टीम बांसके गहनेसे उत्पन्न होनेवाली भागके द्वारा, अन्तःपुरका सरो कराते हुए, तथा इस सम्पन्धके अथके कन्याका माधर ही उधारण करते हुए, याई भोरसे तीन परिक्रमा यदि अन्तःपुरकी करदी जावें तो फिर उसमें और कोई दूसरी आग असर नहीं करती । अर्थात् फिर अन्तः पुरको और कोई दूसरी आग जला नहीं सकती ॥ ६ ॥ तथा ऐसे अन्तःपुरम
(७८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[१ अधिक
और कोई आग जल भी नहीं सक्ती। इसका यही तात्पर्य है कि यदि ऐसे
मकानके पास आग लाई जावे, तो वह यहा आते ही घुझ जाती है, टपट्टी
पदजाती है ॥ ॥ इसी प्रकार बिजलीसे जले हुए पेष्ठ भादिकी रास लेकर,
उसमें उतनीही और मिट्टी (उस महीसे तारपर्य है जो दीवारोंपर एगाई जाती
है) मिलाकर धतूरेके पानीके साय गूयार, उसको दीवारपर लेपन किया जावे,
तो भी उस मकान में दूसरी आगका कोई प्रभाव नहीं होता । (किसी किसी
पुस्तकमें कनवारिणा' के स्थागपर 'करकवारिणा' पाठ है । करकका अर्थ
ओला या वर्षा है । इसलिये इस पाठमें 'उम मट्टीको भोले या वर्षाके पानीके
साथ गूंथा जावे' यही अर्थ करना चाहिये ॥ ८॥
जीनन्तीश्वेतामुष्ककपुष्परन्दाकाभिरक्षीये जातस्याश्वत्थस्य प्र-
तानेन वा गुप्तं सो विपाणि वा न प्रसहन्ते ॥९॥
गिरोय, शंखपुष्पी, काली पाढरी (मुष्क: ) ओर करोंदेके पेडपर
लगे हुए बन्देकी माला भादिके लगानेसे रक्षित हुए २, अथवा संजनेके पेड़ के
ऊपर पैदा हुए २ पीपल के पत्ते भादिकी माला रगानेसे रक्षित हुए २ अन्त
पुरम सपं तथा अन्य विषोंका कोई प्रभाव नहीं होता ॥९॥
मार्जारमयूरनकुलपृपतोमर्गः सर्पान्भक्षयति ॥ १० ॥शुक-
शारिका भृगराजो या सर्पविपशङ्कायां क्रोशति ॥ ११ ॥ क्रौञ्चो
विपाभ्याशे माद्यति ।। १२ ॥
बिलाव, मोर,नकुल (नेवला), और मृगको घरमें छोड़नेपर, ये बिलाव भादि
सोको खा जाते हैं ॥ १० ॥ तोता, मना और बडा भौरा ये, भन्न आदिमें
सर्प विषकी आशा होनेपर चिल्लाने लगते हैं ॥1॥ मौज्ञांक्षी विषके
समीप होनेपर विह्वल होजाता है ॥१२॥
ग्लायति जीवंजीवकः॥ १३ ॥ म्रियते मत्तकोकिलः ||१४||
चकोरस्याक्षिणी विरज्यते ॥ १५ ॥ इत्येवं अग्निपिपसर्पेभ्यः प्रति-
कुर्वीत ॥ १६ ॥
जीवजीप (मोर के समान पसराला पक्षी, या चकोरकी जातिका एक
पक्षी विशेष) नामक पक्षी, विपको देखकर ग्लानियुक, अर्धात् खिन्न हपरहित हो.
जाता है ॥ १३ ॥रायल पक्षी विषको देखकर मरजाता है ॥ १४॥ चकोर
पक्षीको आंख विपको देखकर लाल होजाती है ॥ ५॥ इन सब उपायोंसे
विप भादिवी परीक्षा करके, राजा अपने आपको अग्नि, विप तथा साँसे पचा
कर रखे ॥१६॥
२० अध्या०] विनयाधिकारिक
पृष्ठतः कक्ष्याविभागे स्वीनिवेशो गर्भच्या धवैद्यप्रत्याख्यात-
संस्था वृक्षोदकस्थानं च ।। १७ ॥ बर्हिः कन्याकुमारपुरम् ॥१८॥
राजाके यासगृहके पीछकी गोरके कश्या विभागमें अन्न पुर अर्थात्
राजास्त्रियोंके रहनेका स्थान बनवाया जाये। उसके समीपही, प्रसूता नी,बीमार,तथा
असाध्य रोगिणी स्त्रियोंके लिये पृथक् पृथक् तीन स्थान बनवायें। और उसके
साथही छोटे २ उद्यान तया जलाशय वनयावे ॥ १७ ॥ उससे बाहरकी ओर
राजकन्याओं, तथा यौवन अवस्थाको प्राप्त ग हुए २ राजकुमारोंके लिये स्थान
बनवावें ॥१८॥
पुरस्तादलंकारभूमिमन्त्रभूमिरुपम्यानं कुमाराध्यक्षस्थानं च
।। १९ ।। कक्ष्यान्तरेवन्तर्वशिकसैन्यं तिष्ठेत् ॥ २० ॥
राजाके निवास स्थान के आगेको ओर पहिले सुन्दर घास तथा फूलोंसे
पुक्त उपवन अथवा सुन्दर शोभा युक्त महल होना चाहिये । इसके आगे मन्त्र
समाका स्थान, फिर उपस्थान अर्थात् दरबारका स्थान, आर इसके आगे युवा
राजकुमार तथा समादरी सन्निधाता आदि अध्यक्षों के प्रधान कार्यालय होने
चाहिये ॥ १९ ॥ पक्ष्याओंके यांच २ मे कचुकी आदि पुरपा तथा अन्य अन्त
पुररक्षक पुरपोका समूह रहे ॥ २० ॥ )
अन्तर्गृहगतः स्थविरस्त्रीपरिशुद्धां देवीं पश्येत् ।। २१ ॥ न
कांचिदभिगच्छेत् ।। २२ ।।
अन्त पुरंग जाकर राजा अपने नियामके ही मकान में, विश्वस्त किसी
बूढी परिचारिफाके साथ महारानी से देखे ।। २१ ॥ किसी रानीको लक्ष्य करके
स्वयहा उसके निवास स्थान मेन जाये ॥ २२॥
देवीगृहे लीनो हि भ्राता भद्रसेनं जघान ।। २३ । मातुः
शय्यान्तर्गतश्च पुत्रः कारूशम् ।। २४ ॥ लाजान्मधुनेति विपेण
पर्यस्य देवी काशिराजम् ॥ २५ ॥
क्योंकि इसमें कमी २ बडा धोखा हो जाता है, सुना जाता है पहिले
कभी भदसेन नामक किसी राजा वीरसेन नामक भाईने उसकी रानीसे मिल
कर, उसीके घाम छिपकर, वहा भदसेन राजाको मार डारा था ॥ २३ ॥
इसी प्रकार माताकी वाया नीचे छिपे हुए राजपुग्ने अपने पिता कीरूश
नामक राजाको मार डारा था ॥ २५ ॥ इसी तरह काशिराजकी रानीने ही
स्वष काशिराजको, सीकों में मधुके बहाने थिप मिला कर, और उसे खिलाकर
मार डाला था॥ २५ ॥
[१ मधिल
(८०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
विपदिग्धेन नूपुरेण वैरन्त्यं मेखलामणिना सौवीरं जालूथ-
मादर्शन घेण्यां गूढं शस्त्रं कृत्वा देवी विड्रथं जघान ॥ २६ ॥
तसादेतान्यास्पदानि परिहरेत् ॥ २७॥
तथा विपमें बुझे हुए नूपुर (पायजेय-पैरका आभूपग) के दारा
चरन्त्य राजाको उसकी अपनी रानीने, मेखला (पगडी-काँधनी की मणिके द्वारा
सौवीरको, आदर्श (शीशे ) के द्वारा जादूधको. और अपनी घेणी (वालोंके
जूड) में शस्त्र छिपाकर विडूरय नामक राजाको, उनकी अपनी २ रानियोंने
हो मार डाला था ॥ २६॥ इसलिये राजाको चाहिये कि रानियों के निज
निवास स्थानमें रात्रि के समय कदापि न जाये। प्रत्युन उनको ही अपने
निवास स्थान पर किसी विश्वस्त परिचारिका के साथ पुलवावे ॥२७॥
मुण्डजटिलकुहकप्रतिसंसर्ग वाह्याभिश्च दासीभिः प्रतिपेधयेत्
॥२८॥न चैनाः कुल्याः पश्येयुरन्यत्र गर्भव्याधिसंस्थाभ्याम् ॥२९॥
मुण्डी, जटी, तया अन्य वा पुरपोंके साथ, और बाहरकी दासियो
के साथ रानियोंका किसी प्रकारका भी संसर्ग न होने दे ॥ २८ ॥ और इनके
(गानेयोंके) वन्धु बास्यय भी इनको प्रसव तथा बीमारी आदिके समयके अति.
रिक्तन देख सकें॥२१॥
रूपाजीवाः स्नानघर्षशुद्धशरीराः परिवर्तितवस्त्रालंकाराः प.
श्येयुः ।। ३० ॥
स्नान तथा उबटन आदिसे शरीरको शुद्ध करके, तथा वस्त्र और अलं.
कारों (आभूगों ) से सुसजित, होकर ही वेश्या तथा भन्य रानियां राजाको
देखें ॥३०॥
आशीतिकाः पुरुषाः पश्चाशत्कालियो वा मातापितृव्यञ्जनाः
स्थविरवर्पनराम्यागारिकावावरोधानां शौचाशीचं विद्युः स्थापयेयुश्च
स्वामिहिते ॥ ३१ ॥
अस्पी वर्षकी अवस्थाके पुरुष तथा पचास बर्षकी चूदी स्त्रियां माता
पिताके वेपमें, अर्थात् माता पिताकी तरह रानियोका हित तथा पालन करनेवाले
और यूठे तथा नपुंसक घरके अन्य कार्योको करनेवाले, अवरोध अर्थात् अन्तः
सरको रानियोंकी पवित्रता भीर भपवित्रताका सदा ध्यान रसपे। तथा उनको
(रानियोको) सदा अपने स्यााके कल्यागकी ओर ही लगाये रक्सें ॥३॥
२१ अभ्या०] विनयाधिकारिक
(८)
स्वभूमी च वसेरसर्वः परभूमी न संपरेन् ।
न च बाान संसर्ग कश्चिदाभ्यन्तरो प्रजेत् ॥ ३२ ॥
अपने ३ स्थानपर ही सय ( सली, तथा अन्य सन्तःपुरके परिचारक
जन) लोग रहे, दूसरे स्थान पर भाना जाना न रखें । और कोई भी भीतर
का कादमी याहरके किसी आदमासे न मिसे ॥ ३२ ॥
सर्व चावेक्षितं द्रव्यं निबद्धागमनिर्गमम् ।
निर्गच्छेदभिगच्छेद्वा गुद्राराकान्तभूमिकम् ॥ ३३ ॥
इति पिनयाधिकारिक प्रथमे ऽधिकरणे विशो ऽपायः ॥ २० ॥
यस्तु महतोके भीतरसे बाहर जाये, तथा बाहरसे भीतर भावे, यह
सप भी तरह ये लेनी चाहिये, और उसके माने जानेका स्थान तथा
उसके सम्बन्धकी अन्य आवश्यक पति भी पुस्तक में लिख देनी चाहिये । तथा
भाने जानेयाली प्रत्येक यस्तु के ऊपर मुहर भी लगा देनी चाहिये । विगा
मुहाके कोई भी वस्तु याहर भीतर न जाने आने पाये
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में यीसो अध्याय समाप्त ।
.
.
इक्कीसवां अध्याय।
१८प्रकरण।
आत्मरक्षा।
पुत्र भीर नियोंमे राजाको रक्षाका निरूपण कर दिया गया है
अय अन्य व्यक्तियॉस भी राजाको रक्षा किसमकार होनी चाहिये,
इसका विधान किया जाता है।
शयनादुत्थितः स्रीगणधन्विभिः परिगृह्येत ॥१॥ द्विती.
यस्यां कक्ष्यायां कञ्चुकोणीपिमित्रवराभ्यागारिकः ॥२॥
भाता पाल चिनोगे उठतही राजाको, उसकी रक्षाके लिये हायमें धनु-
पलिये हुए नियों का समूह चारों ओरमै घर लये। अर्थात् उसके चारों भोर
उपस्थित रहे ॥१॥ जय रामा अपने वासगृहमे निकलकर दुमरी कश्या (मह.
र सो विभाग) में जावे, तो यहांवर कुत्तं और पगड़ी पागे हुए नघुमक
तथा अन्य गृहमन्य करने याले पुरप, राजाको सब भोरसे सुरक्षित रक्ते ॥२॥
[१ अधिक (८२) कौटलीय अर्थशास्त्र तृतीयसां कुञवामनकिरातैः॥३॥ चतुर्था मन्त्रिमिः संबन्धिभिदौवारिकैश्च प्रासपाणिभिः ॥ ४॥ पितृपैतामहं महा- संयन्धानुवन्धं शिक्षितमनुरक्तं कृतकर्माण जनमासन्नं कुर्वीत ॥५॥ जब राजा तीसरी श्यामें जावे, तो वहां कुबड़े, वामन, तथा किसी ग्लेर जातिके पुरप राजाकी रक्षा करें ॥ १ ॥ और चौथी कक्ष्यामें पहुंचनेपर राजाकी रक्षा, मन्त्रियों, सम्बन्धियों, तथा हाथमें भाले आदि लिये हुए द्वार- पालोंके द्वारा होनी चाहिये ॥en वंश परम्परासे प्राप्त हुए, यदे उच कुलॉम उत्पन्न हुए २, शिक्षित, अपने में अनुराग रखने पाले, तथा मरयेक कार्यको सम. शने पाले पुरपोंको, राजा अपने समीप रखे। अर्थात् ऐसे पुरषोंको अपना देवरक्षक नियुक्त करे ॥ ५॥ नान्यतोदेशीयमकृतार्थमानं स्वदेशीयं वाप्यपकृत्योपगृहीतम् ॥६॥ अन्तर्वशिकसैन्यं राजानमन्तः पुरं च रक्षेत् ॥ ७ ॥ धन सम्पत्ति तथा सत्कारको न प्राप्त हुए २ विदेशी पुरषको, तथा पहिले एकबार अपने से भिन्न होकर फिर आकर मिले हुए अपने देशके पुरषको भी, राजा कदापि अपना देहरक्षक न बनावे ॥ ६ ॥ भीतर महलों में नियुक्त हुई २ सेना, राजा और अन्तः पुर (रानी आदि ) दोनोंकी रक्षा करे ॥ ७ ॥ गुप्ते देशे माहानसिकः मर्यमाखादयाहुल्येन कर्म कारयेद ॥ ८॥ तद्राजा तथैव प्रतिभुञ्जीत पूर्वमग्नये वयोभ्यश्च वलिं कृत्वा ॥९॥ माहानसिक (पाकशालामें कार्य करने वाले पाचर्कोका अध्यक्ष या निरी- क्ष राजाका भोजनाधिकृत पुरप), क्सिी सुरक्षित स्थानमें, सानेकी हरएक चीजका स्वाद ले २ कर उन्हें अच्छीतरह तैयार करावे । अथवा हरएक चीजको स्वादु धनवावे ॥ ८ ॥ तदनन्तर राजा, इसप्रकार तैयार हुए २ भोजनको, पहिले बलिवैश्वदेव करके, अर्थात् अग्नि और पक्षियों आदिको बलिदेकर फिर स्वयं खावे ॥९॥ अमेर्जालाधूमनीलता शब्दस्फोटनं च विपयुक्तस्य वयसां विपत्तिश्च ॥ १० ॥ अन्नसोप्मा मयूरग्रीवाभः शैत्यमाशुक्लिष्टस्यैव चैवर्ण्य सोदकत्वमक्किन्नत्वं च ॥ ११ ॥ विषमिश्रित असको भग्निमें दालनेसे अप्तिकी लपट और धुभा दोनों भाले रंग के निकलते हैं, और उसमें घट घट' इसमकार शब्द भी होता है। तथा विपमिश्रित भन्न खाटनपर पक्षियोकी विपत्ति भयात् मृत्यु उपस्थित २१ अध्या विनयाधिकारिक होजाती है ॥ १०॥ विषयुक्त अन्नकी भाफ मोरकी गर्दनके समान रंगवाली होती है, तथा वह अब यहुत जल्दी उण्डा होजाता है, हाथ छूनेस या जरा तोड़ने मोडनेसे ही उसका रंग बदल जाता है, उसमें गांठसी पड़ जाती है, और वह अन अच्छीतरह पता भी नहीं ॥१॥ व्यञ्जनानामाशुशुष्कत्वं च काथश्यामफेनपटलविच्छिन्नभावो गन्धस्पर्शरसवधश्च ॥ १२ ॥ दाल आदि व्यञ्जन विपयुक्त होने पर बहुत जल्दी सूससे जाते हैं, यदि इनको फिर आगपर रखकर गरम किया जाये तो मठेको तरह फट २ कर उप- लसे हैं, झागोंका रंग कुछ कालासा, और वे फटे २ से अलहदा २ होजाते हैं। सथा दाल आदिके असली गन्ध स्पर्श और रस (स्वाद) का भी नाश होजाता द्रव्यपु हीनातिरिक्तच्छायादर्शनम् ॥ १३ ॥ फेनपटलसी. मान्तो राजीदर्शनं च ॥ १४ ।। यदि रसेदार शाक भाजी आदिमें विष मिला हुभा हो, तो उसमें अपनी भाकृति विकृत हुई २ दीखती है । अर्थात् कभी छोटो या कभी बड़ी दीखती है, ठीक नहीं दीसती ॥ १३ ॥ और झागाका समूह अलहदा तथा पानी अल- हवा दीसता है, और उसके ऊपर रेसाली दीसने लगती है ॥ १४ ॥ रसस्स मध्ये नीला राजी पयसत्ताना मद्यतोययोः काली दमः श्यामा च मधुन : श्वेता ॥ १५ ॥ घी, तेल तथा रस (ईखका स्म) आदिमें विप मिला हुआ होने पर, उसमें नीले रंगकी रेखायें दीसती है, दूधर्म साम्नवर्णकी (सविक रंगको तरहकी) शराब और पानी में काले रंगकी, दहीमें श्याम और शहद में सफेद रंगकी रेखायें दीपने लगती हैं ॥ १५॥ द्रव्याणामाणामाशुअम्लानत्वमुत्पकमायः क्वाथनीलश्या- मता च ।। १६॥ गीले भक्ष्य दव्य अथान् आम अनार आदि फलोंके विषयुक्त होनेपर, वे (फल भादि) यहुत जल्दी मुरझा जाते हैं, अर्थात् घुड़े हुएसे होजाते है। और उनमसे सड़े हुएकी तरह दुर्गन्ध भाने लगती है, तथा पकानेपर ये फल फुछ का। और पन्दर रंगकी सरह का भुरभुरेसे होजाते हैं ॥ १६ ॥ - .
(८४) कौटलीय अर्थशास्त्र । [१ अधिक शुष्काणामाशुशातनं वैवयं च ॥ १७ ॥ कठिनानां मृदुत्वं मृनां कठिनत्वं च ॥ १८ ॥ तदम्याशे क्षुद्रसत्त्ववधश्च ॥१९॥ सूखे हुए द्रव्यमें विप मिलाया हो, तो उन दयोंका बहुत जल्दी चूरा सा बन जाता है। तथा रंग भी बदल जाता है ॥ १७॥ विप मिलानसे कठिन दिग्य मृदु (मुलायम), और सुदु दध्य कठिन होजाते हैं ॥ १८॥ विषयुक्त वस्तु के समीप रींगने वाले छोटे छोटे कीदे (चींटी आदि) की मृत्यु होजाती - आस्तरणप्रावरणानां श्याममण्डलता तन्तुरोमपक्ष्मशातनंच ॥ २० ॥ लोहमणिमयानां पङ्कमलोपदेहता ॥ २१ ॥ नेहराग- गौरवप्रभाववर्णस्पर्शवधश्चेति चिपयुक्तलिङ्गानि ॥ २२ ॥ विउ ने और ओदनेके कपड़ोंपर चिपका योग करनेपर, कपड़ा उस र जगह कुउ काले या और भिन्न वर्गके धो पड़जाते हैं । तथा उस स्थानपरसे सूतो कपडाके तन्तुओंका, और ऊनी कपड़ों के बालोंका रुआं उड़ जाता है ॥२०॥ सोना चांदी आदि धातुओंकी तथा स्फटिक आदि मणियोंकी बनी हुई वस्तुओं- को यदि विपयुक्त का दिया जाये, तो वे ऐपो मालूम होती हैं, जैपे इनके ऊपर कोई मलो कीचड़मी लोटदी हो ॥ २१ ॥ तथा उनके, निम्रता, कान्ति, भारी- पन, प्रभाव (अपना कार्य करनेको शक्ति , और स्पर्श आदि गुणोंका सर्वथा नाश होनाता है ! यहांतक विपयुक्त पदार्थीको पहचान के लिये उन विशेष लक्षणों या चिोंका निरूपण किया गया ॥२२॥ विषपदस्य तु शुष्कश्याववक्तता वाक्सङ्गः स्वेदो विजृम्भणं चातिमात्रं वेपथुः प्रस्खलनं वाद्यविप्रेक्षणमावेगः स्वकर्मणि स्वभूमौ चानवस्थानमिति ॥ २३ ॥ अय विष देनेवाले पुरपको पहचानकर पकड़ने के लिये, उसके भी कुछ चिन्ह यताते हैं:-पिप देनेवाले पुरपका मुंद कुछ सूखासा, तथा विवर्ण हो. जाता है, पात चीत करते समय घाणी लड़खडाने लगती है, पसीना भाजाता है, घबड़ाहटके कारण शरीरमें जंभाई तथा कंपकपी होने लगती है, साफ़ रास्ता होभेपर भी बेचैनी के कारण वह पुरुप बार बार गिरपाता है, यदि कोई आदमी सेही भापसमें यात कर रहे हों, तो ध्यानसे सुनने लगता है-कहीं ये मेरी ही तो बात नहीं कर रहे कोई बात होनेपर पर उसे कोप भाजाता है (किसी किमी पुस्तक में माया' की जगह भावेश' पाठ है, मर्थ दोनों का एक ही है), 4 २१ अध्या०] पिनयाधिकारिक (८५) अपने कार्यों में तथा अपने स्थानपर उसका चिन स्थिर नहीं रहता, इधर उधर हड़बड़ाया हुआसा घूमता रहता है ॥ २३ ॥ तस्मादस्य बाङ्गलीविदो भिपजश्वासनाः स्युः ॥ २४ ॥ भिपम्भैपज्यागारादावादविशुद्धमौषधं गृहीत्वा पाचकपोकाम्या- मात्मना च प्रतिस्वाद्य राज्ञे प्रयच्छेत् ॥ २५ ॥ पानं पानीयं चौपधेन व्याख्यातम् ॥ २६ ॥ इसलिय विपविद्याको जानने वाले, तथा अन्य चिकित्सक पुरुपभी राजाके समीप अवश्य रहे । अथवा राजा अपने देह रक्षकों में इन पुरुषोंको भी अवश्य रक्खे ॥२४॥ चिकित्सकको उचित है, कि वह ओपधशालासे स्वयं खाकर परीक्षा कोहुई औषधिको लेकर, तथा राजाके सामने ही उस औषधि से कुछ थोड़ीसी, उसके पकाने वाले तथा पीसने वाले पुरुषको खिलाकर, एवं यथावसर स्वयं भी खाकर फिर राजाको देवे ॥ २५ ॥ इसी तरह औषधिक समान, मथ तथा जलके विषय में भी सम्झाना चाहिये। अधीर मद्य और जल को भी पहिले परिचारक पुराप स्वयं पाकर फिर राजाको देव ॥ २६ ॥ कल्पकप्रसाधकाः स्नानशुद्धवस्त्रहस्तासमुद्रमुपकरणमन्तर्वाश- कहस्तादादाय परिचरेयुः ॥ २७ ।। स्नापकसंवाहकास्तरकरजक- मालाकारकर्म दास्यः कुर्यः ॥ २८ ॥ द्वाही मूट पनाने वाले नाई, तथा वस्त्र अलङ्कार आदि धारण कराने वाले पुरप; स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहन कर तथा हाथ आदि अच्छी तरह साफ करके, मोहर लगे हुए, उस्तरे आदि राथा वस्त्र अलक्षार आदि बक्सों को, महलों के अन्दर काम करने वाले कम्चुकी आदिके हाथ से लेकर राजाकी परिचर्ग (सेवा) करें ॥ २७ ॥ राजाको स्नान कराना, उसके अङ्गीका दवाना, विस्तर आदि विधाना, कपड़े धोना तथा माहा आदि बनाना, हम सब कार्योंको दासियां ही करे ॥२८॥ ताभिरधिष्ठिता वा शिल्पिनः ॥ २९ ॥ आत्मचक्षुषि निवेश्य वस्त्रमाल्यं दद्युः ॥ ३० ॥ नानानुलेपनप्रघचूर्णवासस्मानीयानि स्ववक्षायाहुपु च ।। ३१ ॥एतेन परस्मादागतकं च व्याख्यातम् ॥ ३२.॥ अयया दासियोंकी देखरेख में अन्य शिहरीमा उस कार्य करने में चतुर कारीगर लोगही इन कायोको को ॥१९॥ बानी भासे देखा ही दासियो उन [१ अधिक *(८६) कौटलीय अर्थशास्त्र वस्त्र तथा माला आदिको राजाको देवें। जिससे कि उनमें विष आदिके योग का सन्देह न रहे ॥ ३० ॥ स्नान के समय उपयोग की वस्तुये उयटन आदि, चन्दन आदि अनुलेप, तथा वस्य आदिको सुगन्धित करने वाले अन्य चूर्ण (पाउडर ) पटवास आदि, और स्नानके सयय सिर आदिमें लगाने की सुगन्धित वस्तुओंको पहिले दासियां अपनी छाती तथा घांह आदि पर लगा v कर देख लेवे, फिर राजाको उसका उपयोग कराये ॥ ३ ॥ इससे दूसरे स्थान से आई हुई वस्तु के उपयोगके विषयमें भी समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥ कुशीलवाःशस्त्राग्निरसवर्ज नर्मयेयुः ॥ ३३ ॥ आतोयानि चैपामन्तस्तिष्ठेयुरश्वरथद्विपालंकाराच ॥ ३४ ॥ नट आदि अपने खेलों में हथियार, भाग तथा विप आदि प्रयोग खेडाको छोड कर दूसरे सेल ही राजाके सामने दिखावें ॥ ३३ ॥ नटोंके उप. योग में आने वाले याने आदि राज रवनम ही रसव रहने चाहिये, अर्थात् नट भरने बाजोंको (विग आदे श्योग की शङ्का होने के कारण ) राजा सामने लाकर नहीं बना सकते, इसी तरह इनके अन्य उपयोगी सामान चोदे रथ हाथी तथा भिन्न २ प्रकार के अलङ्कार आदि राजभवन से ही मिलने चाहिये । मौलपुरुपाधिष्ठितं यानवाहनमारोहेत् ॥ ३५ ॥ नावं चाप्त- नाविकाधिष्ठिताम् ।। ३६ ॥ अन्यनीप्रतिवद्धां वातपेगवशां च नोपेयात् ॥ ३७॥ उदकान्ते सैन्यमासीत ॥ ३८ ॥ वित प्रधान पुरुषके साथ २ ही राजा, पालकी आदि यानों सपा घोडे आदि सवारियों पर चढे ॥ ३५ ॥ तथा विश्वस्त नाविकसे युक नौका पर घटे, अन्यथा नहीं ॥ ३६॥ दूसरी कियो नावकै साथ बन्धो हुई नावपर, और पायुके वेगमे पहने वाली नाव पर कदापि न घडे ॥ ३७॥ नावके चलने पर, नदीके दोनों तटों पर रक्षाके लिये सेना उपस्थित रहनी चाहिये ॥३०॥ मत्म्यग्राहविशुद्धमनगाहेत ॥ ३९ ॥ व्यालग्राहपरिशुद्धा- द्यानं गच्छेत् ॥ ४० ॥ लुब्धः श्वगणिभिरपाम्तस्तेनव्यालपरा- याधमयं चललक्षपरिचयार्थ मृगारण्यं गच्छेत् ॥ ४१ ।। माछियारोंके द्वारा परिशोधित (जिसमें मछियारोंने घुस कर जल जन्तु. औसे किसी प्रकार का भय न होने का निर्णय कर दिया हो, ऐसे ) नदी जल में भी स्नान करने के लिये प्रवेश करे ॥ ३९ ॥ सोरोपे परिशोधित उद्यान में - २१ अध्या०] विनयाधिकारिक (७) ही भ्रमण आदि के लिये जाये ॥ ४० ॥ कुत्ते रखने वाले शिकारियों के द्वारा, चोर तथा व्याघ्र आदिके भयसे रहित हरिगों के जंगलों में, चलते हुए राक्ष्य पर निशाना मारने रा अभ्यास करने के लिये जावे # ४१ ॥ आप्तशस्त्रग्राहाधिष्ठितः सिद्धतापसं पश्येत् ।। ४२ ।। मन्त्रि- परिपदा सामन्तदूतं संनद्धो ऽश्वं हस्तिनं रथं वारूढः संनद्धमनीक गच्छेत् ॥ ४३ ।। राजाको देसने के लिये नये आये हुए किसी सिन्दू या तपस्सीको, शस्त्र सहित विश्वस्त पुरुपके साथ जाकर ही देसे, अर्थात् उससे मिले ॥२॥ मन्त्रिपरिपके साथ २ ही सामन्तके वूनसे मिले । तपा युन्मोचित कवच आदि वेपको पहिन का ही, घोडे हाथी या रथपर सवार होकर युद्ध के लिये तेयार हुई सेनाको देखे ॥ १३ ॥ निर्याणे ऽभियाने च राजमार्गमुभयतः कृतारक्षं दण्डिभिर- पास्तशस्त्रहस्तप्रवजितव्यङ्गं गच्छेत् ॥ ४४ ।। न पुरुपसंबाधमय- गाहेत ॥४५॥ दूसरे देशको जाने या वहां आनेके समय, हार्थम दण्ड लिये हुए रक्षक पुरुपोंके द्वारा दोनों भोरसे सुरक्षित राजमार्ग पर दी, राजा चले। तथा इस प्रकार का प्रबन्ध करे, कि जिससे मार्गमें कोई सास्त रहित पुरुष, सन्या- सी या एला लाडा महीन पुरपन दीर ॥ ४५ ॥ पुरुषाकी मीढमें भीतर कभी न घुसे ॥४५॥ यात्रासमाजोत्सवप्रवणानि दशर्गिकाधिष्ठितानि गच्छेत् ॥ ४६॥ किसी देवस्थान, समाज, (सभा) उरसर, या पार्टी (प्रवहण ) आदि में जावे, तो कमसे कम सेनाके दस जवान तथा उनका नायक इस स्थानम अवश्य उपस्थित होने चाहिये। ऐसे स्थानाम भवेला, तथा अपने परिमित परिवारको लेकर कदापि न जावे ॥ ६ ॥ यथा च योगपुरुपैरन्याराजाधितिष्ठति । तथायमन्ययाधेम्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ।। ४७ ॥ ति विचयाधिकारिक प्रथमे ऽधिरणे आस्मरक्षितकम् एकविंशोsधाय ॥२॥ एमावता कौटलीयस्यार्थश'यस्य विनयाधिकारिक प्रयम्मधिकरणं समाप्तम् ॥
(८८) कौटलीय अर्थशास्त्र [१ माघ जिस प्रकार यह प्रयत्नशील विजिगीषु राजा, अपने गृढ पुरयोंके द्वारा दूसरोंको कष्ट पहुचाता है । इसी प्रकार दूसरों के द्वारा प्रयुक्त किये हुए कष्टोंसे स्वय अपनी रक्षा भी करे ॥ १७ ॥ विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरणमें इक्कीसया अध्याय समाप्त । विनयाधिकरण प्रथम अधिकरण समाप्त । Mind
अध्यक्षपचार द्वितीय अधिकरण
पहिला अध्याय।
६९प्रकरण।
जनपदनिवेश।
(भूतपूर्वमभूतपूर्व वा जनपद परदेशापवाहनेन स्वदेशाभि-
प्यन्दयमनेन या निवेशयेत् ॥१॥ शूद्रकर्षकमायं कुलशतावरं
पञ्चशतकुलपरं ग्राम क्रोशविक्रोशसीमानमन्योन्यारक्षं निवेशयेत्
॥२॥
पुराने या नये जनपदको राजा, दूसरे देशसे मनुष्योंको धुलाकर अथवा
अपने देशकी जन संपाको अच्छी तरह बढ़ाकर बसाये ॥१॥ जिसमें शूद
और किमान ही प्रायः अधिक हों, ऐसे कमसे कम सौ घरों वाले और अधिक
से अधिक पांचसी घरों वाले गांवको बसावे । एक गांका दूसरेसे एक कोस
या दो कोस का फासला होना चाहिये। ये इस तरह बसाये जावें, जिससे कि
अपसर आने पर एक दूसरे की सहायता कर सकें ॥ २ ॥
नदीशैलवनगृष्टिदरीसेतुबन्धशाल्मलीशमीक्षीरवृक्षानन्तेषु सी-
म्नां स्थापयेत् ।।३।। अष्टशतनाम्या मध्ये स्थानीयं चतुःशतग्राम्या
द्रोणमुखं द्विशतग्राम्या सार्वटिकं दशग्रामीसंग्रहेण संग्रहणं स्थाप-
येत् ।।४ ॥ अन्तेप्यन्तपालदुर्गाणि ॥ ५ ॥
नदी, पहादी, जंगल,येरीके वृक्ष, साई, सेतुबन्ध ( तालाब भादि ),
सिमलके वृक्ष, शमी ( करा) के वृक्ष, तथा यड़ आदि वृक्षाके द्वारा, उन
गांपाको सीमाकी स्थापना गरे । ३ ॥ आठ सौ गांपाक बीचमें गुफ 'स्था-
नीय' की स्थापना फर; चारसी गानों के समूहम 'द्रोणमुख' दो सी गावॉ में
'साटिक' (क्सिी पुस्तकमे 'कारिक' भी पाट है), और दस गावोंका संग्रह
करनेसे 'संप्रण' नामके स्थान विशेषकी स्थापना करे ॥ ४ ॥राज्यकी सीमा
पर अन्तपाल नामक अध्यक्षसे अधिष्टित दुर्गाको स्थापना करे ॥ ५॥
- - कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक जनपदद्वाराण्यन्तपालाधिष्ठितानि स्थापयेत् ॥६॥ तेपाम- न्तराणि वागुरिकशवरपुलिन्दचण्टालारण्यचरा रक्षेयुः ॥ ७ ॥ तथा सीमापरही अपने जनपदवे द्वारभूत स्थानाकी स्थापना करे, इनके अधिष्ठाता अन्तपाल ही होना चाहिये ॥६॥ उनके मध्यभागाकी रक्षा व्याध, शबर, पुलिन्द ( ये दोनों भील जातिया है ), चण्डाल तथा अन्य जगलोंमें घूमने फिरने या रहने वाले रोग करें । अर्थात् उन स्थानों की रक्षाक लिये इन उपर्युक्त जातियों में से ही मनुश्य नियुक्त होने चाहिये ॥ ७ ॥ ऋत्विगाचार्यपुरोहितश्रोत्रियेभ्यो ब्रह्मदेयान्यदण्डकराण्यभि- रूपदायकानि प्रयच्छेत् ॥ ८॥ राजाको चाहिये कि वह ऋविक्, आचार्य, पुरोहित तथा श्रोत्रिय (वेदा. घ्यायी माह्मण) का, उनके भागक लिये खत आदि भूमि देवे । परन्तु उनसे किसी प्रकारका भी कर (लगान) आदि पसूल न करे । उस भूमिको कवि आदिकी पराम्पामें होने वाले पुन पौत्र आदि सबही भोगते जावें । भर्थात् राजा फिर उस भूमिका उनसे कभी चापिस न ले ॥ ८॥ अध्यक्षसंख्यायकादिभ्यो गोपस्थानिकानीकस्यचिकित्साश्व- दमकजङ्घाकरिकेभ्यय विक्रयाधानार्जम् ॥९॥ तथा अध्यक्ष (भिन्न २ कार्योंका निरीक्षण करने वाले प्रधानाधिकारी= सुवर्णाध्यक्ष भादि), भौर सस्पायक (गगक गणना करने वाले सरकारी दफ्त रों में काम करने वाले फर्क) अद्रि पुरुष के लिये, इसी प्रकार गोप (दसगांव का अधिकारी), स्थानिक (नगरका अधिकारी पुरष), अनीकस्य (हाथियोंको शिक्षा देनेमें चतुर पुरर), चिकितपक (वैद्य। असदमक (घोडाको शिक्षा देने वाला), और जवारिक अर्थात दूर देशोंमे जाने मानेसे अपनी आधिका करने वाला, इन सय पुरषोंक लिय भा राना क्षेत्र आदि भूमि देवे। परन्तु इन रोगोंको, अपनी भूमिको बेचने का तथा गिरवी आदि रखने का अधिकार नहीं होता, उस भूमिका कल भेग कर सकते हैं ॥९॥ करदेभ्यः कतक्षेत्रायकपुरपिकाणि प्रयच्छेत् ॥ १० ॥ अ. कृतानि कर्तृभ्यो नादेयात् ।। ११ ॥ रगान आदि देने वाले किसानोंकरिय, जो सेतीके लिये उपयोगी टीक तयार कीहुई तीन दाजावे, वह मिस पुरपके नाम दीजाये, उसहोके नीयन कारतक उसके पास रहसकती है, तदनन्तर राजाको अधिकार है कि यह उस जमीनको, इस पुरुषके पुत्रादिको दवे, अथवा अन्य किसीको ॥ १० ॥ जिन १ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार लगान आदि देने वाले किसानोको यजर भूमि दीगई है, और उन्होंने अपनेही परिश्रमसे उसे सेतीके योग्य बनाया है, राजाको चाहिये कि उन किसानोंसे उस जमीनको कभी न ऐये। ऐसी जगीनाके उपर किसानोको पूर्ण अधिकार माह होना चाहिये। अकृपतामाच्छिद्यान्यम्यः प्रयच्छेत् ॥ १२ ॥ ग्रामभृतक- देहका वा कृपेयुः ॥१३॥ यदि कोई किमान जमीन में खेती नहीं करता, और उसे वैसेही पढ़ी रहने देता है, राजाको चाहिये, उससे यह जमीन छीनकर धीर किती खेती फरने याले किसानको देदेय ॥१२॥ अथवा ऐसे किसानके न मिलनेपर उस जमीन में गांव अधिकारी पुरंग या मापारी लोग सती करें ॥ १३॥ अकृपन्तो ऽपहीनं दाः ।। १४ ॥ धान्यपशुहिरण्यश्चैनान- नुगृहीयात्तान्यनुसुसेन दयुः ॥ १५ ॥ यदि पहिले स्वीकार करक फिर सेती न घर, तो वे उसका इजर्जाना देखें ॥ १५ ॥ राजाको उचित है कि वह धान्य (मौज आदिके लिये, अधया यथा- यसर सानेरे लिये भी), पशु और धन आदि सेतीकै उपयोगी पदार्थों के द्वारा, यथावसर किसानोको सहायता देता रहे । फसल पैदा होनेपर क्सिान भी अपने मुभीत के अनुसार धीरे २, ये मय उस्तु राजाको देदे ॥ १५ ॥ अनुग्रहपरिहारौ चेभ्यः कोशद्धिकरौ दद्यात् ।। १६ ।। राजा, किसानोंक स्वास्थ्यके लिये परिमित धन देता रहे, जिससे कि सुपुष्ट किसान अधिक काम करके राजपके यहानेमे सिद्ध हो। (स्वास्थ बढ़ा. ने लिये दिया हुआ धन अनुग्रह' शन्दसे यहा कहागया है, यहधन अखा?, गदका आदि भित्र प्रकारके शक्तिवर्द्धक व्यायाम में व्यय किया जायेगाडे हुए स्वास्थ्यको गुधारने के लिये दिया हुआ धन 'परिहार' शब्दसे यहापर कहागया है। यह धन गांव २ में औषधालय आदि स्थापन करने में व्यय किया जाये। ये ही स्वास्थ्य संपादन के उपाय है।)॥ १६ ॥ कोशोपघातिको वर्जयेत् ॥ १७ ॥ अल्पकोशो हि राजा पौरजानपदानव ग्रसते ॥ १८ ॥ निवेशसमकालं यांगतकं वा परिहारं दद्यात् ॥ १९ ॥ परन्तु गदि स्वास्थ्य के लिये अनुग्रह और परिहार देनमे राजकोशको कोई हानि पहुंचे, तो कदापि न देवे ॥ ॥ क्योकि को थोड़ा होनेपर ..
. कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक राजा' फिर नगर और जनपद निवासी पुरुषोंकोही सताता है अर्थात् कोश पूरा करनेको उन्हें धनादि लेने के लिये कष्ट पहुंचाता है॥ १८॥ किसी कुलके बसने समय, स्वर संगइनकेलिये प्रतिशत धन, उसे अवश्य देते रहना चाहिये, अथवा राजकोशकी आयके अनुसार, राजा, परिहार (बिगड़े स्वास्थ्यको सुधारनेके लिये) धन अवश्य देता रहे ॥ १९॥ निवृत्तपरिहारान्पितेवानुगृह्णीयात् ॥ २० ॥ आकरकर्मान्त- द्रव्यहस्तिवनग्रजवणिक्पथप्रचारान्वारिम्पलपथपण्यपत्तनानि च निवेशयेत् ।। २१ ॥ यदि पोरजानपद उस परिहारदमको चुकादेष, तो पिता समान रजा उनपर अनुप्रा को । अर्थात् उनमी वृद्ध लिये अनुग्रह धन देकरमा उनका उपकार करे ॥२०॥ सनिज पदापोंके बेचने स्थान, दयघन (चन्दन आदि पतिया लकड़ियों के उत्पत्ति स्थान ), हस्तिवन (हाधियोंका जंगल) गाय पल सादिकी रक्षा और उन्हें पढ़ाने के लिये स्थान, आयत नियोत (विदेशका 'माल स्वदेशमें लाना-अपत, तथा स्वदेशमा माल विदेश में भेजना-निर्यात कहाता इम्पेट, एक्सपोर्ट । व्यापालिये स्थान, जलमार्ग भोर स्थलमार्ग तथा बरे २ याज़ार या मण्डियों आदिका निर्माण करावे ॥१॥ सहोदकमाहार्योदकं या मेतुं यन्धयेत् ।।२२।। अन्येपां या यभतां भूमिमार्गवृक्षोपकरणानुग्रहं कुर्यात् ।। २३ ॥ पुण्यस्थानारामाणां च॥ २४ ॥ नियाल (नदी भादिमे जिनमें सदा रगातार जल आता रहे. ऐसे) अथवा भनिन्यजर ( जिनमे सदा जल न भाये, चिन्नु वर्षानुमै इधर उधरके अंधे स्थानोंसे यहार भाया हुमा जल हाहा होजावे, पसे) य २ जलाशयों के Mi बनाये ॥ २२ ॥ यदि भन्य प्रबाइनही इस कार्यशो करना चाहै, तो समें जलाशय भादिके लिये भूमि, नहर भादिके लिये मार्ग, भौर यथावश्यक सको भादि सामान देकर उनका उपकार को ॥२३॥ नया पुण्यरधान देवालय भादि भीर घाग यांचे आणि यनाने पारे प्रजाजनाकोभी भूमि भादिकी सहा. पता देवे ॥ २४॥ संभूय मैतुबन्धादपक्रामतः कर्मकरवलीपर्दाः कर्म कुर्युः ॥२५व्ययकर्मणि च मागी स्यात् ।।२६ान चांश लभेत ॥२७॥ एक मिटकर मेनुयाय बनाने वाले पुरुषों से यदि कोई मनुप्प इस न होने के कारण काम न करना चाहे तो अपनी जगा भाभे मौकर तथा बलोंको ------ १ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (९३) काम करने के लिये अवश्य देये ॥ २५ ॥ यदि ऐसा करने में कुछ आनाकानी करे, तो उससे, उसके अपने काम के हिस्से का सारा खर्च लिया जाये ॥२६॥ और कार्य समास होनेपर उससे,उसे कुछ भी फायदा न उठाने दिया जाये ॥२७॥ मत्स्यप्लवरहितपण्यानां सेतुपु राजा स्वाम्यं गच्छेत् ॥२८॥ दासाहितकवन्धूनशृण्यतो राजा विनयं ग्राहयेत् ॥ २९ ॥ इस प्रकार के बढ़े २ जलाशयोंमें उपस होने वाली, मछली, प्लया, (कार-पतपकी तरहका एक जलका पक्षL), और- कालदण्ड आदि व्यापारी यस्तुओपर राजाकाही अधिकार रहे ॥ २८ ॥ दास (मृति लेकर सेवा करने वाले नौकर), तथा अहितक (स्वामीमे धन आदि-लेकर आधिरूपसे रक्री हुए) अन्धु या पुग्न आदि यदि अपने मालिककी आशाका उलंघन करे, तो राजा उन्हें उचित रीशिसे शिक्षा देधे ॥ २९ ॥ बालवृद्धव्याधितव्यसन्यनाथांश्च राजा विभूयात् ॥ ३० ॥ नियमप्रजातां प्रजातायाश्च पुत्रान् ।। ३१ ॥ वालद्रव्यं ग्रामवृद्धा वर्धयेयुराव्यवहारप्रापणात् ।। ३२ ।। देवद्रव्यं च ॥ ३३ ॥ बालक, चो, रोगी, दुखी तथा अनाप शक्तियोंका, राजा सदा भाण पोषण करे ॥ ३० ॥ अप्रजातानी, जिसके सन्तान न होती हो, अर्थात् यन्ध्या स्त्री ) और प्रमाता सीके पुत्रादिकी, राजा सदा रक्षा करे, यदि ये अनाथ हाँ ॥३॥ यालकको सम्पत्तिको, गांधके लोग सदा बढ़ाते रहे, जब तककि वह पालक बालिग न हो जाये ॥३२॥ इमी प्रकार जो इन्म देवताकै निमित्तसे निश्चिन किया हुआ हो, उपेभी सता बढ़ाते रहें ।। ३३ ।। अपत्यदारान् मातापितरौ भ्रातृनप्राप्तव्यवहारान्भगिनी क- न्या विधवाश्चाविभ्रतः शक्तिमतो द्वादशपणो दण्डो ऽन्यत्र पति- तेभ्यः ।। ३४ ।। अन्यत्र मातुः ।। ३५ ।। लड़के नियों, माता पिता, नामालिंग भाई, अविवाहित तथा विधवा वहिन, आदिका, जो पुरुष सामध्यं रसते हुएभी पालन पोपण न करे, उसे १२ पण दण्ड दिया गाय। परन्तु ये लड़के शो आदि पतित न हो, यदि किसी कारणस पतित होगये हो, तो समर्थ सम्पन्धीको इनके पालन पोषणके लिये बाधित नहीं किया जासकता ॥ ३४ ॥ परन्तु यह प्रतिपैध माताके लिये नहीं है अर्थात् माता यदि पतित भी दोगई दी तो भी उसकी रक्षा करनीही चाहिये ॥३५॥ .
।
हुए, झुंडके
।
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधिक
नियोंके साथ इधर उधर जंगल में घूमते हुए; हाधियों के शयन स्थान, पैट (पर.
पंक्ति), मल मूत्र त्यागने के स्थान, तथा करारों (दांगों=नदीतटों) के गिराने
भादिके चिन्होंसे, इस बातका पता लगायें, कि हाथियोंके युट, जगलमें कहां
तक घूमते हैं ।
यूथवरमेकचरं निथं यूथपति हस्तिनं व्यालं मत्तं पोतं बंध-
मुक्तं च नियन्धेन विद्युः ॥ १२ ॥
झुंडके साथ घूमने वाले, अकेले घूमने वाले, झुंडसे निकले
मालिक, वरपकृति, मत्त( मम्न), पोत ( छोटी उमरके दश वर्ष तककी भव-
स्थ के), तथा बंध र छूटे हुर हाथीको, हस्तिवनके रक्षक पुरुप, अपनी गणना
पुस्तकसे जानें ॥ १२॥
अनीकस्थप्रमाणैः प्रशस्तव्यञ्जनाचारान्हस्तिनो गृहीयुः। शा.
हस्तिप्रधानो हि विजयो राज्ञाम् ॥ १४ ॥ परानीकव्यूहदुर्गस्क-
न्धावारप्रमर्दना ह्यतिप्रमाणशरीराः प्राणहरकर्माणो हस्तिन इति
॥ १५॥
हस्तिशिक्षाम सुचतुर पुरपाके कपनानुसार, श्रेष्ठ लक्षणोंसे
युक्त
हाधि-
योको, राजाके कार्यके लिये पकड़ लिया जावे ॥ १३॥ क्योंकि राजाओंके
विजयी होनमें हाथीही एक प्रधान साधन हैं ॥ १५॥ बड़े २ शरीर वाले हाथी
हो, शत्रुको सेना, म्यूह रचना, दुर्ग तथा छावनियोंको कुचलने वाले होते हैं,
इसलिये येही शत्रुके प्राणोका हरण करते हैं ॥ १५ ॥
कलिङ्गाङ्गगजाः श्रेष्ठाः प्राच्यायेति करूशजाः ।
दशावापरान्ताश्च द्विपानां मध्यमा मताः ॥ १६ ॥
कलिग और अन देशमै उत्पश्च हुप २ हाथी, तथा पूरयके करूमा देशमें
उत्पछ हुए २ हाथी, सब हाथियों में उत्तम होते हैं। दशार्ण देशमें उत्पन्न हुए
सथा पश्चिममें उत्पश्च हुए २ हाथी मध्यम समझे जाते हैं ॥१६॥
सौराष्ट्रिकाः पाञ्चजनाः तेषां प्रत्यवराः स्मृताः ।
सर्वेषां कर्मणा वीर्य जवस्तेजय वर्धते ॥ १७ ॥
स्यपक्षप्रधारे द्वितीये ऽधिकरणे भूमिष्ठिविधानं द्वितीयो ऽध्याय. ॥२॥
आदितत्रयोविंशः ॥ २३॥
३ मध्या० अध्यक्ष प्रचार सौराष्ट्र और पयजन देशीम उत्पन्न हुए २ हाथी अधम समझे गये हैं, यहांके हाथी सबसे घटिया होते हैं। परन्नु सबही तरहके हाधियोंका पल, वेग तथा तेज, उचित शिक्षाके द्वारा यथावश्यक बढ़ाया जासकता अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त । तीसरा अध्याय। २१ प्रकरण । दुर्गविधान। चतुर्दिश जनपदान्ते सांपरायिक देवकृतं दुर्ग कारयेत् ॥१॥ अन्तहीपं स्थलं वा निम्नावरुद्धमादकं प्रस्तरं गुहां वा पार्वतं निरुदकस्तम्घमिरिणं वा धान्यनं खञ्जनोदकं स्तम्बगहने या वनदुर्गम् ॥ २॥ चारों दिशाओमें, जनपद के सीमास्थानोंमें, युद्धके लिये उपयोगी स्वा. भाविक विकट स्थानोकोही, दुर्गके रूपमें पनया लेरे। अर्थात् यथावसर युद्धके लिये ऐसेही स्थानोंका आश्रय लेने ॥ 1 ॥ इसपकारके दुर्ग मुर यत या चार तर- हके होते हैं:-औदक पार्वत, धाम्वन और धनदुर्ग। इनमें प्रत्येकके फिर दोर भेद है; इन्हीं सबका द्वितीय सूत्रमे निरूरण किया जाता है:-चारी भोर नदियोसे घिरा हु - श्रीचमे रापूके समान, अथवा २ गहरे तालाबोंसे घिर हुभा मध्यका स्थल प्रदेश, यह दो प्रकारका औदक दुर्ग कहाता है। ब? बड़े पत्थरोस घिरा हुमा, भयया स्वाभाविक गुफाओंके रूपमें पना हुआ, यह दो प्रकारका पार्वत दुर्ग होता है । जल तथा पास आदिमे रहित अथवा सया ऊपर भूमिमें बना हुआ, यह दो प्रकारका धान्धन दुर्ग कहाता है। चारों भोर दलदलसे घिरा हुआ अथवा कोटेदार घनी झाड़ियोंसे घिरा हुआ, यह दो प्रका- रका वनदुर्ग कहाता है ॥ २ ॥ तेपां नदीपर्वतदुर्ग जनपदारक्षस्थानं धान्वनयनदुर्गमटवी- स्थानम् आपद्यपसारो वा ॥३॥ जनपदमध्ये ममुदयस्थानं स्थानीय निवेशयेत् ॥ ४॥ इन दुगौमसे नदीदुर्ग और पतिदुर्ग, आपत्ति के समय में जनपदकी रक्षा के स्थान होते हैं । धान्नदुर्ग तथा मगदुर्ग आरविकोंको रक्षारे लिये उप- [२अधिक (१००) कौटलीय अर्थशास्त्र युक्त होते हैं । अथवा विशेष आपत्तिके समय, राजा मी भागकर इन्हीं दुर्गामें आश्रय लेसक्ता है ॥ ३ ॥ जनपदके वीचम,धन आदिची उत्पत्तिके मुत्यस्थान स्थानीय अर्थात् बढे २ नगरोंको राजा बसावे ॥ ४ ॥ वास्तुकप्रशस्ते देशे नदीसङ्गमे हृदस पारिशोपस्याङ्के सर- सस्तटाकस्स वा वृत्तं दीर्घ चतुरश्रं वा वास्तुकवशेन प्रदक्षिणोदकं पण्यपुटभेदनमसारिपथाम्यामुपेतम् ।। ५ ॥ तस्य परिसास्तिस्रो दण्डान्तराः कारयेत् ॥ ६॥ इसप्रकारके स्थानीय (पडे २ नगर), नीचे लिखे प्रदेशोंमें यसाने चाहिये-जिस प्रदेशको, वास्तु विद्या जानने वाले विद्वान् श्रेष्ट बतावें, अथवा किसी नदीके सगमपर, अथवा बढे २ अगाध जलवाले, या जिनमें क्मल पदा होते हो, पेमे तलाशयोंके किनारेपर वसा । वह स्थानीय, भूमिके अनुसार गोलाकार (वर्तुलाकार ), अथवा ऐम्बा या चौकोर पसाया जाना चाहिये। उसमें चारों ओर छोटी २ नहरों के द्वारा जलप्रमाह अवश्य बहता रहना चाहिये । उसके इधर उधर उपस होने वाली विक्रेप वस्तुओका वहा सग्रह तथा प्रय विक्रयका प्रबन्ध होना चाहिये । जल भीर स्थल दोनों तरहके मागासें वहां भानेका सुभीता होना चाहिये ।। ५ ॥ उसके चारों ओर एक २ दण्डके फाम लेसे तीन खाइया खुदवावे । (चार हाथका एक दण्ड होता है । देखो - ३८, देशकालमान-अधि० २, अभ्या० २०)॥ ६ ॥ चतुर्दशं द्वादशं दशेति दण्डान्यिस्तीर्णाः निस्तारादनगाधाः पादोनमध या विभागमूला मूले चतुरश्राः पापाणोपहिताः पा. पाणेष्टकाबद्धपार्था या तोयान्तिकीरागन्तुतोयपूर्णा वा सपरिवाहाः पभग्राहवतीश्च ॥ ७॥ वे खाई प्रमश चौदह दण्ड, पारद दण्ड और दश दण्ड चौड़ी होनी पाहियें। जितनी चौड़ी हों, उससे चौथाई या भाधी कम गहरी होनी चाहिये। अथवा चौडाईका तीसरा हिस्सा गहरी होनी चाहिये । नीचे तमे यरायर तथा परयर आदिसे बंधी हुई होनी चाहिये । इधर उधरके किनारे भी पत्थर अथवा इंटोसे मजबूत चिने हुप होने चाहिये । यहीं से इनको इतना गहरा खोद दिया जाय, जहाँसे स्वयही इनमें जल निकलने लगे । अथवा किसी नदी आदि से जल लाकर इनमें भर दिया आवे । इनमें जल के निकलने का भी मार्ग भव श्य रहना चाहिये । कमल तथा नाकू आदि जलचर भी इन में रह ॥॥
1082) . ई अध्या अध्यक्ष-प्रचार (१०१) चतुर्दण्डापकृष्ट परिखायाः पदण्डोच्छ्रितमवरुद्धं तद्विगु. णविष्कम्भखाताद्वयं कारयेत् ॥ ८॥ परिसा (साई) से चार दण्डके फासलेपर, छ. दप ऊँचा, अपर अर्थात् सब ओरसे दृढ़, तथा जितना ऊँचा हो उससे दुगना नीचेसे चौदा वम अर्थात् सफील बनवाये, इसके बनवाने पही मिट्टी काममें लाई जाधे, जो साईसे सोदकर बाहर फेकी गई है ॥ ८॥ ऊर्चचयं मञ्चपृष्ठं कुम्भकुक्षिकं वा हस्तिभिर्गोभिश्च क्षुण्णं कण्टकिगुल्मविषवल्लीनतानवन्तं पांसुशेपेण वास्तुच्छिद्रं वा पूरयेत् 11९॥ उस पपनानके तीन प्रकार होते हैं.-उपय, मशष्ट तया कुम्भकुक्षिका जो वम (सफ्तील) नीचेसे यहुत मोटा और अपरसे पतला हो, उसे 'ऊध्यंचय' यहूते है, जो ऊपर नीचे दोनों जगहसे बराबर हो, वह 'मा- पृष्ठ' तथा ऊपर नीचपे पतला और वीचमेसे मोटा हो वह कुम्भाक्षिक' कहासा है । पफील को हाथी तथा गाय लॉस सूर सुंदवाना चाहिये, जिससे कि उस. की मही बैठकर वह सूप मज़पून होजाय । तथा उसके इधर उधर कांटेदार शाड़ियों और जहरीली लताये छगा देनी चाहिये । यदि साईयोकी खुदी हुई मिट्टी फिर भी बच जाये तो उससे उन गहें को भर दिया जाये जहाँसे मकान आदि बनाने के लिये मिही गोधी गई हो ॥ ९॥ वनस्योपरि प्राकार विष्कम्भद्विगुणोत्संधीष्टकं द्वादशहस्ता- दूर्घमोड युग्मं वा आ चतुर्विंशतिहस्तादिति कारयेत् ॥ १० ॥ इस यपके ऊपर एक प्राकार (दीवार) सना करवाये, यह अपनी चौड़ा- ईसे दुगना ऊँचा होना चाहिये, कमसे कम बारह हाथसे लगाकर तेरह पन्द्रह आदि विपम संध्याओंमें या चौदह सोलह आदि सम संरयाओंमें अधिकसे अधिक चौबीस हाय तक ऊँचा होना चाहिये ॥ १० ॥ स्थचर्यासंचारं तालमूलमुरजकैः कपिशीर्षकैथाचिताग्रं पृथु- शिलासहितं चा शैलं कारयेत् ॥ ११ ॥ अथवा प्राकारको ऊपरसे इतना चौडा यनवावे, जिसपर एक रथ भासा- नीसे चलसके । ताडयुक्षको जड़ समान, मृदा बाजे समान भौर बन्दरके सिरके समान आकार घाले छोटे बड़े परयों तथा ईटके चूरेसे, जिसके पादर या ऊपरकी ओरका हिस्सा बनाया गया हो अथवा जो केवल पड़ी २ शिला- भासेही ममाया गया हो से प्राकारको मप्रफे ऊपर करवाये.
[२ अपिल २०. कौटलीय अर्थशास्त्र न त्वेव काष्ठमयम् ॥ १२ ॥ अग्निरवहितो हि तसिन्दसति ॥१३॥ विष्कम्भचतुरश्रमट्टालकमुत्सेघसमावक्षेपसोपानं कारयेत् त्रिंशद्दण्डान्तरं च ॥ १४ ॥ यह प्राकार लकड़ीका कभी नहीं बनवाना चाहिये ॥ १२ ॥ क्योंकि इसमें अग्नि सदा सन्निहित रहता है । अर्थात् इसमे आग लगने का भय सदा ही बना रहता है ॥ १३ ॥ प्राकारके आगे एक अट्टालक बनवावे; जो कि प्राकारके विस्तार या ऊंचाई के समान ही विस्तृत या ऊंचा होना चाहिये । तथा ऊंचाई के बराबर ही जिसमें चढ़ने उतरने के लिये सीढ़ियां ( पीढ़ियां ) होनी चाहिये । एक अहालक का दूसरे से तीम दण्ड का फासला होना चाहिये । अर्थान् इनने २ फासले पर प्राकारके चारों ओर अदाला वनवाये जावे ॥१५॥ द्वयोरट्टालकयोमध्ये सहर्म्यद्वितला द्वयायामां प्रतोली कारयेत् ॥ १५ ॥ अहालातोलीमध्ये विधानुष्काधिष्ठानं सपि. धानच्छिद्रफलकसंहतमितीन्द्रकोशं कारयेत् ॥ १६ ॥ दो अट्टालों के बीचमें, हर्मकी दूसरी मंजिलके महित, चौदाईसे त्यादी लम्बी प्रतोली (गृह विशेष) बनवाने ॥ १५ ॥ अहालक और प्रतोल के बीच में एक इन्द्रकोश (स्यान विशेप, यनवाये । वह इतना बड़ा होना चाहिये जिसमें तीन धनुधारो पुरए वैध मके । याहरकी पोरसे रुकावट करने के लिये उनके आगे एक तख्ना लगा रहना चाहिये, परन्तु उस तस्लेमे यथावश्यक छिद्र अवश्य होने चाहिये, जिनसे चे भानुप्फ (धनुर्धारी पुम्प) याहरको वस्नुभाको देख सके, तथा अवसरपर याण आदि चढासकें ॥ १६ ॥ अन्तरेषु द्विहस्तविष्कम्भं पार्श्वे चतुर्गुणायाममनुप्राकारमष्ट- हस्तायतं देवपथं कारयेत् ॥ १७ ।। दण्डान्तरा द्विदण्डान्तरा वा चार्याः कारयेत् ॥ १८ ॥ प्राकारके साथ २, बहालक प्रतोली तथा इन्दकोश के बीच दो हाथ चौदा और प्राकारके पास इससे चतुर्गुण अर्थात् आठ हाथ चौदा एक देवपथ (गुप्तमार्ग) यनवाया जावे ॥ १७॥ एक दण्ड या दो दण्डके फापलेसे चार्या अर्थात् प्राकार आदिपर घने उतरनेका स्थान बनवाया जाये ॥ १८ ॥ अग्राह्य देश प्रधावितिका निकुहद्वारं च ॥ १९ ॥ न दीखने योग्य प्रदेश, प्राकारके ऊपरही प्रधाविति, तथा उसके पासही निष्फुरद्वार यनवाचे । (शत्रुके द्वारा बाहरकी भोरसे याण आदिक ३ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (१०३) छोड़नेपर, उसकी नजरसे बचनेके लिये सिपाहीके सरलतासे छिपने योग्य छोटेसे आवरणका नाम 'प्रधायितिका' है। इस क्षाचरण छोटे बड़े कुछ छेद भी रहते हैं, जिनके द्वारा शत्रुको प्रत्येक चेष्टाको भीतर बैठा हुआ सिपाही अच्छी तरहसे देख सकता है। इन्हीं छेदोंका नाम निष्कुहद्वार' है ॥ १९॥ बहिर्जानुभञ्जनी त्रिशूलप्रकरकूटावपातकण्टकप्रतिसराहिपृ. प्ठतालपत्रशृङ्गाटकश्वदंष्ट्रार्गलोपस्कन्दनपादुकाम्बरीपोदपानकैः छनपथं कारयेत् ॥ २० ॥ परिसासे बादरकी भूमियोंमें, जानुभञ्जनी (घोंटूतक उँचे, 'लकड़ी के यने हुए खूटे, जो रास्ते चलते समय घाटुओंको तोदनेवाले हो), निशूलाका समूह, अंधेरे गढ़े, लोहेको शलाकाओं तथा तिनकोंसे दके हुए गढ़े, लोहे के पने हुए काटोका ढेर, सांपके अस्थिपंजर तथा तालपत्रके समान बने हुए लोहेके जालों, तीन २ नोकवाले लोहे के नुकोले कांटों, कुत्ते की दाद के समान तक्षिण लोदेकी कीलों, बढ़े २ लट्ठों, अधवा गिर जाने के लिये एकही परकी बराबर बनायें कीचड़से भरे हुए गढ़ों, तथा अग्निके गदों और दूषित जल के गडासे दुर्गके मार्गको पाट देवे । रात्पर्य यह है कि साईके माहरकी भूमिमें, दुर्गके लिये आनेवाले रास्तेपर इन २ वस्तुओंको बिछा देवे, या भूमिमें गाढ़ देधे, जिससे कि शत्रु दुर्गकी भोर न आसके ॥ २० ॥ प्राकारमुभयतो मण्डपकमध्यर्धदण्डं कृत्वा प्रतोलीपदतलान्तरं द्वारं निवेशयेत् ॥ २१॥ पञ्चदण्डादेकोत्तरवृद्धयाटदण्डादिति चतुरश्रं द्विदण्ड वा पड्भागमाय मादधिकमष्टभागं वा ॥ २२।। गिम जगहपर दरवाजा बनानेकी इच्छा हो, वहा पहिले नीचे प्राकारके दोनों भागमि डेढ़ दण्ड लग्या चौदा मण्डप अर्थात् चबूतरासा बनाया जाये; तदनन्तर उसके ऊपर प्रसोलोके समान छ: सम्ने खड़े करके द्वारका निर्माण कराया जाये ॥ २ ॥ द्वारका विस्तार पांच दण्डसे लगाकर एक: २ दण्डकी वृद्धि करते जानेसे. अधिकसे भधिक आठ दण्डतक प्राकारके अनुसार चौकोर दोना चाहिये । अथवा दो दण्डका ही दरवाजा होये, यह भी कोई विद्वान् कहते हैं। अथवा नीचे धाधार परिमाणसे हरा या आठवां हिस्सा अधिक करके ऊपर दरवाजा बनाया जाये ।। २२ ॥ पञ्चदशहस्तादेकोत्तरमष्टादशहस्तादिति तलोत्सेधः ।। २३॥ स्तम्भस्य परिक्षेपाः पडायामा द्विगुणो निखाता चूलिकायाश्चतु- [२ अधिक 1 (१४) कौटलीय अर्थशास्त्र र्भागः ॥ २४ ।। आदितलस्य पञ्च भागाः शाला वापी सीमा- गृहं च ।। २५॥ नीचे तल से सम्मकी ऊँचाई पन्द्रह हायसे लगाकर अठारह हाथतक होनी चाहिये ॥ २३ ॥ और सम्माची परिधि अर्थात् मोटाई, सम्भेकी ऊँचाई का छठा हिस्सा होनी चाहिये । जितनी मोटाई हो उससे दुगना भूमिमें गाद दिया जाये, और उसका चौपाई हिस्सा, सम्भकी उपरकी चूलके लिये छोडा जावे ॥ २४ ॥ प्रतालिका के तीन तलों में से पहिले तलके पाच हिरम करे। उनमेसे वीचके हिस्से में तो वापी (पावडी) बनवावे, उसके इधर उधर शाला और शालाके किनारोंपर सीमागृह बनवावे । (शालाओंके किनारेपर पाचवें हिस्से में वन हुए उस छोटे मकानको ही “सीमागृह" कहा जाता है) ॥ २५॥ दशभागिको समत्तमारणी द्वौ प्रतिमञ्चौ अन्तरमाणिः ॥२६॥ हयं च समुच्छ्यादर्धतलं स्थूणावनन्धश्च ॥ २७ ॥ शालाके किनारोंकी भोर मुकाबले में दो मञ्च अर्थात् छोटे २ बैठनेके योग्य चबूतरेसे मनवावे, उनपर चोटी अर्थात् बुजिया भी होनी चाहिये । भार पाला तथा सीमागृहक बीचम आणि अर्थात् एक छोटासा दरवाना होना चाहिये ॥ २६ ॥ हर्म अर्थात् मकान की दूसरी मजिलकी ऊँचाई पहिली मंजिलकी ऊँचाईसे भाधी होनी चाहिये, आवश्यकतानुसार उसकी उतके नाचे छोटे २ खम्भोंका सहारा होना चाहिये । (किसी २ पुस्तकमें 'आणिहन्य' ऐसा इकट्ठा पाठ है, यहापर आणिका अर्थ सामा करना च हिये, भधात् मीमागृहके ऊपरका हम्मं, ऐसा अर्थ होना चाहिये) ॥२७॥ आर्धनास्तुकमुरामागारं विभागान्तरं वा ॥ २८ ॥ इष्टका- यमन्धपार्शम् ।। २९ ॥ वामतः प्रदक्षिणसोपानं गूढभित्तिसोपा- नमितरतः ॥ ३०॥ उत्तमागार अर्थात् हर्मस गी ऊपरकी तीसरी मंजिलकी ऊँचाई डेढ दण्ड हानी चाहिये । (एक यस्तुक, तान दण्डका होता है, अर्धषास्तुक-डेद दण्ड। यह परिमाण उसी समय समझना चाहिये, जर नचे द्वारका परिमाण पाच दण्ड हा, उसहाक अनुपार यह यडा भी होसकता है) । अथवा द्वारका तृतीयांश परिमाण उत्तमागारका होना चाहिये ॥ २८ ॥ उत्तमागारके इधर इधरके भांग, पकी इंटासे खूब मनयत बने हुए हाने चाहिय ॥ २९ ॥ उसके ३ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार गोई और चकरदार सीढ़ियां चलने उतरनेके लिये होनी चाहिये । और दाहिनी और छिपे तौरपर भीतम सीढ़ियां यनबाई जावें ॥ ३० ॥ द्विहस्तं तोरणशिमः ॥ ३१ ॥ त्रिपञ्चमागिको द्वौ कवाट- योगों ।। ३२ ।। द्वौ द्वौ परिधी ॥ ३३ ॥ द्वारका सिर अयात् हरके उपरका बुर्ज आदि दो दायका बनाना चाहिये ॥३॥तीन अया पांच हिस्सोंके, दोनों किया या फाटक होने चाहिये । (तीन या पांच हिस्सेका अर्थ यह है, कि एक किवाड़ लम्बाई में तीन तरते या पांच तोका बना हुआ होना चाहिये) ॥३२॥ किनादोंके पीछकी और दो परिघ अर्थात् अर्गला होने चाहिये ॥ ३३ ॥ अरनिरिन्द्रकीलः ॥ ३४ ॥ पञ्चहस्तमणिद्वारम् ॥ ३५॥ चत्वारो हस्तिपरिघा ।। ३६ ।। एक भरवि परिमाण चीशीस अंगुल परिमाणको अरनि कहा जाता है इसका दूसरा नाम 'हात' या हाथ भी है। एक हाय-१३ फुट) की एक इन्द्रकील (चटखनी) किंवा हॉको यन्द करने के लिये होनी चाहिये ॥३१॥ फाटकके बीच में एक छोटासा पांच वायका दरवाजा होना चाहिये ॥ ३५॥ सम्पूर्ण द्वार इतना बड़ा होना चाहिये, जिसमें चार हाथी एक साथ प्रवेश करसके । (इस सूत्र में 'हस्तिपरिष' शारदका लाक्षणिक अर्थ-हाधियोंके प्रवेशके लिये पर्याप्त, यही करना चाहिये। निवेशाध हस्तिनखः मुखसमः संकमो ऽसंहार्यो वा भूमिमयो वा निरुदके ।। ३७ ।। प्राकारसमं मुखमवस्थाप्य विभागगोधा- मुखं गोपुरं कारयेत् ॥ ३८॥ द्वारकी ऊंचाइसे आधी ऊंचाई वाला (अर्थात् द्वारकी ऊँचाई यदि पांच दण्ड हो तो ढाई दण्ड ऊंचा) हायोके नाखूनके समान भावश्यकतानुसार चाव उत्तारवाला, दरवाजे के समान भाझार वाला ही दुर्गके संचरणका मार्ग मीत् दुर्गपर यथासर घूमने फिरने का मार्ग, मजबून लकड़ी भादि का बना हुमा, अथवा जल रहित स्थानाम मट्टीकाही होना चाहिये ॥३७॥ ऊँचाई आदिम प्राकारके समानही निकलनका मार्ग धनवाकर, उसका तृतीयांश, गोधा (गोह-एक जलचर प्राणी) के मुंहकी तरह आकार वाला गौपुर अर्थात् नगरद्वार बनवाया जावेगा-३८॥ प्राकारमध्ये कृत्वा वापी पुष्करिणीद्वारं चतुःशालमध्य- र्धान्तराणीकं कुमारीपुरं मुण्डहम्य द्वितलं मुण्डकद्वार भूमिद्रव्य- कौटलीय अर्थशास्त्र [२ यधिः- वशेन वा ॥ ३९ ॥ त्रिभागाधिकायामा भाण्डवाहिनीः कुल्याः' कारयेत् ॥४०॥ । प्राकारके बीच मेंही यापी (बावड़ी) बनाकर उसके साथही एक द्वार बनाया जावे, वापीके साथ सम्बन्ध होनेसे इस द्वारका नाम पुष्करिणीद्वार होता है । इसीप्रकार जिम दरवाजे के आसपास चार शाला बनाई जाय, और उस दरवाजमें पहिले कहे हुए छोटे दरवाजैसे ड्यौदा अधिक छोटा दरवाजा लगा हो, उसका नाम कुमारीपुरद्वार होता है। जो दरवाजा दो मञ्जिलमा बन. याया अवै, तथा उसपर कंगूरे वगैरह लगे हुए न हो, तो उसे मुण्डकद्वार कहा जाता है । इसतरह भिन्न २ रीतिसे राजा दरवाजोंको बनवाव । अथवा वहांकी अपनी भूमि तथा अपनी सम्पत्तिके अनुसार इनमें रचित परिवर्तन कर सकता है, अर्थात् जैसी भूमि और जितनी सम्पत्ति हो, उसीके अनुसार इनका निर्माण करावे ॥ ३९ ॥ अन्य सामान्य नहरोंसे तिहाई हिस्सा अधिक चौड़ी नहरें बन. पाई जावें, जिनके द्वारा हर गरह के सामान अन्दर बाहर हाये तथा लेजाये जा- स॥४०॥ तासु पापाणकुद्दालकुठारीकाण्डकल्पनाः। भुशुण्डीमुदरा दण्डचक्रयन्त्रशतमयः ॥ ४१ ॥ उन महरोके द्वारा कौनसे सामान लाये जाये जासकते हैं, इसीका निरूपण इन दो श्लोकोंमें किया जाता है.-पत्यर, कुद्दल (कसी भादि भूमि खोदनेके उपकरण), कुठार, पाण, कल्पना (हाथियोंके उपकरण), भुशुण्डी (पन्दूक आदि शस्त्र । किमी पुनम 'भुशुण्डी' के स्थानपर 'मुसपेठ' पाठ है। लेईको कारोंसे युक्त, लकड़ीकी बनी हुई गदाका नाम 'मुसृष्ठि ' है), मुन्दर, इंडे (लाठी आदि), चक्र, यन्त्र, शतनी ॥१॥ कार्याः कार्मारिकाः शूला वेधनागाश्च घेणयः । उष्ट्रग्रीव्यो ऽग्निसंयोगाः कुप्यकल्पे च यो विधिः ॥४२॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे दुर्गविधानं तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ भादितचतुर्विज्ञः ॥ २४ ॥ लुहारोंके काममें आनेवाला सामान, अथवा उनका पनाया हुभा सा- मान, तीक्ष्ण नोक याले भाले आदि, बांस, ऊँटकी गर्दनके आकार के हथियार, अनि लगाकर पाये जाने वाले अयुध, तथा जिनका कुप्पाध्यक्ष प्रकरणम विधान किया गया है, ये सब सामान । ये पदार्थ हैं जो कि नहरके द्वारा लाये एजाये जाते है। ४२ भयक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त ।
" अध्या] अध्यक्ष प्रचार (१०७) चौथा अध्याय। २२ प्रकरण। दुर्गानवेश। पिरले अध्यायम परिसा, वन, प्राकार, अहालक, प्रतोली, इन्द्र- कोश, देवपथ भादिसे युक्त दुर्गके निर्माण के निपप्रमे निरूपण कर दिया गया । अब इस बात का निरूपण किया जायगा, उस दुर्गमें राजमार्ग राजभवन अमारमभान आदिका निर्माण । किस प्रकार होना चाहिये। प्रयःप्राचीना राजमार्गास्त्रय उदीची ता इति वास्तुविभागः तीन राजमार्ग पूरबसे पच्छिमकी औरको, और तीनही राममार्ग उज- से दरियनकी ओरको होने चाहिये । अर्थात् नगर बसाने के लिये एक स्थान केन्द्र मानकर बहस पूवकी और तीन मार्ग, पच्छिमकी और तीन मा आमन सामनेही एक सीधर्म हो। इसीप्रकार तीन मार्ग उत्तर और तीन मार्ग दक्षि- गकी औरको होने चाहिये । इसतरह लम्बे छः मागामें वास्तु अर्थात् गृहनि. मौण आदिके लिये निश्चित भूमिका विभाग करना चाहिये ॥ १ ॥ स द्वादशद्वारो युक्तोदकभूमिच्छन्नपथः ॥ २ ॥ चतुर्दण्डा- न्तरा रथ्या: ॥३॥ इन विभागोंके अनुसार प्रत्येक दिशाम तीन दरवाजे होनेके कारण चारों ओर कुल मिलाकर पारह दरवाजे हॉगे । इसप्रकार पारस दारोंसे युक्त, तथा उचित जल, भूमि और गुप्त मागासे युक यह वास्तुविभाग होना चाहिये ॥ २ ॥ चार दपट चौड़ी सध्या (उपवीथिकानोटी गली) बनानी चाहिये । (४ अरनिक, दण्ड-२ गज़ । इसप्रकार गलोकी चौड़ाई ८ गज़-२५ फीट हुई ) ॥ ३॥ राजमार्गद्रोणमुखस्थानीयराष्ट्रविवीतपथाः संयानीयव्यूहश्म- शानग्रामपथावाटदण्डाः ॥ ४ ॥ राजमार्ग; दोणमुख (चारसी गांवोका प्रधानभूत केन्द्र स्थान), स्था. नीय (आठसौ गोत्रका प्रधानभूत केन्द्रस्थान), राष्ट्र, तथा चरागाहको जाने घाला मार्ग और व्यापारी मंडियों (संयानीय) का मार्ग, सेनाका मार्ग, श्मशान तथा अन्य गांचाको जाने वाला मार्ग; ये सम आइ २ दण्ड चौड़े होने चाहिये।
(१०८)
कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधि०
चतुर्दण्डः सेतुवनपथः ॥५॥ द्विदण्डो हस्तिक्षेत्रपथः ॥६॥
पञ्चारत्नयो रथपथश्चत्वारः पशुपथः ॥७॥ द्वौ क्षुद्रपशुमनुष्यपथः
..
जलाशयोंका मार्ग तथा जंगलाका मार्ग भी चार दण्ड चौड़ा होना
चाहिये ॥ ५॥ हाथियों के चलनेका रास्ता, तथा खेतोंमें जानेका रास्ता दो दण्ड
चौड़ा होना चाहिये ॥६॥ पांच भरति अर्थात् दाई गज़ चौडा रयोंका, मथा
दो गज़ चौड़ा पशुओंका रास्ता होना चाहिये ॥ ७ ॥ दो भरति अर्थात् एक
गज़ चौड़ा रास्ता, मनुष्य तथा भेड़ बकरी आदि छोटे २ पशुओंके लिये होना
चाहिये ॥८॥
प्रवीरे वास्तुनि राजनिवेशचातुर्वर्ण्यसमाजीवे ॥९॥ वा-
स्तुहृदयादुत्तरे नवभागे यथोक्तविधानमन्तःपुरं प्राङ्मुखमुदङ्मुखं
वा कारयेत् ॥ १० ॥
खूब मज़बूत ज़मीनोंमें राजभवनोंका निर्माण कराना चाहिये । साथ में
यह भी देखलेना चाहिये कि यह भूमि चारों वर्षों की जीविकाके लिये भरयन्त
उपयोगी है ॥९॥ वास्तुके मध्य भागसे उत्तरकी ओरके नौवें हिस्से में पहिले
कही हुई रीतिके अनुसार (देखो:-निशास्तप्रणिधि प्रकरण) अन्त पुरका
निर्माण कराया जाये, इसका द्वार पूरब या परिछमकी ओर होना चाहिये ॥१०॥
तस्य पूर्वोत्तरं भागमाचार्यपुरोहितेज्यातीयस्थान मन्त्रिणश्चा-
वसेयुः ॥ ११ ॥ पूर्वदक्षिणं भागं महानसं हस्तिशाला कोष्ठागार
च ॥१२॥
उस भन्त.पुरके पूर्वोत्ता भागमें अचार्य पुरोहितके स्थान यज्ञस्थान
तथा जलाशय घनवाये जावें, और मन्त्रियों के निवास स्थान भी इस ओर ही
बनवाने चाहिये॥1तक्षिण भागमे (अर्थात् अन्त पुरके पूर्वदक्षिण भाग)
महानस (रसोई), इनिशाला अर्थात् हाथ की पीठ के समान पारस सभागृह
भपवा हाधियोंके रहनेकी जगह और कोप्टागार (घस्तुभण्डार) बनवाना चाहि-
पे॥१२॥
ततः परं गन्धमाल्यधान्यरसपण्या:प्रधानकारयः क्षत्रियाश्च
- पूर्वा दिशमधियसेयुः ॥ १३ ॥ दक्षिणपूर्व भागं भाण्डागारम-
क्षपटलं कर्मनिषद्याथ ॥ १४ ॥ दक्षिणपश्चिमं मागं कुप्यगृहमा-
युधागारं ष ॥१५॥
४ अध्या०]
अध्यक्ष प्रचार
(१०१)
उसके भागे गन्ध (खुशबू-इतर फुलेल आदि), माला, भा, तथा
घी तेल आदिकी दुकानें, और मुख्य शिरपी (कारीगर लोग) तथा क्षन्नियोंका
नियास स्थान पूरयकी ओर होना चाहिये ॥ १३ ॥ दक्षिणपूरबके हिस्सेमें
भाण्डागार (राजकीय फुटकर वस्तुभोंके रखनेका मझान), अक्षपटश (आय-
व्ययकी गणना करनेका मुएष स्थान), तथा सोने चांदी भादिकी बनी हुई
वस्तुओंके रसने के लिये स्थान होने चाहिये ॥ १५ ॥ दक्षिणपछिम हिस्से
में कुध्यगृह (सोने चांदीको छोड़कर अन्य सब धातुओंके रखने के स्थान), तथा
आयुधागार (शस्त्र अस्त्र आदि रसने के स्थान) का निर्माण कराना चाहिये ॥५॥
ततः परं नगरधान्यव्यावहारिककान्तिकालाध्यक्षाः पका-
नसुरामांसपण्याः रूपाजीवास्तालापचारा वैश्याश्च दक्षिणां दिश.
मधिवसेयुः ॥ १६ ॥
इसके आगे नगरम्यावहारिक (नगरके मकान आदिका ब्यापार करने
धाले), फार्मान्तिक (साने आदि कार्योंके अधिकारी पुरप) तथा सेनाध्यक्ष,
(अथवा इस सूत्रके "अपक्ष" पदको प्रत्येक के साथ जोदना चाहिये और
फिर नगराध्यक्ष (नगरका निरीक्षक अधिकारी पुरप), धान्याध्यक्ष ( अन्न
आदिका निरीक्षक अधिकारीपुरप , व्यावहारिकाध्यक्ष (प्यापारियों का निरीक्षक
अधिकारीपुरप), कार्मान्तिकाध्यक्ष (सान तथा अन्य कारसानोंका निरीक्षक
पुरुष) और सेनाध्यक्ष; यह अर्थ करना चाहिये ) और पका हुभा अग्न
बेचनेवाली दूकानें (होटल मादि) तथा शराब और मौसकी दूकानें; वेश्या तथा
नट शादि और पैश्य, ये सब दक्षिण दिशाकी भोर यसाये जायें ॥१६॥
पश्चिमदक्षिणं भागं सरोष्ट्रगुप्तिस्थानं कर्मगृहं च ॥ १७ ॥
पश्चिमोत्तरं भाग यानरथशालाः ॥ १८ ॥
पश्विमदक्षिणके हिस्सेमें गधे भौर ऊंटॉफका गुप्तिस्थान (रक्षागृह सबैले
आदि), तथा कर्मगृह (ऊंट आदिके व्यापारका स्थान; अथवा ऐसी भूमि जहां
नमूनोंके लिये पहिले छोटासा मफाम भादि घनाकर फिर गिरा दिया गाता हो)
बनवाया जाये ॥ १७ ॥ पश्चिमोसर भागमे शिविका (पाकी) आदि यानोंके
और रथ आदि के लिये मकान बनवाया जाये ॥१८॥
ततः परमूर्णासूत्रवेणुचर्मधर्मशस्त्रावरणकारवः शूद्राश्च पश्चिमा
दिशमधिवसेयुः ॥ १९॥ उत्तरपश्चिम भागं पण्यभैपज्यगृहम्
॥२० ।। उत्तरपूर्व भाग कोशो गवावं च ॥ २१ ॥
[२ अधि० कौटलीय अर्थशास्त्र उसके भागे उन सूत बांस तथा चमड़े आदिका काम करने वाले कवच हथियार तया इनके आवरण (कहर) बनानेवाले और अन्य शूद भी पश्चिमकी और भपना निवासस्थान बनावें ॥ १९॥ उत्तरपश्चिमकी भोर पण्यगृह (राजकीय विक्रेय वस्तुमाके रखनेका घर), तथा औषधालयका निर्माण कराया जाये ॥ २०॥ उत्तरपूर्व के हिस्से कोश तथा गाय बल और घोड़ोंके लिये स्थान निर्माण कराया जावे ॥२१॥ ततः परं नगरराजदेवतालोहमाणकारवो ब्राह्मणाथोत्तरांदि- शमधिवसेयुः ॥ २२ ॥ वास्तुच्छिद्रानुलासेपु श्रेणी पयहणिकनि. काया आवसेयुः ।। २३ ॥ उसके आगे उत्तर दिशाकी और नगरके देवतास्मान तथा राजकुल के देवतास्थान, लुगार मनिहार भौर माह्मणोंके निवासस्थानोंका निर्माण कराया जावे ॥ २२ ॥ वास्तुके यीचकी खाली जगहोंमें (अर्थात् कोनोंकी टूटी हुई जगहों में) धोधी, दर्जी, जुलाहे आदि, तथा बाहर विदेशसे आनेवाले अन्य ध्यापारी लोग बसें ॥ २३ ॥ अपराजिताप्रतिहतजयन्तवैजयन्तकोष्ठकान् शिववैश्रवणाश्चि- श्रीमदिरागृहं च पुरमध्ये कारयेत् ॥ २४ ॥ कोष्ठकालयेषु यथो- देशं वास्तुदेवताः स्थापयेत् ॥ २५ ॥ अपराजिता (दुर्गा), विष्णु, जयन्त, इन्द्र, इन देवताओंके स्थान तथा शिव, वैभवण (वरणा, आश्विन कुमार, लक्ष्मी और मदिरा इन पांच देवता के EATH मारके बीच में ही बनवाये जावे ॥ २४ ॥ पूर्व कहे हुए कोटागार भादि स्थानों में भी अपने २ विधार या उस २ देशके अनुसार वास्तुदेवताओंकी स्थापना कीजावे ॥२५॥ ब्राह्मेन्द्रयाम्पसनापत्यानि द्वाराणि ॥ २६ ।। यहिः परि- सायाः धनुःशतापकृष्टाचैत्यपुण्यस्थानवनसेतुबन्धाः कार्याः, यथा- दिशं च दिग्देवताः ॥ २७ ॥ नगरके चारों दिशामाके द्वारोंके मिन र चार देवता होते हैं, उत्तरके द्वारका प्रम देवता होता है, पूर्वका इन्द्र, दक्षिगका यम और पशिमका सेना- पति होता है ॥ २६ ॥ नगरके चारों ओरकी परिखासे बाहर सो दण्ड (दो सौ गम) की दूरी पर चस्य, पुण्यस्थान, बङ्गल तथा जलाशय धनवाये जाव और यहीपर उस २ दिशाके अनुसार भिन्न २ दिग्देवताओं (दिशाके देवताओं) की भी स्थापना कीजाघे २७ ॥ म २ -- ४ अभ्या अध्यक्ष प्रचार उत्तरः पूर्वो वा श्मशानवाटः ॥ २८ ॥ दक्षिणेन वर्णोत्त- राणाम् ॥ २९ ॥ तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ॥ ३० ॥ नगरके उत्तर या पूरयकी ओर इमशान स्थान होना चाहिये ॥ २८॥ और दक्षिण की दिशामें शुद्ध आदिका श्मशान होना चाहिये ॥ २९ ॥ जो इस नियमझा उलंघन करे, उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥३०॥ पापण्डचण्डालानां श्मशानान्ते चामः ॥ ३१ ॥ कर्मान्त- क्षेत्रक्शेन या कुटुम्धिनां सीमानं स्थापयेत् ॥ ३२॥ पापण्ड (कापालिक आदि) तथा चाण्डालों का निवासस्थान रमशानके समीपही बनाया जाय ॥ ३१ ॥ नगरमै बमोवाले परिवारों के लिये निवास. भूमिका निर्णय, उनके कार्य तथा भूमिकी परिस्थिति के अनुसारही करना घाहिये । (अर्थात् मापार आदि कार्य और संत आदिके न्यूनाधिक होने के भनुमारही परिवारोंकी निगासभूमिकी न्यूनाधिस्ता होये) ॥ ३२ ॥ तेषु पुप्पफलवाटपण्डकेदारान्धान्यपण्यनिचयांश्चानुज्ञाताः कुर्युः, दशकुलीयार कूपस्थानम् ॥ ३३ ॥ उन सेतीम फूलो तथा फलोक बाग, कमल आदिफे समूह, तथा अन्य शाक आदिकी क्यारियां बनाये । और राजा तथा अधिकारी पुरपाकी अनुमति लेकर अन्न तथा अन्य विविध विकेप वस्तुभाको भी उनमे पैदा करें । साधा- रणतया को हलासे जोती जाने योग्य भूमिका, नाम 'कुल' है, इसलिये 'दश- कुलीवार' शब्दका अर्थ-बीस हलासे जोती जाने योग्य भूमि, यह है । इसनी भूमिके याचमें जलसेच नके लिये एक कुआ होना चाहिये । (किन्हीं २ विद्वानों ने 'दशकुलोवाट' सन्दका अप-दश बलोले जोती जाने योग्य भूमि, यह किया है)॥ ३३ ॥ सर्पिस्नेहधान्यक्षारलवणभैपज्यशुष्कशाकयवसवल्लूरहणकाष्ठ लोहचर्माङ्गारस्नायुविपविषाणवेणुवल्कलसारदारुपहरणाश्मनिच - याननेकवर्षीपभोगमहान्कारयेत् ॥३४|| नयेनानवं शोधयेत् ॥३५।। घी, तेल, अग्न, क्षार, नमक, दवाई, सूखेशाक,भुस, सूखामांस, घास, एकड़ी (सोरता-गलाने आदिकी लकड़ी), लोहा, चमदा, कोयला, सायु (तांत), विष, सींग, यांस, छाल, सारदार (घड़िया मजबूत लकी मकान आदिके लिये; अथवा चन्दन आदि), हथियार, काय तथा पत्थर इन सबही पस्नुभाको दुर्गने इतनी भधिक संश्याम जमा करे, जोकि भनक बातफ उप- २ मधिल (११२) कौटलीय अर्थशास्त्र योगमें लाई जास॥ ३४ ॥ जो वस्नु पुरानी होजावें, उनके स्थानपर दूसरी नई यस्तुको रखदिया जाये ॥ ३५ ॥ हस्त्यश्वरथपादातमनेकमुख्यमवस्थापयेत् ॥ ३६ ॥ अनेक- मुख्यं हि परस्परभयात्परोपजापं नोपैतीति ॥ ३७॥ एतेनान्त- पालदुर्गसंस्कारा व्याख्याताः ॥ ३८ ॥ हाथी, घोडे, रथ तथा पैदल इन चारों प्रकारकी सेनाओंको, अनेक मुख्य अधिकारियोंके निरीक्षणमें रक्खे ॥ ३६ ॥ क्योंकि अनेक मुल्य ग्यत्तियोंके होनेपर, एक दूसरेके भयमे, उनमेसे कोई भी शत्रुसे जाकर नहीं मिल सकता । यदि एकही मुख्य निरीक्षक हो, तो वह अपने समान दूसरे किसीके न होने के कारण निर्भय हुभा २ लोभ आदिकै वशीभूत होकर कदाचित् शत्रुसे मिल सकता है ॥ ३० ॥ इसी तरह अन्तपालोकं दुर्गाका निर्माण तथा प्रबन्ध आदि भी समझ ऐना चाहिये अपांत् नारके दुर्गाके समानही जनपद की सीमाके दुर्गाका भी सब प्रबन्ध होना चाहिये ॥ ३८॥ न च पाहिरिकान्कुर्यात्पुरराष्ट्रोपघातकान् । क्षिपज्जनपदस्यान्ते सर्वान्या दापयेत्करान् ॥ ३९ ॥ ' इत्यध्यप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे दुर्गनिवेशश्रतु| sपाय ॥ ४ ॥ भादित पञ्चविश ॥२५॥ राजाको चाहिये कि वह नट, नत्तंक, धूर्त तथा जुआरी भादिको किसी ARE भी नगरमें न बसने देवे, क्योकि ये लोग नगर तथा जापदनिवासी पुरुषोंको अपने काम दिखाकर कुमार्गमें प्रवृरा करानेगाले होते हैं। यदि राजा इन बसानाही चाहे तो जनपद के सीमाप्रान्तमें बसावे । और यहॉपर रहने घाल अन्य परिवारों की इनसे भी राज्यकर वसूस किया आवे ॥ ३९॥ अध्यसमचार द्वितीय अधिकरणमें चौथा अध्याय समाप्त । . - पांचवां अध्याय । २३प्रकरण। सान्निधाताका निचयकर्म । सविधाता, भाण्डागाराधिपति या कोशाध्यक्षको कहते है। यह मध्यका किस प्रकार समह करे, तथा किस तरह उसकी रक्षा करे, पही सब इस प्रकाणमें निरूपण किया जायगा ।
५अध्या अध्यक्ष प्रचार - संनिधाता कोशगृहं पश्यगृहं कोष्ठागारं कुप्यगृहमायुधागारं वन्धनागारं च कारयेत् ॥ १॥ सनिधाता अर्थात् कोशाध्यक्ष कोशगृह, पण्यगृह । राजकीय विक्रय यस्तुओंके रसकेका घर), कोठार (साने योग्य अन्न तथा आदि वस्तुओं का रखनेका घर), कुप्यगृह, आयुधागार और अन्यनागार (कारागृह) का निर्माण करावे ॥१॥ चतुरश्रां वापीमनुदकोपस्नेहा सानयित्वा पृथुशिलाभिरुभ- यतः पार्थ मूलं च प्रचित्य सारदारुपञ्जरं भूमिममं नितलमनेक- विधानं कुट्टिमदेशस्थानतलमेकद्वारं यन्त्रयुक्तसोपानं देवतापिधानं भूमिगृहं कारयेत् ॥ २ ॥ पानी और नमी से अर्थात् सोहसे रहित सावडी (प्राची के समान एक गढ़ा ) दुदवाकर, चारों ओर उसकी दीवारोंको और नीचेकी तलीको पठी २ शिलाभोंसे चिनकर मजबूत बना दिया जाये, उसरे बीच में मजनून लाडियोंके यने हुए पिजरेके समान तितला (तीन मजिर घाला), अनेक कोठरियोंसे युक्त, नांचे बीच तथा सश्मे कपरके तलेमें अढिया पक्ष रगे हुए, दरवाजे वाले, यन्त्र युक्त सीढियो महित (भर्थात् जिसकी सीदियोंपर विशेष नियम या समयके अनुसारही पुरुष घर सकता हो, अन्यथा नही, पा), समादेवताओं की आकृतिसे युक्त कियाडों वाला एक भामगृह बनवाया जाये ॥२॥ तस्योपर्युभयतोनिषेधं सप्रग्रीचमष्टकं भाण्डवाहिनीपरिक्षिप्त कोशगृहं कारयेत् ॥ ३ ॥ प्रासादं वा जनपदान्ते ध्रुवनिधिमा. पदर्थमभित्यक्तः पुरुषैः कारयेत् ॥ ४ ॥ उसके ऊपर, दोनों ओर से रफा हुभा (भस् बाहर भीतर दोनों को रसे पन्द होनेवाला), सामने बरोटेसे युष, पछी इंटोंसे मजबूत बना हुभार चारों ओरसे विविधि दयोंसे मरे हुए मकानोंसे घिरा हुआ कोशगृह मधमा प्रासाद बनाया जाये ॥ ३ ॥ जनपदके मध्य प्रान्तमें, वर पुरयों के द्वारा, विपतिमें काम आनेके रिये एक घुघनिधि (स्थायी कोश, जिससे हर समय ध्ययन किया जाय, ऐसे गुप्त राजाने) का निर्माण कराया जाय । (यह कार्य मध्य पुरगोंसे इसलिये कराया जाता है, कि जिससे उनको इस कार्य के समाप्त होते ही मार दिया जाय, ताकि ये इस गुत रहसका किसीको पता न दे सके) ॥ ४॥ 1 । 1 कोटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक पकेष्टकास्तम्भं चतुःशालमेकद्वारमनेकस्थानतलं विवृतस्त- म्मापसारमुभयतः पण्यगृहं कोष्ठागारं च दीर्घबहुलशालं कक्ष्या- घृतकुड्यमन्तः कुप्यगृहं तदेव भूमिगृहयुक्तमायुधागारं पृथग्धर्म-, स्थीय महामात्रीयं विभक्तस्त्रीपुरुपस्थानमपसारतः सुगुप्तकक्ष्य बन्ध. नागारं कारयेत् ॥ ५ ॥ पकी इंटॉसे चिना हुआ, चारों ओर चार मकानोंसे युक्त, एक दर याला, अनेक कोठरियों और खनी (मज़िलों) से युक्त, चारा और खुले खम्भे वाले चबूतरोंसे घिरा हुआ पण्यगृह, तथा कोष्टागार बनाना चाहिये । लम्बी २ बहुत शालाओंसे युक्त, चारों ओर कोठरियोंसे घिरी हुई दीवारों पारा, कुष्यगृह भीतरकी भोर मनाया जाये । भूमिगृहसे युक्त उस कुप्यगृहको ही भायुधागार बनाया जावे । बन्धनागारम, धर्मस्थसे सना पाये हुए, तथा महामानसे सजा पाये हुए पुरुषों के लिये पृथक् २ स्थान बनाये जायें। (धमस्य-व्यवहार निर्णेता। महामान-सन्निधाता समाहर्ता आदि) । तथा स्त्री पुरुषों के लिये बिल्कुल अल. हदा २ स्थान बनाये जावें । बाहर निकलने के मार्ग, तथा अन्य चारों भोरके उसके स्थानोंकी भी तरह रक्षा कोजावे, इसप्रकारका बन्धनागार भर्यात् कारागृह बनवाना चाहिये ॥५॥ सर्वेषां शालाखातोदपानवच्च स्नानगृहाग्निविषाणमार्जार. नकुलारक्षाः स्वदैवपूजनयुक्ताः कारयेत् ॥ ६ ॥ इन सवही कोशगृह आदि स्थानोंमें, शाला परिखा तथा कुभोंकी तरह मानगृह भादिभी बनवायें जावें । तथा अग्नि और विपके प्रयोगसे इनकी रक्षा कोजावे (रक्षाका उपाय देखो -मिशान्तप्रणिधि प्रकरण) विषसे रक्षा होने के लिये दिल्ली और न्योले मादिका रखना भी उपयोगी है। तथा इन स्थानोंकी रक्षा, रक्षक पुरपोंके द्वारा भग्छी तरह करवावे । भौर इनके अपने २ देवता ऑकी पूजा भी करवावे । इनके देवता इसप्रकार है -कोशगृहका देवता कुञ्चर, पण्यगृह भोर कोठागारकी दवता श्री, कुप्यगृहका विश्वकर्मा, भायुधागारका यम और बम्धनागारका बरुण देवता समझना चाहिये ॥ ६॥ कोष्ठामारे वर्षमानमरनिमुखं कुण्डं स्थापयेत् ॥ ७ ॥ तजा. तकरणाधिष्ठितः पुराणं न च रत्नं सारं फल्गुकुप्यं वा प्रतिगृ. हीयात् ॥८॥ कोष्टागारमें वृद्धिको मापने वाले एक कुण्ड (गर्त-छोटासा गदा यन्त्रके समान मनाया जाये, जिसमें दृष्टिका पानी पढ़नेसे टिकी इयत्ताका पता लगा ५ मध्या] अध्यक्ष प्रचार जाय) की स्थापना कोशाये, इसके मुहका घेरा एक अरवि अर्थात् पायीस अंगुल होना चाहिये ॥ ७ ॥ फोटामाराध्यक्ष, उस २ वस्तुके अच्छे जानकार पुरु- पोंकी सहायतासे नये और पुरानेकी विवेचना करके रख, सार (चन्दन भादि), फल्गु ( यस आदि), और कुष्य (लकडी चमड़ा घांस आदि विविध, फोटागार के लिये उपयोगी वस्तुएं) आदि पदार्थीका संग्रह करे ॥ ८ ॥ तत्र रनोपधावुत्तमो दण्डः कर्तुः कारयितुश्च ॥ ९ ॥ सारो- पधी मध्यमः ॥१०॥ फल्गुकुप्योपधौ तच्च तापच दण्डः ॥११॥ यदि कोई पुरुष असरी रसकी जराह कोष्ठागारमें नकली देवे, भीर छलसे असली रयका अपहरण कररे, तो अपहरण करने और करानेवाले दोनों- को उत्सम साहस दण्ड दिया जाये ॥ ९॥ चन्दन आदि सार पदार्थों में छल फरनेपर मपम साहस दण्ड दिया जावे ॥ १० ॥ फल्गु और कुप्य पदार्थाम एल करनेपर, यह पदार्थ ( उसकी तरहका दूसरा, या उसका मूल्य ) ललिया जाये, और उतनाही उसको दण्ड दिया जाये ॥ रूपदर्शकविशुद्धं हिरण्यं प्रतिगृह्णीयात् ॥ १२ ।। अशुद्धं छेदयेत् ॥ १३ ॥ आहर्तुः पूर्वः माहसदण्डः ॥ १४ ॥ शुद्ध पूर्णमभिनवं च धान्यं प्रतिगृह्णीयान् ॥ १५ ॥ विपर्यये मूलद्वि- गुणो दण्डः ॥ १६ ॥ सिकोको परखने पाले पुरपाके द्वारा सिकोकी गुहनाको जानकर हिर. पय (सुवर्णका सिका) आदिका समह करे ॥ १२॥ और जो उन सिधों मेंस नकली या मिलावटी निकले, उसे उसी समय काट देवे, शिससे कि उसका फिर वहार न हो ॥ १३ ॥ इसप्रकार बनाउदी हिरण्य आदि सिफाको लाने पाल (पको प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥ १४ ॥ धान्याधिकारी पुरुष शुद्ध, पुरा तथा नया अक्ष लेवे ॥ १५ ॥ इसस विपरीत लेनेपर उसे मूलसे (अर्थात् जितने मूल्यका यह अग्न है, उससे) दुगना दण्ड दिया जाये ॥ १६ ॥ सेन पण्यं कृप्यमायुधं च व्याख्यातम् ।। १७ ॥ सर्वाधि- करणषु युक्तोपयुक्ततत्पुरुषाणां पणादिचतुष्यणाः परमपहारेषु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः ॥ १८ ॥ इसहीके समान, पण्य, कुष्य तथा आयुधक विषयमे भी नियम सम- भने चाहिये ॥ १७ ॥ प्रत्येक अधिकार स्थानपर काम करने वाले अधिकारी परपको, उसके सहकारी पुरपको, सभा इन दोनोंके नीचे काम करने वाले अन्य पसंगको, प्रवमबार किसी वस्तुका अपहरण करमेपर एर पणसे छगाकर पार [२मधे० . कौटलीय अर्थशास्त्र पितक दण्ड दिया जाये । (किसी ३ पुस्तकमें 'पणादिचतुप्पणा.' के स्थान पर 'पणद्विपणचनुपणा' ऐसा पाठ है। उसका अर्थ-यमा उनको एक पण दो पण और च र पण इण्ड दिया जावे, यह करना चाहिये)। यदि फिर भी घे अपहरण कात चले जाय, तो अपहरणकै क्रमानुसार उन्हें प्रथमसाहस,मध्यम साहस तथा उसमसाइस दण्ड दिया जावे । यदि पांचवी बार फिर अपहरण करें, तो प्राण दण्ड दिया जाये ॥ १८॥ कोशाधिष्ठितस्य कोशावच्छेदे घातः॥ १९ ॥ तद्वयात्यका- राणामधंदण्डः ॥ २० ॥ परिभाषणमविज्ञाने ॥ २१॥ काशाधिकारा पुरण अधार कोशाध्यक्ष, याद मुग आदि लगाकर कोश का अपहरण करल, तो उस प्राण दण्ड दिया जाये ॥ १९॥ तथा उसके नीचे कार्य करन बाल भन्य परिचारक पुरपाको आधा दण्ड दिया जाय ॥ २० ॥ यदि उन लोगाका इस यातका पता न लगा हा कि मुरगक द्वारा काश पक्षने धन अप. हरण किया है, तो उनको दण्डन दिपा जाय, किन्तु कवल निन्दा पूर्वक उपा- लोभ वचनाके द्वारा उनका भरपना पाजावे ॥२१॥ चोराणामभिप्रधपणे चित्रो धातः ॥ २२ ॥ तस्मादाप्तपुरु. पाधिष्ठितः संनिधाता निचयाननुतिष्ठेत् ।। २३ ।। यदि अन्य चार पुरष इसप्रकार भात पाकर धन अपहरण करल, तो जनका चिन्नध किया जाय, अर्थात उन्हें यष्टपूर्वक प्राण दण्ड दिया जाय ॥२२॥ इमरिये सग्निध ता अधीन कोशाध्यक्षको चाहिये, कि वह आत (विश्वम्न ) पुरपासे युक्त हुआ २ ही, धनसग्रह आदिका कार्य करे ॥ २३ ॥ याह्यमाभ्यतरं चायं विद्यार्षिशतादपि । यथा पृष्टो न सज्येत व्ययशेपं च दर्शयेत् ।। २४ ।। इश्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरण सनिधातृनिचयकर्म परमो माये ॥५॥ आदित पविश ॥२६॥ सनिधाताको चाहिये, कि वह या अर्थात् जनपदसे होनेवारी और 'भाम्यन्तर अधीन नगरसे होनेवाली मायको असी तरहसे ज्ञान । यहांतक जान कि यदि उससे सौ वर्ष पाठकी भी आय पूछी जाये, तो वह बिना किसी रुकावट के सट कहदे । और १बचे हुए धनको कोशम सदा दिखाता रहे॥२४॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय आधिकरणमें पांचों अध्याय समाप्त । - FAN ६ अध्या०] . अध्यक्ष प्रचार (११७) . -- छठा अध्याय। २४ प्रकरण। समाहर्ताका करसंग्रह कार्य। (देशम उत्पन्न होनेवाली सर सरहकी फसलोंका अध्यक्ष समा- हत्ता होता है । यही उनमेस राजाके अशको (राजकरको) यमूर करता है। भाजपल ममार्ताको कसक्टर कहा जाता है। इसीके कार्योका निरूपया इस प्रकरणम किया जायगा। समाहर्ता दुर्ग राष्ट्र सनि मेतुं वनं बज वणिक्पथं चावे- क्षेत ॥१॥ समाहतो, दुर्ग, राष्ट्र, सीन, मेनु ग्न व्रज, नथा व्यापारीमागका निरीक्षण करे । अर्थात् इनके विषपमें उन्नति भवनतिका अच्छी तरह विधार करे ।।१॥ शुल्कं दण्डः पोतवं नागरिको लक्षणाध्यक्षो मुद्राध्यक्षः सुरा मना मूत्र तैलं घृतं धारं कौगर्णिकः पण्यसंस्था घेश्या धूतं वास्तुकं कारुशिल्पिगणो देवनाध्यक्षो द्वारबाहिरिकादेयं च दुर्गम् - शुल्क (चुगी), यर (प्रथम साहन्म आदि), पातब शराज बाट आदिका टीक करना), नगराध्यक्ष, पक्षणापक्ष (ग्यत तथा यगोचे आदिकी सीमा, नापकर निश्चित करनेवाला अधिकारीपुरुष पटवारी कानूगाह आदि), मुद्राध्यक्ष मद्याध्यक्ष, माणियबाध्यक्ष, सूपाध्यक्ष, एविक्रयी, भूतविमयी, क्षारविक्रमी (गुरु आदिका बचनेवाला) सायणिक (सुवर्णाधिधारी पुरष), पण्यसस्या (दूवान), श्रेश्या, दून, पास्तुक (गृह निर्माण करने वाले राज भादि), बबई, लुहार तथा सुनार आर पर्श सारी आदिका बारीक काम करनेवाले कारीगरोंका समूह, देवालयका निरीक्षक, नगर आदि द्वारपाल तथा नर नर्सक आदिसे आदय धन 'दुग' कहता ह अत् चुगी आदि पाईम उपायोंसे राजकरके रूपमे रिया हुभा धन 'दुर्ग' कहा गया है ॥ २॥ सीता भागो बलिः करो वणिक नदीपालस्तरो नावः पट्टनं विवीतं वर्तनी रज्जूचओररज्जूश्च राष्ट्रम् ॥ ३ ॥ सीहा (कृषि रेवती), भाग (धान्य आदिका एठा हिस्सा), पाल (उप- हार अथवा भिक्षा), कर (फल तथा वृथायिक सम्बन्ध रानदेय धन', । [२ अधिक . कोटलीय अर्थशास्त्र सा (नदी भादि पार होने का टैक्स), नाव (नोकाध्यक्षके द्वारा लभ्य धन), पहन (कस्वासे लभ्य धन), विवीत (चरागाहफे द्वारा प्राप्तम्य धन), पर्तनी (सदकोंका टेक्स), रग्जू (विषयपार-भूमिनिरीक्षक पुरषोंके द्वारा प्राप्तम्य धन), तथा घोररज्ज् (चोरोंको पकड़ने के लिये गांवसे प्राप्त हुआ धन), ये सय धनसंग्रहके द्वार यहां 'राष्ट्र' शब्दसे कहे गये हैं ॥ ३ ॥ सुवर्णरजतवज्रमणिमुक्तावालशह्वलोहलवणभूमिप्रस्तररसधा- 'तयः सनिः ॥ ४ ॥ पुष्पफ च्याटपण्डकेदारमूलयापाः सेतुः ।।५।। पशुमृगद्रव्यहस्तियनपरिग्रहो वनम् ॥ ६ ॥ सुवर्ण, चांदी, हीरा, मरकत भादि मणि, मोती, मूगा, शंस, लोहा, लवण, भूमि, पत्थर, तथा रसधातु, ये सब पदार्थ खानसे प्राप्त होने के कारण 'खान' शब्दसे कहे गये हैं ॥ ४ ॥ फूल तथा फलौक याग, केला सुपारी आदि, भोंके खेत, मदरस तथा हलदी भादि पस्तुओंके उत्पत्तिस्थान, इन सवका यहां 'सेतु' शम्से कथन किया गया है ॥ ५॥ गधय आदि पशु, 'हरिण, हम कि २ प्रकारको लकड़ी आदि), तथा हाधियोंके जंगलही यहां "वम' शब्दस समझने चाहिये ॥१॥ गोमहिपमजाविकं खरोष्ट्रमश्वाश्वतराय बजः ॥ ७॥ स्थल- पथो वारिपथश्व वणिक्पथः ॥ ८॥ इत्यायशरीरम् ।। ९॥ गाय, भैस, पकरी, भेड़, गधा, उंट, घोड़े, खच्चर भादि प्रज' कहाते है॥॥ स्थलमार्ग भौर जलमार्गकोही यहां 'यगिरथ' कहा गया है ॥ यही भायका पारीर है । अर्थात् राजाको जिन २ मागास भाप होसकती है ये यही । धनकी आमदनी के ये ही स्थान है ॥ ९॥ मूलं भागा व्याजी परिधःक्लप्त रूपिकमत्ययश्वायमुखम् ॥१०॥ मूल (भस तथा फल आदिको बेचकर प्राप्त किया धन), भाग (मा आदिका छटा हिस्सा), व्याजी (प्यापारियोसे, तुला मान आदिके न्यून होनेपर, फिर न्यून न हो इसरिये पारूपमें लिया हुआ आमदनीका बीसको हिस्मा, अर्थात् प्रति सकमा पांच । देखो-भधि ३ भ०१७ सू. १५), परिघ (भानुरदम्य अर्थात् जिस मन्यका कोई वारिस न हो), परत (नियत कर), रूपिक (नमक ग्यापारियोंसे लिया हुआ नमक्का आटयां हिस्सा), अध्यय (धर्मस्यीय कण्टकशोधन आदि अधिकारियों के द्वारा अपराधियोंपर किये गये अरमानोंका धन), ये सब भायके स्थान, भायके मुख कहाते हैं। क्योंकि भाम- दनीके जितने भार यतापे है, उग सपसे घेही मुख्य हैं ...॥
६ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार देवपित्रपूजादानार्थ स्वस्तिवाचनमन्तः पुरं महानसं दूतप्रवर्तनं कोष्ठागारमायुधागारं पुण्यगृहं कुप्यगृहं कर्मान्तो विधिः पत्यश्व रथद्विपपरिग्रहो गोमण्डलं पशुमृगपक्षिव्यालपाटाः काठणवा- टांश्चेति व्ययशरीरम् ।। ११॥ देवपूजा, पितृपूजा, दान, स्वस्तिवाचन (शान्ति तथा पुष्टि भादिके निमित्त पुरोहितको दिया हुआ धन), भन्त पुर, महानस, दूतका इधर उधर भेजना, कोशागार, भायुधागार, पण्यगृर, कुप्यगृह, कर्मान्त (कृषि आदि व्यापार), विष्टि (हठपूर्वक कराये हुए कार्यका व्यय), पैदल, घोडा, रथ, हाथी इन चारों प्रकारकी सेनाओंका सप्रह, गाय, भैस, यकरी आदिका प्रय, जगली पशु, हरिण, पक्षी तथा व्याघ्र आदि हिंसक जानवरोंकी रक्षाक स्थ न, लकड़ी घास तथा पगीचे भादि, ये सब व्ययका शरीर हैं। अर्थात् इनके निमित्त धन व्यय करना पड़ता है। ये व्ययके स्थान है ॥५॥ राजवर्ष मासः पक्षा दिवसश्च व्युष्ट वाहेमन्तग्रीष्माणां तृतीयसप्तमा दिवसोनाः पक्षाः शेपाः पूर्णाः पृथगधिमासक इति कालः ॥१२॥ राजाके राज्याभिषेक समयसे लगाकर मास पक्ष और पिन, इन चार चीजोको ध्युष्ट कहा जाता है। इसका तात्पर्य यही है, कि उस राजाके समयमें जो भी कार्य हो, उनक लेखन भादिमें, इन चारोंका निर्देश किया जावे, जसे भमुक राजवर्षके अमुक गास अमुक पक्ष और अमुक दिनम उस पुरपने इसना धन तथा अन्य कोई पदार्थ दिया इत्यादि। राजरके तीन विभाग किये जावे, वर्षा, हेमन्त (जाडा), ग्रीष्म (गरमी। ये तीनों ऋतु कहे जाते है), इस प्रत्येक विभागमे भाउ पक्ष होंगे, (वर्षा आदि एक एक ऋतु चार चार महीने का होता है, एक महीने में दो पक्ष =शुस्ल और कृष्ण, चार मासकी एक ऋतुम भाठ पक्ष हुए । उनमेंसे प्रत्यक मातुके तीसरे तथा सातवें पक्षमें एवं एक दिन कम माना जाये (एक पक्ष पन्द्रह दिनका होता है, तीसरा तथा सातवा पक्ष चौदह दिन काही माना जाने), बाकी प्रत्येक ऋतुके छहों पक्ष पूरे (पन्द्रह २ दिनके) माने जपें । और इससे पृथक् एक अधि मास ( भाधिकमास-मलमास) माना जावे (सौरमासके अतिरिक्त बाकि म हीनीकी गणना चन्द्रमाकी गति के अनुसार कीजाती है, तो प्रत्येक मासमें प्राय दो एक दिनकी न्यूनता होती परी जाती है, घान्द्र गणना अनुमा हुई । इस न्यूनताको पूरा करने के लिये लगभग प्रत्येक डाई वर्षों बाद, बारह महीने
[२ घभिः
(१२०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
के भतिरिक्त एक तेरहवा महीना और बढ़ा दिया जाता है, इसीका नाम अधि
मास्या मलमास होता ह) । साधारण तथा राजकीयवहारों के लिये यही काल
समझना चाहिये ॥ १२ ॥
करणीयं सिद्ध शेपमायव्ययी नीली च ॥ १३ ॥ संस्थान
प्रचारः शरीरावस्थापनभादानं सर्वसमुद्यपिण्डः संजातमेतत्कर-
णीयम् ॥ १४॥
समाहताको उचित है कि वह करणीय, सिद्ध, शेष,भाय, व्यय, तथा
नायीकी ठीक २ व्यवस्था करे ॥१३॥ करणीय छ प्रकारका होता है,-पस्थान
( अमुक प्रामसे इतना धन लेना चाहिये, ऐसा निर्णय ), पचार ( देश अर्थात्
पृथक् र देशके अवानार विभागेका ज्ञान ), शरीरावस्थापन ( जगपद और न
गरोंकी इतना आय है, इस प्रकार आयके शरीरका निश्चय), आदान (भन्न तथा,
हिरण्य भादिका ठीक समय पर हेलना), सर्वसमुदयपिण्ड (प्रत्येक ग्राम तथा
प्रत्येक नगरमें उत्पन्न हुए धान्य आदिका एक प्रेत करना तथा उसकी जानकारी
रखना ), सात (प्रत्यक उपायमे प्राप्त किये हुए धनके परिमाणका ज्ञान रखना
ये छ करणीय हैं। समाहाक अवश्य करने योग्य कार्य होने के कारण ये 'कर.
णीय' सदमे कह गय हैं ॥ १४ ॥
कोशार्पितं राजहारः पुरव्ययश्च प्रविष्ट परमसंवत्सरानुवृत्तं
शासनमुक्तं मुखाज्ञप्तं चापातनीयमेतत्सिद्धम् ॥ १५ ॥
सिन्दू भी छ प्रकारका होता है, कोशापित ( खनाने में जमा कर दिया
हुभा ), राजहार ( राजान अपने निजी कार्य के लिये समाहता से लिया हुआ),
भीर पुरप्पय ( नगरके शाला निर्माण आदि कार्यों में खर्च हुआ २), यह ताना
प्रकारका धन 'प्रविष्ट शम्से कहा जाता है । परममवस्तरानुरत्त ( पिरले साल
का बचा हुआ धन, जो कि अभी प्रविष्ट नहीं हुआ, अर्थात् न खजाने में जमा
किया गया है, न राजान अपने कार्य के लिये लिया है, और न नगरके कार्याम
रूपय हुआ है', शासममुग (जिप धनके सम्पन्धमें राजाने अभी तक अपना
कोई लिखिर माझा नहीं दी), भौर मुखाक्षप्त (जिस धनके सम्मन्धम
राजाने मौखिक आज्ञा देदी है) यह तीन प्रकारका धन आपातनीय कहा
जाता है। इस तरह तीन प्रकारका प्रपिष्ट भोर तीन प्रकारका आपातनीय
मिलकर कुछ प्रकरका सिद्ध' कहा जाता है।
सिद्धिपकर्मयोग दण्डशेपमाहरणीयं बलात्कृतप्रतिस्तब्धम्
वसृष्टं च प्रशोध्यमेनच्छेपमसारमल्पसारं च ॥ १६॥
- ६ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (१२१) छ प्रकारका हो शेप होता है,।-सिद्धप्रकर्मयोग (धान्य आदिके मिल जानेपर उन्हें अपने अधीन न करने के लिये प्रवृत्ति करना) तथा दण्ड शेष (सनाके उपयोगसे पचाहुआ धन ) सुखपूर्वक लियेगासकने के कारण इन दोनों का नाम 'भाहरणोप' है । राजा प्रिय पुराने बलपूर्वक अपनी इच्छा. नुसार न दिया हुआ धन (तारपर्य यह है कि जो पुरप राजाफे मुंह लगे हुए होते हैं, ये यह सोचकर कि समाहती हमारा क्या करसकता है? जान घूझकर राजदेय धन समाहर्ताको नहीं देते। ऐसा उन लोगोंसे प्राप्त न हुआ २ धन ), और अवसृष्ट अर्थात् नगाके मुखिया लोगोंने अपनी इच्छानुसार न दिया हुआ धन 'प्रशाध्य' नाम कहाजाता है। क्योंकि इन दोनों प्रकारके धनाको घसूल करना समाहर्ताके लिये यड़ा यससाध्य काम है, इसलिये इनका नाम प्रशाध्य रक्सा गया है। इस प्रकार दो तरहका आहरणीय' दो सरहका प्रशोध्य' मिलकर चार तरहका ओर असार (निष्फल व्यय हुआ २ धन ) तथा अल्पसार (बहुत व्यय करकेभी जिसका फल थोबाही मिलाहो) ये सब मिलाकर छ: प्रकारका शेप होता वर्तमानः पर्युषितो ऽन्यजातश्चायः ॥ १७ ॥ दिवसानुवृत्तो वर्तमानः ।। १८ ॥ परममांवत्सरिकः परप्रचारसंक्रान्तो वा पर्यु- पितः ॥ १९॥ आप तीन प्रकारका होता हैसमान पऍपिरा और अन्यजात ॥ १७ ॥ जो आय प्रतिदिन हो, अर्थात् दैनिक आय, वर्तमान आय फहाता है॥ १८॥ पिछले वर्पका जो धन उस समय घसूल न हुआ हो, उसका भय वसूल होना; पहिले अध्यक्षके समयमें हिसाब आदिकी गड़बड़ीसे न मालूम हुए २ धनका मालूम होजाना; अथवा शत्रुके देशसे आया हुभा धन; यह 'पर्युपित' आय कहाता है ॥ १९ ॥ नष्टप्रस्मृतमायुक्तदण्डः पार्थ पारिहीणिकमौपायनिक डमर- गतकस्वमपुत्रकं निधिश्वान्यजातः ॥ २० ॥ भूले हुए धनका फिर याद भाजाना, अपराधी पुरशसे दण्डरूपमें लिया करसे अतिरिक्त किन्हीं वक्र उपायासे अथवा अपने प्रभुपके कारण प्राप्त किया हुआ धन, चौपायासे सस्य आदिके नष्ट किये जानेपर उसके दण्डरूपमें प्राप्त हुभा २ धन, भेटकै रूपमै प्राप्त हुआ धन, सघुसे कलह होनेपर उस झगड़े में शत्रुकी सेनासे अपहरण किया हुआ धन तथा जिम धनका कोई दायभागी न हो इस साहका प्राप्त हुभा १ धन 'मन्य जारा' आयके नामसे कहा जाता है ॥२०॥ हुआ, [ (१२२) कौटलीय अर्थशास्त्र २ अधिक निक्षेपव्याधितान्तरारम्भशेषश्च व्ययप्रत्यायः ॥२१॥विक्रये पण्यानामर्घवृद्धिरुपजा मानोन्मानविशेपो व्याजी क्रयसंघर्षे या पृद्धिरित्यायः ॥ २२॥ किसी कार्यपर लगाई हुई सेनाके लिये व्यय किये जाने वाले धनमेंसे बचा हुआ धन, औषधालय आदिके व्यय के लिये निश्चित किये हुए धनमेंसे बचा हुआ धन, तथा दुर्ग या महलके लिये खर्च किये जाने वाले धनमेंसे बचा हुआ धन, यह 'ध्ययप्रत्याय कहाता है। यह भी एक प्रकारको आय है ॥२॥ मायके और भी पाच प्रकार हैं -विक्रप समयमें वस्तुओंकी कीमत पढ- जाना, उपजा (प्रतिषिद्ध वस्तुओंके बेचनेसे प्राप्त हुआ धन), वाट मादिके म्यूनाधिक करनेसे अधिक प्राप्त हुआ २ धन, ग्याजी (देखो-इसी भन्यायका १० पो सूत्र) और किसी वस्तुके येषनेके समयमें खरीदारोंकी परस्पर स्पर्धासे जो मूल्य बदकर मिल जावे । इस प्रकार यहा तक आयका निरूपण किया गया ॥२२॥ 1 नित्यो नित्योत्पादिको लाभो लाभोत्पादिक इति व्ययः ॥ २३ ॥ दिवसानुवृत्चो नित्यः ॥ २४ ॥ पक्षमाससंवत्सरलाभो लाभः ॥ २५ ॥ तयोरुत्पन्नो नित्योत्पादिको लाभोत्पादिक इति ॥२६॥ व्ययसंजातादायव्यविशुद्धा नीवी प्राप्ता चानुवृत्ता चेति ॥२७॥ भय व्ययका निरूपण करते हैं, प्यय चार प्रकारका होता है-निरय, निस्योरपादिक, लाभ, लाभोरपादिक ॥ २३ ॥ जो व्यय प्रतिदिन नियम पूर्वक होता हो, उसे नित्य कहते हैं ॥ २४ ॥ पाक्षिक, मासिक स्था धार्षिक लामके लिये जो धन पय किया जाता है, उस व्ययको 'लाभ' कहते हैं ॥२५॥ नित्यम्यय और लाभध्ययके साथ जो और अधिक व्यय (व्ययके रिये निय- मित निीत धनसे भौर अधिक धन, व्यय) होजाये, तो उसे पयासस्य निस्योत्पादिक और लामोत्पादिक कहा जाता है ॥ २६ ॥ सप सरहके प्ययसे बचा हुभा, माय और व्ययकी भाछीतरह गणना करके टीक २ निश्चित हुभा धन नापी' कहाता है । यह दो प्रकारका होता है-मास (जो खजाने में जमा कर दिया गया हो) और अनुवृत्त ( जो सजानेमें जमा किये जाने के लिये तैयार रएका हो) ॥ २॥ H 11 M अध्याग अध्यक्ष प्रचार एवं कुर्यात्समुदयं वृद्धिं चायस्थ दर्शयेत् । हासं व्ययस्य च प्राज्ञः साधयेच विपर्ययम् ।। २८ ।। इत्यध्यक्षमचारे द्वितीय ऽधिकरणे समाहसमुदयमस्थपनं पो ऽध्यायः ॥ ६ ॥ आदितः सहविः ॥२७॥ युद्धिमान् समाहर्ताको चाहिये, कि यह इसीप्रकार राजधनका संग्रह करे । और मायकी वृद्धि तथा व्ययका हास, हिसाम आदि ठीक करके दिखाता रहे । तात्पर्य यह है कि वह इसप्रकारका यत्न करें, जिससे आय परापर यदती जाये और व्यय यथाशक्य कम होजाय । यदि किसी अवस्थाम व्यय अधिक करके भी भविष्य में विशेष आपकी सम्भावना हो, सो इस तरहसे भी आपकी सिद्धि करे ।। २८ ॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें छठा अध्याय समाप्त । । सातवा अध्याय । २५ प्रकरण अक्षपटलमें गाणनिक्याधिकार । राजकीय धनके आय व्ययका रेखा जिस स्थानमें बंटकर किया जाये, उसे 'मक्षपटल ' कहते हैं। गाणनिक (गणना करने वाले लर्क आदि) जो कार्य करते है, उसका नाम गाणानिक्य है, उसका अधिकार अर्थात् निरूपण इस प्रकरण में किया जायगा। अक्षपटलमध्यक्षः प्राङ्मुसमुदङ्मुसं या विभक्तोपस्थान नि. बन्धपुस्तकस्थानं कारयेत् ॥१॥ अध्यक्ष (आय व्ययका प्रधान निरीक्षक अधिकारी पुरप), अक्षपटल (भाय व्ययके प्रधान कार्यालय) का निर्माण कराये । उसका दरवाजा पूरच या उत्तरकी भोरको होना चाहिये, प्रत्येक छोटे घदे रेसको (पको) के लिये पृथक प्रधर स्थान होने चाहिये, भाय व्यय के रजिस्टरोके रखने का, उसमें नियमित तथा सुरक्षित प्रयास होना चाहिये || तत्राधिकरणानां संस्थाप्रचारसजातानं कर्मान्तानां द्रव्यम- योगे वृद्धिक्षयच्ययप्रयामव्याजीयोगस्थानवेतनविष्टिप्रमाणं रत्न- सारफरगुरुप्पानामप्रतिवर्ष प्रतिमानमानोन्मानापमानमाण्ड १२ मधिल (.१२४) कौटलीय अर्थशास्त्र देशग्रामजातिकुलसवातना धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानं राजोपजी- विना प्रग्रहप्रदेशभोगपरिहारभक्तवेतनलाभं राजश्व पत्नीपुत्राणां रत्नभूमिलाभं निर्देशोत्सातिकप्रतीकारला मित्रामित्राणां च सं- धिविक्रमप्रदानादानि निवन्धपुस्तकस्य कारयेत् ॥२॥ उस भक्षपटलमें क्या २ कार्य होने चाहिये। यह पताते है:-द्रव्यों के उत्पत्ति स्थानोंकी नामनिर्देशपूर्वक संख्या, जनपद तथा यहांकी हरतरहकी उपजको रजिस्टरॉमें लिसा जावे, अर्थात् अमुक जनपद में इतने २ स्थानासे इतना २ धन प्राप्त हुआ। खान तथा हरप्रकार के कारस नोंके आय पायके सम्बन्ध पृद्धि (व्याज), अक्ष (पुरपोंका नियुक्त करना), व्यय (धान्य दिर- ज्य भादिको कार्यमें लगाना), प्रयाम (तैयार हुभा २ अन्न आदिका समूह ), प्याजी (देखो:-अधि० २, अध्या० ६, सून १०), योग (अच्छे और खरेदपकी मिलावट), स्थाम (प्राम आदि), घेतन, विष्टि (वेगार) आदि सब कार्योंका उल्लेस रजिस्टरमें किया जाय । रन सार पल्गु भीर कुप्य पदार्थों के मूल्य, प्रत्येक वस्तुका गुण, तोल, एम्बाई चौड़ाई, उचाई तथा असली मूलधनका उल्लेख रजिस्टरों में किया जावे । देश माम जाति कुल तथा सभा सोसाईटियों- के धर्म, व्यवहार, चरित्र तथा विशेष परिस्थितियोंका भी उल्लेख किया जाये। राजोपजीवी पुरुषोके प्रमह (पूजा, मन्त्री पुरोहित आदिके प्रति किया हुआ विशेष सरकार), निवासस्थान, भोग ( भेंट मादि), परिहार (कर भादिका म लेना), मक्त ' उनके घोहे हाधी आदिका खर्च देना', तथा वेतन आदिका भी उलेख किया जावे । महारानी तथा राजपुत्रोंके रस और भूमि भादिकी प्राप्तिका भी उल्लेख किया जावे । राजा, महारानी, और राजपुत्राको नित्य दिये जाने घाले धनसे अतिरिक्त दिया हुभा धन, विशेष उत्सव आदिसे प्राप्त हुआ धन, तथा रोगोंको शान्त करने के लिये जनतासे प्राप्त हुआ धन, इनको भी रजिस्टर में लिख लिया जाये। मिन्न तथा शत्रुओंके सन्धि विग्रह और उनको दिये हुए तथा उनसे लिये हुए धन आदिका भी पुस्तकोंमे उल्लेख कर लिया जाये । ये ही सप कार्य हैं, जो कि भक्षपटल अर्थात राजकीय कार्यालयोंमें होने चाहियें ॥२॥ ततः सर्वाधिकरणानां करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययी नीवी- मुपस्थानं प्रचारचरित्रसंस्थानं च निबन्धेन प्रयच्छेत् ॥ ३ ॥ उत्तममध्यमापरेपु च कर्मसु तज्जातिकमध्यक्ष कुर्यात् ॥ ४ ॥. 1 ७ मध्या অং-এষা तदनन्तर सय अधिकाणों (उरपतिस्थानों या कार्यस्थानों ) के करणीय, सिद्ध, शेप, आय, पय, नीधी (देखो -पिछा छा अश्याप), उपस्थान (कार्यकर्ताओंकी उपस्थिति) प्रचार, चरित्र तथा संस्थान आदि सरको लिखकर राजाको दे देव ॥ ३ ॥ उत्तम, मध्यम तथा नीच कार्योंपर उनके अनुकूलही अध्यक्ष नियत किये जावे ।।१।। सामुदायिकेपवक्लप्तिकं यमुपहत्य न राजानुतप्येत ॥५॥ एकदी कार्यको करनेवाले बहुतसे कर्मचारियॉमसे उसहीको अध्यक्ष बनाया जाये, जोकि कार्य करनेमें सबसे निपुण हो, यदि कई कर्मचारी समानही निपुग हों, तो उनमें जो गुणी हो, तथा समान गुणियों में भी जो यश- स्वी हो ( यह 'असर' शमा भव है), इनमें से मी ऐथे गुरुपको अध्यक्ष बनाया जाय, जिसको कि अपराध होने पर दण्ड देने के पश्चात् राजाको अनुताप या पश्चाताप न हो, इसका तय यह है कि राजा ऐसे अध्यक्ष पपिर माहागो अथ अपने निकट सम्बतियोंको नियुक्त न करे, क्योंकि किसी अपराध इनको दण्ड देनेपा राजाको दुखही होता है ॥ ५॥ सहग्राहिणः प्रतिभुवः कोपजीविनः पुत्रा भ्रातरो भार्या दुहितरो भृत्याश्चास्य कर्मच्छेदं वहेयुः ॥ ६ ॥ त्रिंशतं चतुःपञ्चा- शचाहोरात्राणां कर्मसंवत्सरः ॥७॥ यदि कोई अध्यक्ष अपहरण किये हुए राजकीय धनको फिर न देसके, सो वह धन उसके साथी (जिन्होंने अपहत धनमें हिस्सा लिया हो), प्रतिभू (जामिन), गणक (कमपिजीवी-अध्यक्ष नीचे कार्य करनेवाले अन्य कर्मचाtt), उसके (अध्यक्ष) पुग्न, भाई, ली, लड़की, अपया नीकर लोग देय (पहिलेकेन होने पर ही दूसरे दे। यदि उस धन राशिको एक पूरा न कर सके, तो उसी फारसे भोर दूसरे को) ॥ ६ ॥ तीसौ गैरव (३३) दिनरातका एक कर्मसंवरसर समझना चाहिये । (प्रायेक मनुमे एक दिन कम होते जाने से यह समय समझना चाहिये) ॥७॥ तमापाढीपर्यवसानमूनं पूर्ण वा दद्यात् ॥८॥ करणाधिष्ठित- मधिमासकं कुर्यात् ॥ ९॥ उस सरसरको आपाड़ मासको पूर्णमाप्ती तक समाप्त हुआ समझे। यदि कोई अध्यक्ष प्रादि बीच में ही कार्य पर नियुक्त किया गया हो, तो उसे उतने दिनको काटकर वेतन दे दिया जावे मिसने पूरा काम किया हो, उसे पूरा येतन दे दिया जावे १८ प्रतिमासमें किय पुरुषों किनना झाम किया (१२६) कौटलीय अर्थशास्त्र [२'मधिः है, इस बात का पता उपस्थिति के गणक ( हाजिरीका क्लर्क, भधात् सब फर्म- पारियों की उपस्थिति का लेखक ) से लेना चाहिये ॥९॥ अपसाधिष्ठितं च प्रचार प्रचारचरित्रसंस्थानान्यनुपलम- मानो हि प्रकृतः समुदयमज्ञानेन परिहापयति ॥१०॥ अध्यक्षको चाहिये कि वह सम्पूर्ण जनपदके कार्यालयोंकी व्यवस्था का शान गुप्तचरों के द्वारा प्राप्त करता रहे । क्योंकि देशके समाचार और उसकी पूर्व स्थिति को गुप्तचरोंके द्वारा न जानता हुआ अध्यक्ष, अपनी अज्ञानतासे धोकी उत्पत्ति रकापट दारने वाला हो जाता है, अर्थात् उसकी अनवधा. नतासे कर्मचारियॉम इस प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाते हैं, कि जिससे आम दनी में रकावट पढजाती है ॥ १० ॥ उत्थानक्लशासहत्वादालस्पेन शब्दादिपिन्द्रियार्थेषु प्रमादेन संक्रोशाधर्मानर्थभीरुभयेन कार्यार्थियनुग्रहयुद्धिः कामेन हिंसा- पुद्धिः कोपेन विद्याद्रव्यवल्लभापाश्रयादर्पण तुलामानतर्कगणिका- न्तरोपधानाल्लोभेन ॥ ११ ॥ । भयास्पत्ति में बाधा डालने वाले निम्नलिखित आठ दोष है, -सबसे पहिला अज्ञान (जो पिछले सूत्र में बताया जा चुका है ), भालस्प, प्रमाद, काम, क्रोध, दर्प और लोम, परिधमके दुखको न सहन करनेके कारण मा लस्यके द्वारा, गाना बजाना तथा स्त्रियों में आसक्ति के कारण प्रमादके द्वारा, निन्दा भधर्मके तथा अनर्थ के कारण भयसे, किसी कार्यार्थी पर अनुग्रह करने के कारण कामके द्वारा, इसी तरह किसी पर फ्रूरता करने के कारण शोधके विद्या धन तथा राजा आदि का प्रिय होने के कारण दर्पसे, तुला मान 'तर्कना तथा हिसावमें गड़बड़ कर छलके कारण लोभ के द्वारा, कर्मचारी गण आमदनी में रुकावट डाल देते हैं ॥1॥ तेपामानुपूर्व्या यावानर्थोपघातस्तापानेकोचरो दण्ड इति मानवाः ॥ १२॥ ऐसे पुरुषोंको दण्ड दिया जाये, जो किसी प्रकार भी राजकीय धनका नाश करते है । मनु आचार्य के अनुयायियों का कथा है, कि जो कर्मचारी जितना अपराध (धन अपहरण आदि) करे, उसको इन मझाम आदि दोषों के प्रमके अनुसार एक २ गुना भाधिक दण्ड दिया जावे। अर्थात् यदि भज्ञान से हानि हुई हो, तो हानि के बराबर ही इसे दण्ड दिया जाय, भारस्यके , द्वारा, ७ अध्या०] थध्यक्ष प्रचार (१२७) कारण होने पर दानिसे दुगना, प्रमादके कारण होने पर तिगुना, इसी तरह भागे भी समझ लेना चाहिये ॥ १२॥ सनत्राटगुण इति पाराशराः ॥ १३ ॥ दशगुण इति वाई- स्पत्याः ॥ १४ ॥ विंशतिगुण इत्यौशनसाः ॥१५॥ यथाप- राधमिति कौटल्यः ॥१६॥ परन्तु पराशर आचार्य के अनुयायी कहते है, कि सब ही अपराधाम समानता होनेके कारण, सयको ही अठगुना दण्ड देना चाहिये ॥ १३॥ वृहस्पति के भनुपायी आचार्योंका सिद्धान्त है, कि सयको हो दसगुना दण्ड दिया जाये ॥११॥ शुक्राचार्य के शिष्य कहते हैं, कि सबको यीसगुना दण्ड मिलना चाहिये ॥ १४ ॥ परन्तु भाचार्य फौटल्पका अपना मत है, कि जो जितना अपराध करे, उसको उसके अपराधके अनुसार ही दण्ड दिया जाना पाहिये ॥ १६ ॥ गाणनिक्यान्यापाढीमागच्छेयुः ॥१७॥ आगतानां समुद्र- पुस्तभाण्डनीचीकानामेकन संभापावरोधं कारयेत् ॥ १८ ।। छोटे २ सय कार्यालयोंके अध्यक्ष, अपना हिसाव दिखाने के लिये, प्रतिवर्ष भाषाद के महीने में प्रधान कार्यालय में भायें ॥ १७ ॥ आये हुए उन लोगों का, उस समय तक परस्पर भाषण न होने दे, जब तक कि उनके पास राजकीय मोहर लगे हुए रजिस्टर तथा व्ययसे बचा हुआ शेष धन विद्यमान रहे । (अधात् जप उनका हिसाब जाच लिया जाय, और याकी रकम लेली जाय तबही ये लोग आपस में मिल सकें ॥ १८ ॥ । आयव्ययनीवीनामग्राणि श्रुत्वा नीनीमवहारयेत् ॥ १९ ॥ यचाग्रादायस्यान्तरवणे नीव्या वर्धेत व्ययस्य वा यत्परिहापये- तदष्टगुणमध्यक्षं दापयेत् ॥ २० ॥ भाय व्यय तथा शेष परिमाणको सुन कर, जो कुछ उनके पास शेष हो वह ले लिया जावे ॥१५॥ अध्यक्ष आय धनका जितना पारमाण ताया है, यदि रजिस्टरमें उससे अधिक निकले, और इसी तरह जितना व्ययका परिमाण बताया है, जिस्ममें उसस कम निकले, तो वह आयकी अधिक और व्ययकी जितनी रकम कम यतलाई हो, उसका आठगुना उम अध्यक्ष पर जावे ॥२०॥ विपर्यये तमेर प्रति सात् ॥ २१॥ यथाकालमनागताना मपुस्तनीयिकानां वा देयदशबन्धो दण्डः ॥ २२ ॥ जुर्माना किया TH [२ मधिल - उससे कुछ (१२८) कौटलीय अर्थशास्त्र यदि इस बातका निश्चय हो जाय, कि जितनी भामदनी हुई है, अधिक रकम रजिस्टर में लिखी गई है, अयया पस्तुत जितना ध्यय हुमा है, उससे कम ही रजिस्टरमें दर्ज किया गया है, तो इस कारणसे शेषमें जितना अन्तर पर, उसके सम्बन्धमे अध्यक्षको दण्डन दिया जाय । प्रत्युत जो माय व्ययकी न्यूनाधिकता हुई है, वह उसीकी समझा जावे । अर्थात् व्यय में जो कम लिखा गया है, वह धन अध्यक्षको देदिया जावे ॥२१॥ जो अध्यक्ष, निर्दिय समयम, अथवा अपने रजिस्टर और शेष धनको लेकर हिसाब दिखाने के लिये उपस्थित न होवे, तो उसको जितना देना हो, उससे दसगुना जुरमाना उसपर किया जाय ॥२२॥ कानिके चोपस्थिते कारणिकस्याप्रतिवधतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ २३ ॥ विपर्यये कार्मिकस द्विगुणः ॥ २४ ॥प्रचारसमं महा- मानाः समग्राः भावयेयुरविपममात्राः ॥ २५ ॥ पृथग्भूतो मि. ध्यानादी चैपामुत्तमदण्डं दद्यात् ।। २६ ॥ हिसाय देखने के लिये, प्रधान अध्यक्षके ठीक समय पर उपस्थित हो जाने पर, जो अपक्ष माना हिसाम न दिखावे, तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ २३॥ यहि पान आरक्ष, टोक सनप पर भाकर दिसाय न देखे, सो उसे दुगमा प्रथम साहम दण्ट दिया जाय ॥ २४ ॥ राजाके प्रधान कर्मचारी महामान अदि, आय पर तथा नीवी सम्बन्धी अथवा परस्परकी सम्पूर्ण अनुकूल प्रवृत्ति का, जनपद के साथ २ (भात् जनपद निवासी पुरुषाको भी पानी सभाम मिलाकर उनके स य २) भरसी तरह समझा। ॥ २५ ॥ जो इनमें ( महामात्रामे / मे प्रतिकूल अया मिया बोले, उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जावें ॥ २६ ॥ अकृताहोरूपहरं मासमाफाक्षेत ।। २७ । मासाद्ध मा- सद्विशतेोत्तरं दण्डं दद्यात् ॥ २८ ॥ अल्पशेपनीविकं पञ्चरान. माकाक्षेत ततः परम् ॥ २९ ॥ ग्य एकत्रित करनेका जो नियत समय है, यदि संग्रहको उस ममय तक न करे, तो एक महीना भार भी उसकी प्रतीक्षा को, भयात् एक महोने का पत्रमा, समद करने के लिये और दिया जाय ॥ २७ ॥ यदि फिर भी घाम सना करके न दवे, सो उसपर प्रतिमासके हिसाबसे दौसी मुदा जुरमाना किया गावे ॥ २८ ॥ मिस अध्यक्ष के पास राजदेय धन थोड़ा
अध्यक्ष प्रचार
७ मध्या०]
हीप रह गया हो, उसकी केवल पाच दिन तक प्रतीक्षा करें । तदनन्तर उसे
भी दण्डनीय समझा जावे ॥ २९ ॥
कोशपूर्वमहोरूपहरं धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानसंकलननिर्वर्त-
नानुमानचारप्रयोगैरवेक्षेत ॥ ३० ॥ .
कोशधनके साथ २ रजिस्टर आदि राने याले अध्यक्षको निम्नलिखित
भाठ मासोंसे परीक्षा किया जावे, प्रथम धर्म, अर्थात् यह देखा जावे कि यह
वस्तुत ही ऐसाधारमा है,या दग्भी है, उसके व्यवहारको देखाजावे,आचार विचा
रको ऐसा जावे, उसकी पहिली स्थितिको देखा जाये, उसके हिसाम तथा किये हुए
कार्योंको देखा जाये, उसके एक कार्यको देखकर दूमरेका अनुमान किया जाये,
भौर गुप्तचरोंक द्वारा भी उसका परीक्षण किया जाये ॥३०॥
दिवसपञ्चरात्रपक्षमासचातुर्मास्यसंवत्सरंश्च प्रतिसमानयेत्
दिन, पाच दिन, पक्ष ( पन्द्रह दिन), महीना, चार महीना और
साल, इस प्रकार विभाग करके आय व्यय तथा नीची का लेसा करे तात्पर्य
यह -जय वर्ष प्रारम्भ हो, एक २ दिन वी अलहदा' : आप भादि जोढता
रहे। जय पाच दिन हो जाय तो उसे इकट्ठा जाडकर रखे, इसी साह पांच
पाच दिन तक के अगेको इकट्ठा जोडकर रखता रहे, जब पन्द्रह दिन हो
जाय, तो उन पांच २ दिनके तीन अदाको फिर इकट्ठा जोदए, इसी तरह
महीने के बाद दो पक्षक दो अको, चार महीने के बाद एक २ महीमके चारा
भाको, भार सालके याद चार २ महीने के तीन अवाको आपसम जोकर
इकट्ठा कर लेगे। इस प्रकार सय हिसाब साफ स्पस ।। ३।।
व्युटदेशकालमुसोत्पत्यनुवृत्तिप्रमाणदायकदापकनिनन्धक,
प्रतिग्राहकश्वायं समानयेत् ॥ ३२ ॥
आयके रिसने के साथ २ हन याताको रजिस्टरमें और दर्ज करे
युष्ट ( राजाका वर्ष, मास, पक्ष और दिन, दखो अधि० २, अन्याय ६, सूत्र
१२), दश, कार, मुख (भायमुष और आयशरीर), उत्पत्ति ( आय
आदिसे उस्परा हुई वृद्धि), अनुवृत्ति (एक स्थानसे दूसरे स्थानमें लेजाना),
प्रमाण, कर देनयालेका नाम, दिलानेवाले अधिकारीका नाम, लेखक और
सेनेवालपा नाम ! इन पाती लिखने के साथ २ दी भायका देखा बरे ॥३२॥
व्युटदेशकालमुसलामकारणदेययोगपरिमाणाज्ञापकोद्धारक-
निघातृकप्रतिग्राहफैध व्यर्यः समानयेत् ॥ ३३ ॥
(१३०) कोटलीय अर्थशास्त्र [२ माघ तथा व्यय के साथ इन बाताको लिखे -म्युष्ट, देश, काल, मुख लाभ ( पक्ष, मास, या वर्षमें जो प्राप्ति होवे), कारण (किस निमित्तसे व्यय 'दुभा है, यह कारण ), देय (जो चीज दी जाये उसका नाम ), योग ( मिले हुए दम्य में कितना अच्छ' और कितना पुरा है), परिमाण, भाज्ञापक (व्यय के लिए भाशा देनेवालका नाम ), उद्धारक (द्रव्य ग्रहण करनेवाला), निपा तृक (भाण्डागारिक ) प्रतिमाहक ( लेगेवाला ब्राह्मण आदि, अर्थात् वह माह्मण है या अन्य क्षाग्नियादि, यह भी लिखा जावे), इन सब बातोके साथ२ ग्ययका लेखा किया जावे ॥३३॥ व्युष्टदेशकालमुसानुवर्तनरूपलक्षणपरिमाणनिक्षेपभाजनगो- दायकेश्च नीवी समानयेत् ।। ३४ ।। नीषीके साथ इस बातोंको लिस-प्युट, देश, काल, मुस, अनुवर्सन रूप ( उस द्रष्यका स्वरूप), लक्षण ( उस दरके विशेष चिन्द आदि), परिमाण, निक्षेपभाजन (जिस पात्रमें वह दम्य रक्खा जावे ), गे पायक (उसका रक्षक पुरप), इम सबको लिखकर ही नीवी का लेखा किया जावे ॥३४॥ राजार्थे ऽर्थकारणिकस्याप्रतिवधतः प्रतिपेधयतो वाज्ञां निन- न्धादायव्ययमन्यथा या विकल्पयतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ ३५ ॥ जो काराणिक ( गणना कार्यपर नियुक्त हुभा २ पुरप, क्लर्क आदि), राजाके हिरण्य आदि लाभको पुस्तकमें नहीं लिखता, अथवा उसकी आज्ञाका उल्लघन करता है, तथा अन्य व्ययके सम्बन्ध नियमसे विपरीत क्लाना करता है, उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ३५॥ क्रमानहीनमुत्क्रममविज्ञावं पुनरुक्तं वा वस्तुकमवलिसतो द्वादशपणो दण्डः ॥ ३६॥ क्रमविरुद्ध (जहा जिस पस्तुके रिसनेका क्रम ह उसको छोड़कर इधर उधर लिख देना), टरक्रम ( उलट पुलट लिए देना, दो वस्तुओंको एक दूसरेके स्थानपर लिख देना), अविज्ञात (किसी भस्तुको विना समझे जाने लिस देना), तथा पुनरत्त (एक वस्तुको पार २ रिस देना, इत्यादि लिखने वाले लेखकको १२ पण दण्ड दिया जाये ॥३६॥ नीवीमयलिसतो द्विगुणः ॥३७॥ भक्षयतो ऽटगुणः ॥३८॥ नाशयतः पञ्चवन्धः प्रतिदानं च ॥ ३९ ॥ यदि नीचीको इस प्रकार लिखे, सो विगुण अर्थात् २४ पण वण दिया जापे ॥ ३०॥ यदि उहट पुटर दिपकर नीयीको खा जावे ( अर्थात् गवन
८ अध्या०]
अध्यक्ष-प्रचार
(१३१)
करले), तो आ3 गुना अर्थात् ९६ पण दण्ड दिया जावे ॥ ३८ ॥ यदि नीवी
का नाश कर दे, अर्थात् नटनक आदिको देकर अपव्यय करदे तो पांचगुना
(अयात् ६० पण ) दण्ड दिया जाये, और वह वस्तु वापस ली जाये ॥३९॥
मिथ्यावादे स्तेयदण्डः ॥४०॥ पात्प्रतिज्ञाते द्विगुणः
प्रस्मृतोत्पन्ने च ।। ४१॥
मिथ्या बोलने में चोरीका दण्ड दिया जावे ॥ ४०॥ हिसाबके विषय में
पहिले किसी यातको स्वीकार न करके, पीछे स्वीकार कर लेनेपर अर्थात्
दिसायकी जांच के समयमें मान लेनेपर चोरीसे दुगुना दण्ड दिया जावे। पूछे जानेपर
पहिले किसी यातको भूलकर, फिर पीछे सोचकर कहने में भी चोरीसे दुगुना
दण्ड ही दिया जाये ॥११॥
अपराधं सहेताल्पं तुप्येदल्पे ऽपि चोदये ।
महोपकारं चाध्यक्षं प्रग्रहेणाभिपूजयेत् ।। ४ ।।
इस्पध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे अक्षपटले गाणनिक्याधिकारः
ससमो ऽध्यायः ॥ ७॥ भादितोष्टाविंशः ।। २८ ॥
राजाको चाहिए कि वह अध्यक्षके थोडेसे अपराधको सहन करले,
और पदि यह मामदनीको पहिलेकी अपेक्षा थोड़ा भी यढाये तो उसपर
अयन प्रसन्न अथमा सन्तुष्ट होये। महान उपकार करनेवाले अध्यक्षका
जीवन पर्यन्त, हर तरहसे सरकार करता रहे ॥ ४२ ॥
अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण में सातवां अध्याय समाप्त ।
आठवां अध्याय।
२६ प्रकरण
अध्यक्षोंके द्वारा अपहृत धनका प्रत्यानयन ।
कोशपूर्याः सर्वारम्भा ॥१|| तस्मात्पूर्व कोशमवेक्षेत ॥ २!!
सम्पूर्ण कायाँका निर्भर कौशपर है । इसलिये राजाको उचित है,
कि सयसे प्रथम यह कोशक विषयमें विचार करे, अर्थात् कोश सदा पृद्धिको
ही प्राप्त होता रहे, उमका क्षय कदापि न हो, इस पातका ध्यान रखे ॥२॥
प्रचारसमृद्धिश्चरित्रानुग्रहयोरनिग्रहो युक्तप्रतिषेधः सस्यसंप-
त्पण्यवाहुल्यमुपसर्गपमोक्षः परिहारक्षयो हिरण्योपायनमिति को
शवृद्धिः ॥३॥
[१ माधव (१३२) कौटलीय अर्थशास्त्र जनपदको सम्पत्तिका बढाना, जनपदके पुराने आचार व्यवहारका खयाल रखना, चोरोंका निग्रह करना, अध्यक्षाको धनापहरण करनेसे रोकना, ( अथवा प्रजासे रिश्वत आदि लेकर प्रजाको कष्ट पहुचाने पाले अध्यक्षोंसे उसकी रक्षा करना) छोटे बड़े सब तरहके भन्नोंकी उपज करवाना, जल स्थल में उत्पन्न होने वाली विक्रेय यस्तुओको खूब बढाना, अग्नि आदिके उपदवोंसे स्वय तथा जनपदको बचाना, कर भादिका ठीक समय पर वसूल करना, अथवा कर आदिसे किसीको माफ न करना, अर्थात् सबसे ही कर आदि लेना), और हिरण्य आदिकी भेंट लेना, ये सब कोशवृद्धिके उपाय है, ऐसा करनेसे कोश सदा बढता ही रहता है॥३॥ प्रतिनन्धः प्रयोगो व्यवहारोऽवस्तारः परिहापणमुपभोगः परिवर्तनमपहारथेति कोशक्षयः ॥ ४ ॥ सिद्धीनामसाधनमनव- तारणमप्रवेशन वा प्रतिबन्धः ॥५। तत्र दशबन्धो दण्डः ॥६॥ कोशक क्षयके कारण भी भाठ होते हैं, -प्रतिवन्ध, प्रयोग, व्यवहार अवस्तार, परिहापण, उपभोग, परिवर्तन, और अपहार । अगले सूत्रोंसे कमश इन सबके लक्षण पताते हैं--॥१॥राजमार कर आदिका सग्रह करना, सग्रह करके भी उसे अपने अधिकारमें न करना, तथा भधिकारमें करके भी उसे खजाने में न पहुचाना, यह तीन प्रकारका 'प्रतिवन्ध' होता है ॥५॥ प्रतिबन्धके द्वारा जो अध्यक्ष, कोशका क्षय करे, उसके उपर उस कोशसे दसगुना जरमाना किया-जावे ॥६॥ कोशद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगाः प्रयोगः पण्यव्यवहारो व्यवहारः ॥७॥ तर फलद्विगुणो दण्डः ॥८॥ कोशद्रयोंसे अपने आपही लेन देन करने लग जाना 'प्रयोग' कहाता है । सात्पर्य यह है,-अध्यक्ष, कर आदि पसूल करके अपने पास रख लेता है, इस धनको किसी पुरुषको सूद पर देता है, जप यह धन व्याज सहित उस से वसूल हो जाता है, तो व्याज अपने पास रख लेता है, और मूलधन ख जानेमें भेज देता है, इसको 'प्रयोग' कहते हैं। तथा कोश मण्योंका व्यापार करने लग जाना 'म्पपहार' कहाता है ॥ ७ ॥ प्रयोग तथा व्यवहारके द्वारा जो मध्यक्ष कोशका क्षय करे, उसे उस कोशधनसे दुगना शुरमाना किया जाये॥ ८॥ सिद्ध कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः ॥ ९॥तत्र पचपन्धो दण्डः ॥१०॥ - ८ अभ्या०) अध्यक्ष प्रचार (१३३) जो अध्यक्ष, राजप्रान धनका प्रजामोंसे ग्रहण करने का जो समय नियत है, उसे तो टाल देता है, और उत्कोच (रिश्वत ) लेनेकी इच्छासे, दूसरे समयमें प्रजाको तग करके उस धनको एकत्रित करता है, इसको 'भव- स्तार' कहते हैं ॥ ९॥ अवस्तारके द्वारा जो कोशका क्षय करे, उसे क्षयसे पाचगुना दण्ड दिया जावे ॥१०॥ क्लसमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम् ॥ ११ ॥ तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः ॥ १२ ॥ जो अध्यक्ष अपने कुप्रबन्धके कारण नियत भाय को कम कर देता है, भौर पयको बना देता है, इस प्रकारके कौशशय का नाम 'परिहापण है। ॥३१॥ परिहापग द्वारा जो कोशका क्षय करे, उसे क्षयसे चौगुना देष दिया जाये॥ १२॥ खयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः ॥ १३ ॥ तत्र रनोपभोगे पाता सारोपभोगे मध्यमः साहमदण्डः फल्गुकुप्यो- पभोगे तच तापच्च दण्डा ॥ १४ ॥ रल सार फागु पुष्य आदि राजद्गव्योंका अपने आप भोग करना, तथा अपने इष्ट मियोंसे इन वस्तुओका भोग कराना 'उपभोग' कहाता है ॥ १३ ॥ जो उपभोग के द्वारा कोशका क्षय करे, उसे रनोंका उपभोग करने पर प्राण दण्ड, सार मोंका उपभोग करने पर मध्यम साहस दण्ड, तथा फल्गु और कुप्य योका उपभोग काने पर वे द्रव्य वापस लिये जावें और उतना ही दण्ड दिया जाये ॥ १४ ॥ राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनम् ।। १५ ।। तदुप- भोगेन व्याख्यातम् ॥ १६ ॥ राजतयोंको दूसरे दव्योंसे बदल देना परिवर्तन' कहाता है। अर्थात् भरसे किसी राशपको अपने पास रख हेना, और उसकी जगह उस ताद फा दूसरा घटिया दग्य रख देना परिवर्तन होता है| १५॥ परिवर्तनके द्वार। कोशका क्षय करने पर उपभोग' के समान ही दण्ड समझना चाहिये। भास् जो रस्नका परिवर्तन करे, उमे प्राण दण्ड जो सा. दम्यका परिवर्तन फरे, बसे मध्यम साहस दण्ड आदि ॥१६॥ सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति प्राप्ता नीवी विप्रतिजानीत इत्यपहारः ॥१७॥ तत्र द्वादशगुणो दण्डः ||१||
(१४) कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधिक
प्राप्त हुए २ आयको जो पुस्तकम नहीं लिखता, तथा नियमित व्यय
को पुस्तकमें लिखकर भी व्यय नहीं करता, और प्राप्त हुई नौवी का अपलाप करता
है, अर्थात् अपने हाथमें होन पर भी कहता है कि मेरे पास नहीं है, यह तीन
प्रकारका 'अपहार कहाता है ॥ १७ ॥ अपहार के द्वारा जो अध्यक्ष कोशक्षय
करे, उसे क्षयस यारहगुना दण्ड दिया जावे ॥१८॥
तेपां हरणोपायावत्वारिंशत् ॥ १९ ।। पूर्व सिद्धं पश्चादव-
तारितम् ॥ २० ॥ पश्चासिद्धं पूर्वमवतारितम् ॥ २१ ॥ साध्य
न सिद्धम् ॥ २२ ॥ असाध्यं सिद्धम् ॥ २३ ॥ सिद्धमसिद्धं
कृतम् ॥ २४ ॥ असिद्धं सिद्धं कृतम् ॥ २५ ॥ अल्पसिद्ध बहु-
कृतम् ॥ २६ ॥ बहुसिद्धमल्पं कृतम् २७ ॥ अन्यत्सिद्धम-
न्यत्कृतम् ॥ २८ ॥ अन्यतः सिद्धमन्यतः ॥२९॥
अध्यक्ष, चालीस प्रकारसे राजद्रव्यका अपहरण कर सकते हैं। उन
चालीस उपायोंका यहां इसीलिय निरूपण किया जाता है, कि राजा इन सबको
जानकर,अध्यक्षोंको अपहरण करनेसे रोके, भौर अपहत धनको वापस लेसके॥१९॥
घे उपाय ये है-पहिली फसलमे प्राप्त हुए द्रव्यको, दूसरी फसल आने पर
पुस्तकमें चढाना ॥ २० ॥ दूसरी पसलमें प्राप्त होने वाले राजदम्पकी कुछ
प्राप्तिको, पहिली ही फसलम, किताबमें लिख लेना, (यह कार्य राजाको
धोका देने के लिये किया जाता है, जिसस कि राजा उसे पता कार्य कुशल
भौर अपना विश्वासपात्र समझले ॥ २१॥ राजमाच करको रिश्वत भादि
एकर छोड़ देना, अर्थात् उसे वसूल न करना ॥ २२ ।। भौर जिनको राजकर
माफ है, भात देवालय, और विद्वान् प्राक्षण आदि जिनको राजकर नहीं देना
परता, उनसे लुक छिपकर तथा दरा धमकाकर, कर वसूल कर लेना ॥ १३ ॥
कर देने वाले पुरपके कर देदेने पर भी, इसने नहीं दिया, यह कर देना,
मावा रजिस्टरम किस देना ॥ २४ ॥ कर देने पाले पुरुष के कर न दने पर भी
रिश्वत आदि लेकर पुस्तक में यह हिप देना, कि इसने कर देदिया है ॥२५॥
पोटे प्राप्त हुए धनको भी, रिचत आदि लेकर, पूरा प्राप्त होगया है, यह किता
पमें लिख देना ॥ २६ पूरे प्राप्त हुए धनको भी, थोडा प्राप्त हुआ है, इसप्रकार
पुस्तकमें लिपदेना ॥ २० ॥ जो द्रव्य मिला है, उसकी गगह दूसरा लिख देना,
(गहू मिला है, जो लिखदेना) ॥ २८ ॥ एक पुरुषसे प्राप्त हुआ है, दूसरे पुरु
पके नाम रिखना, (देवदत्तसे धन प्राप्त हुआ है, परन्तु यज्ञरतमे स्थित
सेकर उसके नाम लिखना) ॥ २९ ॥
८ अध्या अध्यक्ष-प्रचार देयं न दत्तम् ॥ ३० ॥ अदेयं दत्तम् ॥ ३१ ॥ काले न दत्तम् ॥ ३२ ॥ अकाले दत्तम् ॥ ३३ ॥ अल्पं दत्तं बहुकृतम् ॥ ३४ ॥ बहु दत्तमल्पं कृतम् ॥ ३५ ॥ अन्यहत्तमन्यत्कृतम् ॥३६ ॥ अन्यतो दत्तमन्यतः कृतम् ॥ ३७ ।। देय वस्तुको न देना. (गजाने किसीको स्वर्ण या रजत देनेकी आज्ञा दी है, उसे स्वणं आदि न देना); ॥ ३० ॥ तथा कालान्तरमें अदेय (फल्गु कुप्प आदि) यस्तु किसी तरहसे देना ॥ ३॥ समयपर फिसीको न देना (राजाने यज्ञादि करने के लिये क्सिीको धन देने की भाज्ञा दी है, उसे उस समयपर न देना)॥ ३२ ॥ तया रिश्यत आदि लेकर फिर पीछेसे देना ॥ ३३ ॥ फिर भी घोड़ा देकर यहुत लिस देना; (अथवा राजाने शिसीको सी मुद्रा बनेको फदा, अध्यक्षने सौकी जगह देसी लिसकर सो उस देदेना, भीर पचास अपनेपास रख लेना) ॥ ३४ ॥ तथा बहुत देकर धोया लिसना; (भया राजान किसीको सौ गुदा देनेको कहा, फिताब मौ लिस लेना, किन्तु उसे भस्मीही देना) ॥ ३५ ॥ और कोई दव्य देने को कहा गया, तथा उसकी जगह और कुछ देदिया (राजामे किसीयो सोना दे देनेकी आशा दी, उसे उपकी जगह चांदी देवी गई) ॥ ३६ ॥ दूसरेको देने के लिये कहे जानेपर, उससे दूसरेको दे देना (देवदत्तको देनके लिये कहे जाने पर, यज्ञदत्तको रिधत लेकर दे देना) ॥ ३७ ॥ प्रविष्टमप्रविष्टं कृतम् ॥३८॥ अप्रविष्टं प्रविष्टं कृतम् ॥३९॥ कुप्यमदत्तमूल्यं प्रविष्टम् ॥ ४० ॥ दचमूल्यं न प्रविष्टम् ॥४१|| राजग्राह धन वसूल करके, तथा अपने अधिकारमें करके भी उससे इन्कार कर देना अर्थात् उसे सजाने में जमा न करना; (अथवा किसी विशेष भायश्यकताके यहानेस प्रजाओसे धन वसूल करके भी, उसे कोशमें जमा न करना ) ॥३८॥ कर न लेकरही अर्थात् कोशमें धन न जमा किये जानेपर भी, रिश्वत लेकर जमा हो गया है, इस प्रकार पुस्तक में लिख देना ।। ३९ ।। घन आदि कुष्य इण्य, राजाकी आजाये उस समय मूल्य न देकरही लेकर, फिर पीछेसे उनका थोडासा मूल्य कपड़ेवालको देवेना ॥ ४० ॥ बहुतसा मूल्य देकर खरीदा हुआ कुप्य द्वन्य, उसका उतना मूल्य किताबमें म लिखना ॥४१॥ संक्षेपो विक्षेपः कृतः॥ ४२ ॥ विक्षेपः संक्षेपो या ॥४३॥ महापमल्पार्पण परिवर्तितम् ॥ ४४ ॥ अल्पाय महार्पण वा कौटलीय अर्थशास्त्र t२ घमिका ॥ ४५ ॥ समारोपितोऽर्थः॥४६॥ प्रत्ययरोपितो या॥४७॥ रामयः समारोपिता वा॥ ४८ ॥ प्रत्यवरोपिता या ॥४९॥ बहुतसे मनुष्योंसे मिलकर इकट्ठा लिया आनेवाला 'कर' पृपा २ सरसे बांट २ कर लेमा ॥ ४२ ॥ जो पृथक् २ लेना हो, उसे सबसे इकठा मिलकर लेना ॥१३॥ बहुमूल्य वस्तुको भल्प मूल्यकी वस्तु के साथ परिवर्तन कर लेना ॥ ४५ ॥ अथवा अल्पमूल्यकी वस्तुको यहुमूल्य वस्तुके साथ परिवर्तन फरलेना ॥५५॥ बाजारमै वस्तुओंका भाव बढ़ा देना ॥४६॥ तथा इसीप्रकार वस्तुओं का भाव घटा देना; ( इस तरह पप्राध्यक्ष धन अपहरण करता है) ॥४॥ चेतनके दिन बढाकर लिख देना; (अर्थात् पांच दिनका वेतन देकर सात दिन- का वेतन दिया गया है, इसप्रकार लिख देना ) ॥ ८ ॥ अथवा वेतन के दिन घटाकर देना, (अर्धान दस दिन घेतनको स्वं कृति होनेपर, भृरयको भाट दिनकाही वेतन देना) ॥१९॥ संवत्सगे मासपिपमः कृतः ॥ ५० ॥ मासो दिवसविपमो चा ॥५१॥ समागमविपमः ॥ ५२ ॥ मुसविषमः ॥ ५३ ॥ धार्मिक विषमः ॥ ५४ ॥ निर्वर्तनविषमः ॥ ५५ ॥ पिण्डविपमः ॥५६॥ वर्णविषमः ॥ ५७ ॥ अविषमः ॥ ५८ ॥ मान. विषमः ॥ ५९ ॥ मापनविषमः ॥६० ॥माजनविपमः ॥६॥ इति हरणोपायाः ॥ ६२ ॥ भधिक मास रहित संघस्सरको अधिक मास घाला यताकर, उस मासा के लाभको स्वप ऐलना ॥ ५० ॥ अथवा महानेके दिन घटा पदाकर, (उसके अधिक लाभको स्यय लेखेगा ॥ ५॥ ॥ नौकरोंमें गढयह करके धन लेना, (बहु- ससे कार्य करने वाले नौकरांमसे दो एकके नाम वैसेही लिखे हुए हों, उनके मामका वेतन और भत्ता स्वय ऐलना) ॥ ५२ ॥ एक भायमुससे हुई २ माम. दनाको, दूसरे भायमुखसं प्रसिद्ध करदना ॥ ५३ ॥ माह्मणादिको धर्मार्थ दिये जाने पाल धनमेंस, कुछ उन्ह देकर शंष वय लहना ॥ ५५ ॥ किसी कार्यके करनेम कुटिल उपायस अतिरिक्त धन वसूल करलेना, (जैसे कर उघरानेक समयमें, भाज सबको घरदेना पड़ेगा, ऐसी आज्ञा देकर, किन्हींसे रिश्वत लेकर उन्हें छोड़ देना, अर्थात् उसदिन उनसे कर न उघराना) ॥ ५५ ॥ बहुतसे मनुष्योंसे इकट्ठा मिएकर लिये जाने वाले परम, किसीसे रिश्वत लेकर उसे घोर देना, तथा बाकी मनुष्योरी पूरा धन वसूल करना ॥ ५६ ॥ माह्मण भौदि यो विषमतासे धनका अपहरण काना, में भामागे केवल -] ८अध्या अध्यक्ष प्रचार (१३७) पाह्मणही पार हुए है, उनसे शुल्क नहीं लिया गया, यह कहकर नायध्यक्ष उस दिनी आयको अपहरण कर सकता है । ५७ ॥ छावनियों में मूत्य भादिके व्यवस्थित न रहनसे, उसको कुछ अधिक घटाकर राम उठाना ॥ ५८ ॥ तोल आदिम पर डालकर फायदा उठाना ॥ ५९॥ नापने में विषमता उत्पन्न करके एम उठाना ॥ ६० ॥ पात्र विपत्रक विषमतासे लाभ उठाना, (जैसे-तसे भरे हुए सा घड़े देदो, इसप्रकार गारिकके कहने पर छोटे २ सौ घड़े देना, और बटे २ सौ घडे पिये है, यह पुस्तकमै रिस देना) ॥ ६१ ॥ यहातक अप हरण करनेके चालीस उपायोका निरूपण किया गया ॥ २ ॥ तत्रोपयुक्तनिधायकनिबन्धकपतिग्राहकदायकदापकमन्त्रि- यात्यकरानेकैकशा ऽनुयुञ्जीत ।। ६३ ।। मिथ्यावादे चैषां युक्त- समो दण्डः ॥ ६४ ॥ यदि किसी अध्यक्षके विषयम, राजाको धन अपहरण करने का सन्देह होजाये, तो राजा, उसके (उस अध्यक्षके) प्रधान निरीक्षक अधिकारी पुरण को, भाण्डागारिक (खजानची) को, लेसर को, रने वाले को, कर दिलाने वाले राजपुरपको, अपराधीके सलाहकारको, तथा उस मन्त्री नौकरीको पृथक् २ बुलाकर यह पूछे, कि इस अध्यक्षने धनका अपहरण किया है या नहीं ॥६॥ यदि इनमॅसे कोई झूठ बोले, तो उसे अपराधीके समानही दण्ड दिया जा- ॥६५॥ प्रचारे चावघोपयेत् अमुना प्रकृतेनोपहताः प्रज्ञापयन्त्विति ॥ ६५ ॥ प्रज्ञापयतो यथोपघातं दापयेत् ॥ ६६ ।। भार राजा सम्पूर्ण जनपदमें घोषणा करवादे, कि अमुक अध्यक्ष यदि किसीको पीडा देकर धन अपहरण करे, तो वे यहा भाकर सूचना देवें ॥६५॥ भपहरणकी सूचना दिये जानेपर, उस पुरपको अध्यक्षसे उतनाही धन दिल वाया जावे ॥६६॥ अनेकेषु चाभियोगेषपच्ययमानः सकृदेव परोक्तः सर्व भजेत ।। ६७ ॥ वैषम्ये मत्रानुयोगं दद्यात् ॥ ६८ ॥ अनेक अभियोगोंके होतेपर, (अर्थात एाही समयमें यदि बहुतसे पुरुष अपना धन अपहरण किंधे जानेकी सूचना देवें,) यदि अभियुक्त सय अभिगोगोंको स्वीकार न करे, तो एकही अभियोग पूरी गधाही, तथा अन्य परे सबूत मिलने पर सम भभियोगोंका अपराधी उसे समझा जाये ॥ ६७ ।। यदि अभियुक्त भनेक अभियोगों से कुछ अभियोगोंको स्वीकार फरले, और [२ यधिक (१३८) कौटलीय अर्थशास्त्र कुछ न करे, तो जिनको स्वीकार न करे, उनके लिये अपनी सफाई के गवाह, तथा अन्य सबूतोंको भी उपस्थित करे ॥ १८॥ महत्यर्थापहारे चाल्पेनापि सिद्धः सर्व भजेत ॥६९॥ कृत- प्रतिघातावस्थः सूचका निष्पन्नार्थः पष्ठमशं लभेत ॥ ७० ॥ द्वादशमंशं भृतकः ॥७१ ॥ बहुत अधिक अर्थका अपहरण करनेपर, यदि थोड़ेसे धनके भी गवाह मिल जाये, तो सम्पूर्ण धनका अपहरण करनेका अपराध, उसपर सिद्ध समझा जावे ॥ ६९ ॥ यदि धनका अपहरण करने वाले अध्यक्षकी सूचना, कोई व्यक्ति राजाफे हितकी कामनासेही देता है, अर्थात् किसीको नुक्सान पहुंचाने या द्वेषादिके कारण नहीं देता); ऐसे व्यक्तिको, अपहत धनका ठीक पता लगजान- पर, धनका छठा हिस्सा देदिया जावे ॥ ७० ॥ यदि सूचना देने वाला व्यक्ति, उसका भृत्य हो, तो उसे उस धनका यारहवां हिस्सा देना चाहिये ॥१॥ प्रभूताभियोगादल्पनिष्पत्ती निष्पन्नस्यांशं लभेत ॥ ७२ ॥ अनिष्पन्ने शारीर हैरण्यं वा दण्डं लभेत ॥७३॥न चानुग्राह्यः ॥७४॥ यदि पहुतसे धनके अपहरणका अभियोग हो, अभियोगके सिद्ध होने. पर उसमेंसे थोड़ाही धन वसूल होवे, तो सूचना देने पाले व्यक्तिको उतनेही धनमेंसे हिस्सा दिया जाये ॥ ७२ ॥ यदि अभियुक्त पर अपराध सिद्ध न हो सके, तो सूचना देने वाले पुरुषको शरीर दण्ड दिया जावे, अयया उचित भार्थिक दण्ड दिया जावे ॥ ३ ॥ इसप्रकारके अपराधी पर अनुग्रह कदापि न करना चाहिये ॥१॥ निष्पत्तौ निक्षिपद्वादमात्मानं यापवाहयेत् । अभियुक्तोपजापात्तु सूचको यधमाप्नुयात् ।। ७५ ।। इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे समुश्यस्य युक्तापद्धतस्य प्रत्यानयनमष्टमी sध्यायः ॥ ८॥ आदितः एकोनविशः ॥ २९ ॥ यदि भभियोग सध्या सिद्ध होजावे, तो सूचना देनेवाला पुरुष, अपने भाप उस अभियोग सम्बन्धसे अलहदा कर सकता है, अर्थात् फिर सरका. रही अपनी भोरसे उस मुकदमेको चला सकती है। यदि अभियुक्त सूचना देने वाले पुरएको रिश्वत भादि देकर फुसला लेव, और राजाके सामने वह सपी २ बात न कहे, तो उसे (सूचकको) प्राण दण्ड देना चाहिये ॥ ७५ ॥ अध्यक्ष चार द्वितीय अधिकरणमें भाठवां अध्याय समाप्त । M
९ अध्या०]
अध्यक्ष प्रचार.
नौवा अध्याय ।
२७प्रकरण।
उपयुक्तपरीक्षा।
प्रत्येक कार्योंपर नियुक्त किये गये छोटे २ अधिकारियोंको 'युक्त'
कहाजाता है; जो इनके भी उपर निरीक्षक अधिकारी नियुक्त हों,
उन्हें 'उपयुक्त' करते हैं । 'युक्त' कर्मचारिशके सम्बन्ध में पिछले
अध्यायमें कहा जा चुका है। अब 'उपयुक्त' कर्मचारियोंके सम्ब.
Puनिरूपण किया जायगा।
अमात्यसंपदोपेताः सर्वाध्यक्षाः शक्तित. कर्मसु नियोज्याः
॥१॥ कर्मसु चैपां नित्यं परीक्षा कारयेत् ॥ २॥ चित्तानि-
त्यत्वान्मनुष्याणाम् ।। ३ ॥
सबही अध्यक्षोको अमारपके गुणांसे युक्त होना चाहिये (अर्थात् अमा.
त्योंके जो गुण पीछे कहे गये हैं, अपक्षों में भी वे गुण यथावश्यक अवश्य होने
चाहिये । देशो:--अधि , अध्या. ९ सू 11; सथा इनको (अध्यक्षों को )
इन की शक्ति अनुसार उन २ कार्योपा नियुक्त किया जाये ॥ १ ॥ कार्योपर
नियुक्त किये जानेपर, राजा इगी सदाही परीक्षा करवाता रहे।॥ २ ॥ क्योंकि
मनुप्पोंके चित्त सदा एम्मे नहीं रहते ॥३॥
अश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ताः कर्मसु विकुर्वते ॥४॥
तस्मात्कारं कारणं देश कालं कार्य प्रक्षेपमुदयं चैपु विद्यात् ।।५।।
देखा जाता है, कि आदमियों की भी घोडौंको ताप आदत होती है।
जातक घोचा अपने धानपर या रहना है, यहा शान्त मरहम होता है, परन्तु
जब वह रथ आदिमें जोड़ा जाता है, तो बिगड़ जाता है यही उछल कूद म.
चाता है; इसीप्रकार प्रथम शान्त होने वाला पुरुष भी कार्यपर नियुक्त होता.
नेपर कभी २ विकारको प्राप्त होगाता है ॥ ४ ॥ इसलिये राजाको चाहिये, कि
वह कती (अध्यक्ष), कारण (नीचे कार्य करने वाले कर्मचारी), देश, काल,
कार्म, नौकरों का वेतन, और उदय अर्थात् लाभ, इनको अध्यक्षोंके विषयमें
अवश्य जानता रहे ॥५॥
ते यथासंदेशमसंहता अपिगृहीताः कर्माणि कुर्युः ॥ ६ ॥
संहका गक्षयेयुः ॥ ७ ॥ विगृहीता पिनाशयेयः ॥ ८ ॥
[२ अधिक - (१३८) कौटलीय अर्थशास्त्र कुछ न करे; तो जिनको स्वीकार न करे, उनके लिये अपनी सफाईक गवाह, तथा अन्य सबूतोंको भी उपस्थित को॥ १८॥ महत्यर्थापहारे चाल्पेनापि मिद्धः सर्व मजेत ॥६९॥ कृत- प्रतिघातावस्यः सूचका निष्पन्नार्थः पष्ठमशं लभेत ॥ ७० ॥ द्वादशमंशं भृतकः ॥ ७१ ॥ बहुत अधिक अर्थका अपहरण करनेपर, यदि थोड़ेसे धनके भी गवाह मिल जावें, तो सम्पूर्ण धनका अपहरण करने का अपराध, उसपर सिर समझा जावे ॥ १९॥ यदि धनका अपहरण करने वाले अध्यक्षकी सूचना, कोई व्यक्ति राजाकै हितकी कामनासेही देता है, अर्थात् किसीको नुक्सान पहुंचाने या द्वेपादिके कारण नहीं देता); ऐसे व्यक्तिको, अपहृत धनका ठीक पता लगाने- पर, धनका छठा हिस्सा देदिया जावे ॥ ७० ॥ यदि सूचना देने वाला व्यक्ति, उसका भृत्य हो, तो उसे उस धनका यारहवां हिस्सा देना चाहिये ॥१॥ प्रभूताभियोगादल्पनिप्पत्तौ निष्पन्नस्यांशं लभेत ॥ ७२ ॥ अनिष्पन्ने शारीरं हैरण्यं वा दण्डं लभेत ॥७३॥न चानुग्राह्यः ॥७४॥ यदि यहुतसे धनके अपहरणका अभियोग हो, अभियोगकै सिद होने. पर उसमेंसे थोड़ाही धन वसूल होवे, तो सूचना देने वाले व्यक्तिको उतनेही धनमेंसे हिस्सा दिया जावे ।। ७२ ॥ यदि अभियुक्त पर अपराध सिद्ध न हो सके, तो सूचना देने वाले पुरषको शरीर दण्ड दिया जावे, अथवा उचित भाधिक दण्ड दिया जावे ॥ १ ॥ इसप्रकारके अपराधी पर अनुग्रह कदापि न करना चाहिये ॥४॥ निप्पत्तौ निक्षिपद्वादमात्मानं चापवाहयेत् । अभियुक्तोपजापात्तु सूचको वधमाप्नुयात् ।। ७५ ।। इस्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे समुदयस्य युक्तापहतस्य प्रत्यानयनमष्टमो ऽध्यायः॥८॥ भादितः एकोननिश. ॥ २९ ॥ यदि अभियोग सच्चा सिद्ध होजावे, तो सूचना देनेवाला पुरुष, अपने भापको उस भभियोगके सम्बन्धसे अलहदा कर सकता है, अर्थात् फिर सरका- रही अपनी भोरसे उस मुम्दमेको चला सकती है। यदि अभियुक्त सूचना देने वाले पुरपको रिश्वत आदि देकर फुसला रेचे, और राजाके सामने यह सच्ची २ वात न कई, तो उसे (सूचकको) प्राण दण्ड देना चाहिये ॥ ७५ ॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें आटयां अध्याय समाप्त । .
१. अध्या
अध्यक्ष-प्रचार
१९६९)
नौवा अध्याय।
२७ प्रकरण।
उपयुक्तपरीक्षा।
प्रत्येक कार्यापर नियुक्त किये गये छोटे २ अधिकारियोको 'युक्त'
कहाजाता है। जो इनके भी ऊपर निरीक्षक अधिकारी नियुक्त हों,
उन्हें 'उपयुक्त' कहते है । 'युक्त' कर्मचारियोंके सम्बन्धमें पिछले
अध्याय में कहा जा चुका है, भय उपयुक्त' कर्मचारियोंके सम्प-
धमें निरूपण किया जायगा ।
अमात्यसंपदोपेता. सर्वाध्यक्षाः गक्तित. कर्मसु नियोज्याः
॥१॥ कर्मसु चैपां नित्यं परीक्षा कारयेत् ॥ २ ॥ चित्तानि-
त्यत्वानमनुष्याणाम् ॥ ३ ॥
सग्रही अध्यक्ष को अमारपके गुणांसे युक्त होना चाहिये ( अर्थात् अमा-
त्यांके जो गुण पीछे कहे गये हैं, अध्यक्षा में भी वे गुण यथावश्यक अवश्य होने
चाहिये । देखो:-पि, अध्या ९ सू , तथा इनको (अध्यक्षोंको)
इनकी शक्ति के अनुसार उन २ कार्यापर नियुक्त किया जाये ॥ ॥ कार्यापर
नियुक्त किये जानेपर, राजा इनसी नाही परीक्षा परवाता रई ॥ २ ॥ पाकि
मनुपीके चित्त सदा एकसे नही रहते ॥३॥
अश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ताः कर्मसु विकुर्वते ॥४॥
तसात्कारं कारणं देश कालं कार्य प्रक्षेपमुदयं चैषु विद्यात् ।।५।।
देखा जाता है, कि आदमियाको भा घोड़की ताद आदत होती है।
जरता घोडा अपने पापा का रहता है, बड़ा शान्त मालम होता है, परन्त
जब यह रथ भादिग जोड़ा जाता है, तो पिड़ जाता है यही उछल कूद म.
घाताद इसीमकार प्रथम शान्त दीप शला पुरुष भी कार्यपर नियुक्त होजा.
नेपर कभी २ विकारको ना होजाता है ॥ ४॥ इसलिये राजाको चाहिये, कि
वह कत्ता (अध्यक्ष), कारण (नीचे कार्य भरने वाले कर्मचारी), देश, काल,
कार्य, नौकरॉम वेतन, भऔर उदय अर्थात् साभ, इगको अध्यक्षोंके विपपमें
अवश्य जानता रहे॥ ५॥
ते यथासंदेशमसंहता अधिगृहीताः फर्माणि कुर्युः ॥ ६ ॥
संहता गक्षयेयुः ॥ ७ ॥ विगृहीता विनाशये ॥ ८ ॥
[२यधिक
कौटलीय अर्थशास्त्र
घे अध्यक्ष, अपने मालिककी अमानुसार, एक दूसरे अप्रक्षके साथ न
मिस्त हुए, तथा एक दूसरेके साथ विरोध न करते हुए, अपने २ कामि
तस्पर रह ॥ ६॥ क्योंकि यदि वे आपसमे मिल जायेंगे, तो गुह करके राजाके
धनको खायेंगे ॥ ७॥ और यदि आपसम विरोध करेंगे, तो राजाके कार्यको
नष्ट करेंगे । क्योंकि अपनेही झगहों में लगे रहेगे, राजाका कार्य नए होगा।
इमलिय राजाको ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये, जिससे कि वे न आपमम गुह
पना सके, और न उनका आपसमें कोई राजकार्यका हानिकर विरोध हो ॥८॥
न चानिवेद्य भर्तुः किंचिदारम्भं कुर्युरन्यत्रापत्तीकारभ्यः
॥९॥ प्रमादस्थानेषु चपामत्ययं स्थापयेविसंवेतनव्ययहिगुणम्
॥१०॥
मालिकको विना निवेदन किये, किसी नये कार्यका घे (अध्यक्ष) प्रार
म्भ करें, परन्तु जो कार्य दिसी भापत्तिके मागीकार करने के लिप किये जारहे
हो, उनको करनके लिये, उमी समय राजाको अनुमतिकी अयशसकना नही,
घे राजाको निवेदन किये बिना भी, किये जामकत है ॥ ९॥ याद घे (अध्यक्ष)
अपने किसी कार्यम प्रमाद करें, सो इनके लिये दण्डकी व्यवस्था होनी चाहिये,
साधारण दण्ड, एनके दैनिक वेता व्यय दुगना होना चाहिये । (अर्थात् एक
दिनका जितना वेतन हो, उमगे दुगना दण्ड दिया जावे ॥ १० ॥
यश्चैपां यथादिष्टमर्थ सविशेपं वा करोति स स्थानमानी
लभेत ॥ ११ ।।
जो इन अध्यशामसे, अपने मालिककी बाजानुसार टीक काम करता
है, तथा उससे भी अधिक भार विशेष काम (जिन कार्योंके लिये मालिकने
नहीं भी कहा है, ऐसे उसके हितकर झार्य) करता है, उसकी विशेष उन्नति
दीनापे, (अर्थात् पदके पयालये उसकी तरको करदी जाये) और अन्य प्रका
रसे (धनादि द्वारा) भी उसका उचित सस्कार दिया जाये ॥१॥
अल्पायतिश्चन्महाव्ययो भक्षयति ॥ १२ ॥ विपर्यये यथा-
यतिव्ययश्च न भक्षयतीत्याचार्याः ॥ १३ ॥
किन्ही प्राचीन अचाोंने येईमान भीर ईमानदार अध्यक्षा निम्न
लिखित उपाय पताये हैं। ये कहते हैं, कि जिस अध्यक्षको आमदनी धोती
होती हो, तथा यह एयचं बहुत अधिक करता हो, तो समझना चाहिये कि यह
भवश्यही राजाके धनका अपहरण करता है ॥ १२ ॥ इससे विपरीत होनेपर
भक्ष्या भामबीके मनुपार खर्च करने वाले अध्यक्षको ईमानदार समझना
चाहिये, 4 राजकि धमको मही खाता ॥ १३॥
९ अध्या अध्यक्ष प्रचार अपसणवोपलभ्यत इति कौटल्यः ॥ १४ ॥ परन्तु आचार्य कौरसर इस गतको स्वीकार नहीं करता। यह कहता है कि अध्यक्षांकी ईमानदारी और येईमानीका पता गुप्तचरों के द्वाराही लगाना चाहिये । क्योकि एक बो परिवार वाला अध्यक्ष, स्वय थोड़ा खर्च करसा हुभाभी परिधार पोपण के लिये धन अपहरण कासकता है। तथा भरय. धिक धन अपहरण करता हुआभी कंजूम आदनी कभी अधिक खर्च नहीं करता। इसलिये वाचायाँके कथनानु पार अध्यक्षीको दुष्टताका ठीक पता नहीं लगमकता ! अतः यह कार्य गुप्तचरांके द्वाराही कराना चाहिए ॥ १५ ॥ यः समुदयं परिहापयति स राजार्थ भक्षयति ॥ १५ ॥ स चेदज्ञानादिभिः परिहापयति तदेनं यथागुणं दापयेत् ।। १६ ।। जो अपक्ष समुदर (र्य काल भनिमिति आय) में न्यूनता करता दै अात् राजाको नियमानुसार शिनो अय होनी चाहिये, उसमें यह कती करदेता है, तो समझना चहिये कि यह अध्यक्ष उस राजाके धनमें से अवश्य कुछ न कुछ सदा ॥ १५॥ यदि वह अपन अज्ञान अर्थ र प्रमाद आलस्य नादि के कारण, इमप्रकार आम्दनीम कमी करता है, तो वह कम हुआ २ धन उससे अपराध के अनुसार दुगना तिग : भारत सिमा जाये ॥ १६ ॥ यः समुदयं द्विगुणसुद्धाक्यति स जनपदं भक्षयति ॥१७॥ स चेद्राजार्थमुपनयत्यल्पायराधं वारयितव्यः ॥ १८ ॥ महति यथापराचं दण्डयितच्यः ॥ १९ ॥ जो अध्यक्ष, समुदय दुगना इकदा करता है, अर्थात् जिरानी नियत भाय है, उसमे दुगना वसूल करता है, गमनना चाहिए, यह जनपदको खाता है, शात् मजाको पीडा पहुंचाकरदी इसा धन वसूल घरता है, अन्यथा निगा आयसे अधिक कैमे प्राप्त कासकता है।॥ १७ ॥ यदि वह दस अधिक संप्रद किये हुए धनको राजा लिये भेजदेता है, तो उसे प्रजाको पीडा पहुंचाने के थोडेसे अपराबादी द रियाजाने, जिससे कि वह फिर आगे इसमकार प्रजाको पीड़ा पहुचाकर धन संग्रह न करे ॥ १८ ॥ यदि वह अधिक अपराध करता है, अर्थात् उस धनको राजा पास न कर स्वयं अपहरण करलेता है, तो प्रजापोटग और धनापहरण दोनो अपराधोंका उगे उचित दण्व दियाजावे ॥ ११ ॥ यः समुदयं व्ययमुपनयति स पुरुषकर्माणि भक्षयति ॥२०॥ स कर्मदिवसद्रव्यमूलपुरुषोतनापहारेषु यथापराधं दण्डयितथ्यः ॥२१॥ .
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ मधि
जो अध्यक्ष, व्ययके लिये नियत किएहुए धनको व्यय न करके लाम
शामिल करदेता है, वह पुरुषों (काम करनेवाले मजदूरों) तथा राजकार्यको
खाता अर्थात् नष्ट करता है यह समझना चाहिए । तारपर्य यह है कि किसी
कार्यको करने के लिये नियत कियहुए धनको व्यय न करनेसे, एक तो मजदूरीका
पालन नहीं होता, मजदूरी न मिलनेसे वे कष्ट उठाते हैं, दूसरे वह राजकार्य
महीं होता, जिसके लिये यह बजट पास किया गया है। उसका जो रु० बघता
है, उसे अध्यक्ष मायकी ओर करके नियमित बायसे अधिक भायको अपनेघर
रखलेता है॥२०॥ ऐसा करनेवाले अध्यक्षको, उस कार्यकी हानि (कार्य
करनेपर उस दिन में जितना काम होजाय, उसके मूल्यकी कल्पना करके हानिका
निर्णय कियाजाय ), और पुरुषों के वेतनका अपहरण करने के सम्बन्धमे, अप.
राधके अनुसार उचित दण्ड दिया जाये ॥२१॥
तसादस्य यो यस्मिन्नाधिकरण शासनस्थः स तस्य कर्मणो
याथातथ्यमायव्ययौ च व्याससमासाभ्यामाचक्षीत ॥ २२ ॥
मूलहरतादात्विककदर्याथ प्रतिपेधयेत् ॥ २३ ॥
इसलिये राजाका, जो जिस स्थानमें शासन करनेवाला अधिकारी
अध्यक्ष नियुक्त हो, वह उप कार्यकी यथार्थताको आर उसके आय व्ययको
भावश्यकतानुसार संक्षेप और विस्तारके साथ, राजासे निवेदन करे ॥ २२ ॥
भार जो मूरहर, तादात्विक तथा कदर्य पुरप हॉ, उनकोभी उनके अपने
कार्यसे सदा रोकता रहे ॥ २३ ॥
यः पितृपैतामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः॥ २४ ॥
यो यद्यदुत्पद्यते तत्तद्भक्षयति स तादात्तिकः ॥ २५ ॥ यो भृ-
त्यात्मपीडाभ्यामुपचिनात्यर्थ स कदर्यः ॥ २६ ॥
जो पुरप अपनी पितृपितामह परम्परासे प्राप्त हुई सम्पतिको भन्याय
पूर्वक साता, अर्थात् उपभोग करता है, उसे 'मूलहर' कहते है । ऐसे पुरपोको
.इन कार्यों के करनेसे रोते रहना चाहिये, सियस
ये अपनी पुरानी सम्म
तिको मष्ट न कर टालें ॥ २४ ॥ जो पुरष जितना उत्पन्न घरता है, उतनाही
उस समय खारेता है, भयात् व्यय कर देता है, शेप कुछ नहीं पघाता, उसे
'सादाथिक' कहते है ॥२॥ तथा जो पुरष भपने भृत्यों और अपने आपको
पर देकर धनफा समह करता है वह 'फा' कहाता है ॥ २६ ॥
स पक्षयांवदनादेयः ॥२७॥ पिपर्यये पर्यादातम्पः ॥२८॥
९ अध्या
अध्यक्ष-प्रचार
(१४३)
यदि निषेध करने परभी मूलहर आदि अपने कामको करते ही पर्छ
जाते है, तो उन्हें अपने बन्धु पान्थरोंकी सम्पत्ति पर दायमागमा आधिकार
नहीं रहता । अथवा ऐसे पुरषाको (नकि यन्धु बान्धय हैं । इस सूयमें
'पक्ष' शब्दका अर्थ यन्धु यान्वय) आर्थिक दण्ड न दिया जाय ( क्योंकि
अधिक दण्ड देने से उनके यन्धु बान्धव आदि कुपित हो सकते हैं), किन्तु
उनको केयर पदच्युत कर दिया जाय ॥२७॥ यदि उनके घन्धु मान्धय आदि
नहों, तो उनकी सम्पत्तिको जब्त कर लिया जावे ।। २८ ।।
यो महत्यर्थसमुदये स्थितः कदर्यः संनिधते ऽवनिधचे ऽवसा-
वयति वा संनिधचे स्ववेश्मन्यबनिधचे परिजानपदेष्ववस्रावयति
परविपये तस्य सत्ती मन्त्रिमित्रमृत्यगन्धुपक्षमागति गति च
द्रव्याणामुपलभेत ।। २९ ।।
जो कदर्य । कंजूस ) अध्यक्ष, महाग अर्थ लाभ करता हुआ, धनको
अपने घरमे भूमि आदिमें गाड़ देता है, नगरनिवासी या जनपदनिवासी पुरुषों के
समीप रक्षा के लिये रख देताह, अथवा शनु देश में अपने धनको भेजकर यही कही
पर जमा करता जाता है, उस अध्यक्ष मन्त्री (सलाहकार), मित्र, भृत्य तथा
घन्धु गान्धवाको, और दकि आय व्ययको, सत्री (गुरा पुरुष) अवश्य देखे ॥२९॥
यश्चास्य परविपयतयां संचारं कुर्यात्तमनुप्रविश्य मन्त्र
विद्यात् ।। ३० ॥ सुविदिते शत्रुशासनापदेशैनैनं घातयेत् ॥३१॥
सधा इस कदर्थ अध्यक्ष धनको जो पुम्प शनुके देवा जमेका
प्रयन्ध करता हो, उसके साथ मिलकर अर्थात् उसका मित्र या मृत्य बनकर
सनी इम गुप्तरहस्य को अच्छी तरह जान लेने ॥३०॥ जय सीके द्वारा इसका
यह गुसरहस्य अच्छी तरह मालूप होजावे, तो राजा शत्रुकी आज्ञाके यहानेस ।
इस कदर्यको मरवा देवे । ( तात्पर्य यह है.-एक धनापटी चिट्ठी रिखवाकर,
नोकि शत्रुकी ओरसे इस कदको लिखी गई हो, उस शत्रुके देशमे अपने देश में
आते विसी आदमीके हायमें देरे, उम पुरुषको राज्यकी सीमापर अन्तपाल
गिरफ्तार करके राजाके पास उपस्थित करे, तदनन्तर राजा उस चिट्ठीके आधार
पर, यह कदय अध्यक्ष शत्रुसे पनपनहार रखता है, तथा यही धन भादि भे.
जाता है, इस प्रकार प्रसिद्ध करके उससे मरवा देथे ॥३१॥
तस्मादस्याध्यक्षाः संख्यायालेसकरूपदर्शकनीवीग्राहको.
चराध्यक्षसखा कर्माणि कुर्युः ॥ ३२ ॥
[२ अधिः
कौटलीय अर्थशास्त्र
जो अध्यक्ष, व्ययके लिये नियत किएहुए धनको ग्यय न करके लाभ
शामिल करदेता है, यह पुरपों ( काम करनेवाले मजदूरों) सेथा राजकार्यको
खाता अर्थात् नष्ट करता है यह समझना चाहिए। तात्पर्य यह है कि किसी
कार्यको करने के लिये नियत कियहुए धनको व्यय न करनेसे, एक तो मजदूरीका
पालन नहीं होता, मजदूरी न मिलने से ये कष्ट उठाते है, दूसरे वह राजकार्य
नहीं होता, जिसके लिये वह यमट पास किया गया है । उसका जो रु. बघता
है, उसे अध्यक्ष भायकी भोर करके नियमित भागसे अधिक आयको अपनेघर
रखलेता है ॥ २० ॥ ऐसा करनेवाले अध्यक्षको, उस कार्यकी हानि ( कार्य
करनेपर उस दिन में जितना काम होजाय, उसके मूल्यकी कल्पना करके हानिका
निर्णय कियाजाय ), और पुरुषों के वेतनका अपहरण करने के सम्बन्धम, भए
राधके
अनुसार
दण्ड दियाजाव ॥ २१ ॥
तसादस्य यो यस्मिन्नाधिकरणे शासनस्थः स तस्य कर्मणो
याथातथ्यमायव्ययौ च व्याससमासाभ्यामाचक्षीत ।। २२ ।।
मुलहरतादात्विककदर्याश्च प्रतिषेधयेत् ।। २३ ॥
इसलिये राजाका, जो जिस स्थानमें शासन करनेवाला अधिकारी
अध्यक्ष नियुक्त हो, वह उप कार्यकी यथार्थताको भार उसके आय व्ययको
आवश्यकतानुसार सक्षप और विस्तारके साथ, राजापे निवेदन करे ॥ २२॥
और जो मूरहर, तादारिरक तथा पदर्य पुरष हो, उनकोभा उनके अपने
कार्यसे सदा रोकता रहे ॥ २३ ॥
यः पितृपैतामहमर्धमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः॥ २४ ॥
यो यद्यदुत्पद्यते तत्तद्भक्षयति स तादात्विकः ॥ २५ ॥ यो भृ-
त्यात्मपीडाभ्यामुपचिनोत्यर्थ स कदर्यः ॥ २६ ॥
जो पुरप अपनी पितृपितामह परम्परासे प्राप्त हुई सम्पत्तिको अन्याय
पूर्वक पाता, अर्थात् उपभोग करता है, उसे 'मूलहर' कहते हैं । ऐसे पुरपाको
. इन कार्योंके करनेसे रोकते रहना चाहिये, सिस कि ये अपनी पुरानी सम्प
सिको म न करदालें ॥ २४ ॥ जो पुरुष जितना उत्पन्न करता है, उतमाही
उस समय खालेता है, अर्थात् न्यय कर देता है, शेष कुछ नहीं बचाता, उसे
'सादाधिक' कहते है ॥२६तथा जो पुरुष अपने भृत्यों और अपने आपको
इष्ट देकर धनका सह करता है यह संदर्य' कहाता है । २६॥
स पक्षयांवदनादेयः ॥२७॥ विपर्यये पर्यादातम्यः ॥२८॥
९अध्या अध्यक्ष-प्रचार यदि निषेध करने परभी मूलार आदि अपने कामोको करते ही चले जाते हैं, तो उन्द अपने वन्धु पान्धवॉकी सम्पत्ति पर दायभागका अधिकार नहीं रहता । अथवा ऐसे पुरपाको (जिनकि बन्धु बान्धव है । इस सूममें 'पक्ष' का अर्थ बन्धु यान्यय है ) आर्थिक दण्ड न दिया जाय (क्योंकि भाधिक दण्ड देने से उनके बन्धु बान्धव आदि कुपित हो सकते है), किन्तु उनको केवल पदच्युत कर दिया जाय ॥२७॥ यदि उनके पन्धु चान्धव आदि नहीं, तो उनकी सम्पत्तिको जब्त कर लिया जावे 1॥ २८ ॥ यो महत्यर्थसमुदये स्थितः कदर्यः संनिधत्ते जनियते ऽवसा- चयति चा संनिधचे स्ववेश्मन्यबनिधत्ते पारजानपदेष्ववस्त्रावयति परविषये तस्य सत्ती मन्त्रिमित्रभृत्यबन्धुपक्षमागति गति च द्रव्याणामुपलभेत ॥ २९ ॥ जो कदर्य । कंग) अध्यक्ष, महान अर्थ लाभ करता हुभा, धनको भपने घरमें भूमि आदिमें गाड़ देना है, नगरनिवासी या जनपदनिवासी पुरुषों के समीप रक्षा के लिये रख देता है, अथरा शनु के देशने अपने धनको भेजकर कहीं कहीं पर जमा करता जाता है। उस अप्रक्षक मन्त्री (सलाहकार), मित्र, मृत्य तथा पन्धु पान्धयोको, और द्रव्योंके आय व्ययको, सत्री (गुश पुरुष) अवश्य देखे ॥२९॥ यश्चास्य परविपयतयां संचारं कुर्यात्तमनुप्रविश्य मन्त्रं विद्यात् ।। ३० ।। सुविदित शत्रुशासनापदेशनैनं घातयेत् ॥३१॥ तथा इस कदर्य अध्यक्षके धन को जो पुरुष शत्रुके देशमें सिायानेका प्रबन्ध करता हो, उसके साथ मिलकर अर्थात् उसका मित्र या मृत्य बनकर सत्री इम गुप्तरहस्यको अच्छी ताह जान लेये ॥३०॥ जप सबीके द्वारा इसका यह गुसरहस्य अच्छी तरह मालूम होडावे, तो राजा शनुकी आज्ञाके यहानेस र इस कदर्यको मरवा देवे । ( तात्पर्य यह है.-एक बनावटी चिट्ठी लिखवाकर, जोकि शाकी ओरसे इस कदर्य को लिखी गई हो, उस शत्रुके देशसे अपने देशमें भाते हुए किसी आदमी हायमें देरे, उम पुस्पको राज्यकी सीमा पर अस्तपाल गिरफ्तार करके राजाके पास उपस्थित करे, सदनन्तर राजा उस चिट्ठीके भाधार पर, यह कदयं अध्यक्ष शनुपे पर व्यवहार रसता है, तथा या धन आदि भे. जाता है, इस प्रकार प्रसिद्ध करके रसको मरवा देवे ॥३॥ तस्मादस्याध्यक्षाः संख्यायकलखकरूपदर्शकनीवीग्राहको चराध्यक्षसखा कर्माणि कुर्युः ।। ३२ ।।
(१४४) फौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक इस लिये सब अध्यक्षोनी चाहिये कि ये संख्यायक (गण-आयव्ययका टेवा करने वाला), लेखक, कादर्शक (राजीय मुद्रा तथा अन्य मणिमुक्ता स्वर्ण आदिके खरे खोटेपनको पचानने वाला कर्मचारी ), तथा नीवीम्राहक (आय व्ययसे शेष बचे हुए धनको संभालने वाला अधिकारी , तथा उत्तराध्यक्ष (पहा, अध्यक्षों के ऊपर निरीक्षण करने वाला, प्रधानाधिकारी) इनके साथ मिलकरही राजाके सब कार्योको करें ॥ ३२ ॥ उचराध्यक्षाः हस्त्यश्वरथारोहाः ।। ३३ ।। तेपामन्तेवासि- नश्शिल्पशौचयुक्तास्सङ्ख्यायकादीनामपसर्पाः ॥ ३४ ॥ हाथी घोड़े तथा रथों पर सवार होने वालेही उत्तरा पक्ष यनने चाहिये। ( तात्पर्य यह है --जो पुरप वृद्ध तथा अत्यन्त अनुभघी हैं, वृद्ध होने के कारण युद्ध आदिमें जाने का सामर्थ नहीं रखते, साधारणतया चलने फिरने मेंभी सपारियों का ही सहारा लेते हैं, ऐसे विशेष व्यक्तियों को उत्तराध्यक्ष भर्थात् अन्य अध्यक्षोंका निरीक्षण करने वाला प्रधानाध्यक्ष बनाया जावे ) ॥ ३३ ॥ इन उत्तराध्यक्षाके पास कुछ ऐसे शिन रहने चाहिये, जोकि आज्ञा पालन करने में परे चतुर, तथा हृदयकै पनि हो; वे सब्यायक गणक आदि कर्मचारियों की प्रत्येक प्रवृत्तिको जानने के लिये गुप्तपुरुषका कार्य करें ॥३४॥ बहुमुख्यमनित्यं चाधिकरणं स्थापयेत् ।। ३५ ॥ प्रत्येक अधिकरण अर्थात् कार्यस्थान में अनेक मुख्य पुरोको रक्खाजावे । जिससे कि वे एक दूसरेवा भय रखते हुए राजकार्यको अच्छी तरहसे करें तथा उन मुख्य पुरपांकी स्थिति चिरस्थायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि एसो भय. स्थाचारियोंसे मिग्रताकर अपने दोपको छिपा सकते है, और जनता भी उनके दोषोंको इस भयसे पकट नहीं करती, कि ये भागे हमारा कोई अपकार कर सकते हैं॥३५॥ यथा घनासादपितुं न शक्यं जिहातलस्थं मधु वा निपं वा । अर्थस्तथा धर्यचरेगे राज्ञः स्वल्पो ऽप्यनासादयितुं न शक्यः ॥ ३६॥ जिस प्रकार संभ पर रफरो हुए शहा या गहरके सम्बन्धी कोई यह पाई कि हममा साद न डूं, यह नहीं हो सकता, जीभ पर रखी हुई चीजका १च्छा न होने परभी स्वाद भाही जाता है। ठीक इसी प्रकार सजा सम्ब- नयी कार्यों पर नियुक्त हुए २ कर्मचारी, दस अर्थका थोदामी स्थान न दें, यह
मध्या०९]
अध्यक्ष-प्रचार
(१४५)
कदापि नहीं हो सकता, वे घोड़ा यहुत कुछ न कुछ धन आदिका अपहरण अय-
३५ करते ही ॥३६॥
मत्स्या यथान्तः सलिले चरन्तो
जातुं न शक्याः सलिलं पियन्तः ।
युक्तास्तथा कार्यविधी नियुक्ताः
ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥ ३७॥
रामा जिस प्रकार पानी में रहती हुई मालियां पानी पीती दुई नहीं
मालूम होती, इसीप्रकार अर्धकार्योंपर नियुट हुए २ राज कर्मचारी, अयाका
भपहरण करते हुए मालूम नहीं होते ॥ ३० ॥
अपि शक्या गतिनोतुं पततां से पतत्रिणाम् ।
न तु प्रच्छ प्रभावानां युक्तानां चरतां गतिः ।। ३८ ॥
भाकाशमें उपते हुए पक्ष की गतिको जाना जासकता है, परन्तु गुप्त
रूपसे कार्य करते हुए अध्यक्षांकी गतिको पहिचानना यहा फठिन काम है।
इन दोनों लोकोंका तात्पर्य यहीजलमें मछलीके पानी पीने के समान
सथा भाकाश में उड़ते हुए पक्षीकी गति के ममान अपक्षों के द्वारा भाहरण
किया जाता हुभा धन, राजाके लिये जागना दुष्कर कार्य है ॥३॥
आस्रावपेचोपचितान्विपर्यस्येच कर्मसु ।
यथा न भक्षयन्त्यर्थ भक्षित निर्वमन्ति या ॥ ३९ ।।
इसलिये इसप्रकारके भयझोंके विश्यमें राजाको उचित है कि यह
पहिले, धनोंको अपहरण पर २ के समृद्ध हुए २ अध्यक्षकि धनको, उनकी
समृद्धि मे अधया गुप्तचों द्वारा अच्छी तरह जानकर, उनसे छीन लेवे । भीर
उन कर्मचारियोंको उच्च पद पायुत कर नीचहार्योपर नियुक्त करे। जिस.
से कि वे फिर भर्थका अपहरण न करें, तशा अपहरण किये
धनको स्वयं
ही उगल देव ॥ ३९॥
न भइयन्ति ये त्वानन्यायता वर्धयन्ति च ।
नित्याधिकाराः कार्यास्त राजः प्रियहिते रताः॥४०॥
इराध्यक्ष चारे द्वितीये ऽधिकरणे उपयुझपरीक्षा गमो ऽन्यायः ॥ ९ ॥
सादितनिसा ॥३॥
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधिक
जो अध्यक्ष कभी अर्थका अपहरण नहीं करते, तथा सदा न्यायपूर्वक
उसकी वृद्धि में ही तत्पर रहते हैं। और राजाका प्रिय तथा हित करने में ही
लगे रहते हैं। राजाको चाहिये, कि वह इसप्रकारके अध्यक्षोंको सदा उनके
अधिकारपदपर बनाये रस्से ॥ ४०॥
अध्यक्षपचार द्वितीय अधिकरणमें नौवां अध्याय समाप्त ।
दसवां अध्याय।
२८ प्रकरण
.
शासनाधिकार ।
लिखित भाज्ञा तथा संदेश आदिको ही 'शासम' कहते हैं। इस
प्रकरणमें उसहीका निरूपण किया जायगा।
शासने शासनमित्याचक्षते ॥२॥ शासनप्रधाना हि राजानः
॥२॥ तन्मूलत्वात्संधिविग्रहयोः ॥ ३ ॥
पन भादिपर शिखित अर्थको ही, विद्वान् आचार्य 'शासन' कहते हैं।
भर्धात पायनिक अर्थको कभी 'शासन' नहीं कहा जासकता ॥ ॥ राजाजन
शासनका ही विशेष भादर करते हैं, वाचनिकका नहीं ॥२॥ क्योंकि सन्धि,
और विग्रह भादि सम्बन्धी कार्य शासन मूलकही होते हैं । (इस सूत्रमें सन्धि
विग्रह पदोंको छओं गुणोंका उपलक्षण मानकर, सन्धि, विग्रह, यान, आसन,
संश्रय और द्वैधीभाव इन छओं गुणाका ग्रहण कर लेना चाहिये । अर्थात् पाइ
गुण्य सम्बन्धी सयही कार्य लेग्वद्वारा होनेपरही ठीक समझे जाते हैं)॥३॥
तसादमात्यसंपदोपेतः सर्वसमयविदाशुग्रन्थश्चाक्षरो लेख-
याचनसमर्थो लेसकः स्यात् ॥ ४॥ सो ऽव्यग्रमना राज्ञः
संदेशं श्रुत्या निथितार्थ लेसं विदध्यात् ॥ ५ ॥
इसलिये अमात्यके गुणों से युक्त, हर तरहके (वर्णाधम सम्बन्धी) आ-
चार विचारोंको जानने वाला, शीघ्रताके साथ सुन्दर पाक्य योजना करने वाला,
सुन्दर अक्षर लिखने घाला, सब तरहके हेस रिखने और पढ़ने में समर्थ लेखक
होना चाहिये । (अर्थात् प गुण्य सम्बन्धी शासन आदि लिखने पढ़ने के लिये
इसप्रकारके लेखकको गमा नियुक्त को)॥४॥ यह लेसक सावधान होकर,
रामाके सम्देशको अच्छी तरह सुनकर, दूसरके ऐसके पूर्वापर भोंपर विचार
कर उसके अनुसार, तिक्षित भई पाले ऐषको लिखे ॥ ५॥
२० अध्या अँध्यक्ष प्रचार (१४) देशश्वर्यवंशनामधेयोपचारमीश्वरस्य देशनामधेयोपचारमनी- श्वरस्य ।। ६ ॥ यह लेखपन यदि किपी राजाके सम्बन्ध अधात् राजाके लिये लिखा जाता हो, तो उसमें उसके देश, ऐश्वर्य, यश और नामका पूर्ण कथन होना चाहिये । यदि किसी अमात्य आदिके नाम लिखा जावे, तो उसमें केवल उसके देश और नामकाही पूर्ण निर्देश होना चाहिय ॥ ६॥ जाति कुलं स्थानवयः श्रुवानि कमर्दिशीलान्यथ देशकालो। यौनानुवन्धं च समीक्ष्य कार्ये लेवं विदध्यात्पुरुषानुरूपम् ।। ७ ।। इसके अतिरिक्त प्रत्येक राज कार्य सम्पन्नी लेखामें जाति (बाह्मण भादि), कुल, स्थान (अधिकारस्थान ), आयु, विद्वत्ता (शास्त्रज्ञान), कार्य, धन सम्पत्ति, सदाचार, देश (निवास स्थान), काल, विवाहसम्पन्ध (विवाह आदि सम्बन्ध किन बंशोंके साथ होते हैं, इत्यादि, इसीका नाम 'यौनानुबन्ध' है), आदि इन सप्र प्रातको अची तरह सोचकर, उन २ पुरुषों (उत्तम, मध्यम नीच पुरपी) के अनुकूल अवश्य लिये ॥ ७ ॥ अर्थक्रमः संबन्धः परिपूर्णता माधुर्यमौदार्य स्पष्टत्वमिति लेखसंपत् ॥ ८॥ तत्र यथावदनुपूर्वक्रियाप्रधानस्यार्थस्य पूर्वम- भिनिवेश इत्यर्थस्य क्रमः ॥९॥ प्रस्तुतस्याथस्थानुरोधादुत्तरस्य विधानमासमातेरिति संवन्धः ।। १० ।। अर्थक्रम, सम्बन्ध, परिपूर्णता, माधुर्य, औदार्य, और स्परता, ये छः गुण लेश्य के होते है ॥ ८॥ अर्थानुसार ठोक २ आनुपूर्वीका रखना, अर्थात् सबसे प्रधान अर्थको पहिले रखना, फिर इसीके अनुसार सप पाताका निरूपण करते जाना, अकम' कहाता ॥ ९॥ प्रस्तुत की याधा न करते हुए भगले अर्थका निरूपण करना, इमीप्रकार समाप्ति पर्यन्त करते चले जाना 'सम्पन्ध' कहाता है । तात्पर्य यह है कि अगला अर्थ पहिले अर्थका बाधक न होना चाहिये, एमा होने पर ही यह अर्थ सम्पछ कहा जासकता है ॥ १० ॥ अर्थपद क्षराणामन्यूनातिरिक्तता हेतूदाहरणदृष्टान्तरर्थोपव- नाश्रान्त दतैति परिपूर्णता ॥ ११ ॥ सुखोपनीतचार्वर्थशब्दा- . १४८) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अपि मेधानं, माधुर्यम् ॥ १२॥ अग्राम्यशब्दाभिधानमौदार्यम् ॥१३॥ प्रतीतशब्दप्रयोगः स्पष्टसमिति ॥ १४ ॥ अर्थपद तथा अक्षराका न्यून अधिक न होना, हेतु (कारण), उदाह- रण (शास्त्रीय सवाद भादिका कथन), तथा दृष्टान्स (लाकिक अर्थात् लोक प्रसिद्ध भयंका निदर्शन) पूर्वक अर्थका निरूपण करना, और शब्द कार्पपप या टीले शब्दोंका प्रयोग न काना परिपूर्णता' कहाता है ॥ ॥ सुखपूर्वक भर्थात् सरलतासे अर्थका धोधन करने वाले सुन्दर २ शब्दोंका प्रयाग करमा 'माधुर्य' कहाता है ॥ १२ ॥ अमाम्म (सम्यतास मरे हुए) शब्मोंके प्रयोग करनेको ही 'औदार्य' कहते हैं। तथा सुप्रसिद्ध शम्दोंके प्रयोग करने का नाम 'स्पष्टता'है॥१४॥ अकारादयो वर्णाः विषष्टिः ॥ १५ ॥ वर्णसंघातः पदम् ॥ १६ ॥ तंचतुर्विधं नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्चेति ॥ १७ ॥ तत्र नाम सत्त्वाभिधायि ॥ १८॥ अपिशिष्टलिङ्गमाख्यातं क्रिया- याचि ॥ १९ ॥ क्रियाविशेषकाः पादय उपसर्गाः॥२०॥अव्य- याचादयो निपाताः ॥ २१ ॥ भकार आदि वर्ण नेसठ ( ६३ ) हाते हैं ॥ १५॥ वर्गों के समुदायको 'पद' कहते हैं ॥ १६ ॥ वह पद धार प्रकारका होता है -नाम, उपसर्ग और निपात ॥ १७॥ सावको कहने वाला अर्थत् जाति गुण तथा दण्यका वाचक पद 'नाम' कहासा है ॥ १८ ॥ स्त्री पुरर भादि विशेष लिङ्गों से रहित, क्रियावाचक पदको 'भारपात' कहते हैं ॥१९॥ क्रियाओंक विशेष भोंका द्योतन करने वाले, क्रियाओंके साथ लगे हुए प्र आदि पद उपसर्ग' कहाते हैं॥ २०॥च भादि अव्ययाको 'मिपात' कहते हैं॥1॥ पदसमूहो वाक्यमर्थपरिसमाप्ती.॥ २२ ॥ एकपदावरलिप- दपरः परपदार्थानुरोधेन वर्गः कार्यः ॥ २३ ॥ पूर्ण अर्थको (अभात् निराकांक्ष अर्थको जिस पदसमूहके उम्चारण करदेनेपर सरसम्बन्धी अर्थकी भाकाक्षा न रहे, एसे अर्थको) कहने धाले पद समूहका नाम 'घाम' है ॥ २२ ॥ कमसे कम एक पदपर और अधिकसे भधिक तीन पदपर, मुख्य पदके मनुसार विराम करना चाहिये ॥ २३ ॥ लेपपरिमंहरणार्थ इतिशब्दो वाचिकमस्येति च ।। २४ ।। आरयात, .
१० अध्या अध्यक्ष-प्रचार (१४९ लेखकी परिसमाति प्रोतन करमेके लिये 'इति' शब्दका प्रयोग किया जाता है। यदि लेखमें पूरी बात न लिखो जाये, या लिखनी उचित न समझी जावे, तो अन्तम 'चाचिकमस्य (लेसहरमुखारट्रोतव्यम्)' ऐसा सिसदेना चाहिये। अर्थात् ' इस लेखका शेष अंश, इस पनको लाने वाले पुरुष के मुंहसे सुन लेना' इसप्रकार लिख दिया नावे ॥ २४ ॥ निन्दा प्रशंमा पृच्छा च तथाख्यानमधार्थना प्रत्याख्यानमुपालम्भः प्रतिषेधो ऽथ चोदना ॥ २५ ॥ सान्त्वमभ्यवपत्तिश्च भर्सनानुनयौ तथा । एतेष्वर्याः प्रवर्तन्ते त्रयोदशसु लेखजाः ॥ २६ ॥ निन्दा, प्रशंपा, पृच्छा, आख्यान, अर्थना, प्राण्यान, उपालम्भ, प्रतिपेय, चोदना, सान्त्र (मान्वना) अनापत्ति, भरमना और अमुनय इन तेरह य तोम ही पत्रसे प्रकट होने वाले अर्थ, पस होते हैं; अधीत पत्र में इन तेरह याताममे ही किसी न किपो के सम्बन्धों लिखा जाता है ।। २५-२६ ॥ तत्राभिजनशरीरकर्मणां दोपपचनं निन्दा ॥ २७ ॥ गुणत्र- चनमेतेपामेव प्रशंसा ।। २८ ।। कथमेतदिति पृच्छा ॥ २९ ॥ एवमित्याख्यानम् ॥ ३० ॥ देहीत्यर्थना ॥ ३१ ॥ न प्रयच्छा- मीति प्रत्याख्यानम् ॥ ३२ ।। किसीके अभिजन (वंश), शरीर तथा कार्यमै शेषारोपण करना अथात् इनके सम्बन्धमे बुरा कहना • निन्दा' कहता है ।। २७ ।। और इन्हींके (वंश 'आदिक) सम्म गुणों का कान करना 'प्रशंस' कहाता है ॥ २८॥ यह यात कैसे हुई ?, सरकार पूने को ही परछा' कहते हैं ॥ २९ ॥ यह इस तरह करना चाहिये' यह कहना भारपान कहाता है ॥ ३० ॥ 'दो' इसप्रकार कहकर मांगने का नामहो 'अर्थना' है ॥ ३१ ॥ नहीं देता हूं' इसप्रकार निपेश करदेना ही प्रत्याख्यान' कहाता है ॥ ३२॥ अननुरूपं भवत इत्युपालम्भ. ।। ३३ ॥मा कापीरिति प्रति- पेधः ॥ ३४ ॥ इदं क्रियतामिति चोदना ॥ ३५ ॥ योऽहं स भवान्यन्मम द्रव्यं तद्भवत इत्युपग्रहः सान्त्वम् ।। ३६ ॥ 'यह मापने अपने अनुरूप (सरल) नहीं किया' इसमकार साभिप्राय पचन फहना 'उपालम्भ' कहाता है॥ ३३ ॥ ऐसा मत करो' इसप्रकार कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक भाज्ञा पूर्वक रोकना 'प्रतिपत्र' कहाता है ॥ ३४ ॥ 'यह करना चाहिये इस- प्रकारकी प्रेरणाकोही चोदना' कहते हैं ॥ ३५ ॥ जो मैं हूं घही आप है, जो मेरा दग्य है वह आपकाही है, इसप्रकार कहकर किसीको ससली देना, तथा अपने अनुकूल बनाना 'सारव' या 'सान्त्वना' कहाता है ॥ ३६ ॥ व्यसनमाहाय्यमभ्यवपत्तिः ॥ ३० ॥ सदोषमायतिप्रदर्शन- मभिमसनम् ।। ३८ ॥ अनुनयस्त्रिविधो ऽर्थकतावतिकमे पुरुषा- दिव्यसने चेति ।। ३९॥ ध्यसन (आपत्ति) के समयमें सहायता काना 'मम्मपति' कहाता है ॥ ३७ ॥ दोप सहित भविष्यका दिसलाना, अथात् 'यदि सुम जल्दी ही इस प्रकार न कादोगे, तो मै तु मावा इलू. या कारागारमें बन्द करदूंगा' इस तरह कहना 'भापन'घुमना) कमाता है ॥ ३८ ॥ अनुनय तीन प्रका. रका होता है,:-अपकरण निमित्तक, अतिक्रप निमित्त तथा पुरादिवस- मनिमित्तक, किसी अवश्यमेव करने योग्य कार्य को करनेके लिये जो मित्रकी ओरसे अनुनय हो वहे पहिला है। किसी तरह कुपित हुए २ पुरुषको शान्त करने के लिये जो अनुनय किया जाय का दूसरा है । तथा पिता भाई पुत्र मिग्न भादिक मरने के कारण आई हुई विपत्तिमें जो अनुनय किया जावे, यह तीसरा अनुनय है। अनुनय शब्दका अध अनुग्रह है ॥ ३९ प्रजापना ज्ञापरिदानलेखास्तथा परीहारनिसृष्टिलेसौ । प्रावृत्तिकच प्रतिलेख एव सर्ववगश्चेति हि शासनानि ॥४०॥ शासन अयंत् लेख के, ये और भी निम्मलि खन भाठ भेद है:-रक्षा- पन, आज्ञा परेशान, परीहार, निसृष्टि, प्राकृतिक, पतिलेख और सर्वत्रग। इन आटोका काश. लक्षग करते हैं। अनेन विज्ञापितमेवमाह तद्दीयतां चेद्यदि तत्वमस्ति । राज्ञः समीपे वरकारमाह प्रज्ञापनपा पिरिधोपदिष्टा ॥४१॥ गुत राजपुरुप द्वारा राजाको यताये जानेर (अर्थात् किमी महामा- मी कहाँसे धन मिलाया और उसने ! अपने ही पास रखालेगा; एक गुप्त पुरुषने भाका राजाको ग्वार देवी, तब) राजा महामान आदिम कहता है कि यदि यह पात ठीक है, तो नुप वह धन दो पद राजाके सामने धन देदेने की स्वीकृति करलेता है। हमकारके लेखायका नाम 'प्रज्ञापनर है। यह प्रज्ञापना नामक लेखपत्र भनेक प्रकारका होता॥११ . .
१० अध्या०] अध्यक्ष पवार भर्तुराज्ञा भवेद्यन निग्रहानुग्रहौ प्रति । रिशेपेण तु भृत्येपु तदाज्ञालेखलक्षणम् ॥ ४२ ॥ जिस लेखपत्र में, राजाकी निग्रह या अनुप्र रूप आज्ञा हो । विशेष कर जो लेखपत्र भृत्योंके सम्बन्धमें लिखा जावे, वह 'भाना' कहाता है ॥५३॥ यथार्हगुणसंयुक्ता पूजा यत्रोपलक्ष्यते । अप्याधौ परिटाने या भवतस्तायुपग्रहौ ॥ ४३ ॥ जिस सपत्र में उचित गुणोंसे युक्त सरकारके भाव प्रगट किये जायें, वह 'परिदान' कहाता है। यह दो अग्रस्थााम लिसा जाता है, एक तो उस समय जब कि अपने मृत्यों का कोई बन्धु बान्धव आदि मर गया हो, और उसके कारण उन्हें न्यथा हो, दूसरा उनकी रक्षाके लिये राजा जप कभी विशेष दयामाय प्रगट करे । ऐसी अवस्थाममि राजाकी ओरसे भृत्योंको लिखा हुभा इस प्रकार का लेख, उन्हें राजाके अनुकूल बमा देता है ॥ ३ ॥ जातेर्विशेषेषु पुरेषु चेव ग्रामेषु देशेषु च तेषु तेषु । अनुग्रहो यो नृपवेर्निदेशात्तज्ज्ञः परीहार इति व्यवस्थेत् ॥४४॥ विशेष २ जतियों, उन २ नगरी, ग्रामों तथा देशोंपा, राजाकी आज्ञा नुसार जो अनुग्रह किया जाये, विशेष पुरप इसीका परीहार' कहते हैं ॥ ३५॥ निसृष्टिस्थापना कार्या करणे वचने तथा । एपा याचिकलेस स्याद्भवेनैसृष्टिको ऽपि वा ।। १५ ।। किसी कार्य के कान उमाकाने, किमी अत पुरुष प्रामाण्यका कथन करना निरष्टि' कहाता ह । अधास् अमुक का जो काम है, वहीं मेरा काम है, अमुकका जो वचन है वही मेरा वचन है, इसमकार अपने कार्य तथा घचनमें किसी आत प्रामाणिक पुस्पका कथन करना निसृष्टि' है । यह दो प्रकारका है, एक वाचिक ( जिसमें वधन के प्रामाण्यका कथन हो ), और दूसरा सृष्टिक (जिसमें कार्य के प्रामाण्यका कथन किया जाय)॥ ५५ ॥ विविधा देवसंयुक्त तत्वां चैा मानुषीम् । द्विविधां तां व्यवस्यन्ति प्रवृत्ति शामनं प्रति ॥ ४६॥ भनेक प्रकारकी देवी (सुभिक्ष दुर्भिक्ष अतिवृष्टि सुरटे अष्टि निका उत्पात भादि भनेक प्रकारको दध सम्बन्य), परमार्थभूत (सीक २ हाल न यमाने चारो) तथा मानुग (चो। प्रादेरा होने वाले उपद्र), लेख प्रया प्रवृति दो प्रकारको हासी है । तापर्य यह है कि मावृतिक (प्रवृत्ति समाचार दूमोके भेजे (१५२) कोटलीय अर्थशास्त्र [२ मधि० भयर्थात् जिसके द्वारा केरल परिस्थितिको सूचना दुसरेको दी जावे, ऐसे ) लेख में अनुकूल प्रतिकूल भापाता, चाहे च देवसे हों या मनुष्याके द्वारा, तथा आपातम्य वास्तविक भएर काही उल्लख किया जाता है। ये सब प्रकारकी प्रवृत्ति दो भाग में विभक्त है, ए शुभ भार दूलरी भशुभ । इसलिये प्रावृत्तिक लेखभी शुभ अशुभ रूपसे दो प्रकारकाही समझना चाहिये ॥ १६ ॥ दृप्या यथातच ततः प्रत्यनुभाप्प च । प्रतिलेसो भनेकार्यो यथा राजाचस्तथा ।। ४७ ।। लेखको अताइ देखकर अर्थात् ठीक तौरपर पाहिले स्त्रय उसको वाचका, कि राज क सामने यांचा, राज की भाज्ञाके अनुसार जो उसका उसर लिखाना, उरोको 'प्रतिकव' कहते है । ॥ ४८॥ यत्रेश्वरांश्चाधिकृतांश्च राजो रक्षोपकारी पथिकार्थमाह । सर्वत्रगो नाम भवेत्स मार्गे देशे च सनन च वेदितव्यः॥४८॥ जिम लेखपत्र में राजा, पधिकोंकी रक्षा और उपकार करने के लिये दुर्गपाल राष्ट्रपाल अमपाल आदिको तथा अन्य समाहर्ता प्रशास्ता भादि आधिकारियोंको लिखता है, उपलेखका नाम 'सर्वत्रग'ई, क्योंकि वह मार्ग देश तथा राष्ट्र भादि सही जगहोंपर लिखा जाता है॥४८॥ उपायाः सामोपप्रदानभेददण्डाः ॥ ४९ ।। उपाय चार है, -साम दान दण्ड भे। (इस वातको पहिले कहा ज चुका है कि सन्धिविना भादि लबकी अन हैं, इसलिये ऐखकको उनका ज्ञान अवश्य होना चाहिए । अब सम दान आदि उपायोकामी ज्ञान लेखकको होना आवश्यक है, यह यताया जायगा) ॥१९॥ तर साम पञ्चविधम् गुगसंकीर्तन संपन्धोपाख्यानं परस्प- रोपकारसंदर्शनमायतिमदर्शनमात्मोपनिधानमिति ॥ ५० ॥ उनमें साम पांच प्रकारका हे साहै-गुणमकीर्तन, सम्बन्धोपारपान, परस्परोपकारस दर्शन, मायतिप्रदर्शन, तथा अस्मापानिधान । इनका प्रमश प्रथा २ लक्षग करते तवाभिजनशूरीरकर्मप्रतिश्रुतद्रव्यादीनां गुणागुणग्रहणं प्रशं- सास्तुतिर्गुणसंकीर्तनम् ॥ ५१ ॥ भभिजन (घर), शरीर, कार्य, स्वभाव, विद्वत्ता, तथा अन्य हाथी घोरप भादि दमोंके गुण भोर भगुणों को जानकर उनकी प्रशसा या स्तुति करना 'गुणसकीर्तन' कड़ाता है ॥ ५ ॥ .
D
अध्या०]
अध्यक्ष-प्रचार
ज्ञातियौनमौखस्रीवकुलहृदयमित्रसंकीर्तनं संबन्धोपाख्या-
नम् ।। ५२ ।।
झाति ( समान कुली उत्पन्न होना ), योनिकृतसम्बन्ध ( विवाह
आदि), मुखरुतसम्बन्ध (गुर शिष्य आदि, मुसके द्वारा अध्ययनामापनसे
उत्पन्न हुआ • सम्पन्ध), सुवाकृत सम्बन्ध (समा यज्ञके एक पानविशेषका
नाम है, उसके द्वारा जो सम्बन्ध हो, याज्ययाजक आदि ), कुलकृत
सम्पन्ध (कुलपरम्परासे घरा आया हुआ सम्पन्ध ), हार्दिक सम्पध (स्वयं
अपने हृदय के द्वारा किया हुआ सम्बन्ध), तथा मित्रसम्बन्ध (उपकार आदिके
द्वारा हुभा २ सम्पन्ध), इन सात प्रकार के सम्बन्धोमसे किमीका कथन करना
'मम्बन्धोपस्न्यान' कहाता है ॥ ५२ ॥
सपक्षपरपक्षयोरन्योन्योपकारसंकीर्तनं परस्परोपकारसंदर्श-
नम् ।। ५३ ।। असिन्ने कत इदमावयोर्भवतीत्याशाजननमाय-
तिप्रदर्शनम् ॥ ५४॥
अपने और पराये पक्षमे, एक दूसरेका एक दूसरेके द्वारा किए हुए
उपकारका कथन करना 'परस्परोपकारसदर्शन' कहाता है ॥५३॥ इस कार्यके
ऐसा करनेपर, हम दोनों को यह फल होगा, इसप्रकार आशाका उत्पन्न करना
'यतिप्रदर्शन' कहाता है॥ ५४ ॥
यो ऽहं स भवान्यन्मम द्रव्यं तद्भवता वकृत्येपु प्रयोज्य-
तामित्यात्मोपनिधानमिति ॥ ५५॥
जो मह वही भाप हैं, मेरा धन आपकाही धन है, आप उसे इप्टा-
नुसार अपने कार्याम लगा सकते है, इसप्रकार अपने आपको समर्पण करदमा
'आमापनिधान' कहाता है ॥ ५५ ॥
उपप्रदानमर्थोपकारः ॥ ५६ ॥ शङ्काजननं निर्भमनं च
भेदः ॥ ५७ ॥ वधः परिक्लेशो ऽर्थहरणं दण्ड इति ।। ५८ ।।
धन आदिवे उपकार करना 'उपप्रदान' या 'न' कहाता है
॥५६॥ शत्रुके उदय साक्षा उत्पन्न करदेना या धमकाना 'भेद' कहाता है
॥ ५७ ॥ उसे मारदेमा, तथा अभ्यप्रकारसे पीदा पहुंचाना, या उसके धन
भादिका अपहरण करलेना दण्ड' कहा जाता है ।। ५८ ॥
अकान्तिाघातः पुनरुक्तमपशब्दः मंलव इति लेसदोषाः
१५९॥ तत्र कालपचकमचारुषिपमपिरागाक्षरत्वमकान्तिः ॥६॥
(१५४) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक अकान्ति, व्याघात, पुनरत, अपशब्द और सप्लब ये पाच लेसके दोष होते है ॥ ५९॥ उनमसे स्याही पडे हुए कागजपर भयया स्वभावसेही मलिन कागजपर लिखना, असुन्दर अक्षर बनाना, छोटे बड़े अक्षरोंका होजाना, और फीकी स्याहीसे लिखना, यह लेखका 'अकान्ति' नामक दोष कहाता है ॥६॥ पूर्वेण पश्चिमसान्पपत्तिाघातः ॥ ६१ ॥ उक्तस्याविशे- पेण द्वितीमुचारणं पुनरुक्तम् ॥ ६२ ।। पहिले लेखके साथ अगले रेषका विरोध होजाना, अथवा पहिले एखसे अगल लेखकी पाधा होजाना सपाघात' कहता है ॥ ॥ जो बात पहिले कहदीगई है, उपक समानही फिर दुबारा कहदेना 'पुनरक्त' दोप कहाता है ॥२॥ लिङ्गवचनकालकारकाणामन्यथाप्रयोगो ऽपशब्दः ॥१३॥ अवर्ग वर्गकरणं वगै चापर्गक्रिया गुणविपर्यासः संप्लव इति ॥६॥ लिग (स्त्रीलिक पुलिग आदि), वचन ( एकपपन रिपचन आदि काल ( भूत भविष्यत् आदि), तथा कारक ( की कम भादि), का अन्यथा प्रयोग करदना, अर्थात् स्वीलिंगकी जगह पुल्लिग, एकरचनकी जगह पहुएघन आदि विपरीत प्रयोगोंका करना अपशब्द' कहाना है ॥ ६३ ॥ महाँ लेसम निगम करना चाहिय यहाँ विराम न परना, तथा जहाँ न करना चाहिये यहाँ करदेना, और गुणों का विपर्यास अर्थात् अर्थक्रम आदिके भनुसार लेखमा न लिखना सप्लव' नामक पाचपा दोष होता ह॥१४॥ सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य प्रयोगमुपलभ्य च । कौटल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधिः कृतः॥६५॥ इत्या पक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे शासनाधिकार दशमो ऽध्याय ॥१०॥ आदित प्रकग्निश ॥३॥ रहपन सब शाखाको अच्छी तरह जानकर, और उनके प्रयोगोको भी तरह समझकर फिर सजाकेलिये इम शासनविधिका उपदेश किया । ॥१५॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें दशवा अध्याय समास ।
११ माया०]
अध्यक्ष प्रचार
ग्यारहवा अध्याय ।
२९नकरण
कोशमें प्रवेश करने योग्य रत्नों की परीक्षा ।
( मापागारका नाम का है, मणि मुभा आदिनांकी तथा पार
पाणु और कुष्ण आदि अन्य संमा प्याकी पक्षाकाभी इस
प्रकरणम निशि किया जायेगा।
कोशाध्यक्षा कोशवश्य रवं सारं फल्गु कुप्यं या तसात-
करणाधिष्ठितः प्रतिगृहीयात् ॥ १॥
होगाध्यक्षको उचित है.किवा शमें रमेने योग्य रस, सार, फला.
तथा कुष्य इम्पोको, उन २ दयाका मा व्यापार करनेगा भर जानकार
पुरुयोरेस युक्त हुआ २ ही ग्रहण करे । तापर्य यह है कि ये पुरए पाय सादिकी
परीक्षा करके उसे ठीक पताय, तय ही उस कोराम जपा कामकलिय लेवे।।।
ताम्रपाक पाठ्यकवाटक पाशिक्यं कालेयं चार्गेय माहेन्द्र
कार्दमिक सातसीयं दादीय हैमरतं च मौक्तिकम् ॥ २ ॥
सयमे प्रयम मौसीकी परीक्षा बताने-मोती दश उत्पगि म्यान,
उन स्थानों के नाम प्रकारका मोती होना है, ताग्रपणिक ( पाहय देशों
सानपणी नदी है, उसके ममुद्द-मंगर्म होनेगसरा मोती वानपर्णिक' कहाता
है), पाण्य वाटक (मलयकोटि नाम पहाइपर उत्पय होनेगला', पानी.
श्य पारलिगुनके समीपकी पासिका नामक नदी उगम हुमा २), कोलंय
(मिहलद्वीपकी कुला नाम नदीमें उत्पन्न होनेवाला , चोर्नेय (फेरस देश के
गुराध नामके नगर के समीप चूगी नदी में उत्पन होने पाल ) मादेन्द्र ( महेन्द्र
पहाड़ के पास ममुझमें उत्पन्न होने वाला). कार्दमिक ( फारस देशको कदमा
नामक नदीम उरसा होनेगाला ), सातपाय ( यदरके किनारे बोतसी नामक
गों में उत्पन होने पाना), हादीय (अरके किनारे समुदके पास लगहुए जी.
पद नामक होममें उत्पन्न होनेवाला ), हैमवत (दिमास्य पहाइपर उसस
होमेशक्षा ,ये दा सरहके मोती होने हैं।३॥
शुक्तिः शहः प्रकीर्णकं च योनयः ॥३॥
भौतियाको उत्सानि के तीन कारण होते हैं-गुति, शंग्य और प्रशीर्षक,
(mut सांप भादिक मस्तक तथा भन्य साधनामे उत्पन हुए २ माती प्रकी-
शेम्पम यहां कहे गये हैं ) ॥३॥
-
कौटलीय अर्थशास्त्र
[.२ अधि.
मसूरकं त्रिपुटकं कूर्मकमर्धचन्द्रकं कश्चक्तिं यमकं कर्तकं
खरकं सिक्थकं कामण्डलुकं श्यावं नीलं दुद्धिं चाप्रशस्तम् ॥४॥
मसूरक (मसूरकी तरह भाकारवाला ), निपुटक ( तीन खूटवाला,
अथवा छोटी इलायची के समान आकारवाला), कूर्मक ( कछुएके समान भा.
कारवाला), भर्द्धचन्द्रक (आधे दिके समान ) कन्चुकित ( ऊपर मोटे
छिलकेवाला), यमक ( जुड़ा हुआ), कर्तक (फटाहुआ), सरक (खरखरा)
मिथक (दागवाला), कामण्डलक ( कमण्डलुके समान आकारवाला), श्याव
( चन्दरके समान गवारा), नील ( नीले रंगका), तथा दुर्विद (वेमौके
विधाहुआ, अर्थात जिस जगहसे विधना चाहिये, उस जगइसे न विधाहुभा),
ये तेरह प्रकारके मोती दूपित समझ जाते हैं ॥ ४ ॥
स्थूलं वृत्तं निस्तलं भ्राजिष्णु श्वेतं गुरु स्निग्धं देशविद्धं च
प्रशस्तम् ॥५॥
मोटा, गोलाकार, निस्तल (तल रहित-चिकनी जगहपर न ठहरनेवाला
मात् सट छाकजानेवाला ), दीप्तियुक्त, सफेद, भारी, चिकना तथा ठीक
मौकेपर विंधा मोती उत्तम समझा जाता है।॥५॥
शीर्पकमुपशीर्षकं प्रकाण्डकमवघाटकं तरलप्रतिवन्धं चेति
यटिप्रदेशाः ॥६॥
यष्टि अर्थात् लः (जंजीरी-पिरोपहुए मौतियोंकी एक लम्बी श्रृंखला)
के पांच भेद है,-शीर्षक ( जिसके बीच में एक मोती बडा हो, तथा उसके दोनों
भोर यरायर २ के छोटे मोती लगे हुए हो ), उपशीर्षक (एक मोती पहा
बीच, और उसके दोनों ओर छोटे २ बराबरके दो मोती हों, इसीतरहके
तीन २ मोतियों के समूहसे धनी हुई, अर्थात् एक बडे मोतीके वाद वराबर के
दो छोटे मोती, फिर एक बा मोती, फिर दो परावर २ के छोटे, इसी क्रमसे
बनी हुई मायाको 'उपशीर्षक' कहते है ', प्रकाण्डक ( एक बोध वा और
उसके दोनों ओर छोटे घरायर २ के दो दो मोती हो, इसी तरहके पांच के
समूहमे पनी हुई, अर्थात् एक मोतीके वाद चार छोटे २ परावरके, फिर एक
परा, फिर उसके बाद चार छोटे यरायर २ फे, इसी प्रमसे पनी हुई मालाका
नाम प्रकाश, भवघाटक (एक यहा मोती बीच में लगाकर भार उसके
दोनों और उत्तरोत्तर छोटे २ मोनी लगाते हुए माला तैयार कीजावे, उसे
भवघाटक कहते है), और तरलतियाध (सब घरायर ३ के मोतियोंकी माला
का नाम तरहप्रतिबन्ध है)॥६॥
(१५७) ११ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार यष्टीनामष्टसहस्रमिन्द्रच्छन्दः ॥७॥ ततोऽर्ध विजयच्छन्दः ॥८॥ शतं देवच्छन्दः ॥९॥ चतुष्पष्टिरर्धहारः ॥१०॥ चतु- प्पश्चाशद्रश्मिकलापः ॥ ११ ॥ द्वात्रिंशद्गुच्छः ॥ १२ ॥ सप्त- विंशतिनक्षत्रमाला ॥ १३ ॥ चतुर्विशतिरपगुच्छः ॥१४॥ विंश- तिर्माणवकः ॥ १५॥ ततो ऽर्धमर्धमाणवक़ः ॥ १६ ॥ एक हजार आठ (१००८) यष्टि अर्थात् लोकी माला ( आभूपग विशेष ) को 'इन्द्रच्चन्द' कहते हैं ।। ७ ॥ जो इससे आधी अर्थात् पांचसी चार (५०४) यष्टियोंकी हो, उसका नाम 'विजयच्छन्द' है॥ ८ ॥सौ (१००) यष्टिका नाम 'देवच्छन्द' है ॥ ९ ॥ चौसठ (६४) का 'अर्धहार' ॥ १० ॥ चौवन (५४ } का 'रश्मिकलाप ॥21॥ यत्तीस (३२) का 'गुच्छ' ॥१२॥ सत्ताईस (२७) की 'नक्षयमाला' ॥ १३ ॥ चौवीस ( २५ ) का 'अर्धगुच्छ' ॥ १४ ॥ बीस (२० ) का 'माणवक' ॥ १५ ॥ और उससे आधा अर्थान् दस (१०) का 'अर्धमाणवक' नाम कहा जाताहै ॥ १६ ॥ एत एव मणिमध्यास्तन्माणयका भवन्ति ॥ १७ ॥ एक- शीर्पकः शुद्धो हारः॥१८॥ इन्ही इन्द्रच्छन्द आदिके बीच में यदि मणि लगादी जावे, तो उसका 'इन्द्रच्छन्दमाणयक' आदि नाम होजाता है। इसी तरह 'विजयच्छन्दमाणवक' भादि समझना चाहिये ॥ १७ ॥ यदि इन्वच्छन्द आदि किसी हारमें शीर्षक नामक यष्टिके दंगमेही सम्पूर्ण मोती पिरोये हुए होवें तो यह इन्दर उन्द और शीर्षकको जोड़कर शुद्धहार कदाता है, अर्थात् उसका नाम 'इन्द्रच्छन्दशीर्षक शुद्धहार' यह होता है । इपीप्रकार यदि विजयच्छन्दमें सम्पूर्ण मोती शीर्षक समान पिरोये हुए होंगे, तो उसे 'विजयच्छन्दशीर्षकगुवहार' कहा जायगा। इसीतरह आगेभी 'देवच्छन्दशीर्षकशुदहार' आदि नाम समझने चाहिये ॥१८॥ तद्वच्छेपाः ॥ १९॥ ऊपरके सूत्र (१८) में केवल शीपंक नामक यष्टिको कर कहागया। इसीतरह उपशीर्षक आदि यष्टियोंके सम्बन्ध भी समझना चाहिये । अर्थात् इन्द्रध्वन्द आदिम यदि उपशीर्षक समाग मोती पिरोये हुप होयें, तो यह 'इन्द्रच्छन्दोपशीर्षक शुन्छहार' कहलाधेगा । इसीतरह विजयछन्दोपशीर्षक शुद्ध- हार, देवच्छन्दोपशीर्षक शुद्धहार, अर्धारोपशीर्षक गुवहार आदि नाम समागे चाहिये । इसीतरह यदि एक प्रकारकही समान सम्पूर्ण मोती पिरोये होवे,
{२ अधिक
(१५८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
सो इन्द्रच्छन्दरकाण्डक शुद्धहार भादि नाम होग' हमके अमुनाही एकही
अवघाटक या तालप्रतिबन्ध यष्टके समान मोती पिरोये जानेर नामाकी
करना करनी चाहिये । अर्थात् इन्द्रमाययाटक रहार भार हन्द्राउन
तरह शतिशम्शुद्धहार आदि नाग समनलेने चाहिये ॥ १९॥
मणिमध्यो ऽर्धमाणवकः ॥२०॥
यदि इन शुद्धहारोंके वीचम मणि लगादी जाये, तो यह बजाय सुद्ध-
हारके अर्धमाणवक कहाता है, उसका नाम इन्द्रच्चन्दशोपकार्धमाणवक होगा।
इसीतरह उपशीर्षक आदिको लेकर भी नाम समझलेने चाहिये । ( पहिले जो
माणवकको लेकर इन्द्रच्छन्दमाणवक आदि भेद बतलाये है, उनमें एक शीपंक
आदिका नियम नहीं है, ये सफीर्ण हैं शुद्ध नहीं, भयान् उनमे शर्षिक उपशी-
पंक प्रकाण्डक अदि हरतरहसे मोती पिरोयेजाकरही इन्द्रचन्द भादिको तैयार
करलिया जाता है, उनमें यदि धीचमें मणि डाल दी जावे तो यह इन्दरसम्म
माणवक भादि नामासे पुकारा जायगा । यदि शुद्ध अर्थात् जिसमें एक शीर्षक
आदिका नियम है, उसमें मोतियों के बीच में मणि लगादी जावे तो, चन
माणवक और न शुद्ध कहलायेगा, प्रत्युत उसमें शीर्षक आदिके साथही भध-
माया विशेषण लगेगा । उसका पूरा नाम इन्द्रच्छन्दपिकाधमाणवक,
इन्द्रच्छन्दोपशीर्षकाधमाशयक, इन्द्रच्छन्दप्रकाण्डकार्धमाणवक, इत्यादि रूपसे
कल्पना करना चाहिये । इसीतरह भागे विजयाउद भादिको लेकर विजयर.
न्दशीकाधमाणवक, विजयच्छन्दोपशीर्षकाधमाशयक भादि नाम समझलेने
चाहियें)॥२०॥
त्रिफलका फलकहारः पञ्चफलको वा ॥२१॥
यदि किमीमी मोतीकी मालाम सोनेके तीन या पांच दाने हगेहुए
होंगे, तो उसका नाम 'फर महार' होगा । (महामहोपा राय गणपति शास्त्रीने
२० और २१ दोनों स्नोको इकट्ठा कादिया है। और उसका अर्थ इसरकार
किया, अर्धमाण अधात् । यष्टिकी (जिलका कवन १३
सूत्र में होचुका है ) मालामें यदि सोने के तीन या पांच दाने हो तो उसे 'फल-
कहार' कहाजाता है। हमारे विचारमें यदि कौटल्यको अधमायाकाही विशेष
अवस्थामें 'फलाहार' नाम रखना था, तो २० वे सूनमें उसे 'मणिमध्य'
पर देने की कोई आवश्यकता न थी, क्योकि अर्धमारक होताही मणिमयदे,
उसका लक्षण १६ वे सूत्र में करदिया गया है, फिर मणिमध्य विसपग देना
व्यर्थ था । इसलिये ये दो सूत्र पृथक् २ ही दीक मलूम होते हैं। इनका अर्थ
ऊपर करदिया गया है ) ॥२१॥
१२ वध्या यध्यक्षन्मचार (१५९) सूत्रमेकावली शुद्धा ॥ २२ ॥ सैव मणिमध्या यष्टिः ॥२३॥ हेममाणचित्रा रतावली ॥ २४ ॥ हेममणिमुक्तान्तरो ऽपवर्तकः ॥ २५ ॥ सुवर्णसूत्रान्तरं सोपानकम् ॥ २६ ॥ शुद्ध अर्थात् एकशीपंक आदि क्रमसे यनीहुई एकावली अर्थात् एकही लरकी मालाको 'सूत्र' कहाजाता है ॥२२॥ यदि उसहोके बीच मणि गादी जावे, तो उसका नाम 'यष्टि' होजायगा ॥ २३ ॥ सोने के दाने और मणियाँसे अनीहुई चित्र मालाका नाम 'पलावली' दोगा ॥ २४ ॥ यदि सोनके दाने, मणि और माती ये एक २ के याद सिलसिलवार गुथे हुए हौवे, तो उसका नाम 'अपवर्तक होगा ॥ २५॥ अदि बीच में मणि लगीहुई न होये, मोतियों के साथ केवल सोनमी दाने लगे होयें, तो उसका नाम 'सोपानक' होता है ॥ २६ ॥ मणिमध्यं वा मणिसोपानकम् ॥२७॥ तेन शिरोहस्तपादक- टीकलायजालकविकल्पा व्याख्याताः ।। २८ ।। यदि बीच मणि लगादी जाये, तो उस 'मणिसोपानक' कहते हैं. ॥२०॥ इससे सिर हाथ पैर भार कमरकी, भिग्न २ प्रकारकी मालाओंका व्याख्यान समझलेना चाहिये । इन्हीक अनुपार उनकी भी कल्पना करलेनी चाहिये । यदातक मातियोंके सम्बन्धमें निरूपण कियागया। अब माणके सम्बन्धम कहा जायगा॥ २८ ॥ मणिः कौटो मालेयक पारममुद्रकश्च ॥ २९ ॥ मणिया के तीन मुख्य उत्पत्ति स्थान है, इसलिए मणि तीन प्रकारची कहोजाती है। कार ( मल्यसागरके समीप कोटि नामक स्थान है, वापर उत्पन्न होनेवाली ) मालयक मलय देशके एक हिरसमें कर्णीयन नामक पर्वत माला है, वहांपर उत्पन्न होनेपाली मणि ) और पारसमुद्रक ( समुदके पार सिंहल आदि द्वीपोम टत्पन्न होनेवाली मणि ) ये मणियोंके तीन भेद ॥२९॥ सौगन्धिका पनरागोऽनवद्यरागः पारिजात पुटपको बाल- सूर्यकः ॥३०॥ मणियों में पांच प्रकारका माणिस्य समझा जाता है,-सागन्धिक (मोगान्त्रिक नामक कमलके समान रंगवाला; यह कमल साधारणतया सायंकाल के समय खिलता दे इपका रंग कुल नौलेपनको लिपहुए लाल होता है), पद्मराग (पमके समान संगवाला ), अनयचराग भमवय केसरको कहते है, केसरकी तरह पाला ), पारिजातपुषक (पारिभासके ममान रंगशाला), नपा [२ अधि: कौटलीय अर्थशास्त्र बालसूर्यक ( उदय होते हुए सूर्यके समान अग्ण रगवाला ) ये पांच भेद माणिक है॥३०॥ वैडूर्य उत्पलपर्णः शिरीपपुष्पक उदकवर्णों व रागः शुकप- चवर्णः पुष्यरागो गोमूत्रको गोमेदकः ॥३१॥ वैदूर्य जातिकी मणि भाट प्रकारकी होती है,-उरपलवर्ण । लाल कमलके समान रंगवाली), शिरीपपुष्पक (सिरसके फूरके रगवासी ), उदक वर्ण (जलके समान स्वच्छ रगवाली), वंशराग (बांसके पत्तेके समान रंग वाली), शुरूपप्रवर्ग (तोतेके पखोंकी तरह हरे रगवाली ), पुष्पराग (इलदीके समान पीले रंगवाली), गोमूत्रक ( गोमनके समान रगवाली), गोमेदक ( गोरोचन के समान रगवाली) ये आठ भेद पैदूर्य जातिकी मणिके हैं ॥३॥ नीलारलीय इन्द्रनीलः कलायपुप्पको महानीलो जाम्बयामो जीमूतप्रभो नन्दकः सरन्मध्य ॥ ३२ ॥ इन्द्रनील जातिकी मणिभी माठ प्रकारको होती है,-नीलावलीय (रंग सफेद होनेपरभी जिस मणिमें नीले रंगकी धाराये हों), इन्द्रनील (मोरके पेंचकी तरह नीले रंगवाली ), करायपुष्पक ( कलाय मटरका कहते है, मटरके फूलके समान रंगवाली), महानीर (भोरके समान गहरे काले रगकी), जाम्बयाम (जामुनके समान रगकी), जीमूनमन 'मेघके समान वर्णकी ), नन्दक ( भीतरसे सफेद और बाहरसे नाला ), तथा सवनमध्य (जिसमसे जल प्रवाहक समान किरण यहती हॉ), भाठ भेद नीलम मणिके ई॥३२॥ शुद्धस्फटिकः मुलाटवर्ण शीतवृष्टिः सूर्यकान्तश्चेति मणयः स्फटिक (विलार ) जातिकी मणि चार प्रकार होता है, शुद्धस्फटिक (भस्यन्त शुरु वर्णकी ), मूलाटवर्ण (मक्खन निकाले हुए दही अर्थात् तक्र- मटाफ समान रंगवाली), शोष्टि (चन्द्रकान्त चन्द्रम की किरणोंके स्पर्श पिघल जानेवारी), और सूर्यकाना ( सूर्यको किरणों का स्पर्श होनेपर भाग उगलनेवाली मणि) ये धार भेद स्फटिक मणिके हैं। यहांतकभिक्ष र मणियोंके भेदोका निरूपण कियागया ॥ ३३ ॥ पडश्चतुरश्री वृत्तो वा तीव्ररागसंस्थानवानच्छः स्निग्धो गुरुर्चिष्मानन्तर्गतप्रमः प्रभानुलेपी चेति मणिगुणाः ।। ३४ ।।
११ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार अब मणिके गुणोंका कथन करते हैं,-पडश्न ( छः कोनोंयाली), चतु- रश्र (चार फोनीयाली), वृत्त (गोलाकार ), गहरे रंगवाला अथवा बहुत धमकदार, जिसकी बनावट भूपण आदिम लगाने के योग्य हो, निर्मल, चिकमा, भारी, दीप्सियाला, याचमही चचल प्रभावाला, तथा जो अपनी प्रभासे पास रक्पी हुई वस्तुको प्रभायुक्त या प्रकाशित करनेवाला हो; ये ग्यारह प्रकारके गुण मणियम समझे जाते है ॥ ३ ॥ मन्दरागप्रमः सशर्करः पुष्पच्छिद्रः खण्डो दुर्विद्धो लेखाकीर्ण इति दोपाः ॥ ३५ निम्न लिखित सात प्रकारके दोपभी मणियों में होते हैं,-हलके रंगवाली, इल की कान्तिवाली, सरखरी (जिमके ऊपर टोटे २ दानेसे उठे हुए हॉ), जिसमें छोटे २ छेद या, कटीहुई हो, भनुपयुक्त स्थानपर या मौके जिसमें छेद होगया हो, तया निरा प्रकारकी रेखाओसे घिरीहुई हो; ये सात तरह के दोष मणियों में होते हैं ॥ ३५॥ विमलकः सस्यको जनमूलकः पित्तकः सुलभको लोहिताक्षी मृगाश्मको ज्योतीरसको मैलेयक आहिच्छत्रकः कूपः प्रतिकूर्पः सुगन्धिकूर्पः क्षीरपकः शुक्तिचूर्णकः शिलाप्रवालका पुलका शुक्र- पुलक इत्यन्तरजातयः ॥ ३६॥ इन मणियोकी अठारह अवान्तर जातियां और है,-विमलक ( सफेद और हरे रगसे मिश्रित ), सस्यक ( नीला ), अञ्जनमूलक ( नीला और काला मिश्रित), पित्तक (गाके पिताके समान रंगवाला), सुलभक (सफेद) लोहिताक्ष (किनारोंकी भोर लाल रंगवाला और धीचमें काला ), मृगाश्मक (सफेर भौर काला मिलाहुआ ), किमी २ पुस्तक 'लोहिताक्ष' के स्थानपर 'लोहितक और 'भगाश्मक' के स्थानपर 'अमृतांशुक' पाठ है। लोहितकका अर्थ लाल और अमृतांशुकका जी माइल सफ़ेद करना चाहिये ), ज्योतीरसक ( सफ़ेद और लाल मिलाहुआ), मैलेयफ (शिंगरफ़के समान रंगवाला), साहिन्छ (फोके रंगवाला), कूर्प (सुरदरा, जिसके ऊपर छोटी २ बूंदसी उठीहुई हो), प्रतिकूप (दागो, जिसपर धब्बे लगेहुए हो), सुगन्धिर्प (मूंगके समान वर्णमाला ), क्षीरपक (दूधके समान वर्णवाला), शुक्तिचूर्णक ( चित्रित, मिलेहुए कई रंगवाला ), शिलाप्रवालक (मवालक, अथात् मूंगेके समान रंगवाला), पुलक (जो बीचमे काला हो ), तथा गुरुपुला (जो यीचमसे सफेद हो) ये मणियों के मठारह अवान्तर भेद है ॥ ३६॥ .
[२ अधि० -- (१६२) कौटलीय अर्थशास्त्र शेपाः काचमणयः ॥ ३७ ।। इनके अतिरिक्त जो और मणि हो, उन्हें फाघमणि अधात् काचके समान अधम जातिकीही समझना चाहिये, वे निकृष्ट मणि होती हैं॥३७॥ समाराप्दूक मध्यमराष्ट्रकं काश्मीरराप्दकं श्रीकटनकं मणि- मन्तकमिन्द्रवानकं च वज्रम् ॥ ३८ ॥ अस धनमणि भर्थात् ; हीरेका निरूपण कियाजाता है,- सभाराष्ट्रक (विदर्भ-वरार देशमै उत्पन्न होनेवाला), मध्यमरास्ट्रक ( फौसल देशमै उत्पन्न होनेवाला), कास्तीरराष्ट्रक ( कास्तीरराष्ट्र में पैदा होनेवाला), (किसी . पुस्तकमें 'कास्तीरराष्ट्र' के स्थानपर 'काश्मीरराष्ट्रम' पाठ है। अर्थ स्पष्ट है), श्रीकटनक ( श्रीकटननामक पर्वतपर उत्पक्ष होनेघाला ), मणिमन्तक (उत्साकी मोरके मणिमन्तक नामक पर्यसपर उपस होनेवाला) समा इन्द्रयानक ( काला देशम उत्पन्न होनेवाला), हन निर्दिष्ट छ स्थानॉस उत्पस होने के कारण छ प्रकारका हीरा समझना चाहिये । वस्तुत हीरेकी उत्पत्तिके औरभी अनेक स्थान हैं, इसलिये इन्हें दिमन मानही समझना चाहिये ॥ ३८॥ खनिः स्रोतः प्रकीर्णकं च योनयः ॥ ३९ ॥ खान, कोई २ विशेष जलप्रयाह और हाथीदांतकी जड़ भादि, ये होरके उत्पत्ति स्थान समझने चाहिये । (खान और जल प्रवाहके अतिरिक्त जांकहीसे भी होरा पैदा हो, उसका नाम प्रकीर्णक होगा)॥३९॥ मार्जाराक्षकं च शिरीपपुष्पकं गोमूत्रकं गोमेदकं शुद्धस्फ. टिकं मूलाटीपुष्पकपर्ण मणिवर्णानामन्यतमवर्णमिति पजवर्णा ॥४०॥ अथ हीरके रगोंको यतलाते हैं,-माजीराक्षक (मार्जार-बिलावकी मासके समान ), शिरीपपुष्पक (सिरसके पूलके समान), गोमूत्रक (गो मूग्रके समान), गोमेदक (गोरोचनाके समान ), शुबस्फटिक (भरयस्त श्रेतवर्ण स्फटिकके समन), मूलाटीपुष्पकवर्ण ( मूलाटीके फूलके समान), सपा मणियोंके पतरायेहुए रगॉमसे किसीके समान रगवारा हीरा होता है। पही होरेक रंग होते हैं." स्थूलं गुरु प्रहारसह समकोटिकं भाजनलेपितं कुभ्रामि भ्राजिष्णु च प्रशस्तम् ॥४१॥ मोटा, पिकना, भारी सोटको सहने वारा, परापर कोनोवाला, पानीसे मोहुए पीतल भादिक पतनमें हीरा पालकर उस पतनकै हिलाये जाने . ११ अभ्या०] अध्यक्ष प्रचार वर्तनमें लकीर डाळदेनेवाला, तककी तरह घूमनेवाला (तकमा चर्खा में लगी हुई उस लोहेकी शलाकाका नाम है, जिसपर सूत लपेटा जाता है), और चमकदार हीरा प्रशस्त अथात् उत्तम समझा जाता है ॥ १॥ नष्टकोणं निरश्रि पार्थापवृसं चाप्रश्नस्तम् ॥ ४२ ॥ मष्टकोग अर्थात् शिसर रहित (कोनों से रहित ), अटि रहित (तीक्ष्ण कोने से रहित), तथा एक भोर को अधिक निकले हुए कोनोंवाला हीरा अप्रशस्त भार दूपित समझा जाता है ॥ ४२ ॥ प्रवालकमालकन्दकं चैवर्णिकं च रस पझरागं च करटं गर्मिणिकायज मिति ॥ ४३ ॥ प्रवाल अर्थात् गूंगा के दो उत्पत्तिस्थान हैं, इसलिये दो प्रकारका मूंगा समझना चाहिये,-आलकन्दक (अलकन्द नामका, म्लेच्छ देशोंमें समुद्रके किनारे एक स्थान है, यहाँपर उत्पस होनेवाला) 'वैयर्णिक (यूनान देसके समीप विवर्ण नामक समुद्रका एक भाग है, वापर उत्पन्न होनेवाला')। लाल तथा पनके समान रंग, यह दो प्रकारका मूंगेका रंग होता है। यह की देका खायाहुमा न होना चाहिये, तथा यीचमेसे मोटा या उठाहुआ न होना चाहिये, भयात् इन दो प्रकारके दोषोंसे रहित होना चाहिये । यहांतक रतोंकी परीक्षा सम्बन्ध में निरूपण कियागया ।भप इसके आगे चन्दन आदि सार पदार्थों का निरूपण किया जायगा ॥२५॥ चन्दनं सातनं रक्तं भूमिगन्धि ॥ ४४ ॥ गोशीर्षकं काल- तानं मत्स्यगन्धि ॥ ४५ ॥ हरिचन्दनं शुकपत्रवर्णमाम्रगन्धि ॥४६॥ तार्णसं च ॥४७॥ चन्दनके सातन आदि सोलह सम्पत्तिके स्थान है, साल भादि नौ नंग, और भूमिगन्ध भादि छः प्रकारके गन्ध है, चन्दनम गुण ग्यारह होते हैं, इन्हीं सब यासोंका यथानाम निरूपण कियाजाता है-सातन देशम उत्पन्न होनेवाला चन्दन लाल रंगका तथा भूमिके गंध समान गंधयाला होता है, (भूमिगन्धि भूमिपर पहिलेही जल डालनेपर जैसा गन्ध मालूम होता है, उसके समान) ॥४३॥ गोशीपं देशमें उपत होनेवाला चन्दन कुछ काला और लाल मिले हुए रंगका होता है, तथा इसका गन्ध, मछलीके गन्धके समान होता है। (भहस्वामीने 'मरस्पगन्धि' शनका अर्थ 'लाल करोंदेके गन्धके समान गन्धवाला' किया है)॥ ५५ ॥ हरिचन्दन अर्थात् हरि नामक देशमें उत्सम होनेवाला चन्दन, तोतेके पंरके समान हरे रंगका, भामो गंधके समान गंध
(१६) कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधिक
पाला होता है ॥ ४६॥ और तृणसा नामक भदौके किनारेपर होनेवाला
चन्दनभी हरिचन्दनके समानही होता है ॥ ४ ॥
ग्रामेरुकं रकं रक्तकालं वा वस्तमूत्रगन्धि ।। ४८ ॥ दैव-
सभेयं रक्तं पद्मगन्धि ॥ ४९ जायकं च ॥ ५० ॥
प्रामेरु प्रदेशमें होनेवाला चन्दन लाल रंगका अथवा लाल और काले
मिले हुए रंगका होता है। इसका गन्ध, बकरके पेशावके समान होता है।
(किसी २ व्याख्याकारने 'वस्त' शब्दका अर्थ कस्तूरीहिरणभी किया है, सय
इसके पेशायके समान गन्ध समझना चाहिये ॥४८॥ देवसभा नामक स्थान
में होनेवाला चन्दन लाल रंगका, तथा परके समान गन्धवाला होता हैं ॥४९॥
तथा जावक देशमें उत्पन्न होनेवाला चन्दनभी लाल रंग तथा पनके समान
गन्धवाला होता है ॥५०॥
जोङ्गक रक्तं रक्तकालं वा स्निग्धम् ॥५१ ।। तौरूपं च
।। ५२ ॥ मालेयकं पाण्डुरक्तम् ॥ ५३ ।। कुचन्दनं कालवर्णक
गोमूत्रगन्धि ॥ ५४॥
जॉग देशमें उत्पन्न होनेवाला चन्दन लाल रंगका अथवा लाल और
काले मिलेहुए रंगका तथा चिकना होता है। इसका गन्ध पभके समानही
होता है ॥५१॥ तुरूप देवाका चन्दनभी जोङ्गक ( जोंग देशके चन्दन ) के
सर्वथा समानही होता है ॥५२॥ माला स्थानके चन्दनका रंग कुछ पीला
और लाल मिलाहुभा होता है । इसका गन्धभी पनके समान समझना चाहिये
॥५३॥ कुचन्दन काले रंगका तथा गोमूत्रके समान गम्धघाला होता है।
(किसी २ पाण्याकारने गोमून शब्दका अर्थ नीला कमलभी किया है ॥५४॥
कालपर्वतकं रूक्षमगुरुकालं रक्तं रक्तकालं वा ॥ ५५ ॥
कोशकारपर्वतकं कालं कालचित्रं वा ॥ ५६ ॥
कालपर्वत देशमें पैदा होनेवाला चन्दन रूक्ष (अर्थात् कुछ रूखा सा=
खरखरा), तथा भगरके समान काला, अथवा लाल या लाल और काले
मिलेहुए रंगका होता है। इसका गन्ध गोमूत्रके समानही समझना चाहिये ।
(५४ भार ५५ मूल सूत्रों के स्थानपर किसी २ पुस्तक में "कुचन्दनं कालरूक्ष.
मगरकालं रक्त रक्तकालं वा । कालपर्वतकमनवद्यवर्ग वा" ऐसा पाठ है। इस
पाठमें कुछ शब्द इधर उधर होगये हैं, गन्ध पतलाने वाला कोई शब्द नहीं
भाया, जो अवश्य भाना चाहिये; ओर कोई विशेष अध-भेद नहीं है। अन-
पचवर्ण' शब्दका अर्थ केसरके समान रंग वाला करना चाहिए)॥ ५५ ॥ कोश.
कारपर्वत मामके देश में होनेवाला पन्दन, कासा भएदाचितकबरा होता है ॥५६॥
११ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार शीतोदकीयं पद्मामं कालस्निग्धं वा ।। ५७ ॥ नागपर्वत रुक्षं शैवलवर्ण वा ॥ ५८ ॥ शाकलं कपिलमिति ।। ५९ ॥ शीतोदक देश में होनेवाला चन्दन पनके समान रंगका अथवा काला तथा जिग्ध होता है ॥ ५७ ॥ नागपवन प्रदेशमें उत्पन्न हुभा २ चन्दा रूखा और जलकी काई या सिरवालके समान रंगवाला होता है ॥ ५० ॥ शाकल देशमें उत्पन्न होनेवाला चन्दन कपिल (कुछ पीला और कुछ लाल मिलेहुए) रंगका होता है। इन ( ५६ वे सूत्र से यहांतक यताए हुए सबही ) चपनाका गन्ध गोमूतके समान ही समझाना चाहिये ॥ ५९॥ लघु सिन्धमश्यानं सर्पिलहलेपि गन्धसुखं त्वगनुसार्यनुल- णमविराग्युष्णसहं दाहग्राहि सुखस्पर्शनामिति चन्दनगुणाः ॥६॥ चन्दनमें निम्नलिखित ये ग्यारह गुण होते हैं, -लघु ( हलका होना ), घिकगा, यहुत दिनमें सूखनेवाला, घृतके समान देदमें एगने वाला, मनोहर गन्धवाला, सालके भीतर प्रविष्ट होकर सुरस देनेवाला, अनुरुपण अर्थात् फटाहुआ सा न दीसनेवाला, शरीरपर लेप करलेनपर जिसके वर्ण या गन्धमें कोई भी विकार न हो. गरमी को सहन करनेवाला (अर्थात् देहपर लेप करने से देहकी गरमीको शान्त करने वाला, सन्तापको हरण करने वाला, तथा सश करनेमें भस्यन्त सुसकर प्रतीत होना, ये ग्यारह चन्दन के गुण होते हैं ॥६॥ अगुरु जोङ्गक कालं कालचित्रं मण्डलचित्रं वा ।। ६१॥ श्यामं दोङ्गकम् ।। ६२ ।। पारसमुद्रकं चित्ररूपमुशीरगन्धि नव- मालिकागन्धि चेति ॥ ६३ ॥ अब आगरके विषय में निरूपण किया जायगा -जोहक नामक अगर तीन तरह का होता है, काला, चितकयरा (जिसमें सफेद और काले रंगकी रेखायें सी हों), तथा जिसमें काली और सफेद यूंदसी पट्टी हो । अर्थात् सफेद भौर काले दागों से युक्त हो ॥६॥ ॥ इसी तरह दोगक नाम का भर काला होता है। यह दोनों ही जोङ्गक और दोग र आमाम देशमें उत्पन्न होते है ।। ६२ । समुद्र के पारका अधात् सिंहल द्वीप आदिमें उत्पन्न होने वाला भगर चिन्न रूपका होता है, इनका गन्ध उौर (स) तथा नई चमेलीके समान होता है। ६३ ॥ गुरु स्निग्ध पेशलगन्धि निर्हार्यग्निमहमसंप्लुतधूमं समगन्धं दिमसहमिस्पगुरुगुणाः ।। ६४ ।। -
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधि०
भारी, चिकना, मनोहर गन्धवाला, दूर तक फल जाने पाली गन्धसे
युक्त, अग्नि को सहन करने वाला, जिसका धुओं म्याकुलसा उत्पस करने वाला
न हो, जलाते समय आगे पीछे एक जैसी गन्ध का निकलना, तथा वस्त्र आदि
पूल देनेपर भी गन्ध का उसी तरह बने रहना, ये भगरकै गुण होते हैं ॥ ६ ॥
तैलपर्णिकमशोकग्रामिकं मांसवर्ण पद्मगन्धि ॥६५।। जोङ्गकं
रक्तपीतकमुत्पलगन्धि गोमूत्रगन्धि वा ॥ ६६ ॥
अशोकमाम (आसाम ) में होने पाला तैलपर्णिक (एक प्रकारका
चन्दन) मासके समान वर्णवाला तथा पत्र के समान गन्ध वाला होता है
(व्याख्याकार भट्ट स्वामीने, 'मांयवर्ण' शब्दका अर्थ 'हरिणकी मांसपेशी
के वर्णके समाना यह किया है) ॥६५॥ जोङ्गक ( अर्थात् जोम नामक,
आसाम के एक आवान्तर प्रदेश में उत्पन्न होने वाला) तेलपणिक लाल तथा
पीले मिले हुए से रग का होता है, इसका गन्ध कमल के समान भयवा गो.
भूयके समान होता है ।। ६६ ॥
ग्रामेरुकं स्निग्धं गोमूत्रगन्धि ॥ ६७ ॥ सौवर्णकुड्यकं रक्त-
पीतं मातुलुङ्गगन्धि ॥ ६८॥ पूर्णकद्वीपकं पद्मगन्धि नवनीत-
गन्धि वेति ॥ ६९ ॥
प्रामेरु प्रदेशमें होने वाला तैलपणिक चिकना तथा गोमूत्र के समान
गन्ध घाला होता है ॥ ६७ ॥ भासाम के सुवर्णकुख्य नामक स्थानमें होने
वाला तैलपणिक कुछ लाल और कुछ पीले मिले हुएसे रस का होता है, तथा
इसका गन्ध, मातुला (एक तरह का नीबू) के समान होता है ॥६॥
पूर्णक द्वीपमें उत्पन्न होने वाला तेलपर्णिक पम के समान अधया मरखनके
समान गन्ध वाला होता है।
भद्रश्रीय पारलौहित्यकं जातीवर्णम् ।। ७० ॥ आन्तरवत्य-
मुशीरवर्णम् ।। ७१ ॥ उभयं कुष्ठगन्धि चेति ॥ ७२ ॥
भधीय (एक प्रकारका पन्दन । केई २ व्याख्याकार इसको कपूर
भी कहते है) दो प्रकारका होता है, एक पारलौहित्यक और दूसरा भान्तर.
घरा, भासाम प्रान्त के साहित्य नामक नदके पार होने घाला पारलौहित्यक
काता है, इसका र घमेलीके फूल के समान होता है ।।... दूसर भारतर
वत्य भी आसाम की भतरवती नाके तरपर उत्पस होता है, तथा इसका
खसके रसके समान होता है 101॥ इन दोनों का ही गन्ध कुर (फूट-
औषधि का नाम है) के समान होता है ॥२॥
१९ मध्य अध्यक्ष-प्रचार (१६७) कालेयका स्वर्णभूमिजः स्निग्धपीतकः ॥ ७३ ।। औत्तरपर्य- तको रक्तपीतक इति साराः ।। ७४ ॥ पिण्डकाथधूमसहमविरागि योगानुविधायि च ॥ ७५ ॥ काले यक (दारु हल्दी या पीले चन्दन को कहते हैं ), स्वर्ण भूमि (स्थान विशेष) में उत्पन होने वाला, तथा चिकना और पोछे रह का होता ॥ ७३ ॥ उसर पर्वत अर्थात् हिमालय पर होने वाला कालेयक लाल और पीले मिले हुए से रन का होता है। यहां तक सार वस्तुओंकी परीक्षा का कथन किया गया ॥ ७४ ॥ सैलपर्णिक, भद्रश्रीय और कालेयक, इन सीनोंके गुण निम्नलिखित हैं:-पीसने पर, पकाने पर, तथा आगमें जलाने पर, गन्धमें किसी प्रकारका विकार न होना, तथा दूसरी वस्तु के साथ मिलाने पर और देरतक रक्ख रहने पर भी इनके गन्ध आदिमें किसी तरहका भेद न आना।। ७५॥ चन्दनागरुखच्च तेपां गुणाः ॥ ७६ ॥ कान्तनायकं प्रेयक चोत्तरपर्वतकं चर्म ॥ ७७ ॥ इसके अतिरिक्त, चन्दन और भगरके जो गुण, पीछ बताये गये हैं, यह भी इसमें समझने चाहये ॥ ७६ ॥ अब फल्गु पदार्थों का निरूपण किया जाता है। उनमे सयमे प्रथम चमड़ा है, चमड़ा पन्द्रह तरह की जातियोमें विमत है । सी १००)वे सूत्र तक इन्हीका क्रमशः वर्णन किया जायगा। उनमें से दो भेद यह है-कान्तनायक और प्रेयक, कान्तनाव और प्रैय देशोंमें जो चमड़ा पैदा होता है, उसोके ये नाम हैं, यह दोनों प्रकारका घमड़ा भौत्तर- पर्वतक अधात् हिमालय में उत्पन हुभा २ कहा जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि ये दोनो हो देश हिमालय के ही अवान्तर प्रदेश है ॥ ४७ ॥ कान्तनापर्क मयूरीवाभम् ७८ ।। प्रेयकं नीलपति श्वेतं लेखि विन्दुचित्रम् ॥ ७९ ॥ तदुभयमष्टाङ्गुलायामम् ।। ८० ॥ इन दोनों प्रकार के चमडों में से पहिला कातनायक, मोरकी गर्दनके समान काम्ति याला होता है । ७ ॥ और दूसरा प्रेयक नीले पीले रमका मिला हुभा तथा सफेन रङ्गका, रेखाओं वाला या बूंदोंसे विचिनसा होता है। ॥ ७९ ॥ यह दोनों ही प्रकारका कान्तमावा और प्रेमक नामक, चमड़ा भाठ अंगुल विस्तार पाला होता है। it' ty, बोटलीय अर्थशास्त्र २ मधिल विसी महापिसी च द्वादशगामीये ॥ ८१॥ अव्यक्तरूपा दुहिलितिका चिना वा विसी ।। ८२ ॥ परुपा श्वेतप्राया महा- विसी ॥ ८३ ॥ द्वादशाङ्गुलायाममुभयम् ॥ ८४ ॥ द्वादश ग्राम । हिमालयमें म्लेच्छा के यारह गाव प्रसिद्ध है, उन) में उत्पस होने घाला चमडा यिसी और महायिसी नामसे कहा जाता है॥८॥ इन दोनोमें से जिसका रूप ( बहुत रोंके मिलने के कारण) स्पष्टतया प्रतीत म हो, यालों याला तथा चितकबरा सा हो, यह बिसी होता है। ८२ ॥ कठोर तथा प्राय सफेद रङ्गका घमा महाविसी कहाता है ॥ ८॥ इन दोनों का विस्तार बारह २ अगुल का माना गया है ॥ ८४ ॥ श्यामिका कालिका कदली चन्द्रोत्तरा शाकुला चारोहजाः ॥ ८५॥ कपिला विन्दुचिना वा श्यामिका ॥८५॥ कालिका कपिला कपोतवर्णा वा ॥ ८७ ।। तदुभयमष्टामुलायामम् ॥८८॥ हिमालयके आरोह नामक स्थानमें उस होनेशला चहा पांच प्रकारका होता है -श्यामिका, कारिका, कारी, चन्द्रौत्तरा भार शाकुला ॥ ८५॥ कपिर रग ( सम्या समय जना पश्चिमकी और रंग दिखाई देता ), तथा यूदासे चितकयरेसे रगका चमडा 'श्यामिका' कहाता है ॥८६॥ 'कारिका' नामका धमदाभी कपिल रंगका अथया क्यूतरके समान रगका होता है ॥४७॥ ये दोनों प्रकारके वनडे साठ भगुल विस्तारके समझ जाते हैं।८८॥ पता कदली हस्तायता ।। ८९ ॥ सैव चन्द्रचित्रा चन्द्रो- सरा ॥ ९० ॥ कदलीनिभागा शाकुला कोठमण्डलचित्रा कृत- फर्णिकाजिनचिना चेति ॥ ९१ ॥ 'कदली' नामका घमडा इटोर खुरदरा होता है, इसकी सम्बाई एक हाय समझी जाती है ॥ ८९ ॥ यह कदली नामक चमड़ाही यदि चांदके समान दोसे युक्त होचे, तो उसे 'चन्द्रौत्तरा' कहा जाता है । इन दोनोंका रग का. लिकाके समानही समझना चाहिये ॥ ९० ॥ कदलीसे तीन गुना बड़ा ( अर्थात् सीन हाथका) अथवा कदलीका तीसरा हिस्सा (अर्थात् आठ भगुल परिमाण फा) "शाला' नामक घमदा होता है, यह हाल धन्चासे युक्त होता है, तथा इसमें स्वभावत ही कुछ गांठसी पड़ी होती है ॥ ९ ॥ सामूरं चीनसी सामूली च पाहवेयाः ॥ ९२ ॥ पत्रिंशद- मुलमञ्जनवर्ण सामूम् ।। ९३ ॥ चीनसी रक्तकाली पाण्डुकाली या ।। ९४ ।। सामूली गोधूमवर्णेति ।। ९५ ॥
१९ अध्या.] अध्यक्ष प्रचार हिमालयके वाल्हय नामक प्रदेशमें तीन प्रकारका चमड़ा होता है, सामूर, चीनसी और सामूली ॥ १३॥ छत्तीस अंगुस परिमाण वाला तथा अञ्जनके समान काले रंगका चमड़ा 'सामूर पहाता है ॥ १६ ॥ लाल काले अथवा पोल और काले मिलहुए रंगका चमड़ा 'चीनमी' होता है ।। ९४ ॥ गहुए रंगका चमड़ा 'सामूली' कहाता है। इन दोनोंका परिमाण सामूरके समान छत्तीसं अंगुल हो समझना चाहिये ॥ ९५ ॥ सातिना नलतूला वृत्तपुच्छा चौद्राः ॥९६ ॥ सातिना कृष्णा ॥ ९७ ॥ नलतूला नलतूलवर्णा ॥९८ ॥ कपिला धृत्त- पुच्छा च ॥ ९९ ॥ इति चर्मजातयः ॥ १०० ॥ चर्मणां मृदु स्निग्धं बहुलरोम च श्रेष्टम् ।। १०१॥ उद नामके जलचर प्राणीको साल तीन प्रकारकी होती है, सातिना, नलतूला और वृत्तपुच्चा ॥ १६ ॥ इनमेसे 'सातिना' खाल काले रंगकी होती है ॥ ९७ ॥ नरसलकी बालके समान सफेद रंगकी खाल 'मलतूला' कहाती है ॥ २८ ॥ तथा 'वृत्तपुछा' नामकी खाल कपिल (लाल और पीले मिलहुएमे) रंगकी होती है ॥ ९९ ॥ यहांतक चमड़ेकी मित्र २ जातियोंका निरूपण किया गया ॥ १०॥ चम'मसे मुलायम चिकना तथा अधिक बाली बाला चमड़ा उत्तम समझा जाता है॥१०॥ शुद्धं शुद्धरक्तं पक्षरक्तं चाविकम् ॥ १०२ ।। खचितं वान- चित्रं खण्डसङ्घात्यं तन्तुविच्छिन्नं च ॥ १०३ ॥ कम्बलः कौचपकः कुलमितिका सौमितिका तुरगास्तरणं वर्णकं तालच्छक वारवाणः परिस्तोमः समन्तभद्रकं चाविकम् ॥ १०४॥ भेड़की ऊनसे बुनेहुए कपडे प्रायः, सफेद, लाल, और कुछ लाल रंगके ( अर्थात् जिनमें कुछ तन्तु लाल रंगके हो, और कुछ उनके साथ अन्य किसी रंगके मिल हो होते हैं ।। १०२ ॥ ये कपड़े बनायटके मेदस चार प्रकारके होते हैं,-स्वपित (जिनपर कसीदेका काम कियाहुआ हो), वानचित्र (धुना- पटमही जिनमें सरह २ के फूल वगैरह डालदिये गये हो), सण्डसंघारय ( तरह की बुनावटके छोटे २ टुकड़ाको जोड़कर जो कपड़ा बनाया गया हो) और तन्तुविच्छिम (पुननेके समय कुछ तन्तुओको छोड़कर जालीकी तरह घुनाहुआ कपा), ॥ १०३ ॥ बनकर तैयार हुए २ उनके कपड़ों साधारण- तपा दस भेद है। कम्मल, फौधपक अथवा के चलक (जंगलमे कामं आने पाला शिरस्त्राण) कुलर्मितिका अधया कलमितिका (हायीके ऊपर दालने.
1 (१७०) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक घाला इल, अथवा हाधीपर अग्यारी रखते समय उसके नीचे पीठपर विद्यानेका कर ), सौमितिका ( भावारीके उपर दालनेका काले रंगका कपड़ा), सुरगास्तरण (घोडेकी पीठपर डालनेका कपड़ा), वर्णक (रंगामा कम्मल), तलिच्छक (यहभी एक तरहका कम्इल होता है, जो विस्तरपर नीचे विछानेके काममें भाता है) धारवाण (कोट कुत्ता, या चोला भादि) परि. स्तोम (धारीदार इस प्रकारका पनाहुमा कम्पल जो कुछ, बनावटकी विशेषता के कारण यहा सा मालूम पड़े, और समन्तभद्रक (धार खानेका कम्बल , ये सब कपड़े भेकी उनसे तैयार कियेहुए होते हैं ॥१०॥ पिच्छलमामिव च सूक्ष्मं मृदु च श्रेष्ठम् ॥ १०५ ॥ अष्ट- प्लोतिसंङ्घात्या कृष्णा भिङ्गिसी पर्पवारणमपसारक इति नेपाल कम् ॥१०६॥ चिकना, धमकदार, बारीक डोरेका, मुलायम कम्पल उत्तम समझा जाता है ॥ १.५ ॥ आठ टुकड़ोंको जोड़कर बनाई हुई, काले रंगकी 'भिगिसी' होती है, यह वर्षासे बचनेके फाममें लाई जाती है। इसी प्रकार के एक ही सीधे ( अयात् टुकडोंसे न यनेहुए ) कपड़ेका नाम 'अपतारक' है। यह कपड़े नेपाल देशमें बनाए जाते हैं॥१०६ ॥ संपुटिका चतुरधिका लम्बरा क्टवानकं प्रावरकः सत्तलि- केति मृगरोम ।। १०७ ॥ धः प्रकारका रुपमा मृगके बालों से बनाया जाता है,-संपुटिका (जांघिया, अथवा सुत्यन), चतुरधिका (किगारीसे रहित, तथा कोनोंमें ना अंगुल परिमाणमें बेल यूटोंसे युक्त), लम्परा (उपर पोरनेका पा),फट. धानक ( मोटे सूत अधीन होरेका बना हुभा कपड़ा), प्रापरक (ओढ़नेका कपड़ा, जिसके दोनों भौर किनारे हों), और सत्तालिका (नीचे यिद्यानेका कपड़ा), ये कपड़े मग अर्थात् भित्र २ जंगली जानवरों की उनसे पनाये जाते हैं10॥ वाङ्गकं श्वेतं निग्धं दुकूलं पौण्डूकं श्यामं मणिनिग्धं सौवर्णकुड्यकं सूर्यवर्णम् ॥ १०८ ॥ दुषल अर्थात् दुशाला, देश भेदसे तीन प्रकारका होता है,-वाहक, पौरम, और सौवर्णकुन्धक । इनमें से थाङ्गक मार चंगाममें बना हुभा इंसाठा सफेर तया चिकना होता है। पोषक अर्थात् पुष देशमें पनाया
११ अध्या०]
अध्यक्ष-प्रचार
(१७१)
हुआ दुशाला काला तथा मणिके समान स्निग्ध होता है, और सौवर्णकुख्यक
अर्थात् भासामके सुपर्णकुड्य नामक स्थानमें बनाया जानेवाला, सूर्यके समान
चमकते हुए रगका होता है ॥ १०८ ॥
मणिस्निग्धोदकवानं चतुरथवान च्यामिश्रवानं च ॥१०९॥
एतेषामेकांशुकमधद्वित्रिचतुरंशुकमिति ॥ ११ ॥ तेन काशिक
पौण्ड्रकं च क्षौमं व्याख्यातम् ॥ १११ ।।
इन सपही दुशालों की बुनावट तीन प्रकारकी हो सकती है,-१)
पहिले दुशारके साधन भूत तन्तु आदि द्रव्यों को जलसे भिगोकर, फिर
उन्हे मणियन्धसे रगट कर तन्तुओं को दृढ यनाकर, फिर बुनावट करना, (२)
साने और पाने में दोनो ओरसे ही बरायर एकसे पारीक तन्तुओ से बुनावट
करना; (३) मिले हुए तन्तुओंसे (फपास, ऊन पा रेशम भादि भित २
जातियोंके, भधया सफेद नीले पोले भादि भिन्न २ गोके तन्तुओंसे) युनायट
करना ॥ ३०९॥ इन सब दुशालाम वही उत्तम होता है, जिसके ताने और
पानेमें एकसे ही सूक्ष्म तन्तु हों, इमसे ड्योढे दुगने तिगुने तथा चौगने मोटे
सन्तुओंके होनेपर, उसरोत्तर यह दुशाला कम कीमतका समझा जाता है।
यहांतक दुशालाका निरूपण किया गया ॥ १०॥ इससे काशी प्रान्त में तथा
पुण्डू देशमें उत्पन होने पाले अर्थात् मनाये जाने वाले शाम (रेशमी वस्त्रों)
का भी व्याख्यान समक्ष लेना चाहिये । (अर्थात् जो सूक्ष्म इकहरे तन्तु का
बना हो, वह उत्तम, भौर इसके आगे उत्तरोत्तर स्थूल सन्तुओंके होनेसे पह
कम कीमतका समझा जाता है) ॥११॥
मागधिका पौण्डूिका सौवर्णकुड्यका च पत्रोर्णाः ॥११२॥
नागवृक्षो लिकुचो वकुलो चटश्च योनयः ॥ ११३ ॥
मगध, पुष्क तथा सुवर्ण कुड्यक, इन तीन देशों में उत्पन्न होनेवाली
• पनोर्णा' होती है। ('पग्रोणी ' ऊनके सहश उन तन्तुओंका नाम है, जो
भिन्न ३ वृक्षोंके पत्तो भादि पर कीटोंके द्वारा उनकी लारसे बनाये जाते है।
किसी २ व्याख्याकारने इसका अर्थ पत्ते मादिके रेशे, जो उन्हें फूटकर निकाले
जाते हैं किया है)॥१२॥ यह पोणी निम्न लिसित चार वृक्षोंपर ही
प्राय अधिकतासे उत्पन होती है, नागवृक्ष (नागकेसर अथवा पानवेल भादि)
लिकुच ( पडहर) यकुल (मौलसरी ), तथा वट (ब) ॥ १३ ॥
पीतिका नगदक्षिका ॥ ११४ ॥ गोधूमवर्णा लैकुची
॥ ११५ ॥ श्वेता वाकुली ॥११६॥ शेषा नवनीतवर्णा ॥११॥
[२ अधिक (१७२) कौटलीय अर्थशास्त्र नागवृक्ष पर होने वाली पत्रोण पीले रंगकी होती है ॥४॥ लिकुच अर्थात् बाहर पर होनेवारी गैहुए रंगकी होती है ॥ १५ ॥ धकुल पर उत्पन्न होने वाली सफेद ॥ १६॥ और शेप यह श्रादि वृक्षापर होने वारी पग्रोणां मसनके समान रगवाली होती है ॥ १७॥ तासां सौवर्णकुट्यका श्रेष्ठा ॥ ११८ ॥ तया कौशेयं चीन- पट्टाच चीनभूमिजा व्याख्याताः ॥ ११९ ॥ इन सबमें से सुवर्णकुख्य नामक देशमें उत्पन्न होनेवाली पोर्णा सबसे उत्तम समझी जाती है | इसके समानही अन्य देशम, तथा चीन देशमें उत्पस होने वाले चीनपट (चीन देशमें बने हुए रेशमी यस्य) भी समझ लने चाहिये। (अर्थात् उनके मी नागवृक्ष आदि उत्पत्ति स्थान प्रथा पीले भादि रग होते हैं)॥१९॥ माधुरमापरान्तकं कालिङ्गकं काशिकं वाङ्गकं वात्सकं माहिपक च कासिकं श्रेष्ठमिति ॥ १२० ॥ मधुरा (पापड्य देशको राजधानी, इससे सम्पूर्ण देशका ग्रहण करना चाहिये), अपरान्तक (कोण देश), कलिग, काशी, वन, वरस, और महिपक (मैसूर ), इन देशोंमें उत्पन्न होने वाली कपासके कपडे सब से उत्तम समझे जाते हैं। यहा तक फल्गु पदार्थोंका निरूपण किया गया । ॥ २० ॥ अतः परेषां रत्नानां प्रमाणं मूल्यलक्षणम् । जातिं रूपं च जानीयान्निधान नवकर्म च ॥ १२१ ॥ मौक्तिक से एगाकर कापासिक पर्यन्त जिन रस श्रादिका निरूपण इस प्रकरणमें कर दिया गया है, तथा जिनका निरूपण अगले प्रकरणों में किया जानेवाला है, उनसे अतिरिक रसोंक भी प्रमाण, मूल्य, एक्षण, जाति, स्प, निधान ( उनके उपयोगका प्रकार ), तथा नवकर्म (खान से निकरने पर उनके शोधन धन तथा घर्पण आदि का प्रकार ) बादि सपके विषयमें अवश्य ही कोशाध्यक्ष को जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥१२॥ पुराणप्रतिसंस्कार कर्मगुह्यमुपस्करान् । देशकालपरीभोगं हिंस्राणां च प्रतिक्रियाम् ॥ १२२ ॥ ययक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कोशप्रेवश्यर सपरीक्षा एकादशाऽध्याय ॥१॥ आदितो दाधिश ॥३३॥ - ९.१७३ : १२ च्या०] अध्यक्ष-प्रचार तथा इसके अतिरिक्त पुराने रनों का पुनः संस्कार, कर्मगुल (खाका छीलना, तथा उनका रंग भादि पदलना), उपस्कर (रसों के साफ करने के लिये अन्य उपयोगी साधन), देश कालके अनुसार उनके उपयोग तथा उनमें लगने वाले कीड़े या बूई आदिका प्रतीकार भी कोशाध्यक्षको भयइय जानना चाहिये ।। १.॥ अध्यक्ष प्रचार द्वितीय अधिकरणमें ग्यारहयां अध्याय समाप्त । वारहवां अध्याय । ३० प्रकरण खानके कायोंका संचालन । आकराध्यक्षा शुल्मधातुशास्त्ररसपाकमणिरागज्ञस्तज्ज्ञसखो वा तशातकर्मकरोपकरणसंपन्नः किडम्पाङ्गारमस्मालिङ्गं वाकर भूतपूर्वमभूतपूर्व या भूमिप्रस्तररसधातुमत्यर्थवर्णगौरवमुग्नगन्ध- रसं परीक्षव ॥१॥ भायराध्यक्ष अर्थात् खानोंके मायक्षको चाहिये, कि यह शुल्म शास्त्र (जिसमें सांधा आदिके सोना बनाने की विधि यतलाई गई हो, ऐसा शास्त्र), धातु शास्त्र (किसी धातुमें उचित उपायोंसे अधिक पति उत्पन्न करदे मेकी विधि बताने वाला शास्त्र, रस (गुप्त रसायन आदि), पाक (सुवर्ण भादि- को अभिमें सपामेसे उनके रूपमे उरकृष्टता उत्पस करदेना मादि), और मणि- राग (मणियों के वर्ण आदि बदलने) आदि के विषय में अच्छी जानकारी प्रास करे । अधया इन सय विषयों को जानने वाले पुरपाके साथ रहकर, और इन चीजोंका लगातार व्यापार करने वाले पुरुष, तथा अन्य कसी कुल्हाडे, धोकनी संडासी भादि आवश्यक साधनाको साथ लेकर किट (सोहेका मैस), मूषा (यह वस्नु, जिसके पास सुवर्ण आदिको रसकर तपाया जाता है), और अंगारमस्म (रास) मादि चिन्होको देखकर पुरानी सानकी परीक्षा को । तथा मट्टी, पाथर, रस (सल मादि) आदिम जहां पातु मिली हुई मालूम हो, या उसका रस बहुत सकता हो, या यह मही भादि बहुत मारी, अथवा तीम गन्धस या तीन रससे युफ हो, तो इन सब चिन्होंको - - (१७४) कौटलीय अर्थशास्त्र [२अधिः देखकर मौजूदा खानकी जांच करनी चाहिये, अर्थात् यह समझना चाहिये। कि यहीपर खान विद्यमान है॥३॥ पर्वतानामभिक्षातोदेशानां बिलगुहो पत्यकालयनिगूढसावे- ध्वन्तः प्रस्यन्दिनो जम्यूनूततालफलपकहरिद्राभेदहरितालमन:- शिलाक्षौहिड्डुलकपुण्डरीकशुफमयपत्रपर्णाः सवर्णोदकौपधी- पर्यन्ताश्चिकणा विशदा भारिकाच रसाः काञ्चनिकाः ।। २ ।। पहिले पहिचाने हुए पहारोंके गदा गुफाओं, सराइयों, पथरीले स्था- नों तथा बही २ शिलाओंसे ढके हुए छिपे छेदोंमें यहने पाले; जामुन भाम तथा ताड़के फलके समान, पकी हलदी हरतास मनसिल शहन शिंगर कमल, और तोते तथा मोरके पढोंके समान रङ्ग पाले; अपने समान वर्णके जल तथा औषधि तक फैलने वाले, चिकने पवित्र तथा भारी जलों को देखकर यह अनु- मान करना चाहिये, कि जहाँसे ये इसप्रकारके जल निकलकर बहरहे हैं, यह अवश्यही सुवर्णकी खान है, अर्थात् सोनेकी सानके ये चिन्ह होते हैं ॥२॥ अप्सु निष्ठयतास्तैलवद्विसर्पिणः पङ्कमलग्राहिणश्च ताम्ररू- प्ययोः शतादुपार पेद्वारः ॥ ३ ॥ इसप्रकारके जलोंको यदि दूसरे साधारण अलमें मिलाया जाय, भौर पै उसमें तेककी तरह फैल आवें, अपपा कतक (जकको स्वच्छ करने वाला एक फल=निरपसी) के फलके समान अलको स्वच्छ करता हुआ नीचे बैठ जाये; मथवा सौ पल साये या चांदीको, उसके ऊपर डाला हुआ यह एक पल अल सुनहरा यमादेवे, तो भी समझना चाहिये कि इस जल निकासके नीचे अवश्य सोने की खान है॥३॥ तत्प्रतिरूपकमुग्रगन्धरसं शिलाजतु विद्यात् ॥ ४ ॥ पदि किसी स्थानपर उसके समान फेवल उप्रगन्ध या उग्ररस हो, तो समझना चाहिये कि यहोपर शिलागतुल वरपत्ति स्थान है, सुवर्ण आदिका । - पीतकास्तानकास्तानपीतका या भूमिप्रस्तरधातवः प्रभिन्ना नीलराजीवन्तो मुद्गमापकसरवर्णा वा दधिविन्दुपिण्डचित्रा हरिद्रा रीतकीपनपत्रशैवलयकवलीहानवद्यवर्णा भिन्नाश्चुञ्चुवालुका- लेखापिन्दुस्वस्तिकवन्तः सगुलिका अर्चिष्मन्तस्वाप्यमाना न अध्यक्ष प्रचार १२ अध्या०] भिद्यन्ते बहुफेनधूमाश्च सुवर्णधातवः प्रतीवापास्तानरूप्यवेधनाः पीले रमकी, तायके रङ्गकी अथवा दोनों मिले हुए रङ्गको भूमिधातु (मट्टी) और प्रस्तरघात ( पत्थर भादि), तोड़ने पर बीच में नीलो रेखाओंसे युक्त, अथवा मुंग उडद या तिलोंके समान वर्णके दानोंमे युक्त; अथवा दहीके कोंके समान छोटी २ बूंदर्दोसे घिरी हुई, या दही के समान बड़ी २ चूंदोंसे युक्त, हलदी, हरा, कमलमा पत्ता, सिरवाल, यकृत् प्लीहा तथा केसरके समान धर्णसे युक्त, तथा तोदनेपर थारीक रेतके समान रेखाओ, यूदों या स्वस्तिका (निकोण रूपकी निशेष रेसाओ) से युक्त; छोटी २ गोलियों जैसे मोटे रेतसे युक्त; कान्ति युक्त; तपाये जाने पर न फटने याली तथा बहुत शाग और धुआं देनेवाली, सुवर्णधातु होती हैं, अर्थात् इसप्रकरफी भूमिधातु और प्रस्तरधातु, तांये तथा चांदीको सोना यनादेने वाली होती हैं । इनके मेलस तांया भीर चांदी भी सोना बन जाते हैं ॥ ५॥ शसकर्पूरस्फटिकनयतीतकपोतपारावतविमलकमयूरग्रीवाव- र्णाः सस्यकगोमेदकगुडमत्स्सण्डिकायाः कोविदारपझपाटलीक- लायक्षीमातसीपुष्पवर्णाः ससीसाः साजनाः विस्रा भिन्नाः श्वे- तामाः कृष्णाः कृष्णाभाः श्वेताः सर्वे वा लेखाविन्दुचित्रा मृदयो ध्मायमाना न स्फुटन्ति बहुफैनधूमाश्च रूप्यधातवः ॥ ६ ॥ शंख, कपूर, स्फटिश (मिल्लौर), नवनीत (मासन), कपोत (जगली कयूतर ), पाराया (ग्रामीण कबूतर ), विमला (सफेद तथा लाल रङ्गका मणि), ओर मोरको गर्दन के समान रस घाले; सस्य (नाले रङ्गकी मणि), गोमेदक (गौका पित्ता), गुरु, तथा मत्स्यण्डिका (शक्कर डालीदार) ये समान रंग वाले; कचनार, कमल, पाटली, मटर, क्षुमा (एक तरहकी भलसी) तथा अलसीके समान वर्ग चाले; सीसैसे युक्त, अञ्जनसे युक्त, दुर्ग• से पूर्ण; तोड़े जानेपर याहरसे सफेद मालूम होने वारे भीतर से काले निकलें, तथा जो याहरसे काले हो, ये भीतरसे सफेद निकलें; अथवा सपही तरह २ की रेखा तथा यूदोसे चित्रितसे हो, मृदु, तथा तपाये जानेपर जो फटें नहीं, किन्तु बहुत शान और मां उगल; इसप्रकारके धातु रूप्यधातु कहे जाते .. " सर्वघासूनां गौरववृद्धी सच्चद्धिः ॥ ७॥ .
कौटलीय अर्थशास्त्र अधिक संबही कहे हुए अपवा भागे कहे जाने पाले धातुओंके सम्बन्धमें यह नियम समझना चाहिये, कि उनमें जितनी गुस्ता अधात् भारीपन मधिक होगा, उतनेही घे अधिक सारवान समझ जावेंगे॥७॥ तेपामशुद्धा मूढगर्भा वा तीक्ष्णमूत्रधारभाविता राजवृक्षपट- पीलगोपित्तरोचना महिपसरकरभमूत्रलण्डपिण्डबद्धास्तत्प्रतीया- पास्तदवलेपा वा विशुद्धाः स्रवन्ति ।। ८ ।। इन धातुमिसे जो अशुद्ध हो, अथवा अपने मल आदि दोषोंसे ही जिनका सरख यथार्थ प्रकट न रक्षा हो, उनका शोधन करलिया जाये। शोधन के प्रकार ये हैं --तीक्ष्ण मूग (मनुष्यका मूत्र अथवा हाथी घोडा गाय, गधा या परेका मूत्र), या तक्ष्यि क्षार (भपामार्ग क्षार आदि) में इन धातुओंको फई यार भावना वीजाये । भमएतास, यष्ट, पीलु (विशेष धृक्ष), गौका पिता, गोरोचना, और भंसा, सथा बालक ऊँट, इनके मूय और पुरी के पिण्डके साथ मलिन धातुओंको भावना देकर शुद्ध किया जावे । अमरतास सादिके चूर्ण के साथ अपवा उनसे हेप किये हुए धातु मणको नष्ट करके अपने असली रूपको प्रकट कर देते हैं। भयात् शुद्ध होगाते हैं॥८॥ यवमापतिलपलाशपीलुक्षारैगोक्षीराजक्षीरी कदली यज- कन्दप्रतीवापो मार्दवकरः ॥९॥ उडद, तिल, दक, और पीलुके शार, गाय तथा करके दूध के साभ कदली तथा सूरण कन्दका योग करनसे उनमें सोने और चांदीकी भावना दिये जानेपर ये सोने और चादीको गायनादेते हैं ॥ ९ ॥ मधुमधुरुमजापयः सतैलं घृतगुडकिण्वयुतं, राकन्दलीक । यदपि शतसहस्रधा विभिनं भवति मृदु त्रिभिरेव तन्निपेकैः ॥ १०॥ शहद, मुलहटी, यकीका दूध, तेल, पृत, गुडकी शराव तथा खादरमें उत्पश होने पारे झाइसे युक्त हन सय घस्तुओं को मिराकर यदि तीन वारभी सोने और चांदीमें मायना दी जाये, सो चाहे वह सोना आदि सैकड़ों हजारों तरह कटाफटा या खरखरा हो, अवश्य ही मृदु होजाता है ॥१०॥ गोदन्तभृङ्गप्रतीपापो मृदुस्तम्भनः ॥ ११ ॥ भारिक: स्निग्धो मृदुश्च प्रस्तरघातुर्भूमिभागो वा पिङ्गलो हरितः पाटलो लोहितो या ताम्रपतिः ।।१२।। ' ।
- १२ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार यदि गायक दांत और ससँगको पूर्ण करके पिघले हुए सुरणके ऊपर पुरक दिया जावे, तो उस सुवर्णकी मृदुताका लोप होजाता है। यहांतक सुवर्ण और रूप्य धातुकै सम्पन्ध निरूपण किया गया मारी, चिकना तथा मदु प्रारधातु (पापाणधामु ) अथवा भूमिभाग (अर्थात् भूमिधातु), साम्रधातु अर्थात् ताम्र के कारण होते है । (वारपर्य यह है कि जिस स्थानपर इसतरह के पस्थर तथा भूभाग हों, वहां तांका उत्सरी स्थान समझना चाहिये । उसके OF चार प्रकारके बताये गये है:-पिछल (पीला और लाल मिला हुआ, संध्याकाल के समान ), हरित (नीला ), पाटल (कुछ २ लालसा ), और लोदित ( अर्थात् लाल ) ॥ १२ ॥ काकमेचकः कपोतरोचनावर्णः श्वेतराजिनद्वो वा विसः सीसधातुः ।।१३।। ऊपरकर्पुरः पक्कलोष्ठवर्णों या अपुधातुः ॥१४॥ जो भूमिस्थान कौएके समान काला, कबूतर- या गोरोचनाके समान पर्ण वाला, अथवा सफेद रेखाओं से युक्त और दुर्गन्ध पूर्ण हो, वह सांसा नामक धातुका उत्पत्ति स्थान समझना चाहिये । अर्थात् ऐसे स्थानों में सीसको खान निकलती है ॥ १३ ॥ जो भूमिभाग, ऊपर भूमि समान कुर २ सफेद रह- का हो; अथवा पके हुए खेलेके समान रमवाला हो, यह मा अर्थात् सफेद रजके सीसका उम्पति स्थान समझना चाहिये ॥१४॥ कुरुम्बा पाण्डुरोहितः सिन्दुवारपुष्पवर्णो वा तीक्ष्णधातुः ॥ १५ ॥ काकाण्डभुजपत्रवर्णो वा चैकन्तकधातुः ।। १६ ।। मायः चिकने पाथरोंसे युक्त, कुछ सफ़ेद तथा लाल मिले हुएसे र# याला, अथवा निर्गुण्डीके फूल के समान रजवाला भूमि माग, तीक्ष्णपातु अर्थात् लोहेका उत्पत्ति स्थान होता है।॥ १५॥ कौएके अपदे तथा भोजपत्रके समान पर्ण वाठा भूभाग, कृन्त अर्थात् इस्पाती लौहेका उत्पत्ति स्थान होता है। यातक सात प्रकारकी लोप्दधातुमौंका निरूपण कर दिया गया ॥ १६ ॥ अच्छः स्निग्धः समभो घोपवाशीतस्तीबस्तनुरागश्च माण- घातुः ॥१७॥ धातुसमुत्थितं तज्जातकर्मान्तेषु प्रयोजयेत् ॥१८॥ सच्छ, (ऐमा चमकता हुआ स्थान, जिममें प्रतिविम्य दाख), स्नि ग्य (चिकना), प्रभायुक्त, अग्नि जलाने या घोट देनेपर यहा शब्द करने थाला, अत्यन्त शीनल, फीके समाला, भूमिभाग, माणिधातु अर्थात् मणियोका उत्पत्ति स्थान होता है॥१७॥ घोरेसे धनापय तया यवत जो सुवर्ण आदि भूमिमे मात होवे, उसे फिर अन्य अधिश सागकेही काममें लगा देवे जिसने कि उसरोत्तर सुवर्ण मादिको प्राक्षि होती रहे ॥ १८ ॥ .
. [२अधि० " -- -- (१७) पौटलीय अर्थशास्त्र कृतभाण्डव्यवहारमेकमुसमत्ययं चान्यत्र कर्तृऋषिकेतृणां स्थापयेत् ॥ १९ ॥ जा सुवर्ण आदि धातु विक्री के लिये तैयार होजावें, उनका किसी एक हो नियत स्थानसे विक्रय करना चाहिये। (इसका यही तारपय मालूम होता है, कि राज्यकी औरस सूवण आदि खनिन पदार्थों का भिन्न २ किसी एक व्यक्तिको हा टका ददेना चाहिए, उसही क द्वारा उन वस्तुओका विक्रय परना उचित है)। यदि कोइ पक्कि राजाज्ञाके बिना ही किसी स्थानमें सुव । आदिकी उत्पत्ति करके प्रय विक्रय कान ता उस राजाकी औरसे दण्ड मिलना चाहिय । अर्थात् राजाकी भारसे गिन पक्तियों को इस कार्य के लिये भाज्ञा मिल चुकी है, उनस पत्तिरित पा भी इस कार्यको करे, यह दण्डनीय समझा जावे ॥ १९॥ आकरिकमपहरन्तमष्टगुण दापयेदन्यत्र रनेभ्यः ॥ २० ॥ स्तनमनिसृष्टोपजीविन च युद्ध कर्म कारयेत् ॥ २१ ॥ दण्डोप कारिणश्च ॥२२॥ सनिर पदार्थीका अपहरण करने वाले कार्यकर्ता पुरुषको, इस वस्तु से भाठ गुना दपर दना चाहिये । परन्तु साकी चोरीक लिये यह दण्ड नहीं है, भाग उसका दण्ट, षध बतलाया जावगा ॥ २० ॥ जो पुरुष वारी करे, अमवा राजाकी अगतिक विशाही खनिन पदार्थ का व्यापार फरे, उसे पट कर सानक काम में लगा दिया जाये ॥ २१ ॥ और जिस पुरपको अदालतसे किसी अपराध शाशरिक दण्ड दिया गया हो पातु किसा विशप कारणवश उस यदि यह दण्ड न दिया जाता हो, तो इसक पदलमें उस पुरपका मा खानके कार्य करनम लगा दिया भाव ॥२२॥ व्ययक्रियामारिकमाकर भागेन प्रक्रयेण यादद्यात् ।।२३।। लापविकमात्मना कारयेत् ॥ २४ ॥ खानक अपर यदि भार लगाका बहुत धन देना होगया हा, उस को चुकाकर ही खामकी आमदनी हा सकती हा अथवा यह काय भत्यधिक दर स साध्य हो मा आकाध्यक्षका चाहिए कि यह घोडा २ करके, लागोंक था को धार २ चुका दवे ! अपचा सुदणका कर भाग एक साथ राजाको देकर, उसक बदलम खजानस रपया एकर लागार घनका घूरता फरदव ॥ २३ ॥ यदि पाटदा धन और परिश्रमस यह काय सिद्धान पाला हो ता स्वप हो इस कायका परामरदव ।। २३॥
m । बच्या । अध्यक्ष प्रचार (१७२) ", लोहाध्यक्षस्तानससित्रपुर्वकृन्तकारटवृत्तसंताललोहकर्मा- न्तान्कारयेत् ॥ २५॥ लोहमाण्डव्यवहारं च ।। २६।। लोहाध्यक्षको चाहिये कि वह अपने निरीक्षणम तामा, सालापु पैन्नक, भारयूट, वृत्त, फस, ताल तथा अन्य कारक लोहक सय कार्योंको कापावे ॥ २५ ॥ तथा लोदेस बनने वाले नितने भो पदार्थ हो, उग सय व्यवहारको भी लोहाध्यक्ष करवाये ।। २६ ॥ लक्षणाध्यक्षचतुर्मागताये रूप्यरूपं तीक्ष्णत्रपुसीसाजनाना- मन्यतम मापवीजयुक्तं कारयेदं पणमर्धपण पादमष्टभागंमिति 11 २७॥ रक्षणाध्यक्ष अर्थात् टक्सारके अध्यक्षको चाहिये। चादी तथा ताये के सिरमोरो जिन रीतिसे याबारे । पहिरे चादी के सिकेका निरूपण किया जाता है, पर चार प्रकारका होता है, पण अंधपण पादपण, तथा अभागपण । १६ मा ममाणका एक पण होता है, उसका चौथा भाग अर्थात् चा माप उसमें तांबा होगा चाहिये, एक माप, लोहा बाग सीसा तथा अंजन इन चारों मेसे कोई एक चीज होनी चाहिये । याकी ग्यारह माप चारी होनी चाहिये। इस परिमाणसे मारह मापका एक पण तयार होता है। इसी हिसामसे अर्ध पंण, पादपण, तथा अष्टभागपण तयार करावे ॥ २७ ॥ पादाजी साम्ररूपे मापकमधमापकं कांकणीमधैकाकणी- मिति ।। २८ ।। रूपदर्शकः पणयात्रां व्यावहारिकी कोशप्रवश्यां च स्थापयेत् ।। २९ ॥ रूपिकमष्टकं शतम् ॥ ३० ॥ पणके चौथे हिस्सेका व्यवहार करने के लिये तावका एक अलहदा मिका यनाया जाये, इसका नाम गापर होता है। इसमें चौधाई हिस्सा ती एव हिस्सा रोहे, आदि चारोग से किसीका होना चाहिये, राधा ग्यारह माप साया होना चाहिये । इस प्रकार यादी पपकी तरह, यह तय मापक भी सोए माप परिमाणक होता है। इसी तरह इसके अधर्मापकभी तयार करारे । पादमापा और अभागमा विषे कारणीभार मकाकणी नामक सिकाफा बनवाये। इस तरह चार चादीके तथा चार तावेदे सिके पनाये जाते है ॥२८॥ सिम्लाकी परीक्षा वाने पाला अधिकारी इस बासकी व्यवस्था करदेवे कि कागसा सिमा घलने अधार व्यवहार करने योग्य है, और कौनसा सजाने में जमा करदेनेके योग्य है.२९॥ सो पगपर, जो गाठपण राज्यमाग अनमा से लिया जाता है, उसका नाम 'रुपिक' MAN..... - [२ आधि० - (१८०) कौटलीय अर्थशास्त्र IT पञ्चक शतं व्याजीम् ॥ ३१ ॥ पारीक्षिकमष्टभागिकं शतम् ॥ ३२ ॥ पञ्चविंशतिपणमत्ययं चान्यत्र कर्तवृविक्रेतपरीक्षि. तम्य: ।।.३३॥ सो पणपर, पाचपण राज्यभाग 'व्याजी' कहाता है तथा सौ पणके आठ हिस्से राज्यभाग को पारीक्षिक' कहा जाता है ॥३२॥ यदि कोई व्यक्ति इस आठवें हिस्स राज्यभागका अपहरण करे, तो उसे २५, पण दण्ड दिया जवे, यदि अधिक अपहरण करे, तो इसी ही हिसापसे दुगा धागना दण्ड दिया जावे, परन्तु सिष्ठोंको पनाने पाले, खरीदने पेचने वाले, तथा परीक्षा करने वाले अधिकारी पुरपाके लिये यह दण्ड नहीं है। उनके लिये, द्रन्यकी सारासारताको देखकर पहिलेही दण्डका विधान कर दिया गया है ।। २३ । खन्यध्यक्षः शङ्खवजमणिमुक्ताप्रयालक्षारकर्मान्तान्कारयेत् ॥ ३४ ॥ पणनव्यवहारं च ॥ ३५॥ आकराध्यक्ष (खान क भ पक्ष) को चाहिये कि वह शख, पन, मणि, मुक्ता, मवाल सभा सम तरह क्षारों ( यवक्षार आदि) को उत्पत्तिका प्रपन्ध फरे ॥३४॥ तथा शख भादिक क्रय विक्रय ग्यवहारका भी प्रबन्ध करे ॥३५॥ लपणाध्यक्षः पाकमुक्तं लवणभागं प्रक्रयं च यथाकालं संगृहीयात् ॥ ३६ ।। विक्रयाच मूल्य रूप “व्याजीम् ॥ ३७॥ लवणा पक्षका पाय दे, कि वर तयार किये हुए लवणो (भर्धात् स्थानमसे निकाल कर विक्रो भादिके लिये तैयार हुए. २ लवणको ) भोर किसी खानसे नियमित माग्नाम शतक तौरपर प्राप्त होन वाले लगको टीक २ समयपर सगृ होत फरले ॥३६॥ भोर म्यापारियों के द्वारा उसक विक्रज्ञा प्रयन्ध करे, विरुपसे जो मूर मात करने, उसे, तमा सामोर माजीको भी सगृहीत करे ॥ ३७॥ आगन्तुलवणं पहभागं दद्यात् ।। ३८॥ दरभागविभाग- स्य विक्रयः पशवं शतं व्याजी रूपं रूपिकं च ॥ ३९ ॥ परदेशसे आये हुए नमकपर, उसको पेचन वाला पुरप, उसके मूल्यका पहा हिस्सा, राजाफो करक तौरपर देवे । अर्थात् छदा हिस्सा रामाफो टेक्त थे ॥३८॥जो पेचने पासा पुरप, रामाके लिये छठा भाग देता है तथा तोल का भी वस दरेता यही अपने मायको थेच सकता है। और उस पुरुपको, प्रतिशत पाच, माझी, रूप (पारीक्षिसोका या हिस्सा), और पिक भी राज टिव का पाहिये ।।
. 2 १२ मध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (१८१ केता शुल्क राजपण्याच्छेदानुरूपं च वैधरणं दद्यात् ॥४०॥ अन्यत्र क्रेता पदछतमत्ययं च ।। ४१ ।। उप मालको परीदने वाला व्यापारी नियमानुसार गुरुक ( टेक्स) देये; तथा राजाके बाज़ारमें बचे जानेके कारण, उसको छीजनके अनुसार ही उसकी पूर्ति करे। तात्पर्य यह है कि बाजारका टैक्स भी अलहदा ३ ॥ ४० ॥ राजकीय बाजार के रहते हुए जो व्यापारी, नमकको किसी अन्य स्थानमें खरीदता है, उससे प्रतिरात छ. पण लिया जावे, तथा इससे अतिरिक्त दण्ड और दिया जाये ॥ ११ ॥ विलवणमुत्तमं दण्डं दद्यात् ॥ ४२ ॥ अनिसृष्टोपजीवी च ॥ ४३ ।। अन्यत्र वानप्रस्थभ्यः ॥४४॥ घटिया या मिलावटी नमक क्षेचने वाले व्यापारीको उत्तम साहस दण्ड दिया जाचे ॥ ४२ ॥ तथा जो पुरुष राजाकी अनुमति लिये विमा दी, नमकको उत्पन्न करता, तथा उसका व्यापार करता है, उसको भी उत्तम साहय दण्ड दिया जाये ॥ ५३ ॥ परन्तु यह नियम पानप्रस्थ अर्थात् वनमें रहने वाले माश्रमी पुम्पा लिये नहीं है, अर्थात् राजावी बिना अनुमति के भी पेस गमकको लेकर उसका उपयोग करसकते ॥ ४ ॥ श्रोत्रियास्तपस्विनो विष्टयश्च भक्तलवणं हरेयुः ॥ ४५ ॥ अतोऽन्यो लवणक्षारवर्गः शुल्कं दद्यात् ॥ ४६ ।। नोत्रिय (वेदीका अध्ययन करने वाले), तपस्वी, तथा बलात्कार कार्य करने पाले ( अर्थात् अपनी इच्छा न होनेपर भी राजाकी इच्छानुसार कार्य करने पाले-वेगारी ) पुरुप, विना शुरकके भी, अपने उपयोग मानके लिये नमक लेजा सकत है।॥ ४५ ॥ इससे अन्य, लवण और क्षार वर्गका उपयोग करने यासे पुरप, लपणाध्यक्ष या कोष्ठागाराध्यक्षको शुल्क देवें ॥ १६ ॥ एवं मूल्यं विभागं च व्याजी परिघमत्ययम् । शुल्कं वैधरणं दण्डं रूप रूपिकमेव च ॥४७॥ इसप्रकार मूल्य, विभाग, व्याजी, परिघ ( पारीक्षिक), भत्यय, शुल्क, धरण, दण्ड, रूप (चांदी तथा तयिय सिके), और रूपिक ॥ ४० ॥ खनिम्यो द्वादशविधं धातुं पण्यं च संहरेत् । एवं सर्वेषु पण्येषु स्थापयेन्मुखसंग्रहम् ॥,४८,...
- . + (२२) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधि० तथा सानासे निकाले हुए मारह प्रकारचे धातु, और भिसा २ प्रकारके अन्य विफेय पदार्थों का संग्रह करे । इसप्रकार सरही व्यापारी स्थानों में प्रधान प्रधान विक्रेय वस्तुओंका सम्रह अवश्य स्थापित करे ॥४८॥ 'आकरप्रभवः कोश कोशाद्दण्डः प्रजायते । पृथिवी कोशदण्डाम्यां प्राप्यते कोशभूपणा ॥ ४९ ।। इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे भाकरकर्मान्तप्रवर्तन द्वादशोऽध्याय ॥२॥ भादित अयशि ॥३३॥ कोशको उति खानापर निर्भर है, कोशके उन्नत होनेपर सेना भी सैयार कीजासकती है, कोशसे भूपित पृथिवी, फोश और दण्ड (सेना) के द्वाराही प्राप्त कीजासकती है ॥ १९ ॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय 'अधिकरणमें यारहवां अध्याय समाप्त। - तेरहवां अध्याय ३१ प्रकरण अक्षशालामें सुवर्णाध्यक्ष का कार्य 'खानसे निकाले हुए सोने चादी आदि धातुओको जिस स्थानमें साधन फरक तैयार किया जाय, उसे 'अक्षशाला' कहते हैं। इस कार्यका निरीक्षण करनेवाला जो अधिकारी पुरर होता है, उसका नाम मुवर्णाध्यक्ष है। उसके कार्यों का इस प्रकरणमें निरूपण किया जायगा । जिसमें सुवर्णकी नाति, वर्ण, गुण, शोधन, दोषों की परीक्षा, अन और रक्षाकरना आदि सपहीका समावेश है। मुवर्णाध्यक्षः सुवर्णरजतकर्मान्तानामसंपन्धारेशनचतुःशा- लामेकद्वारामक्षशालां कारयेत् ।१॥ निशिसामध्ये सौयर्णिकं शिल्पयन्तममिजाचं प्रात्ययि घ स्थापयेत् ।। २ ॥ मुवर्णाध्यक्षको चाहिय कि यह साने चापीफे हाएर कामको करवाने के लिये, एकही प्रधान द्वारसे युष अक्षशाला निर्माण परवाये । इसमें चार्ग भीर बरे २ धार मानहा, जिनश भापममें एक दूसरके गथ कोई सम्बन्ध हो । विशिरसाम (मुवर्णनगपार फोदाले पापारियाफे पाजारका नाम विशिखा' है, पहें पारीगर अर्थात् चतुर, गया विवस्त सौव णिक (मुनगंडा मोपरि मनपाई शुनको स्थापना (सोमणिको १३ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार ((.१८३) कार्योंका निरूपण अगले प्रकरणम किया जायगा। यह मुचर्णायके अधीन रहकरही अपना कार्य करता है, इसी बात को यहां पाया गया है ) ॥२॥ जाम्बूनदं शांतकुम्भं हाटकं पैणवं शृङ्गशुक्तिज, जातरूपं रसविद्धमाकरोद्तं च सुवर्णम् ॥ ३ ॥ पांच प्रकारका, पांच वर्गासे युक्त सोना होता है, उसके चीन उत्पत्ति स्थान है, अर्थात् मुवर्ण तीन तरहसे उसा होसकता है । जाम्बूनद् ( मेरू पर्वतसे निकलनेयाली जम्यू नदीसे उत्पन्न होगेवाला सुवर्ण जामुन फलके रसके समान पर्णवाला होता है ) शातकुम (शनकुम्भ, नामक, पर्वतम उत्पा होनेवाला सुवर्ण, कमल के रज समान वर्णसे युक्त होता है ), हाटक (सोनेकी सानसे उत्पन्न हुआ • सौना, फाटेदार सेवतीके फूलके समान रंगवाला होगा है), घेणर (येणु पर्वतपर उत्पन्न होनेवाले सुवर्णका रंग कार्णकार वृक्षके फूलके समान होता है, और शिशुक्तिज (शीत स्वर्ण भूमिसे उत्पन्न होनेवाला, मनसिप्लके समान रंगवाता होता है), यह वर्ण भेदसे पांच प्रकारका सोना होता है । इसके तीन उत्पत्ति प्रकार हैं: जातरप (स्वयं शुद्ध, सुवर्ण रूपमें उत्पन्न हुआ २), रसविद्ध ( रसोके योगसे सोना बनाया हुभा), तथा आकरोगत (अशुद्ध रूपमें खानासे निकलनेवाला)॥३॥ किजल्कवर्ण मृदु स्निग्धमनादि भ्राजिष्णु च श्रेष्ठम् ॥ ४ ॥ रक्तपीतकं मध्यमम् ॥ ५ ॥ रक्तमवरम् ॥ ६ ॥ कमलके रजके समान वर्णवाला, मृदु, सिग्ध, शब्द रहित, । किसी २ पुस्तकमे अनादि' शब्दके स्थानपर 'अनुनारि' पाठ है, उसका अ 'लम्या शब्द करनेवाला, फरना चाहिये) और चमकदार सोमा सबमें श्रेष्ठ समक्षा • जाता है ॥ ४ ॥ लाल और पीले मिले हुए रंगस सोना मध्यस, ॥ ५॥ तथा लाल रंगका भवर अर्थात् निकृष्ट समझा जाता है ॥ ६ ॥ श्रेष्ठानां पाण्डु श्वेतं चाप्राप्तकम् ।। ७ ।। तद्येनाप्राप्तकं तञ्च- तुर्गुणेन सीसेन शोधयेत् ॥ ८ ॥ • उत्तम जातिके सुवर्णो से, जो सोना कुछ पीलासा अर्थात् भुरभुरा और सफेद रहगया हो यह अप्राप्त कहता है। तात्पर्य यह है कि संशो. धन आदिके समयमें यह टीक २ शुद्ध नहीं होता, उसमे कुछ। 'मए, आदि मिले रहते हैं, इसलिये उसे अपनी ठीक हालत ता प्राप्त न होने के कारण भप्राप्सक कहाजाता है ॥ ७ ॥ उस सोनम निरागा मह मिलातुआ हो, उसरेर चौगुना सीसा डालकर उसे शुद्ध करना चाहिये ॥६॥ n 2 .
. (१८४) कोटलीय अर्थशास्त्र [२यधिक सीमान्वयेन भिद्यमानं शुष्कपटलैमापयेत् ॥ ९॥ रूक्ष- त्याद्भिद्यमान तैलगोमये निपेचयेत् ॥ १० ॥ यदि यह सीसाके मेलरे फ्टने लगे, तो जगली कंकी भागमें उसे सपाया जावे ॥ २ ॥ यदि शोषन कालमें सुवर्णके अन्दर कुछ रूक्षता अिर्थात् खरखरापम आजानेसेही घह फटता हो, तो तल और गोपर दोनोंको मिलाकर उसमें भावना देवे । अथवा जबतक ठीक न हाजाय, तबतक चार र इन दोनों चीजों में सोनेको भिगो २ कर निकालता जाये..॥ आकरोइत सीसान्वयेन भिद्यमान पाकपचाणि कृत्या गण्डिकासु कुट्टयेत् ॥ ११ ॥ कन्दलीयजकन्दकल्के वा निपेच. येत् ॥ १२ ॥ खानसे निकालेहुए सोनेकोभी सीसा मिलाकर शुद्ध किया जाये, पदि सीसके मेलसे यह फटने लगे, तो पके हुए पसे उसके साथ मिलाकर किसी लकडीके तपतेपर रखकर उसे खूब कूटे ॥७॥ अथा कन्दली लता, धीर, भौर कमलकी जाका काय बनाकर उसमें उस सानेको खूप भिगोये, जयतक कि उसका फटना बिल्कुल दूर न होजाय॥ १२ ॥ । तुत्थोद्गतं गौडिकं काम्युकं चाक्रवालिक च रूप्यम् ॥१३॥ श्वेतं स्निग्धं मृदु च श्रेष्ठम् ॥ १४ ॥ चादी चार प्रकारकी होती है,-सुस्थोद्गत (मुरथ नामक पतपर उत्पन होने वाली, इसका रग घमेल के फूलक समान होता है), गाडिक (भासाम देशमें उत्पन्न होने वाली, इसका रंग तगरके फूल के समान होता है), काम्वुक (काम्वु नामक पर्वसपर होने पाठी, धादीका), तथा चावाहिक (अर्थात् पक्रमाल खानसे पैदा होने वाली चादीका ग कुन्दके फूल के समान सपेर होता है । यह मुन्नका फूल मायके महीनेग खिलता है)॥ १३ ॥ सफेद, स्निग्ध तथा मृदु चादी सबसे उराम समझी जाता है ॥५॥ विपर्यये स्फोटनं च दुष्टम् ॥ १५ ॥ तत्सीसचतुर्भागेन शोधयेत् ॥ १६ ॥ उद्गतचूलिकमच्छं भ्राजिष्णु दधिवर्ण च शुद्धम् ॥ १७॥ इन गुणासे विपरीत अर्यात् कालापन रखाई, तथा सासरापम, शीर परे हुएसे होना, ये दिक दोष होते है ॥ ५॥ दूपित चौधरीको, उससे चौपाई सीसा दाएकर इन करे । १६५ जिसमें इसे हटे हुए हों, या --- 1 १३ अध्या०] यध्यक्ष-प्रचार जो स्वच्छ, चमकदार और दही के समान सफेद हो, वह चांदी शुद्ध होती । शुद्धसको हारिद्रस्य सुवर्णो वर्णकः ॥१८॥ ततः शुल्पका- कण्युत्तरापसारिता आचतुःसीमान्तादिति पोडशवर्णकाः ॥१९॥ हलदीके समान स्वच्छ रंग वाल, शुद्ध सुवर्णका एक सोलह मापका वर्णक होता है। यह शुद्ध वर्णक कहा जाता है ॥ १८ ॥ फिर उसमें एक तांबे. की काकणी (मापका चौथा हिस्सा ) मिलादी जाधे, तथा उसकी वरावरका मोनेका हिस्मा उसमेंसे कम करदिया जावे, इमीतरह तौवेका हिस्सा मिलाने मोर सोनेका हिस्सा कम करनेसे सोलह वर्णक बन जाते है । क्योंकि यह एक एक काकणीका मेल चार मापतक ही होता है, और एक कारणी, एक मापका चौथा हिस्सा होता है, इसतरह चार माप, सोलह काकणी होनसे सोलह वर्णक बन जाते हैं। ये सोलहाँ मित्रवर्णक कहाते हैं, एक पहिला शुद्ध वर्णक इनमें मिलानेस सब वर्णक मिलकर सत्रह होजाते है ।। १९॥ सुवर्ण पूर्व निकप्य पश्चाद्वर्णिकां निकपयेत् ॥ २० ॥ सम- रागलेखमनिम्नानते देशे निकपितम् ॥ २१॥ परिमृदितं परि- लीढं नखान्तराद्वा गैरिकेणायचूर्णितमुपछि विद्यात् ।। २२ ।। वर्णककी परीक्षा करने के लिये, पहिले सुर्वणकी परीक्षा को, अर्थात् उसे कसौटीपर घिसकर जांच कि यह ठीक है, पश्चात् वर्णिकाको कमोटीपर मिसे ॥ २०॥ घिसनेपा यदि समानही वर्ण और रेखा होवे, तथा घिसके स्थान ऊँचे नीचे नहाँ, तो वह कसौटीपरका परखना न्याय्य अर्थात् टीक ॥ १ ॥ यदि बेचने वाला घणककी उत्कर्पता बतलाने के लिये कसौटीको उसपर ज़ोरसे रगड़ देवे, या खरीदने वाला, उसकी निकृष्टता वत. लाने के विचारसे कसोटीको बहुत धीरेसे रगड़े; अथवा नासूनके बीच कोई दूसरी गरिक आदि पीतधातु रखकर उससे सोनेके साथ २ कसौटीपर रेखा करदे तो इसप्रकार यह तीन प्रकारका कपट पूर्ण घिसना कहा जाता है । अर्थात् इससरह कसोटीपर परखना कपट पूर्ण होनेसे उचित नहीं होता ॥ २२ ॥ जातिहिङ्गुलकेन पुष्पकासीसेन था गौमत्रभावितेन दिग्धे- नाग्रहस्तेन संस्कृष्टं सुवर्ण श्वेतीभवति ॥ २३ ॥ सकेसरस्निग्धो मृदुीजिष्णुश्च निकपरागः श्रेष्ठः ॥ २४ ॥ गौमूत्र भावना दिये हुए एक विशेष प्रकारके शिंगरफके साथ, तथा कुछ है पीले रंगके हरताल के साथ लिपटे हुए हायके अनुभागसे सोनेफा स्पर्श समझा जाता
कुछ शोकासा
जाता
(१८६
कोटलीय अर्थशास्त्र [२ अधि०.
कार्दनपा वह सोना सफ़ेद रंगकासा होजाता है, अर्थात् उसका चमकता हुभा
रंग
पह
है। सोना परीदने वाले व्यापारी प्रायः ऐसा
करते हैं ॥ २३ ॥ महुसहरी केसरके समान रंग वाली, निग्ध {चिकनी), मृद्ध
सपा चमकदार, कसोटीपर खिची हुई रेखा सबसे आम समझी जाती है।
भयात् कसोटीको रेखाका यदि ऐसा ऐसा रंग हो तो वह श्रेष्ठ समशनी
चाहिये ॥२४॥
कालिङ्गकरतापी पापाणो वा मुद्गवर्णो निकपः श्रेष्ठः ॥२५॥
ममरागी विक्रयक्रयहितः ॥२६॥
कहित देशमें महेन्द्र पर्वतसे उत्पन्न होने वाली, अथवा तापी नामक
नदीसे उत्पन्न होने वाली, मूंगके समान घर्णसे युक्त, कसोटी सबसे उत्तम
होती है ॥ २५ ॥ सुवर्णके ठीक ३ वर्णको ग्रहण करने वाली कसौटी, क्रय तपा
विक्रय करने वाले दोनों ही व्यापारियोंके लिये अनुकूल होती है ॥२६॥
हस्तिच्छविका सहरितः प्रतिरागी विक्रयहितः ॥ २७ ॥
स्थिर परुपो विपमवर्णश्चाप्रतिरागी क्रयहितः ॥ २८ ॥
हाशके चमड़के समान एरवरी सश सूखी हुईती, कुछ र हरे रंगसे
युक्त, मामूली सेनेके रंगको भी पटाकर दिखलाने शाली, कसौटी मुवर्ण बेचने
पाले ग्यापारियों के लिये हितकर होती है ॥ २७ ॥ ८८, परप अर्थात् कटोर पा
खरखरी, विषमवर्ण अर्थात् तरह २ के रंगों से युक्त, उत्कृष्ट सुवर्णके भी उसके
असली रंगोंको न दिखाने वाली कसोटी सुवर्ण आदि सरोदने वाले व्यापारि-
योंके लिये हितकर होती है । २८॥
भेदश्विकणः समवर्णः श्लक्ष्णो मृदु जिष्णुश्च श्रेष्ठः ॥२९॥
तापे पहिरन्तर समः किअल्करणः कुरण्डकपुष्पवर्णो वा श्रेष्ठः
छेद भपात सोनेका कटा हुआ छोटासा टुकड़ा, चिकना, अन्दर बाहरसे
एकसे रंग वाला, स्निग्ध मदु तथा चमकदार हो, तो यह सबसे श्रेष्ठ समझा
जाता है ॥ २९ ॥ उस सोनेके टुकडे को अनिमें सपाये जानेपर यदि यह
पाहर और अन्दरसे एक्से ही रंगवाला रहे, अपवा कमल र समान
सपासा, के पूलके समान रंग पाहा हो, तो या श्रेष्ठ समका
जाता है । ३.॥
श्यायो नीलयाप्राप्तः ॥ ३१ ॥ तुलाप्रतिमानं पौववाध्यक्षे
यक्ष्यामः ॥३२॥ तेनोपदेशेन रूप्पसुवर्ण धादादीत च ॥३३॥
१३ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (१८७) यदितपाने पर उसके रंगम कुछ फर्क पड़ जावे, यह कुछ २ बन्दरकेसे रंगफा या नालासा होजाये, तो समझना चाहिये कि वह सोना अप्राप्तक अशुद्ध या खोटा है ॥३१॥ सोना चांदी आदि तोलनेके प्रकारका निरूपण पौतयाध्यक्ष नामक प्रकरगमें किया जायगा ॥ ३२ ॥ उस प्रकरणमें बतलाये हुए तोलके अनुसार ही सुवर्ण लेना और देना चाहिये ॥ ३३ ॥ अक्षशालामनायुक्तो नोपगच्छेत् ॥ ३४ ॥ अभिगच्छन्नु- च्छेद्यः ॥ ३५ ॥ आयुक्तो वा सरूप्यसुवर्णस्तेनैव जीयेत ॥३६॥ अक्षशालामें वह ही पुरुष जावें, जो वहां कार्य करते हैं, बाहरका अन्य कोई पुरप वहां न जाने पाये। (यह सब सुवर्ण आदिके रक्षा करने का विधान है) ॥ ३४ ॥ यदि निषेध करने पर भी कोई पुरष जाता हुआ पकड़ा जाये, तो उसका सर्वस्व अपहरण कर लिया जाये ॥ ३५ ॥ अक्षशालामें कार्य करने याला पुम्पभी यदि अपने साथ सोना चांदी लेकर जाने, तो उसके अनुसारही उसे दण्डित किया जावे ॥ ३६॥ विचितवस्त्रहस्तगुह्याः काञ्चनपतत्वष्मृतपनीयकारयो धमा- यकचरकपांसुधावकाः प्रविशेयुः निष्कसेयुश्च ॥ ३७ ।। रस भादिक योगसे सुवर्ण बनाने वाले शिली, छोटी २ गोली आदि मनाने वाले, बड़े २ पान आदि बनाने वाले कारीगर, तथा तरह २ के भामूपण भादि बनाने वाले शिल्पी, और धौंकनी देने वाले, शाडू भादि लगा कर साफ करने वाले तथा अन्य परिचारक जनमी; अपने पहने हुए वस्त्र, हाय तथा गुस स्थानों (जेय धादि, अथवा धोती आदि) की जांच कराकर ही अक्षशाला में भीतर प्रवेश करें और बाहर निकले ॥ ३७ ॥ सर्व चैपामुपकरणमानिष्ठिताश्च प्रयोगास्तत्रैवावतिष्ठेरन् ।॥३८॥ गृहीतं सुवर्ण धुतं च प्रयोगं करणमध्ये दद्यात् ॥ ३९ ।। सायं प्रातश्च लक्षितं कर्तृकारयित् मुद्राभ्यां निदध्यात् ॥ ४० ॥ इन शिल्पियों के उपकरण अर्थात् काम करके औजार आदि, तथा भाधे बनाये हुए अन्य भाभूषण आदि कार्य, अक्षशालाम ही रपसे रहे, उन्हें यहाँसे बाहर कदापि न लेजाया जावे।। ३८ ॥भाण्डागारसे तोलकर लिया हुआ सोना तथा उससे बनाई हुई जो चीज होवे, उसे कार्य करने के अन्तमें, भंदार के राजकीय लेखक को उसी प्रकार ठीक २ तोलकर सुपुर्द करदेवे, और उस सय फार्म को राजकीय पुस्तकम लिएपा देवे, यह सब काम सुवर्णध्यक्ष को भवश्य करना चाहिये । ३. सथा सायंकाल और प्रातः काल, 'प्रति दिनके
[२ अधिक
करमा
(९८८
कौटलीय अर्थशास्त्र
कार्यको समाप्ति तथा प्रारम्भमें, काम करने वाले सावणिक, और कराने वाले
सुवर्णाध्यक्ष की मुद्रा (मुहर-सोल) से चिन्हित करके, भतारका रेखक, उस
सुवर्णको भण्डारमें रक्से तथा दवे ॥ ४० ॥
क्षेपणो गुणः क्षुद्रकमिति कर्माणि ।। ४१ ॥ क्षेपणः काचा-
पणादीनि ॥ ४२ ॥ गुणः सूनसानादीनि ॥ ४३ ॥ धनं सुपिरं
पृपतादियुक्तं क्षुद्रकमिति ॥ ४४ ॥
कम तीन प्रकारके हाते हैं, क्षेपण, गुण तथा क्षुद्रका (यहोपर यहभाशालाके
कुछ भाभूपण सम्बन्धी मुख्य कार्योंका ही कथन किया गया है)॥४१॥ का
धार्पण अर्थात् मणि भादिका जोडना (भाभूपणों आदिपर जहाई का काम
क्षेपण' कहाता है ॥ ४२ ॥ सोनेक बनाये हुए बारीक सूत्र आदि
का प्रथन करना 'गुण' कहाता है ॥४३॥ ठोस तथा पोला, और छोटी २
धूदों या गोलियोंसे युक्त आभूपण आदिका तयार करना 'क्षुद्रक' कर्म कहा
जाता है॥४४॥
अर्पयेत्काचर्मणः पञ्चभाग
काञ्चनं दशभाग कटुमानम्
॥ ४५ ॥ ताम्रपादयुक्तं रूप्यं रूप्यपादयुक्तं वा सुवर्ण संस्कृतं
तसाद्रक्षेत् ॥ ४६
काचकर्म अर्थात् मणिके जोडने की विधिका निरूपण किया जाता
-मणिके पांचवें हिस्पे नीचके भागको, आधारभूत सुवर्णमें प्रवेश करदे।
मणि को रद करने के लिये उसके चारों ओर सोनेकी जो एक पट्टीसी लगाई
जाती है, उस को कटुवान कहते हैं । मणिका मितना भाग सुपर्णके भीतर
प्रवश कर दिया गया है, उसरे भाधा भाग अर्थात् एसवा हिस्सा कटुमान
का होना चाहिये!॥ ५५ ॥ सुवर्णकार, सस्कृत किये जाते हुए सोने या चांदीम
कुछ मिलायर कर सकते हैं। चांदीके स्थानपर सांबेसे मिली हुई घोदी का,
तथा सुवर्णके स्थानपर चादीसे मिले हुए सुवर्णका घे लोग उपयोग करके
उत्तने अशका स्वय अपहरण करसकते है, और यह मिधित सोना चांदी, शुद्ध
सोना चांदीके समान ही प्रतीत होता है। इसलिये अध्यक्षको चाहिये कि वह
इसप्रकारकी मिलावट की सदा निगरानी रखे, और यन्नपूर्वक असली चीजों
की रक्षा करे।
पृपतकाचकर्मणत्रयो हि मागाः परिभाण्डं द्वौ
वास्तुकम्
॥४७॥ चत्वारो या वास्तुकं त्रयः परिमाण्डम् ॥ ४८ ॥
१३ अध्या.] अध्यक्ष प्रचार (८५) इसके पहिले शुद्ध कायमंका विधान करके, अब मिश्र-काचकर्मकी विधि यताते हैं:-पन काधर्म अर्थात् गुटिका आदिसे मिश्रत काचम्मके किये जानेपर, उसके लिये गितना सुवर्ण लिया जाधे, उसके पांच विभाग किये जाये, जिनमें तीन भाग परिमाण्ड भयात् पा स्वस्तिक आदिका आ- कार बनाने के लिये होते हैं, और माग उसका आधारपीठ अर्थात् उस यने हुए आकारको टिकाने के लिये होते हैं ॥ ७ ॥ यदि मगि यी २ होयें, वो उस सुवर्णके सात माग किये जायें, जिनमसे चार भाग पास्तुक (भाधारपीठ), और तीन भाग परिमाण्डके लिये काममहाये जावे ॥१८॥ त्वष्टकर्मणः शुल्नभाण्डं समसुवर्णन संयूहयेत् ।। ४९ ।। रूप्यभाण्डं घनं घनसुपिरं वा सुवर्णार्धनावलेपयेत् ॥ ५० ॥ चतुर्भागसुवर्ण वा वालुकाहिंगुलकस्य रसेन चूर्णन या चासयेद ॥५१॥ अब स्वप्टकर्म अर्यात् तांये चांदी भादिके यनाये जाने वाले घन पत्र आदि कार्योंझा प्रकार बताया जाता है:-तायेके पापके साथ समान भाग सुवर्णका पत्र चढ़ावे । अधात् जितने तांका पान बना हुमा हो, उसके ऊपर उतने ही सोनेका पन चढ़वा देवे ॥ ४९ ।। चांदीके पात्रपर ( अर्थात् आभूषण भादिपर), चाहे यह टोस हो या पोला, चांदीके भारसे आधे सुपर्णका उसपर पानी पदयादै । यदि पचास पल चांदीका आभूपण बना हुआ हो, तो उसपर परास पल सोनेका पत्र या पानी चढ़यादे५० ॥ अथया चौथा हिस्सा सोना लेकर, उसे बालू और शिंगर चूर्ग तथा रसके साथ मिलाकर, तुपकी अग्निपर पिघलाकर वसा देवे, अर्थात् चांदीके उस आभूषण आदिपर पानीको सरद चवाये । इसप्रकार यहातक बरायर भाधे तथा चौथाई सुवर्णके पत्र आदिके द्वारा तीन प्रकारके सहकर्मका निरूपण किया गया ॥५॥ तपनीयं ज्येष्ठं सुवर्ण सुरागं समसीसातिक्रान्तं पाकपत्वपक्क सन्धविकयोज्ज्वालितं नीलपीतश्वेतहारतशुकपोतवर्णानां प्रकृति- भवति ।। ५२॥ अब तपनीय फर्मका निरूपण करते हैं:-आभूषण आदिके लिये तैयार किया हुमा, कमरज आदिके समान स्वच्छ वर्ण यासा, तण शिग्ध भौर घमकदार सुपण ज्येष्ट भयात् उराम समझा जाता है। वह सोना शुद्ध होने के कारण, नील पीत, प हरित राधा शुकपोत (सोतेका बच्चा) के वर्ण के भाभ। पण भादिका प्रकृति भान् कारण होता है। जो सुवर्ण अशुद्ध हो, उसे बरा.
[२ अधिक
-
(१९०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
घरका सीसा ढालकर शुद्ध किया जावे, अथवा उसके पतले २ पग्रसे बनाकर,
भरणे कड़ों को भागमे तपाकर शुद्ध किया जावे। या सुराष्ट्र देश (सिन्धुदेश)
की मट्टी के साथ रगरकर साफ किया जावे । इसपकार मुद करलेनेपर ही यह
नील पीत भादि आभूषणोंका प्रकृति अर्थात् कारण होसकता है ॥ ५२ ॥
तीक्ष्णं चास्य मयूरग्रीवाभं श्वेवभङ्गं चिमिचिमायितं पात-
चूर्णितं काकणिकः सुवर्णरागः ॥ ५३ ।।
इस सुवर्णके साथ फौलादी लोहा भी, नील पीत भादिका कारण होता
है। वह लोहा मोर की गर्दनके समान आभा वाला होना चाहिये । तथा
काटनेपर सफद निकले, और अस्यधिक चमकने वाला हो, उसे गरम करके
चूर्ण बनाकर एक काकणी परिमाण (माषका चौथा हिस्सा ) सुवर्णमें मिरादेवे,
यह सुवर्णक रगको अच्छी तरह चमका देता है ॥ ५३॥
तारमुपशुद्धं वास्थितुत्थे चतुः समसीसे चतुः शुष्कतुत्थे
चतुः कपाले निर्गोमये द्विरे सप्तदशतुत्थातिकान्तं सैन्धविक-
योज्ज्वालितम् ।। ५४ ॥
अथवा लोहेके स्थानपर अत्यन्त शुद्ध चादीको उसमें मिलावे, वहमी
इस प्रकार नील आदिको प्रकृति हो जाती है । हड्डीके चूरे के साथ मिली हुई
मट्टीस बनी हुई भूषा (सोना आदि पिघलाने का पात्र विशेप) में चार पार,
महीके यरायर मिले हुए सीसेके चूरेकी बनी हुई मूषामें चार यार, कटुशर्कराकी
मूषामें चार बार, शुद्ध मट्टी की मूपामे तीन वार, गोयरमे दो यार, इस तरह कुल
सत्रह बार मूषाओं में भावर्तित करके और फिर सारी सुराष्ट्र देशकी महीसे
रगडकर उज्वलवर्ण किया हुआ, तथा संस्कृत किया हुआ रूप्यधातु शुद्ध हो
जाता है॥५४॥
एतस्मात्काकण्युत्तरापसारिता, आद्विमापादिति सुवर्णे देयं
पथाद्रागयोगः, श्वेततारं भवति ॥ ५५ ॥
इसमें से काकी परिमाण (मापका चौथ हिस्सा) चादी लेकर सोने
म मिलादी जाये, तथा उसमें से इतना ही सोना निकाल दिया जावे। इस
तरह क्रमपूर्वक दो मापतक चांदी मिलाई जासकती है, तथा उतना हा सोना
उसमें से कम किया जासकता है । इस प्रकार मुवर्णमें चांदीका प्रक्षप करनेसे
तथा पीसे रगको चमकाने वाली चीका योग करनेसे वह सुवर्ण, चादीके
'समान अत्यधिक चमक धारा होजाता है॥ ५५ ॥
१३ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार अयोऽशास्तपनीयस्य द्वात्रिंशद्भागश्वेततारमूर्छितं तत् श्वेत- लोहितकं भवति ॥ ५६ ॥ तानं पीतकं करोति ॥ ५७ ॥ बत्तीस विभागों में विभक्त किये हुए साधारण सोने में से तीन हिस्से निकालकर, उनकी जगह उक्त प्रकारसे शुद्ध किये हुए उतने ही सुवर्ण को मिला दिया जाये; फिर उसमे बत्तीसवां हिस्सा शुद्ध की हुई चांदी मिलाकर भावना दी जाये, तो वह सुवर्ण सफेद और लाल मिले हुए रंगका होजाता है। (किसी २ व्याख्याकारने इसका अर्थ इस प्रकार किया है:-इत्तीस भागोंमें से तीन भाग शुद्ध सुवर्णके भार थाकी चांदीके होने चाहिये, इनको मिलाकर आयतन करनेपर, उसका रंग सफेद और लाल मिला हुआ हो जाता है। ॥ ५६ ॥ यदि पूर्वोक्त रीतिसे ही चांदीके स्थानपर तांबेको सोनमें मिला दिया जाये, तो वह उसके रंगको पीला बना देता है । (किसी २ व्याख्याकारने इस सूत्रका अर्थ इस प्रकार किया है:-बत्तीस भाग चांदीफे स्थानपर तांबे का उपयोग करके, अर्थात् चांदीके बजाय तांबा यत्तीस भाग लेकर उसमें तीन भाग शुद्ध सोना मिला दिया जावे, तो उसका रंग पीला होजाता है ॥५७॥ तपनीयमुज्ज्वाल्य रागत्रिभागं दद्यात् ॥५८ ॥ पीतरागं भवति ॥ ५९ ॥ साधारण सोनेको, सुराष्ट्र देशकी खारी मिट्टी के द्वारा चमकार, उसमें शुद्ध हुए २ सोनेका तीसरा हिस्सा मिलादेवे ॥ ५८ ॥ ऐपा करनेसे उमका रंग पीला और लाल मिला हुआ सा हो जाता है। (किसी २ व्यारयाकार ने इन दो सूत्रीका अर्थ इस प्रकार किया है:-शुद्ध हुए २ सुपर्ण को सारी सन्मा मट्टीसे चमकाकर, उसमें तीसरा हिस्सा सांबा मिला दिया जाये, ऐसा करनेसे उसका रंग लाल पीला होजाता है) ॥ ५९ ॥ श्वेततारभागो द्वावेकस्तपनीयस्य मुद्गवर्ण करोति ॥ ६० ॥ शुद्ध चांदीके दो भाग और एक भाग सोने का मिलाकर भावना देनेले उसका रंग मूंगके रंगके समान होजाता है ॥ १० ॥ कालायसस्वार्थभागाभ्यक्तं कृष्णं भवति ॥ ६१॥ प्रति- लेपिना रसेन द्विगुणाभ्यक्तं तपनीयं शुकपच्चवर्ण भवति ॥६२॥ तस्यारम्भे रागविशेपेषु प्रतिवर्णिकां गृह्णीयात् ।। ६३ ।। लोहे के आधे भागले मिला हुमा (रंग बदलने के लिये, जितना सोना हो उसका तीसरा हिस्सा लोहा पीरें कहा गया है, उसका आधा भधात् छटा हिस्सा लौका मिला हुआ ) सोना कालेसे रंगका होजाता है ॥ ६॥ ॥ पिघले . (११९२), कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक हुप लोहे तथा शुद्ध, चांदीसे मिला हुआ दुगना सोना, तोतेके पंखांक समान वर्ण वाला होजाता है । ६२ ॥ पहिले को दुए नाल पीत भादिके प्रारम्ममें विशेष : रंगोंकै विषयम, म्यूनाधिकताके भेदको जानने के लिये, प्रत्येक वर्णक का ग्रहण करलेंवे ॥ ६३॥ तीक्ष्णताम्रसंस्कारं च युद्धयेत ॥ ६४ ॥ ससाद्वज्रमणिमु. ताप्रयालरूपाणामपनयिमानं च रूप्यमुवर्णभाण्डबन्धप्रमाणानि चति ॥६५॥ सोनेके रंग बदलने में काम आने वाले लोहे और तावका शुद्ध करना अत्यन्त आवश्यक है। इस लिये उनके शुद्ध करने की विधि भजी तरह जान लेनी चाहिये ॥६४ ॥ उत्तम प्रकारके वन मणि मुक्ता प्रवास आदि में, भसार (घटिया) पत्र मणि आदि मिलाकर कोई उनका अपहरण म करसके, तथा सोने चांदी आदिकी यननेवाली चीजों को न्यूनाधिक मेल करके गहपद न कर सके। इसलिये वज्र मणि मुक्ता आदिके सम्बन्धमें, और सोने चांदी भ भू. पों तथा पानों भादिके यन्ध (सोने चांदी भादिका नियमित मायाम मिलाना) और प्रमाणके सम्पम्घमें अच्छी तरह जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ १५॥ समरागं समद्वन्द्वमशक्तं पृपतं स्थिरम् । मुघिमृष्टमसंवीतं विभक्तं धारणे सुखम् ॥ ६६ ॥ अभिनीतं प्रभायुक्तं संस्थानमधुरं समम् । मनौनेत्राभिरामं च तपनीयगुणाः स्मृताः ।। ६७॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे अशालाया सुवर्णाध्यक्षप्रयोदशो- ऽध्याय:॥३॥ भादितश्चतुसिंघः ॥ ३४॥ सुवर्णके बने हुए भाभूपों में निम्न लिखित चौदह गुण होते हैं:- एकसा रंग होना, भार तथा रूप भादिम एक दूसरे समान होना, बीचमें कहीं गांठ भादिका न होना, टिकाऊ (स्थिर होना, बहुत दिनों तक नष्ट न होना), 'मी तरह साफ़ करके चमकाया हुभा, टीक ढंगपर पना हुआ, विभक अवयवों पाला, धारण करने में सुखकर होना ॥६६॥ साफ़ सुथरा, कान्ति. युट, मनोहर भाकृतिसे युक्त होना, एकसा होना, मन तथा मेनोंको सुन्दर लगने घाला होना, ये चौदह गुण सुवर्णके मने हुए भाभूपों में हुभा करते हैं ॥६॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें तेरहवां अध्याय समापन।
-
,
१.२६ अध्या०
अध्यक्ष-प्रचार
चौदहवां अध्याय
३२ प्रकरण
विशिखामें सौणिकका व्यापार |
सुवर्ण का व्यापार करने वाले व्यापारियोंके बाजार का नाम
विशिखा है। उसमें, सोनेका व्यापार (कार्य) करने के लिये
नियुक्त हुए. २ पुरषोंकि कार्यों का इस प्रकरण में निरूपण किया
जायगा।
सावर्णिकः पौरजानपदानां रूप्यसुवर्णमावेशनिभिः कारयेत्
॥१॥ निर्दिष्टकाल कार्य च कर्म कुर्युः, अनिर्दिष्टकालं कार्या-
पदेशम् ॥२॥
सौचर्गिक ( भाभूपण मादिका बड़ा व्यापारी पुरप), नगर निवासी
तथा पानपद निवासी पुरपॉके सोने चांदीके आभूपों
शिरपशालामें काम
करने वाले, सुनारोंके द्वारा तैयार करावे ॥ ॥ शिल्पिोको चाहिये कि वे
अपने नियत समय तथा वेतन आदिका निर्णय करके कार्य करें । कायकी पुरता
अधात् कार्य की अधिकता होनेपर नियत समय आदिका निर्देश किये पिनामी
वे लोग कार्य कर सकते है। तात्पर्य यह है कि कार्य यथावश्यक ठीक पादेके
अनुसार ही कर देना चाहिये ।॥ २॥
कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशः तद्विगुणश्च दण्डः ॥३॥
कालातिपातेन पादहीतं चेतनं तद्विगुणश्च दण्डः ॥४॥
यदि कोई शिष्पी कार्यको अन्यथा करदेवे, अर्थात् उसे कुण्डल बनाने
को दिये जाय और रचक बनादेये, तो उसके वेतन ( मजदूरी) को जब्त
कर लिया जावे, तथा नियत घेतमसे दुगना दण्ड दिया जावे ॥३॥ यदि कोई
कारीगर ठीक वादेपर काम करके देवे, तो उसे नियस घेतन पाना वेतन
दिया जाये, अर्थात् वेतन का चौथाई हिस्सा जब्त कर लिया जाये ।
भार जितना बेता उसको दिया जावे, उससे दुगना दण्ड और अतिरिक्त दिया
जावे ॥१॥
यथावप्रमाणं निक्षपं गृहयुस्तथाविधमेवाप्येयुः ॥५॥
फारीगर लोग जिस सरह का तथा जितना सोना चांदी आदि, आभूषण
पनाने के लिये सेवे, उसी तरहका (यहां पर सुवर्गक रूप आदिकी समानता
अपेक्षित है ) तथा उतने ही धजनका आभूषण बनाकर देईघे ॥ ५॥
( १९४) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक कालान्तरादपि च तथाविधमेव प्रतिगृह्णीयुरन्यत्र क्षीण- परिशीर्णाम्याम् ॥ ६ ॥ सोना आदि देनेवाले पुरुष, कालान्तरमें भी (अर्थात् जिस सुनारको उन्होंने सोना, आभूषण आदि यनानेके लिये दिया है, उसके परदेस चले जानेपर या अकस्मात् मरजानेपर, उसके पुनादि से) उसही प्रकारके सोनेको पापस लेवें)। यदि उनका यह सोना भादि नष्ट होगया हो, या कुछ लीज गया है, तो उसके लिये शिल्पी अवश्यही दण्डभागी होगा । तात्पर्य यह है कि परदेस जाने आदि की याधासे यदि घाम कुछ विलम्ब होजाय, तो कारीगरकी वेतन हानि न कीजाय, और न उसे कोई दण्ड दिया जावे । परन्तु सुवर्ण भादिके नष्ट होजापर या कुछ न्यून हो जानेपर दण्ड होना मावश्यक हे ॥६॥ आवेशनिभिः सुवर्णपुद्गललक्षणप्रयोगेपु तत्तज्जानीयात् ॥७॥ तप्तकलधौतकयोः काकणिकः सुवर्णे क्षयो देयः ॥ ८ ॥ शिल्पियोंके द्वारा किये जाने वाले सुवर्ण (उनको संस्कृत करके कमल रजके समान यना देना , पुद्गल (आभूषण भादिका भृङ्गार-सुवर्णसे बना हुभा पानविशेष), तथा लक्षण (मुद्राचिन्ह) आदिके प्रयोगोंमें, उनकी विधि तथा अन्य सपही दाताको सौवर्णिक पुरुष अच्छी तरह जाने । अर्थात् इन सयही विषयों में सौवर्णिक पुरषको अच्छी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये, जिससे कि उनकी देखरेखमें कार्य करते हुए शिल्पीजन, सुवर्णादिका अपहरण न कर सकें ॥ ७॥ अशुद्ध चाँदी तथा सोनेको यदि भाभूपण बनाने के लिये दिया जाये, तो सुवर्णकारको सुवर्णमें एक काकी छीजन देनी चाहिये । अर्थात् सोलह मापक सुवर्णके पीछे एक काकणी (एक मापकको चौधा हिस्सा सोना, भांभूपण बनवाने वाले पुरषको सुनारसे कम लेना चाहिये। क्योंकि इतना सोना, शुद्ध करते समय डीजनमें निकल जाता है ॥ ८॥ तीक्ष्णकाकणीरूप्यद्विगुणो रागप्रक्षेपस्तस्य पढ्भागः क्षयः ॥९॥ वर्णहीने मापावरे पूर्वः साहसदण्डः ॥१०॥ सोनेका रङ्ग पदरनेके लिये, एक काकणी लोहा और उससे दुगनी चौदी उसमें मिलायी जावे, इसने लोहे और चोदीकी मिलावट सोलह मापक सुवर्णमें करनी चाहिये इतने सुवर्णम, मिलावट (एक काकणी लोहा और दो काणी चोदी) का छठा हिस्सा अर्थात् आधी काणी छीजनके लिये निकाल देनी चाहिपे ॥ ९॥ म्यूनसे म्यून यदि एक भाव सुषणको, सुपर्णकार वर्णहीम
२४ अध्या०]
अध्यक्ष-प्रचार
(अर्थात् अपनी अज्ञानतासे कान्ति रहित) मनादेवे, तो उसे प्रथम साहस
दण्ड दिया जाये ॥१०॥
प्रमाणहीने मध्यमः तुलाप्रतिमानोपघावुत्तमः कृतभाण्डो-
पधौ च ॥ ११ ॥ सौपर्णिकनादृष्टमन्यत्र या प्रयोगं कारयता
द्वादशपणो दण्डः ॥ १२ ॥ कर्तुगुिणः सापसारथेत् ॥ १३ ।।
सोलमें एक माप सोना कम होनेपर शिल्पीको मध्यम साहस दण्ड
दिया जाये । 'सराजू बाटम यदि कोई कपट करे, तो उसे उत्तम साहस दण्ड
दिया जाये। इसी प्रकार जो पुरुष, यनकर तैयार हुए २ पाम भादिक इधर
उधर परिवर्तन करनेमें उल कपट करे, उसे भी उत्तम साहस दण्ड दिपा
जाये ॥ ११ ॥ सावर्णिककी अनुमति के बिना ही अथवा अनुमति लेकर भी
विशिखासे बाहर जाकर यदि कोई पुरुष भलार आदिका निर्माण किसी
शिल्पीसे करपाचे, तो उसको पारह पण दण्ड दिया जाने ॥ १२॥ भोर कार्य
करने वाले कारीगर पुरुषको कराने वाले से दुगना दण्ड दिया जावे। परन्तु यह
दण्ड,कार्य करने और कराने बालेको उसी समय समझना चाहिये, जबकि
उनके विषय में चोरी आदिको भाशा कुछ भी न हो ॥ १३ ॥
अनपसारः कण्टकशोधनाय नीयेत ॥१४॥ कर्तुथ द्विशतो
दण्डः पणच्छेदनं वा ॥ १५ ॥
यदि उनपर चोरी आदिकी आशाहोचे, तो कार्य करानेवाले पुरपको कण्टक-
शोधनाधिकारी (प्रदेष्टा ) के समीप उसके भपराधका यथार्थ निर्णय करानेके
लिये लेजाया जाये और कार्य करने वाले कारीगर व्यक्तिको दोसौ पण
दण्ड दिया जाये; यदि वह इतना धन देने में असमर्थ हो, तो उसकी अंगुलियां
काटदी जावें ॥ ५॥
तुलाप्रतिमानभाण्डं पौतवहस्तात्तीणीयुः ॥१६।। अन्यथा
द्वादशपणो दण्डः ॥ १७ ॥
सुवर्णकाको शाहिये, कि वे सोना आदि तोलनेके लिये कोटा और
उसके छोटे पड़े सब तरहके याट भादि, पौतवरध्यक्षके पाससे खरीद लवें;
और उन्हीं के भनुसार तोलने भादिका व्यवहार करें ॥ १६ ॥ यदि घे स्वयंही
कांटा भादि पनाकर उसका उपयोग करें, या पौत्तवाध्यक्षस न लेकर और कहीं
से लेलैयें, तो उन्हें बारह पण दण्ड दिया जाये । १५ ॥
धनः धनसुपिरं संयूह्यमवलेप्यं संघात्यं वासितकं च कार-
कर्म ॥१८॥
[२अधिक (१९६) कौटलीय अर्थशास्त्र धन अर्थात् अंगूठी आदि ठोस भाभूषण), घनमुपिर (उपरसे ठोस मालूम होने वाले, पर भीतरसे पोले कड़े भादि भाभूषण), संयूझ (जिनके उपर मोटा पत्र चढ़ा दिया जाये, ऐसे आभूषण भादि) भवलेप्य (जिनके ऊपर पतला पत्र चढ़ाया जाये), संघात्य (जिस आभूषणको थोड़ा २ जोड़कर बनाया जावे, जैसे तगड़ी जंजीरी आदि) तथा वासितक (जिन आभूपोंको रस भादिसे वासित किया जाये); ये छः प्रकारके शिल्पियोंके कार्य होते तुलाविषममपसारणं विसावणं पेटको पिङ्कश्येति हरणोपाया: ॥ १९॥ इन कार्योंको करते हुए सुवर्णकार निम्नलिखित रीतिसे सुवर्ण आदिका अपहरण कर सकते हैं:--तुलाधिपम, अपहरण, विसावण, पेटक और पिङ्ग ये पांच अपहरणके उपाय हैं। अगले सूत्रोंमें इन्हींका यथाक्रम विस्तार पूर्वक निरूपण किया जाता है।--॥ ९५ संनामिन्युत्कीर्णिका भिन्नमस्तकोपकण्ठी कुशिक्या सकटु- कश्या पारिवल्ययस्कान्ता च दुष्टतुलाः ॥ २० ॥ पहला उपाय है-नुलाविपम, अर्थात् राराणू या काटेका ठीक न होना; निम्नलिखित भाठ प्रकारको तुला विषम ( अर्थात् ठीक २ मतोलने वाली, जिनके द्वारा तोलने में झट बेईमानी कीजासके, ऐसी) होती हैं,:-सनामिनी (हलके लोहेसे यनाई हुई, जो अंगुली लगानेसे यथेच्छ चाहे जिधरको झुकाई जासके), उत्करणिका (जिसके भीतर छेदोम लोहे भादिका चूरा भरा हुआ हो), भिन्नमस्तका (जिसके भागेके हिस्सेमें छेद हुए २ हो, उन छेदोंको पायुकी भोर करके यदि तोला जावे, तो भागेकी ओरसे घायु, उस तराजूको नीचेकी भोर झुका देती है), उपकण्ठी (जिसमें बहुत गांठेसी पदरही हो,), कुशिश्या (जिसका शिक्य अर्थात् पलड़ा बहुत ही खराब हो), जिसकी दोरी आदि अच्छी न हों, लगातार हिलने वाली, ऊपर डण्डी में अयस्कान मणि लगाकर बनाई हुई, ये भाउ प्रकारको तराभू दुष्ट होती हैं, इनके द्वारा सुवर्ण भादिका अपहरण किया जासकता है । इसीका नाम तुलाविषम है ॥२०॥ रूप्यस्य द्वौ भागावकं शुल्बस्य त्रिपुटकम् ॥ २१ ॥ तेना. करोगतमपसार्यते तत्रिपुटकापसारितम् ।। २२ ॥ भसार इम्पको मिलाकर सारदम्पका अपहरण करलेना। इस तरहका भपसार चार प्रकारका होता है।-निपुटकापसारित, शुरुवापसारित, पेशकार , ४ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (१९७) सारत और हेमापसारित । इनका यथाक्रम निरूपग किया जाता है:-दो हेस्पा चांदी और एक हिस्सा तांबा मिलाकर जो मेल तैयार किया जावे, उसका नाम 'निपुटक' है॥२१॥ शुद्ध सुवर्णमें यह निपुटक मिलाकर उस- से उतनाही सोना निकाल लिया जाये, और उस सोनेको किसीके खोटा बतलानेपर कह दिया जाचे, कि यह तो सानसेही इस तरहका अशुद्ध सोना नेकला है। इसमकार निपुटकके द्वारा जो अपहरण किया जाये, उसका नाम त्रिपुटकापसारित है ॥ २२ ॥ शुल्वेन शुल्बापसारितम् ॥ २३ ॥ वेल्लकन वेल्लकापसारि- तम् ॥ २४ ॥ शुल्वार्धसारेण हेम्ना हेमापसारितम् ॥ २५ ॥ जो केनल तांगा मिलाकर अपहरण किया जावे, उसे शुल्पापसारित कहते है ॥ २३ ॥ लोही भौर चांदी मिलाकर जो मेल तैयार किया जावे, उसे 'वेलक' कहते हैं । फिर उस वेलकको सुवर्णमें मिलाकर जो सुवर्णका अपह- रण किया जाता है, उसे 'बेल्लकापसारित' कहते हैं ॥ २४ ॥ तावके साथ आधा सोना मिलाकर, उस मेलको फिर सोनेमें मिलाकर जो सोनेका अपहरण किया जाता है, उसे हेमापसारित कहते हैं ॥ २५ ॥ मूकम्पा पूतिकिट्टः करटकमुखं नाली संदंशो जोङ्गनी सुपर्चिकालवणम् ॥२६॥ तदेव सुवर्णमित्यपमरणमार्गाः ॥२७॥ असार व्यको मिलाने और सार व्यके अपहरण करने का दा यह हैः-मूकमूषा, प्रतिकिह (लोहे का मैल', करटकमुख (सोना आदि करारनेकी कैंची, कतरनी या कतनी), नाली (नाल प्रसिद्ध है), संदंश (संदासी), जोगनी ( लोहेकी छड़सी जिससे आग आदि कुरेदी जाय ), सुपर्चिका (शोरा क्षार ) तथा नमक । तारपर्य यह है-जब शुद्ध सुवर्णको बन्द मूपामें डालकर तपाया जाता है, तब उसके मलको निकालने के पहानेसे, शोरा या नमक मादि क्षारोंकी जगह पर, पहिलेसे तैयार किये हुए निपुटक आदिके पूरेको उस तपते हुए शुद्ध सुवर्णमें डाल दिया जाता है। और फिर कतनी या संहासी भादि भौजारोंके द्वारा उसमें से उतनाही शुद्ध सोना निकाल लिया जाता है। इस तरह सुनार, लोगांके देखते हुए भी सोने आदिका अपहरण कर लेते है।॥ २६ ॥ जय कहा जाय कि तुमने यह सोगा ग्योटा कर दिया, तो कहते हैं कि यह यही सोना है जो हमने आपसे लिया था, यह खानसे इसी प्रकार- का निकला मालूम देता है। ये अपसरणके मार्ग है ॥ २७॥ पूर्वप्रणिहिता वा पिण्डवालुका मूपाभेदादगिष्ठा उद्धियन्ते ॥२८॥ - [२ अधिक (१९८) कोटलीय अर्थशास्त्र अथवा पहिस्सेही उस आगमें भिश धातुओंकी पारीक वालुकासी शादी जाती है, और फिर मूपाको जव अग्निमें रक्ग्वा जाता है, तो यह यहाना करके कि मूषा टूटगई है, और उसमेंसे यह पिघली हुई धातुझी वालुकासी निकलपड़ी है, उस सबको अग्निमसे उठाकर मारिकके सामनेही सोने में मिला दिया जाता है, भौर उपयुक्त रीतिसे उतनाही सोना उसमेसे निकाल लिया जाता है। यहमी अपसारणका एक उपाय है ॥२८॥ पश्चाद्वन्धने आचितकपचपरीक्षायां या रूप्यरूपेण परिवर्तन *विसारणम् ॥२९॥ पिण्डवालुकानां लोहपिण्डवालकाभिर्या ॥३०॥ पहिले वनाईहुई चीजके पीछेसे जोड़ने में, अथवा बहुतसे पन्नों की परीक्षाके समय में, चोदीसे सोने का बदल ऐना, अर्थात् खरे सोनेको निकाल कर खोटा सोना लगादेना विसावण' कदाता है। यह विचावणका एक प्रकार है ॥ २९ ॥ सोनकी खानसे पैदा हुई २ यालुकाको, लोहेकी खानमें पैदाहुई पालकाओं के साथ यदल देनागी विनायण कहाता है । यह विनावण का दूसरा प्रकार है ॥ ३०॥ गाढवाभ्युद्धार्यश्च पेटका संयूह्यारलेप्यसंघात्यपु क्रियते ॥ ३१ ॥ सीसरूपं सुवर्णपणावलिप्तमभ्यन्तरमष्टकेन वद्धं गाढपेटकः ।। ३२ ।। स एव पटलसंपुटेष्वम्युद्धार्थः ॥ ३३ ॥ पेटक दो प्रकारका होता है, एक गाद और दूसरा अभ्युद्धाय । इस उपायका प्रयोग सयूद्ध अवलेप्य तथा सघास्य कभि किया जाता है ॥३॥ सीसेके पत्रको सुवर्णक पनसे मठकर, तथा याच अष्टक अर्थात् लास आदिके रससे अच्छी तरह रहताके साथ जोड़कर जो बन्धन किया जावे, उसे 'गाढ पेटक' कहते हैं ॥ ३२॥ वही यन्धन, यदि उसमें लाख आदिका रस, जोडकी दृढताक लिये न लगाया जाये, और इसीलिये जो सरलताले उपडसकने योग्य हो, अभ्युदायोटक कहाता है। इस प्रकार सारासार दम्पोंके बरावरके सयूहनमें सुवर्ण भादिका अपहरण करलिया जाता है ॥३३॥ पत्रमाश्लिष्टं यमरुपचं यावलेप्येषु क्रियते ॥ ३४ ॥ शुल्नं तारं या गर्भः पचाणाम् ।। ३५ ।। अवसेप्य कमि एक और या दोनों भोर पतपासा सोनेका पन्न जोड़कर, उसमेसे कुछ गुद सुवर्णका अश अपहरण करलिया जाता है ॥३४॥ सपा भवलेप्य कमिडी बाहर पग्न छगानेके बजाय, सुषर्ण पत्रों के बीच में १४ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार ' (१९९) सावे या चांदीका पत्र रवाकर उसके सरायर सोनका अपहरण करीलया जाता संघात्यपु क्रियते शुल्वरूपसुवर्णपचसंहतं प्रमृष्टं सुपार्श्वम् ।। ३६ ॥ तदेव यमकपत्र संहतं प्रमृष्टं ताम्रताररुपं चोचरवर्णकः संपारय कमि, ताये की चीजको एक और सौमक पोंसे मटकर, उसे खूप धमकाकर, एक ओरफे हिस्सेको सूर्य सुन्दर बना दिया जाता है ॥३६॥ उस ही तावेकी चीजके दोनों और सोनक पत्र चहा दिये जाते है, तथा इसे भरी तरह साफ करके चमका दिया जाता है। ऐसा का इससे कुल्ल अंश सोनका निकाल लिया जाता है। (को व्याख्याकार पहिले सूनमें यताये कार्य को 'सुपा' और इस सूत्रम यताये हुए को प्रष्ट' माम देते तदुभयं तापनिकपाभ्यां निःशब्दोल्लेसनाभ्यां वा विद्यात् ॥३८॥ अभ्युद्धार्य बदराम्ले लवणोदके वा साधयन्तीति पेटका ॥ ३९ ॥ भय पेटककी परीक्षा का प्रकार यतलाते हैं-वादपेट तथा अभ्यु- दार्यपेटक इन दोनों की ही अभिम सपने और कसाटी पर घिसनेसे परीक्षा करे । अथवा हलकीसी वोट देकर (जिस घोटके देनेपर मन न हो), या किमी तीक्ष्ण वस्तुसे निभान देकर या सासी खीचकर इनकी परीक्षा करे ॥३०॥ अभ्युदार्य पेटरको परीके अम्ल रसम तथा नमकके पानी में डालकर मी परीक्षा किया जाता है। ऐसा करनेसे उसका र कुर साल्सा होजाता है। यहां तक अपहरण पेटक' नामक उपायका निरूपण किया गया ॥ ३९ ॥ घनसुपिरे या रूपे सुवर्णमृन्मालुकाहिङ्गुलुककल्को वा तप्तो शतिष्ठते ॥ ४० ॥ दबास्तुके का लऐ रालुकानिनजान्धार- पडो वा तप्तो ऽवतिष्ठते ।। ४१ ।। श्रय पांच प्रकारके पिका, तथा उसकी परीक्षामा यथाक्रम निरूपण किया जायगा --ठोस अयया पोले कडे आदि भाभूपों म, सुवर्णमृत, सुवणं- मालुका और शिगरफका फहक मप्तिम तपाका सगा दिया जाता है। यह एक अपनप या असाव्य है, इसकी भाभूपी में मिलाकर, उतनाही शुद्ध सोना उसमेंसे निकाल लिया जाता है। (सुवर्णमृत् । और सुवर्णमालुका, ये दोनों मी कोई विशेष धातु ही हैं). | मिम भाभूपणका वास्तुक (भास्
[२ अधिक
(२००) कौटलीय अर्थशास्त्र
पीठपन्ध आधारभूत माग) भरछी तरह न हो, उसमें, साधारण धातुओं-
की पालुकाकी लाख और सिन्दूरके पक्ष (कीचा दोनोंका एक साथ घुले हुए
होना ) में मिलाकर तथा उन्हें अग्निम सपाकर लगा दिया जाता है। और
उसकी परामरका सोना उससे निकाल लिया जाता है ॥४॥
तयोस्तापनमवध्वंसनं या शुद्धिः॥४२॥ सपरिभाण्डे वा
रूप लवणमुल्कया कटुशर्करया तप्तमवतिष्ठते ॥४३॥ तस्य
काथनं शुद्धिः॥४४॥
ठोस पोले तथा दृढवास्तुक अलारों को अग्निम तपाना, तथा उनपर
यथावश्यक घोट देना, उनके शोधनका उपाय है ॥ ४२ ॥ ददार मणिबन्ध
भादि आभूषणोंम, नमक को छोटा २ कंफाड़ियों के साथ लपy चाली आगमें
तपाकर रख लिया जाता है॥३॥ रीके भम्ल रसमें उबाल कर उसकी
शुद्धि होजाती है ॥ ४॥
अन्ध्रपटलमष्टकेन द्विगुण वास्तुके वा रूपे वध्यते, तस्य
पिहितकाचकस्योदके निमज्जत एकदेशः सीदति, पटलान्तरेषु
चा सूच्या भिद्यते ॥४५॥
अभ्रपटल (अभक ', अपनेसे दुगने पास्तुक (आभूषणों के लिये तयार
किये हुए सुपर्ण भादि) मे लास भादिके द्वारा जोरकर रस लिया जाता है।
उसकी परीक्षा का प्रकार यह है -उस सुवर्ग के आभूषणों को, जिसमें अभ्रक
मिला हुभा होचे, येरीके अम्ल जलमें छोड़ दिया जाये, उस भाभूपण का थोडा
सा हिस्सा ही पानीम इयेगा, शिस भोर अभ्रक होगा यह नहीं डूबेगा । यदि
अनपटल के स्थान पर ताम्रपटल का ही भाभरण आदि में मेल फिया
गया हो, तो उसकी परीक्षा किसी सूई से निशान करके ही टीक तौरपर
हो सकती है। १५॥
मणयो रूप्यं सुवर्ण वा धनसुपिराणां पिकः ॥ ४६ ॥
तस्य तापनमयध्वंसनं वा शुद्धिरिति पिकः ॥४७॥
ठोस तथा पोले आभूषमि मणि (काच मणि भादि), चांदी तथा
अशुद्ध सुवर्ण का मेल करके पित नामक उपाय द्वारा शुद्ध सुवर्ण का अपहरण
किया जासकता है ॥४५॥ उससे अग्निमें सपाना तथा उसपर चोट देना ही
उसके शोधन का प्रकार है। ऐसा करनेसे उसकी धास्तविकता की परीक्षा हो
जाती है। यहां तक पिका निरूपण किया गया ॥४॥
। १४ अध्या अध्यक्ष प्रचौर 9821 १२०१ ) तस्माजमणिमुक्ताप्रवालरूपाणां जातिरूपवर्णप्रमाणपुद्गल- लक्षणान्युपलभेत ॥४८॥ इसलिये सायणिक को चाहिये कि यह पत्र मणि मुक्ता तथा प्रवाल इन घाकि जाति । उत्पत्ति), रूप ( भाकीर), वर्ण (ग), प्रमाण (मापक आदि परिमाण), पुदल (आभरण), और लक्षण अर्थात् चिन्ही को भग्छी तरह जाने । जिससे कोई भी व्यक्ति, किसी उत्सम यस्तुका अपहरण में कर सके ॥४॥ कृतमाण्डपरीक्षायां पुराणमाण्डप्रतिसंस्कारे या चत्वारो हरणोपायाः ॥ ४९ ॥ परिकुट्टनमवच्छेदनमुल्लेखनै परिमर्दनं या ॥ ५० ॥ पात्र तथा भाभरण आदिके निर्माणके अनन्तर परीक्षा समय में, उसमें से सुवर्ण आदिका अपहरण करनेके चार उपाय होते हैं:-॥ ४२ ॥ परिकुवन अवच्छेदन, उल्लेखन और परिमईन ।। ५०॥ पेटकापदेशेन पृपतं गुणं पिटकां या यत्परिशातयन्ति तत्प- रिकंट्टनम् ॥५१॥ यद्विगुणवास्तुकानां वा रूपे सीसरूपं प्रक्षिप्याभ्यन्तरमवच्छिन्दन्ति तदवच्छेदनम् ।। ५२ ।। पूर्वोक्त पेटक उपायकी परीक्षा करने के बहानेसे, छोटी २ गोली, कई मादिका थोडासा हिस्सा या कुछ अधिक हिस्सा, जो किसी आभूपण आदिसे सुनार कार लेते हैं, उसका नाम ' परिकुटन' है ॥ ५१ ॥ बहुतसे पन भीदि को जोड़कर पनाये हुये आभूपणों में, तथा सोमेसे मढ़े हुए कुछ सासे के पत्रों को मिलाकर, फिर भीतरसे काटकर सुवर्ण निकाल लेना 'पदन' कहाता है ॥ ५२॥ यद्धनानी तीक्ष्णेनोलिमुन्ति नदुरलेसनम् ।। ५३ ॥ हरि- तालमनःशिलाहिङ्गुलकचूर्णानामन्यतमेन कुरुविन्दचूर्णेनं वापसे संयूख यत्परिमृद्गन्ति तत्परिमर्दनम् ।। ५४ ॥ सुमार ठोस पापोंको तीक्ष्ण मौजार भादिसे' खोद देते हैं, उसे 'छेखन ' कहते हैं ॥ ५५॥हरताल, मनसिल तथा शिंगरफके घरेके साथ सपा कुरुविक (एक तरह का परपर) के के साथ कड़े को समिकर उससे मैं भीभूषण भादिको रंगड़ी जाती है, इसकी माम परिमर्दन ' दो .
Aur द पनासे बने कौटलीय अर्थशास्त्र (२०२) ૨ अधिक तेन सौवर्णराजतानि भाण्डानि क्षीयन्ते ॥५५॥ न चैपां किंचिदवरुग्णं भवति ॥ ५६ ॥ ऐसा करनेसे सोने तथा चादीक आभरण आदि घिस जाते हैं ॥ ५५ ॥ परन्तु इनम किसी तरहकी चोट या विकारकी प्रतीति नहीं होती। इस प्रकार मामूपण आदिको काटे बिना ही सुवर्णके अपहरण करनेका यह एक उपाय है॥५६॥ भग्नसण्डघृष्टानां संयूह्यानां सदृशेनानुमानं कुर्यात् ॥ ५७ ।। अपलेप्यानां यावदुत्पाटितं तावदुत्पाट्यानुमानं कुर्यात् ।। ५८ ।। हुए आभूषणोंके, परिकुदन भवच्छदन तथा घिमनेसे जितन हिस्स का अपहरण किया गया हो, उसका अनुमान, उसक समान जातीय शप अवययोंसे करे ॥ ५७ ॥ भवलेप्य अर्थात् जिन भाभूपण आदिपर सोनेका पतला पत्र ऊपर चढा हुभा हा, उनपरसे काटे हुए सान के हिस्स का उतनी ही दूक दूसरे हिस्सको काटकर जाने । अर्थात् उस टे हुए हिस्से के परिमाणका उतने ही दूसरे हिस्ससे अनुमान करे ॥ ५८॥ विरूपाणा वा तापनमुदकपेपणं च यहुशः कुर्यात् ॥ ५९॥ जिन मामूपण आदिमें यहुत अधिक अपद्रव्य मिलाकर उन्हें विरूप बना दिया गया हो, उनकी हानिके परिमाणका अनुमान, उसके साश अग्य भाभूषणोंक द्वारा किया जाये। उनको अनिमें खूब तपाकर तथा फिर जलमें फेंककर उनपर धार २ घाट देना ही उनके शोधन का उपाय है। भपहरणके परिमाणको जाननेका प्रयोजन यही है, कि उसके अनुसार अपहरण करनवाले पुरुषको, पूर्वोक्त प्रथमसाहस आदि दण्ड दिये जा ॥ ५९॥ 'अवक्षेपः प्रतिमानमनिर्गण्डिका भण्डिकाधिकरणी पिच्छः सूतं चेलं पोल्लनं शिर उत्सगो मक्षिका स्वकायेक्षादृतिरुदकश- रावमिष्ठमिति काचं विद्यात् ॥ ६ ॥ पूर्वोस अपहरणके उपायोंके अतिरिक्त, भवक्षेप भादि अन्य उपायोंका भी निरूपण करते है-भवक्षेप { अपने हस्तलाघव अधात् चतुराई से देखो हुए भादमीके सामने भी सार दम्य का अपहरण करके उसमें असारदष्य का मिला देना), प्रतिमाम (बदला करनेके द्वारा भपहरण करना), अमि अप्ति के नीचर्म हाण करना), गणिक (जिसपर रखकर सोमे को घोट लगाई खा), मण्डिका (सोनेका मैल आदि रखने का पात्र, अयथा पिघले हुए सोनेक रखने का पात्र), अधिकरणी (लोहेका बना हुमा साधारण सुवर्णके - १४ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२०३) रखनेका पा), पिंछ ( मोर पेंच), सूम, (सुवर्णकी तराजू की रस्मी), चेल (वस्त्र), बोलन (कहानी के बहानसे देखने पालेका पान पटाना), शिर (लिरका खुजाना आदि), वस्संग (गोद या अन्य गुह्य स्थान ), मक्षिका (मक्खीके उड़ानेके बहानेसे द्रव धातु को अपने अंगसे लगा लेना , पसीना भादि दिसानेका पहाना, धौंकनी, जलका शोरा, अग्निमें डाला हुआ भए. दम्या ये सय अपहरण के उपाय जानने चाहिये ।। ६० ।। राजतानां विसं मलग्राहि परुष प्रस्तीनं विवर्ण वा दुष्ट- मिति विद्यात् ।। ६१ ॥ जो मामूपण चांदी के बने हुए हो, उनमे पांच प्रकारके दोपके चिन्ह होते हैं:-विस (सीसा आदिक संसर्गसे दुर्गम्भका आने लगना), मलिन हो जाना, कठोर ( अर्थात् सर्ग करते समय परखरा मालूम होना ), कठिन होजाना ( अर्थात् मृदुताका न रहना), और पिवणं अधात अपदव्य के मिलने से कान्तिहान होजाना, ये पांच प्रकारके दोप चांदीके यने आभूषणोंमें अप- द्रव्य मिलानेसे होजाते हैं । ( इसके शोधनका प्रकार, पूर्व अध्याय में ( अस्थि- सुत्थे चतुः समसीस चतुः' इत्यादि सूत्रसे बता दिया गया है। ॥ ६ ॥ एवं नवं च जीर्ण च विरूपं च विमाण्डकम् । परीक्षतात्ययं चैषां यथोद्दिष्टं प्रकल्पयेत् ॥ ६२ ।। इत्यध्यक्षमचारे द्वितीये ऽधिकरण मिशिसायां सौवणिकप्रचारः चतुर्दयो:- उज्यायः॥१४॥ भादितः पश्यत्रिशः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार नये और पुराने, विरूप या विकृत किये हुए पाम्रो आभूषण आदि को असी तरह परीक्षा करके जाने। और फिर उस मिलावट के अनुसार अपराधियोंके दण्डकी व्यवस्था करे । (जैसा कि वर्णहोने मापकावरे' इत्यादि सूनास प्रतिपादन कर दिया गया ह)॥ ६२ ॥ मध्यक्षपचार छितीय अधिकरणमें चौदहवां अध्याय समा!
कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक (२०४) पन्द्रहवा अध्याय ३३ प्रकरण कोष्ठागाराध्यक्ष। (कोष्ठ' पेटको कहते हैं। उसके लिये जो धान्य, तेल, घी, ममक आदि साने योग्य पदार्य होते हैं, उनका भी नाम कोट है। उन पदार्थों के समह तथा रक्षाके रिये जो स्थान बनाये जायें, उन 'कोष्टागार' कहते हैं। और उनके अध्यक्ष का नाम कोष्ठागारा ध्यक्ष होता है, उसके कार्योंका विस्तृत निरूपण इस प्रकरण में किया जायगा। कोष्ठागाराध्यक्षः सीताराष्ट्रकयिमपरिवर्तकपामित्यकापमि- त्यकसिंहनिकान्यजातव्ययप्रत्यायोपस्थानान्युपलभेत ॥१॥सी. ताध्यक्षोपनीतः सस्थवर्णकः सीता ॥२॥ कोठागाराध्यक्ष को चाहिये, कि वह सीता, राष्ट्र, क्रयिम, परिवर्तक, प्रामिश्यक, भापमिश्यक, सिंहनिका, अन्य मात, श्ययमस्याय और उपस्थान इन दस पातोंका अच्छी तरह चिन्तन करे। इन सबका यथाक्रम विवरण दिया जाताहै-1सीताध्यक्ष (धान्य आदि राजकीय करका ग्रहण करने घाला अधिकारी) के द्वारा कोठागारमें पहुचाये हुए प्रत्येक जातिके धान्यका नाम सीता है । कोष्टागाराध्यक्षको चाहिये कि वह शुद्ध और पूर्ण सीताको लेकर यथोचित कोशागारमें रक्खे ॥२॥ पिण्डकरः पड्भागः सेनाभक्तं पलिः कर उत्सङ्गः पार्श्व पारिहीणिकमौपायनिकं कौष्ठेयकं च राष्ट्रम् ॥ ३॥ पिण्डकर (उन २ गायोंसे दिया जाने वाला नियत राजकीय कर), प्रमाग (रामदेय, अनादिका छठा हिस्सा), सेनाभक्त (सेनाके भाक्रमण काने समय में सेल पूत घायल नमक भादि विशेष राजदेय भाग । किसी२ प्याण्याकारम सैनिकों को चायल तथा अन्य हिरण्य भादि देनेके समयमै उमद्वारा दिये जाने पाले धनादिके कुछ अश' ऐसा अर्ध किया है), पछि (3 हिस्सैसे अतिरिक्त रामदेय भा), कर (जह तथा पृक्ष भादिके सम्बन्ध का राजदेय भश), उरसन (राजाके पुग्न जम्मादि उत्सव होनेपर पार जान. पीके द्वारा दिया हुआ विशेष धम), पार्थ (उचित कर से अधिक प्रहण करना। योगच पबम मधिकरणके, दूसरे भन्यायमें इसका निरूपण किया गया १५ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२०५) है), पारिहीणिक (चौपायोंसे विगाड़े हुए धान्य आदिक दण्ट रूपमें माष्ठ हुआ २ धन), धौपायनिक (भेटमें प्राप्त हुआ २ धन), भौर कौठेयक (रागाके द्वारा बनवाये हुए तालाब और बगीचोंसे प्राप्त होने वाला), यह दस प्रकार का राष्ट्र होता है ॥ ३॥ धान्यमूल्यं कोशनिहार प्रयोगप्रत्यादानं च ऋयिमम् ॥४॥ सस्यवर्णानामन्तिरेण विनिमयः परिवर्तकः ॥५॥ ससंयाच- नमन्यतः प्रामित्यकम् ।। ६ ।। धान्यमूल्य (धान्य भादिको वेचकर मूल्य रूपमें प्राप्त हुआ २ हिरण्य मादि), कोशनिहार (हिरण्य आदि देकर खरीदा हुआ धान्य भादि), तथा प्रयोगपत्यादान (व्याज आदिसे प्राप्त हुए अधिक धान्यका कोठागारमें जमा फरना), यह तीन प्रकारका प्रयिम होता है ॥ ५ ॥ मिरा र जातिके भाम्यासे अन्य भिन्न जातिके धान्योका न्यूनाधिक परिमाणमै पदला करना, जैसे एक मस्थ चावल देकर चार प्रस्थ कोदो बदले में लेलेना, यह परिवर्तक' कहा जाता है ॥ ५॥ अन्य मिन भादिसे, सस (अनअनाज) का मांगना, जो कि फिर लौटाया न जावे, उसे 'प्रामित्यक' कहते है ॥ ६ ॥ तदेव प्रतिदानार्थमापभित्यकम् ।। ७ ॥ कुट्टकरीचकमक्तु- शुक्तपिष्टकर्म तज्जीधनेषु तैलपीडनमौरप्रचाक्रिकेविक्षुणां च क्षारकर्म सिंहनिका ॥८॥ जो धान्य आदि, व्याज सहित लौटा देनेके यादेपर दूसरेसे मांगा जावे, उसे 'भापमित्यक' कहते हैं ॥ ७ ॥ फूटने का कार्य करने वाले, गुंग उदद थादिके छढ़ने, जो भादिका सत्त पीसने, गने आदिके रससे सिरका या भासव मनाने, तथा गेहूं आदिका आटा पीसनेकर कार्य करने वाले, भर्थात् इन कार्योको करके अपनी जीविका करने वाले पुरुषोंस और तिलोसे तेल निकाल- कर तथा मेड़ों के बाल आदि काटकर उनसे जीवित करने वाले पुरुपसि; और गनोंके रसले गुड राशकर आदि बनाकर अपनी जीविका करने वाले पुरुषों- सेको राजदेय अंश लिया जाये उसे सिंदनिका ' कहते हैं। किसी २ प्राचीन म्यारण्याम सहनिका' पाठ है । यह 1.3 अच्छा मालूम होता है ॥ ८ ॥ नष्टप्रस्मृतादिरन्यजातः ॥ ९॥ विक्षेपच्याधितान्तरारम्भ- शेपं च व्ययप्रत्यायः ॥ १० ॥ नष्ट हुए २ तथा भूले हुएका नाम 'अन्य जात है ॥ १॥ विक्षपशेप (किसी कार्यको सिद्ध करने के लिये भेजी दुई सेनाके व्ययसे यथा हुभा),
। [२यधिक
(२०६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
म्याधितशेष (भोपधालय भादिके व्ययसे बचा हुआ), तथा अन्तरारम्भशेष
(भौतर दुर्ग आदिकी मरम्मतसे बचा हुआ धन ), यह तीन प्रकारका 'स्थय
प्रत्याय' होता है॥१०॥
तुलामानान्तरं हस्तपूरणमुत्करो व्याजी पर्युपितं पार्जितं
चोपस्थानमिति ॥ ११॥
तराज या टीके भेदसे अधिक प्राप्त हुआ २ (अर्थात् भारी वासे
लेकर, और हलके घाटोंसे देकर अधिक पैदा किया हुआ), अन्न आदि तोलने
के बाद मुट्ठी भरकर और अधिक डाला हुआ अन, उस्कर(धान्य आदिके देर.
से. तुली हुई या गिनी हुई चीज रें और वस्तु उठाकर डाल देना), प्याजी
(सोलहवा या घाँसवा अधिक लिया हुआ हिस्सा, जिससे कि फिर सोलन में
किसी तरहकी कमी न होनाय ), पर्युषित (पिछल सालका शेष) और प्रार्जित
( अपनी चतुराई इन्टर मिशहु), यह ' उस्मान ' करता है। यहातक
सीता आदि पदार्थोंका विवरण किया गया ॥11॥
धान्यलेहक्षारलवणानाम् ॥ १२॥ धान्यकल्पं सीताध्यक्ष
वक्ष्यामः ॥ १३ ॥ सपिस्तलयसामज्जानः स्नेहाः ॥ १४ ॥ फा-
णितगुडमत्स्यण्डिकाखण्डशर्कराः क्षारवर्गः ॥ १५ ॥
अन इसके आग धान्य, स्नेह (घी तेल मादि), क्षार तथा लवण,
इन पदार्थों का निपरूण किया जावगा ॥ १२॥ इन पदामिसे धान्यवर्गका
विस्तृत विवरण, सीताध्यक्ष नामक प्रकणमें कहा जायगा ।। १३॥ घी, तेल,
घसा और मजा ये चार प्रकारके स्नेह होते हैं । १४ ॥ गोले बने
কারি
(राव), गुड, मत्स्यण्डिका (गुड और खाडके बीचका विकार ), खाद तथा
शकर आदि ये सब क्षारवर्ग हैं॥ १५॥
सैन्धवसामुद्रविडयवक्षारसौपर्चलोद्भेदजा लपणवर्गः ॥१६॥
क्षौद्र मावीकं च मधु ॥ १७ ॥
छ प्रकारका कवण होता है, सैन्धय (सैंधा नमक), सामुद्र (स-
मुद्र के पानी से पना हुभा), विद (एक प्रकारका नमक), पवक्षार (जवाखार
आदि), सौवचल (मजीखार आदि ।, और उन्नेदज (अपरकी महीसे बनाया
हुआ नमक), यह लवणवर्ग है ॥ १६॥ मधु दो प्रकारका होता है, -क्षोद्र
(मक्खियोंक द्वारा इकट्ठा किया हुआ), तथा मादक (मुनका तथा खक
रससे बनाया हुआ ॥ १७ ॥
१५ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२०७) इक्षुरसगुडमधुफाणितजाम्बयपनसानामन्यतमो मेपशृङ्गीपि- प्पलीकाथाभिपुतो मासिकः पाण्मासिकः सांवत्सरिको वा चिद्भि- टोरुिकेक्षुकाण्डानफलामलकावसुतः शुद्धो वा शुक्तवर्गः ॥१८॥ इक्षुरस (देखका रस ), गुल (गुह), मधु (सहद ), फाणित (राब), जाम्यव (जामुन फलका रस), पनस (पनस-कटहल फलका' रस), इन छ'ऑमसे किसी एकको मेपरगी (मेंढासींगी) तथा पिप्पली ( पीपल ) के कायके साथ मिलाकर, एक गहीना, 2 महीना तथा एक वर्षतक बन्द करके रक्रया जाये; चिट्रिटमाटी ककड़ी), उरिक ( कड़वी ककड़ी), इक्षुकाण्ड (ईरा) आम्रफल ( आमका फर ), तथा आमरक (आँवला) इन पायों चीजों को भी उसमें डाले, अथवा न डाले, ऐसा करने से जो रस तयार हो, उसे सिरका करते है। यह एक महीना छ महीना तथा सालभर समयके भेदसे यथाक्रम अधम, मध्यम तथा उत्तम होता है । यह शुगर है ।। 100 वृक्षामलकरमर्दानविदलामलकमातुलुङ्गकोलबदरसाबीरकप - रूपकादिः फलाम्लवर्गः ॥ १९ ॥ इमली (किसी २ ने तिन्तिडोक शब्दका अर्थ केवल पटाई या अमल पर भी किया है, करोंदा, आम, अनार, आवला, खट्टा (एक प्रकारका नीयू), मरबेरीका बेर, पैमली बेर, उनाव, फालमा आदि रहे रसके फल हेते हैं। यह फलाम्ल है ॥१९॥ दधिधान्याम्लादिः द्रवाम्लवर्गः ॥ २० ॥ पिप्पलीमरीच. भृङ्गिराजाजिकिराततिक्तगौरसर्पपकुस्तुम्बुरुचौरकदमनकमरुव - कशिग्रकाण्डादिः कटुकवर्गः ॥२१॥ शुष्कमत्स्यमांसकन्दमूल फलशाकादि च शाकवर्गः ॥ २२ ॥ दही, कांजी तथा आदि पदसे मठा (तर-) आदि ये पनीली पही चीजें होती है। यह दववर्ग है ॥ २० ॥ पीपल, मिरच, अदरख, जीरा, चिरायता, यगा सरसों, धनियाँ, चोरक ( चोरवेल) दमनक (कान्ता नामक औषधि ), मरवक ( मनफल ), संजना आदि ये सब कटु (बडुवे) पदार्थ है। यह कटुकवर्ग है ॥ २१ ॥ सूखी मछली, सूखा मांस, कन्द (पूरण, विवारी सादि), भूल (मूली, गाजर मादि) फल, शाफ ( यशुभा, मेथी मादि), यह सम शाकवर्ग-है ॥ २२ ॥ . - कौटिलीय अर्थशास्त्र (२०१८) अधिः [२ ततो ऽर्धमादर्थ जानपदानां स्थापयेत् ॥ २३ ॥ अर्धमुप- चुञ्जीत ॥ २४ ॥ नवेन चानवं शोधयत् ।। २५ ।। स्नेहपगसे लगाकर यहाँ तक जितने पदार्थ पतलाये गये हैं, उन संयकी उत्पत्तिमैसे आधा, गन पदपर आपत्ति आने के समयमें उपयोगमें लाने के लिये रखलवे ॥ २३ ॥ और आधे सामानका भोजन आदिमें उपयोग करलें ॥२४॥ जब नई फसल का नया सामान भावे, तो पुराने सामानको जगह नया भरकैवे, और पुराने सामनको उपयोग; लेआय ॥ २५ ॥ क्षुण्णघृष्टपिष्टभृष्टानामाईशुष्कसिद्धानां च धान्यानां वृद्धि- क्षयप्रेमाणानि प्रत्यक्षीकुर्वीत ॥ २६ ॥ यार २ फूटा हुआ, साफ किया हुभा, पीसा हुआ, मा भादिमें भूना हुआ, गीला, सुखाया हुआ, तथा पकाकर तैयार किया हुआ, जितना भी धान्य भादि सामान हो, उसके वृद्धि क्षय तथा वर्तमान प्रमाण (तोल आदि) को, कोष्टागाराध्यक्ष स्वयं प्रत्यक्ष को, अधीन सब चीजोंको अपने सन्मुख तुल पाकर उनके परिमाण आदिकी जाच करे ॥ २६ ॥ कोद्रवत्रीहीणामधं सारः ॥ २७ ॥ शालीनामर्धभागोनः ॥ २८ ॥ त्रिभागोनो वरकाणाम् ।। २९ ।। प्रियङ्गणाम सारः नवभागवृद्धिश्च ॥ ३० ॥ उदारकस्तुल्यः ॥ ३१ ॥ कोदी भीर धानसे आधा माल बघता है, भाषा चोकर भादिका निकल जाता है ॥ २७ ॥ वरिया धानकाभी आधा हिस्पासारभूत निकलता है, याकी आधी छिलके भादिमें चला जाता है ॥ २॥ घरक अर्थात् लोभिया भादि भाका तीसरा हिस्पा पोकाका निसा है, याकी दो हिस्से बोली माल निकल आता है ॥ २९ ॥ कांगनीका आधा हिस्सा सारभूत निकल भाता है। कभी २ नोवा हिस्सा इसका भधिक भी होजाता है॥३०॥ उदारक (एक प्रकार का मोटा पाण) को फांगना के समान ही सारभून भाग निकलता है यया 'गोधूमाश्च क्षुण्णाः ॥ ३२ ॥ तिला यवा मुद्गमापाश्च धृष्टाः ॥ ३३ ॥ पञ्चभाग,द्धिर्गोधूमः सक्तपश्च ॥३४॥ पादौना कलायचमसी ।। ३५॥ जी गार गेहूं भी फूटने पर समान भाग ही सपा होजाते हैं। अधीत इनके कटने आदिमें कोई विशेष सीजन मही ती nath तिल, जी, ॥
'अध्या०] अध्यक्ष प्रचार
(२०९)
। उदद दलनेपर बराबर ही रहते हैं ॥ ३३ ॥ गेहूं और भुनेहुए जौ, पीसने
पांचां हिस्सा बढ़ जाते है। ३४ ॥ मटर पीसने पर चौथाई हिस्सा कम
पाता है ॥ ३५॥
मुगमापाणामधपादोनः ॥३६॥ शैम्बानामधं सारः ॥३७॥
भागोनः मसूराणाम् ।। ३८ ॥
मूंग और उद पास जानेपर आठयां हिस्सा कम होजाते है ॥३६॥ जैव
र की फली खुस्ती अवघा सेम) का आधा हिस्सा सारभूत निकलता है ।
ा चोकर निकल जाता है ॥३७॥ मसूरका तीसरा हिस्सा कम हो जाता है,
कोहिस्से ठीक माल निकलता है। दलने भादिक समय यह तीसरा
'मा कम होता है ।। ३८ ॥
पिष्टमाम कुल्मापाआध्यर्धगुणाः ॥ ३९ ॥ द्विगुणो यावकः
४०॥ पुलाकः पिष्टं च मिद्धम् ॥ ४१ ॥
पिसे कचे गेहूं, तथा मूंग उडद आदि पकाये जानेपर ड्योढ़े हो।
ते हैं ॥ ३९ ॥ कूट कर पास हुए जौ, पकाये जाने पर दुगने होजाते हैं
४० ॥ आधे पकाये हुए चावल और सूजी आदि भी पकाये जानेपर दुगने
कोद्रयवरकोदारकप्रियगणां त्रिगुणमनम् ।। ४२ ।। चतुर्गुणं
हीणाम् ।। ४३ ।। पश्चगुणं शालीनाम् ॥ ४४ ।।
कोदी, घरफ अर्यात् लोभिया आदि, उदारक और कांगनीका भात
दि अन्न पकाया जानेपर तिगुना होजाता है ॥४२॥ बोही ( विशेष चावल )
गुने ॥४३॥ और शाली (पासमती आदि घायल) पांच गुने हो जाते हैं ॥aur
तिमितमपरानं द्विगुणमर्धाधिकं विरूदानाम् ॥४५॥ पञ्च-
गिद्धिः भृष्टानाम् ।। ४६ ॥ कलायो द्विगुणः ॥ ४७ ।। लाजा
रुजाश्च ।। ४८ ।।
काटने के समय में खतसे जो गीलाही लिया गया हो, ऐसा अकतथा
घेही काटे हुए प्रीही आदि दुगनेही यवते हैं। यदि और कुछ अच्छी भव.
में काटे जावें, तो दाई गुने यढ़ जाते हैं। किसी २ ग्यारयाकारने इसका
भी अर्थ किया है:-गीले किये हुए चने आदि भन्न दुगने होजाते हैं,
दे धने आदिको गीलाही काट दिया जाये, तो वे ढाई गुना बढ़ जाते हैं)
४५ ॥ यदि इनको मा आदिमें भूना जाने, तो इनकी पांच हिस्सा वृद्धि
जाते है॥११॥
[२ अधिक फौटलीय अर्थशास्त्र होजाती है । ४६ ॥ भुना हुभा मटर दुगना होजाता है ॥ १७ ॥ धानोंकी खील भौर भुने हुए जो भी दुगो होजाते है ॥ १८॥ पदकंतलमतसीनाम् ॥४९॥ निम्बकुशाप्रकापित्यादीनां पश्च- भागः॥५०॥चतुर्भागिकास्तिलकुसुम्भमध्केगुदीस्नेहाः ॥५१॥ भर सीका तेल छठा हिस्सा तयार होता है। अधात् जितनी अरसी हो, उसका छठा हिस्सा उसमेंसे तेल निकरता है ॥ १९ ॥ नीम (निबोरी), कुशा (घासकी जर), माम ( की गुटली), और कैपमें से पांचवा हिस्सा तेल निकलता है ॥ ५० ॥ तिल, कुसुम्भ (फसूम), महुआ, तथा इंगुदी (गोंदा एक पेटका नाम है ) मेंसे चीथा हिस्सा तेल निकलता है ॥ ५ ॥ कार्पासोमाणां पञ्चपले पलसूत्रम् ॥ ५२ ॥ पञ्चद्रोणे शालीनां च द्वादशाढ तण्डुलानां कलभभोजनम् ॥ ५३ ।। कपास तथा रेशममेंसे, पांच परमेंसे एक पल सून निकलता है। इस सूनमें क्षीम' शब्दका अर्थ-'एक विशेष वृक्षकी छाल भी किया गया है। तारपर्य यह है, कि कपास लोर क्षौम जितना हो, उसमें उसका पांचवा हिस्सा सूत तयार होता है)॥ ५२ ॥ पाच द्रोण भर्थात् यीस आदक धानामें से, जय छड कूटकर, बारह अ ढक तण्डुल अर्थात् चावल रह जायें, तय थप हार्थीके पच्चोंक खाने योग्य भन्न होता है । ५३ ॥ एकादशकं व्यालानाम् ॥५४॥ दशकमौवाखानाम् ॥५५॥ नवकं सामाह्यानाम् ॥ ५६ ॥ अष्टकं पत्तीनाम् ॥ ५७ ॥ सप्तकं मुख्यानाम् ॥ ५८ ।। पदकं देवीकुमाराणाम् ॥ ५९॥ पञ्चक राज्ञाम् ॥ ६०॥ जब थोडा और साफ करके पीस आढमसे ग्यारह आहक रह जायें, तो उसे दुष्ट हाथियो (मत हाथियों) के खाने के लिये उपयोग करना चाहिये ॥ ५४ ॥ इसी प्रकार दसयो हिस्सा रहने पर उसे, राजाकी सवारी के हाधियों के भोजनमें लगाना चाहिये ॥ ५५ ॥ और नौवां हिस्सा रहनपर, युद्धमें काम भाने वाले हाथियों के भोजनमें उसका उपयोग करना चाहिये ।। ५६ ॥ आठवी हिस्सा रहमेपर, पैदल सेमाओंके भोजन के लिये उसका उपयोग करना चाहिये ॥ ५७ । सातवा हिस्सा रहनेपर, उसे प्रधान सेनापतियोंके भोजन के लिये उप युक्त करना चाहिये ॥ ५८ ॥ छठा हिस्सा रहनेपर, यह रानियों सधा राजकु मारी भोजनके काम आता है ! ५९ ॥ राया पांचवां हिस्सा रहनेपर, उस. का राजाओं के लिये उपयोग करना चाहिये। इस प्रकार पीस पाठकसे, जय - १५ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (११) साफ़ करते २ पांच आटक अर्थात् चौथाई हिस्सा रह जावे, तय यह राजाके लिये उपयोग में लानेके योग्य होता है। ऊपर यताये हुए हिस्याम भी इसी तरह समझना चाहिये ।। ६०॥ अखण्डपरिशुद्धानांवा तण्डुलानां प्रस्थः ॥ ६१ ॥ चतुर्भागः सूपः सूपपोडशे लवणस्यांशः चतुर्भागः सपिपस्तैलस्य या एकार्यभक्तम् ॥ ६२ ॥ अपया राजाके भोजन के लिये, शोर भी अधिक साफ करके, जम बीस आवकमसे एक प्रश्य चायन रह जाये, तब उनका उपयोग करना चाहिये उन साफ किये हुए घायलों में एक भी दाना टूटा हुभा न होना चाहिये । साफ बिना टूटा एरु २ दाना चुनकर बीस आडकमेसे एक प्रस्थ निकाल लेना पाहिये । (चार भस्यका एक आडक होता है, इसतरह बीम आढकके अस्सी प्रस्य हुए, अस्सी में से एक प्रस्य चायल छांटने चाहिये ॥६॥ प्रस्थका पौधा हिस्सा सूप ( अाए दाल प्रस्स होनी चाहिये ), सूपका सोसहवा हिस्सा नमक, तथा सूपका ही चाथा हिस्सा घी अयया तेलमध्यमस्थिति एक पुरषका भोजन होता है। (राजाकी रसोईसे जिन परिचारक आदिको भसा दिया जाता है, उसका हो यह परिमाण यताया गया है) ॥ १२ ॥ प्रस्थपड्भागः सूपः, अर्धस्नेहमवराणाम् ।। ६३ ।। पादोनं स्त्रीणाम् ॥ ६४ ॥ अर्धे बालानाम् ।। ६५ ।। जो अधमस्थितिक परिचारक हो, उनके लिए प्रस्थका छटा हिस्सा दास, और पदिलेसे भाधा पी अथवा तेल होना चाहिये, शेष सामान पहिलेके परामर ही होना चाहिये।। १३ । इसमें चौथाई हिस्सा कम भोजन नियों के लिये दोना चाहिए॥ ६॥ तथा आधा हिस्सा यालकरहिये होना चाहिये ॥६५॥ मांसपलविंशत्या लेहाकडुनः पलिको लवण सांशः क्षार- पलयोगो द्विधरणिका कटुकयोगो दमवायः ॥ ६६ ॥ मांसके पकानेमकीन २ सी चीज किसनी २ पडनी चाहिये, भर इस- का निरूपण किया जाता है:--बीस पल मांसके साथ, आधी फाय चिकनाई (घी या तेल) शालना चाहिये(चार सुलुसमा एकस्य होता है, स्थका आठवां दिसा आधा अड्डय हुआ); एक पल नमक डालना चाहिये, गदि नमक न होतो एक पलही सजीपार या पासार आदि दालदेना चाहिये, पीपल, सिरप आदि मपाला दो धरण झालना चाहिये। (असी पंगा सरसोका एक रूपमा- पक, और सोलद मापकमा एक धरण होता है। सब परिमाणांके जानने के (१२१२) कौटलीय अर्थशास्त्र [२,यधिक लिये पीतवाध्यक्ष प्रकरण देखना चाहिये ); और आधा प्रस्थ दो कुछय, उसने माम दही डालना चाहिये ।। ६६ ।। तेनोचरं व्याख्यातम् ॥६७॥ शाकानामध्यर्धगुणः ॥६॥ शुष्काणां द्विगुणः स चैव योगः ॥ ६९ ॥ इससे अधिक मांस पकाना हो, सो इसी हिसायसे, सब चीजे उसमें, उचित मात्रामें डाल देनी चाहिये ॥६७ ॥ हरे शाक बनाने के लिये यही सय मसाला (जो मांसके लिये बताया गया है। ड्योढ़ी मात्रा दालना चाहिये। अर्थात् योस पल हरे शाकमें देढ़ गुना उपर्युक्त मसाला डालना चाहिये ॥ ६८ ॥ सूखे शाक अथवा मांसमें यहा ममाला दुगना झला जावे ॥ १९ ॥ हस्त्यश्वयोस्तदध्यक्षे विधाप्रमाणं वक्ष्यामः ॥ ७० ॥ वली. बर्दानां मापद्रोणं यवानां या पुलाका शेपमश्वषिधानम् ॥ ७१।। हाथी और घोडके लिये, चावल आदिका प्रमाण, उनके अध्यक्ष प्रक. रणमें, अर्थात् हस्यध्यक्ष तथा अश्वाध्यक्ष प्रकरणमें निरूपण किया जायगा ॥ ७० ॥ येलो के लिये एक दोण परिमाण उडद, तथा इतनेही, भाधे उबले हुए जो जानने चाहिये, शेष सब घोड़ोंके समान ही समझना चाहिये ॥७॥ विशेषो-याणपिण्याकतुला कणकुण्डकं दशाढकं वा ॥७२।। घोड़ीकी अपेक्षा बलों के लिये जो विशेष है, वह भी मताते है:--सूखे हुए सिलाके कल्क के सौ पल, अथवा टूटे हुए चावलोंसे मिश्रित अनामकी भूपी आदि, दश माढक होने चाहिये ॥ ७२ ॥ द्विगुणं महिपोष्ट्राणाम् ॥ ७३ ॥ अर्धद्रोणं खरपृषतरोहिता- नाम् ॥ ७४ ॥ आढकपेणकुरगाणाम् ।। ७५ ।। अर्थाढकमजैल- कवराहाणां द्विगुणं वा कणकुण्डकम् ॥ ७६ ।। इससे दुगना सामान भंसा और ऊटाके लिये होना चाहिये ॥७॥ यही सब सामान, गदहा और चीतल हिरणोंको, आधा झोण अर्थात् दो भादक देना चाहिये ॥ ४ ॥ एण और कुरा जाति के हिरणोंको (एण और कुरत ये हिरणांकी विशेष जातियां है), यही सामान एक भार परिमाण में देना चाहिये ॥ ७५ ॥ करी भेट तथा सूभरीको आधा आढक देना चाहिये । चावल आदिकी कनकी भोर भूसी मिलाकर, इससे दुगनी भषांत पूरी एक भावक देनी चाहिये ॥
१५ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार प्रस्थीदनःशुनाम ॥ ७७ ॥ हंसकश्चिमयूराणामप्रस्थ ॥ ७८ ॥ शेषाणामतो मृगपशुपक्षिव्यालानामकभक्तादनुमानं ग्राहयेत् ॥ ७९ ॥ कुत्तोंको एक प्रस्थ परिमित साना देना चाहिये ।। ७७ ॥ ६स 'कौश और मारोंको आधा प्रस्य देना चाहिये । ७८ ॥ इनसे अतिरिक्त जितने भी जंगली या ग्राम्य पशु, पक्षी, तथा सिह आदि हिंसक प्राणी हों, उन सबके लिये एक दिन सिलाकर, जितना वे पासके, उसीके अनुसार अनुमानसे पामे के परिमाण आदिका निर्णय करा देवे ॥ ७९ ॥ अङ्गारांस्तुपांघोहकर्मान्तमित्तिलेप्यानां हारयेन् ॥ ८ ॥ काणका दासकर्मकरसूपकाराणामतो ऽन्यदौदनिकापूपिकेभ्यः प्रयच्छेत् ॥ ८१ ॥ कोयले और चोकर या भूमीको, लुहारों तथा मकान लीपने बाले पुरु पोको देदेवे ॥ ८०॥ चावल आदि नाजॉमसे एड फटाकर निकली हुई यारीक कनकीको, दास (फ्रीत सेवक), कर्मकर (अन्य गृह कार्य करने वाले सेवा), राधा सूपकार ( रसोईया) को देदेये । ये उसको अपने खाने आदिके काममें ले भाचें । इससे भतिरिक्त भौर जो कुछ बचे, उसको साधारण मा पकाने घाले तथा पकान आदि बनाने वाले परिचारकके लिये देदेने ॥ ८॥ तुलामानभाण्डं रोचनी दृपन्मुमलोलूखलकुट्टकरोचकयन्त्र- पत्तकर्शपचालनिकाकण्डोलीपिटकर्ममार्जन्यथापकरणानि ।।८२॥ पाकशालाके विशेष उपकरण (साधनतो रसोई के कार्यों में काम भाते है, निम्नलिीमत है:-तुला (तराजू ), मानभण्ड (याट भादि। इनका परिमाण पीतयाध्यक्ष प्रकरणमे यताया जायगा ), रोचनी (दाल आदि दलने का चकला), पत् (दाल या मसाला आदि पीसनेकी यिल), मूसल, भास. ली, कुक यन्त्र (धान आदि यूटनेका यन्य विशेष), रोचक यन्त्र ( भाटा भादि पीसनेका यन्त्र चही, इसके तीन प्रकार हैं:-मनुष्य के द्वारा चलाई . जाने वाली, और मेलों तथा पानीमे चलाई जाने वाली, पहिलीको साधारण. रामा, चकी, और आगेसी दोनों को घराट कहते हैं। पानीप चलाई जाने वाली. का नाम पनधी भी है); पग्रक (लकड़ीया बना हुआ; छिएका आदि साफ़ करने वाला); शूर्प . सूपाज । चालान का (चलना-जलनी) कण्डोली (पालको पतली खपच्चास मनी हुई छोटीसी टोकरी, जिसमें बाज़ारसे शाक (२१४) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक मादि लाया जासके), पिटक (पिटारी, ऐसी चीजें रखने के लिये, जिनमें हवा लगती रहनी आवश्यक हो, भौर समानी (झाडू-बुहारी) ॥ ८२ ॥ मार्जकरक्षकधरकमायककापकदायकदापकशलाकाप्रतिग्राहक- दासकर्मकरवर्गच विष्टिः ।। ८३ ॥ झाडू लगने वारा, कोष्ठागारकी रक्षा करने वाला, सराजू आदि उठा- कर तोलने वाला, तुलवाने वाला, इनका अधिष्ठाता, देने वाला, इसका अधि छाता, बोझ आदिको उठाने वाला, दास (फ्रीत दास), और कर्मकर, ये सय लोग विष्टि कराते हैं ॥ ८॥ उच्चैर्धान्यस्य निक्षेपो भूता. क्षारस्य संहताः । मृत्काष्ठकोष्ठाः स्नेहस्य पृथिवी लवणस्य च ॥ ८४ ॥ इपध्यक्ष प्रचारे द्वितीये ऽधिकरण कोष्टागाराध्यक्ष पदमो माय ॥ १५॥ आदित पद्मशः ॥ ३६॥ धान्य आदिको ऊँचे स्थानमें रखना चाहिये, जहाँ भूमिके साथ स्पर्श न होसके, क्षार अर्थात् गुड राब आदिके रसने के लिये खूब घना फूस भादि लगाकर स्थान बनाना चाहिये, (गर्थात् ऐसा स्थान होना चाहिये, जहापर गुरु राय मादिमें सील न पहुच सके, चारों ओर फूप लगानेसे भरठी गरमी बनी रहती है), स्ने अर्थात् पृत रेल आदिके रखने के लिये, मट्टोके (मृदखान भादि) या लकडीके पाय आदि पनाने चाहिये । नमक आदिको पृथिवीपर ही रखना चाहिये । जिन पदार्थों के रखने का निर्देश नहीं किया गया है,कोठा- गाराध्यक्षको चाहिये, कि उनके रखने का भी यथायोग्य प्रबन्ध करे ॥४॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें पन्द्रहयां अध्याय समाप्त । -- सोलहवां अध्याय ३४ प्रकरण पण्याध्यक्ष। विक्रोके योग्य राजदम्यको 'पण्य' कहते हैं, उसके प्रष विषय के लिये जो पुरष नियुक्त किया जाये, उसका नाम 'पण्या पक्ष' है। इस प्रकरणमें राजकीय पण्यके कर विक्रय पवहारका निरूपण झिया मागगा।
२६ अध्या० यध्यक्ष-प्रचार (२१५) पण्याध्यक्षः स्थलजलजानां नानाविधानां पण्यानां स्थलपथ- चारिपथोपयातानां सारफलवर्धान्तरं प्रियाप्रियतां च विद्यात् ।। ॥१॥ तथा विक्षेपसंक्षेपक्रयविक्रयप्रयोगकालान् ॥ २॥ पण्याध्यक्षको चाहिये कि यह स्थल और जलमै उत्पन्न होने वाले, स्थलमार्ग तथा जलमार्गस आये हुए नाना प्रकार के पयोंके सार तथा फरगु मूल्यके तारतम्य को, और उनकी लोकप्रियता तया अप्रियताको अच्छी तरह जाने । (सार और फल्गुसे तात्पर्य यहुमूल्य और अल्पमूल्य वस्तुओंसे है, उन के मूल्पकी न्यूनाधिकताके क्रमको अवश्य जाने । जिस पदार्थका विक्रय अति शीघ्र होजाये, यह लोकप्रिय, और दूसरा अप्रिय ममलना चाहिये) ॥ १॥ इसी तरह पण्याध्यक्षको यहभी आवश्यक है, शिवह विक्षेप (संक्षिप्त द्रव्यका विस्तार), संक्षेप (विस्तृत व्यका मक्षेप ), क्रय (पण्यका संग्रह-परीदना) और विक्रय । संगृहीत पण्यका ग्यप करदेना=अयात् पेचदेना) के उचित प्रयोग कालको अच्छी तरह पहिचाने ॥२॥ यञ्च पण्यं प्रचुरं स्यात्तदेकीकृत्यार्धमारोपयेत् ॥ ३ ॥ प्राप्त ऽर्थे वार्धान्तरं कारयेत् ॥ ४ ॥ जो फेपर आदि पण्य अधिक मात्रा में हो, उस सयको इकट्ठा करके अधिक मूल्य पर चढ़ा देवे ॥३॥ गन उसका उचित मूल्य प्राप्त होजाये, तो फिर उसे हलके दामों में ही पेचदेवे ॥ ४॥ स्वभूमिजानां राजपण्यानामेकमुखं व्यवहारं स्थापयेत् ।।५।। परभृमिजानामनेकमुखम् ॥ ६ ॥ अपनी भूमिमें उसन्न हुए राजपण्याफ विक्रय आदि व्यवहारीकी स्था. पना, राजा एक ही नियत स्थानसे करवाये । तात्पर्य यह है कि जो पण्य अपने. ही देश में उत्पन्न हो, उसका किसी एक व्यक्तिको ठेका आदिदेवे, और उसी के द्वारा उसका विक्रय करावे ॥५॥ जो दूसरे देशमें उत्पा हुआ २ पण्य हो उसका अनेक स्थानोंसे विक्रय करावे ॥६॥ उभयं च प्रजानामनुग्रहेण विक्रापयेत् ॥ ७ ॥स्थूलमपि च लाभ प्रजानामपिघातिकं वारयेत् ॥८॥ अपने देश तथा परदेशाम उत्पन्न हुए सोनों प्रकार के पयों का विक्रय मादि, राजा को इस प्रकार कराना चाहिये, जिससे कि प्रजाको किसी मकारका करने पहुंचे ॥७॥ यदि किसी कार्य में बहुत अधिक भी बाम [२अधिक (२१६) कौटलीय अर्थशास्त्रं होता हो। परन्तु उस कार्य के करनेसे प्रजाको कष्ट पहुंचता हो, तो राजा उप्त कार्य को तरक्षण रोक देवे ॥ ८॥ अजस्रपण्यानां कालोपरोधं संकुलदोपं वा नोत्पादयेत् ॥९॥ जल्दी ही विक जाने योग्य, शाक तथा दूध आदि पप्योका अधिक समय तक रोके रहना तथा शाक आदि बेचने का पहिले किन्हीं ग्यसियोंको ठेका देकर, उनका माल न विकनेपर ही दूसरोंको, लोमके कारण टेका देना, यह सर्वथा अनुचित है ॥ ९॥ बहुमुख वा राजपण्यं वैदेहकाः कृतार्थ विक्रीणीरन् ॥१०॥ भेदानुरूपं च वैधरणं दद्युः ॥ ११ ॥ बहुत स्थानास, अर्थात् बहुत से व्यक्तियों के द्वरा ने जाने वाले राज पण्यको, व्यापारी लाग मुख्य निश्चय करके पेंच, अर्थात् नियत मूल्रपर थे, ॥१०॥ यदि विक्रय दोनेपर मूल्य में कुछ कमी होजाचे, नो उसके अनुपारही ग्यापारी लोग उस सारी कमीको पूरा करें। (इस पत्ति करने का नाम 'वैधरणा' पाडशभागो मानव्याजी ॥ १२ ॥ विंशतिभागस्तुलामानम् ॥ १३ ॥ गण्यपण्यानामेकादशभागः ॥ १४ ॥ ग्यापारियोंसे कितना र राजकीय अश लेना चाहिये, इसका निरूपण किया जाता है-जितना द्रष्य पारियोके यहा मापा जावे, उसका सोरहवा हिस्सा राजाको देना चाहिये। इसका नाम ग्याजी या मानव्याजी होता है। ॥१२॥ जो द्रव्य तोला जावे, उसका बीसवां हिस्सा राजाको देना चाहिये ॥ १३ ॥ जो पण्य दम्प गिने जावे, उनका ग्यारहवा हिस्सा राजाके लिए देना चाहिये ॥१४॥ परभूमिजं पण्यमनुग्रहेणावाहयेत् ॥ १५ ॥ नाविकसार्थवा- हेभ्यश्च परिहारमायतिक्षम दद्यात् ॥ १६ ॥ अनभियोगश्वार्थेष्वा- गन्तूनामन्यत्र सम्योपकारिभ्यः ॥१७॥ परदेश में उत्पन्न हुए २ एण्यको, अन्तपाल तथा आटविक भादिक उपद्वासे यचाकर, और प्याजी भादि और देने का वादाकर मंगवाये ॥ १५ ॥ नाव तथा जहाज आदिके द्वारा माल लाने जाने वाले ग्यापारियोंसे भी राजा, अपना भादेय भंश न स्वे, अर्थात् उनें कुल टैक्स माफ करदेवे । और भविष्यत् में भी किसी प्रकारको पाधा न पहुंचानेका पचन देदेवे ॥ १६ ॥ विदेशसे भाने वाले व्यपारियो पर,, उत्तमण का भोरसे अर्थ अर्थात मण
(२१७)।
+
१६ अध्या०]
अध्यक्ष प्रचार
सबन्धी अमियोग नहीं चलाया जाना चाहिये । अर्थात् राजा उनके सम्बन्ध
में बिना ही अभियोगके ऋण आदि देनेकी व्यवस्था करदेवे। परन्तु जो पुरुप
विदेशी व्यापारी ' का उपकार करने वाले, अर्थात् कार्यमे सहयोग देने
याले तथा अन्य कर्मचारी पुरप हों, उनका परस्पर अमियोग अवश्य हो
सकता है॥१७॥
पण्याधिष्ठातारः पण्यमूल्यमकमुख काप्ठद्रोण्यामेकच्छिद्रापि-
धानायां निदध्युः ॥ १८ ॥ अथाष्टमे भागे पण्याध्यक्षस्यार्प-
येयुः, इदं विक्रीतमिदं शेपमिति ॥ १९ ॥ तुलामानभाण्डक
चार्पयेयुः ॥ २० ॥ इति स्वविपये व्याख्यातम् ।। २१ ॥
सरकारी माल को बेचने वाले पुरप, पिके हुए मालकी, इकट्ठी हुई २
कीमत को, एक छेद वाली लकड़ी की बन्द सन्दूकचीमें डालदेवें ॥१८॥
और दिनके आठवें भागमें, (भर्थात् साय कालके समय, जब कि ऋय और
विक्रय आदि का दैनिक व्यवहार चन्द किया जाता हो) 'इतना बेच दिया
है और इतना शेष रहा है ऐसा कहकर वह सब धन और माल पण्याध्यक्ष
के सुपुर्द करदेवें ॥ १९ ॥ तराजू तथा याट भादि आवश्यक उपकरणों को भी
उसी तरह पण्याध्यक्षके सुपुर्द करदेव ॥२०॥ यहांतक अपने देशम, पण्य
नव्योंके येचने भादिकी विधिका विवरण किया गया ॥ २१॥
परविषये तु पण्यप्रतिपण्ययोर्यमूल्यं चागमय्य शुल्कवर्त-
न्यातिवाहिकगुल्मतरदेयभक्तभाटकव्ययशुद्धमुदयं पश्येत् ॥२२॥
अब परदेशमे किस तरह व्यापार करना चाहिये, इसका निरूपण
किया जाता है:-अपने देशके तथा परदेशके पण्य द्रव्योंके न्यून अधिक तथा
समान मूल्यको और उनके पैक आदि करामेकी कीमत को अच्छी तरह जान-
कर, और शुल्क (गुरुकाध्यक्ष प्रकरणमें कहे हुए टैक्म आदि), वर्तनीदेय
(अन्तपालको दिया जाने वाला), भातिवाहिकदेय (मार्गमें सहायता करने
पाली पुलिस का देय अंश), गुल्मदेय (जंगलके रक्षकका देय अंश), तरदेय
(नदी आदि पारकराने वाले नाविकका देय अंश), भक्त ( भोजनका व्यय)
तथा भाटक (मादा) भादि इन सब तरहके सी को निकालकर शुद्ध आम.
दनी देशे। तारपर्य यह है कि सब तरहके व्ययको निकालकर फिर जो कुझ
पचता हो, उसपर विचार करे कि इतनी सायपर इम अपने मालको विदेश
में लेजाकर, यहांके मालके मुकाबले में बेच सकते हैं, या नहीं ॥ २२ ॥
(२१८) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक असत्युदये भाण्डनिर्वहणेन पण्यप्रतिपण्यार्पण वा लाभ पश्येत् ॥ २३ ॥ ततः सारपादेन स्थलव्यवहारमधना क्षेमेण प्रयोजयेत् ॥ २४ ॥ यदि इसमें कुछ लाभ न दीखता हो, तो अपने मालको विदेश में भी लेजाकर भविष्यमें लाभको प्रतीक्षा करते हुए, उसीके भनुसार त्रियके द्वारा भपने लाभका विचार करे, अथवा अपने मालसे यहां के लोकप्रिय मालको पद्लार फिर अपने लाभको देखे ॥ २३ ॥ सदनन्तर विधारे हुए लाभका चौथा हिस्सा स्यय करके, उपद्रव रहित स्थलमार्गसे भी कुछ व्यापार करना भारम्भ करदे ॥२४॥ अटव्यन्तपालपुरराष्ट्रमुख्यैश्च प्रतिसंसर्ग गच्छेदनुग्रहार्थम् ॥ २५ ॥ आपदि सारमात्मानं या मोक्षयेत् ॥ २६ ॥ भटयोपाल (जगएका रक्षक), भन्तपाल (सीमारक्षक), मगर के मुण्य पुरुष और राष्ट्र के भी मुख्य २ पुरुषोंके साथ सगत को, अर्थात् उनसे अच्छी तरह अपनी जान पहचान पदावे, जिससे कि वे अपनेसे अनुकूल रहकर अपने व्यापार में लाभ पहुंचा सकें ॥ २५॥ यदि मार्गमें अथपा रहने के स्थान ही कोई चार भादि का उपद्रय होजावे तो सबसे प्रथम सार भीर रस आदि द्रव्यों को और अपने शरीर को छुड़ाये, अधात् इनकी रक्षा करे, यदि दोनों की रक्षा सम्म न हो, सो रस भादिका भी परित्याग कर अपने आपको दी बधाये॥२०॥ आत्मनो वा भूमिमप्राप्तः सर्वदेयविशुद्धं व्यपहरेत् ॥२७॥ परदेशमें ग्यापार करता दुभा पुरुप जब तक अपने देवा म लौट मामे, तब तक (अर्थात जितनी देर परदेशमें व्यापार करता रहे उस समयमें) यहाँके राजाके जितने भी देखभश हो (सरकारी टेक्स हो), उन सबको नियम पूर्वक अदा करता हुआ ही अपने व्यापारको चलाये, क्योंकि कहीं ऐसा न होजाय, कि थोडासा कसम देने लोभमें अपना सर्वनाश होजाय ॥२७॥ वारिपथे च यानभाटकपथ्यदनपण्यप्रतिपण्याप्रमाणयात्रा. कालमयप्रतीकारपण्यपत्तनचारित्राण्युपलभेत ॥ २८ ॥ जलमार्गसे व्यापार करने वाले व्यापारीको, यानभारक (नाव तथा जहाज भादिके गा), पश्यदन (मार्गमें खाने पीने का व्यय), पण्य भार मतिपण्यके मूल्य प्रमाण (अर्थात् अपना, विक्रेप द्रम्य भौर पराये विक्रेय मपके मूल्याही ग्यूनाधिकता वारतस्य) यामाकाल (कौनसी मद भादिमें - १७ अध्या० j अध्यक्ष प्रचार (२१९) यात्रा करना ठीक रहेगा, अपघा कितने दिन में याया समाप्त हो सकेगी, यह यात), भयप्रतीकार (मार्गमें होने वाले चार आदिक भयका प्रतीफार) और जिस दूसरे देशके नगरमें जाकर अपने विशेष माल को बेचना है, वहांके भाचार व्यवहार, इत्यादि सब ही बातोंके सम्बन्धमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये। सब बातों को अनुकूल समझ कर ही ऐसा व्यवहार करे ॥२४॥ नदीपथे च विज्ञाय व्यवहारं चरित्रतः । यतो लाभस्ततो गच्छेदलाभं परिवर्जयेत् ॥ २९ ॥ इरस सक्षमचारे द्वितीये ऽधिकरणे पण्याध्यक्षः पोडशो ऽध्याय ॥ १६ ॥ यादित सप्तत्रिश ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार न केवल समुद्रमार्ग ही, किन्तु नदीमागमे भी, उन र देशों के चरित्र अर्थात् भाचार और दनिज व्यापारको अच्छी तरह जानकर ही जिस मार्गसे लाभ हो, उसीका अनुसरण करे, घोडेसे लाम या अलाम को, तथा जिसमे प्रवास आदि का महान क्लेश हो, ऐसे मार्ग को सर्वथा छोड़देवे ॥२९॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें सोलहवां अध्याय समाप्त । सत्रहवां अध्याय। ३.प्रकरण। कुप्याध्यक्ष । चन्दन आदिकी प्रदिया लकड़ी, बांस तथा छाल आदि सय 'कुप्य' कहाते हैं। इन पदार्थोपर जो राजकीय अधिकारी पुरुष नियुक्त किया गया हो उसका नाम 'कुप्याध्यक्ष' है। इस प्रक । रणम उसकेही फार्थीका निरूपण किया जायगा । कुप्याध्यक्षो द्रव्यवनपालैः कृप्यमानाययेत् ॥ १॥ द्रव्य. वनकर्मान्तांश्च प्रयोजयेत् ।। २ ।। द्रव्यवनच्छिदां च देयमत्ययं च स्थापयेदन्यत्रापद्भयः ॥३॥ कुप्याध्यक्षको चाहिये कि वह, भिरा २ स्थानोंके वृक्षो तथा जंगलोंकी रक्षा करने पाले पुरुषांक द्वारा कृप्य अर्थान् यदिया लकी मंगवाचे ॥४॥ और लकड़ीसे बनने वाले अन्य कार्योंको भी करवाये । अयात. लकड़ीसे भो . ३ कौटलीय अर्थशास्त्र १२ अधिक और चीजें बनाई जाती है उनको भी धनवाचे ॥२॥ पुरण, जंगल या वृक्ष आदिको काटने पाल हो, अर्थात् यही कार्य करके अपनी आजीविका करने वाले हों, उनको वृक्ष आदि काटनेके लिये जो कुछ चेतन देना हो, यह पहिले हीसे नियत करलेना चाहिये, और आज्ञासे अन्यथा कार्य करनेपर दण्ड आदि भी नियत करना चाहिये । परन्तु यदि किसी आपत्ति के कारण, कार्य अन्यथा होगया हो, तो दण्टु न देना चाहिये ॥३॥ कुप्यवर्ग:-शाकलिनिशधन्वनार्जुनमधूकतिलकसालशिंशपा. रिमेदराजादनशिरीपखदिरसरलतालसर्जाश्वकर्णसोमबल्ककशान- प्रियकवादिः सारदारवर्गः ॥ ४ ॥ अय इसके भागे कुष्य वर्गका निरूपण किया जाता है। कुप्य वर्ग में अनेक भावान्तर भेद हैं। उनमें सबसे प्रथम सारदास्वर्ग (सबसे बढ़िया लकड़ी कान कौनसी है, इस यात) को बताते हैं।बाक (सागून), तिनिश (तुन=सिक्स- तैदुआ), धन्वन (पीपलका वृक्ष), अर्जुन, (यह वृक्ष इसी नामसे प्रसिद्ध है), मधूक ( महुभा), तिलक (फरास, इसको तालमखाना भी कहते हैं। यह वृक्ष झाऊके ढका होता है, पर उससे काफी बड़ा होता है), साल (यह पृक्ष इसी नामसे प्रसिद्ध है), शिशपा (शीशमटाली), भरिमेद ( एक प्रका. रफे खा पक्षका नाम है, इससे फुछ २ दुर्गन्ध आती है ), रामादन (खिरमी), शिरीप : सिरस), खदिर रबर ), सरल (एक प्रकार देवदार; सम्भवतः यह सीधा जाने वाले यूरलैपिसका नाम हो), ताल (ताद), सर्ज (पीले रमका साल), भश्वकर्ण (यह भी साल वृक्षकाही एक भेद है, सम्भवतः यह बड़ा सरू हो), सोमवल्क (सफ़ेद खैर), करा (कोकर-बबूर ), भाम, प्रियक (कदंब), धध (गूलर)। इन सबकी लकड़ी बहुत बढ़िया मजबूत होती है। आदि शब्दसे, अन्य इमली आदि सबही मज़बूत लकड़ी वाले वृक्षाका ग्रहण करलेना चाहिये। यह सब सारदारुवर्ग है ॥ ४ ॥ उटजचिमियचापवेणुवंशसातीनकण्टकमाल्लूकादिर्वेणुपर्गः ॥५॥ वेत्रशीकवल्लीवाशीश्यामलतानागलवादिल्लीवर्गः ।।६।। उटज (जो बहुत खोखला हो, और जिसकी गोटौंपर कोटेसे हो), चिमिय (ठोस तथा मुलायम छाल वाला), चाप ( थोडासा पोला और ऊपर- से बहुत सरवा.), रेणु (विमा, चनुप यनाने योग्य), पंश (लम्बी पौरियों याला); साप्तीन, कण्टक (ये भी दांसोंके भेद है), माल्लुक (बहुत मोटा और लम्श तथा कांटोंसे सहित) इत्यादि ये सब बांसोंके भेद है ॥५॥ घेत्र (त), पीकपाठी (इंस बाली-एक प्रकारकी लता), वाशी (अर्जुनके . । i १७ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२) फूलों समान फूट घाली एक रता), इमामलसा (काली निसात अपया सराई), नागलता ( नागवल्हो नागर पान की बेल); भादि ये सब लता- के भेद हैं॥६॥ मालतीमूर्किशणगवेधुकातस्यादिर्यत्कयर्गः ॥ ७॥ मालती (चमेली), मूवा ( मरोर फली ), अर्क (आयाक), पण (सन), गवेधुघा (नागयला), मतसी (भलसी , भादि यह यलकवर्ग है। अर्थात् इनकी डाल काममें भाती है 101 मुजबल्वादि रज्जुभाण्डम् ॥८॥ तालीवालभूर्जानां पत्रम् ॥९॥ किंशुककुसुम्भकुङ्कुमानां पुष्पम् ॥ १० ॥ मुज (मूंज }, यत्यज (सपाएक प्रसारकी पास ), ये रज्ज अर्थात रस्सी बनाने के साधन है ॥ ८ ॥ ताली (साबका एक भेद), ताल (ता), भूर्ण (भाजपा), हनका पसा कागज आदि की तरह लिसने के काम में भाता है ॥ ९ ॥ किंशुक (चाक), कुमुम्म (कसूम), कुंकुम ( केसर), ये सय पस्वादिके रंग के साधन है॥१०n कन्दमूलफलादिरौपषवर्गः ॥ ११ ॥ कन्द (पिदारी सूरा आदि), मूल (जारास आदि), फल (गायला, हरीतकी आदि), ये सब आपधिवर्ग है ॥ १॥ कालकूटयत्मनामहालाहलमेपशृङ्गमुस्ताष्ठमहाविपवेलितक- गौराईबालकमार्कटहैमवंतकालिङ्गकदारदकांकोलसारकोप्ट्टकादी - नि विपाणि ॥ १२॥ कालपूर, वासनाम, हाहाइल, मेपशन, मुस्ता (मोथे की तरह आकार वाला), कुछ (पटके समान ), महाविप, पलिता (भूल से पैदा हुआ, काला भौर लाल रंगका ), गौरा (कन्दसे पैदा हुआ, काले रंगका), पाठक (पीपलके भारस्कर, माकंट (सन्दरके समान रंगका ), ईमयत (हिमालय में उपस हुआ २) कालीक (कदिन देशमै उत्पन्न हुभा २, जो की आकृति के समान), दारदक (दरदसे उत्पन होने पाला पविए), भोलसारक (अकोल वृक्षमे उत्पन्न हुआ २ ), उष्ट्रक (अंटके मेढ़के समान आकार वाला) इत्यादि ये सब विष होते है ॥२॥ सर्पाः कीटाश्च स एव कुम्भगता विपवर्गः ॥ १३ ॥ सर्प (सप), कीट (पारी वाले मडक, छपकी आदि) आदि मा औपनिषदिक प्रकरणमें बताई हुई विधि के अनुसार ही सीसे भादि के . - (२३३) कौटलीय अर्थशास्त्र १२ अधिक घमें बन्द करके सस्कृत किये जायें, तो विष होजाते है। यह विषवर्ग है ॥ १३॥ गोधासेरकद्वीपिशिशुमारसिंहव्याघ्रहस्तिमहिपचमरसमरखड्- गगोमृगगवयानां चर्मास्थिपित्तनाम्यस्थिदन्तभृङ्गखुरपुच्छान्यन्ये- पां वापि मृगपशुपक्षिव्यालानाम् ।। १४ ।। गोड, सेरक ( चन्दन गाह, सफेद खालकी गोह का नाम है, जो प्राय स्थल में रहती है , द्वीपी (यघेरा), शिंशुमार ‘एक प्रकारको बडी मछली), सिंह, मात्र, हाणे, भंसा, धमर (चवरी गाय ), एमर (जगली पशु जाति), खड्ग (गंडा), गाय, हरिण और नोलगाय, इनकी खाल बडो पित्ता स्नायु (जिससे वात पनती है, स्नायु शब्दके भागे फिर दुधारा अस्थि शब्द भागया है। यहाँपर इस सन्दका पाठ अनावश्यक होनेसे सदिग्ध है), दांत, सींग, सुर, पूछ, आदि चीजें काममें भाती है, अर्थात् गोह आदि पशुओं की खाल आदि चीजोंको कुप्यके अन्तर्गत होनेसे अवश्य सगृहीत करे । इनके अतिरिक्त और भी जो मृग, पशु पक्षी तथा जगली हिंसक जानवर ही उनके चर्म भादि का भी समह करे ॥४॥ कालायसताम्रवृत्तकांस्यसीसत्रपुवैकृन्तकारकूटानि लोहानि ॥१५॥ कारायस (काला लोहा • तानवृत्त (सावा, कांस्य (कांसा), सीस (सीसा), पु (ग), यकृन्तक (एक प्रकार का लोहा), भारकूट (पीतल), ये सब लोहे के ही मेद कहाते हैं। ये सभी भाकरकान्त प्रकरण में कहे जाकर भी, यही कुप्यमें गणना करने के लिये फिर कहे गये हैं॥१५॥ निदलमृत्तिकामयं भाण्डम् ॥ १६ ॥ भाण्ड अर्थात् पात्र दो प्रकारके होते हैं, एक विदलमय, दूसरे मृत्ति कामय । जो योसकी खपच या इसी प्रकारको दूसरी पारीक लकड़ियों से ही बनाये जायें, वे पिटारी रोकरी आदि पहिले, और मिहीसे बनाये जाने वाले पोशकारे भादि दसरे होते हैं । ये भी समाश होसे हैं ॥ १६ अद्गारतुपभसानि मृगपशुपक्षिव्यालराटा: काष्ठवणवाटावेति ॥ १७॥ कोयल भीर राख भादि, गृग पशु पक्षी सथा अग्ध हिंसक जगरी आनक समूह तथा एसटी और घास फूपके देरोंका भी कुप्य होने के कारण साह करना अत्यन्त पावश्यक है || 108 १८ अंध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (२२३) वहिरन्तरश्च कर्मान्ता विभक्ताः सर्वभाण्डिकाः । आजीवपुररक्षार्थाः कार्याः कृप्योपजीविना ॥ १८ ॥. इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे कुप्पाध्यक्षः सप्तदशो ऽध्यायः॥ १७ ॥ आदितो ऽष्टाशिः ॥३८॥ पाहर जंगलों के समीप तथा जनपदमें, और अन्दर दुर्ग आदिमें, एथक् २ गाड़ी सथा लकड़ी आदिसे यनी हुई अन्य चीजें या सवारियां सब सरहके भापड ( पान ) भादिक समूद, इत्यादि सब ही आवश्यक पदापों का और अपनी भाजीविका, तथा नगर भादिकी रक्षाफे लिये अन्य आवश्यक पक्षा- थों का भी; कुप्योपसयो ( फुप्पसे अपनी आजीविका करने वाले कुप्याध्यक्ष भादि) पुरुष अच्छी तरह संप्रद करें ॥१८॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें सत्रहवां अध्याय समास । अठारहवां अध्याय ३६ प्रकरण आयुधागाराध्यक्ष । आयुधागाराध्यक्षः सांग्रामिकं दौर्गकर्मिक परपुराभिघातिक चक्रयन्त्रमायुधमावरणमुपकरणं च तज्जातकारुशिल्पिभिः कृत. कर्मप्रमाणकालवनफलनिष्पत्तिभिः कारयेत् ॥ १ ॥ मायुधागाराष्पक्ष, संग्राममें काम आनेवाले, दुर्ग की रक्षा के काममें भानेवाले, तथा शमुझे नारका विश्वंस करने काम भानेवाले, सर्वतोमद् (मशीनगन ), जामदग्य भादि यन्त्रोंका; (किसी २ पुस्तक 'यन्त्रम्' के स्थानपर 'चफ्रयन्यम्' पाठ है), शान्ति चाप आदि अन्य हथियारोंका, तथा शायरथा कथच आदि और सवारी आदि अन्य साधनों का मन २ कार्योको जाननेवाले कार ( मोटा काम करनेवाले कारीगर ) और शिल्पी (बारीक काम करनेवाले कारीगर) पुरपाके द्वारा निर्माण करायें। उन कारीगरोसें। प्रतिदिन कितना काम कराना चाहिये, अर्थात् यन्न भायुध आदि कितने सैयार कराने चाहिये, और कितने समय काम कराना चाहिय (अर्थात् कार्य करनेका समय कितना होना चाहिये ); तथा उनका वेतन आदि कितना होना चाहिये, इन सब बातोका पहिलेहीसे निश्रय करके फिर उन (कागों) से काम कराना चाहिये !
(२२४) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक स्वभूमिषु च स्थापयेत् ॥२॥ स्थानपरिवर्तनमातपायात- प्रदानं च बहुशः कुर्यात् ।। ३ ॥ , : जो सामान यनकर तैयार होताजाये, उसको उसके अपने स्थागमें रखवा दियागावे । अथवा, उस सबको अपनेही आधीन स्थानों में सुरक्षित रखवाया जावे ॥२॥ तथा अध्यक्ष उनका स्थान परिवर्तन करवाता रहे, जिससे कि ये एकही स्थानमें रक्खे २ खराब न होजायें, भारबार २ उनको धूप तथा इया देनेकामी पूरा प्रबन्ध रक्खा जावे ॥३॥ ऊष्मोपलेहक्रिमिभिरुपहन्यमानमन्यथा स्थापयेत् ॥ ४ ॥ जातिरूपलक्षणप्रमाणागममूल्यनिक्षेपैश्चोपलभेत ॥५॥ जो हथियार मादि गरमी, नमी, तथा की (धुन ) आदिके कारण खराय होरहे हों, उन्हें यहांसे उव्याकर इसप्रकार रखवावे, जिससे कि वे फिर खराय न होसकें ॥ ४॥ उनकी जाति (स्वभाय.). उनका रूप (सीधा या देदा आदि), लक्षण (शास्त्रोमें कहेहुए उत्तम मध्यम आदि चिन्ह), प्रमाण (लम्बाई, चौपाई, मोटाई भादि), मागम (जहसे उसकी प्राप्ति हुई है), मूल्य, तथा निक्षेप आदिके सम्बन्धमें अध्यक्ष अच्छी तरह ज्ञान प्राप्त करे ॥५॥ सर्वतोभद्र जामदग्नयहुमुसविश्वासपातिसङ्घाटीयानकपर्जन्य- 'कामाचाह्ववाहूनि स्थितयन्त्राणि ॥ ६ ॥ अव यन्त्रोंके विषयमे निरूपण किया जाता है..-सर्वतोभद्र (पद पन्न होता है जो एक जगह रखा हुआ, चारों ओरको गोली की मार करे ), जामदग्न्य (जिसके बीचमैं एक छेद से ही पात बड़े गोले निकले), यमुख (किले की अंधी दीवारोंपर बनाये हुए उस स्थान विशेष का नाम है, जिसमें बैठकर अनेक योवा पुरष चारों भोरको पाणवृष्टि करसके), विश्वास घासी (नगरके बाहर तिरछा बना हुआ यन्त्रविशेष, जो कि स्पर्श करनेपर मार वाले, इसका यह अन्वनाम इसी लिये है, किजो पहलेसे कुछ न मालूम पड़े, और स्पर्श करनेपर प्राणघात परदेये), सादि (लम्ये २ पोसॉस बनाये हुए, उचे महालक आदि को प्रदीत कामेके लिये अग्नियन्नविशेष), यानक (पहियों के ऊपर परसा ज पाला लम्यासा यन्न, जो बीच में से कुछ चौदा हो, अथवा रप आदि सवारीपर रखकर जो चलाया जावे), पयक ( अग्नि को शान्स करने के लिये काममें मान घाला, परणास्त्र), पाहुयन्त्र (पर्जन्यक के समान ही उससे भाधा सोटा पत्र), अयाहु ( उपर बना हुभा पर्स- म्यकके घरापर याभारी स्तम्भ, जो समीप भामे याला को मारदेये), अर्धपाहु (ऊर्वबाहुसे भाधे परिमाण पाहता या प्रकार के यन्त्र, स्थितन्त्र कहाते हैं। + 1 १८ अध्या अध्यक्ष-प्रचार। (२२५) पश्चालिकदेवदण्डसूकरिकामुसलयष्टिहस्तिवारकतालगृन्तमुद्ग- रंगदास्पृक्तलाकुटालास्फोटिमोद्घाटमोत्पाटिमशतभीत्रिशूलचक्राणि चलयन्त्राणि ।। ७॥ पञ्चालिक (तीश मुख वाला बदिया लकडी का बना हुभा, जो पर. कोटेके याहर जलके बीच शनुको रोकने के लिये झाममें लाया जाता है), देवदण्ट ( कील रहित यदा भारी स्तम्भ, जो कि फिलेके परकोटेके ऊपर रक्खा जाता है ), सूकरिका (सूत और चमडेकी बनीहुई एक पहुत पड़ी मशकसी, जो कि बाहरसे आनेवाले पाण थादिको रोकने के लिये गोपुर मा प्रहालक भादिपर दकदी जाती है। किसी २ ने इसका अर्थ किया है-पांससे पनीहुई राथा घमटेसे दकीहुई सूकरके समान भाकारवाली पहुत बड़ी मशकसी, जो कि दुर्गकी रक्षामें काम आती है ), गुसलयष्टि ( सैरका पनाहुभा, मूसल के समान मजबूत दड़ा जिसके भागे एक मूल हो ), हस्तिवारक (दो मुख या तीन मुखराला इडा अर्थात् द्विशूल या निशूल, किमी २ ने इसका अर्थ 'हाथीको मारने के लिये एक खास तरह का डडा' यह किया है), तालवृन्त (चारों ओरको घूमनेगाला यन्त्र विशेष), मुद्र, एघण ( मुद्गरके समानही एक अस्त्र विशेष ), गदा, स्पृक्तला (काटोपाल। गदा), कुहाल (कसी पाडा) । आस्फोटिम (चमडेसे ढकादुआ, चार कोनोंघाला, मट्टीफे देले या पत्थर आदि फेंकनेका यन्त्र ), उद्घाटिम (मुद्र के समान आकृतियालाही एक यन्त्र पिशेष), उत्पाटिम ! खम्य आदिको उसाढनेपाला श्येन यन्त्र), शतानी ( मोटी ओर एम्मी २ फोलोसे युक्त, यहुत बडा स्तम्भला, जो कि किले की दीवार के ऊपर रक्खा जाता है), त्रिशूल और चक, ये सप पन्न घलयन्त्र कहे जाते हैं ॥७॥ शक्तिमासकुन्तहाटकमिण्डिपालशूलतोमरवराहकर्णकणयक पेणनासिकादीनि च हलमुसानि ॥८॥ शक्ति ( सम्पूर्ण लोहेका दनाहुभा, कनाके पत्ते के समान मुसवाला ), मास ( चौधीस भंगुल लम्बा दुधारा, सम्पूर्ण लोहेका यनाटुमा सया जिसके पीच में लकड़ी लगी हुई हो), कुन्त ( सात बाथका उत्तम छ हायका मध्यम तथा पांच हायका निकृष्ट कुन्त होता है), हाटक (कुस्तके सगान सीन फोटरीवाला इथियार ), भिदिपाल ( मोटे फलेवाले कुनकाही यह नाम हे ), शूल (तीक्ष्ण एक मुखवाला, इसका प्रमाण नियत नहीं है), तोमर (धार हाथका अधम, साढ़े चार हाथका मध्यम और पांच हाथका उत्तम होता है, इसका अगला हिस्सा पाणके समान तीक्ष्ण होता है.) बराहकर्ण. (सारके कान समान मुखाकृति पाले प्रासकाही भाम है), कणय ( सम्पूर्ण , लोहेका धना - - {२ अधिक " । कौटलीय अर्थशास्त्र भी, दोनों भोरसे तीन २ कोटरोंसे युक्त, याचमें मूठयाला, यहचीस भगुल मा भधम, पाईस अगुल का मध्यम आर चीनीस भगुलका उत्तम होता है), फर्पण (सामरकै समान, हायसे फेंकेजाने वाला एक घाण विशेष), प्रासिका (सम्पूर्ण लोहेसे वनीहुई प्रासके बराबर होती है ), इत्यादि ये सब हथियार हलमुख कहाते है, क्योंकि इनका अप्रभाग खूब तीक्ष्ण होता है। लगभग ये सय, माछाकही भेद है ॥ ८ ॥ तालचापदारवशाणि कार्मुककोदण्डद्रूणा धपि ॥९॥ मूर्वार्कशणगवेधुमेणुस्नायूनि ज्याः ॥ १० ॥ साल (ताडका यनाहुआ), चाप (विशेष प्रकारके बांसका मना हुआ), दारव ( किसी मजबून लकीका यनाहुभा ), भार शान सींगोंका पमाहुभा), ये चार प्रकृतियोंसे धनुप पनाये जाते हैं। प्राकृति तथा किया 'भेदसे इनके पृथक् धक् नाम कोदण्ड और दूण " " मूर्षा, । भाख, सन, गोधुका, घेणु (पासा जो केतकीके समान होता है, इसकी फूटकर जो इसके रेशे निकलते हैं, उनकी रस्सी पदुत मगपूरा बनती है), भार माय ( जिसकी तांत बनती है), इन धीजोंसे धनुपकी दोरी बनानी चाहिये ॥१०॥ पेणुशरशलाकादण्डासननाराचाथ इपरः ॥ ११ ॥ तेषां 'मुसानि छेदनभेदनताडनान्यायसास्थिदारवानि ॥ १२ ॥ घेणु (योस, उटज घिमिय इत्यादि), शर (नरसल आदि), पालाका (किसी मजयूर एकडीकी बनाई हुई), दण्डासन (भाधा लोहा और आपापस आदिका बना हुभा), नाराच ( सम्पूर्ण लोहेका बनाहुआ ), ये मि २ प्रकार के वाण हाते है॥1॥ उन धाणोंकि भनेभाग (मुख भगले हिस्से) छेदन काटने के लिये, रफ सहित आधात पहुचानके लिये, तथा रहित घोट पहुचाने के लिये होत हैं । वे लोहे इहो तथा मजबूत, लकड़ीके बनाये हुए होते हैं ॥१९॥ निस्त्रिशमण्डलानासियष्टय खड्गाः॥ १३॥ सङ्गमहिपवार- पापिपाणदास्णुमूलानि त्सवः ॥ १४ ॥ खड्ग (सरूवार ) तीन प्रकारके होते हैं-निखिश (जिसका अगला हिस्सा काफी देशा हमला (सका असरदरमा कुठ २ गोलाकार हो), तथा भसियष्टि (जिसका पतला और लम्बा भाकोर हो) | • लारकी मूह'नित किा वीओंकी होनी चाहिये-सम (स) और मिर के सीगqia, माया दिया और बोसकी जद 11 T १८ माध्या अध्यक्ष प्रचार (२२७) । परशुकुठारपट्टससनिनकुद्दालक्रकचकाण्डच्छेदनाः सुरकल्पाः ॥१५॥ यन्त्रगोप्पणमुष्टिपापाणरोचनीपदचायुधानि ।। १६ ।। परशु (फरसा, कुठार (कुदाक्ष ), पट्टस (दोनों किनारॉपर जिसके त्रिशूल हा) सनिग्न (फायड कसी ), कुहाल (कुदाली-वैसाखी यह सम्पूर्ण लोहेकी यनीहुई सामनेसे चौडे मुहकी होती है ), फ्रकन (भाग), काण्डच्छेदन ( काण्डासिका गडासी ), यह सब क्षुरकल्प या क्षुरवर्ग कदाता है।ौके समान सीधी धार होनेके कारण इनफो यह नाम दिया गया है ॥ १५ ॥ यन्त्रपापाण (किती पत्रविकार पैकाहुभा पापाण आदि), गोपणपापाण ( गोफियोंसे फैकाहुआ पापाण आदि । गॉफिया सूत आदिके पहुए एक यन्त्र विशेषका नाम है, जिसमें पत्थर आदि रखकर फिर उसे धुमाकर तों और यागीचों में पक्षियों को उजाया जाता है), मुष्टिपापा मुलीसे फेंका हुआ पाषाण आदि ), रोचनी (दलनेकी यन्त्र शिला चकाके पार भादि ) और दृपद् ( बडे २ पस्था=महाशिला ), आदि ये सम आयुध कहाते लोहजालजालिकापकाचस्तक कटशिंशुमारकसहिनुक- हस्तिगोचर्मसुरशृङ्गसंघातं वर्माणि ॥ १७ ॥ लोहजाल (सिरके सहित सम्पूर्ण शरीरको ढकोबाला गावरण), लोह मालिका ( सिरको छोड़कर बाकी शरीर को ढकने वाला भाधरण ), लाइ पर (वाहाँको छोदकर बाकी देहपर भानानेवाला आवरण), लोहकवच (केपक पीठ और छातीको ठकनेवाला आवरण), सूत्रण (कपासके सूत आदिका यना हुआ कवच), और शिशुमारक (एक प्रकारको मछली , अर्थ उदधिलार भी किया है), खनि (गेष्टर), धेनुक गरसम् नीलगाय), दायी सया पैल इन पापोंक चमडे, खुर और सींगोंको, यो चातुर्यसे आपसमें मिलाकर भी कयर तैयार किया जाता है । इस प्रकार येह तरह के करच तैयार किये जाते हैं ॥१७॥ शिरस्त्राणकण्ठपाणकूसकन्नुकमारवाणपट्टनागोदारका पेटीचर्महस्तिकर्णतालमूलधमनिकाकनाटकिटिकाप्रतिहतमलाहका- न्ताच आमरणानि ।। १८ ।। शिरखाण (केवल सिरकी रक्षा करने वाला), कण्ठबाण (कण्ठकी रक्षा करनेवाला), कूर्मास (भाधी बाहोंको भावरण करनेवाला , कम्चुक (घोटुओं तक गरीरको दकनेवाला), पारवाण (पैरक रहने तक सारी देहको बकनेवाला) किसीने इसका 7. ।
[२ अधिक - (२२८) कौटलीय अर्थशास्त्र पह{ जिसमें बांह बिलकुल न हो, तपा जो लोहेका बनाया हुभा न हो), नागोदरिका (फेवल हाथकी अगुलियोंकी रक्षा करनेवाला), ये देहपर, धारण किये जानेवाले सात भावरण और होते हैं । पेटी, धर्म (चमकी बनी हुई पेटा), हस्तिकर्ण (मुह पकनेका आवरण), तालमूल (लकनीकी बनी हुई पेटरी), धमनिका (स्तकी यनी हुई पेटी), कवाट (लकदीका पना हुआ एक विशेष पहा), किटिका (चमटे और बांसको कूटकर बनाई हुई पेटी), भमतिहप्त (सम्पूर्ण कायको ढकने वाला आवरण), पलाहकान्त ( किनारों पर लोहे के पतर से धन्धा हुआ अप्रतिहत हो पलाहकान्त कहाता है), और इसी सरहके भन्य भी शरीरका दकन पाले भावरण होते है॥१८॥ हस्तिरथवाजिनां योग्यभाण्डमालंकारिकं संनाहकल्पना वोपकरणानि ॥१९॥ ऐन्द्रजालिकमोपनिषदिकं च कर्म ॥२०॥ हाथी, रथ तथा घो?की शिक्षा भादिके साधन, अकुश कोहे भादि। तथा सजाने के लिय अम्य पताका आदि साधन, भौर कवच सथा शारीरकी रक्षा करने पाले अन्य भाषरण, ये सब उपकरण कहाते हैं ॥ ९॥ ऐन्द्रजा लिक फर्म तथा भौपनिषदिक कर्मको भी उपकरण कहते हैं। (पेन्द्रजालिक= थोडीसी सनाको बहुत सना समान दिखा देना, अनिके न होनेपर ही प्रचण्ड अभिकी वाला दिखा देना आदि। औपनिषदिकभापतिपदक अधिकरणमें पतापे हुए विपैले धुएं तथा दूपित अल भादिका प्रयोगकर उनका प्रभाव दिखा देना) ॥२०॥ कर्मान्तानां च ॥ २१ ॥ इच्छामारम्भनिप्पत्ति प्रयोग व्याजमुद्दयम् । क्षयव्ययौ च जानीयात्कृप्यानामायुधेश्वरः ।। २२ ।। इस्पायक्षपधारे द्वितीये ऽधिकरणे आयुधागा यक्ष भटादशो पाप भादित एकोनपरवारिंश ॥१९॥ पियल दो पायोम यताये हुए द्रयों के व्यापार आदिके विषय में- (कमान्तानां कुप्यानाम् ), रानाकी रधिको, और रश्चिके भनुसार कार्यके प्रार म्भ भार परपसान (समाप्ति) को उपयोग, दोष तथा लामको ठमके क्षय और ग्यरको, भायुपामाराध्यक्ष अरसी तरह सम, कुप्यापस लिये भी ये सरपात पाननी भाषश्यक है। २१-२२॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय मधिकरणमें अठारहया अध्याय समाप्त। । 111412 .
१९ अध्या० .] यध्यक्ष-प्रचार, उन्नीसवां अध्याय ३७ प्रकरण P4 ज तोल मापका संशोधन पौतयाध्यक्षः पातवकर्मान्तान्कारपेत् ॥१॥ घान्यमापा दश सुवर्णमापकः पञ्च वा गुञ्जाः ॥२॥ ते पोडश सुवर्णः कर्पो वा ।। ३ ।। चतुःकर्ष पलम् ॥ ४ ॥ पाचवाध्यक्ष (सोल मापका संशोधन करनेवाला राजकीय अधिकारी), पौतवकर्मान्त अर्थात् तुला और कुदुव भादि पार्टीको पनयावे ॥१॥ वस धाम्यमाप (उदके दाने ) का एक सुवर्णमाप होता है। और इतने ही पांच गुभा (चौटली रत्ती) ॥२॥ सोरह मापका एक सुवर्ण अथवा एक कप होता है ॥ ३ ॥ पार कर्षका एक पल होता हे ॥५॥ यह सुवर्ण वोलमेके पाटी का कथन किया गया है, इसको नित निर्दिष्ट रीतिसे दिखाया गासकता है.-॥४॥ = पल १० उर्दके दाने-1 एक सुवर्णमापक अधवा ५ रत्ती १६मापक = सुवर्ण अथवा १ कर्ष भकर्ष अष्टाशीतिौरसर्पपा रूप्यमापकः ॥५॥ ते पोडश घर- णम् ॥ ६ ॥ शैव्यानि वा विंशतिः ॥ ७ ॥ सफेद सरसो (गा सरसों) के अठासी दाने की पराबर एक रूप्य. मापक होता है ॥५॥ सोलह रूप्यमापक का एक धरण होता है ॥६॥ उसके परावर ही वीस शम्म्य होते शिम्मि फलका नाम सैम्य है, हिन्दी में सेंगरी कहते हैं, यह मूली की फ्लीका माम) । यह, बादीकी तोलका कयन किया गया । इसको इस प्रकार रिखाया जासकता है॥ ॥ ८८ सफेद सरसों रूप्यमापक १६ रूपमापक = धरणापा २० भन्थ्य (मूलीक वीज) विंशतितण्डुलं वज्रधरणम् ॥ ८॥ पीस पावल का एक पनधरण होता है । यह हीरे की तोल ह ॥८॥ २० चायल बन्नधरण। 1 -- (२३०) - . कौटलीय अर्थशास्त्र FR अधिक अर्धमापकः मापकः द्वौ चत्वार अष्टी मापकाः सुवर्णो द्वौ चत्वारः अटौ सुवर्णाः दश विंशतिः त्रिंशत् चत्वारिंशत् शत- मिति ॥ ९ तोलने के लिये बाटीकी सख्या निम्नलिखित शतिसे होनी चाहिये अर्धमाषक (आधा मापक), मापक, दो मापक, चार मापक, भार मापक । सुवर्ण, दोसुवर्ण धार सुवर्ण पाठ सुवर्ण, दस सुवर्ण, यौस सुवर्ण, सौस मुवर्ण चालीस सुवणं, 'सो सुंदण, इस प्रकारसे सोने आदिकी सोहके लिये ये फुल मिलाकर चौदह बाट हाने चाहिय । टोटेसें छोटे अर्धमापकसे लगाकर,सा सुवर्णके बडे बाट तक चादह बाट आवश्यक है ॥९॥ तेन धरणानि व्याख्यातानि ॥ १० ॥ इसी तरह धरणके घाटों की कल्पना भी करलेनी चाहिये । अर्थात् 'धरण, दोधरण, चार धरण, आठ धरण, दस धरण, वीस धरण, तीसे घरण, चालीस घरण, और सौ धरण । रूप्यमापक की भी उपर्युक्त रीतिसे कल्पना करनी चाहिये -अर्ध मापक, माक, दा मापक, घार मापक, माठ मापक, ये बाट चांदी भादिकी तालके लिये उपयुक्त होते हैं ॥ १० ॥ प्रतिमानान्ययोमयानि मागधमेकलशैलमयानि यानि वा नोदकप्रदेहाभ्यां वृद्धि गच्छेयुरुष्णेन या हासम् ॥ ११ ॥ सोलन के सब ही वाट लोहे के बनाये जावें, मगध या मेकल देशमें उपस होने वाल परयरक बनाये आवें । अथया ऐसी चीजोक बनाये जावें, जो पानी या और किमी लेपकी धस्तुके लगनेसे वृदिको प्राप्त न होयें, तथा गरमी पहुचनेसे कम न होजावें ॥1॥ पडङ्गलादूर्घमष्टाङ्गुलोत्तरा दश तुलाः कारयेल्लोहपला. 'दुर्घमेकपलोचरा यन्त्रमुभयतः शिक्य वा ॥ १२ ॥ सोना और चांदी तोलनेके लिये निम्नलिखित सब प्रकारकी तुलाओं का निर्माण कराया जाव, कमसे कम छः अगुल की तुलासे लगाकर, फिर प्रत्येकम आठ २ अगुल बढ़ात चल जावें । तात्पर्य यह है-पहिले सबसे छोटी तुला छ भगुलकी हानी चाहिये । उसके बाद दूसरी चौदद भगुलकी, फिर याईस भगुरुका, और फिर उसके बाद चौथी सीस भगुलकी । इसी प्रकार प्रत्येक आठ २ भगुल बढाते हुए, अन्तिम दसवीं तुला अठत्तर (७८) भगुल की हामी । इनका वजन एक पल लोहेसे लगाकर प्रत्येक मुलामें एक पक्ष बढ़ता जाना चाहिये । पहिलो छ भगुलकी तुला एक पर्वकी, दूसरी चौदह .
१९ अध्या०]
अध्यक्ष प्रचार
(२३)
भगुटकी दो पसकी होनी चाहिये । इसी प्रकार प्रत्यकम एक २ पल पढाते
हुए अन्तिम अठत्तर भगुल की तुला इस पलको होना चाहिये। इसके दोनों
और शिप अर्थात पलड़े लगे हुऐ होना चाहिये ॥१२॥
पञ्चत्रिंशत्पललोहां द्विसप्तत्यगुलायामां समवृतां कारयेत्
"|१३॥ तस्याः पञ्चपलिकं मण्डलं पद्मा समकरणं फारयेत्॥१४॥
सोना चादी तोलनेक लिये पिछली दस तुलाओंका निरूपण किया गया
है, भम भार पदार्थोंको तौलने के रिये दूसरी तुराका निरूपण करते है -पंती
स पल लाहेकी बनी हुई, यहत्तर भगुल अर्थात् तीन हाय एम्बी समयत्ता
नामक, गोलाकार तुला, अन्य पदायाँको बोलने के लिये होनी चाहिय ॥१३॥
उसके यीच में पाच पल का काम लगवाकर, ठीक माप में चिहावायेm
ततः कर्योत्तरं पलं पलोत्तरं दशपलं द्वादश पश्चदश निंश
तिरिति पदानि कारयेत् ॥ १५ ।।
उसके याद, उस बीच के घिस लगाकर एक कप, दो कप तीन कर्प
तया एक पढ़ चिन्द रगवावे, और एक पलके आगे दस पल एक (अर्थात्
एक पल दो पल तीन पल इत्यादि), फिर उसके बाद बारह पर पन्द्रह पल
और योस पटका चिन्ह लगाये | सात्पर्य यह ६, उस केन्द्रस्थित काटको
गोलाकार परिधि में यथाक्रम ये सब चि.६ रपे होन चाहिये ॥१५॥
तत आशतादशोचर कारयेत् ॥ १६ ।। अक्षेषु नान्दीपिनद्धं
कारयेत् ।। १७ ॥
फिर वास पलके आगे सो पल तक दस दसके अन्तरसे चिन्ह लगे
रहने चाहिये, अर्थात् बीस पर के बाद मास पल, चालीस पल, पचास पल
। इत्यादि प्रकारसे सौ पल तक चिन्द,लगवावें ॥ १६ ॥ प्रत्येक अक्ष अर्थात् पाच
पल अन्तरकै चिहपर, पहचान के लिये नादपिनद् अर्थात् सास्तिक चिन्ह
पाया देना चाहिये । ( किसी 'पुस्तक 'नान्दापिनद्ध' के स्याापर
नदीपिनद्ध' पाठ है। नदी रज्जुका नाम है, प्रत्यक पाचा अङ्कर साथ र
एक रज्जके समान रेखा यनवा दीजावे, यही इसका अर्थ करना चाहिये),
तात्पर्य यह है कि पाचव, वसव तथा पन्द्रह आदि अहॉपर पहचानक लिए
एक विशेष चिन्ह गया देना चाहिये ॥ १७ ॥
द्विगुणलोहां तुलामतः पण्णरत्यगुलायामां परिमाणी कार-
येत्॥१८॥ तस्याः शतपदार्श्व विशतिः पश्चाशव
समिति
पदानि कारयेत् ॥ १९॥
। [२ अधिक ₹ (२३) कौटलीय अर्थशास्त्र जिस तुलाका अमीता वर्णन किया गया है, इसको 'समसा' कहते हसमे जितनालोहा लगाया जाता है, उससे दुगने लोहेसे बनी हुई ( अर्थात् सत्तर पल लोईसे बनी हुई। और उद्यानवे (९५) अंगुल अर्थात् शा हाथ लम्धी, 'परिमाणी' मामलों का निर्माण कराये ॥ १८॥ उसके उपर सम वृत्ता नामक सुलाके भनुसार कर्षसे लगाकर सो पल पर्यन्त चिन्ह करके, फिर उसके भाणे, बीस, पचास तथा सौके चिन्ह और बनाने चाहिये । अर्थात् सौके भाग एकसी मौस, एकसौ पचास भौर दोसी पलके चिन्द भार बनाये जा १२॥ विशतितौलिको भारः ॥२०॥ सो पलका नाम एक तुला है, योस नुला परिमाणका एक भार होता है ॥२०॥ १०० पल-1 तुला. २० तुला भार दशधरणिकं यलम् ॥ २१॥तत्पलगतमायमानी ॥२२॥ सोने चांदी के अतिरित अन्य वस्तु भाको सो पठसे अधिक सोलनेक लिये एक विशेष परिमाण बताते है.-पहिले बतलाये दस धरणिकका एक पल होता ॥२॥ और उन सी परॉकी एक भापमानी नामक तुला होती (माय मर्यात् भामदनीको तोलने पारी मुलाका माम ही भायमानी होता . । धरण पल १०. पहाभायमानी पचपलावरा व्यवहारिकी माजन्यन्तःपुरनाजनी च ॥२॥ पांच पांच पल उत्तरोत्तर कम होने पाली तुला यथासरप पावहारि की. माजनी' और 'अन्तःपुरमाउनी' कहाती सत्पर्य यई-इन मीनों तुलाभों में से पहिली तुला, भायमानीसे पोच पल कम अर्थात् पिधान { ९५ ) पलड़ी ही होती है, इसका नाम 'प्यावदारकी। दूसरी भाजनी' नाम तुला व्यावहारिकोसे पांच पल कम भपात नम्मे (१.) एलको होती है। इसी तरह तासरी अन्त पुस्माजनी' भार पाच पल कम करके पिपाप्ती (५५) पलको दो हजाती है। इनमेसे पहिलो क्रय विक्रय महामे, पूसरी मृत्योरो हाय देने और तीसरी सनो ता राजकुमारमादिक 'पने में काम जाती है। MA १९ अध्या अध्यक्ष-प्रचार (२३३) तासामर्धधरणावरं पलम् ॥२४॥ द्विपलावरमुत्तरलोहम् ॥२५।। पडगुलाबरावायामाः ।। २६ ।। इन व्यावहारिकी आदि तीनों तुलामों के प्रत्येक पलने उत्तर आधा आधा धरण कम होता है । तात्पर्य यह है, आयमानी तुलामें दस धरणका एक पल होता है। उसमें आधा धरण कम करके साढ़ेना धरण (२३) का एक पल म्यावहारिकी तुलामें होना चाहिये, उससे भी आधा कम करके अर्थ मी (९) घरणका एक पल माजनी नाम तुला होना चाहिये। इसी तरह अन्त.पुर. भाजनी नामक तुलाम साढ़े आठ (८३) धरणका एक पल होता है ॥ २४ ॥ इसी तरह इन तुलाओंके बनाने के लिये लोहा भी, उत्तरोत्तर तुलामै पहिलीले दो दो पल कम होना चाहिये । अर्थात् प्रायमानी तुला यदि पैतीस पल लोहे- की बनाई जावे, तो व्यावहारिकी तुरा तैतीस पलकी, भाजनी इकत्तीस पलकी और अन्तःपुरमाजमी उन्तीस पर की पनाई जानी चाहिये ॥ २५ ॥ इनकी लरपाई भी उत्तरोतर तुला पहिली तुलासे ३. २ अंगुल कम होनी चाहिये । अपात् यदि भायमानी तुला यहत्तर अंगुलरी यनाई जाये, तो व्यावहारिकी छयासठ (६६) भगुलकी; माजनो सा2 ( ६० ) अगुलकी और अन्य पुरमा- जनी चौवन ( ५४ ) अगुलकी बनाई जाये ।। २६ ॥ पूर्वयोः पञ्चपलिकः प्रयामो मांसलोहलवणमणिवर्जम् ।।२७|| काष्ठतुला अष्टहस्ता पदवती प्रतिमानयती मयूरपदाधिष्ठिता॥२८॥ पहिली दो तुलाभा अर्थात् परिमाणी और आयमानी में, मांस लोहा ममक और मणियोंके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंको सोलने पर पांच पल अधिक सोला जाता है। इसीको 'श्याम' कहा जाता है ॥ २७ ॥ भय लकड़ीकी बनी हुई सुसाका निरूपण किया जाता है, यह तुला आठ हाथकी होनी चाहिये। इसपर एक दो सीन आदि चिन्होंकी रेखाएँ भी अवश्य होनी चाहिये । इसके पाट आदि परथरके बने हुए होवे । मोरके पैरों के समान जिसके पर अधात भाधार हो । ('मापदाधिधिता' के स्थानपर किसी र पुस्तकमे ' मप दाधिष्ठामा' भी पाठ है । अर्थमें कोई भेद नहीं)॥ २८॥ काष्ठपञ्चविंशतिपलं तण्डुलप्रस्थसाधनम् ॥ २९ ॥ एप प्रदेशो वह्वल्पयोः ॥३०॥ इति तुलाप्रतिमानं व्याख्यातम् ॥३१॥ पचीस पल इंधन, एक प्रस्थ चावलाको पकाने के लिये पर्याप्त होता है.॥ २९॥ इसी हिसाब से मधिर और न्यून चापस पाने के लिये, इंधन उपभोगमें लाना चाहिये । (पद्यपि यह पास कोशागाराध्यक्ष प्रकरणमें कमी : .
(२३४) कौटलीय अर्थशास्त्र १२ अधिः उचित थी, पर भसार वस्तुओंकोभी बहुत परिमित व्यय करमा नाहिये, फिर सार वस्तुओकातो कहनाही क्या ? यह प्रकट करनेके लियेही इसका यहाँ कथन किया गया है ॥३०॥ यहातक सोलह प्रकारको हुला और चौदा प्रकार के पोटोंका निरूपण किया गया ॥३॥ अथ धान्यमापद्विपलशतं द्रोणमायमानम् ॥ ३२ ॥ सप्ता- शीतिपलशतमपलं च व्यावहारिकम् ॥ ३३ ॥ अब इसके आगे द्रोण भादक आदि परिमाणोंका निरूपण किया जायगा-धान्यमापके दो सौ पलका एक भायमान दोण होता है, अर्थात् यह दोण केवल राजकीय भायको तोलने केही काममें लाया जाता है, (भाय. मानी तुलाके साथ सम्पन्य होनेसे इसका नाम आयमान है)॥ १२ ॥ एकसो साढ़े सतासी ( १८७३) पलका एक व्यावहारिक द्रोण होता है, यह का विक्रय व्यवहारके समय तलने के काम आता है, (व्यावहारिकी सुलाके साथ सम्पन्ध हाने से इसका नाम व्यावहारिक है ॥ ३३ ॥ पञ्चसप्ततिपलशतं भाजनीयम् ॥ ३४॥ द्विपटिपलशतमर्ध- पलं चान्तःपुरभाजनीयम् ।। ३५ ॥ एकसी विडहसर (७५) पलका एक भाजनीय द्रोण होता है, यह भृत्यों किये द्रव्य आदि तोलने काम भाता है। (माजमी नामक तुला साथ इसका सम्बन्ध होनेसे इसको भाजनीय होण कहा जाता है) ॥ ३४ ॥ एकसौ सावे यासठ (६६२६) परका एक अन्त पुरभाजनीय द्रोण होता है। इसका उपयोग, भन्त पुरके लिये सामान भादि तोलगमें होता है। अन्य पुर- भाजनी नामक मुलाके साथ सम्माय होनेसे मणका नाम सन्त पुर• भाजनीय होता है ॥ ३५ ॥ देपामाढकपस्थकुड्डुवाचतुर्भागापराः ॥ ३६॥ इन चार प्रकारके दोणाका उत्तरोत्तर चतुर्थांश कम होकर भादक और कुटुबका परिमाण निश्चित होता है। तात्पर्य यह है कि द्रोणका जितना परिमाण होता है, उससे चौपा हिस्सा कम भाटकका, और भादकसे चौधा हिस्सा कम प्रस्थका, तथा मस्यसे चौधा हिस्सा कम कुहुपका परिमाण होता है ॥२६॥ पोडशद्रोणा खारी ॥३७॥ विशतिद्रोणिका कुम्मः ॥३८॥ कम्मर्दशमिहः ॥ ३९ ॥ प्रस्थ - .
१९ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (२३५) सोषद द्रोणकी एक पारी होती है ॥ ३० ॥ दीप द्रोणका एक कुम्भ होता है ॥ ३० ॥ दस कुम्भका एक 'वह' होता है ॥ ३९॥ १६ द्रोण खारी २. होण (११ खारी)31 कुम्भ शुष्कसारदारुमयं समं चतुर्भागशिखं मानं कारयेत् ॥४॥ अन्त:शिसं वा ॥४१ ।। रसस्य तु ॥४२॥ सूसी यढ़िया लकीका पनाहुआ, नीचे उपासे यापर, शियरमें चतुर्थाशसे युक्त ( तात्पर्य यह है, नीचे के हिस्सेको तैयार करके जप उसके उपर उसका मुंह या गर्दन पनाई जाये, तो यह इस तरहकी पनीहुई होनी धादिये, जिसमें कि नीचे असली भागमे आनेवाले मालका पौधाई हिस्सा समाजाये । अर्थात् यदि उस सारे मानमें पीस प्रस्थ. धान भासकते ६, सो पांच प्रस्थ उसकी गर्दन में आने चाहिये, पन्द्रह प्रस्य उसके नीचे के हिस्से में पेसा)मान अर्थात् अनाज भादि मापने के लिये एक पतन तैयार कराया जाये ॥ ४० ॥ अथवा उसकी गर्दन के हिस्से को नीचे भागही मिला दिया जावे। (मीफे भागसे पथर गईनको न पनाया जावे, पेटके समान नाघेके हिस्सको ही इस प्रकार बना दिया जावे, कि उतना सम्पूर्ण भना। उसी समाजाय । केवल अनाम आदिक मरने निकालने के लिये एक मुह रखना चाहिये ॥४॥ रस अपार धी तेल भादिके मापने का घर्तन भी इसीतरहका ( अलहदा गगसे रहित) होना चाहिये ॥ ४२ ॥ सुरायाः पुष्पफलयोस्तुपाहाराणां सुधायाच शिखामानं द्विगुणोत्तरा वृद्धिः ।। ४३ ॥ सुरा (शराय भादि), फल, फूल, सुप (नदी भुस आदि), भहार ( कोयला }, सुधा ( चूना कलई आदि), इन छः पदार्थोंको मापने के लिये जो पतन पनाये जावे, उनका ऊपरका हिस्सा नीचे के हिस्सेसे दुगना यदा होना चाहिये । और इन पौनोंकी गर्दनभी नीचे के हिस्से अलहदा पोहुई होनी चाहिये ॥ १३ ॥ सपादपणो द्रोणमूल्यम् ॥४४॥ आढकस्य पादोनः ॥४५॥ पमापका प्रस्थस्य ॥ ४६ ।। मापका कुडुवस्य ॥ ४७ ।। एक द्रोणका मूल्य सया पण होता है। (अधात् जिस यर्शन भादिमें एक दोण माल भामाये, उस पतनकी कीमत सबा पण होनी चाहिये || एसीतर एक भादकका मूल्य पौन पण शेता ॥ ५५ ॥ एक प्रस्थका छ;
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधिक
मापक ॥ १६ ॥ और एक कुटुयका एक मापक मूल्य होता है ॥ ४ ॥
द्विगुणं रसादीनां मानमूल्यम् ॥ ४८ ॥ विशतिपणाः
प्रतिमानस्य ॥ ४९ ॥ तुलामूल्यं त्रिभागः ॥ ५० ॥
रस अर्थात् धी तल भादिके मापनेके पत्तनोंका मूल्य, उपर्युक्त मूल्यसे
दुगना हाता है । एक द्रोण घी मापने के बर्तनका दाई पण मूल्य होगा, इसी
तरह भाटकका डे, प्रस्थका बारह मापक और कुदुरका दो मापक समझना
चाहिये ॥ १८ ॥ चौदह प्रकरके सम्पूर्ण पार्टीका मूल्य बीस पण होता है ।
॥ १९॥ भार तुलाका मूल्य इससे तिहाई अर्थात् ६१ पग होता है ॥ ५० ॥
चतुर्मासिकं प्रातिवेधनिकं कारयेत् ॥ ५१ ।। अप्रतिविद्ध-
स्यात्यय सपादः सप्तविंशतिपण ॥५२॥ प्रातिवेधनिक काक-
णीकमहरहः पौतराध्यक्षाय दगुः ॥ ५३ ।।
भयेक घार चार महीने के पाद तुला और घाट आदिका परिशोधन कराना
चाहिये ॥५१॥जा ठीक समयपर परिशाधन न करावे, उसको सवा ससाईस
पण दण्ड देना चाहिये ॥ ५२॥ व्यापारियों को चाहिये कि वे परिशोधन के
निमित्त, प्रतिदिन एक काकणी के हिसायसे, चार महीनको एकसौ बीस (१२०)
काकणी, पानवापक्षको देवें। यह बाट भादिक परिशोधनका राजकीय रेक्स
होता है॥ ५३॥
द्वात्रिंशद्भागस्तप्तव्याजी सर्पिपश्चतुःपष्टिभागस्तैलस्य ॥५४॥
पञ्चाशद्भागो मानसारो द्रयाणाम् ॥ ५५ ॥ कुड्डुवार्धचतुरष्टभा-
गानि मानानि कारयेत् ।। ५६ ॥
यदि गरम किया हुमा धी खरीदा जावे, तो उसका बत्तीसवां हिस्सा,
प्याजी अर्थात् अधिक लना चाहिय 1 आर तलके उपर चौसठवा हिस्सा ब्याजी
लना चाहिये । अर्थात् इतना भाग अधिक एना चाहिय । ५४ ॥ द्रव पदाथों
का पचासा हिस्सा, तालनके समय छजनका समझना चाहिये ॥५५॥
फुटु भादि छोटो साल के लिये एक कुडुय, आधा फुडुप, चौपाई कुदुर और
भाठयो हिस्सा कुदुर, य चार याट, और मापने के लिये इतने २ ही के बर्तन
नाये जावें। ५६॥
कुहुयाश्चतुराशीतिः वारका सर्पिपो मतः ।
चतुःपष्टिस्तु तैलस्य पादश्य घटिकानयोः ॥ ५७ ॥
त्यध्यक्षमवरे हितीये ऽधिकरणे तुरामानपौसव एकोनविंशो ग्याप ॥१२॥
मादितमत्वारिका ॥३०॥
२० अभ्या०] अध्यक्ष प्रचार (२३७) घी के तोलने के लिये चौरासी फुडुबका एक 'वारक' होता है। और तेलके तोलने के लिये चौंसठ कुडनका ही एक वारक माना गया है। इसके चौथाई हिस्सेका माम 'घटिका' होता है। अर्थात् इक्कीस कुडुबका एक पुत घटिका, और सोलह कुडयकी एक तेलघटिका समझनी चाहिये ॥ ५५ ॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण में उन्नीसवां अध्याय समाप्त । बीसवां अध्याय। ३८ प्रकरण देश तथा कालका मान । मानाध्यक्षो देशकालमानं विद्यात् ॥ १॥ अष्टौ परमाणयो रथचक्रविद् ॥ २॥ ता अष्टौ लिक्षा ॥ ३ ॥ ता अष्टौ यूका- मध्यः ॥ ४ ॥ ते अष्टौ यत्रमध्यः ॥५॥ अष्टौ यवमध्या असलुम् ॥६॥ मध्यमस्य पुरुषस्य मध्यमाया अगुल्या मध्यप्रको बागुलम् मानाध्यक्ष (पौतयाध्यक्ष ) को चाहिये कि यह देश भौर कालके माम को अच्छी तरह जाने ॥१॥ आठ परमाणुओं का मिलकर, 'स्थ पहिये से उड़ाई हुई भूलका एक कण होता है ॥ २ ॥ आठ धूलकण मिलाकर एक लिक्षा होती है, ॥३॥ पाठ लिक्षाका एक यूकामध्य, ॥ ४ ॥ माठ यूकामध्यका एक परमध्य, ॥ ५ ॥ और आठ यवमध्यका एक अगुल होता है ॥ ६॥ अथवा मध्यम पुरुष ( जो न यहुत मोटा हो, और न यहुत पवला, किन्तु इकारें मदनका भादमी हो, उस) की यीच की अगुलीके बीच ही पोहएकी मोटाई जितनी हो, उतना ही एक भगुल समझना चाहिये ॥ ७॥ ८ परमाणु %3D1 धूलकण ८ धूलकण - लिक्षा ८लिक्षा ८ कामध्य- यवमध्य ८ ययमभ्य 31 अगुल चतुरङ्गुलो धनुर्ग्रहः ।। ८ ॥ अष्टाङ्गुला धनुर्मुष्टिः ॥ ९ ॥ द्वादशाङ्गला वितस्तिः ॥ १० ॥ 'छायापीरुपं च ।। ११ ।। चतुं. 31 यूकामध्य + 1 (२३८) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक देशाङ्गुलं शमः शलः परिरयः पदं च ॥ १२ ॥ द्विवितस्तिरनिः प्राजापत्यो हस्तः ॥१३॥ चार अगुलका एक धनुग्रह होता है ॥ ८ ॥ और भाठ अगुल अपवा दो धनुर्पह की एक अनुमुष्टि होती है ॥ ९॥ बारह अगुलकी एक वितस्ति (बीता=बिलोयद ) होती है ॥10॥ छायापौरुष भी बारह भगुरका ही होता है । अर्थात् वितस्तिको छायापुरप भी कर सकते हैं ॥1॥ चौदह अगुल परिमाणका नाम शम, शल, परिरय, भार पर है। भयात् चौदह भगुल परिमाण के लिये ये चार नाम प्रयुक्त होते है ॥ १२॥ दो वितस्तिकी एक भारिन, या मजापत्र (प्रजापति अर्थात् विश्वकर्माको सम्मत ) हाय होता है। मर्थात् इसको एक हाथ भी कहाजाता है ॥ ३ ॥ ४ अगुल =1 अनुमेह ८ भगुल अथवा २ धनुर्मह अधनुर्मुष्टि १२ अगुल, या३ धनुग्रंह 1. वितस्ति पा छायापौरुष अथवा 11 धनुष्टि १५ अगुल =शम=शल परिरय-पदा पैर) २ वितस्ति अरविप्राजापत्य), सधनुर्महः पौतवविवीतमानम् ॥ १४ ॥ सधनुर्मुष्टिः किष्कः कंसो वा ॥१५॥ एक हायके साथ धनुग्रंहको मिलाकर (एक हाय-२५ अगुल एक धनु मेंह- भगुस=) २८ भगुलका बना हुआ पक हाथ, पौतव (लकीको सुला भावि) और विवीत (चरागा) के मापनेके काममें भाता है। अर्थात् पौतय और विधीतको २८ भगुलके हायसे नापना चाहिये ॥ ४॥ एक धनुष्टि अर्थात् पाठ भगुल सहित एक प्राजापत्य हस्त, किकु या कस कहा आत्ता - । पहाय। २८ भगुरु: हाय (विवीत और पासबके मापने में काम आने वाला), ११ भगुल किकु अथवा कस। द्विचत्वारिंशदगुलस्तक्ष्णः क्राकचिककिकृः स्कन्धावारदुर्ग- राजपरिग्रहमानम् ॥१६॥ चतु पञ्चाशदङ्गुलः कुप्यवनहस्तः ॥१७॥ ययाशीस भगुलके एकहाधका उपयोग, पदई के कामोंमें होता है, भारस चीरने के कार्योम इसके स्थान परमिक पारेमागका मगफिया जाता है। १५ २० अध्या] - ये ॥ १७ ॥ अध्यक्ष प्रचार कार्य छावनी किले या राजमहल के होने चाहिये। अर्थात् छावनी भादिम होने वाले बढईके कार्यों में ययालीस अंगुलका एक हाथ, और लकड़ी चीरने आदिमें पत्तीस अंगुलका एक किस्कु प्रयुक्त होता है ॥ १६ ॥ फुप्य और यन (जंगल या उसकी लकड़ी भादि) के नापने के लिये चौधन भंगुलका एक हाथ मानना चाहि- ४२ अंगुल-1 हाम ( छावनी आदिमें बदईके कामके लिये), ॥ =1 किकु (छावनी आदिमें लकड़ी चीरनेके लिये) ५४ अंगुल=हाथ (कुप्य द्रव्य और जंगल सम्बन्धी कार्यों में काम भानेके लिये)। 'चतुरशीत्यगुलो ध्यामो रज्जुमानं सातपौरुषं च ।। १८ ॥ . चौरासी अंगुलशा एक हाथ, 'व्याम' कहा जाता है। यह रस्सी नापने और सोदे हुए कुए या साई माविक नापनेमें काम आता है ॥ १८ ॥ ८४ अंगुल का एक हाथ- पाम (रस्पी, तथा कुए साई भादिके नापने के लिये)। चतुररनिर्दण्डो धनुर्नालिकापौरुपं च ॥ १९ ॥ गार्हपत्यम- एशनामुलं धनुः पथिप्राकारमानं पौरुषं चाग्निचित्यानाम् ॥२०॥ धार भरक्षिका एक · दण्ड' होता है। इसीको धनु नालिका और पोरुष भी कहते हैं ॥ १९ ॥ एकसा आठ अगुलका एक गार्हपत्ल (गृहपत्ति अर्थात् विश्वकर्माका देखा हुभा, या निश्चय किया हुआ धनु होता है, यह सहक और फिले या शहर परकोटेके नापने में काम आता है। तथा अनि पपन अर्थात् यशसम्बन्धी विशेष कार्यों में भी एकसा पाठ अंगुलका एक पौरुप' माना जाता है ॥ २० ॥ ४ अरसिक, दण्ड-धनु-नाशिका-पौरप । 100 मंगुल गाईपलधनु (सड़क भौर परकोटा आदि नापमेके लिये)। = पीरूप (यसम्बन्धी कार्यों के लिये। पदकंसो दण्डो ब्रह्मदेयातिथ्यमानम् ॥ २१ ॥ दशदण्डो रज्जुः ।। २२ ॥ द्विरज्जुका परिदेशः ॥ २३ ॥ त्रिरज्जुकं निवर्तनम् ।। २४ ॥ छ। कंस भर्थात् भाउ प्राजापस्य हाथका एक दण्ट होता है। यह ऋविक् भादि प्रामणोंको दिये जाने पाले भूमि पदार्थों, तथा अतिथियोंके हितकर पदा. घाँके नापने में काम भाताई ॥२१॥ वा एण्टका एक रस होता है । (महो , [२अधिक 7 कौटलीय अर्थशास्त्र पर दण्ड साधारण, चार हाथका ही लेना चाहिपे) ॥ २२ ॥ दो रगुका एक :परिदेश' होता है ॥ २३॥ और सीन रन्जुका भात हे परिदेशका एक निधन होता है ॥ २४ ॥ ६ कस या आठ हाप दण्ड (ग्राह्मण भादिको भूमि देनेके का में उपयुक्त होन याला)। १. दण्ड-( यहां एक) दण्ड साधारण ४ भरक्षिका ही लना चाहिये) २ D! परिदेश ३नु या १३ परिदेश विर्सन एकतो द्विदण्डाधिको पाहुः ।। २५ ॥ द्विधनुःसहस्रं गोरु- तम् ।। २६ ॥ चतुर्गोरुतं योजनम् ॥ २७ ॥ इति देशमानं व्या. ख्यातम् ॥ २८॥ तीस दण्डका एक नियमन होता है, उसके एक भोरको यदि दो दण्ड अदा दिये आवें, अर्थात् जिस परिमाणमें लम्बाई चौडाई एकसी न होकर एक और सरस दण्ड और एक और यतीस हो, उस परिमाणका नाम 'बाहु' होता हे ॥ २५ ॥ दो हजार धनुका एक गोरत हाता है इसको एक क्रोश या कोस भी कहते है॥२६॥ चार गोरुमका एक योजनहाता है।। २७ पrl सक देश मानका निरूपण किया गया ॥२८॥ इस सम्पूर्ण दश मानका पीचको भवान्तर नापों को छोडकर, निस लिखित गीतिसे निग किया जासकता है परमाणु धूलोकण ८ धुलीकण 31 लिक्षा लिक्षा 32 यूकामध्य ८ कामध्य पवमध्य ८ यामध्यमाभगुरु 31 मुमेह २ धनु १ धनुष्टि १३ धनुर्मुष्टि = विसस्ति-(दिलीपद) एपितरित D: 'भाषिक, हा) २० प्राध्या अध्यक्ष प्रचार -- २ बज 31 परिदश १३ परिदेश निवर्तन ६६१ निवर्तन, या २००० धनु 31 गेरत (फ्रास-कोश) (दण्ड) गोरुत = योजन कालमानमत ऊर्मम् ॥ २९ ॥ तुटो लगो निमेपः काष्ठा क्ला नालिका मुहूर्तः पूर्वापरभागौ दिवसो रानिः पक्षो मास मतुरयनं मंवत्सरो युगामिति कालाः ॥ ३० ॥ आय इसके आगे काल मानका निरूपण किया जायगा ॥ २९॥ गुट (श्रुटि), लव, निमेष, काठा, कला नालिका, महूर्त, पूर्वभाग ( पूर्वाद्ग), अपरभाग (अपराहण), दिवस (दिन ), रात्रि, पक्ष (पलपाडा), मास,मत. अयन (उत्तरायण, दक्षिणायन छ महीनका एक भयन हाता है ) सवत्सर भार युग, य कारके साधारणतया सग्रह विभाग किय जात है ॥ ३० ॥ निमेपचतुभागस्तुटः, द्वौ तुटो लर ।। ३१ ॥ द्वा लया निमेपः ॥ ३२॥ पञ्च निमेपा काष्ठा ॥ ३३ ॥ शिकायाः कला 11 ३४ ॥ निमेष (आखका पलक मारतमें जितना समय लगता है, उसे निमय कहते है) का चौथा हिस्सा, अर्थात् कालका सयसे छोटा परिमाण र यात्रुटि होता है। दा सुटका एक लव होता ह ॥३॥ दो लरका एक निमेप होता है ॥ ३२॥ पाच निमपका एक काष्ठा होती है ॥ ३३ ॥ सीस कायाको एक कला होती ६॥ ३४॥ रिंशत्कलाः नारि ॥ ३५॥ सुवर्णमापकाचत्वार- थतुरमुलायामा कुम्भाच्छद्रमादकमम्भसो वा नालिका ।। ३६ ॥ चालीस फलाकी एक नालिका होती है ॥ ३५ ॥ अथवा एक घडमें चार सुवर्ण मापकी परावर चौडा और चार भगुल एम्मा एक घर मनाया जाय, अपात् इतने परिमाणकी एक नलीसी घमं लादी नाच, और उस घर में एक भावक जल भर दिया जाप, उसना जर उस नलीसे जितने समयमें मि पले, बदमे काल को भी मालिका कहते हैं। (किसी ३ पुस्तकमें इस एक या [२ अधि० यामा कौटलीय अर्थशास्त्र के स्थानपर दो सूत्र दिये गये है। जिसमें 'सुवर्णमापकावस्वारश्चनुाहगुला यहा तक एक सूत्र माना है। इसमें कोई पाठ भेद नहीं, पान्त सुनके भगले भागके स्थानपर सर्वथा पाग-वररूप एक दूसराही सूत्र इस प्रकारका है-'सरममाणकुम्भत्रिदेण जादकस्य यारता कालेन प्रति स कालो घा मालिका' दोनों पाटॉम भ, समान ही ह ॥ १६ ॥ द्विनालिको मुहूर्तः ।। ३७ ॥ पञ्चदशमुहूर्तो दिवसो रात्रिश्च चैत्र मास्याश्वयुजे च मासि भवतः ॥ ३८ ॥ ततः परं निमिर्मु- तैरन्यतरः पण्मासं वर्धते हसते चेति ॥ ३९ ॥ दो मालिकाका एक मुहर्स ई ता है ॥ ३७॥ पन्द्रह मुहूत का एक दिन भोर 'एक रस होते हैं । पान्तु ये इस मिाणके दिन रात तके महीनम और भाधिनक महीनमें ही केसे है। क्योंकि इन महीनों में दिन भोर रात वरावर २ हात ॥ ३० ॥ इसके अनन्तर छ महीनतक दिन बढ़ता जाता है, भार निघाती जाती है, सिर दूसरे 7 मह ने तक, रात्रि पढती जाती है, और दिन पाना जाता है। यह घटना और यवना तीन गुहूत तक होता है। अपात दिन और रातमें अधिक से अधिर तीन मुहकी न्यूनाधिकताका भेद १८ जाता है ॥१९॥ छायायामप्टपौरुष्यामष्टादशभागश्छेदः॥ ४० ॥ पदपारुष्या चतुर्दशमागः ॥४१॥ चतुष्पोरुष्यामष्टभागः ॥ ४२ ॥ द्विपौ रुप्या पद्भागः ॥ ४३ ॥ पौरुष्या चार्भागः ॥४४॥ अष्टा- अलायां प्रयो दशभागाः ॥ ४५ ॥ चतुरङ्गुलायां प्रयोऽष्टभागाः ॥ ४६॥ अच्छायो मध्या इति ॥४७॥ जब धूप घटीमें छाया आठ छायापीरुप लम्बी हो (धारह अगुलका एक पौरुप होता है, आठ डायापीरुपमें व्यायें भगुल हुए, इसलिये जब धूप घरी की छाया ९६ भगुल कमी हो), तो समझना चाहिये कि सम्पूर्ण दिएका अटा रइयां हिस्सा समाप्त हेचुका है (एफ पूरा दिन तीस नादिकाका होता है, उसका भटारहवां हिस्सा पौने दा नाहिका हुई, इतना समय बीत चुकता है, भीर सवा भट्ठाईम नाडिका उस समय तक दिाकी बाकी रहती है) ॥४॥ इसी तरह बहपर भगुल छाया रहनेपर दिएका चौदहवां हिस्सा ॥१॥ महणालीस भगुल छाया रहमपर दिनका गारवा दिसा ॥ १२॥ धात्रीस भगुल साया रहनेपर दिनका हिस्सा ४ ॥ एक भागापौरत अर्थात् पारद 'भंगुष छाया रोएर दिक्षा नीषा हिस्सा । ४५ ॥ आठ सगुल गापा रहनेपर द 1 २० अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२४३) दिनके दस भागमसे तीन हिस्सा (दिनके दस भाग कल्पना करके,फिर उन- का तीसरा हिस्सा) ॥ १५॥ चार अंगुल छाया रहनेपर, दिनके आठ हिस्सो. मॅसे तीन हिस्सा दिन समाप्त हुभा १ समझना चाहिये। ४६ ॥ जर' छाया बिल्कुल न रहे, तो पूरा मध्यान्ह समझना चाहिये ॥ ४७ ॥ परावृत्ते दिवसे शेपमेवं विद्यात् ॥ ४८ ॥ मध्यान्द अर्थात् बारह बजेके बाद, उपर्युक्त छायाके अनुसार दिनका शेप समझना चाहिये । अर्थात् चार भंगुल 'टाया होनेपर, दिनके पाठ हिस्मों- मसे तीन हिस्सा दिन शेप समझना चाहिये । इसी प्रकार भाठ अंगुल छाया होनेपर, दिनके इस हिस्सोमसे तीन हिस्सा दिन शेष समझना चाहिये । 'यारह भंगुल रहनपर दिनका चौथा हिस्सा, चौबीस अंगुल होनेपर छठा, अवतालीस अंगुल होनेपर पाठयां, यहत्तर अंगुल होगेपर चौदहमां, छियानवें अंगुल होनेपर मंठारहवां हिस्सा दिनका शेष समझना चाहिये । तदनन्तर दिन समास हो- जाता है, और रात्रिका प्रारम्भ होता है ॥ ४८ ॥ आपाढे मासि नपच्छायो मध्याह्रो भवति ॥ ४९ ॥ अत: पर धावणादीनां पण्मासानां द्वयङ्गुलोचरा माघादीनां दूधमुला- चरा छाया इति ॥ ५० ॥ भाषाढके महीनेमे मध्यान्ह छाया रहित होता है ॥ १९ ॥ इसके अनन्तर, थावण महीने से लाकर छ महीने में मध्यान्हके समय भी दो अंगुल छाया अधिक होती है, और फिर माघ आदि छः महीनों में दो अंगुष्ठ पून होजाती है ॥ ५० ॥ पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः ॥५१॥ सोमायायन: शुक्लः ॥५२।। सोमावच्छेदनो बहुलः ॥ ५३॥ पन्द्रह दिन रातका एक पक्ष होता है ॥५१॥ चन्द्रमा जिस पक्षम बढ़ता चढ़ा जाय उसे शुक्लपक्ष कहते हैं ॥ ५२ ॥ और जिस पक्षमें चन्द्रमा घटसा जाये, उसे बहुल अधात् कृष्णपक्ष कहते है । ५३ ॥ . द्विपक्षो मासः ॥ ५४॥ त्रिंशदहोरात्रः प्रकर्ममासः ॥५५॥ साधः सौरः ॥ ५६ ॥ अर्धन्यूनश्चान्द्रमासः ॥ ५७ ॥ सप्तर्षिश- ति क्षत्रमासः ॥ ५८ ॥ द्वात्रिंशत् मलमासः ॥ ५९॥ पञ्च- त्रिंशदश्ववाहायाः ॥६० ॥ चत्वारिंशद्धस्तिवाहायाः ।। ६१ ।। HOM २४) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ मधिल दो पक्षका एक महीना होता है ॥ ५४॥ तीस दिन रात का एक होना, नौकरों को पतन आदि देने के लिये काममें लाया जाता है ॥५५॥ साठे सीस (1) दिनका, एक सौर (सूर्य की गति के अनुसार की हुई गणनाके द्वारा बना हुआ) मास होता है । ( इसलिये ५५ सूत्रमें जो दो पक्ष का महीना बताया है, वहां चान्द्रमासही समझना चाहिये, दो पक्षकी कल्पना चन्द्रमाके अनुसार ही की जाती है। इसके अतिरिक्त ५७ गुममें चान्द्रमास श्री टीक २ गणना बताई गई है) ॥५६॥ साढ़े उन्तीस (१५३) दिन का एक चान्द्रमास होता है ॥ ५७ ॥ सत्ताईस (२७) दिनका नाक्षत्रमास होता है ॥ ५८ ॥ मसीस (३३) दिन रातका एक मलमास होता है ॥ ५५ ॥ पैतीस दिन रातका एक महीना, घोड़ोंपर काम करनेवाले सईस आदि नौकरों को घेतन देने के लिये काम में लाया जाता है । अर्थात् इन भृत्याका महीना ३५ हिनका समझना चाहिये ॥१०॥ इसी प्रकार जो सेवक हाथियों पर काम करने वाले हों, उनका महीना चालीस दिनका समझाना चाहिये । अथांव इसने दिनों का एक महीना मानकर उन्हें घेनन दिया जावे ॥६॥ द्वौ मासातुः ।। ६२ ॥ श्रावणः प्रोष्ठपदश्च वः ॥६॥ आश्वयुजः कार्तिकश्च शरत् ॥ ६४ ॥ मार्गशीर्षः पौपश्च हेमन्तः ।। ६५ । माघः फाल्गुनच शिशिरः ॥६६॥ चैत्रो वैशाखच वसन्तः ।। ६७ ॥ ज्येष्ठामूलीय आपादश्च ग्रीष्मः ॥ ६८ ॥ दो महीगेका एक कम होता है । ६२ ॥ धावण और प्रोष्टपद (अर्थात् भाद्रपद), इन दो महीना की पात्र होती है ॥ ६३ ॥ भाश्विन और कार्तिक इन दो महीना की शाद ऋतु होती है ॥ ६ ॥ मार्गशीर्ष (अगहन-मगसिर) और पोप, इन दो महीनों की हेमन्त ऋतु होती है ॥ ३५ ॥ माघ र फागुन इन दो महीनों की शिशिर धातु होती है ॥ ३०॥ चैन और पैशाख ये दो महीन वसन्त ऋतुक होते हैं । ६७ ॥ ज्येष्ठामूलीय (ज्येष्ठ-जेट) और भापाद महीने में प्रीस तु होती है। १८॥ शिशिरागुत्तरायणम् ।। ६९ ।। वर्षादि दक्षिणायनम् ।।७०॥ द्रययनः संवत्सरः ॥ ७१ ॥ पक्षसंवत्सरो युमिति ॥ ७ ॥ शिशिर वसन्त और ग्राम प्रस्तु उसरायण कहाती है,॥ १९॥ भार वर्षा पारद तथा मान ये तीनों ऋतु दक्षिणायन कही जात अपन (दक्षिणायन और उत्तरायण) का एक सवत्सर होता है ।।
/ अया] अध्यक्ष प्रचार पांच संवत्सर का एक युग होता है। यहां तक कालमानका निरूपण कि.. या॥ कालके अवान्तर विभागों को छोड़कर, शेप सम्पूर्ण कालमानका निम्न- लिखित गीतिसे निईश किया जाता है।- २ ३० काष्टा %32 D 5 - %3D २ D %3D १ युग १ निमेष निमेष , काठी कला " नादिशा नाडिका मुहूर्त १५ मुहूर्त 1 दिन और रात १५ दिन रात १ पक्ष २ पक्ष 1 महीना २ महीना अयन अयन संयरस संवत्सर दिवसस्य हरत्येक पष्टिभागमृतौ ततः । करोत्येकमहश्छेदं तथैवैकं च चन्द्रमाः ।। ७३ ।। एवमर्धतीयानामन्दानामधिमासकम् । ग्रीष्मे जनयतः पूर्व पश्चान्दान्ते च पथिमम् ॥ ७४ ॥ त्यध्यक्षमचारे द्वितीय उधिकरणे देशकालमानं विशो ऽध्यायः ॥ २० ॥ आदित एग्चस्वारिंश ॥१॥ भय दो श्लोकोसे मलमास या अधिमास का निरूपण करते हैं. पूर्व प्रतिदिन, दिनके सारे हिस्से अयात् एक घटिका का छेद कर लेता है, इस तरह एक प्रत में साट घटिया-एक दिन, अधिरु बना देता है। (इस प्रकार एक सालमें छः दिन, दो सालों १२ दिन, और ढाई सालम पन्द्रह दिन अधिक बना देता है) 1 इसी तरह चन्द्रमा भी प्रत्येक ऋतु एर ३ दिन कम काता चला जाता है, और दाई साल पाइपमा दिनको कमा होजाती है। इस प्रकार दाई सालमें, सार और चान्द गणनाके भनुसार दोनों में एक महीने की न्यूनाधिकता का भेद पद जाता है । उस समय ढाई सालके तीस महीने के बाद, ग्राम भनु में प्रथम मलगाम या अधिक मास को भीरपाच २४६) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधि; साल के पाद हेमन्त ऋतुम एक अधिमास को, सूर्य भार चन्द्रमा उत्पन्न करते है। अर्थात् ढाई सालमें इनकी गणनामें जो एक महीनेका भेद पदमार्ता है। उस एक महीना और अधिक पदाकर पूरा कर दिया जाता है ॥७३,७४॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिफरणमेचीसया अध्याय समास । M इक्कीसवां अध्याय ३९ प्रकरण शुल्काध्यक्ष राजाका दिय जाने वाले मश का नाम शुष्क (भुगी टेम) इस कार्यपर नियुक्त हुए प्रधान राज्याधिकारी को शुरुका प्यक्ष कहा जाता है। उसके कार्यों का निरूपण इस प्रकरण में किया जायगा। शुल्काध्यक्षा शुल्कशाला धज च पाड्मुसमुदङ्मुखं या महाद्वाराभ्याशे निवेशयेत् ॥ १॥ शुरुवाभ्यक्ष को धादिये कि यह शुल्कशााकी स्थापना करावे, भार उसक पूर्व तथा उसरकी आर, प्रधान द्वारके समीप एक ध्वजा (पताका) एगवादे, जो कि शुल्कशालाको चिन्हभूत हो ।। 1 ।। शुल्कादायिनश्चत्वारः पञ्च चा सार्थोपयातान्वणिजो लिखेयुः ॥२॥ के कुतस्तथाः कियत्पण्याः क चाभिज्ञानमुद्रा या कृता इति ॥३॥ शुल्काप्यक्ष, शुष्कशालामें चार या पांच पुरुषों को नियुक्त करे, जोकि लोगोंस शुल्क (चुगी) ग्रहण करते हैं, और व्यपारी भादि अपने माल को लेकर उधरस निकले, उनके सम्बन्धमै नि रिखित मातोंको लिखें ॥२॥ उनके नाम जाति भादि उनका निवास स्थान ( भयात् वे व्यापारी कहाँके रहने वाले हैं) उनक पासको विकय पस्तुहा परिमाण, आर किस स्थान में उन्होंने अपने मालपर यहाँको विताप मुहर लगवाई है। (अर्थात् किम भतशाल भादिने उनक माल को देखकर उसपर अपनी मुहरकी है,अथवा की है या नहीं।)॥३॥ अमुद्राणामत्ययो देयद्विगुण ॥ ४ || कूटमुद्राणां शुल्काप्ट- गुणो दण्डः ॥ ५॥ -- । । 1 re - - na -- २१ अध्या अध्यक्ष प्रचार व्यापारियों के मालपर वह मुहर न लगी हुई हो, उनको उस देय असे दुगनी दण्ड दिया जावे (जो भश, उसे अन्तपालके पास देना चाहिये था, उसीका दुगना दण्ड देना चाहिये) ॥३॥ तथा जिन व्यापारियोंने अपने मालपर नकली मुहर लगाई हो, उनको उस शुरूकसे भाठ गुणा दण्ड दिया जावे ॥ ५ ॥ 'भिन्नमुद्राणामत्ययो घटिकाः स्थाने स्थानम् ।। ६ ।। राज- मुद्रापरिवर्तने नामकृते वा सपादपणिकं बहने दापयेत् ॥ ७॥ जो व्यापारी मुद्रा लेकर उसे नष्ट करदें, उन्हें तीन घटिका तक शुरक गोलाके ऐसे हिस्समें बैठाया जाये, जहाँपर आने जाने वाले अन्य सय व्यापारी उनको देख, जि इन्होंने अमुक अपराध किया है। यही उनका दण्ड है ॥ ६॥ राजकीय मुद्राके यदल बनेपर, अथवा विक्रेय वस्तुका नाम यदल नेपर, पपय 'को लेजान चले पुरुषको (अर्थात् जो पुरष विफेय वस्तुको ले जावे, उसे) सवा (११) पण पद्ध दिया जाय ॥ ७ ॥ भजमूलीपस्थितस्य प्रमाणमषं च वैदेहकाः पण्यस्य युः . ॥ ८ ॥ एतत्त्रमाणेनाथूण पण्यमिदं का क्रेतेति ॥ ९ ॥ व्यापारी पुरप शुल्कशाला मागास उपस्थित हुए. पण्यके परिमाणको और मूल्यको इसप्रकार कह अर्थात् आवाज लगाये ॥ ८॥ इस मालका इतमा परिमाण और इतना मूल्य , इसका कोई खरीदने वाला है' अधांत जो इसको ग्वरीदने वाला हो, वह बोलरे) ॥ ९ ॥ विरुद्धोषितमर्थिभ्यो दद्यात् ॥ १० ॥ क्रेत्मघर्षे मूल्यवृद्धिः सशुल्का कोशं गच्छत् ॥ ११ ॥ इसप्रकार सीमनार आपाज देनेपर जो गरीदना चाहे, उसे उतनेही मूल्यपर माय दिलवा दिया सापे ॥ १० ॥ यदि खरीदने वालों में मापसमें सघर्ष होजीव (अर्थात् ग़रीदने पाले, एक दूसरेसे वार उस गालका मूल्य लगाते 'गा), जो उस मालके बोले हुए मजयमे जितनी अधिक आमदनी हो, वह शुन्क सहित (घुगीके साथ २) राजरीय कोश भेज दी जाये ॥१॥ शुल्कभयात्पण्यप्रमाणं मूल्यं वा हीनं युवतस्तदतिरिक्त राजा हरेत् ॥ १२ ॥ शुल्कमष्टगुणं या दद्यात् ॥ १३ ॥ शुल्क अधिक देने के डरसे जो व्यापारी, अपने मायके परिमाणको att । मूल्यको कम करके बोले, सो उसके बोले हुए परिमाणसे मधित मालो राम देलये ॥ १२॥ अपवा उस म्यापारीसे इस अपराधने आट गुना एक पसूक किया जाये। । प [२ अधिक (२५०) कौटलीय अर्थशास्त्र Mr शस्त्र हथियार ), वर्म ( साधारण कवच आदि आवरण), कवर्ष (पाहु सिर भादि सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त विशेष कवच ), लोहा, रेय, रम, धान्य (भरा आदि), सथा पशु इन आठ वस्तुओंमें से किसी एकको भी, जिसके सम्बन्ध राजाने राना लजाना बन्द कर दिया हो, कोई लावै लेजावे, उसकी पही चीन जब्त कररी जाये, भार पहिले की हुई घोषणाके अनुसार उसे दण्ड दिया शायन अर्थात् राजासे प्रतिषिद्ध इन वस्तुओंको लाने लेजान पाला पुरुष इस प्रकार दण्डित किया जावे ॥ २६ ॥ यदि उपर्युक्त शस्त्र आदि भाठ वातुऑम से कोई भी वस्तु घाहरसे लाई जावे, तो यह सुगीके पिना ही वाहर ( अर्थात् नगरकी अवधि के बाहर ) हो येची जा सकती है अन्तपाल: सपादपणिकां वर्तनी गृह्णीयात्पण्यवहनस्य ||२८॥ पणिकामेकखुरस पशूनामर्धपणिका क्षुद्रपशूनां पादिकामसभा रस्य मापिकाम् ।। २९ ।। नष्टापहृतं च प्रतिविदध्यात् ॥ ३० ॥ भन्तपाल, विर्क का मार दो वाली गारी भादिसे सवा पण (पण) वर्तनी (पागमें रक्षा आदि करने का टैक्स) हवे ॥ २८ ॥ घोडे खघर गध आदि एक सुर पाल पशुओंकी एक पण पर्सनी लवे । तथा इनसे अतिरिक्त येल भादि पशुओकी भाधा पण, पकरी भेट आदि क्षुद पशुओंका चौथाई पण, और कंधे पर मार दोधादी एक 'मा'( तायेका एक सिका) वर्तनी एवे ॥ २९॥ यदि किसी व्यपारीको काई पान Tट होजापे, था घारों के द्वारा पुराली जाये, तो अस्तपालदी उसका वध करे, साईजको दूतकर, तथा पुराई हुई जिका घोरोंको पकडकर वापस एका देये, अन्यथा भपा पासस दये ॥३०॥ वैदेश्यं सार्थ : कृतसारफल्गुभाण्डविचयनमभिज्ञानं मुद्रां च दमा प्रेपदध्यक्षस ॥ ३१ ॥ वैदेहकम्यञ्जनो वा सार्थप्रमाणं राज्ञः प्रेपयेत् ॥३२॥ विदेशमआनेवाले यापारी समूहको, अन्तपाल, उनके सब तरहकै पहिया और घटिया मालमा जाचकर, उसपर मुहर लगाकर तथा उन्हें रमना (पास) देकर, भायक्ष (गुरुकाध्यक्ष) के पास भेज दव ॥ ३१॥ मापारियों के साथ, पे धेशम रहन घाला, तसे नियुक्त किया हुभा गूपुरुष, राजाको उन सय म्यापारियों के सम्बन्ध पहिशी गुप्तरूपसे सूचना देव ॥१२ तेनाप्रदेशेन राजा शुल्काध्यक्षस्य सार्थप्रमाणमुपदिशेत्सर्व- जस्यस्पापनार्थम् ।।१३३ ॥ ततः सार्षमयमो भिगम्पसार - . २३. संध्या। अध्यक्ष-प्रचार ॥ ३४ ॥ इदममुष्यामुष्य च गारमाण्डं फुल्गुभाण्डं च न निगू- हितव्यम् ।। ३५ ।। एप राज्ञः प्रभाव इति ॥ ३६ ॥ इसी सूचनाके द्वारा, राजा शुल्काध्यक्षके पास, उन व्यापारियोंके सम्म धमें उपयोगी सब मात लिस भेजे, जिससे कि शुक्लाध्यक्षको राजाकी सर्व. शतापर विश्वास होजाये, तथा बह राजाकी इस यातको विश्वास-पूर्यक कह सके ॥ ३३ ॥ तदनन्तर इसीके अनुसार, शुशाध्यक्ष व्यापारियोंसे जाकर कहे H३४ ॥ आप लोगों से अमुक र व्यापारीका इतना २ पठिया माल तथा इतना परिया माल है, इसमेंसे भापर्को कुछ ही सिपाना न चाहिये ॥ ३५ ॥ देखिये राजाका इतना प्रभाव है, कि वह इस प्रकार परोक्ष वस्तुओंके सम्बन्म में भी अपना निश्चय देसकता है । ( इसप्रकार राजाकी महिमाकों उनपर प्रकट करे ) ॥ ३६॥ निगृहतः फल्गुभाण्डं शुल्काप्टगुणो दण्डः ॥ ३७ ।' सार- भाण्डं सर्वापहारः ॥ ३८ ॥ जो व्यापारी घटिया मालको छिपाने, उसे गुरकसे भाठ गुना दण्ड दिया गावे ॥ ३७ ॥ तथा जो सार्भाण्ड अर्थात् पढिया मालको छिपाये, उसके उस । सम्पूर्ण मालका अपहरण कर लिया जाये, अर्थात् उसे जब्त कर लिया जाये " राष्ट्रपीडाकर भाण्डमुच्छिन्द्यादफलं च यत् । 'महोपकारमुच्छुल्क कुर्याद्रीजं तु दुर्लभम् ।। ३९ ॥ इस्यध्यक्षप्रचारे द्वितीये ऽधिकरणे शुल्काध्यक्ष एकविंशो ऽध्यायः ॥ २१॥ आदितो द्विचत्वारिंशः ॥ ४२ ॥ राष्ट्रको पीड़ा पहुचाने वाले (विप या मादक दग्य आदि), तथा कोई अन्य अच्छा फल न देने वारे मालको राजा नष्ट करया देवे । और जो प्रजाको उपकार करने वाला, तथा अपने देशमें कठिनतासे मिलने वाला, धान्य आदि पा अन्य प्रकारका माल हो, उसे शुल्क रहित कर दिया जाये; अर्थात् 'उसपर सुगी न लीनाये, जिससे कि ऐसा माल अधिक माना अपने देश के अन्दर . भासके॥ ३९॥। अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें इशीसयां अध्याय समाप्त ।
[२ मधिल - २५६) 4 १ A कौटलीय अर्थशास्त्र जानकर, उसीके अनुसार उन्हें (विधवा आदि सूत कातने वाली नियोंको ) तेल, आंवला और उबटना पारितोषिक रूपमें देकर उन्हें अनुगृहीत करे । जिससे कि घे प्रसन्न होकर और अधिक कार्य करने के लिये प्रोत्साहित होवें॥५॥ तिथिषु प्रतिपादनमानैश्च कर्म कारयितव्याः ॥ ६॥ सूत्र- हासे वेतनहासः द्रव्यसारात् ॥७॥ कार्य करन के दिनों में, दिये जाने वाले येतनका विभाग करके कार्य करवाया जावे । अधात् अमुक कार्य, इतना करनेपर इतना पतन मिलेगा, और इतना कार्य करनेपर इतना । अथया इस सूत्रका यह भर्थ करना चाहिए, तिथियों अर्थात् पर्वो या छुट्टियों के दिनोंमी भौगन दान या सरकार भादिके द्वारा उनसे कार्य करवाया जावे ॥६॥ सूत यदि उचित प्रमाणसे कम होये, तो उस व्यके मूल्य के अनुसारही पेतन कम दिया जाये । ( भयात् सून यदि अधिक कीमती हो तो वतन अधिक काटा जावे, भार कम कीमत होनेपर कम ॥७॥ कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारुभिश्च कर्म कारयेत्प्रतिसंसर्ग च गच्छेत् ॥ ८॥ कार्य सिद्धिके अनुसार जिनके साथ, मियत कार्य, फाल.और येतन भादिका निश्चय किया जाचुका है ऐसे पुरुपोंके द्वारा, तथा भन्य'कारीगरों के द्वारा, कार्य करवाया जाव । भोर उनसे मेल पैदा किया जावे, जिससे किये काम में कोई येईमानी न करसकें, यदि करें भी, तो सरलतासे सबकुछ मालूम होजाय॥ शोमदुकूलक्रिमितानरातयकार्पासमतवानकर्मान्यांय प्रयु. आनो गन्धमाल्यदानैरन्यैयौपग्राहिकैराराधयेत् ॥९॥ पखा- 'स्तरणप्रावरणविकल्पानुत्थापयेत् ॥ १० ॥ झीम, दुकूल, निमितान, राकप (२कु एक प्रकारका मृग होता है, उसके बाल बड़े होते हैं, जिनका कपडा भादि पनाया जाता है, उसीकी उस ऊन के लिये यही 'रोडव' शब्दवा प्रयोग किया गया है, और कपास इन पांचों पीजीका सा कतवाने भार सुमदागेके कार्योको कराता हुभा मध्यक्ष, कारीगरोंको गम्ध माश्य भादि देकर तथा भग्य प्रकारके पारितोषिक देकर सदा प्रसन करता रहे॥९॥ और फिर उमसे मित्र २ प्रकारले पर भारसरण तमा प्रापरणमादिनमवारे॥
ne . 1 २३ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२५७) ककटकर्मान्तांश्च तजातकारुशिल्पिमिः कारयेत् ॥ ११॥ सूतके कवच आदिके कार्योको, उन २ कामि निपुण कारीगरासे करवावे । (इस सूत्रम कारु और शिल्पी दीना पद है । माटा काम करने वाल फारीगरीको 'कार' और यारीक काम करने चाल कारीगरोंको शिरपी' कहते : *. ..... 2 ८ * M र, याचानिष्कासिन्यः प्रोपितनिधमा न्यगा कन्यका वात्मानं विभृयुस्वाः स्वदासीभिरनुसार्य सोपग्रहं कर्म कारयितव्याः॥१२॥ जो खिया परदेमें रहकरही काम करना चाहें, जिनके पति परदेश में गये हुए हो, तथा अङ्गविकल और अविवाहिता विपें, जो कि स्वयं अपना पेट पालन करना चाह, भध्यक्षको चाहिये कि वह दासियों के द्वारा उनसे मत फतयाने आदिका काम करवावे, आर उनके साथ भरीतरह सरकार पूर्वक म्यवहार करे ॥१२॥ स्वयमागच्छन्तीनां वा सूत्रशाला प्रत्युपसि भाण्डवेतन- विनिमयं कारयेत् ॥ १३ ॥ सूत्रपरीक्षार्थमात्रः प्रदीपः ॥ १४ ॥ जो स्त्रिया प्रात कालही स्वय या दासियों के साथ सूत्रशालामें पहुचें, उनके घरपर कियेहुए कार्य ( अर्थात् कातेहुए. सूत्र आदि) को लेकर, उनका उचित वेतन देदिया जाय ॥ १३ ॥ और वहापर ( सूबशालामें, यदि अधिक ९ सपेरा होने के कारण कुछ अन्धेरासा हो, तो ) प्रदीप भादिके द्वारा कवर इतना प्रकाश किया जाये, जिस से कि सूतकी अच्छी तरह परीक्षा कीजासके । ४i. स्त्रिया मुससदर्शने ऽन्यकार्यभापायां या पूर्वः साहस- दण्डः ।। १५ ।। वेतनकालातिपातने मध्यम ॥ १६ ॥ अकृत- कर्मचेतनप्रदाने च ॥ १७ ॥ "स्त्रीका मुख देखन, अभया कार्यके भतिरिक्त और इधर उधरकी यातचीत • करनेपर प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥१५॥ यतन देनेके समयका मातिक्रमण करनेपर मध्यम साहस दण्ड दिया जाये ॥ १६ ॥ तथा, काम, न करनेपर भी (रिश्रत आदि लेकर या अन्य किसी विशेष कारणसे) वेतन देदेनेपर मध्यम साहस दण्डही दिया जाये ॥ १७ ॥ 'गृहीत्वा चैतनं कर्माकुर्वन्त्याः अगष्टमंदंशं दापयेत् ॥१८॥ मक्षितापहृतावस्कन्दितानां च ॥ १९ ॥ चेतनेषु च कर्मकराणा- मपराधतों दण्डः ॥ २०॥ + । 4 + कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक 'जोनी तन करभी काम न करे, उसका भगृठा कटवा दिया जाय 110n और यही दण्ड उनकोमा दिया जाय, जा कि मालको खाजाय धुरालें, अधडा छिपारर मागजाय॥१९॥ अथवा सपही कार्य करने वाल कर्मचारियोंको भपराधक अनुसार वेतन सम्बन्धी दण्ड दियाजाय । वारपर्य यह है, कि यह आवश्यक नहीं, कि कर्मचारियोंका दहदण्डही दिया पाष, पितु 'उसक स्थान पर अपराधानुसार क्वल वतन दण्डभी दिया जा सकता है ॥२०॥ रज्जुनर्तकैश्चर्मकारैश्च स्वयं ससृज्येत ॥ २१ ॥ भाण्डानि च बरसादीनि वर्तये ॥ २२ ॥ रस्सी अदि बटकर जीविका करने वाले, तथा चमडका काम करन पाले कारीगरोंक साथ, स्वय सूयाध्यक्ष मल जाल रक्ख ॥ २१ ॥ और उनस हर तारके धमदे मादिक सामान तथा गाय भादि साधनको और भय प्रकारका हरतरहकी रस्सियां आदि घनयावे ॥ २२ ॥ सूत्रवल्कमयी रज्जू • वरना वनवणवीः । • सोनाया बन्धनीयाश्च यानयुग्यस्य कारयेत् ।। २३ ।। इत्यध्यक्षपचारे द्विताये ऽधिकरण सूनाध्यक्षयोधिगोपाय ॥ २३ ॥ . आदितश्रतुश्चत्वारिंश ॥४४॥ सूत सथा सन भानिस पनाई जानकारी परिसया और धैत तथा पोसॉस है पूटकर बनाई जानेवाली वरपर ( परत-माटा रस्सा), पिस का कि उपयोग करच आदि बनामे तथा घारे भार रथ आदिफे बांधनेग होता है, वैयार करवाच । अर्थात् सूत्राध्यक्ष, इन सय बस्तुओंको आवश्ययता नुसार बनवाये । अध्यक्षपचारतीय अधिकरण में तेईसवा अध्याय WA - समाप्त चैविीसवां अध्याय ४१ प्रकरण सीताध्यक्ष कृषिकर्म अधात खताके इस शाहके कामोको सीता' कहा जाता है। इसके निरीक्षण के लिग जा राजकीय अधिकारी नियुक्त किया आये, उसका नाम 'सीताध्यक्ष उसीक कार्याचा निरूपण इस प्रकरणम किया जायगा।
२४ अध्या०]
अध्यक्ष प्रचार
(२५९);
सीताध्यक्षः कृपितन्त्रशुल्मवृक्षायुर्वेदजस्तज्जमसो वा, मर्व-
घान्यपुप्पफलगाककन्दमूलनाहित्यशोमकासनीजानि यथा-
कालं गृहीयात् ॥ १ ॥
सीताध्यक्ष (कृषि-विभाग प्रयन्धका-यधारा अधिकारी) को यह
आवश्यक ह, कि वह पिशाख, शुस्मशास्त्र (जिसम भूमि भादिके पहिचानने आर
नापन आदिका निरूपण हो । किमी २ पुस्तकम 'शुल्य' के स्थान पर 'गुल्म' भी
पाठ हे ) तथा वृक्षायुर्वद (यह शास्त्र, जिससे वृक्ष आदिके सम्बन्धम पुर
तरका मान मास किया जासके) को अच्छी तरह जाने, अथया इन सब
विद्याभास पाने चार पुरपाको अपना सहायक बनावे, और फिर ठीक
समयपर सब तरह के अन्न, फूल, फल, शाक, कन्द, मूल वाहिग्य (बेल्पर
गन बाहे कर पेटा आदि ), क्षाम सन पूर आदि) और कपास आदिके
चीजोका सग्रह कर ॥ १ ॥
बहुहलपरिकष्टायां स्वभूमी दामकर्मफरदण्डप्रतिकतभिर्माप-
- येत् ॥ २ ॥ कर्पणयन्त्रोपकरणनलीवश्चपामसनं कारयेत् ॥३॥
कारुभिश्च कारकुट्टाकर्मद करज्जुनर्तकमर्पग्राहादिभिश्च ॥४॥
तेपां कर्मफलनिनिपाते तत्फलहानं दण्डः ॥ ५॥
तदनन्तर उन योगाका अपन २ टाक समयपर बहुतधार हलोस
- जोतीहुई अपनी भूमिमें, दास ( उदरदास कोतदास आदि ), कर्मकर (चेतन
- आदि रफर काम करन वाले नौकर ), आर कार्य करके दण्डको भुगताने
बाल अपराधी पुस्पाके द्वारा चुवाये ॥ २ ॥ खेत जोतनेके हल, तथा अन्य .
साधन और बैल आदिके साथ, इन कर्मचारी पुरपका ससर्ग न होने दिया
जाव । तात्पर्य यह है कि इन साधनोंका ये कर्मचारी पुरप, कार्यके समयमै
ही लव, और उनका उपयोग करें, अनन्तर इनरा उनसे कोई सम्बन्ध न
स, उनकी रक्षाका प्रबन्ध करनेवाले पुरष दूसरे होने चाहिय ॥३॥ इसी
प्रकार कार, आर लुहार, बढई, सोदनेवाले ( किया ३ पुस्तक में 'मैदक' के ...
स्थानपर भेदक' पाठ भी है), रस्मी आदि मानेयाले तथा सपेरोसिभी इन
मंगरी पुरपात सदा ससर्ग न होन दवे, उनके सम्बन्धका जब कोई काम
पढ़े, तबही उनम मिलें मिलाव | कार आदिके किसी कार्यको ठीक न
करत वारण यदि सतामे कुछ नुकसान होजावे, तो उतनाही दण्ड उसको
दिया जावे,
वे, अर्थात् प६ नुक्सानका मश उससे वसूल किया जाये ॥५॥
[२ अधि १२६०) कौटलीय अर्थशास्त्र पोडशद्रोणं जागलानां वर्षप्रमाणमध्यर्धमानूपानाम् ॥ ६॥ देशवापानामर्धत्रयोदशाश्मकानां त्रयोविंशतिरवन्तीनानाममित- मपरान्तानां हैमन्यानां च कुल्यावापानां च कालतः ॥७॥ किन प्रदेशों में कितनी वसे फसल ठीक होसकती है, इसका निरूपण करते हैं -सोलह द्रोण ( वृष्टिके जलको मापने के लिये बनायेहुए एक हाथ मुहवाले कुण्ड में, वर्षाका सोलह द्रोण ) जल इकहा होनेपर समझना चाहिये, कि इतनी वर्षा मरुपाय प्रदेशोंमें अच्छी फसल होनेके लिये पर्याप्त है। इसीप्रकार जलप्राय प्रदेशोंमे चौबीस द्रोण ( अभ्यर्ध-सोलह होणसे, उसका आधा और अधिक-२४ द्रोण ), वर्षा पर्याप्त समझनी चाहिये ॥६॥ अब देश मेदसे इस यातका निरूपण किया जाता है, कि किन २ देशों में कितनी २ वर्षा अच्छी फसल के लिये पर्यत है -अश्मक देशों में साढे तेरह (१३) माण, मालवा प्रान्तमै तेईस (२३) द्रोण, अपरान्त अर्थात् पश्चिमके राजपूताना प्रान्तमें अपरिमित, हिमालयके प्रदेशोंमें तथा उन प्रास्तों में जहाँपर नहर आदि बनीहुई हैं, समय समयपर उचित वर्षा होने से फसल ठीक होजाती हैं।" वर्षात्रिभागः पूर्वपश्चिममासयो त्रिभागी मध्यमयोः सुप. मारूपम् ॥८॥ भिन्न २ देशामें होने वाली वर्षाके कीन भाग करने चाहिये, उनमें से पहिला एक हिस्सा श्रावण आर कार्तिकके महीने में बरसना चाहिये, बाकी दोनों हिस्से भादों और कार ( आश्विन) में बरसने चाहिये । तात्पर्य यह है, वर्षाके दिनोंमें जितनी पारिश परे, उसके नि हिस्से करके, एक हिस्सा धाधण मार कार्तिकम, और वाकी दो हिस्से भादों क्वार में पासे, तो यह सवासर बहुत भरडा होता है और इस प्रकारको वर्षा होना फसलके लिये बहुत लाभदायक है॥ ८॥ तस्योपलब्धिहस्पतेः स्थानगमनगर्भाधानेभ्यः शुक्रोदया- स्तमयचारेभ्यः सूर्यस्य प्रकृतिकृताच ॥९॥ इस अच्छे सार का अनुमान निम्नलिखित रीतिसे होता है- पति के स्थान, गमन और गर्माधानस, शुकके उपय, अस्त और पारस, सूर्यके पुण्डल आदि विकासे । तारपर्य यह है-जब वृहस्पति मेप आदि राशियापर धित हो, और फिर मेष भादि राशियोंसे भादि राशियापर सफमण करे, (ऐसा होमा पृष्टिका कारण होता है यह बात ज्योतिशास्त्रम प्रसिद्ध है) 1 । जाता २४ अध्या. अध्यक्ष प्रचार तथा गभाधान अर्थात् मासिर भादि छः महीनों में तुषार आदि देखा जाये। इसी प्रकार शुरुका उदय और अस्त, तथा आपाद महीने की पंचमी आदि नौ तिथियों में उसका संचार होना । और सूर्य के चारों ओर मण्डल होना, में सब अच्छी तरह चर्षा होनेके चिन्ह है ॥९॥ सूर्याद्रीजसिद्धिः ॥ १०॥ बृहस्पते संस्थानां स्तम्बकरिता ॥ ११ ।। शुक्राद्वंटिरिति ॥ १२ ॥ इनमें से सूर्यपर विकार होनेपर अर्थात् सूर्यके चारों ओर मण्डलाकार घेरा सा होनेपर बीजसिद्धि अर्थात् अनाज आदिका अच्छा दाना पड़मेका, अनु. माने करना चाहिये ॥१०॥ तथा परस्पतिसे अनाजके बढ़ने का अनुमान किया ॥ ११॥ और शुक्र के उदय भादिसे वृष्टिक होनेका अनुमान किया जाता है ।।१२॥ त्रयः सप्ताहिका मेघा अशीतिः कणशीकराः । पटिरातपमेघानामेपा वृष्टिः समाहिता ॥ १३ ॥ अरडी याका होना इस प्रकार समझना चाहिये। सीन मेघ (बादला यहाँपर मेघ शब्दका अर्ध वर्षा माहम होता है) लगातार सात सात दिन तक बरसते रहें, अर्थात् यदि लगातार सात २ दिन तक तीनवार बारिश पड़े। और भस्सीवार बूंद २ करके वारिश पहे; तथा साउचार धूग्से युक्त वृष्टि पड़े, अधात् बीच में धूप हो २ कर फिर घृष्टि पड़े; तो यह इस प्रकारको वृष्टि उचित तथा अत्यन्त लाभदायक होती है ॥ १३ ॥ पातमातपयोगं च विमजन्यत्र चर्पति बीनकरीपांश्च जनयंस्तत्र सस्यागमो ध्रुवः ॥ १४ ॥ * मार्गशिराः सतुपारः सहिमः पापः समारुतो माघः । साभ्रः फाल्गुनमासः सपयनवृष्टिश्च यदि चरः॥ तडिदभ्रानिलविद्युजलवृषितो माति यदि च वैशाख। सम्यग् वर्पति मघवान धारणादेवसेषु वर्षति चेत् ।। मंगसिरमें तुपार अर्थात् फोहरेका होना, पोपमें बरफका पड़ना, माघमें हवा चलना, फागुनमें बादलोंका आना, और चैत्र, हवाके साथ २ पूष्टिका होना, तथा वैशाख में बिजली चमकना बादल भाना हवा चलना विजलीका गिरना बादलोंका बरसना देखकर सभी इसीप्रकार धारण दिनी | पैशाख कृष्णपक्षकी प्रतिपदा आदि शार' विधियों का नाम धारण होता है) यर्पा - होना देख कर यह समसना हिये कि इस फसलंम पारिश पहुत अछीहोगी।
[.२ अधि (२६२) कौटलीय अर्थशास्त्र वायु और धूरको अवसर देता हुआ, भयात् इनको पृधा २ विभक्त करके अपना काम करता हुआ, आर पीच २ में तीनवार खेत जोतने का अव- सर देता हुआ, मेघ जिप दशमें यरसता है, वहापर निश्चय ही फसल का अच्छा होना समझना चाहिये ॥ १४ ॥ ततः प्रभृतोदकमल्पोदकं या ससं वापयेत् ॥१५॥ गालि- बीहिंकोद्रवतिलप्रियङ्गदारकवराकाः पूर्वापाः ॥ १६॥ मुद्गमा- . पशेम्पया मध्यापाः ॥ १७॥ इस प्रकार वृष्टिके परिमाणको अच्छी तरह जानन के बाद, फिर अधिक जरस अथवा थोडे जर से उत्पन्न होत वाले अखाको वीजा जाय । अर्थात् वृष्टि आदिके अनुसार हा खताम नाज बोया जाना चाहिये ॥ १५॥ शाली (साठी धान), घोहि (गहू जो आदि धान्य ) योदा, तिल, कगनी, और लोभिया आदि, वांके पालादनाम हा योदेन चहिये ॥ १६ ॥ भूग, उड़द, ओर छीमी आदिको यीच में बोना चहिये ॥ १७ ॥ कुसुम्भमसरकुलुन्थयागोधूमकलायातसीमर्पपाः पवाद्वापाः ॥ १८ ॥ यथर्तुशेन या पाजीवापाः ॥ १९ ॥ कुसुम्भ (कुसुबा) मसूर, कुरथी, जौ, गेहू मटर, तसी तथा सरसा मादि अन्ना को वर्गके अनाम योया जाये॥ १८॥ अथवा इन सबही भयाको स्तु अनुसार जेसा उचित समझ, चोना चाहिये ॥ १९॥ चापातिरिक्तमर्धसातिकाः कुर्युः ॥ २० ॥ स्ववीर्योपजीविनो वा चतुर्थपश्चभागिका यथेष्टमनासितं भागं दद्युरन्यत्र कृच्छ्रेभ्यः इस तरह जिन खतामें बीज न घाया जामके, उनम अधपटाईपर काम करने वाले किसाा माज योय ॥ २०॥ अथवा जो पुरुष र अपना शारीरिक श्रम करके जीधिका फरनेवाले हों, ऐसे पुरर उन अमीनों में सेती करें, और सलका चौथा य पांचवा हिस्सा उनको व्याजावे । तथा भवघटाई पर खतोको जतनेबारे किसान, उन सेताम उरपस हुए २ भग्न में से, स्वामीको इच्छा अनुसारही उसको पेय, परन्तु उनपर ( किसानापर ) कोई घट झा, तो ऐसा न करें। २१॥ स्वसेतुभ्यः हस्तप्रावर्तिममुटकभाग पञ्चमं दाः २२॥ स्कन्धप्रावर्तिमं चतुर्थम् ।। २३ ॥ स्रोतोयन्नप्रावर्तिमं च तृती- ॥२४॥ यम् ।। . 2-4 - का २४ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार अपनाही धनलगाकर स्वय परिश्रम करके याये हुए तालाय धादिसे, हाधसे जल ढोकर संत सीचनेपर, दिसानाको अपनी उपजा पाचवा हिस्मा राजा रिय देना चाहिये ॥ २२ ॥ इसी प्रकारके ताराबासे, यदि कन्से पानो ढाकर सताको सींचाजाये, ता किसान अपनी उपजका चीया हिस्सा राजाको देवें ॥ २३ ॥ यदि छोटी २ नहर या नातिया बनाकर उनके द्वारा सताको सोचाजावे, ता उपजका तीसरा हिस्सा राजारे लिये देना चाहिये । '( भूमिके कसे समागही यह जलाभी कर समझना चाहिये, क्याकि इन दानॉपर राजाका समानही अधिकार शास्त्रकारोंने पत सा है) ॥ २४ ॥ चतुर्थ नटीमरस्तटाकरूपोद्धाटम् ॥२५।। कर्मोदकप्रमाणेन फेटार हैमनं गैष्मिकं वा सस्सं स्थापयेत् ।। २६ ।। अपना धन व्यय करके अपनेही परिश्रमसे बनाये हुए तालाबोंके अतिरिक्त दूसरे नदी, सर (झीर ), तालार और कुओंसे हरट आदि लगाकर यदि खत सींचजाय, तो उन गतागा चौथा हिस्मा राजाकलिये देना चाहिये ॥ ५५ ॥ सतोके अनुसार जर की न्यूनाधिपताको सकरना, खेतों में गोये जाने वाले, हेमन्त नत्नुम (शीत नारे गहनी आदि ) आर ग्राम स्तुके (गरमीरे कपात तथा मझा मार भाटि ) अनाजागो उचाये । अर्थात् नन्तु के अनुग्गर तथा जल क मुभाता अनुसार ही रोताम बीज डाला जावे ॥२६॥ शाल्यादि ज्येष्ठम् ॥ २७ ॥ पण्डो मध्यमः ।। २८ ॥ इक्षुः प्रत्यवरः ॥ २९ ॥ इक्षवो हि बह्वाबाधा व्ययग्राहिणश्च ॥३॥ धान गेंहू आदि, सब पसलाम उत्सम समझे आते ह, क्योंकि हरके बोन धादिमें परिश्रम घोडा, और पर अधिर मिरता है ॥ २७ ॥ इसीप्रकार कदली आदि, मध्यम होते है, क्याकि इनके यो आनिम याद परिश्रमके अनुसार परभी थोड़ा ही मिरता ॥ २८॥ ईम, सरसे ओडी फसल समही जाती है ॥ २९ ॥ क्योंकि इसके धाने आदिम धनाश्रम, उपके पार मनुष्य, चूहे और मन्त्र की आदिका यढा उपद्रव, त्या काटना पीउना आर पाना, फिर कहीं पपी प्राप्ति हाती है ॥ ३० ॥ फेनाघातो वहीफलाना परीनाहान्ता मृकणां कूपप- र्यन्ताः शाफमलानां हरिणपर्यन्ता. हरितकाना पाल्यो लवानां गन्धमपज्योशीरहीवेरपिण्डालुकाढीनाम् ॥ ३१ ।।
[२ माघे० (२६४) कौटलीय अर्थशास्त्र जरूफे किमारेका स्थान पेठा कह ककड़ी तरबूज आदि योनेके लिये - उपयुक्त होता है। पीपल, अंगूर तथा ईख आदि योनेके लिये यह प्रदेश भरछा होता है, जहांपर नदीका जल एक बार घूम गया हो। शाक मूल भादि योनेके लिये कूएके पासके स्थान, जई आदि हरे गौत बोनेके लिये सील तालाब आदिके किनारेके गीले प्रदेश, और काटे जाने वाले गन्ध, भैषज्य (औषधि धनिया सौंफ आदि), उशीर ( खस ), होपर (नेवाला) पिण्डालुक ( कचालू था शकरकन्दी आदि ) आदि चीजोंको बोनेके लिये धे खेत, जिनके बीचमे तालाय यने हों, उपयुक्त होते हैं ॥३॥ यथास्वं भूमिपु च स्थल्याचानूप्याश्वौषधीः स्थापयेत् ॥३२॥ सूखी ज़मीनोंमें तथा जलमय प्रदेशोंमें होने वाले अनाज आदि पदार्षीका उन २ के अपने योग्य प्रदेशोंमें ही पोया जावे । अर्थात् जो चीजें जैसी भूमिमें अच्छी पैदा हो सकती हो, उनको वैसे ही स्थानोंमें योना पाहिये ॥३२॥ तुपारपायनमुष्णशोपणं चासप्तरात्रादिति धान्यबीजानां त्रि. रात्रं पञ्चरात्रं वा कोशीधान्यानां मधुघृतसूकरवसाभिः शका ताभिः कांडवीजानां छेदलेपो मधुघृतेन कन्दानाम् , अस्थिवी- जानां शकुदालेपः, शाखिनां गर्तदाही गोस्थिशवद्भिः काले दौहृदं च ॥ ३३ ॥ भय खेतमें बोयेजाने घाले बीजका संस्कार कैसे करना चाहिये, इसका निरूपण किया जाता है -धानके पीजोंको रातके समय ओसमें, और दिनके समय धूप में सात दिन तक रखा जाये । कोशीधान अर्थात् मूंग उड़द भादिके वीजको, इसीप्रकार तीन दिनरात या पांच दिनरात तक श्रोस और धूपमे रक्खा जावे । काण्डवीज अर्थात् ईख भादिके यीज को ( काण्डवीज-जो टुको के रूपमें रखकर बोयाजाये ख आदि ) कटी हुई जगहोंमें शहद घी अधा सूभरकी घरवीके साथ गोवर मिलाकर लगाना चाहिये । सधा सरण भादि कन्दोंके कटेहुए स्थानोपर गोदर मिलैहुए शहद भथया घी से ही लेप करना चाहिये । अस्थिवीजों (अर्थात् फलके भीतरसे निकलने पाले पीज: कपास भादिके पीजों ) को गोबर भादिसे लपेटकर ( अर्थात् गोरके बीच में उनको भाकीतरह मलकर ) रक्खा जाये, फिर उनको योयाजावे । भाम कर- हल भादि पक्षाके पोजें को एक गमें डालकर कुछ गरमी दी आये, फिर हीक समपपर उनको गायकी हड़ी और गोवरके साथ मिलाकर रखा मापे । . - N २४ अध्या] अध्यक्ष-प्रचार (२६५ इसप्रकारसे इन सब बीजीका संस्कार करके फिर इनको खेतमे घोना चाहिये ॥ ३३ ॥ प्ररूढांचाशुष्ककटुमत्स्यांश्च स्नुहिक्षीरेण वापयेत् ॥ ३४ ॥ उपर्युक्त इन सब चीजोंके बोयेजानेके याद, जब इनमें भकुर निकल भावे, तर इनमे गीली छोटी मछलियोंका सात लगाकर, सैंढके दूधसे इन्हें सीधे । ऐसा करने से इन पौधों को कोई कीड़ा भादि नुक्सान नहीं पहुं. घाता ॥ ३४ कार्पाससारं निकि सर्पस्य च समाहरेत् । न सास्तत्र तिष्ठन्ति धूमो यत्रैप तिष्ठति ॥ ३५ ॥ कपासके बीज अर्थात् बिनौले और सांपकी कैंचुरी (निर्मोक=Riपके ऊपरकी झिल्लोसी, जो उतरकर अलहदा होजाती है) को आपसमें मिलाकर जला दिया जावे, जहांतक इसका धुआ फैल जाता है, वहांतक कोई भी सांप सहर नहीं सकता। यह सर्पके प्रतीकारका उपाय है ॥ ३५ ॥ सर्वचीजानां तु प्रथमवापे सुवर्णोदकसंप्लुतां पूर्व मुष्टिं वाप- येदमुं च मन्त्रं ब्रूयात् ॥ ३६ ॥ हर एक बीजके पहिलेही बोने के समयमै, सुवर्णके जलसे (जिस जल में सुवर्णका संयोग करदिया गया हो) भीगीहुई पहिली बीजकी मुट्ठी को योयाजावे ! तात्पर्य यह है, कि बीजकी जो पहिली मुट्ठी भरकर बोई जाये, उसको सुवर्णके जलसे भिगोकरही योयाजाचे, और उसके साथ इस मंत्रको पढ़ाजावे:-॥ ३६॥ प्रजापतये काश्यपाय देवाय च नमः सदा । सीता मे ऋध्यतां देवी बीजेपु च धनेषु च ।। ३७ ।। मजापति (प्रजाओके मालिक-प्रजाओंको जीवन देनेवाले ), कश्यपके पुत्र (सूर्यके पुत्र), देव (पर्जन्य-मेघ ) के लिये हमारा सदा नमस्कार हो । और 'सीता' देवी ( सीता यह कृपिका ही नाम है, इस बातको पहिले लिखा, जाधुका है, उसीको देवीका रूप देकर यह शर्थना की गई है ) हमारे शोजों तथा धनोंमें सदा वृद्धिको करती रहे ॥ ३७॥ पण्डयाटगोपालकदासकर्मकोम्यो यथापुरुषपरिवापं भक्तं कुर्यात् ।। ३८ ॥ सपादपणिक मासं दद्यात् ।। ३९ ।। कर्मानुरूपं कारुभ्यो भक्तवेतनम् ॥ ४० ॥ 7 [२ आधि० (२६६) कौटलीय अर्थशास्त्र खेतोंकी रखवाली करनेवाले, ग्वाले, दास, तथा अन्य काम करनेवाले मौकरों के लिये, प्रत्येक पुरपके परिश्रमके अनुसार ही भोजन भादिका प्रबन्ध किया जावे ॥ ३८ ॥ इस के अतिरिक्त इनको प्रतिमास सदापण नियत वेतन दिया जावे ॥ ३९ ॥ इसीप्रकार अन्य कारीगर लोगोंके लिये भी उनके परिश्रम के अनुसार ही भोजन और वेतन दिया जाये ॥ ४०॥ प्रशीणं च पुष्पफलं देवकार्यार्थ बीहियवमाप्रयणार्थ श्रोत्रि- यास्तपस्विनचाहरेयुः ॥४१॥ राशिमूलमुञ्छवृत्तयः ।। ४२ ।। वृक्ष आदिसे स्वयं ही गिरेहुए फूल और फलोंको देवकार्य के लिये तथा गेहू जी आदि अशोको आग्रयण (यह एक इष्टिका नाम है, जिसको नई फसल आनेपर किया जाता हैं, इसको 'नवसस्येष्टि' भी कहते हैं) इटिके लिये, श्रोत्रिय तथा तपस्वी जन उठा लेवें ॥ ४ ॥ खल्यानमें पहुए भन्नके घरको उठा लेनेके बाद, जो थोरे पहुत दाने पीछे पडे रह जायें, उनको ये लोग उठाले, जो सिला चुगकर अपना निर्वाह करनेवाले हो ॥ १२॥ यथाकालं च सस्यादि जातं जातं प्रवेशयेत् । न क्षेत्र स्थापयत्किचित्पलालमपि पण्डितः ॥ ४३ ॥ समयक अनुसार तैयार हुए २ भोको, पतुर पुरुष ठीक २ सुरक्षित स्थानों में रखवा देवे, खेतमें पुराल तथा भुस आदि भसार पस्तुओंको भी न छोरे॥४३॥ प्रकराणां समुछायान्वलभी; तथाविधाः । न संहतानि कुर्वीत न तुच्छानि शिरांसि च ॥४४॥ धन्य भादिके रखने के स्थानको 'प्रकर' कहते हैं। किसी २ पुस्तकमें कराणा' के स्थानपर 'प्रकाराणा' भी पाठ है), ऐसे स्थानों को कुछ ऊपी जगहमें बनवाना चाहिये । भथवा उसी सरहके मजबूत तथा चारों ओरसे घिरेहुए भधागारों को बनवावे । इनके अपरके हिस्सोंको आपसमें मिला हुआ न रवसे, भार खासी भी न रखे, तथा अप्टी सरहद बनवावे जिस से कि पर्षा या आधी भादिम भपको किसी तरहकी हानि न पहुपसके ॥४॥ सलस्य प्रकारान्कुर्यान्गण्डलान्ते समाश्रितान् । अननिकाः सोदकाय सले स्युः परिकर्मिणः ॥ ४५ ॥ इत्यध्यक्षपधारे द्वितीये ऽधिकरणे सीताध्यक्ष धनुर्विशो ऽध्याय ॥२५॥ भादित. पयावारिधः ॥ ४५ ॥ - AL २५ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार मण्डल ( अन्न और मुस आदिको अलहदा करने के लिये जहापर, पैलोंकी पंक्ति उनके ऊपर गोलाकार घुमाई जाये, उसको यहा 'मण्डल' शब्दसे कहागया है । 'सल' शब्द केवल उस मानके लिये यहां प्रयुक्त हुआ है, जिसमें कटे हुए अनाजाका ढेर लग रहा हो । तारपर्य यही है, कि ये दोनों स्थान समीप ही होने चाहिये । हिन्दी में दोनोंके ही लिये सल्यान शब्दका प्रयोग होता है ) के समीप ही बहुतमे खल्यानोंको बनाया जाये । सल्यानमे फाम करनेवाले भादमी, अपने पास भाग न सिसके, फिर भी उनके पास जलका प्रबन्ध अवश्य होना चाहिये । जिससे कि समयपर भतिको सरहतासे शान्त किया जासके।५।। अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें चोचीसवां अध्याय समाप्त 1 पच्चीसवां अध्याय। ४२प्रकरण। है - सुराध्यक्ष । गुरु, मधु, तथा पिट्ठी, इन तीन पदार्थों से बननेके कारण 'सुरा' सीन प्रकारकी होती है। उनके पनवाने तथा व्यापार आदि करा- नेके लिये जो राजकीय पुरष नियुक्त किया जाता है, उसे 'सुरा- ध्यक्ष' कहते हैं ! उसीके कार्योंका इस प्रकरण में निरूपण किया जायगा। सुराध्यक्षः सुराकिण्यव्यवहारान्दुर्गे जनपदे स्कन्धावारे या तातसुराकिण्वन्यवहारिभिः कारयेत् एकमुसमनेकमुखं वा बि. क्रयनयवशेन वा ॥१॥ सुराध्यक्षका कार्य है, कि वह शरायके धनवाने और उसके विक्रय भारदके व्यवहारको, दुर्ग, जनपद अथवा छावनी में, शराब बनाने, तथा उसके व्यापार आदिको भाडी तरह जानने वाले पुरषांक द्वारा करवाये। सुमी- सके अनुसार एकही बडे ठेकेदारके द्वारा भयया छोटे २ अनेक ठेकेदारों के द्वारा तथा क्रय विश्यके भी सुमीतेको देखकर यह व्यापार कराये ॥१॥ पछतमत्ययमन्यत्र कर्तृक्रेविक्रेतृगां स्थापयेत् ॥ २ ॥ ग्रामादनिर्गयनमसंपातं च सुरायाः, प्रमादभयात्कर्मसु निदि . [२ अधिक - (२६८) कौटलीय अर्थशास्त्र ष्टानां, मर्यादातिकमभयादार्याणामुत्साहभयाच तीक्ष्णानाम् ॥३॥ नियत स्थानोंसे अतिरिक्त स्थानोम शराब बनाने खरीदने और बेचने घालोंको ६०० पण दण्ड दिया जाये ॥ २ ॥ शराबको, तथा उसे पकिर मत्त हुए २ पुरुषोंको, गावसे बाहर तथा एक घरसे दूसरे धरमै या भीडमें न जाने दिया जावे । क्योंकि जो अध्यक्ष आदि कर्मचारी पुरप है, वे ऐसा करनेसे का याम प्रमाद कर सकते हैं, आर्य पुरप अपनी मर्यादा भग, और तीक्ष्ण अर्थात् कोर प्रकृतिके, शूर, सैनिक आदि पुरष, हथियारोंका अनुचित प्रयोग कर सकते हैं। लक्षितमल्पं वा चतुर्भागमर्धकुड्यं कुडुवमर्धप्रस्थं प्रस्थं वेति ज्ञातशौचा निर्हरेयुः ॥४॥ पानागारेषु वा पिरेयुरसंचारिणः ॥५॥ अथवा राजकीर मुहरसे युक्त घोडही परिमाणमें-दुपका चौथा भाग, आधा बुद्धब, एक कुटुबआधा प्रस्थ, या एक प्रस्थ, शराय घे लोग लेजा सकते हैं निके आचार व्यवहार के सम्बन्ध निधय रूपसे मालूम होचुका हो ॥ जिन पुरुपको शाम लेकर थाहर जानेकी आज्ञा न हो, शराय खानाम जाकर ही पावें ॥५॥ निक्षपोपनिधिप्रयोगापढ़तादीनामनिप्टोपगतानांच द्रव्याणां ज्ञानाधमस्वामिक कुप्यं हिरण्यं चोपलभ्य निक्षेसारमन्यन व्यप- देशन ग्राहयेत् ॥ ६ ॥ अतिव्ययकर्तारमनायतिव्ययं च ॥ ७ ॥ निक्षेप, उपनिधि पेटी आदिमें बन्दया सुला हुभा ही गिरवी रक्खा हुआ धन, मयोग (समानत आधि), चोरी किया हुआ धन तथा इसीप्रकार अन्य मनिष्ट (नाका आदि) उपायासे प्राप्त किये हुए दम्पोंके जानने के लिये स्वामी रहित कुष्य (सद्ग आदि पदार्य ) और हिरण्य आदिको पाकर, निक्षता (जिस मेकि निक्षेप भादिके द्वारा कुछ धन लेकर शरायखानेम भाकर सर्च किया है, ऐसे पुरष) को, शराबखानेसे दूसरी जगहमें किसी बहानेसे नगराध्यक्ष भारा पफडबा देवे । (दूसरी जगह और बहानेसे पकवाना, इसी लिये कहा गया है, कि यदि शराबणानेमें ही बिना किसी बहाने के उन पुरपोको पा लिया जावे, तो दूसरे चोर दाद आदि अपहत धनको यहाँ न लावी)॥६॥ इसीशकार जो भायसे अधिक प्यय करने घाला, तथा विमाही भामदनी के फिजूल रा करने पाला हो, उसे भी उपर्युष रीतिमे पकडमा देधे ॥ ७ ॥ AN . " २५ अध्याoj अध्यक्ष प्रचार न चान'ण कालिकां वा सुरां दद्यादन्यत्र दुष्टसुरायाः ॥ ८॥ तामन्यत्र विक्रापयेत् ॥ ९॥ दासकर्मकरेभ्यो पा वेतनं दद्यात् ।। १० ।। वाहनप्रतिपानं सूकरपोपणं वा दद्याद घोडे भूत्यसे, कालान्तरमें प्राप्त होने पाले मूल्यसे अथवा कुछ कालके बाद किसी नियत समय में ब्याज सहित मिल जाने वाले मूल्यसे भी, बठिया शरार्मको न घेचे । किन्तु इन शत्तीपर परोदारोंको सदा घटिया शरायही देवे ॥ 4 ॥ तथा उस घटिया शरायको भी, यदिया शरामकी दूकानसे न शिकवावे, किन्तु किसी दूसरेही स्थानसे उसकी बिक्रीका प्रबन्ध करे ॥ ९॥ अथमा दास या अन्य छोटे कर्मचारियोंको घेतन रूपमे यह पटिया शराब देदी जावे ॥१०॥ परन्तु यह, ऊँट बैल आदि सवारियों के पालन करने, या सूभर आदिक पालन पोपण करने आदि तुच्छ कार्योंके यदलमे ही देनी चाहिये । (अर्थात् अन्य फायाँका येतग मुदाके ही रूपमै अतिरिक्त दिया जाये) ॥१॥ पानागाराण्यनेककल्याणि विभक्तशयनासनवन्ति पानोदे. शानि गन्धमाल्योदकवन्त्य॒तुमुसानि कारयेत् ॥ १२ ॥ तत्रस्थाः प्रकृत्यौत्पत्तिको व्ययौ गूढा विद्युरागन्तूंश्च ॥ १३ ॥ . शराबसानोंको निम्नलिखित गतिसे बनवाया जाये -उनमे अनेक रक्ष्या भीत् चोटियां होनी चाहिये, सोने और बैठनके रिये भलहवा र कमरे हुए हों, तथा शराब पीने के स्थान भी गुथर । हो, इनमें गन्ध माया जल आदिका पूरा प्रबन्ध हो, और इस ढगके बने हुए होने चाहिये, जिससे कि प्रत्येक मनु में सुराका होसकें ॥ १२॥ शरासानेमें रहने वाले राजकीय गुप्तपुरपा नित्य नियमसे होने पाले शराबके पर्चको, तपा किसी दिन बादरके मनुष्य अधिक आजाने के कारण अधिक हुए २ शराबके सर्चको जाने, तात्पर्य यह है कि स्थानीय पुरुषांक रिये, तथा पाइरफे पुरुषांके लिये प्रपा २ शरापका कितना स है, इस बातका ठीक २ पता रखखा जावे)। भीर यह भी जाने कि माहरसे भाने वाले पुरए कौन २ ॥ १३ ॥ केतॄणां मत्तसुप्तानामलंकाराच्छादनहिरण्यानि च विद्युः ॥ १४ ॥ तन्नाशे वणिजस्तच तावच्च दण्डं दगुः ॥ १५ ॥ तथा गुप्तपुरष ही, शराव परीद पीकर उन्मस होकर सोजानेवाले शरानियोंके थाभूपग यस्य भौर नकदमालका यान रक्खें, तथा यह भी मालम १२ अधिः- ३ , (२७). कौटलीय अर्थशास्त्र- करें कि यह कितना है। यदि उनके भाभूषण आदि नष्ट हो जाय, अर्थात् उसी अवस्था घोर भादि घुरा लेखें, तो शरायके व्यापारी उसना माल (जितना छोरी गया है ) राषियों को दें, और उतना ही दण्ड राशाको . देवें, अर्थात् राजाकी ओरसे उनपर उतना ही माना किया जाय ॥ १५ ॥ वणिजस्तु संघृतेषु कक्ष्याविभागेषु स्वदासीमिः पेशलरूपा- भिरागन्तूनां वास्तव्यानां चार्यरूपाणां मत्सुप्तानां भावं विशुः शरायके व्यापारी, पृथक् २ एकान्त कमरों में भेजी हुई सुन्दर सुचतुर दासियों के द्वारा उन्मत्त होकर सोये हुए बाहरसे आनेवाले तथा, नगर निवासी, ऊपरसे आर्योंके समान रहनेवाले पुरुषोंके मान्तरिक भावोंका पता लगावें ॥१६॥ मेदकप्रसन्नासवारिष्टमरेयमधूनामुदकद्रोणं तण्डुलानामर्धाटक त्रयः प्रस्थाः किण्वस्येति मेदकयोगः ॥ १७ ॥ मैदक, प्रससा, सय, अरिट, मेरेय और मधु ये : शरायके भेद है, इनका क्रमश. निरूपण किया जाता है।-एक द्रोपा जल भाधे मालक चावल और तीन प्रस्थ किण्व अर्थात् मुराधीन, ( देखो इसी अध्याय का २६ सूत्र) इनको मिलाकर जो शराय बनाई जाती है, उसका नाम मेदक है ॥ १७ ॥ 'द्वादशाढके पिष्टस्य पञ्च प्रस्था: किण्यस्य पुत्रकत्वककलयुक्तो वा जातिसंभारः प्रसनायोगः ॥ १८ ॥ पारह भादक चावल की पिछी और पांच ६५ किण्व ( सुरापोज देखो इसी अध्यायका २६ वो सूत्र), अथवा किण्वके स्थानपर इतना ही, "पुत्रक (एक वृक्ष का नाम है) की छाल और फलोंके सहित जाति-सम्मार (अच्छा सम्भार योग, यह पई चीजोंसे मिलाकर बनाया जाता है, देखो इसी भन्यायका सत्ताईसवां सूत्र), मिलाकर प्रसमा योग तैयार किया जाता है; भर्थात् इन वस्तुओंसे प्रसमा नायक शराब तैयार होती है 11 १८ ॥ कपित्थतुला फाणितं पश्चतौलिकं प्रस्थो मधुन इत्यास- वयोगः ॥ १९ ॥ पादाधिको ज्येष्ठः पादहीनः कनिष्ठः ॥२०॥ विगकत्सामारपः. यात्रेयाशे विकाराणामारष्टाः ॥२४ केयके फनका सार सी पल, और सब पांचौ पल, मधु एक प्रस्थ इनको मिलाकर भासय योग तैयार किया जाता है॥ ९॥ इसमें पदि कैथ मादिको सपायर कर दिया जाय. सो क्षेत्र अर्थात six ww india's .
] . 4 .. २५ अध्या० अध्यक्ष-प्रचार (-२७१) और पौना करदेनेसे कनिष्ठ अर्थात् घटिया आसय समझा जाता है। इसलिये जो परिमाण भासयका पहिले यताया गया है, यह मध्यम योग समझना चाहिये ॥ २० ॥ प्रत्येक वस्तुका अरिष्ट उसी प्रकारसे यनाना चाहिये, जो प्रकार चिकि.. स्सोंने उन २ रोगोंको नष्ट करने के लिये बनाये जाने पाले अरिष्टाका यताया हुआ मेपमित्वकाकाधाभिपुतो 'गुडपतीबापः पिप्पलीमरिचसं- भारत्रिफलायुक्तो वा मेरेयः ॥ २२ ।। गुडयुक्तानां वा सर्वेषा त्रिफलासंभारः ॥ २३॥ मेंढासींगीकी हालका साथ मनाकर उसमें गुहका योग देकर पीपल भार मिथके चूर्णको मिलाया जाये, अधया पीपल मिर्च की जगह पर निफग (हरह, यहेडा, भोवला) का चूर्ण मिलाया जाये, इससे जो सराय तयार की. जाती है, उसका नाम मैरेय है ॥ २२ ॥ अथवा जिन यमि गुर मिलापा जाये, उन सबमें ही ग्रिफलाका योग भरश्य होना चाहिये ।। २३ ॥ मृद्वीकारसो मधु ॥ २४ ॥ तस्य स्वदेशो व्याख्यानं. कापिशायनं हारहूरकमिति ।। २५ ॥ मुनका दास आदिके रससे जो शराब बनाई जाती है, उसका नाम मधु है, (अगूरी शराब ) ॥ २४ ॥ उसके अपने देशमै पनाये जाने के कारण दो नाम हैं..-कापिशायन' और हारहरक । (कपिशा नामक नदी के किनारे- हुए नगामें पाये जानेसे • कापिशायन' और हरहर नामक नगर में मनाये जानेसे 'हारहूरक' नाम पढ़ा है। किसी र पुस्तकमें इस सूयके क्या- एयान' पदके स्थानपर 'याख्यान' ऐमा स्पष्ट अर्थवाला पाठ है ) ॥ २५ ॥ मापकलनीद्रोणमाम सिद्ध वा त्रिभागाधिकतण्डुलं मोस्टादीनां कार्पिकमागयुक्तः किण्वबन्धः ।। २६ ।। उडका कल्क (जालमें अधवा सम्बी ही पिसी हु चीजोका नाम करक है) एक द्रोण, करचे अथवा पके हुए, तीन भाग अधिक ( अर्थात् द्रोण) चापल, और मोरटा भादि वस्नुभाका (ग्यो-इसी अध्यायका एक एक कप, इन सब वस्तुओं को मिलाकर फिर नाम: योग तैयार किया जाता है। इसीशे मघवीज या सुरारीज कहते हैं ॥ २६ ॥ पाठालोध्रतेजोवत्येलावालुकमधुमधुरसाप्रिय गुदारुहरिद्रा मरिचपिप्पलानां च पञ्चकर्पिकः संभारयोगो मेदकस प्रसन्ना- पुर यसे सेतीसवां सूत्र .
(२०) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक याच ॥ २७ ॥ मधुकनियुहयुक्ता कटशर्करा वर्णप्रमादिनी च १ पाठा, लोध, गनपीपल इलायची, यालु ( सुगन्धि-किमी तरह के इतर भादिकी सुगन्धि), मुलही, दूर्वा (दुव), केसर, दार हल्दी, मिरय और पीपल, इन सब चीजोंका पाच २ कप लेकर मिला लिया जाये, यह भेदक और प्रसार नामक शराबमें डालन के लिये माला हाता है ॥ २७ ॥ मुलहटी का काटा काके उसमें रयादार शकर मिलाकर, यदि इसको मेदक और सा, शराबमें डाल दिया जाये, तो इनका भेदक भौर प्रसभाका) रग यहुत बधा निसा जाता है ॥२०॥ पोचचित्रकग्लिङ्गगजपिप्पलीनां च पञ्चकर्षिक: अमुकम- धुकमुस्तालोध्राणां द्विकार्षिकशासपसमारः ॥ २९ ॥ दशभाग- पो बीजपन्धः ॥ ३०॥ दालचीनी, चीता, पायविधा और गजपीपल इन सबका एक एक कर रेकर, सुपारी, मुलहटी, मोथा और लोध, इन चीजोंका दो दो कप हार" सबको आपस में मिला लिया जावे, यह आसव नामक शराबका मसाला सम शाना पाहिये ॥ २९ ॥ दालचीनी लादि वस्तुओं का दसवा हिस्मा योजव होता है।पीजबन्धका तात्पर्य यह है कि जिस किसी व्यका भी भासव बनाया जब, उसमें इसको अवश्य मिलाना चाहिय ॥३०॥ प्रसनायोगः श्वेतसुरायाः ॥ ३१ ॥ सहकारसुरा रसोतरा बीजोचरा वा महासुरा समरिकी वा ॥ ३२ ॥ प्रसार नामक शरायका जो पाग बताया गया है, वही योग श्वेतसुरा का मा समझना चाहिये । (किन्तु प्रसाका जो पाठा लोध आदि मसाला बताया गया है। वह इसमें नहीं डाला जाता । किसी २ च्यारयाकारने यह भी लिखा है, कि मसालेकी तरह निवन्ध भी इसमें न दालमा पाहिये ॥ ३॥ ॥ मुराभाने निस लिखित मद भी हैंसहकारसुरा (साधरण सुरामें आम का रस या नेल आदि मिलाकर को तैयार की आय ), रसोत्ता (गुरुका सोदा डालकर जो तैयार कोजाय ), बी मोसस (जिसमें बीजवन्ध दृष्यों की अधिक मात्रा हो, इसीका नाम महामुरा भी ई), और सम्मकी । जिस सुपौ मसाले की मात्रा अधिक परी दुई हा) ॥ ३२॥ तासां मोस्टापलारापत्तरमपशृङ्गीकरजक्षारक्षकपाय भाषितं दग्धकटशर्कगचूर्ण लोधचिरकविलङ्गाठापुस्ताकलिंगयपदारह . . २५ अश्या०] अध्यक्ष प्रचार (२७३) रिदेन्दीपरशतपुप्पापामार्गनसपर्णनिम्बास्फोतकल्कायुक्तमन्त खो मुष्टिः कुम्भी राजपेयां प्रसादयति ॥ ३३ ॥ फाणितः पञ्चपलि. कश्चात्र रसद्धियः ॥ ३४ ॥ इन सब प्रकारकी शराबाको निन्न लिसित रीतिसे निखारा जासकता है:-मरोरफली, पलाश (ढाक), पत्तूर (लोहमारक, भोपध विशेष), मेंढासीगी, करंजया, और क्षीरवृक्ष (दूधिया पेड़, बट गूला पिलसन आदि) इसके काढ़ेमें भावना दियाहुआ गरम रवादार शकरका चूरा, तथा इससे भाधा-लोध, चीता, पायविदा, पारा, मोथा, कलिङ्गयर (कलिङ्ग देशम उत्पन्न हुए २ जो), दार. हल्दी, कमल, सौफ, अपामार्ग (चिरचिढ़ा), सप्तपर्ण (एक वृक्ष, जिसके पत्तों- में प्रायः सात पंसड़ियांमी होती हैं, इसको हिन्दी सानविण या सतधित कहते है ), नींब, और आस्फोत ( आस्फेट आसेगा नाम है, सम्भव है इसी मधमे यह आस्फीत शब्द भी प्रयुक्त हुआ हो, ' आस्फोटा' विष्णुकान्ता भीर मोगोको भी कहते है । साधारणतया शराबमें आसके फूल डालने का कहीं २ रिवाज भी है), आदि वस्तुओका करक (पिपा हुआ चूग) लेकर इन सयको मिला लिया जायें; और इस मसालेकी एक बन्द मुट्ठी भरकर एक खारी परिमाण पाराममं डालदी जावे; इसके डालनेसे उस सरायका रंग इतना निखरता है, कि वह रामाओंके पीने योग्य होजाती है ॥ ३३ ॥ यदि उसमें पांच पल राव भीर मिलादी जाचे, तो उसका स्वाद भी सूप या जाता है ॥ ३ ॥ कुटुम्बिनः कृत्येषु श्वेतसुरामौपधार्थ वारिष्टमन्यद्वा कर्तु लभेरन् ।॥ ३५ ॥ उत्सवसमाजयात्रासु चतुरहःसौरिको देयः ॥ ३६ ॥ तेप्वननुज्ञातानां प्रहवणान्तं देवसिकमत्ययं गृह्णीयात् ॥ ३७॥ नगर निवासी तथा जनपद मिवासी पारिवारिक जान, वियाह आदि का. यो में श्वेतसुरा (सफेद रंगकी शराब) को, और औपके लिये अरिष्टको भथवा अन्य मेदक आदि सुराको उपयोग करनेके लिये प्राप्त कर सकते हैं । (अथवा अपने घरमें भी इन सुराओंको बना सकते हैं, यह अर्थ करना चाहिये) ॥३५॥ यसन्त आदि उरसों में, अपने अन्धुजनोंके मिलने पर, तथा देवयात्रा अर्थात् इष्टदेव आदिशी पूना समयमै, मुराध्यक्ष, चार दिनतक सुरा पाने की आज्ञा देदेवे ॥ ३६ ॥ उन उत्सव आदिके दिनाम जो पुरुष सुराध्यक्षकी अनुमति लिये विनाही मुरा पीये, उनको उत्सरके अन्त में प्रति दिनके हिसायसे कुछ दण्ड दिया जावे । (किसी २ व्याख्याकारने इस सूनका यह भी अर्थ किया - [२ अधिक (२७) कौटलीय अर्थशास्त्र है:--जो कर्मचारी उत्सव आदिके दिनोंमें विनाही अनुमतिके शराब पीकर उन्मत्त होजावें, और उससे राजकीय कार्यकी हानि होवे, तो उस दैनिक हानि- के अनुसारही उनको दण्ड दिया जावे) ॥३७॥ सुराकिण्यविचयं स्त्रियो बालाश्च कुर्युः ॥ ३८ ॥ अराजप- ण्याः शतं शुल्कं दाः सुरकामेदकारिष्टमधुफलाम्लाम्लशीधूनां च॥३९॥ सुराको पामे तथा उसके मसाले थादिको तैयार करनेके कामपर सुरासे अनभिज्ञ स्त्रियों और बालकोंको नियुक्त किया जावे ॥ ३८ ॥ जो पुरुष स्वयं शराय बनाकर घेचे (अर्थात् उत्सव आदि विशेष अवसरोंपर जो स्वय शराय बेचते है, जिनको सरकारकी भोरसे शरावका कोई ठेका नहीं मिला हुभा है, तात्पर्य यह है कि जो सरकारी शराय नहीं बेचते, अपनी ही पनाकर वेधते हैं। यह उत्सव आदिके समयमेही होसकता है क्योंकि अन्य समय में कोई भी पुरुप, टेकेदारके सिवाय शराय नहीं बेच सकता ) पे, सुरा (साधा- रण शराम, श्वेत सुरा आदि), मेदक, भरिए, मधु, फलाम्ल (तापी, या नारि- यक्षके रससे बनाई हुई नाराय), और अम्लशोधु ( रसोतरा, जो कि गुड़के सांदेसे तैयार कीजाती है, देखो इसी अभ्यायका बत्तीसवां सूत्र) आदि शरा- चौका, पांच प्रतिशतक शुन्क देखें ॥३९ । अहश्च विक्रय व्याजी ज्ञात्वा मानहिरण्ययोः। तथा चैधरणं कुर्यादुचित चानुवर्तयेत् ॥ ४० ॥ इत्यध्यक्षपचारे द्वितीये ऽधिकरणे सुराध्यक्ष पञ्चविंशो ऽध्यायः ॥ २४ ॥ भादित पद्यावारिशः ॥ १६ ॥ इस शुल्कके अतिरिक्त, दनिक विश्य तथा वैधरण (सोल मापका भावश्यक टैक्स) को अच्छी तरह जानकर, सुराध्यक्ष तोल मापके अपर सौल. हर्षा हिस्सा और नकद भामदनीपर बीसवो हिस्सा ग्याजी लगाघे । अर्थात् अपनी बनाई शराय येचनेपर उनसे ये टैक्स और घसूल किये जायें; परन्तु सुराध्यक्षको चाहिये कि या इनके साथ सदा उचित वीच ही रखे ॥ ४ ॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें पञ्चीसयां अध्याय समाप्त | २६ अध्या] (२७५) अध्यक्ष-अंचार छब्बीसवां अध्याय। ४३ प्रकरण सूनाध्यक्ष। भक्ष्य प्राणियोंके वधस्थानको 'सूना' कहते हैं; उस पर नियुक्त किये गये राजकर्मचारीका नाम 'सूनाध्यक्ष' है। उत्तम मध्यम और अधम कार्योक अनुसारही उसके अध्यक्षोंकी नियुक्तिके सम्ब. न्ध पीछे कहा जा चुका है। समाहर्ता सविधाता आदि उत्तम अध्यक्ष, पोतवाध्यक्ष आदि मध्यम, तथा सुराध्यक्ष सूमाध्यक्ष भादि अधम है । इस अध्यायमें प्रकरणानुसार सूनाध्यक्षक कार्यों का निरूपण किया जायगा। सूनाध्यक्षः प्रदिष्टाभयानामभयवनवासिनां च मृगपशुपक्षि मत्स्यानो बन्धवधहिंसायामुत्तमं दण्डं कारयेत् ।। १ ॥ कुंटुम्बि- नामभयवनपरिग्रहेषु मध्यमम् ॥ २॥ सरकारको ओरसे जिनके न मारे जानेकी घोषणा करदी गई है, और जो सरकारी बन्द जंगलों में अथवा ऋपियोंके निवास स्थान के जंगलों में रहते हैं, ऐसे मृग (परिण आदि), पशु (गेंडा भरना भंसा आदि) पक्षी (मोर भादि) और मछलियोंको जो पुरुष पकड़े, या उन पर प्रहार करे, अथयो उन्हें मार शालेसूनाध्यक्ष उसको उत्तम साहस दण्ड दिलवावे ॥१॥ यदि कुटुम्बी पुरुष, अभय जंगलों में (जो सरकारकी ओरसे बन्द या सुरक्षित हैं, अथवा जिनमें प्ररपियों भादिक भाश्रम हैं, ऐसे जंगलीम ) इस प्रकार मृग आदिको पकड़ें उन पर प्रहार करें या उन्हें मारें, तो उनको मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ॥२॥ अप्रवृत्तवधानां मत्स्यपक्षिणां बन्धवधहिंसायां पादौनसह- विंशतिपणमत्ययं कुर्यात् ।। ३ ।। मृगपशूनां द्विगुणम् ।। ४ ।। जो कभी भी घातक आक्रमण न करें, अथवा जिनका चिरकालसे वध आदिन हो रहा हो, ऐसे मरस्य तथा पक्षियोंको जो पुरुष पकड़े, प्रहार करे या मारे, उसे पीने सत्ताईस पण (२६३ पण) दण्ड दिया जावे ॥ ३ ॥ तथा जो पुरुष, इसी प्रकार के मृग था पशुओका बप आदि करे, उसे इससे दुगन अधीत् सादे मेपन (५३३) पण दे दिया जायें। ॥
(२७६) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधि० प्रवृत्तहिंसानामपरिगृहीतानां पड्भागं गृह्णीयात् ॥५॥ मत्स्यपक्षिणां दशभागं वाधिकं मृगपशूनां शुल्क वाधिकम् ॥ ६॥ पक्षिमृगाणां जीवत्पड्भागमभयवनेषु प्रमुश्चेत् ॥ ७ ॥ जो पशु आदि घातक आक्रमण करने वाले हों, जिनका कोई मालिक न हो, अथवा जो सरकारी या अन्य सुरक्षित जंगलकेभी न हो, उन्हें जो मारें, उनसे उसका (मारे हुए पशु आदिका ) छठा हिस्सा राजकीय अंश सूनाध्यक्षको लेलेना चाहिये ॥५॥ मछली और पक्षियोंका दसवां हिस्सा, अथवा उससे कुछ भाधिक लेना चाहिये । इसी प्रकार मृग तथा अन्य पशुभकाभी दसवा हिस्सा, अथवा उससे कुछ और अधिक राजकीय अंश शुल्क रूपमें, सूनाध्यक्ष को उन पुरुषास लेना चाहिये, जो इन मृग आदिका वय करें॥ ६ ॥ साधारण जंगलामसे पकड़े हुए पक्षी और मृगोंके जीवित छठे हिस्सेको अभय पोंमें (सुरक्षत जंगलाम) छोड़ देवें ॥ ७ ॥ सामुद्रहस्त्यश्वपुरुपपगर्दभाकृतयो मत्स्याः सारसा नादे- यास्तटाककुल्योद्भवा वा क्रौश्चोत्क्रोशकदात्यूहहंसचक्रवाकजीव- जीवकभृङ्गराजचकोरमत्तकोकिलमयूरशुकमदनशारिका विहारप- क्षिणो मगल्याथान्ये ऽपि प्राणिनः पक्षिमृगा हिंसामाधेभ्यो रक्ष्याः ॥ ८ ॥ रक्षातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ॥९॥ किन २ प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिये, अब यह निरूपण किया जाता है:-समुद्र में उत्पन्न होनेवाले, तथा हाथी घोड़े पुरप पैल गधा भादि की भाकृतिवाले भिन्न प्रकारके मरस्य (जलचर प्राणी) तथा सारस ( सर अर्थात शीलों में होनेवाले), नदियों, तालायों और छोटी २ नहरोंमें होने वाले मत्स्य (यहां तक जलचर मरस्य आदि प्राणियोंको यताया गया), और क्रोश (कुंज, जो शरद् ऋतु में पंक्ति बांध कर भाफाराम उदते हुए देखे जाते है), उस्कोशक (कुर, लम्ची चोचवाला कुछ २ काले रंगका पदा पक्षी }, दास्यूह, (जल कोआ), इंस, चक्रयाक (चकवा), जीपंजीयक (मोरके पंखोके समान पंखोंवाला एक पक्षी), भृगराज ( मुर्गके समान एक पक्षी जिसके सिरपर पलगी सी होती है), पकौर, मत्तकोकिल, मोर, तोता, मदन (एक सरहका पक्षी, मैना, इनसे अतिरिक्त और क्रीड़ाके लिए कुरकुट ( मुगा) भादि प्राणिरोकी रक्षा करनी चाहिए । अर्थात् इन उपर्युक्त प्राणियोंको न कोई मार सके, और :म इनपर प्रहार भादि कर सके, ८॥ यदि सूनाम्पक्ष इमकी रक्षा करने में कुछ मसावधानता करे, तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥९॥ 1 .
२६ अध्या
अध्यक्ष प्रचार
(२७)
मृगपशूनामनस्थिमांसं सद्योहतं विक्रीणीरन ॥ १० ॥
अस्थिमतः प्रतिपातं दधुः ॥११॥ तुलाहीने हीनाटगुणम् ।।१२।।
मृग और पशुओका हड्डी रहित माज़ा मांस हो बाजार येचा जाये
॥ १० ॥ड्डी सहित मांस देनेमें, हड्डीके बदलेका मांस और दिया जाय ।
अधीन मांसके साथ जितनी ही जा रही हो, उतने अंशको पूरा करनेके
लियै, उतना ही माम सरोदारको ओर दिया जावे ॥११॥ यदि तोलने में
मांस कम दिया जाय, अर्थात् मांस पेंचनेवाला धोखरी घोढ़ा मांस तोले, तो
जितना थोड़ा ताले, उससे आठगुना मांस वह दण्डरूपमें और देवे। उसमें से
आठवां हिस्सा खरीदारको दे दिया जाये, और बाकी सात हिस्से सूनाध्यक्ष
वत्सो पो धेनुश्रुपामवध्याः ॥ १३ ॥ प्रतः पञ्चाशत्को
दण्डः ॥ १४ ॥ क्लिष्टघातं घातयतश्च ॥१५॥
गग और पशुओमस बछदा, सांड (विजार ), भौर गाय, पशु
कभी न मारने चाहिये ॥ १३ ॥ जो पुष्प इनमे से किसीको मारे, उसे पचास
५०) पण दण्ड दिया जा ॥ १४ ॥ अन्य पशुओंको अत्यन्त कष्ट पहुंचा
कर मारनेवाले पुरुषों के लिये भी पही (५. पण) दण्ड दिया जाये ॥ १५ ॥
परिसनमशिरः पादास्थि विगन्धं स्वयंमृतं च न विक्रीणीरन्
॥ १६ ॥ अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ।। १७ ।।
नयेचने योग्य मांसाकी गणना इस प्रकार है:--सूनासे अतिरिक्त
स्थान में मारे हुर वाणी का मांस, मिर, पर तय हट्वी रहित मांस (अर्थात्
जंगल में स्वयं मर कर अन्य प्राणियों से स्वाये हुए जानवर का मांस),
दुर्गन्धस युक्त माम, रोग आदिके कारण स्वयं मरे हुए जानवर का मांस, वाजारों
में न थेचा घाने ॥ १६ ॥ जो इस नियमको म माने, उसे बारह (१२)
पण दण्ड दिया जावे ॥१७॥
दुष्टाः पशुमृगव्याला मत्स्यावामयचारिणः ।
अन्यत्र गुप्तिस्थानेभ्यो वधयन्धमवामयुः ॥ १८ ॥
इत्यध्यक्षमचारे द्वितीये ऽधिकरणे सूनाध्यक्षा पतिशो ऽध्यायः ॥ २६ ॥
भादितः ससचावारिंशः ॥ १७ ॥
[२ अधिक (२७८) कौटलीय अर्थशास्त्र अभय वनोंमें रक्षा किये जाते हुए हिंसक जानवर, नीलगाय आदि पशु, मृग और ग्यान तथा मत्स्य आदि माणी, यदि उन सुरक्षित जगलासे पाहर चले जावें, तो उनको मारा या बाधा जासकता है, अर्थात् उनको फिर मारने या बांधने में कोई अपराध नहीं ॥१८॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण में छीसवां अध्याय समाप्त । सत्ताईसवां अध्याय ४४ प्रकरण गणिकाध्यक्ष। अपने रूप सौन्दर्यसे जीविका करने वाली खियों को 'गणिका' कहते हैं। उनकी व्यवस्था करने के लिये नियुक हुए राजकीय अधिकारी का नाम 'गणिकाध्यक्ष है। इस प्रकरण में उसीके कार्योंका निरूपण किया जायगा । गणिकाध्यक्षो गणिकान्वयामगणिकान्वयां या रूपयौवन- शिल्पसंपन्ना महस्रेण गणिकां कारयेत् ॥ १॥ कुटुम्मार्धेन प्रति- गणिकाम् ॥ २॥ गणिकाध्यक्ष, रूप यौवन तथा गाने यमाने आदिकी कलाभोंसे युक्त लाकीको, चाहे यह गणिका ( वेश्या ) के वश, मैं उरपमहुई हो, या न उत्पन्न हुई है, एक हजार , १०००) पण देकर, गणिकाके कार्य पर नियुक्त करे। ॥ ॥ इसी प्रकार दूसरी गणिकाको भी भाधा धन उसके कुटुग्यको और भाधा उसको देकर उसके कार्य पर नियुक्त करे। (पहिले सहस्र में भी आधा २ यांट कर ही गणिका भार उसके कुटुम्ब को दे दिया जावे) अथवा इस सूत्र फा यह अर्थ करना चाहिये-जाको परिचर्श करना ही गणिका फुटुम्ब का कार्य है, वह कार्य प्राधा २ वोट कर प्रतिगणिकाकी नियुक्ति कीजाये । भधात् राजपरिचर्याका आधा कार्य पहिली गणिका करे और आधा दूसरी ॥२॥ निप्पतिताप्रेतयोर्दुहिता भगिनी वा कुटुम्ब भरेत ॥ ३ ॥ तन्माता या प्रतिगणिकां स्थापयेत् ॥ ४ ॥ तामामभावे राजा हरेत् ॥ ५॥ .
२७ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (२७२,) पदि कोई गणिका अपने स्थानको छोड़कर दूसरी जगह चली जावे, अथवा मर जाये तो उसके स्थान पर उसकी लड़की या यहिन, उन २ कार्यों को करती हुई उपकी सम्पत्ति की मालिक बन जावे ॥ ३॥ अथवा बाहर गई हुई या मरी हुई गणिका की माता, उसके स्थान पर किपी दूसरी गाणिका को नियुक्त करले यही उन २ कार्यों को करती हुई, उसको शेष सम्पत्तिकी मालिक बने ॥४॥ यदि इनमेंसे कोई भी न रहे, तो उस सम्पत्तिका मालिक राजा ही समझा जावे ॥५॥ सौभाग्यालंकारया सहस्रेण वारं कनिष्ठ मध्यममुत्तम वारोपयेत् ।। ६॥ छत्रभृङ्गारग्यजनशिविकापीठिकारथेषु च विशेपार्थम् ॥७॥ सौभाग्य और अलङ्कारकी आधिकताके अनुसार ही एक हजार पण देने के क्रमसे वाराङ्गनाके तीन विभाग किये जायें,-कमिठ, मध्यम और उत्तम । अर्थात् जो वाराङ्गणमा (वेश्या गणिका ) सौन्दर्य आदि सजावटमें सबसे कम हो यह कनिए समझी जाये, उसको एक हजार पण बेसन दिया जावे। इसी प्रकार जो सौन्दर्य आदिमें उससे अधिक दो व मध्यम, उसको दो हजार पण वेतन दिया जावे; और जो सबसे अधिक हो, वह उत्तम, उसको तीन हजार पण वेतन दिया जावे। इस तरहसे कनिए, मध्यम और उत्तम तीन भेद बनाये जावें ॥६॥ इन भेदोका प्रयोजन यही है, कि वे गणिका अपने २ पदके अनुसार, राजाके छन, भूमार (इतरदाम या अन्य महर्घ वस्तुकी खोटीसी पेटी, जो राजाके साथ २ रहती है), व्यजन, (पखा), पालकी, पीठिका, (राजाके बैठनेमा बिशेष स्थान ), और रथ सम्बन्धी कार्यों में नियमानुसार उपस्थित रहें, अर्थात भिन्न २ अवसरोंपर मिल र विधिसे राजाको उपचर्या करें। इसका विवेक इस तरह करना चादिए..- जो कनिष्ठ यारयनिता हो, वह छत और मृडार लेकर राजाकी उपचर्या करे, मध्यम, व्यजन और पालकीके साथ रहकर राजाकी सेवा करे, तथा उत्सम राजाके विशेष सिहासन और रथ आदिम साथ २ रहकर उसकी परिचर्या करे ॥ ७॥ सौभाग्यभङ्गे मातृकां कुर्यात् ॥ ८ ॥ निष्क्रयश्चतुर्विंशति- साहस्रो गणिकायाः ॥९॥ द्वादशसाहस्रो गणिकापुत्रस्य ||१०|| अष्ट्वात्प्रभृति राज्ञः कुशीलवकर्म कुर्यात् ।। ११ ।।
(२८०)
[२अधिक
कोटलीय अर्थशास्त्र
जय इनका रूप भार यौवन ढल जाय, तब इनको नई नियुक्त की
हुई गणिकाओंके मातृस्थानमें समझा जाये । अर्थात् नई गणिकाओंकी माता
धनकर ये हैं हर तरहकी शिक्षा देखें, और उनको सदा राजाके अनुकूल
बनाये रक्खे ॥ ८॥ जो गणिका अपने भापको राजाको सेवासे मुक्त करना
चाह, वह उसको चोयीस हजार पण (२४००.) निमय (सेवासे मुक्त
होनेका मूल्य ) देवे । अर्थात् वह राजाको २४००० पण देकर उसकी सेवासे
मुक्त होकमती है ॥१०॥ यदि गणिकाका पुत्र अपने आपको राजाकी सेवासे
मुक्त करना है, तो उसका निष्क्रय पारह हजार (१२०००) पण है ॥१०॥
यदि यह निश्कर देने में समर्थ नहीं है, तो राजाके पाम भार वर्षनक कुशालय
(चारण) का काम करके, किर अपने पापको मुक्त कर सकता है॥१॥
गणिकादासी भमभोगा कोठागारे महानसे या कर्म कुर्याद
॥१२॥ अविशन्ती सपादपणमवरुद्धा मासवेतनं दद्यात् ।। १३ ।।
गणिकाकी दासी जय गोग योग्य उमरको ध जाये, अर्थात् मूवी
होजाये, तप उसको कोहगार या महानर (रसोई ) में काम करने के लिये
नियुक्त कर दिया जाये ॥ १२ ॥ यदि यह काम न करे, भीर किसी एकही पुरु-
पकी भोग्प खो बनकर उसके घरमें रहने लगे, तो वह प्रतिमास उस गणिका.
को सवा (१) पण वेतन देवे ॥१३॥
भोगं दायमायं व्ययमायतिं च गणिकायाः निरन्धयेत्॥१४॥
अतिव्ययकर्म च वारयेत् ।। १५ ।।
गणिकाध्यक्षको चाहिये, कि यह गणि काके भोगधन (गणिकाको भोग
करने वाले पुरपसे प्राप्त हुआ २ धन), दायभाग ( मातृकुलकमसे प्रात
हुभा २ धन), आय (भोगसे अतिरिक्त माह होने वाला धन), व्यय और
आयति (प्रभाव-आगे होने घाले असा) को पराबर अपनी पुस्तक लिखता
रहे ॥१७॥ और गणिकाओंको आयधिक व्यय करनेसे सदा रोकता रहे ॥१५॥
मातृहस्तादन्यत्राभरणन्यासे सपादचतुष्पणो दण्डः ॥१६॥
स्वापतेयं विक्रयमाधान वा नयन्त्याः सपादपश्चाशत्पणो दण्डः
॥१७॥
यदि गणिका, अपनी माता सिवाय और किसीके हायमें अपने आभ-
रण आदि सपि, तो उसे सवा चार (५३) पण दण्ड दिया जावे ॥१६॥ यदिवह
(गणिका) अपने कपड़े पनि पारिवारिक परिच्छदको येथे या गिरवी रश्म्वे,
मो उसे सपा पचास (५०%) पण दण्ड दिया जावे ॥१७॥
२७ अध्याj
अध्यक्ष-प्रचार
(२८)
चतुर्विशतिपणो वाक्पारुष्ये ॥ १८ ॥ द्विगुणो दण्डपारुण्ये
॥ १९ ॥ सपादपञ्चाशत्पणः पणोऽर्धपणश्च कर्णच्छेदने ॥२०॥
यदि वह किसी के साथ याचिक कठोरताका वाव करे, तो उसे चौबीस
(२५) पण दण्ड दिया जाये ॥ १८ ॥ यदि हाथ पैर या लाठी आदिसे मार-
कर किसीके साथ कठोरता करे, तो पहिलेसे दुगना अर्थात् अड़तालीस (५८)
पण दण्ड दिया जावे ॥ १९॥ यदि वह किसीवर कान आदि कारसेवे, तो पौने
यावन (५३) पण दण्ड दिया जाये ॥२०॥
अकामायाः कुमार्या या साहसे उत्तमो दण्डः ॥२१॥
सकामायाः पूर्वः साहसदण्डः ॥ २२ ॥
यदि कोई पुरुष, कामनारहित कुमारीपर बलात्कार करे, तो उसे उत्तम
साहस दण्ड दिया जावे ॥ २१ ॥ तथा जो कामना करने वालीही कुमारीके
साथ ऐसा व्यवहार करे, उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥ २२ ॥
गणिकामकामां रुन्धतो निप्पातयतो या व्रणविदारणेन वा
रूपम्पन्नतः सहस्रदण्डः ॥ २३ ॥
जो पुरुष, किसी कामनारहित गणिकाको बलपूर्वक रोककर अपने घर-
में रक्रो, अथवा उसको मुक्त न करना चाहे, या कोई चोट अथवा घाव लगा-
कर उसके रूपको नष्ट करना चाहे; उस पुरषको एक हज़ार (१०००) पण
दण्ड दिया जावे ॥ २३ ॥
स्थानविशेपेण वा दण्डवृद्धिरनिष्क्रयद्विगुणात्पणसहस्रं वा
दण्डः ॥ २४ ॥
शरीरके मिन २ स्थानोंपर चोट पहुंचानेसे, उन २ स्थान विशेषोंके
अनुसार ही इस दण्डमें (१००० पण दण्डमे) वृद्धि की जावे। यह वृद्धि
निष्कयकी दुगनी रकम तक होजानी चाहिये । ( यारानाका निष्क्रय चौबीस
बजार पण पताया गया है, उसका दुगना अवतालीस हजार पण हुए; शरीर
के किसी अवयवका उपघात करनेपर अघिकसे अधिक इतना दपष्ट होसकता
है। किसी व्यारत्याकारने इसका यह भी अर्थ किया है, कि दण्डवृद्धि उत्तम
भादि वाराङ्गनाओंके विचारसे करनी चाहिये । प्राचीन व्याख्याकारोंने इस सून-
फे 'पणसहस्रं वा दण्टः' इस अंशका गाण्यान नहीं किया, यह अंश मूल पुस्त.
कोंमें यावर देखा जाता है; परन्नु पूर्यापरके साथ इसकी संगति मालम नहीं
होती, इसलिये यह पाठ प्रक्षित ही माउस होता ) ॥ २५ ॥
कौटलीय अर्थशास्त्र १२ मधिल प्रासाधिकारां गणिकां घातयतो निष्क्रयत्रिगुणो दण्ड: ॥ २५॥ मातृकादुहितुकारूपदासीनां पात उत्तमः साहसदण्डः जिन गणिकाओको राजाके समीप उन भृङ्गार आदिका अधिकार माह हो, अर्थात् जो राजकीय वाराङ्गनायें होये, उनको मारने पाइने वाले पुरुषको निमयसे तीन गुना अर्थात् बहत्तर हजार ( ७२०००) पण दण्ड दिया जादै ॥ २५ ॥ माता, लड़की, तण रूपवासी (रूपसे भाजीविका करने के लिये दासी बनी हुई स्त्री) को मारने पीटने पर उत्तम साहस दण्ड दियाजावे ॥२६॥ सर्वत्र प्रथमे ऽपराधे प्रथमः ॥ २७ ॥ द्वितीय द्विगुणः ॥२८॥ तृतीये त्रिगुणः ॥२९॥ चतुर्थे यथाकामी स्यात् ॥३०॥ सवहीं सक्षों में जो अपराध पहिलेही पहिले किया जाय, उसी के लिये निधि दादोंका विधान है। इसलिये दिखलाये हुए ये सब दण्ड, प्रथम दण्ड अर्थात् पहिले अपराध के लिये दण्ड समझने चाहिये ॥ २७ ॥ यदि कोई पुष उसी अपराधको फिर दुवारा करे, तो उसको निर्दिष्ट दण्डसे दुगना दण्ड दिया जाय ॥ २८ ॥ इसी प्रकार सीसरी बार यही अपराध कर मेपर, सिगुना दण्ड ॥ २९ ॥ और चोधी धार उसी अपराध करनेपर, चौगुना अथवा सर्व स्वका अपहरण, या देशसे ही प्रवासित करदेना, आदि दण्टॉमसे कोईसा दण्ड इच्छानुसार दिया जाये ॥३०॥ राजाजया पुरुषमनभिगच्छन्ती गणिका शिफासहस्र लभेत ॥ ३१॥ पञ्चसहस्रं वा दण्डः ॥ ३२॥ जो गणिका, रामाको भाशा होने पर भी, किसी पुरष विशेपके पास न जाये, उसको एक हज़ार कोई लगवाये जावे ॥३॥ अधया यह शारीरिक एण्डन देकर, उसपर पांच हज़ार (५००० ) पण जुरमाना किया जाय ॥१२॥ भोगं गृहीत्वा द्विपत्या भोगद्विगुणो दण्डः ॥ ३३ ॥ वसतिभोगापहारे भोगमष्टगुणं दद्यादन्यत्र च्याधिपुरुपदोपेभ्यः ॥३४॥ यदि कोई गणिका, किसी पुरपसे अपने मोगका घेतग लेकर फिर रा- के साथ इंच को, अर्थात् उसके पास न जाके, तो उस लिये हुए मोगवेतनसे दुगना व रसको दिया जाय ॥१॥ पवि सप्रियम्भोगका बेतन कर, गणिका सातको का, तथा भार बात के बहानेस ही रिता देवे, सो उसको उस देशनका आइगुमा पर दिया जाये। परन्तु यदि उस पुरुषको कोई ऐसा 4 २७ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (२८३) संक्रामक रोग हो, या अन्य किसी प्रकारका उसमें दोष हो, तो सम्मोग न करनेपर भी गणिकां अपराधिनी न होगी ॥३४॥ पुरुष प्रत्याश्चिताप्रतापो ऽप्सु प्रवेशनं या ।। ३५ ।। गाणे- कामरणार्थ भोगं वापहरतो ऽष्टगुणो दण्डः ॥ ३६.!! गणिका मोगमायतिं पुरुपं च निवेदयेत् ।। ३७ ॥ ओ गणिका इसमकार वेतन लेकर पुरुपको मारडाले, उसको उस पुर- पके साथही चितामें रखकर जीतेजी जला दिया जाये, भयया गले में शिला मांधकर गलमें दुशे दिया जाये ॥ ३५ ॥ गणिकाके आभरण, अन्य पदार्थ तथा सम्भोग चेतनको जो पुरुष अपहरण करे, उसे भपहृत धनसे भाठगुना दण्ड दिया जाये ॥ ३६॥ गणिकर अपने भोग, आमदनी तथा अपने साथ सहवास करने वाले पुरुपकी सूचना गणिकाध्यक्षको बराबर देवे ।। ३७ ॥ एतेन नटनर्तकगायकवादकवाग्जीवनकुशीलवप्लवकसौभि- कचारणानां स्त्रीव्यवहारिणां खियो गूढाजीवाश्च व्याख्याताः ॥ ३८ ॥ नर (अभिनय करने वाले ) नर्तक, गायक, वादक, वाग्जीवन (कथा करके जीविका करने वाले) कुशीलब (मुग्ल्याया नृत्य आदि दिखाकर गाने पाले), प्लवक (रस्सीपर चढ़कर खेल दिखाने वाले ), सीभिक (पेन्द्रजा. छिक-जादूगर ), चारण ( भांड मल आदि) सथा और भी जो कोई नियोंके द्वारा अपनी जीविका कमाते हो, उनकी नियं; और छिएका व्यभिचार भादिसे जीविका कमाने वाली स्त्रियोंके सम्बन्धमे भी गाणिकाओंके समानही सब यथो- चित नियम यत्ते जावें । अथात् नट आदिकी नियोंके विषपमें जो नियम जहाँ पम्भव हो, उसके अनुसार ही इनके माय वर्ताव किया जाये ॥ ३८ ॥ तेषां सूर्यमागन्तुकं पञ्चपणं प्रेक्षावेतनं दद्यात् ॥ ३९ ॥ रूपाजीवा मोगद्वयगुणं मासं दाः ।। ४० ॥ यदि नट आदिकी कोई कम्पनी किसी दूसरे देशसे तमाशा दिखाने के लिये भाचे, तोपरयेक तमाशा दिखानेका पांच पण टैक्स राजाको देवे ॥ ३९ ॥ रूपसे भाजीविका करने वाली गणिका, अपनी मासिक आमदनीकी श्रीमतमेसे दो दिनकी भामदनी, राजाको कर रूप दे | तात्पर्य यह है, कि महीने भरमें जितनी भी आमदनी हो, उसको प्रत्येक दिनपर यराना २ पाटकर, दो दिनका जो कुछ भने, उतनाही टैक्प राजाको दिया जावे ॥ १० ॥ ..
कौटलीय अर्थशास्त्र {२ अधिक गीतयाधपाट्यनृचनाट्याक्षरचित्रवीणावणुमृदङ्गपरचित्तज्ञान- गन्धमाल्यसंयूहनसंपादनसंवाहनवशिककलाज्ञानानि गणिका दासी रोपजीविनीश्च ग्राहयतो राजमण्डलादाजीवं कुर्यात् ॥४॥ गाना, बज्ञाना, नाचना, अभिनय करना, लिखना, चित्रकारी करना, वीणा येणु तथा मृदाको विशेष रीतिसे बजाना, दूसरेके चित्तको पहचानना, गन्धाका बनाना, मालाभाका गूंधना, (गन्धसंयूदनं, माल्यसम्पादन), ' भादि भंगाका दयाना (संवाहन ) शरीरको हर तरहसे वेशभूपा आदि करना, तथा धौंसठ कलाओं में से अन्य भावश्यक कलाओंको गणिका, दासी (गणि- फाओंसे अतिरिक्त अन्य साधारण धेश्यायें ), तथा रङ्गमन (स्टेज ) पर अभि- नय करके जीषिका करने वाली खियोंके लिये सिखाने वाले आचार्यकी वृत्ति (निद) का प्रयाय, राजा, राजमण्डल (नगर तथा ग्रामोंसे भाने वाली भाय) सेको ४१॥ गणिकापुत्रानोपजीविनश्च मुख्यान्निष्पादयेयुः सर्वताला- वचाराणां च ॥ ४२ ॥ गणिकाओंके पुों तथा मुख्य रनोपजीवियों ( रंग मंधपर अभिनय भादि करके जीविका करने वाले मुख्य गों) को अन्य सम रंगोपजीधियों का (सर्यतालावधाराणां ) प्रधान पनाया जावे । अर्थात् थे, सबके भाचार्य स्था- नीय रहकर कार्योको करें ।।१२।। संज्ञामाषान्तरज्ञाश्च स्त्रियस्तेपामनात्मसु । चारधातममादार्थ प्रयोज्या बन्धुवाहनाः ॥ ४३ ॥ इत्यध्यक्षमधारे द्वितीय ऽधिकरणे गणिकाध्यक्षः सप्तविंशो ऽध्यायः ॥ २७ ॥ आदितो ऽचत्वारिंशः ॥१८॥ तरह २ के इशारे और मिस २ भाषाओको जानने वाली, उन रंगोप- जीवियोंकी खिपा, राजाके द्वारा धन आदि देकर चशमें किये हुए, उनके (उन त्रियोंके ) बन्धु बाधघोंसे राजाकी भाशानुसार कार्यो में प्रवृत्त कीहुई। भजिते. न्द्रिय दूष्य पुरषोंमें शधुमाके द्वारा भेजे हुए गुप्तचरोंके मारनेके लिये अथवा उनको विषयों में आसक्तकर ममादी बनाने के लिये प्रयुक की जाये तात्पर्य यह है कि रामा, रगोपजीवियों को यह धन आदि देकर उनको पा करके, उनकी मियोंको, शत्रुके गुप्तचोंके वध करने तथा उनको प्रमादी बनाने के कामपर नियुक्त करे, जिससे कि ये अपने कार्यको यथाविधि न कर सकें ॥४॥ अध्यक्षपचार द्वितीय अधिकरणमें सत्ताईसवां अध्याय समाए। .
२८ अध्या०] अध्यक्ष-ग्रचार (२८५) अट्ठाईसवां अध्याय। ४५प्रकरण. नावध्यक्ष। नौकाओंके टैक्स आदिको वसूल करने वाला, राजकीय पुरुष 'नाव- ध्यक्ष' कहाता है। उसके सय कार्योंका इस प्रकरणमें निरूपण किया जायगा। नावध्यक्षः समुद्रसंयाननदीमुखतरपचारान्देवसरोविसरोन- दीतरांश्च स्थानीयादिप्यवेक्षेत ॥१॥ तद्वेलाकूलग्रामाः क्ल दगुः ॥२॥ नायध्यक्षको चाहिये, कि वह समुद्र तटके समीपके, नदी और समुद्र- के संगमके नौमार्गीको तया बढ़ी २ झील, तालाप और नदियोंके नौमार्गा- को ( नाव चलानेके मार्गीको), स्थानीय, द्रोणमुख आदि स्थानों में अच्छीतरह देखता रहे, ( स्थानीय तथा दोण-मुस आदिका विवरण, देखो तीसरे अधिका- रणका पहिला सूय); अर्थात् इन मार्गोका प्रवन्ध और निरीक्षण यराबर करता रहे ॥१॥ समुद्र, झील या नदी आदिके किनारेपर पसे हुए गांव, राजाको कुछ नियत टैक्स देव । (क्योंकि यहां के लोग नाव आदिसे निरन्तर व्यापार कर सकते हैं। यदि ये लोग कुछ न देंगे, तो जनपद के अन्य भाविक व्यापारी किस प्रकार देनेको तैयार होसकेंगे। इसलिये किनारे के गांव सदाही कुछ निय. तकर देते रहे ॥२॥ मत्स्यबन्धका नौकाभाटकं पड्भागं दधुः ॥ ३ ॥ पत्तनानु- वृत्तं शुल्कमार्ग वणिजो दाः ॥ ४ ॥ यात्रावेतनं राजनौभिः संपतन्तः ॥ ५॥ शसमुक्ताग्राहिणो नौभाटकं दाः ॥६॥ स्वाभिर्वा तरेयुः ॥७॥ मछियारे (मछली मारने वाले), अपनी आमदनी (मछली आदि जो कुछ पकरें, उस) का छठा हिम्ला, सरकारी नायपर माने जानेका भादा दे ॥ ३ ॥ समुद आदिके तटपर बसे हुए व्यापारी नगरोंके (अथवा बन्दरगाहोंके) नियमके अनुसार ही निये अपने माल के मूल्यका पांचों या छटा हिस्सा राजक्षीय शुल्क (सरकारी टक्स)देवें॥धा सरकारी नावोंसे अपना माल लाने लेजाने पर उसका भार। मलददा नियमानुसार देवें ॥५॥ इसी प्रकार शंख और मोती आदिको सबसे
[२ आधि०
( २८६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
निकालने वाले व्यापारी, नावका भाड़ा देखें। (यहाँपर कितना भाड़ा देवें,इस-
का कोई निर्देश नहीं है, इस लिये उनके मालके मूल्यका पांचवां या छठा
हिस्साही भाड़ा समझना चाहिये)॥६॥ अथवा अपनी नावांसे ही तरें।
अर्थात् सरकारी नावोंका उपयोग न कर अपना नाशस ही सब काम लेवें
अध्यक्षश्चैषां खन्यध्यक्षेण ध्याख्यातः ॥ ८॥ पत्तनाध्य-
क्षनिबन्धं पण्यपत्तनचारित्रं नावध्यक्षः पालयेत् ॥ ९॥
शंख तथा मोती आदिके विषयमें, खन्यध्यक्षके समान ही नावस्यक्षका
कार्य समझना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार सम्पध्यक्ष, खानमें उपस होने
वाली वस्तुओंके मापार मादिका पूरा प्रबन्ध करता है, इसी प्रकार नावध्यक्ष
भी मछली, शंख, मोती भादि सामुद्रिक वस्तुओं के व्यापार भादिका पूरा प्रबंध
करे ॥ ८॥ पत्तनाध्यक्ष ( नगराध्यक्ष ) के नियत किये हुए, व्यापारी नगरके
नियोको (अथवा बन्दरगाह सम्बन्धी नियमोंको) नावध्यक्ष पूरे तौरपर पालन
करे । अर्थात् नगरम भाकर नागरिक नियमोंका उल्लंघन कदापि न करे ॥ ९ ॥
मूढवाताहतानां पितेवानुगृह्णीयात् ॥ १० ॥ उदकप्राप्त
पण्यमशुल्कमर्धशुल्क वा कुर्यात् ॥ ११ ॥
दिग्भ्रम होजानेसे अथवा तूफान भादिके कारण, नष्ट होती हुई नायको,
पिताके समान अनुमा करके बचावे ॥१०॥ जलके कारण खराब हुए २ मा.
लपर ( अर्थात् जिस मालमें जलके कारण व्यापारीका नुकसान होगया हो,
ऐसे मालपर) शुल्क ( सरकारी टैक्स ) न लेवे; अर्थात् उसका शुल्क माफ
करदेवे । अथवा हानि के अनुसार, उस मालपर आधा ही शुल्क सेवे ॥७॥
यथानिर्दिष्टाश्चैताः पण्यपत्तनयात्राकालेषु प्रेपयेत् ॥ १२ ॥
संयान्तीनीवः क्षेत्रानुगताः शुल्कं याचेत ॥ १३ ॥ हिंत्रिका
निर्यातयेत् ॥ १४ ।। अमित्रविपयातिगाः पण्यपत्तनचारित्रोप-
धातिकाश्च ॥ १५॥
सर्वपा गुरुक रहित तथा भाधे शुल्क वाली इन नावोंको, व्यापारिक
नगरोंकी भोर पाना करने के समयों में भेज देवे या छोड़देव ॥ १२ ॥ धरती
हुई नावोंको, जब वे गुरुक स्थान में पहुंचे, शुल्क मांगे । भयात् नायके चुंगी.
घाके पास पहुंचने पर उनसे सरकारी चुंगी लेली जाये । तात्पर्य यह है, कि जो
नाव बन्दरगाहसे गुमर कर किसी अन्य स्थानपर जाने वाली है, उससे बन्दर-
गाइपर ठहरने या गुजरनेकी चुंगी लेली जाये जो नावे घोर भौर
डाकुओकी हो, उनको नष्ट करदिया जाये ॥ १४ ॥ सधा जो नाव, शत्रुके
देशको जाने वाली , और व्यापारी नगरों या बन्दरगाहोंके नियमों को उल.
पन करने वाली हों, उनको भी नष्ट करदिया जाये ॥ १५॥
२८ अध्या.] यध्यक्ष प्रचार (२८७) शासकनियामकदाप्रश्मिग्राहकोत्सचकाधिष्ठिताथ महानायो हेमन्तग्रीष्मतार्यासु महानदीपु प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥ क्षुद्रकाः क्षुद्रिकासु वर्यास्राविणीषु ॥ १७ ॥ शासक ( नाय चलाने पारों में सब से बडा अधिकारी, जिसकी भाज्ञा के अनुसार नाव चलाई जा). नियामक (नाप चलाने वारा, दानमाहक (दांती रस्मी तथा लादी भादि काटने के लिये आवश्यकतानुसार कोई साधन हाथ में लेने याला; नायों में इसकी भी काफी ज़रूरत पड़ती रहती है) रश्मिनाहक (रस्मी या पतवार भादि पकडने याए), और उत्सेचक (भीतर भरे पानी को बाहर उलीचने याला ), इम पांच कर्मचा. रियोस युक्त यड़ी २ नावों को ही, गरमी और परदी में एकरूप से पहने पाली गहरी और पहुत बड़ी २ सिन्धु भादि नदियों में प्रयुक्त किया जाये। भधार घड़ी नदियों में यही नागों के चलने की है। आशा दी जाये ॥ १६॥ केवल बरसात मे पहने वाली ( अर्थान् परसाती) डोटी २ नदियों के लिये डोटी मावों का पृथर प्रबन्ध किया जाये ॥ १७ ॥ बद्धतीर्थाश्चैताः कार्या राजद्विष्टकारिणां तरणभयात् ॥१८॥ अकाले ऽतीर्थे च तरतः पूर्वः साहमदण्डः ॥ १९ ॥ काले तीर्थे चानिसृष्टतारिणः पादोनसप्तविंशतिपणः तरात्ययः ॥ २० ॥ इन नावों के बन्दरगाही की बहुत सावधानता से निगरानी रयसी जाये । तात्पर्य यह है कि प्रथम तो हा एक नावक ठहरने के स्थान (स्टेशन) मियत होये, और दूसरे जब नाव यहां ठहरे तर उनपर पूरा ध्यान रकरा जाये जिसमे कि कोई भी राजा के साध द्वेष करने वाला, अ५वा शत्रु के भेजे हुए तीक्ष्ण और रसद भादि पुरप, नावा स इधर उधर पार न आ जा सकें ॥ १८ ॥ इसीलिये यदि कोई नाव वाला असमय ( नाय के आने जाने के नियस समयके अतिरिक्त समयम) या पिना ही घाट ( बन्दरगाह) के नदी भादि को पार कर रहा हो, तो उसे प्रथम साहस व दिया जाये ॥१॥ भार ठीक समय में तथा घाट पर भी, मिना भाज्ञा के नाम को पार लगाने याले पक्ति को पाने सत्ताईम २६, पण दण्ड दिया जाये ॥ २० ॥ कैवर्तकाष्ठवणभारपुष्पफलवाटपण्डगोपालकानामनत्ययः स. म्भाव्यतानुपातिनां च सेनाभाण्डप्रचारप्रयोगाणां च ॥ २१ ॥ खतरणैस्तरतास् ॥ २२ ॥ बीजभक्तद्रव्योपस्करांशानुपग्रामाणां तारयताम् ।। २३ ॥
[२ अधिक (२८) कौटलीय अर्थशास्त्र धीघर (मरी आदि मारने वाले), लकडहारे, घसियारे, माली, जडे, खेतों की रखवाली करन वाले, ग्वाल, चोर भादिकी शका से किसीके पीछे जाने वाले ( सम्भाव्यानुपातिना ), राजदूत के पीछे शेष कार्य को पूरा करने के लिये जाने वाले ( दूतानुपातिना ), सेना, सैनिकसामग्री, तथा गुप्तचर पुरपॉको, असमय में या विना घाट के ही नदी पार करनपर भी कोई दण्ड न दिया जावे ॥२१॥ इसीप्रकार जो अपनी ही नावा से नदी आदि पार करें, उनसे भी किसी तरहका दण्ड न लिया जाय ॥ २२ ॥ तथा जलमय प्रदेशों में बसे हुए गावों के, योज (घोने के लिये धान आदि के बीज ), मक्त ( कर्मचारी पुरुषों के खाने के लिये भक्ष्य दम्य ), अन्य दृष्य ( फूल, फल शाक आदि), और उपस्कर ( मसाला भादि ), इत्यादि पदार्थों को पार ले जाने वाले पुरषों को भी किसी प्रकारका दण्ड भ दिया जाय । अर्थात् ऐसे गायों में इन उपर्युक्त पदार्थोंको असमय तथा विना घाटके भी लेजाया जासकता है॥२३॥ ब्राह्मणप्रयजितपालवृद्धव्याधितशासनहरगर्भिण्यो नामध्य- क्षमुद्राभिस्तरेयुः ॥ २४ ॥ कृतप्रवेशाः पारविपयिकाः सार्थ- माणाः प्रनिशेयुः ॥२५॥ ब्राह्मण, सन्यासी, यारक, वृद्ध, बीमार, शासनहर ( राजाका एलची, रामाकी भाज्ञाको दूसरी जगह ले जाने वाला), तथा गर्भवती स्त्री, इनको नावस्यक्षकी मुहर देखकर ही पार कर दिया जावे । अर्थात् नी भादि पार करनेका भादा इनस न लिया जाय ॥ २४ ॥ परदेश से आनेवाले जिन लोगों ने, देशमें मानेकी अनुमति प्राप्त करती है, अथवा जो अनुमति प्राप्त कियेहुए ग्यापारी पुरपोंके सार, वे ही रोग देशमें प्रवेश कर सकते हैं ॥२५॥ परस्य भायां कन्यां वित्तं वापहरन्तं शङ्कितमाविनमुद्भाण्डी- कृतं महाभाण्डेन मूर्तीि भारेणावच्छादयन्तं सद्योगृहीतलिदिनम- लिगिनं या प्रगजितमलक्ष्यच्याधितं भययिकारिणं गूढसारभाण्ड- शासनशस्त्रानियोग विपहस्तं दीर्घपथिरुममुद्रं चौपग्राहयेत् ॥२६॥ किसीकी रखी, कन्या तथा धनका अपहरण करने वाले पुरुषको, भागे कहे हुए शहन आदि चि हाँसे पहिचानकर गिरफ्तार करलिया जाये, वे चिन्ह इस प्रकार है -शक्षित अर्थात् उस भादमीका चौकशा सा होना, अपराय- हुआ होना, शक्तिये यहुत अधिक बोजा उठाये हुए होना, मिरपर पहुत फलेहुए पुराल पा घाम आदिक योझसे मुह भादिको एकाए होमा, अन्य " A हैं
२८ अध्या०]
अध्यक्ष-प्रचार
(२८९)
संन्यासीका वेश बनालेना, या तत्काल ही संन्यासी वेशको छोड़कर सादा वेश
करलेना, बीमारोंके चिन्ह मालूम न होनेपर भी बीमार होने का बहाना करना,
भयके कारण मुख भादिका विकृत होना, बहुमूल्य रस आदि घाँका बहुत
छिपाना, किसी गुप्त लेख आदिका रखना, छिपे तौरपर हथियार रखना,
छिपे तौरपर ही अनियोग (औपनिषदिक प्रकरण में बताया हुआ ऐसा प्रयोग,
जिसका कि कोई प्रतीकार नहीं किया जासकता) आदिका रखना, हाय में
महरका रखना, बहुत दूरका सफ़र करना तथा अन्तपाल से पास लिये बिना
ही सफर करना, इत्यादि चिन्होंसे अनुमान करके, स्नी भादिके अपहरण
करने वाले पुरुषको गिरफ्तार करलिया जावे ॥ २६ ।।
क्षुद्रपशुर्मनुष्यश्च समारो मापकं दद्यात् ॥ २७ ॥ शिरा-
भारः कायभासे गावं च डी ॥ २८॥ उग्दमहियं चतुरः
॥ २९ ॥ पश्च लघुयानम् ॥ ३० ॥ पड़ गोलिङ्गम् ॥ ३१ ।।
सप्त शकटम् ॥ ३२ ।। पण्यभारः पादम् ॥ ३३ ।।
भय नदी आदि पार करनेका कितना भाड़ा होना चाहिये, यह
बताया जाता है:-भेड़ बकरी आदि छोटे जानवर और मनुष्यका जिसके
पास केवल हाथमें उठान योग्य बोझा हो, एक मापक भाड़ा दिया जाये
॥ २७ ॥ सिरस तथा पाठ आदिसे उठाने योग्य घोझ से युक्त पुरुषका, भार
गाय घोड़ा आदि पशुओका दो मायक भाडा दिया जाये॥२८॥ ऊंट और सका
चार मापक ॥२५॥ छोटीसी गारी आदिका पांच मापक ॥३०॥ मध्यम दरजेकी
गादीका छः मापक ॥३१॥ यही बैलगाडीका सात मापक ॥ ३२ ॥ पीस
तुला पोशका पण भाडा दिया जाये ॥ ३३ ॥
[२ अधिक (२६२) कौटलीय अर्थशास्त्र जरद्धेनुगर्भिणीप्रष्ठौहीवत्सतरीणां समविभागं रूपशतमेकः पालयेत् ॥ ४॥ घृतस्याष्टौ वारकान्पणिकं पुच्छमकचर्म च चार्षिकं दद्यादिति करप्रतिकरः ॥ ५॥ बूढी, दूध देने वाली, ग्याभन, पठोरी, वसतरी (जिसने अमी २ दूध चोखना छोड़ा है), इन पांच प्रकारकी गायोंको परावर २ मिलाकर पूरा सौ करदिया जावे, अर्थात् हर तरहकी बोस २ गायोंको इकट्ठा करदिया जाये, और उनका पालन किसी एक व्यक्तिसे कराया जावे । तात्पर्य यह है, कि इस प्रकार सौ सौ गायोंका, एक २ भादमीको एक प्रकारसे ठेका देदिया जाये ॥४॥ भीर इसके बदलेमें वह आदमी, गौओंके मालिकको प्रतिवर्ष आठ वारक घी, ( (घी के तोलनेमें चौरासी कुटुबका एक वारक होता है। देखो भधि. २, अध्या. १९, सूत्र ५७), प्रत्येक पशुके लिये एक एक पण ( 'पणिक पुच्उम्' इसका तात्पर्य यही है, कि एक पलके पीछे एक पण वार्षिक; भात एक पशुका एक पण वार्षिक; इसप्रकार सौ गायोंके सौ पण वार्षिक होगये ), और राजकीय मुद्रासे मुद्रित मरे हुए पशुका एक अदद चमहा देवे । अर्थात् माठ वारक घी, सौ पण और एक चमदा मालिकको देवे । शेर सब आमदनी उसकी अपनी समझी जाये । गौओंकी रक्षाके इस उपायको 'करप्रतिकर' कहते है ॥ ५॥ व्याधितान्यङ्गानन्यदोहीदुर्दोहापुत्रमीनां च समविगागं रूपशतं पालयन्तस्तजातिकं भागं दगुरिति भमोत्सृष्टकम् ॥ ६ ॥ बीमार, मनविकल (कानी, घूची, लगली भादि), अनन्यदोही (अन्य किसीसे न दुही जाने धाली, अर्थात् जिनको एकद्दी आदमी दुइ सके), दुदाहा (जो पैर आदि बांधकर मुश्किलसे दुही जावे ), और पुरानी (जिनका पछड़ा आदि मर जावे, या जो तूप) इन पांच प्रकारकी गायोंको भी पहिलेकी सरह राबर र मिलाकर पूरा सौ करदिया आवे, और उनको भी उसी प्रकार किसी यक्तिको पालने के लिये देदिया जावे, उनको पालने पाले पुरुष पहिलेकी तरह हो, उन गायों की हैसियत के अनुसार पूर्वोकधी आदिका आधा हिस्सा अथवा निहाई हिस्सा जितना भी उचित हो, उतना ही राजकीय अंश अपने पक्ष को देव । गाय आदिकी रक्षाके इस उपायका नाम ' भन्नारसटक' है॥६॥ परचक्राटवीभयादनुप्रविष्टानां पशूनां पालनधर्मेण दशभागं दद्युरिति भागानुप्रविष्टकम् ॥७॥ शत्रुओंके एए करनेके तथा माटयिकों (घमघरी अली पुरुषों) के अपहरण राने गयमे, जो गोपाला अपनी गायोंको सरकारी पाने पिर २९ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (२९३) करदे, उन प्रविष्ट हुई २ गायोके पालनेके अनुसार ही वे गोपालक दसवा हि. स्मा राजाको देयें तारपर्य यह है, कि जय किसी बाहरी इरसे गोपालक अपनी गायाँको सरकारी चरागाहम ही रक्खें, तो वे उन गायोकी आमदनीका दसवा हिस्सा राजाको अवश्य देव । गाय भादिकी रक्षाके इस उपायको ‘भागानुप विष्टक' कहते हैं ॥७॥ वत्सा वत्सतरा दम्या बहिनो वृपा उक्षाणश्च पुड्गया, युग- वाहन शकटवहा वृपभाः सूना महिपाः पृष्टस्कन्धवाहिनश्च महिपाः वत्सिका वत्सतरी प्रष्ठाही गर्भिणी धेनुवाप्रजाता वन्ध्याश्च गावो महिप्यश्थ, मामद्विमासजातास्तासामुपजा वत्मा यत्सिकाच, माम- द्विमासजातानवैयेत् ॥ ८ ॥ मासद्विमासपर्युपित्तमदयेत् ॥ ९ ॥ अझं चिह्र वर्ण शृङ्गान्तरं च लक्षणमेवमुपजा निबन्धयेदिति व्रजपर्यग्रम् ॥ १० ॥ बछा (छोटा बछडा-द्ध चाखने वाला), वरसतर (बडा बछडा जिसने दूध 'चूखना छोड दिया हो), दम्प (खलग-जो पि भादिमें काम सीखने योग्य हो), बोझ दाने पाले साड ( ग्रिजार ), और हल आदि चलाने के काममें पके हुए ये छ प्रकार के पुत्र (अर्थात् पुरुष रूप गाय-बैल) होते हैं। जुभा, हम तथा गाढी आदिमे चलाने वाले, साइ (जो भंसा दाग लगा. कर अच्छी नसल बनाने के लिये छोड दिय जाते हैं, बैलों की तरह उन भैसामो- को भी साद या भैंसा साड कहा जाता है), केवल मासके लिये उपयोग में आने वाले (सूना महिपा ), भार अपनी पीठ तथा कन्धेपर बोझ ढोने वाले, के चार प्रकारके भैसे होते है । बडी ( छोटी बच्चीदूध चूखने वाली), परस- तरी (बडी यटी जिसने दुध चूखना अभी छोटा हो), पठोरी ( जो ग्यामन होनेकी अभिलापा करती हो), ग्याभन, दूध देने वाली, अधेड उमरकी (अ. मजाताअभी तक जिन गायोंकी प्रजनन शक्ति नष्ट न हुई हो, ऐसी), और पास, ये सात प्रकारकी गायें और भसे होती है। उनके दो महीने या एक महीने के लगभग पदा हुए ३ वरस और वरिसकाभी (बरमा, बछडी या करा, कटियाग) को उपजा' ( अर्थात् लपारा) कहते ह। महीन या दो महीने के पारोको ही, तपे हुए लोहे आदिके छलेमे दाग दिया जाये ॥८॥ तथा जो गाय भादि सरकारी चरागाहमे महीना दो महीना तक रहें (जिनका कयन पिउले सातवें सूर्य में किया गया है) शहे उनके मालिकोंका पता छगे या न लो, उनको भी गोध्यक्ष गवा देवे ॥९॥धाम विक स्वस्तिक क्षादिका चिन्ह (२९६) कोटलीय अर्थशास्त्र 2-२ अधि० सावधानतापूर्वक जलजन्तु भादिस रक्षा करें ॥२॥ लोपालोको चाहिये, कि वे सोर, पान, सांप भार नाफू आदिसे पकड़े हुए पशुकी, तथा बीमारी और इंदापेके कारण मरेहुए पशुकी तरकाल ही गोरक्षको सूचना दे देवें । अन्यथा मट हुए २ प्रत्येक पशुकी पूरी कीमत देवें ॥२२॥ कारणमृतस्याङ्कर्म गोमहिपस कर्णलक्षणमजाविकानां पुच्छमकचर्म चाश्वखरोष्ट्राणां वालचर्मवस्तिपित्तनायुदन्तखुरशृ. गास्थीनि चाहरेयुः ॥ २३ ॥ वस्तुतः पशु मरगया है, इस पातका विश्वास दिलाने के लिये गोपाल, गोध्यक्षके पास लाकर गाय और भैसका पहिले दागा हुभा चमना दिखायें; इसी प्रकार बकरी और भेड़ों के चिन्हित कान लाकर दिखाय, घोड़ा गधा भार ऊंटोंकी पूंछ तथा दागा हुआ चमड़ा दिखावें । मरेहुए पशुके दाल चमड़ा, घस्ति (मूत्राशय ), पित्ता, सायु (आंत ), दांत खुर, सींग और हड़ी, हम सब चीजोंका संग्रह करलें । (इनका संग्रह कुप्यागारके लिये होता है, यहाँपर संगृहीत हुई २ ये चीजें यथावसर फिर काम भाती रहती हैं ॥२३॥ मांसमा शुल्कं वा विक्रीणीयुः ।। २४ ॥ उदश्विच्छवराहे- भ्यो दद्युः ॥ २५ ॥ कूर्षिक सेनाभक्तार्थमाहरेयुः ॥ २६ ॥ किलाटो घाणपिण्याकक्लेदार्थः ।। २७ ।। पशुविक्रेता पादिकं रूपं । दद्यात् ।। २८॥ गीले अथवा सूखे कच्चे मांसको बेचदेचें ॥ २४ ॥ मठे (छाछ) को कुत्ते और सूझरोंके लिये देदिया जावे ॥ २५ ॥ कांजी ( दूध या दहीको विकृत करके बनाई हुई एक विशेष खाद्य वस्तु) को सेनामें खानेके लिये लेभायें ॥ २६ ॥ किलाट अर्थात् फटेहुए दूधको, गाय भैसोंकी साना ( गुताया) को गीला करनेके काममें लायाजावे.॥ २७ ॥ पशुओंको बेचने वाला व्यापारी प्रत्येक पशुके पीछे पग अध्यक्षको देवे ॥२८॥ वर्षाशरद्धेमन्तानुभयतः कालं दुयुः ॥२९॥ शिशिरवसन्त- ग्रीष्मानेककालम् ॥ ३० ॥ द्वितीयकालदोग्धुरङ्गुष्ठच्छेदो दैण्ड पा ( सावन, भाशे ), शरन् (धार, कातिक ), और हेमन्त ( अगहन, पोप) में गाय भौर भैसों को, सायं प्रातः दोनी समय दुराजावे ॥ २९॥ तथा शिशिर ( माघ, फागुन ), वमन्त (चेत, वैशाख ), (२९७), . २९ अध्या अध्यक्ष प्रचार भौर प्रोम (जेट असाट ) स्तुमें केवर एक समय ही (राग्रिमे हो) दुपा, जावे ॥ ३० ॥ इन संतुीमें जो पुरुष गाय आदिको दोनों समय दुहे उसका भगूठा काट दिया जावे, यही उसका दाद है । ( किसी २ प्राचीन ग्याख्याकार ने लिखा है कि यह एक समयका दुहना किपी विशेष देशके लिये ही समाना चाहिये, क्योंकि अनेक देशों में, मीम तुम भी दो २ तीन • पार गायाका दुहागाना देखा जाता है ) ॥ ३१ ॥ दोहकालमतिकामतस्तत्फलहानं दण्डः ॥ ३२ ॥ एतेन नस्सदम्ययुगपिङ्गननर्तनकाला व्याख्याताः ॥ ३३ ॥ जो पुरप गाय आदिके दुहने के समयका अनिक्रमण करे, अर्थात् ठीक समयपर आकर उन्द म डुडे, ता उसे उम दिनका वेतन न दिया जावे ॥३२॥ इसी तरह बलाके माध डालनेवाल मा पुरए टीर समयपर आकर नाथन दाल, नये थैलोंको सिखानवाले उन्हें ठीक समयपर आकर न सिखावे, नये और पुराने बैलोको एक साथ जुए आदिमें जोड़नेवाले ठीक समयपर आकर उन्द न जोडे, भौर उन्हें एकसाथ मिलाकर चलाना सिखानेवाले, ठीक समयपर भाकर चलाना न मिखावे, तो उन्ह भी उस दिनका वेतन दिया जावे ॥३३॥ क्षीरद्रोणे गनां घृतप्रस्थः ॥ ३४ ।। पञ्चभागाधिको महिपी णाम् ॥ ३५ ॥ द्विभागाधिको ऽजापीनाम् ॥ ३६ ॥ मन्थो वा सर्वेषां प्रमाणम् ।। ३७ ।। भूमितृणोदकविशेपाद्धि क्षीरघृतवृद्धि भवति ।। ३८॥ एक द्रोण परिमाण गायके दूध स, एक प्रस्थ घी निकलता है ॥३४॥ भैसके दृधर्म से, इससे पाचवा हिस्सा अधिक निकलता है ॥ ३५ ॥ एकरी और भेदके एक दोण परिमाण दूधमे से पांच के दो हिस्से अधिक एक मस्थ घी निकलता है ॥ ३६॥ वस्तुत दहीको मथकर घी निकालने परही घोके ठीक परिमाणका निधय होता है । इसलिये कार यताया हुभा परिमाण मायिकही समझना चाहिये ॥ ३७॥ पयोकि विशेष भूमियोंमें, गाय आदिको खास तरहकी घास या पानी खिलाने पिलानेस दूध और घीकी घृद्धि हाजासी है, अथवा दूध घोकी वृद्धि होजाती है । ( पाहल सूवमें गाध्यक्ष के लिये आठ यातोंको बताया गया है, जिनपर वह भपक्षता करे । उनमें से मारपी यात "क्षीरपृतसञ्जात" है । वतनोपमाहिक आदिकी ताह, नाम लेकर इसका पहिले किन्हीं सुधाम भी मिरूप नही किया गया। हमारे विचारम चौतीस मासे लगाकर यहां तक का कुछ दूध और घी (२ अधिक १६६८) कौटलीय अर्थशास्त्र सन्धमें कहा गया है, वह इसोका निरूाग समझना चाहिये , अयात् उपयुक्त परिमाणों के अनुसार दूर घोको उत्पन्न करके अपने अधीन करना , इसीका नाम "क्षीरघासजत" समझना चाहिये । शब्दास भी यही भाव प्रतीत होता है) ॥३८॥ यूथपं वृषणावपातयतः पूः साहसदण्डः ॥ ३९ ॥ घात.. यत उत्तमः ॥ ४० ॥ वर्णावरोधेन दशतीरक्षा ॥ ४१ ।। गाय आदि पशुओंके झुण्ड में रहनेवाले सांडको जो पुरुष किसी दूसरे सांड के साथ लहावे, तो उस पुरुषको प्रथमसाहस दण्ड दिया जाये ॥३॥ जो उस सांडको मारे, उसे उसमसाहस दण्ड देना चाहिये ॥४०॥ वर्णके अनुसार दम २ गाय आदिकी गणनासे भी सौ गायोंके झुण्डकी रक्षा की जाये । तापर्य यह है, कि एक २ वणकी दस २ गाय इवही कीजा, इसी प्रकारके दस वाँको मिलाकर सख्या पूरी करके, उनको पहि की तरह किन्हीं प्रक्तियोंको, रक्षाके लिये देदिया जावे ॥१॥ उपनिवेशदिग्मिभागे गोप्रचारान्यलान्वयता वा गा रक्षा• सामर्थ्याच ॥४२॥ अजादीनां पाण्मापिकीमा ग्राहयेत् ॥४३॥ तनाश्वसर्राष्ट्रपराहव्रजा व्याख्याताः ॥ ४४ ॥ गाय आदिके जगलों में रहने भार पाने के लिये नियमित स्थानोंकी व्यवस्था, उनके चाने के सुभौते, उनके गोलकी तादाद और उनकी रक्ष के सौकरर्य को देखकरही होनी चाहिये ॥ ४२ ॥ परी और भेट आदिकी उन छ महीने के बाद उतारली जाये ॥ १३ ॥ गाय भैसाके अनुसारही घोडे, गधे, ऊँट और सूभरोंके लिये भी उचित स्थानों की परस्या कोजावे । तथा इनको पक्षा लिग भी यथासम्भव उपयुक उपापों काही भरलम्पन किया जावे neen पलीपर्दानां नसायभद्रगतिवाहिनां यरसस्वार्धभारस्तुणस्य द्विगुगं तुला घाणपिण्याकस दशाढकं कगण्डकस्य पश्चपलिक मुसलपणं तैलकुड्डयो नसं प्रस्थः पानं मांस तुला दमवाढ यद्रोणं मापाणां या पुलामः क्षीरद्रोणमर्धाढकं वा सुरायाः स्नेहप्रस्थः क्षारदशफलं शूटिवेरपलं च प्रतिपानम् ॥ ४५ ॥ अब इस पाठको निरूपण किया जाता है, कि किस तरह के छ भादिको कितना ३ खाना देना चाहिये । बिलों में से जो मधे हुए हो (अयात्र जिमकी नाक यांधकर उसमे नाथ दालदी गई हो) और जो धेय घोड़ाके --
-
२९ सध्या०]
अध्यक्ष प्रचार
(२९९)
समान रथ आदिम चलनेवाले हो, उनको आधा भार (दस तुला) रका
(अधात् राप र आदिका), साधारण घाम या भुप आदि इससे दुगना । अर्थात्
पीप तुला), सानी (दाना, चाकर या अनमे युक आदिक दम आढक, पांच
पल नमक, तलका एकुटा नाकमें औषधिरूपम, तथा पीनकलि तेल का एक
प्रस्थ, रतना सामान आहार के लिये दिग जाना चाहिये । मांपकी एक तुला
(अथात् १०० पल), एक मादक दहीका, एक द्रोण जौऑफा अथवा इसकी
जगह इतनही उड़द, इन सब चीजाको मिलाकर इसका सादा (आधा पकाकर
ही श्रीच मेहा छोडा हुभा) यनाकर दिया जाये। दूध एक द्रोण, अथवा दूधके
भभारमै आधा अढक सुरा, तेल अथवा पीका एक प्रस्थ, गुड दश पल, भीर
सोठ एक पल, इन चारों चीजोंको मिलाकर अग्निदीपन करने के लिये लोको
पिलापा जाये ॥ १५॥
पादोनमश्वतरगोखराणां द्विगुणं महिपोष्ट्राणां कर्मकरवली-
वर्दानां पायनार्थानां च ॥४६॥ धेनूनां कर्मकालतः फलतश्च
विधादानम् ॥ ४७ ।। सर्वेषां तृणोदकप्रकाम्यमिति गोमण्डलं
व्याख्यातम् ।। ४८॥
इन सब चीजों में से चौथाई हिस्सा कम करके जितनी खुराक बने,
पद खरचर तथा बड़े गधों की समझनी चाहिये । अर्थात् खच्चरों और घंटे
गों को उतनी सुराक दी जावे । और उनसे १५५ व सूत्र में यताये रेलों से)
दुगनी खुराक भैसा की अंगें की और सेतों में काम करने वाले पलों की
समझनी चाहिये । तथा दूध देने वाली गायों को भी सामे तथा पीने की दोनों
तरह की खुराक दुगनी ही देनी चाहिये ॥ ४६॥ इसके अतिरिक काम करने
पले यलो तथा दूध देने वाली गायों की खुराक के सम्बन्ध में चलों के कार्य
करने के समय और गायों के दूध आदि की अवस्था को जानकर उसके अनु.
सार दी इनकी खुराक दुगनी अथवा उससे भी अधिक समझनी चाहिये ॥७॥
सप ही पशुओं को घास तथा जल भादि इच्छानुसार (जिसमें उनकी सबंधा
तृप्ति होसके इतना) देना चाहिये । यहाँ तक गाय आदि के सम्बन्ध में
निरूपण कर दिया गया ॥ १८ ॥
पश्चर्पभं सराधानामजाचीनां दशर्पभम् ।
शत्यं गोमहिपोष्ट्राणां यूयं कुर्याच्चतुर्युपम् ।। ४९ ।।
इत्यध्यक्षरधारे द्वितीयेऽधिकरणे गोध्यक्ष एकोनशिौ अध्यायः ॥ २१ ॥
आदितः पञ्चाशः ॥५०॥
{२ अधिक बोटलीय अर्थशास्त्र लम्बा सफर करने और अधिक भार उठाने के कारण हुए घोड़ों के स्वाने के लिये, एक मस्थ चिकनाई (घो भश्या तेल) के साथ २ उत्तना ही अनुवासन ( थकावरको दूर करने के लिये अनेक औषधियोंका मिश्रणा हमके दो भद , अनुशासन, २ निरूह; जो कसले रप्त या क्षोर आदिके साथ दिया जाय, वह निरूला और जो किसी चिकनाई साथ दिया जावे, यह अनुवासन कहाता है); दिया जाये। तथा चिकनाई का एF कुसुम (प्रस्थ का चौथाई हिस्मा , नालिका में डाला जावे । हरे का आधा मर ( अयोद दस तुला ) तृण अर्थात भुस आदि उस से दुगना (भधात् बीस सुला), अधा एक जेट भर के (कौली भर फेन्यानो पाहाँको फैलाकर जितना उसमें आगराव उतना ) हरी घास या नई भादिका गहा दिया जावे ॥ २३ ॥ पादावरमेतन्मध्यमावरयोः ॥२३॥ उत्तमसमो रथ्यो पश्च मध्यमः॥ २४॥ मध्यमसमश्यावरः ॥२५॥ यह उपर बताया हुभा आहार उसम घोरे का समझना चाहिये। इस आहार में से चौथाई हिस्सा कम करके मध्यम घोड़े को; और उससकी चौथाई हिस्सा कम करके अधम घोद को बाहार दिया जावे ॥ २३ ॥ जो मध्यम घोडा रथ में जोगा जाये, और जो सांज प्रोमा हुभा हो, उनको उत्तम घोड़े के समान ही भाहार दिया जाये ॥ २५ ॥ यथा जो अधम घोप में जोते जावे, या सोड छोड़े जावें, उनमें मध्यम घोहे के समान साहार देना पाहिया (मपम घोड़े का पद माहार जो तेईसवें सूत्र में पताया गया . पादहीनं रडयानां पारशमानां च ॥ २६ ॥ अतो ऽधं किशोराणां च ॥ २७ ॥ इति विधायोगः ॥२८॥ मोदी सपा सयर और सचरियोंकीभी उपयुक्त आमि से पापाई हिस्सा कम करके माहार दिया जाये । ( ताप यह है कि उत्तमम आदि कम से घामों के जो भाइर ५, २५ एम्र में सताये गये है, यसी माम के अनुसार यो भार सशको भी मार दिये जाये ) ॥ १६ ॥ इसमें wr (अधात् जो मामा घेडियोको बताया गया है, उससे आधा आधार को दिया जाये ॥ २५ ॥ इस बार यहो सक घेदों के लिये भोजन मादक प्रकारका निरूपण किशन ॥२६॥ विधापाचकमग्राहकचिकित्सका प्रतिस्यादमाजः ॥२९॥ पोदो माहारको पकाने पाले, कोदोके धारक (मादि), भार शासकी चिकिामा शा वाले पक्यिोंको, घोड़ों के दामसे यदि ३० अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (३०५) दिया जाये । (तारपर्य यह है, कि जो मासिक व्यय कोठागारसे घोड़ों के लिये लिया जाता है, उसमें से कुछ हिम्मा इन उपर्युक्त पुरणको भी दिया जावे॥२९॥ युद्धव्याधिजराकमक्षीणाः पिण्डगोचरिकाः स्युः ॥ ३०॥ असमरप्रयाग्योः पौरजानपदानामर्थेन वृपा वडवाखायोज्याः जो घोड़े युद्ध के कारण क्षीणशक्ति होचुके हैं, तथा जो बीमारी और बुढ़ापे के कारण क्षीणसामध्यं होगये हैं, और भार आदि दोनेका काम करने में भी असमर्थ, उग घोडौंको केवल उदरपूर्ति के लिये ही माहार दिया जावे, अर्थात् उन्हें केवल इतना ही आहार दिया जाये, जिससे कि ये भुवे न भरसके ॥३०॥ जो घोहे शक्तिशाली होते हुए भी युद्ध में प्रयोग करने के योग्य न हो, उन घोडाको नगर तथा जनपद निगाली पुरपाकी घोडियामें सततके लिये सर पनाकर रक्सर जाये॥३१॥ प्रयोग्यानामुत्तमाः काम्योजकसन्धपारद्वजवनायुजाः॥३२॥ मध्यमा बाहीकपांपेयकमौवारकततलाः ॥ ३३ ॥ शेषाः प्रत्य- चराः ॥३४॥ विशेष चाल आदिको सीब हुए संग्रामयोग्य घोडों में कामोजक (का. शुल देशमें उत्पन्न हुए २ ), सन्धर (सिन्ध देशमें उत्पन हुए २), भारज+ ( मार देशमै उत्पा हुए २) तया धनायुज (भाष देशमें उसन हुए हु९) ये चार प्रकार के घोड़े सममे उत्तम होते है ॥ ३२ ॥ इसी प्रकार पाल्दीकx + औरह' यह पजायके एक अवान्तर प्रदेशका नाम है, ऐसा टी. आर. कृष्णाचार्य महाभारतमें आये हुए मुख्य नामों की सूची में लिखा है।। हमारा विचार है, :आर' देश वर्तमान काठियावाड़ होना चाहिये । * 'पनायु' यह अरयका प्राचीन नाम है; महाभारतमें इसका कई स्थानों पर उहेरा है। ४ बाहीक किस देशका नाम है ! इस सम्बन्धमें दो विचार है:- (1) टी. भार• कृष्णाचार्यने महाभारत की सूची पालडीक शब्दपर निम्न निर्दिष्ट पंक्ति लिया है। विपाशाशतबायोमयदेशस्म पूर्वमागे विद्यमानो देश, अयात् स्याम भार सतलज नदीक मध्यम केकर देश- से की और जो देश है, उसका नाम थाल्हीक है। (वर्तमान गुर- दासपुर और होशियारपुरके उत्तरीय भाग सधा कांगदेके जिको केकय देश कहते हैं।
[२ अधिक कौटलीय यर्थशास्त्र (चारहीक नामक देशम उस्पर हुए २), पापेयक (पापेयक नामक देशमें उत्पक्ष हुए २), सावारक ( सुबीर अर्थात राजपूतानामें उत्पन्न हुए २), और तैतल (तितल देशमें उत्पन्न हुए २), ये चार प्रकारके घोड़े मध्यम समझे जाते हैं ॥ ३३ ॥ इनसे अतिरिक्त सब जगहोंके घोड़े अधम समझे जाते १॥३५॥ तेषां तीक्ष्णभद्रमन्दवशेन सांनाह्यमौपवाह्यकं वा कर्म प्रयोजयेत् ॥ ३५ ॥ चतुरभं कर्माश्वस्य सांनाह्यम् ।। ३६ ।। । अप घोड़ों के कार्य और उनकी गति आदिका निरूपण किया जायगा:-- उन घोड़ों की तीक्ष्ण ( तीघ्र गति, थोडीसी चोटको भी न सहन करना ), भद्र (मध्यम गति, जितनी चोट लगे उसके ही अनुसार चलना) और मन्द (निकृष्ट गति, बहुत पीटे जानेपर भी धीरे २ ही चलना ), गतिके अनुसार ही, उनको सासाहा (युद्ध सम्बन्धी कार्यों) और श्रीपवाय ( साधारण सवारी (२) परन्तु महाभारत में लिखा है.- पञ्यानां सिन्धुपष्टानां नदीना येऽन्तराश्रिताः । ताधर्मपाधानशुचीन यादीकानपि वर्जयेत् ॥ क. प. , भ.३७, सो. १७॥ सतलज, व्यास, राधी, झेलम, चुनाव ये पांच और छठी सिन्धु, इन छ. नदियोंके बीच जो देश हैं, उन्हींका नाम चाहीक है। ये देश धर्मयाह और अशुचि होने के कारण धर्य है। इसी श्लोकको फर्ण पर्वके ही नामसे, महाभाष्य कैय्यटके व्याख्या कर नागोजी भहने 'एङ् प्राचां देशे' पाणि., अ. १, पा. 1, पू. ७, की व्याख्या करते हुए इसप्रकार लिखा है। पशानां सिन्धुपटानामन्तर ये समाधिताः। वाहीका नाम रो देशा न तन दिवसं वसेत् ॥ मागोजी भरने इस शौकीम्याण्या भी यही की है, जो हम पहिले शोकके नीचे लिख चुके है। टी. भार. कृष्णाचार्य के लेखानुसार तो धर्तमान जलन्धरका जिश ही यालहीक होसकता है। हमारे विचारमें महाभारतको ही अधिक प्रामाणिक समझना चाहिये। t'पाय' नामक देश कौनसा है, इसका टीक २ पता नहीं लगता, हमारे विधारमै यह देश घर्तमान पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त होना चाहिये, क्यो। कि इधरके घोड़े कुछ अण्डे भी समझे जाते हैं। - 5३० अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (३०७) या सेल कूदके ) कार्यो में प्रयुक्त किया जाये ॥ ३५॥ विशेषज्ञ पुरपोके द्वारा सिसलाये जानेपर, युद्धसम्बन्धी प्रत्येक कार्यको अच्छी तरह करलेना घोडेका सानाश कर्म कहाता है। तात्पर्य यह है, कि जो घोड़े युद्धकै लिये उपयोग लाये जाते है, उनको उन सब चालों की शिक्षा दीनाये, जिनकी कि युद्धम आवश्यकता होती है । इन्हीका नाम सान्नास कर्म है ॥ ३६ ॥ वल्गनो नीचर्गतो लखनो घोरणो नारोष्ट्रीपवाह्याः ॥३७॥ तत्रोपवेणुको वर्धमानको यमक आलीढप्लुतः (वृथा ? पृथ? पूर्व ) गस्त्रिकचाली च वल्गनः ।। ३८ ।। औपया अनि सवारी या सेलमें काम आने घाले घोड़ोंकी पालके पांच भेद हैं:-बल्गन, नीचैर्गत, रजन, धोरण और गाराष्ट्र ॥३७॥ इन सबका फापूर्वक निरूपण किया जाता ह गंलमण्डलाकार चूमनेको पलंगन कहते है, यह छः प्रकारका है-औपर्वणुरु (एक ही हाथके गोल घोम पमना), यधमानक (उराने ही घरैमें कई बार घूमजाना ), यमक ( पराया २ के दो घेरॉगि एक साथ ही धूमजाना ), आलोदप्लुत (एक परको समोरकर और दूसरेको फैलाकर छलांग मारनेके साथ ही साथ घूमनाना), पूर्वग (शरीरके भगल भागके आधारपर घूमजाना), और ग्रिकचाली । निक अर्थात् पृष्ठवंश और पिछली दो राँग; इनके भाधारपर पूम जाना); इस तरह यह छः प्रकार का चलान होता है ॥ ३८॥ स एव शिरःकर्णविशुद्धो नीचैर्गतः पोडशमार्गा वा ॥३९।। प्रकीर्णकः प्रकीर्णोत्तरो निषण्णः पार्थानुवृत्त ऊर्मिमार्गः शरभक्री- डितः शरमप्लुतः त्रितालो बाह्यानुवृत्तः पञ्चपाणिः सिंहायतः स्वाधूतः क्लिप्टः सिंगिता हितः पुष्पामिकीर्णश्वेति नीर्गत. मार्गाः ॥ ४० ॥ जय कि सिर और कान में किसी प्रकारका कम्पन मादि का विकार न होने पावे तो उस पलगन गति विशेषको ही 'नौचंगत' नाम से फहा जाता है। अधया नीचैर्गत नामक गति को भी निम्नलिखित सोलह भागों में विभक समझना चाहिये ॥ ३९ ॥ सौरह प्रकार ये है:-कीर्णक (सर चाल का एकमें ही संकर अधात् मिला हुआ होना), प्रकीर ( सब चाली के मिले हुए होने पर भी एक घालमा मुग्य हाना), निरम्य (पृष्ट भाग को नियष्ट करके किसी विशेष चारा का निकालना, अधात उम चाल के होनेपर पीठपर किमी प्रकार का काम भादि पिकार न हो), पाशांनुवृत्त (एफ भोर को (३०८) कोटलीय अर्थशास्त्र [२ अधिक तिरछी चाल चलना), कर्मिमार्ग (लहरों की तरह उंचा नीचा होकर चलना ), शरभमोदित (भारभ [ एक जवान हाथी ] की तरह प्रोडा करते हुए चलना), शरमप्लुत (शरभ की तरह कूदकर चलना', त्रिताल ( तीन परोसे घलना ), बाह्यानुवृत्त ( दायें पायें दोनों और को मण्डलाकार चलना), पशपाणि (तीन पैरों को पहिले एक साथ रखकर फिर एक पैर को दो वार रखकर पलना सिंहायत । सिह के समान लम्बी डग भरके घलना), स्वाधूत (एक साथ बहुत लम्बे कूदकर चलना), क्लिष्ट (बिना सवारके ही विश्वास पूर्वक चलना ) लिङ्गित ( शरीरके अगले हिस्से को शुकाकर चलना), हित (शरीरके अगले हिस्से को ऊंचा करके घलना, और पुष्पाभिकीर्ण (गमत्र के समान इधर उधर को होकर घलना ) ये सब से ला प्रकार के नीचत मार्ग अर्थात् घोड़े की नीचंगत' नामक गति कही जाती कपिप्लुतो भेकप्लुत एकप्लुत एकपादप्लुतः कोकिलसंचा. मुरस्यो वकचारी च लड़नः ॥ ४१ ॥ कूदने का नाम लधन है, यह भी स त प्रकारका होता है:-कपिप्लुन (बन्दर की तरह कूदना) भेकप्लुन (मेंडक की तरह फूदना) एणप्लुन (हरिण की तरह कूदना ), एकपादप्लुत (तान पैरों को सकोड़कर केवल एकही परके सहारे कूदना , कोकिलसंचारी ( कोयल की तरह फुदककर कूदना ), उरस्थ (सब पैरों को सकोड़कर केवल छातीके सहारे ही कूदना ). भोर पकचारी ( यगुले की तरह यीच में धीरे चलकर फिर एकसाथ अचानक कुनना ), ये सात प्रकारके साधन हैं ॥ ४५ ॥ काको वारिकाको मायूरोऽर्धमायूरो नाकुलो ऽर्थनाकुलो वा- राहो वाराहश्चेति धोरगः ।। ४२ ॥ संज्ञाप्रतिकारो नारोष्ट्र इति ॥ ४३ ॥ धीरे २ ष्टी जाने वारी, दुलकी सरपट भादि पालो का नाम धोरण इसके निम्नलिखित भाठ भेद है:-क :-काइ (फा अर्थात् यगुले की तरह चलना), वारिका (वसस या हंस आदि की तरह चलना), मायूर (मयूरको तरह पलमा ), मध-मायूर (कुछ कुछ मोर को तरह घरना), माकुल (मल अर्थात् नेवले की सरह परमा), अधनाकुल (कुछ कुछ नेवले की तरह पलना ), पारा ( राह अर्थात् एभर की तरह चलना ), और अपाराह (कु कु जर की तरह पटना ) इन आर,प्रकार की पालोको ३० अध्या०] अभ्यम-प्रचार (३०९) धारण कहते है ॥ ४२ ॥ मिसाप हुए इशारोंके अनुसार घोडे का चलना 'नाराष्ट्र' कहता है। यहां तक ओपनामा गतियों का निरूपण कर दिया गया ॥१३॥ पंण्णव द्वादशेति योजनान्यध्वा रथ्यानां, पनयोजनान्य- र्धाष्टमानि दशेति पृष्ठवाघानामश्वानामध्या ) ४४ ॥ रप आदिम जाते जाने वाले अधम मध्यम तथा उत्तम घोड़ों को यथासंख्य शनी तथा धारद योजन चलाया जाये; अधात् रथ आदि में एक यार जोतने के बाद अधिक से अधिक इमना चलाया जाये, और फिर उनको विश्राम करने का अवसर दिया जाये । (तक गणरति शास्त्री ने इस सूत्रमें , योजन उसम भार R६ योजन अपन घो के चलने के लिये मार्ग बतलाया है। परन्तु यह संगत नहीं मालूम होता क्योंकि उत्तम घोदा तीमगति होने के कारण अधिक घर सकता है। इसलिये हमारा निश किया हुआ कम ही युक्त प्रतीत होता है) । इमी प्रकार जो पीठपर भार ढोने धाले घोर हा; उनका भी इसी क्रमसे पांच साद सात औइस योजन चलने का मार्ग होना चाहिये । अर्थात् अधम घाटा पांच, मध्यम साढ़े सात भार उत्तम दस योजन चलकर पुन. विश्राम लेवे ॥ ४४ ॥ विक्रमो भद्राश्वासो भारवाह्य इति मार्गाः ॥४५॥ विक्रम वल्पितमुपकण्ठमुपजवा जयश्च धाराः ॥ ४६ ।। इन तीनो तरहके घोड़ों की गति भी तीन प्रकार की होती है,-विक्रम (मन्दगति ), भद्राश्वास ( मध्यम गति ), और भारवाह्य (तीयगति; जिस प्रकार कोई पुरुष कन्धे पर भार रसकर तेज जाता है)॥५॥ भिम २ घोगों के चलने का क्रम भी मिन्न २ ही होता है-कोई २ घोड़ा लगातार भोरे ही धीरे चलता है, कोई शौकन्ना सा होकर इधर उधर को फिरता हुआ सा चलना है, कोई २ द २ कर मार कोई पहिसे रोज नया कोई पीछे तेज चलता है। इन सब तरह की चालों का माम 'धा है। हमको धारा इसी लिये कहते हैं, कि ये घोपी के चलने के अपने २ दंग (कम-धारा=) तेपां बन्धनोपकरणं योग्याचार्याः प्रतिदिशेयुः॥४७॥ सां. ग्रामिकं रथाचालंकारं च सूताः ॥ १८ ॥ अश्वानां चिकित्सकाः शरीरहासद्धिप्रतीकारमतविभक्त चाहारम् ।। ४९ ॥ .
+
(३१२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ बाधिक
समाप्ति पर, तया घो में कोई संक्रामक रोग फैलने पर अर्थात् मरा फैलने
पर, उसको शान्त करने में तरपर हुआ २ अश्वाध्यक्ष, नीराजना नामक कर्म को
करवावे ॥ ५७ ॥
अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण में तीसवां अध्याय समाप्त ।
इकत्तीसवां अध्याय
४८मकरण
।
हरयध्यक्ष
राजकीय हाथेयोंका प्रबन्ध करने वाले प्रधान अधिकारी को
'हस्त्यध्यक्ष' कहते हैं। उस ही के कार्योंका इस प्रकरण में निरूपण
किया जायगा।
हस्त्यध्यक्षो हस्तिपनरक्षा दम्यकर्मक्षान्तानां हस्तिहस्तिनी
कलमानां शालास्थानशय्याकर्मविधायवसप्रमाणं कर्मखायोग
पन्धनोपकरणं सांग्रामिकमलंकारं चिकित्सकानीकस्थोपस्थयुक-
वर्ग चानुतिष्ठेत् ॥ १॥
हस्स्यध्यक्ष को चाहिये, कि यह हाथियों के जगल की रक्षा को सिखाये
जाने योग्य हाथी हथिनी और उनके पचों के लिये शाला (गशाला, जिसमें
हाधी भादि बांधे जाते है), स्थान ( बाहर खुले हुए में हाथी के पांधने की
जगह ), शय्या ( उनके बैठने का स्थान ), कर्म । युद्ध सम्बन्धी आदि
कार्य), विधा (पकाकर दिये जाने वाले भाहार ), और यवस ( हरे गले
रहनी घास पूस आदि, 'यवस' शब्द हरे के लिये भाता है, इसलिये जो
चीजें हरे के तौरपर हाधियोंको दी जावे, उन सब का ही या प्राण करलेना
चाहिये), इन चीजों के प्रमाण (परिमाण ) का नियंग करे। उन हाथी
भादि को हर तरह की चाल आदि ( इनका निरूपण मागे किया जाय)
सिखलाने में लगाये । उनके प्रम्बारी भकुश आदि प्रत्येक साजों और समाम
सम्बन्धी अमारी का प्रबन्ध करे। सथा हाधियों की चिरा करने वाले
पविध, उनको हरतरह की शिक्षा देने वाले और अन्य ८इल दकौरी कारन
पार कर्मचारियों का सदा निरीक्षण करता रहे ॥१॥
अभ्या०]
अध्यक्ष-प्रचार
हस्त्यायामद्विगुणोत्सेधविष्कम्भायामा हस्तिनास्थानाधिका
सप्रनीयां कुमारीसंग्रहां प्राइमुसामुदङ्मुखी या शालां निवे-
शयेत् ॥ २ ॥
हाथोकी लाई से दुगनी ऊंची, चौड़ी तथा लम्बी ( हाथीको सम्पाई
नौ हाथ मानी गई है, देखो इसी अध्याय का नौवां सूत्र; इसका दुगना
अठारह हाय की ऊंचाई आदि होनी चाहिय- ), और हथिनी के लिये उससे
छ: हाय और अधिक लम्बी, भीम् चौग्रीम हाय हम्मी (ऊंची और चौड़ी
उत्तनी ही) आगे बरोडे से युक्त, ( हाधियों के यांधने के लिये जो पेटे गाड़े
जायें, उनके ऊपर एक लकड़ी तराज के समान रखती जावे, इससे हाथी
मुख पूर्वक अधेि जा सकते है, इस का नाम 'हमारो' होता है) इस तरह
की कुमारियों का जिसमें पर्याप्त संग्रह हो, तथा पूरथ या उत्तर की ओर
दरवाजों वाली शाला ( गजशाला ) यमचाई जाघे ॥ २ ॥
हस्त्यायामचतुरश्रश्लणालानस्तम्भफलकान्तरकं मूत्रपुरी-
पोत्सर्गस्थान निवेशयेत् ॥ ३ ॥
हायोकी लम्बाई की परायर लम्बा चाकोर ( अर्थात् गोल नहीं होना
पाहिये ), सपा चिकना एफ मालागस्तम्म ( हाथी के बांधने का खूटा )
चहापर गाड़ा जाये, उसके, चारों ओर एक सस्ता सा जमीन को दकने के.
लिये लगा रहना चाहिये, (तारपणे यह ६, कि उस खूटे को एक तख्ते के
बीचमे रुगाकर फिर गाड़ा जाये, जिससे वह सत्ता जामीनपर अपर रहे, बार
सूटे की गड़ में से मही आदि उपाकर कोई उसे नीला न कर सके।
और पेशाय तथा पसाने के लिये आगे से कुछ उठा हुआ, स्थान पनाया
जावे; जिस से कि यह स्वयं पीछे की भोर को बह जाये या सरक
जावे॥३॥
स्थानसमशव्यामधपाश्या दुर्गे साहो काहाना पाहिद-
भ्यन्यालानाम् ।।४॥
उपर्युक्त स्थान के समान ही शय्या अर्थात् वैदने सोने के लिये एक
यधूतरामा बनाया जाये, जिसकी ऊंचाई साढ़े चार हाथ होनी चाहिये।
जो हाथी युद्ध तथा सवारी आदि के काम में माने वाले ही उनकी शय्या
दुर्ग के भीतर ही भगवाई जाये, और जो अभी पास झादि सीरा रहे हों,
भात भिगको फायर सादि सिलाई गा रही हो, और जो हिंसक पृति के
हो, उनका नियाप्त दुर्ग से बाहर को कराया जाये ॥ ४ ॥
[२ अधिक कोटलीय अर्थशास्त्र प्रथममप्तमारष्टमभागावहः मानकाली तदनन्तरं विधायाः पूर्वाह्न व्यायामकालः पश्चाहः प्रतिपानकालः ॥ ५॥ रात्रिमागा द्वौ स्वभकाली त्रिभागः संवेशनात्थानिकः ॥६॥ घराबर विभक्त किये हुए दिन के भाठ भागों में से पहिला और सातवां भाग हाथी के प्रानका उचित समय समझना चाहिये। ( इससे यह वात प्रकट है, कि हाथीको दिनमें दो यार सन कराया जाये ) दोनों धार मान के भनन्तर पका आहार खाने को देना चाहिये, अर्थात् दिनके दूसरे और आठवें भाग खानको दिया जावे । पूर्वाण में अर्थात् दोपहरसे पहिले समयमें ही व्यायाम (कवायद) आदि का अभ्यास कराये और मध्या होत्तर प्रतिदिन कुछ पीने के लिये दिया जाये ॥।॥ रात्रिके क हिपत सीन भागों में से दो भाग, हाथी के सोनेका समय समझना चाहिये, और शेप तीसरा भाग उठने बैठने के लिये समझा जावे ॥६॥ ग्रीष्मे ग्रहणकालः, विंशतिवर्षो ग्राह्यः ॥ ७॥ धिको मूढो मत्कुणो व्याधितो गर्मिणी धेनुका हस्तिनी चाग्राहाः ॥ ८॥ गरमी की मौसम में ही हाथियों को पकाना चाहिए । क्योंकि उस ऋतु में गरमी अधिक होने के कारण हायी क्षीणयल हो जाते है, और यही सुकरता से पकड़े जा सकते है । यास वर्ष या उससे अधिक आयु का ही हाथी पामे योग्य होता है ॥७॥ दूध पीनेवाला बच्चा (विक्क ), मूद (धिनीके समान दातीयाला, अर्थात जिसको दांत देखकर 'यह हाथी है' इस प्रकार न पहचाना जा सके, इसीलिए इसका नाम 'मूढ' है) मस्कुग (दातासे रहित, भात् जिसके दांत अभी तक न निकले हॉ), यीमार हाथी; और गर्भिणी, तथा दूध चुखानेवाली हधिनीको न पकता जावे ॥ ८ ॥ सप्तारनिरुत्सेधो नवायामो दश परिणाहः प्रमाणतश्चत्वारि- शद्वो भवत्युत्तमः ॥९॥ त्रिंशद्वर्पो मध्यमः ॥१०॥ पञ्चरि- शतिवर्षो ऽवरः ॥११॥ तयोः पादावरो विघाविधिः ॥१२॥ सात हाथ उचा, मौ हाथ एम्मा और दस हाथ मोटा परिमाणवाला नया चाळस पंकी उमरवाला हाथी सबसे उत्तम होता है॥९॥ तीस पपंकी उमरका हाथी मध्यम, (इसका एसई चौड़ाई आदि परिमाण इसी अध्याय १५ सूयमें देख),॥10॥ और पचीस वर्षको उमरका अधम समझना चाहिये । (इसका परिमाण भी पन्नहर्षे सूत्र में ऐसे)म. ध्यम भार मधमको उत्तमको अपेक्षा यथा-क्रम चौथाई हिस्सा कम माहार ३१ गध्या०] अध्यक्ष प्रचार दिया जाये भर्थात् उत्तमको जितना आहार दिया जाये, उसमेंसे चौथाई हिस्सा कम करके मध्यमको, और मध्यमके आहारमेंसे भी चौपाई हिस्सा कम करके अधम हाधीको आहार दिया जावे ॥१२॥ अरतौ तण्डुलद्रोणोऽर्धाढ के तैलस्य सपिवयः प्रस्थाः दश- पलं लवणस्य मांस पश्चाशत्पलिकं रसस्थाढ द्विगुणं या दभः पिण्ड क्लेदनार्थ क्षार दशपलिक मद्यस्य आढकं द्विगुणं या पयसः प्रतिपानं गात्रावसेकस्तलप्रस्था शिरसो ऽष्टभागः प्रादीपिकश्च यसस द्वौ भारी सपादौ शष्पस्य शुष्कस्वार्धत्तीयो भारः काडङ्करस्यानियमः ॥ १३ ॥ उत्तम हाथीका क्या आहार होना चाहिये, यह इस सूत्रम यताया Trar है:--जो हाथी अन्य साधारण हायियोंसे एक हाथही अधिक ऊँचा हो, अर्थात् रेसास हाथका ऊँचा हो (इससे अधिक नहीं । उसे एक दोण चापल, भाधा भादक वेलका, तीन प्रस्थ घीके, दस पल नमकके, पचास पल मांस, सूखे दाने भाविको भिगोने के लिये एक भाडा शोरया (मांसका पका हुआ रस), भथया उसके न होनेपर उससे दुगना दही, दस पल क्षार अर्थात् गुइ भादि, मध्यान्होत्तर पनि के लिये एक आवक म अथवा मद्यके न होनेपर उससे दुगना दूध, शरीरपर लगाने के लिये तेलका एक प्रस्थ, शिरपर लगाने के लिये एक प्रस्थका आठवां हिस्सा अर्थात् पाधा पुटुय, और इतना ही तेल रातको दिया जहानेके लिये, हरेके दो मार अर्थात् चालीस सुस्ता, हरी घास के सवा दो भार भयात् पचास तुला और सूखी घासके दाई भार अधांत साठ तुला, मुस और पत्ते आदिका कोई नियम नहीं, यह जितने भी खाये जावे, उतने ही देने चाहिये । यह सब आहार उत्तम हाधीका है ॥१३॥ सप्तारनिना तुल्यभोजनो ऽष्टारनिरत्यरालः ॥१४॥ यथा- हस्तमयशेपः पडरलिः पञ्चारनिश्च ॥ १५॥ आठ हाथ ऊँचे 'भरपराल' नामक (सात हाय ऊँचे उत्तम सोसे भी जो हाधी ऊंचा हो, उसको भत्सराल' कहा जता है, उस ) सधीको भी . सात हाय ऊँचे उत्तम दाधीकी यरायर ही आहार दिया जवे । अर्थात् इससे अधिक न दिया जाये। १४ इसप्रकार उँगाई हिमापसे जो हामी हाय ६ ऊँने हों, वे मध्यम होते हैं, उनको उपयुक्त वाम हाथोके माहारसे चीमाई हिस्सा कम करके दिया जावे। इसी प्रकार जोहायी पार ही हाय ऊँचे होते n A । कौटलीय अर्थशास्त्र [ २ अधि० है, वे अधम कहात , उसको मध्यम हाथियोंके आहारसे भी सोचाई हिस्सा कम करके दिया जाये। ( म. म. गणपति शास्त्रीने, तेरहवं सूत्रमें बतलाये हुए भाहारको, एक हाथकी ऊंचाई के हिसासे मानकर सात हाय ऊँचे हाधीके लिये उस यताये हुए आहारसे सात गुना आहार कहा है। अर्थात् तेरहवें सूत्र में जितनी तादाद माहारकी यसलाई गई है, उससे सात गुना माहार उसम हाथीको देना चाहिये । इसी प्रकार जो हाथी : हाथ ऊँचा होनेके कारण मध्यम है, उसे तेरहवे सूत्रमें बताये माहारसे 7 गुना आहार दिया जावे,और पांच हाथ के ऊँचे अधम हाथीको पांच गुना, यह व्याप्या उक्त शाखौजीने पन्द्रहवें सूनकी की ६ । परन्तु ऐसा अर्थ करनेपर बारहवें सूपके साथ इसका विरोध होता है। क्योंकि वहांपर उत्तम हाधीके आहारसे चतुर्थांश कम करके मध्यम हाधीका आहार बताया गया है, और उससे चतुर्थांश कम करके अध. मका । इसलिये शास्त्रीजीका लेख चिन्त्य मालूम होता है) ॥१५॥ क्षीरयावसिको विकः क्रीडार्थ ग्राह्यः ॥ १६ ॥ संजातलो. हिता प्रतिच्छन्ना संलिप्तपक्षा समकक्ष्याप्यतिकीर्णमांसा समवल्प. वला जातद्रोणिकति शोभाः ॥ १७॥ दूध पीने वाले छोटे यच्चेको केवल क्रीड़ा अथात् फानुकके लिये पक. इना चाहिये, ऐसी अवस्थमें उसको दूध भऔर हरी २ घास या जई भादके छोटे २ कवल (गसा ) देकर उसका पालन पोषण किया जाय ॥१६॥ हा. थियोंकी सात अवस्थओंके अनुसार उनकी सात प्रकारकी शोभा समझी जानी है। जब हाधीके शरीरमें हड्डी चमड़ा ही रहजावें, और फिर थोदा २ रुधिर उत्पत होने लगे, यह प्रथम अवस्था है इसके कारण जो शोभा हो उसको 'सातलोहिता' नामसे कहते हैं। जिस अवस्थामें कुछ २ मांस पड़ने लगे, उसके कारण होनेवाली शोभाको 'प्रतिच्छता कहतेहाँ जब मास दोनोंओर चढ़ जाता है, तब उसे. हिप्तापक्षा' कहा जाता है। जब सय अवयवॉपर परावर मांस घट जाय, तो उस भरस्थाकी शोभाको ' समकक्ष्या' कहते हैं। जब शरीरपर कहीं नीचा ओर कहीं ऊंचा मांस होजावे, तो उस अवस्थाकी शोभाका नाम 'प्पसिकीर्णमांसा' है। जब पीठको हड्डीके बराबर ३ पीठपर मांस चदजाय, तो उस अवस्थाकी शोभाको ‘समतसतला ' कहा जाता है। तथा जयद की हड्डीस इधर उधरका मांस उंचा होजावे, तो उस अवस्थाकी शोमाको 'जातिहोगका' कहते है। इस तरह ये दाथियोंकी साद प्रकारकी शोमा समझी जाती है।
३२ प्या०]
अध्यक्ष प्रवार
(३२७).
शोभावगेन व्यायाम भद्रं मन्दं च कारवेत् ।
मृगसंकीर्णलिङ्गं च कर्मस्वृतुवशेन वा ।। १८ ॥
इत्यध्यक्षपचारे द्वितीये ऽघि हत्यम्यक्ष एकत्रिंशोऽध्यायः ॥३.n
आदितो द्विपशाशः ॥ ५२ ॥
इसीके अनुसार सहायियोंको व्यायाम कराना चाहिये, अधात् उत्तम,
मध्यम और अधम हाथियोंको जद परिश्रम (कवायद) कराया जावे, तस
उनकी इन उपर्युक अवस्थाभीपर अवश्य ध्यान रखा जावे । तथा इसी प्रकार
जिन हाधियोंके अन्दर उचम मप्पम आदिके मायने चिन्ह विद्यमान हो,
उनको मो सामास और ऑपयास आदि कार्यो में, पूर्वोन मवस्याओं के अनुसार
ही परिश्रम कराया जाये। अपवा सवही हापियाँको मनुओं के अनुसारमाबाह्य
भादि कार्योम लगाया जाये ॥ १८ ॥
अध्यक्ष प्रचार द्वितीय अधिकरणमें इकत्तीसवां अध्याय समाप्त।
बत्तीसवां अध्याय।
४.प्रकरण
हस्तिप्रचार।
इस अधिकरणमें दो अपाय है, पिठले इकत्तीसवें अध्यायमें हस्प-
ध्यक्ष कार्योका निरूपण किया गया । सब इस मध्यापमहाधि-
याके भेद और उनकी गनियोंके सत्रमें विशेष निहाल किया
सायगा।
कर्मस्कन्धाः चत्वारो दम्यः सांना ऑपवाह्यो व्यालश्च
॥१॥ तत्र दम्पः पञ्चविधः ॥ २॥
कार्य भेदमे हाथी धार प्रकार होता है, दम्य (दमन करने योग्य,
अर्यात शिक्षा देने योग्य ), साबाह्य (युदके काममें भाने वाला), आस्वाहा
(सवारीका ), और व्याल (अपांत् घातक वृत्ति चारा इनसे दार
हाथी पांच प्रकारका होता है। तसर्प यह है कि दम हामीले पांच कार्य
होते हैं, उन्हीके कारण उसके पांच मंद समझ जाते हैं।
स्कन्धगतः स्तम्भगतो वारिंगतो ऽवयातगनो ययगतति
॥३॥ तसोपविचारो विकर्म ॥६॥
( ३१८) कौटलीय अर्थशास्त्र [२अधिक व भद इस प्रकार है --स्कन्धगत ( जो अपने कन्येपर किसी मनुष्यको घढासके, साश्य यह है, कि जब कोई पुरष उसके कन्येपर घले इस समय यह किसी तरहका उपद्रव न करे, यह उसका एक काम है, ऐसा करनेपर समझना चाहिये, कि यह हाथी दम्प अधात् कुछ सिखलाये जाने पोग्य है, क्योंकि वह फिर सरलतासे ही वश में किया जा सकता है), स्तम्भगत (जो हाधा खूपर वधना सहन कासके, यह दूसरा काम है, जय हाथी को यह सह्य होजाय, तब उसे दम्य समझकर आग कवायद आदि सिखानी चाहिये ), वारिंगत ( हाधिोंके पकनकी भूमि का नाम 'वारि' है, उसमें जो हाथी पहुच जाय, यह भी सरलतासे वशम हाने योग्य हो जाता है इसलिये वह भी दम्य कहाता है , अग्पातगत ( हाथियोंके पकडनेक लिये जगलों में जो घास फूप से ढकेहुए गढे बनाये जाते हैं, उनका नाम 'भवपात' है, जो हाथा उनमें पहुच जाते है, वे भी दम्प कहाते हैं, क्योंकि उनको फिर पकडकर इच्छानुसार वश किया जा सकता है , भार यूथगा (जो हथिनियोंके साथ विहार करने के व्यसनी होते हैं, वे इथिनियों के शुद्ध में भाये हुए पक जाते हैं, इसलिये उनको भी दम्य कहा गया है। इसप्रकार पांच उपायोंसे दम्प होने के कारण, दम्य हाथियोंके ही पास भेद कल्पित करलिये गये है ) ॥ ३ ॥ दम्य हाथीको परिचर्या हायीके वपके समान ही करनी चाहिये । अर्थात् जिसप्रकार हाथीके छोटे बचको दूर, हरी २ घास भोर गसे भादि देकर पालन पोषण किया जाता है, उसीमकार दम्य हा का भी पालन पोषण करना चाहिये ॥४॥ सांनाह्यः ससक्रियापथः ॥ ५॥ उपस्थानं संवर्तनं संयाम वधायधो हस्तियुद्धं नागरायण सांग्रामिकं च ॥ ६ ॥ तस्योपवि- चारः करपाकर्म ग्रेयेयकर्म यूथकर्म च ॥ ७॥ साशा हाथी के कार्य करन सात मार्ग हैं, इसीलिय सानाय हाधी के सात भेद समझे जात हैं ॥ ५॥ वे भेद इस प्रकार है-उस्थान (भागे पीछे के अवयवोंको उचा नीचा काना, तथा बमा, उका, दास और सप्ती मादिका लाघना ), सरसन ( सामाना, यहजाना, तया भिन्न २ चीजोंका सापना भादि ममि सासन्धी कार्य ), सयान ( साधा तिरा, गोमूयिकाकार अथवा गैलाकार भदि धातुयपूर्ण गतिविशप ), वधावध (सूद, रेस, तथा शरीरके भय किसी अवयवात रथ घारा या भादमी आदिका मारमा पा पकाना), इस्तियुद्ध (न्यून अधिक तथा समान शफियाले हाधिया साथ पुट करना) नागरायण (नगरक दरवाजा, दाव स या अगला आदि ३२ अध्या अध्यक्ष-प्रचार का तोड़ना ), और सांग्रामिक (प्रकट रूपमें युद्ध करना ) । सानाद हाथियों के ये सात काम धताये गये हैं, इन्हीके कारण उन हाथियों के भी सात भेद फलाना कर लिये गये हैं ॥ ६ ॥ मानाश हाधीकी शिक्षा देने के समयमें यह पान रखना चाहिये, कि रस्ता आदि बांधने, गलेमें इन्धन डालने, तथा उसके झुंडके अनुकूल कार्योक करने में उसे अत्यन्त निपुण धनादिया जाय । (प्रत्येक हाथीके सपने झुंद अर्थात् यूथका पता उनके अंगोंकी बनावट से मालूम होसकता है) ॥ ७॥ औपवाह्यो ऽष्टविधः ॥८॥आचरणः कुञ्जरौपवाह्यः घोरण आधानगतिको यष्टुयपवाह्यस्तोत्रीपत्रायः गुद्धोपचाह्यो मार्गा- युकश्चेति ॥ ९॥ औपवाद हाधी आठ प्रकार के होने हैं। (ये भेदभी उनके कार्यों के अनुसार ही कलरमा किये गये हैं)॥८॥ वे भेद हम प्रकार हैं:-भात्राण पिछले हिस्सेको इच्छानुसार ऊचा नीचा करना, इसप्रकार सब तरह के हाधियोंकी गति के अनुसार कार्य करलेना; यह भी एक प्रकारकी विशेष कवायद है), कृक्षरोपवाह र दूसरे हाथोके साथ २ गति करने धाला ), धोरण (एक ही भोरसे सब तरह के कार्य करने वाला), आधान गतिक (दो तीन तरह की चाल चलने वाला ), यष्टयुपयाहा (तादना करने पर ही काम करने वाला ), लोग्रोपवाह्य ( कांटेदार लकड़ीसे सादना किये जाने पर ही कार्य करने वाला), शुद्धोपवाहा (लकड़ी आदिके आघातके मिनाही केवल पैर भादिक इशारेसे सब कामों को करने याला ), और मार्गायुक ( शिकारके सम्बन्ध हरतरहका काम करने की शिक्षा पाया हुभा), ये आठ प्रकारके औपघाह्य हाथी कहासे 1 अगले तथा है॥९॥ तस्योपपिचारः शारदकर्म हीनकर्म नारोष्ट्रकर्म च ॥१॥ इनको शिक्षा देने के समय यह ध्यान रखना चाहिये, कि जो हापी मोटे ( आवश्यकता से अधिक मोटे हों उनको कृश बनाया जाय जो मन्दाग्नि हो उनके अभिडीपनका उपाय किया जाय; तथा जो ठीक स्वास्थ्य की अवस्थामें हो उनके स्वास्थर की रक्षा की जाय, ( यह सब ग्यारया शारदकर्म' शकी है तथा जो हाथी परिश्रम न करता हो उससे परिश्रम कराया जाय, ( होगको)। इसी प्रकार प्रत्येक हाथीको हरसरहके इशारोंकी भी शिक्षा दी जाय, (मारोवकर्म [२ अधि० (३२०) कौटलीय अर्थशास्त्र व्याल एकक्रियापथ ॥११ ॥ तस्योपविचार आयम्यै करक्ष कर्मशङ्कितो ऽवरुद्धो विषम प्रभिन्न प्रभिन्ननिनिश्चयो मदहेतुविनिश्चयश्च ॥ १२ ॥ व्याल अथात् घातक हाधीक कार्य करनका एक हा मग ह. उसका शिक्षा दनक निम्नलिखित उप य ह -उसको काई एक हा व्यक्ति बांधकर नियमम रक्ख अथवा दण्डक जार पर हा उस रक्खा जव । शिक्षाके समय भिम २ रातिस उपद्गव करनक कारण इसक निम्नलिखित भद समझने धाहिये -कमशक्कत (शक्षाक समय प्रतिकूल हा जाना ) अवरुद्ध (काय में उपयागी न हानक कारण उपक्ष किया हुआ) विषम (अपनी इच्छा नुसार काम करना) प्रभन्न (मद दाप स दुष्ट अधात् विचरित हुआ २) प्रभिन वेनिश्चय (मद तथा अहा। आदक ६ पस बचन हुभा २) और मदहतुविनिश्चय ( सदा ही मर रहनक कारण जिसक बिगइनमें मदका हतुताका पता न लग)॥१२॥ क्रियापिपनो व्याल ॥१३ ॥ शुद्ध सुनतो विपम सर्व दोपप्रदुष्टश्च ॥ १४ ॥ साधारणतया कार्य बिगाडनेवाल हायाका हा व्य ल कहत है ॥ १५ ॥ इनक निम्नलिखित विशप भद ह -शुद्ध (जा कवल मारनवाला हो यह अठारह दास युक्त होता है) सुबत ( कवल चलन में गडबड करनवाला इसमें पदह द प हाते है ) विषम (शुद्ध कर सुबत दानोंके दप से सर्वोपमदुष्ट ( पूर्वक्त ततीस द प और उनस भति रक्त अपने उनीस - स युस अथ त् जा सब तरहक द प स युक्त हा । इन सब - पोंका परि झान इस्तिगास्त्र सही हो सकत है)॥१४। तेपो बन्धनोपकरणमनीकस्थप्रमाणम् ॥ १५ ॥ आलान वेयकक्ष्यापारायणपरिक्षेपोचरादिव बन्धनम् ।। १६ ॥ हपियाका बांधन तथा म य आवश्यक सब ( उपकरण ), सामानका समह हाधियों के चतुर शिक्षकों कथनानुसार ही करना चाहिए ॥ १५॥ भालान (स्तम्भ अर्थात् हायीक बांधनका एग) अवेयक (गलमें बांधनकी जीर आति) कश्या (कासक नीचसे बांधाकी रस्सी मादि) परायण (हाथी पर घरते समय सहारा लन की रस्सी) परिशेप ( हायोंके पैम बोधगेकी अजीर अदि) धार सर (गलमधमकी दूसरी रस्सी) इत्यादि पस्तुये पम्धा कहाती है भय गदाधियों के पांधने के फामर्म आती हैं ॥१६॥ युक्त ३२ साध्या.] अध्यक्ष-प्रचार (३२१) अङ्कुशवेणुयन्त्रादिकमुपकरणम् ॥ १७ ॥ वैजयन्तीक्षुरप्र- मालास्तरणकुथादिकं भूपणम् ॥ १८ ॥ वर्मतोमरशरावापयन्त्रा- दिकः सांग्रामिकालंकारः ॥ १९ ।। अंकुश, वेणु (बांस या हंडा ), और यन्त्र (भम्वारी आदि) आदि सप उपकरण कहाते हैं ॥ १७ ॥ वैजयन्ती (हायीके ऊपर लगागेकी पताका) क्षुरप्रमाला ( नक्षत्रमाला, एक प्रकारकी विशेष माला; देखा--भधि० २, भध्याय 13, सूत्र १३), आस्तरण (नमदा, जो अपारीके नीचे दाधीकी पाठपर रखा जाता है), और कुथ (मूल ) आदि पदार्थ हाथियों के सजाने के लिए होते है ॥ १८ ॥ धर्म (करच ) नोमा (चार हाथका एक हथियार विशेष ), शराधाप ( तूगीर, तरकश जिसमें चाण बखे जाते हैं), और यन्त्र ( भिन्न २ प्रकारके हथियार आदि ) आदि, हाथियों के संग्राम सम्बन्धी अलङ्कार समर्श जाते हैं ॥१९॥ चिकित्सकानीकस्थारोहकाधोरणहस्तिपकौपचारिकविधापा- चकयारसिकपादपाशिककुटीरक्षकौपशायिकादिरीपस्थायिकवर्ग: ॥२०॥ चिकित्सक ( हाथियोंकी चिकित्सा करने वाला गमवैध), अनीकस्थ ( हाथियों का शिक्षक ), आरोहक (गत विषपक शास्त्रों को जाननेवाला- गजारोही), आधोरण (शास्त्र ज्ञानपूर्वक, गज विषयक कार्योको करने में कुशल), हस्तिपक (हार्थाकी रक्षा करनेवाला ), औपचारिक (हाथीको नहलाने धुलानेवाला), विधापाचक (हायोके आहारको पकानेवाला), यायसिक (हार्थोके लिए हरा आदि लानेवाला), पादपाशक (हाथी के पैरको बांधनेवाला अर्थात् हाधीको उसके थानपर बांधनेवाला), कुटीरक्षक गजमालाकी रक्षा करनेवाला ), और भोपशायिक (हाधीकी चायनशालाका निरीक्षण करनेवाला), आदि गज परिचारक होते हैं । अर्थात् ये ग्यारह, हाथोकी परिचर्या करनेवाले कर्मचारी होते हैं ॥२०॥ चिकित्सककुटीरक्षविधापाचकाः प्रम्यौदनं स्नेहप्रसूति क्षार- लवणयोथ द्विपलिक हरेयुः ।। २१ ॥ दशपलं मांससान्यत्र चि- कित्सकम्यः ।। २२ ॥ पथि व्याधिकर्ममदजराभितप्तानां चिकि- त्सकाः प्रतिकुर्युः ॥ २३ ॥ ..
(३२२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[२ अधिक
चिकित्सक, कुटीरक्षक, और विधापाचक, इन तीनों में से प्रत्येक,
हाधीके भाहारमें से एक प्रस्थ अस, तेल या घृत आदिकी आधी असली, गुरु
भौर नमकके दो पल ऐरे वें ॥२॥ ॥ तथा चिकित्सकोंको छोडकर याकी दोनों
(कुटीरक्षक ओर विधापाचक ), मांसके दस २ पल रेलवे ॥ २२ ॥ मार्ग
चलनेसे, व्याधिसे, कार्य करनेसे, मदके कारण, तथा युढापेके कारण जो कोई
भी कष्ट हाथियोंको होजावे, चिकित्सक बडी सावधानतापूर्वक उसका प्रती
कार करें ॥२३॥
स्थानस्याशुद्धिर्यवसस्याग्रहणं स्थले शायनमभागे घातः
परारोहणमकाले यानमभूमावतीर्थे ऽप्रतारणं तरुपण्ड इत्यत्यय-
स्थानानि ॥ २४ ॥ तमेपां भक्तवेतनादाददीत ॥ २५ ॥
हाथीके स्थानको साफ न करना, उसे खानको न देना, खाली भूमि
पर सुलाना,
चोट न पहुचाने योग्य मर्म स्थलों पर चोट पहुचाना, दूसरे
भनधिकारी पुरुषको हाथी पर चढ़ामा, नियत समयप अतिरिक्त समयमें
हाथीको घराना, दुर्गम स्थानाम घलाना, विना घाटके ही जलाशयमें उतार
देना, तथा पेढोंके झुण्डोंमें हाथीको लेजाना, ये सब, कर्मचारियोंके भत्यय
स्थान अर्थात् दण्डक स्थान होते हैं। तारपर्य यह है, कि हाथी के साथ इस
प्रकारका व्यवहार करनेमें जिन कर्मचारियों या अध्यक्षका दोप हो, उन्हें
उचित ५५ दिया जावे ॥ २४ ॥ यह दण्ट उनके भत्त और घेतनसे काट
लिया जावे ॥ २५॥
तिम्रो नीराजनाः कार्याश्चातुर्मास्यसंधिषु ।
भूतानां कृष्णसंधीज्याः सेनान्यः शुक्लसंधिषु ॥ २६ ॥
वलकी वृद्धि और विनों की शान्तिके लिय, वर्षमें तीन बार नीराजना
कर्म कराया जावे, यह धार मईनेक बाद ऋतु सधिकी तिथि में कराना
चाहिये; ( यह तिथि आषाढ कार्तिक तथा फाल्गुनकी पूर्णमासी होगी),
और कृष्ण सन्धियों में अर्थात् अमावास्या तिथियों में भूतों का बलिकर्म
कराया जाये । तथा स्कन्द की पूजा भी पूर्णमासी तिथियों में कराई
जावे ॥२६॥
दन्तमूलपरीणाहद्विगुणं प्रोज्झ्य कल्पयेत् ।
अब्दे द्वधर्धे नदीजाना पश्चान्दे पर्वतौकसाम् ॥ २७ ॥
इपध्यक्ष प्रचार द्वितीय ऽधिकरणे हस्तिसारो द्वात्रिंशापाय ॥ ३२ ॥
भादित विपाश ॥ ५ ॥
६ । ३३ अभ्या०] अध्यक्ष प्रचार (३२३), हाथी दांतकी जहमें जितनी मोटाई हो, उससे दुगना दांतका हिस्सा छोड़कर, पाकी भगले हिस्सेको कार लियाजावे । इसके काटनेका समय इस प्रकार समझना चाहिये-जो हाथी नदीचर हों, उनके दांत ढाई साल के बाद काटे जायें, और जो हाथी पर्वतों में रहने वाले हों, उनके दांत पांच साल के बाद काटे जावें ॥२७॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें बत्तीसवां अध्याय समाप्त तेतीसवां अध्याय ४९-११ प्रकरण रथाध्यक्ष पत्यध्यक्ष, तथा सेनापतिप्रचार सेनामें काम भाने वाले रयांका अध्यक्ष स्थाध्यक्ष और पैदल सेनाका प्रधान अधिकारी 'पत्यध्यक्ष' तथा सम्पूर्ण सेनाका प्रधान अधिकारी 'सेनापति' कहाता है, इनके कार्योंका इस अध्यायम यथाक्रम निरूपण किया जायगा । अश्वाध्यक्षेण रथाध्यक्षो व्याख्यातः ॥ १ ॥ स रथकर्मा- न्तान्कारयेत् ॥ २॥ अश्वाध्यक्षके समान ही रथाध्यक्षके भी नियय समझने चाहिये। सापर्य यह है कि जिस प्रकार अश्चाध्यक्ष, शालानिमाण आहार आदिका प्रबन्ध और उपकरणों का संग्रह तथा कर्मचारियों की नियुक्ति कराता है, इसी पकार पोंके सम्बन्धम रयाध्यक्ष भी करे ॥ १ ॥ इसके अतिरिक्त स्थाध्यक्ष, भये रथ बनवाने और पुराने रया को मरम्मत कराने के कार्यों को भी करवावे ॥२॥ दशपुरुपो द्वादशान्तरो रथः ॥३॥ तस्मादकान्तरावरा आपडन्तरादिति सप्तरथाः ।। ४ ।। दश पुरपकी बराबर (एक पुरुष परिमाण १२ गुलका होता है, देसो, भधि २, अध्या, २०, सू, १०, ११), ऊंचाई और बारह पुरुषको घराबर खम्बाई एकरय की होनी चाहिये । इतने परिमाणका रथ उत्तम रथ कहाता है ॥ ३ ॥ बारह पुरष अर्थात् बारह बिलायर लम्बाईमें से एक र बिलांयदकी लम्बाई कम करके कमसे कम छः बिलांयदकी लम्वाई तक के भात प्रकारके रथ होते हैं । अर्थात् सबमे या रथ बारह विलायद लम्बा, [२ अधिक (३२४) कौटलीय अर्थशास्त्र फिर एक २ कम करके, ग्यारह, दम. ना, आठ, मान तथा : पिलायद सक का एमा, ये सात प्रकारके रथ होते है, इनकी ऊचाई भी लम्बाईके अनुसार ही कम करदेनी चाहिये ॥४॥ देवरथपुष्परथसाग्रामिकपारियाणिकपरपुराभियानिकयैनधि- काश्च रथान्कारयेत् ॥५॥ भिन्न २ कार्यो में उपयोग होने के कारण, रथोंके निम्नलिखित नाम या भेद समशेने चाहिये, -देवस्थ (याग्रा तथा उरसय भादिम देवप्रतिमाओ की सवारी के लिये काम में आने वाला रथ ), पुप्यरथ ( विवाह आदि माङ्गलिक कार्योंमें उपयुक्त होने वाला), साम्रामिक (युद्धम काम भाने वाला), पारियाणिक ( साधारण यात्रा करनेक काममें आने वारा परपुरा भियानिक (शत्रुके दुर्ग आदिको तोरने के समय उपयोगमें भाने वाला), और वनयिक (घोडे आदिको चलाना सिखलानेके कामम आने वाला), आदि रथीका भी रक्षाध्यक्ष निर्माण करावे ॥५॥ इष्वस्त्रप्रहरणावरणोपकरणकल्पनाः सारथिरथिकरथ्यानां च कर्मस्वायोग विद्यात् ॥ ६ ॥ आकर्मभ्यथ भक्तवेतनं भृता--- नामभृतानां च योग्यारक्षानुष्ठानमर्थमानकर्म च ॥७॥ स्थाध्यक्षको चाहिये कि वह राण, तुणीर, धनुष मादि भत्र, तोमर गदा आदि प्रहरण, रथ आदिके उपर दालने के आचरण, और लगाम घागडोर मादि उपकरणों के पनाये जाने के सम्बन्धमें, तथा सारथि ( २५ आदिको चलाने बाला), रयिक (स्थ भादिको जानने वाला), भार रथ्य ( रथमे जोते जाने वाले घोटी ) भादिके अपने २ कार्योम नियुक्ति के सम्पन्धर्म पूरी २ जानकारी रव ॥ ६॥ और कार्य समाप्त होने तक, नियमित रूपसे कार्य करने वाले विरिपयोंके भत्ता और घेसनका; अनियमित रूपसे कार्य करने वाले, अर्थात् थोडे ही समयके लिये नियुक्त किये हुए शिल्पियोंके निर्वाह और कार्यके योग्य धन तथा सरकार आदिका मुग्यवस्थित प्रबन्ध करे ॥७॥ एतेन पत्यध्यक्षो व्याख्यातः ॥ ८॥ स मौलभृतश्रेणि- मित्रामित्राटवीचलानां सारफल्गुतां विद्यात् ॥९॥ स्थाध्यक्ष के पापारके समान ही पस्यध्यक्षका भी पार समझलेना चाहिये तथा इसके अतिरिक्त पश्यध्यक्षको चाहिये, कि वह मौल बल ( मूलस्थान अर्थ राजधानी में रोने पाली, या उसकी रक्षा करने पारी मना ) भृमबल ( मालमे अन्य पेतन भोगी सेना), श्रेणिवल ( प्रान्तम ३३ अध्या] अध्यक्ष-प्रचार (३२५) भित २ स्थानांपर रहने वाली सेना ), मिग्रवल (मित्र राजाकी सेना), अमित्रबल (अपने शत्रु राजाकी सेना ), और अटवीयल ( जंगलमें रहने वाली सेना, अथवा जंगलकी रक्षा करने वाले अधिकारियोके उपयोग में आने वाली सेना), इन छः प्रकारकी सेनाभाकी सारता तथा फाल्गुताको अच्छी तरह जाने । अर्थात् इनके सामय या असामर्ष से अच्छी तरह परिचित निम्नस्थलप्रकाशकूटसनकाकाशदिवारात्रियुद्धव्यायामं च विद्यात् ॥ १० ॥ आयोगमयोगं च कर्मसु ॥ ११ ॥ और निम्नयुन्छ (जंगल तया नाचे स्थानों में युद्ध करना), स्थलयुद्ध (मैदानमे होनेवाली लड़ाई ), प्रक रायुद्ध (आमने सामने मिढ़या होने वाली लड़ाई), कटयुद्ध ( कपट पूर्वक होने वाली लड़ाई ), खनकयुद (खाई खोदकर होनेवाली लाई ), आकाशयुद्ध (हवाई जहाजोंसे होने वाली लड़ाई), दिवायुद्ध ( दिनम होने वाली लाई), और रानियुद्ध (रातम होने वाली लड़ाई), इन आठ प्रकारक युम्छम पत्यध्यक्षको अत्यन्त निपुण होना चाहिये ।। १० ॥ देशकालके अनुसार सेनाओके कार्यो में उपयोग और अनुपयोग के सम्बन्ध में मी पत्यपक्ष को पूरी जानकारी रखनी चाहिये ॥11॥ तदेव सेनापतिः सर्वयुद्धप्रहरणविद्याविनीता हस्त्यश्वरथ- चर्यासंपुष्टश्चतुरङ्गस्य बलस्यानुष्ठानाधिष्ठान विद्यात् ।। १२ ॥ अश्वाध्यक्षमे लगाकर पस्यध्यक्ष पर्यन्त, सेनाके चार अङ्गाका जो कुछ कार्य यताया गया है, उस सब कार्यको सेनापति जाने। सेनापतिको हर तरहके युद्ध और हथियार आदिफे चलाने तथा साम्धीक्षिकी भादि शास्त्रों में पूर्ण शिक्षित होना चाहिये, हाथी घोड़े रथ आदिके चलाने में भी अत्यन्त निपुण होना चाहिये । और अपनी चतुरंग मैनाके कार्य तथा स्थानके सम्पन्ध में पूरी जानकारी रखनी चाहिये ॥ १२ ॥ स्वभूमि युद्धकालं प्रत्यनीकममिन्नभेदनं भिन्नसंधानं संहत- भेदनं भिन्नवधं दुर्गवधं यात्राकालं च पश्येत् ॥ १३ ॥ इसके अतिरिक्त सेनापतिक ये आवश्यक कार्य हैं, कि वह अपनी भूमि, युद्धका ममय, शत्रुको सैना, शत्रुके न्यूहका तोड़ना, विसरी हुई अपनी गेमा इकटटा करना, एक दूसरेपी रक्षाके लिये इकटे हुए शत्रु बलको फोडना विसरे हुए शत्रु बलका मारना, शत्रुके दुर्गको तोड़ना, और पात्रा (३२६) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ अधेि० का समय: इन पातीपर अच्छी तरह विचार करे, भार उसके अनुसार कार्य Cतर्यध्वजपताकाभिर्दाहसंज्ञाः प्रकल्पयेत् । स्थाने याने प्रहरणे सैन्यानां विनये रतः ॥ १४ ॥) इत्यध्यक्षपधारे द्वितीयेऽधिकरणे रयाध्यक्ष पायध्यक्ष: सेनापतिप्रचारश्च प्रयसिंगो sध्याय ॥३३॥ आदित चतुष्पचासः ॥५५॥ सेनाकी शिक्षाम सरपर हुभा २ सेनापति, स्थान, गमन भौर प्रहरण के सम्बन्धम, बाजे, वजा और झडियोके द्वारा अपनी सेना के लिये इशारोंकी व्यवस्था करे । तात्पर्य यह है, कि युदके समयम, सेनापति अपनी सेनाका सचालन करने के लिये इस प्रकारके सकेतोंका प्रयोग को, जिमेकि शत्रु, किती तरहभी न समझ सके । ये सकेन याजे या झडियोंके द्वारा होने चाहिये ॥१४॥7 अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरणमें तेतीसवां अध्याय समाप्त । T चौंतीसवां अध्याय ५२-५३ प्रकरण मुद्राध्यक्ष और विवीताध्यक्ष व्यावहारिक लेख आदिमें जो राजकीय चिम्द किया जाता है, उसीका नाम 'मुद्रा' है। उसका जो प्रधान राजकीय भधि- कारी हो उसको 'मुद्राध्यक्ष' कहते है। चरागाहका नाम विवीरा है, उसके प्रधान व्यवस्थापक राजकर्मचारीको शिवीताध्यक्ष' करते है। इन दो प्रकरणों में दोनों अध्यक्षोंके कार्योंका निह. पण किया जायगा। मुद्राध्यक्षो मुद्रां मापकेण दद्यात् ॥ १॥ समुद्री जनपदं प्रवेष्टुं निष्क्रमितुं या लभेत ॥२॥ गुदाध्यक्ष, एक मापक लेकर माने जानेवाले व्यक्तिको मुश देदेवे। तात्पर्य यह है, कि जो पुरुष नगरम आवें, अथवा यहाँखे बाहर जावें, उनको राजकीय मुहर लगा हुभा परवाना देनेके बदले में उनसे एक मापक लिया जावे ।। यह इसीलिये होता है कि जिससे माने जानेवाले पुरणॉपर धौर, चाशत्रुके या भादि होने की शङ्का न की जा सके। एक गापक कल सरी खजाने के लिए लिया जाता है) ॥ जिस आवमीके पास राज- ३४ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (३२७) कीय मुद्रा हो, वही जनपदम प्रवेश कर सकता है, और यही वहांसे पाहर जा सकता है॥२॥ द्वादशपणममुद्रो जानपदो दद्यात् ।। ३ ।। कूटमुद्रायां पूर्वः साहसदण्डः ।। ४ ॥ तिरोजनपदस्योत्तमः ॥५॥ राजाके अपने ही जनपदमें रहनेवाला यदि कोई पुरुष राजकीय मुद्रा न ले तो उसे बारह पण दण्ड दिया जावे ॥ ३॥ यदि कपटमदा (टैक्स से बचने के लिए यनावटी मुहर ) लेकर आना जाना चाहे, तो उस पुरुषको (यदि वह अपनेही जनपदका हो, तो)प्रथम साहस दण्ड दिया जावे॥४॥ यदि वह अन्य किसी प्रदेशका हो, तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जावे॥ ५ ॥ विवीताध्यक्षो मुद्रां पश्येत् ॥ ६ ॥ भयान्तरेषु च विवीतं स्थापयेत् ॥ ७ ॥ विवीताध्यक्षका कार्य है, कि जो पुरुष मुद्रा न लेकर या कपटमदा लेकर, ठीक मागासे न जाकर छिप २ कर जंगलोंमें होकर सफर करते हैं, ऐसे पुरपोंके समीप मुद्रा की जांच करे, अर्थात् यह देखे कि इन लोगों के पास मुद्रा है या नहीं ? यदि है तो कैसी है? ॥ ६॥ जिन स्थानों में चोर या शभु और उसके चर आदि पुरपोंके आने जाने की अधिक शंका या सम्भावना हो, ऐसे ही स्थानॉमें चरागाहकी स्थापना कीजावे ॥७॥ चोरव्यालभयान्निम्नारण्यानि शोधयेत् ॥८॥ अनुदके कूपसेतुबन्धोत्सान्स्थापयेत्पुष्पफलवाटांश्च ॥ ९॥ लुब्धकश्वग- णिनः परिव्रजेयुररण्यानि ॥ १० ॥ चोर और हिंसक जानवरों के दरसे, गहरी खाईयों और घने जंगलोंका परिशोध करावे, भर्यात् इन स्थानों में चोर या हिंसक जानवर तो नहीं रहते? इस बातकी यरायर परीक्षा करवाता रहे ॥ ९॥ जिन स्थानों में जल का अच्छा प्रबन्ध न हो, वहां पक्के कुए, पक्के सालाय तथा थोड़े समयके लिये करचे कुओका भी प्रबन्ध करे । इसीप्रकार फूल तथा फलोंके यगीचे और प्याऊ मा- दिकी भी स्थापना कीजावे; भधात् स्यानोंकी आवश्यकताके अनुसार इनका भी प्रयन्ध किया जावे। शिकारी और ग्रहेलिये जंगलों में बराबर घूमते रहें। (इनके घूमनेका मुख्य प्रयोजन, चोर तथा शत्रुओंके भाने जानेका मालम करना ही समझना चाहिये)॥10॥ तस्करामित्राभ्यागमे शहदुन्दुभिशब्दमग्राह्याः कुर्युः शैलथ- क्षविरूढा वा शीघ्रवाहना वा ॥ ११ ॥ ।
वटपमाचार पढ़ा दिया जाये॥१२॥ [२ अधिक - मीकी ओरको कोसभाके फासलेर जो कर्मचारी हो वह भी इसीप्रकार अग्नि या धुका सकन करे। और इसी सकेतके अनुसार परम्पराम, राजधानी तक हत्यायक्षमचारे द्वितीये ऽधिकरणे मुद्राध्यक्षोषिवीताध्यक्ष.चतुम्बिंशोsध्याय:॥३४॥ ट्रव्यहस्तिवनाजीवं वर्तिनी चोररक्षणम् । सातिवाचं गोरक्ष्यं व्यवहार च कारयेत् ॥ १३ ॥ आदित पञ्चपन्चाशः ॥५॥ विवीताध्यक्षका यह भी कार्य है कि घह दम्पवन और हस्तियों में जो भाजीव अधात् घास ईधन और कोयले आदि हों, उनका प्रबन्ध करे । तथा पर्सनी (दुर्गके मार्गसे यात्रा करनेका टैक्स), चोरोंसे कीहुई रक्षाका टैक्स (यात् चोरोंके उपद्रवसे, व्यापारियों की रक्षा करनेपर, उसके बदले में उनसे लिया हुभा टैक्स, ) भयकै स्थानमें होकर ग्यापारियोंके मुखपूर्वक यात्रा करया देनेका रैकप, गोरक्षाका टैक्स, तथा इन पदाधोंके क्रय विपके पधारका भी प्रबन्ध कावावे ॥१३॥ अध्यक्षप्रचार द्वितीय प्राधिकरण में चौमीसयां अध्याय सात । (३२८) कौटलीय अर्थशास्त्र चोर या शत्रुओंके भाजानेपा, अन्तपालको उनकी सूचना देने के लिप, पहाइ भयया पृत आदिपर चार या दुम्मुनिको एमपकार यज'वे, निस. से किशत्रु या चारों को उस संत का कुछ पता न गे, और अन्तसालको सब सरहको सूचना मिलजाय । अधया शीघ्रगामी घोटापर चाकर, अन्नपाल के पास जाकर ही, उन सपकी उमे सूचना अमित्राटवीसंचारं च राजो गृहकपोतमुद्रायुक्तरियेयुः, धूमा- निपरंपरया वा ॥१२॥ अपने जगलमे आये हुए शोको, रजाको सूचना देने के लिये, राजा. घरके पल कसकिदारा सरवर मिता| ताप यह है कि उन सप स्वरोको चिट्ठीपर लिखकर और उसपर राजाकी मुहर लगाकर उन्हें पालतू कपूतरों के द्वारा राजा पास भिजवा देखें । अथवा धूम और भमिकी परपरसे उस समाचारको राजातक पहुंचावें। इसका त पर्य यह है, कि जहां जाल में शत्रु आदि आये हुए ही वहा पासमें ही जो विति। ध्यक्ष आदि राजकर्मचारी हों, वे यदि रात का समय हो तो भार जना, भोर mari-Mar--- गजवा- दिनका समय हो सो धुभा करता 1 ३५ मध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (३२९) पैंतीसवां अध्याय । ५४-५५ प्रकरण | समाहीका कार्य; गृह-पति वैदेहक तथा तापसके वेशमें गुप्तचर। दुर्ग, जनपद, खाग, जंगल, मन, व्यापारी मार्ग आदि सम्पूर्ण मायस्थानामे सब तरहकी आयको इकट्ठा करने वाले प्रधान राज. कर्मचारीका नाम 'ममाहती है। उसहीके कार्योंका पहले प्रक. रण निरूपण किया जायगा। दूसरे प्रकरण में गृहपति भादिके वेशमें रहने वाले गुप्तचरोंके कार्योका निरूपण होगा। समाहर्ता चतुर्धा जनपदं विभज्य ज्येष्ठमध्यमकनिष्ठविभा- ग्रामाग्रं परिहारकमायुधीयं धान्यपशुहिरण्यकृप्यविष्टिकर- प्रतिकरमिदमेतावदिति निवन्धयेत् ॥ १॥ तत्प्रदिष्टः पश्चग्रामी दशनामी या गोपश्चिन्तयेत् ॥ २ ॥ समाहतको चाहिये, कि वह जनपदको चार भागोंमें विभक्त करके, फिर उनमें भी ज्येष्ठ मध्यम और कनिष्ठकी कल्पना करके (ज्येष्ठ कनिष्ठ वि. भाग, गोंकी मनुष्य-गणना और उपजके आधारपर होना चाहिये ग्रामीको (मार्मीकी पृथर २ मनुष्य-गगना, और सामूहिक गणना; प्रत्येक गायका पृथक् २ ररूया, और सम्पूर्ण एक वर्गका रकमा [चिन-सहित] तथा उनकी भौगोलिक परिस्थितको) 'यह इसना है' इसप्रकार अपनी पुस्तकमें लिख ले। जो गांव दान में देदिये हो, अधात जिनसे किसी प्रकार की भामदनी म हो, सन गांवोंको भएइदा लिसले । इसी प्रकार जो गव, सैनिक पुरुषोंको देखें (भधात् सेना भरती होनेके लिये प्रतिवर्ष नियत संख्यफ पुरुप देखें), सपा जो धान्य (भन्न आदि), पशु (गाय घोडा आदि), हिरण्य (सोना चांदी या उसके सिके आदि), कुष्य ( सोने चादीको छोड़कर अन्य पस), भार विष्टि (नौकर चाकर ), भादिकं रुपमें प्रतिवर्ष नियत कर दे, उनको भी एमक २ अपनी पुस्तकमें लिपलेथे ॥ १ ॥ समाहत्तोकी भाज्ञानुसार, पांघर अथवा दस गांवोंका एक २ वर्ग बनाकर 'गोप' नामक अधिकारी उनका प्रबन्ध करे । (जनपदके धार विभागों से एक २ विभागका प्रयन्ध करने पाला अधिकारी स्थामिक' कहाता है । यह 'गोप' नामक अधिकारी राई भीनीचे काम करने वाला होता है ) ॥१॥ .
(३०) कौटलीय अर्थशास्त्र [२अधिक सीमावरोधेन ग्रामाग्रं कृष्टाकृष्टस्थलकेदारारामपण्डवाटवन- वास्तुचैत्यदेवगृहसतुबन्धश्मशानसत्रप्रपापुण्यस्थानावपतिपथिसं. ख्यानेन क्षेत्राग्रं, तेन सीम्नां क्षेत्राणां च मर्यादारण्यपथिप्रमाण- संप्रदानविक्रयांनुग्रापरिहारनियन्धान्कारयेत् ॥३॥ गृधणाश्च करदाकरदसंख्यानेन ॥४॥ ग्रामोंके परिमाणको नदी पहाड आदिकी सीमाका निर्देश करके लिखे। अर्थात् नदी पहाड आदिके द्वारा उनकी सीमाका निश्चय करके फिर उनके परि- माणको किनायमें लिख इसी प्रकार सेतों के परिमाणको भी निम्नलिखित कृष्ट भादि अठारह वस्तुओंक साध लिखे, भात् खेत आदिके परिमाणका निश्चय करके, जब कितापम उसे लिखे तो साथ ही साय उससे सम्बन्ध रखने वाली कृष्ट भादि वस्तुओंका भी निर्देश करे । वे इस प्रकार है-कृष्ट (जो जमीन खेती करने क ममें भाती हो, अर्थात् जिन जमीनोम खेती होती हो, उनमें बने रोतों के साथ लिखदिया जाय कि इनमें खेती होती है), अकृष्ट (जहा खान होती हो । अपरा'कृष्ट' का अर्थ कृष्टपच्य [कठिनतासे पकने वाल] गेहू भादिक खेत, भार 'अकृष्ट' का अर्थ भकृष्टपप्प [थोडी मिहनतसे ही एक जान घाल ] धान भादिके खेत, करना चाहिये), स्थल ( इधर उधरकी भूमिसे ऊँची भूमि जो ज्वार बाजरा आदिके लिये उपयोगी हो), केदार (साठी आदि धानोंके खेत), आराम (बागीचोंके खत), प ( केले आदिके खेत), पाट (ईस आदिक खेत ), धन (ग्रामवासी पुराँके लिये लकीके जगल), वास्तु (भावादीकी जमीन), चैत्य (सकेतके वृक्ष), देवगृह (देवालय भादि का भूमि), सेनुबन्ध (जिसमें तालाब भादि हा ), श्मशान, सम (भन्न दने. का स्थान ), प्रपा (प्याऊ), पुण्यस्थान (तर्थ आद पवित्र स्थान ), विधीत (चारागाह), और रप गाड़ी तथा पैदल आने जागेके मार्ग | इसप्रकार पुस्त- कमें जिस खेत परिमाणका उल्लेख किया जाये, उसके साथही इन चीजोमस जोकर ही उसका भी निर्देश करदिया जाये । इसीके अनुसार नदी पहाड आदि सीमाओंको भौर सेतों की मर्यादा (भवधि, अर्थात् इन चारों ओर क्या पा पिम्ह है, इमश्चात) का भी पुस्ताम उल्लेख करदिया जावे, इसी प्रकार माण्य (ऐसे जगल जो प्रामवासियाके किसी काममें न आते हों), सतोम आने जाने के मार्ग, उनका अपना २ गृथक् परिमाण, सम्प्रदान (किस पुरुषने किसको अपना सत जोतने धादिके लिये दिया हुआ है), विक्रय, भनुप्रद (भाषायकता होगर किसान आदिको मण कर उसकी सहायता करना), ३५ अध्या०] अध्यक्ष-मंचार (३३१) और परिक्षार (कर आदिका छोड़ना), भादि सम्पन्धकी भी सप बातों का दल्लप करदिया जाये ॥ ३ ॥ और आबादी धोका भी, कर देने वाले तथा कर न देनेवालोंके विचारसे उल्लेख किया जाये। अर्थात् कितने धर्म का ने. पाले ('कर' का अर्थ यहाँ, मकान का किराया, और भूमिका फर दोनों प्रका. रसे काना चाहिये ) पुरुष रहते हैं, और कितने पामें करने देनेवाले ॥४॥ तेषु चताबचातुर्वर्ण्यमतावन्तः कर्षकगोरक्षकवैदेहककारकर्म- करदासाचतावच द्विपदचतुष्पदमिदं च हिरण्यविटिशुल्कदण्ड समुत्तिष्ठतीति ॥५॥ पुस्तक में इमपातका भी उल्लेरा किया जावे, कि उन घरोम इतने मण, इसने क्षत्रिय, हराने वैश्य और इसने भूत रहते है। इसीतरह मिसान, गोपालक (माले) मापारी, शिल्पी, कमकर ( मजदूर) और दास की संख्या- को भी पुस्तक में लिया जाये । पिर सम्पूर्ण मनुष्य, और पशुओक जोदको घ्या २ लिखा जाय, अर्थात सर मिलाकर इतने मनुष्य और इतने पशुहै। और इनसे इतना हिरण्य, इतने मौका पाकर, इतना टैक्स और इतना दण्ड प्राप्त हुआ है। अर्थात् इन पारी प्रकारांसे इतनी बामदनी हुई ह, यह भी पुस्तक लिस लिया जाये॥ ५॥ कुलानां च स्त्रीपुरुषाणां वालवृद्धकर्मचरित्राजीयव्ययपरि- माणं विद्यात् ॥ ६॥ ग्रामके गोप नामक अधिकारीको चाहिये, हि पद गरिधारके साथ सर. धरतने वाले सी पुरवाके परिमाणको ( अर्थात् एक परिवार में कितने पुरुष और कितनी स्त्री है, उनकी तादादको), तया मालक युद्ध (अर्थात् रस परिवारमें कितने बालक और कितन चूठे हैं), उन सय पुरुषोंके यर्ण भादिके अनुसार कार्य, उनके परित्र, उनकी भाजीविका और व्ययक सम्पन्धमें पूरी २ जानकारी रक्से । भर्थात् प्रत्येक परिवारकी उपयुक्त परिस्थितियाँखे पूर्ण परिचित है ॥६॥ एवं च जनपदचतुर्भाग स्थानिकः चिन्तयेत् ॥ ७॥ गोप- स्थानिकस्थानेषु प्रदेष्टारः कार्यकरणं बलिनग्रहं च कुर्युः ॥ ८॥ इमी प्रकार जनपदके चौथे हिस्सेका प्रबन्ध स्थानिक (इस नामका अधिकारी) करे ॥ ७ ॥ गोप और स्थानिक कार्य करने के स्थानी, मस (इस नामका कण्टक शोधनाधिकारी देखो कण्टफशोधन, चतुर्थ श्रधि- करण ) भी राय कण्टकॉके उखाड़नेका अपना कार्य करें; और गोप तपा (३३२) कौटलीय अर्थशास्त्र [२ भाषिक स्थानिकको स्वयम् ही टैक्स आदि न देने वाले पुरुषोंसे, टैक्स भादि मी वसूल करें । अथवा राष्ट्रमें जो बलवान् होकर राज्य प्रबन्ध विप्न उपस्थित करते हैं उनका दमन करे, अर्थात् उनको इस प्रकार सीधा करें, जिससे कि ये गोप और स्थानिक अधिकारियों के भी भाज्ञाकारी होजावें॥८॥ समाहर्तृप्रदिष्टाश्च गृहपतिकव्यञ्जना येषु ग्रामेषु प्रणिहिता- स्तेषां ग्रामाणां क्षेत्रगृहकुलाग्रं विद्युः ॥ ९॥ मानसंजाताम्या क्षेत्राणि भोगपरिहाराभ्यां गृहाणि वर्गकर्मभ्यां कुलानि च ।। १० । समाहर्ताकी आज्ञानुसार गृहपति (गृहस्थ ) के वेशमें रहनेवाले गुप्तचर जिन ग्रामों में नियुक्त किये जावें, उन ग्रामों के क्षेत्र (रकवा अथवा घे खेत आदि), घर और परिवारों के परिमाणको अच्छी तरह जानें ॥ ९॥ गुप्तचर पुरुष, गांवके रथे या खेत आदिकोंको उनके मान और उनकी उपजके साथ जाने अर्थात् खेतोंके सम्बन्ध में जानने की यही बात है, कि उनका ठीक परिमाण कितना है और उनमें क्या २ उपज होती है। इसी प्रकार घॉक सम्पन्ध में यह जानें, कि कौनसे घोंसे कर वसूल किया जाता है, और कौनसे घरोंपर कर छोदा हुआ है। तथा कुलोके (परिवारों के)- सम्बन्ध में जानने की यह बात है, कि वे कौन वर्ण है (पाह्मण, क्षत्रिय भादिमें से), और क्या कार्य करते हैं।.॥ तेपां जंघारमायव्ययौ च विद्युः ॥११॥ मस्थितागतानांच प्रवासावासकारणमनर्थ्यानां च स्त्रीपुरुषाणां चारप्रचारं च विद्युः ॥१२॥ उन परिवारोंके सब प्राणियों की संख्या ( सूत्रमें 'जंघा' शब्द है, जंधा शम्म चलने फिरनेवालोंका उपलक्षण है, इसलिये यहाँ पर परिवार के मनुष्य और पशु आदि सबकी हो गणना अपेक्षित है) और उनके सम्बन्धसे होनेवाले भाय-व्ययको भी जानें ॥un अपने निवास स्थानको छोड़कर दूसरी अगावसनेके लिए जानेवाले, दूसरे प्रदेश से उठकर यहां बसने के लिये आनेवाले, पहिले यहाँस उठकर भोर कहीं जाकर फिर उसी स्थानपर 'सौरकर भानेवाले पुरुषों के प्रवास ( अपने निवास स्थान को छोड़कर जाना) और भावास ( दूसरी जगह जाकर बसना ) के कारणको जानें । राजोपयोगी कान कानवाले स्यो मलेको, कुहनी आदि) पुरुषों (भार, शुभारी भादि) के प्रधाम और भावासको भी जाने । सथा यह भी जानें, कि गजके द्वारा प्रयुक्त हुए २ गुप्तचर कहां २ पर अपना कार्य कररहे हैं ॥ १३ ॥ L का
]
.
३५अध्या
अध्यक्ष-प्रचार
(३३)
एवं वैदेहकव्यञ्जनाः स्वभूमिजाना राजपण्यानां खनिसेतु-
वनकर्मान्तक्षेत्रजानां परिमाणमर्घ च विद्युः ।। १३ ।। परभूमि-
जाताना वारिस्थलपथोपयातानां सारफल्गुपण्यानां कर्मसु च
शुल्कबर्तन्यातिपाहिकगुल्मतरदेयभागभक्तपण्यागारप्रमाणं विद्युः
॥ १४ ॥
इसी प्रकार व्यापापीके घेशमें रहने वाले गुप्तचर, अपने प्रान्तम उत्पन्न
हुई राजकीय विक्रेय खनिज (खानसे उत्पन्न होने वाली), सेतुज (तालाय
आदिमें उत्पन होने वाली ) बनज (जंगलों में उत्पन्न होने वाली ), कर्मान्तन
(कारखाने आदिसे उत्पन्न होने वाली ), और क्षेप्रत (खेतोंसे उत्पन्न होने
बाली ) वस्तुओंके परिमाण और मूल्यको अच्छी तरह जाने ॥ १३ दूसरे प्रदे-
शर्मि उत्पन्न हुई २, जलमार्ग तथा स्थलमार्गसे अपने देशमें आई हुई, सार-
रूप अथवा फरारूप विक्रेय पस्तुके क्रय विक्रय यवहारमें होने वाले परिमाण
और मूल्यको जाने । तथा यह भी जानें, कि इन विदेशी वस्तु के व्यापारियोंने
शुल्क ( शुल्काध्यक्षको दिया जानेवाला टैक्सन्धुगी ), वनी ( अन्तपालको
दिया जानेयाला टैक्स), गुल्मदेय ( मार्ग रक्षक पुलिसका टैक्स), तरदेय
(नाव आदिसे पार होनेका टैक्स), भाग (साशियोंको दिया जानेवाला हिस्सा),
भक्त (व्यवहारी पुरूपके बैल आदिके भोजनका उपय), और पण्यागार (माज़ा.
रका टैक्स ) कितना २ दिया है ॥ १४ ॥
एवं समाहर्टप्रदिष्टास्तापसव्यञ्जनाः कर्पकगोरक्षकौदेहका-
नामध्यक्षाणां च शौचाशाचं विद्युः ।। १५ ।। पुराणचोरव्यञ्जना-
चान्तेवासिनचैत्य चतुप्पथशून्यपदादपाननदीनिपानतीर्थीयतना-
श्रमारण्यशैलवनगहनेषु स्तेनामित्रप्रवीरपुरुषाणां च प्रवेशनस्थान-
गमनप्रयोजनान्युपलभेरन् ॥ १६ ॥
इसी तरह समाह की भाशानुसार, तपस्वीके देशमें रहने वाले
चर, दिसाम वाले व्यापारी और अध्यक्षकी ईमानदारी या येईमानीको मौष
रपये ॥ १५ ॥ पुराने चोरोंके घेपमें रहने वाले, उन तापस वेषधारी गुप्तचोंके
शिष्य; देवालय, चौराहा, मिर्जन स्थान (शून्य स्थान ), तालाब, नदी, कुओंके
समीपके जल शय, तीर्थस्थान, मुनियाँके आश्रम, अरण्य पहाड तथा घने जंग-
लौ उहाकर चोर शत्रु तथा शत्रुसे प्रयुक्त किये हुए तीक्ष्ण और रसद आदि
पुरुपॉके, वह भाने ठहरने और जाने के कारणों का भरीतरह पता लगा॥६॥
[२ अधिक कौटलीय मर्थशास्त्र भी दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार जिस घरमें यह कार्य हो, उस घाका मा. लिक भी इस तरह के पुरुषोंकी, गोप या स्थानिकको सूचना देकर अपराधसे मुक्त होसकता है। यदि यह सूचना न देवे, तो उसे भी भपराधीक समान ही दण्ड दिया जावे ॥1॥ प्रस्थितागतौ च निवेदयेत् ॥ १२ ॥ अन्यथा रात्रिदोपं भजत ।। १३ ॥ क्षेमरात्रिपु त्रिपणं दद्यात् ॥ १४ ॥ घाके मालिकको चाहिये, कि वह घरसे जानेवाले या घाम भाने वाले पुरुषकी सूचना गोप आदिको देवे ॥ १२ ॥ सूचना न देनेपर, यदि वे छोग निमें कोई मोरी आदिका अपराध करें, तो उसका भागी गृहस्वामीको होना पडेगा, अर्थात् गृहस्वामी उसका उत्तरदाता होगा ॥३॥ यदि वे लोग चोरी आदिका कोई अपराध न करें, तो भी जाने आनेकी सूचना न देने के कारण गृहस्वामीको प्रतिरात्रि तीन पण दण्ड दिया जावे ॥१४॥ 'पथिकोत्पथिकाच पहिरन्तश्च नगरस्य देवगृहपुण्यस्थानवन. श्मशानेपु सवणमनिष्टोपकरणमुद्भाण्डीकृत मानिनमतिखममध. क्लान्तमपूर्व वा गृहीयुः ॥ १५ ॥ ग्यापारी आदिके वेपमें बरे २ मागोंपर घूमने वाले घा, तथा ग्वाले लकाहारे आदिके वेपमें रानोंको छोडकर जगलों में घूमने वाले चर, नगरके भीतर पा याहर बने हुए देवालयों, तीर्थस्थानों, जगले. या श्मशानों में यदि किसी हथियार भादिके घाव लगे हुए, निपिद (हथियार या विप आदि) वस्तुओंको पास रखने वाले, शक्तिसे अधिक भार उठाये हुए, हो या घवदारे हुए, घोर निद्राम सोये हुए, लम्बा सफर करने के कारण थके हुए, या अन्य किसी भजनबी भादमीको देखें, तो उसे पकड़ थे, भयात् पकड़कर नागरिक भादि किसी अधिकारी के मुपुर्द करदेवें॥ १५ ॥ एवमभ्यन्तरे शून्यनिशावेशनशोण्डिकोदनिकपाकमासिक धूतपापण्डावासेषु विचयं कुर्युः ॥ १६ ।। इसी प्रकार नगरके अन्दर, शुन्य स्थानमें (अधात् खाली पड़े हुए मकानों में), शिल्पशालामे (मावेशन), मयकी दूकानों, होटका, पका मांस बेचने वालों की दूकाना, जुभारियोंके स्थानों तथा पाखनियाँके रहनेके स्थानों में भी, उपयुक्त हथियारके घाव घाले पुरपा आदि का अन्वपग किया जाये। अर्थात् गुप्त पुरप उस स्थानों में इसको इंदकर नागरिक आदि के पद ३६ अध्या०] मध्यक्ष-प्रचार (३३७) अग्निप्रतीकारं च ग्रीष्मे मध्यमयोरहश्चतुर्भागयोः ॥ १७ ।। अष्टभागो ऽग्निदण्डः ।। ८]] बहिराधश्रयगं वा कुर्युः ॥१९॥ गरमी की मौसस में, दिनक बीचके चार भागोम अग्निका प्रतीकार किया जावे, अधात् अग्नि जलानेका निषेध किया जावे। (यह निषेध पूंस भादिक मनेहुए मकानोंके लिये ही समझना चाहिये ) ॥ १७ ॥ जो पुरुष इस माज्ञाका उलंघन करें; अर्थात् गरमीको मौसममें दिनके दूसरे तीसरे पहर मध्यान्हके समयमें, फंसके मकानोंके अन्दर भाग जलावें, उन्हें एक पणका भाठवां हिस्सा दण्ड दिया जाये ॥ १८ ॥ अथवा अमि सम्बन्धी कार्य को बाहर करें अर्थात् पूंस के मकानों से बाहर खुली जगह में करें ॥१९॥ पादः पञ्चघटीना, कुम्भद्रोणीनिश्रेणीपरशुखिशकचग्रह- णीदतीनां चाकरणे ॥ २० ॥ यदि कोई पुरुष निषिद्ध समय में पांच घटिका पर्यन्त भनिका कार्य करे, तो उसे चौथाई पण दण्ड दिया जाये । और उस पुरुषको भी चौधाई पण दण्ड दिया जावे, जोकि गरमीकी मौसममें अपने घरके दरवाजे के सामने, पानी- से भरे हुए घरे, पानीसे भरी हुई द्रोणी । लकनीकी पनी हुई यहुत बड़ी नांदसी), नसेनी (लकड़ी आदिकी सीढ़ी ) कुल्हाडा (आग लगनेपा रस्सी भादि काटने के लिये). सूप छाज, सामने से फैलते हुए धुएँको रोकनके लिये), अंकुश (कौंचा, लम्बे बांस आदिमें भागे लगा हुआ लोहेका हुक; यह आग लगनेपर भीतरसे सामान निकालनके काममें आता है), कचप्राणी (छप्पर. के कारकै फूपको उतारने के लिये एक विशेष साधन ), और चमकी मशकका इन्तज़ाम न रकाने । क्योंकि गरमीमें भागसे बचने के लिये इन चीजोंका संग्रह करना अत्यन्त भावश्यक है ॥ २० ॥ तृणकटच्छन्नान्यपनयेत् ॥ २१ ।। अग्निजीषिन एकस्यान् वासयेत् ॥ २२ ॥ खगृहप्रद्वारेषु गृहस्वामिनोवसेयुरसंपातिनो रात्री ॥ २३ ॥ रथ्यासु कटवजाः सहस्रं तिष्ठेयुः ॥ २४ ॥ चतुष्पथद्वारराजपरिग्रहेषु च ॥ २५ ॥ हम और घाईके मकानोंको गरमीके मौसम में रठादिया जाचे ॥१७॥ भाषिके द्वारा जीविका करने वाले लुहार बाई मादिको, नगरके एक भोर इक. हाही यसाया जा ॥ २२॥ घोंके मालिक लंग रायमें इधर उधर न जाका अपने घर के दरवाजोपर ही निवास करें ॥ २३ ॥ गलियों या बाजारों में एक . [२ अधिक -- - (२३८) कौटलीय अर्थशास्त्र । हज़ार जलके भरे हुए यहाका सदा प्रबन्ध रहे ॥ २५ ॥ और इसी प्रकार ची- राह, नगरके प्रधान द्वार, राजपरिग्रही (खजाना, कुप्यागार, कोष्टागार, पण्या- गार, गजपाला अश्यशाला आदि ) में भी जलके भरे ६५ हजार २ पदोंका प्रशन्ध काना चाहिये ॥२५॥ प्रदीप्तमनभिधावतो गृहस्वामिनो द्वादशपणो दण्डः ॥२६॥ पट्पणोऽवक्रषिणः ॥ २७ ॥ प्रमादादीप्तेषु चतुष्पश्चाशत्पणो दण्डः ॥ २८॥ प्रादीपिकोऽमिना वध्यः ॥ २९ ।। यदि घरमें लगी हुई भागको देखकरभी कोई गृहस्वामी उसका प्रबन्ध म करे, नो उसे पार पण दण्ड दिया जावे ॥ २६ ॥ और ऐसा ही करनेपर ७ पण दण्ट उसको दिया जावे, जो पुरुष भाड़ा देकर उस घरमें रहता हो ॥ २७ ॥ यदि असावधानी अपने ही घरमें भाग लग जावे, सो घरके मालि. कोंको चयन ' ५५) पण दण्ड दिया जाये। (किसी २व्याख्याकारने लिखा है "कि यह दण्ड उन मकानोंके रक्षकों को होना चाहिये) ॥ २८ ॥ मकान आदिमें भाग लगाने वाले पुरुषको, पदि वह उसी समय पकड़ा जाय तो उसे प्राण दण्ड देना चाहिये । ( कालान्तरमें पकडे जानेपर भी उसे अग्निदाह द्वारा प्राण दण्ड बनेका विधान 'कण्टकशोधन' भधिकरणमें किया जायगा (देखो:- अधि ५, अध्या".सू. २९) ॥ २९॥ पांसुन्यासे रथ्यायामष्टभागो दण्डः ॥ ३० ॥ पकोदक- संनिरोधे पादः ॥ ३१ ॥ राजमार्गे द्विगुणः ।। ३२ ॥ सहकपर, मही या कशा करकट दालनेवाले पुरुषको है (एक पणका भाठवां हिस्सा) पण दण्ड दिया जावे ॥३०॥ तथा जो पुरुष, गारा कीचर या पानांसे सहकको रोके, उसे ३ पण दश दिया जावे ॥३॥ जो पुरुष राजमार्गको इसरकार मेके, उसे इससे दुगना भयात् पहिले भपराधौ १ और दूसरे पााधमें ३पण दण्ड दियानावे ॥ ३३ ॥ पुण्यस्थानोदकस्थानदेवगृहराजपरिग्रहेषु पणोचरा विष्ठादण्डाः ॥ ३३ ॥ मूत्रेचर्घदण्डाः ॥ ३४ ।। भैपज्यव्याधिमयनिमित्तम- दण्ड्याः॥३५॥ पहिले सूत्रसे, इस सूत्र में 'राजमार्ग' पदकी अनुवृत्ति करलेनी चाहिये, इसलिये राममार्ग, पुण्यस्पान (पवित्र तीर्थ स्थान ) कल्यान (कुमओ तालाब भादि ), देवगृह ( देवालय), और राजपरिग्रह (खजाना कोठागार आदि), हम स्थानाम भी पुरुष विष्टा डाले, भात् मठका परित्याग करे, उसे उसरी- : .
३६ मध्या०] अध्यक्ष-प्रचार . . तर एक पण अधिक दण्ड देना चाहिये, तात्पर्य यह है, किराणमार्गपर भल त्याग करने वालेको एक पण, पुण्यस्थानमें त्यागने पालेको दो पण, उदकस्था.. नमें स्यागने पर तीन पण, इत्यादि रूपसे दण्ड दिया जाने ॥ ३३ ॥ ईनहीं उप.. र्युक्त स्थानों में भूत्र-रयोग करने पर, आधा दण्ड दिया जावे । भयात् राजमार्गमा मूत्र-स्यागनैपर पण, पुण्यस्थानमें त्यागनेपर एक पण, उदकस्थानमें मूत्र स्यागनेपर देढ (१) पण, देवालयमें स्वागनेपर दो पण और रामपरिग्रहमें मूग-रयास करनेपर ढाई (२६) पण दण्ड दिया जावे ॥ ३५ ॥ यदि विरेचन. की श्रीपधका सेवन करने के कारण, या अतीसार सया प्रमे आदि बीमारी के कारण, अथवा किसी विशेष भयसे, इसप्रकार उक्त स्थानों में मल-मूधका त्याग होजाये तो उस पुरुषको दण्ड न दिया जाये ॥३५॥ मार्जारश्वनकुलसर्पप्रेतानां नगरस्यान्तरुत्सर्गे त्रिपणो दण्ड: ॥ ३६ ।। खरोष्ट्राश्वतराश्वपशुप्रेतानां पद्पणः ॥ ३७॥ मनुष्य प्रेतानां पञ्चाशत्पणः ॥ ३८ ॥ बिलाव, कुत्ता, गेवला, और सांप, इनके मरजानेपर, हनको याद नग- रके समीप या नगरके बीच में ही छोड़ दिया जावं, तो छोड़ने वाले व्यक्तिको तीन पण दण्ड दिया जाये ॥ ३६ ॥ और यदि गधा, ऊँट, खच्चर तथा घड़ा भादि पशुओंके मृत शरीरों को इस तरह छोड़ दिया जावे, तो छोड़ने वाल पुरु- पको छः पण दण्ड दिया जाय ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार यदि मनुष्पके मृत शरी- रको छोड़ा जाय, तो छोड़ने वालको पचास पण दपद दिया जाये ॥ ३८ ॥ मार्गविपर्यासे शवद्वारादन्यतः शवनिर्णयने पूर्वः साहस दण्डः ॥ ३९ ॥ द्वाःस्थानां द्विशतम् ॥ ४० ॥ श्मशानादन्यत्र, न्यासे दहने च द्वादर्शपणो दण्डः ॥ ४१ ॥ मुसीके लेजाने के लिये जो मार्ग नियत हैं, उनसे मिल मागास मुझेको लेजानेपर, तथा नियत द्वारको छोड़कर, दूसरे द्वारसे नगरके बाहर मुरेको नि. कालनेपर, प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ३९ ॥ और 'द्वारके सनक पुरुषको जोकि इसमकार मुर्देको लेजानेपर न रोके, दोसो पण दण्ड दिया जाये ॥४i श्मशान के लिये नियत भूमिको छोरकर, जो पुरुष मुहाँको दूसरी जगह गई या जलायें, उन्हें बारह पण दण्ड दिया जावे ॥ ४ ॥ विपण्नालिकमुमयतोरात्रं यामतूर्यम् ॥ ४२ ॥ सूर्यशब्दे राज्ञो गृहाभ्याशे. सपादपणमक्षणताडनं प्रथमपश्चिमयामिकम् ॥४३॥ मध्यमयामिकं द्विगुणं, बहिश्चतुर्गुणम् ।। ४४॥
[२ अधिक . . . (३१०) कौटलीय अर्थशास्त्र रोधिके प्रथम भाग और भन्तिम भागकी छ: २ घटियों को छोड़कर दोनों पार राग्निमें बाजेका बहुत ऊंचा सन्द किया जाये । इसका तात्पर्य यह है, कि राग्रिको प्रथम छः घदी व्यतीत होजानेसे लगाकर अम्तिम रात्रि की जब छ। धट्टी शेष रहजायें, तो इस यीच समयमें कोई भी आदमी सड़कॉपर न आवे जावे । इस बात को सूचनाके लिये रातकी पहिली घड़ी बीतनेपर बाजेका ऊंचा शब्द किया जाय, इसी प्रकार जब छः घड़ी रात शेप रहजावे, तब भी उस बाजेके शम्दसे ही, उस समय के बीतने की सूचना देदी जावे ॥ ४२ ॥ उस राग्रि माके बाद जो भादमी, राजाक घरके पाससे गुजरता हुआ देखा जावे, रसे असमय चलनेके अपराध सवा (१३) पण दण्ट दिया आवे, परन्तु यह तना दण्ट निपिद समपकी प्रथम भार भन्तिम घडीके लिये दो समझना चाहिये । १३॥ जो पुरुष निषिद्ध समयके मध्य पहरों में ही भावे जाये, उसे इसका दुगना अधात् ढाई (२३ ) पण दण्ड दिया जावे। ये दण्ड नगरके भीतर ही निपिन समयमें चलने फिरने के है। जो पुरुष नगरके बाहर ऐसे समयमें आवे जाये उसे उक्त दण्डका चौगुना अर्थात् पांच पण दण्ड दिया जावे ॥ ४५ ॥ शङ्कनीये देशे लिङ्गं पूर्वापदाने च गृहीतमनुयुञ्जीत ॥४५॥ राजपरिग्रहोपगमने नगररक्षारोहणे च मध्यमः साहसदण्डः॥४६॥ सूतिकाचिकित्सकप्रेतपदीफ्याननागरिकतूर्यप्रेक्षाग्निनिमित्तं मुद्रा- भिवाग्राह्याः ॥४७॥ उक्त निषिद्ध समयमें जो पुरुष शनीय स्थानों (जहांपर रहनेसे उनके ऊपर घोर भादिकी शश कीजासके, घर के बागीचों भादिमें छिपे हुए, भपया ऐसे ही अन्य स्थानों) में पाये आयें या जिनके पास इसी सरहकी शाका होजानेके चिन्ह विद्यमान हों, तथा जिनकी चोरी आदिका वृत्तान्त पहिले मालूम हो चुका हो. ऐसे पुरषोंको पकड़कर उनसे पूछा जाये, कि तुम कौन हो ? कहाँपे भाये हो किसके हो ? और यहाँ मुम्हारे भामेका क्या प्रयोजन है। इत्यादि। इन बातोका उत्तर मिलने पर उसकी उचित व्यवस्था कोजावे ॥ ४५ ॥ यदि कोई इसप्रकारका मनुष्य सरकारी निवास भादिक स्थानों में प्रविष्ट होजाये, अथवा नगर रक्षाके लिये बनेहुए साल या बु भादिके ऊपर पदजाये, सो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जावे ॥१॥ यदि कोई पुरप, निषिद्ध समयमें भी सूतिका (प्रसूता सी), चिकित्सक, प्रेत (शव भादिके उठाने ), प्रदीपयान (हायमें प्रकाश लेकर जाने), नागरिव सूर्य ( नागरिक पुरुषों को सूचनाकं लिये गाजा बजाने ), पेक्षा ( रामास अनुमत ६६ अध्या०] अध्यक्ष-प्रचार (३४१) नाटक आदि देखने ), तथा अग्नि ( भाग आदिके लग जाने ) के कारण इधर उधर भाये जावे, तथा जिनके पास मन्त्री या 'नागरिक' आदिको सरकारी मुहर हो, उनको न पकड़ा जाय ॥ १७ ॥ चाररात्रिषु प्रच्छन्नविपरीतवेपाः प्रनाजिता दण्डशस्त्रहस्ताश्च मनुप्या दोपतो दण्ड्याः ॥ ४८ ॥ रक्षिणामवार्य वारयता वार्य चावारयतामक्षणद्विगुणो दण्डः ॥ ४९ ॥ जिन रानियों में प्रत्येक पुरषको, हरजगह घूमने फिरनेकी भाशा हो, पेसी महोत्सव आदि सम्बन्धी रानियों में, जो पुरुष प्रणवेपमै ( अधीत् अग आदिको टककर ), अश्या विपरीत पेपमें (खी पुरयोंके वेपमें और पुरुष खियाके षेपों), घूमते हुए देखे जाव; तथा जो मनुष्य सम्पासीके बेपमें, अथवा हाथमें दण्ड या और हथियार लियेहुए देखना; उन्हें पकाकर उनके अपराधके अनुसार उनको दण्ड दिया जावे ॥४८॥ जो नगररक्षक पुरुष, म रोकने योग्य आदमीको आने जानेसे रोक, और रोकने योग्य भादमीको न रोके, उनको असमय जाने पाले पुरुषोक दण्डसे ( देखो, इसी भध्यायका तेतालीसा सूत्र) दुगना अर्थात् दाई (२२) पण दण्ड दिया जावे ॥४१॥ नियं दासीमधिमेहयतां पूर्वः साहसदण्डः ॥५०॥ अदासी मध्यमः ॥५१॥ कृतावरोधामुत्तमः ।।५२।। कुलस्त्रियं वधः॥५३॥ जो पुरुप, दूसरेकी नी दासीके साथ बलात्कार गमन करें, उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ५० ॥ दासीसे भिन्न गणिका भादिके साथ जो बलारकार गमन करें, उनको मध्यम साहस दण्ट दिया जावे ॥ ५॥ जो किसीके द्वारा भार्या रूपसे स्वीकार कीहुई दासी या अदासी पीके साथ इस प्रकारका व्यवहार करें, उनको उत्तम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ५२ ॥ तया जो मुलीन नियों के साथ इसप्रकारका वत्तीय करें, उनको प्राणदण्ट दिया जावे ॥५३॥ चेतनाचेतनिक रात्रिदोषमशंसतो नागरिकस्स दोपानुरूपो दण्डः ॥ ५४॥ प्रमादस्थाने च ।। ५५ ॥ चैतन सम्बन्धी तथा अचेतन सम्पन्धी, रात्रिम किये अपराधकी सूचना यदि कोई नगरनियासी पुरप, अध्यक्षको म देवे, तो उसे उसके अपराधके अनुसार दण्ड दिया जावे ॥ ५५ ॥ भौर उन रक्षक पुरुषोंको भी [२ अधिक १३.०) कौटलीय अर्थशास्त्र राग्रिके प्रथम भाग और भन्तिम भागकी छ २ दिनाँको छोडकर दोनों बार रानिमें वाजेका पहुत ऊंचा शब्द किया जाये । इसका तात्पर्य यह है, किरातिको प्रथम इ. घटी व्यतीत होजानसे छगाका भन्तिम रात्रि की जव छ. घटी शेष रहजाये, तो इस बीच समयमें कोई भी भादमी सड़कोंपर न आवे जावे । इस बातकी सूचनाके लिये गतकी पहिली .. घडी बीतनपर बाजेका ऊचा शब्द किया जाव, इसी प्रकार जब छ पटी रात शेप रहजावे, तब भी उस वार्ज के शब्दसे ही, उस समयके पीतने की सूचना देदी जावे ॥ ४२ ॥ उस रानिपगाके बाद जो भादमी, रामाके धाके पाससे गुजरता हुआ देखा जावे, उसे असमय चलनेके अपराधर्म सवा (१३) पण दण्ड दिया जाव, परन्तु यह तना दण्ट निषिद्ध समपकी प्रथम और अन्तिम घडीके लिये ही समझना चाहिये ॥ ४३॥ जो पुरुष निषिद्ध समय के मध्य पहरों में ही भाधे जाथे, उसे इसका दुगना अर्थात् ढाई (२६) पण दण्ड दिया जावे। दण्ड नगरके भीतर निषिद्ध समयमें घरने फिरने के हैं। जो पुरुष नगरके बाहर ऐसे समयमै भावे जावे, से उस दण्डका चौगुना अधात पाच पण दण्ड दिया जावे ॥ १४ ॥ शङ्कनीये देशे लिङ्गं पूर्वापदाने च गृहीतमनुयुञ्जीत ॥४५॥ राजपरिग्रहोपगमने नगररक्षारोहणे च मध्यमः साहसदण्डः॥४६॥ सूतिकाचिकित्सकप्रेतप्रदीफ्याननागरिकतूर्यप्रेक्षाग्निनिमित्तं मुद्रा- भियाग्राह्याः ॥४७॥ उक्त निषिद्ध समयमें जो पुरप शनीय स्थानों (जहाँपर रहनेसे उनके ऊपर घोर भादिकी शङ्का कीजासके, घरके बागीचों भादिमें छिपे हुए, अथवा ऐसे ही अन्य स्थानों) म पाये जाधे, या जिनके पास इसी तरह की शङ्का होजानेके चिन्ह विद्यमान हो, तथा जिनकी चोरी आदिका वृत्तान्त पहिले मालूम हो चुका हो. ऐसे पुरपोको पकाकर उनसे पूछा जावे, कि तुम कौन हो ? कहांसे माये हो ? किसके हो। और यहां तुम्हारे भामेका क्या प्रयोजन है। इस्पादि। इन बातोंका उत्सर मिलने पर उसकी उचित व्यवस्था कीजावे ॥४५॥ यदि कोई इसप्रकारका मनुष्य सरकारी निवास भादिके स्थानों में प्रविष्ट होजावे, अथवा नगर रक्षाके लिये बने हुए सफाल याने भादिके ऊपर घरजावे, तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जावे ॥१॥ यदि कोई पुरप, निपिछ समय में भी सूतिका (प्रसूता श्री), चिकित्सक, मैत (शप भादिक उठाने), प्रदीपयान (हायमें प्रकाश लेकर जाने), नागरिकसूर्य (नागरिक पुरुषाको सूचनाक लिये बाजा बजाने ), प्रेक्षा (राजासे भनुमत ३६ अध्या०] अध्यक्ष प्रचार (३४१) माटक आदि देखने ), ता अप्ति (भाग भादिके लग जाने ) के कारण इधर उधर भावे जावें, तथा जिनके पास मन्त्री या 'नागरिक' भादिकी सरकारी मुहर हो, उनको न पकड़ा जाय ॥ ४७ ॥ चाररात्रिषु प्रच्छन्नविपरीतपाः प्रबजिता दण्डशस्त्रहस्ताश्च मनुष्या दोपतो दण्ड्याः ॥ ४८ ॥ रक्षिणामवार्य वारयतांवार्य चावारयतामक्षणद्विगुणो दण्डः ॥ ४९ ॥ जिन रानियों में प्रत्येक पुरुषको, हरजगह घूमने फिरनेकी भाशा हो, ऐसी महोत्सव आदि सम्बन्धी रानियों में, जो पुरुष प्रच्छपवेपमें (अर्थात् मुंह आदिको ढककर }, अयया विपरीत वेपमें (खी पुरुपोंके वेपमें और पुरुष नियोंके येपगे), धूमते हुए देखे जायें तथा जो मनुष्य सन्यासीके वेपमें, अथवा हाथमें दण्ड या और कोई हथियार लियेहुए देखनाचें; उन्हें पकाकर उनके अपराधके अनुसार उनको दण्ड दिया जावे ॥४०॥ जो नगारक्षक पुरुष, न रोकभे योग्य आदीको माने जानेसे रोकें, और रोकने योग्य आदमीको न रोके, उनको असमय जाने वाले पुरुषांक दण्डसे ( देखो, इसी अध्यायका लेतालीसा सूत्र ) दुगना अर्थात् दाई (२३) पण दपष्ट दिया जावे ॥ ५९॥ नियं दासीमधिमेहयता पूर्वः साहसदण्डः ॥५०॥ अदासी मध्यमः ॥५१॥ कृतावरोधामुत्तमः ।।५२॥ कुलस्वियं वधः॥५३॥ जो पुरुष, दूसरेकी स्त्री दासीके साथ बलात्कार गमन करें, उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥५०॥ दासीसे भित्र गणिका भादिके साथ जो यळारकार गमन करें, उनको मध्यम साहस दण्ड दिया जाये ॥५१॥ जो किसी के द्वारा भागो रूपसे स्वीकार कीहुई दासी या भदासी बोके साथ इस प्रकारका ग्यवहार करें, उनको उत्तम साहस दण्ट दिया जावे ॥५२ ॥ तथा ओ फुलोन रियों के साथ इसमकारका बत्तीय करें, वनको माणदण्ड दिया जावे ॥५३ ।। चेतनाचेतनिकं रात्रिदोपमशंसतो नागरिकस्य दोपानुरूपो दण्डः ॥ ५४॥ प्रमादस्थाने च ।। ५५ ॥ चेतन सम्बन्धी तथा अचेतन सम्बन्धी, रानिमें किये अपराधकी सूचना, यदि कोई नगरनिवासी पुरुष, अध्यक्षको न देवे, सो उसे उसके अपराध अनुसार दश दिया जावे ॥ ५४॥ और उन रक्षक पुरुषको भी . : [२ मधिल . (३४२) कौटलीय अर्थशास्त्र उनके अपराध के अनुसार ही दश दिया जावे, जो कि मद्यपान भादि करके नगरकी रक्षा करने में प्रमाद करते हों ॥ ५५ ॥ नित्यमुदकसानमार्गभूमिच्छन्नपथवप्रपाकाररक्षावेक्षणं नष्टप्र- स्मृतापसृतानां च रक्षणम् ॥ ५६ ॥ नागरिक अधात् नगरके प्रधान अधिकारीका यह कर्दम्य है, कि यह सदा उदकस्थान ( नदी कूए तालाव आदि), मार्ग, भूमि ( स्थष्ठ प्रदेश), छसपथ (सुरमा मादिके मार्ग), प्र । सफील), प्राकार (पाकोटा), भार रक्षा (पु खाई ) आदि पदायों को अच्छी तरह देख भाव करवा रहे । और खोए हुए भूलेहुए तथा कहीपर स्वयं छूटे हुए भूषण, अन्य सामान, या प्राणियोंको भी उस समय तक सुरक्षित रखें, जब तक कि उसके मालिक का ठीक २ पता न लगजाय ॥ ५६ ॥ चन्धनागारे च पालवृद्धव्याधितानाथानां च जातनक्षत्रपौ. प्रेमासीपु विसर्गः ॥ ५७ ॥ पुण्य लीलाः समयानुपद्धा वा दोप- निष्क्रय दयुः ॥५८ ॥ तथा कारागृह (जेलखाने ) में बन्द हुए २ बालक धूरे बीमार भार मनापाको, राजाकी जन्मगांठ भादिके शुभ नक्षत्रों या पूर्णमासी पयों में कारागृहसे मुरू करदिया जावे ॥ ५७ ॥ अथवा धर्मपूर्वक भाचरण करनेवाले (भधात् भकस्मात् ही किसी भपराधके वश कारागारमें आएहुए) अपनी प्रतिज्ञाओंसे बंधहुए ( हम भविष्य, फिर कभी ऐसा न करेंगे, इसप्रकारकी प्रतिज्ञा कियेहुए), लोग अपने अपराधका निफय (बदला; भाद हिरण्यके रूपमें दण्ड आदि) देकर निदोष होसकते हैं। फिर उनको कारो- गृहमें ले जाने की भावश्यकता नहीं ॥५॥ दिवसे पञ्चरात्रे या बन्धनस्थान् विशोधयेत् । कर्मणा कायदण्डेन हिरण्यानुग्रहेण वा ।। ५९ ।। अपूर्वदेशाधिगमे युवराजाभिषेचने । पुत्रजन्मनि या मोक्षो पन्धनस्य विधीयते ।।६।। इत्ययक्षपचारे द्वितीये ऽधिकरणे नागरिकप्रणिधिः पद्धेशो यायः ॥ ३॥ भादिसः सप्तपत्रायः ॥ ५० ॥ एतावता कोटलीयस्यार्थशासस्य अध्यक्षप्रचारो दित यमधिकरण समासम् ॥२॥ e । " ३६ अभ्या०] अध्यक्ष प्रचार (३४३) प्रतिदिन अथवा प्रति पाच दिन, कारागारमे आयेहुए पुरपाका, अपराधका निष्क्रय लेकर सशोधन पियाजावे । तापय यह है कि प्रतिदिन या पांचवें दिन एमा नियम रक्साजाव, कि उस दिन निष्कय लेकर कुछ कैदी डोरदिये जायाको । निष्प्रय तीन तरहस होसकता है-कार्य कराकर शारीरिक दण्ड दकर और हिरण्य सोन ादका सिक्का ) लेकर । इन सोनॉमिस जिस कैदीके लिय जो योग्य समझा जात्र, या जिसको वह आसानीले भुगता सके उसी निष्कयके द्वारा उसका छुटकारा होसक्ता है ।। ५९ ॥ किसी नए देशके जीत रुनेपर, युवराजका अभिषेक होनेपर अथवा पुरका जन्म होनेपर कनियोंको छोड़ा जाता है ॥६॥ अध्यक्षपचार द्वितीय अधिकरणमें छत्तीसवां अध्याय समास । अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण समास ।
कौटलीय अर्थशास्त्र द्वितीय भाग।
VIDYA RATIYA ..J082 PBHAVAA तृतीय-आधिकरण धर्मस्थाया AL SPATI प्रथम अध्याय। .७-५८ प्रकरण व्यवहार की स्थापना और विवाद को लेखन । धर्मस्थासयत्रयोऽमात्या जनपढमंधिसंग्रहद्रोणमुसस्थानी- येषु व्यावहारिकानर्थान्कुयुः ॥१॥तिरोहितान्तरगारनक्तारण्यो- पध्युपह्वरकृतांत्र व्यवहारान्प्रतिषेधयेयुः ॥ २ ॥ जनपद सन्धि-सीमाप्रान्त, (जहा पर दा राज्या को अथया गावा का सीमा मिरती हो), सग्रहण (दम गावा का प्रधानभूत केन्द्रस्थान), द्वाण 'मुग्ग (चार सो गावो का प्रधानभूत स्थान ), और स्थानाय ( आर मा गावों का प्रधानभूत), म तान तान धर्मस्थ (न्यायाधाश-जज) साथ २ रहते हुए, व्यवहार (इकरारनामा, शतं आदि) सम्यन्यो कार्यों का प्रपन्य कर ॥१॥छिपा कर, घर के अन्दर, रानि में, जार मे, छल कपट पूर्वक तथा एकान्त में किये गये व्यवहारी को राजकीय नियम के बिस्द समक्षा जारे ॥ २॥ कर्तुः कारयितुथ पूर्वः साहमदण्डः ॥ ३ ॥ श्रोतृणामक प्रत्यर्धदण्डाः ॥ ४ ॥ अद्धयानां तु दन्यव्यपनयः ॥५॥ इस प्रकार के गवहार करने यगो पाला को प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥ ३ ॥ सुनो वाली (मुन कर साक्षी देने वाली) में से प्रत्येक को आधा दण्ड ॥ ४॥ और धईया (थदा करने पालों) को ट्रय दल (जुर्माना आदि) दिया जाये ॥५) परोक्षेणाधिकर्णग्रहणमवक्तव्यफरा वा तिरोहिताः सिद्धयेयुः ॥६॥ दागनिक्षेपोपनिधिषिताहयुक्ताः खीणामनिफामिनीनां (३), , १ अध्याय] धास्थीय स्नी, दास, एवज में, सखा हुआ आदमी, नावालिग, अतिवृद्ध, लोक में निम्दित, सन्यासी, लंगडे, सूले आदि तथा योमार इनके द्वारा किये गये व्यवहार भी जायज न समझे जाय, उन व्यवहारों के अतिरिक्त कि जो राजा की ओर से इनकी इच्छा पर छोड़ दिये गये हैं ॥ १३ ॥ तत्रापि क्रुद्धनार्तेन मनोन्मत्तेनापगृहीतेन वा कृता व्यव- हारा न सिद्धयेयुः ॥ १४ ॥ कर्तृकारयितश्रोतृणां पृथग्यथोक्ता दण्डाः ॥१५॥ मोधी, दुःसी, मत्त, उन्मत्त (उन्माद रोग से रोगी) अपगृहीत (पागल, जनूनी अथवा अपराधी) इनके द्वारा किये गये वे व्यवहार भी जिनको राजा ने जनता की इच्छा पर छोड़ दिया है, जायज नहीं समझे जा सकते ॥ १४ ॥ फरमे, कराने तथा सुनने वालों के लिए पृथक् २ पूर्वोक्त दण्ड समझने पाहिय॥ १५॥ स्ये स्वे तु वर्गे देशे काले च स्वकरणकृताः संपूर्णचाराः शुद्धदेशा दृष्टरूपलक्षणप्रमाणगुणाः सर्वव्यवहाराः सिद्धयेयुः॥१६॥ पश्चिम त्वेषां करणमादेशाधिवर्ज श्रद्धेयम् ॥ १७ ॥ इति व्यव- हारस्थापना ॥ १८॥ अपनी २ जात में उचित देश था काल में अपनी प्रकृति के अनुसार किये गये, दोप रहित सम्पूर्ण व्यवहार नियमानुकूल समझे जायें। बशर्ते कि उनकी सम को सूचना दे दी गई हो, और उनके रूप, लक्षण, प्रमाण तथा गुण सम अच्छी तरह देख लिये गये हो ॥ १६ ॥ अन्ततः बलात्कार किये गये व्यवहारों को छोड़ कर इनके सम्र ही व्यवहारों को ठीक माना जाय ।। १७ ।। ध्यवहार की स्थापना यहां तक समाह हुई ॥ १८॥ मंवत्सरमृतुं माम पक्षं दिवसं करणमधिकरणमृणं घेदका- वेदकयोः कृतसमर्थावस्थयोर्देशग्रामजातिगोत्रनामकर्मा त्या. . भिलिख्य वादिप्रतिवादिप्रश्नानानुपूनिवेशयेत् ॥ १९ ॥ निविष्ठांवावेक्षेत ॥२०॥ अपने २ पक्ष को समर्थन करने के लिए उपस्थित हुए. २ अभिपाता और अभियुक्त के देश, माम, जाति, गोत्र, नाम और काम को सिग्य कर, ऋण के देने लेने या चुकाने का साल, मनु, महीना, पक्ष, दिन, स्थान और साक्षी शादि को रि, तदनन्तर वादी शीर प्रतिपादी के प्रश्नों को भों:
[३ अधिक ४ স্বাহা গয়ায় नुमार प्रम में रिया जाय ॥ १०॥ पिर उनसे अजी तरह रिचार पूर्वर गी॥30॥ निनद्धं पादमुत्सृज्यान्य पादं मंत्रामति ।। २१ । पूर्वोत्तं पश्चिमेनार्थेन नामिसंधत्ते ॥ २२ ॥ परवाक्यमनभिग्राह्यमभि- ग्राह्यावतिष्ठते ॥ २३ ॥ प्रतिज्ञाय देशं निर्दिशेत्युक्ते न निर्टिगति ॥ २४ ॥ हीनदेशमदर्श वा निर्दिशति।। २५ ॥ निर्दिष्टोदेशादन्यं देशमुपस्थापयति ॥ २६ ॥ उपस्थिते देश ऽर्थवचनं नवमित्य- पव्ययते ॥ २७॥ माक्षिभिरवधृतं नेच्छति ॥ २८॥ अममाप्ये देश माक्षिभिमिथः संभापते ॥ २९ ॥ इति परोक्तहेतवः ॥३०॥ जो व्यक्ति भररण में आये हुए बात चीत के मिरमिरे को छोडकर दूसरी ओर जाने लगता है ॥ २१॥ जिसवी वाती में पूर्वापर सम्बन्ध कुप नही रहता ॥ २२ ॥ दूसरे के अनभिमत क्यन को मानकर उस पर रट जाना है ॥ २३ ॥ ऋण सेने आदि के स्थान को बताने की प्रतिज्ञा करके, पूछने पर पिर नहीं बनाता ॥ २४॥ किमी मामूली स्थान का नाम रे देता है, या नहीं रेता ।। २५ ॥ अथवा उसमें यजाय किसी अन्य देश का नाम है देता * ॥ २६ ॥ स्थान ठीक बताने पर मण देने की बात मे मुकर जाता है ॥७॥ साक्षिया से कही गई बात को नहीं चाहता ॥ २८ ॥ और अनुचित स्थान में साक्षिया सायमिर र यात चीत करता है॥२९॥ वह परा- जय को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् अपने पक्ष का समर्थन न कर सकने के कारण, ये मय पराय के हेतु है ॥ ३० ॥ परोक्तदण्डः पचव धः ॥ ३१ ॥ स्वयंवादिदण्डो दशवन्धः ॥ ३२॥ पुरुषभृतिरष्टाङ्गः ॥३३॥ पार्थ भक्तमर्थविशेषतः ॥ ३४ ॥ तदुभयं नियम्यो दद्यात् ॥ ३५ ॥ परांत (परागित) अपराधी को पावर (देय धन या पाचा हिम्मा) दण्ड दिया जाये ॥३३॥ तथा स्वयवादि (जो अपने आप ही अपनी बात को पिना साक्षी के यार २ टीक कहता धरा जाय) अपराधी को दनयन्ध (देय धन का दमवा हिस्सा) दपट दिया जाय ॥ ३२ ॥ कर्म चारियों का वेतन आटवा हिस्सा ॥ ३३ ॥ और रास्ते में रोजाना सर्व से मादा पैसे देकर किो ग भोजन फा मर्च ॥ ३५ ॥ इन दोनों तरह के नों को अपराधी अगदो। ३५ ॥
१ प्रामा०] धर्मस्याय अभियुक्तो न मत्यभियुखीत ॥ ३६॥ अन्यत्र कलहसा- . हमसार्थसमवायेभ्यः ||३७ौन चाभियुक्त ऽभियोगोऽस्ति ॥३८॥ फाइ-फोजदारी, डाका, व्यापारियों नया कम्पनियों के प्रगदी को छोड़ कर अभियुक अन्य किसी बात को लेकर अभियोग पर उलटा मुरुदमा नही पा सकता ॥ ३६-३७ ॥ अभियुक्त पर भी उम ही पान को लेकर दूसरी बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकना ॥ ३८॥ अभियोक्ता चेत्प्रत्युक्तस्तदहरेव न प्रतिभूयात्परोक्तः स्यात् ॥ ३९ ॥ कृतकार्यविनियो ह्यमियोक्ता नामियुक्तः ॥ ४०॥ तस्याप्रतिवतस्त्रिरात्रं सप्तरात्रमिति ॥ ४१ ॥ भाभियोका, यदि किमी बात का जवाय तलय शिये जाने पर, उस ही दिन गार दे देवे नो यट पराजित समारा जाय ॥ ३९ ॥ क्योंकि अभियोक्ता भने यक कार्य का पहिलेही निश्चय कर के दाया दायर गरेका है, परन्तु अभियुग, रोया नहीं कर सकता ॥ ५० ॥ इमलिग यदि यह (अभियुक) फौरन सवाय न दे सके तो उमको नीन रात से गा का सार रात तक की मोहटन दी जाये ॥१॥ अत ऊवं विपणावराध्य द्वादशपणपरं दण्डं कुर्यात् ।।४२॥ त्रिपक्षाच॑मप्रति यतः परोक्तदण्डं कन्धा यान्यस्य द्रव्याणि स्यस्ततोऽभियोक्तारं प्रतिपादयेदन्यत्र प्रत्युपकरणेभ्यः ॥ ४३ ।। इसके याद भी उत्तर न मिलने पर, तीच पण मे लगा कर धाराह पण नयः दृण्ड दिया जाये ॥ ४२ ॥द महीने तक भी उत्तर न देने पर, अभियुक्त को पराजित दण्ड (पश्यन्ध रूप दण्ड) दिया जाय, और जितनी इसकी सम्पत्ति हो उममें से न्यायानुवार भाग अभियोका को दे दिया जाये, यदि मण थूकता होने में कुछ कमी रह जाय तो भी अभियुक्त के जीवन निर्वाह के लिए अस्यायश्यक उपकरण (अश, घस्त्र, पात्र आदिमामान) अभियोमा को नहीं दिये जा सकते ॥ ५३॥ तदेव निष्पततो ऽभियुक्तस्य कुर्यात् ।। ४४ ॥ अभियोक्तु- निष्पातसमकालः परोक्तभावः ॥ ४५ ॥ अभियोक्ता के अपराधी सिद्ध होने पर थे ही अधिकार अभियुक्त को दिये जायं ॥ ५४॥ परन्तु अभियुक्त के समान, अभियोका को मोहलत नहीं मिर मो । उसको फौरन ही परोक दाद दिया जाय ॥ ४५ ॥.
[३ अधिक
कौटलीय अर्थशास्त्र
भेतस्य व्यसनिनो चा साक्षिवचनमसारमभियोक्तारं दण्ड-
यित्वा कर्म कारयेत् ॥ ४६ ।। अधिवासकामं प्रवेशयेत् ॥ १७ ॥
रक्षोनरक्षितं वा कर्मणा प्रतिपादयेत् ॥ १८ ॥ अन्यत्र ब्राह्मणा-
दिति ।। ४९॥
- अभियुक्त के भर जाने या आपद्ग्रस्त हो जाने पर, अपने पक्ष को
समर्थन न करने वाले भभियोटा को, (अभियुन के) माक्षियों के कहने के
अनुसार एण्ड देकर अदालत उससे उचित कार्य कराये ॥१६और
नियमित समय तक अपने अधिकार में रफम्वे ॥ १७॥ अयया उममे राक्षमा
के विमों को शान करने वाले यज्ञादिकों को करवाये ॥४८॥ यदि अभियोगमा
माझम हो तो उससे यह कार्य न करवाये ॥ १९॥
चर्तुवर्णाश्रमस्यायं लोकस्याचाररक्षणात् ।
नश्यतां सर्वधर्माणां राजा धर्मप्रवर्तकः ॥ ५० ॥
चारों वर्ण, चारों आश्रम, लोराचार, तथा नष्ट होते हुए सब धी
का रक्षक होने से राजा धर्म का प्रवर्तक समझा जाता है ॥ ५० ॥
धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम् ।
विवादार्थश्चतुप्पादः पश्चिमः पूर्वबाधकः ॥ ५१ ॥
धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा ये विवाद के निर्णायक होने मे
राष्ट्र के चार पैर ममझे जाते हैं, इन्हीं पर राष्ट्र का निर्भर है। इनमें मे
मासे अगला पिळली का बाधक है॥५॥
तत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु ।
चरित्रं संग्रहे पुंसां राजामाज्ञा तु शासनम् ।। ५२ ॥
उनमे से धर्म सत्य में, व्यवहार माक्षियों में, चरित्र पुरषों (दशमामी
आदि में रहने वाले) की जीवन घटनाओं में, और राजाला राजकीय शासन में
स्थित रहने है॥५२॥
रानः स्वधर्मः स्वर्गाय प्रजा धर्मेण रक्षितः ।
अरक्षितुर्वा क्षेप्तुर्वा मिथ्यादण्डमतो ऽन्यथा ॥ ५३॥
१ धर्म पूर्वक प्रजा की रक्षा करने वाले राजा का अपना धर्म स्वर्ग
प्राप्ति का साधन होना है। इसके विपरीत प्रज्ञा की रक्षा म करने वाले
तमा अनुचित पीड़ा पहुंचाने वाले राजा को कभी सुम्ब नहीं होता ॥ १३ ॥
-- . १ अध्या०] धर्मस्यीय (७) दण्डो हि केवलो लोकं परं चमं च रक्षति । राज्ञा पुत्रे च शत्रौ च यथादोपं समं धृतः ।। ५४ ॥ पुत्र और शत्रु को उनके अपराध के अनुसार, राजा के द्वारा बराबर दिया हुआ, केवल बण्ड ही इस लोक ओर परलोक की रक्षा करता है ॥ ५५ ॥ अनुशासद्धि धर्मेण व्यवहारण संस्थया । न्यायेन च चतुर्थेन चतुरन्तां महीं जयेत् ॥ ५५ ॥ धर्म, पयहार, घरिन तथा न्यायपूर्वक शामन करमा हुआ राजा सम्पूर्ण पृपा को जीते ।। ५५ ।। संस्थया धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् । यस्मिन्नर्थे विरुध्येत धर्मणार्थ विनिर्णयेत् ।। ५६ ॥ चारग्र तथा लोकाचार का धर्मशास्त्र के साथ जिस विषय में विरोध र, यहां धर्मशास्त्र को हो प्रमाण मानना चाहिए । अधांत ऐसे अवसर पर उपही के द्वारा अर्थ का निश्चय करे ॥ ६ ॥ शास्त्रं विप्रतिपद्यत धर्मन्यायेन केनचित् । न्यायस्तत्र प्रमाणं स्यात्तत्र पाटो हि नश्यति ।। ५७ ॥ परन्तु यदि कहीं धर्मशास्त्र क धर्मानुकूल राजकीय शासन के साथ विरोध हो, तो यहां राजकीय शासन को ही प्रमाण मानगा चाहिये । क्योंकि ऐसा करने से (धर्मशास्त्र का) पाठ ही नष्ट होता है ॥ ५५ ॥ दृष्टदोपः स्वयंवादः सपक्षपरपक्षयोः । अनुयोगार्ज हेतुः शपथवार्थसाधकः ॥ ५८ ॥ मुकदमे में प्रायः वादी प्रतिवादी दोनों ही अपने २ पक्ष को सच्चा कहते है, परन्तु उनमें से सच्चा एक ही होता है। ऐसी अवस्था में दोनो पक्षों को ठीक २ निर्णय करने वाले निम्नलिखित हेतु हो सकते हैं सबसे प्रथम दृष्ट दोप, अर्थात् जिसके अपराध को देख लिया गया हो, (२)जो स्वयं अपने अपराध को स्वीकार कर ले, (३) सरलता पूर्वक जिरह (४) हेतु (कारणों का उपस्थित कर देना), (५)शपथ कसम दिलाना, ये पांचों ययावश्यक अर्थ को शिव करने वाले होते हैं । ५८ ॥
८)
कोटलीय अर्थशास्त्र
[३अधिक
पूर्वोत्तरार्थव्याघाते साक्षिवक्तव्यकारणे ।
चारहस्ताच निप्पाते प्रदेष्टव्यः पराजयः॥ ५९ ॥
।
इति धर्मरथीये नृताय ऽधिकरण विवादपदनिबन्ध, प्रथमो ऽध्याय ॥१॥
आदिता ऽपशाश ॥ ५८ ॥
वादा प्रतिपादियों क परस्पर पिस्त कथन का यदि उपर्युक्त हेतुओ
से निर्णय न हो सके ता माक्षियों के ओर खुपिया पुरिम के द्वारा इसमा
अनुसंधान कर अपराधा का निर्णय करे॥.९॥
धर्मस्थीय तृतीय अधिकरण में पहिला अध्याय समाप्त ।
द्वितीय अध्याय।
विवाह धर्म, स्त्रीधन और आधिवेदनिक ।
५९मश्रण।
विवाह।
विवाहपूर्वो व्यवहारः ॥१॥ कन्यादानं , कन्यामलंकृत्य
घामो विवाहः ॥२॥ महधर्मचर्या प्राजापत्यः ॥ ३ ॥ गोमि-
थुनादानादार्पः ॥ ४ ॥
सामरिक व्यवहार विवाह होने पर ही प्रारम्भ होते ह॥1॥ कन्या
को अच्छी तरह मजा कर उसे दे देना (निराह कर देना ) ग्राम विवाह
पहाता है ॥२॥ कन्या और घर का परस्पर यह नियम कराकर,
दीनी मिल कर धर्म का आचरण फरंग, विराह कर देना प्राजापत्य विवाह
कहाता है ॥ ३ ॥ पर से धर्म पूर्वक (अथवा कन्या के लिए) गऊ का जोडा
सेकर कम्पा देदना आप विराह होता है ॥ ४॥
अन्तर्वेद्यामृत्विजे दानावः ॥५॥ मिथासमपायाद्गान्धर्वः
॥६॥ शुल्कादानादासुरः ॥७॥प्रसह्यादानाद्राक्षसः ॥८॥
सुप्तमत्तादानापैशाचः ॥९॥
दि के समीप बैठ कर रविन को कन्या देदेने में देव शिवार होता
॥५॥ गान्धर्व विवाह यह है तिमम पन्या और घर आपस में ही
(माता निता आदि की गाद के गिना हो) मिल पावाद कर ले ॥६॥
(९) . २ अध्या धर्मस्थाय धन देकर (कन्या के पिता आदि को) किया हुआ विवाह आसुर कहाता है ॥ ७ ॥, बलात्कार कन्याको लेलेना राक्षस विवाह होता है ॥ ८ ॥ सोनी हुई कन्या को उठा लेजाने से पैशाच निबाह होता है ॥ ९ ॥ पितप्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे धाः॥१०॥मातापिलप्रमाणाः शेपाः ॥ ११॥ तो हि शुल्कहरी दुहितुः ॥१२॥ पहिले चार विवाह धर्मानुयल है, ये पिता की सराह से किये जाते है।।१०॥ थाकी धार विवाह माता और पिता दोनी की सलाह से होत है ।। 11 ॥ क्योंकि ये दोनों ही लड़की को देकर बदले में धन (शुल्क) लेते है॥१२॥ अन्यतरामाये ऽन्यतरो वा ॥१३॥ अद्वितीयं शुल्क स्त्री हरेत ॥ १४ ॥ सर्वेषां प्रीत्यारोपणमप्रतिपिद्धम् ।। १५ ।। यदि उन दोनों (माता पिता) में स कोई एक न हो, तो दूसरा (माता या पिता) उस धन को ले सकता है ॥ १॥ याद उसरा भीम हो, तो उस धन को आधिकारिणा यह स्या (जिसके माथ विवाह किया गया है) ही होरे ।। १५ । सय विवाहो में स्त्री पुरुष की परस्पर प्रीति का होना अत्यन्त आवश्यक है। स्त्री धन। वृत्तिरावध्यं वा खोधनम् ।। १६ ।। परद्विसाहला स्थाप्या पृत्तिः ॥१७॥ आवध्यानियमः ॥१८॥ स्त्रो धन दो प्रकार का होता है-एक वृत्ति, दृप्तरा भारभ्य (गहना आभूपण आदि)॥ १६ ॥ युति यह स्त्रीधन कहाता है जो स्त्री के नाम से कहीं (पैंक आदि में) जमा किया हुभा हो, उसकी वादाद कम से कम दो हजार होनी आवश्यक है ॥ १०॥ आप स्त्रीधन के लिए तादाद का कोई नियम नहीं है । tee तदात्मपुत्रस्नुपाभर्मणि प्रवासाप्रतिविधाने च भार्याया भोक्तुमदोपः ॥ १९ ॥ प्रतिरोधकव्याधिदुर्भिक्षभयप्रतीकारे धर्म- कार्ये च पत्युः ॥२०॥ पति के विदेश चले जाने पर, पीछे कोई प्रबन्ध न होने पर, श्री अपने, अपने पुत्र, और पुनबध के जीवन निर्वाह के लिए उस धा (स्त्रीधन) में से पर्च का मकती है ॥ १९॥ परिवार में पाई हुई किसी विपनि पा --
२ अध्या०]
धर्मस्थीय
(११
है, पहिले नहीं ॥ २७ ॥ दूसरे विवाह का समय दीर्घ प्रवास प्रकरण में
सोर कर लिया जायगा ॥ २८ ॥
'श्वशुरप्रातिलोम्येन वा निविष्टा श्वशुरपतिदत्तंजीयेत ॥२९॥
ज्ञातिहस्तादभिमृष्टाया ज्ञातयो यथागृहीतं दाः ॥३० न्यायो-
पगतायाः प्रतिपत्ता स्त्रीधनं गोपायेत् ।। ३१॥
यदि वह स्त्री अपने सुर की इच्छा के प्रतिकूल दुसरा विवाह
परना चाहती है, तो श्वसुर और मृत पति का दिया हुआ धन वह नहीं पा
सकसी ॥ २९ ॥ यदि बन्धु वाधवा के हाथ से उसके विवाह का प्रबन्ध
किया जाये, तो थे (बन्धु बान्धव ) उसके लिए हुए धन को उसी तरह
पापस कर दे ॥ ३० ॥ क्योंकि न्याय पूर्वक रक्षार्थ प्राप्त हुई स्त्री की रक्षा
करने वाला पुरष उसके धन की भी रक्षा करे ॥३१॥
पतिदाय विन्दमाना जीयेत ॥३२॥धर्मकामा सुजीत॥३३॥
दुसरे पति की कामना करने धारी स्त्री अपने पूर्व पति के दाय भाग
को नहीं पा सकनी ॥ ३२ ॥ यदि यह धर्म पूर्वक जीवन निर्वाह करने की
इच्छा रखती है, तो उस पति के दाय भाग को भोग सकती है।॥ ३३॥
पुत्रवती विन्दमाना स्त्रीधनं जीयेत ॥ ३४ ॥ ततु स्त्रीधनं
पुत्रा हरेयुः ।। ३५ ।। पुनमरणार्थ का विन्दमाना पुत्रार्थ स्फाती-
कुर्यात् ।। ३६ ॥
जिस स्त्री के पुत्र है, यह यदि दूसरा पति करना चाहती है, तो
खाधन को नहीं पा सकती ॥ ३४॥ उस स्त्रीधन के अधिकारी उसके पुत्र
ही होये ॥ ३५ ॥ यदि कोई सी दुसरा विवाह इसलिए करना चाहती है,
कि वह इससे अपने पुत्री का भरण पोषण कर सकेगी, तो उसको यह
आवश्यक है कि अपनी सम्पत्ति उन लड़कों के लिये नामजद करा दे।। ३६ ॥
सहपुरुपरजासं पुनम प्रथामिद खोधनसयस्थापयेंद
॥ ३७॥ कामकारणीयमपि स्त्रीधनं विन्दमाना पुत्रसंस्थं
कुर्यात् ॥ ३८॥
यदि किसी खी के लडके यहुत से आदमियों से उत्पन्न हुए र हों,
तो उसको उचित है कि वह अपनी सम्पत्ति की व्यवस्था, असे २ उन लड़कों
थे पिताओं ने दिया है, उस ही के अनुसार कर देवे ।। ३७ ॥ अपनी इजा-
नुसार पर्च करने के रिए माप्त हुए धन को भी, दूसरा विवाह करने वादी
खी, अपने पुत्री के अधीन र देये ॥ ३८ ॥
[३ अधिक (१२) कौटलीय अर्थशास्त्र अपुत्रा पतिशयनं पालयन्ती गुरुसमीपे स्त्रीधनमायुःक्षया- [ञ्जीत ॥ ३९ ॥ आपदर्थ हि स्त्रीधनम् ॥ ४० ॥ ऊर्च दायाद गच्छेत् ।। ४१॥ जिस स्त्री के पुत्र नहीं है, यह अपने पतिव्रत धर्म का पालन करती हुई, गुरु (धर्म शिक्षक पुरोहित आदि) के समीप रह कर जीवन पर्यन्त खोधन का उपभोग कर सरती है ॥ ३९॥ क्योंकि स्त्रीधन आपत्ति में उपयोग करने के लिए ही होता है ॥४०॥ उसके मरने के याद यचा हुभा धन दायभाग के अधिकारियों को मिल जाये ॥१॥ जीवति भर्तरि मृतायाः पुत्रा दुहितरश्च स्त्रीधनं विभजेरन् ॥ ४२ ॥ अपुत्राया दुहितरः ॥४३॥ पति के जीवित रहते हुए यदि कोई स्त्री मर जाय, तो उसके धन को लड़के और एड़कियां आपस में बांट रे ॥ ४२ ॥ यदि उसके कोई लड़का न हो तो हवियां ही उस धन को ले सक्ती है ॥४३॥ तदभावे भर्ता ॥ ४४ ॥ शुल्कमन्याधेयमन्यद्वा बन्धुभिर्दत्तं पान्धवा हरेयुः ॥ ४५ ॥ इति स्त्रीधनकल्पः ॥४६॥ स्पादियों के भी न होने पर पति उस धन का अधिकारी होवे ॥४॥ और उस स्त्री के पन्धु यान्धया ने जो धन उसको विवाह में शुल्क रूप में या इससे अतिरिक्त दिया हो, वे उसे धापस रीटा सक्ते हैं ॥ ४५ ॥ यहां तक पीपन विषयक विचार समाप्त हुआ ॥ ४६॥ वर्पाण्यष्टावप्रजायमानामपुत्रां वन्ध्यां चाकक्षित ॥ ४७ ॥ दश निन्दं द्वादश कन्याप्रसविनीम् ॥ ४८॥ ततः पुत्रार्थी द्वितीयां पिन्देत ॥४९॥ यदि किसी म्री के यच्चा पैदा न हो या उसके अन्दर बचा पैदा करने की शति ही न हो, तो उसका पति भाठ वर्ष सक प्रतीक्षा करे ॥ १७॥ यदि कोई मरा हुआ यचा पैदा हो तो दश वर्ष, और यदि कन्या ही उत्पन्न हो तो बारह वर्ष तक इन्तजार करे ॥ १८॥ इसके पाद पुत्र की कामना करने पारा पुरप दूसरा विवाह कर ऐवे ॥ १९ ॥ तस्यातिक्रमे शुल्क स्त्रीधनमधं चाधिवेदनिकं दद्यात् ॥५०॥ पतुर्विशतिपणपरं च दण्डम् ।। ५१ ॥
२ अध्या०]
धर्मस्थीय
{ १३)
जो पुरुष इस उपर्युक्त नियम का उल्लान करे (अर्थात् निद्दिष्ट
भवधि से पहिले ही बियाह करना चाहे) तो उसको आवश्यक ह कि वह
शुल्क, (विवाह में प्राप्त हुआ धन दहेज आदि) खोधन तथा इसके अतिरिक
और धन अपनी पहिलोखी को देवे ॥ ५० ॥ तथा २४ पण तक जुर्माना सरकार
को देवे॥५१॥
शुल्कस्त्रीधनमशुल्कस्त्रीधनायांतत्प्रमाणमाधिवेदनिकमनुख्या
च घर्ति दत्त्वा बबीरपि बिन्देत ॥५२॥ पुन्नार्था हि स्त्रियः ॥५३॥
इस प्रकार शुरक और स्त्रीधन देकर, तथा जिस सी को शुल्क नहीं
मिला, और उसके पास सीधन भी नहीं है, उसको उसके (शुल्क और
सीधन के) घरापर ही और धन देकर, तथा उसके जीवन निर्वाह के लिये
पर्याप्त सम्पत्ति देकर कोई भी पुरुप अनेक स्त्रियों के साथ विवाह कर सकता
है॥५२॥ धयोंकि स्त्रियों की सृष्टि पुनोत्पत्ति के लिए ही है ॥ ५५ ॥
तीर्थसमवाये चासां यथाविवाहं पूर्वोढां जीवत्पुत्रां या पूर्व
गच्छेत् ॥ ५४॥ तीर्थगृहनागमने पण्णवतिर्दण्डः ॥ ५५ ॥
यदि इन स्त्रियों का तुकाए एक ही साथ आ जावे, तो पुरुप सबसे
पहिले प्रथम विवाहित स्त्री के पास जाये, अथवा उसके पास जाये जिसका
कोई पहिला पुग्न जीता हो ॥ ५५ ॥ यदि कोई पुरुष ऋतुकार को छिपाता
है, या जाने में आना कानी करता है (स्त्री ससर्ग की इच्छा न होने के
कारण ) तो उमको राज्य की ओर से ९६ पण जुर्माने का पण्ड दिया
जावे ॥ ५५ ॥
पुत्रवती धर्मकामां वन्ध्यां निन्दुं नीरजस्का वा नाकामा-
सुपेयात् ।। ५६ ॥ न चाकामः पुरुषः कुष्ठिनीमुन्मत्तां वा गच्छेन्
॥ ५७ ॥ श्री तु पुर्वार्थमेवंभूतं वोपगच्छेत् ।। ५८ ॥
पुग्न पाली, पधिन जीधन चाली, यमा, जिसके मरा हुआ बच्चा
पैदा हुआ हो, और जिसको मासिक धर्म होना बन्द हा गया हो, ऐसी स्त्री
के साथ पुरुष तब तक ससर्ग न करे, जब तक वह स्त्री स्वय पुरुष सर्ग
की कामना न करे ।। ५६॥ पुरए भी कामना न होते हुए कोही अथवा
उन्मर स्त्री से ससर्ग न करे ॥ ५७ ॥ परन्तु स्त्री पुत्र की इच्छा राषती हुई
इस प्रकार के कोढी अथवा उन्मत्त पुरय के साथ समग कर सकती है ॥५६॥
कौटलीय अथशास्त्र [३ अधिक नीचत्वं परदेश या प्रस्थितो राजकिरियपी । प्राणाभिहन्ता पतितस्त्याज्यः क्लीरो ऽपि वा पतिः ॥५९ ॥ इति धर्मस्थीये तृतीये ऽधिकरणे विवाहसयुक्त विवाहधर्म स्त्रीधनकल्प आधिवेदनिक द्वितीयो ऽध्याय ॥ २ ॥ आदित एकोनपष्टितमो ऽध्याय ॥ ५९॥ । नांच, प्रवासी (परदेस भ गए हुए), राजद्रोही, घातक, जाति तथा धर्म से पतित, और नपुसक पति को स्नी छोड सकती है ॥ ५५ ॥ धर्मस्थीय तीसरे अधिकरण में दूसरा अन्याय ममाप्त। १ ५९प्रकरण। तृतीय अध्याय । विवाहित के विषय में-शुश्रपा, भर्म, पारुष्य, द्वेप, अतिचार और उपकार व्यवहार प्रतिषेध। द्वादशवा स्त्री प्राप्तव्यवहारा भवति ।।१॥ पोडशवर्षः पुमान् ।। २ ।। अत ऊर्घमशुश्रूपायां द्वादशपणः स्त्रिया दण्डः पुंसो द्विगुणः ॥ ३॥ यारह वर्ष की एडकी कानून के अन्दर आ जाती है ॥ १॥ और १६ वर्ष का रफा ॥२॥ इससे ऊपर होने पर, यदि वे किसी राजकीय नियम का उलान (अशुश्रूषा ) करते हैं, तो स्त्री को बारह पण, और पुरप को उससे बिगुण दण्ड दिया जाये ॥३॥ भर्मण्यायामनिर्दिष्टकालायां ग्रासाच्छादनं चाधिकं यथा- पुरुषपरिवापं सविशेपं दद्यात् ॥ ४॥ निर्दिष्टकालायां वदेव मख्याय पन्धं च दद्यात् ॥ ५॥ शुल्कस्त्रीधनाधिनेदनिकानाम- नादाने च ॥ ६ ॥ यदि किसी स्त्रीय भरण पोपग का सीमाकार नियत नहीं है, तो पति को भावश्यक है कि यह भावश्यकतानुमार उसके भोजन पस्न वा उचित प्रयाध करे। अथवा अपनी आमदनी या सम्पत्ति के अनुसार और
(१५)
धर्मस्थीय
३ अध्या०]
कुछ अधिक भी देये ॥४॥ परन्तु जिस स्त्री के भरण पोपण का समय नियत
है उसको, और जिसने शुल्क, स्त्रीधन, तथा आधिवेदनिक ( अतिरिक्त)
धन लेना स्वीकार नहीं किया, उसको बन्धौ हुई रकम अपनी आमदनी के
अनुसार पति ने देरे॥५-६॥
श्वशुरकुलप्रविष्टायां विभक्तायां वा नाभियोज्यः पतिः
॥७॥ इति भर्म ॥ ८॥
यदि स्त्री अपने पति को सुसराल (अर्थात् अपने पितृ-गृह-पीहर-
मायके ) में रहती है, अथवा विल्युल अरहदा स्वतन्त्र होकर रहती है, तो
उसके भरण पोषण के एि पति को याधित नहीं क्यिा जा सकता ॥ ७ ॥
यहा तक स्त्री क भरण पोपग ( भने ) का विचार समाप्त हुआ ॥ ८॥
नमे विनग्ने न्यङ्गे पितृके ऽमातृक इत्यनिर्देशेन विनय-
ग्राहणम् ॥ ९॥ वेणुदलरज्जुहस्तानामन्यतमेन वा पृष्ठे बिरा-
पातः ॥ १०॥ तस्यातिक्रम वाग्दण्डपारुप्यदण्डाभ्यामर्ध,
दण्डाः ॥ ११॥
पहिले नगो, अधनगी, ली, लंगडी, धापमरा, मामरी, इत्यादि
गारिया देने के बिना ही विनय अर्थात् अच्छे रहन सहन का ढग सिखाया
जाय ॥ ९॥ यदि ऐसे काम न चले तो यास ना खप्पच, रस्पी या थप्पर से
तीन बार पीठ पर आघात (चोट) करे ॥ १०॥ फिर भा नियम का उल्लहन
' करने पर वापारप (७२ प्रकरण) आर दण्डपारम (७३ प्रकरण ) मे
कहे गये दण्डी में से यथोचित आधा दण्ड दिया जाये॥१॥
तदेव स्त्रिया भर्तरि प्रसिद्धायामदोपायामीाया बाह्य-
विहारेणु द्वारेप्वत्ययो यथानिर्दिष्टः ॥१२॥ इति पारुष्यम् ॥१३।।
यही दण्ड उस स्त्री को भी दिया जाये, जो और कोई दोष न होने
पर भी प्य से पति के साथ दुर्यवहार करती हो। पति के घर के दरवाजे
पर या घर से यार किये हुए विहारों (अन्य पुरुष के साथ इशारेयाजी
आदि करना, तथा अन्य प्रकार की प्रोदा करना) में होनेवाले व्यतिक्रम
( अस्यय-नियम विरद्वता) का दण्द इसी प्रकरण में आगे निर्देश पर दिया
गया है ॥ १२ ॥ यहा सक पारप्य (कठोरता) मम्बन्धी विचार समाप्त
भतार द्विपती स्त्री सप्तावान्यमण्डयमाना तदानीमेव स्था-
प्याभरणं निधाय भारमन्यया मह ,शयानमनुशीत ॥ १४ ॥
कौटलीय अर्थशास्त्र [३ आधि०
भिक्षुक्यन्वाधिज्ञातिकुलानामन्यतमे या भर्ता द्विपस्त्रियमेकाम-
नुशयीत ॥१५॥
अपने पति के साथ इंप रगती हुई जो स्त्री मात ऋतु (मामिक धर्म)
पर्यन्त दूसरे पुरण की कामना करती रहे, उसको चाहिए कि यह पौरन
मम्पूर्ण स्त्रीधन, ( उसके नाम मे जमा हुई • पूजी और आभूपग) पति को
देकर उसको दूसरी स्त्री के माप सोने की अनुमति दे देवे ॥१४॥ यदि
पति स्त्री के साथ देप रखता हो तो पति को उचित है कि यह भिक्षुकी
(संन्यासिनी) और स्त्रीधन के निरीक्षक उसके (स्त्री के) भाई बन्धुओं के
समीप अवलो रहन से न रोके । अधीत् इस प्रकार उपर्युग अवसरों पर उसे
पहा रहने के लिए अनुमति दे देव ॥१५॥
दुष्पलिङ्गे मथुनापहारे सवापसोपगमे या मिथ्यावादी
द्वादशपणं दद्यात् ॥ १६ ॥ अमोझ्या भर्तुरकामस्य द्विपती
भार्या ॥ १७॥ भार्यायाश्च भर्ता ॥१८॥
अन्य स्त्री के साथ मैथुन करने के चिन्ह देश जाने पर, मैथुन करके
'मैने नहीं किया' इस प्रकार झंट योल्न पर, अथरा अपनी किमी मात्रा में
साथ मगम करके उसका अपराप करने पर (मुकर जाने पर) मिथ्यावादी
को १२ पण दण्ड दिया जाये ।। १६ ॥ पति की इच्छा न होने पर, उसके
साथ द्वेष रखती हुई भी स्त्री, उसका परित्याग नहीं कर सकती ॥१७॥
इसी प्रकार ऐसी अवस्था में पति भी अपनी स्त्री वा परियाग नहीं कर
सकता ।। १८॥
परस्परं द्वेषान्मोक्षः ॥ १९ ॥ स्त्रीविप्रकारादा पुरुषश्चमा
क्षमिच्छेद्यथागृहीतमस्य दद्यात् ॥ २० ॥ पुरुषविप्रकाराद्वा खी
चेन्मोक्षामच्छेन्नास्य यथा गृहीतं दद्यात् ॥ २१ ॥
क्योंकि दोनों का एक दूसरे के साथ शेप होने से ही परियोग सम्मय
॥ १९ ॥ स्त्री के किसी अपकार (पुराई) के कारण यदि पुरप उसको
सोदना चाहे, तो जो सम्पत्ति उसको स्त्री की ओर से प्राप्त हुई है, उसे वह
स्त्री को हटा देवे ॥२०॥ यदि पुरप के किसी अपकार के कारण स्त्री
उमको छोड़ना चाहती है, सो स्त्री से लिया हुभा धन उसको म दिया जाये ॥२॥
अमोक्षो धर्मविवाहानामिति ॥ २२ ॥ प्रतिपिद्धा ती दर्प-
मयाडायो त्रिपणं दण्डं दधात् ॥ २३ ॥ दिया खीपेक्षाविहार•
गमने पदपणो दण्डः ॥ २४ ॥
३ अध्या धर्मस्थाय धर्म विवाहाम (धर्मविवाह-पहिले चार विवाह) परित्याग नहीं हो सकता ॥ २२ ॥ यदि कोई स्त्री निषेध कियेजानेपर भी गर्वके साथ मन आदि पीरे भोर करम क्रीडा करे, तो वह जुरमानेके तौरपर ३ पण दण्ड देवे ॥ २३ ॥ दिगमे किप्ती स्त्रीके साथ थियेटर आदिमें जानेपर (स्त्रीप्रेक्षाविहारगमने, प्रेक्षाविहार नाट्यगृह-थियेटर हाल ) ६ पण दण्ड देवे ॥ २४ ॥ पुरुषप्रेक्षाविहारगमने द्वादशपणः ॥२५॥ रात्रौ द्विगुणः॥२६॥ यदि किसी पुरष के साथ धिपेटर आदि में जाये, तो १२ पण दण्ट देवे ॥ २५ ॥ यदि यही अपराध (२१ और २५ सूत्र में कहा हुआ) रात्रि में किया जाचे, तो स्त्री वो दुगना दण्ड दिया जाय। (२३ सूत्र से भातपिक्षा' पद को यहाँ तक अनुवृति समझनी चाहिए। अतएव जो स्त्री अपी पति तथा अन्य अभिभावक की आज्ञा के बिना इन उपर्युक्त कार्यो को करती है, यह अपराधिनी समझी जाती है । आक्षा लेकर करने पर कोई दोप महीं । तथा कामोत्पादक तमाशे आदि के अलावा, अपने पड़ोस में केवल मिलने मिलाने के लिए पति आदि की आज्ञा चिना भी जा सकती है ॥२६॥ सुप्तमत्तप्रव्रजने भर्तुरदाने च द्वारस्य द्वादशपण: ॥ २७ ॥ रात्रौ निष्कासने द्विगुणः ॥ २८ ॥ यदि कोई स्त्री सोते हुए मा उन्मत्त हुए २ (शराय आदि पीने के फारण गा अन्य किसी कारण से), अपने पति को छोड़ कर घर से बाहर पाली जाये, अधया पति की इच्छा के विरुद्ध पर का दरवाजा बन्द कर लेवे, तो उसको १२ पण दण्ट होना चाहिए ॥ २७ ॥ यदि कोई स्त्री अपने पति को राग में घर नहीं आने देती, अर्थात् उसको घर से बाहर निकाले रखती है तो उस स्त्री को २५ पण दण्ड दिया जावे ॥ २८ ॥ स्त्रीपुंसॉमर्थनार्थेनाङ्गापिचेष्टायां रहोऽश्लीलसंभापायां या चतुर्विशतिपणः खिया दण्डः ॥ २९ ॥ पुंसो द्विगुणः ॥३०॥ केशनीदन्तनसानलम्बनेषु पूर्वः साहसदण्डः ॥३१॥ पुंसो द्विगुणः ॥ ३२ ॥ दूसरे स्त्री पुरयों के परस्पर मान के लिए इशारेगाजी करने पर, अभया एकान्त में इसी विशन फी मात चीत करने पर, स्नी को २५ पण., दण्ड ॥ २९ ॥ और पुरुष को इससे दुगुना अर्थात् ४८ पग पड दिया, नाये ॥३०॥ घाल भार कमायन्द के पपहने पर, तथा दात भार नए फेर M
.
-
फौटलीय अर्थशास्त्र 11३ अधिक
चिन्ह करने पर स्त्री को पूर्वसाहसदण्ड ॥३७॥ और पुरुष को उसमे द्विगुण
दण्ड देना चाहिए ॥३२॥
शङ्कितस्थाने संभापायां च पणस्थाने शिफादण्डः ॥३३ ।।
स्त्रीणां ग्राममध्ये चण्डालः पक्षान्तरं पञ्चशिफा दद्यात् ॥ ३४ ॥
। पणिकं वा प्रहारं मोक्षयेत् ॥ ३५ ॥ इत्यतिचाराः ।। ३६ ॥
शक्ति स्थान में यातचीत करने पर पण के यमाय कोई भादि मार
कर दण्ड दिया जावे ॥ ३३ ॥ गांव में कोई पण्डाल, अपराधी औरत का
उसक एक याग की ओर पाच कोडे लगाये (तारपर्य यह है कि एक ही
आर या एक ही स्थान पर पाच कोदे से अधिक नहीं गाये जा सकते)
॥ ३४ ॥ पण देने पर (उसकी सरया के अनुसार) महार फम फर दिए
जाय । अर्थात् एक पण देने पर एक प्रहार कम कर देवे। दो देने पर दो,
इत्यादि ॥ ३५॥ यहा तक अतिचार के विषय में कहा गया ॥ ३९ ॥
प्रतिपिद्धयोः सीपुंमयोरन्योन्योपकारे क्षुद्रकद्रव्याणां द्वादश-
पणो दण्डः ॥ ३७॥ स्थूलकद्रव्याणां चतुर्विशातिपणः ॥३८॥
हिरण्यसुवर्णयोश्चतुष्पश्चागरपणः स्त्रिया दण्डः ॥ ६९ ॥ पुंसो
द्विगुणः ॥४०॥
यदि काई स्त्री तथा पुरुष, रोके जाने पर भी, टोरी मोटी चीजें देकर
परस्पर एक दूसरे का उपकार करें, तो उनमें स्त्री को, १२ पण, ॥ ३७॥
बडी २ चीजों के लेन दन पर २४ पण, ॥३॥ और सोना अधया सोने
का सिक्का (या साने से बनी हुई कोई चीज आभूषण आदि) लेन देने पर
५४ पण दण्ड दिया जावे ॥ ३९ ॥ और (इन्हीं सब उपर्युक्त अपराधों में)
पुरप को स्त्री से दुगना दण्ड दिया जाये ॥ ४०॥
,
त एवागम्ययोरर्धदण्डाः ॥४१॥ तथा प्रतिपिद्धपुरुषव्यव.
हारेषु च ॥ ४२ ॥ इति प्रतिपेधः ॥४३॥
यदि वे स्त्री पुरष मापस म न मिरते हुए ही इन चीजो को लेते
देते हैं, तो पूर्वोक दण्ड से आधा दण्ड उनको दिया जाय ॥ ४१॥ इसी
प्रकार प्रतिषिद्ध पुरपी के व्यवहार में भी, दण्ड आदि का यही नियम समझना
चाहिए ॥ ४२ ॥ यहा तक उपकार और उपयहार प्रतिषध के विषय में कहा
गया ॥ ५३॥
४ अध्या०] धर्मस्थीय राजद्विष्टातिचाराभ्यामात्मापक्रमणेन च । स्त्रीधनानीतशुल्कानामस्वाम्यं जायते स्त्रियाः ।। ४४ ॥ इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे पियाहसयुक्त शुश्रूपाभ पारप्यपातिचारा उपकारव्यवहारप्रतिपधाश्च तृतीयोऽध्याय ॥ ३ ॥ आदित पष्टितम ॥ ६ ॥ राजा के साथ हेप करने पर (यागी हो जाने पर), आधार का उलङ्घन करने पर, आवारागर्द होने पर, कोई भी स्त्री अपने स्त्रीधन, (२०००) र० मा किया हुआ था आभूषण आदि) आनति, ( पति के दूसरी शादी करने पर, उससे निहार्थ प्राप्त हुआ धन) और शुल्क ( अपने बियाह के समय पति से अथवा बन्धु यान्धों स प्राप्त हुआ धन) की अधिकारिणी नहीं हो सकती॥४४॥ धर्मस्पीय तृतीय अधिकरण में तीसरी'अध्याय समात । ' -- Tv म M चौथा अध्याय ५९ प्रकरण विवाह संयुक्त में निष्पतन, पथ्यनुसरण हस्व प्रवास और दीर्थ प्रवास T पतिकुलानिपतितायाः स्त्रिया पटपणो दण्डोन्यत्र विप्र- कारात् ॥१॥ प्रतिपिद्धाया द्वादशएगः ॥२॥ प्रतिगृहाति- गतायाः पद्पणः ॥३॥ प्रातिशिकभिक्षुकदेहानामवकाश भिक्षापण्यादाने द्वादशपणो दण्डः ॥४॥ पति कुल से भागी दुईको ६ पण दण्ड दिया जाये। यदि वह किसी भय के कारण भागी हो तो कोई दोष नहीं ॥१॥ रोकने पर भी यदि काई स्त्री (पति की आज्ञा के विरद्ध) धर से चली जाय तो उसे १२ पण दण्ड दे चाहिए ॥ २॥ यदि पडौसी क ही घर में माय, साह पण दण्ड दिया जाय ॥३॥ विना आज्ञा अपा पड़ोसी को अपने घर में स्मान देने पर, भिखारी को भीख दने पर, व्यापारी को किसी तरह का माल देने पर, स्त्री को १२ पण दपट दिया जाय ॥ ४॥ प्रतिपिद्धानां पूर्वः साहसदण्ड. ॥५॥ परगृहातिगतापां IP
(२०)
कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधि.
चतुर्विशतिपणः ॥ ६॥ परमार्यावकाशदाने शत्यो दण्डो ज्य-
नापद्धयः ॥७॥
यदि कोई स्त्री प्रतिषिद्ध व्यक्यिों के साथ यही व्यवहार करे तो
परिमित
उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ५॥ यदि वह यताये
अपने सगीप के घरों से बाहर अतिरिक्त स्थानों में जाती है, तो उसे २४
पणे दण्ड दिया जाय ॥६॥ किसी दूसरे पुरप की स्त्री को, यदि उस पर
कोई आपत्ति नहीं है, अपने घर में ठहरा लेने पर १०० पण दण्ड दिया
जावे ॥७॥
पारणाझानयोर्निर्दोषः ॥ ८॥ पतिविप्रकारात् पतिज्ञाति-
सुखावस्थग्रामिकान्याधिभिक्षुकीज्ञातिकुलानामन्यतममपुरुष गन्तु-
मदोप इत्याचार्याः ॥९॥
परन्तु उस हालत में यह अपराध न होगा, जबकि भाने वाली स्त्री,
उसके (गृह स्वामी के) रोकने पर भी उसकी आज्ञा के विरच, अथवा
उसको न मालूम होने पर ही, घर में चली भीती हैn ॥ आचार्यों का
मत है कि पति के द्वारा धिक्कारे जाने पर कोई मा स्त्री, अपने पति के सम्बन्धी,
सुखी, गाय के मुखिया, अपगे धन आदि के निरीक्षक, भिक्षुकी, तथा अपने
सम्बन्धियों में से किसा के, पुरुप रहित घर में जाने पर दोपी नहीं होती ॥१॥
सपुरुपं वा ज्ञातिकुलं कुतो हि साधीजनस्य छलं सुसमे-
तंदवचोमिति कौटल्यः ॥१०॥ प्रेतव्याधिव्यसनगर्मनिमि-
तमप्रतिपिद्धमेष ज्ञातिकुलगमनम् ॥ ११ ॥
फोटेख्य का मरा है कि कोई भी साध्वी स्त्री, उपर्युक्त भवस्था
होने पर अपने सम्बन्धिया या पारिवारिक जनी के पुरुष युक्त (जहों
पुरुष विद्यमान हो) घरों में भी जा सकती है, क्योंकि यह अपने एलपूर्ण
ग्यवहार को छिपा नहीं सकती, अर्थात् उसके इस प्रकार आने के सब
कारण उसके पति या सम्बन्धियों को यही सरलता से मालूम हो सकते
है॥10॥ मृत्यु, बीमागे, आपत्ति, और गर्भ (प्रसर-बच्चा होना) भादि
भवसरोंपर, सम्पन्धियोंके यहां जानेमें कोई रोक टोक नहीं ॥१॥
तनिमित्त वारयतो द्वादशपणो दण्डः ॥ १२॥ तत्रापि
गूहमाना स्त्रीधनं जीयेत ॥ १३ ।। ज्ञातयो पा छादयन्तः शु-
कोषम् ॥ १६ ॥ इति निष्पतनम् ॥ १५ ॥
४ अभ्या०] धर्मस्थीय यदि कोई पुरुष, उपर्युक्त अवसरोंपर खी को सम्बन्धियों के यहां जाने से रोके, तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥१२॥ यदि नी स्वयं कोई महाना बनाकर, वदा जाने से अपने आपको छिपाले, तो उसका श्रीधन अन्त कर लिया जाय ॥ १३॥ यदि सम्बन्धी जन ऐसे अवसर की सूचना न देचे, भयात् लेन देन के भयसे ऐसे अवसर को छिपा लेवें, तो उनको शुल्क शेप (विवाह के समय प्रतिज्ञात, घरफी भोस्ले कन्या के सन्धियों को अय. शिष्ट देय धन) न दिया जावे ॥ ११॥ यहा तक स्त्रियों के निष्पतन (घर से पाहर जाने) का विचार हुआ ॥ १५ ॥ पतिकुलानिष्पत्य ग्रामांन्तरगमने द्वादशपणो दण्डः स्था- प्याभरणलोपश्च ॥ १६ ॥ गम्येन वा पुंसा सहप्रस्थाने चतुर्वि- शतिपणः सर्वधर्मलपश्चान्यत्र भर्मदानतीर्थगमनाभ्याम् ॥ १७ ॥ पति के घरसे भागकर दूसरे गांवमें जानेपर खीको १२ पण दण्ड दिया जाये, और उसके नामसे जमा की हुई पूंजी, रयां भीभूपण मी जब्त कर लिये जाय ॥ १६॥ गमन योग्य पुरुपके साथ जानेपर २४ पण दण्ड दिया जाय, और पतिके साथ होने वाले यज्ञ आदि सब धर्मोंगे उसे पदिष्कृत कर दिया जाय । परन्तु यदि यह अपने घरके भरण पोषण, या अन्य बिग- मान पतिके ही समाप लुगमन के लिये जाये, तो उसे अपराधी न समझा जाय ।। १७॥ पुंसः पूर्वः साहसदण्डस्तुल्यश्रेयसः ॥ १८ ॥ पापीयसो मध्यमः ॥१९॥ वन्धुरदण्ड्यः ॥२०॥ प्रतिपेधे ऽर्धदण्डः ॥२|| सथा इस उपर्युक्त अपराध में स्त्री के समान श्रेष्ठ जाति पाले पुरपको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥१०॥ मानव जाति पाले पुरप को पा साहस दण्ड ।। १९ ॥ उपयुक्त अयस्था में बन्धु दण्डनीय नही होता ॥ २०॥ निषेध किये जानेपर यदि यह इस व्यवहार को करे, तो उसे आधा दर्द दियो जावे ॥२१॥ पथि व्यन्तरे गूढदेशाभिगमने मैथुनार्थेन शङ्कितप्रतिपिद्धा- म्यों या पथ्यनुसारेण संग्रहणं विद्याद ॥ २२ ॥ तालोपचार चारगमत्स्यबन्धलुब्धकगोपालकशौण्डिकानामन्येपों में प्रमुष्ट- स्वीकाणां पध्यनुसरणमदोपः ॥ २३ ॥ मार्ग, जंगल अथवा गुप्तधान में मैथुन के लिये जाती हुई, मथवा किसी सन्देह युक्त (जिसपर कुछ सन्देह गा) या प्रतिषिय (जिसके साथ जान [३ अधि. (२२) कौटलीय अर्थशास्त्र को मना किया गया हो) व्यक्ति के साथ जाती हुई स्त्री को भागने के अपराध में गिरफ्तार किया जाये, और उसी के अनुसार दण्ड को ध्ययस्मा की जाये ॥ २२ ॥ गाने बजाने वाले कायक,भाट, मछियारे, व्याध (शिकारी छोटे २ पक्षी या पशु मारकर या पकदकर उनसे जीविका करमेनाले), ग्याले और कलवार तथा इसी प्रकार के अन्य पुरप जोकि अपने साथ ही साथ अपनी शियों को रखते हैं, इसके साथ जाने म स्त्री को कोई दोप नहीं ॥ २३ ॥ प्रतिपिद्धे या नयतः पुंसः स्त्रियो वा गच्छन्त्यास्त एवार्थ- दण्डाः ॥ २४॥ इति पथ्यनुसरणम् ॥ २५ ॥ निषेध किये जानेपर यदि कोई पुरप स्त्रीको रे जावे, या स्त्री स्वय किसी पुरपके साथ जावे, तो उनको नियमानुसार आधा दण्ड दिया जाये ॥२॥ यहां तक पश्यनुसरण (रास्ते म स्त्री का किसीके साथ जाना) के सम्बन्धमें विचार किया गया ॥२५॥ हस्वप्रयासिनां शूद्रवैश्यक्षत्रियब्राह्मणानां भार्याः संवत्सरो त्तरं कालमाकक्षिरन्नप्रजाताः संवत्सराधिक प्रजाताः ॥ २६ ॥ प्रतिविहिता द्विगुणं कालम् ॥ २७ ॥ थोडे समयके लिये याहर जाने वाले शूट, वश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों की पुनहीन म्रिया एक वर्ष, तथा पुप्रयती इससे अधिक समय तक उनके अने की प्रतीक्षा करें ॥२६ ॥ यदि पति उनकी भाजीविका का प्रबन्ध पर गये हों तो वे दुगने समय तक उनकी प्रतीक्षा करें ॥ २७ ॥ अप्रतिविहिताः सुसावस्था निभृयुः परं चत्वारि वर्षाण्यष्टौ था ज्ञातयः ।। २८ ॥ ततो यथादत्तमादाय प्रमुश्वेयुः ॥२९॥ और जिनके भोजना छादन का प्रयन्ध न हो, उनका, उनके समृध पन्यु पान्धर घार वर्ष, या अधिक से अधिक आठ वर्ष तक पारन पोपण करें ॥ २८ ॥ इसके पाद, प्रथम विवाह में दिये धनको यापस ऐकर दूसरी शादी के लिये भाज्ञा दे देव ॥ २९ ॥ ब्राह्मणगधीयानं दशाण्यप्रजाता द्वादश प्रजाता राज- पुरुषमायुः क्षयादाकाक्षेत ॥ ३० ॥ सपर्णतश्च प्रजाता नाप- वादं लभेत ॥ ३१॥ पटने के लिये पाहर गये प्राह्मणों की पुनरहित खियो दश वर्ष भौर पुप्रयता पारह वर्ष तक उनकी प्रताझा करें।॥ ३० ॥ यदि कोई व्यक्ति राजाके -
४ अध्या
धर्मस्थीय
(२३)
किसी कार्य से बाहर गये हो, तो उनकी सिया आयु पयत उनकी
प्रतीक्षा करे ॥ ३० ॥ यदि किसी समागरण (ब्राह्मणादि ) पुरुषस किसी स्त्री
के बच्चा पैदा हो जाय तो यह निन्दाय नहीं ॥ ३१॥
कुटुम्बाईलोपे वा मुसावस्पैविमुक्ता यथेष्ट विन्देत जीवि-
तार्थम् ॥३२॥ आपद्गता वा धर्मविवाहात्कुमारी परिगृहीतारमना-
ख्याय प्रोपितं श्रूयमाणं सप्ततीर्थान्याकाङ्क्षेत ।। ३३ ॥
कुटुग्यका सम्पारी का नाश होनेपर (या कुटुम्ब की बदती नष्ट हो
जानेपर अर्थात् काइ यच्चा आदि ग रहनपर) अथवा समृद्ध बन्धु यान्धवा से होने
जानेपर कोई या जीवन निवाई के लिए अपनी इच्छा के अनुसार अन्य
विवाह कर सकती है ॥ ३२ ॥ तथा धादि न रहने क कारण मापद्मस्त
वह युक्तर सी (अक्षतयोनि ) निसा विशह पहिले चार प्रकार के
धर्म विवादों के अनुसार हुआ हो, और उसका पति बिना कहे विदेश को
चला गया हो, सात मासिकधर्म पर्यन्त अपने पतिको प्रतीक्षा करे ॥३३॥
संवत्सरं श्रूयमाणमाख्याय ॥ ३४ ॥ भोपितमधूयमाणं पञ्च-
तीर्थान्याकाक्षेत ॥ ३५ ॥ दश श्रूयमाणम् ।। ३६ ।।
यदि यह पुरप कहकर गया हो, तो उसकी एक वर्ष तक प्रतीक्षा
को ॥ ३४ ॥ पतिके विदेश चले प्रापर यदि उसको दुध खयर न मिले, तो
पांच, १३५१ बार खयर मिलने पर दस मासिक धर्म पर्यन्त प्रती करे ॥३॥
एकदेशदत्तशुल्कं त्रीणि तीर्थान्यश्रूयमाणम् ॥ ३७॥ शू-
यमाणं सप्ततीर्थान्याकाक्षेत ॥ ३८ ॥
विवाह के समय प्रतिज्ञात धनमे से कुछ भोढाही भाग जिसने स्त्री
को दिया हो, और विदेश चले जानेपर उसकी (पति की) खबर भी कुछ न
मिली हो, तो तीन मासिक धर्म पर्यन्त ॥ ३५ ॥ तथा खबर मिलनपर सात
मासिक धर्म पर्यन्त, उसकी प्रतीक्षा को ॥ ३८ ॥
दत्तशुल्क पञ्चतन्यश्रूयमाणम् ।। ३९ ॥ दश श्रूयमाणम्
॥४०॥ ततः परं धर्मस्थैविसृष्टा यथेष्ट विन्देत ॥४१॥
जिसने विवाह के समय प्रतिज्ञात सम्पूर्ण धन दे दिया हो, और
विदेश पले आने पर उसकी कुछ सबर न मिले तो पाच ॥ ३९ ॥ तथा खयर
मिटने पर एस मासिक धर्म पर्यन्त उस को प्रसाक्षा करे ॥ ४०॥ इसके
(सपर्युक नियत समय के) या प्रत्येक स्त्री धर्माधिकारी से आशा पाकर
अपनी इमानुसार दूसरा विवाह कर सकती है ॥ ५ ॥
(२६) [३अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र विच्छेद होनेपर तो विद्यमान सर भाई सण्याके अनुसार परायर ६ सम्पत्ति को योर रे ॥५पितासे सम्पत्ति प्राप्त न होनेपर, भयंका पिताकी सम्पत्तिको याटकर भी जो भाई इक्टठे रहते और कमाते हैं, वे पिर भी सपत्ति का विभाग कर सकते हैं ॥६॥ जिसके कारण सम्पत्तिकी अधिक वृद्धि हो, यह सम्पतिका उचित अधिक भाग याटके समय ले ऐये ॥ द्रव्यमपुत्रस्य मोदर्या भ्रातरः सहबीपिनो या हरेयुः कन्याश्च रिक्थम् ॥ ८॥ पुरवतः पुत्राः दुहितरो वा धर्मिठेपु विवाहेषु जाताः ॥९॥ तदभाने पिता धरमाणः ॥१०॥ जिसके कोई पुत्र न हो, उसकी सम्पत्तिको उसके सगे भाई तथा अन्य साथी ले लेवें । और सुवर्ण भादिके आभूपण तथा नकदी कन्या ले लेवे ॥८ जिसके पुत्र हो, उसको सम्पत्तिके अधिकारी उसके पुत्र हो, अथवा वे लद. किया जो धार्मिक विवाहाँ (पहिले चार विवाहों) से उत्पन्न हुई हो ॥९॥ इनके (उक्त पुर पुत्रियोंके) न होनेपर उस मृतपुरुपका जीवित पिता ही सम्पत्तिका अधिकारी रहे ॥१०॥ पित्रमावे भ्रातरो भ्रातृपुत्राश्च ॥ ११॥ अपितृका यहवोऽपि च भ्रातरो भ्रात्पुनाश्च पितुरेकमशं हरेयुः ॥१२॥ पिताके न रहनपर, पिताके भाई तथा उनके पुत्र सम्पत्तिके अधिकारी समक्ष जावें ॥११॥ यदि पिताक न होनेपर, उसके बहुतस भाई और भाईयोंके पुष हो तो व पिताको सम्पत्तिको यरायर याट ले ॥१२॥ सौदर्याणामनेकपितृकाणां पितृतो दायविभागः पिभ्रात- पुराणां पूर्व विद्यमाने नापरमवलम्यन्ते ॥ ३ ॥ज्येष्ठे च कनि- छमग्राहिणम् ॥ १४॥ एकही मास ओक पिताओंक द्वारा उत्पस हुए ल क का दायविभाग पिताको ओरस होजाना चाहिय । क्योंकि फिर पिताके भाईयों (उपपितामा) के थडे एबे, पिताका अनुपास्थतिम घाटाको दायभाग देनमें ग पड़ करते हैं॥१३॥ इसलिये घटेके रहनेपर छाटका आधा हिस्सा मिल जाना चाहिय ॥१४॥ *: जीवद्विभागे पिता नैकं विशेपयेत् ॥ १५॥ न चैकमकार- णानिर्षिभजेत ॥ १६ ॥ पितुरसत्यर्थे ज्येष्ठाः कनिष्ठाननुगृहीयु- रन्यत्र मिध्यावृत्तेभ्यः ॥ १७ ॥ पदि पिता जीवित रहता हुआ ही अपनी सम्पत्तिका विभाग करना + TV । विदेशमें गये 1 T . ५ अध्या धर्मस्थीय। चाहे तो किसीको अधिक न देवे, अर्थात् सबको बराबर बांद देवे ॥१५॥ और विनाही किसी कारण अपने अनेक लइसे किसी एक कोही अलहदा न करे ॥१६॥ पिताकी सम्पत्ति न होनेपर, बड़े भाई छोटोकी रक्षा करें। यदि आचार सयवहार से अष्ट हो जाय तो उनकी रक्षा न करें ॥१७॥ ? प्रामव्यवहाराणां विभागः ॥१८॥ अमामव्यवहाराणां देय- विशुद्धं मायन्धुषु ग्रामद्धेषु वा स्थापयेयुर्व्यवहारप्रापणालोपि. तस्य वा ॥१९॥ संनिविष्टसममसंनिविष्टेभ्यो नैवेशनिक दयु:२० 'पुत्रोंके प्रासव्यवहार (यालिग) होजाने परहो सम्पत्तिका विभाग किया जाता है ॥१८॥ नायालिशीको सम्पत्ति, ठीक २ हिसरयके साथ उनके सामा अथा गांवके शुद्ध विश्वासी पुरुषों के पास रखदी जाये, जरतक कि चे मालिंग होजाये। हुए पुरपको सम्पत्तिका भी इसी तरह प्रबन्ध होना चाहे ये ॥१२॥ विवाहित बड़े भाई, अपने छोटे अविवाहित भाईयोंको विषाहके लिये खर्च देवें ॥२०॥ 'कन्याभ्यथ प्रादानिकम् ॥ २१॥ ऋणरिक्थयोः समी विभागः ॥ २२ ।। उदपात्राण्यपि निष्किंचना विभजेरनित्या- चार्याः ॥ २३ ॥ और कन्याओं के लिये उनके वियाह कालमें देनेको दहेज' आदिकर धन देवे ॥२१॥रण और भाभूपण तथा नकद धाको बराबर २ बांट लेवे ॥१॥ प्राधीन आचार्यों का मत है कि दरिद्ध जन अपने पानी आदिके बर्तनोको भी आपस में बांट लेखे ॥२३॥ छलमेतदिति कौटल्यः ॥ २४ ॥ सतोऽर्थस्य विर्भागो ना- सत एतावानर्थः सामान्यस्तस्यैतावान्प्रत्यंश इत्यनुमाप्य ध्रुवन्सा क्षिषु विभागं कारयेत् ॥ २५॥ पस्तु मोटरसफा नरहेकि ऐसा करना है। २५ किमि मान सपही सम्पत्तिका विभाग किया जाता है, अविधमानका नहीं । 'इवनी सम्पूर्ण सम्पत्ति है, इसमें इतना २ हिस्सा प्रत्येक व्यतिमा है' यह बात साक्षि- याँके सामने कहकर बदवार करवाया जाये ॥ २५ ॥ दुर्विभक्तमन्योन्यापहतमन्तर्हितमविज्ञातोत्पनं वा पुनरिभजेरन ..॥ २६ ॥ अदायादक राजा हरेखावृत्तिप्रेतकार्यवर्जमन्यत्र श्री- विषद्रव्यात् ।। २७ ।। नत्रविद्यम्यः प्रयच्छेत् ॥ २८-11 . 11
१२८)
फौटलीय अर्थशास्त्र [३.अधिक
यदि विभाग ठीक न हुआ हो, या उस सम्पत्तिम से किसी हिस्सेदारने
कुछ अपहरण करलिया हो, या कोई चीज रिपी रह गई हो, अथवा बंटवारे के
बाद कोई धोज अकस्मात् और मिलनाय, तो उस सम्पतिका पिर बांट कर
लिया जाय ॥ २६ ॥ जिस सम्पत्तिका कोई अधिकारी न हो उसे राजा ले रेवे।
परन्तु वीके जीवन निर्वाह और औवंदेहिक (धाद आदि) आदि कार्योक लिये
मितना धन आवश्यक होवे, वह छोड देवे । तया श्रीग्रियके धनको कदापि न
वे ।। २७ ॥प्रत्युत उस धनको वेदोंके जानने वाले विद्वानों को दे देये ॥२८॥
पतितः पतितासातः क्लीपश्चानंशाः ॥२९॥जडोन्मत्तान्ध-
कुष्ठिनश्च ।।३० । सति भार्यार्थे तेपामपत्यमतद्विधं मागं हरेत् ।।
३१ ॥ प्रासाच्छादनमितरे पतितवर्जाः ॥ ३२ ॥
पतित, तथा पतितसे पैदा हुए २, और नपुसकोंको दाय भाग नहीं
मिलता ॥ २९ ॥ सर्वथामूखं, उन्मत्त, अन्धे और कोटीभीमम्पत्तिके भधिकारी
नहीं होते ॥ ३० ॥ मायां को सम्पत्ति होने पर, यदि उनके (मूर्ख भादिजनों
के) लड़के उनके समान (मूखे आदि) नही होते, तो ये (लटके) सम्पत्तिम
दायभागी हो सकते है ॥ ३१ ॥ पतितीको छोडकर अन्य सभी (मूर्य आदि)
उस सम्पत्तिम से केवल, अपने लिये भोजन वन पासकते हैं॥३२॥
तेपां च कृतदाराणां लुप्ते प्रजनने सति ।
सृजेयुः बान्धवाः पुत्रांस्तेपामंशा प्रकल्पयेत् ॥३३॥
इति धर्मस्थाये नृतीये ऽधिकरणे दायविभागे दायकम पचमो ऽध्याय ॥५॥
आदितो द्विषष्टितम ॥२॥
यदि इन उपर्युक्त पुरुषाकी स्त्रिया हों, परन्तु अपनी अशसिसे ये उनमें
पच्चे पैदा न करसकें, तो इन पुरोके गन्धु पान्धय उनमें जिन पुत्रोंको उत्पन्न
करे, वे अपनी पुरानी सम्पत्तिके दायभागी हो सकत हैं ॥ ३३ ।।
धर्मस्थीय सृतीय अधिकरण में पांचया अध्याय समाप्त ।
६० प्रकरण।
छठा अध्याय ।
अंश विभाग।
एकत्रीपुत्राणां ज्येष्ठांशः ॥ १॥ ब्राह्मणानामजाः क्षनिया-
णामधा वैश्यानां गावः शूद्राणामवयः ॥२॥ काणलिङ्गास्तेषां
मध्यमांशः ॥ ३ ॥ भिन्नवर्णाः कनिष्ठांशः ॥ ॥
६ मंध्या धर्मस्थीय' (२९) एक स्त्रीके जय बहुतसे लड़के हों, तो उनमें से सबसे बड़े एकेका हिस्सा निम्न प्रकार होना चाहिये ॥ १॥ माझगाको बकरी, क्षत्रियोळे घोदे, वैश्याकी गाय, और शूद्रोंकी भेद। (अर्थात् वर्णों के अनुसार बड़े लड़केको सम्पत्तिका यह प्रधान भाग मिलना चाहिये) ॥२॥ उन पशुओम जो काणे हो, वे मध्यम अधीत् मंझले लड़केका (व के अनुसार)हिस्सा समझा. जावे ॥ ३ ॥ ओर ही रंगबिरंगे पद्य, सयस छोटे माईका हिस्सा 11 चतुप्पदाभावे रत्नवानां दशानां भागं द्रव्याणामेकं ज्येष्ठो हरेत् ॥५॥ प्रतिमुक्तस्वधापाशो हि भवति ॥६॥ इत्योशनसो विभागः॥७॥ पशुओंक न होनेपर, हीरे जवाहरातको छोड़कर बाकी सब सम्पतिका दसों हिस्सा बड़े लड़केको अधिक मिले ॥ ५॥ क्योंकि इससे यह पितृदेय अनादिके यन्धनले मुक्त हो जाता है। (इसका तात्पर्य यह है कि बड़े लड़केको अपने पूर्वज पितरों के लिये स्वधासपिण्डदान आदि देना पड़ता है, अत: उसपर अधिक भार न पड़े, इसलिये सम्पत्तिका दसवां हिस्सा उसे अधिक मिल जाना चाहिये) ॥ ६ ॥ दायक अंश-विभागके सम्बन्धमें यह उशना (शुक्र) आचार्म का मत है ॥७॥ पितुः परिवापाद्यानमाभरणं च ज्येष्ठांशः ॥ ८॥ शयनासनं भुक्तकांस्यं च मध्यमांशः॥९॥ कृष्णं धान्यायसं गृहपरिवापो गोशकटं च कनिष्ठांशः ॥ १० ॥शेषाणां द्रव्याणामेकद्रव्यस्य वा समो विभागः ॥ ११ ॥ पिताको सम्पत्तिसे सवारी और आभूषण बढ़े लड़केका हिस्सा ॥८॥ सोने यिानेका सामान तथा पुराने सन मझले लड़केका ॥ ९॥ और काला अम, लोहा, अन्य घरेलू सामान तथा बैलगाड़ी छोटे लड़केका हिस्सा समझना पाहिये ॥१०॥ वाकी बचे हुए, सब प्योका, या एक द्रव्यका बराबर २ घांट हो जाना चाहिये।"॥ अदायादा भगिन्यः मातुः परिवापाद्भुक्तकायाभरण- भागिन्यः ॥ १२ ॥ मानुपहीनो ज्येष्ठस्मृतीयमंशं ज्येष्ठांशाल्लभेत ॥ १३ ॥ चतुर्थमन्यायवृत्तिः ॥ १४ ॥ निवृत्तधर्मकार्यो चा कामाचारः सर्व जीयेत ॥ १५ ॥ दायभाग न लेनेवाली वहिन, माताको सम्मातिसे पुराने रतन तथा आभूः [३अधि. J - (३०) फौटलीय अर्थशास्त्र पग ले ऐवें ॥ १२॥ या लडका यदि नपुसक हो, तो उसको उसके निधित हिस्से से तीसरा हिस्सा मिले ॥ १३॥ यदि यह कुछ अन्याय भाचरण करता हो तो चौथा मिले ॥ १४॥ और यदि धर्म-कार्यासे सदा पृथक् रहता हो तथा सय कुछ अपनी इरडाके ही अनुसार करता हो तो उसे सम्पतिका कुछ भी हिस्सा न दिया जाय ॥ १५ ॥ तेन मध्यमकनिष्ठी व्याख्याता ॥ १६ ॥ तयोर्मानुपोपतो ज्येष्ठांशादर्घ लभेत ॥ १७ ॥ नानास्त्रीपुत्राणां तु संस्कृतासंस्कृ- तयोः कन्याकृतक्रियाभाने चैकस्याः पुनयोर्यमयोर्या पूर्वजन्मना ज्यष्ठभार ॥ १८ ॥ मध्यम और छोटे रडकके सम्बन्धमें भा ऐसे अवसरोपर यही नियम समझना चाहिय ॥ १६ ॥ यदि इन दोनॉमसे कोई एक पुस्वयमस युक्त (मानुपोपेत) हो (अर्थात् नपुसक न हा) तो यह बड़े माईके हिस्से मेंसे आधा है लेवे ।। १७ ॥ अनक खियोंक पुत्रोंमें उसहीको यह समझना चाहिये, जो अविवाहित स्त्रीके मुकायलमें विधि पूर्वक विवाहित खोसे उत्पन्न हुआ हो, चाहे यह पीछे हा उत्पन्न हो । अथवा एक खी कन्या अवस्थाम भार्या बनी है, और दूसरी अन्यभुक्ता, उनमस पहिलोका लडका ज्येष्ठ समझा जाये। यदि किसाके दो जुरले पदा हो जाय, तो उनमस वही ज्येष्ठ होगा जो पहिले पैदा हुआ है ॥१८॥ सूतमागधनात्यरथकाराणामैश्वर्यतो विभाग. शेपास्तमुप- जीवेयुः ॥ १९ ॥ अनीश्वराः समविभागा इति ॥ २०॥ सून, मागध, वास्य और रथकाराको सम्पत्तिका, उनके ऐधर्यके भनु सार विभाग करना चाहिये । अर्थात् जो लड़का उनमें प्रभावशाली हो यह सम्पत्ति से सेवे, और वाकी लडके उसीके भरोसपर जीवन निर्वाहका प्रयन्य रव ॥ १९॥ यदि उनम कोई विशेष प्रभावशारी न हो तो ये अपनी सम्प त्तिको पराबर २ बाट लेवें ॥२०॥ चातुर्वर्ण्यपुत्राणां ब्राह्मणीपुत्रश्चतुरोंऽशान्हरेत् ॥ २१ ॥ क्षत्रिया- पुरस्त्रीनंशान् ॥ २२ ॥ वैश्यापुत्रौ द्वावंशौ ॥ २३ ॥ एक शूद्रापुत्रः ॥ २४ ॥ तेन त्रिवर्णद्विवर्णपुत्रविभाग नियवैश्ययो- याख्यातः ॥२५॥ यदि किसी प्राह्मणके चारों वर्गों को लिया हो तो उनमसे ब्राह्मणीके सडकेको सम्पसिके पार भाग मिल ॥२॥ क्षग्नियाकै लरककोप्तीन भाग ॥२२॥ क 1 -- . ६ अंध्या धर्मस्यीय धेश्याके लडकको दो ॥ २३ ॥ और शूदाके लड़केको एक हिस्सा मिले ॥ २४ ॥ इसी प्रकार जहांपर क्षत्रियके घरमें तीन वोकी (क्षत्रिय, वैश्य शू), और वैश्यक परम दो वर्णोको (वैश्य शूर) जिया हो, उनके पुत्रों के लिये भी सम्पत्ति विभागका यही उपयुक्त नियम समझना चाहिये ॥ २५ ॥ ब्राह्मणस्थानन्तरापुत्रस्तुल्यांशः क्षत्रियवैश्ययोरर्धाशः ॥२६॥ तुल्यांशो वा मानुषोपेतः ॥ २७॥ पदि मालणके धरमें मारणी और क्षग्रिया दोहोके पुत्र हो तो वे सम्प. तिका परावर हिस्सा बोट लेवें । अर्थात् माह्मणके घरमैं उससे अश्यवाहित मीच जातिको खासे उत्पन्न हुँआ सदका सम्पूर्ण सम्गतेके आधेका हिस्सेदार होगा। इसी प्रकार क्षत्रिय और पश्यके घरमे इनसे अव्यवहित नीची जातिको खोसे उत्पर हुए लडके (समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए एकेके हिस्सेसे) भाधा हिस्सा पावे ॥ २६ ॥ जो पुरवसे युक्त (मानुपोपेत) हो, वह यरामरका ही हिस्सा लेने ॥ २७॥ तुल्यातुल्ययोरकपुत्रा सर्व हरेत् ॥ २८ ॥ यन्धूश्च विभूयात् ॥ २९॥ ब्राह्मणानां तु पारेंशवस्तृतीयमंशं लभेत ॥३०॥ समाग या असमान वर्गको खियोमेसे किसी एक्के, एकही लड़का उत्पा हुआ हो, तो वह पितामा सम्पूर्ण सम्पत्तिका मालिक होघे ॥ २६ ॥ ओर अपने पन्धु पान्धवों का रण पोषण करे ॥ २९ ॥ पारशर (माणसे शूमा में उत्पन हुआ) प्रामगोंकी सम्पत्तिके तीसरे हिस्सेका मालिक हाये ॥३०॥ द्वावंशो सपिण्डः कुल्यो वासन्न स्वधादानहेतोः ॥ ३१ ॥ तदभाचे पितुराचार्योऽन्तेवासी या ॥ ३२॥ सपिण्ड (मातृरलको सिमी बस उपना २) अथवा मजदीकी पनदानफी पीस उपरा हुमा लक' सम्मतिर दोनगल सकता जिसस कि यह अपने पिता आदिका एपदान का मकै ।। ३६ ।।दा सयके क होनेपर पिलायो भाच र भय भन्नवार्य शिष्म) उसी सम्पत्तिको अधिकारी होये ॥३२॥ क्षेत्रे वा जनयेदस्य नियुक्त क्षेत्रनं सुक्तम् । मावबन्धु. सगोत्रो का तस्मै तत्मदिरोद्धनम् ॥ ३३ ॥ इति धर्मस्यीये नृतीये ऽभिकरणे दायपिमार्ग शधिभाग एसो भ्याय ॥ ६॥ आदितलिपष्टितमः ॥ १३॥ -- 1 (३२) कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधिक अथवा उसकी खीसे नियोगके द्वारा उसपर हुआ एडा, या उसकी माताके यन्धु बान्धव या कोई सगोत्र (अत्यधिक समीपरा रिश्तेदार) उसकी सम्पत्तिका अधिकारी समझा जाये ॥ ३३ ॥ धर्मस्थीय तृतीय अधिकरण में छठा अध्याय समाप्त । - सातवां अध्याय। ६०प्रकरण। पुत्र विभाग। परपरिग्रहे चीजमुत्सृष्टं क्षेत्रिण इत्याचार्या ॥१॥ माता भस्रा यस्य रेतस्तस्यापत्यमित्यपरे ॥२॥ विद्यमानमुभयामिति कोटल्यः ॥३॥ आचार्यका मत है कि दूसरेके क्षेत्रमें डालेहुए बोजका मालिक क्षेमपति ही होता है। अर्थात् किसी पुरपसे अन्यकी खीमें उत्पन्न किया हुआ यचा, उस स्त्रोके पतिकी ही सम्पत्ति होती है ॥ ॥ परम्तु दूसरे विद्वानोका गत है कि जो यचा गिसके पीर्यसे पैदा हो, यह उसीका समगा जाये ॥ २ ॥ कौटल्य कहता है कि ये दोनोंही उस बारकके पिता समझे जाने चाहिये ॥३॥ स्वयंजातः कृतक्रियायामारसः ॥ ४ ॥ तेन तुल्यः पुत्रिका- पुत्रः ॥५॥ सगोत्रेणान्यगोत्रेण वा नियुक्तेन क्षेत्रजातः क्षेत्रजः पुनः ॥६॥ विधिपूर्वक विवाहित स्त्रीमें, स्वय उत्पस किया हुआ पुष औरस फहाता है ॥ ४ ॥ लडकीका लहका भी इसीके समान समझा जाता है ॥५॥ समान गोग्रवारे, अथया भित्र गोत्रकाले किसी पुरपसे अपनी स्त्रीके साथ नियोग कराकर जो यचा पैदा किया जाता है, यह क्षेग्रज कहलाता है ॥६॥ जनयितुरसत्यन्यस्मिन्पुत्रे स एव द्विपितृको द्विगोत्रो वा द्वयोरपि स्वधारिक्थमाग्भवति ॥ ७॥ तत्सधर्मा पन्धूनां गृहे गूढजातस्तु गूढजः॥ ८ ॥ बन्धुनोत्सृष्टो ऽपविद्धः संस्कर्तुः पुत्रः ॥९॥ पदि उत्पन्न करनेवाले पुरपके और कोई सड़का नहीं है, तो वही पिता (द्वि पितृक) अथवा दो गोनवाला (द्विगोय) लड़का उन दोनोंके पिण्ड दान और सम्पनिका भाषिकारी होता है, ॥ ॥ उसीकै समान जो बचा स्त्री ..
(३३)
धर्मस्थीय
..
७ अध्या०]
बन्धु-बान्धवोंके घर रहते हुए छिपे तौरपर पैदा होता है वह गुटज कहाता
है।॥ ८॥ यदि यन्धु-पान्धव उसको अपने यहां न रखें, और कहीं बाहर उस
को डालदें, या फेंकदें, तो जो कोई उस पचेका पालन पोषण करले, उसहीका
(संस्कर्तुः) वह लड़का समझा जाता है ॥२॥
कन्यागर्भः कानीनः ॥ १० ॥ सगर्भोढायाः सहोढः ॥११॥
पुनर्भूतायाः पौमर्भवः ॥ १२ ॥ स्वयंजातः पित्यन्धूनां च
दायादः।।१३॥
कन्याके गर्भसे जो यचा पैदा हो उसे कानीन कहते हैं ॥ १० ॥ गर्भ-
वती स्त्रोका विवाह होनपर जो बचा पैदा हो उये सहोद कहते है ॥११॥
दूसरीयार विवाहित हुई २ खीसे जो बच्चा पैदा होता है, उसे पै.नर्भव कहा
जाता है ॥ १२ ॥ पिता या बन्धुओसे स्वयं उत्पक्ष किया हुआ यालक उनकी
सम्पत्तिका दायभागी होता है ॥१३॥
परजातः संस्कर्तुरेव न बन्धूनाम् ॥ १४ ॥ तत्सधर्मा
मातापितुभ्यामद्भिर्मुक्तो दत्तः ॥ १५ ॥
जो दूसरेफे द्वारा उत्पन्न हुआ हो (इसका तात्पर्य 'गूदज' पुनसे मालूम
होता है) यह संस्कनी (पालन पोषण करनेवाले) कोही सम्पत्तिका अधिकारी
होता है, यन्धु-धान्धयोंकी नहीं ॥ १४ ॥ उसहोके समान जो, माता पिताओं
के द्वारा, हाथमें जल लेकर किसी दूसरेको देदिया गया हो, यह दत्त, जिसको
दिया गया हो, उसोको सम्पत्तिका अधिकारी होता है ॥१५॥
स्वयं बन्धुभिर्वा पुप्रभावोपगत उपगतः ।। १६ ॥ पुत्रत्वेना-
ङ्गीकृतः कृतकः ॥ १७॥ परिक्रीतः क्रीत इति ॥ १८ ॥
जो स्वयं या यन्धुओं द्वारा पुत्रमावसे प्राप्त हुआ
जिसको पुनभावसे स्वीकारकर लिया गया हो यह कुराक ॥ १७॥ और जो
सरीदकर पुन मनाया गया हो, वह क्रीत कहांता है ॥१८॥
औरसे तूत्पन्ने सवर्णास्तृतीयांशहराः ॥ १९ ॥ असवर्णा
प्रासाच्छादनभागिनः ॥२०॥ ब्राह्मणक्षत्रिययोरनन्तरापुत्राः
सवर्णा एकान्तरा असवर्णाः ॥ २१ ॥
औरस पुनके उत्पन्न होनेपर, भन्य सवर्ण नियोंसे उत्पा हुए लड़के
पिताकी जायदादके तीसरे हिस्सेके मालिक होते हैं । १९ ॥ और जो असवर्ण
सिपोंसे उत्पन्न हों, वे केवल भोजन-वन पासकते हैं ॥ २० ॥ मायण और
वह उपगत ॥१६॥
कौटलीय अर्थशास्त्र [३अधिक
'क्षत्रियके अगन्तर (पाह्मणके लिये क्षत्रिया और क्षत्रियके लिये पश्या) जातिकी
स्त्रीसे उत्पन्न हुए पुन सवर्ण ही समझ जाते हैं। जो एक जातिक म्यवानमे
उत्पस हों, अर्थात् पाहणसे वैश्याम क्षनियत पद्गाम, ये असवणं समझे
जाये ॥२१॥
ब्राह्मणस्य वैश्यायामम्यष्ठ. ॥ २२ ॥ शूद्रायां निपादः
'पारशवो वा ॥ २३ ॥ क्षत्रियस्य शूद्रायामुग्रः ॥२४॥ शूद्र
एव वैश्यस्य ॥ २५ ॥
माझणका पैश्याम उत्पन्न हुआ पुन सम्यष्ठ कहाता ६॥ २२ ॥ माणसे
जो शूदामें उत्पन्न होता है, उसे निपाद या पारसय कहते हैं ॥ २३ ॥ क्षग्नियसे
शुदाम उत्पन्न हुआ २ उम्र कहाता है ॥ २४ ॥ वैश्यका जो शूदा उत्पन्न
हो वह शूदही रहेगा ।। २५ ॥
सवर्णासु चैपामचरितत्रतेभ्यो जाता जात्याः ॥२६॥ इत्य-
नुलोमः ॥ २७॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और पैश्यही सपर्णा खियोमे उत्पन्न हुए २ लड़के
समयपर विधिपूर्वक उपनयन और ब्रह्मचर्य आदि मतोंका अनुदान न करने के
कारण यात्य हो जाते हैं ॥ २६ ॥ ये सय अनुलोम (उच्चवर्ण पुरपसे नीचवर्ण
स्त्रीमे) विवाहासे उत्पन्न होते है ॥ २७ ॥
शद्रादायोमवक्षसचण्डालाः ॥ २८ ॥ वैश्यान्मागधवैदेहको
॥ २९ ॥ क्षत्रियात्सूतः ॥ ३०॥
शूदसे, वैश्या क्षयिया और ग्राहाणी में उत्पन्न हुए पुन यथा संरय आयो-
गव, क्षजा और पण्डाल कहाते है ॥ २८ ॥ इसी प्रकार वैश्यसे, क्षनिया और
माक्षणीमें उत्पन्न हुए मागध और वैदेहक ॥ २९ ॥ तथा क्षनियसे ब्राह्मणीमे
उत्पन्न हुआ सूत कहाता है ॥ ३०॥
पौराणिकस्त्वन्यः सूतो मागधश्च ब्रह्मक्षनाद्विशेषः ॥३१॥
त एते प्रतिलोमाः स्वधर्मातिक्रमाद्राज्ञः संभवन्ति ॥ ३२ ॥
परन्तु जो सूत और मागध नामके पुरप पुराणाम वर्णित किये गये हैं वे
इनसे विल्लुल मिला है, तथा ब्राह्मण और क्षनियोसे भी श्रेष्ठ है ॥३२॥ राजा जय
अपने धर्मका पालन नहीं करता तभी में प्रतिलोम (नीचवर्ण पुरपसे उचवर्ण
स्त्री उत्पच हुए) वर्णसकर पैदा होते है ॥ ३ ॥
७ अध्या०] धर्मस्थीय (३५) उग्रान्नैपाद्यां कुक्कुटः ॥ ३३ ॥ विपर्यये पुल्कसः ॥ ३४ ॥ वैदहिकायामम्बष्ठाद्वैणः ॥ ३५॥ विपर्यये कुशीलयः ॥ ३६॥ क्षत्तायामुग्राच्छ्वपाक इत्येते चान्तरालाः ॥ ३७ ।। जो उम (नामक संकर जातिक) पुरुपसे निषाद स्त्रीमें उत्परा होता है, उसे कुक्कुट या फुटक कहा है ॥ ३३ ॥ जो निपाद पुरुपसे उमा स्त्री हो उसे पुल्कस कहते है ॥ ३५ ॥ अम्मष्टसे यरेदिका ण उत्पन्न होता है ॥३५१ और निदेहकर अम्बधा कुशीख्य ॥ ३६ ॥ उग्र क्षत्ताने श्वपाक, इसी प्रकार और भरे भवान्तर संकर जातियां समझगो चाहिये । ३७ ॥ कर्मणा येण्यो रथकारः ॥३८ १ तेपां स्वयोनी विवाहः ॥ ३९ ॥ पूर्वापरगामित्वं पृचानुवृत्तं च स्वधर्म स्थापयेत् ॥४०॥ शूद्रसधर्माणो का ।। ४१ ॥ अन्यत्र चण्डालेभ्यः ॥ ४२ ॥ वैग्य कर्म करनेसे रधकार होजाता है ॥ ३८ ॥ उनका अपनाही नाति- में विवाह होता है ॥ ३९ ॥ ऊपर नीचे जाने, भोर धर्मका निर्णय मानेमें ये अपने पूर्वजोका ही अनुगमन करे ॥ १० ॥ भयवा चालोको छोड़कर सभी संकर जातियों के धर्म शूद्रोंके समान ही समझन चाहिये ।। ५५ ५ ॥ १२ ॥ केवलमेवं वर्तमानः स्वर्गमामोति राजा नरकमन्यथा ॥४३॥ सर्वेपामन्तरालानां समोविभागः ॥४४॥ केवल इस प्रकार से अपनी प्रजाको व्यवस्था करता हुभा राजा स्वर्गको प्राप्त होता है, अन्यथा नरक पाता है ।। ४३ ॥ सब संकर जातियों में, जायदाद का यराबर हिस्सा ही होना चाहिये ।। ४४ ॥ देशस्य जात्या संघस्य धर्मो ग्रामस्य वापि यः। उचितस्तस्य तेनैव दायधर्म प्रकल्पयेत् ॥ ४५ ॥ इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायधिभागे पुग्नविभागः सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ दायविभागः समासः | आदितचतुःपष्ठितमोऽध्यायः ॥१४॥ देशका जातिवा सएका तथा गायका जो उचित धर्म हो, इपीके अनुसार यहांके दायभागका नियम होना चाहिये ॥ ५५ ॥ धर्मस्थीय वतीय अधिकरण में लातयां अध्याय समाप्त ।
[३भधिक
-
(३६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
आठवा अध्याय
६१ प्रकरण
गृह वास्तुक!
सामन्तप्रत्यया वास्तुविवादाः ॥१॥ गृहं क्षेत्रमारामः
सेतुवन्धस्तटाकमाथारो वा वास्तुः ॥२॥ कर्णकीलायससंबन्धो
ऽनुगृहं सेतुः ॥३॥
पास्नु विषयक प्रगमका निर्णय सामन्त (गांवके मुखिपा) करें ।
पर, खेत, याग, सीमायन्म तालाब और यन्द (जल रोकने के लिये पनाये हुए
बांध) आदि सप वास्तु कहाते हैं ॥ २॥ प्रत्येक घरके चारों ओर कोनॉपर लोहे
के छोटे खम्भे गाडकर उनमें रोहेका तार खींच देना चाहिये, यह सीमाका
घोतक है, यही सेतु कहाता है ॥३॥
यथासेतुभोगं वेश्म कारयेत् ॥ ४ ॥ अभूतं या परकुड्याद-
विक्रम्य ॥५॥ द्वावरली त्रिपदी वा देशपन्धं कारयेत् ॥ ६॥
सोगाके अमुसार ही मकाम बनवावे ।अर्थात् जितनी सम्बो चोदीजामीम
हो, उसहोके भनुसार मकान होना चाहिये। ॥ दूसरेको दीवारके सहारे कोई
मकान खदा न करे ॥ ५॥ दो भरती (२ अरखी फुट) या तीन पद,
मकानको नायम कंकरीट कुटयाना चाहिये ॥६॥
अवस्करभममुदपानं पानगृहोचितमन्यत्र सूतिकाकूपादानि-
दशाहादिति ।। ७ ।। तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ॥ ८ ॥
दस दिन के लिये बनाए हुए सूतिका गृहको छोडकर पाको सय मकानॉम
पाखाना, जलनिकलनेका नालियां, फूा, तथा पाकशालाके साथ खाने पीनेका
मकान (भोजन शाला) भी अवश्य बनाने चाहिये ॥ ॥ इस नियमका उल्लं.
घन करने पर प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥
तेनेन्धनावघातनकृतं कल्याणकृत्यष्याचामोदकमार्गायच्या-
ख्याताः ॥९॥ त्रिपदीप्रतिक्रान्तमध्यर्धमरसिं वा प्रवेश्य गाढ-
प्रसृतमुदकर्माग प्रसरणं प्रघातं वा कारयेत् ॥ १० ॥ तस्याति-
क्रमे चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः ॥११॥
इसी प्रकार विवाह आदि उत्सयों में कुल्लेका पानी याहर निकलने के लिये
मालियों, सपा भट्टी भादिके लिये स्थानका प्रबन्ध भी मकामाने रसमा चाहिये ॥९॥
८ अध्या०] धर्मस्थीय (३७) तीन पद या १६ अरखी गहरा, तूप चिकना या साफ दीवारके साथ २ पामी पहने के लिये पतनाला बनवावें । अथवा दीवारसे अवगगिरने वालाही पसनाला लगवा दे ॥ १०॥ इस नियमका उल्लघन करने पर ५४ पण दण्ड दिया जाचे ।। ११ ॥ एकपदी प्रतिक्रान्तभरलिं वा चकिचतुष्पदस्थानमग्निष्ठमु- दअरस्थानं रोचनी कुट्टनी का कारयेत् ॥ १२ ॥ तस्यातिक्रमे चतुर्विशतिपणो दण्डः ॥ १३ ॥ घरके बाहरकी ओर एक धार खम्भोका भगिमस्थान (मशाला) या घाये, जिसमे एक पद या एक अरनों गहरा पानी निकलने का स्थान अवश्य हो । उसके साथ एक ओरमें आरा आदि पसिनेके लिये पाकीफा स्थान, तथा अन्न भादि कूदने के लिये भोसलीका स्थान पनचायें । ५२ ॥ ऐसा न करनेपर २४ पण दण्ड दिया जावे १३॥ सर्ववास्तुकयोः प्राक्षिप्तकयोर्क शालयोः किप्परन्तरिका विपदी वा ॥ १४ ॥ तयोश्चतुरंगुलं नीबान्तरं । समारूढकं वा . प्रत्येक साधारण दो मकामों के बीचम, या उज्जे या उसारे वाले मकानों के जजों या उसारोक यांची एक किस्कु (१ किकु-१३ फुट या एक हाम) या तीन पदका फासला अवश्य होना चाहिये ॥१४॥ किन्दी दो मकानों की छत्तोम या तोचार अगुलका फरक होना चाहिये, याचे आपसम मिली हो ॥१५॥ किष्कमात्रमाणद्वारमन्तरिफायर्या खण्डफुल्लार्थमसंपातं कार- येत् ।। १६ ।। प्रकाशार्थमल्पमूर्य वातायनं कारयेत् ॥ १७ ॥ तदयसिते वेश्मनि च्छादयेत् ॥ १८ ॥ गलीकी ओर एक किक मात्र परिमण याला छोटासा दरवामा बगवाये, जो यथापसर खोला जासके और सूत्र मजबूत हो ॥ १६॥ प्रकाश मानेके रिये उससे कुछ ऊपर एक रोशनदान लगाव।।१७॥ अन्तिम मकान के रोशनदानपर कुछ टोन आदि अवश्य लगवाना चाहिये । शाकि भीतरके धंधके मकानॉम रोशनदान पर साया की आर३पता नहीं होती ॥ १४ ॥ संभ्य वा गृहस्वामिनो यथेष्टं कारयेयुरनिष्टं चारयेयुः ॥ १९ ॥ वानलट्याशेर्भमाहार्यभोगकटप्रच्छन्नमवमर्शभित्ति घा कारयदर्पयाधामयात् ।। २० ॥
[३ अधिक स - (२८) फौटलीय अर्थशास्त्र अथवा पास २ के मकानोंके मालिक आपसमें मिलकर इच्छानुसार मकान यमयालें, और एक दूसरंको कष्ट न होने दें ॥18॥ इतके अपर अस्थायी तौरपर दीवारोंके सहारे एक मका छप्पर दख्या ऐर, जिससे कि छतपर मोते समय बपी मुमै पृष्टिके द्वारा कोई फर न हो ॥ २० ॥ तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ।। २१ ।। प्रतिलोमद्वारवाता- यनबाधायां च ॥ २२ ॥ अन्यत्र राजमार्गरथ्याभ्यः ॥ २३ ॥ ऐसा न करनेपर प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥२९॥जो पुरष बाहर की ओर दरकागा या खिड़की पनाकर पड़ोसियोंको कष्ट पहुंचाये उमें भी प्रथम. साहस दण्ड दिया जाय ॥ २२ ॥ पदि पे दरवाजे या खिड़कियो शाही सरक मा पाजार की भोरको हो तो कोई हानि नहीं ॥ २३ ॥ खातसोपानप्रणालीनिश्रेण्यवस्करभागवाहियांधायां भोगनि- ग्रहे च परकुल्यसुदकेनोपनतो द्वादशपणो दण्डः ॥ २४ ॥ मूत्र- पुरीपोपघाते द्विगुणः ॥ २५॥ गम्ता, सौदी (जीना) नाली, लकड़ीको सीढ़ी (नसनी) और पाशाना भादिसे जो याहरके पड़ौसिमों को कष्ट पहुंचाये, सहन को रोके, तयां पानी निकलनेका ठोक प्रयन्ध न करने के कारण दूसरेको दीपारको हनि पहुंचाने, उसे १२ पण दण्ट दिया जाय ॥ २५ ॥ मूत्र और पासानेको स्कायट करनेपर २४ पण दण्ट दिया जाय ॥ २५॥ प्रणालीमोक्षो वर्पति ॥ २६ ॥ अन्यथा द्वादशपणो दण्ड: ॥ २७॥ प्रतिषिद्धस्य च वसतो निरस्वतश्वावक्रयणम् ॥ २८ ॥ अन्यत्र पास्यस्तेयसाहससंग्रहणमिथ्याभोगेभ्यः ॥ २९ ॥ चपी पनुमे हर एक नाली बुलो रहनी चाहिये । (ताकि पूड़ा करकट इकट्ठा होजाने से नाली यन्द न हो जाय) ॥ २६ ॥ ऐसा न करनेपर २ पण दण्ड दिया जाये ॥ २७ ॥ मालिकके द्वारा मना किये जानेपर भी जो किरायेदार मकान न यो तथा फिराया दे देने परभो जो मालिक, किरायेदारको मकानसे निकाले, उन्हें १२ पण दण्ड होना चाहिये ॥ २८ ॥ परन्तु उनमें से क्सिीका भी कठोर भाषण, चोरी, डाका, व्यभिचार तथा मिथ्याध्यवहारका कोई मामला न हो ॥ २९॥ स्वयमभिप्रस्थितो वीचक्रयशेपं दद्यात् ॥ ३० ॥ सामान्य वैश्मनि साहाय्यमप्रयच्छतः सामान्यप्तपरुन्धतो भोगनिग्रहे द्वादशपणो दण्डः ॥ ३१ ॥ पिनाशयतस्तद्विगुणः ॥३२॥ "
९अध्या
धर्मस्थीय
यदि किरायेदार अपने आप मकान को छोड़े, सो सालभर का थाकी
किराया मालिक को अदा करे। ३० ॥ पञ्चायती मकानों में (धर्मशाला आदिमें)
सहायता न देने वालेको, तथा उसे कार्यमें लानेके लिये रावट करने वालेको
१२ पण अरमाना किया जाय ॥३१॥ ऐसे मकानोंको गो सराम करे उसे २४
पण दण्ड दिया जाय ॥ ३२॥
कोष्ठकाङ्गणवजीनामग्निकुट्टनशालयोः ।
विवृत्तानां च सर्वेषां सामान्ये भोग इष्यते ।। ३३ ।।
इति धर्मस्थीये तृतीये ऽधिकरणे वास्तुके गृहवास्तुकमष्टमा अध्यायः ॥८॥
आदितः पत्रपटिरप्रायः ॥६५॥
कोठे और आंगन को छोरकर अग्निशाला तथा कुटनशाला,
सब ही खुले स्थानोंका उपयोग सब लोग कर सकते है ।। ३३ ।।
धर्मस्थीय तृतीय अधिकरण आठयां अध्याय समाप्त ।
+
भार अन्य
नौवां अध्याय।
६१ प्रकरण।
वास्तु-विक्रय ।
ज्ञातिसामन्तधनिकाः क्रमेण भूमिपरिग्रहान्क्रेतुमभ्याभवेयुः
॥१॥ ततोऽन्ये वाद्याः सामन्तचत्वारिंशरकुल्या गृहप्रतिमुखे
वेश्म श्रावयेयुः ॥ २॥
अपने कुटुम्सी, गांवका मुखिया तथा धनीलोग हो कमश' मकान या
जमीन आदि खरीद सकते हैं ॥१॥ यदि ये खरीदना चाहें तो दूसरे,
गांवसे याहरके सामन्त तथा उनके चालीस कुलातकके पुरपाको, मकानके
सामनेही मकानका दाम मुनाया
सामन्तग्रामवृद्धेषु क्षेत्रमाराम सेतुबन्धं वटाकमाधारं वा
मर्यादासु यथासेतुभोगमनेनार्पण का क्रेता इति बिराघुपितवीत-
मव्याहतं क्रेता केतुं लभेत ॥३॥
मायके मुखिया सथा अन्य वृद्ध पुरपके सामनेही बेत, याग,
सीमायन्ध, साराप, और रोज़ आदिके, उनकी हैसियराके मुतायिक नियम-
पूर्वक मूल्य की, 'इतने वामपर कोन सरीदेगा' इस प्रकार सॉनवार आपात्र
य॥२॥
(४०) ३ अधिः कौटलीय अर्थशास्त्र लगाई जाधे, जो सरीदनेवाला घोलोयोले, यह बिना किसी रोकटोकके मकान आदिको खरीद लेवे ॥३॥ स्पर्धितयोर्वा मूल्यवर्धने मुल्यवृद्धिः सशुल्का कोशं गच्छेत् ॥४॥ विक्रयप्रतिकोष्टा शुल्कं दद्यात् ।। ५ ॥ अस्वामिप्रति- कोशे चतुर्विशतिपणो दण्डः ॥६॥ बोलीमें स्पर्धापूर्वक मूल्य यदानेपर, शुल्क सहित यदाया हुआ मूल्य सरकारी कोष में जमा किया जावे ॥ ४ ॥ बेचनेकी योली योलनेवाला शुल्क देवे ॥५॥ मकान मालिककी अनुपस्थितिमें नीलामीके रिये उसके मकानको- बोली बोलदेनेपर २४ पण दण्ड दिया जावे ॥ ६ ॥ सप्तरात्रादूर्ध्वमनभिसरतः प्रतिष्टो विक्रीणीत ॥ ७ ॥ प्रतिक्रष्टातिक्रमे वास्तुनि द्विशतो दण्डः ॥ ८॥ अन्यत्र चतुर्वि- शतिपणो दण्डः ॥९॥ इति वास्तुविक्रयः ॥ १०॥ सूचना देनेपर मात दिनतक यदि मालिक न आवे तो बोली बोलने. वाला पुरुष उसको अनुपस्थितिमें ही मकान बेच देये ॥ ७ ॥ कोई पुरुष घोली देनेपर याद मकान आदि लेनेसे इन्कार करे, तो उसपर२००पण दण्ड किया जाय ॥ ८ ॥ मकान आदिसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंके मामले में २४ पण दण्ड देना चाहिये ॥ ९॥ यहांतक मकान आदिके येचनेका विपर कहा गया है॥१०॥ सीमविवादं ग्रामयोरुभयोः सामन्ताः पश्चग्रामी दशनामी वा सेतुभिः स्थावरैः कृत्रिमर्वा कुर्यात् ॥ ११ ॥ गांवोंकी सीमाके झगड़ोंका, उन दोनों गांवोंके मुखिया, या आस- पासके पांच गांव अथवा दस गांपके मुखिया, आपसमें मिलकर, स्थायी या बनायी हद्दपन्दियोंके द्वारा, निर्णय करें ॥१०॥ कर्षकगोपालवृद्धकाः पूर्वमुक्तिका वा बाह्याः सेतूनामन- भिज्ञा पहय एको वा निर्दिश्य सीमसेतूविपरीतयेपाः सीमानं नयेयुः ॥ १२ ॥ गांवके किसान, ग्वाले, वृद्ध, सथा अन्य बाहरके अनुभवी पुरुष बहुत या एक, जोकि इदको ठिमबन्दीसे परिचित नहीं, अपने चेपमें परिवर्तन करके (देखो मनु. ८, २५६, माज्ञ. २,५२) सीमाके चिन्होंको लक्ष्यकार, गायोंकी सीमाका निर्णय करें, अथवा उसको यनाये ॥१२॥ "
९ मध्य
धर्मस्थीय
उद्दिष्टानां सेनामदने सहस्रं दण्डः ॥१३॥ देव नीवे.'
सीमापहारिणां सेतुच्छुिदां च कुर्यात् ॥ १४ ॥ प्रनष्टसेतुमार्ग
वा सीमाने राजा यथोषकार विजेते ।।१५।।
निर्णय किये हुए या बनाये हुए सीमाके चिन्हों में देव नपर
अपराधीको १००० पण दण्ड दिया जाय ॥ १५ ॥ यही द उस' पुरुषको
दिया जाय, कि जो सीमाकी भूमिका अपहरण करे या सोमा चिन्होंकों
काटे ॥ ११ ॥ जहापा सीमाके चिन्ह नष्ट होगये हाँ, कोई निर्णयको साधन न
मिले, वहीं राजी स्वय इस प्रकार सीमाका विभाग करे कि जिससे किसीको
हानि नहो, अधात् सपही माम निवासियोंका यथावर उपकार हो ॥ १५ ॥
क्षेत्रविवाद सामन्तवामद्धाः कुयुः ॥ १६ ॥ तेषां वैधी भावे
यतो बहवः शुचयो ऽनुमता या ततो नियच्छेयुः ॥ १७ ॥ मध्यं
वा गृहीयुः॥१८॥
खेती शर्गको निर्णय गायके मुखिया वृधि पुरुष को 15 पद
उनका श्रापसमें एकमत न हो तो बहुतसे धार्मिक, जिनको प्रजा स्वीकार करें,
बेही इनका निर्णय कर देधे ॥ १७॥ या किसीको मध्यस्थ (पर) पनाले,
उसहीके मिर्णयानुसार कार्य करें ॥ १८ ॥
तदुभयं परोक्तं वास्तु राजा हरेत् ॥ १९ ॥ प्रनष्यामिक
चयापकार वा विभजेत् ॥ २० ॥ प्रसंवादानें वास्तुनि स्तय-
दण्डः ॥२१॥
यदि इन शेनोंसे भी निर्णय न हो, तो राजाय उन शेत, आदिको
के लेखे १९ ॥ ओर इस सम्पत्तिको भी ले ले, जिसका कोई मालिक नहीं।
भथया इनका इस प्रकार विभाग कर देवे, जिसस कि जनताका अधिकाधिक
जो पुरुष, मकान भूमि आदि स्थायी सम्पत्तिपर पलाकार
अपना भधिकार जमाये, उसे चोरीका दण्ड दिया जाय ॥ २०॥
कारणादाने प्रयासमाजीचं च परिसंख्याय बन्धं दद्याव-
॥ २२ ॥ मर्यादापहरणे पूर्वः साहसदण्डः ॥ २३ ।। मर्यादामेदे
चतुर्विंशतिषणः ॥ २४
परन्तु जो किसी कण आदिके कारण ले तो भूधामीके शारीरिक
का फल, तथा सम्पत्तिका ऋणस अधिक मूल्य कोपर यह अधिक धन, उसको
कर दिसाय करके देदेथे ११ १२ १ सीमा सरकाने, अर्थात् अपनी ओर
घाम हो ॥ २०॥
[३ भापक
.
(२)
कोटलीय अर्थशास्त्र
मिलानेपर प्रथम साहस दण्ठ ॥ २३ ॥ और सीमा पिन्होंके तोरनेपर २४ पण
दण्ड दिया जाय ॥२४॥
तेन तपोवनाविवीतमहापथश्मशानदेवकुलयजनपुण्यस्थान-
विवादा व्याख्याताः ॥ २५ ॥ इति मर्यादास्थापनम् ॥२६ ।।
इससे तपोवन, चरागाह, यही सहक, श्मशान, देवालय, यज्ञस्पान,
तथा अन्य पुण्यस्थान आदिके विवादोंका निर्णय भी समझ रेना चाहिये ॥२५॥
यहांतफ सीमा विषयक विचार किया गया ॥ २६ ॥
सर्व एव विवादाः सामन्तप्रत्ययाः ॥२७॥ विवीतस्थलकेदार
पण्डखलवेश्मवाहनकोष्ठानां पूर्व पूर्वमावाधं सहेत ॥ २८ ॥
सब तरहके वियादोंका निर्णय सामन्त लोग करें ॥ २७ ॥ चरागाह,
क्यारियां (जोते जानेवाली भूमि) खलिहान, मकान और घुरसाल इनके
सम्पन्ध झगड़ा होने पर इस प्रकार निर्णय किया जाप, जिससेकि अगलंकी
अपेक्षा पहिले में किसी प्रकारकी याया न पडे।भधार निर्णयमें उत्तरकी अपेक्षा
पूर्वको प्रधानता दी जावे ॥२८॥
ब्रह्मसोमारण्यदेवयजनपुष्पस्थानवर्जाः स्खलप्रदेशाः ।। २९ ॥
आधारपरिवाहकेदारोपभोगैः परक्षेत्रकृष्टवीजहिंसायां यथोपघातं
मूल्यं दयुः ॥ ३०॥ केदारारामसेतुबन्धानां परस्परहिंसायां
हिंसाद्विगुणो दण्डः ॥३१॥
प्रहारण्य, सोमारण्य, देवस्थान, यशस्थान और अन्य पुण्यस्थानोंको
छोड़कर शेष सब ही प्रदेश क्षेत्रके योग्य समझने चाहिये । अर्थात् आवश्यकता
होनेपर उपर्युक्त स्थानोंको छोड़,अन्य सभी स्थानों में सेती कराई जा सकती है
॥ २९ ॥ जलाशय, नालो, या क्यारी बनाते हुए यदि किसीके खेतमें योये हुए
बीजका नुक्सान होगाय, तो उस हानिके अनुसारही उसका मूल्य चुका देना
चाहिये ॥ २० ॥ यदि कोई पुरुष खेरा, यागमगीचे, और सीमा यन्ध आदिको
एक दूसरे के बदले आपसम नुक्सान पहुँचाये, तो नुक्सानका दुगना दण्ड उन्हें
भुगताना चाहिये ॥३॥
पवामिविष्टंमधरतटाकं नोपरितटाकस्य केदारमुदकेनाप्लाव-
येत् ॥ ३२ ॥ उपरिनिविष्टं नाधरतटाकस्य पूरास्रावं कारयेद-
न्यत्र त्रिवर्षापरतकर्मणः ॥ ३३ ॥
९ मण्या] धर्मस्थीय (४३) पीछे धने हुए नीचके तालाबसे सीचे जानेवाले खेतको ऊपरके तालाब के पानीसे न सींचे ॥ ३२॥ नीचेके नालायम उपरके तालाबसै आते हुए पानी को न रोके, परासकि नीचेका तालाय तीनवर्ष तक बेकार न पटा रहा हो ॥३३॥ तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ॥ ३४ ॥ तटाकवामनं च ॥ ३५॥ पञ्चवर्षापरतकर्मणः सेतुबन्धस्य खाम्यं लुप्येतान्यत्रा- पद्भ्यः ॥३६॥ इस नियमका उल्लवन करनेपर प्रथम साहस दण्ड दिया जाये॥३४॥ ओर तालाबके पानीको निकलवा दिया जाय ॥ ३५ ॥ पाच वर्षतक यदि कोई जलादिका सीमायभ चेकार रहे, तो फिर उसपर उसके स्वामीका स्वस्व नहीं रहता । यदि किन्हीं आपसियाके कारण कामम माया जासका हो तो कोई हानि नहीं ॥ ३६॥ वटाकसेतुबन्धाना नवप्रवर्तने पाञ्चवार्पकः परिहारः ॥३७॥ भग्मोत्सृष्टानां चातुर्वपिकः ॥ ३८ ॥ समुपारूढानां त्रैवर्षिक: ११ ३९ ।। स्थलस्य द्वैवपिका खात्माधाने विक्रये च ॥४॥ यदि कोई पुरप, तालाब और सीमाअन्ध बिल्कुल नये पनकाय, तो उसपर पाच वर्षतक सरकारी टैक्स न लगाया जाय ॥ ३७॥ यदि टूटेफूटे हुओं को ठीक करवाये तो चार वर्ष ॥ ३८ ॥ बने हुएके ऊपर आर बनवावे तो तीन पपं ॥ ३९ ॥ तथा भूमिको गिरयो रखमेपर और येचदेनेपर दो वर्षतक इस महमें सरकारी टैक्स न लिया जाये ॥४॥ वातप्रावृत्तिमनदीनिवन्धायतनवटाफकेदारारामपण्डवानां सस्यपर्णभागोचरिकमन्येभ्यो वा यथोपकारं दद्युः ॥ ४१ ।। ऐसे तालायों में, जिनम नदीका पानी न जाता हो, वायुसे पलनेवाले रहट आदि लगाकर जो किसान अपने सत्तामे, बगीचाम, फुलवाडियों में पानी देते हैं, उनकी उपजपर सरकार उतनाही टैक्स लगाये, जिसमें उनको किसी प्रकारका कएन हो॥१॥ प्रक्रपाचक्रयाधिभागमोगनिसृष्टोपभोक्तारश्चैपां प्रतिकुर्युः।४२। अप्रतीकारे हीनद्विगुणो दण्डः ।। ४३ ॥ जो किसान तालायाकै मारिक नहीं है, वे भी निम्नलिखित शाप पानी ले सकते है। मालिकको पानी के अनुसार कीमत देकर, कर सामान किया हुआ किराया देकर, अपनी अपनी कुछ हिस्सा देकर, अथवा जिनके - अधिः - कौटलीय अर्थशास्त्र मालिकोने मूली भाग दी हुई है। परन्तु यह आवश्यक है कि ये चारों उस ताप्लाम धार रहट आदिको परावर मरामत करात रहे ॥ १२ ॥ मरम्मत न करामेपर नुक्सानसे दुगना दण्ड उनको दिया जाये ॥ ४५ ॥ सेतुम्पो सञ्चवस्तीयमपारे पट्पणो दमः। पारे बा तोयमन्पो प्रमादेनोपरन्धतः || इति धर्मस्थीये तृतीय ऽधिकरणे यास्तुके वास्तुविक्रय सीमाविवाद क्षेत्रविवाद मर्यादास्थापन साधायाधिक नवमो ऽध्याय ॥९॥ आदित पद्पष्टितमो ऽस्पाय ॥ ६६ ॥ अपनी पारी न होनेपर जो पानी ऐवे, उसे ६ पण दण्ट दिया जाय, और उसका भी यही दण्ड दिया जाय,जो प्रमादसे, अपनी वारीपर पानी लेतेहुए फा पानी रोकरे ॥४॥ ॥ धर्मस्थीय तृतीय अधिकरणमें नौया अध्याय समाप्त ।। दसवां अध्याय। ६.६० प्रकरण। चरागाह और खेतके मागोंका रोकना, तथा नियमका उल्लइन । कर्मोदकमार्गमुचितं रुन्धतः कुतो ऽनुचितं वा पूर्वः साहस- दण्डः ॥१॥ साधारण काय और जलके उचित रास्ताको राकनवार, तथा अनुचित रास्ताक करावाल परपको प्रथम साहस दण्द्र दिया जाय ॥३॥ सेतुकूपपुण्यस्थानचैत्यदेवायतनानि च परभूमौ निवेशयतः पूर्वानुवृत्तं धर्मसेतुमाधान विक्रयं वा नयता नाययतो वा मध्यमः साहसदण्डः श्रोतृणामुत्तमः ॥२॥ अन्यत्र भमोत्सृष्टात् ॥३॥ जो पुरुप दूसरफा भूमिम सामा, पुण्यस्थान, (धर्मशाला आदि) त्य 1 (भनिधान) भार वाल्य नपापे, अयया भो पहिले धमार्य पमे को गिरवी रक्ख, बेच, या विकचाप, उन्हें मध्यमसाइस दण्ड दिया जावे । भार जो पुरपु उसके सहायर या झाक्षी हो, उनको उाम साहस दण्ड दिया जाये ॥१॥ परन्त यदि यह मकान टूटाफूटा होनफे काणं मालिकने छोड हो तो एसो करनेमें शोई हानि नहीं ॥ ३ ॥ हुए मकान १०मस्या धर्मस्थाय स्वाम्यभाचे नामा: पुण्यशीला का प्रतिकुर्युः ॥ ४॥ पथि- प्रमाणं दुर्गनिवेशे व्याख्यातम् ॥ ५ ॥क्षुद्रपशुमनुष्यपथं रुन्धतो द्वादशपणो दण्डः ॥६॥ मकान मालिकके न होनेपर, ग्रामनिवासी तथा अन्य धार्मिकजम उस टूटे फूटे धर्मार्थ मकानकी मरम्मत करवायें ॥ ४ ॥ रास्ता कितना चोदा होना चाहिये, इस बातका निरूपण दुर्गनिवेश' (अधि, अध्या, सूत्र) नामक प्रकरणमें कर दिया गया है।॥ ५॥ छोटे २ शायर और मनुष्यों के मार्गको रोकने वाले पुरुषको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥६॥ महापशुपथं चतुर्विशतिपणः ॥७॥ हस्तिक्षेत्रयथं चतुष्पश्चा- शत्पणः ।।८। सेतुवनपथं पछतः ॥ ९॥ श्मशानग्रामपथ द्विशतः ॥ १९ ॥ द्रोणमुसपथं पञ्चशतः ॥ ११॥ स्थानीय- राष्ट्रविधीतपथं साहस्रः।। १२ ।। पढे २ पशुओंके मार्गको रोकनेपर २३ पण, ॥७॥हाथी और खेतोंके रास्त रोकनेपर ५४ पण ॥ ८ ॥ सेतु और बनके रास्ते को रोकने पर ६०. पण ॥९॥ श्मशान ओर गावके रास्ते रोकनेपर २०० पण ॥ १० ॥ दोणमुसका मार्ग रोकनेपर ५०० पण ॥१॥ स्थानीय राष्ट्र तथा चरागाहके मार्ग रोकनेपर १००० पण दण्ड होना चाहिये ॥१२॥ अतिकपणे चैपांदण्डचतुर्था दण्डाः ॥ १३ ॥ कर्पणे पूर्वोक्ताः ॥ १४ ॥ क्षेत्रिकस्याक्षिपतः क्षेत्रमुपवासस्य पात्यजतो पीजकाले द्वादशपणो दण्डः ॥१५॥ जो हरप इन मागॉफी, खोदने या जोतने भादिके अनिरिक और कोई हानि पहुचाये, तो उसे उपयुक्फ दण्डोंका चोथाई दान दिया जाये ॥३॥ सोदने या जोलनेए तो पूर्वोक्छ यथोचित सब ही दण्ड होने चाहिये ॥१४॥ गोममें रहनेवाला किसान यदि पोज प्रोनेके समयम, खतम बीज नहीं योता, पा खेतको छोडता है, तो उसे ११ पण दण्ड होना चाहिये ।। १५ ।। अन्यत्र दोपोपनिपाताविपक्षैस्यः ॥ १६ ॥ करदाः करदेवा- धानं विक्रयं वा कुर्युः ।। १७॥ ब्रमदेयिका ब्रह्मदेयिका ॥१८॥ पदि वहम कोई दोप होने के कारण, या किसी बाह भाकात्मक आपत्ति के कारण, या असामध्यरु कारण ऐसा नहीं करता, तो कोई पोष 1 अधिक . ? J . (E) कोटलीय अर्थशास्त्र नहीं ॥१६॥ एमान देनेयाले पुरप लंगान देनेवालोंके यहां ही अपनी भूमि सम्पत्तिको गिरवी रख या येच सकते हैं !,१७ ॥ जो भूमिका लगान नहीं देते अधात् जिनको धर्मार्थ भूमि दी हुई है, ये अपने जैसेही पुरपोंके पास अपनी भूमि गिरवी रख, या येच सकते हैं ॥१८॥ अन्यथा पूर्वः साहसदण्डः ॥ १९ ।। करदस्य वाऽकरदग्राम प्रविशतः ॥२०॥ करदं तु प्रविशतः सर्वद्रव्येषु प्राकाम्यं स्यात् ।। २१ ।। अन्यत्रागारात् ॥ २२॥ • इन नियमोंका उदहन करनेपर उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ १९ ॥ यही दण्ड उस, पुरपको भी दिया जाय जो लगान देनेवाले गांवके निनासको छोड़कर, लगान न देनेनाले गांयमें (निवास करनेके विचारसे) 'प्रवेश करे ॥ २० ॥ यदि यह पिर भी रगान देनेवालेही गांवमें निवास करने लगता है, तो उसे रहने के मकानको छोड़कर भाकी सब यातोंमें स्वतन्त्रतादेवी जावे ॥ २१, २२ ॥ तदप्यस्मै दद्यात् ॥ २३ ।। अनादेयमकृपतोऽन्यः पञ्चवर्पा- ण्युपभुज्यप्रयासनिष्क्रयेण दद्यात् ॥ २४ ॥ अथवा उचित समझनेपर मकान भी उसको देदिया जावे ।। २३ । जो पुरप भपनी भूमिको नहीं जोतता, उसको दूसरा एरप बिना रगान दिये ही जोत ऐवे, और पांचवर्ष तक उसका उपभोगकर मालिक्को घापस कर देवे । परन्तु जो खर्भ या मेहनत उस भूमिको ठीक करने में लगा है, उसका मूल्य मालिकसे वसूलकर लेवे ॥ २४ ॥ अकरदाः परत्र वसन्तो भोगमुपजीवेयुः॥ २५ ॥ ग्रामार्थेन ग्रामिकं व्रजन्तमुपवासाः पर्यायेणानुगच्छेयुरननुगच्छन्तः पणार्ध- पणिक योजनं दाः॥२६॥ जो लोग लगान नहीं देते, अर्धात् जिनके पास धर्मार्थ भूसम्पत्ति है, वे दूसरे स्थानों में रहते हुए भी अपनी सम्पत्तिके पूर्ण अधिकारी हैं ॥२५॥ । जब गांवका मुखिया गांव के किसी कामके लिये बाहर जावे, तो ग्रामनिवासी नम्बरवार उसके साथ जाय । न जानेपर १३ पण, योजनके हिसाबसे जुरमाना दे ( योजन-4 मील) ॥ २६ ॥ ग्रामिकस्य ग्रामादस्तेनपारदारिकं निरस्यश्चतुर्विशतिपणो दण्डः ।। २७ ॥ ग्रामस्योत्तमः ।। २८ ।। .
(४७)। १. अध्या०] धर्मस्थीय. यदि गायका मुखिया, चोर और व्यभिचारीके अतिरिक्त अन्य किसीको गावसे बाहर निकाले, तो उसे (मुखियाको) २३ पण दण्ड दिया जाय ॥२७॥ यदि सारा गाय मिलकर ऐसे व्यक्तिको (चोर और व्यभिचारीसे आतिरिक) गावसे पाहर निकालना चाहे, तो उसे (गावको) उत्तम साहस दण्ड दिया जाय॥२८॥ निरस्तस्य प्रवेशी ह्यधिगमेन व्याख्यातः ॥ २९ ॥ स्तम्भैः समन्ततो ग्रामाद्धनुःशतापकृष्टमुपशालं कारयेत् ॥ ३० ॥ इस कथनसे, गायसे शाहर हुए पुरपका फिर गावमे पसना भी समझ लेना चाहिये । (इसका सारपर्य यह है, कि यसने के लिये कहीं बाहरसे आये हुए पुरषको, यदि गावका मुखिया गावमें न बसने दे, तो उस (मुखियाको) २४ पण दण्ड, और इसी अपराधमें गायको उत्तम सहास दण्ड दिया भार) ॥ २९ ॥ चारों ओर रुकावट के लिये खम्म लगाकर, गावसे १००हायकी दूरीपर एक पाटा (जो जोता चोया न जाये ) बनवाये, जहाँ पशु आदि बैठ सके ।। ३०॥ पशुपचारार्थ विवीतमालपनेनोपजीवेयुः ।। ३१ ॥ पिवीतं भक्षयित्वावरतानामुन्द्रमहिपाणां पादिकं रूपं गृहीयुः ।। ३२ ॥ गाश्चपराणां चार्धपादिकम् ।। ३३ ।। क्षुद्रपशूनां पोडशभागि- कम् ॥ ३४ ॥ पशुओंके घूमने और धरने बैठने के लिये जगलोंमें चरागाह बनवाय ॥ ३१ ॥ परागाहमें घरकर यदि ऊंट और भैंस आदि बढे २ पशु अपने घर चले जाते हैं (अर्थात् वे धरागाहमें नहीं पैठते या रहते, उनके मालिक डमको सिर्फ चराकर ले जाते है) तो उनके मालिकोंसे, प्रति पशुझ पानेक बदलम १ एणके हिसायसे कर लिया जाय ॥ ३२॥ इसी प्रकार गाय, घोडे, गधे भादि को ममम मोके पर है, उनके सोक लिप पण कर किया जाय ॥३३॥ छोटे पशु भेड़ एकरी आदिके लिये पर पण रिया जाय ॥ ३४ ॥ भयित्वा निषण्णानामेत एष द्विगुणा दण्डाः ॥ ३५ ॥ परिवसतां चतुर्गुणाः ।। ३६ ॥ नामदेववृषा वा अनिर्दशाहा वा धेनुरुक्षाणो गोहपाश्चादण्डयाः ॥ ३५ ॥ आ जानवर परकर पठते भी यहीं पर हैं, उनके शिय, पहिल के अनुसार दुगना कर लिया जाये ॥ ३५ ॥ मोर जो बराबर रहने भी यही पर है, उनके . - [३'मध (6) कौटलीय अर्थशास्त्र लिये चौगुना ॥ २६ ॥ माम देवताके नामसे छुटे हुए साडी, दस दिनकी ब्याही हुई गार्य, तथा गोभीम रहनेवाले विजारोंका कोई कर न लिया जाय ।। ३७॥ सस्यभक्षणे सस्योपघातं निप्पत्तित परिसंख्याय हिंगुर्ण दापयेत् ॥ ३८ ॥ स्वामिनवानिवेद्य चारयतो द्वादशपणो दण्डः ॥ ३९ ॥ प्रमुञ्चतश्चतुर्विशतिपण ॥४०॥ यदि किसीका जानवर, किमीके सतमें खई भग्नको खाजावं, तो अमके नुक्सानकी गणना करके, उससे दुगना दार्म भरके मालिक को दिलाया जावै ॥३॥ खेतके मालिकसे छिपाकर, जा अपर्ने पशुको उसके खेतमें चरता है, उसको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ ३९॥ नो अपने पशुको किसीके खतम चरनेके लिये खुला भेट देता है, उसे २४ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४ ॥ पालिनामधंदण्डाः ॥४१॥ तदेव पण्डभक्षेण कुर्यात् ।।४।। वॉटमेदे द्विगुणः ॥४३॥ इस प्रकार खेतोंका नुक्सान होनेपर, खेतोकी रखवाली करने के लिये नियुक्त किये गय पुरुषपर, उपर कहे गये दण्डाको भाधा दण्ड होना चाहिये ति॥ यदि खतम भाकर सा खाये, तो भी रखवाली करने वालेको इतना ही देषा दिया जाय ॥ ४२ ॥ खेतकी बाट टूट जानपर, रखवारी करने वाले को दुगमा दण्ड दिया जाय ॥३॥ वेश्मखलबलयगतानां च धान्यानां भक्षणे हिंसांप्रतीकार कुर्यात् ॥ ४४ ॥ अभयवनमृगाः परिगृहीता भक्षयन्तः स्वामिनो निवेद्य यथावध्यास्तथा प्रतिपेद्धव्याः ॥४५॥ घर, खलिहान, और कहा घिरी जगहों में रक्खे हुए अग्नको यदि पशु पालव, ता हानिक मरायर मूल्य ददेना चाहिय ॥ ४४ ॥ आश्रमवासी भृग यदि सतोमें चरते हुए पकडे जाव, ता रखवालेको चाहिये कि वह इस यातकी खयर अपन मालक का द दव, और उन मृगा को पहा से इस प्रकार हटावे, जिसस कि घ मरें नहा, या उनके कोई गहरी चोट न आवे ॥४५॥ पशवी रामप्रतोदाभ्यां वारयितव्याः॥४६॥ तमिन्यथा हिंसायों दण्डपारुण्यदण्डाः ॥४७॥ प्रार्थयमाना दृष्टापराधाचा सर्वोपायनियन्तव्याः ॥४८॥ इति क्षेत्रपथहिंसाः ॥ ४९ ।। पतुभाका रस्सा पा फोदेत हटाना चाहिय ॥ १६ ॥ उनका और किसी विस मारन या हटान पर 'दाद पारष्य' प्रकरण स्थित दचित दण दिये .
१० अध्या] धर्मस्थीय. (४९) जाय ।। ४७ । परन्तु जो पशु, हटाने वाले पुरुप का मुकाबला करें, तथापहिले भी किसी को मारते हुए देखे गये हों, उन्ह सब ही उपायोंसे दमन करना चाहिये ॥४८॥ सहा सक खेत और मार्गदी हानि के विषयमे निरूपण किया कर्पफस्य ग्राममभ्युपेत्याकुर्वतो ग्राम एवात्ययं हरेत् ॥५०॥ कर्माकरणे ५ मवेतनद्विगुणं हिरण्यदानं प्रत्यंशद्विगुणं भक्ष्यपेय- दाने च प्रवहणेषु द्विगुणमंशं दद्यात् ॥५१॥ यदि कोई किसान गायमे आकर, पचायती या खेती धादिका काम न बरे, तो उसपर किये गये माने को गांव ले लेवे । अर्थात् राजा नहीं लेखक- ता ॥ ५० ॥ काम न करनेपा कार्यके येत नसे दुगना, समुदाय कार्यों में अपने हिलेका चन्दा अदि न देने पर उसका दुगना, और गोट तथा पचायती पांत (ोजन) आदिक अयसर पर अपने हिस्सेका ख ने पनि खर्च न देने पर भी उसका दुगना ही दण्ड दिया जाये ॥ ५१ ।। प्रेक्षयामनंशदः स्वजनो न प्रेक्षेत ॥ ५२॥ प्रछन्नश्रवणे- क्षणे च सर्वहिते च कर्मणि निग्रहेण द्विगुणमंशं दद्यात् ।। ५३ ॥ यदि कोई व्यक्ति गायक सार्वजनिक खेल तमाशाम पय करने के लिये अपना हिस्सा न दे, तो वह और उसके घर के सब लोगतमाशानदसोपा॥५२॥ यदि छिपकर ये तमाशा देखे या सुनें, और जो गावके सर्वहितकारी कामों में हिस्सा लनेसे अपने आपको छिपावें, तो ये अपने हिस्सेशा दुगा उन कामेिं ४पय करने लिये देवे ।। ५३ ।। सर्वहितमेकस्य हुनतः कुर्युराज्ञाम् ॥ ५४ ॥ अकरणे द्वादश. पणो दण्डः ॥ ५५ ॥ तं चेत्संभ्य वा हन्युः पृथगेपामपराध- द्विगुणो दण्डः ॥५६॥ जो कोई एक पुरप, सबके कल्याणकी यात की, उसकी भाशाली गांवके सयही लोग माने ॥ ५५ ॥ आज्ञा न माननेपर सयको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ ५५॥ यदि गाय सप लोग मिरकर उस एक व्यसिको मारे, तो मारने वाला हर एकको अलहदा २ अपराधसे दना दण्ड दिया जाये॥५६॥ उपहन्दपु विशिष्टः ब्राह्मणतश्चैषां ज्येष्ठ नियम्येत ।। ५७॥ पाहणेषु चेपांचालणा नाकामाः कुर्युः ।। ५८ ।।
-
L
१५०)
कोटलीय अर्थशास्त्र
[३ अधिक
यदि मारनेचारोंमे कोई ग्राह्मण हो, या प्राह्मणसे भी कोई श्रेष्ठ व्यक्ति
हो, उसको सबसे अधिक दण्ड दिया जाय ॥ ५७ ॥ यदि सार्वजनिक कार्याम
कोई प्राह्मण काम करनेको अभिलाषा न रखता हो, तो गांरके अन्य पुरपही
मिरकर उस कार्यको करलें ॥५८॥
अंशं च लभेरन् ।। ५९ ॥ तेन देशजातिकुलमंधानां समय-
स्थानपाकर्म व्याख्यातम् ॥ ६ ॥
परन्तु व्ययके लिये जो भाग ब्राह्मणकी और आवे, उसे वे अवश्य
लो ॥ ५९॥ इससे देश, जाति, फुल और अन्य समूहोंके नियमोलसनकी
पत्रस्थाको भी समझ लेना चाहिये ॥ ६ ॥
राजा देशहितान्सेतून्कुर्वतां पथि संक्रमात् ।
ग्रामशोभाश्च रक्षाश्च तेपां प्रियहितं चरेत् ॥ ६ ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तु के विवीतक्षेयपहिसा दशमोऽध्याय ॥१०॥
वास्तुक समाप्तम्
समयस्त्रानपाय मं च । आदित सप्तपष्टितमो ऽपाय ॥ ६७ ॥
जो पुरुप मिटर जनताके आरामके लिये सहकापर मकान बनाते हैं.
घर तरहूमे गागको शोभाको यदाते और उनकी रक्षा करते है, राजाको चाहिये
कि उनकी अनुकूलता और कल्याणश सदा ध्यान रखे ॥ ६१ ॥
धर्मस्थीय तृतीय अधिकरणमे दमवां अध्याय समाप्त ।
-
ग्यारहवां अध्याय ।
६३ प्रकरण।
ऋण लेना।
सपादपणा धा मामवृद्धिः पणमतस्य ॥१॥ पश्चपणा
व्यावहारिकी ।। २॥ दशपणा कान्तारकाणाम् ॥ ३ ॥ विंशति-.
पणा सामुद्राणाम् ॥ ४॥
.. पणपर एक महीनेम पण व्याज लेनाही ठीक है ॥१॥
शापारी लोगोंसे ५ पण व्याज लेना चाहिये ॥२॥ जंगलमें रहनेवाली या
पहा व्यापार करनेपारोसे १० पण ॥३॥ और समुबमें आनेजाने पाले या
पहा प्यापार करनेवालोंसे २. पण व्याज लेना चाहिये ॥५॥
११ अध्या०]
धर्मस्थाय
ततः परं कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः ॥५॥श्रोतृ-
णामेकै प्रत्यर्धदण्डः ॥ ६॥ राजन्ययोगक्षेमबहे तु धनिक,
धारणिकयोश्चरित्रमपेक्षेत ॥७॥
इससे अधिक लेने देनेवालोंको प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥५॥
और इनके साक्षियों से प्रत्येकको आधा दण्ड दिया जाय ॥ ६ ॥ यदि मण
देने और लेनेवारके आपसके सौदेपर राज्यको कुछ सुरत समृद्धि या कल्याणका
निर्भर हो, सो सरकारको धाहिये कि यह उनके चरित्रको बराबर निगरानी
रक्स ॥७॥
धान्यवृद्धिः सस्सनिष्पत्तावुपार्धावरं मूल्यकृता वर्धेत ॥ ८॥
प्रक्षेपहारुदयाद, संनिधानसन्ना वार्षिकी देया ॥९॥
यदि अन सम्बन्धी व्याज फसलके मौकेपर चकता करना हो, तो उस
समयतक व्याजकी संख्या मूलधनकी आधी रकमसे अधिक न होनी चाहिये
॥८॥ गोदामके इकट्ठे येचे हुए मालपर (उसी समय मूल्य न मिलनेपर)
लाभका आधा प्याज होना चाहिये । और उसका हिसायकिसाब कमसे कम
वर्षमें एकधार अवश्य हो जाय (तात्पर्य यह है देवदत्तके पास गोदाममे १०००)
का माल भरा हुआ है, यज्ञदत्तने उसको खरीद लिया, परन्तु उसके पास
फोरन दे देनेके रिये रपया नहीं है, ऐसी दशामे देवदस रपयोंका सूद मांगेगा,
जैसे २ यज्ञरा उस मालको बेचता रहेगा, देवदत्तका धन और सूद चुकाता
रहेगा, उस व्याजको तादात पज्ञदत्तको होनेवाले नफेसे आधी होनी चाहिये।
अधीर फेका आधा यशदा और सूदकी शकलमं आधा देवदस से लेबे । इस
मकारक रेनेदेनका हिसाब वर्षमे एकवार अवश्य हो जाना चाहिये) ॥९॥
चिरप्रयासस्तम्भनविष्टो वा मूल्यद्विगुणं दद्यात् ।। १०॥
अकृत्वा पृद्धिं साधयेतो वर्धयतो वा मूल्यं या वृद्धिमारोप्य श्राव-
यतो बन्धचतुर्गुणो दण्डः ॥ ११ ॥
यदि देरतक विदेशमें ले जाने के कारण, या अन्य किसी कारणले
जानवृक्षकर माल खरीदनेवाला उसे नहीं निकारता, तो वह मारके भसरी
मूल्यका दुगना (जिससे माल खरीदा है उसको) देचे ॥१०॥ च्याज पूरा न
होनेपर, पहिलेही व्याज लेनेके लिये जो अघमणको तंग करे, अथवा प्याजको
मूलधन में जोड़कर मूलधनके नामसेही उतना रपया मांगे, इसे मांगे हुएधन
का चौगुना दण्ड होना चाहिये ॥१॥
[३ अपिल
(५२)
कोटलीय अंधशास्त्र
" तुच्छचतुरश्रावणायामभूतचतुर्गुणः ।। १२ ॥ तस्य विमा-
गमादाता दद्यात् ॥ १३ ॥ शेपं प्रदाता ॥ १४ ॥
थोड़ा धन देकर बहुत दिया है' इस प्रकार साक्षियोंके मुनाने पर,
जितना साक्षी सुनायें, उससे चौगुना दण्ड उन्हें (अधमर्ण और उत्तमर्ण दोनों
को दिया जाय ॥ १२ ॥ उसके तीन माग, ऋण लेनेपाला अर्थात् अधमर्ण
अदा करे ॥ १३ ॥ और वाकी हिस्सा उत्तमण ॥ ४ ॥
दीर्घसच्चव्याधिगुरुकुलोपरुद्धं वालमसारं वा नर्णमनुवर्पत
॥ १५ ॥ मुच्यमानमृणमप्रतिगृहतो द्वादशपणो दण्डः ॥१६॥
'यहुए कालतक होनेवाले यहगे घिरे हुए, ग्याधिप्रस्त, तथा गुप्कुलमें
अध्ययन करते हुए व्यक्तिपर, इसी प्रकार यालक या- शक्तिहीन पुरुपपर 'मो
ऋण हो, उसपर व्याज नहीं लगाया जा सकता ॥ १५॥ यदि अधमर्णके द्वारा
भरणको अन्तिम रकम अदा करनेपर उत्तमणे उसे नहीं लेता, तो उस (उत्तमण)
पर १२ पण दण्ड किया जाय ॥ १६ ॥
कारणापदेशेन निवृत्तवृद्धिकमन्यत्र तिठेत् ॥ १७ ॥ दश-
वोपेक्षितमृणमप्रतिग्राह्यमन्यत्र वालवृद्धव्याधितव्यसनिमोषित-
देशत्यागराज्यविभ्रमेभ्यः ॥१८॥
यदि ग लेने में कोई विशेष कारण हो, तो यह रकम बिना ही सूंद के
और कहीं जमा करदी जाये ॥ १७ ॥ यदि कोई उत्तमण दस यरसके भीतर २
अपना ऋण वसूल नहीं कर लेता, तो फिर उस धनके ऊपर उसको कोई अधि.
कार नहीं रहता। परन्तु यदि यह धन पालक, वृद्ध,पीमार, आपद्वस्त, विदेशमें
गये हुए, देशस्यागी यारीजकीय कार्यों के कारण याहर गये हुए व्यक्तिका हो,
तो वे दस बरसके बाद भी बराबर उस धनके अधिकारी रहते हैं ॥१॥
प्रेतस्य पुत्राः कुसीदं दाः ॥ १९ ॥ दायादा वा रिक्थहराः
सहनाहिणः प्रतिमुवो वा ॥ २० ॥ न प्रातिभाव्यमन्यदसारं
चालपातिभाव्यम् ।। २१ ॥
मृत अंधमण व्यक्तिके पुत्र उसके ऋणको चुकायें ॥ १९॥ अथवा उसकी
स्थायी सम्पत्तिको लेनेवाले दायभागी, या साथ २ काम करने वाले उसके जामिन
हिस्सेदार, उत ऋणको पुकावे ॥ २० ॥ इनके अतिरिक्त और कोई उस (मृत)
के रण का जामिन नहीं हो सकता। पालक का जामिन होना तो सर्वथा
अयुक्त
1
-
॥२१॥
११ अध्या०] धर्मस्थीय (५३) असंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा दायादा वा रिक्थं हर- माणा दयुः ॥ २२ ॥ जीनितविवाहभूमिप्रातिभाव्यमसंख्यात देशकालं तु पुज्ञाः पौत्रा का पहेयुः ।। २३ ।। ऐसे मरणको, जिसका स्थान और समय निश्चित नही, स्थायी सम्पत्ति को सेनेवाले पुन, पान या अन्य सायभागी अदा कर ॥ २२ ॥ आजीविका, पियाह, और भूमिके लिये, रिये हुए धनको, तथा किसी का लागिन होने के फारण अदा किये जान थाले धनको (इसका तात्पर्य यह ह कि किसी ने किमी का जामिन बनकर उसको कही से ऋण दिला दिया, करण लन वाले ने फिर उसे अदा करने का नामही न लिया, तय यह धा उस जामिन को अदा करना पडेगा, यदि यह भी मर जाये सो) उसके पुत्र पात्र हा चुकाय ॥ २३ ॥ नानर्णसमवाये तु नैक द्वौ युगपदाभवदेयातामन्यत्र प्रतिष्ठ- मानात् ॥ २४ ॥ तत्रापि गृहीतानुपूर्व्या राजश्रोत्रियद्न्यं या पूर्व प्रतिपादयेत् ॥ २५॥ अनेक व्यक्तियोंके पाणी किसी एक अधमर्ण पर एकहीं साथ ओक उत्त मणं गुरुदमा नही चला सकते । परन्तु यदि वह अधमण कहीं विदशको जर रहा हो, तो उसपर पफ साथ मुकदमा चलाया जा सकता है ॥ २४ ॥ मुकदमा चलाने पर फसलेंके याद, ऋणको चुकाई, प्रण हिम जाने क्रसके अनुसार दी होनी चाहिये । यदि उसके पास राजा या किसा माह्मणका भी रण हो, तो उसे सबसे पहिले चूकता करना चाहिये ॥ २५ ॥ दम्पत्योः पितापुत्रयोः प्रातणां चाविभक्तानां परस्परकृत- मृणमसाध्यम् ॥ २६ ॥ अग्राह्याः कर्मकालेपु कर्पका राजपुस्पाच ॥२७॥ भायों पति, पिता पुत्र, इकड़े रहो पाले भाई, इनके परस्पर एक दूसरे से लिये हुए ऋणका निर्णय नही किया जासक्ता ॥२९॥ काय करनर समय में, किसान और राजकर्मचारियों का प्रण के लिय गिरफ्तार नही किया जा सरता॥२७॥ स्त्री चाप्रतिधारिणी पतिकतमृणमन्पर्व गोपालकासीति- केभ्यः ॥ २८॥ पतिस्तु ग्राह्यः ॥ २९ ।। पति के लिये हुए मणके सम्बन्धमलाको दयाय नही डाला जासरा, जयकि यह उस ऋणको चुकाना सहर नहीं करना । परन्तु माह
कोटलीय अर्थशास्त्र [३ अधिक
प्रकार के उन पुरषा, जिनकी कि जीपिका कुछ न कुछ नियों पर निर्भर है
(भईसीतिक) के लिये हुए ऋणको उनकी नियां भी (पतिको अनुपम्धिनिमें)
भदा करनेकी जिम्मेदार है। अर्थात् थे उसे चुकानेसे इन्कार नहीं कर
सकती ॥ २८ ॥ परन्तु पीके लिये हुए मणके सम्बन्धमें पति को परायर पाया
जासकता है॥२९॥
स्वीकृतमृणमप्रतिविधाय प्रोपित इति मंप्रतिपचायुत्तमः
॥ ३० ॥ असंपतिपतौ तु साक्षिणः प्रमाणम् ॥ ३१ ॥
खोके ऋणको न चुकानेपर, यदि कोई पुरप उसमे यचनेके खयाएमे
यहाना करके विदेश घरा जाय, तो इस बातके सिद्ध होने पर उसे उत्तम
साहस दण्ड दिया जाय ॥३०॥ यदि विदेश जानेमें यह कारण मि न होमके,
तो जैसा साक्षी कहें उसके अनुसार कार्य किया जाय ॥३॥
प्रात्ययिकाः शुचयो ऽनुमता वा व्यवरा अाः ॥ ३२ ।।
पक्षानुमतौ या द्वौ ॥३३ ॥ ऋणं प्रति न त्वेकः ।। ३४ ॥
विश्वासी, पविन चरित्र, तथा दोनों पक्षोंके अनुमत, कमसे कम तीन
साक्षी होने चाहिये ॥ ३२ ॥ अथवा दोनों पक्षों के अनुमत दो साक्षी भी हो
सकते हैं ॥ ३३ ॥ ऋणके मामलाम तो एक साक्षी कदापि न होना चाहिये।
अर्थात् दो या दो से अधिक ही साक्षी होने आवश्यक है ॥ ३ ॥
प्रतिपिद्धाः स्यालसहायापद्धधनिकधारणिकरिग्यगधृत-
दण्डाः ॥ ३५ ॥ पूर्वे चाव्यवहार्याः ॥ ३६ ॥
साला, सहायक, आयद्ध (जिसका जीवन किमी एक व्यक्ति पर सर्वधा
निर्भर है, गर्भदास श्रोतदास आदि) धनिक (उत्तमणे) धारणिक (अधमर्ण)
शत्रु, अगदीन तथा राज्यले दण्डित पुरष साक्षी नहीं होसकते ॥ ३५ ॥ पहिले
जो साक्षी यताये है, (३२ सूत्रम) वे भी, यदि परहारको जानने वाले नहीं
सो साक्षी नहीं होसकते ॥ ३६॥
राजश्रोत्रियग्रामभृतकुष्ठिवणिनः पतितचण्डालकुत्सितकर्माणो
न्धवधिरमूकाहंवादिनः खीराजपुरुषाश्चान्यत्र स्वपर्गेभ्यः ॥३७॥
राजा, वेदवका प्राहाण, गावका मुखिया, कोढ़ी, जिसके शरीर पर बहुत
फोडे फुन्सी या याय है, पतित, चण्डाल, तोचकर्म करने वाले, अन्धे, यहरे,
गूगे, घमण्डी, स्त्री और राजकर्मचारी ये अपने घाँको छोड़कर अत्यन्न साक्षी
नहीं होसकते ॥३॥
। - १२ अध्या1 धर्मस्थीय पारुण्यस्तेयसंग्रहणेषु तु वैरिस्थालसहायवर्जाः ॥ ३८ ॥ रहस्यव्यवहारेषेका स्त्री पुरुष उपश्रोता उपद्रष्टा वा साक्षी स्याद्रा- जतापसवर्जम् ॥ ३९॥ परन्तु पारप्य, चोरी और व्यभिचार के मामलोम शनु, साले और सहायक को छोडकर, पाकी ये सब ही साक्षी होसकते है ॥ ३८ ॥ छिपे हुए गुप्त मामलामे अफेही स्त्री, और राजा तथा तपस्वींको छोड़कर, सुनने या देखने याला अकेला पुरप साक्षी होसकता हे ।। ३९ ।। स्वामिनो भृत्यानामृत्विगाचार्याः शिष्याणां मातापितरौ पुत्राणां चानिग्रहेण साक्ष्यं कुर्युः ॥ ४० ॥ तेपामितरे या॥४१॥ मालिक नोकरोके, मनिर या आचार्य शिष्यांके, माता और पिता पुत्रोके, तथा इसी प्रकार नौकर गदि मालिक भादिक परहर खुले तौर पर साक्षी हो सकते है ॥ ४० ॥ ॥१॥ परस्पराभियोगे चैयामुत्तमाः परोक्ता दशबन्धं दारवराः पश्चयन्धम् ।। ४२ ।। इति साक्ष्यधिकारः ॥४३॥ इनका आपसमे हो सगस होनेपर, यदि उत्तम अर्थात् मारिक, आचार्य, माता पिता आदि, अभियोगमे पराजित हो जाच, सो अवर अर्थात् अपनेसे नीचे नोकर, शिष्य आदिको, पराजित धनका दसग भाग देवे । और यदि मौकर आदि हार जायें, तो अपने स्वामी आदिको हारे हुए धनका पांचवां हिस्सा देव ॥ ४२ ॥ यहां तक साक्षी के सम्बन्ध निरूपण किया गया ॥३॥ ब्राह्मणोदकुम्भाग्निसकाशे साक्षिण परिगृहीयात् ॥ ४४ ॥ तत्र प्रामणं मूयात्सत्यं नहीति ॥ ४५ ॥ माण, जलसे भरा हुआ घडा, अथवा अग्निके पास साक्षी को से जाया जाय ॥ ३४ ॥ यदि साक्षी मामण हो तो यहा पर उससे "सघ बोलो" यह कहा जाय ॥४५॥ राजन्यं वैश्यं वा मा तवेष्टापूर्तफलं कपालहस्तः शत्रुपलं भिक्षार्थी गच्छरिति ।। ४६ ॥ यदि क्षत्रिय और वैश्य हो, तो उनसे "तुमको इष्ट (यस आदि) और पूरी (धर्मशाला, भा, यीचे भादिशाताई हित के लिये पनवाने) का कोई फल न मिले, नुम अपनी शत्रु सेनाको जीतकर छायम खप्पर लेकर शिक्षा मागत फिरो, (पदि सम्प न पोलो)" समझार कहा जाय ॥ ४६॥ -
[३ अधिक
(५५)
कौटलीय अर्थशास्त्र
प्रकार के उन पुरुषों, जिनकी कि जीविका कुछ न कुछ स्त्रियों पर निर्भर है
(अर्द्धसीतिक) के लिये हुए मणको उनकी नियां भी (पतिकी अनुपस्थितिम)
भदा करनेकी जिम्मेदार है। अयात् ये उसे चुकानेसे इन्कार नहीं कर
सकतीं ॥ २८ ॥ परन्तु वीके लिये हुए ऋण सम्बन्ध पतिको यरायर पकड़ा
जासकता है ॥२९॥
स्वीकृतमृगमप्रतिविधाय प्रोपित इति संप्रतिपत्तावुत्तमः
।। ३० ॥ असंप्रतिपत्तौ तु साक्षिणः प्रमाणम् ॥ ३१ ॥
स्त्रीके ऋणको न चुकानेपर, यदि कोई पुरुष उससे बचनेके सयालसे
यहाना करके विदेश चला जाय, तो इस बातके सिद्ध होने पर उसे उत्तम
साहस दण्ड दिया जाय ॥३० ॥ यदि विदेश जाने में यह कारण सिद्ध नहोसके,
तो जैसा साक्षी कहें उसके अनुसार कार्य किया जाय ॥ ३१ ॥
प्रात्ययिकाः शुचयो ऽनुमता वा व्यवरा अर्ध्याः ।। ३२ ।। .
पक्षानुमतौ वा द्वौ ॥ ३३ ॥ ऋणं प्रति न त्वेकः ॥ ३४ ॥
विश्वासी, पविन चरित्र, तथा दोनों पक्षोंके अनुमत, कमसे कम तीन
साक्षी होने चाहिये ।। ३२ ॥ अथवा दोनों पक्षोंके अनुमत दो साक्षी भी हो
सकते हैं ॥ ३३ ॥ ऋणके मामलों में तो एक साक्षी कदापि न होना चाहिये ।
भर्थात् दो या दो से अधिक ही साक्षी होने आवश्यक हैं ॥ ३४ ॥
प्रतिपिद्धाः स्यालसहायावद्धधनिकधारणिकवैरिन्यगत-
दण्डाः ॥ ३५ ॥ पूर्व चाव्यवहार्याः ॥ ३६ ॥
साला, महायक, आवद्ध (जिसका जीवन किमी एक व्यक्ति पर सर्पया
निर है, गर्भदास कोतदास आदि) धनिक (उत्तमर्ण) धारणिक (अधमर्ण)
शत्रु, अङ्गहीन तथा राज्यसे दण्डित पुरुष साक्षी नहीं होसकते ॥ ३५ ॥ पहिले
जो साक्षी यतलाये हैं, (३२ सून) वे भी, यदि व्यवहारको जानने वाले नहीं
तो साक्षी नहीं होसकते ॥ ३६॥
राजश्रोत्रियग्रामभृतकुष्ठित्रणिनः पतितचण्डालकुत्सितकर्माणो
जधवधि परमूकाहंवादिनः स्त्रीराजपुरुषाथान्यत्र स्ववर्गेभ्यः ॥३७॥
राजा, घेदवका प्राण, गांयका मुखिया, कोढ़ी, जिसके शरीर पर बहुत
फोड़े फुन्सी या घाव हैं। पतित, पण्डाल, गोचकर्म करने वाले, अन्धे, बरे,
गूणे, घमण्डी; म्री और राजकर्मचारी ये अपने पाँको छोड़कर अन्यत्र साक्षी
नहीं होसकते ॥ ३०॥
. 2 १६ अभ्या०] धर्मस्थीय पारुष्यस्तेयसंग्रहणेषु तु चैरिस्थालसहायर्जाः ॥ ३८ ॥ रहस्यव्यवहारेष्येका स्त्री पुरुष उपश्रोता उपद्रष्टा वा साक्षी स्याद्रा- जतापसवर्जम् ॥ ३९ ॥ परन्तु पारथ्य, चोरी और व्यभिचारके मामलों में शत्रु, साले और सहायक को छोड़कर, पाकी ये सत्र ही साक्षी होसकते है ॥ ३८॥ छिपे हुए गुप्त मामलोमें अकेली स्त्री; और राजा तथा तपस्वीको छोड़कर, सुनने या देखने याला अकेला पुरप साक्षी होमकता है ॥ ३९ ॥ खामिनो भृत्यानामृत्विगाचार्याः शिष्याणां मातापितरौ पुत्राणां चानिग्रहेण साक्ष्यं कुर्युः॥ ४० ॥ तेयामितरे वा ॥४॥ मालिक नोकरीके, रविर या आचार्य शिष्योंके, माता और पिता युवोके; तथा इसी प्रकार नौकर आदि मालिक आदिके परस्सर खुले तौर पर साक्षी हो सकते हैं ॥४०॥॥५॥ परस्पराभियोगे चैपामुत्तमाः परोक्ता दशबन्धं दारवराः पञ्चवन्धम् ॥ ४२ ॥ इति साक्ष्यधिकारः ॥४३॥ इनका आपसमे ही झगा होनेपर, यदि उत्तम अर्थात् मालिक, आचार्य, माता पिता आदि, अभियोगमे पराजित हो जावे, तो अपर अर्थात् अपनेसे नये नोकर, शिष्य आदिको, पराजित धनषा दसवा भाग देवे । और यदि नौकर आदि हार जावै, तो अपने स्वामी आदिको हारे हुए धनका पांचवा हिस्सा देर ॥ ४२ ॥ यहा तक साक्षी सम्बन्ध निरूपण किया गया ॥३॥ ब्राह्मणोदकुम्भानिसकाशे साक्षिण परिगृहीयात् ।। ४५ ॥ तत्र ब्राह्मणं भूयात्सत्पं बहीति ॥ ४५ ॥ पाहण, जल भरा हुआ घडा, अथवा अग्निक एस साक्षी को ले जाया जाय ॥४४॥ यदि साक्षी माधण हो तो यहां पर उससे "सस पोलो" यह कहा जाय ॥१५॥ राजन्यं वैश्यं वा मा तवष्टापूर्तफलं कपालहस्तः सहस्तं भिक्षार्थी गच्छरिति ।। ४६ ।। यदि क्षत्रिय और वैश्य हो, तो उनसे 'दुरा (जर) और पूर्त (धर्मशाला, कुभा, मगोचे भादि जनता हिरेदार) मई फल न मिले, तुम अपनी शत्रु सेनाको तर समातेर मांगो फिनो, (मपि साय न पोलो)" सागर + [३ अधिक ८ . कौटलीय अर्थशास्त्र । शूद्रं जन्ममरणान्तरे गवः पुण्यफलं तद्राजानं गच्छेत् -11 ४७॥ राजश्व किल्लिप युष्मान् ॥ ४८ ॥ अन्यथावादे दण्डश्चानुवन्धः ॥४९॥ पश्चादपि ज्ञायत यथादृष्टश्रुतम् ॥५०॥ एकमन्त्राः सत्यमवहरतत्यनवहरतां सप्तरात्रादूर्ध्व द्वादशपणो दण्डः ॥५१॥ यदि साक्षी शूट हो तो उसप्ते "जन्मान्तरमें जो तुम्हारा पुण्य हो यह राजाको पहुँने । ४७ ॥ और राजाका पाप तुमको प्राप्त हो ॥ ४८ ॥ और याद रक्सो अट योल्नेपर अवश्यही दण्ड दिया जायेगा ॥ ४९॥ यादमें भी सुनने या देखगेके अनुसार मामले की जांच की जागो ॥५०॥ गलिये नुम सय लोगोको मिलकर सरपकाही घरहार करना चाहिये" इस प्रकार कहा जाय, यदि फिर भी ये सात दिनक सर २ बात न यताये, तो उगको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥५॥ त्रिपक्षाद्धमभियोग दगुः ॥ ५२ ॥ साक्षिभेदे यतो बहवः शुचयो ऽनुमता या ततो नियच्छेयुः ॥५३ ॥ मध्यं वा गृहीयुः ॥ ५४॥ यदि ३ महीने तक भी न बताये, तो उनके विरुद्ध मुकदमेका फैसला कर दिया जाय ॥ ५२ ॥ यदि किसी मुकदमें गयाहोका आपसमें मराभेद हो जाय तो उनमेसे तिस पातको बहुसरथक, पविन चरित्र तथा अनुमत गवाह केह, उसीके आधारपर फैसला कर दिया जाय ।। ५३ ।। अथवा किसीको मध्यस्थ बना लिपा जाय ॥५४॥ तद्वा द्रव्यं राजा हरेत् ॥ ५५ ॥ साक्षिणश्चेदभियोगादून युरतिरिक्तस्याभियोक्ता वन्धं दद्यात् ॥ ५६ ।। अतिरिक्तं या युस्तदतिरिक्तं राजा हरेत् ।। ५७ !! फिर भी फैसला न होने पर उस सम्पत्तिको (जिसपर झगड़ा हो)राजा ले लेखे ॥ ५५॥ ऋणी जो रकम अभियोक्ताने भापतग पसाई है, साक्षी यदि उससे न्यून सतारे, सो अभियोकाको चाहिये कि यह उस भधिक, बताये हुए पना पांचवां हिम्मा राजाको देव ॥ ५६ ॥ यदि साक्षी अधिक बताये तो उस अधिश धनको राजा एवं ॥५७ ।। पालिश्यादभियोक्ता दुःश्रुतं दुर्लिसितं प्रेताभिनिवेशं या समीक्षा साक्षिप्रत्यगमैव सात् ॥ ५८ ॥ माक्षिमालिश्शेग
११ अध्या०]
धर्मस्थीय
पृथगनुपयोगे देशकालकार्याणां पूमध्पमोचमा दण्डा इत्यौश-
नसा: ।। ५९।।
अभियोक्ताके मूर्ख होने के कारण, उसके ठीक न सुने जाने और ठीक
न लिसे जानेका मान करके, अधया उसका दिमाग ठीक नहीं है, ऐसा मान
करके, साक्षियोंके भरोसेपरही उसका फैसला किया जाय ॥ ५८ ॥ उशना
(शुम) भाचार्यके अनुयायी इस पातको कहते हैं, कि जब देश, कार, और कार्योंके
ठीक २ न बतलाये जानेपर अदालतम साक्षियों की मूर्खता सिद्ध होजावे, तो
उनको अवश्यही यथाचित प्रथम साहस दण्ड, मध्यम साहस दण्ड, तथा
उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।। ५९ ।।
कूटसाक्षिणो यमर्थमभूतं वा नाशयेपुस्तदशगुणं दण्डं दा.
रिति मानवाः ॥६०॥ वालिश्यादा मिसंवादयतां चित्रो घात
इति पार्हस्पत्या: ।। ६१ ।।
इसा प्रकार मनु आचार्य के अनुयाया कहते हैं, कि जो छली कपटी
साक्षी, फुध पात न होनेपर भा झूठा मुकदमा खडा करवाय धनका नाश करायें,
ये नाश हुए. धनका दसगुना दण्ड देवें ॥ ५० ॥ यूहरूपतिके अनुयायी कहते
हैं, कि अपनी मूर्खतास परस्पर विरुद्ध बोलनेवार साक्षियाका कपपूर्वक बध
करा दिया जाय ॥६॥
नेति कौटल्यः ॥६२॥ ध्रुवं हि साक्षिभिः श्रोतव्यम् ॥६३।।
परन्तु कौटत्यका यह मत नही है ॥ ६२ ॥ क्योंकि वह समझता
है कि साक्षी निश्चित यातकोटी सुन सकते हैं । अर्थात् साक्षीरूपसे वे जो कुछ
सुनते हैं, वह ठीकही होता ह ॥ १३॥
अशृण्मतां चतुर्विशतिपणो दण्डः ॥ ६४ ॥ ततो ऽर्धमनु-..
याणाम् ॥६५॥
निश्चित न सुननेवाले साक्षियोंको २४ पण दण्ड दिया जाय । अर्थात्
जो साक्षी किसी यातका टीक निश्चय न करकेही गवाही देनेको खडे हो जाते
है, उनको यह दण्ड दिया जाय ॥ ६१ । और इसस माया अर्थात् १२ पण
दण्ड उनको दिया जाय, जो साक्षी होकर यातको रोक २ नहीं यतराते ॥६५॥
देशकालाविदूरस्थान्साक्षिणः प्रतिपादयेत् ।
दूरस्थानप्रसारान्या स्वामिनाक्येन साधयेत् ।। ६६ ।।
इति धर्मस्यीय नृतीये ऽधिकरणे ऋणादान एकादशो ऽध्यायः ॥६६॥
भादितोऽस्पष्टितम ॥ ६८॥
“(५८)
कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधिक
शभियोकाको चाहिये कि देगकारके अनुसर सीप रहनेवाऐको ही
साक्षी बनावे । अश्या न्यायाधीशके कहनेपर, दूरदेशमें स्थित होने के कारण
सुगमतासे न आ सकने वाले साक्षियों को भी पुरावे ।। ६६॥
धर्मस्थीय सृतीय अधिकरणमें ग्यारहवां अध्याय समाप्त।
वारहवां अध्याय।
६४ प्रकरण।
औपनिधिक।
उपनिधिमणेन व्याख्यातः॥१॥
(उपनिधि उस धरोहरका नाम है, जो कोई वस्तु विना दिखाये पेटी
या कपडे आदिमें बन्द करके उसपर मोहर आदिलगाकर किसी के पास रखदी जाये)
ऋण सम्बन्धी नियमों के अनुसार उपनिधिका भी नियम समझना चाहिये ॥१॥
परचक्राटविकाभ्यां दुर्गराष्ट्रविलोपे वा प्रतिरोधकर्वा ग्राम
सार्थवजविलोपे चक्रयुक्ते नाशे वा ग्राममध्याग्न्युदकायाधे वा
किंचिदमोक्षयमाणे कुप्यमनिर्हार्यकर्जमेकदेशमुक्तद्रव्ये या ज्वाला-
वेगोपरुद्ध वा नावि निमनायां मुफ्तिायां खयमुपरूढो नोपनिधि-
मम्पाभवेत् ॥ २॥
शत्रुके पड्यन्त्र और जङ्गलनिवासियों के भाक्रमणसे, दुर्ग और राष्ट्रका
नाश हा जानपर, अथवा ढाकृ या चोरॉक द्वारा, गाव न्यापारी कम्पनियों,
और पशुओंके युण्डोंका नाश हो जानेपर, अथवा आभ्यन्तरिक पद्यन्योंके
कारण नाश होनेपर, गावके बीच में आग लगने या जलकी दाद आदिसे धनके
सर्वथा नष्ट हो जानेपर, भग्नि या वार आदिसे न नष्ट होने योग्य कुप्य अर्थात्
नांचा लोहा आदिके चुछ थोरा बहुत बचाये जानेपर भी, प्रचण्ड अनिके बीच
में घिर जानपर, नावके डूब जानेपर, या उसमें मालकी चोरी हो जानेपर,
भपना बचाव हो जानेपर भी उपनिधि पानेके लिये कोई व्यक्ति किसीपर
मुकदमा नहीं चला सकता ॥२॥
उपनिधिमोक्ता देशकालानुरूपं भोगवेतनं दद्यात् ॥ ३॥
द्वादशपणं च दण्डम् ॥ ४॥ उपभोगनिमित्तं नष्टं चाभ्याभवे-
चतुर्विशतिपणच दण्डः ॥५॥ अन्यथा या निष्पतने ॥६॥
। १२ अध्या०] धर्मस्थीय उपनिधिको अपने काममे लानेवाला पुरष देशकालके भनुसार उसे काममें लानेका बदला चुका देवे ॥ ३ ॥ और १२ पण दण्डके देवे ॥ ४ ॥ उपभोगके कारण उपनिधिको नष्टकर देने वाले पुरपपर अभियोग चलाया जाये, और २४ पण दण्ड किया जाय ॥४॥ यही नियम, अन्य किसी प्रकारसे उपनिधिके नष्ट हो जानेमे भी समझना चाहिये ॥ ६ ॥ प्रेतं व्यसनगतं या नोपनिधिमभ्याभवेत् ॥ ७॥ आधान- विक्रयापव्ययनेषु चास्य चतुर्गुणपञ्चबन्धो दण्डः ॥ ८ ॥ परि- वर्तने निष्पतने वा मूल्यसमः ॥९॥ यदि उपनिधि हर कोई पुरए मर जाये, या भापद्मस्त होजाये, तो उसपर आगे कोई अभियोग या दण्ड नहीं होसकता ॥ ७॥ यदि कोई व्यक्ति उपनिधिको कहीं गिरयो रसदे, वेंचदे, या और किसी तरहसे उसका अपव्यय करदे, उपका चौगुना पशबन्ध दण्ड दिया जाय ॥ ॥ उपनिधिको बदलने या अन्य किसी प्रकारसे नष्ट करने वाले पुरपसे उसके परायर मूल्य वसूल किया जाय ॥९॥ तेन आधिप्रणाशोपभोगविक्रयाधानापहारा व्याख्याताः ॥१०॥ नाधिः सोपकारः सीदेन्न चास्य मूल्यं वर्धेत ॥११॥ इस हीसे गिरवी रक्खी हुई यस्तु (आधि) के नाश करने, अपने कामम लाने, बेचने, गिरवी रख देने और बदलने में नियमोंका कथग किया गया। अर्थात् उपनिधि और भाधिक विषयमै उपर्युत नियमाको समान हो समझना पाहिये ॥१७॥ यदि गिरवी रखी जानेवाली वस्तु सोने चादीके भाभूपण (सोपकार, टपकार आभूपण) है, तो व नष्ट न होवे (अर्थात् उनको उसी दशाम रक्षा रहने दिया जावे) और उनपर व्याज नहीं लिया जाये ॥११॥ निरुपकारः सीदेन्मूल्यं चास्य वर्धेत ॥ १२ ॥ उपस्थित- स्थाथिमप्रपच्छतो अदशपणो दण्डः ॥ १३ । प्रयोउकासंनि- धाने वा ग्रामवृद्धषु स्थापयित्वा निष्क्रयमाधि प्रतिपद्येत ॥१४॥ इनसे अतिरिक्त आधिक नष्ट हो जानेका भय रहता है, इस लिये उनके पदलेमे दिये ऋणपर सूद ऐमा चाहिय ॥ १२॥ अपनी गिरवी रक्खी हुई वस्तु यापस लेनेके लिये आये हुए पुरुषको यदि उसमर्ण (प्याज आदिक लोभसे) न देवे, तो उसरी १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ १३ ॥ यदि अयमणको उत्तमणे (पही पाहर चले जाने मादिके कारण) अपने स्थानपर न मिले, तो ![३ अघि । (६०), कौटलीय अर्थशास्त्र यह आधिकै धनको, गांवके बड़े आस पुरपॉके पास रसकर, अपनी आधिको पापस ले लेवे ॥१४॥ निवृत्तवृद्धिको वाधिस्तत्कालकृतमूल्यस्तत्रैवावतिष्ठेत ॥१५॥ अनाराविनाशकरणाधिष्ठितो वा धारणकसनिधाने वा विनाश- भयादुद्गतार्थ धर्मस्थानुज्ञातो विक्रीणीत ॥१६॥ यदि अधमर्ग अपनी आधिको बेचकर ऋण चुकाना चाहता है, तो उसी समय उसका मूल्य निश्चय करके, उत्तमणके पासही रहने दे, परन्तु उसके याद फिर उस आधिपर उजमण सूद नही ले सकता ॥ १५॥ आधिसे वर्तमानग चाहे राम होरहा हो, या हानि, परन्तु आगे आसम भविष्यमै यदि उसके नाशको सम्भावना हो या उसके मूल्यसे मणको संख्या अधिक होनेपर अधमणका अनुपस्थितिम भी, न्यायाधीशको आज्ञानुसार उत्तमणे उस आधिको बेच देव ॥ १६॥ आधिपालप्रत्ययो वा १७ ॥ स्थावरस्तु प्रयासभोग्यः फल- भोग्यो वा प्रक्षेपञ्चद्धिमूल्यं शुद्धमाजीचं मूल्यक्षयेणोपनयेत् ॥१८॥ : न्यायाधाशका अनुपस्थितिमे आधिपाल (इस विभागका राजकीय कर्मचारी) की आज्ञानुसार इस कार्यका सम्पादन करे ॥१७॥ जो स्थायी सम्पत्ति परिश्रमपूर्वक या बिना हो परिश्रमके फल देनेवाली अथवा भोगनेके योग्य हो, उसे बचा नहीं जा सकता। जिस आधिको उत्तमर्ण व्यापारमें लगा देवे, उसके अनुकूल हुए २ लाभके सहित आधिका असी धन उसके मालिक को लौटांव ॥ १८॥ अनिसृष्टोपभोक्ता मूल्यशुद्धमाजीवं यन्धं च दद्यात् ॥१९॥ शेपमुपनिधिना व्याख्यातम् ॥ २० ॥ एतेनादेशो ऽन्याधिश्व व्याख्याता ॥ २१ ॥ यिनाही आज्ञाके आधिको उपभोग करनेवाला पुरप, उसके अच्छी हालतके, शुद्ध मूल्यका अदा करे, और जुरमाना भी देवे ॥ १९॥ शेष सत्र यतिरिके समारी अयिने मी समझना चाहिये ॥२०॥ इसके अनुसार भादेश (आशा) और अन्वाधि (कहीं गिरयो रक्खी हुई वस्नुको किसी अन्य पुरपके द्वारा वापस मंगवाना) के नियम भी समशने चाहिये ॥२१॥ सार्थेनान्याधिहस्तो वा प्रदिष्टां भूमिमपाप्तथोरैर्भग्नोत्सृष्टो या नान्याधिमभ्याभपेत् ॥ २२ ॥ अन्तरे वा मृतस्य दायादो १२ अध्या- धर्मस्थीय ऽपि नाभ्याभवेत् ॥ २३ ।। शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् ॥२४॥ व्यापारी, मवि किसीके हाथों गिरवी रक्ली हुई वस्तुको सौंपकर उसे कहींपर भेजे, परन्तु चिमेही चोरोंसे लड़े जानेके कारण यह निर्दिए स्थानपर न पहुँच सके, तो उसपर आधि विषयक अभियोग नहीं लगाया जा सकता ॥ २१ ॥ यदि रास्तेमही वह किसी तरह मर जाये, तो उसके पीछे दायभागियों पर भी अभियोग नहीं चलाया जा सकता ॥ २६ ॥ शेष सब नियम उपनिधिके समानही समझने चाहिये ॥ २४ ॥ याचितकमवक्रीतकं वा यथाविधं गृह्णीयुस्तथाविधमेवार्प- येयुः ॥ २५॥ श्रेपोपनिपाताम्यां देशकालोपरोधि दत्तं नष्टं विनष्टं वा नाभ्याभवेयुः ॥ २६ ॥ शेपमुपनिधिना व्याख्यातम् ॥२७॥ उधार मांगी हुई, सा किरायेपर ली हुई वस्तु जिस दशा में लगाय ठीक उसी हालतमें वापिस फरदी जाये ॥ २५ ॥ यदि देश या फालके अनुसार किसी दोष या विशेष आपत्तिसे यह दीहुई वस्तु कुछ खराब हो जाय, या बिल्कुल नष्ट हो जाय, तो उन लोगोंपर अभियोग नहीं चलाया जा सकता ।। २६ ॥ शेप नियम उपनिधिक समानही समझने चाहिये ।। २७ ।। वैच्यावृत्यविक्रयस्तु ॥ २८ ॥ चैव्यावृत्यारा यथादेशकालं विक्रीणानाः पण्यं यथाजातमूल्यमुदयं च दशुः ॥ २९ ॥ शेपमुप- निधिना व्याव्यातम् ॥ ३०॥ अब फुटकर विक्रीकर निरूपण किया जायगा ॥२८॥ फुटकर बेचने पाल व्यापारियों को चाहिये, कि वे देशकालके अनुसार अपनी वस्तुको पेचते यथोचित मूल्य और व्याग (उन थोक ध्यापारियों को, जिनसे इकट्ठी पस्तु खरीद लाकर बेचते है) देवें ॥ २९॥ शेष नियम उपनिधिके समानही समझने चाहिये ॥३०॥ देशकालातिपातने चा परिहीणं संपदानकालिकेनार्पण मूल्यमुदयं च दगुः ॥ ३१॥ यथासंभापितं चा विक्रीणाना नोदयमधिगच्छेयुः ।। ३२ ।। मूल्यमेव दाः ।। ३३ ॥ यदि देशकालके अनुसार पहिले खरीदी हुई चीजो का मूल्य गिर जाय, सो वर्तमान दिये जानेवाले मूल्य के अनुसार मूल्य और व्याज्ञ (धोक व्यापरि. थो को) देव ॥ ३१॥ यदि छोटे फुटकर पेपने पाले व्यापारियों का धड़े व्यापा-
3
.
कोटलीय अर्थशास्त्र 1. अधि.
रियोंके साथ यह स होचुका है कि वे किसी नियत मूल्य पर ही माल बेचेंगे,
तब उसी मूल्यपर घेचते हुए छोटे, वड़ों को केवल मूल्य देवें, ग्याज न
देयं ।। ३२ ॥ ॥ ३३॥
अर्थपतने या परिहीणं यथापरिहीणमूल्यमूनं दद्युः ॥३४॥
सांव्यवहारिकेपु वा प्रात्ययिकेष्वराजवाच्येषु भ्रपोपनिपाताभ्यां
नष्टं विनष्टं वा मूल्यमपि नं दगुः ॥ ३५ ॥ देशकालान्तरितानां
तु पण्यानां क्षयव्ययशुद्धं मूल्यमुदयं च दयुः ।। ३६ ॥
यदि कीमत गिरजाय, तो गिरी हुई कीमत के अनुसार थोडा मूल्य
देवें ॥ ३४ ॥ यावहारिक विश्वास पर होने वाले सौदामे, जिनमें कि कानूनी
कारवाई कोई नहीं की गई है, यदि किसी प्रकार के दोपया आकस्मिक आपत्ति
के कारण माल कुछ खराब होजाये, या बिल्कुल नष्ट होजावे, तो उसका मूल्य
भी छोटे व्यापारी न देव ॥ ३५ ॥ परन्तु दूसरे स्थान, या दूसरे समयमै येची
जाने वाली चीजोका, छोजन (क्षय) और खर्च (व्यय) का ठीक हिसाब करके,
फिर उचित मूल्य और व्याज दिया जावे ॥३६॥
पण्यसमवायानां च प्रत्यंशम् ॥३७॥ शेपमुपनिधिना
व्याख्यातम् ॥३८॥ एतेन चैय्यावृत्यविक्रयो व्याख्यातः ॥३९।।
निक्षेपश्चोपनिधिना ॥ ४० ॥
स्टेशनरी सामान को प्रत्येक वस्तु कुछ अंश छीजनमें निकाल दिया
जावे ॥ ३७ ॥ बासी नियम उपनिधिके समान ही समझने चाहिये ॥३०॥
इसीके अनुसार पुटर विक्रांक भी निरम समझने चाहियें ॥३९॥ निक्षेप (रूप
और संरयाको दिखलाकर खुलो भवत्थामे दिया हुआ धन) और उपनिधि (१
सूत्र देखा) के नियम समान ही है ॥ ५० ॥
तमन्येन निक्षिप्तमन्यस्यार्पयतो हीयेत ॥४१॥ निक्षेपाप-
हारे पूर्वापदानं निक्षेपारश्च प्रमाणम् ॥ ४२ ॥ अशुचयो हि
कारवः ॥ ४३ ॥
कोई व्यक्ति किसी दूसरेके निक्षेप को, और किमीको देदेवे, तो उसे
नियमानुसार यधोचित दण्ड दिया जाय ॥४१॥ जिसके पास निक्षेप रक्खा
गया है, यह यदि उसे दबाले, या नष्ट घरदै, तो उसको प्रथम परिस्थिति
(हेमियत आदि) की जांच की जाय,ओर इस यातमे निक्षप्ता (धरोहर रखने वाले)
वो हो प्रमाण माना जाय, अधीर उस हो के कथनानुसार इस मामले का
फैसला किया जाय ॥ ४२ ॥ शिल्पी लोग प्रायः ईमानदार नहीं होते ॥ ४३ ॥
१२ अध्या०] धर्मस्थाय (६३) नैपां करणपूर्वो निक्षेपधर्मः ॥ ४४ ॥ करणहीनं निक्षेपम- पव्ययमानं गूढमिनिन्यस्तान्साक्षिणो निक्षेप्ता रहस्यप्रणिपातेन प्रज्ञापयेत् ॥ ४५ ॥ इनके यहा जो निक्षेप रक्खा जाता है, ये लोग उसका कोई प्रमाण स्वरूप कागज आदि लिसकर (करणपूर्व) नहीं देते ॥ ५५ ॥ प्रमाण रूप कागज आदि लिखे हुए विना ही (करणहीनम्) जो निक्षेप इमक यहां रखा गया हो, यदि ये लोग उसका अपव्यय करें, तो निक्षेप्ता को चाहिये कि वह, छिपे तौरपर दीवारॉकी मोट में ये हुए साक्षियों को, इनके गुप्त भेदोको सामने रखकर पतलादे ॥४५॥ यनान्ते या मध्यमवणे विश्वासेन रहसि वृद्धो व्याधितो चैदेहकः कश्चित्कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत् ॥४६॥ तस्य प्रतिदेशेन पुत्रो भ्राता वाभिगम्य निक्षेपं याचेव ॥४७॥ दाने शुद्धिरन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात् ।। ४८ ॥ अथया जगर में, नावगें, (या अपने कार्यों में व्यग्र होनेझी हालतम) या एकान्तमें विश्शस पूर्वक, कोई सूडा, यीमार, या वैदेहक (फय विक्रय करने याला व्यक्ति, अथवा सफर जाति विशेष) सास निशान किये हुए व्यको इसके (शिपीके) हाथमें सौंपकर पा जाये ॥ ४६॥ पीछे से उसके (निक्षेप्शाक) कहने पर, उसका रडका या भाई शिल्पी के पास आकर उस निक्षप क्षो मांगे ॥ ७ ॥ यदि यह दे देये तो शुद्ध (ईमानदार) समझा जावे, न देने पर निक्षेप उसमे घसूल किया जाये, और उसको चोरी का दण्ड दिया जावे ॥४८॥ प्रवज्याभिमुखो या श्रद्धेयः कश्चित्कृत्तलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्य प्रतिष्ठेत ॥४९॥ ततः कालान्तरागतो याचेत १॥ ५० ॥ दाने शुचिरन्यथा निक्षेप स्तयदण्डं च दद्यात् ॥५१॥ अथवा कोई विश्वासी पुरप, सन्यासी का चेप बनाकर, विहित प्य को इसके हाथमें सौपकर चला जाये ॥ ५९॥ पिर समय के बाद आकर माये ॥५० देदेने पर ईमानदार, अन्यथा उपसे निक्षेप बसूल किया जाय, और सोशीका दपर दिया जाय ॥५॥ कृतलक्षणेन वा द्रव्येण प्रत्यानयंदनम् ॥ ५२ ॥ वालि- (६४) कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधिक शजातीयो या रात्री राजदायिकाङ्क्षणभीतः सारमस्य हस्ते नि- क्षिप्यापगच्छेत् ॥५३॥स एनं वन्धुना अगारगतो याचेत ॥५४॥ दाने शुचिर यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात् ।। ५५ ॥ अथवा चिन्ह किये हुए ट्रम्पके द्वारा इसरो गिरफ्तार किया जाय ॥५२॥ अथवा कोई पुरप मूखंसा यनकर रातमें पुलिस के देख लेने से डरा हुभा सा, इसके हायमे द्रव्यको सौपकर चला जावे ॥५३ ॥ यह फिर अपने भाईके साथ इसके घर आकर इससे वह धन मांगे ॥ ५५ ॥ दे देने पर ईमानदार अन्यथा इससे निक्षेप वसूल किया जाय, और इसे चोरी के दण्ड से दण्डित किया जाय॥ ५५॥ अभिज्ञानेन चास्य गृह जनमुभयं याचत ॥ ५६ ॥ अन्य- तरादाने यथोक्तं पुरस्तात् ।। ५७ ॥ द्रव्यभोगानामागमं चास्या- नुयुञ्जीत ॥ ५८ ॥ इसके घर मालके पहिचान लेनेसे, घरके दो आदमियोंसे अलहदा २ वह माल मांगा जाय ॥ ५६ ॥ यदि उन दोनों में से कोई एक देनेसे इन्कार करे, तो पूर्वोक्त नियम का ही पालन किया जाय ॥ ५७ ॥ तथा अदालतमें इस से पूछा जाय कि 'यह जो तुम धनके कारण मौज उड़ा रहे हो, यद तुम्हें कही से प्राप्त हुआ है ॥ ५८ ॥ तस्य चार्थस्य व्यवहारोपलिङ्गनमाभियोक्तुश्वार्थसामर्थ्यम् ॥ ५९॥ एतेन मिथः समवायो व्याख्यातः ॥ ६०॥ और उस अर्थक व्ययहार एवं चिन्होंके सम्बन्धमें, तथा अभियोक्का की आर्भिक दशाके सम्बन्ध में भी अच्छी तरह पूछताछ कीजाय ॥ ५९॥ इतमे से, आपसमें मिलकर व्यवहार करने वाले सब ही पुरपा के मामलों को समझना चाहिये ॥६॥ तस्मात्साक्षिमदच्छन्नं कुर्यात्सम्यग्विभापितम् । 1. स्वे परे वा जने कार्य देशकालाग्रवर्गतः ॥ ६१ ॥ हात धर्मस्थाये तृतीये ऽधिकरणे भोपनिधि द्वादशो ऽध्याय ॥ १२ ॥ भादित एकोनसप्ततिः ॥ ६९ ॥ इस सूग्रम 'दन्धुमा अगार गत.' के स्थानपर किन्ही पुस्तका में 'धनागारगत ' पाठ है। शामशास्त्री और प्राणनाथ विद्यारङ्कार ने इस होके अनुसार अर्थ किया है, परन्तु यह पाठ कुछ अच्छा नहीं मालूम होता ! क्योंकि जेसमें जाकर पूछना कुछ अस्वाभाषिक सा मालूम होता है। .
है ३ १३ अभ्या०] धर्मस्थीय इस लिये प्रत्येक व्यक्ति, अपने या पराये पुरुषके साथ व्यवहारमें, साक्षीके सामने ही लेन देन सय कार्यों की कहा सुनी या लिखा पढ़ी करे, और उसके साथ ही स्थान तथा समय का भी खास तौर पर जिक्र जरूर करदे ।। ६१॥ धर्मस्वीय हनीय अधिकरणमें चारहवां अध्याय समाप्त । तेरहवां अध्याय ६५भकरण दास कल्प उदरदासबर्जमार्यमाणमप्राप्तव्यवहारं शूद्र विक्रयाधानं नयतः खजनस्य द्वादशपणो दण्डः ॥१॥ वैश्यं द्विगुणः ॥२॥ क्षत्रिय त्रिगुणः ॥३॥ ब्राह्मणं चतुर्गुणः ॥ ४ ॥ आर्यों के प्राणभूत, उदर दासको छोड़कर, यदि नाबालिग शूद्रको कोई उसका ही अपना आदमी येरे या गिरवी रक्खे, तो उसको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥१॥ यदि नायालिग पैश्यको कोई उसका अपना सम्बन्धी ही पेये या गिरवी रखे, तो उसको २४ पण ॥ २॥ इसी प्रकार क्षत्रिय को ३६ ॥३॥ भौर माह्मण को ३८ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४ ॥ परजनस पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः क्रेश्रोतॄणां च ॥५॥ म्लेच्छानामदोषः प्रजा विक्रेतुमाधातुं वा ॥ ६॥ न वेवार्यस्य दासभावः ॥७॥ यदि इन नायालिग खूप आदि कोई दूसरा आदमी पेचे, या गिरवी रक्खे, तो उनको प्रथम, मध्यम, उत्तम साहस दण्ठ तथा यध दण्ट मापूर्वक दिये जाये ! खरीदनेवाले और गवाहोंके लिये भी यही दण्ड है। म्लेच्छ अपनी सन्तानको पेध या गिरवी रख सकते हैं, इसमें कोई दोष नहीं ॥६॥ परन्तु आर्य किसी हालतमें भी दास नहीं हो सकता ॥७॥ अथ वार्यमाधाय कुलबन्धन आर्याणामापदि निष्पयं चाधि- गम्य बालं साहाय्यदातारं वा पूर्व निष्क्रीणीरन् ॥ ८॥ सदा- माधाता निष्पतितः सीदेव ।। ९ ।। द्विरन्येनाहितकः ॥ १० ॥ भयवा सम्पूर्ण फुलके बन्धनमें १६ जानेपर, पा पहुवसे भार्योपर .
[३ अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र कष्ट आ पडनेपर, भार्थको भी गिरवी रखदे, और उसके छुडाने योग्य धन प्राप्त करके प्रथम चालकको अथवा अपने कार्योमें सहायता देनेवाले को छुडाचे ॥८॥जो पुरुप स्वय अपने भापको गिरवी रख चुका हो, वह" यदि एक बार भी यहांसे भाग जावे, तो उसे जीवन पर्यन्त दास पनाया जावे ॥५॥ जिसको अन्य लोगोंने गिरवी रक्सा हो वह दो बार भागनेपर सदा के लिये दास यमाया जाय ॥ १० ॥ सकृदुभौ परविपयामिमुखी ॥ ११ ॥ वित्तापहारिणो वा दासस्यार्यभावमपहरतो ऽर्धदण्ड ॥ १२ ॥ निष्पतितप्रेतव्यसनि- नामाधाता मूल्यं भजेत ॥ १३ ॥ ये दोनाही यदि एकवार भी दूसरे देशमें चले जानेका इरादा करें, तो जीवन पर्यन्त दास पनाये जावें ॥१॥ धन चुराने वाले अथवा किसीक आर्यवको अपहरण करनेवाले (अर्थात् आर्यको दास बनानेपाल) दासको आधा दण्ड दिया जाये ॥ १२ ॥,भागे हुए, मरे, हुए, तथा बीमारका मूल्य, गिरवी रखनेवारेको ही भुगतना परे। (अर्थात् ऐसे व्यकियोंको गिरवी रखनेवाला पुरप उनके मूल्यको अवश्य हादा दे) ॥ १३ ॥ प्रेतविण्मूनौच्छिटग्राहणमाहितस्य नगस्तापनं दण्डप्रेषणमति- क्रमणं च स्त्रीणां मूल्यनाशकरम् ।। १४ ॥ धात्रीपरिचारिकार्ध- सीतिकोपचारिकाणां च मोक्षकरम् ॥ १५ ॥ जो व्यक्ति पुरुप दाससे मुर्दा, मलमून, या झूठन उठवावे और स्त्री दासको अनुचित दण्ड दे, उसके सतीत्वको नष्ट करे, या अपना अथवा उसकी नग्न अवस्थामें उसे उपस्थित करे या स्थय उपस्थित हो, तो उसके (गिरवी रखने के बदला दिये हुप) धनको जन्त कर लिया जाथे॥१४॥ यदि यही व्यवहार दाई, घाइदासी, अर्दसाविका (गिरवी रक्पी दुई, उस जातिकी खी जिस जातिमें पुरुषोंका जावन निर्वाह विशेपकर स्त्रियोंके कार्योंपर ही निर्भर हो) भीर भीतरी दासाके साथ किया जावे, तो उन्हें दासीपनेसे छुटा दिया जाये । (भधात् व एटकर सदाके लिये अपन घर जा सकती है) ॥१५॥ सिद्धमुपचारकस्साभिप्रजातस्थापक्रमणम् ॥ १६ ॥ पानी- माहितिका वाकामा ववशामधिगच्छतः पूर्वःसाहसदण्डः॥१७॥ परवशा, मध्यमः ॥ १८॥- यदि उच्चकुलमें उत्पन्न हुए दाससे उपर्युक्त ( सूबमें पर्णित) ((६७) २३ अध्या०] *धर्मस्यीय कार्य कराया जाये तो यह वहासे दासपनेको छोडकर-घला जा सकता है ॥१६॥ अपनी दाई या गिरवी रखी हुए किसी अन्य स्त्रीको उनकी इच्छाके विरुद्ध जो व्यक्ति स्वय उनको भपने वशम लानेकी चेष्टा करे, तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ १७ ॥ यदि उपयुक्त अवस्थामें किसी दूसरे व्यक्तिके वश में लाने के लिये चेष्टा करे, तब उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ॥ कन्यामाहितकां चा स्वयमन्येन का दूपयतः मूल्यनाश: शुल्क तद्विगुणश्च दण्डः ॥ १९॥ आत्मनिकायियाः प्रजामार्या विद्यात् -- और गिरवी रखखी हुई कन्याको जो पुरुष स्वय या किसी दूसरेके द्वारा दूपित करे, उसका (बदलेम दिया हुआ) धन जब्तकर लिया जाये, और कन्याको कुछ धन जुरमानेके तौरपर उससे दिलाया जाय । तथा इससे दुगना दण्ड सरकारको देवे ॥ १९ ॥ अपने आपको येच देनेवाले (आय) पुरष. १ की सन्तानको आर्यही समझा जावे ॥२०॥ 'आत्माधिगतं स्वामिकर्माविरुद्धं लभेत पिश्यं च दायम् ॥२१॥ मूल्येन चार्यत्वं गच्छेत् ।। २२ ॥ तेनोदरदासाहितको व्याख्यातो ।।२३।। अपने मालिककी माज्ञानुसार वह स्वयं कमाये हुए धनको भएन पास रख सकता है, और पिताकी सम्पत्तिका भी दायभागी हो सकता है ॥२१॥ तथा अपनी कीमत चुकाकर फिर यह भाय भावको प्राप्त हो सकता (अर्थात् दासताको छोडकर आर्य बन सकता है) इसा प्रकार उदरदास और आहितककै विषयम नियम समझने चाहिये ॥ २३॥ प्रक्षेपोनुरूपश्चास्य निष्क्रयः ॥ २४ ॥ दण्डप्रणीतः कर्मणा दण्डमुपनयत् ।। २९ ।। आर्यप्राणो वजाहतः कर्मकालानुरूपेण मृल्यार्थेन या विभुच्येत ।। २६ ।। गिरवी रखनेके अनुसार ही इनके छुड़ानेका मूरय होना चाहिये ॥२५॥ जिस पुरएको दण्डका धन न भुगतानेके कारण दासता स्वाकार करनी पड़ी है, वह किसी तरहका काम करके उस धनको भुगता देवे, आर स्वतन्त्रता प्राह करऐवे ॥ २५॥ आर्यदास (मार्योका प्राणसम कोई दास स्था) यदि कहीं सुनहम पराधीन होकर दूसरोंसे दास बना लिया गया है, तो यह अपन .
1३ अधिक (६८) कौटलीय अर्थशास्त्र काय या समयके भनुसार, अथवा आधा मूल्य (अपने पफ जाने भादिके ग्ययका) देकर घुटकारा पासकता है ॥ २६ ॥ गृहेजातदायागतलब्धक्रीतानामन्यतमंदासमूनाष्टवपं विबंधु- मकामं नीचे कणि विदेशे दासी या सग मप्रतिविहितगर्भ- भर्मण्यां विक्रयाधानं नयतः पूर्वः साहसदण्डः केतृश्रोतॄणां च ॥२७ घरम उत्पन्न हुए, दायभाग बाटते समय अपने हिस्सेमें प्राप्त हुए, या खरीदे हुए, बन्धुवान्धवोंसे रहित आठ वर्षसे कम उमरके दासको उसकी इच्छाके विरुद्ध जो व्यक्ति कोई नीच काम करनेके लिये विदेशम येचे या गिरवी रक्खे, और इसी प्रकार जो गर्भिणी दासीको, उसके गर्भकी रक्षाका कोई प्रयन्ध न करता हुआ, येचे या गिरवी रखे, उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय, और यही दण्ड उनके खरीदनेवाली तथा गवाहोंको दिया गाय ॥२७॥ दाममनुरूपेण निष्क्रयेणार्यमकुवतॊ द्वादशपणो दण्डः॥२८|| संरोधश्चाकारणात् ।। २९ ।।दासद्रव्यस्य ज्ञातयो दायादाः॥३०॥ तेपामभावे स्वामी ॥ ३१॥ जो व्यक्ति उचित मूल्य पानेपर भी किसी दासको भाये नहीं बनाता, अथात् उसको दासतासे नहीं छोडता, उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ २८ ॥ यदि न छोदमे में कोई कारण भी न हो, तो उसे कारावासका दण्ड दिया जाय ॥ २९ दासकी सम्पतिके अधिकारी, उसके पन्धुवान्धव कुटुम्यो लोग होते हैं ॥३०॥ उनके न होनेपर, दासका मालिक ही उसकी सम्पत्तिका अधिकारी होता है ॥३१॥ खामिनोऽस्यां दास्यां जातं समातृकमदासं विद्यात् ॥३३॥ गृह्या चैत्कुटुम्बार्थचिन्ननी माता भ्राता भगिनी चास्या अदासाः स्युः॥ ३३॥ दासं दासी वा निष्क्रीय पुनर्विक्रयाधानं नयतो द्वादशपणो पण्डः ॥ ३४ ॥ यदि मालिकसे उसकी दासीम सन्तान उत्पन होजाय तो वह सन्तान और उसकी माता दोनों ही दासतासे मुक्त कर दिये जाय ॥३२॥ यदि वह ना कुदम्प के सब कार्योका चिन्तन करती हुई, गालिक पाम ही भार्या के समान हमा पाहती है, तो उसको माता, पहिन और माइयाको भी दोसतासे मुक्त
-
२३ अध्या०]
धर्मस्थीय
कर दिया जाये ॥ ३३ ॥ दास ओर दासीको एकवार घुसकर यदि फिर दुयारा
कोई बेचे या गिरवी रपखे, तो उसको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ ३४ ॥
अन्यत्र स्वयंवादिभ्यः ॥ ३५ ॥ इति दासकल्पः ॥ ३६ ॥
कर्मकरस्य कर्मसंवन्धमासन्ना विद्युः ॥ ३७॥ यथा संभापितं
चेतनं लभेत ॥ ३८ ॥ कर्मकालानुरूपमसंभापितचेतनः ॥ ३९ ॥
परन्तु यदि दास और दासी विकने या गिरवी रखे जाने के लिये स्वयं
कहदे, तो कोई दोष नहीं ॥ ३५ ॥ यहातक दासोके सम्बन्ध निरूपण किया
गया ॥ ३६ ॥ नौकरकी नियुक्तिको पड़ोसीलोग जान ॥ ३७ । प्रत्येक नाफर,
जैसा से होगया हो उसीके अनुसार नौकरी ऐथे ॥ ३८ । परन्तु जिसका वेतन
पहिलेस ते नहीं हुआ है, वह अपने कार्य और समयंक अनुसार वेतन
कर्यका सस्यानां गोपालकः सर्पिपा वैदेहकः पण्यानामा-
स्मना व्यवहतानां दशभागमसंभापितवेतनो लभेत ॥४०॥
संभापितयेतनस्तु यथासंभापितम् ॥४१॥
किसान (खेती करने पर नौकर हुआ ग्याक्ति ) अनाजका, ग्वाला धी
का, और खरीद फरोग्त करने व ला अपने द्वारा पयत हुई चीजोंका दसवां
हिस्सा लेने, बातें कि बेतन पहिलेसे ते न हुआ हो ॥ ५० ॥ पहिलेसे ते
होनेपर तो, उसहाके अनुसार ॥ ४ ॥
कारुशिल्पिकुशीलवचिकित्सकवारजीवनपरिचारकादिराशा-
कारिकवर्गस्तु यथान्यस्तद्विधः कुर्याद्यथा या कुशलाः कल्पयेयु.
स्तथा वेतनं लभेत ॥४२॥
कारीगर, गाने बजानेका व्यवसाय करनेवाले नट आदि, चिकित्सक,
यकील ( वाग्जीवन ) परिचारक ( नौकर धाकर) आदि आशाकारिक वो
(मेहनतानेकी आशासही काम करनेवाले) को वैसाही वेतन दिया जाये, जैसा
अन्य स्थानोंमें दिया जाता हो । अथवा जिस प्रकार चतुर पुरप नियत करदें।
उसी के अनुसार दिया जाये ॥ ४२ ॥
साक्षिप्रत्ययमेव स्यात्
11 ४३ ॥ माक्षिणामभाने यतः कर्म
ततो ऽनुयुञ्जीत ॥ ४४ ॥ चेतनादाने दशवन्धो दण्डः पट्पणो
पा॥४५॥ अपव्ययमाने द्वादशपणो दण्डः पश्यन्धो या ॥४६॥
((७०) कौटलीयामशास्त्र 'मषि विवाद होनेपर, माक्षियोंकि क्थनानुसारही येउनका निर्णय किय जाय ॥ ४३ ॥ यदि साक्षी भा न हो, तो जप्ता काम किया हो, उसी के अनुपा फैिसला करदिया जाय ॥ १४ ॥ घेतन नानेपर उसका दसयों हिस्सा दम अथवा ६ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४५ ॥ भोर अपव्यय करनेपर, उसका पांधक हिस्सा, अपवा १३ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४६॥ नदीवेगज्वालास्तेनच्यालोपरुद्रः सर्वस्व पुत्रदागरमदानेनात स्वातारमाहय निस्तीर्णः कुशलपदिष्टं वेतनं दद्यात् ॥ ४७ ॥ तेन सर्वत्रातदानानुशया व्याख्याताः ॥४८॥ नदीक प्रवाहम यहता हुआ, अनि, चोर या सिह यधेरा आदि हि । जन्तुओसे घिरा हुभा, दुखी पुरप यदि अपना सर्वस्व, पुत्र, स्त्री या स्व अपने आपको देदेनेका वादा करके किसी रक्षा करनेवालको युगफर उ भापत्तिसे पार हो जाये, तो फिर तरकालीन चतुर मेता जसा 'फहें, उसी अनुसार उस रक्षनकी वेतन देये ॥ ७ ॥ इसी प्रकार सयही अवसरों सुखी पुरपके वेनेके प्रणका नियम समशना चाहिए ॥ ८॥ लमेत पुंश्यली भोग संगमस्योपलिङ्गनात् । अतियाश्या तु जीयेत दौमत्याविनयेन वा ।। ४९ ।। इति धर्मस्थीये गृतीये ऽधिकरणे दासकर्मकरकरप दासकल्प फर्मकरकल्पे स्व म्पधिकार प्रयोदशो ऽध्याय ॥ १३ ॥ भादित. सप्ततिरध्याय ॥७॥ वश्या, पुरपको तृप्त करनेके पहिलेही अपने संगमके ते किए हुए धन रेलवे । यदि यह दुष्ट बुद्धिसे, अथवा उरा धमकाकर अनुचित रूपसे अधि .धम ऐना चाहती है, तो उसे वह न दिया जाये ॥१९॥ धर्मस्थीय तृतीय अधिकरण में तेरहवां अध्याय समाप्त। चौदहवां अध्याय। ६६ प्रकरण कर्मकर कल्प, सम्भूय समुत्थान गृहीत्वा वेतन कर्माकुर्वतो भूतकस्य द्वादशपणो दण्डः ॥ -संरोधवाकारणात् ॥ २॥ अशक्तः कुत्सिते कर्मणि न्याधौ व्यस यानुशयं समेत ॥ ३ ॥ परेण या कारयितुम् ।।४।।
। २४ अध्या०] धर्मस्थीव वेतन लेकर जो नौकर काम न करे उसे १३ पण दण्ड दिया जाय ॥१॥ यदि बिना ही कारण काम न करे, सो कारावासका दण्ड दिया जाय ॥२॥ किसी नीचे कर्मम बीमारीमें, तपा आकस्मिक भापत्तिमें प्रस्त होने के कारण कार्य करनेमें असमर्थ हुआ नौकर छुट्टी ले सकता है॥३॥। अपवारअपने' कार्यको किसी दूसरे भादमीसे करवानेका प्रवन्ध करके भी छुट्टी ले सकता है। - तस्य व्ययं कर्मणा लभेत ॥ ५॥ भा या कारयितुं नान्य- स्त्वया कारयितन्यो मया या नान्यस्य कर्तव्यमित्यविरोघे भर्तुर कारयतो भृतकस्साकुर्वतो या द्वादशपणो दण्डः ॥६॥कर्म निष्ठापने भर्तुरन्यत्र गृहीतवेतनो नासकामः कुर्यात् ।। ७ ।। जो उसका पर्च हो, यद उसके कामसे लेवे ॥५॥ यदि मालिकही अपना काम किसीसे करावे, तो उनका आपसमें 'मुम्हें और किसीसे काम मही कराना चाहिए तथा मैं और किसीका काम नहीं करूंगा' इस प्रकारका समझोता होजेपर, मालिक उसहीसे न कराये तो १२ पण दण्ड, और नोकर। न करे तो उसको भी १२ पय दण्ड दिया जाये ॥ ६॥ यदि किसी मजदूरने दूसरी जगह फाम फरमेका घेतन लिया हो, तो वह अपने पहिले मालिक कामको समाप्त करनेपरही, इशानुसार दूसरा काम प्रारम्भ करे ॥ ७ ॥ उपस्थितमकारयताकृतमेव विधादित्याचार्याः ॥ ८॥ नेति' कौटल्यः ॥ ९॥ कृतस्य चेतनं नाकृतस्यास्ति ॥१०॥ आचार्योका मत है कि उपस्थित हुए मजदूरसे यदि काम न भी लिया जाये तो भी (उसकी उपस्थिति हाजिरी ठीक होने के कारण) उसने काम। फरही लिया है, ऐसा समझा जावै ॥ ८ ॥ परन्तु कौटल्यका यह मत नहीं है। ॥ ९॥ यह कहता है, कि वेतन फाम करनेकाही होता है, काम न करते हुए ठाली बैठने का नहीं होता।..॥ सचेदल्पमपि कारयित्वा न कारयेत्कृतमेस विधात् ॥११॥ देशकालातिपातनेन कर्मणामन्ययाकरणे वा नासकामः कृतमनु- मन्येत ।। १२ ।। सभापितादाधिकक्रियायां प्रयास मोयं कुर्यात् ॥ १३ ॥ तेन संघभृता व्याख्याताः ॥ १४ ॥ यदि मारक पोडासा भी काम कराके फिर न कराये, तो अवश्य नौकरका किया हुमा काम समहार जावै ॥ ॥ ॥ माएिकही भाशानुसार टीका F कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधिक स्थान और समयपर काम न करनेसे, अथवा कामोंको उहटा कर देनेपर, नौकरने वस्तुतः काम किया है, ऐसा न समझा जावे ॥१२॥ मालिकके. कहनेसे अधिक काम करनेपर, उरानी मेहनत व्यर्थ ही समझनी चाहिए ॥१३॥, संघ (व्यापारियोंकी कम्पनी भादि) से मज़दूरी पानेवालोंके भी यही नियम तेपामाधिः सप्तरात्रमासीत ॥१५॥ ततो ऽन्यमुपस्थापयेत् ॥ १६ ॥ कर्मनिप्पाकं च ॥ १७ ॥ न चानिवेद्य भर्तुः संघः किंचित्परिहरेदपनयेद्वा ॥ १८ ॥ तस्यातिकमे चतुर्विंशतिपगो दण्डः ॥ १९॥ संघेन परिहतस्यार्धदण्डः ॥ २०॥ इति भृतका धिकारः ॥ २१॥ काम टीक न करनेपर उनकी सात दिनकी मजदूरी दबाए रखनी चाहिए ॥ १५॥ फिर मी टीकम करें तो काम दूसरेको देदिया जावे ॥१॥ और उस कामको टीक २ करा लिया जाये, तथा उचित मज़दूरी देदी जावे ॥ १७ ॥ मालिकको बिना कहे, मजदर न कोई यस्तु नष्ट करें, और न ले जा ॥ १८ ॥ इस नियमका उल्लहन करनेपर २४ पण दण्ड दिया जावे ॥ १९ ॥ यदि सपही मजदूर मिलकर ऐसा करें, तो उनको भाधा दण्ड दिया जाय ॥ २० ॥ यहां तक मज़दूरो (भृतक-कर्मकर-मज़दूर) के विषयमें कहा गया ॥२१॥ संघभृताः संभूयसमुत्थातारो या यथासंभापितं वेतनं समं वा विभजेरन् ॥ २२ ॥ कर्पकवैदेहका वा सस्यपण्यारम्भपर्यवसा- नान्तरे सनस्य यथाकृतस्य कर्मणः प्रत्यंशं दाः ॥ २३ ॥ पुरुषो. पस्थाने समग्रमंशं दाः ॥२४॥ संघसे इकट्ठी नौकरी पानेवाले, अथवा आपसमे मिलकर टेके भादिके द्वारा काम करनेवाले, पहिस्से ते किए हुएके अनुसार या बरायर २ आपसमें घेतन यांट लेवें ॥ २२ ॥ किसान फसएके आरम्भसे अन्न, मह, अश्यया क्रय- विक्रर करने वाला व्यापारी चीज़के खरीदनेसे हेकर विक जाने तकके साथीको उनके किये हुए कामके अनुसार हिस्सा देवें ॥ २३ ॥ यदि कोई साझी व्यक्ति अपने स्थान पर काम करने के लिए किसी दूसरे व्यक्तिको नियत करो तो भी उसको उसका पूरा हिस्सा दिया जाये ॥ २४॥ संसिद्धे तूद्धृतपण्ये सन्नस्य तदानीमेव प्रत्यशं दद्युः ॥ २५।। +- का १४ अध्या धर्मस्थीय (७३) सामान्या हि पथि सिद्धिवासिद्धिश्च ॥२६॥ प्रक्रान्त तु कणि स्वस्थस्यापक्रमतो द्वादशपणो दण्डः ॥ २७ ॥ माल विक जानेपर जब दूकान उठा दी जानेवारी हो, तो साझीको 'फारन हो उसका हिस्सा दे दिया जाय ॥ २५ ॥ क्योकि आगे काम करने में सफलता और असफलता दोनही समान है ( इसलिए जो चाहे साझेमे करे, न चाहे न करे, पहिला हिसाय साफ कर दिया जाये।)॥ २६ ॥ कामके होते रहते हुएहो, यदि कोई तन्दुरस्त व्यक्ति काम छोड़ कर चला जावे, तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ २७ ॥ न च प्राकाम्यमपक्रमणे ॥ २८ ॥ चौरं त्वभयपूर्व कर्मणः प्रत्यंशन ग्राहयेद्दद्यात्मत्यंशममयं च ॥ २९ ॥ पुनः स्तेये प्रवा- सनमन्यत्र गमनं च ॥३०॥ क्योकि इस प्रकार काम छोड़कर चले जाना, किसीकी हवापर निर्भर नहा है ॥ २८ ॥ यदि कोई आपसका काम करनेवाला व्यक्ति चोरो करले, तो उसको भमयदान पूर्वक कहा जाय कि हम तुम्हारा हिस्सा भी देदेंगे, पास ठीक २ यसलादो ठीक बतलानेपर अभय और उसका हिस्सा देदिया जाये ॥ २९ ॥ ओर यदि यह फिरभी चोरी कर लेवे सो उसको साझसे पृथक् कर दिया जाये ॥३०॥ महापराधे तु दृष्यवदाचरेत् ।। ३१ ॥ पाजकाः स्वप्रचार द्रव्यवर्ज यथासंभापितं वेतनं समं वा विभजेरन् ॥ ३२ ॥ अग्नि- टोमादिषु च ऋतुपु दीक्षणादूर्ध्व याजका सन्ना पश्चममंशं लभेत ३३ किसी प्रकारका मा अपराध कर देनेपर तो उसके साथ राज्यापराधीके समान व्यवहार किया जावे ॥ ३३ ॥ यज्ञ करानेवाले (पाजक) अपने निजी काममें आने वाली वस्तुओंको छोड़कर शेष सम्पूर्ण वेतनको, प्रथम निर्णयके अनुसार, अथवा घरापर २ मापसमें यार लेवें ॥ ३२ ॥ अनिष्टोम आदि यॉम दीक्षाके यादही याजकके अकस्मात् यीमार होजानेपर प्रथम निश्चित की हुई समम दक्षिणाका पाचवां हिस्सा वह ले हेचे ॥ ३३ ॥ सोमविक्रयादूर्भ चतुर्थमंशम् ॥ ३४॥ मध्यमोपसदः प्रबर्यो- द्वासनादूर्घ द्वितीयमशं लभेत ॥ ३५ ॥ मायादूर्ध्वमर्घमंशम् ।। ३६ ।। सुत्ये प्रातः सवनादूर्भ पादोनमंशम् ॥ ३७॥ मध्य-
[३अधिक
(2)
कोटलीय अर्थशास्त्र
दिनात्सबनार्ध समग्रमश लमेत ॥ ३८ ॥ नीता हि दक्षिणा
भवन्ति ॥ ३९॥
इसी प्रकार सोमविक्रयके याद चौथा हिस्सा ॥३४॥ मध्योपसत्
सम्बन्धी प्रवग्यांद्वासन (सोम तैयार करनेके रिय एक फर्म बिशपका अभूत,
जिसमे सोमका काटना घटना होता है) के बाद, दूसरा हिस्सा ॥ ३५ ॥ मध्यो-
पसदनके याद भाधा हिस्सा ॥३६॥ और सामके अभिपय कारमें प्रात
सबनके वाद, तीन हिस्से ॥३७॥ तथा माध्यन्दिन सवनके अनन्तर सम्पूर्ण
दक्षिणा ले लेवे ॥३८॥ क्योंकि यज्ञकी समाप्तिपर दक्षिणा पूर्ण हो
जाती है ॥ ३९ ॥ ,
बृहस्पतिसवनवर्ज प्रतिसवनं हि दक्षिणा दीयन्ते ॥ ४० ॥
तेनाहगणदक्षिणा व्याख्याताः॥४१॥ सन्नानामादशाहोरात्रा-
च्छेपभृताः कर्म कुयुः ॥ ४२ ॥ अन्ये वा खप्रत्ययाः ।। ४३ ।।
वृहस्पति सवनको छोड़कर शेप सयही सवों में दक्षिणा दीजाती
है॥४०॥ इससे अहर्गण दक्षिणाओके नियम भी समझने चाहिये ॥४॥
यांमार हुए याजका को शेप दक्षिणा लेकर कार्य पूरा करनेवाले याजक दस
दिन पर्यन्त कार्य करें॥ ४२ ॥ अथवा अन्य याजक अपनी स्वतन्य दक्षिणा
सकर शेष कार्यको पूरा करदें ॥१३॥
कर्मण्यसमाते तु यजमानः सीदेत् ॥ ४४ ॥ ऋत्विजः कर्म
समापय्य दक्षिणां हरेयुः ॥ ४५ ॥ असमाप्ते तु कर्माण याज्यं
याजकं वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ ४६ ।।
प्रारम्भ किये कर्मके समाप्त न होने पर ही यदि यजमान बीमार हो
जावे, तो ऋत्विोंको चाहिये कि वे यज्ञको समाप्त कराके दक्षिणा लेवें ॥ ४४,
५५ ॥ कर्मके समाप्त न होनेपर यदि यजमान, याजकको छोड़े, अपया
याशक यजमानको छोड़े, तो छोडनेवाऐको प्रथम साहस दण्ड दिया जाये॥१६॥
अनाहितानिः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
मुरापो वृपलीमा ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥४७॥
सौ गाय रखते हुए भी भग्न्याधान न करनेवाला, सहस गाय रखते
हुए भी यजन न करनेवाला, शराय पीनेवाला, शूद्राको घरमे रखनेयाला,
प्राक्षणके मारनेवाला, गुरकी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनधारा ॥ १७ ॥
१५ अध्या०]
धर्मस्थाय
असत्प्रतिग्रहे युक्तः स्तेनः कुत्सितयाजकः ।।
अदोपस्त्यक्तुमन्योन्यं कर्मसंकरनिश्चयात् ।। ४८ ॥
इति धर्मस्थीय तृतीये अधिकरणे दासकर्मकरकरपे भृतकाधिकार:
संभूपसमुरथानं चतुर्दशो ऽध्यायः ॥ १४ ॥
भादित एकसप्ततिः ॥ ७ ॥
कुत्सित दान लेनेवाला, चोर, और निन्दित व्यक्तियोंका याजक, फाँके
दूपित हो जानेके भयस, परस्पर एक दूसरे के द्वारा छोड़ा जासकता है, इसमें
कोई दोष नहीं । अर्थात् उपयुक्त प्रकारके यजमान पा याजक एक दूसरेको,
कर्म समाप्त न होनेपर भी छोड़ सकते हैं ॥ ४८ ॥
धर्मस्थीय तृतीय अधिकारपा चौदहवां अध्याय समाप्त ।
पन्द्रहवां अध्याय।
६७प्रकरण।
क्रय विक्रय तथा अनुशय ।
विक्रीय पण्यमप्रयच्छतो द्वादशपणो दण्डः ॥ १॥ अन्यत्र
दोपोपनिपाताविपाभ्यः ॥ २॥ पण्यदोपो दोपः ॥ ३॥ राज-
चोराग्न्युदकबाध उपनिपातः ॥ ४ ॥ बहुगुणहीनमार्तकृतं बाधि-
पहम् ।। ५॥
सौदा बेचकर जो फिर म देचे, उसे १२ पण वण्ड दिया जाय ॥
यदि यह, सौदेम कुरु दोष होनेके कारण, या किसी बाहा आकस्मिक आपत्तिके
कारण, अथवा किसी तरहके वस्तुगत असामर्थ्यके कारण, ऐसा करता है तो
कोई दोष नहीं ॥ २ ॥ सौदे (येची हुई बरस) में किसी तरहकी खराबीका
होना ही दोष है ॥३॥ राजा, धोर, अग्नि या जलके द्वारा बाधा पहुंचना
'उपनिपात' कहाता है ॥ ४॥ उस यस्तुका अत्यधिक गुणहान होना, अथवा
दुःखदायी होना अधिपस' कहा जाता है ॥ ५॥
पैदेहकानामेकरात्रमनुशयः ॥६॥ कर्पकाणां विरात्रम्
॥७॥ गोरक्षकाणां पञ्चरात्रम् ॥ ८॥व्यामिश्रागामुत्तमानां च
वर्णानां विचिविक्रय सप्तरात्रम् ॥ ९॥ आतिपातिकानां पण्या-
नामन्यत्राविक्रयमित्यविरोधनानुशयो देयः ॥ १० ॥
( [३ अधिक - कौटलीय अर्थशास्त्र प्रय विक्रय करनेवाले ग्यापारियोंवा सादा एक दिनके अन्दर रह हो सकता है। (अर्थात् सौदेके रद होनेकी मियाद सिर्फ एकदिन है, एक दिन तक ययाना आदि लौटाया जासकता है। किसानोंका तीन दिन तक ॥७॥ ग्वालोका ५ दिन तक ॥ ८॥ और सहर जाति तया उत्तम वर्णीका उनके जीवन निर्वाह के साधनभूत भूमि आदिके विक्रय में सात दिनसक ॥९॥ जल्दीही येची जानेवाली वस्तुओंको 'देरतक रफसे रहनेपर दूसरी जगह घेचनेके योग्य यह न रहेगी' यह ययाल करके, वह वस्तु पेचनेठक सुरक्षित जैसे रहमके, उस प्रकार ययाना ( अनुशय ) देना चाहिये ॥१०॥ तस्यातिक्रमे चतुर्विशतिपणो दण्डः पण्यदशभागोवा ॥११॥ क्रीत्वा पण्यमप्रतिगृहतो द्वादशपणो दण्डः ॥१२॥ अन्यत्र दोपोपनिपाताविपद्येभ्यः ॥ १३ ॥ समानथानुशयो विक्रेतुरनुश. येन ॥ २४ ॥ इस नियमका उत्तन करनेवालोंको २४ पण, अथवा विक्रय वस्तु का दसवां हिस्सा दण्ट दिया जाय ॥ १ वस्तुको खरीदकर जो फिर म लेवे, उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ १२॥ परन्तु यदि कोई व्यक्ति दोप, उपनि- पात और भविपके कारण ऐसा करता है, तो कोई हानि नहीं ॥ १३ ॥ खरीदने वालेके लिये भी बयानेका यही नियम है, जो पंचने वाले के लिये ॥१४॥ विवाहानां तु त्रयाणां पूर्वेषां वर्णानां पाणिग्रहणासिद्धमुपा- वर्तनम् ॥ १५ ॥ शूद्राणां च प्रकर्मणः॥ १६ ॥ वृत्तपाणि ग्रहणयोरपि दोपमापशायिक दृष्ट्या सिद्धमुपावर्तनम् ।। १७ ।। न त्वेवाभिप्रजातयोः ॥ १८ ॥ घालण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन चोंके विवाहोंमें पाणिग्रहणके याद उलट फेर नहीं होसकती । भर्थात् स्त्री-पुरुष एक दूसरेको नहीं छोड़ सकते है ॥ १५॥ और शूद्रों में प्रथम सम्भोगतक सोड़ा जासकता है, इसके आगे नहीं ॥१६॥ प्रथम तीन वर्षों में पाणिग्रहण हो जानेपर भी, यदि स्त्री-पुरुषके एक साथ प्रथम शयनकालमें, किसीम (स्त्री या पुरप) कोई दोष मालूम पड़े, तो विवाह-सम्बन्ध तोड़ा जासकता है ॥ १७ ॥ सन्तान होजानैपर किसी तरह भी नहीं तोड़ा जासकता ॥ १८॥ कन्यादोषमौपशायिकमनाख्याय प्रयच्छतः कन्यां पण्णपति- दण्डः शुल्कस्त्रीधनप्रतिदानं च ॥ १९ ॥ वरपितुर्या परदोपमना.
१६ अध्या०] धर्मस्थाय (७७) ख्याय विन्दतो द्विगुणः ॥ २० ॥ शुल्कस्त्रीधननाशश्च ॥२१॥ कन्याके किसी गुप्त चोपको छिपाकरही जो पुरुष उसे ध्याद देता है, उसको ९६ पण दण्ड दिया जाय और शुल्क तथा स्त्रीधन उससे वापस लिया जाय ॥ १९॥ इसी प्रकार भो परके दोपोंको छिपाकर विवाह करता है, तो उसे दुगना अधात् १९२ पण दण्ड दिया जाघे ॥ २० ॥ और उसका दिया हुआ सुल्क तथा खीधन भी जब्त कर लिया जाये ॥२१॥ द्विपदचतुप्पदानां तु कुठव्याधितानामशुचीनामुत्साहस्वास्थ्य- शुचीनामाख्याने द्वादशपणो दण्डः ॥ २२॥ आत्रिपक्षादिति चतुष्पदानामुपावर्तनम् ।। २३ ।। आर्मवत्सरादिति मनुष्याणाम् ।। २४ ।। तावता हि कालेन शक्यं शौचाशौचौ ज्ञातुमिति ॥२५ मनुष्य और चौपायोंफे, कोढ़, बीमारी तथा दुष्टता आदि दोपोंके स्थान में, उन्हें उत्साही नीरोग और अच्छा रतलानेवाले व्यक्तिको १२ एण दण्ड दिया जाये ।। २२ ॥ चौपाये डेढ़ महीनेतक लौटाये जासकते हैं ॥ २३ ॥ और मनुष्य सालमर तक ॥ ३४ ॥ क्योंकि इतने समयमें इनकी दुष्टता या सरलतर अच्छी तरह मालूम हो सकती है ॥२५॥ दाता प्रतिगृहीता च स्यातां नोपहतौ यथा । दाने क्रये वानुशयं तथा कुर्युः सभासदः ॥ २६ ॥ इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे विक्रीतकीतानुशयः पञ्चदशो ऽध्यायः ॥ १५ ॥ आदितो द्विसप्ततितमः ॥७२॥ धर्मस्थ पुरपाको उचित है कि ये देने सेने वालों तथा कप विक्रय करने पालो दान या मायमें अनुशयको इस प्रकार व्यवस्था को, जिससे किसीको कोई हानि न उठानी पड़े ॥ २६ ॥ धर्मस्थीय कृतीय अधिकरणमें पन्द्रहवां अध्याय समास । सोलहवां अध्याय। ६८-७२ प्रकरण। . प्रतिज्ञात धनका अप्रदान, अस्वामिविक्रा, स्वस्वामिसम्बन्ध । दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम् ॥ १॥ दत्तमप्यपहा.
[३ अधिक
(७८)
कोटलीय अर्थशास्त्र
यमेकनानुशये वर्तेत ॥ २॥सर्वखं पुत्रदारमात्मानं या प्रदायानु
शयिनः प्रयच्छेत ॥३॥
दान किये प्रतिज्ञात धनको न देना, मणके न देनेके समानही सम.
शमा चाहिये । अर्थात् इन दोनों के लिये एकसेही नियम है॥१॥ दिया हुआ
धन यदि काममें लाने योग्य न होये, तो वह केवल अमानतके तौरपरही
(अनुसय) रखा जाये ॥ २॥ और दाता, अपनी सम्पूर्ण समत्ति, खी पुत्र
तभा अपने आपको भी किसीको देकर, अनुशयी (दानका प्रतिगृहीता) के
धनको चुकावे ॥ ३ ॥
धर्मदानमसाधुपु कर्मसु चौपघातिकैपु वार्थदानमनुपकारि-
प्वपकारिपु वा कामदानमनहेपु च यथा च दाता प्रतिगृहीता च
नोपहतौ स्यातां तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः ॥४॥
असाधुओंगे धर्मबुद्धिसे दिया हुआ प्रतिज्ञात दान (ये साधु हैं, ऐसा
समसकर दान देनेकी प्रतिज्ञा की, फिर उनकी असाधुता मालूम हो जाने पर
वह प्रतिज्ञात धन न दिया हुआ) अथवा अरछे कामोंके लिये, चोरजार आदि
पुरुषों में धार्मिक बुद्धिसे दिया हुआ प्रतिज्ञातधन, ठपकार न करने वाले भथया
अपकार करनेवाले पुरुपोंमें दिया हुआ प्रतिज्ञातधन, काम अभिलापा पूर्ण करने
के लिये वेश्या आदिमें दिया हुभा प्रतिज्ञातधन. अनुशयमें रखा जावे । चतुर
धर्मस्थ पुरुषोंको उचित है कि वे अनुशयका इस प्रकार निर्णय करें, जिसमें
दाता और प्रतिगृहीताको किसी प्रकारकी हानि न पहुँचे ॥ १ ॥
दण्डमयादाक्रोशभयादनर्थमयाद्वा भयदान प्रतिगृह्णतः स्तेय
दण्डः प्रयच्छतश्च ।। ५ ॥ रोपदानं परहिंसायाम् ॥ ६ ॥ राज्ञा-
मुपरि दर्पदानं च ॥ ७ ॥ तत्रोत्तमो दण्डः ॥८॥
दण्डके भयसे, निन्दाके भयसे, अथवा रोग आदिके भयसे, दान देने
चाले या लेने वालेको चोरीका दण्ड दिया जाये ॥५॥ दूसरेको मारनेके लिये
क्रोधसे दान देने या हेनेवालेको भी यही पूर्वोक्त दण्ड दिया जावे ॥ ६॥ किसी
कार्यमें मनिमानके साथ राजासे आधिक यदि कोई व्यक्ति दान देवे, तो उसे
उत्तम साहस दण्ड दिया जाये ॥ ७.८ ॥
प्रातिभाव्यं दण्डशुल्कशेषमाक्षिकं सौरिकं कामदानं च .
नाकागः पुत्रो दायादो या रिक्थहरो दद्यात् ॥९॥ इति दत्त-
स्यानपाकमे ॥१०॥
१६ अध्या धर्मस्थाय था लिया हुआ ऋण, दण्ड (जुरमामा) शेष, शुल्कशेप, जुएमें हारा धन, सुरापानमें किये गये ऋण, तथा वैश्या भादिको दिये जाने वाले धन को, मृत पुरप का कोई दाय भागी, या उस की सम्पत्ति को लेने वाला, लदान करना चाहे, तो न करे । इस में उसे धाधिन नहीं किया जा सकता ॥९॥ यहां तक देने की प्रतिज्ञा की हुई वस्तु के न देनेके सम्बन्ध में कहा गया ॥१०॥ अस्वामिविक्रयस्तु ।। ११ ॥ नष्टापहृतमासाद्य स्वामी धर्म स्थेन ग्राहयेत् ।। १२ । देशकालातिपत्तौ वा स्वयं गृहीत्वोपह- रेत् ॥१३॥ धर्मस्थश्च स्वामिनमनुयुञ्जीत कुतस्ते लब्धमिति ॥१४॥ जो पुरुष किसी वस्तुका हामी न होता हुआ उसे घेच , उसके दण्ड आदिका विधान अब करते हैं ॥ ११॥ खोये अथवा अपहरण किए हुए पदार्थको, मालिक यदि किसीके पास देखे, तो उस पुरपको धर्मस्थसे कह कर पकड़वा देवे ॥ १२ ॥ यदि देश या काल इसमें बाधक हो, तो स्वयं पकड़कर धर्मरथके पास ले जाये ॥ १३ १ धम्मस्थ उससे पूछे, कि तुमने यह माल कहांसे पाया। १४ ॥ स चेदाचारक्रम दर्शयेत न विक्रेतारं तस्य द्रव्यस्याति सर्गेण मुच्येत ॥१५॥ विक्रेता चेदृश्येत मूल्यं स्तेयदण्डं च ।।१६।। यदि यह सब ठीक २ सिलसिलेवार बता दे, कि वह वस्तु मुझे इस प्रकार मिली है, तथा बेचनेवालेको न कहे ( अर्थात् यह चीज़ मुझे किसीने वेची नहीं है, स्वयं ही मुझे कहीं पड़ी हुई, या अन्य किसी प्रकारसे मिल गई है,) और उस पस्तुको उसके असली मालिकको सौंप देवे, तो वह छोड़ दिया जावे ॥ १५ ॥ यदि वह किसी बेचनेवालेको बतलावे (अधात् यह कहे कि मैंने यह वस्तु फलानेसे खरीदी है) तो उस विक्रेताले उस वस्तुका मूल्य खरीदनेवालेको दिला दिया जावे, वह वस्तु उसके असली मालिकको दे दी जाये । और विक्रेताको चोरीका दण्ड दिया जाय ॥१६॥ स चेदपसारमधिगच्छेदपसरेदापसारक्षयादिति क्षये मूल्य स्तेयदण्डं च दद्यात् ॥ १७ ॥ नाष्टिकं च स्वकरणं कृत्वा नष्ट- प्रत्याहतं लभेत ॥१८॥ पदि यह भी किसी दूसरे विकताका नाम लेवे, तो छुटकारा पा जाये। इसी प्रकार होते २ जो सबकी अपमें विफ्रेता निकले (अर्थात् सबसे पहिला (८०) कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधि. विक्रेता, जिसने पहिले पहिल उस चीज़को यचा था) उसीसे उसका मूस्य और जुरमाना वसूल किया जाये ॥ १७ ॥ सोई हुई यस्तुको, उसका असली मालिक, घस्तु विषयक लस और साक्षी दिखलाकरही मात कर सकता है ॥१८॥ स्वकरणाभावे पञ्चवन्धो दण्डः ॥१९॥ तच्च द्रव्यं राजधम्य स्यात् ।। २० ॥ नष्टापहृतमनिवेद्योत्कर्पतः स्वामिनः पूर्वः साहस दण्डः ॥२१॥ यदि वह पुरष उस वस्तुपर अपना स्वरय मिद्ध न कर सके, तो उसके मूल्यका पांचवां हिस्सा जुरमाना भरे ॥ १९ ॥ और उस वस्तुपर रानाकाही धर्मपूर्वक अधिकार हो ॥ २० ॥ खोई हुई वस्तुको क्सिीके पास देखकर, उसका मालिक यदि धर्मस्थको न कहे, अपने आपही छीनने लग जाये, तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥२१ ।। शुल्कस्थाने नटापहतोत्पन्न तिछेत् ॥ २२ ॥ त्रिपक्षादूर्घ- मनभिसारं राजा हरेत्स्वामी वा ॥ २३ ॥ किसीका साया हुआ या अपहरण किया हुआ माल थुर्गाधर (शुल्क- स्थान) में रख दिया जावे ॥ २२ ॥ टेढ़ महीने तक यदि उसका मालिक न मिले, तो यह सरकारी माल समझा जावे । अथवा साक्षी आदिक द्वारा अपना स्वरव उसपर सिद्ध करके मालिक उस वस्तुको लेलवे ॥ २३ ॥ स्वकरणेन पञ्चपणिकं द्विपदरूपस्य निष्क्रयं दद्यात् ॥२४॥ चतुष्पणिकमेकसुरस्य द्विपणिकं गोमहिपस्य पादिकं क्षुद्रपशूनां रनसारफल्गुकुप्यानां पञ्चकं शतं दद्यात् ॥ २५ ॥ दास दासी आदिको छुड़ाने के लिए (प्रति व्यक्तिके हिसायसे) ॥ २४ ॥ एक खुरवाले घोड़े गधे आदिके लिए ४ पण, गाय भैस आदिके लिए २ पण, और छोटे २ पशुओंके लिए पण, तथा रस, यहुमूल्य, टिकाऊ चीज़ों रस हीन वस्तुओं (फल्गु) और तांये आदि धातुओंके लिए प्रतिशतक ५ पण निष्क्रय, (छुड़ानेका सरकारी टैक्स ) छुड़ानेवाला देवे ॥ २५ ॥ परचकाटवीभृतं तु प्रत्यानीय राजा यथास्वं प्रयच्छेत् ॥२६॥ चोरहतमविद्यमानं स्वद्रव्येभ्यः प्रयच्छेत् ॥ २७ ॥ प्रत्यानेतुम- शक्तो या स्वयंग्राहेणाहृतं प्रत्यानीय तनिष्क्रयं वा प्रयच्छेत् ॥२८॥ दूसरे राजा या जंगलियों से अपहरण किए हुए, दास, दासी या चौपा. पोको, राजा स्वयं शकर, जिनके हो उनको देदेवे ॥ २६ ॥ चोरोसे अपहरण ५पण
.
धर्मस्थीय
१६ अध्या.]
(4)
की हुई वस्तु यदि लुप्त हो जाय, अथयां राज भी उसे झौटाकर न छा सके,
तो अपनी चीजों में से उसो जातिकी चीज़, अपहृत यस्तुके स्वामीको देवे ॥२७॥
चोरोको पकड़ने के लिए नियुक्त हुए पुरुषोके द्वारा लाई हुई चीज़ उसके मालिक
को देदेये । यदि ऐसा सम्भय न हो तो खोई हुई वस्तुका मूल्य उसको देदिया
जाये॥ २८ ॥
परविपयाचा विक्रमेणानीतं यथाप्रदिष्टं राज्ञा मुखीतान्यत्रा-
र्यप्राणेभ्यो देवब्राह्मणतपखिद्रव्येभ्यश्च ॥२९॥ इत्यस्वामिविक्रयः .
दूसरे देशसे जीतम लाये हुए धनको, राजाकी आज्ञानुसार भोग करे,
परन्तु यदि यह धग आयो, देवताओं, ग्राहाणों और तपस्वियोंका हो, तो उसे
भोग न करे, प्रत्युत उन्हें वापिस लौटा दे॥ २९ ॥ यहांतक अस्वामिविक्रय
सम्बन्धमे कहा गया ॥३०॥
स्वस्वामिसंबन्धस्तु ॥ ३१ ॥ भोगानुत्तिरुच्छिनदेशानां
यथास्वद्रव्याणाम् ॥ ३२ ॥ यत्स्वं द्रव्यमन्यैर्भुज्यमानं दशवर्या-
ण्युपेक्षत हीयेतास्य ॥३३॥
अप स्वस्वामिसम्बन्ध (सम्पसिपर पुरुपका अधिकार, धन और
मालिकका सम्बन्ध) का निरूरण करते हैं ॥३१॥ जिस पुरुषकी सम्पसिक
लिए साक्षी नहीं मिखते, परन्तु वह लगातार उसको भोगता चला आ रहा है
तो यही दात उस सम्पतिपर उसका स्वत्व बतलाने के लिए पर्यास प्रमाण है
॥ ३२ ॥ जो पुरप, दूसरोंसे भोगी जाती हुई अपनी सम्पत्तिकी दस वर्ष तक
परवाह नहीं करता, तो फिर उस सम्पत्तिपर उसका अधिकार नही रहता ॥३३॥
अन्यत्र बालवृद्धच्याधितव्यसनिनोषितदेशत्यागराज्यविन-
मेभ्यः ॥३४॥ विंशतिवर्षीपेक्षितमनवसितं वास्तु नानुयु-
जीत ||३५॥
परन्तु यदि यह सम्पत्ति साक्षक, वृद्धे, थीमार, आपदस्त, परदेशको गये
हुप, देशयागी, और राजकीय कार्यके कारण याहर घूमने वाले पुरषोंकी हो,
तो उनका दस वर्षके बाद भी यरायर उसपर अधिकार मना रहता है ॥ ३४ ॥
इसी प्रकार जो पुरुष, मालिकरो बिल्कुल पाधा न डाले जाने पर, २० वर्ष तक
लगातार किसी मफानम रहे, तो उसपर, उसी पुरपका अधिकार हो जाता
है॥३५॥
[ অস্ত্র
*
(८२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
सातयः श्रोत्रियाः पापण्डा' वा राजामसंनिधी परवास्तुपु
विवसन्तो न भोगेन हरेयुः ॥ ३६ ।। उपनिधिमाधि निधि निक्षेप
स्त्रियं सीमानं राजश्रोत्रियद्रव्याणि च ॥३७॥
ज्ञाति (भाई पन्यु सम्बन्धी लोग) श्रोणिय, और पापण्ट व्यक्ति, राजा.
ऑफे समाप न होनेपर, दूसरोंके मकानों में रहते हुए भी उसपर अपना अधि.
कार नहीं जमा सकते ।। ३६ ॥ उपनिधि, आधि, निधि (सजाना) निक्षेप,
• स्खी, सीमा तथा राजा या धोत्रियको वस्तुओं पर कोई व्यक्ति अधिकार नहीं
करसकता ॥ ३७॥
आश्रमिणः पापण्डा वा महत्यवकाश परस्परमवाधमाना
वसेयुः ॥ ३८ ॥ अल्पां बाधां सहेरन् ॥३९॥ पूर्वागतो या
पासपर्यायं दद्यात् ॥ ४०॥
आश्रमी और पापड (वेद बाह्य, लाल कपड़े पहिनने, प्रत उपवास
आदि करने वाले) खुली जगइम एक दूसरेको किसी प्रकारको हानि न पहुंचाते
हुए निवास करें ॥ ३८ ॥ यदि थोड़ी सी हानि किसीको एक दूसरेसे पहुंचे, तो
उसे सहन करले ॥ ३९ ॥ प्रथम आया हुआ व्यक्ति, पीछे आने वालेको, निवास
के लिये स्थान देदेवे ॥ ४०॥
अनदाता निरस्येत ॥४१॥ वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणामा-
चार्यशिप्यधर्मभ्रासमानतीर्थ्या रिक्थभाजः ॥४२॥ क्रमेण
विवादपदेषु चैपां यावन्तः पणाः दण्डास्तायती रात्रीः क्षपणाभि-
पेकानिकार्यमहाकच्छवर्धनानि राज्ञश्चरेयुः ।। ४३ ॥
यदिन देवे, तो उसे पाहर निकाल दिया जाय ॥४१॥ वानप्रस्थी,
सन्यासी और मसचारियों की सम्पत्तिके भागी, कमसे उनके आचार्य, शिष्य,
धर्म भाई या सहाध्यायी होते है । (पहिलेके न होने पर दूसरा अधिकारी होता
१)॥ ४२ ॥ यदि इन लोगोंका परस्पर कोई शगदा होजाय, तो उसमें जितने
पण क्सिीके ऊपर जुरमाना हो, उतनी ही रात्रि पर्यन्त वह राजकि इल्याणके
लिये, उपगस, सान, अशिहोत्र, तथा कठिन चान्द्रायण भादि नतोका अनुदान
अहिरण्यसुवर्णाः पापण्डाः साधनस्ते यथास्यमुपधासवतैरा-
राध्येयुः ॥ ४४ ॥ अन्यत्र पारुण्यस्तेयसाहससंग्रहणेभ्यः ॥४५||
तेषु यथोक्ता दण्डाः कार्याः ॥४६॥
१७ अभ्या०]
घसस्थीय
(८३)
हिरण्य सुवर्ण आदि न रखने वाले पाएण्ड धर्मशील व्यक्ति भी दण्ड
होनेपर, अपने उचित उपचास प्रत आदिके द्वारा राजाके कल्याणकी प्रार्थना
करें ॥४४॥ परन्तु पारण्य, (मारपीट आदि) चोरी, साका और व्यभिचारक
मामलोंमें इतने मानसे छुटकारा नहीं होसकता ॥ ५५॥ इनमें पूर्वोक सय
दण्ड नियमानुसार होने चाहिये ।। ४६ ।।
अत्रज्यासु वृधाचाराबाजा दण्डेन वारयेत् ।
धर्मो ह्यधर्मोपहतः शास्तारं हन्त्युपक्षितः।। ४७ ॥
इति धर्मस्थीय तृतीये ऽधिकारणे भस्वामिविक्रया सम्मानिसमन्यः
पोडशोपायः आदितखिसहतिः ॥७३॥
संन्यासियोम भी होनेवाले मिथ्या आचारोंको, राजा दश नारा हटाये।
क्योंकि अधर्मसे दयाया हुआ, तथा उपेक्षा किया हुआ धर्म, शासन करने वाले
राजाको नष्ट करदेता है ॥ ७ ॥
धर्मस्यीय तृतीय अधिकरण में सोलहवां अध्याय समाप्त
सत्रहवां अध्याय।
.
७१प्रकरण!
साहस।
साहसमन्वयवत्प्रसभकर्म ॥१॥ निरन्वये स्थेयमपव्ययने
च ।।२।। रलसारफल्गुकुप्यानां साहसे मूल्यसमो दण्ड इति
मानवाः ॥३॥
खुले तौरपर बलात्कार धन आदिका अपहरण करना साहस (साका
मारवाद आदि) कहाता है छिपकर किसी वस्तुका अपहरण करना, या
सेकर फिर मुकर जाना, चोरी कहा जाता है ॥ २ ॥ रस, यहुमूल्य टिकाऊ
चीन, नीरस अन्य वस्तु तथा तावे आदि पदार्थोपर डाका डालने वालेको,
उनकी कीमत परावर दण्ड दिया जाय, ऐया मनुको मानने याम आचार्याका
मूल्यद्विगुणा इत्याशनसाः ॥४॥ ययापराधमिति काट-
ल्यः ॥५॥ पुष्पफलशाकम्लकन्दपक्कामचर्मयेणुमृद्भाण्डादीनां
क्षुद्रकद्र याणां द्वादशपणावरचतुर्विशतिपणपरो दण्डः ॥६॥
[३ अधिक (८५) कौटलीय अर्थशास्त्र भौशनस सम्प्रदायके विद्वान् कहते हैं, कि मूल्पर दुगना दण्ड दिया जाय ॥ ४ ॥ परन्तु कौटदयका मत है कि अपराधके अनुसार ही दण्ड देना चाहिये ॥५॥ फूल, फल, शाक, मूल, कन्द, पका हुभा अस, पमदा, बांस, मट्टी घर्तन आदि छोटी २ चीजों पर दाका दालने बालेको १२ पण लगाकर २४ पण तक दण्ड देना चाहिये ॥६॥ कालायसकाष्ठरज्जुद्रव्याद्रपशुवाटादीनां स्थूलकद्रव्याणां चतुर्विंशतिपणावरोऽटचत्वारिंशत्पणपरो दण्डः ॥७॥ ताम्र- सकंसकाचदन्तभाण्डादीनां स्थूलद्रव्याणामष्टचत्वारिंशत्पणावरं पण्णवतिपरं पूर्वः साहसदण्डः ॥ ८॥ इसी प्रकार लोहा, लकड़ी, रस्सी आदि चीजों, छोटे २ पशु, तथा यत्र भादि, स्थूल द्रव्योंके दाके आदिमें २४ से लगाकर ४८ पण तक ॥ ७ ॥ और तोया, पीतल, कोसा, कांच तथा हाथी दांत आदि चीजोंके बने हुए बर्तनों तथा अन्य वस्तुओपर डाका आदि डालने वालेको ४८ पणसे लगाकर ९६ पण तक दण्ड दिया जाये, इसीको प्रथम साहस दण्ड कहते हैं ॥ ८॥ महापशुमनुप्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णसूक्ष्मवस्त्रादीनां स्थूलकद्र- व्याणां द्विशतावरः पञ्चशतपरः मध्यमः साहसदण्ड ।। ९॥स्त्रिय पुरुषं वाभिपह्य वधतो बन्धयतो बन्धं या मोक्षयतः पञ्चशतावरः सहस्रपर उत्तमः साहसदण्ड इत्याचार्याः ॥ १०॥ बड़े २ पशु, मनुष्य, रोत, मकान, हिरण्य, सुवर्ण, तथा महान यन आदि बड़े द्रव्योंपर, २०० पणसे लगाकर ५०० पण तक दण्ड दिया गावे । इसीका नाम मध्यमसाहस दण्ड है ॥ ९॥ स्त्री या पुरुषको बलात्कार यांधने या बंधवाने वाले तथा (गजाज्ञाके अनुसार) बंधे हुए पुरपको मुक्त करदेने वाले पर ५०. पणसे लगाकर १००० पण तक जुरमाना किया जाय । यही उच्चमा साहसदण्ड कहाता है, ऐसा आयार्थीका मत है ॥10॥ यः साहस प्रतिपत्तेति कारयति स द्विगुणं दद्यात् ॥ ११ ॥ यावद्धिरण्यमुपयोक्ष्यते तावदास्यामीति स चतुर्गुणं दण्डं दद्यात् ॥१२॥ जो जानबूझकर अधषा कहकर साहस कर्म कराता है उसे दुगना दण्ड दिया जावे ॥१॥ तथा जो पुरप जितना धन व्यय होगा लगाऊंगा (तुम ।
१८ अध्या०] धर्मस्थीय दिल पाह मरा करो)' ऐसा कहकर साहस कर्म कराता है, उसे चौगुना दण्ट दिया जाये ॥ १२॥ य एतावद्धिरण्यं दास्यामीति प्रमाणमुद्दिश्य कारयति स यथोक्तं हिरण्यं दण्डं च दद्यादिति बार्हस्पत्याः ॥१३॥ स चत्कोपं मदं मोहे वापदिशेयथोक्तवद्दण्डमेनं कुर्यादिति कौट- ल्यः ॥१४॥ गृहस्पतिके अनुयायी आचार्योंका मत है कि जो पुरुष 'इतना सुवर्ण दूंगा' इस प्रकार धनको तादाद को कहकर किसीसे साहस कर्म कराता है, वह उतना ही सुवर्ण देवे, और दण्ड अतिरिक्त देवे ।। १३ || परन्तु कौटल्य मत है कि इसमकारं साहस करनेवाले पुरुषको, यदि यह इसका कारण, अपने क्रोध, समियतके ठीक ठिकाने पर न रहने और भज्ञानको यताये तो यही दण्ड दिया जाय जो साहस भादि कर्म करने वालेके लिये बताया गया है ॥१५॥ दण्डकर्मसु सर्वेषु रूपमष्टपणं शतम् । शतात्परे तु व्याजी च विद्यात्पश्चपणं शतम् ।। १५॥ प्रजानां दोपपाहुल्याद्राज्ञां वा भावदोपतः । रूपव्याज्यावधर्मिष्ठे धानुप्रकृतिः स्मृता ॥ १६ ॥ इति धर्मस्थीये तृतीये ऽधिकरणे साहसं ससदको ध्यायः ॥३७॥ आदितश्चतुःसप्ततिः ॥७॥ सप दण्डोम प्रति सैकड़ा ८ पण रूप (इस मामका सरकारी देस) और दण्डको रकम १०० से कम होनेपर, (उसपर प्रति सेकड़ा ५ पण याजी (यह भी सरकारी टैक्स है) समझनी चाहिये ॥ ३५ ॥ मा दोषांकी अधि- कता होगेले अथया राजाके दिल येईमागी आजानेसे रूप भार व्याजी धर्मा- नुकूल नहीं समझो जाते । इसलिये शाखों मे विधान किये गये दण्ड ही धर्मा- नुएल माने गये हैं। धर्मस्थीय तृतीय अधिकरणमें सत्रहवां अध्याय समान । अठारहवां अध्याय। ॥ ७२ प्रकरण चारपारुष्य। वापार यमुपवादः कुत्सनमभिभर्सनामिति ॥ १॥ शरीर- : (८६) कौटलीय अर्थशास्त्र [३ अधिक प्रकृतिश्रुतवृत्तिजनपदानां शरीरोपमादेन काणखजादिभिः सत्ये त्रिपणो दण्डः ।। २॥ गालीगलौच, निन्दा और घुयना यह वारपारण्य फहाता है॥॥ शरीर, प्रकृति (प्राह्मण क्षनियादिरूप) श्रुत (जानकारी) वृति (जीविका निवांह का उपाय) और देश ये पांच वापरालय के विषय हैं, इनमें से शरीरको लेकर यदि कोई पुरप, काणे, गंज, लंगडे, बलेको दाना गादि कहे, तो उसे ३ पण दण्ड दिया जाय ॥२॥ मिथ्योपयादे पदपणो दण्डः ॥ ३॥ शोभनाक्षिमन्त इति काणखजादीनां स्तुतिनिन्दायां द्वादशपणो दण्डः ॥ ४॥ कुष्ठो. न्मादलव्यादिभिः कुत्सायां च ॥५॥ योद शंठो निन्दा करे तो उसे ६ पण दण्ट दिया जाय ॥३॥ यदि कोई पुरुप, काणे आदिकी पाजस्तुतिसे निन्दा करे कि तुम्हारी आर आदि पड़ी अच्छी है, तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥४॥ और कोली, उन्मत या नपुंसक आदि कहकर निन्दा करनेपर भी१२ पण दण्ड दिया जाय ॥ ५ ॥ सत्यमिथ्यास्तुतिनिन्दासु द्वादशपणोत्तरा दण्डास्तु- ल्ये ॥६॥ विशिष्टपु द्विगुणः॥७॥ मीनेष्वर्धदण्डः ॥८!! परस्त्रीपु द्विगुणः ॥९॥ प्रमादमदमोहादिभिरर्घदण्डाः ॥ १० ॥ यदि कोई व्यक्ति अपने यरावरवालोंकी, सची ठिी, या व्याजस्तुतिक द्वारा निन्दा करे, तो उसे यथाक्रम १२, २४ और ३६ पण दण्ड दिया जाय ॥ ६ ॥ यदि अपनसे यड़ों के साथ ऐसा करे तो दुगना दण्ड दिया जाय ॥ ७ ॥ अपनसे छोटा के साथ करनेपर आधा दण्ड ॥ ८ ॥ दूसरोंकी स्त्रियोंके साथ ऐसा न्यवहार करनेपर भी दण्ड दुगनाही दिया जावे ॥ ९॥ यदि इस प्रकार निन्दा करने का कारण प्रमाद, मद या मोह आदि हो, तो आधा ही दण्ड दिया जाय ॥१०॥ कुष्ठोन्मादयोचिकित्सकाः संनिकृष्टाः पुमांसश्च प्रमाणम् ॥११ ।। क्लीचभावे सियो भूत्रफेनमप्सु विष्ठानिमजनं च ॥१२॥ किसीके कोड़ो या उन्मत्त होने में, उसकी चिकित्सा करनेवाले और समीप रहनेवाले पुरषही प्रमाण है ॥1॥ तथा नपुंसक होने में खियां, पेशायम झाग न उठना, और पानी में विधाका बजाना प्रमाण है ॥ १२ ॥ प्रकृत्युपवादे प्राह्मणक्षत्रियंवश्यशूद्रान्तावसायिनामपरेण
.
१८ अध्या
धर्मस्थीय
पूर्वस्य त्रिपणोत्तराः दण्डाः ॥१३॥ पूर्वणापरस्य द्विपणा-
धराः ॥१४॥
। साह्मण क्षत्रियादि प्रकृतिको लेकर जो एक दूसरेको निन्दा करे, उसके
लिये निम्नलिखित दण्ड है: यदि चाण्डाल शुद्धफी निन्दा करे सरे ३ पण,
वैश्यको करे तो ६ पण, क्षग्नियकी करे तो ९. पण, और ब्राह्मणकी करे तो १२
पण दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार ग्राह्मण यदि चाण्डालको निन्दा करे तो
२ पण, शूद्रकी करें तो ४ पग, वैश्यको करे तो ६ पक्ष, और क्षत्रियकी करे
तो ८ पण उसपर द किया जाय ॥ १३-१४ ॥
कुब्रामणादिभिश्च कुत्सायाम् ॥ १५॥ तेन श्रुयोपचादो
वाग्जीवनानां कारकुशीलवानां वृत्युपवादः प्राज्जूषकगान्धारा-
दीनां च जनपदोपवादा व्याख्याताः ॥ १६ ॥
इसी प्रकार यान्जीयो पुरुपको एक दूसरेकी पढ़ाई लिखाई या जान-
कारोफी निन्दा परपर, शिल्शे और गवैयों आदिको एक दूसों के जीवन निर्वाह
के उपायोंकी निन्दा करनेपर, तपा भिा २ देशों के रहनेवालों को, एक दूसरेके
देशको लेकर निन्दा करनेपर, उपयुक्त दण्ड ही दिया जावे ॥ १५-१६ ॥
यः परमेवं त्वां करिष्यामीति करणेनाभिभसयेदकरणे यस्त-
स्य करणे दण्डस्ततोऽर्धददण्डं दद्यात् ॥ १७ ॥ अशक्तः कोयं मदं
मोहं वापदिशेद्वादशपणं दण्डं दद्यात् ॥ १८॥
जो पुरप दूसोको "मैं तुझको इस प्रकार बनाऊंगा' अर्थात् सेरेहाथ
पैर तोडूंगा, एशे रपूर टोदूंगा' इस प्रकार फेशल धमझाये, पर कुछ को नहीं,
उसे उससे आआधा दण्ड मिलना चाहिये, जोकि इस प्रकार कहकर कर भी डाले,
(दण्ड पालथ्यमे यह दण्ड सहा जायगा) ॥१७॥ यदि हाथपैर आदि तोरने में अस.
मर्थ कोई पुरप, इरा हा लवका का क्रोध, माद् या भज्ञा यतादे,
तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ १८ ॥
जातपैराशयः शक्तचापकर्तु यापजीविकावस्थं दद्यात् ॥१९॥
इस बात को मालम हो जानेपर कि किसीने शत्रुताके कारण दूसरेको
हायर तोड़ने की धमकी दी है, और वह ऐसा करनेगे समर्श भी है, तो उसे
अपनी आयके अनुमार दण्ड देना चाहिये । (अधीर समर्थ पुरुषका मोध
आदिका बहाना ग सुना जाय, प्रत्युत उसकी हमियत मुनाग्रिस उससे पूरा
दण्ड वसूल किया जाय) ॥१२॥
[३ अपिल (८८) कौटलीय अर्थशास्त्र स्वदेशग्रामयोः पूर्व मध्यमं जातिसंघयोः । आक्रोशाद्देवचत्यानामुत्तमं दण्डमर्हति ॥ २० ॥ इति धर्मस्थीय तृतीये ऽधिकरणे वापारप्पं अष्टादशोऽध्यायः ॥१०॥ आदितः पासप्ततिः ॥७५|| यदि कोई पुरुप अपने देश व गांयके विषय में निन्दा फरे, तो उसे प्रथम साहस दण्ड, अपनी जाति तथा समाजको निन्दा करनेवालेको मध्यम साहस दण्ड और देव-मन्दिराकी निन्दा कान पालाको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ॥ २० ॥ धर्मस्थीय कृतीय अधिकरणमे अठारहवां अध्याय समान । और धूल उन्नीसवा अध्याय । ७३ प्रकरण. दण्ड पारुष्य। दण्डपारुष्यं स्पर्शनमवगूर्ण प्रहतमिति ॥ १॥ नाभेरधः कार्य हस्तपङ्कमसपासुभिरिति स्पृशतस्त्रिपणो दण्डः ॥ २ ॥ तैरेवामध्यः पादष्टीवनिकाभ्यां च पदपणः छर्दिमूत्रपुरीपादिभिर्वादशपणः ॥३॥ किर्माको छना, विसरपर डण्डा या हाथ आदिका उठाना, और चोद करना ये तीनो दण्ड पारप्य कदाते है ॥१॥नामिक नीचे शरीर भागपर हाथ, कीचड़, रास डालनेवाले ३ पण दण्ड दिया जाय ॥२॥ यदि अपवित्र हाथ आदिसे सर्श किया जाय, अथवा पैरमे छुदिया जाय, या किसीपर थूक दिया जाय, तो ६ पण दण्ड देना चाहिये ! वमन, मून और मल आदि छुआ देनेवालको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥३॥ नाभेरुपरि द्विगुणाः॥ ४॥ शिरसि चर्तुगुणाः समेषु ॥५॥ विशिष्टपु द्विगुणाः ॥ ६॥ हीनेनर्धदण्डाः ॥ ७॥ परस्त्रीपुद्विगुणाः ॥ ८॥ प्रमादमदमोहादिगिरपदण्डाः ॥९॥ येही यात यदि नाभिसे उपरके शरीर भागपर की जावे, तो दुगना दण्ड होना चाहिये ॥ ४ ॥ आर सिरपर चोगुना । ये दण्ड यरायर पालोके साथ ऐसा व्यवहार करनेपर यतलाये गये हैं ॥ ५॥ यो अपरेसे यहे पुरपाके साथ यह व्यवहार किश जाय, तो दुगुना दण्ड देना चाहिये ॥६॥ छोटॉके साथ किये जानेपर आधा दण्ड ७॥ और दूमरॉको गियों के साथ किये जानेपर दुगना पड 1 १९ अध्या धर्मस्थीय होना चाहिये ॥८॥ यदि किसी पुरुषसे यह कार्य प्रमाद, उन्माद या अज्ञानवश हुआ हो, तो उसे आधा दण्ड दिया जाये ॥९॥ पादयस्वहस्तकेशावलम्बनेषु पदपणोत्तरा दण्डाः ॥१०॥ पीडनावेष्टनाजनप्रकर्पणाध्यासनेषु पूर्वः साहसदण्डः ॥११॥ पातयित्वापक्रमतोऽर्धदण्डाः । १२॥ शूद्रो येनाङ्गेन ब्राह्मणम- मिहन्यातदस्य च्छेदयेत् ॥ १३ ॥ पैर, वस्त्र, हाथ और केशोके पकड़नेपर यथाक्रम इ, १२, १८ और २४ पण दण्ड होना चाहिये ॥१०॥ फिसोंको पकड़कर मसलनेपर थाहॉमें लपेटकर रगड़नेपर, मुंह आदि काला करनेपर, जौनपर घसीटनेपर और नीचे डालकर ऊपर चढ़ बैठनेपर, प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥11॥ भूमिपर गिराकर भाग जानेवालेको प्रमथ साहस दण्डका आधा दण्ड दिया जावे 11 १२॥ सूद जिस असे साह्मणको मारे, उसका वही अग काट दिया जाय ॥ १३॥ अवगूर्णे निष्क्रयः स्पशेऽर्धदण्डः ॥ १४ ॥ तेन चण्डालाशु- चयो व्याख्याताः ॥१५॥ यदि शूद, ग्राह्मणके किसी हाथ या पैर आदि अवयवको एकहकर शटक दे, तो उससे उचित दण्ड वसूल किया जाय और केवल छू देनेपर उप. युंक्त दण्डका आधा वसूल किया जाय ॥ १४ ॥ इसी प्रकार चापदाल और अन्य नीच जातियोके सरमधमे नियम समझने चाहिये ॥१५॥ हस्तेनावगूर्णे त्रिपणावरो द्वादशपणपरो दण्डः ॥ १६ ॥ पादेन द्विगुणः ॥ १७ ॥ दुःखोत्पादनेन द्रव्येण पूर्वः साहस- दण्डः ॥ १८ ॥ प्राणायाधिकेन मध्यमः॥ १९॥ हादसे धफैलने या झटकनेपर ३ पणसे लेकर १२ पणतक दण्ड होना शाहिये ॥ १६ ॥ परसे करनेपर दुगना ] 100 तथा किसी दु.सोपानक पस्नु (कांटा सुई आदि) को द्वारा करनेपर प्रथम साहस दण्ड ॥ १८ ॥ और प्राणों को भयंम दालनेवाली बस्तुके द्वारा ऐसा करनेपर मध्यम साहस दण्ड होना पाहिये 9 १९॥ काठलोटपापाणलोहदण्डरज्जुद्रयाणामन्यतमेन दुःसमशो- णितमुत्पादयतश्चतुर्विशतिपणो दण्डः ॥ २० ॥ शोणितोत्पादने द्विगुणः ।। २१ ॥ अन्यत्र दुष्टशोणितात् ॥ २२ ॥ ..
[३ अधिक * . ६०) कौटलीय अर्थशास्त्र लकड़ी, दला, पत्थर, लोहको छड़, रस्सी आदि न्यॉमेसे किसी एकसे मारनेपर, यदि खून न निकले, तो २४ पण दण्ड दिया जाये ॥२०॥ खून निकल आनेपर ८ पण दण्ड दिया जाय ॥२०॥ यदि वह सून कोढ़ या फोडा आदि होनेके कारण निकल आया हो, तो दुगना दण्ड न होना चाहिये ॥२२॥ मृतकल्पमशोणितं तो हस्तपादपारंचिक या कुर्वतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ २३ ॥ पाणिपाददन्तभङ्गे कर्णनासाच्छेदने व्रण- विदारणे च ॥ २४ ॥ अन्यत्र दुष्टत्रणेभ्यः ॥ २५ ॥ यदि बिनाही सून निकाले हुए किसीको मारते २ अधमरा कर दिया जाय, या उसके हाथपैरोंक जोड़ोंको तोड़ दिया जाय, तो मारनेवालेको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ २३ ॥ हाथपैर या दांतोंके तोड़ देनेपर, कान या नाक काट देनेपर और घावोके फाड़ देनेपर भी प्रथम साहस दण्ड होना चाहिये । परन्तु वे घाय कोढ़ आदिके कारण हुए २ न हो ॥ २४-२५ ॥ सक्थिग्रीवाभञ्जने नेत्रभेदने वा वाक्यचेष्टाभोजनोपरोधपु च मध्यमः साहसदण्डः समुत्थानव्ययश्च देशकालातिपत्तौ कण्ट- कशोधनाय नीयत ।। २६ ॥ गोडा वा गर्दन सोड़नेवाले, आंख फोड़नेवाले, घोलने घूमने फिरने, तथा खाने-पीने के शारीरिक साधनाको नष्ट करनेवाले पुरपाको मध्यम साहस दण्ड दिया जाये । तथा अपराधीही उस पुरपके खाने-पीने दवादार, तथा अन्य आवश्यक व्ययके लिये धन भी देषे, जयतक वह टीक न हो जाय । यदि अपराधीको इस प्रकार दण्ड देने में देशकाल पाधक हो, तो उसे कण्टक- शोधन (कपटक शोधन अधिकरणमै यतलाये हुए दण्ड विधान) के लिये ले जाया जावे । (गणपतिशास्त्रीने 'विपत्ती कण्टकशोधनाय नीयत' केपल इतना मूग मानकर विपत्तिका भर्थ मरण किया है, अर्थात् उस पोटे हुए व्यक्ति के मर जानेपर, अपराधीको कण्टक-शोधनके लिये लेजाया जाये) ॥ २६ ॥ महाजनस्यैकं प्रतो प्रत्येकं द्विगुणो दण्डः ॥ २७ ॥ पर्युपितः J फलहे ऽनुप्रवेशो वा नाभियोज्य इत्याचार्याः ॥ २८ ॥ नास्त्यप- कारिणो मोक्ष इति कॉटल्यः ॥२९॥ यदि पहुरासे आदमी मिलकर एवको मार, तो प्रत्येकको दुगना दण्ड दिया जाये । अर्थात् उससे दुगना, जो अकेला आदमी एकको मारनेपर पाता १९ अध्या०] धर्मस्थीय है ॥ २७ ॥ बहुत पुराने झगड़े और चोरियोंपर मुकदमा न चलाया जाय, ऐसा आचार्यों का मत है ॥ २८ ॥ परन्तु कीटल्य कहता है कि अपकारीको कमी न छोड़ना चाहिये ॥ २९॥ कलहे पूर्वागतो जयत्यक्षममाणो हि प्रधावतीत्याचायोः ॥३०॥ नेति कौटल्यः ॥३१॥ पूर्व पवादाभिगतस्य साक्षिणः प्रमाणम् आचायोफा कहना है कि झगा (फौजदारी) होने पर जो पहिलेही अदालतमें आ जाता है, उसकी जीत समझनी चाहिये, क्योंकि यह दूसरेसे दु.ए दिये जानेपर उसे सहन न करता हुआ, धर्मस्थसे कहने के लिये पहिलेही दोषार भाता है।॥ ३० ॥ परन्तु कौटल्य ऐसा नहीं मानता ॥ ३१ ॥ यह कहता है कि चाहे कोई अदालसमै पहिले आवे या पोछे, विवादका निर्णय साक्षियोंके कथनानुसारही होना चाहिये ॥ ३२ ॥ असाक्षिके यातः कलहोपलिङ्गानं वा ॥ ३३ ॥ पातामियो, गमप्रतिब्रुवतस्तदहरेव पश्चात्कारः ।। ३४ ॥ कलहे द्रव्यमपहरतो दशपणो दण्डः ॥ ३५॥ साक्षियोंके न होनेपर चोट आदिसे, अथवा चोट आदिके भी मालूम न होनेपर, अन्य लक्षणोंसे कलहका स्वरूप जानकर निर्णय किया जाये ॥३३॥ फौजदारीके मामलों में यदि प्रतिवादी उसी दिन जवाब न देदेये तो यह हारा हुआ समझा जाय ॥ ३४ ॥दो आदमियोंके आपसमें भगदते हुए यदि उनकी वस्तुभीको कोई अन्य पुरुष उठाकर लेजाय, तो उसे १. पण दण्ड देना चाहिये ॥३५॥ क्षुद्रकद्रव्यहिंसायां तच तावन्न दण्डः ॥ ३६ ।। स्थूलकद्र- व्यहिंसायां तच द्विगुणश्च दण्डः ॥ ३७ ॥ यदि आपसके झगडे में कोई किसीकी छोटी २ घर आँको नष्ट करद तो यह उनका मूल्य मालिक्यो देवे और उतनाही दण्ड राजकोदामे गमा को ॥३६॥ यदि झगड़े में बड़ी ३ वस्तुप नष्ट होजाय, तो नष्ट कानवाला, उनका दुगना दण्ड सरकारको देवे ॥३७॥ असाभरणहिरण्यसुवर्णभाण्डहिंसायां तय पूर्वश्च साहसदण्डः ॥ ३८ ॥ परकुड्यमभिधातेन शोभयतखिएणो दण्डः ॥ ३९ ॥ पदि कोई पखों, आभूषणों, हिरण्य और सोनेके बर्तनों को नष्ट करे, मूल्य मालिकको और
कौटलीय अर्थशास्त्र
[३ आधिक
सो यह मालिकको उनका पूरा मूल्य देवे और उसे नियमानुसार प्रथम साहस
दण्ड दिया जाय ॥ ३८॥ दूसरेकी दीवारको धर्ष या चोटसे हिलानघाले
पुरुषको ३ पण दण्ड दिया जावे ।। ३१ ।
छेदनभेदने पट्पणःप्रतीकारश्च ॥ ४० ॥ दुःखोत्पादनं द्रव्य-
मस्य वेश्मनि प्रक्षिपतो द्वादशपणो दण्डः ॥४१॥ प्राणायाधिक
पूर्वः-साहसदण्डः ॥ ४२॥
दीवारके तोड़फोड़ देनेपर ६ पण दण्ड और नुक्सानका एयज़ लिया
जाय ॥ ४० ॥ यदि किसीके घरमें चोट पहुँचानेवाली या अन्य किसी प्रकारका
दुःख देनयाली वस्तुको कोई फेके, तो उसको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥४॥
यदि कोई ऐसी वस्तु फेके, जिससे प्राणोंका भी भय हो, तो फेंकनेवालेको
प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ४२ ॥
क्षुद्रपशूनां काष्ठादिभिर्दुःखोत्पादने पणो द्विपणा चा दण्डः
॥४३॥ शोणितोत्पादने द्विगुणः ।। ४४ ॥ महापशूनामेतेष्वेव
स्थानेषु द्विगुणो दण्डः समुत्थानव्ययश्च ॥ ४५ ॥
छोटे २ जानवरोंको लकड़ी आदिसे मारनेपर १ या २ पण दण्ड दिया
जाने ॥ ४३॥ यदि जानवरके सून मिकल आवे तो दुगना दण्ड दिया जाये
॥४४॥ गाय भैस आदि घड़े २ पशुओंको इसी प्रकार राकलीफ देनेवाले
पुरुषपर दुगना जुरमाना किया जाय, और यह अपराधीही उसकी चादारका
खर्च भी देवे ॥१५॥
पुरोपवनवनस्पतीनां पुष्पफलच्छायावतां प्ररोहच्छेदने पद-
पणः ।। ४६ ।। क्षुद्रशाखाच्छेदने द्वादशपणः ॥ ४७ ॥ पीनशा-
खाच्छेदने चतुर्विंशतिपणः ॥ ४८ ॥ स्कन्धवधे पूर्वः साहसद-
ण्डः ॥ ४९ ।। समुच्छित्तौ मध्यमः॥ ५० ॥
नगरके उपवनी (बाग यगीचों) में लगे हुए, फल फूल तथा छायावाले
वृक्षोंके पत्ते तोड़नेपर ६ पण दण्ट दिया जाय ॥ ४६॥ छोटी २ शाखाओंके
(टहनियोंक) तोड़नेपर १२ पण ॥ ४७ ॥ मोटी२ शाखाओं काटनेपर २ पण
॥ १८॥ तमके ठीक ऊपरक मोटे २ गुद्धोंके काटनेपर प्रथम साहस दण्ड
॥४९॥ भीर पेड़का जइसे काट डालनेपर मध्यम साहस दण्ड दिया
जाद ॥५०॥
२० अध्या०] धर्मस्थाय पुष्पफलच्छायावद्गुल्मलतापर्धदण्डः ।। ५१ ॥ पुण्यस्थान- तपोवनश्मशानद्रुमेषु च ॥ १२ ॥ फल, फूल और छायावाली झाड़ियों तथा लोंको नष्ट करनेपर, उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ट दिया जाये ॥ ५ ॥ रिन्ही पवित्र स्थानों, तपोवनों, और श्मशानों में होनेवाले वृक्षाको नष्ट करनेपर भी भाधा दण्ड दिया जावे ॥ ५२ ॥ सीमवृक्षेषु चैत्येषु द्रुमेष्यालक्षितेषु च । त एवं द्विगुणा दण्डा: कायो राजक्नेषु च ।। ५३ ।। इति धर्मस्वीय तृतीये ऽधिकरणे दपदपारप्यमकोनविशो ऽध्यायः ॥१९॥ आदितः पट्समतिः ॥५६॥ सीमाके वृक्षा, मन्दिरोम र हुए शो, राजाको ओरसे निशान किये हुए वृक्षा, तथा सरकारी वनोंमें होनेवाले वृक्षाको नष्ट करनेपर दुगना दण्ड दिया जाये 15 ५३॥ धर्मस्थीय तृतीय अधिकरणमें उन्नीसवां अध्याय समाप्त { बीसवां अध्याय। ७४-७५ प्रकरण द्यतसमाह्वय और प्रकीर्णक । वृताध्यक्षो गतमेकमुख कारयेत् ॥ १॥ अन्पत्र दीव्यतो द्वादशपणो दण्डो गूढाजीविज्ञापनार्थम् ॥ २॥ यूताध्यक्ष, किसी एक नियत स्थानमें जमा खेलने का प्रबन्ध कर ॥१॥ निश्चित स्थानको छोड़कर अन्य किसी जगह लुभा सलनेवालेको ११ दण्ड किया जाय । मियत म्यानपर जुआ खेलनका प्रबन्ध इसलिये किया जाता है कि जिससे, तुकाछिपकर जनताको घोरसा देकर, ठगईसे जीविका चलाने वाले रोगीका पता लगाय॥२॥ शताभियोगे जेतुः पूर्वः साहसदण्डः ॥ ३॥ पराजितस्य मध्यमः ॥ ४॥ यालिराजातीयो होष जेतुकामः पराजयं न क्षमस इत्याचार्याः ॥ ५॥ एके मुकदमोम (एम) जोतने पालेको प्रथम साहस दण्ड दिया माय ॥ ३ ॥ भार हारनेवालेको मध्यम तहत इन ॥ ५ पारि यह मुख [३ अधिक (९२) कौटलीय अर्थशास्त्र तो वह मालिकको उनका पूरा मूल्य देवे और उसे नियमानुसार प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ३८॥ दुसरेकी दीवारको धके या घोटसे हिलानेवाले पुरपको ३ पण दण्ड दिया जावे ॥३९ । छेदनभेदने पट्पणः प्रतीकारश्च ।। ४० ॥ दुःखोत्पादनं द्रव्य- मस्य वेश्मनि प्रक्षिपतो द्वादशपणो दण्डः ॥४१॥ प्राणायाधिक पूर्वः साहसदण्डः ॥४२॥ दीवारके तोड़फोड़ देनेपर ६ पण दण्ड और नुक्सानका एपन लिया जाय ॥ ४. ।। यदि किसीके धाम चोट पहुँचानेवाली या अन्य किसी प्रकारका दुःख देनेवाली वस्तुको कोई फेके, तो उसको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥४॥ यदि कोई ऐसी वस्तु फेके, जिससे प्राणोंका भी भय हो, तो फेकनेवालेको प्रथम साहस दण्ड दिया जाये ॥१२॥ क्षुद्रपशूनां काष्ठादिभिर्दुःखोत्पादने पणो द्विपणो या दण्डः ॥ ४३ ॥ शोणितोत्पादने द्विगुणः ।। ४४ ॥ महापशूनामेतेष्वेव स्थानेषु द्विगुणो दण्डः समुत्थानव्ययश्च ॥ ४५ ॥ छोटे २ जानवरोंको लकड़ी आदिसे मारनेपर १ या २ पण दण्ड दिया जाये ॥ ५३॥ यदि जानवरके खून निकल आये तो दुगना दण्ड दिया जावे ॥ ५५ ॥ गाय भैंस आदि पड़े २ पशुओंको इसी प्रकार तकलीफ देनेवाले पुरणपर दुगना जुरमाना किया जाय, और यह अपराधीही उसकी वादारका सर्च भी देवे ॥१५॥ पुरोपवनवनस्पतीनां पुष्पफलच्छायावतां प्ररोहच्छेदने पद- पणः ॥ ४६ ॥ क्षुद्रशाखाच्छेदने द्वादशपणः ॥ ४७ ।। पीनशा- खाच्छेदने चतुर्विशतिपणः ॥ ४८ ॥ स्कन्धवघे पूर्वः साहसद- पडः ॥ ४९ ।। समुच्छित्तौ मध्यमः॥५०॥ नगरके उपचनों (बाग यगीचों) में लगे हुए, फल फूल तथा छायावाले शक्षा के पत्ते तोड़नेपर ६ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४६॥ छोरी २ शालाओंके (टहनियोंक) तोड़नेपर १२ पण ॥ ७ ॥ मोटोर शाखाओंके काटनेपर २४ पण ॥८॥ तनक लोक अपरक मोटे ३ गुदोके कारनेपर प्रथम साहस दण्ड ॥१९॥ भीर पदको जसे फार डालनेपर मध्यम साहस दण्ड दिया सादि । ५.॥
२० अध्या०] धर्मस्थाय पुष्पफलच्छायावद्गुल्मलताखर्धदण्डः ॥५१॥ पुण्यस्थान- तपोवनश्मशानद्रुमेषु च ॥ ५२ ॥ फल, फूल और छायावाली झाडियों तथा येरोको नष्ट करनेपर, उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ड दिया जाये ॥ ५१ ॥ किन्हीं पवित्र स्थानों, तपोवनों, और श्मशानोंमे होनेवाले वृक्षाको नष्ट करनेपर भी आधा दण्ड दिया जावे ॥ ५२ ॥ सीमवृक्षेपु चैत्येपु द्रुमेघालक्षितेषु च । त एव द्विगुणा दण्डाः कार्या राजवनेषु च ॥ ५३॥ इति धर्मस्थीये तृतीये ऽधिकरणे दण्डपारण्यमेकोनविंशो ऽध्याय ॥१९॥ आदितः पट्सप्ततिः ॥७६॥ सीमाके वृक्षों, मन्दिरोंमें सड़े हुप वृक्षा, राजाकी औरमे निशान किये हुए वृक्षा, तथा सरकारी यौम होनेवाले वृक्षाको नष्ट करनेपर दुगना दण्ड दिया जाये ॥ ५३॥ धर्मस्थीय तृतीय अधिारणमें उन्नीसवां अध्याय ममात । बीसवां अध्याय । ७४-७५ प्रकरण। किसी एक द्यतसमाह्वय और प्रकीर्णकः । गताध्यक्षा यूतमेकमुसं कारयेत् ॥ १ ॥ अन्यत्र दीव्यतो द्वादशपणो दण्डो गूढाजीविज्ञापनार्थम् ॥ २ ॥ दूताध्यक्ष, नियत स्थानमें जमा खेलनेका प्रयन्ध करे12॥ निश्चित स्थानको छोडकर अन्य किसी जगइ जुआ खेलने वालेको १२ पर किया जाय । नियत स्थान पर जुआ खेरनेका प्रबन्ध इसलिये किया जाता है कि जिससे, लुकछिपका जनताको धोखा देकर, टराईसे जायिका दलाने वाले होगांका पता एग जाय ॥२॥ घूताभियोगे जेतुः पूर्वः साहसदण्डः ॥ ३॥ पराजितस्य मध्यमः ॥ ४॥ वालिशजातीयो छेप बेतुकामः पराजयं नक्षमत इत्याचार्याः ॥५॥ जुएफे मुकदमामे (जएम) जीतनेवाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ३ ॥ और हारनेवारेको मध्यम साहस ६ ॥ १ ॥ क्योंकि यह मूर्ख
।
(९४)
कोटलीय अर्थशास्त्र
[३ आध०
जीतकी कामनासे जुभा सलता हुभा, भय अपनी हारको संहन नहीं करता,
और जीतनेवालमे मगला परता है। ऐसा भाचायाँका मत है ॥ ५ ॥
नेति कौटल्यः ॥ ६॥ पराजितश्चद्विगुणदण्डः क्रियेत न
कथन राजानमभिसरिष्यति ॥ ७॥ प्रायगो हि फितवाः कूटदे-
विनः ॥८॥
परन्तु कौटल्य इस यातको नहीं मानता ॥ ६ ॥ यह कहता है कि यदि
हारताने पालेको जीतने वाले से दुगना दण्ड दिया जाये, तो फिर कोई भी
हारनेवाला जुभारी अपने झगड़े को लेकर राजाके सामने न आवेगा ॥७॥
और फिर आम तौरपर ये धूर्त, जुआरी, कपटपूर्वक, लुकठिपकर जुभा बलतेही
रहेंगे । (जिससे कि हारनेवाले कभी इनके पंजेमे पाहर नही होसकते) ॥ ८ ॥
तेषामध्यक्षाः शुद्धाः काकण्यक्षांश्र स्थापयेयुः ॥९॥काका-
ण्यक्षाणामन्योपधाने द्वादशपणो दण्डः ॥ १० ॥ कूटकमणि पूर्वः.
साहसदण्डो जितप्रत्यादानमुपधास्तेयदण्डश्य ॥ ११ ॥
जुआरियाँका निरीक्षण करनेवाले राजकीयपुरप, जुआ रोलनेके नियत
स्थानपर साफ कौढ़ी और पामे रखनगदे ॥ ९॥ यदि कोई जुआरी उन कोष्ठी
और पासको बदले, तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥१०॥ यदि कोई
कपटपूर्वक जमा खल, तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय, और उसके
जीते हुए धनको छीनलिया जाय, तथा रखगाये हुए पामॉमें फुर तदली
फरके दूसरेको धोखा देने के कारण चोरीका दण्ड दिया जाय ॥ ११ ॥
जितद्रव्यादध्यक्षः पञ्चकं शतमाददीत काकण्यक्षारलाशलाका-
पक्रयमुदकभूमिकर्मक्रय च ॥ १२ ॥ द्रव्याणामाधानं विक्रयं च
कुर्यात् ॥ १३ ॥ अक्षभूमिहस्तदोषाणां चाप्रातिपेधने द्विगुणो
दण्डः ॥१४॥
जीतने पालेसे, अध्यक्ष पांच प्रति सैफड़ा लेलेये । तथा कौडी, पासे,
भरल (धम को यमाई दुई चौकड़ी, जिसपर पासे भादि दालकर खेला जाता
है), शलाका, जल, जमीन का किराया और सरकारी टैक्स भी पसल पर
लेवे ॥ १२ ॥ शुभारियों को चीज बेचने और गिरवी रखने की इजाजत भी
देदेवै ॥ १३ ॥ यदि अध्यक्ष, उभारियों को, पासे जमीन और हाथकी मुराइयो
से नहीं रोकत्ता, तो उसे दुगना दण्ड दिया जाय । (उमसे दुगना, जितना कि
धन उसने जीते हुए जुभारीसे वसूल करना है ॥ १४ ॥
२० अध्या०]
धर्मस्थाय
(९५)
तेन समायो व्याख्यातः ।।१५ ॥ अन्यत्र विद्याशिल्पस-
मायादिति ॥ १६ ॥ मकार्णकं तु ॥ १७ ॥
सुगा, मैदे तासर आदि नागवरी का आपसमे मुकायला कराकर जुआ
पेसनेमे भी इसी प्रकार नियम समझने चाहिये । १५॥ परन्तु विद्या और
और शिल्प का मुकाबला करके जुआ रोलमें यह नियम लागू नहा होते ॥ १६॥
अय प्रकीर्णक यानी परिशिष्ट का निरूपण करते है। अर्थात् इस अधिकरणके
जिन विषयों में कुछ वक्तव्य शेष है, वह कहते है ॥ १७ ॥
याचितकायक्रोतकाहितकनिक्षेपकरणां यथादेशकालमदाने
यामच्छायासमुपवेशसंस्थितीनां चा देशकालातिपातने गुल्मतर-
देयं मामणं साधयतः प्रतिनशानुप्रवेशयोपरि निमन्त्रणे च द्वाद-
शपणो दण्डः ॥१८॥
यदि कोई पुरप मांगी हुई, किराये पर री हुई, अपने यहां धरोहर
भाविक तौरपर रक्सी हुई, और आभूपग बनाने के लिये, सुवर्ण आदि ची हुई
वस्तुओं को ठीक स्थान तथा समय पर न लौटाये, दिन या रातके किसी समय
और किसी स्थान का संकेत करके फिर ठीक स्थान तथा समयम जाकर न
मिले, (यह समयानपाक का शेष हे) येथे आदि द्वारा नदी पार कराक
प्राण से घिराया मागे, अपने चाके अडोस पासक श्रोत्रिय को छोडकर
याहर और किसी को निमन्त्रण देवे, तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय । (उप.
युंन सय अपराधोंग पारह २ पण दण्ड ह) ॥ १८॥
संदिप्टमर्थमप्रयच्छतो भ्रातभार्या हस्तेन लंघयतो रूपाजीपा-
मन्योपरुद्धां गच्छराः परवक्तव्यं पण्यं क्रीणानस्य समुद्रं गृहमु-
द्भिन्दतःसामन्तचत्वारिंशत्कुल्यावाधामाचरतवाटचत्वारिंशत्यगो
दण्डः॥ १९॥
प्रतिज्ञात धनको न देनेवाले, भाई की स्त्रीको हाधसे पकड़नेवाले,
दूमोके यहां रकी हुई घेश्याके पास जाने पाले, (यहां तक यह साहसका परि-
शिष्ट है) दूसरेसे (खरीदनेके हिये) कहे हुए दरको खरीदने वाले (यह असामि
विक्रय का शप है), राजकीय चिन्हॉस युक्त मकानों को गिराने पाले (यह
साहस का शेप), और सामन्तों के चालीस मुलं तक याधा पहुंचाने पाले
(यह मास्तुका शेष) पुरुष को ५८ पण दण्ड दिया जाय ॥ १९॥
[३ माघे कौटलीय अर्थशास्त्र कुलनीयीग्राहकस्यापव्ययने विधयां छन्दवासिनी प्रसह्याति. चरतश्चण्डालस्यायां स्पृशतःप्रत्यामन्नमापद्यनमिधारतो निष्कारण- मभिधायनं कुर्वतः शाक्याजीवकादीन्पलप्रवजितान्देवपितृकार्येषु भोजयतः शत्यो दण्डः ॥२०॥ जो पुरप, यशपरम्परागत सर्व साधारण सम्पत्ति का अपव्यय करे, स्व. सन्य रहने वाली विधवाक साथ बलात्कार करे, पहार होकर भार्या खी का स्पर्श करे, पडोसीके ऊपर भापति आनेपर उसकी सहायता न करे, मिनाही कारण पड़ोसी के यहाँ मारे जावे, बौद्ध भिक्षुको को तथा शुद्रा सन्यासिनियों को देव. कार्य (यज्ञादि) और पिन कार्यो (धादि) में भोजन कराये, उसे १०० पण दण्ड दिया जावे ॥२०॥ शपथयाम्यानुयोगमनिसृष्टं कुर्वतो युक्तर्म चायुक्तस्य क्षुद्र- पशुवृषाणां पुंस्त्वोपघातिनो दास्या गर्भमापधेन पातयतश्च पूर्वः साहसदण्डः ॥२१॥ धर्मस्य की आज्ञा के बिना ही, साक्षी के तौर पर शपथ ले २ कर झगडा का फैस । करने घाले, अनधिकारी को अधिकार देने वाले, छोटे २ पशुओ के पुरुष को नष्ट कर उन्हें वधिया बनाने वाले, और दासी के गर्भ को दवा देकर गिराने वाले पुरप को प्रथम साहम दण्ड दिया जाव॥२१॥ पितापुत्रयोर्दम्पत्यो भगिन्योर्मातुलभागिनेययोः शिप्या- चार्ययो; परस्परमपतितं त्यजतः स्वार्थाभिप्रयातं ग्राममध्ये वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ २२ ॥ पिता पुत्र, स्त्री पुरप, भाई बहिन, मामा भाजा, और गुरु शिष्य, इन में से कोई एक, यदि न पतित हुए २ दूसरेका परित्याग करें। अथवा कोई पापारियोंके सघका मुखिया किमी व्यक्तिको योमार आदि हो जाने के कारण रास्ते के कहीं गावम ही परित्याग कर दे तो उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥२२॥ कान्तारे मध्यमः ॥ २३ ॥ तन्निमि श्रेपयत उत्तमः सह- प्रस्थायिष्यन्येष्पर्धदण्डाः ॥ २४ ॥ पुरुषमवन्धनीयं बनतो बन्ध- सपना ।
२० अध्या०]
धर्मस्थीय
यतो बन्धं वा मोक्षयतो वालमनामव्यवहारं बनतो बन्धयतो चा
सहस्त्रदण्ड: ।। २५ ॥
यदि कहीं दुर्गम जाल आदिमें छोड़ देवे, तो मध्यम साहस दण्ड ॥२३॥
और इसी कारण मार डाले, तो उत्तम साहस दण्ड दिया जावे। तथा उसके
साथ २ जाने वाले अन्य पुरो पर, मी अपराध में आधा दण्ड दिया
जाये ॥२॥ जो व्यक्ति, निरपराध पुरुष को बांधे या संघनाचे, अथया कैदीको
छोड़ देये, और नाबालिग य को यांधे या अंधयावे, उपे १००० पण दण्ड
दिया जाय ॥ २५॥
पुरुपापराधविशेषेण दण्डविशेषः कार्यः ॥ २६ ॥ तीर्थकर-
तपस्वी व्याधितः क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तस्तिरोजानपदो दण्डखेदी
निष्किंचनश्वानुमायाः ॥ २७ ॥
किसी पुरप के अपराध अनुसार ही उसके दण्ड का विधान होना
चाहिये ॥ २६ ॥ दानी, तपस्वी, बीमार, भूखा, प्यासा, रास्ता चलनेसे थका
हुभा, परदेसी, पहुस पार दण्ड भुगता हुआ, तथा जो अकिंचन (निर्धन) हो,
ऐसे व्यक्तियो पर सदा अनुग्रह करना चाहिये ।। २७ ।।
देवबालणतपखिस्त्रीबालवृद्धव्याधितानामनाथानामनाभसरतां
धर्मस्थाः कार्याणि कुर्युः ॥ २८ ॥ न च देशकालमोगच्छलेना-
तिहरेयुः ॥ २९ ॥ पूज्या विद्याधुद्धिपौरुपाभिजनकर्मातिशयतश्च
पुरुषाः ॥ ३०॥
धर्मस्प अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे देव, पाहाण, तपस्वी, स्त्री,
यार का, यूदे, वीमार तथा अपने दुःखो को कहने के लिप न जाने वाले मनाया
के कार्यों को स्वयं करद ॥ २८ ॥ देश काल भरदिका बहाना करके उनके धन
का अपहरण न करे । अथवा उनको देश, काल या कार्य का बहाना करके संग
न करे ॥ २९ ॥ तथा जो पुरुप, विद्या, धुदि, पौरप, कुल और कायाके कारण
बढ़े हुए हो, उनकी सदा प्रतिष्ठा करें ॥ ३०॥
एवं कार्याणि धर्मस्याः कुर्युरच्छलदर्शिनः ।
समाः सर्वेषु भावेषु विश्वासा लोकसंप्रियाः ॥३१॥
इति धर्मयोय तृतीये अधिकरणं शतसमालयं प्राणकानि विशो ऽध्यायः ॥२०॥
अगदेवः सप्तससतिरध्यायः ॥७॥ एजारता कौटलीयस्याशाखस्य पम्पीय
मृतीयमधिकरण समासम् ॥३॥
[३अधिक १९८) कौटलीय अर्थशास्त्र इस प्रकार धर्मस्य, छल कपट रहित होकर अपने सब कार्योको करें। र सयका घरायर निरीक्षण करते हुए, जनताके विपशम पान तथा होक प्रय यनें ॥३॥ धर्मस्धीय तृतीय अधिकरणम यीमयां अध्याय समाप्त । धर्मस्थीय तृतीय अधिकरण समाप्त । VIDIA BHAYAR BHAY SN...... -- कण्टकशोधन-चौथा अधिकरण प्रथम अध्याय।' ७३प्रकरण। कारुक रक्षण (शिल्पियों से प्रजाको रक्षा) प्रदेशारत्रयस्त्रयो वामात्याः कण्टकशोधनं कुर्युः ॥ १॥ अर्यप्रतीकाराः कारुशासितारः संनिक्षेप्तारः स्ववित्तकारवः श्रेणी- प्रमाणा निक्षेपं गृहीयुः ॥ २॥ मन्त्रियोंके गुणोसे युक्त, तीन तीन प्रदेष्टा (कष्टकशोधनके लिये मियुग हुए अधिकारीया नाम) प्रजापीडक व्यक्तियाँस प्रजाकी रक्षा करें। ॥ ५ ॥ अच्छे स्वभागवाले, शिरिपोके मुखिया अर्थात् उनको भी कार्य सिखानेवाले, सबके सन्मुख लेनदेगका काम करनेवाले, अपने ही धनसे गहने भादि बनानेवाले, संथा साझियोमे विश्वासपात्र शिल्पोलोग हो किसीका निक्षेप (धन गिरपी) रस सकरी है ॥ २ ॥ विपत्तौ श्रेणी निक्षेपं भजेत ॥ ३ ॥ निर्दिष्टदेशकालकार्य च कर्म कुर्युः ॥४॥ आनीर्दष्टदेशकालकार्यापदेशं कालातिपा- तने पादहीनं वेतनं तद्विगुणश्च दण्डः ॥५॥ निक्षेप लेनेवालक मरजाने या चिरकाल के लिये विदेश चले जानेपर साझाही उस निक्षेपके धनको हिस्सवार अदा करे ॥३स्थाने, समय तथा कार्यका मभम निधिय करके ही शिल्पीलोग काम करें ॥४॥ जो शिरूपी स्थान, समय तथा कार्यका निश्चय न करनेका कुछ बहाना निकाले, और काम करने के लिये ठीक समयपर उपस्थित न होव, उनका चौथाई वतन काट लिया जाय और उससे दुगना उनको दण्ड दिया जाय ॥ ५ ॥ अन्यत्र भ्रेपोपनिपाताभ्याम् ॥ ६ ॥ नटं क्निष्टं वाम्या भवेयुः।॥७॥ परन्तु यदि किसी हिसक माणीके द्वारा कोई बाधा उपस्थित होनेपर (श्रेष) अथपा किसी देवी भापसिक अचानक आ जाने पर ऐसा हुआ हो, तो . ..
[४ अधिक २. M (१००) कौटलीय अर्थशास्त्र कोई अपराध नहीं ॥ ६॥ यदि कारीगरसे कोई यस्तु सर्वथा नष्ट हो जाय या बिगड़ जाय, तो कारीगर उसका नुक्सान भरे । परन्तु श्रेप और उपनिपातके कारण ऐसा होगेपर, कोई अपराध नहीं । (ठे सूनका अन्वय इस सूयमें भी समझना चाहिये)॥७॥ कार्यस्पान्यथाकरणे वेतननाशस्तद्विगुणश्च दण्डः ॥ ८॥ तन्तुवाया दशैकादशिक सूत्रं वर्धयेयुः॥९॥ वृद्धिच्छेदे छेद- द्विगुणो दण्डः ॥१०॥ यदि वे कामको बिगाड़ देवें, तो उन्हें वेतन बिल्कुल न दिया जाय. और बेतमसे दुगना जुरमाना उनपर किया जाय ॥८॥ जुलाहेको चाहिये कि वह १० पल कपरा बुननेके लिये पल सूत हेरे, (अर्थात् ३० पल कपड़े के लिये १ पल भधिक सूत लेवे, सारपर्य यह है कि १० पलके ऊपर पल सूत छोजनमे खराब किया जासकता है, इससे अधिक नहीं) ॥९॥ यदि जुलाहा इससे अधिक छाजन निकाले, तो उसपर धीजनका दुगना दण्ड किया जाय॥१०॥ सूत्रमूल्यं यानवेतनं शोगकौशयानामध्यर्धगुणम् ॥११॥ पत्तोर्णाकम्बलतूलानां द्विगुणम् ॥.१२ ।। मानहीने हीनापहीनं बैतनं तद्विगुणश्च दण्डः ॥ १३ ॥ सूतके कपडेको बुनाई (खुनाईकी मजदूरी) सूतकी कीमतके बराबर देनी चाहिये । तथा जूट (पाट) और रेशमी कपलॉकी बुनाई सूतसे त्यादी ॥1॥ धुले हुए रेशमके कपड़े (पत्रोण), ऊनी कम्बल तथा दुशालाकी बुनाई सूतसे दुगनी होनी चाहिये ॥ १२ ॥ जिसने नापका कपड़ा बुननेको कदा गया हो, यदि उससे कम धुने, तो उसी हिसारसे वेतन भी उसे कम देना चाहिये, और कम पुगाईका दुगना जुरमाना उसपर किया जाय ॥१३॥ तुलाहीने हीनचतुर्गुणो दण्डः ।।१४।। सूत्रपरिवर्तने मूल्य- द्विगुणः ।। १५ ।। तेन द्विपटवानं व्याख्यातम् ॥ १६ ॥ ऊर्णा सूलायाः पचपलिको विहननच्छेदो रोमच्छेदश्च ॥ १७ ॥ यदि सूत तोलकर दिया गया हो, तो चुने हुए कपड़ेमें जितनी कमी हो उससे चौगुना दण्ड दिया जाय ॥ १४ ॥ भगर जलाहा सूतको बदल ले, तो उसे मूल्यसे दुगना दण्ड दिया जाये ॥१५॥ इसीरो दुसूती आदिकी घुनाई भी समझ सेनी चाहिये ॥१६॥ १०० पल उनसे ५ पल, पिंजाई (गुनाह साफ कराई) में कम हो जाती है, और ५ पल वुमाईफे समय रूओ १ अध्या०] জুমার 1082) ( (१०१) उ८ जाता है । (तात्पर्य यह है कि धुनाई थुनाईम प्रति सेकड़ा १० पलके हिसाबसे ऊन कम होसकती है, इससे अधिक नहीं)॥ १७ ॥ रजकाः काठफलकलणशिलामु वस्त्राणि नेनिज्युः ॥१८॥ अन्यत्र नेनिजन्तो वस्रोपधात पदपणं च दण्डं दाः ॥ १९॥ मुद्राक्षादन्यद्वामः परिदधानास्खिपणं दण्डं दाः ॥ २० ॥ धोबियाँको चाहिये कि ये लकड़ीके हेपर तथा चिकने साफ पत्थर पर कपड़ों को धोचें ॥ १८ ॥ दूसरी जगह धोनेपर यदि कपड़ा फट जावे, तो वे उसका नुक्सान भैर, और ६ पण दण्ड देये ॥ १९ ॥ धोवियोंके अपने पहिननेक कप दोपर मुहरका चिन्ह होना चाहिये । जो धोयो इस प्रकार चिन्ह युक्त कपन पहिन, ये सरकारको ३ पण दण्ड देव ॥२०॥ परवस्त्रविक्रयावक्रयाधानेषु च द्वादशपणो दण्डः ॥ २१ ॥ परिवर्तने मूल्यद्विगुणों वस्त्रदानं च ॥ २२॥ मुकुलावदात शिलापट्टशुद्धं धौत्रसूत्रवर्ण प्रमृष्टश्वेतं चैकरात्रोत्तरं दगुः ॥२३॥ धुलने के लिये आये हुए, दूसरो कपॉको बेचने किरायेपर चने या गिरयो रस देनेएर १२ पण दण्ड दिया जाये ॥२१॥ कपड़ा पल देनेपर कपड़ेके मूल्यस दुगना दण्ड देवे, तथा कपड़ा पापस करे ॥ २२ ॥ धोबोको चाहिये कि यह फूलको कलो के समान सफेद कपको एक दिनमें ही धोकर देदेये, शिलापटके समान पर कपको दो दिनम, धुले हुए सूतकी तरह सफेद कपड़ेको ३ दिनमे, और अत्यन्त सफेद कपडेको ४ दिनमे धोकर दे देते ॥ २३ ॥ पञ्चरात्रिकं तनुरागम् ।। २४ ।। पात्रिक नील पुष्पला- क्षामजिठारतम् ॥ २५ ॥ गुरुणारिकर्मयलोपचार्य जात्यं पासः सप्तरानिकम् ।। २६ ॥ हलके रंगवाले कपडाको ५ दिनी ॥ २४ ॥ गोले, गाढ़े रंगवाल तथा हारसिंगार, लाए ओर मजीठ आदिमें रंगे हुए कपड़ों को ६ दिनमै १२५ ॥ इसी प्रकार जो कपडे यो मेहनतसे चुने हुए हो (अर्थात् जिनमें पहुरा तरह के काय होरहे हो) अतः जिनके धोने कुर कठिनता हो जो रेशम, पाम आदि उत्तम जातिके या पड़िया कपड़े हो, उन्हें ७ दिनतक धोकर दें देवे ॥२६॥ ततः परं वेतनहानि प्राप्नुयुः ॥ २७॥श्रद्धया रागविवादेषु घेतनं कुशलाः कल्पयेयुः ॥ २८ ॥ पार्णानां पणा चेतनम् [४ अधिक (१०२) कौटलीय अर्थशास्त्र ॥ २९ ।। मध्यमानामर्धपणः ॥ ३० ॥प्रत्यवराणां पादः ॥३१॥ इसके बाद धोनेपर धोनकी मजदूरी न दी जाये ॥ २७ ॥ रंगीन कपडोंकी मजदूरीमें झगडा होनेपर, रंगोंको टीक २ समझनेवाले धनुर पुरष मजदूर्शका फैसला करे ॥ १८॥ बठिया रंगोंका एक पण वेतन ॥२९॥ मध्यम औसत दर्जेके रंगोका आधा पण ॥ ३० ॥ और मामूली रंगोका चौथाई पण वेतन देना चाहिये ॥ ३३ ॥ स्थूलकानां मापद्विमापकम् ॥ ३२ ।। द्विगुणं रक्तकानाम् ॥ ३३ ॥ प्रथमनेजने चतुर्भागः क्षयः ॥ ३४ ॥ द्वितीये पञ्च- भागः ३५ ।। तेनोत्तरं व्याख्यातम् ॥ ३६ ।। रजकैस्तुनवाया व्याख्याताः ॥ ३७॥ मोटे कपडाको धुलाई एक माप (तस्कारोन कोई सिका) या दो माप ॥ ३२ ॥ तथा रगे हुए कपकी, इससे दुगनी होनी चाहिये ॥ ३३ ॥ कपडेकी पहिली धुलाई में उसकी चोधाई कीमत कम हो जाती है ॥ ३५॥ आर दूसरी पुराई पाचौ हिस्पा (अर्थात् शेष मूल्य पांचों हिस्सा) ॥ ३५ ॥ इसी तरह आगे भी समझना चाहिये । (अर्थात् तीसरी धुलाईम दूसरी धुलाई के बाइकी कीमत का छठा हिस्सा कम होजाता है, इत्यादि) ॥३६॥ धोबियोंके अनुसार दर्जियों के नियम भी जान हने चाहिये ।। ३७ ॥ सुवर्णकाराणामशुचिहस्ताद्रूप्यं सुवर्णमनाख्याय सरूपं क्रीणतां द्वादशपणो दण्डः ॥३८॥ विरूपं चतुर्विंशतिपणः ।। ३९ ॥ चोरहस्तादएचत्वारिंशत्पणः ॥ ४० ॥ प्रच्छन्नविरूपं मूल्यहीनक्रयेषु स्तेयदण्ड ॥४१॥ दास तथा नीच नौकर चाकरोसे (अशुचिहस्तात्) सुवर्णाध्यक्ष (अथवा सरकार) को सूचना दिये बिनाही, यदि मुनार सोने घादी भादिके बने हुए गहने (सरूप) साद तो उन्हें १२ पण दण्ड दिया जाय ॥३॥ विना गहने सोने चादी आदिको सदनयाले सुनारोंको १४ पण ॥३९॥ चोरके हाथसे खरी दयागको ४८ पण दण्ट दिया जाये ॥४०॥ दूसरोंसे छिपाकर, गहने आदिको तोडमोड़कर, थोडे मूल्यमे खरीद हेमेपर, सुनारको चोरीका दण्ड दिया जावे ॥४॥ कृतमाण्डोपधौ च ॥ ४२ ।। सुवर्णान्मापकमपहरतो द्विशतो
१ अध्या०]
फण्टकशोधन
(१०३)
दण्डः ॥ ४३ ॥ रूप्यधरणान्मापकमपहरतो द्वादशपणः ॥४४॥
तेनोचरं व्याख्यातम् ॥ ४५ ॥
अनाये मालके बदल लेनेपर भी चोरीकाही दण्ड दिया जाये॥१२॥
यदि सुनार सोनेसे १ माप (तत्कालीन सोनेके सिक्केका सोलहवां हिस्सा)
सोना चुरा लेवे, तो उसे २०० पण दण्ड दिया जाय ॥ ४३ ॥ यदि एक धरण
(माण विशेष) चांदीमेंसे एक माए चुराये, तो उसे १२ पण दण्ड दिया जाय
॥ ५४॥ इसी प्रकार अधिकी चोरी, अधिक्ष दण्डकी कल्पना भी इसीके
अनुसार करलेनी चाहिये ॥१५॥
वर्णोत्कर्षमपसाराणां योग वा साधयतः पञ्चशतो दण्डः
॥ ४६ ।। तयोरपचरणे रागस्यापहारं विद्यात् ।। ४७ ।।
यदि कोई सुनार खोटे सोने चांदी पर नकली बदिया रंग कर देवे,
तथा खरे सोने चांदीमे कुछ खोट मिला देवे, अर्थात् दूसरी धातुकी मिलावद
कर देवे, सो उसे ५०० पण दण्ड दिया जाय ॥ ४६॥ उन दोनों (नकरी रंग
और मिलावट) की असलियत को, उन्हें (सोने चांदी को) अग्निमें डालने पर
रंग के उड़ जाने से पहिचाने ॥ ७ ॥
मापको वेतन रुप्यधरणस्य ॥४८॥सुवर्णस्याटभागः ॥४९॥
शिक्षाविशेषेण द्विगुणा वेतनवृद्धिः ॥५०॥ तेनोत्तरं व्याख्यातम्
.
एक धरण चांदी की कोई वस्तु यनाने पर, एक मापक वेतन दिया
जावे ॥ ४० ॥ सोने की बनवाई के लिये, उसने सोनेका आठवां हिस्सा वेतन
दिया जावे ॥ १९ विशेष कारीगरी करने पर दुगनी मजदूरी देदी जाये ॥ ५० ॥
इसी के अनुसार अधिक काम करानेर आधेक मजदूरी देवी जावे ॥११॥
ताम्रवृत्तकंसवैकृन्तकारकूटकानां पञ्चकं शतं वेतनम् ॥५२॥
तामपिण्डो दशभागः क्षयः ॥ ५३ ।। पलहीने हीनद्विगुणो दण्डः
॥ ५४॥ तेनोत्तरं व्याख्यातम् ॥ ५५ ॥
ताया, सीसा, फांसा, लोहा, (अथवा रोग) पीतल इनकी यनयाईके
लिये पांच प्रति सैकड़ा मजदूरी दी सारे ॥ ५२ ॥ साये का इनयां हिस्सा,
यनाते समय छीजन में छोड़ा जासकता है ॥ ५३ ।। इतने से एक पर कम
होने पर भी नुक्सानका दण्ड दिया जावे।। ५४ । इसी प्रकार अधिक हानि
होने पर, दण्ड का विधान समझ लेना चाहिये ॥५॥
[४ अधि. (१०४) कौटलीय अर्थशास्त्र सीसत्रपुपिण्डो विंशतिभागः क्षय ॥ ५६ ॥ काकणी चास्य पलवेतनम् ॥ ५७ ॥ तेनोत्तरं व्याख्यातम् ॥ ५८ ॥ सोसे ओर रागकी चीजे बनाने में बीसवां हिस्सा टीजनमें निकल जाता है ॥५६ ॥ इसके एक पलशी बनवाईके लिये एक काकणी वेतन होता है ॥५७ ॥ इस से अधिक बनयाईका इसी हिसाब से येतन देना चाहिये॥५४॥ रूपदर्शकस्य स्थितां पणयात्रामकोप्या कोपयत कोप्याम- कोपयतो द्वादशदणो दण्डः ॥ ५९॥ तेनोचरं व्याख्यातम् ॥६० ॥ कूटरूपं कारयतः प्रतिगृह्णतो निर्यापयतो वा सहसं दण्डः ॥६१॥ यदि सिवकों की परीक्षा करने वाला अधिकारी, चरसे हुए खरे पणों का खोटा बताये, और खोटे पणों को ग्वरा कह कर चलने दे, तो उसपर बारह पण जुरमाना किया जाय ॥ ५९॥ यटे सिक्कों के लिये ऐसा करने पर, इसी के अनुसार अधिक दण्ड दिया जाये ॥ ६० ॥ *यदि कोई छिपकर जारी सिक्के बनवावे, धने हुओं को जान वृझ कर स्वीकार करे, अथवा बिना रोकटोक चलने देवे, तो उसे एक सहस्र पण दण्ड दिया जावे ॥६॥ कोशे प्रक्षिपतो यधः ॥ ६२ ॥ अधरकपांसुधावकाः सार- त्रिभागं लगेरन् ।। ६३ ॥ द्वौ राजा रतं च ।। ६४ ॥ रतापहार उत्तमो दण्डः ॥ ६५ ॥ खनिरतनिधिनिवेदनेषु पष्ठमंशं निवेत्ता लभत ।। ६६ ॥ अछे सिक्को की जगह जाली सिम्को को, सरकारी खजानम रखने घाले पुरुषको मृत्यु दण्ड दिया जाय ।। ६२ ॥ खान निकले रयो को साफ करने वाले कर्मचारी, टूटे फूटे सारभूत मारा तीसरा हिस्सा ले लेणें ॥ ३ ॥ याकी दो हिस्से और रक्षा को रागा रेवे ॥ ६४ ॥रल चुराने वाले नौकर को उत्ता साहस वण्ड दिया जाय ॥ ६५ ॥ जो पुरप, रसाको खान, तथा कहीं गढे हुए राजानेका, राजा को पता देवे, तो उसका उठा हिस्सा उस पुरप को दिया जावे। ६६ ॥ * इसके भागे त गणपति शास्त्री सम्पादित पुस्तक में दो सूत्र अधिक है-शानी परिशुद्धा पणपाता। पणाम्मापकमुपजीवतो द्वादशपणो दण्ड"। इनका अर्थ इस प्रकार है-पाच प्रति सकडा टेक्स (पाजी) सरकार को देकर पण घराया जासकता है। एक पण घसाने के लिये माप रिश्वत एएने पर रक्षणाध्यक्ष को १२ पण दण्ड दिया जावे + १ अध्या०] कण्टकशोधन द्वादशमंशं भृतकः ।। ६७ ॥ शतसहस्रादूर्ध्व राजगामी निधिः ॥ ६८ ॥ ऊने पष्ठमंशं दद्यात् ।। ६९ ॥ पौर्वपौरापिक निधिं जानपदः शुचिः स्वकरणेन समग्रे समेत ७० ॥ यदि यह इसी कार्य के लिये राजाकी भोरसे नौकर हो, तो उसे मारहवा हिस्सा दिया जावे ।। ६७॥ यदि एक लाख पणसे अधिक राजामा हो, तो राजा उसका मालिक होता है । इतनेसे कम होनेपर, पाने वाला ही मालिक समझा जावे ॥ ६८॥ परन्तु उसमस छठा हिस्सा वह राजाको अवश्य देवे ॥६५॥ साक्षी और लेख आदि से यदि इस यातका निश्चय हो जाये कि पाया हुआ खजाना पानेशले पिता पितामह भादिका ही स्थापित किया हुआ ती ठीक आचारसे रहता हुआ एह पुरुष सम्पूर्ण स्व जानेका मालिक समक्षा जावे ॥७॥ स्वफरणाभाषे पञ्चशतो दण्डः ॥७१॥ प्रच्छन्नादाने सहस्रम् ।। ७२ ।। भिपजः प्राणायाधिकमनाख्यायोपक्रममाणस्य विपत्ती पूर्वः साहसदण्डः ॥ ७३ ॥ कर्मापराधेन विपती मध्यमः ११७४॥ मर्मवधवैगुण्यकरणे दण्डपारुप्यं विद्यात् ।।७।। यदि यह साक्षी और लेख आदिके बिना ही उस सम्पत्ति पर अपना मभुत्व जमाना चाहता है, तो उसे ५०. पण दण्ड दिया जाये ॥ १॥ छिप कर चुपचाप ही अपनी कब्जा करने पर १... पण दण्ड दिया जाचे ॥७२॥ यदि वैद्य, राजाको विना सूचना दिये हो एसे रोगीकी चिकित्सा को जिनमें रोगी की मृत्यु का भय हो, तथा चिकित्सा करते २ रोगी मर भी जाये, सो वैद्यको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥७३यदि चिकित्सा के ही दोपके कारण मृत्यु हुई हो तो मध्यम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ७४ | शरीर के किसी विशेप भा का गलत ऑपरेशन करने पर यदि रोगी का वह भा नष्ट हो जावे, या और किसी तरह को हानि हो जाये, तो वैद्यको 'दण्ड पारस्य मकरणमें कहा हुआ उचित दण्ड दिया जाये ।। ७५ ॥ कुशालवा वरात्रमकस्था बसेयुः ॥ ७६ ।। कामदानमति- मात्रमेकात्तिपातं च वर्जयेयुः ॥ ७७॥ तस्यातिकमे द्वादश- पणो दण्डः ।। ७८ ॥ कामं देशजातिगोत्रचरणमैथुनापहाने नर्मययुः ॥ ७९ ॥ धनुम नट भादि एक ही स्थानपर निवास को 10६॥ तमाशा - (१६) कौटलीय अर्थशास्त्र । ४ अधिः देखनेसे अत्यन्त प्रसन्न होकर, यदि कोई पुरुप उचित मात्रास अधिक धन उन को देवे, अथवा उनको कोई अत्यधिक स्तुति करे, तो उसे स्वीकार न करें। अथात् ऐसा करनेसे उन्हें रोकदें ॥ ७७ ॥ इस नियमको उल्लहन करनेपर १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ ७८ ॥ किसी खास देश, जाति, गोय, या चरण (क्सिी विशेष शाखा को पढ़ने वाले) को गनाक अथवा निन्दा और मैथुन को छोड़कर नट लोग बाकी सब कुछ अपनी इच्छा अनुसार खेल दिसाकर दर्शकों को खुश करसकते है॥७९॥ कुशीलवैश्वारणा भिक्षुकाश्च व्याख्याताः ॥ ८॥तेपामयः शूलेन यावतः पणानभिवदेयुस्तावन्तः शिफामहारा दण्डाः ॥८१॥ शेपाणां कर्मणां निष्पत्तिवेतनं शिल्पिना कल्पयेत् ॥ ८२ ॥ नटोके ही अनुसार गाने नाचने वाले तथा भिक्षुकोंके नियम समझने चाहिये ॥ ४० ॥ दूसरों के मर्म स्थलोपर पीड़ा पहुंचाने पर इन लोगोंको जितने पण दण्ड दिया जाय, पण अदा न कर सकनेपर उतने ही कोहे लगाये जावें। ॥ ८१ ॥ जो काम पहिले कह दिये गये है उनसे अतिरिक्त काम करने पर भी कारांगरोंका चेतन कक्षाना करके नियत करलेना चाहिये ॥ ८ ॥ एवं चौरानचौराख्यान्वणिकारुशीलवान् । भिक्षुकान्कुहकांश्चान्यान्वारयद्देशपीडनात् ।। ८३ ।। इति क्ण्टकशीधने चतुर्थेऽधिकरण कारकरक्षण प्रथमो ऽध्यायः ॥७॥ आदितो ऽसप्ततिरध्यायः ॥ ८ ॥ इस प्रकार नामके साधु बन हुए, बनिये, कारीगर, नट, भिखारी और ऐन्द्रजालिक आदि चोरोको, तथा इसी प्रकारके अन्य पुरपी को, देशम पीदा पहुंचानेसे रोके ॥ ८३ ॥ रुपटकशोधन चतुर्थ अधिकरण में पहिला अध्याय समाप्त । दूसरा अध्याय ७७प्रकरण व्यापारियों से रक्षा। संस्थाध्यक्षः पण्यसंस्थायां पुराणभाण्डानां स्वकरणविशुद्धाना- माधानं विक्रयं या स्थापयेत् ॥ १॥ तुलामानभाण्डानि चावे. क्षेत पातवापधारात् ॥ २॥ --
२ अध्या०]
फण्टकशोधन
(१०७)
याजार का अध्यक्ष, दूकानों में, दूकानदारों के स्वाधिकृत (जिस माल
पर दुकानदारों का स्वत्व निक्षित है, यानी यह माल चोरी वगैरह का नहीं
है-स्वकरणविशुधरना) पुराने अर आदि मालके प्रवेश और निकासी का
प्रबन्ध करे ॥ १॥ तराजू, य? और नापके बर्तनों का अच्छी तरह निरीक्षण
करें, जिससे कि तोल आदिमें कोई दोष न होवे ॥२॥
परिमाणीद्रोणयोरर्धपलहीनातिरिक्तमदोपः ।। ३ ।। पलही-
नातिरिक्त द्वादशपणो दण्डः ॥ ४ ॥ तेन पलोतरा दण्डवृद्धि-
याख्याता ॥५॥ तुलायाः कर्षहीनातिरिक्तमदोपः ॥६॥
परिमाणी और द्रोणमें (ये दोनों विशेष तोल है) आधा पल म्यून हो
या अधिक हो तो कोई दोष नहीं ॥ ३ ॥ एक पल न्यून या अधिक होने में १२
पण दण्ड दिया जाय ॥४॥ पलकी न्यूनता या अधिकता बढ़ने पर उसीके
अनुसार दण्ड भी पड़ता जाय ॥ ५ ॥ तुला यदि एक कर्ष कम या ज्यादा हो
तो कोई दोष नहीं ॥६॥
द्विकर्पहीनातिरिक्त पदपणो दण्डः ॥ ७॥ तेन कर्पोत्तरी
दण्डवृद्धिाख्याता ॥ ८॥ आढकस्वार्धकर्महीनातिरिक्तमदोपः
॥ ९॥ कर्पहीनातिरिक्त त्रिपणो दण्डः ॥ १० ॥
यदि दो कप कम या अधिक हो तो ६ पण दण्ड दिया जाय ॥७॥
इसी प्रकार कांकी न्यूनता या आधिकताके अधिक होनेपर पडकी भी वृद्धि
समझ लेनी चाहिये ॥ ८ ॥ आढ़क (तोल विशेष) में आधे कर्षको न्यूनता
या भधिकताका होना कोई दोष नही ॥ १॥ यदि एक कर्पकी न्यूनतर या
अधिकता हो तो ३ पण दण्ड दिया जाय ॥ १०॥
तेन कर्पोत्तरा दण्डवृद्धिाख्याता ॥ ११ ॥ तुलामानविशे-
पाणामतो ऽन्येषामनुमानं कुर्यात् ॥ १२ ॥ तुलामानाभ्यामति-
रिक्ताभ्यां क्रीया हीनाभ्यां विक्रीणानस्य त एव द्विगुणादण्डा:
कपकी न्यूनता या अधिकताके अधिक होनेपर, उसी के अनुसार दण्ड
भी पढ़ा दिया जाय ॥ १॥ जिन सुला और मानकी न्यूनाधिकताके विषय में
कुछ नहीं कहा गया है, उनको भी इतनसे अनुमान कर लेना चाहिये ॥ १२ ॥
जो पमिया, अधिक (भारी) तराजू या यहसे सरदार हलकेसे ऐथे, उसे
पूर्वोत्र (धौथे स्यसे लगाकर कहे हुप १२ आदि पण) दण्होंसे दुगना दण्ड
दिया जाये ॥ १३॥
[४ अधिः (१०८) कौटलीय अर्थशास्त्र गण्यपण्येपटभार्ग पण्यमूल्येप्वपहरतः पण्णवतिर्दण्डः ॥१४॥ काठलोहमणिमयं रज्जुचर्ममृण्मयं सूत्रवल्करोममयं वा जात्यमित्य जात्यं विक्रयाधानं नयतो मूल्याटगुणो दण्डः ॥ १५ ॥ गिनकर बेची जानेवाली चीज़ों में, चीज़की कीमतभेमे आठवां हिस्मा अपहरण करनेवाले बनियेपर १६ पण जुरमाना किया जाय ॥ १४ ॥ जो पुरप लकड़ी, लोहा, या गणिसे यने हुए, रस्सी, चमड़े या मोसे यने हुए, सूत, छाल या उनसे बने हुए; घटिया मालको यढ़िया कहकर रखता या बेचता है, उसे वस्तुकी कीमतसे आठगुना दण्ड दिया जाय ॥ १५ ॥ सारभाण्डारमित्यसारभाण्डं तज्जातमित्यतज्जातं राधायुक्त- मुपधियुक्तं समुद्रपरिवर्तिम वा विक्रयाघानं नयतो हीनमूल्य चतुप्पञ्चाशत्पणो दण्डः ॥ १६ ॥ बनावटी (कपूर, कस्तूरी भादि) कम मूल्यकी वस्तुओंको असरी (अधिक मूल्यकी) कहकर, उस देशमें पैदा न हुई २ कम मूल्यकी वस्तुको उसही देशमें पैदा हुई २ यताकर, शोभायुक्त (कम मूल्यके) बनावटी मोती आदिको, (कम कीमतकी) मिलावरी वस्तुको, एक पेटी से अच्छा माल ग्राहक को दिखाकर दूसरी पेटीमेंसे उसी तरहका कम कीमतका माल बेचने या रखने. वाले व्यापारीको ५४ पण दण्ड दिया जाय ॥ १६ ॥ पणमूल्यं द्विगुणो द्विपणमूल्यं द्विशतः ॥ १७ ॥ तेनार्यवृद्धा दण्डवृद्धिाख्याता ॥ १८ ॥ कारुशिल्पिनां कर्मगुणापकर्षमा- जीव विक्रय योपघात वा संभूय समुत्थापयतांसहस्रं दण्डः ॥१९ यदि यह उपर्युक्त माल एक पण कीमतका हो तो पहिलेसे दुगना और दो पण कीमतका हो तो २०० पण दिया जाय ॥ १७॥ इसी प्रकार अधिक मूल्यका माल होनेपर अधिक दण्डकी व्यवस्था की जाय ॥१८॥ जो लुहार, बड़ई तथा अन्य कारीगररोग, आपसमें मिलकर, जैसा काम करने की उन्हें कहा जाय, पैसा न करें, (कर्मगुणापकपम्) भधिक (एक पणकी जगह दो पण) मजदूरी रेवे (भाजीवम्) तथा किसी वस्तुको येचनेके समय अधिक दाम कहकर और सरीदनेके समय बहुत थोड़ा दाम कहकर खरीद फरोख्तमें नुक्सान पहुँचायें, उनमेंसे प्रत्येकको एक एक सहस पण दण्ड दिया जाय।।१९|| पैदेहकानां वा संभूय पण्यमारुन्धतामनर्पण विक्रीणतां या सहस्र दण्डः ॥ २०॥ तुलानामानान्तरमवर्णान्तरं वा धरकस्य
२ अध्या०]
कण्टकशोधन
(१०९)
मापकस्स या पणमूल्यादष्टभागं हस्तदोपेणाचरतो द्विशतो दण्डः
॥ २१॥
जो व्यापारी आपसमे मिलकर किसी वस्तुको विकनेसे एकदम रोक
लेवे और फिर उसे अनुचित मूल्यपर येचे या खरीदें, तो उन्हें प्रत्येकको
१००० पण दण्ड दिया जाय ॥२०॥ तुलाके कारण यहाँके कारण तथा मूल्य
में अन्तर हो जाने के कारण जो र भ होये, उसे बहीमें अवश्य लिख देवें ।
तोलनेवाला या नापनेवाला अपने हाथकी चालाकीसे यदि एक पण मूल्नको
वस्तुमसे आठवा हिस्सा कम करदेवे, तो उसको २०० पण दण्ड दिया जाना
चाहिये ॥२१॥
तेन द्विशतोत्तरा दण्डवृद्धिाख्याता ॥ २२ ॥ धान्यस्नेह
क्षारलवणगन्धर्भपज्यद्रव्याणां समवर्णोपधाने द्वादशपणो दण्डः
॥ २३ ॥ यान्निसृष्टमुपजीवेयुस्तदेषां दिवससंजातं संख्याय
चणिक स्थापयेत् ॥ २४ ॥
इसी प्रकार अधिक भाग कम देनेपर आधिक दण्डकी पवस्था की
जाय, (अर्थात् चौधा हिस्सा कम देवे, तो ४०० पण दण्ड दिया इत्यादि)
॥ २२ ॥ धान्य (अन्न) मेह, (तेर घृत आदि) खार (जयासार आदि) नमक
गन्ध और औषधियामे उसी तरहकी क्म कीमतकी वस्तुओंको मिलाकर
भेचनेपर १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ २३ ॥ दुकानदारोंको प्रतिदिन जितना
लाभ होवे, उसे सस्थाध्यक्ष (बाजारका निरीक्षक चौधरी याणिस्) गपनी यहीम
सीकर गिनकर लिख लेने ॥२३॥
क्रेविक्रेत्रोरन्तरपतितमादायादन्यद्भवति ॥ २५॥ तेन
धान्यपण्यनिचयांश्चानुज्ञाताः कुर्यु ॥ २६ ॥ अन्यथा निचित-
मेषां पण्याध्यक्षो गृहीयात् ॥ २७ ॥ तेन धान्यपण्यनिस्ये व्य-
वहरेतानुग्रहेण प्रजानाम् ॥ २८ ॥
जिस पस्तुकी खरीद फरोस्त सस्थाध्यक्ष सय करता है, उसके लाभ
में कोई हिस्सेदार नही होसफता, अर्थात् यह राजकीय होता है ॥२५॥
भस भन्म व्यापारियोंको उचित है कि वे सस्थाध्यक्षको अनुमतिको लेकर
ही धान्य आदि किसी विक्रेय परतुका सशप करें ॥ २६ ॥ अनुमति गल्नेपर
सस्थाध्यक्षको भधिकार है कि यह उनकी सगृहीत विक्रर वस्तुओंको उनसे
ले लेवे ॥ २७ ॥ सस्थाध्यक्षको चाहिये कि वह उन धान्य आदि सङ्गृहीत
वस्तुओंके विक्रम इस प्रकारका व्यवहार करे, जिसम प्रज्ञाओंका उपकार
हो ॥२८॥
[४ अधि०
.
पग प्रति
(११०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
अनुज्ञातक्रयादुपरि चैपां स्वदेशीयानां पण्यानां पञ्चकं शत-
माजी स्थापयेत् ॥ २९ ।। परदेशीयानां दशकम् ॥३०॥ ततः
परमर्घ वर्धयतां क्रय विक्रये वा भावयता पणशते पञ्चपणावि-
शतो दण्डः ॥ ३१ ॥ तेनार्यवृद्धौ दण्डवृद्धिाख्याता ॥ ३२ ॥
संस्थाध्यक्ष जिन वस्तुओके बेचने की अनुमति दे दे, यदि वे अपने
ही देशमें बनी हो तो उनपर व्यापारी नियत मूल्यसे अधिक ५ पण प्रति
सैकड़ा लाभ लेसकता है ॥ २९ ॥ यदि वे विदेशकी हो तो १०
सैकड़ा लाभ लेवे ॥ ३० ॥ इससे अधिक मूल्य यदानेपर और क्रय अथवा
विक्रयमें ५ प्रति सैकड़ा और अधिक लाभ लेनेपर २०० पण दण्ड दिया जाय
॥३१ ॥ इसी प्रकार और मूल्य पढ़ाकर एाभ उठाने में इसी क्रमसे अधिक
दण्ड दिया जाय ॥ ३२ ॥
संभूयक्रये चेपामविक्रीतेतान्य संभूयक्रयं दद्यात् ।। ३३ ॥
पण्योपघाते चैपामनुग्रहं कुर्यात् ॥ ३४ ॥ पण्यवाहुल्यात्पण्या-
ध्यक्षः सर्वपण्यान्येकमुखानि विक्रीणीत ॥ ३५ ॥
यदि व्यापारी मिलकर संस्थाध्यक्षसे कोई थोकमाल खरीद लेवे, और
घहयिक न सके, तो अन्य व्यापारियोंको घोकमाल न देवे ॥३३॥ यदि
व्यापारीका माल जल या अग्नि आदिके द्वारा नष्ट होजाय, तो संस्थाध्यक्ष उगको
और माल देकर उनकी सहायता करे ॥ ३४ ॥ संस्थाध्यक्षको चाहिये कि वह
सम्पूर्ण विक्रेय वस्तुओको किसी एक व्यापारीके द्वारा ही बेचे ॥ ३५ ॥
तेष्वविक्रीतेपु नान्ये विक्रीणीरन् ।। ३८ ॥ तानि दिवसवे-
तनेन विक्रीणीरननुग्रहेण प्रजानाम् ॥ ३७ ॥ देशकालान्तरि-
तानां तु पण्यानां ॥ ३८ ॥
यदि ये सरकारी माल उसके द्वारा भी न विकसके, तो और पापारी
भी मालको न बेचे ॥ ३६ ॥ और उन सम्पूर्ण वस्तुओंको दैनिक वेतन देकर
इस प्रकार यिकराया जाये, जिससे प्रजाका कल्याण हो ॥ ३७ ॥ संस्थाध्यक्षका
यह कर्तव्य है कि वह दूसरे देश और दूसरे समयमें होनेवाली वस्तुओंके॥३८॥
प्रक्षेपं पण्यनिष्पत्ति शुल्कं घृद्धिमवक्रयम् ।
व्ययानन्यांथ संख्याय स्थापयेदर्घमर्धवित् ।। ३९ ।।
इति कण्टफशोधने चतुर्थेऽधिवरणे पैदेहकरक्षणं द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
आदित एकोनाशीतिः ॥ १९ ॥
३ अध्या] कण्टकशोधन मूल्य, बनवाईका समय, वेतन, च्याज, भाटा और इसी तरह के अन्य सब खर्चीको लगाकर वस्तुकं विप्रेय मूरयका निश्चय करे ॥ ३९ ॥ कण्टकशोधन चतुर्थ आधिकरणमें दूमरा अध्याय समाप्त । तीसरा अध्याय। ७८प्रकरण। देवी आपत्तियोंका प्रतीकार। देवान्यष्टौ महामयानि ॥१॥ अग्निरुदकं व्याधि(मिक्षं मूपिका व्यालाः सी रक्षांसीति ॥ २॥ तेभ्यो जनपदं रक्षेत् ॥३॥ ग्रीष्मे बहिरधिश्रयणं ग्रामाः कुर्युः ॥ ४ ॥ दशमूलीसंग्र- देणाधिष्ठिता या ॥५॥ देववश होनेवाले आठ महामय है ॥ १ ॥ अग्नि, जल, वामारी, दुर्भिक्ष चूहे, न्यान, सांप और राक्षस ॥२॥ राजा इन सबसे जनपदका रक्षा करे ॥ ३॥ गरमीकी फतुमे ग्रामीणजन घरसे बाहर भोजन आदि पकाय ॥४॥ अथवा दशकुली (दस घरी) का रक्षक गोप (यह राजाकी ओर से नियुक्त जमादारका नाम है, देखो अधि - अश ३६) नदी आज्ञा देवं, उसी जगह- पर भोजन आदि बनाये ॥५॥ नागरिकप्रणिधावाग्निप्रतिषेधो व्याख्यातः ॥ ६॥ निशान्त प्रणिधी राजपरिग्रहे च ॥ ७॥ चलिहोमस्वस्तिवाचनः पर्वसु चाग्निपूजाः कारयेत् ॥ ८॥ नागरिक प्रणिधि (अधि २, अध्या ३६) नामक प्रकरण में भनिस बचने के उपाय पतला दिये गये है ॥ ६ ॥ निशान्त प्रणिधि (अधि. १ अध्या. २०) नामक प्रकरण अन्तर्गत राजपरिग्रहम भी अग्निसे बचनेके उपाय बताये है ॥ ७ ॥ पूर्णमासी.आदि पयं तिथियोंमे परिहोम और स्वस्ति बनोसे अतिकी पूजा करवाये ॥८॥ वर्षारानमनूपग्रागा पूर्वलामुत्सृज्य बसेयुः ॥ ९ ॥ काष्ठवे. शुनावश्चापगृहीयुः ॥१०॥ उह्यमानमलायुतिप्लवगाण्डिकाये- णिकामिस्तारयेयुः ॥ ११ ॥ पर्पा काकी राम, नदीके पास गांध, नदीके बिनाको जोड़कर कौटलीय अर्थशास्त्र [४ अधिक दूर जाकर निवास करें ॥ ९॥ लकड़ी, यांसके येड़े तथा नाव आदि तरनेके साधनाका सदा सप्रा रवये ॥ १० ॥ नदी के प्रवाहके साथ यहते हुए या इयते हुए भादमीको स्थी, मशक, तमेढ़, लका या येडेके सहार तरी अधात् बचायं ॥ ११ ॥ अनमिसरता द्वादशपणो दण्डः ॥ १२ ॥ अन्यत्र प्लवहीने- भ्यः ॥ १३ ॥ पर्वसु च नदीपूजाः कारयेत् ।। १४.।। माया- योगविदो वेदविदो या वर्पमभिचरेयुः ॥ १५ ॥ जो पुरप, हुयते हुए आदमी को देखकर यचानेका यस्न न करें, उन्हें १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ १०॥ पान्नु यदि उनके पास तरनेका कोई साधन न हो, तो वे अपराधी नहीं ॥ १३॥ और पूर्णमासी आदि पर्न तिथियों में नदीको पूजा करवाये ||१४|| तथा मान्तिक एर अदि आदिके जाननेवाले पुरपासे अति सृष्टिको शान्त करनेके सिए अप होम आदि करवावे ।। १५ ।। वर्षावग्रहे शचीनाथगङ्गापर्वतमहाकच्छपूजाः कारयेत् ॥१६ व्याधिभयमापनिपदिकः प्रतीकारः प्रतिकुर्युः ।। १७ ।। औपध- चिकित्सकाः शान्तिप्रायश्चित्त सिद्धतापमाः ॥ १८ ।। चोक बन्द हो जानेपर इन्ट, गंगा, पहाड और समुदकी पूजा करवाजे ॥ १६ ॥ भोपानपदिक (१४ वा) अधिकरणमे कहे हुए उपायोंके द्वारा कृत्रिम व्याधि, भय का प्रतीकार करे ॥ १७॥ तथा अकृत्रिम व्याधि भपको वैद्य लोग चिकित्साके द्वारा और सिद्ध तथा तपस्वी जन शान्तिम और प्रायश्चित्त (प्रत उपपासादि) आदिक द्वारा देर कर ॥ १८॥ तेन मरका व्याख्यातः॥ १९ ॥तीर्थाभिपचनं महाकच्छ- वर्धनं गवांउमशानावदोहन कवन्धदहनं देवरात्रिं च कारयेत् ॥२ संशमक (फैरनेवाली) महाव्याधियोंके दूर करनेके लिए भी इसी प्रकारके उपाय कामम लाने चाहिये ॥ १९ ॥ गङ्गा आदि तीर्थों में स्नान, समुद्रको पूजा, श्मशानमे गौओका दोहन (दूध दुहना), चावल और सत्तसे एने हुए कवाय (हिर राहत शरीर ) का श्मशानमै दाह,.और किमी स्थानपर देवकी पूजा करके सने जागरण करपार ॥२०॥ पशुव्याधिमरके स्थानान्यधनीराजनं स्वदेवतपूजनं च कार- येत् ॥२शा दुर्भिक्षे राजा बीजभक्तोपग्रहं कृत्वानुग्रहं कुर्यात् ॥२२॥ यदि पशुआम बीमारी या महामारी फैल जावे, यो स्थान र पर रोगको दूर करने के लिए पान्तिकम फरपाये, और उन २ पशुओके देवताओकी पूजा ० ३ अध्य] कण्टकशोधन करवाये । (पभोंके देवता निर प्रकार हैं-हाथी सुमहण्य, घोडा-अधिनी, गौ-पशुपति, भैसम्धरण, करा:अग्नि इत्यादि) ॥२१॥ दुर्भिक्ष हो जानेपर राजाको चाहिए कि वह बीज तथा अन्न आदि देकर प्रजाओंके ऊपर अनुप्रह करे ॥२२॥ दुर्गसेतुकर्म या भक्तानुग्रहेण भक्तसंविभाग चा देशनिक्षेप था ।। २३ ॥ मित्राणि वाप्यपाश्रयेत ॥ २४ ॥ कर्शनं वमन चा कुर्यात् ॥ २५ ॥ अथवा सुत्पीडितोको उचित वेतन देकर उनसे दुर्ग पा सेतु आदिका निर्माण करवाये । जो कार्य करने में असमर्थ हो, उन्हें केवल अक्ष देवे अथवा समीरके दूसरे देशर्म कष्ट समय तक उन लोगोंके जानेका प्रयन्ध करदे ॥२३॥ अथवा प्रजाकी रक्षाके लिए, अपने मिन राजाओसे सहायता लेवे ।। २५॥ और अपने देश के धनधान आदमियोपा कर लगाये, तथा उनसे अधिक मात्रा में एकमुश्त धन भी लेये ॥ २५॥ निष्पन्नसस्यमन्यविषयं या सजनपदो यायात् ॥ २६ ॥ समुद्रसरस्तटाकानि या संश्रयेत ॥ २७ ॥ धान्यशाकमूलफला- वापान्सेतुपु कुर्वीत ॥२८॥ मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्यारम्भान्या ।।२९।। अथवा जिस देशी अग्नकी खूब अधिकता हो, वहापरही जनपदके सहित 'पला जाये ॥ २६ ॥ अथवा समुद्रके किनारे या बडे २ सालायोंके किनारेपर जाकर बसे ॥ २७ ॥ जहापर धान्य, शाक, मूल, फल आदिकी खेती भी करवा सके ॥ २८॥ अथवा मृग, पशु, पक्षी, व्याघ, मछली आदिका शिकार करके जीवन निर्वाह करे ॥ २९ ॥ मपिकमये मार्जारनकुलोत्सर्गः ॥ ३० ॥ तेषां ग्रहणहिसायां द्वादशपणो दण्डः ॥ ३१ ॥ शुनामनिग्रहे च ॥ ३२ ॥ अन्यत्रा. रण्यचरेभ्यः ॥ ३३॥ चूहोंका भय होनेपा दिल्ली और नेवलोंको जगह २ पर छुडपा देथे ॥३०॥ जो उनको पक. या मार देवे उनको १२ पण दण्ड दिया जाय ॥३१॥ उनको भी १२ पण दण्ड दिया जाय, जो दूसरोंका नुकसान कर देनेपर भी अपने पालतू कुत्ताको म एफडे ॥ ३२ ॥ जगरी कुत्तोंके न पकड़ने में कोई अपराध नहीं ॥ ३३॥ स्नुहिधारीलमानि धान्यानि विसृजेदुपनिषद्योगयुक्तानि या भूपिकफरं वा प्रसीत ॥ ३४ ॥ शान्ति वा सिद्धतापसाः कुर्यु।
[४ अधिक (११२) कौटलीय अर्थशास्त्र दूर जाकर निवास करें ॥ ९॥ लकडी, यांसके येहे तथा नाव आदि तरनेके साधनाका सदा सरह रखे ॥१०॥ नदी के प्रवाहके साथ रहते हुए या इयते हुए आदमोको तूंबी, मशक, तमेड़, रक्कड़ या येड़ेके सहारे तरी अथीत बचाव ॥१॥ अनभिसरता द्वादशपणो दण्डः॥ १२ ॥ अन्यत्र प्लवहींने- भ्यः ॥ १३ ॥ पर्यसु च नदीपूजाः कारयेत् ॥ १४ ।। माया- योगविदो वेदविदो या वर्षमभिचरेयुः ॥ १५ ॥ जो पुरप, इनते हुए भादमी को देखकर बचानेका यत्न न करें, उन्हें १२ पण दण्ड दिया जाय ॥ १२॥ परन्तु यदि उनके पास तैरनेका कोई साधन न हो, तो वे अपराधी नहीं ।। १३ ॥ और पूर्णमासी आदि पर्व तिथियों में मदोकी पूजा करवाये ॥१४॥ तथा सान्त्रिक एवं अर्थोद भादिके जाननेवाले पुरपास अति वृटिको शान्त करने के सिए जप होम आदि करवावे ॥ १५ ॥ वर्षावग्रहे शचीनाथगङ्गापर्वतमहाकच्छपूजाः कारयेत् ॥१६ व्याधिभयमोपनिषदिकः प्रतीकारैः प्रतिकुर्युः ।। १७ ॥ औषधै- श्चिकित्सकाः शान्तिप्रायश्चित्ता सिद्धतापमाः ॥१८ ।। वपाक बन्द हो जानपर इन्द्र, गगा, पहाड और समुद्रकी पूजा करचाये ॥१६ । औपनिषदिक ( १४ यां) अधिकरणमे कहे हुए उपायोके द्वारा कृत्रिम व्याधि, भयका प्राकार कर ॥10॥ तथा अकृतिम व्याधि भयको पैदा रोग चिकिरमाके द्वारा और सिद्ध तथा तपस्वी जन शान्तिकर्म और प्रायश्चिरा (प्रत उपासादि) आदिके द्वारा दूर करे ॥ १८ ॥ तेन मरको व्याख्यातः ॥ १९ ॥तीर्थाभिषेचनं महाकच्छ- वर्धनं गवां उमशानावदोहनं कवन्धदहनं देवरात्रिं च कारयेत् ।।२० समामक (फैलनेवाली) महाव्याधियोंके दूर करनेके रिए भी इसी प्रकारके उपाय काममें राने चाहिय॥ १९॥ गङ्गा आदि तीर्थों में स्नान, समुद्रको पूजा, श्मशान गाओका दोहन (दूध दुहना), चावल और ससे हुए कवन्ध (सिर हित शरीर) काश्मश नमै दाह,और किसी स्थानपर देवकी पूजा करके शनि जागरण करवाय ॥२०॥ पशुव्याधिमरके स्थानान्यर्धनीराजनं सदैवतपूजनं च कार- मेत् ॥२शा दुर्भिक्षे राजा बीजभक्तोपग्रहं कृत्वानुग्रहं कुर्यात् ।।२२।। यदि पशुओम पीमारी या महामारी फैल जाये, यो स्थान पर रोगको दूर करने के लिए शान्तिकर्म करवाये, और उन २ पशुओके देवताको पूजा - ३ अध्या०] कण्टकशोधन करयाये। (पशुओंके देवता निज प्रकार है-हाथी-सुबह्मपय, घोडामधिनी, गौपशुपति, भैंसमवरण, यकरा:अग्नि इत्यादि) ॥ २१ ॥ दुर्भिक्ष हो जानेपर राजाको चाहिए कि वह पीज तथा अन्न आदि देकर प्रजाओंके ऊपर अनुप्रह करे ॥२२॥ दुर्गसेतुकर्म वा भक्तानुग्रहेण भक्तसंविभागं वा देशनिक्षेप वा ।। २३ ॥ मित्राणि वाप्यपाश्रयेत ॥ २४ ॥ कर्शन वमनं वा कुर्यात् ।। २५ ॥ अथवा क्षुषीडिताको उचित वेतन देकर उनसे दुर्ग या सेतु आदिका निर्माण करवाये । जो कार्य करने में असमर्थ हो, उन्हें केवल अन्न देथे अथवा समीपके दूसरे देश में कष्ट समय सफ उन लोगोंके जानेका प्रबन्ध कादे ॥२३॥ अथवा प्रजाकी रक्षाके लिए, अपने मित्र राजाभोसे सहायता लेवे ॥२४॥ और अपने देशके धनवान आदमियोंपर कर लगाव, तथा उनसे आधिक मात्रामें एकमुश्त धन भी लेवे ॥२५॥ निप्पन्नसस्यमन्यविषयं वा सजनपदो यायात् ॥ २६ ।। समुद्रसरस्तटाकानि वा संश्रयेत ॥ २७ ॥ धान्यशाकमूलफला- वापान्सेतुपु कुर्वीत ॥२८॥ मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्यारम्भान्या ।।२९।। अथवा जिस देश में अकी खूब अधिकता हो, वहांपरही जनपदके सहित ला जाये ॥ २६ ॥ अथवा समुद्र किनारे या बड़े २ तालायोंके किनारेपर जाकर बसे । २७ ।। जहांपर धाग्य, शाक, मूल, पाल आदिकी खेती भी करवा सके ॥ २८ ॥ अथवा मृग, पशु, पक्षी, स्थान, मछली आदिका शिकार करके जीवन निर्वाह करे ॥ २९ ॥ मूपिकमये मार्जारनकुलोत्सर्गः ॥ ३० ॥ तेषां ग्रहणहिंसायां द्वादशपणो दण्डः ॥ ३१ ॥ शुनामनिग्रहे च ॥ ३२ ।। अन्यत्रा- रण्यचरेभ्यः ॥ ३३ ॥ चूहका भय होनेपर मिली और नेवलोको जगह २ पर छुड़वा देवे ॥ ३० ॥ जो उनको एकड़ें या मार देर उनको १२ पण दण्ड दिया नाय ॥३१॥ उनको भी १२ पण दण्ड दिया जाय, जो दूसरोका नुकसान कर देनेपर भी अपने पालतू कुत्तोको न पकड़े ॥ ३२ ॥ जंगली कुत्ताके न पकड़ने '. में कोई अपराध नहीं ॥ ३३ ॥ स्नुहिक्षारीलतानि धान्यानि विसृजेदुपनिपयोगयुक्तानि वा मूषिकफरं वा प्रयुञ्जीत ॥ ३४ }| शान्ति या सिद्धतापसा 'गुयुः .
न कौटलीय अर्थशास्त्र [अधि. ॥३५॥ पर्वसु च पिकपूजाः करयेत् ॥ ३६ ॥ तेन शलमप- क्षिक्रिमिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ॥ ३७ ॥ सेंढके दूधर्म भीगे हुए धान्यको या नोपनिषदिक प्रकरणमें यतलाई हुई औषधियोंसे मिले हुए धान्यको इधर उधर बखेर देथे । (जिससे कि उसे खांकर पूरे मर जावे)। अथवा पूहोंको पड़कनेका कोई प्रबन्ध फरें ॥३४॥ सिद्ध प्रसपस्मोजन चूहाको नष्ट करनेके लिये शान्तिकर्म करें ॥ ३५ ॥ पर्व तिथियों में मूपकोंकी पूजा करवाये ॥ ३६ ॥ इससे पतङ्गे, पक्षी और छोटे २ कोदोसे होनेवाले भयोका भी प्रतीकार समझ लेना चाहिये ॥३०॥ व्यालभये मदनरसयुक्तानि पशुशवानि विसृजेत् ॥ ३८ ॥ मदनकोद्रवपूर्णान्यौदर्याणि या ।। ३९ ।। लुब्धकाः श्वगणिनो चा कूटपञ्जरावपातश्चरेयुः ॥ ४०॥ हिंसक व्याघ्र आदि पशुओका भय होने पर औपनिषदिक अधिकरणले पसाये हुए मदनरस भादि युस, पशुभाको लाशों को जंगलमे छुड़या देवे । साकि उसे खाकर यात्रादि मर जाये) ॥ ३८॥ अथवा धतूरा और जंगली कोदोको मिलाकर लाशके पेट में भर दिया जाय, और उन्हें जगलमें छोड़ दिया जाय ॥ ३९ ॥ शिकारी और यहलिये (कुत्तोंके द्वारा शिकार करनेवाली जाति विशेप) हिप हुर गडाको उपयोग फों ॥ ४०॥ आवरणिनः शस्त्रपाणयो व्यालानभिहन्युः ॥ ४१ ।। अन मिसर्तुदशपणो दण्टः ॥ ४२ ॥ स एव लामो ग्यालपातिनः ॥ ४३ ।। पर्वसु स पर्वतपूजाः कारयेत् ॥ ४४ ॥ तेन मृगपशु- पक्षिसंघग्राहप्रतीकारा, व्याख्याताः ॥ ४५ ॥ कवच धारणकर हथियारोंसे सिह आदिको मारें ॥४१॥ ग्याघ्रभादिसे घिरे हुए मनुष्यको जो न यथावे, उसे १२ पण दण्ड दिया जाय ॥१२॥जो व्याघ्रादि को मार देवे, उसे इतनाही (१२ पण) इनान दिया जाय ॥४३॥ और पर्व तिधियोंमें पताकी पूजा कराये ॥ ४४ ॥ इसी प्रकार अन्य अंगरी पशु और पक्षियों के गुण्डाके आक्रमण आदिसे बचनेके उपाय समझने चाहिये ॥ ४५ ॥ सर्पभये गन्नरोपधिभिश्च जागलीचिदश्चरेयुः ॥ ४६ ॥ संभूय योपसर्पान्हन्युः ॥४७॥ अथर्ववेदविदो याभिचरेयुः ॥४८॥ पर्वसु.नागपूजाः कारयेत् ॥ ४८॥ तेनोदकप्राणिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।।५।। 1 -- ३ अध्या०] फण्टकशोधन (१२५) सपंका भय होनेपर मन्त्र भौर औषधियोंके द्वारा, विपवय उनका प्रतीकार करे ॥ ४६॥ अथवा नगरनिवासी जातभी जिस सापको देखें, मिलकर मार देये ।। ४७ ॥ अथवा अथर्ववेद (अथर्ववेद, प्रतिपादित अभिचार कमी)को जाननेवाले पुरप अभिचार क्रियाओंसे सपीको मार ॥ १८॥ पर्व तिपिशेमे सपौकी पूजा करावे।। ५९ ।। जरचर प्राणियोंसे होनेवाले भयोंका प्रकार भी इसी प्रकार समझना चाहिये ।। ५० ॥ । रक्षोभये रक्षोन्नान्यथर्ववेदविदो मायायोगविदो चा कर्माणि फुयुः ॥ ५१॥ पर्वसु च पितर्दिछनोलोपिकाहस्तपताकाच्छागो- पहारैश्चत्यपूजाः कारयेत् ।। ५२ ।। राक्षसोका भय होनेपर, आभिचारिक (अथर्व प्रतिपादित अभिचार वर्मको जाननेवाले तथा मायायोग (शैवादि वन्न प्रतिपादित मारण उसाटन भादि मियाओ) को जाननेवाले पुरप, राक्षसोंके नाश कर्माका अनुष्ठान फोरें ॥५१॥ और कृष्ण चतुर्दशी अष्टमी आदि पर्व तिथियामि बेदी, छाया, कुछ खानेका सामान, हायमें छोटी झण्डी और बकरा भेट के लिये लेकर श्मशाम भूमियाम राक्षसोंकी पूजा करवावे ।। ५२ ।। चरुं वश्वरामीत्येवं सर्वभयेष्यहोरानं चरेयुः ॥ ५३ ॥ सर्वत्र चोपहतान्पितेवानुगृहीयात् ।। ५४ ।। प्रत्येक भयके उपस्थित होनेपर "हम तुम्हारे लिये हषि पफासे है" इस प्रकार कहते हुए पुरप दिन और रातमें घूम ।। ५ ।। उपर्युक्त मास मस्त हुए मजा-जनाकी सब जगह राजा इस प्रकार रक्षा करे, जैसे पिता पुसकी रक्षा करता है।॥ ५४॥ मायायोगविदस्तस्माद्विपये सिद्धतापसा । यसेयुः पूजिता राज्ञा देवापत्प्रतिकारिणः ॥ ५५ ॥ इशि कपटकशोधने धतुर्ये ऽधिकरणे उपनिपासतकारस्तृतीयो याय: ॥३॥ भादितो ऽशीतितम ॥८॥ इस लिये रामाको उचित है कि वह, देवी भापसियोंका प्रतीकार करने याले, मागायोगायिर आर सिद तपस्वियोंकी सखार पूर्वक अपने में अवश्य रपये॥ ५५॥ कण्टकशोधन चतुर्थ श्रधिकरणमें तीसरा अध्याय समान। -- कौटलीय अर्थशास्त्र [ अधि० चौथा अध्याय। ७९ प्रकरण। गूढ़ाजीवियोंका प्रतीकार । समाहर्टप्रणिधौ जनपदरक्षणमुक्तम् ॥ १॥ तस्य कण्टकशो- धनं वक्ष्यामः ॥२॥ जनपनकी रक्षाके उपाय समाहन-प्रचार ( अधि, २ अध्या. ३५. समा- हाम्राजकीय कर वसूल करनेवाले अधिकारीका, प्रचार व्यवहार जिस प्रकरण में यतलाया गया है, उस) प्रकरणमें कह दिये हैं ॥११॥ अय इस पातको कहा जायगा कि जनपदके प्रउराकण्टकोका प्रतीकार किस प्रकार करना चाहिये ॥२॥ समाहर्ता जनपदे सिद्धतापसमत्रजितचनचरचारणकुहकप्रच्छन्द- ककाान्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकचिकित्सकोन्मत्तमूकबधिरजडान्ध- वैदेहककारुशिल्पिकुशीलववेशशौण्डिकापूपिकपाकमासिकौदनिका . न्यजनान्प्रणिदध्यात् ॥ ३॥ समाहर्ताको उचित है कि गूढकण्टको (छिपे हुए प्रजापीड़कों) को जाननेके लिये सम्पूर्ण जनपदमे, सिद्ध, तपस्वी, संन्यासी, निरन्तर घूमनेवाले, भाट, ऐन्द्रजालिक, अपनी इच्छानुसार घूमनेवाले, यमपटको फैलाकर जीविका करनेवाले, शकुन बतानेवाले, ज्योतिषी, वैद्य, उन्मत्त, गूगे, यधिर, मूरी, अन्य व्यापारी, कारीगर, नट मांड, कलवार, हलवाई, पकामांस येचनेवाले और रसोइये भादिके देशमें गुप्तचरोंको नियुक्त करे ॥३॥ ते ग्रामाणामध्यक्षाणां च शौचाशाचं विद्युः ॥४॥ यं चात्र गूदजीविनं विशङ्केत तं सत्तिसवर्णेनापसर्पयेत् ॥ ५॥ ये गुप्तचर प्रामीणों तया गांवके मुखियाओंकी ईमानदारी और येई- मानीका पता लगाव ॥ ४ ॥ गुप्तचर इनमेंसे जिसको गूदकण्टक समझे, उसे सत्री (देखो अधि । अध्या. १२ सून 1) के साथ धर्मस्य (न्यायाधीश) के पास भेज देव ॥५॥ धर्मस्थं विश्वासोपगतं सची ब्रूयात् ॥ ६॥ असौ मे बन्धु- रमियुक्तः॥७॥ तस्यायमनर्थः प्रतिक्रियतामयं चार्थः प्रति- गृह्यतामिति ॥ ८॥ विधरत धर्मस्पको सयी कहे कि:-॥ ६॥"यद मेरा अन्धु है, इसने र ४ अध्या०] कण्टकशोधन (११७) अमुक वापराध किया है ॥ ७ ॥ इसके इस अपराधको माफ कर देना चाहिये, और इसके बदले में यह धनराशि ले लीजिये" ॥ ८ ॥ स चेत्तथा कुर्यादुपदाग्राहक इति प्रयाखेत ॥९॥ तेन प्रदेशारो व्याख्याताः ।। १०॥ यदि वह न्यायाधीश धनराशि लेकर उसे छोड देवे, तो उसे (न्याया धीशको) धूसखोर समझकर उस पदपे हटा दिया जावे १९॥ यही नियम प्रदेष्टा (कपटकशोधनके अधिकारी के लिये भी समदाने चाहिये ॥१०॥ ग्रामकूटमध्यक्षं वा सत्ची ब्रूयात् ॥ ११ ॥ असौ आत्मः प्रभूतद्रव्यस्तस्यायमनर्थः ॥ १२ ॥ तेनैनमाहारयस्वेति ॥ १३ ॥ स चेत्तथा कुर्यादुकांचक इति प्रवास्येत ॥ १४ ॥ गावकी जनता या गावके मुखियासे सत्री कदे कि ॥ ११ ॥ "यह पापी वटा सम्पत्तिशाली है, इसरे अपर सम्प्रति अमुक आपसि आई हुई है॥ १२॥ इसलिये चलो आपतिके पहानेसे सर्वस्व लद वे" ॥३॥ पदि इसके अनुसार यह जनता या अध्यक्ष ऐसाही करें तो उन्हें उत्कोचक ( मजाको कट देकर माल मारनेवाले ) समानकर प्रवासित कर दिया जाय।।१४॥ कृतकाभियुक्तो का कूटसाक्षिणा अभिज्ञातानर्थवैपुल्यनारभेत ॥ १५ ॥ ते चेत्तथा कुर्युः कूटसाक्षिणः इति प्रवास्परन् ।॥ १६ ॥ तेन कूटश्रावणकारका व्याख्याताः ॥ १७ ॥ पनावदी तौरपर अभियुक्त बना हुआ सी, सन्दिग्ध (जिनपर लेपने का सन्देह हो गया हो) कपटी साक्षियोंका बहुतसा धन दिखाकर अपनी हाडी गवाही देने के लिये कुसलाये ॥ १५ ॥ यदि ये लोभमें आ जाये, वो उन्हें हाठा साक्षी समझाकर मवासित किया जाय ॥ १६ ॥ यही नियम मरे पस्ता वेज आदि पनानेवालों के लिये भी समझने चाहिये । १७॥ यं वा मन्त्रयोगमूलकर्मभिः श्माशानिफै; संवननकारक मन्येत तं सत्ची पात् ॥ १८ ॥ अमृप्यभार्या स्तुपा दुहितरं चा कामये ॥ १९ ॥ सा मां प्रतिकामयताम् ।। २० ।। अयं चार्यः प्रतिगृह्यतामिति ॥ २१॥ जिसको, मन्त्रों के द्वारा अथवा गोपधियों के द्वारा, जानेवाले कान्त्रिक उपायोंके द्वारा यशीकरण करनेवाला समोर, इससे सनी या -[४ अधिक M - '(१९८) कोटलीय अर्थशास्त्र कई कि -"मैं अमुक पुस्पकी त्री, पुत्रवधू या लड़या को चाहता हूँ ॥१९॥ इस लिये ऐसा उपाय करो, रिजिमसे यह भी मुद्रो चाहने लगे ॥ २० ॥ लो यह इतना धग लेरो"Ram स चेत्तथा कुर्यात्संवननकारक इति प्रवास्येत ॥ २२ ॥ तेन कृत्याभिचारशीलो व्याख्याती ।। २३ ॥ यदि यह लोभमें आनर पैसा काम करने के लिये तैयार होजाय, तो उसे वशीकरण कत्ती (सपना कारक) समझाकर शामित कर दिया जाय ॥ २२ ॥ यही नियम उन पुरपशि रिपे भी समझने चाहिये, जो अपने उपर भूत, प्रेत, पिशाच आदिको बुलाकर प्रनाको पष्ट देते है, और तान्त्रिक मन्त्र प्रयोगोंक द्वारा अभिचार फर्म पुरपोको मारना) करते है ॥ २३ ।। यं वा रसस्य कतीरं क्रेतारं विक्रेतारं भैपज्याहारव्यवहारिणं वा रसदं मन्येत तं सन्त्री भ्रूयात् ।। २४ ॥ असौ मे शत्रुस्तस्यो- पघातः क्रियतामयं चार्थः प्रतिगृह्यतामिति ॥ २५ ॥ स चेत्तथा कुर्याद्रसद इति प्रवास्येत ॥ २६ ॥ तेन मदनयोगव्यवहारी च्या- ख्यातः॥२७॥ विपके पनानेगले, खरीदने या बेचनेवाले, तथा भापधियों और भो- जन आदि व्यापार करनेवाले पुरपर यदि किसीको विष देनेका सन्देह हो, तो सयो उससे कहे कि -"अमुक पुरप मेरा शत्रु है, उसे आप विप देकर मार ढालिये और इसके यदले यह इतना धन ले लीजिये " ॥ २५ ॥ यदि घह पुरुष ऐसाही करे तो उसे विपदेनेवाला समझकर प्रवासित कर दिया जाय ॥ २६ ॥ यही नियम मूच्छित करनेवाली औषधियोंके व्यापारी के लिये भी समझने चाहियें ॥ २७ ॥ यं वा नानालोहक्षागणामझारभवासंदंशमुष्टिकाधिकरणीधि- म्बटइम्पाणामभीर्ण फ्रेतारं भूपीभस्मधूमदिग्धहस्तपखालिन कर्मारोपकरणसंार्ग कूटरूपकारकं मन्येत तं सची शिष्यत्वेन संव्यवहारेण चानुप्रविश्य प्रज्ञापयेत् ॥ २८ ॥ जो विविध प्रकारक लोहे या खार, तथा फोयला, धोक्नी, सदासी, साड़ी, अधिकरणी (होहेको यह पस्तु जिमे भूमिमै गाठफर उसपर गरम लोहा रखकर ऊपरसे चोट मारते है), तस्वीर, छैनी, भौर गूपा (सुनार जिप्तमें सोना चांदी भादि गरम करते हैं) आदि पदार्थोशे अधिक संख्याम पुरका कण्टकशोधन ५ अध्या०] खरीदे और जिसके हाथ या कपड़ोंपर स्याही, राख तथा धुएंके चिन्ह हो, जो लुहार आदि के सब औजारोंको रखता हो, उसके ऊपर यदि छिपकर गाली सिका यनाने का सन्देह हो जाये, तो सनी उसका शिष्य बनकर और अच्छी तरह मेलजोल बढ़ाकर उसके भीतरकी सन यात मानले और राजाको भी खयर देवे ॥ २८॥ प्रज्ञातः कूटरूपकारक इति प्रवास्येत ।। २९ ॥तेन रागस्या- पहर्ता कूटसुवर्णव्यवहारी च व्याख्यातः ॥ ३०॥ इस बातका निश्चय हो जाने पर कि यह छिपकर जाली सिके बनाता है, उसे प्रयासित कर दिया जाये ॥ २९ ॥ सुवर्ण आदिक वर्णको उहा देनेवाले तथा जाली (बनावटी) सोनेका यापार करनेवाले पुराँके लिये भी यही नियम समझना चाहिये ॥३०॥ आरब्धारस्तु हिंमायां गूढाजीवासयोदश । प्रवास्या निष्क्रयार्थ वा दगुर्दोषविशेषतः ॥ ३१ ॥ इति कण्टकशोधने चतुर्थे ऽधिकरणे गुढाजीवानां रक्षा चतुर्थो ऽध्यायः ॥४॥ आदित एकाशीतिः ॥ ८॥ लोग उपद्रव करनेवाले तेरह गूडाजीवी (पत कण्टक) कहे गये हैं धर्मस्थ, प्रदेशा, प्रागका नुखिया, मामका अध्यक्ष, कूटसाक्षी, फूटप्रायफ, वशी- करणको, हरयाशील, अभिचारशील, विष देनेवाला, मदनयोग व्यापारी, फूट रूपयत्ती, और पूट सुरण व्यापारी, इनको देशसे निकाल दिया जाये, अथवा अपराध न्यूनाधिक होनेपर इनको उसीके अनुसार दण्ड दिया जाये ॥३॥ कण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरणमें चौथा अध्याय समाप्त । ८०प्रकरण। पांचवां अध्याय। 'सिद्धवेषके द्वारा दुष्टोंका प्रकाशन । सस्त्रीप्रयोगादूर्ध्व सिद्धव्यञ्जना माणवा माणवविद्याभिः, प्रलोभयेयुः प्रस्थापनान्तर्धानद्वारापोहमन्त्रेण प्रतिरोधकान्संवनन- मन्त्रेण पारतल्पिकान् ॥ १॥ गुप्तचरोंके गोगके बाद, सिद्धोंके येपमें घोर और व्यभिचारियोंके समूहोंगे रहते हुए ही गुरुपुरुष, उसी एंगको पोशों (समोहिनी विधाओं) से ।
कौटलीय अर्थशास्त्र [४ अधिक प्रजाकण्टकों को प्रलोभन देवें । सुराने, छिपाने संकेतसे दरवाजा पोरने भादिके मायिक मन्यास चोरोरो, तथा घशीकरण मन्यास व्यभिचारियोंको कामे करे ॥१॥ तेषां कृतोत्साहानां महान्तं संघमादाय रानावन्यं ग्राममुद्दि- श्यान्यं ग्राम कृतकाः स्त्रीपुरुपं गत्वा ब्रूयुः ॥ २॥ इहय विद्या. प्रभावी दृश्यताम् ॥ ३॥ कृच्छ्रः परग्रामो गन्तुमिति ॥ ४ ॥ उत्साहित किये चौर और व्यभिचारियोंके यईभारी समूहको लेकर गनिमें जिम गांवको पहिले जानेका इरादा करें, उससे दूसरे गांवमें, जहां पहिले होसे संकेत किये हुए मीपुरा विधमान हो, माकर सिपधारी पुरष चोर आदिको कहे कि --॥२॥ "वहाँपर हमारी विद्या प्रभायको देखी॥३॥ अन दूसरे गांवमें जाना तो बड़ा कठिन है "॥ ४ ॥ ततो द्वारापोहमन्त्रेण द्वाराण्यपोह्य प्रविश्यतामिति श्रूयुः ।।५।। अन्तधानमन्त्रेण जाग्रतामारक्षिणां मध्येन माणवानतिकामयेयुः ॥ ६ ॥ प्रस्थापनमन्त्रेण प्रस्थापयित्वा रक्षिणः शय्यामिर्माणवः संचारयेयुः ॥७॥ इसके पश्चात् द्वारापोह (संकेतसे दरवाजा खोल देनेवाले) मन्यास दरवाजोंको खोरकर, उनके भीतर प्रवेश कर जाने के लिये उन्हें कहें ॥५॥ आन्तधान मन्त्रक द्वारा जागते हुए रक्षक पुरषांके यीचमसे उनको निकाल दे ॥ ६ ॥ और प्रस्थापन मन्त्रसे पहरेदाराके सुलानेका अभिनय करके, चोर भादिक द्वाराही साटाके साथ २ उन्हें घुमाव ॥७॥ संवननमन्त्रेण भार्यान्यञ्जनाः परेपां माणवः संमोदयेयुः ॥८॥ उपलब्धविद्याप्रभावाणां पुरश्चरणायादिशेयुरमिज्ञानार्थम् ॥९॥ कृतलक्षणद्रव्येषु वा वेश्मसु कर्म कारयेयुः ॥ १० ॥ पशीकरण मन्नोंके द्वारा, दूसरोकी कृत्रिम भायां बनी हुई स्त्रियोंको उनके साथ संग सुखका अनुभव कराव ॥ ८॥ जन उनको विद्याका प्रभाव अच्छी तरह मालूम हो जावे, तो स्मरणने लिये उनसे पुरश्चरण (मन्त्रसिद्धिकै अङ्गभूत ग्रत आदि कमविशष) आदि करनेको कहे ॥९॥ और फिर जिन घरोम, मालिकके किसी विशेष चिन्हसे युक्त वस्तुये रखी हुई हो, पहॉपर इनसे चोरी करवावें ॥1॥ अनुमविष्टान्का ग्राहयेयुः ॥ ११ ॥ कृतलक्षणद्रव्यमयवि- -- . अध्या०] कण्टकशोधन (१२१) क्रयाधानेपु योगसुरामत्तान्या ग्राहयेयुः ॥१२॥ गृहीतान्पूर्वोप- दानसहायानतुयुञ्जीत ॥ १३॥ पुराणचोरव्यजना वा चोराननु- प्रविष्टास्तथैव कर्म कारयेयुाहयेयुश्च ॥१४॥ तथा किसी एक घमें घुसे हुए इन सब चोरोंको पकड़वा देवी चिन्हसे युक्त वस्तुओंको खरीदने या बेचने पा गिरवी रखने के समय अथवा मादक औषधि या मदिरासे उन्मत हुए २ इनको एकाधा देवे ॥१२॥ इन पकडे हुए चोरोसे, पहिले की हुई चोरियों और चोरी में सहयता देनयारीके विषयमें पूछे ॥ १३ ॥ अथवा गुप्तचर, पुराने अनुभवी चोरोंका भेस मनाकर घोरोम ही बिल्कुट मिल जायें, भीर उनसे उसी तरह पोरी करवायें और फिर पकडवा देखें ॥ १४ ॥ गृहीतान्समाहर्ता पौरजानपदानां दर्शयेत् ॥ १५॥ चोरग्र- ही विद्यामधीते राजा ॥ १६ ॥ तस्योपदेशादिमे चौरा गृहीताः ॥१७॥ भूयश्च ग्रहीष्यामि ॥ १८॥ वारयितव्यो वः स्वजनः पायाचार इति ॥१९॥ अधिकारी पुरषको चाहिये कि वह पकड़े हुए चौराको नगरनिवासी लोगोंको दिखला देवे ॥ १५॥ और उनस यह कहे कि राजा धोरोको पकर मेकी विधाका बहुत अच्छी तरह जानता है ॥ १६ ॥ उसीकी भाशानुसार ये चोर पकडे गये हैं॥१७॥जो ऐसा काम करेंगे उनको फिर भी पकहूँगा ॥१८॥इसलिये तुमलोग सब भादमियोंसे कहदो कि ये ऐस पाप कर्मका आचरण कभी न करें ॥१९॥ यं चात्रापसर्पोपदेशेन शम्याप्रतोदादीनामपहार जानीया- तमेपां प्रत्यादिशेत ॥ २०॥ एप राज्ञः प्रभाव इति ।। २१ ॥ पुराणचारगोपालकव्याधश्वगणिनश्च पनचोराटायकाननुप्रविष्टाः प्रभूतकूटहिरण्यकुप्यभाण्डेपु सार्थनजनामप्येनानभियोजयेयारशा अधिकारी पुरप गुसवराके कथनानुसार पिस पुरषको सैल और पनी जसी छोटी वस्तुओंके पुरानवाला भी समस, उसे भी जनताके सामन दिला कर यह कहें कि ॥ २०॥ देखो राजाका पदमभाय है, तो इतनी छोटी २ यस्तुको चोरीको भी मरी तरह समझता है ॥ ३ ॥ पुरान पार, पाल, शिकारी और पहेलियके भेसमें, गाजपुरुष जगलीधोरों तथा फोल भीमें बिस्कुल रवामिल जाये और जहाँ अधिक तादादमें पनापटी हिरण्य और होम A (१२२) कौटलीय अर्थशास्त्र [४ अधिक भादिके पात्र हो, ऐसे व्यापारियोके पढाव था गांवों में चोरी करने के लिये इनको तैयार करदेव ॥ २२॥ अभियोगे गूढवलैर्यातयेयुः ॥ २३ ॥ मदनरसयुक्तेन वा पध्यादनेनानुगृहीतलोपभारानायतगतपरिश्रान्तान्प्रखपतः प्रह- वणेषु योगसुरामत्तान्ना ग्राहयेयुः ॥ २४ ॥ जब ये लोग चोरी करना प्रारम्भ करें, तो पहापर छिपी हुई सेनासे इनको मरवा देवें॥ २३ ॥ या रास्ते में विपरस युक्त भोजन देकर इनको मार डालें। अधवा सिरपर चोरीके मालरी गठढी उठाकर आनेजानेके कारण थक- कर सोये हुए, या आनन्दपूर्वक भोजन करने के बाद यदिया मदिरा पीनेके कारण उन्मत्त हुए २ इनको गिरफ्तार करावें ॥२४॥ पूर्ववच्च गृहीलेनान्समाहर्ता प्ररूपयेत् । । सर्वज्ञख्यापनं राज्ञः कारयन्नाप्ट्रयासिपु ॥२५॥ इति कपटकशोधने चतुर्थे ऽधिकरणे सिद्धप्प अनर्माणपप्रकाशन पशुमो अध्याय ॥५॥ भादितो हृयशीति ॥८२॥ अधिकारी पुरुष, इनको पकडकर समग जनताके सन्गुख, सर्वज्ञताको प्रकट करता हुआ, पहिले की तरह इनको उपस्थित करे ॥ २५ ॥ कण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरणमें पांचयां अध्याय समाप्त । राजाकी . - छठा अध्याय। ८१ प्रकरण। शङ्का, चोरीका 'माल, तथा सेंधसे चोरोंका पकड़ना। सिद्धप्रयोगावं शारूपकर्माभिग्रहः ॥१॥ सिबमेस गुप्तपरोक प्रयोगके बाद, भय पक्षा, रूप और कर्मस धोका पकाना सताया जाता है॥॥ क्षीणदायकुटुम्बमल्पनिर्देशं विपरीतदेशजातिगोत्रनामकर्मा- पदेशं प्रच्छन्नवृत्तिकर्माणं मांससुरामक्ष्यभोजनगन्धमाल्यवस्त्रवि- भूपणेषु प्रसक्तमतिव्ययकर्तारं पुंथलीगतशौण्डिकेषु प्रसक्तमभी- क्ष्णप्रयासिनमविज्ञातस्थानगमनपण्यमेकान्तारण्यनिष्कुटविकाल- चारिणं प्रच्छन्ने सामिषे वा देशे बहुमन्त्रसंनिपात सयक्षतव्र " ६ अध्या कण्टकशोधन (२२३) णानां गूढप्रतीकारयितारमन्तहनित्यमभ्यधिगन्तारं कान्तापर परपरिग्रहाणां परस्त्रीगण्यवेश्मनामभीक्ष्णप्रष्टारं कुत्सितकर्मशास्रो- पकरणसंसर्ग विरात्रे छन्नकुट्यच्छायासंचारिणं विरूपद्रव्याणाम- देशकालविक्रेतारं जातवैराशयं हीनकर्मजाति विगृहमानरूपं लिङ्गेन आलिगिनं लिङ्गिनं वा भिन्नाचार पूर्वकृतापदान स्वकर्मभिरपदिष्ट नागरिकं महामात्रदर्शने गृहमानमपसरन्तमनुच्यासोपवेशिनमा: विन शुकभिन्नखरमुखवर्ण शखहस्तं मनुष्यसंपतिग्रासिनं हिंस-' स्तेननिधिनिक्षेपापहारप्रयोगगूढाजीविनामन्यतमं शकतेति शंका- भिग्रहः ॥२॥ शङ्कासे पकड़े जानवाल, अधात् जिनके ऊपर चौरी आदिको शङ्का की जासकती है, एस पुरपाको पहिले बताते है:-जिनकी बुलक्रमागत सम्पत्ति और कृषि आदिका कार्य क्षीण होता जाता हो, जिनको खामे और खर्चके लिये पर्यात वेतन न मिलता हो, जो अपने देश, जाति गौच नाम तथा कामको ठीक २ न बताव, जीविकाके लिये छिप तौरपर काम, करें, मांस शराय आदिक खानपीने और हार फुलेल बस्न तथा अन्य प्रकारको सजावटमे आसार रखने पाले, अत्यधिक ध्यय करनेवाले, पेश्या जुआरी ओर शराबियों में रहनेवाले, जल्दी २ विदेशको जानेषाले, जिनका जानेके स्थानका कुछ पता न चले, जो पंफान्त जंगलमें या घरके बागाचाम अनुचित समयम जावे, छिपे तथा धनियाँके घरोके निकट बार '२ कुछ देखने या सोचनेवाले, ताजे लगे हुए घावोंको छिपकर इलाज करानेवाले, सदा घरके भीतर रहनेवाले, सामने आते हुए किसी पुरपको देखकर सत्काल लौट जानघाले,खी परायणा, दूसरे के परिजनों तथा स्त्री द्रव्य और घर मादिके विषयमे चार २ पूछनेवाले, पोरी आदि कुत्सित काम उपयोगी शस्रो तथा अन्य साधनाको अच्छी तरह जाननेवाले, आधीरातमें छिपकर दीवारको छायामें घूमनेवाले, गहने आदि एस्तुओंकी असली शकल बिगाड़कर अनुचित स्थान ओर समयमै बेचनेवाले, शत्रुताका भाव रखनेवाले, नोचकर्म करनेवाले, तथा नौचजातिमें उत्पन्न हुए २, अपनी असली सूरतको छिपाकर रखनेवाले, जो ब्रह्मचारी आदि न होकर भी प्रदाचारी आदिके पेपमें रहनेवाले, प्राचारी आदि होते हुए भी अपने नियमाका ठीक २ पालन न करनेवाले, जिन्होंने पहिले भी कभी छोरीकी हो, जो अपने बुरे कामोंसे सर अगह प्रसिद्ध हो, नगरके पहरेदार तथा अन्य राजकर्मचारीके दीखनेशर टिपजाने तथा भाग आनेवाले, घुपचाप लिपकर पाइर एकाम्तम बैठनेयाले, [४ अधिक (१२४) कोटलीय अर्थशास्त्र दरे हुए, सूखे हुए मुह तथा भर्राई हुई भावाजवाले, हाथमें हथियार लेकर आत हुए पुरुषको देखकर डर जानेवारे, इत्यादि पुरपॉके अपर यह शङ्का की जासकती है कि या तो यह किसीका मारनेगा है, या चौर है, या किसीकी निधि सभा निक्षेपका अपहरण करनेवाला है, या फ्रोधर्म किसीके ऊपर हथि. यार चलानेवाला है, या गृढाजीवी अर्थात् प्रजाको कष्ट देनेवाला प्रजाकण्टक है। यह शङ्कासे पकड़े जानेके विषयमें कहा गया ॥ २ ॥ रूपाभिग्रहस्तु ॥ ३ ॥ नष्टापहृतमविद्यमान तज्जातव्यवहा- रिषु निवेदयेत् ॥ ४ ॥ तचेभिवेदितमासाद्य प्रच्छादयेयुः साचि- व्यकरदोपमाप्नुयुः ।। ५ ।। अजानन्तो ऽस्स द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येरन ।।६।। अब रूपके (चोरीका माल) द्वारा पकडे जानेके विषयमें कहा जायगा ॥ ३ ॥ अपने प्रमादमे कहीं खोई हुई, या चोरी होगई हुई यस्तु जल्दीही न भिल जावे तो उस घस्नु मापारीको इसकी सूचना देदी जावे (कि इस हुलि येकी यस्तु खोई हुई ह यदि तुम्हारे पस भावे तो खयाल रखना) ॥ ४॥ यदि ये व्यापारी कही हुई वस्तुके आजानेपर भी उसे छिपा रे, तो पोरीम सहायता देने का जो दण्ड हो, यह उन्हें दिया जाय ॥५॥ यदि वे इस घातको न जानते हों, तो उस व्यके दे देने पर उसके अपराधसे छुटकारा पासकते हैं।॥६॥ न चानिवेद्य सस्थाध्यक्षस्य पुराणभाण्डानामाधानं विक्रय पा कुर्युः ॥७॥ तथेनिवेदितमासायेत रूपाभिगृहीतमागमं पृच्छेत् ॥ ८॥कुतस्ते लब्धमिति ।। ९॥ स चेद्व्याद्दायाचादे- आप्तममुप्माल्लब्धं क्रीतं कारितमाधिप्रच्छन्नम् ॥ १० ॥ सस्थापक्षको बिना सूचना दिये पुराने मालको न कहीं गिरवी रव, भार न बेचे ॥ ७॥ यदि वह खोई हुई वस्तु किसी व्यापारीके पास आजावे, तो उस वस्नुके लाने वालेको पूछा जाये, कि॥८॥ तुसने यह पस्तु कहासे हरी ॥९॥ यदि वह कहे कि मैंने यह अपनी जद्दी जापदादसे री है, या और किसीसे (जिससे ली हो उसका नाम लेकर कहे) ली है, अथवा मैंने खरीदी या पनवाई है, या अभीतक रहन सखे रहनेके कारण यह वस्तु छिपी रही... अयमस्य देशः कालथोपसंप्राप्तः ॥ ११॥ अयमस्यार्घः प्रमाणं क्षणमूल्यं चेति तस्यागमसमाधी सुध्येत ॥ १२ ॥ ना.
६ अध्या फण्टकशोधन ष्टिकश्चत्तदेव प्रतिसंदध्यात् ॥१३॥ यस्य पूर्वो दीर्घश्च परिभोगः शुचिर्या देशस्तस्य द्रव्यमिति विद्यात् ॥ १४ ॥ यह अमुक स्थान और अमुक समयपर लीगई थी ॥ ११ ॥ यह इसका असली मूल्य है, इसमें यह प्रमाण है, यह लक्षण है, यह इसकी आजकलकी कीमत है, इस प्रकार उसका सव हाल ठीक २ यतला देनेपर उसे अपराधी न समझा जाये ॥ १२ ॥ यदि अमियोक्ता (जिसकी वस्तु खोई हुई या चोरी गई है, यह) भी उसी चीजको अपनी पतलाये, सो ॥३॥ उन दोनों में से उसी व्यक्ति को उस वस्तु का मारिक समझा जाय, जो पहिले और बहुत दिनोंसे जप्त वस्तुका उपभोगकर रहा हो, तथा जिसके साक्षी विश्वस्त भार सच्चे हो ॥१५॥ चतुष्पदद्विपदानामपि हि रूपलिगसामान्यं भवति किमङ्ग पुनरेकयोनिद्रव्यकर्तनसताना कुप्याभरणभाण्डानामिति ॥ १५ ॥ क्योंकि प्राय यह देखा जाता है कि जब मिस २ योनियो उपन होनेवाले चौपायों में भी भाकृतिसादृश्य और चिन्हसाव है, तो यह क्या अचम्भेकी यात ह कि एकही कारीगर के द्वारा एकही द्रव्यसे बनी हुई आभूषण वसन भावि यस्तुभौम परस्पर समानता हो । (अर्यान् समानता अवश्य हो सकती है, और इसलिये किसी वस्तुको देखकर आदमी उसपर अपनी घरामा धोका खासकवा है।)॥१५॥ स चेद्यात् ॥ १६ ॥ याचितकमवक्रीतकमाहितकं नि- क्षेपमुपनिधि वैग्यावृत्यकर्म यामुप्येति तस्यावसरप्रतिसंधानेन मुच्येत ॥ १७॥ पदि वह वस्तु लानेवाला पुरण, पूरने पर यह कहे कि-॥१६॥ यह वस्तु में अगुक पुरपपे मांगरर लाया हूँ, या किरावेपर लाया है, या मेरे पास धराको किसी पुरुपने गिरवी रस्सा है, या कुछ वस्तु बनाने के लिये मेरे पास रख गया है, या रक्षाके लिए विश्वास करके मुझे दे गया है, या मैंने घेतनमें अमुव पुरपसे इसे पाया है, इत्यादि । तो उस पुरपको बुलाकर पूछनेपर यह यह कहदे कि जो कुछ इसने कहा है यह ठीक है, तो यह वस्तु रानेवाला पुरप छोड़ दिया जाये ।। १७ ॥ नेपमित्यपसारो वा धूयात् ।। १८ ॥ रूपाभिगृहीत. परस्य दानकारणमात्मनः प्रतिग्रहकारणमुपलिङ्गनं वा दायकदापकनि- वन्धकप्रतिग्राहकोपदेष्दृभिरुषश्रोतृभिर्चा प्रतिसमानयेत् ।। १९ ।।
[४ अधिक {१२६) कौटलीय अर्थशास्त्र यदि वह पुरष कहदे कि इसने ठीक नहीं कहा है, मुझसे इसने कुछ नहीं मांगा, इत्यादि ॥ १८ ॥ तो वह वस्तु लानेवाला पुरप, दूसरेके उस वस्तुको देने के कारणको और अपने लेने के फारणको अदालतमें उपस्थित करे, तथा युक्तिपासे इस बातको सिद्ध करे कि मैंने यह वस्तु इससे ली है। उस यस्तुके देनेवाले, दिलानेवाले, लिखनेवाले, लेनेवाले, लिखानेवाले तथा साक्षी पुरपाको न्यायालय में उपस्थित को ॥ १९ ॥ उझिंतप्रनष्टनिष्पतितोपलब्धस्य देशकाललामोपलिङ्गनेन शुद्धिः ॥ २०॥ अशुद्धस्तच तावच दण्डं दद्यात् ॥ २१ ॥ अ- न्यथा स्तेयदण्डं भजेत ॥ २२ ॥ इति रूपाभिग्रहः ॥ २३॥; यदि आभयोक्ता, कहोपर भूली हुई, खोई हुई मा लेजाई हुई वस्तुके प्राप्त होजानेपर उसके सम्पन्ध देश, काल तथा अपने स्वरकको ठीक २ सिद्ध कर देता है, तो समझना चाहिये, यह उसीकी वस्तु है ॥ २० ॥ यदि सिद्ध न करसके, तो उतनीही कोमतको वैसी दूसरी वस्तु और उतना ही दण्ड देवे ॥२१॥ अन्यथा उसको चोरीका दण्ड दिया जावे ॥२२॥ यहांतक रूपके द्वारा पकड़ने के सम्बन्धमें कहा गया ॥ २३ ॥ कर्माभिग्रहस्तु ॥ २४॥ अब इसके भागे चौर्य कर्मके द्वारा पकड़े जानेके विषयमे कहा जाता है ॥२॥ चोरी तीन प्रकारको होती है:-भीतरसे की जानेवाली, श्याहरसे १३ दोनों ओरसे । पहिले, पाहेली चोरीके विषयमे कहा जाता है:- मुपितवेश्मनः प्रवेशनिष्कसनमद्वारेण द्वारस्य संधिना वीजेन वा वेधमुत्तमागारस्य जालवातायननीप्रवेधमारोहणावतरणे च कुड्यस्य वेधमुपखननं या गूढद्रव्यनिक्षेपणग्रहणोपायमुपदेशोपल- भ्यमभ्यन्तरच्छेदोत्करपरिमर्दोपकरणमभ्यन्तरकृतं विद्यात् ॥२५।। विपर्यये बाह्यकृतं उमयत उभयकृतम् ॥२६॥ यदि घोरी किये हुए परमें, पीछे के दरवाजे से आना जाना हुआ हो, अथया दरवाजा जोदों से या नीचे से तोड़ दिया गया हो, मान ऊँचा होने पर रिकी या रोशनदानों को तोड़ दिया गया हो, चढ़ने और उतरने के लिये दीवार में इंट निकालकर या खोदकर जगह बना ली गई हो, पतलाने परही मासूम होने पाही रस छिपाकर रखी हुई वस्तुओं को ऐने के लिये टोक उसी . स ६ अभ्या०] कण्टकशोधत जगह से दीवार या जमीर खोदी गई हो, और मकान के भीतर ,खोदीहुई मही ये मालूम करदी गई हो, तो समझना चाहिये कि इस चोरी में भीतर रहने धाले किसी आदमी का हाथ अवश्य है ॥ २५ ॥ यदि इससे विपरीत लक्षण मिलें, तो इसे थाहर वालों का ही काम समझ, और दोनों तरह के लक्षण मिलने पर दोनों का ॥ २६ ॥ अभ्यन्तरकृते पुरुपमासनं व्यसनिनं करसहायं तस्करोपक- रणसंसर्ग स्त्रियं या दरिद्रकुलामन्यासक्तां वो परिचारकजनं वा तद्विधाचारमतिवमं निद्राक्लान्तमाविक्लान्तमाविनं शुष्कभिन्नखर मुसवर्णमनवस्थितमतिपलापिनमुचारोहणसंरब्धमात्रं विलूननिवृष्ट भिन्नपाटितशरीरपस्त्रं जातकिरणसंरब्धहस्तपादं पांसुपूर्णकेशनखं विलूनभुग्नकेशनसं वा सम्यक्रवातानुलिप्त तैलप्रमृष्टगात्रं सद्योधौतहस्तपादं या पांसुपिच्छिलेषु तुल्यपादपदनिक्षेप प्रवेशनिष्कसनयोर्वा तुल्यमाल्यमद्यगन्धवस्त्रच्छेदविलेपनखेद परी- क्षेत ॥२७ ।। चोरं पारदारिक वा विद्यात् ॥ २८ ॥ यदि यह सन्देह हो कि इस चोरी आदि में भीतर के आदमी का हाथ है, तो उसकी जांचके लिये भीतर या समीप रहने वाले निम्न प्रकार के आद मियों से पूछताछ करे, जो जुआरी हो या शराय पीता हो, कर आदमियों की सहायता करने वाला हो, चोरों की सगत करने वाला, दरिद्री, अथवा भन्यासक्त स्त्री, या अन्य स्त्री पर आसक्त नौका चाकर, यहुत सोनेवाला, निद्रा के कारण थका हुमा सा, मानसिक कष्टों से दुखो, दरा हुआ, घबडाये हुए चेहरे और भर्राई हुई आवाज वाला, चशल, वकवादी, ऊपर चढने में दूसरे वी सहायता लेने घाला, जिसरके वस्म कर करे और रगड़े हुए मालूम परें, जिसके हाय और परों में ठेक पटी हुई हो, जिसके यार और नाखूनों में धूर भी हुई हो, तथा कटे फटे भौर इधर उधर बिखरे हुए हों, जिसने अच्छी तरह स्नान करने के बाद पिरा शरीर पर चन्दन आदि कुछ लगा लिया हो, शरीर पर तेल की मालिश करलो हो, फैरन ही हाथ पर धो डाले हा, धूल या कीचा में जिसके पार के सदश चिन्ह मिर माय, जिसके ऊपर ऐसा ही गन्ध माता हो जैसा कि पोरी किये हुए मकान में रक्खी हुई माता और मर्च का गन्ध हो, उसी तरह कारे परे हो नया धदनादि लगाने पर पसीना भी पैसा ही हो ॥ २७ ॥ इस तरह के पुरपों से भठी तरह पूर ताल करके फिर इस बात का निर्णय करे कि अमुक पुरष रयाभिषा २८३ (१२८) कौटलीय अर्थशास्त्र [४ अधिक सगोपस्थानिको बाह्य प्रदेष्टा चोरमार्गणम् । कुर्यानागरिकश्चान्तर्गे निर्दिष्टहेतुमिः ।। २९ ।। इति कण्टकशोधने चतुर्थ ऽधिकरणे शङ्कास्पकर्माभिग्रह पष्टो अध्याय ॥ ६ ॥ भादितस्त्र्यशीति ॥ ८३॥ यदि चोरा आदि करने धारे यार के ही आदमी हो, तो गोप और स्थानिक को साथ रेकर प्रदेष्टा उनको तालाश करे । तगा नागरिक यतसाये उपायों के द्वारा नगरों में ही उनरी खोग परे। २५॥ फण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरण में छठा अध्याय समाप्त । । सातवां अध्याय ८२ प्रकरण आशुमृतक परीक्षा । तैलाभ्यक्तमाशुमृतकं परीक्षेत ॥ १॥ निष्कीर्णमूवपुरी पातपूर्णकोष्ठत्वकं शुनपादपाणिमुन्मीलिताक्षं सव्यञ्जनकण्ठं पांड- ननिरुद्धोग्यासहतं :विद्यात् ॥ २॥ किसी भारी घाव या बीमारोके विना ही जो पुरप अचानक मर जाय उसे आशुमृतक कहते है। द्वन्धको अपहरण करने वाले कण्टका फे रिपयमें कहा जा चुका है, भव प्राणापहारी कण्टकों को कहत है। आशुमृतक को सेलम डालकर फिर परीक्षा करे ॥ १॥जिसका पशाप प पखाना निकल गया हा, पेट या साल में हवा भरी हुई हो, हाथ पैरा पर सूजन भाई हुई हा, भाख फरी हुई हॉ, गलम निशान हो, तो समझना चाहिये कि इस आदमी का गला घटकर माराया ह ॥ २ ॥ तमेव संकुचितबाहुसक्थिमुद्वन्धहतं विद्यात् ॥ ३॥ शून- पाणिपादोदरमपगताक्षमुघृत्तनाभिमवरोपितं पिद्यात् ॥ ४ ॥ निस्तब्धगुदाक्षं संदष्टजिमाध्मातोदरमुदकहतं विद्यात् ॥ ५॥ यदि उसकी पहिं भोर टांगें सुझी हुई हों, तो समझना चाहिये कि इसे लटकाकर पीसी रुगाफर मारा गया है॥३॥ यदि हाथ पैर और पेट पूले हुए हों, आस भीतर को गी हुई हो, नाभि ऊपर को उठी हुई हो, तो समझना चाहिये कि इस मूलरी पर चुढाकर मारा गया है ॥१॥ पिसकी गुदा +4 । - T ७ अध्या०] कण्टकशोधन और आख बाहर निकल गई हों, जीभ कट सी गई हो, पेट फूला हुआ हो, उसे समझना चाहिये कि यह पानी मे दुबाकर मारा गया ह॥५॥ शोणितानुमिक्तं भन्नभिन्नगात्रं का? रश्मिभिर्वा हतं विद्यात् ॥ ६॥ संभप्रस्फुटितगात्रभवक्षिप्त विद्यात् ।। ७॥ श्याचपाणि- पाददन्तनखं शिथिलमांसरोमचर्माणं फेनोपदिग्धमुसं विपहतं विद्यात् ॥ ८॥ जो खून से भोगा हुआ हो, शरीर के अपयव टूट फूट गये हा, उसे समझना चाहिये कि यह लाठियों और रस्सिया समारा गया है, जिस का शरीर जगह से फट गया हो, उसे समझना चाहिये कि यह मकान आदि के ऊपर से गिराकर मारा गया है ।, ७ ॥ जिसके हाथ, पैर, दात, नाखून कुछ Kछ काले पड़ गये हो, मौस, रुई, और खाल ये बोले,पड गये हों, तथा, मुंहसे झाग आता हो, उसे समझना चाहिये कि यह जहर खिलाकर मारा गया । + है -- तमेव सशोणितदंशं सर्पकोटहतं विधात् ॥ ९॥ विक्षिप्त वसगात्रमतियांतविरिक्तं मदनयोगहतं विद्यात् ॥१०॥' अतो ऽन्यतमेन कारणेन हतं हत्या का दण्डभयादुद्धन्धनिकृत्तकण्ठं विद्यात् ॥ ११॥ यदि हालत यही हो, और किसी काटे हुए स्थानसे रक्त निकल रहा हो, सो समाना चाहिये कि इसे सापसे, अथवा अन्य किसी जहरीले कीडे से कटपा कर मारा गया ह॥९॥ जिसने अपने बस्न तथा शरीर को इधर उधर बरसा रक्खा दो, तथा जिमको के भौर दस्त यहुत आये हों, उसे समझना चाहिये कि यह धतूरा भावि उन्माइक भीषभिये खिराकर मारा गया है ॥20॥ इन उपर्युक्त कारणों में से किसी एक कारणले गरे हुए आदमी को पहिचाने । "अथवा कोई व्यक्ति किसी को मारकर फिर यह विचार करके कि भव राजा बढे कर से मेरे प्राण ले, इस दरसे स्वय ही गले में फांसी लगाकर लटक कर या अपनी गर्दन काटकर अपने भापही मा सकता है॥१॥ विपहतस्य भोजनशेपं पयोभिः परीक्षेत ॥ १२ ॥ हृदयादु- द्धृत्याग्नौ प्रक्षिप्तं चिटचिटायदिन्द्रधनुर्पर्ण वा विपयुक्त विद्यात् ॥ १३ ॥ दग्धस्य हृदयमदग्धं दृष्ट्या वा तस्य परिचारकजन या दण्डपारुष्यातिलाचं मार्गव ।। १४ ।। .
[४ अधिक . १९२३०), कौटलीय अर्थशास्त्र विषसे मरे हुए व्यक्ति के पेट से शेप अध निकाए, उसे रस मादि (रासायनिक क्रिया) के द्वारा परीक्षा फरवाये। (किसी पुस्तक में 'पयोमिकी जगह पयामि' पाठ है। अर्थात् पक्षियों के द्वारा, उन्हें पह अब खिलाकर उसकी परीक्षा करावे) ॥१२॥ पेट में सर्वथा भसका परिपाक हो जानेपर, हृदय फा एवं हिस्सा कटवाकर उसे अग्निमें दालें, उसमें से यदि 'चिट चिट' इस प्रकार जलने का शब्द निकले, और घ कालिक इन्द्र धनुप के नीले लाल रंग दीस, तो उसे विण्युक्त समझा जाये ॥ १३ ॥ जलाये हुए पुरपके अधजले हृदय प्रदेश को देखकर, अयथा मरे हुए व्यत्तिके नौकर पाकों से जिन्हें, चारपारप्य और दण्डपारप से पीडित किया गया हो, विष दन बार का पता लगाये १४॥ दुःखोपहतमन्यप्रसक्तं वा स्त्रीजनं दायानिवृत्तिस्रीजनामि- मन्तारं वा पन्धुम् ।। १५ ।। तदेव हतोद्वन्धस्य परीक्षेत ।।६।। स्वयमुदन्धस या विप्रकारमयुक्त मार्गेत ॥ १७ ॥ " || इ खासे पीड़ित तथा अन्य पुरुषम आसस वीको और इस प्रकार समझन पाले मान्धवको, कि अमुक व्यक्तिके माजानेपर इसको सम्पत्तिका वाय मुझे भास होगा, अथवा इसकी स्त्रिया मेरी भोग्य होजायगी, मृत 'म्पतिके विषयमे पूरा जाय ॥ १५॥ इसी प्रकार मारकर मर जानेवाले विषयम पूछताछ कीजावे ॥ १६॥ यदि कोई व्यक्ति स्वयही फांसी लगाकर मरगया हो, तो उसके विषयमें इस यातका पता लगाया जाय कि इसको क्या भयार कट था जो इसने ऐसा किया ॥ १७ ॥ सर्वेषां वा स्त्रीदायाद्यदोषः कर्मस्पर्धा प्रतिपक्षद्वेषः पण्यसंस समवायो वा विवादपदानामन्यतमद्वा रोपस्थानम् ॥ १८ ॥ रोपनिमित्तो घातः ॥ १९॥ साधारणतया सपही पुरषोंके नोधके निम्नलिखित कारण होते हैं- स्त्री, दायभाग, रामकुरोंमें हुकूमतका सघर्ष, शत्रुके साथ शावता, ज्यापार (एक दूसरेको नुक्सान पहुँचनेका इच्छा), सप, (जब सय किलोकी प्रधानता नष्ट होजाय) साधारण जनताके परस्पर क्रोधके येही आधारभूत विषय है। १८॥ प्रोध; यद' जानेपर ही एक पुरष दूसरे पुरपको मार दालती है ॥१९॥ + खयमादिष्टपुरुपर्वा चोरनिमित्त साश्यादन्यवेरिभिर्वा हत्तस्य पातमासनेम्या परीक्षितः ॥ २० ॥ येनाहुतः । सहखिता - - . ७यिभ्या०]] कण्टकशोधन प्रस्थितोहितभूमिमानीतो बा तमनुयुजीत गीता : जिसमे ओरमघात किया हो, या जिसको किसीने नौकरचाकरोंसे मर. पाया हो, या जिसको चाराने धनकै कारण मार दिया हो, या शत्रुओंने शकस सूरत एकसा होनेसे किसी दूसरे आदर्माके धोखमें किसीको मार दिया हो, इन संय तरहफी मौतोफे विषयमे मृतव्यक्तियोंके समीप रहनेवालोंसे पूछताऊँ की जाय ॥२०॥ जिसने इसको बुलाया, जिसके साथ ठहरा, जिसके साथ गया, जो इसको स्तरोनम साया, उससे आये, ये बास्स हतभूमावासन्नचरास्तानेकैकशः पुनः॥ २२ ॥ केनायमिहानीतो हतो वा ॥ २३ ॥ का सशस्त्रः संग्रहमान 'उद्विनो या युष्माभिदृष्ट इति ॥२४ ॥ते यथा बेयुस्तथानुयुञ्जीत ॥ २५ ॥ और जा पुरुष मृत्युस्थानमें इधर उधर घूमरहे।हो, उन सयको एक २ करके सूखे (४२२॥ इसे यहां कौन लाया था? और किसने इसे मारा है ॥२३॥ कोन आदमी हथियारयन्द अपने आपको छिपाता हुभा, घबड़ाया हुआ, आप लोगोंने इधर आते जाते देखा है ॥ २४॥ वे जैसा कहें, उसी के अनुसार और भी आवश्यक बातों का पता गाये ॥ २५ ॥ -अनाथस्य शरीरस्थमुपभोग परिच्छदम्।। घस्त्रं वे विभूषा या दृष्ट्वा तद्वयवहारिणः ॥२६॥ अनुयुञ्जीत संयोग निवासं वासकारणम् । 'कर्म च व्यवहारं च ततो मार्गणमाचरेत् ॥ २७ ॥ मृतम्यक्तिक शरीरपर धारण किये हुए माला आदि (उपभोग) और छाता जूता आदि (परिच्छस), कपड़े, वैष (जटिल है-सा मुण्डी है, इत्यादि) सथा भलबार भादिको अच्छी तरह देखकर, उनका (माला भादिका) व्यापार करनेघालोसे पूछे कि यह पुरुष रगृतस्यत्ति) किनके साथ मित्रता रखता था, कहां उहता यसत्ता था, अमुक स्पान में यह क्या रहता था, यह क्या काम करता था, और इसका व्यवहार वत्तीय कैसर या, इत्यादित न संभ यातका ठीकर -पतारमा नेपा फिर घातक पुरपका अन्वेषण किया जाये ॥२-२७॥ रज्जुशस्त्रवि पि कामक्रोधवशेना यः ।। , घातयेत्स्वयमात्मानं स्त्री वा-पापेन मोहिता ।।,२८ ।। "जुना राजमार्गमा चण्डालेनापयेत् । - . . 1 [४.अधि. कौटलीय अर्थशास्त्र न श्मशानविधिस्तेपां न संबन्धिक्रियास्तथा ॥ २९ ॥ जो पुरुष काम या ग्रोधके वशीभूत होकर फांसी लगाकर, इमिपारस अथवा विपके द्वारा आरमहत्या करले, या कोई दो पापसे मोहित हुई। आत्महत्या करले, तो चण्डाल उन्हें रस्सीम यांधकर बाजारमें घसीटता हुभा लेजावै । ऐसे व्यक्तियोके दाहादि संस्कार सर्वथा वर्जित है, और न उनके लिये जलाभाल आदि दीजाये ॥ २८-२९ ॥ बन्धुस्तपां तु यः कुर्यात्प्रेतकार्यक्रियाविधिम् । तिद्गति संचरेत्पश्चात्स्वजनाद्वा प्रमुच्यते ॥ ३०॥ जो पान्धव, आत्म घातियाँके दाह भादि सस्कार भोर तर्पण, भादि मियाओंको फरे, यह अपनी मृत्यु के अनन्तर आरम घातियोंकी गतिको प्राप्त होवे अथवा उसे जातिच्युत करदिया जावे ॥३०॥ ... संवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् । 'याजनाध्यापनाद्यौनात्तश्चान्यो ऽपि समाचरन् ॥ ३१ ।। इति कण्टकशोधने चतुर्थे ऽधिकरण आशुमृतकपरीक्षा सप्तमो ऽध्यायः ॥ ७ ॥ आदितश्चतुरशीति ॥४॥ पतित पुरपके साथ यजन अध्ययन और विवाह आदि सम्बन्ध करता हुमा पुरुष, एक पके अन्दर स्वयं पतित होजाता है। फिर उसके साथ उपर्युत अपघहार करनेवाले अन्य पुरष भी एक वर्षमै पतित होते चले जाते है॥३१॥ फण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरण में सातवां अध्याय समाप्त । . . । . 1 - ८३ प्रकरण। आठवां अध्याय। वाक्य कर्मानुयोग। मुपितसंनिधौ वाहानामम्यन्तराणां च साक्षिणामभिशस्तस्स देशजातिगोचनामकर्मसारसहायनिवासाननुयुञ्जीत ॥ १॥ तां- वापदेशैः प्रतिसमानयेत् ॥ २॥ - जितका माल चोरी गया है उसके सामने, तथा अन्य बाहर भीत्ताके पुरुषों के सामने, सानीस, सन्देह (चोरीके सन्देह), में पड़े हुए आदमी के M . - ,,फण्टकशोधत . 1 +- ८ साया nol देश, जाति, गोत्र, नाम, काम, सम्पत्ति, मिन और निवासस्थामके विषयम पूछा जावे ॥१॥ और फिर युक्तिपूर्वक जिरह करके उसकी (जो कुछ साक्षीने कहा हो उसकी) अच्छी तरह आलोचना करे ॥ २॥ ततः पूर्वस्याहः प्रचार रात्री निवासं चाग्रहणादित्यनुयु- श्रीत ।। ३ ।। तस्थापसारप्रतिसंधाने शुद्धः स्यात् ॥४॥ अन्यथा कर्मप्रासः ॥५॥ इसके बाद सन्देहमे पफ हुए आदमीसे, पिउले दिनके कार्य तथा राषिके निवास और जिस समय घर, एकदा गया है, उस समयतकके सय कायोंके सम्पन्ध पूलताछ करे ॥ ३॥ यदि उसके निरपराध होनमें पूरे सबूत मिल जाय, तो उसे छोड़ दिया जाय ॥ ४ ॥ अन्यपा यह अपराधी समझा जावे॥५॥ त्रिरात्रादुर्भगग्र यः शक्त्तिकः पृच्छाभारादन्यत्रोपकरणद- शनात् ॥६॥ अचौरं चोर इत्यभिव्याहरतचोरसमा दण्डः ॥७॥ चोरं प्रच्छादयतश्च ॥८॥ तीन दिन बीत जानेपर सन्दिग्ध (जिसपा चौरी आदिका सन्देह किया गया हो) पुरपको गिरफ्तार न किया जाव । क्याकि फिर चोरीके दिनसे पहिले दिनको यात, विस्मरण हो जानके कारण उससे टोक २ नहीं पड़ी जामकती, परन्तु यदि किसीके चोरीके साधन (सयत) मिलजाय, तो उसे तीन दिन याद भी अवश्य गिरफ्तार किया जासकता ह ॥६॥ जो पुरुष साधको चोर बताये, उसे चोरके समानही दण्ड दिया जाय ॥ ॥ और यही पपई उसे भी दिया जाय जो पौरके छिपानेका यन करे ॥८॥ चौरेणाभिशस्तो वैरद्धेपाभ्यामपदिएकः शुद्धः स्यात् ॥ ९ ॥ शुद्धं परिवासयता पूर्वः साहसदण्डः ॥ १०॥ शङ्कानिष्पन्नमुप- करणमन्त्रिसहायरूपवैय्यावृत्यकरानिष्पादयेत् ॥ ११ ॥ यदि चोर किसी भलेमानसको शत्रुता और पिके कारण पकरया, सधा यह सिद्ध होजाय, सो उसे निरपराध समझा जाये ॥९॥ निरपराधको दण्ड देनेवाले अधिकारीको (प्रदेधा आदिको) प्रथममाहस दण्ड दिया जाये ॥10॥ सन्देहम परे हुए पुरुपसे, चोरी करने के उपाय (साधन), सलाह फार, सहायक, चोरोके माल, भार उसके अपने महनताने के सम्बन्धमे अच्छी सर पूलता करें ॥७॥ कर्मणश्व प्रदेशद्यादानांशविभागः प्रतिसमानपेत् ।।१२।। .
. - कौटलीय अर्थशास्त्र [मधिल एतेषां कारणानामनमिसंघाने विमलपन्तमचोर विद्यात् ॥१॥ और यह भी पूछे, कि चोरी कति समय मकान मौतर किस २ ने प्रवेश किया, क्या २ माल हाथ लगा, तथा किस २ को कितना ३ हिस्सा मिला, तथा इसपर सूय विचार करे ॥२॥जो पुरण, चोरी सिद्ध करनेवाले इन कारणों के ऊपर कुर भी खयाल न करता दुआ, दरस उलटा ५ बोले, 'ग्म चोर न समझा जाय ॥३॥ दृश्यते घचोरो ऽपि चोरमार्गे यदृच्छया ॥१४॥ संनिपाते चोरवपशसभाण्डसामान्येन गृह्यमाणो दृष्टश्चौरमाण्डस्योपवासेन वा यथा हि माण्डव्यः कर्मक्लेशभयादचोरथोरो ऽस्मीति -युवाणः ॥१५॥ क्योकि लोकमे यह देखा गया है कि जो घोर नदी यह मी अचानक घोरीके रास्ते पर जाता हुआ, घोरीके समानही ग्रेप, हथियार भीर-माल अपने पास होने के कारण गिरफ्तार किया जाता हुआ देखा गया है, तथा इसी प्रकार घोरीके मालके पास रहनेसे भी पकहा जाता हुआ देखा गया है। जैसा कि मानुन्य मारके उरसे, अपने आपको चोर न होते हुए भी 'मै चोर हूँ' इस मकार कहता हुमा पका गया । (इसकी कथा महाभारतमें आदि. १५६.10. अध्याय, प. पु. ५,१८,' मार्फ पु० १६, स्वाद पु० भावन्त्यसपवान्तर्गत रेघाखण्ड १७०-१६२, नागरखण्ड १३६-१३८) ॥ १४ १५ ॥ तस्मात्समाप्तकरणं नियमयेत् ॥ १६ ॥ मन्दापराध यालं वृद्ध व्याधितं मत्तमुन्मत् क्षुत्पिपासाघलान्तमत्याशितमात्मका शितं दुर्वलं पान कर्म कारयेत् ॥ १७॥ तुल्यशीलपुंश्चलीमापा. विककथाविकाशभोजनदातृभिरपसर्पयेत् ॥२८॥ एवमतिसंद- ध्यात् ।। १९ ॥ " Tr.. इस रिये इस प्रकारके मामर्शम पूर्व सोच पिचीरकर ही अपराधी को दण्ड दिया जाये ॥१६॥ थोडा अपराध करने वालेको, पालक, बड़े, घीमार, पागल, उन्माद रोगके रोगी, भूरो, तासे, थके हुए, बहुत अधिक भोजन किये हुए, अजीर्णके योगा, और यह होगको शारीरिक दण्ड (कोट आदि मारना) न देवे ॥ १७॥ समान स्वभाव वाली वश्याना; दूतिया, करयकों, सराय भार होटल बालोंके द्वारा सुफिया तौरपर दुष्कर्म करने पालोका पता एगाये ॥ १८॥ पीछे कही हुरीतियोंसेहिधिोखादेव .
४ ८ अध्या] कण्टकशोधन (१३५)" यथा वा निक्षेपापहारे व्याख्यातम् ॥ २०॥ आप्तदोप कर्म कारयेत् ॥ २१॥ न त्वेव स्त्रियं गर्मिणी सूतिका वा मासागर प्रजाताम् ॥ २२ ॥ खियास्त्वर्धकर्म वक्यानुयोगो वा ॥ २३ ॥ अथवा निक्षेपका अपहरण कर लेनेपर उसकी खोजके जो उपाय बताये गये है, उन्हींको कामम लोय ॥ २० ॥ जिसका अपराध निश्चित होजायें, उसी को दण्ड देये ॥२५॥ परन्तु गर्भिणी या एक महीनस कमसी प्रसूता स्त्रीको हर्गिज भण्डन दवे ॥ २२ ॥ उन २ अपराधोम जो दण्ड पुरएक लिये कहा गयाह उससे आधादण्ड स्त्रीको दिया जावे अथवा कैरर याग्दण्ड दिया जाय २१॥ बामणस्य सत्रिपरिग्रहः श्रुतवतस्तपखिनश्च ।। २४ ॥तस्था- तिक्रम उत्तमो दण्डः कर्तुः कारयितुश्च कर्मणा व्यापादनेन च ॥ २५ ॥ व्यावहारिक कर्मचतुष्कम् ॥ २६ ॥ पदण्डाः मत कशा द्वायुपरिनिरन्धावुदकनालिका च ॥ २७ ॥ 17 विद्वान् थाहाण तथा तपरतीको, सिपाहीसे पकडयाकर इधर उधर घुमानेका हा पड दिया जाय ॥ २५ ॥ नो अधिकारी काम करान या मारन के द्वारा, इन उपर्युक्त दण्डक नियमों का उल्हान परे पा कराय, तो उसे उत्तमसाहस एण्ड दिया जाय ॥ २५॥ सर्वत्र लाक व्यवहार में प्रसिदधार प्रकारके दप है -॥२६॥छ उण्टे मारना सा को मारना, हायपर पाकर उपर को उलटा हाका दना, और नमकका पानी नाकमें दालना ॥२७॥ । परं पापकर्मणा नववेत्रलता द्वादशकं द्वापूरी: अष्टौ विंशति- नक्तमाललताद्वात्रिंश चला द्वौ वृश्चिकमन्धायुल्लापने चले सूची- हस्तस यवागूपीतस्यैकपदहनमगुल्याः स्नेहपीतस्य प्रतापनमेक महः शिशिररानो परमजाप्रशय्या चत्यप्टादशक कर्म ॥२८॥ उपयुक्त धारके अतिरिक्त, पापाचरण करो वाले पुरुषोंको निमा लिखित प्रकारोंसे भी दपः दिया जाय-९ हायक सत्र तसे, पारह पैंत एगाना, २ रस्सियोंसे भलइदा र टांगांका लपेना (बह दो प्रकारमा स्टना), परजो की छहीस २० यार आधा कागा, ३२ थप मारना, या हापको पारसको भोरस थीए पैरके साथ यांधना और दोए हारको दाए परके साथ (यह दो प्रकारका एधिक पन्ध), दोनों हाथ आपसमें धर एटका देना और दोनों प्रेर यांधकर एटश देना (पदा प्रकारके यान), हाथ मारपनाम मुई [४ अधिक - कौटलीय अर्थशास्त्र सुमोना, लप्सी पिलाकर पेशाय न करने देना, अगुली का एक पौरुमा जला देना, पो पिलाकर एक दिनतक धूपमें या अग्निके सामने सपाना, जाहोंकी रातमें भीगी हुई साटपर सुराना । इस प्रकार १५ ये और ४ पहिले, कुल मिलकर दण्ड देने के प्रकार है ॥२८॥ तस्योपकरणं प्रमाणं प्रहरणं प्रधारणमवधारणं च खरपट्टा- दागमयेत् ॥ २९ ॥ दिवमान्तरमेकैकं च कर्म कारयेत् ॥३०॥ इस दण्ड कर्मक लिय रस्सी आदि, दण्डे या कोई आदि की एम्बाई, घेत या करजवे को छटी आदि, दण्डनीय पुरपा खस आदि करने, और शरीर के अनुकूल दण्ट आदि निश्चय यरनके विपयनं सरपट्ट (प्रन्यकर्ता का नाम ) के बताये हुए शस्त्रका अध्ययन करना चाहिय ॥ २५ ॥ कठिन शारीरिक श्रम के कार्योंको बीच में एक दिनका अन्तर देकर कापावे ॥ ३० ॥ पूर्वकृतापदान प्रतिज्ञाया अपहरन्तमेकदेशमएद्रव्यं कर्मणा रूपेण वा गृहीतं राजकोशमपस्तृणन्तं कर्मवध्यं वा राजवचना- समस्त व्यस्तमभ्यस्तं वा कर्म कारयेत् ॥ ३१।] पहरू घोरा करने वालेको, प्रतिज्ञा करके वस्तु अपहरण करने वाले को, धुराई हुई या खोइ हुई चीजोंमें स किसी एक चीजके सहित मिले हुए पुरुषको, अथवा चोरी करत हुए और माल लेनारो हुए पकडे जाने बारे पुरुष को राजाको सम्पत्ति हडप करन वाले, तथा हत्या आदि महाअपराध करने वाले पुरुषको, राजाको आज्ञानुसार, एक साय अलहदा २ अथवा कमसे भाजी धन कठिन समका दण्ड दिया माये ॥३१॥ 3 सर्वापराधेवपीडनीयो ब्राह्मणः ।। ३२ ॥ तस्यामिशस्ताको ललाटे स्यावयवहारपतनाय ॥ ३३ ॥स्तेये श्वा ॥३४ ॥ मनु- प्यवधे कान्धः ॥ ३५ ॥ गुरुतल्पे भगम् ॥३६ ।। सुरापाने मद्यध्यजः ॥ ३७॥ माझणको किसा भरथम भी मयुदण्ड या साहन दण्ट न दिया जाधे ॥ ३१॥ प्रयुत भिड ३ अपराधा अनुसार उसके मस्तक पर चिन्द लगा दिया सादे, जिसस कि यह जातीय व्यवहाराम पतित समझा जाय ॥ ३३ ॥ चोरी करनपर कुत्तका चिन्ह, १३५॥ मनुष्य हत्या करनपर फवम्य (मनुष्यके भ) का चिन्ह ॥ ३५ ॥ गुरु पयाके साथ पापाचरण करने पर भग (योनि का चिन्द), ॥ २६ ॥ सुरापान फरन पर पाराबकी झण्डी का चिन्ह कर दिया जाये ॥३॥ ܐ ܚ ryar ९ अध्या०] कण्टकशोधन (१३) त्रालयं पापकर्माणमुद्धप्याङ्ककृतव्रणम् । कुर्यानिर्विषयं राजा वासयेदाकरेषु वा ॥ ३८॥ इति कण्टकशोधो चतुर्थे ऽधिकरणे वाक्यकर्मानुयोग अटमो ऽध्याय ॥८॥ आदित पचाशीति ॥ ८५॥ पापी माखणके माथे पर उपयुक्त चिन्ह लगाकर, भार सम्पूर्ण जनतामें इस पातकी घोषणा करके, राजा उस अपन देशसे निकार देवे । भश्या खानों म रहनेक लिये आज्ञा देदेवे ॥ ३८॥ काटकशोधन चतुर्थ अधिकरणमें भाठा अध्याय समाप्त। नौवां अध्याय - ८४ प्रकरण सब अधिकारी तथा उनके स्थानों की देखभाल । समाहर्तृप्रदेष्टारः पूर्वमध्यक्षाणामध्यक्षपुरुषाणां च नियमन कुर्युः ॥ १ ॥ सनिसारकर्मान्तेभ्यः सारं रन वापहरतः शुद्धवधः ॥ २ ॥ फल्गुद्रव्यकर्मान्तेभ्यः फल्गुद्रव्यमुपस्कर वा पूर्वः साहस दण्डः ॥३॥ समाहा और प्रदेष्टा पहिले अध्यक्ष भार उनके सहकारी पुरयोंकी नियुक्ति करें ॥१॥ भो कर्मचारी खान आदिसे बहुमूल्य रस आदि तथा चन्दन अगर आदि के कारखानोंसे चन्दन भादिको चुराब, उन्हें प्राण दण्ड दिया जाये ॥२॥ जो पुरुष कपास या साधारण लकड़ी आदि के कारखानों से सारहीन वस्तु का अपहरण करें, तो उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ३॥ पण्यभूमिभ्यो वा राजपण्यं माषमूल्यादूर्वमापादमूल्यादित्य- द्वादशरगो दण्ड', आद्विपादमूल्यादिवि चतुर्विशतिपणः जीरा भगवायन आदिके राजकीय खेतास जो कर्मचारी,एक माप कीमत से लगाकर ४ माप कीमत तक्की इन चीजाको चुराये, उसे १२ पण दगदिया और उसके भाग (८ माप) तक कामतको यस्तु घुरानपर ४ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४॥ आत्रिपादमूल्यादिति पनिशरपणः ॥५॥ आपणमूल्या जाय, [४ अधिक . (१३८) कौटलीय अर्थशास्त्र दित्यष्टचत्वारिंशत्पणः । ६ ॥ आदिपणमूल्यादिति पूर्वः साहस- दण्डः ॥ ७॥.आचतुष्पणमूल्यादिति मध्यमः ॥८॥ आष्टपण- मूल्यादित्युत्तमः ॥ ९॥ आदशपणमूल्यादिति वधः ॥ १० ॥ पण (१२ माप) तककी पुरानेपर ३६ पण दण्ड, ॥ ५॥ और पूरे एक पण (१६ माप) तककी पुराने पर ४८ पण दण्ड दिया जाय ॥६ ॥ इस. के आगे दो पण मूल्यतककी चुराने पर प्रथम साहस दण्ड ॥ ७८ ॥ चार पग मूल्य तककी चुराने पर मध्यम साहस दण्ट ॥ ८॥ आठ पण मूल्पतक की चुराने पर उत्तम साहस दः ॥ ९॥ तण दश पण मूल्य तकनी चुराने पर प्राण दण्ड दिया जाय ॥1॥ कोठपण्यकुप्यायुधागारेभ्यः कुप्यभाण्डोपस्करापहारेष्वर्धमू- ल्येष्वेत एव दण्डाः ।। ११ । कोशभाण्डागाराक्षशालाभ्यश्चतु- र्भागमूल्येष्वेत एव द्विगुणा दण्डाः ॥ १२ ॥ गोदाम, दुकान सोये लोहे आदिके कारखाने तया शस्त्रागारमें से जो कर्मचारी भाध माप कीमतसे लगाकर दो माप कीमत तकी ताये आदि धातुओं, उनसे बनी हुई चीजों तथा छोजन आदिका अपहरण करे, उसको भी उपर्युक्त १२ पण आदि दण्ड दिये जाय ॥11॥कोश, माण्डागार और अक्ष- शालासे माप ( काकणी) मूल्यसे लगाकर माप मूल्य तककी परतु चुरानेपर, उपयुक्त पे ही द्विगुण अर्थात् २४ पण आदि दण्ड दिये जाय॥१२॥ चोराणामभिप्रधर्षण चित्रो घात इति राजपरिग्रहेषु व्याख्या- तम् ॥ १३ ॥ बाह्येषु तु प्रच्छन्नमहनि क्षेत्रखलवेश्मापणेभ्यः कुप्यमाण्डमुपस्करं या मापमूल्यामापादमूल्यादित्यपहरतस्त्रि- पणो दण्डः ॥ १४ ॥ जो राजकर्मचारी, दस्तुभी का स्थय अपहरण करके धोरों के द्वारा सुराये जानेका बहामा कर, उन्द कार पूर्वक माण दण्ड दिया जाय, इस बात को राम. परिपाद प्रकरणम कहा जाबुका है । 1 राजकीय क्षेत्र आदिसा भातरित, जनताके वता, करयाणों, घरों, और दूकानों में से पदि एफमाप मूल्यसे लगा। कर चारमाप मूल्य तककी कुप्प, भाण्ड आदि वस्तुओंकी दिनही धोरी होजचे सो पुराने पालको ३ पण दण्ड दिया जाप ! अथवा उसकी देहपर अच्छी सरह गोवर लपेट कर, दिदोरा पीटते उसे सारे शहरमं घुमाया जाय ॥१४॥ आतिपादमूल्यादिति पदपणः ॥ १५.॥ गोमयभस्मना वा 4 :- - । ६ अध्या फिण्टकशोधन : अलिप्याययोपणम् ॥१६॥ आत्रिपापमूल्यांदिति नपणः॥१७॥ -गोमयमस्मना वा प्रलिप्यावघोषणम् ॥ १८ ॥ शरावमेखलया या ।। १९ ॥ पण (८ माप) तक कीमतको वस्तु चुरानेपर ६ पण दण्ड दिया जाय ....५ ॥ अथवा गोबरकी राखसे उसका सारा शरीर लपेटकर (काला करके) दिरा पीटते हुए सारे शहरमें घुमाया जाय,॥ १६॥ पण (१२ माप मूल्य तककी पस्तु पुरानेपर ९ पण वाट दिया जाय, 11७ ॥ अथवा. गोवरकी राख- से काला शरीर करके दिढोरेके साथ शहरमें घुमानाaan या एक रस्सी शंकोरा (कटोरेकी शकल का महीका छोटासा पात्र) पिरोकर, उसे पोरकी कमर अथवा गलेमें लटकाकर, चौरको विदास पीटते हुए शहरमें घुमाया जाय ॥१९॥ आपणमूल्यादिति द्वादशपणः ॥ २० ॥ मुण्डनं प्रबाजन या'। '२१ ॥ आद्विपणमूल्यादिति चतुर्विशतिपणः ॥ २२ ॥ मुण्डनमिष्टकाशकलेन प्रधाजनं वा ॥ २३ ॥ आचतुप्पणमूल्या- दिति पत्रिंशत्पणः ॥ २४ ॥ पण (१६ माप) मूल्य तककी वस्तु चुरानेपर २ पण दर दिया जाय ॥ २० ॥ अथवा उसका सिर मुंडकर देशसे बाहर कर दिया जाय ॥२॥ २ पण कीमत तककी यस्तु चुरानेपर २४ पण दण्ड दिया जाय ॥ २२ ॥ अपरा सिर मुंडवाकर रोड़ों के साथ देशसे निकाल दिया जाय ॥ २३ ॥ चारपण कीमत तकको यस्तु चुरानेपर ३६ पण दण्ड दिया जाय ॥ २५ ॥ आपञ्चपणमूल्यादित्यष्टचत्वारिंशत्पणः ॥ २५ ॥ आदशप- णमूल्यादिति पूर्वः साहसदण्डः ॥ २६ ॥ आविंशतिपर्णमूल्या- दिति द्विशतः ॥ २७ ॥आत्रिंशत्पणमूल्यादिति पाशतः ॥२८॥ ओचत्वारिंशत्पणमूल्यादिति सहस्रः ॥ २९ ॥ आपश्चाशत्रण- मूल्यादिति वधः ॥ ३०॥ ५ फ्ण कीमत तकफी पस्नुके लिए ४८ पण दण्ड ॥ २५॥ ' कीमत तक प्रथम सास ॥ २६॥ २० पण तकके लिये २.. पण एण्ड "२०५३० एण तकके लिये ५.. पण दण्ड ॥२८॥४. पण तकके लिये १००० पण दण्ड, ॥२९॥ और ५० पर मूल्य सम्मी पस्नु पुरानेपर प्राग : दिया जाय ॥२०॥ १. पण - [४ अधिक ३ (१४०)) फौटलीय अर्थशास्त्र 1 प्रसय दिवा रानी पान्तर्याममेव हरतो ऽर्धमूल्यवेत एवं द्विगुणा दण्डाः ॥ ३१ ॥ प्रसह्य दिवा रात्री वा सशसस्थापह- स्तचतुर्भागमूल्येपेत एच दण्डाः ॥ ३२ ॥ दिन अथया रातमें रक्षा की जाती हुई वस्तुको यराकार अपहरण करनेपर, ३ माप मूल्यकी वस्तुओंसे लेकर • माप मूल्य तकको चोरीम पूर्वोक्त पणसे दुगना) अर्थात् ६ पण लादि दण्ड दिया जाय ॥३॥ यदि पलात्कार अपहरण करने पाला पुरुष हथियार मन्द हो, सो माप (काकणी) मूख्यकी वस्तु घुरानपर ही ६ पण दण्ड दिया जाय ॥ ३२ ॥ कुटुम्माध्यक्षमुख्यस्वामिनां कूटशासनमुद्राकर्मसु पूर्वमध्यमो- त्तमपधा दण्डाः ॥३३ ॥ यथापराधं वा ॥ ३४ ॥ धर्मस्यश्चेद्वि- बदमानं पुरुष तर्जयति भर्सयत्यपसारयत्यभिग्रसते वा पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् ॥ ३५ ॥ यदि कुटुम्धी (साधारण प्रजाजन) नाली कागज या मुहर आदि बनाये तो उस प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ३३ ॥ अध्यक्ष (सुवर्णाध्यक्ष आदि) सा काम करे, ता उसे ममम साहस दण्ड, गायका मुखिया करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड और समाहत्ता करे तो उसे प्राण दण्ड दिया जाय ॥३३॥ भधवा अपराध अनुसार उचित दण्ड दिया जाप ३४॥ धर्मस्य (माया धाश), यदि अदालत में मुकदमा पेश करते हुए या अभियोगके सम्बन्धमें कुछ कहते हुए पुरुषको, भगुरा दिपाकर डराता है, या धमकाता पुष्कता है, या बाहर निकलश देता है, या उससे रिश्वत लेटता है, तो उसे (धर्मस्थको) प्रथम साहसद दिया जाच ॥ ३५ ॥ वाक्पारुष्ये द्विगुणम् ॥ ३६॥ पृच्छयं न पृच्छत्यपृच्छचं पृच्छति पृप्या वा विसृजति शिक्षयति स्मारयति पूर्व ददाति वेति मध्यममस्मै साहसदण्डं कुर्यात् ॥ ३७ ॥ यदि विधाद करते हुप पुरपके प्रति धर्मस्थ कठोर वाक्याका प्रयोग कर (अधात् गाली गलाच देये), तो पूर्वोक्तसे दुगना दण्ड दिया जाय ॥३६॥ और पूछने योग्य पातोंमें साक्षीसे कुछ नहीं पूछता, न पूछने योग्य बाताको पूस्ता है, पा कर (दिनाही उत्तरलिये) छोर देता है, गवाही देते समय गवाहको सिखाता है, या उसे याद दिलपाता है, या साक्षीके द्वारा आधी ९ अध्या - कण्टकशोधन कही हुई शातको अपनी ओर से पूरी कर देता है। इस प्रकार व्यवहार करने वाले धर्मस्थ को मध्यम साहस पद दिया जाय ॥ ३० ॥ देयं देशं न पृच्छत्यदेयं देशं पृच्छति कार्यमदेशेनातिया- हयति छलेनातिहरति कालहरणेन प्रान्तमपंवाहयति मार्गापन्नं शाक्यमुत्क्रमयति मतिसाहाय्यं साक्षिभ्यो ददाति तारिवानुशिष्टं कार्य पुनरपि गृह्णाति उत्तममस्मै साहसदण्डं कुर्यात् ॥ ३८ ॥ विचारणीय वस्तु के लिये अत्युपयोगी साक्षीसे तो कुछ नही पता और अनुपयुक्त साशीसे पूछता है, बिनाही साक्षीके किसी झागडेका निपटारा कर देता है, सस्पनादी साक्षीको भी कपटपूर्ण पाग्यांस अपराधी बना देता है, व्यर्थ समय बितानेसे साक्षीको धक का हटा देता है, साक्षीके फ्रमपूर्वक वाक्योंको भी उलटपुलट कहता है, साक्षियोंको यौच.२ म सहायता देता है, विचारपूर्वक निर्शित यासको फिर विचार करने के लिये उपस्थित करता है, ऐसे न्यायाधीश को उत्तमसाहस दण्ड दिया जाये ॥३८॥ 1. पुनरपराधे द्विगुणं स्थानान्यपरोहणं च ।। ३९ ।। लेखक- थेदुक्तं न लिखत्यनुक्तं लिखति दुरुक्तमुपलिसति सूक्तमुल्लिसत्य- र्थोत्पत्ति विकल्पयतीति पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् ॥ ४० ॥ यथापराध वा ॥४१॥ दुमा यही अपराध करनेपर दुगना पड़ दिया जाये, और पदप्युन पर दिया जाये ॥ ३९ ॥ लेखक (मुहरिर) यदि कही हुई सातको मही लिखता, न कहीं ई को लिख ऐता है, बुरी तरह कही हुई को अरष्टी नाह करके लिख ऐता है, और अपनी तरह कही हुई को पुरी नाह करके लिखता है, या यातके सारपर्यको पदस देता ह, उसे प्रथमसाहस दण्ड दिया जाय ॥४०॥ अथवा अपराधके अनुसार उचित दण्ड दिया जाये ॥१॥ धर्मस्थः प्रदेष्टा का हैरण्यमदण्ट्यं लिपति क्षेपद्विगुणमस्मै दण्डं कुर्यात् ॥ ४२ ॥ हीनातिरिक्ताटगुणं वा शरीरदण्डं क्षिपत्ति शारीरमेव दण्डं भजेत !॥ ४३ ॥ निष्क्रयद्विगुणं चा।। ४४।। धर्मस्थ भयका प्रदेश यदि किसी निरपराधीको मुवर्ण दण्ड देखे, तो उससे दुगना दण्ड इनको (धर्मस्थ और प्रदेष्टाको) दिया जाये ॥४२॥ यदि इपित दण्डसे कम या अधिक दाद अपराधीको देये, तो उन्हें दिये दुम (कम पा मधिक) पका माटगुना दश दिया जाये। और शारीरिक ए नेपा + (१२) कौटलीय अर्थशास्त्र ४ मधिः तमको भी यही शारीरिक दण्ड दिया जावे ॥५॥ यदि उस शारीरिक बदले में कोई धनदण्ड देदे, तो उसका दुगना दल (धर्मस्थ भादिको) होना चाहिये॥४॥ यं या भूतमर्थ नाशयत्यभूतमर्थ करोति तदष्टगुणं दण्डं दद्यात् ।। ४५॥ धर्मस्थीयाचारकान्निस्सारयतो बन्धनागाराच्छ- । यासनभोजनाचारसंचार रोधबन्धनेषु विपणोत्तरा दण्डाः कर्तुः | कारयितुश्च ॥ ४६॥ न्याय्य (उचित) अर्थको (धनको) नाश करने, और अन्याय्यको संग्रह करनेपर, उस (नष्ट या संगृहीत) धन राशिम आठ गुना दण्ड दिया जाय ॥ ५५ ॥ धर्मस्थके द्वारा निर्दिष्ट की हुई हयालाससे पदि कोई (निरीक्षक राज- पुरुष) घूम रेकर अपराधीको पाहर निकलनेकी माना (धूपने फिरने के लिये दे, या जल अथवा हवालात में सोने, यहने, खानपान और मलमूत्र त्यागका प्रयन्ध करे, या कराव, तो उसे उत्तरीसर ३ पण अधिक दण्ड दिया जाये॥ १६ ॥ चारकादभियुक्तं मुञ्चतो निष्पातयतो वा मध्यमः साहसद- ण्डो अभियोगदान च॥ ४७ ॥बन्धनागारात्सर्वस्व वधथ ॥४८॥ बन्धनागाराध्यक्षस्य संरुद्धकमनाख्याय चारयतश्चतुर्विशतिपणो दण्डः ॥ ४९ ॥ कर्म कारयतो द्विगुणः ॥ ५० ॥ यदि कोई राजपुरुष किसी अपराधीको यन्धनागार (हवालात) से लोड़ देवे, अथवा चरे जाने के लिये प्रेरणा कर, तो उमे मध्यमसाहस दण्ड दिया जाय । और उस अपराधीने जितना देना था, वह भी उसको अदा करना पढे ॥ ४ ॥ यदि कोई प्रदेष्टाके अन्धनागार (जलपाने) में किसी अपराधी छोड देवे, तो उसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति जब्त करली जाय, और उसे प्राण इण्ड देदिया जावे ॥ ४० ॥ कैदीको जेलरकी विना आज्ञा बाहर घुमानेमें २४ पण दण्ड ॥४९५ और यह काम करवाने वाले व्यक्तिको दुगना अर्थात् ४८ पण दण्ड दिया जावे ॥५०॥ स्थानान्यत्वं गमयतो ऽनपान वा रुन्धतः पण्णयतिर्दण्डः ॥५१॥ परिलेशयत उत्कोटयतो वा-मध्यमः साहसदण्डः ॥५२॥ प्रतः साहसः ॥ ५३ ॥ परिगृहीतां दासीमारितिका चा संरुद्धिकामधिचरतः पूर्वः साहसदण्ड. ।। ५४ ।। गदि फैदीकी जगह पदले, या उसके खानेपीने में रफायट साले, तो उसे ५६ पण दण्ड ॥ ५ ॥ और उसको कोई भादि मारकर दुख देवे, याशित १ अध्या०] कण्टकशोधन दिलयाचे तो उसे मध्यमसाहस दण्ड दिया माय ॥ ५२ ॥ कैदीका वध कर देनेपर १००. पण दण्ड दिया जाय ॥ ५३ ॥ खरीदी हुई या गिरवी रखती हुई दासी यदि किसी अपराधकै कारण कैद होजाये, उसके साथ जेलम दुराचार कानेपर (करनेवाले राजपुरषको ) प्रथम पाइस दण्ड दिया जाये॥ ५४॥ चोरडामरिकभार्या मध्यमः ।। ५५ । संसद्धिकामार्यामुत्तमः ।। ५६ ॥ संरुद्धस्य वा तव घातः ।। ५७ ॥ तदेवाक्षणगृहीता.. यामार्यायां विद्यात् ।। ५८ ॥ घोर और दामरिक (अकस्मात् नष्ट हुआ २ पुरप) की भार्या के साथ ऐसा करनेपर मध्यमसाहस दण्ड दिया जाय ॥ ५५ ।। कैन हुई २ कुलीन स्वी (आय) के साथ ऐसा करनेपर उत्तमसाहस पड दिया जाय ॥ ५६ ॥ यदि जेलम ही कोई कैदी ऐसा दुराचार करे, तो उसे प्राण दण्ड दिया जाय ॥५७।। भध्यक्ष (सुवर्णाध्यक्ष आदि) यदि फुलीन नीके साथ ऐसा करे तो उसे भी माण दण्ड विपर जाय ॥५॥ दास्यां पूर्वः साहसदण्डः ॥ ५९ ।। चारकमभित्वा निष्पा- तयतो मध्यमः ।। ६० ॥ भित्वावधः ॥ ६१॥ वन्धनारामात्स- वसं बधश्च ।। ६२॥ दासी के साथ ऐसा करनेपर प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ५९॥ धर्मस्थके पन्धनागार (धारक) को मिनाही सोडे, यदि कैदीको कोई बाहर निकाल देवे, तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ३०॥ यदि तोडर निकाले तो माण दण्ड ॥ ६॥ यदि प्रदेष्टाके जेलखाने,से निकाले तो उसकी मारी जायदाद जन्त करके प्राण दण्ड दिया जाय ॥ १२॥ एवमर्थचरान्पूर्व राजा दण्डेन शोधयेत् । शोधयेयुश्च शुद्धार्थैः पौरजानपदान्दमः ॥ ६३ ॥ इति कण्ठशोधने चतुर्थेधिकरणे सर्वाधिकरणाक्षण नबमोपाय ॥९॥ आदित पडशीहि ॥८॥ रामा इस प्रकार पहिले अपने कर्मचारियोंको दण्डके द्वारा ठीक मार्ग पर पलाये। फिर नियमानुसार व्यवहार करनेवाले राजकीय कर्मचारी दण्डके द्वारा नगर या प्रान्त में रहनेवाली सम्पूर्ण प्रजाको डीक २ रास्तेपर ला॥६३ ॥ कष्टकशोधन चतुर्थ अधिकरणमै नौवा अध्याय समाप्त ।
(१५८) .[४ मधि० कौटलीय अर्थशास्त्र दसवां अध्याय । ८५ प्रकरण। एकागवध और उसका निष्क्रय । तीर्थघातग्रन्थिभेदोर्घकराणां प्रथमे ऽपराधे संदंशच्छेदनं चतुष्पञ्चाशत्पणो वा दण्डः ॥ १ ॥ द्वितीये छेदनं पणस्य शत्यो दण्डः ॥२॥ T तीर्थोपर वस्त्र आदि चुरानेवाले (उठाईगीर, उयके), गंठकटे, आर एत फोडनेवाले पुरपाका अगृठा और कनी (फनिष्टिका) भगुली कटवादी जाये, भथपा ५४ पण दण्ड दिया जाय । (भगुलीच्छेदनका ५४ पण निजय है, भीत् यातो अगुली काटी जावे, या उसके पदरमे ५४ पण दा दिया माय, इसी तरह भागे भी सब जगह समझना चाहिये।) ॥॥ दूसरीयार फिर अपराध करने पर सत्र अगुली काटदी जावे, अथवा १०० पण दण्ड दिया जाये॥२॥ तृतीये दक्षिणहस्तवधश्चतुःशतो या दण्डः ।। ३ ।। चतुर्थे यथाकामी वधः॥ ४॥पञ्चविंशतिपणावरेपु कुक्कुटनकुलमार्जार- श्वसकरस्तेयेषु हिंसायां वा चतुष्पश्चाशत्पणो दण्डः ॥ ५ ॥ नासाग्रच्छेदनं वा ।। ६ ॥ चण्डालारण्यचराणामर्घदण्डाः ॥७॥ तीसरीवार अपराध करनेपर दहिमा हाय काट दिया जाये, अथवा ५०. पण दण्ट दिया जाय ॥ ३ ॥ ची धार फिर अपराध करनेपर इच्छा- नुसार (शुद्ध या चित्र) प्राण दण्ड दिया जाये ॥ ४ ॥२५ पणसे कम कीमत गुगें, नकुल, बिलाय, कुत्ते और सूभर घुरालेने तथा मार देनेपर ५४ पण दण्ड देना चाहिये, अथवा उसकी नाकका अगला हिस्सा काट देना चाहिये ॥५६॥ यदि मुर्गे भादि किसी घण्डारके हों, अथवा जगली हों, तो उप. थुक दण्डसे आधा दण्ड दिया जावे ॥७॥ पाराजाललूटापपातेप बद्धानां मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्याना- मादाने तच्च तावच दण्डः ।। ८ ।। मृगद्रव्यवनान्मृगद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः ॥९|| निम्नविहारमृगपक्षिस्तेये हिंसायां वा द्विगुणो दण्डः ॥ १० ॥ फदा, जाल भार गो खोदकर उनपर घासफूस आदि बिछाकर उनके द्वारा पकड़े जाने वाले, राजकीय रुग, अन्य पशु, पक्षी, हिंसजीव और मा
10
१४ मध्य
कण्टकशोधन
लियाँको जो लेने पकडे वह उनकी कीमत मेरे और उतनाही दण्ड दे । ८ ॥
सुरक्षित जगलके जानवरोंको तमा लकडी भादिको जो चुरावे उसे 16 पण
दण्ड दिया जावे ॥५॥ विचित्र रंगकी सुन्दर चिडियाओं, घरके सुन्दर हरिणों और
तोते आदि पक्षियोंको जो चुरावे, या मारडाल उसे २०० पण दण्ड दिया
जावे ॥१॥
कारुशिल्पिकुशीलवतपखिना क्षुद्रकद्रव्यापहारे शत्यो दण्ड:
॥ ११॥ स्थूलकद्रव्यापहार द्विशतः ॥ १२ ॥ कृषिद्रव्यापहारे
चं ॥१६॥
यी आदि मोटा काम करने पारों, होशियार कारीगरौ, कस्को और
तपस्वियोंकी कोई छोटी वस्तु चुरानेपर चारको १०० पट दण्ड दिया जाय 1
और यही चीजें पुराने पर २०० पण ॥ १२ ॥ खेती करनेके साधन हल आदि
चुरानपर भी २०० पपा दण्ड देना चाहिए ॥ १३ ॥
दुर्गमकृतप्रवेशस्य प्रविशतः प्राकारच्छिद्राद्वा निक्षेपं गृही-
त्वापसरतः कन्धरावधो द्विशतो या दण्डः ॥ १४ ॥
जिसको किले में घुसने का अधिकार नहीं है यदि यह पहा प्रवेश करे
अथवा परकोटे की दीवार तोडकर माल लकर भाग, उसके परके पीछेको दो
मुख्य नसे पटवादी जाये, अथवा २०० पण दण्ड दिया जाये ॥१४॥
चक्रयुक्तं नावं क्षुद्रपशुं वापहरत एकपादवधः त्रिशतो या
दण्डः ॥ १५ ॥ कटकाकण्यक्षारालाशलाकाहस्तविषमकारिण
एकहस्तवधयतुःशतो वा दण्डः ॥ १६ ॥
घायुक्त (धन शास्त्र अथवा यन्न विशेपसे युक्त) नायको, या छोटेसे।
पशुको जो धुरांव, उसका एकपर काट दिया जावे, अधया ३०. पण दण्ड
दिया जाये ॥ १५ ॥ जाली कोडा, पासे, भरला (चमद्देकी पनी हुई चौकड़ी):
और शलाका (ये सब चीजें जुआ खेलने में काम आती हैं, पूत समाय
अध्याय देखो)यनाने वाले, राया अन्य हायकी बुराई करने वाले पुरुषका एव
हाभ काट दिया जाये, अथवा ४०. पण दण्ड दिया जाये ॥ १६ ॥
स्तेनपारदारिकयोः साचिव्यकर्मणि स्त्रियाः संगृहीतायाश्च
कर्णनासाच्छेदनं पञ्चशतो वा दण्डः ॥ १७ ॥ पुंसो द्विगुणः-
• ॥ १८॥ महापशुमेकं दासं दासी वापहरतः प्रेतभाण्ड वा वि-
क्रीणानस्य द्विपादयधः पदछतो वा दण्डः ॥ १९ ॥
[५ मधिल , कौटलीय अर्थशास्त्र घोर भौर प्यभिचारियोंके तपनेका काम करनेवाली बिपोंके कान नाक काट लिये जावें, अथवा ५०. पण एण्ड दिया जाय ॥ 10 यदि पुरष ऐसा करे तो उसे दुगना अर्थात् १००० पण दण्ड दिया जाप ॥ १८॥ गाय मंस आदि पदे पशुको, एक दास पा दासीको जो धुरा, अथवा गुर्देके घर भादिको(मृतभाण्ड) बेचे, उसके दोनों पैर काट दिये जाय, अथवा ६०० पण दण्ड दिया जाय ॥१९॥ वर्णोत्तमानां,गुरूणां च हस्तपादलहने राजयानचाहनाधा- रोहणे चैकहस्तपादवधः सप्तशतो वा दण्डः ॥ २० ॥ शूद्रस्य- प्राह्मणवादिनो देवद्रव्यमवस्तुणतो राजद्विष्टमादिशतो द्विनेत्री- दिनच योगाञ्जनेनान्यत्वमटशतो वा दण्डः ।। २१ ।। भपनेसे उत्तम वर्गके किसी व्यक्तिको तया गुरुजनोंको जो हाथपैर मादिसे मारे, भएका राजाकी सवारी या छोटे आदिपर पड़े, उसका एक हाथ और एक पर काट दिया जाये, अथवा ७.. पण दण्ड दिया जाय ॥२०॥ जो शूद अपने भापको मादाण पतलाये, और देवताके उद्देश्य से दिये हुए दम्पका अपहरण करे, तया जो भविष्यमें राजाके अनिष्टको (ज्योतिषी बनकर) बनाये अथवा यगावत करे, या किसीकी दोनों आखें फोड देवे, ऐसे व्यक्ति को औपधियाँका सुरमा लगाकर अग्धा करदिया सावे, अथवा उसे ८०. पण दण्ड दिया जाय ॥२॥ चौरं पारदारिकं या मोक्षयतो राजशासनमूनमतिरिक्तं या लिखतः कन्यां दासी या सहिरण्यमपहरतः कूटव्यवहारिणो विमांसविक्रायिणश्च वामहस्तद्विपादयधो नवशतो वा दण्डः ॥२२॥ घोर या विभचारीको होड देनेवाले, राजाकी भाशाको फम या अधिक करके लिखनेवाले, कन्या या दासीको आभूषण भादिके सहित पुरानेवाले, घरकपटकर म्यवहार करनेवाले, अमक्ष्य पशुओका मांस येचनेवाले पुरुषका बायो हाय और दोनों पैर काट दिये जावें, अथवा १०० पण दण्ड दिया जावे ॥ २२॥ मानुपमांसविक्रये वधः ॥ २३ ॥ देवपशुप्रतिमामनुष्यक्षेत्र- गृहहिरण्यसुवर्णरशसस्थापहारिण उत्तमोदंण्डः शुद्धबधो वा ।।२।। आदीका मांस बेचनेम माण दण्ड दिया जाय ॥ २३ ॥ देव सम्बन्धी पश, प्रतिमा, मनुष्य, खेत, पर, हिरण्य, मुवर्ण रस और भन्न इन नौवस्तुभी
११ अभ्या०] कण्टकशोधन
(१७)
को जो व्यक्ति धुराये, उसे उसमसाहस दुपा दिया जाय, अथवा उसको यिना
किती भन्य केशके प्राणदण्ड दिया जाय ॥ २४ ॥
पुरुष चापराधं च कारणं गुरुलाघवम् ।
अनुबन्धं तदात्वं च देशकालौ समीक्ष्य च ॥ २५ ॥
उत्तमावरमध्यत्वं प्रदेष्टा दण्डकमणि ।
राज्ञा प्रकृतीनां च कल्पयेदन्तरास्थितः ॥ २६ ॥
इति कण्टक शोधने चतुर्थे ऽधिकरणे एकालवधानिकयो दशमो ऽण्याप ॥१०॥
भादित सप्ताशीति ॥७॥
प्रदेष्टाको चाहिये कि पह, राजा और अमात्योंके मध्यम रहता हुआ,
पण्ड देके समय में पुरुषको उसके अपराधको अपराधके कारणोंको, भादमीकी
छोटी बदी हेमियनको, भविष्य में तथा उस समय में होनेवाले परिणामको,
देश और कालको अरठी सरह सोचविचार लेवे । फिर उत्तम, प्रथम तथा
मध्यमसाइस भादि दण्डोंको न्यानानुसार देवे ॥ २५२६॥
फण्टफशोधन चतुर्थ अधिकरणमें दसवां अध्याय समाप्त ।
ग्यारहवां अध्याय।
८६प्रकरण।
शुद्ध और चित्र दण्ड ।
कलहे प्रतः पुरुष चित्रो पातः॥१॥ सप्तरानसान्तम॒ते
शुद्धवधः ॥२॥ पक्षस्यान्तरुत्तमः ॥३॥ मासस्यान्तः पञ्चशतः
समुत्थानव्ययश्च ॥४॥
लाई झगरेमें जो पुरप दूसरे भादमीको जानसे मारदे, उसको
कधपूर्वक प्राण दण्ड दिया जाय । (अर्थात् उसे दुख दे २ कर मारा जाय,
यह चिनवध कशाता है, जिस धधक पूर्व कोई अन्य कर न दिया जाय उसे शुद्ध
पध कहते है)॥१॥ झगड़ेम मारते ३ यदि इसनी चोट पहुचाये कि यह
पुरुप सात दिनतक मरजाये, तो मारनेवारे को शुद्ध प्राण दण्ड दिया जाये ॥२॥
पदि ५दिनके बाद मरे तो उत्तमसाहस एण्ड दिया जाय ॥३॥ एक महानके
पाद मरे, तो ५०० पण दण्ड, और उसकी चिकित्सा आदिका सम्पूर्ण व्यय
देवे॥॥
शस्त्रेण प्रहात उत्तमो दण्डः ॥ ५॥ मदेन इस्तवधः ॥६॥
। , । १४८) कौटलीय अर्थशास्त्र [अधि० मोहेन द्विशतः ॥७॥ वधे यधः ॥ ८॥प्रहारेण गर्भ पातयत उत्तमो दण्डः ॥९॥ मैपज्येन मध्यमः ॥ १० ॥ परिलेशन पूर्वः साहसदण्डः ॥ ११ ॥ "यदि हथियारसे प्रहार करे, तो उत्तम साइस दण्ड दिया जावे ॥५॥ यदि अपने यलके घमपडसे प्रहार करे, तो हाय काट दिया जाये ॥६॥ मोधके कारण प्रहार करे तो उसे २०० पण दण्ड दिया जाय ॥ ७॥ जानसे मार देनेपर हत्यारेको प्राण दश दिया जाय ॥ ८ ॥ चोट लगाकर गर्म गिराने माले, पुरपको उत्तमसाहस दण्ड दिया जाय ॥९॥ श्रीपधिके द्वारा गर्म गिरानेपर मध्यमसाइस दण्ड ॥ १०॥ भोर कठोर काम करानेके द्वारा गर्म गिराने पर प्रथमसाहस दण्ड दिया जाय ॥1॥ प्रसभनीपुरुषघातकाधीसारकनिग्राहकाबपोपकावस्यन्दकोप- वेधकान्पथि वेश्मप्ररोधकाबाजहस्त्यश्वस्थानां हिंसकान्स्तेनान्वा शूलानारोहयेयुः ॥ १२ ॥ यश्चनान्दहेदपनयेद्वा स तमेव दण्डं लभेत साहसमुत्तमं वा ॥ १३॥ पलास्कार सी या पुरपको हत्या करनेवाले, पलास्कारसे स्त्रीको उठा ले जानेवाले, बलात्कार जनताके नाक या कान भादि फार देनेवाले, "मैं हत्या करूंगा, चोरी करूंगा" इस प्रकारकी घोषणा करनेवाले, बलास्कार नगर और प्रामोसे दण्यापहरण करनेवाले, सया भीत भादि फोड़कर सेंध लगानेवाले, पुरपाको, और मार्गकी धर्मशालाओं तथा प्यामि चोरी करनेवाले, राजाक हाथी, घोहे भोर रथोंको नष्ट करने मारने या चुरानेवाले पुरुषोंको, शूलीपर चढ़ाकर मार दिया जाये ॥ १२ ॥ शूलीपर चढ़ाकर मारे हुए इन पुरुषोंका जो दाहसंस्कार करे या उठाकर लेगावे, उसे भी यही दण्ड, अथवा उत्तमसाहस दण्ड दिया जाय ॥ १३ ॥ हिंस्रस्तेनानां भक्तवासोपकरणानिमन्वदानवैयावृत्यकर्मसूत्तमो दण्डः ॥ १४ ॥ परिभाषणमविज्ञाने ॥ १५ ।। हिंस्रस्तेनानां पुत्रदारमसमन्त्रं विसृजेत्समन्त्रमाददीत ।। १६ ।। जो पुरुष, घातक और चोरोंको अन, निवासस्थान, पख आदि अन्य सामान, अग्नि और सलाद देवें, सपा उनके पास नौकरी करें, तो उन्हें टतम साहस दण्ड दिया जाप ॥ ११॥ यदि यह मालम न हो कि ये घातक या जोर, हैं, तो केवल याग्दण्ड दिया जाये । अर्थात उलाहना भादि वेकर उन्हें . क . ११ अभ्या०] फण्टकशोधन (१४९) समझा दिया जाये ।। १५ ॥ पातक और चोरोंके लामो तथा चियाको यदि वे घोरी भीर हत्याकी सलाहमें शामिल न हों, तो निरपराध समझकर छोड़ दिया जाये । यदि सराहमें शामिल हों, तो गिरफ्तार करके उचित दण्ड दिया जाये ॥१६॥ राज्यकामुकमन्तः पुरप्रधर्पकमटव्यमित्रोत्साहकं दुर्गराष्ट्रद- ण्डकोपर्क वा शिरोहस्तपादीपिकं घातयेत् ॥ १७ ॥ ब्राह्मणं तमः प्रवेशयेत् ।। १८॥ राज्यकी कामना करनेवाले, अन्त पुरमें भमेला दालनेपाले, भटर्वाचर पुरिन्द आदिको तथा अन्य शत्रुओंको उभारनेयाले, क्रिले तथा घाहरकी सेनाको राजास उपित करादेनेवाले, पुरपाको उनके सिर और हाधपर जलसा हुआ भगारा रखकर फरल करया दिया जाये ॥ १७ ॥ यदि ऐसा काम कानेवाला कोई प्राह्मण होवे, तो उसे आजीवन काराकोररीमें बन्द करदे मातृपित पुनधानाचार्यतपस्विघातकं वा त्वफ्छिर-मादी- पिकं घातयेत् ॥ १९ ॥ तेपामाक्रोशे जिहाच्छेदः ॥ २० ॥ अहाभिरदने तदङ्गान्मोच्यः ॥२१॥ माता पिता, पुन, माई, भाचार्य और तपस्वाकी हत्या करनेवाले शुरूपको उसके सिरकी खाल उतरवाकर उसपर आग जलाकर कत्तल करपा देये ॥ १९॥ माता पिता भादिको गाली देनेपर जीम कटवा देवे ॥ २० ॥ और यह माता भादिके जिस किसी अङ्गको अपन नाखून आदिसे नच खसोटे, वही मग उसका कटवा दिया जाय ॥२॥ यदृच्छाघाते पुंसः पशुयथाऽश्वस्तेये च शुद्धबधः ॥ २२ ॥ दशावर च यूथं विद्यात् ॥ २३ ॥ उदकधारणं सेतुं भिन्दतस्त- वाप्सु निमज्जनम् ।।२४॥ अनुदकमुत्तमः साहसदण्डः ॥२५।। भग्नोत्सृष्टकं मध्यमः ॥ २६॥ जो किसी धरपको अचानक मार देवे, अथवा पशुओंके झुण्ड या घोडाको घुरालेये, उसे शुद्ध प्राणदण्ट दिया नाय ॥ २२ ॥ कमसे कम दस पशुभाका एक झुण्ड यहा समझना चाहिये ॥ २३ ॥ जरको रोकनेवाले सेतु (पांघ) को जो तोडे, उसे वहीं जलम हुयाका मार दिया जाय ॥ २५ ॥ यदि विमाही जल सेतु बना हुआ हो, तो उसे तोडनेवाले पुरुषको उत्तमसाहस दण्ड दिया जाये ॥ २५ ॥ यदि यह पहिलेसेही हटाफूटा पडाहो और फिर उसे तो तो मध्यमसाहस दण्ड दिया जाप ।। २६ ।।
कौटलीय अर्थशास्त्र
[४ अधिक
विपदायकं पुरुष स्त्रियं च पुरुषमीमपः प्रवेशयेदगर्भिणीम्
।। २७ ॥ गर्भिणी मासावरप्रजातां पतिगुरुप्रजाघातिकामग्निवि-
पदा संधिच्छेदिकां वा गोभिः पाटयेत् ॥ २८ ॥
किसीको विप देकर मारनेवाले पुरपको, और पुरुपकी हत्या करनेवाली
स्त्रीको जलमें जुवाकर मार दिया जावे, परन्तु वह स्त्री गर्भिणी न हो ॥२७॥
अगर गर्भिणी हो, तो बरचा होने के कमसे कम एक महीने बाद सुपाकर मार
दी जावे । और अपने पति, गुरु तथा बच्चे की हत्या करनेवाली, भाग लगाने-
वाली, विष देनेवाली, तेथी सेंध लगाकर चोरी करनेवाली स्त्रीको गोभोंके
पैरोंके नीचे कुचलवाकर मार दिया गाये ॥ २८॥
विवीतक्षेत्रखलवेश्मद्रव्यहस्तिवनादीपिकमामिना दाहयेत्
॥२९॥राजाशकमन्त्रभेदकयोरनिष्टप्रवृत्तिकस्य नाक्षणमहानसा-
वलेहिनजिह्वामुत्पाटयेत् ॥३०॥ प्रहरणावरणस्तेनमनायुधीयमि-
पुर्भिर्यातयेत् ॥ ३१॥
चरागाह, खेत, खत्यान, घर, लकड़ियोंके, तथा हाथियोंके सुरक्षित
जंगलों में भाग लगाने वाले पुरपको अप्रिम जला दिया जाय ॥ २९॥ राजाको
गाली देनेवाले, गुप्त रहस्यको खोल देनेवाले, राजाके अनिष्टको फैलाने वाले,
तथा प्रामणकी पाकशालासे पलारकार अन्न लेकर खानेवाले पुरषकी जिला
कटया दी जाय ॥ ३० ॥ जो हथियारसे अपनी भाजीविका न करता हो, ऐसा
पुरुप यदि हथियार और कवच आदि धुरावे, तो उसे सामने खढा करके पाणों
से मरवा देना चाहिए ॥३॥
आयुधीयस्योत्तमः ॥ ३२ ॥ मेटफलोपघातिनस्तदेव छैद-
येत् ॥ ३३ ॥ जिह्वानासोपघाते संदेशवधः ॥ ३४ ॥
यदि यह हथियारोंसे भाजीविका करता हो, तो उसे उत्तम साहसदंड
दिया जावे, ॥ ३२ ॥ यदि कोई किसीफी उपस्थ इन्द्रिय और अण्डकोश काट
डाले, तो उसकेभी उपस्थ इन्द्रिय ओर भण्डकोश कटवा दिये जावें ॥ ३३ ॥
किसीकी जिला और नासिका कष्ट देने पर, काटने वाले पुरुषकी फनी (कनि-
ष्टिका) भंगुली और मंगूठा कटवा दिया जाय ॥ ३५ ॥
एते शास्त्रष्वनुगताः क्लेशदण्डा महात्मनाम् ।
अश्लिष्टानां तु पापानां धर्म्यः शुद्धबधः स्मृतः ॥३५॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थे ऽधिकरणे शुद्धश्चियश्च दण्डकप एकादशो
अध्यायः ॥ १॥ भादितो ऽटाशीतिः ॥ ८॥
(१५६) मिधिः कोटलीय अर्थशास्त्र करे, उसका हाथ काट दिया जाय, अथवा १०. पण दण्ट दिया जाय, भार सगाईका (शुल्क) धन उससे पप्सूल किया जाये ॥ सारा मासिक धर्म होने सकभी यदि सगाई की हुई कन्याका विवाह न किया जाये, तो उसका भाषा पति, उस कन्याको यथेष्ट भोग सकता हैऔर यह उस कन्या के पिताको हर्जानाभी न देवे ॥९॥ क्योंकि यह पिता मासिक भानु धर्मरूपी सस्करों के कारण, लहकीके स्वामित्वसे हटादिया गया है । अर्थात् ऐसी भयस्था में लटकीपर उसका कोई स्त्र नहीं रह जाता ॥ १०॥ त्रिवर्षप्रजातातवायास्तुल्यो गन्तुमदोपः ॥ ११ ॥ ततः परमतुल्यो ऽप्यनलंकृतायाः ॥१२॥ पिद्न्यादाने स्तेयं भजेत ॥ १३॥ यदि तीन वर्पतफ मासिक धर्म होनेपरभी कन्या न वियाही जाये, तो उसकी जातिका कोई भी पुरप उसके साथ सग कर सकता है इसमें कोई दोप नही । (अर्थात् वह पुरुप उसको अपने पास रख सकता है) 11. यदि मासिक धम होतेहुए तीन वर्षमे अधिक गुतर जाय, तो भिन्न जातिका पुरपभी उसको अपनी स्त्री बना सकता है, इसमें कोई दाष नहीं, परन्तु यह पुरण, लपकाके पिताके यनवाये हुए आभूपण भादि, तथा अन्य द्रव्य, उस एदकोके साथ नहीले जासकता ॥१२॥ यदि यह उसके (कन्याके) पिताके द्रव्यको उसे (पिताको) न सोटावे तो चोरीका दण्ड पावे ॥ १३ ॥ परमुद्दिश्यान्यस्य विन्दतो द्विशतो दण्डः ॥ १४ ॥ न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ॥ १५ ॥ कन्यामन्यां दर्शयित्वान्यां प्रयच्छतः शत्यो दण्डस्तुल्यायाम् ॥१६॥ हीनायां द्विगुणः ॥१७॥ दूमोके लिये कही हुई कन्याको, 'घह पुरुष मैं ही ' ऐसा कहकर जो अन्य पुरुष विवाहता है, उसे २०० पण दण्ड दिया जाय ॥ १५॥ स्त्रीकी कामना न होनेपर कोई भी पुरुष यथेच्छ भोग न करे, ॥ १५ ॥ एक कन्याको पहिले दिसला कर वियाहके समय उसी जातिकी दूसरी कन्याको देये, तो १०. पण दण्ड दिया जाय ॥१६॥ यदि हीन जातिकी कन्याको देवे तो २०० पण दण्ड दिया जाय ॥१७॥ प्रकर्मण्यकुमायाश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः ॥ १८ ॥ शुल्क- व्ययकर्मणी च प्रतिदद्याद् अवस्थाय ॥१९।। तज्जातं पश्चात्कृता द्विगुणं दद्यात् ॥ २० ॥ जो पुरुष क्षतयोनि स्त्रीका भातपोनि फहकर दूसरी बार पियाह करदे, वे.
१२अध्या. फण्टकशोधन उसे ५४ पण दण्ड दिया जाय ॥१८॥ौर शुल्क तथा विवाहमें हुए खर्चको विवाह करने वाले पुरुषके पास लौटादे ॥ १९ ॥ यदि फिर तीसरी . धारभी वह भक्षत योनि कहकर विवाह करे, तो पहलेसे दुगना अर्थात् १०८ पण उसे गुरमाना किया जाय ॥२०॥ अन्यशोणितोपधाने द्विशतो दण्डः ॥ २१॥ मिध्याभिशं सिनश्च पुंसः ॥ २२ ॥ शुल्कव्ययकर्मणी च जीयेत ॥ २३ ॥ योनिक्षीणता दिखलानेके लिये, दूसरेका रघिर अपने कपड़ोपर लाने पाली स्त्रीको २०० पण दण्ड दिया जाय ॥ २१॥ और झूठ बोलने वाले पुरुष कोभी (अर्थात् जो अक्षत योनि स्त्रीको क्षत योनी यताये) यही (२०० पण) दण्ड दिया जाय ॥ २२ ॥ तथा शुल्क और विवाहका खर्चमी उससे दिलवाया जाय ॥ २३॥ न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ॥२४॥ स्त्री प्रकृता सकामा समाना द्वादशपणदण्डं दद्यात् ॥ २५ ॥ प्रक/ द्विगुणम्॥२६॥ स्त्रीकी इच्छाक पिगन्द्व उसे कोई नहीं भोग सकता ॥ २४ ॥ कामना रसती हुई समान जातिकी स्त्रीको यदि कोई क्षतयोनी करदेवे, तो वह स्त्री १२ पण जुरमाना देवे ॥ २५ ॥ यदि यह स्त्री स्वयं ही अपनी योनिको क्षीण कर लेचे, तो उसे दुगना अर्थात् २४ पण दण्ड दिया जाय ॥ २६ ॥ अकामायाः शत्यो दण्ड आत्मरागार्थ शुल्कदानं च ॥२७॥ स्वयं प्रकृता राजदास्यं गच्छेत् ।। २८ ॥ पहिग्रामस्य प्रकृतायो मिध्यामिशंसने च द्विगुणो दण्डः ॥ २९ ॥ . पुरुषको कामना न रखती हुई भी स्त्री कमल थोड़ी देरकी अपनी खुशीके लिये, किसी पुरुपसे अपनी योनि क्षीण कराती है, तो वह १०. पण दण्ड देथे, और उस पुरुषको फीस देवे ॥ २७ ॥ जो स्त्री अपनी इच्छासे संग करती है, वह राजवासियों में होजाये ॥ २८ ॥ गांधके बाहर विशन स्थानमें संग करनेपर स्त्रीको दुगना अर्थात् २४ पण, और पुरुषको 'मैंने संग नहीं किया इस प्रकार झूठ बोलनेपर दुर्गना दण्ड दियाजाय ॥ २९ ॥ प्रसह्य कन्यामपहरतो द्विशतः ॥ ३० ॥ ससुवर्णामुत्तमः ॥३१ ।। बहूनां कन्यापहारिणां पृथग्यथोक्ता दण्डाः ॥ ३२ ॥ यलास्कार कन्या अपहरण करने वाले पुरुषको २०० पण दण्ड दिया जाय ॥३०॥ यदि वह स्वर्णके आभूषण श्रादिसे युक्त हो, तो अपहरण करने १२ अध्या०] कण्टकशोधन (१५५) रक्षापुरष हिरण्यकी रिश्वत लेकर उस जार पुरषको छोड देवे, तो उसे लिपहुए हिरण्यस ८ गुणा दण्ड दिया जाय ॥४३॥ केशाकशिकं संग्रहणमुपलिगनाद्वा शरीरोपभोगानां तज्जा- तेभ्यः स्त्रीवचनाद्वा ॥ ४४ ॥ किसी स्त्रीका दूसरे पुरए के साथ फसा होना, निम्न लिखित रीतिसे जाना जासकता है-एक दूसरेके कश आदि पकडकर कोजाती हुई कामकीडाको देखनसे, या कामके उद्दोपन चन्दन आदिका शरीरपर लेप करनेसे, या फाम सम्बन्धी इशारोंको जानने वाले पुरशके द्वारा, या स्त्री जब स्वय कह देवे ॥ ४॥ परचक्राटवीहवामाघप्रव्यूढामरण्येपु दुर्भिक्षे वा त्यक्तां प्रेत- भावोत्सृष्टां वा परस्त्रियं निस्तारयित्वा यथासंभापितं समुपभुजीत ॥४५॥ फोई पुरप, शत्रुओं या जगलियोंके द्वारा अपहरण की हुई, नदी प्रवाहम यहती हुई, जगलोंमें अथवा दुभिक्षके समयमै त्यागी हुई, रोग' या मूर्छाके कारण मरी हुई समझ कर छोडी हुई पराई स्त्रीको भी इन सारी आपत्तियोंस उद्धार करके, दोनोंकी सराह होने पर अच्छी तरह भौग सकता है॥१५॥ जातिविशिष्टामफामामपत्यवती निष्क्रयेण दद्यात् ॥ ४६ ॥ यदि वह स्त्री उच कुलका हो, समान जाति होनेपर भी उद्धार करता पुरपकी कामना न परे, और बालबच्या वालाहो, तो उसके पतिसे अपने परि श्रम (आपत्तिसे उद्धार करने)का उचित पुरस्कार लकर उसे, उसके मालिकको देदेवे ॥ ४६॥ गोरहस्तानदीयेगादुर्भिक्षादेशविभ्रमात् । निस्तारयित्या कान्तारानष्ठां त्यक्तां मृतेति वा ॥४७॥ भुञ्जीत स्त्रियमन्येपो यथासंभापितं नरः। न तु राजप्रतापेन प्रमुक्तां स्वजनेन वा ।। ४८ ॥ न चोत्तमा न चाकामा पूर्वापत्यवतीं न च । ईशी चानुरूपेण निष्क्रयेणापवाहयेत् ॥ ४९ ॥ इति कण्टकशोधने चतुर्थे ऽधिकरणे कन्याप्रकर्म द्वादशोऽध्याय ॥१२॥ आदित एवोननवति !! ८९॥ ।
कौटलीय अर्थशास्त्र
[४ अधिक
चोरोंके हाथसे, नदी प्रवाहस, दुर्भिक्षसे पचाकर और जंगलों में भटकती
हुई 'सया मरगईहै' ऐसा समप्तकर छोडी हुई पराई स्त्रीकोभी भापतिसे रक्षा
करके दोनोंकी सलाह होनेपर कोई पुरुष भोग सकता है। परन्तु राजाके प्रोध
अथवा अपने जनासे त्यागी हुई स्त्रीको, कुलीन, कामना रहित भौर बालयञ्चों
वालो नीको आपत्तिसे छुढानेपरभी कोई पुरुष उपभोग नहीं कर सकता,
प्रत्युत अनुरूप पुरस्कार लेकर इस प्रकारकी स्त्रीको उनकेघर भिजवावें॥१७४९।।
कण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरणमें वारयां अध्याय समाप्त
A
तेरहवां अध्याय
८८प्रकरण
अतिचार दण्ड
ब्राह्मणमपेयमभक्ष्यं वा ग्रासयत उत्तमो दण्डः ॥१॥ क्षत्रिय
मध्यमः ॥२॥ वैश्यं पूर्वः साहसदण्डः ॥३॥
जो किसी ब्राह्मणको भभक्ष्य या अपेय वस्तु खिलावे पिलावे,
उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ॥१॥ यदि क्षत्रियको खिलाये पिलावे तो
मध्यम साहस दण्ड ॥२॥ और वैश्यको खिलाने पिलानेपर प्रथम साहस दण्ड
दिया जाय ॥३॥
शूद्रं चतुष्पश्चाशत्पणो दण्डः ॥ ४॥ स्वयंग्रसितारो निर्वि-
पयाः कार्याः ॥५॥ परगृहाभिगमने दिवा पूर्वः साहसदण्डः
॥६॥ रात्रौ मध्यमः ॥७॥ दिया रात्री वा सशस्त्रस्य प्रविशत
उत्तमो दण्डः ॥८॥
तथा शूदको खिलाने पिरानेपर ५४ पण दण्ड दिया जाय ॥ ४॥ यदि
प्राह्मण आदि स्वयही भमय अपेय खायें पीवें तो उन्हें देशसे पाहर करदिया
जाय ॥ ५ ॥ जो पुरुष दिन ही किसी दूसरेके घरमें घुसे, उसे प्रथम साहस
दण्ड दिया जाय ॥ ६ ॥ रानिमें प्रवेश करनेपर मध्यम साहस दण्ट ॥७॥
और रात अथवा दिन में हथियार लेकर प्रवेश करनेपर उत्तम साहस दण्डदिया
जाय॥८॥
भिक्षुकनैदेहको मनोन्मत्तौ बलादापदि चातिसंनिकृष्टाः प्रवृत्त-
प्रवेशाचादण्ड्या अन्यत्र प्रतिपेधात् ॥९॥ स्वयेश्मनो ऽपि राना.
दुर्घ परिवार्यमारोहतर पूर्वः साहसदण्डः ॥ १० ॥
।
१३ अभ्या०] फण्टकशोधन
भिखारी भीर फेरी लगानेवाले, मदिरा पीने और उन्माद रोगसे
पागल हुए २ पलात्कार, बन्धुवान्धय और मित्र आदि आपत्तिमें, यदि दूसरेके घाम
प्रवेश करें, तो ये उस हालतम दण्डनीय नहीं होते, जपकि घरके किसी
भादमीने भीतर जानेसे इन्हें रोका न हो ॥९॥ यदि कोई पुरुप एक महर
रात्रि शीतजानेपर, अपनेही घरकी माहरकी ओरकी दीवारोंपर घड़े, तो उसे
प्रथमसाहस दण्ड दिया जाय ॥१०॥
परवेश्मनो मध्यमः ॥ ११ ॥ ग्रामारामवाटभेदिनच ॥१२॥
ग्रामेष्वन्यतः सार्थिका ज्ञातसारा वसेयुः ।। १३ ।। मुपितं प्रया.
सितं चैपामनिर्गत रात्री ग्रामस्वामी दद्यात् ॥ १४ ॥ नामान्तेपु
वा मुपितं प्रवासितं विवीताध्यक्षो दद्यात् ॥ १५ ॥
यदि इसी हालतमें दूसरेके घरकी दीवारोंपर चहे॥११॥ और ग्राम
अथवा पांगीचों की पादको तोहे, हो उसे मध्यमसाहस पण्ड दिया जाय ॥१२॥
याया करते हुए व्यापारी लोग यदि किसी गांवमें ठहरे, तो अपने पासके सम
मास असायको सूचना प्रामाध्यक्षको देकरही ठहर ॥१३॥ रातमें पदि
यदि इनकी चोरी होजाय, पा गांवमें कोई यस्तु एट जाय, तो उस पस्तुको
मामाध्यक्ष देये ॥ १४ ॥ भार गांवके भार सरहद ही कोई वस्तु
धुराई गई हो या टूट गई हो, तो उसे विवीताध्यक्ष (चरागाह का निरीक्षक)
देये ॥ १५॥
अविवीतानां चोररज्जुकः ॥ १६॥ तथाप्यगुप्तानां सीमा-
वरोधेन विचयं दाः ॥ १७॥ असीमावरोधे पञ्चग्रामी दशग्रामी
वा ॥१८॥
यदि यद्दपिर चारागाह भादि भी न होय, ऐसे स्थानोंपर घुराई हुई
या टूटी हुई वस्तुको चोरग्क (चोरोंको एकरनेवाले शापुरप) देखें ॥ १६ ॥
यदि फिरभी घरत सुरक्षित रह सके तो जिसको सीमांग यह घोसी भादि
हुई हो, उस सीमाका मालिक यस्तु मिल जानेपर दे देवे ॥१७॥ यदि
फिर भी प्रयन्ध न हो सके, तो जहां चोरी भादि हुई हो उसके पास के पांच
गांव या दसगांवकी पयायत उस धनको ढूंढकर अदा करे ॥ १८॥
दुर्वलं वेश्म शकटमनुराधमूर्धस्तम्भरास्त्रमनपाश्रयमप्रति-
च्छन्नं धनं रूपं कटावपातं या कृत्वा हिंसायांदण्डपालप्यं विद्याद
॥१९॥
[अधिक - (१५८) कोटलीय अर्थशास्त्र मकानकी दीवार आदिको कमजोर करके, गाडीकी उतरी भादि मगत न लगाकर, हधियारको ठीक तौरपर न रखकर, गड्डेको न पूरकर, और कुएको मन न बनाकर, अर्थात् इन सातोंको धनइंस जो पुरुष किसीकी हरयामें कारण बन जाय, तो उसे दण्डपारध्यमें धवलाय हुए उचित दण्ड दिये जावें ॥ १९॥ घृक्षच्छेदने दम्यरश्मिहरणे चतुष्पदानामदान्तसेवने या काष्ठ- लोटपापाणदण्डवाणवाहविक्षेपणेपु याने 'हस्तिना च ।। २० ॥ संघट्टने चापहीति प्रक्रोगन्नदण्ड्यः ॥ २१ ॥ वृक्ष काटते समय, मारनेवाले बैर भदिकी रस्सी खोलते समय, पहिले पहिले चौपायोको सवारी चराने का अभ्यास कराते समय, अथवा दोका लापसमें झगडा होनेपर लकडी, ढेला, पाथर, दण्डे, याण फेंकन और हाथापाई करते समय, तथा हाथीकी सवारी करते समय, और भीडमें हटजाओ२ इस प्रकार चिलानपर भी योदे बीच में आ जानेसे किसीके हाथ पर टूट जाये, तो वृक्ष काटोवाल आदि पुरष दण्डनीय न समझे जावे ॥ २०.२१॥ हस्तिना रोपितेन हतो द्रोणान्नमद्यकुम्भ माल्यानुलेपनं दन्त- प्रमार्जनं च पटं दद्यात् ।। २२॥ पदि कोई पुरुष 'मैं हायीके द्वारा मारा जाऊँ' ऐसा सोचकर सड़कपरं उसके रास्तेमें आकर लेट जावे, और इस लिये गुस्सैमें आकर हाथी उसे मार देवे, तो उसके उत्तराधिकारी मन्धु बान्धर्वोको उचित है कि ये दाणभर अन्न मद्यका एक घड़ा, माला, अनुलेपन (माथेरर गाने के लिये सिन्दूर या चादन आदि) और दान्त साफ करनेका वस्त्र, हा के लिये देवे ॥ २२ ॥ अश्वमेधावभृथलानेन तुल्यो हस्तिना वध इति पादप्रक्षाल- नम् ॥ २३ ॥ उदासीनवधे यातुरुत्तमो दण्डः ॥२४॥ भृङ्गिणा दंष्ट्रिणा चा हिंस्यमानममोक्षयतः सामिनः पूर्वः साहसदण्डः ॥ २५ ॥ .. क्योंकि जितना पुण्य अश्वमेधक अनन्तर पवित्र स्नान करनेसे होता है, उत्तनाही पुष्प हाधीके द्वारा मारे जानेपर होता है, इसलिये द्रोणभर अन्न भादि देना, यह हाथोकी पूना विशेष ॥ २३ ॥ परन्तु यदि कोई पुरप इस प्रकार मरना न चाहे, और वह सपारके मादसे हाथोके द्वारा मारा जावे, तो सवारको उत्तम साहस दण्ड दियाजाय ॥ २४ ॥ यदि किसी पुस्पको, गो १३ अध्याय कैण्टकशोधन (१५९) आदि सींगसे गारे, मधवा, मोड़े आदि दांतसे काटे, और गौ आदिका मालिक उसको न छुड़ाये, तो मालिकको प्रथम साहम दण्ड दियाजाय ॥ २५ ॥ प्रतिक्रप्टस्य द्विगुणः ।। २६ ।। शृङ्गिदष्टिभ्यामन्योन्यं घात- यतस्तच तावच दण्डः !! २७ ॥ देवपशुमृपभमुक्षाणं गोकुमारी वा वाहयत पञ्चशतो दण्डः ॥ २८ ॥ मारे या काटे जाने वाले भादमाके 'मुझे छुडाओ २, इस प्रकार चिलानेपर भी यदि मालिक न छुड़ाये, तो पहिलसे दुगना दण्द दिया जायेरका यदि सोंग भाले और दांतवाले लानर आपसमें लइकर एक दूसरेको, मारदें, तो (मारने घाले पशुका) मालिक मरे हुए जानवरकी झीमत और उतनाही दाद देवे ॥२७॥ देव सम्बन्धी (देवताके नामपर छोड़े हुए) किसी पशुको, साइको, श्रेलको या पडीको जो कोई पुरुष जोते उसे ५०० पण दण्ड दियाजाय ॥ २० ॥ प्रवासयत उनमः ॥ २९ ॥ लोमदोहवाहनप्रजननोपकारि- णां क्षुदपशूनामादाने तच्च तावच दण्डः ॥ ३० ॥ प्रयासने च ॥ ३१ ।। अन्यत्र देवपितृकार्येभ्यः || ३२ ।। यदिइनको कोई निकालं या दर लेजाये, तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ॥२९॥ ऊन, दूध, तथा सारी देनशले, और बच्चा पैदा करने वाले छोटे पशुओंका जो अपहरण पारे, यह उनकी कीमत और उतनाही दाद देवे ॥३०॥ इनका प्रवासन करनेपर भी ग्रहो दण्ड दिया जावे ॥ ३१ ॥ परन्तु यदि दव. कार्यके लिये या पिन कार्य के लिये मवासन हो तो कोई रेप नही ॥ ३२ ॥ छिन्ननस्यं भगयुगं तिर्यक्प्रतिमुखागतं प्रत्यासरता चक्रयुक्त यातपशुमनुष्यसंधाधे वा हिंसायामदण्ड्यः ॥ ३३ ॥ अन्यथा यथोक्तं मानुपप्राणिहिंसायां दण्डमभ्याभवेत् ।। ३४ ।। यदि येलको नाथ टूट जाय, या जूभा टूट जाय, या जुवा हुभाही बैल तिरा होजाय, या सामनेको ओर घिरकुल उलटा होजाय, या अन्य गाड़ियों पशुओं तथा मनुष्याकी भारी भीड हो, ऐसे समयमै यदि किसी मनुष्य या । पशुको चोट पहुँच जाय, तो गापी चलाने घालेको अपराधी न समझा जावे ॥ ३३ ॥ यदि ये सब बाते न हो शो मनुष्य या पशुको किसी तरहकी चोट पहुँचनेपर पहिले बहे हुए उचित दण्ड दिये जावें ॥ ३४ ॥ अमानुषप्राणियधे प्राणिदानं च ।। ३५ ॥ बाले यातरि या. नस्थ: स्वामी दण्डयः॥ ३६ || अस्वामिनि यानस्य प्राप्तन्यवहारो [४ अधिः (१६०) पोटलीय अर्थशास्त्र चा याता ॥३७॥ बालाधिष्ठितमपुरुष वा यानं राजा हरेत् ॥३८॥ अदि मनुष्य या यहे पशुके अतिरिक्त कोई छोटासा यकरी या मुगा भादि मर जाय, तो वह उसी तरहका दूसरा जानपर देये ॥ ३५ ॥ यदि उस समय गादी घटाने वारा नायालिग हो, तो उसका माटिक इन सब दण्डों को भुगते ॥ ३६॥ यदि मारिक उपस्थित न हों, तो गार्समें सवार होनेया। पुरुप, अथवा दूसरा यालिग सारपि इस दण्डको भोगे ॥३७॥ यदि गादी में याएक के सिवाय कोई न हो तो राजा उसे जब्त करणे ॥३८॥ कृत्याभिचाराभ्यां यत्परमापादयेत्तदापादयितव्यः ॥३९॥ कामं भार्यायामनिच्छन्त्यां कन्यायां वादारार्थिनां मतरि भार्याया वा संवननकरणम् ॥ ४० ॥ अन्यथा हिंसायां मध्यमः साहस- दण्डः ॥४१॥ फुत्या और अभिचार काँसे जो दूसरेको तग करे, उसे गिरफ्तार कर लिया जाय ॥ ३९ ॥ जो स्त्री पतिको न चाहे, उस पर पति, कन्यापर स्त्रीको चाहनेपाल पुरण, और अपने पत्तिपर भारी, कृरया पशीकरण आदि तान्त्रिक प्रयोगोंको कर सकते है। इतने में वे अपराधी न समझे जावे ॥ ४०॥ इससे अतिरिक विषय में तान्त्रिक प्रयोग करनपर, करने वालोंको मभ्यम साहस दण्ड दिया जाय ॥ ४॥ मातापिनोभगिनी मातुलानीमाचार्याणां स्नुपां दुहितरं भ- गिनी याधिचरतः लिङ्गच्छेदनं बधश्च ॥ ४२ ॥ सकामा तदेव लभेत ।। ४३ ॥ जो पुरप, माता और पिताकी यहिन (मासी और भा), मामाकी स्त्री (मामी) गुरुमाता (गुरको स्या), पुप्रयधू, अपनी रदकी ओर अपनी बहिनके साथ व्यभिचार करे, उसकी उपस्थ इन्द्रिय और अण्डकोश काटकर प्राण दण्ड दिया जावे ॥४२॥ यदि मासी यूआ आदि स्वय ऐसा करवाय, तो उन्हें भी दोना स्तन और भगका छेदन करके प्राण दण्ड दिया जावे ॥ ५३॥ दासपरिचारकाहितकभुक्ता च ॥ ४४ ॥ ब्राह्मण्यामगुप्तायां क्षत्रियसोत्तमः ॥ ४५ ॥ सर्वस्वं वेश्यस्य ॥ ४६॥ शूद्रः कटा- निना दह्येत ॥४७॥ सर्वत्र राजभार्यागमने कुम्भीपाकः ॥१८॥ दास, पारेचारक और बन्धुए यदि व्यभिचार करें, तो उग दोनोंको भी घदी दण्ड दिया जाये ॥ ४५ ॥ स्वतन्त्र रहने वाली ग्राह्मणीफे साथ यदि १३ अध्या] फण्टफशोधन क्षत्रिय व्यभिचार करे, तो उसे उसम साहसदण्ट दिया जाये ॥४५॥ यदि पैश्य करे तो उसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति जन्त करली नावे ॥ ४६ ॥ यदि शूद करे, तो उसको चिनकों की भागमं जमा देना चाहिए । ४.॥राजाकी स्त्री के साथ जो कोई भी व्यभिचार फरे, उसे तपे भादमें भून दिया जाये ॥४॥ श्वपापांगमने कृतकंपन्धाक्षः परनिपपं गच्छेच्छपाकत्वं था ॥४९ ।। शूद्रश्वपाकस्यार्यागमने वधः स्त्रियाः कर्णनासाच्छे- दनम् ।। ५० ।। प्रबजितागमने चतुर्विंशतिपणो दण्डः ॥५१॥ सकामा तदेव लभेत ।। ५२ ।। पण्डाली के साथ गमन करनेपर पुरुषके माथेपर छाप लगाकर उसे देश से माहर निकाल दिया जाये। यदि शमन करने वाला पुरष प्रद हो, तो उसे चण्डालभी पनाया जा सकता है ॥ ४९ ॥ चण्डाल यदि किसी मार्ग (पाक्षणी क्षत्रिया, पैश्या) के साथ गमन करे, तो उसे प्राण दिया जाय, मोर स्त्रीके कान सथा नाक काट दिये जावें ॥ ५० ॥ सन्यासिनी के साथ गमन करनेपर २४ पण दुपट दिया जाप, ॥५१॥ यदि संन्यासिनी कामवश ऐसा करवाये तो उसेभी यही (२४पण) दण्ड दिया जाय ।। ५१ ॥ रूपाजीचायाः प्रसह्योपभोगे द्वादशपणो दण्डः ॥ ५३ ।। बहूनामेकाधिचरतां पृथक्चतुर्विशतिपणो दण्डः ॥ ५४ ॥ स्त्रिय- मयोनौ गच्छतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ ५५ ॥ पुरुषमधिमेहतच येश्या साप यलाकार संभोग करनेपर १२ पण दण्ड दिया जाये, ॥५३॥ यदि यहुतसे आदमी किसी एक स्त्रीके साथ भोग करें, तो उन्हें पृथक गृथक् २४ पण दण्ड दिया जाय ॥ ५४॥ स्त्रीको यदि योनिके अतिरिक्त स्थान से (गुदा मुस आदिमें) कोई भोग करे, तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥ ५५ ॥ पुरपके साथ गमन (शालाम) करने परभी यही (प्रथम साहस) दण्ड दिया जावे ॥५॥ मैथुने द्वादशपणः तिर्यग्योनिष्वनात्मनः । दैवतप्रतिमानां च गमने द्विगुणः स्मृतः ॥ ५७ ॥ अदण्ड्यदण्डने राज्ञो दण्डस्त्रिंशद्गुणो ऽम्भासि । वरुणाय प्रदातव्यो ब्राह्मणेभ्यस्ततः परम् ॥ ५८ ॥ गो आदि पशुयोनियमिं गमन करनेवाले पापी पुरुषको १३ पण, और देव प्रतिमाओके साथ गमन करनेपर २४ पण दश दिया जाय ॥ ५७ भदा - [४ अधिक . (१६) कौटलीय अर्थशास्त्र गनीय व्यक्तिको दण्ड देनेपर, राजाको उस दण्डसे ३० गुणा दण्ड दिया जाये और यह दण्डका धन, वरण देवताके उद्देश्य से जलम दाल दिया जाये, भौर "फिर पाहाणोंको देदिया जाये ॥५८ ॥ तेन तत्पूयते पापं राज्ञो दण्डापचारजम् । शास्ता हि वरुणो राजा मिथ्या व्याचरतां नृपु ।। ५९ ॥ इति कण्टकशोधन चतुर्थे ऽधिकरण भतिचारदण्डः प्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥ भावितः गवतिः ॥ ९॥ एतावता फौटलीयस्यार्थशाखस्य कटकशोधनं चसुधमाधिकरण समाप्तम् ॥ ५ ॥ ऐसा करनेसे, ठीक दण्ड न देनेके कारण उत्पन्न हुआ हुआ राजा का पाप, शुद्धहो जाता है । अधीर राजा उस पापसे छूट जाता है। क्योंकि मनु- प्यो मिथ्या व्यवहार (अनुचित व्यवहार) करने पाले राजाओंका शासन परण हो करता है ॥ ५९॥ फण्टफशोधन चतुर्थ आधिकरणमें तेरहवां अध्याय समाप्त । कण्टकशोधन चतुर्थ अधिकरण समाप्त ॥
योगवृत्तपञ्चम अधिकरण पहला अध्याय दण्ड (उपांशुवध) प्रयोग। दुर्गराप्द्रयोः कण्टकशोधनमुक्तम् ॥१॥ राजराज्ययोक्ष्यामः ॥२॥ दुर्ग और राष्ट्रके कण्टकाका शोधन चतुर्य अधिकरणमें कह दिया गया अराजा और उसके अमारय आदिमें कण्टकोका शोधन बताया जायगा ॥२॥ राजानमवगृह्योपजीविनः शनुसाधारणा वा ये मुख्यास्तेपु गूढपुरुषप्रणिधिः कृत्यपक्षापग्रहो या सिद्धियथोक्तं पुरस्तादपजा पोपसोया यथा च पारग्रामिके वक्ष्यामः ॥३॥ राजाको नीचा करके रहने वाले, अथवा दुश्मनोंसे मिले हुए जो मुख्य पुरप (प्रधान पुरप-सन्त्री पुरोहित सेनापति युवराल आदि) होवें उनके गुकामलेम सिद्धिलाभ करने के लिये यह आवश्यक है कि राजा मत्युत्तम गुस पुरपाली नियुक्ति करे, और जो व्यक्ति अयुओंसे खार स्वाप बैठे हो उनको अपनी और मिलाये । उनकी नियुक्ति और काम करानेका ढग पहिले (अधि १२ अध्यायमें) कद चुके हैं, भार भागे पारमामिक (३ भधि १ अभ्या. प्रकरण म कहा जायगा ॥३॥ राज्योपपातिनस्तु वल्लभाः संहता था ये मुख्याः प्रकाशम शक्याः प्रतिपेढुं दुष्यास्तेषु धर्मरुचिरुपांशुदण्डं प्रयुञ्जीत ॥ ४ ॥ जो अध्यक्ष अथवा भापसमें मिले हुए अमात्य आदि राज्यका नाश कर रहे हों, जिन दुष्टोंको कि खुले तौरपर कुछ न कहा जासके (क्योंकि ये घो २ अधिकारोंपर रहते हैं, इमको सीधा कहनेसे प्रशाम असन्तोष फैलनेकी सम्मानमा रहसी है), धमालमा राजाको घाहियेकिनमम उपांशुदण्ड (ऐसा वध आदि दण्ट जिसमें मारने का तया मारने वाले आदिका कछभी विशेष - ॥ ७॥ V (१६४) कौटलीय अपशास्त्र [५ अधि० पता न लगन पाय , अथात् छिपे २ चुपचाप बघ आदि करा देने) का प्रयोग करे ॥४॥ 'दूप्यमहामात्रातरमसत्कृतं सच्ची प्रोत्साह्य राजानं दर्शयेत् ॥५॥ तं राजा दूप्यद्रव्योपभोगातिसर्गेण दूप्ये विक्रमयेत् ॥६॥ दोण रसेन वा विमान्तं तत्रैव पातयेद्माघातको व्यमिति || दूपणीय हस्त्यध्यक्ष आदिफे भाईको, जिसको कि दायभाग न मिला हो, सरकार पूर्वफ उमार कर, समी, राजाको दिखावे, अपांत् उसे राजा के पास रावे ॥ ५ ॥ राजा उसको दूषणीयका निग्रह करनेक लिये हथियार आदि सामान देकर, शगता करवा देवे ॥१॥ जय वा विप या शास्त्र आदिस अपने भाईको मार देवे, तो इसी अपराधम 'यह अपने माईका घातक है' ऐसा कहकर राजा उसेभी मरवा तेन पारशवः परिचारिकापुत्रश्च व्याख्यातौ ॥ ८॥ दूष्य- महामानं या सत्तिप्रोत्साहितो भ्राता दाय याचेत ।। ९ ।। यही ग पाराव महामान (महामानका, नीच वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुभा पुय) और परिचारिका पुत्र (दासीसे उत्पन्न हुए पुत्र) के सम्बन्ध जानना चाहिये । अर्थात् सी इनको उमारकर हावे, ये अपने पिताको मार, और इन्हें पितृधातक कहकर इसी अपराधमे राजा मरवा देवे ॥८॥ भयया सत्रीसे उभारा हुआ भाई, दूपणीय महामाग्नसे अपना दाय माग मागे ॥९॥ तं ट्यगृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र या वसन्तं तीक्ष्णो श्रूयात् ॥ १० ॥ हतो ऽयं दायकामुक इति ।। ११ ॥ ततो हत. पक्षं परिगृह्येतरै निगृह्णीयात् ।। १२ ॥ फिर तीक्ष्ण पुरुष (घातक गुभचर व्यक्ति), दूपणीयके परके दरवाजे के सामने सोते हुए भथवा अन्यत्र निवास करते हुए इसको रातमें मारकर कहे 'कि'-॥ १०॥ यह अपना दायभाग मागता था, इसलिए इसके महामात्र भाईभे इसे मार डाला है ॥ ११॥ इसके अनन्ता राजा हतध्यक्तिके मधुयाधव लटके मामा भादिको धुलपाकर, महामारको 'यह भाईका घातक है' ऐसा कहकर मरवा दाले ॥ १२ ॥ म्यसमीपस्था या सत्रिणो भ्रातरं दायं याचमानं घातेन परिभर्सयेयुः ॥ १३ ॥ तं रात्राविति समानम् ॥ १४ ॥ भया पीप (महामात्र आदि) के समीप रहते हुए सभी लोग .
१ अभ्या०.] योगपच दायमाग मांगने याले माईको, 'हम तुझे मारखालँगे' ऐसा कहकर धमकाये फिर पूर्योक्तरीसिस रातम स्वयं तीक्ष्ण उसे मारदेचे, आगे सय पूर्ववत् ही समझना चाहिए ॥३॥१४॥ दप्यमहामात्रयोर्या यः पुत्रः पितुः पिता या पुत्रस दारा- नधिचरति भ्राता वा भ्रातुस्तयोः कापटिकमुखः कलहः पूर्वण व्याख्यातः ॥१५॥ दूप्य और महामायका पुग्न, अपने पिताको स्त्रियोंके साथ, पिता पुनोंकी खियाके साथ, और भाई भाइकी खोके साथ यदि म्यभिचार करें, तो उनका पितापुन और भाई भाईका) आपसमे कापटिक गुप्तचर (देखो- अधि०, ११ अध्या०२-३ सून) झगड़ा करवा देवे । एक दूसरेको मार देनेपर पहिलेकी तरह कार्य किया जाय ॥ १५॥ दुष्पमहामानपुत्रमात्मसंभावितं वा सची राजपुत्रस्त्वं शत्रुभयादिह न्यस्तो ऽसीत्युपजपेत् ॥ १६ ॥ प्रतिपन्नं राजा रहसि पूजयेत् ॥ १७ ॥ प्राप्तयौवराज्यकालं त्यां महामात्रभया- नाभिपिञ्चामीति ॥ १८ ॥ और महामायके पुनके पास, जोकि अपने आपको यहा यहादुर भीर उदार समानता हो, सग्री आये, भीर कहे कि तुम सो युवराज होसकते हो, शाके भयसे यहां पड़े हुए हो इत्यादि ॥ १६ ॥ सनीके कपनको स्वीकार करके जब यह रागाके पास आये, तो एकान्तमें राजा उसका अच्छी तरह सरकार रहे ॥ १७ ॥ और कहे कि तुम्हारे यौवराज्यका समय आगया है, मैं केवल महामात्र (राज्यकी कामना करनेवाला, उस लाका पिता) के भयसे तुम्हारा अभिषेक नहीं करता, इत्यादि ॥१८॥ तं रात्री महामानवधे योजयेत् ॥ १९ ॥ विक्रान्तं तत्रैव पातयोपित्यातकोऽयमिति ॥ २० ॥ भिक्षुकी का दूष्यमा सांचननकीभिरोषधीभिः संवाय रसेनातिसंदध्यात् ॥ २१ ॥ इत्याप्यः प्रयोगः ॥२२॥ फिर सत्री उस लड़केको अपने पिता महामायके वध करनेके लिये तैयार करये ॥ १९ ॥ जय यह महामात्रका वध कर देवे, तो इसी अपराधको सामने रखकर यह पितृघातक है, ऐसा कहकर राजा उसे भी मरवा डाले ॥२०॥ अथवा गुसघरका काम करती हुई भिक्षुकी, दूष्य (महामान आदि)
[५ अधि
कौटलीय अर्थशास्त्र
की मायांको कहै कि मैं वशीकरणको औपनि यहुत अच्छी तरह जानती हूँ,
सुम यह आपधि अपने पतिको सिराना, इस प्रकार वशीकरणकी जगह विष
देकर मरवा देव ॥ २१ ॥ इस प्रकार किये गये कार्यको 'माय भयोग'
कहते हैं ॥ २२॥
दूप्यमहामात्रमटवी परग्राम वा हन्तुं कान्तारव्यवहित वा
देशे राष्ट्रपालमन्तपालं या स्थापयितुं नागरस्थानं या कुपितमब-
गृहीतुं सार्थातिवाद्यं प्रत्यन्ते या समत्यादेयमादातुं फल्गुबलं
तीक्ष्णयुक्तं प्रेपयेत् ।। २३॥
दप्य महामान, जगलके निरीक्षक और यागी गावको मारनं के रिये,
सीदय पुरुषों के साथ, राजा थोडीसी सेना यह यहाना करके भेजे सि इस
जालके पार अमुक नगरम राष्ट्रपाल या अन्तपारका स्थापना करनी है, या
अमुक नगर प्रजा विरुद्ध होगह है उसे चशमै फरना है, या यह यहाना करे
कि राज्यको सीमापर दूसर कृपक आदि पुरपाने हमारी भूमि दबाली है, उसे
उनसे वापस लेना है इत्यादि ॥ २३ ॥
रात्रौ दिवा वा युद्धे प्रवृत्ते तीक्ष्णाः प्रतिरोधकव्यञ्जना वा
हन्युरभियोगे हत इति ॥ २४ ॥ यात्राविहारगतो का दृष्यमहा-
मानान्दर्शनायाह्वयेत् ॥ २५ ॥ ते गूढशस्त्रैस्तीक्ष्णैः सह प्रविष्टा
मध्यमकक्ष्यायामात्मविचयमन्तः प्रवेशनार्थ दाः ॥ २६ ॥
इसके बाद रातमें या दिनमें लदाई होनेपर तीक्ष्ण पुरष घोर पा
दाकुओका भेस पनाकर जिसको मारना हो मार डालें, और फिर कहदें कि
यह लडाईम मारा गया है ॥२४॥ याना या विहार के लिये तैयार हुमा २
राजा, दूप्प महामात्रीको देखनके लिये अपने पास बुलाये ॥ २५॥ अपने पास
शत्र छिपाये हुए तीक्षण पुरष भी महामानोंके साथ २ राजाके पास भीतर
जायें । दूसरी स्यौदीपर, प्रवेश करने के लिये अपनी तलाशी देवें ॥ २६ ॥
ततो दौवारिकाभिगृहीतास्तीक्ष्णा ट्यप्रयुक्ताः स्म इति
घूयुः ॥ २७ ॥ ते तदमिविख्याप्य दृप्यान्हन्युः ॥ २८ ॥
जय द्वारपाल हथियारों के साथ उन्हें (तांश पुरपॉफ) पकते, तो ये
कहें कि हमको दूप्याने रामाके मारनेको हथियार कराने के लिये कहा है। (यह
धात उसी हालत में समझनी चाहिये, जबकि भीतर सशस्त्र जानेकी किसीको
भी आज्ञा न हो) ॥ २७ ॥ तर नगा यह मण्यात करके कि दूप्य महामात्र
बाजाको मारना चाहते थे, उन्हें (महामानोंको) मरवा दिया जाये ॥२८॥
१ मध्या०] योगवृत्त (१६७) तीक्ष्णस्थाने चान्ये ध्याः ॥ २९ ॥ बहिर्विहारगती या दृष्यानासबाबासापूजयेत् ॥ ३० ॥ तेषां देवीव्यञ्जना या दुःखी रात्रावावासेषु गृह्यतेति समानं पूर्वेण ॥ ३१ ॥ तथा तीक्ष्ण पुरुपोंके स्थानपर और किन्दोंको मरवा दिया जाये ॥२९॥ अथवा बाहर विहारके दिये गया हुमा राजा, अपने पासमें ही बहरे हुए दूष्यों फा बहुत अच्छी तरह आदरसरकार करे ॥ ३० ॥ फिर रातमें, किसी दुष्ट सोको महाराणीके भेसमें बनाकर, उनके शयन स्थानमें भेजदेवे, सदनन्तर सिपाहियों के द्वारा यहींपर उसे गिरफ्तार कराले, पुन इसी अपराधमे दूप्योंको मरया देवे, इत्यादि ॥३१॥ दूप्यमहामात्रं वा सूदो भक्षकारो वा ते शोभन इति स्तवेन भक्ष्यभोज्यं याचेत ।। ३२ ॥ बहिर्वा कचिदध्वगतः पानीयं तदु- मयं रसेन योजयित्वा प्रतिसादने तावैवोपयोजयेत् ॥ ३३ ॥ तदभिविख्याप्य रसदाविति घातयेत् ॥ ३४ ॥ अथवा राना, दूप्य महामात्रसे "सुग्दारा रसोईया और पकवान मनाने- पाला यदेही चतुर हैं। इस प्रकार उनकी स्तुति काके, फुछ साध पदा मांगे ॥ ३२ ॥ पा कहीं बाहर रास्तमें जाता हुभा जल मांगे, और उन दोनों यस्तुओंम विप मिलाकर, लीजिये आपही पहिले खाईये या पीजिये, ऐसा कहकर दूप्य महामायको ही यह साय या पेय लौटादे । ये खापीकर मर जायेंगे ॥ १३ ॥ फिर भोजम मगानेवालेको ये दोनों विप देनेवाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध करके मरवा देये ॥ ३४॥ अभिचारशीलं वा सिद्धव्यञ्जनो गोधाकूर्मकर्कटकूटाना लक्ष- ण्यानामन्यतमप्रकाशनेन मनोरथानवाप्स्यसीति ग्राहयेत् ॥ ३५ ॥ प्रतिपन कर्मणि रसेन लोहमुसलैर्वा घातयेत्कर्मव्यापदा हत इति ॥३६॥ सिके भैसमें कोई गुप्तचर, आभिचारिक कौम श्रद्धा रखनेवाले दूप्य महामानको फहे कि, भरछे लक्षणोंसे युक्त गोह, कछुवा, केकटा और टूटे हुए सींगवाले हरिण, इन चारों से किसीको आभिचारिक विधिसे श्मशानमें पकाकर खामेपर तुम अपने सम्पूर्ण मनौरथोंको प्राप्त करसकोगे ॥३५॥ जय दूप्य महामात्र इसपर विश्वास करको श्मशानमे अभिचार कर्मको प्रारम करे सो उसे खानेसे विष देकर भयया लोहे मूसलोंसे पूदकर मार दिया जाये।
[५ अधिक 4 कौटलीय अर्थशास्त्र और यह प्रसिद्ध करदिया जाये कि कमकै विगुण होजानेकै कारण पिशाच आदिने उसको मार दिया है । ३६ ॥ चिकित्सकव्यञ्जनो वा दौरात्मिकमसाध्यं या व्याधि दप्यस स्थापयित्वा भैपज्याहारयोगेपु रसेनातिसंदध्यात् ॥ ३७ ।। प्रदा- रालिकव्यजना वा प्रणिहिता दूप्यं रसेनातिसंदघ्पुः ॥ ३८ ॥ इत्युपनिषत्प्रतिपेधः ॥ ३९ ॥ भथया चर वैपका भेस बनाकर, दूप्यसे करे कि दुराधारसे उत्पा, या अन्य कोई असाध्यरोग तुम्हें होगया है, इस प्रकार कहकर चिकित्सा करते समय औषधि या भोजनके द्वारा विप देकर मारडाले ॥३७॥ अथवा मांस पकानेवाले या चावल आदि पकानेवाले पाचकके भेसमें जाकर दूप्यके पास रहे और उसे पिप देकर मार डाले ॥ ३८ ॥ यहांतक गुप्तरूपसे दूप्यों के निग्रहके ढंग बताये गये ॥३९॥ उभयदृष्यप्रतिपेधस्तु ॥ ४० ॥ यत्र दृप्यः प्रतिपेद्धव्यस्तत्र दुप्पमेव फल्गुबलतीक्ष्णयुक्तं प्रेपयेत् ॥४१॥ मच्छामुमिन्दुर्गे राष्ट्रे वा सैन्यमुत्थापय ॥ ४२ ॥ भय दो दुपयोंको एकही यनसे किस प्रकार नष्ट किया जाय, इसका उपाय पताते है ॥४०॥ जहाँपर एक दूप्पका निराकरण करना हो, यहाँ दूसरे दूप्यको ही थोडीसी सेना और तीक्ष्ण पुरुषोंके साथ भेजे ॥ ४ ॥ उससे यह कहे कि अमुक किले या प्रान्तमें जाओ और वहां सेनाके योग्य भादमि. योको सेनामें भर्ती करो ॥ ४२ ॥ हिरण्यं या ॥ ४३ ॥ वल्लभाहा हिरण्यमाहारय,॥४४॥ यल्लमकन्यां वा प्रसह्यानय ॥ ४५ ॥ दुर्गसेतुवणिक्पथशून्यनिवे- शखनिद्रव्यहस्तिवनकर्मणामन्यतमद्वा कारय ॥ ४६ । राष्ट्रपा- ख्यमन्तपाल्यं वा ॥४७॥ अथवा सुवर्ण भादि धन जमा करो ॥ ४३ ॥ या अमुक अध्यक्षसे धन भाहरण करलाभो ॥४४॥ या अमुक भध्यक्षको कन्याको बलात्कार लेआमी ॥ ४५ ॥ या अमुक स्थानपर दुर्ग, मकान बगयाभो, व्यापारियोंके मार्गको ठीक करवाओ, जंगलमें मकान बनाओ, खानों में, लकड़ीके या हाधियोंके जंगलों में अमुक काम करपाभो ॥ ५६ ॥ या राष्ट्रपाल अपवा अन्तपालके कार्योको करवाभो ॥ ४ ॥ . - . १ अध्या०] योगवृत्त (१६९) यच त्वा प्रतिषेधयेन वा ते साहाय्यं दद्यात्स पन्धव्यः स्यादिति ।। ४८ ।। तथैवतरेषां प्रेपयेदमुप्याविनयः प्रतिपेद्धव्य इति ॥४९॥ तमेतेषु कलहस्थानेषु कर्मप्रतियातेपु वा विवदमानं तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा प्रच्छन्नं हन्युः ॥ ५० ॥ तेन दोपेणेतरे नियन्तच्याः ।। ५१ ।। यदि तुम्हारे इन कार्योम कोई स्कायट हाले, या सहायता न वैये, उसे गिरफ्तार कालिया जाप, इत्यादि ॥ १८॥ और इसी प्रकार दूसरे दूप्योको पह मासिकसूचना भैजदेवे कि अमुक व्यक्ति की उदण्डताओको रोको, इत्यादि ॥ ४९ ॥ इस तरह एक दूसरे में झगदा होनेपर या कामम रकावट दालेजामेपर विवाद उपस्थित परनेवाले गुप्यको गुप्तरूपसे सांदन पुरप नोंके द्वारा मार देवें ॥ ५० ॥ इस प्रकार दूसरे दूप्योपर, राजाके द्वारा नियुक्त हुए पुरुषके पथका अपराध लगाकर, उनको भी मरवा दिया जाये ॥ ५ ॥ पुराणां ग्रामाणां कुलाना वा दूष्याणां सीमाक्षेत्रखलवेश्म- मर्यादासु द्रव्योपकरणसस्यवाहनहिंसासु प्रेक्षाकृत्योत्सवेषु का समुत्पन्ने कलहे तीक्ष्णरुत्पादित वा तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा प्रयुः॥५२॥ दूप्य नगर, माम अथवा परिवारोंके, सीमा, खेत, सल्यान भौर मकानों की मर्यादाके विपपमें, सुवर्ण, वख, भक्ष और सवारीका विनाश करदेनेसे सभा तमाशे और उरसों में परस्पर झगडे होनेपर अथवा तक्षिण पुरोके द्वारा प्य. नगर आदिमें शादा करादेनेपर, तीक्ष्ण पुरुषही छिपे शोरपर कुछ दूष्योंको. हथियारोंसे मार डालें, और दूसरे दुयोपर उस हत्याका थोपते हुए कहें कि सुम्ही अपराधी हो ॥५२॥ एवं क्रियन्ते ये ऽमुना कलहायन्त इति ॥ ५३॥ तेन दो- पेमेतरे नियन्तव्याः ॥५४॥ येपो वा म्याणां जातमूला: कलहास्तेषां क्षेत्रसलवेइमान्यादीपयित्वा बन्धुसंघन्धिषु वाहनेषु वा तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा तथैव घूयुः ॥ ५५॥ जो उनके साथ झगड़ा करते हैं उनका यही हाल किया जाता है ॥५३॥ इसी अपराध को सामने रखका अन्य दृष्योंको भी मरवा दिया जाये ॥५४॥ जिन दूण्य पुरुषोके आपसकै झगड़े जड पकड गए हों, उनके खेत खल्याम और महान भादिको जलाकर, तक्ष्ण परप हमके भाई बन्धनों साय.
[५ शधि० (१७०) फौटलीय अर्थशास्त्र धियों और घोडे सादि सवारियाँको हथियारसे मारकर उसी प्रकार कहे ॥ ५५ ॥ अना प्रयुक्ताः स्म इति ॥ ५६ ।। तेन दोपेणेतरे निय- न्तव्याः ।। ५७ ॥ दुर्गराष्ट्रप्यान्वा सचिणः परस्परस्यावेश- निकान्कारयेयुस्तत्र रसदा रसं दद्युस्तेन दोयेणेतरे नियन्तन्याः ॥ ५८॥ अमुक व्यक्तिने हमको यह काम करनेके रिए कहा, इत्यादि ॥ ५६ ॥ इसी अपराधम उनको (अन्य दूप्योंको) मिरपतार करके प्राण दण्ड दे दिया जाय ॥ ५७ ॥ आपसमें दुश्मनी रखनेवाले, सिमें धीर उसके पादर रहते हुए दृष्योंको, सग्निपुरप परस्पर मेल कराकर, एक दूसरेके घरमें उनको निमन्द्रण दिएवावें, और विष देनेवाले तीक्ष्ण पुरष घहापर भोजनफे साप निमन्त्रित दूप्यको विप देदेवें। इसी (विष देने के ) अपराधम राजा दूसरे सूप्यको प्राण दण्ड दे देवे ॥५८ ॥ मिक्षुकी या दूप्यराष्ट्रमुख्यं दृष्यराष्ट्रमुख्यस्य भार्या स्नुपा. दुहिता वा कामयत इत्युपजपेत् ॥५९॥ प्रतिपन्नस्साभरणमादाय स्वामिने दर्शयेत् ।। ६० ॥ अथवा ( घरका कार्य करती हुई) कोई भिक्षुकी, राष्ट्र के किसी उरघ पदाधिकारी दूप्यको जाकर झूठ मूठ कहे कि अमुक दूप्य उधपदाधिकारीकी भायां, पुत्रवधू या लड़की भापको बहुत चाहती है ॥ ५९ ॥ यदि घह इस यातपर विश्वास करले, तो उससे भार्या भाविके नामपर उसका कोई आभूषण लेकर दूसरे दूष्यको आकर दिखला देवे ॥ ६ ॥ अमौ ते मुख्यो यौननोसिक्तो भार्या स्नुपां दुहितरं वाभि- मन्यत इति ॥ ६१ ॥ तयोः कलहो रामाविति समानम् ॥६२॥ और कहे कि देखो यह पदाधिकारी जवानीके मदके गम भाकर तुम्हारी मार्या, पुत्रवधू या कन्याकी कामना करता है, इस्पादि ॥ ६॥ इस प्रकार जब उनका आपसमें अच्छा सरह झगडा हो जाये तो रातमें तीक्ष्ण पुरष एक दूप्यको हथियारोंस मार डाल, और प्रसिद्ध करदें कि अमुक दूप्यने इसको मारा है, राजा इसी अपराधम उसको भी मरवा ढाले ॥ १२ ॥ दृप्यदण्डोपनतेषु तु युवराजः सेनापतिर्वा किंचिदुपकृत्याप- क्रान्तो विक्रमेत ॥ ६३ ।। ततो राजा दृष्यदण्डोपनतानेव प्रेपये- फिल्गुबलतीक्ष्णयुक्तानिति समानाः सर्व एव योगाः ॥ ६४ ।।
[५ आंधन -- । कौटलीय अर्थशास्त्र का निर्भर वृष्टि पाही हो, तथा नहीं भन्न सूयहो, अपका सासरा पा चीथा हिस्सा, राजा मांगकर प्रजाकी अनुमतिसे लेवे (अर्थात् प्रजापर बलात्कार करके न लेये) ॥२॥ यथासार मध्यमवरं चा दुर्गसेतुकर्मवणिक्पथशून्यनिवेशख- निद्रव्यहस्तिवनकर्मोपकारिणं प्रत्यन्तमल्पप्राणं वा न याचेत ।।३।। धान्यपशुहिरण्यादि निविशमानाय दद्यात् ॥ ४ ॥ इसी प्रकार मध्यम भार छोटे २ मान्तासे भी, यहांपर उत्पन्न होने वाले भसके अनुसारही राजा हिस्सा ले । परन्तु जो प्रान्त फिलों, मकानों, व्यपारी मार्गा, खाली मैदानी खान, लकड़ी और हाथों जंगलोंके द्वारा राजा या प्रजाका उपकार करने वाले हो; जो राज्यको सीमापर हों, और जिनके पास भरा भादि बहुत घोड़ा हो, उनसे राजा कुछ न मांगे ॥३॥ नये बसने वाले किसानको खेती के लिये भस, बैल भाद पशु तथा सहायतार्थ धन, सरकारको औरसे दिया जाये ॥४॥ चतुर्थमंश धान्यानां वीजभक्तशुद्धं च हिरण्येन क्रोणीयात् ॥५॥ अरण्यजातं श्रोत्रियस्खं च परिहरेत् ॥६॥ तदप्यनुग्रहेण क्रीणीयात् ॥७॥ इस तरहफे किसानोंसे, राजा उनके द्वारा पैदा किये हुए अबका चौथा हिस्सा खरीद लेबे, और फिर सेतके बीज, तथा उनके खाने योग्य अस सोष्ट का बाकीभी खरीद लेवे ॥ ५॥ जंगलमें स्वयं पैदा हुए तथा योनियों द्वारा उत्पन्न किये अससे राजा हिस्सा न लेवे । खप्तके पोज और खाने योग्य अन ' छोड़कर उसमसे भी राजा खरीद सकता है । ॥ तस्याकरणे या समाहर्टपुरुषा ग्रीप्मे कर्मकाणामुद्वापं कारयेयुः ॥ ८॥ प्रमादावस्कनस्यात्ययं द्विगुणमुदाहरन्तो वीजकाले चीज- लेख्यं कुर्युः ॥ ९ ॥ यदि प्रोत्रिय खेती न करे, तो अधिकारियोंको चाहिए कि वे उस जमीनको भन्य किसानोंसे गरमीम उतवा वुवा देवें ॥८॥ पदि किसानके प्रमादसे खेतमे वोया यीज नष्ट होजाय, तो उससे उसपर दुगना जुरमाना करते हुए अधिकारी जन फिर बीज बोनेके समय, पीजके सम्बन्धकी किसानकी उत्तः फारवाईको सरकारी पुस्तफमें लिखलेवें ॥९॥ निष्पन्ने हरितपफादानं धारयेयुः ॥१०॥ अन्यत्र शाकफट ( १७३) २ अध्या०] योगवृत्त भगमुष्टिभ्यां देवापतृपूजादानार्थ गवार्थ वा ॥ ११॥ भिक्षुक- ग्रामभृतकार्थ च राशिमूलं परिहरेयुः।। १२.॥ जय फसल तैयार होनेवाली हो तो किसानोंको हरा या पक्का अन्न (खेतमेसे) लेनेसे रोक देबें ॥ १० ॥ परन्तु वे (किसान) देयपूजा या पितृपूजा में देने के लिये अथवा गायके लिये सागकी मुंही और पुआल भादिकी मुही सेतसे ले सकते हैं ॥ ११॥ भिखारी और गांपके नाई धोवी माशकी आदि चाकरोंके लिये धान्य राशि (खख्यानमें साफ किये हुए नाजका देर) के नीचे फा हिस्सा छोड़ दे ॥ १२ ॥ स्वसस्यापहारिणः प्रतिपातो ऽष्टगुणः ॥१३॥ परसस्यापहा- रिणः पश्चाशद्गुणः सीतात्ययः स्ववर्गस्य ॥ १४ ॥ अपने ही सेतसे जो धान्यकी चोरी करले (किसान ऐसी चोरी सर. फारको पैदावारकी कमी दिखाने के लिये कर सकता है), उसे चोरीके मालका आठगुणा दण्ड दिया जाय ॥ १३॥ जो दूसरेके सस्य (खड़ी फसल) अपहरण करे, तथा यह उसी प्रामका रहने वाला हो तो उसे इस अपराधमे चोरीके मालका पचास गुणा दण्ड दिया जाय ॥ १४ ॥ बाह्यस्य तु वधः ॥१५॥ चतुर्थमंशं धान्यानां पष्ठं यन्यानां तूललाक्षाक्षौमवल्ककाासरौमकौशेयकौपधगन्धपुष्पफलशाकपण्या- नां काष्ठवेणुमांसवल्लूराणां च गृह्णीयुः ॥ १६ ॥ यदि भपहरण करनेवाला याहरके (दूसरे) किसी गांवका हो तो उसे माण दण्ड दिया जाय ॥ १५ ॥ धान्याका चौथा हिस्सा, और बनमें होनेवाले अन्नादिका तथा रुई, लास, पाट (जूट), छाल, कपास, अन, रेशम, औपधि, गन्ध, पुष्प, फल, शाक और लकड़ी, बांस, मांस तथा सूखे मांसका, छठा हिस्सा, राज्ञालोग करके तौरपर ग्रहण करें ॥१९॥ दन्ताजिनस्सार्धम् ॥ १७ ॥ तदनिसृष्टं विक्रीणानस पूर्वः साहसदण्डः ॥ १८ ॥ इति कर्पकेषु प्रणयः ॥ १९ ॥ हाथी दांत और गौ आदिके चमईका आधा हिस्सा टैक्सके तौरपर राजा लेवे ॥१७॥जो पुरुप इन वस्तुओंको राजाकी आज्ञाके बिना येचे, उसे प्रथम साहसदण्ड दिया जाय ॥ १८॥ यहां तक किसानोंके विषय में प्रणय (प्रार्थना, राज्यकर लेनेके लिये कथन करना-राजाफी ओरसे फरसी याचना) फी निरूपणं किया गया ॥ १९॥' .
[५यांचा (१७४) कौटलीय अर्थशास्त्र सुवर्णरजतवनमणिमुक्ताप्रयालाश्वहस्तिपण्याः पञ्चाशत्कराः ॥२०॥ सूत्रवसताम्रवृत्तसगन्धभपज्यशीधुपण्याथत्वारिंशत्कराः ॥ २१ ॥ धान्यरसलोहपण्याः शुकटव्यवहारिणश्य त्रिंशत्कराः ॥ २२॥ काचव्यवहारिणो महाकारवन विंशतिकराः ॥ २३ ।। क्षुद्रकारको वर्धकिपोपकाथ दशकराः ॥ २४ ॥ काष्ठवेणुपापाण- मृद्भाण्डपकानहरितपण्याः पञ्चकराः ॥२५॥ सोना, चांदी, हीरा, मणि, मोती, मूंगा, घोड़े और हायी इन व्यापा- रिक ग्यापर, मूल्यका पचासवां हिस्सा टैक्स लिया जाय ॥२०॥ सूत, कपडा, तांबा, पीतल, कांसा, गन्ध, जड़ीबूटी और शरायपर चालीसा हिस्सा ॥२॥ गेहू, धान आदि अन्न, तेल घी आदि रस, और रोहेपर, तथा जो किराये पर गाड़ी चलाकर अपनी जीविका करते हैं उनसे ३०वां हिस्सा ॥ २२॥ कांचका पवहार करने वाले और बं? २ कारीगरोंसे १०वां हिस्सा ॥ २३ ॥ छोटे २ कारीगरोंसे, और कुलटा स्नीको घाम रखने वाले पुरपसे दसवां हिस्सा ॥ २५ ॥ लकी, योस, परयर, मट्टी के बर्तन, पकवान और हरे शाक आदिपर पांचवां हिस्सा सरकारी टैक्स लिया जाय ।। २५ ॥ कुशीलया रूपाजीवाश्च वेतनार्थ दाः ।। २६ ॥ हिरण्यकरम- कर्मण्यानाहारयेयुः॥२७॥ न चेपां कंचिदपराधं परिहरेयुः ॥२८॥ नट आदि तथा वेश्यायें अपने बेचन (कमाई) में से आधा राज्यकर देवे ॥ २६ ॥ जो बनिपे आदि व्यापारके काम न लगे हुए ही, उनसे प्रति पुरुष के हियावसे कुछ नकदी (एक घण्टक-सिका विशेष) टैक्स लिया जाय ॥ २७ ॥ और इनके किसी अपराधकी उपेक्षा न कीजाय । अपात उनका भ्यापार न करनाही अपराध कोटिम समझा जाय, और उसका दण्डरूप कर उगसे अवश्य लिया जाय ॥२८॥ ते छपरगृहीतमभिनीय विक्रीणीरन् ॥ २९ ॥ इति व्यव- हारिषु प्रणयः ॥ ३०॥ क्योंकि ऐसे लोगों से यह भी सम्भव है कि वे अपनी पस्तुको दूसरेकी करके पेंच, जिससे सरकारको यह मालूम हो कि पे व्यापार नहीं करते, और इसलिये टैक्ससे यर जाय ॥ २५ । व्यापारियोंसे राज्यकर ऐनेके विषय में यहां तक कहा गया है।॥ ३०॥ कुक्कुटरफरमधं दधात् ॥ ३१ ॥ क्षुद्रपशवः पहभागम् PM
.
२ अध्या०]
योगवृत्त
(१७५)
।। ३२ ।। गोमहिपाश्वतरखरोष्ट्राश्च दशभागम् ॥ ३३ ॥ बन्ध.
कीपोपका राजप्रेष्यामिः परमरूपयौवनाभिः कोशं संहरेयुः ॥३४॥
इति योनिपोपकेषु प्रणयः ॥ ३५ ॥
मुर्ग और सूभर पालनेवाले, उनका (मुर्गे आदि की बढ़तीका) भाषा
॥३॥ भेडमकरी पालने वाले छठा, ॥ ३२ ॥ गाय, भैंस, खयर, गधे और
ऊँट पालनेवाले दसवां हिस्सा सरकारी टैक्स देवें ॥ २३ ॥ घेश्याओंके जमादार
राजासे अनुमति पाई हुई, परमरूपपती युवती धेश्याओंके द्वारा राजकोषके
लिये धन जमा करें ॥ ३५ ॥ यहांतक जानवर पालनेवालोंसे राज्यकर लेनके
विपय निरूपण किया गया॥३५॥
सकृदेव न द्विः प्रयोज्यः ॥ ३६ ॥ तस्याकरणे वा समाहर्ता
कार्यमपदिश्य पौरजानपदामिक्षेत ॥ ३७॥ योगपुरुषाशात्र
पूर्वमतिमानं दाः ॥ ३८॥
राजाको चाहिये कि इस प्रकारका अधिक कर एकही पार लेवे, दूसरी
यार कभी न लेवे । (क्योंकि इसमें प्रजाके असन्तोषका भय रहता है)॥३१॥
यदि उपर्युक्त रीतियोंसे कोशरा समय न किया जासये तो, समाहर्साको
चाहिये कि यह किसी कार्यका यहागा करके नगरानवासी तथा प्रान्तनिवासी
लोगोंसे धन मांगे ।। ३७ ॥ संकेत किये हुए समाहाके पुरप पहिले उस
कार्यमें अधिकसे अधिक धन देखें ।। ३८ ॥
एतेन प्रदेशेन राजा पौरजानपदाभिक्षेत ॥ ३९ ॥ काप-
टिकाचनानल्पं प्रयच्छतः कुत्सययुः ॥ ४० ॥ मारतो या हिर-
ण्यमाढ्यान्याचेत ॥४१॥ यथोपकारं वा ववशावा यदुपहरेयुः
स्थानच्छत्रवेष्टनविभूपाश्चैषां हिरण्येन प्रयच्छेत् ।। ४२ ।।
तदनन्तर इसी बहानेसे राजा, नगर तथा जनपदनिवासी जनोंसे धन
मांगे ।। ३२ ॥ यदि ये थोड़ा धन देखें, तो राजाके छिपे पुरुष (कापटिक) इनकी
निन्दा करें।॥४०॥ अथवा धनी पुरपासे उनकी हैसियतके माफिक धन,
मांगें ॥४१॥ उपकारके अनुसार (सरकारने जिन ग्यक्तियोंके लिये जितने
न्यूनाधिक सुभीते किये हुए हों उनके अनुसार), अथवा जो धन अपने वशके
आदमी देवें, उतनाही रकम धनियास रीजाये और इस प्रकार राजाको सहा-
यता देगेवाले इन पनी पुरुषोका, अधिकार स्थान देका, छत्र आदि लगानेकी
भनुमति देकर, सासतरहझी पगट्टी या आभूषण भादि देकर राजाकी ओरसे
संस्कार किया जाय ॥ १२॥
(१७६) [५ अधिक फोटलीय अर्थशास्त्र पापण्डसहद्रव्यमश्रोत्रियभोग्यं देवद्रव्यं या कृत्यकराः प्रेतस्स दग्धहृदयस्य वा हस्ते न्यस्तमित्युपहरेयुः ॥ ४३ ॥ देवताध्यक्षो दुर्गराष्ट्रदेवतानां यथासमेकसं कोशं कुर्यात् ॥ ४४ ॥ तथैव चापहरेत् ।। ४५॥ किसी पासण्डी या समूहकी सम्पतिमी, तथा जिसरा कोई माग श्रोप्रियके पास न जाता हो ऐसे किसी मन्दिरको सम्पत्तिको, यह मरे हुए है, अथवा घर जले हुएकी है ऐसा कहते हुए कृत्य करनेवाले पुरुष लेप्रांच, और राजाको अर्पण कादं ॥ ४३ ॥ देवताध्यक्ष, दुर्ग और राष्ट्रके देवताओं (देव मन्दिरों) के भाय धनको यथोचित रूपमे एक स्थानपर रवान ।। और फिर राजाको देदिया करें ॥ ४५ ॥ दैवतचेत्यं सिद्धपुण्यस्थानमापपादिकं या रामावुत्थाप्य यात्रा- समाजाभ्यामाजीवेत् ॥ ४६ ॥ चैत्योपवनवृक्षण या देवताभिग- मनमनातवपुष्पफलयुक्तेन ख्यापयेत् ॥ ४७ ।। किसी प्रसिद्ध पविग्रस्थानमें भूमिको फाडकर देवता निकला है, ऐसी प्रसिद्धि काफर रातिम वहां एक देयताफी पेदी भनवादे, और मेला लगवाकर यात्रियों तथा अन्य पुरषासे उसपर खूब अट घढवार्य, और उसे राजाको अर्पण करदे ।। ४६ ॥ शिनाही ऋतुके देवमन्दिरके उपवनमें प्रयत्नपूर्वक किसी वृक्षपर फल या फूल पैदा करपाके, प्रसिद्धि करादे कि यह देवताकी महिमा . मनुष्यकर या वृक्षे रक्षोभय रूपयित्वा सिद्धव्यजनाः पौरजान पदानां हिरण्येन प्रतिकुर्युः ॥ ४८ ॥ अधवा सिद्धोंके भेसमें घूमनेवारे गुप्तपुरप, रातमें किसी वृक्षपर बैठकर, "मुझ प्रतिदिन एक २ मनुष्य देना चाहिये, नहीं तो सबको खाजा- ऊँगा" इस प्रकार मनुष्यकर मागते हुए राक्षसका भय दिखल कर, नगर तथा जनपदनियासी पुरुपाके धनसे इस भयका प्रतीकार करावे ! और उस धनको राजाको देदेये ॥ ८ ॥ सुरङ्गायुक्ते वा कूपे नागमनियतशिरस्तं हिरण्योपहारेण दर्शयेत् नागप्रतिमायामन्तश्छिद्रायाम् ।। ४९ ।। अथपा किसी सुरनवाले कुएमें तीन सिरवाले, या पाच सिरपाले बनार घटी सापको, इस प्रकारकी पोली तापकी मूतिम दिखलाये कि ज़िममें कोई - २ अध्या.] योगवृत्त (१७७) असली साप समा सकता हो । और दिखाने के बदले दर्शकोंसे धन ले लेवे । यह धन राज्ञाको देदिया जाये ॥१९॥ चैस्यच्छिद्रे वल्मीकछिद्रे या सर्पदर्शनमाहारेण प्रतिबन्धसंज्ञ कृत्वा श्रद्धधानानां दर्शयेत् ॥ ५० ॥ किसी मन्दिर या धमई (बम्बी) के छेदमें सांपको अचानक देखनेपर उसे मन्य या भोपाधसे बांध लेवे, अर्थात् काम करलेधे, और यह कहते हुए भन्दाल पुरपोझो दिसाये कि देलो देवताको कैसी महिमा है ॥ ५० ॥ अभधानानामाचमनमोक्षणेषु रसमुपचाय्य देवताभिशाप घूयात् ।। ५१ ।। अमित्यक्तं चा दंशयित्वा योगदर्शनप्रतीकारेण वा कोपाभिसंहरणं पुर्यात् ॥ ५२ ॥ जो पुरप इसपर अक्षा न करे, उन्हें चरणामृतके साथ केवल इतना विष देवे, जिससे ये मेहोश होजाय और फिर कहे कि देखो यह नाग देवता का शाप है ॥५१॥ और देवताकी निन्दा करनेवाले पुरएको सांपले फटया देवे । और कहे कि देखो यह देवताका शाप है, अधया फिर औपनिषदिक प्रकरणमें बताई हुई विपचिकित्साके द्वारा उस विषका प्रतीकार करदेवे । इस प्रकार धनसयय करके राजकोशको बढाता जाये॥५२॥ वैदेहकन्यजनो चा प्रभूतपण्यान्तेवासी व्यवहरेत ॥ ५३ ।। स यदा पण्यमूल्ये निक्षेपप्रयोगरपाचितः स्यात्तदैनं रात्री मोप- येत् ॥ ५४॥ अथवा व्यापारीके भेसमें गुप्त राजपुरुष, प्रचुर विक्रय यस्तुएं और अनेक सहायकों को लेकर व्यापार करना प्रारम्भ करदे ।। ५३ ॥ जय इसके पास स्या- पारका धन खूब होजाये, और अन्य पुरुष इसको अरछा सेट समझकर वि. भाससे इसके पास अमानत आदिका धन खूष जमा करदें, तथा व्याज आदिके लिये भी लोग इसके पास काफी पूंजी जमा करदें, तब इसके यहां चोरी करवा देवे भर्थात् चोरीके बहानेसे वह सारा धन राजा ले लेवे ॥ ५॥ एतेन रूपदर्शकः सुवर्णकारश्च व्याख्यातौ ।। ५५ ॥ इसी प्रकार राजकीय सिकोका निरीक्षक और सुवर्णकार भी छल करके राजकोपके लिये धन इकहा करें । (अर्थात् निरीक्षक सिकोको परीक्षाके लिये अपने घरमें इकठा कराये, रातको पहां चोरी होजाय । इसी प्रकार सुवर्णकारके यहां जय आभूपण बनागेके लिये लोगोंका यहुत सोना इकट्ठा होजाय, यहां चोरी करवा लीलाबे) ॥ ५५ ॥ । ।
(१७८) कौटलीय अर्थशास्त्र [५ अधिक वैदेहकव्यानो वा प्रख्यातव्यवहारः प्रवहणनिमित्तं याचित- कमवक्रीतकं या रूपसुवर्णभाण्डमनेकं गृहीयात् ।। ५६ ।। समाजे वा सर्वपण्यसंदोहेन प्रभुतं हिरण्यसुवर्णमृणं गृह्णीयात् ॥ ५७ ॥ अयथा व्यापारीका मेस बनाकर गुप्तरामपुरष अपने प्रयविक्रय व्यव- हारके खूब प्रसिद्ध होजानेपर, एक दिन जौनार (निमन्त्रण-पोत) के यहाने भासपासके सब लोगोंके यहाँस चांदी भोर सोनेके अनेक प्रकारके यर्तन,मांग कर या भाडेपर ले । ॥ ५६ ॥ श्रीर अनेक पुरवोंकी उपस्थिति में अपने सम्पूर्ण मालकी बोटम (के बदले) पर्याप्त हिरण्य सुवर्ण आदि धन ऋण से रु। ५७६१ प्रतिभाण्डमूल्यं च ॥ ५८ ।। तदुभयं रात्रौ मोपयेत् ॥५९|| और दूसरे दिन जिनको अपनी वस्तु बेचनी हरें, उनसे प्रतिवस्तुका भूल्प भी ले लेवे ॥ ५८ ॥ इन दोनों यस्तुओं (नकदीमाल और सोने आदिके असनों) को रातमें चोरी करवादे । अर्थात् चोरीके यहाने राजाके कोपमें यह धन भिजवा दिया जाय ॥ ५९॥ साध्वीव्यञ्जनाभिः सीमियानुन्मादयित्वा तासामेव वैश्म- स्वमिगृद्य सर्वस्वान्याहरेयुः ॥ ६ ॥ बुलीम स्पिोंकि भेसमें रहनेवाली (राजकीय गुस) स्त्रियों के द्वारा राजासे दुश्मनी रखनेवाले दूप्य पुरषोंको उन्मए पनाकर, उन स्त्रियोंके घरमें ही उनको गिरफ्तार किया जाय, और उनका सर्वस्व अपहरण कर लिया जाय ॥६०॥ दूप्यकुल्यानां वा विवाद प्रत्युत्पने रसदाः प्रणिहिता रस दः ॥ ६१॥ तेन दोषणेतरे पर्यादातव्याः ।। ६२॥ दूप्य पुरपोंका अपने खानदानी लोगों के साथ कोई क्षगा खड़ा होने पर, विष देनेवाले मुफिया रसोईये भादिके वेपमें उनके पास ही रहते हुए किसी एक पक्षवालको विष देवें ॥३१॥ इसी अपराधमें दूसरे दूष्योंका सर्वस्व अपहरण कर रिया जाये ॥ १२॥ दप्यमभित्यतोवा श्रद्धयापदेशं पुण्यं हिरण्यनिक्षेपमणप्रयोग दायं वा याचेत ॥ ३॥ कोई अभिव्यक्त (पध्य-सियो मारदेना चाहिये ऐसा व्यक्ति), माल, स्वर्ण आदिकी अमानत, ऋण भयवा दायभागको दुप्पके पास आकर उससे - A २ अध्याoj योगवृत्त . (१७) इस प्रकार मांगे, जिससे कि लोगों को विश्वास होजाय कि इन यस्तुभास इसका भयरप कुछ न कुछ सम्बन्ध है ॥१६॥ दासशब्देन या दप्यमालम्बेत ॥ ६४ ॥ भार्यामस्य स्नुपां दुहितरं या दासीशब्देन भार्याशब्देन वा ।। ६५ ॥ तं दूप्यगृह- प्रतिद्वारि राबायुपशयानमन्यन या वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा चूयात् . अथवा दुप्पको दास कहकर पुकारे ॥ ६४ ॥ या इसकी भाषां, पुनवधू और साफीको दासी शरसे या अपनी भाषा कहकर गाली देवे ॥६५॥ तय उपको रातम दूप्यके सरमने सोते हुए, अथवा और किसी जगह निवास करते हुएको, तीक्ष्ण पुरुप जाकर मार देवे, और कहे कि:- हतोऽयमित्थं कामुक इति ॥ ६७ ॥ तेन दोपणेतरे पर्या- दातव्याः ।।६८॥ यह कामी पुरुर इस प्रकार (दृप्यके साथ उ7 प्रकारसे झगड़ा करने के कारण) मारा गया है ॥ ६७ ॥ इयो अपराध दूसर दूप्योंका, राजा सर्वस्व अपहरण करले ॥ ६॥ सिद्धव्यसनो वा दूप्यं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयित्वा घूयात् ॥६९॥ अक्षयं हिरण्यं राजद्वारिक स्त्रीहृदयमारव्याधिकरमायुष्यं पुनीयं चा कर्म जानामीति ॥ ७० ॥ अथवा सिद्ध के मेसमें गुप्तराजपुरुष दुप्यको छलविद्याओंसे प्रलोभन देकर कहे कि:-॥ ६९ ॥ में अक्षय मुवर्णके सजानेको देखना, राजाको चशमें करना, सीके हृदयको अपनी ओर आकर्षित करना, दुश्मनको यीमार करदेना, आयुको यहागा, और सन्तान उत्पन करना, आदि कामाको अच्छी तरह जानता हूँ" ॥ ७० ॥ प्रतिपन्नं चैत्यस्थाने रात्री प्रभूतसुरामांसगन्धमुपहार कार- येत् ॥७१॥ एकरूपं चात्र हिरण्यं पूर्वनिखातं प्रेताङ्गं प्रेतशिशु यत्र निहितः स्यात्तो हिरण्यमय दर्शयेदत्यल्पमिति च श्रूयाद ॥७२॥ जय उसको विश्वास आ जाय, तो किसी देवस्थान में जाकर रातमें उससे खूब मदिरा मांस और गल्य अादि भेट देवताको घदयाचे ॥१॥ .
अधिक १९८०) कोटलीय अर्थशास्त्र पहिलेसेही गाद हुए (तशालीन) एक सिकेकी परापर सोनेको, जहाँपर मुर्देका कोई अंग, या मरा हुआ बया गढरहा हो, यहांसे मिकालकर इस भूध्यको दिखावे, और कहे कि यह बहुत थोदा है। क्योंकि तुमने भेंट भी थोड़ाही चढ़ाई है) । ७२ ॥ प्रभूतहिरण्यहेतोः पुनरुपहारः कर्तव्य इति स्वयमेवैतेन हिर- ण्येन श्वोभूते प्रभूतमोपहारिक क्रीणीहीति ।। ७३ ॥ तेन हिर- ण्येनौपहारिककये गृह्येत ॥ ७४ ॥ यदि तुम यहुत अधिक हिरण्य चाहते हो तो तुमको देवतापर भीर अधिक भेंट चढ़ाना चाहिये, तो यह भी सोना लो, इस सोनेसे तुम फलको अपने भापही पाजार में जाफर अधिक चढ़ायेका सामान सरीदना ॥४॥ जय वह दूष्य उस सोनसे यदाका सामान पाजारसे खरीदने लगे, तपही उसको गिरफ्तार कर लिया पाय, भौर इस अपराधम उसका सर्वस्व अपहरण फरलिया जावे ॥४॥ मातृव्यअनाया वा पुत्रो मे त्वया हत इत्यवरूपितः स्यात् ।। ७५ ।। संसिद्धमेवास्य रात्रियागे नयागे वनक्रीडायां वा प्रवृत्तायां तीक्ष्णा विशस्याभित्यक्तमतिनयेयुः ॥ ७६ ॥ अथवा कोई गुप्तराजनी, माताके भेसमें आकर दूप्यके उपर मिथ्या दोषारोपण करे कि तूगे मेरे लड़केको मार डाला है ॥ ४५ ॥ दूप्यके रानियाग (रामिका हवन), यनयाग (जंगलमे किये जानेवाला होम), और यमझोडाके प्रारम्भ होनेपर, तीक्ष्णपुरुष पहिलेहांसे तैयार किये हुए वश्य पुरुषको मारकर रात्रियाग आदिके समीपस्थाममें गाद देवें । और इसी अपराध दूप्यको पकड़ उसका सर्वस्व अपहरण करलिया जाय ॥६॥ ध्यस्य वा भृतकन्यजनो वेतनहिरण्ये कूटरूपं प्रक्षिप्य प्ररूपयेत् ॥ ७७ ॥ कर्मकारख्यर्खनो वा गृहे कर्म कुर्वाणस्तेन कूटरूपकारकोपकरणमपनिदध्यात् चिकित्सकन्यवनो वा गर- मगरापदेशेन ।। ७८॥ भभवा दूष्य के नौकरके रूपमें रहता हुआ कोई खुफिया नौकरीका धन पानेपर उसमें जाली सिका मिलाकर राजाको खवर देवे ॥ ७ ॥ अथवा पाकरके भेसमें दूष्पके घर काम करता हुभा कोई सुफिया चोरी २ जालीसिके मनानेके सर साधनाको यहां रखदे । अथवा वैयका भेस बनाकर विपनासक 'भापधिके यहानेसे उसके (प्यके) हाधम विष देदेवे । (सूसमें 'गरमगदापदे- ३ अध्या योगवृत्त (१४) शन' यह भी पाठान्तर है, उसका भर्थः-रोगनाशक औषधिके महाने रोगव- ईक औपाधि देकर' यह करना चाहिये) और इसी अपराधम दूप्यको पकड़कर उसका सर्वस्व अपहरण करलेवे ॥ ७॥ प्रत्यासन्नो वा दूप्यस्य सच्ची प्रणिहितमभिपेकभाण्डममित्र- शासनं च कापटिकमुखेन आचधीत कारणं च ग्रूयात् ॥ ७९ ॥ अथया दृष्यके समीप रहता हुभा कोई सत्री (गुप्तचर विशेष), दूप्यके घरमें ररो हुए अभिषेकके सामान भीर धानुके लेखको कापटिक (गुप्तचर विशेष) के द्वारा राजाको कहे । और इसका कारण यह पताये कि दूप्य राजाको मारकर शत्रुको रग्यपर अभिषेक करने का यत्न करता है, इरयादि । इसी अप- राधमें उसका सस्प अपहरण कलिया जाये । ७९ ॥ एवं दूष्येषधार्मिकेषु च वर्तेत ॥ ८ ॥ नेतरेषु ।।.८१ ।। अधिक कोश जमा करने के लिये राजा ऐसे उपार्यो। प्रयोग टूप्यों और अधार्मिक पुरापरही करे ॥ ८० ॥ अन्योंपर नही ।। ८१॥ पकं पकमिवारामात्फलं राज्यादवाप्नुयात् । आमच्छेदभयादामं वर्जयेत्कोपकारकम् ॥ ८२ ॥ इति योगयुसे परमे अधिकरणे कोशालिसहरणं द्वितीयो ऽध्यायः ॥ २ ॥ आदितो द्विनवतिः ॥ ९२ ॥ राजा दुष्ट पुरपीफे धनको इस प्रकार ले लेये, जैसे पके हुए फलको याटिकासे ले लिया जाता है, और धमारमाओ धनको इस प्रकार छोड़ दिया जाय, असे करे फलको छोड़ दिया जाता है । को फल की तरह धोरमानासे लिया हुआ धन भी प्रशातेके कोपका कारण होता है। अभीर जैस कया फल खाया हुभा देहकी पिस कर आदि प्रकृतिको कुपित करदेता है । ऐसेही धमारमाका लिया हुआ धन प्रकृति अर्थात् प्रजाको कुपित करदेता है ॥ ८२ ॥ योगवृत्त पञ्चम अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त । तीसरा अध्याय। ९१ प्रकारण। भृत्योंका भरण पोषण। दुर्गजनपदशक्त्या भृत्यकर्म समुदयवादेन स्थापयेत् ॥ १॥ कार्यसाधनसहेन वा भृत्यलाभेन शरीरमवेक्षेत ॥ २ ॥ दुगे और जनपदकी शक्तिके अनुसार नैकरोंके लिये अपनी सम्पूर्ण 1५ अधि० और राज- (९८२) कौटलीय अर्थशास्त्र भायका चौथा भाग म्पय करके, उनकी स्थापना करे ॥1॥ अथवा कार्य फरने में समर्थ मृत्य, जितने धनसे मिल सकें, उतनाही धन देकर (सहं यह सम्पूर्ण मायके चतुर्थांशसे अधिक भी हो) उनकी नियुक्ति फरे । परन्तु धाम. दनीकी असली हालतको अवश्य देखता रहे, (शरीरमयेक्षस)। कहीं ऐसा न हो कि आमदनीसे ज्यादा व्यय होगाय ॥ २ ॥ न धर्मार्थों पीडयेत् ॥ ३॥ ऋत्विगाचार्यमन्त्रिपुरोहित सेनापतियुनगजराजमातृराजमहिन्यो ऽष्टचत्वारिंशत्साहस्राः॥४॥ एतावता भरणे नानास्वाद्यत्वमकोपर्क चैपां भवति ॥ ५ ॥ ऐसा कोई भी काम न करे जिसमें धर्म और अर्थको पीस पहुंचे। भधात् देवकार्य, पितृकार्य और रान आदि धमाको, तया दुर्ग, सेतु और घ्या. पारी मार्ग बनवाना आदि अर्थसाधक कार्यों को बरायर करता रहे ॥३॥ ऋत्विर, भाचार्य, मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, राजम महिपी पटरानी) इनको प्रतिवर्ष ४८००० सहस्र पण वेतनरूपमें दिया जाय ॥४॥ क्योंकि भरणपोपगके लिये इतना वेतन मिल्नेपर ये भारामसे रह सकते हैं। और राजाके प्रति कोपके कारण न बनेंगे ॥५॥ दौवारिकान्तर्वशिकपशास्तृसमाहर्तृसंनिधातारचतुर्विंशतिसा- हस्राः ॥ ६॥ एतावता कर्मण्या भवन्ति ॥७॥ कुमारकुमार- मातनायकाः पौरव्यावहारिककाान्तिकमन्त्रिपरिपद्राष्ट्रान्तपालाथ द्वादशसाहस्राः ॥८॥ दौवारिक ( द्वारपाल-द्वाररक्षाका मुख्य अधिकारी), अन्तर्वशिक ( अन्न पुरका रक्षक , आयुधायक्ष, हमाहर्ता (धान्यकर आदि वसूल करने वाला प्रधान अध्यक्ष ), और भाण्डागाराध्यक्षको २४ सहस्त्र पण धार्पिक दिया जावे॥६॥ इतना वेतन मिलनेपरही ये कार्य करने में समर्थ हो सकते हैं ॥ ७ ॥ कुमार (युवराजसे अतिरिक्त अन्य राजकुमार), कुमारमाता (पट- रानीसे अतिरिक्त अन्य रानिया अथवा राजकुमारोको पालन करनेवाली धाय ), नायक ( पैदल सेनानीका नेता सूबेदार मेजर ), मगर निरीक्षक, व्यापारा. ध्यक्ष, कृपि भादिका अध्यक्ष, मन्त्रिपरिपके १२ सदस्य, राष्ट्रपाल ( सम्पूर्ण म. म. गणपति शास्त्रीने 'कुमार' का अर्थ 'अश्वानुचर' और 'कुमारमाता' का अर्थ 'अशीतिजननेता' किया है । यह अर्थ उनकी प्रान्तिक भाषामें उपलब्ध हुए, अर्थशास्त्र विसी पुराने अनुगदके भाधारपर किया गया है। परन्तु यह अर्थ फुछ संगत प्रतीत नहीं होता।
.
३ आपा०
योगवृत्त
पुलिसंफर मुख्य अधिकारी पुलिस सुपरिन्टेपदेण्ट ), अन्तपाल, ( सीमा निरी-
क्षक), इनको १२.०० वार्पिक दिया जावे ॥८॥
स्वामिपरिवन्धनलसहाया घेतायता भवन्ति ॥ ९॥ श्रेणी-
मुख्या हस्त्यश्वरथमुख्याः प्रदेष्टारबाटसाहसा ॥१॥ स्ववर्गा-
नुकर्पिणो घेतावता भवन्ति ॥ ११ ॥
इतना येतन देनसे ये लोग सदा राजाके अनुकूल रहेंगे, और उसकी
सहायता करने के लिए हर समय तैयार रहेंगे ॥ १ ॥ सजातीय शिदिपयोंके
निरीक्षक, (इञ्जिनीयर) हाथी, घोडे, और रथोंके निरीक्षक, तथा प्रदेष्टर
(कप्टफशोधनाधिकारी ), इनको ८००० पार्पिक दिया जाये ॥ १० ॥ इतना
वेतन मिलने पर ये लोग अपने घर्गके कर्मचारियोंको अनुफूल रक्खेंगे।
पत्यश्वरथहस्त्यध्यक्षा द्रव्यहस्तियनपालाश्चतु:साहस्राः
॥१२॥ रथिकानीकचिकित्सकावदमकवर्धकयो योनिपोपकाच
द्विसाहताः॥१३॥
पदाति सेनाका अध्यक्ष, अश्वारोही, रथारोही, गजारोही सेनाओंके
अध्यक्ष, लकड़ी और हाधियोंके जंगलोंके निरीक्षक, इनको ४००० पण वार्षिक
दिया जावे ।। १२॥ रथका चलाना सिपानेवाले, गज शिक्षक, चिकित्सक,
शरपशिक्षक, तथा, मुर्गे, सूभर भादि पालनेवालोंका अध्यक्ष, इनको २०००
पण यार्षिक येतन दिया जाय॥ १३ ॥
कार्तान्त्रिकनैमित्तिकमौहर्तिकपौराणिकम्तमागधाः पुरोहित-
पुरुषाः सर्याध्यक्षाथ साहस्राः ॥ १४ ॥ शिल्पवन्तः पादाता:
संख्यायकलेसकादिवर्गः पञ्चशताः ॥ १५ ॥
स्त्री या पुरपॉके हाथ आदि लक्षण (चिन्ह) देखकर उनके भूत या
भविष्यत् को बतानेवाले, शकुन बतानेवाले, ज्योतिषी, पुराणोकी कथा कहने
थाले, सारथि, रसुति पाटक, पुरोहिरा भृत्य और सुरा आदिके अध्यक्ष, इनको
100. चार्षिक दिया जावे ।। १४ ।। प्रकार, पादात (गरका, यनैट, तलवार
भादि चलने में अत्यन्त चतुर), हिसाय करनेवाला तथा रेखक आदिको ५००
पण वार्षिक दिया जाय ॥ १५ ॥
कुशीलवास्त्वर्धतृतीयशताः ॥१६॥ हिगुणवेतनाचैपां तृर्य-
कराः ॥ १७ ॥ कारुशिल्पिनो विंशतिशतिकाः ॥१८॥ चतुष्पद-
द्विपदपरिचारकपारिकर्मिकोपस्थायिकपालकविष्टिवन्धकाः पहिवे-
बनाः॥१९॥
A (१८४) कौटलीय यर्थशास्त्र [५ अधिक कुशीलर (कट) अदिको २५० पण, और जो उनमें अढ़िया वागे आदि भी यनाना नानते हों, उन्हें दुगना अयान ५०० मण दिया जाय ॥१६॥10॥ भन्य साधारण कारीगरोंको १२. पण दिया जाय ॥ १८ ॥ पशु राधा मनुष्योंके परिचारक और उनके मुखिया, शरीर परिचारक (स्नानादि करानेपाल ) गौ भादिकी रक्षा करनेवाले, और पंगारियोंको ६. पण पार्पिक घेतन दिया जाय ॥१९॥ कार्ययुक्तारोहकमाणवकशलखनकाः सर्वोपस्थायिन आचार्या विद्यावन्तश्च पूजावेतनानि यथाई लभैर-पाजशतावरं सहसपरम् ॥ २० ॥ माय (अच्छे स्वभाव वारा सापुरप), युत्तारोहक (यिग हुए घोदे भादिपरभी जो अच्छीतरह सवारी करसके), माणवक (पेदादि पढ़नेवाला विद्यार्थी), पत्थर आदिपर खोदनेवाला (मपाशी करनेवाला), गाने आदिमें अत्यन्त चतुर गान्धर्वाचार्य (सर्वोपस्थापिन आचार्याः), और भाजे पिताम् पुरणको उनके सत्कारार्थ योग्यतानुसार ५०० पणसे १००० पण तक दिया जाय॥२०॥ दशपणिको योजने दूतः मध्यमः ॥२१॥ दशोत्तरे द्विगुण- वेतन आयोजनशतादिति ॥ २२ ।। समानविद्येभ्यस्त्रिगुणवेतनो राजा राजसूयादिपु ऋतुषु राज्ञः सारथिः साहस्रः ॥ २३ ॥ एक योजन जानेवाले मध्यम (न बहुत तेज चलनेवाले न मन्द) दूत को १० पण दिये जाय ॥२१॥ दस योजनसे अधिक सौ योजन तक चलने वालेको दुगना, अर्थात् प्रतियोजन २० पण दिये जाय ॥२२॥ राजसूय आदि यज्ञोके करनेपर राजा, मन्त्री पुरोहित आदिको उनके साधारण घेतनसे तिगुना देवे । और राजाको यज्ञ स्थानमें लाने वाले सारधिको १००० पण दिया जाय ॥ २३ ॥ कापटिकोदास्थितगृहपतिकचैदेहफतापसव्यजनाः साहस्राः ।।२४। ग्रामभृतकसञ्चितीक्ष्णरसदभिक्षुक्यः पञ्चशताः ॥ २५ ॥ चारसंचारिणोर्धतृतीयशताः प्रयासवृद्धयेतना या ॥ २६ ॥ कापटिक, उदास्थित्त, गृहपतिक, येदेहक और तापस आदि के मेसमें काम करनेवाले गुप्तचरोंको (ये सय गुप्तचरोंके भेद है) १००० पण दिया जावे ॥ २४ ॥ गांपके नौकर (धौषी नाई आदि) अथवा गांव के मुखिया सन्नी (गुस- ।
- १९८५) 15 m ३ अध्या०] योगवृत पर विशेष ), तीक्ष्ण, विष आदि देनेवाले, राधा भिक्षुकीके वेषभं काम करने पाले गुप्तचरोंको ५०० पण दिया जाय ॥ २५ ॥ घरोंको इधर उधर भेजनेवाले कर्मचारियोंको २५० पण दिया जाय । अथवा मेहनतके अनुसार सबको अधिक घेतन मिले॥२६॥ शतवर्गसहस्रवर्गाणामध्यक्षा भक्तवेतनलाभमादेशं विक्षेप च कुर्युः ।। २७ ।। अविक्षेपो राजपरिग्रहदुर्गराष्ट्ररक्षावेक्षणेषु च नि- त्यमुख्याः स्युरनेकमुख्याश्च ।। २८ ॥ उपयुक भृत्योंके शतवर्ग या सहस्रवर्ग के अध्यक्ष, भृत्योंको मसा घेतन देय और राजाकी मामाका उनसे पालन करावं तथा उनको उचित स्थानापर नियुक्त अश्या तम्बोल कर ॥ २७ ॥ किसी वर्ग क कार्य न होनेपर, उसका अध्यक्ष, राजमहल, दुर्ग तथा राष्ट्रकी रक्षा और देसभालके लिए पुरपाको नियुम करे, श्येक धक कर्मचारी अपने अध्यक्ष के अधीन रहकर अपने अपने फायाँको टीक ठीक करे । अध्यक्षमी भनेक होने चाहिये ॥२८॥ कर्मसु मृतानां पुनदारा भक्तवेतनं लमेरन् || २९ ।। चाल. वृद्धव्यापिताश्चपामनुग्राह्याः ॥ ३० ॥ प्रेतव्याधितमतिकाकृत्येपु चपामर्थमानकर्म कुर्यात् ॥ ३१ ॥ अल्पकोशः कुप्यपशुक्षेत्राणि दद्यात् ॥ ३२ ॥ अल्पं च हिरण्यम् ॥ ३३ ॥ राजर्मचारियोंके काम करते हुए मरजानेपर उनके घेतन आदिको उनये लपके या स्त्री ऐ॥ २१ ॥ मृत राजकर्मचारियों के पाएक बृढे और श्रीमार सम्बन्धियोपर राजा सवा अनुग्रह दृष्टि बनाये रखे ॥ ३० ॥ तथा इनके यहा मौत बीमारी या बच्चा आदि पैदा होनेपर, आथक सहायता, और जाने भानेसे सरकार आदि करता रहे ॥३१॥ खजागेम कमी होनेपर राजा, सहा यता देने योग्य पुरुपको कुप्य, पशु तथा जमीन आदि देवे ॥ ३२॥ सुवर्ण आदि बहुत धोढा देवे ।। ३३ ॥ शून्यं वा निवेशयितुमभ्युत्थितो हिरण्यमेव दद्यात् ॥३४॥ न ग्रामं ग्रामसजातव्यवहारस्थापनार्थम् ॥ ३५ ॥ एतेन भृताना.' मभृतानां च विद्याकर्मभ्यां भक्तवेतनविशेपं च कुर्यात् ॥ ३६ ।। परन्तु यदि राजा निर्जन मैदानोंको बसाना चाहे, तो स्वर्णही अधिक देये ॥२१॥ जमीन आदि न देखें। जिससे कि बसे हुए गायके मूल्य आदिका निर्णय, ध्यपहारको स्थापनाके लिये ठीक तौर पर होसके । (अर्थात् 1 कौटलीय अर्थशास्त्र [५,अधि. भमुक गांव में इतना सुवर्ण ग्यय होगया है, उससे इतनी अमदनी अवरय होनी चाहिये, इस प्रकारके व्यवहारका निश्चय करने के लिये) ॥ ३५ ॥ इप्सी प्रकार स्थायो या अस्थायी कर्मचारियों के विद्या और कार्यको न्यूनाधिकताके भनुमार, उन्हें न्यून या अधिक येतन तथा भसा दिया जावे ॥ ३६ ॥ पाटिवेतनस्साढकं कृत्वा हिरण्यानुरूपं भक्तं कुर्यात् ॥ ३७॥ पत्त्यश्वरथद्विपाः सूर्योदये बहिः संधिदिवसनर्ज शिल्पयोग्याः कुर्युः ॥ ३८ ॥ तेषु राजा नित्ययुक्तः स्यादभीक्ष्णं चैपां शिल्पदर्शनं कुर्यात् ॥ ३९ ॥ ६. पणके पीछे एक आदकभर अन्न दिया जाये, इसीके अनुसार वतन जैस २ न्यून या अधिक हो, पैसेही वैसे अन्न (भन भत्ता) भी न्यून अथवा अधिक दिया जाय ॥ ३७॥ अमावस्या आदि छुट्टीके दिनोंको छोटकर सूर्योदय होनेपर ही पदाति, अश्वारोही, रथारोही, और गगारोही सेनाको कवायद सिखलाई बावे ॥३८॥ राजाको चाहिए कि यह सेनाओंपर यरायर सदा ध्यान रक्से । और जरदा जली उनकी कवायद आदि को देखता रहे ॥ ३९ ॥ कृतनरेन्द्रात शस्त्रावरणमायुधागारं प्रवेशयेत् ॥४०॥ अशस्त्राश्चरेयुरन्यन मुद्रानुज्ञातात् ।।४१॥ नटं विनष्टं या द्विगुणं दद्यात् ।।४२॥ और शस्त्रचर्या कायद) के बाद, रानाकी मुद्रा (मोहर) से चिन्हित फौजी हथियारों और कवच आदिको आयुधागारमें ररावा दिया जावे ॥ ४० ॥ जिनको हर समय हथियार रखने का सैसन्स मिला हुआ है, उनको छोड़कर पाकी सब सिपाही आदि बिना ही हथियाराक इधर उधर आ जायें ॥ ४१॥ जो हथियार खोजाय या टूटफूट जाय, उसका दुगना मूल्य उसस वसूल किया जाय ॥४२॥ घा विधस्तगणनां च कुर्यात् ॥ ४३ ॥ सार्थिकानां शस्त्रापरण- मन्तपाला गृह्णीयुः समुद्रमवचारयेयुर्चा। ४४ ॥ यात्रामभ्युत्थितो सेनामुद्योजयेत् ॥ ४५ ॥ आयुधशारा आदिम दृद या नष्टहुए हथियारोका बराबर गिनती करता रहे ॥ १३ ॥ दूसरे देशस आनेवाले व्यापारियोक हथियारा और कवचाको अन्तपाल (सीमा निरीक्षक अधिकारी) रलवे । जिनके पास लसन्स होघे उन्हें छोप, अयात् उनसे हथियार न लेवे, उन्हें सशस्त्र हो देशम माजान॥४॥ ।
1. ४ अध्या०] योगवृत्त (१८७) किसीपर चढाईकी तैयारी करनेवाला राजा अपनी मेनाको अरछी तरह इकठ्ठा करलेवे ।। १५॥ ततो वैदेहकव्यसनाः सर्वपण्यान्यायुधीयेभ्यो यात्राकाले द्विगुणप्रत्यादेयानि दगुः ॥४६॥ एवं राजपण्ययोगविनयो वेतनप्रत्यादानं च भवति ॥४७॥ भार फिर यानाकै समय, राजाके द्वारा नियुक्तहुए गुप्त पुरष व्यपारियों फे मेसमें युद्धको सम्पूर्ण आवश्यक सामग्रीको सिपाहियोंके हाप दुगने दामों पर बेचे ।। ५६ ।। इस प्रकार राजकीय पदार्थाका विषयभी होजायगा, और सिपाहियों को दिया हुआ पेतन, फिर शाही खजाने में कुछ न कुछ लौट आयगा ॥१७॥ एवमवेक्षितायव्ययः कोशंदण्डव्यसनं नाबामति ।। ४८॥ इति भक्तवेतनरिकल्पः ॥ ४९ ॥ इसप्रकार भाय व्ययकी भच्छी तरह देखभाल करनेवाला राजा, कभी भी भाषिक या सैनिक भापतिको प्राप्त नहीं होता ॥५८॥ यहांतक भला पेतमके विषय में विविध विचार किया गया ॥४९॥ सचिणवायुधीयानां वेश्याः कारुकुशीलवा । दण्डवृद्धाश्च जानीयुः शौचाशौचमतन्द्रिताः ॥ ५० ॥ इति योगपृत्त पचम अधिकरणे भृत्यभरणय मृत्तीयो ऽध्याय HAR भादित खिमवति ॥ १३ ॥ सन्नी, पेश्या, कारीगर और पुराने युद्ध सैनिक, यी सावधानी के साथ सिपाहियोंकी ईमानदारी (मघाईसे काम करना शौचम्) और बेईमानीका (अशोधम् ) जानें, । अर्थात् उनके काम करनेके दगका सदा निरीक्षण करते रहे। ५०॥ योगवृत्त पञ्चम अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त । ९२ प्रकरण चौथा अध्याय मन्त्री आदिराजकर्मचारियोंका राजाके प्रति व्यवहार ।। लोकयावाविद्राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसंपन्नं प्रियहितद्वारेणा-
[५ अधिक
(१८८)
कोटलीय अर्थशास्त्र
श्रयेत ॥ १॥ यं वा मन्येत यथाहमाश्रयेप्सुरेखमसौ बिनयेप्सुरा.
भिगामिकगुणयुक्त इति ॥ २॥
सांसारिक स्यहाराम चतुर पुरप, आत्मसम्पप्न (महाकुलीन और देवी
घुद्धि आदिसे युक), तया योग्य अमायर्यासे युक्त रानाका, राजाके प्रिय और
हितपी पुरपोंके द्वारा आश्रय लेवे ॥१॥ यदि ऐसा राजा न मिले, तो जिसको
यह समझे कि-'जैसे में अच्छा आश्रय पाइसा ह, ऐसे ही यह विद्यावृद्ध अनु.
| भयो पुरषको चाहता है' ऐसे आत्मसम्पन्न राजा आश्रय लेने ॥२॥
इन्यप्रकृतिहीनमप्येनमाश्रयेत ॥३॥ न त्वेवानात्मसंपन्नम्
॥४॥ अनात्मवान्हि नीतिशास्त्रद्वपादानर्थ्यसंयोगाद्वा प्राप्यापि
महदैश्वर्य न भवति ॥ ५॥
चाहे वह द्रव्य प्रकृति हीनही हो, अर्थात् श्रेष्ठ गुणपाले अमारय आदिसे
युक्त न भी हो ॥ ३ ॥ परन्तु जो राजा भरमसम्पन्न न होये, चाहेयह अमात्यादि
प्रकृतिसे युक्त हीहो, उसका आश्रय कदापि न ले ॥४॥ क्योंकि भारमम.
म्पत्तिहीन राजा, नीतिशास्त्र आदिकी जानकारी न रखनेके कारण अपवा भन-
र्थकारी मृगया घूतआदि कार्यों के करने, या इस प्रकारके पुरोकी संगति करने
के कारण, महान् पितृ पैतामह ऐश्वर्यको मास करकेभी नष्ट होजाता है ॥५॥
आत्मवति लब्धावकाशः शास्त्रानुयोग दद्यात् ।। ६ ॥ अवि-
संवादाद्धि स्थानस्थैर्यगवामोति ।। ७ ॥ मतिकर्मसु पृष्टः तदात्वे
चायत्यां च धर्मार्थसंयुक्तं समर्थ प्रवीणवद परिषद्धीरुः कथयेत् ।।८।।
यदि राजा आरमसम्पनहो तो अवसर आनेपर उसे शास्त्रानुकूल सम्मति
देवे ॥ ६ शास्त्र के साथ उसकी सम्मतिमा मिसान हो जाने पर राजाको यह
निश्चित होजाता है कि यह नीतिशास्त्र के तापको जानने वाला है, और फिर
उसकी किसी अधिकारी पदपर स्थायी नियुक्ति होजाती है ॥ ७ ॥ अति विचार-
णीय विपयोंके सम्बन्धमें उससे कुछ पले जानेपर, उस समय पा भविष्यत्में
धर्म और अर्थसे युक्त, शक्तिसम्पर चतुर पुरपोंके समान, सभाम न डरता हुआ
भाषण करे ॥८॥
इप्सितः पणेत ॥ ९॥ धर्मार्थानुयोगमविशिष्टेषु बलब-
संयुक्तेषु दण्डधारणं बलवत्संगोगे तदात्वे च दण्डधारणमिति
न कुर्याः ॥ १० ॥ पक्षं धृत्तिं गुह्यं च मे नोपहन्याः ॥ ११॥
संजय च त्वां कामक्रोधदण्डनेषु पारयेयामिति ॥ १२ ॥
- ४ अध्या०] योगवृत्त ( १८९) यद राजा उसको अमात्य बनाना चाई, तो यह राजाके साथ इस प्रकार निम्नलिखित शतं करे कि-॥९॥ जो पुरुष साधारण बुद्धि वारे है और धर्म अर्थके तत्वॉको नहीं समझते, उनसे कभी जिज्ञासाके तौरपर धर्म भर्थक सम्बन्ध प्रश्न न करना, तथा यलवान् , या बलवान् जिसके सहायक हो ऐसे शत्रुपर दण्ड न उठाना, और मेरे सम्बन्ध भी किसी यातपर फौरन ही दण्ड न उठाना ।। 10 ॥ मेरे पक्ष, मेरे व्यवहार या जीविका तथा मेरे गुप्त रहस्योंको कमी नसेलना या नष्टकरना ॥ ११ ॥ काम या शोधके वशीभूत होकर अनुचित दण्ड देनेके लिए तैयार हुए २ तुमको, मै परापर इशारोंसे रोकगा। तुम इसका ध्यान रखना और बुरा न मानना ॥ १२ ॥ आदिष्टः प्रदिष्टायां भूमापनुज्ञातः प्रविशेत् ।। १३ ।। उप- विशेच पार्थतः संनिकृष्टः विप्रकृष्टः परासनम् ।। १४ ।। विगृह्य कथनमसभ्यमप्रत्यक्षमश्रद्धेयमनृतं च वाक्यमुच्चैरनमणि हासं यातष्ठीवने च शब्दवती न कुर्यात् ॥ १५ ॥ 'राजाकी अनुमतिले किसी अधिकार पदपर नियुक्त हुभा २ कार्य करे ॥ १३ ॥ तथा राजाके समीप इधर उधर (सामने नहीं) न बहुत दूर न अति समीप श्रेष्ठ उचित भासनपर बैठे ॥ १४ ॥ आक्षेप संक, असभ्य, परोक्षविष यक, अविश्वसनीय, तथा असत्य कयन कभी न करे, यमाके उचे कभी न हसे, शब्दके साथ ढकार या सफार कभी न रेगे ॥१५॥ मिथः कथनमन्येन जनवादे द्वन्द्वकथनं राज्ञो वेपमुक्तकह- कानां च रत्नातिशयप्रकाशाभ्यर्थनमेकाक्ष्योष्ठनिर्भोग भ्रकुटीकर्म वाक्यापक्षेपणं च बुपति पलमत्संयुक्तविरोध स्त्रीभिः स्त्रीदर्शिमिः सामन्तदूत प्यपक्षावशिसानयैश्च प्रतिसंसर्गमेकार्थचर्या संघातं च वर्जयेत् ॥ १६ ॥ राजाकी उपस्थिति में ही किसी दूसरे के साथ मिलकर बातचीत करना, किसी अपवाह (जनवाद) की बायत मिश्रित रूपसे हो या ना कहदेना, राजा के या उद्धत पारसण्डियोंके घेशको धारण करना, राजाले धारण करने योग्य शॉकी अपने लिए खुले तौर पर प्रार्थना करना, एक ओख या एक होंठको रंदर फरक बोरना, मौ चढाना, राजा बोलते हुए बीचमें प्राप्त कारना, बलपान के सम्बन्धीसे झगम दरना, नियोंक साथ स्त्रियोंके देखनेवालोंके साथ दूसरे देशके दूतोंके साथ राजाके दुश्मन उदासीन आर तिरस्कृत तथा अनर्थकारी कार्य .
[५ अधिक ( १९०) कोटलीय अर्थशास्त्र या पुरपोके साथ संसर्ग करना, एकही वातको करते चले जाना, और गुह बनाकर रहना आदि सब कामीको सर्वथा छोड़ देवे ॥१६॥ अहीनकालं राजार्थ स्वार्थ प्रियहितैः सह । परार्थदेशकाले च ब्रूयाद्धर्मार्थसहितम् ॥ १७ ॥ पृष्टः प्रियहितं चूयान त्यादहितं प्रियम् । आप्रियं वा हितं घूयाच्ग्यतो ऽनुमतो मिथः ॥ १८ ॥ राजाके मतलबकी यातको उससे फौरन कह देवे, अपने मतलयकी बातको राजाके प्रिय भौर हितकारी पुरुषोंसे कहे, दूसरेके मतलबकी यातको स्थान ओर अवसर देखकर कहे, तथा जो कुछ कहे यह सब धर्म और अर्थसे युक्त होना चाहिए ॥ १७ ॥ राजा के पूछने पर जयकि यह ध्यानपूर्वक सुन रहा हो, उसको अनुमति लेकर प्रिय और हितकारी बातको कहे, अहितकार, प्रिय कभी न कहे, किन्तु अप्रिय हितकारी बातको अवश्य कद देवे ॥ १८ ॥ तूष्णीं वा प्रतिवाक्ये स्याद्वेष्यादीच न वर्जयेत् । अप्रिया अपि दक्षाः स्युः तद्भावाये बहिष्कृताः॥१९॥ अनर्थ्याश्च प्रिया दुष्टाश्चिचज्ञानानुवर्तिनः । अभिहास्येप्पभिहसेदोरहासांश्च वर्जयेत् ॥ २० ॥ उत्तर देते समय यदि अप्रिय याम्प सुनानेमे डर हो, तो चुप हो जावे । और राजाके द्वेष्य पुरुषोंका कथन न करे । क्योंकि ऐसा करनेसे राजा की इद्यानुसार न चलनेवाले पतुर पुरप भी राजाके अप्रिय हो जाते हैं ॥१९॥ भौर राजाकी इच्छानुसार चलनेवाले अनर्थकारी पुरष मी राजाके प्रिय देसे गये हैं। राजाक हंसनेपर हसे, कारकी तरह खड़ा न रहे। और माहासको सर्वया छोड़ देये ॥ २०॥ परासंकामयेद्वोरं न च घोरं परे वदेत् । तितिक्षेतात्मनश्चैव क्षमावान्पृथिवीसमः ॥ २१ ॥ किसी घोर भयावह संवादको दूसरेके द्वारा कहलावे, स्वयं कभी न न कहे। यदि अपने ही अपर कोई ऐसी बात भाजावे, तो पृथिवी के समान क्षमाशील होकर उसका सहन करे ॥२१॥ आत्मरक्षा हि सततं पूर्व कार्या विजानता। अमाविव हि संप्रोक्ता पुंची राजोपजीविनाम् ।। २२ ।। .
- ५ अध्या०] योगवृत्त एकदशं दहेदग्निः शरीरं वा परं गतः । सपुत्रदार राजा तु घातयेद्वर्धयेत वा ॥ २३ ॥ इति योगवृत्ते परमे ऽधिकरणे अनुजीयिवृत्त चतुर्थो ऽध्याय ॥ ४ ॥ आदितश्चतुर्नयति ॥ ९४ ॥ इस लिये समझदार कर्मचारीको सबसे पहिले यही सावधानीके साथ अपनी रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि राजाके आश्रय रहने पाले पुरपाकी स्थिति अनिमें सेल करने वाले के समान कही गई है ॥ २५ ॥ अग्नि तो शरीरके एक- देश, या अधिक से अधिक सारे शरीरको जला सकती ६, परन्तु राजा पुन कलन सहित सम्पूर्ण परिवारको नष्ट कर सकता है। तथा अनुकूल होनेपर उखत भी कर सकता है ॥ २३ ॥ योगवृत्त पञ्चम आधकरणमें चौथा अध्याय समाप्त । पांचवां अध्याय ९३ प्रकरण व्यवस्था का पालन । नियुक्तः कम व्ययविशुद्ध मुदयं दर्शयेत् ॥१॥ आभ्यन्तरं माझं गुवं प्रकाश्यमात्ययिकसुपेक्षितव्यं वा कार्यमिदमेवमिति विशेपयेच ॥२॥ अपने कायॉपर नियुक्त हुआ २ समाहता आदि कर्मचारी पुरुष, सर्चको अलइदा दिराफर शुद्ध आमदनी राजाको दिखाये ॥ ३ ॥ दुर्ग में होने वाले और थाहर जनपद में होने वाले कार्योंको, तथा छिपाकर खुलेतौरपर विन पूर्वक और उपेक्षा पूर्वक किये जाने वाले कार्योंको-'यह इस प्रकार किया गया है' इसतरह राजाके सामने साफ २ कहे, और इन सब बातोंको राजकीय पुस्तकमें लिरादेचे ॥२॥ मृगयानंतमयस्त्रीपु प्रसक्तं चेरमनुवर्तेत ॥ ३ ॥ प्रशंसाभि- रासन्नधास्य व्यसनोपघाते प्रयतेत ॥ ४ ॥ परोपजापातिसंधानो- पाधिभ्यश्च रक्षेत् ॥५॥ राजा यदि मृगया यूत गद्य और स्त्रियों में आसक्त रहता हो, तो उसकी प्रशसा करते हुए उसका अनुगामी बनारह ॥ ३ ॥ और इसके पास रहता [५ मधिल (१९२) कोटलीय अर्थशास्त्र हुआ इसे व्यसनांसे छुपानेका यरन करे ॥ ४ ॥ तथा शत्रुओंके द्वारा मेटालने घाले, गने वाले, और विप आदि देनेवाले पुरुषोंमे राजाकी रक्षा करे ॥ ५ ॥ इगिताकारी चास लक्षयेत् ॥ ६ ॥ कामदेपर्षदेन्यव्यव सायभयद्वन्द्वविपर्यासमिङ्गिताकाराभ्यां हि मन्त्रसंवरणार्थमाचर- न्ति प्रजाः ॥७॥ राजाको चटाको और आकारको बही सूक्ष्म अप्टिसे यार यार देग्यता रहे ॥ ६ ॥ क्योंकि अपने गुप्त रहस्त्रोको छिपाये रखने के लिये बुद्धिमान् पुरप, फाम, द्वेष, हप, दैन्य, व्यवसाय (किसी कार्य करने का निश्चय), भय, इन्द्रों (मुख दु ख आदि) के विपर्यासको, घेष्टाओं तथा विशेष आकृतियोंके द्वारा ही यतलाते हैं । अत चेष्टा आदिके जानने में बढ़ा पान रखना चाहिए ॥ ७ ॥ दर्शने प्रसीदति ॥८॥ वास्यं प्रतिगृह्णाति ॥९॥ आसनं ददाति ।। १० ॥ विविक्तो दर्शयते ॥ ११ ॥ शङ्कास्थाने नातिशङ्कते ॥ १२ ॥ कथायां रमते ॥ १३ ॥ परिज्ञाप्येप्ववेक्षते ॥ १४ ॥ पथ्यमुक्तं सहते ॥ १५ ॥ स्मयमानो नियुक्त ॥१६॥ हस्तेन स्पृशति ॥ १७ ॥ साध्ये नोपहसति ॥ १८ ॥ परोक्षं गुणं ब्रवीति ।। १९ ।। भक्ष्येषु स्मरति ॥ २० ।। सह विहारं याति ।। २१ ॥ व्यसने ऽभ्यवपद्यते ॥ २२ ॥ तद्भक्तीपूजयति ॥ २३ ॥ गुह्यमाचष्टे ॥ २४ ॥ मानं वर्धयति ॥ २५ ॥ अर्थ करोति ॥२६॥ अनर्थ प्रतिहन्ति ।।२७॥ इति तुष्टज्ञानम् ॥२८॥ राजाकी प्रसपताको निम्नलिखित यातोसे समझना चाहिये -वह देख- नेपरही प्रसन्न होजाता है ॥ ८ ॥ उसकी कही हुई यातको ध्यान पूर्वक आद- रसे सुनता है ॥ ९ ॥ उसको यैठने के लिये उचित आसन देता है ॥ १० ॥ विपित्त-एकान्त स्थान भयवा अन्त पुर आदिमे भी उसे दर्शन देता है। शाका असर होनेपर भी, विश्वासके कारण अधिक शङ्का नही करता ॥१२॥ उसके साथ बातचीत करने में कुछ सुखका अनुभव करता है ॥ १३ ॥ दूसरोके यताये हुए कार्योम भी अपने रिय पुरपझी सलाहकी इच्छा रखता है ॥ १४ ॥ हितसे कही हुई कठोर यातको भी सहन करता है ॥ १५ ॥ गुस्कराता हुआ उसे किसी कामपर रगाता है ॥ १६ ॥ हायसे छूता है, अयवा छूते हुए बात करता है ॥ १७ ॥ प्रशसा योग्य किये गये झामपर उसके सामनेही हसता है ॥ १८॥ उपके पीछे उसके गुणों की प्रशंसा करता है ॥ १९ ॥ भोजनोंके सम.
५ अध्या०] योगवृत्त (१९३)) यमें याद करता है, भर्यात् विशेष भोजनॉम उसेभी भुलाता है ॥ ३० ॥ उसके साथ २ संसने कूदने आदिके लिये जाता है ॥ २१ ॥ उसके ऊपर कोई दुःख भानेपर, उस घटाने के लिये पूरी सहायता करता है ॥ २२ ॥ उसके साथ अनु- राग रखने वालों का सूप साकार करता ६॥ २३ ॥ अपने गुप्त रहस्पोंको भी उसके सामने कहदेता है ।। २४ ॥ उसके मान सरकार आदिको खूर यदाता है ॥ २५ ॥ उसकी इच्छानुसार भाधिक सहायता देता है ॥ २६॥ और अन. का निवारण करता है ॥ २७ ॥ इन सय पासास राजाकी प्रसराता जानी जाती ॥२८॥ एतदेय विपरीतमतुष्टस्य ॥ २९ ॥ भूयश्च वक्ष्यामः ॥३०॥ संदर्शने कोपः ॥३१॥ वाक्यस्याश्रयणप्रतिषेधः ॥३२॥ आस- नचापोरदानम् ॥ ३३ ॥ वर्णसरमेदः ॥३४॥ एकाक्षिश्रुथ्यो- निर्भेदः ।। ३५ ॥ खेदवासस्मितानमस्थानोत्पत्तिः ॥ ३६ ॥ परिमन्त्रणम् ॥ ३७ ।। अकस्माद्जनम् ॥ ३८ ॥ वर्धनमन्यस्य ॥ ३९ ॥ भूमिगात्रविलेखनम् ।।४०।। अन्यस्योपतोदनम्॥४१॥ विद्यावर्णदेशकुत्सा ॥ ४२ ।। समदोपनिन्दा ।। ४३ ॥ प्रतिदोप- निन्दा ॥ ४४ ।। प्रतिलोमस्तयः ।।४५।। सुकृतानपेक्षणम् ॥१६॥ दुष्कृतानुफीर्तनम् ।। ४७ ॥ पृष्ठावधानम् ॥ ४८ ॥ अतित्यागः ।। ४९ ॥ मिथ्याभिभाषणम् ॥ ५० ॥ राजदर्शिनां च तद्वृत्तान्य- त्वम् ।। ५१॥ जय राजा भरसन्न हो, तो येही सय यात उल्टी होजाती ॥ २९॥ भीर कुछ अधिक बात भी अपसता जानने के लिये बताते है ॥ ३० ॥ जिसपर राजा अप्रसन हो उसे देखतेही कुपित होजाता है ॥३॥ । उसकी कही हुई मासको सुनताही नहीं, या रोक देता है ॥ ३२ ॥ यैटनेके लिये आसन नहीं देता और उसकी भोर आस भी नहीं उठाता ॥ २३ ॥ मुंह बहाकर और मायाज बदलकर योलता है॥ ३५॥ एक मांखसे या भाचढाकर, अधवा होस टेवा कर घोला है ॥ ३५ ॥ और मिनाही असर उसे पसीना भाजाता है, सम्या सांस चलने लगता है, तथा यह मुस्कराने लगता है ॥३६॥ दूसरेके साथ बातचीत करने लगता है।३७ ॥ अचानक उठकर चला जाता ॥३८॥ इसको छोड़कर दूसरेको प्रशंसा करने लगता है ॥ ३९ ॥ भूमि भयवा अपने शारीरको नाखूनसे कुरेदने छगता है।॥ १० ॥ दूसरे किसीको सारने लगता है है ( १९४) कौटलीय अर्थशास्त्र [५ अधिक ॥४१॥ उसकी विद्या उपके घणं और उसके देशको निन्दा काने एगा है॥ ४२ ॥ उसके किसी दोपको ॥ ५३॥ या उसके समान किसी दूसरेके दोपको निन्दा करने गता ॥ ४ ॥ व्याज्ञस्नुति करने एाता है ॥ ४५ ॥ उसके अच्छे किये हुए फामकी भी कुछ पवाद नहीं करता ॥५६॥ और विगते हुए कामको सय जगह कह देता है ॥ ७ ॥ उसके सौटनेपर पौडेसे उसे घड़े ध्यानस देखता है॥१८॥ समीप आनेपर तरक्षण किसी कार्य बहान उसे यहासे दूर हटा देता है ॥ ५९॥ और उसके साथ मिध्या-माव. शून्य भयात् सारहीन भाषण करता है ॥ ५० ॥ अन्य राजमेयकोंको टप्स ध्यवहारम भेद डालता है ॥ ५ ॥ वृत्तिविकारं चायेक्षताप्यमानुपाणाम् ॥ ५२ ।। अयमुचैः सिञ्चत्तीति कात्यायन: प्रयव्राज ॥ ५३॥ मनुष्योसे अतिरिक्त पशु और पक्षियोंके भी क्तिविकारको (मानसिक भाता पृत्तिपॉके अनुसार विकृत हुए २ मुखादि भकारोंको) अटी तरह ध्यानपूर्वक देखना चाहिये । ५२ ॥ यह जल सींचनेवाला भान ऊपरसे जल सींच रहा है, इस बातको देखकर मन्त्री कारयायम राजाको छोड़कर चला गया ॥ ५३॥ क्रौञ्चो ऽपसन्यमिति कणिको भारद्वाजः ॥ ५४॥ 8 इसका इतिहास इस प्रकार है:-पौण्ड्रदेशमें सोमदा नामका राजा रहता था। उसके पुत्रने फोई अपराध किया | राज पुनको फेद करने के लिये राजाने अपने मन्त्री कात्यायनके साथ इस विषय में सलाह की । राज- पुन पक्षक सौगाको इस बातका पता एगगया, और उन्होंने राजकुमारको वहसि किसी अन्य सुरक्षित स्थानपर पहुंचा दिया। राजाने समझा फि मन्त्री कात्या. पनने ही हमारे भेदको खोल दिया है। उसका पथ करने के लिये अपने नौकरों को उसने आशा देदी। किसी जल सींचनेवाले आदमीने राजाकी इस माशाको किसी तरह सुन लिया । जय कि मन्या कात्यापन उधरको आरहा था, यह जलखेचड़ परसे ही जल सासकर सोचता रहा । यह देख मन्त्रीने अपने चित्तम विचार फिया, कि कलतक तो यह मेरे ऊपर डांट गिरजानेके से धीरे २ नांचेसे सीचता था, पर आज इसने कुछ परवाह न की, मालम होता है मेरे प्रति, राजाका कोई महान कोप इसे मालूम होगया है, इसलिए इस चित्तम यह विकार हुआ है । यह निश्चय करके मन्त्री कात्यायन, तत्कालही राजाको बोट कर पा गया ।।५।।
कौटलीय अर्थशास्त्र [५ अधिक ऋहाथीने ऊपर पानी डाल दिया यह देखकर किक मामका भाचार्य राजाको छोड़कर चला गया ॥ ५ ॥ रथाश्वं प्राशंसीदिति पिशुनः ।।५८ ॥ रथके घोड़ेकी प्रसंशा सुनकर पिशुन नामका आचार्य अपने राजाको छोड़कर चला गया ॥ ५० ॥ प्रतिरवणे शुनः पिशुनपुत्र इति ।। ५९ ॥ कुत्ते के भूकनेपर पिशुन आचार्यका पुन राजाको रयागकर चला अर्थमानावक्षेपे च परित्यागः॥ ६० ॥ खामिशीलमात्मनश्च किल्विपमुपलभ्य वा प्रतिकुर्वीत मित्रमुपकृष्टं वास्स गच्छेत् ॥६१॥ गया ॥ ५९॥ यङ्गालने शतानन्द नानक राजाके यहां, एक किझएक नामका आचार्य रहता था। यह राजाकी सवारीक हाथीको नित्यप्रति पुचकारकर फिर राजकुलम जाया करता था।किसी दिन हाधीके ऊपर चढ़े हुए राजाने भाचार्यक सम्बन्धम द्रोहपूर्वक मन्त्रणा की। इस बातको जानकर दूसरे दिन जब आचार्य हाधीके पास आया, तो उसने अपनी सूडसे आचार्यके ऊपर जर फैक दिया। इस घेटास, राजाके चित्तमें अपनी ओरसे विकार जानकर, वह राजाको छोड़ चला गया॥५७ ॥ पिशुन नामका आचार्य उज्जयिनीम प्रद्योत राजाके पुत्र पालकको राजनीति विद्या पढ़ाता था। पढ़ाई समाप्त होजानेपर, रामाने पिशुनके धनको अपहरण करने के लिये अपने पुनसे मंत्रणा की । पुन्नने गुरुयोह न करते हुए अगले दिन जुते हुए रथको भाचार्यके सामने खड़ा करके कहा कि ये घोडे घलनेमें बहुत रोग है, एक दिनमै ३०० योगन जासकते हैं । भाचार्य पिशुनने अपने घले जानेका यह इशारा जान कर तत्काल ही उस राजा को छोड़ दिया ॥ ५८॥ पिशुन आचार्यका पुत्र बाल्यकालमही सम्पूर्ण राजनीति तत्वोंको जानकर राजाको सेवा करता था। राजा उसको विद्वान् जानकर सदा उसका अनुसरण करता था। एस्सार राजाने विचार किया कि अभी यह यालक होने से मन्त्री पदके योग्य तो है नहीं, इस लिए इसे युवा होनेतक बांधकर रखना धाहिये, नहीं सो यह दूसरे देशो चला जायगा । राजाकी इस सलाहको जान कर एक कुत्ता पिशुनपुरके आगे पार २ भौकताया। इससे पिशुनपुमने राजा रितके रिकारका अनुमान करके उसे छोड़ दिया । ५३ . ६ अध्या. ] योगवृत्त (१९७) सम्पति और सरकारका नाश करनेवाले राजाको भी रयाग देना चाहिए ॥ ६ ॥ अधया राजाके स्वभाव भार अपने अपराधपर विचार करके, राजाको न छोड़ने की इजा होनेपर, उसका प्रतीकार करना चाहिए। अधया राजाके किसी सीपके सम्बन्धी मा मिनका भाश्रय लेना चाहिए, जिसके द्वारा राजा को प्रसर किया जा सके।६१॥ तत्रस्थो दोपनिर्घातं मित्रैर्भर्तरि चाचरेत् । ततो भतीर जीयेद् या मृते वा पुनराव्रजेत् ।। ६२ ।। इति योगत्ते परमे ऽधिकरणे समयाचारिक पक्षमो न्यायः॥५॥ आदितः पञ्चनयति ॥ १५॥ राजाके पास रहता हुआ ही, मिग्रोके द्वारा अपने अपराधी सफाई कराये, और राजाके प्रसव होनेपर चाहे उसोक आश्रयमें रहे, या उसके मर जानेपर फिर भा जावे ॥ १२॥ योगवृत्त पञ्चम अधिकरण में पांचवां अध्याय समाप्त । छठा अध्याय ९४-९५ प्रकरण राज्यका प्रतिसन्धान और एकेश्वर्य । राजव्यसनमेवममात्यः प्रतिकुर्वीत ।। १ ।। प्रागेव मरणा- वाधभयाद्राज्ञः प्रियहितोपग्रहेण मासहिमासान्तरं दर्शनं स्थापयेत् ॥ २ ॥ देशपीडापहममित्रापहमायुष्यं पुत्रोयं वा कर्म राजा सा- घयतीत्यपदेशेन राजव्यञ्जनमनुरूपयेलायां प्रकृतीनां दर्शयेत् ॥३॥ राजापर आई हुई आपत्तियांका प्रतीकार, अमात्य इस प्रकार करे ॥१॥ राजाको मृत्युके भयल पूर्व ही, राजाके प्रिय भौ हितैप पुरुषाकी सलाह सेकर एक महीना या दो महीने यार राजाके दर्शनकी तिथि नियुक्त करदे ॥२॥ और यह बहाना करे कि राजा भाजक्ल, देशको पीडाको दूर करनेवाले, शत्रुओंको नए फरनेषाले, भायु देनेवाले तथा पुर देनेवाले कर्मका अनुशान पर रहा है, इत्यादि । जय राजाके दर्शनका ठीक समय भावे, तो राजा भैस में किसी पुरपको मजाके सामने दिखला देवे ॥३॥ मिवामित्रदूतानां च ॥ ४॥ तैश्च यथोचितां संभापामगा: त्यसुखो गच्छेत् ।। ५ ॥ दौवारिकान्तर्वशिकमुखध यथोक्त रोज (१९८) । फौटलीय अर्थशास्त्र [५ गाधिक प्रणिधिमनुपर्तयेत् ।। ६ ।। अपकारिषु च हेडं प्रसाद वा प्रकृति- कान्तं दर्शयेत् ॥ ७॥ प्रसादमवोपकारिपु ॥ ८॥ मित्र, शत्रु, और दूताको (अथवा मियके दूत तथा शत्रुके दूतोको) भी उसी बनावटी राजाको दिखा देवे ॥४॥ उन लोगावे साथ यह राजा अमात्यके द्वाराही यथोचित सम्भाषण करे ॥ ५॥ पहिले प्रसिद्ध किये राजाके कार्य विषयमे द्वारपाल और अन्त पुरके रक्षक पुरपॉफे द्वारा ही कहलवाये ॥६॥ अपकार करनेवाले लोगोंपर अमात्यकी सम्मतिसे कोप अथवा प्रसरता दिखाये ॥ ७ ॥ ओर उपकार करनेवासेपर प्रसनता ही दिखावे, कोप नहीं॥८॥ आप्तपुरुपाधिष्ठितौ दुर्गप्रत्यन्तस्थो वा कोशदण्डावेकस्थी कारयेत् ॥ ९॥ कुल्यकुमारमुख्यांश्वान्यापदेशेन ॥१०॥ यश्च मुख्यः पक्षवान्दुर्गाटवीस्थो वा वैगुण्यं भजेत तमुपग्राहयेत् ॥११॥ दुर्ग भौर सीमाप्रान्तके कोश तथा सेनाको किमी अत्यन्त विश्वस्त पुरुषकी देखरेखम, फिसी यहानेसे इकट्ठा कर देवे ॥ ९ ॥ तथा और फिसी पहानेस राजाके खान्दानी, राजकुमार, आर अम्प मुख्य पुरपाको भी एकत्रित कर देये ॥ १० ॥ जो मुरय (प्रधान कर्मचारी), किसीकी सहायता लेकर दुर्ग अथवा भटवी में स्थित हुभा २ रागाके विरद्ध हो जाये, तो उसे किसी उपापसे अपने अनुकूल पनाया गये ॥१॥ यह्वाबाधां या यात्रां प्रेपयेत् ॥ १२ ॥ मित्रकुलं वा॥१३॥ यस्मात्र सामन्तादाराधां पश्येत्तमुत्सदविवाहहस्तिवन्धनाश्वपण्य- भूमिप्रदानापदेशेनााग्राहयेत् ॥ १४ ॥ अथवा उसे यहुत याधाभोसे युक्त याग्रा (भाममण, किसी देशपर चाई ) पर भेज देपे ॥ १२॥ भयना किसी मिग्र राष्ट्र के पास उसकी सहायताका पहाना फरफे भेज देखे ॥ १३ ॥ जिस किती सामन्त अर्थार समीप फे राजासे बाधा (कप्ट) का भय हो, उसे उत्सम, पियाइ, हाधीके पकटने और घोडा, अन्य माल, तथा भूगि देने के बहाने से अपने पास बुलाकर भनुपूल पाये । १५॥ खामित्रेण या ततः संधिमयं कारयेत् ॥ १५ ।। आटवि- कामि, वरं ग्राहयेत् ।। १६ तत्कुलीनमवरुद्ध वा भूम्येकदे- श्रेनोपग्राहयेत् ।। १७ ॥ .
r ६ अभ्या०] योगवृत्त १.१९९) अथवा अपने मिनके द्वारा उसे अनुकूल मना लेये, और फिर उसी के द्वारा अपने साथ अदृष्य । दूपित न होनेवाली) सन्धि कराये ॥ १५ ॥ भयका बाटविक, तशा भरने के साथ इस सामन्तका पैर करादेवे ॥ १६ ॥ भया सामन्तो परानेके किसी भादमीको भूमिका कुछ हिस्सा देकर अपने पशम करलये और फिर उसके द्वारा सामन्तका दमन फरापे ॥१७॥ कुल्यकुमार गुख्योपग्रहं कृत्वा वा कुमारमभिषिक्तमेव दर्शयेद .॥ १८ ॥ दाण्डधर्मिकवद्वा राज्यकण्टकानुद्धृत्य राज्यं कारयेत् ॥ १९॥ राजा मर जानेपर तो राजांक पंशज राजकुमार, तथा राष्ट्र के मुख्य कर्मचारियोंकी अनुकूलता देसकर, अभिषिक्त राजकुमारकी ही प्रजाओं के सामने दिसलाये ॥१८॥भार दाकर्मिक प्रकरण में यतलाई हुई रीतिसे, राज्य कण्टकोको उसाइकर निष्कण्टक राज्य कराये ॥ १९॥ यदि वा कश्चिन्मुख्यः सामन्तादीनामन्यतमः कोपं भजेत तमेहि राजानं त्वा फरिष्यामीत्यापाहपित्या पातयेत् ॥२०॥ आपत्प्रतीकारेण वा साधयेत् ॥ २१ ॥ यदि सामन्त आदिमसे कोई एक मुल्य इस यातसे कुपित होजावे, सो उससे कहे कि:-"यह मालक तो सर्वथा राज्यके अयोग्य है, तुम यहाँ भाओ, मैं तुमको दो राजा वनादूंगा' इस प्रकार थुलाकर उसे मरवा माले ॥ २० ॥ यदि बदल आये, तो भापरप्राकार प्रकरणमे यताई हुई रीतिये उसे सीधा करे ॥21॥ युवराजे या क्रमेण राज्यभारमारोप्य राजव्यसनं ख्यापयेत् ॥ २२॥ परभूमौ राजव्यसने मित्रेणामित्रव्यञ्जनेन शत्रोः संधिम- वस्थाप्यापगच्छेत् ।। २३ ।। युवराजपर धीरे २ सम्पूर्ण राज्यका भार सौपकर फिर राणाकी विपति को सबके सामने प्रकट करे ॥ २२ ॥ यदि राजा कहीं दूसरे देशही मरजाने, तो पनावटी दुश्मन बने हुए मित्र के साथ की सन्धि कराकर वापस चला भाव ॥२३॥ सामन्तादीनामन्यतमं यास दुर्ग स्थापयित्वापगच्छेत् ॥२४॥ कुमारमभिषिच्य वा प्रतिव्यूहेत ॥ २५ ॥ परेणाभियुक्तो या यथोक्तमापत्प्रतीकारं कुर्यात् ।। २६ ।। एवमेकैश्चर्यममात्यः कार- येदिति कौटल्यः ॥ २७ ॥ .
. [५ अधिक (२००) कोटलीय अर्थशास्त्र अश्या सामन्त आदिमसे किमी एफको इसके दुर्ग में स्थापित करके पला भाये ॥ २४ ॥ और राजकुमारका राज्याभिषेक करके फिर शके साथ युद्ध करे ॥ २५ ॥ यदि कोई अन्य सही इसके ऊपर चढ़ाई करदे, तो ममि. यापरकम अधिकरणमं बतलाये हुए याहर और भीतरकी भापत्तियोंसे पगने उपायोंके द्वारा उम आपत्तिका प्रतीकार करे ॥ २६ ॥ इस प्रकार.भमाश्य एक- स्यय राज्यका पालन करावे, यह कारस्यका मत है ॥ २७॥ नैवमिति भारद्वाजः ॥ २८ ॥ प्रप्रियमाणे वा राजन्यमात्यः कुल्यकुमारमुख्यान्परस्परं पुख्येपु चा विकामयेत् ॥ २९ ॥ वि. क्रान्तं प्रकृतिकोपेन घातयेत् ।। ३०॥ परन्तु भारद्वाज भाचार्यका मत है कि अमात्य इस प्रकार राजपुरका एकैघय (एफच्छत्र) राज्य न कर वारे ॥ २८ ॥ किन्तु राजाके आमसमरण (मरगेवाले) होनेपर, अमात्य, राजाके वंशज, राजकुमार, तथा मुख्य व्यक्तियों को परस्पर, या इनको अन्य मुख्योंके साथ लगा देवे ॥ २९॥ इनके पहनेपर प्रजा या अमात्य आटिके कुपित होनेके कारण इनको मरवा देये ॥ ३० ॥ कुल्यकुमारमुख्यानुपांशुदण्डेन वा साधयित्वा स्वयं राज्यं गृह्णीयात् ।। ३१ ॥राज्यकारणाद्धि पिता पुत्रान्पुत्राय पितरमभि- द्रुह्यन्ति ॥३२॥ किमङ्ग पुनरमात्यप्रकृतिकप्रग्रहो राज्यस्य ॥३३।। भधशा राजाके वंशज, राजकुमार, और मुख्य व्यक्तियोंको उपांशुदण्ड से (चुपचाप कोई पद्यन्त रचकर, विप आदि देनेसे) मरवा देवे । और अपने भापही सम्पूर्ण राज्यका मालिक यनजाये ॥ ३० ॥ क्योंकि राज्य के लिये पिता पुत्र के साथ और पुग्न पिता के साथ अभिद्रोह करते देखे गये है ॥ ३२॥ फिर मारयका तो कहनाही क्या ? जोकि सम्पूर्ण राज्यकी एक यागऔर समझा जाता है॥३३॥ तत्स्त्रयमुपस्थितं नावमन्येत ॥ ३४ ॥ स्वयमारूढा हि स्त्री त्यज्यमानामिशपतीति लोकप्रवादः ॥ ३५ ॥ इस लिये स्वयं भाये हुए इतने विशाल राज्यका कभी तिरस्कार न करे ।। ३५ ॥ पाक रमण करने के लिये स्वयं आई हुई स्त्री (भी) यदि छोड़ दी जावे तो घद पुरुषको शाप देती है, यह पात लोक प्रसिद्ध है ॥ ३५ ॥ फालश्च सदभ्येति यं नर कालकाक्षिणम् । दुर्लमः स पुनस्तस्य कालः कर्मचिकीर्पतः ।। ३६ ।।
- ६ अध्या०] योगवृत्त 1082/ ( २०१) काम करने की इच्छासे, पुरुष चिरकालसे जिस उचित समयकी प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसा मौका कमी एकसारही उसके पास आता है। उसकी उपेक्षा करदेनेपर फिर अवसा दुर्लभ होता है। सांप निकल जानपर लकीर पीटनेसे क्या फायदा ॥ ३६ ॥ प्रकृतिकोयकमधर्मिष्ठमनैकान्तिकं येतदिति कौटल्यः ॥३७॥ राजपुत्रमात्मसंपन्नं राज्य स्थापयेत् ।। ३८ ॥ १। परन्तु इसके विरुद्ध कीटस्यका मत है कि इस प्रकारकी कार्रवाई मजा. को रष्ट करनेवाली, अधर्मस युक्त और सदा न होने वालो , है ॥ ३७॥ अतः आत्मसम्पन्न राजपुरको ही राजसिहासनएर अभिषिक्त करदे ॥ ३८॥ संपन्नाभाव व्यसनिनं कुमारं राजकन्यां गर्भिणी देची या पुरस्कृत्य महामानान्सन्निपात्य घूयात् ॥ ३९ यदि कोई राजकुमार आरमसम्पन्न न होवे, तो म्यसनी (सी मध आदि में आसक्त) राजमारको, राज कन्याको, या गर्भिणी महाराणोको, सामने कर वं, राष्ट्र के सम्पूर्ण महान व्यक्तियाँका एकाग्रत परक कहे, कि---- ३९ ॥ अयं वो निक्षेपः ॥४०॥ पितरमस्यावेक्ष, सचाभिजन. मात्मनश्र ॥४१॥ ध्वजमानो ऽयं भवन्त एव स्वामिनः ॥४२॥ कथं वा क्रियतामिति ॥ १३ ॥ यह आप लोगोंकी धरोहर है, इसकी रक्षा माप रोगको ही करनी है ॥ ५० ॥ इसके (राजकुमारक) पिताक पराक्रम और यशवी और भी ध्यानंद और जरा अपनी और भी देख ॥४१॥ यह (राजयुमार) केवल एक झण्डके समान है, जो सबसे ऊँचा रहता हुआ फहराता रहता है, वस्तुत' इस राज्यके प्रयन्धका आपही लोग हैं ॥ ४२ ॥ अय यतलाइये इस विषयमें क्या किया जाय ? इत्यादि ॥ ४३ ॥ तथा ध्रुवाणं योगपुरुषा ब्रूयुः ॥ ४४ को न्यो भवत्पुरोगा- दस्माद्राज्ञश्चातुर्वण्यमर्हति पालयितुमिति ॥ ४५ ॥ इसप्रकार कहतेहुए अमात्यको, दे एकग्नित कियेहुए राष्ट्रके महान व्यक्ति कहें:--|| ४४ ॥ आपके नेतृत्वमें अथया आपकी देखरेख में रहते हुए इसके (राजकुमारके) सिपाय और कौन है, जो राजाकी चातुर्वर्ण्य मनाका पार न करसके, इत्यादि ॥ ४५ ॥ तथेत्यमात्यः कुमारं राजका गर्मिणी देवी वाधिकुति .
(२०२) कोटलीय अर्थशास्त्र [ अधिक ॥ ४६ ॥ पन्धुसंवन्धिनां मित्रामित्रदूतानां च दर्शयेत् ॥ ४७ ।। 'मरठी यात है' कहकर अमारय, उस राजकुमारको पा राजकन्याको अथवा गर्भिणी महाराणीको राज्य सिंहासनपर अभिषिक्त कर दे ॥ ४६॥ और इसे, उसके भाई बन्धु तथा सम्बन्धियों, मित्र, नु, तथा दूतोंको दिखला दे, कि ये राजा हूँ॥ ४७ ॥ भक्तवेतनविशेषममात्यानामायुधीयानां च कारयेत् ॥४८॥ भूयचाय वृद्धः करिष्यतीति घूयात् ॥ ४९ ॥ एवं दुर्गराष्ट्रमुख्या- नाभापत ॥ ५० ॥ यथाहं च मित्रामित्रपक्षम् ॥ ५१ ॥ विनय- कमणि च कुमारस्य प्रयतेत ।। ५२ ।। अमात्य और सिपाहियोंके भत्ते और मेतनमें कुछ तरकी करवा देवे ॥४८॥ और कहे कि यह बड़ा होकर और भी वेतनवृद्धि करेगा ॥ १९ ॥ इसी प्रकार दुर्ग तथा राप्टूके मुख्य कर्मचारियोंको भी कहे ॥ ५० ॥ और मिन तथा शनुपक्षके साथ भा यथोचित आभापण करे ॥ ५॥ तथा राज- कुमारकी विद्या विनय और अन्य प्रकारको शिक्षाके लिये पूरा प्रयय करे ॥५२॥ कन्यायां समानजातीयादपत्यमुत्पाद्य वाभिपिश्चेत् ॥५३॥ मातुश्चित्तक्षोभभयारकुल्यमल्पसत्वं छात्रं च लक्षण्यमुपनिदध्यात् ।। ५४ ॥ ऋतौ चैनां रक्षेत् ॥ ५५ ॥ अथवा किसी समानजातीय पुरपसे राजकन्याम पुत्र उत्पना कराके, उसे राज्यसिहासनपर अभिषिक्त करे ॥ ५३ ।। राजकुमारकी माता (महाराणी) • का पिस येचन न हो यह विचार करके किसी कुर्गन, निर्बल, सौम्य, वेदा- ध्येताको उसके पास रखदेवे, जिससे कि यह धर्मशास्त्र तथा पुराण आदि सुनाकर उसके चित्तको शान्त रक्खे ॥ ५४ ॥ और ऋतुकालमें इसकी अच्छी सरह रक्षा करे ॥ ५५॥ न चात्मार्थ कश्चिदुत्कृष्टमुपभोगं कारयेत् ॥ ५६ ॥ राजार्थ तु यानवाहनाभरणवस्रस्रीवेश्मपरिवापान्कारयेत् ॥ ५७ ॥ भपने लिये उपभोगका कोई पदिपापदार्थ सत्रित न करे ।। ५६ परन्तु राजाके लिये पान (रभ भादि सवारी) वाहन (पोड़े हाथी आदि) भामरण, पस, स्त्री, मकान, और यढ़िया शयनासन आदि तैयार करावे ।। ५७ ॥ . 11 यौवनस्थं च याचेत विश्रमं चित्तकारणात् । परित्यजेदतुप्यन्तं तुप्यन्तं चानुपालयेत् ।। ५८॥ F ६ . ६ मध्या०] योगवृत्त (२०३) जय राजकुमार युवा होजाये, राज्यभार संभाल सके, तो उसके पित भभिप्रायको जानने के लिये स्वयं मन्त्रीका कार्य छोड़ने को उससे कहे। यदि वह 'चले जागो' ऐसा कहदे, तो राजकुमारको छोड़कर यह पला जावे । यदि यह जानेको न कहे तो फिर उसीके आश्रयमें रहका यापूर्व कार्य करता रहे ॥५॥ निवेद्य पुनरक्षार्थ गूढसारपरिग्रहान् । अरण्यं दीर्घसत्र वा सेवेत्तारुच्यतां गतः ।। ५९ ।। भमास्य पदपर फार्थ करनेकी रवि न रहनेपर अधया राजाकी भोरसे पुछ मनमुटाव होनेपर, पुनकी रक्षाकं लिपे पिट पितामह आदिक स्थापित किये हुए गूढ पुरुष मूलपल और सजाने आदिको राजपुत्रको पताकर भरण्यमें सपस्याके लिये चला जाये । अयया यहुत लम्बे समयता होनेवाले पज्ञ आदि काका अनुष्ठान करे ॥ ५९।। मुख्यैरवगृहीतं वा राजानं तत्प्रियाश्रितः । इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रपित् ॥ ६ ॥ अथवा मामा, फूफा आदि “मुख्य व्यक्तियोंके अधीन दुए २ राजा (राजकुमार, को, उसके प्रिय पुरषोंके आश्रित रहता हुआही, तज्ञ अमारय इतिहास और पुराणोके द्वारा धर्म भयक तत्वोंको यथावत् समझाता रहे ॥६॥ सिद्धव्यञ्जनरूपो या योगमास्थाय पार्थिवम् । लभेत लब्ध्वा दृष्येषु दाण्डकर्मिकमाचरेत् ।। ६१ ।। इति योगस पसमे ऽधिकरणे राज्यातिसंधानम् एश्वर्य पो ऽध्याय. ॥६॥ आदितः पण्णवति ॥१६॥ एतावता कौटलीयस्यार्थशासस्य योगवृत्रं पञ्चममधिकरणं समाप्तम्।।५।। यदि इस तरहसे भी राजाको यथावत् तपन समझा सके, तो सिद्ध पुरपका भेत बनाकर कपटका आप्रय लेकर राजाको अपने पशमें को। और फिर यशमै करके मातुल आदि दूष्य पुरपोमें दाण्डकर्मिक प्रकरणमें पतायें उप- युक्त दण्डों का प्रयोग करे ॥६॥ योगवृत्त पञ्चम शधिकरणों छटा अध्याय समाप्त । - योगवृत्त पञ्चम अधिकरण समाप्त ।
. मण्डलयोनि पष्ठ अधिकरण । पहला अध्याय। ९६-प्रकरण । प्रकृतियोंके गुण । खाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः ॥१॥ तत्र स्वामिसंपत् ॥२॥ स्थामी, अमात्य, जगपद, दुर्ग, कोश, दण्ड, (सेना) मित्र, ये सात प्रकृति कहलाते हैं ।। १। इनमें से सबसे पहिले स्वामी (राजा) के गुण बताते हैं: महाकुलीनो दैवबुद्धिः सत्त्वसंपन्नो वृद्धदर्शी धार्मिकः सत्य- वागविसंवादकः कृतज्ञः स्थूललो महोत्साहो ऽदीर्घसूत्रः शक्य- सामन्तो दृदयुद्धिरक्षुद्रपरिपत्को विनयकाम इत्यामिगामिका गुणाः ॥३॥ महाकुलीन (श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुआ २), भाग्यशाली, मेधावी, धर्य- शाली दूरदर्शी अथवा महाज्ञानी, धार्मिक, सस्यवादी, सत्यप्रतिज्ञ, कृतज्ञ, महादानी, महाउपमाही, क्षिप्रकारी (किसी कार्यको सरक्षण सोचकर कानवाला) सामन्ती (समीपके परराष्ट्री) को वश करनेवाला, दनिश्चय अथवा दृढ़ भक्ति, गुणी परिवारयाला, शास्त्रमर्यादाको चाहनेवाला, ये राजाके १६ गुण आभिगामिक (राजाके गुण दो तरह के होते हैं, . आभिगामिक २ आरम- सम्पत्तिरूपं उपर्युफ १६ आशियामिक गुण हैं।) गुण कहाते हैं ॥३॥ शुश्रूपाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानोहापोहतत्वाभिनिवेशाः प्रज्ञा- गुणाः ॥ ४ ॥ शौर्यममर्पः शीघ्रता दाक्ष्यं चोत्साहगुणाः ॥५॥ सुपा (शास्त्र सुननेकी इमा), श्रवणः (शास्त्रज्ञाग), प्रत्येक यातका समझना, समशी हुई पातको याद रखना, किसीके सम्बन्धमें विशेषज्ञान रखना, किसी धातकी वास्तविकता जानने के लिये तर्क करना तथा दुष्ट पक्षको स्याग देना, गुणियों का पक्ष करना, ये माठ राजाके प्रशागुण कहाते हैं ॥ ४ ॥ .
या० मण्डलयोनि (२०५) (मिर्भाक्ता), अमर्प (पापाचरणको क्षमा न करना), शीभकारी होना, प्रत्येक कार्य (सधन लग्न भागहण आदि) में चना होना, ये चार गुण 'रमाहगुण' कहलाते है ॥ ५॥ वाग्मी प्रगल्मः स्मृतिमतिबलवानुदनः स्वयग्रहः कृतशिल्पो- ने दण्डनाय्युपकारापकारयोदृष्टमतीकारी हीमानापत्मकृत्यो- नेयोक्ता दीर्घदूरदर्शी देशकालपुरुपकारकार्यप्रधानः संधिवि- त्यागसंयमपणपरच्छिद्रविभागी संवृतोऽदीनाभिहास्यजिह्मभ्र- क्षणः कामक्रोधलोभस्तम्भचापलोपतापपशुन्यहीनः शशाः रतोदग्राभिभाषी पद्धोपदेशाचार इत्यात्मसपत् ॥६॥ पाग्मी (अर्थपूर्ण मापण करने में समर्थ), मगम (सभा आदिमें पोस्ते य कम्परहित) स्मृति मति तथा पलसे युक्त, उन्नतचिरा, संयमी, हाथी । आदिके चलाने में निपुण, शनुको विपत्तिम पढ़ाई करनेयाला, अपनी तिमें सेनाकी रक्षा करनेवाला, किसके द्वारा उपकार या आपकार किये पिर उसका शारफे अनुसार प्रतीकार करने वाला, हमा, दुर्भिक्ष और भेक्षमें धान्य आदिका टीक २ विनियोग करमेवाला, एम्बी और दूरकी धनपाला, अपनी सेनाफे युद्धोधित देशकाल उत्साहाशि, राधा कार्यको मानतया देखनेवाला, सन्धिके प्रयोगको समझनेपाला, प्रकाशयुद्ध भादि नेमें चतुर, अपान में दान देनेवाला, मजाको कट न पहुँचाकर ही गुप्तरूपसे को यकानेवाला, शत्रुके अन्दर मृगयाधूत आदि पसनोको देखकर उसपर पा रस आदिका प्रयोग करनेमे समर्थ, अपने मन्त्रको गुप्त सपनेवाला, दीन स्पाकी हंसी न उड़ानेवाला, रेती भी न करके देखने वारा, काम, मोब, लोभ ह, चपलता, उपताप बीर पशुम्म (चुगएसोरी) से सदा अलग रहनेवासा, प पोलनेयारा, समुप तथा उदार आपण करनेवाला, और पृन्द्रोंके उप. शराथा आधार माननेयाला राजा होना चाहिये । ये राजाकी आरमसम्पा । इनसे युक्त राजा आरमसम्पा कदाता है ॥ ६ ॥ अमात्यसंपदुक्ता पुरस्तात् ॥ ७॥ मध्ये चान्ते च स्थानवा- मात्मधारणः परधारणभापदि वारक्षः स्थाजीवः शत्रुद्वेपी शक्य- मन्तः पक्षपापाणोपरविपगकण्टकचेगीच्यालमृगाटवीहीनः का- तः सीतासनिद्रव्यहस्तिनधान् गव्यः पोरुपेयो गुप्तगोचरः पशुमा- नदेवमातृको बारिम्बलपथाभ्यामुपेतः सारचित्रबहुपण्यो दण्डकर-
मण्डलयोनि पष्ठ अधिकरण ।
-
पहला अध्याय।
९६ प्रकरण।
प्रकृतियोंके गुण ।
खाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः ॥१॥
तत्र स्वामिसंपत् ॥ २॥
स्वामी, अमात्य, सगपद, दुर्ग, कोश, दण्ड, (सेना) मिन, ये सात
प्रकृति कहलाते हैं ॥ १। इनमें से सबसे पहिले स्वामी (राजा) के गुण
बताते हैं
महाकुलीनो दैवबुद्धिः सत्त्वसंपन्नो पद्धदर्शी धार्मिकः सत्य-
वागविसंवादकः कृतज्ञः स्थूललक्षो महोत्साहो ऽदीर्घसूत्रः शक्य-
सामन्तो दृढवुद्धिरक्षुद्रपरिपत्को विनयकाम इत्याभिगामिका गुणाः
-॥२॥
.
प
महाकुलीन (श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुआ २), भाग्यशाली, मेधावी, धैर्य-
पाली दूरदर्शी अपरा महाज्ञानी, धार्मिक, सत्यवादी, सत्यप्रतिज्ञ, कृतज्ञ,
महादानी, महाउत्माही, क्षिपकारी (किसी कार्यको तरक्षण सोचकर कानवाला)
सामन्तों ( समीपके परराष्ट्रा) को वशमें करनेवाला, हदनिश्चय अथवा इट
भक्ति, गुणी परिवारपारा, शास्रमर्यादाको चाहनेवाला, ये राजाके १६ गुण
आभिगामिक (राजाके गुण दो तरह के होते है, . आभिगामिक २ भारम-
सम्पत्तिरूप । ये उपर्युक्त १६ आमियामिक गुण हैं ।) गुण कहाते है ॥३॥
गुभूपाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानोहापोहतत्वाभिनिवेशाः प्रज्ञा-
गुणाः॥ ४॥ शौर्यममर्पः शीघ्रता दाक्ष्यं चोत्साहगुणाः ॥५॥
शुभूषा (शास्त्र मुननेकी इच्छा), श्रवण (शासशार), प्रत्येक पासका
समझना, समझी हुई पातको याद रखना, किसीके सम्बन्धमें विशेषज्ञान
रखना, किसी यातको वास्तविकता जानने के लिये तर्क करना सभा दुष्ट पक्षको
रयाग देना, गुणियोंका पक्ष करना, ये आठ राजाफे महागुण कहाते हैं ॥ ४ ॥
+4 १ अध्या०] मण्डलयोनि (२०५) शौर्य (निर्भीकता), अमर्प (पापाचरणको क्षमा न करना), शीशकारी होना, और प्रत्येक कार्य (सहन न भारोहण आदि) में चतुर होना, ये चार गुण राजाके 'उत्साहगुण' कहलाते है ॥ ५॥ वाग्मी प्रगल्भः स्मृतिमतिपलवानुदनःस्ववग्रहः कुतशिल्पो- व्यसने दण्डनाय्युपकारापकारयोदृष्टप्रतीकारी ह्वीमानापत्प्रकृत्यो- विनियोक्ता दीर्घदूरदर्शी देशकालपुरुषकारकार्यप्रधानः संधिषि- क्रमत्यागसंयमपणपरच्छिद्रविभागी संवृतोऽदीनाभिहास्खजिमश्र कुटीक्षपणः कामक्रोधलोभस्तम्भचापलोपतापपैशुन्यहीनः शहा स्मितोदग्राभिभापी वृद्धोपदेशाचार इत्यात्मसपत् ॥ ६॥ घाग्मी (अर्थपूर्ण भाषण करने में समर्थ), प्रगल्भ (सभा आदिमें बोलते समय कम्पराहत) स्टति मति तथा यससे युक्त, उक्षतचित्त, संयमी, हामी घोड़े गारिक बलानमें निपुण, शत्रुको पिपतिमें घड़ाई करनेवाला; अपनी विपत्तिमें सेनाकी रक्षा करनेवाला, किसीके द्वारा उपकार या अपकार किये जानेपर उसका शास्त्र के अनुसार प्रतीकार करनेवाला, लमाशील, दुर्भिक्ष और सुभिक्षमें धान्य आदिका रोक ३ विनियोग करनेवासा, लग्नी और 'दूरकी सोचनेवाला, भपनी सेनाके मुन्द्रोधित देशकाल उत्साहशक्ति तथा कार्यको प्रधानतया देखनेवाला, सन्धिके प्रयोगको समझनेवाला, प्रकाशयुद्ध भादि करनेमें धतुर, सुपात्र में दान देनेवाला, प्रजाको कष्ट न पहुँचाकर ही गुप्तल्लसे कोशको पढ़ानेवाला, शत्रुके अन्दर सुगयाप्त आदि प्यसनोंको देखकर उसपर तीझा रस आदिका प्रयोग करनेमें समर्थ, अपने मन्त्रको गुप्त रखनेवाला, दीन पुरषोंकी हँसी न उड़ानेवाला, टेली भी न करके देखनेवाला, काम, क्रोध, लोभ मोह, चपलता, उपताप और पैशुन्य (चुगलखोरी) से सदा अलग रहनेवाला, प्रिय बोलनेराला, हँसमुख तथा उदार मापण करनेवाला, और गृद्धोंके उप- देश तथा मापारका माननेवाला राजा होना चाहिये । ये राजाकी आत्मसम्पत् हैं। इनसे युक्त रामा रमसम्पा कहता है ॥ ६॥ अमात्यसंपदुक्ता पुरस्तात् ॥ ७ ॥ मध्ये चान्ते च स्थानवा- नात्मधारणः परधारणश्चापदि खारक्षः स्वाजीवः शबुद्वेपी शक्य- सामन्तः पक्षपापाणोपरावपमफण्टकश्रेणीच्यालमृगाटवीहीनः का. न्तः सीतासनिद्रव्यहास्तियनवान् गव्यः परिपेयो गुप्तगोचरः पशुमा- नदेवमातृको वारिसलपथाभ्यामुपेतः सारचित्रवहुपण्यो दण्डकर-
(२०६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[६ अधिक
सहः कर्मशीलकर्पको ऽवालिशवाम्पवरवर्णप्रायो भक्त शुचिमनुष्य
इति जनपदसंपत् ॥ ८॥
अमात्यसम्पत् पहिले वनयिक अधिकरणमें कही जाचुकी है ॥ ७ ॥
अब जनपद सम्पत् बतलाते है:-मधर्म तथा सीमानान्तमें किले हो, जिस
में स्वेदशनिवासी तथा परदेशल आनेवाले जोंके लिये पर्याप्त धान्य आदि
पैदा हो सके, आपत्तिः पहाड़ पर आदिके होने से देशमासियोंकी रक्षा करसके
या पर्वत भादिके कारण सरलतासे जिसकी रक्षा की जायके, तहां थोहेही पी.
श्रमसे धान्य आदि पैदा हो जाय, राजाके शनुसे दुश्मनी रखने वाले मनुष्यों
से
युक्त,
जिसके आसपासके राजा दुलहों, कोचढ़ कक उसर विषम चोर
ज्वारी (कप्टक), छोटे २ शत्रु (श्रेणी) हिसक जानवर और घने जंगलोंसे
रहित हो, नदी सर भादिके कारण रमणीय, खेती सान रकदियों तथा हाथियों
के जंगलोंसे युक्त हो, गोभोंके लिये हितकारी हो, पुरपॉके लिये भी जहांका
जलवायु अंच्छा हो, लुब्धक आदिसे सुरक्षित, गाय भैस आदि पशु जहां ख्य
हो, नदी नहरोंसे युक्त, जल थलके यहूमूल्य तरह २ के झरय वस्तु से युक्त,
जो दण्ड और करको सहन कर सके, जहांके किसान यडे मेहनती हो, जहांक
मालिक समझदार हो, जहाँ नौच वर्गके मनुष्य अधिक हो, जहां अनुरक्त भार
शुद्ध हृदय के पुरुष हो, पेमा जनपद होना चाहिये। ये सब याते जनपद
सम्पत्ति के मामले कही जाती हैं॥८॥
दुर्गसंपदुक्ता पुरस्तात् ॥ ९॥ धर्माधिगतः पूर्वैः स्वयं वा
हेमरूप्यप्रायश्चित्रस्थूलरनहिरण्यो दीर्घामप्यापदमनायति सहेतेति
कोशसंपत् ।। १० ॥
दुगे सम्मत् पहिले ही दुर्ग विधान प्रकरणमें बतलाई जाचुकी है ॥९॥
काशसम्पत् बताते हैं.-पहिले राजाओंके द्वारा या स्वयं धर्मपूर्वक सञ्चित
किया हुआ धान्यका पभाग आदि, अत्यधिक सुवर्ण तथा रजतसे युक्त,
यहुमूल्य बड़े २ और नाना प्रकार के रनों तथा हिरोंसे मराटुभा, जो चिर
काल राफ रहनेवाली दुर्भिज्ञ आदि आपत्ति और धन पयको सहन कर
सके ऐसा कोश होना चाहिये । इनसब बातोका होना कोदासम्पत् ' कहाता
है॥१०॥
पितृपतामहो नित्यो चश्यस्तुष्टभूतपुत्रदारः प्रवासेपपि संपा-
दितः सर्ववाप्रतिहतो दुःससही पहुयुद्धः सर्वयुद्धप्रहरणविद्यावि-
शारदः सहपृद्धिक्षयिकत्यादवैध्यः क्षत्रप्राय इति दण्डसंपत् ॥११॥
१ अध्या० मण्डलयोनि (२०७) पितृपितामहके समयसे आया हुआ, इसी लिये स्थिरताके साथ सेवा करनेवाला, वश में रहनेवाला, जिसके पुग्न और स्त्री राजाको भोरसे भरण पोपण होने के कारण सन्तुष्ट रहते हैं, पढ़ाईके समयमें भी जो उचित आप- श्यक वस्तुओस युत कादिया जाता है, जो कहीं हार न खाना हो, दुःख सहने वाला, युद्धकी चतुरसाओंसे परिचत, हर तरह के युद्ध के हथियारोंके चलाने में सुचतुर, राजाके भनुकूल, हानि लाभ होनेके कारण भेदरहित, जिसमें क्षत्रियही प्रायः अधिक हों, ऐसा सन्य होना चाहिये । दण्ड अर्थात् सेनाके अन्दर इन गुणोंका होना ही (दण्डसम्पत् कहाता) है ॥११॥ पितृपैतामहं नित्यं वश्यमद्वैध्यं महल्लघुसमुत्थमिति मित्रसं- पत् ॥ १२ ॥ पितृपितामह क्रमसे आये जो बनावटी न हों, अपने वशमै रद, जिनके साथ कभी भेद न हो, जो मु मन्न तथा उत्साह आदि शक्तियोंसे युक्त हो, असा आने पर झट सहायता करनेके लिये तैयार होजाय, इम प्रकारके मित्र होने चाहिये । मिनोम इन गुणोका होना ही 'मित्रसम्पत् ' कहाता है ॥ १२॥ अराजपीजी लुब्धः क्षुद्रपरिपत्को विरक्तप्रकृतिरन्यायवृत्ति- रयुक्तो व्यसनी निरुत्साहो देवप्रमापो यत्किंचनकार्यगतिरननु- बन्धः क्लीयो नित्यापकारी चेत्यमित्रसंपत् ॥ १३ ॥ एवंभूतो हि शत्रुः सुखः समुन्छेनुं भवति ॥ १४ ॥ जो शुद्ध राजवंशका न हो, लोभा, दुष्ट परिवार पाला, अमात्य आदि प्रकृति जिससे प्रसन्न न रहें, शास्त्रके प्रतिकूल आचरण करने वाला, अयुक्त, व्यसनी, उत्साह रहित, भाग्यको ही सरकुछ समझने वाला, बिना विचारे काम करनेवाला, अशरण, सहाय रहित, नपुंसक-धर्यहीन, अपने तथा परायेकी सदा दुई कानेयाला, शत्रु होना चाहिये, इन पातोंका शाओमें होना ही शत्रु सम्पत् ' फदाता है ।। ३॥ इस प्रकारका शनु पड़ी भासानीमे उसाइ दिया जाता है ।।१४॥ अरिवर्जाः :: प्रकृतयः सप्तताः स्वगुणोदयाः। उक्ताः प्रत्यङ्गभूतास्ताः प्रकृत्ता राजसंपदः ।। १५ ।। शबुको छोड़फर (क्योंकि वह राजा होनेसे स्वामिप्रतिके अन्दर भानाता है) की ये रामी भादिमात प्रशानियों अपने २ गुणों से युक्त कहदी [६ अधिः (२०८) कौटलीय अर्थशास्त्र गई। ये एक दूसोको सहायक होनेमे परस्पर भभूत हुई ३ और अपने २ फायॉमें एगीहुई, 'शजसमत्ति' नामसे कही जाती है ॥१५॥ संपादयत्यसंपन्नाः प्रकृतीरात्मवान्नृपः । विवृद्धावानुरक्ताश्च प्रकृतीर्हन्त्यनात्मवान् ॥ १६ ॥ ततः स दुष्टप्रकृतिश्चातुरन्तो ऽप्यनात्मवान् । हन्यते या प्रकृतिभिर्याति चा द्विपतां यशम् ॥१७॥ आत्मसम्पत्तिमे युक्त राजा, अपने • गुणोंसे रहित प्रकृतियोंको भी गुणोंसे सम्पन्न बना लेता है। और आत्मसम्पत्तिसे रहित राजा गुणसमृद्ध तथा अनुरक्त प्रकृतियोंको भी नए करदेता है ॥ १६ ॥ इसी कारण यह दुष्ट प्रकृति, आरमसमत्ति रहित राजा धत्तुस्समुद्र पर्पन्त भूमिका अधिपति होता हुआ भी पातो अमात्य आदि प्रकृतिपोंके द्वारा मारदिया जाता है, अथवा दात्रु के ममें चला जाता है॥ १७ ॥ आत्मवांस्त्वल्पदेशो ऽपि युक्तः प्रकृतिसंपदा । नयज्ञः पृथिवीं कृत्लां जयत्येव न हीयते ॥ १८ ॥ इति मण्डलयोनी पटे ऽधिकरणे प्रकृतिसंपदः प्रथमोऽध्याय ॥१॥ आदितः सप्तनवातः ॥१७॥ परन्तु आरमसम्पन्न नातिज्ञ राजा थोड़ी भूमिका मालिक होते हुए भी प्रकृति सम्पपिसे युक्त हुभा २ सम्पूर्ण पृथियीको विगय करलेता है, और कभी क्षीणताको प्राप्त नहीं होता ॥१८॥ मण्डलयोनि पप्त अधिकरण पहिला अध्याय ममाप्त । दूसरा अध्याय ९७ प्रकरण शांति और उद्योग। शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ॥१॥ कौरम्भाणां योगा- राधनो व्यायामः ॥२॥ शान्ति क्षममा तथा व्यायाम योगका कारण है ॥१॥ अपने देश में दुर्ग भादि तथा दूसरे देशमें सन्धि आदि कार्योका, कार्य कुशल पुरुषोंके सथा आवश्यक उपकरणों के साथ सम्बन्धका जो साधक है यही 'मायाम कहाता है। भधारा दुर्ग तथा सन्धि आदि कार्योंपर उपकरण सहित कार्यकुशल पुरपाको नियुक्त करना ही घायाम सदका अर्थ है ॥२॥ ..
। २ अध्या मण्डलयोनि (२०१५) कर्मफलोपभोगानां क्षेमाराधनः शमः ॥ ३ ॥ शमव्यायाम- योपोनिः पाड्गुण्यम् ॥ ४॥ क्षयस्थानं वृद्धिरित्युदयास्तस्य ॥५॥ मानुपं नयापनयो दैवमयानयौ ॥६॥ दुर्ग तथा सन्धि भादि कोंके फलोंके उपभोग करने में हर तरह के आनेवाले विधाक नाशका जो साधा है, यही शम कहाता है ॥३॥ शम भोर यायामके कारण सन्धि, विग्रह, यान आसन, सश्रय और देधीभाव यक गुण हैं ॥ ४ ॥ उन्नति ( वृद्धि ), अवनति (क्षय ), या उसी अवस्था में रहमा ( स्थान ), ये तीन, झन छ गुणों के फल है ॥५॥ इन फलोंक प्राप्त करानेवाले दो प्रकारके कर्म हैं, एक मानुष और दूसरे देव । नय और अरनय मानुषकम है। अय और अनय दैव कर्म हे ॥ ६ ॥ दैवमानुपं हि कर्म लोकं यापयति |७|| अदृष्टकारितं देवम् तस्मिनिटेन फलेन योगो ऽयः॥९॥ अनिष्टेनानयः ॥१०॥ ये देष और मानुपकर्म ही लोक यात्राको करते है ॥ ७ ॥ धर्म और अधर्मरूप अष्टसे कराया हुआ कर्म देव कहाता है ॥ ८॥ उसके होनेपर जय पान्छनीय फल के साथ सम्बन्ध होजाय तो वह अय कहा जाता है ॥ ५॥ भोर प्रतिकूल पल्के साथ सम्बन्ध होनेपर अनप कहाता है॥ दृष्टकारितं मानुपम् ।। ११ ॥ तस्मिन्योगक्षेमनिष्पत्तिर्नयः विपत्तिरपनयः ।। १३ ॥ प्रभुशक्ति, मन्यक्ति या उत्पाहशक्ति आदिके कारण, सन्धि विग्रह आदि गुणोंके प्रयोगक द्वारा जो कराया जाय, यह मानुपकर्म व हाता ॥११॥ उसके होनेपर यदि योग और क्षेम| सिद्धि हो जाय तो यह भय कहाता है ॥ १२॥ यदि विपत्ति आजाय तो अपनय कहा जाता हे ॥१३॥ तचिन्त्यम् ॥ १४ ॥ अचिन्त्यं दैवमिति ॥ १५॥ योग क्षमी सिद्धि और विवतिके सीकारक लिए मानुषामका हो यहापर विचार करना चाहिए ॥ १४॥ दैव कर्म चिन्रय है, उसपर विचार काना इमारी शक्तिसे बाहर है, स्पोंकि यह सर्वथा परोक्ष है॥ १५॥ राजारमद्रव्यप्रकृतिसंपन्नो नयस्याधिष्टानं विजिगीपुः ॥१६॥ तस समन्ततो मण्डलीभूता भूम्यनन्तरा अरिप्रकृतिः ॥ १७॥ तथैव भूम्येकान्तरा मित्रप्रकृतिः ॥१८|| अरिसंपद्युक्तः सामन्तः है . (२१०) कौटलीय अर्थशास्त्र भारमसम्पन्न, अमाश्य आदि द्रव्यप्रति सम्पस, और नातिका भान- यभूत राजा विजिगीषु कहोता है ॥ १३ ॥ विजिगीयुके रायके चारों और लंग हुए राज्योंके अधिपति 'आरे प्रकृति' कहाते हैं ॥ १७ ॥सी प्रकार एक राज्य सअपहित राज्याके अधिपति मित्र प्रकृति' कहाते है ॥16॥ अरिसम्मति (मराजयाजी इस्यादि) से युक्त सामन्तभी शत्रु कहाता है ॥ १९॥ व्यसनी यातव्य अनपाश्रयो दुर्वलाश्रयो चोच्छेदनीयः॥२०॥ विपर्यये पीडनीयः कर्शनीयौ वा ॥२१॥ इत्यरिदिशेपाः ॥२२॥ जो शत्रु व्यसनी हो, उसपर आक्रमण करदेना चाहिए । आश्रयहीन अथवा दुर्वल आध्यवाले शत्रुका भी उग्छेद करदेना चाहिये ॥ २०॥ यदि शत्रु आधयहान या दुर्बल आश्रयगारा न हो, तो किसी अपकारके द्वारा उसे पीटा पहुचाये, अधया उसकी सेना य धनको किन्हीं उपायोंसे कम करनेका यरन करे ॥ २१॥ ये शत्रुओके चार भव बतलाये गये ॥ २२ ॥ तस्माभित्रमरिमित्रं मित्रमित्रमरिमित्रमित्रं चानन्तर्येण भू- भीनां प्रसज्यते पुरस्तात् ।। २३॥ इसके बाद मित्र, अरिमिन, मित्रमिग्र और भरिमिनमित्र, ये राजा राज्यों के क्रमसे विजिगीषुके सामने आते हैं । अर्थात् जय विजिगीषु शत्रुको विनय करने के लिये प्रयुक्त होता है तय उसके सामने क्रमसे ये पांच राजा भांत है-शत्रु, मित्र, भरिमित, मित्रमित्र और औरमिनमित्र । तात्पर्य यह कि अपने देशसे लगही हुए देशका राजा शत्रु, उसके भागेका मिग्न और उसके भागेका भरिमित्र, इसी प्रकार आगे समझिये ॥ २३॥ पश्चात्पाणिग्नाह आक्रन्दः पाणिग्राहासार आक्रन्दासार इति ॥ २४ ॥ भूम्यनन्तरः प्रकृत्यमित्रः तुल्याभिजन सहजः ॥२५॥ विरुद्धो विरोधयिता वा कृत्रिमः ॥ २६ ॥ तथा विजिर्गापुके पीछेके चार पाप्णिमाह भाकन्द पाणिमाहासार भार भारन्दमार कहाते है, इन दोनोंके बीचमे एक विजिगीषु, ये सय मिला कर दशका, 'राजमण्डल कहाता है ॥ २४ ॥ अपने राज्यके समीपही राज्य करनेवाला स्वाभाविक शत्रु, तथा अपने वश में उत्पन्न हुआ दायमागी, येदोनों 'संहजशत्रु' कहाते है ॥ २५ ॥ सय विरुद्ध होतानेवाला, अथवा किसीको विरोभा करदयाला 'कृषिमश' कहर ता है ॥ २६ ॥ 7 भूम्यकान्तरं प्रकृतिमित्रं मातापितृसंबद्धं सहजम् ॥ २७ ॥ धनजीवितदेवोराश्रितं कृत्रिममिति ॥ २८ ॥ अरिविजिगीप्वो. स - एक २ अध्या०] मण्डलयोनि ५ (२११) भूम्यनन्तरः संहतासंहतयोरनुग्रहसमर्थों निग्रहे चासंहतयोर्मध्यमः ॥ २९ ॥ राय म्यवधानसे राज्य करनेवाला स्वभावत मिन, तथा ममेरा यो फुफेरा भाई ये 'सहजमिन' होते हैं २६ ॥'धन या जाविकाकयिकी भाभय से, यह 'कृत्रिममित्र' कहाता है ॥ २१ ॥ और और विजिगीषु दोमांक राज्यासे मिला हुआ, उनकै सन्धि और विमह करनेपर अनुग्राम समर्थ, और केवल विग्रह करने पर विग्रहमें समर्थ राजा 'मध्यम' कहासा ह ॥ २९ ॥ अरिविजिगीपुमध्यानां बहिः प्रकृतिभ्यो बलवत्तरः संहतामह- तानामरिविजिगीपुमध्यमानामनुग्रहे समर्थो निग्रहे चासंहताना- मुदासीनः ॥ ३० ॥ इति प्रकृतयः ॥ ३१ ॥ भरि, विनिगीपु और मध्यम इनकी प्रकृतियासे बाहर, तथा शक्तिशाली मध्यमसभी और अधिक बलवान्, भरि विजिगीषु और मध्यमके साध तथा विग्रह होनेपर अनुमहमें समर्थ, और विग्रह होनेपर मिग्राम समर्थ राजा उदा सीन कहाता है ॥ ३० ॥ इस प्रकार इन आरह राजप्रकृतियोंका निरूपण किया गया ॥३॥ विजिगीपुर्मिने मित्रमित्रं वास्य प्रकृतयस्तिस्रः॥ ३२"। ताः पञ्चभिरमात्यजनपददुर्गकोशदण्डप्रकृतिमिरेकैकशः संयुक्ता मण्डलमष्टादशकं भवति ॥ ३३ ॥ भर घार मण्दराका सक्षेपमें निरूपण करते है -विजिगीषु, उसका मित्र और मित्रमित्र ये तीन प्रकृति है ॥ ३२ ॥ इनमेंस एक २,अलहदा २ धमारय जपद दुर्ग कोश और दण्ड इन पाच प्रकृतियों के साथ मिलकर (अर्णत एक विजिगीषु और उसको अमात्य आदि पाच प्रकृसिया-६ संब मिलकर) अठारह अवयय याल एक साल पन जाता है । इसे विजिगीषु सम्बन्धी मण्डल कहते हैं ॥ ३३ ॥ अनेन मण्डलपथक्वं व्याख्यातमरिमध्यमोदासीनानाम् ॥३४॥ एवं चतुर्मण्डलसइक्षेपः ॥ ३५ ॥ द्वादश राजप्रकृतयः ३६॥ पटिद्रव्यप्रकृतयः ।। ३७ ।। संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ ३८ ॥ ठीक इसी प्रकार गरिमण्डल, मध्यममण्डल, और उदासीनमण्डलकी भी पृथक् २ फापना करनी चाहिये ॥ ३४ इस प्रकार मण्डलाका सप निरूपण कर दिया गपा ॥ ३५॥ राज प्रहति धारह ॥ ३३॥ भार [६ अधिक (२१२) कौटलीय अर्थशास्त्र साठ असाप्यादि दम्य प्रकृति ॥ ३७॥ इन सबको मिलाकर संक्षेपमे ७२प्रकृति कहोजाती है ॥ ३८॥ तासां यथास्वं संपदः शक्तिः सिद्धिथ ॥ ३९ ॥ वलं शक्तिः ॥४०॥ सुसं सिद्धिः॥ ४१ ।। शक्तिस्त्रिविधा ॥ ४२ ॥ ज्ञान- पलं मन्त्रशक्तिः ॥ ४३ ॥ कोशदण्डवलं प्रभुशक्तिः विक्रमवलमुत्साहशक्तिः॥४५॥ इनकी सम्पत्ति यथायोग्य पहिले कही जाचुकी है। शक्ति और सिदि भी इसप्रकार समझनी चाहिये ॥ ३९ ॥ थल शक्ति है ॥ ४० ॥ और सुसही सिद्धि है ॥ ११ ॥ शक्ति तीन प्रकारको होती है ॥ ४२ ॥ ज्ञान वरही मन्त्र शक्ति है, यह शत्तिका एक प्रकार है ॥ ४३ ॥ कोश और दण्ड (सेना) का यल मभुशक्ति है, दूसरा प्रकार ॥ ५५ ॥ विषमवल उत्साह शक्ति है, तीसरा प्रकार। अर्थात् ज्ञानादिसे यागक्षरका माधन करने में समर्थ पृथक् २ तीन शपियां एवं सिद्धिास्त्रविधव ॥ ४६॥ मन्त्रशक्तिसाध्या मन्त्रमिद्धिः ॥४७॥ प्रभुशक्तिसाध्या प्रभुसिद्धिः ॥ ४८॥ उत्साहशक्ति- साध्या उत्साहसिद्धिरिति ।। ४९ ।। इसी तरह सिद्धिभो ३ प्रकारको है ॥ ४६॥ मन्त्रशक्तिमे होनेवारी सिखि मन्यसिद्धि कहलाता है ॥ १७ ॥इसी प्रकार प्रभुशक्तिपे होनेवाली सिद्धि को प्रसिद्धि ॥ ८ ॥ ओर उत्साहशक्तिम होनेवाला सिद्धिको उरसाहसिाद कहते है॥४९॥ ताभिरम्युचितो ज्यायान्मवति ॥ ५० ॥ अपचितो होनः ॥५१॥ तुल्यशक्तिः समः ॥ ५२ ॥ तस्माच्छक्ति सिद्धिं च घटेतात्मन्यावेशयितुम् ॥ ५३ ।। इन शक्तियोसे युक्त हुआ २ राजा बहुत बड़ा या श्रेष्ठ होजाता है ।॥ ५० ॥ इन शकयास राहत हुआ २ होन या अधम होजावा है ॥५१॥ और पराबर शाक्त रखने वाला सम अधीत् मध्यम कहलाता है। ॥ ५२ ।। इस लिये अपना शक्ति और सिद्धिको पढानेका सर्वदा पूरा प्रयत्न करें ।। ५३ ॥ साधारणो का द्रव्यप्रकृतिष्वानन्तर्येण शौचयन वा दृष्या- मिधाम्यां वापक्रष्टुं यतेत ॥ ५४ ॥ जो राजा साधारण भयो भपनी शाक्ति व सिविको न पहातके, यह २ अध्या०] मण्डलयोनि (२११) अमारय आदि द्रव्यप्रकृत्तियों में क्रमसे अथवा सुभीतेके अनुसार शाक्ति व सिद्धि को बढाये । और दूष्य तथा शभुकी शक्ति व सिद्धिको घटाने या नष्ट करनेका यल करे ॥ ५४॥ यदि वा पश्येत् ॥ ५५ ॥ अमित्रो मे शक्तियुक्तो वाग्दण्ड- पारुण्यार्थदूपणैः प्रकृतीरुपहनिष्यति ॥ ५६ ॥ सिद्धियुक्तो या मृगयाछूतमधस्त्रीभिः प्रमादं गमिष्यति ॥ ५७ ॥ म विरक्तमक- तिरुपक्षीणः प्रमत्तो वा साध्यो मे भविष्यति ।। ५८ ॥ यदि वह राजा यह देखे कि ॥ ५५ ॥ यह शक्तिशाली मेरा शत्रु, पाक्पारुष्य इण्डपारुष्प और आर्थिकदाप लगाकर अपना अमात्य भाद. दम्य प्रकृतियाको रुष्ट या पिरह परदेगा ॥ ५६ ॥ अथवा सिद्धियुक्त हुभा २ सूरया चूत मध और खियाम आसक्त होनेक कारण प्रमादको प्रास होजायगा ।। ५७ ॥ इस प्रकार अमाप आदिक चिरक होजानपर असहाय हुमा २ और मृगया शादिगे आसक्त होने के कारण प्रमत्त हुभा २ शत्रु अवश्यही मेरे घशम होजा यगा, अर्थात् मै उसको आसानीस जात सकूगा ॥ ५८ ॥ विग्रहाभियुक्तो वा सर्वसंदोहेनेकस्थो दुर्गसो वा स्थास्यति ॥ ५९ ॥ स संहितसेन्या मित्रदुर्गवियुक्तः साध्यो मे भविष्यति ॥६॥ अथा जर मैं अपने सम्पूर्ण सेनासमूहको लेकर लाने के लिये उसपर पढाई करूंगा, तो यह अपनी शक्तिके गर्घसे किसी एक स्थानमे या दुर्गमही अकेला स्थित रहेगा ॥ ५९॥ एसो हालतम उसको सेना घिर जायगी, यह मित्र या दुर्गसे कोई सहायता न ऐसफेगा, और फिर में उसे आसानांसे जीत सऊंगा ॥६॥ चलवान्या राजा परतः शत्रुमुच्छेत्तुकामस्तमुच्छिद्यमानमु- च्छिन्यादिति बलवता प्रार्थितस मे विपन्नकारम्भस्य वा सा- हाय्यं दास्यति ।। ६१ ।। मध्यमलिप्सायां चति ॥ ६२ ।। एच- मादिपु कारणेपमित्रस्यापि शक्ति सिद्धि चच्छेत् ।। ६३ ।। भधवा दिया ऐसा समझ, कि-यह बलवान् राजा दूसरे शनुका उरद करनेकी अभिलाषा रा हुआ, उसे उच्छेद करके मेरा उद नहीं करेगा, अथवा बलवानके साय युद करनेके कारण मेरे क्षाणशाके होनेपर भोर मपमको अपेक्षा करनेपर या भयश्पही मेरी सहायता करेगा ६,१९ ।
फौटलीय अर्थशास्त्र [६ मधिल तो इस प्रकारक विशेष कारण उपस्थित होनेपर की भी शक्ति और सिद्धिकी कामना करे ।। ६३॥ नमिमेकान्तराव राज्ञः कृत्वा चानन्तरानरान् । नाभिमात्मानमायच्छन्नेता प्रकृतिमण्डले ।। ६४ ।। मध्ये ऽभ्युपहितः शनुर्ने तुमित्रस चोभयोः । उच्छेधः 'पीडनीयो वा बलवानपि जायते ।। ६५ ।। इति मण्डलयोनौ पष्टे ऽधिकरणे शव्यायामिक द्वितीयो ऽध्यायः ॥ २ ॥ आदितो उपनवतिः ॥ १८॥ एतायता कॉटलीयस्यार्थशाखस्य मण्डलयोनिः पष्टमधिरण समाप्तम् ॥६॥ मेना विजिगीषु, राजमण्डलरूपी चक्र एक राज्यसे ग्यवहित मित्र राजाओको नेमि, समीपके राजाओंको अरा, और भएने आपको नाभिक स्थान समझे ।। ६५ । बलवान् भी शत्रु, विजिगीषु और मित्र इन दोनों श्रीधमं भाजानेपर, या तो नष्ट करदिया जाता है, अथषा बहुत पीड़ित किया जाता है।। ६५ ॥ मण्डलयोनि पट अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त । ... मण्डलयोनि पष्ठ अधिकरण समाप्त ।
पाइगुण्य सप्तम अधिकरण ।
पहिला अध्यायः ।
न
-
4
-
९८, ९९प्रकरण।
छः गुणोंका उद्दश और क्षय, स्थान तथा
वृद्धिका निश्चय
पाइगुण्यस प्रकृतिमण्डलं योनिः॥१॥ संधिविग्रहासन-
यानसंश्रयद्वैधीभावाः पाड्गुण्यमित्याचार्याः ॥ २॥ ।
स्वामी भादि सात प्रकृति और १२ - राजमण्डल, सन्धि आदि छर
गुणों के कारण हैं ॥१॥ आचार्य कहते है कि-सन्धि, विग्रह, यान, भासन,
संध्य और वैधीभाव ये छ गुण है ॥२॥
द्वैगुण्यमिति वातव्याधिः ॥३॥ संधिविग्रहाभ्यां हि पाइगु-
ण्यं संपद्यत इति ॥ ४॥
घातव्याधि (उदार) आचार्यका सिद्धान्त है कि गुण दो ही हैं ॥३॥
सन्धि और विमह, शेष चार इन्ही दोके भवान्तर भेद है । भासन और
समयका सन्धिमें, यानका विग्रहम और वैधीभावका यथायोग्य दोनों ही
भतर्भाव होजाता है॥४॥
पाइगुण्यमेवैतदवस्थाभेदादिति कौटल्यः ॥ ५॥
सन्धि और विमहसे यान आदि धाराका सर्वथा भेद होने छ ही
गुण है, यह कोटल्यका अपना मर है ॥५॥
तत्र पणन्ध संधिः ॥ ६॥ अपकारो विग्रहः ॥ ७॥
उपेक्षणमासनम् ।।८|| अभ्युच्चयो यानम् ॥ ९॥ परार्पणं संश्रयः
।। १० । संधिनिग्रहोपादानं हेच मार इति पड्गुणाः ॥ ११ ।।
इनमेंमे, टो राजाओवर विन्ही सत्तापर मेल हामाना, 'सन्धि' कहाता
है ॥ ६ ॥ शत्रुका कोई अपकार करना विग्रह यहा जाता है ॥७॥ सन्ध
आदिका प्रयोग न करके उपेक्षा करदना आसन कहाताई ॥८॥ का
भादिको अत्यधिक होनागा हो, यानका हेतु हानम यान पदाता ६ ॥२॥
४ (२१६ ) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अघि दूसरे पलवान् राजाके सासने अपने पुत्र, श्री, भामा तथा मयस्यको भर्पण करदेना संध्य कहाता है ॥ ॥ सन्धि भौर विग्रह दोनोंका उपयोग करना द्वैधीभाव कहाता है। इस प्रकार ये छ: गुण है ॥१॥ परस्मादीयमानः संदधीत ॥ १२ ॥ अम्युच्चीयमानो वि- गृह्णीयात् ॥१३॥न मां परोनाहं परमुपहन्तुं शक्त इत्यासीत ॥१४॥ यदि शत्रुस अपने आपको निर्घल समझे तो सन्धि करलेचे ॥ १२ ॥ यदि शाक्त भादिसे सम्पन्न होनेके कारण अपने आपको बलयान् समझे तो विना करे ॥३॥ न शनु मुझे दवा सकता है, और न मैं ही शत्रुको दया सकता हूँ, ऐसी अवस्थामें भासन गुणका प्रयोग करे ॥ १४ ॥ गुणातिशययुक्तो यायात्॥१५॥ शक्तिहीनः संश्रयेत ॥१६॥ सहायसाध्ये कार्य द्वैधीभावं गच्छेत् ॥ १७ ॥ इति गुणावस्थाप- नम् ॥ १८॥ भाभपास्यस्कमे अधिकरणमें कहे हुए शक्ति दंश काल आदि गुणोंके अधिक या ठीक होनेपर यामका प्रयोग करे ॥ ५॥ शक्ति रहित हुमा २ राजा संश्रयसे काम निकाले ॥ १६॥ किसी कार्यम सहायताकी अपेक्षा होनपावधीभावका प्रयोग करे ॥ १७ ॥ इस प्रकार विषय मेदसे छ: गुणोंका यहांतक निरूपण किया गया ॥१८॥ तेपो यस्मिन्या गुणे स्थितः पश्येत् ॥ १९॥ इहस्थाश- क्ष्यामि दुर्गसेतुकर्मवणिक्पथशून्यनिवेशसनिद्रव्यहस्तियनकर्मा- ण्यात्मनः प्रवर्तयितुं परस्य चैतानि कर्माण्युपहन्तुमिति तमातिष्ठेद ॥२०॥ उन गुणोंमसे जिस किसी (सन्धि आदि) गुणका आश्रयण करनेपर यह समझे कि ---11:९ ॥ मैं इस सन्धि मादि गुणका आश्रय लेता हुआ, अपने दुर्ग, संस्कम, प्यापारीमार्ग, शू पनिवेश (नई यस्ती बसाना), खाग, सकड़ियों सथा हाथियों के पन आदि काम करने में समर्थ होसकंगा, और शत्रुके दुर्ग आदि कार्योको नए कर सबूँगा, उसही का अवलम्बन करे ॥२०॥ सा पुद्धिराशुतरा ॥ २१ ॥ मे वृद्धिर्भूयस्तरा पृद्ध्युदयतरा वा भविष्यति विपरीता परस्पति ज्ञात्वा परद्धिमुपेक्षेत ॥ २२ ॥ इस प्रकारक गुणका अयएम्बन या अनुदान पृद्धिका हेतु होनेसे वृद्धि कहलाता है ॥ २१॥ मेरी पुदि पहुत जल्दी होगी, और शमुखी देरसे, मेरी मृद्धि १ मध्या] पाइगुण्य (२१७) पहुत अधिक होगी और शत्रुकी कम, शत्रुकी और मेरी एकही समयमै परायर वृद्धि होनेपर भी उत्तको हासोन्मुख होगी और मेरी अभ्युदयोन्मुख, ऐसा जप देखें, तो शत्रुको वृद्धिको कुछ पर्वाह न करे ॥ २२ ॥ तुल्यकालफलोदयायां वा वृद्धो संधिमुषेयात् ।।२३।। यस्मि- न्या गुणे स्थितः स्वकर्मणामुपघातं पश्येनेवरस्य तस्मिन्न तिष्ठेत् ॥ २४ ॥ एप क्षय: ॥ २५ ॥ यदि शाकी मी घृद्धि परायर उतनेही समयमें उदयोन्मुखही होवे, तो उसके साथ सन्धि करलव ॥ २३ ॥ जिस गुणकं अवलम्बनसे अपने दुर्ग आदि काका नाश आर शत्रुक काँका नाश न होना समझ, उस गुणका कदा- पि आश्रय न ले ॥ २४ ॥ इस प्रकारक गुणका अनुष्ठान क्षयका हेतु होनेसे क्षय कहाता है ॥ २५ ॥ चिरतरेणाल्पतरं वृद्ध्युदयतरं या क्षेष्ये विपरीतं परं इति ज्ञात्वा क्षयमुपेक्षेत ॥ २६ ॥ मेरा क्षय बहुत दिनोमे होगा, शत्रुका बहुत जल्दी, मरा क्षय बहुत थोडा होगा नुका बहुत आधक, मेरा क्षय उदयोन्मुख होगा और शत्रुका क्षयोन्मुख, जर एमा समझे, ता अपने क्षयको कुछ पर्वाह न करे, अर्थात् उस क्षयके प्रतीकारका काई उपाय न करे ॥ २६ ॥ तुल्यकालफलोदये वा क्षये संधिमुपेयात् ॥२७॥ यस्मिन्या गुणें स्थितः स्वकर्माद्धिं क्षयं वा नाभिपश्येदेतत्स्थानम् ।। २८ ।। यदि शत्रुका क्षय भी एकहा समयम यराबर और उदयोन्मुखही हो तो उसके साथ सन्धि करलेवे ॥ २७ ॥ जिस गुणका अपरम्बन करनेपर अपनी वृधि और क्षय कुछ भी न देखे, वह समान स्थितिमें रखनेके कारण 'स्थान' कहाता ६॥२८॥ इस्वतरं वृद्ध्युदयतरं वा स्थास्यामि विपरीतं पर इति ज्ञात्वा स्थानमुपेक्षेत ॥ २९॥ मेरी ऐसी स्थिति बहुत थोरे दिनतक रहेगी, शत्रुको बहुत दिनोतक, मेरी स्थिति उदयोन्मुख होगी और शनुकी क्षोन्मुस, जब ऐमा समझे तो अपनी उस स्थितिकी पवाद न करे, अर्थात् उमके सुधारनेका कोई उपाय न करे ॥ २९॥ तुल्यकालफलोदये वा स्थाने संथिमुपेयादित्याचार्याः॥३०॥ शशुका भी स्थान परावर समयत होनेवाला भीर उदयोन्मुखदी हो .. (२१६) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक दूसरे पलवान् राजाके सामने अपने पुस, घी, आत्मा तथा सर्वस्वको भर्पण करदेना संश्रय कहाता है ॥ १० ॥ सन्धि और विग्रह दोनोंका उपयोग करना वैधीभाय कहाता है। इस प्रकार ये छः गुण है ॥1॥ परस्माद्धीयमानः संदधीत ।। १२ ।। अभ्युचीयमानो चि- गृह्णीयात् ।।१३शान मां परो नाहं परमुपहन्तुं शक्त इत्यासीत ॥१४॥ यदि शत्रुसे अपने आपको नियंल समझे तो सन्धि करलथे ॥ १२ ॥ यदि शक्ति आदिसे सम्पन्न होने के कारण अपने आपको बलयान् समझे तो विग्रह फरे ॥ १३॥ नानु मुई दया सकता है, भीर न मैं ही शत्रुको दवा सकता हूं, ऐसी अवस्थामे भासन गुणका प्रयोग करे ॥ १४ ॥ गुणातिशययुक्तो यायात् ॥१५॥ शक्तिहीनः संश्रयेत ॥१६॥ सहायताध्ये कार्य द्वैधीमा गच्छेत् ॥ १७ ॥ इति गुणावस्था" नम् ॥ १८॥ आभियास्यत्कर्म अधिकरण में कहे हुए शक्ति देश फाल आदि भधिक या ठीक होनेपर यानका प्रयोग करे ॥५॥ शक्ति रहित राजा संघयसे काम निकाले ॥१९॥ किसी कार्यमें होनेपर वैधीभावका प्रयोग करे ॥ १७॥ इस प्रकार विपपमे, पहातक निरूपण किया गया। १८ ॥ तेषां यस्मिन्या गुणे स्थितः पश्येत् ॥ १९ ।। क्ष्यामि दुर्गसेतुक-निरासनिद्र०यह ण्यात्मनः प्रवयितुं ॥ २० ॥ उन गुणोंमसे जिस किता यह समझे कि:-॥ १९॥ मैं इस भपने दुर्ग, स्तुकर्म, व्यापारीमार्ग, १५ एकड़ियो सथा हाधियोंके मन भादि कामोंके शत्रुके दुर्ग भादि कार्योको नष्ट कर सचूंगा, सा वृद्धिराशुतरा ॥ २१ ॥ मे ५ या भविष्यति विपरीता परस्पति ज्ञात्वा इस प्रकार के गुणा अवलम्बन या कहलाताई ॥ २३ ॥ मेरी छुद्धि बहुत जल्दी होगी Sha .
[७ अघि (२१८)। कोटलीय अर्थशास्त्र तो उसके साथ सन्धि कार्लेनी चाहिये, ऐसा आचामोंका सिद्धान्त है ॥३०॥ नैतद्विभापितमिति कौटल्यः॥३१॥ यदि वा पश्येत् ॥३२॥ संघौ स्थितो महाफलैः स्वकर्मभिः परकर्माण्युपहनिप्यामि ॥३३॥ परन्तु कौटत्य कहता है कि भाचायाने यह बहुत साधारण यात बताई ॥३१॥ कुछ विशेष वात इस तरह समझनी चाहिये, यदि विजिगीषु इस पातको देख कि:-॥ ३२ ॥ सन्धि करलेनपर अत्यन्त लाभदायक 'दुर्ग'भाडि अपने कमाँसे शत्रुके कर्मोंका नाश करदुगा, अर्थात् अपने देशम तरह २ का अधिकाधिक माल तयार कराक, उसे शक दशम भेजकर वहांके मालकी कीमत गिरादूगा ॥ ३३ ॥ महाफलानि वा स्वकर्माण्युपभाक्ष्ये परकर्माणि वा ॥३४॥ संधिविश्वासेन चा योगोपनिपत्प्राणधिभिः परकर्माण्युपहनिप्यामि ॥ ३५॥ अथवा यह समझा कि-महापएशारी अपने कानोंकी तरह शत्रुके काँका भी सन्धिक यहाने उपभोग करूगा ॥ ३५॥ अथा गृपुरुष भीर तीक्ष्ण आदि प्रयोगाके, तया विष और जलदूपण आदि प्रयोगोंके द्वारा, सन्धि के बहाने शत्रुके कार्योका नाश करूगा ॥ ३५ ॥ सुसं वा सानुग्रहपरिहारसौकर्य फललामभूयस्त्वेन खकर्मणा परकर्मयोगावहजनमास्रावयिष्यामि ॥ ३६ ॥ अथया सन्धिक बहानसे, शत्रुके कार्यकुशल पुरपोको, उनके सुभाते, अन्य प्रकार के उपकार और उनस फर आदि न ऐनका वचन देकर अपने देशम खींच राऊगा, जिसस मेरे कृप्यादि कार्योंमें सुभीता होनसे अधिक लाभ होगा ।। ३६ ॥ चलिनातिमात्रेण या संहितः परः स्वकर्मोपघातं प्राप्यति ॥३७ ॥ येन वा विगृहीतो मया · संधत्ते तेनास्य विग्रहं दीर्घ करिष्यामि ॥ ३८॥ अथवा अत्यधिक बलवान् शत्रुके साथ सन्धि करनेएर शत्रुको पहुत अधिक धन देना पड़ेगा भार कोशको क्षीण करनेसे वह अपने कार्योंको क्षीण करहेगा ॥३७ ॥ अथवा जिसके साथ विग्रह रखक, यह मुझस सन्धि करता है। उसके साथ इसका बहुत दिनोंतक विग्रह कराये सखूगा ॥ ३८ ॥ मया वा संहितस्य मद्वेपिणो जनपदं पीडायष्यति ॥३९|| - १ मध्या०] पाइगुण्य (२१९) परोपहतो यास्य जनपदो मामागमिष्यति ॥ ४०॥ ततः कर्मसु 'वृद्धि प्राप्स्यामि ॥ ४१ ॥ अथवा मेरे साथ सन्धि करके, मेरे शत्रुके राष्ट्रको यह अवश्य पीड़ा पहुंचावेगा ।। ३९ ॥ अथवा दूसरेसे सताया हुभा इसका राष्ट्र, भय सन्धि कर. लेनेपर मेरेही पास भाजावेगा ॥१०॥ इसके बाद मैं अपने दुर्ग आदि कोमें अत्यधिक घृद्धि करसकूगा ॥ ४ ॥ विपन्नकर्मारम्भो वा विपमस्थः परः कर्मसु न मे विक्रमेत ॥ ४२ ॥ परतः प्रवृत्तकारम्भो वा ताम्यां संहितः,कर्मसु वृद्धि प्राप्स्यामि ॥ ४३॥ अथया दुर्ग आदि कार्योंके नष्ट होजानेपर भापहन हुभा २ शत्रु मेरे पार्योंपर आक्रमण नहीं करसकेगा ॥ ४२ ॥ अथवा यदि दूसरे शत्रुकी सहा. यतासे उसने अपना कार्य प्रारम्भ भी किया, तो दोनों के साथ सन्धि होनेसे मैं अपने कार्योको अच्छी तरह उन्नत करसकूगा ।। ४३ ॥ शत्रुप्रतिबद्धं चा शत्रुणासंधि कृत्वा मण्डलं भेत्स्यामि ॥४४॥ भिन्नमवाप्स्यामि ॥ ४५ ॥ अथवा शत्रुके साथ मिले हुए मण्डलको, शनुसे सन्धि करके दोनोंमें परस्पर भेद डालदूंगा ॥४५॥ और मह उसे भिन हुर २ शत्रुको अपने शम करसवंगा ॥ ५५५ दण्डानुग्रहेण वा शत्रुमुपगृह्य मण्डललिप्सायां विद्वेपं ग्राह- यिष्यामि ॥ ४६॥ विद्विष्टं तेनैव घातयिप्यामीति संधिना वृद्धि मातिष्ठेत् ॥ ४७ ॥ अथवा सैनिक सहायता देकर शत्रुको वशमें करके, मण्डलके साथ मिलनेकी इसकी इच्छा होनेपर उलटा द्वैप करादूगा ॥ ४६ ॥ और द्वेष हो जानेपर मण्डल के द्वाराही इसे मरवादूगा । इस प्रकारके विषय उपस्थित होने पर सन्धिके द्वारा अपनी उसति करे ॥ ४७ ॥ यदि वा पश्येत् ॥४८॥ आयुधीयप्रायः श्रेणीमायो या पे,जनपदः शैलपनन्दीदुर्गेकद्वारारक्षो वा शक्ष्यति पराभियोग अतिहन्तुमिति ॥४९॥ भय विमहसे किस प्रकार अपनी सृद्धि को यह पताया जाता है, यदि पिजिगीषु समझ कि- ५८ ॥ मेरे राउपमें भायुधजीयी क्षग्निय और खेती ~ (२१०) कोरलीय थर्थशास्त्र [७ मधिल करने करानेवाले पुरपही अधिक रहते है, पहाड, जाल, गदी और फिले बहुत है, राज्यमें बाहर आन जानेके हिये मार्ग भी एकही है, इसरिये शाके किये हुए भाक्रमणका प्रतीकार, मेरा प्रान्त यहुन अच्छी तरह करसकता है, वो शत्रुके साथ विग्रह करदेव ॥ ५९॥ विपयान्ते दुर्गमविपघमपाश्रितो वा शक्ष्यामि परकर्माण्युप- हन्तुमिति ॥५०॥ व्यसनपीडोपहतोत्साहो वा परः संप्राप्तकर्मो- पघातकाल इति ॥ ५१ ॥ विगृहीतस्यान्यतो वा शक्ष्यामि जन- पदमपवाहयितुमिति निग्रहे स्थितो वृद्धिमातिष्ठेत् ॥ ५२ ॥ अथवा राउपका सीमापर भति दुर्भद्य दुर्गका आश्रय रेकर, मैं भावुके दुर्ग आदि कार्योंका अच्छी तरह नाश करसकूँगा, ऐसा जब समझे, तो भी चिप्रह करदेव ॥ ५० ॥ अथवा व्यसन और पोरासे हतोत्साह हुए. २ लुके काँका अब विनाशकाल प्राप्त होगया है, जब ऐसा समझे तो भी विग्रह करदे ॥ ५ ॥ अथवा विग्रह किये हुए शत्रुके जनपदको दूसरे किसा रास्तेसे भी पार सगा, जब ऐसा समझे तो भी विग्रह करदे । इस प्रकार इन अवसरोंके भानपर पिमहके द्वारा अपनी उन्नति करे ॥५२॥ यदि वा मन्येत ॥ ५३ ॥ न मे शक्तः परः कर्माण्युपहन्तुम् ॥५४॥ नाहं तस्य कर्मोपघातीचा ॥ ५५॥व्यसनमस्य श्वव- राहयोरिव कलहे या ॥ ५६ ॥ स्वकर्मानुष्ठानपरो या वर्धिष्य इत्यासनेन वृद्धिमातिष्ठेत् ॥ ५७ ॥ भव आसनके द्वारा वृद्धि किस प्रकार करनी चाहिये यह बताते हैं, अथवा यदि विजिगापु यह समझे, कि --॥ ५३ ॥ शनु मेरे दुर्ग आदि कर्मीका नाश नहीं करसकता ॥ ५५ ॥ आर में भी उसके फौका नाश नहीं कर सकता ॥ ५५ ॥ इस समय इसपर विपत्ति आई है, समान शरियाले कुत्ते और सूअरके समान हमारा विग्रह होजानेपर मी॥५६॥ अपने कर्मोंका भनुष्ठान करता हुभा में अपनी वृद्धि करूगा, इस प्रकार आसनके द्वारा राजा अपनी उसति करे ।। ५७॥ यदि वा मन्येत ॥ ५८ ॥ यानसाध्यः कर्मोपघातः शत्रोः प्रतिविहितखकारक्षश्चास्मीति यानेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।। ५९ ॥ अथवा यदि राजा यह समझे कि -॥ ५८ ॥ शगुके कर्मोका नाश पानसेही होसकता है, और मैंने अपने कमौकी रक्षाका प्रपन्ध अच्छी तरह करादिया है, यह समझकर राजा यानक दारा भपनी उक्षति करे ॥ ५५ ॥ 1 -- १अध्या पाइगुण्य (२२१ यदि वा मन्येत ॥ ६० ॥ नास्मि शक्तः परकर्माण्युपहन्तुं स्वकर्मोपघातं वा त्रातुमिति बलवन्तमाश्रितः स्वकर्मानुष्ठानेन क्षयात्स्थानं स्थानार्द्वि चाकाइक्षेत ॥ ६१ ॥ अथवा यदि राजा यह समझे कि--॥ ६० ॥ मैं शत्रुके दुर्ग भादिके नाश करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ और मेरे दुर्ग आदिपर आक्रमण होनेपर मैं उसकी रक्षाभी नहीं करसकता, इसलिये ऐसा समझनेपर बलवानका भाश्रय लेवे, और अपने कर्मोंका अनुपान घरता हुआ क्षयसे स्थानकी और स्थानसे. वृद्धि की भाकाहा करे ॥ ६१॥ यदि वा मन्येत ॥ ६२ ॥ संधिनैकतः स्वकर्माणि प्रवर्तयि- प्यामि विग्रहेणकतः परकर्माण्युपहनिष्यामीति द्वैधीभावेन पृद्धि- मातिष्ठेत् ॥ ६३॥ अथवा यदि राजा यह समझे कि -॥ ६२ ॥ एक शत्रुके साथ सन्धि करके अपने दुर्ग आदि कार्योको यथावत् करता रहूगा, और दूसरेके साथ विग्रह करके उसके कमौका नाश करता रहूगा, तो द्वैधीभाव गुणका प्रयोग करके अपनी उसतिका सम्पादन करे ॥ ६३ ॥ एवं पड्भिर्गुणैरेतैः स्थितः प्रकृतिमण्डले । पर्येपेत क्षयात्स्थानं स्थानावृद्धिं च कर्मसु ॥६४ ॥ इति पागुण्ये सहमे ऽधिकरणे पाद्गुण्यसमुद्देश क्षयस्थानगृद्धिनिश्चयश्च प्रथमोऽध्याय ॥1॥ भादितो नवनय ते ॥ ९९ ॥ : इस प्रकार अमात्य आदि प्रकृतिमण्डर में स्थित हुआ . राजा, सन्धि आदि र गुणोफे प्रयोगोंसे, कोक सम्पन्धमे क्षरावस्थाको पार करये स्थान और स्थ नावस्थाको पार करके वृद्धिको आका करे ॥ ६४ ॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरणने पहिला अध्याय समाप्त ।
(२२२) कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक दूसरा अध्याय १००प्रकरण संश्रय वृत्ति। [ किसी प्रवल राजाके आधयसे अपनी शक्तिको पूरा करना 'संश्रय- पृत्ति' कहाता है। पहिले अध्यायमें यह बताया गया है कि एक ही गुणसे किस प्रकार अपनी उन्नति करनी चाहिये । भय सपसे पहिले सश्रयत्तिके प्रसझक-दो गुणोंसे एक समान ही लाम होनेपर उन दोनोंमें से किस गुणका प्रयोग करना चाहिये, यह यताया जायगा। संधिविग्रहयोस्तुल्यायां वृद्धौ संधिमुपेयात् ॥१॥ विग्रहे हि क्षयव्ययप्रयासप्रत्यवाया भवन्ति ॥ २॥ सन्धि और विग्रह दोनोंसे जब एकही समान राम समझ, तो सन्धि का हो अवलम्बन करे ॥ ॥ क्योंकि विग्रह करनेपर प्राणियोंका नाश, धान्य आदिका व्यय, दूसरेके देशमे जाना, ओर शत्रुके द्वारा विप आदिक प्रयोग से कष्ट इत्यादि अनर्थ अवश्यम्भावी है ॥२॥ तेनासनयानयोरासनं व्याख्यातम् ॥ ३ ॥ द्वैधीभावसंश्रय- योद्वैधीभावं गच्छेत् ॥ ४ ॥ द्वैधीभूतो हि स्वकर्मप्रधान आत्मन एवोपकरोति ॥ ५॥ संश्रितस्तु परस्योपकरोति नात्मनः॥६॥ इसी तरह आसन और यानसे समान राम देखनेपर भासनका ही भाधय रवे ॥३॥ द्वैधीभाव और सध्यसे समान लाभ होनेपर द्वैधीभावका ग्रहण करे ॥ ४ ॥ क्योंकि द्वाभाषका भाश्रय लेनेपर राजा, मुख्यतया अपने ही कार्योंको फरता हुआ, अपना ही उपकार करता है ॥५॥ परन्तु सश्रयका सहारा नेपर, अपने आध्यभूत राजाकाही अधिक उपकार करता है, अपना नहीं ॥६॥ यदलः सामन्तस्तद्विशिष्टयलमाश्रयेत ॥७॥ तद्विशिष्टय- लाभारे तमेवाश्रितः कोशदण्डभूमीनामन्यतमेनास्योपकर्तुमदृष्टः, प्रयतेत ॥ ८॥ महादोपो हि निशिष्टपलसमागमो राज्ञामन्यत्रा- रिविगृहीतात् ॥ ९ ॥ सामन्त (अपना प्रतिद्वन्द्वी राजा) जितना बलवान् हो, उससेभी भस्य. धिक बलशाली राजाफा साक्षय हुवे ॥ ७ ॥ यदि इतना परशाली कोई राजा २ अध्या०] पाइगुण्य ॥ (२२३) न मिले, तो अपने इस अभियोका (प्रतिद्वन्द्वी) सामन्तका ही आश्रय लेलेवे और धन, सेना, तथा भूमि आदिम से किसी चीजको देकर, दूर रहता हुभा ही इसके उपकार करनेका प्रयत्न करे, समीप न आये ॥ ८॥ श्योंकि राजाओंका बलवान् के साथ समागम करना, कभी २ वध बन्धन आदि महान अनर्थोका उत्पादक हो जाता है। परन्तु यदि यह बलवान, शत्रुस विग्रह किया हुआ हो, अर्थात शनुने उससे विग्रह कर रक्खा हो, तो उसके साथ मिलने में कोई हानि नहीं ॥ ९॥ अशक्यो दण्डोपनतवद्वतेत ॥ १०॥ यदा चास्य प्राणहरं व्याधिमन्तःकोपं शत्रुघृद्धि मित्रव्यसनमुपस्थितं वा तन्निमित्तमा. त्मनश्च वृद्धिं पश्येत्तदा संभाव्य व्याधिधर्मकार्यापदेशनापयायात् ॥ ११ ॥ यदि बलवान् राजाको, यिना उसके पास जाये प्रसन्न करना अशक्य हो, तो सनापंण द्वारा उसके साथ सन्धि फरक नम्रता पूर्वक यहीं पर रहे ॥20॥ आर जय देखे कि इस (पलवान् आश्रयभूत राजा) को कोई प्राणान्त कारी व्याधि हुई है, अथवा पुरोहित आदि कुपित होगये है, अथवा शत्रु बहुत यदगये है, या मिनके ऊपर कोई विपत्ति आखड़ी हुई है; और इन्हीं कारणोंसे अपनी उत्पति देखे, तब किसी सम्भावित व्याधि या धर्मकार्यका बहाना करके वहीसे अपने देशको चला जाये ॥ ११ ॥ स्वविषयस्थो वा नोपगच्छेत् ॥१२॥ आसन्नो वास्य च्छिद्रेषु प्रहरेत् ॥ १३ ॥ बलीयसोर्चा मध्यगतस्त्राणसमर्थमाश्रयेत् ॥१४॥ यदि यलपानको उपयुक्त हालांग, यह अपनही देशमें होवे, तो बुलाये जानेपर भी किसी व्याधेि या धर्म कार्यका बहाना करके उसके पास न जाये ॥ १२॥ अथवा उसके समीप रहता हुआ ही, उसकी निर्यरताओंपर वरावर आघात करता रहे ॥ १३ ॥ अपपा दो यलबार राजाओंके बीचमें रहता हुआ अपनी (नाघिसकी) रक्षा करनेमे समय राजाकाही आघय लेवे ॥ १४ ॥ यस्य वान्तधिः स्यात् ॥१५॥ उमौ वा कपालसंश्रयस्तिष्ठेत् ॥१६॥ अथवा जो अपने समोय होय उसीका भाश्रय लेवे ॥५॥ दोनोंके सीप होनेपर, कपाल सन्धिक द्वारा दोनोंका ही आनय ऐथे, दोनोंस जाकर भलहदा २ यह कहे कि भापही मेरे रक्षक है, यदि आप मेरी रक्षा ग. . . +- [७ मधिल (२२५) कौटलीय अर्थशास्त्र करेंगे, तो दूसरा राजा मुझे उखाड़ कर फेंक देगा, इसका नामही कपाल सन्धि है ॥१६॥ मूलहरमितरसेतरमपदिशेत् ॥ १७ !! मेदमुभयो; परस्प- रापदेशं प्रयुजीत ॥ १८ ॥ भिन्नयोरुपांशुदण्डम् ॥ १९ ॥ दोनाको एक दूसरेका अपकार करनेवाला बतलाता रहे ॥ १७ ॥ एक दूसरेके द्रव्यका परस्पर नाश करने वाला बताकर, उन दोनॉमे भेद दरवा देवे ॥१८॥ इस प्रकार दोनाम भंद पजाने पर, उपांशुदण्डका प्रयोग करे, अधात् दोनोंको छिपकर किन्हीं उपायोसे मरथा देवे ।। ११ ॥ पाश्चस्था या बलस्पयोरासनमयात्प्रतिकुर्वीत ॥२०॥ दुर्गा- पाश्रयो वा द्वैधीभूतस्तिष्ठेत् ॥ २१ ॥ संधिविग्रहक्रमहेतुमिर्या चेष्टेत ॥ २२ ॥ अथवा उन दोनो बलवान् राजाभॉम से जिसकी ओरसे शीघ्र भयकी भाराका हो, उसके समीपहा रहता हुआ भावी आपत्तिका प्रतीकार करे ॥२०॥ अथवा दुगंका आश्रय लेका इंधाभावका प्रयोग करे, अधीत् एकके साथ सन्धिकर दूसरेके साथ विग्रह करदेवे ॥ २३ ॥ अथवा ७, १, ३३मे, राथा ७, १,१९ मे कहे हुए सन्धि और विग्रहके निमित्तोको रेकर कार्य करने में प्रवृत्त हो जावे ॥ २२ ॥ ध्यमित्राटविकानुभयोरुपगृह्णीयात् ॥ २३ ॥ एतयोरन्यतरं गंच्छंस्तैरेवान्यतरस्य व्यमने प्रहरेत् ॥ २४ ॥ द्वाभ्यामुपहितो या मण्डलापाश्रयस्तिष्ठेत् ॥ २५ ॥ दोनाहो प्रतिद्वन्द्रियोंके दूप्य, शत्रु और भाटविकों को दान सरकार आदिसे अपने वशमे करसेचे ॥ २३ ॥ दोनोमे से किसी एक प्रतिद्वन्द्वीका मुकायला करता हुभा जिस विषयमं वह निर्बल हो वहींपर दूष्य आदिके द्वारा ही प्रहार करयाचे ॥ २५ ॥ यदि दोनोही इसको पोदा पहुचाव, तो मण्डलका भाधय लेकर रहे॥२५॥ माध्यममुदासीनं या संश्रयेत ॥ २६ ॥ तेन सहकमुपगृह्येतर- मुच्छिन्द्यादुमौ वा ॥ २७ ॥ द्वाभ्यामुच्छिन्नो वा मध्यमोदासी- नयोस्तत्पीयाणां वा राज्ञा न्यायवृत्तिमाश्रयेत ॥ २८ ॥ मध्यम अथवा उदासीनका आश्नप हेरे ॥२६॥ मध्यम अथवा उदासीनके साथ रहता हुआ, एक (भियोक्ता प्रति द्वन्द्वी) को दान आदिसे पशमै फरके दूसरेका उणेद कादेवे, यदि होसके तो दोनोंका ही उच्छेद है
३ मभ्या०]
पागुण्य
कादेवे ॥ २७ ॥ अथवा दोनोंसे पीडित किया हुआ राजा मध्यम का उदासान,
या उनके पक्षके भन्य राजाओं में से जो न्यायवीस अर्थात् 'न्यायानुकूल व्यवहार
करनेवाला हो उसका आश्रय लेवे ॥ २८ ॥
तुल्यानां वा यस्य प्रकृतयः सुख्येयुरेनं यत्रस्थो वा शक्नु-
यादात्मानमुद्धतुं यत्र पूर्वपुरुषोचिता गतिरासन्नः संबन्धो वा
मित्राणि भूर्यासीति शक्तिमन्ति वा भवेयुः ।। २९ ।।
यदि उनमेंसे कई राजा न्यायशील होय, तो जिसकी अमात्य भादि
प्रकृतिया अपने अनुकूल या प्रीति करनेवाला हों, उसीका माश्रय लेवे।
अथया जिसके साथ रहता हुआ अपना उद्धार कर सके, अथवा निसके साप
अपने पूर्व पुरषाओंका विवाह आदि अन्तर सम्बन्ध रहा हो, मथवा सदा
पतसे पाक्तिशाली मित्र हों, उसका आश्रय लेवे ॥ २९ ॥
प्रियो यस्य भवेद्यो वा प्रियो ऽस्य कतरस्तयोः ।
प्रियो यस्य स तं गच्छेदित्याश्रयगतिः परा॥३०॥
इति पाइगुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे सधयवृत्ति द्वितीयो ऽशय ॥२॥
आदित. शततम ॥१०॥
जो जिसका प्रिय है, न दोनों से कौन किसका प्रिय नहीं होता?
अर्थात् दोनोंही दोनोंके प्रिय होते । इसलिये जो जिसका प्रियं हो, यह
उसीका माधय सेये, यही भाश्रयस्थान सबसे श्रेष्ठ यताया गया है ॥ ३० ॥
पाड्गुण्य सप्तम अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त ।
سع
.
तीसरा अध्याय
१०१, १०२ प्रकरण
सम, हीन तथा अधिकके गुणोंकी स्थापना और
हीनके साथ सन्धि ।
विजिगीपुः शक्त्यपेक्षः पाइगुण्यमुपयुञ्जीत ॥१॥ समज्या-
योम्यां संधीयेत ॥ २॥ होनेन विगृहीयात् ॥३॥.
विजिगीषु अपनी शक्तिके भनुसार सन्धि आदि छ गुणोंका यथोचित
प्रयोग करे ॥१॥ परायर तथा अधिक शक्ति वाले साय सन्धि करलेये ॥
दीन शक्तिके साथ विप्रहका प्रयोग करे ॥३॥
. (२२६) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाम्युपैति ॥४॥ समेन चामं पात्रमामेनाहतमियोभयतः क्षयं करोति ॥५॥ क्योंकि अधिक शनिवाले के साथ विग्रह करनेपर होनशफि राजाकी वही दुर्दशा होती है, जो कि गजारोहियोंके साथ युद्ध में प्रवृत्त हुए २ पदातियों की ॥४॥ भार समानके साथ विमद करनेपर, जैसे कच्चा घटा करचे घटके साथ मिष्टकर दोनों नष्ट होजाते है, इसी प्रकार उन दोनोंका ही नाश होजाता है॥५॥ कुम्भेनेवाश्मा हीनेनैकान्तसिद्धिमवामोति॥ ६ ॥ ज्यायां- थेन संधिमिच्छेदण्डोपनतवृत्तमावलीयसंवा योगमातिष्ठेत् ॥७॥ हीनके साथ विप्रद करनेपर अवश्य ही सिद्धि होती है, जैसे घदेके साथ पत्थरकी चोट लगनेपर घड़ा अवश्य ही टूटफूट जाता है ॥ ६॥ मधिक शक्तिवाला राजा यदि सन्धि न करना चाहे, तो दण्डोपनरावृत्त ( अधि०, १५ मध्याय) प्रकरणमें पतलाये हुए उपायों भौर आवलीयत (१२ अधि०) अधिकरणम कहे प्रयोगोंका अवलम्बन करे ॥७॥ समथेन्न संधिमिच्छेद्यावन्मानमपकुर्यात्तावन्मात्रमस्य प्रत्यप- कुर्यात् ।। ८॥ वेजो हि संधानकारणम् ॥९॥नातप्तं लोहं V लोहेन संधत्त इति ॥१०॥ परायर शक्तिपाला राजा यदि सन्धि न करना चाहे, द्रो जितनी हानि यह पहुचाव, उतनी ही उसकोमी हानि पहुचा देये ॥ ८॥ क्योंकि तेज ही सन्धिका कारण होता है ॥९॥ बिना तपा हुभा लोहा, दूसरे.लोहेके साथ कभी नहीं मिल सकता ॥१०॥ हीनश्चेत्सर्वनानुप्रणतस्तिष्ठेत्सधिमुपेयात् ॥ ११॥ आरण्यो ऽग्निरिव हि दुःसामर्पजे तेजो विक्रमयति मण्डलस्य चानुप्रायो भवति ॥ १२॥ यदि होनशक्ति राजा प्रत्येक विषयमें ननही पना रहे, जो इसके साथ सन्धि करबे ॥ १॥ श्योंकि दुःख और भमसे उत्पन्न हुभा २ तेज जगल में लगी हुई अनिके सम होता है। सन्धि न करने पर सम्भवत वह सेज, होनशाक्ति राजाको विजिगीषुके विषयमै विक्रमशाली धना देता है। तो पिरवह हाम शक्तिराजा मण्डलका कृपापाय पनजाता है ॥१२॥ संहितधेत्परप्रकृतयो लुब्धक्षीणापचारिताः प्रत्यादानभयावा * (२२७), M ३ अध्या०] पाइगुण्य नोपगच्छन्तीति, पश्येद्धीनो ऽपि विगृह्णीयात् ॥ १३ ।। विगृहीत- चप्रकृतयो लुब्धक्षीणापचारिता विग्रहोद्विना या मां नोपगच्छ- न्तीति प्रश्येज्ज्यायानपि संघीयतः॥ १४॥ हीनशक्ति विजिगीषु सन्धि करनेपर भी यदि यह देखे,'कि शत्रुके भमास्य भादि प्रकृति जन लोभ, नीचता, या असन्तोपके कारण अथवा पदला लियेजानेके भपसे मुझे नहीं अपनासे, तो विग्रह करदेवे ॥ १३ ॥ अधिक शक्तिशाली विजिगीषु, दीन शक्ति राजाके साथ विग्रह करनेपर भी यह देखें किरमाश्य आदि प्रकृति लोभी क्षीण तथा चरित्रहीन होने के कारण, अथवा विग्रहसे उद्विग्न होने के कारण मुझसे अनुराग नहीं रखते, तो सन्धि करलेवे ॥१४॥ विग्रहोद्वेग या शमयेत् ॥ १५ ॥ व्यसनयोगपद्यपि,गुरुव्य सनोऽस्मि लघुव्यसनः परः सुसेन प्रतिकृत्य व्यसनमात्मनोमि- गुज्यादिति पश्येज्ज्यायानपि संधीयेत ॥ १६ ॥ अथवा विग्रहके कारण उत्पन्न हुई २ उद्विमताको शान्त करे ।। १५ ॥ अथवा जब यह देखें, कि मेरे ऊपरभी आपत्ति आई हुई है, और शत्रुके अपरभी, पर मेरी भापसि बहुत बरी तथा शत्रुको यहुत थोटी है, वह आनन्द के साथ अपनी भापतिका प्रतीकार करके मेरा मुकाबला करनेके लिये तैयार होजायेगासो शक्तिहीनके साथभी सन्धि करलेचे ॥१६॥ संधिविग्रहयोश्चत्परफर्शनमात्मोपचयं वा नाभिपश्येज्ज्याया- नप्यासीत ।। १७ ॥ परव्यसनमप्रतिकार्य चेत्पश्यद्धीनो ऽप्यभि- यायात् ॥ १८॥. यदि भधिक शक्तिशाली भी विजिगीषु यह समझे, कि-सन्धि पा विमह करनेपर शके हास और मेरी पृद्धिकी सम्भावना नहीं है, तो इन दोनों को छोड़कर भासनका भयलम्पन करे ॥ १७ ॥ यदि होनशक्ति विजिगापु भी • यह देखे, कि-शत्रु अपनी भापत्तिका प्रतिकार नहीं करसकता, तो नि सन्देश उसपर चदाई करदेवे ॥1॥ अप्रतिकार्यासनव्यसनो या ज्यायानपि 'संश्रयेत ॥ १९ ॥ संधिनकतो पिग्रहेणकतश्चेत्कार्यसिद्धिं पश्येज्ज्यायानपि द्वैधीभू- तस्तिदिति ॥२०॥ अमतीकार्य (प्रतीकार न की नासानेपाली) आपतिको समीप माया देख भधिक पाकिभी पिजिगीषु, सभा भरलायन करे ॥19॥ यदि एषके (२२८) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक साथ सन्धिके द्वारा, और एक साथ विप्रहके द्वाराही अपनी कार्यसिद्धि समाप्त तो अधिक शक्तिभी विजिगीषु वैधीभावका अवलम्पन करे ॥ २०॥ एवं समस पाड्गुण्योपयोगः ।। २१ ॥ वन तु प्रतिविशेषः ॥ २२ ॥ इस प्रकार सम, हीन तथा अधिक शक्ति सबकेही प्रति सन्धि आदि छ गुरुके उपयोगका निरूपण कर दिया ॥२॥ अय उनमेसे हीनके प्रति कुछ विशेषतायें घतलाई जावेंगी ॥ २२ ॥ प्रवृत्तचक्रेणाक्रान्तो राज्ञा घलवतावलः । संधिनोपनमेत्तूर्ण कोशदण्डात्मभूमिभिः ।। २३ ।। सेना आदिक द्वारा बलवान् रागासे दबाया हुआ निर्वल राजा, जल्दी धन सेना भारमा और भूमि समर्पण करके बलवान्से सन्धि करलेवे, अर्थात् उसके सामने झुक जाय ॥ २३ ॥ स्वयं संख्यातदण्डेन दण्डस्य विभवेन वा । उपस्थातव्यमित्येप संधिरात्मामिपो मतः ।। २४ ।। विजेता जितना कहे उतनीही सेना लेकर भऔर अपनी शक्तिके अनुसार धन लेकर जो विजित स्वय शाके पास जाकरही उसकी सेवा करता है, इस प्रकारकी सन्धि 'आमिपसन्धि' कहाती है, क्योंकि यह सन्धि अपने आपको भोग्यरूपसे उपस्थित किये जानेपरही होती है ॥ २४ ॥ सेनापतिकुमाराभ्यामुपस्थातव्यमित्ययम् । पुरुषान्तरसंधिः स्यानात्मनेत्यात्मरक्षणः ॥ २५ ॥ जो सन्धि, सेनापति और राजकुमारको शत्रुकी सेवामें उपस्थित करके फीजाती है, उसे 'पुरुपान्तरसन्धि' कहते हैं, क्योंकि वह सेनापति और राज- कुमार रूप पुरुषविशेषको अर्पण करनेपाही होती है। इसीका नाम 'भारमरक्षण सन्धि' भी है, क्योंकि इसमें स्वय राजाकी रक्षा होजाती है, उसे शत्रुके दर यारमें नहीं जाना पड़ता ॥ २५ ॥ 'एकेनान्यत्र यातव्यं स्वयं दण्डेन वेत्ययम् । अदृष्टपुरुषः संधिर्दण्डमुख्यात्मरक्षणः ॥ २६ ॥ किसी दूसरे स्थानपर शत्रुकै कार्यको सिद्ध करनेके लिये, में स्वम अकेला ही जाउगा, अथवा मेरी सेनाही जायगी, इसपकार शर्स करके जो सन्धि कोजाती है, उसे 'अरपुरष सन्धि' कहते हैं। क्योंकि इस सन्धिके होनेपर शत्रुकी रोपामे किसी पुरुपको उपस्थित मही होना पाता। इसी सधि . +- - ३ अध्या०] पाड्गुण्य (२२९) को ("दण्दमुख्यात्मरक्षण सन्धि भी कहते हैं, क्योंकि इसमें सेनाके मुख्य व्यक्ति और स्वय राजाकी रक्षा होजाती है ॥ २६ ॥ मुख्यखीवन्धनं कुर्यात्पूर्वयोः पश्चिमे त्वरिम् । साधयेदमित्येते दण्डोपनतसंघयः ।। २७ ।। उपयुक्त तीन प्रकारको सन्धियों से पहिली आत्मामिप और आत्म- रक्षण इन दो सन्धियोंमे, विश्वासके लिये अधिकशक्ति राजा मुख्य राजव्यक्तियों की कन्याओंका विवाह सम्बन्ध करे । तथा तीसरी भरपुरुष सन्धिमें शत्रुको विप आदि गूढ प्रयोगोंके द्वारा घशमें करे, ये तीनों सन्धि 'दण्डोमनतसन्धि' कहाती है॥२७॥ कोशदानेन शेषाणां प्रकृतीनां विमोक्षणम् । परिक्रयो भवेत्संधिः स एव च यथासुसम् ॥ २८ ॥ बलवान् भानुसे युद्ध में गिरफ्तार किये हुए अमात्य आदि प्रकृतियोंको, जिस सन्धिमें धन देकर छुडाया जाके, उसे 'परिणयसन्धि' कहते हैं । और यही परिमयसन्धि, जब कि सुखपूर्वक ॥ २८ ॥ स्कन्धोपनेयो बहुधा ज्ञेयः संधिरुपग्रहः । निरुद्धो देशकालाभ्यां अत्ययः स्यादपग्रहः ॥ २९ ॥ किश्तयार थोडा २ धन बहुत बारमे देना किया जावे, तो 'उपप्राहु- सन्धि' कहाती है । तथा जय देयधनके विषयम यह नियम करदिया जावे कि अमुक स्थानमें अमुकसमयमें इतना धन अवश्य देना होगा, तब इसी उपमई- को भिस्पय' कहा जाता ह॥ २९॥ विपादानादायत्यां क्षमः स्त्रीवन्धनादपि | सुवर्णसंधिविश्वासादेकीमावगतो भवेत् ॥ ३० ॥ सुखपूर्वक नियत समग्रमें नियमित धनराशि दे देनेके कारण यह सन्धि, कन्यादान सन्धिसे भी कहीं प्रशस्त ह, यह भविष्यम अरठा फल लानेवाली होती है, तपे हुए सुवर्णके आपसमें मिल जाने के समान, यह सन्धि शत्रु और विजिगीषुको आपसमें मिलानेका भी साधन हो जाती है, इसीलिये इसको 'सुवर्णसन्धि' भी कहते हैं॥३०॥ विपरीतः कपालः स्यादत्यादानाभिभापितः । पूर्वयोः प्रणयेत्कुप्यं हस्त्यश्वं वागुरान्वितम् ॥ ३१ ॥ इस उपर्युक्त सन्धिसे विपरीत सन्धि, भात् जिसमें सम्पूर्ण धनराशि तरक्षण भदा करनी पड़े, 'कपालसन्धि' कहलाती है । दुष्टसन्धि होमेसे --
पागुण्य
.
'४ अध्या
(२३१)
कुर्यादवेक्षणं पूर्वी पथिमी त्यापलीयसम् ।
आदाय फलमित्येते देशोपनतसंधयः ॥ ३६||
इन चारों सन्धियोंमेंसे पहिली दो आदिष्ट और उछिन्न सन्धियों में
शत्रुकी विपत्तिकी प्रतीक्षा करे । तथा पिछली दो सन्धियॉमें भूमिसे उत्पन्न
यस्तुओंको लेकर, आबलीयस (१२ अधि) अधिकरणमें कहे हुए उपायोंके
द्वारा शत्रुका प्रतीकार करे । इस प्रकार भूमि देनेके कारण ये चारों साधियों
'देशोपनतसन्धि' या भूम्युपनतसन्धि' कहाती हैं । ३६ ॥
स्वकार्याणां वशे ते देशे काले च भापिताः ।
आरलीयसिकाः कार्यानिविधा हीनसंधयः ॥ ३७॥
। इति पाइगुण्ये सप्तमेऽधिकरणे समहानग्यायसा गुणाभिनिवेशो
हीनय, तृायो ऽस्याय ॥३॥ आदित एकात ॥
इस प्रकार निरूपण की हुई इन तीन प्रकारकी (दण्ढोपनत, कोशोपनत,
दशोपनत) हीन सन्धियोंको निर्बल राजा अपने कार्य, देश और समयके अनु-
सार उपयोगमें लाये ॥ ३७ ।।
1
पादगुण्य सप्तम अधिकरण में तीसरा अध्याय समाव ।
चौथा अध्याय।
१०३-१०७ प्रकरण
विशेष आसन और यान ।
संधिविग्रहयोरासनं यानं च व्याख्यातम् ॥ १॥ स्थान-
मासनमुपेक्षणं चेत्यासनपर्यायाः ॥ २ ॥ विशेषस्तु ॥ ३॥ गुणै-
कदेशे स्थानम् ॥ ४ ॥
सन्धि भौर विमहमें ही आसन तथा पानको पूर्वापार्यों कही है।
स्थान, आसन और उपेक्षण ये आसनके पर्यायवाची शब्द हैं ॥२॥ परन्तु
'जो इनमें विशेषता है, उसे भर यताते है ॥३॥ आसगरूप गुणके एकदेशमें
स्थानशब्द प्रयुक्त होता है । इसका तात्पर्य यह है कि-शत्रुके बराबर शक्ति
फा होनाही आसन है, जब उसका एकदेश-श कमी भापता हो, अर्थात्
जिस अपस्थामें शत्रुके द्वारा कोई अपकार किये जानेपर भी उसका बदलाम
लिया जासके, ऐसी अल्पशक्तिकी भवस्थामें भासनके लिये 'स्याम' शब्दका
प्रयोग होता है ॥ ५॥
[७ अधिक 1 (२३२) कोटलीय अर्थशास्त्र स्ववृद्धिमाप्त्यर्थमासनम् ॥ ५॥ उपायानामप्रयोग उपक्षण- मिति ॥ ६ ॥ संधान कामयोररिविजिगीपोरुपहन्तुमशक्तयोर्विगृ- ह्यासनं संधाय वा ॥ ७॥ अपनी वृद्धि के लिये जय इस गुणका अपलायन किया जाय, तो इसे 'आसन'कहते हैंn५॥उपायाँका प्रयोग न करना अथवा योश करना 'उपेक्षण' कहाता है।६॥ सन्धिकी इच्छा करनेवाला शत्रु और विजिगीपु,जबकि भापसमें एक. दूसरेका कोई अपकार न कर सकते हो तो (अधिकशक्ति होगेपर) विग्रह करके आसनका अवलम्बन करें, अथवा (अल्पशक्ति होनेपर) सन्धि करकोही करें॥७॥ यदा वा पश्येत्स्वदण्डैर्मित्राटवीदण्डैर्वा समं ज्यायांसं वा कर्शयितुमुत्सह इति तदा कृतनायाभ्यन्तरकृत्यो निगृह्यासीत ॥८॥ अयदा जय विजिगीषु देखे, कि अपनी सेना और मिग्र तथा भाटविक की सेनाओंके द्वारा मैं बराबर या अधिक शक्विाले शत्रुको दया सकता हू, तो किले और थाहर जनपद के सप कृत्योंको ठीक २ कराकर विग्रह करकेही भासनका भवलम्बन करे ॥८॥ यदा वा पश्येदुत्साहयुक्ता मे प्रकृतयः संहता विवृद्धाः स्व- कर्मण्यव्याहतावरिष्यन्ति परस्य वा कर्माण्युपहनिप्यन्तीति तदा विगृह्यासीत ।। ९ ।। अथवा जब देखे कि मेरी अमात्य भादि प्रकृतिया उत्साहसे भरी हुई हैं, एक सलाहसे काम करनेवाली तथा उन्नत है, अपने दुर्ग आदि कार्यों को बिना किसी विरोधके पूर्णरूपसे करेंगी और शनुके कर्मोंका उपहनन करेंगी, तप ऐसी अवस्थामें भी विग्रह करकेही आसनका अवलम्बन करे ॥९॥ यदा वा पश्येत्परस्यापचरिताः क्षीणा लुब्धाः खचक्रस्ते- नाटवीव्यथिता वा प्रकृतयः स्वयमुपजापेन वा मामेष्यन्तीति ॥१०॥ अमवा जब देखे कि -शत्रुके अमात्य आदि प्रकृतिजन, राजास तिर- स्कृत, दुर्भिक्ष आदिके कारण क्षीण और लुन्ध हुए २, तथा अपनाही सेना, पौर और भारविकोंसे सताये हुए हैं, इसलिये अपनेही भाप, अधवा मेरे द्वारा प्रयुक्त किये गये भेदके उपायोंसे वे मेरेही पास आजावेंगे ॥१०॥ संपन्ना मे वार्ता विपन्ना परस्य तस्य प्रकृतयो दुर्भिक्षोपहता मामेष्यन्ति ॥ ११ विपन्ना मे वार्ता संपन्ना परस्य ॥१२॥ तं । ४ अध्या०] पाइगुण्य मे प्रकृतयो न गमिष्यन्ति विगृह्य चास्य धान्यपशुहिरण्यान्या- हरिष्यामि ॥ १३ ॥ मेरी पार्ता (कृषि वाणिज्य आदि) बनी हुई है और शत्रुको विगढ़ गई है, उसके अमात्य आदि प्रकृतिजन दुर्भिक्षसे पीड़ित हुए २ मेरेही पास भावों ॥.. भामुको वार्ता बनी हुई है और मरी बिगड गो है, फिरभी-- ॥ १२ ॥ शत्रुके पास मेरे अमात्य आदि प्रहातेजन नहो जायेंगे, विमह करके मैं शत्रुकै धान्य, पशु और हिरर्ण्य आदिको छोन सगो १३ ॥ स्वपप्योपघातीनि वा परपण्यानि निवर्तयिष्यामि ॥ १४ ॥ परवणिक्पथाद्वा सारवन्ति मामेष्यन्ति निगृहीते नेतरम् ।।१५।। दूष्यामिनाटीनिग्रहं वा विगृहीतो न करिष्यति ॥ १६ ॥ परदेससे आया हुआ माल मेरे देश के विक्रय माल्को हानि पहुचाता है, इसलिये थाहरसे आनेवाले मालको रोकदृगा ॥ १४ ॥ अथवा शत्रुके व्यापारी मागाँसे सारवान् पस्तु (हाथी, घोड़े, हाथीदात आदि) मेरे पास भाजायगा, विग्रह करनेपर शनुक पास न जासकगो ॥ १५॥ अथवा इसके (शनुके) साथ विग्रह करनेर, यह (शशु) भरने दूष्य, शत्रु और आटविकों को वशमें नहीं करसकेगा।।१६॥ तैरेव वा विग्रहं प्राप्स्यति ।। १७ ॥ मित्रं मे भित्रभाव्यभि- प्रयातो बहल्पकालं तनुश्यव्ययमर्थ प्राप्स्यति ॥ १८ ॥ अथवा दूप्य, शत्रु और आटावकोंके सायही इसे विरह करना पड़ेगा ॥ १७ ॥ अथवा मेरे मित्रभावि (देखो , अधि अध्या, ५५ सुन) मिनपर हमला करके, यह (शा) बहुत याद समयमें, थोड़ीसी सेना आर धन व्यय करकेही महान अर्थको प्राप्त करेगा, मैं इसके कार्यमें रकायद दासगा 540 गुणवतीमादेयां चा भूमि सर्वसंदोहेन वा मामनादृत्य प्रयातुकामः कथं न यायात् ॥ १९ ॥ इति परद्धिप्रतिघातार्थ प्रतापार्थ च विगृह्यासीत ॥ २० ॥ तमेव हि प्रत्यायची नसत इत्याचार्याः ।। २१ ॥ - अथवा गुणवती अत्यन्त सुख देनशाला उपादय भूगिको रेनके लिये, पण (आक्रमण) फरनेफी इच्छा रखनेवाला यह शत्रु मेरा अनादर करकेही, कहीं अपनी सम्पूर्ण सेनाको लेकर चल न दे ॥ १९॥ इत्यादि अवस्थामा देखे भानपर विजिगीपु, शत्रुको उतिकर विधात बरमके दिय भार अपने प्रशाए M १२३४) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधि० का विस्तार करनेके लिये विग्रह काकेही आसनका अवलम्बन करे ॥२०॥ भाक्रमणकारी शत्रु, विजिगापुके द्वारा उसके धामण विन्न किये जानेपर कहीं कुपित हुभा २ इसीके ऊपर आक्रमण कर इसका उच्छेद करदे, तो अनर्थ ही होगा, इसलिये ऐसी अवस्थाम विग्रह करके भासनका अवलम्बन न करे यह प्राचीन अनेक आचार्योंका मत है ॥२१॥ नेति कौटल्यः ॥ २२ ॥ कर्शनमात्रमस्य कुर्यादव्यसनिनः ॥ २३ ।। परवृद्ध्या तु वृद्धः समुच्छेदनम् ॥ २४ ॥ किन्तु कौटल्य इस बातको नहीं मानता ॥ २२ ॥ यह कहता है कि कुपित हुआ २ शत्रु, व्यसन रहित विजिगीपुको उपाह नहीं सकता, फिन्तु थोड़ा बहुत कष्ट पहुचा सकता है ॥ २३ ॥ परन्तु पदि विजिगीषु उसके भाक्रमण में घिन न डाले, तो यह निविप्न अपने शत्रुको जीतकर और अधिक बलवान् होकर, फिर विजिगापुका अवश्य हो उच्छेद कर सकता है ॥ २५ ॥ । एवं परस्य यातव्यो ऽस्मै साहाय्यमविनष्टः प्रयच्छेत् ।।२५।। तस्मात्सर्वसंदोहप्रकृतो विगृह्यासीत ॥ २६ ॥ इस प्रकार विग्रह करके आसनका अवलम्बन करनेपर सो, सुरक्षित हुआ २, शशुका यातव्य (पातम्य उस राजाको कहते हैं जिसपर आक्रमण किया जाय), भपनी रक्षा करनेवाले विजिगीषुको अवश्यही सहायता पहुंचावेगा ॥ २५ ॥ इसलिये सम्पूर्ण सैन्यशक्ति को लेकर प्रयाण करनेवाले शत्रुके साथ अवश्यही पिमह करके आसनका अवलम्बन करे ॥ २६ ॥ विगृह्यासनहेतु प्रातिलोम्ये संघायासीत ॥ २७ ॥ निगृह्या- सनहेतुभिरभ्युचितः सर्वसंदोहवर्ज विगृह्य यायात् ॥ २८ ॥ विग्रह करके आसनके जो हेतु पतलाये गये है, यदि उनसे विपरीत देखे, तो सन्धि करकेही आसनका अवलम्बन करे ॥ २० ॥ विग्रहके अनन्तर भासनके हेनुभोंसे शक्तिका उपचय करके, शत्रुके साथ विप्रहकर यानका अव- एम्बन करे । परन्तु जो शत्रु अपनी सम्पूर्ण सेनाको रेकर किसीपर भाक्रमणकर रहा हो, उसकेप्रति यानका अवलम्बन न करे ॥ २८ ॥ यदा वा पश्येयसनी परः प्रकृतिव्यसनं यास्य शेपप्रकृति- मिरप्रतिकार्य स्खचक्रपीडिता विरक्ता यास्य प्रकृतयः कर्शिता निरुत्साहाः परस्सराद्वा भिन्नाः शक्या लोभपितुमग्न्युदकव्या- धिमरकदुर्भिक्षनिमित्तं क्षीणयुग्यपुरुपनिचयरक्षाविधानः पर इति तदा विगृह्य यायात् ।। २९ ॥
४ अध्या०] पागुण्य (२३५) अथवा जप देखे कि शत्रु व्यसनी होगया है, या इसके भमारप आदि प्रकृतियोंका व्यसन, शेप प्रकृतियों के द्वारा नहीं हटाया जासकता, अपनी सेनाओंसे पीडित (सताई हुई) प्रजा, राजाके प्रति विज हो गई हैं, इसीलिए उरसाह हीन हैं, आपसमें मिलकर नहीं रह सकतीं, इनको लोभ दिया जासकता है, भौर शत्रु, भग्नि जल, व्याधि, सफ्रामकरोग, तथा दुर्भिक्ष आदि उपद्रवोंके कारण, अपने वाहन, कर्मचारी पुरुष, और कोशकी रक्षा न कर सकनेसे क्षीण होचुका है तो उसके साथ विग्रह करके पानफा अयल म्बन करे ।।२९॥ यदा वा पश्यन्मित्रमाक्रन्दश्च मे शूरवृद्धानुरक्तप्रकृतिविपरी- तप्रकृतिः परः ॥ ३० ॥ पाणिग्राहथासारश्च ॥३१॥ शक्ष्यामि मित्रेणासारमाक्रन्देन पाणिग्राहं वा निगृह्य यातुमिति तदा विगृह्य यायात् ।। ३२॥ अथवा जय देखे, कि-मेरे आगेका मिनराजा और मेरे पीछेका मित्र राजा, दोनोंही शूर, अनुभवी एव भनुरक्त अमात्योंसे युक्त है, और शत्रु इनसे विपरीत अमात्योंसे युक्त है, तथा ॥ ३० ॥ इसी प्रकार पाणिग्राह ओर आसार भी ॥ ३१ ॥ इसलिय मित्र के साथ भासारका, और आफदके साथ पाणिग्राह का विग्रह कराके में शत्रुके ऊपर आक्रमण कर सकूगा इत्यादि, तो विग्रह करके थानका अवलम्बन करे ॥ ३२ ॥ यदा पा फलमेकहार्यमल्पकालं पश्येत्तदा पाणिग्राहासारा- भ्यां विगृह्य यायात् ।। ३३ ॥ विपर्यये संधाय यायात ।। ३४ ।। अथवा जप किसी फलको अपने अकेले हीके द्वारा योदेही समयमै सिद्ध होजाने पाला देखे, तो पाणिमाह और आसारके साथमी विग्रह करके यातव्य के प्रति यानकरे ॥ ३३ ॥ यदि फल भलेहीके द्वारा थोडे समयमें सिद्ध होनेवाला न दीखे, सो सन्धि करके यानका भवलम्बन करे ॥ ३४ ॥ यदा वा पश्यन्न शक्यमकेन यातुमवश्यं च यातव्यमिति तदा समहीनज्यायोभिः सामवापिकैः संभूय यायादेकर निर्दिष्टेनांशे- नानकवानिर्दिऐनांशेन ॥ ३५॥ अथवा जर देखे, कि मैं अकेला यान नही कर सकता, पर यान करना अवश्य चाहिये, तो उस समय समशक्ति होनशक्ति तथा अधिकाति इकठे हुए राजाओं के साथ मिलकर यानका भवलायन करे। यदि एकही
[७ अधिक
कोटलीय अर्थशास्त्र
देशपर धावा करना हो तो हिस्सेका निर्देश करके, और अधिक देशोपर धावा
फरना हो तो हिस्सेका निर्देश किय दिनाही यानका भारम्म करे ॥ ३५ ॥
तेपामसमवाये दण्डमन्यतमसिन्निविष्टांशेन याचेच ॥३६॥
संभूयाभिगमनेन या निविंश्येत ।। ३७ ॥ ध्रुवे लाभे निर्दिष्टेना-
शेनाभुये लाभांशेन ॥ ३८॥
यदि समशक्ति आदि राजाओं में से कोई राजा साय चलना स्वीकार न
फरे तो उसको कुछ हिस्सा देना कहकर उससे सेना मागे ॥ ३६ ॥ भयका यह
कहे कि यदि इस समय साथ चलकर तुम मेरी सहायता करोगे, तो मैं भी
अवसर मानेपर साथ चलकरही तुम्हारी सहायता करुगा ॥ ३७॥ यदि भाष
मण करनेपर भूमि मिले तो उसहोमसे निर्दिष्ट अशदे, यदि अन्य सामान मिले
तो उसमेंसे साभके अनुसार हिस्सा देदेवे ॥ ३८॥
अंशो दण्डसमः पूर्वः प्रयाससम उत्तमः ।
विलोपो वा यथालाभं प्रक्षेपसम एव या ॥ ३९ ॥
इति पाइगुण्य सप्तमे ऽधिकरणे विगृह्यासन सधायासन विगृह्ययान सधाययान
सभूयप्रयाण चतुर्थी अध्याय ॥ ४ ॥ आदितो द्विशत ॥१०२॥
मिलकर शत्रुको जीत लनेपर वहासे प्राप्त धनका विभाग इस प्रकार
करना चाहिये -सेताओंकी न्यूनता या अधिक्ताके अनुसार राजाओंको धन
दियेजावे, यह प्रथम पक्ष ह । जिसने जितनी मेहनतकी है उसके अनुसार
उसे धन दियाजाये, यह उत्तम पक्ष समझा जाता है । लूटमें जो जिसके पले
परजाय यह उसीका धन रहे, यहभी एक पक्ष हे। अथवा आममणके समयमें
जितना जिसका थम व्यय हुभा हो, उसहोके भनुसार उसे हिस्सा दिया
जाय ॥३९॥
पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें चौथा अध्याय समाप्त ।
1
पांचवा अध्याय
१०८-११०प्रकरण
३
यान विषयक विचार, प्रकृतियों के क्षय, लोभ
तथा विरागके हेतु, और विजिगीपुके
अनुगामियोंका विचार
+ तुल्यसामन्तव्यसने यातव्यममित्रं येत्यमित्रमभियायात् ॥१॥
५ अध्या०] । पाड्गुण्य (२३७), तत्सिद्धौ यातव्यम् ॥ २॥ अमित्रसिद्धौ हि यातव्यः साहाय्य दद्यान्नामित्रो यातव्यसिद्धौ ॥३॥ यातव्य और मनुके ऊपर सामन्तादि जनित सुल्य व्यसन होनेपर, पहिले जनुके प्रति ही भयाण वरे ॥ १ ॥ उसके वशमें होजानेपर फिर यारण्य पर आक्रमण करे ॥ २ ॥ शत्रुके वशमें कर लेनेपर यातव्य अपना (विजिगी- पुका) सहायक हो सकता है, परन्तु यातन्यके वशमै करलेने पर भी शत्रु कभी सहायक नहीं हो सकता, क्योंकि वह नित्यही अपकार फरनेवाला होता है ॥ ३॥ गुरुव्यसनं यातव्यं लघुव्यमनममित्रं वेति ।। ४ ।। गुरुव्य- सनं सौकर्यतो यायादित्याचार्याः ॥५॥ अधिक व्यसनमे फसे हुए यातव्यपर पहिले चढाई की जाय, या थोडेसे व्यसनमें फसे हुए शनुपर' ॥ ॥ ४ ॥ अधिक व्यसनी यातन्यपर ही पहिले आमामण किया जाय, क्योंकि उसका जीरा लेना बहुत सुगम है, । ऐसा आचार्यों का मत है ॥ ५ ॥ नेति कौटल्यः ॥ ६॥ लघुव्यसनममित्रं यायात् ॥७॥ लम्वपि हि व्यसनमभियुक्तस्य कृच्छं भरति ॥ ८॥ परन्तु कौटल्य इस घातको नहीं मानता ॥ ६॥ यह कहता कि पहिले पर ही आममण किया जाय, चाहे उसपर थोडीही विषारी हो ॥ ७॥ क्योंकि आक्रमण किए जानेपर छोटेसे व्यसनका भी प्रतीकार करना कठिन हो जाता है ॥ ८॥ सत्यं गुर्वपि गुरुतरं भवति ॥९॥ अनभियुक्तस्तु लघुन्य- सनः सुखेन व्यसनं प्रतिकृत्यामित्रो यातव्यमभिसरेत् ।। १० ।। पाणिं गृह्णीयात् ॥ ११ ॥ यपि यातम्यका गुरु व्यसन, चढाई कर देनेपर और भी गुस्ता हो जायगा, और उसका जीतना अत्यन्त सरल हो जायगा ॥ ९॥ तथापि पहिले लघु-उपसन शत्रुपरही यहाई करे, क्योंकि उसपर चढाई न करनेपर, यह अपने छोटेसे व्यसनका सरलतासे प्रतीकार करके यातव्यको सहायताके लिए तैयार हो जायगा ॥ ३० ॥ या पाणिग्राह (युद्ध के समय पीछेसे आममण कर देने चाला) बन जायगा ॥ यातव्ययोगपये गुरुज्यसनं न्यायवृत्रि लघुव्यसनमन्याय- प्रति विरक्तप्रकृति वेति ।। १२ ।। विरक्तप्रकृति यायात् ।। १३ ।।
(२३८) फोटलीय अर्थशास्त्र [७ अपिल गुरु व्यसन (जिसपर मारी विपत्ति आई हुई हो) और प्रजाका न्याय पूर्वक पालन करनेवाला यातन्य एक, रघु व्यसन (जिसपर पोलीसी आपत्ति हो) और अन्याय पूर्वक प्रजाका पालन करनेवाला यातम्य दूसरा, जिससे अमात्य आदि प्रकृति विरक हो ऐसा पातव्य तीसरा, इस प्रकार युगपत् प्राप्त इन तीनों यासम्पोंमेंमे, सबसे प्रथम विरक्तप्रकृति यातम्यपरही आक्रमण किया जाय॥ १२, १३ ॥ गुरुव्यसनं न्यायवृत्तिमभियुक्तं प्रकृतयोऽनुगृह्णन्ति ॥१४॥ लघुव्यसनमन्यायवृत्तिमुपेक्षन्ते ॥१५॥ गुरु व्यसन, पर न्यायवृत्ति यातम्पपर आक्रमण किये जानेपर उसके अमात्य आदि प्रकृरोजन माणपणसे उसकी सहायता करते हैं ॥ ४ ॥ लघु- ध्यसन अन्यायवृत्ति यातव्यपर आक्रमण किये जानेपर उसके अमारय आदि प्रकृतिजन उपक्षावृत्तिसे रहते हैं, अर्थात् न उसकी सहायता करते हैं, और नविरोध करते हैं ॥१५॥ विरक्ता बलपन्तमप्युच्छिन्दन्ति ॥१६॥ तस्माद्विरक्तप्रकृति- मेव यायात् ॥१७॥ क्षीणलुब्धप्रकृतिमपचरितप्रकृति वेति ॥१८॥ परन्तु विरक्त हुए २ अमात्य भादि यलदान राजाकाभी उच्छेद करदेते है॥१६॥ इसलिये घिरसमकृति यातम्पपरही सबसे प्रथम भाक्रमण किया जाय ॥ १०॥ दुर्भिक्ष आदि विपत्तियों से पीड़ित और लोभी अमात्य भादिसे युक्त पातव्यपर पहिले हमला करें, या तिरस्कृत अमात्य आदिसे युक्त यातग्यपर? क्षीणलुन्धप्रकृति यायात् ॥ १९ ।। क्षीणलुब्धा हि प्रकृतयः सुखेनोपजापं पीडां वोपगन्छन्ति ॥ २०॥ नापचरिताः प्रधा- नावग्रहसाध्या इत्याचार्याः ॥२१॥ प्रथम क्षीण और लोभी अमात्य भादिसे युक्त यातव्यपरही आक्रमण करे ॥ १९ ॥ क्योंकि पीड़ित और लोभी अमात्य यही सुगमतासे बहकाये और सताये जासकत है ॥ २०॥ परन्तु तिरस्कृत अमात्य आदिका बहकाना या सताना कठिन है, क्योंकि वे अपनी किसी यातको प्रधान पुरुषक स्वीकार करने परही फिर उसके वशीभूत होसकते हैं, यह भाचार्योका मत है ॥ २१ ॥ नेति कौटल्यः ॥ २२ ॥ क्षीणलुब्धा हि प्रकृतयो भर्तरि स्निग्धा भहिते तिष्ठन्ति ॥ २३ ॥ परन्तु फौटल्य इस पातको नहीं मानता ॥७क्योंकि वह कहता "
५ अध्या०]
पागुण्य
(२३९)
है, कि-पीडित भी क्षमास्य आदि प्रकृतिजन, अपने मालिक में यदा नह
रखते हैं, और उसके हिसके लिये हरघडी तयार होसकते हैं ॥ २३ ॥
उपजापं वा विसंवादयन्ति ॥२४॥ अनुरागे' सार्वगुण्यमिति
॥ २५ ॥ तस्मादपचरितप्रकृतिमेव यायात् ॥ २६ ॥
यहभी सम्भव है कि वे बहकाने में न आवें ॥ २४ ॥ ये इस पातको
समझते हों कि अपने मालिक, अनुराग रखनाही सव गुणोंका मूल है ॥२५॥
इसलिये तिरस्कृतप्रकृति ( जिस पासव्य राजाने अपने अमात्य आदिका अनादर
किया हुआहो) यातव्यपरही प्रथम आक्रमण कियाजाय ॥ २६ ॥
बलवन्तमन्यायत्तिं दुर्बलं वा न्यायवृत्तिमिति ॥ २७ ॥
बलवन्तमन्यायवृत्ति यायात् ॥ २८ ॥ बलवन्तमन्यायपृत्तिममि-
युक्तं प्रकृतयो नानुगृह्णन्ति निष्पातयन्त्यमित्रं वास्य भजन्ते ॥२९॥
अन्यायवृत्ति (अन्यायपूर्वक प्रजाका पालन करने वाले) बलवान् यातल्प
पर पहिले आक्रमण कियाजाय, या भ्यायति दुर्बल यातव्यपर ? ॥ २७ ॥
पहिले भन्यायवृत्ति बलवान् यातव्य राजापरही आक्रमण करे ॥ २८ ॥ क्योंकि
बलवान् भी अन्यायवृत्ति यातव्यपर थाक्रमण कियेजानेपर उसके अमात्य आदि
प्रकृतिजन उसकी सहायता नहीं करते, प्रत्युत दुर्ग आदिसे उसे निकाल देने
है, अथवा इसके शत्रुके साथ जाकर मिल जाते हैं, इसे छोड़कर उसका भाश्रय
लेलेते हैं॥२९॥
दुर्लभं तु न्यायवृत्तिमभियुक्तं प्रकृतयः परिगृह्णन्त्यनुनिष्प-
तन्ति वा ।। ३०॥
परन्तु दुर्यलमी न्यायवृत्ति यातम्यके ऊपर हमला कियेजाने पर उसके
अमात्य आदि प्रकृतिमन प्राणपणसे उसकी सहायता करते है, और उसके दुर्ग
सादिस याहर निकल भागनेपाभी सरायर उसके अनुयायी बने रहते हैं ॥३०॥
अवक्षेपेण हि सतामसतां प्रग्रहण च ।
अभूतानां च हिंसानामधाणां प्रवर्तनः ॥ ३१॥
उचितानां चरित्राणां धर्मिटानां निवर्तनः ।
अधर्मस्य प्रसङ्गेन धर्मस्यावग्रहेण च ॥ ३२ ॥
सजन ग्यक्रियांका तिरस्कार और दुर्तनापर अनुग्रह करनेसे, अनुचित
अधर्मयुक हिंसाभों का आरम्भ करनेसे ॥ ३१ ॥धारमाओंके उचित भाच-
रणों घोड़ने, अधर्ममें भासक रहने और धर्मको होड दरेते ॥ ३२ ॥
. F (२४०) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधि० अकार्याणां च करणः कार्याणां च प्रणाशनः । अप्रदानैश्च देयानामदयानां च साधनैः ॥ ३३ ॥ अदण्डनैश्च दण्ड्यानामदण्ड्यानां च दण्डनैः । अग्राह्याणामुपग्राहाह्याणां चानभिग्रहः ॥ ३४ ॥ भनुचित कार्योंके करने तथा उचित कार्योंके बिगाडनेसे, सुपानामें दान नदेने और कुपार्योको हरतरह सहायता करनेसे ॥३३॥ अपराधी य. क्तियोंको दण्ड न देने और सर्वया निरपराध व्यक्तियोंको कठोर दण्ड देनसे, चोर भादि स्याज्य पुरपोंको सदा पास रसने और सान्दानी आये हुए सभ्य नागरिक पुरुषको दूर हटाने से ॥ ३५ ॥ अनर्थ्यानां च करणरानां च विपातनः । अरक्षणेच चोरेभ्यः स्वयं च परिमोपणैः ॥ ३५ ॥ पातैः पुरुपकाराणां कर्मणां गुणदूपणेः । उपयातः प्रधानानां मान्यानां चायमाननः ।। ३६ ॥ अनर्थकारी कार्योंके करने और सुफ्लोत्पादक कार्योंके न फरसे, चोरोंसे प्रजाकी रक्षा न करने आर स्वय चोरी करनेसे ॥३५॥ पुरुषार्थी ग्य- क्तियोंके छोड़ने आर पथास्थान उचित रीतिपर प्रयुक्त किये गये सन्धि धादि गुणोंकी निन्दा करनेसे, भध्यक्ष धादि प्रधान पुरुपोंपर दोपारोपण करके उन्हें मीच काममें लगाने और माननीय आचार्य पुरोहित आदि व्यक्तियोंका तिर- स्कार करनेसे॥३६॥ विरोधनैश्च वृद्धानां वैपम्येणानृतेन च । कृतस्यापतिकारेण स्थितस्याकरणेन च ॥ ३७॥ राज्ञः प्रमादालस्याभ्यां योगक्षेमवधेन च । प्रकृतीनां क्षयो लोभो वैराग्यं चोपजायते ॥ ३८॥ किसीके विषयमें किसी दूसरेसे अनुचित उचनीच या झूठ कहकर वृद्ध पुरपामें परस्पर विरोध करानेसे, किसीसे किये हुए उपकारको न मानने और स्थित अर्थात् नित्य कर्मोके न करनेसे ॥३७॥ तथा राजाके प्रमाद और आएस्यके कारण, योग (किसी वस्तु की प्राप्ति) तथा क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) का नाश होनेसे अमात्य आदि प्रकृतियोंका क्षय, उनमें लोभ, और राजाके प्रति पेराग्य उत्पन्न होजाता है ।। ३८॥ क्षीणाः प्रकृतयो लोभं लुब्धा यान्ति चिरागताम् ।
भी जाय, • अभ्या०] पाइगुण्य (२४१) विरता यान्त्यमित्रं या भर्तारं मन्ति चा स्वयम् ।।३९।। क्षीण हुए २ अमात्य आदि प्रकृतिजन लोभमस्त होजाते हैं, लोभी होकर राजाकी ओर से विरक्त होजाते है, और विरक्त होनेपर शसे जा मिलसे है। अथवा अपने भापही अपने मालिकका हनन कर डालते हैं ॥ ३९ ॥ तस्मात्प्रकृतीनां क्षयलोभविरागकाराणानि नोत्पादयेत् ॥४०॥ उत्पनानि या सद्य प्रतिकुर्वीत ॥४१॥ इसलिये राजाका कर्तव्य है कि वह अमात्य आदि प्रकृतियों के भय, लोभ तथा विरागके कारणोंको उत्पन्न न होने दे ॥ ४०॥ यदि वे उत्पन हो तो उनका तत्काल प्रतीकार करदिया जावे ॥११॥ क्षीणा लुब्धा निरक्ता वा प्रकृतय इति ॥ ४२ ॥ क्षीणाः पीडनोच्छेदनभयात्सयः संधि युद्ध निष्पतन वा रोचयन्ते ॥४३॥ क्षीण जुन्ध और विरा इन तीन प्रकार की प्रकृत्तियों से पूर्वकी अपेक्षा उत्तरको गुर समझना चाहिए ॥ ४२ ॥ क्षीण,हुए २ अमात्य आदि प्रकृतिजन पीडा और उच्छेदके भयसे, जल्दी ही सन्धि, युद्ध या न या दुर्ग आदि छोड जाना स्वीकार कर रेते हैं ॥ ४३ ॥ लुब्धा लोभेनासंतुष्टाः परोपजापं लिप्सन्ते ॥४४॥ विरक्ताः पराभियोगमभ्युत्तिष्ठन्ते ।। ४५ ॥ लुब्ध अमात्यादि, लोभके कारण सन्तुष्ट न होनेसे, शत्रुके द्वारा प्रयुक हुए २ भेदको माप्त हो जाते हैं । अर्थात् शत्रु, उनको शट पहफा सकते है ॥ ४४ ॥ विरत प्रकृत्ति शधुके साथ मिलकर विजिगीपुपर आक्रमण करनेको तैयार होजाती हें ॥ ४५ ॥ तासां हिरण्यधान्यक्षयः सर्वोपघाती कृच्छ्रप्रतीकारव॥४६॥ 'युग्यपुरुपक्षयो हिरण्यधान्यसाध्यः ।। ४७ ॥ इन प्रकृतियोंके हिण्य और पाम्पका क्षय होजाना, हाथी घोडे आदि सबका नाश होता है, और इसीलिये इसरा प्रतीकार होना भी आयन्त कठिन है ॥ १६ ॥ परन्तु हाथी घोडे और पुरपोंके क्षय का प्रतीकार हिरण्य तथा धान्य आदिके द्वारा सुगमतासे होसकता है ॥ ७ ॥ लोम ऐकदेशिको "मुख्यायत्तः परार्थेषु शक्यः प्रतिहन्तु- मादातुं चा॥ १८ ॥ निरागः प्रधानापग्रहसाध्यः ॥४९॥ लोभ, प्रकृतियों में से किसी एकको होता है, उसका नाम लेना भी
(२४२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[७ अधिक
। मुख्य के अधीन है, और गत्रु या यातम्प आदिक धनोंके द्वाराही उसका
प्रतीघात या मतीकार भी होसकता है, अभया मुख्य न्यासियोंके द्वारा यह स्वय
लिया भी जासकता है ॥ १८ ॥ परन्तु विरागका प्रतीकार प्रधान पुरुषको
पशम किये बिना नहीं होसकता ॥१९॥
निष्प्रधानाहि प्रकृतयो भोग्या भवन्त्यनुपजाप्याथान्येपाम-
नापत्सहास्तु प्रकृतिमुख्यप्रग्रहैस्तु बहुधा मिन्ना गुप्ता भवन्त्यापत्स-
हाश्च ॥५०॥
प्रधान रहित प्रकृतिजन, विजिगीपुके पराम होजाते हैं, वे दूसरेके
द्वारा यहकाये भी नहीं जासकते , परन्तु वे आपत्तियों को नहीं सहसकते,
किसी आपत्तिके आनेपर विजिगीषुको खोदकर चले जाते ६ । प्रधान पुरुपके
भधीन रहनेपर तो दूसरासे प्राय अभेद्य सुरक्षित और शनुस द्वारा भारमण
फादमेपर विपत्तिको भी सहन करसकते हैं ॥ ५० ॥
समानायिकानामपि संघिचिग्रहकारणात्यवेक्ष्य शक्तिशाच-
युक्तौ संभ्य यायात् ॥ ५१॥ शक्तिमान्हि पाणिग्रहणे यात्रा-
साहाय्यदाने या शक्तः ॥५२॥
साथ २ घटनेवाले अनुगामियांक भी सन्धि और विमहके कारणोंको अच्छी
तरह सोच विचारकर, शक्ति और पवित्रताको देखकर उनके साथही आक्रमण
करे ॥ ५५ ॥ क्योंकि शक्तिशाली अनुगामी, पाणिग्राहक रोकने और युद्ध के
लिय यात्रा सना आदि देनसे सहायता करसकता है ॥ ५२ ॥
शुचिः सिद्धौ चासिद्धी च यथास्थितकारीति ॥५३ ॥ तेषां
ज्यायसकेन द्वाभ्यां समाभ्यां या संभूय यातव्यमिति । द्वाभ्यां
समाम्यां थेयः ॥ ५५॥
और शुचि अर्थात् पविय (निष्कपट), कार्यसिद्ध होने या न होनेपर
दोनों भवस्याओं में न्याय्य मार्गकाही अनुसरण करता है ॥५३॥ उनमेसे
अधिक शक्तिवाले एकके साथ, या घरावर शचिवाले दोके साथ मिलकर यात्रा
करे ? अर्थात् इन दोनॉमसे किसके साथ यात्रा करना अच्छा है। ॥ ५४॥
बरायर शक्तिवाले दोके साथ यात्रा करना श्रेष्ठ हे ॥५५॥
ज्यायसा झवगृहीतश्वरति समाभ्यामतिसंघानाधिक्ये वा
11 ५६ ॥ तौ हि मुसौ भेदयितुम् ॥ ५७॥ दुरथैको द्वाभ्यां
नियन्तुं भेदोपगृहं चौपगन्तुमिति ॥ ५८ ॥
-- ५ अध्या०J पाइगुण्य (२५३) क्योंकि अधिक शक्तिवालो साथ विजिगीषुका तिरस्कृत होकर या दवकरही पलना परता है, वरायर शक्तिशालॉके साथ यह नहीं होता ॥५६॥ और उनमेंसे (परावर शक्तिशालोमेसे) एकके साथ अधिक मेल करके उन दोनों में परस्पर भेद भी सुगमतासे डाला जासकता हे ॥५४॥ यदि उन दोनॉमसे कोई दुष्ट हो तो दूसरेकी सहायतासे उसका दमन और दूष्य भादिके द्वारा भेद प्रयोगसे विग्रह भी किया जासकता ह ॥ ५८ ॥ समेनकेन द्वाभ्यां हीनाभ्यां वेति ॥ ५९॥ द्वाम्या हीनाम्या श्रेयः ॥६०॥ तौ हि द्विकार्यसाधको वश्यौ च भवतः ॥ ६१ ॥ समशक्ति एकके साथ, या होनशक्ति दोके साथ गाना करे ? अर्थात् इन दोनोगेसे किसके साथ यात्रा करना अच्छा है? ॥ ५९॥ होनशात दोके साथ यात्रा करना श्रेष्ठ है ।। ६० ॥ क्योंकि वे दोनों दो कार्योको एक साथ फरसकते हैं और विजिगांधुके वशमें भी रहते हैं॥६॥ कार्यसिद्धो तु ॥ ६२॥ भपतक, मिलकर यात्रा करने के लिये विजिगीपुसे भपेक्षित रामाभोंके विषयमें निरूपण किया गया। अब दूसरे राजाओंसे अपेक्षित विजिगापुर सम्यन्धमें पताया जाता है। कार्य सिद्धि होनेपर यदि--२ ॥ कृतार्थाज्ज्यायसो गूढः सापदेशमपस्रवेत् । अशुचेः शुचिवृत्तात्तु प्रतीक्षेताविसर्जनात् ॥ ६३ ॥ कृतार्थ हुए २ अधिकशक्ति राजाके दिल में वेईमानी भाजावे, तो पुन्छ यहाना करके चुपचाप यहांसे चलदेवे । उसकी ईमानदारी निष्कपटता जान लेनेपर तो, गवतक यह न छोडे तबतक प्रतीक्षा करे ॥३॥ सत्रादपसरेयत्तः कलत्रमपनीय वा समादपि हि लब्धार्थाद्विश्वस्तस्य भयं भवेत् ॥६४॥ दुर्ग आदि सङ्कटमय प्रदेशसे, यक्षपूर्वक अपने कलत्र आदि भन्तरण पारिवारिक जनोंको कहीं दूसरी जगह भेजकर चला जाये। क्योंकि सफल हुए२ समशक्ति राजासे भी विजिगीपुका मयही होता है ॥ ६ ॥ ज्यायस्त्वे चापि लब्धार्थः समो विपरिकल्पते अभ्युचितश्चाविश्वास्यो.द्धिचित्तविकारिणी ।। ६५ ।। सार यह है कि चाहे अधिक शक्ति हो या समशक्ति, कार्य सिद्धि हो जानेपर दिल यदल्ही जाता है। पृद्धिको प्रत हुए रानाका कमी विधास नहीं करना चाहिये, यह दि तिको विकृत करदेनेपाली होती है ॥ १५॥ .
[७ प्रधिo. " . M (१२४४)) कोटलीय अर्थशास्त्र विशिष्टादल्पमप्यंश लब्ध्वा तुष्टमुसो बजे अनंशो या ततोऽस्याङ्के प्रहत्य द्विगुणं हरेत् ।। ६६ ।। अधिकशक्ति राजासे योदासा मी अंक प्राप्त करके प्रसचमुर होकर चला जावे, यदि वह उस समय कुछ भी न दे, तो भी प्रसन्नतापूर्वक लौट जाये और पीछे से उसकी किसी निर्यलतापर प्रहार करके दुगना धन धमूल करलेवे,॥६॥ कृतार्थस्तु स्वयं नेता विसृजेत्सासवायिकान् अपि जीयेत न जयेन्मण्डलेप्टस्तथा भवेत् ॥ ६७ ॥ इतियागुण्ये सप्तमेऽधिकरणे यातव्यामिन्योरभिमचिन्ता क्षयरोभविरागहेतवः प्रकृतीनां सामवायिकविपरिमर्श पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ आदितस्त्रिशतः ॥ १०३॥ स्वतन्त्रतापूर्वक यात्रा करनेवाला विजिगीषु,, सफल. (कार्यसिदि) होनेपर, अपने साथी भनुगामी राजाओंको आदरपूर्वक विदा करे, चाहे उसे स्वयं थोदाही हिस्सा मिले। ऐसा करनेसे यह राजमण्डलका अतिप्रिय हो जाता है।६७ ॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमे पांचयां अध्याय समाप्त । . -- . छठा.अध्याय.. १११, ११२ प्रकरण एकसाथ प्रयाण, और" परिपणित, अपरिपणित, तथा अपस्तृत सन्धि। विजिगीपुर्द्वितीयां प्रकृतिमेवमतिसंदध्यात् ।। १ ॥ सामन्तं संहितप्रयाणे योजयेत् ॥ २॥ त्वमितो याहि ॥ ३ ॥ अहमिवो' यास्यामि ॥४॥.समानो लाभ इति ॥५॥ विजिगीपु, द्वितीया 'प्रकृति अर्थात्ाारूप प्रकृतिको घक्ष्यमाण प्रकारोंसे धोखा दे' एकसायाभिध स्थानकी, यानाके लिये सामन्तको नियुफ करे ॥२॥ उससे कहे कि-तू इधरसे जा, ॥३॥ और मैं अपने यातम्यके प्रतिदारसे (माया ॥ दोनों स्थानोंपर जो लाभ होगा, यह परापर हम - दोकासमता जावेगा ॥ ५॥.
६ आया०]
पाइगुण्य
लाभसाम्यसिंधिः ॥६॥ वैषम्ये विक्रम ॥७॥ संधिः
परिपणितश्चापरिपणितश्च ॥ ८॥ त्वमेतं देशं याबहमिमं देश
यास्यामीति परिपणितदेशः ॥९॥
यदि दोनोंको समान लाभही हो तो, चिनिणीपु, समशक्ति होमके,
कारण उससे सन्ध्रि करलेवे ॥ ६ ॥ यदि विजिगीपुको ,अधिक लाभ हो, तो
उससे लडाई कारेवे ॥ ॥ अव परिपणित (देश, काल, या कार्य किसीकी
शर्त लगाकर कीजानेवारी) और अपरिपणित (इससे विपरीत) सन्धिका-
निरूपण करते है॥ ८॥ उस अमुक देशको जा, और मैं इसको जाऊगा, इस
प्रकार देश विशेषका निश करके जो सन्धि कीजाय वह पहिली_परिपणित
सन्धि ह । इसको परिपणितदेशसन्धि भी कह सकते है ॥ ९ ॥
त्वमेतावन्तं कालं चेष्टस्वाहमेतावन्तं कालं चेष्टिष्य इति
परिपपितकालः ॥१०॥ त्वमेतावत्कार्य साधयाहमिद कार्य साध-
यिष्यामीति परिपणितार्थः ।। ११ ॥
तुम इतने समय तक कार्य करते रहो) और मैं इतने समय तक करूगा,
इस प्रकार नियमित समयका निर्देश करके जो सधि की जाय वह दूसरी
परिपणितकालसन्धि कहाती है ॥ १० ॥ तुम इसने कार्यको पूरा करो, और
इतना कार्य पूरा करूगा, इस प्रकार नियमित कार्यका निर्देश करके की हुई
सन्धिको परिपीणतकार्यसाम्य कहा जाता है ॥११॥
यदि वा मन्येत शैलवननदीदुर्गमटवीव्यवहितं छिन्नधान्य-
पुरुपवीवधासारमयवसेन्धनोदकमविज्ञातं प्रकृष्टमन्यभावदेशीयं वा
सैन्यन्यायामानामलब्धभोमं वा देश परो यास्यति विपरीतमह-
मित्येतस्मिन्विशेपे परिपणिवदेश संधिमुपेयात् ॥ १२॥
जय विजिगीषु यह समझे कि--जिस देशमें पहा, जगली और
नदियोंके किनारपर हे २ किले हों, वहा तक पहुचने में भयानस-जगलाको
पार करना पडे, जहा दूसरे देशसे धान्य, पुरुष, नैलत आदि सामान और
अपने मिन घलको म लाया जा सके, जहा घास की आर जल न मिले,
अपरिचित हो (जिसका पूर्णतया भोगोलिक ज्ञान न हो), दूर हो, जहाको
प्रजा स्वामी भक्त न हो तथा जहां सन'के भान जाने या कवायद धादिके लिए
अच्छी भूमि न हो, इत्यादि कारणोंसे, कठिनतासे पशमें भानेवाले देशको
दूसरा सामन्त यात्रा करेगा, और सुगमतासही यसमें आजनियाले देशपर मैं
भाक्रमण करूगा तो इस विशेषताके होनेपर परिणितदेशसन्धि करले वे ॥२॥
(२४६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[७ माध०
यदि वा मन्येत प्रवर्पोप्णशीतमतिव्याधिप्रायमुपक्षीणाहारोप-
भोग सैन्यव्यायामानां चौपराधिक कार्यसाधनानामूनमतिरिक्त
या कालं परश्चेष्टिष्यते विपरीतमहमित्येतस्मिान्वशेपे परिपणितकालं
संधिमुपेयात् ॥ १३ ॥
अथवा यदि विजिगीषु यह समझे कि-जब वी गरमी और सरदी
बहुत अधिक हो, जिन दिनों साधारणतया बीमारी होती हो, आहार भादिके
लिये सामान अच्छी तरह न मिरता हो, सेनाकी कवायदादिष्टीक न होसकती
हो, तथा जितने समयमें कार्य सिद्धहो उतने, या उससे भी अधिक समय में
दूसरे सामन्तका कार्य करना पड़ेगा, और मैं अपने अनुकूल समयमें ही कार्य
फरूंगा, तय ऐसे विशेष कारणके उपस्थित होनेपर परिपणितकालसन्धि
कर देवे ॥ ३॥
यदि वा मन्येत प्रत्यादेयं प्रकृतिकोपकं दीर्घकालं महाक्षय-
व्ययमल्पमनर्धानुबन्धमकल्यमधर्म्य मध्यमोदासीनविरुद्धं मित्रो-
पघातकं वा कार्य परः साधयिष्यन्यति विपरीतमहमित्येतस्मिन्वि-
शेपे परिपणितार्थ संधिमुपेयात् ॥ १४ ॥
अथवा विजिगीषु जब यह समझे, कि-शत्रुसे उच्छेद करदेने योग्य
भमात्य भादि प्रकृतियोंको कुपित करनेवारे, बहुत समयमें सिद्ध होनेवाले,
तया जिन कार्योंमें अत्याधिक पुरषोंका नाश और धनका व्यय हो, थोरे और
भविष्यके अनर्थकारी, कार्यकालम कष्टकर, अधर्मसे युक्त, मध्यम सथा उदा.
सीन राजाके विरोधी, तथा मित्रोंको कष्ट पहुंचाने वाले, फार्यको दूसरा सामंत
करेगा, और मैं इससे विपरीत कार्यको करूंगा, तद इस विषेश कारण के होने
पर परिपणितार्थ सन्धिकरे ॥ १४ ॥
एवं देशकालयोः कालकार्ययोर्देशकार्ययोर्देशकालकार्याणां
चावस्थापनात्सप्तविधः परिपणितः ॥ १५ ॥ तस्मिमन्प्रागेवारभ्य
प्रतिष्ठाप्य च स्वकर्माणि परकर्मसु विक्रमेत ॥ १६ ॥
इसी प्रकार देश-काल, काल-कार्य, देश-कार्य, भौर देशकालकार्य इनके
परस्पर भवस्थापन अर्थात् मिलानेसे, १ ये और तीन पहिली, कुल मिलाकर
सात प्रकारकी परिपणित सन्धि होती है ॥ १५॥ परिपणित सन्धि कर लेने
पर पहिणेही अपने कार्योको प्रारम्भ करे और उन्हें पूर्ण उद्देश्यपर पहुंचा देवे ।
तदनन्तर शके दुर्ग भादि कार्योंपर भाक्रमणकरे ॥१॥
. ६ अध्या०] पाइगुपय (२४७) व्यसनत्वरावमानालस्थयुक्तमहं या शत्रुमतिसंधानुकामो देश- कालकार्याणामनवस्थापनात्संहितौ स्व इति संधिविश्वासन पर- च्छिद्रमासाद्य प्रहरदित्यपरिपणितः ॥१७॥ मस, यूत आदि व्यसनासे, शीघतासे, तिरस्कारसे तथा आलस्यसे युत, अविचारशील मूर्ख शत्रुको विजय करनेकी इच्छा रखनेवाला राजा, देश, काल और कार्यकी व्यवस्था न करकेही हमदोमा आपसम सन्धि करते हैं' ऐसा वाणीमानसे कहकर, सन्धिके बहाने उसपर अपना विश्वास जमाकर, तथा उसके दोपोंका पता लगाकर भाक्रमण कादेव, यह अपरिपणित सन्धि होती है ॥१७॥ तत्रैतद्भवति ॥ १८ ॥ . सामन्तेनैव सामन्तं विद्वानायोज्य विग्रहे । ततोऽन्यस्य हरेद्भूमि छित्वा पक्षं समन्ततः ।। १९ ॥ सन्धि कर लेनेपर या करना चाहिये कि.-~॥ १८ ॥ विद्वान् विचार- शील विजिगीषु, एक सामन्तके साथ ही दूसरे सामन्तको लडादेवे । और फिर यातव्य मिनके समम पक्षको नए करके, धन्य यातव्यको भूमिको अपने वशमें कर लेवे।।१९।। संधेरकृतचिर्पा कृतश्लपणं कृतविदूपणमवशीर्णक्रिया च ।। २० ।। विक्रमस्य प्रकाशयुद्ध कूटयुद्धं तूप्णींयुद्धमिति संधि- विक्रमौ ॥ २१ ॥ अपूर्वस्य संधैः सानुबन्धैः सामादिभिः पर्ये- पर्ण समहीनज्यायसां च यथावलमवस्थापनमकृतचिकीर्षा ॥२२॥ सन्धि चार धर्म समझे जाते हैं अकृतधिकीर्पा, कृतश्लेषण, कृतनि- दूपण, और अवशीर्णक्रिया ॥ २० ॥ तथा विग्रहके प्रकाशयुद्ध, फूटयुद्ध और तूष्णीयुख, ये तीन धर्म है । इस प्रकार सन्धि और विग्रहका परस्पर विभाग है ॥१५॥ किसी राजाके साथ पहिले ही पहिले, एक दूसरेके साथ मिलकर प्रयुक्त किये गये साम आदिके द्वारा सन्धिझा करना, और अपनी शक्तिके अनु- सार, समशक्ति, दीनशक्ति तथा अधिकशक्तिः राजाओंकी, उचित साम आदि के द्वारा ही व्यवस्था करना 'अकृतचिकीर्षा' नामक सन्धि धर्म है ॥२२॥ कृतस्य प्रियहिताभ्यामुभयतः परिपालनं यथासंमापितस्य च निवन्धनस्यानुवर्तनं रक्षणं च कथं परस्मान मियेत इति । (२४८) कौटलीय अर्थशास्त्र [७अधिक कृतश्लेषणम् ॥ २३ ॥ परस्यापसंधेयतां यातिसंघानेन स्था- पयित्वा व्यतिक्रमः कृतविदूपणम् ॥ २४ ॥ की हुई सन्धिको प्रिय'तपा हित आयरणके द्वारा, दोनों पक्षोंकी और से यनाये रखना, और अपने पूर्व कथनके (समझोत) अनुसार शाका मानना - तथा इसमकार उनकी रक्षाकरना, जिससे शत्रु भेद न दालसके, यह 'कृत- 'इरेपण' सन्धि धर्म कहाता है ॥ २३ ॥ इसने दूप्य (राज्यद्रोही) के साथ सन्धिकी है, इस बहानेसे शनुकी ओरसे सन्धिमङ्गको सिद्धकरके, विजिगीपु • का पहिले कीहुई सन्धिको तोड़ देना, ‘कृतबिदूपण' सन्धि धर्म होता "है॥२४॥ भृत्येन मित्रेण या दोपापस्तेन प्रतिसंधानमवशीर्णक्रिया ॥ २५॥ तस्यां गतागतश्चतुर्विधः-॥ २६ ॥ किसी दोपसे विजिगीपुको छोड़कर गये हुए भृत्य या मिनके साथ फिर सन्धिका होजाना 'अवणिप्रिया' नामक सन्धि धर्म कहाता है ॥ २५ ॥ भवणिक्रिया पृथर होकर फिर मिलजाना (गतागत) चार प्रकारका होता है ॥२६॥ कारणाद्गतागतो विपरीतः कारणाद्गतो 5 कारणादागतो विपरीतश्चेति ॥ २७ ॥ किमी कारण विशपसे ही पृथक् होना और फिर किसी कारण विशेपसे -ही भाकर मिलजाना, विगाही कारणके पृथक् होना और बिना कारणही आकर फिर मिल जाना, किसी कारण विशेषसे पृथक् होनेपर बिना ही कारण आकर फिर मिलगाना, मिनाही कारणके पृथक् होना तय किसी कारण विशेषसे पुन आकर मिलजाना ॥२७॥ स्वामिनो दोपेण गतो गुणेनागतः परस्य गुणेन गतो दोपणागत इति कारणाद्गतागतः संधेयः ॥ २८॥ अपने मालिकके दोष (भप्रसन्नता आदि) से पृषर हुभा २ तथा (पस- क्षता आदि) गुणके कारण पुन आया हुशा, शत्रुके गुणोके कारण मारिकको 'छोडकर गया हुआ तथा शत्रुके दोषाको जानकर पुन मालिकके पास आया हुभा । यह गमनागमन कारणपूर्वक होता है, इसरिये पुन सन्धि करने के । योग्य है ॥ २८ ॥ 'स्वदोषेण गतागतो गुणमुभयोः परित्यज्याकारणाद्गता- गतंथलघुद्धिररोधयः ।। २९ ॥
६ अध्या०] पाइगुण्य (२४२) अपनेही दोपसे स्वामीको छोड़कर शयुके पास गया हुआ, तथा उसी दोपसे शत्रुको छोड़कर फिर स्वामीके पास आया हुआ, स्वामी और शत्रु दोनोंके गुणोंको न समझ सकनेके कारण, उन्हें बिना ही कारण छोड़कर माता भाता हुमा, चञ्चल बुद्धि पुनः सन्धि काने योग्य नहीं होता ॥ २९ ॥ स्वामिनो दोपण गतः परस्मात्स्वदोपेणागत इति कारणा- गतो ऽकारणादागतस्तयितव्यः ॥ ३०॥ स्वामीके दोपसे शत्रुके पास गया हुआ, तथा यहाँसे अपने दोपसे लोटा हुआ, कारणसे गत और भकारणसे भायाहुआ समशाजाचे, तथा इसकी जांच निम्नलिखित रीतिसे कोजावे ॥३०॥ परप्रयुक्तः स्वेन या दोपेणापकर्तुकामः परस्योच्छेत्तारममित्रं मे ज्ञात्वा प्रतिघातभयादागतः परं वा मामुच्छेत्तुकामं परित्य- ज्यानृशंस्यादागत इति ज्ञात्वा कल्याणयुद्धि पूजयेदन्यथावुद्धि- मपकृष्टं पासयेत् ॥ ३१ ॥ क्या यह शत्रुकी प्रेरणाले मेरा अपकार करने के लिये आया है ? अथवा मेरे द्वारा कियेगये पहिले भपकारको याद करके स्वयही उसका बदला निका- लेने आया है ? वा शत्रुके आदमियों का वध करनेकी इरछा करनेवाले मेरे शत्रुको जानकर अपो बधके भयसे यहां चला भाया है ? अथया मेरे उच्छेदकी कामना करनेवाले शत्रुको छोड़कर पहिले बहके कारण मेरे पास आगया है ! इत्यादि । इसको कल्याणबुद्धि जागकर सत्कारपूर्वक अपने पास रक्खे, यदि अन्यथायुद्धि हो तो दूरही पास करावे ॥३॥ स्वदोपेण गतः परदोपेणागत इत्यकारणाद्गतः कारणादा. गतस्तर्कयितव्यः ।। ३२॥ अपने दोपसे मालिकको छोड़कर श के पास गया हुआ, तथा शत्रुके दोपके कारण उसे छोड़कर पुनः आया हुआ, अकारण गत और कारणसे भावाहुआ समझना चाहिये । इसकी भी निरीतिसे जांच कोजावे ॥ छिद्रं मे पूरयिष्यत्युचितो ऽयमस्य वासः परनास्य जनो न रमते ॥ ३३ ॥ मित्रै संहितः शत्रुभिर्विगृहीतो लुब्धक- रादाविमा शत्रुसंहिताद्वा परस्मादिति ज्ञात्वा यथावुद्धयवस्थाप- पितव्यः ॥ ३४॥ क्या मह भय यहां भाकर मेरे दोपोंको फैलायेगा ? या इस प्रान्तका [७ अधि.. (२५०)। कौटलीय अर्थशास्त्र निघास इसकेलिए अनुकूल है इसलिये आया है ? अथवा इसके सीपुर आदि परदेशमें रहना नहीं चाहते ? अथवा मेरे मित्रोंके साथ इसने सन्धि करती है। या शश्रुनि इप्सका कुछ भपकार किया है ? अथया अपने शयुसे सन्धि कियेहुए लोभी तथा कर शत्रुसे घबना गया है। हत्यादि। इन सब मातोंको जानकर फरयाणवृद्धि होनेपर उसे रक्खे, अन्यथा दूर करे ॥३३ ३४॥ कृतप्रणाशः शक्तिहानिर्विद्यापण्यत्वमाशानिर्वेदो देशलौल्य- मविश्वासो बलवद्विग्रहो वा परित्यागस्थानमित्याचार्या ॥३५॥ आचार्योंका मत है कि जो कृतज्ञ न हो, जिसकी शक्तियोंका क्षय होचुका हो, साधारण विगैप वस्तुओंके समान जिसके राज्यमें विद्या मूरय लेकर विकती हो, भर्थात् जो विद्याको अवहेलना करनेवाला हो, ऐनकी आशा दिलाकर न देनेपर दुखदाई हो, जिसके देशमें उपद्रय रहता हो, जो मृरयापर विश्वास न करता हो, अथवा बलवान् राजाके साथ झगडा कर बैठे,ऐसे मालिक (राजा) का परित्याग करदेना चाहिये ॥ ३५॥ भयमवृत्तिरमर्प इति कौटल्यः ॥ ३६ ।। इहापकारी त्याज्यः परापकारी संधेयः ॥३७ पान्तु कोटरयका मत है कि-भय, किसी कार्यको भारम्भ न करना तथा फेध, इन्ही तीन कारणोंके होनपर राजाका परित्याग करे ॥३६ ॥ गतागतके विषयमें इतनी बात और ध्यान रखनी चाहिये कि जो अपना अपकार करके जावे, और शत्रुका भपकार किये बिनाही वापस भावे उसे सर्वथा त्यागदेवे । और जो शत्रुकाही भपकार करने वाला हो, उसके साथ फिर मिळावे ॥३७॥ उभयापकारी तर्कयितन्य इति समानम् ॥ ३८ ॥ असंधे- यत्वेन त्ववश्यं संधातव्ये यतःप्रभावस्ततः प्रतिविदध्यात् ॥३९॥ जो दोनोंका अपकार करनेवाला हो उसकी अच्छी तरह परिक्षा करके कल्याण पुद्धि होनेपर रखलेवे, अन्यथा म रक्खे ॥ ३८॥ जो सन्धि करने योग्य नहीं है, ऐसे व्यक्ति के साथ यदि किन्हीं विशेप पारणोंसे अवश्य सन्धि करनी पदजावे, तो शत्रुका जिन कारणोंसे उस (व्यक्ति) पर प्रभाव हो, उनका प्रती- फार फरदेषे ॥३९॥ सोपकारं व्यवहितं गुप्तमायुः क्षयादिति । वासयेदरिपक्षीयमवशीर्णक्रियाविधौ ॥ ४० ॥ शत्रुपक्षका कोई व्यक्ति अपने आथित रहकर, किसी दोपसे फिर शत्रु के पास जाकर पुन वापस आये तो इस प्रकारके गतागत के विषय में भी पुछ 1 । ६ अध्या०] पाड्गुण्य (२५१) सन्धिके नियम बतायजाते हैं:-अवशीर्ण क्रिया विधिमें (टूटी हुई सन्धिको पुनः स्थापित करनेम) अपना उपकार करनेवाले शत्रु पक्ष गतागत व्यक्तिको, एक विश्वस्त मृत्पकी देखरेखम, छिपे तौर पर आयुपर्यन्त आश्रय दिया जावे ॥४०॥ विक्रामयेद्भर्तरि वा सिद्धं वा दण्डचारिणम् । कुर्यादमित्राटवीए अत्यन्तै वान्यतः क्षिपेत् ॥४१॥ यदि पह निष्कपट सिद्धहो तो स्वामाकी परिचयों में लगा लिया जाये, यहाभी निष्कपट सिद्ध होनेपर सेना विभागमें नियुक्त करके शत्रु अथवा आट- विकॉके मुकावलमे भेज दियाजावे । अपवा अन्यत्र दूरदेशमें किसी कामपर नियुक्त कर दियाजावे ॥ १॥ पण्यं कुर्यादसिद्धं वा सिद्धं वा तेन संवृतम् । तस्यैव दोषणादृष्य परसंधेयकारणात् ॥ ४२ ॥ यदि जिस कार्यपर यह लगाया गया है, उसके करनेमें असमर्थ हो, अर्थात् हदय कपट होने के कारण ठीक करता हो, तो उसे माल ऐचना कहकर शत्रके देशमें भेज दियाजावे, और इस बहानेसे शभुके साथ सन्धि फरनेका दोपारोपणकर, उसीके दोपसे उसे मार दियाजाचे ॥११॥ अथ वा शमयेदेनमायत्यर्थमुपांशुना । आयत्यां च वधप्रेप्सुं दृष्ट्वा हन्यागतागतम् ।। ४३ ॥ अथवा भविष्य में कुछ उपद्रव न हो, ऐसा विचारकर, उसका उपांशु. बध करा दियाजावे । भविष्यमें वध करनेकी इच्छा रखनेवाले गतागत व्यक्ति को तो देखतेही मरवा दाले ॥ ४३॥ अरितो ऽभ्यागतो दोपः शत्रुसंवासकारितः । सर्पसंवासमित्वान्नित्योद्वेगेन दूषितः ।। ४४ ।। शत्रुके पाससे आया हुआ पुरुष, शत्रुके साथ रहने के कारण अवश्य ही दोपका हेतु होता है, क्योंकि शत्रुका सहवास सके सहवासके समान है। इस लिये सदा ही भयका हेतु होने से इस प्रकारका व्यफि निन्दित कहा गया है।॥४॥ जायते प्लक्षवीजाशात्कपोतादिव शाल्मले । उद्वेगजननो नित्यं पवादपि भयावहः ॥४५॥ पिलखनके यीन खानवाला कयूतर जैसे सिमलके उद्देगका ही कारण होता है इसी प्रकार शत्रुपक्षका व्यक्तिभी विजिगी के लिये भयङ्कर भौर पीसे बढेग अनकही होगा है ।। ५५ ।।
.
(२५२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[७ अधिक
प्रकाशयुद्धं निर्दिष्टोदेशे काले च विक्रमः।
विभीषणमवस्कन्दः प्रमादव्यसनार्दनम् ॥ ४६ ॥
भय युद्धधोके विपयमें दो श्लोकोंसे यतराते हैं-अमुक्देश और
अमुक समयमें हमारा तुम्हारा युद्ध होगा, इस प्रकार कहकर जो युद्ध किया
जाता है, उसे प्रकाशयुद्ध' कहते हैं । धोदीसी सेनाको बहुत दिसलाकर भय
उत्पल करदेना, किले आदिका जलाना और लूटना, प्रमाद तथा व्यसनके समय
शत्रुको पीडा देना ॥ ४६॥
एकत्र त्यागपातौ च कूटयुद्धस्य मातृका ।
योगगूढोपजापार्थ तूष्णींयुद्धस्स लक्षणम् ॥ ४७॥
इति पाइगुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे सहितप्रयाणिक
परिपणितापरिपणितापमृताच संधयः पष्टो ऽध्यायः ॥ ६॥
भादितशतु शप्त. ॥ १०४ ॥
एक जगह युद्ध छोड़कर दूसरी जगह धावा करदेना, ये सब कूटपुद्ध के
लक्षण हैं। विप औपाधेि आदिके प्रयोग तया गूढ पुरपॉके द्वारा उपजाप
(बहकाना, धोखादेना) भादिके प्रयोगोंसे शत्रुका नाश करना 'तूष्णीयुद्ध' का
सक्षण है।॥ १७॥
पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें छटा अध्याय समाप्त ।
सातवां अध्याय
११३ प्रकरण
द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम ।
विजिगीषुद्धितीयां प्रकृतिमेवमुपगृहीयात् ॥ १॥सामन्तं
सामन्तेन संभूय यायात् ॥ २॥ यदि वा मन्येत-पाणि मे न
ग्रहीष्यति ॥३॥
विजिगीषु अपने समीप देशम स्थित शत्रुको, अपनी सहायताके लिये मिल
लिखित उपायोंसे तैयार करे ॥1॥ पुंठ तया पार्श्व देशस्थित सामन्तके साथ
मिलकरही यातग्य सामन्तपर आक्रमण करे ॥२॥ अथवा यदि समझे कि
--अपने साथ मिलाया हुआ सामन्त पार्णिमाह नहीं पनेगा, भात् यातव्य
पर भाक्रमण करनेके लिये मेरे पाहरचले जानेपर, यह पीछेसे मेरेदेशपर आक्र.
सण नहीं करेगा ॥३॥
७ अध्या०] पाइगुण्य (२५३) पाणिग्राहं वारयिष्यति ॥४॥ यातव्यं नामिसरिष्यति ॥५॥ बलवद्वैगुण्यं मे भविष्यति ६॥ वीवधासारी मे प्रव- तयिष्यति ॥ ७॥ परस्य वारयिष्यति ॥८॥ दूसरे पाणिपाह (पीछेसे आक्रमण करनेवाले) को रोकेगा ॥४॥ मेरे यातव्यका पक्ष प्रहण न करेगा ॥ ५॥ मेरा बल दुगना होजावेगा ॥७॥ अपने देशमें उत्पन्न हुए २ धान्य, तथा मेरेमित्रकी सेनाको मेरी सहायताके लिये आनेदेगा, उसे धीच न रोकेगा ॥७॥ और शनुके लिये इन दोनों चीजोंको रोकेगा, अर्थात् धान्य और मित्र सेना को उस सक न पहुंचने देगा ।। ८॥ बह्वावाधे मे पथि कण्टकान्मर्दयिष्यति ॥ ९॥ दुर्गाटव्य- पसारेषु दण्डेन चरिष्यति ॥ १०॥ यातव्यमाधिपो दोषे संधी या स्थापयिष्यति ॥११॥ मेरे यात्रा करनेपर, मार्गमें आई हुई विप्न याधाओंको नष्ट करेगा ॥९॥ दुर्ग तथा भाटवियों में विजिगीषु सेनाके जानेपर, अपनी सेनासे रायर उसकी सहायता करेगा ॥१०॥ कोई असह्य अनर्थ या आपत्ति आपड़नेपर, यातव्यके साथ सन्धिकी स्थापना करदेगा ॥११॥ लब्धलाभांशो या शवनन्यान्मे विश्वासयिष्यतीति ।। १२ ।। द्वैधीभूतो वा कोशेन दण्डं दण्डेन कोशं सामन्तानामन्यतमाल्लि- प्सेत ॥ १३ ॥ और अपने प्रतिज्ञान धनको मुझसे प्राप्तकर, मेरे मम्य शत्रुओंको भी मेरा विश्वास उत्पस फरापेगा, इत्यादि । सामन्तको साथ मिलाकर पात्रा करने पर, ये पाणिशुद्धि आदि १० प्रयोजन सिद्ध होते हैं। यह समशकर विजिगीषु सामन्तको साथ मिलाये ॥१२॥ यदि विजिगीषु सामन्तके मिलाने में विश्वास न करे तो वैधीभावका अवलम्बनकर पृष्ठ तथा पार्ववर्ती सामन्तामसे किसी एकसे, कोशदेकर सेना (पदि सेना कमहोतो), और सेनादेकर कोश (यदि कोश कम होतो), लेने की इच्छाकरे ।। ३ ।। तेषां ज्यायसो ऽधिकेनांशेन समात्समेन हीना नेनेति सम- संधिः ॥ १४ ॥ विपर्यये विषमसंधिः ॥१५॥ अधिक शक्ति सामन्तको अधिक हिस्सादेकर सन्धिकारना, समशक्ति सामन्तको समभाग और होगशक्ति सामन्तको थोड़ा हिस्सा देकर सन्धिकरना
[७ अधिक
कौटलीय अर्थशास्त्र
परानीकस्य प्रत्यनीकं मित्राटवीनां वा शत्रोर्विभूमीनां देशि-
कं मूलपाणिप्राणार्थ वा समः समवलेन लाभेन पणेत ॥ २८ ॥
पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयात् ।।२९।। अन्यथा विक्रमेत ॥३०॥
शत्रुकी सेना, तथा शत्रुके मिग्र और आटविकोंके साथ, युद्ध करने में
समर्थ, शत्रु के पर्वतमान्त आदिके नक्शोंको ठीक २ जाननेवाले (विभूमीनां
देशिकम् ), अथवा अपने मूल और पार्णिकी रक्षाके लिये समशक्ति सामन्तकी
सेनाके यरावरही लाम देकर सन्धि करे ॥ २८॥ सन्धि करनेपर यदि समश-
क्ति सामन्त कल्याणबुद्धि हो तो उसपर अनुग्रह बनाये रक्रो ॥ २९ ।। अन्यथा
दुष्टबुद्धि होनेपर आक्रमण करदेवे ॥३०॥
जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमनेकविरुद्धमन्यतो लममानो वा समः
समवलाद्वीनेन लाभन पणेत ॥ ३१ ॥ पणितस्तस्यापकारसमर्थों
विक्रमेत ॥ ३२ ॥ अन्यथा संदध्यात् ॥ ३३ ॥
मृगया आदि व्यसनास तथा प्रकृति कोपसे युक्त, और अनेक अन्य
सामन्तोंके विरोधी, अथवा सहायताके बिना अन्य किसी उपायसे कार्यासद्धि
होनेपर, समशक्ति सामन्तकै साथ सेनाकी अपेक्षा लाभका थोड़ाही हिस्सा
देकर सन्धि करे ॥ ३१ ॥ सन्धि करनेपर यदि उसके अपकार करने में समर्थ
हो तो उसपर आक्रमण करदेवे ॥ ३२ ॥ अन्यथा चुपचाप सन्धि करलेवे
एवंभूतो वा समः सामन्तायत्तकार्यः कर्तव्ययलो वा बलस-
माद्विशिष्टेन लाभेन पणेत ॥ ३४ ॥ पणितः कल्याणयुद्धिमनु-
गृह्णीयात् ॥ ३५ ॥ अन्यथा विक्रमेत ॥ ३६॥
मृगया आदि ग्यसन और प्रकृतिकोपसे युक्त, दूसरे सामन्तकी सहा-
यता होनेपरही अपने कार्योंको सफल देखनेवाला, अथवा नई सेना भर्ती कर-
नेवाला समशक्ति सामन्त दूसरे समशक्ति सामन्तके साथ सेनाकी अपेक्षा
अधिक लाभ देकर सन्धि करे ।। ३ ।। सन्धि होनेपर, यदि वह कल्याणबुद्धि
हो तो सदा उसपर अनुग्रह दृष्टि रक्खे ॥ ३५ ॥ यदि दुष्टबुद्धि हो तो झाक्रमण
कादेवे ॥ ३६॥
जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमभिहन्तुकामः खारब्धमेकान्तसिद्धिं
वास्य कर्मोपहन्तुकामो मूले यात्रायां वा प्रहर्तुकामो यातव्याद्भूयो
लभमानो वा ज्यायांसं हीन समं वा भूयो याचेत ॥ ३७ ॥
७ अध्या०] पाद्गुण्य (२५७) मृगया आदि व्यसन तथा प्रकृतिकोपसे युक्त ज्यायान्, हीन अथवा समको नष्ट करनेकी हल्ला करनेवाला, या उसके उचित देशकालके अनुसार भारम्भ किये गये अतएव अवश्य सफल हो जानेवाले कार्यको नष्ट करनेकी कामनावाला, अथवा विजिगापुके यात्रा करनेपर पासे उसके किले मादिपर धाया करनेकी इच्छा रखनेवाला, अथवा विजिगीषुकी अपेक्षा यातत्यूसे अधिक धन पाजानेवाला होन, ज्यायान् या सर्म, उपर्युक्त ज्यादान हीन अर्षया समस और अधिक लाभकी याचना करे ॥ ३७॥ भूयो चा गाचितः खरलरक्षार्थ दुर्धर्पमन्यदुर्गमासारमटी या परदण्डेन मर्दितुकामः प्रकृप्टेऽध्वनि काले या परदण्डं क्षयव्य- याभ्यां योक्तकामः परदण्डन वा विवृद्धस्तमेवोच्छेत्तुकामः पर- दण्डमादातुकामो वा भूयो दद्यात् ॥ ३८ ॥ इस प्रकार अधिक को याचना किये जानेपर, अपनी सेनाकी रक्षाके लिये, अथवा दूसरेके दुर्गम दुर्ग, मित्रवल तथा आटविकोको (अधिक धन मागनेवाले दूसरे सामनार्को सेनाके द्वारा ही कुचलने की इच्छा करनेवाला, दूर देश में अधिक समय तक दूसरे सामन्तको सेनाको कामपर लगाकर क्षय और म्ययसे युक्त करनेकी कॉमनोवाला, अथवा यातव्यकी सेनाके द्वारा (उसके जीत लेनेपर) अपनी सेनाको बढाकर फिर उसीका (अधिक मांगने यालेका) उच्छेदन करने की कामगावला, अधवा यातम्यकी सेनाको अधिक याचक सामन्तकी सहायतासे लेनेको इरछा पाला, अवश्यही उतना अधिक लाम दे देवे जितना कि दूसरे सामन्तन मागी है ॥ ३८ ॥ ज्यायान् वा हीनं यातव्यापदेशेन हस्ते कर्तुकामः पर- मुच्छिय वा तमेवोच्छेत्तुकामस्त्याग का कृत्वा प्रत्यादातुकामो वलसमाद्विशिष्टन लामेन पणेत ॥३१॥ पणितस्तस्थापकारस- मर्थो विक्रमेत ।। ४० }। अन्यथा संध्यात् ।। ४१॥ ज्यायान्, होनके साथ, उसे यातव्यके यहाने अपने वशमें करनेकी इच्छावाला, अधवा शत्रुका उच्छेद फरक फिर उसीका उच्छेद करनेकी काम नावाला, अथवा देकर फिर लौटा लेनकी इच्छा रखनेवाला भवश्यही सेनाकी अपेक्षा अधिक लाभ दकर सन्धि करलवे ।। ३९ ॥ सन्धि होनेपर यदि उसका अपकार करने में समर्थ हो, तो उसपर मारमण करदेवे ॥ ५० ॥ अन्यथा चुपचाप सन्धि बनाये रक्खे ॥ १॥ A (२५८) कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक यातव्यसंहितो वा तिष्ठेत् ॥ ४२ ॥ दृप्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् ॥ ४३ ॥ जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रो वा ज्यायान्हीनं पलसमेन लाभेन पणेत॥४४॥ पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्र- मेत ॥ ४५ ॥ अन्यथा संदध्यात् ।। ४६ ॥ अथवा यातम्यक साथ सन्धि करके अपने स्थानपर ही रहे॥ ४२ ॥ अथवा अपनी दूप्य शत्रुभूत तया भाटायिक सेनाको सन्धि करनेवाले अधिक शक्ति सामन्तक लिये देदेवे ॥ ५३॥ मृगया भादि व्यसनॉर्म भासक्त तथा प्रकृतिकोप आदिसे युक्त, अधिकशक्ति सामन्त होनेके साथ सेनाके परावर लाभ देकर सन्ध्रि करलेवे ॥ ५४॥ सन्धि करनेपर यदि उसका अपकार करने में समर्थ हो तो उसपर आक्रमण करदेवे ॥ १५॥ अन्यथा सन्धि बनाये स्पख ॥ ४६॥ एवंभूतं वा हीनं ज्यायान्चलसमाद्धीनेन लाभेन पणेत ॥४७॥ पणितस्तस्यापकरणसमर्थो विक्रमेत ॥ ४८ ॥ अन्यथा संदध्यात् ॥४९॥ व्यसनी और प्रकृतिकोप भादिसे युक्त होनके साथ, अधिकाति सामन्त, बलकी अपेक्षा न्यून लाभ देकर सन्धि करलेवे ॥ १७ ॥ यदि भपकार करने में समर्थ हो तो आक्रमण करदेवे ॥ १८॥ अन्यथा सन्धि बनाये रक्खे ॥४९॥ आदौ बुद्धयेत पणितः पणमानश्च कारणम् । ततो वितोभवतो यतः श्रेयस्ततो व्रजेत् ।। ५० ॥ इति पाद्गुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे सहित प्रयाणिक द्वैधीभावका: संधिविकमाः सप्तमो ऽध्यायः ॥ ७॥ मादितः पशशतः ॥ १०५॥ इसलिये पणित (सन्धि या शर्त किया हुआ) और पणमाम (सन्धि या श करनेवाला) दोनों, उपर्युक्त सन्धियोंके कारणों को ठीक ३ समझें । फिर सन्धि करनेपर लाभ या हानिको तथा विग्रह करनेपर लाभ या हानिको भच्छी सरह सोच समझकर, जिसमें अपना कल्याण समझे, उसी मार्गका आघय लेवे ॥५०॥ - पाहगुण्य सप्तम अधिकरणमें सातवां अध्याय समाप्त ।
- । ८ या पाइगुण्य (२५९) आठवां अध्याय। ११४, ११५ प्रकरण। यातव्य सम्बन्धी व्यवहार, तथा अनुग्राह्य, मित्रोंके विशेष। यातव्योऽभियास्यमानः संधिकारणमादातुकामो विहन्तुकामो वा सामवायिकानामन्यतम लाभद्वैगुण्येन पणेते ॥१॥ यातव्य विजिगीपु (जिसपर कोई विजिगीषु आक्रमण करे यह यातन कहाता है, यात ही जब पहिले विजिगीपुपर आक्रमण करने लगे तो वह भी विजिगीषु ही है, इस प्रकारका यातन्य विजिगीप), यान करनेके पहिले ही सन्धिके कारणको स्वीकार करने या अस्वीकार करनेकी इध्यावाला, अन्य साम- वायिक (सहायक साथी. सामन्तॉमसे किसी एकके साथ पूर्व निश्चित लामसे दुगना लाभ देकर सन्धि करलेवे ॥१॥ प्रपणितः क्षयव्ययप्रवासप्रत्यवायपरोपकारशरािबाधांश्चास्य वर्णयेत् ।। २ ।। प्रतिपन्नमर्थेन योजयेत् ।। ३ ।। वैरं वा परैर्दाह- यित्वा विसंवादयेत् ॥ ४॥ सन्धि करनेवाला पुरपोका नाश, धनका व्यय, दूरदेशका आना जाना, मार्गके विध, शत्रुके पक्षमें प्रवेशकर उसका उपकार करना, और शरीरको पीडा (अर्थात् कदाचित् प्राणान्ततक होजाना), इन छः दोपोंको साथी सामंतके सामने अच्छी तरह पतला दे ॥ २ ॥ यदि वह इन सयको स्वीकार करलेवे, तो उसे प्रतिज्ञात धन देदेवे ॥ ३॥ यदि सन्धि कारणको ही स्वीकार न करे, तो दूसरे सामन्तों के साथ इसका विरोध कराके सन्धि तोड़ देवे ॥ ॥ दुरारब्धकर्माणं भूयः क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामः स्वारब्धां या यात्रासिनि चिघातयितुकामो मूले यात्रायां वा प्रतिहन्तुकामो यातन्यसंहितः पुनचितुकामः प्रत्युत्पन्नार्थकृच्छ्रस्तस्मिन्नविश्व- स्तो वा तदात्वे लाभमल्पमिच्छेत् ॥५॥ भनुचित देश कालम युद्धयात्राका आरम्भ करनेवाले सामन्तको फिर क्षय और व्ययसे युक्त करनेकी हत्या करनेवाला, अथवा उचित देश कालमें यात्रा करनेपर अवश्य होनेवाली सिद्धिका विधात करनेकी इच्छा वाला, अथवा यात्रा करनेपर दुर्ग भादिके अपर आक्रमण करने की इच्छा वाला, यातायसे
[अधिः
(२६०) कौटलीय अर्थशास्त्र
उस समय थोडाही रेकर सन्धि करफे फिर अधिक मांगनेकी फामना वारा,
अथवा तत्काल अचानकही उत्पश्च अर्थ कष्टसे युक्त, अथवा यातम्यमें अविश्वास
करनेपाला उस समय थोडाही लाम लेकर सन्धि कर लेचे । और फिर भविष्यमें
अधिक धन लैनकी इच्छा करे ॥५॥
आयत्यां प्रभूतं मित्रोपकारममित्रोपघातमर्थानुवन्धमवेक्ष-
माणः पूर्योपकारकं कारयितुकामो भूयस्तदात्ने महान्तं लाभमु-
त्सृज्यायत्यामल्पमिच्छेत् ॥ ६॥
किसी विशेष फलसे युक्त, मित्रके लाभ और शत्रुकी हानिको देखता
हुआ, तथा पहिले उपकार करनेव लेको फिर करानेकी इच्छावाला, उस समय
अधिक लाभका मोदकर भविष्यम भी थोडे लाभको कामना करे ॥६॥
दूप्यामित्राभ्यां मूलहरेण वा ज्यायसा विगृहीतं बातुकाम-
स्तथाविधमुपकारं कारयितुकामः संबन्धावेक्षी वा तदात्वे चाय-
त्यां च लाभं न प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७॥
दूप्य तथा शत्रुसे अथवा किले भादि तोडगेवाले अधिकशक्ति सामन्त
से विगृहीत हुए २ साथीकी रक्षा चाहनेवाला, तथा इस प्रकारके उपकारोंको
स्वय या किसी अन्यके द्वारा कराने की इच्छावाला, तथा यातण्यके साथ सम्बन्ध
चाहनेवाला, उस समय और भविष्यमें भी अपने साथीसे लाभ न लेवे ॥ ७ ॥
कृतसंधिरतिक्रमितुकामः परस्य प्रकृतिकर्शनं मित्रामित्रसंघि.
विश्लेषणं वा कर्तुकामः पराभियोगाच्छङ्कमानो लाभमप्राप्तमधिक
वा याचेत ॥८॥
पहिलो का हुई सन्धिको ताडनेको इछावाला, शत्रुक प्रकृतिजनाको
नष्ट करने और मिग्रे तथा शत्रुको सन्धिको तोडनेकी कामना करनेवाला, शत्रुके
आक्रमणकी आशङ्का करनेवाला, भप्राप्त (न वसूल हुए २) तथा पूर्व निशित
लाभसे अधिकको याचना करे ॥८॥
तमितरस्तदात्वे चांयत्यां च क्रममपेक्षेत ॥ ९॥ तेन पूर्वे
व्याख्याताः ॥१०॥
दूसरा सामन्त (जिससे लाभकी याचना की गई है), इस प्रकारकी
मांग की यायत, उस समय तथा भविष्यगे होनेवाले राम हानिका अच्छी तरह
विचार करे ॥ १॥ इसी प्रकार पहिले तीन पक्षाम भी हानि लाभका विधार
समझना चाहिए॥३०॥
भारम्भ किये
४ अध्या
पाइगुण्य
(२)
अरिविजिगीष्योस्तु स्वं खं मित्रमनुगृङ्गतोः शक्यकल्यभव्या-
रम्भिस्थिरकर्मानुरक्तप्रकृतिभ्यो विशेषः ॥ ११॥ शक्यारम्भी
विपा कारभेत ॥ १२ ॥
शत्रु और विजिगीपु, जो कि अपने २ मिनोपर प्रडा अनुग्रह रखते हों,
पे शक्यारम्भी , कल्यारम्भी, भव्यारम्भी, स्थिरकर्मा और अनुरक्त-प्रकृति, इन
मिनोपर ही विशेप अनुग्रह करें ॥ ११॥ अपनी शक्तिके अनुसार कर सकने
योग्य कार्यको ही आरम्भ करनेवाला शक्यारम्भी कहाता है ॥ १२ ॥
कल्यारम्भी निर्दोषम् ॥ १३ ॥ भव्यारम्भी कल्याणोदयम्
॥१४॥ स्थिरकर्मा नासमाप्य कर्मोपरमते ॥ १५ ॥ अनुरक्तन-
कृतिः सुसहायत्वादल्पेनाप्यनुग्रहेण कार्य साधयति ॥ १६ ।।
जो दोपरहित कार्य को आरम्भ करे यह कल्यारम्भी, ॥ १३ ॥ भविष्य
में करयाण रूप फल देने वाले कार्य को जो करे, वह भव्यारम्भी, ॥१४॥
हुए कार्य को जो विना समाप्त किये न छोड़े वह स्थिरकर्मा, ॥१५॥
मनायास ही सहायक हो जानेके कारण, योदे सैन्य आदिसे भी कार्य को सिद्ध
कर देने वाले अनुरक्तप्रकृति कहाते हैं ॥ १६ ॥
त एते कृतार्थाः सुसेन प्रभृतं चोपकुर्वन्ति ॥ १७ ॥ अंतः
प्रतिलोमे नानुग्राह्यः ।। १८॥
यदि इन शक्यारम्भी आदि पाच प्रकारके मित्रों को सहायता दी जाय,
तो कृतार्थ हुए २ ये वही सुगमतासे बहुत अधिक सहायता देते है ॥ १७ ॥
जो इनसे विपरीत हो, अर्थात् अशक्यारम्भी आदि, उन पर कभी अनुग्रह म
करे ॥ १८॥
तयोरेकपुरुषानुग्रहे यो मित्रं मित्रतरं वानुगृह्वाति सो ऽति-
संधत्ते ॥ १९ ॥ मित्रादात्मवाद्धिं हि प्रामोति ॥ २० ॥
पाद शत्रु और विजिगीषु दोनों एकही पुरप पर अनुग्रह करना चाह,
तो जो मिग्र अपया अनिशय मित्र हो, उसही पर अनुग्रह करना अच्छा होता
है यह अत्यन्त राम पहुचाता है। ॥ १९ ॥ क्योंकि मित्रसे सदा अपनी उन्नति
ही होती है, जब उस पर अनुग्रह किया जाय, तो कहना की क्या ॥२०॥
क्षयन्ययप्रयासपरोपकारानितरः ॥ २१ ॥ कृतार्थश्च शत्रु-
चैगुण्यमेति ॥ २२ ॥
[७ आधे० (२६२), कौटलीय अर्थशास्त्र जो मिनके यजाय शत्रु पर अनुग्रह करता है, उसके पुरुषों का क्षय और धन का व्यय होता है, तथा दूर दूर देशमें जाना और शत्रु फा उपकार करना पड़ता है। ॥२१॥ और मतलप निकल आने पर शत्रु फिर विगढ़ भी पैठता है । ॥ २२॥ मध्यम त्वनुगृहतोर्यो मध्यमं मित्रं मित्रतरं बानुगृहाति सो ऽतिसंधत्ते ॥ २३ ॥ मित्रादात्मवृद्धिं हि प्रामोति क्षयव्ययप्रवास- परोपकारानितरः ॥ २४ ॥ यदि मध्यवर्ती राजा पर शत्रु और विजिगीषु दोनों भनुग्रह करना चाहते हैं तो भी मित्र अथवा अतिशय मित्र परही अनुग्रह करना अच्छा तथा लाभदायक होता है। ॥ २३ ॥ क्योंकि मित्रसे सदा अपनी वृद्धि होती है। और शत्रु पर अनुग्रह करने वाले को सदा क्षय, व्यय, प्रवास तथा शत्रु का उपकार करना पड़ता है ।॥ २४ ॥ मध्यमवदनुगृहीतो विगुणः स्यादमित्रो ऽतिसंघचे ॥ २५ ॥ कृतप्रयासं हि मध्यमामित्रमपसृतमेकार्थोपगतं प्रामोति ।। २६ ।। तेनोदासीनानुग्रहो व्याख्यातः ।। २७ ॥ अनुगृहीत हुआ २ मध्यम यदि बिगड़ जावे, तो अपने शत्रु को ही विशेष लाभ होता है । ॥ २५ ॥ क्योंकि पहिले भित्र बना हुआ, और भय बिगड़ जानेसे शत्रु हुआ २ मध्यम समान कार्य करने वाले मित्र को (विजिगीषु के शत्रुरूप) को प्राप्त कर लेता है । ॥ २६ ॥ इसी प्रकार उदासीन पर अनुग्रह करने का विवरण भी समझ लेना चाहिये ॥ २७ ॥ मध्यमोदासीनयोर्विलांशदाने यः शूरं कृताखं दुःखसहमनुरक्त चा दण्डं ददाति सो ऽतिसंधीयते ॥ २८॥ विपरीतो ऽतिसंधत्ते ॥ २९॥ मध्यम और उदासीन राजाओं को सेना की सहायता देने के विषय में, जो शूर, भस्म आदि चलाने में सुचतुर, दुःख सहने वाले, अनुरक्त सैन्य को दे डालता है, यह ठगा जाता है, अर्थात् धोखा खाता है।॥ २८ ॥और जो अपनी इस प्रकार की सेना को नहीं देता, यह लाभ में रहता है॥ २९॥ यत्र तु दण्डः प्रतिहतस्तं वा चार्थमन्यांश्च साधयति तत्र .
९ अभ्या०] पागुण्य (२६३) मौलभृतश्रेणीमित्राटवीचलानामन्यतममुपलब्धदेशकालं दण्डं द- घात् ।। ३०॥ जिस कार्यके किये जाते हुए पहिले मेजी हुई सेना नष्ट हो चुकी हो, उसी कार्यको पूरा करनेके लिये, या अन्य कार्योंको सिद्ध करनेके लिये, उस अवसरपर मौलयल, भृतबस, श्रेणीवल, मिन्नयल तथा भटकीयस, इन पांचॉमसे किसी एक सेनाको उचित देशकालके अनुसार भेजदेवे ॥३०॥ अमित्राटवीवलं चा व्यवहितदेशकालम् ॥ ३१ ।। यं तु मन्येत कृतार्थो मे दण्डं गृह्णीयादमिवाटण्यभूम्यनृतुपु वा वास- येदफलं वा कुर्यादिति दण्डव्यासापदेशैननमनुगृहीयान् ।।३२।। अथवा दूरवेश और अधिक कालके लिये अमिनयल या भटवायलको ही देवे, अन्य मौल भादिको नहीं ॥३१॥ जिस उदासीन या मध्यमको यह समझे कि, यह अपना काम निकालकर मेरी सेनाको अपने अधीन करलेगा; अथवा शत्रुके पास, भाटविकोंके पास, न रहने योग्य स्थानों तथा स्तुओंमें रखेगा अथवा मेरी सेनाको जीतके धनसे कुछ हिस्सा न देगा; उसको 'मेरी सेना किसी दूसरे काममें लगी हुई है' ऐसा महाना काके सेना न देने ॥३२॥ एवमवश्यं त्वनुगृहीतव्ये तत्कालमहमस्मै दण्डं दद्यात् ॥३३॥ आसमाप्तेश्चनं वासयेद्योधयेच बलग्यसनेभ्यश्च रक्षेत् ॥ ३४ ॥ यदि इस प्रकार के राजाको अवश्य ही सहायता देनी पाजावे, तो उस समयके लिये समर्थ सेनाको, उसे देदे ॥ ३३ ॥ और कार्य समाप्त होनेपर सेनाको योग्य भूमि आदिमें निवास कराये, तथा अवसर भानेपर युद्ध कराये । और सैनिक मापत्तियाँसे या हथियार आदिके टूट फूट जानेसे उन्हें सुरक्षित रक्खे ॥३५॥ कृतार्थाच सापदेशमपस्रावयेत् ।। ३५ ।। प्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् ।।३६।। यातव्येन वा संधापनमतिसंदध्यात् ॥३७॥ काम निकल जाने पर उदासीन या मध्यमसे, कुछ पहाना करके अपनी सेनाको यहांसे बुलवा सेवे ॥३५॥ और फिर अक्सर मानेपर अपनी चूथ्य सेना शत्रु सेना, या अदवी सेनाको उसे देदेवे ॥ ३६ ॥ भषया यातम्यके साथ सन्धि करके मध्यम या उदासनिसे खूब लाम (पूर्व निश्चितसे भी अधिक, लेवे
(२६४) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अघि
समे हि लामे संधिः स्वाद्विपमे विक्रमो मतः ।
ममहीनविशिष्टानामित्युक्तः संधिविक्रमः ॥ ३८॥
इस पाइगुण्ये सप्तमे ऽधिकरण पातम्यतिरनुमाप्रमियविशेषा
भएमो ऽध्यायः ॥ ८॥ आदितः पतः ॥ १०६॥
परावर लाम होनेपर सन्धि, और काममें न्यूनाधिकता होनेपर विप्रह
करना चाहिये । सम हीन और विशिष्ट राजाभोंके सन्धि तथा विक्रम हम
भघ्यायमें निरूपण किये गये हैं ॥ १८ ॥
पाहगुण्य सप्तम यधिकरणम आठयां अध्याय समाप्त ।
-
नौवां अध्याय
११६ प्रकरण
मिग्र, हिरण्य भूमि तथा कर्म (दुर्ग) आदिके द्वाराकी हुई सम्धि ।
इस नयम अध्यायमें मित्र सन्धि और हिरण्यसन्धिका दी निरूपण
किया जायगा।
सहितप्रयाणे मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्रोचरो लाभः श्रेयान
॥१॥ मित्रहिरण्ये हि.भूमिलामाद्भवतो मित्रं हिरण्यलाभात्
॥२॥यो वा लाभः सिद्धः शेपयोरन्यतरं साधयति स श्रेयान् ।। ३॥
मिलकर यात्रा करनेके विषयमें मिन, हिरण्य और भूमि इन लाभों-
असे उत्तरोत्तर लाभ श्रेष्ठ है, अर्थात् मित्र लाभकी अपेक्षा हिरण्य लाभ और
हिरण्यलाभकी अपेक्षा भूमिलाभ उत्तम समझा जाता है। क्योंकि भूमि
सामसे मित्र भौर हिरण्य दोनों प्राप्त हो सकते हैं, सपा हिरण्य लाभ मित्र
लाभ हो सकता है ॥ २ ॥ अयवा जो सिद्ध हुभा २ राम, शेप (दोनों या )
दोनोमस किमी एकको सिद्ध करसके, वही श्रेष्ठ समझना चाहिये ॥ ३ ॥
त्वं चाहं च मित्रं लभावह इत्येवमादिभिः समसंधिः ॥४॥
त्वं मित्रमित्येवमादिमिर्षिपमसंधिः ॥ ५॥तयोविशेपलाभादति-
संधिः ॥ ६॥ समसंधौ तु यः संपन्नं मित्रं मित्रकृच्छ्रे या मित्र-
मयामोति सो प्रतिसंधत्ते॥शा आपद्धि सौहृदस्थैर्यमुत्पादयति ॥८॥
६ अध्या धाड्गुण्य तू भौर में दोनों मिन्न को लाभ करें, इस प्रकार की हुई सन्धि सम- सन्धि होती है।॥ ४ ॥ तू मिन को लाभ कर मै हिरण्य को, तू हिरण्य को लाभ कर मैं भूमिको इस प्रकार कीहुई सन्धि विषमसन्धि कहाती है ॥५॥ उन दोनों समसन्धि और विषमसन्धि, पूर्व निशिरासे अधिक लाभ हो, वह अतिसन्धि होती है ॥६॥ समसन्धिमै तो, जो सम्पन्न ( देखो यही अध्याय ९, सू ५०) मित्रको, अथवा विपत्तिग्रस्त मित्रको प्राप्त करता है, यह अति. सन्धि निमित्त विशेष लाभको पाता है। क्योंकि भापत्ति, मित्रतागे दृढ़ता को पैदा कर देती है, अर्थात् आपत्तिमें मित्रता स्थिर होजाती है। मित्रकले ऽपि नित्यमवश्यमनित्यं वश्यं वेति ॥९॥ नित्य- मवश्यं श्रेयः ॥ १०॥ तद्धचनुपकुर्वदपि नापकरोतीत्याचार्याः मित्रकी विपत्ति दशामें भी अपने वश न रहनेवाले सार्वदिक मित्र (जो सदा अपना मित्र बना रहे) का प्राप्त होना अच्छा है, या अपने पशमें रहनेवाले पर, थोड़े दिन के लिये ही मित्रता रखनेवाले मित्रका प्राप्त होना अच्छा है ॥ ९॥ इस विषयमें आचार्योंका मत है कि वशम न रहनेवाले सार्वेदिक मित्रका प्राप्त करनाही अच्छा है॥ १० ॥ क्योंकि वह उपकार न करने पर भी कभी अपकार भी नहीं कर सकता ॥ ११ ॥ नेति कौटल्यः ॥ १२ ॥ वश्यमनित्यं श्रेयः ॥१३॥ याव- दुपकरोति तापन्मित्रं भवत्युपकारलक्षणं मित्रमिति ॥ १४ ॥ परन्तु कोटत्य इस घातको नहीं मानता ॥ १२ ॥ उसका सिद्धान्त है कि अपने अधीन रहनेवारा थोडे दिनका भी मिन अच्छा होता है ॥ १३ ॥ क्योंकि यह जगतक अपना उपफार करता रहता है, तमी तक मिन रहता है। मित्रका स्वरूपही, अपने साथीकी मलाई करना ह ॥ १४ ॥ चश्ययोरपि महाभोगमनित्यमपभोगंवा नित्यमिति ॥१५॥ (महामोन्मानित्यं यः ॥ १६॥ महाभोगमानित्वमाल्पकालेन महदुपकुर्वन्महान्ति व्ययस्थानानि प्रतिकरोतीत्याचार्याः ॥१७॥ अपनी अधीनता स्वीकार करनेवाले दोनों मित्रों में भी, थोडे ही सम- पके लिये अधिक कर देने वाला अच्छा है, या सर्वदाफै रिये थोडा ३ कर आदि देनेवाला अच्छा है। ॥ १५ ॥ इस विषयमे भाचार्यों का सिद्धान्त है, फियो *दिनतका ही कर आदि अधिक देनेवारा अच्छा है ॥ १६॥ पोंकि यह पौडेही दिन में बहुत अधिक धन सामग्री देकर विजिगीपुका महान उपकार करता है।
. (२६६) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ मधिल तया अपनी सहायतासे, उसके व्ययस्थानीका प्रतीकार कर देता है। अयात् विजिगीपुका, जिन २ राजकार्याम म्यय होता है, उस व्ययमें यह भी सहायक हो जानेसे, उसका उपयभार कम कर देता है। नेति कौटल्यः ॥ १८॥ नित्यमल्पभोगं श्रेयः ॥ १९ ।। महाभोगमनित्यमुपकारमयादपक्रामति ॥२०॥ उपकृत्य वा प्रत्यादातुमीहत ॥२१॥ नित्यमल्पभोग सातत्यादल्पमुपपुर्वन्म- हता कालेन महदुपकरोति ॥ २२ ॥ परन्तु आचार्य कौटल्यका यह सिद्धान्त नहीं है। यह कहता है कि सदाके लिये थोड़ा २ देनेवारा ही मित्र अच्छा है ॥ १९ ॥ क्योंकि एक साथ अधिक देनेवाला मित्र, इसी मयसे बहुत जल्दी मित्रता छोड़ बैठता है ॥२०॥ और फिर यह इसके लियेभी यत्र करने लगता है कि जो कुछ मैंने इस दिया है, यह किसी तरह वापस करना चाहिए ॥ २१ ॥ तथा सदाके लिये निरन्तर थोदा २ देनेवाला भी बहुत समयके पश्चात् विजिगीपुका महान उपकार कर देता है अर्थात् उसका धीरे २ लगातार थोड़ा २ उपकार किया हुभाभी काला. स्तरम महान होजाता है ॥ २२ ॥ गुरुसमुत्थं महन्मित्रं लघुसमुत्थमल्पं वेति॥२३॥ गुरुसमुत्थं महन्मित्रं प्रतापकर मवति ॥ २४ ॥ यदा चोत्तिष्ठते तदा कार्य साधयतीत्याचार्याः ॥ २५ ॥ घड़ी कठिनतासे चिरकाल तक प्रयत्न करनेपर, शनुसे युद्ध करनेक तैयार होनेवाला प्रपल मित्र अच्छा है, या सरलतासे ही झट तैयार होजाने पाला अल्पशक्ति मित्र अच्छा है? ॥ २३ ॥ भाचार्योंका इस विषय में यही सि. द्धान्त है, कि कठिनतासे तैयार होनेवालाभी भबल मिन अच्छा है, क्योंकि वह शत्रुओंका दमन अच्छी तरह करसकता है ॥ २४ ॥ और जपभी तैयार हो जायगा, कार्यको अवश्यही पूरा करदेगा ॥ २५ ॥ नेति कौटल्यः ॥ २६ ॥ लघुसमुत्थमल्पं थेयः ॥ २७ ॥ लघुसमुत्थमल्पं मित्रं कार्यकालं नातिपातयति दौर्बल्याच यथेष्ट- भोग्यं भवति नेतरत्प्रकृष्टभौमम् ॥ २८ ॥ परन्तु कौटल्य इसको स्वीकार नहीं करता ॥ २६ ॥ यह कहता है, कि सररतासे झट तैयार होजाने घाला, अल्प शक्ति भी मित्र अच्छा होता है॥९॥ क्योंकि ऐसा मित्र अवसरको कभी नहीं चूकता । अर्थात् जप अवसर होता है सुत्काल ही कार्य करने के लिये तैयार होजाता है। कार्यके समयको टलने नहीं
९ अध्या०]
पाइगुण्य
देता।और अपनेसे दुर्यल होनेके कारण अपनी इच्छानुसार कार्यमें लगाया जासकता
है। परन्तु ये सब बातें दूसरे मित्रमें नहीं हो सकती, और विशेषकर उस
अवस्थाम, जयकि वह किसी दूर देशामें रहता हो ॥ २८ ॥
विक्षिप्तसैन्यमवश्यसैन्य वेति ।। २९ ॥ विक्षिप्तं सैन्यं शक्य
प्रतिसंहर्तुं वश्यत्वादित्याचार्याः ॥ ३० ॥
जिस मित्र राजाकी सेना, अन्य कार्यों को सिद्ध करने के लिये अनेक स्था-
नोंमें भेजी हुई हो, ऐसा वश्य (अपने पशमें रहनेवाली) सेना रखनेवाला मित्र
अध्ठा, या जिसकी सेना वशमै तो न हो, पर सब अपने पास विद्यमान हो
ऐसा मिन अच्छा है? ॥ २९ ॥ आचोंका इस विषयमें यही सिद्धान्त
है कि इधर उधर बिखरी हुई सेना वालाभी मित्र अध्छा होता है क्योकि
वह सेना अपगे वश में होने के कारण शीघ्रही इकट्ठी की जासकती है॥३०॥
नेति कौटल्यः ॥३१॥ अवश्यसैन्यं श्रेयः ॥३२॥
अवश्यं हि शक्यं सामादिभिर्वश्यं कर्तुम् ॥ ३३॥ नेतरस्कार्यन्या-
सक्तं प्रतिसंहर्तुम् ॥ ३४ ॥
परन्तु कौटल्य इस पातको नहीं मानता ॥ ३१॥ यह कहता है कि
जिसकी सेना अपने वश में नहीं है, पर अपने पासही सय एकग्नित विद्यमान
है, वही मिन अच्छा है ॥ ३२ ॥ क्योंकि साम आदि उपायोंके द्वारा अवश्य
सेनाको भी अपने वश किया जासकता है, और तरकाल उसे यथेच्छ कार्यापर
लगाया जासकता है ॥ ३३ ॥ परन्तु इधर उधर बिखरी हुई सेना, अपने
अपने कार्योंमें लगी हुई होनेके कारण तरकाल ही एकत्रित नहीं की जासकती
पुरुपभोगं हिरण्यभोग या मित्रमिति ॥ ३५ ॥ पुरुषमोगं
मित्रं श्रेयः ।। ३६ ॥ पुरुपभोग मित्र प्रतापकरं भवति ।। ३७ ।।
यदा चोत्तिष्ठते तदा कार्य साघयतीत्याचार्याः ॥ ३८ ॥
पुरापोंके द्वारा उपकार करनेवारा मिन अच्छा है, या हिरण्यके द्वारा
उपकार करनेवाला अच्छा ॥ ३५॥ इस विषपमें आधोका सिद्धान्त है कि
पुरोंके द्वारा उपकार करनेवाला मित्र अच्छा है क्योंकि वह स्वयं ही शत्रुओंक
अपर आक्रमण करसकता है, और उन दया सकता है।३७n और जयक्रमी
भी किसी कार्य को करनेके लिये तैयार होजाता है, अवश्य ही उस कार्यको पूरा
कर दालता॥३८॥
नेति कौटल्यः ॥ ३९ ॥ हिरण्यभोग मित्र श्रेयः॥१०॥
(२८) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिः नित्योहि हिरण्येन योगः कदाचिद्दण्डेन दण्डव हिरण्येनान्ये च कामाः प्राप्यन्त इति ॥४१॥ परन्तु कोरल्य इस सिदान्त को स्वीकार नहीं करता ॥ ३९ ॥ यह कहता है कि हिरण्य आदिसे सहायता करनेवाला मित्रही श्रेष्ठ है' ॥१०॥ क्योंकि धनकी सदाही आवश्यकता रहती है, भौर सेना भादिकी आवश्यकता कंभी २' होती है। तथा धन होनेपर उसके द्वारा सेनाका संग्रहमी किया जासकता है, और अन्य कामनाओंको मी पूरा किया जासकता है ॥४१॥ हिरण्यभोग भूमिभोगं वा मित्रमिति ॥ ४२ ॥ हिरण्यभोगं गतिमत्त्वात्सर्वव्ययप्रतीकारकरमित्याचार्याः॥ ४३ ॥ हिरण्य भादिधन देनेवाला मित्र अच्छा, या भूमि देनेवाला मित्र अच्छा ॥१२ ।। भाचायाँका इस विषयमें यही सिद्धान्त है, कि हिरण्य आदि धनकी सहायता देनेवालाही मित्र अच्छा है। क्योंकि धनको 'चाहे जहां इच्छानुसार लेगाया जासकता है। और हरतरहके व्ययमें इसका उपयोग किया जा सकता है॥४३॥ नेति कौटल्यः॥४४॥ मित्रहिरण्ये हि भूभिलाभाद्भवत इत्युक्तं पुरस्तात् ॥४५॥ तस्माङ्गमिभोगं मित्रं श्रेय इति ॥ ४६॥ परन्तु कौटल्यका यह मत नहीं है ॥ ५४॥ वह कहता है कि मित्र भोर हिरण्य दोनोंही भूमिके द्वारा प्राप्त किये जासकते हैं। यह हम पहले कद चुके हैं।॥ ४५ ॥ इस लिये भूमिकी सहायता देनेवाला मित्र ही सबसे श्रेष्ठ होता है ॥ १६॥ तुल्ये पुरुपभोगे विक्रमः क्लेशसहत्वमनुरागः सर्वपललामो या मित्रकुलाद्विशेषः ॥ ४७ ॥ तुल्ये हिरण्यभोगे प्रार्थितार्थता प्राभूत्यमल्पप्रयासता सातत्याच विशेषः ॥ ४८ ॥ ततद्भवति- ॥४९॥ दो मिय यदि समान रूपसे पुरुपाकी हो सहायता देनेवाले हों, तो उनमेंसे भी विक्रमशाली, ग्लशशको सहन करनेवाला, अनुरागी और मौल भृत आदि,सप तरहको सेनाओंको देनेवाला मिग्रही प्रशस्त समझा गया है ॥७॥ समान रूपसे हिरण्य भादि धनकी सहायता देनेवाले दो मित्रोंमेंसे भी यही मित्र प्रशस्त समझा जाता है, जोकि मांगते ही बहुत योषा परिश्रम करने पर भी बहुतधन देदेव, गौर निरन्तर देतारहे ॥ ४८ ॥ अब इसके आगे मित्र तथा उनके गुणोंका निरूपण करते है:- १९॥ . . - .
९ अध्या०] पाइगुण्य (२६९) नित्यं वश्यं लघृत्थानं पितृपैतामहं महत् । अद्वैध्यं चेति संपन्नं मित्रं पड्गुणमुच्यते ॥ ॥ ५० ।। निस्य, वश्य, लघूधान,पिट पामह, महत् और अवैध्य ये छ: प्रकारके मिन परस्पर गुणोंके भेवसे होते हैं ॥ ५० ॥ ऋते यदर्थ प्रणयाद्रक्ष्यते यच रक्षति । पूर्वोपचिवसंबन्धं तन्मित्रं नित्यमुच्यते ॥५१॥ धन आदि सम्बन्धके बिनाही, प्रथम उत्पन हुए योनिसम्बन्धके कारण अत्यन्त स्नेहसे विजिगीषु जिसकी रक्षा करता है, और इसी प्रकार जो विनिंगीपु की रक्षा करता है, इस प्रकारके मित्रोंको 'नित्य' कहते हैं ॥ ५५ ॥ सचित्रमहाभोग त्रिविधं वश्यमुच्यते । एकतोभाग्युभयतः सर्वतोभोगि चापरम् ।। ५२ ।। यश्य मिन सीन प्रकारका होता है:-सर्वभोग, चिनमोग और महा- भोग । जो सेना, धन और भूमि आदि सय तरहसे विजिगीपुकी सहायता करे, यह सर्वभोग कहाता है। केवल सेना और धनसे महान उपकार करने पाला महाभोग, तथा रस, तांबा, लोहा भादि खनिज पदार्थ और लकड़ी जंगल आदि भिन्न २ याओसे सहायता करनेवाला चित्रभोग कहाता है। ये तीन भेद धनमासिके भेदसे यताये गये हैं। अनर्थ निवारणके द्वारा उपकार करने से भी पश्यमिय तीन प्रकारके होते है.--गुरुतोगी उमयभोगी और सर्वतोभोगी। जो केवल शत्रुका प्रतीकार करे वह एकताभोगी; जो शत्रु और शमुके मिन दोनोंका प्रतीकार करे वह उभयतोमोगी सधा जो शत्रु, शत्रुके मिन्न और भाटविक आदि सबका प्रतीकार करे घर सर्वतोभीगो कहाता वै ॥ ५२ ॥ आदाद वा दात्रपि वा जीवत्यरिपु हिंसया । मित्रं नित्यमवश्यं तदुर्गाटव्यपसारि च ॥ ५३ ।। जो विजिगीपुका उपकार न करने पर भी, शत्रुओंमें लूटमार करके पुले देकर अपना निर्वाह करता है, और दुर्ग तथा अटयों में रहने के कारण अपनी रक्षा करता हुआ शत्रुके हाथ नहीं आता, यह विशिगपिका पश्यमित्रता हीन नियमित्र होता है ।। ५३ ॥ अन्यतो विगृहीतं वा लघुव्यसनमेव वा । 'संधत्ते चोपकाराय तन्मित्रं पश्यमभुवम् ॥ ५४॥ परन्तु जिसपर शभुने आक्रमण करदिया हो, अपया और कोई छोटीसी भापति जिसपर भापड़ी हो, इस कारण उरसार करनेके लिये विजिगीषुके . .
२७०) कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक साथ जो सन्धि करलेव, यह निष्य मिग्रता हीन यश्यमिन कहाता है। उप. कारक होनेसे वश्य, तथा अपने उपतिकाल तकही मिग्रता रसनेके कारण भनिरय होता है ॥ ५४॥ 'बिना ही विशेपययके जो अपनी सेनाको सहायताके लिये तैयार रख यह 'लघूपयान' जो पितापितामह फ्रमसे मित्र पला भाया हो, यह पितृपैतामह, तथा जो भाष्यन्त प्रतापी और अरयधिक सैनासे युक्त हो, यह 'महत्' कहाता है। सरस होनेके कारण यहां मूलमन्थमें इनके लक्षण आयार्य कौटल्यने नहीं बतलाये । इनको छोदकरही अव अद्वैध्य मियका स्वरूप यताते है:- एकार्थनार्थसंपन्धमुपकार्यविकारि च । मित्रभावि भवत्येतन्मित्रमद्वैध्यमापदि ॥ ५५ ॥ समानही सुखदुःखका अनुभव करनेवाला, सदा उपकार करनेवाला, कभी विकारको प्राप्त न होनेवाला, आपत्तिमें भी भिन्न न होनेघाला मित्र 'भद्वेष्य' कहाता है । इसी लिये मिग्रतामा निरयसम्बन्ध होनेके कारण इसे 'मिनभावी' भी कहा जाता है॥५५॥ मित्रभावार्द्धवं मित्रं शत्रुसाधारणाचलम् । न कस्यचिदुदासीनं द्वयोरुभयभाचि तत् ॥ ५६ ।। इसके विपरीत एक 'उभयभावी' मिय होता है । यह शत्रु और विजि. गांधु दोनोंका उपकार न करने के कारण, तथा दोनोंका उपकार करनेके कारण, या दुर्यल होनसे दोनोंका सेवक होनेके कारण तीन प्रकारका होता है। इनमेसे पहिला फिर दो प्रकारका है:-एक सामर्थ्य होनेपर भी इच्छा न होनेसे उप. कार न करने वाला, और दूसरा इच्छा होनेपर भी सामोमावसे उपकार न करने पाला । इनमेसे पहिलका यताते हैं।-जो मिग्न होने के कारण नित्य भौर शत्रुका भी मित्र होनेके कारण अनिरय, शत्रु और विजिगीषु दोनोंका ही धना. दिके द्वारा उपकार न करनेवाला (नित्यानिरयोमयरूप) हो, यह उभयमावी मित्र कहाता है॥५६॥ विजिगीपोर मित्रं यन्मित्रमन्तर्धितां गतम् । उपकारे निविष्टं वा शक्तं वानुपकारि तत् ॥ ५७ ॥ तथा भूम्यनन्तर (अपने देशसे लगे हुए देशाका राजा) होनेके कारण विजिगीषुका शत्रुभूत, तथा शत्रु और विजिगाएक बीचमें होने के कारण मिग्न
.
.
९ अध्या०]
पाइगुण्य
(२७१)
बना हुमा, इच्छा होनेपरमी असामयके कारण दोनोंका उपकार न करने वाला,
भी उभयभाधी मित्र फहाता है ॥ ५७ ॥
प्रियं परस्य वा रक्ष्यं पूज्यं संबन्धमेव था।
अनुगृह्णाति यन्मित्रं शत्रुसाधारणं हि तत् ॥ ५८ ।।
'जो पिजिगीषुका मित्र, शत्रुका प्रिय और रक्ष्य (रक्षा किये जाने योग्य)
है, तथा शत्रुके साथ जिसका कोई पूज्य सम्यन्ध है, इस प्रकार शत्रु भौर
विजगीषु दोनों का उपकार करनेवाला, दूसरा उभयभावी मित्र कहाता है ॥५॥
प्रकृष्ट भौम संतुष्टं पलवचालसं च यत् ।
उदासीनं भवत्येतद्यसनादवमानितम् ॥ ५९ ।।
दूरदेशमें रहनेवाला, सन्तोषी बलवान्, आलसी तथा अन्य यूत भादि
व्यसनोंके कारण तिरस्कृत हुआ २ मित्र, उपकार करनेके समय उदासीन हो
जाता है।५९ ॥
अरेर्नेतुश्च यवृद्धि दौर्बल्यादनुवर्तते ।
उभयस्याप्यविद्विष्टं विद्यादुभयभावि तत् ॥ ६ ॥
जो मिग्र दुर्बल होने के कारण, शत्रु और विजिगीषु दोनोंकी उन्नतिका
भनुगामी होता है। किसीसे द्वेप नहीं करता, प्रत्युत दोनोंका आज्ञाकारी रहता
है, वह तीसरे प्रकारका उभयभावी मित्र कहाता है ।। ६०॥
कारणाकरण ध्वस्तं कारणाफरणागतम् ।
यो मित्रं समपेक्षेत स मृत्युमुपगृहति ॥ ६१॥
विनाही कारण छोड़कर चले जानेवाले, तथा विनाही कारण फिर माकर
मिल जानेवाले मित्रको जो अपने यहां रख लेता है। यह निश्चय ही मृत्युका
मालिशन करता है अर्थात् इस प्रकारके मित्रको रखकर अश्य धोखा खाता
भौर शीघ्र ही नष्ट कर दिया जाता है ॥६॥
क्षिप्रमल्पो लामश्विरान्महानिति का ॥६॥ क्षिप्रमल्पो
लाभः कार्यदेशकालसंवादकः श्रेयानित्याचार्याः ॥ ६३ ॥
शीम होजानेवाला घोड़ासा लाभ अच्छा, या देरमें होनेवाला महान
लाभ भया? इसपर विचार किया जाता है॥ १२ ॥ प्राचीन भाचार्योंका इस
विषयमें यह सिद्धान्त है कि शीघ्र होजानेवाला थोडासा लाभही अच्छा होता
है, क्योंकि शनि लाम होजानेपर, इस बातका विचार किया जासकता है कि
अमुक कार्य से अमुक देश या समयमें इतना लाभ होजायगा ॥१३॥
[७ मधिल (२७२) कौटलीय अर्थशास्त्र नेति कौटल्यः ॥ ६४ ॥ चिरादावनिपाती नीजसधर्मा महां- छामः श्रेयान्विपर्यये पूर्वः ॥६५॥ परन्तु कोटख्य भाचार्यका यह सिदान्त नहीं है । ६४ ॥ वह कहता है कि चिरकाल में होमेवाला भी वित रहित धान्य बीज धादिया महान लाभ होना भायन्त श्रेष्ठ है। परन्तु महान लाभम मिस होनेकी सरमायना होनेपर तो पूर्वोक्त आचार्योका मत ही उपादेय है ।। ६५॥ एवं दृष्ट्वा ध्रुवे लाभे लाभांशे च गुणोदयम् । स्वार्थसिद्धिपरो यायात्संहितः सामवायिकैः ।। ६६ ॥ इति फागुण्ये ससमे ऽधिकरण मिग्रहिरण्यभूमिकर्मसंधी मित्रसंधिः हिरण्यसंधिः भवमो ऽध्यायः ॥ ९ ॥ आदितः रामशतः १०७५ इस प्रकार निधयरूपसे अपने लाभको जानकर, थोडा टाम होनेपर मित्रकी प्राप्तिको जानकर, अन्य रागाभासे सम्धि करके विजिगीषु, सदा अपनी भय सिद्धि करनेमें तत्पर रहे ।। ६६ ।। पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें नौवां अध्याय समाप्त । दसवां अध्याय ११६ प्रकरण भूमिसन्धि । त्वं चाहं च भूमि लमायह इति भूमिसंधिः ॥१॥ तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थः संपन्नो भूमिमवाप्रोति सो ऽतिसंधत्ते ॥ २ ॥ 'तुम और मैं भूमिको प्राप्त करें' इस प्रकार की हुई भूमि निमित्तक सन्धिको भूमिसन्धि' कहते हैं। शत्रु भौर विजिर्गापु दोनोंको समान भावस भूमिकी ही प्राप्ति होनेसे, यह 'समसन्धि' भी कहाती है ॥१॥ मनु और विजिगीषु दोनोंमसे जो आपश्यक कार्यो में व्यय करने लिये घर और गुणी मृत्य जनोंको शीन उपस्थित कर, सम्मक समृद्ध भूमियोप्रास करता है, यह विशेष लाभ उठाता है ॥२॥ तुल्ये संपन्नालाभे यो बलवन्तमाकम्य भूमिमवामोति सो ऽतिसंधत्ते ॥३॥भूमिलाभं शनुकर्शनं प्रतापं च हि प्रामोति || दोनोंको समानरूपसे समृद्ध भूमिक प्राप्त होनेपर भी, यही विशेष ।
१
1
अध्या.]
पाइगुण्य
(२७३)
लाभ उठाता है, जो बलवान् शत्रुपर आक्रमण करके, उसे दवाकर भूमिको
मास करता है ॥ ३ ॥ क्योकि ऐसा करनेसे भूमिका लाभ भी होता है, और
शत्रुका नागभी, सथा सर्वत्र अपने प्रतापका विस्तार भी होजाता है॥ ४॥
दुर्बलादमिलाभे सत्यं सौकर्य भवति ॥५॥ दुर्वल एव
च भूमिलामः तत्सामन्तश्च मित्रममित्रभावं गच्छति ॥ ६॥
यद्यपि दुर्वलसे भूमि मास करना निस्सन्देह सुकर है ॥ ५॥ परन्तु
इस प्रकारका भूमिलाभ अत्यन्त निकृष्ट होता है, क्योंकि यह एक दुर्बलको
हिसा करके मास किया जाता है । तथा दुर्बलका पड़ोसी राजा भूम्पनन्तर होने.
से उसका शत्रुभूत, और विजिगोपुका मित्र, विजिगीपुकी इस कार्यवाहीको
देखकर उसका शत्रु बन जाता है। क्योकि उसके हृदयमे यह सन्देह उत्पन्न हो
जाता है कि भाव इसने दुर्यलको दवाया है, फिर यह मुझपरभी भाक्रमण कर
देगा । यह सोचकर पद दुर्यलका सहायक बनजाता है। और विजिगीपुका
शनु बनकर उसके लिये अनर्थ खड़ा कर सकता है। इसलिए दुर्बलसे भूमिलेगा
श्रेयस्कर नहीं ॥६॥
तुल्ये बलीयस्त्वे यः स्थितशत्रुमुत्पाट्य भूमिमयामोति सो
ऽतिसंधचे ॥७॥ दुर्गावाप्तिर्हि खभूमिरक्षणं मित्राटवीप्रतिपेधं
च करोति ॥८॥
दो शत्रुओके समान बलशाली होनेपर, जो विजिगीषु स्थायी शत्रुको
उच्छिन्न करके भूमिलाम करता है, यही विशेष लाभ उठाता है ॥ ५ ॥ पाकि
शत्रुके दुर्ग आदि अपने हाथमें आजानेपर, अपनी भूमिकी रक्षा तथा अन्यशत्रु
और आटविकोका प्रतीकारमी सरलतासे किया जासकता है ॥८॥
चलामित्रागामिलामे शक्यसामन्ततो विशेषः ॥९॥ दुर्वल-
सामन्ता हि क्षिप्राप्यायनयोगक्षेमा भवन्ति ॥ १०॥ विपरीता
बलवत्सामन्ता कोशदण्डारच्छेदिनी च भूमिभवति ॥ ११ ॥
अस्थिर (जिसके पास अपना दुगंआदि नहीं है) शत्रुस समानरूपसे भूमि-
लाभ करनेपर भी उसी अवस्थामे विशेष लाभ रहता है, जबकि अस्थिर शत्रुका
पड़ोसी दुर्वल हो ।। ९ ॥ क्योंकि ऐसी भूमि (दुर्बलसामन्ता:जिसका सामन्त
दुल हो उसका पदोसो राजा विजिगीषुके प्रति सामन्त कहाजाता है), विजि-
गीपुकै लिये शीघ्रही योग क्षमको यदानेवाली होती है ॥ १०॥ परन्तु जिस
भूमिका सामन्त बलवान् हो, यह संबंशा इसके विपरीत होती है। विजिगीषु
के कोरा भार वरको क्षीणकरने वाली होती है ॥११॥
(२७६)) कौटलीय अर्थशास्त्र [ ৩ লাখ नीय (सर्वथा उरिटन्न किया जानेवाला) इन दोनामसे उच्छेदनीयसे भूमिका लाभ होना श्रेयस्कर है ॥ २३ ॥ क्योंकि निराश्रय या दुर्थलका आश्रय प्राप्त किये हुए उच्छेदनीयके ऊपर जब आक्रमण किया जाता है, तो यह कोश और सेना लेकर अपने स्थानसे भाग जानकी इच्छा करता है। ऐसी अवस्थामें प्रकृति जन उसकी सहायता नहीं करते, इसे छोड़ देते हैं॥ ३४ ॥ परन्तु पीडनीय, दुगे और मिम्रोको सहायता प्राप्त करके, अपने स्थानपर ही स्थित रहता है, इसी लिये प्रकृतिमन उसका त्याग नहीं करते ॥ ३५ ॥ दुर्गपतिस्तब्धयोरपि स्थलनदीदुर्गीयाभ्यां स्थलदुर्गीयाभूमि- लाभः श्रेयान् ।। ३६ ॥ स्थलीयं हि सुरोधावमस्कन्दमनिसा- विशत्रु च ॥ ३७ ॥ नदीदुर्ग तु द्विगुणक्लेशकरमुदकं च पातव्यं त्तिकरं चामित्रस्य ।। ३८ ॥ दुर्गासे सुरक्षित हुए हुऑर्मेसे मी स्थलदुर्गमें रहनेवालेसे भूमिलाम होना अच्छा है, या नदीदुर्गमें रहनेवालपे ? स्थलदुर्गमें रहनेवालेसे ही भूमि- लाभ होना अच्छा है ॥ ३६ ॥ क्योंकि स्थलमें रहनेवाले दुर्गको यही सरलतासे घेरा जा सकता है, उच्छिन्न किया जा सकता है, तथा शत्रुको भी उसके भीत- रसे निकल भागनेका सुयोग प्राप्त नहीं होसकता । अतएव शीघ्र ही वह आधी. नता स्वीकार करता है। इसलिये इससे भूमिलाम करना सरल और शेयस्कर है ॥ ३७॥ नदीदुर्ग तो दुगने कष्ट उठाकर भी वशमें गहीं आता। वहांपर पीने योग्य जलके होनेसे, तथा जलाधीन अस फल आदिके होजानेसे, शत्रुके निर्वाहम कोई हानि नहीं पड़ती। अतएव इसका उच्छेद करमा अत्यन्त कठिन होता है ॥ ३८॥ नदीपर्वतदुर्गीयाभ्यां नदीदुर्गीयाद्भमिलामः श्रेयान् ॥३९॥ नदीदुर्ग हि हस्तिस्तम्भसंक्रमसेतुबन्धनौभिः साध्यमनित्यगाम्भी- यमपस्राव्युदकं च ॥ ४०॥ नदोदुर्ग और पर्वत दुर्गमे रहने वालोमसे, नदीदुर्गमें रहनेवालेसे भूमिराभ होमा अछा है ॥ ३९ ॥ क्योंकि नदीदुर्ग, हाथी लकडी सम्भे आदि, पुल, थांधी तथा नायोंके द्वारा जलपार करके हस्तगत किया गा सकता है। जल मी उसमें सदा अधिक नहीं रहता, तया किनारोंको तोरकर जल निकाला भी जासकता है । अतएव इससे भूमिलाम फरना सरल है ॥ १० ॥ पार्वतं तु स्थारक्षं दुरवरोधि कृच्छ्रारोहणं भन्ने चैकास्मिन्न सर्ववधः ।। ४१ ॥ शिलावृक्षपमोक्षश्च महापकारिणाम् ॥ ४२ ॥ -
V
१० अध्या०]
घागुण्य
(२७७)
परन्तु पर्वत प्रदेशका दुग अत्यन्त सुरक्षित पत्थर आदिसे बना हुआ
सुदृद्ध होता है, इसको न सरलतासे घेरा जासकता है, और न इसपर पड़ा
जासकता है । अत्रोंके द्वारा एफके नष्ट होनेपर भी शेष सब सुरक्षित रहते
है। उनकी कुछ हानि नहीं होती ॥ ४१ ॥ यदि कोई अत्यन्त बलशाली शत्रु
उनपर आक्रमण करे, तो ऊपरसे उसपर शिल्य तथा वृक्ष आदि गिराकर बडी
सरहतासे ये उसका प्रतीकार कर सकते हैं। ४२ ।।
निम्नस्थलयोधिभ्यो निम्नयोधिभ्यो भूमिलामः श्रेयान् ॥४३॥
निम्नयोधिनी घुपरुद्धदेशकालाः ॥ ४४ ॥ स्थलयोधिनस्तु सर्व-
देशकालयोधिनः ॥ ४५
निम्नयोधी (नौका आदिमें बेटकर युद्ध करने वाले) और स्थलयोधी
शशुओंमेंसे, निन्नयोधी शनुसे भूमिलान होना अच्छा है॥ ४३ ॥ क्योंकि
निग्नयोधी किसी विशेष देश या कालमें ही युद्ध कर सकते हैं, सर्वदा नहीं
कर सकते । इसलिये उनसे भूमि लेना आसान है ॥ ५४॥ परन्तु स्यलयोधी
सब देश और सब कालमें युद्ध कर सकते हैं, इसलिये उनको शघि बशमें
करना दुप्कर है ॥ ५५॥
खनकाकाशयोधिभ्यः खनकेभ्यो भूमिलामः श्रेयान् ॥४६॥
खनका हि खातेन शस्त्रेण चोमयथा युध्यन्ते ॥४७॥ शस्त्रेणैवा-
काशयोधिनः॥४८॥
खनक योधी (खाई खोदकर उसमसे युद्ध करनेवाले) और आकाश
योधी शत्रुओंमेसे, खनकयोधी शत्रुसे भूमिलाभ करना अरछा है ॥ ४६॥ क्या
कि वे युद्ध के लिये खाई और शस्र दोनोंकी ही अपेक्षा रखते है, कभी कहीं
खाईके योग्य उचित स्थान न मिलनेपर पे युद्ध नहीं कर सकते, अत सनदेश
और सर कालमें युद्ध न कर सकनेके कारण ये शीघ्र ही सरसतास वशमें आ
जात है॥४७॥ परन्तु भाकारायांधी शत्रुओको युद्ध करने के लिये केरल शस
को ही अपेक्षा होती है। वे सरदेश और सबकालमें युद्ध कर सकते हैं। अत.
एवं उनको शर्म करना अत्यन्त कठिन है॥१८॥
एवंविधेभ्यः प्रथिवीं लभमानोऽर्थशास्त्रनित् ।
संहितेभ्यः परेभ्यश्च विशेषमधिगच्छति ॥ ४९ ॥
इति पाइगुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे मिग्रहिरण्यभूमिकर्मसंधी भूमिसंधिः
दामो ऽस्याय 10 || आदितो ऽशतः ॥ १० ॥
[७ आधिक (२७८) कौटलीय अर्थशास्त्र अर्थशास्त्रको जाननेवाला विजिगीषु, उक्त प्रकारके सन्धि किये हुए तथा अन्य पात्रु राजाओंसे पृथ्वीका लाभ करता हुआ, सदा उमतिको प्राप्त होता ॥३९॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें दसवां अध्याय समाप्त । ग्यारहवां अध्याय ११६ प्रकरण अनवसित सन्धि निश्चयरूपये किसी विशेष कार्यका भाम महेकर, सामान्य रूपसे शून्य स्थानोंको नगर खान लकडीके जङ्गल आदिके द्वारा यसा. नेकी शर्स करके जो सन्धि की जाती है, उसे भनवसित सन्धि कहते हैं । जिस सन्धिमें दुर्ग आदि कार्योंका निश्चितरूपसे नाम ऐदिया जाता है, वह 'कर्म सन्धि' अगले अध्यायमें पतलाई जावेगी। इन दोनों सन्धियोंमें केवल यही भेद है। त्वं चाहं च शून्यं निवेशयावह इत्यनषसितसंधिः ॥ १ ॥ तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थो यथोक्तगुणां भूमिं निवेशयति सो ऽतिसं- धते ॥ २॥ 'आओ तुम और मैं शून्य स्थानोंको नगर आदिके द्वारा बसायें' इस प्रकार जो सन्धि की जाय, उसे अनवसित सन्धि कहते हैं ॥1॥ उन दोनों- मेंसे जो, पूर्ण सामग्रीसे युक्त हुआ २, जनपदनिवेश भादि प्रकरणाम प्रताये हुए गुणोंसे सम्पस भूमिको यसाता है, वह दूसरेकी अपेक्षा विशेष लाभको मास करता है ॥ २॥ तत्रापि स्थलमादकं वेति ॥ ३ ॥ महतः स्थलादल्पमोदकं श्रेय सातत्यादवस्थितरवाच फलानाम् ॥ ४ ॥ यथोक्त गुण समय होनेपर भी, स्थल अधार जहा केवल वृष्टिसे ही जल प्राप्त हो सके, ऐसी भूमि अच्छी है, या औदक अर्थात् जहा सदा जलसे भरे सराव अथवा नदी हों, ऐसी भूमि भी है॥३॥ पसे अधिक भी स्थल भूमिसे थोड़ी भादक भूमि भरछी है। क्योंकि यहां सर्वदा निश्रित रूपसे फ्ला आदिकी उत्पति हो सकती है॥४॥ स्थलयोरपि प्रभूतपूर्वापरसस्यमल्पवर्षपाकमसक्तारम्भ श्रेया
११ अध्या०]
पागुण्य
(२७९)
॥५॥ औदकयोरपि धान्यवापमयान्यवापाच्छ्यः ॥ ६ ॥
दो स्थल भूमियों में भी यही भूमि उत्तम होती है, जहां बराबर आगे
पीछे होनेवाली वसन्त तथा शरद्की फ़सलें बहुत अच्छी होती हों, तमा थोड़ी
ही दृष्टिसे अम आदि सरस होकर पकजाते हो। और जो उबड़ खाबड़ राधा
कंकरीली पथरीली न होनेसे अच्छी तरह जोती बोई जासके ॥ ५॥ दो औदक
भूमियों में भी यही भूमि उत्तम है, जहां गेहूँ धान आदि अच्छी तरह बोये
जासकें । जहाँ ये आ ग हो चह भूमि अच्छी नहीं ॥ ६ ॥
तयोरल्पबहुत्वे धान्यकान्तादल्पान्महदधान्यकान्तं श्रेयः ।।
महत्यवकाशे हि स्थाल्याश्चानूप्याथोपधयो भवन्ति ॥ ८॥ दुर्गा-
दीनि च कर्माणि प्राभूत्येन क्रियन्ते ॥ ९ ॥ कृत्रिमा हि भूमि-
गुणाः ॥ १०॥
उसमे भी थोड़ी या बहुतका विचार करने पर, धान्य आदिस युक्त
धोदी भूमिसे, धान्य आदि पैरा न करनेवाली भी बहुत भूमि अंध है ।। ७ ।।
क्योंकि अधिक भूमिका विस्तार होनेपर उसमें कही न यही स्थल तथा -
प्राय प्रदेशामें अनेक प्रकारके अस आदि उपज किये जासकते है ॥4॥ भार
दुर्ग आदि राज्य स्थायी साधनीको अधिक संख्या धनाया जासकता है ॥ ९॥
क्योंकि वस्तुतः भूमि सम्बन्धी गुण अपनी इच्छा के अनुसार मनाये जासकते हैं।
तात्पर्य यह है, कि करनेवाला, भूमिको जैसा चाहे पैसा बना सकता है, इस
लिये आधस अधिक भूमिका हाथमे आजाना अच्छा है॥10॥
(सनिधान्यभोगयोः खनिभोगः कोशकरः ॥११॥ धान्यभागः
कोशकोठागारफरः ॥ १२ ॥ धान्यमूलो हि दुर्गादीनां कर्मणा-
मारम्भः ॥१३॥ महाविषयविक्रमो या सनिभोगः श्रेयान ॥१४॥
खानयुक्त तथा धान्ययुक्त स्थानोमेसे पहिला स्थान फेवल कोशको वृद्धि
करसकता है ॥11॥ परन्तु दूसरा धान्योपयोगी स्थान कोश और कोडागार
(भनाज रखनके बड़े १ स्थान) दोनोंको पाता है ॥ १२ ॥ पयोकि दुर्ग आदि
कार्योंका भारम्भमा धान्य मूलक ही होता है। इसलिये धान्योपयोगी स्थान
श्रेयस्कर है ॥ १३ ॥ अथरा main स्थानभी उराम है, पकि यहाँसे उत्पन्न
हुई वस्तुभाका पट्टाभारी व्यापार किया जासकता है ॥ १४॥
द्रव्यहस्तिवनभोगयोर्द्रव्यवनभोगः सर्वकर्मणां योनिः प्रभू-
तनिधानक्षमथ ॥१५|| विपरीतो हस्तियनभोग इत्याचार्याः॥१६॥
[७ अधिक 1 (२८०) कौटलीय अर्थशास्त्र पढ़िया लकष्टीके जंगल और हाथियोंके जंगलॉमसे कौनसा उत्तम होता है ? आचायोका सिद्धान्त है कि, लकड़ी के लिये उपयोगी जंगल ही अच्छा होता है। क्योंकि दुर्ग आदि सभी कार्योम लकड़ी की भत्यन्त आवश्यकता होती है। तथा उसका अधिकसे अधिक संचंय मी सरलता से किया जासकता है ॥ १५॥ पान्तु हा के जंगलों में यह बात नहीं होती, इसलिये पहिलाही उत्तम है ॥ १६ ॥ नेति कौटल्यः ॥१७॥ शक्यं द्रव्ययनमनेकमनेकस्सां भूमौ वापयितुं न हस्तिवनम् ।। १८ ॥ हस्तिप्रधानो हि परानीकवध इति ॥ १९ ॥ कौटल्य इस उपयुक्त सिद्धान्तको स्वीकार नहीं करता ॥ १७ ॥ उसका कहना है कि तरह २ की लकीके जंगल अनेक स्थानों में अपनी इलाके भनु. सार लगाये जा सकते हैं । परन्तु हाथियोंके जंगल स्वयं उत्पन्न नहीं किये जा सकते; हाया किसी २ जंगलमही उत्पन्न होते हैं ॥ १८ ॥ और शत्रुकी सेनाको नाश करनेके लिये हाथी एक प्रधान वस्तु है इसलिये हाथियोंकी उत्पत्तिका उपयोगी जंगलही उत्तम समझना चाहिये ॥ १९ ॥ वारिस्थलपथभोगयोरनित्यो वारिपथभोगो नित्यः स्थलपथ- भोग इति ॥२०॥ वारिपथ (जलका मागे) और स्थलपथ (स्थलका मार्ग ), यदि ये दोनाही अनित्य (कादाचिरक-कभी २ होने वाले । हो, तो इनमेसे पारिपथ के लिये उपयोगी स्थानही उत्तम होता है। पदि दोनोंही नित्य (सदा होने वाल) हो, तो पलपथ का स्थानही श्रेष्ठ समझाना चाहिये ॥२०॥ भिन्नमनुष्या श्रेणीगनुष्या वा भूमिरिति ।। २१॥ भिन्न- 'मनुष्या श्रेयसी !! २२॥ मिस मनुष्यों (आपसमे मिलकर न रहनेवाले मनुष्यों) से युक्त भूमि अच्छी होती है, अथवा श्रेणी मनुष्यों (सदा आपसमे मिलकर रहनेवाले मनु- प्यों) से युक्त भूमि अच्छी होती है ? ॥२॥ भिन्न मनुष्यांसे युक्त भूमिही धेय- स्कर होती है ॥ २२॥ भिन्नमनुप्या भोग्या भवत्यनुपजाप्या चान्येपामनापत्सहातु ॥ २३ ॥ विपरीता श्रेणीमनुष्या कोपे महादोपा ॥ २४ ॥ क्योंकि ऐसो भूमि शोघही अपने अधीन होजाती है, अर्थात् विभि- गीषु ऐमो भूमिको शोधही अपने अधिकारमें कर लेता है। तथा अन्य शत्रुओंके . ११ अध्या पाड्गुण्य (२८१) द्वारा यह पहकाई भी नहीं जासकती, क्योंकि यहांके मनुष्य आपसमें मिलतेही महीं। इसलिये सापत्तियोंका सहन करने के लिये भी ये लोग कभी तयार नहीं हो सकते ॥ ३३ ॥ परन्तु श्रेणीमनुष्य भूमि, इसके सर्वया विपरीत होती है। वह शत्रुके द्वारा यहकाई भी आसकती है, मिलकर रहने के कारण यहाँके मनुष्य हर तरहको आपत्ति सहनेके लिये भी तयार होजाते है । और फुपित होनेपर राजाका भी उच्छेद कर सकते हैं ॥ २५ ॥ तस्यां चातुर्वर्णाभिनिवेशं सर्वभोगसहत्यादवरवर्णप्राया श्रे- यसी ॥ २५ ॥ बाहुल्याद्भुवत्वाच कृष्याः कर्षणवत्तीः ।। २६ ।। उस भूमिम चारों वर्गों के निवासके सम्बन्ध विचार होनेपर, यही निश्चय समझना चाहिये कि सब तरह के सुख दुखादिका सहन करनेके कारण शुद्ध, पाले आदि नीच जातिके मगुप्योंसे युक्त भूमिही श्रेष्ठ होती है ॥ २५ ॥ खेतीक बहुत होनेसे, तथा निश्चित हो फलदायक होनस खेतीके योग्य भूमि प्रेयस्कर होती है ॥ २६ ॥ कृप्या चान्येपांचारम्भाणां प्रयोजकत्वात् गोरक्षकवती ।।२७।। पण्यनिचयर्णानुग्रहादाट्यपणिग्वती ।। २८ ।। कृषि सम्बन्धी व्यापार तथा अनेक कार्योंका निर्भर भी गाय या गोपा- शेके उपर है । इसलिये गाय और गोपालोंसे युक्त भूमि भी उत्तम होतो है ॥ २७ ॥ध्रापारके लिये धान्य आदि पस्तुओका सवय करने,-या व्यासपर मरण आदि देकर उपकार करनेके कारण व्यापारी और धनिक पुरषासे युक्त भूमि भी श्रेष्ठ होती है ॥२८॥ भूमिगुणानामपाश्रयः श्रेयान् ॥ २९ ॥ दुर्गापाश्रया पुरुषा- पाश्रया या भूमिरिति ।। ३० ॥ भूमिके उपर्युक्त सरही गुणामसे केवल आश्रय देना या रक्षा करनाही सयसे भेंट है ॥ २९ ॥ दुर्गाका माश्रय देनेवाली भूमि अच्छी होती है, या मनुष्योंका भाश्रय देनेवाली ? तारपर्य यह है कि दुर्गाके सहारे किसी भूमिमें आश्रय लेना अच्छा है, या पुरपोके सहारे ॥ ३० ॥ ) पुरुपापाश्रया श्रेयसी ॥३१॥ पुरुषवद्धि राज्यम् ॥३२॥ अपुरुषा गोर्वन्ध्येव किं दुहीत ॥ ३३ ॥ पुरषोंका भाश्रय देनेवाली भूमिही उत्तम होती है । अर्थात् जहाँ पुट. पोका सहारा मिएमके, यही स्थान श्रेष्ट है ॥३॥ क्योंकि राज्य यावर [७ आधि ។ (२४२) कौटलीय अर्थशास्त्र उसीका नाम है, जहां यहुत पुरपॉफा सयोग हो ॥ ३२॥ पुरपहीन भूमि, धन्ध्या गौके समान क्या उपयोग देसकती है।॥३३॥ महाक्षयच्ययनिवेशानु भूमिमवाप्तुकामः पूर्वमेन फ्रेतारं पणेत ॥ ३४ ॥ दुर्बलमराजनीजिनं निरुत्साहमपक्षमन्यायवृत्तिं व्यस. निनं देवप्रमाणं यत्किंचनकारिणं या ॥ ३५ ॥ 1 जन धनका अत्यधिक म्यय करके बसाई जाने योग्य भूमिको यदि विजिगीषु प्राप्त करना चाहे, तो उसे चाहिये कि प्राप्तिक पहिले हो निम्न प्रका रके आठ राजाओं में से किसीको उस भूमिका खरीदार तैयार कर ॥ ३४ ॥ दुर्बल, भराजवानी (जा किसी राजवशम उत्पस हुआ २ न हो) उत्साहहीन, अपक्ष (जिसकी सहायता करनेवाला कोई पक्ष न हो), अन्यायवृत्ति (प्रनापर अन्याय करनेवाला), सनी (शिकारी शरायी आदि), भाग्यके भरासेही सब काम करनेयाला, तथ जो कुछ चित्तमें आजाय, विना विचार यही कर डालनवाला (याँ कानकारी)। (नरपर्य यह है कि इनमें से किसीको यह जमीन खरीदवाकर, जब यह अपना धन-जन आदि व्यय करके उसे बसाल, उसके क्षीण हानपर विजिगीषु उस भूमिपर अपना अधिकार जमाये । इसी पातका अगल सूनाम बताया ज ता है) ॥ ३५ ॥ महाक्षयव्ययनिवेशायां हि भूमौ दुलो राजनीजी निविष्टः सगन्धाभिः प्रकृतिभिः सह क्षयव्ययेनारसीदति ॥ ३६ ॥ जन-धन आदिका अयधिक व्यय करके बसाइ जान गोग्य भूमिम पप बलहीन, राजवराम उपस हुआ २ राजा, निवास बनाद, अयार जय उस भूमिको बसादता है, ता अत्याधक पुरुपोका क्षय और धनका व्यय हानक कारण, भपकी सहायता करगवाल सजातीय अमात्य आदि प्रकृति जनोंके साथ ही वह क्षीण होजाता है ॥ ३६ ॥ बलवानराजवीजी क्षयभयादसगन्धाभिः. प्रकृतिभिस्त्यज्यते ॥ ३७॥ निरुत्साहन्तु दण्डवानपि दण्डस्याप्रणेता सदण्डः क्षय- व्ययेनावभज्यते ॥ ३८॥ राजवैशमें उत्पनन हुए २ घलान् राजाको, पुस्खोंके क्षय और धनके ग्यय होजानेके भयसे निजातीय अमात्य आदि सहायक प्रकृति जन छोड देते ६॥३७ ॥ उत्साहदीन राजा सेनाक होत हुए भी, उसका उचित रीतिसे उपयोग नहीं कर सकता, इसलिय सेनाफे सहित ही, जन-धना होजानेके कारण नष्ट होजाता है ॥ ३८॥ क्षय व्यय ' सहायता ११ अध्या?] पाइगुण्य,... (२८३.), कोशवानप्यपक्षः क्षयव्ययानुग्रहहीनत्वान्न., कुतश्चित्यामोति ॥ ३९ ॥ अन्यायवृत्ति निविष्टमप्युत्थापयेत् ॥ ४० ॥ स कथ- मानविष्टं निवेशयेत् ॥ ४१ ।। कोश रहते हुए भी मिय रहित राजा, क्षय व्यय (योग्य पुरषोके नाशका नाम क्षय, और धनका न्यून होजाना व्यय कहाता है) में मिलनेके कारण किसी तरहमी सिद्धिको. माह नहीं हो सकता ।। ३९ ।। अन्याय करनेवाले बसे हुए भी राजाको जब माजी उखाई देती है, तो गये प्रदेशको प्राह कैसे असा सकता है vieHITTER "तेन व्यसनी व्याख्यातः ॥ ४२ ॥ चप्रमाणों मानुपहीनो निरारम्भो विपन्नकर्मारम्भो वापसीदति ।।..४३ ॥ प्यसनी राजाका भी यही हाल - होता है ॥ ४२ ॥ , केवल भाग्यपर भरोसा करनेवाला रामा भी पौरुषहाँग हुआ २ किसी कार्यको प्रारम्भ नहीं फरसा, यदि फरभी देता है, सो प्रारम्भ किये कार्य में किस भाजानेपर, उसे छोड़ घेरता है, और इस प्रकार जन-धनका नाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है TIT "...'-1. " यत्किंचनकारी न किंचिदासादयति ॥४४॥ स चैपां पापि प्रतमो भवति ॥४५॥ यत्किंचिदारममाणो हि विजिगीपोः कदाचिच्छिद्रमासादयदित्याचार्या ॥ ४६॥ 12: विना विचारे इच्छानुसार कार्य करनेयाला राजा कभी सिद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥ ४५ ॥ परन्तु इन उपयुक्त सभी राजाओमसे वह विजिगीपुर्के लिये अत्यन्त हानिकारक हो सकता है ॥ १५ ॥ क्योंकि जिस किसी कार्यका भारम्भ करता हुआ शत्रु, कदाचित् विजिगीपुके किसी दोपका पता लगा लेवे, और उसके द्वारा विजिगीपुको हानि पहुंचा सके। क्योंकि विजिगीपुं उसे समशकर उसकी ओरसे उपेक्षा रष्टि रखता है। यह प्राचीन आचापाका सिद्धान्त है॥४६॥ यथा छिद्रं तथा विनाशगयासादयेदिति फोटल्यः ||४७il तेपामलामे यथा पाणिग्राहोपग्रह वक्ष्यामस्तथा भूमिमवस्थापये- दित्यभिहितसंधिः ॥४८॥ ... परन्तु कोटक्ष्यका मत है कि यह विजिगीषुके.दोपासनाननेकी तरह भपन विनाशको.भी प्राप्त कर सकता है, क्योंकि विजिगीषु सो. इसके अनेक ।
[ও সবি
कोटलीय अर्थशास्त्र
दोपोंसे परिधित रहता है । इसलिये उसे जब चाहे दमा सकता है ॥ ४ ॥
यदि इन उपयुक्त राजाओंमेमे कोई भी उम भूमिको परीदनेवाररान मिले,
तो जिस प्रकार पाणिप्राहक साप सन्धि आदिके प्रकरणमे (देगी-अधि ,
सध्या १३) यताया जायगा, उसहीके अनुसार भूमिके यसाने भादिको व्यव.
स्था करे। इसका नाम 'अभिहितसन्धि' ह । क्योंकि भूमिके हेने और देनेमे
उत्पन्न होनेके कारण यह विचलित नहीं होती, यरायर यनी रहती है ॥ ५८ ॥
गुणवतीमादेयां वा भूमिं चलनता क्रयेण याचितः संधिम-
वस्थाप्य दद्यादित्यनिभृतसंधिः॥ ४९ ।।
विशेष गुणयुक्त भूमियो, जो कि सरोदनेवालेकी उपेक्षासे फालान्तरमें
अपनेही पास फिर वापस आजानेवाली हो, बलवान् सामन्त यदि प्रयके द्वारा मांगे,
अर्थात् खरीदना चाहे, तो उसके साथ अवमर होनेपर तुम मेरी सहायता करोगे'
इस प्रकार सामान्यसन्धि की स्थापना करके, वह भूमि उसके हाथ येच
देवे। इसका नाम ' भनिसृतसन्धि' कहाता है। क्योंकि प्रयल सामन्त,
दुबरके प्रति अविश्वास कर सकता है, भोर अपनी प्रतिज्ञात सन्धिको तोर
सकता है॥ ५९॥
( समेन वा याचितः कारणमवेक्ष्य दद्यात् ॥ ५० ॥ प्रत्या-
देयो मे भूमिवश्या चानया प्रतिबद्धः परो मे वश्या भविष्यति
भूमिविक्रयाद्वा मित्रहिरण्यलाभः कार्यसामर्थ्यकरो मे भरिप्यतीति
॥५१॥ तेन हीनः क्रेता व्याख्यातः ॥५२॥
यदि परावर शक्तिवारा राजा, उस भूमिको फ्रय करना चाहता है, तो
निलिखित कारणों को अच्छी तरह सोच विचारकर, यह भूमि उसको बेच
देवे ॥ ५० ॥ चे कारण ये हैं-'देचदेने पर भी यह भूमि कालान्तर में मेरे
पास भासकेगी; भयदा मेरे उपयोगम भाती रहेगी, भर्यास् येचनेपरमीमैं इससे
लाभ उठाताही रहूगा, मया समशक्ति राजाके साथ इसके द्वारा सम्बन्ध होने
पर दूसरा शत्रु मेरे अधीन होजायगा, अथवा भूमिके येचनेसे, प्रत्येक कार्यों के
पूर्ण करनम समर्थ, मित्र और धन सम्पत्तिका राभ होगा'। इन्हीं सब फारणों
को विचार पूर्वक निश्चय करके घर भूमि पेचदेवे॥५१॥ इसीप्रकार अपनेस हीन
शति ताके सम्बन्धम भी समझना चाहिये । ५२॥
एवं मिनं हिरण्यं च सजनामजनां च गाम् ।
लभमानो ऽतिसंधत्ते शास्त्ररित्सामवायिकान् ॥ ५३॥
इति पाहगुप्ये सप्तम ऽधिकरण मिहिरण्यभूमिकमंसधौ भनवसितसधि.
प्रकादशो न्याय ॥1॥ आदितो नवरातः ॥ १०९॥
१२ अभ्या०] थागुण्ये (२८५) अर्थशास्त्रको जाननेपाला राजा, इस प्रकार मित्र, धन सम्पति, तथा आयाद एवं उजाद भूमि को पास करता हुआ, अपने साथी दूसरे राजाओंकी अपेक्षा सदाही विशेषलाभ उठाता है ॥ ५३॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें ग्यारहवां अध्याय समात1) बारहवां अध्याय ११६प्रकरण कर्म सन्धि । स्वं चाहं च दुर्ग कारयावह इति कर्ममंधिः ॥ १॥ तयोर्यो दवकृतमविपद्यमल्पव्ययारम्भं दुर्ग कारयति सो ऽतिसंधत्ते ॥२॥ 'तुम और मैं मिलकर दुर्ग बनवार्य' इसप्रकार निश्चित रूपसे कार्यवस्तु कानाम लेकर जो सन्धि कीजाती है, उसे 'कर्मसन्धि' कहते हैं ॥१॥ चिजि गीपु और उसके साथी, दोनोमेसे वही विदोष लाभमें रहता है जो स्वभाषसेही दुर्गम स्थान, अतएव शाओंसे दुगैद्य, थोड़ाही धन व्ययकरके अपना दुर्ग पनवाता ॥२॥ तत्रापि सलनदीपर्वतदुर्गाणामुत्तरोचरं श्रेयः ॥ ३ ।। सेतु- बन्धयोरप्याहार्योदकात्सहोदकः श्रेयान् ॥ ४ ॥ सहोदकयोरपि प्रभूतवापस्थान. श्रेयान् ॥ ५॥ ऐसे दुर्गामभी स्थलमें यनेहुए दुर्गकी अपेक्षा, नदीका दुर्ग अच्छा होता है, और उससे भी अच्छा पर्यंत प्रदेशमें यनाहुआ दुर्ग होता है ॥३॥ (परके यांध लाफिर जलका रोकना सेतुबन्ध कहाता है) सेतुबन्धामभी केवल घर्षा ऋतु जल इकट्ठा होनेवाले की अपेक्षा स्वमावसे ही जलयुक्त सेतुबन्ध उत्तम होता 1 ॥ उनमें भी यह प्रेष्ठ है, हा खेती करनेके लिए स्थान पयांत हो ॥ ५॥ द्रव्यवनयोरपि यो महत्सारबद्दव्याटवीकं विपयान्ते नदीमा- तुकं द्रव्यवनं उदयति सो ऽतिसंधत्ते ॥६॥ नदीमावकं हि स्वाजीमपाश्रयश्चापदि भवति ।। ७ ॥ अनेक पीके उपसि स्थान अन प्रदेशमें भी, जो राजा अपने सीमा मान्समें नदियोसे सीपेजाने वाले, तथा अच्छी तरह फल आदि उत्पन्न करनेवाले जगलॉको ठीक कर देता है यह विशेपटाभ प्राप्त करता है ।। ६॥ क्योंकि नदीसे
[७ अधिक
(२८६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
सीवेजानाले स्थान सुखपूर्वक भाजीविका साधन होते है और विपत्ति पने
पर उनमें आश्रयभी लिया जासरता है।
हस्तिमृगवनयोरपि यो बहुशूरमृगं दुर्वलप्रतिवेशमनन्ताय.
क्लेशि विषयान्ते हस्तिवन वनाति सो ऽतिसंधत्ते ॥ ८ ॥
हाथियोंके जगलाम भी, जो राजा अनेक शक्तिशाली जंगली जानवरों
(हाथियों) से युक्त, दुबलोंके रिये मी नियत स्थानवाले तथा अत्यधिक
भानेजाने के मार्गों से युक्त, हाधियोंके जंगलोंको अपने सीमाप्रान्त में बसाता है,
पही लाभमें रहता है ॥ ८ ॥
तत्रापि बहुकुण्ठाल्पशरयोरल्पशूरं श्रेयः ॥९॥ शूरेपु हि
युद्धम् ॥ १० ॥ अल्पाः शूरा पहून्शूरान्भजन्ति ते भग्नाः स्वसे-
न्यायघातिनो भवन्तीत्याचार्याः ॥ ११ ॥
इस प्रकारके हाथियोंके जंगलों में भी, जिसमें संरयाम अधिक पर शक्ति-
हीन हाधी हों, उसकी अपेक्षा शक्तिशाली योहे हाथियोका जंगल उत्तम है
॥ ९॥ क्योंकि शक्तिशाली हाथियों के भरोसेपर ही युद्ध होता है ॥ १०॥ थोड़े
भी शक्त, यहुतसे अशक्तों को भगा देते हैं । और वह विश्वरित (तितर बितर)
हुए २ हाथी अपनी ही सेनाको कुचल डालते हैं। यह आचार्योका सिद्धान्त
नेति कौटल्यः॥१२॥ कुण्ठा यहव. श्रेयॉसः स्कन्धविनियो-
गादनकं कर्म कुर्वाणाः स्वेपामपाश्रयो युद्धे ॥१३॥ परेषां दुर्धर्षा
विभीपणाश्च ॥१४॥
परन्तु कोटय इस सिद्धान्तको नहीं मानता ॥१२॥ उसके सिद्धान्त
में शक्तिहीन भी बहुत हाथियोंका होना श्रेयस्कर है। ययोंकि सेनाके अनेक
विभागामें पृथक् २ अनेक कार्य उनसे रिये जासकते हैं। इसलिये युद्ध में वे
अपने अच्छे सहायक होते हैं ॥ १३ ॥ तथा शत्रुको घबडादेनेवाले, ओर इसी
लिये उनके वश न आनेवाले होते हैं । तात्पर्य यह है कि शत्रु उनकी अधिक
सरुपाको देखकरही हरजाता है । और मैदानसे भागजाता है ॥ १४ ॥
बहुषु हि कुण्ठेषु पिनयकर्मणा शक्यं शौर्यमाघातुम् ॥१५॥
न त्वेवाल्पेषु शूरेषु यहुखमिति ॥ १६ ॥
सहम अधिक हाथी यदि कुण्ठ (युद्ध आदि करनेमें चतुरता न रखने
घाले, सामप्पहीन) मी हॉ, तोभी कोई हानि नहीं, क्योकि युद्ध सम्बन्धी
विविध शिक्ष ऑके द्वारा उन्हें सुधार तथा समर्थ बनाया जासकता है ॥१५॥
. १२ अध्या०] 'पाईगुण्य (२८७) परन्तु शक्तिशाली थोडे हाथियों के होनेपर, उनकी संख्याको सहसा बढ़ाया महीं जा सकता है ॥१६॥ खन्योरपि यः प्रभूतसारामदुर्गमार्गामल्पव्ययारम्भा खनि खानयति सो ऽतिसंधत्ते ।। १७ ॥ तत्रापि महासारमल्पमल्पसार का प्रभूतामिति ॥ १८ ॥ खानाम भी, जो राजा अधिक बदिया माल देनेवाली, अति दुर्गम मागासे युक्त, तथा थोड़ाही धन व्ययकरके खानीको खुदधाता है, वही विशेप लाभ उठाता है ॥ १७ ॥ खाना भी, यहुमूल्य मणि आदि श्रेष्ठ वस्तुओको थोड़े परिमाणमें उत्पना करनेगारी खान अच्छी है, अथवा अल्पमूत्यकी, परिमाण अलधिक धस्तुआको उत्पन्न करनेवाली अच्छी है ? ॥ १८ ॥ महासारमल्यं श्रेयः ॥ १९ ॥ यज्ञमणिमुक्ताप्रवालहमरूप्य- धातुर्हि प्रभूतमल्पसारमत्यर्पण ग्रमत इत्याचार्याः ॥ २० ॥ अनेक आचार्योका मत है कि बहुमूल्य, श्रेध, घोड़ी वस्तुकी ही उत्पत्ति उत्तम है ॥ १५ ॥ क्योंकि हीरा, मणि, मोती, मूगा, सोना, चांदी आदि बहु- मूरप पदार्थ, अपने मुकाबले में अड्पमूल्य अत्यधिक पदार्थकोभी मूरपकी तुलना होनेपर दयालेते हैं । अर्थात् थोडेपी हीरा, मणि आदिका मूल्य अन्य अधिक वस्तुओंके मूल्यसे अधिकट्टी रहता है ॥ २० ॥ नेति कौटल्यः ॥२१|| चिरादल्पो महासारस्य नेता विद्यते ॥ २२ ॥ प्रभूतः सातत्यादल्यमारस्य ।। २३ ॥ एतेन वणिक्पथो व्याख्यातः 11 २४॥ परन्तु आचार्य कौटल्य का यह सिद्धान्त नहीं है ॥ २१॥ यह कहता है कि यहुमूल्य पस्तुका सरोदनवाला, बहुतसमय में कोई विरलाही आदमी मिला। है॥ २२ ॥ परन्तु अल्पमूल्य यस्तुओको खरीदनेवाल, सदाही बहुत मिलते हैं ॥ २३ ॥ इसीने यापारी मागौंका बनानाभों समझलेना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार व्यापारी मागाके बनाने पर विशेषलाभ होसके, उसी तरह उनका निर्माण किया जाये ॥२५॥ तत्रापि पारिन्धलपथयो रिपथः श्रेयान् ॥ २५ ॥ अल्प- ध्यपव्यायामः प्रभूतपण्योदयश्चेत्याचार्याः ॥ २६ ॥ इनमेंभी जलीयमार्ग और स्थलमागामले जलीयमाही धेयस्कर है ॥२५॥ क्योंकि यह थोडासा धनम्ययं करनेपर थोड़ेही परिश्रमसे तैयार किया (२८८) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ माध जासकता है । तथा जलमार्गसे मारभी यदी आसानीके साथ लाया लेजाया जासकता है । इस लिये इनमागास यहुत लाभ होनेकी सम्भावना रहती है। यह प्राचीन भाचायाँका मत है ॥ २६ ॥ नेति कौटल्यः ॥ २७ ॥ संरुद्धगतिरसार्वकालिकः प्रकृष्टभ- ययोनिनिष्प्रतिकारश्च वारिपथः, विपरीतः स्थलपथः ॥ २८ ॥ परन्तु काटय इस सिद्धान्तको नही मानता ॥ २७ ॥ क्योंकि जलका मार्ग, विपति में सब भोरसे रक सकता है, वृष्टि आदिके समयमै उसस जाना भानाभी नहीं होसकता, इसलिये सब तुओंके लिये उपयोगी भी नहीं। तथा स्थलमार्गकी अपेक्षा अधिक भयजनक है (क्योंकि जरमें डूबने भादिका दर पहुत रहताहै), और जल मार्गम भय उपस्थित होने पर उसका प्रतीकारभी नहीं किया जासकता। परन्तु स्थरमार्ग इससे बिल्कुल विपरीत होत । हसलिये दोनोमसे स्थलमार्गकोही उत्तम समझना चाहिये ॥२८॥ वारिपथे तु कलसंयानपथयोः कृलपथ पण्यपट्टणवाल्या- च्छ्यान्नदीपथो वा सातत्य द्विपयायाधत्वाच ।। २९ ॥ जलीयमार्ग भी दो प्रकारके होते हैं, एक जलके किनारे २ का मार्ग (फूलपथ), भौर दूसरा जलके मध्यका मार्ग ( सयानपथ समुद्र आदि, निर• तर जरही जलमे जाना) इन दोनो मार्गों में से भी प्रथम जलीयमार्ग अच्छा होता है। पाकि ऐसे मार्गोंपर व्यापारी नगर बहुत होते हैं, और उनसे बहुत हाभ उठाया जासकता है । अथवा नदी द्वारा जो जलमार्ग नियत किये जाते है, वे भी उत्तम समझने चाहिये । क्योकि नदीजरकी धारा निरन्तर पनी रहती है, और उस मार्गमें कोई उत्क्रयाधा भी उपस्थित नहीं हसी ॥ २९ ॥ स्थलपथे ऽपि हैमरतो दक्षिणापथाच्छ्यान् ॥ ३० ॥ हस्त्य- श्वगन्धदन्ताजिनरूप्पसुपर्णपण्याः सारवत्तरा इत्याचार्याः ॥३॥ स्थलमार्ग में भी दक्षिण भोरके मार्गकी अपेक्षा उत्तरका मार्ग श्रेष्ठ है ॥ ३० ॥ क्योकि इस ओर हापी, घोडे, कस्तूरी, दान्त, धर्म, चादी और सोना आदि यहुमूल्य विकेय वस्तुएँ बहुतायनसे मिल जाती है, यह आचार्यो- का मत है ॥३३॥ नेति कौटल्यः॥ ३२ ॥ कम्बलाजिनावपण्यवर्जाः शङ्कव- जमणिमुक्ताः सुवर्णपण्याथ प्रभूततरा दक्षिणापथे। ३३ ।। परन्तु कौटय इस सिद्धान्तको नहींमानता ॥ ३२ ॥ यह कहता है किकम्बल, चर्म तथा घोड़े आदि इन विशेष वस्तुभाको छोड़कर शेष हावी - । घाइगुण्य - १२ अध्या०] (२८९) भादि सबही रस्तुएँ, तथा शङ्ख, हीरा, मणि, मोती, सुवर्ण आदि अन्य अनेक विफेय वस्तुऐं उत्तरकी अपेक्षा दक्षिणको भोर ही अधिक होती हैं। इसलिये दक्षिणकी औरका मार्गही श्रेयस्कर है ॥ ३३ ॥ दक्षिणापथेऽपि बहुखनिःसारपण्यः प्रसिद्धगतिरल्पव्यायामो वा वणिक्पथः श्रेयान् ।। ३४ ॥ प्रभूताविपयो वा फल्गुपण्यः ॥ ३५ ॥ तेन पूर्वः पश्चिमश्च वणिक्पथी व्याख्यातः ॥ ३६॥ दक्षिण मार्गमै भी यहुप्त खानासे युक्त, बहुमूल्य विक्रय वस्तुओंवाला, तथा निर्वि भानेजानेके लिये उपयोगी और थोड़ेही परिश्रमसे सिझदोने पाला व्यापारी मार्ग उत्तम समझाना चाहिये ॥ ३४ ॥ अथवा यह मार्ग श्रेष्ठ समझनी चाहिये, जिसपर थोड़ी कीमतको भी चीजें बहुत अधिक परिमाणमें होती हों, या जहां कमकीमतकी भी वस्तुओंको खरीदनेवाले पहुरा अधिक हों पूर्व और पधिमके व्यापारी मार्गोको' भी समझ लेना तत्रापि चक्रपादपथयोश्चक्रपथो विपुलारम्मत्वाच्छ्रेयान् ॥३७॥ देशकालसंभावनो वा खरोष्ट्रपथः ।। ३८ ॥आभ्यामसपथो व्या- ख्यातः॥ ३९॥ इन व्यापारी मार्गामें भी, पैदल के मार्गकी भपेक्षा गादी भादिका मार्ग अधिक उत्तम समझना चाहिये । क्याकि ऐसे मागाके द्वारा बहुत अधिक व्यापार किया जासकता है। विकेय वस्तुएं अधिक तादादमें लाई लेजाई जासकती है ॥ ३७॥ देशकालके अनुसार गधे और ऊंटोंका मार्गभी श्रेष्ठ समझना चाहिये क्योंकि इनके द्वारा भी, व्यापार अधिक परिमाणमें किया जासकता है । ३८॥ इसी प्रकार कंधोएर मार दोनेयाले मैल आदिक, व्यापारीमार्गीका विवरणभी समझलेना चाहिये ॥ ३९॥ परकर्मोदयों नेतुः क्षयो वृद्धिर्विपर्यये । तुल्ये कर्मपथे स्थानं ज्ञेयं स्व.विजिगीपुणा ।। ४० ।।, शत्रुका अपने कार्योंसे लाभ होगा ही, विजिगीपुका क्षय समझना पाहिये । तथा अपने कार्योंके सफल होनेपर ही वृद्धि समझनी पाहिये । यदि कापीका फल दागोंको पावर ही हो, तो विजिगीपुको परामर ही समझना चाहिये। कि मैं अपने उसी स्थानपर भयस्थित हूं। मैंने इनप्ति पा भवनति पुरा नहीं की ॥४॥ , - . (२९०) कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक अल्पागमातिव्यययता क्षयो वृद्धिर्विपर्यये । समायव्ययता स्थान कर्ससु नेयमात्मनः ॥४१॥ योगी भाय भीर अधिक व्यय हो तो क्षय, और इससे विपरीत होने पररावृष्टि समझनी चाहिये । तथा कार्योम मराबर माय और व्यय होनेपर समान अवस्था समझनी चाहिये ॥ ११ ॥ तस्मादल्पव्ययारम्भं दुर्गादिषु महोदयम् । कर्म लब्या विशिष्टः स्यादित्युक्ताः कर्मसंधयः॥४२॥ इति पाइगुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे मिहिरण्यभूमिकर्मसधौ कर्मसधि दिशो ऽध्याय ॥ १२ ॥ भादितो दशात ॥१०॥ इसलिये विजिगीषुको उचित है, कि वह दुर्ग आदि कार्याम थोड़ा ऽपय फरफ ही महानफलको प्राप्त करनेका यस करे। बड़े फल वाले कार्यको मात करके ही विजिगीषु दाघुसे यट सकता है। इसमकार यहातक कर्मसन्धि योका निरूपण किया गया ॥ ४२ ॥ पाइगुपय सप्तम अधिकरणमें बारहवा अध्याय समाप्त । तेरहवां अध्याय ११७.प्रकरण पार्णिमाह चिन्ता पृष्ट स्थित शत्रुको पार्णिमाह कहते हैं । ऐसी अवस्थामें विजिगी पुको क्या करना चाहिये, इसी यातका विचार इस अध्यायमें कियागया है। संहत्यारिविजिगीष्योरमित्रयोः पराभियोगिनोः पाणि गृह- तोर्यः शक्तिसंपन्नस्य पाणि गृह्णाति सो ऽतिसंधत्ते ॥ १॥ विजिगीषु और शनु मिरकर, जब पृष्टरी होकर किसी राजापर भाक्रमण करें, तो इनमेंसे यही विशेष लाभमें रहता है, जो कि अपने शनुभूत, दूसरेके साथ पुद करनमें लगे हुए दो राजाभास शक्ति सम्पन्न राजाकी पार्मिणको प्रहण करता है। शक्तिसंपनो घमित्रमुच्छिद्य पाणिग्राहमुच्छिन्द्यात् ।। २॥ पोंकि शक्तिसम्पन्न रामाही अपने शनुका उच्चद करके पाणिग्राहका कर सकता है। सात्पर्य यह है -जब शत्रु अपने शत्रुके साथ युद . - 4 १३ अध्या पाइगुपया (:२९१) करता हुआ हो, तबही विजिगीषु और शभुको मिलकर उनपर आक्रमण जना चाहिये । क्योंकि यदि पानिमाह मनेहुए विजिगीषुका शत्रुःअपने शत्रुको जीत लेगा तो अधिक बलवान्।होकर विजिगीपुको भी पीछेसे नष्ट करहालेगा । इस लिये विजिगीषुको चाहिये, कि वह अपने शत्रुके साथ युद्ध करते हुएही शत्रुपर आक्रमण करके उसके विजयमें विन दालदे, जिससे कि वह शधुको जोसकर बलवान् न होसके। ऐसी अवस्था यथोक विजिगाए और धुमस वही विशेष लाभमें रहता है, जो युद्ध करते हुए पलवान् शत्रुका पार्णिमाई पनती है। क्योंकि उसहीसे अपने उच्छेदकी अधिक आशङ्का रहती है। दुर्बल शर्ड, विजिगीपुका कुछ नहीं बिगाड़ सकता ॥ २ ॥ न हीनशक्तिरलब्धलाम इति ॥३॥ दीनशक्ति, शत्रुराजा तो अपने शनुका उच्छेद करनेमें असमर्थ होनेक कारण बलयुक्त नहीं होसकता, इसीलिये उसको औरस कोहे' शा नहीं हो सकती । अतएव उसकी पाणिको प्रहण करनेवाले विजिगीषु। यो शत्रु को कोई विशेष लाभ नहीं होता ॥३॥ शक्तिसाम्ये यो विपुलारम्भस्य पाणिं गृह्णाति सो ऽतिसंपत्ते ॥४॥ यदि शत्रु समान शक्तिके हो, तो जो भङ्ग आदि साग पदार्थ तथा युद्ध सम्बन्धी अन्य सब प्रकारकी सामग्रोस सम्पन हो (विपुलराम), उस- होके पाणिको जो ग्रहण करता है, यह विशेष लाभमें रहता है ॥ ४ ॥ विपुलारम्भो ह्यमित्रमुच्छिद्य पाणिग्राहमुच्छिन्द्यानाल्पारम्भः सक्तचक्र इति ॥५॥ क्योकि पिपुल युद्धयात्रा सम्बन्धी सामग्रीसे सम्पस हुआ २'शत्रु राजा, अपने शत्रुका उच्छद करके पाणिग्राहका भी उच्छेद कर सकता है। इसलिये ऐसे शत्रुको कभी बढ़ने न देना चाहिये। जिसके पास युद्धपात्रा सम्यन्धी कोई विशेष सामग्री नहीं है, अपनी बिखरी हुई सेनाको भभी इकट्ठा करने में ही लगा है, यह न अपने शत्रुका उच्छेद कर सकता है, और न उससे विजिगीपुको भय होना चाहिये। इसलिये ऐसे राजाके पाणिपर आश्मण फरना लाभदायक नहीं होता ॥५॥ आरम्भसाम्य यः सर्वसंदोहेन प्रयातस्य पाणि गृहाति सो 'तिसंधत्ते ॥६॥ यदि युद्धयाना सम्बन्धी सामग्री भी समानही हो तो उन रोजाआमसे [७ मधिल - -- कौटलीय अर्थशास्त्र ऐसे राजाके पारिणको ग्रहण करनेपर ही विशेष लाभ हो सकता है, जो अपने सम्पूर्ण सैन्यको लेकर शत्रुके साथ युद्ध करने के लिये चढ़गया हो ॥६॥ शून्यमूलो ह्यस्य सुकरो भवति नैकदेशवलप्रयातः कृतपाणि- 'प्रतिविधान इति ॥ ७ ॥ श्याँकि मूलस्थानमें रक्षक सेनाके न होनेसे, इसको वशम करना अत्यन्त सुकर है, किन्तु जो अपनी थोडीसी सेनाको साथ लेजाकर रोपको मूल स्थानकी रक्षाके लिये छोड देता है, उसके पाणि ग्रहण करनेमें टाम नहीं होता, क्योंकि वह पाणिप्राइका अच्छी तरह प्रतीकार कर सकता है ॥ ७॥ वलोपादानसाम्ये यश्चलामित्रं प्रयातस्य पाणि गृह्णाति सो तिसंधत्ते ॥८॥ चलामित्रं प्रयातो हि सुसेनावाप्तसिद्धिः पाणि- ग्राहमुच्छिन्द्यान्न स्थितामित्रं प्रयातः ॥९॥असी हि दुर्गति- हतः पाणिग्राहे च प्रतिनिवृत्तस्थितेनामित्रेणावगृह्यते ॥१०॥ यरायर सनाआका लजान चाल राजाओमसे भी उसहोका पाणि महण करने विशेष लाभ हो सकता है। निसन अपने दुर्ग रहित शत्रुर आक्रमण किया हो ॥ ८॥ क्याकि दुर्ग रहित शत्रुपर आक्रमण करनेवाला राजा, सहजमें हा उसे अपन अधान करक भाधिक बलवान् बन सकता है। और फिर यह पाणिमाहका भी उच्छेद कर सकता है । परन्तु दुगाँसे सम्पन रानाक ऊपर घवाई करनेपर ऐसा नहीं हो सकता ॥ ९ ॥ क्योंकि दुर्गाके द्वारा उसका अच्छी तरह प्रतीकार किया जासकता है। इसलिये ऐसे राजाके पाणिपर आक्रमण करने में कोई काम नहीं। प्रत्युत हानिकी ही सम्भावना को जासकती है। षयोंकि जप वह दुर्गसम्पन्न राजाके साथ अपना पश न चरनार खिसियाया हुभा परको ओर शापस लौटता है, तो पाटिरप्राहके सायही युद्ध करने के लिय सद्ध होजाता है। और ऐसी अवस्थामे पाणिग्राहको हानिहीं होती है, लाभ कुछ नहीं ॥1॥ तेन पूर्व व्याख्याताः ॥११॥ दुर्गसम्पद पर भाप्रमण करनेपालके पार्णिका प्रहण करनेचारेकी सरह, हीनसिके पाणिप्राहा, अपारम्भ (५ सूनदेखा) के पार्णिमादी, तथा कुछ सेना जानवाले के पाणिमाही राजाओकी अवस्था भी समझ लेनी चाहिये ॥११॥ : शनुसाम्ये यो धार्मिकाभियोगिनः पाणि गृह्णाति सो ऽति- संधत्ते ॥१२॥ धार्मिकाभियोगी हि खेपांच द्वेप्यो भवति ॥१३॥ अधार्मिकाभियोगी सप्रियः ।। १४॥
१३ अध्या०] पाइगुण्य (२९३) सर्वथा समानशात शत्रुओंमेंसे उसहीका पाणिग्राह होनेमें विशेष लाभ होता है, जिसने अपने किसी धर्मारमा शत्रुपर आक्रामण किया हुशा हो ॥ १२ ॥ क्योंकि ऐसा करनेपर अपने और पराये सभी उसके साथ द्वेप करने लगते है, ऐसी अवस्थामें पाणिग्राह, सरलतासेही उसे अपने वशमें कर सकता है॥ १३ ॥ परन्तु अधारमा शत्रुपर आक्रमण करनेवाला राणा सभीका प्रिय होजाता है, उसका अपने शत्रुपर जयलाभ करना निश्चित है, इसलिये ऐसे राजाके पाणिका ग्रहण करना लाभदायक नहीं होता ॥ १४ ॥ तेन मूलहरतादात्विककदयोभियोगिनां पाणिग्रहणं च्या- ख्यातम् ॥ १५॥ इससे मूलहर तादात्विक तथा कदयं राजाओपर आक्रमण करनेयालेक पाणिमहणका भी लाभालाम समझ लेना चाहिये । तात्पर्य यह है:-पितृ पैता- मह परम्परामात सम्पत्तिको अन्यायपूर्वक सानेपाले राजाका नाम 'मुलहर' है। समय र पर प्राप्त हुई सम्पत्तिको व्ययं व्यय करने वाला तादाविक' कहाता है। मृत्यों तथा अपने आपको पाधा पहुचाकर सम्पत्ति इकट्ठा करनेवाले राजाको 'कदर्य' कहते हैं। इस प्रकार मूलहर और तादाधिक राजाओंपर आक्रमण फरनेवालोमसे, मूलहरपर आक्रमण कर मेवालेके पार्णिको जो ग्रहण करता है, घही विशेष लाभमें रहता है। क्योंकि अर्थवष्ट परेहुए मूलहर रामाको उच्छेद फर, पह पागमाहका भी उच्छेद करसकता है । अतः पाणिग्राह यदि बीचमै ही विन डालदे, तो उसका अपनी रक्षा होजाना ही विशेष लाभ होता है। इसी तरह सादाधिक और कार्य राजाभापर आक्रमण करने वालों मेंसे कार्य पर भाप्रमण करयाले राजा के पारिणको जो दमाता है। यही लाभ रहता क्योंकि कंजूस राजा कभी नौकरोंकी भलाई नहीं करता । इस लिये उसका "सरलतासे उपउद करके, शत्रु, पाणिग्राहका भी उछेद, कर सकता है । अतः "उसके विजय निमडासना पिजिगीपुके लिये भस्यन्त आवश्यक है ॥ १५॥ मित्राभियोगिनोः पाणिग्रहणे त एव हेतवः ॥१६॥ मित्र- ममित्रं चाभियुञ्जानयोयों ऽमित्राभियोगिनः पाणिं गृहाति सो अतिसंधत्ते ।। १७ ।। मित्राभियोगी हि सुखनावाप्तसंधिः पार्णि- ग्राहमुच्छिन्द्यात् ॥ १८॥ मिन्न राजाभोंपर भाममण कानेवालोंके पाशिका महण करनीभी येही कारण समझ पाहिये, जोकि ये अतिसम्धिके कारण निर्देश दिये गये है १६॥ मित्र और शत्रुप भाक्रमण करनेवाले राजाभामसे जो मिनपर भाग- । -
(२९४)
कौटलीय अर्थशास्त्र [७ माध
मण करनेवाले राजाके पाणका प्रहण करता है, यह विशेष लाभमें रहता है
॥ १७ ॥ क्योंकि मित्रपर आममण करने वाला सहज ही सिद्धि प्राप्त कर
लेता है, और फिर यलयान् होकर पाणिमाहका भी उच्छेद कर सकता
है॥१८॥
सुकरो हि मित्रेण संधि मित्रेणेति ॥ १९ ॥
क्योकि मिग्रके साथ सन्धि होजाना पहुत सुकर है । शत्रुके साथ
सन्धि, कुछ कठिनतासे ही होसकती है, अत शनुपर भाक्रमण करनेवाला
राजा, सिद्धि लाभ न करता हुमा, पार्णिमाका कुछ भी नहीं बिगाद सकता
मित्रममित्रं चोद्धरतार्योऽमित्रोद्धारिणः पाणि गृह्णाति सो
अतिसंधते ॥२०॥ वृद्धमित्रो ह्यमित्रोद्धारी पाणिग्राहमुच्छिन्द्याने
तरः स्वपक्षोपघाती ॥ २१ ॥
मित्र और शत्रुका उद्धार (उन्मूलन-उच्छेद) करनेवाले राजाभॉम से
जो शत्रुका उद्धार करनेवाले राजाके पाष्णिका ग्रहण करता है, वही विशेपलाभ
में रहता है ॥ २० ॥ क्योंकि शत्रुका उद्धार करनेवाला राजा, स्वपक्ष या मित्र
के बदमागेपर अधिक बलवान हुभा २ पाणिग्राहका भी डरछेद करसकता है।
परन्तु दूसरा, मित्रकाही उद्धार करनेवारा राजा, अपनेही पक्षका पातक होनेके
कारण हीन हुआ २ कभीभी पाणिग्राहका उच्छेद नही करसकता, इसीलिये इस
फी औरसे तो कोई भय रखनाही नहीं चाहिये ॥२१॥
तयोरलब्धलाभापगमने यस्यामित्रो महतो लाभाद्वियुक्तः
क्षयव्ययाधिको वा स पाणिग्राहो ऽतिसंधत्ते ॥ २२ ॥
मिन और शत्रुका उद्धार करनेवाले राजाभाके कुछ विशेष लाभ प्राप्त
किये यिनाही लौट आनेपर, जिसका शत्रु बहे लाभसे रहित हो, तथा जिसके
पुरपाका क्षय और धनका भी पर्याप्त व्यय होगया हो, ऐसे शत्रुपर आक्रमण
किये हुए राजाका
रिंगमाह विशेष लाममें रहता है । क्योंकि यह नुको क्षीण
करके पाणिग्राहको भी हानि पहुंचानका यस करसकता हे ॥ २९॥
लब्धलाभापगमने यस्यामित्रो लाभेन शक्तथा हीनः स
पाणिग्राहो ऽतिमंधत्ते ॥ २३ ॥ यस्य वा यातव्यः शत्रुर्विग्रहाप-
कारसमर्थः
तथा विशेष लाभ प्राप्त करके ही लोटनेपर जिसका शत्रु लाभसे और
शाहिसे हान हो, ऐसे आक्रमणकारी रानाका पाणिमाह लाभमे रहता है।
सात् ॥ २४ ॥
-
१३ अध्या०]
पाइगुण्य
(२९५)
क्योंकि दूसरा, लाभ और शक्तिसे सम्पन्न शत्रुको वशमें न करसकनेके कारण
याताप
पाणिग्राहका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता ॥ २३ ॥ अथवा जिसका
(जिसके ऊपर प्राक्रमण किया जाय, ऐसा शत्रु), शत्रु विजिगीपु रूप शत्रु,
अर्थात् विजिगीषु) के साथ युद्ध करके, उसका अपकार करनेमें समर्थ हो, उसके
माणिको दयानवाला राजाभी विशेष लाभमें रहता है ॥ २४॥
पाणिग्राहयोरपि यः शक्यारम्भवलोपादानाधिकः स्थितशत्रु:-
पार्थस्थायी वा सो ऽतिसंधत्ते ॥ २५ ॥
दो पाणिग्राह राजाओंमेंस भी, जोकि सब गुणोंमें समान हैं, वहीं
पाणिग्राहयिशंप सभमे रहता है, जिसके पास सिद्ध होने योग्य कार्योको
प्रारम्भ करने के लिये, दूसरेकी अपेक्षा अधिक सेना एकत्रित हो, तथा जो स्थित
शनु अर्थात् दुर्ग आदिसे सम्पन्न शत्रु हो, अथवा जो यातयके समीप ही रहने
पालाको ।।२५॥
पार्श्वस्थायी हि यातव्याभिसारो मूलागाधकश्च भवति, मूला-
बाधक एव पश्चातस्थायी ॥ २६ ॥
पयोंकि समीप रहनेवाले (पाश्चस्थायी) को यही विशेष लाभ होता है,
कि पातम्यके
साथ
मिल सकता है, और विजिगीपुके मूलस्थानको बाधा पहुंचा
सकता है परन्तु दूर रहनेवाला विजिगीषुके मूलस्थानको किसीतरह भी
पाधा
नहीं पहुंचा सकता ॥ २६ ॥
पाणिग्राहास्त्रयो ज्ञेयाः शोश्रेष्टानिरोधकाः ।
सामन्तात्पृष्ठतो वर्गः प्रतिवेशौ च पार्श्वयोः ॥ २७ ।।
शत्रुके प्रत्येक व्यापार पा कार्यको रोकनेवाले, ये पाणिमाह तीन प्रकार
के होते हैं.-(1) आक्रमण करनेवाले राजाके देशके समीप रहनेवाले, (6)
पीछे अपात् व्यवहित देशमे रहनेवाले, (३) इधर उधर पार्धमागों में रहने
पाले॥२७॥
अरेनेतुश्च मध्यस्थो दुर्वलो ऽन्तर्धिरुच्यते ।
प्रतिघातो चलवतो दुर्गाटव्यपसारवान् ॥ २८ ॥
भाक्रमणकारी विजिगीषु और उसके मासुकै मध्यम होंगेगा दुल
राजा मताधि फडाता है। (यह माफ होने के कारण 'पाणिनाइ' नहीं हो
सकता । गतएव इसका पृयर ही निस्पण किया है) यह केवल, परवान्का
मुकायला होनेपर, दुर्ग भयमा भटवी (धने भगल) में भागकर टिपजाता
है। इसी लियेही इसका भन्वयं नाम 'अन्ताध' रखा गया है ॥ २८ ॥
(ও ঘি
-
(२०६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
1 मध्यमं त्वरिविजिगीपोर्लिप्समानयोर्मध्यमस्य पाणि गृह-
गोर्लन्धलाभापगमने यो मध्यमं मित्राद्वियोजयत्यमित्रं च मित्र-
भानोति सो ऽतिसंधत्ते ॥ २९ ॥
मध्यमको पशमें करने की इच्छा रखनेवाले शत्रु और विजिगीपुमसे
यही विशेष लाभमें रहता है, जो कि मपमके पाणिको ग्रहण करता
हुआ, वहाले कुछ लाभ प्रास करके भी, मध्यम राजाको उसको अपने
मिनसे वियुक्त कर देता है। तथा स्वय अपने शत्रुकोभी अपना मिग्र वना
लेता है॥ २९॥
संधेयश्च शत्रुरुपकुर्वाणो न मित्र मित्रभावादुत्क्रान्तम् ।।३०॥
तेनोदामीनलिप्सा व्याख्याता ॥ ३१ ॥
उपकार करने वाले शत्रुके सायमी सन्धि कर लेनी चाहिये । तया
मित्र भावसे रहित हुए २ भर्यात् अपकार करनेवाले मित्रकोभी छोडना चाहिये
॥३०॥ मध्यमको पशमें करनेकी तरह, उदासीनको परामें करनामी समझ
लेना चाहिये ॥३१॥
पाणिग्रहणाभियानयोस्तु मन्त्रयुद्धादम्युच्चयः ॥ ३२ ॥
व्यायामयुद्धे हि क्षयव्ययाभ्यामुभयोरद्धिः॥३३॥ जित्त्वापि हि
क्षीणदण्डकोशः पराजितो भवतीत्याचार्याः ॥ ३४ ॥
पाणिमाह और और आक्रमणकारी इन दोनों राजाओमेसे वही अधिक
उनत होसकता है, जो मन्प्रयुदसे शयुका नाश करता है । (साधारणतया युद्ध
दो प्रकारका होता है-) व्यायामयुद्ध, (२) मन्त्रयुद्ध । युद्धभूमिमें प्रवेश
करके शस्त्रान आदिके प्रयोगोंके द्वारा शत्रुका नाश करदेना 'व्यायामयुद्ध'
कहाता है । युद्धभूमिमें न जाफरही सनी, रसद भोर तीक्ष्ण भादि गूदपुरपाके
द्वारा शत्रुका नाश करदेना 'मन्त्रयुद्ध' कहाता है। इन दोनों से मन्त्रयुद्धका
अनुष्टान करनेसे ही वृद्धि हो सकती है ॥ ३२ ॥ क्योंकि व्यायामयुद्धके करने
पर मनुष्योंका क्षय और धनका अत्यधिक म्यय होनेके कारण, दोनों वाही
हानि होती हे ॥ ३ ॥ तथा युद्ध में विजय प्राप्त होजानेपर भी सेना और कोश-
के क्षीण होजानेके कारण, यह राजा प्राय. पराजितसाही होजाता है। यह
प्राचीन आचापाका सिद्धान्त ॥ ३४ ॥
नेति कौटल्यः ।। ३५ ।। सुमहतापि आयव्ययेन शत्रुविनाशो
इम्पुपगन्तव्यः ॥ ३६॥
-- T - १३ अध्या०1 पाइगुण्य १(२९) परन्तु फौटल्य इसको नहीं मानता ॥ ३५ ॥ यह कहता है कि, चाहे कितनाही मनुष्योंका भय और धनका व्यय होजाय, शत्रुका नाश करनाही हर हालसमें अभिमत होना चाहिये ॥ ३६ ॥ तुल्ये आयव्यये यः पुरस्ताद्दष्यवलं घातयित्वा निःशल्यः पश्चादश्यवलो युध्येत सो ऽतिसंधत्ते ॥ ३७॥ - मनुष्य तथा धनकी यरायर हानि होनेपर जो राजा पहिले अपने दृष्य- बल (बह सेना, जो अपने राजाके साथ दोह करनेवाली हो, तभा वशमें म रहती हा) को मरवाकर; निष्कण्टक होकर, पाछेस अपने वशमें रहनेपाली सेनाको लेकर युद्ध करता है, वहीं विशेष लाभमें रहता है ।। ३७ ॥ द्वयोरपि पुरस्तादृष्यचलघातिनोर्यो बहुलतरं शक्तिमत्तरमत्य- न्तदृष्यं च घातयेत्सो ऽतिसंधने ॥३८॥ तेनामित्राटवीवलपातो व्याख्यातः॥३९॥ यदि दोनों राजाही पहिले अपने दूप्ययलको ही मरया, तो उनमेंसे पही विशेप लाभमें रहता है, जो सख्यामें अधिक, शक्तिशाली, अत्यन्तदूप्य. पळको पहिले मरवाता है ॥ ३८ ॥ दूष्यबलकी तरह शगुमल और अरवीग्रलका मरवाना भी समझना चाहिये ॥ ३२॥ पाणिग्राहो अभियोक्ता वा यातव्यो वा यदा भवेत् । विजिगीषुस्तदा तत्रं नैवमेतत्समाचरेत् ॥ ४० ॥ विजिगीषु जय पाणिग्राह, अभियोका (आक्रमणकारी) अथवा पातव्य (जिसपर भाफमण कियाजाय) हो, उस भयस्याम उसे यह निम्न निर्दिष्ट नेतृत्व का कार्य करना चाहिये ॥१०॥ पाणिग्राहो भवेनेता शत्रोमित्राभियोगिनः । विग्राह्य पूर्वमानन्दं पाणिग्राहाभिसारिणा ॥४१॥ विजिगीषुको उचित है कि अपन (विजिगोमुझे) मित्रके अपर माक मण करनेवाले शत्रुके पश्चात् स्थित मित्रको (भ क्रन्द) पहिले अपने मित्रकी सेनाके साथ पुद्ध कराक, फिर स्वप उसक पाष्णिका महण करे ॥४॥ आफन्दनाभियुञ्जानः पाणिग्राहं निवारयेत् । तथाक्रन्दाभेसारण पाणिग्राहाभिसारिणम् ।। ४२ ।। यदि विजिगीषु स्वयही भमियोक्ता मयां आक्रमण करनेवाला हो, तो यह अपने पाणिमाहको मिनके द्वारा निधारण करे । सया पाणिमाको समाका - f- - (२८) कौटलीय अर्थशास्त्र अधिक मुकायला मिग्रकी सेनाके द्वाराही र ॥ ४२ ॥ अरिमित्रेण मित्रं च पुरस्तादयघट्टयेत् । मित्रमित्रमरेश्चापि मित्रमित्रेण वारयेत् ॥ ४३ ॥ इस प्रकार अपने पीछेको ओरका प्रबन्ध करके, सामनेकी भोरसे यदि भनुका मित्र मुकारलेमें भवि, तो उससे अपने मित्रको भिदा देवे । यदि शत्रुके मित्रका मित्र भाव, तो उसका निवारण अपने मित्रके मिनके द्वारा करे ॥१३॥ मित्रेण ग्राहयेत्पार्णिमभियुक्तो ऽभियोगिनः । मित्रमित्रेण चाक्रन्द पाणिग्राहं निवारयेत् ॥ ४४ ।। यदि विजिगीषु स्वय अभियुक्त हो अर्थात् उसके उपरही कोई चदाई करनवाला हो, तो भाक्रमणकारीके पाष्णिको मिनके द्वारा ग्रहण करावे, अर्यात् शिगी एका मिन, भाशमणकारीका पाणिग्राह यनजाये। यदि आफमणका रीका कोई मिन पाप्णिाहका मुकाबरा करनेके लिये आजाये, तो मिनके मित्रके द्वारा अयांत पाणिग्राहक मित्रके द्वारा उसका निराकरण करे ॥ १४ ॥ एवं मण्डलमात्मार्थ विजिगीपुनिवेशयेत् । पृष्ठतश्च पुरस्ताच मित्रप्रतिसंपदा ॥४५॥ इस प्रकार विजिगीषु, मित्ररूप प्रकृति (अर्थशास्त्र प्रसिद्ध सात प्रकृति यामस मित्रभो अन्यतम प्रकृति है) की पूर्वोक्त गुणसमा से युक्त राजमण्टर को अपनी सहायताक लिये भागे और पीछे ठीक सौरपर स्थापित करे ॥४॥ कृत् च मण्डले नित्यं दूतान्गूढांश्च वासयेत् । मित्रभूतः सपत्नानां हत्वा हत्वा च संवृतः॥४६॥' अपनी सहायता के लिये स्थापित किये हुए इस सम्पूर्ण राजमण्डलमें, दूतों और गुसरीका सदाही प्रपन्ध रखे। तथा शत्रुओंके साथ ऊपरसे मित्रता रखकर, उनै एक एकको गारदेवे, और अपन भाप ऊपरसे उदासीनसा बनारहे, अर्थात् इस प्रकार के अपने आन्तरिक भावोंको प्रकर न होने ॥ १६ ॥ असंवृतस कार्याणि प्राप्तान्यपि विशेषत । निःसंशयं विपद्यन्ते भिन्नः प्लप इबोदधौ ॥४७॥ इति पाइगुण्ये ततमे ऽधिकरणे पाणिमाहचिन्ता प्रयोदशी पाय ॥१३॥ "आदित कादशशतं ॥1॥ जो रामा अपने भान्तरिक विचारों या मन्त्रणाओंको लिपाकर नहीं एजसकता, सके THE सस्थाको प्राप्त हुए २ भी कार्य निस्सन्देह नष्ट हो +:
१४ अध्या]. पाइगुग्य जाते हैं। समुद्र में नौकाके फरजानेपर पुरुषकी जो अवस्था होती है, ठीक यह अवस्था मन्त्रक फूट जागेपर राजाको होजाती है। इसलिये विजिगीषुको उचित है कि यह सदा अपने मन्त्रको सुरक्षित रखे ॥ ७ ॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरण में तेरहवां अध्याय समाप्त । - चौदहवां अध्याय १२८ प्रकण हीनशक्ति-पूरण । सामवायिकरेवमभियुक्तो विजिगीषुयस्तेपा प्रधानस्तं ब्रूयात् ॥१॥ त्वया में संधिः ॥२॥ यदि बहुतसे राजा मिलकर, विजिगीषुपर आक्रमण करद, ता विजि- गापु अपनी रक्षा भोर वृद्धिका विचार करके, उन इक हुए राजामाक मुखिया राजाको इस प्रकार कहे, कि ॥ १ ॥ तुम्हारे साथ मेरी सन्धि रहा, (इतना पात केवल उसा समय कही जासकती है, जबकि वह भुपिया धमारमा हो, यदि लोभी हो, तो कहे कि -) ॥२॥ इदं हिरण्यम् ॥ ६ ॥ अहं च मित्रम् ।। ४ ॥ द्विगुणा ते घृद्धिः ॥५॥ नाई स्यात्मक्षयेण मित्रमुखानमित्रान्वर्धयितुम् ॥६॥ एते हि वृद्धास्त्वामेय परिभाविष्यन्तीति ॥ ७॥ यह हिरण्य है ॥ ३ ॥ और मै तुम्हारा मिनहू ॥ ४ ॥ तुम्हारा दुगुनी वृद्धि होगई है, क्योंकि एक तो मुझ भाभियोचास तुम्ह पर्याप्त धन मिल गया, और भापत्ति में सहायता देनेवाला में एक मित्र मिल्गरा) ॥ ५ ॥ इस लिये अपने जन भौर पनका नाश करके, ऊपरले मिघ्रता दिखाने पाले इन शत्रुआको यठाना भापक रिय युक्त नहीं है ॥ ६ ॥ क्योकि ये वृद्धिको प्रास होकर सुमकाही दबायेंगे । अथात् तुम्हारी सहायतासे पहिले मेरा उरलंद करके, फिर तुम्हारा तिरस्कार करेंगे। इसरिये तुम्हें इनका साथ नहीं देना चाहिये ॥ ७॥ भेदं या ब्रूयात् ॥ ८ ॥ अनपकारो यथाहमेतैः संभुयाभियु- क्तस्तथा त्यामप्यते संहितबलाः स्वस्था व्यसने वाभियोक्ष्यन्ते ॥९॥ वलं हि चित्तं विकरोति ॥१०॥ तदपां विधातयति ॥११॥ भयया हममें आपस में ही भेद हल्वा देवे,'(पह उसी समय करना [७ अधिक . (३००) फौदलीय अर्थशास्त्र चाहिने, जव कि वह मुखिया पहिली यातको स्वीकार में करें)। भेद दलवाने के लिये कहे कि ॥ ८॥ जिस प्रकार निरपराध मुझपर इन सपने मिरकर आक- मण किया है, इसीपकार ये सब इकट्ठे होकर अपनी उन्नत भवस्याम अपया तुम्हारे भापद्मख होनेपर अवश्यही तुमपर आक्रमण करेंगे ॥९॥क्योंकि एकत्रित हुभा २ थल अवश्यही चित्तको विकृत भयात् गर्वित पनादेता है ॥१०॥ इस लिये आपको उचित है, कि भाप अभीसे इनके यलको वितभिव करदें ॥१॥ भिन्नेषु प्रधानमुपगृह्य हीनेषु विक्रमयेत् ॥ १२ ॥ हीनान- नुग्राह्य वा प्रथाने ।। १३ ॥ यथा या श्रेयोऽभिमन्यते तथा, रं या पराहयित्वा विसंवादयेत् ॥.१४.॥ इसप्रकार आपसमें उनका भेद पदजाने पर, प्रधानकी सहायता लेकर भन्य सब हीन राजाओपर भाक्रमण करदेवे ॥ १२ ॥ अथवा उपयुक्त प्रकारसे होनॉम साम आदिका प्रयोग करके, उनकी सहायता लेकर प्रधान राजापर भाममण फरदेवे ॥ १३ ॥ अथवा जिस प्रकार अनपा कल्याण समझे, उसीप्र. कार कार्य को । अथवा दूसरोके साथ एक एकका विरोध कराके आपसमेही भिमाद । (यह कार्य उसी समर किया जाता है, जब विजिगोपु स्वयं युद्ध करना न चाहता हो या न कर सकता हो) ॥१४॥ फलभूयस्त्वेन वा प्रधानमुपजाप्य संधिं कारयेत् ॥ १५ ॥ अथोभयवेतनाः फलभूयस्त्वं दर्शयन्तः सामवायिकानतिसंहिताः स्थ इत्युपर्ययुः ॥ १६ ॥ अथवा पहुतसा धन भादि देने की प्रतिज्ञा करके, प्रधान राजाको उधरसे तोड़कर, उसीफे द्वारा अन्य राजाओके साथ सन्धि करसैये ॥१५॥ इसके अनन्तर उभयवेतन गुप्त पुरुष दोनों ओरसे वेतन लेनेयाले, अर्थात् जो गुदपु- रुष भन्दरसे तो विजिगीपुके आदमी हो, परन्तु ऊपरसे अपने भापको, पूर्णतया दूसरोंका धवल , घे) उन सामवापिक (एकत्रित-इफट) राजाओंको, प्रधान के लिये मारी रकम मिलनेकी दातको कहते हुए, 'तुम सबको उसने ठगलिया है' इसप्रकार भड़कायें ॥१६॥ दुष्टेषु संधि दूपयेत् ॥ १७ ॥ अथोभयचेतना भूयो भेदभेषां कुर्युरेवं तदस्माभिर्दर्शितमिति ॥ १८ ।। भिन्नपन्यतमोपग्रहेण वा चष्टेत॥ १९॥ बवे सब राजा, प्रधानसे विरद होजावे, तब यह प्रधान के साथ की. हुई सन्धिको तो देवे । 10" इसके अनन्तर फिर उभयवेतन गृहपुरुष, १४ अध्या०] पाइगुण्य 1082) (१३०१) इनका आपसमे भेद डालें, और कहें कि देखो, हमने पहिलेही कहा था कि इस प्रधान राजाको भारी रकम मिलने वाली है, अब उसीमे कुछ गडबड हो. जानेके कारण, इसने विजिगीषुके साथ कोहुई सन्धिको तोड़दिया है। पहिले कही हुई हमारी बात, इसको इस कार्यवाहीसे घिरकुल स्पष्ट होगई है ॥१८॥ इन उपायोसे भापसमें उनके भिन्न होजानेपर, दोनोमस किसी एकका सहारा लेकर, दूसरेके साथ युद्ध प्रारम्भ करदे ॥ १९॥ प्रधानाभावे सामायिकानामुन्साहयितारं स्थिरकर्माणमनु- रक्तप्रकृति लोभायाद्वा संघातमुपागतं विजिगीपोर्भातं राज्य- प्रतिसंवन्धं मित्रं चलामित्रं वा पूर्वानुत्तराभावे साधयेत् ।। २०॥ यदि उन सामयायिक राजाओका काई एक प्रधान राजा न हो, तो उनमेस जो सयको उत्साहित करनेवाला, स्थिरका (कार्यको परिणामतक पहुंचाने का साहस रखनेवाला-शका उच्छेद किये बिना पाई न हटनेचारा), अनुरक्त प्रकृति (जिसके अमात्य, तथा, प्रजाजन जिसमे अनुराग रखते हो), लोमस राजा ओके मघमें आकर मिला हुभा, अथवा भयस उनमें आकर मिला हुभा, विजि गीपुसे डरा हुआ, अपने राज्य के साथ कुर सम्पन्ध रसनेवाला, अपनाही मित्र (जो कि सामयायिक राजाओके साथ जाकर मिलगया हा), और चलामिन अर्थात् दुर्ग आदि रहित शत्रु हो, इनको ही अपने वशमें करे । परन्तु इन नौओं प्रकारके राजाभागस, अगरके न होनेपरही पहिरेको पशम करनेका यस करे। जैस-उत्साहपिता और स्थिरकमी इन दोनॉमस, स्थिरकमाके न हानेपाही उत्साहयिताको धशमें कर, अन्यथा तो विरामीको ही पशमै कानका यस करे। इसीतरह आगे भी समझना चाहिये ॥ २० ॥ उत्साहयितारमात्मनिसर्गेण स्थिरकर्माण सान्त्वप्रणिपाते- नानुरक्तप्रकृति कन्यादानयापनाभ्यां लुब्धमंशद्वैगुण्येन भीतमेभ्यः कोशदण्डानुग्रहेण खतो भीतं विश्वासयेत् प्रतिभूप्रदानेन राज्य- प्रतिसंबन्धमेकीभावोपगमनेन मित्रमुभयतः प्रियहिताभ्यामुपकार- त्यागेन वा चलामिनममधुतमनपकारोपकाराभ्याम् ॥ २१॥ विजिगोपुको उचित है कि यह उरगाह पिताको अमाश्य और पुग्ना- दिक सहित सुम्हारे अधीन है, तुम अपनी इच्छानुसार जिसकायपर थाहो मुझे लगासकसे हो, परन्तु मरा उछेद न करों' इसमकार भास्मसमपर्ण फरक नसमें करे । भिरकर्माको 'आपने मुशे जीतरिया है, आप सय गुणोंमें उपष्ट है' इस प्रकार कहकर मणिपात प्रधाए उसके सामने अपना सिर झुकाकर वार्मे करे ।
1 (३०२) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक अनुरक्तप्रकृति राजाको कन्या ले या देकर वशम करे । रोमीराजाको दूना हिस्सा देकर परामें करे । सामवायिक राजाभास हरे हुएको सेना और धनकी सहायता देकर पशमें करे । अपने आपसे डरे हुएको, वीचमै किसी अन्य राजाको साक्षी अनाकर उसे इसतरहका विश्वास कराकर कि मैं तुम्हारा कोई अपकार नहीं करूँगा, अपने अनुकूल पनाचे । अपने राज्यसै सम्पन्ध रखनेवाले राजाको 'मैं और तुम एकही हैं, मेरे पराजयमें तुम्हारा भी पराजय है, दूसरोंके साथ मिलकर मुझपर आक्रमण करना तुम्हारे लिये युक्त नहीं' इसप्रकार एकताका भाव दिखा. कर अपने वशमं कर, मिनराजाको, प्रिय और हितवचनी से तथा जो कर उसस अमा तक लिया जाता था उसे छोड दन से अपने वशमें करे । और अस्थिर शत्रु राजाका उसका उपकार काने और अपकार न करने की प्रतिज्ञासे विश्वस्त बनाकर अनुकूल बनावे ॥२१॥ यो वा यथायोगं भजेत तं तथा साधयेत् ॥ २२ ॥ साम- दानभेददण्डैवी यथापत्सु व्याख्यास्यामः ॥ २३ ॥ अथवा इन सामवायिक राजाओमसे, जो भी जिस प्रकारस भेदको प्राप्त होसके, उसा तरह उसे वश करनका यत्न कियाजाय ॥ २२ ॥ अथवा साम, दान, भेद और एण्ड इन सपहा उपायोंमे उनको अपने अधीन करनेका यत्र करे, जैसा कि हम आपत् प्रकरणम कथन करेंगे। (दखो-९ अधि०, ५ अध्याय)॥ २६॥ व्यसनोपपातत्वरितो वा कोशदण्डाभ्यां देशे काले कार्ये चावधृतं संधिमुपेयात् ॥ २४ ॥ कृतसंधिहीनमात्मानं प्रतिकुति ॥ २५॥ 1 अथवा विजिगीषु अपने ऊपर आई हुई विपत्तिको शीघ्र ही नष्ट करने की इच्छा रखती हुमा, सामवार्षिक राजाओं के साथ, सेना आर धनके द्वारा अमुक देश, काल तथा कार्यके उपस्थित होनेगर पासर सहायताके लिये शपथ भादि करके निश्चित सम्धि करलेवे ॥ २४ ॥ आर इस प्रकार सन्धि करनेके अनन्तर अपनी क्षीणशक्तिको पूर्ण उन्नत बनानेका यम करता रहे ॥ २५ ॥ पक्षे हीनो बन्धुमित्रपक्षं कुर्वीत ॥ २६ ॥ दुर्गमपिपा वा ।२७ ॥ दुर्गमित्रपतिम्तब्धो हि स्वेषां परेषां च पूज्यो भवति ॥ २८ ॥ भान पक्ष भयो मित्रसे रहित पिनिगीपु, बन्धु और मित्ररूप पक्षको अण्डी सरह पनावे । अर्थात् महातक होसके, राजाभाको अपना मित्र मनाचे १४ अध्या०] पाइगुण्य (३०३) ॥ २६ ॥ अथवा शत्रुओं से अभय दुगं बनवा ॥ २७ ॥ क्योंकि इस प्रकार दुर्ग और मिनासे युक्त हुभा २ विजिगीषु, अपने और पराम सयहाका पूज्य होजाता है। अर्थात् फिर उसके विरोध सहसा कोईभी शत्रु खदा नहीं हो सकता ॥२८॥ मन्त्रशक्तिहीनः प्राज्ञपुरुषोपचयं विद्यावृद्धसंयोगं धा कुर्भात ॥ २९ ॥ तथा हि सद्याश्रेयः प्राप्नोति ॥ ३० ॥५॥ मनशक्ति अर्थात् युद्धियलसे हीन राजा, बुद्धिमान् पुरुषोंका समह और विद्या गृद्ध अनुभवी पुग्पाकै साथ सगति करे ॥ २९ ॥ इस प्रकार करनेसे राजा, शीमही कल्याणको प्राप्त होता है ॥ ३०॥ प्रभावहीनः प्रकृतियोगक्षेमसिद्धौ यतेत ॥ ३१ ॥ जनपदः सर्वकर्मणां योनिः ॥ ३२ ॥ तत प्रभावः ॥ ३३ ॥ तस्य स्था- नमात्मनश्च आपदि दुर्गम् ॥ ३४ ॥ प्रभाव अर्थात् प्रभुशक्तिसे हीन राजा, अमास्य आदि प्रकृति अथवा मजाओंके योग क्षेमको सिद्ध करनेमें महान यलकरे ॥ ३ ॥ क्योंकि जनपद सयही कार्योका मूलकारण है, उसहीसे कोश और सेनाकी उत्पत्ति होसकती है और दुरीका भी निर्माण किया जासकता हे ॥ ३२ ॥ तदनन्तर सय प्रभाव भी होसकता है ॥३३॥ उस प्रभावका मूल निवासस्थान दुर्गही हे, और आप- तिकालमें, दुर्गके द्वारा अपनीभी रक्षा होसकती है ॥ ३५ ॥ सेतुबन्ध. सस्यानां योनिः ॥ ३५॥ नित्यानुपक्तो हि वर्षगुणलाभः सतुवापेषु ॥ ३६ ॥ सेतुबन्ध (बढे २ बाध लगाकर बनाये हुए जल शय), अन आदिकी उत्पत्तिका प्रधान कारण है ॥३५॥ क्योंकि जा भन्न आदि, वृष्टिके द्वारा हमें कभीर माप्त होसकते हैं, घे इन जलाशयोंके समीप बोई हुई भूमिमें सदाही प्राप्त होते रहते हैं । अर्थात् सेतुबन्धोंके द्वारा प्रत्येक ऋतु, भन आदि पदार्थ प्राप्त किये जासकते हैं ॥३६॥ वणिक्पथः परातिसंधानस्य योनिः ॥ ३७ ॥ वणिक्पथेन हि दण्डगूदपुरुषातिनयनं शस्त्रावरणयानवाहन यश्च क्रियते॥३८॥ प्रवेशो निर्नयनं च ॥ ३९ ॥ म्यापारी मार्ग शभाको धोखा देने का प्रधान कारण हैं ॥ ३७॥ क्यों कि सेना और तीक्ष्ण, रसद भादि गूढ पुरपाको गा देशमें पहुचाना, तथा ।
[७ अधिक - - (३०४) कौटलीय अर्थशास्त्र र तरह के इधियार करय, सवारी और घोड़े आदि वस्तुओंको प्रविश्य व्यवहार सय व्यापारी मागाके द्वौरीही किया जाता है - २०॥ तथा दूसरे देशको यस्तुओको अपने देशमें लाना और अपने देशकी पत्तुभाको दुसरे देशमें भेजना भी इन्ही मागोंके द्वारा होता है ॥ ३९ सनिः संग्रामोपकरणानां योनिः ॥ ४० ॥ द्रव्यवनं दुर्ग- कर्मणाम् ॥ ४१ ॥ यानरथयोश्च ॥ ४२ ॥ - सनामके प्रत्येक उपकरणों (हथियार भादि साधनों) का प्रधामकारण सानही है ॥ ४० ॥ लकड़ियाँका जगल, दुर्गों और रानमासाद भादि कार्योका प्रधान कारण है ॥४१॥ भार रथ तथा इसी तरहकी अन्य सवारियांका भी यही कारण होता है ॥ १२॥ हात्तिननं हस्तिनाम् ॥४३॥ गवाश्वरथोष्याणां च प्रजा ॥ ४४ ॥ तेषामलामे बन्धुमित्रकुलेभ्यः समार्जनम् ॥ ४५ ॥ हाधियोका जगल, हाथियोंकी उत्पत्तिका प्रधान कारण है ॥३॥ और हाथी, घोरे, गधे तथा उरोंको उत्पत्तिका कारण मज अयात् गोशाला है। (यद्यपि 'प्रज' शब्दका अर्थ गाठ या गोशाला है, परन्तु यहापर यह शब्द सय हो पालतू पशुओके रक्षा स्थान के लिये प्रयुक्त किया गया है) ॥४४॥ पदि ये उपयुक्त सबहा पदार्थ अपने यहां नहीं, मो अपने बन्धु और मित्रोंके पुलोंसे इनका संग्रह करना चाहिए ॥ ४५ ॥ उत्साहहीनः श्रेणीप्रवीरपुरुषाणां चोरगणाटविकम्लेच्छजातीनां परापकारिणां गूढपुरुषाणां च यथालाभमुपचयं कुर्वीत ॥ ४६ ।। परमित्रप्रतीकारमारलीयसं चा परेपु प्रयुञ्जीत ॥४७॥ उत्साह हान राजा, अपनी उत्साह शक्तिको पूरा करनेके लिये श्रेणी पुरपी (देखो, अधि० ९ अध्याय २), शूरवीर पुरुषों, तथा भन्नुओका अपकार करने में कठियद हुए २ घोरों, आरविको भौर म्लेर जातिके पुरुषों, एवं गूढ पुरपाका अपने लामके अनुसार सरडी सरह सग्रह करसेच ॥ ४६॥ शत्रु ओका उपासे यनावटी मित्र बनकर उनका प्रकार करता रहे। अधया पाय- लोपस अधिकरणमें (धारहयां भधिकरण) पत्ताये हुए प्रतीकारोंका शत्रुापर प्रयोग करे ॥ १७ ॥ एवं पक्षण मन्त्रेण द्रव्येण च यलेन च । संपन्न प्रतिनिर्गन्छेत्परावग्रहमात्मनः ॥४८॥ इति पाद्गुष्प सप्तमे ऽधिकरणे हानशकिरण चतुर्दशोऽध्याय ॥११॥ आदितो द्वादशशतः ॥१३ १५ अध्या०] पाइगुण्य । इस प्रकार बन्धु और मिश्रा पक्ष, विधायद शादि पुरषांके सगसि रूप मन्त्रसे, दुर्ग सेतुबन्ध आदिके द्वारा उत्पन्न हुए २ गुग्यसे, और श्रेणी आदि बलसे, अपनी शक्तिको पूर्ण करता हुआ विजिगीषु सदा मनुका. प्रतीकार करता रहे ॥ १८॥ पागुण्य सप्तम अधिकरण चौदहया अध्याय साप्त । . पन्द्रहवा अध्याय ११९-१२० प्रकरण प्रबल शत्रके साथ विरोध करके दुर्ग 'प्रवेशके कारण, और विजित शत्रका व्यवहार दुर्वलो राजा बलवताभियुक्तः तद्विशिष्टयलमाश्रयेत यमितरों मन्त्रशकया नातिसंदध्यात् ॥ १ ॥ यदि कोई गलयान राजा, दुल राजार भागमण करे, तो वह आफ मणकारी राजासे भा आर अधिक बलशाली किसी राजाका आधयललेय जिसको कि, वह आक्रमणकारी राजाभी, मन्त्र शक्तिप किसी तरहकाभी भोज़ा न देसके ॥ ॥ तुल्यमन्नशक्तीनामायत्तसंपदो वृद्धसंयोगाद्वा विशेषः ॥२॥ यदि माधय लेनेके योग्य, परायर सैनिक शक्ति भौर मन्त्रशक्ति वाले अनके राजा हो, सो उनमसे उसही का आश्रय लय, जिसके अमात्य आदि अत्यन्त बुद्धिमान् हो । यदि इस तरह के भी बहुतले राजा आश्रय लेनके योग्य मिल जाय तो उनमसे उसहीका भाश्रय लेव, जो राजा, अत्यन्त अनुमवी विधासे युक्त होवे ॥२॥ विशिष्टवलामारे समवस्तुल्यनलसर्गि पलपतः संभूय तिष्ठेद्यावन मन्त्रप्रभावशक्तिभ्यामतिमदध्यात् ॥ ३॥ याद आक्रमणकारी राजास विशप शक्तिशाली कोई राणा माश्रय रेने के लिये न मिले, तो अपन समानशाक्त वाल अपवा अपनो मनाक यराबाही सना रखन वाल पहुतस राजाक साथ मिलकर, श्वल सका उस समय तक मुकायका करे, जप सककि यह ( अभियाका प्रबल शत्रु), मिले हुए राजाना को मन्त्र तथा प्रभाव पाक्ति द्वारा भेद हारकर पृथक् म करदे १५ प +7 . . (३०६) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधि० तुल्यमन्त्रप्रभावशक्तीनां विपुलोरम्मतो विशेषः ॥ ४ ॥ यदि इस प्रकारके राजानी आश्रय लेने के योग्य, बहुतसे मिल जायें, तो उनमेंसे विपुलारम्भ राजाही विशेप होता है । अथात् उन सबममे विपुलारम्भ राजाकाही भाभय लेना चाहिये । (जिस राजाके पास अब तथा अन्य सब युद्ध सम्बन्धी सामग्रो बहुत अधिक तादादमें विद्यमान हो, वह राजा 'विपुलारम्भ' कहाता है॥१॥ समबलाभावे हीनवल. शुचिभिरुत्साहिमिः प्रत्यनीफभूतै- बलवतः संभूय तिष्ठेद्यावन्न मन्त्रप्रभावोत्साहशक्तिभिरतिसंद- ध्याद ।।५।। पदि कोई समशक्ति राजाभी आश्रयके लिये न मिले, तो पविन हृदय, उत्साही बलवान शत्रुके अत्यन्त विरोधी, बहुतसे होनशक्ति राजाओं के साथ मिलकरही उस समय तक उस प्रथल शभुका मुकाबला करे, जब तक कि यह, अपनी सहायता करने वाले इन राजाभाम, मन्य अमाय तथा उत्साह शक्तिके द्वारा भेद डालकर अपनेसे पृथक् न करदे ॥५॥ तुल्योत्साहशक्तीनां स्वयुद्धभूमिलाभाद्विशेषः॥ ६ ॥ तुल्य- भृमीनां स्वयुद्धकाललाभाद्विशेषः ॥ ७ ॥ पदि इस प्रकारकेभी बहुतसे राजा आधयके योग्य मिलें, तो उनमेसे वही विशेष है, जिसके पास युद्ध के योग्य अपनी भूमि हो । अर्थात् जिसके पास अपनाही युद्धके योग्य देश मिल सके, उसी राजाका आथय लेलेचे ॥ ६॥ यदि इस प्रकार युद्ध योग्य भूमिभी अनेक राजाओंके पास मिलती हो, तो उनसे उसहीका भाश्रय लेने, जिसके सहारे पर अपने अनुकूल युद्ध के योग्य समयभी मिल सके।७॥ तुल्यदेशकालानां युग्यशस्त्रावरणतो विशपः ॥८॥ पदि देश और काल दोनॉही चीज़ अनेक राजाओंके पास मिल सकती दो, तो उनमसे उसी राजाका आश्रय लेवे जिसके पास बैल, घोडे, ऊंट भादि सवारीके जानवर, हर तरहके हथियार और कंवर भादि अधिक संख्या में हों। अधात् उपयुक्त युद्ध साममो जिसके पास अधिकहो वही सबमें विशेष है,उसी का आश्रय लेखे ॥८॥ सहायाभावे दुर्गमाश्रयेत पत्रामित्रः प्रभूतसैन्योऽपि भक्त- यवसैन्धनोदकोपरोधं न कुर्यात् ॥ ९॥ स्वयं च आयव्ययाभ्यां पुज्येत् ।। १० ।। 1 ।
१५ अध्या] पाइगुण्य
(३०७)
, यदि कोईभी सहायता करनेवाला न मिले, तो दुर्गका आश्रय लेवे,
जहांपर शत्रु, अत्यधिक सेनासे युक्त हुआ, २ भी, अपने लिये अपेक्षित,
भक्ष्यपदार्थ, और पशुओके गाने पदार्थ (यवस), इंधन और जल आदिकी
रुकावट किसी तरहभी न करसके ॥ ९ ॥ और स्वयं ही शत्रु, मनुष्याक नाश
तथा धनके व्ययसे युक्त होजाय । भयोत् शत्रुके जनधनका जहां अच्छी तरह
सफाया होता रहे ॥ १०॥
तुल्यदुर्गाणां निचयापसारतों विशेपः ॥ ११ ॥ निचया,
पसारसंपनं हि मनुष्यदुमिच्छेदिति कोटल्यः ॥ १२ ॥
* यदि उपयुक्त प्रकारके पहुतसे दुर्ग आश्रयके योग्य मिलते हो, तो उन
मेसे वही दुर्ग विशेष है, जहां तेल नमक आदि नित्य उपयोगको वस्तुओंका
अच्छा संघयहो तथा अवसर आनेपर जहांसे निकल जानेका मार्गभी ठीक हो
।। १५ । क्योंकि आचार्य फाटल्यका मत है कि ऐसाहो दुर्ग मनुष्योंके भावयफे
योग्य होसकता है, जोकि निचय (तेल, नमक आदि नैत्यिक सामी) और
अपसार (निकलनेका मार्ग) से सम्पन्न हो । आश्रयके लिये राजा सदा ऐसे ही
दुर्गकी इच्छा करे ॥ १२॥
तदभिः कारणैराश्रयेत ॥ १३ ॥
इन निम्नलिखित कारणोंमसे कोई एक कारण होने पर दुर्गका आश्रय
लेवे । (इस अध्यायके ३० वें सूबतक इन्हीं कार या प्रयोजनोंका निरूपण
किया गया है, इनमॅसे कोईसी एक यात होने पर, राजा दुर्गका भाश्रय रेलेवे)
॥ १३॥
पाणिग्राहमासारं मध्यममुदासीनं वा प्रतिपादयिष्यामि ॥१४॥
यदि विजिगीषु यह समझे, कि में पारिशमाह, मित्रवल, मध्यम अश्या
उदासीन राजाको अपने शाके मुकाबरे में युद्ध करनके लिये खड़ा करसकूँगा,
तो दुर्गका आश्रय लेखे । (यह पहिला म्योजन है, इसीप्रकार कुल मिलाकर
१६ प्रयोजन । प्रत्येक आदिम भययाके भागे 'जब यह समशे, कि यह
पाश्य, और भन्तमें 'तो दुर्गका माश्रय देवे' यह पाक्य जोद लेना चाहिये) ॥१४॥
सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धानामन्यतमेनास्य राज्यं हार-
यिष्यामि घातयिष्यामि वा ॥१५॥
अथवा यह समझे, कि सामन्त, भारपिक अथया आगमणकारीक वि.
संधी 'उसीके किसी वंशजके द्वारा, उसका राज्य हरण करालंगाया उसको
गरया दालंगा ॥५॥
to अधिक ((३०८)" कौटलीय अर्थशास्त्र । कृत्यपोपग्रहेण वास्य दुर्गे राष्ट्र स्कन्धानारे वा कोपं समुत्थापयिष्यामि ॥ १६ ॥ अथवा अभियोक्ता (आक्रमणकारी) के कर्मचारावर्गको साम भादि उपा यों द्वारा अपने अधीन करके, दुर्गमें, राष्ट्रमें अथवा छावनी में विप्लप (कोप) पदा करवादूर्गा ॥ ६ ॥ शस्त्राग्मिरणप्रणिधान पनिपदिकैर्वा यथेष्टमासन्नं हनिप्यामि - अथवा हथियार, अग्नि या पिप आदिसे मारनेवाले गुप्तचरोंके द्वारा, या औपनिषदिक प्रकग में बताये हुए यागोंके द्वारा, समीप आये हुए अभियोक्ता भाधुको इच्छानुसार मरवाडासूगा ॥१०॥ स्वयमधिष्ठितेन वा योगप्रणिधानेन क्षयव्ययमेनमुपने- प्यामि ॥ १८ ॥ भधवा विश्वासी घातक पुरपाका स्वप प्रयोग करते हुए उसके पुरपाका भय और धाका समय अच्छी तरह करवा सगा ॥१८॥ क्षयव्ययप्रयासोपतप्ते वास्य मिनरर्गे सैन्ये वा क्रमेणोपजापं प्राप्स्यामि ॥ १९ ॥ अथवा मनुष्योंके गाश, धनके व्यय और प्रयास (यात्रा) के दुपके कारण, इसक मित्रगं और सैन्पके दुखी होनपर, धीरे २ इनमें परस्पर भच्छी तरह भेद दलवा सकूगा ॥ १९ ॥ वीवधासारप्रसारवधेन यास्य स्कन्धावारावग्रहं करिष्यामि ॥२०॥ अपवा भभियाक्ताक अपन देशसे आनवाल ग्वाद्यपदार्थ, मिग्रबल, तथा पास भूमा और इंधन आदिको पाचहा नष्ट करके, इसकी छावनीको अत्यन्त पीडा पहुचा सकूगा ॥२०॥ दण्डोपनयन यास्य रन्ध्रमुत्थाप्य सर्वसंदोहेन प्रहरिष्यामि ॥२१॥ अथया भपनी कुछ सनाको, अभियोकाकी छावनी में छिपेतौरपर लेजा कर, इसके दोषा अर्थात् निर्यलताओको भच्छीतरह मालम फरक, फिर बहुत अधिक सैन्य समुदायके साथ, इसके ऊपर प्रहार कर सकूगा ॥२१॥ प्रतिहतोत्साहन या यथेष्टं संधिमाप्स्यामि, मयि प्रतिर न्धस्य वा सर्वतः कोपाः समुस्थास्यन्ति ।। २२ ॥
1 १५ अध्या०] बाइगुण्य । अथवा किसीतरह अभियोक्ताके उासाहको नष्ट करके, फिर उसके साथ इरानुसार सन्धि कर सकूगा । अश्या मुझपर आक्रमण करनेवाले अभियोला के ऊपर चारों ओरसे सवही राजालोग कुपित हो लेंगे ॥ २२॥ निरासारं वास्य मूलं मित्राटीदण्डैरुद्धातयिष्यामि ॥२३॥ महतो या देशस्य योगक्षेममिहस्थः पालयिष्यामि ।। २४ ।। अथवा इसके मिजयलको पृथक् रोककर, उसकी सहायता न पहुचनेपर इसके मूलस्थान (प्रधान राजधानी) को भाने मित्रपल और भाटविकों के द्वारा मष्ट करनूगा ॥ २३ ॥ अथ अपने योनारी देश के योगक्षेमही, यहोंपर रहकर में पूर्णतया पालन फरसगा ॥ २४ ॥ स्त्रविक्षिप्तं मित्रविक्षिप्तं वा मे सन्यामहस्थस्यैकस्थमारपा भविष्यति ॥२५॥ अथवा यहाँपर रहत हुए मेरे, अपन कायंक लिय या मिग्नक कायक लिये अन्धन भेजी हुई सना यहाँपर मोसाय एकात्रमहाकर, कदापे शत्रुके घाम म होसकेगी ॥२५॥ निम्नसातरात्रियुद्धविशारदं वा मे सैन्यं पथ्यायाधमुक्तमा- सन्न कमाणे करिष्यति ।। २६ ॥ अथवा नीचे (मैदानमे), खाई खादकर, और रायके समय युद्ध कर में अत्यन्त चतुर मेरी सेना, लेिम रास्त का थकावटको दूर करके, अवसर आनेपा खूप अरोताह कार्य का सकेगा।॥ २६ ॥ विरुद्धदंशकालमिहागतो वा खयमेव क्षयव्ययाभ्यां न भवि- यति ॥ २७ ॥ अथवा अभियोक्ता, अपनी सेनाके लिये प्रतिकूल देश भौर कालमे यहाँ भानेपर, हमारे पस्नके मिनाही अपने भाप मनुष्योका क्षय तथा धनका स्यय होनेसे नष्ट होजायगा ।। २७ ॥ महाक्षयन्ययाभिगम्यो ऽयं देशो दुईटच्पपसारमाहुल्पात ॥२८॥ भवा इसमें वही राजा आक्रमण कर सकेगा, जो अपना महान क्षय और व्यय करनके लिये तैयार होगा। क्योंकि यहा दुर्ग जंगल तथा भप- सार (पावर निकलजानेके) स्थान बहुत है ॥ ३८॥ परेपां व्याधिप्रायः सैन्यव्यायामानामलब्धभौमश्च तमापत- गतः प्रत्यति ॥२९॥ प्रविष्टो चा न निर्गमिप्यतीति ।। ३०॥
[७ मधि० - है कोटलीय अर्थशास्त्र और परदेशसे आनेवाले लोगों के लिये यह स्थान म्याधि-जनक है। सेना. भोंकी कवायद मादिके लिये भी यहां पर्याप्त भूमि नहीं मिल सकती । इसलिये जो भी आक्रमणकारी यहाँ आवेगा, वह अवश्यही भापग्रस्त होगा ॥२९॥ यदि केिसीतरह वह यहा भा भी गया, तो फिर यहाँसे उमका कायाण पूर्वक निकलना कठिन होजायगा, इसप्रकार जब विजिगीषु समझे, तो अवश्यही दुर्ग का आश्रय रेलेवे ॥३०॥ कारणाभाने वलसमुच्छये वा पास्य दुर्गमुन्मुच्यापगच्छेद ॥ ३१ ॥ अग्निपतङ्गपदमिने वा प्रविशेद ॥ ३२ ॥ अन्यतरसि- द्विहि त्यक्तात्मनो भवतीत्याचार्याः ॥ ३३ ॥ यदि ये उपर्युक्त कारण नहीं, ओर शत्रुको सेना भरयन्त पलवान् तथा बहुत अधिक हो तो फिर क्या करना चाहिये ' इस विषय में आचार्योका मत है, कि दुर्गको छोड़कर चले जाना चाहिये ॥३. ॥ अथवा अग्निमें पताके समान, शत्रुपर भाक्रमण करदेना चाहिय ॥ ३२ ॥ क्योंकि अपना मोह छोड़कर इसपकार आक्रमण करने पर कभी २ विजय लाभ भी होजाना है। अर्थात् जैसे दीपकके ऊपर गिरा हुआ पता, कभी २ उसे बुझाभी देता है। इसीतरह काम- मणकारी प्रबल शत्रुभी, कभी २ पराजित होजाता है, और दुर्बल विजिगापु भी अद्भुत पराक्रमके द्वारा विजयाम करता है ॥ ३३ ॥ नेति कौटल्यः ॥ ३४ ॥ संधेयतामात्मनः परस्य चोपलभ्य संदधीत ॥३५॥ विपर्यय विक्रमेण सिद्धिमपसारं वा लिप्सेत ॥३६॥ परन्तु कौटल्य इस सिद्धान्तको नहीं मानता ॥ ३४ ॥ यह कहता है कि सयसे प्रथम अपनी और शत्रुकी सन्धि विषयक योग्यताको देखकर सन्निही करलेनी चाहिये । तात्पर्य यह है कि जहातक होसके, यम, शनुके साथ सन्धि करनेकाही यल करे ॥ ३५॥ यदि किसीतरह भी सन्धि होने की सम्भावना न हो, तो फिर पराक्रमके द्वारा सिद्धिलाम करे । (किसी पुस्तक 'सिद्धि' के स्थान- पर 'सन्धि' भी पाअन्तर है, उसका अर्थ इसप्रकार समझना चाहिये-विक्र मके द्वारा सन्धिका लाभ करे, अर्थात् युद् प्रारम्भ करदनेष शत्रुके क्षय न्य होमेस, उसे इतना तग करदे, कि वह दुखा होकर सन्धि करनेके लिये तैयार होजाय) । अथवा जय समझे कि सन्धि होना सर्वथा असम्भव है, तो स्य नको छोड़कर चलाजावे ॥ १६ ॥ यहांतक प्रपल शत्रुके साथ विरोध करके दुर्ग प्रवेशके कारणोंका निरूपण किया गया । अप इसके भागे विजित शत्रुका स्यवहार बताया जायेगा। - १ १५ अध्या०] पाड्गुण्य " संधेयस्य वा दूतं प्रेषयेत् ॥ ३७॥ तेन वा प्रेषितमर्थमाना- म्यां सत्कृत्य भूयात् ॥ ३८ ॥ इदं राज्ञः पण्यागारमिदं देवीकृ- माराणां देवीकृमारवचनादिदं राज्यमहं च त्वदर्पण इति ॥३९॥ अथवा जब सम्धि सर्वथा असम्भय हो, तो सम्धेय अर्थात् धर्मविजयी शक्तिशाली अभियोक्का राजा के पास अपना दूत भेजे ॥ ३७ ॥ अथवा उसके भेजे हुए दूतको धन और मानसे सस्कृत करके यह कहे, कि ॥ ३८ ॥ राजाफे लिये (विजेता राजाके लिये) यह बहुमूल्य में है, और यह, देवी (रानी) तथा कुमारी (राजकुमारों) के कथनानुसार, उनके देवी और कुमारोंके लिये मेंट है। यह सम्पूर्ण राज्य और मैं सर्वथा तुम्हारे ही अर्पण हैं । अर्थात इस राज्यके भौर मेरेभी, आपही हरतरह मालिक हैं ॥ ३९ ॥ लब्धसंश्रयः समयाचारिकवद्भर्तरि वर्तेत ॥४०॥ दुर्गा- दीनि च कर्माण्यावाहविवाहपुत्राभिषेकाचपण्यहस्तिग्रहणसत्र- यात्राविहारगमनानि चानुज्ञातः कुर्वीत ।। ४१ ।। इसमकार दूत भादि भेजने के द्वारा, विजेताका आश्रय मिरजानेपर, नियमानुसार सेवकों की भांतिही उसके पास रहता हुआ, उसीतरहका पत्ताव करे ॥ ४० ॥ और दुर्ग आदि बनवामा, कन्या देना या लेना, (अर्थात् कन्या और पुनका विवाह), यौवराज्याभिषेक, घोड़ोंफा खरीदना, हाधियोंका पकदमा, यश, कहीं जाना भाना, या उद्यान आदिमें ऋढिाके लिये जाना, इत्यादि सपही कार्योको, उसकी (विजेता राजाकी) भनुमति लेकर करे ॥४॥ खभूम्यवस्थितप्रकृतिसंधिमुपयातमपसृतेषु वा सर्वमनुज्ञातः कुर्वीत ॥४२॥ दुष्टपौरजानपदो वा न्यायवृत्तिरन्यों भूमि याचेत H . अपने ही देश में रहते हुए अमात्य भादि प्रकृतियों के साथ सन्धि, या अपने देशसे भागकर दूसरी जगह गये हुए उनके लिये दण्डकी व्यवस्था, यह सय कुछभी, विजेता राजाकी अनुमतिसे ही करे ॥ ४२ ॥ स्वय न्यायानुकूल भाधरण करता हुआ राजा, (किसी पुग्नको 'न्यरयावृत्ति' ऐपा पाठान्तर है वह 'भूमि' का विशेषण समझना चाहिये) नगरनिवासी और जनपदनिवासी लोगों भात् अपने विरोधी या अन्यारपट्टसि होजानेपर, विजेतासे अपने विश्वासके लिये अन्य भूमिको याचना करे । भयात ऐसी अवस्थामें वंशपरम्प- रागत भी अपनी भूमिका छोपका, निवास के लिये दूसरी भूमि विजेताले मागे - कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक व्यग्रदुपांशुदण्डेन चा प्रतिकुर्वीत ॥ ४४ ॥ उचितां वा मित्राद्भमि दीयमानां न प्रतिगृह्णीयात् ।। ४५ ॥ अमवा अन्य भूमिको न मागता हुआही, दूप्योंके समान, उपाशुदगरसे उन दुष्ट भन्यायपवृत्ति पुरपोका प्रतीकार करे ॥४४॥ यदि विजेता राजा, अपने (पिजिसके) ही किसी मिनसे डीनकर, अनुकूल भूमि उसे देना चाहे, सो उस भूमिको कदापि लेना स्वीकार न करे ॥ ४५ ॥ मन्तिपुरोतिसेनापतियुपराजानामन्यतममरश्यमाने भतार पश्येत् ॥४६ ॥ और अपने मन्त्री, पुरोहित, सेनापति तथा युवराज इनसे किसीको भी भत्ती विजता राजा) फी उपस्थितिमें म देख्ने । (इसका अभिप्राय यही है कि जिससे अपने नौकर, भर्माका उपस्थितिम अपने आपको सेवककी अवस्थामें न देखसकें। अर्थात् अपने सेवक, अपनको जव देखें, तब राजाकी हैसियतमही देखें, सेवकी नहीं)॥ ४६ ॥ यथाशक्ति चोपकुर्यात् ॥ ४७ ॥दैवतस्वस्तिवाचनेषु तत्परा आशिपो वाचयेत् ॥ ४८ ॥ सर्वत्रात्मनिसर्ग गुणं भूयात् ।।४९।। तथा यथाशक्ति अपने मालिकका, समय २ पर मैंट भादि देकर उपकार करता रहे ॥४७॥ देवता के आराधन और माङ्गलिक कृत्योंके अवसरों पर, अपने मालिक के लिये भाशीर्याक्याफा कहलवाये ॥ ४८॥सथके सन्मुख, अपने आपको सामों के समर्पण कानका सथा उसके गुणोंका कीर्तन करे ॥४॥ संयुक्तपलवत्सेवी विरुद्धः शङ्कितादिभिः । वर्तत दण्डोपनतो भर्तर्येनमवस्थित ॥ ५० ॥ इति पाइगुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे बलवता पिगृहोपरोधहेतब इण्डोपनतवृत्त पञ्चदशो ऽध्याप ॥ १५ ॥ आदितस्त्रयोदशशत ॥1॥ इस प्रकार विजेत राजा, अपमे विजेता राजाको सेवाम रहता हुआ, उसके पलश ली भमात्य आदिके साथभी सदा अनुकूल वर्ताव रखा तथाजो विनताके विरोधी, या जिनपर वह सन्देह करता हो, उनस सदा विरुद्ध होकर हो रहे ।। ५.॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें पन्द्रहया अध्याय समाप्त ! - 3 1
कार करके भाग
1
१३१४)।
कौटलीय अर्थशास्त्र
[७ अधिक
चाहिये' इसको, 'समुच्चय' ३हते हैं। मूल सूग्रमें, भनन्तरमकृति-शत्रु-
प्रकृति-शनु, और एकान्तरप्रकृतिममित्रप्रकृति-मिय कहे गये हैं।) ॥५॥
ग्रामारण्योपजीवित्रजयाणिक्पथानुपालनमुज्झिवापसृतापका-
रिणां चार्पणमिति सान्त्वमाचरेत् ॥ ६ ॥ भूमिद्रव्यकन्यादान-
ममयस्य चेनि दानमाचरेत् ।। ७॥
}", गांव या जगलमे रहनेवाली गाय भैसों आदिकी, तथा जैल और स्थल
के व्यापारी मार्गों की रक्षा करना, और दूसरे राजाके दरसे अथवा अपना अप..
हुए, तया दूप्य अमात्य भादि भृत्य पगाका अन्येपण' करके
दना, इत्यादि रूपसे दुर्बल राजाके साथ सामका प्रयोग करे ॥ ६५ भूमि-
दान, द्रव्यदान, कन्या दान, तथा शत्रुओको औरसे भय उपस्थित होनेपर
भभयदान
इस प्रकारसे दुर्वल राजाके सम्बन्धमै दान रूप उपायका
प्रयोग करे ॥ ७॥
सामन्ताटविकतत्कुलानावरुद्धानामन्यतमोपग्रहेण कोशदण्ड-
भूमिदाययाघनमिति भेदमाचरेत् ॥ ८॥
सामन्त, भाटविक, उस (मातव्य शत्रु) के अपने कुलमें उत्पश्च हुए २
किसी सम्बन्धी तथा किसी नजरबन्द, किये हुए यातल्यके पुत्र, इनमेंसे
किसी एकको अपने अधीन करके, उसके द्वारा कोशे, सेना, भूमि तथा अपने
दायभागकी याचना करवाका, पलान् राजा और उसके सामन्त आदिमें भेद
हलया देवे । तात्पर्य यह है, कि विजिगीषुके पहकानेसे, सामंत आदि, यलवान्
राजासे कोश भादिकी याचना करें, उनके न देनैपर, विजिगीषु उनमें भेदरूप
उपापका प्रयोग करे॥॥
। प्रकाशकूटतूष्णींयुद्धदुर्गलम्भोपायैरमित्रप्रग्रहणमिति दण्डमा-
चरेत् ॥ ९॥
है। इसी प्रकार प्रकाशयुदः (देश और कालकी सूचनाको देकर किया
जानेवारा युर), फूट युद्ध (देश कालकी सूचनाके बिनाही, किये जानेवाला
युद्ध), भौर सूर्ण युद्ध (छिपे तौरपर गूदुपुरप आदिके द्वारा शत्रुका मरवा देना)
इनं ३ प्रकारके युदोके द्वारा, तथा दुर्गलम्भोपाय (१३ अधि०) अधिकरणमें
बतायेहुए विषदान आदि उपायोंके द्वारा शत्रुके वामें करना चाहिये । यही
दारूप उपायक प्रयोगका प्रकार हे ॥९॥
एवमुत्साहयतो दण्डोपकारिणः स्थापयेत् ॥ १० ॥ स्वप्रभा-
ववतः कोशोपकारिणः प्रज्ञावतो भूम्युपकारिणः ॥ ११ ॥
व्यवस्था है -- T १६ अध्यो०] पाइगुण्य इस प्रकार उक्त उपायोंक द्वारा अपने अधीन हुए राजाओमसे उत्साही तथा अपनी सेनाका उपकार करनेवाल पुरपाको सनासम्बन्धी कार्योंपर नियुक्त किया जाय ॥ ॥ इसी प्रकार प्रभुशापयुक्त भयात् कोश' सम्पन्न, कोश क्षेकर उसका उपकार करनेवाले पुरुषाका काश सम्बन्धी कार्योंपर, तथा दिमान् मन्त्रशक्तियुक्त, भूमि देकर उसका वृद्धि करनेवाले.. पुरुषाको भूमि सम्बन्धी कार्यों पर नियुक्त किया जाय । जा कि इनकी उचित करसके ॥1॥ तेपां पण्यपत्तनग्रामखनिस जीतेन रनसारकुप्येन 'द्रव्यहस्ति- वनवजसमुत्थेन यानवाहनेन वा यद्गहश उपकरोति तचित्रभोगम् ॥१२॥ दण्ड आदि उपायाझे द्वारा चशम किये हुए मिनभूत राजाओमसे, जो राजा यढे २ पाजारी, गावा तथा सुवर्ण आदिक उत्पत्ति स्थानास बहुए, मणि मुक्ता भादिरल, चन्दन आदि सारद्रव्य, शख आदि फार गुदव्य तथा वस्त्र आदि दयाको देकर अथया लकडियोंके जगल, हाधियाक जगल तथा गाय आदि पशुओंस, पनाये या उत्पन्न हुए रथ आहे यानों तथा हाथा आदि चाहनाका देकर, विजिगीषुका अत्यन्त उपकार करता है । यह मित्र चित्रभोग' कहा जाता है । क्योंकि उससे तरह तरहक भोगाकी प्राप्ति होती रहती है॥ १२ ॥ यद्दण्डन कोशेन वा महदुपफरोति तन्महाभोगम् ॥ १३ ॥ यद्दण्डकोशभूमीरुपकरोति तत्सर्यभोगम् ॥ १४ ॥ जो मिन राना सेना और कोशके द्वारा विभिगोपुका महान उपकार करता है, पर 'महाभोग' कहाता है ॥ १३ ॥ राया जा राजा, सेना कोश और भूमि इन सब चीजोको देकर विजिगीपुका महान उपकार करता है, यह सर्व भोग' कहाजाता है॥१४॥ यदमित्रमेकतः प्रतिकरोति तदेकतोभोगि ॥१५॥ सर्थ देकर, उपकार करनेवाले मिनोका निरूपण करके. अब अनर्थका निवारण करके उपकार करनेवाले मिनाको बताते है-उनमेंसे जो मिन राजा, एफही शत्रुका प्रतीकार करके विजिगीषुका उपकार करता है, यह एकतो भोगी' कहाता है॥ १५॥ यदमित्रमासारं चोपकरोति तदुभयतोमोगि ॥ १६ ॥ यद- मित्रासारप्रतिवेशाटाविकान्सर्वतः प्रतिकरोति तत्सर्वतोमोगि॥१७॥ जो मित्र राजा, शनु ओर भासार अधांद गनुमिग्न (शत्रुका मित्र)इन 3 [७ अधिक + + - ((३१६) कौटलीय अर्थशास्त्र 1 दोनाका प्रतीकार करके विजिगापुका उपकार करता है, यह ' उमयतोभोगी' कहाता है ॥१६॥ तथा जो मिनराजा, मनु, शत्रुमित्र, मतिश (पसका शत्रु- राजा) नया आटविक इन सयका प्रताकार करके विजिगीपुका उपकार करता है, वह सपतो भोगी' 'कहागाता है ॥१७॥ 11. 7 पाणिग्राहचाटविकः शर्मुख्यः शत्रुर्या भूमिदानसाध्या "कश्चिदासायेत ॥ १८॥ निर्गुणया भूम्यनमुपग्राहयेत् ॥ १९॥ अप्रतिसंबद्धया दुर्गस्थम् ।। २० ।- योद पाणिग्राह, आटावक, शत्रुकै अमात्य आदि मुख्यपुरुष, अथवा शाही, भूमि दनैपर, अपन अधीन होने के लिये तैयार हों, तो ॥ ८ ॥ गुण रहित भूमि देकरही उन्ह अपने अधीन कर ॥ १॥ पदि पाणिग्रह भादि, दुर्गमें रहनेयाला हो, तो उसे दुर्गसे किसी तरहका सम्बन्धन रखने वाली । दूरदेश की भूमि देकर पशमे करे ॥ २० ॥ निरुपजी-ययाटविकम् ॥ २१॥ प्रत्यादेयया तत्कुलीनम् ॥ २२ ॥ शत्रोरुपच्छिन्नया शबोरुपरुद्धम् ॥ २३ ॥ आटविरुको, जीवनक योग्य, धान्य आदि जिसमें उत्पन र होसकें, 'ऐसी भूमि देकर वश करे ॥ २ ॥ शनुकुलम उत्पन्न हुए व्यक्तिको ऐसी भूमि दवे, जो फिर वापस अपनेही पास लौटाई जासके, अर्थात् जिसका फिर स्वय अपहरण कर सके ॥ २२ ॥ नजस्यन्द किये हुए शत्रुके पुत्र आदिको, पहिल कभी शत्रुसे छीनी हुई भूमिका हो 'देवे ॥ २३ ॥ नित्यामित्रया श्रेणीबलम् ।। २४ ॥ बलवत्सामन्तया संहत- 'चलम् ।। २५ ॥ उभाभ्यां युद्ध प्रतिलोमम् ॥ २६ ॥ श्रेणीयल (नेता रहित मनुष्याझा समूह-पेनाविशेष ) को ऐसी' भूमि देवे, जिसमें प्योर आरयिक आदि, नित्यही उपद्रव करते रहते हो ॥ २४ ॥ सहतयल (नेताकै सहित म प्योका समूह-सेनाविशेष) को ऐसी भूमि देवे, जिसको सामन्त (समीप लगे हुए देशका राजा) अत्यधिक बलवान् हो ॥२५॥ युद्धमे कुटिलता करनेवाले अथात् कूटयुद्ध करनेवाले शनुको, ऐसी भूमि देवे, जहाँ घोर और आटविक आदिका भी सदाही उपद्रय रहता हो, तया सामन्त भी जिसका अधिक पलवान् हो ॥ २६ ॥ अर्लन्धव्यायामयोत्साहिनम् ॥ २७ ॥ शून्ययारिपक्षीयम् 12-1२८॥ कर्शितयापवाहितम् ।। २९।। दरसाहशाल । आदिको ऐसी भूमि थे, जिसमें सेनाऑकी कवायः Tr . T " . १६ अध्या पाइगुण्य आदिके लिये योग्य स्थान म हो ॥ २७ ॥ शत्रुपक्षके किसी पुरपको शून्यभूमि ही देवे। अर्थात् जिससे किसी तरहका फल प्राप्त न होसके एसा भूमि देकर उसे घशमें करे ॥२८॥ सन्धि करके फिर उसे तोढदेने घाले राजाको ऐसी भूमि देवे, जिसमें सदाही शत्रु सेना और भाटविक भादिका उपनर बना रहता हो ॥२९॥ महाक्षयच्ययनिवेशया गतप्रत्यागतम् ॥३०॥ अनपाश्रयया प्रत्यपसृतम् ।। ३१ ॥ परेणानधिवास्थया स्वयमेव भारमुपग्राह- येत् ॥ ३२ ॥ एकवार शत्रुसे मिलकर जो किर अपनेसे मिलना चाहे, उसे ऐसी भूमि देकर वशमें करे, जिस भूमिमें नई यसावट परनेझ लिये अत्यधिक पुरपाका क्षय और धनका व्यप दोजाय ॥ ३० ॥ शनुके इरसे, अपने देशसे भागे हुए पुरुषको, ऐसी भूमि देकर वशमें करे, जो कि दुर्ग आदिसे सर्वथा रहित हो -॥ ३१॥ जिस भूमिपर, उसके असली मालिकले सिराय कोई नहीं रह सकता, ऐसी भूमि उस व्यक्तिको देकर वशमें करे, जो वि इस भूमिका पुराना, असरी मालिक तेषां महोपकारं निर्विकारं चानुवर्तयेत् ॥ ३३ ॥ प्रतिलोम- सुपांशुना साधयेत् ॥ ३४॥ दण्ड आदि उपायों के द्वारा अपन वशम किये हुए राजाओमसे, जो राजा अपना (विजेसाफा) महान उपकार करता हो, तथा उसकी ओरसे अपने चित्तम विमी तरहका विकार न रखता हो, उसक साथ ऐसा व्यवहार रख जिससे कि उसे कभी किसी प्रकारकी हानि न हो ॥ ३३॥ परन्तु जो अपनसे प्रतिकूल भ घरण करे, उसे उपांशुदण्डसे (छिपे तौरपर उचित दण्ड आदि देकर) सीधा फरे । पयोंकि भकट दण्ड देनेसे अन्य वशीभूत राजाओम उद्वैग पैलजानका भय रहता है॥३४॥ उपकारिणमुकारशक्तया तोपयेत् ॥ ३५ ॥ प्रयायतश्चार्थमानी कुर्यात् ।। ३६ ॥ व्यसनेषु चानुग्रहं स्वयमागतानां यथेटदर्शनं प्रतिविधानं च कुर्यात् ॥ ३७॥ अपना उपकार करनेवाले राजाको भपनी शधि के अनुसार सदा सन्तुष्ट रवखे ॥ ३५ ॥ ओर उनके परिश्रम के अनुसार उन्हें धन देवे, तथा उनका अच्छी तरह सस्कार करे ॥३६॥ उनके उपर किसी तरह की कोई विशति आने. पर, सामयना आदि देकर सदा उनपर अनुग्रह करता रहे । और यदि ये स्वय ही अपात् रिमा पुरायही अपने यहाँ भाजाय, तो उनके साथ मह प्रेम - 1 --- (१८) कोटलीय अर्थशास्त्र ৩ ঘি पूर्वक मिले मिलाये । परन्तु उनकी भोरसे यदि किसी पुराइंफो भाशा हो तो उससे अपनी रक्षा करने के रिये सदा तैयार रहे ॥ ३७॥ परिभवापघातकुत्सातिवादश्चैिपु न प्रयुञ्जीत ॥३८॥ दवा चाभयं पितेवानुगृहीयात् ॥ ३९ ॥ यश्चास्यापकुर्यातदोपमामिपि- ख्याप्य प्रकाशमेनं पातयेत् ॥ ४० ॥ तथा इन दण्डोपन्त (दण्ड आदि उपायोंसे अपने अधीन किये हुए) राजाओंके विषयम, तिरस्कार, कटुवाक्य, निन्दा या अतिस्तुति भादिका प्रयोग कभी न करे ॥ ३० ॥ और उन्हें अभय देकर, पुत्रोंपर पिताके समान, सदा उनपर अनुग्रह करता रहे ॥ ३९ ॥ परन्तु उनसे जो इसका (विजेताका) अपकार करे, उसके उस अपराधको सर्वय प्रकाशित करके प्रकटरूमें उमका वध करवा देवे ॥१०॥ परोद्वेगकारणाद्वा दाण्डकार्मकाचेप्टेत ॥४१॥ न च हतस्य भूमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत ।। ४२ ॥ कुल्यानप्यस खषु पानेषु स्थापयेत् ॥ ४३॥ यदि इस बात का भय हो, कि प्रकर दण्ड देनेसे अन्य दण्डे पनत राजा उद्विग्न हो उठेगे, तो दाण्डकमिक प्रकरणम (८९ प्रकरण, बताये प्रयोग करे । अर्थात् ऐसा अवस्थामै उपांशुदण्डका प्रयोग करे ॥४॥तथा इसपकार मारे हुए इण्डोपनत राजाके भूमि, दम्प, पुन और स्त्री आदिपर कमा अधिकार न करे । अर्थात् उनका स्वय अपहरण न करे ॥ ४२ ॥ किन्तु इनको, भौर इनके पराके अन्य व्यक्तियोंको भी, उनके अपने चित राज्य स्थानीपर नियुक्त करदे । अर्थात् उनकी योग्यताके अनुसार अवश्य ही राज्यके भिन्न २ भधिकार पदापर उनकी स्थापना करे ॥ १३ ॥ कर्मणि मृतस्य पुत्रं राज्ये स्थापयेत् ॥४४॥ एवमस्य दण्डोपनताः पुत्रपौत्राननुवर्तन्ते ॥ ४५ ॥ यदि किसी को वशर्म करने के लिये किये जाने वाले युद्धमें वह राजा मारा जावे, तो उसके पुत्रकोही राज्याधिकार पर स्थापित करे । अर्थात् उसेही राजा बनावे ॥४४॥ विजिगीपुके इस प्रकार आचरण करनेसे, दण्डोपनत राना न केवल विजिगीपुके ही अधीन रहते हैं, किन्तु उसके पुन भोर पोर आदिके भी अनुगामी बने रहते हैं ॥ ४५ ॥ यस्तूपनतान्हत्वा वधा या भुमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत ,,तसोद्विग्नं मण्डलमभागायोत्तिष्ठते ।।४६ ॥ हुप उपायोंका १ १७ अध्या०] पाइगुण्य (३१९) परन्तु जो विजिगीषु, दण्डोपनत राजाओंका मारकर भथया कैदमें सालकर, उनके भूमि, न्य, पुन आर खी आदिको अपने अधिकारमें कर लेता है, उससे कुपित हुआ राज मण्डल (बारह प्रकारके राजा भोंमेंस विजिगीपुको छोडकर धन्य ग्यारह प्रकारके राजा) उसका (विजिगीपुका) विध्वस करने के लिये तैयार होजाता है। (बारह प्रकारके राजा ये हैं -विजिगीपु, शत्रु, मित्र, शत्रुका मित्र, मित्रका मिन, शत्रुके मित्रका मित्र, पाणिग्राह, भाक्रन्द, पा प्णिमाहासार, आफन्दासार, मध्यम, और उदासीन ।, देखो अधि० ६, अध्याय २) ॥ ४६॥ ये चास्यामात्याः स्वभूमिष्वायत्तास्ते चास्योद्विना मण्डलमा- श्रयन्ते ॥४७॥ स्वयं राज्यं प्राणान्वास्याभिमन्यन्ते ॥ ४८॥ और जो विजिगीपुके अमात्य, अपने १ अधिकार पदोंपर कार्य करते हुए रहते हैं, घे भी इससे कुपित होकर, इसको दयामके लिये तैयार हुए। राजमण्डलके साथ मिलजाते हैं। ४७ ॥ अथवा स्वयही इसके राज्य या प्राणों पर अपना अधिकार फरलेते हैं । अर्थात् इसके राज्यको अपहरण करलेने हैं, अथवा इसे मारडालते हैं ॥ १८ ॥ स्वभूमिपु च राजानः तस्मात्साम्नानुपालिताः । भवन्त्यनुगुणा राज्ञः पुत्रपौत्रानुवर्तिनः ॥४९॥ इति पाइगुण्य सप्तमे ऽधिकरणे दण्डोपनायिवृत्त पोडशो ऽध्याय ॥१६॥ आदितचतुर्दशशत ॥१५॥ इस लिये जो राजा, अपनी २ भूमियों में राज्यका उपभोग करते रहते हैं, भौर पिजिगीषु सामके द्वारा ही उनकी रक्षा करता है, घे विजिगीपुके अनुकूल उसके पौत्र भादिक भी अनुगामी बने रहते है ॥ ४९ ॥ पाइगुण्य सप्तम अधिकरणमें सोलहवा अध्याय समाप्त - -- सत्रहवां अध्याय 1 १२२, १२३प्रकरण , सन्धिका दृढ़ करना; और विश्वासके लिये, रक्खे 'हुए राजपुत्र आदिका छुड़ाना। शमः संधिः समाधिरित्येकोऽर्थः॥१॥ राजां निश्वासो- पगमः शमः संधिः समाधिरिति ॥२॥ .
(३२०) कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक शम, सन्धि, और समाधि ये तीनों शाद एक ही अर्थको कहते हैं ॥ भार वह है, राजाओंके परस्पर विश्वास रस होजानका कारण | अधात् सरय, शपथ और जामिन, तथा रामपुर आदिका ऐसा, इस्पादि फारणोस, राजाओंको जो परस्पर एट विश्वास होजाता है, यही राम, सग्धि या समाधि कराता है॥२॥ सत्यं शपथो वा चलः संधि ॥ ३ ॥ प्रतिभूः प्रतिग्रहो वा स्थावरः इत्याचार्याः ॥ ४ ॥ आचार्योंका मत है, कि जो सन्धि 'यह ऐसा ही होगा, आयया नहीं होगा' इस प्रकार सस्यता पूर्वक बचा मानसही की जाती है, अपरा भपने पूज्य पिता आदिक पैर या सुवर्ण आदिको छूकर शपप पूर्वक कोजाती है, वह सम्धि स्थिर नहीं होता ॥ ३॥ भीर जो सन्धि प्रतिमू (जामिन) के द्वारा, और विश्वासके लिय राजपुन भादिको लेकर कीजाती है, वह स्थावर अर्थात् स्थायी अत्यन्त विश्वसनाय होती है ॥४॥ नेति कौटल्यः ॥ ५॥ सत्यं वा शपथो वा परत्रेह च स्था- पर सधिः ॥६॥ परन्तु कौटल्य इस मतको नहीं मानता ॥ ५॥ यह कहता है कि जो सन्धि सत्यता पूर्वक और शपथ पूर्वक कोशाती है, यह अत्यन्त विश्वासके योग्य तथा स्थापी हाती है। पयोंकि उसमें सन्धि करनेवालोंको इस बातफा भय रहता है कि यदि इस सन्धिका हम उल्लघन करेंग, तो परलोकमें नरकम पड़ेंगे और लोकमै झड़े कहलाकर बदनाम होंगे ॥६॥ इहार्थ एव प्रतिभूः प्रतिग्रहो वा बलापेक्षः ॥ ७ ॥ परन्तु प्रतिभू और प्रतिग्रह ( राजपुत्र श्रादिका लेना) पूर्वक की दुई सन्धिको तोहदेने पर केवल इसी लोकमें कुछ योडायत अनर्थ होसकता है, पररोफमें नहीं होसकता इस लिये इसके तोरने में भय कम रहता है। तथा प्रतिभू भी उसी समय विश्वसनीय होता है जयकि यह बलवान् हो, और प्रतिमा भी उसी समय विश्वसनीय समझा जाता है, जब कि यह देनेवारेका प्रेममात्र + १ सहिताः स्म इति सत्यसधाः पूर्व राजानः सत्येन संदधिरे ॥८॥ तस्यातिकमे शपथैन अग्न्युदकसीताप्राकारलोप्टहस्तिस्क- न्धाश्वपृष्ठरथोपस्थशखरनधीजगन्धरससुवर्णहिरण्यान्यालेमिरे॥९॥ हन्पुरतानि त्यजेयुभेनं शपथमतिक्रामेदिति ॥ १० ॥ -- १७ अभ्या०] पाइगुपय (३२१) सत्य प्रतिज्ञा करनेवाले पहिले राजा लोग 'हम सन्धि करते हैं। इस प्रकार सत्यके द्वाराही दृढसन्धि करलेते थे॥८॥ सस्यका भतिक्रमण करमेपर अग्नि, जल, भूमि, मकान, हाधीका कन्धा, घोडेकी पीठ, रथमें बैठनेकी जगह, हधियार, रन, धाम आदिके बीज, चन्दन भादि गन्ध, घृत आदि रस, सुवर्ण और हिरण्य इन चीजोंका स्पर्श करते थे ॥ ९॥ और 'ये चीजें उस व्यक्तिको न करंद या त्यागर्दै, जो इस प्रतिज्ञाका अतिप्रामण करे' इस प्रकार शपथ. पूर्वक सन्धि करलेते थे ॥१०॥ शपथातिक्रमे महतां तपस्विनां मुख्यानां वा प्रातिभाव्यवन्धः प्रतिभूः ॥ ११ ॥ तस्मिन्यः परावग्रहसमर्थान्प्रतिभुवो गृह्णात्ति सो ऽतिसंधत्ते ॥ १२ ॥ विपरीतोऽतिसंधीयते ॥ १३ ॥ शपथका मी अति फ्रमण करदनपर दो २ उपस्वी भयका प्रामादिके मुख्य पुरपाको भत्तिमू बनाकर सन्धि करना उचित ह। सन्धिके दृद्ध रखनेका उत्तरदायिस्थ इन्ही पुरषॉपर रहता है ॥ ११ ॥ प्रतिभू मनाकर सन्धि करने वाले राजाओमेसे वही राजा विशेष लाभमें रहता है, जो कि प्रतिज्ञा या सन्धि को सोनवाले पत्रुभआके निमह अर्थात दमन करनेमे समर्थ पुरुषको अपना प्रतिभू बनाता है ॥ १२ ॥ इससे दूसरा राजा, अवश्यही अपने शत्रुसे धोखा खाता है॥ १३॥ पन्धुमुख्यप्रग्रहः प्रतिग्रहः ॥ १४ ॥ तस्मिन्यो दुम्यादृष्या- मात्यं दृष्यापत्यं वा ददाति सो ऽतिसंधत्ते ॥ १५ ॥ विपरीतो ऽतिसंघीयते।। १६ ॥ दूसरेके वचनपर विश्वास के लिये, उससे उसके मम्धु याम्धव या मुख्य पुरुषोंको सेलेना प्रतिमह कहाता है ॥ १५ ॥ इसप्रकार प्रतिमा (पन्भु यान्ध- घको देने) के द्वारा सम्धि करनेवाले राजामिसे वही राजा विशेष साम में रहता है, जो अपने दृष्य अमात्य या दूष्य पुनादिको देदेता है ॥ १५ ॥ और दूसरा राजा (दूप्य अमात्य आदिको रेनेवाला) ऐसी अास्थामें अवश्यही अपने शत्रुसे धोखा खाता है ॥१६॥ प्रतिग्रहगुणविश्वस्तस्य हि परः छिद्रे' निरपेक्षः महरति ॥१७॥ क्योंकि लेनेवाला तो यह समझता है कि मेरे पास इसके माय आदि हैं, यह मेरे पिर कुछ नहीं कर सकता, इसलिये उसपर विश्वास करता है। परन्तु दूसरा देनेवाला, उसकी निर्वस्तामाको दूदता हुआ, दोपॉके मिलाने (३२) कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक पर, दियेहुए दूप्य अमात्य आदिको कुछ अपेक्षा न करता हुआ उसपर प्रहार अर्थात् ऋगण कर देता है ॥ १७ ॥ अपत्यसमाधौ तु कन्यापुत्रदाने ददत्तु कन्यामतिसंधत्ते ।। १८ ॥ कन्या ह्यदायादा परेपामेवार्थाय क्लेशाय च विपरीतः पुत्रा ॥ १९ ॥ पुन आदिको देकर सन्धि करनेवाले राजाओमस, यहो राजा विशेष लाभम रहता है, जो कि पुन और कन्या दोनोंमेसे किसी एकको दिये जाने के प्रसंगमें कन्याको देदेता है ॥ १८ ॥ क्योंकि कन्या दायको अधिकारिणी नही होती, तथा यह दूसरी होके उपभोगके लिये होता है । और पिताके लिये तो धनादि व्ययके द्वारा दुःखदेनेवाली ही होती है। परन्तु पुत्र ऐसा नहीं होता, यह दायभागी, पिताके अपने लिये और उसके फेशाको दूर करनेके लिये होता है॥ १९- पुत्रयोरपि जात्यं शूरं प्राज्ञ कृतास्त्रमेकपुत्रं चा ददाति सो अतिसंधीयते ॥ २०॥ विपरीतो ऽतिसंधत्ते ॥ २१ ॥ जा- त्यादजात्यो हि लुप्तदायादसंतानत्वादाघातुं श्रेयान् ॥ २२ ।। पुरोको देकर सन्धि करनवाले राजाओसे, वह राजा अवश्यही अपने शत्रुस धोखा खाता है, जो कि अपने कुलीन, बुद्धिमान् , शूर, अनादि चला. नौ चतुर पुनको, अथवा अपलही पुग्नशी देदेता है ॥ २० ॥ इससे दूसरा रागा (अकुलान-दासी आदिस उरएस, युद्धिहीन पुत्रादिको देनेवाला) अवश्य ही फायदेमे रहता है ॥ २१ ॥ इसलिये समान जातीय पुनकी अपेक्षा, अस. मान जातीय पुगशे देदेनाही अच्छा है, क्योंकि उसकी सन्तान सम्पत्तिको दाय- भागी नहीं होसकसी ॥ २२॥ प्राज्ञादप्राज्ञो मन्त्रशक्तिलोपात् ॥ २३ ॥शूरादशूर उत्साह- शक्तिलोपात् ॥२४॥ कृतास्त्रादकृतास्रः प्रहर्तव्यसंपल्लोपात् ।।२५।। एकपुत्रादनेकपुत्रो निरपेक्षत्वात् ।। २६ ॥ पुदिमान पुनकी अपेक्षा पुद्धिहीन पुत्रका देदेना इसलिये अच्छा होता है कि उसमें अपनी मम्मशक्ति कुछ नहीं होती । अतएव अपनी मन्त्रणासे श- त्रुको कुछ लाम नहीं पहुचा सरता ॥ २३॥ शूर पुनकी अपेक्षा भीर पुत्रका देदेना इसीलिये अरसा है कि उसमें उत्साह शक्ति बिल्कुल नहीं होती। यह शत्रुका राम पा अपनी हानि कुछ नहीं कर सकता ॥ २४ ॥ शस्त्रादि चलाने में । है १७ अध्या०] पाइगुणेंय चतुर पुत्रकी अपेक्षा इससे विपरीत पुरका देदेना इसीलिये अच्छा है कि वह आक्रमण करने की शक्तिसे सर्वथा रहित होता है ॥ २५ ॥ एक्लौते पुत्रकी अपेक्षा अनेक पुरॉमसे एकको देदेना इसीलिये अध्या है, कि उसके विनाभी काम चल सकता है ॥ २६ ॥ जात्यप्राज्ञयोरजात्यमप्राज्ञमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तते ॥२७॥ प्राज्ञ- मजात्यं मन्त्राधिकारः॥२८॥ मन्त्राधिकारे ऽपि वृद्धसंयोगामात्यः प्राज्ञमतिसंधत्ते ॥२९॥ जास्य (समान जातीय कुलीन) और प्राज्ञ (इडिमान्) पुत्रोमेसे, जात्य पर मशाहीन पुयका ऐश्वर्य प्रकृति अनुगमन करती है । अर्थात् बुद्धिहीन होने पर भी समान जातीय होनेसे सम्पूर्ण राज्य सम्पत्तिका वही उत्तराधिकारी होता है, इसलिये राज्यका दायभागी होना उसका विशेष गुण है ॥२७॥ और जो असमान जातीय, पर पुद्विमान है, मन्नशाफ उसका अनुगमन करती है। अधात् उसके राज्माधिकारी न होने पर भी मन्त्रशक्तिमे युक्त होना उसका एक विशष गुण ॥८॥ इन दोनों पुत्रोमेसे, मन्त्रशक्तिमे युक्त होनेपर भी अजात्य प्राशको अपेक्षा जास्य अाज पुत्रही Jध होता है ! पाकि वह राज्या. धिकारी होकर विचार स्थानोपर वृद्ध अनुभवी बुद्धिमान् पुरुषोको नियुक्त करके अपनी उस कमीको पूरा कर सकता है ॥२९॥ प्राज्ञशूरयो प्राज्ञमशूरं मतिकर्मणां योगो ऽनुवर्तते ।। ३० ।। शूरमपाशं विक्रमाधिकारः ।। ३१ ।। विक्रमाधिकारेऽपि हस्ति- नमिव लुब्धाः प्राज्ञः शूरमतिसंधत्ते ॥३२ ।। इसीप्रकार बुद्धिमान और शूर पुनोमेरे, मुद्धिमान् , शूरताहीन पुसकर, पुखिपूर्वक किये कार्य अनुगमन करते हैं । अर्थात् वह बुद्धिपूर्वक फायाँको कर सकता है ॥ ३० ॥ ओर युद्धहीन शूर पुत्र पराक्रमके कायोको कर सकता है। ॥३१॥ इन दोनों पुवामसे, शूर किन्तु बुद्धिहीन पुनक पराक्रमी होनेपर भी उसकी अपेक्षा, पराक्रमहोन घुद्रिमान पुत्रही श्रेष्ठ होता है। जैसेएक पुद्धिमान शिकारी, शक्तिशाली भी हाथीको अपने वश में करलेता है। इसीप्रकार बुद्धि- मान पुन अपने बुद्धिषलसे, शुरको भी अपने पशमें कर सकता है॥३२॥ शूरकृतास्त्रयोः शूरमकृतास्त्रं विक्रमव्यवसायोऽनुवर्तते ॥३३॥ कृताखमशूरं लक्षलम्माधिकारः ॥ ३४ ॥ लक्षलम्माधिकारेऽपि स्थैर्यप्रतिपत्त्यसंमोहः शूरः कृताखमविसंधत्ते ।। ३५ - .
[७ अधि० (३५) कौटलीय अर्थशास्त्र शूर और कृतास (शमान चलानेमे अरयन्त चतुर) पुरामस, शसादि न चला सकनेवाला किन्तु शूरपुत्र, केयल पराक्रमके कायाको अच्छीतरह कर सकता है ॥ ३३ ॥ और शाताहीन पर शस्त्रादि चरानमें चतुर पुत्र, भपने एक्ष्य. को अच्छी तरह भेदन करनेकी शक्ति रखता है ॥ ३४ ॥ इन दोनोंमसे, लक्ष्यको ठीक भेदन करनेवाले पराक्रमहीन पुत्रको अपेक्षा, पराक्रमी पुत्रही मेष्ठ होता है। क्योंकि वह अवसर आनेपर, अपनी स्थिरता, विपसिके समय भी तरक्षण प्रतीकारके उपायोंका कर डालना, तथा अपनी रक्षा करने में सदा सावधान रहना, इत्यादि गुणोंसे कृताखको भी अपने आधीन कर सकता है ॥ ३५ ॥ बढकपुत्रयोबहुपुत्र एकं दत्त्वा शेपवृत्तिस्तब्ध संधिमति- कामति नेतरः ॥३६ ।। एक पुत्र और बहुत पुत्रोंमसे, यहुत पुत्रोंका होनाही अच्छा है।क्योंकि सन्धिकी दृढ़ता दिखानेके लिये, उनमेंसे एक पुत्रको देकर भी, रोप पुरॉके भरोसेपर अभिमान रखता हुआ राजा, अवसर मानेपर की हुई सम्धिको तोड़ सकता है, परन्तु जिसके एकही पुत्र हो, वह ऐसा नहीं कर सकता ॥ ३६॥ पुत्रसर्वस्खदाने संधिश्वत्पुत्रफलतो विशेपः ॥ ३७॥ सम- फलयोः शक्तप्रजननतो विशेषः ॥ ३८ ॥ शक्तप्रजननयोरप्युप- स्थितप्रजननतो पिशेपः ॥ ३९ ॥ यदि सन्धि करनेवाले दोनों राजाओंके एक एकही पुन हो, और उनके देदेनेपर ही सन्धि रद होती हो, तो दोनॉमसे वही राजा विशेष राभमें रहता है, जिसके पुत्र का भी पुत्र होगया हो । क्योंकि सन्धि टूटने पर पुनके नष्ट होने पर भी पौन राज्यसिंहासनपर बैठ सकता हे ॥ ३७ ॥ यदि सन्धि करनेवाले दोनों ही राजाओंके पुतोंके पुत्र विद्यमान हों, तो उनमेंसे वही विशेष है, जिसका पुग्न अभी युवा है, अर्थात् और पुत्र उत्पन्न करनेको शक्ति रखता है ॥ ३८ ॥ पदि दोनोंही अन्य पुग्न उत्पध करने की शक्ति रखते हों, तो उनमसे वही विशेष जोकि भासनतर भषियों (जल्दीसे जरदी) पुत्र उत्पस कर सकता हो । परन्तु यथाशक्ति पुनको देना नहीं चाहिए ॥३९॥ शक्तिमत्येकपुत्रे तु लुप्तपुत्रोत्पत्तिरात्मानमादध्यानचैकपुत्र- मिति ॥४०॥ पुनोत्पादनकी अथवा राज्यभारको वहन करनेकी, शक्ति रखनेवाले एक ही पुत्रके होमेपर, स्वय पुनोत्पादन शचिसे हीन हुए २ अपने आपको ही सन्धिको ताके रिये देदेवे। उपर्युक्त गुणासे युक्त एक्लौते पुत्रको फभी न देखें।
१७ अध्या०] पाइगुण्य (३२५) यहांतक सन्धिकर्म अर्थात् सन्धिके ६ करने के उपायोंका निरूपण किया गया।॥४०॥ अभ्युच्चीयमानः समाधिमोक्षं कारयेत् ॥४१॥ कुमारासन्नाः सत्त्रिणः काशिल्पिव्यञ्जनाः कर्माणि कुर्वाणाः सुरङ्गया रात्रा- चुपखानयित्वा कुमारमपहरेयुः ।। ४२ ।। सन्धिके कारण अच्छी तरह अपनी शक्ति बढ़ जानेपर, विश्वासके लिये दूसरे राजाके यहां रक्खे हुए राजपुत्र आदिको यहांसे मुक्त करालेवे ॥ १ ॥ उसको (राजपुग्न आदिको) वहाँसे छुराने के निम्नलिखित उपाय समझने चाहिये। राजकुमारके पास रहनेवाले अपने गूढ पुरप, बढ़ई लहार सुनार या मिस्त्री आदिके पेपमें रहने वाले अपने अन्य गुप्त पुरुप, वहाँपर अपमे २ कार्योको करते हुएही, राज कुमार के निवासके समीपसे एक सुरङ्ग खोदकर रात्रिम उसही मार्गसे उसे लेकर भाग भावें ।। ५२ ॥ नटनर्तकगायकवादकवाग्जीवनकृशीलवप्लवकमाभिका वा पूर्व- प्रणिहिताः परमुपतिष्ठेरन् ।। ४३ ।। ते कुमारं परम्परयोपतिष्ठेरन् ॥४४॥ अथवा नट अभिनय करनेवाला), नत्तक (नाचनेवाला), गायक (गाने पाला), वादक (यजानेवाला), याम्जीवन (कथा आदि कहकर अपनी जीविका करनेवाला फुशोलप (श्लोक पाठक अथवा स्तुतिपाठक), प्लवक (तलब र भादिफे खेल दिखानेवाला , सोभिक (आकाशमे उड़नेवाला , ये आठ प्रकार के धेपॉमें विजिगीषुके द्वारा भेजे हुए गुप्तचर पहिले शत्रु राजाके पास आध ॥ १३ ॥ फिर वे धीरे २ वहीं रहते हुए कुमार तक पहुंच ॥ १४ ॥ तेपामनियतकालप्रवेशस्थाननिर्गमनानि स्थापयेत् ॥ ४५ ॥ ततस्तद्वन्यजनो या रात्री प्रतिष्ठेत । ४६ ॥ तेन रूपाजीया भार्यान्यनाश्च व्याख्याताः ॥ ४७॥ वाह राजकुमार राजाको अनुमतिसे, अपनी इच्छानुसार चाहे जिससमय अपने घर में उन (मट आदि) को भानेजाने भोर ठहरने की व्यवस्था करा लेवे ॥५॥ फिर उनहोंमें से किमौका धेश यनार, रानिमें यहांसे निकल आवे । और उसके साथ ही अपने देशवो चलानावे ॥ ५॥ इसी प्रकार वेश्या भयया भार्याक बेशमें गये हुए गुस पुरपभी, राजकुमारको वहसि पुरा छानेका उपाय फरें ॥ १० ॥ . . .
. [७ माधे + (३२६) फौटलीय अर्थशास्त तेषां या तूर्यभाण्डफेलां गृहीत्वा निर्गच्छेत् ॥ १८ ॥ सदा. रालिकलापकसंवाहकास्तरककल्पकप्रसाधकोदकपरिचारकै; द्रव्य वस्त्रभाण्डफेलाशयनासनसंभोगनिहियेत् ॥ ४९.॥ अथवा नट मर्तक मादिक बागों या आभरणों (अभिनयकै समय समने के लिये घस्य आभूषण आदि) की पेटीको उठाकर उनके साथही बाहर निकल जावे ।। ५८ ॥ अथवा सूद (रसोईया, भारालिक मिष्ट आदि मनानेवाला), स्न'पक (स्नान आदि करानेवाला), संघाहक (शरीरको दबानेवाला), मास्तरफ (बिस्तर आदि बिछानेवाला), कल्पक (नाई), प्रसाधक (पस्त्र भादि धारण करानेवाला), और उदक परिचारक (जल आदि देनेवाला), इन लोगों के द्वारा जब कोई वस्तु (भक्ष्य आदि , वस्त्र भाभूपों की पेटी या विस्तर मादि अपने फाराम भानेवाली चीज बाहर लेजाई जावे, तब उसके साथ हो भवसर पाकर राज कुमारभी बाहर निकल जारे ॥ ४९ ॥ परिचारकच्छपना वा किंचिदरूपवेलायामादाय निर्गच्छेद ॥ ५० ॥ सुरङ्गामुखेन वा निशोपहारेण ।। ५१ ॥ तोयाशये या वारुणं योगमातिष्ठेत् ।। ५२ ॥ भण्या राजकुमार, नौकरके यहानसे भन्धकारके समय कोई वस्तु लेकर याहर निकलजाये ॥ ५० ॥ अथवा रातमे भूतवली (भूतोके उद्देश्यले भेट आदि करना) आदि देनेका यहाना परके सुरहके रास्तेसे याहर निकल जाये ॥५१॥ अथया मदी, तालाव आदि किसी यडे जलाशयम धारण योगका (जलके भीतर बैठरहनेवाले या यहां चलने फिरगेका उपाय विशेष । देखो:-अधिक १६, अध्याय १, सूर्य १३, १४) अगुष्टान फरक समयपर पाहर निकल जावे ॥५२॥ चंदेहकन्यवना वा पकानफलव्यवहारेणारक्षिषु समवचार- येयुः ।। ५३ ॥ दैवतोपहारश्राद्धप्रहवणनिमित्तमारक्षिषु मदनयोग युक्तमन्नपानं रसं या प्रयुज्यापगच्छेत् ॥ ५४ ॥ भषया व्यापारीके भैहमें रहनेवाले गुप्तपुरप, पहुए अक्ष या फल भादिक व्यवहार (प्रयोग) से पहरदारों को विष देदे । अथात् राजकुमारपर पहा देनेवाले रोगोंको, गुप्त पुरुष, अपादिके द्वारा विष देदेव | और जब वे घेहोश होजा, गुप्तपुरष राजकुमारको लेकर बाहर निकल जावें ।। ५३ ॥ अधमा देवताकी भेंट प्राद या प्रीतिमोजन के निमित्तसे, बेहोश करमेघाली पधियों
[७ अघि
(३२८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
अथवा औपनिषदिक प्रकरणमें पतापेहुए उपायोंसे अपनी शकलको
बिल्कुल यदलकर, या रोगीकासा भेस पनाका या जंगली भील कोल
आदिका भेस बनाकर, राजकुमार चुपचाप रातमें बाहर निकल पावै ॥६॥
अथवा राजकुमारको मुदीकी शकलमें अपने कन्धोपर रखकर, गूदपुरष थाहर
ले जावें ॥ ६२ ।। अथवा किसी मुके पीछे २ स्लीका वेश मनाकर, राजकुमार
याहर निकल जावे ॥१३॥
वनचरव्यञ्जनाचनमन्यतो यान्तमन्यतो पदिशेयुः ॥६४॥
ततो ऽन्यतो गच्छेत् ।। ६५ ॥ चक्रचराणां वा शकटवाटरपग-
च्छेत् ।। ६६ ॥
राजकुमारके बाहर निकल जानेपर, जब उसका अन्वेपण करनेवाले
राजपुरप इधर उधर जावे, तो जंगलियोंके भेस में रहनेवाले (राजकुमार पक्षके)
गुप्तपुरुष, इन इंदने वाले पुरपाको दूसराही रास्ता बतरादेवें । अर्थात् 'जिस
रास्तेसे राजकुमार जारहा हो उससे बिल्कुल उलटा रास्ता उन्हें पतादेव ॥६॥
और राजकुमार, अन्वेषकाको यतलाये हुए मासे भिन्न मार्गके द्वाराही जावे
॥ १५ ॥ अथवा गाड़ी चलानेवाले पुरपाकी गाड़ियोंके झुण्डके साथ २ ही
जावे ॥१६॥
आसन्न चानुपाते सत्तूं या गृहीयात् ।। ६७॥ सत्राभावे
हिरण्यं रसविद्धं वा भक्षजातमुभयतः पन्थानमुत्सृजेत् ।। ६८॥
ततो ऽन्यतोऽपगच्छेत् ॥ ६९ ॥
यदि अपने ढूंढनेवाले पुरुष, यहुतही समीप भाजारे, तो कहीं घने जंग.
लम छिप जावे ॥ ६७ ॥ यदि छिपने के लिये कहीं घना जंगल न मिले, तो
हिरण्य, अथवा विपयुफ खाद्यवस्तु, रास्तके दोनों ओर डालदेवे ।। ६०n और
फिर दूसरे किसी रास्तैसे निक्ल जावे ॥ ६९॥
गृहीतो या सामादिभिरनुपातमतिसंदध्यात् ।। ७० ॥ रस-
गिद्धेन वा पथ्य ( पाथेय ) दानेन ।। ७१॥
अयवा यदि इंढनेवाले पुरष इसको पका लेवें, तो सामदान आदि
उपायोंके द्वारा उसको धोखा देकर निकल जावे ॥ ७० ॥ अथवा विषयुक्त पा.
थेय (मार्गम खाने के लिये संभाया हुभा खाद्यपदार्थ) देकर उनको मार देवे,
मा मूति कादये, और स्वयं वहांसे निकल भागे ॥ ७॥
वारुणयोगाग्निदाहेपु वा शरीरमन्यदाधाय शत्रुमामियुञ्जीत
पुत्रो मे त्वया हत इति ॥ ७२ ॥
मारताला
.
१८ अध्या०]
पाड्गुण्य
(३२९)
पकड़े जानेके हरसे छिपे हुए राजकुमारको भगालेजानेका एक यह भी
उपाय है, कि पूर्वोक्त वारणयोग और अग्निदाहके अवसरोंपर, दूसरे किसी शरी.
रको वहां डालकर, विजिगीषु शके ऊपर भभियोग करे, कि तुमने मेरे पुनको
। इस अभियोगसे, शत्रु यह समझकर कि राजकुमार मरगया है,
उसका दूढना यन्द करदेगा । तथा राजकुमार निश्चिन्ततासे अपने देशमें चला
जावे ॥ ७२ ॥
उपाचच्छन्नशखा वा रात्रौ विक्रम्य रक्षिषु ।
शीघ्रपातैरपसरेद्गढप्राणिहितैः सह ॥ ७३ ॥
इति पाड्गुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे सधिकर्मसंधिमोक्ष. सप्तदशो ऽध्यायः॥१७॥
आदित पश्चदशशतः॥११५।।
अथवा पूर्वोक्त कोई भी उपाय यदि न किया जासके, तो राजकुमारको
चाहिये, कि वह रातम छितोर पर हथियारोंको लेकर अपने पहरेदारोंके ऊपर
आक्रमण करके या उन्हें मारकर शीघ्रगामी घोड़े आदि सवारियों के द्वारा, गूद
पुरपोके साथ २ बाहर निकलजाये ॥ ७३॥
पाइगुप्य सप्तम अधिकरणमें सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
.
.
अठारहवां अध्याय।
१२४-१२६ प्रकरण
मध्यम, उदासीन और अन्य राजमण्डलके प्रति
विजिगीषुका व्यवहार ।
मध्यमस्यात्मतृतीया पञ्चमी च प्रकृती प्रकृतयः ॥१॥
द्वितीया च चतुर्थी पठी च विकृतयः ।। २॥
मध्यम, स्वयं और तीसरी तथा पांचची प्रकृति अर्थात् मित्र और मिन-
का मिन, ये तीनों (भारमा, मित्र, मिमित्र), मध्यमकी प्रकृति कहाती है।
(मध्यम के अच्छीतरह सहायक होनेके कारण, ये उसके 'प्रकृति' कहे जाते
हैं।)॥ ॥ शत्रु, शत्रुका मित्र, और गायु के मियका मिन, ये तीनों मध्यमकी
• विकृति' कहे जाते हैं। क्योंकि ये मध्यमका विरोध करनेवाले होते है ॥२॥
तचेदुभयं मध्यमो ऽनुगृहीयाद्विजिगीपुर्मध्यमानुलोमः
स्यात् ॥ ३ ॥ न चेदनुगृहीयात्मकृत्यनुलोमः स्यात् ॥ ४ ॥
(३३०) । कोटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक मध्यमको चाहिये कि यह दोनों प्रकार के (प्रकृति और विकृतिरूप) राजाओंपर पूर्ग अनुमहबुद्धि रपे । और विजिगीपुको चाहिये कि यह सदा मध्यमराजाके अनुकूल बनारदे ॥ ५॥ यदि मध्यम दोनों प्रकार के राजाओंपर अनुग्रह न कर सके, तो अपनी प्रकृति अर्थात् मारमा, मित्र भीर मित्रका मित्र इनको तो अवश्यही अपने अनुकूल बनाये रक्से ॥४॥ मध्यमश्वद्विजिगीपोर्मित्रं मित्रमावि लिप्सेत मित्रस्यात्मनश्च मित्राण्युत्थाप्य मध्यमाच मित्राणि भेदयित्वा मित्रं बायेत ||५|| यदि मध्यम विजिगोपुके मिनभावि मित्र (देखो अधि. ७, अध्या. ९ . सूत्र ५५) को अपने अधीन करना चाहे, तो उस समय विजिगीपुको चाहिये, कि वह अपने मित्राके मित्र और अपने मित्रोंको सहारा देकर, तथा मध्यमके मित्रांका उससे भेद सलवाकर अपने मित्रकी रक्षा करे ॥५॥ मण्डलं या प्रोत्साहयेत् ॥ ६॥ अतिप्रवृद्धोऽयं मध्यमः सर्वेषां नो विनाशायाम्युत्थितः संभूयास्य यात्रां विनाम इति ।। ७ ।। तचेन्मण्डलमनुगृहीयान्मध्यमावग्रहेणान्मानमुपहयेत् ॥८॥ यदि विजिगीषु एसा न कर सके, तो मध्यमके विरुद्ध अन्य राजमण्ड लको इसप्रकार प्रोत्साहित करदे, कि ॥ ६ ॥ देखो, बहुत उरत हुआ २ यह मध्यम, हम सबकाही नाश करने के लिये उठ खड़ा हुआ है। हमको घाहिये, कि हम सब मिलकर इसके आक्रमणको रोकें ॥७॥ यदि इसमकार प्रोत्साहित किया हुआ राजमण्डल, अपनी (विजिगीषुकी) सहायना करनेके लिये तैयार होजाय, तो उनकी सहायतास मध्यमका निग्रह करके अपने पापको भच्छीत- रह उन्नत बनावे ॥८॥ न चेदनुगृह्णीयात्कोशदण्डाभ्यां मित्रमनुगृह्य ये मध्यमद्वे- पिणो राजानः परस्परानुगृहीता वा यहवस्तिष्ठेयुरेकसिद्धौ वा यहवः सिद्धयेयुः परस्पराद्वा शङ्किता नोत्तिष्ठेरंस्तेषां प्रधानमेक- मासनं पा सामदानाभ्यां लभेत ॥९॥ याद राजमण्डल विजिगीषुकी सहायता न करे, तोवहधन और सेनाके द्वारा अपने मित्रकी सहायता करके, जो बहुतसे राजा मध्यमके साथ प रख. नेवाले हों, भपश जो आपसमें एक दुसरेकी सहायता करके मध्यमका भपकार फरना चाहते हो, या जो मध्यम शत्रु, एकके अनुकूल (विजिगीषुके अनुकूल) दोजानेपर सप अनुकूल होजाये, अथवा मिलकर सिविलमकी कामना रहते हुए (३३१), १८ अध्या०] पाड्गुण्य मी परस्पर एक दूसरेके भयसे जो आक्रमणके लिए तैयार न होते हो, ऐसे मध्यमके शत्रु राजाओंमेसे एक प्रधान राजाको, अथवा अपने देश के समी- पके राजाको साम और दानके द्वारा अपने वश में करे, अर्थात् अपने अनुकूल बनावे ॥९॥ द्विगुणो द्वितीयं त्रिगुणस्तृतीयम् ॥१०॥ एवमभ्युवितो मध्यममवगृह्णीयात् । ।। ११॥ इसप्रकार दूसरे राजाकी सहायता मिल्नेपर विजिगीषु द्विगुणवलशाली होजाता है । यदि इसीतरह तीसरे राजाकी और सहायता मिलजावे, तो पिजि. गीपुका, तिगुना घल होजाता है ॥ १० ॥ इसप्रकार अपनी शक्तिको पदांकर विजिगीषु, मध्यमका निग्रह करे ॥१॥ देशकालातिपत्तौ वा संघाय मध्यमेतरमित्रस्य साचिव्यं कुर्यात् दृष्येषु वा कर्मसंधिम् ॥ १२ ॥ भथवा मध्यमके शत्रुओंकी सहायता लेनेके पहिलेही, देशकालके भनु- सार विजिगीषु सीधा मध्यमके साथही सन्धि करे, और फिर अपने उस मित्र (मिनभावि मित्र) के साथ भी मध्यमकी सन्धि फराकर उसको सहायता करे। यदि ऐसा सम्भव न हो, अर्थात् मध्यम यदि सन्धि न करना चाहे, तो मध्य. मके प्य पुरुषी (ऐस प्रधान कर्मचारी, जो भीतरही भीतर मध्यमसे समुता रखते हों) के साथ कर्म सन्धि करे । अर्थात् उनसे कहे कि तुम लोग अमुक स्थान आदिमें आग लगगदो, या इसीपकारका अन्य कोई उपद्रव राडा करदो, अनन्तर में इसके साथ युद्ध करूगा, इसप्रकार दूयोस सन्धि करे ॥ १२ ॥ अपने मिनमावि मिगको अधीन करने के लिये तैयार २मध्य- मके साथ विजिगीषुको क्या व्यवहार करना चाहिये, यह कहदिया गया । अब कर्शनीय मित्र (ऐसा मित्र जो विजिगीपुके विरुद्ध रहता हो, और इसीलिये विजिगीषु उसके धम और सेनामा क्षय करके जिसे कुश पनाना चाहता हो) को अधीन करनेके लिये प्रयत्न करते हुए मध्यमके सय चिजिर्ग पुका यया व्यवहार करना चाहिये, यह बताते है फर्शनीयं वास्य मित्रं मध्यमो लिप्सेत प्रतिस्तम्भयेदेनमहं त्या त्रायेय इस्साकर्शनात् ॥ १३ ॥ कर्शितमेतं बायेत ॥ १४ ॥ विजिगीपुळे रशनाय मित्रको यदि मध्यम अपने अधीन करना चाहे सो विजिगीषुको चाहिये, कि वह अपने उस मिनको अपनी भोरसे यह कहकर, [७ अधि० (३३२) कौटलीय अर्थशास्त्र अभय करदे, कि मैं मध्यमसे तुम्हारी रक्षा करूंगा, धपदाओ नहीं। परन्तु यह अभयवचन उसी समयतक होता है, जयतक कि मध्यमके द्वारा यह कृशताको प्राप्त करा दिया जाय । अर्थात् दुर्बल बना दिया जाय ॥ १३ ॥ कृशताको प्राप्त होनेपर तो इसको रक्षा, विजिगीपुको अवश्यही करनी चाहिये । अर्थात् जब यह दुबल यना दिया जाय, तो विजिगीषु अपदय इसकी रक्षा करे ॥ १४ ॥ उच्छेदनीय वास्य मित्रं मध्यमो लिप्सेत कर्शितमेतं त्रायत मध्यमवृद्धिमयात् ॥ १५ ॥ उच्छिन्नं वा भूम्यनुग्रहेण हस्ते कु- यादन्यत्रापसारभयात् ॥ १६॥ पदि पिजिगापुके उच्छेदनीय मित्रको मध्यम अपने अधीन कानाचाहे तो विजिगीपुको चाहिये कि वह अपने उच्छेदनीय मित्रकी उसी समय रक्षा फरे, जयकि मध्यम, उसको अरछी तरह कष्ट पहुंचा चुका हो; परन्तु अभीतक उच्छेद न किया हो । क्योंकि उसके उच्छेद करनेपर तो मध्यम और भी शक्ति शाली होसकता है, तथा विजिगीपुको भी हानि पहुंचा सकता है ॥ १५ ॥ अथवा उच्छिन्न हुए ३ उस मिग्रको अपनी ओरसे कुछ भूमि देकर अपने वश कर लेवे, अन्यथा यह सम्भव होसकता है कि यह शत्रु पक्षमें जाकर मिलजाय ॥ १६॥ कर्शनीयोच्छेदनीययोश्चेन्मित्राणि मध्यमस्य साचिव्यकराणि स्युः पुरुपान्तरेण संधीयेत ॥ १७॥ विजिगीप्योस्तयोमित्राण्य- वग्रहसमर्थानि स्युः संधिमुपेयात् ॥ १८ ॥ याद कशनीय और उच्छेदनीय राजाओंके अन्य मित्र मध्यमकीही सहा- यता करनेवाल हो, तो विजिगीषु को चाहिये कि वहभी अपने राजकुमार अथवा अमात्य आदिको उपस्थित फरफ (मध्यमके पास विश्वासकी दृढ़ताके लिये भाधिरूपमे रखकर) मध्यमस सन्धि करवे ॥ १७ ॥ पिजिगीपुके फर्श- नीय और उच्छेदनीय राजाओंके मित्र, यदि मध्यमका मुकाबला करने में समर्थ हो, तो विजिगीषुको चाहिये कि वह मध्यमके साथ सन्धि करलेवे । यहातक विजिगीपुके अपने मियोपर अभियोग करनेवाले मध्यमके साथ विजिगीषु का क्या अपहार होना चाहिये, इस यातका निरूपण किया गया । अव विनि- गीयुके शाापर अभियोग करनेवाले माघमके साथ विजिगीपुके व्यवहारका निरूपण करने आ लिप्सेत .० ॥ १९ ॥ एवं प्रियं . . ६ वार्थश्च १८ अध्या०] पाइगुण्य (३३३) 'यदि घिजिगीपुके किसी शत्रुको, मध्यम अपने अधीन करना चाहे, तो विजिगीपुको यह चाहिये कि वद मध्यमके साथ सन्धि कर लेधे ॥ १९॥ क्योंकि ऐसा करनेसे दोनों बातें सिद्ध हो जाती । एक तो अपने शत्रुका नाश हो जानेसे अपना कार्यसिद्ध होजाता है, और मध्यमका भी प्रिय होजाता है ॥२०॥ मध्यमश्वेत्स्वामित्रं मिनमावि लिप्सेत पुरुपान्तरेण संदध्यात् ॥२१॥ सापेक्षं या नाहसि मित्रमुच्छेत्तमिति चारयेदुपेक्षेत वा मण्डलमस्य कुप्यतु खपक्षपधादिति ।। २२ ।। • यदि मध्यम अपने ही किसी निग्रभावी मित्रको अपने अधीन करना चाहे, सो विजिगीपुको चाहिये कि अपने सेनापति आदिको भेजकर मध्यमको सदायता करे ॥ २१ ॥ अश्रया उस मिग्रसे अपनी अर्थसिद्धिको देखता हुआ, मध्यमको उसपर आक्रमण करनेसे यह कहकर रोकदेवे, किमिनका डरछेद करमा भाया नहीं होता। ऐसा करनेसे विजिगीपु, अन्य राजाओंका आधिक घिरवस्त होजाता है। अथवा यह सोचकर इसकी उपेक्षा ही कर देये, कि मध्यम यदि अपने मिय परही आसमण करेगा, तो इसका राजमण्डल ही इससे, यह जानकर कपिराहो जायगा,कि यह अपने मित्रकाही वध करने के लिये तैयार होगया है ॥ २२ ॥ अमित्रमात्मनो वा मध्यमो लिप्सेत ।। २३ ।। कोशदण्डा- भ्यामेनमदृश्यमानो ऽनुगृहीयात् ।। २४ ।। उदासीनं चा मध्यभो लिप्सेत ॥ २५॥ उदासीनाद्भिद्यतामिति ॥२६।। मध्यमोदामी- योर्यो मण्डलसाभिनेतस्तमाश्रयेत ।। २७ ।। यदि मध्या अपने किसी शत्रुको ही अपने अधीन करना चाहे ॥२३॥ हो विजिगीपुको चाहिये कि यह धन और सेनाके द्वारा छिपे तौरपर ही मधमके शत्रुकी सहायता करे ॥ २४ ॥ यदि मध्यस, किसी उदासीन राजाको अपने अधीन करना चाहे, सो विजिगोपु यह सोचकर कि 'मन उदासीनसे सर्वपर भेदको प्राप्त होजाय' मध्यम और उदासीन दोनामसे जो राजमपदलका अधिक प्रियहो उसहोके साथ मिल जाये । और उसकी सहायतामें लगनावे ॥ २५ ॥ ॥२६॥२७॥ मध्यमचरितनोदासीनचरितं व्याख्यातम् ॥ २८ ॥ उदा. सीनमध्यमं लिप्सेत यतः शत्रुमतिसंदध्यान्मित्रस्योपकारं कुर्या- (३३४) कौटलीय अर्थशास्त्र [७ अधिक दुदासीनं वा दण्डोपकारिणं लभेत ततः परिणमेत ॥२९॥ एव- मुपवृयात्मानमरिप्रकृति कर्शयन्मित्रप्रकृति चोपगृहीयात् ॥३०॥ मध्यमके चरितके समान, उदासीनका भी चरित समझ लेना चाहिये ॥ २८ ॥ यदि उदासीन राजा किसी मध्यम राजाको अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषुको चाहिये, कि वह इन दोनोमसे, उस राजाके साथ मिलजावे, जिसके साथ मिलनेसे अपने शत्रुका उच्छेद और मित्रका उपकार करसके अथवा मध्यम वा उदासीनको सेनाकी सहायता देकर अपने परामें फरसके ॥ २९ ॥ इस प्रकार विजिगीषु अपनी वृद्धि करके शनुरूप प्रकृति अर्थात् शनुका नाशकरे और मिग्ररूप प्रकृतिम उपकार करे ॥३०॥ सत्यप्यमित्रभावे तस्यानात्मनानित्यापकारी शनुः शत्रुसहितः पाणिग्राहो वा व्यसनी यातव्यो व्यसने वा नेतुरभियोक्तेत्यरि- भाविनः ॥ ३१॥ शनु शब्दसे कहे जानेवाले सामन्त तीन प्रकारके होते हैं। शत्रुभाषी मिग्रभावी, तथा भृत्यभावा, इन सयका क्रमपूर्वक निरूपण करते हैं.. अपने राज्यके साथ लगहुए होने के कारण, विजिगीपुके प्रति शत्रुभावकी समता होनेपर भी, यह सामन्त निन्न रीतिके अनुसार भार प्रकारका कहा जाता है. -अजितेन्द्रिय, सदा भपकार करनेवाला, शत्रु अर्थात् बिना ही कारण द्वेप करनेवाला, शत्रुको सहायतासे युक्त (अर्थात् विजिगीपुको शत्रुझी सहायता से युक्त), पाणिग्राह ( किसी दूसरे राजा पर चढ़ाई करनेपर पीछेसे उपद्रव करने धाला), और बन्धु आदिकी मृत्युसे दुखी, यातव्य (जिम पर आक्रमण किया जाय), विजिगीपुको व्यसनमें फसा देखकर उस पर आक्रमण करने घाला, यह शनुभावी सामन्त कहाता ह॥३॥ एकार्थाभिप्रयातः पृथगाभिप्रयातः संभ्ययात्रिका संहित- प्रयाणिकः स्वार्थाभिप्रयातः सामुत्थायिकः कोशदण्डयोरन्यतरस्य क्रेता विक्रेता द्वैधीभाविक इति मित्रभाविनः ॥ ३२ ॥ तथा विजिगीषुके साथ एकही अर्थकी सिद्धिके लिये यात्रा करनेयाला, अर्थात् जिस भूमि आदि अर्पकी सिद्धि के लिये विजिगीषु एक और जाये, उसी अर्थकी सिद्धि के लिये दूसरी ओर वो जानेवाला, भयया विजिगीपुके भूमिके रिये जानेपर स्वय हिरण्यके लिये जानेवारा, विजिगीषुके साथ २ ही 'याग्रा अर्थात् विसापर आक्रमण करनेवाला, विजिगीषुके साथ सम्धि करके, तू धाको जा, मैं इधरको जाऊंगा' इसमकार कहकर यात्रा करनेवाला, पिजिगीषु . १८ अध्या०] पाइगुण्य (३३) के ही किसी कार्यको सिद्ध करने के लिये यात्रा करनेवाला, विजिगीपुसे मिलकर शून्य स्थानोंके यसान के लिये प्रवृत हुआ २ धन और सेना इन दोनोंमेंसे किसी एकको एक दूसरेके बदले में खरीदने या येचनेवाला, द्वैधीभाष गुणसे उपयोग लेने वाला, ये सब आठ प्रकारके मित्रभावी सामन्त कहाते हैं ॥ ३२ ॥ सामन्तो बलवतः प्रतिघातोऽन्तधिः प्रतिवेशो वा बलवतः पाणिग्राहो वा स्वयमुपनतः प्रतापोपनतो वा दण्डोपनत इति भृत्यमाविनः सामन्ताः॥३३॥ तैर्भूम्येकान्तरा व्याख्याता॥३४॥ और सामन्त, बलवान् राजाका मुकाबला करनेवाला, अन्तधि, प्रति- धेश (पड़ोसी), बलवान् राजापर पीछेस आक्रमण करनेवाला, स्वयंही आकर आश्रित हुआ २ अथवा अपने प्रतापसे आश्रित किया हुआ या पलपूर्वक भपने अधीन किया हुआ; ये आठ प्रकारके हो भृत्य भावी सामन्त कहलाते हैं ॥ ३३ ॥ इन तीन प्रकारके (३१, ३२, ३३, सूत्र में कहे हुए ) शत्रुओंके समानही, भूम्ये कान्तर (एक देशके व्यवधानसे राज्य करनेवाले) मिन्नौकभी भेद समझ लेने चाहिये । अर्थात् जिसतरह शनु, शनुभावी, मिनभावी और भृत्य भावी ये तीन प्रकारके होते है, इसीतरह मित्र भी, शनुभावी, मित्रभावी और मृत्यभावी ये तीन प्रकारके ही होते है ॥ ३४ ॥ तेपां शत्रुविरोधे यन्मित्रमेकार्थतां व्रजेत् । शक्त्या तदनुगृह्णीयाद्विपहेत यया परम् ॥ ३५ ॥ उन भूम्यकान्तर मिग्रामें से किसीके ऊपर यदि शत्रु आक्रमण करदेवे, तो उस मित्रके साथ जो सन्धिकरे, यह धन और सेनाकी, उसको इतनी सहा- यता पहुंचावे, जिससे वह शत्रुको दबासके ।। ३५ ॥ प्रसाध्य शत्रु यन्मित्रं वृद्धं गच्छेदवश्यताम् । सामन्तैकान्तराभ्यां तत्प्रकृतिभ्यां विरोधयेत् ॥ ३६ ॥ जो मित्र अपने शनुको जीतकर वृद्धिको प्राप्त हुआ २, पशमें (अर्थात् पिजिगीषुके वशम) नहीं रहता, उसके सामन्त और भूम्यैकानार मित्रोंके तथा उनकी अमात्य आदि प्रकृतियोंके साथ किसी तरह उसका विरोध फरादेवे ॥३६॥ तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां भूमि या तस्स हारयेत् । यथा चानुग्रहापेक्षं वश्यं तिष्ठेत्तथा चरेत् ॥ ३७॥ भयया उसे अवश्य (अपने-पिनिगांधुके वशमें न रहनेपाले) मिनो • पारिवारिक यन्धुपान्धयों तथा नजरबन्द किशहुए पुनादिके द्वारा उसकी शूमिका [७ अधिक 1 (३३६) कौटलीय अर्थशास्त्र अपहरण कराये । अथवा अपनी सहायता पाहता दुभा यह जिस तरहभी परामें रहसक, उसीतरह उसके साय व्यवहार कियागाय ॥ ३७॥ नोपकुर्यादमित्रं वा गच्छेद्यदतिकर्शितम् । तदहीनमवृद्धं च स्थापयन्मित्रमर्थवित् ॥ ३८ ॥ जो मित्र क्षीण अवस्थाको प्राप्त हुआ २ अपने (विजिगीपुका) कोई उपकार न करसके, अथवा शत्रुके साप जाकर मिलनाये, अपने अर्थको सिद्ध करनेवाले विजिगापुको चाहिये, कि इस प्रकारके मित्रको ऐमीही अवस्थामें रक्से, जिससे कि यह न सर्वथा उच्छिम ही होजाय, और न अपनी वृद्धि ही करसके ॥ ३८ ॥ अर्थयुक्त्या चलं मित्रं संधिं यदुपगच्छति । तस्यापगमने हेतुं विहन्यान्न चलेद्यथा ॥ ३९ ॥ जो चल मित्र लोभक कारण सन्धि करता है, यह कदाचित् सन्धि तोड़ न देव, इस विचारसे, विजिगीषुको चाहिये कि उसके अर्थ लिप्सारूपी सन्धि विच्छेदके कारणको, स्वय ही कुछ धन आदि देकर नष्टकरदेवे । जिससे कि वह फिर सन्धि न तोरसके ॥३०॥ अरिसाधारणं यद्वा तिष्ठेत्तदरितः शठम् । भेदयद्भिनमुच्छिन्द्यात्ततः शत्रुमनन्तरम् ।। ४० ॥ जो धूतमित्र, अपने (विजिगीपुके) शत्रुके साथ मिलकर रहता हो, पहिले उसका शत्रुस भेद कराये । और भेद कराकर उसका उच्छेद करदे । तदनन्तर शत्रुकामी उच्छेद करदे ॥ ४० ॥ उदासीनं च यत्तिष्ठत्सामन्तस्तद्विरोधयेत् । ततो विग्रहसंतप्तमुपकारे निवेशयेत् ॥ ४१ ॥ जो मिन, शत्रु और विजिगीषु दोनोंकी ओरसे उदासीन रहे, विजिगीषु को चाहिये कि सामन्तोके साथ उसका विरोध करादे। जब सामन्त उसके साथ युद्ध छेपदे, और वह लड़ाईस बहुत तंग भाजावे, तब उसको अपने उपकारमें लगाने । अर्थात् उसको योग्य यनादेये, जिससे किवह अपने द्वारा किये जानेवाले उपकारका अपेक्षाको अच्छीतरह समझने लगे ॥१॥ अमित्रं विजिगीपुं च यत्संचरति दुर्वलम् । तबलेनानुगृह्णीयायथा सान्न परामुखम् ॥ ४२ ॥ जो दुर्घल मिन अपनी शक्ति बढ़ाने के लिये, शा और विजिगीषु दोनों का भाभय लेना चाहता है । विजिगीपुको चाहिये कि पेमे दुर्घळ मिन्नको सेना, - - r . २८ अध्या०] पाइगुण्य (३३७), भादिकी सहायता देकर सदा उपकृत करता रहे, जिससे कि वह परराइमुख न होये, अर्थात् शनुस जाकर न मिलजावे ॥ १२ ॥ अपनीय ततो ऽन्यस्यां भूमौ चा संनिवेशयेत् । निवेश्य पूर्व तत्रान्यद्दण्डानुग्रहहेतुना ॥४३ ।। अथवा उसकी, उसकी अपनी भूमिसे हटाकर किसी अन्य भूमेपर स्थापित करते, थवा वहां शत्रुकी सहायताकी कोई यक्षा नहीं ऐसी अपनी भूमिमें ही रहने । और उसकी भूमिमें उसके जानेसे पहिलेही सनाके द्वारा सहायता पहुचान के लिये, इस कार्य करनेमें समर्थ किसी अन्य व्यक्किा स्थापित करद ॥ १३॥ 1" अपकुर्यात्समर्थ वा नोपकुर्याबदापदि । उच्छिन्द्यादेव तन्मित्रं विश्वस्याङ्कमुपस्थितम् ।। ४४ ॥ जो मित्र विजिगोपुका अपकार करे, तथा विजिगीपुके उपर कोई श्राप ति आनेपर, प्रतीवार परमेमें समर्थ हुआ र मी उसको सहायता देथे, पिजि- गीपुको चाहिये कि ऐसे मित्रको, पहिल सूम, विश्वस्त बनाकर अपनी मुट्ठी में आजाने पर उच्छिा करदेव ॥ ४४ ॥ मित्रव्यसनतो वारित्तिष्ठेद्यो ऽननग्रहः । मित्रेणेवा भवेत्साध्यः छादितव्यसनेन सः ॥४५ ॥ यदि विजिगीपुका शनु, विजिगीपुके मिनपर कोई आपत्ति आजानेके कारण विशाही किसी रफायटके अपनी उन्नति करले, तो विजिगीपुको चाहिये कि वह अपने मित्रकी आपत्ति हट जाने पर अथवा आपत्तिको अप्रकाशित करके ही अर्थात् उसे वीचमही दबाकर उस मिनके द्वाराही शनुको याम करेन का यक्ष करे ॥ ४५॥ अमित्रव्यसनान्मिनमुत्थितं यद्विरज्यति । अरिव्यसनसिया तच्छनुणैव प्रसिद्धयति ॥ ४६ ।। इसी प्रकार जो मित्र, भपने शत्रुपर भापति आनानेसे उठत होकर विजिगी पुसे अपरत होजाता है, अथात् उरपल दोकर विजिगीपुझे भपूल नहीं रहता विजिगी पुको चाहिये कि ऐसे मित्रको, शकी आपतिके दूर होजाने पर उसीके द्वारा चशमें करे ॥ १६॥ वृद्धिं क्षयं च स्थानं च कर्शनाच्छेदनं तथा । सर्वोपायान्समादध्यादेतान्यश्वार्थशास्त्रवित् ॥ ४७ ।।
। (३३८) फौटलीय अर्थशास्त्र [७ आधि० अर्थशारत जाननेवाले राजाको उचित है, कि यह सि, क्षय, स्थान (उअति भवनतिसे रहित एकही अवस्था रहना), फर्शन और उरदन, इनका तथा सब ही साम दान आदि, उपायोका अच्छी तरह विचार पूर्वक प्रयोग करें ॥१७॥ एवमन्योन्यसंचारं पागुण्यं यो ऽनुपश्यति । स बुद्धिनिगलैबरिष्ट क्रीडति पार्थिवैः ॥४८॥ इति पाद्गुण्ये सप्तमे ऽधिकरणे मध्यमचरितमुदासीनचरितं मण्डल. चरितमटादशोऽध्यायः। आदित. पोदशशतः ॥१६॥ एतामता फौटलीयस्यार्थशास्त्रस्य पाइगुण्यं सप्तममधिकरणं समाप्तम् । इस प्रकार जो राम्रा, भापसमें जकड़े हुए इन छ: गुणोंको मच्छीतरह विचारपूर्वक प्रयुक्त करता है। यह निश्चय ही अपनी बुद्धिरूपी संकल्से पांचहुए अन्य राजाओं के साथ इच्छानुसार क्रीड़ा करता है ॥८॥ पारगुण्य सप्तम अधिकरणमें अठारहवां अध्याय समाप्त । पाड्गुण्य सप्तम अधिकरण समाप्त ।
व्यसनाधिकारिक अष्टम अधिकरण। । पहिला अध्याय 1 11 - १२७ प्रकरण प्रकृतिव्यसनवर्ग व्यसनयोगपद्ये सौकर्यतो यातव्यं रक्षितव्यं चेति व्यसन- चिन्ता ॥१॥ दैवं मानुपं वा प्रकृतिव्यसनमनयापनयाभ्यां संभवति ॥ २॥ जब पानु और विजिगीषु दोनोंपर समान ही विपत्ति हो, और शत्रुपर आक्रमण तथा अपना रक्षा करने में भी समानता ही दीखती हो, तब उस अव स्थामें शत्रुपर आक्रमण करना चाहिये, या अपनी रक्षा करनी चाहिये, यह विचार किया जाता है । इसलिये सयस प्रथम इस अध्यायमें व्यसनों (विप त्तियों) का चिन्तन किया जाता है। कौनसा व्यसन बड़ा या कौनसा छोटा होता है ॥॥ व्यसन दो प्रकारका होता ह, एक दव और दूसरा भानुपा अमात्य आदि प्रकृति वर्गके ये व्यसन अनय आर अपनयसे ही पदा होते सन्धि आदिकी उचित व्यवशा न करना अनय, और शत्रुसमूहसे पीड़ित होते रहना अपनय कहाता है ॥२॥ गुणप्रातिलोम्यमभावः प्रदोपः प्रसङ्गः पीडा वा व्यसनम् ॥३॥ व्यस्यत्येनं श्रेयस इति ज्यसनम् ॥ ४॥ महाकुलीनता आदि गुणोंकी प्रतिकूलता, इसी प्रकार के अन्य गुणोंका न होना, अथवा सन्धि आदि गुणोंका उचित उपयोग न करना, कोप आदि दोषोंका पजाना, विषयों में अति भासक्ति हाना, और शत्रुओं के द्वारा पीरित हना, ये पांच प्रकारके व्यसन कहाते हैं। यात उक प्रकार राजापर विप सिका भाना ही व्यसन कहाता है॥३॥ ध्यसनका शम्दार्थ भी यही है कि जो , [८ अधिक । ani (३४०) कौटलीय अर्थशास्त्र पुरुषको फल्याण मार्गसे भ्रष्ट करदेवे । जो कार्य राजाको उत्सत भवस्थासे नीचे गिराने वाला हो, वही उसके लिये व्यसन कहाजाता है ॥ ४॥ खाम्पमात्यजनपद कागदण्डामित्रव्यसनानां पूर्व पूर्वगरीय इत्याचार्याः ॥५॥ आचार्योका मत है कि स्वामी (राजा), अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, सेना और मिन, इनपर विपत्ति आनेपर, अगलकी अपेक्षा पहिरेपर विपत्तिका भामा अत्यन्त कष्टकर है । अर्थात् राजा और अमात्य इन दोनोंपर आपत्ति आने पर राजाकी आपत्ति अधिक भयावह है, इसी तरह आगे भी समझ लेना चा- हिये ॥५॥ नेति भारद्वाजः ॥ ६॥ स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीय इति ॥ ७॥ मन्त्री मन्त्रफलावाप्तिः कर्मानुष्ठानमायव्यय- कर्म दण्डप्रणयनमाभित्राटयो प्रतिषेधो राज्यरक्षणं, व्यसनप्रतीकारः कुमाररक्षणमभिपेकश 'कुमाराणामायत्तममात्येषु 12 परन्तु भारद्वाज (मीण भाच ये, इस सिद्धान्तको नहीं गागता॥ ६ ॥ उसका कहना है कि, यदि स्वामा और अमारयपर एक साथ दो स्यसन आप, सो अमात्यका व्यसन ही अधिक भयावह या फटकर है ॥ ७ ॥ क्योकि प्रत्येक कार्यको विचार, उनके फराफलको प्राप्तिका विचार, निधित कार्यों का करना, आय आर समयकी स्वस्थर, सेनाकी स्यवस्था (अधार सेनाका संग्रह करना और उचित स्थानों पर इसका उपयोग फाना), शत्रु और आरवि (मारधाड करने पाले, या सीमा प्रनों पर छापा मारने वाले जगलो आद) का निराकरण करना, अपने राज्यकी रक्षा करना, विपत्तियों का प्रकार काना, राजकुमारको संक्षा और उनका अभिपैक करना, इस्पादि सय ही कार्य अमात्योंपर ही निर्भर होते हैं। हमरिये उनपर प्यसन आना अधिक भयावह होता है । ८ ॥" तेपाममा तदमावश्छिन्नपक्षस्ये राज्ञश्चेष्टानाशो व्यसनेषु चासनाः परोपजापाः ॥ ९ ॥ वगुप्ये च प्राणवाधः ताणान्तिक- चात्वाद्राज इति ॥१०॥ । । इसप्रकारके आमारपाक न रहनेपर ये सय ही कार्य नष्टपाय होजाते है। पार पख करे हुए पक्षाके समान राजा भी सम्पूर्ण कार्यक्रमाका नाश होजाता है, शथा.यसनाफे स्परिणत पनेपर यहां शनु अपने पद्य-योका जाल पलाने स्मता ॥९॥ या श्रमायाँ विगुण, भर्यान् प्यसनी या विपरीत होजानेपर (३४२) कोटलीय अर्थशास्त्र [८ मषिः पत्र तथा लोहा साया आदि सेवक या भृत्यवर्ग, घोड़े उँट आदि सवारियां, भन्न तथा घृत सैल आदि सभी सामान जनपदसे ही प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥ जन- पदपर विपत्ति भानेसे जनपदका नाश होनेपर इन सब घस्तुभोंको भी माश होजाता है, तया इनके प्राप्त न होनेपर फिर भमास और राजाका भी उच्छेद "होजाता है ॥२१॥ नेति कौटल्यः ॥ २२ ॥ अमात्यमूलाः सर्यारम्माः ॥ २३ ॥ 'जनपदस कर्ममियः स्वतः परतश्च योगक्षेमसाधनं व्यसनप्रती- कारः शून्यनिवेशोपचयो दण्डकरानुग्रहश्चति ॥ २४ ॥ परन्तु कोटल्स प्राचार्य विशालाक्षके इस मतको नहीं मानता ॥२२॥ क्योंकि यह कहता है कि सपही कार्योका निर्मर अमात्योपर है। अयांत अमा. योंके द्वारा ही सब कार्योका आरम्भ किया जाता है ॥ २३ ॥ जनपदके दुर्ग तथा कृषि आदि कार्योकी सिद्धि, राजकीय परिवार भोर भरतपाल तथा भाट. विकोंकी ओरसे योगक्षेमका साधन, आपत्तियोंका प्रतीकार, निर्जन प्रदेशका घसाना और उनको वृद्धि करना, अपराधिपाको दण्ड देना तथा राजकरका संग्रह करना इत्यादि सब कार्य भनात्यों के हो करनेके हैं। उनपर विपत्ति आने पर जनपद सम्बन्धी ये कार्य सम्पादन नहीं किये जामाते। इसलिये जनपदकी विपत्तिको अपेक्षा अमात्योपर विपत्तिका भानाही अधिक भयावह होता है ॥२४॥ जनपददुर्गच्यसनयोर्दुर्गव्यसनमिति पाराशराः ॥ २५ ॥ दुर्गे हि कोशदण्डोत्पत्तिरापदि स्थानं च जनपदस्य शक्तिमत्तराय पौरजानपदेभ्यो नित्याश्चापदि सहाया राज्ञो जानपदास्त्वमित्र- साधारणा इति ॥ २६॥ पराशर मतानुयायी भाचायोका मत है कि जनपद और दुर्ग इनदोनो पर साथहो विपत्ति आनेपर, जनपदकी विपत्तिको अपेक्षा दुर्गपर भाई हुई विपति ही अधिक भयावह होती है ॥२५॥ क्योकि कोश ओर सेनाको दुर्गमें ही सुरक्षित रक्सा जा सकता है । शत्रुके द्वारा जनपदपर कोई विपत्ति आनेपर दुर्ग ही भाययस्थान होता है। नगर तथा जनपदों ( अर्थात् वहाँ रहनेवाले पुरपों) की अपेक्षा दुर्ग अधिक शक्तिशाली तथा स्थायी होते हैं, तथा किसी प्रकारकी भी भापत्ति आनेपर हर तरहसे राजाके सहायक होते हैं। इनके (दुर्गाके) मुकामले में जानपदों (अर्थात् जनपद निवासी पुरषों) को सो शत्रुके समान ही समझना चाहिये । क्योंकि किसी प्रकार के यहाँ आजानेपर, . १ अध्या०] व्यसनाधिकारिक (३४३) उसकोभी धे कर आदि देकर उसकी सहायता के लिये भी तैयार होसकते हैं। इस लिये जनपदको विपत्तिकी अपेक्षा दुर्गकी विपत्तिको ही अधिक भयावह समझना चाहिये।॥२६॥ नेति कौटल्यः ।। २७ ।। जनपदमूला दुर्गकोशदण्डसतुवा- रम्भाः शौर्य स्थैर्य दाक्ष्यं बाहुल्यं च जानपदेषु ॥ २८ ॥ परन्तु कौटल्य आचार्य पारशरोंके इस मतको ग्राश नहीं समझता ॥ २७ ॥ क्योंकि वह कहता है कि दुर्ग, कोश, सेना सेतुबन्ध और फाप आदि सबही कार्य, जनपदके ऊपर ही निर्भर हैं । तथा शूरता, स्थिरता, चतुरता और सख्याकी अधिकता भी जानपदों (जनपद निवासी पुरुषों) में ही हो सकती है॥२८॥ पर्वतान्तीपाश्च दुर्गा नाध्युष्यन्ते जनपदाभावत् ॥ २९ ॥ कर्षकमाये तु दुर्गन्यसनमायुधीयभाये तु जनपदै जनपदव्यसन- मिति ॥ ३०॥ यदि जनपद पर भापत्ति मानेसे उसका नाश होजाय, तो पर्वतों और नदी जलाशयों भादिके भीतर थन हुए, अत्यन्त दृढ दुर्गभी सून पो रहत हैं। अर्थात् जमपदके न होनेपर उनका कुछगी उपयोग नहीं हो सकता । इस लिये दुर्ग व्यसन की अपेक्षा जनपद व्यसनको ही अधिक भयायह समझना पाहिये ॥ २९ ॥ पान्तु इसमें इतना विशेष है कि जैसे जनपद रहित दुर्ग सूना पड़ा रहता है, ऐसे ही दुर्ग राहत जनपद में भी निवास होना दुप्पर ही है। इस लिये यहा इतना पिवेक मा चाहिये, कि जो कृषि प्रधान प्रदेश हैं यहां दुर्गपर भापति आना अधिक भयापह है। तथा शो आयुधप्रधान देश हो अर्थात् जहाँ सबल योद्धा ही अधिक यसते हों, वहां जनपदपर विपत्तिका आना अधिक भयावह है। क्योंकि ऐसे प्रदेशमें दुर्गकी विपत्तिका तो योद्धा जन अच्छीतरह प्रतीकार करसकते हैं ॥३०॥ दुर्गकोशव्यसनयोः कोशव्यसनमिति पिशुनः ॥ ३१॥ को- शमूलो हि दुर्गसंस्कारो दुर्गरक्षणं च ।। ३२ ।। दुर्गः कौशादुप- जाप्यः परेपाम् ॥ ३३ ॥ पिशुन (नारद) भाचार्यका मत है कि दुर्ग और कोश इनपर साथ ही विपत्ति आनेपर दुर्गकी आपत्तिकी अपेक्षा कोशपर आईहुई विएति ही अधिक भयावह होती है ॥ ३॥ ॥ क्योंकि दुगकी मरम्मत भार उनकी रक्षा, कोतपर ही निर्भर ६ ॥ ३२ ॥ कोदाके सहारेसे शत्रुओं के दुर्गका उरछेद भी किया जा 1 1 कौटलीय अर्थशास्त्र [८ अधिक सकता है। तात्पर्य यह है कि आधुदुर्गास्थत पुरषों को प्रमादिके द्वारा थपनी और मिलाकर शत्रुदुर्गरा, निराकरण या विध्यम किया जा सकता . - जनपदमित्रामित्रनिग्रहो देशान्तरिवानामुत्माहनं दण्डबल- व्यवहारः ॥३४॥ कोशमादाय च व्यसने शक्यमपयातु:न दुर्ग- मिति ॥ ३५ ॥ कोशके द्वारा ही जनपद, मित्र तथा यात्रुका निग्रह भी किया जा सकता है । इसोके सहारे देशान्तारेरा (दूर देशमें रहनेवाले ) राजाओं को भी अपनी सहायताके लिये प्रेत्साहित किया जासकता है। सपा सनिकात्तिका उपयोग भी कोशपर हा निर्भर है ॥ ३५ ॥ यदि अचानक कोई विपत्ति आपटे ता काशका अपन साथ लकर भागाभी जासकता है। परन्तु ऐसी ,गवस्था दुगेको अपन साथ नहीं लेजाया जासकता। येहा पाते हैं जिनसे मालूम होता है कि दुगम्यसनका अपक्षा काशव्यसन अधिक कष्टकर है ॥ ३५॥ नेति कौटल्यः ।। ३६ ।। दुर्गापणः कोशो दण्डस्तूष्णीयुद्वं स्वपक्षीनग्रहो दण्डवलव्यवहार आमारप्रतिग्रहः परचक्राटवीप्रतिपे- धश्च ॥ ३७॥ परन्तु काटल्प आच'ये भारदके इस मतको ग्राह्य नहीं समझता ॥३६॥ क्योकि यह कहता है कि हमारे काश आर सेना दोनोंको रक्षा दुर्गफे द्वाराही हो सकता है । सूप्णायुद्ध, अधीर गा पुरुष आदिके द्वारा चुपचाप किसीका पध कराना, अपन पक्षके दूष्य (राजद्रोहा ) पुरपोका निग्रह करना, सैनिक शक्तिको व्यवस्था अथात् उसका ठीक २ उपयोग करना, मित्र सेनाका प्रतिप्रह (स्वीकार) अर्थात् उसे भाश्रय देना, आर शत्रु समूह तथा आरधिकों का निरा- करण करना य सब बातें मुर्गके द्वारा ही की जासकती है ॥३०॥ दुर्गाभावे च कोशः परेपाम् ॥ ३८ ॥ दृश्यते हि दुर्गवता- मनुच्छितिरिति ॥ ३९॥ तथा दुर्गपर दिपति भानेसे उसका नाश हो जानेपर, यह भी सम्म है कि हमारे कोशको शनु छीनकर लेतवे । क्योंकि उसकी रक्षाके लिये हमारे पास कोई साधन नहीं ॥ ३८ ॥ आर यह देखा जाता कि जिनके पास कोई अधिक भारो कोश नहीं है, परन्तु दुर्ग मास भरपन्त इद हैं, उनका उच्छेद नहीं किया जासकता । इस लिये कोशम्यसनकी अपेक्षा दुर्गव्यसन ही क्षधिक कष्टकर समझना चाहिये ॥ ३९ ॥ -- । १२ अध्या०] व्यसनाधिकारिक (३५). कोशदण्डव्यसनयोर्दण्डव्यसनमिति कौणपदन्तः ॥ ४ दण्डमूलो हि मित्रामित्रनिग्रहः परदण्डोत्साहनं स्वदण्डप्रतिग्रहव- ।। ४१॥ दण्डाभावे च ध्रयः कोशविनाशः ॥ ४२ ॥ कोणपदन्त (भीम ) आचार्यका मत है कि कोश और सेना दोनोंपर व्यसन (वित्ति) आनेपर, कांश पसनकी अपेक्षा सेनाका ग्यमनही अधिक कएकर होता है ॥ ४० ॥ क्योकि शत्रु और गिन्नका निग्रह सेनाके द्वारा ही हो सकता है। दूसरेकी आईहुई सेनाको सेना द्वारा ही प्रोत्साहित किया. जासकता है, अर्थात् कार्यपर लगाया जासकता है । तथा अपनी सेनाका अधिक समह भी सेनाके द्वारा ही किया जासकता है। क्योंकि अपना सैनिक मल न होनेपर, शत्रु भागे विजिगोपु कभी भपनी सेना बदा नहीं सकता ॥ ११॥ यदि सेनापर विपत्ति बाजानेले वह नष्ट हाजाय, नो निशप ही योशका माश होजाता है। क्योंकि उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं रहता ॥ १२॥ कोशाभावे च शक्यः कुप्येन भूम्या परभूमिखयंग्रहेण वा दण्डः पिण्डयितुम् ॥ ४३ ॥ दण्डवता च कोशः ॥ ४४ ॥ खा- "मिनधासन्नवृत्तित्वादमात्यसधर्मा दण्ड इति ॥ ४५ ॥ कोश न होने पर भी खाभरण आदिके द्वारा, भूमिके द्वारा, अथवा पल. पूर्वक प्रहण किपेटुए शत्रुके दन्यके द्वारा सेनाका सम्रा अच्छी तरह किया जासकता है ॥ ४३ ॥ तथा सेनाका संग्रह होने पर कोश भी इकट्ठा सकता हे ॥ ५४॥ सदा स्वामी (राजा) के समीप रहनके कारण, सेनाको समायों के समान ही समझना चाहिये । अयात् जसे राजाके पास रहताहुआ अमात्य, उसकी हरतरहसे भलाई करता है, इसीप्रकार राजाके समीप रहती हुई सेना भी सदा राजाका उपकार करती है। इसलिये कोशम्यसनकी अपेक्षा । सेनाका व्यसन अधिक भयावह है ॥ १५॥ - नेति कोटल्यः ॥ ४६॥ कोशमूलो दण्डः ॥ १७॥ कोशाभावे दण्डः परं गच्छति ॥४८॥ स्वामिनं वा हन्ति ॥४९॥ सर्वाभियोगकरथ ॥ ५० ॥ कोशो धर्मकामहेतुः ॥ ५१ ।। परन्तु कीटल्य भाचार्य भीमके इस मतको प्राश नहीं समझता ॥४॥ पद कहता है कि सेनाकी स्थिति फोशपर ही निर्भर है॥ ४०॥ कोदान "दोनेपर सेना, या तो शके अधीन होजाती है ॥ ५८ या भरभ 'सामीका किया जा - . . (३४६): फौटलीय अर्थशास्त्र [८ अधि० ही पध'पर डालती है ॥ १९ ॥ सये सामन्तों के साथ विजिपुिका विरोध भी सेना फरासकती है। क्योकि ार्थ (धर ) के देनेगर सब ही वशम करलिये जाते हैं ॥ ५० ॥ चतुर्वंग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष), के भभूत धर्म और कामकी माहि भी कोश (अर्थ) के ही द्वारा होसक्ती है। कोश ही इनका कारण है । तात्पर्य यह है -इस लोकमै होनेवाले धर्म, अर्थ, काम इस नियर्गके बीच में अर्थ भैठाहुआ है, यह इधर उधर लगेहुए धर्म और काम धोनोंको सिद्ध करता है। भात् दोनोंका निर्भर केन्द्रस्थित अर्थपर ही २ देशकालकार्यवशेन तु कोशदण्डयोरन्यतरः प्रमाणीभवति ॥ ५२ ।। लब्धपालनो हि दण्डः कोशस्य ॥ ५३ ।। कोशः को- शस्य दण्डस्य च भवति ॥ ५४ । सनद्रव्यप्रयोजकत्वात्कोगव्य. सनं गरीय इति ॥ ५५ ।। किन्तु इनमें इतना विशेष समझना चाहिये, कि देश, काल तथा कार्यके भनुसार कोश और सेना इन दोनॉमसे किसी भी एकको प्रधान माना जासकता जिसके कि भरोसे पर विजिगीपुका निर्वाह हे सके ॥ ५२ ॥ परन्तु सेना प्रध नता पतलाने वाले नाच र्यने पीछे जो यह यात कही है, कि सेनाके में होनेपर निश्चय ही कोशका विन श होजावेगा, यह ठीक नहीं है क्योकि सेने। फेवल कोशकी ही रक्षा करसकती है ।। ५३ ॥ परन्तु कोश, सेना और कोश दोनोंकी रक्षा करसकता है ॥ ५४ ॥ इसलिये सय प्रकृत्तियों (दुर्ग आदि) के निवाहका कारण होने के कारण कोशके ऊपर आईहुई विपत्ति, अत्यन्त कष्टकर होता हे॥ ५५ ॥ दण्डभित्रव्यसनयोभिनव्यसनमिति वातव्याधिः ॥ ५६ ।। मिनमभृतं प्यवहितं च कर्म करोति ॥ ५७ ॥ पाणिग्राहमासा- रममित्रमाटपिकं च प्रतिकरोति ॥ ५८ ॥ कोशदण्डभूमियोप- करोति व्यसनासम्यायोगमिति ॥ ५९ ॥ पतम्याधि ( उलव) भाचार्यका मत है कि अपनी सेना आर अपने मित्र दोनोंपर एकसाथ विपी आनेपर अपने मिनपर आई हुई विपास सेनाकी वित्तिको अपेक्षा अधिक भयावह होती है॥५६॥ क्योकि मि: पर रहताहुभा भी, पिंगा ही कुछ घेराालियहुए विजिगापुके कार्यको करदेस परन्तु रोगाके हिपे पेपन भौर निगरागी दोमानी जस्ता पाती है ॥५७ भौर मिश, पानिमाइका, पाणिमाके मका, पातु सपा आरषिकर है । १ गया. यसनाधिकारिक *1३४७) प्रतीकार करने के लिये सदा तैयार रहता है, सा प्रतीकार करसकता है ॥५०॥ जोश, सेना और भूमिके द्वारा, विजिगीषुमा यरायर उपकार करता रहता है । तथा विजिगीपुकी विपत्ति अवस्थामें भी उसका साथ नहीं छोरता । इसलिये सेनाक जयसनी अपेक्षा भिवाम्पसन अधिक कष्टकर सोता ह॥ ५९॥ नेति कैटल्यः ॥ ६० ॥ दण्डनतो मित्रं मित्रभाने तिष्ठत्य- मिनो या मिनभाये ॥६१ ॥ दण्डमिनयोस्तु साधारणे कार्य सान्तः स्वयुद्धदेशकाललाभाद्विशेषः ॥ ६२ ॥ परन्तु कीटस्य आचार्य बातम्यारिके इस सिद्धान्तको प्राह्य नहीं • समझता ॥६०॥ यह कहता हकि जिसक पास सेनाकी भरी शक्ति होती उसके मित्र तो मित्र बने ही रहते , किन्तु शत्रु भी भित्र पनजावे ॥ ६॥ सेना और मित्र इन साधारण कार्या, लामो अनुसार अपने युद्ध, देश, मोर कालही अपेक्षासे विशेषता समझना चाहिये ॥ १२ ॥ शीघ्राभियाने त्वमित्रादपिकाभ्यन्तरकोपे च न मित्रं विद्यते ॥६३॥ व्यसनयोगपद्ये परवृद्धौ च मित्रमयुक्तौ तिष्ठति ।। ६४॥ प्रकृतिव्यसनसंप्रधारणमुक्तमिति ॥ ५ ॥ कहीं शोध आक्रमण करनेपर अथवा शनु और आरविकोंदे या भम्पन्तरकोप (विजिगीपुके भरने देश या अमात्य आदि प्रकृतियों में परस्पर के कोप) के उपस करदेनेपर, इसका मतीकार करने के लिय मित्रका कुछ भी उपयोग नहीं हांसकता। ऐसे अवसर अपनी सेना ही काम दती है॥१३॥ एकसाथ भापति भाजानेपर अधवा शत्रु पद जानेपर मिन ही अर्थसिद्धि में सहायक होता है ॥६॥ यहां तक प्रतिव्यसनका निर्गप करदिया गया ॥६५॥ प्रकृत्यवयानां तु व्यसनस्य विशेषतः । पहुभानो ऽनुरागो पा सारो वा कार्यसाधकः ।। ६६ ।। स्थामी भमास आदि प्रतियोके जो भवयर होते (जैसे-हामी पए तके अपयर राा युवराज भादि, अमात्य प्रतिक मन्त्री मन्ग्रपरिषद् भादि जनपदके किसान आयुधजीवी भादि, दुर्गा धान्यन का भादि, कोश रय सार पाणु आदि, दण्रक मोठ भूत भादि, मित्र सहज तपा निग आादि अवयव हराते हैं। उनके पी पक्ष दुमरेपर विशप पपन मापनपर भी, जिप प्रतिपा मसन पाह, पत्री अधि: सापा, स्वामी में भक्ति पिप गुणास गुफ हाना, यात फारको मिस करने चारी हाती वारपर्य प है कि यदि शत्रुपर दुर्ग यमन मकर पाना भार -कौटलीय अर्थशास्त्र . • [८ अधिः (३८) विजिगीपुपर जनपदम्पसन, तो दुर्गध्यमनसे जनपद्व्यसन यद्यपि गुस्तर भधांत अधिक हानिकर है, फिर भी यदि जनपदफी संरया ग्रहुत अधिक है, भौर वह अपने स्वामीमें भक्ति रसनेवाला तथा गुणशाली है भीर शत्रुक दुगोंमें यह बात नहीं है, तो विजिगीपुको शानुपर आक्रमण करदेना चायिये, इस प्रकारको अवस्था विजिगीपुके लिये अवश्य सिद्धिकर होती है । ६६ ।। द्वयोस्तु व्यसने तुल्ये विशेपो गुणतः क्षयात् । शेपप्रकृतिसाद्गुण्यं यदि स्यान्नाभिधेयकम् ॥ ६७ ।। यह उपयुक्त कथन शत्रु और विजिगीपुपर मिल २ व्यसन होने के सम्बन्ध कियागया है, यदि दोनोंपर समान ही व्यसन हो, तो एकके गुणशाली और दूसरेके गुणहीन होनेपर ही विशेषता होती है । (मानलिया जाय, कि शनु और विजिगीषु दोनोंपर जनपदव्यसन आपडा है, यदि विजि गीपुकै जनपदके अपययोंकी संरया बहुत है, ये स्वामिभक्त और गुणशाली है तथा ये यात शनुके जनपदम नहीं है, तो विजिगीषुको शत्रुपर आक्रमण करदेना चाहिये, उसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है। परन्तु जिम प्रकृतिपर ग्यसन है उससे अतिरिक्त शेप सबही प्रकृति यदि अपनी २ ठीक अवस्था में होने के कारण विशेष शक्तिशाली है, तो यह पूर्वोक्त विशेषता न समझनी चाहिये । तात्पर्य यह है कि जनपदव्यसनके तुल्य होनेपर भी और उसमें भाधिक्य भादि न होने पर भी यदि शत्रुकी अन्य प्रकृति अच्छी शक्तिशाली हैं, तो ऐसी अवस्थाम विजिगीपुको उसके ऊपर कदापि भाक्रमण न करना चाहिये ॥ ७ ॥ शेपप्रकृतिनाशस्तु यत्रैकव्यसनाद्भवेत् । व्यसनं तद्गरीयः स्यात्प्रधानसेतरस्य वा ॥ ६८॥ इति स्पसनाधिकारिक ऽटमेऽधिकरणे प्रकृति यमनवर्ग प्रथमो. यार ॥१॥ आदित सप्तदशशत ॥१७॥ यदि एक प्रकृतिपर पन आनेसे शेष प्रकृतियोंका भी नाश होता हो, तो चाहे यह व्यसन प्रधानप्रकृति सम्बन्धी हो, या अप्रधान प्रकृति सम्बन्धी हो, उसे सबही व्यमों की अपेक्षा गुरतर अर्थात् अत्यधिक हानिकर समझना चाहिये । विजिगीपुको आवश्यक है, कि ऐसे व्यसनोका सबसे प्रथम प्रतीकार करे ॥१८॥ व्यसनाधिकारिक अष्टम अधिकरण में पहला अध्याय समाप्त ।
[८ अधिक
(३०)
फोटलीय अर्थशास्त्र.
द्वैराज्यवैराज्ययोराज्यमन्योन्यपक्षपानुरागाम्या परस्पर-
संघर्पण या विनश्यति ॥ ६ ॥ वैराज्यं तु प्रकृतिचित्तग्रहगापेक्षि
यथास्थितमन्यभुज्यत इत्याचार्याः ॥ ७ ॥
राज्य के कारण राजापर थानेवाले पसनका निरूपण करके, अब
राजाके कारण राज्यपर भानेवाले व्यसनका निरूपण किया जाता है:-रा
(जिस राज्यके दो स्वामी हो, यह द्वैगज्य दहाता है , और पैराय (जिस
रापका अपना सामी न हो, अर्थात् किसीका विजित राज्य ), इन दोनों
प्रकार के राज्यों में से बैराज्य, परस्पर दोनों पक्षों द्वेष तथा अनुराग के कारण
अथवा परस्परकी पोंके कारण शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥६॥ परन्तु
पैराग्य, प्रजाके विचारोंके अनुसार चलाना ( अर्थात् प्रजाके विचारों के
भानुकूल्यकी अपेक्षा करता हुभा ) तथा टीक २ अपनी परिस्थिति में रहताहुआ
प्रजाजोसे भोगा जाता है। तात्पर्य यह है कि यदि विजित देशका राजा
प्रजाभोंके चित्र के अनुसार कार्य करता रहे, तो प्रजा व सुखपूर्वक रह
सकती है। इसलिये इन दोनों राज्यों में से पैराजपही भरा तथा राजन
अधिक कष्टकर होता है, यह प्राचीन अनेक आचार्योंका मत है ॥ ७ ॥
नेति कौटल्यः ॥ ८॥ पितापुत्रयोोत्रो द्वैराज्यं तुल्य-
योगक्षेमममात्यावग्रहं वर्तयेतेति ॥९॥
परन्तु भाचार्य कौटल्य इस सिद्धान्तको मानता ॥ ८॥ क्योंकि
द्वराज्य, पिता पुत्र तथा दो भाइयों के परस्पर दायभागको HT होनेपर ही
दोसकता है, और उनका योग क्षम समान ही होता है, इसलिये राज्य कार्यकी
चिन्ता करने वाले अमात्याके द्वारा वह झगडा शीघ्र ही शान्त किया जासकता
। इसलिये द्वैराज्यमें कोई बहा दोप नहीं ॥९॥
वैराज्ये तु जीवतः परस्याच्छिय नैतन्ममेति मन्यमानः कर्श-
यत्यपवाहयति ॥ १० ॥ पण्यं वा करोति ।। ११ । विरक्तं वा
परित्यज्यापगच्छतीति ॥ १२ ॥
परन्तु वैम, जीवित शनुको ही उरिउ कामे, उमसे यापूर्वक
उसके राजाको छीनकर विजिगीषु 'यह मेरा नहीं है। ऐसा मानताहुआ उससे
दण्ड (जुर्माना ) तया कर (टाप) भादिक द्वारा यह कष्ट पहुचता है,
दूसरी जगह लेगाता है ॥१०॥ अथवा अच्स मूमलेर ति फिर्य के
जी हाथ पेर डालता है॥1या अपने में प्रजाओको विग्ण जानकर,
उसके सर्वश्वको अपहरण करके फिर उसे छोड़कर चला जाता है ॥२॥
२ मध्या०] इससनाधिकारिक
(३५१)
अन्धवलितशास्त्रो वा राजेति ॥ १३ ॥ अशास्त्रचक्षुरन्धो
यत्किंचनकारी दृढाभिनिवेशी परप्रणयो वा राज्यमन्यायेनोप
हन्ति ॥१४॥ चलितशास्त्रस्त यत्र शाखाचलितमतिर्भवति
शक्यानुनयो भवतीत्याचार्याः ।। १५ ।।
अन्ध (शाओं का अध्ययन न करने वाला, अर्थात् जिसने शानों का
अध्ययन नहीं किया है), तथा चलित शास्त्र (पा.स्त्रोका भययन करके भी
जो उसके अनुज भाषाण नहीं करता ), इन दोनों रानाओमें से कोनसा
राजा, मजाके लिये अधिक यहकर ( कल्याण करने वाला ) होता है, इस
खानका भय निरूपण किया जायगा ॥ १३॥ इस विषय में प्राचीन आचापीका
मत है, किशान रूपी चक्षुभास होत होने के कारण अंधा राजा विना विधारे
हा कार्य करने वाला, हटपूरे दुष्कर्म करने के लिये भाग्रह करने वाला, या
दूसरेको पुद्रिके अनुपार कार्य करने वाला होकर अन्यायसे राज्यको नष्ट
कादेता है ॥ १५ ॥ चलना ( शाखाको नागका भी उनपा आचरण न
काने याला ) राजा हो, जिस विषयमें शाससे घलितति होमाता है।
भात शास्त्रमे विरुद्ध चलता है, बड़ी सरलतासे अनुनय विनय करके उसे
उधरसे रोका जासकता है । इसालेये मध राजाले चलितशास्त्र राजा उत्तम
होता है।॥१५॥
नेति कौटल्यः ॥ १६ ॥ अन्धा राजा शक्यते सहायसंपदा
यत्र तत्र वा पर्यवस्थापयितुमिति ॥ १७ ॥ चलितशास्त्रस्तु
शाखादन्यथाभिनिविष्टबुद्धिरन्यायेन राज्यमात्मानं चोपहन्ती-
ति॥१८॥
परन्तु आचार्य फौटस्य इस मतको नही मानता ॥ १६ ॥ क्योंकि
अन्ध रामाको, अमात्य भादिकी हितकारी सहायक बुद्धि के अनुसार जिधर
चाई उधर भसे भर मागंपर सरलतासे चलाया जासकता है ॥ १७॥
परन्तु पलिए शाम राजा तो शाखसे निराध करने में ही पठनुचि होकर (अधाए
शासको जानकर भी ज्ञानयूझकर उससे विरुद्ध आचरण करनेका ६ सपने
पाला होकर), अन्यायसे अपने राज्य और अपने आपको भी नष्ट फर
डालता है।
च्याधितो नवोगा राजेति ॥१९॥ व्याधितो राजा राज्यो-
पघातममात्यमूलं प्राणायाधं या राज्यालगपामोति ॥ २० ॥
[८ अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र नवस्तु राजा स्वधर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिः प्रकृतिरञ्जनो- पकारेश्वरीत्याचार्याः ॥ २१ ॥ भय धाधिप्रस्त और नये अभिषिक्त (अभिषेक किये हुए ) राजा में से कौनसा उत्तम होता है, इस बानका निरूपण किया जायगा ॥१९॥ इस विषयों प्राचीन आचाका मत है, कि ज्याधिप्रस्त राजा, अमात्यमूलक (राजाका भय न होने के कारण निरंकुश होकर काम करने वाले समारों के द्वारा उत्पस हुए २) राज्यनाशको प्राप्त होता है; अधया राज्यमूलक (अमात्य आदि प्रकृतियों के द्वारा हानेर ले, अपने ) प्राणनाशको प्राप्त करता है । तात्पर्य यह है, कि व्याधित राजाके अमात्य भादि या तो उसके र ज्यको नष्ट करदेते हैं, या उसे ही मार डालते हैं ॥ २० ॥ नया अभिषिक्त राजा तो, शास्त्रोक अपने राजधर्म के अनुष्ठान, कोशस प्रजाकी सहायता करने, का छोडने, दान देने, सरकार करने और अन्य प्रजाहितकारी कर्म ( बाग कुंए आदि पनघाना) फरनेस, प्रजाओं में अनुराग उत्पन्न करने वाले उपायोंके द्वारा व्यवहार करता है। इसलिये प्याधिप्रस्त और गये राजाम से, नया राजा उत्तम समक्षा जाता है ॥२॥ नेति कौटल्यः ॥ २२ ॥ व्याधितो राजा यथाप्रवृत्त राज- प्रणिधिमनुवर्तयति ॥२३॥ नवस्तु राजा बलार्जितं ममेदं राज्य- मिति यथेष्टमनवग्रहश्चरति ॥ २४ ॥ परन्तु आचार्य कोटक्ष्य इप्त मतको नहीं मानता ॥ २२ ॥ पोंकि प्याधिमस्त राजा, पहिले प्रमके अनुसार ही राजकीय व्यापारीको बराबर घकाता रहता है ॥ २३ ॥ किन्तु नपा राजा अपने बल से प्राप्त कियेहुए राज्य को, इसका मैंने स्वयं संग्रह किया है, ऐसा मानताहुआ इच्छानुसार स्वतन्यता के साथ भोगता है। अर्थात् उस राज्यके साथ मनमाना वर्ताव करता है ॥ २४ ॥ सामुत्थयिकैरवगृहीतो वा रज्योपघातं मर्पयति ॥ २५ ॥ प्रकृतिप्यरूढः सुसः समुच्छेत्तुं भवति ॥ २६ ॥ व्याधिते विशेषः पापरोग्यपापरोगी च ।। २७॥ अथवा जब अपनी उकति करने वाले साथी राजाओंसे घेरा जाता है, तो राज्य के नाशको सहन करलेता है, अर्थात् उसका प्रतीकार नहीं करसकता, और उन राजाओं द्वारा उस राज्यको नष्ट होता देश, उसकी उपेक्षा करदेता है ॥ २५ ॥ था। प्रजामा मह न, होमेके कारण, आशुओं के द्वारा ।
२ अभ्या०] म्यसनाधिकारिक अनायास ही उसाद दिया जाता है, अर्थात् नष्ट करदिया जाता है। ( 'मुखः समुघले।' इसके स्थान पर किसी २ पुस्तकमें 'सुसमुछ भी पार है । श्रम कोई भेद नहीं ) ॥ २६ ॥ इसलिये गये रामाकी अपेक्षा ग्याधिमस्त राजा ही राम होता है। परन्तु यह विशेषता सामान्य व्याधिस प्रस्त राजामें ही समझनी चाहिये । वाकि व्याधिमस्त राजा दो प्रकारके होसकते है, एफ पपरोगी (कुछ [फोद ] भादिके रोगीको पापरोगी कहते हैं) मोर दूसरे भपापरांगी (साधारण व्याधिस प्रस्त राजा)। इनमें से भपाप- रोगी राजामें ही यह उपयुक्त विशेषता समानी चाहिये ॥२७॥ नये ऽप्यभिजातो ऽनभिजात इति ॥ २८ ॥ दुर्यलोमि- जातो वलनाननभिजातो राजेति ॥ २९ ॥ दुर्बलस्याभिजातस्यो- पजापं दौल्यापेक्षाः प्रकृतयः कृच्छ्रेगोषगच्छन्ति ॥ ३० ॥पल. वतयानभिजातस्य बलापेक्षाः सुखेनेत्याचार्याः ॥३१॥ गए राजाओंमें भी उप कुरका रागा उत्तम होता है या नीच फुलका? ॥ २८ ॥ तथा इनमें से भी उघ कुलका दुर्यल राजा उत्तम होता है, या नीच फुलका पलवान् राजा ! इसका अप विचार किया जायगा ॥ २९ ॥ इस विषय में प्राचीन भागायाँका मत है, कि उचकुलोत्पल दुर्यल राजाके भमात्य भादि प्रकृतिजन तथा प्रगाजन, उसकी दुर्वलताके कारण यही कठिनसासे उसके पशमें होते हैं। अभीत उसे अनुकूल पनाने के लिये, दुर्मल होने के कारण राजाको पड़ी कठिनाईयां उठानी पड़ती है ॥ ३० ॥ परन्तु नीचकुलोररक्ष भी बलवान् राजाके पलके दयायके कारण बड़ी सरलतासे ही सम्पूर्ण अमात्य आदि प्रकृतिजन, उसकी भनुयूलताको स्वीकार करलेसे हैं, अर्थात् शीनही उसके भनुरागो पनजाते हैं, इसलिये दुर्यल अगिजात राजाकी अपेक्षा बलयान अनभिजात जाको ही उतम समझना चाहिये ॥३१॥ नेति कौटल्यः ॥ ३२ ।। दुर्बलमभिजातं प्रकृतयः स्वयमुप- नमन्ति, जात्यमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तत इति ॥ ३३ ॥ बलवतश्चान- भिजातस्योपजापं विसंवादयन्ति अनुरागे सार्वगुण्यमिति ॥३४॥ परन्तु आचार्य कौटल्य इस मतको नहीं मागवा ॥ ३२ ॥ क्योंकि जो राजा उच्च कुलोत्पन हो, वह चाहे दुर्थल भी हरे, महतिजन अपने भापही उसके आगे झुक जाते है, अर्थात् स्वयं ही उसका आश्रय लेलेते हैं। क्योकि ऐश्वर्यकी योग्यता उचकुलोपन राजाका हो अनुवर्तन करती है। तात्पर्य * [८ अधिक (३५६) कौटलीय अर्थशास्त्र क्योंकि कुपित राजाको उसके अमात्य आदि हो एपिन होर नष्ट करदाते दभार कामी रागा तो अपने पाइरके शानु या ग्याधियोंसे ही मर होता नेति भारद्वाजः ॥ १० ॥ सत्पुरुपाचारः कोपो वैरायतन- मवज्ञातवधो भीतमनुष्यता च ॥११॥ नित्यश्च कोपेन संवन्धः पापप्रतिपेधार्थः ॥ १२॥ परन्तु इस उपयुक्त मतको भारद्वाज अर्थात् द्रोणाचार्य मान्य नहीं समझते । सात्पर्य यह है कि ये काम और क्रोधको दोष नहीं मानते ॥ १०॥ क्योंकि कोप करना, श्रेष्ठ पुरोका ही भाचार अर्थात् धर्म है। कोप करनेसे शत्रुओंका प्रतीकार होता है, दूसरेसे किये हुए तिरस्कारका मी यदला इसीके द्वारा लिया जाता है, और मनुष्य केधी पुरुपकी बुराई करने से करते रहते हैं तथा कोई भी पुरप सदाके लिये मोधको नहीं हो सस्ता, क्योंकि क्रोधके हो द्वारा पापी पुरपाका निग्रह किया मारता है ॥१२॥ फामः सिद्धिलाभः, सान्तं त्यागशीलता संनियमानश्च ॥ १३ ॥ नित्यश्व कामेन संबन्धः कृतकर्मणः फलोपभोगार्थ इति ॥१४॥ इसी प्रकार काम भी सिद्धिलाभ अर्धात् सुखोंका हेतु होता है। और इतोके कारण पुरप यथार्थ बोरने वाला अर्थात् मधुरभापी, सी, तथा सबसे प्रियभाव रखने वाला भयात् सौम्य होजाता है ॥१३॥ तथा अपने कियेहुए कार्योंका फलोपभोग करने के लिये, प्रत्येक पुरुषका कामके साथ सम्बन्ध होना अषजनीय है। तारपर्य यह है कि अपने कमाँका फल मोगनेके लिये, कामका अवलम्बन करना प्रत्येक पुरुपके लिये अवश्यम्भावी नेति कौटल्यः ॥ १५॥ द्वेग्यता शत्रुवेदनं दुःखासङ्गाश्च कोपः ॥ १६ ॥ परिभवो द्रव्यनाशः पाटचरातकारलुब्धकगाय- कवादकैश्वानर्थैः संयोगः कामः ।। १७ ॥ परन्तु कौटल्य भाचार्य भारद्वाजके इस उपर्युक्त मतको युक्तिसंगत मही समता ५॥ क्योंकि कोप और काम कभी गुण नहीं होसकते, पे भनेक महाम भनथों उत्पन्न करने पासे है। कोपके वारण मनुष्प सपका भी शोमाता है, यह राय उससे द्वेष पा सकी मिया परमे लगते हैं।
३ मध्या०] व्यसनाधिकारिक (३५७) उसके अनेक शत्रु उत्पा होजाते हैं और सदा हो उसके पीछे दुस लगे रहते हैं। किसी ३ पुस्तक सदनमनस्य संयोगो दुःसासाथ इस प्रकारका सूत्रपात है। परन्तु प्राचीन व्यारयाकारीने 'मनस संगः' इस पदको सूनका अ नहीं गाना। १६ । इसी प्रकार कामके कारण भी पुरपका सर्वग्न तिरस्कार होता है; इयों (धग आदि ) का माश होजाता है तथा चौर शुभारी, शिकारी और गाने पजाने पाले अनर्थकारी व्यक्तियोंके साथ सदा सम्बन्ध जोड़ना पड़ता है । ( झामसे उरपत होने के कारण ही इनको यह 'काम' से फहागया है ) ॥ १७ ॥ तयोः परिभवाद्वेष्यता गरीयसी ॥१८॥ परिभूतः स्थैः परै- थापगृह्यते, द्वेष्यः समुच्छिद्यत इति ।। १९ ।। द्रव्यनाशाच्छत्रु- वेदनं गरीयः ॥ २० ॥ द्रव्यनाशः कोशाधकः ॥ २१॥ शत्रु- वेदन प्राणायाधकामिति ॥ २२ ॥ कामसे उत्पन्न होनेवाले और फ्रेधसे SUN होनेशले दोषों में से फामजन्य परिभव दापकी अपेक्षा मोजायता स दोप अधिक हानिकर होता है॥१८॥ काकि तिरत पुरप, अपने और पाये आदमियों द्वारा कभी न कभी अनुगामी पना ही लिया जाता है पान जो सपकार होता है, अर्थात् जिससे सपही देप करते हैं, उसका तो सर्वथा वही फोदिया जाता है। इसलिये तिरस्कृत होने की अपेक्षा देय होना अधिक कष्टकर है ॥ १९ ॥ दुधमाश होगाने की अपेक्षा शत्रुओंका पैदा होजाना अधिक हानिकर होता है ॥ २० ॥ क्योंकि द्रव्यका नाश होना केवरू कोशमें ही पाधा पहुंचाने वाला होता है उममें प्राणोका भय नहीं, ॥ २१ ॥ परन्तु शत्रुओंका पैदा होजाना, प्राणोंको भी संकट में डालने पाला होता है।॥ २२॥ अनर्थ्यसंयोगादुःखसंयोगो गरीयान् ।।२३॥ अनर्थसंयोगो मुहूर्तप्रीतिकरो दीपेल्लेशकरो दुःसानामासङ्ग इति ॥ २४ ।। तस्मात्कोपो गरीयान् ॥ २५ ॥ घोर भारी भादि अनर्थकाही पक्तियों के साथ सम्बन्ध होने की अपेक्षा, दुःसके साथ सम्पन्ध होना अधिक षटकर होता है ॥ २३ ॥ श्योंकि चोर भारी भादिक सास सम्बन्ध, परिणाममे दुःसायी होनेपर भी थोड़े समयके लिये भश्य ही सरताको उप करमे पाला होता है। किरा पा साप सम्पन्ध, war सा पहुंचाता है। किसी [८ मधिल कौटलीय अर्थशास्त्र क्योंकि कुपित राजाको उसके भमात्य भादि ही पित होकर नष्ट करडालते हैं। भार कामी सजा तो अपने पाइरके शत्रु या प्याधियों से ही नष्ट होता 1 नेति भारद्वाजः ॥ १० ॥ सत्पुरुषाचारः कोपो वैरायतन- मयज्ञातवधो भीतमनुष्यता च ॥ ११ ॥ नित्यश्च कोपेन संबन्धः पापप्रतिषेधार्थः ॥ १२॥ परन्तु इस उपयुक्त गतको भारद्वाज अर्थात् द्रोगाचार्य मान्य नहीं समझते । सारपर्य यह है कि ये काम और श्रोधको दोष नहीं मानते ॥ १० ॥ क्योंकि कोप करना, धेठ पुरुषोंका ही आचार अर्थात् धर्म है : कोप करनेस शत्रुओं का प्रतीकार होता है। दूसरेसे किये हुए तिरस्कारका भी बदला इसीके द्वारा लिया जाता है; और मनुष्य फ्रेधी पुरुषकी युराई करने में डरते रहते हैं॥1॥ तथा कोई भी पुरप सदाके लिये मोधको नहीं जोड़ सस्ता, क्योंकि क्रोधके ही द्वारा पापी पुरपोका निग्रह किया गावता है ॥१३॥ कामः सिद्धिलाभः, सान्त्वं त्यागशीलता संघियभापथ ॥ १३ ॥ नित्यश्व कामेन संबन्धः कृतकर्मणः फलोपभोगार्थ इति ॥ १४॥ इसी प्रकार काम भी सिद्धिलाभ भीत् सुखाका हेतु होता है। और इसीके कारण पुरुप यथार्थ घोलने घाला अर्थात् मधुरभाषी, त्यागी, तथा समसे प्रियभाव रखने वाला अधात् सौम्य होजाता है ॥ १३॥ तथा अपने कियेहुए कार्योंका फलोपभोग करने के लिये, प्रत्येक पुरुषका कामके साथ सम्बन्ध होना भवजनीय है । तात्पर्य यह है कि अपने काँका फल मोगने के लिये, कामका अवलम्बन करना प्रत्यक पुरुपके लिये अवश्यम्भापी है॥४॥ नेति कौटल्यः ॥ १५ ॥ द्वेष्यता शत्रुवेदनं दुःखासगश्व कोपः ॥ १६ ॥ परिभवो द्रव्यनाशः पाटचरगतकारलुब्धकगाय- कवादकैवानथ्यः संयोगः कामः ॥१७॥ परन्तु कौटल्य भाचार्य भारद्वाजके इस उपर्युक्त मतको युक्तिसंगत मही समझता ॥ १५ ॥ क्योंकि कोप और काम कभी गुण नहीं होसकते, भनेक महाम भमयों उत्पन्न करने पाले हैं। कोपके कारण मनुष्य सपका भी होमासा ऐ मा राप उससे वेप या उसको निन्दा करमे छगते है।
[८ बधि. (३५) कौटलीय अर्थशास्त्र पुस्तकमें 'मुहूर्तप्रीतिकरः' के स्थानपर 'मुहतपतीकार': पाठ है । उसका अर्थ करना चाहियः-अनार्य पुरुषोंके साथ सम्बन्धका शीघ्र ही प्रतीकार किया जासकता है, परन्तु दुःखोंका संसर्ग, चिरकाल तक शकर होता है) ॥ २४ ॥ इसलिये कामजन्य दीपोंकी अपेक्षा कोपजन्य दोपोंके अधिक कष्टकर होनेसे, कामके मुकाबले में ग्रोधको ही अधिक महत्व देना चाहिये । भधात् कामको अपेक्षा प्रोधसे अधिक हानि होसकती है, इसलिये मोधसे बहुत बचकर रहना चाहिये ॥ २५॥ यापारुष्यमर्थपणं दण्डपारुष्यमिति ॥ २६ ॥ वाक्पारु- प्यार्थपणयोर्यापारुष्यं गरीय इति विशालाक्षः ॥ २७॥ परुप- मुक्तो हि तेजस्वी तेजसा प्रत्यारोहति ॥ २८ ॥ दुरुक्तशल्यं हृदि निखातं तेजासंदीपनमिन्द्रियोपतापि चेति ॥ २९ ॥ पहिले कहे हुए कोपजन्य निवर्गके गुरु रघुभावका भय निरूपण करते हैं। कोपज त्रिवर्ग इस प्रकार है.-वाक्पारण्य, अदूपण और दण्डपारथ्य ॥ २६ ॥ आचार्य विशालाक्षका मत है, कि वाक्पारुण्य और अर्थदूपग इन दोनों में से वाक्पारुष्य ही बलवान् है ॥ २७ ॥ क्योकि अपने तिरस्कारको सहन न काने वाले किसी पुरपके साथ कठोर वाक्योंका पबहार किया जाने पर वह भवश्य ही कठोरताका व्यवहार करने वाले पुरुषपर अपने तेजके द्वारा भाक्रमण करता है ॥ २८ ॥ दुर्वचन ( कठोर पाक्य ) रूपी ल्य (बाणतीर ), हृदयमें गदाहुभा, भान्तरिक लेनको दीप्त करने वाला और इन्द्रियोंको संताप पहुंचाने वाला होता है। इसलिये अयंदूपणकी अपेक्षा पापपाहत्यको ही अधिक बलवान् अर्थात् कष्टकर या हानिकर समाना पाहिये ॥ २९॥ नेति कौटल्यः ॥ ३० ॥ अर्थपूजा वाक्छल्यमपहन्ति, वृत्ति- विलोपस्त्वर्थदूपणम् ॥ ३१ ॥ अदानमादानं विनाशः परित्यागो पार्थस्येत्यर्थदूषणम् ।। ३२ ॥ परन्तु कौटल्य आचार्य विशालाक्षके इस मतको प्राप्त नहीं समझता ॥ ३० ॥ यह कहता है कि अर्थक द्वारा कियाहुआ सस्कार, दुर्वचन रूपी शल्यको नष्ट करदेता है। परन्तु वाणी द्वारा कीहुई पूजा अर्थदूपगको नहीं हटा सकती। किप्तीकी जीविकाका मारना ही अर्थदूपण कहाता है। प्रियवचन बोलनेपर भी जीविकाका विघात पूरा नहीं किया जासकता ॥ ३॥ अर्थदूषण भार प्रकारका होता , मदान (कार्य फरनेपर भी फर्मपारीका घेतमम Pr ३ माया०] ग्यसनाधिकारिक (३५९) देमा), आदान (दण्ड भादिके द्वारा धन ग्रहण करना), विनाश (देशको पीडा पहुचाना), और अर्थका परित्याग ( अर्थात् रक्षा करने योग्य भर्थकी रक्षा न करना ) । इन पूर्वोक्त युक्तियोंसे वाक्पारप्यको अपेक्षा अर्थदूषणको ही बलवान् समझना चाहिये । ३२॥ अर्थपणदण्डपारुष्ययोरर्थपणं गरीय इति पाराशराः॥३३॥ अर्थमूलौ धर्मकामौ ॥ ३४ ॥ अर्थप्रतिबन्धश्च लोको वर्तते ॥३५ ।। तस्योपघातो गरीयानिति ॥ ३६॥ पाराशर ( पराशरके अनुयायी) भाचार्योका सिद्धान्त है, कि अर्थ- दूपण और दण्डपारप्यमें से अर्थदूपण ही पलवान् होता है ॥ ३३ ॥ क्योंकि धर्म और काम दोनों अर्थभूलक ही होते है । अभार इन दोनोंका अर्थपर ही निर्भर है ॥ ३४ ॥ लोकनिर्वाह भी अर्थके हा कारण हो सकता है, तारपर्य यह है, कि ससारमें हरतरह के व्यवहार के लिये धनकी यदी भावश्यकता रहती है ॥३५॥ इसलिये उसका (मर्थका), उपघात (दूषण । होना अत्यन्त फटकर या आपज्जनक होता है । अतएव अर्थदूषण और दण्डपारुष्य में अर्थ दूपणको ही यदा समझना चाहिये ।। ३६ ॥ नेति कौटल्यः ॥ ३७॥ सुमहताप्यर्थेन न कथन शरीर- विनाशमिच्छेत् ॥ ३८॥ दण्डपारुष्याच तमेव दोपमन्येभ्यः प्रामोति ॥ ३९ ॥ इति कोपजस्त्रितर्गः ॥४०॥ परन्तु भाचार्य कौटल्य पाराशर भाचार्यों के इस मतको युक्ति सगत नहीं समझता ॥ ३०॥ वह कहता है कि महान अर्थ राशिकी प्राप्तिके द्वारा भी कोई पुरप अपने शरीरका नाश नहीं चाहता अर्यात् अत्यधिक धन प्राप्तिके बदले में अपने आपको कोई नष्ट नहीं करना चाहता ॥ ३८ ॥ प्रत्युत दण्डपारपसे अपने आपको बचाने के लिये पुरुष उतना धन अवश्य शालता है । इसलिये अधदूपणकी अपेक्षा दण्यपारध्यको ही भधिक कष्टकर समझाना चाहिये ॥ ३९ ॥ यहा तक कोपजन्य निवर्गका निरूपग करदिया दे गया॥४०॥ L- कामजस्तु ।। ४१ ॥ मृगया धूतं त्रियः पानमिति चतुर्वर्गः ॥ ४२ ॥ तस्य मृगयागयो गया गरीयसीति पिशुनः ॥४३॥ भव इसके आगे कामजन्य पतुर्वगका निरूपण किया जावेगा ॥४॥ कामजन्य चतुर्वर्ग इसप्रकार है-मृगया (शिकार खेलना), पूत (भा), सी, भार पान (शराय भादिका पीना) ॥ ४२ ॥ कामजन्य इस धतुर्वर्गके [८ अपिल फोटलीय अर्थशास्त्र गगया और गुप्त नामक दोषों में से मुगया दीप ही अधिक कष्टकर होता है। यह पिशुन अान् गारद आचार्यका मत ६॥ १३ ॥ स्तेनामित्रव्यालदावप्रस्सलनभयदिमोहाः क्षुत्पिपासे च प्रा. णायाधस्तस्याम् ॥ ४४ ॥ गते तु जितमेाक्षविदुपा यथा जयत्से- नदुर्योधनाम्यामिति ॥ ४५ ॥ क्योंकि मृगया, चोर, शनु, हिंसक जागर, गंदर की भाग तथा गिरने (चलने कभी २ असापधानीके कारण गिरजाना-प्रसलन ) भादिमे सदा ही भय रहता है, दिग्भ्रम (दिशाओं की वास्तविक परिस्थितिको भूलका भटकते फिरना ), तथा भूस पास यहुत तंग करती है, और कभी २ प्राणोंपर भी भावनती है ॥ ४४ ॥ पान्तु जुए। जो यदि पा चिलापी होता है, यदर्जत ही लेता है, जैसे जयरसेन और दुर्योधनने नल और युधिष्ठिरको जुएम जीत ही लिया था। तारपर्य यह है, कि जुरम परिया खिलादीकी जीत होही जाती है। इसलिये जुरको अपेक्षा शिकारमें बहुत अधिक कष्ट होते हैं ॥५॥ नेति कौटल्यः ॥ ४५ ॥ तयोरप्यन्यतरपराजयो ऽस्तीति नयुधिष्ठिराभ्यां व्याख्यातम् ॥ ४७ ॥ तदेव विजितद्रव्यमा- मिपं पैरवन्धश्च ॥४८॥ परन्तु कौरव्य आचार्य पिशुनके इस सिद्धान्तको युनि संगत नहीं समझता ॥ ४६ ॥ क्योंकि जिस तरह मृगयामें अनेक दोष है, इसी तरह पूतमें भी दोपोंकी कमी नहीं है, जुभा खेलने वालों में भी एकका पराजय अवश्य ही होता है, जैसे नल और युधिष्ठिर जुएमें हार गये थे । तात्पर्य यह है, कि दोनोंमें से जैसे एकमा जय होता है, वैसे ही दूसरेका पराजय भी होता है, परन्तु यह नियत नहीं कि इसीका जय और इसीका पराजय होगा, इसलिये यूत भी फष्टकर ही होता है ॥ ४७ ॥ तथा उपमें जीता हुभा धन, पराये मांस के समान होता है, और जिसका धन जीत लिया जाता है, वह जीतने वाले प भी करने लगता है। ४८ ॥ सतोऽर्थस्य विप्रतिपत्तिरसतथार्जनमप्रतिभुक्तनाशो मूत्रपुरी- पधारगबुभुक्षादिभिश्च व्याधेिलाभ इति यूतदोपाः ॥ ४९ ।। तथा पहिलेसे धर्मपूर्वक कमायेहुए धनका युरे स्थान में उपयोग होता है, तथा जुएमे अधर्म पूर्वक नये धनका समह किया जाता है, सम्रा किया हुभा भी यह धन पिना मोग किये ही नष्ट हो जाता है, अर्थात् जुएमें फिर ३ अध्या) व्यसनाधिकारिक हार दिया जाता है। पेशाव तथा पखाने आदिके रोकने और भूख आदिके रोकनेसे बीमारी भी होजाती है । तात्पर्य यह है कि जुआरी, पेशाय पसानेको रोकेहुए तथा भूख आदिको भी रोकहुए, खेलने के कारण लगातार बैठे रहते है, इस प्रकार करनेसे उन्हें भनेक बीमारियां होजाती है. यह सब जएका ही देय है। इसलिये जुएको भी कम कर देने वाला न समझना चाहिये । ४९॥ मृगयायां तु व्यायामः श्लेष्मपित्तमेदःस्वेदनाशश्चले स्थिते म काये लक्षपरिचयः कोपभयस्थानहितेषु च मृगाणां चित्तज्ञानम- नित्ययानं चेति ॥ ५० ॥ प्रत्युत मगया में ये निम्नलिखिन गुण भी होते है:-पायाम (शारी. रिक परिश्रम), कफ और पित का नाश, मांस का ग बदनापीना निकलने देह का हुलका होजाना, चलते हुए तथा स्थिर शरीर पर लक्ष (निशानामारने) का अभ्यास होना, क्रोध तथा गय के कारण होनेवाली भित्र प्रकार की चेष्टाओं में जंगली जानवरों के चित्त का ज्ञान होना भीर किसी २ विशेष रतु में ही मृगया का होना, ये सप ऐसे गुण है जिनका चूत में होना सम्भव नहीं, इस लिये मृगया की अपेक्षा धूत को ही अधिक कष्टकर समझना चाहिये ॥५०॥ छूतस्त्रीव्यसनयोः कैतवव्यसनमिति कौणपदन्तः ॥५१॥ सातत्येन हि निशि प्रदीपे मातरि च मृतायां दीव्यत्येव कितवः ॥५२॥ कृच्छ्रे च प्रतिपृष्टः कुप्यति ॥ ५३॥ कोणपदन्त भयात् भीष्म आचार्य का मत है कि सूतव्यसन और खी. व्यसन में से द्यूतव्यसन ही अधिक कष्टकर होता है ॥ ५॥ ॥ क्योंकि जुमारी रात में भी दीपक का प्रकाश करके तथा अपनी माता के मरजाने पर भी बराबर शुभा खेलता ही रहता है (इसका तात्पर्य यह है कि जब स्वाभाविक सूर्य का प्रकाश नहीं रहता, तम भी जुभारी दीवे आदि के कृत्रिम प्रकाश में जुभा खेलता है, और एक और माता फै मरमाने पर भी उसकी पौर्वदेहिक किपा की कुर पर्वाह न करके शरापर शुभा खेलता रहता है, यह व्यसन बहुत ही युश होता है) ॥ ५२ ॥ तथा विसी तरह का कार्यप्तस्ट आपड़ने पर उससे कोई कुछ पूछता है तो वह कुपित होने लगता है ॥ ५३ ॥ सीव्यसनेषु तु सानप्रतिकर्म योजनभूमिपु भवत्येव धर्मार्थप- रिप्रश्नः ॥५४॥शक्या च स्त्री राजहिते नियोक्तम् ॥५५॥उपांशु, (३६२), कौटलीय अर्थशास्त्र [८अधि० दण्डेन व्याधिना या व्यावर्तयितुमवस्रावयितुं वेति ॥ ५६ ।। संध्यसनों में तो, स्त्रीव्यसनी राजा से मानभूमि में, वन भादि धारण करने के समय तथा भोजन भादि के समय प्रो अर्थ के सम्बन्ध में पूना या बतलाया जासकता है ॥ ५५ ॥ तथा जिस पी पर राजा भासक हो उसको भी राजा के कल्याणकारी व्यवहार में अमात्य आदि के द्वारा लगाया जा सकता है ॥ ५५ ॥ अथवा यदि वह स्त्री मन्त्रियों के कयनानुसार राजा के कल्याण की ओर ध्यान न देवे, तो उसे उपांशुदण्ड से (चुपचाप छिपकर मार डालने से)मष्ट किया जा सकता है । यदि उसे नष्ट भी न किया जा सके तो सविप भीपधि आदि देने के कारण उत्पन हुई २ व्याधि के बहाने से उसे और किसी स्थान पर लेजाया जा सकता है। तापर्य यह है कि ग्रीव्य. सन होने पर भी उसका उस रीति से परिहार हो सकता है । इसलिये सी. व्यसन की अपेक्षा तव्यसन को ही अधिक कष्टकर समझना चाहिये ॥५॥ नेति कौटल्यः ।। ५७ ॥ सप्रत्यादेयं यूतं निष्प्रत्यादेयं स्त्री- व्यसनमदर्शनं कार्यनिर्वेदः कालातिपातनादनर्थधर्मलोपश्च तन्त्र- दौपल्यं पानानुवन्धश्चेति ॥ ५८ ॥ परन्तु कौटल्य आचार्य कोणपदन(भीम) के इस सिद्धान्त को युक्ति- संगत नहीं समझता ॥ ५७ ॥ क्योंकि जुए में जो चीज हार दी जाये, वह फिर जुएके द्वारा जीसी भी जासकती है, परन्तु स्त्रीव्यसनमें ऐसा नहीं होसकता, वहां तो जो चीज एक बार हायसे निकलगई, निकली ही समझनी चाहिये । इसके अतिरिक्त स्त्रीव्यसनी राजाका मन्त्रियों को दर्शनभी नहीं होता; और इसी कारणसे फिर उन लोगोंका कार्य करने में उरसाह भी नहीं रहता। इसी प्रकार कालान्तरमें जाकर अर्थ और धर्म दोनोंकी हानि होती है। राज्यतन्न दुर्वल होजाता है और नीग्यसनमें नीरमण भादिके सहकारी मद्यपानका ध्यसन भी लाजाता है। इसलिये पतव्यसनकी अपेक्षा स्त्रीव्यसनको ही अधिक हानिकर समझना चाहिये ॥५॥ स्त्रीपानव्यसनयोः स्त्रीच्यसनमिति वातव्याधिः ॥ ५९॥ स्त्रीपु हि पालिश्यमनेकविधं निशान्तप्रणिधौ व्याख्यातम् ॥६०॥ पाने तु शब्दादीनामिन्द्रियार्थानामुपभोगः प्रीतिदानं परिजन- पूजनं कर्मश्रमवयथेति ।। ६१॥ बातम्य धि ( उद्ध) भाचार्यका मत है, कि स्त्री-व्यसन भौर मद्यपान. म्पसममेसे स्त्री-व्यसनही अधिक कष्कर होता है ॥ ५९ ॥ क्योंकि मिया बस वह ३ अध्या व्यसनाधिकारिक (३६३) बहुत सरहकी भूखंताएं होती है, वे अपने भत्ताओंका वध तक करने के लिये सरह २ के उपायोंकी रचना कर डालती है, इत्यादि भनेक खोजन्य बाधाओंका व्याख्यान निशान्त प्राणधि (अधि. 1, अध्या. २०, प्रक. १७) नामक प्रक. रणमें अरछी तरह कर दिया गया है। मद्यपान में इन भापतियोकी सम्भावना नहीं होती॥१०॥ मद्यपान में तो इन्द्रियोंके विषय-भूत शब्द आदिका उपभोग ही किया जाता है। तात्पर्य यह है:-मद्यपान करनेसे चित्तकी एकाग्रता होजाने के कारण इन्द्रियों के शब्द गन्ध रस आदि अर्योका अच्छा अनुभव होता है प्रीति- दान (प्रेमका विस्तार ), परिजनोंका सरकार और अधिक कार्य करनेसे उत्पन्न हुई २ थकावट दूर होजाती है । इसलिये मद्यपान मसनकी अपेक्षा ग्रीष्य. सनको अधिक दुःखदायी समझना चाहिये ॥ ६ ॥ नेति कौटल्यः ।। ६२ ।। स्त्रीव्यसने भवत्यपत्योत्पत्तिरात्म- रक्षणं चान्तर्दारेषु विपर्ययो वा वाह्येष्वगम्येषु सर्वाच्छित्तिः ।। ६३ ।। तदुभयं पानव्यसने ॥ ६४ ॥ पान्तु कौटल्य आचार्य वातम्माधि (उदय) के इस सिद्धान्तको युक्ति संगत नहीं समझता ॥ ६२ ॥ क्योंकि स्त्रीध्यसन में, यदि वह अपनी विवाहिता स्त्रियों में ही परिमित हाये, तो पुत्रों की उत्पत्ति और उनकी सहायता से भपनी रक्षाका होना, या बड़ा भारी लाभ है । यदि वा व्यसन गणिका आदि माय स्त्रियों में होवे, तो यह लाभ नहीं होता; यदि अन्य कुलीन स्त्रि. यो होथे, तो राजाके सर्वत्व का ही नाश हो जाता है। इसलिये यास त्रियों और फुलीन स्त्रियों में भासक्ति होना ही न व्यसनका दोष है ॥ ६३ ॥ परन्तु मद्यपान ध्यसनमें ये दोनों ही दोष रहते हैं, अर्थात् पुत्र दिकी उत्पत्ति भी नहीं होती और सस्तका नाश भी होजाता है। तथा इनमें अतिरिक्त और भी भनेक दोप मयपानग्यसनमे हैं, इनका विवरण अगले सूत्रमें किया जाता पानसंपत्-संज्ञानाशो ऽनुन्मत्तसोन्मत्तत्वमप्रेतस्य प्रेतत्वं कौपीनदर्शनं श्रुतप्रज्ञापाणवित्तमित्रहानिः सद्भिर्वियोगोऽनर्य- संयोगस्तन्त्रीगीतनैपुण्येषु चार्थमेषु प्रसङ्ग इति ॥६५॥ जयपान करने से निम्नलिखित दोष उत्पन्न होजाते:- मर्यात विवेक घुद्धिका लोप होजाता है, अनुन्मत्त पुरषही उन्मत्त के समान होजाता है, भपात् जिपके चितमं किसी तरहका भी विकार न हो मय पीनेसे उसका भी चित्त विकृत होजाता है। जीता हुमा ही पुरुष मो हुएके समान (३६४) फौटलीय अर्थशास्त्र [ अधिक निश्रेष्ट होजाता है। उसके छिपे हुए पापोंका पता लगजाता है। शास्त्रज्ञान, शास्त्रज्ञानसे परिमात पुद्धि, पल, धन और मिन इन सयही वस्तुभाका नाश होजाता है, समान पुरपौके साथ संसर्ग नहीं रहता; मर्यया अनर्थकारी गान बजाने वाले आदमियों के साथ ही उठना बैठना रहता है। तण धनको, नए करने वाले वाद्य और गीतं आदिके चातुर्य में ही भासक्ति रहती; ये सप दोष है जो कि मयपानके साथ २ होजाते हैं। इसलिये स्नीव्यसनकी भपेक्षा मधपानको ही अधिक पानिकर समझना चाहिये । ६५॥ द्यूतमद्ययोः श्रूतमेकेपाम् ॥६६॥ पणानिमित्तो जयः पराजयो वा प्राणिपु निश्चतनेषु या पक्षधेन प्रकृतिकोपं करोति ॥६॥ , चूत और मा इन दोनों व्यसनांग यूत ही अधिक कष्टकर होता है, यह किन्हीं आचार्योका मत है ॥६६॥ श्योफि पण (जुए में बाजीपर लगाये हुए द्रव्य- का नाम पण है, उस ) के कारण होनेवाले जय और पराजय (जप याजीपर लगाया हुआ धम अपने हाथमें आजाये तो जय, और दूसरेके हायमें चला- जावे, तो पराजय समझना चाहिये), प्राणी राधा भमाणी विषयक दोनों प्रका- रके शुओंम परस्पर विरुद्ध दो पक्षका उदावन होनेसे प्रकृतियों में कोपको उपक्ष करदेते है । तात्पर्य यह है, कि जुमा खेलने पाले दो पक्षोंम भश्याही एक जीतने पाला और दूसरा हारने पाठा पक्ष होता है, यह उप और परा- जय, दोनों पक्षोंके पुरुषों कोध उस्पस कर देता है। मयमें यह बात नहीं, इसलिये मघकी अपेक्षा धूतको अधिक हानिकर समझना चाहिये ॥ ६७ ॥ विशेषतश्च सङ्घानां सवधर्मिणां च राजकुलानां शूतनिमित्तो भेदः, तनिमित्तो विनाश इति ॥ ६८ ॥ असत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानो तन्त्रदौर्बल्यादिति ॥ ६९ ॥ और विशेषकर साथ २ रहने वाले तथा ऐकमत्यसे रहने वाले रात. कुलोका तो यूत के ही कारण परस्पर भेद होजाता है; और भेद होने के कारण फिर उनका नाश होजाता है । ६८ ॥ असाप्रमह (जिस व्यसनमें अमन पुरुषों का ही सरकार किया जावे, ऐसा ) अर्थात् मद्यपान का ध्यसन, अन्य सब ही व्यसनों में अत्यन्त पापिष्ट है, क्योंकि इसका सेवन करने से सम्पूर्ण उपचक्र ही दुर्बल होमाता है; इस हालत में राज्यको उचित व्यवस्था नहीं कीजासकती। इसलिये अन्य अनेक भाचार्य इसोको सब व्यसनोंमें अत्यधिक हानिकर सम. झते है । ( इस सूग्रम यद्यपि यह किन्हीं भाचार्योंका मत है' स अर्थको चोतन करने के लिये ' भन्येषां ' गे 'अपरेषा ' ऐसा कोई पद नहीं दीखता, परन्तु नय सन्निका मास्याम 'अन्पामिति' यह प्रतीक कर इस अर्थको
।
४ अध्या.j অলংকাৰিক ।
प्रकट किया गया है। उसहोके अनुसार हमने भी यहांपर उपर्युक्त मध किया
है। जो कि प्रकरणसे भी संगत मालूम होता है ।। ६१ ॥
असतां प्रग्रहः कामः कोपश्चावग्रहः सताम् ।
व्यसनं दोपवाहुल्यादत्यन्तमुभयं मतम् ॥ ७० ॥
तस्मात्कोपं च कामं च व्यसनारम्भमात्मवान् ।
परित्यजेन्मूलहरं वृद्धसेवी जितेन्द्रियः ।। ७१ ।।
इति व्यसनाधिकारिके ऽदमे ऽधिकरणे पुरुषव्यसनवर्गस्तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
आदित एकोनविंशतो ऽध्यायः ॥११९॥
काम और क्रोध दोनोंही, गाने यजानेका पवसाय काने घाले असत्पु-
रुपोंके सरकारके हेतु और सत्पुरुपोंके निग्रह अर्थात् तिरस्कारके हेतु होते हैं।
दोषों की अधिकताके कारण दोनोंको ही महान पसन माना गया है, अर्थात्
काम और क्रोध दोनों ही वहुन बड़े व्यसन है क्योंकि ये दोषोंसे भरे हुए हैं
॥ ७० ॥ इपलिये धीर बसेवी तथा जितेन्द्रिय राजाको चाहिये, कि वह मूल.
को नष्ट करने वाले ( भधात प्राणांतक सर्वस्व का ही नाश करने वाले), दुःख-
जमक काम और फ्रोधका सर्वथा परित्याग करदे ॥१॥
व्यसनाधिकारिक अष्टम अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त।
चौथा अध्याय ।
१३०-१३२ प्रकरण।
पीडनवर्ग, स्तम्भवर्ग और कोशसङ्गावर्ग ।
राष्ट्रपर माने वाली देवी तथा मानुषी आपत्तियों के समूहको
पीटना' कहते हैं । राजकीय धनको राजातक न पहुंचने देनेका
नाम स्तम्भवर्ग' और कोशके धनको कोशतक न पहुँचने भनेका
नाम 'कोशासवर्ग' है । इस अध्यायमें तीन प्रकोंसे इन्हीं तीन
याताका निरूपण किया जायगा।
देवपीडनमनिरुदकं व्यापिर्दुर्भिक्षं मरक इति ॥ १॥
राष्ट्रपर भाने वाली देवी आपत्ति पांच प्रकारको होती है:-अमि, जल,
ग्याधि, दुर्भिक्ष तथा मस्क (महामारी)॥ ॥
• अग्न्युदकयोरग्निपीडनमप्रतिकार्य सर्वदादि च ॥२॥
शपयोपगमनं तार्यामाधमुदकपीउनमित्याचार्याः ॥ ३ ॥
[८ माघ कौटलीय अर्थशास्त्र इन सबमें एक दूसरेकी अपेक्षा, कौनसी आपत्ति प्राधिक कष्ट देने वाली, तथा कौनसी कम कष्ट देने वाली है, इस बात का भव क्रमशः निरूपण किया जायगा। इस विषयमें अनेक प्रचीन भाचार्यों का मत है,कि अग्नि और जल से उत्पन्न होने वाली भापत्तियों में अग्निजन्य आपत्तिही अधिक करकर होती है, क्योंकि भाग लग जाने पर सरलतासे उसका कोईभी प्रतीकार नहीं किया जासकता, तथा आग सबही वस्तुओंको जलाकर भस्म कर दालती है ॥२॥ परन्तु जलमें यह बात नहीं, घोंकि जलके शीतल होनेसे उसका सशे सत्र होने के कारण, जल में रहकरभी उससे अपना यचाव किया जासक्ता है तथा नौका आदि साधनोंके द्वारामी जलसे यचाव होसकता है । इस लिये जलजन्य आपत्तियोंकी अपेक्षा अग्निजन्य आपत्तिकोही अधिक भयावह समझना चाहिये ॥३॥ नेति कोटल्यः॥ ४ ॥ आमिग्राममर्धग्रामं वा दहति ॥५॥ उदकवेगस्तु ग्रामशतप्रवाहीति ॥६॥ परन्तु कौटल्य, प्राचीन भाचार्योंके इस सिद्धान्तको युक्तिसंगत नहीं मानता ॥ ४ ॥ क्योंकि अग्नि, किसी एकही गांवको या आधेही गांवको जला सकता है ॥ ५ ॥ परन्तु जलप्रवाहका वेग, सैकड़ों गांवोंको एक साथही बहा लेजाता है॥६॥ च्याधिदुर्भिक्षयोर्व्याधिः प्रेतव्याधितापसृष्टपरिचारकव्याया- मोपरोधेन कर्माण्युपहन्ति ॥ ७॥ दुर्भिक्षं पुनरकर्मोपघाति हिरण्यपशुकरदायि चेत्याचार्याः ॥ ८॥ ग्याधि और दुर्भिक्ष इन दोनों आपत्तियोंमेंसे व्याधिही अधिक कष्ट देनेवाली होती है, यह भनेक प्राचीन भाचार्योंका सिद्धान्त है । क्योंकि प्याधिके कारण मरे हुए, ग्याधिग्रस्त २ तथा रोगी पुरुषोंकी परिचर्या में लगे होनेके कारण अन्य पुरपभी कृषि भादि कार्योंको ठीक २ नहीं निकाह समते । तात्पर्य यह है, कि व्याधिका प्रकोप होनेपर पुरप, अपने कृषि सादि आवश्यक कार्योंको भी नहीं करसकते, अर्थात् व्याधि होनेसे कृषि आदि कार्य दीले पड़ जाते है ॥ ॥ परन्तु दुर्भिक्ष, आगे किये जाने वाले कार्य में कोई बाधा नहीं डालता । तथा दुर्भिक्षके कारण धान्यके न होनेपर भी हिरण्य या पशुके रूपमें, राजाको कर दियाही जासकता है। इसलिये दुर्भिक्ष की अपेक्षा म्याधिकाही अधिक कष्टप्रद समझना चाहिये, यही माघीम आचा. यीश मत है।
अभ्या०] व्यसनाधिकारिक (३६७) नेति कौटल्यः ॥ ९॥ एकदेशपीडनो व्याधिः शक्यप्रती- रिश्च ॥ १० ॥ सर्वदेशपीडनं दुर्भिक्षं प्राणिनामजीवनायेति ११॥ तेन मरको व्याख्यातः ॥ १२ ॥ परन्तु कौटल्य, प्राचीन आचार्योंके इस सिद्धान्त को युक्तिसंगत मानता ॥ ९ ॥ यह कहता है कि ग्याधि, किसी एकही प्रदेशमें पीड़ा हुंचा सकती है, अर्थात् जिस देशमें व्याधि हो, उससे उसही देशको हानि हुंच सकती है, तथा औषधि आदिके द्वारा ग्याधिका प्रतीकारभी भाछी रह किया जासकता है ॥ १० ॥ परन्तु दुर्भिक्ष सम्पूर्ण देशको पीडा हुंचानेवाला होता है, और इसके कारण सही प्राणियोंकि जीवनी संकट में जाते हैं । इसलिये व्याधिकी अपेक्षा दुर्भिक्षको ही अधिक कष्टपद समझना वाहिये ॥1॥ इसहीसे महामारीकी भी लघुता गुरुताको समक्ष लेना चाहिये । अपात् अत्यधिक प्राणियों के मरणका हेतु होने के कारण, महामारी दुर्भिक्षकी भी अपेक्षा अधिक कष्टपद होती है ॥१२॥ क्षुद्रकमुख्यक्षययोः क्षुद्रकक्षयः कर्मणामयोगक्षेमं करोति 1॥ १३ ।। मुख्यक्षयः कर्मानुष्ठानोपरोधधर्मत्याचार्याः ॥ १४ ॥ छोटे कार्यकर्ताओं काम करनेवाले पुरषों) और मुख्यकार्यकर्ताओं (काम करयानवाले पुरुषों) मेंसे छोटे कार्यकर्ताओंका क्षय होना अधिक हानिकर होता है। क्योंकि काम करनेवाले आदिमियोंके न रहनेपर कार्यका योगक्षेम (न धलसे हुए कार्यका प्रारम्भ करना योग, और चलते हुए कार्य की रक्षा करमाक्षेम, कहता है) नही चल सकता ॥ १३॥ परन्तु मुख्यकार्यकर्ताओंका क्षय, केवल कामको निगरानी में ही स्कावट डालता है। अर्थात् कार्य करानेवाले पुरुषाको अनुपस्थिति में भी, करनेवाले पुरुषों के रहने के कारण वह कार्य हो हो सकता है । इसलिये मुख्यकार्यकर्ताको भपेक्षा छोटेकार्यकर्ताओंका नावा होना अधिक हानिकर होता है। यह भनेक प्राचीन चायाँका मत है॥१४॥ नेति कौटल्यः ॥ १५ ॥ शक्यः क्षुद्रक्षयः प्रतिसंधात बाहुल्याक्षुद्काणान्न मुख्यमयः ॥ १६ ॥ सहस्रेषु हि मुख्यो भवत्येको न वा सचप्रज्ञाधिक्यात्तदाश्रयत्यात्क्षुद्रकाणामिति॥१७॥ परन्तु कोरल्य, इस सिद्धान्तको युति मगत नहीं मानता ॥१५॥ यह कहता है, कि छोटे कर्मचारियों की कमीको, उनके समान काम करन- पालोंकी गहुत अधिक सरया होने के कारण दूसरे पुरषोंकी नियुक्ति के द्वारा पूरा किया जासकता है। परन्तु मुख्य कार्यकाका क्षय होनेपर यह पान .[८ अधिः (३६८) कौटलीय अर्थशास्त्र नहीं होसफी ॥ ६ ॥ क्योंकि ऐसा मुख्य पुरप, हजारों में एकही मिलता है, या कमी २ वह भी नहीं मिरता, क्योंकि वह बल और युद्रिके कारण सबसे अधिक या घड़ा होनसे सयही छोटे कार्यकत्ताओमा आश्रयभूत होना है, इसलिये उसका क्षय होनाही मोटे कार्यकत्ताओंकी अपेक्षा अधिक हानिकर समझना चाहिये ॥ १७॥ स्वचक्रपरचक्रयोः स्वचक्रमतिमात्राभ्यां दण्डकराभ्यां पीड- यत्यशक्यं च वारयितुम् ॥ १८ ॥ परचक्रं तु शक्यं प्रतियोद्ध- मपसारेण संधिना या मोक्षयितुमित्याचार्याः ॥ १९ ॥ यहांता देवी भापत्तियोंका निरूपण करदिया गया, भय इसके भागे मानुषो आपत्तियोंका निरूपण किया जायगा:-वचक्र (अपने ही देशकी राजशक्ति) और पाचक (परदेशकी राजशक्ति), इन दोनोमसे स्वचक्रही, सीमातीत दण्ड (जर्माना भादि) और कर (टैक्स) के द्वारा प्रजाको पोका पहुंचाता है; तथा अपनेही देशकी राजशक्ति होनेके कारण इसका निवारण भी नहीं किया जासकता । अर्थात् जय अपना स्थामीही इतना कष्ट पहुंचाने लगे तो उसका प्रतीकार कौन करे ॥ १८ ॥ परन्तु परचमका प्रतीकार, उसका देषा छोट देने के द्वारा अथवा कुछ धन आदि देकर सन्धि करलेने के द्वारा किया जासकता है। इसलिये परचाकी अपेक्षा स्वचक्रको भधिक कष्टकर समझना चाहिये । यह सब अनेक प्राधीन भाचार्योंका मत है ॥१९॥ नेति कौटल्यः ।। २० ।। स्वचक्रपीडनं प्रकृतिपुरुपमुख्यो- पग्रहविघाताभ्यां शक्यते धारयितुमेकदेशं वा पीडयति ॥२१॥! सर्वदेशपीडनं तु परचक्र विलोपघातदाहविध्वसनोपवाहनैः पीड- यतीति ।। २२॥ परन्तु कौटल्य, प्राचीन भाचार्योंके इस सिद्धान्तको युक्तिसंगत नहीं समाता ॥ २० ॥ वह कहता है, कि स्वचफसे पहुंचाई हुई पीडाका, अमात्य आदि मुख्य पुरोको अपने अनुकूल बनाने या उनका नाश कर देने के द्वारा भीतरह प्रतीकार किया जासुकता है । तथा सम, धनधान्य भादिसे समन अपने किसी एक देशकोही पीड़ा पहुंचाता है ॥ २१ ॥ परन्तु परचक्र, धन आदि लूटने, मारनेधाने, भाग लगाकर भस्म करने, अन्य प्रकारांसे नाश करने, तथा अपने देशसे निकाल देनेके द्वारा, सम्पूर्ण देशकोही पीदा पहुंचाता है। इसलिये स्वचा की अपेक्षा परचकोही अधिक कष्टकर समझना चाहिये ॥ २२ ॥ " ar
४ मध्या०] . ज्यसनाधिकारिक
प्रकतिराजवियादयोः प्रकृतिविवादः प्रकृतीनां भेदकः परा-
भियोगानावहति ॥ २३ ॥ राजविवादस्तु प्रकृतीनां द्विगुण-
भक्तवतनपरिहारकरी भवतीत्याचार्याः ॥ २४ ॥
प्रकृतिविवाद (अमारय आदि प्रकृत्तियों का परस्पर झगड़ा) और राज-
विवाद (राजाओ का परस्सर झगड़ा), इन दोनों में से प्रकृतिविवाद ही अधिक
हानिकर होता है। क्योंकि यह अमात्य आदि में परसर फूट डालने वाला,
सपा शानु के कार्यों को सहारा देने वाला होता है ॥ २३ ॥ परन्तु राजविवाद
अमात्य आदि प्रकृतियों के दुगने भत्तं तथा चेतन का और अन्य प्रजाजनों के
कर (टैक्स) आदि छोड़ देनेका कारण होता है। तार्य यह है, कि राजविवाद
होने पर, अपनी प्रजाओंको सन्तुष्ट करनेके लिये, ये उपर्युक कार्य करने पड़ते
हैं। इनमें प्रमाकी भलाई ही होती है । इसलिये राजविवादको अपेक्षा प्रकृति-
विवादको ही अधिक हानिकर समझना चाहिये, यह अनेक प्राचीन आचार्यों का
सिद्धान्त है ॥ २४ ॥
नेति कीटल्यः ॥ २५ ॥ शक्यः प्रकृतिविवादः प्रकृतिमु-
ख्योपग्रहेण कलहस्थानापनयनेन वा चारयितुम् ॥ २६ ॥ विव-
दमानास्तु प्रकृतयः परस्परसङ्घर्पणोपकुर्वन्ति ॥ २७ ॥ राज-
विवादस्तु पीडनोच्छेदनाय प्रकृतीनां द्विगुणव्यायामसाध्य इति
॥ २८ ॥
परन्तु कौदक्ष्य, प्राचीन भाचायकि इससिद्धान्तको युक्ति संगत नहीं
समझता ।। २५ ॥ वह कहता है, कि प्रकृति विवादको, अमात्य आदि मुख्य
प्रकृतियों के अनुकूल बनाने तथा कलहके कारणों को इटादेनेसे, अच्छी तरह रोका
जासकता है ॥ २६ ॥ तथा पास्पर विवाद करते हुए प्रकृतिजन, एक दूसरेकी
स्पर्धासे राजाका उपकार ही करते हैं ॥ २७ ॥ परन्तु राजविवाद, प्रजाभाको
पीहा और उच्छेदके लिये होता है। अर्थात् प्रजाजनोंकी जितनी शक्ति या
समृद्धि होती है, वह सबही इस झगम स्वाहा होजाती है । तथा राजविया-
दको शान्त करने के लिये, प्रकृतिविवादकी अपेक्षा दुपना प्रयब करना परता
है। इसलिये राजविवादको ही भकृतिविवादसे अधिक हानिकर समझना चाहि.
य॥ २८ ॥
देशराजविहारयोः देशविहारखैफाल्येन कर्मफलोपयातं
करोति ।। २९ ।। राजविहारस्तु कारुशिल्पिकुशीलववाग्जीवन
देहकोपकारं करोतीत्याचार्याः ॥ ३० ॥
-[८ अघि
कोटलीय अर्थशास्त्र
देशविहार (साधारण प्रजाजनोंकी फ्रोडा. अर्थात् मनोपिनोदके लिये
हंसी खेलकूद आदिका करना ) और राजविहार (राजकोटा अर्थात् राजाके
मनाविनोदके लिये मिन्न ३ प्रकारके खेल आदिका किया जाना), इन दोनों में
से देशविहार अधिक हानिका होता है, क्योंकि प्रजाजनोंके सेलफूर में लग-
जानेसे तीनों कालों में होने वाले कृषि आदि कार्यों का उच्छेद होजाता है।
भयात् पहिले बोयेहुए खेतोंकी रक्षा नहीं होती, पर्पमानमें भौर नेत बोए
नहीं जाते, बार भागे बोने के लिये भूमि तैयार नहीं कीजाती; इसप्रकार तीनों
कालांमें खेतीका नाश होता है। (इसीतरह अन्य कार्योंमें मी समप्त लेना
चाहिये ) ॥२९॥ परन्तु राजविहार, कार ( मोटे कारीगर वर्दई लुहार मादि),
शिवपो ( सूक्ष्म कार्य करनेवाले कारीगर सुनार आदि), कुशीलव ( गाने
पाले ), वाग्नीवन (स्तुतिपाठ करनेवाले, भार धारण आदि), रूपाजीवा
(वैश्या), तथा चैरेहक (अन्य व्यापारी) आदि व्यक्तियों का भस्यन्त उपकार
करने वाला होता है, तारपर्य यह है, कि राजविहारके लिये जो सामान भादि
तयार कराये जाते हैं, या उसके आगे जैसे कार्यक्रम होते हैं, उनमें हाताहक
कारीगर, गान बजाने वाले तथा अन्य व्यापारियों को विशेष लाभ होता है,
इसलिये राजविहारकी अपेक्षा देशविहारको भधिक हानिकर समझना चाहिये,
यह अनक प्राचीन आचार्योंका मत है ॥३०॥
नेति कौटल्यः ॥ ३१ ॥ देशविहारः कर्मश्रमवधार्थमल्पं
भक्षयति ॥ ३२ ॥ भक्षयित्वा च भूयः कर्मसु योगं गच्छति
॥ ३३ ॥ राजविहारस्तु स्वयं वल्लभेश्च सयंग्राहप्रणयपण्यागार-
कार्योपग्रहः पीडयतीति ॥ ३४ ॥
परन्तु कौटल्य, प्राचीन आचार्योफे इस मतको युक्तिसंगत नहीं
समक्षता ॥ ३॥ ॥ वह कहता है, कि देशविहार, कार्य करने से उत्पन्न हु।
थकावटको करने के लिये योदा ही म्यय करता है। अर्थात् प्रजानाका
मनोपिनोद थोड़े ही अयमे होजाता है ॥३२॥ तथा इतना व्यय करके नई
उमंगसे मरेहुए उन प्रजाभोंको, फिर अपने २ फापे आदि कार्योम लगादेता
। भान् मनोविनोदके अनन्तर चे पुरुष अतीतरहसे फिर अपने २ कार्यों में
लगजात ॥ ३३॥ परन्तु राजाविहार स्वयं राजाके द्वारा तथा राजाके अत्य
प्रिय पुरुषाके द्वारा, जनादकी इच्छाके विरुद्ध उससे धन लेका, पम्पशालासे
तथा भतिरिक्त कार्योंको पूरी करनेके लिये रिधत आदिसे धन लेकर प्रजाको
बहुत कष्ट पहुंचाता है। इमलिय देशविहारकी अपेक्षा रानविहारको ही अधिक
फरकर समझना चाहिये ॥ ३५ ॥
४ अभ्या०] व्यसनाधिकारिक (३७) सुभगाकुमारयोः कुमारः स्वयं बल्लभैध स्वयंग्राहप्रणयपण्या- गारकार्योपग्रहै: पीउयतीति ॥ ३५ ॥ सुभगा विलासोपभोगेने. त्याचार्याः ॥ ३६॥ देवो । रानी-सुमा) और युवराज इन दोनोंके बिहारी से राजका विहार, स्वयं युवराजके द्वारा तथा युवराजके अम्प प्रिय पुरुपोंके द्वारा, जनपदकी इच्छाके विरुद्ध उससे धन लेकर, पण्यशालासे तथा अन्य कायोंको पूरा करनेके लिये रिश्वत आदिसे धन लेकर प्रजाको बहुत कष्ट पहुंचाता है॥ ३५ ॥ और देवी विलासोपभोगके द्वारा अर्थात गाय माल्प आदि विलासका सामग्रीक द्वारा ही प्रताको पारा पहुचाती है । इसलिये देवीविहारको अपेक्षा युवराजरिहारको हो अधिक कष्टकर समझना चाहिये, यह प्राचीन आचाफा मत है ॥ ३६॥ नेति कौटल्यः ॥ ३७॥ शक्यः कुमारो मन्त्रिपुरोहिताम्यां धारयितुं न सुभगा बालिश्यादनर्यजनसंयोगाचति ॥ ३८॥ परन्तु कोरल्य, प्राचीन आवायोंके इस मतको युक्तिसंगत नहीं मानता ॥ ३० ॥ यह कहता है, कि युवराजको इस तरहका कार्य करनेसे मन्त्री तथा पुरोहितोंके द्वारा रोका जासकता है; अधात् मन्त्री और पुरोहित भादि उच राजकर्मचारी, कुमारको समझाकर इसतरहके अनकारी कार्यों के करने पृथक रख सकते हैं। परन्तु रानियों के सम्बन्धमें यह बात नहीं होसकता, क्योंकि उनमें मायः मूर्यता अधिक होती है, और फिर गाने जाने मादिका व्यवसाय करनेवाले अनर्थकारी मीच पुरषोंके साथ ही प्रायः वनका संसर्ग रहता है। हम अवस्थामें उन्हें समझाना भी बहुत कठिन है। इसलिये कुमारविहारको अपेक्षा देषानिहारको अधिक कटकर समझना चाहिये ॥१८॥ श्रेणीमुख्ययोः श्रेणी बाहुल्यादनवग्रहा स्तेयसाहसाभ्यां पीडयावे ॥ ३९ ॥ मुख्यः कार्यानुग्रहविधाताभ्यामित्याचार्याः धेणी (भायुधमीषी तथा पिजीवी पुराँके परस्पर इकटे हुए संघका नाम धणी ) भार मुएए (अपनी देसमाप्लमें फाम करामवाल प्रधान राजकर्मचारी) पुरवा मस धेगी ही घोरी तथा डाका भारिस प्रजाको कर पहुंचाती है, तथा उसकी संख्या पहुस भधिक होने के कारण उसको रोका भी नही जासकता ॥३६॥ गुगपुरुष, केश शित भादि लेजर कार्य करमे, तशा पिसठ न मिघ्नेपर पापं पिणाद नेसैदी प्रमाको पाता
-
अधि.
(३७२)
फौटलीय अर्थशास्त्र
पहुंचाते हैं। इसलिये मुख्य पुरपाको अपेक्षा श्रेणी पुरोकोही अधिक याद
समाना चाहिये । यह प्राचीन आचाका मत है॥ ४० ॥
नेति कौटल्यः ॥ ४१ ।। सुव्यावर्त्या श्रेणी समानशीलव्य-
सनत्वाद, श्रेणीमुख्यैकदेशीपग्रहेण वा ॥ ४२ ॥ स्तम्भयुक्तो
मुख्यः परमाणद्रव्योपघाताभ्यां पीडयतीति ॥ ४३ ।।
परन्तु आचार्य कौटल्य, प्राचीन प्राचायाँके इस सिद्धान्तको युक्तिसंगत
नहीं मानता ॥ १ ॥ वह कहता है, कि श्रेणीको चोरी डाके आदिसे बड़ी
सरलतापूर्वक रोका जासकता है, क्योंकि जिनके यहां वे चौरी आदि करते हैं।
थे भी उनके समानही स्वभाव तथा कृषि आदि समान व्यवसायपाले होते
है। अथवा उनके गिरोह के मुख्य आदिमियोंको अपने अनुकूल बना ले सभी
उनको चोरी आदिस रोका जासकता है ॥ ४२ ॥ परन्तु राजकीय मुण्यपुरए
घई अभिमानी होते हैं, और वे दूसरोक प्राण तथा धनफा अपहरण करके
अस्यन्तकर पहुंचाते हैं। इसलिये श्रेणीको अपेक्षा मुख्य पुरपकोही अधिक
काटकर समझना चाहिये ॥ १३ ॥
संनिधासमाहौस्संनिधाता कृतविद्पणात्ययाभ्यां पीड.
यति ॥ ४४ ॥ समाहर्ता करणाधिष्ठितः प्रदिष्टफलेपभोगी भव-
तीत्याचार्याः ॥ ४५ ॥
सनिधाता और समाहर्ता, इन दोनों में से सविधाता (धनको कोपों
रखनेवाला भाधिकारी) दीहुई भूषण आदि वस्तुओंके दूसण निकालने भौर
समय बीतगाने आदिका यहाना करके प्रजाको पीढ़ा पहुंचाता है।४४ ॥
परन्तु समाहसी अपम टोक हिसायके काममें लगा हुआ, अपनो नियामत
मौकरीकाही भोगनवाला होता शास्पर्य यह है कि सविधाता तो किसी
पहास रिश्वत आदि लेकर प्रजाको पीला पहुंचा सकता है। परन्तु समापी
को एक २ पसेका शिलाप रखना पड़ता है, इसलिये यह केवल अपने पेतनार
ही निर्याह करता है । अतएव समाहाकी अपेक्षा सनिधाताही प्रजाको अधिक
पर पहुंचाता है, यह प्राचीन भाचार्यों का मत है ॥ ४५ ॥
नैति कौटल्यः ॥ ४६ ॥ सनिधाता कृतावस्थमन्यैः कोश-
प्रवेश्यं प्रतिगृह्णाति ॥ ४७ ॥ समाहतो पूर्वमर्थमात्मनः कृत्वा
पश्चाद्राजार्थ करोति, प्रणाशयति वा, परस्वादाने च प्रत्यय-
भरतीति ॥४८॥
४ अध्या०] व्यसनाधिकारिक (३७३) परन्तु आचार्य कोरम, प्राचीन भाचायाँके इस मतको युक्तिसंगत नहीं मानता ॥ ४५ ॥ यह कहता है, कि सविधाता को दूसरे कर्मचारियों के हारा व्यवस्थित कियेहुए फोशमें रखने योग्य धन को ही ग्रहण करता है। अर्थात् जिस पस्तुको कोशो रखने के लिये दूसरे अधिकारी निश्रित करदेस हैं। सविधाता उसी तरह उसको कोशम रख देता है, यह स्वयं किसी वस्तु को लेने पाम लेने का अधिकार नहीं रखता ॥ १७ ॥ परन्तु समाहतi ( सरकारी टेक्सको वसूल करने वाला अधिकारी) पहिले अपनी रिश्वत आदि लेकर, फिर राजाके धमका संग्रह करता है, अथवा उसमें से भी स्वयं अपहरण फरके धनको नष्ट करता है । और दूसरों से टैक्स वसूल करने के समय अपनी इच्छा अनुसार ही सब काम करता है। इसलिये समिधाताको अपेक्षा समाहतोकोही अधिक पोका पहुंचाने वाला समझना चाहिये ॥ ४०॥ अन्तपाल्देहकायारन्तपालधोरप्रसङ्गदेयात्यादानाम्यां वणि- पथं पीडयति ॥४९॥ वैदेहकास्तु पण्यप्रतिपण्यानुग्रहैः प्रसाध. यन्तीत्याचार्याः ॥५०॥ मनापाल और पैदेहक, इन दोनों से, भन्तपाल ( सीमारक्षक अधि. कारी) चोरों के द्वारा पधिकोंके धनको लुदवाकर या मार्गका का अत्यधिक मात्रा लेकर, व्यापारी मागीपर चलने वाले पथिकों को अत्यन्त कर पहुंचाता है ॥ ४९ ॥ परन्तु यदेहक ( व्यापारी पुरुष ), पण्य (विक्रय पदार्थ) भार प्रसिपण्य (पण्यके पदलेमें लिए जाने वाला पदार्थ) पर अनुग्रह करनेसे अधार विशेष लाभ पहुंचानेसे मापारी मार्गोंको घरापर उात यनाते है। इसलिये व्यापारियोंकी अपेक्षा अन्तपालीको ही अधिक २४ समझना चा. हिये। यह प्राचीन आवायाँका मत है ॥ ५० ॥ नेवि कौटल्यः ॥५१॥ अन्तपाला पण्यसंपावानुग्रहेण वर्तयति ।। ५२ ॥ वैदेहकास्तु संभूय पण्यानामुत्कर्षापर्प पुर्याणा: पणे पणशतं फुम्मे कुम्गशवपित्याजीवन्ति ॥ ५३॥ परन्तु भाचार्य कोरल्य, प्राचीन भाषायोंकि इस माको युक्तिगत नहीं समाता ॥ ५ ॥ यह कहता है, कि अस्तपाल, एकसाथ हाये हुए पिक्रेर पराधोंपर अमित पानी ( व्यापारी मागाका देशस) लेकर व्यापारी माताको उमरा फराहुया उन्हें लाभमद मित्र काता है ।। ५२ ॥ यदेहक सो एमसाय मिसकर नाच मागसमें सलाह का म्यारी मार पर पटा पाका (शिस माघको परिमाहो उसके मूख्यको घटाकर मार मिरा माह . (३७४) कौटलीय अर्थशास्त्र [८अधिक को येचना हो उसके मूल्यको बढ़ाकर ) एक पण सो पण और एक कुम्भके बुम्म सौ कुम्भ (घी आदि मालपे भरहुर वर्तन भादिको यहापर शादसे कहागया है) लाभ उठाते हैं। इसलिये अन्तपालशी अपेक्षा ग्यापारी यनियोको ही प्रजाके लिये अधिक कटकर समझना चाहिये ॥ ५३ ॥ अभिजातोपरुद्धा भूमिः पशुव्रजोपरुद्धा वेति ॥ ५४॥अभि- जातोपरुद्धा भूमिः महाफलाप्यायुधीयोपकारिणी न क्षमा मोक्ष- यितुं व्यसनाबाधभयात् । ५५ ॥ पशुव्रजोपरुद्धा तु कृषियोग्या क्षमा मोक्षयितुम्, विवीतं हि क्षेत्रेण बाध्यत इत्याचार्याः॥५६॥ भय कष्ट पहुंचने वाली भूमिके सोने न छोडनेके विपमें विचार किया जायगा विजिगीपुके वंशके पारिवारिक पुरुशेसे घीहुई भूमिको छोड़ना चाहिये, अथवा गो आदि पशुओं के समूहसे घेरीहुई भूमिको ? ॥५४॥ इस विषय में प्राचीन आचार्योका निर्णय है, कि अत्यधिक नन भादिके द्वारा लाभदायक होमेपर भी यदि वह भूमि सैनिक पुरुषों को देकर उपकार करने वाली हो, अर्थात् विजिगीपुको उप्त भूमिसे पर्याप्त संख्या में सनिक मिल सकते है, तो उस भूमिको न छोडना चाहिये, क्योंकि वायु के आक्रमण करनेपर सेनिफ पुरषोंके न होने से क्ट होने का भय रहता है ॥ ५५ ॥ पशुभासे घेरीहुई भूमे तो, यदि पिके योग्य हो, सो दोषी जासकती है, अर्थात् उसमें से चरागाहको उठाकर खेती कराई जासकती है, क्योंकि चरागाहकी अपेक्षा खेतीसे अधिक लाभ होसकता है ॥ ५६ ॥ नेति कौटल्यः ॥ ५७ ॥ अभिजातोपरुद्धा भूमिरत्यन्तम- होपकारापि क्षमा मोक्षयितुम् व्यसनायाधभयात् ।। ५८॥ पशु- ग्रजोपरूद्धा तु कोशवाहनोपकारिणी न क्षमा मोक्षयितुमन्यत्र सस्सवापोंपरोधादिति ॥ ५९॥ परन्तु आचार्य फाटल्य, प्राचीन आघायोंके इस निर्णयको ठीक नहीं मानता ।। ५७ ॥ यह कहता है, कि विजिगापुके पारिवारिक पुरुषों के द्वारा धेरी भूमि, सैनिक पुरोको देकर अत्यन्त उपकार करने वाली होने पर भी जोडी जासकती है। क्योंकि अपने ( विजिगीषुके ) दोपका अन्येपण करने पाले पारिपारिफ पुरगोंके द्वारा ही भापत्ति आनेका गय रहता है ॥ ५८ ॥ पमुस पिहुई धरागाहकी भूमि सो, कांशमें संग्रह करने योग्य पत भादि तथा बैंक यादि पानीको फर भत्यात उपकार करने पार्टी होती है।
४ अध्या.] व्यसनाधिकारिक इसलिये वह नहीं छोड़ी जासकती । किन्तु उसके समीप यदि नानके खेत हो, और घरगाहके कारण उनमें नुकसान होता हो, तो उसे भी छोड़ा जासकता है, अन्यथा नहीं॥ ५९॥ प्रतिरोधकाटविकयोः प्रतिरोधकाः रात्रिसस्त्रपराः शरीराक्र- मिणो नित्याः शतसहस्रापहारिणः प्रधानकोपकाच ॥६०॥व्य. वहिताः प्रत्यन्तारण्यचराचारविकाः प्रकाशा दृश्याचरन्त्येकदेश- घातकाश्चत्याचार्याः ॥ ६१॥ प्रतिरोधक और भाटश्चिक इन दोनों में से, प्रतिरोधक लुटेरे, जो कि भिम २ स्थानॉपर रहते ) राग्रिमें उथा घने जंगलों में घूमने पाले, आने जाने पाले पुरुषोंके शरीरॉपर आक्रमण करने वाले, सदा ही समीप रहने वाले, सैकड़ों और हज़ारोंकी संख्याम धनका अपहरण करने वाले, तथा राष्ट्र के प्रधान २ पुरुषोंको लूर मादिके द्वारा कुपित करने वाले होते हैं ॥३०॥ और आटविक ( अपने राज्यकी सीमाके जंगलों में रहने वाले लुटेरे) दूर रहने वाले, देशकी सीमाके गले में घूमने फिरने वाले, प्रकट रूपमें रहने याले तथा दृष्टिगोधा होते हुए घूमते हैं, इसलिये ये देशके एक ही हिस्सको पोहा पहुंचा सकते हैं, और मालूम होनेपर लोग इनसे अपनी रक्षा मी कर सकते हैं। अतएव भाविकांकी भपेक्षा प्रतिरोधक पुरुष की प्रजाके लिये अत्यधिक पीड़ा पहुंचाने वाले होते हैं, यह प्राचीन भाचार्यों का मत । नेति कौटल्यः ।। ६२ ।। प्रतिरोधकाः प्रमत्तस्यापहरन्ति ।। ६३ ।। अल्पाः कुण्ठाः सुखा ज्ञातुं ग्रहीतुं च ॥ ६४ ।। स्वदे- शस्था: प्रभूता विक्रान्ताश्चाटविकाः ॥ ६५ ॥ प्रकाशयोधिनी उपहारो हन्तारश्च देशानां राजसधर्माण इति ॥६६॥ परन्तु भाचार्य कौटल्य, प्राचीन आचायोंके इस मतको युक्तिसंगन नहीं मानता॥ ३२॥ यह कहता है, कि प्रतिरोधक पुरुष प्रमादी यहाँसे ही (भधात जो सावधानता पूर्वक नहीं रहता, रस ही के यहांस ) धन भादिका भपहाण करसकते ॥ १२ ॥ ये लोग संख्या यहुत धोदे होने के कारण सब जगह नहीं फैल सकते, इसीलिए ये लोग बड़ी सरलतामे जाने जासकते तथा एक जासकते हैं ॥६४ा और भारपिक अपने देश में स्थित तथा संस्था बहुत होते हैं, यहादुर होने के कारण बी सटिगतासे पक जासकते है ॥६५॥ प्रकट रूपमें युद्ध काने पाले होते देश निवासी पुरुपोंके धग तथा (३७६) कौटलीय अर्थशास्त्र [८यधिक प्राणोंको अपहरण करने पालं होते है, तथा निराश होने काण इनकी परिस्थिति बाजाभों के समान होती है। इसलिये प्रतिरोधक पुरुषकी अपेक्षा भारधिकोंको ही अधिक पीड़ा पहुंचाने याला समझना चाहिये ॥ ६६ ॥ मृगहस्तिवनयोः मृगाः प्रभूताः प्रभूतमांसचोपकारिणी मन्दग्रासावलेशिनः सुनियम्याथ ।। ६७ ॥ विपरीता हस्तिनो गृक्षमाणा दृष्टाश्च देशविनाशायेति ।। ६८ ॥ मृगयन और हस्तिवन इन दोनों में से इस्तिवन (हाधियोंके रहगेका जंगल ) अधिक कष्टकर होता है। क्योंकि मृग संग्या यहुन भधिक, तथा अत्यधिक मांस और धमाके द्वारा उपकार करने वाले, घोड़ा पाने वाले इसीलिये भागते समय जल्दी थक जाने वाल, तथा पकड़े जाकर बड़ी सरलतासे वशमें भाजाने वाले होते है ॥ १०॥ दाधी इनसे विरकुल विप- रीत होते हैं, संख्यामें यहुत थोड़े, बहुत घोड़ा मांस चमड़ा देने वाले, हुत खानेके कारण जल्दी न थकने वाले, तथा पकडे जाकर भी दुष्ट होनेपर लोगों को मार मालने वाले होते हैं ॥ १८ ॥ स्वपरस्थानीयोपकारयोः स्वस्थानीयोपकारोधान्यपशुहिरण्य- फुप्योपकारो जानपदानामापद्यात्मधारणः ॥ ६९ ॥ विपरीतः परस्थानीयोपकारः, इति पीडनानि ॥ ७० ॥ अपने नगरका उपकार करना और पराये नगरका उपकार करना, इन दोगॉम से अपने नगरका उपकार करना (प्रत्येक वस्तुके क्रय विक्रय व्यवहारका करना और उससे अपने नगर को लाभ पहुंचाना ही यही उप कार कहा गया है ) अर्थात् धान्य पशु हिरण्य और कुप्प आदि पदार्थों का अपने ही नगरमें क्रय विक्रय करना, जनपद निवासी पुरुषों की आपत्ति (दुर्भिक्ष भादिसे उत्पन्न हुई विपत्ति) के समय में प्राण धारणका हेतु होता है ॥१९॥ परन्तु दूसरे के नगरमें कर विका व्यवहार करके उसे लाभ पहुंचाने से विपरीत ही परिणाम निकलता है, अर्थात् उससे दूपरेके नगरकी वृद्धि होती है, और यह भपने ( क्रय विक्रय व्यवहार करने वाले पुरुष के) देशको कष्ट पहुंचाने वाला होता है। यहांतक पीडनपर्ग अर्थात् देशो पासा पहुंचाने वाले हनुओं का निरूपण कर दिया गया ॥७॥ आभ्यन्तरो मुख्यस्तम्भो बाटो मित्राटयीस्तम्भ इति स्तम्भ वर्ग: ।। ७१ ।। भपने ही सरकारी मुख्य कर्मचारियों के द्वारा अर्थ का रोका जाना ५ अध्या) व्यसनाधिकारिक (३७७) "माभ्यन्तर स्तम्भ' भोर मित्र तथा आरपिंक पुरुर्षे के द्वारा अपका रोका जाना 'मा स्तम्भ' कहा जाता है। स्तम्म दो ही प्रकारका होता है । यह स्तम्भ वर्गका ध्याख्यान कर दिया गया ॥ ७१॥ ताभ्यां पीडनयोक्तश्व पीडितःसको मुख्येषु परिहारोपहतः प्रकीर्णो मिथ्यासंभृतः सामन्ताटवीभृत इति कोशेसङ्गाः ॥७२॥ दोनों प्रकारके आभ्यन्ता और यास स्तम्भोंक द्वारा तथा पूर्वोत पीरा के द्वारा पीडित हुआ २ अर्थात् उचित आमदनीकी मात्रासे घटापा हुआ, कर देनेवाले पुरुषोले वसूल करके मुख्य कर्मचारी पुरुषोले उपयोग किया हुआ, अर्थात गबन किया गया हुआ, राजाकी आज्ञानुसार का माफ हो जाने के कारण म हुभ २ इधर उधर विन्धरा हुमा, उचित परिमाण स न्यून अथवा अधिक मात्रा में इकट्ठा किश हुमा, नथा सामान और भाविक पुरुपोंके द्वारा अपहरण किया हुआ धन खगाने में नही भाने पाता, चांचौ । नष्ट होजाता है। इसका नाम कोशमा है । यह को शसन वर्गका निरूपण कर दिया गया ॥ २॥ पीडनानामनुत्पत्तावुत्पन्नानां च पारणे । यतेत देशद्धयर्थ नाशे च स्तम्भसङ्गयोः ॥ ७३ ।। इति व्यसनाधकारिके मे अधिकरणे पोडा. स्तम्मनः कोशासावर्ग: चतुर्यो ऽध्यायः॥ ४ ॥ आदितो विशतिशतो पाय ॥२०॥ पूर्वोक्त पीड़ाओं को उत्पन्न न होने देनेने, अपर उसन होजाने पर उनका निवारण करने में और स्तम्भ तथा कोशसक नाश करने में, रामा को सदा यसपान होना चाहिये, जिससे कि वह अपने देश भार कोशकी वृद्धि करसके ॥३॥ নাঙ্কাকে ধ্বংস সাজগে ৪ অর্থ ব্যয় মান पांचवां अध्याय १३३, १३४ प्रकरण बलव्यसनवर्ग और मित्रव्यसनवर्ग। अपनी सेना पर भाने घाली विपत्ति तथा मित्रार आम चारी विपत्तियों के समूह का इन दो प्रमाणात यधाम निरपण । किया जायगा।
[८ अधिक अन्ध; १३७८) कौटलीय अर्थशास्त्र चलच्यसनानि ॥ १ ॥ अमानितं विमानितमभृतं व्याधितं नवागतं त्यातं परिधान्त परिक्षीणं तिहत हताप्रवेगमनृतप्राप्त- मभूमिप्राप्तमाशानिदि परिसृप्त कलत्रगन्तःशल्यं कुपितमूलं भिन्नगर्भमपसृतमविक्षिप्तमुपनिविष्ट समाप्तमुपरुद्धमुपक्षिप्तं छिन्न- धान्यपुरुपवीवधं स्वविक्षिप्त मित्रविक्षिप्त दप्ययुक्तं दुटपाणिग्राह शुन्यमूलमस्समिसंहतं मिन्नमन्धमिति ।। २ ॥ सेनापर आने वाले व्यसन, भिन्न लिखित प्रकारसे समझने चाहिये ॥ ५॥ ममानित, निमानित, अमृत, व्याधित, नवागत, दुरापात, परिप्रान्त परिक्षीण, प्रति.तइतामवेग, अमृतप्राप्त, भभूमिप्राप्त, भाशानिधी, परिसप्त, फलनगही, अन्तः पाल्य, कुपितमूल, भियगर्भ, अपमृत, अतिक्षित, उपनिविष्ट, समाप्त, उपरद, परिक्षित, विनधान्य, शिवपुरषावध, स्यधिक्षित, मित्र. विक्षिप्त, दूप्ययुक्त, दुष्पाणिप्राइ, शून्यमूल, अस्वामिसंहत, भित्रकूट और ये तीस प्रकारके व्यसन हैं । (इन भर्थ और परस्पर गुरु लघुभाव का विचार, यथाक्रम अगले सूत्रों में किपा जाता है।२॥ तेपाममानितविमानितयोरमानितं कृतार्थमानं युध्येत न विमानितमन्तःकोपम् ।। ३ ।। इम अमानित आदि तीस प्रकार की विशेषताओंसे युक्त सेनाओं के पीधर्म, विमानित (तिरस्कार की हुई)और अमानित (सरकार न की हुई) सेना में से, अमानित ही समय पर सत्कार आदि किये जानेपर विजिगीषु की ओरसे युद्ध कर सकती है। विमानित सेना कभी युद्ध करने को तैयार नहीं होती; क्योंकि उसके हृदय में, पहले किये हुए तिरस्कार के कारण कोप विद्यमान रहता है॥३॥ अमृतव्याधितयोरभृतं तदात्यकृतवेतनं युध्यते न व्याषित- मकर्मण्यम् ॥ ४॥ भभृत (जिसका वेतन न दिया गया हो) और प्याधित (रोगी) सेनाओं में से अभूत सेना ही उस समय वेतनके दिये जाने पर विजिगीषु की औरसे करने के लिये तैयार होसकती है, न्याधित सेना नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें कार्य करने की शक्ति ही नहीं होती। नवागतदूरायातयोर्नवागतमन्यत उपलब्धदेशमनवमिश्नं यु- ध्येत न दूरायातमायतगतपरिक्लेशम् ॥ ५॥ .
- ५ सया०] व्यसनाधिकारिक भवागत (मई आई हुई अर्थात् भमी जल्दी ही आई हुई) और दूरायात (दरसे आई हुई ) सेनाओं में से नवागत सेना, किन्ही दूसरे मर्यात् पहिले से ही यहां रहने पाले किन्ही मनुष्योंले देशके संरन्धमें जानकारी प्राप्त करके, सथा पुराने आदमियों के साथ मिलकर विजिगीषुकी ओरसे युद्ध करने को तैयार हो सकती है। और दुरायात सेना तैयार नहीं हो सकती, क्यो- कि यह दूरसे पाने के कारण (लम्बी यात्रा तै करने के कारण) यहुत थकी हुई होती है ॥ ५॥ परिश्रान्तपरिक्षाणयोः परिश्रान्तं स्नानभोजनस्वपलब्धषि- श्राम युध्येत न परिवीणमन्यत्राहचे क्षीणयुग्यपुरुषम् ॥ ६ ॥ परशान्त (ठीक आहार न मिलने तथा दूरको यात्रा करने के कारण थकी हुई। और परिक्षीण (दूसरे युद्धमे जिसके योग्य सैनिक पुरुप नष्ट होचुके हैं, ऐसी) सेनामि से परिश्रान्त सेना ही, स्नान भोजन शयन तथा विश्राम आदिकी सुविधा होनेपर हर तरहकी यकाघटको दूर करके विजिगीषुकी औरसे युद्ध करने को तैयार हो सकती है। परिक्षीण सेना तैयार नहीं हो सकती,क्यों- कि दूसरे युद्ध में उसके भनेक योग्य पुरुषों का नाश हो चुका है। ६ ॥ प्रतिहतहतागवेगयोः प्रतिहतमग्रपातमा प्रवीरपुरुपसंहतं युध्येत न हताप्रवेगमरपातहतमवीरम् ॥ ७ ॥ प्रतिहत (युके भारम्भमें ही पराजय को मात हुई २ सेना), और हताप्रवेग (अपने वीर पुरपोंके मरजाने के कारण सबसे प्रथम युद्ध करने में उरसाद न रखने वाली) सेनाभों में से, पहिले वारमें हारी हुई प्रतिहत सेना ही अन्य वीर पुरुपौके साथ मिलकर, विजिगीपुके लिये युद्ध करसकती है। हताप्रवेग सेना युद्ध करने को तैयार नहीं होसकती, क्योंकि आगे आक्रमण करमे के कारण उसके अनेक धीरोंका नाश होचुका होता है ॥७॥ अत्त्वभूमिप्राप्तयोरन्तुप्राप्तं यथर्तुयोग्यशस्त्रावरणं युध्येत नाभूमिप्राप्तमवरुद्धप्रसारण्यायामम् ॥ ८ ॥ अतुम त (जिसको युद्धके योग्य ऋतु अर्थात् समय प्राप्त न हो) भोर अभूमि मास (जिसको कवायद भादिके लिये भूमि प्राप्त न हो), इन दोनाम से भन्तुमास सेना, वर्तमान सुके अनुसार ही सवारी हथियार तथा क्षय भादिको लेकर शुद्ध करके लिये तैयार होसकती है, अभूमिप्राप्त सेना तयार नही होसकती, क्योंकि उसके पलने फिरनेको मार्गमा युद संधी कार्य सय ही स्के रहते हैं।
(३८०) . - कौटलीय अर्थशास्त्र | আধ? आशानिदिपरिसृप्तयोराशानिदि लब्धाभिप्राय युध्येत न परिसृप्तमपसृतमुख्यम् ।। ९ ॥ भाशामिदी (इच्छित वस्तुके न मिलनेसे निराशा को पास हुई २ मैना) और परिसृप्त (मुख्यनेतामे रहित सेना) इन दोनोमे से आशानिषंदी सेना, अपनी कामनाको पूरी हुई देखकर विजिगीषु की ओरसे युद्ध करने के लिये पार होजाती ह, परिक्ष सेना तैयार नहीं होसक्ती, क्योंकि उसका मुरुप नेता कोई नहीं होता ॥१॥ कलत्रगर्यन्त शल्ययोः कलत्रगर्युन्मुव्य कलत्रं युध्येत नान्तःशल्यमन्तरमित्रम् ॥ १० ॥ कारबाही (पोस्यको निन्दा कानेवाला, अर्थात् कला आदि मेरे युद्ध सबन्धा कार्याम रुकावट डालने वाले हैं, इस प्रकार उनकी निन्दा फागेवाला) और भाप (अन्दरसे शत्रुता रखनेव ला), इन दोनों यलों (सेनाभी) मे से कलत्राही पल अपने कला भादिकी समुचित सुरक्षत स्थानी व्यवस्था करके विजिगीषुकी ओरसे युद्ध करनेके लिये तैयार होसकता है; अनःशल्य बल तपार नहीं होसकता, क्योंकि वह विजिगीषुके साथ अंदर से शत्रुता रखता है ॥१०॥ कुपितमू उभिन्नगर्भयोः कुपितमूलं प्रशमितकोपं सामादिमि- बुध्येत न भिन्नगर्भमन्योन्गरमाद्भिनम् ।। ११ ।। कुपितगूर (प्रायः क्रोध करने पालो सेगा) और मिनाग (मापसमें ही शत्रुता-फूट रखने पाली सेना), इन दोनों में से कुपितमूक सेना को, साम भादिक द्वारा उसका कोध शान्त करके युद्ध करने के लिये तैयार किया जा सकता है। भिवगर्भ सेना युद्ध के लिये तैयार नहीं होसकती, क्योंकि उनकी आपसमही फूट पड़ी रहती है ॥ 311 - अपस्तातिक्षिप्तयारपसृतमेकराज्यातिकान्तममन्वव्यायामा- भ्यां सत्रिमित्रापाश्रगं युध्येत नातिक्षिप्तमनेकराज्यातिक्रान्त बहानाचत्वात् ।। १२ ॥ आपस्त { एकही राज्य में अन्य रोगाके द्वारा कर पाई हुई सेना) और अतिक्षिप्त ( भगेरामांगे अन्य सेना द्वारा कष्ट पाई हुई सगा), इन योगे समायमिरे, माया गेला, एकही राज्यगं कर ठाने पारण, मन्त्र (सानों में बताये हुप विशेष उपार भार विशेष शिक्षारूप व्यायाम (पा.
५ अभ्या} ध्यसनाधिकारिक (३८) यद) के द्वारा जगल भौर मिनका सहारा लेकर युद्ध करनेक लिये तैयार होस काती है। अतिक्षिप्त सेमा ऐसी तैयारी नहीं करसकती, क्योंकि वह अनेक राज्यों में बहुत कटाका अनुभव किये हुए होती है ॥ १२॥ उपनिविष्टसमाप्तयोरुपनिविष्टं पृथग्यानस्थानमतिसन्धातारं युध्येत न समाप्त परिणतकस्थानयानम् ॥ १३ ॥ उपनिविष्ट (शत्रु समीप रहने वाली सेना अर्थात् शत्रुसे सम्मन्यम रखती हुई स्वतन्त्र रूपसे वारने तथा नाक्रमण करने वाली सेना) भोर समाप्त (पके साथ २ हो ठहरने और आक्रमण करने वाली सेना), इन दोनों सेनाओमसे उपनिवेष्ट सेना, अपने साथ मुकाबला रखनेवाले शत्रुके साथ युद्ध करनको तयार सकती है, क्याकि मिन यर मान होने के कारण, शशु उसका भेद नहीं पासकता, समाप्त सेना युद्द नहीं करसकती, क्योंकिशनुके साथ समानही यान स्थान होनेके कारण, यह इसके भोको जाने रहता . उपरुद्धपरिक्षिप्तयोरुपरुद्धमन्यतो निष्कम्योपरोद्धारं पति- युध्येत न परिक्षित सर्वतः प्रतिरुद्धम् ॥ १४ ॥ उपरख (एक ओरसे घिरी हुई सेना) और परिक्षिस ( चारों ओरसे घिरी हुई गा), इन दानों सेनाआमेरा उपर सेना, एक ओरसे निकललर घेरा डालने वालेका मुकाबला करसकती है, पारक्षित सेना ऐसा नहीं करस फसी, क्याचि यह चारों आरसे घिरी दुई होती ॥ १४ ॥ छिन्नधान्यपुरुपचीवधयोः छिन्नधान्यमन्यतो थान्यमानीय जनमसावराहार या युध्येत न छिन्नपुरुपनीरधमनभिसारम् ॥१५॥ सिधान्य (अपने देशसे धान्य आदि भगाने के लिये जिसका सम्बन्ध टूट गया हो) और हिसपुरणवावध (निस सेनाका अपन देशसे सनिक अरषयमा भार दागके साधन महगी आदि ल ने लेजानेका सम्बन्ध टूट गया दा), दाना भामरे जिसमाध किसी दूसो स्थानसे धाम्य आदि रहार मगार अयम जगम मुग शादि प्राणिमीमा मांग कर या स्थावर वृक्ष भादिक फरसाकर अपना निर्वाह कसी हुई, शनुके साथ युद्ध करसकती थे। जिसपुरषोपय से ऐसा नहीं करसकती, क्योंकि यह सतरहसे अस. दाय होती है। उसको किसी परतुझी मी सहायता नहीं पहुचती ॥ । सायिभिप्तमितनिक्षिसयोः स्वविक्षितं स्वभूमौ विक्षिप्तं सैम्य- ३ 1८अधिक (३८२) कौटलीय अर्थशास्त्र मापदि शक्यमवस्रापयितुं न मित्रविक्षिप्त विप्रकृष्टदेशकालत्वाद 1 स्वविक्षिप्त (अपनेही देश में किसी कार्य के लिये इधर उधर भेजी हुई सेना) और मिग्रविक्षिस (मिनके कार्य के लिये उसके देशमें भेजी हुई सेना), इन दोनो सेनाभीमसे, स्वविक्षिप्त सेना, अपनेही देशमें फैली हुई होने के कारण भापतिके समयमें आसानीसही इकही कीजासस्ती है; मित्रविक्षिप्त सेना दूर देशमें रहने के कारण ठीक समयपर नहीं बुलाई जासकती । क्योंकि दूरसे आमे. में विलम्ब की सम्भावना रहती है ॥१६॥ प्ययुक्तदुष्टपाणिग्राहयोप्ययुक्तमाप्तपुरुषाधिष्ठितमसंहतं यु- ध्येत न दुष्टपाणिग्राहं पृष्ठाभिघातत्रस्तम् ॥ १७ ॥ दू"युक्त (राज्यको कष्ट पहुंचानेवाले मुण्यकर्मचारियों को दूर कहते हैं, उनके साथ सम्पन्ध रखने वाली सेना ) और दुष्टपाणिग्राह (जिसका पाल. मार पीछेसे भापत करने के लिये दोप बढ़नेमेही लगा रहता है, ऐसी सेना ), इन दोनों में से दूष्पयुस सेना, विजिगीपुकी ओरसे युद्ध करने के लिये संपार दोसकती है, कोंकि विजिगोपु अपने विश्वस्त पुरुषोको दूष्योंकी सेवा में नियुक्त करके उनसे सेनाके सम्बन्धको विठित करसकता है। किन्तु दुष्ट गागमाह सेना ऐसा नहीं करसकती, क्योंकि उसे पीछसे आयात होनेका सदाही डा बना रहना है॥१॥ शून्यमूलास्वामिसंहतयोः शून्यमूलं कृतपौरजानपदारक्षं सन- मंदोहेन युध्येत नास्वामिसंहतं राजसेनापतिहीनम् ॥ १८ ॥ शून्यमूह ( सम्पूर्ण सैन्यके बाहर चलेजानेपर मूलस्थाम [राजधानी में रही दुई भस्यल्प सेना) और अस्यामिसहत (राजा तथा सेनापतिसे रहित सेना), इन दोनोमेंसे शून्यमूल सेना, नगर निवासी तथा जनपद निवासी पुरपति सहायता दियेजानेपर अपनी सम्पूर्ण शक्तिसे युद्ध करसती है। भस्वा. मिसंहत सेना ऐसा नहीं करसकती, क्याकि यह रावा या सेनापतिरूप अपने तारो सर्वधा रहित होती है ॥ १८ ॥ भिन्नकूटान्धयोभिभकूटमन्पाधिष्ठितं युध्येत नान्धमदेशिक- मिति ॥ १९॥ मिनट (शिसास छूट कहते हैं, उसीके समान जो सप समाांका सपक्ष को उसको नाम भी कूट है, इस प्रकारकै अध्यक्षसे रहित सेनाको भ्या०] ध्यसनाधिकारिक (३८३) कूट कहते हैं) और भन्ध (शत्रुके व्यवहारके सम्बन्धमें कुछभी जानकारी खने पाली सेना), इन दोनों में से भिन्नकूट सेना, दूसरे किसी अध्यक्ष का रा लेकर युद्ध के लिये तैयार होसकती है । अन्ध सेना गधुके व्यवहार को झाने वाले भादमी न मिलनेसे ऐसा नहीं करसकती ॥ १९॥ दोपशुद्धिर्बलावापः सत्रस्थानातिसंहितम् । संधिश्चोत्तरपक्षस्य बलव्यसनसाधनम् ॥ २० ॥ इम सैनिक व्यसनोंके परिहारका उपाय यह समझना चाहिये:- गानन विमानन भादि दोषोंका प्रायश्चित करना, दोष रहित सेमाको दूसरी के साथ ठहराना, जंगल में सेनाकी स्थिति रखना, तथा कूट उपायोसे सनाका भेद करना, अपनेसे बलवान पक्षके साथ सन्धि करना। ये यस. सनों (सेना संवन्धी आपत्तियों) के हटाने के साधन हैं ॥ २० ॥ रक्षेत्स्वदण्डं ज्यसने शत्रुभ्यो नित्यमुत्थितः । प्रहरेदण्डरन्धेपु शत्रूणां नित्यमुत्थितः ॥ २१ ॥ सदा सजग रहता हुभा विजिगपु, व्यसन के समयमें शत्रुओंसे पनी सेनाको अच्छी तरह रक्षा करे । और बड़ी चतुरतासे शत्रुओं की सना बन्धी निर्बलताओंपर सदा प्रहार करता रहे । यातक बलम्पसमवर्गका रूपण किया गया ॥२१॥ अभियातं स्वयं मित्रं संभूयान्यवशेन वा । परित्यक्तमशक्त्या वा लोभेन प्रणयेन वा ॥ २२ ॥ प्रय मित्रम्यसनवर्ग का निरूपण किया जायगा:-अपने प्रयोजनसे अथवा अपने किसी वन्धु आदिके प्रयोजनसे मिलकर शत्रुपर भाक्रमण करनेवाले अपने मिनको, जब विजिगीषु असमर्थ होने के कारण, लोभ (शत्रुप धन आदि लेने के कारण, या स्नेह (शत्रुके साथ मिग्नता रोजाने के कारण छोड़ देता है, भात् ऐसे समयमें उसकी सहायता नहीं करता तो यह भिस हुभा २ मिन फिर बड़ी कठिनतासे वशमें आता है । (इस सोकका अन्वय २७वें शोक के 'कृच्छेग साध्यते' पदके साथ है, वहांतरके इसके आगेके श्लोकों का भी इसी तरह अन्यय समझना चाहिये) ॥ २२ ॥ विक्रीतमभियुञ्जाने संग्रामे यापवर्तिना। द्वैधीभावन वा मिनं यास्यता चान्यमन्यतः ॥ २३ ॥ हुए होमेपर हो, शत्रुसे धन अदिलकर अपनी सहायताको पराम करके बीच में होधिर्जिापुसे छोदा हुआ मिन, अथवा वैधामिावसे भपात युदके पलंत [८ मधि (३८४) कौटलीय अर्थशास्त्र विजिगीपुळे द्वारा अपने मित्र के साथ सन्धि काके अपने याताय पर भाक्रमण कादेनेके कारण येचा हुआ भार मानेपनमे छोड़ा हुभा मित्र; भयवा 'तुम इधरको भाक्रमण करो भीर में इधरको करूंगा' इस प्रकार एक दूसरे अपने मित्र के सारे साथ सन्धि कामे, किसी दूसर भर्मही भाक्रमण करनेवाले विजिगीपुर खोदा हुआ मित्र, फिर यी कठिनतामे याम होता है ॥२३॥ पृथग्या सह याने वा विश्वासेनातिसंहितम् । भयात्रमानालस्यैर्या व्यसनान प्रमोक्षितम् ॥ २४ ।। पृथक् २ आक्रमण करने या साथ ही आक्रमण करनेपर, पहिले विश्वास दिलाकर,फिर छिपे तौरपर मिनके शत्रुके साथ सन्धि फरके विशिगपुर द्वारा उगाभा, अर्थात् घोसा दियाहुभा मित्रभयया मिग्र के शके भयम, या मियक विषयमें तिरस्कार थुदि होने के कारण, या अपने ही बालस्य कारण, भापतिसे न छुटारा हुआ मित्र, फिर फठिनतामे ही पशमें माता है॥२४॥ अवरुद्धं सभूमिभ्यः समीपाढा भयाद्गतम् । आच्छेदनाददानाद्वा दत्या पाप्यवमानितम् ॥ २५ ॥ अपने (विजिगीपुक) देशम होकर जानेसे रोका हुभा, अथवा अपने ( विजिगीषुके ) समीपसे ही भय ( यध या यम्धन आदिक भय) के कारण गया हुभा मित्र, यसपूर्वक उसके दायका अपहरण करनेसे तिरस्कृत किया हुभा देने योग्य वस्तुको न देने के कारण, अधया देकर भी फिर तिरस्कृत किया हुआ मित्र बदी काठनतासे वशमें भाता है ॥ २५ ॥ अत्याहारितमर्थ या स्वयं परमुखेन वा। अतिभारे नियुक्तं वा भड्क्ता परमवस्थितम् ।। २६ ।। अपने भापही (वयं विजिगीपुके द्वाराही) अथवा किसी दूसरे के द्वारा, सर्पधा धन अपहरण किया या कराया ठुभा मिम (तात्पर्य यह है कि जिप्त मित्र के धनको विजिगीपु स्वयं अपहरण करले या किसी द्वारा करवा वेधे, ऐसा मित्र , अधया विजिारिपुके शत्रुको जीतकर पाया हुआ. सपा उसी समय किसी दूसरे दुस्साध्य कार्यपा लगाया हुआ मित्र, विग जानेपर बड़ी कठिनतासे वश में आता है॥ २६ ॥ उपेक्षितगशक्त्या का प्रार्थयित्वा विरोधितम् । कृच्छ्रण साध्यते मित्र सिद्ध चाशु विरज्यति ॥ २७ ॥ * - म किया ५.सध्या व्यसनाधिकारिक सामध्यहीन होने के कारण उपेक्षा किया हुआ मित्र, भषया पहिले एकघार मिनताके लिये प्रार्थना करके फिर विरुद्ध किया हुआ मित्र पड़ी कठि- नतासे घशमें होता है। वात्पर्य यह है-उपर्युक्त तिसे विकारको प्राप्त हुए । ये मिष बड़ी कठिनतासे वश म्ये जासकते हैं, यदि किसी तरह-जनमेरे कोई किरविजिगीषु के पशमै हो मी जस्य अर्थात् विजिगीपुके मनु मूल पन मी जाय, तो वह शीघही फिर अवसर पाकर विजिगीपुसे चिरफ होजाता है। पहसिक विकृति मिन की फिर दुस्साभ्यताका निरूपण किया गया है ॥२७॥ कृवप्रयास मान्य का मोहान्मिनममानितम् । मानितं वा न सदृशं शक्तितो वा निवारितम् ॥ २८ ॥ अप इसके आगे उन मित्रों का निरूपण किया जायगा, जो कि सरल. सातही फिर विजिगीपुकै भानुकल्पको स्वीकार करलेने हैं। जिसने विजिगायुके लिये संमाम आदिम अत्यन्त परिश्रम किया हो, इसीलिये पूजाके योग्य, अम. से या प्रमादसे तिरस्कृत किया हुआ मिन अथवा परिधमके अनुकूल सरकार हुभा मित्र अथवा विजिगीषु अनुराग होने के कारण, शिनिमीषुके शशुभरैसे तुकारा हुआ मित्रासोघही फिर विनिमी के अनुकूल होजाता है।२८॥ मित्रोपघातत्रस्तं वा शाश्तं वारिसंहिताव! यैर्चा भेदितं मित्रं साध्यं सिद्धं च तिष्ठति ।। २९ । विजिगीपुके द्वारा किसी दूसरे मिनपर किये हुए आपातको देखकर राहुभा ( भयात् आज विजिगीषुने अपने अमुक मिग्रको धोखा दिपाई, अवसर पाकर यह मुझे भी धोखा देसकता है, इस विचारसे डा टुभा), अयण शत्रुके साथ सन्धि करलेने कारण शङ्कितचित्त हुभा २ मिन, अथवा दृष्य पुरुषों के द्वारा भेदको मात कराया हुमा मिन, परिवही विजिगीषु मनु- कूल होजाता है । इसप्रकार वे छ. सरहके मित्र, विकारको प्राप्त होकर भी फिर विजिगीपु के बामें क्षेत्राते हैं, और उसकी अनुकूलताको फिर छोड़ते भी महीं।। २९॥ तसानोत्पादेयेदनान्दोपामित्रोपघातकान् । उत्पन्नाच्या प्रशमयेद्गुणैर्दोषोपघातिभिः ॥ ३० ॥ इसलिये विजिगाधुको चाहिये, कि यर मियों के साथ भेद मानेवाले इन योपोंको कभी वरपन न होने दे। यदि कोई दोष ठापस हो भी जावे, जो उन्हें, दोपोंको नाश करनेवाले गुणों के द्वारा सत्कालही शान्त करदे ॥३०॥ यतोनिमिचं व्यसनं प्रकृतीनामवाप्नुयात् ।
(३८६) कौटलीय अर्थशास्त्र [८ भाषिक प्रागेव प्रतिकुर्वीत तन्निमित्तमतन्द्रितः ।। ३१ ।। इसि म्पसनाधिकारिक ऽष्टमे ऽधिकरणे पलव्यसनवर्गः, मिनप्यसनर्ग पनमो ऽध्याय ॥ ५॥ आदित एकविंशतिशतो ऽध्यायः ॥ १२॥ एतावता कौटलीयस्यार्थशास्त्रस्य ध्यसनाधिकारिक अष्टममधिकरणम् समाप्तम् ॥८॥ तथा जिन कारणों से, स्वामी अमात्य धादि प्रकृतियों के सम्बन्धमें जो म्यसनप्राप्त होघे, आलस्यरहित रहते हुए विजिगीपुको चाहिये कि उस न्यसनके उत्पन्न होने से पहिलेही उसके कारणों का प्रतीकार करपे । (इस श्लोक मूल पुस्तकोंमें मित्रव्यसनवर्गका निरूपण भारम्भ होनेसे पहिलेही रक्ता गया है। परन्तु नयचन्द्रिका स्याण्यामें इसको सबसे अन्तिम श्लोक मानकर अधिकरणके अन्तमही इसकी व्यारया कीगई है । उसहीके भनुसार हमने भी ध्यास्पान किया है ॥३॥ व्यसनाधिकारिक अgम अधिकरणमें पांचवा अध्याय ममाप्त । व्यसनाधिकारिक अष्टम अधिकरण समाप्त । US अभियास्यत्कर्म नवम अधिकरण । पहिला अध्याय। १३५-१३६ प्रकरण। शक्ति, देश-कालके बलावलका ज्ञान, और यात्रा-काल । उत्साह प्रमाव आदि शक्ति, सम विषम भादि देश और शीत उष्ण आदि समयकी अनुकूलताका अपनी सेनाके लिये होमा वल, सथा शत्रुकी सेनाके लिये शक्ति आदिका अनुकूल न होमा अमल कहाता है। प्रथम प्रकरणमें इन्दीका विचार किया जायगा। तदनन्तर यानाके समयका निरूपण होगा। विजिगीपुरात्मनः परस्य च बलावलं शक्तिदेशकालयात्रा- कालबलसमुत्थानकालपथात्कोपक्षयव्ययलाभापदां ज्ञात्वा विशि- एचलो यायात् ॥ १ ॥ अन्यथासीत ॥ २ ॥ विजिगीषुको चाहिये, कि घर अपने और शत्रुके बलाबलको जानकर भर्यात् शक्ति, देश, काल, याना-काल (सेनाके, किसी देशपर आक्रमण कर. नेका समय), पलसमुस्थानकाल (सेनाकी उसतिका समय), पश्चात्कोर (दूसरे देशपर माक्रमण करने के अनन्तर, पीछेसे राजधानी मादिपर पानि. प्राह मादिके द्वारा आक्रमण किया जाना), क्षय (योग्य पुरपोका माश हो. जाना), म्यय (धन आदिका नाश होजाना),लाभ (फलसिदि), और भापति (वाय और माम्यन्तर दोनों तरहकी विपत्ति इसका ४३प्रकरणमें निरूपण किश जायगा), इनके सम्बन्धमें शत्रु और अपने पक्षावको जानकर, फिर शकी भपेक्षा अपनी बहुत अधिक सेना लेकरही उसपर माक्रमण करे :॥ ॥ यदि नाफा मधिक प्रबंधन होसके तो आक्रमण करना पाहिये, सारा भषाप को अधार सुपचाप अपने घर पैसा रहे । १ ॥
[९ मभिः
।
(३८८)
कौटलीय मशास्त्र
उत्साहप्रभाषयोरुत्साहः श्रेयान् ॥ ३॥ स्वयं हि राजा
शूरो बलवानरोगः कृतास्रो दण्डद्वितीयो ऽपि शक्तः प्रभाववन्तं
राजानं जेतुम् , अल्पो ऽपि चास्य दण्डस्तेजसा कृत्यकरो भवति
॥ ४॥ निरुत्साहस्तु प्रभाववान्नाजा विक्रमाभियनो नश्यतीत्या-
चार्याः ॥ ५॥
(शक्ति तीन प्रकारको होती है:--उत्साह शकि, प्रभाव शक्ति और
मन्त्र शक्ति; भव इनके पारस्परिक गुरुलघुभाषका निरूपण किया जाता
है:-) उत्साह शक्ति और प्रभाव शक्ति इन दोनोंमेंसे उत्साह शक्तिही श्रेष्ठ
होती है ॥ ३ ॥ क्योंकि स्वयं शूर, बलवान् , नीरोग, शस्त्रास्त्र विद्याको जानने
वाला केपल भएनोही सेनाकी सहायता रखने वाला ( अर्थात् मित्र आदिकी
सहायता न होनेपर भी ) शक्तिशाली राजा अकेलाही प्रभाव शक्किम युक्त
राजाको अछी तरह जीत सकता है । और घोड़ी भी इसकी सेना, इसके
तेजमेरताहका कार्य करने के लिके तैयार होजाती है ॥ ४॥ प्रभावशाली
भी उत्साहहीन राजा तो पराक्रमफे समय भयश्यही नष्ट होजाता है, अर्थात्
पराकम करने का अवसर आनेपर वह अपनी रक्षा नहीं कर सकता, यह प्राचीन
भनेक आचार्योकीमत
नेति कौटल्यः ॥ ६ ॥ प्रभाववानुत्साहवन्तं राजानं प्रभा-
वेनातिसंपत्ते ॥ ७ ॥ तद्विशिष्टमन्यं राजानमावाह्य हत्वा क्रीत्या
प्रवीरपुरुपान्प्रभूतप्रभावहयहस्तिरथोपकरणसंपन्नश्वास दण्डः सर्व-
वाप्रतिहतवरति ॥ ८॥ उत्साहवतश्व प्रभाववन्तो जित्वामीत्वा
बलियो पालाः पङ्गयो ज्धाच पृथिवी जिम्युरिति ॥९॥
परम्नु आचार्य कौटल्य इस सिद्धान्तको युक्तिसंगत नहीं मानता ॥३॥
पहु कहता है कि प्रभावशाली रामा, उत्साही राजाको भपने प्रभावके द्वारा दया
लेता है । मीर उससे भी अधिक उत्साही किसी दूसरे राजाको अपने पक्ष में
मिलाकर तथा प्रवीरपुरषों ( वहादुर भादमियों) को भत्ता और वेतन आदि
देने अश्या अत्यधिक धन देनेसे अपने घशमें करके भौर भी अधिक प्रभाव और
पोरे हाथी तथा रथ आदि साधनोंसे युक्त हुई २ इसकी सेना, विना किसी
रोक टोक सय जाह विचरण करती है ॥ ८॥ तथा ऐतिशमी इस बातमें
प्रमाण है कि ची पाठक लंग और अन्धे भी प्रभावशाली राजा माने अपमे
प्रभावक कारण उत्साही राजाभाको जीतकर, सधा धन आदिके द्वारा पशमें
करके, पपिदीपर विजयलाभं किया था ॥९॥
माया]
।
मंभियास्पस्कर्म
(३८५)
प्रभावमन्त्रयोः प्रभावः श्रेयान् ॥ १०॥ मन्त्रशक्तिसंपनो
हि वन्ध्य युद्धिरमभावो भवति ॥ ११ ॥ मन्त्रकर्म चाय निश्चि-
तमप्रभावो गर्भधान्यमवृष्टिरिवोपहन्तीत्याचार्याः ॥ १२ ॥
प्रभावशक्ति और मन्यशक्ति इन दोनों में से प्रभावशक्तिही भधिक श्रेष्ठ
होती है ॥ १०॥ क्योंकि मन्प्रशक्तिसे सम्पक्ष भी राजा, यदि प्रभाषशक्तिसे
रहिस हो, तो उसका मन्त्र कभी सफल नहीं होता, तात्पर्य यह है कि कोई
भी प्रभावहीन राजा विचारपूर्वक कार्य नहीं कर सकता ॥ ११॥ प्रभावशक्ति
से हीन राजाका विचारपूर्वक निधित किया हुआ भी मन्त्र कर्म ( मन्त्र-रूप
कार्य ) इसीप्रकार नष्ट होजाता है, जैसे गर्भस्थ धान्य ( अपनी उत्पत्ति में
वृष्टि की अपेक्षा करने वाला धान्य) वृष्टिके न होनेस नष्ट होजाता है। तात्पर्य
यह है, कि प्रभाव हीनता उसी तरह मन्त्रको नष्ट करदेती है, जैसे कि पुष्टिका
म होना धान्यको। यह प्राचीन आचार्यों का मत है ॥ १२॥
नेति कौटल्यः ॥ १३ ॥ मन्त्रशक्तिः श्रेयसी ॥ १४ ॥
प्रज्ञाशास्त्रचक्षुर्हि राजाल्पनापि प्रयत्नेन मन्त्रमाधातुं शक्तः परा-
नुत्साहप्रभाववतश्च सामादिभिर्योगोपनिपझ्यां चातिसन्धातुम्
॥१५।। एवमुत्साहप्रभावमन्त्रशक्तीनामुत्तरोत्तराधिको ऽतिसंधत्ते
॥१६॥
परन्तु भाचार्य कौटल्य, इस सिद्धान्तको युक्तिसगत नहीं समझता
॥ १३ ॥ वह कहता है कि प्रभायशक्तिकी अपेक्षा. मन्त्रशक्तिही अधिक
होती है। क्योकि बुद्धि तथा शाररूपी चक्षुभोसे युक्त राजा,थोड़ा भी प्रयन
करके अपने मन्त्रका अच्छी तरह अनुष्ठान कर सकता है । और दूसरे अपने
प्रतिद्वन्द्वी उस्स ही तथा प्रमावशाली राजा को भी, साम भादि उपायोके
दारा, सीक्षण रसद आदि गूढ पुरकि द्वारा तथा भोपनिषदिक प्रकरणमें कहे
हुए विष या अग्नि भादिक प्रयोगोंके द्वारा दवा सकता है, अर्थात् उत्साह
प्रभावशाफ़ि के घोरे होने पर भी मन्त्रशक्ति के द्वारा उनको अपने वशमें कर
सकता है॥ १५॥ इस प्रकार उत्साहशक्ति प्रभावशक्ति और मन्यशक्तियों में
से उत्तरोत्तर अधिक शक्ति से युक्त हुआ २ राजा, पूर्व पूर्व शक्ति से युक्त राजा
को दया सकता है। यहा तक शक्ति का निरूपण किया गया ॥१६॥
देशः पृथिवी ॥ १७ ॥ तस्यां हिमवत्समुद्रान्तरमुदीचीनं
योजनसहस्रपरिमाणं तिर्यक्चक्रवतिक्षेत्रम् ॥ १७ ॥ तत्रारण्यो
'ग्राम्य पार्वत औदको भौमः समो विपम इति विशेषाः ॥१९॥
[९मधिः कौटलीय अर्थशास्त्र • भय इसके भागे देशका निरूपण किया जाय।। 1 पृषिशीका ही माम है ॥ १७ ॥ पृथिवीपर हिमालयसे दक्षिण समुद पर्यन्त अर्यात् उत्तर दक्षिणमे हिमालय और समुद्र के बीच का तथा एक हजार योजन तिरछा अर्थात पूर्व पश्चिमकी ओर एक हजार पोजन विस्तारवादा, पूर्व पश्चिम समुद्र की सीमासे युक्त देश चक्रपतिक्षेन कहाता है। भयात् इसने प्रदेश पर शासन करनेवाला राजा घवी होता॥16॥ उस चक्रवर्ती क्षेयमें जंगल, आवादी, पहाड़ी इलाका, जलमाग, स्थलप्राय, समतल तथा अबदा पसायद ये विशेष भाग होते हैं ॥ १९ ॥ तेषु यथाखनलद्धिकरं कर्म प्रयुजीत ।। २० ।। यत्रात्मनः सैन्यव्यायामानां भूमिरभूमिः परस्य स उत्तमो देशः, विपरीतो ऽधमः, साधारणो मध्यमः ।। २१ ॥ इन विशेष भूभागों पर, जिस प्रकार अपनी सेना की वृद्धि होसके, उस तरह कार्यों का प्रयोग करे अर्थात् वप्ती अवस्था में युद्ध भादि कार्यों को फरे, जय कि अपना विजय और दूसरे का पराजय निश्चित हो ॥ २०॥ जिस प्रदेश में अपनी सेना की कवायद भादिके लिये अच्छी भूमि मिल सके, तथा पाणु की सेना की कवायवका कुछ भी सुभीता न हो, उसको उत्तम देश समझना चाहिये । जो इससे विपरीत हो (यात् जिसमें अपनी सेनाकी फ़वायदके लिये कुछ भी सुमीता न हो, और शत्रुकी सेना की कवायद के लियं हर तरहका सुमीता हो) वह अधम, तथा जो अपने और शत्रुके लिये साधारण हो ( भर्धात् जिसमें दोनोंके लिये कवायद आदिका मुमीता होना न होना परायर हो) वह मध्यम देश होता है । यहांतक देशका निरूपण कर दिया गया ॥ २१ ॥ कालः शीतोष्णवपत्मा ॥ २२ ॥ तस्य रात्रिरहः पक्षो मास मातुरयनं संवत्सरो युगमिति विशेषाः ॥ २२ ॥ तेषु यथास्वयलवृद्धिकरं कर्म प्रयुद्धीत ॥ २४ ॥ यत्रात्मनः सैन्य- व्यायामालामृतस्तृतः परस स उत्तमः कालो, विपरीतो ऽधमः साधारणो मध्यमः ॥२५॥ भर काल का निरूपण किया जायगा। यह तीन भागों में विभक है- सरदी, गर्मी, और वो ॥ २२ ॥ उस कालके निरा लिखित विशेष भेद -प्रात, दिन, पक्ष (पाव-पन्द्रद पम्पह दिन का शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष) महीना, ऋतु, अयन ( महीने का एक भयन होता है, एक वर्ष में. हो 7. १ मध्या०] अभियास्यत्कर्म भयन होते है, उसरायण और दक्षिणायन ), संवरसर ( साल), भौर युग ॥ २३ ॥ समय के इन विशेष भागों में, विजिगीषु अपनी सेना की वृद्धि करने पाले कार्योका अनुमान करे, अर्थात् इस प्रकार के कार्याको करे, जिससे अपनीही सेना की वृद्धि हो सके ॥२४॥ जो ऋतु आदि अपनी सेनांक व्यायामके लिये सर्वया अनुकूल हो और शत्रुको सेनाके लिये सर्वथा प्रतिकूल दो, पामतु भादि काल उत्चमकाल समझना चाहिये । इससे विपरीतकाल अधम, और अपने तथा शत्रु के लिये साधारण काल मध्यमकाल कहाता है। पहातक शक्ति देश तथा काल के भवान्तर भेद तथा उनके बलापल का कि. पार किया गया ॥ २५॥ शक्तिदेशकालानां तु शक्तिः श्रेयसीत्याचार्याः ॥ २६ ॥ शक्तिमान्हि निम्नस्थलवतो देशस्य शीतोष्णवर्षयतच कालस्य शक्तः प्रतीकारे भवति ।। २७ ॥ भय इसके भागे शक्ति देश और काल इन तीनों के परस्पर पलादल का विचार किया जायगा । आचार्यों का मत है कि शक्ति, देश और काल इन तीनों में से शक्ति हो सय की भपेक्षा अधिक श्रेष्ठ होती है ॥ २६॥ क्योंकि शक्ति से युक्त राजा, ऊपासाव तथा पथरीले प्रतिकूल देश के और हारवी गर्मी सपा वर्षासे युक्त प्रतिफूल काल के प्रकार कानेमें अच्छी सह समर्थ होताहै ॥२०॥ देशा यानित्य के ॥ २८ ॥ स्थलगतो हि वा ननं विक- पति निम्नगतो नकः श्वानमिति ॥ २९ ॥ किमही और प्राचीन भाचार्यों का मत है कि शाकि देश और काछ इन तीनामसे देश ही सयकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ट होता है ॥२८॥ क्योंकि अपने मनुकूल रथल देशम खा हुमा कुत्ता, जलचर नमः (नांफू) को सींच लेता हैराथा अपने अनुकूल निस्थल (जलदेश) में पड़ा हुभा नफ उस देशक होममायस कुत्तको खींच लेता है । सारपर्य यह है कि अपने २ अथक देशमें ही स्थित होकर प्रत्येक व्यक्ति अपन विगोधीको नीचा दिखा सकता है इस लिये शक्ति भादि सोनोमस देशको ही प्रधान समतना चाहिये ॥२९॥ कालः श्रेयानित्येके ॥ ३० ॥ दिया काकः काशिक हन्ति रात्री कौशिकः काकामिति ॥ ३१ ।। इसके अतिरिस बिना भाचायाँका यहभी मतककारी माय सबकी भपेक्षा मेष्ठ समाना चाहिये ॥३०॥पयोंकिका प्रमावा
[.९ भाषिक
।
(३९२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
से दिगमें कीमा उल्लू को मार डालता है, और रात्रिमें उल्लू कौएको,मार
सालता है । तात्पर्य यह है, कि जिसके अनुकूल जो काल होता है, वह उसके
भरोसेपरही भपने बलवान् विरोधीको भी नष्ट कर देता है । इस लिये काल
फोही सबकी अपेक्षा प्रधान समक्षमा चाहिये ॥ १ ॥
नेति कौटल्यः॥ ३२ ॥ परस्परसाधका हि शक्तिदेशकालाः
॥३३॥
परन्तु भाचार्य कोटरूप, पृथक ३ शक्ति आदिको प्रधान मानने वाले
इन भादापोंके गतको युक्तिमंगत नहीं समझता ॥ ३२ ॥ क्योंकि वह कहता
है, कि शक्ति देश भौर काल ये तीनोंही परस्सर एक दूसरेके साधक होते है ।
इनसे किसी एकको प्रधान और दुसरेको अप्रधान न समझना चाहिये,
प्रत्युत तीनोंही एक दूसरेकी अपेक्षा करके कार्यको सिद्ध करने वाले होते है,
इस लिये सबके ऊपर समानही प्रधानता समझनी चाहिये । यहाँ तक शकि
देश भौर कालके बलापलका विचार किया गया ॥ ३३ ॥
तैरभ्युचितस्तृतीयं चतुर्थ वा दण्डस्यांशमूले पार्ष्या प्रत्य-
न्ताटवीपु च रक्षा विधाय कार्यसाधनसहं कोशदण्डं चादाय
क्षीणपुराणभक्तमगृहीतनवभक्तमसंस्कृतदुर्गममित्रं वार्षिकं चास्य
सस्य, हैमनं च मुष्टिमुपहन्तुं मार्गशीपी यात्रां यायात् ॥३४॥
अम इसके आगे यात्राकालका निरूपण किया जायगा, शत्रुको लक्ष्य
करके विजिगीषुके द्वारा किये गये भाक्रमणका नाम 'यात्रा' है, उसके लिये
समुचित कालोंका कथन किया जायगा:-अपने अनुकूल शक्ति देश मौर फालसे
युक्त हुआ २ भाव शक्ति आदि के द्वारा शत्रुकी अपेक्षा अधिक भतिशय
को मास हुभा २ विजिर्गापु, आवश्यकतानुसार सेनाके तिहाई भयना चौधाई
हिस्सेको मूल (राजधानी), पाणि (पृष्ठभाग), भऔर सरहदी इलाकोंके
जंगलों में रक्षा के लिये स्थापित काके, कार्यको सिद्ध करनेमें समर्थ भात
कार्य को पूरा करने में उपयोगी कोश (खजाना ) और सेनाको लेकर, शत्रुको
नष्ट करने के लिये मार्गशीर्ष (मंगसिग्भगहन ) महीनेमें शत्रुकी और भाक्र.
मण करे । इस समयमें शत्रु पर भारुपण करनेसे विजिगीपुको बहा लाम
रहता है, क्योंकि इस ऋतुनुका पुराना संगृहीत किया हुआ भर समाप्त
हो पुछता है, नई फसलके अमका अभी तक संग्रह नहीं होता, और वर्षाके
भनम्तर किलोकी मरम्मतभी नहीं हो पाती। तथा वर्षा ऋतुके उत्पन्न हुए २
धान्पको, और आगे हेमन्त ऋतुमें उत्पन्न होने वाली फसल को भी नए करने के
लिये यह पाया उपयोगी होती है। यह यात्राका पहिला समय है ॥३५॥
. अध्या - अभियास्यकर्म हैमन चास्य सत्यं वासन्तिकं च मुष्टिमुपहन्तुं चैत्री यात्रा यायात् ॥ ३५ ॥ क्षीणतृणकाष्ठोदकमसंस्कृतदुर्गमामित्रं यास- न्तिकं चास्य ससं वापिकी वा मुष्टिमुपहन्तुं ज्येष्ठामूलीयां यात्रा यायात् ॥ ३६॥ इसी प्रकार, हेमन्त स्तुम उत्पन्न हुए २ धान्योको, तथा वसन्तऋतुमें होनेवाली फपलको नष्ट करने के लिये चैत्र मासमे शत्रुपर आक्रमण करना चाहिये । यह दूसरा यात्राकाल समझना चाहिये ॥ ३५ ॥ इसी तरह, बसन्त ऋतु में तैयार किये हुए धान्याको, तथा आगे वाऋतुम उपजने वाली फसल को नष्ट करने के लिये ज्येष्ठ (जेड के महीनेश याना करे । क्योंकि इस ऋतु में शत्रुके तृण (घास फूस आदि), काठ (लकड़ी, सोख्ता आदि), तथा जल आदि पदार्थ क्षीण अर्थात् नए या कम होजाते है, और इसीलिप वह अपने दुर्ग भादि आदिकी मरम्मत भी नई करा सकता। ये तीनी यात्राकाल शनुको हामि पहुंचाने के लिये बहुत अच्छे होते है । तारपर्य यह है कि इन पानाफालों में शपर भामण करके, विजिगीषु शीघ्रही उसको अपने अधीन कर सकता है ॥ ३६॥ अत्युष्णमल्पयवसेन्धनोदकं वा देशं हेमन्ते यायात् ॥३७॥ तुपारदुर्दिनमगाधनिम्नमायं गहनतणयक्ष या देशं ग्रीष्मे यायात् ॥३८॥ सैन्यव्यायामयोग्यं परस्यायोग्यं वर्पति यायात् ॥३९॥ अघ देशोंके अनुसार यात्राकाल का निरूपण किया जायगा,-अयस्त गरम और थोदेही गाल (पशुमाकी खाद्य सामग्रीको मौत कहते हैं, उसके लिये यहाँ 'ययर' शब्द है), इंधन तथा जल बाले देशको हेमन्त प्रस्तुमें जाये, अर्थात ऐसे देश पर हेमन्त ऋतुम आक्रमण करना सुखप्रद होता है ॥३५॥ जिस देश में लगातार घरफ पा पारिश पृष्टुती हो, धड़े र गहरे पालाप हों, परें घने जंगल वा पासके मदाग हाँ ऐसे देशको नीम में जाये। गरीमयों में भाषश्यक सब चीजोका मुर्भाता होने के कारण ऐरे देशों पर गामी में ही आक्रमण करना सुराकर होता है ॥ ३८॥ अपनी सेना के लिये वायद गादि करने के योग्प, तगा शशी सेनाके लिये कवायद भादि करने के सपा भयोग्य देश पर, वर्षा ऋतु में भारमण करे । भान् वर्षा अनुमें ऐसे देश । भाक्रमण करे, जहां अपनी सेनाके लिये तो कवायन भादि का सुभीता हो, पंच की 'मेनरके हि कषायर भारिका किसी सरपका भी हमीदों १ सध्या अभियास्यरकर्म हो तभी उसपर भाक्रमण करदेना चाहिये; क्योंकि अपनी शक्तिका अधिक होना अवश्याही कार्य को सिद्ध करने वाला होता है । शत्रुकी भापतिका कोई ठिकाना नहीं, यदि शत्रुपर आपत्ति आई हुई भी हो, फिर भी विजिगीपुकी शक्ति घदी हुई न होने के कारण यह निश्चित नहीं होसकता कि विजिगीपुको विजय लाम हो ही जावेगा । इसलिये आक्रमण करने के सम्बन्धमें शत्रुके व्य. समझी अपेक्षान करके विजिगीपुको अपनी शक्तिके अभ्युदरकीही अधिक अपेक्षा करनी चाहिये ॥४५॥ यदा या प्रयातः कयितुमुच्छेत्तुं वा शक्नुयादमित्रं तदा यायात् ॥ ४६॥ अथवा जिस किसी समय में भी आक्रमण कामे पर विजिगीषु अपने शत्रुको निर्मल पनासके, या उसका उच्छेद करसके, उसी समय उसपर भाक्रमण करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि जब भी विजिगीषु अपने आप को इतना शक्तिसम्पा समझे, कि वह शत्रुको दया या नष्ट कर सके, तभी उसपर माफमण करदे, शके ध्यसन और अपने अभ्युदयकी भी विशेष अपेक्षा न करनी चाहिये ॥ १६ ॥ अत्युष्गोपक्षीणे काले ऽहस्तियलपायो यायात् ॥ ४७ ।। हस्तिनो ह्यन्तःस्सेदाः कुष्ठिनो भवन्ति ॥४८॥ अनवगा- हमानास्तोयमपिबन्तश्चान्तरवक्षाराचान्धीभवन्ति ।। ४९ । तसा- प्रभूतोदके देशे वर्पति च हस्तिबलप्रायो यायात् ॥ ५० ।। भय सेनाके अनुसार काल नियमका कथन कियाजायगा:-भस्यधिक उत्पातायुक्त समय में हाधियोंकी सेनाके अतिरिक्त अर्थात् हाधियोंकी सेनाको छोड़कर ऊर भादिकी सेनाको साथ लेकर ही भाक्रमण करना चाहिये ॥ ७ ॥ क्योकि हाथी, बाहर न निकलने के कारण भीतर ही स्थित हुए पसीने के जालासे कोढी होजाते हैं, भात अत्यधिक उष्ण देश हायीकी खाल दूषित हो जाती है, और पुछ रोग सा होजाता है॥ ५८ ॥ तथा पानीमें न नहाने के कारण और अच्छी तरह जल में पीने के कारण, अन्दरका वाह अधिक बढ़ जानेसे हाधी भन्धे भी होजाते ॥ ५९॥ इसलिये जिस देश जल महुत अधिक हो, और वर्षा ऋतुम ही, हाधियों की सेमाको लेकर भाकरण करना पाहिये ॥ ५५ ॥ विपर्यये खरोष्ट्राचवलप्रायः ॥ ५१ ॥ देशमल्पवर्षपई वर्पवि मरुप्रायं चतुरङ्गवलो यायात् ॥५२॥ समविपमानिस कोटलीय अर्थशास्त्र [९ अधिक स्थलहखदीर्घवशेन वाध्वनो यात्रां विभजेत् ॥ ५३ ॥ जही ऐसा न हो, अर्थात् जलका स्थायी प्रबन्ध भी नहो, और वो भी नहो, पैसे देश तथा समयमें गधे ऊट तथा धौदोंकी सेनाको लेकर हो आक्रमण करना चाहिये । ऐसी अवस्थाम हाथियों की सेनाको कमी न लेजावे ॥ ५१ ॥ जिस देशम चपाके होनेपर भी कीचद योड़ी ही होती हरे, पेसे सहप्राय प्रदेशम (रोगिस्तान आदिमें ) वर्षा ऋतुमें चतुरग सेना ( दाधी, घोडे, रय और पदाति ) को लेकर भी आक्रमण किया जासकता है ॥५२॥ अथवा मार्गके सम विषम निम्न स्थल हस्व तथा दी होने के कारण भी यात्रा को विभक्त किया जासकता है । (सम-समतल, एकसी जमीन जो ऊची नीची नहीं, विषम-उची नीची, निम्न-जलपाय, स्थल स्थलाय, इस्वयोरे ही समयमै स किया जाने वाला, तथा दीर्घ-बहुत समयमें से किया जाने वाला मार्ग)॥ ५३ ॥ सर्ग वा हस्यकालाः स्युर्यातव्याः कार्यलाघवात् । दीर्घाः कार्यगुरुत्वाद्वा वर्षावासः परत्र च ॥ ५४॥ इस्पभियास्यस्कमणि नवमे ऽधिकरणे शक्तिीशकाल बलाबलशान यानाकाला प्रथमो ऽध्याय ॥१॥ भादितो द्वाविंशशतो ऽध्याय ॥ १२२॥ सबही यात्राएं कार्यके धौड़ा होनेके कारण इस्वकाल होती हैं। अर्थात् कार्य थोदा होनेपर, उनके लिये दिये जाने वाले भाक्रमण थोपाही समय लेते हैं। इसीप्रकार जो कार्य परे होते हैं, उनके लिये कीजाने पाली यात्रा बहुत समय लगता है। भोर कभी ३ कार्याधिश्पके कारणही वर्षा ऋतु में भी (जब कि अपनेही देशमें पास करना चाहिये)दूसरे देशमें निवास करना पड़ता है । इसलिये कार्यों की गुरता एधुताके अनुसारही यात्रा का हवाल तथा दीघकाल समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ अभियास्यत्कर्म नवम अधिकरणमें पहिला अध्याय समाप्त । 1 है २ सध्या०] अभियास्यत्कर्म . . दूसरा अध्याय। १३७-१३९ प्रकरण। सेनाओं के तैयार होने का समय, सन्नाहगुण और प्रतिबलकर्म। इस अध्यायमें तीन प्रकरण हैं, पहिले प्रकरणी सेनाओंके यार होने या उनको उचित कार्योंपर लगाने के समयका निरूपण किया जायगा । दूसरे प्रकरणी सेनाओं के उद्योग के गुणोंका, तथा तीसरे प्रकरण में शत्रुकी सेनाके अनुरूपही पाक्ति आदिके द्वारा अपनी सेनाको भी पनानेके पायोका निरूपण किया जायगा । मौलभृतकश्रेणीमित्रामित्राटधीयलानां समुदानकाला ॥१॥ मौलपल ( मूलस्यान अर्थात् राजधानीकी रक्षा करने पाली सेना), भूतकाल ( मौकरी देकर बनाई हुई सेना), श्रेणीधल ( जनपदमें अपना २. काम करने वाले शस्त्रास्त्र विद्या में निपुण पुरुपोंकी सेना), मिनल (मित्रकी सेना ), अमिग्रवल (शत्रुकी सेना), भोर भरवीवर ( आटविक पुरुयोंकी सेना), इनके युद्धादि कार्यों में जानेके लिये तेयार होने के समयका निरूपण किया गायगा । तात्पर्य यह है कि इन मिस २ सेनाओंको किस २ अवसरपा युद्ध के लिये तैयार करना चाहिये, इसका निरूपण किया जायगा मूलरक्षणादतिरिक्त मौलबलम् ॥ २ ॥ अत्यावापयुक्ता या मौला मूले विकुरिनिति ॥ ३ ॥ बहुलानुरक्तमौलबलः सार- बलो वा प्रतियोद्धा व्यायामेन योद्धव्यमिति ॥ ४ ॥ सपसे पहिले मालपलके तैयार होने केही कारणोंको यताया जाता है:- मूलस्थानकी रक्षा कानेके लिये जितनी सेना पयांत है, उससे अधिक माछ सैना हो, तो उसे युद्ध में ले जाना चाहिये ॥ २ ॥ अश्या मौलपल इस समय मायन्त दोह करने में लगा हुभा होने के कारण, हमारे चले मानेपर मूलस्थान में अवश्यही हमारे विरुद्ध आन्दोलन करेगा, ऐसी अवस्थामै भी मालवलको अपने साथही युद्ध भादि कार्योंपर लेजाना चाहिये ।। ३ ॥ अथवा अपना मुकाबला करनेवाला शत्रु, उसमें (में)प्रत्यन्त धनुराग रखनेवाले मौलपलको लेकर पा शक्तिशाली दूसरे सैम्पको लेकर मेरे साथ युद्ध करने के लिये माया है, इसलिये उसके साथ बहुत मयसपूर्वक युद्ध करना चाहिये,ऐसी अवस्था भी विजिगीषु अपने मौसमयको लेकाही उसके साथ मुकाबला करे ॥ ४ है . ८ कौटलीय अर्थशास्त्र प्रकृष्ट ध्वनि काले या क्षयव्ययसहत्वान्मोलानामिति ॥ ५ ॥ बहुलानुरक्तसंपाते च यातन्पयोपजापभयादन्यसै- न्यानां भृतानामविश्वासे ॥६॥ लक्षये वा सर्वसैन्यानामिति मौलवलकालः ॥७॥ घहुत लम्बा रास्ता ते करने के बाद, या बहुत समयमें शत्रुके साथ पुट करनेकी तैयारी होनेपर क्षय (मनुष्योंका नाश) और व्यय (धनका माश) भपश्यम्भाधी है; मौलबलही उसको सहन कर सकता है, इस कारण- से भी मौलयलको युदपर लेगाना चाहिये ॥५॥ अपने स्वामीमें भस्यन्त अनुराग रखने वाले शत्रुके दूत, यहाँ भाकर अवश्यही मेरी सेनामा भेद डालनेका यन करेंगे,इम प्रकार के द्वारा भेद डालेजानेके भयसै, और मौल सेना के अतिरिक्त अन्य भृत आदि सेनाओपर पूरा विश्वास न होने के कारण, ऐसे अवसरपर मौलव कोही युद्ध के लिये लेजाना चाहिये, क्योंकि मौलाल अत्यन्त विश्वस्त होता है, उसमें भेद नहीं डाला जासकता ॥ ६ ॥ अथवा अन्य सा सेनाओंका क्षय होजानेपर मौलवलको युद्ध के लिये लेगाये । तात्पर्य यह है कि जब अन्य सेनाओंके प्रधान पुरुषोंका नाया होजाय, और विजिगी. पुको पहजर हो, कि अब यह सेना कहीं खेत छोड़कर भाग न सी हो, उस समय मौलपलको बुलाकर युद्ध के लिये तैयार करदे। ये सब मौलपल के युद्धादि कार्यापर नियुक्त होने के अवसर समझने चाहियें ॥७॥ प्रभूतं मे भृतथलमल्पं च मौलबलमिति ।। ८ ॥ परसाल्पं विरक्त वा मौलपलं फल्गुणायमसारं वा भृतसैन्यमिति ॥९॥ मन्त्रेण योद्धव्यमल्पव्यायामेनेति ॥१०॥ भव भूतबल के उन अवसर या कारणों का निरूपण किया जायगा- मेरे (विजिगीषुके) पास भृत बस बहुत अधिक है, और मैलिबल धोरा है, ऐसे भवसा पर भृत्तपल को ही युद्धपर लेजाना चाहिये । पल थोड़ा है, तथा उसमें अनुराग भी नहीं रखता, इसलिये मेरा भृतवस हो उसके मुकाबले में कार्य सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है। इस कारण से भी भृतबल को ही युद्ध के लिये जाये । भया शत्रुका भृतसैन्य शक्तिहीन तथा न होनेके बराबर है, अर्थात् बहुत थोड़ा है। तब भी विजिगीषु अपने भृतबल को ही युद्धके लिये तैयार करे ॥ ९ ॥ अथवा मन्त्रसे ही युद्ध करना पड़ेगा, भधात् इस समयमें शत्रुके साथ युद्ध ही करना पड़ेगा, उसमें थोदे की मसे कार्य हो सकता है, इस कारण से भी भूतबलकोही पुरके लिये ले पावे ॥10॥ शका मौल.
२ मध्या
अभियास्यकर्म
हस्खो देशः कालो वा तनुक्षयव्यय इति ॥ ११ ॥ अल्प.
सम्पातं शान्तोपजापं विश्वस्तं वा मे सैन्यमिति ॥ १२॥ पर-
स्याल्पः प्रसारो हन्तव्य इति भृतबलकालः ॥ १३ ॥
अधवा युद्ध के लिये गन्तव्य देश बहुन दूर नहीं है, समय भी थोड़ा
लगना है, तथा क्षय और न्यय भी बहुत थोडा ही होगा, ऐसा निमित्त होने
परभी भृतवलको ही युद्धके लिये लेजावे ॥11॥ शत्रुके दूत मेरी सेमामे
पहुत कम आसकते है, तथा वह भेदभी नही दाल सकते, यदि थोदा पहुत
हाल भी दे,तो उसको भन्डी तरह शान्त भी किया जासकता है, क्योंकि
यह मेरी सेना बहुत विश्वस्त है, ऐसा निमित होने परभी अपने भृतबलको
ही युद्धक लिो लेजाये । १२ ॥ शत्रुके थोरे ही फैलाय का विधात करना
है, अर्थात् मृणकाठ आदि साधारण वस्तुभा को ही उसके पासतक न पहुंचने
देने के लिये परन करना है, और उसके लिये मेरा भृतबल ही पर्याप्त है, ऐसा
अवसर होने परभी भृतवल को ही युद्ध करनेके लिये लेजावे । यहाँ तक भूत-
बलके तैयार होने के अवसरोंका निरूपण किया गया ॥१३॥
प्रभूतं मे श्रेणीवलं शक्यं मूले यात्रायां चाधातुमिति ॥१४॥
हसः प्रवासः श्रेणीवलपायः प्रतियोद्धा मन्त्रव्यायामाभ्यां प्रति.
योद्भुकामो दण्डबलच्यवहार इति श्रेणीचलकालः ॥ १५ ॥
भय धेणी यलके समय का निरूपण किया जाता है। मेरे (=विजि.
गीयुके) पास भेगीबल यहुत अधिक है, उसको भूलस्थानको रक्षा मी लगा
सकता हूं, और शत्रुके साथ युद्ध करने के समयमे भी उसे साथ लेजा सकता
हूं॥ १४ ॥ भोष्टी दूरका सफ़र है, मुकायले में लगने वाला शत्रु भी प्रायः
श्रेणीपलको ही लेकर युद्ध करनेको वैयार है, अथवा शत्रु मन्त्र (सूप्णीयुद्ध)
यो व्यायाम (प्रकाशयुद) के द्वारा मुकाबला करना चाहता है, अथवा जब शानु
उसे ठरा हुआ होनेके कारण अपनी सेनाको किसी धूसरे राजाके सुपर्द
करके युद्ध व्यापारको चलाने वाला हो; विजिगीपुको चाहिये, कि वह इन सब
अयमसपर अपने श्रेणीवलका उपयोग करे ॥ १५॥
प्रभूतं मे मित्रयलं शक्यं मूले यात्रायां चाधातुमल्पः प्रवा-
सो मन्त्रयुद्धाच भूयो व्यायामबुद्धमिति ॥ १६ ॥मित्रवलेन
या पूर्वमटवीनगरस्थानमासाएं या योधयित्वा पचात्स्ववलेन भोप-
विष्यामि ॥ १७॥
. , . . . (86) कौटलीय अर्थशास्त्र, [१ आधि भव मिग्र सेनाके उपयोगका समय बताते है:-- मेरे (=विजिगीषुके) पास मित्रसेना बहुत है, में उसको मूलस्थानकी .रक्षामें भी लगा सकता हूं, और शत्रुके साथ युद्ध करने के लिये भी लेजा सकता हूं। सफर भी बहुत थोड़ा है, मन्नयुद्ध (तूप्णीयुद्ध) की अपेक्षा वहां भधिकतर व्यायामयुद्ध (प्रकाशयुद्ध) ही होगा, इसलिये अधिक क्षय व्ययकी भी सम्भावना नहीं है ॥ १६॥ अथपा शत्रुची भाटविक सेना या मिनाको, जो कि उसके नग- में आकर ठहरी हुई है. पहिले अपनी मित्रमैनाके साथ लडाकर, फिर अपनी सेनाके साथ लड़ाऊंगा ॥ १७ ॥ मित्रसाधारण वा मे कार्यम्, मित्रायत्ता वा मे कार्यसिद्धिः ॥ १८॥ आसनमनुग्राह्य वा मे मित्रमत्यावा यास माधयि- ध्यामीति मित्रवलकालः ।। १९ ।।. अथवा इस युद्धादि कार्यसे जितना मेरा प्रयोजन है, उत्तनाही मेरे मिनका भी है, अथवा इस कार्यकी सिद्धि मित्रके ही अधीन है॥१८॥ भधवा मेरा मित्र मेरे अत्यन्त समीप या मेरा अन्तरंग है, मुझे अवश्यही इसका कुछ उपकार करना चाहिये । अथवा अपने मित्रके दूप्य बलको (मित्र. से दोह रखने वाली सेनाको) शत्रुके साथ भिवाकर मरवा डालूंगा, इत्यादि निमित्तासे मित्रसेनाको युद्धपर लेजाना चाहिये । अर्थात् मित्रसेनाको पुद्धपर लेजाने के लिये उपर्युक्त ये भवसर या समय समझने चाहिये ॥ १९ ॥ प्रभूतं मे शत्रुवलं शत्रुयलेन योधयिष्यामि नगरस्थानमटवीं या ।। २० ॥ तत्र मे श्ववराहयोः कलहे चण्डालस्येवान्यतरसि- द्धिर्भविष्यति ॥ २१ ॥ अब शत्रुसयाकै समयका निरूपण करते हैं,:- मेरे पास शत्रुसेना बहुत भधिक है, अर्थात् मेरी शक्ति के सामने शुकी हुई पहुतसी शत्रु सेना मेरे पश- में है, जो कि मेरे नगरमें ठहरी हुई है। इसी सेनाको मैं अपने दूसरे शत्रुके साथ छडाऊंगा; अधधा लाटविक सेनाको अनुसेनाके साथ लदारूंगा ॥ २० ॥ इसप्रकार दोनों गनुसेनाओं के मापसमेंही भिहजानेपर, दोनों में से किसी एकके माश होनेपर मेरे अभीष्टकी सिद्धि होगी; जसे कुत्ते और सूभरके आपसमें लढ़नेपर, दोनॉमसे किसी एकके मरजानेपर, ( कुण और सूभर दोनोंको सा. जाने वाले ) हालका लाभही होता है। इस निमित्तके होनेपर एक शत्रुसें. नाकोही दूसो नुको सेनाके साथ करने के लिंग भेजे ॥१... आसाराणामटयीनां या कण्टकमर्दनमेतत्करिष्यामि ॥२२॥ P २ अध्या० ... अभियास्यत्कर्म /D82) (४०) अत्युपचितं वा कोपभयान्नित्यमासन्नमरिचलं वासदयेन्यत्राभ्यन्त- रकोपशङ्कायाः शत्रुयुद्धावरयुद्धकालश्चेत्यमित्रवलकालः ॥ २३ ॥ बथवा अपने मित्र की सेना तथा आटविक सेनाकै कण्टको (कष्ट देने बालों)का इस सेतिसे उन्मूलन करसकूँगा, तात्पर्य यह है, कि शत्रुको सेनाके जो व्यक्ति, मित्रसेना तथा भारविक सेनाको कष्ट पहुंचाने वाले हैं, उनका इस रोतिसे उच्छेद कर दिया जाएगा, इस निमित्तपे भी शत्रु सेनाकोही शत्रुके गुकाबलेमें युद्ध के लिये भेजे ॥ २२ ॥ अथवा भयन्त वृद्धिको प्राप्त हुई ३ शत्रु की सेनाको, कुपित होजाने के डरसे विजिगीषु सदा अपने पास रखे। परन्तु उसके पास रखने में यदि अपने ही अन्तरंग अमाय पुरोहित अदिके कुपित होजानेका भय हो, तो ऐसा न करे । अर्थात् ऐसी अवस्थाम शत्रु सेनाको अपने समीप न रक्खे । यदि विजिगीपुका शत्रु, अपने ही किसी दूसरे शत्रु के साथ युद्ध में प्रवृत्त होरहा हो, तो उस युद्ध के समाप्त होनेपा जो दूमा युद्ध के योग्य समय आधे, उस समय भी शत्रुपेनाकोही दूसो शके मुकरले में युद्ध के लिये भेगे। ये सप अवसर शनुसेनाको युद्धपर भेजने के हैं ॥ २३ ॥ तेनाटवीवलकालो व्याख्यातः ॥ २४ || मार्गदेशिकं परभू- मियोग्यमरियुद्धप्रतिलोममटवीयलप्रायः शत्रुर्वा पिल्वं बिल्वेन हन्यतामल्पः प्रसारो हन्तव्य इत्यटवीबलकालः ॥ २५ ।। इसीके अनुसार आरविक सेनाको युद्धपर भेजनके समयका मो व्याख्यान समहालेना चाहिये । अर्थात् जो २ कारण शत्रुसेनाके युद्धपर जानके लिये बताये घेही आटविक सेनाकं लिये समझने चाहियें ॥२२॥ भाटविक सेनाक सम्ब- न्धमें जो और विशेष बात है, उनका यह निर्देश किया जाता है:-शत्रुके देशपर आक्रमण करने के समय आटविक संगा मार्गीको अच्छी तरह पहचान सकती है, वारविक सेना शतुकी भूमिमें युद्ध करने के योग्य आयुधोंकी शिक्षा प्राप्त किये हुये होती है, अथवा शत्रुके साथ युद्ध करनेके सम्बन्ध विजि- गीपुकी आज्ञाके बिनाही आटविक सेना, शके प्रतिपक्ष रूपमे तैयार रहती है अथया शत्रु प्रायः आटपिक सेनाको लेकरही मुकाबला काने के लिये तैयार है, इसलिये एक बिल्वफल (बैल) को दूसरे विस्वफलके साथ टकराकर फोद दिया जाता है, नैसेही हमारी ओरसे भी उसके समानजातीय आरक्षिक पल- द्वारा ही भाक्रमण किया जाना चाहिये, अथवा वात्रुके तृण काहु भादि छोटे २ पक्षार्थीको शत्रु-तक न पहुचने - देनेके लिये, अर्थात् इनको सोच में ही नष्ट कादेने के लिये आटधिक सेनाही उपयुक्त होसकती है,. इत्यादि नि मेत्तोंके होनेपर भी आरविश सेनाको ही शत्रुके मुकाबले में लाने के लिये भेगना ।
. (४०२) कौटलीय अर्थशास्त्र [९ मधिल चाहिये । यहांतक मौल भादि : प्रकारकी सेनामा शत्रुपर आक्रमण करने के अवसरोका निरूपण करदिया गया ॥ २५ ॥ सैन्यमनेकमनेकजातीयस्थमुक्तमनुक्कं या विलोपार्थ यदुति- एति तदौत्साहिकम् ॥ २६ ॥ भक्तवेतनविलोपविष्टिप्रतापकर भेद्यं परेपामभेद्यं तुल्यदेशजातिशिल्पप्राय संहतं महदिति बलो- पादानकालाः ॥ २७॥ इन छ: प्रकारकी सेनाओं के अतिरिक्त, एक सातवीं सेना औरसाहिक' माम की होती है। जो सेना एक मुरुप नेतासे रहित, भित्र २ देशोंमें रहने पाली, राजासं स्वीकार की हुई अथवा स्वीकार न की हुई, केवल दूसरे देशों को लूटने के लिये उठ खड़ी होती है, उसी सेनाका नाम साहिक' है ॥ २६॥ इस सेनाके दो भेद हैं. एक भेध और दूसर अभेद्य । प्रतिदिन भत्ता लेकर, सथा मासके अनन्तर हिरण्य आदिके रूपमें नियत येतन लेकर, शत्रुके देशमें लूट मचाने वाला, दुर्गामें काम करने वाला तथा राजाकी सामयिक भाज्ञाका पालन करने याला प्रोत्साहिक पल 'भय' कहाता है। क्योंकि शत्रु भधिक मत्ता भादि देकर इसको अपनी ओर शुका सकता है । परन्तु जो औरसाहिक सेना प्रायः एक ही देश 'जातिकी तथा समान व्यवसाय करने पाली होती है, वह अभेद्य कहो जाती है, शत्रु उसे अपनी और नहीं मिला 'सकता, क्योंकि वह सेना भत्ता तथा वेतन आदिकी कुछ अपेक्षा नहीं करती, उसे अपने देश आदिका अधिक स्थान होता है । इसीलिये पर सेमा सुसंघ- टित और शक्तिसम्पन समझी जाती है । इसलिपे इस सेनाका भी पथावसर संग्रह करना चाहिये । यहांतक सेनाभोंके आक्रमणके, समय भादिका निरूपण किया गया ॥२०॥ तेषां कुप्यभृतमामित्राटवीपलं विलोपभृतं वा कुर्यात् ॥२८॥ इन सास प्रकारकी सेनाओं में से, शत्रु सेना और भारविक सेनाको 'यस भास्तरण आदि दम्य भयवा शत्रुकै देशका जीता हुभा या लूटा हुभा मासी, घेतन के रूपमें देदिया जाये । सात्पर्य यह है कि शत्रु सेना सपा भारधिक सेमाको नियत मासिक न दिया जाने, प्रत्युत्त घे परदेशमें लूटे हुए मालको ही अपने पेतन रूपमें लेकर कार्य करें ॥२८॥ अमित्रस्य चा बलकाले प्रत्युत्पन्ने शत्रुमवगृहीयात् ॥२९॥ अन्यत्र वा प्रेषयेत् ॥ ३० ॥ अफलं वा कुर्यात् ॥ ३१ ॥ 1 ..
[९ अधि०
(४०४
कौटलीय अर्थशास्त्र
कारण तथा स्वामीके विषयमें सेनाका अनुराग होने के कारण, मृतयलकी
भक्षा मौलपल हो Jष्ट होता है ॥३६॥ तथा घेणोपली भपंक्षा भृतवल
अधिक श्रेयस्कर होता है क्योंकि वह (मृतवल ) राजाकं सदा समीप
रहता है, पिना किसी विलाबके बहुत जल्दी हो युद्ध के लिये तैयार किया
जासकता है, और अपने अधीन भी रहता है, श्रेणीयलमें यह बात नहीं
होती, वह दूर भी रहता है तैयार होने में देर लगाता, तथा अपने घशमें
भी नहीं होता ॥३७॥
जानपदमेकार्थोपगतं तुल्यसमिसिद्धिलाभ च श्रेणी-
चलं मित्रवलाच्ट्रयः ॥ ३८ ॥ अपरिमितदेशकालमेकार्थोपग-
माञ्च मित्रयलमामित्रबलाच्छ्यः ।। ३९ ॥
मिनबलकी अपेक्षा थ्रणीयल अधिक श्रेयस्कर होता है, क्योंकि यह
अपने मालिकके ही देश का होता है, एक ही प्रयोजन के लिये उनका संग्रह
किया जाता है अर्थात् देशके स्वतन्त्र रहनेसे जैसा विजिगीपुको लाम है,
घेसा वहांकी प्रजाको मी, तथा अपने मालिक के समान ही संघर्ष अमर्प
और सिद्धिसे युक्त होता है, तात्पर्य यह है कि मालिक जिसके साथ संघर्ष
करना चाहता है, श्रेणीचल भी उसके अनुसार ही चाहता है, मालिका
जिसपर क्रोध होता है, श्रेणीयल को भी उसपर क्रोध होता है, मालिकको
जिस प्रकारकी सिद्धि होती है, श्रेणीबलको भी वही सिदि अभीष्ट होती
है। परन्तु मित्रयलमें ये बात नहीं होसकती ॥३८॥मित्रवल भी अमिन-
पल (शत्रुसेना ) फा अपेक्षा अधिक प्रेयस्कर होता है, क्योंकि मिनबलसे
अपनी इच्छानुसार प्रत्येक देश तथा प्रतिसमयमें सहायता ली जासकती है,
तथा विजिगीपुर प्रयोजनके अनुपार ही मित्रपल का भी प्रयोजन होता है,
परन्तु भमित्ररलमें यह बात नही होती, क्योंकि उसको स्वतन्त्रतापूर्वक
उसकी इच्छानुसार, चाहे जिप दशम चाहे जिस समय युदपर नहीं
भेजा जासकता क्योंकि इसमकार शत्रुसेनाको चाहे जहां भेजने में डरही रहता
है। तथा विजिगीषु और शत्रुसेनाके प्रयोजनमें भी भेद होता है, यह सट।
(महामहोपाध्याय तक गणपति शास्त्रीने इस सूत्रके दो भाग करदिये है, एक
'भपरिमित देशकालमेकाोंपगमार । और दूसरा मित्रवलममिनबला-
रट्रेयः' । पहिले सूत्रको उन्होंने मित्रवलकी अपेक्षा घेणीयलकी प्रेशताहीमें
लगाया है, तथा अमिग्रयलसे मित्रयलकी श्रेष्टना बतलाने में उन्होंने किसी
हेतुकी भावश्यकता नहीं समझी; यह व्याख्यान कुछ क्रम-विरुद्धसा प्रतीत
होता है। और नयचान्द्रका पाल्याके भी विरुद्ध है) ॥ ३९ ॥
.
जाय,
..
२ अध्या०]
अभियास्यत्कर्म
(४०५)
आर्याधिष्ठितममित्रयलमटवीलाच्छ्यः ॥४०॥ तदुभयं
विलोपार्थम् ॥ ४१ ॥ अविलोपे व्यसने च ताभ्यामाभयं
स्यात् ॥ ४२ ॥
अमित्रवल भी अटवीयळकी अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर होता है, क्योंकि
अमित्रयल, भायं अर्थात् सद्गुणोंसे युक्त विश्वस्त पुरुषोंके नेतृत्व में रहता है,
मटपीपल, ऐसा नहीं होता ॥ ५० ॥ ये दोनों ही प्रकार की सेनाएं भर्थात् शत्रु-
सेना और भाविकमैना, विलोपकेही लिये अर्यात् शत्रुदेशको लूटने आदिकही
लिये प्रयुक्त कीजाती हैं॥1॥योंकि लूट भादिके अतिरिक्त यदि युद्ध भादिमें
उन्हें लगाया जाय, तथा अपनी विपसिके समयमें उन्हें कहीं कार्य पर लगाया
तो उसे आस्तीनके सांपकी तरह सदा डरही रहता है। अर्थात् यह
अपनेही पक्ष फुछ झगड़ा आदि करके नया यखड़ा सड़ा करसकती है ॥४२॥
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रसैन्यानां तेजःप्राधान्यात्पूर्व पूर्व श्रेयः।
संनाहयितुमित्याचार्याः ॥ ४३ ॥
प्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य और शूध वाकी पृथर २ सेनाओंम उत्तरो-
तर सेनाकी अपेक्षा पूर्व २ सेना, तेजकी प्रधानता होने के कारण अधिक य.
स्कर होती है। यह लाचार्योंका मत है (यहां तेजकी प्रधानताका तात्पर्य
शायकी प्रधानता न लेनी चाहिय, कोंकि ब्रह्मण में शोर्यकी अधिकता नहीं
होती, इसलिये कृतज्ञता धार्मिकता भादि गुण सम्पत्ति हो तेज शब्दका भाव
समझना चाहिये)॥ ४३ ॥
नेति कौटल्यः॥४४॥ प्रणिपातेन ब्राह्मणवलं परोऽभिहा-
रयेत् ॥ ४५ ॥ प्रहरणविद्याविनीतं तु क्षत्रियवलं श्रेयः ॥४६॥
बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलामिति ॥ ४७ ।।
परन्तु आचार्य कोटक्ष्यका यह मत नहीं है ॥ ४ ॥ शत्रु, भाह्मणवलको
प्रणिपात ( नमस्कार, सरकार या भागे शुरुजाना ) से ही अपने आधीन कर.
लेता है ॥ ४५ ॥ इसलिये शखात्रकी विद्यामे सुशिक्षित क्षनियरलकोही मव.
की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर समझना चाहिये ॥ ४६ ॥ अथवा वैश्य शूदपल.
को भी श्रेयस्कर समझा जासकता है, जब कि उसमें वीर पुरपाकी भरली
तरह भधिकता हो ॥ ७ ॥
तसादेवंबलः परस्तस्यैतत्प्रतिवलामिति बलसमुद्दानं कुर्यात्
॥४८॥
(४०६) कौटलीय अर्थशास्त्र [९ अधिक सेनाओंकी इसतरह पासर आपेक्षिक श्रेष्टताको जानके अनन्तर शत्रु- के पास इसप्रकारकी सना है, भौर उपके मुकापलेकी अमुक सेना होसकती है, इसप्रकार विचार करके उपयुक्त सेनाओंका संग्रह करे ॥ १८॥ हस्तियन्त्रशकटगर्भकुन्तप्रासहाटफवेणुशल्यवास्तिवलस्य प्रविबलम् ।। ४९ ।। हस्तिसेनाके मुकाबले के लिये, हापो, यन्त्र (जामदग्न्य भादि ) शE- गर्भ (जितका मध्यभाग शष्टके समान हो, पैसा आयुधविशेष), कुन्त ( भाला ), मास (बरसा ), हाटक ( तीन फलों घाला भर्यात् तीन को चाला माला; किसी र पुस्तक ' हाटक' पदके स्थान पर टिक' पाठ है, पर यह पार भधिक संगत नहीं मालूम होता), घेणु (लम्मा २सयालाही आदि), शरुप ( चारों ओरसे लोहेकी कीलो पाला, लोहे काही पना हुआ डमा), श्रादि साधनॉस युक्त सेनाकी आवश्यकता होती है ॥ ५९ ॥ वदेव पापाणलगुडावरणामुशकचग्रहणीप्राय रथबलस्य प्रतिवलम् ॥ ५० ॥ यही सेना, भधा जो सेना, हस्तिसेनाके मुकापळे के लिये पतलाई गई है, यदि पाषाण ( बड़ी २ शिलाएँ मा परधर ), लगु (पटे या छोटी २ गदा), वरण (कवच ), अंकुश, और कधग्रहणी (कौंचा-बहुत कम्पी लोहेकी छड, जिसके भागे बसा हुक, लगा हुआ हो ) आदि साधनासे युक्त हो, तो रथवल (स्थ सधार सेना ) को उसे प्रतिवल ( मुकाबले में प्रती. कार करने पाली सेना) समझना चाहिये ॥ ५० ॥ तदेवाश्वानां प्रतिबलम् ॥ ५१ ॥ वर्मिणो वा हस्तिनो ऽश्वा या पर्मिणः कवचिनो रथा आवरणिनः पत्यश्चतुरङ्गबलस्थ प्रतिपलम् ।। ५२॥ हायोसवार सेनाके मुकायलेकी जो सेना बताई गई है, यही सेना घुड़सवार सेनाका भी मुकाबला करने वाली समसनी चाहिये । तात्पर्य यह है, कि भश्वबल का भी वही प्रतिदल समझना चाहिये, जे इस्तिषलका प्रति- वल कहा गया है ॥ ५ ॥ कवच धारण करने वाले हाथी, इसी प्रकार कवच धारण करने गले ही घोष, तथा मजबूत लोहके पत्तरोंसे म हुए स्थ, और कवच धारण करनेवाली ही पैदल सेना, ये साधारणतया यथासंख्य हाशी, सवार घुड़सवार स्थसवार तथा पैदल चतुरंग सेनाक प्रतियल समझने पा. - (७) - ३ मण्या पश्चात्कोपचिन्ता हिये । अर्थात् चतुरंग सेगा का मुकारला, कवच पहिनने पाले हाथी भादिके द्वारा ही किया जासकताई। ५२ ॥ एवं बलसमुहाने परसैन्यनिवारणम् । , विभवेन स्वसैन्यानां कुर्यादङ्गविकल्पशः ॥ ५३ ।। हरयाभयास्यकर्मणि मवमे अधिकरण पलोपादानकरला संनाहगुणाः मतियक्षकर्म द्वितीय ध्यायः ॥ २॥ भादितस्त्रयोविंशशतो भ्याय: ।। १२३ ॥ इस पर्यो रातिके अनुसार ही, सेनाओंको पारस्परिक श्रेष्ठता, तथा गुरुता लघुता का विचार करके ही उपयुक्त सेनाओंका संप्रा करे। सपा मौल भूत आदि अपनी सेनाओं की जाति अनुसार, एवं हाथी घोड़े आदि सैनामों- के अभूत पहायों की महुलता और भाप के कारण किये गये विभागोंके अनु- सार ही शत्रु सेनाका निराकरण करना चाहिये । अयं विजिगी को चाहिये कि यह यथाशा अपनी सेनाका समद करता रहे। तथा शत्रुकी सेनानीका प्रतीकार करता रहे। ५३ ॥ अभियास्यत्कर्म नवम अधिकरणमे दूसरा अध्याय समाप्त । तीसरा अध्याय १४०-१४२ प्रकरण पश्चात्कोपचिन्ता, बाह्य और अभ्यन्तर प्रकृतिके कोपका प्रतीकार। (इस Rध्यायमे दो प्रकरण हैं। भागे होने वाले लाभक उद्देश्यस विजिगीपुके द्वारा शत्रु पर आक्रमण किये जाने पर पीछेस पा. !णिप्राह भारधिक तथा अन्य वृध्य ग्यासियोंके राजधानीम जो उपदध किया जाता है, उसीका माम 'पश्चाएकोप' है। पहिल प्रकरणमें आगे होनेवाले लाभको अपेक्षा पनाकोपके गुरुलधु- भावका विचार किया जायेगा । और दूसरे प्रकरणों का क्या अभ्यन्तर प्रकृतिजन्य कोपके प्रतीकारका निरूपण होगा। अल्पा पश्चात्कोपो महान्पुरस्तालाम इति ॥ १॥ अल्प: पश्चात्कोपो गरीमान् ॥ २ ॥ अल्प पश्चात्कोपं प्रयातस्य भ्या- मित्राटविका-हि सर्वतः समेधयन्ति प्रकृतिकोपयो पा॥३॥- A-
..
कौटलीय अर्थशास्त्र [९यधिक
थोडा पश्चारकोप और अत्यधिक, आगे होने वाला लाभ; इन दोनाम
से कौन गुस्वर है इस बात का विचार किया जायगा | तारपर्य यह, कि घोड़े
पश्चास्कोप के कारण बड़े लाभकी उपेक्षा करदी जावे, या बड़े सामके कारण
योड़े पचारकोपकी, उपेक्षा करदो जाये ॥ १॥ इस यिपय निर्णय यही है, कि
थोरा भी पश्चारकोप, पढ़ लाभकी अपेक्षा गुरतर होता है। अर्थात् थोडे पक्षा.
रकोपके कारण, बड़ेभी लाभकी उपेक्षा कीजासकती है ॥२॥ क्योंकि योदे
भी पश्चारकोपको, विजिगीपुर बाहर घले जानेपर, दूष्यव्यक्ति शत्रु तथा
भाटधिक पुरष, चारों ओरसे अच्छी तरह बढ़ा देते हैं । अथवा मन्त्री पुरोहित
आदि अभ्यन्तर प्रकृतिसेही उत्पन्न हुभा २ कोप, उस थोड़े भी पश्चाकोपको
और अधिक बढ़ा देता है। इस लिये महान् पुरस्तालाम (भागे होनेवाले
लाभ) की अपेक्षा थोड़े पश्चारकोपकोही गुरतर समझना चाहिये ॥ ३ ॥
लक्ष्मपि च महान्तं पुरस्ताछामम् एवंभूते भृते भृत्यमित्रक्षय
व्यया ग्रसन्ते ।। ४ ॥ तस्मात्सहसैकोयः पुरस्ताल्लाभस्यायोगः
शतकीयो वा पश्चात्कोप इति न यायात् ॥ ५॥ सूचीमुखा
ह्यनर्था इति लोकप्रवादः॥६॥
पक्षात्कोपकी पहिले कुछ पर्वाह न करके यदि आफ्रमणसे होनेवाले
बड़े भारी लाभको पास कर भी लिया जाय, ता भी इस प्रकारके पश्चाकोपके
यरनेपर फिर उसका प्रतीकार करने के लिये भृष और मित्रसम्बन्धी क्षय
घय उस लाभको परावा कर देते हैं । अर्थात् जो, कुछ लाभ होता है, वह
बढ़े हुए पधारकोपको शान्त करने में सब कुछ खर्च होजाता है ॥४॥
इप्सलिये जब कि आगे होनेवाले लामकी सिद्धि, प्रतिसहस्र एक अंश माग्न
होनेवाली हो, उसके मुकाबलेमें पश्चरकोपसे होनेवाला अनर्थ प्रतिशतक एक
अंश समझना चाहिये । अधात पसारकोपजन्य अनर्थकी अपेक्षा भागे
होनेवाले लाममें दसगुनी असारता होती है। इसलिये पक्षाकोपको आशंका
होनेपर कमी पाम्रा न करे ॥५॥ लोकमे कहावत है कि अनर्थ सदा
सूचीमुख होते हैं । तात्पर्य यह है कि अनर्थ पहिले तो सुई की नोककी
तरह बहुत सूक्ष्म मालूम होते हैं, परन्तु पोछेसे वे सदा बहुत ही भयावह
रूप धारण कर लेते हैं॥६॥
पश्चात्कोपे सामदानभेदण्डान्प्रयुञ्जीत ॥ ७ ॥ पुरस्ता-
लामे सेनापति कुमार या दण्डचारिणं कुर्वीत ॥ ८ ॥
अध्या b] अभियास्त्रकर्म (५०९) यदि पवाकोपको अधिक सम्मायना हो तो साम दान भेद और दण्ड, इन सय ही उपार्योका प्रयोग करे । अर्थात् विजिगीषु स्वयं आक्रमण के लिये न जाकर ही पश्चारकोपको शान्त करने के लिये साम आदि सब ही उपार्योका प्रयोग करे ॥ ७॥ और आक्रमणसे होनेवाले लामको यदि न छोड़ना हो, तो उसको भी प्राप्ति के लिये यात्रामें सेनापति अथवा युवराजको ही प्रधाम सेनानायक मनाकर भेज देवे । अयात् इनमें से किसी की अधीनता सेनाको करके उसे युद्ध के लिये भेज देचे ॥८॥ बलवान्या राजा पश्चात्कोपावग्रहसमर्थःपुरस्ताल्लाभमादातुं यायात् ॥ ९॥ अभ्यन्तरकोपशकायां शङ्कितानादाय यायात् अथवा बलवान् राजा जो कि पश्चारकोपका प्रतीकार काने में समर्थ हो, तारपर्य यह है कि जिस गजाके पास पर्याप्त सेना दो, और इसीलिये उसके भरोसेपर अपनी अनुपस्थिति भी पधारकोपको शान्त कर सकता हो, वह थोडासी सेना पीछे छोड़कर, आगे होनेवाले लाभकी प्राप्तिके लिये स्वयं ही यात्रा कर सकता है ॥ ९॥ यदि उसको आभ्यन्तर कोपकी का हो, अर्थात् यह सम्मेद हो कि मेरे चले जानेपर भमाश्य पुरोहित आदि ही उपदय खा करदेंगे तो उनको अपने साथ लेकर है। शत्रुपर आक्रमण करे । भत् ऐसे शक्षित व्यक्तियों को अपने साथ ही युद्धपर लेजावे ॥१०॥ बाह्यकोपशङ्कायां या पुत्रदारमेपामभ्यन्तरावग्रहं कृत्वा शून्यपालमनेकवलवर्गमनेकमुख्यं च स्थापयित्वा यायाम यायावा ॥११॥ अभ्यन्तरकोपो बायकोपात्यापीयानित्युक्तं पुरस्तात् वाहाकोप (अन्तपाल भारविक आदिके द्वारा, विजिगीपुके बाहर चले जानेपर राजधानी आदिमें जो उपद्रव किया जाय, उसे मानकोप' कहते हैं। इसका निरूपण इसी अध्यायके २७ वे सूत्र में किया जायगा ) की आशंका होनेपर, मारकोपको करनेवाले अन्तपाल भाविक पुग्न तभा स्त्रियोंको अपने अमात्यों के अधान करके विजिगीषु युद्धपर चलानावे । प्राय तथा अभ्यन्तर दोनों ही 'भोरसे उपदवकी आशंका होनेपर तो, अनेक प्रकारको मोल भृत भादि सेनाओंके समूहसे युक्त, तथा अनेक मुख्य सेनाध्यक्षोंसे युक्त शून्यपाल (शत्रु के मुकामले में विजिगीपुके चले जानेपर पीछे से स्वामी रहित राजधानीकी रक्षा करनेवाला अधिकारी) को स्थापित करके फिर यात्रा को। यदि फिर
[२भाषिक
कौटलीय अर्थशास्त्र
भी भम्पन्तर कोपकी आशका बनी ही रहे, तो विजिगीषु न जावे । (फिसी २
पुस्तकमें 'न यायादा' के स्थानपर 'न वा यायात्' ऐपा भी पाठ है, परन्तु
अर्थ में कोई किसी तरह का भेद नहीं) ॥1॥ क्योंकि अभ्यम्तर कोप,
याप्रकोपकी अपेक्षा अत्यधिक हानिकर होता है, इस पातको पहिले कहा
जाचुका है ॥ १२॥
मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजानामन्यतरकोपो ऽभ्यन्तर-
कोपः ॥ १३ ॥ तमात्मदोपत्यागेन परशक्त्यपराधवशेन वा
साधयेत् ॥ १४ ॥
मन्त्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज इन चारोमें से किसीके
द्वारा किये जानेवाले उपद्वको 'अभ्यन्तरकोप' कहते है ॥ १३॥ इस भम्प
भतरकोपको यदि विजिगीषु अपने ही किसी दोषसे उत्पन्न हुआ २ समझे,
नो उस दोषका परित्यागकर अभ्यन्तर कोपको शान्त करे । यदि मन्त्री
पुरोहित भादिके दापके कारण ही वह उपद्रव उठा हो, तो उनको उनके
भपायके भनुसार वध (प्राणदण्ड ) बन्धन ( कैदमें रखना ) तथा भर्थ-
दण्ड (जुरमाना आदि करना ) भादिके द्वारा सीधा करे ॥ १५ ॥
महापराधे ऽपि पुरोहिते संरोधनमपत्रावणं वा सिद्धिः॥१५॥
युवराजे संरोधनं निग्रहो वा गुणवत्यन्यसिन्सति पुत्रे ॥ १६ ॥
ताम्यां मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ॥१७॥
यदि पुरोहित, इसताहका कोई महान अपराध भी करदे, तो भी
उसका पच नहीं होना चाहिये, क्योंकि यह ब्राह्मण होता है, प्राह्मणका वध
निषिद्ध है । इसलिये या तो उसको कैदमें दालदिया जाये, या अपने देशसे
बाहर निकाल दिया जाये । उसके लिये यही दण्ड है ।। १५ । यदि युवराज
ही इसप्रकारका महान अपराध करदेवे, तो उसे या तो बन्धनागारमें डाल
किया जावे, या उसका वध करदिया जावे, अर्थात् उसे प्राणदण्ड दियाजा.
पान्तु यह प्राणदण्ड उसी अवस्थामे देना चाहिये, जब कि अत्यन्त गुणी
कोई दूसरा पुन विधमान हो ॥ १६॥ पुरोहित और युवराजके समान,
अथवा पन्धन और धधक द्वारा मन्यी और सेनापतिके भी दण्डका पारामान :
ममझ लना चाहिये । अर्थात् यदि वह ब्राह्मण हो तो अपराध के अनुसार बन्धन
या देशनिकाला, और अमालण हो सो अपराधानुसार पन्धन पा धका पर
दिपाजापे ॥१॥
. 1 ३ अंध्या०] ममियासत्कर्म (४२) पुत्रं भ्रातरमन्यं वा कुल्यं राज्यग्राहिणमुत्साहेन साधयेत् ॥ १८ ॥ उत्साहाभावे गृहीतानुवर्तनसंधिकर्मभ्यामरिसंधानभ- यात् ॥ १९ ॥ अन्येभ्यस्तद्विधेभ्यो वा भूमिदानैर्विश्वासये- देनम् ॥ २० ॥ अपने पुन, अपने भाई तथा अपने ही कुलमे उपना हुए अन्य ग्यक्तिको, जो कि राज्य लेनकी इच्छा रखते हो, उत्साह देकर शान्त करे । अर्थात् उनके योग्य सेनापति आदि पापर उन्हे नियुक्त करके अपने वश में करे ॥ १८॥ यदि उनको उत्साह न देसके, तो जो सम्पत्ति राज्यकी भोरसे उन्ह भोगने को मिली हुई है, उसे सदा के लिये उन ही देकर तथा भार अधिक सम्पति आदि देकर उगरी सन्धि करके भपने वश में करे । क्योंकि यदि उन्हें अपने घमाम न किया जाय, तो विजिगीपुकी इस पातका सहाही डर बना रहता है, कि कहीं घे मेरे शमुक साथ न मिलजाँच ॥ १९ ॥ अथवा उसी तरहके दूसरे सानदानी आदमियोंको जमोन भादि देकर, इनको भगना विश्वासी बनाले ! तारपर्य यह है कि जो अपना खानदानी भादमी राज्य लेनेकी इच्छा रखता हो, उसको वश में करनका एक यह भी उपाय है, कि उसी जैसे अपने अन्य खानदानी आदमियोंको भूमि भादि देव, ऐसा करने से यह पुरुष भी अपना विश्वस्त होजायगा ॥ २०॥ तहिशिष्टं स्वयं ग्राहं दण्डं वा प्रेपयेत् ॥ २१ ॥ सामन्ताट- विकान्वा, तैर्षिगृहीतमतिसंदध्यात् ।। २२ ॥ अवरुद्धादानं पार- ग्रामिकं वा योगमासिष्ठेत् ॥ २३ ॥ एतेन मन्त्रिसेनापती ब्या- ख्याता ॥ २४ ॥ अथवा इसकी अध्यक्षताम (जो पुरष राज्य लेना चाहे, उसकी अध्यक्षता ) स्वयंमाह सेना (जिस सेना सम्बन्धमे यह घोषणा कर दी जापे, कि जो कुछ टूटमें इसको मिलेगा, यह उसीका होगा, इस सेनाको 'स्वयंमाह सेना' कहते है ) को देफर कहीं युद्ध करने के लिए भेज दिया जाये ॥ २१॥ अथया सामन्त और भारपिकोंको ही उसकी अध्यक्षताम कही युद्धपर भेज दिया जाये और उनके साथ (अर्थात् स्वयंमाह सेना, सामन्स सथा सारविकों के साथ) पिरोध पराक गर्यात् किसी यातपर सगड़ा करके उसे पन्धनमें लिया जाये ॥ २२ ॥ जब यमाह मेमा पादि उसको गिरफ्तार कर हैं, तो उनस विजिगीषु उसे है ऐसे अयग दुर्गलाभोपास भधिकारमें पतलापे हुए पारामिद नामा योगका अनुहार ११२) . कौटलीय अर्थशास्त्र [९ मधिल करे । अर्धार इस योगके द्वारा उसे सीधा करे ।। २३ । इसी के अनुसार, मन्त्री और सेनापति के द्वारा उस किये हुए कोप, तथा उसके प्रतीकारका भी ग्याख्यान समझ लेना चाहिय ॥ २४ ॥ मन्त्रयादिवर्जानामन्तरमात्यानामन्यतमकोपो ऽन्तरमात्य कोपः ।।२५।। तन्नापि याहमुपायान्प्रयुञ्जीत !! २६ ।। मात्री, पुरोहित, युवराज और सेनापति. इन चारोंके अतिरिक्त, भन्य अन्तरमात्य अर्थात् दीवारक (द्वारपाल ) या अन्तवशिक ( महलों में काम करने वाले विशेष कर्मचारी ) आदि पुस्पॉमसे किसी एकके द्वारा उठाये हुए उपद्रयको अन्तरमात्यकोप' कहते है ॥ २५ ॥ उसके शान्त करनेके लिये भी यथायोग्य उपर्युक्त उपापोंकाही प्रयोग करे। यहांतक अभ्यन्तरकोपके सम्ब. ग्ध निरूपण कर दिया गया ॥२६॥ राष्ट्रमुख्यान्तपालाटविकदण्डोपनतानामन्यतमकोपो याह्य- कोपः ।। २७ । तमन्योन्येनावग्राहयेत् ॥ २८ ।। भख बाहाकोप और उसके परिहराका निरूपण किया जायगा:-राष्टके प्रधान व्यक्ति, अन्तपाल (लीमारक्षक अधिकारी), आटविक और दण्डोपनरा (सनिक शक्तिके द्वारा अर्थात् बल पूर्वक अपने अधीन किया हुआ ग्यक्ति), इन चारों में से किसीके द्वारा उठाये हुए उपदवको 'बाह्यकोप' कहते हैं ॥२७॥ उस कोपको, भापसमही उन्हें एक दूसरेके साथ टकराकर शान्त करे । भर्यान् राष्ट्रमुल्यके कोपको अन्तपाल आदिके द्वारा ओर अन्तपाल आदिके कोपको राष्ट्र मुरपके द्वारा शान्त करयाये ॥२८॥ अतिदुर्गप्रतिस्तब्धं वा सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धाना- मन्यतमेनावग्राहयेत् ॥ २९ ॥ मित्रेणोपग्राहयेद्वा, यथा नामित्रं गच्छेत् ॥ ३०॥ अथवा प्रबल दुर्गसे युक्त राष्ट्रमुख्य या अन्तपाल आदिको, सामन्त भाविक पा उनके कुलम.उत्पन्न हुभा २ कोई रोका हुभा पुरुष (राजपुग्न आदि), इन सबसकिसके द्वारा पकड़वावे । तात्पर्य यह है, कि बाझोपको उठाने वाले राष्ट्रमुख्य आदिको सामन्त भादिके द्वारा पकाया देवे ॥२९॥ भयषा अपने मिन्न के साथ उसकी भी मिग्नता करपा देवे । जिससे कि वह शत्रुकी और जाकर न मिझजावे ॥२०॥ अमित्रात्सत्ती मेदयेदेनम् ॥ ३१ ॥ अयं त्वां योगपुरुष मन्यमामो भर्तयें विक्रमयिष्यति ॥ ३२ ॥ अवाप्तार्थो दन्ड.. - अध्या मभियास्यत्कर्म (४) चारिणममित्राटविकेषु कृच्छ्रे वा प्रवासे योक्ष्यति ॥ ३३ ॥ सनी (गूढ पुरुष एक विशेष गुप्तचर ), इस बार राष्ट्रमुख्य भादिको शत्रुसे सदा भिन्न बनाये रक्खे, अर्थात् इनका आपसमें सदा भेद सलवाये रक्खे ॥३॥ क्या कहकर भेद डलवावं, अब इसका निरूपण किया जायगाः- सत्रां, राष्ट्रमुख्य आदिको कहे कि तुम जिसके साथ ( विजिगीपुके जिस शत्रुके साथ ) मिलना चाहते हो, वह तुमको विजिगीपुका गुप्त-पुरुष समझेगा, और यह समझता हुआ तुमको तुम्हारे मालिकके ऊपरही हमला करमेको कोगा ॥ ३२ ॥ और तुम्हारे मालिकपर किये गये आक्रमणके परिणामको देखकर, तुमको अपनी सेनाका नायक बनाकर अपने शत्रु या आरविकके मुकाबले में किसी दुष्कर माफपण के लिये नियुक्त करेगा; अर्थात तुमको किसी दूर दे के कठिन प्रघास के लिये बाध्य करेगा ॥ ३३॥ विपुत्रदारमन्ते या वासायिष्यति ॥ ३४ ॥ प्रतिहतविक्रम त्वां भर्तरि पण्यं करिष्यति ॥ ३५ ।। त्वया चा संधिं कृत्वा भर्तारमेव प्रसादयिष्यति ॥ ३६॥ मित्रमुपकृष्टं वास्य गच्छे- दिति ॥ ३७॥ अथवा तुमको, तुम्हारे स्त्री पुरुषोंसे वियुक्त करके, अपने सरहदी हला. को रक्खेगा । तारपर्य यह है, कि तुम्हारे नी पुत्रों को अपनी अधीनतामें रवरखेगा, और तुम्हें किसी सरह ही इलाके कार्य करनेके लिये नियुक्त करेगा ॥ ३४ ॥ अथवा अपनेही मालिकके मुकाबले में लाने के लिये सदा हुभा २ तू यदि उससे हार जायगा, तो यह तेरे मालिक कीमत लेकर उसीके हाथ तुसे येच डालेगा । अर्थात् तेरे असफल हो जानेके कारण, तुझपर प्रसन्न न होता हुभा, वह, तेरे मालिकसे कुछ धन लेकर उसीके हाथ में तुझे सौंपदेगा ॥३५॥ अथवा सुम्हेंही स्यामीको भर्पण करके अर्थात् शर्तके तौरपर तुम तुम्हारे मालिकके लिये देकर, सन्धि करके, स्वामीको प्रसन्न करलेगा ॥३६॥ अथवा तुम्हारी शर्त लगाकर अपने किसी मियके साथही तुम्हारे स्वामीकी सन्धि फरावेगा । इत्यादि बातोंको कहकर सन्नी, राष्ट्रमुख्य आदिका शत्रुसे भेद डल- वाये रखे ॥ ३७॥ प्रतिपन्नमिष्टाभिप्रायः पूजयेत् ॥ ३८ ॥ अप्रतिपभस्म संश्रयं भेदयेदसौ ते योगपुरुषः प्रणिहित इति ॥ ३९ ॥ यदि इस भेदके उपदेशको, यह व्यक्ति स्वीकार करते, तो उसे उसकी अभीष्ट यस्तुभोंको देकर सात दिया जाये ॥ ३८ ॥ यदि स्वीशर न करे, ती [९ अपिल (४४) कौटलीय अर्थशास्त्र उसके संश्रय (सन्धि विग्रह आदि गुणोंमसे एक संश्रय भी होता है। किसी बलवान् राजाके अधीन रहकर अपनी शक्तिको बहाना 'संश्रय' कहाला है। इसलिये जिस राजाके अधीन रहे, उसको भी संश्रय कहदेते हैं) को ही यह कहकर उससे भिन्न करदेये, कि अमुक पुरुष जो तुम्हारे आश्रित रहनके लिये उपस्थित होता है, वह दूसरेका भेजा हुआ गुप्तपुरुष है, ना उससे संभलकर रहना चाहिये ॥ ३९॥ सत्ती चैनमभित्यक्तशासघातयेत् गूढपुरुपैर्वा ॥ ४० ॥ सहप्रस्थायिनो वास्य प्रवीरपुरुपान्यथाभिप्रायकरणेनावाहयेत् ॥४१॥ नया सत्री, भभिस्यक्त (बधके लिये निश्चित हुए. २) पुरषों के हाथ नकली चिट्ठियां भिजवाकर (जिनके लिखित विषयका यह अभिप्राय हो, कि तुम छिपकर शत्रुको मारडालो) धुके ममम सन्देह डालकर उसके द्वाराही ( राष्ट्रभुण्य आदि ) व्यक्तिको मरवाडाले । अथया साक्षात् गृढपुस्पीके द्वाराही मरवाहाले ॥ ४० ॥ अथवा शत्रुका भाश्रय लेने के लिये,पाल (राष्ट्र मुख्य मंत- पाल आदि) के साथ जो धीर पुरुष जाने के लिये तैयार होवे; उनको उनके अभिमायके अनुसार कार्य करके अर्थात् उनकी इराकी पर्सि करके अपनी ओर मिला लेवे । ( 'आवाहयेत्' के स्थानपर किमी २ पुस्तक, 'बाहयेत्' भी पाठ है, अर्थ दोनोंका समान है ) ॥४१॥ तेन प्रणिहितान्सत्ती बृयादिति सिद्धिः ॥ ४२ ॥ परस्य चैनान्कोपानुत्थापयेत् ॥ ४३ ।। आत्मनश्च शमयेत् ।। ४४ ।। यदि वे वीर पुरप अपने पक्ष भाने के लिये तैयार न होवें, तो सनी उनके सम्बन्धम शत्रुसे इसप्रकार कहे, कि ये सब वीर पुरप विजिगीपुने मुम्हारे मारने के लिये भेजे हैं, ये सबही गूढ पुरुष हैं। इसमकार शत्रुको समझाकर और उसकेही द्वारा उन्हें नष्ट करवाकर बाह्यकोपका प्रतीकार कर ॥ ४२ ॥ तथा शत्रुपक्षमें अभ्यन्तरकोप और याह्यकोपको उत्पस करने के लिये पूरा यक्ष फरे ॥ १३ ॥ और अपने पक्षमें भयुके दास उपज किये हुए कोपो- का पूर्ण रीतिसे प्रतीकार करे ॥४४॥ या कोपं कर्तुं शमयितुं वा शक्तस्तत्रोपजापः कार्यः ॥४५॥ यः सत्यसंधः शक्तः कर्मणि फलावातौ चानुग्रहीतुं विनिपाते च वातं तत्र प्रतिजापा कार्यः ॥ ४६ ।। तर्कषितव्यच कल्या- मधुदिरताहो गठ इति ।। ४७ ॥ - .
। ३मध्या अभियास्यत्कर्म जो कोपको उस्पा करने भौर शान्त करने में समर्थ हो, वहाँप उप. जाप (कोपको उत्पन्न करने के लिये भेद डालने या फूट डालनेको ही 'उप- जाप' कहते है ) का प्रयोग करना चाहिये । सारपर्य यह है, कि जो पुरुप इतमा सामध्य रसता हो, कि स्वयं खड़े होकर उपद्रव करसके, और दूसरेके द्वारा उठायेहुए उपदवको शान्त करसके, उसीपर उपजापका प्रयोग करना चाहिये, अर्थात् उसका दूसरेके साथ मेद दारुदिया जायें ॥ ४५ ॥ इसी natt जो पुरुष सत्यातिज्ञ, कार्यके तथा फलसिद्धि के समय अनुयह करने भीर भापतिके समय उससे रक्षा करने में समर्थ हो; यहाँपर प्रतिजाप ( उप. मापके स्वीकार करलेनको 'प्रतिज्ञाप' कहते हैं) का प्रयोग ठीक है । तात्पर्य यह है, कि उपजापको स्वीकार करनेसे पहिले यह समझलना चाहिये, कि यह उपजाप करनेवाला पुरुष सत्यवादी तथा समयपर उपकार करने और रक्षा करने में भी समर्थ है, सभी प्रतिज्ञापका होना अधीन उपजापको स्वीकार करमा ठीक होता है ॥ ४६ ॥ यदि उपजपिता | उपजाप करनेवाले के सम्बन्ध प्रतिजपिता (इपजापको स्वीकार करने अर्थात् मानने वाले ) को यह आशंका दोभावे, कि कही यह वशक तो नहीं है ? मुझे उगने के लिये ऐसा कह रहा है, तो उसकी कल्याणबुद्धि अथवा शचुद्धि की परीक्षा करलेवे, कि यह मुझे हितबुधिसे ऐसा कर रहा है या उगना चाहता है ॥ ५ ॥ शठो हि पायो ऽभ्यन्तरमेवमुपजपति-॥४८॥ भारं चेद्धत्वा मां प्रतिपादयिष्यति शत्रुवधो भूमिलाभश्च मे द्विविधो लाभो भविष्यति ॥४९॥ उपजापके दो ही विषय होसकते हैं, या तो बाह्य उपजपिता न्य. स्तर के साथ उपमापका प्रयोग करसस्ता है, या अन्यन्सर उपजपिता मायके साथ, इनमें से शबुद्धि उपजपिता किसप्रकार उपजाप करता है, और कल्याणबुद्धि किसप्रकार । इस यातका विवेचन किपाजायगा:-उन मेंसे ठ. बुद्धि बाह्य, अभ्यन्तर के साथ इसप्रकार उपनाम करता है:-॥४८॥ मेरे द्वारा भेदको पास करायाहुमा मन्त्री, यदि मालिकको मारकर उसके स्थानपर मुश गाजा यनादेगा, तो शत्रुका नाश और भूमिका लाम, ये दोनों ही फायदे होजायगे ॥ ४२ ॥ अथ पा शत्रुरेनमाइनिष्यतीति हतबन्धुपक्षस्तुल्यदोपदण्डेन वोद्विग्नश्च ॥ ५० ॥ मे भूयान् कृत्यपक्षो भविष्यति ॥५१॥ अथवा यदि शत्रु : मन्त्रीको मार डालेगा, सो मारहुप मन्त्रीका बन्धुवर्ग; तथा मन्त्री के समान ही अपराध करनेयाला मुन्छ तपा लुब्धवर्ग:
1९ अधिः
(४१६) *
कोटलीय अर्थशास्त्र
(देखो-प्रथम अधिकरणका तेरहवां चौदहवां अध्याय ), मन्त्रीके धके
कारण, राजासे अस्पन्त उद्विग्न होजावेगा ॥५०॥ इसप्रकार वहां पर मेरा
प्रससा कृत्यपक्ष बननायगा; अयात् मारहुए मन्त्रीके अन्धुवर्ग भादिको
यही सरलतामे मैं अपने वश में करसकुंगा ॥५१॥
तद्विधे वान्यास्मिन्नपि शङ्कितो भविष्यति ॥ ५२ ।। अन्य-
मन्यं चास्य मुख्यमभिव्यक्तशासनेन घातयिष्यामीति ॥ ५३ ॥
तथा इसप्रकारके अन्य कर्मचारियोंपर भी विजिगीपुको विश्वास नहीं
रहेगा । अर्थात् वह अपने दूसरे कर्मचारियोंपर भी सन्देह करने लगेगा
॥५२॥ इसतरह एक २ करके ( राजाके ) सब ही मुख्य कर्मचारियों को,
भभित्यक्त पुरुषोंके हाथ नकली चिट्ठियां भिगवाकर मरवा डालूंगा। तात्पर्य
यह है, कि उन कर्मचारियोंके नाम, विनिगीपुके वध तथा इन्धन भादिके
सम्बन्ध कूट चिठियां लिख २ कर विजिगोपुको उनसे विरुद्ध करादूगा;
और यह विजिगीषु उन सयको नष्ट करदेगा; इसप्रकार मेरी फार्यसिदि
होजायगी। यहांतक अभ्यन्तर मन्त्री आदिको फाड़नेके लिये बास शठके
उपजापका प्रकार बतायागया॥ ५३॥
अभ्यन्तरोवा शठो बाह्यमेवमुपजपति-॥५४॥ कोशमस्य
हरिष्यामि ॥ ५५ ॥ दण्डं वास्य हनिष्यामि ॥ ५६ ॥ दुष्टं
वा भर्तारमनेन धातयिष्यामि ॥ ५७ ॥ प्रतिपन्नं पाह्यममित्रा.
टविकेपु विक्रमयिष्यामि ॥ ५८ ॥ चक्रमम्य सज्यताम् ॥ ५९॥
वैरमस्य प्रसज्यताम् ॥ ६० ॥ ततः स्वाधीनो मे भविष्यति
॥६१ ॥ ततो भारमेव प्रसादयिष्यामि ।। ६२ ॥
भब इसके भागे अभ्यन्तर शठ, बाहाको फाइनेके लिये किसप्रकार
उपजाप करता है, इसका निरूपण किया जायगा:-अभ्यन्तर शठ, यासके
प्रति इसप्रकारका उपजाप करता है, कि:-॥ ५४ ॥ इस बाह्यके कोशका अप.
हरण करूंगा ॥ ५५॥ अथवा इसी सेनाको मार डालूंगा ॥५६॥ अथवा
अपने दुष्ट मालिकको इसके द्वारा मरवाऊंगा ॥ ५७ ॥ अथवा जब यह मेरे
मालिकको मारनेके लिये स्वीकार करलेगा, तो इस बाह्यको शत्रु तथा भार.
विकॉके साध मुकायलेमें युद्ध करने के लिये भेगूगा ॥ ५८ ॥ इमकी सेना,
शत्रु
भौर भारविकों के साथ मुकाबला करने में लगी रहेगी ॥ ५९ ॥ तथा उनके
(शत्रु आदिक) सापइसका वरावर वै। बता जायगा ॥६॥ उस भवस्मामें यह
मेरे अपने अधीन होजायगा, अर्थात् मेरा भाज्ञाकारी दोजायगा ॥६॥
अथवा
३ मध्या०]
अभियास्यत्कर्म
(४१७)
इससे मैं अपने मालिकको ही प्रसा करलूंगा, अर्थात् बाबके अपने पशमें
होजानेके कारण, मालिक मुतसे अवश्य प्रसन्न होजायगा ॥ १२॥
स्वयं या राज्यं ग्रहीष्यामि ॥६॥वधा वा बाह्यभूमि भई-
भूमि चोभयमवाप्स्यामि ॥६॥ विरुद्धं वावाहयित्वा चायं विश्व-
स्तं पातयिष्यामि ॥६५॥ शून्यं वास्य मूलं हरिष्यामीति ॥६६॥
स्वयं ही याह्मके राज्यको लेलंगा, क्योंकि यह मेरा भाज्ञा-
कारी होगा, मुझे रोक नहीं सकता ॥ १३ ॥ अथवा बाह्यको बांधकर भर्यात्
उसे कैद करके, उसकी भूमिको भौर अपने मालिकको भूमिको दोनोंको
ही प्राप्त करलंगा; तात्पर्य यह है, कि दोनों राज्योंपर मेरा शासन होगा
॥ १४ ॥ अथवा बालके किसी विरोधीको पुलवाकर, उसके द्वारा ही इस
विश्वस्त (विधास करनेवाले ) याह्यको मरवा डालंगा ॥ १५ ॥ अथवा इसके
शुन्य मूलस्थानको स्टलंगा अर्थात् जब यह, मात्रु या आटविक भादिपर
भाक्रमण करनेके लिये चलाजायगा, इसकी रिक्त राजधानी श्रादिका अपहरण
करूंगा । यहांतक अभ्यन्तर शनुके, बायका उपजाप करने के प्रकारोंका
निरूपण कर दियागया; भात् इन उपर्युक्त प्रकारोंसे अभ्यन्तर पाठ, नाम
को मिल करता है॥६६॥
कल्याणयुद्धिस्तु सहजीव्यर्थमुपजपति॥६७ कल्याणबुद्धिना
संदधीत ।। ६८ ॥ शठं तथेति प्रतिगृह्यातिसंदध्याद इति ॥६९॥
कल्याण बुद्धि तो साथी बनकर ही उपजाप करता है। अर्थात् उप-
जाप्पके साथ ही साथ अपनी जीवन वृसिको समझकर, उसके हितका पान
करके ही उपजापका प्रयोग करता है, वह उसका भहित कभी नहीं चाहता
॥ ७॥ इसलिये कल्याणबुद्धि के साथ अवश्य सन्धि करलेनी चाहिये
॥ १८ ॥ और शठको तो 'जैसा तुमने कहा है, मैं वैसा ही करूंगा। इस
प्रकारका वचन देकर पीछेसे धोखा देवे । अर्थात् पहिले उसकी बातो
मानकर, फिर भयसर पाकर उसे ठगलेवे ॥ ६९॥
एवमुपलभ्य:-
परे परेभ्यः स्वे स्वभ्यः स्वे परेभ्यः स्वतः परे ।
रक्ष्याः स्वेभ्यः परेभ्यश्च नित्यमात्मा विपश्चिता ॥ ७१॥
इत्यभिपास्यरकर्मणि नयमे ऽधिकरणे पश्चारकोपचिन्मा, पायाभ्यन्तरमहातिकोप-
प्रसीकारक तृतीयोऽध्यायः ॥ १॥ भादितर्विशगतो पापः ॥२१॥
[९ मधिल
कौटलीय अर्थशास्त्र
इसमकार कल्याणबुद्धि और शठबुद्धिका निश्चय करके ॥५०॥
विद्वान्, कार्यके तस्वको जाननेवाले विजिगीषुको चाहिये, कि पह, जिन
दूसरोंके सम्बन्धमें यह जानता है, कि ये शठ हैं, उनकी दूसरोंसे रक्षा करे,
भयो उनकी इस बातको किसी तरह भी प्रकाशित न होने दे । इसीप्रकार
जो अपने भादमी शठ हॉ, उनको अपनोंसे ही रक्षा को, अर्थात् उनके इस
भावको अपनी पर भी प्रकट न होने दे। इसी तरह अपनोंको दूसरोंसे और
दूसरॉको अपनोंसे भी रक्षा करे, अर्थात् एक दूसरेके इन भाषोंको किसीपर
प्रकाशित न करे । तथा अपने और पराये दोनों से, अपने भापकी रक्षा करे,
भात् अपने परायोंके प्रति कोई भी उनके अनुकूल या प्रतिकूल अभिमाय
अपनी भोरसे प्रकट न करे ॥ ७ ॥
अभियास्यत्कर्म नवम अधिकरणमें तीसरा अध्याय समान ।
.
चौथा अध्याय ।
१४२ प्रकरण।
क्षय व्यय तथा लाभका विचार ।
युग्य भयात् याहन और पुरुषोंका नाश ोजाना 'क्षय', धान्य
हिरण्य आदिका नाश होजाना 'व्यय और भूमि भादिकी प्राप्ति
होना 'काम' कहता है। इनकी परस्पर लघुता गुस्ताका विधार
इस प्रकरणमें किया जायगा।
युग्यपुरुषापचयः क्षयः ।। १ ।। हिरण्यधान्यापचयो व्ययः
॥२॥ ताभ्यां बहुगुणविशिष्टे लाभे यायात् ।। ३ ।।
हाथी घोदे भादि सवारियों, सभा कर्मचारी पुरुषों के श होजानेकोही
'क्षय' कहते हैं. हिरण्य (सोने भादिके सिके धन ) भौर धान्य
(प्रीही भादि) का नाश होना 'प्यय कहाता है ॥ २ ॥ क्षय ओर ग्यपका
ध्यान रखते
जिस समयमै भत्यधिक गुणोंसे युफ लाभकी सम्भावना हो,
उसी ममय आक्रमण के लिये जाना चाहिये। ( वे गुण कौनसे होते हैं । इनका
निरूपण भगदी सूत्रम किया जाता है ॥ ३ ॥
आदेयः प्रत्यादयः प्रसादकः प्रकोपको हस्सकालस्तनुक्षयो
ऽस्पच्पयो महान्यदुधदयः कल्यो धर्म्यः पुरोगवेति लामसंपत्
॥४॥
मध्या०] अभियास्यत्कर्म वे निन्ननलिखित पारह गुण होते हैं:-मादेय, प्रामादेय, प्रसादका प्रकोपक, इस्त्रकाल, तनुक्षय, अल्पग्यय, महान, वृत्युक्य, कल्प, धर्य और पुरोग; ये बारह, छाभकी सम्पति या गुण कहाते हैं। इन सबके स्वरुपको निरूपण प्रमशः अगल सूत्र में किया जाता है ॥ ४॥ सुप्राप्यानुपाल्यः परेपामप्रत्यादेय इत्यादेयः ॥ ५॥ विप- येये प्रत्यादेयः ॥ ६॥ तमाददानस्तत्रस्थो वा विनाशं प्रामोति, ॥७॥ जो बनी रहतासे प्रास किया जासके, तथा प्रासिके अनन्सर सरहता से ही रक्षा किया जासके, और कालान्तरमे भी जिसको शत्रु न छान सके, ऐसे लाभको 'आदेय' कहा जाता है । मात् यह लाभका एक विशेष गुण है।॥५॥ जो इससे विपरीत लाभ हो, अर्थात् जिसकी प्राप्ति और रक्षामे भी मन कठिनता हो, कालान्तरमें शत्रु भी जिसको छीन सके, ऐसे लाभका नाम 'घरयादेय' है ॥ ६ ॥ इस प्रकार के भूमि आदिके लाभको प्राप्त करता हुआ, अथवा पीपर रहकर जीवन निर्वाह करता हुआ विजिगीषु, अवश्यही नाशको माप्त होता है। (महामहोपाध्याय त. गणपति शास्त्रीने इस सूत्रके 'विपर्यय' पदका सम्बन्ध पहिले सूत्रके केवल ' भरपादेय' पदके साथही किया है। सुमाय मौर अनुपाल्य होनेपर भी जो लाभ, कालान्तरमें शनुके द्वारा जीना जासके, उसको 'प्रत्यादय' कहना चाहिये ) ॥ ७ ॥ यदि वा पश्येद-॥८॥ प्रत्यादेयमादाय कोशदण्डनिचयः रक्षानिधानान्यवसापयिष्यामि ॥९॥ खनिद्रव्यहस्तिवनसेतु- पन्धणिक्पथानुवृतसारान्करिष्यामि ॥ १० ॥ प्रकृतीरस्य कर्श- यिष्यामि ॥११॥ आवाहयिष्याम्यायोगेनाराधयिष्यामि वा ॥ १२ ॥ भवस्था विशेषम प्रस्यादेय' नामक लामको भी प्रहग करना चाहिये, इसबासका अप निरूपण किया जायगा:-विजिगीषु यदि यह समझे, कि:- ८ ॥ मैं प्रापादेय लाभको लेकर, उस लाभके नाशसे ( अर्थात् शत्रुके द्वारा किये गये, उस लामके नाशसे), अपने शयुके कोश ( सजाना , दण्ड {सेना), धाम्य आदिके समय और दुर्ग तथा परकोटे धादिकी रक्षा का. रोमो दीन पगादूगा ॥ ९ ॥ यत्रा शशुकी सान, ममता (वादियों के जी) परिसरन (हाधियों के संगण), सेतुबन्ध (पदे २ जलदाय ), सापांपारी मार्गीको या तोरकर नष्टकर माया ॥ १०॥ अथवा शभुकी नमाम्य आदि
[९ अधिक
.
(४०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
प्रकृतियोंको कर पहुंचाकर कृश (निर्वल), नाडालंगा ॥ ॥ शत्रुश्री
प्रहतियों को पहोंपर खुलालंगा; भी। उस भूमिको मात करके उसका फल
मोगके लिये शत्रुकी प्रजाओंको वहां लाकर बसा दूंगा; अथवा उनकी इच्छा
नुसार सय तरह के सुखसाधनोंकी स्वीकृति देकर उन्हें प्रसन्न कररूंगा। (इस
सनमें 'भावाहयिष्यामि' के स्थानपर किसी २ पुस्तकों 'अपवाहयिष्यामि'
भी पाठ है। मधमे कोई विशेष भेद नहीं; परन्तु पहिला पाठ बच्या मालम
होता)॥ १२॥
ताः परः प्रयोगेण कोपयिष्यति ॥ १३ ॥ प्रतिपक्षे वास्य
पण्यमेनं करिष्यामि ॥ १४ ॥ मित्रमवरुद्धं वास्य प्रतिपादयि-
ष्यिामि ॥ १५॥ मित्रस्य स्वस्य वा देशस्य पीडामत्रस्थस्तस्क.
रेभ्यः परेभ्यश्च प्रतिकरिष्यामि ॥१६॥ मित्रमाश्रयं वास्य वैगुण्यं
ग्राहयिष्यामि ॥ १७॥
अथवा शत्रु, ४न प्रजाओको, उनके प्रतिकूल आचरण करनेसे, भरनी
मोरसे कुपित करदेगा, तारपर्य यह है, कि जब मुझसे (विजिगीपुसे) गृहीत
उस भूमिको शत्रु वापिस छीम लेगा, तब मैंने प्रजाओंपर जो अनुप्रह किया
था उसके विपरीत आचरण करने के कारण, वह उन प्रगानीको अपनी ओरसे
कुपित करलेगा ॥ १३ ॥ अथवा उस लाभको ( प्राप्त की हुई भूमिको ) शत्रु
के विरोधी पक्षमै बेचद्धालंगा ॥ १४ ॥ अथवा विशेष लाभ आदिसे रहित,
शत्रुके उस स्थानमें, अपने मित्र या अपने पुत्र भादिको अधिकारी बनाका
स्थापित कर दूंगा ॥ १५ ॥ अधवा प्राप्त की हुई भूमिमें स्थित होकर मैं, अपने
सथा अपने मिनके देशको, चोरों और शत्रुओंसे पहुंचाई जाने वाली पीडाका
भी तरह प्रतीकार कर सकंगा॥१६॥ अथवा इस शत्रुके मित्र, तथा इस.
के भाक्षय ( आश्रय शब्दसे उस पलवान् रागाका ग्रहण किया जाता है, जिस
की त्र-छाया रहता हुभा दूसरा छोटा राजा अपनी शक्तिको बढ़ाता रहे,
इसप्रकार के भाथयभूत राजा) को, इससे प्रतिकूल बनायूँगा; अर्थात् उस
भूमिमें रहकर इनका परस्पर वैमनस्य करवादूंगा ] १७॥
तदमित्रं विरक्तं तत्कुलीनं अतिपत्स्यते, सत्कृत्य वास्सै भूमि
दास्यामीति संहितसमुत्थितं मित्रं मे चिराय भविष्यतीति प्रत्या-
देषमपि-साभमाददीत ।। १८ ! इत्यादेयप्रत्यादेयौ प्याख्याती
• ॥१९॥
[९ अधिक
.
(४२२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
तिरस्कार करता है, और इसमें उसे विशेष लाम होजाता है, यह बात मन्त्रि.
योंके पितमें शंकाको उत्पन करदेती है, और वे उसकी ओरसे कुपित होजाते
है। मन्त्रियों के चित्तमें शंकाका इसप्रकार प्रादुर्भाव होता है, कि यदि यह
सफलप्रयन होगया, तो अवश्यही हमको नष्ट करदेगा ॥ २५ ॥ इनसे विप.
रीत काम, प्रसन्न करने वाला होने के कारण 'प्रसादक' कहा जाता है । अर्थात्
मन्त्रियोंके उपदेशके अनुसार प्राप्त हुभा २ लाभ, और दूप्यमन्त्रियोंके तिर.
स्कारसे न प्राप्त हुआ २ लाभ, सबको प्रसर करने वाला होता है, इसलिये
इसको 'प्रसादक' कहते हैं ॥ २५ ॥ इसप्रकार यहांतक 'प्रसादक' और
प्रकोपक' ला का निरूपण किया गया ॥२६॥
गमनमानसाध्यत्वाद्धस्वकालः ॥ २७ ॥ मन्त्रसाध्यत्वात्त-
नुक्षयः ॥ २८ ॥ भक्तमात्रव्ययत्वादल्पव्ययः ॥ २९ ॥ तदा-
त्ववैपुल्यान्महान् ॥ ३० ॥ अर्थानुबन्धकत्वादृदयः ॥३१॥
निराबाधकत्वात्कल्यः ॥ ३२ ॥ प्रशस्तोपादानाद्धर्म्यः ।। ३३ ॥
सामवायिकानामनिर्वन्धगामित्वात्पुरोग इति ॥ ३४ ॥
थोड़ा ही सा परिश्रम करनेसे, अर्थात् जाने मानसे ही जो लाभ
प्राप्त होजाय, उसे हस्वकाल कहते हैं ॥ २७ ॥ जो लाभ फेवल मन्त्र अर्थात्
उपजाव आदिसे ही प्राप्त होजाने वाला हो, उसे 'तनुक्षय' कहते हैं। ( मन्त्र
में चतुर, पोदी शक्ति वाला भी राजा इस लाभको प्राप्त करसकता है)
॥ २८ ॥ जा लाभ केवल भोजन आदिका व्यय करके ही प्राप्त होजाय, उसे
'भल्पव्यय' कहते हैं ॥ २९ ॥ जो तत्काल ही अर्थात एक साथ ही अत्यधिक
लाभ प्राप्त होजाय, उसे 'महान्' कहते है.॥३०॥ जो लाभ भविष्यमे भी
अत्यधिक अंधप्राप्तिको करानेवाला हो, उसे 'गृहयुदय' कहते है ॥ ३ ॥
जिस लाभमें आगे किसी तरहकी भी माधा उपस्थित न होसके, उसे
'कल्य' कहा जाता है ॥ ३२ ॥ जो लाभ प्रकाशयुद्ध आदिसे धर्मपूर्वक ग्रहण
किया जावे, उसे 'धम्र्य' कहते हैं ॥ ३३ ॥ मापसमें मिलकर भाक्रमण करने
माले राजाओंके, प्राप्तिके सम्बन्ध पहिलेसे कोई शर्त न होने के कारण,
सपो. २ मात कियेहुए लाभको 'पुरोग कहते हैं ॥ ३४ ॥
तुल्ये लाभे देशकालो शक्त्युपायौ प्रियाप्रियो जवाजवी
सामीप्यविप्रकौ तदात्यानुबन्धौ सारत्वसातत्ये बाहुल्यानुगुण्ये
च विमृश्य बहुगुणयुक्तं लाभमादीत ॥ ३५ ॥
" ४ अध्या०] भाभयास्अरकर्म (४२३) उभयपक्षमें बराबर ही लाभ होनेपर, देशकाल आदिके अनुसार भच्छी तरह विचारकर, जो लाभ मुहुरा गुणीसे युक्त हो, उस ही कर ग्रहण करे। उसका विचार या विवेचन इसप्रकार करना चाहिये:-देश और काल किसी एक ही वस्तुम गुणविशेषको उत्पत्तिके, कारण होते हैं। मन्त्र प्रभार और उत्साह इन तीनों शक्तियों में पहिलं पहिलो शकिसे मात किया हुभा लाभ, उत्तरोत्तर शकिसे प्राप्त कियेहुए स्वामको अपेक्षा अधिक प्रशस्त (भच्छा) दोता है। इसीमकार साम दान मेन और दण्ड, इन चार उपायों में अगले २ उपायसे प्राप्त कियेहुए लाभकी अपेक्षा पहिले पहिले उपायसे प्राप्त कियाहुमा छाभ, उत्तम होता है हिम्य भ दिका लाभ अर्थात् नकद धन का लाभ, अन्य लामोंकी अपेक्षा प्रिय होनेके कारण गुणयुक्त समझा जाता है, और लाभ इसके मुकाबले में भिय नहीं समझे जाते: इसीतरह शीघ्र प्राप्त होजानेवाला लाम, विलम्दसे रस होनेवाले लाभकी अपेक्षा उत्तम होता है। अपनी भूमिक समीप ही होनेवाला लाम, भूमिसे दूर होनेवाले लाभकी अपेक्षा उत्तम होता है सत्काल ही होनेवाले लाभको अपेक्षा, भविष्यमें मी सगातार होनेवाला लाम प्रशस्त होता है; बहुमूल्य लाभ तथा अत्यधिक उपयोगमें आनेवाला काम, संख्या या परिमाणमें अधिक लाम और बहुत गुणोंसे युक्त लाम, पे सब बाल लामों में गुण बतलानेकी निमित्त हे अर्थात् लाभौम गुणों का होना समकार मालूम करलेना चाहिये। सदनन्तर जो लाभ अस्यधिक गुणों से युक्त हो, उसीका ग्रहण करना उपयुक्त होता है ।। ३५ ।। लाभविना:-कामः कोपः साध्वसं कारुण्यं हीरनार्यभावो मानः सानुक्रोशता परलोकापेक्षा दाम्भिकत्वमत्याशित्वं देन्यम- स्या हस्तगतावमानो दौरात्मिकमविश्वासो भयमनिकारः शीतो- प्णवणामाक्षम्य मङ्गलतिथिनक्षत्रेनित्यमिति ।। ३६ ॥ लाभमे निम्नलिखित विप्न उपस्पित होसकते है:-काम (नीप्रसंग ), शोध, सास (अप्रगल्भता मर्यान् शत्रु मित्र आदिमें उचित प्याहारका न कामा ), करुणा (दया-प्राणियों के वधको आशंकासे युद्ध भादिका न करना), लक्षा, अनार्यभाव (विश्वासघात भादिका करना ), मान (मैं ही सब कुछ हूं. इसमकार अहंक का होना), सानुकोशता (किसी के कुछ भेट आदि देने पर, सट उसपर दयालु होजाना, अयात् जहां तीक्ष्ण वृत्तिका उपयोग करना चाहिये यहाँ थोडेसे निमित्तसे मृदु बनजामा ), परलोकापेक्षा (परलोडको विगाहने वाले पापकी आशंकासे भाग लगाने या लूट मादिके पिष्ट होना), दाम्भिकता (दमी होनाभपनेपा विश्वास कानेवालों को (४२४) कौटलीय अर्थशास्त्र [९भाषिक हो ठगना; किसी २ पुस्तकमें इसकी जगह 'धार्मिकरवं भी पाठ है), अत्या. शिव ! अन्यायसे अत्यधिक लाभका साना किसी पुस्तक 'अत्यागिरवं भी पाठ है), दीनता (अपनेसे नीच व्यक्तियोंसे भी सहायता मांगना ),असूया (अमात्य पुरोहित मादिक गुणो होनेपर भी उनमें बोपारोपण करना), हस्तगतापमान ( हाथमें आईहुई चीजका तिरस्कार करदेना), दौरास्मिक (पीडा देनेके योग्य अयोग्य सब ही को पीदा पहुंचाना), भविश्वास ( विश्वास करने योग्य पुरुषों में भी विश्वासका न करना), भय (युद्ध आदिमें पराजयकी भाशकाका होना ), अनिकार ( शत्रुका तिरस्कार न करना; किसी २ पुस्तकमें 'भप्रतीकार' भी पाठ है, अर्थात् लाभसिद्धि के पूर्व ही आनेवाले विनोका प्रतीकार न करना), सरदी गरमी तथा वर्षा आदिका न सइसकना, कार्योंके प्रारम्भमें माङ्गलिक तिथि नक्षत्र आदिका देखना; ये सब ही बातें लाभ होने में रकावट डालनेवाली होती॥३६ ॥ नक्षत्रमतिपृच्छन्तं बालमों ऽतिवर्तते । अर्थो ह्यर्थस्य नक्षत्रं किं करिष्यन्ति तारकाः ॥ ३७॥ नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थाबरा यतशतैरपि । अर्थरर्थाः प्रयध्यन्ते गजाः प्रतिगरिव ॥ ३८ ॥ इत्यभियास्यकर्मणि नवमे ऽधिकरणे क्षयध्ययलामविपरिमर्श चतुर्थो ऽध्यायः ॥en आदितः पञ्चविंशतः ॥२५॥ कार्य के प्रारम्भमें अत्यधिक वक्षोंकी अनुकूलताको पूछनेवाले, अर्थात् भरम तो भाग लगीहुई है, और इधर उसके प्रतीकारके अनुकूल नक्षत्रकी खोज होरही है इसप्रकार करनेवाला प्रमादी राजा, कभी अपने अमीष्ट अर्थको माप्त नहीं करसकता, प्रत्येक कार्यकी सिद्धि के लिये आवश्यक धन भादि उपायोंको ही नक्षय समझना चाहिये, ये तारका किसीकर पया विगार या सुधार सकती हैं ॥ ३७ ॥ धन आदिस हीन अर्थात् आवश्यक उपायोंसे रहित पुरष सेकड़ों यय करनेपर भी अपने अभीष्ट फलको शत नहीं करसकते; अधाका ही अयोंके साथ सम्बन्ध है, धन ही धन को खींचता है। जैसे एक हाधीके सहारेसे दूसरे हाधीको पकड लिया जाता है ॥ ३८ ॥ अभियास्यत्कर्म नवम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
५ अभ्यास मभियास्यरफर्म पांचवां अध्याय १४३ प्रकरण बाह्य तथा अभ्यन्तर आपत्तियां । (राष्ट्रमुख्य सथा अन्तपाल आदिके द्वारा उत्पा की हुई भार- तियाको 'बाय' भार मन्त्री पुरोहित आदिके द्वारा उत्पन हुई भापत्तियोंको अभ्यन्तर' कहते हैं। इस प्रकाणमें उन आपत्तियों का और उनके प्रतीकारका निरूपण किया जायगा। संध्यादीनामसथोद्देशावस्थापनमपनयः ॥१॥ तस्मादापदः संभवन्ति ॥ २ ॥ बाह्यत्पतिरभ्यन्तरपतिजापा, अभ्यन्तरोत्य- चियापविजापा, प.होत्पचिर्भापतिजापा, अभ्यन्तरोत्पचिर- भ्यन्तरप्रतिजापा, इत्यापदः ॥३॥ सन्धि विग्रह मावि छः गुणोंके, उचित स्थान पर प्रयोग न करनेकी ही अपनय' कहते हैं। अधीए सन्धिके स्थानपर पिग्रहका उपयोग, तथा विमहके भवसरपर यानका, और पानके मौके पर सन्धि आदिका उपयोग करना अपनय (नीति मार्गसे भ्रष्ट होना ) कहाता है ।। १॥ इस अपनयले की सम्पूर्ण भापत्तियोंका प्रादुर्भाव होता है ॥ २ ॥ बाल भर अभ्यन्तर भापत्तियोंके, उपपिता तथा प्रतिजपिताके भेदसे चार भेद होते हैं।-(1) पास अर्थात् राष्टमुख्य, अन्तपाठ आदि जिस आपत्तिमें उपपिता ( उप- जाप अर्थात् भेद आदि डालकर भापतिको उपस करनेवाले ) हो, भोर सभ्यन्तर भीत् मन्त्री पुरोहित भादि जिसमें प्रतिजपिता (भात् रामुख्य भादिके द्वारा कियेगरे उपजायको स्वीकार करके उसके अनुसार कार्य करने पाले ) . या पहिली भापात है।(0) इसी प्रकार जिसमें भम्पस्तर उपजपिता और पास प्रतिजपिना हो, या दूसरी भापात कही जाती है। हम दोनों भापतियों के उपापिता और प्रतिमपिता पर विशातीय होसे हैं।()-जिसका यहाही उपजपिता भार सार है। प्रतिजपिता हो, पर सीसी भापति ।(v)-और जिसका अभ्यन्तर ही उपजपिता भार अम्मातर ही सिजपिता , यह चौधी भापति समझी जाती है। इन दोनो भापतियों में समाननातीप ही उपमपिता और प्रतिनपिना होते । इमप्रकार मिळकर में चार प्रकारकी भापनियां हैy. M -- "(२) कोटलीय अर्थशास्त्र समषि यत्र याह्या अभ्यन्तरानुपजन्त्यम्यन्तरा वा बाह्यास्तत्रो- भययोगे प्रतिजपतः सिद्धिर्विशेषयती ॥ ४ ॥ सुव्याजा हि प्रति- जपितारो भवन्ति नोपजपितारः ॥ ५॥ तेषु प्रशान्तेषु नान्यां. छक्नुयुरुपजपितुमुपजपितारः ॥ ६ ॥ जहां वाह्य, अभ्यन्तरोंका अथवा अभ्यन्तर बाद्योंका उपजाप करते है, भर्थात् जिन दो श्रापत्तियों में उपजपिता भार प्रतिजपिता मिरजातीय होते हैं। यहां इन दोनों में से, आपतिका प्रतीकार करने के लिये प्रतिजपिताको साम दान आदिके द्वारा शान्त करदना भयात् अपने अनुकूध यना ना भधिक श्रेयस्कर ( या लाभपद ) होता है ॥ ४ ॥ क्योंकि प्रतिमपिता पुरुषों के प्रतिजापका कारण धनग्रहण आदि ही होता है, इसलिये उनको धन भादिके द्वारा सुखपूर्वक वशमें किया जासकता है, परन्तु उपजपिता पुरवा को इसप्रकार वशम नहीं किया जासकता, क्योंकि उनके उपजापके कारणका पता लगना कठिन होता है |॥ ५॥ इसपकार किन्ही प्रतिजपिसाभोंकि प्रशान्त होजान पर, उजपिता फिर अन्य व्यक्तियों में उपजाप करने के लिये तैयार मही हो सकते, क्योंकि उनको अपने उपजापके फूट जागेकार रहता है ॥६॥ कृच्छ्रोपजापा हि बाह्यानामभ्यन्तरास्तेपामितरे पा, महतश्च प्रयत्नस्य वधः, परेपामर्थानुबन्धधात्मनोऽन्य इति ॥ ७ ॥ तथा बाझोके लिये अभ्यन्तरीका और अभ्यन्तरोंके लिये वामका उपजाप करना यहा कठिन होता है। क्योंकि ये दोनों प्रकार के व्यक्ति पर दूसरेसे सर्वथा पृथक् रहते हैं। और यदि उपजाप्य व्यक्ति (जिसके उपर उपनापका प्रयोग किया जाता है) उस उपमापको स्वीकार न करें, तथा 'उस फोड़ दे, तो उपजपिताका पड़ा भारी मयन निष्फल होजाता है। इसपकार उपजापके फोड़ देनेसे उपजाप्प पुरुष अपने स्वामीकी प्रसन्नता रूप अभीष्ट सिद्धिको मात करते हैं; और उपजपिता स्वामी भासाद (भमसलना रूप अनर्थका भागी होता है। इसलिये भी अभ्यन्तर और बसका परस्पर उपज प करना अत्यन्त कठिन है। (नपचन्द्रिका पार पाक कत्ती माधवपमान इस सूत्रके भन्तिम 'भन्म' परसे रहित 'मातच प्रवास वधः, परेपाम नुबन्धात्मनः' इसना ही सूत्र पाठ मानकर इसप्रकार पारयान किया है। यद्यपि बाघ और अभ्यस्तरका परस्पर उपजापति कठिन है, फिर भी उसे छोपना न चाहिये, क्योंकि उपजापसे दूसरेके असार का नाच, भौर अपने उत्साहको पति होती है)।.॥ . *. " . - r 6 । ५ अध्या०] अभियास्यत्कर्म (४२७)" अभ्यन्तरेपु प्रतिजपत्सु सामदाने प्रयुञ्जीत ॥ ८॥ स्थान- मानकर्म सान्त्वम् ॥९॥ अनुग्रहपरिहारो कर्मस्वायोगो वा दानम् ॥१०॥ प्रतिजपिताको शान्त करने के लिये उपायोंका निरूपण किया जाता है:-यदि मन्त्री पुगहित आदि अभ्यन्तर पुरुष ही प्रतिजपिता होयें तो साम, और दानका प्रयोग करना चाहिये विशेष अधिकार स्थानोंपर नियुक्ति करना ( =स्थानकर्म ), तथा छत्र. चामर आदि रखने की स्वीकृति देईना ( =मानकम) साम कहाता है। अर्थात् सामका प्रयोग इसप्रकार करना चाहिये ॥ ९॥ अनुग्रह (धनका देना ) और परिहार ( लिये जाने पाले धन का न लेना, या कर आदिका छोडदमा); तथा विशेष कार्यों में इसके सम्पूर्ण फलको स्वयं ललनको अनुमति दरेना, ( अर्थात् किये गये कायके सम्पूर्ण फलको, उस कार्यका करनेवाला ही लेलेवे, राजा उसमेसे अपना अंश सर्वथा न लेवे) यह दान होता है। अर्थात् यह दानके प्रयोगका प्रकार है॥१०॥ बाह्यपु प्रतिजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत ॥ ११॥ सत्तिणो मित्रव्यञ्जना वा बाह्यानां चारपां घूयुः ॥ १२ ॥ अयं वों राजा दूज्यव्यजनैरतिसंधातुकामो युध्यध्यामिति ॥ १३ ॥ यदि याद्य प्रतिजपिता हो, तो उन्हें शान्त करने के लिये भेद और दण्डका प्रयोग करना चाहिये ॥१॥ बाहों के प्रति जापिता होनेपर, उनके मिन्नके वेपमें रहनेवाले सन्नी (गुप्तचर विशेष ), उम बहके सामने, राजाके गुप्त भेदशा इस प्रकार उघाटन करें:- ॥ १२॥ यह आपका राजा, प अमात्य भादिके द्वारा ( अर्थात् उपरसे भापके प्रिय की बात कहनेवाले, पर अन्दरसे भप्रिय चिन्तन करनेवाले समारय भादिके द्वारा) भापको मवि. मपिसा यनाकर धोखा देना चाहता है। इस रहस्यको भाप भी पर जान कर प्रतिजपिताके कार्य में कभी कदम न रक् ॥३॥ प्येषु या ध्यग्यञ्जनाः प्रणिहिता दृप्यान्याधैर्भदययाद्या- न्वा यः ॥ १४ ॥ दयाननुपविष्टा या तीक्ष्णाः शखरसान्यां.,. हन्युः ॥ १५ ॥ आइय पा-पाह्यान्यावयेयुरिति ॥ १६॥ भयवर राना अमियकारी या यमाय आदितथा मारा राष्ट्र छल्प नारि प्रतिपिता सोनेपर, दूण्य (माके भरिपरी पर 4 से (४२८) कौटलीय अर्थशास्त्र [९माधि रहनेवाले गुसथर, दृष्योंको वायोंमे और बाहोंको दूप्योंसे भिन्न कर दें, अर्थात उनका आपसमें भेद डाल दे ॥ ११ ॥ अथवा दूष्योंके मध्यमें प्रविष्ट हुए२ तक्षिण पुरुष, शस्त्र अथवा पिप भादिके द्वारा उनको ( दूप्याँको) मार देखें ॥ १५॥ अथवा बाहाको किसी बहानेसे अरहदा बुलाकर मार शल । यहाँसक पहिली दी आपत्तियों के प्रतीकारका निरूपण किया गया॥१६॥ यत्र बाबा बाह्यानुपजपन्त्यभ्यन्तरानम्यन्तरा वा, तत्रैका- न्तयोगमुपजापितुः सिद्धिर्विशेषयती ॥ १७ ॥ दोपशुद्धौ हि या न विद्यन्ते ।।१८।। दृष्यशुद्धौ हि दोपः पुनरन्यान्दूपयति॥१९॥ अब अन्तिम दो आपातयांक प्रतीकारका कयग किया जायग:- जहाँपर बास, बाघरको और अभ्यन्तर अभ्यन्तरीको उपाए करते हैं, यहाँ समानजातीयके उपजाप प्रतिजाप प्रयोगमें; उपजपिताको अपने अनुयूल बना लेना ही अधिक धेयस्कर होता है ॥ १७ ॥ क्योंकि उपजाप रूप दोपके म रहनेसे, दूष्य पुरुषों का भी प्रादुर्भाव नहीं हो सकता । तत्पर्य यह है, कि उपनापसे ही तूप्य पुरुषों की उत्पत्ति होती है, यदि उपजपिता पुरुषको ही अपने अनुकूल बना लिया जाय, तो उपजापको आशंका ही नहीं रहती 11) दृष्य पुरुषो ( उपजाप रूप दोपसे दूषित धुद्धि पाले भतिजपिता पुरुषों ) के शान्त करने के लिये यह करनेपर तो, उपचाप रूप दोप भम्य पुरुषों को फिर दूपत कर सकता है। इसलिये उपजपिताको ही शान्त करमे काय करना चाहिये। १९॥ तस्मादायधूपजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत ॥ २० ॥ सत्तिणो मित्रन्याना वा ध्युः ॥ २१ ।। अयं वो राजा स्वयमादातुकामो विगृहीता: स्थानेन राज्ञा युध्यध्वमिति ॥ २२ ॥ इसलिये ( उपजपिताको ही अनुक्त पनाने के कारण) उपजाप करनेवाले बास पुरुपोंमें भेद और एण्डका ही प्रयोग करना चाहिये ॥ २०॥ उनके (उपजपिताओके) मिनके वेष में रहनेवाले सनी, उपजपिताओं को इस प्रकार का:-- ॥ २९ ॥ यह राजा नमको प्रतिजपिता पुरपोंके द्वारा अपने अधीन करना चाहता है, इसलिये इस ,राजासे तुम्हें विग्रह कर देमा चाहिये, आप लोगोंको यह सब सोचते हुए सम्मल कर रहना चाहिये भात किलीपर भी विश्वासपूर्वक उपजापका प्रयोग मत को ॥ २२॥ पतिजपितुर्वा ततो दूतदण्डाननुप्रविष्टास्तक्षिणाः शसरसादि- मिपां छिद्रपु प्रहरेयुः ॥ २३ ॥ ततः सत्रिणः प्रतिजपित्तारम- मिर्शसा ॥ २४ ॥ .
६ + ५ अध्या अभियास्थरकम अथवा प्रतिजपिताके पाससे उपजपिताके समीप बातचीत करने के लिये जाते हुए ( प्रतिजपितुर्यात), या हो उपजपिता है, यहां जाते हुए दूत अथवा समिक पुरुप में प्रविष्ट हुए तीक्ष्ण पुरुष, श तया रस भादिक द्वारा अवसर पाकर इनपर हमला करें। अर्थात् मे संग पुरुष, उपमपिताको वारनके द्वारा अथवा विप आदि देकर मार डा ॥२३॥ सदान्तर सग्री, इस तरह की मत्युझे सम्बन्धमें प्रतिमपिता पुरुषोंका माम लवे । अधीत् वे मिथ्या ही इस यातको प्रसिद्ध कर दें, कि उपजपिता पुरुषों को प्रतिजपितामोंने ही मारा है। जिससे कि प्रत्येक उपजाप कानेवाले पुरुषका, प्रतिजपितामें आवश्वास हो जाये ॥२४॥ अभ्यन्तरानभ्यन्तरे पृपजपत्सु यधार्हमुपायं प्रयुञ्जीत ॥२५॥ तुलिङ्गमतुष्टं विपरीतं या साम प्रयुञ्जीत ।। २६ ॥ इसी प्रकार अभ्यन्त रोंको उपजाप करनेवाले अभ्यन्तर पुर में भी यथायोग्य साम आदि उपायोंका प्रयोग किया जाय ॥ २५॥ सन्ताप सूचक पर घस्तुतः असन्तोपद सामका प्रयोग किया जाये, अथवा असतोपके सूचक, वस्तुतः सन्तोषजनक सामका ही प्रयोग किया जाये । तात्पर्य यह है, कि भवस्याके भनुसार इनमें से किसी तरह के सामका प्रयोग किया जाये T शौचसामोपदेशेन व्यसनाम्युदयावेक्षणन या प्रतिपूजन- मिति दानम् ॥ २७॥ शोध अथवा के बहाने, मघा बाधुवियोग मादिके दुःस्नमय, और पुरसय आदि सुषमय अवसरोकी अपेक्षा करके यस्य राधा बामरण भादिके द्वारा सत्कार किया जाना दान होता है। अर्थात् दान प्रयोगका. या प्रकार समझना चाहिए ॥२७॥ मित्रव्यानो वा ब्रूयादेतान् ॥ २८ ॥ चित्तज्ञानार्थमुपधा- स्थति को राजा ॥ २९ ॥ सदस्याख्यातव्यमिति ॥ ३० ॥ पर- स्पराद्वा भेदयनान् ।। ३१ ॥ असौ च यो राजन्येवमुपजपतीति मे ॥३२॥ अथवा उमेर मित्रके चंपमें रहनेवाला सम्री उनको (सम्यन्तर टप. पिता शुदीको) स प्रकार करे:- २०॥ हमारे हायगर शामिमायको शाम के लिये रामा, पम मदिक धारा सम्हारी Tiar aim ॥२९॥ रसाद को मानेर दरग रिशमा देशहिले?
[९ अपिल कोटलीय अधशास्त्र शत्रुमुख भास केवर शत्रुके द्वारा उत्पन्न की हुई भापतिमें तो (चाहे वह भापत्ति ३५ शत्रु द्वारा या उसके मन्त्रीक द्वारा, या उसके भमायके द्वारा, या मन्त्री और अमात्य इन दोनों के द्वारा उत्पन्न हुई हो, अर्थात् शत्रुको ओरसे ये धार प्रकारकी आपत्ति होसकती हैं, इनमें से कोई भी भापति हो, उसको तो), शत्रु जित सामन्त भादिके अधीन है, मन्त्री जिसके अधीन है, या अमात्य मादि जिसके अधीन उनमें साम भादिका पपायोग्य प्रयोग करके विजिगीपुको सिद्धिकी प्राप्ति करनी चाहिये ॥७॥ स्वामि यायत्ता प्रधानसिद्धि. ॥८॥ मन्त्रिष्वायत्तायत्त- सिद्धिः ॥ ९॥ उभयायत्ता प्रधानायत्तसिद्धिः ॥१०॥ प्रधान विषयक सिद्धि, अर्थात् मन्त्रीसे उरपस की हुई आपत्तिका प्रस कार, स्वामी अधीन होता है, तत्पर्य यह है, कि मन्त्री के आपति जनक होनेपर उसके स्मामीको हो साम आदि द्वारा भतुहूल बनाने का यह करना चाहिये ॥ ८॥ भायत्तसिद्धि, अर्थात् कार्य से कहेहुए (७ सूत्र में ) अमात्य भादिके द्वारा उत्पन की दुई आपत्तिका प्रतीकार, मन्त्रियों के अधीन होता है, अर्थात् उसके प्रतीकारके लिये मन्त्रियों को ही साम आदि प्रयोगों के द्वारा अनुकूल बनाना चाहिये ॥ ९ ॥ इसीप्रकार मन्त्री और अमात्य दोनोंसे उत्पन की हुई भापत्तिका प्रतीकार, समी और मन्त्री इन दोनों के ही अधीन होता है। अर्थात् इस आपत्ति के प्रतीकारके लिय स्वामी और मन्त्री दोनॉको ही साम आदिके प्रयोगसे अनुकूल बनाना चाहिय ॥१०॥ दृष्यादृष्याणामामिश्रितत्वादामिश्रा ॥ ११ ॥ आमिश्रा- यामप्यतः सिद्धिः ॥ १२ ॥ आलम्पनाभावे ह्यालम्बिता न विद्यते ॥ १३ ॥ केवळ शशु भादिसे उपर हुई शुद्ध भापरिका निरूपण करनेके भनन्तर अप दुप्प ओर भदूष्य (शत्रु ) धोनों द्वारा मिलकर उत्पन्न कीहुई मामि भापत्तिके सम्पन्ध निरूपण किया जायगा -दूष्य और भदूरप दोनों द्वारा उत्पन्न कीहुई भापति 'भामिध' पा मिश्रित कहाती है, (पहिले दो प्रकारकी 'शुद्ध' भापसिका निरूपण किया ज चुका है) ॥ आमिक्ष भापासमें अदूष्पके द्वारा सिद्धि प्राप्त होसकती है। भयात् भामिन भाप का प्रतीकार करने के लिये अदूष्यको ही साम आदि उपार्योंसे मनुफक बनाना चाहये ॥ १२ ॥ क्योंकि अदूप्योंका ही सहारा लेकर दूप्य आपत्ति जनक हो सकता प्रदूष्य भनुकूल हो जानेपर यह स्वयं ही शान्त हो जाता - ६ अध्या अभियास्यत्कर्म (४३३) मित्रामित्राणामेकीभावात्परमिश्रा, परमिश्रायां मित्रतः सिद्धिः ॥ १४ ॥ मुकरो हि मित्रेण सन्धिामित्रेणेति ॥ १५ ॥ मित्र और शत्रु इन दोनों के द्वारा मिलकर दरपन्न की हुई भापत्ति 'परमिश्र' (अन् जिसमें यात्रु विशेष रूपसे मिलकर मापत्तिका जनक होता है,) कहाती है। इसको 'शामिध' भी कहते हैं। परमिथ भापत्तिम मित्र द्वारा ही सिद्धि प्राप्त होसकती है; अर्थात् उस मियों द्वारा ही इस आपत्तिका प्रतीकार किया जाता है। क्योंकि मित्र के साथ सन्धि होजाना सुकर होता है शत्रु के साथ इस तर६ सन्धि होमा कठग है (किसी २ पुस्तक 'सन्धिः' पदके स्थान पर सिद्धिः ऐमाप है; अर्धमे कोई विशेष भेद नहीं)॥१५॥ मित्रं चेन्न संधिमिच्छेदभीक्ष्णमुपजपेत् ॥ १६ ॥ ततः सत्तिमिरमित्रा दयित्वा मित्रं लभेत ॥ १७ ॥ मित्रामित्रसंघस्य वा योऽन्तःस्थायी तं लभेत ॥१८॥ अन्तःस्थायिनि लब्ध मध्यस्थापिनो भिद्यन्ते ।। १९ ।। मित्र, यदि सन्धि न करना चाहे तो पार २ उपका उपाप करे अधीत दुसे भिरा करने का यन करे :१६॥ इसमकार सन्नी गुप्तपुरपोके "द्वारा, शत्रुसे उसकी फूट दलवाकर जिनको मात करे अर्थात् उसको फिर बने अनुकूल बनाये ॥ १७॥ एक देश व्यवधानसे अथवा देशके साथ ही गेहुए यशाकम मिन और शाके संघके अवसानमें रहनेवाले सामन्तोषो अपनी और मिलाये ॥१०॥ क्योडि में रहनेवाले सामन्तके अपने कामे होजानेपर मपस्थित राजा, परस्पर स्वयं ही फट जाते हैं ॥ ३९ ॥ मध्यस्थायिनं वा लभेत । २०॥ मध्यस्थायिनि या लब्धे नान्तःस्थायिनःसंहन्यन्ते ॥ २१ ॥ यथा चैपामाश्रयभेदस्तानु- पायाप्रयुजीत ॥ २२॥ अथवा मध्यस्थायी सामन्ती सपने अधीन करे ॥२.योकि मा स्थापी सामन्त के वशमै होलाजेपर, भर्धात् जय यह अपने वशीभा होजाता है, तो अन्तमें रहनेवा रामा मा भापसग मिल नहीं सरने। भयात् उनका पररपर भेद होजाता है ॥ २१॥ या जिस प्रकार सानु सौर मित्र, अपने बाध्य अर्थात् अपनेको सहारा देनेवाले शरिहालो राजासे भित रहम, इमीप्रकार के उपायोका प्रयोग हिपानावे ॥ २२ ॥ है (४३४) कौटलीय अर्थशास्त्र [९ भाषिक धार्मिकं जातिकुलश्रुतवृत्तस्तवेन संवन्धेन पूर्वेषां त्रैकाल्यो। पकारानपकाराभ्यां वा सान्त्वयेत् ॥ २३ ॥ धार्मिक राजाके विषयमें सामके प्रयोगका यह प्रकार है:-जाति, कुल, झुल ( पड़ाई लिखाई ), और वृत्त ( सत्यवहार या आचार ) आदिकी स्तुतिक सम्बन्धस, तथा उनके कुलवृद्धोंके सदा उपकार या अनपकारके द्वारा धार्मिक राजाको शान्त करे ॥ २३ ॥ निवृत्तोत्साहं विग्रहश्रान्तं प्रतिहतोपायं क्षयव्ययाभ्यां प्रवा- सन चोपतसं शौचनान्यं लिप्समानमन्यस्माद्वा शङ्कमानं मैत्री- प्रधान वा कल्याणयुद्धिं साना साधयेत् ॥ २४ ॥ उत्साहहीन, लड़ाईसे थके हुए, अधीत युद्ध करनेमें रुचि न रखने वाल, निष्फल उपाय वाले ( अर्थात् जिसके प्रयोग कियेहुए साम आदि उपाय सफल ग हुए हों, ऐसे ), क्षय ( सवारी तथा भादमियों के नाश व्यय (धग धान्य आदिके नाश) और प्रयास (दुरदेशकी यात्रा से संतप्त हुए २, पवित्रता पूर्वक ( अर्थात् ईमानदारीसे) किसी दूसेर राजाको अपना मित्र बनानेकी इच्छा रखने वाले, दूसरेसे शक्का रखनेवाले भार दूसरेपर विश्वास न करनेवाले, और सबके साथ मित्रभावका ही व्यवहार करनेवाले कल्याणबुद्धि राजाको, सामके द्वारा ही शान्त करनेका प्रयत्न करे ॥ २४ ॥ लुब्धं क्षीणं वा तपस्विमुख्यावस्थापनापूर्व दानेन साधयेत् । ॥ २५ ॥ तत्पश्चविधम् ॥ २६ ॥ देवविसर्गो गृहीतानुवर्तन- मात्तप्रतिदानं स्वद्रव्यदानमपूर्व परवपु स्वयंग्राहदानं चेति दान- कर्म ॥ २७॥ लोभी, अथवा धनहीन राजाको, तपस्वी और अन्य मुख्य न्यासियोंकी प्रामाणिकतामें दानके द्वारा वशीभूत करे । तात्पर्य यह है, कि देनेके समय सपस्वी तथा प्रधान व्यक्तियों को इस यातका साक्षी बनावे, कि अमुक राजाको समयमै इम ঘনব इतना धन आदि दिया है जिससे कि आगे किसी तरहके झगड़ेकी सम्भावना न हो ॥ २५ ॥ वह दान पांच प्रकारका होता है ॥ २६॥ देयविसर्ग ( प्रहण कीहुई भूमिमें, ब्राह्मण आदिके लिये पहिलेके अनुसार ही छोदाहुआ ), गृहीतानुवर्तन ( पहिले पूर्वजोंके द्वारा लोहुई भूमि आदिको भोगनेके लिये प्रतिषेध न करना), आत्तप्रतिदान ( लीहुई भूमि आदिका फिर वापस देदेना ), नये तारपा अपने ही नव्यका देना, और शत्रुके देशसे स्टहुए धनको लूटने पालेको ही देना, भर्थात् शत्रुके भने अमुक -- ६ अध्या०] अभियास्यत्कर्म देश पर चढाई करने पर पास जितना धन लूटमें तुम्हारे हाथ लगेगा, वह तुम्हारा ही होगा, इसप्रकार दानके ये पांच भेद होते है ॥ २७ ॥ परस्परद्वेपवैरभूमिहरणशसितमतो ऽन्यतमन भेदयेत्॥२८॥ भीरं या प्रतिघातेन ॥ २९ ॥ कृतसंधिरेप त्वयि कर्म करिष्यति मित्रमस्य निसृष्टम् ॥ ३० ॥ संधौ वा नाभ्यन्तर इति ।। ३१ ॥ भय भेदका निरूपण किया जाता है:-जो राजा आपसके द्वेप ( उसी समय किये हुए अपकारके द्वारा उत्पन्न हुआ २ विरोधीभाव ), वैर (चिर- कालसे उत्पन हुआ २ विरोधीभाव ), तथा भूमिका अपहरण भादि करनेकी आशा रखता हो, उसे इन्हीं में से किपी एकके द्वारा भिन्न कादेवे । अर्थात् वेप भादिके द्वारा ही उनकी आपसमे फूट डालदे ॥ २८ ॥ भीर ( डरपोक ) राजाको प्रतिधात के द्वारा (शत्रु बलवान् है, यदि तू इस समय युद्ध आदि करेगा, तो मारा जाय, इसप्रकार भय दिखाकर ) भिन्न करदेवे ॥ २९ ॥ अथवा यह कहकर भेद डाले, कि देखो, इस समय तो यह सुमसे सन्धि करलेगा, पर सन्धि करके फिर पीछेसे तुमपर भाक्रमण करदेगा, क्योंकि सन्धि करने के लिये विजिगीपुके पास इसने अपने मित्र को भेजदिया है ॥३०॥ अथवा यह कहकर भेद डाले, कि देखो-शत्रु और मित्रके साथ सन्धि करने के समयमें इन्होंने तुम को उसमे सम्मिलित नहीं किया, अर्थात् उस कार्यसे तुम्हारा बहिष्कार करदिया ॥ ३१ ।। यस्य वा स्वदेशादन्यदेशाद्वा पण्यानि पण्यागारतया गच्छे- युस्तान्यस्य यातव्याल्लब्धानीति सत्तिणचारयेयुः ॥ ३२ ॥ बहुलीभूते शासनमभिव्यकेन प्रेषयेत् ॥ ३३ ॥ मित्र या शनु किसीके अपने देशसे या दूसरेके देशसे, एण्यागार (विक्रेय घस्तुओंके रखनेका स्थान विशेष) में रखनेके लिये जो पण्य (बिकने आदिका सामान ) भावे, उसके सम्बन्धमें सनी यह प्रसिद्ध करदे किछिपे तोरपर सन्धि करनेकी इच्छा रखनेवाले यातव्य (जिसके ऊपर आक्रमण कियाजाने वाला हो, उस) से ही यह सामाम मास हुआ है ॥३२॥ इस मिथ्या वृत्तान्तके बहुत अधिक फैल जानेपर, एक कपटलेख (बनावटी पत्र लिखकर ) अभिव्यक्त (सर्वथा वध्यरूपसे निश्चित हुआ २ पुरुष, इसी अर्थको प्रकट करनेके लिये अधि९, अध्याय ३, सून ५३ की पारयामें 'अभिव्यक्त के स्थान पर 'अभिव्यक्त' शब्दमा प्रयोग किया है, यद्यपि मूल सूप में यहां 'भभिव्यक्त' पाठ ही छपगया है, पर नयचन्द्रिका व्याप्याके (४३६) कोटलीय अर्थशास्त्र [९ अदि० अनुसार यहाँ भिभित्य ते पाठ ही है। पातु हम स्थल में नयचन्द्रिका च्यारयामें भी अभिव्यक्त ही पाठ है) पुरपके हायमें देकर उसे भेजे ॥३३॥ एतत्ते पण्य पप्पागारं वा मया ते प्रेषितम् ॥ ३४ ॥ साम- यायिकेपु विक्रमस्थापगच्छ वा ॥ ३५ ॥ ततः पणशेपमवाप्स्य- सीति ।। ३६ ॥ ततः सत्तिणः परेषु ग्राहयेयुः ॥ ३७ ॥ एतद- रिप्रदत्तमिति ।। ३७ ।। उस रेखका भाव यह होना चाहिये:-यह योहा यहुत सामान मैंने आपके लिये भेजा है, तथा यह पण्यागार अर्थात् पण्य गृह के समान, शकट आदि बड़ा २ सामान भी मैंने आपके पास भेजा है ॥ ३४ ॥ तुमारे अपने साथ ही उठनेपाले अर्थात् मेरे शत्रुको सहायता करने वाले राजाओंपर आक्र मण करो, अथवा उन्हें छोड़कर अलहदा होजाभो; अर्थात् मेरी सहायता करने के लिये तैयार होजाओ ॥ २५ ॥ इसके अनन्तर तुमको, श किया हुआ शेष धन भी प्राप्त होजावेगा, अर्थात् मेरी ओरसे तुमें शेष धन उसी समय मिल सकेगा, जम तुम उनपर चढ़ाई करोगे, या उन्हें छोडवोगे । इममकार बनावटी पत्र लिखवावर उसके पास भेजा जाये ॥ ३६॥ तदनन्तर सनी, अन्य सामवायिक राजाओंमें इस बात का निश्चय करादे, कि यद्दपन विजिगीपुका अर्थात् भापके शत्रुका दिया हुआ है ॥ ३ ॥ शत्रुप्रख्यातं वा पण्यमविज्ञातं विजिगीपुं गच्छेत् ॥ ३८ ॥ तदस्य चैदेहकव्यञ्जनाः शत्रुमुख्येषु विक्रीणीरन् ।। ३९ ।। ततः सत्तिणः परेषु ग्राहयेयुः, एतत्पण्यमरिप्रदत्तमिति ॥ ४०॥ अथवा शत्रु अर्थाए सामवायिन राजाओं में से किसी एकके साथ सम्बन्ध जोरे हुए रत्न आदि पण्य (सामान ) को, बिना ही किसीके जानेहुए, रिसीतर विजिगीपुके पास पहुचाया जावे ॥ ३८॥ तदनन्तर ब्यापारियों के वेपमें रहनेवाले उसके गुप्तचर, उस सामानको अन्य, शत्रुके समान गुख्य सामायिक राजाभामें लेनाकर यथें ॥ ३९ ॥ और इसके बाद सनी ( गुस- परपुरप), उस सामानको, अन्य सामवायिक राजाओंमें जाकर रक्षक पुरपा Em यह कहकर पका दे, के या सय सामान आपके शत्रु अर्थात् विति. गीपुके द्वारा यहां हम ( अमुक) पुरुषोंके पास बेचने के लिये भेजा गया है। सपापणाम यह निकलेगा, कि सामवायिक राजाओंके हृदयमें यह निश्रित होजाया, कि इनमें से कोई राज विजिगीपुके साथ मिल गया है। और इसतरह उनमें परस्सर अवश्य फट होजायगी ॥ ४ ॥ , ध्या०] भमियास्यत्कम महापराधानर्थमानाम्यामुपगृह्य वा शस्त्ररसाग्निमिरमित्रे गदध्यात् ॥४१॥ अथैकममात्यं निष्पातयेत् ॥ ४२ ॥ न्य पुत्रदारमुपगृह्य रात्रौ हतमिति ख्यापयेत् ॥ ४३ ॥ अथा. त्यः शत्रोस्तानकैकशः प्ररूपयेत् ।। ४४ ॥ महान अपराध करनेवाले अमारप आदिको, भूमि हिरण्य आदि धन । छा चामर आदि सस्कारके देनेसे अपने वश में करके, उन्हें शत्रुपर शस्त्र का रस आदिके द्वारा आक्रमण करने के लिये नियुक्त करे । तात्पर्य यह है, विजिगीषु इस प्रकारके अपराधी अमात्योंसे 'तुम लोग जाकर शस्त्र पिप या अभि आदिक द्वारा शत्रुको मार डालो, यह कहकर छिपे तौरपरही उन्हें स कामके लिये भेज देवे ॥ ४ ॥ पहिले एकही भम त्यो अपने पाससे नकालकर शनुके पास पहुंचा देवे ॥ ४२ ॥ तदनन्तर उसके स्त्री और पुत्रों को करकर अर्थात् किसी एकान्त स्थानमें छिपे तौरपर सुरक्षित करके, रात्रि में उन्हें जाने मार डाला है, इस प्रकार मिया वृत्तान्तकोही प्रसिद्ध करावे । ( यह सीलिये किया जाता है, कि जिससे शत्रु, भेजे हुए अमात्यो सम्बन्धमें जिगीपुकी शत्रुता का विश्वास करसके) ॥ ५३ ॥ जब यह अमास्प, शत्रुके यहां स्थान पाजावे, अर्थात् शत्रु जब उसपर पूरा विश्वास करने लगे तो वह विजिगीपुके यहाँसे आये हुए अन्य अमात्योंको भी एक एक करके यह कहकर परिचय करा देवे, कि यह लोग विजिगीपुळे उपके कारण यहां आये हैं और भापडी सेवाम रहने के योग्य है ॥ ४५ ॥ ते चेद्यथोक्तं कुर्युर्न चैनान्याहयेत् ॥ ४५ ॥ अशक्तिमतो वा ग्राहयेत् ॥ ४६ ।। आसमायोपगतो मुख्यादस्यात्मानं रक्ष- णीयं कथयेत् ।। ४७ ॥ अथामित्रशासनममुख्यायोपघाताय प्रे- पितमुभयवेतनो ग्राहयेत् ॥ ४८ ॥ यदि ये अमात्य, विजिगीषुकी भाज्ञानुसार सब कार्य का भात् उस शत्रुको शव भादिके द्वारा मार डाळे, तो उन्हें न पकड़वावे । अर्थात् ये रोग दोनों ओरसे घेतन लेते हैं, यह कहकर शनुके द्वारा उन्हें गिरफ्तार न करवाच ॥ ५५ ॥ यदि ये लोग शनुके मारने में अपना असामय प्रकट करें, सो इन्हें पढ़या देवे ॥ ४६॥ विजिगीषुके द्वारा निकाला हुआ यह अमाप, सामयायिक साओं के मुखियाके साथ इस प्रकार भेद बाले:-जय य: समा स्थ शत्रुका अत्यन्त विश्वस्त दोआये, तो वह शत्रुमे कई, कि आपको साम. वायिक राजाभों के मुखियोंसे अपने आपकी रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि ये
(४३८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
[९ अधिक
लोग विश्वास करनेके योग्य नहीं हैं ॥ ४७ । इसके अनन्तर, अमुग्न साम
वाविकके उपघ.तके लिये शत्रुके द्वारा भेजी हुई लिखित फूट माज्ञाको
उभयतन पुरुष ( दोनों भार से वेतन लेनवाले), रक्षक पुरुषोके द्वारा मुख्य
सामघायिकके पास पहुंचवा देखें। (किसी २ पुस्तक 'अमुल्याय' के स्थान पर
'मुख्याय' भी पाठ है) १८ ॥
उत्साहशक्तिमतो वा प्रेपयेत् ।। ४९ ।। असुप्य राज्यं गृहाण
यथास्थितो न संधिरिति ॥ ५० ॥ ततः सत्तिणः परेषु ग्राहयेयुः
॥५१॥
अधवा उत्साह तथा विक्रम शक्तिसे युक्त किसी एक सामवाथिकके
पासही उस नकली आशाको भिजवावे। ॥ १९ ॥ उस आज्ञापनका विषय
इस प्रकार होना चाहिये:-भाप उस मुरुप सामवाधिक राज्यको ले लेचें;
पहिले निश्चिय की हुई सन्धिको भर स्वीकार नहीं किया जासकता ॥ ५० ॥
इसके भनन्तर वे सत्री (गुप्त) पुरुष, भन्य सामवायिक राजाओंके पास जाकर
इस बात की सूचमा देदेखें । अर्थात् अमुक सामवायिकपर इस २ तरहका
कोई पत्र भाया है, इस बातसे रमें सूचित करदेवें ॥ ५१ ।।
एकस्य स्कन्धावारं विवधमासारं वा घातयेयुः ॥ ५२ ॥
इतरेषु मैत्री बुवाणाः ॥५३॥ तं सत्रिणः-त्वमेतेषां पातयितव्य
इत्युपजपेयुः॥ ५४॥
अधवा यह करना चाहिये, कि सनीपुरप, किसी एक सामघायिक
राजाके स्कन्धावार (छावनी अथवा पड़ाव ), उसके अपने देशसे धान्य
आदिके आगम, तथा उसके मिनावरको नष्ट करडालें ॥ ५३ ॥ भऔर अन्य
सामवायिक राजाभों में अपनी मित्रताका कथन करते रहें। जिससे कि उनके
सामने यह बात सर्वथा छिपी रहे ॥५३॥ तदनन्तर सव्रीपुरुप, उस एक
सामवायिक राजाका, अम्य सामवायिक राजाओंसे, यह कहकर भेद डालें,
कि ये सामवायिक राजा तुझे मारना चाहते हैं, ऐसी अवस्थामें इनके साथ
तेरी सन्धि कसे होसकती है ॥ ५४॥
यस्य वा प्रवीरपुरुषो हस्ती हयो वा म्रियेत गूढपुरुषहन्येत
हियेत वा तं सत्रिणः परस्परोपहतं ब्रूयुः ॥ ५५ ॥ ततः शास-
नमभिशस्तस्य प्रेपयेत् ॥ ५६ ॥ भूयः कुरु ततः पणशेषमया-
प्स्यसीति ॥ ५७ ॥ तदुभयवेतना माहयेयुः ॥ ५८ ॥
। ६ अध्या०] अभियास्यत्कर्म अथवा जिस किसी सामवायिक का कोई बहादुर आदमी, हाथी या घोसा स्वयं मर जावे, गृढ पुरुषों के द्वारा मार दिया जाये, अधचा अपहरण कर लिया जाये उसके सम्बन्धमे सत्री पुरुष, उसे एक दूसरेके द्वारा मारा हुआ घसलाचें । अर्थात् जिनके वे आदमी आदि मर गये हैं, उनको यह सम- झावं, कि तुम्हारे यह आदमी आदि अन्य सामवायिक राजाभीके द्वारा ही मारे गये है । ५५ ।। तदनन्तर जिस सामयायिक का मारने वालों में नाम लिया गया है, उसके पास एक बनावटी आज्ञापन भेजा जावे ॥५६ । उस का मजमून यह होना चाहिये:--कि फिर तुम इसी प्रकार करो, अर्थात् अन्य सामवायिकोंके बहादुर आक्ष्मी और घोड़े आदिकों को इसी प्रकार नष्ट करते रहो, इसके बाद ही तुम्हें शेष धन दिया जासकेगा ॥ ५७ ॥ उस अनावटी माशापन को, उभयतन (विजिगीषु और सामवाधिक दोनों की ओर से वेतन लेने वाले) पुरुष, गूढ पुरुषों द्वारा सामयायिक राजा तक बिजया देवें । इस प्रकार सामायिक रानामों में परस्पर भेद डालने का यल करना चाहिये ॥५८॥ भिनेष्वन्यतमं लभेत ॥ ५९ ॥ तेन सेनापतिकुमारदण्ड- चारिणो व्याख्याताः ॥ ६॥ साधिकं च भेदं प्रयुञ्जीतेति भेदकर्म ।। ६१ ॥ जब लामवापि राजा आपसमें फूट जावे, तो उनमें से एकको पकड़ कर अपने अधीन करल ॥५१॥ भेद डालने का जो उपाय सामायिक राजाओं के लिये कहा गया है, वही उपाय सेनापति युवराज तथा अन्य सेना. सम्बन्धी व्यक्तियों में भेर डालनेके लिये भी समझमा चाहिये । ६० ।। सद्ध- वृत्त अधिकरण (ग्यारहवे अधिकरण)में निरूपण किये जाने वाले, भेद डालने के उपायों का यहां भी प्रयोग किया जासकता है। यहां तक मेद सम्बन्धी कार्यों का प्रतिपादन कर दिया गया ॥६॥ तीक्ष्णमुत्साहिनं व्यसनिनं स्थितश चा गूढपुरुषाः शस्त्रा. मिरसादिभिः साधयेयुः ।। ६२ ॥ सौकर्यतो वा तेपामन्यतमः ॥६३ ॥ तीक्ष्णो खेका शस्त्ररसानिभिः साधयेत् ॥ ६४ ॥ अयं सर्वसंदोहकर्म विशिष्टं वा करोतीत्युपायचतुर्वर्गः ।। ६५ ॥ तीक्ष्ण (अत्यधिक क्रोधी अथवा असहनशील), उत्साही (बहादुर पराक्रमशालो), व्यसनी (शिकार आदि सेलने में लगा रहने वारा), तथा पुर्ग भादिसे युक्त शक्तिशाली शत्रु को, गृापुरप तर अग्नि तथा पिए आदि क्षरा मिलकर मार डालें ॥ १२ ॥ अथवा उनमें से कोई एक ही गृपुरुष (४४०) कौटलीय अर्थशास्त्र ९.आई. जो कि सुगमता से ही शत्रु का वध कर सकता हो, यह अकला ही किसी उपायस इन उपयुक्त प्रकार के शत्रुओं को मार डाले । ६३ ॥ (यह कौन एक ऐसा होसकता है, उसका ही निरूपण करते है-, क्योंकि एकही तीक्ष्ण पुरुष (एक प्रकार का गूढ पुरुष, जो कि शस्त्र आदिसे ही अपने कार्यों को सिद्ध करता है, पह) शत्र, विष भादि रस तथा अशिक द्वारा उक्त सव प्रकार के हो शत्रुओंको ठीक कर सकता है, अधात् मार सकता है ॥ ६५ ॥ इस प्रकार का यह तीक्ष्ण गूदपुरप, न केवल सय तरहके गृहपुरुपोंसे मिलकर किये जाने वाले कार्य को ही अकेला कर सकता है, प्रत्युत उनकी अपेक्षा अधिक भी कार्य कर सकता है। अर्थात् वे मिलकर भी जिस फाम को नहीं कर सकते हैं, उस कामको भी यह अकेला ही कर सकता है। यहां तक साम दान भेद और दण्ड इन चार उपायों के सम्बन्ध निरूपण कर दिया - गया ।। ६५॥ पूर्वः पूर्वश्चास्स लघिष्ठः ॥ ६६ ॥ सान्त्वमेकगुणम् ॥६७।। दानं द्विगुणं सान्त्वपूर्वम् ॥ ६८ ॥ भेदखिगुणः सान्त्वदान- पूर्वः ॥ ६९ ॥ दण्डवतुर्गुणः सान्त्वदानभेदपूर्वः ॥ ७० ॥ अग्र इनके गुरु घुभावका विचार किया जाता है। इन चारों उपायों में से पहला उपाय, अगले उपायों की अपेक्षा लघु होता है, अर्थात् इसका प्रयोग भनायास ही किया जा सकता है, क्योंकि यह थोड़े अनप पाला होता है ॥ ६६ ॥ साम एकहीं गुण वाला होता है, अर्थात् प्रयोक्ता स्वयं अपने भाप ही उसमा एक गुग (=अवश्य) होता है ॥ ६ ॥ दान दो गुण (=अवयव ) पाला होता है, क्योंकि साम अर्थात् सान्त्वना और देना, दोनों ही इसके भवयव होते हैं। ६८॥ भेद तीन गुणों वाला होता है, पहिले दो उपाय और तीसरा अपने माप, ये तीनों ही अश्यय रूपसे उसमें मिले रहते हैं। ६९ ॥ इसी प्रकार दण्ड चौगुना होता हैं, भार पहिले तीन उपाय और एक स्वयं, ये चारों ही इसके अवयव होते हैं। ७०॥ इत्यभियुखानेपृक्तम् ।। ७१ ॥खभूमिष्ठेषु तु त एवोपायाः ॥ ७२ । विशेषस्तु- ७३ ॥ स्वभूमिष्ठानामन्यतमस्य पण्यागा. रैरभिज्ञातान्दतमुख्यानभीक्ष्णं प्रेपयेत् ॥ ७४ ।। जो मित्र अथवा शत्रु, पातम्यकी ओर, मिलकर आक्रमण करने के लिए चल पड़े हों, और उमफे समीप ही कही पहाय डालकर पड़े हों, उन भाग- मणकारी सामघायिक गजाआके विषय में ही यह इसप्रकारका माम आदि उपायों j , ६ अध्या गभियास्यत्कर्म (४४) का विधान बताया गया है॥१॥और जद वह आक्रमण के लिये पल न परे हो, किन्तु अपनी २ भूमि में ही स्थित हो, तबभी इन्हीं उपायों का प्रयोग किया जावे ॥७२॥ उस अवस्थामें इनका प्रयोग करने में जो विशेष बात है उसका भय निरूपण किये देते हैं। :-।। ७३ । मिलकर भाक्रमण करनेसे पहिले, जव कि मित्र और शत्रु सा अपने २ देशोंमें स्थित रहते हैं, उनमें से किसी एकके पास अत्यधिक मणि मुस्ता आदि सामानके साथ, उन राजाओं के सम्बन्धमें अच्छी जानकारी रखने वाले दूतमुस्यों को विजिगीषु बार २ भेजे ॥ ७ ॥ त एनं संधौ परहिंसायां वा योजयेयुः ।। ७५ ॥ अप्रतिप- धमानं कृतो नः संधिरित्यावेदयेयुः ॥ ७६ ॥ तमितरेपामुभय- वेतनाः संक्रामयेयुः ॥ ७७ ।। अयं वो राजा दुष्ट इति ।।७८॥ दूतमुण्य, उस मित्र अथवा अनु छो, अपने साथ सन्धि, अथवा दूसरेके मारनेमें नियुक्त करें ॥ ७५ ॥ यदि यह सन्धि काना स्वीकार न करे, तो भी 'इसने हमारे साथ सन्धि करली है, इस प्रकार घे दूतमुख्य मिश दी प्रसिद्धि करदें॥७६ ॥ उभयवेतन पुरुष, अन्य मित्र तथा शत्रुओंके पास भी उस समाचार को पहुंचा देवें ॥ ७७ ॥ और यह कहें कि भाप लौगाम से अमुक राजा मढ़ा दुष्ट है, क्योंकि इसने भाप लोगोंसे कुछ न कहकर नुपचाप ही विजिगीपुसे सन्धि करली है ॥ ७॥ यस्य या यस्माद्भयं चैरं द्वेपो या तं तसा दयेयुः ॥७९॥ अयं ते शत्रुणा संधत्ते ॥ ८० ॥ पुरा त्वामतिसंधत्ते क्षिप्रतरं संघीयख ॥ ८॥ निग्रहे चास्य प्रयतखेति ॥ ८२ ।। जिसको जिससे शत्रुता द्वेषतथा भय हो, उसको उससे भिन्न कर देखें। अधात् गूढपुरुष, इस प्रकारके दो राजाओं में कभी सन्धि न होने दें ॥७९॥ उसको इस प्रकार करें, कि देखो, यह तुम्हारे शत्रुके माय सन्धि करता ॥ ८ ॥ फिर यह तुमको ही दराने के लिये तयार होजाएगा, इस लिये तुम बहुत गरी उस शके (अर्थात् विजिगीषुके) साथ स्वयं सन्धि करलो ॥६॥ भोर इसका निप्रह करने के लिये अर्थात् इसको अपने काम करने के लिये प्रपर करो ॥ ८२ ॥ आवाहविवाहाम्यां या कृत्वा संयोगमसंयुक्तान्भेदयेत् ॥ ८३ ।। भायाह (कन्याका स्वीकार करना) अपया विवाद (स्या का देना) फे द्वारा आपस में सम्माध परफे, सम्बन्ध रहित दूसरे राजाओं के साथ उसका (४४०" कौटलीय अर्थशास्त्र [९आई. जो कि सुगमता से ही शत्रु का वध कर सस्ता हो, यह अंकला ही किसी उपायसे इन उपर्युक्त प्रकारके शत्रुओं को मार डाले ॥ ६३ ॥ (घर कौन एक ऐसा होसकता है, उसका ही निरूपण करते है-, क्योंकि एकही तीक्ष्ण पुरुष एक प्रकार का गृढ पुरुष, जो कि शख आदिसे ही अपने कार्यो को सिद्ध करता है, वह शत्र, विप श्रादि रस तथा अग्निके द्वारा उक्त सय प्रकार के ही शग्रुओंको टीक कर सकता है, अर्थात् मार सकता है ॥ ६ ॥ इस प्रकार का यह तीक्ष्ण गृढ़पुरप, न केवल सय ताहफे गृढपुरपासे मिलकर किये जाने वाले कार्य को ही भला कर सकता है, प्रत्युत उनकी अपेक्षा अधिक भी कार्य कर सकता है। अर्थात् घे मिलकर भी जिस काम को नहीं कर सकते हैं, उस कामको भी यह अकरा ही कर सकता है। यहां तक साम दान भेद आर दण्ड इन चार उपायों के सम्बन्ध निरूपण कर दिया गया ॥६५॥ पूर्वः पूर्वश्चास्य लघिष्ठः ॥ ६६ ॥ सान्ममेकगुणम् ॥६७|| दानं द्विगुणं सान्त्वपूर्वम् ॥ ६८ ॥ भेदस्त्रिगुणः सान्त्वदान- पूर्वः ॥ ६९ ॥ दण्डवतुर्गुणः सान्त्वदानभेदपूर्वः ॥ ७० ॥ अय इनके गुरुन्धुभावका विचार किया जाता है.-इन चारों उपायों में से पहला उपाय, भगले उपायों की अपेक्षा लघु होता है, अर्थात् इसका प्रयोग अनायास ही किया जा सकता है, क्योंकि यह थोडे अवरव याला होता है ॥ ६६ ॥ साग एकही गुण वारा होता है, अर्थात् प्रयोक्ता स्वयं अपने आप ही उसका एक गुग (अवघ) होता है ॥ ६॥ दान दो गुण (अपच ) पाला होता है, क्योंकि साम अर्थात् सावना भार देना, दोनों हो इसके अवयव होते हैं ॥ ६८ ॥ भेद तीन गुणों पाला होता है, पहिले दो उपाय और तीसरा अपने ये तीनों ही अश्यय रूपसे उसमें मिले रहते ॥ ६९ ॥ इसी प्रकार दण्ड चौगु होता है, अर्थात् पहिले तीन उपाय और एक स्वय, ये चारों ही इसके अवयव होने हैं ॥ ७० ॥ इत्याभियुद्धानेपूक्तम् ।।७१ ॥ खभूमिष्टेषु तु त एवोपाया। ।। ७२ ॥ विशेपस्तु-11 ७३ ॥ वभूमिष्ठानामन्यतमस्य पण्यागा- रैभिज्ञात्तान्तमुख्यानभीक्ष्णं प्रेपयेत् ॥ ७४ ।। जो मित्र अथवा शत्रु, थातम्यकी और, मिलकर आक्रमण करने के लिए चल पडे हॉ, और उसके समीप दो कहा पहाय डालकर पडे हों, उन आक्र. मनकारी सामायिक गजाओंकेविश्या यह इसप्रकारका माम आदि उपाय आप, .] . ६अध्या अभियास्यत्कर्म (४४) का विधान यताया गया है ॥ ७॥ और जब वह नाकमण के लिये चलन पड़े हों, किन्तु अपनी २ भूमि में ही स्थित हों, तबभी इन्ही उपायों का प्रयोग किया जाये ॥ ७२ ॥ उस अवस्था में इनका प्रयोग करने में जो विशेष पात है उसका अग निरूपण किये देते हैं:- :-॥७३॥ मिलकर आक्रमण करनेसे पहिले, जब कि मित्र और शत्रु सर अपने २ देशों में स्थित रहते हैं, उनमें से किसी एकके पास अत्यधिक मणि मुक्ता आदि सामानके साथ, उन राजाओंके सम्बन्धमे अच्छी जानकारी रखने वाले दूतमुस्यों को विजिगीषु धार २ भेजे ॥ ७ ॥ त एनं संधौ परहिंसायां वा योजयेयुः ॥ ७५ ।। अप्रतिप- द्यमानं कृतो ना संधिरित्यावेदयेयुः ॥७६ ॥ तमितरेपामुभय- वेतनाः संकामयेयुः ॥ ७७ ।। अयं यो राजा दुष्ट इति ॥७८॥ दूतमुख्य, उस मित्र अथवा अनु को, अपने साथ सन्धि, अधया दूसरेफे मारने में नियुक्त करें ।। ७५ ॥ यदि यह सन्धि काना स्वीकार न करे, तो भी 'इसने हमारे साथ सन्धि करती है, इस प्रकार घे दूतगुख्य मित ही प्रसिद्धि करदें ॥ ७६ ॥ उभयवेतन पुरुष, अन्य मिन तथा शत्रुओंके पास भी उस समाचार को पहुंचा देवें ॥ ७७ ॥ और यह कहें कि भाप लोगमिसे अमुक राजा बड़ा दुष्ट है, क्योंकि इसने आप लोगोंसे कुछ न कहकर चुपचाप ही विजिगीपुसे सन्धि करली है ॥ ७८ ॥ यस्य वा यसाद्भयं वैरं द्वेपो वा तं तसा दयेयुः ॥७९॥ अयं ते शत्रुणा संधत्ते ॥८० ॥ पुरा त्यामतिसंधत्ते क्षिप्रतरं संधीयख ॥ ८१ ॥ निग्रहे चास्य प्रयतखेति ॥ ८२ ।। जिसको जिससे शत्रुता द्वेप तया भय हो, उसको उससे मिस कर दे। भात् गूदपुरप, इस प्रकारके दो राजाओं में कभी सन्धि न होने दें ॥७॥ उपको इस प्रकार करें, कि देवो, यह तुम्हारे शत्रुके राय सन्धि करता है ॥ ४० ॥ फिर यह तुमको ही दराने के लिये तयार होजाएगा, इसलिये नुम पहुत जल्दी उस अनुके (अर्थात् विजिर्गापुके) साथ स्वयं सन्धि नरको और इसका निग्रह करने के लिये भयान इसको अपने कापूमें करने के लिये प्रया करो ॥८३॥ आवाहविवाहाभ्यां या कृत्या संयोगमसंयुक्तान्भेदयेत् ॥ ८३ ॥ भायाह (कन्याका स्वीकार करना) अथवा पिवार (स्या या देना) के द्वारा भापस में सम्पन्ध कार्य, समन्ध रहित दूसरे राजाला साथ उसका [१ अधि० (४४२) कोटलीय अर्थशास्त्र भेद डाल दिया जाये। यहां तक अपनी २ भूमिमें रहने वाले राजाधों में परस्पर भेद दालने के प्रकारों का निरूपण कर दिया गया ॥ ३ ॥ सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुदैश्चपा राज्यानिर्यातयेत् ।।८।। सार्थवजाटवीर्वा, दण्डं वामिसृतं, परस्परापाश्रयायैपांजातिसङ्का- श्छिद्रेपु प्रहरेयुः ।। ८५ ॥ गूढाश्चाग्निरसशस्त्रेण ।। ८६ ॥ सामन्त (उनकी भूमिके समीप रहने वाले राजा), आटविक (जंगल के स्वामी), अथवा उनके (मिग्न या शत्रुओंक) कुलमें ही उत्पन्न हुए अवरुद्ध राजपुत्रादिके द्वारा ही विजिगीषु उनके राज्यको हानि पहुंचाने का यल करे ॥८४॥ अथवा उनके व्यापारी भारको ढोने वाले पशु, अन्य गाय भैस आदि पशु, तथा नष्पवन और हस्तिवमाको मष्ट करवा देवे, अथवा रक्षा करने पाली सेना को ही नष्ट करवा दे। (किसी पुस्तक 'साधरनाटवीपी' के स्थान पर 'सार्थबजाटवीभिर्वा' ऐसा सृतीयान्त पाठ है। इस पाठमें सार्थ, ग्रज तथा भटवी के साथ २ रक्षक सेनाको भी नष्ट काया देवे, यही अर्थ करना चाहिये) । और एक दूसरेसे पृथक किये हुए जातिसंघ (विच्छिलिक आदि नाम चाले जाप्ति समूह: इनका संघवृत्त अधिकरणमें निरूपण किया जायगा), इन मिन या शत्रुओंके प्रमादस्थाॉम बराबर प्रहार करते रहें, भर्यात जहां उनको कमजोर देखें, वहीं उनपर प्रहार करदें ॥८५॥ भार भन्य तीक्ष्ण रसद भादि गूठपुरुष, अमि, विप आदि रस तथा हथियारोंके द्वारा प्रहार करें ॥८६॥ वितसगिलवचारीन्योगैराचरितैः शठः । घातयत्परमिश्रायां विश्वासेनामिपेण च ॥ ८७॥ इस्पभियाश्यत्कर्मणि नवमे ऽधिकरणे दूष्यशासंयुक्ताः पष्ठोऽध्यायः ॥६॥ भादितः सप्तधिशशतः ॥ १२ ॥ परमिध अर्धान मिग्र और शत्रु दोनोंसे मिलकर उपस हुई भापतिमें, शठ (गृढ व्यवहार करने वाला) विजिगीपु, वितंस (पक्षियोंके विश्वास के लिये पक्षियोंके विविध चित्रोंसे युक्त, शरीरको ढकने वाला घन) और गिल (खाने का मांस के समान, प्रयुक्त किये हुए कपट उपायोंके द्वारा अपने अन्दर विश्वास उत्पन्न कराके, तथा कुछ सार वस्तु देकर अपने शत्रुओं को पशमें करे ।। ८७ ॥ अभियास्यत्कर्म नयम अधिकरणमें उठा अध्याय समाप्त ।
. ७ अध्या०] अभियास्यत्कर्म (४४३) सातवां अध्याय १४५-१४६ प्रकरण अर्थ, अमर्थ तथा संशयसम्बन्धी आपत्तियां, और उन आपत्तियोंके प्रतीकारके लिये साम आदि उपायोंके प्रयोग विशेषसे होनेवाली सिद्धियां हिरण्य भूमि आदिको 'अर्थ' कहते हैं उनके नाश तथा शरीरके नाशका नाम 'अनर्थ है, अर्थ और अनर्थ विषयक सन्देहकोही 'संशय' कहा जाता है, इनसे युक्त भापत्तियोंका, पहले प्रकरणमें निरूपण किया जायगा । और दूसरे प्रकरण में साम आदि पार्यो के कारण इन्हीं आपतियोंके प्रतीकारका निरूपण किया जायगा। कामादिरुत्सेका स्वाः प्रकृतीः कोपयति ॥१॥ अपनयो बायाः ॥२॥ तदुभयमासुरी वृत्तिः ॥ ३॥ स्वजनविकार: कोपः परवृद्धिहेतुष्पापदर्थो ऽनर्थः संशय इति ॥ ४ ॥ काम कोध भादि दोषों का अधिक होना, अपनेही मन्त्री भादि भम्य- न्तर प्रकृतिजनोंको कुपित करनेवाला होता है । अपनय अर्थात् नीति- मार्गसे भ्रष्ट होना, राष्ट्र मुख्य अन्तपाल आदि बाल प्रतियोंको कुपित कर. देता है ॥ २॥ इसलिये काम आदि दोष और सपनय इन दोनोंकोही भासुरी- गृषि कहा गया है, भात ये दोनों, असुरों के करने योग्य कार्य हूँ ॥३॥ अपनेही अमात्य आदि पुरुषोंका विकाररूप कोप, शत्रुको वृनिके, कारण उपस्थित होनेपर, भारतिका रूप धारण करलेता है । यह भापति अमरूप भनरूप और संशयरूप तीन प्रकारकी होती है॥४॥ यो ऽर्थः शत्रुद्धिमप्राप्तः करोति, प्राप्तः प्रत्यादेयः परेपां भवति, प्राप्यमाणोचा क्षयच्ययोदयो भवति, स भवत्यापदर्थः।।५।। जो भय (उपेक्षा करने के कारण) अपने हाथमे न भाया हुमा, शत्रुकी ही मृद्धिको करता है तथा जो अपने हाथमें भाजानेपर भी फिर शत्रुके द्वारा छोटाया जासकता है। और इसी प्रकार जो अर्थ प्राप्त किया जाता दुभा भरपधिक क्षय तथा व्ययको करनेवाला होता है, उसे 'भापदय' कहते हैं। अचाइ यह भरूर भापत्ति कहोगालो है ॥ ५॥ .
(४४) कौटलीय अर्थशास्त्र [१ अधिक यथा-सामन्तानामामिपभृतः, सामन्तव्यसनजो लाभः, शत्रुथितो या स्वभाषाधिगम्यों लाभः, पश्चात्कोपेन पाणिग्राहेण विगृहीतः पुरस्ताल्लाभो, मित्रोच्छेदेन संधिव्यतिक्रमेण वा मण्ड- लविरुद्धो लाभ इत्यापदर्थः ॥ ६॥ जैसे-यदुतसे सामन्तोंका भोग्यभूत पदार्थ, पदि एकही सामन्तको Pास रोजावे, तो वह अन्य सामन्तों के द्वारा मिलकर लौटाये जाने के कारण आपतिका जनक होजाता है। इसी प्रकार सामन्त की व्यसन दशामें, उससे जीना हुआ लाम; स्वभावसेही प्राप्त होने के योग्य, शत्रुके द्वारा मांगा हुआ लाभ; पश्चारकोप (मूलस्थानमें दूप्प भादिके द्वारा उठाये हुए उपव) तथा पार्णिमाह (पीछेके शत्रु। के द्वारा बाधा पहुंचाये जानेपर, पातब्य राजाले प्राप्त किया हुआ लाभ; मित्रका उच्छेदन करने तथा सन्धिको उलंघन करने कारण, रानमण्डलकी इच्छा विरुद्ध प्राप्त किया हुभा लाभ; ये सबही लाम 'आपदय' होते हैं ॥ ६॥ स्वतः परतो वा भयोत्पत्तिरित्यनर्थः ॥७॥ तयोरों न वेति, अनर्थो न वेति, अर्थोऽन इति, अनर्थोऽर्थ इति संशयः॥८॥ स्वयं या अन्य किसीसे प्राप्त हुए २ अर्धके कारण जो भयकी उत्पति होती है, इसको अनयरूप आपत्ति कहते हैं। अब अर्थ और भन विषयक संशयरूप भापतिका निरूपण करते हैं:--1. यह अर्थ है, या नहीं? (अर्थात् अर्थके भाव और भभावको लेकर संशयका होमा), २. यद अनर्थ है या नहीं? (अर्थात् भनके भाव और अमावको लेकर संशयका होना), ३. यह अर्थ है या अनर्थ है ? (अर्थात् अर्थ ओर अनर्थ विषयक संशयका होना), ४. यह अनर्थ है याअर्थ है ? (इस प्रकार अनर्थ और अर्थ विषयक संशयका होना); इस तरह अर्थ मनको लेकर यह चार प्रकारका संशय होता है, यह मी भापत्तिका मूल होने से आपत्ति कहाता है । (इनके उदाहरण क्रमशः निशलिखित रीतिपर समाने चाहिये ) ॥ शबुमित्रमुत्साहयितुमर्थो न येति संशयः ॥ ९॥ शत्रुघल- मर्थमानाम्यामावाहयितुमनर्थो न वेति संशयः ॥ १०॥ क्ल- वत्मामन्तां भूमिमादातुमर्थोऽनर्थ इति संशयः ॥ ११ ॥ ज्या- यसा सम्भूययानमनर्थोऽर्थ इति संशयः १२ ।। तेपामर्थ- संशयमुपगच्छेत् ॥ १३ ॥ ॥८ ७ अस्था] भामयास्यत्कर्म (४४५) शत्रुके मित्रको उत्साहित करनेमें, अर्थात् शत्रुके मियको शाके ही साथ लड़ाने के लिये तैयार करने में, पहिला संशय होता है । मधील ऐसा करने में अर्थ है या नहीं ? इस प्रकार का संशय होता है ॥ ९॥ शत्रुको सेना को, धन तथा सरकार द्वारा बुलानेमें दूसरा संशय होता है। अर्थात् इस प्रकारसे शत्रु सेनाको बुलाने में कोई अनर्थ तो न होजावेगा? इस तरह का संशय होता है ॥ १०॥ बलवान् सामन्तवाली भूमिको (अर्थात् जिस भूमिका सामन्त (उस भूमिके समीप का राजा] अपनेसे बलवान हो, उस भूमिको) लेनमें सासरा संशय होता है। अर्थात् ऐसा करनेमें अर्थ होगा या अमर्थ ? इस प्रकार का संशय होता है। बलवान राजाके साथ मिलकर, यातन्य (विस राजा पर आक्रमण किया जावे, उस) पर भाक्रमण करने में चौथा संशय होता है । अर्थात् ऐसा करने में समर्थ होगा या अर्थ? इस प्रकार का संशय होता है ॥ १२ ॥ इन सब संशगों से जो संशय अर्थ विश्यक हो भनके साथ जिसका स्पर्श मी न होता हो, ऐसे संशयके विषयमें विजिगीषु उद्योग करे॥१३॥ अर्थो ऽर्थानुबन्धः ॥ १४ ॥ अर्थो निरनुपन्धः ॥ १५ ॥ अर्थो ऽनानुवन्धः ॥ १६ ॥ अनर्थो ऽर्थानुषन्धः ॥ १७ ॥ अनर्थो निरनुबन्धः ।। १८ ।। अनर्थो ऽनर्थानुबन्ध इत्यनुबन्ध- पवर्गः ॥ १९॥ प्रत्येक अर्थ और अनर्थ के साथ अनुबन्धका योग करने और न करने से इसके छः भेद होजाते हैं। इसको 'भनुबन्धपश्चंग' कहते हैं। उसके भेय इस प्रकार है-भानुबन्ध अर्भ, निरनुबन्ध (अर्थ और अनर्थ के अनु. बन्धसे रहित ) अर्थ, अनानुरन्ध अर्थ, यह तीन प्रकारका अर्थ है, और भानुमन्ध अनर्थ, निरनुसन्ध (अर्थ और भनके भनुमन्यसे रहित) अनर्थ तथा अनर्थानुबन्ध भन, यह तीन प्रकारका अनर्थ है। इन दोनों को मिला कर हो 'अनुसन्धषड्वर्ग' कहा जाता है। (किसी पुस्तक में प्रत्यनुवन्ध्य- वर्ग:' के स्थानपर 'इस्यनषड्वर्गः' ऐसा पाठ है। पर यह पाठ संगत नहीं मालम होता ॥ १४ ॥ १९ ॥ शत्रुमुत्पाट्य पाणिग्राहादानमर्थो ऽर्धानुवन्धः ॥२०॥ उदासीनस्य दण्डानुग्रहः फलेन अर्थो निरनुबन्धः ॥२१॥ परस्यान्तरुच्छेदनमों नर्थानुवन्धः ।। २२ ॥
[९ मर्षिक
के
१ (४४८)
कोटलीय अर्थशास्त्र
गुणों (देखो, अधि. ९, अध्या. ४, सू..४) से युक्त भर्य के प्रांत होने की सम्मा.
वना हो तो उस अर्थको लेने के लिये अवश्य चला जावे । अर्थात् ऐसी अव-
स्थामें विजिगीषु भाक्रमण करसकता है ॥ ३६ ॥ यदि दोनों ओर लाभगुण
समानही हो, तो उनसे जो प्रधानफल अधात् प्रशस्त या श्रेष्ठफलमे युक्त
हो, अथवा अपने देश के समीप हो, या थोदेही समयमै प्राप्त होसकता हो;
अथवा जिसके प्राप्त न करनेपर अपने में कुछ न्यूनता प्रतीत हो; उस अको
लेनेके लिये चला जावे; अर्थात् इस अवस्थाम विजिगीषु यानकाही अवलम्स
करे । (किसी ३ पुस्तक, 'उनो वा येन मवेत्' के स्थानपर 'अनौपायन
भयेत्' ऐसा भी पाठ है। उसका अर्थ करना चाहिये:-जहां पर योदेही उपायस
अर्थकी प्राप्तिकी संभावना हो, वहां भी यानकाही अवलम्प फरे) ॥३०॥
इतो ऽनर्थ इतरतो ऽनर्थ इत्युभयतो ऽनर्थापत् ॥ ३८ ॥
तस्यां समन्ततो ऽनयां च मित्रेभ्यः सिद्धिं लिप्सत ॥ ३९ ।।
इधरसे अनर्थ भौर उधरसे भी अनथे, इस प्रकार जब दोनों ओरसे
अनर्थ कोही उत्पत्ति हो, तो उसे 'उभयतोऽनर्धापद्' कहा जाता है ।। ३८ ॥
उसमें (उमयतोऽनर्धापत्म) और समन्ततोऽनर्यापत्मे मित्रोंसेही सिदि लामकी
इच्छा करे । अर्थात् इन दोनों आपत्तियोंका प्रतीकार मित्रोंके द्वाराही किया
जासकता है ॥ ३९॥
मित्राभावे प्रकृतीनां लघीयस्यैकतोऽनां साधयेत् ॥ ४० ॥
उभयतोऽनाज्यायस्या, समन्ततो ऽनर्थी मूलेन प्रतिकुर्यात्
॥४१॥ अशक्ये समुत्सृज्यापगच्छेत् ॥ ४२ ॥ दृष्टा हि
जीवतः पुनरापुत्तिर्यथा सुयात्रोदयनाभ्याम् ॥ ४३ ॥
यदि मित्राकी सहायता ग प्राप्त हो सके, तो अपनी प्रकृतियों मेसे
छोटी प्रकृति के द्वारा (अर्थात् किसी छोटे राजकर्मचारीके त्यागके द्वारा; अर्थात्
उसे देकर) 'एकतोऽनापद' का प्रतीकार किया जासकता है ॥ ४० ॥ उम.
यतोऽनर्यापद्का ज्येष्ठ प्रकृति के द्वारा और समन्ततोऽनापद्का मूलस्थानको
स्यागमेकही द्वारा प्रतीकार किया जासकता है ॥४॥ यदि इतनेपर भी
इन भापत्तियों का प्रतीकार न किया जासके, तो अपना सम कुछ छोड़कर
चला जावे ॥ ४२ ॥ यदि पुरुष जीवित रहता है, अर्थात् विपत्ति के समय
फही अन्पन्न लेझाकर अपने आपको सुरक्षित रखता है, तो वह फिर भी अपने
स्थानको पासकता है। जैसा कि राजा गल (सुयाल ) और वासराज उदयनके
जीवनस मालूम होता है ॥ १३ ॥
. ७ मध्या अभियास्यत्कर्म (४४९) इतो लाभ इतरतो राज्याभिमर्श इत्युभयतो ऽर्थानापद्भ- चति ॥३॥तस्यामनर्थसाधको यो ऽर्थस्तमादातुं यायात् ।।४५।। अन्यथा हि राज्यभिमर्श वारयेत् ॥ ४६ ।। एक और से लाभ और दूसरी ओर से राज्यपर अर्थात् अपने ही जनपदपर । किसी गनु आदिके द्वारा) आक्रमण किया जाना, इसको दोनों भोर से अर्ध और अनसे युक्त होनेक कारण 'उभयतोर्यानर्धापद्' कहा जाता है ॥ ४५ ॥ इस निरुत आपत्तिम, महण किया जाता हुभा जो अर्थ, अनर्थका भी प्रतीकार कर सके, उस ही को ग्रहण करने के लिये यता करना चाहिये ॥ ५५॥ यदि वह अर्थ, अनर्थका प्रतीकार करनेमें समर्थ न हो, तो उसके लिये न जाया जावे। अर्थात् उसकी उपेक्षा करके, राज्यपर किये जाने वाले आक्रमणका ही प्रतीकार किया जावे ॥ ४६॥ एतग समन्ततो ऽर्थानापद्याख्याता॥ ४७ ॥ इतोऽनर्थ इतरतो ऽर्थसंशय इत्युभयतो ऽनर्थसंशया ॥४८॥ तस्यां पूर्व- मनर्थ साधयेत् तत्सिद्धावर्थसंशयम् ॥ ४९ ॥ एतया समन्ततो अनर्थार्थसंशया व्याख्याता ।। ५० ॥ इसके निरूपण से 'समन्तोऽर्थानापद्' का व्यापान भी समस लेना चाहिये । अर्थात् 'उभयतोऽनर्धापद' के प्रतीकार आदिके लिये जो उपाय बताये गये है, 'समन्ततोऽनिर्यापद्' में भी उनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ४५ ॥ एक और से भावश्यक अनर्थका होना, तथा दूसरी और ले अर्थ में संशय होना, यह 'उभयतोनार्धसशयापन, कहाती है ॥ve ॥ इस आपत्तिम पहिले अनर्थका ही प्रतीकार करना चाहिये, उसका प्रतीकार होजानेपर फिर अर्थ संशयका प्रतीकार करना उचित होता है ॥४९॥ इसीप्तकार 'समन्तसोनार्थसंशधापद्' का भी प्रास्थान समझ लेना चाहिये। भर्याप्त 'उभयतोऽनर्थसंशयापद्' के समान इसमें भी पहिले अनर्यका प्रतीकार परके ही फिर अशयके प्रतीकारके लिये यस करे ॥ ५० ॥ इतो ऽर्थ इतरतो ऽनर्थसंशय इत्युभयतो अर्थार्थसंशयापत् ॥५१॥ एतया समन्ततो ऽर्थानर्थसंशया व्याख्याता ॥५२॥ तस्यां पूर्वी पूर्वा प्रकृतीनामनर्थसंशयान्माक्षयितुं यतेत ॥५॥ एक और से अर्थ, और दूसरी भोर से अनर्थका संशय होनेपर 'उभयतोऽर्थानपरायापद' कही जाती है। इसके समान ही 'सम.
[९ आधि०
(४५०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
ततोऽर्थानर्थसंशयापद्' को भी समझ लेगा चाहिये ।। ५२ ॥ इनके प्रती.
कारका फ्रम यह है-पहिले सायं संशयको घटाकर फिर अर्थके लिये यस
करे । स्वामी भादि प्रकृतियों की ओरसे ही भनके होने का संशय रहता
स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड (सेना ) और मिन, इस क्रमसे
प्रकृतियों का निरूपण किया गया है, इनमें से अगलीकी अपेक्षा पहिली २
प्रकृतियों के अनर्थसंशयसे छुटनेका यन करे । तारपर्य यह है कि पूर्व पूर्वकी
अपेक्षा उसर उत्तर प्रकृति भप्रधान हैं। प्रधान प्रकृति से होनेवाले भनकी
उपेक्षा करके प्रधान प्रकृतिसे होनेवाले अनर्थका ही प्रथम प्रतीकार करना
चाहिये । ५३ ॥
थेयो हि मित्रमनर्थसंशये तिष्ठन दण्डः ॥५४ ॥ दण्डो
वा न कोश इति ॥ ५५ ॥
मित्रकी भोरसे यदि भनका संशय हो, तो वह सेनाकी भोर से
होनेवाले अनर्थ के संशयकी अपेक्षा अच्छा है; क्योंकि मित्र इतनी पीड़ा नही
पहुंचा सकता, जितनी कि पीड़ा सेना पहुंचा सकती है। इसलिये सेनाकी
औरसे होनेवाले अनसंशयका पहिले दो प्रतीकार करना चाहिये ॥ ५४ ॥
तथा सेनाका भी अनर्थसंशय, कोशमे होनेवाले अनसंशयकी अपेक्षा
अच्छा होता है। (क्योंकि कोशके ठीक रहनेपर सेनाको फिर ठीक किया
जासकता है ) । इसलिये सेनाकी ओरसे अनर्थसंशयकी अपेक्षा, कोशकी
भोरसे होनेवाले अनसंशयका प्रथम ही प्रतीकार करना चाहिये ॥ ५५ ॥
समग्रमोक्षणाभावे प्रकृतीनामवयवान्मोक्षयितुं यतेत ॥५६॥
तत्र पुरुपप्रकृतीनां च बहुलमनुरक्तं वा तीक्ष्णलुन्धवर्जम् ॥५७।।
प्रकृतियां पुरप रूप भौर द्रव्य रूप होती है। पदि समप्र प्रकृतियोंका
अनर्थ संशय एक साथ न छुड़ाया जासके, तो प्रकृतियों के कुछ अवयौंको
ही अनर्थ संशयस छुड़ाया जावे । अर्थात् घोडा २ करके ही अनर्थ संशयका
प्रतीकार कियाजावे ॥५६॥ भवपयसे अनर्थ संशयका प्रतीकार करने में,
पुरुष प्रतियोमिये तीक्ष्ण और लोभी पुरोको छोड़कर पहिले उनसे ही
भन संशयका प्रतीकार कियाजावे, जो संख्या आदिमे बहुत हों, तथा
अपने में कुछ भनुराग रखते हो। ५७ ॥
द्रव्यप्रकृतीनां सारं महोपकारं वा ॥ ५८ ॥ संधिनासनेन
द्वैधीभावेन वा लघुनि विपर्ययः गुरूणि ॥ ५९ ॥
७ अध्या०] मभियास्यत्कर्म (४५१) द्रव्य प्रकृतियों के बीच में अत्यधिक मूल्यवाले, तथा उपकार पहुंचाने वाले द्रव्योको ही अनर्थसंशयापद् से छुड़ानेका यन करें ॥ ५८ ॥ सन्धि, भासन तथा द्वैधीमावके द्वारा लघुदथ्योको छुड़ानेका घस करे, मौर विप्रह, यान तथा संश्रय रूप गुणोंके द्वारा गुरद्रव्योंके छुड़ाने का यह करे ॥ ५९ ।। क्षयस्थानवृद्धीनां चोत्तरोत्तरं लिप्सेत ॥६०॥ प्रातिलोम्येन वा क्षयादीनामायत्यां विशेपं पश्येत् ॥ ६१ ।। क्षय ( शक्ति और सिद्धि के अपचयको क्षय कहते है), स्थान ( शक्ति और सिदिका उसी अवस्थामें रहना स्थान कहाता है), और वृद्धि ( शक्ति मौर सिद्धि के उपचयका नाम वृद्धि है), इनमेसे उत्तरोत्तरको प्राप्त करनेकी इच्छा करे । अधात क्षयस स्थान और स्थान से वृद्धिको प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ ६० ॥ अथवा यदि भविप्यम किसी वृद्धिक अतिशय की सम्भावना हो, तो प्रतिलोम गतिसे भी क्षय आदिकी इच्छा को । अर्थात् वृद्धिसे स्थान और स्थानसे क्षयकी इच्छा करे। यह उसी समय है, जबकि भविष्यम अली वृद्धि होने का निश्चय हो ॥६॥ इति देशावस्थापनम् ॥ ६२ ॥ एतेन यात्रामध्यान्तेष्वर्थान- र्थसंशयानामुपसंप्राप्तिाख्याता ॥ ६३ ॥ यहांतक देशनिमित्तक आपत्तियोंका निरूपण करदिया गया ॥ १२॥ देशानिमित्तक आपत्तियों के स्वरूप और प्रतीकारके समान ही, यात्रा (भाग मण) के आदि, मध्य तथा अन्त में होनेवाले अर्थ अनर्थ तथा संशयोंकी प्राप्ति और प्रतीकारका भी चारयान समझ लेना चाहिये ॥ ६३ ।। निरन्तरयोगित्वाचार्थानर्थसंशयानां यात्रादायर्थः श्रेयानुप- संप्राप्तुं पाणिग्राहासारप्रतिघातक्षयव्ययप्रवासप्रत्यादेयमूलरक्षणेषु च भवति ॥ ६४ ॥ यदि यात्रा भादिमें, भ अनर्थ संशय इमकी एक साथ हो उत्पत्ति होजावे. तो इनमेंसे अर्थका प्रहण करना ही श्रेयस्कर होता पाणिप्राद ( पृष्ठस्थित शत्रु) और आसार ( यातव्यकी मिन्न सेना ) के प्रतिपातका साधक होने के कारण ही मर्यकी घटता समझी जाती है । क्षय ( घोड़े मादि सवारी तथा पुरुषोंका नाश), व्यय (धान्य हिरण्य आदिका नाश ), प्रवास (दूरकी याया ), प्रत्यादेय ( यातम्यसे लौटाने योग्य भूमि आदि भर्धात् पातन्यसे अपहरण कीहुई भूमिको फिर वापिस काना) और मूळस्थान ( राजधानी आदि) इन सी रक्षा करनेमें अकी सहायता भपात
[९ अधिः
।
(४५२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
भपेक्षित होती है । अर्थात् इन सबकी रक्षा करने में अर्थ ही प्रधान कारण
होता है ।। ६५ ॥
तथानर्थः संशयो वा स्वभूमिष्ठस्य विपह्यो भवति ।। ६५ ।।
एतेन यात्रामध्येऽर्थानर्थसंशयानामुपसंप्राप्तिर्व्याख्याता॥६६॥
अर्थके समान ही, अनर्थ और संशय भी यदि यात्रा आरम्भमें ही
हो, तो अपनी ही भूमिमें स्थित हुए २ विजिगीपुके लिये ये सुखसाध्य हो
होते हैं। तारपर्य यह है, कि यानासे पहिले ही हुए २ अन या संशयाँका
प्रतीकार, विजिगीषु अपनी भूमिमे स्थित होनेके कारण, यदी अच्छीतरह
कर सकता है ॥६५॥ इसी तरह यात्राके मध्य में भी अर्थ अनर्थ और
संशयकी प्राप्ति तथा प्रतीकारका व्यारवान भी समझ लेना चाहिये ॥ ६६ ॥
यात्रान्ते तु कर्शनीयमुच्छेदनीयं वा कर्शयित्वोच्छिद्य वार्थः
श्रेयानुपसंप्राप्तुं नानर्थः संशयो वा परावाधभयात् ॥ ६७ ॥
यात्रा अन्त में तो कर्शनीय (निल पनाने योग्य ) तथा उच्छेदनीय
(जसे उखाउने योग्य; उच्छिा करने योगर ) शत्रुफो, निर्मल बनाकर या
उरिष्ट का करके परभूमिमै शित हुए २ विजिगीपुके लिये, अपका ही ग्रहण करना
श्रेयस्कर होता है । अनर्थ या सशयका ग्रहण करना किसी तरह भी अच्छा
मही होसकता; क्योंकि ऐसी अवस्थामें दोपान्वेषी शत्रुको ओरसे हरसमय
बाधा पहुंचाने की सम्भावना बनी ही रहती है ॥ १७ ॥
सामवायिकानामपुरोगस्य तु यानामध्यान्तगो ऽनर्थः संशयो
घा श्रेयानपसंप्राप्तमनबन्धगामित्वाच ॥ ६८ ॥
७ अध्या अभियात्यकर्म ॥ ७१ ।। तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयान्प्रतिकर्तुम् ।। ७२ ॥ अर्थो नर्थ इति धर्मो ऽधर्म इति कामः शोक इति संशयत्रिवर्गः ॥ ७३ ।। तस्योत्तरपक्षसिद्धौ पूर्वपक्षः श्रेयानुपसंग्रामम् ॥ ७४ ॥ इति का- लावस्थापनम् ।। ७५ ।। इत्यापदः । ७६ ॥ अर्थ, धर्म और काम इनको ' अर्यत्रिवर्ग' कहा जाता है ॥१९॥ इस भनिवर्गके योचमे पूर्व पूर्वका ग्रहण करना ही श्रेयस्कर होता है; अर्थात् कामसे धर्म और धर्मसे अर्थ श्रेष्ठ समझना चाहिये ॥ ७० ॥ अनर्थ, अधर्म, और शौक, यह 'अनत्रिवर्ग' कहाता है ॥ १॥ इस अनर्थनिवर्ग के बोचमेस पूर्व पूर्वका प्रतीक्षार करना कल्याणकारी है ॥ ७२ ॥ भ अनर्थ, धर्म अधर्म और काम शोक, इन तीन जो को लेकर इनमें परस्पर संशय होना संशयग्निवर्ग' कहाता है॥७३॥ इस संशयनिमें से उतरपक्षका ( अनर्थ, अधर्म, शोकका ) प्रतीकार होने पर, पूर्वपक्षका ( अर्थ, धर्म, काम का ) महण करमा धेयकर होता है ।। ७४ ॥ यहां तक यात्राके आदि माय अन्तकालादि निमित्तक अधे अनर्थ आदि की व्यवस्थाका निरूपण कर दिया गया ॥ ७५ ॥ यहां तक अर्थ अनर्थ तथा संशययुक्त स प्रकारको आपतियों का निरूपण कर दिया गया ॥ ७६ ॥ तासां सिद्धिः-पुत्रधातयन्धुपु सामदानाभ्यां सिद्धिरनु- रूपा, पौरजानपददण्डमुख्येषु दानभेदाभ्यां सामन्ताटपिकेषु भेददण्डाभ्याम् ।। ७७॥ भर उन आपतियोंके प्रतीकारके लिये जिन उपायों की भायश्यकता होती है, इन उपायोंकी यथायथ पवस्थाका विरूपण किया जायगा. गुन भाई तथा वन्धुओंके विषय में जिस प्रतीकारका पहिले निरूपण कर दिया गया है, वह प्रतीकार साम और दानके अनुरूप होने पर ही उचित समझा जाता है। भर्षात् पुनादि अन्य आपत्तिके प्रतीकारके लिये लाम और दाम पामका प्रयोग काना है. उचित है। इसी प्रकार नगर सधा जनपद निवासी पुरषों, सेनामी और राष्ट्रमुख्य व्यक्तियों में, दाग और भइ उपायोंका ही प्रयोग करना चाहिये । तथा सामन्त और आदषिकांके विषय में भेद और दर उपा- यों का प्रयोग करना ही उचित होता है ॥ ७॥ एपानुलोमा विपर्यये प्रतिलोमा ॥७८ ॥ मित्रामित्रेषु व्यामिश्रा सिद्धिः ॥ ७९ ॥ परस्परसाधका घुपायाः ८०॥
कौटलीय अर्थशास्त्र
[९अधिः
इस नियमके अनुसार किया हुआ प्रतीकार 'अनुलोम' अर्थात भनुकूल
भंतीकार कहाता है। इसमें विपर्यय होनेपर 'प्रतिलोम' अर्थात् प्रतिकूल प्रती-
कार कहा जाता है ॥ ७० ॥ मित्र तथा शत्रुओंके विपरम मिले हुए उपायोंका
प्रयोग करके ही प्रतीकार करना चाहिये ।। ७९ ॥ क्योंकि उपाय परस्सर एक
दूसरेके सहकारी ही होते हैं । इसलिये मित्र और शत्रुओक सम्बन्ध में जहां
जैसा सचित हो, उसके अनुसार ही पृथक् २ या मिलाकर उपायका प्रयोग
करना चाहिये। ॥ ८॥
शत्रोः शाहिनामात्येपु सान्त्वं प्रयुक्तं शेपप्रयोग निवर्तयति
॥८१ ॥ दृष्यामात्येपु दानं, सङ्घातेषु भेदः, शक्तिमत्सु दण्ड
इति ॥ ८२ ॥
शत्रुके शक्ति भमास्योंमें ( अर्थात् शत्रु जिन पर क्रोध आदि दोषाक
कारण सन्देह रखता हो, और इसी लिये विजिगीषु जिनको अपनी ओर फोक
सकता हो, एसे अमात्यों में ) प्रयुक्त किया हुआ साम, अन्य उपायोंको निवृत्त
करदेता है। अर्थात् सामसे ही काम होजाने पर दूसरे उपायोंका प्रयोग करने
की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ८ ॥ इसी प्रकार शत्रुके दूप्य अमात्यो दान,
आपस में मिले हुए भमारयोंमें भेद, और शक्तिशाली अमात्योंमें दण्डका प्रयोन
किया हुआ, शेप उपााँको निवृत कादेता है। अर्यात् उपर्युक्त प्रकारके
अमात्यादिम, निर्दिए एक २ उपायका प्रयोग करनेसे ही कार्यसिद्धि हो जाती
है। उससे अतिरिक्त उपार्टीका प्रयोग करने की आवश्यक्ता नहीं रहती ॥२॥
गुरुलाघवयोगाचापदां नियोगविकल्पसमुचया भवन्ति
॥ ८३ ॥ अनेनैवोपायेन नान्येनेति नियोगः ॥ ८४ ॥ अनेन
वान्येन वेति विकल्पः ॥ ८५ ॥ अनेनान्येन चेति समुच्चयः
।
आपत्तियों के रघुगुरभावके अनुसार ही, उपायोंके नियोग विकल्प
तथा समुच्चय होते हैं ॥ ८३ ॥ 'इस ही उपायसे कार्य सिद्धि होसकती है,
भन्पस नहीं' इसका नाम 'नियोग' है॥ ५ ॥'इस उपायसे इस कार्यवी
सिद्धि होसकती है, अथवा अन्य उपायसे भी' इसका नाम विकल्प होता
है॥ ४५ ॥ "इस उपायसे और दूसरे उपायसे अर्थात दोनों उपायों से मिलकर
इस कार्यको सिद्धि होसकती है। इसको 'समुच्य' कहते हैं ॥ ८॥
७ अध्या] अभियास्यत्कर्म तेपामेकयोगाश्रवारस्त्रियोगाथ ॥ ८७ ॥ द्वियोगाः पद ।। ८८ ।। एकचतुर्योग इति पञ्चदशोपायाः ॥ ८९ ॥ तावन्तः प्रतिलोमाः ॥१०॥ साम आदि चार उपायोंका पृथक् र, दो २ मिलाकर तथा तीन २, और चारों को एक साथ मिलाकर पन्द्रह तरह प्रशंग किया जासकता है। केवल साम, केवल दान, फेवल मेद तथा केवल दण्ड, यह चार तरह का पृथक् २ प्रयोग, और चार तरहका ही तीन २ को मिलाकर प्रयोग; जैसे-सामानभेद, सामानदण्ड, साममेदवड, और दानभेददण्ड, इसतरह ये मिलकर आठ प्रकार के प्रयोग हुए ॥ ८७ ॥ दो दो को मिलाकर छः प्रकार के प्रयोग होते हैं। जैसे-सामान सालभेद, सामदण्ड, दानभेद, दानदण्ड, और भेददण्ड पहिले आठके साथ ये छः मिलाकर चौदह हुए ॥ ८८ ॥ साम दान भेद दण्ड इन चारों को मिलाकर एक प्रयोग इसप्रकार ये सब मिलाकर पन्द्रह प्रकार के प्रयोग हुए ॥ ८९ ।। पन्य कारके ही प्रतिलोम उपाय होते हैं; जैये:-दण्ड, भेद, दान, साम ये चार पृथक् २; दण्डभेदान, इण्ड दमाम, भेददानसाम, दण्डदानसाम, ये पार तीन २ उपायों को मिलार; दण्डभेद, दण्डदान, दण्डसाम, भेवदान, भेदसाम, दानसाम ये छ: दो दो को मिलाकर, तथा दण्ड आदि चारों एक सब मिलाकर पन्द्रह प्रतिलोम उपाय कहाते हैं॥ १०॥ तेषामेकेनोपायन सिद्धिरेकसिद्धिः ॥ ९ ॥ द्वाभ्यां द्विसि- द्धिः ॥ ९२ ॥ निभित्रिसिद्धिः ॥ ९३ ॥ चतुर्भिवतुःसिद्धि- रिति ।।९४ ॥ इन उपायों में से एक ही उपायक द्वारा जो सिद्धि दोजाती है, उसे 'एकसिद्धि' कहते हैं ॥ ९ ॥ दो उपायोंसे हुई २ सिादको निमिदि' ॥ ५२ ॥ तीन उपायोस हुई २ सिदिको "प्रिसिद्धि' ॥ ९३ ॥ तथा चार उपायोंसे हुई २ सिद्धिको 'चतु:सिदि कहा जाता है ॥ ९४ ॥ धर्ममूलत्याकामफलत्वाचार्थस्य धर्मार्थकामानुबन्धा यास सिद्धिः सा सर्वार्थसिद्धिः ॥ ९५ ॥ इति सिद्धिः ।। ९६ ॥ प्रतीकाररूप इन सिद्धियोंसे होनेवाले अनेछ लाभोंमें मे धर्म काम और भयंका माधक होने के कारण, अर्थका लाभ ही सबसे प्रेष्ट क्षेता है। अभी सिद्धि या लाको हो 'सार्थसिद्धि' नाममे कहा जाता है ॥ १५॥ यहातक सिद्धियाका -भधात भापतियोंके प्रतीकारपूर्वक सामाका--नि साधा ये कौटलीय अर्थशास्त्र [९ अधिक करदिया गया । यह सब मानुषी आपत्तियों को लेकर निरूपण किया गया दैवादाग्निरुदकं व्याधिः प्रमारो विद्रवो दुर्भिक्षमासुरी सृष्टि- रित्यापदः ॥९७|| तासां देवतब्राह्मणप्रणिपाततः सिद्धिः ॥१८॥ दैवी भारत्ति इसप्रकार समझनी चाहिये:-पूर्वजन्मकै सत्रिय धर्माधर्म के कारण होनेवाली; अग्नि, जल, व्याधि, महामारी, राष्ट्रविष्ठव, दुर्भिक्ष, भार आसुरी सृष्टि ( अर्थात् चूहे इत्यादि हानिकर जन्तु की अत्यधिक उत्पत्ति होजाना ), ये सब देवी आपत्तियां समझनी चाहिये ॥ २७ ॥ इन देवी आप- सियोंका प्रतीकार, देवता तथा ग्राह्मणोंको नमस्कार करनेसे ही किया जा- सकता है ।। ९८॥ अवृष्टिरतिवृष्टिी सृष्टिर्वा यासुरी भवेत् । तस्यामाथर्वणं कर्म सिद्धारम्भाव सिद्धयः ।। ९९ ।। इपभियास्यरकर्मणि नवमे ऽधिकरणे अर्थानर्थसंशययुक्तास्तासामुपायविकल्प. जाः सिदयश्च सहमो ऽध्यायः ॥७॥ आदितो धार्षिशशतः ॥ १२८॥ एतावता कौटलीयस्यार्थशास्त्रस्य अभियास्थरकम नवममधिकरणं समाप्तम् ॥९॥ अवृष्टि ( सर्वथा वर्षाका न होना), भतिवृष्टि (भावश्यकतास भास्य- धिक पृष्टिका होजागा), अथवा भासुरी सृष्टि ( चूहे आदि जन्तुओका अत्य- धिक दोजाना), इन सबके कारण जो भापत्ति उत्पन्न होवें, उनके प्रतीकारके लिये, अथर्ववेदमें प्रतिपादित शान्तिकाका अनुष्ठान किया जाये । तपा सिद्ध सपस्थी महात्मा पुरुषोंके द्वारा प्रारम्भ कियेगये अन्य शान्तिफमरको भी, इन आपत्तियों के प्रतीकार करने कारण समझना चाहिये ॥ ९९ ॥ अभियास्यत्कर्भ नवम अधिकरणमें सातयां अध्याय समाप्त अभियास्यत्कर्म नवम अधिकरण समाप्त ।
सांग्रामिक दशम
अधिकरण
पहिला अध्याय
१४७ प्रकरण
स्कन्धावारनिवेश।
युद्धभूमिके समीप ही सेनाके आवास स्थानको ' स्कन्धावार'
(छावनी ) कहते हैं। उसका निवेश अर्थात् निर्माण किसतरह
करना चाहिये, इस यातका निरूपण, इस प्रकरणमें किया
जायगा।
वास्तुकमशरते वास्तुनि नायकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्कन्धावारं
वृत्तं दीर्घ चतुरनं या भूमिवशेन वा चतुर्दारं पट्पथं नवसंस्थानं
मापयेयुः ॥ १ ॥ खातयप्रसालद्वाराहालकसंपन्नं भये स्थाने
च ॥२॥
वास्तुविया ( गृहनिर्माग आदि विद्या ) में सुचतुर मनुष्योंके द्वारा
प्रशंसा कियेहुए प्रदेशमे, नायक (सेनापति), वर्धफि (स्थपत्ति-कारीगर), मौर
मौहर्तिक (निर्माण आदिके शुभकालका निश्चय करनेवाला ज्योतिपो) मिलकर,
गोलाकार लम्बे या चौकोर, अथवा वहा जैसी भूमि हो उसके अनुसार, चार
दरवाजे वाले ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में एक एक दरवाजे
से पुक्त), छः मागाँसे युक्त ( तीन मार्ग, पूर्वसे पश्चिम हो, और तीन ही
उसरसे दक्षिणकी और हो), तया नौ स्थान (सलियेश-अधात् जिसमें
पृषत् २ नौ गुदले से हों, ऐसे ) वाले सन्धाचारका निर्माण परावें ॥१॥
खाई, नाचेकी सफील या वाग, परकोटा, एक प्रधान द्वा तथा महालिकाओं
( अटारियों से युक्त स्कन्धाशर, उसी अवस्था में तैयार कराया जाचे, जबकि
शत्रुओंकी ओरसे आक्रमण होनेके मय, तथा पहा चिरकाल तक ठहरनेकी
सम्भावना हो ॥२॥
मध्यमस्योत्तरे नवभागे राजवास्तुकं धनुःशतायाममर्धवि-
स्तारं, पथिमा तस्यान्तःपुरमन्तर्वशिकमैन्यं चान्ने निविशेत ॥३॥
कौटलीय अर्थशास्त्र [१. मधिल स्कन्धावारके मध्यभागसे उत्तरकी ओर, न िहिस्से में, सौ धनु ( देखो-अधि २, मध्या. २०) ला ता इससे आधा चौदा, राजाका निवासस्थान बमचाया जाये। उससे पश्चिमकी और उसके माधे हिस्सों में भन्तःपुर (राजाकी स्त्रियों के निवासस्थान ) का निर्माण कराया जाये। और भरतपुरकी रक्षा करनेयास सैनिक पुरषों का स्थान, भम्तःपुरके समीपमें ही नियत किया जाये। ( किसी २ पुस्तकमें इस सूत्रके 'राजयास्तुकं' पदके स्थान पर ( राजयास्तुनिवेश कारयेत् । ऐसा पाठ है । अर्थ में कोई भेद नहीं)॥३॥ पुरस्तादुपस्थानं दक्षिणतः कोशशासनकार्यकरणानि वामतो राजोपयाह्यानां हस्त्यश्वरथानां स्थानम् ।। ४ ।। अतो धनुःश. तान्तराथत्वारः शकटमेथीप्रततिस्तम्भसालपरिक्षेपाः ॥ ५॥ राजगृहके सामनेकी ओर, राजाका उपस्थानगृह पनवाया जाये, (उपस्थानगृह उसको कहते हैं, जहां पर बैठकर राजाके दर्शनार्थी पुरष रामास मिलते हैं।) राजगृहसे दाहिनी ओर कोश (खजानेकी जगह), शासन- करण (भक्षपटसआय व्यप आदिका प्रधान कार्यालय सेक्रेटरियेट), तथा कार्यकरण (कार्योंके निरीक्षण करनेका स्थान ), इन स्थानोंका निर्माण कराया जाये । और राजगृहसे बाई ओर, राजाकी सवारीमें काम भाने वाले हाथी घोदे तथा रयोंके लिये स्थान ममयाया गावे ॥ ४ ॥ राजगृहसे दूरीपर चारों और, उसकी रक्षाक लिये पार पाद लगाई जाये। इनमें से पहिली पाडू शकर अयात् गाड़ियों की होनी चाहिये, दूसरी बार, कारोंसे रुदीहुई पड़ी शाखाओकी; तीसरी मजयत लकनीके खम्भों या फटॉकी; भोर चौथी मज़वृत्त चिनीहुई परकोटेके दंगकी धाप होनी चाहिये । प्रत्येक यादका आपसमें सौ सी धनुषका फासला होघे । इस प्रकार सौ सौ भनुपके फासलेपर ये पार प्रकारकी धार, राजगृहको पारों भोर उसकी रक्षाके लिये होनी चाहिये ॥५॥ प्रथम पुरस्तात्मन्त्रिपुरोहितो, दक्षिणतः कोष्ठागारं महानसं च, यामतः कृप्यायुधागारम् ।। ६ ।। द्वितीये मौलभूतानां स्थान- मश्वरथानां सेनापतेश्च ॥७॥ तृतीये हस्तिनः श्रेण्यः प्रशास्ता च॥८॥ पहिली पार बीचमें सामनेकी भोर मस्त्रियों और पुरोहितोंके स्थान बनाये जायें । दाहिनी भोर कोटागार ( घस्तुभण्डार ) और महानस (पार पालासोईघर ) पनवाया जाये । तगा पाई भोर चुप्यागार ( लोहा । १ अध्या०] सांग्रामिक (४५९) तांपा साड़ी चमड़ा आदि रखने का स्थान ) और आयुधागार ( हथियार रखनेका स्थान ) बनाया जाये ॥ ६॥ दूसरी बाद मर्मात् धेरैके बीच मौल भृत भादि सेनाओं के स्थान; हाथी और घोड़े या सेनापतिके स्थानका निर्माण कराया जाये 10 तीसरे धेरेमें हाथी, शेणोशल तमा मशास्ता (झण्टकशोधनाध्यक्ष) आदिके स्थान बनवाये नामें ॥ ८ ॥ चतुर्थे विष्टियको मित्रामित्राटवीचलं स्वपुरुषाधिष्ठितम् ॥९॥ वणिजो रूपाजीवाभानुमहापथम् ॥ १०॥ बाह्यतो लुब्धकश्चगाणनः सतर्यामयः गूढावारक्षाः ॥ ११ ॥ चौधे धेरैमें दिष्टि (फर्मचारीवर्ग-सेवकवर्ग), नायक ( दश सेना पतियोंका एक प्रधान अधिकारी }, और अपने ही किसी पुरुषसे अधिष्ठित ( अर्थात् अपने पुरुषके हो नेतृत्वमें; सिनका अधिकारी अपना ही भादमी हो, ऐसी) मित्र सेना, शत्रु सेना तथा भाटविक सेनाके लिये स्थान बनवा जायें ॥ १ ॥ व्यापारी धनिये और वेश्याभोंके लिये बड़े बाज़ारके साथ ही स्थान बनवाये जायें ॥१०॥ यहलिये शिकारी, राजे तथा अनि भादिके इभारेसे शत्रुके आगमनको पतलामे वाले, और ग्याले भादिके पेपमें छिपे तौरपर रहने वाले रक्षक पुरुषों को सबसे धाहरको भोर रखा जाये ॥१॥ शत्रूणामापाते कूपकूटावपातकण्टकिनीश्च स्थापयेत् ॥१२॥ अष्टादशवर्गाणामारक्षविपर्यास कारयेत् ॥ १३ ॥ दिवायामं च कारयेदपसर्पज्ञानार्थम् ॥ १४ ॥ जिस मामसे शाओंके भानेकी सम्भावना हो, उस मार्ग में कुए छिपेहुए धोखेके गढ़ी (नीचे गढ़े खोदकर ऊपर घास भादिसे ढक देना) फो खोदकर भौर कांटों या लोहेकी कीलोंसे युक्त सस्तोंको ज़मीनपर विछाकर शत्रुके रोकनेका प्रवन्ध किया जावे ॥२॥ पहरे के लिये भर्थात् हरसमयकी रक्षाके लिये, अठारह वर्गाका पर्यायसे भायोगन करे । वारपर्य यह है, मौल भृत आदि छः प्रकारको सेना होती है (देखो-मधि० ९, अश्या०२, सून ), प्रत्येक सेवाके तीन २ आधिकारी होते हैं-पदिक सेनापति और मायक; इसमकार प्रत्येक सेमाके अपने २ अधिकारीकी अधीनतामें तीन ३ धर्ग होकर, हा प्रकारकी सेनाओंके अठारह वर्ग होनाते हैं हनको यदल २ का रक्षा के लिये निपुक करें। पपोंकि ऐसा करनेसे शत्रुके दारा उपशाप ।१० अधिक (४६०) कोटलीय अर्थशास्त्र किये जानेका भय नहीं रहता ॥ १३ ॥ शत्रुके गुप्तचरोंको जाननेके लिये दिनरातमें अपने भादमियों के इधर उधर घूमनेका भी नियम करे ॥ १४ ॥ विवादसौरिकासमाजातवारणं च कारयेत् ॥१५ ।। मुद्रा- रक्षणं च ॥ १६ ॥ सेनानिवृत्तमायुधीयमशासनं शून्यपालो ऽनुव- ध्नीयात् ॥ १७॥ भापसके झगड़े, शराब आदि पीने, गोष्टी करने, तथा जुभा मादि खेलनेस, सैनिकोंको सर्वथा रोग्देवे ॥१५॥ छावनीके बाहर भीतर आने जानेके लिये राजकीय मुहरका का कड़ा प्रबन्ध रक्खै । तात्पर्य यह है, कि जिनके पास खास शाही पास हो, उन्हींको बाहर भीतर आने जाने दिया जाये॥ १६ ॥ राजाकी लिखित आज्ञा लिये बिना ही युद्ध भूमिसे भागकर वापस लौटेहुए सनिक पुरोको शून्यपाल ( राजासे रहित राजधानीकी रक्षा करने वाला अधिकारी) गिरफ्तार करले। 1 (किसी पुस्त को 'शून्पपाल' के स्थान पर 'अन्तपाल' भी पाठ है ) ॥ १७ ॥ पुरस्तादध्वना सम्यक्प्रशास्ता रक्षणानि च । यायावर्धकिविष्टिम्यामुदकानि च कारयेत् ॥ १८॥ इति सांग्रामिके दशमे ऽधिकरणे स्कन्धावारनिवेशः प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ भादित एकोनविंशच्छत. ॥१२९॥ प्रशास्ता ( कण्टकशोधनाध्यक्ष ), सेना आदिके सहित राजाके प्रस्थान करनेसे पहिले ही, शिल्पी तथा कर्म कर पुरुपों या उनके अध्यक्षों के साथ चलाजाय; और मार्गकी हरतरहसे रक्षाका, तथा आवश्यक स्थानों में जल भादिका अच्छी तरह प्रबन्ध करे । ( मार्गकी रक्षाका तात्पर्य-मार्गके ऊंचे मीचे स्थनोंको घराबर कराना, काटे आदिको साफ़ कराना, तथा हानिकर. हिसक प्राणियोंको दूर भगाने भादिसे है। किसी पुस्तक में रक्षणानि ' की जगह प्राणानि' पाठ भी है। पर यह पाठ कुर संगत नहीं मालूम होता)॥१८॥ सांगामिक दशम अधिकरण में पहिला अध्याय समाप्त ।
सांग्रामिक (४६१) २ अभ्या०] दूसरा अध्याय १४८-१४९ प्रकरण स्कन्धावारप्रयाण;तथा बलव्यसन और अवस्कन्दकालसे सेना की रक्षा । इस अध्यायमें दो प्रकरण हैं, पहिले प्रकरण में स्कन्धावारका और सेना सहित राजाके प्रस्थानका निरूपण किया जायगा । और दूसरे प्रकरण में अमानित विमानित आदि सेना सम्बन्धी व्यसनासे तथा लम्बा रास्ता या घने जंगल आदिमें पलनेके कष्टोंसे अपनी सेनाको यचाने के उपायोंका निरूपण किया जायगा। ग्रामारण्यानामध्वनि निवेशान् यवसेन्धनोदकवशन परिसं- ख्याय स्थानासनगमनकालं च यानां यायात् ॥ १॥ तत्प्रती. कारद्विगुणं भक्तोपकरणं वाहयेत् ॥ २ ॥ अशक्तो चा सैन्येष्वेव प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥ अन्तरेषु वा निचिनुयात् ॥ ४ ॥ ग्राम अधात् आबादीक मागौमें ठहरनेके योग्य स्थानों का घास लकड़ी तथा जल आदिके अनुसार निर्णय करके और उन स्थानोंमें पहुंचने ठहरने तथा चलने आदिके समयका पहिलेसेही ठीक २ निर्णय करके, फिर याम्राके लिये जाया जावे । अर्थात् विजिगोपु, इन सब बातोंको, आक्रमण करनेसे पहिले निश्चय करलेवे । (नयचन्द्रिका व्याख्याकार माधवपवाने इस सूत्रके 'स्थान' 'माप्सन' भौर 'रामन' शब्द का अर्थ निम्नलिखित रीसिसे किया है:-किसी नियत स्थानपर दो तीन महीने तक ठहरना 'स्थान', पांच छः दिनतक सहरना 'भासन' और केवल एक रातके लियेही ठहरना 'गमन' कहाता है)। ॥॥ उस यानाम, जितने खाने पीने के सामान और वस्त्र आदि की आव. • श्यकता हो, उससे दुगना लेजावे ॥२॥ यदि इतना सामान सवारियापर दोका न लेजाया जासके, तो थोड़ा २ सामान सनिक पुरोको देदेवे ॥३॥ अथवा यो हरनेके लिये नियत हुए २ प्रदेशामही, इन सब सामानोंका संग्रह करवाये ॥५॥ पुरस्तान्नायकः ॥५॥ मध्ये कलत्रं स्वामी च ॥६॥ पार्श्वयोरचा वाहूत्सारः ॥७॥ चक्रान्तेषु हस्तिनः ।। ८॥ प्रसारवृद्धिी सर्वतः ॥९॥ वनाजीवः प्रसारः ॥ ११ ॥ स्वदे- ।
(४२)
कौटलीय अर्थशास्त्र [१० अधिक
शादन्वायसिविधः ॥ ११॥ मिनपलमासारः ॥ १२ ॥ कत्ल-
त्रस्थानमपसारः ॥ १३ ॥ पथान सेनापतिः पर्यायान्निविश्वेत
॥ १४ ॥
सेनाके सबसे भगले हिस्से में नामक ( रस सेनापत्तियों के प्रधाम
अधिकारी ) को पहना चाहिये ॥ ५॥ वायमे अन्तःपुर तथा राजा घले
॥६॥धर उधर घाजुभ में, भपमी गुमाओंने ही शत्रु आपातको रोकने
चाकी घुड़सवार सेना चके ॥ ७ ॥ सेनाके पिके भाग हाधी च ॥ ८ ॥
प्रसार भीत् भन्न और घास भूमा आदि बहुत अधिक सामान, सय बोरसे
ले जाया जाये॥९॥ जंगलों उत्पन्न होने सली, भाजीविका योग्य (अन्न तथा घास
भूला भादि) घस्तुओं को प्रमार' कहते हn.॥ अपने ही देशसे, भस
भादि द्रव्योंके लगातार चले मानेको, 'वीय' कहते हैं ॥ ११ ॥ मित्रकी
सेनाको 'आसार' कहा जाता है ॥ १२॥ कलम अर्थात् अन्त.पुर ( रानिणे)
के ठहरनेक स्थानको अरसार ' करते हैं ॥ १३ ॥ सबसे पिउले हिस्से
सेनापाते, पर्यायसे अर्थात् अपनी २ सेना पीछे, नियत रहे । ताप: यह है
कि प्रत्येक सेनापति अपनी सेना पछिके भाग मिलकर घले॥१४॥
पुरस्तात् अभ्यापासे मकरेण यायात्पश्वाच्छकटेन पायो-
बजेण समन्ततः सर्वतोभद्रेणैकायने सूच्या ॥ १५ ॥
यदि सामनेकी ओरसे शनु भाक्रमण करने की सम्भावना हो, तो
मकराकार (मकरफे मुखके समान आकृति रखने वाला, देखो-अधि० १०,
अध्या० ६) न्यूहकी रचना करके शत्रुकी ओर चले । यदि पीछे की ओरसे
शत्रुके माममणकी सम्भावना हो, तो शकटव्यूह बनाकर ही भागे यो । यदि
इधर उधर वाशुमोकी ओरसे शत्रु भाक्रमणकी सम्भावना हो, तो वनभ्यूम
कमाकर आगे यदे । इसी प्रकार चारों भोरपे भाक्रमणकी सम्भावना होनेपर
सर्वतोभद्र भ्यूहके द्वारा भागेको पले; यदि मागं इसमा तंग हो, कि उससे
एक समयमें एक ही एक भादमी नापसे, तो सूचीज्यूह बनाकर भागे .
की ओर चले। ( इन सब म्यूहों का निरूपण इसी अधिकरणके छठे भवायमें
देखिये) ॥१५॥
पथि द्वैधीभावे स्वभूमितो यापात् ॥ १६ ॥ अभूमिष्ठानां
हि स्वभूमिष्ठा युद्धे प्रतिलोमा भवन्ति ॥ १७॥ योजनमधमा
मध्य मध्यमा द्वियोजनमुत्तमा संभाव्या चा गतिः ॥ १८ ॥
२ सध्या-] सांग्राहीक (४६३) यदि मार्गमें किसी तरहको द्विविधा हो, अर्थात् कोई माग अपने अनुफूल या प्रतिकूल हो, तो उनमें से जो मार्ग अपने हाथी घोडे रथ और पैदल सेनाके लिये ठीक पहे, उसी मार्गसे होकर जाधे ॥ १६॥ क्योंकि युद्ध के अवसर पर, अनुकूल मार्गने न चलने वाले राजाओंके भागमणीय नहीं होते, जो कि अपने भनुकूल दो मामेसे गमन करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रतिकूल मासे चलने वाले राजा, अमुकूल मार्गसे चलने वाले रामाओं पर माफमण नहीं कर सकते ॥ १७ ॥ अथ यह बताते हैं, कि एक दिन में कितना रास्ता चलना चाहिये -प्रतिदिन एक योजन (चार कोसका एक योजन होता है) चलवा अधम गति कराती है। देद योजन चलना मध्यम गति, और दो योगन प्रतिदिध चलना, उत्तम गति कहाती है। अथवा हर एक सुभीतेके साथ, प्रतिदेिम जितना सम्भव होलके, उसमा हो आश्रयकारी संपन्नयाती पामिरासारो मध्यम उदासीनो या प्रतिकर्तव्यः ॥ १९ ॥ सङ्कटो मार्गः शोधयितव्यः ॥२०॥ कोशो दण्डो मित्रामित्राटवीबलं विष्टिभंतुळ प्रतीक्ष्याः ॥ २१ ॥ विजिगीषु जब यह सोचे, कि मैं अपनी उपति के लिए किसीको अपना माश्रय पनाऊगा, अथवा धम धाग्य आदिसे समृद्ध शधुके दलको न करूंगा, अथवा पाणिग्राह (पृष्टस्थित शनु), आसार (मित्रबल ।, मध्यम (शत्रु और विजिगीपुके देशों के बीच मे रहने वाला सामन्त ), और उदासीन राजा का शिकार करूगा, भात इनके क्रोध को शान्त करूंगा; सो धीरे २ यात्रा करे। (इम सूत्रोंका अन्वय २२वें सूपके 'इति शनायात्' इस पदे साथ कर लेना चाहिये ) १९ ॥ अथवा ऊबड़खायड ( सङ्कटमविषम) शस्तको साफ करना है, यह सोचकरभी धीरे २ जावे ॥ २०॥ भया जब कोश (धन संग्रह), ६ण्ठ (अपनी सेमा अर्थात् विरपरी हुई सेनाले मिलाना चाहे), सेना, रानु पेना, मारविक सेना, विधि (कमेका पुरुष) और अपनी सेनाके अनुकूल ऋतु की प्रतीक्षा करनी हो, तो भी धीरे ही जाधे॥२१॥ कुतदुर्गकर्मनिचयरक्षाक्षपः कीवक्लनिर्वेदो मित्रवलनिर्वेद- धागमिष्यति, उपजापितारो यानातित्वरयन्ति, समुरभिप्रायं या परमिप्यतीति शनैर्यायात् ॥ २२ ॥ विपर्यये शीघ्रम् ॥ २३ ॥ '
--
कौटलीय अर्थशास्त्र
[१० मधिल
भयवा जप यह सम्भावना हो, कि शत्रुके अपने दुगकी पहिले कीहुई
मरम्मत नष्ट होजायगी, उसके मंगृहीत धान्य आदिका भी नाश होजायगा,
तया रक्षा (रक्षा सम्बन्धी प्रयन्ध) का भी नाश हो जायगा; धन देकर
अपने परामें की हुई सेना पिता होजायगी (भर्थात् शमुसे उसकी यह सेना
विरक्त होजायगी), और मित्रकी सेना भी विरक हो जायगी, तबभी
धारे २ ही यात्रा करे । अथवा जय यह समझे कि युके उपजपिता पुरष
अभी शीघ्रता नहीं कर रहे हैं, अथवा दानु, युद्ध के पिता ही विजिगीपुके
अभिप्रायको पूरा करदगा, तयभी धीरे २ ही पाया करे ॥ २२ ॥ और इन
उपर्युक्त भवस्याओं से विपीन अवस्था होने पर शीघ्र ही यात्रा करे ॥२३॥
हस्तिस्तम्भसंक्रमसेतुबन्धनौकाठवणुमवारलायुचर्मकरण्डह-
तिप्लवगण्डिकावेणिकाभिधोदकानि तारयेत् ॥ २४ ।।
भय इस बातका निरूपण करते हैं, कि सेनाएं नदी आदिको किन
साधनों से पार कर.-हायो, स्तम्भ संझम (नदीमें खो गाड़कर और उनपर
फटे आदि रखकर ), सेतुयन्ध (पुल आदि यांधकर), गाय, लकढ़ी तथा
बांसोंके बेड़े बनाकर; तूंबी, धर्मकाण्ड (चमसे मड़ा हुमा, बांसके छिलको
से बनाया गया एक खोजका पात्रविशेष), रति (मस्ता धोक्नीक संमान
बना हुभा चमड़े का एक तैरनेका साधन ), प्लव (मोमजामै आदि कपड़ेका,
सकिये के गिलाफके समान बना हुबा, इसको फूंकसे भरकर फिर तैरनेके काम
में लाया जाता है), गण्डिका (काग नामकी लाडीके बने हुए तैरनेके विशेष
साधग), भार घेणिका (मजबूत रस्सियां), आदि साधनों के द्वारा सेनाएं
जलोको पार करें॥२४॥
तीर्थाभिग्रहे हस्त्यश्वरन्यतो रात्राचार्य सतूं गृहीयात्
॥ २५॥ अनुदके चक्रिचतुष्पदं चाचप्रमाणेन शक्त्योदकं
वाहयेत् ।। २६ ॥
नदी आदिसे पार उतरनेके घाटोंको यदि शत्रुने रोका हुआ हो, या
रोकने की सम्वना हो, तो हाथी और घोड़ों के द्वारा, पिना ही घाटके दूसरी
जगहाँस, रात्रिमें ही अपनी सेनाको पार उतार कर, विजिगीषु, सत्र (यूट
युद्ध पिल्प प्रकरणमें इसका निरूपण किया जायगा, देखो -अधि० १०,
अध्या. ३)का ग्रहण करे ॥ २५ ॥ जिस प्रदेशमें जल न हो, वहांपर, गाही
तथा बैल आदि चौपायोंके ऊपर, उतने मार्ग के लिये पर्याप्त मल, शकिके अनुसार
के माये । इस प्रकार यहांत धावारप्रयाणा गिरूपण परदिया गया ॥२६॥
२ मध्या०] सांग्रामिक दीर्घकान्तारमनुदकं यवसेन्धनोदकहीनं था कृच्छाभ्यानम- भियोगप्रस्कन्न क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तं पङ्कतोयगम्भीराणां या नदीदरीशैलानामुद्यानापयाने व्यासक्तमेकायनमार्गे शैलावपमे सङ्कटे वा बहुलीभूतं निवेशे प्रस्थिते विसंनाहं भोजनव्यासक्त- मायतगतपरिश्रान्तमयसुप्तं व्याधिमरकदुर्भिक्षपीडित व्याधितपस्य- श्वादपमभूमिष्ठं वा बलव्यसनेषु वा स्वसैन्यं रक्षेत् ॥ २७ ॥ पर- सैन्यं चाभिहन्यात् ॥ २८ ॥ विजिगीषु लम्बा रास्ता तै करने वाली तथा जंगल में होकर सफर करने वाली अपनी सेना की रक्षा करे। (इस सूत्रके अन्तिम पद स्वसैन्यं रक्षेत्' का प्रत्येक वाक्य के साथ अन्वय समझना चाहिये) मार्गमें जल प्राप्त न करने बाली सेना की भी, विजिगीषु रक्षा करे । इसी प्रकार घास भूसा (गौत: यवस) ईधन और जलसे हीन (दूसरी पार जलका प्रहण उसकी प्रधानता चोतन करने के लिये किया गया है), कठिन मार्गमें चलने वाली; चिरकालसे मुकाबला करने के कारण खिम हुई २, भूख प्यास और सफर के कारण बेचैन दुई २, भारी दलदल, गहरे जल, नदी, गुफा और पर्वताके पार करने तथा चड़ने उतरने में लगी हुई; एक हीके जाने योग्य संग मार्गमें, पथरीले पहाड़ी विषम स्थानमें या इस प्रकार पहाडी किलेमें इकही हुई २, ठहरने तथा यात्रा समयमें हथियार और कवच भादिसे रहित, भोजनमें लगी हुई, लंगा सफर करनेसे थकी हुई मांद लेती हुई; ज्वर आदि रोग, संझामक महामारी तथा दुर्भिक्षसे पीड़ित हुई २, बीमार, पैदल हाथी और घोड़ोंसे युक्त, ( अर्थात् जिस सेनाके सिपाही और हाथी घोडे बीमार होगये हों, ऐसी); अपने युद के अनुरूप भूमिमें न ठहरी हुई। अथवा युद्धकै समयमें सैनिक मापत्तियोंसे युक्त भपनी सेना की, विजिगीषु हर तरहसे रक्षा करे ॥ २०॥ तथा इन्हीं भवस्थाओं को प्राव हुई २ शत्रुकी सेना को नष्ट भ्रष्ट कर डाले, अर्थात् मार डाले॥२८॥ एकायनमार्गप्रयातस्य सेनानिश्वारग्रासाहारशय्याप्रस्तारानि- निधानध्वजायुधसंख्यानेन परवलज्ञानं, तदात्मनो गृहयेत् ।।२९।। शत्रुके साथ सन्धि या लड़ाई करने में, उसकी मेना का परिमाण जानना अत्यन्त आवश्यक होता है, इसलिये उसके परिमाणके जानने का दंग बताया जाता है। जप शत्रु, एकके दी जाने योग्य तंग रास्ते से जारहा हो, -- कौटलीय अर्थशास्त्र [१० अधिक इस समय यहाँसे निकलते हुए उसके सैनिक पुरुषों के गिननेसे; हाथी भादि की मोय सामग्री की गणना करनेसे; उनके सोने के स्थानों की गिनती से, भोजन पकानेके चूल्हों की गणना करनेसे, ध्वजा (झटिपां-पताकाएं । तथा हथियारों की गिनती करनेसे; शत्रु की सेना की इयत्ता वा (अर्थात् शत्रुकी इतनी सेना है, इस पातका) पता लगा लेना चाहिये । भार अपनी सेना की इयत्ता का पता देदेने घाल इन साधनों को छिपा देवे, भपया नष्ट कर देवे॥ २९ ॥ पार्वतं वा नदीदुर्ग सापसारप्रतिग्रहम् । स्वभूमौ पृष्ठतः कृत्वा युध्येत निविशेत च ॥ ३० ॥ इति समामि दशमे ऽधिकरण स्कन्धावारप्रयाणं, पलम्मलनायस्कन्दकाल- रक्षणं च द्वितीयो उपायः ॥ २॥ भादितधिशच्छतः ॥ १३.॥ अपसार (पराजय होनेपर मागजानकी जगहको · अपसार कहते हैं)भार प्रतिग्रह ( भाक्रमण करतीहुई शत्रुसी सेनाको गिरफ्तार करनेकी जगहका नाम 'प्रतिप्रह' है। से युक्त ( अर्थात् जिनमें अवसरपर भागने और शत्रुकी सेनाको पकडने का काफ़ी सुभीता हो, ऐसे) पार्वतदुर्ग ( पहाड़ी किले, देखो-अधि० २, अध्या. ३, सूत्र २) मोर वनदुर्गको अन्ती ताद तैयार करके, अपने लिये सर्वथा अनुकूल, भूमिमें ही ठहरकर युन्न करे; अयथा चिन्ता रहित होकर वासकरे ॥३०॥ सांग्रामिक दशम अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त तीसरा अध्याय १५०-१५२ प्रकरण कूटयुद्ध के भेद, अपनी सेना का प्रोत्साहन, तथा अपनी और पराई सेना का व्यवस्थापन । इस अध्यायमें तीन प्रकरण हैं । पहिले प्रकरणमें कपटपूर्वक कियेजाने पाले युद्धों का निरूपण किया जायगा । दूसरे प्रकरणमें प्रवटयुद्धके समय अपनी सेनाओं को मोरसाइन देने के सम्बन्धमें निरूपण किया जायगा तथा तीसरे प्रकरणमें शत्रुकी सेनाकी अपेक्षा अपनी सेनाकी विशेष व्यवस्था अर्थात् विशेष स्यूहरचना भादिके सम्बन्धमें निरूपण किया जायगा।
या ३ अध्या noj सांनामिक १४६७) चलविशिष्टः कृतोपजापः प्रतिविहितकर्तुः स्वभूम्यां प्रकाश: युद्धमुपेयात् ॥ १॥ विपर्यये कूटयुद्धम् ।।२ बहादुर धौर अधिक सेनासे युक, शत्रुपक्षमें उपजाप करने के लिये समर्थ, युद्धयोग्य समयको अपने अनुकूल बनाने वाला विजिगीषु, अपनी भूमिमें अधात् अपने अनुकूल प्रदेश में प्रकाशयुद्ध करना स्वीकार करे । हारपर्य प्रकाशयुद्ध करने के लिये, विजिगीषुको इसप्रकार शक्तिशाली होना अत्यन्त आवश्यक है ॥ ॥ यदि अवस्था इसके विपरीत हो, तो कूटयुब ही करना चाहिये ॥२॥ बलव्यसनावस्कन्दकालेषु परमभिहन्यात् ॥ ३ ॥ अभूमिष्ठं बा स्वभूमिष्ठः ॥ ४ ) प्रकृतिपग्रहो वा स्वभूमि दृष्यामित्रा- ट्वीवला भर दस्था विभूमिप्राप्त हन्यात् ॥५॥ संहतानीके हस्तिभिर्भेदयेत् ।। ६ ॥ अमानिस बिम नित आदि देखो-अधि० ६ अपा० ५, सू० १, २ सेगा सम्बन्धी प्रसनों आनेपर, या लम्बा सफर जङ्गलका सफर तथा जल भादिके न मिलने से सेनापर कट आनेकी अनस्थाम; शत्रुके उपर भाक्रमण किया जाय । अर्थात् जब शत्रुकी सेनाकी उपर्युक्त अवस्था हो, तब उस पर मा. फ्रमा किया जावे ॥३॥ अथवा शत्रुकी स्थिति युद्ध के प्रतिकूल होनेपर, और अपनी स्थिति युद्ध के अनुकूल होनेपा, विजिगीषु शभुके ऊपर आक्रमण को ॥ ॥ अथवा शत्रुको अमात्य भादि प्रकृतिको उपआपके द्वारा अपने वश में फरनेवासा विजिगीषु, युरके अनुकूल प्रदेशमे स्थित हुए २ मी शनुपर धामण का वेचे । अथवा अपनी दुष्यसेना, शत्रुसेना और प्रारपिक सेनाके द्वारा पराजय देकर, अनुफूल भूमि समझकर ( वस्तुतः प्रतिकूल भूमि में ही) अपने विजयके विश्वास से भायेहुए शनुको, मारडाले ॥ ५ ॥ अपनी अनुकूल भूमि में, मिलकर ठहरी हुई शत्रु सेनाको दायियों के द्वारा छिन्न मिल करदेवे ॥६॥ पूर्व भङ्गादानेमानुप्रलीनं भिन्नाभिन्न प्रतिनिहत्य हत्या ॥७॥ पुरस्तादभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पृष्ठतो हस्त्यश्वेनाभि- हन्यात् ॥८॥ पृथ्वोऽभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पुरस्ता- सारखलेनामिहन्यात् ॥ ९॥ पहिले पाजयके कारण जिन्न भिा हुई २ शभुकी सेनाको, स्वयं इट्टी हुई २ (अभिभम् ) विजिगीयुकी सेमा लौटकर फिर मारे ॥ ७ ॥ सामने [१. अधिः (४६८) कोरलीय अर्थशास्त्र की भोरसे भाक्रमण करने के कारण छिप भिम हुई २, भया विमुख हुई २ मात्रकी सेनाको, पोलेकी भोरसे हाथी और घोदोके द्वारा नष्ट करे ॥ ८ ॥ तथा पीछेकी ओरसे आक्रमण करनेके कारण छिस मिल हुई २, या उझरी भागी हुई शत्रुकी सेना को, सामनेकी ओरसे यहादुर सेना द्वारा नष्ट करे ॥५॥ ताभ्यां पार्थाभिघाती व्याख्याता ॥ १०॥ यतो बा दूप्य- फल्गुक्ल ततो ऽभिहन्यात् ॥ ११ ॥ आगेकी और और पोरकी ओरसे किये जाने वाले भाक्रमणों के अनुः सार ही, इधर उधर बाजुऑकी धोरसे किये जानेयाले आक्रमणोंका भी व्याग्यान समझ लेना चाहिये ॥10॥ अथवा जिस भोर नुकी दृप्य या नियंल सना हो, उसी ओरसे शत्रुपर धापा मारे ॥1॥ पुरस्ताद्विपमायां पृष्ठतो ऽभिहन्यातू ।। १२ ।। पृष्ठतो विप- मायां पुरस्तादभिहन्यात् ॥ १३ ॥ पाश्वतो विपमायामितरतो. ऽभिहन्यात् ।। १४ ॥ यदि सामनेकी ओरसे आक्रमण करना अपने अनुकूल न परे, ती पोछकी ओर से ही भाक्रमण को ॥ १२॥ इसीप्रकार पीछेकी ओरसे आक. मण की अनुकूलता न होनेपर, सामनेसे ही आक्रमण करे ॥ १३ ॥ इधर उधर पार्श्वभागास आप्रमणकी अनुकूलता न होनेपर, दूसरी ओरसे भाक्रमण करे । (इन सब सूत्रोम आक्रमणकी अनुकूलता गृधिची के आधारपर ही बताई गई है। अर्थात जिस और भूमि उपाखावर हो, उस भोरसे आक्रमण न करे, कि उसके दूसरी ओरसे आक्रमण करे, जिससे कि उनुकी सेना, उलटी भागकर उस विपम भूमिमें फस जाये, और फिर उसको सरलतासे ही नष्ट किया जासके ॥ १४॥ दृष्यामित्राटवीपलैर्वा पूर्व योधयित्वा श्रान्तमश्रान्तः परम- भिहन्यात् ॥ १५ ॥ दूष्यवलेन वा स्वयं भङ्गं दत्त्वा जितमिति विश्वस्तमविश्वस्तः सत्रापाश्रयो ऽभिहन्यात् ॥ १६ ॥ अथवा पहिले अपनी दूप्यसेना, शत्रुसेना तथा भाविक सेनाके साथ शत्रुका मुकाबला कराके उसे खूब अच्ची सरह थकाकर, फिर भपने आप न थका हुभाही विजिगीपु स्वयं, शत्रुपर भाक्रमण करे ॥ १५ ॥ भथया पहिले दूप्यकल के साथ छाकर रपयं ही उसको पराजय देवर अर्थात् अपने दूग्यपलके पराजित होजाने पर }, अथ शत्रुको इस पासका विश्वास होजाय, कि मैंने
३ अभ्या-
सांग्रामिक
विनिशीपुको जीत लिया है। सब स्वयं उसका विश्वास न करता हुभा सत्रका
आश्रय लेकर
'सन' का निरूपण इसी अध्यायके २५वे सूत्रमें किया
जायगा) शत्रुपर आक्रमण करदेवे ॥ १६॥
सार्थवजस्कन्धावारसंवाहविलोपप्रमत्तमप्रमत्तो ऽभिहन्यात
॥ १७ ॥ फल्गुबलावच्छन्नः सारवलो वा परवीराननुप्रविश्य
हन्यात् ॥ १८ ॥ गोग्रहणेन थापदवधेन वा परवीरानाकृष्ण
सत्रच्छन्नो ऽभिहन्यात् ॥ १९ ॥
व्यापारी समूह, गौओंके समूह तथा छावनियोंकी रक्षा करने में
और इनके लुटने की अवस्था भी प्रमादी बने हुए पात्रुको, प्रमाद रहित
विजिगीषु नष्ट कर देवे । तात्पर्य यह है, कि जद शत्रु प्रमादी बना हुआ हो,
उस समय प्रमादहीन विजिगीषु उसपर आक्रमण कर देवे ॥ १७॥ भयका
बाहर की ओर अपनी निर्बल सेनाको लगाकर और बीचमें बहादुर सेनाको
तस्पकर विजिगीपु, शत्रुके वीर सैनिकोंमें धुपकर उन्हें नष्ट कर देखें ॥ १८ ॥
अथवा शत्रुके देशमै गाय आदि पशुओका अपहरण करने और व्या वराह
भादि जाली पशुश्रीका शिकार करनेसे, शत्रुके वीर पुरुषोंको अपनी ओर
खुलाकर अर्थात् उसका प्रतीकार करने के लिए उद्यत होकर अपनी और खिचे
पुरुपाको, सत्रमें विपकर मार डाले। इसतरह धोखसे उन्हें अपनी ओर लाकर
मष्ट कर ढाले ॥ १९ ॥
रानावयस्कन्देन जागरयित्वाऽनिद्राक्लान्तानवसुप्तावा दिवा
हन्यात् ॥ २०॥ सपादचर्मकोशै; हस्तिभिः सौप्तिकं दद्यात्
॥ २१ ॥ अहःसनाहपरिश्रान्तानपराह्ने अभिहन्यात् ।। २२॥
रात्रिमें इधर उधर लूटमार गा मारधाड़ करके, उन्हें भयके कारण
जगाकर, रातमें निद्रा न मानेसे बेचैन हुए २, इसीलिए शत्रुके सोये हुए वीर
पुरुषोंको दिन में मार डाले। तात्पर्य यह है, कि रातमें कुछ न कुछ उपद्रव
करके इम्ह सोमेन देवे, और जब वे दिनमें सौवं, तो भवसर पाकर उन्हें
नष्ट कर डाले ॥ २० ॥ चमड़ेका खोल पैरोंपर लगे हुए (अर्थात् जिनके पैरों
पर चमका खोल लगा दिया गया हो, ऐसे) हाधियों के द्वारा, सोते हुए
पुरुषोंपर आक्रमण कर दिया जाये ॥२१॥ दिनमें दोपहरसे पहिले कवायद आदि
करके कारण भी तरह के हुए पुरुषोंका, दोपहर बाद वध करघाने ॥२२॥
[१० अधिक . (४७२) कोटलीय अर्थशास्त्र जलसे भरा हुआ, मन्नोंसे संस्कृत किया हुआ, तथा दम (दाम-एक प्रकार की घास) से टका हुआ, नया शकीरा (शावमी का बना हुमा, कटोरेके भाकारफा एक पात्र) उस पुरपको प्राप्त नहीं होता, तया यह नरकमें पड़ता है, जो अपने मालिक के लिये युद्ध नहीं करता । अर्थात् उस सत्वों की रक्षाके लिये अपने जीवन को नहीं लगा देता ॥३६॥ इस प्रकार मन्त्री भार पुरोहितों के द्वारा अपने योद्धा पुरपाको उत्साहित कराये ॥ ३५ ॥ व्यूहसंपदा कार्तान्तिकादिवास्य वर्गः सर्वत्रदेवसंयोगख्या- पनाभ्यां स्वपक्षादर्पयेत् ॥ ३८ ॥ परपक्षं चोद्वैजयेत् ।। ३९ ।। इस विजिगीषु राजाके ज्योतिषी और शकुन शास्त्रो पुरप, पृथक् २ न्यूहों की विशेष रचनाके द्वारा अपनी सर्वशताकी प्रसिद्धि करने, सया देवक साक्षात्कार होनेकी र याति करके, आने पक्षको रखूब हर्पयुक्त बनावें । अर्थात् उनको अच्छीतरह उत्साहित करें ॥ ३८॥ तथा शत्रुके पक्षको खूब घेचैन करें ॥ ३९ ॥ श्वो युद्धमिति कृतोपवास: शस्त्रवाहनं चाधिशयीत ॥४०॥ अथर्वभिश्व जुहुयात् ॥४१॥ विजययुक्ताः स्वर्गीयाथाशिपो वाचयेत् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मणेभ्यश्चात्मानमतिसृजेत् ।। ४३॥ 'कलको युद्ध है। ऐसा निश्चय होनेपर, पहिले दिन उपवास करता हुभा अपने हथियार और हाथी घोड़े आदि सवारियोंके समीपही रात्रिमें शयम करे ॥ ५० ॥ तथा अथर्ववेदमें बतलाये हुए मन्त्रोंके द्वारा, शनुमोका विस करने के लिये यज्ञ करे ॥ ४५ ॥ शत्रुके हार जानेपर, अपने विजयके अनुकूल, तथा अपने ही भादमियोंके मारे जानेपर स्वर्गसम्बन्धी आशीर्वादीको माहाके द्वारा पढवावे ॥ ५२ ॥ अपनी रक्षाके लिये अपने आपको प्राणों के ही भर्पण करदेव ॥ ५३॥ शौर्यशिल्पाभिजनानुरागयुक्तमर्थमानाभ्यामविसंवादितमनी- कगर्भ कुर्वीत ॥ ४४ ।। पितृपुत्रधारकाणामायुधीयानामध्वज मुण्डानीकं राजस्थानम् ॥ ४५ ।। यहादुर, कारीगर, खानदानी, तथा मुख्यत रखनेवाली, और धन तमा सरकार भादिसे सदा अनुकूल पनाई हुई सेनाको, भानी बड़ी सेनामें, अपनी रक्षाके लिये नियुक्त करे ॥ १४ ॥ राजाके पिता, पुग्न तथा भाई भादि भन्तरंग सम्बन्धियोंके, राजाकी कक्षाके लिये हथियार उठानेवाले (भधार राजाके भगरक्षकबादीगॉर्ड), भौर राजाके सम्बन्धको पतलानेवाले वेषको न । ३ अध्या०] सांनामिक (४७३) धारण करनेवाली प्रधान सेनाके निवासस्थानको राजाके समीपही रक्खे । अर्थात् जहां राजा ठहरा हो, यहींपर इनको भी ठहरावे ॥४५॥ हस्ती स्थो वा राजवाहनमवानुवन्धे ॥ ४६॥ यत्प्राय: सैन्यो यत्र या विनीतः स्यात्तदधिरोहयेत् ॥४७॥ राजव्यञ्जनो व्यूहानुष्ठानमायोज्यः ॥४८॥ हाथी तथा रथ, राजाकी सवारी समझी जाये । अर्थात् राजा, हाथी पर या रथ पर सवार होकर चले, और उसकी रक्षाके लिये उपके साथ अश्वारोही पुरुष होवें ॥ १६ ॥ अथवा माय. जिन सवारियों पर सेना होवे, या राजाको जिस सवारी पर चढ़ने का भरडा अभ्यास होवे, उसी सवारी पर राजा चढे ॥ ४७ ॥ पूर्णतया राजाके वेपमें, किसी पुरुषको ब्यूह रचनाका अधिष्ठाता नियुक्त किया जावे । तात्पर्य यह है, कि राजाके समान स्पष्ट रूपमै सेनाकी देख रेख करने के लिये, पूरे तौरपर राजाकही घेपमें रहने वाले किसी भादमीको रखा जावे; जिससे कि शत्रुपक्षके पुरप राजाको प्रकट रूप में पहचान न स ॥४८॥ सूतमागधाः शूराणां वर्गमस्वर्ग भीरूणां जातिसंघकुलकर्म- वृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः ॥४९॥ सूत और मागध ( सूत-पुराने इतिहासको जानने वाले, मागध-स्तु- तिपाठक ) पुरुष, शूरवीर सिपाहियों के स्वर्ग, डरपोकोंके नरक, तथा अन्य योद्धाओंके जाति ( याह्मण भादि ), संघ ( उनके अपने देशकी सामूहिक एकता), कुल, कर्म (कार्य जीविका भादि), तथा उनके शीलस्वभाव अथवा व्यवहार भादिकी स्तुतिका अच्छी तरह वर्णन करें । अर्थात् उनके उत्साहके लिये उनके सामने इन बातोंका भलीभान्ति वर्णन करें ॥ ४५ ॥ पुरोहितपुरुषाः कृत्याभिचारं श्रूयुः ॥५० ।। सत्तिकवकि- मौहूर्तिकाः स्वकर्मसिद्धिमसिद्धिं परेपाम् ।। ५१ ।। तथा पुरोहित पुरुष, शत्रुओंके नष्ट करने वाली कृप्या देवताके धारा भभिचार यज्ञोंका अनुदान करें। तारपर्य यह है, कि जो शत्रुभोंके नाश करने के लिये अथर्य मन्त्रों का प्रयोग किया जाता है, उसकी को . कृत्याभिचार' कहसे हैं। पुरोहित, अपने राजाकी विजय के लिये इसका अनुष्ठान करे ॥५०॥ सत्री (एक प्रकारका गुप्तचा ), बढई, तथा युद्धके प्रारम्म मुहूर्त आदिक निश्चय करने वाला ज्योतिषी, ये सदा अपने कार्योंकी पिद्धि और शत्रुके कार्यों की असिदिकोही बतलायें ॥५॥ - [१० अधिक , (४७४) कौटलीय अर्थशास्त्र सेनापतिर्थमानाम्यामभिसंस्कृतमनीकमामाषेत ॥ ५२ ॥ शतसाहस्रो राजवधः ॥५३॥ पश्चाशत्साहस्रः सेनापविकुमार- वधः ॥५४॥ दशसाहस्रः प्रवीरमुख्यवयः ॥ ५५ ॥ पञ्चसाह- स्रो हस्तिरथवधः ॥५६॥ साहस्रो ऽश्वधः ॥ ५७॥ शत्यः पत्तिमुख्यवधः ॥५८ ॥ शिरो विंशतिकम् ॥५९ ॥ भोगद्वैगुण्यं स्वयंग्राहवेति ॥ ६० ॥ तदेयां दशवर्गाधिपतयो विद्युः ॥६१ ॥ सेनापत्ति, धन और सरकार आदिसे पूना कीहुई-बढ़ाई हुई सेनाको इसपकार को:-॥ ५२ ॥ आप लोगों से जो सैनिक, शत्रु राजाको मार मालेगा, उसे एक लाख सुवर्ण मुद्राकी प्राप्ति होगी; अर्थात् शत्रु राजाके मारने पालेको इतना इनाम दिया जायेगा ॥ ५३ ।। इसीप्रकार, आप लोगों से जो सैनिक, शत्रु के सेनापनि, या राजकुमारको मार डालेगा, उसे पचास हज़ार सुवर्णमुद्रा इनाम दिया जायगा |॥ ५५ ॥ तथा . इसी प्रकार शभुके महादुर भादमियोंमेंसे मुख्य व्यक्तिक मारने पालेको दस हज़ार ॥ ५५ ॥ हाथी और रयोंके नष्ट करने वाले को पांच हज़ार; ॥ ५६ ॥ घुर सवारों (या मुख्य घो) के नष्ट करने पालेको एक हज़ार; ॥ ५७ ॥ पैदल सेनाके मुख्य व्यक्तियों को नष्ट करने वाले को एक सौ ॥ ५८ ॥ अथा साधारण सिपाहीका सिर काटकर लाने पालेको वीस सुवर्णमुदा इनाममें दिये जायेंगे ॥ ५९॥ और युद्धमें इसप्रकार हिस्सा लेने वाले सिपाहियोंका भत्ता और वेतन दुगना कर दिया जायेगा। तथा शत्रुके यहां लूटमें सिपाहियोको जो कुछ माळ मिलेगा, यह सब उनका ही समझा जायगा, भर्यात् उस माल पर उनकाही अधिकार होगा ॥६॥ इस उपर्युक्त राजवध मादिके समाचारको. केवल दशवगाधिपति (पदिक, सेनापति सपा नायक; देखो:-धि० १०, अध्या० ६, सूत्र ४६-४८) ही जान॥६॥ चिकित्सकाः शस्त्रयन्त्रागदनेहवस्रहस्ताः नियथानपानर- क्षिण्यः पुरुषाणामुद्धर्पणीयाः पृष्ठतस्तिष्ठेयुः ।। ६२ ।। चिकित्मक ( चिकित्सा करने वाले शल्यशास्त्र के ज्ञाता वैद्य) तथा शम (मण आदि को काटनेके भौजार ) यन्त्र ( चीमटी भादि, जिनका मुंह भागे की भोर से मुसा हुभा हो, ऐमे चिकित्सा में काम आने वाले श्रीज़ार), भगद (औषधि ), ह (घी तेल भादि-घाव भादि के लिये उपयुक्त भौषध मिधित धी तेल भादिका ही यहां ग्रहण करना चाहिये), और वस्त्रों (पट्टी भादि अधिने पलों ) को हाथ में लिये हुए अन्य पुरुष ( चिकित्सक के कार्य में ३ अध्या०] सांग्रामिक (४७५) सहायता देने वाले ), और साने पीने आदि की सामग्री की रक्षा करने वाली स्त्रियां, जो कि सैनिक पुरुषोंको खूब प्रसन्न रखने वाली हो, इन सबको युद्ध भूमि में, सेनाके पिछले हिस्से में रखा जाये ॥ १२ ॥ अदक्षिणामुखं पृष्ठतः सूर्यमनुलोमयातमनीकं स्वभूमौ व्यूहेत ।। ६३ ॥ परभूमिव्यूहे चाश्वांश्चारयेयुः ।। ६४ ॥ विजिगीपुको, अपनी सेनाको युद्धके ममन, दक्षिण की ओर मुंह न करके ( दक्षिण की ओर मुंह करके खड़ा होना भमांगलिक समझा जाता है, इसलिये उस ओर को मुंह न कर और किसी और को ही मुंह करके), जय कि सूर्य पीछे की ओर रहे (अर्थात् सेना को खड़ा करने में इस बात का पूरा ध्यान रखे, कि सूर्य सेना के सा मे न पाने पाधे ) और जैसे वायु अनु. कूल हो ( अर्थात् सेना के सामने की ओरसे हया न चल रही हो) इस प्रकार म्यूहरचना का खड़ा करना चाहिये ।। ६३ ॥ यदि युद्ध भूमि शत्रुके अनुकूल हो, भौर वही पर विजिगीषु को ब्यूहरचना करनी पड़े तो शनुका विधात कर. ने के लिये इस भूमि में अपने घोड़ों को फिरावे ॥ ६४ ॥ यत्र स्थान प्रजवश्वाभूमिव्यूहस्य तत्र स्थितः प्रजवितश्चोभ- यथा जीयेत ॥ ६५ ॥ विपर्यये जयति उभयथा स्थाने प्रजये जिप्स प्रदेश में ठहरने अर्थात् चिरकाल तक रहकर कार्य करमे या बहुत जल्दी ही कार्य करनेका मौका न हो, ऐसे स्थानमें ठहरता हुआ था जल्दी ही कार्य करता हुआ विजिगीषु दोनों भवस्थाओंमें अवश्यही शत्रुके द्वारा मारा जाता है ॥६५॥ इससे विपरीत अवस्था होने पर भयात् दोनों तरह के भवसरके योग्य भूमि होने पर, ठहरने पर भी और जल्दी काम करने पर भी दोनों ही अवस्थाभोंमें विजिगीषु भपने शत्रु को अवश्य जीत लेता है ॥६॥ समा पिमा व्यामिश्रा या भूमिरिति पुरस्तात्पार्धाभ्यां पवान ज्ञेया ।। ६७ ॥ समायां दण्डमण्डलव्यूहाः ॥ ६८॥ वि- पमायां भोगसंहतन्यूहाः ॥६९॥ व्यामिश्रायां विपमन्यूहाः ॥७०॥ म्यूहरचना की भनुकूलता भूमिके आधार पर ही हो सकती है। इस लिपे भव भूमिके विभाग यताते है।-भूमि तीन प्रकार की होती है।-सम, विपम, और म्यामि । इनमें से प्रत्येक फिर साम । मेद हैं:-भागे शेना, इधर उधर होना भान पार्श्वभागों में होमा, तथा पाछ की ओर होना, (कमांत कौटलीय अर्थशास्त्र [१० आधि० सम भूमि आगे हो, पीछे हो, या इधर उधर हो, इन तीन अवस्थाओं में ही हो सकती है, इसी तरह दूमी विपः धादि को भी समझ लेना चाहिधे ॥ ७॥ तीनों प्रकार की सम भूमिमै दण्टम्यूह ( दण्डाकार सेना की स्थापना) और मण्डलम्यूह ( मण्डलाकार गोलाकार सेना की स्थापना ) की रचना की जाये ॥ ६८ ॥ इसीप्रकार तीनों तरह की विषम भूमिमें मोगप्यूह और संहत. न्यूहों की रचना की जावे। ( न्यूहों की रचना का प्रकार इसी अधिकरगके पांचवें अध्यायमें देखें)॥ ६९ ॥ और तीनों प्रकार की व्यामिश्र भूमिमें विषम. व्यूहों की रचना कीजावं ॥ ७० ॥ विशिष्टवलं भक्त्वा संधिं याचेत ॥७१ ॥ समवलेन या- चितः संदधीत ।। ७२ ॥ हीनमनुहन्यात् ।। ७३ ।। न त्वेव स्व- भूमिप्राप्तं त्यक्तात्मानं वा ।। ७४ ।। विजिगीषुको चहिये, कि अपनेसे अधिक शक्तिशाली शत्रुकी सेनाको पहिले अच्छी तरह नष्ट करके, फिर उससे सन्धिको स्वयही प्रार्थना करे ॥७॥ यदि शत्रु, समान शक्तिवाला ही होवे, तो उससे प्रारमा किये जाने परही सन्धि करे ।। ७२ ॥ अपनसे होनशक्ति शत्रुको तो सर्वथा नष्ट कर डाले, जिस. से कि वह फिर मुकारलेके लिये कदापि न उठ सके ॥ ७३ ॥ परन्तु इनिशक्ति शत्रुको भी, यदि वह मनुयूल स्थान (भूमि) में पहुंचा हुआ हो, या अपने जीवन से निराश हो चुका हो, तो न मारे । ( क्योंकि इन भवस्थाओं होनशक्ति भी विजिगीषुकी अधिकसे अधिक हानिको कर गुजरता है) ॥ ७॥ पुनरावर्तमानस्य निराशस्य च जीवितै । अंधार्यो जायते वेगस्तसाग्नं न पीडयेत् ॥ ७५ ॥ इति सामामिक दशमे ऽधिकरण कूटयुद्धपिकहरः स्वसेन्योत्साहनं स्वयलान्य- परण्यायोगध तृतोपो ऽध्यायः ॥ ३ ॥ भादित एकनिशच्छते ॥ १३ ॥ जीयनसे निराश होने के कारण, फिर लौटे हुए हीनपल शधुका भी युचवंग धारण नहीं किया जा सकता, इसलिए भान हुए २ अर्थात् पहिलेसे शक्तिहान बनाए हुए शत्रुको, फिर पीड़ा पहुंचाकर कुपित न करे ॥ ७५ ।। ग्रामिक दशम अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त । 41
सांग्रामिक
(४७)
४ अध्या
चौथा अध्याय
१५३, १५४ प्रकरण
युद्धयोग्य भूमि; और पदाति, अश्व, स्थ
तथा हाथी आदिके कार्य ।
इस अध्यायमें दो प्रकरण हैं, पहिले प्रकरणमें युद्ध के योग्य
भूमियोंका निरूपण किया जायगा। और दूसरे प्रकरणमे पैदल
सेना, तथा घोड़े रथ और हाथीपर सवार होकर युद्ध करनेवाली
सेना कायाका निरूपण किया जायगा।
स्वभूमिः पत्यश्वरथद्विपानामिष्टा युद्धे निवेशे च ॥ १ ॥
पेंदल, घुडसवार, रथसवार, तथा हाथीसपार सेनाओंके युद्ध के समय
और उनकी भवस्थिसिके समयमे अनुकूल भूमिका होना अत्यन्त अपेक्षित
है। तात्पर्य यह है, कि सबतरह की सेनाओं के युद्ध और टहरनेके लिये,
अपने अनुकूल भूमिका ही अवलम्बन लेना चाहिये ।।
धान्य नवननिम्नस्थलयोधिनां खनकाकाशदिवारात्रियोधिनां
च पुरुषाणां नादेयपार्वतानूपसारसानां च हस्तिनामश्वानां च
यथास्वमिष्टा युद्धभूमयः कालाथ ॥ २॥
धान्वन दुर्गमें युद्ध करनेवाले, वनदुर्गमें युद्ध करनेवाले, जल तथा
स्थलमै युद्ध करने वाले, खाई खोदकर उनमें बैठकर युद्ध करने वाले, आकाश
मे युद्ध करनेवाले, दिन तथा रातमें युद्ध करनेवाले, ( अर्थात् उपर्युक्त भाठ
प्रकारके, पैरल सेनामें काम करनेवाले पुरषोंके ), और नदी पहाट जलमय.
प्रदेश तथा बड़े २ तालाबोंके सहारे युद्ध करनेवाले हाथियों और घोड़ोंके;
उनके अपने अनुकूल हो युद्धयोग्य प्रदेश तथा ऋतु आदि समय अपेक्षित
समा स्थिराभिकाशा निरुत्खातिन्यचक्रखुरानक्षग्राहिण्यवृक्ष-
गुल्मप्रततिस्तम्भकेदारश्वभवल्मीकसिकताभङ्गभङ्गुरा दरणहीना
च रथभूमिः ॥३॥
रके योग्य भूमियोंका भय निरूपण करते है --यरायर (अर्थात् जो
उंची मीचीन हो ], नीचेसे मजबूत (=स्थिराजो नीचेसे पोलीसी न हो
),
साफ (तिम भाविस सहित ), साई बधे अदिस रहित, जिसमें रथ
होते हैं ॥२॥
रथ के (४७८) कौटलीय अर्थशास्त्र १० अधिक पहिये सथा घोड़ोंके सुम भादि न गढ़ते हो, धुरैको न पकड़नेवाली; पेड़, गुल्म ( धनी बेलोसे टको हुई जगह, ) लता, डूंग, क्यारियां, गढ़े, बमई, रेत, कीचड़ तथा तिरछेपन भादिसे रहित; और दरड़ोंसे रहित भूमि ही रयोंके चलनेके योग्य समझनी चाहिये । मीत् रयसवार सेना के लिए ऐसी ही भूमि योग्य होती है ॥३॥ हस्त्यश्वयोर्मनुष्याणां च समे विपमे हिता युद्ध निवेशे च ॥४॥ अण्वश्मवृक्षा हस्वलङ्घनीयश्वभ्रा मन्ददरणदोपा चाश्व- भूमिः ॥ ५॥ उपयुक्त भूमि ही, हाथी घोहे ओर मनुष्यों के भी अनुकूल, सम विषम देशमें और युद्ध तथा ठहरने के समय में समझने चाहिये । अर्थात् इन उपयुक्त भवस्थाओम, जो भूमि रथ लिपे उपयुक बताई गई है, यही भूमि हाथी घोरे और मनुष्यों लिये भी उपयुस समझनी चाहिये ॥ ४ ॥ घोडे आदिके लिये विशेष भूमि, निम्नलिखित रीतिसे समझनी चाहियः-छोटे २ कंकद तथा वृक्षासे युक्त, छेटे लांघने योग्य गोंसे युक्त, तथा कहीं २ छोटी २ दरमों वाली भूमि को घोड़ों के लिये विशेष उपयुक्त समझना चाहिये ॥५॥ स्थूलस्थावश्मवृक्षप्रततिवल्मीकगुल्मा पदातिभूमिः ॥६॥ गम्यशैलनिम्नविपमा मर्दनीयवृक्षा छेदनीयप्रततिः पङ्कभंगुर- दरगहीना च हस्तिभूमिः ॥७॥ मोटे २ ढूंठ, परथर या कंकड़, वृक्ष, लता (पेल), यमई, तथा गुल्म भादिसे युक्त भूमि, पैदल सैनिकों के लिये अधिक उपयुक्त होती है ॥६॥ हाथियोंके जासकने योग्य पहाड तथा ऊंचे नीचे भागोंसे युक्त, हाधियों के रगड़ने ( अर्थात् खुजली करने ) के योग्य वृक्षासे युक्त, काटने योग्य लताओं पाली, कीचड़ गढ़े तथा दराडोंसे रहित भूमि, हाधियों के लिये भधिक उपयुक्त समझनी चाहिये ॥७॥ अकण्टकिन्यवहुविपमा प्रत्यासारवतीति पदातीनामतिशयः ॥ ८ ॥ द्विगुणप्रत्यासारा कर्दमोदकखजनहीना निःशर्करेति वाजिनामतिशयः ॥ ९॥ कांटोंसे रहित, तथा जो बहुत ऊंची नीची नहो, और जिसमें अवसर भाने पर लौटने के लिये अच्छा सुमीता हो, वह भूमि पैरठ सेगके लिये भयुत्तम होती है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार जिस भूमिमें भाग बने की अपेक्षा .
४ अध्या०] सांग्रामिक (४७२) पीछे लौटने के लिये दुगना सुभीसा होता है, और जो कीचड़, जल, दलदल तथा कंकड़ीली महीसे रहित होती है, वह भूमि घोड़ोंके लिये अतिशय लाम. प्रद होती है ॥ ९॥ पांसुकर्दमोदकनलशराधानवती श्वदंष्ट्राहीना महावृक्षगा- खाघातवियुक्तति हस्तिनामतिशयः ॥१०॥ तोयाशयाश्रयवती निरुत्सातिनी केदारहीना व्यावर्तनसमर्थति रथानामतिशयः ॥ ११ ॥ उक्ता सर्वेषां भूमिः ॥ १२ ॥ धूल, कीचड़, जल, (कीघदसे मिला हुभा जल ही यहां 'उपक' शब्द से अभिप्रेत है ), नसल, मूंज और इन दोनों की (नड़सल और मूंज की ) जर, इन सब पस्तुसि युक्त; गोखुरुओंसे रहित, तथा बडे २ वृक्षों की शाखा भों की टकरसे रहित (अर्थात् हाथी पर चढ़ कर जिस भूमि में पड़े वृक्षोंके टहनोंसे टकर न ला सके, ऐसी ) भूगि हाथियों के अत्यन्त उपयोगी होती है ॥ १० ॥ स्नान आदिके योग्य जलाशोरी तथा विश्राम करने के योग्य स्थानीसे युक्त, उखड़े हुए स्थानोंसे रहित, क्यारियोंसे रहित, अवसर पाने पर लौटने के योग्य स्थानोंसे युक्त ( अर्थात् जिसमें लौटने के लिए पर्याप्त स्थान मिलसके, ऐसी ) भूमि, रयोंके लिये अधिक उपयोगी होती है । ॥ यहांतक सब प्रकार की भूमियोंके सम्बन्ध निरूपण करदिया गया ॥ २ ॥ एतया सर्ववलनिवेशा युद्धानि च व्याख्यातानि भवन्ति ॥१३॥ इसप्रकार भूमिके व्याख्यानके अनुसार ही सब सेनाओंके निवेश अर्थात् ठहरनेके साथ सम्बन्ध रखने वाले सव कार्यों और युद्धसम्बन्धी कार्योंका भीग्याख्यान समझ लेना चाहिये । सापर्य यह है कि भूमिकेसमान, सेनानियेश और युद्ध कार्योंका विचार करना भी भरयन्त मायश्यक है ॥ १३॥ भूमिवासवननिचयो विषमतायतीर्थयातरश्मिग्रहणं चीबधा. सारयोर्घातो रक्षा वा विशुद्धिस्थापना च बलस्प प्रसारवृद्धिर्या- हूत्सारः पूर्वप्रहारो व्यावेशनं व्यावधनमाश्वासो ग्रहणं मोक्षणं मार्गानुसारविनिमयः कोशकुमाराभिहरणं जघनकोव्यभिधातो हीनानुसारणमनुयानं समाजकर्मेत्यश्वकर्माणि ॥ १४ ॥ भप इसके आगे पैदल, घोरे रथ तथा हाथियोंकी सेनाके कायाँका तिरूपण किया जायगा:-ससे प्रथम घोके कार्योका निरूपण करते हैं:- (४८०) कौटलीय अर्थशास्त्र [१० अधि० भूमि, वासस्थान, तथा बनका संशोधन घोड़ों के द्वारा किया जाना चाहिये, ( दस भूमिसे, छिपेहुए शत्रुके बलको हटाना भूमिविचय' या भूमिका संशोधन कहाता है, इसीप्रकार सेनाके निवासस्शनों में से उपदवका दूर करना 'चास- विचय' और जंगली रास्तों में से चोरों आदिका हटाना 'बनविचय' कहाता है); विषम ( जहागर शत्रु आक्रमण न करसके ), साय (जहांपर जलके भरेलुएं तालाव आदि हो ), तीर्थ ( नदी आदि उतरनेका जहांसे भरठा सुभीता हो), वात ( जहांपर वायु अच्छीतरह भाजाम), और रश्मि (जहां सूर्यके प्रकाश पहुंचनेमें किसी प्रकारकी बाधा न हो ) आदिके लिये उपयुक्त स्थानों को पहिलेसे ही अपने काबूमें करलेना, शत्रुके वीवध ( उसके अपने देशसे लगातार जीविका योग्य द्रव्योंका आना ) और आसार (शत्रुके मित्रकी सेनाका भाना) का नाश तथा अपने वीवध और आसारकी रक्षा करन'; ठिपका विष्टहुई शत्रुसेनाकी सफाई करना तथा अपनी सेनाके गड़बड़ होजानेपर उसकी ठीक २ स्थापना करना; प्रसार (जंगलों में होनेवाले धान्य तथा घास भादिको प्रसार कहते हैं) की वृद्धि करना; बाहुओंके समान घोदोंके द्वारा की सेनाको हटाना; शत्रुको सेनापर पहिले ही प्रहार करना; शत्रुकी सेनामें घुसकर उसे विचलित करदेना; शत्रु सेनाको तरह २ की तक- लीफ पहुंचाना; अपनी सेनाको आश्वासन (तसल्ली) देगा; शत्रुकी सेनाको पकड़ना; शत्रुसे पकड़ेहुए अपने योदाऑको छुड़ाना; अपनी सेनाके मार्गपर शत्रुओं की सेनाके चले जानेपर स्वयं शत्रुकी सेनाफे मार्गका अनुसरण करना; शत्रुके कोश भार राजकुमारका अपहरण करना; पीछे तथा सामनेकी भोर आपात अर्थात् भाक्रमण काना; घोड़े गरेहुए सैनिकोंका ( अर्थात् जिनके घोड़े मरगये हैं, ऐसे सीमकोका) पीछा करना; भागीहुई शत्रुसेनाका पीछा करना तथा विखरी हुई अपनी सेनाको इक्ट्ठी करना इत्यादि ये सब ही कार्य 'भश्वकर्म' अर्थात् घोड़ोंके करनेके काम कहे जाते हैं। इन कार्योंको घोड़ोंके द्वारा कराने ही सुगमता रहती है ॥१४॥ पुरोयानमकृतमार्गवासतीर्थकर्म बाहूत्सारस्तोयतरणावतरणे स्थानगमनावतरणं विपमसंबाधः प्रवेशोऽग्निदानशमनमेकाझविजयः भिनमंधानमभिन्नभेदनं व्यसने त्राणमभिधातो विभीपिका त्रासनमौदार्य ग्रहणं मोक्षणं सालद्वाराट्टालकभञ्जनं कोशवाहन- मिति हस्तिकर्माणि ॥ १५ ॥ अप हाथाकै कार्योका निरूपण किया जाता है:-अपनी भेनाके आगे चलमा, पहिले न बनेहुए मार्ग, घामस्थान तथा तीर्थ (घाट) आदिका ..
४ मध्या.]
सांप्रानिक
(१५
बनाना,भुजाओंके समान, शत्रुकी सेनाको अपनी सेनाके पास खड़े होकर
घटाना; नदी आदिके जल में उसके नापनेक लिगे सरमा या भीतर प्रवेश
करना; शत्रु सेनाके आक्रमण करनेपर पंक्ति यांधकर खड़े होजाना (स्थान)
इसीमकार मार्ग में चलना; तथा ऊंचे स्थानसे इसीतरह गोचकी ओर उतरना;
घने जंगल तथा शत्रुसेनाको भीडमें घुस जाना; धुके पडायमें भाग लगाना,
तथा अपने पड़ावमै रगीहुई आगको युझाना; सेना के एक अभूत हाथी
द्वारा ही शत्रुपर विजय लाभ करमा; विखरीहुई सेनाको हकही करना; शत्रुकी
इक्ट्ठी हुई २ सेनाको छिन्नभिन्न करना; आपत्तिके समयों रक्षा करमा,
शशुकी सेनाका कुचलना; वेबल दिखानेसे ही उसे डराना; मद आदिकी
अवस्था द्वारा उन्हें विचलित करदेना, सेनाका महत्व दिखलाना; शत्रुके
योद्धाओको पकड़ना; धुके पडेहुए अपमे योद्धाओंको छुदाना; शमुके
परकोटे, प्रधान द्वार तथा उपरकी भारी आदिको गिराना; शत्रुके खजाने
तथा सवारी आदिको भगा जाना, ये सब 'इस्तिक' अर्थात् हाथी के
करने योग्य काम कहाते है ॥ १५॥
स्वयलरक्षा चतुरङ्गबलप्रतिपेधः संग्रामे ग्रहणं मोक्षणं भिन्न
संधानमभिन्नभेदनं त्रासनमौदार्य भीमघोषश्चेति रथकर्माणि ॥१६॥
*प इसके आगे रथके कार्यों का निरूपण किया जायगा:-अपनी
सेनाको रक्षा करना; संग्राम के समय शत्रुकी सेनाका रोकना; शत्रुके योद्धा.
ओंको पकाना; शत्रुस पकड़े हुए अपने योद्धाओंको छुड़ाना; बिखरी हुई
अपनी सेनाको इकट्ठी करना, इकट्ठी हुई २ शत्रुको सेनाको विभिन्न फरना;
भय आदि दिखाकर शत्रुकी सेनाको वितरित करना, अपनी सेनाका
भौदार्य अर्थात् महत्व दिखलाना; और भयङ्कर घोप भयात् ध्वनि (आवाज)
फा करना; ये सब स्थकर्म भधार रध करने योग्य कार्य कहे जाते हैं ॥१६॥
सर्वदेशकालशस्त्रवहनं व्यायामश्चेति पदातिकर्माणि ॥१७॥
भव पैदल सेनाका निरूपण करते हैं:-सवही सम विषम भादि
स्थानों और वर्षा शरद् आदि मतु मे शस्त्रोका धारण करना तथा नियम
पूर्वक कयायद आदि कामा भौर गयसर आनेपर युद्ध करना, ये सब पह
सेना करने योग्य कार्य (पमासिकर्म) कहा है ..॥
शिविरमार्गसेतुकूपतीर्थशोधनकर्मयन्त्रायुधायरणोपकरणग्रा-
सवहनमायोधनॉच प्रहरणावरणप्रतिविद्धापनयनमिति विष्टि-
फर्माणि ॥१८॥
i१० अधि०
युद्ध करने
(४८४)
कौटलीय अर्थशास्त्र
पश्चारलि धनुः ॥ ६ ॥ तस्मिन्धन्विनं स्थापयेत् ॥७॥
विधनुष्यश्चं, पञ्चधनुपि रथं हस्तिनं या ॥ ८ ॥ पञ्चधनुरनीक-
संधिः पक्षकक्षीरस्यानाम् ॥ ९ ॥
पांच भरतिका (हायका ) एक धनुप् होता है। (यहाँपर पांच भर.
सिका एक भनुप पताया गया है। परन्तु अधि. २, मध्या. २० में [देश-काल
मान' प्रकरण में ] चार भाविकाही एक धनुए बताया गया है । उस अपा
यके १९३ सूयके साथ इसकी तुलना करें)॥ ६ ॥ धनुप माणसे
पाले पोधाओंको इतने फासलेसे (भर्यात् पाच हायके पासलेसे) सता. करे
॥ ७ ॥ तीन धनुप ( अर्थात् पन्द्रह हाथ ) के फासलो घोड़ोंको, और पांच
धनु ( अधात् पचीस हाथ ) के फासलेसे रथ भार हाधियोंको खाकरे
॥ ॥ पक्ष कक्ष तथा उसको पांचों सेनाओंका आपसका मामला पाच
धनुपू ( अर्थात् पचीस २ हाथ होना चाहिये । अर्थात् एक फौज दूसरी
फौजसे पचीस हायके फासलेपर खड़ी कीज ये ॥ ९ ॥
अश्वस्य त्रयः पुरुपाः प्रतियोद्धारः ॥ १० ॥ पञ्चदश
रथस्य हस्तिनो वा पञ्च चाश्चाः ॥ ११ ॥ तावन्तः पादगोपा
वाजिरथद्विपानां विधेयाः ॥१२॥
घुरसवार सिपाही के आगे २ रहकर उसकी सहायतार्थ युद्ध करनेके
हिये तीन पुरुष नियुक्त किये जावें ॥ १०॥ इसी प्रकार हाथी और रयके
भागे पन्द्रह २ भादमी, अथवा पांच २ घुडसचार सिपाही खहे किये जावें
॥11॥ घोडे रथ तथा हाधियोंके उतनेही ( अर्थात् पांच ) पादगोप (-पाद.
रक्षक अर्थात् उनकी सेवा या टाल टकोरी करने पाले सेवक जनसाईस
भादि) नियुक्त किये जायें। इसमकार एक २ रपके भागे पांच घोडे, और
एक २ घोदेक भागे सीन २ आद्मी मिलाकर कुल पन्द्रह मादमी भागे
चाने वाले, भीर पांच सेवक, इसी तरह हाथोके साथ भी समझने
पाहिये । (माधवयग्नाने अपनी पचन्द्रिका व्याख्या में लिखा है, कि
से एक घोरेके आगे धरने वाले तीन भादमी होसे, इसीतरह उसके
सेवक भी सीनही आदमी होने चाहिये) ॥ १२ ॥
श्रीणि त्रिकाण्यनीकं स्थानामुरस्यं स्थापयेत् ॥१३॥
तापकक्षं पक्षं चोभयतः ॥ १४ ॥ पञ्चचत्वारिंशत् एवं रथा
रथव्यूहे भवन्ति ॥ १५॥
५ अध्या०]
सांग्रामिक
(३८५)
उरस्य स्थानमें अर्थात् म्यूहरचनाके मध्यस्थानमें इसप्रकारके नौ
रथों (तीन विक३४३-९) की स्थापना करे । तात्पर्य यह है कि तीन २
रथोंकी एक २ पंक्ति बनाकर तीन पंक्तियों में गौ रथों को खड़ा करे ॥१३॥
इसीप्रकार कक्ष और पक्ष स्थानों में दोनों भोर नौ २ रथोंको खड़ा करे ॥१॥
इस तरह एक म्यूह में पैंतालीस रथ होजाते हैं । (९ उरस्य:५८ कक्ष और
१८ पक्ष-४५)॥ १५ ॥
द्वे शते पञ्चविंशतिश्चाश्वाः ।। १६ ॥ पद्शतानि पञ्चसप्त-
तिश्च पुरुषाः प्रतियोद्धारः ।। १७ ॥ तावन्तः पादगोपा वाजिर-
थद्विपानाम् ॥ १८॥
प्रत्येक रथके भागे पांच घोड़े होने के कारण, पैंतालीस रथों के भागे
दो सौ पच्चीस (२२५ ) घोई होने चाहिये ॥ १६ ॥ और प्रत्येक रथके भागे
पन्द्रह भादमी होने के कारण, पैतालीस रोंके आगे छः सौ पिचहत्तर (६७५)
एक दूसरेकी सहायतार्थ युद्ध करने के लिये होने चाहिये ॥ १७॥ घोरे रथ
और दाथियोंके इतनेही पादगोप होने चाहिये। भर्षात् घोडोंके आगे चलने
वाले जितने पुरुष हो, उतनेही उनके पादगोप; और रथ तथा हाधियों के
आगे चलने वाले जितने घोरे और आरमी हों, उसनेही उनके पादगोप होते
-
एप समव्यूहः ॥ १९ ॥ तस्य द्विरथो वृद्धि। एकविंशति-
रथात् ॥२०॥ इत्येवमोजा दश समव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ।।२१।।
इस तरहके म्यूहको 'समव्यूह' कहते हैं । ( पयोंकि यह यरायर २
के तीन २ ग्रिकोसे तैयार किया जाता है ॥ १९॥ इसी प्यूमम दी २ रयाको
वृन्दि, इक्कीस रथ पर्यन्त भौर की जासकती है। (तात्पर्य यह है, कि पहिला
एक म्यूह तीन निकोसे तैयार होता है, इसीमें यदि दो रयोंकी वृद्धि कादी
जाय, तो पांच रोंके पांच पचासे यह म्यूद तैयार किया जायगा; अपात्
दोनों कक्ष दोनों पक्ष और एक उरस्यमें पांच २ रयों की पांच पतियां लगाई
जायेंगी; इसप्रकार कक्ष आदि पांचों स्थानों में एकसी पचीस रय होनायेंगे,
उन्हीं के अनुसार घोड़े और मनुष्योंकी तादाद समझ लेनी चाहिये । इसी तरह
इसमें दो रथ और बढ़ाकर प्रत्येक स्थान में सात २ रयों की सात र परि लगा.
कर म्यूह रचना कीजादेगी। इसी प्रकार दो २ रप बढ़ाकर इकीस रथ पर्यन्त
प्यूहोंकी कल्पना करलेनी चाहिये ) ॥ २० ॥ इसमका भयुग्म रूपमें तीन
रयोंसे लगाकर इकोस रथ पर्यन्त, दस ताहकी मम व्यूह रचना कहाती है।
मात् दस ताटके समयूहके ये दस भेद हैं ॥२॥
- (४८४) कौटलीय अर्थशास्त्र १० अधिक पश्चारति धनुः ॥ ६ ॥ तम्मिन्धन्विनं स्थापयेत् ॥७॥ विधनुष्यश्वं, पञ्चधनुपि रथं हस्तिनं वा ॥ ८ ॥ पश्चधनुरनीक- संधिः पक्षकक्षारस्यानाम् ॥९॥ पांच भरनिका (हायका) एक धनुए होता है। (यहाँपर पांच भर- निका एक धनुष पतापा गया है। परन्तु अधि, २, मध्या. २० में [देश-काल मान ' प्रकरणमें ] चार भरविकाही एक धनुप् बताया गया है। उस अध्या यके १९३ सूत्रके साथ इसकी तुलना करें)॥ ६ ॥ धनुप-माणसे युद्ध करने धाले योधाभाको हतने फासलेसे ( भयोस् पांच हायके फासलेसे) खडा करे ॥ ७॥ सीन धनुष (मर्थात् पन्द्रह हाथ ) के फासलेसं घोदीको; और पांच धनु ( अर्थात् पचीस हाथ ) के फासलेसे रथ भौर हाधियोंको खड़ा करे ॥ ॥ पक्ष कक्ष तथा उत्स्यकी पांचों सेनानीका आपसका मामला पांच अनुप ( अर्थात् पचीस २ हाथ होना चाहिये । अर्थात् एक पीज दुसरी फौजसे पचीस हायके फासले पर राजी कीज वे ॥९॥ अश्वस बयः पुरुषाः प्रतियोद्धारः ॥ १० ॥ पञ्चदश रथस्य हस्तिनो वा पञ्च चावाः ॥ ११ ॥ तावन्तः पादगोपा वाजिरथद्विपानां विधेयाः ।। १२ ।। घुसपार सिपाही के आगे २ रहकर उसकी सहापतार्य युद्ध करनेके लिये तीन पुरुष नियुक्त किये जावें ॥१. इसी प्रकार हाथी और रयके भागे पन्द्रह २ भादमी; अथवा पांच २ घुसवार सिपाही खड़े किये जायें ॥१॥ घोड़े रय तथा हाथियों के उतनेही (अर्थात् पांच) पादगोप (-पाद. रक्षक भर्थात् उनकी सेवा या हल टकोरी करने वाले सेवक जन-साईस भादि) नियुक्त किये जायें। इसप्रकार एक २ रथके भागे पांच घोडे, और एक २ घोड़ेक भागे तीन २ आद्मी मिलाकर कुल पन्द्रह आदमी भागे चाने वाले, और पांर सेवक, इसी तरह हाधीके साथ भी समझने चाहि । ( माधवपग्याने अपनी मयचन्द्रिका ग्याल्यामें लिखा है, कि जैसे एक घोड़े भागे चलने याले तीन भादमी होते हैं, इसीतरह उसके । सेवक भी सीनही आदमी होने चाहियें)॥ १२॥ श्रीणि त्रिकाण्यनीकं स्थानामुरस्यं स्थापयेत् ॥ १३ ॥ तावरकक्षं पक्षं चोभयतः ॥ १४ ॥ पञ्चचत्वारिंशत् एवं रथा रथन्यूहे भवन्ति ॥ १५ ॥ १
५ अध्या०]
सांग्रामिक
(४८५)
उरस्प स्थानमें अर्थात् म्यूहरचनाके मध्यस्थानमें इसप्रकारके नौ
रयों (तीन त्रिक-३४३-९) की स्थापना करे । तात्पर्य यह है कि तीन र
रयोंकी एक २ पंक्ति बनाकर तीन पंक्तियों में नौ रथों को खड़ा करे ॥१३॥
हमीप्रकार कक्ष और पक्ष स्थानामें दोनों भोर नौ २ रथोंको खड़ा करे ॥१४॥
इस तरह एक व्यूह में पैंतालीस रथ होजाते हैं। (९ उरस्य-16 कक्ष और
१८ पक्ष-५५)॥ १५ ॥
वे शते पञ्चविंशतिचाश्वाः ॥ १६ ॥ पट्शतानि पञ्चसप्त-
तिच पुरुपाः प्रतियोद्धारः ॥ १७ ॥ तावन्तः पादगोपा वाजिर-
थद्विपानाम् ॥ १८ ॥
प्रत्येक स्थके आगे पांच घोड़े होने के कारण, पैंतालीस रथोंके भागे
दो सौ पचीस (२२५) घोपे होने चाहिये ॥ १६॥ और प्रत्येक रथके आगे
पन्द्रह मादमी होने के कारण, पैंतालीस रथोंके आगे छ: सौ पिचहत्तर (६७५)
पुरुष, एक दूसरेकी सहायता युद्ध करने के लिये होने चाहिये ।। १७॥ घोके रथ
और हाथियोंके इतनेही पादगोप होने चाहिये । अर्थात् घोडोंके भागे चलने
पाले जितने पुरुष हों, उतनेही उनके पादगोप; और रथ तथा हाधियों के
आगे चलने वाले जितने घोई और आदमी हो, उतनेही उनके पादगोप होते
।
.
हैं॥१८॥
एप समव्यूहः ॥ १९ ॥ तस्य द्विरथो वृद्धि। एकविंशति-
रथात् ।। २०॥ इत्येवमोजा दश समव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ॥२१॥
इस तरह के न्यूहको ‘सगव्यूह' कहते हैं। क्योंकि यह बराबर २
के तीन २ निकोसे तैयार किया जाता है ॥ १९ ॥ इसी म्यूम्म दो २ रयाको
वृद्धि, इसकीस रथ पर्यन्त भौर कोजासकती है। (तारपर्य यह है, कि पहिला
एक व्यूह तीन निकोसे तैयार होता है, इसी में यदि दो रथोंकी वृद्धि कादी
जाय, तो पांच रभोंके पांच पचर्कोसे यह प्यूर तैयार किया जायगा; अर्थात्
दोनों कक्ष दोनों पक्ष और एक उपमें पांच २ रयों की पांच पंक्तियां लगाई
जायेंगी; इसप्रकार कक्ष भादि पांचों स्थानोंमें एकसौ पच्चीस रथ होजावेंगे,
उन्होंके अनुसार घोड़े और मनुष्योंकी तादाद समझ लेनी चाहिये । इसी तरह
इसमें दो रथ भौर यदाकर मस्येक स्थानमें सात २ रथोंकी सारा २ पंक्ति लगा.
कर म्यूह रचना कीजादेगी। इसी प्रकार दो २ रप बहाकर इक्कीस रथ पर्यन्त
प्यूहोंकी कल्पना करलेनी चाहिये ) ॥ २० ॥ इसरकार भयुग्म रूपमें तीन
रयोंसे लगाकर इहीस रथ पर्यन्त, इस ताहको सम म्यूह रचना कहाती ।
भधार इस तरह समग्यूह के पे दस भेद है ॥ २॥
[१० अधिक
निक,
-
(१४८६)
कौटलीय अर्थशास्त्र
पक्षकक्षोरस्यानामतो विषमसंख्याने विपमव्यूहः ॥ २२ ॥
तस्यापि द्विरथोत्तरा पृद्धिरा एकविंशतिस्थात् ॥ २३ ॥ इत्येव-
मोजा दश विषमव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ॥ २४ ॥
पक्ष कक्ष भौर उरस्य स्थानामि रथाकी परस्सर पिपम संख्या होनेपर
ये ही न्यूद 'विपम ' कहाते हैं । (तारपर्य यह है कि जब उरस्यमें तीन २
और पक्ष या कक्षमें पांच २ पश्यक हों अथवा उरस्यमें सात २ सप्तक
और पक्ष कक्ष में पांच २ पञ्चक ही बा; अथवा उरस्यमै पाँच ३ पक
और पक्ष कक्ष में सात २ सप्तक हो; इसमकार जब इनकी संख्या विषमता
हो, तो ये 'विषमम्यूह' कहे जाते हैं ) ॥ २२ ॥ इनमें भी तीन मे आगे
दौ २ की यदि करके इकोस तक, भयुग्म रूपसेही दश विषमभ्यूहॉकी
रखना कीजाती है। अर्थात् विषमयूहके भी इसतरह दश भेद हैं ॥ २३-२४ ॥
अतः सैन्यानां व्यूहशेपमावापः कार्यः ।। २५ ।। रथानां
द्वौ त्रिभागावङ्गे धावापयेत् ।। २६ ॥ शेपमुरवं स्थापयेत् ॥२७॥
एवं त्रिमागोनो रथानामावापः कार्यः ॥ २८ ॥
यदि इसप्रकार प्यूहरचना करनेके अनम्तर इसमेंसे कुछ सेना बच रहे,
को उसेभी प्यूके अन्दर इधर उधर दाल देवे । २५ उसके ढालनेका प्रकार
यह है:-बची हुई सेनाका दो तिहाई हिस्सातो पक्ष कक्षमें दाल देवे ॥२६॥
याकी एक हिस्सा ठरस्यमें सम्मिलित कर देवे ॥ २० ॥ व्यूदरूपमें खड़ी
हुई ग्योंकी सेनामे, जो बचे हुए रथ पीछेसे सम्मिलित किये जायें, उनकी
मादाद, व्यूहरूपमें खड़ी हुई सेना के एक तिहाई से कम होनी चाहिये। अर्थात्
उसकी बराबर या उससे अधिक सेना कभी भी न मिलानी चाहिये ॥२८॥
तेन हस्तिनामश्वानामावापो व्याख्यातः ॥ २९ ॥ यावद-
श्वरथद्विपानां युद्धसंबाधनं न कुर्यात्तापदावापः कार्यः ॥ ३० ॥
इमीतरह हाधी भोर घोड़ोंके मिलाने के सम्बन्ध में भी समझ लेना
चाहिये ॥ २९ ॥ अभिप्राय यह है कि जब तक युद्ध के समय, घोड़े रथ और
दाधियोंम परस्पर भीड़ मालम न हो, उस समय तक भधिक सेनाको उसमें
मिलाते रहना चाहिये । (तिहाई हिस्से आदिका कथनसो केवल दंग यसलाने
के लिये किया गया है ॥ ३० ॥
दण्डबाहुल्यमावापः ॥ ३१ ॥ पत्तिबाहुल्यं प्रत्यायापः
॥ ३२ ॥ एकागबाहुल्यमन्यावापः ॥ ३३ ॥ दृष्यवाहुल्यमत्या
पापः ॥ ३४ ॥
५ अध्या०] सांनामिके (४७) प्यूहरचनासे अतिरिक्त सेनाका शेष रहलाना, तथा उसको फिर न्यू: हके अन्दरही मिलादेना आवाप' कहाता है॥३१॥ केवल पैदल सेनाका इसमकार म्यूहरचनाके अन्दर मिलाना प्रत्यावाप' कहाता है ॥ ३२ ॥ घोड़े रथ हाधी इन तीनोमस किसी एक अंगके द्वारा इसप्रकार सेनाको बढ़ाना 'अन्वावाप' कहाता है ।। ३३ ॥ दूषय (=राजाके साथ विरोध रखने वाले मुएय) पुरुषोंके द्वारा इसप्रकार सेनाके बतानेका ' अश्यावाप' कहते हैं ॥३॥ परावापात्प्रत्यावापादाचतुर्गुणादाटगुणादिति वा विभवतः सैन्यानामावापः कार्यः ॥ ३५ ॥ रथव्यूहेन हस्तिव्यूहो व्याख्यातः ॥ ३६॥ शत्रु अपनी सेनामे जितना आवाय या प्रत्यावाप करे उसने चौगुनसे लगाकर अठगुने तक, विजिगीषु अपनी सेनामें आवाप करे। अथवा अपनी शक्तिके अनुसार जितना संभव होसके, उतनेही आवाप भादिके द्वारा अपनी सेनाको यदाये ॥ ३५ ॥ रथोंकी व्यूहरचनाके भनुसारही हाधियों की व्यूहरच. नाका भी व्याख्यान समझलेना चाहिये ॥३६॥ व्यामिश्रो वा हस्तिरथाश्वानाम् ।। ३७॥ चक्रान्तयोर्हस्तिनः पार्थयोरश्वमुख्या रथा उरस्ये ॥ ३८ ॥ हस्तिनामुरस्सं स्थानां कक्षावश्चानां पक्षाविति मध्यभेदी॥३९॥ विपरीतोऽन्तभेदी॥४०॥ अथवा हाथी रथ और घोड़ोंको मिलाकर व्यूहरचना कोजावे ॥ ३७॥ उस रचना का प्रकार यह है:-सेनाके अन्त अर्थात् सामने दोनों ओर हाधियोशो खड़ा किया जावे; पिछले हिस्से में दोनों ओर यढ़िया घोड़ोंको खड़ा किया जाये; और उरस्य अर्थात् मध्यभागमें रयोंको खड़ा किया जाये । (पक्ष स्थान में अर्थात् भगले हिस्सेमें दोनों भार हाथियों को खड़े करने के कारण इस व्यूहरचनाका 'पक्षभेदी' भी एक विशेष भाम है) ॥ ३८॥ इसी म्यूह धनाका एक भौर प्रकार यह भी है।हाधियोंको मध्यमें, रयोंको पीछेकी और, और घोडाको भागेकी भोर रखा जावे; इस व्यूहरचनामें हाथियोंको मध्य में रखने के कारण, इसका विशेष नाम 'मध्यभेदी' होता है ॥ ३९ ॥ इस. से विपरीत प्यूहरचनाका नाम 'अन्तभेदी' होता है । अर्थात् हाथियोंको पीछे. की ओर रखना, मध्यमें घोड़े और प्रागेको ओर रयोंको रखना। इसका नाम अन्तर्मेंदी' इसी लिये है, कि इस प्यूहमें हाथियों को अन्त अान् कक्ष में एखा जाता है॥. ।। ।
(४४८) कोटलीय अर्थशास्त्र 1१०अधिक हस्तिनामेव तु शुद्धः॥४१॥ सांनाह्यानामुरस्समापयाह्यानां जपनं व्यालानां कोट्याविति ॥ ४२ ॥ केवल हाथियोंके ही बनाये हुए न्यूहको शुद्ध कहा जाता है, अर्थात् इसमें घोड़े भादिका मिश्रण नहीं होता ॥ ४ ॥ इन हाथियों में से जो युद्ध के योग्य (=सासाह्य) हाथी होवं, उनको उरस्य अर्थात् मध्यभागमें रक्खा जाये। जो हाथी राजाकी सवारी भादि के हों, उनको कक्ष अात् पिटले हिस्से में रखा जावे । इसी प्रकार जो हाथी दुष्ट या उन्मत हो, उनको भाले दोनों हिस्सों में नियुक्त किया जाये । यहां तक हाथियों के शुद्ध न्यूह के सम्बन्ध निरूपण करदिया गया ॥ ४२ ॥ अश्वव्यूहो पर्मिणामुरस्यं शुद्धानां कक्षपक्षाविति ॥४३ ॥ पत्तिव्यूहः पुरस्तादावरणिनः पृष्ठतो धन्विन इति शुद्धाः ॥४४॥ घोड़ोंके शुद्ध व्यूहमें घोड़ों को निम्नलिखित रीतिसे खरा किया जावेः- कवचसे युक्त घोड़ों को उरस्य अर्थात् मध्यस्थानमें खड़ा किया जावे; और कवच रहित घोहीको पक्ष ( सामने की भोर दोनो भागों में ) तथा कक्षमै (पीछे को भोर दोनों भागॉम ) खड़ा किया जावे ॥ ४३ ॥ इसी तरह पैदल सेनाके शुद्ध न्यूहमें, पैदल सेनाको इस प्रकार खड़ा किया जावे:-कवच पहि- नने वाले सिपाहियोंको भागेकी ओर दोनों हिस्पोम, और धनुर्धारी सिपाहियों को पीछे की ओर दोनों हिस्सों में खड़ा किया जावे । ( उरस्पमें कैसे सिपाहियों को खड़ा किया जाय, यह इस सूनम निर्देश नहीं किया गया; प्रकरणानुसार यही समझना चाहिये, कि अन्य साधारण सिपाहियों को मध्यभागमें खड़ा किया जावे ) । यहाँ तक हाथी घोड़े तथा पैदल सेनाओंके शुद्ध म्यूहीका यथा. क्रम निरूपण करदिया गया। ४५॥ पत्तयः पक्षयोरश्वाः पार्श्वयोहस्तिनः पृष्ठतो रथाः पुरस्तात्पर- व्यूहवशेन वा विपर्यास इति ध्यङ्गयलविभागः ॥ ४५ ॥ तेन प्रयायलविभागो व्याख्यातः॥४६॥ मिश्रायहीमें सेनाके दो २ भगोको लेकर इसप्रकार म्यूहरपना की. जासकती है:-पैदल सिपाहियोंको भागे की ओर दोनों भागों में खड़ा किया जावे, तथा धोदीको पिछले दोनों हिस्सों में ( भया हाथियोंको पीछेकी भोर दोनों भागों में, भौर रखाको आगे की भोर । अथवा शनु की प्यूहरचनाके भनुकूल (भर्धात् जिस तरह की प्यूहरचना करनेसे गजुफा मुकाबला की हर किया जासक, ऐसा) इसमें विपर्यय कर ले। इस तरह सेनाके दो 1 (४८९) ५ अध्या०] सांग्रामिक अंगों को लेकर तीन प्रकारका व्यूहविभाग किया जासकता है ॥ ४५ ॥ इसी के अनुसार सेनाके तीन अंगों को लेकर भी व्यूहरचना का विभाग समझ लेना पाहिये। यहां तक पक्ष कक्ष तथा उरस्योक रूपमें सेना की संख्याके अनुसार न्यूद विभाग का वर्णन कर दिया गया ॥ ५६ ॥ दण्डसंपत्सारवलं पुंसाम् ॥ ४७ ।। हस्त्यश्वयोर्विशेषः-कुलं जातिः सत्त्वं वयःस्थता प्राणो वम जवस्तेजः शिल्पं स्थैर्यमुद- ग्रता विधेयत्वं सुव्यञ्जनाचारतेति ॥४८॥ अर सार और फल्गु सेना का विभाग किस प्रकार करना चाहिये, इसका निरूपण किया जायगा:-जो पैदल सेना पितृपैतामह क्रमसे लगातार चली भाने वाही, नित्य तथा वशमें रहने प ली हो, उसको सारयल अर्थात् सारभूत सेना कहा जाता है ॥ ४७ ॥ हाथी और घोड़ोंमें इतना और विशेष समझना चाहियः-कुल, जाति, धीरता, कार्य करने योग्य आयु, शारीरिकचल, आवश्यक ऊंचाई और चौड़ाई आदि (= वर्म ), वंग, पराक्रम (अथवा तिरस्कार का न सहना ), सुशिक्षा (युद्ध समाधी शिक्षाओं का होना) स्थिरता (अर्थात् प्रहार होने परभी अपने कार्यसे न हटगा), उदप्रता (सदा- उपर को मुंद उठाकर रखना ), सयार की आज्ञामें रहना, अन्य शुभलक्षण और शुभचेष्टाभोंसे युक्त होना, इत्यादि गुणों से युक्त हार्थी और घोड़े 'सारपल समझ जाते हैं ॥४८॥ पत्त्यश्वरथद्विपानाम् सारग्रिभागमुरस्य स्थापयेत् ॥ ४९ ।। द्वौ विभागौ कक्षं पक्षं चोभयतः ॥ ५० ।। अनुलोमनुसारम् ॥ ५१ ॥ प्रतिलोमं तृतीयसारम् ॥ ५२ ॥ फल्गु प्रतिलोमम् ॥५३ ॥ एवं सर्पमुपयोग गमयेत् ॥ ५४ ॥ पैदल घोड़े रथ तथा हाथियों के सारभूत पलके एक तिहाई हिस्से को मध्यभागमें स्थापित किया जाये ॥१९॥ बाकी दो तिहाई हिस्सों को दोनों भोर पक्षमै मोर दोनों और कक्षमें नियुक्त किया जावे ॥५०॥ यह सबसे उत्तम सेना के, खड़े करने का प्रकार बताया गया, जो सेना उससे कुछ न्यूनशक्ति रखती हो, उसको भनुसार' कहाजाता है। ऐसी सेनाको सारपलके पीछे की ओर खदा परे ॥ ५१ ॥ इससे भी चल न्यून शक्ति पाली 'गृतीयसार' सेनाको पहिली सेनासे उलरा अथात् सारबलके भागे की भोर सदा करें। यह सारवल के सरे करने का प्रकार बताया गया ॥ ५२ ॥ फरगुयलको ( भयात् जो सेना नसीयसारसे भी निर्बल हो, या जिसमें पितामह, निश्य, वश्य, भादि गुण [२० अधिक (४९०) फोटलीय अर्थशास्त्र म हो, उसको फल्गुयस कहा जाता है, ऐसे पलयो) नृतीयसार सेनाके भी भागे खड़ा किया जाये ॥ ५३ ॥ इसप्रकार सय तरह की सेनाओंको उपयोग मेरावे ॥ ५४॥ फल्गुवलमन्तेबवधाय वेगोभिहुतो भवति ।। ५५ ॥ सार- पलमप्रतः कृत्वा कोटीप्वनुसारं कुर्यात् ।। ५६ ।। जघने तृतीय- सारं, मध्ये फल्गुबलमेतत्सहिष्णु भवति ॥ ५७ ॥ फल्गुबलको पक्षस्थानमें खड़ा करके लढ़ानेपर, शत्रुके आक्रमणका ये। उसीपर शान्त होजाता है। तात्पर्य यह है कि यदि फल्गुषलका नाश भी होजाय, तो उससे इतनी हानि नहीं, जितनी कि मारपलके नाश होने से होसकती है । इसलिये फल्गुवरको पक्षस्थानमें ही रक्खें ॥५५ ।। यदि सारयलको आगे कियाजावे, और कोटी अर्थात् किनारोंमें 'अनुसार' पलको नियुक्त कियाजावे ॥५६॥ पीछकी ओर कक्षभागमें 'मृतीयसार' सेनाको खडा कियाजावे, तथा मध्य में फल्गुसेनाको सदा किया जावे । इसमकार सब सेनाओंको सड़ा करके भी एक म्यूहकी रचना फौजाती है। यह व्यूह, शत्रुके भाक्रमणका सहन करनेवाला' होता है। अर्थात् शत्रुक भाक्रमणसे इस प्रकारके व्यूह में सड़ीहुई सेना का पराजय नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ व्यूहं तु स्थापयित्वा पक्षकक्ष्योरस्यानामेकेन द्वाभ्यां वा प्रहेरत् ।। ५८ ॥ शेपैः प्रतिगृह्णीयात् ।। ५९ ॥ पक्ष कक्ष तथा उरस्य स्थानों पहिले म्यूहकी ठीक २ स्थापना करके फिर सेनाके एक अंगके द्वारा अथवा दो भंगोंके द्वारा शउपर आक्रमण करे ॥ ५८ ॥ और सेना के शेप अंगों से, शत्रु के आक्रमण को रोके ॥ ५९॥ यत्परस दुर्वलं वीतहस्त्यश्वं दृष्यामात्यकं कृतोपजापं वा तत्प्रभूतसारेणाभिहन्यात् ॥ ६० ॥ यद्वा परस्य सारिष्ठं तद्वि- गुणसारेणामिहन्यात् ॥ ६१ ॥ यदङ्गमल्पसारमात्मनस्तद्वहुनो. पचिनुयात् ॥ ६२ ॥ यतः परस्यापचयस्ततोऽभ्याशे व्यूहेत यतो वा भयं सात् ।। ६३ ॥ शत्रुकी जो सेना दुर्यल, दाधी घोप्टोंसे रहित, दूप्य अमात्यासे युक्त तथा उपजाप फीहुई ( भात् भेदहालीहुई ) हो, उसको बहुतसी साराभूत ५ अध्या०] •सांग्रामिक (३२) सेना द्वारा भष्ट कर डाले । ६०॥ और गधुको जो सेना सारभूत हो, उसको अपनी दुगनी सारभूत सेनाके द्वारा मष्ट बाडाले ॥ ६॥ अपनी सेनाका जो ा अल्पसार (थोड़ी शक्ति माला) हरे, उसको बहुतसी सेनाके साथ युक्त करदे । अर्थात् उसकी सहायताके लिये, अपनी बहुतली सेना उसके साथ लगादे ॥६२॥ जिस ओरसे शत्रुकी सेनाका अपचय (क्षय-विनाश) होरहा हो, उस ही के समीप अपनी सेनाकी व्यूह रचना करे । तात्पर्य यह है, कि मानु जिस भोरसे दुयल हो, उस ओरसे ही उसपर भाक्रमण करे। अथवा जिस सोरसे अपने ऊपर साक्रमण होनेका भय हो, उस ओरसे व्यूहरचना करे ॥ ६३ ५ अभिसृतं परिसृतमतिसृतमपसृतमुन्मथ्यावधानं वलयो गोमूत्रिका मण्डलं प्रकीर्णिका व्यावृत्तपृष्ठमनुवंशमग्रतः पार्धाभ्यां पृष्ठतो भगरक्षा मन्नानुपात इत्यश्वयुद्धानि ।। ६४ ॥ भय इसके भागे घोड़े हाधी रथ तथा पैदल सेनाओंके युद्धोंका निरूपण किया जायगा। सबसे पहिले घोड़ोंके युर्योका निरूपण करते हैं:- भाभिस्त ( अपनी सेनासे शत्रुकी सेनाकी और जाना ), परिसन (शत्रु की सेनाके चारों ओर चोट पहुंचाते हुए घूममा), अतित (शनुकी सेनाको बीचसे छिन मिल करके सुईकी तरह चले जाना), अपसृत (उसी मार्गसे शिर दुधारा निकलना), बहुत से घोड़ों के द्वारा शन्नुकी सेनाको उन्मधित करके फिर उनका इकट्ठा होजाना, दो औरसे सुईके समान मार्ग बना. कर जाना, गोमूनिका (गौ के भूप्रकी तरह पक्रगतिसे जाना ), मण्डल (शत्रु की सेनाके किसी एक देशको काटकर चारों ओरसे उसे घेरलेता), प्रकीर्णिका (सप ही बालों को मिलाकर प्रयोग करना ), अनुवंश (शत्रुसेनाके अभिमुख हुई २ अपनी सेनाका भनुवर्चन करना), नष्ट होतीहुई अपनी सेनाकी, आगे पीछे तथा इधर उधासे घूमकर रक्षा करना ( भमरक्षा ), छिस मिस हुई २ शत्रुकी सेनाका पीछा करना ये तेरह प्रकारके पोदोंके युद्ध होते हैं ॥६॥ प्रकीर्णिकावर्जान्यतान्येव चतुर्णामझानां व्यस्तसमस्तानां वा पातः ॥६५॥ पक्षकक्षोरस्यानां च प्रभञ्जनमवस्कन्दः सौतिक चेति हस्तियुद्धानि ।। ६६ ।। प्रकाणिकाको छोड़कर थोषों के शेप सब युद्ध, विसरे हुए या इकटे हुए सेनाके चारों अंगोंका हनन करना ॥ ६५ ॥ पक्ष कक्ष तथा उरस्यमें [१० अधिक (४९२) कौटलीय अर्थशास्त्र सदी हुई सेनाका भईन करना, शत्रुकी सेनाकी कहाँसे निर्यलता देखकर उसपर प्रहार करना, भार सोते शत्रुओंको मार डालना; ये मय हाथियों के युद्ध होते हैं ॥६६॥ उन्मथ्यावधानवर्जान्येतान्येव स्वभूमावभियानापयान - स्थितयुद्धानीति रथयुद्धानि ॥ ६७ ॥ सर्वदशकालपहरणमुपांशु- दण्डथेति पत्तियुद्धानि ।। ६८ ।। उन्मध्यावधान (यहुतसे हाथियोंके द्वारा शकी सेनाको उन्मथित करके फिर उनका इक्ट्ठा हो जाना) को छोड़कर शेष सय हाथियों के युद्ध, भपने योग्य भूमिमें ठहरकर शत्रुपर आक्रमण काना, शत्रु सेनाको हराकर भाग जाना, भपनी रक्षा करके बैठे हुए शत्रुके चारों ओर घेरा डालकर उसके साथ युद्ध करना; ये सब रथोंके युद्ध कहाते हैं ॥ ६७ ॥ सब देश भौर मय कालॉमें हथियारोंका धारण करना, और चुपचाप शत्रुसेगका नाश करना, ये सब पैदल सेनाओंके युद्ध होते हैं ॥ ६८ ॥ एतेन विधिना व्यूहानोजान्युग्मांश्च कारयेत् । विभवो यावदगानां चतुर्णा सदृशो भवेत् ।। ६९ ॥ द्वे शते धनुपां गत्वा राजा विष्ठेत्प्रतिग्रहे । भिन्नसंघातनार्थ तु न युध्येताप्रतिग्रहः ॥ ७० ॥ इति सानामिके दराने ऽधिकरणे पक्षकारस्यानां पलाप्रतो प्यूहविभागः, सारफल्गुयलविभागा, परपश्वरथहस्तियुद्धानि च पञ्चमो भ्यायः ॥ ५॥ आदितस्त्रयरिंशच्छतः॥ १३॥ इस विधिसे विजिगीषु, भोज (भयुग्म ) तथा युग्म ज्यूहोंकी रचना करे । अपने पास हाथी घोदे रथ तथा पैदल, इन सेनाके चारों अंगोंकी जितनी सम्पति हो, उसहीके अनुकूल अपने व्यूहोंकी रचना करे ॥ १९ ॥ युद पारग्म हो जानेपर राजा सेनाके पिछले हिस्से में दो सौ धनुपके फामुळे पर ठहरे। ऐसा करनेसे शत्रुके द्वारा चिन्न भिन्न की हुई अपनी सेनाको राजा फिर इकट्ठी कर सकता है। इसलिये सेनाके पृष्ठ भागका आश्रय लिये पिना राजा कदापि युद्ध न करे । (किसी पुस्तकमें "भिमसंघात ना तु' के स्थानपर 'भिक्षसंघातन तरमात्' भी पाठ है । अर्थमें कोई भेद नहीं ) ॥७॥ सांग्रामिक दशम अधिकरणमें पांच्या अध्याय समास ।
सांग्रामिक या० - छठा अध्याय १५८, १५९ प्रकरण दण्डव्यूह, भोगव्यूह, मण्डलव्यूह, असंहत- व्यूह; इनके प्रकृतिव्यूहों और विकृति- व्यूहोंकी रचना; तथा उपर्युक्त दण्डादि- व्यूहोंके प्रतिव्यूहकी स्थापना। इस अध्यायमें दो प्रकरण हैं। पहिले प्रकरण में दण्डव्यू आदि चार प्रकारके म्यूहाँकी रचनाका प्रकार बताया जायगा । दूसरे प्रकरणमें इन उपर्युक्त न्यूहोंके मुकाबलेके लिये दूसरे म्यूहोंको स्थापनाका कथन किया जायगा। पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः ॥ १॥ पक्षौ कक्षावुरस्य प्रतिग्रह इति पार्हस्पत्यः ॥२॥ अगले दोनों ओरके हिस्से), उरस्य (मध्यभाग) ओर प्रति. प्रह (पिछला हिस्सा ) ये चार ही अवयव व्यूहमें होते हैं, इस प्रकारका म्यूहविभाग उशना ( शुक्र) आचार्य ने किया है ॥ १॥ पक्ष, कक्ष । पिछले दोनों ओरके दा हिस्से), उरस्य भौर प्रतिग्रा ये छ अवयव न्यूहमें होने चाहिये। इसप्रकारका न्यूहविभाग वृहस्पति आचार्यने किया है ॥ २ ॥ अपक्षकक्षोरस्या उभयोः दण्डभोगमण्डलासंहताः प्रकृति- व्यूहाः ॥ ३ ॥ तत्र तिर्यग्वृत्तिर्दण्डः ॥ ४ ।। समस्तानामन्याव- तिर्भोगः ॥ ५॥ सरता सर्वतोवृत्तिः मण्डलः ॥६॥स्थितानां पृथगनीकवृत्तिरसंहतः ॥ ७॥ शुक्र और वृहस्पति दोनों ही भाचायोके मतमें, पृथर २ पक्ष कक्ष तथा उरस्य स्थानों में खड़ी होनेवाली सेनाके दण्ड भाग मण्डल तथा असंहत नामक चार प्रकारके म्यूह होते हैं। ये न्यूइ प्रकृतिव्यूहके नामसे कहे जाते हैं ॥ ३ ॥ इनमेसे, सेनाको तिरछे खड़ा करके जो न्यून बनाया जाय, उसे 'इण्डन्यूह' कहते हैं ॥ ४॥ शुक्रके मतसे उपर्युक्त चार अवयवों, और गृह स्पतिके मतसे उपयुक्त सः अवयोंका गातार कई पार घुमाव डालकर जो प्यूह पनाया जाय, उसे 'भोगन्यूह' कहते हैं ॥ ५॥ शत्रुकी सेनाकी और पक्ष
(४९४)
कौटलीय अर्थशास्त्र [१० अधि०
जाती हुई सेनाओंका चारों धोरसे घिरकर शत्रुपर आक्रमण काना 'मण्डल'
नामक व्यूह होता है ॥ ६ ॥ शत्रुकी और चलनेसे पहिले, चार या छ:
ठहरी हुई सेनाओंको, अपने आपको एक दूसरे से पृथक् २ दिखलाते हुये
शनुपर आक्रमण करना असंहत' नामक व्यूर कहाता है ॥ ७॥
पक्षकक्षारस्यैः समं वर्तमानो दण्डः ॥ ८॥ स कक्षामि-
क्रान्तः प्रदरः ॥९॥ स एव पक्षाभ्यां प्रतिक्रान्तो दृढका
॥१०॥ स एवातित्रान्तः पक्षाभ्यामसह्यः ॥ ११ ॥ पक्षायव-
स्थाप्योरस्याभिक्रान्तः श्येनः ॥ १२ ॥ विपर्यये चापं चापकुक्षिः
प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश्च ॥ १३ ॥
ऊपर जो लक्षण व्यूहोंके किये गये हैं, वे शुक्र और बृहस्पतिके मतसे
किये गये हैं। अब व्यूहके कक्ष अवयवको न मानने वाले शुक्राचार्य के मतके
विरुद्ध, दण्ड आदि व्यूहोंका अपने मतके अनुकूल लक्षण किया जाता है:-
कक्ष पक्ष तथा उरस्य इन पांपों यरावर २ सेनाओंके द्वारा, स्थानगमनादि
पूर्वक ठीक २ किया जाता हुआ ब्यूह 'दण्डन्यूह' कहाता है। यह दण्डन्यूह,
प्रकृतिघ्यूह होता है; इसके विकृतिप्यूहोंका अय निरूपण करते हैं:-॥८॥
जब कक्ष भागाँकी ओरसे शत्रुकी सेनापर आक्रमण कियाजाय, तो
उस ही दण्डम्यूहको 'प्रदर' नामक म्यूह कहाजाता है ॥ ९ ॥ जय कि
पक्षस्थित सेना मुड़कर, शत्रुकी सेनापर वारकरे, तब इस अवस्थामें वह
दण्डव्यूह हो 'दृढक' मामक ब्यूह कहाता है ॥ १०॥ पक्षस्थित सेना जब
अत्यधिक वेगसे शत्रुकी सेनामें घुसजावे, तब वह दृढक व्यूह 'भसा' नामक
न्यूह कहाता है ॥ ११ ॥ दोनों पक्षोंको अपने २ स्थानपर स्थापित करके
उरस्यके द्वारा उद्युकी सेनाकी सौर आक्रमण करना 'इयेन' नामक व्यूह
कहा जाता है ॥ १२ ॥ इन उपर्युक्त प्रदर आदि चारों न्यूहोंसे सर्वथा
विपरीत म्यूह यथाक्रम चाप चापकुक्षि प्रतिष्ठ और सुप्रतिष्ठ कहे जाते
है॥ १३॥
चापपक्षः सञ्जयः॥ १४ ॥ स एवोरस्यातिकान्तो विजयः
॥ १५॥ स्थूलकर्णपक्षः स्थूलकर्णः ।। १६ ॥ द्विगुणपक्षस्थूलो
विशालविजयः ॥ १७ ॥ व्यभिक्रान्तपक्षश्चमूमुसः ॥ १८॥
विपर्यये झपास्यः ॥ १९ ॥ ऊर्ध्वराजिदण्डः सूची ॥२०॥
द्वौ दण्डौ वलयः ॥२१॥ चत्वारो दुर्जय इति दण्डव्यूहाः ॥२२॥
६ अध्या
सांनामिक
जिस व्यूहके यक्ष चापके समान हों, वह 'सञ्जय' नामक व्यूह होता
है ॥ १४ ॥ जय कि उरस वा पर आक्रमण करके उसकी सेनाके
सन्दर प्रवेश करदिया जावे, उस समय यह दण्डन्यूह, 'विजय' नामक व्यूह
कहाता है ॥ १५ ॥ बड़े कान समार, जिम न्यूइके पक्ष हो, वह भूलकर्ण'
नामक न्यूर कहा है ॥ १६॥ विजए म्यूहकी अपेक्षा पक्षस्थानों में जो
दुगना बड़ा हो, वह 'विशालावन मनामक न्यूह कहाता है ॥ १७ ॥ जिस
न्यूझके पक्ष, दोनों कक्ष और उत्स्य तीनों की बराबर दौ, वह 'चमूमुख' नामक
म्यूह कहता है ॥ १८ ॥ और इससे विपरीत अर्थात् जिस ब्यूहके का, दोनों
पक्ष और उरस्यकी बराबर हो, वह 'झपास्य' नामक ब्यूर कहाजाता है
५ १९ जिस व्यूहमें सत्रुकी औरको ऊंची होकर सेना आमरण को, वह
दण्डम्यूह 'सूचीब्यूम' कहलाता है ॥ २० ॥ जय कि पक्ष कक्ष तथा उस
स्थानों में दो दण्डन्यू मेंको तिरमा खा करदिया जाये, तब उसको 'बलप'
कागजाता है |॥ २ ॥ यदि इसी प्रकार घार दण्डम्यूड खो करदिये गये तब
असको 'दुर्जय' कहते हैं । यहांतक दण्डन्यूका निरूपग करादेश गया ॥२२॥
पक्षकक्षारस्पैविपमं वर्तमानो भोगः, स सर्पसारी गोभूत्रिका
वा ॥ २३ ॥ स युग्मोरस्यो दण्डपक्षः शकटः ॥ २४ ॥ विपर्यये
मकरः ॥ २५ ॥ हस्त्यश्वरथैर्व्यतिकीर्णः शकटः पारिपतन्तक
इति भोगव्यूहाः ॥ २६ ॥
कक्ष पक्ष आदि स्थानोंके द्वारा विषम संख्या रचा जाता हुआ
न्यूद 'भोगम्यूद' कहाता है । पक्ष आदिमें समानता रखनेवाला दण्डन्यूर'
पहिले कहा जा चुका है। इस न्यूहमें सर्पके समान कुटेिल स्थिति होने के
कारण पक्ष आदि स्थानों में सेनाओंकी तादाद न्यूनाधिक होती है। इसीलिये
इसको 'भोगव्यूह' कहाशाता है। यह भोगव्यूह या तो सर्प के समान हकछा
२६ रूपमें ही खवा किया जाता है, या गोमूत्रके समान विविध रूपोंमें सका
किया जाता है। इसलिये मोगर पूह ये दो भेद इसे एक ससा,
दूसरा गोमूशिका ॥ १३ ॥ पड़ी भोगव्यूर उस समय 'कर' नामक व्यूह
कहाता है, जबकि उसका मध्यभाग युग्म अर्थात् दो भाग विभत्ता दण्डके
भाकरके समान हो, और दोनों पक्ष एक २ दपरके समान शित होय
॥ २४ ॥ इससे विमति होने पर दस ही को 'मकरस्यूह' कहामारा है
{! १५ हामी घोरे और रथासे भोहुए (युक्त ) कट व्यूहशे ही
पारिपात' म्यूह का है। यहांत भोगनों का निरूपण कादिया
गया॥२६॥
[१० आधुः (४९६) कोटलीय अर्थशास्त्र पक्षकक्षोरस्यानामेकीभावे मण्डलः ॥ २७ ॥ स सर्वतो- मुखः सर्वतोभद्रो ऽष्टानीको दुर्जय इति मण्डलव्यूहाः ॥ २८ ।। जिस म्यूहमें कक्ष पक्ष और उरस इठे मिलजावें, उसको 'मण्डल. न्यूह' कहते हैं ॥ २०॥ जपकि चारों भोरसे शत्रुके ऊपर आक्रमण किया जाय, तव उस मण्डलब्यूहको 'सर्वतोभद्र' म्यूह कहा जाता है। इसी प्रकार जब उसमें आठ सेना मिलकर ( दो उरस्यम, दो दोनों पक्षस्थानों और दो दोनों कक्ष स्थानों में ) कामको, अधीत् शनुपा एकमाय भाक्रमग करे, तम उसे 'दुर्जय' नामक व्यूह कहाजाता है। यहांत मण्डलग्यूहोंका निरूपण करदिया गया ॥ २८ ॥ पक्षकक्षोरस्यानामसंहतादसंहतः ॥ २९ ॥ स पञ्चानीका- नामाकृतिस्थापनाद्वजो गोधा वा ॥ ३० ॥ चतुर्णामुद्यानका काफपदी वा ॥ ३१ ॥ त्रयाणामर्धचन्द्रिका कर्कटकशृङ्गी येत्या संहतव्यूहाः ॥ ३२॥ पक्ष भादि पांचों स्थानों में स्थित सेनाओंके, शत्रुपर आक्रमण करने में असंहत ( आपसमें न मिलना ) होनेसे 'भसंहत' नामक व्यूह कहाजाता है ॥२९॥ यह दो प्रकारका होता है, एक 'वज्र' दूसरा 'गोधा'। जबकि पक्ष आदि पाचों स्थानों की सेनाओंको वज्रके भाकारमें सड़ा किया जावे, तब उसे 'वन' और जब उन्हें गोधा (गोह-एक जल का जानवर) के आकारमे खड़ा किया जाये, तय 'गोधा' कहते हैं ॥ ३० ॥ जयकि दोनों पक्ष उरस्य तथा प्रतिमह इन चार स्थानों में ही उस दंगसे सेनाको खड़ा किया जाये, तम उस संहत म्यूहको 'उद्यानक' अथवा 'काकपदी' कहाजाता है ॥३॥ ॥ जय दोनों पक्ष, और उरस्प तथा प्रतिग्रह इनमेंसे कोई एक, इन तीन स्थानों में हो सेनाको स्थापित किया जाता है, तब उस व्यूहको अर्धचन्द्रिक ' अथवा 'कर्कटक- शकी' कहा जाता है । यहां तक असंहतव्यूहों का निरूपण कर दिया गया ॥३२॥ रथोरस्यो हस्तिकक्षोऽश्वपृष्ठोऽरिएः ॥ ३३ ॥ पत्तयो ऽश्वा रथा हस्तिनथानुपृष्ठमचलः ।। ३४ ॥ हस्तिनो ऽश्वा रथः पत्त- यश्चानुपृष्ठमप्रतिहतः ॥ ३५ ॥ इन उपर्युक्त भदौसे अतिरिफ, प्यूहों के निललिखित ओर भी तीन भेद है:-जिस प्यूह के मध्यभागमें रघ हो, कक्ष स्थानों में हाथी, पिछले ६ अध्या०] सांयामिक (४९७) हिस्सेमें (भर्यास् मतिप्रद स्थानमें) घोड़े और परिशेप होनेसे पक्ष स्थानों में पैदल होवें, उस प्यूहको 'भरिष्ट' कहते हैं। क्योंकि इसमें किसी तरहका भशुम नहीं होता ॥ ३३ ॥ भोर मिस म्यूदमें पैदल पक्ष स्थानों में, घोड़े उरस्य स्थानमें, रथ कक्ष स्थानॉमें भोर हावी प्रतिमह स्थानमें खड़े किये जावे, उस म्यूहको 'भचल' कहते हैं ॥ ३४ ॥ सभा जिस म्यूहमें हाथी पक्ष स्थानॉम, घोड़े उरस्य स्थानमें, रथ कक्ष स्थानों में भौर पैदल सेना प्रतिग्रह म्यानमें नियुक्त हो, उस प्यूहको 'भप्रतिहत' कहा जाता है ।। ३५ ॥ तेषां प्रदरं दृढकेन पातयेत् ॥ ३६॥ दृढकमसोन ॥३७॥ श्येनं चापेन ॥ ३८ ॥ प्रतिष्ठं सुप्रतिष्ठेन ॥ ३९ ॥ संजयं विन. येन ॥ ४० ॥ स्थूलकर्ण विशालविजयेन ।। ४१॥ पारिपतन्त। सर्वतोभद्रेण ॥४२॥ इसके पहिले सब ताके व्यूहका निरूपग करदिया गया । अय उनका मुकाबला करनेवाले म्यूहोंका निरूपण कितीजायगा; अर्थात् किस २ न्यूहका कौन २ से न्यूइसे प्रतीकार करना चाहिये, इस बात का निरूपण किया जायगा!-उन व्यूहों में से 'प्रदर' नामक व्यूहको पदक व्यूहसे नष्ट करे ॥ ३६॥ इसीप्रकार दृढक व्यूहको असह्य म्यूहके द्वारा नष्टकरे ॥ ३७ ।। श्येनम्यूहको चापम्यूहके द्वारा; ॥ २८ ॥ प्रतिष्ट व्यूहको सुपतिष्ठ ज्यूहके दाग; ॥ ३९ ॥ संजय म्यूहको विजय ग्यूहके द्वारा; ॥ ७० ॥ स्थूलकर्ण ग्गूहको विशाल विजय व्यूह के द्वारा; ॥ १ ॥ पारिपतन्तक म्यूहको सर्वतोभद्र म्यूहके द्वारा ॥ ४२ ॥ दुर्जयेन सर्वान्प्रतिव्यूहेत ॥४३॥ पत्त्यश्वरथद्विपानां पूर्व पूर्वमुत्तरेण घातयेत् ॥४४॥ हीनाङ्गमधिकाङ्गेन चेति ।। ४५ ॥ और दुर्जय म्यूहके द्वारा सप ही व्यूहोंको नष्ट करे ॥ १३ ॥ पैदल घोड़ा रथ और हाथी इन सेनाके अंगों में से पहिले २ अंगको, भगले २ अंगसे नएको ॥ ४५ ॥ और हीन अंगको (अर्थात् शक्ति आदि से रहित अंगको ) अधिक भंगसे (अर्थात् शक्तिसंपा अंगके द्वारा) नष्ट करे ॥ ५५ ॥ अङ्गदशकस्यैकः पतिः पदिकः ॥४६॥ पदिकदशकस्यैका सेनापतिः ॥४७॥ तदशकस्यैको नायक इति ॥४८॥ अब सेना संचालक अधिकारियोंके सम्पन्ध निरूपण किया जाता है:-श सेनाहोंके एक पनि अर्थात् आधेकासेको 'पादेक' कहते हैं। इसका अभिप्राप या समझना चाहियः-सेनाङ्ग चार प्रकारके होते हैं, परन्तु यहाँपर ॥४७॥ ॥४८॥ (१९८) कौटलीय अर्थशास्त्र [१० भाषिक प्रधानभूत रथ और हाथी दो ही अंगोंका ग्रहण करना चाहिये । इसलिये दश रथ और दश हाथियोंका जो एक अधिकारी हो, उसीको 'पदिक' कहा जाता है। प्रत्येक रथ या हाथोके साथ कितने घोड़े और पैदल होते हैं, इसको जाननेके लिये देखो:-अधि० १०, अध्या० ५, सून १०-१२ ॥ ४६ ॥ इसीतरहके दस पदिक अधिकारियोंके ऊपर एक सेनापति होता भौर दस सेनापति अधिकारियोंके उपर एक नायक होता स तूर्यघोषध्वजपताकाभिर्व्यहागानां संज्ञाः स्थापयेत् ॥४९॥ अङ्गविभागे संघात स्थाने गमने व्यावर्तने प्रहरणे च ॥ ५० ॥ समे ब्यूहे देशकालयोगासिद्धिः ॥५१॥ वह सबसे प्रधान अधिकारी नायक, याजोंके विशेष २ शन्दोंके द्वारा भयवा ध्वज्ञा पताकाओके द्वारा, ब्यूहमें खड़ी हुई सेनाओं व्यवहारके लिये विशेष संज्ञाओं (चिन्हों शारी) की स्थापना को ।। ४९ ॥ इन संज्ञाओंको सेनाके निम्नलिखित कार्यो काम लाया जावे.-न्यूहमें खड़ी हुई सेनाकै अंगोंको अवसर पड़मेपर विमत करनेन, पिखरी हुई सेनाको इकट्ठी करनेमें, चलती हुई सेनाको रोकनेम, खड़ी हुई सेनाको चलाने में, भाक्रमण करती हुई सेनाको लोदानेमें, और यथावसर आक्रमण कानेमें, इन इशारोंको काममें लाया जावे ॥ ५० ॥ बरावरकी व्यूहरचना होनेपर अर्थात् शत्रुसेना भौर अपनी सेनाकी समानता होनेपर देश (सम विषम आदि) काल (रानि दिन मादि) और सार ( शौर्य विक्रम आदि) के योग ( सम्पन्ध ) से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती ह। अर्थात् जिसको देशकाल आदिकी अमुकूलता होगी, वहीं उस युद्धमें विजय प्राप्त कर सकेगा॥५॥ दण्डैरुपनिषद्योगस्तीक्ष्णेयासक्तधातिभिः । मायाभिर्दैवसंयोगैः शकटैर्हस्तिभूपणैः ।। ५२ ॥ यन्घ्र (जामदग्न्य भादि), उपनिपद्योग (भोपनिषदिक प्रकरणम बताये हुए विप आदिके प्रयोग ), दिपकर या मिलकर मारनेवाले तीक्ष्ण पुरुषों, अल कपट, राजाके भाग्यके कथन, और हाथोंके योग्य वषाँसे टके हुए रघोके द्वारा शत्रुको येचैन किया जावे। ( इसका भन्वय ५४ वें श्लोको समझना चाहिये, इसी तरह अगले श्लोक का मी) ॥५२॥ दृष्यप्रकोपै!यूथैः सन्धावारप्रदीपनैः । कोटीजघनघात; दूतच्यञ्जनमेदनः ।। ५३ ।।
६ अध्या०] साग्रामिक (४९९) शत्रुके दूप्य पुरुषों में कोप उत्पन्न करने, भाग गोमाका झुण्य सदा करने, खायनीम भाग लगा देने, सेनाके आगे या पीछके हिस्साम छापा मारने, दूतक चेपमें गुरुवर पुरयाको शत्रुको सेना में भेजकर उनमें भेद डालनेसे भी शत्रुको वितरित को ॥ ५३ ॥ दुर्ग दग्धं हृतं वा ते कोपः कुल्यः समुत्थितः । शवराटविको वेति परस्योद्वेगमाचरेत् ॥ ५४॥ तथा 'सेरे दुर्ग में भाग लगा दी गई है, तेरे दुर्गमें मच गई है अर्थात तरे दुर्गको अधीन कर लिया गया है, तेरे कुल्लका को कोई पुरुष तो विचन्द्र उठ बना हुआ है, तेरा सामन्त शत्रु युद्ध करने के लिए तैयार हो गया है, अथवा तेरा भारपिक शत्रु सेरे विरुद्ध सग्राम करनेके लिये सन्नद्ध हो चुका ६'न यासको कहकर भी विजिगीषु, शत्रुको उद्विग्न (बेचैन सिन) को । क्योंकि व्यग्र हो जाने से शत्रु शीघ्र ही कराग आ जाता है ॥ ५५ ॥ एक हन्यान्न का हन्यादिपुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञन तु मतिः क्षिसा हन्याद्गर्भगतानपि ॥ ५५ ॥ इति सांसारिक दशमे ऽधिकरण दण्डभोगमण्डलासंइतब्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिब्यूह. स्थापनं च पाटो ध्याय; ॥ ६॥ आदितश्चतुर्विंशतः ॥ १३४ ॥ एतावता कौटलीयस्पाशाखस्य सांप्रामि दशममधिकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥ युदसे मन्न बलवान होता है, इस बातको मन्तिम श्लोकसे उप. संहार कररो हुए कहते है:-धनुर्धारीके धनुपसे छोड़ा हुआ थाण, सम्भय किसी एक भी पुरुषको मारे या न मारे। परन्तु बुद्धिमान व्यक्तिके द्वारा किया हुआ बुद्धिका प्रयोग, गरिथत प्राणियों को भी नष्ट कर देता है। इसलिये की अपेक्षा बुद्धिको ही अधिक शक्तिसम्पन्न समझना चाहिये ।।५५॥ सांनामिक दशम अधिकरणमें छठा अध्याय समाप्त । सांग्रामिक दशम अधिकरण समाप्त ।
संघवृत्त एकादश अधिकरण पहिला अध्याय १६०-१६१ प्रकरण । भेदके प्रयोग और उपांशुदण्ड । इस अध्यायमें दो प्रकरण है। पहिने प्रकरणम भेदक ( भेद दालने वाले संभका विश्लेप करने याले ) उपायोंके प्रयोगोंका निरूपण किया जायगा । दूसरे प्रकरणमें उपांशुदण्ड (=छिपकर एकान्त में किसीका वध करादेना, इस ) का निरूपण किया जायगा। संघलाभो दण्डमित्रलाभानामुरामः ॥ १॥ संघाहि संहत- स्वादधृष्याः परेपाम् ॥ २ ॥ ताननुगुणान्मुखीत सामदानाभ्याम् ॥ ३ ॥ विगुणान्भेददण्डाभ्याम् ॥ ४ ॥ संघलाभ, सेनालाभ और मित्रलाभ, इन सय ही लाभ में से संघलाभ उराम होता है। क्योंकि इकट्ठा रहनेसे संघाको, शत्रु दवा नहीं सकते ॥२॥ यदि वे संघ अपने अनुकूल हों, सो विजिगीषु साम और दानके द्वारा उनका उपभोग करे । अर्थात् अपने अनुकूल कार्यों में उनका उपयोग लेरे॥३॥ यदि चे प्रतिकूल होवें, तो भेद भौर दण्डके द्वारा उनका उपयोग करे ॥ ४ ॥ काम्बोजसुराष्ट्रक्षत्रियश्रेण्यादयो वार्ताशस्त्रोपजीविनः ॥५॥ लिच्छिविकनजिकमलकमद्रककुकुरकुरुपाञ्चालादयो राजशब्दोप- जीपिनः ॥६॥ पे संघ किनके होने हैं, इस यातका निरूपण इस सूत्रमें कियाजाता है:-काम्बोज और सुराष्ट्र (गुजरात) देशीम उत्पक्ष होनेवाले क्षत्रिय भादि पाँके (मूल सूनके भादि पदसे वैश्य आदिके वर्गाका भी ग्रहण करलेना चा. हियेही घे संघ होते हैं। ये लोग पाता (कृषि व्यापार आदि) और शसके द्वारा ही अपनी जीविका करते हैं ॥ ५॥ इनके भतिरिक लिजिविक प्रमिक १ अध्या०] संघवृत्त (५०१) मलफ मदक कुकुर कुर और पाशाल आदि देशोके, केवल नाममायको राजा कहलानेवाले पुरपाके भी ये सघ होसे हैं। (इनमें से लिच्छियिक और मनिक नामकी क्षनियोंकी जातियां पाटलिपुग्न वर्तमान पटनाफे उत्तरकी ओरके देशाम रहा करती थी। प्राकृतम इन जातियोंको लिच्छवी और विजी कहते है। लिच्छियो क्षसियोंकी राजधानीका नाम 'यशालि ' था, जिसके चिन्ह अभी तक भी पायेजाते है।मलक जाति भी पटनाके आस पास यसती थी। इनकी राजधानीका नाम 'पाया' था। मद्क और कुकुर जातियां पजाबके मध्य देशॉमें निवास करती थीं। मदक देशका, पजामी भाषाका अपभ्रश नाम आजकल माझा है। कुरदेश वर्तमान अम्बाला करनाल आदिके जिलोंका इलाका है। ताज भादिक प्रान्तको 'पाशाल' कहते हैं। इन स्थानाम रहनेवाले क्षत्रिय आदि घगों के ही वे सप होते थे ) ॥६॥ सर्वेपामासन्नाः सत्रिणः संघानां परस्परन्यगद्वेपवैरकलह- स्थानान्युपलभ्य क्रमाभिनीतं भेदमुपचारयेयुः ॥७॥ असौ त्वा विजल्पतीति ॥ ८॥ एवमुभयतः ॥ ९ ॥ इन सय ही प्रकारके सघोंके समीप, सत्री (एक प्रकारके गुप्तचर ) पुरुष रहें, भार वे उन सब सघौके परस्पर दोपोंको, राथा टेप (कठोर वाक्यों भादिके द्वारा प्रकट किया हुआ फ्रोध), पैर ( भपकार आदिक कारण किसीके साथ द्रोह करना), और कलह स्थानोंको मानकर, धीरे २ उन्हें सामने लाकर उन सघों में ही परस्पर इसमकार भेद दालनेका उपफम करें ॥ ७ ॥ 'अमुक सघ तुम्हारी इस तरह निन्दा करता है' यह कहकर उस सघको दूसरेसे भएकाच ॥ ८॥ इसीप्रकार कहकर दूसरेको भी उससे भटका देवें। भर्थात् इधर उधर जाकर दोनों को एक दूसरेसे भिसा करदे ॥९॥ पद्धरोपाणां विद्याशिल्पगतवैहारिकेमाचार्यव्यञ्जना बालक- लहानुत्पादयेयुः॥ १० ॥ वेशशौण्डिकेषु वा प्रतिलोमप्रशंसाभिः संघमुख्यमनुष्याणां तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः ॥ ११ ॥ कृत्य- पक्षोपग्रहेण वा ॥१२॥ एक दूसरेके साथ मुख हुए २ सघोंके यालकोवा विद्या शिप पूत तथा प्रभोत्ता आदिके विषयमें, भाचार्यके वेपमें रहनेवाले गुप्तचर कलह उत्पन्न करादेवें ॥१०॥ अथवा वेश्या तथा सुरापान आदिमें भासक्त हुए २, सबके मुण्य मनुष्यों की उल्टी प्रशसा करवाकर, तीक्ष्णपुरुष, आपसमें ही उनका कला उत्पस करा दे । ॥ अथवा संघके मुख्य मनुष्यों के जो कृरय २
१५०२)
[११ माप
ये भी चुमार और तुर भी कुमार, फिर ये तुममे अधिक सुख सामग्रीको
कौटलीय अर्थशास्त्र
(उद लुब्ध भीत तया अवमानिस देखो-अधि० , अध्या. १४) व्यक्ति
हो, उनको अपने अनुकूल बनाकर, फिर उनका ही संघोंके साथ कला
उत्पन्न करादे ॥ १२॥
कुमारकाविशिष्टच्छन्दिकया हीनच्छन्दिकानुत्साहयेयुः
॥ १३ ॥
संघके कुमारोंमें जो माघेक योग्य वस्तुको रेकर सुखपूर्वक रहते
हों, उनके मुकाबले में पोटी योग्य सामग्रीको लेकर निगह करनवाले संघ
कुमारीको भड़कायें । अर्थात् ममी कहकर उत्तीजत करें कि देखो
उपभोग क्यों करते हैं॥ १३॥
- । - अध्या संघवृत्त (५०३३ सर्वेषु च कलहस्थानेषु हीनपक्षं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य गतिपक्षवधे योजयेत् ।। १९ ॥ भिन्नानपयाहयेद्वा ।। २० ॥ इस तरहके सपही कलहके अवसरों पर राजा, हीनपक्ष (जिसको सं. के साथ कोई पक्षपात न हो, ऐसे किसी संघकटी ) पुरुषको, कोश और पड हा अपने अनुकूल पनाकर, प्रतिपक्ष (शत्रु पध करने में नियुक्त कर थे ॥ ९॥ अपया संपके प्रतिकुल हुए २ उन• पुरुषों को संघसे टएर कर ये १६ २०१ एकदेशे समस्तान्या निवेश्य भूमौ चैपां पञ्चकुली दशकुली "पा कृष्यां निवेशयेत् ॥ २१॥ एकस्था हि शस्त्रग्रहणसमर्थाः स्युः ॥ २२ ॥ समवाये चैपामत्ययं स्थापयेत् ॥ २३ ॥ भधया किसी एक प्रदेशमें इन सपको इकदा बसाकर, इनकी भूमिमें पि करने के योग्य पञ्चकुली या दशकुली गांवोंको यसाये 1 अर्थात् इनके पांच २ इस २ कुलोके छोटे २ गांवोंको पृथक् र यसाचे ॥२॥ ॥ क्योंकि यदि इनको एक साधी यसा दिया जायगा, तो समय है, ये लोग फिर कभी विजिगीषुके विरुद्ध हथियार उठाने में समर्थ होजावें ॥ २२ ॥ इनकी आबादी के बीच ३ में मोसी २ सेना भवश्य नियुक्त कोजावे ॥ २३ ॥ राजशब्दिभिरवरुद्धमवक्षिप्तं का कुल्यममिजातं राजपुत्रत्त्वे स्थापयेत् ॥ २४ ॥ कान्तिकादिवास्य वर्गो राजलक्षण्यतां संघेषु प्रकाशयेत् ॥ २५॥ अब नाममानको राजा कहलाने वाले संघोंको आपस में भिन्न करने के जय पताये जाते है:-राजा नामको धारण करने वाले लिच्छिवी मादि क्षत्रि- घरे हुए अथवा तिरस्कृत किये हुए, उप कुलोत्पल गुणी शक्तिको राज- रूपमें स्थापित करे : अयोस् 'मह राजपुन है' इस प्रकार विजिगीषु असिद्धि को ।। २१ और इससे सम्बन्ध रखने वाले देवा (ज्योसिपी) सामुद्रिकशाखी पुरुष, इसको लिच्छिपी आदि संघों में, राजलक्षण से युक्त त करें॥२५॥ संघमुख्यांश्च धर्मिष्ठानुपजपेत् ।। २६ । स्वधर्ममाप्य राज्ञः या प्रस्भ्रिातरि वा प्रतिपयध्यामिति ॥ २७ ॥ प्रतिपन्ने कृत्यपक्षो. का शीर्थमर्थ दण्डं च प्रेषयेत् ।। २८ ॥ -- (५०६) कोटलीय अर्थशास्त्र [११ अधि० द्वारा उन्माद युक्त बंगावें । अर्थात् स्त्रियोंके फन्दे में फंसाकर उन्हें प्रमादी बनावें ॥ ४० ॥ जब उनमें से बहुतसे संघमुख्य खियोंकी कामना करनेटगे, तो किसी एकको कहीं विशेष स्थान पर स्वीके मिलनेका संकेत करके, उस स्त्रीको वहां से अन्य किसी संघमुख्य पुरुषके द्वारा दूर करदेवे, या उससे ही उस स्त्रीका अपहरण करादेचे । तदनन्तर यही वहाना लेकर उन संघ. मुख्यों में आपसमें ही प्रगदा पैदा करादेवें ॥५॥ भगदा होनेपर तीक्ष्ण पुरुष अपना काम करें; अर्थात् भापसमें झगड़ा करनेवाले उन संघमुरय पुर्षों में से किसी एकको मारडालें ॥ ४२ ॥ तदनन्तर यह प्रसिद्ध करदें, कि इस कामी पुरुपको इसके प्रतिद्वन्द्वी दूसरे कामुक पुरष ने मारढाला है ॥ ४३ ॥ विसंवादितं वा मर्पयमाणमभिसृत्य स्त्री ब्रूयात् ॥ ४४ ॥ असौ मां मुख्यस्त्वयि जातकामां बाधते ॥ ४५ ॥ तसिञ्जीपति नेह स्थास्यामीति घातमस्य प्रयोजयेत् ।। ४६ ।। यदि उन संघमुख्योम परस्पर झगड़ा होनेकी सम्भावना होनेपर एक उनमें से सहन करजावे; और दूसरेके साथ स्रोके लिये झगडा करना न चाहे, तो स्वयं उसके पास आकर इसाक र कहः - ॥ ४४ ॥ अमुक संघमुरय पुरुष, भापके अन्दर मेरी अभिलाण होने पर भी मुझे रोकता है । अर्थात् मैं भापको दिलसे चाहती हूं, और वह इसमें बाधा पहुंचाता है ॥ ५ ॥ उसके जीवित रहते हुए मैं यहां नहीं रह सकेंगी, अर्थात् आपके पास नहीं ठहर सकूगी' । इसप्रकार कहकर उसके वधका आयोजन करवादेवे ॥ ५६ ॥ प्रसह्यापहृता घोपवनान्ते क्रीडागृहे वापहर्तारं रात्रौ तीक्ष्णन वातयेत् ॥ ४७ ॥ स्वयं या रसेन ॥४८॥ ततः प्रकाशयेत् ॥४९॥ अमुना मे प्रियो हत इति ॥ ५० ॥ 'अथवा बलात्कार अपहरण की हुई स्त्री, जंगलों या कोडागृहमें, . 'अपहरण करनेवाले पुरएको, रात्रिके समय तीक्ष्णपुरपके द्वारा मरवाहाले । अपना स्स्य ही विष आदि देकर उसे मारडाले ॥ १८ ॥ और फिर पह प्रक्ट करे, कि.-॥ ४९ ॥ अमुक प्रतिद्वन्द्वी कामुक पुरपने मेरे पारेको मार डाला है । ( अर्थात् उस संघमुख्यके मारनमें अन्य किसी संघगुरयका नाम लपादेव)॥ ५० ॥ जातकामं वा मिव्यञ्जनः सांवननिकीभिरोपधीभिः संवा- स रसेनातिसंधायापगच्छेत् ॥ ५१ ॥ तसिन्नएकान्ते सतिणः परप्रयोगमभि संयुः ॥ ५२ ॥ .
१ अभ्या "संघवृत्त (५०७) भथया संघमुख्यकी, खीम उरकण्ठा उपस होजागेपा, सिद्ध के वेपमें रहनेवाला गुप्तचर, वशीकरण के लिये उपयुक्त श्रीपाधियोंके बहानेसे, विष. मिश्रित प्रापधों के द्वारा उस संघमुख्य पुरुषको मारकर भागजावे ॥ ५ ॥ उसके भाग जानेपर अन्य सनी पुरुष, इस यातको प्रसिद्ध करदें, कि इसके प्रतिद्वन्दी दूसरे कामी पुरुषने ही यह काम किया है। अर्थात् उसकी प्रेरणा ही सिद्ध पुरुपने इसको विप देकर मारडाला है ॥ ५२ ॥ आत्यविधवा गूढाजीया योगस्त्रियो वा दायनिक्षेपार्थ वि- वदमानाः संघमुख्यानुन्मादयेयुरिति ॥ ५३॥ अदितिकौशिक- स्त्रियो नर्तकी गायना वा ॥ ५४ ॥ प्रतिपन्नान्गूढवेश्मसु रात्रि- समागमप्रविष्टांस्तीक्ष्णा हन्युर्वध्या हरेयुर्या ॥ ५५ ॥ धनी विधया नियां, गृढानीवा (सधवा भी दरिद्रताके कारण व्यभिचार आदिसे अपनी जीविका करने वाली स्त्रियां), अथया कपटपूर्वक स्त्रीका घेप धारण करने वाले पुरुषही दायमाग तथा निक्षेप (भमानत ) भादिके लिये विवाद करते हुए, संघ मुख्य पुरुषोंको उम्मादयुत पनावें । अर्थात् विवादके निर्णय के बहानेसे उनके पास जाकर उन्हें अपने वशमें करनेका यस करें ॥ ५३ ॥ अषया अदितिखियां (सह २ के देवताओंके चिनोको दिखाकर अपनी आजीविका करने वाली स्त्रियां ), कौशिकखियो ( सांपोंको पकाने वाले सपेरों की नियां), या नाचने गाने वाली मियाही जाकर संघ मुरव्योंको अपने फन्दे में फंसाय ॥ ५५ ॥ जब संघमुख्य पुरुष इन स्त्रियों की बातों में आजायें, और उनमे समागम करने के लिये किन्धी निश्चित स्थानोंका संकेत करदें, तप उन छिपे हुए घरों में रात्रिके समय समागम करने के लिये प्रविष्ट हुए २ संघमुख्य पुरुपोको, तीक्ष्णपुरुष मारढाले; अथवा उनको बांधकर अपहरण करलेजावें॥५५॥ सत्त्री वा स्त्रीलोलपं संघमुख्यं प्ररूपयेत् ॥ ५६ ॥ अमु- प्मिन्ग्रामे दरिद्रकुलमपसृतम्, तस्य स्त्री राजार्हा, गृहाणैनामिति ॥ ५७ ॥ गृहीतायामर्धमासानन्तरं सिद्धव्यञ्जनो दृष्यसंघमुख्यं मध्ये प्रक्रोशेत् ।। ५८ ॥ असौ मे मुख्यां भार्या स्नुपां भगिनी दुहितरं वाधिचरतीति ॥ ५९ ॥ अथवा सत्री, स्त्रीलोलुप संघमुख्य पुरपको इसप्रकार कहे:-॥५६ ॥ भनुक माममें एक दरिद्र कुलका पुरुष, जीविकाके लिये बाहेर विदेश में चला " [११ अधिक - (५०८) कौटलीय अर्थशास्त्र गया है, उसकी सी राजाके योग्य है, आप इसको लेले ।। ५७ ॥ यदि वा संघल्प पुरुष, उस प्रोको हेलेये, तो पन्द्रह दिन के बाद सिरके घेपमें एक दूग्य पुरुष (राजाके साथ झगरा करके रहने वाला पुरए), संघमुरायके धीच में आकर इस प्रकार चिलावे, भात् शोर मचाव:-॥ ५८ ॥ कि यह संघ. मुख्य पुरुष मेरी मुख्यभार्या, पुप्रभार्या, बहिन या लाकीको पलाका उपभोग करता है । अधात् भार्या आदि किसी एका नाम लेकर वह भाक्रन्दम करे॥ ५९॥ तं चेत्संघो निगृहीयाद्राजैनमुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेत ।। ६० ।। अनिगृहीते मिद्धव्यञ्जनं रात्रौ तीक्ष्णाः प्रवासयेयुः ।। ६१ ॥ ततस्तद्यञ्जनाः प्रक्रोशेयुः ॥ ६२ ॥ असौ ब्रह्महा ब्राह्मणीजारश्चेति ॥ ६३ ।। यदि इस बात पर संघ, उसको (संघमुख्य पुस्पको) गिरफ्तार कर- लेवे; तो विजिगीषु राजा, निगृहीत हुए २ उसको अपनी ओर मिलाकर यात् अपने अनुकूल बनाकर; विरोधी संघोंके मुक बलेमें उसे युद्ध करने के लिये खड़ा करदेवे ॥५०॥ यदि संघ, उसको गिरफ्तार न करे, तो सिद्धके वेरम भाने वाले उस दूप्य पुरुषको, तीक्ष्ण पुरुष रातमें मार दालें ॥ ६ ॥ १६. मन्तर स्वयं ही सिद्धके वेपमें आकर इसप्रकार कोलाहल मचाव:-॥१२॥ यह संघमुख्य पुरुष माहत्यारा है, और यह माह्मणीके साथ जारकर्म करता है। भर्यात् उस सिद्ध प्राहाणकी पाके साथ दुष्कर्म करता है और इसीने उस सिद्धको मरया दाला है । ६३ ॥ काान्तिकव्यञ्जनो या कन्यामन्येन वृतामन्यस्य प्ररूपयेत् ॥६४ ॥ अमुष्य कन्या राजपत्नी राजप्रसविनी च भविष्यति ॥६५॥ सर्वस्वेन प्रसह्य चैनां लभस्वेति ॥ ६६ ॥ अलभ्यमा. नायां परपक्षमुद्धपयेत् ॥ ६७ ॥ लब्धायां सिद्धः कलहः ।।६।। अथवा दैवज्ञ (ज्योतिपीके ) वेषमें रहने वाला सत्री, अन्य किसी सपमुख्यसे वरण कहुई कन्याको, और किप्ती संघमुख्यके लिये बतला देये । और उससे इस प्रकार कहे:-॥ ६४ ॥ अमुक पुरपकी कन्या, राजपवी और गाजमाता होगी; अयात् उससे जो विवाह करेगा, यहभी राजा होगा, और उसले जो पुत्र उत्पल होगा, यहभी अवश्य राजा होगा ॥६५॥ इसलिये अपना सर्वस्व देकरभी, अथवा पलास्कारसे इसको अवश्यही प्राप्त करो। भी नसेगी होसके, इसको अपनेभधीन अवश्य करो॥६६॥इस तरह करने के संघवृत्त अश्या०] ( ५०९) पाद प्रयय करने परमी यदि यह मंघमुख्य पुरुष उस कन्याको प्राप्त न करसके; तो पहिले चरण करने वाले पक्षकाही, इसके विरुद्ध उत्साहित करे ॥ ६ ॥ यदि कन्याको वह प्राप्त करले, सो दोनों का झगदा होजाना निश्रितही है ॥ ६८ ॥ मिक्षुकी वा प्रियभार्य मुख्य पात् ॥ ६९ ॥ असौ ते मुख्यो यौवनोत्सितो भार्यायां मां प्राहिणोत् ।। ७० ॥ तस्याहं मयाल्लेख्यमाभरणं गृहीत्वाऽऽगतासि ।। ७१ ॥ निर्दोपा ते भार्या ॥ ७२ ।। गढमसिन्प्रतिकर्तव्यम् ।। ७३ ॥ अहमपि तावत्प्रति- पत्स्यामीति ॥ ७४ ॥ भयवा भिक्षुकी (भिक्षुको भिखारिनके मेपरें गुसचर-स्त्री या पुरुष), अपनी भासि प्यार करने वाले किसी संघमुए प पुरपके पास आकर इस प्रक र कहे ॥ ६९ ॥ अपनी जवानीका घमण्ड करने वाले अमुक संघगुग्थ्य पुरुषने, आपकी छीके पास अपने समागमको विषम लगाने के लिये मुझे दूसरी बनाकर भेजा है ॥ ७० ॥ मैं उसके दरसे यह लेखान और आभूषण मादि लेकर आई हूं।॥ १॥इस विषयमें भापकी स्त्री सर्वथा निर्दोष है ॥७२॥ आप छिपे तारपर इस यातका भीमरह प्रतीकार करें । अर्थात् धुपचापही इस संघमुएम पुरुषको मरवा दाले ॥ ७३ ॥ मंभी तय तक तुम्हारे समीपाही रहना भनी कार करूंगी। (तसंप या है, कि यदि उस संपमुख्य पुरुषके मरवा देने हे पहिलेही मैं यहांले चली गई, तो यह अवश्यही मुझे नष्ट करादेगा। इसलिये जब तक आप उसे नहीं मरवा देते, तबतक मैं आपकीही सेयाम रहूंगी)॥ ७४ ॥ एवमादिपु कलहस्थानेषु स्वयमुत्पन्ने वा कलहे तीक्ष्णैरुत्पा- दिते वा हीनपक्षं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य विगुणेषु विक्रम- येदपवाहयेद्वा ।। ७५ ॥ इसप्रकारके कलहकारणोंकी उपस्थितिम, म्ब यही झगड़ोंके उत्पन्न होनेपर, भयवा तीक्षा भादि पुरुषों के द्वारा उपम किये जाने पर हीनपक्ष (जिपका पक्ष कुछ शाक्ति सम्पन न हो, ऐसे ) संघमुरप आदि पुरुषको, विजिगीषु राजा, कोश तथा सेनाको उचित सहायता देकर अपने अनुकूल बना लेवे; और अवसर आनेपर, विरोध करनेवाले संघोंके मुकाबले में युद्ध करने के लिये उसे तैयार कर देव । यदि यह युद्ध करने में असमर्थहो, तो उसे अपने देवासे निकाल देव ।। ७५ ॥ .
[११ बाघ कौटलीय अर्थशास्त्र संघषेवमेकराजो वर्तेत ॥ ७६ ॥ संघावाप्येवमेकराजादे- तेभ्यो ऽतिसंधानेभ्यो रक्षयेयुः ।। ७७ ।। इसप्रकार विजिगीषु, संघॉम १६ मुख्य राजा बनकर रहे । भयात् उन सपके ऊपर अपना पूर्ण भाधिपत्य रखता हुभाही अपने व्यहारको चलावे ॥ ७६ ॥ भोर संघभी इसप्रकार चेष्टा (पहार) करते हुए राजासे, भीर उसके द्वारा फैलाये हुए इन जालोसे अपने आपकी रक्षा करें । यहातक संघीमें राजाके, भीर राजाम संघाके पयहारका निरूपण करदिया गया ॥७॥ संघमुख्यश्च संघेपु न्यायवृत्तिहितः प्रियः । दान्तो युक्तजनस्तिष्ठेत्सर्वचित्तानुवर्तकः ।। ७८ ॥ इति संघवृत्ते एकादशे ऽधिकरणे भेदोपादानानि, उपांशु एउश्च प्रथमो ऽध्यायः । आदितः पत्रिंशतः ॥ १३५ ॥ एतावता कौटलीयस्यार्थशास्त्र संघवृत्तमेकादशमधिकरण समाप्तम् ॥ ११ ॥ भय उपसंहार श्लोकसे, संघोंमें सघमुख्यके व्यवहारका निरूपण किया जाता है:-सपमुख्यको चाहिये, कि वह संघोंमें सदा न्पाययुक्त हितकारी तथा प्रिय व्यवहार करे । कमी उद्धततासे काम न लेवे; तथा अपने अनुकूल पुरोकोही अपने समीप रक्खे, और सब संघके पुरुषों के मतानुसारही व्यवहारोंको रे ॥ ७८ ॥ सहवृत्त एकादश अधिकरण पहिला अध्याय समाप्त । सङ्घवृत्त एकादश अधिकरण समाप्त ।
आबलीयस द्वादश अधिकरण पहिला अध्याय १६२ प्रकरण दूतकर्म । यह भावलीयस थारहयो अधिकरण है। इसमें प्रयल अभियोक्ता के प्रति दुबळ राजाको क्या करना चाहिये' इस बातका निरूपण किया जायगा। सबसे प्रथम इस अधिकरण के पहिले अपाय दूतके कायाका कथन करते हैं। बलीयसाभियुक्तो दुर्बलः सर्वत्रानुप्रणतो चेतसधर्मा तिछेत् ॥ १ ॥ इन्द्रस्य हि स प्रणमति यो बलीयसो नमतीति भारद्वाजः ॥२॥ जय किसी दुर्घल राजापर कोई बलवान् राजा आक्रमण करे, तो यह उसके सामने, हरतरहका तिरस्कार होनेपर भी झुका रहे। जिसप्रकार जलके वेगके सामने येतका पेड़ झुका हुया या उसके भनुप्तार रहकर, भपनी स्थितिको पनाये रखता है; इसीप्रकार दुल राजा बलवान् राजाके सामने नम्र या उसके अनुकूल रहता हुआ अपनी स्थितिको दृढ़ बनाये रक्ख ॥ १॥ जो अपनेसे बलवान् राजाके सामने झुकता है, वह इन्द्र के सामने झुकता है, यही समझना चाहिये । यह सब भारद्वाज आचार्यका मत ॥२॥ सर्वमंदोहेन बलानां युध्येत ॥३॥ पराक्रमो हि व्यसन- मपहन्ति ॥४॥ स्वधर्मश्चैय क्षत्रियस्य ।। ५ ।। युद्धे जयः पराजयो वेति विशालाक्षः ॥६॥ विशालाक्ष आचार्यका इस विषयमें यह मत है, कि दुघल राजा, बलवान् राजाके मुकाबले में भी अपनी सेनाओं के सम्पूर्ण सामध्यके साथ युद्ध करे ॥ ३ ॥ क्योंकि परामम ही आपत्तियोंको नष्ट करदेता है ॥ ४ ॥ और क्षत्रिय का पह (पराक्रम करना) अपना धर्म है । ५ ॥ युद्धमें जय [१२ अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र हो, या पराजय हो, क्षत्रियको अपने धर्म पराक्रम का ही पालन करना चाहिये । शत्रुके पैरों में कभी न गिरना चाहिये ॥ ६॥ नेति कौटल्यः ।। ७॥ सर्वत्रानुप्रणतः कुलैंडक इव निराशो जीविते वसति ॥ ८ ॥ युध्यमानश्वाल्पसैन्यः समुद्रामिवाप्लवो- ऽवगाहमानः सीदति ॥ ९ ।। तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्ग- मविपा वा चटत ॥१०॥ परन्तु कोटल्य भाचार्य भारद्वाज और विशालाक्षके इन दोनों ही मतोंको नहीं मानता ॥ ७ ॥ यह कहता ह, कि मो दुर्पल राजा, हरतरह का तिरस्कार होनेगा भी नन ही बना रहता है, वह अपने झुंडमे अलहदा हुए २ कुलके मेंढेके समान (जो मेंढर मारने के लिये ही रक्खा जता है, उपको कुलडक' कहते हैं। उपके जीवन में सदा ही सदा रहता है, ग मालम किस समय मारदिया जाय।हिनदीमें इसीसे एक कहावत बनगई है-'बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी। इसी तरह ) जीवन से निराश हुभा २ जैसे तैसे निवास करता है । अांत ऐसे दुर्भल राजाको अपना जीवन भी भारी होजाता है ॥ ८ ॥ और इसीतरद शोढ़ी सेनाकी सहायता लेकर ही जो युद्ध करने लगजाता है, वह राजा, सणसाधन के मिना ही समुदमें प्रवेश करजामेघाले पुरपके समान अवश्य दु.ख उठाता है ॥ ९॥ इसलिये दुल राजाको चाहिय, कि वह अपने प्रतिद्वन्द्वी राजाके समान या उससे भी अधिक शक्ति रखनेवाले किसी अन्य राजाका माध्य रेलवे । अथवा ऐसे दुर्गमें जाकर अपना कार्य भारम्भ करे, जिसपर शत्रुका कुछ बस न चर. सकता हो । अर्यात ऐसे राजा या दुर्गका आश्रय लेकर ही दुल राजा अपने शत्रुका मुकाबला करे ॥ १० ॥ त्रयो ऽभियोक्तारो धर्मलोभासुरविजयिन इति ॥११॥ तेपामभ्यवपच्या धर्मविजयी तुष्यति ।। १२ ।। तमभ्ययपद्येत परेपामपि भयात् ॥ १३ ॥ अभियफा (दुर्घल राज पर भाफ्रमण करनेघाला घलबाम् राजा) तीन प्रकारके होसकते हैं । धर्मविजयी, लोमविजयी और भसुरविजयी ।। 111 उनसे धर्मविजयी, आत्मसमर्पण करने ('म तुम्हारा हूँ' इस प्रकार कहने) से ही सन्तुष्ट होजाता है ॥ १२॥ उस धर्मविजयी राजाको सन्तुष्ट रक्ले । न चल इस विष रसे कि उसमे भय न रहे, किन्तु इस विचारसे भी कि ऐसा करने पर दूभरे शत्रुसे भी भय न होगा। तारपर्य यह है
१ मध्या०]
आयलीयस
कि धर्मविजयी अभियोक्ता सन्तुष्ट होनेपर, स्वयं तो पाधा पहुंचाताही नहीं,
किन्तु भन्यशत्रुपे भी उस दुर्यल राजाकी मदा रक्षा करता है ॥ ३॥
भूमिद्रव्यहरणेन लोभविजयी तुष्यति ॥ १४ ॥ तमर्थेना-
भ्यवपद्यत ॥१५॥ भूमिद्रव्यपुत्रदारप्राणहरणेनासुरविजयी
॥ १६ ।। तं भूमिद्रव्याभ्याशुपगृह्याग्राह्यः प्रतिकुर्वीत ॥ १७ ॥
लोभविजयी भभियोक्ता, भूमि भीर द्रव्य लेनेसे ही सन्तुष्ट होता है
॥ १४ ॥ इसलिये दुर्यल राजा, धनादिके द्वारा उसको सन्तुष्ट रक्खे ॥ १५ ॥
असुरपि नगी मियोपता तो, भूमि द्रव्य पुग्न स्त्री और प्राणों तकका भी अप-
हरण फालने परही सन्तुष्ट रहता है ॥ १६ ॥ इसलिये उससे कभी भी न
मिलकर दूरही रहते हुए, उसकी इच्छानुपार भूमि भीर दम्य देकर उसको
भनुकूल बनाये, तथा सन्धि भादिक ारा उसका प्रतीकार करे ॥१७॥
तेपामुत्तिष्ठमानं संधिना मन्त्रयुद्धेन कूटयुद्धेन वा प्रतिव्यूहे.
त ॥ १८ ॥ शत्रुपक्षमस्य सामदानाभ्याम् ॥ १९ ॥ स्वपक्षं
भेददण्डाभ्याम् ॥ २० ॥ दुर्ग राष्ट्र स्कन्धाकारं वास्य गूढाः
शखरसाग्निभिः साधयेयुः ॥ २१ ॥
उगमसे किसी एकका, जो अपने ऊपर आममण करने के लिये तैयार
हो, सन्यिके द्वारा, मन्त्रयुद्धसे अधया कूटयुद्धसे मुकाबला को । (किती २
पुस्तकमें 'तेपामुत्तिष्ठमानं' के स्थानपर 'नेपामन्यनममुतिष्ठमान' ऐसा भी
पाट है । अर्थमें कोई विशेषता नहीं ) ॥ १८ ॥ मन्नयुद्धका यह दंग है:-
इसके शत्रुपक्षको भयात् प्रयल अभियोक्ताके शत्रुपक्षको, साम और दानके
द्वारा अपने अनुकूल बनानेका यन करे ॥ १९॥ और अपने पक्षको, अर्थात्
अपने अमात्य भादि प्रकृतिवर्गको भेद और दण्ड के द्वारा अपने घशमै रक्स
॥ २० ॥ कूटयुन्छका यह ढग समझना चाहिये:-प्रयल अभियोक्ताके दुर्ग
राष्ट्र तथा छायनियोंको अपने गृदपुरुषों के द्वारा, छिपकर शखबहार करने,
विष देने तथा भाग आदि लगा देनेसे नष्ट कर या वे ॥२१॥
सर्वतः पार्णिमस्य ग्राहयेत् ॥ २० ॥ अटवीमि राज्यं
घातयेत् ॥ २३ ॥ तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां या हारयेत् ॥ २४ ॥
पीछे तथा इधर उधरसे, यस अभियोक्ताकी पार्षिणका ग्रहण करवाये।
अभिप्राय यह है कि भवसर पापर अभियोक्ताचे पीछे की भोरसे, या
इधर उधर बाजुओकी भोरसे इसपर छापा मारमेका प्रपन्ध करपावे ॥२१॥
[१२ मधिल - - कौटलीय अर्थशास्त्र हो, या पराजय हो, क्षत्रियको अपने धर्म पराक्रम का ही पालन करना चाहिये । शत्रुके पैरों में कभी न गिरना चाहिये ॥ ६ ॥ नेति कौटल्यः ॥७॥ सर्वत्रानुप्रणतः कुलडक इव निराशो जीविते वसति ॥ ८॥ युध्यमानवाल्पसन्यः समुद्रामवाप्लयो- ध्वगाहमानः सीदति ॥ ९॥ तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्ग- मविपा वा चरेत ॥ १० ॥ परन्तु कोटल्य भाचार्य भारद्वाज और विशालाक्षके इन दोनों ही मतोंको नहीं मानता ॥ ७ ॥ वह कहता है, कि गो दुर्घल राजा, हरतरह का तिरस्का होनेपर भी नम्र ही बना रहता है, वह अपने मुडमे भलइदा हुए २ कुरु के मेढेके समान (जो मेंढा मारने के लिये ही रक्सा जता है, उपको 'कुलडक' वहते हैं। उसके जीवन में सदा ही सन्द रहता है, न मालम किस समय गारदिया जाय ! हिन्दी में इसीसे एक कहावत बनगई है-'यकोकी मां कब तक खैर मनायेगी। इसी तरह ) जीवनसे निराश हुआ २ जैसे तैसे निवास करता है । अर्थात् ऐप दुर्घल राजाको अपना जीवन भी भारी होजाता है ॥ ८ ॥ और इसीतरह थोड़ी सेनाकी सहायता लेकर हो जो युद्ध करने लगजाता है, वह राजा, सरणसाधन के बिना ही समुदम प्रवेश कर जानेवाले पुरपके समान अवश्य दुःख उठाता है ॥ ९॥ इसलिये दुर्भल राजाको चाहिय, कि वह अपने प्रतिद्वन्द्वी राजाके समान या उससे भी अधिक शक्ति रसनेवाले किसी अन्य राजाका माधय लेलय । अथवा ऐसे दुर्गमें जाकर अपना कार्य भारम्भ करे, जिसपर शत्रुका कुछ यस न चर. सकता हो । अर्थात् ऐसे राजा या दुर्गका आश्रय लेकर ही दुर्यल राजा अपने शत्रुका मुकाबला करे ॥ १० ॥ त्रयो अभियोक्तारो धर्मलोमासुरविजयिन इति ॥ ११ ॥ तेपामभ्यवपच्या धर्मविजयी तुष्यति ॥ १२ ॥ तमभ्यवपद्येत परेपामपि भयात् ।। १३ ।। अभियोक्ता (दुर्बल राम.पर आक्रमण करनेपाला पलपान् राजा) सीन प्रकार के होसकते हैं । धर्मविजयी, लोभविजयी और भसुरविजयी ॥1॥ उनमेंसे धर्मविजयी, आत्मसमर्पण करने (मैं तुम्हारा हूँ' इस प्रकार कहने) से ही सन्तुष्ट होजाता है ॥१२॥ उस धर्मविजयी राजाको सन्तुष्ट रफ्ते ; नवल इस विक रसे दि उसमे भय न रहे, किन्तु इस विचारसे भी कि ऐमा करनेपा झरे शत्रुसे भी भय न होगा ! तारपर्य यह है १ मध्या आपलीयस कि धर्मविजयी भमियोक्ता सन्तुष्ट होनेपर, स्वयं तो पाधा पहुंचाताही नहीं, किन्तु भन्यशत्रुमे भी उस दुर्यल राजाकी सदा रक्षा करता है ॥ १३ ॥ भूमिद्रव्यहरणेन लोमविजयी तुष्यति ॥ १४ ॥ तमर्थेना- भ्यवपद्यत ॥ १५ ॥ भूमिद्रव्यपुत्रदारप्राणहरणेनासुरविजयी ॥ १६ ॥ तं भूमिद्रव्याम्यागुपगृह्याग्राह्यः प्रतिकृति ।। १७ ॥ लोभायजयो अभियोक्ता, भूमि और इध्य लेनेसेही सन्तुष्ट होता है ॥ १४ ॥ इसलिये दुर्यल राजा, धनादिके दाग उसको सन्तुष्ट रक्खें ॥ १५॥ असुरचिनयी अभियोक्ता तो, भूमि दम्य पुत्र स्त्री और प्राणों तकका भी अप. हरण करलेने पाही सन्तुष्ट रहता है ॥ १६ ॥ इसलिये उससे कभी मी म मिलकर दूरही रहते हुए, उसकी इच्छानुसार भूमि और दम्य देकर उसको भनुकूल यनावे, तथा सन्धि भादिके द्वारा उसका प्रतीकार करे ॥ १७ ॥ तेपामुनिष्ठमान संधिना मन्त्रयुद्धेन कूटयुद्धेन चा प्रतिब्यूहे- त ॥ १८ ॥ शत्रुपक्षमस्य सामदानाभ्याम् ॥ १९ ॥ स्वपक्षं भेददण्डाभ्याम् ॥ २० ॥ दुर्ग राष्ट्र स्कन्धावार वास्स गूढाः शस्त्ररसानिमिः साधयेयुः ॥ २१ ॥ उनमे से किसी एकका, जा अपने ऊपर भाक्रमण करने के लिये तैयार हो, सन्धिके द्वारा, मन्ययुद्ध से अथवा कूटयुसे गुकाबला करे । (किसी २ पुस्तकमे 'तेपामुत्तिष्ठमान' के स्थानपर 'सेषामन्यनममुक्तिएमान' ऐसा भी पाठ है । अर्थ में कोई विशेषता नहीं)॥ १८ ॥ मन्ययुद्धका यह दंग है:- इसके शत्रुपक्षको अर्थात् प्रयल अभियोक्ता के शत्रुपक्षको, साम और दानके द्वारा अपने अनुकूल बनानेका या करे ॥ १९ ॥ और अपने पक्षको, भर्थात् अपने अमात्य भादि प्रकृतिवर्गको भेद और दण्ड के द्वारा अपने वशमै रक्से ॥ २० ॥ कूटयुन्द्रका यह ढग समझना चाहिये।---प्रबल अभियोक्ताके दुर्ग राष्ट्र तथा छावनियोंको अपने गूढपुरषोंके द्वारा, छिपकर शास्त्रमहार करगे, विष देने तथा आग आदि लगा देनेसे नए करवा देवे ॥२१॥ सर्वतः पार्णिमस्य ग्राहयेत् ॥ २० ॥ अटवीमिर्वा राज्य पातयेत् ॥ २३॥ तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां वा हारयेत् ॥ २४ ॥ पीछे तथा इधर उधरसे, प्रबल अभियोक्ताकी पारिणका ग्रहण करवाये। अभिप्राय यह है, कि भवसर पानेपर अभियोक्ताके पीछे की भोरसे, पा इधर उधर वाजुभोंकी भोरसे इसपर छापा मारनेका प्रबन्ध कापावे ॥२२॥ ।
(५९४)
कोटलीय अर्थशास्त्र
[१२ आधिक
अथवा भादपिक पुरपोके दाग, इसके राज्य भयात् दुर्ग जनपद आदिको नष्ट
करयादेचे ॥ २३ ॥ भषया अभियोकाकही किमी अन्य पन्धु पान्धवके द्वारा,
या रोके हुए. (पन्धनम डाले हुए) उसके (मभिपीताक) पुन भादिक द्वाराही,
इपके राज्यका अपहरण कादव ॥ २४॥
अपकारान्तेषु चास्य दूतं प्रेपयेत् ।। २५ ।। अनपकृत्य या
संधानम् ॥ २६ ॥ तथाप्यभियान्तं कोगदण्डयोः पादोत्तरमहो-
रात्रोत्तरं वा संधि याचेत ॥ २७ ॥
इसतरह उसका अपकार कराकर, तदनन्तर सन्धिके लिये उसके
पास अपना दूत भेज । क्योंकि एमी अवस्थांम सरलतासही सन्धि जाया
करती है ॥ २५ ॥ अयमा यदि दुल राजा, प्रबल अभियाताका क्रिपी तरह
का भी अपचार करने में समर्थ न हो, तो ऐसी अवस्थामें भी स्वयं सन्धि की
याचना करे ॥ २६ ॥ यदि फिर भी वह सन्धि न करे, और सुदाई करने के
लियेही उतारू होरहा हो, सो सन्धि की शचंक लिये पहिलेमही नियतसंरप्रक
धन और सेनाम च याई हिस्सा और बढाकर सन्धि की याचना करे । अथवा
दिन और रातकी संख्या बढाकर भी सन्धि की याचना करे । इसका अभिप्राय यह
है।दुल के द्वारा नियरा समयतक सन्धिकी याचना करने पर आर अपना
अभिलपित धन देने पर भी यदि अभियोक्ता सन्धि करनेको तयार न हो, तो
अभियोक्ताको इच्छा अनुसारही धन देकर, उत्तने समयम और अधिक दिन
जोड़कर तन्धि की यारना करे अर्थात् सन्धिके दिनोंकी भवधि और बढवा
स चेद्दण्डसंधिं याचेत कुण्ठमसै हस्त्यश्च दद्यादुत्साहितं वा
गरयुक्तम् ॥ २८ ॥
यदि अभियाना, सेनाकी सम्धिकी याचना करे, अर्थात् सन्धिकी
सत्ताम लेनाको ही लेना चाहे, नो दुबैर राजाको चाहिये, कि वह अपने
कुण्ड अभीत् वार्य वरनम सर्वथा अशक्त हाधी घोरको देदेव । अधया
उत्साह ( कार्य करनेगे समर्थ) हाथी घोड़ोंको भी ऐसा विग खिकाका
देटाले, जिससे कि वे पन्द्रह धीस दिन या महीने भर के पाद तक मर
जावे॥२८॥
पुरुषसंधिं याचेत प्यामित्राटवीवलमले दद्यायोगपुरुपाधि-
ठितम् ॥ २९ ॥ तथा कुर्यायोभयविनाशः स्यात् ॥ ३० ॥
आपलीयस
२ अध्या०]
यदि अभियोका, पुरप सन्धिकी याचना को, भात् सम्धिकी शर्तोम
पैदल सेनायो हेना चाहे, तो अपने योगपुरपासे ( विप, गैस तथा दूषित
जल आदिको देकर दूष्प आदि सेमाको मारडालने वाले, भरने विश्वस्त
गृटपुरपॉसे) मुफ, दूप्यपल, शत्रुक्ल तथा भारविक पलको इसके लिये
देदेये ॥ २९ ॥ और इसपकारका प्रबन्ध करे, जिससे कि अपमो दीहुई
दूप भादि सेना, तथा शत्रुकी सेना दोनोका ही अप बिनाश होजावे ॥३०॥
तीक्ष्णवलं वासै दद्यात् यदवमानितं विकुर्वीत ॥ ३१ ॥
मौलमनुरक्तं या, यदस्य व्यसने ऽपकुर्यात् ॥ ३२ ॥
अश्या अभियोक्ताके लिये, अपने तीक्ष्णयलको देदव, जो कि थोदाला
अपमान करनेपर ही निगह बटे, और शत्रुका अपकार करडाले ॥ ३ ॥
अयया दुर्यल राजा. अपनी मौल (पापरासे भाईहुई ) भनुरन्त
( राजामें भरयन्त भनुराग रखने वाली, जिसपर राजाको भी पूरा विश्वास
हो, ऐसी ) सेनाको ही अभियुक्त के लिये देवरे । जो कि शत्रुपर भापत्तिके
समयमै उसका (शाका ) भच्छीतरह अपकार करसके ॥ ३२ ॥
कोशसंधि यात सारमसै दद्याद्यस्य क्रेतारं नाभिगच्छेत्
॥ ३३ ॥ कुप्यमयुद्धयोग्यं वा ॥ ३४ ॥
यदि अभियोक्ता, कोशसम्भिकी याचना करे, अर्धान् सन्धिकी शाम
धन ही लेना चाहे, तो सार भर्थात् बहुमूल्य रस भादि धनको ही इसके
लिये देये । जिस ( रस भादि) का खरीदने वाला भी इसे कोई न मिले
॥ ३३ ॥ अथवा घस भास्तरण भादि कुप्य, और युरमें काम न भानेवाले
भम्य सामान इसको देवे ॥ ३४ ॥
भूमिसंधिं याचेत प्रत्यादयां नित्यामित्रामनपाथयां महा-
क्षयव्ययनिवेशा बासै भूमिं दद्यात् ॥ ३५ ॥ सर्वस्वेन वा राज-
धानीवर्जेन संधि याचेत बलीयसः ॥३६॥
यदि भभियोक्ता, भूमिसन्धिकी पाचना करे, तो इसके लिये ऐसी
भूमि देवे, जो पिर आसानीसे वापस लीजासकती हो, अथवा जिसमे हमेशा
दुश्मन नजदीक रहे, या जिसमें कोई किसी तरहका भी दुर्ग न हो, और
जिसमें निवास करनेके लिये अत्यधिक धमका व्यय भोर पुरषोंका क्षय होनेकी
सम्भावना हो ॥ ३५ ॥ अथवा जो अत्यन्त परवान् अभियोक्ता हो, उसको
राजधानीके अतिरिक्त और अपना सर्वस्व देकर भी उससे सन्धिकी याचना
करे ॥ ३६॥
कौटलीय अर्थशास्त्र [१२ अधिक यत्प्रसा हरेदन्यः तत्प्रयच्छेदुपायतः । रक्षेत्स्वदेहं न धनं का ह्यनित्ये धने दया ॥ ३७॥ इस्पाबलीयसे द्वादशे ऽधिकरणे दूतकमर्माणि संधियाचन प्रथमो ऽध्यायः ॥ ॥ भादितः पत्रिंशतः ॥ १३६ ॥ यदि कोई अन्य प्रबल अभियोक्ता,यलपूर्वक अपने (दुर्यल अभियुक्त राजाके) धन आदिका अपहरण करे; तो उस धन आदि समात्तिको उपायके साथ अर्थात् सन्धि भादिके बहाने से उसे ही देदेवे । धनकी अपेक्षा अपनी देहकी ही सर्वधा रक्षा करे, क्योंकि अवर ही नष्ट होजाने वाले धन पर क्या दिखाना स्पर्ध है। यदि देव सुरक्षित रहंगी, तो नर हुआ २ धन भी फिर पैदा किया जासकता आयलीयस द्वादश भधिकरणमें पहिला अध्याय समाप्त । दूसरा अध्याय १६३ प्रकरण मन्त्रयुद्ध मति-बुद्धिके उत्कर्षको ही मन्त्र कहते हैं, उसके द्वारा युद्ध करना भधात् बुद्धिमत्तोप्त शत्रुको उगनाही 'मन्नयुद्ध' कहासा है । जब शत्रु सन्धिकी याचना करनेपर भी सन्धि न करे, तो उसे मंत्रयुद्ध के द्वाराही सीधा किया जाये । इपीलिये इस प्रकरणमें मन्नयुद्धका ही निरूपण किया जायगा । स चेत्संधी नावतिष्ठेत ध्यादेनम्:-॥ १ ॥ इमे पड्वर्गव- शगा राजानो विनष्टाः तेपामनात्मवतां नार्हसि मार्गमनुगन्तुम् ॥२॥ धर्ममर्थ चावेक्षस्व ।। ३ ।। पदि प्रयल अभियोक्का या शनु, सन्धिमे स्थित न रहे, भात् सन्धि. को स्वीकार न करे, तो उससे यह कहे:- ॥ १॥ देखो ये पड्वर्ग ( काम, क्रोध, लोभ, मान मद हपं । देखो अधि. १ अध्या. ६ ! किसी पुस्तकमें पवर्ग' के स्थानपर शत्रुपड्यर्ग' भी पाट है । अर्थ करने में किसी प्रकारका भेद नहीं) के अधीन हुए २ राजा लोग नष्ट होगये। तुम उन नीय राजाभोंके मार्गका कभी मनुसरण न करना चाहिये ॥ २ ॥ अपने धर्म और IT २ अध्या०] आयलीयस (५१७) अर्थ की और मराठी तरह देखो भयात् उनके सुरक्षित रखने में पूरा या रखो ॥३॥ मित्रमुखा ह्यमित्रास्ते ये त्वां साहसमधर्ममर्थाविक्रम च ग्राहयन्ति ॥ ४ ॥ शूरैस्त्यक्तात्मभिः सह योद्धु साहसम् ॥ ५॥ जनक्षयमुभयतः कर्तुमधर्मः ॥ ६ ॥ दृष्टमर्थ मित्रमदुष्टं च त्यक्तु. मर्थातिक्रमः ॥ ७॥ ये लोग ऊपरसे मित्र, और पास्तविक रूपमें मुम्हारे शत्रु है, जो सुम् साहस (युद्ध), अधर्म, और धन भादिका ध्यय करने के लिये प्रेरित या उरसा- हित करते रहते हैं ॥ ॥ अपनी देहों की या अपने भापकी कुछ पयांह करनेवाले पहादुर भादमियों के साथ युद्ध करनेके लिये, ये गाई प्रोत्साहित करते हैं, यही साहस है ॥ ५॥ इसमें दोनों भोरकेही भादमियोंका क्षय (नाश) होता है, यही इसमें अधर्म है ॥ ६॥ विद्यमान धनको श्रीर भायन्स समान मित्रको छोड़ने के लिये ये तुम्हें मेरणा करते हैं, यही इसमें भर्थका नाश या घनका नाश॥७॥ मित्रवांथ स राजा भूपतेनार्थेन मियाण्युयोजयिष्यति यानि त्या सर्वतो ऽभियास्यन्ति ।। ८ ।। न च मध्यमोदासी- नयोर्मण्डलस्य वा परित्यक्तः ॥९॥ भवांस्तु परित्यक्तो ये त्यां समुद्युक्तमुपप्रेक्षन्ते ॥ १० ॥ भूयः क्षयव्ययाम्यां युज्यताम् ॥ ११ ॥ मित्राच भिद्यताम् ॥ १२ ॥ अथैनं परित्यक्तमूलं सुखेनोच्छेत्स्याम इति ॥ १३ ॥ उस राजाके बहुत मिन्न हैं, और फिर यह इसी धनके द्वारा अपने मित्रों को और भी साथ लगा लगा; जोकि सप मिलकर तेरे उपर मप्रमण फा देंगे॥ मध्यम और उदासीन राजामोंके मण्डल (समूह) ने भी उसका परित्याग नहीं किया हुआ है। भयात् ये भी उपका साथ देने लिये तैयार हैं॥९॥ परन्तु तुम्हारा तो उन्होंने परित्याग दिया है । जोकि युद्ध के लिये तैयार हुभा २ तुम्हें देखकर आप चुपचाप इस यातकी प्रतीक्षा कर रहे *:-॥ ॥ कितिर सुमारे आदमियों का नाश भोर धनका प्य हो जाये ॥1॥ और तुम अपने मित्रस मिन होजाभो ॥२॥ इसप्रकार जप ताहारी श िसर्वथा क्षीण होजाय, और तुम्हारी जा दीली पदाप, अपार कौटलीय अर्थशास्त्र [१२ अधिक भोपधिको अपने प्रिय व्यापारीके शरीरपर छिड़कना, वह तुम्हारे पशमें होजाचगा ॥ २३ ॥ सिद्धे सुभगाया अप्येनं योगमुपदिशेद्-राजशरीरे ऽवघात. व्येति ।। २४ ॥ ततो रसेनातिसंदध्यात् ॥ २५ ॥ जय यह कार्य सिद्ध होजाये ( अर्यात् ब्यपारी शरीर वह भोपधि छिड़के जानेपर जब यह उपरसे दिखानेके लिय उपके वश में रहने लो), तब उस सुन्दर महारानीको भी इस वशीकरणके योगका उपदेश दिया जावे । और उससे कहा जावे, कि इस ओषधिको राजाके दारीरपर छिड़क देना, वा अवश्य तुम्हारे पशमें होजायगा ॥ २४ ॥ उमी योगमें विप मिलाकर राजाको मारडाले॥ २५ ॥ कार्यान्तिकव्यञ्जनो वा रहामा राजलक्षणसंपन्न क्रमाभि- नीतं घूयात् ।। २६ ॥ भार्यामस्य भिक्षुकी-राजपत्नी राजप्रसवि- नी या भविष्यसीति ॥ २७ ॥ अब महामात्रको मिस करने का प्रकार बताते हैं:-अथवा कार्ता- न्तिक (शरीरके चिन्ह आदिको देखकर भविष्य की पात बतानेवाले) के धेपमें रहनेवाला गुसपुरुष महामान अर्थात् राज लक्षणोंसे (राजा होने की सूचना देनेवाले चिन्होंसे) युक्त व्यक्तिको, जोकि अपने ऊपर (कातास्तिक पर)पूरा विश्वास रखता हो, इस प्रकार कहे, कि 'तू राजा अवश्य होजायगा' ॥ २६ ॥ और इस महामात्र की भार्याको, भिक्षुकी (भिखारिन के भेसमें रहनेवाला गुप्तचर, पुरुष या स्त्री), यह कहै, कि तू राजाकी खी होगी, भौर सजा होने योग्य पुत्रको जनेगी'। इसप्रकार राजा होनेकी लालसासे, महामाग्रका राजाके साथ विरोध होजायगा ॥ २७ ॥ भार्याव्यञ्जना वा महामानं घूया-॥ २८ ॥ राजा किल मामयरोधयिष्यति ॥ २९ ॥ तयान्तिकाय पत्रलेख्यमाभरणं चेदं परिवाजिकयाहृतमिति ॥ ३० अधपा महामान की भार्या बनकर रहनेवाली गुप्तनी ( वन्धकी भादि 'जोकि विजिगीपुकी भोरसे गुमपाका कार्य कररही हो), महामायको इस. प्रकार कहे:-॥ २८ ॥ राजा मुझको अवश्य रोकेगा, अर्थात् अपमे अन्त:- पुरमें लेगायगा ॥ १९ ॥ तुम्हारे लिये, राजा दिये हुए इस लेखपत्र और भाभरणको, दूती बनी हुई परिवाशिका (भिक्षुकी या सम्यासिनीके वेषमें २ अध्या०] आयलोयस (५२१) रहनेवाली वी) लाई है। इस निमित्तत भी महामात्रका राजाके साथ देष होजायगा ॥३०॥ मदारालिकन्यजनो या रसप्रयोगार्थ राजवचनमर्थ चास्य लोभनीयमभिनयेत ॥ ३१ ॥ अथवा सूद (पाचकरसोईया) या भारालिक (मांस आदि बनानेवाले) के पेपमें रहनेवाला गुप्तचर (जोकि महामायके यहां काम करता हो, वह), रसका अर्थात् विष मादिका प्रयोग करने के लिये राजाके कथन को सथा सोममें छालने वाले राजाके द्वारा दिये जानेयाले धनको महामायके सामने प्रकर करे । तारपर्य यह है, कि सूद या आरालिक, महामात्रके सामने यह बात कहे, कि हमको राजाने विप देनेके न्येि कहा है, और उसके लोभ के लिये प्रचुर धन देनेका पादा किया है । (इस सूममें 'राजवचनमय के स्थानपर किसी २ पुस्तक में 'राजवचनाद ऐमा पाठ है; परन्तु प्रकरणानुसार इस पाठका कोई संगत अर्थ प्रतीत नहीं होता) ॥३१॥ तदस्य वैदेहकव्यञ्जनः प्रतिसंदध्यात् ॥ ३२ ॥ कार्यसिद्धि च धूयात् ।। ३३ ॥ एवमेकेन द्वाभ्यां त्रिमिरित्युपायैरेकैकमस्य महामात्र विक्रमायापगमनाय या योजयेदिति ॥ ३४ ॥ जय सूद या अरालिक, महामायको इसप्रकार कहें, तो उनकी बात को सत्य पिद्ध करने के लिये, व्यापारी वेपमे रहने वाला (विप भादि बेचने वाला) गुरुपुरुष, महामायके पास आकर इस यातको साक्षी देवं ओर कहे कि 'राजाके कहनेसे मैंने तुम्हारे सूद और अरालिकको विप दिया था, यह मैं नहीं जानता कि वे किस लिये लेगये थे ॥ ३२ ॥ तथा कार्य सिद्धिका भी कथन करदे । अर्थात् इस पातको भी कहदे, कि उस विपसे बहुत जल्दीही मृत्यु होसकती है ॥ ३३ ॥ इसप्रकार विजिगीपुके सन्नीपुरुष, एक दो या तीनों उपायोंसे, इस राजाके एक २ महामात्रको, राजाके विरुद्ध युद्ध करने के लिये उत्साहित करदेवे। इसतरह यहांतक महामान और राजाओंके परस्पर भेद डालने का प्रकार बताया गया ॥ ३५ ॥ दुर्गेषु चास्य शून्यपालासन्नाः सचिणः पौरजानपदेषु मैत्रीनिमित्तमावेदयेयुः ॥ ३५ ॥ "शून्यपालेनोक्ता योधावा- धिकरणस्याश्च ॥ ३६॥ कृच्छ्रगतो राजा जीवनागमिष्यति न या ॥ ३७॥ प्रसह्य वित्तमार्जयध्वममित्रांच हत" इति ॥ ३८ ॥ -- - (५१२) कोटलीय अर्थशास्त्र [१२ अधिक भव शून्यपाल (राजधानीसे राजाके बाहर चले जानेपर, पीसे राजरहित शून्य राजधानी की रक्षाके लिये नियुक्त किए हुए अधिकारी पुरुष) से, नगरनिवासियों के भेद दालनेका प्रकार बताते हैं:-इस शत्रु राजाम स्थानीय दुर्गाम, शून्यपालके समीप रहनेवाले सग्रीपुरुष, नगरनिवासी तथा जनपद निवासी पुरपॉम मैत्री के लिये ( अर्थात् शून्यपाल के प्रति अनुराग उापस करने के लिये ) इसप्रकार निवेदन करें:- ॥ ३५॥ शून्यपालने सब योद्धाओं और कचहरीके सब बड़े अधिकारियोंको (अर्थात् न्यायाधीश आदिको इसप्रकार कहा है, कि:-॥३६॥ राजा इस समय वही कठिनतामें फंसा हुआ है; कहा नहीं जासकता, कि का जीता भी आसकेगा या नहीं ॥३७॥ इसलिये आप लोग बलपूर्वक प्रजासे भन्छी तरह धन वसूल करें, और जो आपके साथ शत्रुता रखते हों, उनको भाप निस्सन्देह मारदालें ॥ ३८॥ बहुलीभूते तीक्ष्णाः पौरानिशास्वाहारयेयुमुख्यावाभिहन्युः ॥३९ ।। एवं क्रियन्ते ये शून्यपालस्य न शुश्रूपन्ते इति ॥४०॥ शून्यपालस्थानेषु च सशोणितानि शस्त्रचित्तवन्धनान्युत्सृजेयुः ॥४१॥ ततः सत्रिणः शून्यपालो घातयति विलोपयति चेत्या- वेदयेयुः ॥ ४२ ॥ एवं जानपदान्समाहर्तुर्भेदयेयुः ।। ४३ ॥ जम शून्यपालकी यह भाशा सर्वत्र फैल जाये, तप तीक्ष्णपुरुष, मगर निवासियोंको रात लूटने के लिये अपने भादमियों को प्रेरणा करदें । और नगरके किन्ही मुख्य व्यक्तियोको मरवा डालें ॥ ३९ ॥ तथा सर्वन इस बातको प्रसिद्ध कादें, कि जो लोग शूम्पपालकी शुश्रूषा नहीं करते, अर्थात् उसके अनुगामी नहीं बनते। उनकी यही हालत कोजाती है ॥ ५० ॥ भौर खूनसे भरे हुए हथियार धन तथा रस्सी आदिको, शून्यपालके स्थानमें छोर देखें ॥1॥ तदनन्तर सत्री पुरुष, इस बातको प्रसिद्ध करदें, कि यह शून्यपालही सर लोगोंको मरवाता तथा लुटवाता है। इसतरह सन्नी, शून्यपाल तथा । प्रजाजनों में परस्पर झगड़ा दलवा देवें ॥ ४२ ॥ और इसीप्रकार समाहर्ता (कैलाटर-प्रमाओंसे कर वसूल करने वाला अधिकारी) सेभी, जनपद- निवासी पुरपाको भिन्न करा देखें । अर्थात् इनकामी आपसमें विशेष दलवा देवें ॥ ५३॥ • समाहर्टपुरुषांस्तु ग्राममध्येषु रात्रौ तीक्ष्णा हत्वा भ्रूयुः ॥४४॥ एवं क्रियन्ते ये जनपदमधर्मेण चाधन्त इति ॥ ४५ ॥ समुत्पन्ने ३ अध्या०] आयलीयस (५२३) दोपे शुन्यपालं समाहर्तारं वा प्रकृतिकोपेन घातयेयुः ॥४६॥ तत्कुलीनमवरुद्धं वा प्रतिपादयेयुः ॥ ४७॥ प्रजाजनास समाहाको मिन्न करनेका यह प्रकार है:-समाहती पुरपाको, गांव के पाचर्म रात के समय मारकर तीक्ष्ण तुरप इसप्रकार क. ।। ४४ ॥ जो लोग जगपदको अधीर प्रजावर्गको अधर्मसे कष्ट पहुंचाते हैं, उनकी यदी भवस्था कीजाती है। (इस बातको सुनकर अन्य समाहर्सागी प्रभावगस भिकर होजात है ॥ ४५ ॥ जय शून्यपाल भार समाहर्ता पुरषों के ये दोष सर्वत्र विस्तृत होजायें, तय प्रकृतिके कोपके कारण, सग्री पुरष उनको दुर्दशीपूर्वक जानसे मारताले ॥ ४ ॥ तथा शत्रुके किसी सम्बन्धी अन्धुबान्धय भाटिको' या नजरबन्द राजपुरकोही राजसिंहासन पर बेठा देव ॥ १७ ॥ अन्तःपुरपुरद्वारद्रव्यधान्यपरिग्रहान् । दहेयुस्तांच हन्युर्या युरस्यार्तवादिनः ।। ४८ ।। इस्याबलीयसे द्वादशे ऽधिकरगे दूतकर्माणि वाश्ययुद्धं मन्ययुद्ध द्वितीयो sध्यायः ॥ २ ॥ आदित. सप्तनिशच्टरा• ॥ १३७ ।। सदनन्तर तीक्ष्णपुरुष, इस शत्रु राजाके अन्त पुर पुरद्वार (गोपुर: नगरका प्रधान द्वार), दम्यपरिग्रह (जिन स्थानाम छकदी वस्त्र भादि भरे हुए हॉ), और धान्यपरिग्रह (जिन स्थानों में अन भरा हुभा हो, ऐसे ) स्थानोंको जला देव; और उन स्थानोंके रक्षकोंको मालाले । तथा म्यं इस घटनाके लिये बहुत दुःख प्रकट करते हुए, इस कामको नगरनिवासी श्रीर जनपद- मियासी पुरुषों काही किया हुआ पतलावें ॥ ५८॥ आपलीयस द्वादश अधिकरणमें दूसरा अध्याय समाप्त । तीसरा अध्याय १६४-१६ प्रकरण सेनापतियोंका वध और मित्र आदि राज- मण्डलका प्रोत्साहन इस अध्यायमें दो प्रकरण हैं । पहिले प्ररणमें सेना- मुख्य अर्थात् सेनाके अध्यक्ष अधिकारी) पुरषोंके वध करनेका
[१२ यधिक
(५२४) फौटलीय अर्थशास्त्र
प्रकार बताया जायगा । अथरा सूत्रके 'सेना' शब्दसे सेनाके
अध्यक्ष गा पैनापतियोंका और 'मुख्य' शबदसे महामात्रोंका
ग्रहण करना चाहिये। पहिले प्रकरण में इन दोनों केही वधका प्रकार
घताया जायगा। भौर दूसरे प्रकरण में मिग्र आदि दश प्रकारके
राजमपडलको प्रोत्साहित करने के सम्बन्ध निरूपण किया जायगा।
राज्ञो राजवल्लभानां चासन्नाः सत्रिणः पत्त्यश्वरथद्विपमु-
ख्यानां राजा क्रुद्ध इति सुहृद्विश्वासेन मित्रस्थानीयेषु कथयेयुः
॥१॥
राजा तथा राजाके प्रिय पुरुपोंके समीप मित्र बनकर रहनेवाले पत्री
पुरप, पैदल, घुरसवार, रथसयार तथा हाथीसवार सेनाकि भपी और
महामानोंके मित्ररूप (अथवा मित्रोंके) स्थानाम जाकर मियप्तमान विश्वासमे
यह कह, कि सेनाध्यक्ष भादिके प्रति राजा कुपित होगया है ॥५॥
बहुलीभूते तीक्ष्णाः कृतराविचारप्रतीकारा गृहेषु स्वामिवच-
नेनागम्यतामिति युः ॥ २॥ तानिर्गच्छत एवाभिहन्युः ॥३॥
स्वामिसंदेश इति चासन्नान् ब्रूयुः ॥ ४ ॥
जय राजाके कुपित होने का प्रवाद सब जगह फैल जावे, तब तीक्ष्ण
पुरुप रातमें भ्रमण करने के दोपका प्रतीकार करके (अर्थात् किसी प्रकारसे इस
मासकी अनुमति पाकर, कि वे रासमें यथेच्छ धूम सकते हैं), घमि जाकर
'भाप लोगों को स्वामी की भाज्ञासे ही स्वामीके पास आना चाहिये' इसप्रकार
सेनाध्यक्ष आदिको कहें ॥ २ ॥ और उनको मिकलतही हुए मार दालें ॥३॥
सदनन्तर मित्रके घेपमें रहनेवाले सत्रीपुरुषोंको, तीश पुरुष कहें, कि हमने
यह सब काम स्वामीकी ही आज्ञासे किया है।
ये च प्रवासितास्तान्सत्रिणो भ्रूयुः ॥५॥ एतत्तघदसामिः
कथितं जीवितुकामेनापक्रान्तव्यमिति ॥ ६॥
तथा राजाको छोड़कर पहिलेही गये हुए सेनापति आदिको समापुरुष
केह, कि:-५५॥ देखो, यह यही बात भागई, जो कि हम पहिले कहते
थे, कि जो अपनी जान बचाना चाहे, वह यहांसे भाग जाये; भव यही बात
ठीक होगई।(ऐरा कहनेस, जो सेनापति आदि अभीतक राजाको सेवा
कारहे हैं, ये भी भाग जाने के लिये तैयार किये जासकते है। और इस
तरा शत्रुको दुल क्षमाया जासकता है ॥६॥
-- ३ अध्या] आपलीयस (५२५) येभ्यश्च राजा याचितो न ददाति तान्सचित्रणो युः ॥७॥ उक्तः शून्यपालो राज्ञा ॥ ८ ॥ अयाच्यमर्थमसौ चासौ मा याचते ॥ ९॥ मया प्रत्याख्याताः शत्रुसहिताः ॥१०॥ तेषा. मुद्धरणे प्रयतस्वेति ।। ११ ॥ ततः पूर्ववदाचरेत् ॥ १२ ॥ कोई यस्तु मांगने पर राजा जिनके लिये उस वस्तुको नहीं देता है सनी उनको कद:-॥ ॥ राजाने शून्यपालको कर दिया है, कि:-॥८ अमुक २ पुरुप मुझसे भयाच्य यस्तुको (जो वस्तु मुझसे नहीं मांगनी चाहिये ऐसी वस्तुको ) मांगता है ॥ ९॥ मैंने उनको मना करदिया है, इसलिये घे शत्रुसे जाकर मिलगये हैं ॥ १० ॥ उनको उच्छेद करने में तुम मच्छी तरह प्रयय करो ॥१॥ ऐसा कहनेके अनन्तर, पहिले की तरहही सय काम किया जाय । भथीत तीक्ष्ण पुरुष, रातमें कुछ भादमियोंको मारदाले ; तथा गिनको न मारे, उनको यह बध दिखलाका राजाके पाससे भगादेवें । इस प्रकार भागे भी समझना चाहिये ॥ १२॥ येभ्यश्च राजा याचितो ददानि तान्सचित्रणो घूयुः ।।१३।। उक्तः शून्यपालो राज्ञा ॥ १४ ॥ अयाच्यमर्थमसौ चासौ च मा याचते ॥ १५॥ तेभ्यो मया सो ऽर्थो विश्वासार्थ दत्तः, शत्रुसं- हिताः ।।१६।। तेपामुद्धरणे प्रयतस्त्रोते ॥ १७॥ ततः पूर्ववदा- चरेत् ॥ १८॥ कोई वस्तु मांगनेपर राजा जिनको देदेता है, उनसे सम्री इसप्रकार कहे :॥ १३ ॥ राजाने शून्यपालसे कह दिया है, कि-॥ १४ ॥ अमुक २ पुरुष मुझसे अयाच्य वस्तुकी याचना करते थे ॥ १५ ॥ मैंने उनको यह पस्तु विश्वासके लिये देवी है (अर्थात् जिससे कि उनका मुझपर विश्वास पनारहे, इसलिये यह वस्तु मैंने उनको देवी हैं), परन्तु वे आदमी, शत्रुसे मिले हुए ॥ १६ ॥ इसीलिये उनको उच्छेद करने में तुम्हें अच्छी तरह प्रयख करन- चाहिये ।। १७ ।। इतना कहनेके अनन्तर पूर्ववत् अाचरण किया जाये । (देखें पिछला, सून १२)॥ १८॥ ये चैन याच्यमर्थ न याचन्ते तान्सत्रिणो श्रूयुः ॥ १९ ॥ उक्ता शून्यपालो राज्ञा ॥ २०॥ याच्यमर्थमसौ चासौ च मा न याचते ॥ २१ ॥ किमन्यत् स्वदोपशक्षितत्वात् ॥ २२ ।।
(१२ अधिक १५२८) कोटलीय अर्थशास्त्र (देखो भधि. ७, अध्या. १३) को विजिगीषु सप्रकार कहे:-॥ ३९ ॥देवी, यह राजा, मेरा उच्छेद करके, तुम्हारा भी उच्छेद अवश्य करदेगा ॥१०॥ इसलिये तुम इसकी पार्णिका ग्रहण करो, अर्थात् पी से इसके उपर हमछा करो॥ १ ॥ जब यह इस यातको देखकर गुम्हारी भोर आक्रमण करंगा, तो उस समय में इसकी पाणिका ग्रहण कहेगा ; अर्थात् में इसके पीछेकी भोरसे हमला करूंगा ॥ ४२ ॥ मित्राणि वास्य ब्रूयात् ।। ४३ ॥ अहं वः सेतुः ।। ४४ ॥ मयि विभिन्ने सानेप यो राज प्लाययिष्यतीति ।। ४५।। संभूय चास्य यात्रां विहनाम इति ॥ ४६॥ अब मित्रों के प्रोत्साहन के सम्बन्ध में कहते हैं:-अथवा इसके मियाको विजिगीषु इसप्रकार कहे:-॥४३॥ मैंही तुम्हारा सेतु अर्थात् पुल हूं। तात्पर्य यह है, कि जर प्राणियोंको जलसे बचाने लिये पुल एक साधन होता है, इसीप्रकार के आक्रमणसे बधाम, आप लोगोंके लिये महा एक साधन हूं ॥ १४ ॥ मेरे नष्ट होजाने पर, यह शत्रु राजा, भाप सबको भी नष्ट करबालेगा ॥ ५५ ॥ इसलिये आमो, हम सब मिलकर इसके भाक्रमणको विफल करें॥४६॥ तत्संहतानामसंहतानां च प्रेषयेत् ।। ४७॥ एप खलु राजा मामुत्पाख्य भवत्सु कर्म करिष्यति ॥४८॥ बुध्यध्वम्, अहं वः श्रेयानभ्ययपत्तमिति ॥ ४९ ।। तदनन्तर विजिगीपु, शत्रुके साथ मिलकर रहनेवाले, तथा उससे पृधा रहनेवाले सवही राजाभोंके पास, निम्नलिखित समाचार (संदेश) भेजे ॥ १७ ॥ निश्वयही यह अमुक राजा मेरा उच्छेद करके, आपका भी उच्छेद करेगा । भर्धा आपके ऊपर आक्रमण करके, आप लोगोंको भी नष्ट कर डालेगा ॥४८॥ इसलिये आप लोग विचार करें, और यह समझें, कि भापतिके समयम, आप लोगोंके द्वारा में अवश्यही रक्षा किये जाने योग्य हूं। अधात् इस आपकालम भाप लोगोंको मेरी अवश्य रक्षा करनी चाहिये । ४९५ मध्यमस्य प्रहिणुयादुदासीनस्य वा पुनः । यथासन्नस मोक्षार्थ सर्वस्वेन तदर्पणम् ॥ ५० ॥ इत्यावलीयस द्वादशे ऽधिकरणे सेमामुख्यवधः मण्डलपोत्साहनं च तृतीयो ऽध्यायः ॥ ३ ॥ भादितो ऽत्रिंशतः ॥ १३८ ॥ H
अध्या
आयलीयस
(५२२)
दुयल राजा, बलवान् भाभियो के आक्रमणसे बचने के लिये; मध्यम उदा.
नभौरभपने समीप रहनेवाले सबही सामन्तों के पास इसप्रकारका सन्देश भेजे,
मैं सर्वथा भापहीलोगोंके अर्पण हूं। मैं अपना सर्वस्व देकर भी भाप लोगोंके
श्रियसै पृथक् नहीं होना चाहता । जब मैं सर्वस्वको शर्त लगाकर भापकेही
पंण होचुका हूं, तो भाप लोगोंको सर्वात्मना मेरी रक्षा करनी चाहियो।५० ।
आवलीयस द्वादश अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त ।
।
चौथा अध्याय
१६६-१६७ प्रकरण
शस्त्र, अग्नि तथा रसोंका गूढप्रयोग, और
वीवध, आसार तथा प्रसारका नाश ।
इस अध्यायमें दो प्रकरण हैं । जब मोरसाहित करने पर भी
राजमण्डल, सहायता के लिये तैयार न हो, उस समय विजिगीषु
को, हथियार, भाग तथा विप आदिके गूढपयोग करके शत्रुका
नाश करना चाहिये; पहिले प्रकरणमें हथियार आदिके गूढ प्रये -
गोकाही निरूरण किया जायगा । दूसरे प्रकरण में, शत्रु के वीवध
आसार और प्रसारका किसप्रकार नाश करना चाहिय, इस
बातका निरूपण होगा।
ये चास्य दुर्गेपु वैदेहकव्यअनाः, ग्रामेपु गृहपतिकव्यञ्जनाः,
जनपदसंधिपु गोरक्षकतापसव्यञ्जनास्ते सामन्ताटविकतत्कुली-
नावरुद्धानां पण्यागारपूर्व प्रेपयेयुः ॥ १ ॥ अयं देशो हार्य इति
॥२॥
शत्रुके स्थानीय दुर्गों में (राजधानी आदिमें), व्यापारीके वेपमें जो
चिनिगापुके गुप्तचर हो ; इसीप्रकार जो गांवों में गृहपति ( गृहप) के पेपमें
हो, तथा सरह ही इलाकों में जो पाले भौर तपस्वियोंके वेपमें गुप्तचर हो, वे
गुप्तपर, के साथ स्वभावसे ही विरोध करनेवाले सामन्त आटर्षिक शत्रुके
बन्धु पान्धय तथा नजरयन्द राजपुत्र आदिके समीप कुछ भटकानेक सामान
के साप २ निम्नलिखित सन्देश मिजवावे ॥॥ यह सन्देश इस प्रकार
है:-शत्रुके भमुक प्रदेशको, दुल होने के कारण, भाप लोग हरण
करसकते है॥२॥
गांध
(५२८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
॥देवा,
(देखो भधि. ७, अध्या, १३) को विजिगीषु इसप्रकार कहे:-॥ ३९ ॥
यह राजा, मेरा उच्छेद करके, तुम्हारा भी उच्छेद अवश्य कादंगा ॥१०॥
इसलिये तुम इसकी पापिका ग्रहण करो, अर्थात् पी से इसके ऊपर हमला
करो ॥ ४ ॥ जब यह इस यातको देखकर तुम्हारी भोर आक्रमण कांगा,
तो उस समय मैं इसकी पाणिका ग्रहण करुंगा ; अर्थात् में इसके पीछेकी
मोरसे हमला करूंगा ॥१२॥
मित्राणि वास्य भूयात् ॥ ४३ ॥ अहं वः सेतुः ।। ४४ ॥
मयि विभिन्ने सर्वानेप वो राजाप्लावयिष्यतीति ॥ ४५॥ संभ्य
वास्थ यात्रां विनाम इति ॥ ४६॥
अब मित्रों के प्रोत्साहन के सम्बन्ध कहते हैं।-अथवा इसके मित्राको
विजिगीषु इसप्रकार करे:-॥४३॥ मंही तुम्हारा सेतु अर्थात् पुल हूं।
तात्पर्य यह है, कि जैसे प्राणियोंको जलसे बचाने के लिये पुल एक साधन
होता है, इसीप्रकार शत्रुके आक्रमणसे वधान में, भाप लोगोंके लिये मही एक
साधन हूं ॥ ५४ ॥ मेरे नष्ट होजानेपर, यह शत्रु राजा, भाप सबको भी नष्ट
करदालगा॥ ४५ ॥ इसलिये माओ, हम सब मिलकर इसके आक्रमणको
विफल करें॥ ४६॥
तत्संहतानामसंहतानां च प्रेपयेत् ॥ ४७ ।। एप खलु राजा
मामुत्पाट्य मयत्सु कर्म करिष्यति ॥४८॥ बुध्यध्वम्, अहं वः
श्रेयानभ्यवपत्तुमिति ।। ४९ ।।
तदनन्तर विजिगीषु, शत्रुके साथ मिलकर रहनेवाले, तथा उससे
पृथक् रहनेवाले सवही राजाभोके पास, निम्नलिखित समाचार (संदेश) भेजे
॥ १७ ॥ निश्चयही यह अमुक राजा मेरा इच्छेद करके, आपका भी उच्छेद
करेगा । अधीत् आपके ऊपर आक्रमण काके, आप लोगोंको भी नष्ट कर
दालेगा। १८ । इसलिये भाप लोग विचार करें, और यह समझें, कि
भापत्तिके समयम, भाप लोगों के द्वारा में अवश्यही रक्षा किये जाने योग्य हूं।
भयात् इस भापत्कालमे आप लोगोंको मेरी अवश्य रक्षा करनी चाहिये ।।४९॥
मध्यमस्य प्रहिणुयादुदासीनस्य चा पुनः ।
यथासनस्य मोक्षार्थ सर्वस्वेन तदर्पणम् ।। ५० ॥
इस्पावकीयत द्वादशे ऽधिकरणे सेनामुख्यवधा मण्डलारसाहनं च तृतीयो
ऽध्यायः ॥ ३ ॥ आदितो ऽत्रिंशतः ॥ १३८॥
-
५सध्या
आयलीयस
(५२९)
दुर्मल राजा, बलवान् भाभियोता भाक्रमणसे बचने के लिये,मध्यम उदा
सीन भौरभपने समीप रहनेवाले प्तवही सामन्तोंके पास इसमकारका सन्देश भेजे,
कि मैं सर्वथा आपही लोगोंके अर्पण हु । मैं अपना सर्वस्व देकर भी भाप लोगोंके
माश्रयस पृथक् नहीं होना चाहता । जब मैं सर्वस्वका शत लगाकर भापकेही
भर्पण होचुका हू, तो आप लोगोंको सर्वात्मना मेरी रक्षा करनी चाहिय॥५०॥
आवलीयन द्वादश अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त ।
चौथा अध्याय
१६६-१६७ प्रकरण
शस्त्र, अग्नि तथा रसोंका गूढप्रयोग, और
वीवध, आसार तथा प्रसारका नाश ।
इस अध्यायमें दो प्रकरण हैं । जय प्रोत्साहित करनेपर भी
राजमण्डल, सहायता के लिये तैयार न हो, उस समय विजिगीषु
को, हथियार, आग तथा विष आदिके गूदप्रयोग करके चानुका
नाश करना चाहिये, पहिले प्रकरणमें हथियार आदिके गूदपये.
गौकाही निरूपण किया जायगा । दूसरे प्रकरण में, शत्रुके वीवध
आसार और प्रसारका कितप्रकार नाश करना चाहिय, इस
बातका निरूपण होगा।
ये चास्य दुर्गेपु वेदेहकव्यजनाः, ग्रामेषु गृहपतिकव्यञ्जनाः,
जनपदसंधिपु गोरक्षकतापसव्यञ्जनास्ते सामन्ताटविकतत्कुली.
नावरुद्धानां पण्यागारपूर्व प्रेपयेयुः ।। १ । अयं देशो हार्य इति
॥२॥
शत्रुके स्थानीय दुमि (राजधानी आदिमें), व्यापारीके वेपमें जो
विजिगीपुके गुप्त पर हों , इसीप्रकार जो गावाम गृहपति ( गृहस्स) के वैषमें
हो, तथा सरहहो इलाकों में जो ग्वाले भोर तपस्वियों के देपमें गुप्तचा हो, वे
गुप्तघर, के साथ स्वभावलेही विरोध करनेवाले सामन्त आटविक बुक
बन्धु पान्धव सपा नजायद राजपुत्र दिवे समीप कुछ का सामान
के साप निलिखित सन्देश मिजाव ॥1॥ वह सदा इस मसर
है-'शत्रुके भमुक प्रदेशको, दुल होने के कार7, ना लोहान
करसकते ॥२॥
(५३०) कौटलीय अर्थशास्त्र [१२ अधिक आगतापां दुर्गे गूढपुरुषानर्थमानाभ्याममिसत्कृत्य प्रकृति च्छिद्राणि प्रदर्शयेयुः ।। ३ ॥ तेपु तैः सह प्रहरेयुः ॥ ४ ॥ इस सन्देशको पाकर, जव शधुके दुर्गमें, सामन्त भादिके गृढपुरुष भाजावे; तो उनको प्रथम धन, और सरकार आदिसे अच्छी तरह साकृत करके, फिर शत्रुको भमारय आदि प्रकृतियोंके दोषोंका, उनके सामने अच्छी तरह दिखला देवें ॥ ३ ॥ जव अमात्य आदि प्रकृतियोंके दोप उन्हें मालम होजाय, सब उन सामन्त आदिके साथही, अर्थात् उनकी सहायता लेकर, ये लोग शग्रुपर आक्रमण करदेवें ॥४॥ स्कन्धावारे वास्य शौण्डिकव्यञ्जनः पुत्रमभियुक्त स्थापयि- त्वावस्कन्दकाले रसेन प्रवासयित्वा नैपेचनिकमिति मदनरसयु- तान्मयकुम्भांच्छतशः प्रयच्छेत् ।। ५ ॥ अथवा शत्रुको छावनी में, शराब बेचने वाले के वेपमें एक सग्री, किसी घध्य पुरुषको अपना पुत्र बनाकर, रानिके भवसान कालमें विप आदि द्वारा उसे मारकर मृत व्यक्ति की तृप्ति के लिये यह 'पेचनिक' द्रव्य है, ऐसा महाना करके मादकता उत्पन्न करने वाले विपसे युक्त मद्यक सकड़ों घरों को वहां दे दाले । तात्पर्य यह है कि अपन मृत पुत्रके निमित, सैकड़ों पदे विष युक्त शराब, दानके तौर पर फौजियों को पिला देवे । जिससे वे मरजावेंगे, और शत्रुकी सेनाकी शक्ति घट नावेगी ॥५॥ शुद्धं वा मद्यं मायं या मयं दद्यादेकमहः ॥६॥ उत्तरं रससिद्ध प्रयच्छेत् ॥ ७ ॥ शुद्धं वा मद्य दण्डमुख्येभ्यः प्रदाय मदकाले रससिद्धं प्रयच्छेत् ।। ८ ।। अथवा उन लोगोंके विश्वास के लिये पहिले विप रहित मघ देखें। अथवा पहिले दिन मग्र का चौथाई हिस्ता विष मिलाकर देवे ॥ ६ ॥ तदनन्तर पर्याप्त विपसे युक्त मय देवे ॥ ७ ॥ अषया सेनाके मुखिया अर्थात् अध्यक्षोंको पहिले विपरहित मद्य देवे, (क्योकि प्रायः ये लोग पहिले किसी और आदमी को पिलाकर फिर अपने आप पीत है, इस लिये पहिले हनको विपरहित ही मय देवे ), अनन्तर जय ये शराबसे बेहोश होने लगे, तब विष मिली हुई शराब देदेधे ॥ दण्डमुख्यव्यञ्जनो वा पुत्रमभित्यक्तमिति समानम् ॥ ९ ॥ पकमासिकौदनिकशॉण्डिकापूपिकव्यञ्जना वा पण्याविशेषमवयो.
५ अध्या०] आवलीयस (५३१) पयित्वा परस्परसंघर्पण कालिक समर्धतरमिति वा परानाहूय रसेन स्वपण्यान्यपचारयेयुः ॥ १० ॥ अथवा सेनाके मुखियाके पेपमें मत्री, किसी वध्य को अपना पुन मनाकर शेष सब काम पहिले ही की तरह करे ॥ ९॥ अथवा पका मांस, पका भग्न, शराम तथा चटपटे पुए या पकौदे आदि पेचने वालेके घेष सत्री, एक दूसरे की स्पांस अपनी २ दुकानों की खूब तारीफ करके बहुत थोपा तथा फिरभी कालान्तरमें मूल्य लेने का वादा करके, शत्रुके भादमियों को बुलाकर विषसे युक्त अपने सब सादे को उन दे डाले ॥१०॥ सुराक्षीरदधिसर्पिस्तैलानि वा तयवहतहस्तेषु गृहीत्वा स्त्रियो बालाच रसयुक्तेषु स्वभाजनेषु परिकिरेयुः ॥ ११ ॥ अनेनार्पण विशिष्टं वा भूयो दीयतामिति तत्रैवावकिरेयुः ॥ १२ ॥ शराय दूध दही घी तथा नेल को, इनका व्यवहार करने वाले पुरुषों के हाथोंसे लेकर स्त्री तथा बालक, अपने विपयुक्र वर्तनों में लौटलेवें ॥१॥ और फिर उनके साथ यह झगड़ा करें, कि अमुक वस्तु को इतने ही मूल्यमें हमको दो, नहीं तो हम तुम्हारा कुछ भी सामान न खरीदेंगे । जब वे व्यवहर्ता पुरुष न मानें तो उन शराय दुध आदि वस्तुओं को फिर उन्होंके बर्तनों में लौट देवें, ऐमा करनेसे घे सय चीजें विपयुक्त हो जायेंगी ॥ १२॥ एतान्येव वैदेहकच्यञ्जनाः पण्यविक्रयेणाहर्तारो वा हस्त्य. श्वानां विधायसेपु रसमासन्ना दद्युः ॥ १३ ॥ फिर व्यापारीके वेपमें रहने वाले सत्री, अथवा शराय भादि सौदेके देचने के बहानसे लाने वाले अन्य व्यक्ति इन्हीं सब विपयुक्त वस्तुओं को लाकर हाथी और घोगोंके खाने योग्य अन्न तया घास भादिमें उनको विपरूप से मिलाकर देदेवें । ये घ्यापारी प्रायः छावनीके साथ ही रहने वाले होते हैं कर्मकरन्यञ्जना वा रसाक्तं यवसमुदकं वा विक्रीणीरन् ॥ १४ ॥ चिरसंसृष्टा या गोवाणिजका गवामजावीनां वा यथा- न्यवस्कन्दकालेषु परेपां मोहस्थानेषु प्रमुग्नेयुः ॥ १५ ॥ अयया मजदूरके भेसमें रहने वाले गुप्त पर, विपसे युफ घास अथया जलको ये ॥ १४ ॥ अथवा चिरकालसे मिग्र पने हुए, गौमों का ग्यापार करने पास सग्री, भपनी गाप यसरी तपा भैगोंके झुण्डौको, भरी राम्रिके समय
(०३२).
कौटलीय अर्थशास्त्र [१२ अधिक
में शत्रुओंके मोह अवस्था को प्राप्त हो जाने पर उनकी व्याकुलता यदानके
निमित्त छोददेवें ॥ १५ ॥
अधखरोष्ट्रमहिषादीनां दुष्टांश्च तयञ्जना पा चुचुन्दरीशो-
णिताक्ताक्षान् ॥१६॥ लुब्धकव्यजना या व्यालमृगान्पञ्जरेभ्यः
प्रमुश्चेयुः ॥१७॥ सर्पग्राहा या सानुग्रविपान् ॥ १८ ॥ हस्ति-
जीविनो वा हस्तिनः ॥१९॥ अग्निजीविनो वाग्निमवसृजेयुः ॥२०॥
इसी प्रकार घोड़ा गधा ऊंट तथा भैस भादि जानवरोंमेंये जो दुष्ट
अर्थात् कटखने मरसने पा उन्मत्त हो, उनको, उनके पापारी वेपमें रहने
चाले सग्री उनकी में छडूंदर का खून भोज कर छोड्दे ॥ १६ ॥
शिकारीक चेपमें रहने वाले सत्री, अपने हिंसक जंगली जानवरों को पिंज दास
छोदा ॥ १०॥ इसी तरह सांपों को पकाने वाले, अपने तीन विप वाले
सांपों को ॥१८॥ और हाथियोंसे जीविका करने वाले (अर्थात् उनका
ग्यापार आदि करने वाले ) सत्री अपने हाथियों को लोहदेवें । यह सब काम
शत्रुकी सेना को ज्याकुल करने के लिये किया जाता है। ऐपी भावुलवामें शत्रु
पर आक्रमण करके विजिगीषु उसे हरा देता है ।। १९ । और इसी प्रकार जो
गुप्तचर, भग्निसे अपनी जीविका करते हों, घे ( रसोईये, लुहार आदि) अपनी
अग्नि को छोड़देवे । अर्थात् शत्रुके आदमियोंके मदोन्मच होने पर छावनी में
आग लगा देवें ॥२०॥
गुटपुरुपा वा विमुखापत्यश्वरथद्विपमुख्यानभिहन्युः ॥२१॥
आदीपयेयुर्वा मुख्यावासान् ॥ २२ ॥दूष्यामित्राटविकव्यञ्जनाः
प्रणिहिताः पृष्ठाभिघातमवस्कन्दप्रतिग्रहं वा कुर्पः ॥ २३॥ वन-
गूढा वा प्रत्यन्तस्कन्धमुपनिष्कृप्याभिहन्युः ॥ २४ ॥
अथवा गृढपुरुष, विमुख हुए २ पैदल घुड़सवार रथसधार तथा हाथी-
सवार सेनाभोंके मुखियाओं अर्थात् अध्यक्षों को मार डालें ॥२॥ अपया
भायोंके निवास स्थानों में भाग लगावें ॥ २२ ॥ अध्या दूप्य शत्रु या
भारविक के पेयमे रहते वाले मृदपुरुष, लौटी हुई सेनाके पीछे की भोरसे
भाक्रमण करें अथवा सोते समय उनको नष्ट कर डालें, या युन्द से लौटते
समय उनका फिर मुकाबला करें ॥ २३॥ अथवा यनमें छिपकर रहने वाले
गृढपुरुष, सरहदी इलाकों की रक्षाके लिये खसी हुई सेनाको किसी बहाने से
अपनी ओर बुलाकर मार डालें । यहां तक शस्र अप्ति तथा विपके प्रयोगों का
निरूपण कर दिया गया ॥ २४ ॥
(५३४) कोटलीय अर्थशास्त्र [१२ मयि. द्वारा बहाकर शत्रुसेनाको नष्ट करदातें ॥ ३२ ॥ धावनदुर्ग, वनदुर्ग तथा मिग्नदुर्गम स्थित हुए २ शत्रुको, योगाप्ति ( छलपूर्वक पिशेप द्रष्योंके योगसे उत्पनकी हुई श्रमि), और योगभूम (विपैकी गैस भादि ) के द्वारा नए कर. दियाजावे ॥३३॥ सङ्कटगतमग्रिना धान्यनगतं धूमेन निघानगतं रसेन तोया- वगाढं दुष्टग्राहरुदकचरणैर्वा तीक्ष्णाः साधयेयुः ॥ ३४ ॥ घने जंगॉसे घिरे हुए जहापर माना जाना भी भस्यन्त कठिन हो, ऐसे) प्रदेश में प्रविष्ट हुए २ शत्रुको अनिके द्वारा ; धान्यनदुर्गमें स्थित हुए २ शत्रुको ख स गैस आदिके द्वारा, बहुतही छिपे हुए प्रदेशमै शत्रुको विप आदि रसके द्वारा ; अथवा जलके भीतर छिपे हुए शत्रुको भयर मगरमच्छ आदि जबजन्तुओं के द्वारा ; अथवा जलमें जानेके अन्य साधनोंके द्वारा (देखो- भधि, १३, अध्या. ", तीक्ष्णपुस्प पकड़ लेवे, या नष्ट करदालें ॥ ३४॥ आदीप्तावासान्निष्पतन्तं वा-॥ ३५ ॥ योगवामनयोगाम्यां योगेनान्यतमेन वा । अमित्रमतिसंदध्यात्सक्तमुक्तासु भूमिपु ॥ ३६ ।। इस्पावलीयसे द्वादशे ऽधिकरणे शस्रानिरसप्रणिधयः चीवधासारप्रसारवधव चतुर्षो ऽध्यायः ॥ ४ ॥ आदित एकोनचत्वारिंशतः ॥ ३९ ॥ अथवा आग लगे हुए घरसे निकलकर भागते हुए राजाको ॥ ३५ ॥ तथा अपनी रक्षाके लिये धान्वन भादि भूमियों में पहुंचे हुए शत्रु राजाको, योगवामन (देखो-अधि, १३, भष्या. २) और योग(अर्थात् योगातिसन्धान, देखो - अधि. १२, मध्या. ५) के द्वारा, अथवा अकेले योगकेही दाग पामें किया जाये । तात्पर्य यह है, कि शत्रुको वशमें करने के लिये जितने भी उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसी एक योग्य उपायके द्वारा यात्रुको पशम करे। ३६॥ भायलीपस द्वादश अधिकरणमें चौथा अध्याय समाप्त ।
५ अध्या०] आपलीयस पांचवां अध्याय १६८-१७० प्रकरण योगातिसन्धान, दण्डातिसन्धान और एकविजय। इस अध्यायमें तीन प्रकरण हैं । पहिले प्रकरणमें शत्रुको कपट उपासेि ठगनेका अर्थात् अपने काम करनेका प्रकार बताया जायगा। दूसरे प्रकरण में सेनाक वशम करने का प्रकार, तथा तीसरे प्रकरणमें 'अकेलाही विजिगीषु किस तरह शत्रुका भभिमव करसकता है' इस बातको वताया जायगा । दैवतेज्यायां यानायाममित्रस्य बहूनि पूज्यागमस्थानानि भक्तितः, तास्य योगमुजयेत् ॥ १॥ देवताको पूजा करने के समय, या देवताके निमित्तसे होनेवाले किसी विशेष उत्सव के लिये पात्राके समयम, अधार इस प्रकारके अवसरों पर; शत्रु राजाक, देवतामें उसकी भक्ति के अनुसार, पूजाके लिये आने जानेक अनेक प्रसंग भासकते हैं। इन्ही अवसरों पर शत्रु राजाके प्रति फूट उपायोंका प्रयोग किया जाये॥1॥ देवतागृहप्रविष्टस्योपरि यन्त्रमोक्षणेन गूढभित्ति शिलां या पातयेत् ॥ २॥ शिलाशस्त्रचर्पमुत्तमागारात् ।। ३ ॥ कवाटमव- पातितं वा, भित्तिप्रणिहितमेकदेशबन्धं वा परिघं मोक्षयेत् ॥४॥ भय उन प्रयोगोंकाही मकार बताते हैं:-जय राजा देवतागृहके भन्दर प्रविष्ट हो, तप उसके ऊपर, यन्त्रके छोड़ देनेसे (यह यन्त्र, भीत और शिसा इन दोनोंके सम्बन्धको जोड़नेवाला तथा दोनोंका आधारभूत होना चाहिये, जिसके निकालनेस यह गृभित्ति या शिक्षा गिर पड़े), गूढभित्ति (खास तौरसे भघर पनी हुई दीवार) और पिलाको गिरा दिया जाये ॥२॥ उपरके मकानकी तमे उम सत्रुपर पत्थर गधा हथियारों की पी कीजाये nan भयमा नीच उसादकर कियाद कोही तमुके ऊपर डाल दिया जाये। भयया भीतम डिपे हुए तथा एक भोरसे बंधे हुए भर्गलेकोही शत्रुपर जोर दियाजाये ॥४॥ देवतादेहस्थाहरणानि वास्योपरिष्टापातयेत् ॥ ५॥ स्था. नारान गमनभूमिपु वास्य गोमयप्रदेहेन गन्धोदकमसेकेन या रस- [१२ अधिः (५३६) कौटलीय अर्थशास्त्र मतिचारयेत् पुष्पचूर्णोपहारेण वा ॥ ६ ॥ गन्धप्रतिच्छिन्नं वास्स तीक्ष्णं धूममतिनयेत् ॥ ७॥ अथवा देवताकी देहपर धारण करादुर हथियारोंको हो, शाके अपर गिरा दियाजावं ॥ ॥ अथवा इसके ठहरने यंटने और जानेकी भूमियों में, विषयुक्त गोयरसे लेपन करदिया जाये, विषयुक्त सुगन्धित जलोंसे छिद- काय कियाजावे; तथा विपयुक्त फूलॉके चूरेको, देवताकी भेंटके निमित्त, उसे लाकर दियाजावे ॥६॥ अथवा विपकी गन्धको दबाने वाली विशेष गन्ध से युक्त, तीच धुभां (गैस), इसको अत्यधिक मात्रा में ग्रहण कराया जावे ॥ ७॥ शूलकूपमवपातनं या शयनासनस्याधस्ताद्यन्नपद्धतलमेनं कीलमोक्षणेन प्रवेशयेत् ॥ ८॥ प्रत्यासन्ने वामित्रे जनपदाचान- वरोधक्षममतिनये ॥९॥ दुर्गाचानवरोधक्षममपनयेत् ॥१०॥ भधवा इसके शयन और आसनके नीचे, लोहे की अतितोग शला. कामासे युक्त कुभा तथा गहरा गदा होवे, उसके ऊपर शत्रुकी चारपाई या अन्य कोई उठने बैठनेको वस्तु, एक यन्त्रके भाधारपर अधा बांधीजावे, जय शत्रु इसपर बैठे, तब ही उस यन्त्रकीलको खींच लेनेसे, चारपाई भादिके समेत उस शत्रुके, गढ़े आदेमें ढकेल दियाजावे ॥ ८ ॥ अथवा जय शत्रु समीप ही होवे, अर्थात् उसका देश भाने देशसे लगा हुआ ही होवे। तब अपने कार्य में पाया दालने वाले, उसके जनपदके पुरुषों को पकड़कर जेलमे दालदेघे, जिससे कि वे फिर विजिगीपुको पाधा न पहुंचा सके ॥ ९ ॥ तथा जो पुरुष विजिगीषुको बाधा पहुंचाने में असमर्थ हों, और शत्रुने उनको यन्धन (जल आदि ) में डाला हुआ हो, तो विजिगीषु उन्हें छुड़ा देवे ॥ १०॥ प्रत्यादेयमरिविपर्य वा प्रेपयेत् ॥ ११ ॥ जनपदं चैकस्थं शैलवननदीदुर्गेवटवीव्यवहितेषु वा पुत्रभ्राउपरिगृहीतं स्थापयेत् ॥ १२ ॥ उपरोधहेतवो दण्डोपनतवृत्ते व्याख्याताः ॥ १३ ॥ शत्रुके प्रान्तसे लायाहुआ जो भादमी, अवश्य ही लौटाना पड़े, उसे स्वयं ही शत्रुके देशमें भेजदेवे॥१॥ जो जनपद अकेले ही शत्रु राजाके शासनमें स्थित हो, उसके पर्वतदुर्ग वनदुर्ग और नदीदुर्गाको तथा पने जंगलासे घिरेहुए भम्य प्रदेशको शत्रुके पुत्र या शत्रुके भाई की अधीनतामें
५ अध्या०1
आपलीयस
(५३७)
करादेवे । अर्थात् एकच्छत्र शत्रुके जनपदमें से, इस उपयुक्त प्रदेशोपर शत्रुपुत्र
आदिका आधिपत्य फरादेवे ॥ १२॥ उपरोधक हेतुओंका व्याख्यान, दण्डोप-
नतवृत्त नामक प्रकरण में करदिया गया है। (देखो अधि० ७, मध्या०
१५)॥ १३॥
तृणकाष्ठमायोजनाद्दाहयेत् ॥ १४ ॥ उदकानि च दूषयेत्
।। १५ ॥ अवासावयेच ॥ १६ ॥ कूटकूपावपातकण्टकिनीश्च
बहिरुब्जयेत् ॥ १७॥
शत्रुके पड़ायके चारों और एक २ योजन (एक योजन-चार कोस)
तक, घास तथा लकड़ी आदिको जलवादेवे जिससे ये चीजें शत्रुको मिल न सकें
॥ १४ ॥ ओर जलोको विष आदि मिलाकर दृषित करयादेवे ॥ १५ ॥ तथा
जलाशयोंके किनारे या याध आदिका तुइय कर मलको बाहर निकलवादेव
॥ १६ ॥ और बाहर शत्रुको सेनाके आनेके मार्ग में अन्धेरे कूए घास अदिसे
ढके हुए गढ तथा स्थान २ पर काटेदार लोहेकी जंजीरोंके जाल बनया
देव ॥ १७ ॥
सुरङ्गाममित्रस्थाने बहुमुखी कृत्वा विचयमुख्यानभिहार-
येत् ।। १८ ॥ अमित्रं वा ॥ १९ ॥ परप्रयुक्तायां वा सुरङ्गायां
परिखामुदकान्तिकी खानयेत् ॥२०॥ कूपशालामनुसालं वा॥२१॥
शनुके ठहरनेके स्थानमें, बहुत गुंहवाली एक सुरंग यावाकर, शत्रुके
मधान व्यक्तियोंको उसीमें फसावे ॥ १८ ॥ अपरा अवसर आनेपर शत्रुको
भी उस ही मे फसादेवे ॥ १९॥ यदि शनु दी, विनिगीपुके दुर्गमें आनेके
लिये सुरंग बनवाये, तो विजिगीपुको चाहिये, कि वह दुर्गके चारों भोर
इतनी गहरी साई खुदवाये, जिसमे कि जल निकल भायै । अर्थात् जल
निकल लानेतक उस साईको खुदवाता ही गावे ॥ २० ॥ यदि इतनी बाई
खुदवाने में असुविधा हो, तो परकोटेको लम्बाईके मुताबिक उसके चारों
और कूपशाला बनवादी जावे । ( कृपशालासे त स्पर्य, चारों ओर मनाए
जाग वाले गहरे २ कुमासे है। ऐसा करनेसे शत्रुको दुर्गके भीतर भानेके
लिये, सुरग पनानेका रास्ता नहीं मिल सकेगा) ॥ २३ ।।
अतोयकुम्भान्कांसभाण्डानि वा शङ्कास्थानेषु स्थापयेत्खाता-
मिज्ञानार्थम् ॥२२।। ज्ञाते सुरङ्गापथे प्रतिसुरजां कारयेत् ॥२३॥
मध्ये भित्वा धूममुदकं या प्रयच्छेत् ॥ २४ ॥
[१२ अधिक कौटलीय अर्थशास्त्र (५३८) अथवा जिन स्थानोंम सुरंग मनाये जानकी भाशंका हो, यहाँ जल रहित घाँको भथवा कोसके छोटे २ स्तूप पा टुकदोको रसदिया जाये, जिससे कि खुहुए सुरंग मार्गका पता लगता रहे ॥ २२ ॥ शत्रुको मुरंग मागके मालूम होजानेपर, उसके विरुद्ध दूसरी मुरंग खुधा देखें ॥ २३ ॥ अथवा बाघ से उसकी फोड़कर, विपला धुआं (अथवा साधारण शुमा हो) • जल इसमें भरदेवे । (विपैले धुएंकी तरह जल भी उनमें विपयुक्त भरा जासकता है)॥२४॥ प्रतिविहितदुर्गो वा मृले दायादं कृत्वा प्रतिलोमामस्य दिशं गच्छेत् ॥ २५ ॥ यतो या मित्रबन्धुभिराटविकर्या संसृज्येत ॥ २६ ॥ परस्यामित्रैर्दयैर्वा महद्भिः ॥ २७ ॥ यतो वा गतो. ऽस्य मित्रैवियोगं कुर्यात् ।। २८ ॥ पाणि वा गृह्णीयात् ।।२९ ।। राज्यं वास्य हारयेत् ॥ ३० ।। वीवधासारप्रसारान्या वारयेत् ॥३१॥ भधवा शक्ति के अनुसार दुर्गको रक्षा करनेपर भी यदि पूर्ण सफलता न दोख्ने, तो दुवस राजा, मूलस्थानमें अपने पुत्र आदिको नियुज करके स्वयं शत्रुकी प्रतिकूल दिशाको घलाजाये । अर्थात् ऐसी दिशा में जावे, जहां जाकर यात्रुको हानि करसके ॥ २५॥ अथवा जिस और जाकर, अपने मिन, बन्धु- घान्धव और भारविकों के साथ मिलकर शत्रुका अपकार करने के लिये उचित अवसर प्राप्त करसके ॥ २६ ॥ अथवा अपने शत्रुके शत्रु, और अत्यन्त शक्ति- शाली तूप्य पुरुषों के साथ मिलकर शत्रुझी हानि करसके ॥ २७ ॥ अथवा जहां जाकर शत्रुका, उसके मित्रोंसे भेद करवा देवे ॥ २८ ॥ अथवा शत्रुमर पीछेकी भोरसे हमला करसके ॥ २९ ॥ अथवा शटके राज्यको अपहरण करसके ॥ ३०॥ अथवा शत्रुके पोवध भासार भार प्रसारको उसके पास तक न पहुंचने देपे ॥३॥ यतो वा शरनुयादाक्षिकवदपक्षेपणास्य प्रहर्तुम् ॥ ३२ ।। यतो वा स्वं राज्यं त्रायेत ॥ ३३ ॥ मूलस्योपचयं या कुर्यात् ॥ ३४ ॥ यतः संधिमभिप्रेतं लभेत ततो वा गच्छत् ॥ ३५ ॥ भया जहां जाकर कपटी जुआरीकी सरह, कपट प्रयोगोंको करके मधुपर प्रहार कर सके ॥ ३२ ॥ अथवा नहो जाकर अपने राज्यकी रक्षा करसके॥ ३३ ॥ अथवा अपने मूलस्थानको भलीभांति वृद्धि कर सके ।। ३४ ॥
५ अध्या०] आवलीयस (५३९) अश्वा जहांसे अपनी इच्छाके अनुसार मन्धि करनेका अवसर मिलसके, ऐसे स्थानपर चला आवे ॥ ३५ ॥ सहप्रस्थायिनो वास्प प्रेपयेबुः ॥ ३६ ॥ अयं वे शत्रुरस्साकं हरतगतः ॥ ३७॥ पण्यं विप्रकारं वापदिश्य हिरण्यमन्तासार- बलं च प्रेपयस्व एनमर्पयेम वर्द्ध प्रवासितं बोते ॥ ३८ ॥ प्रति- पन्ने हिरण्यं सारवलं चाददीत ॥ ३९ ॥ अथवा दुर्वल राजाके साथ २ जानेघाले, उसके (दुर्वल राजाक) गृढपुरप, शत्रुके पास इस प्रकार बन्देश भिगयाचें ॥ ३६ ॥ यह तुम्हारा शत्रु, इस समय हमारे हाथमें भाया हुभा है ॥ ३४ ॥ इसलिये, किसी सौदेके यहानसे सुवर्ण आदि धनको, और किसी भपकार भादिके यहानेस भावसार सेनाको हमारे पास भेजो । तदनन्तर हम, कैद किये हुए या मारे हुए तुम्हारे इस शत्रुको, तुम्हारे अर्पण करसकते हैं ॥ ३० ॥ जय शत्रु इस बातको मानकर, सुवर्ण आदि धन और अन्तस्तार सेनाको (यहुत ही मजबूत पहादुर सेनाको) भेजदेये, तो दुर्वल राजा उस सब सामानको अपने अधीन करोये ॥ ३९ ॥ अन्तपालो वा दुर्गसंप्रदानेन चलैकदेशमतिनीय विश्वस्त घासयेत् ॥ ४० ॥ जनपदमेकस्थं वा पातयितुममित्रानीकमाया. हयेत् ॥ ४१ ॥ तदवरुद्धदेशमतिनीय विश्वस्त घातयेत् ॥ ४२ ॥ भभवा अन्तपाल ( सीमारक्षक अधिकारी), अपना दुर्ग, शत्रुके सुपुर्द करके, उसकी सेनाके कुछ हिस्सेको ऐसी जगह लेजावे, जहांसे उनका लौटना असम्भव हो, और विश्वासपूर्वक उरें चीपर मारदाले ॥४॥ अथवा किसी उपहनल, एकाग्रत हुए २ जनपदको कायूमें करनेके लिये, अन्तपाल, शाकी सेनाको बुलयालेये ॥४१॥ तदनन्तर उस मेमाको ऐसे देशमें ले जाये, जहांसे निकलना अत्यन्त दुष्कर हो, वहां जाकर विश्वासपूर्वक उस सेनाको मरवासाले ॥ ४२ ॥ मित्रव्यन्जनो या बाह्यस्य प्रेपयेत् ॥ ४३ ॥ क्षीणमस्मिन्दुर्गे धान्यं स्नेहाः क्षारो लवणं वा ॥ ४४ ॥ तदमुमिन्देशे काले च प्रवक्ष्यति ॥ ४५ ॥ तदुपगृहाणेति ॥ ४६ ।। अपवा मित्र पेषमें रहनेधारा सन्नी, शके पास इसप्रकार सन्देश भिजवाये ॥ ४३ ॥ इस दुर्गमें धान्य (अनादि ), ह (घी तेल आदि), सार (गुद पर भादि) तथा स्वण (नमक) आदि सा पदार्थ समाप्त [१२ अधिक (५४०) कौटलीय यर्थशास्त्र होचुके हैं ॥ ४४ ॥ ये सब सामान, अमुक २ देश तथा अमुक कालमें लाये जायेंगे। (अयात् इन पदार्थों के लाने मार्ग और समय आदिसे, आधुको ठीक २ सूचित करदे ) ॥ ५ ॥ आप इस सय सामानको ऐलये । अर्थात् रास्तेमही ठीक समयपर पहुंचकर इस सय सामानको बरकर अपने अधीन करलेय ॥ ४६॥ ततो रसचिद्ध धान्यं सेहं क्षारं लवणं वा दूम्यामिबाटविकाः प्रवेशयेयुः ॥ ४७ ॥ अन्ये वाभित्यक्ताः ॥ ४८ ॥ तेन सर्वभा- ण्डवीवधग्रहणं व्याख्यातम् ।। ४९ ॥ तदनन्तर दिजिगीपुके दूप्य, शत्रु तथा भाटधिक पुरुष, विपसे युक्त, हुए २ धान्य, ने, क्षार तथा लयण भादि पदार्थाको लेकर ठीक समयपर उन्हीं निर्दिष्ट मागासे होकर गुजेरे ॥ ५७ ॥ अथवा अन्य पध्यपुरप इस कार्यको करें । अर्थात् विषयुक्त धान्य आदिको लेकर निरिए समयपर निर्दिष्ट मागासे होकर दुगकी ओर जावें । ( तारपर्य यह है, कि इसप्रकार शत्रु, सूट में विपयुक्त धान्य आदि लेजाकर अपने कार्यमें लायेगा, और मारा जायगा)॥ १८ ॥ इसीप्रकार सब तरहके अन्य खाद्य पदार्थोंको विपयुक्त बनाकर, शत्रुको प्रण करानेके सम्बन्धमें भी व्याख्यान समझ लेना चाहिये ॥ १९॥ संधि वा कृत्वा हिरण्यैकदेशममै दद्यात् ॥ ५० ॥ विलम्ब मानः शेपम् ।। ५१ ॥ ततो रक्षाविधानान्यवस्रावयेत् ॥५२॥ अमिरसशस्त्रैर्वा प्रहरेत् ॥ ५३ ॥ हिरण्यप्रतिग्राहिणो चास्य वल्ल- भाननुगृहीयात् ॥ ५४॥ अथवा दुर्वल राजा, शमुके साथ सन्धि फरके, प्रतिज्ञात धनका कुछ भाग उसे तत्कालही देदेवे ॥ ५० ॥ और शेष भाग विलन करके, देनेको कहकर, फिर ठीक समयपर देये ॥ ५॥ तदनन्तर शत्रुपर अपना विश्वास जमाकर (अर्थात् शत्रु जय उसपर पूरा विश्वास करने लगे) अपने चारों ओर रक्षा के लिये रक्खी हुई शत्रु सेनाको हटवा देवे ॥ ५२ । इसके अनन्तर स्वतन्त्र होकर, भग्नि विष तथा शझोंके द्वारा शत्रुपर प्रहार करे । (५२वें सून का यह भी अभिप्राय होसकता है, कि शत्रुराजा, दुर्वलपर विश्वास होनेके कारण, उसके सामने अपनी रक्षाको अपेक्षा न रक्से; इस प्रकार जय कभी दुर्बल के सामने शत्रु सर्पधा अरक्षित हो, तो आग, पिप तथा शन भादिके द्वारा उसे नष्ट करवा दाले) ॥ ५३ ॥ अथवा धन भादि लेकर कायमें भाने
५ अध्या०]
आवलीयस
(५४१)
घाले, शत्रुके प्रिय पुरुपोंकोही इस कार्यके करनेके लिये तैयार करे । भर्थात्
धन आदि देकर उन्हीके द्वारा शत्रुको मरवा देवे ॥ ५५ ॥
परिक्षीणो वासै दुर्ग दचा निर्गच्छेत् सुरुङ्गया ॥ ५५ ॥
कुक्षिप्रदरेण वा प्राकारभेदेन निर्गच्छेत् ॥ ५६ ॥
अथवा यदि दुर्वल गजा, सर्वथाही हीनशक्ति होजावे, अर्थात् शत्रुका
निवारण करनेमें किसी तरह भी समर्थ न होसके, तो अपना दुर्ग शत्रुको
ऐकर सुरंगके रास्तेस बाहर निकल जावे । अर्थात् दुर्गको छोड़कर भाग
जावे ॥ ५५ ॥ अथवा किलेमें सुरंग न होनेपर, परकोटेकी दीपार जहांसे
कमज़ोर हो, यहीसे उसे फोड़कर बाहर निकल जावे ॥ ५६ ॥
रांत्राववस्कन्दं दत्वा सिद्धस्तिष्ठेत् ॥ ५७ ॥ असिद्धः पार्थे-
नापगच्छेत् ॥ ५८ ॥ पापण्डच्छद्मना मन्दपरिवारो निर्गच्छेत्
।। ५९ ॥ प्रेतव्यजनो वा गूदैनिर्हियेत ॥६॥ स्त्रीवेपधारी
वा प्रेतमनुगच्छेत् ॥ ६१ ॥
रातमें सोते समय शत्रुसेनाके ऊपर छापा मारकर यदि कार्यसिद्धि
होजावे, तो दुर्यल अपने दुर्गमेंही ठहरा रहे ।। ५७ ॥ यदि कार्यसिदि न होवे,
तो पाससे होकर निकल जावे ॥ ५० ॥ निकलने के प्रकार ये है:-पापण्ड
(पाखण्डी-धर्मध्वजी) का वेप बनाकर थोडेसे परिवारके साथ बाहर निकल
जावे ॥ ५९ ॥ अथवा मरे हुपके वेपमें, गूढ पुरुषोके द्वारा लेजाया जाचे ।
अर्थात् गूढ पुरुप, राजाको मरे हुए समान भर्थीपर बांधकर दुर्गसे बाहर
निकाल लेजावें ॥ ६० ॥ अथवा स्त्रीका वेप धारण करके किसी मृतपुरुषके
पीछे २ निकल जावे ॥६॥
दैवतोपहारश्राद्धप्रहवणेपु वा रसविद्धमन्नपानमवसृज्य कृतो-
पजापो दृष्यव्यञ्जनैनिष्पत्य गूढसैन्योऽभिहन्यात् ।। ६२ ॥
देवतोपहार ( देवताओंको बलि देने ), भाद्ध, तथा प्रक्ष्यण भादि
(उद्यान आदिमें मित्रोंको भोजन कराने पार्टियों) के अयपरोंपर शत्रुक
विपयुक्त भलपान भादि देकर; या द्यके वेपमें रहने वाले सत्रियों के द्वारा शE
पक्षमें प्रवेश करके, और उनको वहां भरडी तरह उपनाप करके (भा
उनको उनके स्मीसे भिन्न करके), छिपी हुई अपनी सेनाके सहित दुर्य
राजा, शत्रु को नष्ट कादेवे ॥ १२ ॥
[१२ अधिक २५४२) कौटलीय अर्थशास्त्र एवं गृहीतदुर्गो वा प्राश्यप्राशं चैत्यमुपस्थाप्य दैवतप्रतिमा- च्छिद्रं प्रविश्यासीत ॥ ६३॥ गूढभित्तिं वा दैवतप्रतिमायुक्तं भूमिगृहम् ॥ ६४॥ अब अकेलाही विजिगीषु किपप्रकार शत्रुका अभिभय करसकता है, इस बात का निरूपण किया जायगा:-इसप्रकार शत्रुके द्वारा अपने दुर्गके छिन जानेपर विजिगीपु, खाने योग्य प्रचुर अन्नसे युक्त किसी देवालयमें उपस्थित होकर, वहाँ देवताकी प्रतिमाके छेदमें प्रवेश करके निवास करे ॥ ६३ ॥ अथवा उिपकर रहने योग्य किती दीवार के बीचही ठहरे। अर्थात् जिस दीवारपर पाहचाने जाने के लिये कोई बाह्यचिन्ह न हो, वहीं छिपकर बैठजावे । या देवताकी प्रतिमासे युक्त किसी तैखाने (=भूमिगृह ) में जाकर छिपजावे ॥४॥ विस्मृते सुरुङ्गया रात्रौ राजावासमनुप्रविश्य सुप्तममित्रं हन्यात् ॥६५॥ यन्त्रविश्लपणं वा विश्लेम्याधस्तादवपातयेत् ॥६६॥ रसाग्नियोगेनावलिप्तं गृहं जतुगृहं वाधिशयानममित्रमादीपयेत् ॥६७॥ जब शत्रु राजा इस बातको भूल नावे, अर्थात् शत्रुको जप यह निश्चय होजावे, कि हमारा विरोधी अमुक राजा सर्वधा नष्ट होचुका है, इसलिये इसकी भोरसे जर शत्रुकी उपेक्षाटि होजावे, तो यह सुरंगके द्वारा रातमें, राजाके निवास करने के मकानमें प्रविष्ट होका, सोतेहुए शराजाको मारडाले ॥६५॥ अथवा यन्त्रको ढीला करके उसे शत्रुके ऊपर गिरादेधे । (संभवतः इसका यह भभिप्राय प्रतीत होता है, कि राजाओंके शयनगृह भादिमें कोई इस प्रकारके विशेष यन्त्र होते थे, जिनके हिलाने हुलानेसे महानकी परिस्थितिम विशेष अन्तर पदसकता था; अपवा परसे झाडफानूस भादिक गिरानेकी भी कल्पना कीजासकती है ॥ ६६ ॥ अथवा आग लगाने में सहायता देनेवाले खास तरह के मसाले से लिहुए ( भोपनिपादेक अधिकरण के प्रलम्भन प्रकरण में इसतरहके मसालोंका ज़िक किया गया है) घरम; या लाखके घरमें शत्रुके सतिदुप होनेपर, उस घरको आग लगादेवे ॥ ६७ ॥ प्रमदवनविहाराणामन्यतमे वा विहारस्थाने प्रमत्तं भूमिगृह- सुरुङ्गागृढभित्तिप्रविष्टास्तीक्ष्णा हन्युः ॥ ६८ ॥ गूढप्रणिहिता वा रसेन ।। ६९ ॥ वपतो वा निरुद्ध देशे गूढाः स्त्रियः सर्पर- ५ सध्या आपलीयस सानिधूमानुपरि मुश्चेयुः ।। ७० ॥ प्रमदस्थान धनस्थान और विहारस्थानमें अधवा इनमें से एक विहार' स्थानमें ही प्रमत्त हुए २ शत्रुको; भूमिगृह सुरंग या गूडमितियों में छिपेहुए तीक्ष्ण पुरुष, मारडालें ॥ ६८ ॥ अधवा छिपकर रहनेवाले सूद आरालिक आदि गूढपुरुष, विष देकर शत्रुको मारडाले ॥ ६९ ॥ अथवा किसी घिरेहुए स्थानमें (जहां पर लोगोंके भाने जाने का सर्वथा निषेध हो) सौतेहुए शत्रुराजाके अपर, गुप्त वेपमें रहने वाली खियां, सर्प, विप अग्नि तथा विपैले धुऍको छोड़ देयें । अर्थात् शत्रुको मारनेके लिये सोते समय उसपर इन चीजों का प्रयोग करें ॥७॥ प्रत्युत्पन्ने का कारणे यद्यदुपपद्येत तत्तदमित्रेऽन्तःपुरगते गूढसंचारः प्रयुञ्जीत् ।। ७१ ।। ततो गूढमेवापगच्छेत् ।। ७२ ।। खजनसंज्ञां च प्ररूपयेत् ।। ७३ ॥ अथवा समयानुसार उन २ कारणोंके उत्पन्न होनेपर, जैसा अवसर हो उसीके अनुकूल, विशिगीपु, अन्त:पुरमें गयेहुए बत्रुके असर, गूढ रीतिसे उसे नष्ट करनेवाले उपार्योका प्रयोग करे ॥ १ ॥ तदनन्तर छिप तौरपर ही पहांसे बाहर निकल जाये ॥ ७२ ॥ तथा अपने भादमियोंको ( जो वहीपर इधर उधर छिपे हों) इशारोंसे इस बातकी खबर देदेवे ॥ ७३ ॥ द्वा:स्थान्वर्षवरांश्चान्यान्निगूढोपहितान्परे । तूर्यसंज्ञाभिराहूय द्विपच्छेपाणि घातयेत् ॥ ७४ ।। इत्याबलीयसे द्वादशे ऽधिकरणे योगातिसंधानं दण्डातिसंधानं एफविजयश्च पञ्चमो. ऽध्यायः ॥ ५॥ आदितवरवारिशच्यतः ॥ १४०॥ एकावता कौटलीयस्था- शास्त्रस्य आपलीयसं द्वादशमधिकरणं समाप्तम् ॥ १२ ॥ अन्तिम उपसंहार शोरुम इसी यातका स्पष्ट निरूपण कियाजाता वैः- द्वारपाल, गपुंसक, सथा अन्तःपुर आदिके अन्य कर्मचारियों के वेपमें रहनेवाले तथा शत्रुके ऊपर डिपे तौरपर नियुक्त कियेहुए अपने गुप्त पुरुपोंको याजे भादि के शासे युखाकर, यात्रुके शेग आदमियोंको भी, विजिगीषु, उन्हींके द्वारा मरवाहाले । अर्थात ने गुसपुरुष ही दुश्मन के धाको भादगियों को मारडालें। (इस लोक में 'घातयेत्' पदके स्थान पर किसी पुस्तक में 'कारयेत्' भी पाठ है। अ उसका भी यही करना चाहिये) ॥ ४ ॥ आपलीयस द्वादश अधिकरण में पांचवां अध्याय समाप्त । आबलीयस द्वादश अधिकरण समाप्त ।
दुर्गलम्भोपाय त्रयोदश अधिकरण पहिला अध्याय १७१ प्रकरण उपजाप यह दुर्गलम्भोपाय तेरहयां अधिकरण है । इस अधिकरणमें शनुके दुर्गों को प्राप्त करनेके उपायोंका निरूपण किया जायगा । अब सबसे पहिले प्रकरणमे उपजाप अर्थात भेदका निरूपण किया जाता है। विजिगीपुः परग्राममवाप्तुकामः सर्वज्ञदैवतसंयोगख्यापना. भ्यां स्वपक्षमुद्धर्पयेत् ।। १ ।। परपक्षं चोद्वैजयेत् ॥ २ ॥ शत्रुके ग्राम या नगर भादिको प्राप्त करने की इच्छा रखता हुआ विजिगीषु, अपने आपको सर्वज्ञ तथा देवताका साक्षात्कार कामेयाला प्रसिद्ध करके अपने पक्षको उत्साहित करे ॥ १ ॥ और इन्ही कारणों से शत्रुके पभको उद्विग्न (=खिस-थेचैन) करे ॥ २ ॥ सर्वज्ञख्यापनं तु-॥ ३ ॥ गृहगुह्यप्रवृत्तिज्ञानेन प्रत्यादेशो मुख्यानाम् ॥ ४ ॥ कण्टकशोधनापसागमेन प्रकाशनं राजद्विष्ट- कारिणाम् ॥ ५ ॥ विज्ञाप्योपायनख्यापनमदृष्टमसंगविद्यासंज्ञा- दिभिः ॥ ६ ॥ विदेशप्रवृत्तिज्ञानं तदहरेव गृहकपोतेन मुद्रासंयु- तन ॥ ७॥ भपनी सर्वज्ञताको प्रसिद्ध करनेके लिये विजिगीषु निम्नलिखित उपायोंका प्रयोग करे--॥३॥ मुख्य व्यक्तियों के घरों में होनेयाले किम्ही छिपेहुए पुरे काोको गूपुरपीके द्वारा जानकर, मुरय पुरुषाको ऐसे काम करनेसे बोके ॥
अध्या०] दुर्गलम्भोपार्य (५४५) कण्टकशोधन अधिकरणके पांचवे अध्यायम बतलाये हुए अपसोपदेश ( गूद पुरुषोंक कथन । देखो, अधि० ४, अध्या० ५, सू. २०-२५) के राजाके साथ शत्रुता करनेवाले पुरपाकै छिपे भेदोंको जानकर, उन्हें उनके सामने प्रकट करे, और ऐसा करनेसे उन लोगोंको रोके ॥ ५ ॥ अन्य पुरुषोंसे न जानीहुई संसर्गविद्या ( नाचना, गाना बजाना आदि विशेष विया) के इशारोंसें तथा गुप्तचर आदिसे जानकर, राजाके पास आनयाली भेंटको आनेस पहिले ही प्रस्ट करदेव ॥ ६ ॥ विदेशम होनेवाली घटनाको जिसदिन वह घटना हो इसी दिन, अपने घाम रहनवाले मुदायुक्त कबूतरके द्वारा बतला देवे ( भाभिषाय यह मालूम होता है, कि दूर देशकी किन्हीं विशेष घटनाओंको बहुत जल्दी जान लेनेके लिये कबूतरों का उपयोग उस समय किया जाता था, इसीतरह लग कोई शिक्षित कबूतर, लिखहुए पत्रके रूप किसी समाचारको राजाक पास लावं, तो राजा उसका इसरकार प्रकट करे, जैसे उसने किसी अदृष्ट या अशेष कारणस ही यह सब ज न लिया दैवतसंयोगख्यापनं तु॥८॥ सुरुङ्गामुखेनाग्निचैत्यदैवत प्रतिमाच्छिद्रानुप्रविष्टैरग्निचैत्यदैवतव्यजनैः संभापणं पूजनं च ॥९॥ उदकादुत्थितैर्वा नागवरुणव्यञ्जनैः संभापणं पूजनं च -- देवता के साथ साक्षात् सयोगकी प्रसिद्धि करनके लिये, इन उपायोंको प्रयोगमें लाये ॥ ८॥ सुरगके द्वारा अग्निके बीचमे तथा पाली देवताओंकी प्रतिमाओंके बीच में प्रविष्ट हुए. २, अग्निधैत्य (अग्निः बीचमे रहने वाले गूदपुरुषों के साथ राजा सम्भाषण करे, और उनका पूजन भी करे ॥ ९ ॥ भयवा जलसे उठेहुए अर्थात् जलसे निकले हुए, नाग (सर्पदेव) और धरणदेयके वेपमें रहनेवाले गृढपुरुषोंके साथ राजा सम्भापण को, तथा उनका पूजन भी रानावन्तरुदके समुद्रवालुकाकोशं प्रणिधायाग्निमालादर्श- नम् ।। ११ । शिलाशिक्यारगृहीते प्लवके स्थानम् ॥ १२ ॥ रानिक समय जलाशय भादिफे पाच मुहर लगा हुई मजयूस पेटयों के अन्दर (जिनमें कि सर्वया अल्का प्रवेश न होस)रेता भाकर छिपा दिया जाये, उसके सहारेसे रखी दुई भागको जलमसे निकालकर फिर निखटाया जावे un भारी शिलासे युक्त छीफे भादिके द्वारा जकी हुई छोटी २ नावोंको [१३ अधिक (५४६) कौटलीय अर्थशास्त्र पानीकी तेजधारमै स्थिरतासे खड़े करदेना । (अभिप्राय यह प्रतीत होता है, एक छोटी सी नावको, पानीकी तेज़ धारमें, उसके उपर रस्सियों में परयर यांधकर नीचे पानी में उन्हें लटकाकर, खड़ा करदेवे । अनन्तर लोगों को बतलायें, कि देखो, राजाका इतना प्रभाव देवताभोंके साथ सम्बन्ध होने के कारण ही है, इसीलिए इसने जलकी तेज चलती हुई धारमें नावको मिथल सदा करदिया है) ॥११॥ उदकवस्तिना जरायुगा वा शिरोऽवगूढनासः पृपतान्त्रकुली- रनफशिंशुमारोद्रवसाभिर्वा शतपाक्यं तैलं नस्तः प्रयोगः ।। १३ ॥ तेन रात्रिगणशश्वरतीत्युदकचरणानि ॥ १४ ॥ उदकवस्ती (बलको भीतर प्रवेश करनेसे रोकनेवाला एक वस्त्र विशेष ), भथवा जर'यु (गर्नकी थैलीके समान पनीहुई चमरेकी एक थैली) मे सिर आर नासिकाको ककर, चीतल हरिणको आंत तथा केंका, माकू, शिशुमार (शिरस नामकी मउली ) और उद् (हूद नामकी मछली) की परीके साथ तैएको एकसौ पार पकाकर, नासिकामें उसका प्रयोग कियानावे; भीत् इस मैलको माकमें दालाजाचे ॥१३॥ ऐसा करनेसे 'राग्निमें झुण्टके सुण्ट पुरुप, जलेमें सरण करसाते हैं ॥ १४ ॥ तैरुणनागकन्यावास्यक्रिया संम्भापणं च ॥१५॥ कोपस्था- नेषु मुखादाग्निधूमोत्सर्गः ॥ १६ ॥ जलमें घूमनेवाले उम पुरुपोंके द्वारा, राजा, वरुण तथा सर्पदेवोंकी कन्याओं के समान भाषाज करवावे । भार वे पुरुष, धरण आदिकी कन्याओं के समान शब्द को भोर राजा उनके साथ बातचीत को ।। १५॥ कोपके कारण उपस्थित होने पर अर्यात् क्रोध आने के अवसरों में राजा, अपने मुंहसे भाप और धुएंको निकाले । अर्थात् मुंइसे औषध भादिके योगसे इसतरहका कार्य करे ॥ ११ ॥ तदस सविपये काान्तिकनैमित्तिकमौहर्तिकपौराणिकक्ष- णिकगूढपुरुषाः साचिव्यकरास्तद्दर्शिनश्च प्रकाशयेयुः ॥ १७ ॥ परस्य विपये देवतदर्शनं दिब्यकोशदण्डोत्पत्तिं चास्य प्र॒युः॥१८॥ राजाकी इन सय उपर्युक्त बातोंको, इसके अपने देशम; इसकी रानाकी ) बहापसा करनेवाले तथा इन सब कामोंको देख्नेवाले कान्तिक (घ) नैमितिक देशले भरारे ), मोहार्तिक (ज्योतिषी ), पौराणिक ( पुराण आदिको यथायोग्य रक्षणोंको देखकर शुभाशुभकी सूचना ] १अध्या० दुर्गभोपाय (५४७) कसा करनेवाले), ईक्षणिक ( प्रश्न करके भविष्य शुभाशुभको बतानेवा.), तया गूदपुरुष, सर्वत्र प्रकाशित करदेवें ॥ १७ ॥ तथा अश्रुके देश, इसके देवताभोंके दर्शन और दिव्य कोश तथा दिव्य सेनाफे प्रादुभावको पता। अर्थात् 'इसका देवताओके साथ साक्षात्कार होता है, यह अपनी इच्छाधार जब चाहे, अपनी सहायताके लिये भपरिमेन दिन्म कोश या दिव्य सेनाको डरपक्ष करसकता है' इस्यादि यातोंको शपुदेशमें प्रसिद्ध करतेपे । १८॥ दैवतप्रश्ननिमित्तवायसाझविद्यास्वममृगपक्षिव्याहारेपु चाख विजयं दे॒युः ॥ १९ ॥ विपरीतममित्रस्य सदुन्दुभिम् ॥ २० ॥ उल्कां च परस्य नक्षत्रे दर्शयेयुः ॥ २१ ॥ दैवतप्रश्न ( शुभाशुभ कर्म विषयक प्रश्न अर्थात् अपने भाग्य के सम्बन्धमें पूछना ), निमित्त (शकुन ), कौए भादिका बोलना, अङ्गापिशा (शरीर के अंगोंका स्पर्श करनेसे शुभाशुभको बतलाने वाली विद्याः-सामुद्रिकका विशेष भाग), स्वम, तथा पशु पक्षी भादिके णेलनेके समय में इस राजाके विजय का ही सदा कथन करें । अर्थात् प्रत्येक निमित्तके होनेपर यही कहें, कि देखो-इस लक्षणसे मालूम होता है, कि इस राजाका विजय अवश्य होमा ॥ १९ ॥ शनु रामाके सम्बन्धम, नक्षन (भाकाश ) में उल्का दर्शन कराये । अर्थात् उल्कापात आदिके दिखानेसे इस यातको प्रसिर करें, कि शत्रुका कोई भारी अनिए होनेवाला है ! ( उल्कापातफे सम्बन्ध में देखो,-अधि० १४, अध्या. २, सू. ३२ के लगभग) ॥२१॥ परस्य मुख्यान्मित्रत्वेनापदिशन्तो दूतव्यञ्जनाः स्यामिस- कारं घूयुः ॥ २२ ॥ स्वपक्षवलाधानं परपक्षप्रतिघातं च तुल्य- योगक्षेमममात्यानामायुधीयानां च कथयेयुः ।। २३ ॥ तेषु व्यस- नाभ्युदयावेक्षणमपत्यपूजनं च प्रयुञ्जीत ॥ २४ ॥ शत्रुके मुख्य पुरुषॉके साथ मिम रूपसे व्यवहार करने वाले, दूत पेपधारी पुरण; उन मुश व्यक्तियों के सन्मुख, अपने स्वामी के द्वारा लिपहुए भाने मकारका खूप पसान को। ( जिससे कि उनके हृदयमें भी इस सरकारको प्राप्त करनेका लोभ उत्पश्च होजावे) ॥ २२ ॥ शत्रुके अमात्य तथा सनिक पुरषों के सामने, अपने पक्षको सेनाको उति और शनु पक्षकी सेनाक हासका, तथा दोनोंके सुरूप योगक्षेमका भीतरह कपन करें ॥२३॥ और अमात्य तथा सैनिक पुरुषोंके सामने, ये पुरष यह भी कह.कि हमारा राना अपने भनुपरोके भापत्तिकाल में पूर्ण सहायता करता है, तथा [१३ मधि० (५५८) कौटलीय अर्थशास्त्र अभ्युदयके समय, अभिनन्दन आदिसे उन्हें अरछीतरह सन्तुष्ट करता है। तथा अमात्य भादिके मरजानेपर उनके पुत्रोंका भी यहुत अच्छीतरह सत्कार करता है ॥२४॥ तेन परपक्षमुत्साहयेद्यथोक्तं पुरस्तात् ॥ २५ ॥ भूयश्च वक्ष्यामः--॥ २६ ॥ साधारणगर्दभेन दक्षान् ॥ २७ ॥लकुट- शाखाहननाभ्यां दण्डचारिणः ॥ २८ ॥ कुलैलकेन चाद्विग्नान् ॥ २९ ॥ अशनिवर्षेण चिमानितान् ॥ ३० ॥ इन सपही उपर्युक्त प्रकापि शत्रुपक्षको उत्साहित को अर्थात् शत्रुके अमात्य आदि कर्मचारियोंको शत्रुसे भिन्न करदेव ॥ २५ ॥ शत्रु पक्षमें भेद डालने के अन्य उपायोंका भी अब निरूपण किया जायगा:-॥ २६ ॥ जो पुरष भालस्य रहित होकर कार्य करने में अत्यन्त चतुर तथा तस्पर रहते हो, उनको गर्दभ आदि शब्दोंके द्वारा, उनके स्वामीसे भिस करें । इसका अभिप्राय यह है कि इस तरह कार्य करनेवाले, शत्रुके कर्मचारियों को यह कदा जाय, तुम लोग बिल्कुल गधेकी बराबर हो, जैले गधा लगातार काम करता रहता है, परन्तु उसको उस कार्यके फलका कुछ भी शान नहीं होता, इसी तरह भाप लोग भी अपने कार्यके फलसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इसी तरहके उदाहरण देकर उनको उस कार्यसे अन्यमनस्क करदिया जाय; इसीसे उनको अपने स्वामीके साथ मनमुटाव होजायगा । अगले सूत्रों में भी इसी तरहके अभिप्राय समझने चाहिये ) ॥ २७ ॥ सैनिक पुरुषोको, लाठी तथा कुल्हाडे भादिका उदाहरण देकर उत्साहित करे, अधात् उनके स्वामीसे जन्हें मिस करे ॥ २८॥ उद्विग्न अर्थात् शत्रुसे डरनेवाले कर्मचारियोंको, अपने झुण्डसे भलइदा हुए २ जीवनसे निराश मेंढे या बकरका उदाहरण देकर, उत्साहित किया जाये ॥ २९ ॥ शत्रुसे तिरस्कृत हुए २ व्यक्तियोंको, 'तुमने बन्न पातके समान तिरस्कारको कैसे सहन करीलया' यह कहकर रसारित किया जाये ॥३०॥ विदुलेनायकेशिना वायमपिण्डेन कैतवजमेधेनेति विहता- शान् ॥ ३१॥ दुर्भगालंकारेण द्वेपिणेतिपूजाफलान् ॥३२॥ व्याघचर्मणा मृत्युकूटेन चोपहितान् ॥ ३३ ॥ पीलुविखादनेन करकयोप्ट्रया गर्दभीक्षीराभिमन्यनेनेति ध्रुवापकारिण इति ।।३।।
१ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय (५४९) शघुसे भन्न मनोरथ हुए २ (अर्थात् जिनको अपने स्वामीकी भोरसे किसी तरहकी भी भाशा न रही हो, ऐसे)पुरुपोंको, फलहीन बेंत अथवा लोहमय अर्थात् खानेके सर्वथा भयोग्य अबपिण्ड, या न परसनेवाले बादलकी उपमा देकर, उनके स्वामी के विरुद्ध उत्साहित किया जावे ॥ ३॥ ॥ अलवार मादि देकर पूजा किये हुए पुरुषाको (अर्थात् पूजाके साथ जिनको विशेष भलार आदि मिले हों, भौर उसे ये अपने कमीका फल समझते हों, ऐसे पुरोको) बुराई करनेवाले अनिष्टकारक अशङ्कारों का उदाहरण देकर उत्साहित करें ॥ ३२ ॥ शत्रुके द्वारा प्रयुक्त हुई २ चालोसे ठगे हुए पुरुषोंको, मृत्युके स्थान-यन घटी पात्रका उदाहरण देकर (भर्षात् व्याघ्र चर्म पहिनकर बनावटी पने हुए व्याघ्रका उदाहरण देकर) उनके स्वामी के विरुद्ध उत्साहित करें॥३३॥ जो पुरुष सदाही अपकार करते रहते हैं उनको पालुफलके खाने, करका (तिरसका एक शाक विशेप), उष्टी (यह भी सिक्तरसकी एक ओषधि होती है), तथा गधोके दूधके बिलोनेका उदाहरण देकर, उनके स्वामीसे भिक करें ॥ ३४ ॥ प्रतिपन्नानर्थमानाभ्यां योजयेत् ।। ३५॥ द्रव्यभक्तच्छिद्रेषु चैनान्द्रव्यभक्तदानैरनुगृह्णीयात् ॥३६ ।। अप्रतिगृह्नता स्वीकुमा- रालंकारानभिहरेयुः ॥ ३७ ।। जो पुरुष, इन यातोंको मानकर शत्रुके विरुद्ध कार्य करें, उनको धन और मान (सरकार) से युक्त किया जाये । अर्थात् धन मान आदिसे उनको अशी तरह सस्कृत किया जाये ॥ ३ ॥ तथा इनपर जब धनसम्बन्धी या भलसम्यन्धी संकट भावे, तब धन और सा देकर इनकी अच्छी तरह सहायता की जावे ॥ ३६ ॥ यदि ये लोग अपना गौरव नट होजानेके विचारसे, इस प्रकार धन भौर भल मादि न लेना चाहें, तो इनकी खी और यचों भादिके लिये साकारपूर्वक आभूषण भादि वनवाकर दवे ॥३७ ॥ दुर्भिक्षस्तेनाटन्युपपातेपु य पौरजानपदानुत्सायन्तः स- त्रिणो युः ॥३८॥ राजानमनुग्रहं याचामहे ॥ ३९ ॥ निरनु- ग्रहाः परत्र गच्छाम इति ॥ ४० ॥ दुर्भिक्ष, और चोर तथा भाटयिकों के माक्रमण करनेपर ( अर्थात् दुर्भिक्ष की भवस्पाम भार जर चौर तथा भ रविक, प्रान्तम प्रायः सूर मारकर मजा को सता रहे हों, सय) सत्री पुरप, नगर निवासी तथा जनपदनिवामी पुरमों को वक्ष्यारित करते हुए, इसका कह:-॥ ३८ ॥ हम लोग, राजासे
[१३ आध०
(५५०)
कौटलीय अर्थशास्त्र
सहायताके लिये याचना करते हैं ॥ ३९ ॥ यदि राजा, हमको सहायता नहीं
देता है, तो हमसन लोग, दूसरे राजाके माध्यमें चले जावेंगे। इसप्रकार
सत्री, पौर जानपदोंको उनके स्वामीसे भिन्न करें ॥ १०॥
तथेति प्रतिपनेषु द्रव्यधान्यपरिग्रहः ।
साचिव्यं कार्यमित्येतदुपजापाद्भुतं महत् ॥ ४१ ।।
इति दुर्गम्भोपाये त्रयोदशे ऽधिकरणे उपजाप प्रयमो ऽध्यायः ॥७॥
आदित एकचत्वारिंशष्टतः ॥१४॥
जय पौर जानपद पुरप अपने स्वामीसे सहायता प्राप्त न कर, मन्त्री
पुरुषोंके कथनको स्वीकार करनेके लिये तैयार होजावें ; तब धन धान्य और
वासस्थान आदि देकर इनकी सहायता कीजाये। अर्थात् विजिगीषु उनकी
इसप्रकार सहायता करे। शत्रुके आदमियोंका शत्रुसे भेद ढालने के लिये, यह
एक पहुतही अद्भुत उपाय है ॥ ४ ॥
दुर्गलम्भोपाय त्रयोदश अधिकरण में पहिला अध्याय समाप्त |
दूसरा अध्याय
१७२ प्रकरण
योगवामन
योग अधात् कपटसे, शत्रुको दुर्गसे बाहर निकालदेना 'योगवामन'
कदाता । इस प्रकरणमें शत्रुको, कपटपूर्वक दुर्गसे बाहर निकाल
देनेका ही निरूपण किया जायगा ।
मुण्डो जटिलो वा पर्वतगुहावासी चतुर्वर्पशतायु वाणः
प्रभूतजटिलान्तेयासी नगराभ्याशे तिछेत् ॥१॥ शिष्याश्चास्य
मूलफलोपगमनेरमात्यान् राजानं च भगवदर्शनाय योजयेयुः ॥२॥
पहाइकी गुफामें रहने वाला, चारसौ बरसकी अपनी उमर बताने
बाला, यहुतसे जटाधारी छायोंसे युक्त, मुण्ड अथवा गाटेल (जटाधारी) के
घेपमें रहतामा गूदपुरप, मगरके समीप ही अपनी स्थिति करे ॥ भोर
इसके शिष्य, फल मूल (क) भादि लेकर राजा और अमात्योंको भगव-
दर्शन (भगवान के दर्शन उस जटाधारी सिद्धके येपमें रहनेहुए गृढपुरपके
दर्शन करने के लिये प्रेरित करें ॥ २ ॥
१ १ पा०] आपलीयस (५५१) समागतश्च राज्ञा पूर्वराजदेशाभिज्ञानानि कथयेत् ॥३॥ शते शवे च वर्षाणां पूर्णे ऽहमग्निं प्रविश्य पुनर्वालो भवामि ॥४॥ तदिह भवत्समीपे चतुर्थमग्निं प्रवेक्ष्यामि ॥ ५॥ अवश्यं में भवान्मानयितव्यः ॥ ६ ॥ त्रीवरान्वृणीष्वेति ॥७॥ राजाके साथ समागम होनेपर, वर गूढपुरुष, पहिले राजा और देशोंके चिन्हांको बतलाये ॥ ३ ॥ और कहे कि-'मै सौ सौ बासके पूरे होनेपर, अतिमें प्रवेश करके फिर वालक बनजाता हूं ॥ ४ ॥ अब यहां आपके पास चौथीवार अग्निमें प्रवेश करूंगः ॥५॥ मेरी औरसे आपका, वर आदिके द्वारा अवश्न सत्कार होना चाहिये ॥ ॥ आर मुझमे, इच्छानु- सार तीन वर मांग सकते हैं ॥ ७ ॥ प्रतिपन्नं भूयात् ॥ ८ ॥ सप्तरात्रमिह सपुत्रदारेण प्रेक्षाप्रह- वणपूर्व वस्तव्यमिति ॥ ९॥ वसन्तमवस्कन्देत ॥ १० ॥ यदि राजा इन सब माताको स्वीकार करले, तो उससे इस प्रकार कहे ॥ ८॥ आप सात रात्रि पर्यन्त, अपने पुत्र भोर स्त्री सहित, खेल तमाशा भादि करातहुए ( =प्रेक्षापूर्व ) और प्रसन्नता पूर्वक सत्र ही मागन्तुक पुरुषों को भोजन भादि देतेहुए (प्रवणपूर्व) यहाँ मेरे पास निवास करें ॥ ९॥ जब वह राजा, वही इसप्रकार रहने लगे, तो छिपकर या सोते समयमें उसे मामाले ॥१०॥ मुण्डो वा जटिलो वा स्थानिकव्यञ्जनः प्रभूतजटिलान्ते. वासी वस्त्र शोणितदिग्धां वेणुशलाको सुवर्णचूर्णेनावलिप्य वल्मीके निध्यात्, उपजिहिकानुसरणार्थ, स्वर्णनालिका वा ॥ ११ ॥ ततः सच्ची राज्ञः कथयेत् ॥ १२ ॥ अमौ सिद्धः पुष्पितं निधि जानातीति ॥ १३॥ अथवा किसी विशेष स्थान के अध्यक्ष के रूप में रहनेवाला ( स्थानिक- म्यअनः) मुण्ड या जटिल गूदपुरुप, यहुतसे जटाधरी छात्रों को अपने समीप रसताहुआ, यकोके खूनसे सनीहुई भार सोनेके पुरादे ( चूरे ) से लिपटी दुई एक बांसकी शलाकाको; अभया सुवर्णसे युक्त एक यांसकी नलीको, समीकी पहिचान के लिये उस बमी (जंगम दीमक, जमीन से मही उठा २ पर जो ऊंचा सा देर ना देती है, उस ही को थमी कहते है) में ही रखदेथे ॥1॥इसके पाद सत्री, राजाको जाकर कहे, कि-॥ १२ ॥ यह सिद्ध [१३ अधिक . (५५२) कौटलीय अर्थशास्त्र पुरुष फूलहुए खजानेको (पुपितं निधि-ऐसा सजाना, जो अभी तक फल न लाया हो, फल आनेसे पहिलेकी भवस्था में रक्याहुभा; ऐसे गजानेको) जानता है॥ १३॥ स राज्ञा पृष्टस्तथेति बृयात् ॥ १४ ॥ तच्चामिज्ञानं दर्शयेत् ॥१५॥ भूयो वा हिरण्यमन्तराधाय त्याचनम् ॥ १६ ॥ नाग- रक्षितो ऽयं निधिः प्रणिपातसाध्य इति ।। १७॥ प्रतिपनं घूया. त् ॥ १८ ॥ सप्तरात्रमिति समानम् ॥ १९॥ जब राजा, उस सिद्ध पुरपप्ते छे, कि तुम ऐसा जानते हो ? तो यह कहदेवे, कि हो जानता हूं ॥ १४ ॥ और उस चिन्हको दिखलादेये, ( अर्थात् चीमें लगीहुई, सुवर्णयुक्त यांसकी नलीको दिखलादेवे)॥ १५ ॥ अथवा फिर वहां और भी बहुत अधिक सुवर्ण रखकर राजाको कहे, कि--॥ १६ ॥ यह खजाना सांपोंसे सुरक्षित है; इसलिये नम्रतापूर्वक ही वशमें किया जासकता है ॥ १७ ॥ जब राजा, सिद्धकी इन सब बातोंको स्वीकार करले, तो उससे कहे, कि ॥ १८॥ आपको सात रात्रि पर मेरे यहां रहना चाहिये, इत्यादि आगे सष पहिलेका तरह ही समझना चाहिये । भर्थात जब राजा पुत्रस्त्रीसहित वहाँ पूर्ववत् रहनेलगे, तो उसे मारढाले ॥१९॥ स्थानिकव्यञ्जनं वा रात्रौ तेजनानियुक्तमेकान्ते तिष्ठन्तं सचित्रणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः ॥ १० ॥ असौ सिद्धः सामेधिक इति ॥ २१.॥ तं राजा यमर्थ याचेत तमस्य करिष्य- माणः सप्तरात्रमिति समानम् ॥ २२ ।। अधवा रात्रि में तेजन अग्नि ( अपने शरीरको भाग्निके समान प्रचलित करके अद्भुत रूपमें दिखानेवाले प्रयोग; देखो-अधि० १४, अध्या० २.) से युश हुए ३ तथा एकान्तमें बैठेहुए, धीरे २ अपना रूप दिखाते हुए, उस स्थानिकम्यजन गूदपुरषको, सग्री पुरण, राजाको दिखाका, राजासे यह कहें, कि-॥२०॥ वह सिद्ध पुरुष भविष्यमै होनेवाली समृद्धिको यतला देता है ॥ २१ ॥ तदनन्तर राजा, उस सिद्ध पुरुषसे जिस अर्थकी याचना करे, उसी को भविष्यमें पूरा करदेने का वादा करके उससे कहै, कि भाप सात रानि पर्यन्त मेरे पास रहें । शेप पूर्ववत् ही समझना चाहिये ॥ २२ ॥ सिद्धव्यसनो वा राजानं जम्मकविद्याभिः प्रलोभयेत् ॥ २३ ॥ तं राजेति समानम् ।। २४ ॥ सिद्धव्यञ्जनो वा देशदे- । +
२ अध्या०]
दुर्गलम्भोपाय
(५५३)
पतामभ्यहितामाश्रित्य प्रहयणैरभीक्ष्णं प्रकृतिमुख्यानभिसंवास्य
क्रमेण राजानमतिसंदध्यात् ॥ २५ ॥
अथवा सिद्धके वेपमें रहने वाला गूढपुरुष, राजाको कपट विद्याओंसे
पशमें करे ॥ २३ ॥ जब राजा, उसके प्रलोभनमें फंत जावे, तो उससे कहे,
कि सात राम्रिपर्यन्त मेरे समीप रहों। शेष सब पूर्ववत्ही समझना चाहिये
॥ २४ ॥ अथवा सिद्ध के वेपमें रहने वाला गूढपुरुष, देशकी पूज्य देवताका
भाश्रय लेकर (उस देशमें जो सबसे प्रधान देवता मानी जाती हो, उसीका
आश्रय लेकर ) निरन्तर उत्सव और सहभोज ( पार्टियों ) आदिके द्वारा, वा.
की अमात्य आदि प्रधान प्रकृतियोंको भरने वश करके, फिर धीरे २ अर्थात्
सन भमात्य भादिके द्वाराही, वहाँ राजाकीमी वञ्चना करे ॥ २५ ॥
जटिलव्यञ्जनमन्तरुदकवासिन वा सर्पचैत्यसुरङ्गाभूमिगृहा-
पसरणं वरुणं नागराज या सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयु:
॥ २६ ॥ तं राजेति समानम् ।। २७ ॥
उदकचारी विद्याओंके द्वारा, मलके बीचमही रहने वाले, सब भंगी-
से सफेद ( अर्थात् अत्यन्त जिनके सबही स्थोंके बाल सफेद होगये हों,
अधया देवताके वर्णके समानही जिसके सब अंगोंका सफेद वर्ण होगया,
जिसके देखने से यह विश्वास होजाय, कि यह वस्तुतः देवतासम्बन्धीही रूप
है; इस तरह के श्वेतवर्ण) हुए २, किनारेकी सुरंग (छेद ) या भूमिगृहसे
निकलने वाले, यरुणके रूप में या नागराजके रूपमें धीरे २ अपने अनुकूल
बनाये हुए, जटिल वेषधारी सिद्ध पुरुपके सम्बन्धकी सब बातोंको सत्री पुरुष,
राजासे करें .॥ २६ ॥ जब राजा, उससे अपने किसी अभिलषित पदार्थको
याचना करे, तम वह शेष सम्पूर्ण व्यवहार पूर्ववन्ही करे ॥ २७ ॥
जनपदान्तेवासी सिद्धव्यञ्जनो या राजानं शत्रुदर्शनाय
योजयेत् ॥ २८॥ प्रतिपन्नं विम्ब कृत्वा शत्रुमावाहयित्वा निरु.
द्धे देशे घातयेत् ॥ २९॥
अथवा जनपद की सीमा में रहनेवाला, सिद्धका वेप धारण किये हुए
गूढ पुरुष, वहाके राजाको गनुके देखने के लिये प्रेरित करे। अर्थात् उन दोनोंको
उस सीमाप्रान्त में परस्पर मिझाने की योजना करे ॥ २८ ॥ जय रामा इस
शासको स्वीकार करले, तो पहिलेसे संकेत किये हुए विशेष चिन्होंके द्वारा शत्रु.
को या पुलाकर, किसी छिपे हुए स्थानमें दसे मरवादाले ॥ २९ ॥
[१३ अधिक (५५४) कौटलीय अर्थशास्त्र अश्वपण्योपयाता वैदेहकव्यञ्जनाः पण्योपयाननिमित्तमा- हृय राजानं पण्यपरीक्षायामासक्तमश्वव्यतिकीर्ण वा हन्युरश्चैव प्रहरेयुः ॥ ३० ॥ घोरे भादि बेचने वाले व्यापारी वेपमें रहो' हुए गूढ़पुरुष, विक्रीके योग्य घोड़ोंको साथ लेकर, उस सौदेको दिखलाने बहानेसे पानुराजाको यहाँ मुलया । जब वह उस सौदेकी (-घोड़ोंकी) परीक्षा अर्थात् अच्छी तरह देखभालमें लगा हुभा हो; या घोदोंकी भारी भीटमें घिर गया हो; तब उसको मारडॉल । और उन घोड़ोंके द्वाराही (अर्थात उन घोगों पर सवार होकरही) उसके मूलख्यान पर हमला कर देवें ॥ ३० ॥ नगराभ्याशे या पैत्यमारुह्य रात्रौ तीक्ष्णाः कुम्भेपु नाली- न्वा विदलानि धमन्तः 'स्वामिनो मुख्यानां वा मांसानि भक्ष- यिष्यामः पूजा नो वर्तता' मित्यव्यक्तं ब्रूयुः ॥ ३१ ॥ तदेषां नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः ख्यापयेयुः ॥ ३२ ॥ अथवा नगरके समीप रातमें किसी निर्दिष्ट (श्मशान आदिके) विशेष पृक्षपर पढ़कर सत्री पुरुष, भव्यक्त ( अस्पष्ट ) रूपमें इसप्रकार पोले-हम स्वामीके (राजाके) या अमात्य आदि मुख्य प्रकृतियोंके मांसको अवश्य खायेंगे, हमारी पूजा होनी चाहिये ॥ ३ ॥ इन गृढपुरुषोंकी इस कही हुई बासको नैमित्तिक (पशकुन भादि यताने वाले ) सथा मौहर्तिक (ज्योतिषी) के घेपमें रहने वाले गुप्तपुरुष, सर्वत्र प्रसिद्ध करदेवें ॥ ३२॥ मङ्गल्ये वा हदे तटाकमध्ये वा रात्री तेजनतैलाभ्यक्ता नागरूपिणः शक्तिमुसलान्ययोमयानि निष्पेपयन्तस्तथैव चूयुः ॥३३॥ अथवा किसी मांगलिक गहरे जलाशय ( तालाव) में रातके समय, दीप्तियुक्त तैलकी मालिश किये हुए, नाग देवताके रूपमें दीखने वाझे मिद्ध पेपधारी गृढ पुरष, लोहे के बने हुए शक्ति और मूमलोंको परस्पर रगरते हुए उसी प्रकार बोलें । अर्थात् या कहें, कि 'हम राजा और मन्त्रियों का मांस स्वावेंगे, हमारी पूना होनी चाहिये' ॥ ३३ ॥ ऋक्षचर्मकम्युक्किनो यानिधूमोत्सर्गयुक्ता रक्षोरूपं वहन्तस्तिर- पसव्यं नगरं कुर्वाणाः शिवसृगालवाशितान्तरेषु तथैव भ्रूयुः ॥ ३४ ॥ चैत्यदेवतप्रतिमा वा तेजनलेनाभ्रपटलच्छन्नेनामिना . -
२ अध्या०]
कुर्नलम्भोपाय
वा रात्रौ प्रज्माल्य तथैव ब्रूयुः ।। ३५ ॥ तदन्ये ख्यापयेयुः
अथवा रीछके घर को ऊपर ओठे हुए मुइसे भाग और धुआं निकालते
हुए राक्षसोंका रूप धारण किये हुए, नगरके चारों ओर बाई ओरसे तीनवार
घूमते हुए, गूढपुरुप, कुत्ते तथा सुगाल (गदिड ) भादिके शब्दों में उसी
प्रकार बोले ॥ ३४ ॥ अथवा ३मशान के देवताको, प्रतिमाको, दीलियुक्त तैलस
या अभरकके बीच छिपी हुई ( ढकी हुई । आगसे रातमें प्रज्वलित करके,
गूदपुरप, उसी प्रकार बोलें ॥ ३५ ॥ तदनन्तर दूसरे सत्री पुरुष, इनकी कही
हुई इस पातको सर्वत्र प्रसिद्ध करदेवें ॥ ३९ ॥
दैवतप्रतिमानामभ्यर्हितानां वा शोणितेन प्रस्तावमतिमा
कुर्यु ॥ ३७॥ तदन्ये दैवरुधिरसंसाने संग्रामे पराजयं चूयुः
॥ ३८॥
अथवा गूठपुरुष, देवताभोंमसे प्रधान देवताओंकी प्रतिमाओंका अत्यन्त
रुधिास य करें। तार्पय यह है, कि यहरे भादिका पून लेकर गूढ पुरुप, उसको
प्रतिमाओंके अन्दरसे होकर निकालें, जिससे देखने वालों को यह प्रतीत हो, कि
यहमतिमाही स्वप खून बाहर निकाल रही है ॥ ३० ॥ तदनन्तर उस दैवी
रुधिरके रहने पर, अन्य सत्री पुरुष, सर्वत्र इस बातको प्रसिद्ध करें, कि
इनलक्षणोंसे मालूम होता है, कि समाममें अवश्यही राजाका पराजय
हो जायगा॥३८॥
संधिरात्रिपु शमशानप्रमुखे वा चैत्यमूर्धभक्षितर्मनुष्पैः प्ररू-
पयेयुः ॥ ३९ ॥ ततो रक्षोरूपी मनुष्यकं याचेत ।।४।।
यश्चात्र शूरवादिको ज्यतमो वा द्रष्टुमागच्छेत्तमन्ये लोहमुसलै.
हैन्युः ॥ ४१ ॥ यथा रक्षोमिहत इति ज्ञायेत ॥ ४२ ॥
अपचा पर्यको रातों ( अर्थात् पूर्णमासी भमायस्या आदिकी रातमें)
मुण्य इमाम स्थान में, ऊपरसे साये हुए मनुष्यों के द्वारा चिता चिन्हों को.
गरपुर दिसज्ञा ॥ ३९ ॥ तदनन्तर राक्षसके रूममें, एक गूढपुरुष, अपने
साके लिये एक पुरषको मांगे ॥ ४० ॥जो कोई अपने आपको यहादुर कहने
चाला, या और कोई पुरप, यदा इसको देखने के लिये भावे, उस पुरुषको दूसरे
सग्री भादि मिरकर लोहे के मूसलोंसे मार दास ॥४॥ जिमसे सब पुरगे-
को यही मालमही, कि अमुक मनुष्यको राक्षोंने मारहाला ॥१२॥
२ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय (५५७) देवो कोंका प्रतीकार करके ) कोश बढ़ाने के लिये धनसञ्चयभी करे । ( यह सून पहिलेभी आया है । देखो अधि. ५, अध्या० २, सून्न ५२) ॥५०॥ हस्तिकामं वा नागवनपाला हस्तिना लक्षण्येन प्रलोभयेयुः ।। ५१ ॥ प्रतिपन्नं गहनमेकायनं वातिनीय धातयेयुर्वेध्या वाप- हरेयुः ॥ ५२ ॥ तेन मृगयाकामा व्याख्यातः ॥ ५३ ॥ अथवा हाधीकी इच्छा रखने वाले शत्रु राजाको, हाधियोंके जंगलोंकी रक्षा करने वाले, विजिगीषु पक्षके पुरुष, शुभलक्षणयुक्त हावीके द्वारा प्रलोभन देवें । भधात् उस प्रकारका हाथी पकरवा देने की भाभलापा उसके हृदय में उत्पा करा देयें ॥५१॥ जय वह इस बात को स्वीकार काले, तो उसे अकेलेही घने जंगल में लेजाकर मरया डालें, अथवा बांधकर अपने विजिगीषु राजाके पास लेजावे ॥ ५२ ॥ इसीके अनुसार, शिकार खेलनेकी इच्छा रखने वाले शत्रु राजाके सम्बन्ध भी समझ लेना चाहिये ॥ ५३॥ द्रव्यस्त्रीलोलुपमाट्यविधवाभिर्वा परमरूपयौवनाभिः स्वीमि. यादनिक्षेपार्थमुपनीतामिः सत्रिणः प्रलोभयेयुः ।। ५४ ॥ प्रतिपन रात्रौ सत्रिछन्नाः समागमे शसरसाम्यां घातयेयुः - अपया जो शत्रुराजा, धन और खियोंकी कामना रखता हो, उसको सभी पुरुष, धनी विधवा क्षियों के द्वारा, या अपने दायभाग तथा मादिक मुकदमोंके महानेसे वहां लाई हुई अन्य अण जवान सियोंके द्वारा लोमा देखें। क्षा राजाको फंसायें॥ ५ ॥ जयः उनकी यातको स्वीकार करले, समागम करने के लिये किसी फेशित स्थानमा मुरुषके साध सम्बन्ध रखने थाले गृटपुर- विस भद सिल'फर उस राजाको मार दा॥ ५ सिक चत्यस्तूपदेवतप्रतिमानाममीक्ष्णाभिंगमनेषु वा भूमिगृहमरागृढभित्तिप्रविष्टास्तीक्ष्णाः परमभिहन्यः ।। ५६ ॥ Sila (साधु), प्रमजित (भिक्षु), दमशान के स्तूप या देवताओं काति पाने के लिये पार २ जाने अवतोपर; भूमिगृह सुरंग हुए गुठपरप, मधुराजाको मार डालें ॥५६॥ सुधा स्पेि ३ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय (५५९) साथी गूढपुरुषों के साथ ही तक्षिा पुरुष, शत्रुओं के ऊपर प्रहार करके उन्हें मारडालें । ( ५७ वें लोकसे लगाकर यहांतक पांच लोकोंका इकट्ठा ही अन्यय समझना चाहिये)॥६॥ यथैव प्रविशेयुश्च द्विपतः सचहेतुभिः । तथैव चा गच्छेयुरित्युक्तं योगवामनम् ॥ ६२॥ इति दुर्गलम्भोपाये प्रयोदशे ऽधिकरणे योगवामनं द्वितीयो ऽध्यायः ॥ २ ॥ आदितो द्विचत्वारिंशउत. ॥ १२ ॥ जिसपकारसे शत्रुओंके बीच में, सभी पुरुष, कपटपूर्वक श्वेश करें, उसी प्रकार कपटपूर्वक उन्, उनके बीच से बाहर निकल आना चाहिये। अन्यथा शत्रुओंके द्वारा उनके पकरे जानेकी सम्भावना होसकती है। यहांतक योग- धामनका निरूपण करदिया गया ॥ ३२ ॥ दुर्गलम्मोपाय त्रयोदश अधिकरणमें दूसरा अध्याय समात । १७३ प्रकरण तीसरा अध्याय गूढपुरुषोंका शत्रदेशमें निवास । गृढपुरुपोंका ही नाम 'अपसर्प' है । उनको शत्रुके . देशमें भेजकर, यहां रखना ही 'भपसर्पप्रणिधि' कहानारा है। इस प्रकाणमें इसी यातका निरूपण किया जायगा। श्रेणीमुख्यमाप्तं निष्पातयेत् ॥ १॥ स परमाश्रित्य पक्षा- पदेशेन खविषयात्साचिव्यकरणसहायोपादानं कुर्वीत ॥ २ ॥ कृतापसोपचयो या परम मान्य. स्वामिनो दूष्पग्रामं वीतहस्त्य- श्व दृष्यामात्यं दण्डमाक्रन्दं वा हत्या परस्य प्रेपयेत् ॥ ३ ॥ चिनियाधु, भपने अत्यन्त विश्वस्त श्रेणीमुण्य पुरुषको, अपने यहांसे निकाल देये । ( इसका अभिप्राय यही है, कि अपरसे बनायटी शत्रुता दिखाकर उसको अपने यहाँसे बाहर करदेवे, जिससे कि पिना सन्देहके वह गधुके पास भाभय कैसके). या विश्वस्त पुरुष, शत्रुका आप्रय ले र, शत्रुपक्षके कावदानेसे, अपने देशले अपनी सहायता कानेवाले पदार्थोका संग्रह करे ॥२॥ जय पनी सहायता के लिये यहुतसे गृहपुरपाको इकट्ठा करलवे,
(५६०)
कोटलीय अर्थशास्त्र
[१३ भधिक
तो शत्रुकी अनुमति लेकर, विजिगीषु ( अपने वास्तविक स्वामी) के दूष्यवर्ग
को, घोडे तथा हाथियोंसे रहित, और दूप्य नमात्यांस युक्त सेनाको, भार
माकन्द अर्थात् पृष्ठस्थित मित्रको जीतकर शाके पास भेजदेवे ॥ ३ ॥
जनपदैकदेशं श्रेणीमटवीं वा सहायोपादानार्थ संश्रयेत
॥४॥विश्वासमुपगतः स्वामिनः प्रेषयेत् ॥ ५॥ ततः स्वामी हस्ति-
बन्धनमटाघात वापदिश्य गूढमेव प्रहरेत् ॥६॥ एतेनामा-
त्याटविका व्याख्याताः ॥७॥
जनपदके एकदेश, श्रेणी (पलवान् पुरपाका कोई संघ), अथवा
भारविक पुरुषों को स्वामीकी सहायताके बहानेमे अपने वश में करके, उनके
साथ गृढ व्यवहार करे ॥ ५ ॥ जब ये लोग अपने पूर्ण विश्वस्त होजावें, तो
अपने असली मालिक विजिगीपुकी सहायताके लिये, उन्हें उसके पास भेज
देवे ॥५॥ तदनन्तर मामी भर्थात् विजिगीषु, अपने हाथियोंके पकड़े जाने
या जंगल के नष्ट करदेने का बहाना करके, उपचाप दी (शत्रुके तैयार हुए
यिना ही ), शत्रुपर चढाई करदेवे ॥६॥ इसीके अनुसार, भमास्य तथा
भारविकको गूदपुरप बनाकर, शत्रुके देश में भेजने का प्रकार भी समझ लेना
चाहिये ॥७॥
शत्रुणा मैत्री कृत्वामात्यानवक्षिपेत् ॥ ८॥ ते तच्छत्रोः
प्रेपयेयुः ॥ ९ ॥ भतारं नः प्रसादयेति ॥ १० ॥ स यं दूत
प्रेपयेत् तमुपालभेत ॥ ११॥ भर्ता ते माममात्यैर्मेदयति ॥१२॥
न च पुनरिहागन्तव्यमिति ॥ १३ ।।
गृढपुरुषको शत्रुके देशमें भेजनेका भव और प्रकार बताते हैं:-विजि.
गीपु, भपने शत्रुके साथ ऊपरसे बनावटी मिग्रता करके, अपने मायाको
धिक्कारपूर्वक तिरस्कृत करे ॥ ८॥ अमात्य, इस शत्रुके पास भैपने दूत
को निन्नालेखित सन्देश देकर भेजें, कि ॥ ९॥ भाप हमारे मालिकको प्रसव
करा दीजिये ॥ १०॥ तदनन्तर वह शत्रु, अपने जिस दूतको, विजिगीपुके
पास वह काम करनेके लिये भेजे, विजिगीषु उसको यह कहकर घुड़क देवे,
कि 'तुम्हारा मालिक हमारे समात्योंसे मेरा भेटेकराना चाहता है
॥ १२ ॥ याद रखो ! इस तरहका सन्देश लेकर मेरे पास फिर कभी मत
माना ॥1॥
३ अध्या०]
दुर्गलम्भोपाव
अथैकममात्यं निष्पातयेत् ॥ १४ ॥ स परमाश्रित्य यो
गापसापरतल्यानशकिमतः स्तेनाटमिकानुभयोपघातकान्वा
परस्योपहरेत् ॥ १५॥ आप्तभावोपगतः प्रवीरपुरुषोपचात-
मस्योपहरेत् ॥ १६ ॥
इसके अनन्तर, विजिगीपु, उन अमात्यों में से एक अमात्यको अपने यहां-
से निकाल देखे ॥ १४ ॥ नह अमात्य शत्रुका आश्रय लेकर; कपर्टी गूढपुरुष,
स्मानीमें अपरका हुए २ दूप्यपुरुप, शक्तिरहित चोर तथा आटपिक पुरुषों को,
भथया विजिगीषु और शत्रु दोनोका ही नाश करमेयाले पुरुपोको, यह कहता
हुमा शनुके पास ले जाये, कि मैंने तुम्हारे इतने नये सहायक मार किये
हैं ॥ १५॥ जब शत्रु इस अमात्य पर पूरा विश्वास करने लगे, तो वह अमात्य
भानुके शक्तिशाली पुरपीको मार डाले ॥ १६ ॥
अन्तपालमाटविकं दण्डचारिणं वा ॥ १७ ॥ दृढमसौ चा.
सौ च ते शत्रुषा संधत्त इति ।। १८ ॥ अथ पश्चादभित्यक्तशा-
सनैरेनान्धातयेत् ॥ १९ ॥ दण्डबलव्यवहारेण या शत्रुमुद्योज्य
घातयेत् ।। २०॥
उनके नष्ट करने का उपाय निम्नलिखित रीबिसे समझना चाहिये.-दह
अमात्य, मारविक ( जंगलकी रक्षा करने वाला ) तथा सैनिक पुरुषोंकी दुष्टता-
की सूचना, शत्रु रामाको देवे । अर्थात् राजाको कहे, कि आपके ये आटविक
और सैनिक पुरुप पढ़े दुष्ट होगये है ॥ १७ ॥ मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूं;
कि अमुक २ भाटविक या सैनिक पुरुष, शत्रुके साथ सन्धि कररहे हैं ॥ १८ ॥
इसके अनन्तर, विजिगीपुके वध्य पुरुषों के पास, भारविक और विजिगीपुकी
परस्पर मित्रताको प्रकट करनेघाले कपट लेखौको शत्रुको दिखाकर अन्तपाल
आदिको मरया बाले ॥ १९ ॥ अथवा, मनुको सनिक सहायता देने का वादा
फरक, उसके शत्रुसे उसे भिट्टादेवे, यादमें उसे सहाया न देकर, उसके शत्रुके
द्वाराही उसे माया वाहे ॥२०॥
कृत्यपक्षोपग्रहेण वा परस्यामित्रं राजानमात्मन्यपकारवि-
त्याभियुञ्जीत ॥ १॥ ततः परस्य प्रेषयेत ।। २२ ॥ असौ ते
वैरी ममापकरोति ।। २३ । तमेहि संभूय हनिष्यावः ॥२४ ।।
भूमौ हिरण्ये या ते परिग्रह इति ॥ २५ ॥
[१३ आधि.
(५६२)
कौटलीय अर्थशास्त्र
अथवा शक कृत्यपक्ष मुद, लुब्ध तथा भीरावर्ग) को अपने अनल
बनाकर विजिगीषु, शत्रुके शत्रुराजासे अपने ऊपर कुछ भपकार करवाकर,
उसपर पाई करनेकी तैयारी करदेव ॥२॥ तदनन्तर शत्रुके पास निम्न-
लिखित सम्देश देकर अपने दूतको भेजे ॥ २२ ॥ वह तुम्हारा शत्रु, परापर
मेरा भपकार कररहा है ॥ २३ ॥ आओ, हम दोनों मिलकर उसपर चढ़ाई
करेंगे ; अर्थात् उसको मिलकर मारेंगे ॥ २४॥ शत्रुपर विजय प्राप्त होने पर
भूमि भौर हिरण्य (धन) में तुम्हारा हिस्सा होगा ॥ २५ ॥
प्रतिपन्नममिसत्कृत्यागतमवस्कन्देन प्रकाशयुद्धेन वा शत्रुणा
यातयेत् ॥ २६ ॥ अभिविश्वासनार्थ भूमिदानपुत्राभिषेकरक्षाप-
देशेन वा ग्राहयेत् ॥ २७ ॥ अविपद्यमुपांशुदण्डेन वा धातयेत्
॥२८॥
जब शत्रु इस पातको स्वीकार करले, और अपने पाग भाजाये, तो पहिले
उसको भरसी तरह सरकार करके, फिर सोनेके समय छिपकर मारदाले ।
अथवा प्रकाशयुद्ध के समय शत्रुके द्वाराही मरवा डाले ॥ २६ ॥ यदि पे दोनों
मिलकर शत्रुको जीत लेवें, तो विजिगीषु, प्रथम प्रतिज्ञा की हुई भूमिको देने,
पुनके राज्याभिषेक करने तथा अपनी रक्षा करने के बहानेसे शत्रुको पकड़या
देवे ॥ २७ ॥ यदि शत्रु, इस प्रकार भी काचूमें न भावे, तो उपांशुदण्डके
द्वारा उसका वध करवा देवे । अर्थात् छिपकर तीक्ष्ण पुरुषों के द्वारा मरवा
देवे ॥२८॥
स चेद्दण्डं दद्यान्न स्वयमागच्छेत्तमस्य वैरिणा घातयेत्
॥ २९ ॥ दण्डेन वा प्रयातुमिच्छेन्न विजिगीपुणा, तथाप्येन मु-
भयतः संपीडनेन धातयेत् ।। ३० ॥
शत्रुको नष्ट करने के ये पूर्वोक्त उपाय उसी समय किये जासकते है,
जय शत्रु स्ययही विजिगीषुको सहायनाके लिये भाजाये । यदि वह अपनी
सेनाकोही विजिगीपुकी सहायता के लिये भेनदेवे, और स्वयं न आये तो
उसकी सेनाको उसके शत्रुके द्वारा मरचा डाले । अर्थात् शत्रुके मुकाबलेमें
सदाकर नष्ट करवा देवे ॥ २९ ॥ यदि विजिगीपुके साथ मिलकर, अपने
शत्रुस पुद करने के लिये भाया हुआ शत्रु, अपनी सेनाके सायही चलना
चाहता है, विजिगीपुकै साथ चलना नहीं चाहता, तोभी इसको दोनों ओरसे
मेरकर मरना डाले ॥३०॥
.
३ अध्या०]
दुर्गलम्मोपाय
(५६३)
अविश्वस्तो वा प्रत्येकशो यातुमिच्छेत्तद्राज्यैकदेशं वा यात-
व्यस्यादातुकामस्तथाप्येनं वैरिणा सर्वसन्दोहेन या घातयेत्
॥ ३१ ॥ वैरिणा वा सक्तस्य दण्डोपनयेन मूलमन्यतो हारयेत्
॥ ३२॥
यदि शत्रु, विजिगीपुर अविश्वास रखने के कारण, अपनी सेनाको भल-
हदाही लेफर इस कामनासे उस शत्रु राजापर चढ़ना चाहसा कि उसके
राज्यके एक हिस्सेको मैं अपने वशमें करलंगा तौभी विजिगीषु, इस शग्रुको
इसके शभुके द्वारा अथवा अपनीही सम्पूर्ण सैनिक शक्तिके द्वारा अवश्य मरवा
खाले ॥ ३॥ ॥ अथवा अपने शत्रुके ऊपर चढ़ाई करके, उसके साथ लड़ाई में
लगे हुर शमुके मूलस्थानकोही; विजिगीषु, सेना भेजकर अपहरण करवा
लेचे । अर्थात् शत्रु, अपने शग्रुपर चढ़ाई करके जाये, और विजिगीषु उसकी
राजधानीपर लूटमार करदेव ॥ ३२ ॥
शत्रुभूम्या या मित्रं पणेत ॥ ३३ ॥ मित्रभूम्या वा शत्रुम्
॥ ३४ ॥ ततः शत्रुभूमिलिप्सायां मित्रेणात्मन्यपकारयित्वाभि-
युजीत ।। ३५ ।। इति समानाः पूर्येण सर्व एव योगाः ॥३६॥
अथवा विजिगीपु, मित्रके साथ निझलिखित रीतिसे छिपे तौरपर
सन्धि करे, कि यदि हम दोनों ने मिलकर पत्रुको जीत लिया, तो उसकी
भूमिको साधा २ याउलेंगे ॥ ३३ ॥ मीनगार विजिगीषु, गधुके साथ भी
छिपे तौरपर शर्त करे, कि हम तुम मिलकर, तुम्हारे अमुक श पर (अर्थात्
विजिगीषुके मित्रपर ) चढ़ाई करके, उसकी भूमिको बराबर बांटलेंगे ॥ ३४ ॥
इसतरह जय शत्रुकी भूमिको लेने की इछा हो, तो विजिगीषु, मित्र के द्वारा
भपने ऊपर कुछ भपकार करवाके, इसी बहानेसे उसके ऊपर आक्रमण करने
की तैयारी करदेव ॥ ३५ ॥ इसके अनन्तर सब कार्य पूर्ववत् ही काना
चाहिये । (मर्थात् मिलकर चढ़ाई करने के लिये शत्रुको अपने समं प बुलाकर,
उसे उपर्युक विविध उपायोंसे मारदाले) ॥ ३६॥
शत्रु वा मित्रभूमिलिप्सायां प्रतिपन्नं दण्डेनानुगृहीयाद
॥३७॥ ततो मित्रगतमतिसंदध्यात् ॥ ३८॥ कृतप्रतिविधानो
या व्यसनमात्मनो दर्शयित्वा मित्रेणापित्रमत्साहयित्वात्मानम
भियोजयेत् ॥ ३९ ॥
[१३ अधिक - फौटलीय अर्थशास्त्र अयया जय शनुको, विनिगीपुके मित्रकी भूमि लेनेकी इजा हो, तो शत्रुके तैयार होनेपर, उसको अपनी ओरसे सैनिक सहायता देवे । अर्थात् अपनी सेना साथ देकर मित्रके देशपर उससे पढाई फरयादेवे ॥ ३० ॥ जय वा मित्र देशम पहुंच जाये, तो मिनये मिलकर, शत्रुको नष्ट करवावे ॥३८॥ अथवा हरतरहको आपत्तिका प्रतीकार करके विजिगीपु, अपने आपके ऊपर कोई बनावटी भापत्ति दिखाकर, धरने मित्रके द्वारा शत्रुको उत्साहित करके अपने उपर चढाई करवादेवे ( इस सूबम कृतप्रधानो वा' इसके स्थानपर किसी २ पुस्तकमै 'तत. प्रतिविदानेन वा' ऐसा मी पाठ है । परन्तु दोनों पाठोका अर्थ समान ही है ) ४३५ ॥ ततः संपीडनेन घातयेत् ॥ ४० ॥ जीवग्राहेण वा राज्य. विनिमय कारयेत् ॥ ४१ ॥ मित्रेणाहृतश्चेच्छनुरमाये सातुमि- च्छेत्सामन्तादिभिर्मूलमस्य हारयेत् ॥ ४२ ॥ दण्डेन वा बातु- मिच्छेतमस्य पातयेत् ।। ४३ ।। इस प्रकार विजिमीपुके मित्रके साथ मिलकर, जब शत्रु विजिगीपुपर पढ़ाई करदेवे, तो विजिगी और उसका मिग्र, दोनों ही, शत्रुको बीच में धेरकर मारडाल ॥ ४० ॥ अथवा जीते हुए ही उसे पकड़कर, उसके राज्यका परिवसन करदें। अर्थात् उसको पन्धनमें डालदेवें, ओर उसकी गहीपर, अपने भाज्ञाकारी उसके पुत्र या अन्य किसी सम्बन्धीको बैठा देयं ॥ १ ॥ यदि विजिगीपुरे मित्रसे लायाहुआ शत्रु, उस मिनसे अलहदा रहना चाहे अधात् उसके साथ २ मिलकर सहाई करनेको न जाना चाहे, किन्तु पृथक होकर ही जाना चाहे, तो सामन्त (पातुके समीप देशके राजा) आदिके द्वारा इसकी राजधानीका अपहरण करवादेव ॥ ४२ ॥ यदि सेनाके द्वारा वह अपनी रक्षा करना चाहे, तो उस सेनाको मरवा दियाजावे ॥ १३ ॥ तौ चेन्न मिययाता प्रकाशमेवान्योन्यस्य भूम्या पणेत ॥ ४४ ॥ ततः परस्परं मित्रव्यञ्जनोमयवेतना वा दूतान्प्रेपयेयुः ॥ ४५ ॥ अयं ते राजा भूमि लिप्सते शत्रुसंहित इति ॥ ४६॥ तयोरन्यतरो जासाशङ्कारोपः पूर्ववच्चेष्टेत ॥ ४७ ।। मित्र भौर शगु, यदि छिपे तौरपर शर्त करनेसे भदको प्राक्ष न हो, तो प्रकटरूपमेही एक दूसरेकी भूमिफी शर्स करे । अर्थात् मित्रको भूमिसे शके साथ, और शत्रुका भूमिसे मित्र के साथ खुले तौरपरही शर्स करले
-
इस
३ अध्या०]
दुमेलम्भोपाय
॥ ४५ ॥ तदनन्तर शत्रु और मित्र दोनों केही पास, शनु और मित्रके दोनोंके
मिनके घेपमें रहनेवाले गूदपुरुष, अथवा दोनो ओरसे ( विजिगीषु और मित्रकी
औरस) वेतन पानेवाले गुप्तपुरप, निम्नलिखित सदेशको देकर अपने दूतोको
भेजें ॥ ४५ ॥ वह संदेश यह है:- 'यह राना, शत्रुके साथ मिलकर तुम्हारी
भूमिको लेना चाहता हे ॥ ४६ ॥ उन दोनों (मित्र शत्रुओं) मेंस कोई एक
शक्षितचित्त तथा बुन्द्ध होकर, पूर्ववत्ही चेष्टा करे । अभिप्राय यह है, उन दोनों
मॅसे जो क्रुद्ध होकर विजिगीषुपर चढाई करे, उससे दूसरे के साथ मिलकर
विजिगीषु, पूर्वोक्त उपायोंके द्वारा अक्रमणकारीको नष्ट करदाले ॥ ४५ ॥
दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यान्या कृत्यपक्षहेतुभिरभिविख्याप्य प्रया-
जयेत् ॥४८॥ ते युद्धावस्कन्दावरोधव्यसनेषु शनुमतिसंदध्युः
॥ ४९ ॥ भेदं वास्य स्ववर्गेभ्यः कुर्युः ॥ ५० ॥ अभित्यक्तशा-
सनैः प्रतिसमानयेयुः ।। ५१ ।।
अथवा दुर्ग (मूलस्थान राजधानी), राष्ट्र (जगप३) और सेनाके मुख्य
व्यक्तियोंको , अपने (विजिगीपुके) कृत्यपक्ष नन्द लुब्ध भीतवर्ग) की सहायता
करनेका बहाना करके, अर्थात् ये लोग मरे कृत्यपक्षको सहायता देते है,
प्रकार सर्वत्र प्रसिद्ध कर के, उनको विजिगीपु, अपने देशसे बाहर निकाल देये
॥४८॥ चे सब लोग, शके आश्रयमें जाकर , कभी युद्धके अवसरपर, सोते
समय, अन्त पुरमें रहनके समय, या किसी विशेष आपत्तिके समयमें मौका
पाकर शत्रुको मारडाले ॥ ४२ ॥ अथवा इसके अपने भगार, आदि वर्गासही
इसका भेद करवा देयें ॥ ५० ॥ ओर विजिगीपुके वध्य पुरुषोंके द्वारा लाये
गये कपटपूर्ण लेखों के साथ, अपनी मिथ्याकल्पित बाताको मिला देवें । अभि.
प्राय यह है, कि इस प्रकार अमात्य आदिके साथ राजाका भेद पुलवा देवे ॥५॥
लुब्धकव्यञ्जना वा मांसविक्रयेण द्वाःस्था दौवारिकापाश्र-
याथोराभ्यागमं परस्य द्विनिरिति निवेद्य लब्धप्रत्यया भर्तुरनीकं
द्विधा निवेश्य ग्रामवधे ऽवस्कन्दे च द्विपतो भूयुः ॥ ५२ ॥
आमन्नथोरगणो महांयाकन्दः प्रभूतं सैन्यमागच्छत्विति ॥५३॥
भधवा शिकारीके वेपमें रहनेवाले गृढपुरुष, मास घेरने के बहानेसे
दरयाजेपर ठहरकर, द्वारपालोंके आश्रयसे, दो तीन चार चिल्लाकर इस बात्तको
कहें, कि शत्रुके गायों में चोर आते हैं। इस तरह जय राजाको इन बातोपर
विश्वास दोजावे, तो ये अपने सज की सेनाको, ग्रामवध भोर रातिको साते
समयकी लटमार स्येि दो भागों में विभक्त करके शत्रुसे कह:-॥५२॥
[१३ यधिक (५६६) कौटलीय अर्थशास्त्र चोरोंका झुण्ड बहुत नजीक भाया हुआ है। आदमियोंका बहुत कोलाहल मचरहा है ; भापकी बहुतसी सेना उनके प्रतीकारके लिये हमारे साथ मानी चाहिये ।। ५३॥ तदर्पयित्वा ग्रामघातदण्डस्य सैन्यमितरदादाय रात्रौ दुर्गद्वारेषु ब्रूयुः ।। ५४ ॥ हतधोरगणः ॥ ५५ ॥ सिद्धयात्रमिदं सैन्यमागतम् ॥५६॥ द्वारमपात्रियतामिति ॥५७॥ पूर्वप्रणिहिता वा द्वाराणि दाः ॥ ५८ ॥ तैः सह प्रहरेयुः ॥ ५९॥ इसपकार उस सेनाको, ग्रामवधके लिये नियुक्त हुई सेनाके सुपुर्द करके, अपनी सेनाके दूसरे हिस्मको लेकर, रातके समय दुर्गके दरवाजापर भाकर इसत्ताह कह:-॥ ५५ ॥ चोरोंके समूहको हम लोगॉन मारडाला ह ॥ ५५ ॥ यह सेना अपनी यात्राको सफल करके, अर्थात् अपने कार्य को पूरा करके यहां पहुंच गई है ॥ ५६ ॥ इसलिये दुर्गके दरवाजोको सोलदिया जावे' ॥ ५७ ॥ अथवा पहिले नियुक्त हुए २ गूढपुरुषही इशारा पाकर दरवाजा सोलदेवें ॥ ५८ ॥ और आई हुई सेनाके साथही ये लोग भी दुर्गपर हमला बोला ॥ ५९॥ कारुशिल्पिपापण्डकुशीलवदेहकव्यञ्जनानायुधीयान्या पर- दुर्गे प्रणिदध्यात् ।। ६० ।। तेपां गृहपतिकव्यञ्जनाः काष्ठतृण- धान्यपण्यशकटः प्रहरणावरणान्याभिहरेयुः ।। ६१ ॥ देवधजप्र- तिमाभिर्वा ।। ६२॥ अथवा फारु, शिल्पी, पाखण्डी, कुशीलव ( नट) और पैदेहक (व्यापारी) के वेपमें रहनेवाले या आयुधजीपीके घेपमें रहनेवाले गूढपुरपोंको शनुके दुर्गम भेदिया बनाकर नियुक्त किया जावे ॥ ६॥ उनमेंसे गृहस्थके धेपमें रहनेवाले गपुरम, लकी घास अनाज और दूसरे सौदोंकी गाड़ियों द्वारा हथियार तथा कवच भादि युद्धोपयोगी सामग्रीका संग्रह करके, उन कारु आदिके वेपमें रहनेवाले गृदपुरषों को देखें ॥ ६ ॥ अधका देवताओंकी ध्वना. रूप तसगारोंके साग या प्रतिमाओके साथ हाकर भी हथियार भादिका संग्रह करके; कार मादि गुप्तपुरषोंको देदेवें ॥ ६२॥ ततस्तयजनाः प्रमत्तवधमयस्कन्दप्रतिग्रहमभिप्रहरणं पृष्ठतः शवदुन्दुभिशब्देन वा प्रविष्टमित्यावेदयेयुः ॥ ६३ ॥ प्राकारद्वारा- हालकदानमनीकमेदं घातं या कुर्युः ।। ६४ ॥
३ अध्या दुर्गलम्भोपाय १५६७) तदनन्तर कार आदिके वेपमें रहने वाले गूढपुरुष, प्रमादी पुरुषों के वध, बलात्कार लूटमार और चारों भोरसे भाक्रमणके सम्बन्ध तथा शंख और नगाड़ेके शब्दके साथ, पीछेकी ओरसे हमला करनेके सम्बन्ध निवेदन करदेवें । अर्थात् आमत भविष्यमें होने वाली इस घटनाको सूचना, शत्रुको देदेवें ॥ ६३ ॥ जय शत्रु, उनके प्रतीकारके लिये, अपनी सेनाके साथ पीछेसी भोरको जावे, तो इघरसे कार आदिक वपमें गूढपुरुषः परकोटा, प्रधान दरवाजा तथा दरवाजेके ऊपरके चौबारे आदिको तोड़ने के साथ २ ही पूर्ववत् शत्रुकी सेनाकोभी विभक्त करदे । अथवा भवसर पाकर सर्वथा नष्टही कर डालें ॥६॥ सार्थगणवासिभिरातिवाहिकैः कन्यावाहिकैरश्वपश्यव्यवहा- रिभिरुपकरणहारकैर्धान्यक्रेपितृभिर्वा प्रत्रातलिङ्गिभितश्च दण्डातिनयनं संधिकर्म विश्वासनार्थमिति राजापसः।। ६५ ।। शत्रुकी सेनामें भेद डालनेके समान, उसे दुर्गम मार्गोसे छंघानामी गूढपुरुषकाही कार्य है, इसी बातका अब निरूपण करते हैं। दुर्गम मार्गोसे पार करने वाले व्यापारियों के झुण्डके रूपमें रहते हुए, कन्याओंको लेगाते हुए, घोदोंका व्यापार करते हुए, उसके साथ सम्बन्ध रखनेवाले दूसरे सौदे वेचते हुए था उनको इधरसे उधर ढोते हुए, अनाज आदिकी खरीद फरोख्त करते हुए तथा संन्यासियोंके पेपमें रहते हुए दूतही, सेनाओंको दुर्गम मार्गोसे निकाल कर पाहर लेजायें; तथा शन्नुके विश्वास के लिये सन्धिकी शौका पूरा २ ध्यान रखें । इसप्रकार यहाँ तक राजाओंके गूदपुरानोका निरूपण कर दिया गया ।। ६५॥ एत एवाटवीनामपसर्पाः कण्टकशोधनोक्ताश्च ॥६६॥ ब्रजमटव्यासन्नमपसर्पाः सार्थ वा चौरैर्घातयेयुः ।। ६७ ॥ कृतसं- केतमन्नपानं चात्र मदनरसविद्धं या कृत्वापगच्छेयुः ॥ ६८॥ गोपालकवैदेहकाच ततश्चोरान् गृहीतलोप्नमाराः मदनरसविका- रकाले ऽवस्कन्दयेयुः ॥ ६९ ।। कष्टकशोधन अधिग्ण में कहे हुप, तथा ये यहां कहे हुए गूढपुरुपही, भाटकोकभी समाने चाहिये । तात्पर्य यह है कि भावश्यकता होने पर भारधिकॉममी येही गूदपुरण कार्य को ॥६६ ॥ आटविकों में, गृढ पुस्प, यह कार्य करें:-जंगलके समीपकी गोश लाओं तथा मार्गमें चलने वाले पुरुषों को, भाटविकी (=चोरों-चोरवृत्ति पुरुषही आटविझ करलाते है) के साय मिल. कर लटले, मी उन्हें नष्ट करबालें ॥ ७॥ तदनन्तर संकेत पाकर, उनके खाने [१३ अधि० 7 कोटलीय अर्थशास्त्र पीनकी वस्तुभाम, मादकता करने वाले विषाको मिरकर, अरसर पातही वहांसे भाग जाय ॥ ६८ ॥ तदनन्तर बाले और व्यापारी, चोरोसे चुराये हुए माल-भार) को पकडकर, अर्थात् उनसे सायं लेकर, विपका विकार होने के "समयम (अर्थात् विषयुक्त साथ पदार्थ साजाने के कारण, उमका भमर होने के समयमें) चोरों को गिरफ्तार करवे ।। ६९ ॥ संकर्षणदैवतीयो या मुण्डजटिलव्यञ्जनः प्रहवणकर्मणा मदनरसयोगाभ्यामतिसंध्यात् ।। ७० ॥ अथावस्कन्दं दद्यात् ॥७१ ।। शौण्डिकव्यञ्जनो वा दैवतप्रेतकार्योत्सवसमाजेबाट- चिकान्सुराविक्रयोपायनानिमित्तं मदनरसयोगाभ्यामतिसंदध्यात् ।।७२ ॥ अथावस्कन्दं दद्यात् ।। ७३ ॥ अपका संकर्पण देवताको माननेगाला (सरायके साथ यहुत मुहम्वत्त रखनेवाले पलभदको ही अपना इष्टदेव समझनेवाला), मुण्ड तथा जटाधारी के वेपमें रहता हुआ गूढपुरप ही, सन्तुष्ट होकर सहभोज आदिके कराने (अर्थात् पार्टी देने ) के द्वारा, तथा मादकतायुक्त विष या अन्य प्रयोगांसे आटांवोंको टगे, अर्थात् उन्हें काम करे ॥ ७० ॥ इसके बाद जब उनको विप आदिका असर हो जाये, तो उन्हें गिरफ्तार कर लेवे ॥ ७॥ ॥ अथवा भाराव पेचने वाले के पेपमें रहनेवाला गूढ़ पर प; देवतासम्बन्धी कार्य, नेतकार्य, उत्सव तथा अन्य सभा सम जोंके अवसरों पर, भाट वेक पुरपोंको, विक्रयार्थ सुराके लाने का बहाना करके मदकारक विष आदि रस, सथा अन्य योगोंके द्वारा अपने घशम करे ॥ २ ॥ जब उनके ऊपर, इन रस नादिका प्रभाय होजाय तो उनको गिरफ्तार कर लिया जावे ॥३॥ ग्रामघातप्रविष्टां वा विक्षिप्य बहुधाटवीम् । पातयेदिति चौराणामपसर्पाः प्रकीर्तिताः ॥ ७४ ।। इति दुर्गलम्भोपाये प्रयोदशे ऽधिकरणे भपसर्पप्रणिधिस्तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ भादितखिचस्वरिशच्छत. ११४३॥ प्राम भादि को नष्ट करने के लिये, गांवमें प्रविष्ट हुप २ थाटविक पुरों को, मिस २ प्रकार उनके चिचमें विकार उत्पा करके, नष्ट करदिया जाये । यहां तक आटविक अर्थात् घोगके सामन्ध, गूपुरमा के कार्यों का निहरूपण करदिया गया ॥ ४॥ दुगलम्भापाय प्रयोदश यधिकरणम तीसरा अध्याय समाप्त ४ अध्या दुर्गलम्भोपाय चौथा अध्याय N........... १७४-८५मकरण LIBRARY शत्रुके दुर्गको घेरना तथा शत्रुके दुर्गका अवमर्द इस अभ्यायमें दो प्रकरण हैं । पहिले प्रकरणमै 'शत्रुके दुर्गको चारों ओरसे घेरकर, फिर सेनाको क्या करना चाहिये' इस पातका निरूपणं किया जायगा । शत्रुके दुर्गको अपने अधि- कारमै करलेना 'अवमर्द' कहाता है। यह अवमर्द कब और किस समय करना चाहिये; इत्यादि बातोंका दूसरे प्रकरणमें निरूपण किया जायगा। कर्शनपूर्व पर्युपासनकर्म ॥ १॥ जनपदं यथानिविष्टमभये स्थापयेत् ॥ २ ॥ उत्थितमनुग्रहपरिहाराभ्यां निवेशयेदन्यत्राप- सरतः॥३॥ शत्रुके कोश और सैन्यका नाश करने हुए, तथा अमात्य आदिका वध करते हुपही, विजिगीषु को शत्रु के दुर्गके चारों ओर घेरा डालने का काम करना पाहिये ॥१॥ परन्तु इस अवस्थामभी विजिगीषु, शत्रुके जनपदको पहिलेके समानही अभयस्थानमें रवले, अर्थात् जनपदको किसी तरहको पोका न होने देवे, प्रत्युत उसकी रक्षाही करे ॥२॥ यदि जनपद, विजिगीपुके विरुद्ध भान्दोलन करे, तो उसे पन आदि देने तथा टैक्स भादिके छोड़ देनसे, शाम्त करे । परन्तु यह उसी भवस्या करना चाहिये, जय कि जनपद अपने स्थानको छोर कर कहीं बाहर न जारहा हो । बाहर जाने के लिये तैयार होनेपर तो उसे किसी तरह की भी सहायता न देधे ॥३॥ समग्रमन्यस्यां भूमौ निवेशयेदेकस्यां वा वासयेत् ॥ ४ ॥ न ह्यजनो जनपदो राज्यमजनपदं वा भवतीति कौटल्यः ॥५|| विपमस्थस्य मुष्टिं सस्सं या हन्यादीवधप्रसारौ च ॥६॥ उस जनपद में भिन्न स्थानोंपरही, भधिक भादमियाँको बसाये अधया कहाँ एक स्थानपर भी अधिक मादमियोंको बसावे॥४॥ क्योंकि मनुष्यों से रहित प्रदेश, जनपद नहीं कहला सकता; और जनपदसे रहिस, राज्य नहीं होसकता क्यॉकि, यदि जनपदही न होगा, तो राज्य फिस पर किया जायगा, यह कौटल्य माधाका सपना मत है ॥५॥ भव घुगे पोड़ा पहुंचाने के प्राका [१३ गांधक (५७०) कौटलीय अर्थशास्त्र निरूपण किया जाता है। जब वापर कोई आपत्ति भाई हुईही, तो विजिगीपु, उसकी फसलको, तथा उत्पन्न हुए अप आदिको नष्ट करदवे, भौर धोवध (अनाज घी तैल आदिका प्रदेश आना) तथा प्रसार (मास लकड़ी आदिका राज्यमें आना; इन दोनों) को भी नष्ट करदाले ॥६॥ प्रसारवीवघच्छेदान्मुष्टिसस्यवधादपि । चमनाद्गूढघाताच जायते प्रकृतिक्षयः॥७॥ अय शत्रुकी अमात्य आदि प्रकृतियाके क्षय होने का प्रकार बताते है:-प्रसार तथा वावधका उरछेद होनेसे, और मल तथा अनाज आदिका नाश करदेनेसे; इसीप्रकार प्रकृतियोंको फहीं दूसरी जगह लेजाने, या छिपकर मार देनेसे भी उसका क्षय (नाश) होजाता है ॥ ७ ॥ प्रभूतगुणवद्धान्यकुप्ययन्त्रशस्त्रावरणविष्टिरश्मिसमनं मे सै- न्यमृतश्च पुरस्तात् ॥ ८॥ अपर्तुः परस्य व्याधिदुर्भिक्षनिचयर- क्षाक्षयः क्रीतमलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्वेति पर्युपासीत ।।९।। फिस अवस्था शत्रुके दुर्गको घेरना चाहिये, इसका अब निरूपण करते हैं। जबकि अपनी सेना, अत्यधिक गुणों से युक्त, तथा धान्य (अनाज), कुष्य ( लोहा साया वन मास्तरण आदि) यन्त्र (मशीन ), शन (हथियार) आवरण ( चमकी पेटी भादि, नथा अन्य कवच आदि), विष्टि (सेवा करने वाले कर्मचारी ) और रश्मि ( रस्सी) आदि सम्पूर्ण सामग्रीसे युक्तही, और पतुभी अपने भनुकूल हो । अर्थात् जिस समय अपनी सेना और ऋतु भादि- कोतो इसतरह अनुकूलता हो ॥ ॥ परन्तु शत्रुके लिये ऋतु सर्वथा विपरीत हो; व्याधि, दुर्मिक्ष, धान्य आदिके संग्रहका तथा रक्षक पुरुषोंका भभाव उपस्थितहो; खरीदी हुई अर्थात् केवल वेतनभोगी सेना सहायता देनेसे इन्कार करती हो, और मित्रकी सेनाभी खिन्न होचुकी हो; इस अवस्था के दुर्ग. का पेरा डाला जावे ॥९॥ कृत्वा स्कन्धावारस्य रक्षां वीवधासारयोः पपश्च परिक्षिप्य दुर्ग सातसालाभ्यां दूपयित्वोदकमवसाव्य परिखाः संपूरयित्वा वा सुरङ्गालकुटिकाभ्यां वप्रपाकारौ हारयेत् ॥ १० ॥ घा टालनेका यह प्रकार समझना चाहिये:-पहिले विजिगीषु अपनी छावनी, घीवध, भासार (मित्रसेना ), तया अपने मार्गको रक्षा करके दुर्गकी खाई और परकोटेके अनुसार दुर्गको चारों भोरसे घेरकर : विष भादिसे ५ माया ] दुर्गलम्भोपाय (५७१) जलको दूपित करके अथवा बांध भादिके तोड़देनेसे उसे महाकर; खाईयोंको भरकर, सुरंग तथा टेदी खुदी हुई खाईयोंके द्वारा बाहरकी ओरके परकोटे तथा पारके ऊपर हमला करे ॥१०॥ दारं च गुलेन निन्नं वा पांसुमालयाच्छादयेत् ॥ ११ ॥ बहुलारवं यन्वैर्यातयेत् ॥ १२॥ निष्करादुपनिष्कृष्याश्वैश्व प्रहरेयुः ॥ १३ ॥ विक्रमान्तेपु च नियोगविकल्पसमुच्चयैश्वोपाया. नां सिद्धिं लिप्सेत दुर्गवासिनः ॥ १४ ॥ फटी हुई दरडोंको इौसे, तथा गहरी नीची जगहको मट्टीसे भाटकर ढक दिया जाये ॥1॥ दुर्गके जिस प्रदेशमें रक्षाका बहुत अधिक प्रबन्ध हो, उसे यन्त्रों के द्वारा नष्ट करवा देवे ॥ १२ ॥ कपटसे ( =निष्करात् ) अथवा हाथियोंकी सूंड लम्पी करके खड़ा करनेसे रक्षक पुरषोंको बाहर निकालकर, घोड़े तथा हाथियोंके द्वारा उनपर आक्रमण कर देवें ॥ १३ ॥जब शनुकी सेना युदमें विशेष पराक्रम दिखाने लगे, तब उपायोंके (साम दान दण्ड भौर भेद ये चार उपाय होते हैं) नियोग ( अमुक भवसरपर इसी उपायसे काम लेना चाहिये दूसरसे नहीं, इस प्रकारकी व्यवस्था करना "नियोग' कहाता है ), विकल्प ( इस अवसरपर चाहे इस उप यसे काम लेना चाहिये, चाहे इस दूसरे उपायसे; इस प्रकारको व्यवस्थाको 'विकल्प' कहते हैं ) और समुचय (इस अवसरपर भमुक २ दोनों या दो से भी अधिक उपायोसे इकट्ठाही काम लेना चाहिये। इसको 'समुच्चय' कहते हैं) से यथावसर काम लेकर 'दुर्गनिवासी शत्रुसे सिदिलाभ (विजयलाभ ) की इच्छा करे ।।४॥ श्येनकाकनप्पभासशुकशारिकोलूककपोतान्याहयित्त्या पुच्छे. प्वनियोगयुक्तान्परदुर्गे विसृजेयुः ॥ १५ ॥ अपकृष्टस्कन्धावा- रादुच्छ्रितध्वजधन्वारक्षा वा मानुपेणामिना परदुर्गमादीपयेयुः ॥१६॥ स्पेन (याज ), कौआ, मप्ता (मुके समान एक पक्षी), भास (गिद), तोता, मैना, उल्लू, तथा कबूतर, इन पक्षियोंको पकड़वाकर, इनकी पूछमें, भाग लगाने वाली भौषधियोंका संसर्ग करके, इनको शत्रुके दुर्गमें मोड़ देवें। जिससे यहां भाग लग जाये ॥१५॥ शत्रुके दुर्गसे बाहर नीचेकी और परी हुई अपनी (विजिगीषुकी) डायनासे, शत्रुके दुर्गपर भाग फेंकनेके लिये ध्वजा नया धनुर आदिको उठाये हुए पुरए, गक दुर्ग में, भानुप भग्निके (१३ अधिक (५७२) कौटलीय अर्थशास्त्र द्वारा (शत्रुसे मारे हुए या शूलीपर चढ़ाकर मारे हुए पुरपकी हड्डी में चितकबरे घाँसके घिसनेमे उत्पन हुई २ अनिके द्वारा) शनुके दुर्गमें आग लगा देयें । अथवा पहरेदारही इस कामको करें ॥१६॥ गूढपुरुषाधान्तदुर्गपालका नकुलवानरविडालशुना पुच्छेप्व- नियोगमाधाय काण्डनिययरधाविधानवेश्मसु विसृजेयुः ॥१७॥ शुष्कमत्स्यानामुदरेष्वनिमाधाय पल्लूरे या वायसोपहारेण वयो- भिर्हारयेयुः ॥१८॥ अन्तपाल या दुर्गपारके वेपमें रहने वाले गृढपुरण, नेवछा, पन्दर, बिल व तथा कुत्ते की पंछमें, आग लगा देनेवाली औषधियोंको लगाकर, उनको शत्रुके उन घरोंमें छोड देवें, जहाँपर गण तथा कुप्प आदि सही, रक्षा करने के सामान रक्खे हुए हों । १७ । सूखे मछलीके पेटमें, अथवा सूखे हुए मांसमें भशियोग { भाग लगानेवाली औषधियोंके समूद) को रखकर उस मांसको, पक्षियोंको खिलाने के बहानेसे पक्षियों के द्वारा अपहरण करा देवें । (अर्थात् पक्षियोंके द्वारा, उस शत्रुके दुर्गमें पहुंचाकर, वहाँ भाग लगा दे) ॥१८॥ सरलदेवदारुपूतिहणगुग्गुलुश्रीवेष्टकसर्जरसलाक्षागुलिकाः खरोष्ट्राजावीना लण्ड चामिधारणम् ॥ १९॥ प्रियालचूर्णमव- ल्गुजमपीमधूच्छिष्टमश्वसरोष्ट्रगोलण्डमित्येप क्षेप्यो ऽनियोगः ॥२०॥ सरु, देवदार, प्रतितृण ( एक प्रकारकी घास, जिसमेंसे सुगन्ध आती है), गूगल, सरुका गोंद, गल और लाष, इन सप चीजोंकी बनाई हुई गोलियां, तथा गधा ऊट बकरा और मेढा, इन जानवरोंका लिङ्ग; अग्निको धारण करनेवाले होते हैं भयात् इनमें श्रमिका अंश बहुत अधिक होता है ॥ १९॥ चिरें जोका घूरा, बावधीका दददा चूरा (अर्यास् जौकुटसा हुभार) शहद, और घोड़ा गधा ऊंट तथा बलका लिंग, इन सब चीजों को मिलाकर, फैककर काममें मानवाला भनियोग तैयार होता है ॥ २० ॥ सर्वलोहचूर्णमनिवर्ण वा कुम्भीसीसत्रपुचूर्ण वा पारिभद्रकप- लाशपुष्पकेशमपीतैलमधृच्छिष्टकश्रीपेष्टकयुक्तोऽग्नियोगो विवा- सघाती वा ॥ २१ ॥ तेनावलिप्तः सणापुसवल्कवेष्टितो वाण इत्यगियोगः ॥ २२ ॥ ..
. ४ अध्या०]. दुर्गलम्भोपाय (५७३) अथवा भाषिके समान वर्णवाला, सब तरहके लोहेका चूरा ; अथवा कापफल सीसा और शंग इन सब चीजों का चूरा; नीम और ढाकके फूल, नेग्नवाला का चूरा, तेल, शहद तथा सरूका गोंद, इन सब पस्तुओंके साथ मिलाकर बनाया हुआ भनियोग निश्वप ही विश्वासघाती होता है, अर्थात् जहां आग लगने की सम्भावना भी न हो, वहां भी इसका प्रयोग किये जाने पर अवश्य भाग लग जाती है, इसलिये इसको बा सोन भनियोग माना गया है ॥ २१॥ उपर्युक्त इन सब चीजों से सनाभा, तथा सन और ककड़ी की बेलकी छालसे लपेटा हुमा बाणभी अग्मियोग होता है। अर्थात् वा जहां जाकर लगेगा, वहीं आग लगा देगा। (इस सूत्रमें आये हुए 'ब' शब्दका अर्थ, महामहोपाध्याय त. गणपति शास्त्रीने 'अर्जुनवृक्ष' किया है।। २२ ।। न त्वेव विद्यमाने पराक्रमे ऽग्निमवसृजेत् ॥ २३ ॥ अवि- श्वास्यो धग्निः दैवपीडनं च ॥ २४ ॥ अप्रतिसंघातपाणिधान्यप- शुहिरण्यकुप्यद्रव्यक्षयकरः ॥ २२ ॥ क्षीणनिचयं चायाप्तमपि राज्यं क्षयायैव भवति ॥ २६ ॥ इति पर्युपासनकर्म ॥ २७ ॥ पराक्रमके समय में, ( अर्थात् जिस समय युद्ध प्रारम्म हुआ २ हो, उस समयमें ) इन अप्रियोगोंको न छोड़ें ॥ २३ ॥ क्योंकि अग्नि का कुछ वि. श्वास नहीं होता, और यह देवपीडन बताया गया है (देखो अधि० . ५ सू..)॥ २४ ॥ तया यह अग्नि, भसंख्यात प्राणियों, धान्य पशु धन तथा अन्य कुप्य भादि द्रव्यों का नाश करने वाला होता है ॥२५॥ जिस राज्य में सब प्रकारके संग्रहों का क्षय होगया हो वह राज्य अपने हाथमें भाजाने पर भी क्षयके लिये ही होता है। अर्थात से राज्य को जीतकर भी विजिगीषु कभी उसत नहीं होसकता ॥ २६ ॥ यहांतक शत्रुके दुर्गको चारों भोरसे परने के सम्बन्ध निरूपण करदिया गया ॥२७॥ सर्वारम्भोपकरणविष्टिसंपन्नो ऽस्मि ॥ २८ ॥ च्याधितः पर उपधाविरुद्धप्रकृतिरकृतदुर्गकर्मनिचयो वा निरासारः मासारो वा पुरा मित्रैः संधत्ते इत्यवमर्दकालः ॥ २९ ॥ भव इसके आगे शत्रुके दुर्ग को, कब और किस समय भपने अधि- कारमें करना चाहिये, इस बात का निरूपण किया जाता है:-जब विभिगी पह समझे, कि मैं सब ताइके पदोपयोगी साधनों से युक्त हूं, मेरे पास सब तहका कार्य करने के लिए भादमी मौजूर हैं ॥ २८ ॥ शत्रु पाधिप्रस्त है, .
[१३ अधिक (५७४, कौटलीय अर्थशास्त्र उसकी अमात्य आदि प्रकृति उसको धोखा देने वाली दुर्ग आदिकी मरम्मत तथा धान्य आदि का संग्रह भी इसने अभी तक नहीं किया है, मित्र की भी इसे कोई सहायता नहीं है, अथवा सहायता की सम्भावना होने पर मीश्रमी तक उनके साथ सन्धि ही कररहा है, अर्थात् इसका सबसे पहिला काम मित्रों के साथ सन्धि करने का है, यह भी अभी तक शत्रुने निश्रा का समास नहीं किया है। इसमकार जब पिजिगीपु समझे, उसी समय में शत्रुपर भाक. मण करदेवे । अर्थात् शत्रुके कुचलने का यही समय होता है ॥ २९ ॥ स्वयमग्री जाते समुत्थापिते वा प्रहवणे प्रेक्षानीकदर्शनस- इसौरिककलहेषु नित्ययुद्धश्रान्तयले बहुलयुद्धप्रतिविद्धप्रेतपुरुपे जागरणक्लान्तसुप्तजने दुर्दिने नदीवेगे या नीहारसंप्लवे वावमृ- दीयात् ॥ ३०॥ अथवा शत्रु के दुर्ग भादिमें स्वयं अग्नि लगजाने पर, या आनन्दोत्सव आदिक मनाने का ही दौरदौरा होने पर ( तात्पर्य यह है कि जब राजा सह- भोज या पार्टी आदिमें ही लगातार लगा रहता हो, या तमाशे भौर चांद. मारीमें ही अधिक भासक्त रहता हो, या शरापियोंके द्वारा कोई झगड़ा खड़ा करदेने पर, लगातार युद्ध करने से सेनाकै यक जाने पर, लम्बा युद्ध होनेके कारण भस्यधिक भादमियों के जखमी होजाने और मरजानेपर, जागने के कारण हुए २ पुरुषोंके सोजाने पर, दुर्दिन अर्थात् जिप दिन मांधीमेह आदि बहुत होरदा हो, या जब रानु किसी पेगवती नदीको पार कररहा, या जिस दिन कुहरा भादि बहुत पड़रहा हो, ऐसे समयमै अर्थात् शत्रुकी ऐसी अवस्था होने पर, विजिगीषु उसको कुचल दाले ॥३०॥ स्कन्धावारमुत्सृज्य वा वनगूढः शत्रु सत्रान्निष्क्रान्तं घातयेत् ॥ ३१ ।। मित्रासारमुख्यव्यञ्जनो वा संरुद्धेन मैत्री कृत्वा दूतम- भित्यक्तं प्रेषयेत् ॥ ३२ ॥ ते छिद्रम् ।। ३३ ॥ इमे प्याः ॥ ३४ ॥ संरोद्धुर्वा छिद्रमयं ते कृत्यपक्ष इति ॥ ३५ ॥ भयवा डावनी को छोड़कर विजिगीपु. जंगलमें जाकर कहीं छिपजावे भीर यहाँ जंगलसे निकलते हुए शत्रुको मरवाढाले ३१॥ मित्रके वेपमें रहने पाला भधया मित्रकी सेनाके मुखियाके वेपमें रहने वाला गृपुरुष, संरक्ष (घिरे हुए ) शत्रु राजाके साथ मित्रता करके, अपने एक वध्य दूतको निज लिखित संदेश देकर उसके पास भेजे ॥ ३२॥ तुम्हारे अन्दर अमुक २ दोप ४ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय (५७५) या निर्बलता है ॥ ३३ ॥ वे अमुक २ तुम्हारे दृष्य पुरुष है ॥ ३४ ॥ संरोन्द्रा विजिगीषु की अमुक २ निर्वलता है, और यह तुम्हारा कृत्यपक्ष है, भयात् सरोद्धा विजिगीपुके कुद्ध लुब्ध भीत भादि वर्गमेंस अमुक पुरुष तुम्हारी ओर मिलने को तैयार है ॥ ३५ ॥ तं प्रतिदूतमादाय निर्गच्छन्तं विजिगीपुर्गृहीत्वा दोपम- भिविख्याप्य प्रवास्यापगच्छेत् ततः ॥ ३६ ॥ मित्रासारव्य- अनो वा संरुद्धं घूयात् ।। ३७ ॥ मां त्रातुमुपनिर्गच्छ ॥ ३८ ॥ मया वा सह संरोद्धारं जहीति ॥ ३९ ।। जब वह दूत, उस सदेशका उत्तर लेकर लौटकर भाये, तो मार्ग निकलते हुए उस दूतको विजिगीषु पकडलेये, और उसके इसी दोपको प्रसिद्ध करके, कि यह हमारा अपकार करता है, उसको मारकर, यहाँसे चलाजाये ।। तथा उस उत्तर लेखपत्रको अपने काबू में रखे) ॥ ३६॥ मथ । मिग्रके वेपमें या मिनकी सगाके येवमें नेशाला गूढपुरप, संरख राजाको ही कहे ॥ ३७॥ 'मेरी रक्षाके लिये तुम्हें उठ खड़ा होना चाहिये ॥ ३८ ॥ अथवा मेरे साथ घलकर संरोद्धा (रोकनेवाले विजिगीषु राजा) को मारो, अर्थात् चलो, हम दोनों मिलकर विजिगीपुको मार ३५॥ प्रतिपन्नमुभयतः संपीडनेन घातयेत् ॥ ४० ॥ जीवग्राहेण वा राज्यविनिमयं कारयेत् ॥४१॥ नगरं वास्स अमृद्गीयात् ॥४२ ॥ सारवलं वास्य वमयित्वाभिहन्यात् ॥४३॥ तेन दण्डोपनताटयिका न्याख्याताः ॥ ४४ ॥ वह जय इस बातको स्वीकार करले, तो दोनो ओरसे घेरकर उसे मारदिया जाये ॥४०॥ अथवा उसे जीवित ही पकाकर उसके राज्यको मनल दियाजाये ॥ 1 या उसके नगरको ( अर्थात् राजधानीको यस्वाद करदिया जाये ॥ ४२ ॥ अभया इसके साररलको ( पनि मज़बून सेनाको) दुर्गसे पाहर निकालकर मारदाले ॥ ४३ ॥ इसीके अनुसार दण्मोपना (भपनी सैनिक शक्तिके भरोसेपर पलपूर्वक अपने पाम कियेहुए राजा) भौर आरविका सम्बन्धमें भी ग्याएपान समझलेना चाहिये । ४४ ॥ दण्डोपनताटविकयोरेन्यतरो वा संरुद्धस्स प्रेपयेत् ॥ ४५ ॥ अयं संरोद्धा व्याधितः पाणिग्राहेपाभियुक्तश्छिद्रमन्यदुत्थित- मन्यसां भूमावपयातुकाम इति ॥ ४६ ॥ प्रतिपमे संरोद्धा कौटलीय अर्थशास्त्र [१३ अपिं० स्कन्धावारमादीप्यापयायात् ॥४७ ॥ ततः पूर्ववदाचरेत् ॥४८॥ अथपा दण्डोपनत और भादयिक, इन दोनोमिसे कोई एक, संस्तु (घिरेहुए ) शत्रु राजाके पास यह निमलिखित संदेश भेजे ॥ ४५ ॥ 'यह संरोद्धा (घरा डालनेवाला विजिगीषु राजा ) आजकल व्याधिपीड़ित होरहा है, पाणिग्राहने इसपर हमला करदिया है यह एक और मी उपद्रय सदा होगया है, अब यह, यहाँसे दूसरी किसी जगहमें भाग जाने की इच्छा कररहा है' इत्यादि ॥ १६ ॥ जप घिराहुआ मनु राजा, इन सब पातीको स्कार करले, तव संरोद्धा विजिगीषु अपनी छापनी में आग लगाकर वहांसे चला जावे ॥ ४७ ॥ तदनन्तर पूर्ववत् ही सब काम कियाजाय । अर्थात् जप शत्रु, विजिर्ग पर धावा करनेलगे, तो उसे बीचमें घेसकर मारदिया जावे ॥ ८ ॥ पण्यसंपातं वा कृत्वा पण्येनेनं रसविद्धनातिसंदध्यात् ।।४९।। आसारव्यजनो वा संरुद्धस्य दूतं प्रेपयेत् ॥ ५० ॥ मया बाह्यम- भिहतमुपनिर्गच्छाभिहन्तुमिति ।। ५१ ॥ प्रतिपनं पूर्ववदाचरेत् ॥ ५२ ॥ मित्रं बन्धुं वापदिश्य योगपुरुषाः शासनमुद्राहस्ताः प्रविश्य दुर्ग ग्राहयेयुः ।। ५३ ।। अथवा व्यापारियोंके सघका भागमन दिखलाकर (अर्थात् यह प्रकट करके, कि बाहरसे एक व्यापारियोंका संघ आया है, उसके द्वारा दी हुई) विष भादि रसमिश्रित ख घ वस्तुओके द्वारा ही, इस शत्रुको मष्ट करदिया जाये ॥ ५९॥ अथवा मित्रसेनाके वेपमें रहनेवाला गूढपुरुष, संरुद्ध शत्रु राजाके पास निम्नलिखित संदेश देकर एक दूतको भेजे ॥ ५० ॥ मैंने तुम्हारे इस बाह्य शत्रुको मार २ कर खूब कमजोर बना रखा है, अब इसे सर्वथा मए करने के लिये तुम दुर्गसे बाहर निकल आभो ॥ ५ ॥ जब शत्रु, इस बात को स्वीकार करले, तो पहिलेकी तरह दोनों ओरसे, उसे घेरकर मारदिया जाये ॥५२॥ अथवा अपने भाप मित्र या बन्धु रतलाकर, मुदर लगे हुए बनावरी कलपनको हाथ कर मृदपुरप, दुगके भर चले जायें। और वहां किसी उपायसे द्वार आदि खोलकर, दुर्गको विजिगीपुके अधिकार में करवा आसारव्यसनो वा संरुद्धस्य प्रेपयेत् ॥ ५४ ॥ अमुष्मिन्देश काले च स्कन्धाधारममिहनिष्यामि ॥ ५५ ॥ युष्माभिरपि ४ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय (५७७) योद्धव्यमिति ॥ ५६ ॥ प्रतिपन्न यथोक्तमभ्याघातसंकुलं दर्श- यित्वा रात्रौ दुर्गानिष्क्रान्तं घातयेत् ॥ ५७ ॥ अथवा मित्र सेनाके वेपमें, रहनेवाला गूलपुरुष, घिरेहुए शत्रुराजाके पास यह सम्देश भिजवाये ॥ ५४॥ 'मैं अमुक देश और भमुक समयमें छावनीके ऊपर हमला करूगा ॥ ५५ ॥ आपको भी उस समय मेरी औरसे ही युद्ध करना चाहिये ॥ ५६ ॥ जब शत्रु राजा इस यातको स्वीकार करले, तो पूर्व कथनानुसार विजिगीपुकी छावनीमें लड़ाईका घमासान दिखलाचे; जब उसे देखकर रातमें शत्रु विश्वासपूर्वक अपने दुर्गसे बाहर निकले, तो उसे बीचमे घेरकर मारदिया जावे ॥ ५ ॥ यद्वा मित्रमावाहयेत् आटषिकं वा, तमुत्साहयेत् ॥ ५८॥ विक्रम्य संरुद्ध भूमिमस्य प्रतिपद्यस्वेति ॥ ५९ ॥ विक्रान्तं प्रकृ. तिभिर्दूष्यमुख्योपग्रहेण वा घातयेत्, स्वयं वा रसेन ॥६॥ मित्रघातको ऽयमित्यवासार्थः ॥ ६१ ॥ अथवा विजिगीषु, अपने मित्र या आटविकको वहां बुलवावे, तथा उसको इसतरा उत्साहित करे ॥ ५८ ॥ संरुद्ध शत्रु राजापर आक्रमण करके, उसकी भूमिको अर्थात् उसके राज्यको अपने अधीन करलो ॥ ५५ ॥ जब यह या आटविक, उस घिरेहुए शत्रुपर आक्रमण करदेवे, तब उसको, उसकी अमात्य आदि प्रकृतियोंके द्वारा, या अपने अनुकूल पनाएदुए उसके दुष्प मुख्य पुरुषों के द्वारा ही उसको मरवाडाले । भथवा आप ही विष मादिके योगसे उसे मारताले ॥१०॥ तदनन्तर 'यह शत्रु मेरे मित्रको मारनेवाला है इस मातको प्रसिद्ध करके अपने कार्यको सिद्ध करे ॥६॥ विक्रमितुकामं वा मित्रव्यञ्जनः परस्यामिर्शसेत् ।। ६२ ।। आमभावोपगतः प्रवीरपुरुषानस्योपघातयेत् ॥ ६३ ।। संधि चा कृत्वा जनपदमेनं निवेशयेत् ॥ ६४ ॥ निविष्टमन्यजनपदमवि- जावो हन्यात् ॥६५॥ भधया मित्रके येपमें रहनेवाला गृउपुरप, शत्रुको इसमकार कहे, कि विजिगीषु तुम्हारे उपर भाक्रमण करना चाहता है ॥ ६२ ॥ इसतरह जय यह शत्रुका भरयन्त विश्वस्त होजाये, सप उसके प्रवीर पुरपों (मुरप बहादुर भादमियों) को मरवादाले । ६५ ॥ भपवा शके साथ सन्धि करके उसको उसी जनपद में रहने देवे । अथवा इसके हो द्वारा एक अन्य जनपदको
[१३ यधिक
(५७८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
भाषाद. करवाये ॥ ६४ ॥ और उस नये आवाद हुए २ जनपदको, शत्रुके
बिना जाने ही फिर नष्ट करदाले । अर्थात् स्वयं उसे वरयाद कराले ॥६५॥
अपकारयित्वा दूष्याटविकेषु वा बलैकदेशमतिनीय दुर्गम-
वस्सन्देन हारयेत् ॥ ६६ ॥ दूप्यामित्राटविकद्वेष्यप्रत्यपसृताश्च
कृतार्थमानसंज्ञाचिह्वाः परदुर्गमयस्कन्देयुः ॥ ६७ ॥
अथवा अपने दूप्य और भाटविकोंके द्वारा अपना कुछ अपकार करवाकर
उन प्य और भाटीवापर आक्रमण करनेके यहानेसे, शत्रुकी सेनाकै एक
हिस्सेको बहुत दूर किसी देशमें लेजावे । और फिर थोड़ी सेनासे पुक्त, शत्रुके
दुर्गको अक्रमणकर बलपूर्वक धीन लेये ॥ ६६ ॥ शनुके दुर्गपर आक्रमण
करने के लिये कौन पुरष सहायक हो यह बतलाते हैं:-शत्रुके दूष्य पुरुष,
शत्रु, मारधिक, जिनसे शत्रु द्वेष रखता हो, तथा शत्रुके पाससे एकसार जाकर
फिर वापस उसी के पास आये हुए, तथा विजिगीपुके द्वारा धन मान आदि
से सस्कृत किये हुए, और भाक्रमणके समय, भादिसे सूचित किये हुए, शत्रुके
दुर्गका अपहरण करने में सहायता देवें ॥ ६७ ॥
परदुर्गमवस्कन्ध स्कन्धावारं वा पतितपराङ्मुसाभिपनमु-
क्तकेशशस्त्रभयविरूपेभ्यश्चाभयमयुध्यमानेभ्यश्च दशुः ॥ ६८ ।।
परदुर्गमवाप्य विशुद्धशत्रुपक्षः कृतोपांशुदण्डप्रतीकारमन्तबहिश्य
प्रविशेत् ॥ ६९ ॥
शत्रुके दुर्गको अथवा उसकी छापनीको इस्तगत करके, विजिगीपु.
पक्षके पुरुगोंको उचित है, कि घे पराित (युद्ध के मैदान में गिरे हुए), पराङ्मुख
(युद्धसे भागे हुए), छिपद्मस्त, मुक्तकेश (बिखरे हुए यालाचाले), हथियारोंसे
डरकर चिकृत भाकारवाल, तथा युद्ध न करनेवाले पुरपोंके लिये सर्वथा
भमय देदेखें ॥ ६८ ॥ शत्रुके दुर्गका मात करके, भौर यहाँसे शत्रुपक्षके सबही
पुरुपाकी सफाई करके, विजिगीषु, अपना विरोध करनेवाले पुरपाका उपांशु.
दण्डसे प्रतीफार करता हुआ, दुर्गके अन्दर और बाहर प्रवेश करे । (इस सूत्रमें
'विशुदशत्रुपक्षा' के स्थानपर किसी पुस्तक 'विशुद्धशत्रुत्रपक्ष' भी पाठ
है। इस पाठमें यह पद क्रियाविशेषण समझना चाहिये ) ॥ १९॥
एवं विजिगीपुरमित्रभूमि लब्ध्वा मध्यमं लिप्सेत ।। ७० ॥
तत्सिद्धावुदासनिम् ॥ ७१ ॥ एप प्रथमो मार्गः पृथिवीं
जेतुम् ॥ ७२ ॥
- ४ अध्या दुर्गलम्भापाय इस प्रकार विजिगीषु, शत्रुको भूमिको प्राप्त करके, मध्यमको प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ ७० ॥ उसको भी प्राप्त करलेनेपर, उदासीम राजाको अपने अधीन करने का यत्र करे ॥७॥ पृथिवीको विजय करनेके लिये यह प्रथम मार्ग है ॥ २॥ मध्यमोदासीनयोरभावे गुणातिशयेनारिप्रकृतीः साधयेत् ।। ७३ ।। तत उचराः प्रकृतीः ॥ ७४ ॥ एप द्वितीयो मार्गः ॥७५ ॥ मध्यम और उदासीन राजाओंके न होनेपर, अपने गुणों के भाधिक्य के द्वारा (अर्थात् शत्रुके गुणों की अपेक्षा अपने गुणों के भतिशयसे) शत्रुकी अमात्य आदि प्रकृतियोंको अपने अनुकूल बनावे । ७३ । तदनन्तर शत्रुकी, अन्य कोश सेना आदि प्रकृतियों को अपने वशमें करनेका मयन करे ॥ ७ ॥ पृथिवीको विजय करने का यह द्वितीय मार्ग है ॥५॥ मण्डलस्याभावे शत्रुणा मित्रं मित्रेण वा शत्रुमुभयतः संपी- डनेन साधयेत् ॥ ७६ ॥ एप तृतीयो मार्गः ॥ ७७ ।। सम्बद्ध राजमण्डलके न होनेपर (दश प्रकारके राजाओं के समूहका नामही 'मण्डल' या राजमण्डल होता है; देखो:-अधि. ७, अध्या. १८), शत्रुके द्वारा मित्रको और मिनके द्वारा शत्रुको, दोनों ओरसे घेरकर या दपा. कर अपने अनुकूल पनावे ॥७६॥ पृथिवीको विजय करने का यह सृतीय मार्ग है ॥ ७॥ शक्यमेकं वा सामन्तं साधयेत् ॥ ७८ ॥ तेन द्विगुणो द्वितीयं त्रिगुणस्तृतीयम् ॥ ७९ ॥ एप चतुर्थो मार्गः पृथिवीं जेतुम् ॥ ८० ॥ जित्वा च पृथिवीं विभक्तवर्णाश्रमा स्वधर्मेण भुञ्जीत ॥ ८१॥ भपया जीतसकने योग्य एकही सामन्त ( समीपस्थित राजा) को अपने अनुकूल बनावे ।। ७८ ॥ उसके अनुकूल बनजानेरा जब अपनी शक्ति दिगुण होजावे, तो और दूसर सामन्तको अपने अनुकूल बनानेका प्रयत करे। जब उसके अनुकूल बनजानेपर अपनी शक्ति म्रिगुण होजावे, तो विजिगीषु, तीसरे सामन्तको अपने वशमें करनेका प्रयन्त को ॥७९॥ एपिपीको विजय करनेका यह चतुर्थ मार्ग है ॥ ८॥ इसप्रकार पृथिवीको जीतकर, वर्ग और आश्रमोंका टीक २ विगाग करके, राजा, धर्मपूर्वक निपचीका भोग करे॥६॥ .
[१३ अधिक (५८०) कौटलीय अर्थशास्त्र उपजापापसौ च वामनं पर्युपासनम् । अवमर्दश्च पश्चैवे दुर्गलम्मरस हेतवः ॥ ८२ ॥ इति दुर्गमम्मोपाये प्रयोदशे ऽधिकरणे पर्युपासनकर्म, अवमदेव चतुर्यो. sध्यायः ॥ ४॥ आदितश्चतुश्चत्वारिंशउत. ॥ १४४ ॥ उपजाप (शत्रुके भादमियोंको बहकाना), अपसर्प (अपने गूढपुरपोंके द्वारा शत्रुपक्षका नाश करना), वामन (विप आदि विषम सपा-का प्रयोग काके शत्रुका नाश करना), पर्युपासन (शके दुर्गके चारों ओर घेरा डालना), तथा भवमर्द (अन्य उपायोंसे शत्रुके दुर्ग आदिका विध्वंस करना) ये पांच, शत्रुके दुर्गको प्राप्त करने हेतु बताये गये हैं। (इस सूत्रमें 'उपजापापसपी च' के स्थानपर किसी पुस्तकमें 'उपजापोऽपसो वा' ऐसा भी पाठ है । अपमें कोई भेद नहीं)॥ २ ॥ दुगलम्भोपाय त्रयोदश अधिकरणमें चौथा अध्याय समाप्त । । पांचवां अध्याय १७६ प्रकरण विजित दुर्ग आदि में शान्ति स्थापित करना विजिगीषु को चाहिये कि वह पत्रुके दुर्ग श्रादि को जीतकर उनमें शान्ति की स्थापना करे । इसका यही प्रयोजन होता है। कि दुर्ग भादिमें निवास करने वाले पुरषों को अपने नये स्वामी के विषय में कोई शङ्का नहीं रहती; प्रजाजन उसपर पूर्ण विश्वास करने लाते हैं । इन्हीं सब बातोंका इस प्रकरणमें निरूपण किया जायगा। द्विविधं विजिगीपोः समुत्थानम् ॥१॥ अटव्यादिकमेक- प्रामादिकं च ॥ २॥ त्रिविधवास्य लम्भः ॥ ३ ॥नको भूतपूर्वः पित्र्य इति ॥४॥ विजिगीषु का समुत्थान (अभ्युरथान-उपोग) दो प्रकार का होता है अर्थात् विजिगीपु का उद्योग, दो रूपोंमें फलता है॥१॥ एक अटवी भादिके (भादि शब्दसे खान आदिका भी ग्रहण करलेना चाहिये) और दूसरा एकमाम भादिक रूपमें (भादि शमसे नगर भादि का भी प्राइण करना चाहिये)।२ ॥
५ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय विजिपीपु का लाभ, तीन प्रकार का होता है ॥३॥ (1) नव (नया, जो विनिर्मापुने शत्रुको जीतकर प्राप्त किया हो), (२) भूतपूर्व (जो पहिले अपने ही पास हो, परन्तु बीचमें नाके पास जाकर फिर विजिगीपु ने उस से अपहरण कर लिया हो , (३) और पिञ्य (अपने पिता आदि से प्राप्त जो बीच में शत्रुके हाथमें जाकर, विजोगापुने पिर इससे घापस ले लिया हो) ॥ ४॥ नवमवाप्य लाभं परदोपान्स्यगुणैश्छादयेत् गुणान्गुणद्वैगु- ण्येन ॥५॥ स्वधर्मकर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिश्च प्रकृतिप्रि- यहितान्यनुवर्तेत ॥ ६ ॥ यथासंभाषितं च कृत्यपक्षमुपग्राहयेत ॥ ७॥ भूयश्च कृतप्रयासम् ॥ ८ ॥ नये लाम को प्राप्त करके विजोगायु, शत्रु के दोषों को अपने गुणों से हक दे, तथा शत्रु के गुणों को अपने दुगने गुणों से ढक देने ॥५॥ विजिगीषु, सदा अपने धर्म (प्रजा पालन आदि), कर्म (यशानुष्ठान आदि), अनुप्रद (समय २ पर प्रजावर्ग की सहायता करना), परिहार (भूमि पर राजकाय फर भादि को छोड़ देना), दान, और सरकार भादि कार्यो के द्वारा के अनुकूक हित करने में ही लगा रहे ॥६॥ अपने पूर्व कपन के भनुसार कृत्यपक्ष (कुछ लुन्ध भीतवर्ग) को, धन मादि देने के द्वारा सदा प्रसन्न वस्खे ॥ ७ ॥ तथा जिसने विजिगीपुके लिये बहुत परिश्रम किया हो, उसे और भी अधिक धन भादि देकर खूब प्रप्तान रखे ॥ ८॥ अविश्वासो हि विसंवादकः स्वेषां परेषां च भवति प्रकृति- विरुद्धाचारश्च ॥ ९॥ तसात्समानशीलवेपभाषाचारतामुपगच्छेद ॥१०॥देशदैवतसमाजेत्सिवविहारेषु च भक्तिमनुवर्तेत ।।११।। क्योंकिपाहिले कहकर फिर मुकरजानेवाला राजा, अपने और पराये सबही के लिये अविश्वसनीय होजाता है। तथा वह राजा मी समका अविश्वस. नीय होजाता है। जोकि अपने प्रजायर्गके विरुद्ध आचरण करता है ॥९॥ इसलिये राजा को उचित है, कि यह अपने प्रजापर्गके समानही शील, येष, भाप सपा भाषाका प्रहण करे ॥ १०॥ और देशी देवता, समाज, उरसर तथा विहमॉम, भलिभायना रखे । भर्यान् इन काम समय ३ पर महयोग पता रहे॥11॥ मजा [१३ अधिक (५८२ फोटलीय अर्थशास्त्र देशग्रामजातिसंघमुख्येषु चाभीक्ष्णं सत्रिणः परस्यापचार दर्शयेयुः ॥ १२ ॥ माहाभाग्यं भक्तिं च तेषु स्वामिनः स्वामि- सत्कार च विद्यमानम् ॥ १३ ॥ उचितयनान्भोगपरिहाररक्षा- वेक्षणैः भुञ्जीत ॥ १४ ॥ देश, नाम, जाति, संघ और मुख्यों में जाकर, विजिगीपुरे सत्रीपुरुष, पारवार, शत्रुके हित अनुष्ठानको (प्रजाके प्रति किये गये भपकाको) दिखलावें ॥ १२॥ और उनके विषयमें (वेश प्राम भादि विषयमें) अपने स्वामीकी ( नपे राजा विजिगीपुकी ) महामागता (उदारता), भक्ति (प्रेम) तथा स्वामी के द्वारा किये गये विद्यमान सरकारकोभी अच्छी तरह दिखलाये। (इसका प्रयोजन यही है, कि प्रजााकी आस्था, शत्रुकी औरसे हटकर, सर्वपा विजिगीपुको औरही होजावे) ॥ १३ ॥ तथा रचित भोग (राजभाग- का देना), परिहार (टैक्स भादिका न लेना), और रक्षावेक्षणासे ( कपटक भोपन अधिकरणमें कहे हुए कपटकोंका उद्धार करनेसे ) अर्थात प्रजाजनोंके लिये ये सुभीते करके, उनको समयानुसार अपने उपयोग में लाये ॥ १४ ॥ सर्वदेवताश्रमपूजनं च विद्यावाक्यधर्मशूरपुरुषाणां च भूमि- द्रव्यदानपरिहारान्कारयेत् ॥ १५ ॥ सर्वबन्धनमोक्षणमनुग्रह दीनानाथग्याधितानां च ॥ १६ ॥ विजिगीपु, सब देवत्ताभों भौर भाश्रमोंका पूजन करवाये । तथा विद्या. शूर (विद्वान् ) धाग्यपूर (पाग्मी बहुत अच्छा बोलने वाले ), और धर्मशूर (धार्मिक ) पुरषों के लिये भूमि और दव्य देवे, तथा उनसे भूमि भादिका कर न लेवे ॥ १५॥ दीम अनाय तथा व्याधित पुरुषाको, सब तरहसे अनुगृ- हीत करे, भर्यात हरतरहसे इनकी सहायता करे; और सबही पुरुषको, फारा- गार आदिके बन्धनसे छुवा देवे ॥ १६ ॥ चातुर्मास्येष्वर्धमासिकमघातम् ॥ १७ ।। पौर्णमासीषु च चातूरात्रिकम् ॥ १८ ॥ राजदेशनक्षत्रेष्करात्रिकम् ॥ १९ ॥ योनियालवधं पुंस्त्योपघातं च प्रतिपेधयेत् ॥ २० ॥ घार २ महीनों के वर्गमसे पन्द्रह दिनतक, प्राणषट आदिका प्रतिपेध परदेये । अर्थात् चार महीने में पन्द्रह दिन ऐसे रक्खे, जिनमें कि प्राणदण्ड मादि न दिये जावें ॥10॥ तथा सम्पूर्ण पूर्णमासियों में से पार पूर्णमासी तिथियों में किसीका बध न किया जाये ॥ १८ ॥ राजाके गद्दोपर बैठने के, सपा ५ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय (५८३) देशकी प्राप्तिके नक्षयमें भी एक दिनतक किसीका वध न किया जाधे ॥ १९॥ बचे पैदा करनेकी शक्ति रखनेवाले मावा जानवरों, तथा छोटे पोंको विजि. गीषु न मारने देवे । भौर नर जानवरोंको पुंस्वहीन न मनान दिया जावे ॥२०॥ यच्च कोशदण्डोपघातिकमधर्मिष्ठं वा चरित्रं मन्येत तदपनीय धर्म्यव्यवहारं स्थापयेत् ॥ २१ ॥ चोरप्रकृतीनां म्लेच्छजातीनां च स्थानविपर्यासमनेकखं कारयेत् दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यानां च ॥२२॥ जिस चरित्रको विजिगीषु, कोश और सेनाके नष्ट करनेवाला तथा अधर्म युक्त समझ, उसको हटाकर धर्मयुक्त व्यवहारकी स्थापना करे ॥२१॥ चोरम कृति म्लेच्छ जातियोंका, तथा दुर्ग, राष्ट्र और सेनाके मुख्य व्यक्तियों का, दूर २ पर स्थानविपर्यय करता रहे । तारपर्य यह है, कि इन लोगोंको इकट्ठा एक स्थानपर न रहनेदेवे ॥ २२ ॥ परोपगृहीतानां च मन्विपुरोहितादीनां परस्य प्रत्यन्तेष्वने- कस्यं वास कारयेत् ॥ २३ ॥ अपकारसमर्थाननुक्षियतो वा भर्तृ- विनाशमुपांशुदण्डेन प्रशमयेत् ॥ २४ ॥ स्वदेशीयान्वा परेण वावरुद्धानपवाहितस्थानेषु स्थापयेत् ।। २५ ।। शत्रुस उपकृत मंत्री और पुरोहित आदिको, शत्रुके सीमाप्रान्तों में भिन्न २ स्थानोंपर निवास कराये । जिससे ये परस्पर एक दूसरेके साथ मिलने म पा ॥ २३ ॥ तथा जो व्यक्ति, अपना (विजिगीषुका) अपकार करने में समर्थ हो, अथवा विजिगीपुका विनाश करनेके विचारसेही वहां रहते हो, उनको उपांशुदण्डसे नष्ट करहाले ॥ २४ ॥ अपने देशके पुरपीको, अथवा शाके द्वारा कारागारके बन्धनमें डाले गये पुरुषाको । विजिगीपु, अपने र अधिकारीसे प्युरा किये गये शत्रुक्षय पुरोके अधिकार पदोंपर नियुक्त फरे । अर्थात् शत्रुपक्षके पुरुषोंको अधिकार पदसे हटाकर, उन स्थानोंपर इनको नियुक्त करे ॥ २५॥ यश्च तत्कुलीनः प्रत्यादयमादातुं शक्तः प्रत्यन्ताटवीस्थो या प्रयाधितुमभिजातस्तस्मै विगुणां भूमि प्रयच्छेत् ॥ २६ ॥ से सोग हुई भूमिको, उसके वंशकाही कोई पुरुष, यदि फिर पापस सेनेक लिये समर्थ हो, अथवा सीमामात सामन या बाटविकके
[१३ मधिल
in
कौटलीय अर्थशास्त्र
द्वारा उस भूमिपर पाधा पहुंचाये जाप्लकनकी आशंका हो; तो विजिगीषु
उनके लिये, किसी गुणहीन भूमिका कुछ हिस्सा देदेव ॥ २६ ॥
गुणवत्याश्चतुर्भाग वा कोशदण्डदानमवस्थाप्य, यदुपकु-
र्वाणः पौरजानपदान्कोपयेत् ॥ २७ ॥ कुपितैस्तैरेनं घातयेत्
॥ २८ ॥ प्रकृतिभिरुपष्टमपनयेत् ॥ २९ ॥ औपघातिके वा
देशे निवेशयेदिति ॥ ३०॥
भथवा गुणवाली भूमिकाही चौथा हिस्सा इस शर्तपर देदेवे, कि वह
सामन्त, विनिगीपुके लिये कोश और सेनाकी बहुत अधिक संख्या देता रहेगा।
जिसके लिये (अधात् जिस कोश और सेनाको इकट्ठा करने के लिये) वह अपने
नगरनिवासी तथा जनपदनिवासी पुरुषाको कुपित करलेगा । भयात् उतग
धन और सेनाको इकट्ठा करनेके लिये प्रजाको तंग किये जानेपर, प्रजा उससे
कुपित हो उठेगी ॥ २७ ॥ प्रजाजनोंके कुपित होनेपर, वि.जगीपु, उन्हीके
द्वारा, उस सामन्तको मरवा ढाले ॥ २८ ॥ अथवा अमात्य आदि प्रकृतियाँस
निन्दा किये जानेपर उसको वहांसे हटा देवे ॥ २९ ॥ या उसको ऐसे प्रदेशमै
भेजदेवे, जहां उसके नाश करने के लिये अनेक साधन उपस्थित हो ॥३०॥
भूतपूर्वे येन दोपेगापधृत्तस्तं प्रकृतिदोपं छादयेत् ॥ ३१ ।।
येन च गुणेनोपावृत्तस्तं तीव्रीकुर्यादिति ॥ ३२ ॥ पित्र्ये पित्-
दोपश्छिादयेत् ॥ ३३ ॥ गुणांश्च प्रकाशयेदिति ॥ ३४ ।।
पहिले जिस दोपके कारणा, अपना राज्य शत्रुके हाधम घलागया हो,
उस प्रकृतिदोषको सदा दवाये रवखे ॥३॥ तथा जिस गुणके कारण,
शत्रुके हायमें गयाहुमा राज्य फिर वापस लिया गया हो, उस गुणको
सदा तीन करता रहे, अर्थात् यदाता रहे॥ ३१॥ यदि सत्यके शत्रुइस्मगत
होने में पिताका दोष हो, तो उन दोषोंको भी छिपाये रयते ॥ ३३॥ और
पिताके जो कुछ गुण हों, उन सबको परावर प्रकट करता रहे ॥३॥
चरित्रमतं धन्यं कृतं चान्यैः प्रवर्तयेत् ।
प्रवर्तयेन चाधर्म कृतं चान्यनिवर्तयेत् ।। ३५ ॥
इति दुर्गलम्भोपाय योदो अधिकरणे सम्पप्रशमनं पामो ऽध्यायः ॥ ५ ॥
भादितः पचावाशिष्ठतः ॥ १५॥ एतावता कौटलीयस्यार्थशाखण
दुरोलम्भोपायप्रयोदशाधिकरण समाप्तम् ॥५॥
५ अध्या०] दुर्गलम्भोपाय जिन धर्मयुक्त चरित्रोंका भाषरण न कियाजाता हो, विजिगीषु उनको महत्त को; तथा अन्य पुरुषोंसे किपेग धर्मयुक्त म्यवहाको भी भधर्मयुक्त व्यवहारोको कभी प्रवृत्त न होने दे तथा जो अधर्मबुरू व्यवहार प्रवृत्त हुए २ हो, उनको प्रयसपूर्वक रोके ॥ ३५॥ " मत रक्स। दुर्गलम्भोपाय प्रयोदश अधिकरणमें पांचवां अध्याय समास । दुर्गलम्भोपाय त्रयोदश अधिकरण समाप्त MUN औपनिपदिक चतुर्दशअधिकरण पहिला अध्याय १७७प्रकरण परघातप्रयोग 'इस चौदह मधिकरणक नाम' ओपनिषदिक ' है । भापत्र भोर मन्त्र क रहस्यको 'उपनिषद्' कहते हैं। इसीका निरूपण करने के कारण यह अधिकाण 'मोपनिषदिक' फाता है। इसके पहिले प्रकरणम, शत्रुका वध करने के लिये औषध प्रयोगका कपन किया जायगा। चातुर्वर्ण्यरक्षार्थमोपनिपदिकमधर्मिष्ठेपु प्रयुञ्जीत ॥ १ ॥ कालकूटादिः विपवर्गः श्रद्धेयदेशवेपशिल्पभाजनापदेशैः कुब्ज- वामनकिरातमूकबधिरजडान्धच्छमभिः म्लेच्छजातीयैरभिप्रेतैः स्त्रीभिः पुंभिश्च परशरीरोपभोगेष्यवघातव्यः ॥२॥ विजिगीपु, चातुर्वण्यकी रक्षाके लिये, अधार्मिक पुरुषोंमें भापनिपदिकका प्रयोग करे ॥ १॥ कालकूट भादि (धादि शब्दसे वसनाभ हलाहल आदिका भी ग्रहण करलेना चाहिये ) विषयमूहको, अपने विश्वसनीय देश घेष शिल्प सपा सुपान्नस्व (योग्यता) को प्रकट करनेवाले, कुपरे पौने पस्तकद गूगे बहिरे मूर्ख तथा अन्यक घपमें रहनेवाले, और म्जेच्छे जातिके प्रिय पुरुषों तथा मियों के द्वारा, शत्रुके शारीरसे उपभोग्य या मोदिमें सयुन करदिया जाये। तात्पर्य यह है. कि ये उपयुक्त. पुरुष या स्त्री आदि, शत्रुके वस्त्र आदिमें विप का ससगं करदेवें ॥२॥ राजक्रीडाभाण्डनिधानद्रव्योपमोगेपुगूढाः शस्त्रनिधानं कुर्युः ॥ ३ ॥ सचाजीविनश्च रात्रिचारिणो ऽमिजीविनश्यागिनिधानम् ॥४॥ शत्रु राजाके खेलनकी वस्तुओं के रखनेके स्थानमें, भूषण रखने के स्थानगे, तथा सुगन्धि दग्पाके रखने के स्थानमें, गृढपुरुष इपियारों को छिपा अंध्या رأونها ) के औपनिपदिक कर रखदेव । अथवा इस सूचका अर्थ इसमकार करना चाहियेः- विजिगीषु गूढपुरुप, शत्रुके खेलने समय, भूषण आदि धारण 'करनेक समय., प्रथा सुगन्धिं भादि द्रव्योंका उपभोग करने सध्यमें, उसपर (शत्रुपर) शखोंका प्रयोग करें.॥ ३ ॥ और राग्रिमें इधर उधर घूमनेवाले,सत्री पुरुष, तथा लुहार मादि अमिजीवी (अग्निके द्वारा भपनी जीविका करनेवाले पुरुष, शस्थानमें 1 अग्निको रख देनका कार्य करें ॥ ५ ॥ चित्रभेककौण्डिन्यककृकणपञ्चकुष्ठशतपदीचूर्णमुचिदिङ्गक- बलींशतकन्देमककलासचूर्ण गृहगोलिकान्धाहिककृणकपूतिकी- टगोमारिकाचूर्ण मल्लातकावल्गुकारसयुक्तं सद्यःप्राणहरमेतेषां वा धूमः ॥ ५॥ चितकबरा मेंडक, कौण्डिन्यक (एक प्रकारका कीड़ा, जिसका पेशाब और पखाना, विपके समान होता है), गंगली तीतरं, फूटके पांचों अंग (कूट एक वृक्ष होता है, उसके पत्ते फल फूल छाल और जड़ ये पांच अंग ), कान- खजूरा, इन सब चीजोका चूर्ण । अथवा उचिोदङ्ग (एक प्रकारका कीडा); कम्पली (=कमला छोटी अंगुलीकी तरह लंम्बा गोल कीड़ा होता है), शत (=शतमूली शतावरी). जमीकन्द, दाफकी लकड़ी और कृकलास (करकेंटा= गिरगट), इन सब चीजोंका चूर्ण ; अथवा छपकली (किरली), अन्धादिक ( विपरहित सार; त. गणपति शाम्रोमे इसका अर्थ 'एक प्रकारकी मारली' किया है), कणक (जंगली तिर), पतिकीट (एक प्रकारका कीड़ा), गोमारिका (एक प्रकारकी भोपधि ) इन सब चीजोंका चूर्ण; मिलाना और वावचीके रसके साथ मिला लिया जाये ; ये चीजें, तथा इन चीजोंका धुआं, तत्काल ही प्राणों को हरण करने वाला होता है॥५॥ कीटो वान्यतमस्तप्तः कृष्णसर्पप्रियङ्गुभिः । शोपयेदेप संयोगः सद्यः प्राणहरो मतः॥६ ऊपर कहे हुए कीड़ों से किसी एक कोपेको अनिमें तपाकर प्राण आदिसे यदि उसका उपयोग किया जावे, तो पह सूंघनेवाले शरीरको मुशा देता है। यदि काले सांप भौर कांगनी के साथ इसका पोग करदिया जाधे, तो यह सत्कालही प्रागाँको हरण करनेवाला माना गया है ॥ ६ ॥ 'धामार्गवयातुधानमूलं मल्लातकपुप्पचूर्णयुक्तमार्धमासिकः ॥७॥ व्याघातकमूलं भल्लावकपुप्पचूपयुक्तं कीटयोगो मासिका .
१४ माघ (५८८) कौटलीयनशास्त्र ॥ ८॥ कलामा पुरुषाणां द्विगुणं सराश्वानां चतुर्गुणं हस्त्यु- प्ट्राणाम् ।। ९॥ - घामार्गव (भपामार्गचित्रपिता-पुटकवा, या कटवी तोरई), और यातुधान (इस नामकी या राक्षक नामकी एक भीपधि), की अटको, परि मिलाके फूलों के चूर्ण के समय मिला लिया जावे सो यह योग परमह दिनमें प्राण हरलेता है ॥ ॥ अमलतासकी जट, मिसावेके फूलके पूर्णके साथ मिलाकर, उसमें यदि किसी भी प्राप्तकीटका योग करदिया जाये, तो यह प्रयोग, एक महीने तक प्राण हरण करता है। (इस सूत्रम 'प्यापातकमूल' के 'स्थान पर यदि ग्याधिघातकमूल' ऐसा पाठ हो, तो युफ मालूम होता है, क्योंकि व्याधिषसक' शब्दही भमझतासका पर्याय है। प्राचीन ग्यरुपाकारों ने 'न्याघातक' शन्दका भी अर्थ अमलतासही किया है ॥८॥ इस कीटयोग * की मात्रा पुरएको एक कला (घोटीसी) देनी चाहिये , उससे दुगनी गधे और घोडौंको, सथा चौगुनी हाथी और उटॉको देनी चाहिये ॥९॥ शतकर्दमोचिदिनकरवीरकटुतुम्बीमत्स्यधूमो मदनकोद्रवप- लालेन हस्तिकर्णपलाशपलालेन वा प्रवातानुपाते प्रणीतो यावच्च- रति तावन्मारयति ॥१०॥ शतावरी, कर्दम =यक्षकर्दम, कपूर आर कस्तूरी भोर ककोल इन पारों चीजोंक पिसे हुए लेपको यक्षकदम या कर्दम कहते हैं), उचिदिंग, कमेर, फहवी तूपी, और मछली इन सब चीजोंका धुर्भा , धतूरा कोदो और पुरालके (धाम आदिकी पालको काटकर नीचे के रहे हुए हि सके) साथ, अथवा धनिया दाक और पुरालके साथ, यदि सामने सेज हवा के चलते हुए होनेपर किया जाये,रो यह धुभा जहांतक जाता है, यहांतकले प्राणियोंको मार देता है। पूतिकीटमत्स्यकतुम्बाशितकर्दमेन्द्रगोपचूर्ण पूतिकीटक्षुद्रा- रालाहेमविदारीचूर्ण था यस्तशृङ्गसुरचूर्णयुक्तमन्धीकरो धूमः . , पूतिकीट (एक प्रकारका कोडा, इसके ऊपर कुछ ३ कोटेसे होते है ) मछली, कदवीतूम्धी , शतावरी, कम, डाककी सकती, और इन्दगोप ( मखमल की तरह छाल स्गका कीसरा, जिसको 'रामजीकी भैंस' कहते हैं इन सब चीजोंका चूर्ण, अयवा पूतिकीट, कटेहरी या कटेरी, राल, धतुरा भार विदागीकन्दा हम सब चीजोंका चूर्ण, यदि कोके सींग और सुरके . .
, . . १ अध्या०] औपनिषदिक (५८९ पूर्णके साथ मिलादिया जाये तो इन सब वस्तुओं का किया हुआ धुभां माणियोंको अन्धा बनादेता है ॥1॥ पूतिकरजपत्रहारतालमनःशिलागुञ्जारक्तकार्पासपललान्या- स्फोटकाचगोशकद्रसपिष्टमन्धीकरो धूमः ॥ १२ ॥ सर्पनिर्मोक गोश्वपुरीपमन्धाहिकशिरथान्धीकरो धूमः ॥ १३ ।। कांटेदार करंजुमा, पत्रक, हड़ताल, मनुसिल, चूंटली ( रत्ती ), लाल रंगकी (नरमा) कपास, और पलक (फल रहित धान आदिका काण्ड-पुराल), इन सय चीजों को, आखा भाक), काच तथा गोबरके रसमें पीला जाये; इन सय पीजोंका धुआं भी प्राणियोंको अन्धा कादेता है ॥ १२ ॥ सांपकी कैंचुली, गोवर और घोड़की लीद, तथा भन्धाहिक (विपरहित सांप या विशेष मछली) का सिर, इन सब चीजोंका पृथक् २ धुश्री भी प्राणियोंको भन्धा पनादेता है ॥ १३॥ पारावतप्लवककन्यादानां हस्तिनरवराहाणां च मूत्रपुरीपं का- सीसहिङ्गुयवतुपकणतण्डुलाः कार्पासकुटजकोशातीनां च बीजा- नि गोमूत्रिकाभाण्डीमूलं निम्बशिग्रफणिञ्जकाक्षीवपीलुकभङ्गः सर्पशफरीचर्म हस्तिनखभृङ्गचूर्णमित्येप घूमो मदनकोद्रवपला- लेन हस्तिकर्णपलाशपलालेन वा प्रणीतः प्रत्येकशो यावच्चरति तावन्मारयति ॥ १४ ॥ कपूतर, यतख, गिद्ध हाथी, मनुष्य और सूअर, इन सब प्राणियोंका मून और पुरीप: या कसीस, हींग, जौका छिलका, टूटा दाना ( कण) सपा पूरा दाना ( भपमा जौका छिलका, दाना, और घायल), और कपास कुटज (बुटकी कुरैमा) तथा करवी तोरई या पुठकरे (चिरषिer) पीजी या गोमूनिका ( एक प्रकारकी घास जो कि गौके पेशावकी तरह रेवी २ जमीन पर फैलती है) और मंजीठकी जा, रानीम, सेजना, फणिन (जीरका एक भेद-मफेर मरवा ), काक्षीय (समनेका ही एक भेद ) और पीलु, इन पांचों पृक्षाका छिलका; या सांप और मउलीकी खाल, या हाथोके नाखून भौर दांतोंका पूरा; इम वस्तुओं अपने प्रत्येक वर्गका धुनो, धतूरा कोदों भौर पसाळ (फल रहित धान मादिक का नाचेका हिस्सा-पुराल ) के साथ, भपया धनिया पजारा भार पसारके साप मनापामा, जितनी दूरता फैलता जाता है, उतने ही में सब प्राणियों को माता जाता है।
ना 1१४ अधिः + + कौटलीय अर्थशास्त्र कालीकुष्ठनडशतावरीमूलं सर्पषचलाककणपञ्चकुष्ठचूर्ण या धूमः पूर्वकल्पनाशुष्कपलालेन या प्रणीतः संग्रामावतरणावस्क- न्दनसंकुलेषु कृततेजनोदकाक्षिप्रतीकारः प्रणीतः सर्वप्राणना 'नेमः ।। १५॥ धकोतरा, फूल, नरसल, और शतावरी, इन चीजोंकी' जाका या "सांप, मोरकी छ, जंगली तेत्तर, फूटके पांचों अंय ('कूट' एक वृक्षका नाम है, उसके पत्ते फल फूल छाल और जा, ये पांच भंग करेजात है), इन सब चीजों के चूर्णका; पूर्वकल्प अर्थात् पहिले सूत्र बतलायेहुए योग ( धतूग, कोदो, पलार; या धनिया, पलाश, पलाल देखो सूत्र ४) के साथ मिलाकर ओ धुआं बनाया जाता है अथया कुछ गोले और कुछ सूरी केवल पलाल (पुराल) के साथ जो धुर बनाया जाता है; संग्राममें उतरने और रानिये बलात्कार आक्रमणकी भोरके समपमें, तेजना क (देखो. अधि. १५, अध्या. १, मूत्र ।) के सहारेस भांखोंका प्रतीकार कियेहुए ,पुरुषों के द्वारा बनाया गयाहुमा पद धुमा, सपही माणियोंके नेत्रों को नष्ट काढालता है। तात्पर्य यह है, कि हम उपर्युक्त धुएंका प्रयोग करते समय, प्रयोग करनेवाले पुरुष, इसके प्रतीकारका प्रयोग अपनी आंखोंपर अवश्य करल, नहीं तो उनकी भी सांस न हो जायेगी ( इस सूत्र में 'माईशुष्कपलासन', इस पदके -स्थान पर किसी पुस्तक में साई शुष्कपकाळे ऐसा सप्तरगत पाठ है । अर्थ कोई भेद नहीं आता)॥ १५ ॥ शारिकाकोत्तयकालाकालण्डमर्काक्षिपीलुकस्नुहिक्षीरपिष्ट- मन्धीकरणमञ्जनमुदकपणं च ॥ १६ ॥ मेंगा, कयूता, माला और बगली, इन पक्षियोंकी विष्ठाको लाख (आक), नक्षी (सेंजने या बहोकी किसमका एक पेड़), पीठ, तपा सेंट, इन चारों वृक्षोके दूध पीसफर, अंजन तैयार किया जावे, यह अंजन प्राणियों के अन्धा करनेवाला, तथा जलको दूपित करनेवाला होता है। १६ ॥ यवकशालिमूलमदनफलजातीपवनरस्त्रयोगः 'प्लक्षविदा- रीमूलयुक्तो भूकोदुम्बरमदनकोद्रवकाथयुक्तो हस्तिकर्णपलाश- 'क्वाथयुक्तो वा मदनयोगः ॥ १७ ॥ यरक (जी, अधया जलपीपल) और शाली (धान) की जाट, मैन फल, चमेली, पत्रक, और नरमुख (भादमी का पेशाब) इन सय चीजों को - IN . १ अध्या०] औपनिषदिक (५९१), मिलाकर, तथा इनमें पिलखन या लास-देने वाले पीपल और विदारी-की जा का योग करके, अयचा मलिन जल में बने हुए गूला धतूरा और कोदों के क्वाथ का योग करके, अथवा धनियां और पलाश के स्वाथ का योग करके, 'मदनयोग' तैयार होजाता है। अर्थात् यह योग चित्त का उन्मादक, चित्त को भ्रममें डालने वाला होता है। १७ ॥ शृङ्गिगौतमवृक्षकण्टकारमयूरपदीयोगो गुञ्जालाइलीविषमू- लिकेङ्गदीयोगः कस्वीराक्षिपीलकार्कमृगमारणीयोगो मदनको- द्रवकाथयुक्तो हस्तिकर्णपलाशकाधयुक्तौ वा मदनयोगः ॥ १८ ।। समस्ता वा यवसेन्धनोदकपणाः ॥ १९ ॥ शृङ्गी नामकी मछलीका पित्ता (जिगौतम), लोध, सिंभल और मौरशिखा.( अजमोदी ) इन चीजों का योग, तथा घोंटली (रत्ती), जलपीपल या नारियल (गणपति शास्त्रीने ' लागली' का अर्थ 'पृथपणी' अर्याद पिठवन किया है), कालकूट आदि विष और इगुदी (हिंगनबेट, या गोंदी । गणपति शास्त्री ने इसका मर्य 'कटभी' अर्थात् मालकगनी किया है), इन सय चीजों का योग, करवीर (कनर ), अक्षी (सेंगना या बढ़े की किस्म का एक पेस), पीलु, भाक, मृगमारणी (मृगको मारने वाली कोई भोपधि विशेष), इन सब चीजाका योग, धतूरा और कोदोंके क्वाथ के साथ, अथवा धनिया ओर पलाश के क्वाथके साथ 'मदनयोग' अर्थात् उन्माद करदेने वाला योग हो जाता है ॥ १८ ॥ भयवा ये सब ही मदनयोग, पशुओंके घारे, ईधन और जल को भी दूपित करने वाले होते हैं ॥ १९ ।। कृतकण्डलककलासगृहगोलिकान्धाहिकध्मो नेत्रवधमुन्माद च करोति ॥२०॥ पकाई हुई नस नाडियोवाळे (जिनके स्नायु अर्थात् नस नाहियों को पकालिया गया है ऐसे) गिरगट, उपकली और अन्धाहिक का धुभा नेनों को नष्ट कर देता है, तथा उन्माद को करने वाला भी होता है ॥ २० ॥ कृकलासगृहगोलिकायोगः कुष्ठकरः ॥२॥ स एव चित्रमे- कान्बमधुयुक्त प्रमेहमापादयति ॥ २२ ॥ मनुष्यलोहितयुक्तः शोपम् ॥ २३ ॥ गिरगट और छपकली का योग, अर्थात् इन दोनों का धुमा कुटको पैदा कामगारा होता है । यही योग (अर्थात् गिरगट भार उपकली का योग), [१४ अधिक . (५९२) कौटलीय अर्थशास्त्र, चिसयरे मटककी आंत और मधुसे युध हुभा २, प्रमेह रोगको उत्पन्न बता है ॥ २९ ॥ यदि इस योग में मनुष्य का रक्त मिला दिया जाव, तो यह पोग, क्षयरोग को उत्पय करता है । २३ ॥ द्वीविष मदनकोद्रवचूर्णमुपजिविकायोगः मालवाहकाल. लिकारचलाकमेकाक्षिपीलुरुयोगो विचिकाकरः ॥२४॥ पञ्चकुष्ठककौण्डिन्यकराजवृक्षमधुपुष्पमधुयोगो ज्वरकरः ॥ २५ ।। भोपधि भादिके योग होनशक्ति हुआ २ विष (अर्थात् शुद्ध हुभा २ विष ). धतूरा, और कोदाका चूर्ण, दीमकके साप युत करके, फिर माहवाहक (एक विशेष पो), अलि कार एक भीषधि विशेष), प्रचालक (मोरच मोर की पूल का चंदीवा) मेंटक, अक्षी (संपने या बोहे की बिER का एक पेड़), और पीलुके साथ मिलाकर योग तैयार किया जाये। यह योग, विधिका अथात् इजा करने वाला होता है ॥ २४ ॥ करके पांचों म (कूट एक वृक्ष का नाम है, उसके पत्ता फल फूल छाल मार जल, ये पायों संग ), कौपिडपक (एक प्रकारका कीटा, जिसका मल मूत्र विपके समान होता है) राजवृक्ष (अमलतास), शहद और पुप्पमधु (मक-महुभा) इन सब चीजों का पोग, वा उपस करने वाला होता है ॥ २५ ॥ भासनकुलजिह्वाग्रन्थिकायोगः खरीक्षीरपिष्टो भूकबधिरकरो मासार्धमासिकः ॥ २६ ॥ कलामानं पुरुषाणामिति समानं पूर्वेण ॥ २७ ॥ गिद्ध, नेवला, भौर मंजीठ, इन चीजोंको मिलाकर, इन्हें गधीके दूध पीसा जावे, यह योग एक महीने या पन्द्रह दिनके अन्दर मनुष्यको गूंगा और वहिरा बना देता है ॥ २६॥ इन सब ही योगोंको माया पुरुपोंके लिये एक कला होनी चाहिये, शेष पूर्ववत् जान लेवें । अर्थात् घोडे गधे भादिके लिये मनुप्योंसे दुगनी, और ऊट हाधी. आदिके लिये चौगुनी मात्रा देनी चाहिये ।। २७॥ मनकाथोपनयनमौषधानां चूर्ण प्राणभृताम् ।। २८ ॥ सर्वेषां या काथोपनयनमेवं वीर्यवत्तरं भवति ।। २९ ॥ इति योगसंपत् उपर्युक सकती योगोंमें, आपधाका उपयोग कूटकर स्वाथ एनाकर लेना चाहिये। और प्राणियोंका उपयोग चूर्ण बनाकर लिया जाये ॥ २०॥ - १ १ अध्या औपनिषदिक (५९३) अथवा सवही चीजोंका काथ (काढ़ा) बनाकर ही उपयोग लिया जाये। क्योंकि इसप्रकार उपयोग करनेसे औपधम बहुत शफि भाजाती है ॥ २९ ॥ यहांराक योगसम्पत्ति ( विशेष २ योगों का निरूपण कर दिया गया ॥३०॥ शाल्मलीविदारीधान्यसिद्धो मृलवत्सनाभसंयुक्तश्चुचुन्दरी- शोणितप्रलेपेन दिग्धो बाणो यं विध्यति स विद्धो ऽन्यान्दशपु- रुपान्दशति ॥ ३१ ॥ ते दष्टाधान्यान्दशन्ति पुरुपान् ॥३२॥ सिंभल, यिवारी और धनियेमें सिद्ध किया 'हुओ ( अर्थात् भावना दिया हुभा), तथा पिप्लीमूल और वरसनाभ (इप्ती - नामसे प्रसिद्ध एक प्रकारका विप) से युक्त, और छडूंदरके रके लेपसे सना हुआ पाण जिसको जाकर लगता है (अर्थात् पिंधता है ), वह बाणसे चोट साया हुआ आदमी भन्य दश पुरुषोंको काट लेता है ॥ ३ ॥ काटे हुए वे दश पुरुष, अन्य दश २ पुरुषोंको काट खाते हैं, ( इसी प्रकार विष फैल जानेसे शत्रुकी सम्पूर्ण सेना नष्ट हो जाती है ॥ ३२ ॥ भल्लातकयातुधानापामार्गबाणानां पुष्पैरेलकाक्षिगुग्गुलुहा- लाहलानां च कपायं वस्तनशोणितयुक्तं दंशयोगः ॥ ३३ ॥ भिलावा, यातुधान (इस नामकी या राक्षस नामकी एक विशेष भोपधि), अपामार्ग (चिरधिदा-पुठकंडा) और दाण (अर्जुनवृक्ष), इन सय चीजोंके से सिद्ध किया हुआ, और इलायची, अक्षी, गूगल तया हलाहल विप इन सब चीजोका बनाया हुआ काढा, यकर और मनुष्य रकसे युक्त फरीदया जाये। यह देशयोग भर्यात् काटनेके लिये काममें लाये जानेवाला योग है। यह कादा, जिसके शरीरमें चकाजाय, वह पुरुष भी भन्य अनेक पुरुषको कार लेता है ॥ ३३ ॥ ततो ऽर्धधराणको योगः सक्तुपिण्याकाम्यामुदके प्रणीतो धनुःशतायाममुदकाश्यं दूपयति ॥ ३४ ।। मत्स्यपरम्परा ह्येतेन दष्टाभिमृष्टा वा विपीभवन्ति ॥ ३५ ॥ यचैतदुदकं पियति स्पृ. शति वा ॥३६॥ उस कपाय (कार) से भाषा धरणिक प्रमाण योग, सत्तू मौर विल- पुरेसाय जलमें बनाया हुमा; सीधनुए (धनुएक परिमाण होता है, देखो:- भधि. १, भरपा. २० । परणिक एक तोपका नाम है, देखो--मधि. २, Hदा. १९) पर्यन्त सम्बे चौड़े जाशपको कुपित करता है ॥ ३४ ॥ इसके [१४ अधिक (५५४) कौटलीय अर्थशास्त्र दूषित होनेसे यहांकी मछलियां, लगातार एक दूसरेको काटने और स्पर्श कानसे विषयुक्त होजाती है । (सूत्रके 'विपी मयन्ति' पदके स्थानपर कहीं २ 'विपीभवति' ऐसा एकवचनान्त पाठ भी है) ॥ ३५ ॥ भार जो इस जलको पीता है, भथवा स्पर्श करता है, यह भी विषयुक्त होताता है ॥ ३६॥ रक्तश्वेतसप्पैर्गोधा त्रिपक्षमुष्टिकायां भूमौ निखातायां निहि- ता वध्येनोद्धृता यावत्पश्यति तावन्मारयति ॥ ३७॥ कृष्ण- सो वा ॥ ३८॥ लाल और सफेद सरसोंके साथ एक गोधा (गोड) को, तीन पक्ष अर्थात पैतालीस दिनतक, ऊंटॉसे मुक्त ( अर्थात् जहाँपर ऊंट आदि बंधते हो, ऐसी ) भूमि में एक गढ़ा ग्वोदकर, घड़े भादिमें बन्द करके रखें (अधपा 'उप्टिका' शब्दका ही अर्थ मृद्माण्ड करना चाहिये )। नियत अवधिक याद किसी पण पुरषके द्वारा उस निकलवावे, वह निकालनेवाला जबतक उसे देखता है, उतने ही में वह गोधा, उस पुरुषको मारदेती है। तारपर्य यह है, कि उसके देखते हं पुरुष मरजाता है ॥ ३७ ॥ गोद को तरह काला सांप भी, इसी तरह पाड़कर उखाड़ा जावे, तो वह भी पुरुपको भारदेता है। अर्थात् उसके भी देखनेसे पुरप तत्काल ही मरजाता है ॥ ३८॥ विद्युत्प्रदग्धोङ्गारोऽज्वालो वा विद्युत्मदग्धैः का?हीतथा- नुवासितः कृत्तिकासु भरणीपु वा रौद्रेण कर्मणाभिहुतोऽमिः प्रणीतच निष्प्रतीकारो दहति ॥ ३९ ।। अथवा बिजलीसे जले हुए ज्वाला (लपट) सहित भंगारेकी (अर्थात् दहकते हुए भंगारेमें प्रविष्ट हुई २) अग्निको, बिजलीसेही जली हुई लकड़ियोके द्वारा छेकर उसे खूप यढाया जाचे ; अर्थात् उस भागको बिजलीकी जली लकटियामें ही लगाकर सुलगाया जाचे ; और कृत्तिका अथवा भरणी नक्षत्र, रोदर्म द्वारा (रव देवताको लक्ष्य करके विशेष कर्मके द्वारा) उस अमिमें हवन किया जाघे.। इसप्रकार बनाई हुई इस आगका प्रतीकार नहीं होसकता । अर्थात् सधुदुर्ग भादिमें रगाये जानेपर, बिना किसी प्रतीकारके, यह उसने जका देती है ॥ ३९॥ कर्मारादग्निमाहृत्य क्षौद्रेण जुहुयात्पृथक् । सुरया शौपिउफादमिं भार्यायोमिं घृतेन च ॥ ४०॥ अब धार श्लोकोंसे एक और योगका निरूपण करते हैं। कुम्हार पहास भाग लेकर, पृथक् (अर्थात् भागे पताई जानेवाली आगोंसे पृथ . - १अभ्या०] औपनिषदिक रखकर) ही, शहदसे उसमें हवन करे, इसीप्रकार शराब बेचनेवालेके घरस भान लेकर, उसमें शरायसे हवन करे ; तथा उहारके यहांसे भाग लेकर उसमें भार्गी (भारंगी नामकी भौषधि) तथा मासे मन करे ॥ ४०॥ माल्येन चैकपत्न्यान पुंश्चल्यनिं च सर्पपैः । दभा च सूतिकास्वग्निमाहिताग्निं च तण्डुलः ॥४१॥ पतिव्रता स्त्रोके पाससे लाई हुई भग्निको, माल्य {फूलाकी माला) से हवन करे । स्वभिचारिणी स्त्रीके पाससे लाई हुई भागमें सरसोंसे हवन करे । सूतिकागृह (जधाघर) में विद्यमान अग्निको लाकर, उसमें दहस हवन करे । अमिहोत्रीके परसे लाई हुई भागमें घावलेसे हवन करे ॥ ४ ॥ पण्डालानि च मांसेन चिताग्निं मानुषेण च । समस्तान्बस्तवसया मानुषेण ध्रुवेण च ॥ ४२ ॥ चंदालके यहांसे लाई हुई भागमें मांससे इवन करे , चिताकी अभिमें मनुष्यसे इयन करे । फिर इन सब अग्नियोंको इकट्ठा करके, इनमें बकरेकी मजा (पी), मनुष्य और वन (सूखी लकड़ी, या सालवन की लकड़ी गणपति शास्त्रीने "शुम' का अर्थ 'वट' अर्थात् परगद या घड़ किया है) से हवन करे ।। ४२ ॥ जुहुयादमिमन्त्रेण रामवृक्षस्य दारुभिः । एप निष्प्रतिकारो ऽग्निपिता नेत्रमोहनः ॥४३॥ तथा अमलतासकी लकड़ियोंसे, श्रमिकी स्तुति करनेवाले मन्त्रों के द्वाय इस भमिमें हवन करे । इस रिका प्रतीकार नहीं होसफ्ता । मर्यात् पायुफे दुर्ग भादिमें लगाई हुई इस भागका प्रतीकार करने के लिये, शत्रु सया असम होता है। यह अमि न केवल दुर्ग आदिकोही जलाता है किन्तु शत्रुमौंको उसके देखने मानसे, मूढ़ भी बना देता है । भात् उसके देखने पर नयुकी विधकहष्टि नष्ट हो जाती है ॥ ५३॥ अदिसे नमस्से ॥४४॥ अनुमते नमस्ते ॥ ४५ ॥ सरस्वति नमस्ते ॥ ४६ ।। सचितर्नमस्ते ।। ४७ । अग्नये स्वाहा ।।४८|| सोमाय स्वाहा ॥४९॥ भूः स्वाहा ॥५०॥ भुवः स्वाहा ।।५१॥ इत्योपनिषदिके चतुर्दशे ऽधिकरण परधातश्योगः प्रथमो ऽध्यायः ॥ १॥ भादितः पट्चत्वारिंशदुत्ताशतः ॥ १५६ ॥ इधन करने के लिये इन मन्याचा उपयोग करना चाहिये ॥ ४४ ५१॥ औपनिषदिक चतुर्दश अधिकरणमें पहिला अध्याय समाप्त ।
[१४ अधिक (५२६) फौटलीय अर्थशास्त्र दूसरा अध्याय १७८ प्रकरण प्रलम्भनमें अद्भुतोत्पादन औपच तथा मन्त्रों के प्रयोग के द्वारा, भूखध्यासके नए काने या आकृति आदिक बदल लेनेसे शत्रुको ठगना 'प्रलम्भन' कहावा है। इसके दो भेद है, अद्भुतोरपादन और भैषज्यमन्यप्रयोग । इसोको लेकर यह प्रकरण, दो अध्यायोंमें विभक्त करदिमा है। अब इस पहिले अध्यायमें अद्भुतोत्पादनका निरूपण किया जायगा । शिरीपोदुम्बरशमीचूर्ण सर्पिपा संहत्यार्धमासिकः क्षुद्योगः ॥१॥ कशेरुकोत्पलकन्देक्षुमूलविसर्वाक्षीरघृतभण्डासद्धो मा- सिका ॥२॥ शिरीप (सिरस), उदुम्बा (गूलर), और शमी (ोकरा), इनके चूर्ण को पीके साथ मिलाकर खासे, पन्द्रह दिनतक भूख नहीं लगती ॥ ॥ कशेरक (कसेरू, यह मीठा, छोटाला कन्म होता है, जगली तालायोंके किनारे अधिक सर पैदा होता है), कमलको जह, गले की जड़, कमल की डंडी (विस-भिस में) दूम घास, दूध, घी तथा मांड, इन सब चीजोंको मिलाकर तैयार किया हुभा योग, खानेपर एक महीनेतक भूख नहीं लगने देता ॥२॥ मापयवकुलुत्थदर्भमूलचूर्ण वा क्षीरघृताम्याम् ॥ ३ ॥ वल्ली- क्षीरघृतं वा समसिद्धं, सालपृश्निपर्णीमूलकल्कं पयसा पीत्वा || पयो वा तसिद्ध मधुघृताभ्यामशित्वा मासमुपवसति ॥ ५ ॥ उड़द, जौ, कुलयो भौर दाभकी जड़, इन घीजोंको दूध पीके साथ मिलाकर पीलेनेपर एक महीनेतक पुरुष, उपवास करसकता है अथवा अजमोद, दूध और धोको बरावर २ मिलाकर पीसनपर भी एक महीने तक भूख नहीं लगती। इसीपकार सालपर्ण और पृश्निपर्णी (इही नामों से प्रसिद्ध भौषधि विशेष, हिन्दी में इनको पथानाम सालवन और पिठवन कहाजाता है। गणपति शास्त्रीने ' सानको पृथक् और पृश्निपीको पृथक् मानकर, सायका भयं भर्गुन, और पृभिपर्णीका अर्थ लागली किया है। लाली के दो भ-जरूपीपल और नारियल) की जाके कारकको दूधसे पीकर भी एक महनेतक सूख नहीं लगी ॥ १ ॥ अथवा सालपणी और निपाक साप - .
२ अध्या०] ,औपनिपदिक (५९७) दूधको पकाकर, शहद और घीके साथ मिलाकर खालेनसे भी, एक महीनेतक उपनास करसकता है॥५॥ श्वेतमस्तसूत्रे सप्तरात्रोपितैः सिद्धार्थकैः सिद्धं तैलं कटुका- लायौ मासार्धमासस्थितं चतुष्पदद्विपदानाविरूपकरणम् ॥ ६ ॥ तक्रयवभक्षस्य सप्तरात्रादूर्ध्व. श्वेतगर्दभस्य लण्डययैः सिद्धं गौर- सर्पपतैलं विरूपकरणम् ॥ ७ ॥ सफेद बकरके पेशाबमें सात राततक रक्खी हुई सरसोंसे निकाला हुआ तेल, फडवी तूंबी में एक महीना या पन्द्रह दिनतक रक्खा जावे, तदनन्तर उस तेलको जिन चौपायों या दुपार्योंपर लगाया जायगा, उनकी आकृति अर्थात् रंग रूपमें भेद पड़जायगा । यह घिरूपकरण योग होता है ॥६॥ इसी प्रकार मठा ( छाछ ) और जौ खानेवाले भादमाके, सात दिनके बाद (अर्थात् सात दिनतक मठा भौर जो खानेपर, तदनन्तर) सफेद गधेके लैंद (लीदके गोलेस) और जौके साथ पकाये हुए सफेद सरसों के तेलको लगाने या खानेसे, आकारमें भेद पदजाता है ॥७॥ एतयोरन्यतरस्य मूत्रलण्डरससिद्धं सिद्धार्थतैलमर्कतृलपत- चूर्णप्रतिवापं श्वेतीकरणम् ॥ ८ ॥ श्वेतकुक्कुटाजगरलण्डयोगः श्वेतीकरणम् ॥९॥ सफेद मकरा और सफेद गधा, इन दोनों में से किसी एकके, पेशाय और लंडके रसके साथ पकाया हुआ सरसोंका तेल ; भाक, पारसपीपल, भौर धानके चूर्णके साथ मिलाया जाकर, श्वेतीकरण योग अनजाता है । अर्थात् इस प्रकारसे तैयार किया हुआ तेल, लगानेवाले या खानेव लेको सफेद बनादेता ६।॥ ८ ॥ सफेद मुर्गा और अजगर सांप इन दोनोंकी विष्ठाको मिलाकर तैयार किया हुआ योग भी, सफेदयनादेता है ॥ ९॥ श्वेतपस्तमूत्रे श्वेतसर्पपाः सप्तरात्रोपितास्तकमकक्षीरमर्कतृल कटुकमत्स्यविलङ्गाश्य, एप पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ॥१०॥ समुद्रमण्डूक िशहसुधाकदीक्षारतक्रयोगः श्वेतीकरणम् ॥११॥ सफेद बकरके पैशायमें, सात रात्रि पर्यन्त सफेद सरसोंको रक्स जाये, तदनन्तर पन्द्रह दिनतक, इस सरसोंको मठा, अकंक्षीर (आकक दूध ), भाक, पारमपीपल, पटोल (कडा परवल), मरस्य, तथा वायविडंग इन सप पोजों के साथ मिलाकर खाजाये, इसके पाद तैयार कियाहुमा य (५९८) [१४ भाषिक है कोरलीय भर्थशास्त्र योग भी सफेद करनेवाला होता है .. ॥ समुद्रकी मेंटकी, रोख, सुभा (=पूर्वा-मरोरफली ), कदली (केला), क्षार (जवासार) और मटा (पाच), इन सब चीजों का योग भी सफेद करनेवाला होता है॥1 कदल्यवल्गुजक्षाररसशुक्ताः सुरायुक्तास्तकार्कतूलस्नुहि- लवणं धान्याम्लं च पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ॥ १२ ॥ कटुकालावी वल्लीगते नगरमधमासस्थितं गौरसर्पपपिष्टं रोम्णां श्वेतीकरणम् ॥ १३ ॥ केली, बावची जवाखार, पारद, भौर कोई कठिन सही, चीन ( फल मूल भादि), इन सब वस्तुओंको शरायमें भिगोदियाजावे; सदनन्तर छाछ, भाक, पारसंपीपल, संद, नमक और काजीको उसमें मिलाकर पन्द्रह दिनतक रक्खा रहने दियाजावे । इसतरह बनाया हुआ यह योग भी सफेद करनेवाला होता है ॥ १२॥ बेलमें लगीहुई कड़वीतूवीम, पन्द्रह दिनतक सोंठको रसदियाजावे, बादमें निकाल कर सफेद सरसों (बंगा सरसों) के साथ इसे पीस लिया जावे, यहभी श्वेतीकरण योग होता है ॥ ३ ॥ अर्कतूलोऽर्जुने कीटः श्वेता च गृहगोलिका । एतेन पिप्टेनाभ्यक्ताः केशाः स्युः शङ्खपाण्डराः ॥ १४ ॥ भाक, पारसपीपल, अर्जुनक्षपर उत्पन्न होनेवाला एक प्रकारका कीड़ा, और सफ़ेद छपकली, इन सब वस्तुओंको पीसकर यदि पाळीपर लगाया जाये, तो पाल, संखके समान सफ़ेद होजाते हैं ॥४॥ गोमयेन तिन्दुकारिष्टकरकेन वा मर्दिताङ्गस्य भल्लातकरसा- नुलिप्तस्य मासिकः कुष्ठयोगः ॥ १५ ॥ कृष्णसर्पमुखे गृहगोलि- कामुखे वा सप्तरात्रोपिवा गुलाः कुष्ठयोगः ॥ १६ ॥ शुकपित्ता- ण्डरसाम्यङ्गः कुष्ठयोगः ॥ १७ ॥ कुष्ठस्य प्रियालकल्ककपायः प्रतीकारः १८॥ गोया अधपा तिन्दुक ( टेंभुरना छोटा तेंदुभा ) और नीमके कल्कसे मंगाका मर्दन करनेक वाद मिलावा और पारेको मिलाकर देहपर लगाने वाले पुरएको एक महीने तक कोढ़ होजाता है ॥ १५ ॥ काले सापके मुंहमें अधवा छपकली के मुंहम, सात रात बक रक्खीहुई चोटली (बत्ती) भी कुछ- योग होता है। अर्थात् इसको फिर देहपा समानेसे कोट होमाता है ॥ १६ ॥ तोरोके पित्त तया भण्डेके रससे, शरीरपर मालिश करनेपर कुष्ठ होजाता है २ अध्या औपनिषदिक ॥ 1 ॥ चिसंजीके कल्कसे बनाया हुमा काढा, कुष्ठका प्रतीकार होता है॥१८॥ कुक्कुटकोशातकीशतावरीमूलयुक्तमाहारयमाणो मासेन गौरो भवति ॥ १९ ॥ वटकपायनातः सहचरफल्कदिग्धः कृष्णो भव- ति ॥ २० ॥ शकुनकङ्गुतैलयुक्ता हरितालमनःशिलाः श्यामी- करणम् ॥२१॥ खद्योतचूर्ण सर्पपतैलयुक्तं रात्रौ ज्वलति ॥२२॥ 'मुर्गी, तथा कारवी तोरई या परवल और शतावरीकी जड़को खाता हुभा पुरुष, एक महीने में गौरवण होजाता है। १९॥ बरगद ( बड़) काढेसे नहायाहुआ, तथा पियावायके कहकको मालिश करके, पुरुष काला होजाता है । ( इस सूत्रके 'सहचर' शब्दको मारुपा कातेहुप, गणपति शास्त्रीने 'अन्यथा ' और 'कुरवक' को पर्यायवाची लिखदिया है। परन्तु भन्यथा हरदको कहते हैं, और 'कुरव' कुरटे या पियाबांपेका नाम है ॥२०॥ गिद्ध (पक्षी) और कांगनीके तेलसे युक्त हड़ताल और मनसिल भी 'श्याम:- करण' योग है। अर्थात् हड़ताल और मनसिलको गिन्द्र तथा कांगनी के तेल में मिलाफर लगानेसे, पुरुप काला होजाता है ॥ २१ ॥ खद्योत (जुगनू पट- योजना ) का चूर्ण, सरसों के तेल के साथ मिलादेनेपर, रातमें जलने लगता के . है ॥२२॥ खद्योतगण्ट्रपदचूर्ण समुद्रजन्तूनां भृङ्गकपालानां खदिरक- र्णिकाराणां पुष्पचूर्ण वा शकुनकगुतैलयुक्तं तेजनचूर्णम् पारिभ- द्रकत्वमपी मण्डूकवसया युक्ता गात्रप्रज्वालनमग्निना ॥ २३ ॥ जुगनू भौर गेंदुए ( यह लम्बा २ कीड़ा वर्षा ऋतु में होता है) का पूर्ण, समुरके इसीतरहके छोटे २ जानयरोंका चूर्ण, भृग ( मस्तकचूढ ) नामक पक्षीके सिरकी हड्डियोंका चूर्ण, खर भार कनेरके फूलोंका चूर्ण गिद्ध (पक्षी) भौर कांगनीके रोलसे युक्त पांसका चूर्ण, मेंडककी चर्षीसे युक्त नीमकी छालकी स्याही, इन सप वस्तुओंमें से प्ररयेका, भशिके द्वारा शरीरफे चमकाने या जलाने के समय काम भाती है । भयात् इन आफ्धाको देहपर मलकर, देवमें मिना ही किती पीड़ाके भनि प्रयालम किया जासकता है ॥ २३ ॥ पारिभद्रकत्वग्वजकदलीतिलकरकप्रदिग्धं शरीरममिना ज्वलति ॥२४॥ पीलुत्वङ्मपीमयः पिण्डो हस्ते ज्वलति ॥२५॥ मण्डकपसादिग्धो ऽग्निना चलति ॥२६॥ तेन प्रदिग्धमझं
[१४ अधिक
है
(६००१ कौटलीय अर्थशास्त्र
कुशाग्नफलवैलसिक्तं समुद्रमण्डकीफेनकसर्जरसचूर्णयुक्तं वा चल-
ति ॥२७॥
नीमकी छाल, पोहर, फदली भीर तिलके करकसे लिपटाहुभा शरीर
अनिके संसर्गसे जलन छगता है। अयात् मिना हो किमी कष्टक भग्निको
तरह चमकने लगता ॥ २४ ॥ पीलु वृक्षकी छालकी स्वाहीका यना आ
गोला, बिना ही अग्नि संसर्गके, हाथमें जलने एगता है ॥ २५॥ अष्टककी
चसि सनाहुआ वही गोला, अग्निक संसर्गस जलने लगता है ॥ २९॥ उस
गोलेसे सनाहुभा भंग, कुशके तैल और आम्रफल ( आR ) के तमस गीला
कियाहुभा, भथवा सगुनको मेंडकी, समुद्रसाग, और राल, इनके चूर्णसे
युक्त हुआ र, अनिका संसर्ग होनेपर जलने लगता दे ॥२॥
मण्डूकवसासिद्धन पयसा कुलीरादीनां वसया समभागं तैलं
सिद्धमभ्यङ्गो गात्राणामग्निप्रज्वालनम् ॥ २८ ॥ मटूकवसादि-
ग्धोऽग्निना ज्वलति ॥ २९ ।।
मेंडककी चीके साथ पहुए दूध, तभा कैको भादिकी चर्चासे,
समभागमें परावर २ मिला हुआ तेल ( अर्थात् उस दूध और चसे तुल्य
परिमाणमें मिलाहुआ तेल), शरीरपर मालिश कियाहुमा, अनिके समान
प्रज्वलित करदेता है। अधात् इस तेलकी मालिश करलेनेसे देह भाग्निके समान
दी होजाती है ॥ २८॥ मेंडककी धसि सनामा पुरुष, मनिके संसर्गसे
जलने लगता है ॥ २९॥
वेणुमूलशैवललिप्तमङ्गं मण्डूकवसादिग्धमग्मिना ज्वलति
३०॥ पारिभद्रकप्रतिबलावञ्जलवनकदलीमूलकल्केन मण्डूकय-
सादिग्धेन तैलेनाभ्यक्तपादो ऽझारेषु गच्छति ॥ ३१ ॥
बांसकी जा और सिरयालसे लिस अंग, तया मेंढककी चर्चासे युक्त
भगवाला पुरप अग्निक संसर्गसे जलने रुगता है ॥ ३० ॥ नीम, खाँसी, बम्जुल
(तिवस या तेंदुभा, बैत, भपका भशोक, पन्जुल शब्दके ये तीनों अर्थ हैं),
थोहर और कदली, इन सब वृक्षोंकी जदका कल्क बनाकर, उसमें मेसककी
घी साप तैल मिलाकर, उस रोलको में मालिश करके पुरुप, भंगारों के
ऊपर चल सकता है॥१७॥
उपोदका प्रतिबला कञ्जुला पारिभद्रका।
एतेषां मूलकल्केन मण्डूकवसया सह ॥ ३२ ॥
- २ अध्या० औपनिषदिक साधयेत्तैलमेतन पादावस्यज्य निर्मलौ। अङ्गारराशौ विचरेद्यथा कुसुमसंचये ॥ ३३ ॥ पोदीना, खरंटो, बन्जुल (तेंदुआ, बेत अथवा अशोक ), नीम, इन सय वृक्षों की जबका कल्क बनाकर, तथा इनके साथ मंडककी चर्बो मिलाकर, इन सब चीजोंमें तैलको सिद्ध किया जाये, अर्थात् वस्तुओंम तैलको मिला- कर पकाया जावे । निर्मल धूले हुए पैरोंको इस सैलसे मालिश करके पुरुष अंगारोंके ढेरपर उसी तरह घूम सकता है, जैसे कि फूलोंके देरपर ॥३२-३३॥ हंसकौञ्चमयूराणामन्येषां वा महाशकुनीनामुदकलवानां पुच्छेपु बद्धा नलदीपिका रावाचुल्कादर्शनम् ॥ ३४ ॥ वैशुतं . भसाग्निशमनम् ॥ ३५॥ हंस, सोश (कुंज ), और मयूरो ( मोरोंकी ), अथवा अन्य जलमें घूमने वाले बतख भादि बहे २ पक्षियोंकी फूलोमे यांधी हुई नलदीपिका (नरसलका नाम 'नल' है, उस पर लगाई हुई छोटीती, दीपिका-पत्ती) रातमें उक्काके समान दीसती है। अर्थात् रात में दुरसे यह मनुष्पोंको भयभीत कर देती है। ये समझते हैं, कि कोई भयंकर राक्षस आदिही इस कृत्यको कर रहे हैं (एक लकड़ीके सिरेग आग लगाकर, उप्त लकड़ी को इधर उधर घुमाने या हिलाने से आपकी जो शकल होजाती है; उसीको भलात या उल्का कहते हैं) ॥ ३४ ॥ विजलीसे जली हुई लकड़ीको राख, आप्तिको शान्त करने वाली होती॥३५॥ स्त्रीपुष्पपायिता मापा प्रजकुलीमूलमण्डकवसामिश्रं चुल्ल्यां दीप्तायामपाचनम् ।। ३६ ॥ चुल्लीशोधनं प्रतीकारः ॥ ३७ ।। खोरजसे मिले हुए उपद; भार मेंढककी चर्बीसे मिली हुई, गोट ( गोभीके रहनेकी जगह ) में उत्पर होने वाली बड़ी कटेहलोकी जद, इस हालसमें ये दोनों चीजें, चूल्हेके अच्छी तरह जलने परभी नहीं पकती । भर्धात् इन चीजोंके नीचे चाहे जितनी आग लगाई जाय, इनमें पाफ नहीं होता ।। ३६ ॥ चूल्हेसे उतारकर इनको साफ़ कर नाही, इस पाकप्रतियन्धका प्रतीकारदे॥ ३७॥ पीलुमयो मणिरग्निगर्भः सुवर्चलामूलग्रन्थिः सूत्रग्रन्धिर्वा पिचुपरिवटितो मुखादग्निध्मोत्सर्गः ॥ ३८ ॥ कुशानफलतैल- सिक्कोऽगिर्वप्रवातेपु ज्वलति ।। ३९ ।। .
[१४ अधिक ! (६०२) कौटलीय अर्थशास्त्र पोलुको लकड़ीमे पनाया हुआ मटका अग्निगर्म होता है (अर्धाम इसमें भाग्नका श बाधक होनस, बाहरकी यादी आपका संमग भी, इसपर सरकालहा प्रभाव कादता है), मलप्सोको जड़की गांट, अयवा भलपीके सूनों की गांठ, इस लिपटा हुई, मुंहस भाग और धुआं छोदनका साधन होती है ॥ ३८ ॥ कुरा ( एक प्रकारकी घाम, जिसके मन आदि पनाये जाते हैं । आम्रफल ( भाम), और तेल के सहारेसे जलाई हुई भाग, आंधी और वाम भी जलती रहता है ॥३९॥ समुद्रफेनकतिलयुक्तो ऽम्भसि प्लवमानो ज्वलति ॥ १० ॥ प्लवङ्गमानामाथि कल्मापयेणुना निर्मथितोऽग्निर्नोदकेन शाम्यत्यु दकेन च ज्वलति ॥ ४१ ॥ समुद्रझाग, तलसे युक्त हुआ २, पानी में तैरना हुभा भी जलता रहता है ॥४०॥ बन्दरको हांडयोम, विचित्रण के वांससे निर्मथन करके उत्पन्न की हुई अनि, जलसे शान्त नहीं होती, प्रत्युत जलसे और भी जलने लगती है ॥४॥ शस्त्रहतस्स शूलपोतस्य वा पुरुषस्य वामपार्श्वपशुकास्थिपु कल्मापवेणुना निर्मथितोऽग्निर्यत्र निरपसव्यं गच्छति न चात्रा- न्योऽमिज़लति ॥ ४२ ॥ हथियार (तलवार भाले भादि) से मारेहुए, या जिसके देहमें शूली भादिका प्रवेश कियागया हो, ऐपे पुरुपके, बाई ओर की पसलोकी हाड़ियों में विचित्र वर्णरे यांससे निर्मथन करके निकाली हुई अग्नि; अथवा स्त्री या पुरुषकी हड्डियों में मनुष्पकी पमलीसे निर्मथन करके पैदा कीहुई अग्नि; जहांपर तीनवार बाई भोरको घुमादी जाती है, वहांपर दूसरी मनिका प्रभाव नहीं होसकता; अर्थात् और कोई अग उस जगह नहीं लग सकती । (इसका उपयोग 'भारमरक्षितक' प्रकरणमे बताया गया है। देखो-अधि.., अध्या. २.)॥ १२ ॥ चुचुन्दरी खञ्जरीटः खारकीटश्च पिष्यते । अश्वमूत्रेण संसृष्टा निगलानां तु भञ्जनम् ।। ४३ ॥ सईदर, खान (कबूतरकी बराबर, नामा कपासकेपे रंगका एक पश्री. प्रायः जलके किनारे रम्य जंगलों में रहता है), और खारकीट । ऊसर भूमि में उत्पन्न होने वाला एक प्रकारका कीड़ा), इनको घोड़ेके पेशाब के साथ अलहदा २ पीसलिया आवे, फिर इनको मिला लिया जावे, इगका यह मिश्रण घोहे या मनुष्य भाविको बांधने वालो संकलों को ताड़ देता है n ५३ ॥
संध्या.] १ औपनिषदिक अयस्कान्तो वा पापाणः॥ ४४ ॥ भथवा अयस्कान्त नामक पापाण (मणि) भी सकलाको तोड़ने वाला होता है ॥ ५४॥ कुलीराण्डदर्दुरखारकीटवसाप्रदेहेन द्विगुणो दारकगर्भः क- भासपार्थोत्पलोदकपिष्टश्चतुष्पदद्विपदानां पादलेपः, उलूकगृ- धवसाभ्यामुष्ट्रचर्मोपानहावभ्यज्य वटपौः प्रतिच्छाद्य पञ्चाशयो- जनान्यथान्तो गच्छति ॥ ४५ ॥ कैंकड़े के अण्ड और मेडक तथा खारकीटकी चर्बी से बढाए हुए, अच्छी तरह घनताको प्राप्त हुए २ सूकर गर्भको, कक ( इसी नामसे प्रसिद्ध एक पक्षी ), और गिद्धका पसलियों तथा कमर के जलम पोपकर, चौपायो या दुपायोंके गैरॉमें उसका लेप कर लिया जाव, और उल्लू, तथा गिड़की चर्वासे, ऊटके चमडकी अनाहुइ जूतियाका चुपड़कर, तथा बरके पत्तम ढक्कर, उन जतियाका पहनकर, पैरोंमें उपयुस ला किया हुभा पुरुष, पचास योजन तक ( एक योजन-चारकोस) बना थकावट क चला जाता श्येनकङ्ककाकगृध्रहंसक्रौञ्चवीचिरल्लानां मानो रेतांसि वा योजनशताय ॥ ४६॥ सिंहव्याघ्रदीपिकाकोलूकानां मानो रेतांसि वा सार्ववर्णिकानि गर्भपतनान्युष्ट्रिकायामभिषूय श्मशाने प्रेतशिशून्वा तत्समुत्थितं मेदो योजनशताय ।। ४७ ।। याज, कक, कौआ, गिद्ध, हस, कुज, वोचिरल ( एक प्राणी, जिसकी पीठ मर लहरों की तरह कम्पल की सी रेखार होती है, इन प्राणियों की चर्बी भी रेस (वीयं । को मिलार, पूर्ववत् पैरों में लेप किया जावे, तथा नूतियो पर चुपटा जावे, इससे, पुरुप सी योजन तक बिना थकावट के जा सकता है ॥ ४६ ॥ सिह, परा, गेंदा, कौसा भार उरलू, इनकी चर्बी और रेतस्, अथवा सब ही वर्गों के गिरे हुए गोंको मिट्टी के किसी पात्र में अभिपव करके, अपया मरे हुए छोटे बच्चों को श्मशान भूमिमें ही भाभिपव करके, उनसे उत्पन्न हुआ २ अर्थात् उनके शरीरस निकाला हुमा मैदर (शरीरको मजा नामक धातु), इन दोनों ही वस्तुओको पर आदि करके परगे व ला पुरप, दिना पकारट के सी योजन सक चला जाता है (४५-१७ नतम ग्रोश मधं यात सस्पट है। मूल पाठ में भी भितर . -
३ अध्या०]
औपनिषदिक
भयभीत बनावे, जिससे उसके प्रदेशमें अराजकता फैल जावे । इसप्रकार
का व्यापार, अनिष्टकारक तथा कल.का हेतु होनेपर भी, परसर राजाओं
के द्वेषभाव के बढ़नपर करना ही पड़ता है; इसीलिये इसका यहांपर
निरूपण कर दिया गया है ॥ ४ ॥
औपनिषदिक चतुर्दश अधिकरण में दूसरा अध्याय समाप्त ।
{
तीसरा अध्याय।
१७८ प्रकरण ।
प्रलम्भनमें भैषज्यमन्त्रयोग ।
5 शत्रु को धोखा देने के लिये, इस प्रकरण में भैषज्य और मन्त्रों
के योग का निरूपण किया जायगा ॥
मार्जारोष्ट्रवृकबराहश्वाविवागुलीनप्नुकाकोलूकानामन्येपां
या निशाचराणां सवानामेकस्य द्वयोहूनां वा दक्षिणानि वा-
मानि बाक्षीणि गृहीत्वा द्विधा चूर्ण कारयेत् ॥१॥ ततो दक्षिणं
वामेन वाम दक्षिणेन समभ्यज्य रात्रौ तमसि च पश्यति ॥२॥
पहिले भैषज्ययोग का कथन किया जाता है:--बिलाव, ऊंट, मेरिया,
सूभर, सेही, पगली, नसा ( एक प्रकार का पक्षी ) कोमा और पल्लू, अथवा
राग्निमें विचारण करने व से अन्य प्राणियों में से, एक दो या बहुतों की
दाई पाई भोखों का लेकर, उनका पृथक् २ दो जगह चूर्ण यमा लेवे ॥ ५ ॥
सदनन्तर पाई आंखों के चूर्णसे दाहिनी आंसको आंजकर, और दाई आंखों
के चूर्णसे पाई आंखको आंजकर, रातमें अन्धकारके समप भी पुरुष,
प्रत्येक वस्तु को देख सकता है ॥ २॥
एकाम्लकं वराहाक्षि खद्योतः कालशारिवा ।
एतेनाम्यक्तनयनो रात्रौ रूपाणि पश्यति ।। ३ ।।
एक यदल ( या पदहल, यह एक प्रसिद्ध फल, गेए से रंगका मीठा
होता है), सूमा फी सास, जुगन्, और काला शारिवा ( इसो गाम से
प्रतिब एफ औषधि ), इन सब पीजों को मिलाकर मांस में रगान से
पुरुष, र त में भी रूपों को अच्छी तर प सकता है ॥३॥
[१४ आघ नारकभिः 1 (६०४). कौटलीय अर्थशास्त्र पुस्तकों में बहुन भेद है। इसलिये और भी अर्थका टीक निश्चय नहीं होगा। ४५ वे सूत्र में, शामवासी आदि की सम्मादिक पुस्तकों में ' ऐसा पाठ है, परन्तु गणपति शास्त्री की सम्पादित पुस्तकों . दारकगर्भः' पाठ है। शामशास्त्री तो यहां पर प्रायः विचारणीय सय ही शब्दोंके भागे यह (१) सन्देहयोतक चिन्ह लगा गये हैं । आपने अपनी सम्पादित मूल पुस्तक में 'नारकगर्भ:' पाठ रखकर भी इंग्लिश अनुवादमें ' नारफ ' सदके भागे संदेह चिन्ह लगाकर, आगे A Donkey ( =गा ) लिया हुआ है, म मालम यह अर्थ आप किस शब्द का कररहे है. मालूम ऐसा होता है, कि कहीं आप 'गर्भ' का अर्थ ' गईभ ' समझ रहे हैं। इसी तरह सूमोकी पूर्वापरके साथ योजना भी बहुत उलट पुलट को है । ४७ ये सूत्र में तो गर्भवती ऊरणीको भूनकर, पहुत यही अर्थ ससन्धी गड़बा की है । उस जगह का पाठ आएकी मूल पुस्तक में इस प्रकार है- साप्नपणिकानि गर्भवामान्युष्ट्रिकायामलिटूय' । इन वाक्यों में से 4 अ न मालूम मापने किस दिव्यशली के आधार पर निकाला है इमी सूत्रके सियान आदि लम्मे पदका अर्थ करना भाप बिल्कुल ही भूल गये हैं। गणपति शारखीके भी अर्थ कुछ निश्चयारमक प्रतीत नहीं होरो । ४५ वे सूत्र में उत्सल' का अर्थ 'मरस ' किया है, फिर उसके आगे के 'उ'रका ममन्वय न मालूप क्या होगा । ४७ वे सूत्रों जहां शामशास्त्राने ऊंटनी भूनी है, पहांका मूल पाठ गणपति शास्त्री की पुस्तक में इस प्रकार है:--सावर्णिकानि गर्भपरानान्युष्टिकायाममिपूय' । हमने भी इसी पाठके अनुपार सूत्र का अर्थ कर दिया है, पर आर्थिक वास्तविकता का कुछ निश्चय नहीं हुआ। इसी तरह ४५व सूत्र में ' वारकगर्भः' का अर्थ गणपति शास्त्री ने सूकरगर्मः' कर दिया है, पर इससे भी अर्थ स्पष्ट नहीं खुलता । तात्पर्य यह है, कि इन तीनों ही सूत्रों में, व्यास्थाकारो और मूल सम्पादोंके अनेक स्सलग दौख रहे हैं। विचारशील विद्वान् पाठक, स्वयं ही गोता लगाकर इसमें से कुछ रहस्य ढूंढने का यत करें) ॥ ४७ ॥ अनिष्टैरद्भुतोत्पातैः परस्योद्वेगमाचरेत् । आराज्यायेति निर्वादः समानः कोप उच्यते ॥ ४८ ।। इत्योपनिषदिक चतुर्दशे प्रधिकरणे प्रलम्भने भद्भुशोत्पादनं द्वितीयो ऽस्यायः ॥ आदितः सप्तचत्वारिंशदुसरशतः ॥ १४ ॥ इसप्रकार साश्चर्यचकित करने घाई दन अदुस, तथा अनिष्टकारक उत्पातों से विजिगीप, शगुको भजीतर धेचैन करे । अर्थात् उसको सम .
३ अध्या०] औपनिषदिक (६०५) भयभीत बनावे, जिससे उसके प्रदेशमें अराजकता फैल जाये । इसप्रकार का व्यापार, अनिष्टकारक तथा कलङ्कका हेतु होने पर भी, परस्थर राजाओं के द्वेषभाव के बढ़नेपर करना ही पड़ता है। इसीलिये इसका यहापर निरूपण कर दिया गया है ॥ १७ ॥ औपनिषदिक चतुर्दश अधिकरण में दूसरा अध्याय समाप्त । तीसरा अध्याय। १७८ प्रकरण। प्रलम्भनमें भैषज्यमन्त्रयोग। । शत्रु को धोखा देने के लिये, इस प्रकरण में भैषज्य और मन्त्री के योग का निरूपण किया जायगा ॥ मार्जारोष्ट्रवृकबराहश्वाविद्वागुलीनप्तकाकोलूकानामन्येषां या निशाचराणां सत्यानामेकस्य द्वयोहूनां वा दक्षिणानि वा- मानि याक्षीणि गृहीत्वा द्विधा चूर्ण कारयेत् ॥१॥ ततो दक्षिणं वामेन वाम दक्षिणेन समभ्यज्य रात्रौ तमसि च पश्यति ॥२॥ पहिले भैपज्ययोग का कथन किया जाता है:-पिलार, ऊंट, मेदिया, सूभर, सेही, पगली, नता (एक प्रकार का पक्षी ) कोमा भार अल्लू अथवा रानिमें विधारण करने व से अन्य प्राणियों में से, एक दो या बहुतों की दाई पाई भांखों का लेकर, उनका पृथक् २ दो जगह चूर्ण यमा लेवे ॥१॥ सदगन्तर बाई आंखों के चूर्णसे दाहिनी आंखको अंजकर, और दाई आंखों.. के पूर्णसे पाई भास्त्रको भांजकर, रात, अन्धकारके समय भी पुरुष, प्रत्येक वस्तु को देख सकता है ॥२॥ एकाम्लकं वराहाक्षि खद्योतः कालशारिवा। एतेनाभ्यक्तनयनो रात्रौ रूपाणि पश्यति ।। ३ ॥ एक पदल ( या दहल, यह एक प्रसिद्ध फल, गैरए सेगका मौका होता है, सूभर की आंस, जगन्, भीर काला शारिया ( इस प्रमिद एक औषधि ), इन सप चीजों को मिलाकर मार मेगा में भी रूपों को अच्छी तरह देख सकता ॥३॥ पुर, [५४ अधि० कौटलीय अर्थशास्त्र विरात्रोपोपितः पुष्ये शस्त्रहतस्यशूलपोतस्य वा पुंसः शिरः- कपाले मृत्तिकायां यवानावास्याविक्षीरेण सेचयेत् ॥ ४ ॥ ततो यविरूढमालामायद्धय नष्टच्छायारूपश्वरति ॥ ५ ॥ तीन राशि पर्यन्त उपवास रक्खा हुआ पुरष, पुष्य नक्षत्रसे युक्त काल में हथियार से मारे हुए, अथवा शूलपोत पुरपके (जिसके शरीर मे घूस का प्रवेश किया गया हो, ऐसे ) सिर की हड्डी में मही भरके उसमें जी बोकर, उन्हें भेड़के दूध से सींच ॥ ४ ॥ तदनन्तर उन उपजे हुए जाभी की माला को गले में बांधकर, छाया और रूप से रहित होकर विचरण करता ह । अर्थात् उसकी छाया और रूप किमी पुरष को नहीं दीखते, तथा वह सबको देख लेता है ॥ ५ ॥ त्रिराम्रोपोपितः पुष्येण श्वमार्जारो लूकबागुलीनां दक्षिणानि वामानि चाक्षीणि द्विधा चूर्ण कारयेत् ॥ ६ ॥ ततो यथास्वम- भ्यक्ताक्षो नष्पच्छायारूपश्चरति ॥ ७॥ अथवा तन रात्रि पर्यन्त उपवास रखता हुमा पुरप, पुष्प नक्षत्रमे युक्त कालमें, कुता बिल य, उल्लू और पागुरी ( एक प्रकारका पक्षी संभवतः यगली का यह नाम हो ),इन चारों जानवरोंको दाई और बाई आंखों को पृथकर दो जगह नूर्ण कराये ॥ ६ ॥ तदनन्तर दाई भांख के चूर्ण को दाई मांख,भार पाई भांखके चूर्णको पाई भोख में लगाकर, छाया और रूपसे रहित होकर विचरण करता है॥ ७॥ त्रिरात्रोपोपितः पुष्येण पुरुषघातिनः काण्डकस्य शलाकाम- जनीं च कारयेत् ॥ ८॥ ततो ऽन्यतमेनाक्षिचूर्णेनाम्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्वरति ॥९॥ भधवा तीन राषि पर्यन्त उपवास रखता हुआ पुस्प, पुष्य नक्षत्रसे युक्त कारमें, पुरुषको मारने वाले व णके लोहे की एक सुरमा डाळनेकी सलाई और एक सुरमादानी बनवावे ॥ ८॥ तदनन्तर कुत्ता, बिलाव, उल्लू और वागुली, इन चारोंमे किसी एकको दाई याई भाखाका पृथक २ चूर्ण बनाकर उसी सलाई और सुग्मैदानी के द्वारा उसे आँखोम आंजकर घद पुरुष, छाया भीर रूपसे रहित होकर विचरण करता है ॥ ९ ॥ त्रिशत्रोपोषितः पुष्येण कालायसीमानी शलाकां च कार- येत् ॥ १०॥ ततो निशाचराणां सत्त्वानामन्यतमस्य शिri ३ अध्या०] औपनिपदिक (६०७) कपालमञ्जनेन पूरयित्वा मृतायाः खिया योनौ प्रवेश्य दाहयेत् ॥११॥ तदञ्जनं पुष्येणोद्धृत्य तस्यामञ्जन्यां निदध्यात् ॥१२॥ तेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्वरति ॥ १३ ॥ अथवा तीन रानिपर्यन्त उपवास रखता हुआ पुरुष, पुष्य नक्षत्रसे युक्त कालम, फौलाद (लोहे ) की एक सुरमादानी और सलाई बनवावे ॥ १० ॥ तदनन्तर, रातमें घूमने वाले जानवरों से किसी एक की खोपड़ीको भजनसे मरकर, बसे मोहुई स्त्री को योनिमें प्रविष्ट करके जला देवै ॥ ११ ॥ बादमें पुष्य नक्षत्रम युक्तमालमें उस भजनको यहांसे उठावे, और उस लोहे की सुरमेंदानीमें रख देवे ॥ १२ ॥ उस अञ्जनको, उसी पूर्वोक्त सलाईसे आंख में ओजकर पुरुष, छाया और रूपसे रहित होकर सर्वत्र विचरण करता है ॥१३॥ यत्र ब्राह्मणमाहिताग्निं दग्धं दह्यमानं या पश्येत्तत्र त्रिरात्रो- पोपितः पुष्येण स्वयंमृतस्य वाससा प्रसेवं कृत्वा चिताभस्मना पूरयित्वा तमाराध्य नपच्छायारूपश्चरति ॥ १४ ॥ अधवा जहाँपर आहिताग्नि (अग्निहोत्री ) प्रामणको जला हुआ या जलता हुआ देखे, वहाँपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवास रखता हुभा पुरुष, प्य- नक्षत्रसे युक्तकालमें, स्वयं मरेहुए किसी मनुयके वस्त्रसे एक पोटली (थैली- सी) पनाकर, उसको उसी मनुष्यको चिताकी राखसे भरलेवे, और उस पो- टली को अपने शरीरमें किप्ती जगद बांधलेये; ऐसा करनेसे वह पुरुष, छाया भोरे रूपसे रहित होकर सर्वत्र विचरण करता है ॥ १४ ॥ बामणस्य प्रेतकार्ये या गौः मार्यते तस्सा अस्थिमजाचूर्ण- पूर्णाहिमस्खा पशुनामन्तर्धानम् ॥ १५ ॥ सर्पदष्टस्य भसना पूर्णा प्रचलाकभत्रा मृगाणामन्तर्धानम् ।। १६ ॥ ब्राह्मणके मेतकार्य अर्थात् श्राद्धमें जो गाय मारी जाती है, उसकी हड्डी और ममा चूर्गपे, सौरकी कांचनीको भर दिया जावे; यह पशुओंके अन्स- धान करने का योग है। भात उस चूगं भी हुई सांपकी कांचलोका संसा किसीको भी नहीं दीखता ( इस सूत्रमें 'या गौमार्यते तस्या भास्थि' के पानपर किसी पुस्त में 'यो गौ माते मस्साधि' ऐसा पति पाट पी५ ॥ ससे काटेहुए किपी जानवरकी राखस, मारपेचको बनाई हुई लीको शरदिया नारे, यह योग समी जंगली पशुमाक अन्तनिके होने पर प. बि.॥
(६०८ कौटलीय अर्थशास्त्र [१४ अधिक उलूकवागुलापुच्छपुरीपजान्वस्थिचूर्णपूर्णाहिमस्खा पक्षिणा- मन्तर्धानम् ॥ १७ ॥ ३त्यष्टावन्तर्धानयोगाः ॥ १८ ॥ उल्लू और यागुलीको पूछ, विष्टा, जानु (घोंटू, टांग ) और हट्टियोंके पूर्णसे, सांपको कैचरीको भर दिया जाये; यह योग ममी पक्षियोंके भन्मघांन- के लिये होता है। भयात् उस चूर्णसे भी सांपको कैंचलोका ससग होनेपर, वह पक्षी किसीको भी नहीं दीखता ॥ १७ ॥ यहांतक अन्तधान रिये आठ योगोंका निरूपण कर दिया गया ॥ १८॥ वलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्परम् । भण्डीरपाकं नरकं निकुम्भं कुम्ममेव च ॥ १९ ॥ देवलं नारदं वन्दे वन्दे सावर्णिगालपम् । एतेषामनुयोगेन कृतं ते स्वापनं महत् ॥ २० ॥ यथा खपन्त्यजगराः स्वपन्त्यपि चमूसलाः । तथा वपन्तु पुरुपा ये च ग्रामे कुतूहलाः ॥ ११ ।। भण्डकानां सहस्रेण रथनेमिशतेन च । इमं गृह प्रवेक्ष्यामि तूष्णीमासन्तु भाण्डकाः ।। २२ ।। नमस्कृत्वा च मनवे वधा शुनकफेलकाः । ये देवा देवलोकेषु मानुपेषु च ब्राह्मणाः ॥ २३ ॥ अद्धययनपारगाः सिद्धा ये च कैलामतापसाः । एतेभ्यः सर्वसिद्धभ्यः कृतं ते स्वापनं महत् ॥ २४ ॥ आतिगच्छति च मय्यपगच्छन्तु संहताः ॥२५॥ अलिते पलिते मनवे स्वाहा ।। २६॥ भव इसके भागे सबको सुला देनेके चार योगोंका निरूपण किया जायगा इन योगों में मन्नौका भी प्रयोग करना पडता है, ११ से २६ संख्या तक भाउ मन्त्र यहां बतलाये गये है, जिनमें पाहेला मन्त्र बलि वैरोचनं पन्ने, से प्रारम्भ होता है, और बाठवा मन्त्र भरिते पलिते मनवे स्वाहा' पर समा. त होजाता है । इन मन्त्रों के अर्थ विल्कुल स्पष्ट हैं, और इनका यहा उपयोगी फेचल पाठ मात्रमेडी पर्यवसित होजाता है। ये आठों मन्त्र पहिले दो योगोंके लिये साधारण है, अर्थात् निम्न प्रतिपादित दोनों यागीमें इन्हीं मन्त्रोंका उप.
३ अध्या औपनिषदिक (६०९) योग होना चाहिये । २४३ श्लोको 'एसेभ्यः' के स्थानपर 'एते च' और २६ चें मन्त्र में पलिते के स्थानपर चलिते' पाठान्तर है॥ १९-२६ ॥ एतस्य प्रयोगः-॥ २७ ॥ त्रिरानोपोषितः कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां श्वपाकीहस्ताद्विलखायलेखनं क्रीणीयात् ।। २८ ।। तन्मापैः सह कण्डोलिकायां कृत्वासङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् ।। २९ ।। द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्य कुमार्या पेपयित्वा गु- लिकाः कारयेत् ॥ ३० ॥ तत एकां गुलिकामभिमन्त्रयित्वा यतेन मन्त्रेण क्षिपति तत्सर्व प्रखापयति ॥ ३१ ॥ इस मन्त्र समूहका प्रयोग इसतरह समझना चाहिये ॥ २७॥ तीन रानिपर्यन्त उपवास रखता हुभा पुरुष, पुष्यनक्षत्रसे युक्त, कृष्णपक्षको चतुर्द- शीमें, किसी घाण्डालोके हायसे चूहेका एक टुकड़ा खरीदलेबे ॥ २८ ॥ उसको उदयों के साथ एक छोटीसी पिटारीमें रखकर, सुले विस्तृत श्मशान में गदा खोदकर यहां इसे गार देवे ॥ २९ ॥ दूसरी चतुर्दशी में { अधीत् जिस चतुर्दशीमें गादा था, उससे अगली चतुर्दशी ) वहांसे इसे उखादकर, किसी कुमारी से इस पिसवावे, और इसको गोली मनका लेवे ॥ ३० ॥ तदनन्तर एक गोलीको मन्त्रोसे अभिमन्त्रित करके, जहांपर इस उक्त मन्त्र- समूहको पढ़ता हुआ गोलीको फैंक देता है, वहां वह पुरुष, सबको सुला देता है। अधात् उस म्यानमे विद्यमान सब ही भाणी, उस मन्त्रयुक्त गोली के प्रभाव सोजाते हैं। यहांतक पाहेले पोगका निरूपण किया गया ॥३॥ एतेनैव कल्पेन श्वाविधः शल्यकं त्रिकालं विश्वतमसङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् ॥ ३२॥ द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्य दह- नमसना सह यतेन मन्त्रेण क्षिपति तत्सर्व प्रस्थापयति ॥३३॥ पूर्वोक्त प्रकारके अनुसारही ( अधात् नियत समयतक उपवास करके पुष्पयुः कृष्ण चतुर्दशी ), चाण्डाली हाथसे, तीन जगहसे काली और तीन जगह सफेद सेहीके कोरे खरीद और उसे खुले विस्तृत माने भैरागमें पूर्ववतही गढ़ा खोदकर गाद देवे ॥ ३२ ॥ उससे अगली च उसे उखाड़कर, श्मशानकी राएकै साथ जहां उसको मन्त्रपूर्वक है, यहीं सपो सुना देता है। यह दूसरे योगा गिलान किया ग॥ सुवर्णपुप्पी ब्रह्माणी ब्रह्माणं च कुशधजम् । सर्वाष देवता वन्दे पन्दे सर्वाश्च तापसान् ॥ ३४ ॥ TAY N - LIBF
[१४ अधि०
-
कौटलीय अर्थशास्त्र
वशं मे ब्राह्मणा यान्तु भूमिपालाश्च क्षत्रियाः ।
वशं वैश्याश्च शूद्राश्च वशतां यान्तु मे मदा ॥ ३५ ॥
स्वाहा अमिले किमिले ययुजारे प्रयोगे फो वयुश्वे विहाले
दन्तकटके स्वाहा ॥ ३६॥
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
श्वाविधः शल्यकं चैतत्रिश्वेतं ब्रह्मनिर्मितम् ॥ ३७ ।।
प्रसुमाः सर्वसिद्धा हि एतत्ते सापनं कृतम् ।
यावग्रामस्य सीमान्तः सूर्यस्योद्गमनादिति ॥ ३८ ॥
स्वाहा ॥ ३९ ॥
पहिले भार दूसरे योगमें ममानही मन्त्रों का उपयोग होता है।
तीसरे योग के लिये मन्न भिर है, वे मन्त्र ३५ वी संपामे लगाकर ३९ यी
संख्या तक समझने चाहियें इन मौका प्रारम्भ 'सुवर्णपुप्पी प्रमाणी' और
समाप्ति सूर्यस्याङ्गमनादिति स्वाहा 'हे । अर्थ सबके स्पष्ट हैं; यहाँ इनका
उपयोग, केवल इनके पाठमात्रसे है । ३६ वी संरयाके मन्त्रवाक्यमें 'वयु-
जारे' के स्थानपर 'वसुजारे' या 'वयुचारे'; और 'क्युरये' के स्थान पर 'वयुद्ध'
या धुर्ट' तथा 'करके' क स्थानपर 'कटके पाठान्तर हैं ॥ ३४.३९ ॥
एतस्य प्रयोगः-॥ ४० ॥ श्वाविधः शल्यकानि विश्वेतानि
सप्तरात्रोपितः कृष्णचतुर्दश्यां सादिराभिः समिधामिरग्निमेतेन
मन्त्रेणाष्टशतसंपातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् ।। ४१ ।।
तत एकमेतेन मन्त्रेण ग्रामद्वारि गृहद्वारि वा यत्र निसन्यते तत्सर्व
प्रस्वापयति ॥ ४२ ॥
इस मन्ग्रपमूहका प्रयोग इस प्रकार समझाना चाहिये-॥१. ॥ पूर्ववत्ती
तीन गरी गफद सही काटेको श्मश न भूमि में गाड देवे । सात रात
पर्यन्त उपवाग रसना हुभ्र' पुरण, पगारक्षकी नुरंगीमें खर आदि
वृक्षाश मामघासाय
इम मन्त्रमूद दारा; शहद और घा मिल कर
उमएको आठ वा अनिम आहुति देवे ॥ ११ ॥ इस कृत्यके अनन्तर
प्रशान में गहुए काटाको उख इकर, उनमें से एक काटा लेकर, इस
मन्त्रसमूहके द्वारा उसको जहांकी, किमी प्राम या घर के दरवाजेपर गाड़ देता है,
पीपर सरको सुला देता है। यह तीसरे थोगका निरूपण करदिया गया ॥४२॥
६ अध्या०]
औपनिषदिक
(६१)
बलि वैरोचनं वन्दे शतमाय च शम्बरम् ।
निकुम्भ नरकं कुम्भं तन्तुकच्छ महासुरम् ॥ ४३॥
अर्मालवं प्रमीलं च मण्डोलूकं घटोलम् ।
कृष्णकंसोपचारं च पौलोमी च यशस्विनीम् ॥ ४४ ॥
अभिमन्वय गृह्णामि सिद्धार्थ गवमारिकाम् ।
जयतु जयति च नमः शलकभूतेभ्यः स्वाहा ॥ ४५ ॥
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ॥ ४६॥
सुखं स्वपन्तु सिद्धार्था यमर्थ मार्गयामहे ।
यावदस्तमयादुदयो यावदर्थ फलं मम ॥ ४७ ॥
इति स्वाहा ।। ४८॥
अब चौथे योगका निरूपण किया जाता है । इसमें उपयोग करने
लये बलि रोचन ar' से लगाकर 'यावदर्य फलं मम । इति स्वाहा' सक
सन्न निर्दिष्ट इनमें ४५ दी संख्या मन्त्रमें 'घटेलम्' के स्थानपर
"घटोअसम्'; ४५ वी संख्या मन्त्री 'अभिमन्त्रय' के स्थानपर
अभिमन्वयित्या' और 'दावतारिकाम्' के स्थानपर 'शवपारिताम्' ये
पारन्तर है॥ ४३-५८॥
एतस्य प्रयोगः-॥४९॥ चतुर्नक्तोषवासी कृष्णचतुर्दश्या
नसकीर्ण आदहने बलिं कृत्वा एतेन मन्त्रेण शवशारिकां गृहीत्वा
यात्रीयोइलिको यनीयात् ।। ५० ॥ तन्मध्ये श्वाविधः शल्यकेन
ध्वा यत्रतेन मन्त्रेण निखन्यते तत्सर्व प्रस्थापयति ॥५१ ।।
इस मन्त्रसमूहका प्रयोग, इसप्रकार समझना चाहिये:-॥४९॥
बार रात्रि पर्यन्त उपचास रखता हुमा पुरुष, कृष्णपक्षकी चतुर्दशीमें, विस्तृत
सुले श्मशान के मैदान में यति देकर, इस मन्त्रसमूहके द्वारा एक मरी हुई
मेंगाशे लेकर, डोटेसे कपड़े में उसको पोटली यांध लेये ॥५०॥ उसके बीच
सेहीका एक छोटा पींधकर, जहां कहीं भी इस मन्नसमूहको पढ़ता हुआ, उसे
गार देता है, वहांपर 1ो सुला देता है । यहांतक पुला- धारों
.पोकागा.निशार्पफ वर्णन करहिया गया ॥ ५॥
[१४ अधिक १ (६१२) कौटलीय अर्थशास्त्र उपैमि शरणं चाग्नि देवतानि दिशो दश । अपयान्तु च सर्वाणि वशतां यान्तु मे सदा ।। ५२ ॥ स्वाहा ॥ ५३॥ भय इसके आगे दरवाजा सोलदेनेके योगका निरूपण करते१,५२ भार ५३ संख्यासे, उसके मन्यका निर्देश किया गया है ॥ ५२-५३ ।। एतस्य प्रयोगः-॥ ५४ ॥ त्रिरात्रोपोपितः पुप्येण शर्करा एकविंशतिसंपातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् ।। ५५॥ ततो गन्धमाल्येन पूजयित्वा निखानयेत् ॥ ५६ ॥ द्वितीयेन पुष्ये- णोद्धृत्यैकां शर्करागभिमन्त्रय्य कवाटमाहन्यात् ।। ५७ ॥ अभ्य- न्तरं चतसृणां शर्कराणां द्वारमपात्रियते ॥ ५८ ॥ स मन्त्रका प्रयोग निम्नलिखित रीतिसे समझना चाहियेः-॥५॥ तीन रात्रिपर्यन्त उपवास पूर्व छ, पुप्यनक्षनके योगर्म पहुतसो कंकड़ियोंको लेकर (=शा । इस शब्दका अधं गणपति शास्त्रीने सोपड़ी भी किया है), उनके ऊपर अशिम, शहद भार घीसे इकोसवार आहुति डालकर हवन करे ॥ ५५ ॥ तदनन्ता, गन्ध और मालाओसे उनकी (कंकड़ियों, या खोप- दियोंकी) पूजा करके, एक गढा खोदकर उसमें उन्हें गाड़देवे ॥ १६ ॥ जद दूसरीयार पुष्यनक्षत्रका योग होवे, तो उन्हें उखाडकर, उनमें से एफ कंकहींको, मन्नासे अभिमन्त्रित करके क्विाइपर मारे । अर्थात् मन्त्रपूर्वक उस कंकलीको, किगहों पर आघात करे ॥ ५० ॥ उस आघातसे चार कलियोंकी परामर जगहमें, किवादमें छेद होजायगा । इसीतरह सम्पूर्ण द्वारको, घुपचाप कियाष्ट्र तोड़कर खोला जासकता है।५८ ॥ चतुर्नक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां नमस्य मुरुपस्यास्थ्ना अपभं कारयेत् ।। ५९ ॥ अमिमन्त्रयेचतेन ।। ६० ॥.द्विगोयुक्तं गोया- नमाहृतं भवति ॥ ६१॥ ततः परमाकाशे विक्रामति ।। ६२ ।। इसी मन्नका एक भीर भी प्रयोग पत्ता : :-चार रात्रिपर्यन्त उप. घारापूर्वक रहता हुभा पुरष, णपक्षको चतुर्दशी, टूटे हुए पुरुषकी इझीसे एक बैर की मूर्ति मनवावे । (बिसी २ पुस्तकों 'चतुर्नतोपयाती' के स्थानपर 'चतुर्भशापवासी' भी पाठ है । अर्ध दोनोका एकही है ॥ ५९ ॥ इस उपर्युक्त मन्नके द्वारा, उस मूर्तिका अभिमन्त्रण को । अर्थात् उपयुंग विधिस होम पूजा आदि परके, उसको सिद्ध करे ।।१०॥ ऐसा करनेसे की थैलोंसे युक्त ३ अध्या०] औपनिषदिक एक बैल गावी वहां उपस्थित होजाती है ॥६॥ तदनन्तर उसके द्वारा पुरुष, परम आकाशमें घूम सकता है। और सर्वत्र प्रवेश करसकता है; अर्थात् उसे द्वार आदि, कहीं बाधा नहीं दे सकते ॥ ६२ ॥ सदारविरविः सगण्डपरिघाति सर्व भणाति ॥ ६३ ॥ चण्डालीकुम्बीतुम्भकटुकसारीघः सनारीभगो ऽसि स्वाहा ॥६४॥ अप एक मन्त्र ताला खोलने, और सुला देने, इन दोनों कामों में आनेवाला बताते हैं, यह मन्त्र ६३ और ६५ संख्यासे बताया गया है । ६४ वो संख्या वाक्यमें 'कुम्बीतम्भ' फे स्थानपर 'कुम्बीतम्ब' ऐसा पाठान्तर भी है ॥ ६३-६४ ॥ तालोद्धाटनं प्रस्थापनं च ।। ६५ ।। इस मन्त्रका प्रयोग ठीक उसी तरह करना चाहिये, जैसाकि दरवाजा खोलने के मन्त्र का पहिला प्रयोग बतलाया गया है। इसी रीतिसे इस मन्त्रके द्वारा ताला भी खोला जासकता है, और लोगोंको सुलाया भी जासकता त्रिरात्रोपोपितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलपोतस्य वा पुंसः शिरः- कपाले मृत्तिकायां तुवरीरा वास्योदकेन सेचयेत् ॥६६॥ जातानां पुष्येणैव गृहीत्वा रज्जुकां वर्तयेत् ॥ ६७ ॥ ततः सज्यानां धनुपां यन्त्राणां च पुरस्ताच्छेदनं ज्याच्छेदनं करोति ॥ ६८ ॥ अब धनुपकी रस्सी काट देनेका योग यतलाते हैं। तीन रानिपर्यन्त उपयासपूरक रहता हुआ पुरुप, पुष्पगमनसे युक्तकालमें, हथियारसे मारे या शूलपोत ( जिसके शरीर लोहनी शला का, या सूली भादिका प्रवेश हुमा हो, ऐसे पुरुषकी खोपड़ी में मही भरकर उसमें थोर या अरहर बोदेवे और जलसे उनको सींचता रहे ॥ ६६ ॥ गर वह अहुरित होजाये तो, पुष्पनक्षग्रसे युक्तकाल में ही उसे उसाड़कर उनकी रस्सी बटवावे ॥ ६७ ॥ उस रस्सीके द्वारा वह पुरुष, दोरी सहित धनुपोंका, और अन्य यन्नोंका भी सामनेसे छेवन करसकता है। सपा नुपकी दोरीका भी छेदन करसकता है ॥६॥ उदकाहिमस्खामुच्छवासमृत्तिकया स्त्रियाः पुरुषस्य पा पूरयेत् ॥ ६९ ॥ नासिकावन्धनं मुखग्रहय ॥ ७० ॥ चराहवास्ति- मुच्छयासमृत्तिकया पूरयित्वा मर्कटस्नायुना बधीयात् ॥ ७१॥ आनाकारणम् ॥ ७२ ।। कृष्णचतुर्दश्यां शस्त्रहताया गोः कपिल .
२४ अधिक (६५) कौटलीय अर्थशास्त्र लायाः पित्तेन राजवृक्षमयीममित्रप्रतिमां अञ्यात् ।। ७३ ।। अन्धीकरणम् ॥ ७४॥ जलके सांपकी कैंचुलीको, किसी स्त्री या पुरुषकी चिताके उपरकी मिहांसे भर देव ॥ ६९॥ यह योग नासिका ओर मुखमा निरोध करनेवाला होता है ॥ ७० ॥ इसीतरह सूरज वस्तीम चिता ऊपरछा मिष्टी भरकर उसे किसी यम्दरको नाराम यांध दिया जावे ॥ १॥ यह योग मलक रोकनवाला होता है ॥ ७२ ॥ कृष्णपक्षको चतुर्दशा, हाथयारस मारी हुई कपिला गायके पित्तसे, अमलतासशी लफपीसे यनी हुई शत्रुकी प्रतिमाको भांजे । अर्थात् उस प्रतिमाकी आंखमें, उस पित्तको अंजनकी तरह लगाव ॥ ७३ ॥ शत्रुको अन्धा बना देन लिय यह योग है, अपोम् एसा करनसे शत्रु अन्धा हो जाता है ॥ ४॥ चतुर्नक्तोपयासी कृष्णचतुर्दश्यां पलिं कृत्वा शूलपोतस्य पुरुषस्यास्थ्ना कोलकान्कारयेत् ॥ ७५ ॥ एतेपामेकः पूरीपे मूत्रे वा निखात आनाहं करोति ॥ ७६ ॥ पादे ऽस्यासने वा निखातः शोपेण मारयति ॥ ७७ ॥ आपणे क्षेत्रे गृहे या वृत्ति- च्छेदं करोति ॥७८॥ एतेन कल्पेन विद्युग्धस्व वृक्षस्य कीलका व्याख्याताः॥ ७९ ॥ चार रानिपर्यन्त उपयाह-पूर्वक रहता हुआ पुरुष, कृष्णपक्षको चतु. दशीमें विधिपूर्वक पलि देकर, शूलपोत पुरषको हट्ठोसे पहुतसी कीलें बनवाये ॥ ५॥ इनमें एक कील, जिसके पासाने या पेशाध, गाड़ देता है, उसी का पालामा बन्द हो जाता है ॥ ७६ ॥ यदि किसीके पैर अथवा आसनमें इस कोरको गाई देता है, तो वह पुरुष सूत २ कर मर जाता है ॥ ७॥ जिसकी दूकान खेन या घरमें यह कील गाड़ दी जाती है, उसकी भाजीविका को मर कर देती है ॥ ७en इसीप्रकार विजलीसे जले हुए पक्षकी मनाई दुकीलका भी व्याख्यान समत लेना चाहिये ॥ ७९ ॥ पुनर्नवमवाचीनं निम्बा काकमधुथ यः । कपिरोम मनुप्यास्थि यध्या मृतकवाससा ॥ ८० ॥ निसन्येत गृहे यस पिष्टा वा गं प्रपाययेत् । ... सपुत्रदार सधनत्रीपक्षालातिवर्तते ।। ८१ ।। :
३ अध्या औपनिषदिक दविखनकी ओर होनेवाला पुनर्नवा ( इसी नामसे प्रसिद्ध एक यूटी) और जिसका फल को के लिए बहुत मीठा लगनेवाला हो, ऐसा नीम ( 'काकमधु' के स्थान पर कहीं २ 'काममधु' भी पाठ है), पन्दरके बाल और मनुष्यकी हड्डो; इन सब चीजोंको, मृतक पुरुपके कपडेमे यांधकर; ॥ ८० ॥ जिसके घरमें गाड़ दिया जाता है, अथवा जिसको पीसकर पिला दिया जाता है, ( 'प्रपाययेत्' की जगह किसी पुस्तकमे 'पदं नयेत्' भी पाठ है ) तो या पुरुष, अपने पुत्र थी और धनके सहित, तीन पक्ष अर्थात् डेढ़ महीना समयको भी पार नहीं कर सकता । तात्पर्य यह है, कि इतने समयके अन्दर २, वह अपने पुत्र स्त्री और धन सहित नष्ट हो जाता है ॥ ८॥ पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः । स्वयंगुप्ता मनुष्यास्थि पदे यस्य निखन्यते ।। ८२ द्वारे गृहस्य सेनाया ग्रामस्य नगरस्य वा । सपुत्रदारः सधनस्वीपक्षान्नातिवर्तते ।। ८३ ॥ दक्खिनकी ओर होनेवाला पुनर्नया, काकमधु, नीम, धमासा ( स्वयं गुप्ता करछुरा, हिन्दी नाम धमासा है), ओर मनुष्की हड्डी, इन सब चीजों को जिसके स्थानपर गाद दिया जाता है ॥ ८२ ॥ अथवा जिस किती घर, सेना, गांव या नगरके दरवाजेपर गाड दिया जाता है,वहांका निवासी पुरुष अपने पुत्र स्त्री और धनके सहित डेढ महीनेके अन्दर २ अवश्य नष्ट होजाता ॥ - है ॥ ८३॥ अजमर्कटरोमाणि मारिनकुलस्य च । बाह्मणानां श्वपाकानां काकोलूकस्य चाहरेत् ॥ ८४ ॥ एतेन विष्ठावक्षुण्णा सघ उत्सादकारिका । यकरा, यदर, बिलाव, नेवला, ब्राह्मण, चाण्डाल, कौआ और उल्लू, इन सय प्राणियोंके रोम अर्थात् पालोंको इकट्ठा करे ॥ ८४ ॥ फिर जिप पुरुषको मारगा हो, उसकी रिष्ठाको, इन सब पालों साय पोस लिया जाये, उस पिसी हुई चीजको यो कराते ही वह पुरुष तरकाल मर जाता है। प्रेतनिर्मालिकाकिण्यं रोमाणि नकुलस्य च ।। ८५ ।। पृश्चिकाल्यहिकृत्तिश्च पदे यस्य निखन्यते । भवत्यपुरुषः सद्यो यावत्तनापनीयते ।। ८६ ।। गुर्देपर दाली हुई माला, सुरायीन, और नेवलेके पाल ॥ ८५ ॥ .
[१४ अधि० 1 कौटलीय अर्थशास्त्र तथा बिच्छू, भोरा और सांप, इन तीनों जानवरोंकी बाल, इन सय चीजोंको मिलाकर जिसके स्थानपर गाड़ दिया जाता है, वह पुरष तरकालही अपुरुप हो जाता है, जबतक कि उन गादी हुई चीजोंको वहांसे हटाया न जाये। ( अपुरप दोनेका तात्पर्य यही मालूम होता है, कि वह अपने आपको पुरपसम्बन्धी कार्योंके करने में असमर्थ समझने लगता है) ॥ ६ ॥ विरात्रोपोषितः पुप्येण शस्त्रहतस्य शूलपोतस्य वा पुंसः शिरकपाले मृत्तिकायां गुञ्जा आवास्योदकेन च सेचयेत् ।।८७।। जातानाममावास्यायां पौर्णमास्यां या पुष्पयोगिन्यां गुजायल्ली- ग्राहयित्वा मण्डलिकानि कारयेत् ।। ८८ ॥ तेप्पम्नपानभाजनानि न्यस्तानि न क्षीयन्ते ॥ ८९ ।। तीन राघि पर्यन्त उपवास पूर्वक रहता हुआ पुरुष, पुष्य नक्षत्र से युक्त समयमें, हथियार स मारे हुए अथवा शूलपोत पुरप की खोपड़ी में मट्टी भरकर, उसमे गुजा (चौटली-रची ) योदेवे, और उन्हें जलसे परामर सींचता रहे ॥ ८७ ॥ जब वह उत्पा होगा तब पुष्य नक्षत्र से युक्त अमावस्या अथवा पौर्णमासी में गुजा को उन बेरों को उखड़वाकर, उनके द्वारा चारों और गोल घेरे बनवावे ॥ ८८ ॥ उन घेरों के बीचमें सस हुए, खाने पीनेके पात्र, क्षीणताको प्राप्त नहीं होते ॥ ८९ ॥ रात्रिप्रेक्षायां प्रवृत्तायां प्रदीपाग्निषु मृतधेनोः स्तनानुत्कृत्य दाहयेत् ॥ ९० ॥ दग्धान्पमत्रेण पेपयित्वा नवकुम्भमन्तर्ले- पयेत् ॥ ९१ ॥ तं ग्राममपमन्यं परिणीय यत्नत्र न्यस्तं नवनी- तमेपां तत्सर्वमागच्छतीति ॥ ९२ ॥ रातको तमाशा होने के समयमै, प्रदीप की आगो पर, मरी हुई गाय के थनों को काटकर जलावे ॥ ९० ॥ जले हुए अर्थात् भुने हुए उन धनों को, बैल के पेशाबके साथ पीसकर, एक नये घटेके भीतर चारों ओर लीप देवे ॥ ९ ॥ उस घड़े को बाई भोर से उस गांव की परिक्रमा कराके जहा रस देता है। प्रामीण पुरषों का सब मक्खन, वहीं पर ( अथात् उस घढे में) भाजाता है (')" ९२ ॥ कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां शुनो लग्नकस्य योनौ काला- यसी मुद्रिका प्रेपयेत् ॥९३॥ तां स्वयं पतितां गृह्णीयात् ॥१४॥ तया वृक्षफलान्याकारितान्यागच्छन्ति ।। ९५ ।।
अध्याj औपनिपदिक (६१७) पुष्य नक्षत्र से युफ, कृष्णपक्ष की चतुर्दशीमें, कामासक्तं कुत्तो की योनि में (सूत्र में 'शुनः' शब्न पुगि निर्देश किया गया है, परन्तु योनि शब्दके निर्देश से यहां लिंगकी अविवक्षा ही समझनी चाहिये), लोहे की बनी हुई एक मुद्रिका (अंगूठी सी) लगा देवे ॥ ९३ ॥ जब वह अपने आप वहां से निकलकर गिर पड़े, तो उसे लेलेवे ॥ ९॥ उसके द्वारा वृक्षाके फल, बुलाए जानेपर, आजाते है।९५॥ मन्त्रीपज्यसंयुक्ता योगा मायाकृताश्च ये । उपहन्यादमित्रांस्तैः स्वजनं चामिपालयेत् ॥ ९६ ॥ इत्योपनिषदिके चतुर्दशे ऽधिकरणे प्रलम्भने भैपज्यमन्त्रयोगः तृतीयो ऽध्यायः ॥ ३॥ आदितो ऽgचत्वारिंशग्छतः ॥ १४ ॥ मन्त्र और भोपधियों से युक्त, जिन योगों का निरूपण किया गया है, और मायासे युक्त जिन योगोंका निरूपण किया गया है; (भपने भंगारों के देर पर चलना; इत्यादि प्रयोगोंको ही मायाकृत योग समझना चाहिये)। उन सय योगों से शभुका नाश करे, भौर स्वजनों की परिपालना को॥ १६ ॥ औपनिषदिक चतुर्दश अधिकरणमें तीसरा अध्याय समाप्त ॥ .. शारीर को जलाना, चौथा अध्याय। १७६ प्रकरण शत्रके द्वारा अपनी सेनापर कियेगये घातक प्रयोगों का प्रतीकार । 'शत्रुका नाश करने के लिये जिन उपायों को पीछे पताया गया है यदि शत्रुही, विजिगीपुके नाशके लिये उन उपायों का प्रयोग करने लगे, तब ऐसी अवस्थामै विजिगीपुको उनका क्या प्रतीका करना चाहिये। इन्हीं सर यातों का इस प्रकरण में निरूप किया जायगा। खपक्षे परप्रयुक्तानां पिचिपगराणां प्रतीकारे श्लेष्मातका पित्वदन्तिदन्तशठगोजीशिरीपपाटायलास्योनाकपुनर्नवायेवा-
[१४ अधिक
(६१८)
कौटलीय अर्थशास्त्र
वरणकाथयुक्तं चन्दनसालाकीलोहितयुक्तं तेजमोदक राजोप-
मोग्यानां गुहाप्रक्षालनं स्त्रीणां सेनायाश्च विपातीकारः ॥१॥
शत्रुके द्वारा प्रयुक्त किये गये, जलादि दूपक तथा विष भादि प्रयोगों
का अपने पक्षमे प्रतीकार करने की अभिलापा होने पर विपके प्रतीकारके
लिये निम्नलिसित तेजनोदक का उपयोग करे । यह इसप्रकार बनाना
चाहिये:-हसोड़ा, कैथ, जमालगोटा, अभीरी नीयू, गोभी, सिरस, काली
पांढरी या पाटल, खौटी, सोनापाठा, पुनर्नवा, शराब और घरमा नामक घृक्ष,
इन सब चीजों का क्याथ बनाया जाये, और चन्दन तथा शालाकी (इस
पादके तीन अर्थ हैं, बन्दरी, गीदड़ी और कुत्ती; इन तीनों में से किसी एक
का खून लेना चाहिये) का खून एक जगह मिलाकर रखा साये उस क्वाथ
और इस रक्तसे मिला हुआ तेजनोदक (रोगन, यांस को कहते हैं, उसके
पानीमें इन सम चीजोंको हल करमा होता है, इसी को यह रोगनोदक
कहाता है), राजाके उपभोगमें आने वाली रिनपोंके गुह्यस्थानों को साफ
करने वाला, तथा सेना सम्बन्धी अर्थात् सेनामें प्रयुक्त किये हुए विपका
प्रतीकार करने वाला होता है ॥१॥
पृपतनकुलनीलकण्ठगोधापित्तयुक्तं मपीराजियूर्ण सिन्दुवा-
रितवरणवारुणीतण्डुलीयकशतपर्वाग्रपिण्डीतकयोगो मदनदोपहरः
॥२॥ सृगालविनामदनसिन्दुवारितवरणवारणवल्लीमूलकपाया-
णामन्यतमस्य समस्तानी या क्षारयुक्तं पानं मदनदोपहरम् ॥३॥
चीतल एक प्रकारका मृग,जिसके ऊपर दागसे होते हैं), नेवला,मोर और
गोह, इन सय जानवरोंके पित्तासे युक्त, काले संभालू भौर राईका पूर्ण ;
उन्मादक द्रव्यों से उत्पन्न होनेवाले होपोंको अपहरण करनेवाला होता है।
राथा संभालू, बरना, दूबधास, चौलाई, यांसका अप्रभाग और मैमफल, इन
सब पीजोंका योग भी उन्मादकद्रग्यजन्थ दोर्पाका अपहरण करनेवाला होता
है ॥२॥ मुगालविता (एक भौषधिका नाम है), धतूरा, संभाल, वरना,
और गजपीपल, इन पांचों चीजोंकी अदाको मिलाकर, या पृथक् २ एक २
काही कादा, दूधके साथ पीलेनेसे, उन्मादकद्रव्यजन्य दोषोंका अपहरण
करनेवाला होता है ॥३॥
कैडर्यपूतितिलतलमुन्मादहरं नस्तःकर्म ॥ ४ ॥ प्रियङ्गुन-
क्तमालयोगः कुष्टहरः ॥५।। कुष्ठलोध्रयोगः पाकशोपन्नः ॥६॥
कफलद्रवन्तीचिलङ्गचूर्ण नस्तःकर्म शिरोरोगहरम् ॥७॥
किया
४ अध्या०]
औपनिषदिक
(६१९)
कायफल,कांटेदार करंजुआ और तिल इन चीजोंका तैल,नासिकाके द्वारा
उपयुक्त किया.हुआ, उन्माद अर्थात् चित्तविभ्रमको हरण करनेवाला होता है।
॥ ४ ॥ प्रियगु (मंहदी या कांगनी) क्षौर नक्तमाल (करंजुआ), इन दोनोंका
योग कुष्टको नष्ट करने वाला होता है ॥ ५॥ फूट भौर लोध, इन दोनोंका
योग, पाक (पकना, पाल आदिका सफेद होजाना) तथा शोप (क्षयरोग) का
नष्ट करनेवाला होता है ॥६॥ कायफल, द्रवन्ती (भूषापर्णी नामकी एक
चूंटी), और वायविंडग, इन तीनों चीजोंका चूर्ण, नासिकाके द्वारा उपयुक्त
हुआ,
सिरके रोगोंको नष्ट करनेवाला होता है ॥ ७ ॥
प्रियङ्गुमञ्जिष्ठतगरलाक्षारसमधुकहरिद्राक्षौद्रयोगो रज्जूद-
कविपपहारपतननिःसंज्ञानां पुन: प्रत्यानयनाय ॥ ८॥ मनु-
ष्याणामक्षमात्रं गवाश्वानां द्विगुणं चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् ॥९॥
मेंहदी या कांगनी,मंजीठ,तगर,लाक्षा,(लाख),महुआ,हलदी, और शहद,
इन सब चीजोंका योग । रस्सी, दूपितजल, विष, महार, तथा ऊपरसे गिरमे
के कारण बेहोश हुए २ पुरुपाको फिर होश में लानेके लिये, अत्यन्त उपयुक्त
होता है ॥ ॥ प्रतीकारके लिये दी जानेवाली ओपधियोंकी मात्रा, मनुष्यके
लिये केवल एक अक्ष (सोलह मापकका एक अक्ष होता है । मापक तोलके
लिये, देखो-अधि० २, अध्या. १९) होनी चाहिये । गाय और घोड़ों के
लिगे मनुष्यसे दुगनी, तथा हाथी और अटों के लिये चौगुनी होनी चाहिये ॥९॥
रुक्मगर्मचैपां मणिः सर्वविपहरः ॥ १० ॥ जीवन्तीश्वेतामु-
ष्ककपुष्पवन्दाकानामक्षीचे जातस्याश्वत्थस्य मणिः सर्वविपहरा
॥११॥
भाठवें सूयमें येहोशीको दूर करनेवाला जो योग यताया गया है,
उसको यदि सोनेके पत्तरके सोचमें रखकर तावीज बना लियाजाय, तो उस
तापीजको धारण करनेसे सब तरह के विका प्रतीकार होता है॥१॥
गुइची (गिलोय ), सफेद संमलू या चौरयेल, काली पांढरी, पुष्प (भीषधि
विशेष ), और भमरपेल, इन सब चीजोंका तापीज ( =मणि ); अथवा सह-
जने या मोमके पर पैदा हुए २ पीपलका तापोज, सव साहक विपाको
अपहरण करनेवाला होता है।
तूर्याणां तैः प्रलिप्तानां शब्दो विपविनाशनः ।
लिप्तमजं पताका वा रष्ट्रा भवति निर्विपः ॥ १२ ॥
[१४ अधिक (१२०) कौटलीय अर्थशास्त्र एतैः कृत्वा प्रतीकारं स्वसेन्यानामथात्मनः । आमित्रेषु प्रयुञ्जीत विपधूमाम्युपणान् ॥ १३ ॥ इसौपनिषदिके चतुर्दशे ऽधिकरणे स्वपलोपयातप्रतीकारः चतुर्थोऽध्यायः ॥५॥ भादित एकोनपज्ञाशच्छतः ॥ १४९ ॥ एतावता कौटलीयस्यार्थशाखस्यो. पनिषदिकं चतुर्दशमधिकरणं समाप्तम् ॥ १४ ॥ जीवन्ती ( गिलोय) आदि औषधियोंसे पोते हुए (लिबढे हुए) बाजों का शब्द विपको नष्ट करने वाला होता है । इसीप्रकार इन औषधियों सेलित शिखरपाली झंडीको देखकर भी विषका प्रभाव महीं रहता ॥ १२ ॥ इन श्रीपधियोंके द्वारा, अपनी सेना और अपने आपकी रक्षा करके, विजिगीषु, शिप धूम और जलदूपों का सदा शत्रुभों में ही प्रयोग करे ॥ १३ ॥ औपनिपदिक चतुर्दश अधिकरणमें चौथा. अध्याय समाप्त ॥ औपनिषदिक चतुर्दश आधिकरण समाप्त ।
तन्त्रयुक्ति पञ्चदशअधिकरण। पहिला अध्याय। १८० प्रकरण। तन्त्रयुक्ति। प्रकृतमें 'तन्न' का अर्थ 'अर्थशास्त्र' है। इस शास्त्रमें भर्धक निर्णय के लिये उपयोगी युक्तियों का, लक्षण और उदाहरण निरूपण, इस प्रकरण में किया जायगा। मनुष्याणां वृत्तिरर्थः ॥१॥ मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः ॥२॥ तस्याः पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ॥३॥ तद्दात्रिंशयुक्तियुक्तम् ॥ ४ ॥ अधिकरणं विधानं योगः पदार्थो हेत्वर्थ उद्देशो निर्देश उपदेशो ऽपदेशो ऽतिदेशः प्रदेश उपमान- मर्थापत्तिः संशयः प्रसङ्गो विपर्ययो वाक्यशेपो ऽनुमतं व्याख्यान निर्वचनं निदर्शनमपवर्गः स्वसंज्ञा पूर्वपक्ष उचरपक्ष एकान्तो जागतावेक्षणमतिक्रान्तावेक्षणं नियोगो विकल्पः समुच्चय ऊस- मिति ॥५॥ मनुप्योंके व्यवहार या जीविकाको 'अर्थ' कहते हैं ॥१॥ मनुष्यों से युक्त भूमिका भी नाम 'अर्थ' है ॥ २ ॥ इस भूमिको प्राप्त करने और रक्षा करने के उपायोंका निरूपण करने याला शास्त्र अर्थशास्त्र' काया है ॥३॥ यह यत्तीस प्रकारकी युक्तियों से युक्त है। ये पुलिया ये हैं। अधिकरण, पिधान, योग, पदार्थ, हेयर्थ, उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, भातेदेश, प्रदेश, उपमान, भयोपत्ति. संशय, संग, विपर्यप, यापशेष, मनुमत, ग्यारयान, निर्यपन, निदर्शन, भपयर्ग, स्वसंज्ञा, पूर्वपक्ष, चरपक्ष, एकान्त, भनागसापेक्षण, अतिवान्तापेक्षण, नियोग, विकल्प, समध्यप, भौर उम्म॥५॥ - ६२२) कौटलीय अर्थशास्त्र [१५याधि० यमर्थमधिकृत्योच्यते तदाधिकरणम् ॥ ६ ॥ पृथिव्या लामे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि तूर्वाचार्यः प्रस्तावितानि प्रायजस्ता- नि संहृत्यैकभिदमर्थशास्त्रं कृतमिति ॥ ७॥ जिस अर्थका अधिकार करके कपन किया जाय, असे अधिकरण ॥ ६ ॥ जैसे सबसे पहिले सूत्र में पृथिवीके लाम का कयन करके, सम्पूर्ण शास्त्रको एक अधिकरण पाया गया है। इसीप्रकार प्रधानतया उन २ भयों का निरूपण करने से, विनयाधिकारिक, अध्यक्षप्रचार आदि अधिकरण हैं । इस सूबका अर्थ देखने के लिये, देखो, अधि० १, अध्या.., सूत्र. १॥ (आगे सब युक्तियों के लक्षणों के साथ २ उदाहरण बताने के लिपे, हम केवल उन २ स्थलोंका पता लिखते जायेंगे, पाठक, उनको यहीं से देख लैवें ॥७॥ शास्त्रस्य प्रकरणानुपूर्वी विधानम् ॥ ८॥ विद्यासमुद्देशो वृद्धसंयोग इन्द्रियजयो अमात्योत्पत्तिरित्येवमादिकमिति ॥९॥ प्रकरणानुसार शास्त्र की आनुपूर्वी का कयन करना 'विधान' कहाता है॥८॥ देखो---अधि., अध्या. १, सू. ३-६॥९॥ वाक्ययोजना योगः ॥ १० ॥ चतुर्वर्णाश्रमो लोक इति . पाक्यों का योजनाको 'योग' कहते हैं ॥१०॥ देखो-भधि.., अध्या.सू.१९ ॥११॥ पदावधिकः पदार्थः ॥ १२ ॥ 'मूलहर' इति पदम् ॥१३॥ यः पितृपैतामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहर इत्यर्थ ॥१४॥ केवल पदके अर्थको पदार्थ' कहते हैं ॥ २ ॥ जैसे मूलइर' या एक पद है। इसका अर्थ, 'पदार्थ' होगा; इसके जानने के लिये, देखो- अधि. २, अभ्या. ९, स्. २४ ॥1॥ हेतुरर्थसाधको हेत्वर्थः ।। १५ ।। अर्थमूलौ हि धर्मकामा- विति ॥ १६ ॥ अर्थको सिद्ध करने वाला हेतु ही हेत्वयं' कहाता है ॥१५॥ देखो भधि, अपा. ७, सू." ॥१६॥ समासवाक्यमुद्देशः ॥ १७॥ विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजय इति ॥१८॥ .
१ अध्या०] तन्त्रयुक्ति (६२३) संक्षिप्त वाक्य का कहना 'उद्देश' कहा जाता है ॥७॥ देखो- अधि., अध्या. ६, सू. १ ॥१८॥ व्यासवाक्यं निर्देशः ॥ १९ ॥ कर्ण त्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रि- याणां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धेप्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजय इति ॥२०॥ विस्तृत वास्यका कथन करना निर्देश' कहाता है ॥ १९ ॥ देखो- अधि., मध्या. ६, सू. २ ॥२०॥ एवं वर्तितव्यमित्युपदेशः ॥ २१ ॥ धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत न निःसुखः स्यादिति ॥ २२ ॥ 'इस प्रकार वर्तना चाहिये' ऐसे कथनको 'उपदेश' कहते हैं ॥२१॥ देखो-अधि. 1, अध्या. ७, सू०६.७ ॥ २२ ॥ एवमसावाहेत्यपदेशः ॥२३॥ मन्त्रिपरिपदं द्वादशामात्या- न्कुर्वीतेति मानवाः ॥ २४ ॥ पोडशेति बार्हस्पत्याः ॥ २५॥ विंशतिमित्यौशनसाः ॥ २६ ॥ यथासामर्थ्यमिति कौटल्य इति ॥२७॥ अमुक पुरुपने इस विषयमें यह कहा है' ऐसा कथन करना 'अपदेश' कहाता है ।, २३ ।। देखो-अधि. १, अध्या. १५, सू. ५२-५५ 1 ॥२४-२७॥ उक्तेन साधनमतिदेशः ।। २८ ॥ दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातमिति ॥ २९॥ कही हुई बातसे न कही हुई पातको भी सिद्ध करदेना "भतिदेश' फहाता है ॥२८॥ देखो-अधि. ३, अध्या. १६, सू. . ॥ २५ ॥ वक्तव्येन साधनं प्रदेशः ॥ ३०॥ सामदानभेददण्डी यथापत्सु च्याख्यास्याम इति ॥३१॥ आगे कही जामवाली पातसे, न कही गई यातको सिद्ध करना 'प्रदेश' कहाता है ॥ ३० ॥ देसो-अधि. , अभ्या. १४, सू २४ ॥३॥ दृष्टेनादृष्टस्य साधनमुपमानम्॥ ३२ ॥ निवृत्तपरिहारान्पि- तेवानुगृहीयादिति ।। ३३ ।।
[ १५ अधिक
.
((६२४) कौटलीय अर्थशास्त्र
देखी हुई वस्तुसे, न देखी हुई यस्तुको सिद्ध करना 'अपमान'
कहाता है ॥ ३२ ॥ देखो-अधि. २, अध्या. ., सू. २० ॥ ३३ ॥
. यदनुक्तमर्यादापद्यते सार्थापत्तिः ॥ ३४ ॥ लोकयात्रावि-
'द्राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसंपने प्रियहितद्वारेणाथयेत ॥३५॥नानि-
यहितद्वारेणाश्रयतेत्यर्थादापन्नं भवतीति ॥ ३६ ॥
न कहीं हुई बात, जो भसे आपरा (प्राप्त) होजाय, उसे 'भापति'
कहते हैं ॥ ३४ । देखो-अधि. ५, अध्या. . . . ॥३५॥ अधार
भप्रिय और महित पुरपके द्वारा, राजाका आश्रय न लेवे, यह वहां अर्धापत्ति
से जाना जाता है ॥३६॥
उभयतोहेतुमानर्थः संशयः । ३७ ॥ क्षीणलुब्धप्रकृतिमप-
चरितप्रकृतिं वेति ॥ ३८ ॥
किपी अर्धमें रेनों (विरुद्ध पक्षके हेतुओका होना 'संशय' कहाता
है॥३७ ॥ देखो-अधि. ७, अपा. ५, सू. १८ ॥ ३८॥
प्रकरणान्तरेण समानो ऽर्थः प्रसङ्गः ।। ३९ ॥ कृषिकर्मम-
दिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेणेति ॥ ४० ॥
दूसरे प्रकरणके साथ अर्थकी समानता होना 'प्रसा' कहाता है
॥३९ ।। देखो-अधि. 1, अध्या. ११, सू. १३ ॥३०॥
प्रतिलोमेन साधनं विपर्ययः ॥ ४१ ॥ विपरीतमतुष्टस्येति
॥४२॥
कही हुई पातके वैपरीत्यसै किसी वस्तुका निर्देश करना 'विपर्यय'
कहाता है ॥ ४॥ ॥ देखो-अधि. 1, भाया. १६, सू. १४ ॥ ४२ ॥
येन बाक्यं समाप्यते स वाक्यशेपः ॥४३॥ छिन्नपक्ष-
स्येव राज्ञश्चेष्टानाशश्चेति ॥४४॥ तत्र शकुनेरिति वाक्यशेपः
॥४५॥
जिसके द्वारा वाक्यकी समाप्ति हो, वह 'वाक्यशेष कहाता है ॥ १३ ॥
देखो-भधि. ८, अध्या. 1, सू. ९ ॥ ४४ ॥ वहार सामध्यसे मात (=भ-
थाहत) 'शकुनि' पद वाक्योप है ॥ ५५॥
परवाक्यमप्रतिपिद्धमनुमतम् ।। ४६ ।। पक्षाघुरस्य प्रतिग्रह
इत्यौशनसो व्यूहविभाग इति ॥ ४७ ॥
देखो-अधि १०, , . ॥ ४५-५०॥ अध्या तन्त्रयुक्ति (६२५) पारोध न किया हुआ दूसरेका वाक्य 'अनुमत' कहाता है ॥ ४ ॥ भया , सू ॥४७॥ आतिशयवर्णना व्याख्यानम् ॥ १८॥ विशेषतच संघानां संघधर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमिचो भेदः ॥ ४ ॥ तनि- मिनो बिनाश इत्यसत्पारग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्ब- ल्यादिति ॥ ५॥ सिद्ध किये हुए अर्थका, भत्यधिक युक्तियोंसे विस्तारपूर्वक समर्थन करना 'व्याख्यान' कहाँता है ॥ १८॥ देखो-अधि ८, मध्या'५, सू ६८,१९ गुणतः शब्दनिष्पत्तिनिर्वचनम् ।। ५१॥ व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनमिति ।। ५२ ॥ गुणके द्वारा (अर्थान्वयपूर्वक) किसी शब्दकी सिदि करना "निर्वचन' कहाता है ॥५१॥ देखो-अधि ८, अभ्या ,सू ४ ॥ ५२ ॥ " दृष्टान्तो दृष्टान्तयुक्तो निदर्शनम् ॥ ५३॥ विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युतीति ॥५४॥ दृष्टान्त सहित टान्तका निर्देश करना 'निदर्शन' कहाता है ॥५३॥ देखो-अधि. अभ्या ३, सू ४ ॥ ५५ ॥ 'अभिप्तव्यपकर्पणमपवर्ग ॥५५॥ नित्यमासनमरिवलं चासयेदन्यवाभ्यन्तरकोपशङ्काया इति ॥ ५६ ।। किती विधिको सामान्यतया व्यापक रूपसे कहते १, उसके विषयका सकोप करदेना अपवर्ग' कहाता है ॥ ५५ ॥ देखो-अधि १,'अध्या २, गू परैरसंज्ञितः शब्दः स्वसंज्ञा ॥ ५७॥ प्रथमा प्रकृविस्तस्य अम्यन्तरा द्वितीया भूम्येकान्तरा वतीयति ॥ ५८ सात सकेत न कियाहुभा शब्द, स्पसही ' कहाता है । ५७ ॥ देखो-मधि , भष्पा २, स् प्रतिपद्धव्यं पाक्यं पूर्वपक्षः ॥ ५९॥ साम्यमात्यव्यसन- योरमात्यन्यसनं गरीय इति ॥ ६॥ माधि किया जागेषाला पाय 'पूर्वपक्ष' कहाता है । ५९ ॥ देखो- भधि पासू...॥ ३ ॥५८ [१५ मधिल (६६ फौटलीय अर्थशास्त्र तस्य निर्णयनवाक्यमुत्तरपक्षः ॥६१।। तदायत्तत्त्वात् ॥६२।। तत्कूटस्थानीयो हि स्वामीति ॥ ६३॥ उस पूर्वपक्षका निर्णय करनेवाला वाक्य 'उत्तरपक्ष' कहाता है nan देखो-अधि.८, अध्या. 1, सू, १८ ॥ १२ ॥-॥ ६३ ॥ सर्वत्रायत्तमेकान्तः ॥६४॥ तसादुत्थानमात्मनः कुर्वीतेति जो भयं किसी देश या कालमें न छोटा जासके, उसे 'एकान्त' कहते है ॥ १४॥ देखो-अधि. ., मध्या. १९, सू. ५॥६५॥ पश्चादेवं विहितमित्यनागतावेक्षणम् ॥६६॥ तुलाप्रतिमानं पौतवाध्यक्षे वक्ष्याम इति ॥ ६७ ।। 'पारसे इसप्रकारका विधान किया जायगा' ऐसा कयन करना 'भना. गतावेक्षण' कहाता है ॥ ६६ ॥ देखो-अधि. २, अध्या. १३, सू. ३. ॥२०॥ पुरस्तादेवं विहितमित्यतिक्रान्तावेक्षणम् ॥ ६८ ॥ अमात्य- संपदुक्ता पुरस्तादिति ॥ ६९ ॥ 'इस पातका पहिले निरूपण करदिया गया है ऐसा कपन करना अतिक्रान्तापेक्षण' फहाता है ॥६०n देखो-मधि. ६, मध्या. १, सू. ॥१९॥ एवं नान्यथेति नियोगः ।। ७० ॥ तस्माद्धर्ममर्थ चास्योप- दिशेनाधर्ममनर्थ चेति ॥ ७१ ॥ 'अमुक कार्य इसीतरह करना चाहिये, अन्यथा नहीं' ऐसा कथन करना 'नियोग' कहाता है ॥४०॥ देखो-अधि. 1, अध्या. १७, सू. ३५010 अनेन चानेन चेति विकल्पः ॥ ७२ ॥ दुहितरो वा घर्मि- ठेषु विवाहेपु जाता इति ॥ ७३ ।। 'अमुक कार्य इससरह किया जासकता है, अथवा इसतरह' ऐसा कीन करना 'विकल्प' कहाता है ।। ७२ ॥ देखो-अधि, ३, अध्या. ५, ए. ९॥१॥ अनेन चानेन चेति समुच्चयः ॥७४ ।। स्वस (य) जाता पिबन्धूनां च दायाद इति ।। ७५ ।। 'भमुक कार्य इसतरह भी होसकता है, और इसतरह मी' ऐसा कथन- करना 'समुच्चय' कहाता है ४॥ देखो-अधि. ३, मध्या. ७ सू. ५॥७r . - १अध्या० तन्त्रयुक्ति (६२७) अनुक्तकरणमूहम् ॥ ७६ ॥ यथावदाता प्रतिगृहीता च नोपहतौ स्यातां तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुरिति ।। ७७ ॥ न कहीहुई पातका करलेना 'जय' कहावा है ॥ ७६ ॥ देखो-अधि. एवं शाखमिदं युक्तमताभिस्तन्नयुक्तिभिः । अवासौ पालने चोक्तं लोकसास्य परस्य च ॥ ७८ ॥ धर्ममर्थ च कामं च प्रवर्तयति पाति च । अधर्मानर्थविद्वेपानिदं शास्त्रं निहन्ति च ॥ ७९ ॥ येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भू।। अमर्षणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम् ।। ८० ।। इति सन्नयुक्तौ पञ्चदशेऽधिकरणे वन्प्रयुक्तयः प्रथमो ऽध्यायः ॥३॥ मादितः पाशततमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ एतापता कौटलीयस्यार्थशास्त्रस्य तन्नयुक्तिः पञ्चदशम- धिकरणं समाप्तम् ॥ १५॥ इसप्रकार यह मान, इन तात्रयुक्तिोसे युक्त है । इस कोक और परलोककी प्राप्ति सथा रक्षा करने में यही शास्त्र साधन प्रताया गया है ॥७॥ क्योंकि यह अर्थशाख, धर्म अर्थ और कामको प्रवृत करता है, तथा उनकी रक्षा करता है। और अर्यके साथ विरोध रखनेवाले अधौंको नष्ट करता है ॥ ७९ ॥ जिसने शाख, शख और नन्दराज्ञाके अधीन हुई २ भूमिका क्रोध कारण पहुरा जल्दी उद्धार करदियाउसी विष्णुगुम कौटल्यने इस शास्त्रको मनाया है। तन्त्रयुक्ति पञ्चदर्श अधिकरपा पहिला अध्याय समाप्त । तन्त्रयुक्ति पञ्चदश अधिकरण समाप्त दृष्ट्वा विप्रतिपत्ति बहुधा शास्त्रेषु भाष्यकाराणाम् । खयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ॥ कौटलीय अर्थशास्त्र समाप्त .
No text on this page.
चाणक्य प्रणीत सूत्र सुखस्य मूलं धर्मः ॥ १॥ धर्मस्य मूलमर्थः ॥ २॥ अर्थस्य मूलं राज्यम् ॥३॥ राज्यमूलमिन्द्रियजयः ॥४॥ इन्द्रियजयस्य मूलं नियः ॥ ५॥ विनयस्य मूल वृद्धोपसेवा ॥ ६ ॥ वृद्धसेवाया विज्ञानम् ॥ ७॥ विज्ञानेनात्मानं संपादयेत् ॥८॥ संपादितात्मा जितात्मा भवति ॥ ९॥ जितात्मा सेयो. थै ससंयुज्येत ॥ १० ॥ अर्थसंपत्प्रकृतिसंपदं करोति ॥ ११ ॥ प्रकृतिसंपदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते ।। १२ । प्रकृतिकोप- सर्वकोपेभ्योः गरीयान् ॥ १३ ॥ सुखका मूल (कारण) धर्म है ॥ ॥ धर्मका मूल, मध हे ॥२॥ मर्थका मूल राज्य है ॥ ३ ॥ इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनादी राज्यका मूल है ॥ ४ ॥ इन्द्रियों के विजयका मूल, विनय हे ॥ ५॥ पृद्धोंकी सेवा करना, धिनयका मूल है॥६॥ वृद्धोंकी सेवाका मूल, विज्ञान हे ॥ ॥ इसलिये पुरुप, विज्ञामसे अपने लापको सपन यनावे ॥८॥ जो पुरुष विज्ञानसे सस होता है, वह अपने ऊपर काबू पासकता है ॥९॥ अपन ऊपर काबू रखनेवाला पुरुष, सब अाले सयुक्त हाजाता है ... ॥ अर्धसम्पत्ति, प्रकृतिसम्मति (अमात्य, सेना, मित्र आदि सम्मति) को नपा करनेवाली होती है ॥ ११॥ प्रकृतिसपत्तिके द्वारा, नेतारहित राज्यका भी सचालन किया जासकया है ॥ १२ ॥ प्रकृतिकोप, सव कोसैसे बलवान होता है ॥१३॥ पिनीतस्वामिलाभादस्वामिलामः श्रेयान् ।।१४संपाद्या- त्मानमन्विच्छेत्सहायवान् ॥ १५॥ नासहायस्य मन्त्रनिश्चयः ।।१६।। नैक चक्र परिभ्रमयति ॥२७॥ सहायस्समसुखदुःखः ॥१८॥ विनयहीन स्वामीके लाभसे, स्वामीका लाम न होनाही असा ॥१४॥ अपने मापको शक्तिपपत्र बनाकर, फिर सहायकों की इच्छा करे (६३०) कौटलीय अर्थशास्त्र (स्त्रमें 'सहापवान्' के स्थानपर 'सहायकान्' पाठ संगत मालूम होता है) ॥१५॥ क्योंकि सहायकहीन राजाके मम्म्रका, कभी निश्चय नहीं होसकता ॥१६॥ एक पहिया कमी गाडीको घुमा नहीं सकता ॥ १७ ॥ सहायक पही होता है, जो अपने सुख और दुःखम बरायर साथी रहे ||१८॥ मानी प्रतिमानिनमात्मनि द्वितीय मन्त्रमुत्पादयेत् ॥१९॥ अविनीतं हमात्रेण न मन्त्रे कुर्वीत ॥ २० ॥ श्रुतवन्तमुपधाशु. द्धं मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ २१ ॥ मन्त्रमूलास्सारम्भाः ॥ २२ ॥ मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति ।। २३ । मन्त्रविनाची कार्य नाश- यति ।। २४ ॥ प्रमादात् द्विपतां वशमुपयास्यति ॥ २५॥ सर्व- द्वारेम्यो मन्त्रो रक्षितव्यः ॥२६॥ मन्त्रसंपदा राज्यं वर्धते श्रेष्ठतमा मन्त्रगुप्तिमाहुः ॥ २८ ॥ कार्यान्धस्य प्रदीपो मन्त्रः ॥ २९ ॥ मन्त्रचक्षुषा परच्छिद्राण्यवलोकयन्ति ॥ ३० ॥ मानी पुरुष, अपने समान दूसरे मानी पुरुषकोही अपना सलाहकार पनावे ॥ १९॥ विनयहीन पुरुपको, केवल नेहके कारण, कभी मन्त्र (सलाह करने) में सम्मिलित न करे ॥ २० ॥ विद्वान् तथा सब तरहसे परीक्षा किये हुए शुद्ध हृदय पुरुषको, मन्त्री बनावै ॥२१॥ सय कार्य, मन्त्रपरही निर्भर होते हैं ॥ १२॥ मन्त्रकी रक्षा करने में कार्यकी सिद्धि होती है ॥२३॥ मन्त्रको फोट देनेवाला पुरप, कार्यको नष्ट करदेता है ॥ २३ ॥ प्रमादसे शत्रुओंके वशमें चला जाता है ॥ २५॥ इसलिये सब ओरसे, मन्त्रकी अवश्य रक्षा करना चाहिये ॥ २६ ॥ मन्त्रसंपत्तिसे (अर्थात मन्त्रके सुरक्षित रहनेसे) राज्य पढ़ता है ॥ २७ ॥ मन्त्रको गुप्त रखना सबसे श्रेष्ठ बात कही गई है ॥२८॥ कार्यके (कतन्याकर्त्तव्पक) विषयमें अन्धे हुए २ पुरुपके लिये, मन्त्र प्रदीप होता है ॥ २९ ॥ मन्त्ररूपी चक्षुसेही, पुरुप, शत्रुके दोपों को देखपाते हैं ॥३०॥ मन्त्रकाले न मत्सरः कर्तव्यः ॥ ३१ ॥ त्रयाणामेकवाक्ये 'संप्रत्ययः ॥ ३२ ॥ कार्याकार्यतत्त्वार्थदर्शिनो मन्त्रिणः ॥३४॥ पर्णाद्भिद्यते मन्त्रः ॥ ३४॥ मन्त्रक समयमें किसीसे दाह नहीं करनी चाहिये ।।३१ ॥ तीन पुरगोंकी एक सम्मति होनेपाही, किसी भयंका निश्चय किया जासकता है ॥९॥ कार्य और अकार्यके पास्तविक अपंको देखनेवालेही मन्त्री होते हैं कहाता चाणक्य प्रणीत सूत्र ॥ ३३ ॥छ कानोंसे मन्त्र फूट जाता है, अर्थात् छः कानों में जातेही मा, प्रकट होजाता है ॥३४॥ आपत्सु सहसंयुक्त मित्रम् ॥ ३५ ॥ मित्रसंग्रहणे पलं संप- द्यते ।। ३६ ॥ बलवानलब्धलामे प्रयतते ॥ ३७॥ अलन्धला- मो नालसस्य ।। ३८ ॥ अलसस्य लब्धमपि रक्षितुं न शक्यते ॥ ३९ ॥ स चालसस्य रक्षितं विवर्धते ॥ ४० ॥ न भृत्यान् प्रेपयति ॥४१॥ जो पुरुप आपत्तिकालमें भी, स्नेह पूर्वक अपने साथ रहे, यही मित्र ॥ ३५ ॥ मित्रों का संग्रह कर लेने पर अपना बल बढ़ जाता है ॥३६ ॥ बलवान् पुरुप, भप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता है ॥ ३७॥ भालसी पुरुष को कभी अमाप्त वस्तु प्राप्त नहीं होसकती ॥३०॥ भालसी को, अपनी प्रात वस्तु की रक्षा करनी भी अशक्य होजाती है ॥३५॥ भालसी पुरुप का, रक्षित (रक्षा किया हुआ) भी भर्थ कभी वृद्धि को प्राप्त नहीं होता । ( मूल पुस्तक में स चालसस्य' पाठ छपा हुआ है, परन्तु यह पाठ असंगत मालूम होता है; न घालसस्य' पाठ होना चाहिये non वृद्धि को प्राप्त न होनेके कारण ही, आलसी पुरुष अपने भृत्यों तक को भी धन वितरण नहीं कर सकता ॥४॥ अलब्धलाभादिचतुष्टयं राज्यतन्त्रम् ॥ ४२ ॥ राज्यतन्त्रा- यत्तं नीतिशास्त्रम् ॥४३॥ राज्यतन्त्रेष्वायत्तौ तन्त्रावापौ ॥४४॥ तन्त्र स्वविषयकृत्येष्वायत्तम् ॥ ४५ आवापो मण्डलनिविष्टः ॥ ४६॥ सन्धिविग्रहयोनिमण्डला ॥४७॥ सलब्धलाभ आदि चारों वस्तु (अलग्धलाभ, लब्ध परिक्षण, राक्षस विवर्धन, और घर्षित का भृत्यों में वितरण) ही राज्य तन्न हैं, अर्थात् राज्यको परिस्थिति यही है, इन्हींका नाम राज्यसत्ता है ॥ ४२ ॥ राज्य तन्त्र (राज्य- सत्ता या राज्य परिस्थिति) का भाधार, नीति शास्त्र ही होता है ॥ ३ ॥ सन्न और भावाप, राज्यसत्ता के ही अधीन होते हैं ॥ ४४ ॥ अपने देशके कार्यों में ही तन्त्र, भायन है । अर्थात् अपने देशमें, सामदान आदि उपायों का प्रयोग करने में तन्त्र (राज्यकी सत्ता ) का निर्भर है ॥ ४५ ॥ मण्डल (चार प्रकार के राज मण्डल) में निविष्ट (प्रयुक्त प्रयोग किये गये ) साम भादि को ही भावाप कहते हैं ॥५६॥ मण्डल, सन्धि और विमा का कारण राजा, (६३२) कौटलीय अर्थशान होता है। अर्थात् सन्धि और विग्रह का होना, मण्डल (राज समूह) पर ही निर्भर होता है । (सन्धि विग्रह यहां उपलक्षण मात्र हैं, यान, भासन, संलय, द्वैधीभाष, इन शेष चार गुणों का भी ग्रहण करलेना चाहिये) ॥४vil नीतिशास्त्रानुगो राजा ॥४८॥ अनन्तरप्रकृतिश्शत्रुः ॥४॥ एकान्तरितं मित्रमिष्यते ॥५०॥ हेतुतश्शनुमित्रे भविष्यतः॥५१॥ हीयमानस्सन्धि कुर्वीत ॥ ५२ ॥ तेजो हि संधानहेतुस्तदर्थानाम् ॥ ५३ ॥ नातप्तलोहो लोहेन संघीयते ॥ ५४॥ नीति शास्त्रके अनुसार कार्य करने वाला, राजा होता है अर्थात् उसी को कहा जासकता है, जो नीतिशास्त्र के अनुसार कार्य करे ।। ४८ ॥ अपने देशके, साथ लगे हुए (भनन्तर=अव्याह ) देशम राज्य करने वाला राजा, मित्र होता है ॥ ५० ॥ शत्रु और मिय, किसी कारणसे ही बन जाते हैं ॥ ५॥ क्षीण शक्ति होता हुआ पुरुप, सन्धि कर छेवे ॥ ५२ ॥ उन २ अधोंके जोड़ने का कारण, तेज ही होता है।.५३ ॥ बिना तपा हुआ लोहा, लोहेके साथ जुड़ नहीं सकता ॥५५॥ पलवान् हीनेन विगृहीयात् ।।५५।। न ज्यायसा समेन वा '। ५६ ॥ गजपादयुद्धमिव पलवद्विग्रहः । ५७ ॥ आसपात्रमा- मेन सह विनश्यति ॥ ५८ । आरिप्रयलमभिसमीक्षेत ॥.५९ ॥ संघायैफनो वा ॥ ६॥ लवान् राजा, हीन (दुईल) के साथ यिनह (गुदा) कर, देवे॥५५॥ अपने पदे या परापर वालेके साथ कमी अगदा न करे साथ सुडाई करना, हाथी (हाथी सवार) और पद बलवान के होता है । ५७ ॥ कया वर्तन, कच्चे वर्तनकेसाथ भिकर टूट जाताहै, इसलिये परावर घाले के साथ मी लड़ाई नहीं करनी चाहिये ॥ ५८ ॥ शत्रुके प्रथलका सदा, भष्म तरह निरीक्षण करता रहे.॥ ५९॥ अथवा एक ओर से सन्धि करके रहे । अर्थात् भनेक शत्रु होने पर एक शत्रुसे सन्धि कर लेवे ॥६॥ आमित्रविरोधादात्मरक्षामावसेत् ॥ ६१ ॥ शक्तिहीनो पल- .वन्तमाश्रयेत् ॥ १२ ॥ दुर्बलाश्रयो दुःखमावहति ॥ ६३ ।। आमिवद्राजानमाश्रयेत् ॥ ६४ ॥ राज्ञः प्रतिकूलंनाचरेत् ...६५ ॥ - ३ - चाणक्यप्रणीत सूत्र (६३३) उद्धतवेपधरो न भवेत् ॥ ६६ ॥ न देवचरितं चरेत् ॥ ६७ ॥ द्वयोरपीर्ण्यतोः द्वैधीभावं कुर्वीत ॥ ६८ ॥ शत्रुके द्वारा किये जाने वाले विरोधसे, अपने आपकी रक्षा करे ॥६॥ शक्तिहीन राजा, यलवान् का आश्रय लेलेवे ॥ ६२ ॥ दुर्थलका आश्रय लेने पाला राजा, सदा दुख उठाता है ।। ६३॥ अग्निके समान ही राजा का भाश्रय लेवे । अर्थात् भागके समीप जिस तरह पुरुष रहता है, उसी तरह राजाक समीप रहे॥६॥राजाके प्रतिकूल, कदापि आचरण न करे ।। ६५॥ उद्धत वेपको कभी धारण न करे; भर्थात् सदा साम्यवेप ही रक्खे ॥ ६६ । देवताभोंके चरित की नकल न उतारे ॥६७ ॥ परस्पर ईयर्या रखने वाले दो राजाभा में फूट डाल देव ॥६॥ न व्यसनपरस्य कार्यावाप्तिः ॥ ६९ !! इन्द्रियवशवी च- तुरङ्गवानपि विनश्यति ॥७०॥ नास्ति कार्य द्यूतप्रवृत्तस्य ||७१॥ मृगयापरस्य धर्मार्थो विनश्यतः ।। ७२ ॥ अर्थेपणा न व्यसनेषु गण्यते ॥ ७३ ॥ न कामासक्तस्य कार्यानुष्ठानम् ॥ ७४ ॥ अनिदाहादपि विशिष्टं वाक्पारुष्यम् ।। ७५ ॥ दण्डपारुण्यास- जिनद्वेष्यो भाति ॥७६॥ अर्थतोपिणं श्रीः परित्यजति ॥७७।। व्यसनोंमें फसे हुए राजाकी कार्यसिद्धि कभी नहीं होती ।। ६९ ॥ । इन्द्रियोके वशमे हुभा २ राजा, चतुग सेनाके होने पर भी नष्ट होजाता है। ७० ॥ जुएमें लगे हुए राजा का कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता ॥ ७॥ शिकारमें ही तत्पर रहने वाले राजा के धम और अर्थ नष्ट होजाते हैं ॥७२॥ भर्थकी अभिलाषाको व्यसनामें नहीं गिना जाता ॥ ३ ॥ कामातक (कामी) राजा के कार्य, कभी नहीं किये जाते ॥ ७४) पाणी की कठोरता, अग्निके जलाने से भी बढ़कर हाती है । ७५ ॥ दण्डकी कठोरतासे, राजा, सय जनता का द्वेष्य होजाता है ।। ७६ ॥ अर्थ के विषय में सम्सोप रखने वाले राजाको लक्ष्मी छोर देती है । ७७ ॥ आमित्रो दण्डनीत्यामायत्तः ॥ ७८ ॥ दण्डनीतिमधितिष्ठन् प्रजास्संरक्षति ॥ ७९ ॥ दण्डस्संपदा योजयति ॥८०॥ दण्डा- भावे मन्त्रिवर्गाभावः ॥८१॥ न दण्डादकार्याणि कुर्वन्ति ॥२॥ दण्डनीत्यामायत्तमात्मरक्षणम् ॥ ८३ ॥ आत्मनि रक्षिते सर्व" फौटलीय अर्थशास्त्र रक्षितं भवति ॥ ८४ : आत्मायत्तौ घृद्धिविनाशौ ॥८५॥ दण्डो हि विज्ञाने प्रणीयते ॥ ८६ ।। शत्रुकी अधीनता दण्डनीति पर ही निर्मर है ॥ ७० ॥ दण्डनीतिका ही भाश्रय लेता हुभा राजा, सम्पूर्ण प्रजामोंकी रक्षा करता है ॥ ७९ ॥ दण्ड, संपत्तिसे युक्त करदेता है। अर्थात् सपत्ति का बढना, दण्ड नीति पर ही निर्भर है ॥ ८॥ दण्डकी शक्ति न रहने पर, मन्त्रिसमूह का अभाव होजाता है। अर्थात् ये लोग नियममें नहीं रहते ॥ ८॥ दण्डके होने पर वे लोग, न करने योग्य कार्यों को नहीं करते ॥ ८२ ॥ अपनी रक्षाभी दण्डनीति पर निर्भर रहती है ।। ८३ । अपनी रक्षा होने पर, सबकी रक्षा की जासकती है।॥ ५ ॥ वृद्धि और विमाश, अपने ही अपर निर्भर होते है ॥ ५॥ अछीसरह सोच विचार कालेने पर ही दण्ड का भयोग किया जाना चाहिये ॥ ८६ ॥ दुर्वलोपि राजा नावमन्तव्यः ।। ८७ ॥ नास्त्यर्मेदौर्बल्यम् ॥ ८८ ॥ दण्डे प्रतीयते वृत्तिः ॥ ८९ ॥ धृत्तिमूलमर्थलामः ॥९० ॥ अर्थमूलौ धर्मकामौ ॥९१॥ अर्थमूलं कार्यम् ॥१२॥ यदल्पप्रयत्नात्कार्यसिद्धिर्भवति ॥ ९३ ॥ उपायपूर्व न दुष्करं स्यात् ॥ ९४ ।। अनुपायपूर्व कार्य कृतमपि नश्यति ॥ ९५ ॥ कार्यार्थिनामुपाय एष सहायः ॥ ९६ ।। कार्य पुरुषकारेण लक्ष्य संपद्यते ॥ ९७ ।। पुरुपकारमनुवर्तते दैवम् ॥ ९८॥ दैवं विना- ऽतिप्रयतं करोति यत्तद्विफलम् ॥ ९९ ।। राजाको दुल समझकर, कभी उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥ अमि, कभी दुर्बल नहीं होती ॥ ८॥ व्यवहार, दण्डके ही जाना जाता है ।। ८९॥ भकी प्राप्ति, व्यवहारमूलक होती ॥ १०॥ धर्म और काम, भयंमूलक होते हैं ॥ ९॥ कार्यही भर्थका मूल होता है ॥ ९२ ॥ क्योंकि योडा भी प्रयास करनेसे कार्यकी सिद्धि होजाती है ॥ १३ ॥ उपायपूर्वक किया जाता हुभा कोई भी कार्य, कठिन मालूम नहीं होता ॥९॥ जो कार्य, उपायसे नहीं किया जाता, यह किया कराया भी नष्ट होजाता है ॥ १५ ॥ कार्य में सफलता चाहनेवालों के लिये, उपायही परम सहायक होता है॥९६ ॥ कोई भी कार्य, पुरुषार्थ के द्वाराही लक्ष्य बनसकसा है ॥ १७ ॥ भाधारपर . चाणक्यप्रणीत सूत्र देव भी पुरुपाके पीछे २ चलता है ॥ १८ ॥ दैवके बिना, भस्यन्त प्रयवसे किया हुमा कार्य भी विफल होजाता है ॥ ९९ ॥ असमाहितस्य वृत्तिर्न विद्यते ॥१०० ॥ पूर्व निश्चित्य पश्चात्कार्यमारभेत् ॥ १.१॥ कार्यान्तरे दीर्घसूत्रता न कर्तव्या ॥१०२ न चलचित्तस्य कार्यावाप्तिः ॥ १०३ ॥ हस्तगतावमा- ननात्कार्यव्यतिक्रमो मवति ॥ १०४ ॥ दोपवार्जितानि कार्याणि दुर्लभानि ॥ १०५ ॥ दुरनुबन्धं कार्य नारमेत ॥ १०६॥ मबारधान रहते हुए पुरुषका कोई भी ग्यवहार नहीं पड़ सकता ॥१.. ॥ पहिले निश्नय फरक, फिर कार्यका आरम्भ करे । १०१॥ पूसरे कार्यके करगेमें दीर्घसूत्रता न करनी चाहिये ॥ १०२ ॥ पश्चलमित पुरुषकी, कभी कार्यसिद्धि नहीं होती ।। १०३ ॥ हाथमें आई हु वस्तुका तिरस्कार करनेसे, काम बिगा जाता है ।। १८४ ॥ ऐसे कार्य, संसारमें बहुत दुर्लभ हैं, जो वोपोंसे सर्वथा रहित हो ॥ १० ॥ दुःख या कठिनताओंसे भरे हुए कार्योका भारम्भ म करे ॥ १०६ ।। कालविर कार्य साधयेत् ॥ १०७ ॥ कालातिकमात्काल एव फलं पिबति ॥ १०८ ॥ क्षणं प्रति कालविक्षेपं न कुर्यात्स. कृत्येषु ।।१०९॥ देशफलविभागौ ज्ञात्वा कार्यमारभेत ॥११॥ दैवहीन कार्य सुसाधमपि दुस्साधं भवति ॥ १११ ॥ समयको पहिचाननेवाला पुरुष, अपने कार्यको सिद्ध करे, तात्पर्य यह है, कि यही पुरुष भपने कार्यको सिद्ध करसकता है, जो समयकी गति या परिस्थितिको खूब पहिचानता है ॥ १० ॥ कार्यके उचित कालके चूक जाने से, कालही, उस कार्यके फलको पोजाता है ॥ १८॥ इसलिये सपही कामामें एक क्षण भी काळविक्षेप न करे ।। १०९ ॥ देश और फलका विवेचन करकेही कार्यका आरम्भ करे ।। आसान भी काम, देवके विपरीत होनेपर कठिन होजाता है॥1॥ नीतिज्ञो देशकालो परीक्षेत ॥ ११२ ॥ परीक्ष्यकारिण श्रीविरं तिष्ठति ॥ ११३ ।। सर्वाश्व संपदः सर्वोपायेन परिग्रहेव ॥११४ ॥ भाग्यवन्तमपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति ॥११५॥ ज्ञानानुमानैव परीक्षा कर्तव्या ॥ ११६ ॥ - फोटलीय अर्थशास्त्र नीतिश पुरप, देश और कालका मरठीतरह विचार करे ॥२॥ विचारपूर्वक कार्य करनेवाले पुरुषके पस, लक्ष्मी चिरकालतक मिस करती है॥१३॥ सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका, सपही उपायोसे ( साम, दान, दण्ड भेद पे धार उपाय होते है ) सग्रह करे ॥ १४॥ भाग्यशाली भी, अपक्षयकारी (दिना विचारही काम करनेवाले) राजाको, लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ १५॥ प्रत्येक वस्तु की परीक्षा, प्रत्यक्ष और भनुमान प्रमाणोंसे करनी चाहिये यो यस्मिन् कर्मणि कुशलस्तं तस्मिन्नेर योजयेत् ।।११७|| दुस्साघमपि सुसाधं करोत्युपायज्ञः ॥ ११८ ॥ अज्ञानिना कृत- मपि न बहुमन्तव्यम् ॥ ११९ ॥ यादृच्छिकत्वात् कृमिरपि रूपान्तराणि करोति ॥ १२० ॥ सिद्धस्सै कार्यस्य प्रकाशनं कर्तव्यम् ॥ १२१ ।। ज्ञानवतामपि देवमानुपदोपात्काणि दुष्यन्ति ॥ १२२ ॥ जो जिस कार्यक करने में चतुर हो, उसको उसी कार्यपर लगाना चाहिये ॥10॥ उपायोंका जाननेवाला पुरप, कठिन कामोंको भी सीधा पमा लेता है॥16॥ अज्ञानीके द्वारा किये गये, कार्यको बहुत नहीं मानना चाहिये । ११९ ॥ क्योंकि कीस भी पहच्यासही, अनेक रूप रूपा. न्तरोंको बना देता है ॥ २०॥ सिद्ध हुए २ कार्य काही प्रकाश किया जाना चाहिये ॥ २७॥ ज्ञानी पुरषोंके भी पार्य, देवदोप या मानुप दोषोंसे दूषित होगाते हैं, अर्थात् सफल नहीं होपाते ॥ १२२ ॥ दैवं शान्तिकर्मणा प्रतिपेद्धव्यम् ॥ १२३ ॥ मानुपी कार्य- विपत्ति कौशलेन विनिवारयेत् ॥ १२४ ॥ कार्यविपत्तौ दोपान वर्णयन्ति बालिशाः ॥१२५॥ कार्याधिना दाक्षिण्यं न कर्तव्यम् ॥ १२६ ॥ क्षीरार्थी वत्सो मातुरूधः प्रतिहन्ति ॥१२७ ।। अप्रयत्नात्कार्यविपतिर्भवेत् ॥ १२८ ॥ न दैवप्रमाणानां कार्य- सिद्धिः ॥ १२९ ॥ शान्तिकमके द्वारा, देवका प्रतीकार करना चाहिये ॥ १२॥ भार अपने कायाम, जो विपत्तियां, मनुष्य के द्वारा प्राप्त हों, उनका निवारण (पतीकार) अपने कौशल अर्थात् चातुर्यसे करे ॥ २४ ॥ कर्वके अमय २ अध्या०] चाणक्यप्रणीत सूत्र १६३७) विपत्ति मानेपर, मूर्ख पुरुषही, उनमें दो!का वर्णन करते हैं ॥२५॥ जो पुरुष, अपने कार्यमें सफलता चाहे, उसे सर्वधा सरल न होना चाहिये ॥ १२६ ॥ पछड़ा भी जब दूध चाहता है, अपनी माताके अयन (ऐन- अधस्) में आघात करता है ॥ १२७ ॥ प्रयत न करनेसे, अवश्यही कोयाम विपत्ति या विघ्न आजाता है ॥ १२८ ॥ दैवकोही प्रमाण माननेवाले पुरुषको कार्यसिद्धि कभी नहीं होती ॥ १२९ ॥ कार्यवाह्यो न पोपयत्याश्रितान् ॥ १३० ॥ या कार्य न पश्यति सोऽन्धः।। १३१ । प्रत्यक्षपरोक्षानुमानैः कार्याणि परी- क्षेत ॥ १३२ ।। अपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति ॥ १३३ ।। परीक्ष्य तार्या विपत्तिः ॥१३४ ॥ स्वशक्तिं ज्ञात्वा कार्यमारभेत ॥१३५॥ स्वजनं तर्पयित्वा यश्शेपभोजी सोऽमृतभोजी ॥१३६।। सर्वानुष्ठानादायमुखानि वर्धन्ते ॥ १३७ ॥ नास्ति भीरोः कार्य- चिन्ता ।। १३८॥ कार्यसे पृथक् रहनेवाला पुरुष, अपने भाश्रित व्यक्तियोंका कदापि पालन पोषण नहीं करसकता ॥ ३० ॥ जो अपने कार्यको नहीं देखता, वही है॥ १३॥ प्रत्यक्ष, परोक्ष (शब्द) और भनुमान प्रमाणोंसे कार्योंकी परीक्षा करे ॥ १३२ ॥ बिना विचारे काम करनेवाले पुरुषको लक्ष्मी छोड़ देती है ।। १३३॥ अच्छीतरह विवेकपूर्वक विपत्तिको पार करे ॥ १३ ॥ भपनी शक्तिको समझकर, कार्यको आरम्भ करे ॥ १३५ ॥ अपने आदमियों को तृप्त कराके, जो शेप भन्न खानेवाला होता, वही अमृतभोजी (अमृत खानेवाला) समझना चाहिये ॥ ३९ ॥ सब तरह के उचित कार्योंके करनेसे, आमदनीके रास्ते बढ जाते हैं ॥ १३७ ॥ भीरु ( अपरिश्रमी कामचौर ) पुरुषको, अपने कार्योकी कोई चिन्ता नहीं होती ॥ १३ ॥ 'स्वामिनश्शीलं ज्ञात्या कार्यार्थी कार्य साधयेत् ॥ १३९ ।। धेनोश्शीलज्ञः क्षीरं भुङ्क्ते ॥ १४० ॥ क्षुद्रे गुरप्रकाशनमात्म- वान कुर्यात् ॥१४१|| आश्रितैरप्यवमन्यते मृदुखभावः ॥१४॥ तीक्ष्णदण्डस्सर्वेरुद्वेजनीयो भवति ॥ १४३ ॥ यथाईदण्डकारी स्यात् ।। ११४॥ कार्य करनेकी इरडा रखनेवाला पुरप, अपने स्वामी स्वभावको भन्धा (३८) कौटलीय अर्थशास्त्र मान काही, कार्यको सिद्ध फरे, या कार्यको सफल बनावै ॥३९॥ जो गायक सभावसे परिचित होता है, यही उसके दूघका उपमोग करता है ॥ १४॥ भारमवान् (अपनी कुछ हैसियत रखनेवाला) पुरुष, छोटे विचार रखनेवाले आदमीपर, अपने छिपे मेदोंको प्रकट न करे ॥ ॥ जोराना साल स्वभावका हो उसका, उसके आश्रित पुरुषमी तिरस्कार कर देस ॥१४॥ भोरं जो राजा, तीम समावका होता है, उसमे सभी पुरुष उद्विप (खिमपेन ) रहते हैं ॥ १४३ सिद्धिये राजाडो, उचित र देने घालाही होना चाहिये ॥४॥ अल्पसारं श्रुतवन्तमपि न बहुमन्यते लोकः ॥ १४५ ॥ अतिभारः पुरुषमवसादयति ॥१४६।। यस्संसदि परदोयं संसति स स्वदोपबहुत्वं प्रख्यापयति ।। १४७ ।। आत्मानमेव नाशयत्य- नात्मवता कोपः ॥ १४८॥ नास्त्यप्राप्यं सत्यवताम् ।। १४९ ।। साहसेन न कार्यसिद्धिर्भवति ॥ १५० ॥ व्यसनाओं विसरत्य- प्रवेशेन ॥ १५१॥ शास्त्र पारगामी भी दुर्यल राजाको, जनता यहुत नहीं मानती ॥१४५॥ भधिक भार, पुरुपको खिन्न करदेता है ॥ ११६ ॥ जो पुरुष, सभामें दूसरेके दोपका कथन करता है, वह अपनेही दोषोंकी अधिकताको प्रसिद्ध करता है ॥ १४ ॥ अपने भापको वश न रखनेवाले पुरुषोंका क्रोध, स्वयं उनकोही नष्ट कादेता है ॥ १४८ ॥ सस्यका भाचरण करनेवाले पुरुषोंके लिये कोई वस्तु भप्राप्य नहीं होती ॥ ५० ॥ विपद्ग्रस्त पुरुष, विपतियोंके टल जानेपर, उन्हें भूल जाता है ॥ १५॥ नास्त्यनन्तरायः कालविक्षेपे ॥ १५२ ।। असंशयविनाशा- संशयविनाशश्श्रेयान् ॥ १५३ ॥ अपरधनानि निक्षेतुः केवलं वार्थम् ।। १५४ ॥ दानं धर्मः ॥ १५५ ॥ नार्यागतोऽर्थवद्विप- रीतोऽनर्थभावः ॥ १५६ ॥ यो धर्मार्थों न विवर्धयति स कामः ॥ १५७ ॥ तद्विपरीतोऽनर्थसेवी ॥ १५८ ।। समय घूमानेपर, कार्योम अवश्यही विन, उपस्थित होजाते है ॥ १५२ ॥ संदेह रहित विनाशसे (अर्थात् अवश्यम्भापी विनाशस) संदिग्ध विनाश (जिस विनाशसन्देश हो, ऐसा विनाश) अच्छा होता है ॥ १५३ ॥ दूसोके धनोंको अमानत रखनेवाले पुरुषका केवल स्वार्थही प्रयोजन होता १अध्या चाणक्यप्रणीत सूत्र ॥ ५५ ॥ दान देना धर्म है ॥ ५५ ॥ वैश्यवृत्तसे किया हुआ यह धर्म, सफल नहीं होता । तथा दान धर्मका न करना, तो सर्वथाही अनर्थका हेतु होता है ॥ १५६ ॥ 'काम' वही होता है, जोकि धर्म और अर्थको नहीं घटाता ॥ १५७ ॥ धर्म और अर्थक घटानेवाले अथवा न पढ़ने देनेगले 'काम' का सेवन करना तो, अनर्थकाही सेवन करता है ॥ १५८ ।। ऋजुस्वभावपरो जनेषु दुर्लभः ॥ १५९ ॥ अवमाननागत- मैश्वर्यमवमन्यते साधुः ।। १६०॥ यहूनपि गुणानेकदोपो ग्रसति ॥ १६१ ॥ महात्मना परेण साहसें न कर्तव्यम् ।। १६२॥ क- दाचिदपि चारित्रं न लड़येत् ॥ १६३ ।। क्षुधाऽऽर्तो न तृणं चरति सिंहः ॥ १६४ ॥ प्राणादपि प्रत्ययो रक्षितव्यः ॥१६५।। पिशुनश्श्रोता पुत्रदारैरपि त्यज्यो ।। १६६ ।। मनुष्यों में, सर्वथा सरल स्वभावका पुरुप, दुर्लभ होता है ॥ १५९ ॥ तिरस्कारपूर्वक आये हुए ऐधर्थको, सजन पुरुप, तिरस्कृत कादेते हैं । अर्थात उसे नहीं अपनाते ॥१६० ॥ बहुतसे गुगको भी, लाही दोप खानाता है ॥ १६ ॥ मह रमा श्रेष्ठ धस्मा) शनुके साथ, युद्द नहीं करना चाहिये ॥ १६२ ॥ चरित्र (सदाचार) का कभी उलधन न करे ॥ १६३ ।। भूखा भी सिंह, कभी तिनके नहीं घरता ॥ १६ ॥ प्राण देकर भी अपने विश्वासकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १६५ ॥ चुगली करनेवाले और सुननेवाले पुरुपको, उसके स्त्रीपुत्रादि भी छोड़ देते हैं ॥ १६६ ॥ पालादप्यर्थजातं शृणुयात् ॥ १६७ ॥ सत्यमप्यश्रद्धेयं न यदेत् ॥ १६८ ॥ नाल्पदोपाद्वहुगुणास्त्यज्यन्ते ॥ १६९ ॥ चिप- श्चित्स्वपि सुलभा दोपाः ॥ १७० ।। नास्ति रनमखण्डितम् ॥ १७१ ॥ मर्यादातीत न कदाचिदपि विश्वसेत् ॥ १७२ ।। अनिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति ।। १७३ ॥ नमन्त्यपि तुला- कोटिः कूपोदकक्षयं करोति ॥ १७४ ।। पालक भी उचित पातको मुनलेवे ॥ १६ ॥ विधासके भयोग्य सत्य भी न बोले ॥ १८ ॥ थोडेसे दोपसे, बहुत से गुणोंको छोड़ा नहीं जाता । १६९ ॥ विद्वानों में भी दोपका रोजाना आसान है ॥ १७॥ जैसे कोई भी रस भसण्डित नहीं होता ॥ ७॥ कभी भी मादासे अधिक विश्वास [१५ अपिल . (६८०), कौटलीय अर्थशाख म करे ॥ १७२ ॥ अप्रिय पुरुष (यु) के सम्बन्धमें किया हुआ मिय कार्य (उस धुके अनुकूल) मी द्वेष्य (प्रतिकूल) ही समझा जाता है ॥ १३॥ झुकती हुई भी दींकलो, कुए उसका क्षय करदेती है ॥ १७ ॥ सतां मतं नातिकमेत् ॥ १७५ ॥ गुणवदाश्रयान्निर्गुणोपि गुणी भवति ॥१७६॥ क्षीराश्रितं जलं क्षीरमेव भवति ॥१७७॥ मृत्पिण्डोपि पाटलिगन्धमुत्पादयति ॥ १७८ ॥ रजतं कनकसं- गात्कनकं भवति ॥१७९।। उपकर्तर्यपकर्तुमिच्छत्ययुधः।।१८०।। न.पापकर्मणामाकोशमयम् ॥ १८१ ।। श्रेय पुरपॉके मन्तव्यका अतिक्रमण न करे ॥ १७५॥ गुणी पुरषका भाश्रय लेनेसे, गुणहीन भी गुणो होजाता है ॥ १७६॥ दूधके आश्रित (अर्थात् दूध मिला हुमा) जल भी, दूधही होजाता है ॥ १७ ॥ महोका, हेला भी, पाटली (एक प्रकारका फूल) के गन्धको उत्पड करता है | 100 ॥ चांदी भी, सोनके साथ मिलनेसे सोना होजाती है ॥ ७९ ॥ भुद्धिर्शन पुरप, उपकार करनेवाळेपर भी, भपकारही करना चाहता है ॥ १८ ॥ पाप कर्म करनेवाले पुराँको निन्दा का भय नहीं होता ॥ ८॥ उत्साहवतां शत्रवोपि वशीभवन्ति ।। १८२ ।। विक्रमधना राजानः ॥ १८३ ॥ नास्त्यलसस्थाहकामुष्मिकम् ।। १८४॥ निरु- त्साहादैवं पतति ॥ १८५ ॥ मत्स्यार्थीव जलमुपयुज्यार्थ गृही. यात् ॥ १८६ । अविश्वस्तेषु विश्वासो न कर्तव्यः ॥ १८७ ॥ विपं विपमेव सार्वकालम् ॥ १८८ ॥ उत्साही राजाभोंके, शत्रु भी, वशमें होजाते हैं ॥१८२॥ राजामौका मुख्यधन विक्रम (बहादुरी) ही होता ॥ १३॥ आलसी व्यक्तिको, न ऐहलौकिक और न पारलौकिकही सुख मिलता है ॥ १८४ ॥ उस्पाइहीन होनेसे भाग्य भी गिर जाता है । १८५॥ मछियारा जैसे जलको, इसी प्रकार पुरुष उपयोग करके भर्थको ग्रहण करे । अथवा उपयोगमें भानके योग्य अर्थको ग्रहण करे ॥ १८६ ॥ अविश्वस्त पुरषोपर कभी विश्वास न करना चाहिये ॥ १८ ॥ क्योंकि विप प्रत्येक समय में विषही रहता है ॥ १८॥ अर्थसमादाने वैरिणां सङ्ग एव न कर्तव्यः ॥ १८९ ॥ अर्थसिद्धौ वैरिणं न विश्वसेव ॥१०॥ अर्थाधीन एच नियत- चाणक्यप्रणीत सूत्र (६४ संबन्धः ॥ १९१ ॥ शत्रोरपि सुतस्सखा रक्षितव्यः ॥ १९२ ॥ यावच्छत्रोश्छिद्रं पश्यति ताबद्धस्तेन वा स्कन्धेन वा वाह्यः ॥१९॥ श छिद्रे परिहरेत् ॥ १९४ ॥ आत्मच्छिद्रं न प्रकाशयेत् ॥ १९५॥ छिद्रप्रहारिणश्शत्रवः ॥ १९६ ॥ हस्तगतमपि शर्नु • न विश्वसेत् ।। १९७॥ अर्थका सग्रह करनेमें, शनुभोंका साथही न करना चाहिये ॥ १८९ ॥ अर्थकी प्राप्ति जानेपर भी शत्रुका विश्वास न करे ॥ १९० ॥ निश्चित सम्बध, अर्थकेही अधीन होता है ॥ १९१ शत्रुका भी पुत्र यदि अपना मिन्न हो, तो उसकी रक्षा करनी चाहिये । १९२ ॥ जबतक शत्रुके दोप या उसकी निर्वलताको नहीं देख लता , तबतक उसको अपने हाथ या कन्धेसे वहन करे ॥१९३ ॥ जहा शत्रुकी दुर्बलता यहीं उसपर प्रहार करे ॥ १९ ॥ सपने योप या दुर्वलताको कभी प्रकट न होने देवे ॥ १९५ ॥ जो छिद् (दोप या दुर्बलता) पर प्रहार करनेवाले होते हैं, वेही शत्रु समहोने चाहिये ॥ १९६ ॥ भपने हाथमें आये हुए शत्रुका भी कभी विश्वास न करे ॥ १९७ ॥ खननस्य दुर्वृत्तं निवारयेत् ॥ १९८ ॥ स्वजनावमानोपि मनखिनां दुःखमावहति ॥ १९९ ॥ एकागदोपः पुरुपमवसाद- यति ॥ २०० । शत्रु जयति सुवृत्ता ॥ २०१।। निकृतिप्रिया नीचाः ॥ २०२ ॥ नीचस्य मतिर्न दातव्या ॥ २०३ ॥ तेषु विश्वासो न कर्तभ्यः ॥ २०४॥ सुपूजितोपि दुर्जनः पीडयत्येव ॥२०५॥ चन्दनादीनपि दावोऽनिर्दहत्येव ।। २०६॥ अपने भादमियोंके दुर्व्यवहारको रोके ॥ १९८ ॥ अपन भादमियोंका अपमान भी, मनस्वी पुरषों के लिय दु खदाई होता है १९९ ॥ एक भगका दोष भी पुरुषको नष्ट करदेता है ॥ २०० ॥ सद्व्यवहारही शत्रुको जीतता है ॥ २० ॥ नीच पुरुषको तिरस्कार करनाही अच्छा मालूम होता है ॥२०॥ मीच पुरुपको कभी सुमति न देनी चाहिये ॥ २० ॥ भार न उगपर कमी विश्वास करना चाहिये ॥ २०४ ॥ सत्कार किया हुभा भी दुष्ट पुरुष, पीड़ाही पहुचाता ह ॥२०५॥ जगलकी भाग, चन्दन भादिको मी जलाही देती है। २०६॥ कदापि पुरुष नावमन्येत ।। २०७॥ क्षन्तव्यमिति पुरुष न माधेत ।। २०८ ॥ मोऽधिकं रहस्युक्त वक्तुमिच्छन्त्यबुद्धयः . (६४२) कौटलीय अर्थशाख ॥ २०९ ॥ अनुरागस्तु फलेन सूच्यते ॥ २१० ॥ प्रज्ञाफलमै- श्वर्यम् ॥ २११ ॥ दातव्यमपि वालिशः परिकेशेन दास्यति ॥ २१२ ॥ महदैश्वर्य प्राप्याप्यधुतिमान् विनश्यति ।। २१३ ।। नास्त्यधृतरहिकामुष्मिकम् ।। २१४ ॥ पुरपका कभी भी तिरस्कार न करे ॥ २०७ ॥ 'क्षमा करदेना चाहिये इसप्रकार पुरुषको कमी बाधित न करे ॥ २०८ ॥ अपने मालिकके द्वारा एकान्तमें कही हुई यातका, बुद्धिहीन पुरप, बहुत अधिक कहना चाहते हैं ॥ २०५ ॥ अनुराग अर्थात् प्रेम, परिणामके द्वाराही प्रतीत होता है ॥ २१०॥ बुद्रिकाही परिणाम ऐधर्य होता है ॥२॥1॥ देने योग्य वस्तुको भी, मूर्ख पुरुष, पढे लेशसे देता है ॥ २१॥ महान ऐश्वर्यको प्राप्त करके भी धैर्यहीन पुरुष न हाजाता है ॥ २१ ॥ धैर्यहीन पुरुपको न पेहलौकिक और न पारली. किकही सुख मिल सकता है ॥ २१४॥ न दुर्जनैस्सह संसर्गः कर्तव्यः ॥ २१५ ॥ शौण्डहस्तगतं पयोप्यवमन्येत ॥ २१६ ॥ कार्यसकटेष्वर्थव्यवसायिनी बुद्धिः ।।२१७ ॥ मितभोजनं स्वास्थ्यम् ।।२१८॥ पथ्यमपथ्यं वाजीर्णे नाश्नीयात् ॥ २१९ ॥ जीर्णभोजिनं व्याधिर्नोपसर्पति ॥२२०॥ जीर्णशरीरे वर्धमान व्याधि नोपेक्षेत ।। २२१ ॥ अजीर्णे भोजन दुःखम् ॥ २२२ ॥ शवोरपि विशिष्यते व्याधिः ॥ २२३ ।। दुर्जनों के साथ कभी ससर्ग न करना चाहिये ॥ २५॥ कलालके हायमें गया हुआ दूध भी बुरा समझा जाता है । २१६ ॥ कार्यसकटों में भको निश्चय करनेवाली ही, बुद्धि होती है ।। २१८॥ परिमित भोजन करना ही स्वास्थ्य समझना चाहिये ॥२८॥ अजीर्ण होनेपर, पथ्य या अपप्य पुछ न खाये ॥२९॥ पहिला खायाहुभा पचजानेपर स्वानवाले पुरुषको कोई ग्पाधि महीं सतासी ॥ २२० ॥ पूढे शरीरमें बढतीहुई.म्याधि की, कभी उपेक्षा न करनी चाहिये ॥ २२ ॥ अजीर्ण होनेपर भोजन करना दु खदाई होता है । २१२ ॥ व्याधि सघुसे भी अधिक कष्टपद होती है ॥ २२३ ॥ दानं निघानमनुगामि ॥ २२४ ॥ पटुतरे तृष्णापरे सुलभ- मतिसन्धानम् ॥ ५२५ ॥ कृष्णया मतिश्छाद्यते ॥ २२६ ॥ कार्यबहुवे बहुफलमापनिक कुर्यात् ॥ २२७ ।। स्वयमेवावस्कन चाणक्यप्रणीत सूत्र दान, कार्य निरीक्षेत ॥२२८॥ मृर्सेषु साहस नियतम् ।।२२९।। मूर्सेषु विवादो न कर्तव्यः ॥२३०॥ मूर्खेषु मूर्सवत्कथयेत् ॥ २३१ ॥ आयसैरायसं छेद्यम् ।। २३२ ॥ नास्त्यधीमतस्सखा ॥ २३३ ॥ कोशका भनुगामी होता है। भात् जैसा अपना कोश हो, जसके अनुसार ही दान कियाजाता है ॥ २२४ ॥ जो पुरुष अत्यन्त तृष्णापर हो, भर्थात् जिसकी तृष्णा पहुत बढीहुई हो, उसको वश करलेना, बहुत भासान होता है ॥ २२५ ॥ तृष्णा, वृद्धिको ढक लेती है ॥ २२६ ॥ बहुतसे कार्योंके होनेपर उनमें से उसी कार्यको करना चहिये, जो भविष्यमै अधिक फल देनेवाला हो ॥ २२७ ॥ भाक्रमण मादिके कार्यका, राजा स्वय ही निरी- क्षण करे ॥ २२८ ॥ मूखीम निश्चित ही साहम (लड़ाई झगड़ा करनेका माहर) होता है ॥ २२९ ॥ मूखम कभी विवाद न करना चाहिये ॥ २३०॥ मूर्खमि मूर्सके समान ही फहना चाहिये ॥२३॥ लोहेको लोहसे ही काटामा- सकता है ॥ २३२ ॥ पुदिहीन पुरुषका कोई मित्र नहीं होता ॥ २३३ ॥ धर्मेण धार्यवे लोकः ॥ २३४ ॥ प्रेतमपि धर्माधर्माचनुग- च्छतः ॥ २३५ ॥ दया धर्मस्य जन्मभूमिः ।। २३६ ।। धर्ममूले सत्यदाने ।। २३७ ॥ धर्मेण जयति लोकान् ॥ २३८ ॥ मृत्यु- रपि धर्मिष्ठं रक्षति ।। २३९ ॥ धर्माद्विपरीतं पापं यत्र यत्र प्रस- ज्यते तत्र धर्मावमतिमहती प्रसज्यते ॥ २४० ॥ उपस्थितविना. शानां प्रकृत्या कार्येण लक्ष्यते ॥ २४१ ॥ आत्मविनाशं सूचय- त्यधर्मबुद्धिः ॥ २४२॥ धर्मने ही लोकको धारण कियाहुआ है ॥ २५४ n धर्म और अधर्म, मृत पुरुषके साथ २ जाते हैं ॥ २३५॥ दया ही धर्मकी जन्मभूमि है ॥ २१६॥ सत्य भार दान, धर्ममूलक ही होते है। २१७ ॥ धर्म द्वारा लोकोंको गीतलेता है ॥ २३८ ॥ मृत्यु भी धर्मारमा पुरपकी रक्षा करती है ॥ २३९ ॥ धर्मकै पिरत पापका जहाँ २ प्रसार होता है, यहाँ धर्मका महान तिरस्कार होता है ॥ २४० ॥ उपस्थित विनाशोंकी परिस्थिति, स्वभावसे या कार्यसे पहिचानी जाती है। ( 'प्रकृया कार्यण' के स्थानपर 'प्रकृतिराकारेण' ऐसा पाठ शामशाखीने ठीक माना है । होने वाले पिनाशोंकी प्रकृति, आकारसे पहिचानी जाती है। यही उसका अपं करना चाहिये ) ॥ २१॥ मधर्मबुदि मापने (मामा) विनासको सपना देदेती है ॥ २४२ ॥ - कौटलीय अर्थशास्त्र मगवत जंजीर है ॥ ३५६ ॥ जो जिस कार्य में चतुर हो, उसको उसी कार्यपर लगाना चाहिये ॥ ३५७ ॥ दुष्ट स्त्री, मनस्वी पुरषोंके सरीरको घूसनयाळी होती है ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्तो दारान् निरीक्षत ।। ३५९ ॥ स्वीपु किंचिदपि न विश्वसेत ॥ ३६० ॥ न ममाधिः स्त्रीपु लोकनता च ।। ३६१।। गुरूणां माता गरीयसी ॥ ३६२ ॥ सर्वावस्थासु माता भर्तच्या ॥ ३६३ ॥ वैदुप्यमलकारणाच्छाद्यते ॥ ३६४ ॥ स्त्रीणां भूपण लजा ।। ३६५ ॥ विप्राणां भुपणं बंदः ।। ३६६ ।। सर्वेषां भूपणं धर्मः ।। ३६७ ॥ भूपणानां भूपणं सविनया विद्यते ॥ ३६८ ॥ अनुपद्रवं देशमावसेत् ।। ३६९ ।। साधुजनबहुलो देशः ॥३७०॥ प्रमादरीहत होकर स्वीस निरीक्षण करे ॥ ३५९ ॥ खियोपर कुछ भी विश्वास न करे ॥ ३६० ॥ लियॉम निश्चलता तथा अपहारपटुता नहीं होती ॥ ७६१ ॥ सय बढी चीजोंमें माता की सबसे बड़ी होती है ॥ ३६२॥ सब भवस्थाभोंमें माताका रण पोपण काना चाहिये ॥ १३ ॥ विद्या, भलङ्कार (आभूषण आदि ) से दकदी जाती है ॥ ३६४ ॥ नियोंका भूपण लजा है ॥ ३६५ ॥ ब्राह्मणांका भूपण वेद है ॥ ३६६ ॥ सबका भूपण धर्म है ॥ ३६७ ॥ लना भादिका, विनयसे सहित होना, भूपोंका भी भूपण होता है।३६८॥ उपद्रवरहित देशमें निवास करे ॥२६९ ।। जहां साधुगन बहुत रहते हो. वही देश होता है ॥ ३७. ॥ राज्ञो मैतव्यं सार्वकालम् ॥ ३७१ ॥ न राज्ञः परं दैवतम् ॥ ३७२ ॥ सुदूरमपि दहति राजपतिः ॥ ३७३ ।। रिक्तहस्तो न राजानमभिगच्छेत् ॥ ३७४ ॥ गुरुं च दैवं च ३७५ ।। कुटुम्बिनो भेतव्यम् ॥ ३७६ ॥ गन्तव्यं च सदा राजकुलम् ॥ ३७७ ॥ राजपुरुपैस्संबन्धं कुर्यात् ॥ ३७८ ॥ राजदासीन सेवितव्या ।। ३७९ ॥ न चक्षुपाऽपि राजानं निरीक्षेत ॥३८०॥ पुत्रे गुणवति कुटुम्बिनः स्वर्गः ॥ ३८१ ।। पुत्रा विद्यानां पारं गमयितव्याः ।। ३८२ ।। राजासे सदा हरना चाहिये ॥३१॥ राजासे पदकर कोई दैवत नही होता ॥ ३७२॥ राजारूपी भाग, बहुत दूर रहतेहुए भी जलादेती है चाणक्यप्रणीत सूत्र (६४३) कार्य निरीक्षेत ॥२२८॥ मूर्येषु साहस नियतम् ।।२२९॥ मूर्खेषु विवादो न कर्तव्यः ।। २३०॥ मूर्खेषु मूर्खवत्कथयेत् ॥ २३१ ॥ आयसैरायस छेद्यम् ।। २३२ ॥ नास्त्यधीमतस्सखा ॥ २३३ ।। दान, कोशका अनुगामी होता है। अर्थात् जैसा अपना कोश हो, • ऊसके अनुसार ही दान कियाजाता है ॥ २२४ ॥ जो पुरुष अत्यन्त तृष्णापर हो, भयात् जिसकी तृष्णा बहुत बढीहुई हो, उसको वामें करलेना, बहुत भासान होता है ।। २२५ ॥ तृष्णा, वृद्धिको ढक लेती है ॥ २२६ ॥ बहुतसे कार्योंके होनेपर उनसे उसी कार्य को करना चहिये, जो भविष्य में अधिक फल देनेवाला हो ॥ २२७ ॥ आक्रमण आदिके कार्यका, राजा स्वय ही निरी. क्षण करे ॥ २२८ ॥ मूमि निश्चित ही साहम (लडाई झगड़ा करनेका मादा) होता है ॥ २२९ ॥ मूखम कभी विवाद न करना चाहिये ॥ २३० ॥ मूर्खोंमें मूखके समान ही कहना चाहिये ॥ २३॥ ॥ लोहेको लोहेसे ही काटाजा. सकता है ॥ २३२ ॥ घुद्धिहीन पुरुषका कोई मित्र नहीं होता ॥ २३३ ॥ धर्मेण धार्यते लोकः ॥ २३४ ॥ प्रेतमपि धर्माधर्मावनुग- च्छतः ॥ २३५ ॥ दया धर्मस्य जन्मभूमिः ॥ २३६ ।। धर्ममूले सत्यदाने ॥ २३७॥ धर्मेण जयति लोकान् ॥ २३८ ॥ मृत्यु- रपि धर्मिष्ठं रक्षति ॥ २३९ ॥ धर्माद्विपरीतं पापं यत्र यत्र प्रस- ज्यते तत्र धर्मावमतिमहती प्रसज्यते ॥ २४० ॥ उपस्थितविना- शानां प्रकृत्या कार्येण लक्ष्यते ॥ २४१ ।। आत्मविनाशं सूचय- त्यधर्मयुद्धिः ॥ २४२॥ धर्मन ही लोकको धारण किया भा है ॥ २३४ ॥ धर्म और अधर्म, मृत पुरपके साथ २ जाते हैं ॥ २३५ । दया ही धर्मकी जन्मभूमि है ॥ २३६ ॥ सत्य और दान, धर्ममूलक ही होते हैं । २३७ ॥ धर्मके द्वारा लोकोंको जीतलेता है ।। २३८ । मृत्यु भी धर्मारमा पुरषकी रक्षा करती है ॥ २३९ ॥ धर्मके विरुद्ध पापका जहा २ प्रसार होता है, यहां धर्मका महान तिरस्कार होता है ॥ २४० ॥ उपस्थित विनाशोंकी परिस्थिति, स्वभावसे या कार्यस पहिचानी जाती है। ( 'प्रकृया कार्यग' के स्थानपर 'प्रकृतिराकारेण' ऐसा पाठ शामशानीने ठीक माना है । होनेवाले विनाशोंकी प्रकृति, आकारसे पहिचानी जाती है। यही उसका अर्थ करना चाहिये) ॥ २२ ॥ अधर्मवृदि मापने ( भधारमा विनाशकी सूचना देदेती है ॥ २४३ ॥ - . (६४२) कौटलीय अर्थशास्त्रे ॥ २०९ ॥ अनुरागस्तु फलेन सूच्यते ॥ २१० ॥ प्रज्ञाफलमै- श्वर्यम् ॥ २११॥ दातव्यमपि बालिशः परिक्लेशेन दास्यति ।। २१२ ॥ महदैश्वयं प्राप्याप्यधृतिमान् विनश्यति ॥ २१३ ।। नास्त्यधृतेरहिकामुष्मिकम् ।। २१४ ॥ पुरपका कभी भी तिरस्कार न करें] ॥ २० ॥ 'क्षमा करदेना चाहिये' इसप्रकार पुरुपको कभी बाधित न करे ॥ २०८ ॥ अपने मालिकके द्वारा एकान्तमें कही हुई पातको, युद्धिहीन पुरुष, यहुत अधिक कहना चाहते हैं ॥ २०२ ॥ अनुराग अर्थात् प्रम, परिणामके द्वाराही प्रतीत होता है ॥ २० ॥ शुद्धिकाही परिणाम ऐश्वर्य होता है ॥ २१ ॥ देने योग्य वस्तुको भी, मूर्ख पर क्लेशसे देता है ॥ २१॥ महान ऐश्वर्यको प्राप्त करके भी धैर्यहीन पुरुष न हाजाता ह ॥ २३ ॥ धैर्यहीन पुरुषको न ऐहलौकिक और न पारली- किकही सुख मिल सकता है ॥ २१४ ॥ न दुर्जनस्सह संसर्गः कर्तव्यः ॥ २१५ ॥ शौण्डहस्तगतं पयोप्यवमन्येत ॥ २१६ ॥ कार्यसकटेष्वर्थव्यवसायिनी घुद्धिः ॥२१७ ॥ मितभोजनं स्वास्थ्यम् ।।२१८॥ पथ्यमपथ्यं वाजीर्णे नाश्नीयात् ॥ २१९ ।। जीर्णमोजिनं व्याधि!पसर्पति ॥२२०॥ जीर्णशरीरे वर्धमान व्याधि नोपेक्षेत ॥ २२१ ॥ अजीर्णे मोजनं दुःखम् ।। २२२ ॥ शत्रोरपि विशिष्यते व्याधिः ।। २२३ ।। दुर्जनोंके साथ कभी ससर्ग न करना चाहिये ॥ २१५॥ कलालके हाथमें गपा हुआ दूध भी पुरा समझा जाता है ॥ २१६ । कार्यसकोंमें भयको निधय करनेवाली ही, बुद्धि होती है ॥ २१ ॥ परिमित भोजन करना ही स्वास्थ्य समझना चाहिये ॥२१८॥ अजीर्ण होनेपर, पथ्य या अपथ्य कुछ म स्वावे ॥ २१९ । पहिला खायाहुमा पचजानेपर स्नानवाले पुरुषको काई ग्याधि महीं सताती ॥ २२० ॥ धूढे शरीरमें बढतीहुई व्याधि की, स्पेक्षा न फरगी पाहिये ॥ २२ ॥ अजीर्ण होनेपर भोजन करना दुखदाई होता है ॥ २१२ ॥ पाधि शत्रुसे भी अधिक कष्टप्रद होती है ॥ २२३ ॥ दानं निधानमनुगामि ॥ २२४ ॥ पटुतरे तृष्णापरे सुलभ मतिसन्धानम् ॥ २५ ॥ तृष्णया मतिश्छायते ॥ २२६ ॥ कार्यवाहत्वे बहुफलमासद्रिक कर्यात् ॥.२२७ ।। स्वयमेवावस्कर्म ॥
चाणक्यप्रणीत सूत्र (६४५) नीच कुलमें उत्पन्न हुआ २ भी धनी पुरुष, उच्च कुल्लमें उत्पन्न हुए पुरपसे बड़ा समझा जाता है ॥ २६० ॥ नीच पुरुषको अपने तिरस्कारका डर नहीं होता ॥ २६ ॥ ज्ञानवान् चतुर पुरुषको, अपनी जीविकाका भय नहीं होता ॥ २६२ ॥ जितेन्द्रिय पुरुषको, विषयोंसे भय नहीं होता ॥ २१३ ॥ कृतकृत्य भर्थात् भामज्ञानी पुरुषको मृत्युका भय नहीं होता ॥ २६४ ॥ कस्यचिदर्थ स्वमिव मन्यते साधुः ॥ २६५ ॥ परविभवे- प्वादरो न कर्तव्यः ॥ २६६ ॥ परविभवेष्वादरोपि नाशमूलस् ॥२६७ ।। पलालमपि परद्रव्यं न हर्तव्यम् ॥ २६८ ।। परद्रव्या- पहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः ॥ २६९ ॥ न चौर्यात्परं मृत्युपाशः ॥ २७० ॥ यवागूरपि प्राणधारणं करोति काले ।। २७१ ॥ न मृतस्यौपधं प्रयोजनम् ॥ २७२ ।। समकाले स्वयमपि प्रभु- स्वस्य प्रयोजनं भवति ।। २७३ ।। सजन पुरुष, किसी भी दूसरेके अर्थको, अपने ही भर्यके समान समझता है ॥ २६५ ॥ दूसरेकी संपत्तिोंपर कमी दात न लगाना चाहिये ॥ २१ ॥ दूसरेकी संपत्तियोंको अपनाने का विचार भी नाशका कारण होता है ॥ २६७ ॥ पुरासके समान भी दूसरेका दम्य, हड़प नहीं करना चाहिये ॥ २६८ ॥ दूसरेके द्रव्योंका अपहरण करना, अपने दम्योंके नाशका. देतु होता है । २६९ ॥ पोरीसे अधिक और कोई भी, दुःखमें डालनेवाला बन्धन नहीं होता ॥ २७० ॥ समयपर लपसी मी प्रार्थों को धारण करनेमें सहारा होतीहै ॥ १॥ मरेहुए वादीका दवाईसे कुछ मतलब नहीं रहता ॥२२॥ किसी २ समयमें अपने भाप भी, प्रभुताका प्रयोजन होता है ? ॥ २७३ ॥ नीचस्य विद्याः पापकर्मणि योजयन्ति ॥ २७४ ॥ पयः- पानमपि विषवर्धनं भुजङ्गस्य नामृतं स्यात् ॥ २७५ ॥ न हि धान्यसमो यर्थः ॥२७६ ॥ न क्षुधासमश्शत्रुः ॥ २७७ ॥ अकृतेनियता क्षुत् ॥ ३७८ ॥ नास्त्यभक्ष्यं क्षुधितस्य ।। २७९ ।। इन्द्रियाणि जरावशं कुर्वन्ति ॥ २८० ॥ सानुक्रोशं भर्तारमा- जीवेत् ।।२८१।। उन्धसेवी पावकेच्छया खद्योतं धमति ।।२८२॥ विशेषज्ञ स्वामिनमाश्रयेत् ।। २८३ ।।
..
(६४५)
कौटलीय अर्थशास्त्र
पिशुनवादिनो न रहस्यम् ॥ २४३ ॥ पररहस्यं नैव
श्रोतव्यम् ।। २४४ ॥ वल्लमस्य कारकत्वमधर्मयुक्तम् ॥२४५ ॥
स्वजनेष्वतिक्रमो न कर्तव्यः ।। २४६ ।। माताऽपि दुष्टा त्याज्या
॥ २४७ ॥ स्वहस्तोपि विपदिग्धश्छेद्यः ॥ २४८ ॥ परोपि च
हितो बन्धुः ॥ २४९ ॥ कक्षादप्यौपधं गृह्यते ॥ २५० ॥ ना-
स्ति चौरेषु विश्वासः ॥ २५१ ॥ अप्रतीकारेष्वनादरो न कर्तव्यः
॥ २५२ ॥ व्यसनं मनागपि वाधते ।। २५३ ।।
सुगलखोर भादमीको पात कभी छिपी नहीं रहती ॥ २४३ ॥ दूसरे
की सिपाहुई पातको कभी न सुनना चाहिये ॥ २४ ॥ मालिकका कठोर
होना, भधर्मयुक्त होता है (?) ॥ २४५ ॥ अपने आदमियों में व्यवहारका
अहंघन नहीं करना चाहिये ॥ २४६ ॥ दुष्ट माताको भी छोपदेना चाहिये
॥ २४७ ॥ विपसे भरेहुए अपने हाथको भी काटदेना चाहिये ॥ २४८॥
दूसरा भादमी भी हित करनेवाला अपना बन्धु ही होता है ॥ २४९ ॥ सूखे
जगलसे भी श्रौषधका ग्रहण कियाजाता है॥ २५० ॥ घोरों में कभी विश्वास
नहीं होता ॥ २५ ॥ विनरहित कार्योंके करने में कभी उपेक्षा न करनी
पाहिये ॥ २५२ ॥ थोड़ा भी ध्यसन अवश्य पोदा पहुंचाता ही है । २५३ ॥
अमरवदर्थजातमार्जयेत् ॥ २५४ ॥ अर्थवान् सर्वलोकस्य
बहुमतः ॥ २५५ ॥ महेन्द्रमप्यर्थहीनं न बहुमन्यते लोका
॥ २५६ ॥ दारिद्रयं खलु पुरुषस्य जीवितं मरणम् ॥ २५७ ॥
विरूपोऽर्थवान् सुरूपः ॥ २५८ ॥ अदातारमप्यर्थवन्तमर्थिनो
न त्यजन्ति ।। २५९ ॥ अकुलीनोपि कुलीनाद्विशिष्टः ॥२६॥
नास्त्यमानभयमनार्यस्य ॥ २६१ ॥ न चेतनवता वृत्तिभयम्
॥२६२ ॥ न जितेन्द्रियाणां विपयभयम् ॥ २६३ ॥ न कृतार्था-
नां मरणभयम् ।। २६४ ॥
भपने भापको भमर समझकर अर्थों का संग्रह करे ॥ २५ ॥ धनवान्
पुरुष, सब ही लोगोंका बहुत मान्य होता है ॥ २५५ ॥ अर्थहीन इन्द्रको
भी, संसार बड़ा नहीं मानता ॥ २५६ ॥ पुरुषकी दरिद्रता, निशिरा हो, जीते
हुए ही मरना है ॥ २५७ ॥ रूपहीन भी धनी पुरुष सुन्दर रूपयाला समता
जाता है ॥ २५८॥ न देनेवाले भी धनी पुरुषको, पाचक नहीं छोड़ते ॥२५॥
चाणक्यप्रणीत सूत्र मीच कुलमें सत्पन्न हुभा २ भी धनी पुरुष, उच्च कुलमें उत्पन हुए पुरुषसे पड़ा समझा जाता है ॥ २६० ॥ नीच पुरुषको अपने तिरस्कारका डर नहीं होता ॥ २६ ॥ ज्ञानवान् चतुर पुरुषको, अपनी जीविकाका भय नहीं होता ॥ २२ ॥ जितेन्द्रिय पुरपको, विपयोंसे भय नहीं होता ॥ २६ ॥ कृतकृस्य भर्थात् भारमज्ञानी पुरुपको मृत्युका भय नहीं होता ॥ २६४ ॥ कस्यचिदर्थ स्वमिव मन्यते साधुः ॥ २६५ ।। परविभवे- वादरो न कर्तव्यः ॥ २६६ ॥ परविभवेष्वादरोपि नाशमूलम् ॥२६७ ॥ पलालमपि परद्रव्यं न हर्तव्यम् ॥ २६८ ।। परद्रव्या- पहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः ॥२६९ ॥ न चौर्यात्परं मृत्युपाशः ॥ २७० ॥ यवागूरपि प्राणधारणं करोति काले ॥ २७१ ॥ न मृतस्यौपधं प्रयोजनम् ॥ २७२ ।। समकाले खयमपि प्रभु- स्वस्य प्रयोजनं भवति ॥ २७३ ।। सजन पुरुप, किसी भी दूसरेके अर्धको, अपने ही मर्यके समान समझता है ॥ २६५ ॥ दूसरेकी संपत्तियोंपर कमी दांत न लगाना चाहिये ॥ २१६ ॥ दूसरेकी संपत्तियोंको अपनाने का विचार भी नाशका कारण होता है ॥ २६॥ पुरालके समान भी दूसरेका दम्प, हडप नहीं करना चाहिये ॥ २६८ ॥ दूसरेके दन्योंका अपहरण करना, अपने द्रव्योंके नाशका हेतु होता है ॥ २६९ ॥ चोरीसे अधिक और कोई भी, दुःखमें डालनेवाला बन्धन नहीं होता ॥ २७ ॥ समयपर लपसी भी प्राणों को धारण करने में सहारा होतीहै ॥ १॥ मरेहुए आदर्माका दवाईसे कुछ मतलब नहीं रहता ॥२७२॥ किसी २ समयमें अपने आप भी, प्रभुताका प्रयोजन होता है ॥ २७३॥ नीचस्य विद्याः पापकर्मणि योजयन्ति ।। २७४ । पय:- पानमपि विपवर्धनं भुजङ्गस नामृतं स्यात् ॥ २७५ ॥ न हि धान्यसमो ह्यर्थः ॥ २७६ ॥न क्षुधासमश्शत्रुः ।। २७७ ॥ अकृतेनियता क्षुत् ॥ ३७८ ॥नास्त्यभक्ष्यं क्षुधितस्य ॥ २७९ ॥ इन्द्रियाणि जरावशं कुर्वन्ति ॥ ८ ॥ सानुक्रोशं भर्तारमा- जीवेत् ।।२८१॥ लुन्धसेवी पावकेच्छया सद्योतं धमति ॥२८२।। विशेषज्ञ स्वामिनमाश्रयेत् ।। २८३ ॥
(६४६) कौटलीय अर्थशास्त्र नीच पुरुषकी विधाएँ, उसको पापकर्ममें एगा देती है ॥ २७४ ।। सापको दूध पिलाना भी विप वदानवाला ही होता है, यह अमृत कमी नहीं धनसकता ॥ २७५ ॥ धान्य (अन) के समान कोई अर्थ (धन) नहीं है ॥२७६ ॥ भूखके समान कोई शत्रु नहीं है। २०७॥ धनहीन पुरुषको निश्चित ही भूख यहुत सतातो है ॥ २७८ ॥ भूखे आदमी के लिये कोई वस्तु अभक्ष्य नहीं होती ।। २७९ ॥ इन्द्रिया पुरपको बुदापेके अधीन करदेती हैं ॥ २८० ॥ दयालु मालिकके पास अपनी जीविका करे ॥ २८ ॥ लोभी मालिककी सेवा करनेवाल पुरपी, यहा हालत होती है, जो भागके लिये, जुगनूको लेकर उसमें फूक मारनेवालेही होती है ॥ २८२ ॥ खूप समझदार मालिकका माश्रय लेवे ॥ २८३ ।। पुरुषस्य मैथुनं जरा ।।२८४॥ स्त्रीणाममैथुनं जरा ॥२८५।। न नीचोत्तमयोःचाहः ॥२८६॥ अगम्यागनादायुर्यशःपुण्यानि क्षीयन्ते ॥ २८७ ॥ नास्त्यहवारसमशनुः ॥ २८८ ॥ संसदि शर्नु न परिक्रोशेत् ॥ २८९ ॥ शत्रुव्यसनं श्रवणसुसम् ।।२९०॥ अधनस्य पुद्धिन विद्यते ॥ २९१ ॥ हितमप्यधनस्य वाक्यं न गृह्यते ॥ २९२ ।। अधनस्वमार्ययाऽप्यवमन्यते ॥ २९३ ॥ पुष्पहीनं सहकारमपि नोपासते भ्रमराः ॥ २९४ ॥ विद्या धनमधनानाम् ॥ २९५ ॥ विद्या चौरेरपि न ग्राह्या ॥ ॥२९६॥ विद्यया ख्यापिता ख्यातिः ।। २९७ ॥ यशश्शरीरं न विनश्यति ॥ २९८॥ मैथुन, पुरुषका धुनापा है ॥ २४ ॥ भमैथुन स्त्रियोंका पुढापा है ॥ २८५ ॥ मीच और उत्तमका भापसमें विवाह नहीं होना चाहिये ॥२८॥ भगम्प स्त्रीके साथ गमन करनेसे भयु, यश और पुण्य, क्षीण होजाते हैं ॥ २८७ ॥ अहङ्कारके समान कोई शत्रु नहीं है ।। २८८ ॥ सभामें शत्रुकी निन्दा न करे ॥ २८९ ॥ शत्रुकी विपत्ति, कानों के लिये बधी सुखार होती है ॥ २९ ॥ धनहीन पुरुषके पुद्धि नहीं होती ॥ २९ ॥ धनहीन पुरएका हितकारक वाक्य भी ग्रहण नहीं कियाजाता ॥ २९२ ॥ धनहीन पुरा अपनी भायांस भी तिरस्कृत होता है ।। २९३ ॥ भोरे, पुष्पहीन अब्रवृक्ष पास भी, नहीं फटकने ॥ १९४ ॥ धनहीन पुरषोंका विद्या ही धन है ।। २९५ ॥ चियाको, चोर भी नहीं सस्ते ॥ २९६ ॥ विद्यासे सर्वत्र यश पैलगाता ॥ २९७ ॥ यश रूपी शरीरका कमी नाश नहीं होता ॥ २९८ ॥ r चाणक्यप्रणीत सूत्र (६७) यः परार्थमुपसर्पति न सत्पुरुषः ॥ २९९ ॥ इन्द्रि- याणां प्रशमं शास्त्रम् ।। ३०० ॥ अशास्त्रकार्यवृत्तौ शास्त्रांकुशं निवारयति ॥ ०१॥ नीचस्य विद्या नोपेतव्या ॥ ३०२ ।। म्लेच्छभापणं न शिक्षत ॥ ३०३ ॥ म्लेच्छानामपि सुवृत्तं ग्राह्यम् ॥ ३०४ गुणे न मत्सरः कर्तव्यः।।३०५||शत्रोरपि सुगुणो ग्राह्यः ॥ ३०६ ॥ विपादप्यमृतं ग्राह्यम् ॥ ३०७॥ अवस्थया पुरुपस्संमान्यते ।। ३०८ ॥ स्थान एव नराः पूज्यन्ते ॥३०९॥ आर्यवृत्तमनुतिष्ठेत् ॥ ३१० ॥ कदाऽपि मर्यादा नातिक्रमेद ॥३११॥ जो दूसरों के लिये कार्य करता है, वहीं सरपुरुष कहाता है ॥ २९९ ॥ इन्द्रियोंको शान्त करनेवाला होता है ॥ ३०० ।। भशास्त्रीय कार्य करने में लगजानपर, शाखरूपी अंकुश ही उसको रोकता है ॥ ३० ॥ नीच पुरुषको विद्या ग्रहण नहीं करनी चाहिये ॥ ३०२ ॥ म्लेच्छोंके समान बोलचाल की शिक्षा, न लेनी चाहिये ॥ ३०३ ॥ म्लेच्छोंका मी अच्छा वयहार ग्रहण करलेना चाहिये ॥ ३० ॥ गुणमें कभी मारतयं न करना चाहिये ॥ ३०५ ॥ शत्रुका भी अच्छा गुण ग्रहण करलेना चाहिये ।। ३०६ ॥ विषसे भी यमृतका प्रहण करलेना चाहिये ॥ ३० ॥ भवस्था से ही पु. पक संमान होता है ॥३०८ ॥ अपने स्थानपर ही पुरुषों की पूजा होती है । ३०९॥ सदा श्रेष्ठ पुरषोंके आचारका ही अनुष्ठान करे ॥ ३० ॥ मर्यादाका उलंघन कभी न करे ॥३॥ नास्त्यर्पः पुरुपरत्नस्य ॥ ३१२ ॥ न स्त्रीरत्नसमं रतस् ॥ ३१३ ॥ सुदुर्लभं रत्रम् ॥ ३१४ ॥ अयशो भयं मयेषु ॥ ३१५ ॥ नास्त्यलसस्य शास्त्राधिगमः ॥ ४१६ ॥ न स्त्रैणस खर्गाप्तिधर्मकृत्यं च ॥३१७॥ नियोपि स्त्रैणमवमन्यन्ते ॥३१८।। न पुष्पार्थी सिञ्चति शुष्कतरुम् ॥ ३१९ ॥ अद्रव्यप्रयत्नो बालु- काकथनादनन्यः ॥३२०॥ न महाजनहासः कर्तव्यः ॥३२॥ कार्यसंपदं निमित्तानि विशेषयन्ति ।। ३२२ ।। नक्षत्रादपि निमि- तानि विशेषयन्ति ॥३२३॥ न त्वरितस्य नक्षत्रपरीक्षा ॥३२४॥ पुरुष रखका ( पुरुषस्पी रनका, अर्थात् पुरुषों में जो सके सम्मान मेरो)को मूल्य नहीं होता ॥ ३.१ ली रके समान कोई एवं कौटलीय अर्थशास्र मजपूत जंजीर है ॥ ३५६ ॥ जो जिस कार्यमें घनुर हो, उसको उप्ती कार्यपर लगाना चाहिये ॥ ३५७ ।। दुष्ट स्त्री, मनस्वी पुरुषों के शरीरको घूसनेपाली होती है ॥ ३५८॥ अप्रमत्तो दारान् निरीक्षत ।। ३५९ ।। स्त्रीपु किंचिदपि न विश्वसेत ॥ ३६० ॥ न ममाधिः स्त्रीपु लोकज्ञता च ।। ३६१।। गुरूणां माता गरीयसी ॥ ३६२ ॥ सर्वावस्थासु माता भर्तव्या ॥ ३६३ ॥ वैदुष्यमलङ्कारणाच्छाद्यते ॥ ३६४ । स्त्रीणां भूपण लजा ।। ३६५ ।। विप्राणां भुपणं वंदः ॥ ३६६ ॥ सर्वेपां भूपणं धर्मः ॥ ३६७ ।। भूषणानां भूपणं सविनया विद्यते ॥ ३६८ ॥ अनुपद्रवं देशमावसेत् ।। ३६९ ॥ साधुजनपहुलो देशः ॥३७०॥ प्रमादरीहत होकर नीस निरीक्षग करे ॥ ३५९ ॥ खियोपर कुछ भी विश्वास नको ॥ ३६० ॥ विम निश्चलता तथा पयहारपटुता नहीं होती ॥ ७६१॥ सय बढी चीजों में माता की सबसे बड़ी होती है॥३१२॥ सप अवस्थाओं में माताका रण पापण करना चाहिये ॥ १३ ॥ विद्वत्ता, भलङ्कार (भाभूपण भादि) से तकदी जाती है ॥ ३६४ ॥ त्रियोंका भूषण सजा है ॥ ३६५ ॥ ब्राह्मणाका भूपण वेद है ॥ ३६६ ॥ सबका भूषण धर्म है ॥ ३६७ ॥ राजा आदिका, चिनयसे सहित होना, भूषणोंका भी भूषण होता है॥३६८॥ उपद्रवाहित देशमें मिवास करे ॥ ३६९ ॥ जहां साधुजन .बहुत रहते हों, वही देश होता है ॥ ३७॥ राज्ञो भेतच्यं सार्थकालम् ॥ ३७१ ॥ न राज्ञः परं दैवतम् ॥ ३७२ ॥ सुदूरमपि दहति राजवह्निः ॥ ३७३ ।। रिक्तहस्तो न राजानमभिगच्छेत् ॥ ३७४ । गुरुं च दैवं च ॥ ३७५ ॥ कुटुम्बिनो भेतव्यम् ॥ ३७६ ॥ गन्तव्यं च सदा राजकुलम् ।। ३७७ ॥ राजपुरुपैस्संबन्धं कुर्यात् ॥ ३७८ ॥ राजदासी न सेवितव्या ।। ३७९ ॥ न चक्षुपाऽपि राजानं निरीक्षेत ।।३८०॥ पुत्रे गुणवति कुटुम्बिनः स्वर्गः ॥ ३८१॥ पुत्रा विद्यानां पारं गमयितव्याः ॥ ३८२ ॥ राजासे सदा डरना चाहिये ॥ ३७१ ।। राजासे बढ़कर कोई दैवत मही होता ॥ ३१॥ राजारूपी भाग, बहुत दूर रहते हुए भी जलादेती है . - चाणक्य प्रणीत सूत्रे ॥ ३७३ । खाली हाथ राजाके पास न जावे ॥ ३७४ ॥ गुरु और देवताके पास भी रोते हाथ न जाये ।। ३७५ ॥ कुटुम्बासे डरना चाहिये ॥ ३७६ ॥ भौर राजकुलमें सदा जाना चाहिये । ३७७ ॥ यथाशक्ति राजपुरषोंके साथ सम्बन्ध करे ॥ ३७८ ॥ राजाकी दासीके साथ संग न करे ॥ ३७९ ॥ राजा को भी आँखस 'मर्थात् उसकी और आंख सठाकर ) न देखे ॥ ३८० ॥ पुत्रके गुणवान् होनेपर कुटुम्पी पुरुषका यहीं स्वर्ग होजाता है ॥ ३८१॥ पुत्रोंको विद्याओंके पार पहुंचादेना चाहिये अर्थात् उसको पूरा विद्वान् बना देना चाहिये ।। ३८२ ॥ जनपदार्थ ग्रामं त्यजेत् ॥ ३८३ ।। ग्रामार्थ कुटुम्बस्त्यज्यते ॥३८४॥ आतिलाभः पुत्रलाभः ॥ ३८५ ॥ दुर्गतेः पितरौ रक्षति स पुत्रः ।। ३८६ ।। कुलं प्रख्यापयति पुत्रः ॥ ३८७ ॥ नानप- त्यस स्वर्गः ॥ ३८८। या प्रसूते भार्या ॥३८९॥ तीर्थसमवाये पुत्रवतीमनुगच्छेत् ॥ ३९ ॥ सतीर्याभिगमनाद्ब्रह्मचर्य नश्यति ।। ३९१ ॥ न परक्षेत्रे बीजं विनिक्षिपेत् ॥ ३९२ ॥ पुत्रार्था हि स्त्रियः ॥ ३९३ ॥ जनपदके हितके लिये गांवको छोड़ देवे ॥ ३८३ ॥ गांवके लिये कुटुम्ब छोड दिया जाता है ॥ ३८४ ॥ पुत्रका लाभ, बहुत बड़ा लाम है ॥ ३८५ ॥ दुर्गतिले जो अपने माता पिताकी रक्षा करता है, वही पुत्र है ।। ३८६ ॥ पुत्र, अपने कुलको प्रसिद्ध करदेता है ॥ ३८ ॥ पुनहीन पुरुषको स्वर्गकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ३८८ ॥ जो स्त्री ऐसे पुत्रको उत्पन्न करती है, वही भार्या समझ. भी चाहिये ॥ ४८१ ॥ भनेक स्त्रियोंके एक साथही नातुमती होनेपर, उसी पीके पास जाये, जो पहिलेस पुत्रवती हो ।। ३९० ॥ रजस्वला स्त्रीके गमन करनेसे महा नष्ट होजाता है ॥ ३९ ॥ दूसरेके खेतमे श्रीज न डाले । अपात् परमी के साथ कदापि संग न करे ॥ ३९२ ॥ पुत्रोंके लियेही नियां होती है। ३९३ ॥ स्वदासीपरिग्रहो हि स्वदासभावः ॥ ३९४ ॥ उपस्थितवि. नाशा पथ्यवाक्यं न शृणोति ॥ ३९५ ॥ नास्ति देहिनां सुख- दुम्साभावः ॥ ३९६ ॥ मातरमित्र वत्साः सुखदुःखानि कर्तार- मेवानुगच्छन्ति ॥ ३९७ ॥ तिलमात्रमप्युपकारं शैलमात्रं मन्यते साधुः ॥ ३९८ ।। उपकारोऽनार्येष्वकर्तव्यः ।। ३९९ ॥.प्रत्युप- - कौटलीय अर्थशास्त्र कारभयादनार्यश्शत्रुर्भवति ।। ४०० खल्पमप्पुपकारकृते प्रत्यु- प्रकारं कर्तुमार्यो न स्वपिति ॥ ४०१ ॥ अपनी दासीको स्वीकार करलेनाही, अपने आपको दास बना लेना ॥३९४ ॥ जिसका विनाश उपस्थित होता है, यह हिचकर घायको नहीं सुनता ॥ ३९५ ॥ प्राणियोंके सुख और दुःखका अमाव नहीं होता । भयात् प्राणियों के सुख और पनेही रहते हैं ॥ ३९६ ॥ जैसे वधे माताके सायही जाते हैं, इसी तरह सुख और दुःख, कत्तांके साथही लगे रहते हैं॥ ३९ ॥ तिलमात्र उपकारको भी साधु पुरष पर्वतके समान मानता है ॥ ३९८ ॥ नीच पुरुषोंपर उपकार न करना चाहिये ॥ ३९९ ॥ उपकरका बदला देने के से, नीच पुरुप शत्रु होजाता है ॥ ४०० ॥ श्रेष्ठपुरप, थोडेसे उपकारके बदले में भी प्रस्युपकार करने के लिये कभी चुप नहीं रहता ॥ १.१॥ न कदापि देवताऽवमन्तव्या ॥ ४०२ ॥ न चक्षुपः समं ज्योतिरस्ति ॥ ४०३ ॥ चक्षुर्हि शरीरिणां नेता ॥ ४०४ ॥ अप- चक्षुपः किं शरीरेण ।। ४०५॥ नाप्सु मूत्रं कुर्यात् ।। ४०६॥ न नमो जलं प्रविशत् ॥ ४०७॥ यथा शरीरं तथा ज्ञानम् ॥४०८ ॥ यथा बुद्धिस्तथा विभवः ॥ ४०९ ॥ अनावग्निं न निक्षिपेत् ॥ ४१० ॥ तपखिनः पूजनीयाः ।। ४११ ॥ परदारान् न गच्छेत् ॥ ४१२ अन्नदानं भ्रूणहत्यामपि मार्टि ॥ ४१३ ।। न वेदवायो धर्मः ॥ ४१४ ।। कदाचिदपि धर्म निपेवेत ॥४१५॥ देवताका कभी तिरस्कार न करना चाहिये ॥ ५०२ ॥ चक्षुके समान, कोई ज्योति नहीं है ॥ ४०३ ॥ अक्षुही प्राणियोंका नेता है ॥ १०४ ॥ चक्षु रहित प्राणीको शरीरसे क्या ॥ ४०५ ॥ जलमें मूर न करे, ॥ ३०६ ॥ नंगा होकर जलमें प्रवेश न करे ॥ १०७ ॥ जैसा शरीर होता है, कैप्साही ज्ञान होता ॥ ४ ॥ जैसी घुद्धि होती है, उसीके अनुसार विभव मर्यात् ऐश्वर्य होता * ॥ १.९॥ भागमें भागको न फेंके ॥ १० ॥ तपस्वियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये ॥ ११॥ परनियों के साथ गमन न करे ॥ १२ ॥ भक्षका दान करना, भ्रूणहत्याको भी साफ करदेता है ॥ १३॥ वेदवाहा, धर्म नहीं होता ॥ १४॥ सदाही धर्मश्री सेवन करता रहे ॥ ४॥५॥ "वर्गनियति सुनृतम् ॥ ४१६ ॥ नास्ति सत्यात्परं सपा Hire७॥ सत्यं खर्गस्य साधनम् ॥४१८॥ सत्येन पार्यते
विशेष प्रयक्षके विनाही जहां जल प्रास होसके, वहीं खेत समझना चाहिये
॥ ४५ ॥ ऐस्टका सहारा लेकर हाथीको कुपित न करे ॥५५२ ।। बहुत
सादा चौटाया पदा दुभा भी सिभरका वृक्ष, हाथी को रोकनेवाले सम्भका
काम नहीं देता ॥५६॥ बहुत बड़ा मी नेरका वृक्ष, मुसस बनाने के
नीच
कौटलीय अर्थशास्त्र
दुष्करं कर्म कारयित्वा कर्तारमवमन्यते नीचः ॥ ४३८ ।।
नाकृतज्ञस्य नरकानियतनम् ॥ ४३९॥ जिह्वायत्ता वृद्धिविनाशा
॥ ४४० ॥ विपामृतयोराकरी जिह्वा ॥४४१ ॥ प्रियवादिनो
न शत्रुः ॥ ४४२ ॥ स्तुता अपि देवतास्तुष्यन्ति ॥ ४४३ ॥
अनृतमपि दुर्वचनं चिरं तिष्ठति ॥ ४४४॥ राजद्विष्टं न च वक्त
व्यम् ॥ ४४५ ॥ श्रुतिसुसात् कोकिलालापास्तुप्यन्ति ।।४४६
स्वधर्महेतुस्सत्पुरुषः ॥ ४४७ ॥
पुरुष, पहिले किसीसे कठिन कार्य करवाकर फिर उस कार्य की
को तिरस्कृत करदेता है। ४३८ ॥ कृतप्त पुरुष, कभी नरकस नहीं लौटता
॥ ३९ ॥ वृद्धि और विनाश, जिह्न केही अधीन है ॥ ४४० ॥ जिद्धा, विष
और अमृत दोनोंकीही खान है ॥ १४ ॥ प्रियवादी पुरपका कोई शत्रु नहीं
होता ॥ ४४२ ।। स्तुति किये जानेपर देवता भी सन्तुष्ट होजाते हैं ।। ४४३ ॥
झला भी दुर्वधन चिरकालता याद रहता है ॥ ४४४ ॥ राजाके विरुद्ध न
कहना चाहिये ॥ ४४५ ॥ कानोंको सुख देनेवाले कोयलके समान भालापर!
पुरुष सन्तुष्ट होजाते हैं ॥ १४६ ॥ अपनेही धर्मके कारण पुरुष, सरपुरुष
हा है॥४४॥
नास्त्यर्थिनो गौरवम् ।। ४४८ ॥ खीणां भूपर्ण सौभाग्पम्
॥४४९ ॥ शत्रोरपि न पातनीया पृत्तिः ॥ ४५ ॥ अप्रयत्नो
दक क्षेत्रम् ॥ ४५१ ॥ एरण्डमवलम्व्य कुजरं न कोपयेत्
॥४५२|| अतिप्रवृद्धा शाल्मली वारणस्तम्भो न भवति । ४५३॥
अतिदीर्घोपि कर्णिकारो न मुसली ॥ ४५४ ॥ अतिदीप्तोपि ख-
घोतो न पायकः ॥ ४५५ ॥ न प्रवृद्धत्वं गुणहेतुः ॥ ४५६ ।।
सुजीर्णोपि पिचुमन्दो न शकुलायते ॥ ४५७ ॥
पात्रकका कभी गौरव नहीं होता ॥४८॥ सौभाग्यही खियोंका
भूपण है ॥ ४४९ ॥ शत्रुके भी जीवननिर्वादको, नष्ट न करना
चाहिये ॥५०॥