Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur

Lati Samhita

Sharma, Giradhar · 2010/06

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Front matter

प्रकाशक
शास्त्र सभा
अहिंसा मन्दिर,
१, दरियागज, नई दिल्ली-२
मूल्य • स्वाध्याय
प्रथम सस्करण
१००० प्रतियाँ
वीर स० २५१३
सन् १९८८
मुद्रक
शकुन
प्रिंटर्स
नवीन
शाहदरा,
दिल्ली-११००३२

प्राक्कथन जैन धर्म मूल मे निवृत्ति-प्रधान है क्योकि मोक्ष का प्रधान कारण निवृत्ति है किन्तु गृहस्था- श्रम प्रवृत्ति प्रधान होता है । प्रवृत्ति के बिना गृहस्थाश्रम का निर्वाह असम्भव है। श्रावक धर्म ही नहीं, अपितु, मुनिधर्म का भी मूल आधार सम्यग्दर्शन है, इसलिए सभी श्रावका- चारो मे सर्वप्रथम सम्यक्त्व का ही वर्णन किया गया है। परन्तु इसके विषय मे अलग-अलग महान आचार्यों ने विभिन्न विशेषताओ पर जोर दिया है। सम्यग्दर्शन सज्ञी (मनसहित) पचेन्द्रिय जीवो को ही हो सकता है और वह हर काल और हर गति मे होता है ऐसी भगवान सर्वज्ञ की आज्ञा है। इसके विपरीत इस पचम काल मे निश्चय सम्यग्दर्शन और स्वानुभूति नही हो सकती ऐसा मानना ठीक नहीं है। सम्यकदर्शन अपना ही गुण होने से इसके लिए कही जाना नहीं पडता । इसे अपने मे ही खोजना पडता है इसीलिये इसको प्राप्त करना बहुत सरल है तथा अत्यन्त कठिन और दुर्लभ नही है । इसका उपाय अध्ययन और ध्यान का निरन्तर करते रहना है । महान आचार्यों ने इस विषय मे जो लिखा है उसकी स्वाध्याय और उस पर मनन-चिन्तन करते रहना चाहिये और तत्व-सबधी श्रद्धा को सही करना चाहिए । ज्ञान ज्यो-ज्यो सही होगा मिथ्यात्व कर्म की गाठ ढीली पडती जाएगी और मिथ्यात्व ज्यो-ज्यो ढीला पडेगा स्वाध्याय और ज्ञान-उपार्जन की रुचि और अधिक बढेगी और इस क्रम से एक दिन तम्यग्दर्शन प्राप्त हो ही जाता है। सम्यक् दर्शन हुआ कि नही, इसकी पहचान शास्त्रो मे प्रशम, सवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य से बताई है। दूसरो को पता चले या न चले पर स्वय अपने को स्वानुभूति या स्वय के अनुभव से पता चल ही जाता है। जीवराज ग्रन्थमाला शोलापुर से "श्रावकाचार सग्रह" पाच भागो मे प्रकाशित हुआ है। इसमे ३६ श्रावकाचारो का सग्रह किया गया है । यह इस ग्रन्थमाला की अनुपम देन है और जैन समाज को इस सस्था का आभारी होना चाहिए। इन सब ग्रन्थो को इकट्ठा करना, पुरानी हस्तलिखित प्रतियो से मिलान करना, उनका अनु- वाद करना और प्रेस कापी तैयार करना, यह सब एक जटिल कार्य है और केवल एक व्यक्ति के लिए तो यह सब काम असम्भव-सा जान पडता है पर सिद्धाताचार्य प० हीरालाल शास्त्री न्यायतीर्थ (साढुमल वालो) ने इस असम्भव काम को सम्भव कर दिखाया। जैन समाज अनेक पीढियो तक उनका ऋणी रहेगा। इन ही पण्डित जी के कथनानुसार उन ३६ श्रावकाचारो मे लगभग १५ ग्रन्थ महान आचार्यों द्वारा रचित ऐसे हैं जिनमे से किसी भी ग्रथ या ग्रथो को कोई भी मुमुक्षु सम्यक दर्शन की प्राप्ति का निमित्त बनाना चाहे तो बना सकता है और रत्नत्रय मे से इस परम आवश्यक रत्न को उपरोक्त ढग से (अध्ययन और ध्यान द्वारा) प्राप्त कर सकता है। इन १५ ग्रन्थो को अलग-अलग प्रकाशित कराने की परम आवश्यकता है। . 1 ( iv) पण्डित हीरालाल जी के अतिरिक्त सभी विद्वानो ने १०८ श्री समन्तभद्र स्वामी द्वारा रचित "रत्नकरण्ड श्रावकाचार" को पहला नम्बर दिया है । इसमे दो मत नही हैं और इसीलिए प्रस्तुत ग्रन्थ मे रत्नकरण्ड श्रावकाचार का पण्डित गिरधर शर्मा कृत हिन्दी पद्यानुवाद परिशिष्ट के रूप मे दिया है। इसे तो. कण्ठस्थ ही कर लेना चाहिए। पण्डित हीरालाल जी ने ग्रंथो का मूल्याकन करने मे १, २, ३ का कोई क्रम तो नही रखा है पर "लाटी-सहिता” की प्रशसा को देखकर ऐसा जान पडता है कि रत्नकरण्ड के बाद दूसरा नम्बर इसी का है । वे लिखते हैं कि “पण्डित राजमल्ल जी ने सम्यक्त्व का जो अपूर्व सागोपाग व सूक्ष्म वर्णन किया है वह श्रावकाचारो मे तो क्या करणानुयोग या द्रव्यानुयोग के किसी भी शास्त्र मे दृष्टिगोचर नहीं होता। सम्यक्त्व विषयक उनका यह समग्न विवेचन पढ़कर मनन करने योग्य है । प्रशम सवेगादि का विशद वर्णन करते हुये लिखा है कि ये बाह्य दृष्टि से सम्यक्त्व के लक्षण हैं। यदि वे सम्यक्त्व के बिना हो तो प्रशमाभास आदि जानना चाहिए। परन्तु स्व० पण्डित कैलाशचन्द्र शास्त्री का मत है कि 'रत्नकरण्ड' के पश्चात् नम्बर आता है "पुरुषार्थ सिद्धयुपाय" का। यह अध्यात्मी आचार्य अमृतचन्द्र की कृति है और उस पर उनके अध्यात्म की छाप सुस्पष्ट है । प्रारम्भ के १५ पद्य बहुमूल्य हैं। आदि की तरह इस ग्रथ का अन्त भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं । इस तरह का श्रावकाचार यही एक मात्र है।" अन्त मे मैं वह बात कहना चाहता हूँ कि जो मुझे सर्वप्रथम कहनी चाहिए थी और वह यह कि "लाटी-सहिता" के इस सस्करण को प्रकाशित करने का सम्पूर्ण श्रेय श्री बाबूलाल जी कलकत्ते वालो को जाता है क्योकि उन्होने ही पहले शास्त्र सभा मैं गद्दी पर इसका स्वाध्याय किया था और कहा था कि यह प्रथ तो अलग से छप जाय तो अच्छा है । उनकी प्रेरणा से ही इसे छपवाने का प्रबन्ध किया गया । इसके अतिरिक्त मेरी प्रार्थना पर उन्होंने इस ग्रन्थ की प्रस्तावना लिखने की स्वीकृति भी प्रदान की। यह प्रस्तावना अगले पृष्ठ से प्रारम्भ होती है और अपने मे मोक्षमार्ग पर एक स्वतन्त्र और सम्पूर्ण ट्रैक्ट है । साधक कहाँ कहाँ ठोकर खाता है यह बात उन्हें स्वाध्याय और स्वानुभव से भली प्रकार मालूम है और इस ही का वर्णन उन्होने इस प्रस्तावना मे किया है। इतना ही नहीं, अथ की छपाई के खर्चे में भी उन्होंने अपना योगदान दिया है । इस सबके लिए धन्यवाद देने और आभार प्रकट करने के लिये मेरे पास यथायोग्य और पर्याप्त शब्द नहीं हैं। श्री बाबूलाल जी के दिल मे कविवर श्री राजमल्ल जी के लिए बडी श्रद्धा और बहुमान है । उन्हें वे एक बेजोड ग्रंथकर्ता मानते हैं । कुछ साल पहले इन्ही की प्रेरणा से स्व. श्री महेन्द्रसेन जैनी ने कविवर राजमल्ल जी की -समयसार-कलश पर ढुढारी भाषा की टीका का हिन्दी मे अनुवाद किया था। इस नथ की प्रस्तावना भी श्री बाबूलालजी ने ही लिखी है और बार बार पढ़ने और मनन करने योग्य है । सभी मुमुक्षुओं को (जिनमे मैं स्वय भी शामिल हूँ) निश्चय सम्यक् दर्शन और स्वानुभूति की प्राप्ति शीघ्रातिशीघ्र हो यही मेरी एक मात्र भावना है। .-अजीत प्रसाद व्यवस्थापक प्रस्तावना "जो सत्यारथ रूप सो निश्चय, कारण सो व्यवहारो" जिन शासन मे चार अनुयोग है। चारो ही अनुयोग मोक्ष मार्ग का अपनी अपनी मुख्यता से उपदेश देते हैं। चारो अनुयोगो वी एकता होना ही सच्ची समझ है । पूज्यनीय वर्णीजी कहा करते थे कि एक ब्राह्माणी के चार लडके थे । किसी ने सबसे छोटे लडके को जीमने का न्यौता दिया। यह समझकर कि यह सबसे कम खायेगा । उस ब्राह्मणी ने कहा कि चाहे छोटे को न्यौता दो या बड़े को सभी पाँच पसेरी हैं। याने खाने मे सभी वराबर हैं । यहा पर भी यही कह रहे है कि चारो अनु- योगो मे कोई छोटा बडा नही है । हमारी बात सही बही है जो चारो अनुयोगो को पुष्ट करे किसी का निषेध न करें। किसी ने चरणानुयोग से पूछा कि मोक्ष कैसे हो उसने जवाब दिया कि मुनिव्रत धारण करने से मोक्ष होगा । फिर करणानुयोग से पूछा कि मोक्ष कैसे हो उसने जवाब दिया कि कर्मो का नाश कर दो मोक्ष हो जाएगा। उसने फिर अध्यात्म से पूछा कि मोक्ष कसे हो, तब उसने जवाब दिया कि आत्मा रमण करने से मोक्ष हो जायेगी। जब प्रथमानुयोग से पूछा गया, तब उसने जवाब दिया कि पहले तीर्थकरादि हुये है उन्होने ससार शरीर भोगो का त्याग करके मुनिव्रत धारण कर, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र की एकता को प्राप्त किया और मोक्ष गए आगे भी इसी उपाय से मोक्ष जाएंगे। इस प्रकार चारो अनुयोगो ने अपने अपने विषय की मुख्यता से कथन किया। उनकी एकता तभी हो सकती है जब एक दूसरे की सापेक्षता रहे । जैसे अगर मोक्ष प्राप्त करना है तो बाहर मे मुनिव्रत धारण कर अपनी आत्मा मे रमण करे तो कर्मो का नाश कर मोक्ष की प्राप्ति हो । ऐसा ही भूतकाल मे हुआ है और आगामी काल मे भी ऐसा ही होगा। यह चारो की एकता है । चरणानुयोग का कथन अध्यात्म सापेक्ष है और अध्यात्मका उपदेश चरणानुयोग सापेक्ष है। यह सापेक्षता बिना कहे हमारे ज्ञानमे आ जानी चाहिए। व्रत धारण करने से मोक्ष होगी उसका अर्थ है व्रत धारणकर अपने स्वरूपमे रमण करेगा तो मोक्ष होगी। इसी प्रकार अगर यह कहा जा रहा है कि अपने स्वरूप में रमण कर तब उसका अर्थ है बाहर से हट- कर अपने मे रमण कर । यह भी बिना कहे हमारे ज्ञान मे आनी चाहिए यही अनुयोगो के कथन की सापेक्षता है। चरणानुयोग वाहरी साधन सामग्री का वर्णन करता है और अध्यात्म अन्तरंग साधन सामग्री का वर्णन कर रहा है । जैन शासन का पूरा स्वरूप वही बनता है जहा अध्यात्म और चरणानु- योग की एकता बनती है। दोनो को अलग-अलग करने से दोनो ही कार्यकारी नही रहते । एक द्रव्य दृष्टि का एकान्त वन जाएगा और दूसरा पर्याय दृष्टि का एकान्त हो जाएगा। चरणानुयोग मे पर्याय दृष्टि की मुख्यता से वर्णन है पर्यायदृष्टि मे ग्रहण भी है और त्याग भी है। इसलिए पर्याय दृष्टि से जव उपदेश दिया जाता है तब त्याग का उपदेश दिया जाता है। कुछ लोग चरणानुयोग के कथन को द्रव्यदृष्टि की मुख्यता करके यह कह देते है कि मैं ग्रहण त्याग से शून्य हूँ। तब व्रतादि धारण करना-मुनिव्रत धारण करना—यह उपदेश सब निरर्थक हो जाता है । चरणानुयोग का कथन पर्याय दृष्टि से करना चाहिए जहाँ ग्रहण है वही उसके त्याग का उपदेश है । और वह ग्रहण त्यागे बुद्धि पूर्वक किया जाता है। ।

VI । शुभ भाव दो प्रकार के है एक दयारूप परिणाम-गरीबो की, दुखी लोगो की देख-भाल करना, दानादि करना- लोगो का उपकारादि करना । दूसरा सच्चेदेव शास्त्र गुरू के आश्रित होते हैं उनके प्रति भक्ति का होना, उनके गुणो का चिन्तवन करना आदि । यह दूसरे प्रकार का शुभोपयोग मात्र वन्ध का ही कारण नहीं है यह अपने स्वभाव की प्राप्ति मे बाहरी साधन भी है । सच्चे देव शास्त्र गुरू को माध्यम बनाकर हम अपने स्वभाव के निकटवर्ती हो सकते है- स्वभाव की प्राप्ति का उपाय कर सकते हैं। व्रत-उपवासादी के द्वारा कषाय को मन्द करके स्वभाव की प्राप्ति का या उसमे ठहराव का उपाय कर सकते हैं। जो लोग शुभोपयोग को मोक्ष का कारण मानकर अथवा इसी को धर्म मान- कर इसमे लगे हुए थे उनको यह बध का कारण है धर्म नहीं है, धर्म तो वीतराग भाव है । ऐसा कहकर वीतराग भाव मे लगाने का उपाय किया । जो लोग बध का कारण मानकर अशुभोपयोग के समान इसको हेय समझ कर अपने स्वभाव की प्राप्ति का उपाय नही कर रहे थे उनको स्वभाव की प्राप्ति का साधन बताकर उसको माध्यम बनाने का उपदेश दिया। यह व्यवहार धर्म है । इसकी व्याख्या पहितवर टोडरमल जी ने की है कि यह धर्म नहीं है परन्तु धर्म का बाहरी साधन है इसलिए साधन मे साध्य का उपचार करके इसको व्यवहार (उपचार) से धर्म कहा है इसी को धर्म न मानना परन्तु धर्म का बाहरी साधन मानना । प्रश्न होता है कि जो बध का कारण है वह साधन कैसे हो सकता है। इसका उत्तर है कि एडवरटाइजमेन्ट का खर्चा यद्यपि खर्चा है उतना रुपया नफे मे से कम हो जाता है परन्तु एडवरटाइज- मेन्ट का खर्चा, खर्चा होते हुये भी नफा का बाहरी साधन है । अगर कोई एडवरटाइजमेन्ट तो बहुत करे और माल बेचने का पुरुषार्थ न करे तो नुकसान ही होगा। परन्तु जो एडवरटाइज करके दुकान खोल कर माल वेचने का पुरुपार्थ करे तो नफा हो । इसी प्रकार शुभोपयोग से बन्ध होता है यह सही है जितने अश मे राग है उतना वध जरूर होगा। परन्तु जब तक शुद्धोपयोग की प्राप्ति न हो तव तक तीव्र कषाय से बचने के लिए और मद कषाय मे रहकर शुद्धोपयोग की प्राप्ति का उपाय करते रहना जरूरी है। इससे स्वरूप की पुष्टि होती है । पुण्य वध तो गौण फल है मुख्य तो स्वभाव की पुष्टि करना-वीतरागता के प्रति-तत्व ज्ञान के प्रति तीव्र रुचि का होना इसका मुख्य फल है । इसीलिये आचार्यों ने इसका विधान किया और व्यवहार धर्म के नाम से कहा है। इसलिए इसको वध का कारण कहने के साथ साधनपने की दृष्टि वताना भी जरूरी है । साधनपना भी उसी के लिए है जो स्वरूप की प्राप्ति के लिए अथवा स्वरूप मे ठहरने के लिये इनको माध्यम बनाता है । जो कोई अन्य अभिप्राय -~-मान बडाई अथवा पुण्य बध का माध्यम बनाता है उसके निए स्वरूप की प्राप्ति का माध्यम या साधन नही बनता है । यह भी हमारे पर ही निर्भर है। श्री समयसार मे आचार्यों ने इसको हस्तालवन नाम दिया है । जैसे बच्चे को पहले गाडुला का अवलम्बन दिया जाता है और जब उसके अवलम्बन से चलना आ जाता है तो उस गाडुले का अव- लवन छुटाया जाता है इसीप्रकार व्यवहार का अवलम्वन दिलाया भी गया है और व्यवहार का अव- लबन छुटाया भी गया है । कोई मात्र व्यवहार का अवलम्बन छुटाया गया है यह मानकर व्यवहार का अवलम्बन नही लेता है-जैसे गाडुले का अवलम्बन नही लेता है उसकी तरह उसको निरालम्बन चलना नही आ सकता । जवकि व्यवहार हजारों विकल्पो को तुडवाकर एक विकल्प को पकडवाता है तव अध्यात्म एक को छुडाकर स्वभाव मे लगाता है । ससार शरीर भोगो का विकल्प बहुत गहरा होता है उससे हटाकर तत्व के विकल्प मे लगाया और वहां से हटाकर स्वभाव मे लगाया। विकल्प तो दोनो - - (vii) ही है परन्तु दोनो के अन्तर को समझना भी जरूरी है। पण्डितवर टोडरमल जी ने यह लिखा है कि अशुभ विकल्प से बचकर शुभभाव हो तो खुश भी होता है पर उसको कम घाटा समझता है ज्यादा घाटा से बचने की खुशी भी है परन्तु उसको नफा नही मानता। श्री समयसार मे प० जयचन्द जी पाचवे कलस का भावार्थ लिखते हुए और कलस १११ का पुण्य-पाप अधिकार मे भावार्थ लिखते हुये खुलासा किया है और सच्चे देव शास्त्र गुरू के आश्रित शुभ भावो को साधनपने की दृष्टि से मजूर किया है। कहने का अभिप्राध यही है कि चरणानुयोग को मात्र बन्ध का कारण कहने से लोगों की चर- नुयोग के प्रति श्रद्धा ही खत्म हो गई है व्रतादि धारण करे अथवा न करे परन्तु व्रतादि के प्रति हमारी श्रद्धा सही रहनी चाहिए। लोग आचरण से रहित तो पहले ही हो रहे है ऐसा उपदेश मिलने पर आच- रण के प्रति श्रद्धा भी नही रहेगी-करेले की बेल नीम पर चढ जायेगी । ऐसा ही होता मालूम दे रहा है। पहली सीढी पर आकर दूसरी सीढी पर चढने का उपाय करे उसके लिये पहली सीढी साधन है परन्तु जो दूसरी सीढी पर चढने का उपाय न करे और पहली पर ही सन्तुष्ट हो जाये अथवा ऐसा माने कि पहली पर आने से दूसरी पर अपने आप पहुच जाऊँगा ऐसा मानना मिथ्या है। प्रवचन सार मे चरणानुयोग चूलिका मे गाथा २०१ की टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द स्वामी लिखते हैं । अहोअनशनावमोदर्य स्वाध्यायध्यानव्युत्सर्गलक्षणतपआचार, न शुद्धस्यात्मत्वम- सीति निश्चयेन जानामि तथापि त्वा तावदासीदामि यावत् त्वत्प्रसादात् न शुद्धस्यात्मानमुपलभे इत्यादि-इसका अर्थ है अहो अनशन, अवमोदर्य-स्वाध्याय, ध्यान और व्युत्सर्ग स्वरूप तपाचार मैं यह निश्चय से जानता हूँ कि तू शुद्धात्मा का नही है तथापि तुझे तब तक अगीकार करता हूँ जब तक तेरे प्रसाद से शुद्धात्मा को उपलब्ध कर लू । यहाँ पर दो शब्द विचारने योग्य है तू "शुद्धात्मा का नही है" इससे बध का कारण साबित किया है और "तेरे प्रसाद से” इस शब्द के द्वारा साधनपना स्वीकार किया। क्या तत्त्व विचार करने से व्रत उपवास करने से अथवा जिन पूजन-भक्ति करने से ससार शरीर भोगो की पुष्टि होती है अथवा अपने शुद्धात्मा के स्वभाव की पुष्टि होती है ? अगर पुण्य बन्ध की पुष्टि होती है तब आश्रय लेने योग्य नही । अगर स्वभाव की,.सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र की पुष्टि होती है तो उसका नीचे के गुण स्थानो मे यथायोग्य अवलम्बन लेना जरूरी है। जीव वर्तमान में पराधीन हो रहा है उसको स्वाधीन होना है यह पर्याय दृष्टि की बात है। शरीर के आधीन है गर्मी-सर्दी के आधीन है चार बार चाय चाहिए, कपडा चाहिए, खाने को चाहिये यह सब पराधीनता है उस पराधीनता को क्रम से हटाया गया है । और स्वाधीनता की तरफ त्याग मार्ग के द्वारा लगाया गया है । एक गृहस्थ से एक ब्रह्मचारी ज्यादा स्वाधीन है और उससे एक मुनी और ज्यादा स्वाधीन है । जिसको कोई चीज की जरूरत नहीं है। इस प्रकार चरणानुयोग के द्वारा पराधीनता क्रम से दूर करके इसको स्वाधीनता की तरफ ले जाया जाता है। पाप का त्याग तो हर हालत मे करना चाहिए चाहे सम्यग्दृष्टि हो या मिथ्यादृष्टि जिनको भेद विज्ञान नही हुआ है वे भी व्रतादि धारण कर सकते है । परन्तु उनको यह मानना चाहिए कि व्रतादि धारण करने से मैं मोक्षमार्गी हो गया ऐसा नहीं है परन्तु मोक्षमार्ग तो सम्यग्दर्शन होने पर ही होगा। ऐसा जीव अगर मुनिपना धारण किए हुए है तो पहले से सीधा सतवाँ गुणस्थान हो सकता है। -- (viii) इसलिये जहाँ शुभराग को बन्ध का कारण कहा जा रहा है वहा उसके साधनपने का कथन करना भी जरूरी है। यह ग्रन्थ लाटी-सहिता राजमल कवि की रचना है । राजमल जी ने पचाध्यायी नाम का ग्रन्थ बनाया जो अपने ढग का अद्वितीय ग्रन्थ है । वह पूरा नहीं हो सका । जिस प्रकार पचाध्यायी मे हरेक बात न्याय युक्ति से सिद्ध करके बताई गई है उसी प्रकार इस ग्रन्थ मे भी सम्यग्दर्शन के विषय को न्याय युक्ति से सिद्ध करके समझाया गया है इसके बाद ११ प्रतिमा रूप श्रावक के आचरण का वर्णन है वह भी न्याय युक्ति से सिद्ध करके बताया है। स्वाध्याय प्रेमियों के लिए यह ग्रन्थ बहुत जरूरी है। यह छपा हुआ उपलब्ध नहीं हो रहा था। इसलिये शास्त्र सभा मे बैठने वालो की, खासकर वयोवृद्ध श्री अजीत प्रसाद जी की प्रेरणा से इसको छपवाने का निश्चय किया गया है। श्री अजीत प्रसाद जी स्वाध्याय प्रेमी हैं । जबसे मैं दिल्ली आया १९७० से बराबर शास्त्र ध्वाध्याय मे बैठते हैं । इसके लिए शास्त्र सभा के बैठने वाले भाई बहन और खासकर अजित प्रसाद जी धन्यवाद के पात्र हैं। श्री अजीत प्रसाद जी ने इसके छपवाने मे बडी मेहनत करी है तथा सब भाई बहनो ने इसके छपवाने मे सहयोग दिया है। सभी भाई-बहनो से अनुरोध है कि इस ग्रन्थ का स्वाध्याय बरावर करें और चरणानुयोग के अनुसार अपने आचरण को सही बनाने की चेष्टा करें। - । -बाबूलाल जैन सन्मति बिहार, २/१० अन्सारी रोड, दरियागंज़ मई,दिल्ली-११०००२ पृष्ठ iii V XI १ १ mm ५ विषय-सूची क्र०स० विषय १. प्राक्कथन २. प्रस्तावना ३. मगलाचरण (लाटी-सहिता) ४ धर्म का स्वरूप और व्रत का लक्षण ५ श्रावको की तिरेपन क्रियाओ का वर्णन ६ दार्शनिक श्रावको का स्वरूप ७ दार्शनिक श्रावक को अष्टमूलगुण धारण करने का उपदेश तथा चर्मपात्रगत घृत तैल आदि त्यागने का विधान ८ खाद्य स्वाध आदि भक्ष्य पदार्थों को शोधकर खाने का उपदेश ६ साग-भाजी आदि के ग्रहण करने का निषेध १०. रात्रि-भोजन-त्याग का विधान ११ दही छाछ आदि के मर्यादा से बाहिर न खाने का विधान १२ मदिरा, भाग, अफीम आदि के सेवन का निषेध १३ मधु-त्याग का उपदेश १४ उदम्बर फलो के त्याग का उपदेश १५. कदमूल आदि साधारण वनस्पति भक्षण का निषेध १६ सप्त व्यसन त्याग का उपदेश १७. सम्यक्त्व की दुर्लभता और महत्ता का वर्णन १८. सम्यग्दर्शन का स्वरूप और उसके निश्चय तथा व्यवहार १६ सम्यक्त्वी के प्रशम सवेग आदि गुणो का सयुक्तिक वर्णन २० कुलाचार क्रिया का व्रत रूप से पालन करने पर ही पचम गुण स्थानवर्ती दार्शनिक सज्ञा होती है, अन्यथा नही २१ सम्यग्दर्शन के आठ अगो का विस्तृत वर्णन २२ श्रावक व्रतो के धारण करने योग्य पुरुष का निरूपण २३ यद्यपि सम्वक्त्वी पुरुष का व्रत-ग्रहण मोक्ष के लिए होता है, तथापि सम्यक्त्वी, मिथ्यात्वी, भव्य और अभव्य को भी व्रत धारण करने का उपदेश २४ पुण्य क्रियाओ के करने का उपदेश २५ अणुव्रत और महाव्रत का स्वरूप २६ हिंसा पाप का निरूपण २७ एकेन्द्रियादि जीवो का विस्तृत विवेचन २८ प्रमत्तयोगी सदा हिंसक है, अप्रमत्तयोगी नही & १० १० ११ १७ ३० ३१ ३८ ५० ७८- ८१ ८३ ८४ ८४ ८५ ६६ ६६ १८ १०० १०२ (x) २६. अणुव्रतधारी को प्रसहिसावाली क्रियाओ का त्याग आवश्यक है ३०. व्रत के यम और नियम रूप भेदो का वर्णन ३१ महारम्भ रूप कृषि, वाणिज्य आदि कार्यों के त्याग का उपदेश ३२ व्रतरक्षार्थ भावनाओ के करने का उपदेश ३३ श्रावक को यथासम्भव ईर्या आदि समितियो के पालन करने का उपदेश ३४ भोजन के समय श्रावक को हिंसा पाप की निवृत्ति के लिए यथासम्भव अन्तरायो के पालन करने का तथा द्विदल अन्न आदि खाने का निषेध ३५ एपणाशुद्धि के लिए सूतक-पातक आदि पालन का निर्देश ३६ अहिंसाणुव्रत के अतिचारो का निरूपण ३७ सत्याणुतव्रत का निरूपण, भावना व अतिचार ३८ अचीर्याणुव्रत के स्वरूप का वर्णन, भावना व अतिचार ३६ ब्रह्मचर्याणुव्रत का निरूपण, भावना व अतिचार ४० परिग्रहपरिमाण अणुव्रत का स्वरूप, भावना व अतिचार ४१ दिग्विरति गुणवत का वर्णन व अतिचार ४२ देशविरति गुणव्रत का स्वरूप निरूपण व अतिचार ४३ अनर्थदण्डविरति गुणयत का निरूपण व अतिचार ४४ सामायिक शिक्षावत का विस्तृत निरूपण व अतिचार ४५ प्रोपधोपवास शिक्षाव्रत का स्वरूप व अतिचार ४६ भोगोपभोग परिमाण शिक्षावत का स्वरूप और उसके अतिचार ४७ अतिथिसविभाग शिक्षाव्रत का स्वरूप व अतिचार ४८ सल्लेखना का विधान और उसके अतिचारो का निरूपण ४६ सामायिक प्रतिमा का स्वरूप वर्णन ५० प्रोपध प्रतिमा का स्वरूप वर्णन ५१ सचित्त त्याग प्रतिमा का स्वरूप निरूपण ५२ रात्रि भक्त परित्याग प्रतिमा का स्वरूप निरूपण ५३ ब्रह्मचर्य प्रतिमा का स्वरूप निरूपण ५४ आरभ त्याग प्रतिमा का स्वरूप निरूपण ५५ परिग्रह त्याग प्रतिमा का स्वरूप निरूपण ५६ अनुमतित्याग प्रतिमा स्वरूप का निरूपण ५७ उद्दिष्ट भोजन त्याग प्रतिमा के दोनो भेदो का स्वरूप निरूपण ५८ ग्यारहवी प्रतिमा वाले वानप्रस्थ आदि का स्वरूप निरूपण ५६ अनशन आदि बारह तपो निरूपण ६० परिशिष्ट-रत्नकरण्ड श्रावकाचार (हिन्दी पद्यानुवाद) १०६ १०७ १०८ ११०४ ११४ ११७ १२० १.३ १२५ १२७ १२६ १३४ १३६ १३६ १४१- १४२ १४२ १४३ १४३ १४४ १४५ १४५ १४६ १४८ १४६ १५३ का

श्री वीतरागाय नमः
श्रीस्थाद्वादानवद्यपद्यगद्यविद्याविशारदविद्वन्मणि
श्रीमत्पंडितराजमल्लविरचिता
श्रावकाचारापरनाम्नी
लाटी-संहिता
प्रथम सर्ग
ज्ञानानन्दात्मानं नमामि तीर्थकरं महावीरम् ।
यचिति विश्वमशेषं व्यदीपि नक्षत्रमेकमिव
नभसि ॥१॥
नमामि शेषानपि तीर्थनायकाननन्तबोधादि चतुष्टयात्मनः ।
स्मृतं यदीयं किल नाम भेषजं भवेद्धि विघ्नौधगदोपशान्तये ॥२॥
प्रदुष्टकर्माष्टकविप्रमुक्तकांस्तदत्यये चाष्टगुणान्वितानिह ।
समाश्रये सिद्धगणानपि स्फुट सिद्धेः पथस्तत्पदमिच्छतां नृणाम् ॥ ३॥
त्रयी नमस्या जिनलिंगधारिणा सता मुनीनामुभयोपयोगिनाम् ।
पदवयं धारयता विशेषात् पदं मुनेरद्विनयादिहार्थतः ॥ ४॥
जयन्ति जनाः कवयश्च तगिर. प्रवर्तिता. यैर्वृषमार्गदेशना ।
विनिजितं जाड्यमिहासुधारिणा तमस्तमोरेरिव रश्मिभिर्भहत् ॥ ५ ॥
इतीव सन्मङ्गलसत्क्रिया दधन्नधीयमानोऽन्वयसात्परपराम् ।
उपज्ञलाटीमिति संहिता कविश्चिकीर्षति श्रावकसद्गतस्थितिम् ॥ ६ ॥
जिस प्रकार समस्त आकाश मे चमकता हुआ एक नक्षत्र स्पष्ट दिखाई देता है उसी प्रकार
जिनके ज्ञान मे अथवा जिनकी चेतना शक्ति में यह समस्त ससार प्रत्यक्ष चमकता हुआ-सा जान पडता
है, तथा जिनका आत्मा अनन्त ज्ञान और अनन्त सुखस्वरूप है ऐसे अन्तिम तीर्थंकर श्रीमहावीरस्वामी
को मैं (ग्रन्थकर्ता कविवर राजमल) नमस्कार करता हूँ॥ १॥ जिनके नामरूपी औषधि का स्मरण
करने मात्र से ही समस्त विघ्नरूपी रोग शान्त हो जाते हैं तथा जिनका आत्मा अनन्त दर्शन, अनन्त
ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य इन चार अनन्तचतुष्टयमय है ऐसे बाकी के श्रीऋषभदेव से आदि
लेकर श्रीपार्श्वनाथ तीर्थकर तक तेईस तीर्थंकरो को भी मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ तदनन्तर जो
सिद्ध भगवान अत्यन्त दुष्ट जो आठ कर्म उनसे सर्वथा रहित हैं तथा उन आठो कर्मों के नाश होने से
जिन्हे सम्यक्त्व आदि आठ गुण प्राप्त हुए है और जो सिद्ध पद को प्राप्त करने की इच्छा करने वाले
मनुष्यो के लिए सिद्धि के मार्गस्वरूप हैं ऐसे श्रीसिद्धपरमेष्ठी का मैं प्रत्यक्ष रूप से आश्रय लेता हूँ ॥३॥

( II ) जो मुनिराज जिनलिंग अथवा निर्ग्रन्थ अवस्था को धारण करने वाले है, जो अत्यन्त सज्जन हैं शुभोपयोग वा शुद्धोपयोग मे लीन रहते हैं और जो विशेषकर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को सदा पालन करते है ऐसे मुनियो की त्रयी को अर्थात् आचार्य उपाध्याय सर्व साधुओ को मैं नमस्कार करता हूँ ॥४॥ यहा तक ग्रन्थकर्ता ने अनुक्रम से अरहत सिद्ध आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु इन पांचो परमेष्ठियो को नमस्कार किया तथा अरहन्तो मे भी सबसे पहले श्रीमहावीर स्वामी को नमस्कार किया इसका कारण यह है कि यह वर्तमान समय श्रीमहावीर स्वामी का शासन समय है. इसलिए श्रीमहावीर स्वामी अन्य तीर्थकरो के समान ही पूज्य होने पर भी शासनकर्ता होने से अधिक पूज्य हैं अथवा इस वर्तमान समय मे श्रीमहावीरस्वामी की दिव्यध्वनि ही परम्परा से मोक्षमार्ग का प्रकाश कर रही है और उसी से हम लोगो का वा समस्त भव्य जीवो का उपकार हो रहा है इसलिए भी भगवान महावीरस्वामी केवल उपकारदृष्टि से हम लोगो के लिए अधिक पूज्य हैं। कविवर ने सबसे पहले श्रीमहावीर स्वामी को नमस्कार किया है और फिर अन्य तीर्थंकरो को नमस्कार किया है । यहा पर इतना और समझ लेना चाहिए कि यद्यपि अरहन्त अवस्था तीर्थकर केवली और सामान्य केवली दोनो की एक सी होती है तथापि देव के स्वरूप में जो सर्वज्ञ वीतराग और हितोपदेशी ये तीन गुण बतलाए है उनमे से हितोपदेशी गुण तीर्थंकर केवली मे नियमरूप से होता है तथा सामान्य केवली मे इसके होने का कोई नियमित नियम नहीं है क्योकि सामान्य केवलियो मे कोई अन्तकृत केवली भी (उसी समय केवल ज्ञान और उसी समय मोक्ष जिन्हे प्राप्त हो उनको अन्तकृतकेवली कहते हैं) होते और कोई मूक केवली भी (जिनकी दिव्य ध्वनि खिरती ही नही) होते हैं । अन्तकृत केवलियो की भी दिव्य ध्वनि खिरती नही और मूक केवलियो की भी दिव्य ध्वनि खिरती नही । तथा देव के स्वरूप मे हितोपदेशी गुण मुख्य है क्योकि भव्य जीवो को मोक्षमार्ग मे लगाने वाला तथा कल्याण करने वाला हितोपदेशी गुण ही है । इस हितोपदेशी गुण के ही कारण अरहन्त भगवान सिद्धो से भी प्रथम पूज्य माने जाते हैं इसलिए देव के स्वरूप में अरहन्त परमेष्ठी शब्द से तीर्थंकर केवली ही लिये जाते हैं और इसीलिए कविवर ने उनको ही नमस्कार किया है ।। ४ ।। जिस प्रकार सूर्य की किरणो से बडा भारी अन्धकार भी दूर हो जाता है उसी प्रकार जिन कवियो वा कवियो की जिस वाणी ने इस ससार के प्राणियो का अज्ञान दूर कर दिया और जो धर्ममार्ग के उपदेश की प्रवृत्ति करने वाले हैं ऐसे जैन धर्म की वृद्धि करने वाले कवियो की वाणी सदा जयशील हो ।। ५ ।। इस प्रकार पच परमेष्ठी की श्रेष्ठ मागलिक स्तुति करते हुए तथा श्रीमहावीर स्वामी के समय से गुरु परम्परापूर्वक चली आई श्रावको के अणुव्रत आदि उत्तम व्रतो की स्थिति को अच्छी तरह अध्ययन करने वाले कविराज राजमल्ल उन्हीं उत्तम व्रतो के स्वरूप को कहने वाली 'लाटी-सहिता' नाम के ग्रन्थ को बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं ॥६॥ NA लाटीसंहिता प्रथम सर्ग अहिंसा परमो धर्म स्यादधर्मस्तदत्ययात् । सिद्धान्त' सर्वतन्त्रोऽयं तद्विशेषोऽधुनोच्यते ॥१ सर्वसावधयोगस्य निवृतिर्बतमुच्यते । यो मृषादिपरित्याग सोऽस्तु तस्यैव विस्तरः ॥२ तद्वतं सर्वत फतुं मुनिरेव क्षमो महान् । तस्यैव मोक्षमार्गश्च भावी नान्यस्य जातुचित् ॥३ अतः सर्वात्मना सम्यक् कर्तव्यं नद्धि घीधने । कृच्छ्रलब्धे नरत्वेऽस्मिन् सूकबिन्दूदकोपमे ॥४ तत्रालसो जनः कश्चित्कषायभरगौरवात् । असमर्थस्तथाप्येष गृहस्थवतमाचरेत् ॥५ उक्तंच- गुण वय तव सम पडिमा दाणं च अणयिमियं । दसणणाणचरितं किरिया तेवण्ण सावयाणं च ॥१ तथा चोक्तम्- दसण वय सामाइय पोसह सचित्त रायभत्ते य । बम्भारम्भ परिग्गह अणुमणमुद्दिट्ट देसविरदो य २ इस ससारमे अहिंसा ही परम धर्म है और उस अहिंसा धर्मका उल्लघन करना या विनाश करना ही अधर्म है। यह सिद्धान्त सर्वतन्त्र है-अर्थात् सर्वसिद्धान्त-सम्मत है। अब आगे इसी अहिंसा धर्मका विशेष वर्णन करते हैं ।।१।। पाप सहित समस्त योगोका त्याग करना व्रत कहलाता है तथा झूठ बोलने का त्याग करना, चोरीका त्याग करना, आदि अलग-अलग पापोका त्याग करना बतलाया है वह सब उसी व्रतका विस्तार समझना चाहिए ॥२॥ उन व्रतका पूर्ण रीतिसे पालन करनेके लिए मुनिराज ही समर्थ होते हैं और इसीलिए उन मुनिराजोको ही मोक्षमार्गकी प्राप्ति होती है ॥३॥ जिस प्रकार कमल पत्रपर जलकी बूंदका ठहरना अत्यन्त कठिन है उसी प्रकार इम मनुष्य जन्मका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है। इसलिए ऐसे दुर्लभ मनुष्य जन्मको पाफर पापरूप योगोका त्याग अवश्य कर देना चाहिए ॥४|| कदाचित् तीव्र कपायोंके उदयसे फोई मनुष्य उन अतोको पूर्णस्पसे पालन करनेमे आलस्य करे अथवा असमर्थ हो तो उसे एक- देशप गृहम्योका व्रत अवश्य पालन करना चाहिए ।।५।। कहा भी है-आठ मूलगुण, बारह व्रत, बारह प्रकारका तप, एक समता, ग्यारह प्रतिमा, चार प्रकारका दान, एक पानी छानकर काममे लाना, एक रात्रिभोजनका त्याग करना और रलाय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारिय इन तोनो रत्नोमो धारण करना ये तिरेपन श्रावकोको किया महलाती है ।।१॥ग्रन्थकारोने श्रावकोंके व्रत इस प्रकार भी कहे हैं-दर्शन, प्रत, सामायिक, पोपट (प्रोषधोपवास), नचित्त त्याग, रात्रिभुक्तित्याग, ब्रह्मचर्य, आरम्भ त्याग, परिपत्त्याग, अनुमनत्याग, और उद्दिष्टत्याग इन क्यान्ह प्रतिमानोको पालन करनेवाला देगा विरत श्रावक कहलाता है ॥२॥ .

२ श्रावकाचार-सग्रह अष्टमूलगुणोपेतो द्यूतादिव्यसनोज्झितः । नरो दर्शनिक प्रोक्त स्याच्चेत्सद्दर्शनान्वित ॥६ मद्यं मासं तथा क्षौद्रमथोदुम्बरपञ्चकम् । वर्जयेच्छावको धीमान् केवलं कुलधर्मवित् ।।७ ननु साक्षान्मकारादित्रयं जैनो न भक्षयेत् । तस्य किं वजन न स्यादसिद्धं सिद्धसाधनात् ॥८ मैव यस्मादतीचारा सन्ति तत्रापि केचन । अनाचारसमा. नून त्याज्या धर्माधिभि स्फुटम् ।। तभेदा वह्व सन्ति मादृशां वागगोचराः । तथापि व्यवहारार्थ निर्दिष्टाः केचिदन्वयात् ॥१० चर्मभाण्डे तु निक्षिप्ता घृततैलजलादयः । त्याज्या यतस्त्रसादीना शरीरपिशिताश्रिताः ॥११ न चाशक्यं पुनस्तत्र सन्ति यद्वा न सन्ति ते । संशयोऽनुपलब्धित्वाद् दुर्वारो व्योमचित्रवत् ॥१२ सर्व सर्वज्ञज्ञानेन दृष्ट विश्वकचक्षुषा । तदाजया प्रमाणेन माननीय मनीषिभि ॥१३ नोझमेतायता पाप स्याद्वा न स्यादतीन्द्रियात् । अंहो मांसाशिनोऽवश्यं प्रोक्तं जैनागमे यत ॥१४ तदेवं वक्ष्यमाणेषु सूत्रेषूक्तिसूत्रवत् । संशयो नैव कर्तव्य शासनं जैनमिच्छता ॥१५ जो जीव सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाला हो और फिर वह यदि आठो मूलगुणोको धारण कर ले तथा जुआ, चोरी आदि सातो व्यसनोका त्याग कर दे तो वह दर्शन प्रतिमाको धारण करनेवाला कहलाता है ।।६।। केवल अपने कुलधर्मको जाननेवाले बुद्धिमान् श्रावकको मद्य, मास, शहद और पांचो उदुम्बरोका त्याग कर देना चाहिए ॥७॥ कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करे कि कोई भी जैनी मद्य मास शहदको साक्षात् भक्षण नहीं करता, इसलिए क्या जैनी मात्रके उनका त्याग नहीं हुआ ? अवश्य हुआ । इसलिए सिद्ध साधन होनेसे आपके त्याग करानेका उपदेश असिद्ध है। परन्तु यह वात नहीं है क्योकि यद्यपि जैनी इनका साक्षात् भक्षण नहीं करते हैं, तथापि उनके कितने ही अतिचार हैं और वे अतिचार अनाचारोके समान हैं इसलिए धर्मात्मा जीवोंको उन अतिचारोका त्याग भी अवश्य कर देना चाहिए ॥८-९॥ उन अतिचारोंके बहुत-से भेद हैं जो मेरे समान पुरुषसे कहे भी नहीं जा सकते तथापि केवल व्यवहारके लिए गुरुओकी आम्नायपूर्वक चले आये कुछ भेद कहे जाते हैं ॥१०॥ चमड़ेके बर्तनमे रक्खे हुए घी तेल पानी आदिका त्याग कर देना चाहिए क्योकि चमडेके बर्तनमे रखे धी तेल आदिमे त्रस जीवोंके शरीरके मांसके आश्रित रहनेवाले जीव अवश्य रहते हैं ॥११॥ चमडेके बर्तनमे रक्खे हुए तेल घी जल आदिमे जिस पशुका वह चमडा है उस पशुके मासके आश्रित रहनेवाले जीव हैं या नही ऐसी शका भी नही करनी चाहिए । यहाँपर कदाचित् यहाँ कोई यह कहे कि जिस प्रकार पूर्ण आकाशका चित्र दिखाई नही पडता इसलिए वह कोई पदार्थ नही है इसी प्रकार चमडेके बर्तनमे रखे हुए तेल घी आदिमे जिस पशुका वह चमडा है उस पशुके मासके आश्रित रहनेवाले जीव दिखाई नही पडते इसलिए उसमे जीव हैं या नही इस शकाका दूर होना अत्यन्त कठिन है ॥१२॥ परन्तु इसका उत्तर यह है कि भगवान् अरहन्तदेवने अपने सर्वज्ञ ज्ञानसे समस्त सूक्ष्म पदार्थ भी प्रत्यक्ष देख और जान लिए हैं और गुरु परम्परापूर्वक उनके उपदेशके अनुसार आचार्योने वैसा ही शास्त्रोमे निरूपण किया है इसलिए बुद्धिमानोको भगवान् सर्वज्ञदेवकी आज्ञा मानकर प्रमाणरूपसे सब मान लेना चाहिए ॥१३॥ जो जीव इन्द्रियगोचर नही होते ऐसे सूक्ष्म अतीन्द्रिय जीवोके.. भक्षण करनेसे पाप होता है या नहो ऐसी शका भी नही करनी चाहिए। क्योकि मासभक्षण करनेवालोको पाप अवश्य होता है ऐसा जैन शास्त्रोमे स्पष्टरूपसे बतलाया है ॥१४॥ इसलिए सर्वज्ञ वीतराग भगवान् अरहन्तदेवके कहे हुए जैन शासनको धारण करनेकी इच्छा करनेवालोको जो सूत्र पहले कहा लाटीसहिता ३ १ अन्नं मुद्गादि शुण्ठयादि भेषजं शर्करादि वा । खाद्य स्वाधं तु भोगार्थ ताम्बूलादि यथागमात् ॥१६ पेयं दुग्धादि लेपस्तु तैलाभ्यङ्गादि कर्म यत् । चतुर्विधमिद यावदाहार इति सज्ञितः ॥१७ अथाहारकृते द्रव्यं शुद्धशोधितमाहरेत् । अन्यथामिषदोष' स्यात्तदनेकत्र साश्रितात् ॥१८ विद्धं त्रसाश्रितं यावद्वर्जयेत्तदभक्ष्यवत् । शतश शोधितं चापि सावधानैर्दुगादिभि ॥१९ सन्दिग्धं च प्रदन्नादि श्रितं वा नाश्रितं त्रसै । मन शुद्धिप्रसिद्धयर्थ श्रावक वापि नाहरेत् ॥२० अविद्धमपि निर्दोषं योग्यं चानाश्रित त्रसै । आचरेच्छ्रावक सम्यग्दृष्टं नादृष्टमीक्षणे ॥२१ ननु शुद्धं यदन्नादि कृत शोधनयानया । मैवं प्रमाददोषत्वात्कल्मषस्यास्रवो भवेत् ॥२२ गालितं दृढवस्त्रेण सपिस्तैलं पयो द्रवम् । तोयं जिनागमाम्नायादाहरेन्स न चान्यथा ॥२३ अन्यथा दोष एव स्यान्मांसातीचारसंज्ञकः । अस्ति तत्र त्रसादीनां मृतस्याङ्गस्य शेषता ॥२४ गया है और जो सूत्र आगे कहे जायेंगे उनमें कभी संशय नही करना चाहिए ।।१५।। मूंग, मोठ, चना, गेहूँ, जौ, आदि अन्न कहलाता है। सोठ, मिरच, पीपल आदि औषधियां कहलाती है । मिश्री, बूरा, लड्डू, पेडा, बरफी आदि खाद्य पदार्थ कहलाते हैं। भोगोके लिए आगमानुकूल ताम्बूल आदि पदार्थ स्वाद्य कहलाते हैं । दूध, पानी आदि पदार्थ पेय कहे जाते हैं और तेल मर्दन करना, उबटन लगाना आदि लेप कहे जाते हैं। ये सब पदार्थ चार प्रकारके आहारके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥१६-१७|| इनको आहाररूपमे ग्रहण करनेके लिये शुद्ध पदार्थोंको ग्रहण करना चाहिए, अशुद्ध पदार्थ कभी ग्रहण नही करना चाहिए। तथा जो शुद्ध पदार्थ भी ग्रहण किये जायें वे भी शोधकर ग्रहण करने चाहिए। यदि वे पदार्थ विना शोधे हुए ग्रहण किये जायेंगे तो उनके भक्षण करनेमे मास खानेका दोप लगेगा क्योकि इन खाने-पीनेके पदार्थोंमे प्राय त्रस जीवोके रहनेकी या आ जानेकी सम्भावना रहती है। यदि विना शोधे हुए पदार्थ खाये जायेंगे तो उनमे आये हुए वा उनमे रहनेवाले वा उत्पन्न होनेवाले जीवोके मारे जानेका पाप लगेगा और विना शोधे पदार्थोके साथ वे जीव भी भक्षणमे आ जायेगे इसलिए उनके मास खानेका भी महापाप लगेगा। इसलिए खानेके समस्त पदार्थोको देख-शोधकर ही ग्रहण करना चाहिए। खानेके पदार्थोंको विना शोधे ग्रहण करना मास त्यागका दूसरा अतिचार है ॥१८|| घुने हुए व बीधे हुए अन्नमे भी अनेक अस जीव होते हैं। यदि सावधान होकर नेत्रोंके द्वारा सैकडो बार देखा व शोधा जाय तो भी घुने हुए अन्नमेसे सब त्रस जीवोका निकल जाना असम्भव है इसलिए सावधानीके साथ सैकडो बार शोधा या देखा हुआ भी घुना या बीधा अन्न अभक्ष्यके समान त्याग कर देना चाहिए ॥१९॥ जिन अन्न आदि पदार्थोंमे त्रस जीवोके रहनेका सन्देह हो और 'इसमे त्रस जीव हैं या नहीं हैं' इस बातका सन्देह बना ही रहे तो भी श्रावकको मन शुद्ध रखने के लिए ऐसे पदार्थोंका त्याग कर देना चाहिए |२०|| जो अन्न आदि पदार्थ धुने हुए नही है, जिनमे कोई किसी प्रकारका दोष नही है और जो त्रस जीवोसे सर्वथा रहित हैं ऐसे पदार्थ नेत्रोसे अच्छी तरह देख-शोधकर खाने आदिके काममे लेने चाहिए विना अच्छी तरह देखे-शोधे योग्य निर्दोष पदार्थ भी काममे नही लेने चाहिये ।।२१।। शका-जो अन्नादिक पदार्थ ऊपर लिखी विधिसे अच्छी तरह शोधकर शुद्ध कर लिये गये हैं उनके ग्रहण करनेमे प्रमादरूप दोषोसे उत्पन्न हुए पापोका आस्रव कभी नही हो सकेगा ॥२२॥ घी, तेल, दूध, पानी आदि पतले पदार्थोंको जैनशास्त्रोमे कही हुई विधिसे मजबूत गाढे वस्त्रमे छानकर ही खानेके काममे लाना चाहिए, पतले पदार्थोंको विना छाने कभी काम नहीं लाना चाहिए ॥ ३॥ इसका भी कारण यह है कि विना छने घी तेल आदि पदार्थोंमे त्रस जीवोंके मरे V श्रावकाचार-सग्रह दुरवधानतया मोहात्प्रमादाद्वापि शोधितम् । दु शोधितं तदेव स्याद् ज्ञेय चाशोधितं यथा ॥२५ तस्मात्सवतरक्षार्थ पलदोषनिवृत्तये । आत्मदृग्भि स्वहस्तैश्च सम्यगन्नादि शोधयेत् ॥२५ यथात्मार्थ सुवर्णादिक्रयार्थी सम्यगीक्षयेत् । प्रतवानपि गृह्णीयादाहारं सुनिरीक्षितम् ॥२७ सधर्मणानभिज्ञेन साभिज्ञेन विर्धामणा । शोधितं पाचितं चापि नाहरेद् व्रतरक्षक. ॥२८ ननु केनापि स्वीयेन सधर्मेण विधर्मिणा । शोधित पाचित भाज्य सुज्ञेन स्पष्टचक्षुषा ।।२९ मैवं यथोदितस्योच्चैविश्वासो वतहानये । अनार्यस्याप्यनास्य सयमे नाधिकारिता ॥३० चलितत्वात्सीम्नश्चैव नूनं भावियतक्षते । शैथिल्पाद्धीयमानस्य संयमस्य कुत स्थिति ॥३१ शोधितस्य चिरात्तस्य न कुर्याद ग्रहण कृती। कालस्यातिक्रमाद्भूयो दृष्टिपूत समाचरेत् ॥३२ हुए शरीरके अवयव अवश्य रहते हैं। इसलिए विना उने घी तेल आदि पदार्थ ग्रहण करनेमे मास त्यागका अतिचार अवश्य लगता है। अतएव घी तेल आदि पदार्थोंको भी अच्छे मजबूत दोहरे बूड़े छत्नेमे छानकर ही काममे लाना चाहिए ॥२४॥ जो अन्नादिक पदार्थ मनकी असावधानीसे शोधे गये हैं, या होश हवाश रहित अवस्थामे शोधे गये हैं अथवा प्रमादपूर्वक शोधे गये हैं ऐसे शोधे हुए पदार्थ भी दु.शोधित (अच्छी तरह नही शोघे हुए) कहलाते हैं और ऐसे दुशोधित पदार्थ विना शोधे हुएके समान हो गिने जाते हैं ।।२५।। इसलिए श्रेष्ठ व्रतोकी रक्षा करनेके लिए और मास भक्षणके दोषोका त्याग करनेके लिए श्रावकोको अन्न आदि पदार्थ अपने ही नेत्रोसे और अपने ही हाथोसे शोध लेना चाहिए फिर काममे लाना चाहिए ।।२६।। जिस प्रकार अपने लिए सोना खरीदनेवाला पुरुष उस सोनेको बहुत अच्छी तरह देखकर खरीदता है उसी प्रकार व्रती श्रावकको भी तरह देख-शोधकर आहार ग्रहण करना चाहिए ॥२७॥ जो आहार शोधने या शुद्धता पूर्वक भोजन तैयार करनेको विधिको न जाननेवाले साधर्मी द्वारा शोधा हुआ है या ऐसे ही अजानकार साधर्मीके द्वारा पकाकर तैयार किया हुआ है अथवा जो शोधने या शुद्धतापूर्वक विधिको जाननेवाले विधर्मी द्वारा शोधा हुआ है या ऐसे ही जानकार विधर्मीके द्वारा पकाकर तैयार किया हुआ है ऐसा भोजन भी अपने व्रतोकी रक्षा करनेवाले श्रावकोको कभी नही ग्रहण करना चाहिये ॥२८|| कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करे कि जो मनुष्य शोधने या शुद्धता पूर्वक भोजन तैयार करनेकी विधिको जानता है और शोधने आदि कामो के लिये जिसके नेत्र निर्मल हैं, जिसके नेत्रोमे कोई दोष नही है, जिसके नेत्रोकी ज्योति मन्द नही है ऐसे मनुष्यके द्वारा शोधा हुआ और पकाया हुआ भोजन ग्रहण कर लेना चाहिये वह मनुष्य अपना साधर्मी हो और चाहे विधर्मी हो । अर्थात् भोजन शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ होना चाहिये चाहे वह साधर्मी द्वारा तैयार किया हुआ हो और चाहे वह विधर्मी द्वारा तैयार किया हुआ हो । भोजन तैयार करने या शोधनेमे साधर्मो या विधर्मीकी क्या आवश्यकता है ? परन्तु यह बात नही है । क्योकि जो आहारको शोधने और शुद्धतापूर्वक तैयार करनेकी विधिको जाननेवाला विधर्मी हो इन दोनो प्रकारके मनुष्योपर दृढ विश्वास किया जायेगा तो व्रतोमे हानि अवश्य होगी । तथा इसका भी कारण यह है कि जो पुरुष अनार्य है अथवा निर्दय है उसको सयमके काम मे सयमकी रक्षा करनेमे कोई अधिकार नही है ॥२९-३०॥ यदि व्रती मनुष्य अपनी सीमा या मर्यादासे चलायमान हो जायेगा तो आगे होनेवाले उसके व्रतोमे अवश्य ही हानि पहुँचेगी तथा यदि वह सयम इसी प्रकार शिथिलता पूर्वक घटता जायगा तो फिर भला उसकी स्थिरता किस प्रकार रह सकेगी? ॥३१।। जिन अन्न आदि पदार्थोंको शोघे हुए कई दिन हो गये हैं ऐसे पदार्थ बहुत अच्छो लाटीसहिता केवलेनाग्निना पक्व मिश्रितेन घृतेन वा । उषितान्नं न भुञ्जीत पिशिताशनदोषवित् ॥३३ तत्रातिकालमात्रत्वे परिणामगुणात्तथा। सम्मच्छर्यन्ते त्रसा. सूक्ष्मा ज्ञेया सर्वविदाज्ञया ॥३४ शाकपत्राणि सर्वाणि नादेयानि कदाचन । श्रावकर्मासदोषस्य वर्जनार्थ प्रयत्नतः ॥३५ तत्रावश्यं वसा सूक्ष्मा. केचित्त्युदृष्टिगोचरा । न त्यजन्ति कदाचित्तं शाकपत्राश्रयं मनाक् ॥३६ तस्माद्धर्मार्थिना नूनमात्मनो हित मिच्छता । आताम्बूलं दल त्याज्यं श्रावकैदर्शनान्वितैः ॥३७ रजन्या भोजनं त्याज्य नैष्ठिकैर्वतधारिभि । पिशिताशनदोषस्य त्यागाय महदुद्यमै ॥३८ ननु रात्रिभुक्तित्यागो नात्रोद्देश्यस्त्वया क्वचित् । षष्ठसंज्ञकविख्यातप्रतिमायामास्ते यत ॥३९ सत्यं सर्वात्मना तत्र निशाभोजनवर्जनम् । हेतो. किन्त्वत्र दिग्मानं सिद्धं स्वानुभवागमात् ॥४० अस्ति कश्चिद्विशेषोऽत्र स्वल्पाभासोऽर्थतो महान् । सातिचारोऽत्र दिग्मात्रे तत्रातीचारजिता ॥४१ भी व्रती श्रावकोको ग्रहण नही करना चाहिये। जिन पदार्थोंको शोध लेनेपर भी बहुत सा काल बीत गया है, मर्यादासे अधिक काल हो गया है उनको फिर अपने नेत्रोसे देख-शोधकर ग्रहण करना चाहिये ।।३२।। जो रोटी, दाल आदि पदार्थ केवल अग्निपर पकाये हुए हैं अथवा पूडी कचौरी आदि गरम धीमे पकाये हुए हैं अथवा परामठे आदि पदार्थ घी और अग्नि दोनोंके सयोग से पकाये हुए है ऐसे सब प्रकारके पदार्थ मास-भक्षणके दोषोको जाननेवाले श्रावकोको दूसरे दिन बासी नहीं खाना चाहिये ॥३३॥ इसका भी कारण यह है कि वासी भोजनमे मर्यादासे बाहर काल बीत जाता है इसलिये उनमे इस प्रकारका परिणमन होता है जिससे कि उसमे सूक्ष्म और सम्मूर्छन ऐसे त्रस जीव उत्पन्न हो जाते हैं जो इन्द्रियोसे दिखाई नही पड सकते, ऐसे सूक्ष्म त्रस जीव केवल सर्वज्ञदेवके द्वारा प्रतिपादन किये हुए शास्त्रोसे ही जाने जा सकते हैं ॥३४॥ श्रावको; को प्रयत्न पूर्वक मासके दोषोंका त्याग करनेके लिये सब तरहकी पत्तेवाली शाक भाजी भी कभी ग्रहण नही करना चाहिये अर्थात् मैथी, पालक, चनाकी शाक, बथुआ, चौराई आदि पत्तेवाले शाक भी नहीं खाने चाहिये ।।३५।। क्योकि उस पत्तेवाले शाकमे सूक्ष्म त्रस जीव अवश्य होते हैं। उनमेसे कितने हो जीव तो दृष्टिगोचर होते हैं, दिखाई पडते है और कितने ही दिखाई नही पडते, परन्तु वे जीव किसी समयमे भी उस पत्तेवाले शाकका आश्रय थोडा सा भी नही छोडते ॥३६।। इसलिये अपने आत्माका कल्याण चाहनेवाले धर्मात्मा जीवोको पत्तेवाले सब शक तथा पानतक छोड देना चाहिये और दर्शन प्रतिमाको धारण करनेवाले श्रावकोको विशेषकर इनकात्याग कर देना चाहिये ॥३७॥ व्रत धारण करनेवाले नैष्ठिक श्रावकोको मास-भक्षणके दोषोकात्याग करने- के लिए बहुत बडे उद्यमके साथ रात्रिमे भोजन करनेका त्याग कर देना चाहिये ॥३८॥ कदाचित् कोई यहाँपर यह शका करे कि आपको यहापर मूल गुणोके वर्णनमे रात्रि-भोजनके त्यागका उपदेश नही देना चाहिये क्योकि रात्रि-भोजनका त्याग करनेवाली छठी प्रतिमा है। छठी प्रतिमाके वर्णन मे इसके त्यागका वर्णन करना चाहिये। इसके उत्तरमे कहा है कि यह बात ठीक है परन्तु उसके साथ इतना और समझ लेना चाहिये कि छठी प्रतिमामे तो रात्रि भोजनका त्याग पूर्ण रूपसे है और यहाँपर मूल गुणोके वर्णनमे स्थूल रूपसे रात्रि भोजनका त्याग है । मूल गुणोमे स्थूल रूपसे भी रात्रि भोजनका त्याग करना अपने अनुभवसे भी सिद्ध है और आगमसे भी सिद्ध है ॥३९-४०॥ यहाँपर मूलगुणोके धारण करनेमे जो रात्रि भोजनका त्याग है उसमे कुछ विशेपता है। तथा वह विशेषता मालूम तो थोडी होती है किन्तु उसको अच्छी तरह समझ लेनेपर वह विशेषता बहुत बड़ी मालूम देती है। सामान्य रीतिसे वह विशेषता यह है कि मूलगुणोमे जो रात्रि भोजनका ar . श्रावकाचार-संग्रह निषिद्धमन्नमात्रादिस्थूलभोज्यं व्रते दृशः । न निषिद्धं जलाधन ताम्बूलाद्यपि वा निशि ॥४२ तत्र ताम्बूलतोयादिनिषिद्धं यावदासा । प्राणान्तेऽपि न भोक्तव्यमौषधादि मनीषिणा ॥४३ न वाच्यं भोजयेदनं कश्चिद्दर्शनिको निशि । अवतित्वादशक्यत्वात्पक्षमात्रात्सपाक्षिक ॥४४ मस्ति तत्र फुलाचार सैषा नाम्ना कुलकिया। तां विना दर्शनिको न स्यान स्यानामतस्तथा ॥४५ मासमात्रपरित्यागादनस्तमितभोजनम् । व्रतं सर्वजघन्यं स्यात्तदधस्तात्स्यादकिया. ॥४६ नेत्यं य पाक्षिकः कश्चिद् व्रताभावारस्त्यवती । पक्षमात्रावलम्बी स्याद्वतमात्रं न चाचरेत् ॥४७ यतोऽस्य पक्षप्राहित्वमसिद्ध वाघसम्भवात् । लोपात्सर्वविदाज्ञाया साध्या पाक्षिकता कुत ॥४८ त्याग है वह अतिचार सहित है । उसमे अतिचारोका त्याग शामिल नहीं है और छठी प्रतिमामे जो रात्रि भोजनका त्याग है वह अतिचार रहित है उसमे रात्रि भोजनके सव अतिचारोका त्याग ॥४१॥ इस व्रतमे रात्रिमे केवल अन्नादिक स्थूल भोजनोका त्याग है इसमे पान जल तथा आदि शब्दसे औषधिका त्याग नही है ॥४२॥ तथा छठी प्रतिमामे पानी, पान, सुपारी, इलायची, औषधि आदि समस्त पदार्थोंका सर्वया त्याग बतलाया है इसलिये छठी प्रतिमा धारण करनेवाले बुद्धिमान् मनुष्यको औषधि या जल आदि पदार्थ प्राणोके नाश होनेका समय आनेपर भी रात्रिमे कभी नहीं खाने चाहिये ॥४३|| कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करे कि दर्शन प्रतिमाको धारण करनेवाला (दर्शन प्रतिमाम भी मूलगुणोका धारण करनेवाला) अव्रती है-उसके कोई प्रत नहीं है इसलिये वह रात्रिमे अन्नादिक भोजनोका भी त्याग नही कर सकता-वह रात्रिमे अन्नादिक भोजन खा सकता है अथवा वह अभी अव्रती है इसलिए वह रात्रि भोजनके त्यागमे असमर्थ है-शक्ति रहित है इसलिए भी वह रात्रिमे अन्नादिक भोजन खा सकता है। अथवा वह पाक्षिक है-व्रतादिको के धारण करनेका केवल पक्ष रखता है। व्रतादिकोंको धारण नही करता इसलिए भी वह रात्रि भोजनका त्याग नही कर सकता । परन्तु ऐसी शका करना ठीक नही है क्योकि इस दर्शन प्रतिमा मे अथवा दर्शन प्रतिमाके अन्तर्गत मूलगुणोके धारण करनेमे एक कुलाचार माना गया है-कुल परम्परांसे चला आया जो आचरण उसे कुलाचार कहते हैं और उसी कुलाचारको कुलक्रिया भी कहते हैं । रात्रि-भोजनका त्याग करना इस पाक्षिक श्रावकका कुलाचार या कुलक्रिया है। इस कुलाचार या कुलक्रियाके बिना वह मनुष्य दर्शन प्रतिमाधारी अथवा पाक्षिक श्रावक नही हो सकता। और की तो क्या ? इस रात्रि भोजन त्यागरूप कुलक्रियाके बिना नाम मात्रसे भी वह पाक्षिक श्रावक नही हो सकता ॥४४-४५।। जो मास मात्रका त्यागी है और रात्रि भोजन नही करता है वह सबसे जघन्य व्रती कहलाता है तथा उससे जो नीच है अर्थात् जिसके मास और रात्रि भोजनका भी त्याग नही है वहाँपर कोई भी क्रिया नही समझनी चाहिए ॥४६॥ कदाचित् कोई यह कहे कि पाक्षिक श्रावक किसी व्रतको पालन नहीं करता इसीलिए वह अव्रती है। वह तो व्रत धारण करनेको केवल पक्ष रखता है-किसी व्रतको पालन नही करता अतएव रात्रि भोजनका त्याग भी नहीं कर सकता। परन्तु शका करनेवालेको यह शका करना ठीक नही है और इसका भी कारण यह है कि रात्रि भोजनका त्याग न करनेसे उसका पाक्षिकपना अथवा व्रतोके धारण करनेके पक्षको स्वीकार करना भी सिद्ध नही होता, क्योकि उसमे प्रत्यक्ष बाधा आ जाती है। जब रात्रि भोजनका त्याग करना कुलक्रिया है और उसके बिना दर्शन प्रतिमा या मूलगुण हो ही नहीं सकते फिर भला रात्रि भोजन करनेवालेके मूलगुणोका अथवा वह लाटीसहिता ७ आज्ञा सर्वविदः सैव क्रियावान् श्रावको मत । कश्चित्सर्वनिकृष्टोऽपि न त्यजेत्स कुलक्रियाः ॥४२ उक्तेषु वक्ष्यमाणेषु दर्शनिकवतेषु च । सन्देहो नैव कर्तव्यः कर्तव्यो व्रतसग्रहः ॥५० प्रसिद्धं सर्वलोकेऽस्मिन् निशाया दीपसन्निधौ । पतङ्गादि पतत्येव प्राणिजातं त्रसात्मकम् ॥५१ म्रियन्ते जन्तवस्तत्र झम्पापातासमक्षातः। तत्कलेवरसम्मिथं तत्कुत स्यादनामिषम् ॥५२ युक्तायुक्तविचारोऽपि नास्ति वा निशि भोजने । मक्षिका नेक्ष्यते सम्यक् का कथा मशकस्य तु ॥५३ तस्मात्सयमवृद्धयर्थं निशायां भोजनं त्यजेत् । शक्तिनस्तच्चतुष्कं स्यादनाद्यन्यतमादि वा ॥५४ यत्रोषितं न भक्ष्यं स्यादन्नादि पलदोषत । आसवारिष्टसन्धानाथानादीना कथाऽत्र का ॥५५ रूपगन्धरसस्पर्शाच्चलित नैव भक्षायेत् । अवश्यं त्रसजीवाना निकोतानां समाश्रयात् ॥५६ सम्यग्दर्शन धारण करनेका भी पक्ष किस प्रकार कहा जा सकता है ? दूसरी बात यह है कि यदि रात्रि भोजन त्यागरूप कुलक्रियाका पालन न किया जायगा तो फिर सर्वज्ञदेवकी आज्ञाका लोप करना समझा जायगा । क्योकि सर्वज्ञदेवने रात्रि भोजनका त्याग कुलाचारमे बतलाया है और बिना इस कुलाचारके सम्यग्दर्शन हो नहीं सकता इसलिए रात्रि भोजनका त्याग न करना कुला- चारका पालन नही करना है और कुलाचारका पालन न करना सर्वज्ञदेवकी आज्ञाका लोप करना है तथा जब सर्वज्ञदेवकी आज्ञाका लोप ही हो जायगा तो फिर उसका पाक्षिकपना भी किस प्रकार ठहर सकेगा ॥४७-४८॥ क्योकि भगवान् सर्वज्ञदेवकी यही आज्ञा है कि जो क्रियावान् है- कुलक्रियाका पालन करता है वही श्रावक माना जाता है। जो सबसे निकृष्ट श्रावक है उसको भी अपनी कुलक्रियायें कभी नही छोडनी चाहिये । अतएव मास त्याग करनेवाले पाक्षिक श्रावक को रात्रि भोजनका त्याग अवश्य कर देना चाहिए ।।४९।। बहुत कहाँतक कहा जाय इस दर्शन प्रतिमाके वर्णनमे जो कुछ पहले कह चुके हैं और जो कुछ आगे कहेगे उसमे किसी प्रकारका सन्देह नही करना चाहिए। सभी सन्देहोको छोडकर केवल व्रतोका सग्रह करना चाहिए ॥५०॥ यह बात समस्त ससारमे प्रसिद्ध है कि रात्रिमे दीपकके सहारे पतगा आदि अनेक त्रस जीवोका समुदाय आ जाता है ॥५१।। वह त्रस जीवोका समुदाय जरा सी हवाका झकोरा लगने मात्रसे ही अपने देखते-देखते मर जाता है तथा उनका कलेवर उड-उडकर सब भोजनमे मिल जाता है । (कुछ जीव तो जीवित ही भोजनमे पडकर मर जाते हैं और फिर वे उसमेसे अलग नही किये जा सकते तथा कुछ मरे हुए भी उड-उडकर भोजनमे मिल जाते हैं ।) ऐसी हालतमे रात्रि भोजनके त्याग न करनेवालोके मासका त्याग कैसे हो सकता है ? ॥५२॥ दूसरी बात यह है कि रात्रिमे भोजन करनेमे योग्य और अयोग्यका विचार भी नही रहता है। अरे जहाँपर अच्छी तरह मक्खी भी दिखाई न पडे फिर भला उस रात्रिमे मच्छर आदि छोटे जीव तो किस प्रकार दिखाई दे सकते हैं ? ॥५३।। इसलिए सयमको वृद्धिके लिए रात्रि भोजनका त्याग अवश्य कर देना चाहिए। यदि अपनी शक्ति हो तो चारो प्रकारके आहारका त्याग कर देना चाहिए। यदि अपनी इतनी शक्ति न हो तो अन्न पानादिक चारो प्रकारके आहारोमेसे अन्न आदि किसी एक प्रकारके अथवा दो प्रकारके या तीन प्रकारके आहारोका त्याग कर देना चाहिए ॥५४॥ जहाँपर मास भक्षणके दोषसे बासी भोजनके (एक या दो दिन पहले बनाये हुए भोजनके) भक्षण करनेका भी त्याग है वहांपर आसव अरिष्ट सधान अथाना आदिको तो बात हो क्या है ।।५५।। इसी प्रकार जो पदार्थ रूप, रस, गन्ध, स्पर्शसे चलायमान हो जाते हैं, जिनका रूप बिगड़ जाता है, रस विगड जाता है- चलित हो जाता है, गन्ध बदल जाती है, स्पर्श बिगड जाता है ऐसे चलित पदार्थोंको भी कभी ?

८ श्रावकाचार-संग्रह वधितकरसादीनां भक्षणं वक्ष्यमाणत । कालादर्शक ततस्तृदय न भक्ष्यं तदभक्ष्यवत् ॥५७ इत्येव पलदोषस्य दिग्माश लक्षणं स्मृतम् । फलितं भक्षाणादस्य वक्ष्यामि शृणुताधुना ॥५८ सिद्धान्ते सिद्धमेवैतत् सर्वत सर्वदेहिनाम् । मांसाशस्याशनादेव भावः संक्लेशितो भवेत् ॥५९ न कदाचित् मृदुत्वं स्याद्यद्योग वतधारणे । द्रव्यतो कर्मरूपस्य तच्छक्तरमतिक्रमात् ॥६० अनाद्यनिधना नूनमचिन्त्या वस्तुशक्तय । न प्रतक्र्या कुतकर्यत् स्वभावोऽतर्कगोचर ॥६१ अयस्कान्तोपलाकृष्टसूचीवत्तद्वयोः पृथक् । अस्ति शक्तिविभावाख्या मियो बन्धादिकारिणी ॥६२ न वाच्यमकिश्चित्करं वस्तु बाह्यमकारणम् । घत्तरादिविकाराणामिन्द्रियार्थेषु दर्शनात् ।।६३ उक्तं च- यद्वस्तुबाह्यं गुणदोषसूतेनिमित्तमभ्यन्तरमूलहेतो। अध्यात्मवृत्तस्य तदङ्गभूतमन्यन्तर केवलमप्यल ते ॥३ नही खाना चाहिए। क्योकि ऐसे पदार्थोमे अनेक स जीवोकी और निगोद राशिको उत्पत्ति अवश्य हो जाती है ॥५६॥ दूध, दही, छाछ आदि रसोका भक्षण उनके कहे हुए नियमित समयके पहले-पहले कर लेना चाहिए, अर्थात् जितनी उनकी मर्यादा कही है वही तक उनको खाना चाहिये। उस मर्यादाके बाहर अभक्ष्य पदार्थोंके समान उसे कभी नहीं खाना चाहिये । अर्थात् दूध, दही आदिकी जितनी मर्यादा है उसके बीत जानेपर वे अभक्ष्य हो जाते हैं फिर उनका भक्षण कभी नही करना चाहिए ॥५७। इस प्रकार मांसके दोपोका थोडा सा वर्णन किया है। अब आगे मास खानेसे क्या फल मिलता है उसको बतलाते हैं सो सुनो ॥५८॥ सिद्धान्तशास्त्रोमे यह बात सिद्ध है कि मासका एक अशमात्र भी भक्षण करनेसे समस्त जीवोके भाव सव ओरसे सक्लेशरूप हो जाते हैं ॥५९॥ क्रूर और सक्लेश परिणाम होनेके कारण उन परिणामोमे फिर प्रत धारण करने योग्य कोमलता कभी नही रह सकती तथा उन परिणामोमे तीन कमरूप शक्तिके बनने- का उल्लंघन कभी नही होता है ॥६०॥ कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करे कि मासमे ऐसी क्या बात है जो उसके भक्षण करनेसे परिणामोमे सदा संक्लेशता बनी रहती है ? सो इसका उत्तर यह है कि प्रत्येक पदार्थकी शक्तियां अचिन्त्य हैं और वे अनादिकालसे चली आ रही हैं और अनन्तकालतक बराबर बनी रहेंगी। इसमे किसी भी कुतर्कीको किसी भी प्रकारका कुतर्क नही करना चाहिए क्योकि जो जिसका स्वभाव है उसमे किसीका तर्क चल नही सकता ।।६१।। अथवा जिस प्रकार चुम्बक पत्थर और सुई दोनो अलग अलग पदार्थ हैं परन्तु दोनोके मिलनेसे एक ऐसी विभावरूप शक्ति उत्पन्न हो जाती है जिससे कि चुम्बक सुईको अपनी ओर खीच लेता है अथवा सुई चुम्बकको ओर खिंचकर चली जाती है। उसी प्रकार जीव अलग पदार्थ है और मास अलग पदार्थ है परन्तु जीवमे एक वैमाविक नामकी ऐसी शक्ति है जो उस जीवके साथ मासका सयोग होनेपर (मास भक्षण कर लेनेपर) तीन बन्धका कारण होती है ॥६२॥ कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करें कि शुभ अशुभ बन्ध करनेवाले परिणाम जीवके ही होते हैं उसमे वाह्य वस्तु कोई कारण नहीं है बाह्य पदार्थ तो अकिंचित्कर हैं वे कुछ नही कर सकते, परन्तु यह शका करना ठीक नहीं है । क्योकि धतूरा आदि खा लेनेसे जीवकी इन्द्रियोमे विकार हो ही जाता है ॥६३॥ कहा भी है--गुण दोषोके उत्पन्न होनेमे जो बाह्य पदार्थ निमित्त कारण पड़ते हैं वे आभ्यन्तर मूल कारणके होनेसे ही निमित्त कारण होते हैं अर्थात् आभ्यन्तर कारण मुख्य कारण ?

लाटी संहिता ९ एवं मांसाशनाद्भावोऽवश्यं संक्लेशितो भवेत् । तस्मादसातबन्ध स्यात्ततो भ्रान्तिस्ततोऽसुखम् ॥६४ एतदुक्तं परिज्ञाय श्रद्धाय च मुहुर्मुहुः । ततो विरमणं कार्यं श्रावकैर्धर्मवेदिभि ॥६५ मद्यं त्यक्तवतस्तस्य वम्यतीचारवर्जनम् । यत्त्यागेन भवेच्छुद्ध श्रावको जात्यस्वर्णवत् ॥६६ हृषीकज्ञानयुक्तस्य मादनान्मद्यमुच्यते । ज्ञानाद्यावृत्तिहेतुत्वात्स्यात्तदवद्यकारणम् ॥६७ भङ्गाहिफेनधत्तूरखस्खसादिफलं च यत् । माद्यताहेतुरन्यद्वा सर्व मद्यवदीरितम् ॥६८ एवमित्यादि यद्वस्तु सुरेव मदकारकम् । तनिखिलं त्यजेद्धीमान् श्रेयसे ह्यात्मनो गृही ॥६९ दोषत्वं प्राग्मतिभ्रंशस्ततो मिथ्यावबोधनम् । रागादयस्ततः कर्म ततो जन्मेह क्लेशता ॥७० दिग्मात्रमत्र व्याख्यातं तावन्मात्रैकहेतुतः । व्याख्यास्यामः पुरो व्यासात्तद्वतावसरे वयम् ॥७१ है और बाह्य पदार्थ गौण कारण है । तथा कही-कहीपर केवल अन्तरग कारणसे ही कार्यकी सिद्धि हो जाती है। अतएव आत्मा जो आत्मामे लीन होता है उसका कारण केवल अन्तरंग कारण होता है । उसके लिए बाह्य कारणको आवश्यकता नहीं पड़ती ॥३॥ इस प्रकार मास भक्षण करनेसे इस जीवके परिणाम सक्लेश रूप अवश्य होते हैं तथा सक्लेश परिणाम होनेसे असाता वेदनीयका बन्ध होता है । असाता वेदनीयका बन्ध होनेसे ससार- मे परिभ्रमण होता है और ससारमे परिभ्रमण होनेसे दुख उत्पन्न होता है। इस प्रकार मास भक्षण करना अनन्त कालतक अनन्त दु खोका कारण है ।।६४॥ इस प्रकार ऊपर जो कुछ मास भक्षणके दोष बतलाये हैं उनको जानकर और उनपर बार बार श्रद्धान कर धर्मका स्वरूप जानने- वाले श्रावकोको उन अतिचारोका त्याग अवश्य कर देना चाहिए ॥६५।। अब आगे जिसने मद्यका त्याग कर दिया उसके लिए उसके अतिचार छोडनेका उपदेश देते हैं। जिस प्रकार कीट-कालिमा- हटा देनेसे सुवर्ण शुद्ध हो जाता है उसी प्रकार मद्यके अतिचारोका त्याग कर देनेसे श्रावक अत्यन्त शुद्ध हो जाता है ॥६६।। जिन अल्पज्ञानी जीवोके इन्द्रियजन्य ज्ञान है वे जीव मद्यपान करनेसे उन्मत्त रूप हो जाते हैं अर्थात् मद्यपान (नशीली चीजोका खाना पीना) इन्द्रियोको धारण करनेवाले संसारी जोवोको उन्मत्तताका कारण है इसीलिए वह मद्य कहलाता है तथा मद्यपान करनेसे ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि अशुभ कर्मोका बन्ध होता है इसलिए वह पापका कारण है ॥६७॥ भांग, अहिफेन (अफीम), धतूरा, खसखसके दाने आदि (चर्स, गांजा) जो जो पदार्थ नशा उत्पन्न करनेवाले हैं वे सब मद्यके समान ही कहे जाते हैं ॥६८|| ये सब पदार्थ तथा इनके समान और ऐसे पदार्थ जो कि मद्यके समान मद्य या नशा उत्पन्न करनेवाले हैं वे सब पदार्थ अपनी आत्माका कल्याण करनेके लिए बुद्धिमान् गृहस्थको छोड देना चाहिए ॥६९॥ इस मद्यके सेवन करनेसे तथा भांग, धतूरा, खसखस आदि मद्य त्यागके अतिचार रूप नशीले पदार्थोंके सेवन करने से पहले तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, फिर मिथ्या ज्ञान होता है, माता बहिन आदिको भी स्त्री समझने लगता है तथा इस प्रकारका मिथ्या ज्ञान होनेसे फिर रागादिक उत्पन्न होते हैं, रागादिक उत्पन्न होनेसे फिर व्यभिचार सेवन, अभक्ष्य भक्षण या अन्य अन्याय रूप क्रियायें उत्तन्न होने लगती हैं तथा व्यभिचार सेवन या अभक्ष्य भक्षण करनेसे इस ससारका जन्म-मरण रूप परिभ्रमण बढता है और जन्म-मरण रूप परिभ्रमण बढनेसे इस जीवको सदा सक्लेश या दुख उत्पन्न होते रहते हैं। इसलिए नशीली सब चीजोका त्याग कर देना ही इस जीवके लिए कल्याणकारी और सुख देनेवाला है ।।७०'। इस प्रकार जो जो पदार्थ केवल नशा उत्पन्न करनेवाले हैं ऐसे भांग, AF २ १० श्रावकाचार-सग्रह माक्षिकं मक्षिकानां हि मांसासृक्पीडनोद्भवम् । प्रसिद्धं सर्वलोके स्यादागमेष्वपि सूचितम् ॥७२ न्यायात्तद्भाणे नूनं पिशिताशनदूषणम् । प्रसास्ता मक्षिका यस्मावामिषं तत्कलेवरम् ॥७३ किञ्च तत्र निकोतादिजीवा संसर्गजा.क्षणात् । संमूच्छिमा न मुञ्चन्ति तत्सङ्ग जातु क्रव्यवत् ॥७४ यथा पक्वं च शुष्कं वा पल शुद्ध न जातुचित् । प्रासुकं न भवेत् पवापि नित्यं साधारणं यत' ७५ अयमों यथानादि कारणात्प्रासुकं भवेत् । शुष्कं वाप्यग्निपक्वं वा प्रासुक न तथामिषम् ॥७६ प्राग्ववत्राप्यतीचारा सन्ति केचिज्जिनागमात् । यथा पुष्परस पीत पुष्पाणामासवो यथा ॥७७ उदुम्बरफलान्येव नादेयानि दृगात्मभि । नित्य साधारणान्येव प्रसाङ्गैराश्रितानि च ॥७८ अत्रोदुम्बरशब्दस्तु नून स्यादुपलक्षाणम् । तेन साधारणास्त्याज्या ये वनस्पतिकायिका ॥७९ धतूरा आदि मद्यके थोडे-से ही अतिचारोका वर्णन यहाँपर किया है । इनका विस्तृत वर्णन हम आगे व्रतोका निरूपण करते समय करेंगे ॥७१|| शहदकी प्राप्ति मक्खियोके मास रक्त आदिके निचोडने से होती है। यह बात समस्त ससारमे प्रसिद्ध है तथा शास्त्रोमे भी यही बात बतलाई है ।।७२।। इस प्रकार न्यायसे भी यह वात सिद्ध हो जाती है कि शहदके खानेमे मास भक्षणका दोष आता है क्योकि मक्खियां स जीव हैं और शहद उनका कलेवर है । जो प्रस जीवोका कलेवर होता है वह सब मास कहलाता है। शहद भी मक्खियोका कलेवर है इसलिए वह भी मास ही है अतएव शहदका खाना मास खानेके समान है ।।७३। इसके सिवाय एक बात यह भी है कि जिस प्रकार मासमे सूक्ष्म निगोदराशि सदा उत्पन्न होती रहती है उसी प्रकार शहदमे भी रक्त मांसके सम्बन्ध से सदा सूक्ष्म निगोदराशि उत्पन्न होती रहती है। शहद किसी भी अवस्थामे क्यो न हो उसमे सदा जीव उत्पन्न होते रहते हैं । उन जीवोसे रहित शहद कभी भी नहीं रहता ।।७४|| मास चाहे कच्चा हो, चाहे पका हुआ, चाहे पक रहा हो और चाहे सूखा हो वह कभी शुद्ध नहीं हो सकता। इसका भी कारण यह है कि वह सदा साधारण रहता है। उसमे हर अवस्थामे अनन्तकाय रूप निगोदराशि उत्पन्न होती रहती है। इसलिए मास किसी भी अवस्थामे क्यो न हो वह कभी प्रासुक नहीं हो सकता ||७५|| इसका भी अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार गेहूँ जो आदि अन्न अपने अपने कारण मिलनेसे प्रासुक हो जाते हैं अर्थात् भून लेनेसे, पका लेनेसे, कूट लेनेसे, पोस लेनेसे गेहूँ जो आदि अन्न प्रासुक हो जाते हैं उसी प्रकार मास चाहे सूखा हो चाहे अग्निपर पकाया हुआ हो किसी भी अवस्थामे क्यो न हो, वह कभी प्रासुक नही हो सकता ॥७६|| जिस प्रकार पहले शराव और मासके अतिचार कह चुके हैं उसी प्रकार इस शहदके अतिचार भी जैन शास्त्रोमे वर्णन किये हैं । जैसे पुष्पोका रस पोना अथवा फूलोंका बना हुआ आसव खाना आदि सब शहद त्याग व्रतके अतिचार हैं । गुलकन्दका खाना भी इसी दोषमे समझ लेना चाहिए ॥७७|| इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीवोको उदुम्बर फल भी नहीं खाना चाहिए, क्योकि उदुम्बर फल साधारण हैं, अनन्तानन्त निगोदराशिके स्थान हैं तथा अनेक त्रस जीवोसे भरे हुए हैं । भावार्थ-बड का फल, गूलर, पीपलका फल, अजोर और पाकर इनको उदुम्बर फल कहते हैं। इनके पेडोमेसे सफेद दूध सा निकलता है इसलिए इनको क्षोरो फल भी कहते हैं। बड, पीपर, गूलरमे हजारो जीव प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं तथा अजीरमे भो सूक्ष्म जीव रहते हो हैं, अजोर गूलर जैसा ही फल है उसमे सूक्ष्म जीवोका होना स्वाभाविक है। इसलिए सम्यादृष्टिको इन सबका त्याग कर देना अत्यावश्यक है ।।७८॥ यहाँपर जो उदुम्बर शब्द कहा है। वह उपलक्षण रूप है । जिस प्रकार उदुम्बर .

लाटी सहिता ११ उक्तं च-- मूलग्गपोरबोआ साहा ग्रह खंधकंदबीअरुहा । सम्मुच्छिमा य भणिया पत्तयाणंतकाया य ॥४ साहारगमाहारं साहारणमाणपाणगहणं च । साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं भणियं ॥५ जत्थेक्क मरइ जीवो तत्थ दु मरणं हवे अणताणं । चंकमइ जत्थ इक्को चंकमणं तत्थ णताणं ॥६ साधारण है, अनन्त कायात्मक है उसी प्रकार जितने वनस्पति साधारण या अनन्त कायात्मक हैं उन सबका त्याग कर देना चाहिए, तथा जिन जिन पदार्थोंमे त्रस जीव रहते हो या रहनेकी सम्भावना हो उन सबका भी त्याग कर देना चाहिए। अनन्त कायात्मक अथवा साधारण वन- स्पति कौन कौन सी हैं इन सबका खुलासा इस प्रकार है ।।७९।। कहा है--जिनका मूल या जड ही बीज हो ऐसे हल्दी अदरख आदिको मूलजीव कहते हैं। जिनका अग्र भाग ही बोज हो जो ऊपरकी डाली काटकर लगा देनेसे लग जाय ऐसे मेहदी आदिको अग्रबीज कहते हैं। जिनका पर्व या गाँठ ही बीज हो ऐसे गन्ना आदिको पर्वबीज कहते हैं । कन्द ही जिनका बीज हो ऐसे सूरण, पिंडालु आदिको कन्दवीज कहते हैं। जिनका स्कन्ध ही बीज हो ऐसे ढाक आदिको स्कन्धबोज कहते हैं। जो बीजसे उत्पन्न हो ऐसे गेहूँ, जो आदिको बोजरुह कहते हैं तथा जो मूल अग्रबीज आदि निश्चित बोजोके बिना अपने आप उत्पन्न हो उनको सम्मान कहते हैं। जैसे घास आदि । ये सब प्रत्येक वनस्पति कहलाते हैं। जिन वन- ? स्पतियोमे अनन्त निगोद जीवोके शरीर हो उनको अनन्तकाय या सप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते हैं तथा जिन वनस्पतियोमे अनन्तकाय शरीर न हो उनको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते हैं। इस प्रकार सप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर तथा अप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर दोनो ही प्रकारके जीव सम्मूर्च्छन समझने चाहिए ॥४॥ ये निगोदके जीव साधारण नामा नामकर्मको प्रकृतिके उदयसे साधारण कहलाते हैं। साधारणका अर्थ सब जीवोके एक साथ होना है। उस निगोद पिंडमे अनन्तानन्त जीव एक साथ उत्पन्न होते है, उन सबकी आहार पर्याप्ति साथ-साय होती है और वह पहले समयमे होती है । आहार वर्गणारूप पुद्गलकन्धोको खल (हड्डी आदि कठिन भाग रूप), रस (रक्त आदि नरम भाग रूप) भागरूप परिणमानेकी शक्तिको आहार पर्याप्ति कहते हैं। यह आहार पर्याप्ति भी सब जीवोकी साथ साथ उत्पन्न होती है तथा उन्ही आहार वर्गणारूप पुद्गल स्कन्धोको शरीरके आकार परिणमानेकी शक्तिको शरीर पर्याप्ति कहते हैं । यह शरीर पर्याप्ति भी सबकी साथ साथ होती है तथा उन्ही पुद्गलस्कन्धोको स्पर्शन इन्द्रियके आकार रूप परिणमानेकी शक्तिको इन्द्रिय पर्याप्ति कहते हैं। यह इन्द्रिय पर्याप्ति भी उन जीवोकी एक साथ होतो है तथा श्वासो- च्छ्वासरूप आणप्राण पर्याप्ति भी उन सब जीवोको साथ-साय होतो है। पहले समयमे एक निगोद शरीरमे अनन्तानन्त जीव उत्पन्न हुए थे। फिर दूसरे समयमे अनन्तानन्त जीव आकर और उत्पन्न हो जाते हैं फिर तीसरे समयमे भी अनन्तानन्त जीव और आकर उत्पन्न हो जाते है । नये नये जो जीव आकर उत्पन्न होते जाते है वे जिस प्रकार आहार आदि पर्याप्तियोको धारण करते हैं उनके हो साथ पहलेके समस्त जीव आहारादि पर्याप्तियोको धारण करते हैं। इन सब जीवोका आहारादिक सब एक साथ होता है इसलिए इनको साधारण कहते हैं ।।५।। एक निगोद शरीरमे जिस समय एक जीव अपनी आयुके नाश होनेपर मरता है उसी समय मे जिनको आयु समान हो ऐसे अनन्तानन्त जीव एक साथ मर जाते हैं। तथा जिस समयमे एक जीव उत्पन्न होता है उसी समयमे समान स्थितिके धारक अनन्तानन्त जीव उत्पन्न होते हैं। इस १२ श्रावकाचार-सग्रह मूलबीजा यथा प्रोक्ता फलकाद्याद्रकादय । न भक्ष्या दैवयोगाद्वा रोगिणाप्यौषधच्छलात् ॥८० तभक्षणे महापापं प्राणिसन्दोहपीडनात् । सर्वज्ञाज्ञाबलावेतद्दर्शनीय हगङ्गिभि ॥८१ ननु केनानुमीयेत हेतुना पक्षधर्मता । प्रत्यक्षानुपलब्धित्वाज्जीवाभावोऽवधार्यते ॥८२ मैवं प्रागेव प्रोक्तत्वात्स्वभावोऽतकंगोचर । तेन सर्वविवाज्ञाया स्वीकर्तव्यं यथोदितम् ॥८३ प्रकार जन्म-मरण जिन जीवोका एक साथ साधारण हो उनको साधारण जीव कहते हैं। इसी प्रकार दूसरे समयमे जो अनन्त जीव उत्पन्न हुए थे वे भी साथ ही मरते हैं । इस प्रकार एक निगोद शरीरमे एक-एक समयमे अनन्तानन्त जीव एक साथ उत्पन्न होते हैं और एक साथ हो मरते हैं और वह निगोद शरीर ज्योका त्यो बना रहता है। उस निगोद शरीरकी उत्कृष्ट स्थिति असख्यात कोडाकोड़ी सागर है। इतने समय तक उसमे प्रत्येक समयमे अनन्तानत जीव उत्पन्न होते रहते हैं और अनन्तानन्त जीव प्रत्येक समयमे मरते रहते हैं। इतना विशेष है कि जिस निगोदमे पर्याप्त उत्पन्न होते हैं उसमे पर्याप्त ही उत्पन्न होते हैं अपर्याप्त नहीं। तथा जिसमे अपर्याप्त उत्पन्न होते हैं उसमे अपर्याप्त हो उत्पन्न होते हैं उसमे पर्याप्त उत्पन्न नही हो सकते । क्योकि उनके समान कर्मका उदय होता है ।।६।। ऊपर जो मूली, अदरख, आलू आदि मूलबीज, अग्रवीज, पोरबोज आदि अनन्तकायात्मक साधारण बतलाये हैं उन्हें कभी नहीं खाना चाहिए। यदि कोई रोगी हो और उसे औषधिरूपमे इन साधारण वनस्पतियोका सेवन करना पड़े तो भी उसे इन साधारण वनस्पतियोका भक्षण नही करना चाहिये ।।८०॥ इसका भी कारण यह है कि इन साधारण वनस्पतियोके भक्षण करनेमे अनन्तानन्त जीवोका घात होता है अथवा यो कहना चाहिये कि अनन्तानन्त जीवोसे भरे हुए अनन्त पिंडोका नाश होता है। इसलिये इनके भक्षण करनेमे महापाप होता है। इस महापापका विचार भगवान् सर्वज्ञदेवकी आज्ञाके अनुसार सम्यग्दृष्टियोको अवश्य करना चाहिये ।।८।। कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करे कि इस पक्ष धर्मका अनुमान किस हेतुसे करना चाहिए, अर्थात् आलू, अदरक आदि मूलबीज या अन्य साधारण वनस्पतियोमे अनन्तानन्त जीव हैं यह बात किस प्रकार मान लेनी चाहिये । क्योकि उनमे चलते फिरते जीव प्रत्यक्ष तो दिखाई देते ही नही हैं। इसलिये प्रत्यक्षमे तो उन साधारण वनस्पतियोमे जीवोका अभाव ही दिखायी पडता है और इसलिये उनमे कोई जीव नही है और जीव न होनेसे उनके भक्षण करनेमे कोई पाप नही है ऐसा ही निश्चय करना पडता है। परन्तु ऐसी शका करनेवालेके लिये कहते है कि यह बात नही है। हम यह बात पहले कह चुके है कि प्रत्येक पदार्थका जो अलग-अलग स्वभाव है उसमे किसी प्रकारका तर्क वितर्क नही चल सकता । गिलोय कडवो होती है और गन्ना मीठा होता है यह उन दोनोका स्वभाव है । इसमे कोई यह नही पूछ सकता कि गन्ना मीठा क्यो होता है अथवा गिलोय कडवी ही क्यो होती है। जिस पदार्थका जैसा स्वभाव होता है वह वैसा ही रहता है । इसी प्रकार आलू अदरक आदि कन्दमूलोका या अन्य साधारण वनस्पतियोका यही स्वभाव है कि उनमे प्रत्येक समयमे अनन्तानन्त जीव उत्पन्न होते रहते हैं और मरते रहते है तथा जैसा उनका स्वभाव है वैसा ही उन्होने बतलाया है। यद्यपि माल अदरक आदि कन्दमूलोमे या अन्य साधारण बनस्पतियोमे जीव दिखाई नही पडते है क्योकि वे अत्यन्त सूक्ष्म है परन्तु सर्वज्ञदेवने उनमे अनन्तानन्त जीव राशि बतलायी है इसलिये भगवान् सर्वज्ञदेवकी आज्ञा मानकर कन्दमूल या साधारण वनस्पतियोके भक्षण करनेका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥८२-८३|| लाटी सहिता-श्रावकाचार नन्वस्तु तत्तदाज्ञाया प्रष्टुमोहामहे परम् । यदेकाक्षशरीराणां भक्ष्यत्वं प्रोक्तमहता ॥८४ सत्यं बहुबघादन भक्ष्यत्वं नोक्तमहता । कुतश्चित्कारणादेव नोल्लध्यं जिनशासनम् ॥८५ एवं चेत्तत्र जीवास्ते कियन्तो वद कोविद । हेतोर्यदत्र सर्वज्ञैरभक्ष्यत्वमुदीरितम् ॥८६ घनाड्गुलासंख्यभागभागैकं तद्वपु स्मृतम् । तौकस्मिन् शरीरे स्यु प्राणिनोऽनन्तसंजिता ॥८७ उक्तञ्च- एयणिगोयसरीरे जीवा दध्वप्पमाणदो दिट्ठा । सिद्धेहि अणंतगुणा सम्वेण वितीदकालेण ॥७ इदमेवात्र तात्पर्य तावन्मात्रावगाहके । केचिन्मियोऽवगाहा स्युरेकीभावादिवापरे ।।८८ प्रश्न-सर्वज्ञदेवकी आज्ञा मान लेना ठीक है इसमे किसीको कुछ कहना नही है परन्तु इसमे इतना और पूछ लेना चाहते हैं कि भगवान् अरहन्तदेवने ही तो एकेन्द्रिय जीवोंके शरीरको भक्ष्य या खाने योग्य बतलाया है। फिर आप अनन्तकाय वनस्पतियोंके भक्षण करनेका निषेध क्यो करते हैं वे भी तो एकेन्द्रिय जीव हैं ॥८४|| उत्तर-यह ठीक है कि सर्वज्ञदेवने दो इन्द्रिय आदि जीवोके शरीरके भक्षण करनेका निषेध किया है क्योकि दो इन्द्रिय आदि जीवोके शरीरकी मास सज्ञा है तथा एकेन्द्रिय जीवोके शरीरको मास सज्ञा नही है इसीलिये सर्वज्ञदेवने एकेन्द्रिय जीवोके प्रासुक शरीरको भक्षण करनेका निषेध नही किया है तथापि उन्होने (अरहन्तदेवने) अनन्तकायिक वनस्पतियोके भक्षण करनेका निषेध किया ही है क्योकि अनन्तकायिक वनस्पतियोंके भक्षण करनेमे अनेक जीवोका घात होता है। इसलिये किसी भी कारणसे भगवान् अरहन्तदेवकी आज्ञाका उल्लघन नही करना चाहिये ॥८५।। प्रश्न-यदि यही बात है अर्थात् साधारण वनस्पतियो- के भक्षण करनेमे उनके जीवोका वध होता है तो विद्वानोको बतलाया चाहिए कि उसमे कितने जीव रहते हैं जिस कारणसे कि भगवान् अरहन्तदेवने उनको अभक्ष्य बतलाता है ।।८६।। उत्तर-- साधारण जीवोका शरीर धनागुलके असख्यातवें भाग प्रमाण होता है। अर्थात् साधारण जीवोका शरीर इतना सूक्ष्म होता है कि वह देखनेमे आ नही सकता, किन्तु उसको अनुमानसे जाननेके लिये एक अगुल लम्बे एक अगुल चौडे और एक अगुल ऊँचे क्षेत्रके यदि असख्यात भाग किये जायें तो उनमेसे एक भाग प्रमाण साधारण जीवोका होता है उतने छोटे अत्यन्त सूक्ष्म शरीरमे अनन्तानन्त जीव रहते है ।।८।। कहा भी है-एक निगोद शरीरमे अनन्तानन्त जीव हैं। उनकी अनन्तानन्त सख्या सिद्ध राशिसे अनन्तगुणी है तथा अबतक जितने सिद्ध हुए हैं उन सबकी सख्यासे भी अनन्तगुणी है ॥७॥ कदाचित् कोई यह प्रश्न करे कि इतने अत्यन्त सूक्ष्म एक शरीरमे उतने ही बडे शरीरको धारण करनेवाले अन्य अनन्तानन्त जीव उसमे किस प्रकार रह सकते हैं तो इसका उत्तर यह है कि सूक्ष्म पदार्थ जगह नही रोकता है। जगह रोकनेकी शक्ति स्थूल पदार्थोंमे ही है। चांदनी धूप प्रकाश अन्धकार आदि ऐसे बहुत-से स्थूल सूक्ष्म पदार्थ भी हैं जो जगह नही रोकते हैं फिर भला अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ तो जगह रोक ही किस प्रकार सकता है ? उन निगोदिया जीवोका शरीर भी अत्यन्त सूक्ष्म होता है इसलिये उसी एक शरीरमे उतने ही अवगाहको धारण करने- वाले अन्य शरीर भी समा जाते हैं और सब मिलकर एकरूप हो जाते हैं। इसीलिए आचार्योने बतलाया है कि अत्यन्त सूक्ष्म एक निगोदियाके शरीरमे उतने ही बडे शरीरको धारण करनेवाले अनन्तानन्त जीव रहते हैं ।।८८॥ ?

१४ श्रावकाचार-राग्रह उक्तं च- जम्बूदीवे भरहे कोसल साकेय तग्घराय च । खघउर आयासा पुलवि सरीराणि दिटुंता ।।८ एतन्मत्वाऽहंता प्रोक्तमाजवावभीरुणा । कन्दादिलक्षणत्यागे कर्तव्या सुमति सती ॥८९ एवमन्यदपि त्याज्यं यत्साधारणलक्षणम् । साश्रितं विशेषेण तद्वियुक्तस्य का कया ॥९० साधारण च केषाचिन्मल स्कन्धस्तथागमात् । शाखाः पयाणि पुष्पाणि पर्वदुग्धफलानि च ॥९१ तत्र व्यस्तानि केषाश्चित्समस्तान्यथ देहिनाम् । पापमूलानि सर्वाणि ज्ञात्वा सम्यक् परित्यजेत् ॥९२ मूलसाधारणास्तत्र मूलकाश्चाद्रकादय । महापापप्रदा सर्वे मूलोन्मूल्या गृहिवते ॥९३ स्कन्धपत्रपय पर्व तुर्यसाधारणा यथा । गण्डोरकस्तया चाकंदुग्धं साधारण मतम् ॥२४ कहा भी है-जिस प्रकार जम्बूद्वीपमे भरतक्षेत्र है, भरतक्षेत्रमे कौशल आदि देश हैं, कौशल आदि देशोमे साकेत आदि नगर हैं और उन नगरोमे घर है उसी प्रकार इस लोकाकाशमे स्कन्धोकी संख्या असख्यात लोक प्रमाण है। प्रतिष्ठित प्रत्येक जीवोके शरोरोको स्कन्ध कहते हैं। लोका- काशके जितने प्रदेश हैं उनको असख्यातसे गुणा कर देनेपर जो आवे उतनी सख्या उन स्कन्धोकी है तथा एक-एक स्कन्धमे असख्यात लोकप्रमाण अडर हैं। एक-एक अडरमे असख्यात लोकप्रमाण आवास हैं। एक एक आवासमे असख्यात लोकप्रमाण पुलवी हैं तथा एक एक पुलवीमे असख्यात लोकप्रमाण निगोद शरीर है और एक-एक निगोद शरीरमे अनन्तानन्त जीव हैं |८|| यही समझकर भगवान् अरहन्तदेवने कहा है कि जिनको इस ससारके परिभ्रमणसे कुछ भी भय है उनको कन्दमूल आदिके त्याग करनेमे हो अपनो सम्यक् और उत्तम बुद्धि लगानी चाहिये ॥८९।। श्रावकोको जिस प्रकार कन्दमूलका त्याग कर देना चाहिए उसी प्रकार और भी जो-जो साधारण हो उन सबका त्याग कर देना चाहिये तथा जिन पदार्थोमे अस जीव रहते हो उनका विशेष रीतिसे त्याग करना चाहिये और जिनमे सजीव भी रहते हो तथा जो साधारण भी हो, अनन्त जीवोका आश्रय भी हो ऐसे पदार्थोंकी तो बात ही क्या है ? अर्थात् ऐसे पदार्थोंका तो अवश्य ही त्याग कर देना चाहिये ॥९०॥ किसी वृक्षको जड साधारण होती है, किसीका स्कन्ध साधारण होता है, किसीकी शाखाएँ साधारण होती है, किसीके पत्ते साधारण होते हैं, किसीके फूल साधारण होते हैं, किसीके पर्व (गांठ) साधारण होते है, किसीका दूध साधारण होता है धौर किसीके फल साधारण होते हैं। इस प्रकार उनका साधारणपना आगमसे जान लेना चाहिये ॥११॥ इनमेसे किसो-किसीके तो मूल पत्त स्कन्ध फल-फूल आदि अलग-अलग साधारण होते हैं और किसी-किसीके मिले हुए पूर्णरूपसे साधारण होते है परन्तु ये सब प्राणियोंके लिये पापके कारण होते हैं। इनके भक्षण करनेसे या अन्य किसी काममे लाकर विराधना करनेसे महापाप लगता है इसलिये इन सबको अच्छी तरह जानकर सबका त्याग कर देना चाहिये ।।१२।। मूली, अदरक, आल, अरबी, रतालू, जमीकन्द आदि सब मूल साधारण कहलाते है । अर्थात् इनकी जड़ें सब साधारण हैं। तथा ये सब अनन्तकाय हैं । इनके भक्षण करनेसे तथा किसी प्रकारसे भी काममे लानेसे महापाप उत्पन्न होता है । इसलिये व्रती गृहस्थोको इनका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ॥९३।। गडीरक एक प्रकारके कडवे जमीकन्दको कहते है। उसके स्कन्ध भी साधारण होते हैं, पत्ते भी साधारण होते हैं, दूध भी साधारण होता है और पर्व (गांठे) भी साधारण होते हैं। इस प्रकार उसके चारो अवयव साधारण होते हैं। दूधोमे आकका दूध साधारण होता है . लाटी सहिता १५ पुष्पसाधारणाः केचित्करीरसषंपादय । पर्वसाधारणाश्वेक्षुदण्डाः साधारणानकाः ॥९५ फलसाधारणं ख्यातं प्रोक्तोदुम्बरपञ्चकम् । शाखासाधारणा ख्याता कुमारीपिण्डकादयः ॥९६ कुम्पलानि च सर्वेषां मृदूनि च यथागमम् । सन्ति साधारणान्येव प्रोक्तकालावधेरध ॥९७ शाकाः साधारणाः केचित्केचित्प्रत्येकमूर्तय । वल्ल्य साधारणा काश्चित्काश्वित्प्रत्येकका स्फुटम् ॥ तत्स्वरूपं परिज्ञाय कर्तव्या विरतिस्तत । उत्सर्गात्सवंतस्त्यागो यथाशक्त्यापवादत ॥९९ शक्तितो विरतौ चापि विवेकः साधुरात्मनः । निविवेकात्कृत कर्म विफलं चाल्पफलं भवेत् ॥१०० कदाचिन्महतोऽज्ञानादुर्दैवानिविवेकिनाम् । तत्केवलमनाय कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥१०१ यथाऽत्र श्रेयसे केचिद्धिसा कुर्वन्ति कर्मणि । अज्ञानात्स्वर्गहेतुत्वं मन्यमाना प्रमादिन ॥१०२ तदवश्यं तत्कामेन भवितव्य विवेकिनाम् । देशतो वस्तुसंख्यायाः शक्तितो व्रतधारिणा ॥१०३ विवेकस्यावकाशोऽस्ति देशतो विरतावपि । आदेयं प्रासुकं योग्यं नादेय तद्विपर्ययम् ॥१०४ ॥९४॥ फूलोमे करीरके फूल और सरसोके फूल तथा और भी ऐसे ही फूल साधारण होते हैं तथा पर्वोमे ईखकी गाँठे साधारण होती है तथा उसका आगेका भाग भी साधारण होता है ॥९५॥ फलोमे साधारण फल पांचो उदुम्बर फल होते है तथा शाखाओमे साधारण कुमारी पिंड (गारपाठा) है। अर्थात् गवारपाठा शाखारूप ही होता है और उसकी सब शाखायें साधारण हैं ।।१६।। वृक्षोपर पहले ही पहले जो नये पत्ते निकलते हैं वे बडे कोमल होते हैं जिनको कोपर कहते हैं वे सब अपने नियत समयके भीतर साधारण रहते हैं। भावार्थ-समस्त वृक्षोंपर जो-जो नये पत्ते निकलते हैं वे सब कुछ समय तक साधारण रहते हैं। अपना साधारण अवस्थाका समय बीत जानेपन फिर वे ही पत्ते बडे होनेपर प्रत्येक हो जाते हैं ॥९७।। शाकोमे (चना, मेथी, बथुआ, पालक, कुलफी आदि शाकोमे) कोई शाक साधारण होते हैं और कोई प्रत्येक होते हैं । इसी प्रकार लता या बेलोमे कोई लताएँ साधारण होती है और कोई लतायें प्रत्येक होती हैं ॥९८॥ इन सब साधारणोका स्वरूप जानकर इनका त्याग अवश्य कर देना चाहिये क्योकि मन-वचन-काय या कृत कारित अनुमोदनासे समस्त पापोका त्याग कर देना उत्सर्ग मार्ग है और अपनी शक्तिसे त्याग कर देना अपवाद मार्ग है ।।९९॥ शक्तिके अनुसार त्याग करनेमे भी अपना विवेक या विचार ही कल्याण करनेवाला होता है। (यह कार्य मेरे आत्माके लिये कल्याण करनेवाला है और यह नही है। इस प्रकारके विचारोको विवेक कहते हैं) श्रावकोके द्वारा जो कुछ पापोका त्याग किया जाय वह विवेक या विचारपूर्वक ही त्याग होना चाहिये। क्योकि जो कार्य विना विवेकके या विना विचारके किया जाता है वह या तो निष्फल जाता है या उसका फल बहुत ही थोड़ा मिलता है ॥१००।। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जो विवेकरहित पुरुष अपने अज्ञानसे अथवा अपने अशुभ कर्मके उदयसे जो कुछ शुभ अथवा अशुभ कार्य करते हैं उनसे अनेक अनर्थ उत्पन्न हो जाते हैं ॥१०१ जैसे इस ससारमे कितने ही प्रमादी पुरुष ऐसे हैं जो अपना भला करनेके लिये या अपना कल्याण करनेके लिये देवताओकी पूजा करनेमे या यज्ञ करनेमे या अन्य ऐसे ही कामोमे अनेक जीवोकी हिंसा करते हैं और अपने अज्ञानसे या मिथ्याज्ञानसे उसे स्वर्गका कारण मानते हैं ॥१०२।। इसलिये जो जीव अपनी शक्तिके अनुसार व्रत धारण करना चाहते हैं और पदार्थोकी सख्याका एक देश रूपसे त्याग कर देना चाहते हैं उन्हे विवेकी अवश्य होना चाहिये ॥१०३।। एक देशत्याग करनेमे भी विवेक या विचारकी बडी भारी आवश्यकता है क्योकि जो निर्जीव और योग्य पदार्थ है उन्हीको ग्रहण करना चाहिए तथा जो सचित्त या जीवराशिसे भरे हुए हैं, श्रावकाचार-संग्रह न च स्वात्मेच्छया किश्चिदात्तमादेयमेव तत् । नात्तं यत्तदनादेयं भ्रान्तोन्मतकवाक्यवत् ॥१०५ तस्माद्यत्प्रासुकं शुद्ध तुच्छहिंसाकर शुभम् । सर्व त्यक्तुमशक्येन ग्राह्य तत्क्वचिदल्पश ॥१०६ यावत्साधारणं त्याज्य त्याज्यं यावत्प्रसाश्रितम् । एतत्त्यागे गुणोऽवश्यं सग्रहे स्वल्पदोषता ॥१०७ ननु साधारणं यावत्तत्सर्व लक्ष्यते फयम् । सत्य जिनागमे प्रोक्ताल्लक्षणादेव लक्ष्यते ॥१०८ तल्लक्षणं यथा भने समभागः प्रजायते । तावत्साधारण शेष शेय प्रत्येकमेव तत् ॥१०९ तत्राप्यत्यल्पीकरण योग्य योगेषु वस्तुषु । यतस्तृष्णानिवृत्त्यर्थमेतत्सर्व प्रकीतितम् ॥११० साधारण या सजीवोसे भरे हुए हैं अथवा अयोग्य हैं ऐसे पदार्थोंको कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए-ऐसे पदार्थोंका दूर ही से त्याग कर देना चाहिये ||१०४॥ जो कुछ अपनी इच्छानुसार ग्रहण कर लिया है वही आदेय या ग्रहण करने योग्य है तथा जो कुछ अपनी इच्छानुसार छोड दिया है वही अनादेय या त्याग करने योग्य है ऐसा सिद्धान्त नही है। जिस प्रकार किसी पागल या उन्मत्त पुरुषके वाक्य उसकी इच्छानुसार कहे जाते है, पदार्थोंकी सत्ता या असत्ताके अनुसार नही कहे जाते और इसीलिये वे मिथ्या या ग्रहण करने अयोग्य समझे जाते है उसी प्रकार इच्छा- नुसार ग्रहण करना या छोडना भी मिथ्या या विवेकरहित समझा जाता है। इसलिये किसी भी पदार्थका त्याग या ग्रहण अपनी इच्छानुसार नहीं होना चाहिये किन्तु विवेकपूर्ण यथार्थ शास्त्रोंके अनुसार होना चाहिये ॥१०५।। अतएव जो पुरुष पूर्णरूपसे पांचो पापोका त्याग नही कर सकते, महाव्रत धारण नही कर सकते उनको जो पदार्थ प्रासुक हैं, जीव रहित हैं, शुद्ध हैं, शुभ हैं और जो थोडी बहुत हिंसासे या थोडेसे ही सावद्य कर्मोसे उत्पन्न होनेवाले हैं ऐसे पदार्थ भी थोडे बहुत प्रहण करने चाहिये और वे भी कभी-कभी ग्रहण करना चाहिये सदा उन्हीमे लीन नहीं रहना 'चाहिये ॥१०६॥ जो सधारण हैं उनका सवका त्याग कर देना चाहिये और जिनमे त्रसजीव रहते हैं उनका सबका त्याग कर देना चाहिये । इनके त्याग करनेसे गुण-मूलगुण और उत्तर गुण बढते हैं और इनका ग्रहण करनेसे भक्षण करनेसे महापाप उत्पन्न होते हैं ।।१०७॥ प्रश्न-यदि साधारण वनस्पतियोका त्याग कर देना चाहिए तो फिर यह भी बतलाना हाहिये कि साधारण वनस्पतियोकी पहचान क्या है। किस लक्षणसे उनका ज्ञान हो सकता है । उत्तर-आपका यह पूछना ठीक है। जैन-शास्त्रोमे जो कुछ साधारणका लक्षण बतलाया गया है उसी लक्षणसे साधारण वनस्पतियोका ज्ञान हो सकता है ॥१०८॥ उसका लक्षण शास्त्रोंमे इस प्रकार लिखा है कि जिसके तोड़नेमे दोनो भाग एकसे हो जायं जिस प्रकार चाकूसे दो टुकड़े करने पर दोनो भाग चिकने और एकसे हो जाते हैं उसी प्रकार हाथसे तोड़ने पर भी जिसके दोनो भाग चिकने एकसे हो जायें वह साधारण वनस्पति है। जब तक उसके टुकडे इसी प्रकारके होते रहते हैं तब तक उसे साधारण समझना चाहिये तथा जिसके टुकड़े चिकने और एकसे न हो ऐसी बाकीकी समस्त वनस्पतियोको प्रत्येक समझना चाहिये ॥१०९॥ इस प्रकार पदार्थों की प्राप्ति होने पर जो योग्य पदार्थ हैं उनको भी बहुत थोडी मात्रामे ग्रहण करना चाहिये अर्थात् योग्य पदार्थोंमे भी अधिक भागका त्याग कर जितने कमसे अपना कार्य सिद्ध हो सकता है उतना ही ग्रहण करना चाहिये। बाकी सबका त्याग कर देना चाहिये | क्योकि यह सब त्याग या समस्त व्रत, मूलगुण उत्तरगुण आदि तृष्णाको दूर करनेके लिये ही कहे गये हैं। यदि तृष्णा कम न हुई तो त्याग करना व्यर्थ है । क्योकि तृष्णा घटानेके लिये ही त्याग किया जाता है |११०॥ इस प्रकार अत्यन्त लाटीसहिता १७ इति सक्षेपतः ख्यात साम्ना मूलगुणाष्टकम् । अर्थादुत्तरसज्ञाश्च गुणाः स्युरॅहमेधिनाम् ॥१११ तांस्तानवसरे तत्र वक्ष्याम स्वल्पविस्तरात् । इत प्रसङ्गतो वक्ष्ये तत्सप्तव्यसनोज्झनम् ॥११२ द्यूतमांससुरावेश्याऽऽखेटचौर्यपराङ्गनाः । महापापानि सप्तेति व्यसनानि त्यजेद् बुधः ॥११३ अक्षपासादिनिक्षिप्त वित्ताज्जयपराजयम् । क्रियाया विद्यते यत्र सर्व धूतमिति स्मृतम् ॥११४ प्रसिद्ध द्यूतकर्मेदं सद्यो बन्धकर स्मृतम् । यावदापन्मयं ज्ञात्वा त्याज्य धर्मानुरागिणा ॥११५ तत्र बह्वय' कथा सन्ति धूतस्यानिष्टसूचिका । रतास्तत्र नरा पूर्व नष्टा धर्मसुतावय ॥११६ श्रूयते दृश्यते चैव धूतस्यैतद्विजृम्भितम् । दरिद्राः कतितोपाङ्गा नराः प्रास्ताधिकारका ॥११७ न वाच्यं धूतमाशं स्यादेकं तव्यसन मनाक । चौर्यादि सर्वव्यसनपतिरेष न संशयः ॥११८ विद्यन्तेऽत्राप्यतीचारास्तत्समा इव केचन । जेतव्यास्तेऽपि दृग्मार्गे लग्नः प्रत्यग्रबुद्धिभिः ॥११९ अन्योन्यस्येर्षया यत्र विजिगीषा द्वयोरिति । व्यवसायादृते कर्म धूतातीचार इष्यते ॥१२० यथाऽहं धावयाम्पत्र यूयं चाऽप्यत्र धावत । यदातिरिक्तं गच्छेय त्वत्तो गृह्णामि चेप्सितम् ॥१२१ सक्षेपमे गृहस्थोके समुदाय रूप मूलगुणोका वर्णन किया । इसके आगे जो गृहस्थोंके अणुव्रत गुणवत शिक्षाव्रत आदि गुण हैं, व्रत हैं, वे सब अर्थात् उत्तरगुण कहलाते हैं ॥१११।। उन अणुव्रत, गुणव्रत तथा शिक्षाक्तोका वर्णन थोडेसे विस्तारके साथ उनके कथन करनेके समय करेंगे। इस समय प्रसग पाकर सातो व्यसनोके त्यागका वर्णन करते हैं ॥११२।। जुआ खेलना, मास भक्षण करना, शराब पीना, वेश्या सेवन करना, शिकार खेलना, चोरी करना और परस्त्री सेवन करना ये सातों महापाप व्यसन कहलाते हैं। बुद्धिमान् जनोको इन सातो व्यसनोका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥११३॥ जिस क्रियामे खेलनेके पासे डालकर धनकी हार-जीत होती है वह सब जूमा कहलाता है अर्थात् हार जीतकी शर्त लगाकर तास खेलना, चौपड खेलना, शतरज खेलना, नक्कोमूठ खेलना आदि सब जुआ कहलाता है ।।११४॥ यह जुआ खेलना ससार भरमे प्रसिद्ध है। उसी समय महा अशुभ कर्मोंका बध करनेवाला है और समस्त आपत्तियोको उत्पन्न करनेवाला है ऐसा समझकर धर्ममे प्रेम करनेवाले श्रावकोको इसका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥११५|| जो लोग इस जुआमे लोन हुए हैं वे सब नष्ट हुए हैं। युधिष्ठिर आदिको इस जुआ खेलनेके ही कारण अनेक आपत्तियां उठानी पड़ी थी, जुआ खेलनेवालोको अनेक आपत्तियाँ उठानी पड़ी और अनेक दुख भोगने पडे । इन सब चरित्रोको कहनेवाली बहुत सी कथाएं हैं ॥११६।। इस जुमा खेलनेका फल प्रतिदिन सुना जाता है और प्रतिदिन देखा जाता है । इस जुआ खेलनेसे लोग दरिद्र हो जाते हैं, उनके अग उपाग सब काटे जाते हैं तथा और भी अनेक प्रकारके दुख उन्हे भोगने पडते हैं ॥११७। इस जुआ खेलनेको एक हो व्यसन नही समझना चाहिये और न इसे छोटा सा व्यसन समझना चाहिये। किन्तु यह जुआ खेलनेका व्यसन चोरी आदि सब व्यसनोका स्वामी है इसमे किसी प्रकारका सदेह नहीं है ॥११८|| इस जुआ खेलनेके त्यागरूप व्रतके कितने ही अतिचार हैं जो कि जुआ खेलनेके ही समान हैं इसलिए सम्यग्दर्शनके मार्गमे लगे हुए तीव्र बुद्धि श्रावकोको इन अतिचारोका त्याग भी अवश्य कर देना चाहिए ॥११९।। जैसे अपने-अपने व्यापारके कार्योंके सिवाय कोई भी दो पुरुष परस्पर एक दूसरेकी ईर्ष्यासे किसी भी कार्यमे एक दूसरेको जीतना चाहते हो तो उन दोनोके द्वारा उस कार्यका करना भी जुआ खेलनेका , अतिचार कहलाता है ॥१२०॥ जैसे मैं यहाँसे इस स्थानसे दौडना प्रारम्भ करता हूँ तू भी मेरे साथ दौड लगा। हम दोनोमेसे जो मैं आगे निकल जाऊँगा तो तुझसे अपनी इच्छा पूरी कर लूंगा। इस प्रकारकी शर्त ३ १८ श्रावकाचार-संग्रह इत्येवमादयोऽप्यन्ये धूतातीचारसंजिका । क्षपणीया क्षणादेव द्यूतत्यागोन्मुखैनरैः ॥१२२ मांसस्य भक्षणे दोषा प्रागेवात्र प्रपञ्चिता. । पुनरुक्तभयाद् भूयो नीता नोद्देशप्रक्रियाम् ॥१२३ कर्म तत्र प्रवृत्तिः स्यादासक्तिय॑सन महत् । प्रवृत्तिर्यत्र त्याज्या स्यादासक्तस्तत्र का कया ॥१२४ मैरेयमपि नादेयमित्युक्त प्रागितो यतः । ततोऽद्य वक्तव्यताया पिष्टपेषणदूषणम् ॥१२५ प्राग्वदत्र विशेषोऽस्ति महानप्यविवक्षित. । सामान्यलक्षणाभावे तद्विशेषक्षतियथा ॥१२६ प्रवृत्तिस्तु क्रियामात्रमासक्तिर्व्यसन महत् । त्यक्ताया तत्प्रवृत्ती वे का कयाऽऽसक्तिवर्जने ॥१२७ तदल बहुनोक्तेन तद्गन्धोऽवद्यकारणम् । स्मृतमान हि तन्नाम धर्मध्वसाय जायते ॥१२८ पण्यस्त्री तु प्रसिद्धा या वित्तार्य सेवते नरम् । तन्नाम दारिका दासी वेश्या पत्तननायिका ॥१२९ तत्याग सर्वत श्रेयान् श्रेयोऽयं यतता नृणाम् । मधमासादिदोषान्वै नि शेषान् त्यक्तुमिच्छताम् १६० आस्तां तत्सङ्गमे दोषो दुर्गती पतनं नृणाम् । इहैव नरफ नून वेश्याव्यासक्तचेतसाम् ॥१३१ लगाकर दौडना या और कोई ऐसा ही काम करना जुमाका अतिचार है ।।१२१|| इसी प्रकार ऐसे ही ऐसे और भी कितने ही जुआके अतिचार हैं। जिन गृहस्थोने जुआ खेलनेका त्याग कर दिया है उनको ऐसे जुआके अतिचारोका उसी समय त्याग कर देना चाहिए ।।१२२।। माम भक्षणके दोष पहले विस्तारके साथ कह चुके हैं इसलिए पुनरुक्त दोषके भयसे यहां पर उनका वर्णन नही किया है ।।१२३।। मास भक्षणमे प्रवृत्ति होना मास कर्म कहलाता है और मास भक्षणमे आसक्त होना तो मास भक्षण नामका सबसे बडा व्यसन कहलाता है । जव कि मास भक्षणकी प्रवृत्ति ही त्याज्य है, त्याग करनेके योग्य है, फिर भला आसक्तिको तो कथा हो क्या है ? ॥१२४|| इसी प्रकार मद्य या शराबका त्याग कर देना चाहिए । इसी बातको पहले अच्छी तरह कह चुके हैं । यदि इस समय फिर कहा जायगा तो पिष्टपेषण दूषण होगा अर्थात् जिस प्रकार पिसे हुएको फिर पीसना व्यर्थ है उसी प्रकार शराबके दोष पहले लिख चुके हैं अब फिर लिखना व्यथ है ॥१२५।। यद्यपि विशेष कहनेकी यहां पर कुछ विवक्षा नहीं है तथापि मूलगुणोमे जो मासका त्याग कराया है उससे यहाँ पर कुछ विशेषता है। जहाँ किसीका सामान्य लक्षण कहा जाता है वहाँपर उसका विशेष भी त्याग करा चुके हैं तो फिर विशेष रीतिसे त्याग करानेको भी अवश्य आवश्यकता होती है। वही विशेष त्याग यहाँ पर कराया है ।।१२६।। शगव पीनेकी क्रिया करना शराबकी प्रवृत्ति कहलाती है और उसमे अत्यन्त आसक्त होना व्यसन कहलाता है। जब उसकी प्रवृत्तिका ही त्याग कराया जाता है तो फिर उसमे आसक्त होनेका त्याग तो अवश्य करना चाहिए ||१२७।। इसलिए अधिक कहनेसे कुछ लाभ नही है शराबकी गध भी महापाप उत्पन्न करनेवाली है। शराबका नाम भी स्मरण मात्रसे धर्मका नाश हो जाता है फिर भला उस शराबको किसी काममे लाने या पोनेसे तो धर्मकी रक्षा कभी हो ही नही सकती ॥१२८॥ जो स्त्री केवल धनके लिये पुरुषका सेवन करती है उसको वेश्या कहते हैं । ऐसी वेश्यायें ससारमे प्रसिद्ध हैं । उन वेश्याओको दारिका, दासी, वेश्या या नगरनायिका आदि नामोंसे पुकारते हैं ॥१२९॥ जो मनुष्य अपने आत्माके कल्याणके लिये प्रयत्न करना चाहते हैं और मद्य मास आदिके समस्त दोषोको त्याग कर देना चाहते हैं उनको इस वेश्या सेवनका त्याग अवश्य कर देना चाहिए। ऐसे पुरुषोंके लिए पूर्ण रूपसे वेश्या सेवनका त्याग कर देना ही कल्याणकारी है ।।१३०|| वेश्या सेवन करनेसे अनेक दोष उत्पन्न हाते हैं तथा मनुष्योको नरकादिक दुर्गतियोमे पडना पड़ता है, यदि इन परलोकके ?

१ लाटीसहिता उक्तंच- या खादन्ति पर्ल पिबन्ति च सुरा जल्पन्ति मिथ्यावचः स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम् । नोचानामपि दूरवक्रमनसः पापात्मिका कुर्वते लालापानमहनिश न नरकं वेश्या विहायापरम् ॥९ रजकशिलासहशीभि कुक्कुरकर्परसमानचरिताभिः । वेश्याभिर्यदि सङ्ग कृतमिव परलोकवार्ताभि ॥१० प्रसिद्धर्बहुभिस्तस्यां प्राप्ता दुःखपरम्परा । श्रेष्ठिना चारुवत्तेन विख्यातेन यथा पराः ॥१३२ यावान् पापभरो याहग्दारिका दरिकर्मण । कविनापि न वा तावान् क्वापि वक्तुं च शक्यते ॥१३३ आस्तां च तद्रतावत्र चित्रकादिरजो नृणाम् । नारकादिगतिभ्रान्तेर्यद् दुःखं जन्मजन्मनि ॥१३४ दु खोकी उपेक्षा भी करें तो जिनका हृदय वेश्या सेवनमे लीन हो रहा है उनको इस जन्ममें ही निश्चयसे नरककी अनेक यातनायें या अनेक दु ख भोगने पड़ते हैं। उनके लिये यह लोक ही, यह जन्म हो नरक बन जाता है ।।१३१॥ कहा भी है-यह पापिनी वेश्या मास खाती है, शराब पीती है, झूठ बोलती है, केवल धनके लिए प्रेम करती है, अपने धन और प्रतिष्ठाका नाश करती है और कुटिल मनसे या बिना मनके नीच लोगोकी लारको भी रात-दिन चाटती रहती है इसलिये कहना चाहिये कि वेश्याको छोडकर ससारमे और कोई नरक नही है। वेश्या ही घोर नरक है। यह वेश्या धोबीकी शिलाके समान है अर्थात् जिस प्रकार धोबीकी शिलापर ऊँच-नीच अनेक घरोके बुरेसे बुरे मैल आकर बहते हैं उसी प्रकार वेश्याके शरीरपर भी ऊंच-नीच अनेक पुरुषोके घृणितसे घृणित और अत्यन्त निन्दनीय ऐसे वीर्य या लार आदि मल आकर बहते हैं, इसके सिवाय वह वेश्या कुत्तेके मुंहमे लगे हुए हड्डीके खप्परके समान आचरण करती रहती है अर्थात् जिस प्रकार उस खप्परको चबाने वाला कुत्ता उस खप्परको चबाता है और उसके चबानेसे जो मुंहके भीतरी गलपटोसे रुधिरकी धारा बहती है उसको वह कुत्ता समझता है यह मीठी-मीठी रुधिरकी धारा इस खप्परसे ही निकली है उसी प्रकार वेश्या सेवन करनेवाला अपने धनको हानि करता है और फिर भी उस वेश्याके सेवन करनेसे आनन्द मानता है। ऐसी वेश्याके साथ जो पुरुष समागम करते हैं वे साथ ही साथ परलोकको बातचीत भी अवश्य कर लेते हैं। वेश्याका सेवन करनेवाले पुरुष अवश्य ही परलोक बिगाड लेते हैं इसमे किसी प्रकारका सन्देह नही है ।।९-१०॥ इस वेश्या सेवनमे आसक्त होनेके कारण अनेक लोगोने अनेक प्रकारके दुख पाये हैं और जन्म-जन्मान्तर तक दुख पाये हैं सो शास्त्रमे प्रसिद्ध ही है। जैसे अत्यन्त प्रसिद्ध सेठ चारुदत्तने इस वेश्या सेवनसे ही अनेक प्रकारके दुःख रहे थे ॥१३२॥ इस ससारमे वेश्याएं अपनी वेश्या वृत्ति- से जितने पाप उत्पन्न करती हैं उन सबको कवि भी नही कह सकते फिर भला औरोकी तो बात ही क्या है ॥१३३।। वेश्या सेवन करनेसे मनुष्योको इसी जन्ममे गर्मी उपदश आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यदि उनको न भी गिना जाय तो भी यह मनुष्य उस वेश्या सेवनके महापापसे अनेक जन्मो तक नरकादिक दुर्गतियोके परिभ्रमणसे उत्पन्न होनेवाले अत्यन्त घोर दुख सहता २० श्रावकाचार-संग्रह न वाच्यमेकमेवैतत्तावन्मात्राल्पदोषत । धूतादिव्यसनासक्ते कारण धर्मध्यसकृत् ।।१३५ सुगमत्वादि निस्तारप्रयासो न कृतो मया । दोष सर्वप्रसिद्धोऽत्र वावदूकतया कृतम् ॥१३६ सन्ति तत्राप्यतीचाराश्यतुर्थवतवर्तिन । निर्देक्ष्यामो वय तांस्तान तत्तत्रावसरे यया ॥१३७ रूपात पण्याङ्गनात्याग सक्षेपावक्षप्रत्यरात् । आखेटकपरित्याग साधीयानिति शस्यते ॥१३८ अन्तर्भावोऽस्ति तस्यापि गुणाणुवतसजके । अनर्थदण्डत्यागास्ये बाह्यानक्रियादिवत् ॥१३९ तत्तश्रावसरेऽवश्य वक्ष्यामो नातिविस्तरात् । प्रसङ्गाद्वा तदत्रापि दिग्माण वक्तुमर्हति ॥१४० ननु चानर्थदण्डोऽस्ति भोगादन्यत्र या. क्रिया । आत्मानन्दाय यत्कर्म तत्कयं स्यातथाविधम् ॥१४१ यथा सकचन्दन योषितस्याभरणभोजनम् । सुखार्थ सर्वमेवैतत्तथाखेटक्रियाऽपि च ॥१४२ मैव तीवानुभागस्य बन्धः प्रमावगौरवात् । प्रमादस्य निवृत्त्यर्थ स्मृत व्रतकदम्बकम् ।।१४३ स्रक्चन्दनवनितादौ क्रियायो वा सुखाप्तये । भोगभावो सुख तत्र हिंसा स्यादानुषङ्गिको ॥१४४ रहता है ॥१३४॥ वेश्या सेवन करनेवाला जन्म-जन्म तक नरकादिक दुर्गतियोंके दुख सहता रहता है। उसको यही एक दुख भोगना पडता है यह वात नही कहनी चाहिये क्योकि ऐसा कहने- से वेश्या सेवनमे थोडा दोष सिद्ध होता है। परन्तु वेश्यासेवन करना सबसे बडा महादोष है । जुआ खेलनेके व्यसनमें लीन होनेका कारण यह वेश्यासेवन ही है । धर्मका नाश करनेवाला यह वेश्यासेवन ही है ॥१३५॥ वेश्यासेवनके दोषोका जान लेना अत्यन्त सुगम है इसलिये इसके दोष विस्तारके साथ वर्णन नहीं किये हैं। इसके सिवाय इस वेश्या सेवनके दोष बाल गोपाल तक सब लोगोमें प्रसिद्ध हैं इसीलिये व्यर्थ ही अधिक कहनेसे कोई लाभ नही है ॥१३६॥ इस वेश्या सेवनके त्याग रूप चतुर्थ ब्रह्मचर्याणुव्रतको धारण करनेवाले पुरुषोके लिये इस वेश्या सेवनके त्यागमे भी कितने ही अतिचार लगते हैं । जिनको हम समयानुसार ब्रह्मचर्याणुवतका वर्णन करते समय वर्णन करेंगे ॥१३७।। इस प्रकार इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले दोषोका वर्णन कर अत्यन्त सक्षेपसे वेश्या सेवनके त्यागका वर्णन किया । अब आगे शिकार खेलनेका त्याग करना भी अत्यन्त प्रशसनीय है इसलिये उसका वर्णन करते हैं ॥१३८॥ यद्यपि शिकार खेलना बाह्य अनर्थ क्रियाओके समान है। इसलिये उसका त्याग अनर्थ- दण्डत्याग नामके गुणवतमे अन्तर्भूत हो जाता है ।।१३९|| इस अनर्थदण्डत्यागका वर्णन करते समय थोडेसे विस्तारके साथ इसका भी अवश्य वर्णन करेंगे तथापि प्रसग पाकर थोडा-सा वर्णन यहाँ भी कर देते हैं ।।१४०॥ प्रश्न-भोगोपभोगोके सिवाय जो क्रियायें की जाती हैं उनको अनर्थदण्ड कहते हैं परन्तु शिकार खेलनेसे आत्माको आनन्द प्राप्त होता है इसलिये शिकार खेलना अनर्थ- दण्ड नहीं है किन्तु जिस प्रकार पुष्पमाला, चन्दन, स्त्रियां, वस्त्र, आभरण, भोजन आदि समस्त पदार्थ आत्माको सुख देनेवाले हैं, आत्माको सुख देनेके लिये काममे लाये जाते हैं उसी प्रकार शिकार खेलनेसे भी आत्माको सुख प्राप्त होते हैं। इसलिये वह अनर्थदण्ड कभी नही हो सकता? ॥१४१-१४२।। उत्तर-परन्तु ऐसी शका करना ठीक नहीं है। क्योकि प्रमादकी अधिकता होनेसे अनुभागबन्धकी अत्यन्त तीव्रता हो जाती है और प्रभादको दूर करनेके लिये ही समस्त व्रत पाले जाते हैं। शिकार खेलनेसे अशुभ कर्मोंमे अत्यन्त तीव्र फल देनेकी शक्ति पडती है। इसलिये शिकार खेलना भोगोपभोगकी सामग्री नहीं है किन्तु महा प्रमाद रूप है ॥१४३॥ माला चन्दन स्त्री आदिके सेवन करनेमे सुखकी प्राप्तिके लिये केवल भोगोपभोग सेवन करनेके भाव किये जाते लाटीसहिता २१ आखेटके तु हिसायाः भाव स्याभूरिजन्मिनः । पश्चादेवानुयोगेन भोग स्याद्वान वा क्वचित् १४५ हिंसानन्देन तेनोच्चरौद्रध्यानेन प्राणिनाम् । नारकस्यायुषो बन्ध स्यानिर्दिष्टो जिनागमे ॥१४६ ततोऽवश्य हि हिंसाया भावश्वानर्थदण्डकः । त्याज्य प्रागेव सर्वेभ्यः सक्लेशेभ्य प्रयत्नतः ॥१४७ तत्रावान्तररूपस्य मृगयाभ्यासकर्मण । त्याग' श्रेयानवश्यं स्यादन्यथाऽसातबन्धनम् ॥१४८ अतीचारास्तु तत्रापि सन्ति पापानुयायिनः । यानपास्य व्रतिकोऽपि निर्मलीभवति ध्रुवम् ॥१४९ कार्य विनापि क्रीडार्थ कौतुकार्थमथापि च । कर्तव्यमटन नैव वापीकूपादिवमसु ॥१५० पुष्पादिवाटिकासूच्चैर्वनेषूपवनेषु च । सरित्तडागक्रीडाद्रिसरःशून्यगृहादिषु ॥१५१ शस्याधिष्ठानक्षेत्रेषु गोष्ठीनेष्वन्यवेश्मसु । कारागारगृहेषुच्चैर्मठेषु नपवेश्मसु ॥१५२ एवमित्यादिस्थानेषु विना कार्य न जातुचित् । कौतुकादिविनोदार्थ न गच्छेन्मृगयोज्झित ॥१५३ हैं तथा उनके सेवन करनेसे सुख मिलता भी है और उसमे जीवहिंसा होती है वह प्रसगानुसार होती है। शिकार खेलनेके लिये जब घरसे निकलता है तब पशु-पक्षियोके मारनेके परिणामोको लेकर ही घरसे निकलता है। तदनन्तर उसके कर्मोंके उदयके अनुसार भोगोपभोगकी प्राप्ति होती भी है और नही भी होती । शिकार खेलनेवाला प्राणियोको मारनेके ही अभिप्रायसे जाता है परन्तु यह बात दूसरी है कि उसके हाथसे कोई जीव मरे या न मरे उसके परिणाम हिंसारूप ही रहते हैं ॥१४४-१४५।। शिकार खेलना हिंसामे आनन्द मानना है और हिंसामे आनन्द मानना रौद्रध्यान है तथा ऐसे रौद्रध्यानसे प्राणियोको नरकायुका ही बन्ध होता है ऐसा जैनशास्त्रोमे वर्णन किया है ॥१४६।। इसलिये मानना पडता है कि इस प्रकारकी हिंसा करनेमे अपने परिणाम रखना अवश्य ही अनर्थदण्ड है और इसीलिये समस्त सक्लेशरूप परिणामोके त्याग करनेके पहले इस शिकार खेलनेका त्याग बडे प्रयत्नसे बड़ी सावधानीसे कर देना चाहिये ॥१४७।। शिकार खेलनेका अभ्यास करना, शिकार खेलनेकी मनोकामना रखकर निशान मारनेका अभ्यास करना तथा और भी ऐसी ही ऐसो शिकार खेलनेकी साधनरूप क्रियाओका करना भी सब इसी शिकार खेलनेमे ही अन्तर्भूत होता है । इसलिये ऐसी क्रियाओका, ऐसे अभ्यास करनेका त्याग भी अवश्य कर देना चाहिये क्योकि ऐसी क्रियाओका त्याग करना भी कल्याण करनेवाला है। यदि ऐसी हिसारूप क्रियाओका त्याग नही किया जायगा तो फिर उन क्रियाओसे दुख देनेवाले अशुभ या असाता वेदनीय कर्मोंका ही बन्ध होगा ॥१४८॥ इस शिकार खेलनेके त्याग करने रूप व्रतके कितने ही अतिचार हैं जो शिकार खेलनेके समान ही पाप उत्पन्न करनेवाले हैं। उन समस्त अतिचारोका त्याग कर व्रती गृहस्थ भी अत्यन्त निर्मल हो जाता है, इसलिए अपने व्रत निर्मल करनेके लिए अतिचारोका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ।।१४९।। विना किसी अन्य प्रयोजनके केवल क्रीडा करनेके लिए अथवा केवल तमाशा देखनेके लिए इधर-उधर नही घूमना चाहिये, किसी बावडी या कुआँके मार्गमे या और भी ऐसे ही स्थानोमे विना प्रयोजनके कभी नही घूमना चाहिये ॥१५०॥ जिसने शिकार खेलनेका त्याग कर दिया है उसको विना किसी अन्य कार्यके केवल तमाशा देखनेके लिये या केवल मन बहलानेके लिए पौधे फूल वृक्ष आदिके बगीचोमे, बडे-बडे वनोमे, उपवनोमे, नदियोमे, सरोवरोमे, क्रीडा करनेके छोटे-छोटे पर्वतोपर, क्रीडा करनेके लिये बनाये हुए तालाबोमे, सूने मकानोमे, गेहूँ, जौ, मटर आदि अन्न उत्पन्न होनेवाले खेतोमे, पशुमोंके बांधनेके स्थानोमे, दूसरोंके घरोमे, जेलखानोमे, बडे-बड़े मठोमे, राजमहलोमे या और भी ऐसे पापकाचार-संग्रह । तस्करादिविघातार्थ स्थानेषु चण्डभीरुषु । योद्धमुत्सुकभूपादियोग्यासु युद्धभूमिपु ॥१५४ गोतनावविवाहाविनाटघशालादिवेश्मपु । हिंसारम्भेषु कूपादिखननेषु च कम्मंसु ॥१५५ न कतव्या मतिर्षीरे. स्वप्नमा मनागपि । केयल फर्मवन्धाय मोहस्यैतद्धि स्फूजितम् ॥१५६ गच्छन्नप्यात्मकायायं गच्छेद भूमि विलोकयन् । युगदघ्ना हशा सम्यगोर्यासशुद्धिहेतवे ॥१५७ तत्र गच्छन्न छिन्दवा तरूपर्णफलादिकान् । पदया वोा न कुर्वोत जलस्फालनकर्म च ॥१५८ शर्फरादिपरिक्षेपं प्रस्तरेभूमिकुट्टनम् । इतस्ततोष्टनं चापि क्रीडाकूदनकर्म च ॥१५९ हिसोपदेशमित्यादि न फुर्वोत विचक्षण । प्राकपदव्यामिवारढ. सर्वनोऽनर्थदण्डमुक् ॥१६० व्याख्यातो मृगयादोष सर्वज्ञाज्ञानतिक्रमात् । अर्गलेवावतादीनां व्रतादीनां सहोदर. ॥१६१ अथ धौर्यव्यसनस्य त्याग श्रेयानिति स्मृत । तृतीयाणुवतस्यान्तर्भावो चाप्यत्र सूपित ॥१६२ तल्लक्षणं यथा सूओ निर्विष्टं पूर्वसूरिभिः । यद्यवदत्तावान तस्तेय स्नेयविजिते ॥१६३ ही ऐसे स्थानोमे कभी नही जाना चाहिये ॥१५१-१५३।। जिन स्थानोमे चोर, डाकू, हत्यारे यादि महा अपराधी मनुष्योको प्राण दण्ड दिया जाता हो ऐसे अत्यन्त भयानक और भय उत्पन्न करने- वाले स्थानोमे जहाँपर युद्ध करनेकी इच्छा करनेवाले राजा सेनापति आदि लोग युद्ध कर सकें ऐसी युद्ध करने योग्य युद्धभूमिमे, जिनमे गाना, नाचना, उत्सव, विवाह, नाटक आदि होते हो ऐसे स्थानोमे जानेके लिये घोरवीर पुरुषको स्वप्नमे भी कभी बुद्धि नही करनी चाहिए, इसी प्रकार जिनमे बहुत-सी हिसा या आरम्भ होता हो ऐसे कुआं बावडी खुदाने आदिके कार्योके करनेमे स्वप्नमे भी कभी अपनी थोडी-सी बुद्धि भी नही करनी चाहिये क्योकि ऐसे स्थानोमे जानेसे या ऐसे स्थानोको बनवानेसे केवल अशुभ कर्मोका ही बन्ध होता है तथा मोहनीय कर्मके तीव्र उदयसे ही ऐसे स्थानोमे जानेके लिये या ऐसे काम करनेके लिये बुद्धि उत्पन्न होती है, इसलिये यह सब मोहकर्मका ही कार्य समझना चाहिये ॥१५४-१५६॥ व्रती गृहस्थको जब कभी अपने कार्यके लिये भी कही जाना हो तो उसे शुद्ध ईर्यापथ पालन करनेके लिये अपने दोनो नेत्रोंसे शरीर प्रमाण चार हाथ पृथ्वीको देखते हुए जाना चाहिये ॥१५॥ मार्गमे चलते हुए व्रती गृहस्थ- को अपने पैरोंसे छोटे-छोटे पौधे, पत्ते या फल नही तोडते या काटने चाहिये तथा अपने दोनो पैरो व हाथोसे पानीको उछालना नही चाहिये ॥१५८॥ इसी प्रकार ढेले-पत्थर फेंकना, पत्थरोसे पृथ्वीको कूटना, इधर-उधर घूमना, केवल मनोविनोदके लिये कूदना, हिंसाका उपदेश देना इत्यादि विना प्रयोजनके व्यर्थ ही हिंसा उत्पन्न होनेवाले कार्य पूर्णरूपसे अनर्थदण्डोका त्याग करनेवाले तथा पहली दर्शनप्रतिमाको धारण करनेवाले चतुर गृहस्थको कभी नहीं करने चाहिये ॥१५९-१६०। इस प्रकार भगवान् सर्वज्ञदेवकी आज्ञाके अनुसार शिकार खेलनेके दोष बतलाये । इन दोषोंके त्याग कर देनेसे सब अव्रत रुक जाते हैं और व्रतोको अत्यन्त सहायता पहुंचती है ॥१६॥ आगे चोरी करने रूप व्यसनका त्याग करनेके लिये उपदेश देते हैं, क्योकि चोरीका त्याग कर देना भी इस जीवके लिये कल्याणकारी है। यद्यपि चोरीका त्याग तीसरे अचौर्य अणुव्रतमे अन्त- भूत होता है तो भी व्यसन रूपसे त्याग करनेका यहां उपदेश दिया है ॥१६२॥ अचौर्य महाव्रतको धारण करनेवाले पहलेके आचार्योंने चोरीका लक्षण करते हुए बतलाया है कि जो दूसरेका विना दिया हुआ पदार्थ ग्रहण कर लेता है वह चोरी है ॥१६३॥ उस चोरी करने रूप कार्यमे अत्यन्त - लाटीसहिता २३ व्यसनं स्यात्तत्रासक्ति' प्रवृत्तिर्वा मुहुर्मुहु । यद्वा व्रतादिना क्षुद्र परित्यक्तुमशक्यता ॥१६४ तदेतद्व्यसनं नूनं निषिद्ध गृहमेधिनाम् । ससारदु खभीरूणामशरीरसुखैषिणाम् ॥१६५ तत्स्वरूपं प्रवक्ष्याम पुरस्तादल्पविस्तरात् । उच्यतेऽत्रापि दिग्मानं सोपयोगि प्रसङ्गसात् ॥१६६ उक्त प्राणिवघो हिंसा स्यादधर्म स दुखद । नार्थाज्जीवस्य नाशोऽस्ति किन्तु बन्धोऽत्र पीडया ॥१६७ ततोऽवश्य हि पापः स्यात्परस्वहरणे नृणाम् । यादृश मरणे दु ख तादृशं द्रविणक्षतौ ॥१६८ एवमेतत्परिज्ञाय दर्शनश्रावकोत्तमै । कर्तव्या न मति क्वापि परदारधनादिषु ॥१६९ आस्तां परस्वस्वीकारायद् दुखं नारकादिषु । यदत्रैव भवेद् दुखं तद्वक्तुं कः क्षमो नर ॥१७० चौर्यासक्तो नरोऽवश्यं नासिकादिक्षति लभेत् । गर्दभारोपणं चापि यद्वा पञ्चत्वमाप्नुयात् ॥१७१ उद्विग्नो विघ्नशकी च भ्रान्तोऽनवस्थचित्तक । न क्षणं तिष्ठते स्वस्थ परवित्तहरो नर ॥१७२ परस्वहरणासक्तै. प्राप्ता दु खपरम्परा । श्रूयते तत्कया शास्त्राच्छिवभूतिद्विजो यथा ॥१७३ आसक्त होना अथवा चोरी करनेमे बार-बार प्रवृत्ति करना चोरीका व्यसन कहलाता है अथवा क्षुद्रपुरुष जो अचौर्य आदि व्रतोको धारण कर चोरो आदिका त्याग नही कर सकते उसको भी चोरीका व्यसन कहते हैं ॥१६४।। जो ससारके दुखोसे भयभीत हैं और आत्मजन्य सुखोकी इच्छा करते हैं ऐसे गृहस्थोके लिये यह चोरीका व्यसन अवश्य ही त्गग करने योग्य बतलाया है अर्थात् व्रती गृहस्थोको इस चोरीके व्यसनका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥१६५।। आगे अचौर्य अणुव्रत- का वर्णन करते समय थोडेसे विस्तारके साथ इसका वर्णन करेंगे, परन्तु यहाँ भी प्रकरणके अनुरोधसे थोडा-सा वर्णन कर देते है ॥१६६।। शास्त्रोमे कहा है कि प्राणियोका वध करना हिंसा है तथा हिंसा करना ही अधर्म है और अत्यन्त दु ख देनेवाला है। यद्यपि दूसरेका धन हरण करनेमे जीवका नाश नही होता है तथापि उसको जो मानसिक महासन्ताप और वेदना होती है उससे चोरी करनेवालोको अशुभ कर्मोंका तीव्र बन्ध होता है और इसीलिये चोरी करनेवाले मनुष्योको अवश्य महापाप उत्पन्न होता है क्योकि जिसका धन हरण किया जाता है उसको जैसा मरनेमे दुख होता है वैसा ही दुख धनके नाश हो जानेपर होता है ॥१६७-१६८।। ऊपर लिखे अनुसार चोरी करनेके महादोषोको समझकर दर्शनप्रतिमा धारण करनेवाले उत्तम श्रावको- को दूसरेकी स्त्री या दूसरेका धन हरण करनेके लिये कभी भी अपनी वुद्धि नही करनी चाहिये ॥१६९।। दूसरेका धन हरण करनेसे या चोरी करनेसे जो नरकादिक दुर्गतियोमे महादु ख होता है वह तो होता ही है किन्तु ऐसे लोगोको इस जन्ममे ही जो दु ख होते हैं उनको भी कोई मनुष्य कह नही सकता ॥१७०॥ जो मनुष्य चोरी करनेमे आसक्त रहता है पकडे जानेपर उसकी नाक काट ली जाती है या हाथ काट लिये जाते है, उसे गधेपर चढाकर बाजारमें घुमाया जाता है और अन्तम उसे प्राणदण्ड दिया जाता है ।।१७१।। जो मनुष्य दूसरेका धन हरण करता है उसके चित्तमे सदा उद्वेग या भय बना रहता है, उसे पद-पदपर विघ्नोको शका बनी रहती है, उसका हृदय हर समय इधर-उधर घूमा करता है, उसका चित्त सदा डावाडोल रहता है और वह एक क्षण भी निराकुल नहीं रह सकता ॥१७॥ दूसरेके धन हरण करनेमे आमक्त रहनेवाले लोगोने पहले जन्म-जन्मान्तर तक अनेक प्रकारके दुख पाये हैं। जिनकी कथायें शास्त्रोसे सुनी जाती । जैसे शिवभूति ब्राह्मणने चोरो करनेमे ही अनेक प्रकारके दुख पाये थे ।।१७।। चोरी करने २४ श्रावकाचार-सग्रह न केवलं हि श्रूयन्ते दृश्यन्तेऽत्र समक्षत । यतोऽधापि चुरासक्तो निग्रहं लभते नृपात् ॥१७४ सन्ति तत्राप्यतीचाराश्चौर्यत्यागवतस्य च । तानवश्य यथास्थाने बूमो नातीवविस्तरात् ।।१७५ अथान्ययोषिव्यसन वूरत परिवर्जयेत् । आशीविषमिवासां यच्चरित्रं स्याज्जगत्त्रये ॥१७६ तुर्याणुव्रते तस्यान्तर्भाव स्थावस्य लक्षणात् । लक्ष्यतेऽत्रापि विग्मात्र प्रसङ्गादिह साम्प्रतम् ॥१७७ देवशास्त्रगुरून्नत्वा बन्धुवर्गात्मसाक्षिकम् । पत्नी पाणिगृहीता स्यात्तदन्या चेटिका मता ॥१७८ तत्र पाणिग्रहीता या सा द्विघा लक्षणाद्यथा । आत्मज्ञाति. परजाति कर्मभूरूढिसाधनात् ॥१७९ परिणीतात्मज्ञातिश्च धर्मपत्नीति सेव च । धर्मकार्य हि सध्रीची यागादो शुभकर्मणि ।।१८० सुनूस्तस्या. समुत्पन्नः पितुर्धर्मेऽधिकारवान् । स पिता तु परोक्ष स्याद्देवात्प्रत्यक्ष एव वा ॥१८१ स सनु कर्मकार्येऽपि गोत्ररक्षादिलवाणे । सर्वलोकाविरुद्धत्वादधिकारी न चेतर ॥१८२ परिणीतानात्मज्ञातिर्या पितृसाक्षिक्षपूर्वकम् । भोगपत्नीति सा नया भोगमात्रकसाधनात् ।।१८३ वालोंके दुखोकी कथायें केवल सुनी ही नही जाती हैं अपितु इस समयमे भी प्रत्यक्ष देखी जाती हैं क्योकि आजकल भी चोरी करनेवाले लोगोको राज्यको ओरसे अनेक प्रकारके कठोर दण्ड दिये जाते हैं ॥१७४। इस चौर्यत्यागवतके कितने ही अतिचार हैं उनको भी समयानुसार अचौर्याणु- व्रतका वर्णन करते समय थोडेसे विस्तारके साथ अवश्य वर्णन करेंगे ॥१७५।। अब आगे परस्त्री व्यसनके त्यागका वर्णन करते हैं। जिन स्त्रियोका चरित्र लोकोमे सर्पके महाविषके समान प्रसिद्ध है ऐसी परस्त्रियोंके सेवन करनेका त्याग भी अवश्य कर देना चाहिये तथा दूरसे ही कर देना चाहिये ॥१७६।। परस्त्री त्याग प्रतका जो लक्षण है उससे यह व्रत चौथे अणुव्रतमे अन्तर्भूत होता है तथापि इस समय प्रकरण पाकर यहांपर उसका थोडा सा वर्णन करते हैं ॥१७७॥ देव शास्त्र गुरुको नमस्कारकर तथा अपने भाई बन्धुओको साक्षीपूर्वक जिस कन्याके साथ विवाह किया जाता है वह विवाहिता स्त्री कहलाती है। ऐमी विवाहिता स्त्रीके सिवाय अन्य सव पलियां दासी कहलाती हैं ॥१७८।। उसमे भी जो विवाहिता पत्नी है वह दो प्रकार है तथा उन दोनोंके लक्षण अलग हैं। कर्मभूमिमें रूढिसे चली आयी जो अलग-अलग जातियाँ है उनमेसे अपनी जातिकी कन्याके साथ विवाह करना और अन्य जातिको कन्याके साथ विवाह करना । इस प्रकार अपनी जातिकी विवाहिता पत्नी और अन्य जातिकी विवाहिता पत्नोके भेदसे पलियोके दो भेद हो जाते हैं ॥१७९॥ अपनी जातिकी जिस कन्याके साथ विवाह किया जाता है वह धर्मपत्नी कहलाती है ऐसी धर्मपत्नी ही यज्ञपूजा प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्योमे या प्रत्येक धर्मकार्यमे साथ रह सकती है ॥१८०॥ उस धर्मपत्नीसे जो पुत्र उत्पन्न होता है वही पिताके धर्मका अधिकारी होता है क्योकि कभी-कभी पिता तो परोक्ष हो जाता है, सन्यास धारण कर लेता है अथवा स्वर्गवासी हो जाता है तथा भाग्योदयसे कभी प्रत्यक्ष भी बना रहता है ॥१८१॥ वह धर्मपत्नीसे उत्पन्न हुआ पुत्र ही समस्त धर्मकार्योमे अधिकारी होता है और गोत्रको रक्षा करनेरूप कार्यमे अर्थात् पुत्र उत्पन्न कर आगेके लिये गोत्रकी रक्षा करनेरूप कार्यमे या अपने समस्त घरका स्वामी बनने या समस्त गृहस्थ धर्मकी रक्षा करने रूप कार्यमे अधिकारी होता है क्योकि धर्मपत्नीसे उत्पन्न हुआ पुत्र ही समस्त लोकका अविरोधी पुत्र है। अन्य जातिको विवाहिता कन्यारूप पत्नीसे उत्पन्न हुमा पुत्र ऊपर लिखे कार्योंमे कुछ भी अधिकार नही रखता ।।१८।। जो पिताकी साक्षीपूर्वक अन्य जातिकी कन्याके साथ विवाह किया जाता है वह भोगपत्नी कहलाती है क्योकि वह केवल लाटीसहिता २५ आत्मज्ञाति परजाति सामान्यवनिता तु या। पाणिग्रहणशून्या चच्चेटिका सुरतप्रिया ॥१८४ पेटिका भोगपत्नी च द्वयोर्भोगाङ्गमात्रत । लौकिकोक्तिविशेषोऽपि न भेद पारमार्थिक ॥१८५ भोगपत्नी निषिद्धा स्यात्सर्वतो धर्मवेदिनाम् । ग्रहणस्याविशेषेऽपि दोषो भेवस्य सम्भवात् ॥१८६ अस्ति दोषविशेषोऽत्र जिनदृष्टश्च कश्चन । येन वास्या प्रसङ्गेन वज्रलेपोऽघसञ्चय ॥१८७ भावेषु यवि शुद्धत्वं हेतु पुण्यार्जनादिषु । एवं वस्तुस्वभावत्वात्तव्रतात्तद्धि नश्यति ॥१८८ उक्तंच- मुनिरेव हि जानाति द्रव्यसंयोगजं गुणम् । मक्षिका वमनं कुर्यात्तद्विद छविप्रणाशिनी ॥११ ननु यथा धर्मपत्न्यां यैव दास्यां क्रियैव सा । विशेषानुपलब्धेश्च कथं भेदोऽवधार्यते ॥१८९ मैवं अतो विशेषोऽस्ति युक्तिस्वानुभवागमात् । दृष्टान्तस्यापि सिद्धत्वावेतो साध्यानुकूलतः ॥१९० भोगका ही साधन है ॥१८३।। इस प्रकार अपनी जाति और परजातिके भेदसे स्त्रियाँ दो प्रकार हैं तथा जिसके साथ विवाह नही हुआ है ऐसी स्त्री दासी या चेरी कहलाती है, ऐसी दासी केवल भोगाभिलाषिणी होती है ।।१८४॥ दासी और भोगपत्ली ये दोनो ही केवल उपभोग-सेवन करने के ही काम आती हैं। इसलिए यद्यपि लौकिक दृष्टिके अनुसार उनमें कुछ थोडा-सा भेद है तथापि परमार्थसे देखा जाय तो उन दोनोमे कोई भेद नही है ॥१८५।। धर्मके जाननेवाले पुरुषोको भोग- पत्नीका पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिए। यद्यपि विवाहिता होनेसे वह ग्रहण करने योग्य है तथापि धर्मपत्नीसे वह सर्वथा भिन्न है, सब तरहके अधिकारोसे रहित है, इसलिए उसके सेवन करनेमे दोष ही है ॥१८६।। भोगपत्नीके सेवन करनेसे अनेक प्रकारके विशेष दोष उत्पन्न होते हैं जिनको कि भगवान् सर्वज्ञदेव ही जानते हैं। दासीके साथ विषय सेवन करनेसे वज्र लेपके समान पापोका सचय होता है ।।१८७॥ यदि पुण्य उपार्जन करनेमे भावोकी शुद्धता ही कारण है क्योकि वस्तुका स्वभाव ही इसी प्रकार है तो फिर दासीके साथ विषय सेवन करनेसे वह परिणामोकी शुद्धता अवश्य नष्ट हो जाती है ॥१८८।। कहा भी है-किस-किस द्रव्यके सयोगसे कैसा कैसा गुण प्रकट होता है इस बातको मुनि ही जानते है। हम लोगोके अल्पज्ञानमे यह बात नही आ सकती। देखो, मक्खीके पेटमे चले जानेसे वमन हो जाता है परन्तु उसकी विष्टा या बीट खा लेनेसे वमन रोग दूर हो जाता है। अतएव यह सिद्ध है कि दासी या भोगपत्नीके सेवन करनेमे विषय सेवनको तीव्र लालसा रहती है, इसलिए परिणामोकी शुद्धता नही रह सकती तथा परिणामोमे तीव्र कषायोका सचार होनेसे या काम सेवनकी तीव्र लालसा होनेसे तीव्र पापकर्मोंका बन्ध होता है ॥११॥ शका-विषय सेवन करते समय जो क्रिया धर्मपत्नीमें की जाती है वही क्रिया दासीमे की जाती है उन दोनोके साथ होनेवाली क्रियाओमे कोई किसी प्रकारका अन्तर नहीं है, फिर भला दासी और धर्मपत्नीमे भेद क्यो बताया जाता है। जिस प्रकार उनके साथ होनेवाली क्रियाओमे कोई भेद नही है उसी प्रकार उन दोनोमे भेद नही होना चाहिए ।।१८९॥ समाधान- परन्तु ऐसी शका करना ठीक नही है, क्योकि दासी और धर्मपत्नीमें बहुत अन्तर है, यह बात युक्तिसे भी सिद्ध होती है, आगमसे भी सिद्ध है और अपने अनुभवसे भी सिद्ध होती है। इसके लिये अनेक दृष्टान्त मिलते हैं और इस साध्यको सिद्ध करनेवाले अनेक हेतु मिलते हैं ॥१९०॥ - - ४ 1 - २६ श्रावकाचार-संग्रह - मैयं स्पर्शादि यवस्तु बाह्यं विषयसज्ञिकम् । तद्धेतुस्तादृशो भावो जीवस्यैवास्ति निश्चयात् ॥१९१ दृश्यते जलमेवैकमेकरूपं स्वरूपत । चन्दनादिवनराज प्राप्य नानात्वमध्यगात् ॥१९२ न च वाच्यमय जीव स्वायत्त केवलं भवेत् । बाह्यवस्तु विनाऽऽश्रित्य जायते भावसन्ततिः ॥१९३ ततो बाह्यनिमित्तानुरूपं कार्य प्रमाणतः । सिद्ध तत्प्रकृतेऽप्यस्मिन्नस्ति भेदो हि लीलया ॥१९४ अत्राभिज्ञानमप्यस्ति सर्वलोकाभिसम्मतम् । वासा वास्या सुता ज्ञेया तत्सुतेभ्यो ह्यनादृशाः ॥१९५ कृतं च बहुनोक्तेन सूक्तं सर्वविवाज्ञया । स्वीकर्तव्यं गृहस्थेन दर्शनव्रतधारिणा ॥१९६ भोगपली निषिद्धा चैत्का कथा परयोषिताम् । तथाप्यत्रोच्यते किञ्चित्तत्स्वरूपाभिव्यक्तये ॥१९७ केवल यही नहीं समझना चाहिये कि कर्मबन्ध होनेमे या परिणामोंमे शुभ अशुभपना होनेमे स्पर्श करना या विषय सेवन करना आदि बाह्य वस्तु ही कारण हैं किन्तु जीवोके वैसे परिणाम होना ही निश्चयसे कारण हैं। भावार्थ-बाह्य क्रिया एक सी होनेपर भी सबके परिणाम एक-से नही होते, इसी प्रकार धर्मपत्नीके सेवन करनेमे जीवोके मन्द परिणाम होते हैं इसलिये उसके सेवन करनेसे तीव्र अशुभ कर्मोंका बन्ध नहीं होता, किन्तु दासीका सेवन करनेमे विषय सेवन करनेकी तीव्र लालसा होती है इसीलिए उसके सेवन करनेसे तीन अशुभ कर्मोंका बन्य होता है। अतएव दासी और धर्मपत्नीमे बहुत भारी भेद है ।।१९१॥ ससारमे भी देखा जाता है कि जो जलस्वरूपसे एकरूप है अथवा एक ही है वह एक ही जल चन्दनके पेडमे देनेसे चन्दन रूप हो जाता है, नीममे देनेसे कडवा हो जाता है, धतूरेमे देनेसे विषरूप हो जाता है और ईखमे देनेसे मीठे गन्नेरूप परिणत हो जाता है। जल पात्र भेदसे अनेक प्रकारका परिणत हो जाता है उसी प्रकार धर्मपत्नी या दासीमे एक-सी क्रिया होनेपर भी पात्र मेदसे परिणामोमे वडा भारी अन्तर पड़ जाता है तथा परिणामोमें अन्तर पडनेसे शुभ अशुभरूप कर्मबन्धमे बड़ा भारी अन्तर पड जाता है ॥१९२।। कदाचित् यह कहा जाय कि यह जीव शुभ-अशुभरूप कर्मवन्ध करनेमे नितान्त स्वाधीन है क्योकि भाव या परिणामोकी परम्परा बाह्य पदार्थोके आश्रय किये विना भी बराबर बनी ही रहती है अर्थात् परिणामोके शुभ-अशुभ होनेमे बाह्य पदार्थ कोई कारण नही है । शुभ या अशुभ परिणामोको उत्पन्न करना सर्वथा जीवके अधीन है इसलिये चाहे दासीका सेवन किया जाय और चाहे धर्म- पत्नीका सेवन किया जाय उन दोनोके सेवन करनेमे परिणामोमे कोई अन्तर नही पडता इसलिए दासी और धर्मपत्नीमे कोई भेद नही है सो यह कहना भी ठीक नहीं है क्योकि परिणामोमे शुभ- अशुभपना बाह्य पदार्थोके आश्रयये ही होता है। बाह्य पदार्थोका जैसा आश्रय मिलता है वैसे ही परिणाम बदलकर हो जाते हैं ॥१९३।। इसलिये यही प्रमाण मानना चाहिये कि जैसा बाह्य पदार्थों का निमित्त मिलता है उन्हीके अनुसार कार्यको सिद्धि होती है। इसी न्यायके अनुसार इस प्रकरणमे भी दासी और धर्मपत्नीमे लोलापूर्वक बहुत ही सरल रोतिसे भेद सिद्ध हो जाता है ॥१९४॥ इस विषयमे समस्त लोगोके द्वारा माना हुआ ज्ञान ही प्रमाण है क्योकि समस्त ससारके समस्त लोग यह मानते हैं कि दासोसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं वे दास कहलाते हैं और वे दास धर्मपत्नीसे उत्पन्न हुए पुत्रोसे सर्वथा भिन्न दूसरे प्रकारके ही कहलाते हैं। इससे भी धर्मपत्नी और दासीमे बडा भारी अन्तर सिद्ध होता है ॥१९५।। बहुत कहनेसे क्या भगवान् सर्वज्ञदेवको आज्ञानुसार शास्त्रोमे जो कुछ वर्णन किया है, जो व्रत बतलाये हैं वे सब दर्शन प्रतिमारूप व्रतको धारण करनेवाले गृहस्थोको अवश्य स्वीकार करने चाहिये ॥१९६॥ शास्त्रोमे जव भोगपत्नीका ?

लाटीसहिता २७ विशेषोऽस्ति मिथश्चात्र परत्वैकत्वतोऽपि च । गृहीता चागृहोता च तृतीया नगराड्गना ॥१९८ गृहीताऽपि द्विधा तत्र यथाऽऽद्या जीवभर्तृका । सत्सु पित्रादिवर्गेषु द्वितीया मृतभर्तृका ॥१९९ चेटिका या च विख्याता पतिस्तस्या स एव हि । गृहीता सापि विख्याता स्यादगृहीता च तद्वत् ॥२०० जीवत्सु बन्धुवर्गेषु रण्डा स्यान्मृतभर्तृका । मृतेषु तेषु सैव स्यादगृहीता च स्वैरिणी ॥२०१ अस्या ससर्गवेलायामिङ्गिते नरि वैरिभि । सापराघतया दण्डो नृपादिभ्यो भवेद्धृवम् ॥२०२ केचिज्जैना वदन्त्येवं गहीतंषा स्वलक्षाणात् । नुपादिभिर्गृहीतत्वान्नीतिमार्गानतिक्रमात् ॥२०३ विख्यातो नीतिमार्गोऽय स्वामी स्याज्जगतां नृप । वस्तुतो यस्य न स्वामी तस्य स्वामी महीपति ॥२०४ तन्मतेषु गृहीता सा पित्राद्यैरावृतापि या । यस्याः संसर्गतो भीतिर्जायते न नृपादित ॥२०५ तन्मते द्विधैव स्वैरी गृहोताऽगृहीतभेदत. । सामान्यवनिता या स्याद्गृहीतान्तर्भावत ॥२०६ सेवन करना ही निषिद्ध बतलाया है-त्याग करने योग्य बतलाया है फिर भला परस्त्रीके सेवन करनेकी तो बात ही क्या है। उसका त्याग तो अवश्य ही कर देना चाहिए तथापि प्रकरण पाकर उसका स्वरूप बतलानेके लिये यहाँपर थोडा-सा उसका वर्णन करते हैं ॥१९७।। परस्त्रियां भी दो प्रकारको है एक दूसरेके अधीन रहनेवाली और दूसरी स्वतन्त्र रहनेवाली, जिनको क्रमश गृहीता और अगृहीता कहते है । इनके सिवाय तीसरी वेश्या भी परस्त्री कहलाती है ॥१९८॥ उनमे भी गृहीता या विवाहिता स्त्रियाँ दो प्रकारकी हैं-एक ऐसी स्त्रियां जिनका पति जीता है, तथा दूसरी ऐसी स्त्रियाँ जिनका पति तो मर गया हो परन्तु माता, पिता, भाई आदि जीते (जीवित) हो और उन्हीके यहाँ रहती हों। अथवा जेठ देवरके यहाँ रहती हो ॥१९९।। इनके सिवाय जो दासी हो और उसका पति वही घरका स्वामी हो तो वह भी गृहीता कहलाती है। यदि वह दासी किसीकी रक्खी हुई न हो, स्वतन्त्र हो तो वह गृहीता दासीके समान ही अगृहीता कहलाती है ॥२००॥ जिसके भाई बन्यु जीवित हो परन्तु पति मर गया हो ऐसी विधवा स्त्रीको भी गृहीता ही कहते हैं। यदि ऐसो विधवा स्त्रोके भाई बन्धु आदि सब मर जायें और वह स्वतन्त्र रहती हो तो उसको अगृहीता कहते है ॥२०१॥ यदि ऐसी स्त्रियोंके साथ ससर्ग करते समय कोई शत्रु राजाको सूचित कर दे तो इस महा अपराधके बदले उस मनुष्यको राज्यकी ओरसे भी कठोर दण्ड मिलता है ॥२०२।। कितने ही जैनी लोग यह भी कहते हैं कि जिस स्त्रीका पति भी मर जाय और भाई बन्धु आदि भी सब मर जायँ तो भी अगृहीता नही कहलाती किन्तु गृहीता ही कहलाती है क्योकि गृहीताका जो (किसीके द्वारा ग्रहण की हुई) लक्षण बतलाया है वह उसमे घटित होता है क्योकि नीतिमार्गका उल्लघन न करते हुए राजाओके द्वारा वह ग्रहण की जाती है इसलिए वह गृहीता ही है ।।२०३॥ नीतिमार्गका उल्लघन न करते हुए राजाओके द्वारा वह ग्रहण की हुई समझी जाती है इसका भी कारण यह है कि ससारमे यह नीतिमार्ग प्रसिद्ध है कि ससार भरका स्वामी राजा होता है। वास्तवमे देखा जाय तो जिसका कोई स्वामी नही होता उसका स्वामी राजा होता ही है ॥२०४॥ जो लोग इस नीतिको मानते हैं उनके मतके अनुसार उसको गृहीता ही मानना चाहिए। चाहे वह माता-पिताके साथ रहती हो चाहे अकेली रहती हो। उनके मतमे अगृहीता उसे समझना चाहिये जिसके साथ ससर्ग करनेसे राजादिका डर न हो ॥२०५।। ऐसे लोगोके मतमे इच्छानुसार रहनेवाली (कुलटा) स्त्रियां दो प्रकारकी ही समझनी २८ श्रावकाचार-संग्रह एतत्सर्व परिज्ञाय स्वानुभूतिसमक्षात । पराङ्गनासु नादेया बुद्धिर्षीधनशालिभि ॥२०७ या निषिद्धाऽस्ति शास्त्रेषु लोकेऽत्रातीव गहिता । साश्रेयसी कुतोऽन्यस्त्री लोकद्वयहितैषिणाम् ॥२०८ त्याज्यं वत्स परस्त्रीषु रति तृष्णोपशान्तये । विमृश्य चापवा चक्रं लोकद्वयविध्वसिनीम् ॥२०९ श्रूयन्ते बहवो नष्टा परस्त्रीसङ्गलालसा । ये वशास्यादयो नूनमिहामुत्र च दुःखिताः ॥२१० श्रूयन्ते न परं तत्र दृश्यन्तेऽद्यापि केचन । रागाङ्गारेषु सवग्या. दुखितेभ्योऽपि दु खिता ॥२११ मास्ता यन्नरके दुखं भावतीवानुवेदिनाम् । जातं पराङ्गनासक्ते लोहाङ्गनाविलिङ्गनात् ॥२१२ इहैवानर्थसन्वेहो यावानस्ति सुदुस्सह । तावान्न शक्यते वक्तमन्ययोषिन्मतेरित ॥२१३ आवावुत्पद्यते चिन्ता द्रष्टु वक्तुं समोहते । तत स्वान्तभ्रमस्तस्मादरतिर्जायते ध्रुवम् ॥२१४ तत. क्षुत्तविनाश स्यापु काश्यं ततो भवेत् । तत स्यादुधमाभावस्ततः स्याद्रविणक्षति ॥२१५ उपहास्य च लोकेऽस्मिन् तत शिष्टेष्वमान्यता । इङ्गिते राजदण्ड स्यात्सर्वस्वहा ॥२१६ चाहिये-एक गृहीता दूसरो अगृहीता। जो सामान्य स्त्रियाँ हैं वे सब गृहीतामे ही अन्तर्भूत कर लेना चाहिये (तथा वेश्यायें अगृहीता समझनी चाहिये) ॥२०६॥ अपने अनुभव और प्रत्यक्षसे इन सब परस्त्रियोके भेदोको समझकर बुद्धिमान पुरुषोको परस्त्रियोके सेवन करनेमे अपनी बुद्धि कभी नहीं लगानी चाहिए ॥२०७॥ जो कुलटा परस्त्री समस्त शास्त्रोमे निषिद्ध है, स्थान-स्थानपर उसके सेवन करनेका निषेध किया है तथा जो इस ससारमे भी अत्यन्त निन्दनीय गिनी जाती है ऐसी परस्त्री इस लोक और परलोक दोनो लोगोका हित चाहनेवाले लोगोके लिये कल्याण करनेवाली किस प्रकार हो सकती है अर्थात् परस्त्री सेवन करनेसे इस जीवका कल्याण कभी नही हो सकता ॥२०८।। इसलिए हे वत्स । हे प्रिय । परस्त्रीमे प्रेम करना अनेक आपत्तियोका स्थान है तथा वह परस्त्री दोनो लोकोके हितका नाश करनेवाली है यही समझकर अपनी तृष्णा या लालसाको शान्त करनेके लिये परस्त्रीमे प्रेम करनेका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥२०९।। इस परस्त्री सेवनकी लालसा रखनेवाले रावण आदि बहुतसे महापुरुष नष्ट हो गये और उन्होने इस लोक तथा परलोक दोनो लोकोमे अनेक प्रकारके दुख पाये ऐसा अनेक शास्त्रोमे सुना जाता है ॥२१०॥ परस्त्रीकी लालसा रखनेवाले पुरुष अनेक प्रकारसे दुखी होते है यह बात केवल शास्त्रोमें ही नहीं सुनी जाती, किन्तु आजकल भी देखी जाती है। आज भी ऐसे बहुत-से लोग हैं जो इस रागरूपी अगारेकी अग्निसे जलकर अत्यन्त दुखी लोगोसे भी अधिक दुखी हो रहे हैं ॥२११॥ परस्त्रियोमे आसवत्त रहनेवाले लोगोको उनकी तीन लालसाके कारण नरकमे गरम लोहेकी स्त्रियोके आलिंगन करानेसे जो दुख होता है वह तो होता ही है, किन्तु इस लोकमे भी परस्त्री सेवन करनेवालोको जो अत्यन्त असह्य दु ख और अनेक अनर्थ उत्पन्न होते हैं वे भी कहे नही जा सकते ॥२१२-२१३।। देखो, परस्त्रो सेवन करनेवालोंके सबसे पहले चिन्ता उत्पन्न होती है फिर उस परस्त्रीको देखनेकी लालसा उत्पन्न होती है, फिर उसके साथ बातचीत करनेकी लालसा होती है, फिर उसका हृदय भ्रममे पड़ जाता है और फिर हृदयमे भ्रम उत्पन्न होनेसे अवश्य ही अरुचि हो जाती है अर्थात् किसी भी काममे उसका चित्त नहीं लगता ॥२१४।। अरुचि उत्पन्न होनेसे उसकी भूख प्यास सब नष्ट हो जाती है, भूख प्यास नष्ट होनेसे शरीर कृश हो जाता है, शरीर कृश होनेसे फिर वह मनुष्य उद्यम नही कर सकता, किसी भी प्रकारका व्यापार नही कर सकता और व्यापार न करनेसे उसके धनका नाश हो जाता है ॥२१५।। इसके सिवाय इस ससारमे उसकी हंसी होती है,

लाटीसहिता
भवेद्वा मरणं मोहादन्यस्त्रीलीनचेतस । चित्रं किमत्र रोगाणामुद्भवोऽपि भवेद् ध्रुवम् ।।२१७
यद्वाऽमुत्रेह यद दुखं यावद्यादृक् च दुःस्सहम् ।
अन्यस्त्रीव्यसनासक्त सर्व प्राप्नोति निश्चितम् ॥२१८
अस्मदीयमतं चैतद्दोषवित्तद्धि मुश्चति । न मुञ्चति तथा मन्दो ज्ञातदोषोऽपि मूढधी ॥२१९
इति श्रीलाटीसहिताया दर्शनप्रतिमामहाधिकारे मूलगुणाष्टकप्रतिपाल-
सप्तव्यसनरोधवर्णनो नाम प्रथम सर्ग ॥१॥
ससारमे हँसी होनेसे भले शिष्ट या सभ्य लोगोमे उसकी अमान्यता या अपमान हो जाता है तथा
मालूम हो जानेपर उसे कठोर राजदण्ड मिलता है तथा राज्यकी ओरसे उसका सब धन हरण कर
लिया जाता है ॥२१६॥ अथवा तीव्र मोह होनेके कारण परस्त्री सेवन करनेवालोका मरण भी
हो जाता है तथा उपदश आदि अनेक प्रकारके भयकर रोग उत्पन्न हो जाते हैं इसके लिये तो
कुछ आश्चर्य ही नही करना चाहिये । अर्थात् परस्त्री सेवन करनेवालोके उपदश आदि भयंकर
रोग उत्पन्न होते ही हैं इसमे तो किसी प्रकारका सन्देह ही नही है ॥२१७।। अथवा परलोकमे
जितने असह्यसे असह्य दु ख हैं वे सब परस्त्री सेवन करने रूप व्यसनमे लीन होनेवाले मनुष्योको
अवश्य प्राप्त होते हैं ॥२१८॥ हमारा तो यह सिद्धान्त है कि जो इस परस्त्री सेवनके दोषोंको
जानता है, इसको अवश्य छोड देता है । कदाचित् कोई मन्द बुद्धि होता है और वह दोषोको नही
जानता तो वह नही भी छोडता है परन्तु जो दोषोको जानकर भी नही छोडता उसे सबसे बढकर
मूर्ख समझना चाहिये ॥२१९।।
इस प्रकार दर्शनप्रतिमा नामके महा अधिकारमे आठ मूलगुणोको पालन करने और
सातो व्यसनोका त्याग करनेका वर्णन करनेवाला यह प्रथम सर्ग समाप्त हुआ ॥१॥

द्वितीय सर्ग सम्यक्त्वं दुर्लभं लोके सम्यक्त्व मोक्षासाधनम् । ज्ञानचारित्रयो/जं मूलं धर्मतरोरिव ॥१ तदेव सत्पुरुषार्थस्तवेव परमं पदम् । तदेव परम ज्योति. तदेव परमं तपः ॥२ तदेवेष्टार्थसंसिद्धिस्तदेवास्ति मनोरथ । अक्षातीतं सुखं तत्स्यात्तत्कल्याणपरम्परा ॥३ विना येनात्र ससारे भ्रमति स्म शरीरभाक् । भ्रमिष्यति तथानन्तं कालं भ्रमति सम्प्रति ॥४ अपि येन विना ज्ञानमज्ञानं स्यात्तदज्ञयत् । चारिगं स्यात्कुचारिशं तपो बालतप स्मृतम् ॥५ अत्रातिविस्तरेणालं कर्म यावच्छभात्मकम् । सर्व तत्पुरत सम्यक् सर्वे मिथ्या तदत्ययात् ॥६ तच्च तत्वार्यश्रद्धानं सूशे सम्यक्त्वलक्षणे । प्रामाणिकं तदेव स्याफ्छूतकेवलिभिर्मतम् ॥७ तत्त्वं जीवास्तिकायाथास्तत्स्वरूपोऽयंसज्ञक । श्रद्धानं चानुभूति स्यात्तेषामेवेति निश्चयात् ॥८ सामान्यावेकमेवेतत्तविशेषविद्विधा । परोपचारसापेक्षा तो तबलादपि ॥९ इस ससारमे सम्यग्दर्शन ही दुर्लभ है, सम्यग्दर्शन ही ज्ञान और चारित्रका बीज है अर्थात् ज्ञान चारित्रको उत्पन्न करनेवाला है और सम्यग्दर्शन ही धर्मरूपी वृक्षके लिये जडके समान है ॥१॥ यह सम्यग्दर्शन ही सबसे उत्तम पुरुषार्थ है, यह सम्यग्दर्शन ही सबसे उत्तम पद है, यह सम्यग्दर्शन ही उत्कृष्ट ज्योति है और यह सम्यग्दर्शन ही सबसे श्रेष्ठ तप है ॥२॥ यह सम्यग्दर्शन ही इष्ट पदार्थों की सिद्धि है, यही परम मनोरथ है, यही केवल आत्मासे उत्पन्न होनेवाला अतीन्द्रिय सुख है और यही सम्यग्दर्शन अनेक कल्याणोको परम्परा है ॥३॥ इस सम्यग्दर्शनके ही विना इस घोर ससारमे यह प्राणी अनादिकालसे अबतक भ्रमण कर रहा है और आगे अनन्तकाल तक बराबर परिभ्रमण करेगा ||४|| इस सम्यग्दर्शनके विना ही इस जीवका ज्ञान अज्ञानी पुरुषके समान अज्ञान या मिथ्याज्ञान कहलाता है, चारित्र मिथ्याचारित्र कहलाता है और तप वाल तप या अज्ञानतप कहलाता है ॥५॥ इस विषयको बहुत बढाकर कहनेसे क्या लाभ है, थोडेसेमे इतना समझ लेना चाहिये कि इस ससारमे जो शुभरूप कर्म हैं, शुभ कार्य है, शुभ भाव हैं वे सब सम्य- ग्दर्शनपूर्वक ही होते हैं और विना सम्यग्दर्शनके वे सब कार्य या भाव मिथ्या होते हैं, विपरीत होते हैं, अशुभ होते हैं ॥६॥ इस सम्यग्दर्शनका लक्षण तत्त्वार्थसूत्रमे तत्त्वार्थश्रद्धान बतलाया है । इसका अभिप्राय यह है कि प्रत्येक पदार्थमे अलग-अलग धर्म रहता है। उसी धर्मसे उस पदार्थका निश्चय किया जाता है । उस धर्मको तत्त्व कहते हैं। अर्थ शब्दका अर्थ निश्चय करना है, जिस पदार्थका निश्चय उसमे रहनेवाले धर्मसे कर लिया है उस पदार्थका स्वरूप कभी विपरीत नही हो सकता ऐसे यथार्थ पदार्थका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहलाता है। यह जो सम्यग्दर्शनका लक्षण बतलाया है वही प्रमाण है और वही श्रुतकेवलियोने माना है ॥७॥ जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, सवर, निर्जरा, मोक्ष ये सात तत्त्व कहलाते हैं, इनका जो स्वरूप है वही पदार्थ कहलाता है तथा निश्चय नयसे उन पदार्थोकी अनुभूति होना श्रद्धान कहलाता है ।।८। वह यथार्थ पदार्थोंका श्रद्धान या अनुभूति अथवा सम्यग्दर्शन सामान्य रीतिसे एक प्रकार है और विशेष विधिसे वही दो प्रकार है। उसके उत्पन्न होनेके कारण जो कि पर पदार्थोके उपचारोकी अपेक्षा रखते हैं दो प्रकारके हैं।

लाटीसहिता
३१
तद्विशेषविधिस्तावनिश्चयाव्यवहारत । सम्यक्त्वं स्याद द्विधा तत्र निश्चयश्चकधा यथा ॥१०
शुद्धस्यानुभव साक्षाज्जीवस्योपाधिवजित । सम्यक्त्वं निश्चयान्नूनमर्थादेकविधं हि तत् ॥११
उक्तं च-
दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोध ।
स्थितिरात्मनि चारिशं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ॥१२
व्यवहाराच्च सम्यक्त्वं ज्ञातव्यं लक्षणाद्यथा । जीवादि सप्ततत्त्वानां श्रद्धानं गाढमध्ययम् ॥१२
उक्तं च-
जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं तेसिमधिगमो णाणं । रायादीपरिहरणं चरणं एसो हु मोक्खपहो ॥१३
यद्वा व्यवहृते वाच्यं स्थूल सम्यक्त्वलक्षणम् । आप्ताप्तागमधर्मादिश्रद्धानं दूषणोज्झितम् ॥१३
उन कारणोके दो भेद होनेसे सम्यग्दर्शनके भी दो भेद हो जाते हैं ॥९॥ उसके दो भेद निश्चय
और व्यवहारसे होते हैं। इसीलिये सम्यग्दर्शन भी निश्चय सम्यग्दर्शन और व्यवहार सम्यग्दर्शनके
भेदसे दो प्रकारका कहलाता है। उसमेसे निश्चय सम्यग्दर्शन एक ही प्रकार है । निश्चय सम्यग्दर्शन-
के और भेद प्रभेद नही हैं ॥१०॥ जो विना किसी उपाधिके, विना किसी उपचारके शुद्ध जीवका
साक्षात् अनुभव होता है वही निश्चयनयसे निश्चय सम्यग्दर्शन कहलाता है। उस निश्चय
सम्यग्दर्शनमे कोई उपाधि या उपचार नही हैं इसलिये ही वह सम्यग्दर्शन एक ही प्रकारका होता
है ॥११॥ यही प्रकारान्तरसे दूसरे शास्त्रोमे इसका लक्षण कहा है-शुद्ध आत्माका निश्चय
होना, अनुभव होना, निश्चय सम्यग्दर्शन है। शुद्ध आत्माका ज्ञान होना निश्चय सम्यग्ज्ञान है
और शुद्ध आत्मामे लीन होना निश्चय सम्यक्चारित्र है। इसलिये इन निश्चय सम्यग्दर्शनज्ञान
चारित्रसे कैसे बन्ध हो सकता है ॥१२॥ आगे व्यवहार सम्यग्दर्शनका लक्षण बतलाते हैं-जीव
अजीव आदि सातो तत्त्वोका नाश न होनेवाला चल मलिनरहित गाढ़ श्रद्धान करना व्यवहार
सम्यग्दर्शन है ।।१२।। यही दूसरे शास्त्रोमे कहा है । जीवादिक सातो पदार्थोंका यथार्थ श्रद्धान
करना सम्यग्दर्शन है, उन्ही जीवादिक सातो पदार्थोंको जानना सम्यग्ज्ञान है और राग-द्वेषको
दूर करना सम्यक्चारित्र है। ये सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ही मोक्षके मार्ग हैं या
मोक्षके कारण हैं ॥१३॥
अथवा व्यवहारके लिए स्थूल सम्यग्दर्शनका लक्षण इस प्रकार भी आचार्योंने बतलाया है
कि आप्त, आप्तका कहा हुआ आगम और आप्तका कहा हुआ दयामय धर्म इन तीनोका सब
प्रकारके दोषोसे रहित श्रद्धान करना व्यवहार सम्यग्दर्शन है। भावार्थ-इन दोनो लक्षणोमे
केवल ऊपरसे देखनेकी ही भिन्नता है, वास्तवमे कोई भेद नही है क्योकि आगमके श्रद्धानमे
आगममे कहे हुए सातो तत्वोका श्रद्धान आ जाता है अथवा तत्त्वोके श्रद्धानमे देवशास्त्र गुरुका
श्रद्धान आ जाता है क्योकि जीव तत्त्वके श्रद्धानमे जो चार घातिया रहित शुद्धजीवका स्वरूप है
वही आप्त है, उसी आप्तका कहा हुआ सातो तत्वोको वर्णन करनेवाला आगम है और सवर
या निर्जराके स्वरूपमे दयामय अहिंसामय धर्मका स्वरूप वर्णन करना धर्म है। इस प्रकार विचार
करनेसे व्यवहार सम्यग्दर्शनके दोनो ही लक्षण पृथक्-पृथक् नही हैं किन्तु दोनो ही एक हैं केवल
बतलानेका या कथन करनेका प्रकार अलग-अलग है और कुछ भेद नही है । ॥१३॥

३२ श्रावकाचार-सग्रह उक्तंच- नास्ति चाहत्परो देवो धर्मो नास्ति दयापरः । तप परं च नन्थ्यमेतत्सम्यक्त्वलक्षाणम् । १४ हेतुतोऽपि द्विषोद्दिष्टं सम्यक्त्वं लाणाद यथा । तन्निसर्गादधिगमावित्युक्तं पूर्वसूरिभि ॥१४ निसर्गस्तु स्वभावोक्तिः सोपायोऽधिगमो मत. । अर्थोऽयं शम्पमात्रत्वावर्थत सूच्यतेऽधुना।।१५ नाम्ना मिथ्यात्वकमकमस्ति सिद्धमनावित । सम्यक्त्वोत्पत्तिवेलायां द्रव्यतस्तत्विषा भवेत् ॥१६ अघोऽपूर्वानिवृत्त्याख्य प्रसिद्ध करणत्रयम् । करणान्तर्मुहूर्तस्य मध्ये शेषाऽस्ति नान्यवा ॥१७ उक्तंच- जन्तेण कोहवं वा पढमुवसमसम्मभावजतेण । मिच्छावव्वं तु तिहा असखगुणहीण दख्वकमा ॥१५ यही लक्षण अन्य शास्त्रोमे भी कहा है भगवान् अरहन्तदेवके समान अन्य कोई देव नही है, दयाके समान ओर कोई धर्म नही है और निग्रन्थ अवस्थाके समान और कोई उत्कृष्ट तप नही है अर्थात् तप करनेवाले गुरु निर्ग्रन्थ ही होते है ऐसा मानना हो सम्यग्दर्शन है। यही सम्यग्दर्शन- का लक्षण है ॥१४॥ यह सम्यग्दर्शन जिस प्रकार अपने लक्षणसे निश्चय और व्यवहाररूप दो प्रकार है उसी प्रकार यह सम्यग्दर्शन अपने उत्पन्न होनेके कारणोके भेदसे भी दो प्रकार है। उसके उत्पन्न होनेके दो कारण है एक निसर्ग और दूसरा अधिगम । जो निसर्गसे उत्पन्न होता है उसको निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं और जो अधिगमसे उत्पन्न होता है उसको अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं । ऐसा पहले आचार्योने निरूपण किया है ॥१४॥ जो सम्यग्दर्शन स्वभावसे उत्पन्न होता है, अपने आप उत्पन्न होता है जो विना किसी उपदेशके उत्पन्न हो जाता है उसको निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं और जो बहिरग उपदेश आदि उपायोंसे उत्पन्न होता है उसको अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं। यह अर्थ केवल शब्दमात्रसे बतलाया है। जो भेद या जो अर्थ उन शब्दोंसे निकलता है वह बतलाया है। वास्तवमे उन दोनोमे क्या भेद है तथा निसर्गज और अधिगमज सम्यग्दर्शन किसको कहते हैं यह बात अब आगे बतलाते हैं ॥१५॥ सम्यदर्शनरूप आत्माके गुणका घात करनेवाला एक मिथ्यात्वकर्म है। वह मिथ्यात्वकर्म अनादिकालसे एक ही प्रकारका चला आ रहा है । जब इस जीवको मिथ्यात्वकर्मके उपशम होनेसे प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है तब वही एक प्रकारका मिथ्यात्वकमं अलग-अलग द्रव्यरूप तीन प्रकारका हो जाता है ॥१६॥ अध करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण ये तीन करण प्रसिद्ध हैं। इन तीनो करणोका समय अन्तर्मुहूर्त है। यह जोव जिस अन्तर्मुहूर्तमे इन तीनो करणोको करता है उसी अन्तर्मुहूर्तमे उस मिथ्यात्वकर्मके तीन भेद कर डालता है। ये भेद किसी दूसरे समयमे नही होते, करणत्रय करते समय ही होते हैं ॥१७॥ कहा भी है-जिस प्रकार कोदो नामके धान्योको चक्कीसे पीसनेपर उसके तीन भाग हो जाते हैं-चावल अलग हो जाते हैं, भूसी अलग हो जाती है और कण अलग हो जाते हैं उसी प्रकार उपशम सम्यग्दर्शनरूपी चक्कीके द्वारा पीसे जानेपर मिथ्यात्वकर्म भी तीन भागोमे बैट जाता है। पहले भागको मिथ्यात्वकर्म कहते हैं यह सबसे अधिक बलवान् और अधिक होता है। दूसरा सम्यक्मिथ्यात्व है यह उससे कम बलवान् है और इसकी द्रव्य सख्या भी उससे कम होती है। तीसरा सम्यक्प्रकृति मिथ्यात्व है। यह दूसरेसे भी कम बलवान् और द्रव्यमे कम होता है ।।१५।।

लाटीसहिता m विधाभूतस्य तस्योच्चैरेवं मिथ्यात्वकर्मण । भेदास्त्रयश्चतुष्कं च स्यादनन्तानुबन्धित ॥१८ एतत्समुदितं प्रोक्तं दर्शनं मोहसप्तकम् । प्रागुपशमसम्यक्त्वे तत्सप्तोपशमो भवेत् ॥१९ उक्तं च- पढमं पढमे णियदं पढमं विदियं च सव्वकालसि । खाइयसम्मत्तो पुण जत्थ जिणा केवलं तहि ॥१६ निसर्गेऽधिगमे वापि सम्यक्त्वे तुल्यकारणम् । इग्मोहसप्तकस्य स्यादुभयाभावसंज्ञकः ॥२० उक्तं च- सत्तण्हं उवसमदो उक्समसम्मो खयादुखइयो य । विदियकसाउदयादौ असंजदो होदि सम्मो सो॥१७ किन्तु सत्यन्तरङ्गेऽस्मिन् हेतावुत्पद्यते च यत् । नैसर्गिक हि सम्यक्त्वं विनोद्देशादिहेतुना ॥२१ यत्पुनश्चान्तरङ्गेऽस्मिन् सति हेतौ तथाविधि । उपवेशाविसापेक्षं स्यादधिगमसंज्ञकम् ॥२२ बाह्यं निमित्तमत्रास्ति केषाचिद्विम्बदर्शनम् । अर्हतामितरेषां तु जिनमहिमदर्शनम् ॥२३ इस प्रकार अनादिकालसे चले आए मिथ्यात्वकर्मके तीन भेद हो जाते हैं ॥१८॥ मिथ्यात्व- कर्मके ऊपर लिखे तीन भेद तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ चार भेद ये सब मिलकर सात भेद दर्शनमोहसप्तक (सम्यग्दर्शनको ज्ञात करनेवाली सात प्रकृतियाँ) कहलाता है । जब इस जीवको सबसे पहले उपशम सम्यग्दर्शन होता है तब इन सातो प्रकृतियोका उपशम हो जाता है ॥१९॥ कहा भी है-यह नियम है कि प्रथम अवस्थामे अर्थात् अनादि मिथ्यादृष्टि आत्मामे सबसे पहले प्रथमसम्यक्त्व अर्थात् औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है तथा प्रथम औपशमिक सम्यग्दर्शन और द्वितीय क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन समस्त समयमे उत्पन्न हो सकता है। परन्तु क्षायिक V सम्यग्दर्शन वही होता है जहाँ श्रुतकेवली अथवा भगवान् सर्वज्ञदेव विद्यमान हो ।।१६।। सम्यग्दर्शन चाहे निसर्गज हो और चाहे अधिगमज हो दोनों प्रकारके सम्यग्दर्शनोंमें सम्यग्दर्शनको घात करनेवाली ऊपर लिखी सातो प्रकृतियोका अभाव होना समान कारण है। अर्थात् दोनो प्रकारके सम्यग्दर्शनोमे इन सात प्रकृतियोका अभाव होना ही चाहिये विना इन सातो प्रकृतियोके अभाव हुए सम्यग्दर्शन कभी उत्पन्न नही हो सकता ॥२०॥ कहा भी है-मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, और सम्यकप्रकृति मिथ्यात्व ये दर्शनमोहनीयकी तीन प्रकृतियाँ तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सब सातो प्रकृतियोके उपशम होनेसे औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है तथा इन सातों प्रकृतियोके क्षय होनेसे क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है। इस अविरत सम्यग्दर्शन नामके चौथे गुण-स्थानमे अप्रत्याख्यानावरण कर्मका उदय होनेसे सयम नही होता इसीलिये इस गुणस्थानको असयत सम्यग्दर्शन कहते हैं ॥१७॥ सातो प्रकृतियोके उपशम या क्षय होने पर जो बिना बाह्य कारणोके सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो जाता है उसको नैसर्गिक या निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते है ॥२१॥ तथा जो अन्तरग कारणोके होने पर अर्थात् सातो प्रकृतियोका अभाव होने पर जो उपदेश आदि बाह्य कारणोको अपेक्षा रखते हुए सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है उसको अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते है ॥२२।। इस सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होनेमे बाह्य निमित्तकारण अनेक है। किसीको भगवान् अरहन्तदेवके प्रतिबिम्बोके दर्शन करनेसे सम्यग्दर्शन होता है, किसीको भगवान् अरहन्तदेवकी महिमा या समवशरणादिक विभूतिके देखनेसे सम्यग्दर्शन ५ ३४ श्रावकाचार-सग्रह धर्मश्रवणमेकेषां यद्वा देवद्धिवर्शनम् । जातिस्मरणमेकेषां वेदनाभिभवस्तथा ॥२४ एवमित्यादिबहवो विद्यन्ते बाह्यहेतव । सम्यक्त्वप्रथमोत्पत्तावन्तरङ्गानतिक्रमात् ।।२५ अस्यैतलक्षण नूनमस्ति सम्यग्हगात्मनः । जिनोक्तं श्रद्दधात्येव जीवाद्यर्थं यथास्थितम् ॥२६ उक्तच- णो इदिएसु विरदो णो जीवे थावरे तसे चापि । जो सद्दहदि जिणुत्तं सम्माइट्ठी अविरदो सो ॥१८ ननूल्लेख किमतावानस्ति किं वा परोऽप्यत । लक्ष्यते येन सदृष्टिलक्षणेनान्वित पुमान् ॥२७ अपरायपि लक्ष्माणि सन्ति सम्यग्दृगात्मन । सम्यक्त्वेनाविनाभूतैर्यश्च सडलक्ष्यते सुदृक् ।।२८ उक्तमा सुखं ज्ञानमनादेयं दृगात्मनः । नादेयं कर्मसर्वस्व तद्वदृष्टोपलब्धित ॥२९ सम्यक्त्वं वस्तुत सूक्ष्मं केवलज्ञानगोचरम् । गोचरं वावधिस्वान्तपर्ययज्ञानयोयो ॥३० न गोचरं मतिज्ञानश्रुतविज्ञानयोर्मनाक । नापि वेशावपेस्तत्र विषयोऽनुपलब्धित ॥३१ अस्त्यात्मनो गुण' कश्चित्सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् । तदहग्मोहोदयान्मिथ्यास्वादरूपमनावित ३२ देवाकालाविसलब्धो प्रत्यासन्ने भवार्णवे। भव्यभावविपाकाद्वा जीव सम्यक्त्वमश्नुते ।।३३ हो जाता है ॥२३॥ सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होनेमे किसीको धर्मश्रवण कारण पडता है, किन्हीको बडे-बडे देवोकी ऋद्धियोका देखना ही कारण पडता है, किन्हीको जातिस्मरण (पहले भवका स्मरण हो आना) ही कारण पडता है और किन्हीको नरकादिककी तीव्र वेदनाके कारण आत्माको तीव्र दुःख होना या आत्माका तिरस्कार होना ही सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होनेमे कारण पड़ता है ।।२४॥ प्रथम सम्यग्दर्शन उत्पन्न होते समय मिथ्यात्व आदि सातो प्रकृतियोके अभावरूप अन्तरग कारणोंके होने पर ऊपर लिखे बाह्य कारण भी निमित्तकारण होते हैं तथा इनके सिवाय और भी ऐसे ही अनेक कारण निमित्तकारण पड़ जाते हैं ॥२५।। इस प्रकारका सम्यग्दर्शन जिसके उत्पन्न हो गया है ऐसे इस सम्यग्दृष्टीका लक्षण निश्चयसे यही है कि वह भगवान् सर्वज्ञदेवके द्वारा कहे हुए जीवादिक पदार्थोके यथार्थ स्वरूपका अवश्य श्रद्धान करता है ।।२६।। कहा भी है जो न तो इन्द्रियोंसे विरक्त होता है और न अस स्थावर जीवोकी हिंसाका त्याग करता है जो केवल भगवान अरहन्त देवके कहे हुए पदार्थोका श्रद्धान करता है उसको अविरत सम्यग्दृष्टि कहते हैं ||१८|| शका-क्या सम्यग्दृष्टिके विषयमे इतना ही कथन है या और भी है ? क्या ऐसा कोई लक्षण है जिस लक्षणसे युक्त यह जीव सम्यग्दृष्टि कहलाता है ? ॥२७॥ समाधान-सम्यग्दृष्टि आत्माके और भी लक्षण हैं, सम्यक्त्वके अविनाभावी जिन लक्षणोके द्वारा सम्यग्दृष्टि जीव लक्षित किया जाता है ॥२८॥ यथा पहले इन्द्रियजन्य सुख और ज्ञानका कथन कर आये हैं जो सम्यग्दृष्टि आत्माके लिए उपादेय नही माना गया है। इसी प्रकार उसके लिए सम्पूर्ण कर्म भी उपादेय नही माना गया है। और यह बात प्रत्यक्षसे भी दिखाई देती है कि सम्यग्दृष्टिकी इन सबमे हेय बुद्धि हो जाती है ।।२९॥ वास्तवमे सम्यग्दर्शन अत्यन्त सूक्ष्म है जो या तो केवलज्ञान- का विषय है या अवधिज्ञान और मन पर्ययज्ञानका विषय है ॥३०॥ यह मतिज्ञान और श्रुतज्ञान इन दोनोका किञ्चित् भी विषय नही है। साथ ही यह देशावधिज्ञानका भी विषय नही है, क्योकि इन ज्ञानोंके द्वारा सम्यग्दर्शनकी उपलब्धि नही होती ॥३१।। आत्माका निर्विकल्प सम्यक्त्व नामका एक गुण है । जो दर्शन मोहनीयके उदयसे अनादिकालसे मिथ्या स्वादरूप हो रहा है ॥३२॥ देववश कालादिलब्धियोंके प्राप्त होने पर जब ससार समुद्र निकट रह जाता है और भव्य भावका परिपाक .

लाटीसंहिता ३५ प्रयत्नमन्तरेणापि हरमोहोपशमो भवेत् । अन्तर्मुहूर्तमानं च गुणश्रेण्यनतिक्रमात् ॥३४ अस्त्युपशमसम्यक्त्व हम्मोहोपशमात् यथा । पुसोऽवस्थान्तराकार नाकारं चिद्विकल्पकै. ॥३५ सामान्याद्वा विशेषाद्वा सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् । सत्तारूपं पारिणामि प्रदेशेषु पर चितः ॥३६ तत्रोल्लेखस्तमोनाशे तमोरेरिव रश्मिभि । दिश प्रसादमासेदु सर्वतो विमलाशयाः ॥३७ इग्मोहोपशमे सम्यग्दृष्टरुल्लेख एष वै । शुद्धत्वं सर्वदेशेषु त्रिधा बन्धापहारि यत् ।।३८ यथा वा मद्यधत्तूरपाकस्यास्तङ्गतस्य वै । उल्लेखो मूच्छितो जन्तुरुल्लाघ स्यादमूच्छितः ॥३९ दृग्मोहस्योदयान्मू वैचित्य वा तथा भ्रम । प्रशान्ते तस्य मूर्छाया नाशाज्जीवो निरामयः ॥४० होता है तब यह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त होता है ॥३३॥ उक्त कारण सामग्रीके मिलते ही इस जीवके विना किसी प्रयत्नके एक अन्तर्मुहूर्तके लिए दर्शन मोहनीयके उपशम होता है और तब गुण श्रेणी निर्जरा भी होती है ॥३४॥ दर्शन मोहनीयके उपशमसे जो उपशम सम्यक्त्व होता है वह जीवकी मिथ्यात्व अवस्थासे सर्वथा भिन्न दूसरी अवस्थारूप है जिसका चैतन्यके विकल्पमे आकार नही आता ॥३५।। सम्यग्दर्शन सामान्य और विशेष दोनो प्रकारसे निर्विकल्प है, सत्त्वरूप है और केवल आत्माके प्रदेशोमे परिणमन करनेवाला है ॥३६॥ जैसे सूर्यको किरणोके द्वारा अन्धकारका नाश हो जानेपर दिशाएँ सब तरफसे निर्मल होकर प्रसन्नताको प्राप्त होती हैं वैसे ही दर्शन मोहनीयका उपशम होने पर सम्यग्दृष्टिके भी वही दशा होती है। इसके जो सम्यग्दर्शन होता है वह सब प्रदेशोमे शुद्ध होता है और तीन प्रकारके बन्धको दूर करनेवाला होता है ।।३७-३८॥ अथवा जिस प्रकार मदिरा और धतूरेके परिपाक होने पर यह जीव मूर्छित होता है और इनकी नशा दूर हो जानेपर यह जीव मूर्छारहित होकर प्रसन्न हो जाता है ॥३९।। उसी प्रकार दर्शन मोहनीयके उदयसे इस जीवके मूर्छा वैचित्य या भ्रम देखा जाता है और दर्शन मोहनीय कर्मके उपशान्त हो जानेपर मूर्छाका नाश हो जानेसे यह जीव निरामय देखा जाता है ॥४०॥ विशेषार्थ- यहाँ सम्यक्त्व किस ज्ञानका विषय है इस बातका निर्देश करके सम्यक्त्व आत्माका गुण है यह बतलाया गया है और साथ ही उसकी उत्पत्तिकी सामग्री पर प्रकाश डाला गया है। सम्यक्त्व अमूर्त आत्माका गुण है इसलिए इसका प्रत्यक्ष ज्ञान केवलज्ञानके सिवाय अन्य ज्ञानो द्वारा सम्भव नही है। फिर भी यहाँ वह अवधिज्ञान और मन पर्यय ज्ञानका भी विषय बतलाया गया है सो इसका कारण भिन्न है । बात यह है कि परमावधि और सर्वावधिका विषय कर्म तो है ही, इसलिए इन ज्ञानोके द्वारा कर्मके उपशम आदिको जानकर अवधिज्ञानी यह जान लेता है कि इस आत्मामे सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो गया है । इसी प्रकार कर्मके निमित्तसे होने वाली मनकी पर्याय मन पर्ययज्ञान- का विषय होनेसे मन पर्ययज्ञान भी सम्यक्त्वको जान लेता है । पर शेष ज्ञान सम्यक्त्वको नही जान मकते, क्योकि वे स्थूल मूर्त पर्यायोको ही जानते हैं। इस प्रकार सम्यक्त्व किस ज्ञानका विषय है यह तो स्पष्ट हो जाता है। अब सम्यक्त्वकी उत्पत्तिकी सामग्रीके सम्बन्धमे विचार करना है। बात यह है कि सम्यक्त्वकी उत्पत्ति अधिकसे अधिक अर्धपुद्गल परिवर्तन कालके शेष रहने पर ही होती है। उसमें भी इस कालके भीतर जब सम्यक्त्वको उत्पत्तिकी योग्यता होती है तभी यह सम्यक्त्व उत्पन्न होता है। सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके विषयमे ऐसा नियम है कि सर्वप्रथम उपशम सम्यक्त्व होता है जो अध करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण-पूर्वक होता है । उसमे भी मिथ्यात्व- का अन्तरकरण उपशम होता है और अनन्तानुबन्धी चतुष्कका अनुदयरूप उपशम होता है। इस सम्यक्त्वका अन्तर्मुहूर्त काल है । इसके होने पर जीवकी ऐसी अवस्था प्रकट होती है जिससे उसका श्रावकाचार-संग्रह धवानाविगुणाः बाह्यं लक्ष्म सम्यग्हगात्मनः । न सम्यक्त्वं तदेवेति सन्ति ज्ञानस्य पर्यया ||४१ मपि चात्मानुभूतिश्च ज्ञान ज्ञानस्य पर्ययात् । अर्थात् ज्ञानं न सम्यक्त्वमस्ति चेबाह्यलक्षणम् ।।४२ यभोल्लाघो हि दुर्लक्ष्यो लक्ष्यते स्थूललक्षण । वाग्मन कायचेष्टाणामुत्साहाविगुणात्मक ॥४३ नन्वात्मानुभव साक्षात्सम्यक्त्वं वस्तुत स्वयम् । सर्वतः सर्वकालस्य मिथ्यादृष्टेरसम्भवात् ॥४४ नेव यतोऽनभिज्ञोऽसि सत्सामान्यविशेषयो । अप्यनाकारसाकारलिङ्गयोस्तद्यथोच्यते ॥४५ आकारोऽर्थविकल्पः स्यावर्थ स्वपरगोचर । सोपयोगो विकल्पो वा ज्ञानस्यैतद्धि लक्षणम् ॥४६ नाकार स्यावनाकारो वस्तुतो निर्विकल्पता । शेषानन्तगुणानां तल्लक्षणं ज्ञानमन्तरा ॥४७ नन्वस्ति वास्तवं सर्व सामान्य च विशेषवत् । तत्किश्चित्स्यावनाकारं किश्चित्साकारमेव तत् ॥४८ सत्यं सामान्यवदज्ञानमर्थाच्चास्ति विशेषवत् । यत्सामान्यमनाकारं साकारं यद्विशेषभाक् ॥४९ ज्ञानाद्विना गुणाः सर्वे प्रोक्तसल्लाणाङ्किता । सामान्याहा विशेषाद्वा सन्त्यनाकारलक्षणा ॥५० ततो वक्तुमशक्यत्वानिर्विकल्पस्य वस्तुन । तदुल्लेखं समालेल्य ज्ञानद्वारा निरूप्यते ॥५१ स्वापूर्वार्थद्वयोरेव प्राहकं ज्ञानमेकश । नात्र ज्ञानमपूर्वार्थो ज्ञानं ज्ञानं पर पर ॥५२ चित्त ससार और ससारके कारणोसे स्वभावतः हट जाता है। यो तो सम्यक्त्वकी उत्पत्तिकी प्रक्रियाके विषयमे बहुत कुछ वक्तव्य है पर यहां संक्षेपमे उसका संकेतमात्र किया है। सम्यग्दृष्टि मात्माके यद्यपि श्रद्धान आदि गुण होते है पर वे उसके बाह्य लक्षण हैं। सम्यक्त्व उन रूप नही है, क्योकि वे ज्ञानको पर्याय है ॥४१॥ तथा आत्मानुभूति भी ज्ञान ही है, क्योकि वह ज्ञानको पर्याय है । वास्तवमे वह आत्मानुभूति ज्ञान ही है सम्यक्त्व नहीं । यदि उसे सम्यक्त्व माना भी जाय तो वह उसका बाह्य लक्षण है ॥४२॥ आशय यह है कि जिस प्रकार स्वास्थ्य लाभ जन्य हर्षका ज्ञान करना कठिन है परन्तु वचन, मन और शरीरकी चेष्टामओके उत्साह आदि गुणरूप स्थूल लक्षणोंसे उसका ज्ञान कर लिया जाता है उसी प्रकार अतिसूक्ष्म और निर्विकल्प सम्यग्दर्शनका ज्ञान करना कठिन है तो भी श्रद्धान आदि बाह्य लक्षणोंके द्वारा उसका ज्ञान कर लिया जाता है ।।४३।। शका- वास्तवमे आत्मानुभव ही साक्षात् सम्यक्त्व है, क्योकि मिथ्याष्टिके इसका कभी भी पाया जाना असम्भव है ॥४४॥ समाधान-ऐसा नही है, क्योकि सत्सामान्य और सद्विशेषका तथा अनाकार और साकारके चिह्नोका तुम्हे कुछ ज्ञान ही नही है। जो इस प्रकार है-ज्ञानमे अर्थका विकल्प होना आकार कहलाता है और अर्थ स्व-परके भेदसे दो प्रकार है। अथवा सोपयोग अवस्थाका होना ही विकल्प है जो कि ज्ञानका लक्षण है ॥४५-४६।। आकारका नही होना ही अनाकार है। उसीका नाम वास्तवमे निर्विकल्पता है। यह निर्विकल्पता ज्ञानके सिवाय शेष अनन्त गुणोका लक्षण है ॥४७॥ शका-जब कि सत्सामान्य और सद्विशेष यह सब वास्तविक है तब फिर कुछ अनाकार है और कुछ साकार है ऐसा क्यो ॥४८॥ समाधान यह कहना ठीक है तथापि ज्ञान वास्तवमे सामान्य और विशेष दोनो प्रकारका होता है । उनमेसे जो सामान्य ज्ञान है वह अनाकार होता है और जो विशेष ज्ञान है वह साकार होता है । तथा ज्ञानके सिवाय सत् लक्षण वाले सामान्य या विशेष रूप और जितने भी गुण कहे गये हैं वे सब वास्तवमे अनाकार ही होते हैं ॥४९-५०।। इसलिये निर्विकल्प वस्तुका कथन करना शक्य नही होनेसे जहां भी उसका उल्लेख किया जाता है वह ज्ञान द्वारा ही किया जाता है ।।५१।। यद्यपि स्व और अपूर्व दोनो प्रकारके पदार्थोंको ज्ञान युगपत् ग्रहण करता है तथापि ज्ञान अपूर्वार्थ नही हो सकता है। किन्तु ज्ञान ज्ञान है और पर पर है ॥५२॥ यत चित् शक्ति ज्ञानमात्र लाटीसंहिता ३७ स्वार्थो हि ज्ञानमात्रस्य ज्ञानमेकं गुणश्चित । परार्था स्वात्मसम्बन्धिगुणा शेषा सुखादय ॥५३ तद्यथा सुखदु खादिभावो जीवगुण स्वयम् । ज्ञानं तद्वेदकं नूनं नार्थाद्ज्ञानं सुखादिमत् ॥५४ अपि सन्ति गुणा सम्यक् श्रद्धानादिविकल्पका । उद्देशो लक्षणं तेषां तत्परीक्षाऽधुनोच्यते ॥५५ तत्रोद्देशो यथा नाम श्रद्धारुचिप्रतीतय । चरणं च यथाम्नायादर्थात्तत्त्वार्थगोचरम् ॥५६ तत्त्वार्थाभिमुखी बुद्धि श्रद्धा सात्म्यं रुचिस्तथा । प्रतीतिस्तु यथेति स्यात्स्वीकारश्चरणं क्रिया ॥५७ अर्थादाद्यत्रिक ज्ञानं ज्ञानस्यैवार्थपर्ययात् । क्रिया वाक्कायचेतोभिर्व्यापार' शुभकर्मसु ॥५८ व्यस्ताश्चैते समस्ता वा सददृष्टलक्षणं न वा । समक्ष वा विपक्षे वा सन्ति यद्वा न सन्ति वा ॥५९ स्वानुभूतिसनाथाश्चेत्सन्ति श्रद्धादयो गुणाः । स्वानुभूति विनाभासा नार्थाच्छुद्धादयो गुणा ॥६० तस्माच्छ्रद्धादय सर्वे सम्यक्त्वं स्वानुभूतिवत् । न सम्यक्त्वं तदाभासा मिथ्याश्रद्धादिवच्चित ॥६१ सम्पग्मिथ्याविशेषाभ्या विना श्रद्धादिमात्रका । सपक्षावद्विपक्षेऽपि वृत्तित्वाद् व्यभिचारिण ॥६२ अर्थाच्छ्रद्धादयः सम्यग्दृष्टिश्रद्धादयो यत' । मिथ्याश्रद्धादयो मिथ्या नार्थाच्छुद्धादयो यत ॥६३ ननु तत्त्वरचिः श्रद्धा श्रद्धामात्रैकलक्षणात् । सम्यग्मिथ्याविशेषाभ्या सा द्विधा तु कुतोऽर्थतः ॥६४ नेवं यत समव्याप्ति श्रद्धास्वानुभवद्वयोः । नून नानुपलब्धार्थे श्रद्धा खरविषाणवत् ॥६५ मानी गयी है अत केवलज्ञान हो उसका स्वार्थ है और स्वार्थसे सम्वन्ध रखनेवाले शेष सुखादि गुण उसके परार्थ है ॥५३॥ आशय यह है कि सुख दु खादि भाव यद्यपि जीवके निज गुण हैं और ज्ञान उसका वेदक है तथापि वास्तवमे ज्ञान सुखादिरूप नही है ॥५४॥ यत सम्यक् श्रद्धान आदि- के भेदसे और भी बहुतसे गुण हैं, इसलिए यहाँ अब उनका उद्देश, लक्षण और परीक्षा कहते हैं ॥५५॥ उनमेसे उद्देश इस प्रकार है । जैसे कि आम्नायके अनुसार जीवादि पदार्थ-विषयक श्रद्धा, रुचि, प्रतीति और चरणको सम्यक्त्व कहना उद्देश है ॥५६।। इनमेसे जीवादि पदार्थोक सन्मुख बुद्धिका होना श्रद्धा है । बुद्धिका तन्मय हो जाना रुचि है । ‘ऐसा ही है' इस प्रकार स्वीकार करना प्रतीति है और अनुकूल क्रिया करना चरण है ॥५७।। इनमेसे आदिके तीन वास्तवमै ज्ञान ही हैं, क्योकि श्रद्धा, रुचि और प्रतीति ये ज्ञानकी ही पर्याय हैं । तथा चरण यह चारित्रगुणकी पर्याय है, क्योकि शुभ कार्योमे जो वचन, काय और मनका व्यापार होता है उसे चरण कहते हैं ॥५८॥ ये श्रद्धा आदि चारो पृथक् पृथक् रूपसे अथवा समस्त रूपसे सम्यग्दृष्टिके लक्षण भी हैं और नहीं भी हैं, क्योकि ये सपक्ष और विपक्ष दोनो ही अवस्थाओमे पाये जाते है और नही भी पाये जाते हैं ।।५९|| यदि स्वानुभूतिके साथ होते हैं तो श्रद्धादिक गुण हैं और स्वानुभूतिके विना वे वास्तवमे गुण नही हैं किन्तु गुणाभास है ॥६०॥ इसलिए यह निष्कर्ष निकला कि श्रद्धा आदिक सभी गुण स्वानुभूतिके साथ समीचीन है और सम्यक्त्वके बिना मिथ्या श्रद्धा आदि रूप होने के कारण वे तदाभास हैं ॥१॥ सम्यक् और मिथ्या विशेषणके बिना जब केवल श्रद्धा आदिक विवक्षित होते हैं तव उनकी सपक्ष- के समान विपक्षमे वृत्ति देखी जाती है अत वे व्यभिचारी हैं ।।१२।। यतः सम्यग्दृष्टिके श्रद्धा आदिक ही वास्तवमे श्रद्धा आदिक हैं अत. मिथ्यादृष्टिके श्रद्धा आदिकको मिथ्या जानना चाहिए। वे वास्तवमे श्रद्धा आदिक नहीं हैं ॥६३।। गका-जव कि तत्त्व रुचिका नाम श्रना है क्योकि उसका श्रद्धा यही एक मात्र लक्षण है । तब फिर वह वास्तवमे सम्यक्ता और मिथ्याश्रता ऐसी दो भेद वाली कैसे हो जाती है ?||४|| समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि श्रद्धा और स्वानुभव इन दोनोमे समव्याप्ति है, इसलिए अनुपलब्ध पदार्थमे गधेके सीगके समान प्रद्धा हो ही ३८ श्रावकाचार-संग्रह विना स्वात्मानुभूति तु या श्रद्धा श्रुतमात्रतः । तत्वार्थानुगताप्यर्थाच्छुद्धा नानुपलब्धित ॥६६ लब्धि. स्यावविशेषाद्वा सदसतोरुन्मतवत् । नोपलब्धिरिहाख्याता तच्छेषानुपलब्धिवत् ॥६७ ततोऽस्ति यौगिकी रूढि श्रद्धा सम्यक्त्वलक्षणम् । अर्थादप्यविरुद्ध स्यात्सूक्त स्वात्मानुभूतिवत् ॥६८ गुणाश्चान्ये प्रसिद्धा ये सदृष्टेः प्रशमावय । बहिदृष्टया यथा स्व ते सन्ति सम्यक्त्वलक्षणम् ॥६९ तत्राद्य प्रशमो नाम संवेगश्च गुण क्रमात् । अनुकम्पा तथास्तिक्यं वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा ॥७० प्रशमो विषयेषज्वैर्भावक्रोधादिकेषु च । लोकासंख्यातमायेषु स्वरूपाच्छिथिल मन ॥७१ सद्य कृतापराधेषु यद्वा जीवेषु जातुचित् । तद्वधादिविकाराय न बुद्धिः प्रशमो मत ॥७२ हेतुस्तत्रोदयाभावः स्यादनन्तानुबन्धिनाम् । अपि शेषकयायाणां नूनं मन्दोदयोंऽशत ॥७३ आरम्भादिक्रिया तस्य दैवावा स्यावकामतः । अन्त शुद्धः प्रसिद्धत्वानहेतु प्रशमक्षतेः ॥७४ सम्यक्त्वेनाविनाभूत प्रशमः परमो गुण । अन्यत्र प्रशमं मन्येऽप्याभास स्यात्तवत्ययात् ।।७५ सवेग परमोत्साहो धर्मे धर्मफले चित' । सधर्मेष्वनुरागो वा प्रीतिर्वा परमेष्ठिषु ॥७६ धर्म सम्यक्त्वमात्रात्मा शुद्धास्यानुभवोऽथवा । तत्फलं सुखमत्यक्षामायं क्षायिक च यत् ॥७७ नही सकती ॥६५।। स्वानुभूतिके बिना केवल श्रुतके आधारसे जो श्रद्धा होती है वह यद्यपि तत्त्वार्थानुगत है तो भी तत्वार्थकी उपलब्धि नही होनेसे वह वास्तविक श्रद्धा नही है ॥६६॥ सत् और असत्की विशेषता न करके उन्मत्त पुरुषके समान पदार्थोकी जो उपलब्धि होती है वह वास्तव- मे उपलब्धि नही है किन्तु उन पदार्थोक सिवाय शेष पदार्थोकी अनुपलब्धिके समान वह अनुपलब्धि ही है ॥६७। इसलिए यौगिक रूढिके आधारसे श्रद्धा सम्यक्त्वका लक्षण है यह कहना वास्तवमे तव अविरुद्ध हो सकता है जब उसे स्वानुभूतिसे युक्त मान लिया जाय ॥६८॥ सम्यग्दृष्टि जीवके जो प्रशमादिक अन्य गुण प्रसिद्ध हैं वाह्य-दृष्टिसे वे भी यथायोग्य सम्यक्त्वके लक्षण हैं ।।६९।। उनमेसे पहला प्रशम गुण है, दूसरा सवेग है, तीसरा अनुकम्पा है और चौथा आस्तिक्य है। अब क्रमसे इनका लक्षण कहते हैं ॥७०|| पञ्चेन्द्रियोके विषयोमे और असख्यात लोक प्रमाण क्रोधादिक भावोमे स्वभावसे मनका शिथिल होना प्रशम भाव है ॥७१॥ अथवा उसी समय अपराध करने- वाले जीवोंके विषयमें कभी भी उनके मारने आदिकी प्रयोजक बुद्धिका नही होना प्रशम भाव है ॥७२॥ इस प्रशम भावके होनेमे अनन्तानुबन्धी कषायोका उदयाभाव और शेष कषायोका अश रूपसे मन्दोदय कारण है ॥७३॥ यद्यपि प्रशम भावसे युक्त सम्यग्दृष्टि जीव देव वश बिना इच्छाके आरम्भ आदि क्रिया करता है तथापि अन्तरगमे शुद्धता होनेसे वह क्रिया उसके प्रशम गुणके नाशका कारण नहीं हो सकती ।।७४|| सम्यक्त्वके साथ अविनाभाव सम्बन्ध रखने वाला जो प्रशम भाव है वह परम गुण है और सम्यक्त्वके अभावमे जो प्रशम भाव होता है वह प्रशम भाव न होकर प्रशमाभास है ऐसा में मानता हूँ ॥७५।। विशेषार्थ-कषाय और विषयाभिलाषा ही जीवनमे व्याकुलताका कारण है और जहाँ व्याकुलता है वहाँ प्रशमभावका होना अत्यन्त कठिन है। यही कारण है कि प्रशम गुणके लक्षणका निर्देश करते हुए उसे क्रोधादि कषाय और विषयोमे मनकी शिथिलतारूप बतलाया है। किन्तु इस प्रकारकी मनकी शिथिलता कदाचित् सम्यक्त्वके अभावमे भी देखी जाती है जिससे कि प्रशम गुण सम्यक्त्वका सहचारी नही माना गया है । किन्तु जो प्रशम गुण अनन्तानुबन्धीके उदयाभावमे होता है वह अवश्य ही सम्यक्त्वका सहचारी है, क्योंकि सम्यग्दृष्टिके अनन्तानुबन्धी कषायोका उदय नही पाया जाता। यद्यपि अनन्तानुबन्धी कषायका ३९ लाटीसंहिता इतरत्र पुनारागस्तद्गुणेष्वनुरागत । नातद्गुणोऽनुरागोऽपि तत्फलस्याप्यलिप्सया ॥७८ अत्रानुरागशब्देन नाभिलाषो निरुच्यते । किन्तु शेषमधर्माद्वा निवृत्तिस्तत्फलादपि ॥७९ न चाऽऽशक्यं निषिद्ध. स्यादभिलाषो भोगेष्वलम् । शुद्धोपलब्धिमात्रेऽपि हेयो भोगाभिलाषवत् ॥८० अर्थात्सर्वोऽभिलाष स्यान्मिथ्या कर्मोदयात्परम् । स्वार्थस्यार्थक्रियासिद्धच नालं प्रत्यक्षतो यतः ॥८१ क्वचित्तस्यापि सद्भावे नेष्टसिद्धिरहेतुत' । अभिलाषस्याभावेऽपि स्वेष्टसिद्धिस्तु हेतुत ॥८२ यश श्रीसुतमित्रादि सर्व कामयते जगत् । नास्य लाभोऽभिलाषेऽपि विना पुण्योदयात्सतः ॥८३ जरामृत्युदरिद्रादि नापि कामयते जगत् । तत्संयोगो बलादस्ति सतस्तत्राशुभोदयात् ॥८४ संवेगो विधिरूप स्यानिर्वेदस्तु विशेषसात् । स्याद्विवक्षावशाद्वैतं नार्थादर्थान्तरं तयो ॥८५ त्याग सर्वाभिलाषस्य निर्वेदो लक्षणात्तथा । संवेगोऽप्यथवा धर्मसाभिलाषो न घर्मवान् ॥८६ नापि धर्म क्रियामात्रं मिथ्यादृष्टेरिहार्थतः । नित्यं रागादिसद्भावात्प्रत्युताऽधर्म एव हि ॥८७ नित्यं रागी कुदृष्टि स्यान स्यात्क्वचिदरागवान् । अस्तरागोऽस्ति सदृष्टिनित्यं वा स्यान्न रागवान् ॥८८ उदयाभाव तीसरे गुणस्थानमे भी होता है पर यह इसका अपवाद है इतना यहां विशेष समझना चाहिए। धर्ममे और धर्मके फलमे आत्माका परम उत्साह होना या समान धर्म वालोमे अनुरागका होना या परमेष्ठियोंमें प्रीतिका होना सवेग है ।।७६॥ सम्यक्त्व मात्र या शुद्ध आत्माका अनुभव ही धर्म है और अतीन्द्रिय, अविनाशी क्षायिक सुख ही उसका फल है ।।७७॥ समान धर्मवालोमे और पांच परमेष्ठियोमे जो अनुराग हो वह उनके गुणोमें अनुराग बुद्धिसे ही होना चाहिये । किन्तु जो समान धर्मवालो या पांच परमेष्ठियोके गुणोसे रहित हैं उनमे इनके समान होनेकी लिप्साके विना भी अनुराग नहीं होना चाहिए ॥७८॥ प्रकृतमे अनुराग शब्दका अर्थ अभिलाषा नही कहा गया है। किन्तु अधर्म और अधर्मके फलसे निवृत्ति होकर जो शेष रहता है वही अनुराग शब्दका अर्थ है ॥७९॥ ऐसी आशका भी नही करना चाहिये कि अभिलाषा केवल भोगोमे ही निषिद्ध मानी गई है। किन्तु जैसे भोगोको अभिलाषा निषिद्ध है वैसे ही शुद्धोपलब्धिकी अभिलाषा भी निषिद्ध मानी गई है ।।८।। वास्तवमे जितनी भी अभिलाषा है वह सब सम्यग्दर्शनके अभावमे होती है इसलिये वह अज्ञानरूप ही है, क्योकि जिसे तत्त्वार्थको प्राप्ति नही हुई है वही प्राप्त करना चाहता है । जिसने प्राप्त कर लिया है वह नही ॥८१।। उदाहरणार्थ-कहीपर अभिलाषाके होनेपर भी कारण सामग्रीके नही मिलनेसे इष्ट सिद्धि नही होती है और कहीपर अभिलाषाके नही होने पर भी कारण सामग्रीके मिल जानेसे इष्ट सिद्धि हो जाती है ।।८२॥ यद्यपि सम्पूर्ण जगत् यश, लक्ष्मी, पुत्र और मित्र आदिकी चाह करता है तथापि पुण्योदयके बिना केवल चाह मात्रसे उनकी प्राप्ति नहीं होती ।।८३॥ इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्, जरा, मृत्यु और दरिद्रता आदिकी चाह नही करता है तथापि यदि जीवके अशुभका उदय है तो चाहके बिना भी बलात् (हठात्) उनका सयोग हो जाता है.॥८४॥ सवेग विधिरूप होता है और निर्वेद निषेधरूप होता है । विवक्षा वशसे ही ये दो हैं वास्तवमे इन दोनोमे कोई भेद नही है ।।८५।। सब प्रकारकी अभिलाषाओका त्याग ही निर्वेद है, क्योकि इसका यही लक्षण है । अथवा वह निर्वेद सवेगरूप धर्म प्राप्त होता है, क्योंकि जो अभिलाषा सहित होता है उसके सवेगधर्म नही हो सकता ॥८६॥ यदि क्रियामात्रको धर्म कहा जाय सो भी बात नही है, क्योकि मिथ्यादृष्टिके निरन्तर रागादि पाये जाते हैं इसलिए वह - ४० श्रावकाचार-सग्रह - अनुकम्पा कृपा ज्ञेया सर्वसत्त्वेष्वनुग्रह | मैत्रभावोऽथ माध्यस्थ्यं नि शल्यं वैरवर्जनात् ॥८९ दृग्मोहानुवयस्तत्र हेतुर्वाच्योऽस्ति केवलम् । मिथ्याज्ञानं विना न स्याद्वैरभाव क्वचिद्यथा ||९० मिथ्या यत्परत स्वस्य स्वस्माता परजन्मिनाम् । इच्छेत्तत्सुखदुःखादि मृत्युर्वा जीवित मनाक् ॥९१ अस्ति यस्यैतवज्ञानं मिथ्यादृष्टि स. शल्यवान् । मज्ञानाद्धन्तुकामोऽपि ामो हन्तु न चापरम् ॥९२ समता सर्वभूतेषु यानुकम्पा परत्र सा । अयंत स्वानुकम्पा स्याच्छल्यवच्छल्यवर्जनात् ॥९३ रागाद्यशुद्धभावाना सद्भावे बन्ध एव हि । न वन्यस्तदसद्धावे तद्विधया कृपात्मनि ॥९४ मास्तिक्य सत्त्वसद्धावे स्वत सिद्ध गतिश्चित । धर्मे हेतौ च धर्मस्य फले चात्मादि धर्मवित् ॥९५ अस्त्यात्मा जीवसजो य स्वत सिद्धोऽप्यमूर्तिमान् । चेतन स्यादजीवस्तु यावानप्यस्त्यचेतन. ॥९६ अस्त्यात्माऽनादितो बद्ध कर्मभि कार्मणात्मकैः । कर्ता भोक्ता च तेषा हि तत्क्षायान्मोक्षभाग्भवेत् ॥९७ अस्ति पुण्य च पाप च तद्धेतुस्तत्फल च वै । आस्रवाद्यास्तथा सन्ति तस्य ससारिणोऽनिशम् ॥९८ अस्त्येव पर्ययादेशाद् बन्धो मोक्षस्तु तत्फलम् । अपि शुद्धनयादेशात् शुद्ध सर्वोऽपि सर्वदा ॥९९ तत्रायं जीवसंज्ञो य स्वयवेद्यश्चिदात्मक । सोऽहमन्ये तु रागाद्या हेया पौद्गलिका अमी ॥१०० इत्याद्यनादिजीवादि वस्तुजातं यतोऽखिलम् । निश्चयव्यवहाराभ्यामास्तिक्यं तत्तथामति ॥१०१ वास्तवमे अधर्म हो है ।।७।। मिथ्यादृष्टि जीव निरन्तर रागी होता है वह रागरहित कभी भी नही हो सकता और सम्यग्दृष्टि जीव निरन्तर रागरहित होता है अथवा उसके सदा काल राग नहीं पाया जाता ||८८|| अनुकम्पाका अर्थ कृपा है । या सव जीवोका अनुग्रह करना अनुकम्पा है। या मैत्री भावका नाम अनुकम्पा है । या मध्यस्थ भावका रखना अनुकम्पा है । या शत्रुताका त्याग कर देनेसे शल्यरहित हो जाना अनुकम्पा है ॥८९।। इसका कारण केवल दर्शन मोहनीयका अनुदय है, क्योकि मिथ्या ज्ञानके बिना किसी जीवमे वैर भाव नही होता है ॥९०|| परके निमित्तसे अपने लिए या अपने निमित्तसे अन्य प्राणियोंके लिए थोडे ही सुख, दुखादि या मरण और जीवनकी चाह करना मिथ्या ज्ञान है ॥२१॥ और जिसके यह अज्ञान होता है वही मिथ्यादृष्टि है और वह शल्यवाला है । वह अज्ञान वश दूसरेको मारना चाहता है पर मार नही सकता ।।९२।। सब प्राणियो- मे जो समभाव धारण किया जाता है वह परानुकम्पा है और काटेके समान शल्यका त्याग कर देना वास्तवमे स्वानुकम्पा है ॥९३|| रागादि अशुद्ध भावोंके सद्भावमे बन्ध ही होता है और उनके अभावमे बन्य नही होता, इसलिए अपने ऊपर ऐसी कृपा करनी चाहिए जिससे रागादि भाव न हो ॥९४॥ स्वत सिद्ध तत्त्वोके सद्भावमे निश्चय भाव रखना तथा धर्म, धमके हेतु और धमके फलमे आत्माको अस्ति आदि रूप बुद्धिका होना आस्तिक्य है ।।९५।। जो स्वत सिद्ध है, अमूर्त है और चेतन है वह आत्मा है। इसका दूसरा नाम जीव है तथा इसके सिवाय जितना भी अचेतन पदार्थ है वह सब अजीव है ॥९६) आत्मा अनादि कालसे कार्मण वर्गणा रूप कमोंसे बधा हुमा है । और अपनेको उन्हीका कर्ता व भोक्ता मान रहा है। जब इनका क्षय कर देता है तब मुक्त हो जाता है ।।९७। उस ससारी जोवके पुण्य, पाप, इनका कारण, इनका फल और आस्रव आदि सदैव बने रहते हैं ।।९८|| इस प्रकार पर्यायार्थिक नयको अपेक्षा बन्ध भी है, मोक्ष भी है और उनका फल भी है। किन्तु शुद्ध नयको अपेक्षा सभी जीव सदा शुद्ध हैं ।।९९।। उनमे एक जीव ही ऐसा है जो स्वसवेद्य, चिदात्मक और 'सोऽहम्' प्रत्ययवेद्य होनेसे उपादेय है। बाकी जितने भी रागादिक भाव हैं वे सब हेय हैं, क्योकि वे पौद्गलिक हैं ॥१००। इस प्रकार अनादि कालसे चला लाटीसहिता ४१ सम्यक्त्वेनाविनाभूतस्वानुभूत्येकलक्षणम् । आस्तिक्यं नाम सम्यक्त्वं मिथ्यास्तिक्यं ततोऽन्यथा॥१०२ ननु वै केवलज्ञानमेकं प्रत्यक्षमर्थत । न प्रत्यक्षं कदाचित्तच्छेषज्ञानचतुष्टयम् ॥१०३ यदि वा देशतोऽध्यक्षमाक्ष्यं स्वात्मसुखादिवत् । स्वसवेदनप्रत्यक्षमास्तिक्यं तत्कुतोऽर्थतः ॥१०४ सत्यमाद्यद्वयं ज्ञानं परोक्षं परसंविदि । प्रत्यक्ष स्वानुभूतौ तु दृग्गमोहोपशमाद्रित ॥१०५ स्वात्मानुभूतिमात्रं स्यादास्तिक्यं परमो गुण । भवेन्मा वा परद्रव्ये ज्ञानमात्रे परत्वत ॥१०६ अपि तत्र परोक्षत्वे जीवादी परवस्तुनि । गाढं प्रतीतिरस्यास्ति यथा सम्यग्दृगात्मन ॥१०७ न तथास्ति प्रतीतिर्वा नास्ति मिथ्यादृशः स्फुटम् । दृग्मोहस्योदयात्तत्र भ्रान्ते सद्भावतोऽनिशम् ॥१०८ तत सिद्धमिदं सम्यग्युक्तिस्वानुभवागमात् । सम्यक्त्वेनाविनाभूतमस्त्यास्तिक्यं गुणो महान् ॥१०९ उक्तं च- संवेओ निव्वेमो णिदण गरहा य उवसमो भत्ती । वच्छल्लं अणुकम्पा अट्ठगुणा हुंति सम्मते ॥१८ उक्तं गाथार्थसूत्रोऽपि प्रशमादिचतुष्टयम् । नातिरिक्तं यतोऽस्त्यत्र लक्षणस्योपलक्षणम् ॥११० अस्त्युपलक्षणं यत्तल्लक्षणस्यापि लक्षणम् । तद्यथास्त्यादिलक्ष्यस्य लक्षणं चोत्तरस्य तत् ॥१११ यथा सम्यक्त्वभावस्य संवेगो लक्षणं गुण । स चोपलक्ष्यते भक्त्या वात्सल्येनाथवाहताम् ॥११२ आया । समस्त जीवादि वस्तु समुदाय निश्चय और व्यवहार नयसे जो जैसा माना गया है वह वैसा ही है ऐसी बुद्धिका होना आस्तिक्य है ॥१०१।। सो सम्यक्त्वका अविनाभावी है जिसका स्वानुभूति एक लक्षण है वह सम्यक् आस्तिक्य है और इससे विपरीत मिथ्या आस्तिक्य है ॥१०२।। शका- वास्तवमे एक केवलज्ञान ही प्रत्यक्ष है बाकीके चारो ज्ञान कभी भी प्रत्यक्ष नही हैं ।।१०३।। अथवा अपने आत्माके सुखादिककी तरह इन्द्रियजन्य ज्ञान एकदेश प्रत्यक्ष हैं इसलिये आस्तिक्य भाव स्वसवेदन प्रत्यक्षका विषय कैसे हो सकता है ? ॥१०४॥ समाधान-यह कहना ठीक है तथापि आदिके दो ज्ञान परपदार्थों का ज्ञान करते समय यद्यपि परोक्ष हैं तथापि दर्शनमोहनीयके उपशम आदिके कारण स्वानुभवके समय वे प्रत्यक्ष ही है ॥१०५।। प्रकृतमे अपने आत्माकी अनुभूति ही आस्तिक्य नामका परमगुण माना गया है। फिर चाहे परद्रव्यका ज्ञान हो चाहे मत हो, क्योकि परपदार्थ पर है ॥१०६।। दूसरे यद्यपि जीवादि परपदार्थ परोक्ष हैं तथापि इस सम्यग्दृष्टि जीवको जैसी उनकी गाढ प्रतीति होती है ॥१०७।। वैसी उनकी स्पष्ट प्रतीति मिथ्यादृष्टिके कभी नही होती, क्योंकि दर्शनमोहनीयके उदयसे उसके निरन्तर भ्रान्ति बनी रहती है ।।१०८|| इसलिये युक्ति, स्वानुभव और आगमसे यह भली भांति सिद्ध होता है कि सम्यक्त्वके साथ अविनाभाव सम्बन्ध रखनेवाला आस्तिक्य नामका महान् गुण है ॥१०९।। कहा भी है-'सवेग, निर्वेद, निन्दा, गरे, उपशम, भक्ति, वात्सल्य और अनुकम्पा ये सम्यक्त्वके आठ गुण हैं ॥१८॥ उक्त गाथा सूत्रमे भी प्रशम आदि चारो ही कहे गये हैं अधिक नही क्योकि इस गाथा सूत्रमे लक्षणके उपलक्षणकी विवक्षा है ॥११०॥ जो लक्षणका भी लक्षण है वह उपलक्षण कहलाता है। क्योकि जो आगेके लक्ष्यका लक्षण है वही प्रथम लक्ष्यका उपलक्षण है ॥१११।। सम्यक्त्व भाव- का सवेग गुण लक्षण है, इसलिये सम्यक्त्व भाव अरहन्तोकी भक्ति और वात्सल्यसे उपलक्षित हो जाता है। आशय यह है कि सम्यक्त्वका सवेग गुण लक्षण है और अरहन्तोकी भक्ति और वात्सल्य ये दोनो गुण सवेग गुणके लक्षण हैं, इसलिये ये दोनो सम्यक्त्वके उपलक्षण प्राप्त होते ? ६

४२
श्रावकाचार-संग्रह
तत्र भक्तिरनौद्धत्यं वाग्वपुश्चेतसा शमात् । वात्सल्यं तद्गुणोत्कर्षहेतवे सोद्यतं मनः ॥११३
भक्तिर्वा नाम वात्सल्यं न स्यात्संवेगमन्तरा । सवेगो हि शो लक्ष्म द्वावेतावुपलक्षाणौ ॥११४
दृग्मोहस्योदयाभावात्प्रसिद्ध प्रशमो गुण । तत्रापि व्यञ्जकं बाह्याग्निन्दनं चापि गर्हणम् ॥११५
निन्दनं तत्र दुर्वाररागादौ दुष्टकर्मणि । पश्चात्तापकरो बन्धो नोपेक्ष्यो नाप्यपेक्षित ॥११६
गहणं तत्परित्याग पञ्चगुर्वात्मसाक्षिक । निष्प्रमादतया नूनं शक्तित. कर्महानये ॥११७
अर्थादेव द्वयं सूक्तं सम्यक्त्वस्योपलक्षणम् । प्रशमस्य कषायाणामनुद्रेकाविशेषत ॥११८
शेषमुक्तं यथाम्नायाद ज्ञातस्य परमागमात् । आगमा धेः परम्पार मादृग्गन्तुं क्षामः कथम् ॥११९
एषमित्यादिसत्यार्थ प्रोक्तं सम्यक्त्वलक्षणम् । केश्चिल्लक्षाणिकै सिद्धे. प्रसिद्धं सिद्धसाधनात् १२०
भवेद्दर्शनिको नूनं सम्यक्त्वेन युतो नरः । दर्शनप्रतिमाभास क्रियावानपि तद्विना ।।१२१
देशतः सर्वतश्चापि क्रियारूपं व्रतादि यत् । सम्यक्त्वेन विना सर्वमवतं कुतपश्च तत् ॥१२२
तत प्रथमतोऽवश्यं भाव्यं सम्यक्त्वषारिणा । अवतिनाणुवतिना मुनिनायेन सर्वतः ।।१२३
हैं ॥११२|| कर्मोंका उपशम हो जाने से वचन, शरीर और चित्तका उद्धत न होना ही भक्ति है
और सम्यक्त्वके गुणोका उत्कर्ष करने के लिए मनका तत्पर रहना ही वात्सल्य है ॥११३।। भक्ति
और वात्सल्य ये सवेगके बिना नही होते, इसलिये सवेग सम्यग्दर्शनका लक्षण है और ये दोनो
उसके उपलक्षण हैं ।।११४॥ दर्शनमोहनोयके उदयाभावसे प्रशम गुण होता है और उसके निन्दा
और गर्दा ये बाह्य रूपसे अभिव्यजक हैं ।।११५॥ वारण करनेके लिये कठिन ऐसे रागादि दुष्ट
कके सद्भावमे बन्ध अवश्य होता है जो न तो अपेक्षणीय है और न उपेक्षित भी है इस प्रकार
पश्चात्ताप करना निन्दन है ॥११६॥ और प्रमाद रहित होकर शक्त्यनुसार कर्मोंका नाश करनेके
के लिये पांच गुरु और अपनी साक्षीपूर्वक रागादि भावोका त्याग करना गर्दा है ॥११७॥ यत्त
प्रशम गुणके समान इन दोनो गुणोमे कषायोके अनुद्रेककी अपेक्षा कोई विशेषता नही है अत ये
दोनो वास्तवमे सम्यक्त्वके उपलक्षण हैं यह जो पहले कहा है सो बहुत ही अच्छा कहा है ॥११८||
इस प्रकार पहले सम्यक्त्वके जिन गुणोका वर्णन कर आये हैं उनके सिवाय शेष कथन आम्नायके
अनुसार परमागमसे जान लेना चाहिये, क्योकि आगमरूपी समुद्रके उस पार जानेके लिए हम
सरीखे जन कैसे समर्थ हो सकते हैं ॥११९।। इस प्रकार ऊपर लिखे अनुसार जो सम्यग्दर्शनका
लक्षण कहा है वही यथार्थ लक्षण है। वही लक्षण समस्त लक्षणोके जानकार कितने ही सिद्ध
पुरुषोने कहा है और यही लक्षण हेतुवादसे सिद्ध होता है ॥१२०|| इस प्रकार जिस सम्यग्दर्शनका
लक्षण कहा है उससे जो सुशोभित होता है जिसके वह सम्यग्दर्शन होता है वह मनुष्य दार्शनिक
अथवा दर्शन प्रतिमावाला कहलाता है। यदि किसी मनुष्यके वह सम्यग्दर्शन न हो और वह
मनुष्य क्रियावान् हो, यत्नाचारसे चलने वाला या व्रतादिकोको पालन करनेवाला हो तो भी
दर्शनिक या दर्शनप्रतिमावाला नही कहलाता, दर्शनप्रतिमाभास अथवा मिथ्यादृष्टि कहलाता
है ॥१२१॥ क्योकि ससारमे जितने भी क्रियारूप व्रत या तप हैं वे चाहे एकदेशरूप हो और चाहे
पूर्णरूप महाव्रत हो वे सब बिना सम्यग्दर्शनके अव्रत कहलाते हैं तथा बिना सम्यग्दर्शनके जितना
भी तप है वह सब कुतप कहलाता है ॥१२२।। इसलिए अव्रती श्रावकोको या अणुव्रतादि गृहस्र्थोके
बारह व्रत धारण करनेवाले श्रावकोको यौर महाव्रतादि धारण करनेवाले मुनियोको सबसे पहले
सम्यग्दर्शन अवश्य धारण करना चाहिये ॥१२३॥

लाटीसंहिता ४३ ऋते सम्यक्त्वभावं यो धत्ते व्रततप क्रियाम् । तस्य मिथ्यागुणस्थानमेकं स्यावागमे स्मृतम् ॥१२४ प्रकृतोऽपि नरो नैव मुच्यते कर्मबन्धनात् । स एव मुच्यतेऽवश्यं यदा सम्यक्त्वमश्नुते ॥१२५ किञ्च प्रोक्ता क्रियाऽप्येषा दर्शनप्रतिमात्मिका । सम्यक्त्वेन युता चेत्सा तद्गुणस्यानवतिना ॥१२६ तत्राप्यस्ति विशेषोऽयं तुर्यपञ्चमयोदयो । योगाद्वा रूढितश्चापि गुणस्थानविशेषयो. ॥१२७ सैवैका क्रिया साक्षादष्टमूलगुणात्मिका । व्यसनाधुज्झिता चापि दर्शनेन समन्विता ॥१२८ एवमेव च सा चेत्स्यात्कुलाचारक्रमात्परम् । विना नियमादि तावत्प्रोच्यते सा कुलक्रिया ॥१२९ भावशून्याः क्रिया यस्मान्नेष्टसिद्धयं भवन्ति हि । क्रियामात्रफलं चास्ति स्वल्पभोगानुषगजम् ॥१३० दर्शनप्रतिमा नास्य गुणस्थानं न पञ्चमम् । फेवलं पाक्षिक स स्थावगुणस्थानावसंयत ॥१३१ फिञ्च सोऽपि क्रियामात्रात्कुलाचारक्रमागतात् । स्वर्गादिसम्पदो भुक्त्वा क्रमाद्याति शिवालयम् १३२ शास्त्रोमे लिखा है कि विना सम्यग्दर्शनके जो व्रत या तपश्चरणकी क्रियाओको धारण करता है उसके सदा पहला मिथ्यात्वगुण स्थान ही रहता है ।।१२४॥ विना सम्यग्दर्शनके कैसा ही विद्वान् पुरुष क्यो न हो कर्मबन्धनसे कभी छूट नही सकता तथा वही मनुष्य जब सम्यग्दर्शन धारण कर लेता है तब फिर वह उन कर्मबन्धनोसे अवश्य छूट जाता है ॥१२५।। ऊपर जो यह दर्शन प्रतिमारूप क्रिया बतलायी है वह यदि उन गुणस्थानोमे होनेवाले सम्यग्दर्शनके साथ हो तब तो वह दर्शनप्रतिमा कहलाती है अन्यथा नही ॥१२६॥ उसमे भी इतना विशेष है कि सम्यग्दर्शनके साथ-साथ आठ मूलगुणोका साक्षात् धारण करनेरूप क्रिया तथा सातो व्यसनोके त्याग करनेरूप क्रिया योगसे तथा रूढिसे चौथे पांचवें दोनों विशेष गुणस्थानोमे एक-सी ही होती है। भावार्थ-चौथे गुणस्थानमे सम्यग्दर्शन भी होता है और आठ मूलगुणोका पालन तथा सातो व्यसनोंका त्याग भी होता है। पांचवें गुणस्थानमे भी ये सब क्रियायें होती है। इस प्रकार चौथे पाँचवें दोनो गुणस्थानोमे ये ऊपर लिखी क्रियायें एक-सी होती हैं तथापि उनमे नीचे लिखे अनुसार अन्तर है ॥१२७-१२८॥ यदि ये ऊपर लिखी क्रियाएँ विना किसी नियमके यो ही कुलपरम्परासे चली आयी हो तो उनको व्रत नही कहते किन्तु कुलक्रिया कहते हैं। भावार्थ-व्रत तभी कहलाता है जब कि नियमपूर्वक धारण किया जाता है। मद्यमासादिकका या व्यसनोका नियमपूर्वक त्याग किये विना कुलाचार कहलाता है व्रत नही कहलाता ॥१२९॥ इसका भी कारण यह है कि विना भावोके को हुई किसी भी क्रियासे अपने इष्टपदार्थोकी सिद्धि नही होती है। ऐसे विना भावोंके जो क्रियाएं की जाती हैं उनका फल केवल क्रिया करने मात्रका होता है जैसे थोडी-सी भोगोपभोगकी सामग्रीका मिल जाना आदि। इसके सिवाय और कुछ फल नही मिलता तथा जो त्याग भावपूर्वक किया जाता है उसका फल स्वर्ग मोक्ष मिलता है ॥१३०॥ इस प्रकार जो मनुष्य मद्य, मास, मधु, पाँचो उदुम्बर तथा व्यसनोका सेवन नही करता, परन्तु उनके सेवन न करनेका नियम भी नही लेता, इन ऊपर लिखे पापोंको भावपूर्वक त्याग नहीं करता उसके न तो दर्शनप्रतिमा होती है और न पांचवां गुणस्थान ही होता है । उसको केवल पाक्षिक श्रावक कहते हैं और उसके असयत नामका चौथा गुणस्थान होता है ॥१३१।। इस प्रकार सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाला पुरुष भी कुलक्रमसे चली सायी परिपाटीके अनुसार जो क्रियाएं पालन करता है वह भी स्वर्गादिककी सम्पदाओको भोगकर अनुक्रमसे मोक्ष प्राप्त करता है - श्रावकाचार-सग्रह सम्यक्त्वेन विहीनोऽपि नियमेनाप्यथोज्झित । योऽपि कुल क्रियासक्त. स्वर्गादिपदभाग्भवेत् ॥१३३ अथ क्रियां च तामेव कुलाचारोचिता पराम् । प्रतरूपेण गृह्णाति तवा दर्शनिको मत ॥१३४ वर्शनप्रतिमा चास्य गुणस्थान च पञ्चमम् । सयतासयतारयश्च संयमोस्य जिनागमात् ॥१३५ हगायकावशान्तानां प्रतिमानामनादित । पश्नमेन गुणेनामा व्याप्ति साधीयसी स्मृते ॥१३६ ननु या प्रतिमा प्रोक्ता दर्शनास्या तदाविमा। जैतानां सास्ति सर्वेषामदिवतिनामपि ॥१३७ मैवं सति तथा तुयंगुणस्थानस्य शून्यता । नूनं दृप्रतिमा यस्माद्गुणे पञ्चमके मता ॥१३८ नोां रग्प्रतिमामात्रमस्तु तुयंगुणे नृणाम् । व्रतादिप्रतिमा. शेषा. सन्तु पञ्चमके गुणे ॥१३९ मेवं सति नियमादावतित्व कुतोऽर्थतः । व्रतादिप्रतिमासूच्चैरवतित्वानुषङ्गत ॥१४० ॥१३२।। तथा जो पुरुप सम्यग्दर्शनसे भी रहित होता है और नियमपूर्वक भावपूर्वक मद्य, मास, मधु, उदुम्बर, व्यसन आदिका त्याग भी नहीं करता, केवल अपनी कुलक्रियाका पालन करता है कुलपरम्पराके अनुसार, मद्य, मास, मधु, पाँचो उदुम्बर और व्यसनोका सेवन नही करता वह मनुष्य भी स्वर्गादिक सुखोको प्राप्त करता है ।।१३३।। यदि वही मनुष्य सम्यग्दर्शनके साथ-साथ फुलपरम्परासे चली आयी परिपाटीके अनुसार मद्य, मास आदिके न सेवन करनेरुप क्रियाओको प्रतरूपसे धारण कर लेता है तव वह दर्शनप्रतिमाको धारण करनेवाला दार्शनिक कहलाता है ॥१३४॥ इस प्रकार सम्यग्दर्शनके साथ नियमपूर्वक आठो मूलगुणोको धारण करनेवाले तथा सातो व्यसनोका त्याग करनेवाले पुरुषके पहली दर्शन प्रतिमा कहलाती है। उसका गुणस्थान संयतासयत नामका पांचवां गुणस्थान कहलाता है और वह भगवान जिनेन्द्रदेवके कहे हुए शास्त्रोके अनुसार अपने सयमका पालन करता है ।।१३५।। यह निश्चय है कि सम्यग्दर्शनको आदि लेकर- जो ग्यारह प्रतिमायें है उनकी निर्दोष व्याप्ति अनादिकालसे पांचवें गुणस्थानके साथ ही चली आ रही है ॥१३६।। यहाँपर शकाकार कहता है कि यह जो पहिली दर्शनप्रतिमा कही है वह तो समस्त जैनियोके होती है और इस हिसाबसे अव्रत सम्यग्दृष्टिके भी अवश्य होनी चाहिए ॥१३७।। समाधान-परन्तु यह मानना ठीक नहीं है क्योकि यदि ऐसा मान लिया जायगा अर्थात् भवत सम्यग्दृष्टियोके भी पहिली प्रतिमा मान ली जायगी तो फिर चौथे गुणस्थानका सर्वथा अभाव मानना पडेगा क्योकि यह नियम है कि दर्शनप्रतिमा पांचवें गुणस्थानमे ही होती है। भावार्थ- यदि अविरत सम्यग्दृष्टिके ही दर्शनप्रतिमा मान ली जाय तो फिर उसके पांचवा गुणस्थान ही मानना पडेगा क्योकि प्रतिमाएं सब पांचवे गुणस्थानमे ही होती है तथा अविरत सम्यग्दृष्टिके पांचा गुणस्थान माननेसे फिर चौथा गुणस्थान कोई बन ही नहीं सकेगा इस प्रकार चौथे गुण- स्थानका अभाव ही मानना पडेगा ॥१३८॥ यहाँपर शकाकार फिर कहता है कि अच्छा भाई, मनुष्योके होनेवाली दर्शनप्रतिमा तो चौथे गुणस्थानमे ही मान लो और शेप बची हुई वतादिक दश प्रतिमाओको पांचवें गुणस्थानमे मान लो। ऐसा माननेसे कोई विशेष हानि भी नहीं है परन्तु ग्रन्थकार कहते है कि यह शंका करना भी ठीक नहीं है। इसका कारण यह है कि नियमपूर्वक मद्य मासादिकका त्याग कर लेनेपर भी फिर अवतीपना किस कारणसे माना जायगा। यदि नियमपूर्वक मद्य, मासादिकके त्याग करने रूप व्रतको धारण कर लेनेपर भी अव्रत अवस्था मानी जायगी तो फिर व्रत आदि बाकीकी दश प्रतिमाओको धारण कर लेनेपर भी अव्रत अवस्था मान लेनी पडेगी। तथा ऐसा माननेसे फिर पांचवें गुणस्थानका अभाव या लाप मानना पडेगा इसलिए लाटीसहिता ४५ ततो विविक्षितं साधु सामान्यात्सा कुलकिया। नियमेन सनाथा चेद्दर्शनप्रतिमात्मिका ॥१४१ किश्च मूलगुणावीनामादानेऽथापि वर्जने । समस्ते प्रतिमास्त्याद्या व्यस्ते सति कुल क्रिया ॥१४२ यथा चैकस्य कस्यापि व्यसनस्योज्झने कृते । दर्शनप्रतिमा न स्यात्स्याद्वा साध्वी कुलक्रिया ॥१४३ यवा मूलगुणावानं धूतादिव्यसनोज्झनम् । दर्शनं सर्वतश्चैतत्त्रयं स्यात्प्रतिमादिमा ॥१४४ वर्शनप्रतिमायास्तु क्रियाया व्रतरूपतः । तस्याः कुल क्रियायाश्चाविशेषोऽप्यस्ति लेशतः ॥१४५ प्रमावोद्रेकतोऽवश्यं सवोषा स्यात्कुल क्रिया। निर्दोषा' स्वल्पदोषा वा दर्शनप्रतिमानियाः ॥१४६ यथा कश्चित्कुलाचारी धूतातिव्यसनोज्झनम् । कुर्याद्वा न यथेच्छायां कुर्यादेव हगात्मकः ॥१४७ उक्त शंका सर्वथा अनुचित है। दर्शनप्रतिमा पाँचवें गुणस्थानमे ही होती है। यही सिद्धान्त शास्त्रानुकूल है और अनादिकालसे चला आ रहा है ॥१३९-१४०॥ अतएव सामान्यरीतिसे विना किसी नियमके केवल कुलपरम्परासे चली आयी परिपाटीके अनुसार जो मद्य, मांस, मधु, पाँच उदुम्बर सातो व्यसनोका सेवन न करना है उसको कुलक्रिया या कुलाम्नाय कहते हैं और यदि उनके सेवन न करनेका नियम ले लिया जाय, नियमपूर्वक मद्यादिकका त्याग कर दिया जाय तो ऐसे सम्यग्दृष्टिके वह दर्शनप्रतिमा कहलाती है । यह जो हमने कहा है सो बहुत ही ठीक शास्त्रानु- फूल कहा है ॥१४१॥ उसमे भी इतना विशेष और समझ लेना चाहिए यदि कोई सम्यग्दृष्टि समस्त आठो मूलगुणोंको धारण करे और समस्त सातो व्यसनोका त्याग करे तब तो उसके पहिली दर्शनप्रतिमा होती है यदि वह अलग-अलग किसी एक दो व्यसनोंका त्याग करे अथवा मूलगुणोमेसे किसी एक दो चार मूलगुणोको धारण करे तो उसकी पहिलो दर्शनप्रतिमा नही कहलाती किन्तु कुलक्रिया कहलाती है ॥१४२।। जैसे किसी सम्यग्दृष्टि मनुष्यने किसी एक व्यसनका त्याग कर दिया तो उसके दर्शनप्रतिमा नही कहलायेगी, किन्तु श्रेष्ठ कुलक्रिया कहलावेगी ॥१४३।। जब उसके पूर्ण सम्यग्दर्शन होगा, आठो मूलगुण होंगे और सातो व्यसनोंका त्याग होगा ये तीनो नियमपूर्वक पूर्ण रीतिसे होंगे, तभी उसके पहली दर्शनप्रतिमा होगी अन्यथा नहीं ॥१४४॥ दर्शनप्रतिमामें होनेवाली व्रतरूप क्रियाओंमे (नियमपूर्वक धारण की हुई क्रियाओमें) तथा विना नियमके होनेवाली कुलक्रियाओकी क्रियाओमे यद्यपि कुछ अशोमे अविशेषता है, एकसापन है तथापि यदि यथार्थ दृष्टिसे देखा जाय तो उसमे बहुत कुछ अन्तर है ।।१४५।। कुलक्रियामें प्रमादकी तीव्रता होती है क्योकि प्रमाद ही उसे नियमपूर्वक त्याग नही करने देता, अतएव प्रमादकी तीव्रता होनेके कारण कुलक्रियायें सदोष समझी जाती हैं, उनमे समय-समयपर अनेक प्रकारके अनेक दोष लगते रहते हैं तथा दर्शनप्रतिमा धारण करनेवालेकी जो क्रियाये हैं उनमे प्रमादकी अत्यन्त मन्दता है क्योकि प्रमादोकी मन्दतासे ही वह नियमपूर्वक उनका त्याग करता है इसीलिए उसकी क्रियायें निर्दोष है अथवा मन्दरूपसे प्रमादकी सत्ता रहनेके कारण क्वचित् कदाचित् कुछ थोडा-सा दोष लग भी जाता है इसलिए उसे थोडेसे दोषवाली क्रियाएँ कहते हैं ॥१४६।। जैसे कुलक्रियाको पालन करनेवाला कोई पुरुष जुमा खेलने, चोरी करने आदि व्यसनोका त्याग कर भी सकता है और नही भी कर सकता है। त्याग करना और न करना उसकी इच्छापर निर्भर है उसकी इच्छा हो तो त्याग कर दे और यदि उसकी इच्छा न हो तो न करे। उसके नियमपूर्वक त्याग होना ही चाहिए यह बात नही है किन्तु दर्शनप्रतिमावालेके नियमपूर्वक इनका त्याग होता है क्योकि त्याग किये विना दर्शनप्रतिमा हो ही नही सकती। बस यही इन दोनोमे अन्तर है ।।१४७|| श्रावकाचार-संग्रह अप च पाक्षिको यहा दर्शनप्रतिमान्वित । प्रकृतं न परं कुर्यात्कुर्याद्वा वक्ष्यमाणकम् ॥१४८ प्रामाणिक. क्रमोऽप्येष ज्ञातव्यो व्रतसत्रये । भावना चागृहीतस्य व्रतस्यापि न दूषिका ॥१४९ भावयेद् भावना नूनमुपयुंपरि सर्वत' । यावनिर्वाणसम्प्राप्तो पुंसोऽवस्यान्तरं भवेत् ॥१५० उक्तंच- जं सक्कइ त कोरइ जं च ण सपका तहेव सद्दरण । सद्दहमाणो जीवो पावइ अजरामरं ठाणं १९ यपात्र पाक्षिकः कश्चिदर्शनप्रतिमोऽथवा । उपर्युपरिशुद्धधयं यद्यत्कुर्यात्तदुच्यते ॥१५१ सर्वतो विरतिस्तेषां हिंसावीनां व्रतं महत् । नैतत्सागारिभि कतुं शक्यते लिङ्गमहंताम् ॥१५२ मूलोत्तरगुणा. सन्ति वेशतो वेश्मवर्तिनाम् । तथानगारिणां न स्यु सर्वत. स्यु परेऽप ते ॥१५३ तत्र मूलगुणाश्चाप्टो गृहिणां प्रतधारिणाम् । क्वचिवतिनां यस्मात्सर्वसाधारणा इमे ॥१५४ निसर्गाचा कुलाम्नायावायातास्ते गुणाः स्फुटम् । तद्विनापि तत पावत्सम्यक्त्वं च गुणोऽङ्गिनाम् ॥१५५ जो पाक्षिक श्रावक होता है अथवा दर्शनप्रतिमाघारी श्रावक होता है वह कुलपरम्परा से चली आयी परिपाटीका पालन नहीं करता, किन्तु नीचे लिखे अनुसार व्रतोका पालन करता है ॥१४८|| तोके धारण करनेमे यही क्रम प्रामाणिक समझना चाहिए तथा जो आगेके व्रत धारण नही किये हैं उनको धारण करनेके लिए भावना रखनेमे कोई दोष नहीं है ।।१४९।। जब तक इस जीवको अन्तिम शुद्ध अवस्था प्राप्त न हो जाय अर्थात् मोक्ष प्राप्त न हो जाय तव तक ज्यो ज्यो ऊंचे व्रत धारण करता जाय, त्यो त्यो आगेके व्रत धारण करनेके लिए सर्वत्र भावनाएं रखनी चाहिए ॥१५०॥ कहा भी है जो कर सकता है वह कर लेना चाहिए और जो नही कर सकता उसका श्रदान करना चाहिए क्योकि श्रद्धान करनेवाला जीव अजर अमर ऐसे मोक्षस्थानको प्राप्त होता है ॥१९॥ अव मागे पाक्षिक श्रावक अथवा दर्शन प्रतिमाघारी श्रावक आगे आगे अपनी आत्माको शुद्ध करनेके लिए क्या क्या करता है, कौन कौनसे प्रत पालन करता है इसी बातको दिखलाते हैं ॥१५१॥ इस ससारमे हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह ये पांच पाप कहलाते हैं । इन पांचो पापोका पूर्ण रीतिसे मन, वचन, काय और कृत कारित अनुमोदनासे त्याग कर देना महाव्रत कहलाते हैं। यह महाव्रत धारण करना भगवान् अरहतदेवका चिह्न है। जिनलिङ्ग अथवा निम्रन्थ लिङ्ग कहलाता है। इस अवस्थाको इन महाव्रतोको गृहस्थ लोग धारण नही कर सकते ॥१५२।। किन्तु गृहस्थ लोग एकदेश व्रतोको धारण करते हैं। इन्ही एकदेश व्रतोको मूलगुण और उत्तरगुण कहते हैं । ये एकदेश व्रत रूप मूलगुण अथवा उत्तरगुण मुनियोंके नही होते अपितु गृहस्थोंके ही होते हैं। मुनियोंके तो हिंसादि पांचो पापोके पूर्ण रूपसे त्याग करने रूप महाव्रत होते है। अथवा यो कहना चाहिए कि मुनियोके मूलगुण और उत्तरगुण इन गृहस्थोके मूलगुण या उत्तरगुणोंसे सर्वथा भिन्न हैं ॥१५३॥ इनमेसे आठ मूलगुण व्रत धारण करनेवाले गृहस्थोके होते हैं अथवा अव्रती सम्यग्दृष्टियोंके भी होते हैं क्योकि ये सर्वसाधारण व्रत होते हैं, प्रत्येक मनुष्य के पालन करने योग्य हैं, अतएव व्रती अवती दोनो प्रकारके श्रावकोंके होते हैं ॥१५४॥ इस जीवके जब तक सम्यग्दर्शन रूप गुण रहता है तबतक मद्य, मास, मधुका त्याग तथा पांचो उदुम्बरोका

लाटीसहिता
41
एतावता विनाप्येष श्रावको नास्ति नामत । किं पुन' पाक्षिको गूढो नैष्ठिक साधकोऽथ वा ॥१५६
मद्यमांसमधुत्यागी यथोदुम्बरपञ्चकम् । नामतः श्रावक ख्यातो नान्यथापि तथा गृही ॥१५७
यथाशक्ति विधातव्यं गृहस्थैर्व्यसनोज्झनम् । अवश्यं तद्वतस्थैस्तैरिच्छद्भिः श्रेयसी क्रियाम् ॥१५८
त्यजेद् दोषांस्तु तत्रोक्तान् सूत्रेऽतीचारसंज्ञकान् । अन्यथा मधमांसादीन् श्रावक क समाचरेत्॥१५९
दानं चतुर्विधं देयं पात्रबुद्धयाऽथ श्रद्धया। जघन्यमध्यमोत्कृष्टपात्रेभ्यः श्रावकोत्तमैः ॥१६०
कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम् । पात्रबुद्धया निषिद्धं स्यानिषिद्धं न कृपाधिया ॥१६१
शेषेभ्यः क्षुत्पिपासादि पीडितेभ्योऽशुभोदयात् । दीनेभ्योऽभयदानादि दातव्यं करुणार्णवैः ॥१६२
पूजामप्यर्हतां कुर्याद्यद्वा तत्प्रतिमासु च । स्वरव्यञ्जनान् संस्थाप्य सिद्धानप्यर्चयेत्सुधी ॥१६३
सूर्युपाध्यायसाधूनां पुरस्तात्पादयो स्तुतिम् । प्राग्विधायाष्टधा पूजा विदध्यात्स त्रिशुद्धित ॥१६४
त्याग रूप गुण चाहे तो स्वभावसे हो और चाहे कुलपरम्पराकी परिपाटीके अनुसार चले आ रहे
हो, नियम रूपसे या व्रत रूपसे धारण न किये हों तो भी वे गुण ही कहलाते हैं ॥१५५।। इसका
भी अभिप्राय यह है कि इन गुणोको धारण किये बिना यह मनुष्य नाम मात्रसे भी श्रावक नही
कहला सकता। फिर भला पाक्षिक श्रावक या गूढ श्रावक या नैष्ठिक श्रावक अथवा साधक
श्रावक किस प्रकार कहला सकता है ॥१५६॥ जो मनुष्य मद्य, मास, मधुका त्यागी है और जिसने
पांचो उदुम्बरोका त्याग कर दिया है ऐसा गृहस्थ नाम मात्रका श्रावक कहलाता है। जिसने इन
मद्य मासादिकका त्याग नही किया है वह कभी श्रावक नही कहलाता। ऐसे गृहस्थको केवल
गृहस्थ कहते हैं श्रावक नही कहते अतएव पाक्षिक श्रावकको अथवा दर्शन प्रतिमाधारी श्रावकको
इन मद्य मासादिकका त्याग अवश्य कर देना चाहिए ॥१५७।। इसी प्रकार जो गृहस्थ अपनी
कल्याणमय क्रियाओको करना चाहते हैं, और जिन्होने ऊपर लिखे मद्य, मासादिकका त्याग कर
दिया है, मूलगुण धारण कर लिये हैं, ऐसे गृहस्थोको अपनी शक्तिके अनुसार सातो व्यसनोका
त्याग अवश्य कर देना चाहिए ॥१५८॥ सूत्रोमे या शास्त्रोमें इन आठों मूलगुणोके अथवा सातो
व्यसनोके जो दोष बतलाए हैं जिनको अतिचारोंके नामसे कहा गया है उनका भी त्याग अवश्य
कर देना चाहिए । अन्यथा ऐसा कौन श्रावक है जो मद्य, मासादिकको साक्षात् सेवन करे ॥१५९॥
इसी प्रकार उत्तम श्रावकोको जघन्य पात्र या मध्यम पात्र अथवा उत्तम पात्रोके लिए पात्र बुद्धिसे
अथवा श्रद्धापूर्वक आहार दान, औषध दान, उपकरण दान और वसतिका दान या अभय दान
यह चारो प्रकारका दान अवश्य देना चाहिए ॥१६०॥(इसी प्रकार कुपात्रोके लिए तथा अपात्रोंके
लिए भी उनकी योग्यतानुसार उचित दान देना चाहिए। शास्त्रोमे इन अपात्र या कुपात्रोके लिए
दान देनेका निषेध पात्र बुद्धिसे किया है । करुणा बुद्धिसे दान देनेका निषेध नही किया है ॥१६१॥
इन पात्र कुपात्र अपात्रोंके सिवाय और भी जो जीव अपने अशुभ कर्मके उदयसे भूख या प्यास
आदिसे पीड़ित हो या कोई दीन दुखी हो उनके लिए भी करुणासागर श्रावकोको अभयदान
आदि योग्यतानुसार उचित दान देना चाहिए ॥१६२।। इसी प्रकार बुद्धिमान् श्रावकोको भगवान
अरहन्तदेवकी पूजा करनी चाहिए अथवा भगवान् अरहन्तदेवकी प्रतिमामे भगवान्की पूजा करनी
चाहिए तथा स्वर और व्यजनोको स्थापन कर सिद्ध यन्त्र बनाकर सिद्ध भगवान्की पूजा करनी
चाहिए ॥१६३।। इसी प्रकार मन, वचन, कायकी शुद्धतापूर्वक आचार्य उपाध्याय साधुओकी जल-
चन्दनादिक आठो द्रव्योंसे पूजा करनी चाहिए और फिर उनके समीप बैठकर उनके चरण कमलोकी
स्तुति करनी चाहिए ॥१६४॥

४८ बायकाचार-संग्रह सन्मानादि यथाशक्ति कर्तव्यं च सर्मिणाम् । पतिनां चेतरेषां या विशेषाद् ब्रह्मचारिणाम् ॥१६५ नारीभ्योऽपि वताउपास्यो न निषिद्धं जिनागमे । वेयं सन्मानवानादि लोकानामविरोधतः ॥१६६ जिनचैत्यगृहावीना निर्माणे सावधानता ।। ययासम्पद्विधेयास्ति दूप्या नावद्यलेशतः ॥१६७ सिद्धानामहतो चापि यन्त्राणि प्रतिमा शुमा । चैत्यालयेषु संस्थाप्य वाक् प्रतिष्ठापयेत्सुघो. ॥१६८ अपि तीर्थावियात्रासु विवध्यात्सोधतं मनः । श्रावक. स च तत्रापि सयमं न यिराधयेत् ॥१६९ नित्ये नैमित्तिके चैत्यजिनविम्बमहोत्सवे । शैथिल्यं नेय कर्तव्यं तत्त्वजस्तविशेषतः ॥१७० संयमो विविधश्चैव विधेयो गृहमेषिभि । विनापि प्रतिमालपं प्रत यद्वा स्वशक्तित ॥१७१ तपो द्वावशया द्वेषा बाह्याभ्यन्तरभेवतः । कृत्स्नमन्यतम वा तत्कार्य चानतिवीर्यवान् ॥१७२ तदनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार व्रती या अव्रती धर्मात्मामओका आदर सत्कार करना चाहिए तथा ब्रह्मचारी त्यागियोका आदर सत्कार विशेष रीतिसे करना चाहिए ॥१६५।। जो स्त्रियां यत पालन करती हैं, ब्रह्मचारिणी है अथवा क्षुल्लिका है उनका मादर सत्कार करना भी जैन शास्त्रोमे निषिद्ध नही बतलाया है । ऐसी स्त्रियोका मादर सत्कार भी इस प्रकार करना चाहिए जिससे लौकिक दृष्टिमे कोई किसी प्रकारका विरोध न आवे ॥१६६।। भगवान् अरहन्तदेवकी प्रतिमा या जिनालय वनवानेमे भी सावधानी रखनी चाहिए। जिन प्रतिमा या जिनालय इस अच्छी रीतिसे वनवाना चाहिए जिससे कि थोडेसे भी पापोंसे दूषित न होने पावें ॥१६७॥ बुद्धिमान् गृहस्थोको सिद्ध परमेष्ठीके यत्र वनवाने चाहिए तथा अनेक शुभ लक्षणोसे सुशोभित ऐसी अरहन्त भगवान्की प्रतिमाएं बनवानी चाहिए। उन सिद्ध यम और जिन प्रतिमाओको जिनालयमे स्थापन कर सबसे पहले उनकी प्रतिष्ठा करानी चाहिए ।।१६८॥ श्रावकोको तीर्थ यात्रा, सघयात्रा आदि करनेके लिए भी अपने मनको सदा उत्साहित रखना चाहिए। परन्तु इतना ध्यान रखना चाहिए कि उन तीर्थ यात्रा आदि करनेमे अपने सयममे किसी प्रकारको बाधा या विराधना नहीं होनी चाहिए ॥१६९।। प्रतिदिन होनेवाली पूजा वन्दना या अभिषेक आदिमे तथा किसी निमित्तसे होने वाले अभिषेक पूजा वन्दना आदिमे या किसी जिन प्रतिमा या जिनालयके महोत्सवमे पूजा प्रतिष्ठा रथोत्सव आदि पुण्य बढाने वाले प्रभावनाके कार्योंमे श्रावकोको कभी शिथिल नही होना चाहिए । तथा जो तत्त्वोंके जानकार विद्वान् श्रावक हैं उनको विशेष रीतिसे ऐसे कार्यों मे उत्साह पूर्वक भाग लेना चाहिए । विद्वान् श्रावकोको तो ऐसे पुण्यवर्द्धक कार्योंमे कभी भी शिथिलता नही करनी चाहिए ॥१७०। इसी प्रकार गृहस्थ श्रावकोको इन्द्रिय सयम और प्राण सयम दोनो प्रकारके सयमोका पालन करना चाहिए अथवा जिन्होने प्रतिमा रूपसे व्रत धारण नही किये हैं ऐसे पाक्षिक श्रावकोको अपनी शक्तिके अनुसार अहिंसादिक अणुव्रतोका पालन करना चाहिए ॥१७१।। इसी प्रकार तपके दो भेद हैं-बाह्यतप और अन्तरग तप । बाह्यतपके अनशन, अवमोदर्य, वृत्ति- परिसख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन, कायक्लेश ये छह भेद हैं तथा अन्तरग तपके प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह भेद हैं। इस प्रकार बारह प्रकार- का तप भी अपनी शक्तिके अनुसार गृहस्थोको पालन करना चाहिए । जो गृहस्थ तपश्चरण पालन करनेकी अधिक शक्ति नहीं रखते उन्हे भी एक दो चार आदि जितने बन सकें उतने तपश्चरण पालन करने चाहिए ॥१७२।।

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तृतीय सर्ग ननु तदर्शनस्यैतल्लक्षणं स्यादशेषत । किमथास्त्यपरं किञ्चिल्लक्षणं तद्वदाद्य न ॥१ सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमस्ति सिद्धं जगत्नये । लक्षणं च गुणश्चाङ्गं शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥२ नि शङ्कितं तथा नाम नि.काक्षितमत परम् । विचिकित्सावज चापि यथादृष्टेरमूढता ॥३ उपबृहणनामाथ सुस्थितीकरणं तथा। वात्सल्यं च यथाम्नायाद्गुणोऽप्यस्ति प्रभावना ॥४ शङ्का भी साध्वस भीतिर्भयमेकाभिधा अमी। तस्या निष्क्रान्तितो जातो भावो नि शङ्कितोऽर्थतः ।।५ अर्थवशादत्र सूत्रार्थे शङ्का न स्यान्मनीषिणाम् । सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः सन्ति चास्तिक्यगोचरा ॥६ तत्र धर्मावय सूक्ष्मा सूक्ष्मा कालाणयोऽणव । अस्ति सूक्ष्मत्वमेतेषां लिङ्गस्याक्षरदर्शनात् ॥७ अन्तरिता यथा द्वीपसरिनाथनगाधिपा । दूरार्था भाविनोऽतीता रामरावणचक्रिण ॥८ न स्यान्मिथ्याशो ज्ञानमेतेषां क्वाप्यसशयम् । संशयादथ हेतोर्वे दृग्मोहस्योक्यात्सत ॥९ न चाऽऽशङ्खधं परोक्षास्ते सदृष्टेर्गोचरा कुत । ते सह सन्निकर्षस्य साक्षिकस्याप्यसम्भवात् ॥१० शकाकार कहता है कि क्या सम्यग्दर्शनका सम्पूर्ण लक्षण इतना ही है अथवा कुछ और भी है। यदि इसके सिवाय और भी कोई लक्षण है तो उसे आज कहिये ॥१॥ तीनो लोकोमे सम्यग्दर्शनके आठ अग प्रसिद्ध हैं तथा लक्षण, गुण, अग आदि सब शब्द एक ही अर्थको कहने वाले हैं ||२|| नि.शक्ति, नि काक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपबृहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना ये सम्यग्दर्शनके आठ अग शास्त्रोकी परम्परापूर्वक अनादिकालसे चले आ रहे हैं ॥३-४|| शंका, भी, साध्वस, भीति और भय ये शब्द एक ही अर्थको कहनेवाले हैं। जो आत्माके भाव इन शब्दोके द्वारा कही जानेवाली शकासे रहित हैं उसीको नि शकित अग कहते हैं ।।५।। इसका भी अभिप्राय यह है कि बुद्धिमानोको अपने किसी भी प्रयोजनसे किसी भी सूत्रके अर्थमे किसी भी पदार्थके स्वरूपमे शका नही करनी चाहिये । ससारमे जो पदार्थ सूक्ष्म हैं, इन्द्रियगोचर नहीं हैं, जो अन्तरित हैं अर्थात् जिनके मध्यमे अनेक नदी पर्वत क्षेत्र द्वीप समुद्र आदि पड गये हैं अथवा जो दूरार्थ हैं अर्थात् जो सैकडो हजारो वर्ष पहले हो चुके हैं ऐसे समस्त पदार्थोपर गाढ विश्वास होना चाहिए। ये सब पदार्थ पहले कहे हुए आस्तिक्य गुणके गोचर होने चाहिए ॥६॥ धर्म-अधर्म आकाश आदि सब सूक्ष्म पदार्थ हैं, कालाणु भी सब सूक्ष्म हैं और पुद्गलके परमाणु भी सब सूक्ष्म हैं। ये सब पदार्थ इन्द्रियगोचर नही होते और न इनका कोई यथेष्ट हेतु दिखाई पडता है इसीलिये ये सूक्ष्म कहलाते हैं ||७|| नदीश्वरादिक द्वीप, क्षीरसागर आदि सागर, मेरु आदिक पर्वत अन्तरित कहलाते हैं। इसी प्रकार राम, रावण, चक्रवर्ती, तीर्थंकर आदि जो पहले हो चुके हैं उनको दूरार्थ कहते हैं ॥८॥ इस प्रकारके सूक्ष्म अन्तरित और दूरार्थ पदार्थोंका ज्ञान मिथ्यादृष्टियोको कभी भी सन्देह रहित नही होता, क्योकि दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे उस मिथ्यादृष्टिके सदा सन्देह बना रहता है ॥९॥ कदाचित् यहाँपर कोई यह शंका करे कि सूक्ष्म अन्तरित और दूरार्थ ये सब परोक्ष पदार्थ हैं फिर भला वे सम्यग्दृष्टिके ज्ञानगोचर किस प्रकार हो जायेंगे क्योकि उन सूक्ष्मादिक पदार्थोंका इन्द्रियोके साथ सम्बन्ध होना तो असम्भव ही है ।

लाटीसंहिता ५१ अस्ति तत्रापि सम्यक्त्वमाहात्म्यं महता महत् । यदस्य जगतो ज्ञानमस्त्यास्तिक्यपुरस्सरम् ।।११ नासम्भवमिद यस्मात्स्वभावोऽतर्कगोचर । अतिशयोऽतिवागस्ति योगिना योगिशक्तिवत् ॥१२ अस्ति चात्मपरिच्छेदि ज्ञानं सम्यग्दृगात्मन । स्वसवेदनप्रत्यक्षं शुद्धं सिद्धास्पदोपमम् ।।१३ यत्रानुभूयमानोऽपि सर्वैराबालमात्मनि । मिथ्याकर्मविपाकाद्वै नानुभूति शरीरिणाम् ॥१४ सम्यग्दृष्टेः कुदृष्टश्च स्वादुभेदोऽस्ति वस्तुनि । न तत्र वास्तवो भेदो वस्तुसोम्नोऽनतिक्रमात् ॥१५ अत्र तात्पर्यमेवैतत्तत्वैकत्वेऽपि यो भ्रमः । शाया सोऽस्त्यपराधो सास्ति मिथ्योपजीविनी ॥१६ ननु शङ्काकृती दोषो यो मिथ्यानुभवो नृणाम् । शङ्कापि कुतो न्यायादस्ति मिथ्योपजीविनी ॥१७ अत्रोत्तरं कुदृष्टिर्य स सप्तभिर्भयैर्युतः । नापि स्पृष्टः सुदृष्टिर्य सप्तभिः स भयैर्मनाक् ॥१८ भावार्थ-शकाकार कहता है कि जब सूक्ष्मादिक पदार्थोंका इन्द्रियोके साथ सम्बन्ध ही नही होता तो फिर उनका ज्ञान जैसा मिथ्यादृष्टिको होता है वैसा ही सम्यग्दृष्टिको होना चाहिये। जिस प्रकार इन सूक्ष्मादिक पदार्थोंके ज्ञानमे मिथ्यादृष्टिको सन्देह रहता है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टिको भी सन्देह रहना चाहिये परन्तु शकाकारकी यह शका ठीक नही है ।।१०। क्योकि परोक्ष पदार्थोके जाननेमे महापुरुपोके सम्यग्दर्शनका ऐसा ही कुछ बडा भारी माहात्म्य रहता है जिससे कि उनके ससार भरका ज्ञान आस्तिक्य गोचर होता है। भावार्थ-सम्यग्दर्शनका एक आस्तिक्य गुण है जिससे यह सम्यग्दृष्टि जीव भगवान् सर्वजदेवके कहे हुए सूक्ष्मादिक समस्त पदार्थोंका ज्योके त्यो सत्तारूपसे श्रद्धान करता है तथा उसी आस्तिक्य गुणके कारण उन सूक्ष्मादिक पदार्थोंको अस्ति- रूप समझता है । मिोदृष्टि पुरुषके वह आस्तिक्य गुण होता नही इसलिये मिथ्यादृष्टिको उन पदार्थीका ज्ञान सन्देहरहित नही होता तथा आस्तिक्य गुण होनेके कारण सम्यग्दृष्टिको उन पदार्थोका ज्ञान सन्देहरहित होता है ॥११॥ “आस्तिक्यगुणके कारण सम्यग्दृष्टिको समस्त ससारके पदार्थोका ज्ञान सन्देहरहित हो जाता है" यह बात असम्भव नही है क्योकि सम्यग्दृष्टिका स्वभाव ही ऐसा होता है। जो जिसका जैसा स्वभाव होता है उसमे किसी भी प्रकारका तर्क- वितर्क नही हो सकता। सम्यग्दृष्टिका यह अतिशय वचनोंके अगोचर होता है। जैसे योगियोकी योग शक्ति वचनोके अगोचर होती है ।।१२।। सम्यग्दृष्टिका ज्ञान आत्माके शुद्ध स्वरूपको जानने- वाला ज्ञान है । वह ज्ञान शुद्ध है, स्वसवेदन प्रत्यक्ष है और सिद्धोके समान है ।।१३।। यह अपने शुद्ध आत्माका अनुभव बालकोसे लेकर वृद्धोतक समस्त आत्माओमे होता है ॥१४|| इसमे भी इतना और समझ लेना चाहिये कि मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टिको केवल पदार्थों के अनुभवमे, स्वाद लेनेमे अन्तर पडता है। उन आत्माओमे कोई किसी प्रकारका वास्तविक भेद नही है तथा पदार्थोंकी जो सीमाये हैं, मर्यादाएँ हैं उनका उल्लघन कभी नही होता है ॥१५।। इस सबके कहनेका अभिप्राय यही है कि यद्यपि जाननेवाला आत्मतत्त्व भी समान है। जैसा मिथ्यादृष्टिका है वैसा ही सम्यग्दृष्टिका है तथा जानने योग्य पदार्थ भी दोनोके एक ही है, भिन्न-भिन्न नहीं हैं तथापि मिथ्यादृष्टिको जो पदार्थोमे भ्रम होता है वह केवल उसको शकाका अपराध है। तथा वह शका उसके मिथ्यात्वकर्मके उदय होनेके कारण होती है ।।१६।। यहाँपर शकाकार फिर कहता है कि मनुष्योको अपने आत्माका मिथ्या या विपरीत अनुभव होता है वह शकासे होता है यह बात तो ठीक है परन्तु वह शका मिथ्यात्वकमके उदयसे ही होती है यह बात किस प्रकार सिद्ध हो सकती है ? ||१७|| इस शकाका समाधान यह है कि वह शका मिथ्यात्व कर्मके उदयसे ही होती है अत्त श्रावकाचार-संग्रह परत्रात्मानुभूते विना भीतिः कुतस्तनी । भीति' पर्यायमूढानां नात्मतत्त्वैकचेतसाम् ॥१९ ततो भोत्यानुमेयोस्ति मिथ्या भावो जिनागमात् । सा च भोतिरवश्यं स्थाढेतोः स्वानुभवक्षते ॥२० अस्ति सिद्धं परायत्तो भीत स्वानुभवच्युतः । स्वस्थस्य स्वाधिकारित्वान्नूनं भीतेरसम्भवात् ॥२१ ननु सन्ति चतस्रोऽपि संजास्तस्यास्य कस्यचित् । अर्वाक तत्तस्थितिच्छेदस्थानावस्तित्वसम्भवात् २२ तत्कथं नाम निर्भीकः सर्वतो दृष्टिवानपि । अप्यनिष्टार्थसंयोगादस्त्यध्यक्ष प्रमत्तवान् ।।२३ सत्यं भीतोऽपि निर्भीकस्तत्स्वामित्वाधभावत' । रूपिद्रव्यं यथा चक्षु पश्यन्नपि न पश्यति ॥२४ मिथ्या दृष्टि सातो भयोसे सदा ग्रस्त रहता है। परन्तु जिसके मिथ्यात्व कर्मका उदय नही है ऐसा सम्यग्दृष्टि सातो भयोसे किंचिन्मात्र भी नही डरता है। डरनेकी तो बात ही क्या सम्यग्दृष्टि को सातो भय स्पर्श भी नही करते हैं। इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि शका या डर उत्पन्न करनेवाला मिथ्यात्व कर्म ही है ॥१८॥ जिस समय यह जीव परपदार्थोंमे अपने आत्माका अनुभव करने लगता है उसी समय इसको भय उत्पन्न होता है। परपदार्थोंमे अपने आत्माका अनुभव हुए बिना भय किसी प्रकार उत्पन्न नही हो सकता। इसलिए जो जीव आत्माकी विभाव पर्यायो- को ही अपना आत्मा समझ लेते हैं उन्हीको भय होता है। जो जीव केवल अपने शुद्ध आत्माका ही अनुभव करते हैं उनके भय कभी नही हो सकता ॥१९॥ इस प्रकार जब यह बात सिद्ध हो चुकी कि भय-मिथ्यात्व कमके उदयसे ही होता है, उसके उत्पन्न होनेका और कोई कारण नही है तब यह बात भी अनुमानसे सिद्ध हो जाती है कि जिन जिन जीवोके भय है उनके मिथ्यात्व कर्मका उदय अवश्य है तथा यह बात शास्त्रोसे स्पष्ट है कि मिथ्यात्व कर्मके उदयसे होनेवाला वह भय अपने आत्माके अनुभवका नाश करनेमे अवश्य ही कारण है ।।२०।। अतएव इस ऊपरके कथनसे यह सिद्ध हुआ कि जो पराधीन है, परपदार्थोंको अपना आत्मा समझ रहा है और इसीलिए जो भय-सहित है वह मनुष्य अपने आत्माके अनुभवसे अवश्य ही रहित है तथा जो मनुष्य अपने आत्माके अनुभवमे लीन है वह अपने ही आत्माका अधिकारी है, परपदार्थका उसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिए उस मनुष्यको किसी भी प्रकारका भय होना नितान्त असम्भव है ।।२१।। यहाँपर कोई शकाकार कहता है कि किसी किसी सम्यग्दृष्टिके आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चारो सज्ञाएँ रहती है तथा उन सज्ञामोका जहाँ तक जिस गुणस्थानतक नाश नहीं होता है वहाँ तक उन संज्ञाओका अस्तित्व मानना ही पडेगा। अतएव सभी सम्यग्दृष्टि निर्भय होते हैं यह बात कैसे बन सकती है अर्थात् जिस सम्यग्दृष्टिके जहांतक भय सज्ञा है वहाँ तक तो उसके भय मानना ही पडेगा इसमे तो उसके कोई सन्देह ही नही है। दूसरी बात यह है कि अनिष्ट पदार्थोंका सम्बन्ध होनेपर सम्यग्दृष्टिको भी प्रमाद उत्पन्न होता है और प्रमादके कारण वह भय करने लगता है यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है, अर्थात् सादिक अनिष्ट पदार्थोंका सयोग होने पर उनसे बचनेका प्रयत्न वह करता ही है। इससे सिद्ध होता है कि सम्यग्दृष्टिको भी भय होता है वह सदा निर्भय नही रहता है ।।२२-२३।। समाधान-यह बात ठीक है कि किसी किसी सम्यग्दृष्टिको भय होता है, किन्तु वह सम्यग्दृष्टि भयवान होता हुआ भी निर्भय होता है। इसका भी कारण यह है कि यद्यपि उसके चारो संज्ञाएँ हैं उन संज्ञाओंके कारण उसको भय उत्पन्न होता है परन्तु उसीके साथ यह भी है कि वह सम्यग्दृष्टि अपने आत्माको उन सज्ञाओ का स्वामी नही समझता अथवा यो कहना चाहिए कि उन संज्ञाओको अपनी नही समझता किन्तु लाटीसहिता ५३ - सन्ति संसारिजीवानां कर्माशाश्चोदयागताः । मुह्यन् रज्यन् द्विषंस्तत्र तत्फलेनोपयुज्यते ॥२५ एतेन हेतुना ज्ञानी नि शङ्को न्यायदर्शनात् । देशतोऽप्यत्र मूछीया शङ्काहेतोरसम्भवात् ।।२६ स्वात्मसञ्चेतनं तस्य कीदृगस्तीति चिन्त्यते । येन कर्मापि कुर्वाणो कर्मणा नोपयुज्यते ॥२७ तत्र भीतिरिहामुत्र लोके वा वेदनाभयम् । चतुर्थी भीतिरत्राणं स्यादगुप्तिस्तु पञ्चमी ॥२८ भीति स्याद्वा तथा मृत्यु तिराकस्मिकी ततः । क्रमादुद्देशिताश्चेति सप्तैता भीतयः स्मृता ॥२९ तोह लोकतो भीति क्रन्दितं चात्र जन्मनि । इष्टार्थस्य व्ययो मा भून्मा मेऽनिष्टार्थसङ्गम ॥३० स्थास्यतीदं धनं नो वा दैवान्मामुद्दरिद्रता । इत्याद्याधिश्विता दग्धुं ज्वलिते वा दृगात्मनः ॥३१ अर्थादज्ञानिनो भीति तिर्न ज्ञानिन क्वचित् । यतोऽस्ति हेतुत शेषाद्विशेषश्वानयोर्महान् ॥३२ कर्मोंसे उत्पन्न होनेके कारण उन्हे पौद्गलिक या परपदार्थ रूप समझता है, अथवा उन्हे कर्म- जन्य उपाधि समझता हुआ परपदार्थ रूप मानता है इसीलिए उन सज्ञाओके होनेपर भी उसको भय उत्पन्न नही होता जैसे चक्षु रूपादिक परपदार्थोंको देखता हुआ भी नही देखता। भावार्थ- यद्यपि रूपादिक पदार्थोंको चक्षु देखता है तथापि वास्तवने देखा जाय तो भावेन्द्रियसे ही पदार्थ देखा जाता है । पुद्गलमयी द्रव्य चक्षुसे कुछ नही देखा जाता । यदि द्रव्य चक्षु ही देखता तो उस शरीरसे जीव निकल जानेके बाद भी देखता परन्तु जीव निकल जानेके बाद वह नही देखता। इससे सिद्ध होता है कि देखनेकी शक्ति भावेन्द्रियमे अथवा आत्मामे है । उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि मिथ्यादृष्टिके समान अपनेको सज्ञाओंका स्वामी समझकर उसमे लीन नही होता किन्तु उनसे अपनेको सर्वथा भिन्न समझता है और इसीलिए उन सज्ञाओसे उत्पन्न होनेवाला भय उसको नही होता ॥२४॥ इस ससारमे जितने प्राणी हैं उन सबके कर्मोंकी वर्गणाएँ उदयमे आती रहती हैं। उन कर्मोके उदय होनेसे जो सुख-दु-खादिक फल मिलता है उसमे यह ससारी जीव मोह करने लगता है या राग करने लगता है अथवा द्वेष करने लगता है, परन्तु सम्यग्दृष्टि पुरुष इन सब कारणोके मिलनेपर नि शक रहता है। न तो उन कर्मोक फलोंमे राग करता है, न द्वेष करता है और न मोह करता है क्योकि राग, द्वेष, मोह ये तीनो ही दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे होते है तथा सम्यग्दृष्टि पुरुषके दर्शनमोहनीय कर्मका अभाव है इसीलिए उसके राग, द्वेष, मोह उत्पन्न नहीं होते, अतएव यह बात न्यायसे सिद्ध हो जाती है कि सम्यग्ज्ञानीके एकदेश भी मूर्छा नही है इसलिए उसके शका होनेके कारण ही असम्भव है ॥२५-२६।। आगे इसी बातका विचार करते हैं कि इस सम्यग्दृष्टिकी ज्ञानचेतना कैसी बिचित्र है जिसके कारण वह सम्यग्दृष्टि कर्मोको करता हुआ भी उनसे उपयुक्त नही होता ॥२७॥ ससारमे सात प्रकारके भय है । क्रमसे उनके नाम ये है-इस लोकका भय, परलोकका भय, वेदनाका भय, चौथा अरक्षाका भय, पांचवीं अगुप्तिका भय, छठा मृत्युका भय और सातवाँ आकस्मिक भय । ये सात प्रकारके भय हैं २८-२९।। इनमेसे सबसे पहले इस लोकके भयको बतलाते हैं मेरे इष्ट पदार्थोंका कभी नाश न हो, इसी प्रकार मेरे अनिष्ट पदार्थों का भी कभी समागम न हो। इस प्रकार इस जन्ममे सदा विलाप करते रहना, इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोगसे सदा डरते रहना इस लोक सम्बन्धी भय कहलाता है ॥३०॥ “यह घर मेरे ठहरेगा अथवा नही, मेरे घर दैवयोगसे भी कभी दरिद्रता न हो" इस प्रकारको अन्तरङ्गकी व्याधि रूपी चिन्ताएँ मानो मिथ्यादृष्टिको जलानेके लिए ही उसके हृदयमे सदा जलती रहती हैं ॥३१।। इस लोकके भयके लक्षणसे यह बात सिद्ध हो जाती है कि यह इस लोक सम्बन्धी भय अज्ञानी या मिथ्यादृष्टिको ही होता है । वह इस लोक सम्बन्धी श्रावकाचार-संग्रह अज्ञानी कम नोकर्म भावकर्मात्मकं च यत् । मनुतेऽहं सर्वमेवैतन्मोहादद्वैतवादवत् ॥३३ विश्वाशिन्नोऽपि विश्वं स्व कुर्वन्नात्मानमात्महा । भूत्वा विश्वमयो लोके भयं नोज्झति जातुचित् ३४ तात्पर्य सर्वतोऽनित्ये कर्मणा पाकमम्भवात् । नित्यं बुद्ध्या शरीरादौ भ्रान्तो भोतिमुपैति स ॥३५ सम्यग्दृष्टि सवैकत्वं स्वं समासादयन्नियत् । यावत्कर्मातिरिक्तत्वाच्छुद्धमभ्येति चिन्मयम् ॥३६ शरीरं सुखदुःखादि पुत्र-पौत्रादिकं तथा । अनित्य कर्मकार्यत्वादस्वरूपमवैति य ॥३७ लोकोऽयं मे हि चिल्लोको नून नित्योऽस्ति सोऽर्थत । नापरो लौकिको लोकस्ततो भीति कुतोऽस्ति में ॥३८ स्वात्मसञ्चेतनादेवं ज्ञानी ज्ञानेकतानत । इह लोकभयान्मुक्तो मुक्तस्तत्कर्मवन्धनात् ॥३९ परलोकः परत्रात्मा भाषिजन्मान्तराशभाक् । ततः कम्प इव त्रासो भीतिः परलोकतोऽस्ति सा ॥४० भद्रं चेज्जन्म स्वलॊके मामून्मे जन्म दुर्गतौ । इत्याद्याकुलित चेत साध्वस पारलौकिकम् ॥४१ मिथ्यादृष्टस्तदेवास्ति मिथ्याभावैककारणात् । तद्विपक्षास्य सदृष्टेर्नास्ति तत्तत्र व्यत्ययात् ॥४२ बहिदृष्टिरनात्मज्ञो मिथ्यामात्रकभूमिक । स्व समासावयत्यज्ञ कर्म कर्म फलात्मकम् ।।४३ ततो नित्यं भयाक्रान्तो वर्तते भ्रान्तिमानिव । मनुते मृगतृष्णायामम्भोभारं जन कुधीः ॥४४ भय सम्यग्ज्ञानी या सम्यग्दृष्टिको कभी किसी कालमे भी नही होता है । इस प्रकारके इस फल- रूप हेतुसे या इस कार्य रूप हेतुसे यह बात सहज सिद्ध हो जाती है कि सम्यग्दृष्टि और मिथ्या- दृष्टिमे बहुत भारी अन्तर है ॥३२॥ यतः अज्ञानी जोव कर्म, नोकर्म और भावकर्ममय है अत वह इस सबको मोहवश अद्वैतवादके समान अपनेसे अभिन्न मानता है ॥३३|| वह आत्मघाती विश्वसे भिन्न होकर भी अपने आत्माको विश्वमय मान बैठा है और इस प्रकार विश्वमय होकर लोकमे कभी भी भयसे मुक्त नही हो पाता ||३४|| तात्पर्य यह है कि यद्यपि शरीरादि सर्वथा अनित्य हैं तो भी वह मिथ्यात्व कर्मके उदयसे इनमे नित्य बुद्धि रखकर भ्रान्त हो रहा है जिससे वह भयको प्राप्त होता है ॥३५।। किन्तु सम्यग्दृष्टि जीव सदा ही अपने आत्मामे एकत्वका अनुभव करता है। वह उसे सब कर्मोसे भिन्न, शुद्ध और चिन्मय मानता है ॥३६॥ वह शरीर, सुख, दुख और पुत्र, पौत्र आदिकको अनित्य मानता है और कर्मजन्य होनेसे इन्हे आत्माका स्वरूप नही मानता ॥३७॥ वह ऐसा विचार करता है कि यह चैतन्य लोक ही मेरा लोक है । वह वास्तवमे नित्य है। इससे भिन्न अलोकिक लोक नही है इसलिये मुझे भय कैसे हो सकता है ॥३८॥ इस प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव अपने आत्माका अनुभव होनेके कारण ज्ञानानन्दमे लीन रहता है। जिससे वह इस लोक सम्बन्धी भयसे सदा मुक्त रहता है और इसके कारणभूत कर्मबन्धनसे भी अपनेको मुक्त अनुभव करता है ।।३९।। आगामी जन्मान्तरको प्राप्त होनेवाले परभव सम्बन्धी आत्माका नाम ही परलोक है। इसके कारण जीवको कम्पके समान दुख होता है इसलिये ऐसे भयको परलोक भय कहते हैं ॥४०॥ यदि इस लोकमे जन्म हो तो अच्छा है, दुर्गतिमे मेरा जन्म न होवे इत्यादि रूपसे चित्तका आकुलित होना ही परलोक भय है ॥४१॥ मिथ्यादृष्टि जीवके ऐसा भय अवश्य पाया जाता है, क्योकि इसका कारण एकमात्र मिथ्याभाव है। किन्तु इससे विपरीत सम्यग्दृष्टिके यह भय नही पाया जाता है क्योकि इसके मिथ्याभावका अभाव हो गया है ।।४२॥ मिथ्यादृष्टि जीव अपनी आत्माको नही पहिचानता है, क्योकि वह एकमात्र मिथ्याभूमिमे स्थित है। वह मूर्ख अपनी आत्माको कर्म और कर्मफल रूप ही अनुभव करता है ॥४३।। इसलिये लाटी संहिता ५५ अन्तरात्मा तु निर्भीक' पदं निर्भयमाश्रित । भीतिहेतोरिहावश्यं मिथ्याभ्रान्तेरसम्भवात् ॥४५ मिथ्याभ्रान्तिर्यदन्यत्र दर्शनं चान्यवस्तुनः । कथा रज्जौ तमोहेतो साध्यासाद्रवत्यधी ॥४६ स्वसंवेदनप्रत्यक्ष ज्योतिर्यो वेत्त्यनन्यसात् । स बिभेति कुतो न्यायादन्यथाभवनादपि ॥६७ वेदनागन्तुका बाधा मलानां कोपतस्तनौ । भीतिः प्रागेव कम्पोऽस्या मोहाद्वा परिदेवनम् ॥४८ उल्लाघोऽहं भविष्यामि मामून्मे वेदना क्वचित् । मूच्छंव वेदना भीतिश्चिन्तनं वा मुहुर्मुहु ॥४९ अस्ति नूनं कुदृष्टे सा दृष्टिदोषकहेतुत । नीरोगस्यात्मनोऽज्ञानाप्न स्यात्सा ज्ञानिनां क्वचित् ॥५० पुद्गलाद्भिनचिदाम्नो न मे व्याधि कुतो भयम् । व्याधि सर्व शरीरस्य नामूर्तस्येति चिन्तनात् ५१ स्पर्शनादीन्द्रियार्थेषु प्रत्युत्पन्नेषु भाविषु । नादरो यस्य सोऽस्त्यर्थानि को वेदनाभयात् ॥५२ व्याधिस्थानेषु तेषच्चै सिद्धो नादरो मनाक् । बाधाहेतोः स्वतस्तेषामामयस्याविशेषत ॥५३ अत्राणं क्षणिकैकान्ते पक्षे चित्तक्षणादिवत् । नाशात्प्रागंशनाशस्य त्रातुमक्षमतात्मन ॥५४ भीति प्रागंशनाशात्स्यावंशिनाशनमोऽन्वयात् । मिथ्यामात्रैकहेतुत्वान्नूनं मिथ्यादृशोऽस्ति सा ॥५५ शरणं पर्ययस्यास्तङ्गतस्यापि सदन्वयम् । तमनिच्छन्निवाज्ञ स त्रस्तोऽस्त्यत्राणसाध्वसात् ॥५६ भ्रमिष्ठ पुरुषके समान वह निरन्तर ही भयाक्रान्त रहता है । ठीक ही है क्योकि अज्ञानी जीव मृग- तृष्णामे ही जल समझ बैठता है ॥४४॥ किन्तु जो अन्तरात्मा है वह निर्भय पदको प्राप्त होनेके कारण सदा ही निर्भीक है, क्योकि भयकी कारणभूत भ्रान्ति इसके नियमसे पायी जाती है ॥४५॥ जो अन्य पदार्थमे किसी अन्य पदार्थका ज्ञान होता है वह मिथ्या भ्रान्ति कहलाती है। जैसे कि अज्ञानी जीव अन्धकारके कारण रस्सीमे सर्पका निश्चय हो जानेसे डरकर भागता है वैसे ही मिथ्यादृष्टि भी मिथ्यात्वके कारण कर्म और कर्मफलमे आत्माका निश्चय कर लेनेसे डरता रहता है ॥४६।। किन्तु जो स्वसवेदन प्रत्यक्ष रूपी ज्योतिको अपनेसे अभिन्न जानता है वह कैसे डर सकता है, क्योकि उसे ज्ञात रहता है कि कोई भी कार्य अन्यथा नहीं हो सकता है ॥४७॥ शरीरमे वातादि मलोके कुपित होनेसे जो बाधा उत्पन्न होती है वह वेदना कहलाती है। इस वेदनाके पहले ही शरीरमे कम्प होने लगता है अथवा मोहवश यह जीव विलाप करने लगता है इसीका नाम वेदना भय है ।।४८|| मैं नोरोग हो जाऊँ, मुझे वेदना कभी भी न हो इस प्रकारकी मूर्छाका होना या इस प्रकार बारबार चिन्तवन करना ही वेदना भय है ॥४९॥ वह वेदना भय मिथ्यादर्शनके कारण नीरोग आत्माका ज्ञान न होनेसे मिथ्यादृष्टि जीवके नियमसे होता है। किन्तु ज्ञानी जीवके वह कभी भी नही पाया जाता ॥५०॥ ज्ञानी जीव विचार करता है कि आत्मा चैतन्यमात्रका स्थान है जो पुद्गलसे भिन्न है इसलिये जब कि मुझे व्याधि ही नही तब भय कैसे हो सकता है। जितनी भी व्याधियाँ हैं वे सब शरीरमे ही होती हैं अमूर्त आत्मामे नही ॥५१॥ जिसका स्पर्शन आदि इन्द्रियोके वर्तमानकालीन और भविष्यत्कालीन विषयोमे आदर नही है वही वास्तवमे वेदनाभयसे निर्भीक है ॥५२॥ सम्यग्दृष्टि जीवके व्याधियोके आधारभूत इन इन्द्रियो- के विषयोमे अत्यन्त अनादर भावका पाया जाना असिद्ध नहीं है, क्योकि वे स्वय बाधाकी कारण हैं इसलिये उनमे रोगसे कोई भेद नही ॥५३।। जिस प्रकार क्षणिक एकान्त पक्षमे चित्तक्षण आदिकी रक्षा नही की जा सकती उसी प्रकार नाशसे पूर्व ही अशीके नामको रक्षा करनेमे अपनी असमर्थता मानना अत्राणभय है ॥५४॥ पर्यायके नष्ट होनेके पहले ही अन्वयरूपसे अशीके नाशका होना अत्राण भय है। इसका कारण मिथ्याभाव है इसलिये यह मिथ्यादृष्टिके नियमसे होता है ॥५५॥ यद्यपि पर्याय निरन्तर नष्ट होती रहती है तथापि अन्वयरूपसे एक सत् ही शरणभूत है। किन्तु ५६ श्रावकाचार-सग्रह सदृष्टिस्तु चिवंशै स्वै क्षणे नष्टे चिदात्मनि । पश्यन्न नष्टमात्मानं निर्भयोऽत्राणभीतितः ॥५७ द्रव्यतः क्षेत्रतश्चापि कालावपि च भावत. । नात्राणमंशतोऽप्यत्र कुतस्तद्धीमहात्मन ॥५८ दृग्मोहस्योवयाबुद्धिर्यस्यैकान्ताविवादिनः । तस्यैवागुप्ति भीति स्यान्नून नान्यस्य जातुचित् ॥५९ असज्जन्म सतो नाशं मन्यमानस्य देहिन । कोऽवकाशस्ततो मुक्तिमिच्छातो गुप्तिसाध्यसात् ॥६० सम्यग्दृष्टिस्तु स्वं रूपं गुप्तं वै वस्तुनो विदन् । निर्भयोऽगुप्तितो भीते तिहेतोरसम्भवात् ॥६१ मृत्युः प्राणात्यय प्राणा. कायवागिन्द्रियं मन । निश्वासोच्छावसमायुश्च दशैते वाक्यविस्तरात् ॥६२ तद्धीतिर्जीवितं भूयान्मामून्मे मरणं क्वचित् । कदा लेभे न वा दैवादित्याऽऽघि स्वे तनुव्यये ॥६३ नूनं तभी कुदृष्टीनां नित्यं तत्त्वमनिच्छताम् । अन्तस्तत्त्वकवृत्ताना तभीतिर्ज्ञानिनां कुत ॥६४ जीवस्य चेतना प्राणा नूनं स्वात्मोपजीविनी । नान्मृत्युरतस्तद्भी कुत स्यादिति पश्यतः ॥६५ अकस्माज्जातमित्युच्चैराकस्मिकभयं स्मृतम् । तद्यथा विद्युदादीनां पातात्पातोऽसुधारिणाम् ॥६६ भोति भूयाद्यथा सौस्थ्यं माभद्दौस्थ्यं कदापि मे । इत्येवं मानसी चिन्तापर्याकुलितचेतसाम् ॥६७ अर्थावाकस्मिकभ्रान्तिरस्ति मिथ्यात्वशालिन । कुतो मोक्षोऽस्ति तद्भातेनि कैकपदच्युते ॥६८ निर्भीकैकपदो जीवः स्यादनन्तोऽप्यनादिमान् । नास्त्याकस्मिकं तत्र कुतस्तद्धीस्तमिच्छतः ॥६९ मिथ्यादृष्टि इसे स्वीकार नही करता इसलिये वह अत्राणभयसे त्रस्त हो रहा है ।।५६।। यद्यपि चैतन्य आत्माका अपनी चैतन्यरूप पर्यायोकी अपेक्षा प्रति समय नाश हो रहा है। किन्तु सम्यग्दृष्टिजीव इस अपेक्षासे आत्माका नाश मानता हुआ भी अत्राणभयसे निडर है ।।५७॥ यत द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावको अपेक्षा वस्तु थोडी भी अरक्षित नही है अत महात्माओको अत्राण भय कैसे हो सकता है ॥५८॥ दर्शनमोहनीयके उदयसे जिसकी बुद्धि एकान्तवादसे मूढ है उसीके निश्चयसे अगुप्ति भय होता है किन्तु अन्यके (सम्यग्दृष्टिके) ऐसा भय कभी भी नही होता है ॥५९॥ जो प्राणी असत्का जन्म और सत्का नाश मानता है वह अगुप्ति भयसे भले ही छुटकारा चाहता हो पर उसे उससे छुटकारा कैसे मिल सकता है ।।६०॥ किन्तु सम्यग्दृष्टि जीव वस्तुके स्वरूपको सदैव सुगुप्ति मानता है इसलिये उसके भयका कारण न रहनेसे वह अगुप्ति भयसे निर्भय है ॥६१।। प्राणोका वियुक्त होना ही मृत्यु है। विस्तारसे प्राण काय, वचन, पांच इन्द्रियाँ, मन, श्वासोच्छ्वास और आयु ऐसे दस प्रकारके होते हैं ॥६२|| मेरा जीवन कायम रहे, मेरा मरण कभी न हो, देववश भी में मृत्युको प्राप्त न होऊं इस प्रकार अपने शरीरके नाशके विषयमे मानसिक चिन्ताका होना मरणभय है ।।६३।। तत्त्वको नही पहिचाननेवाले मिथ्यादृष्टियोको सदा ही इस प्रकारका मृत्यु भय बना रहता है किन्तु जिनकी वृत्ति अन्तस्तत्त्वमे लीन है ऐसे ज्ञानियोको मृत्यु भय कैसे हो सकता है ॥६४|| जीवके चेतना ही प्राण हैं और वह चेतना आत्माका उपजीवी गुण है । वास्तवमे मृत्यु होती ही नही अत इस प्रकारका जो अनुभव करता है उसे मृत्यु भय कैसे हो सकता है ।।६५।। जो भय अकस्मात् उत्पन्न होता है वह आकस्मिक भय माना गया है। जैसे कि बिजली आदिके गिरनेसे प्राणियोका मरण हो जाता है ऐसे समयमे आकस्मिक भय होता है ॥६॥ में सदा स्वस्थ रहूँ अस्वस्थ कभी न होऊँ इस प्रकार व्याकुल चित्तवालेके जो मानसिक चिन्ता होती है वह आकस्मिक भय है ॥६७॥ वास्तवमे आकस्मिक भय मिथ्यादृष्टियोंके ही होता है। ऐसा जीव निर्भय पदसे च्युत रहता है इसलिये इसे आकस्मिकभयसे मुक्ति कैसे मिल सकती है ॥६८|| वास्तवमे यह जीव निर्भीक पदमे स्थित है, आदि और अन्तसे रहित है।

लाटीसहिता ५७ . काक्षा भोगाभिलाष' स्यात्कृते मुख्यक्रियासु वा । कर्मणि तत्फले स्वात्म्यमन्यदृष्टिप्रशंसनम् ॥७० हृषीकारुचितेषूच्चैरुद्वेगो विषयेषु य । स स्याद्धोगाभिलाषस्य लिङ्गं स्वेष्टार्यरञ्जनात् ॥७१ तद्यथा न रतिः पक्षे विपक्षे वारति विना । नारतिर्वा स्वपक्षेऽपि तद्विपक्षे रति विना ॥७२ शीतद्वेषी यथा कश्चिदुष्णस्पर्श समीहते । नेच्छेदनुष्णंसंस्पर्शमुष्णस्पर्शाभिलाषुक ॥७३ यस्याऽस्ति काक्षितो भावो नूनं मिथ्यागस्ति सः। यस्य नास्ति स सदृष्टिः युक्तिस्वानुभवागमात् ॥७४ आस्तामिष्टार्थसंयोगोऽमुत्रभोगाभिलाषत । स्वार्थसाथैकसंसिद्धिर्न स्यानामैहिकापि सा ॥७५ निस्सारं प्रस्फुरत्येष मिथ्याकमकपाकतः । जन्तोरुन्मत्तवच्चापि वार्द्धांतोत्तरङ्गवत् ॥७६ ननु कार्यमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते । भोगाकाक्षा विना ज्ञानी तत्कथ व्रतमाचरेत् ॥७७ नासिद्धं बन्धमात्रत्वं क्रियाया. फलमद्वयम् । शुभमात्र शुभायाः स्यादशुभायाश्चाशुभावहम् ॥७८ न चाऽऽशक्यं क्रियाऽप्येषा स्यादबन्धफला क्वचित् । दर्शनातिशयाद्धेतोः सरागेऽपि विरागवत् ।।७९ सरागे वीतरागे वा नूनमौदयिको क्रिया । अस्ति बन्धफलावश्यं मोहस्यान्यतमोदयात् ॥८० न च वाच्यं स्यात्सदृष्टिः कश्चित्प्रज्ञापराधतः । अपि बन्धफलां कुर्यात्तामबन्धफलां विदन् ॥८१ उसे किसी भी प्रकारका आकस्मिक भय नही है । जब यह बात है तब इस पदको चाहनेवालेको आकस्मिक भय कैसे हो सकता है ॥६९॥ व्रतादिक क्रियाओको करते हुए उनसे परभवके लिये भोगोकी अभिलाषा करना, कर्म और कर्मके फलमे आत्मीय भाव रखना और अन्यदृष्टिकी प्रशसा करना काक्षा है ।।७०।। इन्द्रियोके लिए अरुचिकर विषयोमे जो तीन उद्वेग होता है वह भोगाभिलाषाका चिह्न है, क्योकि अपने लिए इष्ट पदार्थोंमे अनुराग होनेसे ही ऐसा होता है ॥७१।। जैसे स्वपक्षमे जो रति होती है वह भी विपक्षमे अरति हुए विना नही होती वैसे ही स्वपक्षमे जो अरति होती है वह भी उसके विपक्षमे रति हुए विना नही होती ॥७२।। जैसे कि शीत स्पर्शसे द्वेष करनेवाला व्यक्ति ही उष्ण स्पर्शको चाहता है, क्योकि जो उष्ण स्पर्शको चाहता है वह शीत स्पर्शको नही चाहता है ।।७३|| इस प्रकारका काक्षारूप भाव जिसके है वह नियमसे मिथ्यादृष्टि है और जिसके ऐसा भाव नही है वह सम्यग्दृष्टि है यह बात युक्ति, अनुभव और आगमसे जानी जाती है ॥७४॥ भोगाभिलाषासे परभवमे इष्ट पदार्थोंका सयोग होना तो दूर रहा किन्तु इससे ऐहिक पदार्थोंकी भी सिद्धि नही होती है |७५।। जैसे किसी उन्मत्त पुरुषके मनमे व्यर्थ ही नाना प्रकारके विकल्प उठा करते हैं या समुद्रमे वायुके निमित्तसे व्यर्थ ही नाना प्रकारकी तरगें उठा करती हैं वैसे ही इस जोवके मिथ्यात्वकर्मके उदयसे यह भोगाभिलाषा व्यर्थ ही उदित होती रहती है ।।७६।। शका-जब मन्द पुरुष भी कार्यका निश्चय किये विना प्रवृत्ति नहीं करता है तब फिर ज्ञानी पुरुष भोगाकाक्षाके विना व्रतोका आचरण कैसे कर सकता है ॥७७|| क्रियाका फल एकमात्र बन्ध है यह बात भी असिद्ध नही है, क्योकि शुभ क्रियाका फल शुभ है और अशुभ क्रियाका फल अशुभ है ।।७८॥ यदि कोई ऐसी आशका करे कि सम्यग्दर्शनके माहात्म्यसे वीतरागके समान किसी सरागीके भी यह क्रिया बन्ध फलवाली नही होती है, सो ऐसी आशका करना भी ठीक नहीं है ।।७९|| चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी हो दोनोके क्रिया औदयिकी ही होती है, इसलिये जब तक मोहनीयकी किसी एक प्रकृतिका उदय रहता है तबतक क्रियाका फल नियमसे बन्ध ही है ।।८०॥ यह कहना भी ठीक नही है कि कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव बुद्धिके दोषसे बन्ध फलवाली क्रियाको यह जानकर ही ८ ५८ श्रावकाचार-सग्रह यत प्रज्ञाविनाभूतमस्ति सम्यग्विशेषणम् । तस्याश्चाभावतो नूनं कुतस्त्या दिव्यता दृश ॥८२ नैवं यत सुसिद्धं प्रागस्ति चानिच्छित क्रिया । शुभायाश्चाशुभायाश्च को विशेषो विशेषभाक् ॥८३ नन्वनिष्टार्थसंयोगरूपा सानिच्छत किया। विशिष्टेष्टार्थसंयोगरूपा सानिच्छत कथम् ॥८४ तमिया सतरूपा स्यादर्थाशानिच्छत स्फुटम् । तस्या स्वतन्त्रसिद्धत्वात्सिद्धं कर्तृत्वमर्थसात् ॥८५ नैवं यथोऽस्त्यनिष्टार्थ सर्व कर्मोक्यात्मक । तस्मान्नाकाक्षतेऽज्ञानी यावत्कर्म च तत्फलम् ॥८६ यत्पुन फश्चिदिष्टार्थोऽनिष्टार्थः फश्विदर्थसात् । तत्सर्व दृष्टिदोषत्वात्पीतशवावलोकवत् ॥८७ दृग्मोहस्यात्यये दृष्टिः साक्षाद्भतार्थदर्शिनी । तस्यानिष्टेस्त्यनिष्टार्थबुद्धि कर्मफलात्मके ॥८८ न चासिद्धमनिष्टत्व फर्मणस्तत्फलस्य च । सर्वतो दुखहेतुत्वाद् युक्तिस्वानुभवागमात् ॥८९ अनिष्टार्थफलत्वात्स्यावनिष्टार्या प्रतक्रिया । दुष्टकार्यानुरूपस्य हेतोदृष्टोपदेशवत् ॥९० अथासिद्ध स्वतन्त्रत्वं क्रियायाः कर्मण फलात् । ऋते फर्मोदयादतोस्तस्याश्वासम्भवो मत ॥९१ यावदक्षीणमोहस्य क्षीणमोहस्य चात्मन । यावत्यस्ति क्रिया नाम तावत्योदयिकी स्मृता ।।९२ पौरुषं न यथाफामं पुंस कर्मोचित प्रति । न परं पौरुषापेक्षो देवापेक्षा हि पौरुष ॥९३ करता है कि उसका फल मबन्ध है, क्योकि इसके सम्यक् विशेषण प्रज्ञाका (स्वानुभूतिका) अविना- भावी है उसके विना सम्यग्दर्शनमे दिव्यता कैसे आ सकती है ।।८१-८२॥ समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि यह पहले ही अच्छी तरह सिद्ध कर आये हैं कि विना इच्छाके ही सम्यग्दृष्टिके क्रिया होती है। फिर इसके शुभ क्रिया और अशुभ क्रियाको क्या विशेषता शेष रही अर्थात् कुछ भी नही ।।८।। शका-जो क्रिया अनिष्ट अर्थका सयोग करानेवाली है वह तो नही वाहनेवालेके भी हो जाती है किन्तु जो विशिष्ट और इष्ट पदार्थका सयोग रूप है वह नही चाहनेवालेके कैसे हो सकती है ? ॥८४॥ उदाहरणार्थ व्रतरूप जो समीचीन क्रिया है वह वास्तवमे विना चाहनेवाले पुरुषके नहीं होती। उसके करनेमे व्यक्ति स्वतन्त्र है इसलिए कोई उसका कर्ता है यह बात सिद्ध होती है ।।८५।। समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि कर्मके उदयरूप जो कुछ भी है वह सव अनिष्ट अर्थ है, इसलिये जितना कर्म और उसका फल है उसे ज्ञानी पुरुष नही चाहता है ॥८६॥ और प्रयोजनवश हमे जो कोई पदार्थ इष्टरूप और कोई पदार्थ अनिष्टरूप प्रतीत होता है सो यह सब दृष्टि दोषसे ही प्रतीत होता है । जैसे कोई दृष्टि दोषसे शुक्ल शखको पीला देखता है वैसे ही दृष्टि दोषसे पदार्थोमे इष्टानिष्ट कल्पना हुआ करती है ॥८७॥ किन्तु दर्शनमोहनीयका नाश हो जानेपर जो पदार्थ जैसा है उसे उसी रूपसे साक्षात् देखनेवाली दृष्टि हो जाती है । फिर उसकी अनिष्टरूप कर्मोंके फलमे अनिष्ट पदार्थरूप ही बुद्धि होती है ॥८८|| कर्म और उसका फल अनिष्टरूप है यह बात असिद्ध भी नहीं है, क्योकि कर्म और कर्मका फल सर्वथा दुखका कारण है इसलिये इनका अनिष्टरूप होना युक्ति, अनुभव और आगमसे सिद्ध है ।।८९।। जैसे दुष्ट उपदेशके समान जिस दुष्ट हेतुसे दुष्ट कार्यकी उत्पत्ति होती है वह दुष्ट ही कहा जाता है । वैसे ही व्रत क्रियाका फल अनिष्ट है इसलिये वह अनिष्टार्थ ही है ॥९०॥ यत क्रिया कर्मका फल है इसलिये उसे स्वतन्त्र मानना ठीक नहीं है, क्योकि कर्मोदयरूप हेतुके विना क्रियाकी उत्पत्ति होना असम्भव है ॥९१।। चाहे अक्षीणमोह आत्मा हो और चाहे क्षीणमोह इन दोनोंके जितनी भी क्रिया होती है वह सब औदयिकी ही मानी गयी है ॥९२।। जीवका पुरुषार्थ कर्मोदयके प्रति इच्छानुसार नहीं होता और वह केवल पुरुषार्थकी लाटीसहिता ५९ सिद्धो नि काक्षितो ज्ञानी कुर्वाणोऽप्युदितां क्रियाम् । निष्कामतः कृत कर्म न रागाय विरागिणाम् ॥९४ नाशक्य चास्ति नि काडक्ष सामान्योऽपि जन क्वचित् । हेतो कुतश्विदन्यत्र वर्शनातिशयादपि ९५ यतो नि काङ्किता नास्ति न्यायात्सद्दर्शन विना । नानिच्छास्त्यक्षजे सौख्ये तवत्यक्षमनिच्छतः ॥९६ तदत्यक्षसुख मोहान्मिथ्यादृष्टि स नेष्यति । दृग्मोहस्य तथा पाकशक्तेः सद्भावतोऽनिशम् ॥९७ उक्तो नि काड् क्षितो भावो गुणो सद्दर्शनस्य वै। अस्तु का नः क्षतिः प्राक् चेत्परोक्षाक्षमता मता ॥९८ अथ निर्विचिकित्साख्यो गुण संलक्ष्यते स य । सद्दर्शनगुणस्योच्चैर्गुणो युक्तिवादपि ॥९९ आत्मन्यात्मगुणोत्कर्षबुद्धया स्वात्मप्रशंसनात् । परत्राप्यपकर्षेषु बुद्धिर्विचिकित्सा स्मृता ॥१०० निष्क्रान्तो विचिकित्साया प्रोक्तो निविचिकित्सकः । गुण सद्दर्शनस्योच्र्वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा १०१ दुर्दैवाददुःखिते पुंसि तीवासाताघृणास्पदे । यन्नासूयापरं चेतः स्मृतो निर्विचिकित्सकः ॥१०२ नैतत्तन्मनस्यज्ञानमस्म्यह सम्पदा पदम् । नासावस्मत्समो दीनो वराको विपदा पदम् ॥१०३ प्रत्युत ज्ञानमेवैतत्तत्र कर्मविपाकजा । प्राणिन सदृशः सर्वे त्रसस्थावरयोनयः ॥१०४ यथा द्वावर्भको जातौ शूद्रिकायास्तथोवरात् । शबावभ्रान्तितस्तौ द्वौ कृतो भेदो भ्रमात्मना ॥१०५ अपेक्षासे होता हो सो बात नही है किन्तु वह (क्रिया) अवश्य ही दैवकी अपेक्षासे होता है ।।९३।। इससे सिद्ध हुआ कि ज्ञानी पुरुष कर्मोदय जन्य क्रियाको करता हुआ भी काक्षारहित है, क्योकि विरागियोका बिना इच्छाके किया हुआ कार्य रागके लिए नही होता ॥९४॥ यदि कोई ऐसी आशका करे कि सम्यग्दर्शन रूप अतिशयके बिना भी किसी अन्य कारणसे सामान्य जन भी कही- पर काक्षारहित हो जाता है सो ऐसी आशका करना भी ठीक नहीं है, क्योकि न्यायसे यह.बात सिद्ध है कि सम्यग्दर्शनके बिना नि काक्षित गुण नही हो सकता है। कारण कि जो अतीन्द्रिय सुखको नहीं चाहता उसकी इन्द्रियजन्य सुखमे अनिच्छा नही हो सकती ।।९५-९६।। उस अती- न्द्रिय सुखको मोहवश मिथ्याजीव नही चाहता, क्योकि उसके दर्शनमोहनीयकी पाकशक्ति सदैव उसी प्रकार पायी जाती है ॥९७|| इस प्रकार नि काक्षित भावका निर्देश किया जो नियमसे सम्यग्दर्शनका गुण है । यदि यह सम्यग्दर्शनके पहले होता है ऐसा माना जाय तो ऐसा माननेमे हमारी क्या हानि है क्योकि प्रत्येक बात परीक्षा करके ही मानी जाती है ॥९८॥ अब निर्वि- चिकित्सा नामका जो गुण है उसका लक्षण कहते हैं । यह युक्तिसे भी सम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट गुण सिद्ध होता है ॥९९|| अपनेमे अपने गुणोके उत्कर्षकी बुद्धिसे अपनी प्रशसा करना और दूसरो- के अपकर्षकी बुद्धि रखना विचिकित्सा मानी गयी है ॥१००|| जो इस प्रकारकी विचिकित्सासे रहित है वह सम्यग्दर्शनका सर्वोत्तम निर्विचिकित्सक नामक गुण कहा गया है। अब इसका लक्षण कहते हैं ॥१०१॥ यथा-जो पुरुष दुर्दैवके कारण दुःखित हो रहा है और तीव्र अमाताके कारण जो घृणास्पद है उसके विषयमे असूयारूप चित्तका नही होना ही निर्विचिकित्सक गुण माना गया है ॥१०२।। मनमे ऐसा अज्ञान नहीं होना चाहिये कि मैं सम्पत्तियोका घर हूँ और यह दीन गरीब विपत्तियोका घर है। यह हमारे समान नही हो सकता ॥१०३।। किन्तु इसके विपरीत मनमे ऐसा ज्ञान होना चाहिये कि कर्म विपाकसे जितने भी प्राणी त्रस और स्थावर योनि मे हैं वे सब समान हैं ।।१०४॥ जैसे शूद्रीके उदरसे दो बालक पैदा हुए। वे दोनो वास्तवमे शूद्र हैं । किन्तु ६० श्रावकाचार-सग्रह जले जवालवज्जीवे यावत्कर्माशुचि स्फुटम् । अहं ते चाविशेषाद्वा नूनं कर्ममलोमसा ॥१०६ अस्ति सद्दर्शनस्यासौ गुणो निविचिकित्सक । यतोऽवश्यं स तत्रास्ति तस्मादन्यत्र न क्वचित् ॥१०७ कर्मपर्यायमात्रेषु रागिण स कुतो गुणः । सद्विशेषेऽपि समोहाद द्वयोरेक्योपलब्धितः ।।१०८ इत्युक्तो युक्तिपूर्वोऽसौ गुणः सद्दर्शनस्प य । नाविवक्षोऽपि दोषाय विवक्षो न गुणाप्तये ॥१०९ अस्ति चामूढष्टिः सा सम्यग्दर्शनशालिनी । ययाऽलड्कृतमात्र सद्भाति सद्दर्शन नरि ॥११० अतत्त्वे तत्त्ववान मूढदृष्टि स्वलक्षाणात् । नास्ति सा यस्य जीवस्य विख्यात सोऽस्त्यमूढदृक् १११ भस्त्यसद्धेतुदृष्टान्तैमिथ्यार्थ साधितोऽपरे । नाप्यल तत्र मोहाय दृग्मोहस्योदयक्षते ॥११२ सूक्ष्मान्तरितदूरार्ये दर्शितेऽपि कुदृष्टिभि । नाल्पश्रुत समुह्येत किं पुनश्चेदबहुश्रुतः ॥११३ अर्थाभासेऽपि तत्रोच्चै सम्यग्दृष्टेर्न मूढता । स्थूलानन्तरितोपात्तमिथ्यार्थेऽस्य कुतो भ्रमः ॥११४ तद्यथा लौकिको रूढिरस्ति नाना विकल्पसात् । नि सारैराश्रिता पुभिरथानिष्टफलप्रदा ॥११५ अफला कुफला हेतुशून्या योगापहारिणी । दुस्त्याज्या लौकिकी रूढि कश्चिदुष्कर्मपाकत ॥११६ अदेवे देवबुद्धि स्थादधर्म धर्मधीरिह । अगुरौ गुरुवुद्धिर्या ख्याता देवविमूढता ॥११७ कुदेवाराधनां कुर्यादैहिकश्रेयसे कुधी । मृषालोकोपचारत्वावधेया लोकमूढता ॥११८ भ्रमात्मा उनमे भेद करने लगता है। वैसे ही प्रकृतमे जानना चाहिए ।।१०५।। जैसे जलमे काई होती है ठीक वैसे ही जीवमे जव तक अशुचि कर्म मौजूद है तब तक मैं और वे सब ससारी जीव सामान्यरूपसे कर्मोसे मैले हो रहे हैं ।।१०६।। यह निर्विचिकित्सा सम्यग्दर्शनका एक गुण है क्योकि वह सम्यग्दर्शनके होनेपर ही होता है उसके विना और किसीके नही होता ॥१०७॥ किन्तु जो केवल कर्मकी पर्यायोमे अनुराग करता है उसके वह गुण कैसे हो सकता है, क्योकि कर्मकृत्त पर्याय यद्यपि सत्से भिन्न है तो भी मिथ्यादृष्टि जीव मोहवश उन दोनोको एक समझ बैठा है ।।१०८। इस प्रकार युक्तिपूर्वक जो यह सम्यग्दर्शनका गुण कहा गया है उसकी यदि अविवक्षा कर दी जाय तो कोई दोष नही है और विवक्षित रहनेपर कोई लाभ नही है ॥१०९॥ वह अमूढ- दृष्टि सम्यग्दर्शनसे सुशोभित मानी गई है जिसके होनेपर इस जीवके सम्यग्दर्शन चमक उठता है ॥११०॥ अतत्त्वमे तत्त्वका श्रद्धान करना यह अपने लक्षणके अनुसार मूढदृष्टि है। यह जिस जीवके नही होती है वह अमूढदृष्टि कहलाता है ॥१११॥ दूसरे दर्शनवालोने मिथ्या हेतु और दृष्टान्तो द्वारा मिथ्या पदार्थकी सिद्धि की है वह मिथ्या पदार्थ सम्यग्दृष्टिके दर्शनमोहनीयका उदय नही रहनेसे मोह पैदा करनेके लिये समर्थ नही होता ॥११२।। मिथ्यादृष्टियोके द्वारा सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थोके दिखलाये जानेपर भी उनमे अल्पश्रुत ही जब मोहित नही होता तब जो बहुश्रुत है वह मोहित ही कैसे होगा ॥११३।। इस प्रकार इन सूक्ष्म आदि अर्थाभासोमे भी जब सम्यग्दृष्टिके मूढता नही होती तब फिर स्थूल, समीपवर्ती और उपात्त मिथ्या अर्थोमे इसे कैसे भ्रम हो सकता है ॥११४॥ उदाहरणार्थ-लोकिकी रूढि नाना प्रकारकी है, जिसे नि सार पुरुषोने आश्रय दे रखा है, जिसका फल अनिष्ट है ॥११५|| जो निष्फल है, खोटे फलवाली है, जिसकी पुष्टिमे कोई समुचित हेतु नही मिलता और जो निरर्थक है तो भी कितने ही पुरुष खोटे कर्मके उदयसे उस लौकिकी रूढिको छोडनेमे कठिनताका अनुभव करते है ॥११६॥ जीवके जो अदेवमे देवबुद्धि, अधर्ममे धर्मबुद्धि और अगुरुमे गुरुबुद्धि होती है वह देवविमूढता कही जाती है ।।११७।। मिथ्यादृष्टि जीव ऐहिक सुखके लिये कुदेवकी आराधना करता है । यह झूठा लोकाचार लाटीसंहिता अस्ति श्रद्धानमेकेषां लोकरूढिवशादिह । धनधान्यप्रदा नूनं सम्यगाराधिताम्बिका ॥११९ अपरेऽपि यथाकामं देवानिच्छन्ति दुधिय । सदोषानपि निर्दोषानिव प्रज्ञापराधत ॥१२० नोक्तस्तेषां समुद्देशः प्रसङ्गादपि सङ्गत । लब्धवर्णो न कुर्यादवै निस्सारं ग्रन्थविस्तरम् ॥१२१ अधर्मस्तु कुदेवाना यावानाराधनोद्यमः । तै प्रणोतेषु धर्मेषु चेष्टा वाक्कायचेतसाम् ॥१२२ कुगुरु कुत्सिताचार. सशल्य सपरिग्रह । सम्यक्त्वेन व्रतेनापि युक्तः स्यात्सद्गुरुयंत ॥१२३ अत्रोद्देशोऽपि न श्रेयान्सर्वतोऽतीव विस्तरात् । आदेयो विधिरत्रोक्तो नादेयोऽनुक्त एव स ॥१२४ दोषो रागादिचिद्भाव स्यावावरणं च कर्म तत् । तयोरभावोऽस्ति निःशेषो यत्रासौ देव उच्यते १२५ अस्त्यत्र केवलं ज्ञानं क्षायिकं दर्शनं सुखम् । वीयं चेति सुविख्यातं स्यादनन्तचतुष्टयम् ॥१२६ एको देवः स सामान्याद् द्विधाऽवस्थाविशेषत । संख्यधा नामसंदर्भाद् गुणेभ्य स्यादनन्तधा ॥१२७ एको देव स द्रव्यात्सिद्ध शुद्धोपलब्धितः । अर्हनिति च सिद्धश्च पर्यायार्थाद्विधा मतः ॥१२८ दिव्यौदारिकदेहस्थो धौतघातिचतुष्टयः । ज्ञानहग्वीर्यसौख्याढ्य सोऽर्हन् धर्मोपदेशक ॥१२९ मूर्तिमद्देहनिर्मुक्तो लोको लोकानसंस्थितः । ज्ञानाधष्टगुणोपेतो निष्कर्मा सिद्धसंज्ञकः ॥१३० अर्हनिति जगत्पूज्यो जिनः कर्मारिशातनात् । महादेवोऽधिवेवत्वाच्छङ्करोऽभिसुखावहात् ॥१३१ है अतः लोकमूढता अकल्याणकारी मानी गई है ॥११८|| लोकमूढतावश किन्ही पुरुषोका ऐसा श्रद्धान है कि अम्बिकाकी अच्छी तरह आराधना करनेपर वह धन-धान्य देती है ।।११९।। इसी तरह अन्य मिथ्यादृष्टि जीव भी अज्ञानवश सदोष देवोको भी निर्दोष देवोंके समान इच्छानुसार मानते है ॥१२०।। प्रसगानुसार सुसगत होते हुए भी उनका निर्देश यहाँपर नही किया है, क्योकि जिसे चार अक्षरका ज्ञान है वह निष्प्रयोजन ग्रन्थका विस्तार नहीं करता ॥१२॥ कुदेवोको आराधनाके लिये जितना भी उद्यम है वह और उनके द्वारा कहे गये धर्ममे वचन, काय और मनकी प्रवृत्ति यह सब अधर्म है ॥१२२।। जिसका आचार कुत्सित है जो शल्य और परिग्रह सहित है वह कुगुरु है, क्योकि सद्गुरु सम्यक्त्व और व्रत इन दोनोसे युक्त होता है ॥१२३।। इस विषयमे भी अत्यन्त विस्तारसे लिखना सर्वथा उचित नहीं है, क्योकि जो विधि आदेय है वही यहाँ कही गयी है और जो अनादेय है वह कही ही नहो गयी है ॥१२४॥ रागादिका पाया जाना यह दोष है और ज्ञानावरणादि ये कर्म हैं जिनके इन दोनोका सर्वथा अभाव हो गया है वह देव कहा जाता है ॥१२५।। उसके केवलज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक सुख और क्षायिक वीर्य यह सुविख्यात अनन्तचतुष्टय होता है ॥१२६।। द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षा वह देव एक है, अवस्था विशेषकी अपेक्षा दो प्रकारका है, सज्ञावाचक शब्दोकी अपेक्षा संख्यात प्रकार है और गुणोंकी अपेक्षा अनन्त प्रकारका है ॥१२७॥ शुद्धोपलब्धिरूप द्रव्याथिकनयकी अपेक्षासे वह देव एक प्रकारका माना गया है और पर्यायाथिकनयकी अपेक्षासे अरहन्त और सिद्ध इस तरह दो प्रकारका माना गया है ॥१२८॥ जो दिव्य औदारिक देहमे स्थित है, चारो घातिया कर्मोंसे रहित है, मान- दर्शन, वीर्य और सुखसे परिपूर्ण है और धर्मका उपदेश देनेवाला है वह अरहन्तदेव है ॥१२९।। जो मूर्तशरीरसे रहित है, सम्पूर्ण चर और अचर पदार्थोंको युगपत् जानने और देखनेवाला है, लोकके अग्रभागमे स्थित है, ज्ञानादि आठ गुण सहित है और ज्ञानावरणादिक आठ कर्मोंसे रहित है वह सिद्ध देव है ॥१३०॥ यह देव जगत् पूज्य है इसलिए अर्हत् कहलाता है, फर्मरूपी शत्रुओका नाश कर दिया ६२ श्रावकाचार-संग्रह विष्णुर्ज्ञानेन सर्वार्थ विस्तृतत्वात्कथश्चन । बह्मा बह्मजरूपत्वाद्धरिर्दु खापनोदनात् ॥१३२ इत्याद्यनेकनामापि नानेकोऽस्ति स्वलक्षणात् । यतोऽनन्तगुणात्मैकद्रव्यं स्यात्सिद्धसाधनात् ॥१३३ चतुर्विशतिरित्यादियावदन्तमनन्तता। तहत्वं न दोषाय देवत्वैकविवस्वत ॥१३४ प्रदीपानामनेकत्वं न प्रवीपत्वहानये । यतोऽत्रेकविधत्वं स्यान्न स्यानानाप्रकारत ॥१३५ न चाऽऽशक्यं यथासंख्य नामतोऽप्यस्त्वनेकधा । न्यायादेकगुणं चैक प्रत्येकं नाम चैककम् ॥१३६ नामतः सर्वतो मुल्यं सख्यातस्यैव सम्भवात् । अधिकस्य ततो वाचा व्यवहारस्य दर्शनात् ॥१३७ वृद्ध प्रोक्तमत सूत्रे तत्त्व वागतिवति यत् । द्वावशाङ्गागवाह्यं च श्रुतं स्थूलार्थगोचरम् ॥१३८ कृत्स्नकर्मक्षयाज्ञान क्षायिक दर्शनं पुन: । अत्यक्ष सुखमामोत्यं वीर्य चेति चतुष्टयम् ॥१३९ सम्यक्त्वं चैव सूक्ष्मत्वमध्याबाधगुण स्वतः । अस्त्यगुरुलघुत्व ध सिद्धे चाष्टगुणा स्मृताः ॥१४० इत्याधनन्तधर्माढच. कर्माष्टकविवर्जितः । मुक्तोऽष्टादशभिर्दोषैर्देवः सेव्यो न चेतर ॥१४१ अर्थाद्गुरु स एवास्ति श्रेयोमार्गोपदेशक । भगवास्तु यत साक्षान्ता मोक्षस्य वमन ॥१४२ तेभ्योऽर्वागपि छप्रस्थरूपा तद्रूपधारिणः । गुरव स्युगुरोन्यायान्यापोऽवस्थाविशेषभाक् ॥१४३ - है इसलिए जिन कहलाता है, सब देव इससे नीचे हैं इसलिए महादेव कहलाता है, सुख देनेवाला है इसलिए शकर कहलाता है ॥१३१।। ज्ञान द्वारा कथचित् सब पदार्थोंमे व्याप रहा है इसलिए विष्णु कहलाता है, ब्रह्मके स्वरूपका ज्ञाता है इसलिए ब्रह्मा कहलाता है और दुखोका हरण करनेवाला है इसलिए हरि कहलाता है ॥१३२।। इस प्रकार यद्यपि इसके अनेक नाम हैं तथापि वह अपने लक्षणकी अपेक्षा अनेक नही है, क्योकि वह साधनोसे भले प्रकार सिद्ध अनन्तगुणात्मक एक ही द्रव्य है ॥१३३॥ यद्यपि चौबीस तीर्थंकरोसे लेकर अन्ततक विचार करनेपर व्यक्ति रूपसे देव अनन्त हैं तथापि वह देवोका बहुत्व दोषाधायक नही है, क्योकि इन सबमे एक प्रकारका ही देवत्व पाया जाता है ॥१३४॥ जिस प्रकार दीपक अनेक हैं तो भी उससे प्रदीप सामान्यकी हानि नही होती, क्योकि जितने भी दीपक होते हैं वे सब एक ही प्रकारके पाये जाते हैं नाना प्रकारके नही। उसी प्रकार व्यक्ति रूपसे देवोके अनेक होनेपर भी कोई हानि नहीं है, क्योकि देवत्व सामान्यकी अपेक्षा सब देव एक है ॥१३५।। यदि कोई ऐसी आशका करे कि नामकी अपेक्षा क्रमसे देवके अनन्त भेद रहे आवें, क्योकि न्यायानुसार एक एक गुणकी अपेक्षा एक एक नाम रखा जा सकता है सो ऐसी आशका करना भी ठीक नहीं है, क्योकि इस प्रकार नामकी अपेक्षा देवके मुख्य रूपसे सख्यात भेद ही सम्भव हैं, क्योकि वचन व्यवहार इससे अधिक नही दिखाई देता है ॥१३६-१३७|| इसीसे पूर्वाचार्योने सूत्रमे यह कहा है कि तत्त्व वचनके अगोचर है और बारह अग तथा अग बाह्यरूप श्रुत स्थूल अर्थको विषय करता है ॥१३८॥ सम्पूर्ण कर्मोके क्षयसे सिद्धके ये आठ गुण होते हैक्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, अतीन्द्रिय सुख और आत्मास उत्पन्न होनेवाला वीर्य-ये चार अनन्त चतुष्टय होते हैं।।१३९।। इनके सिवाय सम्यक्त्व, सूक्ष्मत्व, अव्यावाध और अगुरुलघु ये चार गुण और होते हैं ॥१४०।। इस प्रकार जो ज्ञानादि अनन्त धर्मोसे काँसे रहित है, मुक्त है और अठारह दोषोंसे रहित है वही देव सेवनीय है अन्य नही ।।१४।। वास्तवमें वहीं देव सच्चा गुरु है, वही मोक्ष मार्गका उपदेशक है, वही भगवान् है और वही मोक्ष मार्गका साक्षात् नेता है ॥१४२।। इन अरहत और सिद्धोंसे नीचे भी जो अल्पज्ञ है और उसी रूप अर्थात् दिगम्बरत्व, वीतरागत्व और हितोपदेशित्वको धारण करनेवाले हैं वे गुरु हैं, क्योकि इनमें युक्त है, आठ ६३ लाटीसहिता अस्त्यवस्थाविशेषोऽत्र युक्तिस्वानुभवागमात् । शेषसंसारिजीवेभ्यस्तेषामेवातिशायनात् ॥१४४ भाविनगमनयायत्तो भूष्णुस्तद्वानिवेष्यते । अवश्य भावतो व्याप्ते सद्भावात्सिद्धसाधनात् ॥१४५ अस्ति सद्दर्शन तेषु मिथ्याकर्मोपशान्तित । चारित्रं देशतः सम्यक् चारित्रावरणक्षते. ॥१४६ तत सिद्धं निसर्गाद्वै शुद्धत्वं हेतुदर्शनात् । मोहकर्मोदयाभावात् तत्कार्यस्याप्यसम्भवात् ॥१४७ तच्छुद्धत्व सुविख्यातनिर्जराहेतुरखसा । निदानं संवरस्यापि क्रमानिर्वाणभागपि ॥१४८ यद्वा स्वयं तदेवार्थानिर्जरादित्रयं यतः । शुद्धभावाविनाभावि द्रव्यनामापि तत्त्रयम् ॥१४९ निर्जरादिनिदानं य शुद्धो भावश्चिदात्मकः । परमार्ह स एवास्ति तद्वानात्मा परं गुरुः ॥१५० न्यायाद्गुरुत्वहेतु स्यात्केवलं दोषसक्षय । निर्दोषो जगतः साक्षी नेता मार्गस्य नेतर ॥१५१ नालं छास्थताप्येषा गुरुत्वक्षतये मुने । रागाधशुखभावानां हेतुर्मोहैककर्म तत् ॥१५२ नन्वावृत्तिद्वयं कम वीर्यविध्वंसि कर्म तत् । अस्ति तत्राप्यवश्य कुत शुद्धत्वमत्र चेत् ॥१५३ सत्यं किन्तु विशेषोऽस्ति प्रोक्तकमंत्रयस्य च । मोहकर्माविनाभूतं वन्धसत्त्वोदयक्षयम् ॥१५४ तद्यथा बध्यमानेऽस्मिन् तद्वन्धो मोहबन्धसात् । तत्सत्त्वे सत्त्वमेतस्य पाके पाक क्षये क्षय ॥१५५ न्यायानुसार गुरुका लक्षण पाया जाता है। ये उनसे भिन्न और कोई दूसरी अवस्थाको धारण करनेवाले नही हैं ।।१४३।। इनमे अवस्था विशेष पाई जाती है यह बात युक्ति, आगम और अनुभवसे सिद्ध है, क्योकि उनमे शेष ससारी जीवोसे कोई विशेष अतिशय देखा जाता है ॥१४४॥ भावि नैगमनयकी अपेक्षासे जो होनेवाला है वह उस पर्यायसे युक्तकी तरह कहा जाता है, क्योकि उसमे नियमसे भावकी व्याप्ति पाई जाती है इसलिए ऐसा कहना युक्तियुक्त है ।।१४५।। उनमे दर्शनमोहनीय कर्मकी उपशान्ति (उपशम, क्षय, क्षयोपशम) हो जानेसे सम्यग्दर्शन भी पाया जाता है और चारित्रावरण कर्मका एकदेश क्षय (क्षयोपशम) हो जानेसे सम्यक्चारित्र भी पाया जाता है ॥१४६॥ इसलिए उनमे स्वभावसे ही शुद्धता सिद्ध होती है और इसकी पुष्टि करनेवाला हेतु भी पाया जाता है। यत उनके मोहनीय कर्मका उदय नही है अतः वहाँ मोहनीय कर्मका कार्य भी नही पाया जाता है ॥१४७।। उनकी यह शुद्धता नियमसे निर्जराका कारण है, सवरका कारण है और क्रमसे मोक्ष दिलानेवाली है यह बात सुप्रसिद्ध है ।।१४८॥ अथवा वह शुद्धता ही नियमसे स्वय निर्जरा आदि तीन रूप है, क्योकि शुद्ध भावोसे अविनाभाव रखनेवाला द्रव्य इन तीन रूप ही होता है ॥१४९॥ आशय यह है कि आत्माका जो शुद्ध भाव निर्जरा आदिका कारण है वही परमपूज्य है और उससे युक्त आत्मा ही परम गुरु है ॥१५०॥ न्यायानुसार गुरुपनेका कारण केवल दोषोका नाश हो जाना ही है । जो निर्दोष है वही जगत्का साक्षी है और वही मोक्षमार्ग का नेता है अन्य नही ॥१५१॥ मुनिकी यह छद्मस्थता भी गुरुपनेका नाश करनेके लिए समर्थ नही है, क्योकि रागादि अशुद्ध भावोका कारण एक मोह कर्म माना गया है ।।१५२॥ शका- छद्मस्थ गुरुओमे दोनो आवरण कर्म और वीर्यका नाश करनेवाला अन्तरायकर्म नियमसे है इसलिए उनमे शुद्धता कैसे हो सकती है ? ॥१५३|| समाधान-यह बात ठीक है किन्तु इतनी विशेषता है कि उक्त तीनो कर्मोका बन्ध, सत्त्व, उदय और क्षय मोहनीय कर्मके साथ अविनाभावी है ॥१५४॥ खुलासा इस प्रकार है कि मोहनीय- का बन्ध होनेपर उसके साथ साथ ज्ञानावरणादि कर्मोका बन्ध होता है। मोहनीयका सत्त्व रहते हुए इनका सत्त्व रहता है, मोहनीयका पाक होते समय इनका पाक होता है और मोहनीयका क्षय ६४ श्रावकाचार-संग्रह नोह्य छप्रस्थावस्थायाम गेवास्तु तत्काय' । अंशान्मोहक्षयस्यांशात्सर्वत सर्वत धाय ॥१५६ नासिद्धं निर्जरा तत्त्व सदृष्टेः कृत्स्नकर्मणाम् । आग्मोहोदयाभावात्तच्चासत्यगुणा क्रमात् ॥१५७ ततः कर्मप्रय प्रोक्तमस्ति यद्यपि सांप्रतम् । रागद्वेषविमोहानामभावाद गुरुता मता ॥१५८ अथाऽस्त्येकः स सामान्यात्सद्विशेषास्त्रिधा मतः। एकोऽप्यग्निर्यथा तार्ण्य पार्यो दाय॑स्त्रिघोच्यते १५९ आचार्य स्यादुपाध्याय. साधुश्चेति त्रिधा गति । स्युविशिष्टपदारूढास्त्रयोऽपि मुनिकुञ्जरा ॥१६० एको हेतुः क्रियाऽप्येका विषश्चैको बहिः समः । तपो द्वादशधा चैक व्रतं चैक च पञ्चधा ॥१६१ प्रयोवशविघं चैक चारित्र समतैकघा । भूलोतरगुणाश्चैको सयमोऽप्येकधा मत ॥१६२ परीषहोपसर्गाणा सहन च सम स्मृतम् । आहारादिविषिश्चैकश्चर्यास्थानासनादय ॥१६३ मार्गो मोक्षास्य सदृष्टिः ज्ञानं चारित्रमात्मन । रत्नत्रय समं तेषामपि चान्तर्बहिस्थितम् ॥१६४ ध्याता ध्यानं च ध्येयश्च ज्ञाता ज्ञानं च ज्ञेयसात् । चतुर्विधाराधनापि तुल्या क्रोधादिजिष्णुता ॥१६५ किंवात्र बहुनोक्तेन तद्विशेषोऽवशिष्यते । विशेषाच्छेषनि शेषो न्यायावस्त्यविशेषभाक् ॥१६६ आचार्योनादितो दोगादपि निरुच्यते । पञ्चाचार परेभ्य स आचारयति संयमी ॥१६७ अपि छिन्ने वते साधो पुनः सन्धानमिच्छतः । तत्समादेशदानेन प्रायश्चित्त प्रयच्छति ॥१६८ होने पर इनका क्षय होता है ।।१५५।। यदि कोई ऐसी आशका करे कि छद्मस्थ अवस्थामे ज्ञाना- वरणादि कर्मोका क्षय होनेके पहले ही मोहनीयका क्षय हो जाता है सो ऐसी आशका करना भी ठीक नहीं है, क्योकि मोहनीयका एकदेश क्षय होनेसे इनका एकदेश क्षय होता है और मोहनीय- का सर्वथा क्षय होनेसे इनका भी सर्वथा क्षय हो जाता है ॥१५६|| सम्यग्दृष्टिके समस्त कर्मोंकी निर्जरा होती है यह वात असिद्ध भी नहीं है, क्योकि दर्शनमोहनीयके उदयका अभाव होनेपर वहाँसे लेकर वह उत्तरोत्तर असख्यात गुणी होने लगती है ।।१५७। इसलिये छद्मस्थ गुरुओके यद्यपिवर्तमान मे तीनो कर्मोका सद्भाव कहा गया है । तथापि राग, द्वेष और मोहका हो अभाव हो जानेसे उनमे गुरुपना माना गया है ॥१५८॥ वह गुरु सामान्य रूपसे एक प्रकारका और अवस्था विशेषकी अपेक्षा- से तीन प्रकारका माना गया है। जैसे अग्नि यद्यपि एक ही है तो भी वह तिनकेकी अग्नि, पत्तेकी अग्नि और लकडीकी अग्नि इस तरह तीन प्रकारकी कही जाती है। वैसे ही प्रकृतमे जानना चाहिये ॥१५९॥ इनके ये भेद आचार्य, उपाध्याय और साधु ये तीन हैं। ये तीनो ही मुनिकुजर यद्यपि अपने अपने विशेष पद पर स्थित हैं ॥१६०॥ तथापि इनके मुनि होनेका कारण एक है, क्रिया एक है, बाह्य वेष एक सा है, बारह प्रकारका तप एक सा है, पाँच प्रकारका व्रत एक सा है; तेरह प्रकारका चारित्र एक सा है, समता एक सी है, मूल और उत्तर गुण भी एकसे है, सयम भी एक सा है, परीषह और उपसर्गोका सहन करना भी एक सा है, आहार आदिको विधि भी एक सी है, चर्या, स्थान और नासन आदि भी एकसे है; मोक्षका मार्ग जो सम्यग्दर्शन और सम्परज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप आत्मीक रत्नत्रय है वह भी उनके भीतर और बारह समान है। इसी प्रकार ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार प्रकारकी आराधनाएँ और क्रोधादिकका जीतना ये भी समान हैं ॥१६१-१६५}} इस विषयमे बहुत कहां तक कहे । उनका जो कुछ विशेष है वही कहना बाकी है, क्योकि विशेष रूपसे जो भी शेष रह जाता है वह न्यायानुसार अविशेष (समान) कहलाता है ॥१६६।। अनादिकालीन रूढि और निरुक्त्यर्थ इन दोनोकी अपेक्षासे आचार्य शब्दका यह अर्थ लिया जाता है कि जो सयमी दूसरोसे पांच आचारका आचरण कराता है वह आचार्य है ॥१६७। तथा व्रतभग होने पर फिरसे उस व्रतको जोडनेकी इच्छा करनेवाले साधुको जो आदेश लाटीसंहिता ६५ आदेशस्योपदेशेभ्यः स्याद्विशेष स भवभाक् । आवत्ते गुरुणा दत्तं नोपदेशेष्वयं विधि ॥१६९ न निषिद्वस्तदादेशो गृहिणां व्रतधारिणाम् । दीक्षाचार्येण दीक्षेव दीयमानास्ति तक्रिया ॥१७० स निषिद्धो यथाम्नायाववतिनां मनागपि । हिंसकश्योपदेशोऽपि नोपयुज्योऽत्र कारणात् ॥१७१ मुनिव्रतधराणां वा गृहस्थव्रतधारिणाम् । आवेशश्वोपदेशो वा न कर्तव्यो बधाश्रितः ॥१७२ न चाऽऽशक्यं प्रसिद्ध यन्मुनिभिर्वतधारिभि । मूत्तिमच्छक्तिसर्वस्वं हस्तरेखेव वशितम् ॥१७३ नूनं प्रोक्तोपदेशोऽपि न रागाय विरागिणाम् । रागिणामेव रागाय ततोऽवश्यं स वर्जितः ॥१७४ न निषिद्ध स आदेशो नोपदेशो निषेधितः । नूनं सत्पात्रदानेषु पूजायामहंतामपि ॥१७५ यद्वाऽऽदेशोपदेशौ स्तो द्वौ तौ निरवद्यकर्मणि । यत्र सावधलेशोऽपि तत्राऽऽदेशो न जातुचित् ॥१७६ सहासंयमिभिर्लोक संसर्ग भाषणं रतिम् । कुर्यादाचार्य इत्येकेनासौ सूरिन चाहंतः ॥१७७ सङ्घसम्पोषक सूरि प्रोक्त कैश्विन्मतेरिह । धर्मावशोपदेशाम्यां नोपकारोऽपरोऽस्त्यतः ॥१७८ यद्वा मोहात्प्रमावाद्वा कुर्याधो लौकिकी क्रियाम् । तावत्कालं स नाचार्योऽप्यस्ति चान्तर्वताच्युतः ॥१७९ इत्युक्तवततपशीलसयमादिधरो गणी । नमस्य स गुरु साक्षात्तदन्यो न गुरुर्गणी ॥१८० द्वारा प्रायश्चित्त देता है वह आचार्य है ॥१६८।। उपदेशोसे आदेशमे पार्थक्य दिखलाने वाला यह अन्तर है कि आदेशमे 'मै गुरुके द्वारा दिये गये व्रतको स्वीकार करता हूँ' यह विधि मुख्य रहती है किन्तु उपदेशोमे यह विधि मुख्य नही रहती ॥१६९।। व्रतधारी गृहस्थोके लिये भी आचार्यका आदेश करना निषिद्ध नहीं है, क्योकि दीक्षाचार्यके द्वारा दी गयी दीक्षाके समान ही वह आदेशविधि मानी गई है ॥१७०॥ किन्तु जो अन्नती है, उनके लिए आगमकी परिपाटीके अनुसार थोडा भी आदेश करना निषिद्ध है और इसी प्रकार कारणवश हिंसाकारी उपदेश करना भी उपयुक्त नही है ॥१७१।। चाहे मुनिव्रतधारी हो चाहे गृहस्थव्रतधारी हो इन दोनोके लिये हिंसाका अवलम्बन करनेवाला आदेश और उपदेश नही करना चाहिये ॥१७२।। जो यह प्रसिद्ध है कि व्रतधारी मुनि मूर्तिमान पदार्थोंकी समस्त शक्तियोंको हस्तरेखाके समान दिखला देते हैं इसलिये उक्त उपदेश और आदेश उनका कुछ भी बिगाड नही कर सकता सो ऐसी आशका करना भी ठीक नही है, क्योकि यद्यपि पूर्वोक्त उपदेश विरागियोके लिए रागका कारण नही है तो भी जो रागी हैं उनके लिये वह रागका कारण अवश्य है इसलिये उसका निषेध किया गया है ।।१७३-१७४|| किन्तु सत्पात्रोके लिये दान और अरहन्तोकी पूजा इन कार्योंमे न तो वह आदेश ही निषिद्ध है और न वह उपदेश ही निषिद्ध है ॥१७५॥ अथवा आदेश और उपदेश ये दोनो ही निषिद्ध कार्योंके विषयमे उचित माने गये है, क्योकि जिस कार्यमे सावद्यका लेशमात्र भी हो उस कार्यका आदेश करना कभी भी उचित नही है ॥१७६।। कितने ही आचार्योंका मत है कि आचार्य असयमी पुरुषोके साथ सम्बन्ध, भाषण और प्रीति कर सकता है परन्तु उनका ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योकि ऐसा करनेवाला न तो आचार्य ही हो सकता है और न अरहन्तके मतका अनुयायी ही हो सकता है ॥१७७|| जो सघका पालन-पोषण करता है वह आचार्य है ऐसा किन्ही अन्य लोगोने ही अपनी मतिसे कहा है अत यही निश्चय होता है कि धर्मका आदेश और उपदेशके सिवाय आचार्यका और कोई उपकार नही है ॥१७८॥ अथवा मोहवश या प्रमाद वश होकर जो लौकिकी क्रियाको करता है वह उतने काल तक आचार्य नही रहता इतना ही नही किन्तु तब वह अन्तरगमे व्रतोसे च्युत हो जाता है ।।१७९॥ इस प्रकार पूर्वोक्त व्रत, तप, शोल और संयम आदिको धारण करने- ९ ६६ श्रावकाचार-संग्रह उपाध्याय स साध्वीयान् वावी स्याद्वादकोविद । वाग्मी वाग्ब्रह्मसर्वज्ञ. सिद्धान्तागमपारग ॥१८१ कवि प्रत्यग्रसूत्राणां शब्दार्थ सिद्धसाधनात् । गमकोऽर्थस्य माधुर्ये धुर्यो वक्तृत्ववर्त्मनाम् ॥१८२ उपाध्यायत्वमित्यत्र श्रुताभ्यासोऽस्ति कारणम् । यदध्येति स्वयं चापि शिष्यानध्यापयेद्गुरु. ॥१८३ शेषस्तत्र व्रतादीनां सर्वसाधारणो विधि. । कुर्याद्धर्मोपदेशं स नादेशं सूरिवत्वचित् ।।१८४ तेषामेवाश्रमं लिङ्ग सूरीणां संयमं तप । आश्रयेत् शुद्धचारित्रं पञ्चाचारं स शुद्धधी ॥१८५ मूलोत्तरगुणानेव यथोक्तानाचरेच्चिरम् । परीषहोपसर्गाणा विजयो स भवेद् ध्रुवम् ॥१८६ अत्रातिविस्तरेणालं नूनमन्तर्बहिर्मुनेः । शुद्धवेषधरो धीरो निम्रन्य' स गणाग्रणी ॥१८७ उपाध्याय समाख्यातो विख्यातोऽस्ति स्वलक्षणे । अधुना साध्यते साघोर्लक्षणं सिद्धमागमात् ॥१८८ मार्ग मोक्षस्य चारित्रं सहजप्तिपुरस्सरम् । साधयत्यात्मसिद्धयर्थ साधुरन्धर्थसंजक. ॥१८९ नोचे वाचंयमी किश्चिद्धस्तपादाविसज्ञया । न किञ्चिद्दर्शयत्स्वस्थो मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥१९० भास्ते स शुद्धमात्मानमास्तिघ्नुवानश्च परम् । स्तिमितान्तर्बहिर्जल्पो निस्तरङ्गाब्धिवन्मुनि ॥१९१ नावेशं नोपदेश वा नादिशेत्स मनागपि । स्वर्गापवर्गमार्गस्य तद्विपक्षस्य किं पुन ॥१९२ वैराग्यस्य परां काष्ठामधिरूढोऽधिकप्रभ । दिगम्बरो यथाजातरूपधारी दयापर ॥१९३ वाला आचार्य ही नमस्कार करने योग्य है और वही साक्षात् गुरु है। इससे भिन्न स्वरूपका धारण करनेवाला न तो गुरु ही हो सकता है और न आचार्य ही हो सकता है ।।१८०॥ समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वाद विद्याका जानकार, वाग्मी, वचन ब्रह्ममे पारगत, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति तथा मुख्य सूत्रोका शब्द और अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला होनेसे कवि, अर्थको मधुरताका ज्ञान करनेवाला और वक्तृत्व कलामे अग्रणी उपाध्याय होता है ।।१८१-१८२।। उपाध्याय होनेमे मुख्य कारण श्रुतका अभ्यास है। जो स्वय पढता है और शिष्योको पढाता है वह उपाध्याय है ॥१८३|| उपाध्यायका व्रतादिक सम्बन्धी शेष सब विधि मुनियोंके समान होतो है । यह धर्मका उपदेश कर सकता है किन्तु आचार्यके समान किसीको आदेश नहीं कर सकता ॥१८४॥ शुद्ध बुद्धि वाला वह उन्ही आचार्योंके आश्रममे रहता है। उन्हीके संयम, तप, शुद्ध चारित्र और पचाचारका पालन करता है ॥१८५।। वह चिरकालतक शास्त्रोक्त विधिसे मूल- गुणो और उत्तरगुणोका पालन करता है। परोषह और उपसर्गोको जीतनेवाला होता है तथा जितेन्द्रिय होता है ।।१८६।। यहाँपर अधिक विस्तार करना व्यर्थ है किन्तु इतना ही कहना पर्याप्त है कि वह अन्तरंग और बहिरग दोनो प्रकारसे मुनिके शुद्ध वेषको धारण करनेवाला, बुद्धिमान, निर्ग्रन्थ और गणमे प्रधान होता है ||१८७।। इस प्रकार अपने लक्षणोसे प्रसिद्ध उपाध्यायका स्वरूप कहा । अब साधुके लक्षणका विचार करते हैं जो कि आगममे भलीभांति सिद्ध है ॥१८॥ मोक्षका मार्ग सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान पूर्वक सम्यक्चारित्र है। जो आत्मसिद्धिके लिए इसका साधन करता है वह साधु है। यह इसका सार्थक नाम है ॥१८९।। यह साधु स्वस्थ रहता है इसलिए न तो कुछ कहता है, न हाथ पैर दिसे किसी प्रकारका इशारा करता है और न मनसे ही कुछ विचार करता है ।।१९०॥ किन्तु वह मुनि केवल शुद्ध आत्मामे लीन रहता है, अन्तरंग और बहिरग जल्पसे रहित हो जाता है और तरग रहित समुद्रके समान शान्त रहता है ॥१९१॥ वह स्वर्ग और मोक्षके मार्गका थोडा भी न तो आदेश करता है और न उपदेश हो करता है फिर विपक्षका तो कर ही कैसे सकता है ।।१९२॥ वैराग्यकी चरम सीमाको प्राप्त, अधिक प्रभावान्, - लाटीसंहिता ६७ निर्ग्रन्थोऽन्तर्बहिर्मोहग्रन्थेरुद्ग्रन्थको यमी । कर्मनिर्जरकः श्रेण्या तपस्वी स तपः शुचिः ॥१९४ परीषहोपसर्गाद्यैरजय्यो जितमन्मथ । एषणाशुद्धिसंशुद्ध प्रत्याख्यानपरायण ॥१९५ इत्याद्यनेकधाऽनेकै साधु साधुगुणे श्रितः । नमस्य श्रेयसेऽवश्यं नेतरो विदुषां महान् ॥१९६ एव मुनित्रयी ख्याता महती महतामपि । तद्विशुद्धि विशेषोऽस्ति क्रमात्तरतमात्मक ॥१९७ तत्राचार्य प्रसिद्धोऽस्ति दीक्षादेशाद्गुणाग्रणी । न्यायाद्वा देशनोऽध्यक्षात् सिद्धः स्वात्मन्यतत्पर ॥१९८ अर्थानातत्परोऽप्येष दृग्मोहानुदयात्सत । अस्ति तेनाविनाभूतशुद्धात्मानुभव स्फुटम् ॥१९९ अप्यस्ति देशतस्तत्र चारित्रावरणक्षति । वाक्यार्थात् केवल न स्यात्क्षतिर्वापि तदक्षति ॥२०० तथापि न बहिर्वस्तु स्यात्त तुरहेतुत । अस्त्युपादानहेतोश्च तत्क्षतिर्वा तदक्षतिः ॥२०१ सन्ति संज्वलनस्योच्चै स्पर्द्धका देशघातिन । तद्विपाकोऽस्त्यमन्दो वा मन्दो हेतु क्रमाद्वयोः २०२ संक्लेशस्तक्षतिर्नून विशुद्धिस्तु तदक्षति । सोऽपि तरतमस्वाशै साऽप्यनेकैरनेकपा ॥२०३ अस्तु यद्वा न शैथिल्यं तत्र हेतुवशादिह । तथाप्येतावताचार्य सिद्धो नात्मन्यतत्पर ॥२०४ तत्रावश्यं विशुद्धयंशस्तेषां मन्दोदयादिह । संक्लेशाशोऽथवा तीब्रोदयानायं विधि स्मृत ॥२०५ दिगम्बर जन्मके समय जैसा रूप होता है वैसे रूपको धारण करनेवाला, दयाशील, निम्रन्थ, अन्तरग और बहिरग मोहकी गाँठको खोलनेवाला, व्रतोको जीवन पर्यन्त पालनेवाला, गुणश्रेणि- रूपसे कर्मोको निर्जरा करनेवाला, तपरूपी किरणोको तपनेसे तपस्वी, परीषह और उपसर्ग आदिसे अजेय, कामको जीतनेवाला, शास्त्रोक्तविधिसे आहार लेने वाला और प्रत्याख्यानमे तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके साधुके योग्य अनेक गणोको धारण करनेवाला साधु होता है। ऐसा साधु कल्याणके लिये नियमसे नमस्कार करने योग्य है इससे विपरीत कोई यदि विद्वानोमे श्रेष्ठ भी हो तो वह नमस्कार करने योग्य नही है ।।१९३-१९६।। इस प्रकार यद्यपि श्रेष्ठमे भी श्रेष्ठ इन तीन प्रकारके मुनियोका व्याख्यान किया तथापि उनमें तरतमरूप कुछ विशेषता पाई जाती है ॥१९७। वह इस प्रकार है-उन तीनोमे जो दीक्षा और आदेश देता है वह गणका अग्रणी आचार्य है। वह अपनी आत्मामे लीन रहता है यह बात युक्ति आगम और अनुभवसे सिद्ध है ॥१९८।। इसके दर्शन मोहनीयका अनुदय होता है इसलिये यह वास्तवमे अपनी आत्मामे अतत्पर नही है । किन्तु इसके उससे अविनाभाव सम्बन्ध रखनेवाला शुद्ध आत्माका अनुभव नियमसे पाया जाता है ॥१९९।। दूसरे इसके चारित्र मोहनीयका एक देश क्षय भी पाया जाता है। क्योकि चारित्रकी हानि और लाभ केवल बाह्य पदार्थके निमित्तसे नही होता है ।।२००॥ किन्तु उपादान कारणके बलसे चारित्रकी हानि या उसका लाभ होता है । तव भी अहेतु होनेसे बाह्य वस्तु उसका कारण नहीं है ।।२०१।। वास्तवमे सज्वलन कषायके जो देश- घाति स्पर्धक पाये जाते हैं उनका तीव्र और मन्द उदय ही क्रमसे चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण है ।।२०२।। सक्लेश नियमसे चारित्रको क्षतिका कारण है और विशुद्धि चारित्रकी हानिका कारण नहीं है और वह सक्लेश तथा विशुद्धि भी अपने तरतमरूप अशोकी अपेक्षा अनेक प्रकारकी है। और ये तरतमरूप भी अपने अवान्तर भेदोकी अपेक्षा अनेक प्रकारके हैं ।।२०३।। अथवा कारणवश आचार्यके चारित्रमे कदाचित् शिथिलता भी होवे और कदाचित् न भी होवे तो भी इतने मापसे आचार्य अपनी आत्मामे अतत्पर है यह बात सिद्ध नही होती ॥२०४|| उनके देशघाति ६८ श्रावकाचार-संग्रह किन्तु देवाद्विशुद्धघंश सक्लेशांशोऽथ वा क्वचित् । तद्विशुद्धविशुद्धघंश संक्लेशांशावयं पुनः।। २०६ तेषा तीवोदयात्तावदेतावान बाधक । सर्वतश्चेत्प्रकोपी च नापराधोस्त्यतोऽपर ॥२०७ तेनातायता नूनं शुद्धस्यानुभवच्युतिः । कर्तुं न शक्यते यस्मादत्रास्त्यन्य प्रयोजक ॥२०८ हेतु शुद्धात्मनो ज्ञाने शमो मिथ्यात्वकर्मण । प्रत्यनीकस्तु तत्रोच्चरशमस्तस्य व्यत्ययात् ॥२०९ दृग्मोहेऽस्तङ्गते पुंसः शुद्धस्यानुभवो भवेत् । न भवेद्विघ्नकर कश्चिच्चारित्रावरणोक्य ॥२१० न चाकिश्चित्करश्चैवं चारित्रावरणोदय । हरमोहस्य क्षातेनालमलं स्वस्य कृते च य ॥२११ कार्य चारित्रमोहस्य चारित्राच्च्युतिरात्मन । नात्मदृष्टस्तु दृष्टित्वाल्याय्याक्तिरदृष्टिवत् ।।२१२ यथा चक्षु प्रसन्नं वै कस्यचिदैवयोगत । इतरनाक्षातापेऽपि दृष्टाध्यक्षान्न तत्क्षाति ॥२१३ कषायाणामनुद्रेकश्चारित्रं तावदेव हि । नानुद्रेक कषायाणा चारित्राच्च्युतिरात्मनः ।।२१४ ततस्तेषामनुनेक स्थावुद्रेकोऽथवा स्वत । नात्मदृष्टे क्षतिनं दृग्मोहस्योदयादृते ।।२१५ अथ सूरिरुपाध्याय द्वावेतौ हेतुत समौ । साधुरिवात्मज्ञो शुद्धौ शुद्धौ शुद्धोपयोगिनी ॥२१६ नापि कश्चिद्विशेषोऽस्ति द्वयोस्तरतमो मिथ । नेताभ्यामन्तरत्कर्ष साधोरप्यतिशायनात् ॥२१७ स्पर्धकोके मन्द उदय होनेसे नियमसे विशुद्धता होती है और देशघाति स्पर्धकोके तीव्र उदय होनेसे सक्लेश होता है यह विधि नही मानी गई है ।।२०५।। किन्तु देववश उनके कही पर विशुद्धयश भी होता है और दैववश कही पर सक्लेशाश भी होता है । यदि चारित्रको विशुद्धि है तो विशुद्धघश होता है और यदि सक्लेशाशका उदय होता है तो संक्लेश भी होता है ।।२०६।। उन देशघाति स्पर्धकोका तीन उदय तो केवल इतना ही आचार्यके बाधक है कि यदि वह सर्वथा प्रकोपका कारण है ऐसा मान लिया जाय तो इससे बडा और कोई अपराध नही है ॥२०७। इसलिये यहाँ पर इतने मात्रसे आचार्यके शुद्ध अनुभवको च्युति नही की जा सकती, क्योकि इसका कारण कोई दूसरा है ॥२०८॥ मिथ्यात्व कर्मका अनुदय शुद्ध आत्माके ज्ञानमे कारण है और उसका तीव्र उदय इसमे बाधक है, क्योकि मिथ्यात्वका उदय होने पर शुद्ध आत्माके ज्ञानका विनाश देखा जाता है ॥२०९|| दर्शनमोहनीयका अभाव होनेपर शुद्ध आत्माका अनुभव होता है इसलिये चारित्रावरण- का किभी भी प्रकारका उदय उसका बाधक नही है ॥२१०।। एतावता चारित्रावरणका उदय अकिचित्कर है यह बात नही है क्योकि यद्यपि वह दर्शनमोहनीयका कार्य करनेमे असमर्थ है तथापि वह अपना कार्य करनेमे अवश्य समर्थ है ।।२११॥ चारित्र-मोहनीयका कार्य आत्माको चारित्रसे च्युत करना है आत्मदृष्टिसे च्युत करना उसका कार्य नही, क्योकि न्यायसे विचार करने पर इतर दृष्टियोके समान वह भी एक दृष्टि है ।।२१२॥ जिस प्रकार दैवयोगसे यदि किसोकी एक आँख निर्मल है तो यह प्रत्यक्षसे देखते हैं कि दूसरी आँखमे सतापके होने पर भी उसकी हानि नही होती। उसी प्रकार चारित्र मोहके उदयसे चारित्रगुणमे विकारके होने पर भी आत्माके सम्यक्त्व गुणको हानि नही होती ॥२१३।। जब तक कषायोका अनुदय है तभी तक चारित्र है और कषायोका उदय ही आत्माका चारित्रसे च्युत होना है ॥२१४॥ इसलिये चाहे कषायोका अनुदय हो चाहे उदय हो पर दर्शनमोहनीयके उदयके बिना इतने मात्रसे सम्यग्दर्शनकी कोई हानि नही होती ॥२१५॥ अन्तरग कारणकी अपेक्षा विचार करने पर आचार्य और उपाध्याय ये दोनो ही समान हैं, साधु हैं, साधुके समान आत्मज्ञ हैं, शुद्ध हैं और शुद्ध उपयोगवाले हैं ॥२१६।। इन दोनोमे परस्पर तरतमरूप कोई विशेषता नही है और न इन दोनोंसे साघुमे भी अतिशयरूपसे कोई भीतरी उत्कर्ष पाया जाता है ॥२१७॥ यदि इनमे परस्पर

लाटीसहिता
६९
लेशतोऽस्ति विशेषश्चेन्मिथस्तेषा बहिः कृत । का क्षतिर्मूलहेतो स्यादन्त शुद्धिसमन्वितः ॥२१८
नास्त्यत्र नियत कश्चिद्युक्तिस्वानुभवागमात् । मन्दादिरुदयस्तेषां सूर्युपाध्यायसाधुषु ॥२१९
प्रत्येकं बहव सन्ति सूर्युपाध्यायसाधव । जघन्यमध्यमोत्कृष्टभवैश्चैकैकश पृथक् ॥२२०
कश्चित्सूरि कदाचिद्वै विशुद्धि परमा गत । मध्यमां वा जघन्यां वा स्वोचितां पुनराश्रयेत् ॥२२१
हेतुस्तत्रोदिता नानाभावाशे स्पर्द्धका क्षणम् । धर्मादेशोपदेशादिहेतुर्नात्र बहि क्वचित् ॥२२२
परिपाट्या नया योज्या पाठका साधवश्च ये । न विशेषो यतस्तेषां नियत शेषो विशेषभाक ॥२२३
न तु धर्मोपदेशादि कर्म तत्कारणं बहि । हेतोरभ्यन्तरस्थापि बाह्यं हेतुर्बहि क्वचित् ॥२२४
नैवमर्थाद्यत सर्व वस्त्वकिञ्चित्कर बहि । तत्पदं फलवन्मोहादिच्छतोऽप्यान्तरं परम् ॥२२५
किं पुनर्गणिनस्तस्य सर्वतोनिच्छतो बहि । धर्मादेशोपदेशादिस्वपदं तत्फलं च यत् ॥२२६
नास्यासिद्धं निरोहत्व धदिशादिकमणि । न्यायादक्षार्थकाक्षाया ईहा नान्यत्र जातु चित् ॥२२७
ननु नेहा विना कर्म कर्म नेहा विना क्वचित् । तस्मानानीहितं कर्म स्यादक्षार्थस्तु वान वा ॥२२८
थोडी बहुत विशेषता है भी तो वह बाह्य क्रियाकृत ही है क्योकि इन तीनोका मूलकारण
अन्तरग शुद्धि जब कि समान है तो बाह्य विशेषतासे क्या हानि है अर्थात् कुछ भी हानि नही
है ।।२१८।। इन आचार्य, उपाध्याय और साधुके कषायोका कोई भी मन्दादि उदय नियत नही
है। युक्ति, स्वानुभव और आगमसे तो यही ज्ञात होता है कि इनके किसी भी प्रकारके अशोका
उदय सम्भव है ॥२१९॥
आचार्य, उपाध्याय और साधु इनमेसे प्रत्येकके अनेक भेद हैं जो पृथक्-पृथक् एक-एकके
जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भावोकी अपेक्षासे प्राप्त होते हैं ॥२२०।। कोई आचार्य कदाचित्
उत्कृष्ट विशुद्धिको प्राप्त होकर फिर मध्यम या जघन्य विशुद्धिको प्राप्त होता है ॥२२१।। नाना
अविभाग प्रतिच्छेदोको लिये हुए प्रति समय उदयमे आनेवाले सज्वलन कषायके देशघाति स्पर्धक
ही इसका कारण हैं, धर्मका आदेश या उपदेश आदि रूप बाह्यक्रिया इसका कारण नही है ।।२२२॥
जिस परिपाटीसे आचार्योंके भेद बतलाये हैं इसी परिपाटीसे उपाध्याय और साधुओके भेद भी
घटित कर लेने चाहिये क्योकि युक्तिसे विचार करनेपर आचार्यसे इनमे अन्तरगमे और कोई
विशेषता शेष नहीं रहती। वे तीनो समान है ॥२२३।। शका-धर्मका उपदेश आदि बाह्यकार्य
आचार्य आदिकी विशेषताका कारण रहा आवे, क्योकि बाह्यहेतु कहीपर आभ्यन्तर हेतुका बाह्य
निमित्त होता है ।।२२४॥ समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योकि समस्त बाह्य पदार्थ
वास्तवमे अकिञ्चित्कर हैं। अब यदि मोहवश कोई परपदार्थको निज मानता है तो उसके
लिये ये पर-आचार्य आदि अवश्य ही फलवाले हैं । अर्थात् इनसे वह सासारिक प्रयोजनकी सिद्धि
कर सकता है ॥२२५।। किन्तु जो बाह्यरूप आचार्य पद और धर्मका आदेश तथा उपदेश आदि
रूप उसके फलको सर्वथा नही चाहता है उस आचार्यका तो फिर कहना ही क्या है, अर्थात् उसकी
अन्तरग परिणतिमे ये बाह्यकार्य बिलकुल ही कारण नही हो सकते ॥२२६।। धर्मके आदेश आदि
कार्योंमे आचार्य निरीह होते हैं यह बात असिद्ध नहीं है, क्योकि न्यायसे इन्द्रियोके विषयोकी
आकाक्षा ही ईहा मानी गई है अन्यत्र की गई इच्छा कभी भी ईहा नहीं मानी गई है ॥२२७॥
शका-कहीं भी क्रिया विना इच्छा नही होती है और इच्छाके विना क्रिया नही होती है
इसलिये इन्द्रियोंके विषय रहे या न रहे, तथापि विना इच्छाके क्रिया नही हो सकती ? ॥२२८॥

७० श्रावकाचार-संग्रह नैवं हेतोरतिव्याप्तेरारादाक्षीणमोहिषु । बन्धस्य नित्यतापत्तेर्भवेन्मुक्तरसम्भव ।।२२९ ततोऽस्त्यन्त कृतो भेद शुद्धनाशांशतस्त्रिषु । निविशेषात्समस्त्वेष पक्षो माभूबहि कृत. ॥२३० किचाऽस्ति यौगिकी रूढि प्रसिद्धा परमागमे । विना साधुपदं न स्यात्केवलोत्पत्तिरञ्जसा ॥२३१ तत्राकृतमिद सम्यक् साक्षात्सर्वार्थदर्शिनः । क्षणमस्ति स्वत श्रेण्यामधिरूढस्य तत्पदम् ॥२३२ यतोऽवश्यं स सूरि पाठक श्रेण्यनेहसि । कृत्स्नचिन्तानिरोधात्मलक्षाण ध्यानमाश्रयेत् ॥२३३ तत' सिद्धमनायासात्तत्पदत्वं तयोरिह । नूनं बाह्योपयोगस्य नावकाशोऽस्ति तत्र यत् ॥२३४ न पुनश्चरण तत्र छेदोपस्थापना वरम् । प्रागादाय क्षणं पश्चात्सरि. साघुपदं श्रयेत् ॥२३५ उक्त दिग्मात्रमत्राऽपि प्रसङ्गाद्गुरुलक्षाणम् । शेष विशेषतो ज्ञेय तत्स्वरूप जिनागमात् ॥२३६ धर्मो नीचपदादुच्चै पदे धरति धार्मिकम् । तत्राजवञ्जवो नीचे पवमुच्चैस्तदत्यय ॥२३७ सम्यग्हग्ज्ञप्तिचारित्रं धर्मो रत्नत्रयात्मक । तत्र सद्दर्शन मूलं हेतुरद्वैतमेतयो ॥२३८ तत सागाररूपो वा धर्मोऽनागार एव वा । सह-पुरस्सरो धर्मो न धर्मस्तद्विना क्वचित् ॥२३९ रूढितोऽधिवपुर्वाचां क्रिया धर्म शुभावहा । तत्रानुकूलरूपा वा मनोवृत्ति. सहानया ॥२४० सा द्विधा स च सागारानागाराणां विशेषत । यत. क्रियाविशेषत्वान्नूनं धर्मो विशेषत ॥२४१ तत्र हिंसानृतस्तेयाब्रह्मकृत्स्नपरिग्रहात् । देशतो विरति. प्रोक्तं गृहस्थानामणुव्रतम् ॥२४२ समाधान-ऐसा नहीं है, क्योकि ऐसा माननेपर यह लक्षण क्षीणमोही और उनके समीपवर्ती गुणस्थानवालोमे अतिव्याप्त हो जाता है और यदि यहाँ भी इच्छापूर्वक क्रिया मानी जाती है तो बन्धको नित्यताकी आपत्ति प्राप्त होनेसे मुक्ति असम्भव हो जाती है ।।२२९।। इसलिये विशुद्धिके नाना अशोकी अपेक्षासे अन्तरगकृत भेद है यह पक्ष सामान्यरूपसे तीनोमे माना जाना चाहिये। इसे बाह्य क्रियाको अपेक्षासे मानना उचित नही है ।।२३०॥ दूसरे परमागममे जो यह सार्थकरूढि प्रसिद्ध है कि साधुपदको प्राप्त किये विना नियमसे केवलज्ञानकी उत्पत्ति नही होती है ॥२३१।। सो इस विषयमे समस्त पदार्थोंको साक्षात् जाननेवाले सर्वज्ञदेवने यह ठीक ही कहा है कि श्रेणीपर चढे हुए जीवके वह साधुपद क्षणमात्रमे स्वत प्राप्त हो जाता है ॥२३२|| क्योकि चाहे आचार्य हो या उपाध्याय, श्रेणीपर चढनेके समय वह नियमसे सम्पूर्ण चिन्ताओके निरोध रूप ध्यानको धारण करता है ।।२३३।। इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि आचार्य और उपाध्यायके श्रेणी आरोहणके समय साधुपद अनायास होता है क्योकि वहाँपर बाह्य उपयोगको कोई अवकाश नही है ।।२३४।। किन्तु ऐसा नहीं है कि आचार्य पहले छेदोपस्थापना रूप उत्तम चारित्रको ग्रहण करके पश्चात् साधु- पदको धारण करता है ॥२३५।। इस प्रकार यहाँपर प्रसगवश सक्षेपसे गुरुका लक्षण कहा। उनका शेषस्वरूप विशेषरूपसे जिनागमसे जानना चाहिये ॥२३६।। जो धर्मात्मा पुरुषको नीच स्थानसे उठाकर उच्चस्थानमे धरता है वह धर्म है। यहाँ ससार नीच स्थान है और उसका नाशरूप मोक्ष उच्चस्थान है ॥२३७|| वह धर्म सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन रूप है। उन तीनोमेसे सम्यग्दर्शन इन दोनोके समीचीनपनेका एकमात्र कारण है ।।२३८|| इसलिए गृहस्थ धर्म या मुनिधर्म जो भी धर्म है वह सम्यग्दर्शनपूर्वक होनेसे ही धर्म है । सम्यग्दर्शनके विना कही भी धर्म नही ॥२३९॥ फिर भी रूढ़िसे शरीर और वचनको शुभफल देनेवाली क्रियाको धर्म कहते हैं या शरीर और वचनकी शुभ क्रियाके साथ जो अनुकूल मनकी प्रवृत्ति होती है उसे धर्म कहते हैं ॥२४०। सम्पूर्ण गृहस्थ और मुनियोंके भेदसे वह क्रिया दो प्रकारकी है, क्योकि क्रियाके भेदसे ही धर्ममे भेद होता है ॥२४१॥ इन दोनोमेंसे जो हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और समस्त परिग्रह इनसे एकदेश विरति लाटीसहिता ७१ यतेर्मूलगुणाश्चाष्टाविंशतिर्मूलवत्तरोः । नात्राप्यन्यतरेणोना नातिरिक्ता कदाचन ॥२४३ सर्वैरेव समस्तैश्च सिद्ध यावन्मुनिव्रतम् । न व्यस्तैयस्तमात्र तु यावदंशत्रयादपि ॥२४४ उक्तं च- -- वदसमिदिदियरोधो लोचो आवसयमचेलमन्हाणं । खिदिसयणमदंतवणं ठिदिभोयणमेयभत्तं च ॥२० एते मूलगुणा प्रोक्ता. यतीनां जैनशासने । लक्षाणां चतुरशीतिर्गुणाश्चोत्तरसंज्ञका ॥२४५ ततः सागारधर्मो वाऽनगारो वा यथोदित । प्राणिसंरक्षण मूलमुभयत्राविशेषत ॥२४६ उक्तमस्ति क्रियारूपं व्यासावतकदम्बकम् । सर्वसावद्ययोगस्य तदेकस्य निवृत्तये ॥२४७ अर्थाज्जैनोपदेशोऽयमस्त्यादेश स एव च । सर्वसावद्ययोगस्य निवृत्तिव्रतमुच्यते ॥२४८ सर्वशब्देन तत्रान्तर्बहिर्वतिपदार्थत । प्राणोच्छेदो हि सावध सैव हिंसा प्रकोतिता ॥२४९ योगस्तत्रोपयोगो वा बुद्धिपूर्व स उच्यते । सूक्ष्मश्चाबुद्धिपूर्वो य स स्मृतो योग इत्यपि ॥२५० तस्याभावो निवृत्ति स्यावतं चार्थादिति स्मृति । अंशात्साप्यंशतस्तत्सा सर्वतः सर्वतोऽपि तत्॥२५१ सर्वतः सिद्धमेवैतद् व्रतं बाह्यं दयाङ्गिषु । व्रतमन्त कषायाणा त्याग सेवात्मनि क्रिया ॥२५२ लोकासंख्यातमात्रास्ते यावदागादय स्फुटम् । हिंसायास्तत्परित्यागो व्रत धर्मोऽथवा किल ॥२५३ है वह गृहस्थोका अणुव्रत कहा गया है ।।२४२॥ यतिके अट्ठाईस मूलगुण होते हैं। वे ऐसे हैं जैसे कि वृक्षका मूल होता है। कभी भी इनमेसे न तो कोई कम होता है और न अधिक ही होता है ॥२४३॥ समस्तरूप इन सब गुणोके द्वारा ही पूरा पूरा मुनित्रत सिद्ध होता है, व्यस्तरूप इन सब गुणोके द्वारा नही, क्योकि एक अशको ग्रहण करनेवाले नयकी अपेक्षा तो वह व्यस्तरूप ही सिद्ध होता है, पूरा मुनिव्रत नही सिद्ध होता ॥२४४॥ कहा भी है-'पांच महाव्रत, पाँच समिति, पाँचो इन्द्रियोका निरोध करना, केशलोच, छह आवश्यक, नग्न रहना, स्नान नही करना, जमीनमे सोना, दन्तधावन नही करना, खडे होकर आहार लेना और एक बार भोजन करना ये अट्ठाईस मूलगुण है ॥२०॥ जैनशासनमे यतियोके ये मूलगुण कहे हैं। उनके उत्तरगुण चौरासी लाख होते हैं ॥२४५।। इसलिये जैसा सागारधर्म कहा गया है और जैसा मुनिधर्म कहा गया है उन दोनोंमे सामान्यरीतिसे प्राणियोका सरक्षण मूल है ।।२४६।। इसी प्रकार विस्तारसे क्रियारूप जितना भी व्रतोका समुदाय कहा गया है वह केवल एक सर्वसावद्ययोगकी निवृत्तिके लिये ही कहा गया है ॥२४७।। अर्थात् जिनमतका यही उपदेश है और यही आदेश है कि सर्वसावद्ययोगकी निवृत्तिको ही व्रत कहते हैं ।।२४८॥ यहाँपर सर्व शब्दसे उसका यौगिक अर्थ अन्तरग और बहिरग वृत्ति लिया गया है तथा सावध शब्दका अर्थ प्राणोका छेद करना है और वही हिंसा कही गई है। इस हिंसामे जो बुद्धि- पूर्वक उपयोग होता है वह योग है या जो अबुद्धिपूर्वक सूक्ष्म उपयोग होता है वह भी योग है ॥२४९-२५०।। तथा इस सर्वसावद्ययोगका अभाव होना ही उससे निवृत्ति है और वही वास्तवमे वृत माना गया है। यदि सर्वसावद्ययोगकी निवृत्ति अशरूपसे होती है तो व्रत भी एकदेश होता है और यदि वह सब प्रकारसे होती है तो व्रत भी सर्वदेश होता है ।।२५१॥ इस प्रकार यह बात सब प्रकारसे सिद्ध हो गयी कि प्राणियोपर दया करना-बाह्म व्रत है और कषायोका त्याग करना अन्तरग व्रत है। अपनी आत्मापर कृपा यही है ।।२५२।। क्योकि जबतक असख्यात लोकप्रमाण -- ७२ श्रावकाचार-संग्रह आत्मेतराङ्गिणामङ्गरक्षणं यन्मतं स्मृती । तत्पर स्वात्मरक्षाया कृतेनात परत्र तत् ॥२५४ सत्सु रागाविभावेषु वन्य' स्यात्कर्मणा वलात् । तत्पाकादात्मनो दुःख तत्सिद्धः स्वात्मनो वधः ।। तत शुद्धोपयोगो यो मोहकर्मोवयाहते । चारित्रापरनामैतव्रतं निश्चयत परम् ॥२५६ रूढे. शुभोपयोगोऽपि ख्यातश्चारित्रसंज्ञया । स्वार्य क्रियामकुर्वाण सार्थनामा न निश्चयात् ॥२५७ किन्तु बन्धस्य हेतु स्यावर्थात्तत्प्रत्यनीफवत् । नासौ वर वर य स नापकारोपकारकृत् ॥२५८ विरुद्धकार्यकारित्वं नास्यासिद्धं विचारसात् । बन्धस्यैकान्ततो हेतो शुद्धादन्यत्र सम्भवात् ॥२५९ नोह्य प्रज्ञापराधत्वान्निर्जराहेतुरंशत । अस्ति नावन्धहेतुर्वा शुभो नाप्यशुभावहात् ॥२६० कर्मादानक्रियारोध स्वरूपाचरणं च यत् । धर्म. शुद्धोपयोग स्यात्सैप चारित्रसंज्ञक ॥२६१ उक्तं च- चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समोतिणिहिट्ठो । मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु समो ॥२१ नूनं सद्दर्शनज्ञानचारित्रैमोक्षपद्धति । समस्तैरेव न व्यस्तैस्तत्कि चारित्रमात्रया ॥२६२ सत्य सद्दर्शन ज्ञान चारित्रान्तर्गत मिथ । त्रयाणामविनाभावाद रत्नत्रयमखण्डितम् ॥२६३ वे रागादिक भाव रहते हैं तबतक ज्ञानादिक धर्मोकी हिंसा होनेसे आत्माको हिंसा होती रहती है ॥२५३।। आशय यह है कि वास्तवमे रागादि भाव ही हिंसा है, अधर्म है, व्रतसे च्युत होना है और रागादिका त्याग करना ही अहिंसा है, व्रत है अथवा धर्म है ।।२५४|| रागादि भावोंके होनेपर कर्मोंका बन्ध नियमसे होता है और उस बंधे हुए कर्मके उदयसे आत्माको दुख होता है इसलिये रागादि भावोका होना आत्मवध है यह वात सिद्ध होती है ।।२५५।। इसलिये मोहनीय कर्मक उदयसे अभावमे जो शुद्धोपयोग होता है उसका दूसरा नाम चारित्र है और वही निश्चयसे उत्कृष्ट व्रत है ।।२५६॥ चारित्र सब प्रकारसे अपनी अर्थक्रियाको करता हुआ भी निर्जराका कारण है यह वात न्यायसे भी अबाधित है इसलिये वह दीपकके समान सार्थक नामवाला है ॥२५७॥ किन्तु वह अशुभोपयोगके समान वास्तवमे बन्धका कारण है इसलिये यह श्रेष्ठ नही है। श्रेष्ठ वह है जो न तो उपकार ही करता है और न अपकार ही करता है ।।२५८॥ शुभोपयोग विरुद्ध कार्यकारी है यह बात विचार करनेपर असिद्ध भी नही प्रतीत होती, क्योकि शुभोपयोग एकान्तसे बन्धका कारण होनेसे वह शुद्धोपयोगके अभावमे हो पाया जाता है ।।२५९।। बुद्धि दोषसे ऐसी तर्कणा नही करनी चाहिये कि शुभोपयोग एक देशनिर्जराका कारण है, क्योकि न तो शुभोपयोग ही वन्धके अभावका कारण है और न अशुभोपयोग ही बन्धके अभावका कारण है ।।२६०॥ कर्मोंके . ग्रहण करनेकी क्रियाका रुक जाना ही स्वरूपाचरण है। वही धर्म है, वही शुद्धोपयोग है और वही चारित्र है ॥२६॥ कहा भी है-"निश्चयसे चारित्र ही धर्म है और जो धर्म है उसीको शम कहते हैं।" तात्पर्य यह है कि मोह और क्षोभसे रहित आत्माका परिणाम ही धर्म है ॥२१॥ शका-जब कि सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र इन तीनोके मिलनेपर ही मोक्षमार्ग होता है एक-एकके रहनेपर नही तब फिर केवल चारित्रको मोक्षमार्ग कहनेसे क्या प्रयोजन है ॥२६२।। समाधान-यह कहना ठीक है तथापि सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान ये दोनो मिलकर चारित्रमे गर्भित हैं, क्योकि तीनोका परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध होनेसे ये तीनो लाटीसंहिता ७३ किञ्च सद्दर्शनं हेतुः संविच्चारित्रयोद्धयोः । सम्यग्विशेषणस्योच्चैर्यद्वा प्रत्यग्रजन्मनः ॥२६४ अर्थोऽयं सति सम्यक्त्वे ज्ञानचारित्रमत्र यत् । भूतपूर्व भवेत्सम्यक् सूते वाऽभूतपूर्वकम् ॥२६५ शुद्धोपलब्धिशक्तिर्या लब्धिज्ञानातिशायिनी । सा भवेत्सति सम्यक्त्वे शुद्धो भावोऽथयापि च ॥२६६ यत्पुनद्रव्यचारित्रं श्रुतज्ञानं विनापि दृक् । न तद्ज्ञानं न चारित्रमस्ति चेत्कर्मबन्धकृत् ॥२६७ तेषामन्यतमोद्देशो नालं दोषाय जातुचित् । मोक्षमागैकसाध्यस्य साधकानां स्मृतेरपि ॥२६८ बन्धो मोक्षश्च ज्ञातव्यः समासात्प्रश्नकोविदै । रागांशैर्बन्ध एव स्यानारागांशः कदाचन ॥२६९ उक्तं च- येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२२ येनाशेन तु ज्ञानं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२३ येनांशेन चारित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२४ उक्तो धर्मस्वरूपोऽपि प्रसङ्गात्सङ्गतोऽशत । कविलब्धावकाशस्तं विस्तराद्वा करिष्यति ॥२७० देवे गुरौ तथा धर्मे दृष्टिस्तत्त्वार्थदर्शिनी । ख्याताप्यमूढदृष्टिः स्यादन्यथा मूढदृष्टिता ॥२७१ सम्यक्त्वस्य गुणोऽप्येष नालं दोषाय लक्षित । सम्यग्दृष्टिर्यतोऽवश्यं यथा स्यान तथेतरः ॥२७२ अखण्डित हैं ।।२६३।। दूसरी बात यह है कि सम्यग्दर्शन यह ज्ञान और चारित्र इन दोनोमे सम्यक विशेषणका हेतु है । अथवा जो ज्ञान और चारित्र नूतन होते हैं उनमे सम्यक् विशेषणका एकमात्र यही हेतु है ।।२६४॥ इसका यह अभिप्राय है कि पहलेका जो ज्ञान और चारित्र होता है वह सम्यग्दर्शनके होनेपर समीचीन हो जाता है । अथवा सम्यग्दर्शन यह अभूतपूर्वज्ञान और चारित्रको जन्म देता है ॥२६५।। शुद्ध आत्माके जाननेकी शक्ति जो कि ज्ञानमे अतिशय लानेवाली लब्धिरूप है वह सम्यक्त्वके होनेपर ही होती है । अथवा शुद्धभाव भी सम्यक्त्वके होनेपर ही होता है ।।२६६।। और जो द्रव्य चारित्र और श्रुतज्ञान है वह यदि सम्यग्दर्शनके विना होता है तो वह न ज्ञान है न चारित्र है। यदि है तो केवल कर्मबन्ध करनेवाला है ॥२६७। इसलिये इन तीनोमेसे किसी एकको कथन करना कभी भी दोषाधायक नही है, क्योकि मोक्षमार्ग एक साध्य है और ये तीनो इसके साधक माने गये है ॥२६८॥ प्रश्नके अभिप्रायको जाननेवाले पुरुषोको सक्षेपमे बन्ध और मोक्षका स्वरूप इस प्रकार जानना चाहिये कि रागाशरूप परिणामोसे बन्ध होता है और रागाश- रूप परिणामोके नही रहनेसे कभी भी बन्ध नही होता ॥२६९।। कहा भी है-'जिस अशसे यह सम्यग्दृष्टि है उस अशसे इसके बन्ध नही होता है। किन्तु जिस अशसे राग है उस अशसे इसके बन्ध अवश्य होता है ॥२२॥ जिस अशसे ज्ञान है, उस अशसे उसके कर्म-बन्ध नहीं होता, किन्तु जिस अशसे राग है, उस अशसे कर्म-बन्ध होता है ।।२३।। जिस अशसे चारित्र है, उस अशसे उसके कर्म-बन्ध नही होता, किन्तु जिस अंशसे राग है, उस अशसे कर्म-बन्ध होता है ॥२४॥ इस प्रकार प्रसगवश सक्षेपसे युक्तियुक्त धर्मका स्वरूप कहा । कवि यथावकाश उसका विस्तारसे कथन आगे करेगा ॥२७०।। समस्त कथनका सार यह है कि देव, गुरु और धर्ममे यथार्थताको देखनेवाली दृष्टि ही अमूढदृष्टि कही गयी है और इससे विपरीत दृष्टि ही मूढ दृष्टि है ॥२७१।। यह भी सम्यक्त्वका गुण है। यह किसी प्रकार भी दोषकारक नही है, क्योकि जो सम्यग्दृष्टि है वह नियमसे अमूढदृष्टि होता है और जो सम्यग्दृष्टि नहीं है वह अमूढ दृष्टि १० ७६ श्रावकाचार-सग्रह उक्तं च- आरहिदं कादव्वं जइ सक्कइ परहिद च कादव्वं । आदहिदपरहिदादो आदहिदं सुठु कादव्वं ॥२५ उक्तं दिग्मावतोऽप्यत्र सुस्थितीकरणं गुणः । निर्जराया गुणश्रेणौ प्रसिद्ध सुहगात्मन ||३०० वात्सल्यं नाम दासत्व सिद्धार्ह बिम्बकेश्मसु । संघे चतुर्विघे शास्त्रे स्वामिकायें सुभृत्यवत् ॥३०१ अर्थावन्यतमस्योच्चैरुद्दिष्टेषु सुदृष्टिमान् । सत्सु घोरोपसर्गेषु तत्पर स्यातदत्यये ॥३०२ यद्वा न ह्यात्मसामथ्यं यावन्मत्रासिकोशकम् । तावद्रष्टुं च श्रोतुं च तद्वाषा सहते न स ॥३०३ तद्विधाऽय च वात्सल्यं भेवात्स्वपरगोचरात् । प्रधानं स्वात्मसम्बन्धिगुणो यावत्परात्मनि ॥३०४ परीषहोपसर्गाथै पीडितस्यापि कस्यचित् । न शैथिल्यं शुभाचारे ज्ञाने ध्याने तदादिमम् ।।३०५ इतरत्प्रागिहाख्यातं गुणो दृष्टिमतः स्फुटम् । शुद्धध्यानवलादेव सतो बाघापकर्षणम् ॥३०६ प्रभावनाङ्गसंज्ञोऽस्ति गुण सद्दर्शनस्य वै । उत्कर्षकरणं नाम लक्षणादपि लक्षितम् ॥३०७ अर्थात्तद्धर्मण पक्षे नावधस्य मनागपि । धर्मपक्षक्षतेयंस्मावधर्मोत्कर्षरोषणात् ।।३०८ पूर्ववत्सोऽपि वैविध्य स्वान्यात्मभेदत पुन । तत्राद्यो वरमादेय स्यावादेयो परोऽप्यत ॥३०९ उत्कर्षो यद्बलाधिक्यावधिकीकरण वृषे । असत्सु प्रत्यनीकेषु नालं दोषाय तत्क्वचित् ॥३१० दूसरेका अनुग्रह करना चाहिए। किन्तु अपने व्रतको छोडकर दूसरे जीवोकी रक्षा करनेमे तत्पर होना उचित नही है ।।२९९।। कहा भी है-'सर्वप्रथम आत्महित करना चाहिए। यदि शक्य हो तो परहित भी करना चाहिए । किन्तु आत्महित और परहित इन दोनोमेसे आत्महित भले प्रकार करना चाहिये ॥२५॥ इस प्रकार सक्षेपसे यहां पर स्थितीकरण गुण कहा जो कि सम्यग्दृष्टि जीवके गुण श्रेणी निर्जरामे भली प्रकार प्रसिद्ध है ॥३००। जिस प्रकार उत्तम सेवक स्वामीके कार्यमे दासभाव रखता है उसी प्रकार सिद्ध प्रतिमा, जिन बिम्ब, जिनमन्दिर, चार प्रकारका सघ और शास्त्र इन सबमे दासभाव रखना वात्सल्य अंग है ॥३०१।। अभिप्राय यह है कि पूर्वोक्त सिद्ध प्रतिमा आदिमेसे किसी एक पर घोर उपसर्ग आने पर वह सम्यग्दृष्टि जीव इसके दूर करनेके लिए सदा तत्पर रहता है ।।३०२।। अथवा यदि आत्मीक सामर्थ्य नहीं है तो जब तक मन्त्र, तलवार और धन है तब तक वह उन सिद्ध प्रतिमा आदि पर आई हुई बाधाको न तो देख हो सकता है और न सुन ही सकता है ।।३०३।। स्व और परके भेदसे वह वात्सल्य दो प्रकारका है। इनमेसे अपनी आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाला वात्सल्य प्रधान है और अन्य आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाला वात्सल्य गौण है ॥३०४|| परीषह और उपसर्ग आदिसे कही पर पीडित होकर भी शुभाचारमे, ज्ञानमे और ध्यानमें शिथिलता न लाना यह पहला स्ववात्सल्य है ॥३०५॥ दूसरा पर वात्सल्य इस ग्रन्थमे पहले कह आये हैं। वह भी सम्यग्दृष्टिका प्रकट गुण है क्योकि शुद्ध ज्ञानके बलसे ही बाधा दूर की जा सकती है ।।३०६॥ सम्यग्दर्शनका एक प्रभावना नामक गुण है। इसका लक्षण उत्कर्ष करना है। इसीसे यह जाना जाता है ॥३०७।। हिंसा अतद्धर्म है इसलिये इस पक्षका थोडा भी प्रोषण नही करना चाहिए क्योकि अधर्मके उत्कर्षका पोषण करनेसे धर्म पक्षको हानि होती है ।।३०८॥ पहले अगोके समान यह अग भी स्वात्मा और परात्माके मेदसे दो प्रकारका है। उनमेसे पहला अच्छी तरहसे उपादेय है और इसके बाद दूसरा भी उपादेय है ॥३०९।। यत धर्मको हानि पहुंचाने वाले असमीचीन कारणोके रहने पर अधिक बल लगाकर धर्मको वृद्धि करना ही उत्कर्ष है अत ऐसा उत्सर्ग किसी भी हालत

७७
लाटीसहिता
मोहारातिक्षतेः शुद्ध शुद्धाच्छुद्धतरस्तत । जीवः शुद्धतम कश्चिदस्तीत्यात्मप्रभावना ॥३११
नायं स्यात्पौरुषायत्तः किन्तु नूनं स्वभावत । ऊर्ध्वमूवं गुणश्रेणी यतः शुद्धिर्यथोत्तरा ॥३१२
वाह्यप्रभावनाङ्गोऽस्ति विद्यामन्त्रासिभिर्बले । तपोदानादिभिजैनधर्मोत्कर्षो विधीयताम् ॥३१३
परेषामपकर्षाय मिथ्यात्वोत्कर्षशालिनाम् । चमत्कारकरं किञ्चित्तविधेयं महात्मभि ॥३१४
उक्त प्रभावनाड्गोऽपि गुण सद्दर्शनस्य वै । येन सम्पूर्णतां याति दर्शनस्य गुणाष्टकम् ॥३१५
इति श्रावकाचारापरनामलाटीसहिताया अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनवर्णनो नाम तृतीय सर्गः ।
मै दोपकारक नही है ॥३१०॥ कोई जीव मोहरूपी शत्रुका नाश होनेसे शुद्ध हो जाता है। कोई
शुद्धसे शुद्धतर हो जाता है। और कोई शुद्धतम हो जाता है। इस प्रकार अपना उत्कर्ष करना
स्वात्मप्रभावना है ॥३११॥ यह सब पौरुषाधीन नही है किन्तु स्वभावसे ही ऐसा होता है क्योकि
ऊपर ऊपर जैसे गुणश्रेणी निर्जरा बढती जाती है तदनुसार आगे आगे उसकी शुद्धि होती है ॥३१२।।
विद्या और मन्त्र आदि बलके द्वारा तथा तप और दान आदिके द्वारा जैनधर्मका उत्कर्ष करना
बाह्य प्रभावना अग है ॥३१३।। जो अन्य लोग मिथ्यात्वका उत्कर्ष चाहते हैं उनका अपकर्ष करने के
लिए महा पुरुषोको कुछ ऐसे कार्य करने चाहिए जो चमत्कार पैदा करनेवाले हो ॥३१४।। इस
प्रकार सम्यग्दर्शनका प्रभावना नामका गुण कहा । जिसके कारण सम्यग्दर्शनके आठों गुण पूर्णता-
को प्राप्त होते है ॥३१५।। इन आठ गुणोके सिवा सम्यग्दृष्टिके और भी बहुतसे गुण हैं ।
इस प्रकार श्रावकाचार अपर नाम लाटीसहितामे अष्टाङ्ग सम्यग्दर्शनका वर्णन करनेवाला
तीसरा सर्ग समाप्त हुआ |॥३॥

चतुर्थ सर्ग शुद्धदर्शनिकोद्दान्लो भावै सातिशय क्षमी । ऋजुजितेन्द्रियो धोरो व्रतमादातुमर्हति ॥१ शरीरभवभोगेभ्यो विरक्तो दोषदर्शनात् । अक्षातीतसुखैषी य स स्यान्ननं व्रताहत ॥२ न स्यावणुव्रतार्हो यो मिथ्यान्धतमसा तत । लोलुपो लोलचक्षुश्च वाचालो निर्दय कुधी ॥३ मूढो गूढो शठप्रायो जाग्रन्मूच्छपिरिग्रह । दुविनीतो दुराराध्यो निविवेकी समत्सर ॥४ निन्दकश्च विना स्वार्थ देवशास्त्रष्वसूयक । उद्धतो वर्णवादी च वावदूकोऽप्यकारणे ॥५ आततायी क्षणादन्यो भोगाकाक्षी व्रतच्छलात् । सुखाशयो धनाशश्च बहुमानी च कोपत ॥६ मायावी लोभपात्रश्च हास्यायुद्रेकलक्षित । क्षणादुष्ण क्षणाच्छीत क्षणाद्भीरु क्षणाद्भट ।।७ इत्याधनेकदोषाणामास्पद स्वपदास्थितः । इच्छन्नपि व्रतादोंश्च नाधिकारी स निश्चयात ८ जिसका सम्यग्दर्शन शुद्ध है, जो अनेक प्रकारके तपश्चरणादिके क्लेश सहन करनेमे समर्थ है, जिसके परिणामोकी शुद्धता अत्यन्त विलक्षण और सबसे अधिक है, जो क्षमाको धारण करने- वाला है, जिसका मन, वचन, काय सरल है, जो इन्द्रियोको वशमे करनेवाला है और जो अत्यन्त धीरवीर है वही पुरुष व्रतोको धारण कर सकता है ॥१॥ जो मनुष्य शरीर, ससार और इन्द्रियोंके भोगोको सदा नश्वर और असार समझता है और इसीलिये जो शरीर ससार और भोगोंसे सदा विरक्त रहता है, इसके साथ जो आत्मजन्य अतीन्द्रिय सुखकी सदा इच्छा करता रहता है वही मनुष्य निश्चयसे व्रत धारण करनेके योग्य होता है ।।२।। जो पुरुष मिथ्यात्वरूपी घोर अन्धकारसे व्याप्त हो रहा है, जो अत्यन्त चंचल है, जिसके नेत्र सदा चचल रहते हैं, जो बहुत बोलनेवाला है, जो निर्दयी है, जिसकी बुद्धि विपरीत है, जो अत्यन्त मूर्ख है अथवा अत्यन्त मूर्खके समान है, जिसका मूर्छारूप परिग्रह अत्यन्त प्रज्वलित हो रहा है अथवा जिसकी तृष्णा या परिग्रह बढानेकी लालसा बहुत बढी हुई है, जो अत्यन्त अविनयी है, जो अधिक सेवा करनेसे भी प्रसन्न नही होता अर्थात् जिसका हृदय अत्यन्त कठोर है, जो निर्विवेकी है, सबसे ईर्ष्या, द्वेष करनेवाला है, सबकी निन्दा करनेवाला है तथा जो विना किसी अपने प्रयोजनके भी दूसरेको निन्दा करता रहता है, जो देव शास्त्रोसे भी ईर्ष्या द्वेष करता है, जो अत्यन्त उद्धृत है, जो अत्यन्त निन्दनीय है, जो व्यर्थ ही बकवास करता रहता है तथा विना कारणके बकवाद करता रहता है, जो अनेक प्रकारके अत्याचार करनेवाला है, जिसका स्वभाव क्षण-क्षणमे बदलता रहता है, जिसे भोगोपभोगोकी तीव्र लालसा है, जो प्रतोका बहाना बनाकर अनेक प्रकारके भोगोपभोग सेवन करता है, जो सदा इन्द्रिय सम्बन्धी सुख चाहता रहता है, जिसको धनकी तीव्र लालसा है जो बहुत ही अभिमानी है, बहुत ही क्रोधी है बहुत ही मायाचारी है और बहुत ही लोभी है, जिसके हास्य, शोक, भय, जुगुप्सा, रति, अरति आदि कषाएं तीव्र हैं, जो क्षणभरमे शान्त हो जाता है और क्षणभरमे क्रोधसे उबल पडता है, जो क्षणभरमे भयभीत हो जाता है और क्षणभरमे ही बहुत बडा शूरवीर बन जाता है, इस प्रकार जिसमे अनेक दोष भरे हुए है और जो अपने आत्माके स्वरूपमे लीन नही है ऐसा पुरुष यदि व्रतोके धारण करनेकी इच्छा भी करे तो भी निश्चयसे व्रतोके धारण करनेका अधिकारी नही होता अतएव ऐसा पुरुष अणुव्रत धारण करनेके योग्य भी लाटीसहिता न निषिद्धोऽथवा सोऽपि निर्दम्भश्चेद्वतोन्मुखः । मृदुमतिभॊगाकाक्षी स्याच्चिकित्स्यो न वञ्चक ९ अर्थात्कालादिसंलब्धो लब्धसद्दर्शनान्वित । देशत सर्वतश्चापि व्रती तत्त्वविदिष्यते ॥१० विनाऽप्यनेहसो लब्धे कुर्वन्नपि व्रतक्रियाम् । हठादात्मबलाद्वापि व्रतंमन्योऽस्तु का क्षतिः ॥११ किच्चात्मनो यथाशक्ति तथेच्छन्वा प्रतिक्रियाम् । कस्कोऽपि प्राणिरक्षार्थ कुर्वन्नान वारित ॥१२ द्रव्यमात्रक्रियारूढो भावरिक्ता यहच्छत । स्वल्पभोगं फलं तस्यास्तन्माहात्म्यादिहाश्नुते ॥१३ निर्देशोऽयं यथोक्ताया क्रियाया प्रतिपालनात् । छद्मनाऽथ प्रमादाद्वा नायं तस्याश्च साधक ॥१४ अभव्यो भव्यमात्रो वा मिथ्यादृष्टिरपि क्वचित् । देशत सर्वतो वापि गृह्णाति च व्रतक्रियाम् ॥१५ हेतुश्चारित्रमोहस्य कर्मणो रसलाघवात् । शुक्ललेश्याबलात्कश्चिदाहतं व्रतमाचरेत् ॥१६ यथास्वं व्रतमादाय यथोक्तं प्रतिपालयेत् । सानुराग क्रियामात्रमतिचारविजितम् ॥१७ एकादशाङ्गपाठोऽपि तस्य स्याद् द्रव्यरूपत । आत्मानुभूतिशून्यत्वाद्भावत संविदुज्झित ॥१८ नही हो सकता ॥३-८|| अथवा कोई पुरुष छलकपट रहित है और व्रत धारण करना चाहता है उसके लिए व्रत धारण करनेका निषेध नही है क्योकि जिसकी बुद्धि कोमल है अर्थात् जो दयालु है और भोगोकी आकाक्षा रखता है ऐसा पुरुष यदि वचव्य न हो तो वह चिकित्साके योग्य है ॥९।। इस सबका अभिप्राय यह है कि काललब्धि आदि समस्त सामग्रोके मिलनेपर जब सम्यग्दर्शन प्राप्त हो जाता है तब एकदेश पापोका त्याग करनेवाला अथवा पूर्णरूपसे पापोका त्याग करने- वाला व्रती (अणुव्रती या महाव्रती) आत्मतत्त्वका जानकार गिना जाता है ।।१०। जिस किसी मनुष्यको काललब्धि प्राप्त नही हुई है तथा काललब्धिके विना जिसको सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नही है ऐसा मिथ्यादृष्टि पुरुष भी यदि हठपूर्वक अथवा केवल अपने बलसे व्रत पालन करे, तो भी उसमे कोई हानि नही है अन्तर केवल इतना ही है कि विना सम्यग्दर्शनके वह व्रती नही कहला सकता किन्तु 'व्रतमान्य' (विना व्रतोके भी अपनेको व्रती माननेवाला) माना जाता है ॥११।। अथवा यह साधारण नियम समझना चाहिए कि यदि कोई भी पुरुष प्राणियोकी रक्षा करनेके लिये चाहे मिथ्यादृष्टि व्रतोका पालन करे अथवा व्रत पालन करनेकी इच्छा करे तो आर्यव्रती पुरुष उसका निषेध कभी नही करते हैं ॥१२॥ जिस पुरुषके परिणाम शुद्ध नहीं हैं अथवा जो पुरुष अपने व्रतोके पालन करनेमे अपने भाव या परिणाम नही लगाता तथापि जो अपनी इच्छानुसार व्रतोकी बाह्य क्रियाओको पूर्णरीतिसे पालन करता है उसको भी उन व्रतोके पालन करनेसे थोड़ेसे भोगोपभोगोकी सामग्री प्राप्त हो ही जाती है ॥१३।। इसमे भी इतना विशेष है कि जो व्रतरूप क्रियाओको शास्त्रानुसार पालन करते हैं, उन्हीको उनके पालन करनेका फल मिलता है। जो पुरुष किसी छल-कपटसे अथवा प्रमादसे व्रतरूप क्रियाओ पालन करते हैं उनको उन व्रतोंके पालन करनेका कोई किसी प्रकारका फल प्राप्त नही होता ॥१४॥ भव्य जीव या अभव्यजीव अथवा कभी-कभी मिथ्यादृष्टि भी एकदेश या सर्वदेश व्रतोको (अणुव्रतोको या महा- व्रतोको) धारण कर लेते हैं ॥१५॥ व्रतोके धारण करनेके लिए चारित्रमोहनीय कर्मका मन्दोदय कारण है । चारित्रमोहनीय कर्मके मन्द उदय होनेपर तथा शुक्ललेश्याके बलसे यह जीव भगवान् अरहन्तदेवके कहे हुए व्रतोको धारण कर सकता है ।।१६।। अपनो शक्तिके अनुसार अणुव्रत या महाव्रतोको धारण कर उनको शास्त्रानुसार पालन करना चाहिये तथा बड़े प्रेमसे अतिचार रहित पालन करना चाहिये और पूर्णक्रिया या विधिके साथ पालन करना चाहिये ॥१७॥ कोई मुनि मिथ्यादृष्टि भी होते हैं। वे यद्यपि ग्यारह अगके पाठी होते हैं और महावतादि क्रियाओको ८० श्रावकाचार-संग्रह - न वाच्यं पाठमात्रत्वमस्ति तस्येह नार्थतः । यतस्तस्योपदेशाद्वै ज्ञानं विन्दन्ति केचन ॥१९ ततः पाठोऽस्ति तेषूच्चै पाठस्याप्यस्ति ज्ञातृता । ज्ञातृतायां च श्रद्धानं प्रतीतोरोचन क्रिया ॥२० अर्थात्तत्र यथार्थत्वमित्याशङ्कचं न कोविदः । जीवाजीवास्तिकायानां यथार्थत्वं न सम्भवात् ।।२१ किन्तु कश्चिदविशेषोऽस्ति प्रत्यक्षाज्ञानगोचर. । येन तज्ज्ञानमात्रेऽपि तस्याज्ञानं हि वस्तुत ॥२२ तत्रोल्लेखोऽस्ति विख्यात परीक्षादिक्षामोऽपि य । न स्याच्छुखानुभूति सा तत्र मिभ्याशि स्फुटम् ॥२३ अस्तु सूत्रानुसारेण स्वसंविदविरोधिना । परीक्षाया' सहत्वेन हेतोर्बलवताऽपि च ॥२४ दृश्यते पाठमात्रत्वाद् ज्ञानस्यानुभवस्य च । विशेषोऽध्यक्षको यस्मादृष्टान्तावपि समत ॥२५ यथा चिकित्सक कश्चित्पराङ्गगतवेदनाम् । परोपदेशवाक्याद्वा जानन्नानुभवत्यपि ॥२६ तथा सूत्रार्थवाक्यार्थात् जानताप्यात्मलक्षाण. । नास्वावयति मिथ्यात्वकर्मणो रसपाकतः ॥२७ बाह्यरूपसे पूर्णरूपसे पालन करते हैं तथापि उन्हे अपने शुद्ध आत्माका अनुभव नही होता इसलिए वे अपने परिणामोके द्वारा सम्यग्ज्ञानसे रहित ही होते हैं ॥१८॥ यहाँपर कदाचित् कोई यह शका करे कि ऐसे मिथ्यादृष्टि मुनिको जो ग्यारह अगका ज्ञान होता है वह केवल पाठमात्र होता है उसके अर्थोंका ज्ञान उसको नहीं होता । परन्तु यह शका करना भी ठीक नहीं है क्योकि शास्त्रोमे यह कथन आता है कि ऐसे मिथ्यादृष्टि मुनियोके उपदेशसे अन्य कितने ही भव्य जीवोको सम्यग्दर्शनपूर्वक सम्यग्ज्ञान प्रगट हो जाता है अर्थात् उनके उपदेशको सुनकर कितने ही भव्यजीव अपने आत्मस्वरूपको पहचानने लगते हैं उन्हे अपने शुद्ध आत्माका अनुभव हो जाता है और वे रत्नत्रय प्राप्तकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ।।१९।। इससे सिद्ध होता है कि ऐसे मिथ्यादृष्टि मुनियोके ग्यारह अगोका ज्ञान पाठ मात्र भी होता है और उस पाठके सब अर्थोंका ज्ञान भी होता है । उस ज्ञानमे श्रद्धान होता है, प्रतीति होती है, रुचि होती है और पूर्ण क्रिया होती है ।।२०।। इतना सब होनेपर भी विद्वानोको उस ज्ञानमे या श्रद्धानमे अथवा क्रियामे यथार्थपनेको शका नही करनी चाहिये। भावार्थ-ऐसे ऊपर लिखे मिथ्यादृष्टि मुनियोका वह ज्ञान श्रद्धान या आचरण यथार्थ होता है ऐसी शका भी नही करनी चाहिये क्योकि ऐसे मिथ्यादृष्टि मुनियोंके जीव अजीव आदि पदार्थोके ज्ञान या श्रद्धानके यथार्थ होनेकी सम्भावना भी नही होती है । भावार्थ-ऐसे मिथ्यादृष्टि मुनियोका ज्ञान श्रद्धान या आचरण आदि सब मिथ्या ही होता है यथार्थ या सम्यक् नही होता ॥२१॥ ग्यारह अंगोको जाननेवाले ऐसे मिथ्यादृष्टि मुनियोके ज्ञानमे प्रत्यक्ष ज्ञानके द्वारा जानने योग्य कोई ऐसी विशेषता होती है जिससे इतना ज्ञान होनेपर भी वह ज्ञान वास्तवमे मिथ्याज्ञान कहलाता है ॥२२॥ इसमे इतना और समझ लेना चाहिये कि यद्यपि ऐसा मिथ्यादृष्टि-मुनि जीवादिक पदार्थोंकी परीक्षा कर सकता है तो भी उसके शुद्ध आत्माकी अनुभूति कभी नही होती ॥२३॥ अथवा स्वानुभूतिका अविरोधी जो एकादशाग सूत्रपाठ है वह बना रहे, परन्तु परीक्षाकी योग्यतासे और बलवान हेतुसे यह देखा जाता है कि पाठमात्र ज्ञानसे और अनुभवमे प्रत्यक्ष विशेषता या भेद है तथा दृष्टान्तसे भी यही बात सिद्ध होती है जैसा कि आगे दिखलाते हैं ॥२४-२५।। जिस प्रकार कोई वैद्य दूसरेके उपदेशके वाक्योसे दूसरेके शरीरमे होनेवाले रोगोके खोको जानता है परन्तु वह उन दु खोका अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि पुरुष शास्त्रोमे कहे हुए वाक्योंके अनुसार आत्माके स्वरूपको जानता है तथापि मिथ्यात्वकमके उदय लाटीसहिता ८१ ? सिद्धमेतावताऽप्येतन्मिथ्यादृष्टे क्रियावत । एकादशाङ्गपाठेऽपि ज्ञानेऽन्यज्ञानमेव तत् ॥२८ न चाशङ्कयं क्रियामत्रे नानुरागोऽस्य लेशतः । रागस्य हेतुसिद्धत्वाद्विशुद्धस्तत्र सम्भवात् ॥२९ सूत्राद्विशुद्धिस्थानानि सन्ति मिथ्यादृशि क्वचित् । हेतोश्चारित्रमोहस्य रसपाकस्य लाघवात् ॥३० ततो विशुद्धिससिद्धेरन्यथानुपपत्तितः । मिथ्यादृष्टेरवश्यं स्यात्सद्वतेष्वनुरागिता ॥३१ तत. क्रियानुरागेण क्रियामानाच्छुभास्त्रवात् । सद्वतस्य प्रभावात्स्यादस्य वेयकं सुखम् ॥३२ किन्तु कश्चिद्विशेषोऽस्ति जिनदृष्टो यथागमात् । क्रियावानपि येनायमचारित्री प्रमाणितः ॥३३ सम्यग्दृष्टस्तु तत्सर्वं यथाणुव्रतपञ्चकम् । महाव्रतं तपश्चापि श्रेयसे चामृताय च ॥३४ अस्ति वा द्वादशाङ्गादिपाठस्तज्ज्ञानमित्यपि । सभ्यग्ज्ञानं तदेवैकं मोक्षाय च दृगात्मनः ॥३५ एवं सम्यक् परिज्ञाय श्रद्धाय श्रावकोत्तमै । सम्पदर्थमिहामुत्र कर्तव्यो व्रतसंग्रह ॥३६ उसका आस्वादन या अनुभव नहीं कर सकता ।।२६-२७। इससे सिद्ध होता है कि अणुव्रत या महाव्रत क्रियाओको पालन करनेवाले इस मिथ्यादृष्टिका ज्ञान यद्यपि ग्यारह अक तकका ज्ञान है तथापि शुद्ध आत्माके अनुभवके विना वह ज्ञान अज्ञान ही कहलाता है ।।२८।। यहाँपर कदाचित् कोई यह शका करे कि मिथ्यादृष्टिके व्रतोके पालन करने रूप क्रियाओमे लेशमात्र भी अनुराग नही होता होगा? सो भी ठीक नही है क्योकि मिथ्यादृष्टिके व्रतोमे अनुराग होना हेतुपूर्वक सिद्ध हो जाता है तथा व्रतोमे अनुराग होनेका हेतु उसके आत्मामे विशुद्धिका होना है ॥२९॥ मिथ्यादृष्टि पुरुषके भी आत्माको विशुद्धि होती है इसका कारण यह है कि कभी-कभी मिथ्यादृष्टि- के भी चारित्रमोहनीय कर्मका उदय मन्द होता है तथा चारित्रमोहनीय कर्मके मन्द उदय होनेसे उस मिथ्याष्टिके भी कितने ही विशुद्धिके स्थान हो जाते हैं ऐसा शास्त्रोमे स्पष्ट उल्लेख मिलता है ॥३०॥ यह नियम है कि मात्माकी विशुद्धि मोहनीय कर्मके मन्द उदयसे होती है। मोहनीय कर्मके मन्द उदय हुए विना आत्माकी विशुद्धि कभी नही होती। मिथ्याष्टिके चारित्रमोहनीय कर्मका मन्द उदय होता है इसलिए उसके आत्मामे विशुद्धि होना अनिवार्य है क्योकि जहाँ-जहाँ चारित्रमोहनीय कर्मका मन्द उदय होता है वहाँ-वहाँ विशुद्धि अवश्य होती है और जहाँ-जहाँ आत्माकी विशुद्धि होती है वहाँ-वहाँ व्रतोमे अनुराग अवश्य होता है। इस प्रकार मिथ्यादृष्टि पुरुषके भी चारित्रमोहनीय कर्मका मन्द उदय होता है, मोहनीयकर्मके मन्द उदय होनेसे आत्माकी विशुद्धि होती है और आत्माकी विशुद्धि होनेसे उसके व्रतोमे अनुराग होता है ॥३१॥ इस प्रकार मिथ्यादृष्टि पुरुषके व्रतरूप क्रियाओके पालन करनेमे अनुराग हो जाता है । व्रत्तोमे अनुराग होनेसे वह क्रियारूप व्रतोको पालन करता है तथा व्रतरूप क्रियाओको पालन करनेसे शुभ कर्मोका आस्रव होता है। इस प्रकार श्रेष्ठ व्रतोके पालन करनेसे उस मिथ्यादृष्टि पुरुषको भी नव वेयकतकके सुख प्राप्त होते हैं ॥३२॥ इतना सब होनेपर भी मिथ्यादृष्टिमे कोई ऐसी विशेषता होती है जिसको भगवान् अरहन्तदेव ही देखते हैं अथवा वह विशेषता शास्त्रोसे जानी जाती है। उस विशेषताके कारण ही महावत आदि व्रतोकी पूर्ण क्रियाओको पालन करता हुआ भी वह चारित्र-रहित कहलाता है ।।३३॥ किन्तु सम्यग्दृष्टि-पुरुषके उस दर्शनमोहनीय कर्मका अभाव हो जाता है इसलिए उसके पांचो अणुव्रत, पांचो महावत और बारह प्रकारका तप आदि सब आत्माका कल्याण करनेवाला होता है और परम्परासे मोक्ष प्राप्त करनेवाला होता है ॥३४॥ अथवा यो कहना चाहिये कि सम्यग्दृष्टि पुरुषके जो द्वादशागका पाठ है अथवा उसका ज्ञान है वह सब सम्यग्ज्ञान कहलाता है और वह सम्यग्ज्ञान अकेला ही मोक्षका कारण होता है ॥३५।। इस प्रकार उत्तम श्रावकोको ११ ८२ श्रावकाचार-संग्रह सम्यग्दृशाऽथ मिथ्यात्वशालिनाऽप्यथ शक्तितः । अभव्येनापि भव्येन कर्तव्य व्रतमुत्तमम् ॥३७ यत पुण्यक्रिया साध्वी क्वापि नास्तीह निष्फला । यथापात्रं यथायोग्यं स्वर्गभोगादिसरफला ॥३८ पारम्पर्येण केषांचिदपवर्गाय सक्रिया । पञ्चानुत्तरविमाने मुदे वेयकादिषु ॥३९ केषांचित्कल्पवासाविधेयसे सागरावधि । भावनादित्रयेपूच्चै सुधापानाय जायते ॥४० मानुषाणां च केषाञ्चितीर्थकरपदाप्तये । चक्रित्वार्यार्द्धचक्रित्वपदसम्प्राप्तिहेतवे ॥४१ उत्तमभोगभूषूच्चे सुखं कल्पतरूद्भवम् । एतत्सर्वमहं मन्ये श्रेयसः फलितं महत् ॥४२ सत्कुले जन्म वीर्घायुर्वपुर्गाढं निरामयम् । गृहे सम्पदपर्यन्ता पुण्यस्यैतत्फल विदु ॥४३ साध्वी भार्या कुलोत्पन्ना भर्तुश्छन्दानुगामिनी । सूनव पितुराज्ञाया मनागचलिताशयाः ॥४४ सधर्मभ्रातृवर्गाश्च सानुकूलाः सुसंहता । स्निग्धाश्चानुचरा यावदेतत्पुण्यफल जगु ॥४५ जैनधर्म प्रतीतिश्च सयमे शुभभावना । ज्ञानशक्तिश्च सूत्रार्थे गुरवश्चोपदेशका ॥४६ अच्छी तरह समझकर और उसपर पूर्ण यथार्थ श्रद्धान रखकर इस लोक और ककी विभूतियोको प्राप्त करनेके लिये व्रतोका सग्रह अवश्य करना चाहिये ॥३६|| इसलिए सम्यग्दृष्टिको या मिथ्यादृष्टिको, भव्य जीवको अथवा अभव्य जीवको सबको अपनी शक्तिके अनुसार उत्तम व्रत अवश्य पालन करने चाहिये ॥३७|| इसका भी कारण यह है कि पुण्य प्राप्त करनेवाली व्रतरूप श्रेष्ठक्रिया कभी निष्फल नही होती। व्रत पालन करनेवाला जैसा पात्र हो और जैसी योग्यता रखता हो उसीके अनुसार उसे स्वर्गादिकके भोगोपभोग रूप उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥३८॥ इन्हीं महाव्रतादिक व्रतरूप क्रियाओके पालन करनेसे कितने ही जीवोको परम्परासे मोक्ष प्राप्त हो जाती है अथवा नव अवयकोके सुख वा विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित, सर्वार्थसिद्धि इन पच अनुत्तर विमानोंके सुख प्राप्त होते हैं ॥३९॥ अथवा कितने ही जीवोंको सोलह स्वर्गाके सुख प्राप्त होते हैं। वहाँपर वे सागरोपर्यन्त इन्द्रियजन्य सुखोका अनुभव करते रहते हैं और अमृतपान किया करते हैं तथा कितने ही जीव उन व्रतोंके प्रभावसे भवनवासी व्यन्तर ज्योतिष्क देवोमे उत्पन्न होकर अपनी आयुपर्यन्त अमृतपान किया करते हैं ।।४०॥ उत्तम व्रत पालन करनेवाले सम्यग्दृष्टि पुरुषोको मनुष्य पर्यायमे भी तीर्थंकर पद प्राप्त होता है, चक्रवर्ती पद प्राप्त होता है, अथवा अर्द्धचक्रवर्ती पद प्राप्त होता है ॥४१॥ अथवा व्रत पालन करनेसे उत्तम भोगभमिमे कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न हुए उत्तमोत्तम सुख प्राप्त होते हैं ऐसे-ऐसे महाफलोका प्राप्त होना या अनुक्रमसे समस्त फलोका प्राप्त होना आदि सब व्रत पालन करने रूप श्रेष्ठ क्रियाओका ही फल है ऐसा ग्रन्थकार मानते हैं ॥४२॥ श्रेष्ठ कुलमे जन्म होना, बड़ी आयुका प्राप्त होना, नीरोग और बलवान् शरीर प्राप्त होना और घरमे अपार लक्ष्मीका प्राप्त होना आदि सब व्रत करनेसे प्राप्त हुए पुण्यका ही फल समझना चाहिए ।।४३॥ उत्तम कुलमे उत्पन्न हुई, पतिके आज्ञानुसार चलनेवालो और अच्छे स्वभाववालो स्त्रीका प्राप्त होना पुण्यका ही फल समझना चाहिये। पिताकी आज्ञासे जिनका मन किंचित्मात्र भी चलायमान न हो ऐसे पुत्रोका प्राप्त होना भी पुण्यका फल कहा जाता है । अपने धर्मको अच्छी तरहसे पालन करनेवाले, अपने अनुकूल रहनेवाले और सब मिलकर इकट्ठे रहनेवाले ऐसे भाई-बन्धुओका प्राप्त होना भी पुण्यका फल कहा जाता है तथा अपनेपर सदा प्रेम और भक्ति करनेवाले सेवकोका प्राप्त होना भी पुण्यका फल कहा जाता है। इस प्रकार सुख देनेवाली सब कुटुम्बकी सामग्रीका प्राप्त होना व्रत पालन करने रूप पुण्यका फल कहा जाता है ॥४४-४५|| जैनधर्ममे श्रद्धान होना, सयम - लाटीसंहिता समिणः सहायाश्च स्पष्टाक्षरं वाक्पाटवम् । सौष्ठवं चक्षुरादीनां मनीषा प्रतिभान्विता ॥४७ सुयश सर्वलोकेऽस्मिन् शरविन्दुसमप्रभम् । शासनं स्यादनुल्लंघ्यं पुण्यभाजां न संशयः ॥४८ विजय स्यादरिध्वंसात्प्रतापस्तच्छिरोनति । दण्डाकर्षोऽप्यरिभ्यश्च सर्व सत्पुण्यपाकतः ॥४९ चक्रित्वं सन्नृपत्वं वा नहि पुण्याहते क्वचित् । अकस्मादबलालाभो धनलाभोऽप्यचिन्तनात् ॥५० ऐश्वयं च महत्त्वं व सौहादं सर्वमान्यता । पुण्यं विना न कस्यापि विद्याविज्ञानकौशलम् ॥५१ अथ किं बहुनोक्तेन त्रैलोक्येऽपि च यत्सुखम् । पुण्यायतं हि तत्सर्वं किञ्चित्पुण्यं विना नहि ॥५२ तत्प्रसीदाधुना प्राज्ञ मद्वच शृणु फामन । सर्वामयविनाशाय पिब पुण्यरसायनम् ॥५३ प्रोवाच फामनो नाम्ना श्रावक सर्वशास्त्रवित् । पुण्यहेतौ परिज्ञाते तत्कर्तुमपि चोत्सहेत् ॥५४ शृणु श्रावक पुण्यस्य कारणं वच्मि साम्प्रतम् । देशतो विरतिर्नाम्नाणुवतं सर्वतो महत् ॥५५ ननु विरतिशब्दोऽपि साकांक्षो व्रतवाचक । केभ्यश्च कियन्मात्रेभ्यः कतिभ्य सा वदाध न ॥५६ धारण करनेके लिये शुभ भावनाओका होना, सूत्रोका या समस्त जैनशास्त्रोका अर्थ समझने योग्य या दूसरोको प्रतिपादन करने योग्य अपने ज्ञानकी शक्तिका प्राप्त होना, रत्नत्रयका उपदेश देनेवाले गुरुका सहवास प्राप्त होना, धर्मात्मा पुरुषोका साथ होना अथवा धर्मात्मा पुरुषोंकी सहायता प्राप्त होना, स्पष्ट अक्षरोका उच्चारण होना, वचनोके कहनेकी चतुरता प्राप्त होना, नेत्र, नाक, कान आदि इन्द्रियोकी सुन्दरता प्राप्त होना, प्रतिभाशाली बुद्धिका प्राप्त होना, शरद ऋतुके चन्द्रमाके समान अत्यन्त निर्मल और समस्त लोकमे व्याप्त होनेवाला सुयशका मिलना और जिसका कोई भी उल्लघन न कर सके ऐसे शासनका प्राप्त होना आदि सब पुण्यवान् पुरुषोको ही प्राप्त होता है इसमे सन्देह नही है ॥४६-४८॥ बड़े-बडे महायुद्धोमे समस्त शत्रुओको नाशकर विजय प्राप्त करना, वे सब शत्रुराजा अपना मस्तक झुकाकर नमस्कार करने लगें ऐसा प्रताप प्राप्त होना और समस्त शत्रु राजाओसे दण्ड वसूल करना आदि सब श्रेष्ठ पुण्यके ही फलसे प्राप्त होता है ।।४९॥ पुण्य कर्मके उदयके विना न तो कभी चक्रवर्ती पद प्राप्त होता है और न कभी श्रेष्ठ राजा होता है। अकस्मात् स्त्रीका प्राप्त हो जाना, विना ही इच्छाके धन प्राप्त हो जाना, ऐश्वर्य या विभूतियोका प्राप्त होना, बडप्पन प्राप्त होना, सबके साथ मित्रता प्राप्त होना, समस्त लोकमे माननीय उत्तमपद प्राप्त होना, श्रेष्ठ विद्या, विज्ञान और कुशलता प्राप्त होना आदि समस्त सुखकी सामग्री विना पुण्यके किसीको भी प्राप्त नही होती है ।।५०-५१॥ बहुत कहनेसे क्या ? थोडेसेमे इतना समझ लेना चाहिये कि तीनो लोकोमे जितना भी सासारिक सुख है वह सब पुण्य कर्मके ही उदयसे प्राप्त होता है। विना पुण्यके किंचित्मात्र भी सुख प्राप्त नही हो सकता ॥५२॥ इसलिए हे बुद्धिमान् और विद्वान् फामन ! तू अब प्रसन्न हो और मेरी बात सुन ! तू अब ससारबन्धी समस्त रोगोको (ससारके दु खोको) दूर करनेके लिए पुण्यरूपी रसायन पो ॥५३॥ यह बात सुनकर समस्त शास्त्रोका जाननेवाला फामन नामका श्रावक कहने लगा कि पुण्यके कारणोको जान लेनेपर ही तो कोई भी श्रावक उसके करनेके लिए तैयार हो सकता है ।।५४।। इसके उत्तरमे ग्रन्थकार कहने लगे कि हे श्रावकोत्तम फामन । सुन । मैं अब आगे पुण्यके कारणोको बतलाता हूँ। पाँचो पापोका एकदेश त्याग करना अणुव्रत है और (उन्ही पाँचो पापोका) पूर्ण- रीतिसे त्याग करना महाव्रत है ॥५५॥ यह सुनकर फामन कहने लगा कि व्रतोको कहनेवाला ८४ श्रावकाचार-संग्रह हिसाया विरति प्रोक्ता तथा चानृत्यभाषणात् । चौर्याद्विरति ख्याता स्यादब्रह्मपरिग्रहात् ॥५७ एभ्यो देशतो विरतिगुहियोग्यमणुव्रतम् । सर्वतो विरति म मुनियोग्य महाव्रतम् ॥५८ ननु हिंसात्वं किं नाम का नाम विरतिस्तत । किं देशत्वं यथाम्नायाद् ब्रूहि मे वदतां वर ॥५९ हिंसा प्रमत्तयोगा यत्प्राणव्यपरोपणम् । लक्षणाल्लक्षिता सूत्र लमशः पूर्वसूरिभिः ।।६० प्राणाः पञ्चेन्द्रियाणीह वाग्मनोऽङ्गबलत्रयम् । नि श्वासोच्छ्वाससंज्ञ स्यादायुरेकं दशेति च ॥६१ उक्तं च- पञ्चवि इंदिय पाणा मण बचिकाएण तिण्णि बलपाणा। आणपाणप्पाणा आउगपाणेण हुंति वह पाणा ॥२६ एकाक्षे तत्र चत्वारो द्वीन्द्रियेयु षडेव ते । व्यक्षे सप्त चतुराक्षे विद्यन्तेऽष्टौ यथागमात् ॥६२ नवासंजिनि पन्नाक्षे प्राणाः संजिनि ते दश । मत्वेति किल छद्मस्थै कर्तव्यं प्राणरक्षणम् ॥६३ यह विरति शब्द सापेक्ष है। सो पहले तो यह बताना चाहिये कि किनका त्याग करना चाहिये, कितना त्याग करना चाहिये और कितनेका त्याग करना चाहिये। यह सब आज बतलाना चाहिये ।।५६|| ग्रन्थकार कहने लगे कि हिंसाका त्याग करना चाहिये, झूठ बोलनेका त्याग करना चाहिये, चोरीका त्याग करना चाहिये, अब्रह्म या कुशीलका त्याग करना चाहिये और परिग्रहका त्याग करना चाहिये ||५७|| इन पांचो पापोका एकदेश त्याग करना सो गृहस्थोंके धारण करने योग्य अणुव्रत कहलाता है तथा इन्ही पांचो पापोको पूर्णरीतिसे त्याग करना सो मुनियोंके धारण करने योग्य महाव्रत कहलाता है ॥५८॥ यह सुनकर फामन फिर पूछने लगा कि हिंसा किसको कहते हैं, विरति शब्दका क्या अर्थ है और एकदेश किसको कहते हैं। हे वक्ताओमे श्रेष्ठ । आचार्य परम्परासे चला आया इनका लक्षण मुझे बतलाइये ॥५९।। इस प्रश्नके उत्तरमे ग्रन्थकार कहने लगे कि प्रमादके योगसे प्राणोका व्यपरोपण करना, कषायके निमित्तसे प्राणोका वियोग करना हिंसा है । पहलेके आचार्योंने शास्त्रोमे इस हिंसाका स्वरूप अनेक प्रकार बतलाया है ॥६०॥ स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कणं ये पांच इन्द्रियाँ, मनोबल, वचनवल और कायवल ये तीन बल, श्वासोच्छ्वास और आयु ये दश प्राण कहलाते हैं ॥६१।। कहा भी है-पांचो इन्द्रियाँ प्राण हैं, मन, वचन, काय ये तीनो बल प्राण हैं, श्वासोच्छ्वास प्राण है और आयु प्राण है । इस प्रकार दस प्राण हैं ॥२६॥ इन प्राणोमेसे वृक्षादिक वा पृथ्वीकायादिक एकेन्द्रिय जीवोके एक स्पर्शन इन्द्रियप्राण, दूसरा कायबलप्राण, तीसरा श्वासोच्छ्वासप्राण और चौथा आयुप्राण इस प्रकार चार प्राण होते हैं। लट, शख आदि दोइन्द्रिय जीवोके छह प्राण होते हैं । स्पर्शन रसना दो इन्द्रियप्राण, कायवल वचनबल दो बलप्राण, आयु और श्वासोच्छ्वास ये छह प्राण होते हैं। चीटी चीटा खटमल आदि तेइन्द्रिय जीवोके सात प्राण होते हैं। स्पर्शन रसना घ्राण ये तीन इन्द्रियां, कायवल वचनवल ये दो बल, आयु और श्वासोच्छ्वास । भौंरा, मक्खो आदि चौइन्द्रिय जीवोके आठ प्राण होते हैं। स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु ये चार इन्द्रिया, कायवल वचनवल, आयु और श्वासोच्छ्वास । पानीके सर्प आदि असेनी पचेन्द्रिय जीवोंके नौ प्राण होते हैं। स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु कर्ण ये पांचो इन्द्रियाँ, कायबल, वचनवल, आयु और श्वासोच्छ्वास । मनुष्य, स्त्री, गाय, भैस, कबूतर, चिड़िया आदि सेनी पचेन्द्रिय जीवोंके मन भी होता है इसलिये उनके दशो प्राण होते हैं। इस ।

८५ लाटीसंहिता अौकाक्षादिजीवाः स्यु प्राणशब्दोपलक्षणात् । प्राणादिमत्त्वं जीवस्य नेतरस्य कदाचन ॥६४ प्रसङ्गादत्र दिग्मात्र वाच्यं प्राणिनि कायकम् । तत्स्वरूपं परिज्ञाय तद्रक्षां कर्तुमर्हति ॥६५ सन्ति जीवसमासास्ते संक्षेपाच्च चतुर्दश । व्यासादसंख्यभेदाश्च सन्त्यनन्ताश्च भावतः ॥६६ तत्र जीवो महीकाय सूक्ष्म स्थूलश्च स द्विधा । पर्याप्तापर्याप्तकाभ्यां भेदाभ्यां स द्विधाऽथवा ॥६७ प्रत्येकं तस्य भेदा' स्युश्चत्वारोऽपि च तद्यथा । शुद्धाभूर्भूमिजीवश्च भूकायो भूमिकायिक ॥६८ शुद्धा प्राणोज्झिता भूमिर्यथा स्यादग्यमृत्तिका । भूजीवोऽद्यैव भूमौ यो द्रागेष्यति गत्यन्तरात् ॥६९ भूरेव यस्य कायोऽस्ति यद्वानन्यगतिर्भुव । भूशरीरस्तदात्वेऽस्य स भूकाय इत्युच्यते ॥७० भूकायिकस्तु भूमिस्थोऽन्यगतौ गन्तुमुत्सुक । स समुद्घातावस्थायां भूकायिक इति स्मृतः ॥७१ एवमग्निजलादीनां भेदाश्चत्वार एव ते । प्रत्येकं चापि ज्ञातव्या सर्वज्ञाज्ञानतिक्रमात् ॥७२ प्रकार इन जीवोके प्राण होते है । यह सब समझकर गृहस्थ लोगोको प्राणोकी रक्षा करनी चाहिये ॥६२-६३।। यहाँपर प्राण शब्दसे एकेन्द्रिय वा दोइन्द्रिय आदि जोव समझने चाहिये। इसका भी कारण यह है कि ससारमे प्राणधारी जीव ही हैं, जीवोके ही प्राण होते है। जीवोके सिवाय अन्य किसी पदार्थके भी प्राण नही होते ॥६४॥ यहाँपर अहिंसा वा जीवोकी रक्षाका प्रकरण है इसलिये प्रसग पाकर सक्षेपसे जीवोके भेद बतलाते हैं क्योकि जीवोके भेदोको और उनके स्वरूपको जानकर ही श्रावक लोग उन जीवोकी रक्षा कर सकते है ॥६५।। यदि जीवोके अत्यन्त सोपसे भेद किये जायें तो चौदह होते हैं। यदि समस्त जीवोके विस्तारके साथ भेद किये जाये तो असख्यात भेद होते हैं तथा यदि भावोकी अपेक्षासे उन जीवोके भेद किये जायें तो अनन्त भेद हो जाते हैं ॥६६।। आगे चौदह जीवसमासोको या जीवोके चौदह भेदोको बतलाते हैं । जीवोके मूल भेद दो हैं—त्रस और स्थावर । उनमेसे स्थावर जीव पांच प्रकारके है-पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक । आगे सबसे पहले इन्ही स्थावर जीवोके भेद बतलाते हैं । पृथ्वी- कायिक जीवोके दो भेद है-स्थूल और सूक्ष्म तथा इन दोनोके भी दो-दो भेद है-एक पर्याप्तक और दूसरे अपर्याप्तक ॥६७॥ इन चार भेदोमेसे भी प्रत्येकके चार-चार भेद होते है-शुद्धपृथ्वी, पृथ्वीजीव, पृथ्वीकाय और पृथ्वीकायिक ॥६८।। जो पृथ्वी प्राणरहित है उसको शुद्ध पृथ्वी कहते हैं जैसे जली हुई मिट्टी। जो जीव किसी दूसरी गतिसे पृथ्वीमे आनेवाला है अर्थात् जिसने अन्य गति छोड दी है, दूसरी गतिका शरीर छोड दिया है और पृथ्वीकायिकमे उत्पन्न होनेवाला है जो पृथ्वीकायिकमे उत्पन्न होनेके लिये विग्रहगतिमे आ रहा है ऐसे जीवको पृथ्वीजीव कहते हैं ॥६९।। पृथ्वी ही जिसका शरीर है अयवा जो पृथ्वीकायमे विद्यमान है, पृथ्वीकायके सिवाय जिसकी और कोई गति नही है अथवा पृथ्वीरूप शरीरको जो धारण कर रहा है उसको पृथ्वीकाय कहते हैं ॥७०॥ तथा जो जीव अभी पृथ्वीकायमे विद्यमान है परन्तु पृथ्वीकायकी गतिको छोड़कर अन्य गतिमे जानेके लिए तैयार है तथा अन्य गतिमे जानेके लिए समुद्घात कर रहा है उसको पृथ्वी- कायिक कहते है ॥७१।। इसी प्रकार जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिके भी चार-चार भेद समझने चाहिए अर्थात् जल, जलजीव, जलकाय और जलकायिक ये चार जलके भेद हैं । अग्नि, अग्निजीव, अग्निकाय और अग्निकायिक ये चार अग्निके भेद है। वायु, वायुजीव, वायुकायिक, वायुकाय चार वायुके भेद हैं। वनस्पति, वनस्पतिजीव, वनस्पतिकाय और वनस्पतिकायिक ये चार वनस्पतिके भेद हैं। इन सब भेदोका स्वरूप भगवान् सर्वज्ञदेवकी आज्ञाके अनुसार जान लेना ये ८६ श्रावकाचार-संग्रह सूक्ष्मकर्मोदयाज्जाता सूक्ष्मा जीवा इतीरिता । सन्त्यघातिशरीरास्ते वन्जानलजलाविभि ॥७३ उक्तंच- णहि जेसि पडिखलणं पुढवीताराहि अग्गिवाराहि । ते हुति सुहमकाया इयरे पुण थूलकाया य ||२७ स्थूलकर्मोक्याज्जाताः स्थूला जीवा स्वलक्षणात् । सन्ति घातिशरीरास्ते वज्रानलजलादिभिः ॥७४ उक्तंच- घाविसरीरा थूला अधादिसरीरा हवे सुहमा ॥२८ किम्च स्थूलशरीरास्ते क्वचिचव क्वचिदाश्रिता । सूक्ष्मकायास्तु सर्वत्र शैलोक्ये घृतवद्घटे ॥७५ उक्तंच- आधारघरा पढमा सव्वत्य णिरन्तरा सुहमा ॥२९ प्रत्येक ते विधा प्रोक्ता केवलज्ञानलोचनैः । पर्याप्तकाश्चापर्याप्तास्तेषां लक्षणमुच्यते ॥७६ पर्याप्तको यथा कश्चिद्देवाद्गत्यन्तराच्च्युतः । अन्यतमा गति प्राप्य गृहीतुं वपुरुत्सुकः ॥७७ चाहिए ॥७२।। इनमेसे जो जीव सूक्ष्मनामकर्मके उदयसे उत्पन्न होते हैं उनको सूक्ष्म जीव कहते हैं। इन सूक्ष्म जीवोका वज्र, अग्नि, जल आदि किसी भी पदार्थसे कभी भी धात नही होता है ।।७३॥ कहा भी है-पृथ्वी तारे अग्नि जल आदि किसी भी पदार्थसे जिनका परिस्खलन नही होता अर्थात्मे जो न तो पृथ्वीसे रुकते हैं, न तारोसे टक्कर खाते हैं, न अग्निमे जलते हैं और न जलसे बहते हैं उनको सूक्ष्म जीव कहते हैं तथा जो जीव पृथ्वीसे रुक जाते हैं, तारोंसे टकराते हैं, अग्निसे जल जाते हैं और पानीमे बह जाते हैं उनको स्थूलकाय या स्थूल शरीरको धारण करनेवाले जीव कहते हैं ॥२७॥ जो जीव स्थूलनामके नामकर्मके उदयसे उत्पन्न होते हैं उनको स्थूल जीव कहते हैं क्योकि स्थूलका जो लक्षण है वह उनमे अच्छी तरह सघटित होता है तथा वन अग्नि जल आदिसे उनरी जीवोका शरीर पाता जाता है ।।७४|| कहा भी है-स्थूल जीव उनको कहते हैं जिनका शरीर धाता जाय और सूक्ष्म जीव उनको कहते हैं जिनका शरीर किसीसे भी न धाता जाय ॥२८॥ इस प्रकार स्थूल और सूक्ष्म दोनो प्रकारके जीवोका लक्षण बतलाया है। इसमे भी इतना भेद है कि जो स्थूल शरीरको धारण करनेवाले जीव हैं वे सब जगह नहीं हैं किन्तु कही-कहीपर किसी न किसीके आश्रय रहते हैं तथा जो सूक्ष्म जीव हैं वे इन तीनो लोकोमे सब जगह इस प्रकार भरे हुए हैं जैसे घडेमे घी भरा रहता है ।।७५॥ कहा भी है-स्थूल जीव किसीके आधारपर रहते हैं और सूक्ष्म जीव इन तीनो लोकोमे सब जगह और सदैव भरे रहते हैं ।।२९|| अब आगे इनके पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक भेद बतलाते हैं। केवलज्ञानरूपी नेत्रोको धारण करनेवाले भगवान् अरहन्तदेवने उन स्थूल और सूक्ष्म दोनो प्रकारके जीवोमेसे प्रत्येक जीवके दो दो मेद बतलाये हैं-एक पर्याप्तक और दूसरे अपर्याप्तक । अब उनका लक्षण कहते हैं ॥७६।। जो जीव दैवयोगसे वा आयु पूर्ण हो जानेसे किसी भी एक गतिको छोड कर दूसरी किसी भी गतिमे आकर उत्पन्न होता है तब वह जीव वहाँपर शरीर धारण करनेका प्रयत्न करता है तथा लाटीसंहिता ८७ उदयात्पर्याप्तकस्य कर्मणो हेतुमुत्तरात् । सम्पूर्ण वपुरादत्ते निष्प्रत्यूहतयाऽसुमान् ॥७८ अपर्याप्तकजीवस्तु नाश्नुते वपुःपूर्णताम् । अपर्याप्तकसंजस्य तद्विपक्षास्य पाकतः ॥७९ अष्टादशैकभागेऽस्मिन् श्वासस्यैकस्य मात्रया। आयुरस्य जघन्यं स्यादुत्कृष्टं तावदेव हि ॥८० क्षुद्रभवायुरेतद्वा सर्वजघन्यमागमात् । तद्वदायुविशिष्टास्ते जीवाश्चातीव दुःखिताः ||८१ उक्तं च- तिणि सया छत्तीसा छावट्ठि सहस्स वार मरणाहं । अन्तोमुत्तकाले तावदिया चेव खुद्दभवा ॥३० अत्रापर्याप्तशब्देन लब्ध्यपर्याप्तको मत । अपर्याप्त कजीवस्तु स्यात्पर्याप्तक एव हि ॥८२ एवं ज्ञेयं जलादीनां लक्ष्म नो देशितं मया । ग्रन्थगौरवभीतेर्वा पुनरुक्तभयावपि ॥८३ किञ्चिद्भूम्यादिजीवानां चतुर्णां प्रोक्तलक्ष्मणाम् । धातुचतुष्कमेतेषां संज्ञा स्याज्जिनशासनात् ॥८४ अथ धातुचतुष्काङ्गाः सम्भवन्त्यप्रतिष्ठिताः । साधारणनिकोताङ्गस्तैर्वनस्पतिकायिकै ॥८५ उक्तंच- पुढवी आइचउण्हं नित्थयराहारदेवणिरयगा। अपदिद्विदा णिगोदै पदिट्ठिदङ्गा हवे सेसा ॥३१ पर्याप्तकनामा नामकर्मके उदयसे और सब तरहकी विघ्नवाधाओके अभाव होनेसे वह जीव शरीर बननेके लिए प्राप्त हुई पुद्गलवर्गणाओमे शरीर बननेकी शक्ति उत्पन्न करता है। जब उसकी वह शरीर बननेकी शक्ति पूर्ण हो जाती है तबसे वह पर्याप्तक कहलाता है और अपनी आयुपर्यन्त पर्याप्तक ही रहता है |७७-७८॥ अपर्याप्तक जीवके अपर्याप्तक नामके नामकर्मका उदय होता है । यह अपर्याप्तक नामकर्म पर्याप्तक नामकर्मका विरोधी है। उसी पर्याप्तकनामा नामकर्मके विरोधी अपर्याप्तकनामा नामकर्मके उदयसे यह जीव शरीर बननेकी शक्तिको पूर्ण नही कर पाता है। शरीर बननेकी शक्ति पूर्ण होनेके पहले ही आयु पूर्ण हो जानेके कारण मर जाता है ऐसे जीवको अपर्याप्तक कहते हैं ।।७९।। इस अपर्याप्तक जीवकी आयु एक श्वासके अठारहवें भाग प्रमाण होती है । यही उसकी जघन्य आयु है और यही उत्कृष्ट आयु है ।।८०॥ शास्त्रोमे बतलाया है कि यह आयु सबसे जघन्य आयु है और क्षुद्रभव धारण करनेवालोकी होती है। इस प्रकारकी आयुको धारण करनेवाले अर्थात् क्षुद्रभव धारण करनेवाले जीव अत्यन्त दुखी होते हैं ।।८।। कहा भी है-यह जीव अपर्याप्तनामकर्मके उदयसे एकेन्द्रियादि सत्रह स्थानोमे एक अन्त- मुहूर्त समयमे छयासठ हजार तीन सौ छत्तीस बार जन्म-मरण करता है और इतने ही क्षुद्रभव धारण करता है ॥३०॥ यहाँ पर अपर्याप्त शब्दसे लब्ध्यपर्याप्तक समझना चाहिए क्योकि जो निर्वृत्यपर्याप्तक है वह तो नियमसे पर्याप्तक होता ही है अथवा निवृत्यपर्याप्तकको पर्याप्तक ही समझना चाहिए, क्योकि उसके पर्याप्तिनामा नामकर्मका उदय रहता है अपर्याप्तिनामा नामकर्मका उदय नही रहता ।।८२।। जिस प्रकार ये पृथ्वीकायके भेद बतलाए हैं उसी प्रकार जलकायिक अग्निकायिक वायुकायिक वनस्पतिकायिकके भी भेद समझ लेना चाहिए। ग्रन्थ बढ जानेके भयसे अथवा पुनरुक्त दोषके भयसे हमने उन सबका लक्षण जुदा नही कहा है ।।८३।। जिनका लक्षण पर कहा जा चुका है ऐसे पृथ्वी जल अग्नि वायु इन चारोकी ही जेनशास्त्रोमे धातुसज्ञा कही गई है ।।८४॥ ये चारो ही धातु अप्रतिष्ठित होते हैं। इनमे वनस्पतिकायिकके साधारण निगोदिया जीव नही रहते ॥८५॥ कहा भी है-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, तीर्थंकरोका शरीर, आहारक शरीर, देवोका शरीर

८८
श्रावकाचार-पग्रह
फिन्तु धातुचतुष्कस्य पिण्डे सूच्यामाग्रके । एकाक्षा सन्त्यसंख्याता नानन्ता नापि सस्यका ||८६
अयमयं पृथिव्यादिकाये यत्नो विधीयताम् । तद्वधादिपरित्यागवृत्त्यभावेऽपि श्रावफे ॥८७
अनन्तानन्तजीवास्तु स्युर्वनस्पतिकायिका पूर्ववत्तेऽपि सूक्ष्माश्च वादराश्चेति भेदत ॥८८
पर्याप्तापप्तिकाश्च प्रत्येक चेति ते द्विधा । प्रत्येका साधारणाश्च विज्ञया जैनशासनात् ॥८९
सूक्ष्मवादरपर्याप्तापर्याप्ताना च लक्षणम् । ज्ञातव्य यत्प्रागव निर्दिष्ट नातिविस्तरात् ॥९०
साधारणा निकोताश्च सन्त्येवैकार्यवाचका' । घृतघटवद्युः सुधमर्लोकोऽयं सभृतोऽखिल ॥९१
आधाराधेयहेतुत्वाद् बादरा स्यु कचित्याचित् । तेऽपि प्रतिष्ठिता केचिन्निकोतश्चाप्रतिष्टिता ॥१२
तैराश्रिता यथा प्रोक्ता प्रागितो मूलकादय । अनाधिता ययतैश्च ग्रोहयश्वणकादय ॥९३
तत्रैकस्मिन् शरीरेऽपि सन्त्यनन्ताश्य प्राणिन । प्रत्येकाश्च निकोताश्च नाम्ना सूत्रेषु सजिता ॥९४
उक्तंच-
एय णिगोयसरोरे जोवा दस्वप्पमाणदो दिट्ठा । सिद्धेहि अणतगुणा सम्वेण वितीदकालेण ॥३२
और नारकियोका शरीर इन आठ स्थानोमे निगोदिया जीव नही रहते हैं। इनके सिवाय वाकी
जोवोके शरीर निगोदगगिसे भरे हुए प्रतिष्ठित समशने चाहिए ॥३१॥
इस प्रकार यद्यपि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु इन चारो धातुओमे निगोदिया जीव नही रहते
तथापि इन चारो ही धातुओका पिंड जितना सुईके अग्रभागपर आता है उतने धातुओके पिंडमे
असख्यात एकेन्द्रिय जीव होते है । उन जीवोकी सख्या न तो मख्यात होती है और न अनन्त होती
है किन्तु मसख्यात ही होती है ।।८६।। इस सबके कहनेका अभिप्राय यह है कि यद्यपि श्रावकोके
स्थावर जीवोको हिंसाका त्याग नहीं होता तथापि उनको पृथ्वीकायिकादि जीवोकी रक्षाका
प्रयत्न अवश्य करते रहना चाहिए ।।८७॥ वनस्पतिकायिक जोव अनन्तानन्त होते हैं तथा उनके
भी पहलेके समान स्थूल और सूक्ष्म ऐसे दो भेद होते हैं ।।८८॥ इनमे भी प्रत्येकके दो-दो भेद होते
हैं-एक पर्याप्तक और दूसरा अपर्याप्तक । जैनशास्त्रोमे इन सबके दो-दो भेद बतलाए हैं-एक
प्रत्येक और दूसरे साधारण ||८९॥ इनमेसे सूक्ष्म वादर (स्थूल) पर्याप्तक और अपर्याप्तकोका
लक्षण पहले बता चुके हैं, इनका जो लक्षण पहले सक्षेपसे बतलाया है वही यहाँपर समझ लेना
चाहिये ॥९०॥ साधारण और निगोद ये दोनो ही शब्द एक ही अर्थको कहनेवाले हैं। जो निगोद-
का अर्थ है वही साधारणका अर्थ है। ऐसे सूक्ष्म निगोदिया जीवोसे यह समस्त लोकाकाश इस
प्रकार भरा हुआ है जैसे घोका घडा घीसे भरा रहता है ॥९१॥ स्थल वनस्पतिकायिक जीव इस
लोकाकाशमे आधाराधेयरूपसे कही-कहीपर रहते हैं। तथा वे स्थूल जीव अन्य कितने ही जीवोंके
आधारभूत भी होते हैं और उन स्थूल जीवोमेसे कितने तो ऐसे हैं जो निगोदिया जीवोसे भरे
हुए प्रतिष्ठित हैं और कितने ही ऐसे हैं जो निगोदिया जीवोसे रहित अप्रतिष्ठित हैं ॥९२।। उन
अनन्तानन्त निगोदिया जीवोसे आश्रित रहनेवाले वनस्पतिकायिक स्थूल जीव मूली अदरक
आदिक हैं जिनका स्वरूप पहले अच्छी तरह बतला चुके हैं तथा जो अनन्तानन्त निगोदिया
जीवोसे आश्रित नही हैं अर्थात् जिनमे मनन्तानन्त निगोदिया जीव नही हैं वे एक स्थूल वनस्पति-
कायिक गेहूँ चना आदि हैं ॥९३॥ उन निगोदियोके एक शरीरमे भी अनन्त जीव होते हैं जो कि
आगम-सूत्रोमे प्रत्येक और निगोद नामसे कहे गये हैं ॥९४॥
कहा भी है-निगोदिया जीवोके एक शरीरमे जो अनन्तानन्त जीव होते हैं उनकी संख्या
व्यतीत अनादिकालसे तेथा आज तक जितने सिद्ध हुए हैं उनकी सख्यासे अनन्तगुणी है ॥३२॥

८९ लाटीसहिंता फलमेतावदुक्तस्य तद्वोघस्याथवार्थत । यत्नस्तद्रक्षणे कार्यः श्रावकैर्दु खभीरुभिः ।।९५ उक्तमेकाक्षजीवाना सक्षेपाल्लक्षणं यथा । साम्प्रतं द्वीन्द्रियादीनां त्रसानां वच्मि लक्षाणम् ॥९६ तल्लक्षण यथा सूत्रे त्रसा स्युर्तीन्द्रियादय । पर्याप्तापर्याप्तकाश्च प्रत्येकं ते द्विधा मताः ॥९७ कृमयो द्वीन्द्रिया प्रोक्तास्त्रीन्द्रियाश्च पिपीलिकाः । प्रसिद्धसंज्ञकाश्चैते भ्रमराश्चतुरिन्द्रिया ॥९८ पञ्चेन्द्रिया द्विधा ज्ञेया. सज्ञिनोऽसंज्ञिनस्तथा । सज्ञिनस्तत्र पञ्चाक्षा देवनारकमानुषाः ॥९९ तिर्यञ्चस्तत्र पञ्चाक्षा संज्ञिनोऽसंज्ञिनस्तया । प्रत्येकं ते द्विधा ज्ञेया सम्मूच्छिमाश्च गर्भजाः ॥१०० लब्ध्यपर्याप्तकास्तत्र तिर्यञ्चो मनुजाश्च ये । असंज्ञिनो भवन्त्येव सम्मच्छिमा न गर्भजा ॥१०१ इति संक्षेपतोऽप्यत्र जीवस्थानान्यचोकथत् । तत्स्वरूपं परिज्ञाय कर्तव्या करुणा जनैः ॥१०२ व्यपरोपणं प्राणानां जीवाद्विश्लेषकारणम् । नाशकारणसामग्री-सांनिध्यं वा बहिष्कृतम् ॥१०३ अर्थात्तज्जीवद्रव्यस्य नाशो नैवात्र दृश्यते । किन्तु जीवस्य प्राणेभ्यो वियोगो व्यपरोपणम् ॥१०४ ननु प्राणवियोगोऽपि स्यादनित्यः प्रमाणसात् । यत प्राणान्तरान् प्राणी लभते नात्र संशयः ॥१०५ इस सब कथनके कहनेका-जाननेका और उसके अर्थको समझनेका यही फल है कि जो श्रावक ससारपरिभ्रमणके दु खोसे डरते हैं उनको इन समस्त जीवोकी रक्षा करनेका प्रयत्न करना चाहिये ।।९५।। इस प्रकार सक्षेपसे एकेन्द्रिय जीवोका लक्षण बतलाया। अब आगे दोइन्द्रिय तेइन्द्रिय आदि त्रसजीवोका लक्षण कहते हैं ।।९६|| शास्त्रोमे त्रसजीवोंका लक्षण 'द्वीद्रियादयस्त्रसा' अर्थात्-'दो इन्द्रियको आदि लेकर त्रस हैं' ऐसा कहा है। उन सब सजीवोमेसे प्रत्येकके दो दो भेद हैं-एक पर्याप्तक और दूसरा अपर्याप्तक ।।९७॥ लट, गेंडुए आदि जीव दोइन्द्रिय कहलाते हैं, चीटी, चीटा, खटमल आदि तेइन्द्रिय जीव कहलाते हैं तथा भौंरा, मक्खी ततैया, बर्र, लैंप वा दीपकपर आनेवाले छोटे छोटे उडनेवाले जानवर सब चौइन्द्रिय कहलाते हैं, ये सब जीव ससारमे प्रसिद्ध हैं ॥९८।। पचेन्द्रिय जीवोके दो भेद हैं-एक सैनी और दूसरे असैनी । उनमेसे देव, नारकी और मनुष्य सब सैनी पचेन्द्रिय कहलाते हैं ॥९९।। ससारमे जितने पचेन्द्रिय तिर्यंच हैं वे दो प्रकारके हैं-एक सैनी और दूसरे असैनी। वे दोनो ही प्रकारके तिर्यच दो दो प्रकारके हैं एक गर्भसे उत्पन्न होनेवाले गर्भज और दूसरे सम्मूर्छन ॥१००॥ इनमे जो लब्ध्यपर्याप्तक तिर्यच हैं वे सब असेनी होते हैं और जो लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य है वे सब सम्मूर्च्छन होते है तथा लब्ध्य- पर्याप्तक तिर्यंच भी सम्मूर्छन ही होते हैं । लब्ध्यपर्याप्तक चाहे तिर्यंच हो चाहे मनुष्य हो वे सब सम्मूर्च्छन ही होते हैं गर्भज नही होते । स्त्रियोके कुच या काँख आदि स्थानोमे सम्मूर्च्छन मनुष्य उत्पन्न होते रहते है ॥१०१॥ इस प्रकार अत्यन्त सक्षेपसे जीवोके स्थान बतलाए। इन सबका स्वरूप समझकर श्रावकोको इन समस्त जीवोपर करुणा वा दया करनी चाहिये ॥१०२।। अब आगे व्यपरोपण शब्दका अर्थ बतलाते हैं । जीवसे उसके प्राणोको अलग करना-वियोग करवा व्यपरोपण कहलाता है अथवा प्राणोके नाश करनेकी सामग्रीका इकट्ठा करना अथवा प्राणोको जीवसे सर्वथा अलग कर देना व्यपरोपण है ॥१०३॥ इसका भी अभिप्राय यह है कि इस ससारमे जीवद्रव्यका तो नाश कभी होता ही नही है किन्तु जीवद्रव्यसे उसके वर्तमान आयु, श्वासोच्छ्वास आदि प्राणोका वियोग हो जाता है । इसीको प्राणोका व्यपरोपण वा हिंसा कहते हैं ।।१०४॥ कदाचित् यहाँपर कोई यह शका करे कि प्राणोका वियोग होना भी अनित्य है, होता ही रहता है। क्योकि बिना मारे भी जीव मरते ही हैं तथा वे जोव फिर अन्य प्राणोको धारण करते हो हैं इसमे कोई सन्देह नही है यह बात प्रमाणसे सिद्ध है। अतएव जब प्राणोका वियोग होना अनित्य १२ ९० श्रावकाचार-संग्रह मैवं प्राणान्तरप्राप्ती पूर्वप्राणप्रपोडनात् । प्राणभृदु खमाप्नोति निर्वाच्यं मारणान्तिकम् ॥१०६ कर्मासातं हि बध्नाति प्राणिना प्राणपीटनात् । येन तेन न फतव्या प्राणिपोडा कदाचन ॥१०७ ततो न्यायागतं चेतद्यद्यद्वाधाकरं चितः । कायेन मनसा वाचा तत्तत्सर्व परित्यजेत् ॥१०८ तस्मात्वं मा वासत्यं चौर्य मा चर पापकृत् । मा कुरु मैयुनं काञ्चिन्मूछों वत्स परित्यज ॥१०९ यतः क्रियाभिरेताभिः प्राणिपीडा भवेद् ध्रुवम् । प्राणिनां पीडयाऽवश्यं बन्ध स्यात्पापकर्मण ॥११० तदेकाक्षाविपञ्चाक्षापर्यन्ते दुखभोरणा । दातव्य निभयं दानं मूलं व्रततरोरिव ॥१११ नन्वेवमोर्यासमिती सावधानमुनावपि । अतिव्याप्तिर्भवेत्कालप्रेरितस्य मृतौ चित ॥११२ मैव प्रमत्तयोगत्वाद्धेतोरध्यक्षाजाप्रतः । तस्याभावान्मुनी तत्र नातिव्याप्तिर्भविष्यति ॥११३ एव यत्रापि चान्यत्र मुनौ वा गृहमेथिनि । नैव प्रमत्तयोगोऽस्ति न बन्धो बन्धहेतुकः ॥११४ है और प्राणोका वियोग होनेपर जव यह प्राणी अन्य प्राणोको धारण कर ही लेता है तब फिर प्राणोका वियोग करनेमे कोई पाप नही होता ॥१०५।। परन्तु यह शका करना ठीक नहीं है, क्योकि जव इस जीवके प्राणोका वियोग होता है तव उन प्राणोको बहुत ही पीडा होती है तथा प्राणोको पीडा होनेसे उस जीवको मरणसे उत्पन्न होनेवाला एक प्रकारका ऐसा महा दुख होता है जो वचनोसे कहा भी नहीं जा सकता ॥१०६।। इसीके साथ दूसरी बात यह है कि प्राणियोकी पीडा करनेसे यह जीव बहुतसे असातावेदनीयकर्मका वन्ध करता है, इसलिए श्रावकोको या गृहस्थोको प्राणियोकी पीडा कभी नहीं करनी चाहिए ॥१०७।। इस प्रकार यह वात न्यायपूर्वक सिद्ध हो जाती है कि जो-जो कार्य इस जीवको दुख देनेवाले हैं, जिन कार्योंसे अन्य जीवोको किसी भी प्रकारको वाधा वा दुख पहुंचता हो, उन सब कार्योंका मनसे, वचनसे और कायसे त्याग कर देना चाहिए ॥१०८॥ अतएव हे वत्स ! फामन तू कभी झूठ मत बोल, अनेक प्रकारके पाप उत्पन्न करनेवाली चोरी कमो मत कर, कुशील सेवन कभी मत कर और किसी भी प्रकारकी मूर्छा वा परिग्रह रखनेकी लालसा मत कर ।।१०९।। क्योकि झूठ बोलनेसे, चोरी करनेसे, कुशील सेवन करने से और परिग्रहकी अधिक लालसा रखनेसे प्राणियोको पीडा अवश्य होती है, तथा प्राणियोको पीडा होनेसे पाप कर्मोका बन्ध अवश्य होता है ।।११०। इसलिए जो जीव उन पापकर्मोके उदयसे होने- वाले महादु खोसे डरना चाहते है, बचना चाहते हैं उन्हे एकेद्रियसे लेकर पचेन्द्रियपर्यंत समस्त जीवो को अभयदान देना चाहिए अर्थात् समस्त जीवोकी रक्षा करनी चाहिए । यह समस्त जीवोकी रक्षा करना व्रतरूपी वृक्षकी जड है ॥१११॥ यहां पर कदाचित् कोई यह शका करे कि जो मुनि चलते समय ईर्यासमितिसे सावधान रहते हैं अर्थात् ईर्यासमितिको पूर्णरीतिसे पालन करते हुए चलते हैं उनके पांवसे भी कालके द्वारा प्रेरित हुए प्राणोकी मृत्यु हो सकती है इसलिए अहिंसाके इस लक्षणमे अतिव्याप्ति दोष आता है । क्योकि जो जीव मारते हैं उनसे भी हिंसा होती है और जो जीवोको सवर्था बचानेका प्रयत्न करते हैं जो जीवोंकी रक्षाके लिए ही ईर्यासमितिसे चलते हैं उनसे भी हिंसा होती है इसलिए अहिंसाका यह लक्षण ठीक नहीं है ॥११२।। परन्तु यह शका ठीक नही है क्योकि जहाँपर प्रमाद वा कषायके सम्बन्धसे प्रत्यक्ष जीवकी हिंसा होती है वहीपर हिंसा कहलाती है । मुनिराजके कषायका सम्बन्ध लेशमात्र भी नही है। उनके प्रमादका सर्वथा अभाव है अतएव प्राणोका वियोग होनेपर भी उनको हिंसाका दोष लेशमात्र भी नही लग सकता ॥११३। चाहे मुनि हो और चाहे गृहस्थ हो यह नियम सब जगह समझ लेना चाहिए कि जहाँपर प्रमाद नही है लाटीसंहिता ९१ उक्तंच- मरदु व जीवदु जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा। पयदस्स पत्थि बंधो हिंसामित्तेण विरदस्स ॥३३ ननु प्रमत्तयोगो यस्त्याज्यो हेय. स एव च । प्राणिपीडा भवेन्मा वा कामचारोऽस्तु देहिनाम् ॥११५ मैवं स्यात्कामचारोऽस्मिन्नवश्यं प्राणिपीडनात् । विना प्रमत्तयोगाद्वै कामचारो न दृश्यते ॥११६ उक्तं च-- तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिनां । तदायतनमेव सा किल निरगला व्यावृतिः। अकामकृतकर्म तन्मतमकारणं ज्ञानिनां द्वयं न हि विरुद्धचते किमु करोति जानाति च ॥३४ सिद्धमेतावता नूनं त्याज्या हिंसादिका क्रिया । त्यक्तायां प्रमत्तयोगस्तत्रावश्यं निवर्तते ॥११७ अत्यक्तायां तु हिंसादिक्रियायां द्रव्यरूपत । भाव प्रमत्तयोगोऽपि न कदाचिन्निवर्तते ॥११८ ततः साधीयसी मैत्री श्रेयसे द्रव्यभावयो । न श्रेयान् कदाचिद्वै विरोधो वा मिथोऽनयोः ॥११९ वहाँपर न तो कर्मोंका बन्ध होता है और न कर्मोके बन्च होनेका कोई कारण ही है ॥११४।। कहा भी है-जीव चाहे मर जाय अथवा जीवित बना रहे परन्तु जो जीवोकी रक्षा करनेमे प्रयत्न नहीं करता, जीवोकी रक्षामे सावधान नही रहता उसके हिंसाका पाप अवश्य लगता है तथा जो समितियोका पालन करता है, जीवोकी रक्षा करनेमे प्रयत्न करता है, सावधानी रखता है उसके जीवोकी हिंसा होनेपर भी कर्मोंका बन्ध नही होता ॥३३॥ यहाँपर कोई शका करता है कि जब प्रमादके सम्बन्धसे ही हिंसाका पाप लगता है, जीवोंके प्राणोका वियोग हो या न हो परन्तु प्रमाद होनेपर हिंसाका पाप लग ही जाता है तो फिर प्रमादका ही त्याग करना चाहिए क्योकि प्रमाद हो त्याग करने योग्य है। प्रमादके त्याग कर देनेपर फिर प्राणियोको पीडा हो वा न हो यह प्राणियोकी इच्छापर निर्भर रहना चाहिए ॥११५।। परन्तु शका ठीक नहीं है क्योकि प्रमादका त्याग कर देनेपर जोवोकी हिंसा करना हिंसा करनेवालेकी इच्छा पर निर्भर रखना सर्वथा अयुक्त है अर्थात् यह बात बन नही सकती । जिसने प्रमादका त्याग कर दिया है वह हिंसा भी करता रहे यह बात सर्वथा असम्भव है क्योकि हिंसा करनेसे प्राणोकी पीडा अवश्य होती है तथा विना प्रमादके हिंसा करनेकी इच्छा ही उत्पन्न नही हो सकती। भावार्थ-विना प्रमादके न तो हिंसा करनेके परिणाम होते हैं और न हिंसा हो सकती है ॥११६।। कहा भी है-ज्ञानियोको निरर्गल प्रवृत्ति नही करनी चाहिए क्योकि निरर्गल व्यापार करना प्रमादका घर है। जो कर्म विना इच्छाके किया जाता है वह ज्ञानियोंके लिए कर्मबन्धका कारण नहीं होता । इसलिए करता और जानता दोनो ही परस्पर विरुद्ध नही होते ॥३४॥ इससे सिद्ध होता है कि हिंसादिक क्रियाओका त्याग अवश्य कर देना चाहिए। हिंसादिक क्रियाओका त्याग कर देनेसे प्रमादरूप योगोंका त्याग अपने आप हो जाता है ॥११७॥ यदि द्रव्य- रूपसे हिंसादिक क्रियाओका त्याग नही किया जायगा तो प्रमत्तयोगरूप जो परिणाम हैं उनका त्याग भी कभी नहीं हो सकेगा ॥११८।। इसलिए आत्माका कल्याण करनेके लिए द्रव्य और भावकी मैत्री होना ही अच्छा है अर्थात् द्रव्यहिंसा और भावहिंसा दोनोका साथ-साथ त्याग कर देना अच्छा है। इन दोनोका विरोध होना कभी भी कल्याणकारी नही हो सकता ॥११९।। इतना सब सुन ९२ 1 -- - श्रावकाचार-सह ननु हिंसा निषिद्धा स्याद् यदुक्त तद्धि सम्मत । तस्य वेशतो विरतिस्तत्कथं तद्वदाद्य न ॥१२० उच्यते शृणु भो प्राज्ञ तच्छ्रोतुंकाम फामन । देशतो विरतेलक्ष्म हिंसाया वच्मि साम्प्रतम् ॥१२१ अत्रापि वेशशब्देन विशिष्टोऽशो विवक्षित । न यथाकाममात्मोत्थं कश्चिदन्यतमोऽशकः ॥१२२ वेशशब्दोऽत्र स्थूलार्थे तथा भावाद्विवक्षित । कारणास्थूलहिंसादेस्त्यागस्यैवात्र दर्शनात् ॥१२३ स्थूलत्वमार्दवं स्थूलत्रसरक्षादिगोचरम् । अतिचाराविनाभूतं सातिचारं च सास्रवम् ॥१२४ तद्यथा यो निवृत्तः स्याद्यावत्त्रसवधादिह । न निवृत्तस्तथा पञ्चस्थावरहिसया गृही ॥१२५ विरताविरताख्यः स स्यादेकस्मिन्ननेहसि । लक्षणात्त्रसहिंसायास्त्यागेऽणुवतधारक ॥१२६ उक्तंच-- जो तसवहाउ विरओ अविरमओ तह थावर-वहाओ। एकसमयम्हि जीवो विरदाविरदो जिणेक्कमई ॥३५ अत्र तात्पर्यमेवैतत्सर्वारम्भण श्रूयताम् । त्रसकायबधाय स्याक्रिया त्याज्या हितावती ॥१२७ लेनेपर फामन फिर पूछने लगा कि आपने जो हिंसाका त्याग करना बतलाया है और उसके त्याग करनेकी जो विधि बतलाई सो तो सब ठीक है परन्तु उसका एकदेश त्याग कैसे किया जाता है । एकदेशका क्या अर्थ है उसे ही आज बतलाइये ॥१२०॥ हे विद्वान् फामन ! तूं हिंसाके एकदेश त्यागका लक्षण सुनना चाहता है सो सुन । मै अब उसी हिंसाके एकदेश त्यागका लक्षण कहता हूँ ॥१२१।। यहाँपर देश शब्दका अर्थ विशिष्ट अश लिया गया है। अपनी इच्छानुसार त्याग कर देना अथवा किसी एक अशका त्याग कर देना एकदेश शब्दका अर्थ नही है ॥१२२॥ यहाँपर एकदेश शब्दका अर्थ स्थूल लेना चाहिए तथा भावपूर्वक लेना चाहिए अर्थात् कारण पूर्वक स्थूल हिंसादिकका त्याग करना ही एकदेश त्यागका अर्थ है। यही अर्थ शास्त्रोमे कहा गया है ॥१२३।। स्थूल शब्दका भी अर्थ कोमल परिणाम या करुणा है। करुणापूर्वक स्थूल अस जीवोकी रक्षा करना ही अहिंसाणुव्रत है। यह अणुव्रत अतिचारोंके साथ-साथ होता है अर्थात् यह अतिचार सहित होता है और आस्रव सहित होता है ॥१२४|| आगे इसीका खुलासा कहते हैं। इस अहिंसा अणुव्रतको धारण करनेवाला गृहस्थ त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग कर देता है परन्तु पांचो स्थावर जीवोकी हिंसाका त्याग नही करता इसलिए अणुव्रतोको धारण करनेवाला गृहस्थ एक ही पापका त्यागी भी होता है और त्यागी नही भी होता, अतएव अणुव्रतीको विरताविरत कहते हैं तथा अहिंसाणुव्रतका लक्षण त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग करना बतलाया है। इस प्रकार जो अस जीवोकी हिंसाका त्यागी और स्थावर जीवोकी हिंसाका त्यागी नही है उसको अणुव्रती कहते हैं ॥१२५-१२६॥ कहा भी है जो त्रस जीवोंकी हिंसाका त्यागी है परन्तु स्थावर जीवोकी हिंसाका त्यागी नही है। इस प्रकार केवल जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाको माननेवाला सम्यग्दृष्टि श्रावक एक ही समयमे विरताविरत कहलाता है। अर्थात् वह त्रस जीवोको हिंसाका त्यागी है इसलिए विरत कहलाता है और स्थावर जीवोकी हिंसाका त्यागी नही है इसलिए अविरत कहलाता है, इस प्रकार एक ही समयमे वह विरत और अविरत अर्थात् विरताविरत कहलाता है ॥३५॥ इस सबके कहने का अभिप्राय यह है कि जिस आरम्भसे त्रस जीवोकी हिंसा होती हो ऐसी जितनी भी क्रियाएं हैं उनका सब प्रकारसे त्याग कर देना चाहिए। इस बातको खूब अच्छी लाटीसहिता ९३ क्रियायां यत्र विख्यातस्त्रकायबधो महान् । तां तां क्रियामवश्यं स सर्वामपि परित्यजेत् ॥१२८ अत्राप्याऽऽशकते कश्चिदात्मप्रज्ञापराधतः । कुर्याद्धिसां स्वकार्याय न कार्या स्थावरक्षतिः ॥१२९ अयं तेषां विकल्पो यः स्याद्वा कपोलकल्पनात् । अर्थाभासस्य भ्रान्तेर्वा नैवं सूत्रार्थदर्शनात् ॥१३० तद्यथा सिद्धसूत्रार्ये दर्शितं पूर्वसूरिभिः। तत्रार्थोऽय विना कार्य न कार्या स्थावरक्षति ॥१३१ एतत्सूत्र-विशेषार्थेऽनवदत्तावधानकै । नूनं ते स्खलितं मोहात्सर्वसामान्यसङ्ग्रहात् ॥१३२ किञ्च कार्य विना हिंसां न कुर्यादिति धीमता । दृष्टस्तुर्यगुणस्थाने कृतार्थत्वादहगात्मन ॥१३३ यदुक्तं गोम्मटसारे सिद्धान्ते सिद्धसाधने । तत्सूत्रं च यथाम्नायात्प्रतीत्य वच्मि साम्प्रतम् ॥१३४ उक्तं च- सम्माइट्ठी जीवो उवइटुं पवयणं च सदहदि । सद्दहदि असन्भावं अजाणमाणो गुरुणियोगा ॥३६ तरह सुन लेना चाहिए, क्योकि ऐसी क्रियाओसे आत्माका कभी कल्याण नही होता है। ऐसी त्रस जीवोकी हिंसा करनेवाली क्रियाओसे यह आत्मा नरकादिक दुर्गतियोमे ही प्राप्त होता है ॥१२७॥ जिस क्रियाके करनेमे त्रस जीवोकी महा हिंसा होती हो ऐसी-ऐसी समस्त क्रियाओका त्याग अवश्य कर देना चाहिए ॥१२८॥ यहाँपर कोई पुरुष अपनी बुद्धिके दोषसे कुतर्क करता हुआ शका करता है कि अपने कार्यके लिए तो त्रस जीवोकी हिंसा भी कर लेनी चाहिए परन्तु विना प्रयोजन स्थावर जीवोका विघात भी नही करना चाहिए, परन्तु यह उसका विकल्प कपोल- कल्पित है। या तो उसे अर्थका यथार्थ परिज्ञान नही हुआ है अथवा भ्रमरूप बुद्धि होनेसे ऐसी कपोलकल्पना करता है, क्योकि उसका किया हुआ यह अर्थ सूत्र या शास्त्रोके अनुसार नही है। सूत्र या शास्त्रोके विरुद्ध है ॥१२९-१३०॥ शका करनेवालेने जो शका करते हुए अहिंसा अणुव्रत- का अर्थ किया है वह विरुद्ध क्यो है इसी बातको आगे दिखलाते है। पहलेके आचार्योंने अनादि- सिद्ध शास्त्रोमे जो अर्थ बतलाया है वह यह है कि विना प्रयोजनके स्थावर जीवोकी हिंसा भी नही करनी चाहिए। फिर भला त्रस जोवोकी हिंसा करनेकी तो बात ही क्या है । त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग तो सर्वथा कर देना चाहिए। किसी विशेष प्रयोजनके वश होकर भी त्रस जीवोकी हिंसा कभी नहीं करनी चाहिए ॥१३१॥ जो लोग इस सिद्धान्तके विशेष अर्थको नही जानते हैं ऐसे लोग ही अपने मोहनीय कर्मके उदयसे स्खलित हो जाते हैं अर्थात् मोहनीय कर्मके उदयसे हिंसाको ही अहिंसा वा अहिंसा अणुव्रत मान लेते हैं। ऐसे लोग समस्त कथनको सामान्यरूपसे समझ लेते हैं और सबको सामान्य समझकर एक साथ सग्रह कर लेते हैं ।।१३२।। दूसरी समझने योग्य विशेष बात यह है कि सम्यग्दृष्टि पुरुष कृतार्थ होता है। यह अपने आत्माके स्वरूपको अच्छी तरह जानता है अतएव वह चौथे गुणस्थानमे भी विना प्रयोजनके हिंसा नही करता। इस बातको सब बुद्धिमान् अच्छी तरह जानते हैं ॥१३३।। यही बात जीवकी सिद्ध अवस्थाके उपायको बतलानेवाले गोमट्टसारनामके सिद्धान्तशास्त्रमे बतलाई है। आचार्योंकी परम्परापूर्वक चला आया जो वह सूत्र है उसको मै अब विश्वासके लिए कहता हूँ ॥१३४॥ गोमट्टसारमे लिखा है-सम्यग्दृष्टि जीव भगवान् सर्वज्ञदेवके कहे हुए शास्त्रोका श्रद्धान करता है तथा जिस किसी पदार्थका स्वरूप वह नहीं जानता है और उसका स्वरूप गुरु बतला देवें तो उन गुरुका बतलाया हुआ उस पदार्थका स्वरूप चाहे यथार्थ न हो तो भी वह उन यथार्थ गुरुके कहे वचनोका श्रद्धान कर लेता है ॥३६।।

९४ श्रावकाचार-सग्रहे अत्र सू चकारस्य ग्रहणं विधते स्फुटम् । तस्यार्थष्टीकाकारेण टीकायां प्रकटीकृत ॥१३५ टीका व्याख्या यथा कश्चिज्जीवो य सम्यग्दृष्टिमान् । उपदिष्टं प्रवचनं जिनोक्त श्रद्दधाति स. १३६ चकारग्रहणादेव न कुर्यात्त्रसहिंसनम् । विना कार्य कृपादत्वात्प्रशमादिगुणान्वित ॥१३७ एवमित्यत्र विख्यातं कथितं च जिनागमे । स एवार्थो यद्यत्रापि वतित्व हि कुतोऽर्थत ॥१३८ तत्पश्चमगुणस्थाने विग्मात्रं व्रतमिच्छता । त्रसकायवधार्थ या क्रिया त्याज्याऽखिलाऽपि च ॥१३९ ननु जलानलोयंनसनस्पतिकेषु च । प्रवृत्तौ तच्छ्रितानानां त्रसानां तत्र का कथा ॥१४० नैष दोषोऽल्पदोषत्वाधवा शक्यविवेचनात् । निष्प्रमादतया तत्र रक्षणे यत्नतत्परात् ॥१४१ एवं चेत्तहि कृष्यावो को दोषस्तुल्यकारणात् । अशक्यपरिहारस्य तद्वत्तत्रापि सम्भवात् ॥१४२ इस सूत्रमे एक चकार है । सूत्रकारने जिस प्रयोजनके लिए चकारका ग्रहण किया है उसका स्पष्ट अर्थ टीकामे लिखा है ।।१३५।। टीकाकारने इस सूत्रकी टीका इस प्रकार लिखी है कि जो कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव है वह भगवान् जिनेन्द्रदेवके कहे हुए वचनोका श्रद्धान करता है। इस सूत्रमे जो चकार है उसका अभिप्राय यह है कि उसका हृदय करुणासे अत्यन्त भीगा रहता है क्योकि प्रशम, सवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य ये चार गुण उसके स्पष्ट प्रगट हो जाते हैं । अतएव वह सम्यग्दृष्टि पुरुष विना प्रयोजनके स जीवोकी हिंसा कभी नहीं करता है ॥१३६-१३७॥ चतुर्थ गुणस्थानवी अवत सम्यग्दृष्टिका यह स्वरूप सर्वत्र प्रसिद्ध है तथा जैनशास्त्रोमे सर्वत्र कहा है। यदि यही अर्थ पचम गुणस्थानवर्ती अहिंसा अणुव्रतके स्वरूपमे लिया जायगा तो फिर उसको प्रत्ती किस कारणसे कहा जायगा ॥१३८। इसलिए जो श्रावक पांचवें गुणस्थानको धारण कर थोडेसे भी व्रतोको धारण करना चाहता है उसे ऐसी समस्त क्रियामोका त्याग कर देना चाहिये जिनमे स जीवोकी हिंसा होती हो ॥१३९॥ यहाँपर शका करनेवाला फिर शका करता है कि अहिंसा अणुव्रतको धारण करनेवाला अस जीवोकी हिसा करनेवाली क्रियाओका त्यागी होता है। स्थावर जीवोकी हिंसा करनेवाली क्रियाओका त्यागी नही होता अतएव जब वह पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवोकी हिंसा करनेवाली क्रियाओमे प्रवृत्त होता है उस समय उन स्थावर जीवोके आश्रय रहनेवाले अस जीवोकी क्या अवस्था होती होगी ॥१४०॥ कदाचित् यह कहो कि अणुव्रतीके लिए इसमे कोई दोष नही है क्योकि इसमे बहुत थोडा दोष लगता है, वह अस जीवोकी हिंसा करनेके लिए तैयार नही हुआ है केवल स्थावर जीवोंके आश्रय होनेसे उनका घात हो जाता है। उसके परिणाम उनके हिंसा करनेके लिए नही होते इसलिए इसमे अधिक दोप नहीं है। दूसरी बात यह है कि जिन त्रस जीवोको वह बचा सकता है उनको बचा देता है, जिनके बचानेमे वह असमर्थ है, किसी तरह भी नही बचा सकता उन्हीका घात हो जाता है इसलिए भी इसमे दोष नही है। तीसरी बात यह है कि वह श्रावक उन जीवोंके मारनेके प्रति कषाय नही कर रहा है कषायपूर्वक उनका घात नहीं करता है अतएव प्रमादरहित होनेके कारण भी उसमे दोष नहीं है और चौथी बात यह है कि उनकी रक्षा करनेके लिए वह अच्छी तरह यत्न करता है। उनकी हिंसा होनेमे वह असावधान नही है इसलिए भी अणुव्रतीके लिये कोई दोष नहीं आता। शकाकार कहता है कि इस प्रकार अणुवतीको तुम निर्दोष सिद्ध करना चाहो सो भी ठीक नहीं है क्योकि वह इस प्रकार निर्दोष सिद्ध हो नहीं सकता। कदाचित् ऊपर लिखे कारणोंसे उसे निर्दोष सिद्ध करना चाहो तो फिर अणुव्रतीके लिये लेती लाटीसंहिता ९५ अपि तत्रात्मनिन्दादिभावस्यावश्यभावत । प्रमत्तयोगाद्यभावस्य यथास्वं सम्भवादपि ॥१४३ जलादावपि विख्यातास्त्रसा. सन्त्युपलब्धित । कृष्यादौ च वसा सन्ति विख्याता क्षितिमण्डले ॥१४४ नैवं यतोऽनभिज्ञोऽसि हिसाणुव्रतलक्षणे । सतृणाम्यवहारित्वं भुञ्जानो द्विरदादिवत् ॥१४५ वम्यहं लक्षणं तस्य सावधानतया शृणु । क्षणं प्रमादमुत्सृज्य गहितावधकारणम् ॥१४६ अणुत्वमल्पीकरणं तच्च गृद्धेरिहार्थतः । यथावद्यस्य हिंसादेहृषीकविषयस्य च ॥१४७ कृष्यादयो महारम्भाः क्रूरकर्मार्जनक्षमा । तक्रियानिरतो जीव कुतो हिंसावकाशवान् ॥१४८ न चाऽऽशक्य हि कृष्यादिमहारम्भ क्रिया तु या। सत्स्वल्पीकरणं चाखिसाणुनतमिष्यते ॥१४९ यत' स्वल्पीकृतोऽप्यत्र महारम्भः प्रवर्तते । महावद्यस्य हेतुत्वात्तद्वान्नाणुवती भवेत् ॥१५० करनेमे भी क्या दोष है क्योकि जो कारण ऊपर बताये हैं वे सब यहां भी मिलते हैं। जिस प्रकार स्थावर जीवोके आश्रय रहनेवाले त्रस जीवोकी हिंसाको भी वह बचा नही सकता उसी प्रकार खेतीमे होनेवाली त्रस जीवोकी हिंसाको भी वह बचा नही सकता ॥१४१-१४२॥ दूसरी बात यह है कि खेती करने में जो त्रस जीवोकी हिंसा होती है उसके करते समय वह अपनी निन्दा अवश्य करता है अर्थात् उस हिंसाको वह त्याज्य अवश्य मानता है। इसी प्रकार जैसे वहाँ- पर उसके प्रमादका अभाव है, कषायरूप परिणामोका अभाव है उसी प्रकार खेती करनेमे भी कषायरूप परिणामोका अभाव है। खेती करनेमे जो त्रस जीवोकी हिंसा होती है उसको वह कषाय-पूर्वक नही करता तथा उनकी रक्षा करनेमे भी वह सावधान रहता है अतएव अणुव्रतीके लिए यदि स्थावर जीवोके आश्रय रहनेवाले त्रस जीवोकी हिंसाको निर्दोष कहा जायगा तो खेती करनेमे होनेवाली त्रस जीवोकी हिंसाको भी निर्दोष कहना पडेगा ॥१४३।। शकाकार कह रहा है कि कदाचित् तुम यह कहो कि स्थावर जीवोके आश्रय त्रसजीव रहते ही नही है सो भी ठीक नही है क्योकि जलके आश्रय रहनेवाले त्रस जीव प्रसिद्ध हैं और वे प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। सूक्ष्मदर्शक यन्त्रसे स्पष्ट दिखाई देते हैं तथा छोटी-छोटी मछलियाँ तथा और भी अनेक प्रकारके जलचर जीव इन्द्रियोसे भी दिखाई देते हैं। इसी प्रकार खेती करनेमे भी पृथ्वी मण्डलमे रहनेवाले अनेक प्रकारके त्रसजीव प्रसिद्ध हैं। गिडोरे गिजाई आदि असख्यात जीव खेतोमे उत्पन्न हो जाते हैं इसलिए स्थावर जीवोके आश्रय त्रस जीवोका सद्भाव मानना ही पड़ता है तथा खेती करनेमे भी त्रस जीवोकी हिंसा माननी ही पड़ती है। इस प्रकार पांच श्लोकोमे शकाकारने शका उपस्थित की है ॥१४४॥ ग्रन्थकार अब उसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि शकाकारकी यह शका ठीक नही है क्योकि जिस प्रकार घासके साथ चावलोको खाता हुमा हाथी चावलोको नहीं समझता, केवल घासको ही समझता है उसी प्रकार शंका करनेवाला अहिंसा अणुव्रतके लक्षणको नही समझता ॥१४५।। हे शकाकार, तू अत्यन्त निन्दनीय और पापका कारण ऐसे प्रमादको छोडकर तथा सावधान होकर क्षणभर सुन । मै अब अणुव्रतका लक्षण कहता हूँ ॥१४६।। अणु शब्दका अर्थ घटाना है तथा यहाँपर प्रकरणके दशसे गृद्धता वा लालसाका घटाना लेना चाहिए तथा वह लालसा भी पापकर्मोकी लालसा, हिंसाकी लालसा और इन्द्रियोके विषयोकी लालसा घटानी वा कम करनी चाहिए ॥१४७॥ खेती आदिक व्यापार महा आरम्भ उत्पन्न करनेवाले हैं तथा क्रूर कार्योंसे उपार्जन किये जाते हैं ? उन क्रू र कार्योमे लगा हुआ जीव भला अहिंसा अणुव्रतको किस प्रकार पाल सकता है ? ॥१४८॥ यहाँपर यह शका भी नही करनी चाहिए कि खेती आदिके महारम्भोमे होनेवाली क्रियाओका कम करना भी अहिंसा अणुव्रत कहलावेगा? क्योकि खेती ?

९६ श्रावकाचार-संग्रह अलं वा बहुनोक्तेन वावदूकतया यलम् । त्रसहिंसा क्रिया त्याज्या हिंसाणुव्रतधारिणा ||१५१ ननु त्यक्तुमशक्यस्य महारम्भानशेषत । इच्छत स्वल्पीकरण कृष्यादेस्तस्य का गति ॥१५२ अस्ति सम्यग्गतिस्तस्य साधु साधीयसी जिने । कार्या पुण्यफलाश्लाघ्या क्रियामुत्रेह सौख्यदा ॥१५३ यथाशक्ति महारम्भात्स्वल्पीकरणमुत्तमम् । विलम्बो न क्षाणं कार्यो नात्र कार्या विचारणा ॥१५४ हेतुरस्त्यत्र पापस्य कर्मण संवरोंऽशत । न्यायागत प्रवाहश्च न केनापि निवार्यते ॥१५५ साधितं फलवन्न्यायात्प्रमाणित जिनागमात् । युक्ते स्वानुभवाच्चापि कर्तव्य प्रकृत महत् ॥१५६ तत्रागमो यथा सूत्रादाप्तवाक्यं प्रकीर्तितम् । पूर्वापराविरुद्धं यत्प्रत्यक्षारिवाधितम् ॥१५७ उक्तं च- ? यथार्थदर्शिन पुसो यथादृष्टार्थवादिन । उपदेश परार्थो य स इहागम उच्यते ॥३७ आगमः स यथा द्वेघा हिंसादेरपकर्षणम् । यमादेकं द्वितीय तु नियमादेव केवलात् ॥१५८ आदिमे होनेवाली महारम्भोकी क्रियाएँ चाहे जितनी कम की जाये तो भी उनमे महारम्भ ही होते रहते हैं | इसका भी कारण यह है कि खेती करनेका महारम्भ महापापका कारण है इसलिए खेती करनेवाला महारम्भी पुरुष कभी अणुव्रती नहीं हो सकता ॥१४९-१५०। बहुत कह से क्या ? अथवा अधिक वाद-विवाद करनेसे या अधिक बोलनेसे क्या? यह निश्चित सिद्धान्त है कि अहिंसा अणुव्रत धारण करनेवालेको त्रस जीवोकी हिंसा करनेवाली समस्त क्रियाओका त्याग कर देना चाहिए ॥१५१॥ यहाँपर शकाकार कहता है कि जो कोई पुरुष खेती आदिके महारम्भोको पूर्ण रीतिसे त्याग नही सकता परन्तु उनको कम करना चाहता है उसके लिए क्या उपाय किया जायगा ॥१५२॥ इसका उत्तर यह है कि खेती आदिके महारम्भोको कम करनेवाले लोगोके लिए भी भगवान् जिनेन्द्रदेवने बहुत ही अच्छी गति बतलाई है । भगवान् जिनेन्द्रदेवने कहा है कि जो क्रियाएं पुण्यरूप फलको उत्पन्न करनेवाली हैं और इसीलिए प्रशसनीय और इस लोक तथा परलोक दोनो लोकोमे सुख देनेवाली हैं ऐसी क्रियाएँ गृहस्थोको सदा करते रहना चाहिए ।।१५३॥ अपनी शक्तिके अनुसार खेती आदिके महारम्भोको कम करना उत्तम कार्य है। ऐसे कार्योंके करनेके लिये देर नही करनी चाहिए और न ऐसे उत्तम कार्योके करनेके लिए कुछ विचार करना चाहिये ॥१५४॥ ऐसे उत्तम कार्योंको अत्यन्त शोघ्र और विना किसी सोच विचारके करनेका कारण भी यह है कि खेतो आदिके महा आरम्भ जितने कम कर दिये जायेंगे उत्तने ही पापकर्मोके अशोका सवर हो जायगा । यह न्यायसे प्राप्त हुआ प्रवाह सदासे चला आ रहा है वह किसीसे निवारण नही हो सकता ॥१५५|| इस प्रकार न्यायसे सिद्ध होता है कि खेती आदि महारम्भोका कम करना भी सफल .. पुण्यफल को देनेवाला है। यह बात जैनशास्त्रोसे भी सिद्ध होती है, युक्तिसे भी सिद्ध होती है और अनुभवसे भी सिद्ध होती है अतएव खेती आदिके महारम्भोको कम करनेरूप जो उत्तम कार्य है वह गृहस्थोको अवश्य करना चाहिये ।।१५६॥ जो सूत्रोंके द्वारा आप्तवाक्योका कहना है वही आगम कहलाता है । वह आगम पूर्वापर विरोधसे रहित होता और प्रत्यक्षादिक प्रमाणोसे अबाधित होता है ॥१५७॥ कहा भी है जो पुरुष विशेष या अरहन्तदेव यथार्थ दर्शी हैं, समस्त स्थूल सूक्ष्म पदार्थों- को प्रत्यक्ष देखते हैं तथा जिस प्रकार देखते हैं उसी प्रकार उनका स्वरूप निरूपण करते हैं ऐसे भगवान् अरहन्तदेवका भव्य जीवोका कल्याण करनेके लिए दिया हुमा जो उपदेश है उसीको आगम कहते हैं ।।३७॥ उसे आगममे हिंसादिक पापोका जो त्याग बतलाया है वह दो प्रकारसे बतलाया है-एक ९७ लाटीसहिता यमस्तत्र यथा यावज्जीवनं प्रति पालनम् । देवाघोरोपसर्गेऽपि दुःखे वा मरणावधि ॥१५९ यमोऽपि द्विविधो ज्ञेय प्रथमः प्रतिमान्वितः । अन्य सामान्यमानत्वात्स्पष्टं तल्लक्षणं यया ॥१६० यावज्जीवं साना हि हिसादेरपकर्षणम् । सर्वतस्तक्रियायाश्चेत्प्रतिमारूपमुच्यते ॥१६१ अथ सामान्यरूपं तद्यदल्पीकरण मनाक् । यावज्जीवनमप्येतद्देशतो न (तु) सर्वत ॥१६२ माह कृषीवलः कश्चिदद्विशत न च करोम्यहम् । शतमात्रं करिष्यामि प्रतिमाऽस्य न कापि सा ॥१६३ नियमोऽपि द्विधा ज्ञेय सावधिर्जीवनावधि. । त्रसहिंसाक्रियायाश्च यथाशक्त्यपकर्षणम् ॥१६४ सावधिः स्वायुषो यावदर्वागेव व्रतावधि । उद्ध्वं यथात्मसामयं कुर्याद्वा न यथेच्छया ॥१६५ पुन कुर्यात्पुनस्त्यक्त्वा पुनः कृत्वा पुनस्त्यजेत् । न त्यजेद्वा न कुर्याद्वा कारं कारं करोति च ॥१६६ अस्ति कश्चिद्विशेषोऽपि द्वयोर्यमनियमयोः । नियमो हकप्रतिमायां व्रतस्थाने यमो मत ॥१६७ तो केवल यमरूपसे और दूसरा केवल नियमरूपसे ॥१५८॥ इन यम नियम दोनोमेसे जीवनपर्यन्त पालन करना यम है । यदि दैवयोगसे कोई घोर उपसर्ग आ जाय अथवा महादु ख उत्पन्न हो जाय अथवा मरण होने तकका समय आ जाय तो भी उस किये हुए त्यागसे विचलित न होना यम कहलाता है ।।१५९।। वह यम भी दो प्रकार है-एक प्रतिमारूप और दूसरा सामान्यरूप । इन दोनोका स्पष्ट लक्षण नीचे लिखे अनुसार है ॥१६०।। जीवन पर्यंत पूर्णरूपसे त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग करना तथा जिन जिन क्रियाओमे त्रस जीवोकी हिंसा होती हो ऐसी समस्त क्रियाओका जीवनपर्यन्ततकके लिए त्याग कर देना प्रतिमारूप यम कहलाता है ॥१६१॥ तथा जीवन पर्यन्त त्रस जीवोकी हिंसाको थोडा कम करना और वह भी पूर्णरूपसे नही किन्तु एकदेश कम करना सामान्य- रूप यम कहलाता है ।।१६।। जैसे कोई किसान जन्मभरके लिए यम-नियम ले कि मै जो इस समय दो सौ बीघा खेती करता हूँ सो अब न करूंगा। अबसे मै जन्म भर तक सौ बीघा खेती करूंगा। ऐसे यमरूप त्यागको सामान्य यम कहते हैं। इसमे त्रस जीवोकी हिंसा कम की गई है, उसका पूर्ण रूपसे त्याग नही किया गया है इसलिए वह प्रतिमारूप यम नही है किन्तु एकदेश रूपसे कम की गई है इसलिए उसको सामान्य यम कहते हैं ।।१६३।। इस प्रकार यमके दो भेद बतलाए । अब आगे नियमके भी दो भेद बतलाते हैं । नियम भी दो प्रकार है । जिनमे त्रस जोवो- की हिंसा हो ऐसी क्रियाओका अपनी शक्तिके अनुसार कालकी मर्यादा लेकर त्याग करना पहला जियम है तथा उन्ही क्रियाओका अपनी शक्तिके अनुसार जीवन पर्यन्त त्याग करना दूसरा नियम है ॥१६४।। अपनी आयुके पहले पहले तक किसी कालको मर्यादा लेकर किसी व्रतके धारण करने. का नियम करना वह पहला सावधि (अवधि अर्थात् कालकी मर्यादा सहित) नियम कहलाता है। उस व्रतके धारण करनेकी जितने कालको मर्यादा ली है उतने काल तक तो वह उसको पालन करता ही है। उसके बाद वह उस व्रतको अपनी इच्छानुसार और अपनी सामर्थ्यके अनुसार पालन करता भी है और नही भी करता है ।।१६५।। कालको मर्यादा लेकर नियम करनेवाला पुरुष उस मर्यादाके पूर्ण होनेपर फिर उस व्रतको करता भी है, करके छोड़ भी देता है, छोड करके भी फिर करने लगता है और फिर छोड देता है, अथवा फिर उसे नहीं छोड़ता-बरावर करतां ही रहता है, अथवा कालकी मर्यादा होनेपर फिर उसे करता ही नही, सर्वथा छोड देता है अथवा वार बार करता है और फिर करता है ।।१६६।। इन यम और नियम दोनोमे विशेषकर यह भेद १३ - -- श्रावकाचार-संग्रह अयं भावो व्रतस्थाने या क्रियाऽभिमता सताम् । तां सामान्यत कुर्वन्सामान्ययम उच्यते ॥१६८ प्रतिमायां क्रियाया तु प्रागेवात्रापि सूचिता । यावज्जीवं हि ता कुर्वनियमोऽनवधि स्मृत ॥१६९ उक्तं सम्यक् परिज्ञाय गृहस्थो व्रतमाचरेत् । यथाशक्ति यथाकालं यथादेशं यथावय ॥१७० त्रसहिंसाक्रियात्यागो यदि कतुं न शक्यते । व्रतस्थानाग्रहेणालं दर्शनेनैव पूर्यताम् ॥१७१ प्रतस्थानक्रिया कर्तुमशक्योऽपि यदीप्सति । व्रतंमन्योऽपि संमोहाद् व्रताभासोऽस्ति न व्रती ॥१७२ अलं कोलाहलेनालं कर्तव्या' श्रेयस क्रिया । फलमेव हि साध्यं स्यात्सर्वारम्भेण धीमता ॥१७३ त्रसहिंसाक्रियात्यागशब्द स्यादुपलक्षणम् । तेन भूकायिकादींश्च नि शद्धं नोपमर्दयेत् ॥१७४ किन्तु चैकाक्षजीवेषु भूजलादिषु पञ्चसु । अहिंसावतशुद्धयर्थ कर्तव्यो यत्नो महान् ॥१७५ असहिंसाक्रियात्यागी महारम्भं परित्यजेत् । नारकाणा गते/ नूनं तदु खकारणम् ॥१७६ है कि दर्शनप्रतिमामे तो श्रावक नियमका पालन करता है और व्रत प्रतिमामे यमका पालन करता ॥१६७|| इसका भी अभिप्राय यह है कि व्रत प्रतिमामे सज्जनोके लिये जो क्रियाएँ बतलाई हैं उनको जो सामान्य रीतिसे या एक देशरूपसे पालन करता है उसको सामान्य यम कहते हैं तथा दर्शनप्रतिमामे जो क्रियाएं पहले बतलाई हैं उनको जो पुरुष जीवन पर्यन्त पालन करता है उसको अनवधि नियम अथवा जीवनपर्यन्त होनेवाला नियम कहते हैं ॥१६८-१६९।। ऊपर जो कुछ यम और नियमका स्वरूप बतलाया है उसको अच्छी तरह समझ कर अपनी शक्तिके अनुसार, देशके अनुसार, कालके अनुसार और अपनो आयुके अनुसार गृहस्थोको व्रत पालन करना चाहिए ॥१७०॥ जो पुरुष जिनमे स जीवोकी हिंसा होती है ऐसी क्रियाओका त्याग नही कर सकता उसको पांचवें गुणस्थानमे आनेकी आवश्यकता नही है अर्थात् उसे अणुव्रत धारण नही करना चाहिए। उसको चतुर्थ गुणस्थानमे होनेवाली क्रियाएं ही पूर्ण रीतिसे पालन करनी चाहिए ॥१७१।। जो पुरुष पांचवें गुणस्थानमे होनेवाली क्रियाओका पालन नहीं कर सकता, अर्थात् अणुव्रतोको धारण नही कर सकता, अथवा त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग नही कर सकता, अथवा जिनमे त्रस जीवोकी हिंसा होती हो ऐसी क्रियाओका त्याग नहीं कर सकता, तथापि वह यदि व्रतोको धारण करना चाहे और अपनेको व्रती मानना चाहे तो भी वह व्रती नही हो सकता किन्तु मोहनीय कर्मके उदय होनेसे उसको व्रताभासी अथवा व्रताभासोको धारण करनेवाला कहते हैं ॥१७२।। ग्रन्थकार कहते है कि व्यर्थके कोलाहल करनेसे कोई लाभ नही है। जिन क्रियामोसे आत्माका कल्याण होता हो ऐसी ही क्रियाएँ श्रावकको करनी चाहिए, क्योकि बुद्धिमान् पुरुष जितने आरम्भ या कार्य करते हैं उन सबसे अपने फलकी ही सिद्धि करते हैं ।।१७३॥ "अणुव्रती श्रावकोको जिनमे श्रम जीवोकी हिंसा होती हो ऐसी समस्त क्रियाओंका त्याग कर देना चाहिये" यह जो कहा गया है वह उप- लक्षण है । अतएव अस जीवोकी रक्षा तो करनी ही चाहिये किन्तु पृथ्वीकायिक जलकायिक आदि स्थावरकायिक जीवोको नि शक होकर उपमर्दन नही करना चाहिये ॥१७४।। अतएव अहिंसा अणुव्रतको शुद्ध बनाये रखनेके लिये पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक इन पांचो प्रकारके एकेन्द्रिय स्थावर जीवोकी रक्षा करनेमे भी सबसे अधिक प्रयत्न करना चाहिये ॥१७५।। जिनमे त्रस जीवोकी हिंसा होती है ऐसी क्रियाओको त्याग करनेवाले श्रावकको खेती आदिके समान महा आरम्भोका त्याग कर देना चाहिये, क्योकि महा आरम्भ करना नरकगतिका कारण है तथा निश्चयसे नरकोंके महा दुख देनेवाला है ॥१७६|| लाटीसंहिता उक्तं च-- - मिच्छो हु महारंभो निस्सीलो तिब्बलोहसंजुत्तो । निरयाउगं णिबद्धइ पावमयी रुद्दपरिणामो॥३८ क्रूरं कृष्यादिकं कर्म सर्वतोऽपि न कारयेत् । वाणिज्याथ विदेशेषु शकटादि न प्रेषयेत् ॥१७७ क्रयविक्रयवाणिज्ये क्रयेद्वस्तु त्रसोज्झितम् । विक्रयेद्वा तथा वस्तु नूनं सावद्यजितम् ॥१७८ वाणिज्यायं न कर्तव्योऽतिकाले धान्यसंग्रहः । घृततैलगुडादीनां भाण्डागारं न कारयेत् ॥१७९ लाक्षालोष्टक्षणक्षारशस्त्रचर्मादिकर्मणाम् । हस्त्यश्ववृषादीना चतुष्पदानां च यावताम् ॥१८० द्विपदानां च वाणिज्यं न कुर्याद्वतवानिह । महारम्भो भवत्येव पशुपाल्यादिकर्मणि ॥१८१ शुककुकुरमार्जारीकपिसिंहमृगादय । न रक्षाणीयाः स्वामित्वे महाहिंसाकरा यत ॥१८२ इत्यादिकाश्च यावन्त्य क्रियास्त्रसबधात्मिका । कर्तव्यास्त्रसाना ह्यहिसाणुव्रतधारिभिः ॥१८३ सर्वसागारधर्मेषु देशशब्दोऽनुवर्तते । तेनानगारयोग्यायाः कर्तव्यास्ता अपि क्रिया ॥१८४ कहा भी है जो मिथ्यादृष्टि है, महारम्भ करनेवाला है, शीलरहित है, तीव्र लोभके वशीभूत है, पापरूप क्रियाओको करनेवाला है और रौद्रपरिणामी है वह नरक आयुका बन्ध करता है ॥३८॥ अणुव्रती श्रावकोको परिणामोमे क्रूरता उत्पन्न करनेवाले खेती आदिके कार्य पूर्ण रूपसे छोड देना चाहिये तथा व्यापार करनेके लिए ( किसी मालको भेजने वा मंगानेके लिए ) विदेशोको गाडी आदि नही भेजने चाहिये ॥१७७॥ यदि किन्ही पदार्थोंके खरीदने या बेचनेका व्यापार करना हो तो ऐसे पदार्थोंको खरीदना चाहिये जिनमे त्रस जीव न हो तथा जिनके खरीदनेमे बहुत सा पापकार्य न हो। इसी प्रकार ऐसे ही पदार्थ बेचने चाहिये जिनमे स जीव न हो और जिनके बेचनेमे अधिक पाप न हो ॥१७८|| व्यापार करनेके लिये गेहूँ जौ आदि धान्योका सग्रह बहुत दिन तक नही करना चाहिये, इसी प्रकार गुड तैल और घी आदि पदार्थोंका भडार भी नहीं रखना चाहिये ॥१७९॥ लाख, गूगुल, नील, लोहा, खार, शस्त्र, चमडा आदिका व्यापार नही करना चाहिये तथा इसी प्रकार हाथी घोडा बैल आदि पशुओका व्यापार भी नही करना चाहिये ॥१८०॥ अणुव्रती श्रावकोको दास दासी आदिका व्यापार भी नही करना चाहिये तथा पशुओके पालनेका व्यापार भी नही करना चाहिये, क्योकि पशुओके पालन करने आदिमे भी महा आरम्भ होता है ॥१८१॥ तोते, कुत्ते, बिल्ली, बन्दर, सिंह, हिरण मादि पशुओको भी नही पालना चाहिए क्योकि ये सव पशु या जानवर महा हिंसा करनेवाले हैं । जो श्रावक इन पशुओको पालकर इनका स्वामी बनता है वह भी इनकी हिंसाके सम्बन्धसे महा हिंसक कहलाता है ॥१८२।। त्रस जीवोको हिंसाका त्याग करनेवाले अहिंसाणुव्रती श्रावकोको ऊपर लिखी क्रियाओके समान त्रस जीवोकी हिंसा करने- वाली समस्त क्रियाओका त्याग कर देना चाहिए ॥१८३॥ अहिंसा अणुव्रतीके कर्तव्य ऊपर दिखला चुके हैं। इनके सिवाय इतना और समझ लेना चाहिये कि गृहस्थोके धर्ममे देश शब्द लगा हुआ है अर्थात् गृहस्थोका धर्म एकदेश धर्म है और मुनियोका धर्म सर्वदेश या पूर्ण धर्म है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि मुनियोका जो धर्म है उसीको एकदेशरूपसे पालन करना गृहस्थोका धर्म है अतएव अणुव्रती श्रावकोको मुनियोके करने योग्य क्रियाओमेसे जो जो क्रियाएँ गृहस्थ पालन कर सकते हैं, अथवा उन क्रियाओंके जितने अशोको पालन कर सकते है, उतनी क्रियाओको अथवा उन क्रियाओंके उतने अशोको अवश्य पालन करना चाहिए ।।१८४॥ आगे उन्ही क्रियामओको बतलाते .

१०० श्रावकाचार-संग्रह यथा समितयः पञ्च सन्ति तितश्च गुप्तय । अहिंसावतरक्षार्थ कर्तव्या देशतोऽपि ते ॥१८५ उक्तं तत्वार्थसूत्रेषु यत्तत्रावसरे यथा । व्रतस्थैर्याय कर्तव्या भावना पञ्च पञ्च च ॥१८६ तत्सूत्रं यथा- तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ॥३९ तत्रापि हिंसात्यागवतरक्षार्थ वाड्मनोगुप्तीर्यावाननिक्षेपसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ।।४० न चाऽऽशक्यमिमाः पञ्च भावना मुनिगोचरा । न पुनर्भावनीयास्ता देशतो व्रतधारिभि ॥१८७ यतोऽत्र वेशशब्दो हि सामान्यादनुवर्तते । ततोऽणुव्रतसंज्ञेषु व्रतत्वान्नाव्यापको भवेत् ॥१८८ अलं विकल्प-संकल्पैः कर्तव्या भावना इमा । अहिंसावतरक्षार्थ वेशतोऽणुव्रतादिवत् ॥१८९ तत्र वाग्गुप्तिरित्युक्ता प्रसवाधाकरं वच । न वक्तव्यं प्रमावाद्वा बघ-बन्धादिसूचकम् ॥१९० अवश्यम्भाविकार्येऽपि वक्तव्यं सकृदेव तत् । धर्मकार्येषु वक्तव्यं यद्वा मौनं समाश्रयेत् ॥१९१ हैं। जिस प्रकार पाँचो महाव्रतोका पालन करना मुनियोका कर्तव्य है उसी प्रकार पांच समिति और तीन गुप्तियोका पालन करना भी मुनियोका कर्तव्य है अतएव अणुव्रती श्रावक जिस प्रकार पांचो व्रत्तोको एकदेशरूपसे पालन करता है उसी प्रकार अहिंसाणुव्रतकी रक्षा करनेके लिये श्रावकोंको एकदेशरूपसे समिति और गुप्तियोका पालन अवश्य करना चाहिये ॥१८५।। अहिंसा अणुव्रतका स्वरूप कहते समय तत्त्वार्थसूत्रमे कहा है कि व्रतोको स्थिर रखनेके लिये प्रत्येक व्रतको पांच पांच भावना करनी चाहिये ॥१८६।। तत्त्वार्थसूत्रका वह सूत्र यह है। उन व्रतोको स्थिर रखनेके लिए प्रत्येक व्रतकी पांच पांच भावनाएं हैं। उसमे भी अहिंसाणुव्रतकी रक्षा करनेके लिए ये पांच भावनाएँ हैं-वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपानभोजन ये पांच अहिंसाणुव्रतकी भावनाएं हैं ॥३९-४०॥ आगे सक्षेपसे इन्ही भावनाओका निरूपण करते हैं-कदाचित् यहाँपर कोई यह कहे कि इन भावनाओका पालन करना मुनियोका ही कर्तव्य है, एकदेशव्रतको धारण करनेवाले अणुव्रती श्रावकोको इन भावनाओके पालन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु यहाँपर ऐसी शका करना सर्वथा अनुचित है, कभी नही करनी चाहिये क्योकि गृहस्थोंके व्रतोमे एकदेश शब्द सामान्य रीतिसे चला आ रहा है इसीलिए वह एकदेश शब्द अणुव्रतोमे भी व्यापक नही है अर्थात् अव्यापक है क्योकि अणुव्रत भी व्रत है ॥१८७-१८८|| इस विषयमे अनेक संकल्प-विकल्प उठाने से कोई लाभ नही है । यह निश्चित सिद्धान्त है कि श्रावक जिस प्रकार अहिंसावतकी रक्षा करने के लिए तोका एकदेश रूपसे वा अणुव्रत रूपसे पालन करता है उसी प्रकार उसको उसी अहिंसा- व्रतकी रक्षा करनेके लिए इन भावनाओका पालन करना चाहिये ॥१८९॥ अब आगे इन पांचों भावनामोमेसे वचन गुप्तिका स्वरूप कहते हैं । वचनयोगको अपने वशमे रखना वचनगुप्ति है । गृहस्थ उसको पूर्णरूपसे पालन नही कर सकता इसलिए उसे ऐसे वचन नही कहने चाहिये जिससे अस जीवोको बाधा पहुंचे, अथवा प्रमादसे ऐसे वचन भी नही कहने चाहिये जो प्रस जीवोके वध बन्धन आदिको सूचित करनेवाले हो ॥१९०।। जो कार्य अवश्य करने पड़ेंगे उनके लिए एक बार कहना चाहिये । यह नियम रखना चाहिये कि धर्म कार्योमे तो सदा कहना वा बोलना चाहिये। धर्म कार्योक सिवाय बाकीके कार्योंमे मौन धारण करना चाहिये ॥१९शा आगे गृहस्थोके लिए लाटीसंहिता मनोगुप्तियथानाम सच्छेदे न चिन्तयेत् । समुत्पन्नेऽपि तत्कार्ये जने वा सापराधिनि ॥१९२ सड़ग्रामादिविधौ चिन्ता न कुर्यान्नैष्ठिको व्रती । अवतो पाक्षिको कुर्याईवयोगात्कदाचन ॥१९३ नैष्ठिकोऽपि यदा क्रोधान्मोहाडा सङ्गरक्रियाम् । कुर्यात्तावति काले स भवेदात्मव्रताच्युत ॥१९४ हिंसा क्रियायां वा नाऽपि व्यापारेयन्मन. । मोहाद्वापि प्रमादाद्वा स्वामिकार्ये कृतेऽपि वा ॥१९५ वीतरागोक्तधर्मेषु हिंसावा न वर्तते । रूढिधर्मादिकार्येषु न कुर्यात्त्रसहिंसनम् ||१९६ रूढिधर्मे निषिद्धा चेत्कामार्थयोस्तु का कथा । मज्जन्ति द्विरदा यत्र मशकास्तत्र किं पुनः ॥१९७ हुषोकार्थादिदुनिं वञ्चनायं स नैष्ठिकः । चिन्तयेत्परमात्मानं स्वं शुद्धं चिन्मयं मह' ॥१९८ यद्वा पञ्चपरमेष्ठिस्वरूपं चिन्तयेन्मुहुः । यद्वा त्रैलोक्यसंस्थानं जीवांस्तद्वतिनोऽथवा ॥१९९ जगत्कायस्वभावी वा चिन्तयेत्तन्मुहुर्मुहुः । द्वादशात्राऽप्यनुप्रेक्षा धारयेन्मनसि ध्रुवम् ॥२०० यद्वा दृष्टिचरानत्र जिनबिम्वांश्च चिन्तयेत् । मुनीन् देवालयांश्चापि तत्पूजादिविधीनपि ।।२०१ एकदेश मनोगुप्तिका स्वरूप बतलाते है। यदि किसी त्रस जीवके छेदन भेदन करनेका कार्य आ पडे अथवा कोई अपराधी जीव सामने आ जाय तो भी अणुव्रती श्रावकको त्रस जीवोके छेदन भेदन करनेके लिए कभी चिन्तवन नही करना चाहिये ॥१९२।। व्रतोको धारण करनेवाले नैष्ठिक श्रावकको युद्ध आदिका चिन्तवन कभी नहीं करना चाहिये । जो अव्रती पाक्षिक श्रावक हैं वे दैवयोगसे कभी कभी युद्धादिकका चिन्तवन करते हैं ॥१९३।। यदि कोई व्रतोको करनेवाला नैष्ठिक श्रावक तीव्र क्रोधके उदयसे अथवा मोहनीय कर्मके उदयसे युद्ध करनेमे लग जाय तो वह जितने कालतक युद्ध करता है उतने कालतक अपने व्रतोसे रहित हो जाता है ।।१९४|| इसी प्रकार अणुवती श्रावकको मोहसे अथवा प्रमादसे त्रस जीवोकी हिंसा करनेवाली क्रियाओमे अपना मन कभी नहीं लगाना चाहिये । यदि ऐसा कोई कार्य अपना न हो किन्तु अपने स्वामीका हो तो उस अपने स्वामीके ऐसे अस जीवोकी हिंसा करनेवाले कार्योमे भी व्रती श्रावकको अपना मन नही लगाना चाहिये ॥१९५।। यह निश्चित सिद्धान्त है कि वीतराग सर्वज्ञदेव भगवान् अरहन्तदेवके कहे हुए धर्ममे तो हिंसा करनेवाले पाप कार्य है ही नहीं तथा जो रूढिसे माने हुए धार्मिक कार्य हैं उनके लिए भी अणुव्रती श्रावकोको कभी भी उस जीवोको हिंसा नहीं करनी चाहिये ।।१९६|| अणुवती श्रावकोको यह स्वयं ही समझ लेना चाहिये कि जब रूढिसे माने गये धार्मिक कार्योंमे ही श्रस जीवोकी हिंसाका निषेध किया गया है तो फिर अर्थ और काम पुरुषार्थके लिए तो कहना ही क्या है क्योकि जहाँपर बडे बडे हायो डूब जाते है वहाँपर मच्छरोको तो बात हो क्या है ॥१९७।। इन्द्रियोके विषयोसे उत्पन्न हुए आर्तध्यान या रोद्रध्यानोसे बचनेके लिए, अथवा किसी भी प्रकारके अशुभ ध्यानसे बचने के लिए व्रतोको धारण करनेवाले नैष्ठिक श्रावकको सदा परमात्माका चिन्तवन करते रहना चाहिये अथवा शुद्ध चैतन्यस्वरूप और देदीप्यमान अपने मात्माका चिन्तवन करना चाहिये ।।१९८॥ अथवा भरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय बोर सर्व- साधु इन पांचो परमेष्ठियोंके स्वरूपका बार वार चिन्तवन करते रहना चाहिये, अथवा तीनो लोफोके आकारका तथा तीनो लोकोमे भरे हुए जीवोके स्वरूपका चिन्तवन करते रहना चाहिये ॥१९९॥ लपवा जगत् मोर कायके स्वभावका चिन्तवन बार बार करते रहना चाहिये। तथा अणुयती धावको अपने मनमे बारह अनुप्रेक्षागोका चिन्तयन करते रहना चाहिये ॥२०॥ अथवा न्हाँ जहाँ पर भगवान् जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमालोके दर्शन किये हो उन सबका चिन्तवन १०२ श्रावकाचार-संग्रह इत्याधालम्बनांश्चिते भावयेद् भावशुद्धये । न भावयेत्कदाचिद्वै प्रसहिंसां नियां प्रति ॥२०२ उक्ता वाग्गुप्तिरत्र व मनोगुप्तिस्तथैव च । अधुना कायगुप्तेश्च भेदान् गृह्णाति सूत्रवित ॥२०३ तोर्यादाननि.क्षेपभावनाः कायसंश्रिता । भावनीया सदाचारराजवंजवविच्छिदे ॥२०४ अशेर्यावचनं यावद्धर्मोपकरण मतम् । तस्याऽऽदानं च निक्षेप. समासात्तत्तथा स्मृत ॥२०५ अस्यार्थो मुनिसापेक्ष पिच्छका च कमण्डलुः । प्रसरक्षामतापेक्ष पूजोपकरणानि च ॥२०६ घण्टाचामरदीपाम्भ परछत्रध्वजादिकान् । स्नानाद्ययं जलावीश्च धोतवस्त्रादिकानपि ॥२०७ वेशनावसरे शास्त्र दानकाले तु भोजनम् । काष्ठपट्टादिकं शुद्धं काले सामायिकेऽपि च ॥२०८ इत्याधनेकभेवानि धर्मोपफरणानि च । निष्प्रमादतया तत्र कार्यो यत्नो बुधैर्यथा ॥२०९ दृग्भ्या सम्यग्निरोक्ष्यादौ यत्नत प्रतिलेखयेत् । समादाय ततस्तत्र कार्ये व्यापारयत्यपि ॥२१० करना चाहिये, अथवा जिन जिन मुनियोके दर्शन किये हुए हो उनका चिन्तवन करना चाहिये, जिन जिन जिनालयोंके दर्शन किये हो उन जिनालयोका चिन्तवन करना चाहिये तथा भगवान् जिनेन्द्रदेवके अभिषेककी विधि या पूजाकी विधि आदिका चिन्तवन करना चाहिये ॥२०१॥ अपने परिणामोको शुद्ध रखनेके लिए इस प्रकार ऊपर लिखे हुए परिणामोको निर्मल रखनेके जितने साधन हैं उन सबका चिन्तवन करते रहना चाहिये, परन्तु जिनमे स जीवोकी हिंसा होती हो ऐसी क्रियाओका चिन्तवन कभी नही करना चाहिये ॥२०२।। इस प्रकार ऊपर लिखे अनुसार वचनगुप्ति और मनोगुप्तिका स्वरूप बतलाया, अब आगे जैनसूत्रोंके जाननेवाले विद्वान् काय- गुप्तिके भेदोको इस प्रकार ग्रहण करते हैं ।।२०३।। ईर्या आदाननिक्षेपण भावनाए शरीरके आश्रित हैं अतएव ससारके दु खोको नाश करनेके लिए अणुव्रत आदि सदाचरणोको पालन करनेवाले श्रावकोको इन भावनाओका पालन अवश्य करना चाहिये ॥२०४॥ यहाँपर ईर्या शब्दका अर्थ धर्मोपकरण है तथा आदान शब्दका अर्थ ग्रहण करना और निक्षेप शब्दका अर्थ रखना है । उन धर्मोपकरणोका ग्रहण करना तथा रखना सो संक्षेपसे ईर्यादान निक्षेप भावना कहलाती है ॥२०५॥ इसका भी अर्थ यह है कि मुनियोंके धर्मोपकरण पीछी और कमण्डलु हैं तथा त्रस जीवोकी रक्षा करने रूप अणुव्रतोको धारण करनेवाले श्रावकोंके धर्मोपकरण पूजाके उपकरण हैं अर्थात् पूजाकी सामग्री, वर्तन, स्थान, पुस्तक आदि पूजा करनेमे जो जो पदार्थ काममे आते हैं वे सब पूजाके उपकरण कहलाते हैं ।।२०६।। इनके सिवाय घटा, चमर, दीपक, जल, छत्र, ध्वजा, स्नान करनेका जल और धुले हुए वस्त्र आदि भी सब पूजामे काम आते हैं इसलिए ये सब भी पूजाके उपकरण कहलाते हैं ।।२०७॥ जो श्रावक धर्मोपदेश देता है उस समय उसका उपकरण शास्त्र है, जिस समय वह दान देता है उस समय बना हुआ तैयार भोजन भी उसका धर्मोपकरण है तथा सामायिकके समय बैठनेका आसन वा काठका पाटा आदि धर्मोपकरण है। अभिप्राय यह है कि धार्मिक क्रियाओमे जो जो पदार्थ काम आते हैं वे सब धर्मोपकरण कहलाते हैं ॥२०८। इस प्रकार श्रावकोंके धर्मोपकरणोके अनेक भेद हैं। बुद्धिमानोको इन सब कार्योमे सब तरहका प्रमाद छोड कर यल वा यत्लाचार करना चाहिये । वह यत्नाचार किस प्रकारका करना चाहिये इसी बातको आगे दिखलाते हैं ॥२०९॥ सबसे पहले उन पदार्थोंको नेत्रोसे अच्छी तरह देख लेना चाहिये, फिर यत्ताचारपूर्वक उसको कोमल वस्त्रसे झाड पोछ लेना चाहिये और फिर उसको वहाँसे उठाना चाहिये । इस प्रकार उस धर्मोपकरणको उठाकर फिर उसको जिस कार्यमे लगाना हो उस कार्यमें लगाना चाहिये। उस धर्मोपकरणसे कार्य लेते समय भी किसी जीवका घात न हो जाय, इस लाटीसहिता १०३ दृष्टिपूतं यथाऽऽदानं निक्षेपोऽपि यथा स्मृत । दृष्ट्वा स्थानादिकं शुद्धं तत्र तानि विनिक्षिपेत् ॥२११ इत समितय पञ्च वक्ष्यन्ते नातिविस्तरात् । ग्रन्थगौरवतोऽप्यत्र नोक्तास्ताः संयतोचिता ॥२१२ संयतासंयतस्यास्य प्रोक्तस्य गृहमेधिनः । समितयो या योग्याः स्युर्वक्ष्यन्ते ता क्रमादपि ॥२१३ ईयर्यासमितिरप्यस्ति कर्तव्या गृहमेधिना । अर्याशब्दो वाच्योऽस्ति मार्गोऽयं गतिगोचर ॥२१४ दृष्ट्वा दृष्ट्वा शनै सम्यग्युगदघ्नां धरां पुर । निष्प्रमादो गृही गच्छेदीर्यासमितिरुच्यते ॥२१५ किञ्च तत्र विवेकोऽस्ति विधेयस्त्रसरक्षाकै । बहुत्रसाकुले मार्गे न गन्तव्यं कदाचन ॥२१६ तत्र विचार्या प्रागेव देशकालगतिर्यथा। प्रष्टव्या साधवो यद्वा तत्तन्मार्गावलोकिनः ॥२१७ निश्चित्य प्रासुकं मार्ग बहुत्रसैरनाश्रितम् । ईर्यासमितिसशुद्धस्तत्र गच्छन्न चान्यथा ॥२१८ गच्छस्तत्रापि दैवाच्चेत्पुरोमार्गस्त्रसाकुल । तदा व्याघुट्टन कुर्यात्कुर्याद्वा वीरकर्म तत् ॥२१९ वीरकर्म यथा तत्र पर्यड्काद्यासनेन वा । कायोत्सर्गेण वा तिष्ठेद्योगिवद्योगमार्गवित् ॥२२० .. बातका ध्यान रखना चाहिये ॥२१०|| जिस प्रकार उस पदार्थको नेत्रोसे देखकर उठाया था उसी प्रकार नेत्रोसे देखकर तथा कोमल वस्त्रसे झाडकर शोधकर उस पदार्थको रखना चाहिये, तथा रखते समय जिस स्थानपर रखना हो उस स्थानको भी नेत्रोसे देख लेना चाहिये, तथा कोमल वस्त्रसे झाड़कर शुद्ध कर लेना चाहिये । इस प्रकार स्थान और पदार्थ दोनोको देख-शोधकर तब उस पदार्थको रखना चाहिये, इस प्रकार सक्षेपसे श्रावकोके पालन करने योग्य कायगुप्तिका स्वरूप कहा ॥२११।। अब आगे सक्षेपसे पांचो समितियोका स्वरूप कहते हैं । यहाँपर केवल अणुव्रती श्रावकोके पालन करने योग्य समितियोका स्वरूप कहते हैं । ग्रन्थ बढ जानेके डरसे मुनियोके पालन करने योग्य समितियोका स्वरूप इस ग्रन्थमे नही कहा है ॥२१२॥ ऊपर जिस अणुव्रती श्रावककी क्रियाओका वर्णन करते चले आ रहे हैं ऐसे सयतासयत गृहस्थके पालन करने योग्य जो समितियाँ है उन्हीको यहाँपर क्रमसे कहते हैं ।।२१३॥ पांचो समितियोमे पहली ईर्यासमिति है वह भी अणुव्रती श्रावकको पालन करनी चाहिये । यहाँपर ईर्या शब्दका अर्थ मार्गमे गमन करना है ।।२१४।। गृहस्थोको आगेकी चार हाथ जमीन देखकर तथा प्रमादको छोड़कर धीरे-धीरे अच्छी तरह बार-बार देखते हुए गमन करना चाहिये, इसीको ईर्यासमिति कहते हैं ।।२१५॥ इसमे भी त्रस जीवोकी रक्षा करनेवाले श्रावकोको बहुत-सा विचार करना चाहिये और वह विचार यह है कि श्रावकोको ऐसे मार्गमे कभी भी गमन नही करना चाहिये जिसमे बहुत-से त्रसजीव भरे हो ॥२१६।। देश और कालकी गतिके अनुसार उसका विचार पहलेसे ही कर लेना चाहिये अथवा उस मार्गको देखनेवाले सज्जन लोगोसे पूछ लेना चाहिये ॥२१७॥ गमन करनेके पहले यह निश्चय कर लेना चाहिये कि जिस मार्गसे जाना है वह प्रासुक है या नही, अथवा वह अनेक त्रस जीवोंसे रहित है या नही जब वह मार्ग प्रासुक वा जीव जन्तुओसे रहित हो तथा उसमे त्रस जीवोका आश्रय न हो तब ईर्यासमितिसे उस मार्गको शोधते हुए गमन करना चाहिए। यदि ऐसा मार्ग न हो तो उस मागसे कभी गमन नही करना चाहिये ॥२१८॥ जिस मार्गका प्रासुक होने तथा प्रस जीवोसे रहित होनेका निश्चय हो चुका है उस मार्गमे गमन करते हुए यदि दैवयोगसे आगेका मार्ग त्रस जीवोसे भरा हुआ हो तो वहाँसे लौट आना चाहिये, अथवा वहीपर बैठकर वीरकर्म करना चाहिये ॥२१९॥ आगे वीरकर्मका स्वरूप कहते हैं-योगकी विधिको जाननेवाला जो. श्रावक योगियोके समान पर्यकासनसे अथवा कायोत्सर्गसे एक स्थानपर विराजमान होता है उसको १०४ श्रावकाचार-सग्रह यावत्तस्योपसर्गस्य निवृत्तिर्वा वपु क्षति. । यदवावधि यथाकालं नीत्वाऽस्तीतस्ततो गति ॥२२१ सर्वारम्भेण तात्पर्य प्रत्यक्षात्त्रससङ्घले । मार्गे पादौ न क्षेप्तव्यो अतिनां मरणावधि ॥२२२ किञ्च रजन्यां गमन न कर्तव्यं दीर्घऽध्वनि । दृष्टिचरे शुद्ध स्वल्पे न निषिद्धा मार्गे गति ॥२२३ अश्वाधारोहण मागें न कार्य व्रतधारिणा । ईर्यासमितिसंशुद्धि कुत स्यात्तत्र कर्मणि ॥२२४ इतीयांसमिति प्रोक्ता सक्षेपाद् व्रतधारिण' । यद्वोपासकाध्ययनात् ज्ञातव्यातीतविस्तरात् ।।२२५ अप्यस्ति भाषासमिति कर्तव्या समवासिभिः । अवश्यं देशमात्रत्वात्सर्वथा मुनिकुखरै ॥२२६ वचो धर्माश्रितं वाच्यं वरं मौनमथाऽऽश्रयेत् । हिंसाश्रित न तद्वाच्य भाषासमितिरिष्यते ।।२२७ इति संक्षेपतस्तस्या लक्षण चात्र सूचितम् । मृषात्यागयताख्याने वक्ष्यामीषत्सविस्तरात् ।।२२८ एषणासमिति कार्या भावधर्मवेविभि । यया सागारधर्मस्य स्थितिमुनिव्रतस्य च ।।२२९ यतो व्रतसमूहस्य शरीरं मूलसाधनम् । आहारस्तस्य मूलं स्यादेषणासमितावसौ ॥२३० वीरकर्म कहते हैं। इस वीरकर्ममे उस श्रावकको जबतक वह उपसर्ग दूर न हो जाय, अथवा जबतक अपना शरीर नाश न हो जाय तवतक वहीपर विराजमान रहना पड़ता है, अथवा जवतक उसकी मर्यादाका समय पूरा हो जाय अथवा इधर-उधरसे जानेका मार्ग हो जाय, तबतक उसको वही रहना पडता है ।।२२०-२२१॥ इस समस्त कथन कहनेका अभिप्राय यह है कि जो मार्ग प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले प्रस जीवोसे भरा हो उस मार्गमे अणुव्रती श्रावकको मरनेका समय आनेपर भी अपने पैर नही रखने चाहिये ॥२२२॥ इसी प्रकार अणुव्रती श्रावकको किसी लम्बे मार्गमे रातको नही चलना चाहिये परन्तु जो मार्ग नेत्रोंसे देखा हुआ है, शुद्ध है और छोटा है । उस मार्गमे रातमे चलनेका निषेध नही है ।।२२।। अणुव्रती श्रावकको घोडे गाडी आदिकी सवारीपर चढकर भी मार्गमे नही चलना चाहिये, क्योकि घोडे आदिको सवारीपर चढकर चलनेमे उसके ईर्यासमितिको शुद्धि किस प्रकार हो सकतो है ॥२२४|| इस प्रकार अणुव्रती श्रावको- के पालन करने योग्य ईर्यासमितिका स्वरूप अत्यन्त संक्षेपसे बतलाया। इसका विशेष स्वरूप या विस्तारपूर्वक स्वरूप उपासकाध्ययनोसे या श्रावकाचारोसे जान लेना चाहिये ॥२२५।। दूसरी समितिका नाम भाषासमिति है। उस भाषासमितिका एकदेश पालन गृहस्थोको अवश्य करना चाहिये, क्योकि इसका पूर्ण पालन मुनिराज ही करते हैं ।।२२६।। अणुव्रती श्रावकोको धर्मरूप ही वचन कहने चाहिये। यदि धर्मरूप वचन कहते न बने तो फिर मौन धारण करना चाहिए। जिन वचनोसे हिंसा होना सम्भव हो, अथवा जो वचन हिंसात्मक हो ऐसे वचन श्रावकोको कभी नही कहने चाहिये । हिंसात्मक वचन कहनेका त्याग करना और धर्मरूप वचन कहना ही श्रावको- के लिये भाषासमिति कही जाती है ॥२२७|| इस प्रकार यहाँपर सक्षेपसे भाषासमितिका स्वरूप कहा है। इसका थोडा-सा विशेष स्वरूप अथवा थोडे-से विस्तारके साथ इसका स्वरूप आगे सत्याणुव्रतका स्वरूप करते समय कहेगे ॥२२८॥ तीसरी समितिका नाम एषणासमिति है। धर्मके स्वरूपको जाननेवाले श्रावकोको इस एषणासमितिका पालन भी अवश्य करना चाहिये क्योकि गृहस्थ धर्मकी स्थिति और मुनियोके बतोकी स्थिति इस एषणा समितिपर ही निर्भर है ।।२२९।। गृहस्थोको एषणासमितिका पालन करना अत्यावश्यक है, क्योकि व्रतोके समूहको पालन करनेका मूल साधन शरीर है । यदि शरीर न हो तो कोई किसी प्रकारका तप वा व्रत पालन नही हो सकता तथा शरीरका मूल साधन आहार .

लाटीसंहिता १०५ एषणासमितिर्नाम्ना संक्षेपाल्लक्षणादपि । आहारशुद्धिराख्याता सर्वव्रतविशुद्धये ॥२३१ उक्तमांसाद्यातीचारैर्वजितो योऽशनादिक । स एव शुद्धो नान्यस्तु मांसातीचारसंयुतः ॥२३२ सोऽपि शुद्धो यथाभक्तं यथाकाल यथाविधि । अन्यथा सर्वशुद्धोऽपि स्यादशुद्धवदेनकृत् ॥२३३ काले पूर्वाह्लके यावत्परतो परालेऽपि च । यामस्याद्धं न भोक्तव्वं निशायां चापि दुर्विने ॥२३४ याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लद्धयेत् । आहारस्यास्त्ययं कालो नौषधादेर्जलस्य वा ॥२३५ समामादिदिने हिले चन्द्रसूर्याधुपग्रहे । अन्यत्राप्यपयोगेषु भोजनं नैव कारयेत् ॥२३६ उच्यते विधिरत्रापि भोजयेन्नाशुचिगृहे । तमश्छन्नेऽथ त्रसादिबहुजन्तुसमाश्रिते ॥२३७ जैमनीयादिजीवानां हिंस्राणा दृष्टिगोचरे । अश्वादिपशुसंकीर्ण स्थाने भोज्यं न जातुचित् ॥२३८ है क्योकि विना आहारके यह शरीर टिक नहीं सकता और उस आहारका प्राप्त होना एषणा समितिके पालनसे ही होता है ॥२३०। समस्त व्रतोको शुद्ध पालन करनेके लिए आहारकी शुद्धि रखना ही एषणासमिति है तथा सक्षेपसे यही एषणासमितिका लक्षण है ॥२३१।। पहले जो मास मद्य मधु उदम्बर आदिके अतिचार बतलाए हैं उनसे रहित भोजन करना शुद्ध आहार कहलाता है । जिस भोजनमे मासादिकके अतिचार लगें वह भोजन कभी शुद्ध नही कहला सकता ॥२३२।। अणुव्रती श्रावकोको वह शुद्ध और यथायोग्य भोजन भी समयके अनुसार और विधिके अनुसार ग्रहण करना चाहिए। यदि वह भोजन समय और तिथिके अनुसार ग्रहण न किया गया हो तो सब प्रकारसे शुद्ध होनेपर भी वह अशुद्ध और पाप उत्पन्न करनेवाला कहलाता है ॥२३३॥ भोजनका समय दोपहरसे पहले पहले है अथवा दोपहरके बाद दिन ढलेका समय भी भोजनका समय है, अणुव्रती श्रावकोको सूर्य निकलनेके बाद आधे पहरतक भोजन नही करना चाहिये, इसी प्रकार सूर्य अस्त होनेके आधे पहर पहले भोजन कर लेना चाहिये । इसी प्रकार अणुव्रती श्रावकको रातमे सर्वथा भोजन नही करना चाहिये तथा जिस दिन पानी बरस रहा हो, काली घटा छायी हो और उस घटाके कारण अन्धेरा-सा हो गया हो उस समय भी । भोजन नही करना चाहिये ॥२३४।। अणुव्रती श्रावकोंको प्राय पहले पहरमे भोजन नही करना चाहिये । (क्योकि वह समय मुनियोके भोजनका समय नही है। मुनिलोग प्रायः दूसरे पहरमे भोजनके लिए निकलते हैं तथा मुनियोको आहार देकर या उस समयतक पात्रकी प्रतीक्षा कर भोजन करना श्रावकका कर्तव्य है अतएव श्रावकोको पहले पहरमे भोजन नही करना चाहिये ।) इसी प्रकार अणुव्रती श्रावकोको दोपहरका समय उल्लघन भी नही करना चाहिये । यह भोजनका समय बतलाया है, औषधि और जलका समय नही बतलाया । अत वह उन्हे ले सकता है ।।२३५॥ जिस दिन कोई भारी युद्ध हो रहा हो, अथवा जिस दिन अनेक जीवोकी हिंसा हो रही हो, जिस दिन सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण पड रहा हो तथा इनके सिवाय और भी अशुभयोग जिस दिन हो उस दिन अणुव्रती श्रावकको उचित है कि वह भोजन न करे ॥२३६।। आगे भोजनकी विधि बतलाते हैं। अपवित्र घरमे कभी भोजन नही करना चाहिए। जिस घरमे अन्धेरा हो वहाँपर कभी भोजन नही करना चाहिए तथा जिस घरमे या जिस स्थानमे बस और स्थावर आदि अनेक प्रकारके बहुतसे जीवोका समुदाय हो, जहाँपर बहुतसे त्रस या स्थावर जीव भरे हो वहाँपर कभी भोजन नही करना चाहिये ॥२३७॥ जहाँपर घोडे, गाय, बैल आदि पशु बांधे जाते हो ऐसे सकीर्ण या छोटे स्थानमे भी कभी भोजन नही अरना चाहिये, इसी प्रकार जहाँपर यज्ञ आदिमे मारे - श्रावकाचार-सग्रह अन्तरायाश्च सन्त्यत्र श्रावकाचारगोचरा । अवश्यं पालनीयास्ते त्रसहिंसानिवृत्तये ॥२३९ वर्शनात्स्पर्शनाच्चैव मनसि स्मरणादपि । श्रवणाद् गन्धनाच्चापि रसनादन्तरायका ॥२४० वर्शनात्तद्यथा साद्रं मांसमद्यं वसाऽजिनम् । अस्यादि भोजनस्यादौ सद्यो दृष्ट्वा न भोजयेत् ॥२४१ शुष्कचर्मास्थिलोमादिस्पर्शनान्नेव भोजयेत् । मूषकादिपशुस्पर्शात्यजेदाहारमनसा ॥२४२ गन्धनान्मद्यगन्धेव पूतिगन्धेव तत्समे । आगते घ्राणमार्ग च नान्नं भुञ्जीत दोषवित् ।।२४३ प्राक् परिसख्यया त्यक्तं वस्तुजातं रसादिकम् । भ्रान्त्या विस्मृतमादाय त्यजेद् भोज्यमसंशयम् ॥२४४ आमगोरससंयुक्तं द्विदलानं परित्यजेत् । लालायाः स्पर्शमात्रेण त्वरितं बहुमूर्च्छनात् ॥२४५ भोज्यमध्यादशेषांश्च दृष्ट्वा सकलेवरान् । यद्वा समूलतो रोम दृष्ट्वा सद्यो न भोजयेत् ॥२४६ चमतोयादिसम्मिश्रात्सदोषमशनादिकम् । परिजायेगिते सूक्ष्मैः कुर्यादाहारवर्जनम् ॥२४७ जानेवाले जीव दृष्टिगोचर हो रहे हो वहाँपर भी भोजन नही करना चाहिये ॥२३८।। अणुव्रत्ती श्रावकोंके लिए श्रावकाचारोमे भोजनके अन्तराय बतलाये हैं। श्रावकोको त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग करनेके लिए उन अन्तरायोको भी सदा बचाते रहना चाहिये ॥२३९॥ श्रावकोके लिए भोजनके अन्तराय कई प्रकारके होते हैं। कितने ही अन्तराय देखनेसे होते हैं, कितने ही छूनेसे वा स्पर्श कर लेनेसे होते हैं, कितने ही मनमें स्मरण कर लेने मात्रसे होते हैं, कितने ही सुननेसे होते हैं, कितने ही सूंघनेसे होते हैं और कितने ही अन्तराय चखने वा स्वाद लेनेसे अथवा खाने मात्रसे होते हैं ॥२४०।। सबसे पहले देखनेके अन्तराय दिखलाते हैं । गीला मास, मद्य, चर्वी, गीला चमडा, गीली हड्डी, रुधिर, पीव आदि पदार्थ यदि भोजन करनेसे पहले दिखाई पड जाय तो उसी समय भोजन नही करना चाहिये। यदि भोजन करते समय ये पदार्थ दिखाई पड़ जायें तो उसी समय भोजन नही करना चाहिए। यदि भोजन करते समय ये पदार्थ दिखाई पड जाये तो भोजन छोड देना चाहिये। मुख शुद्धि कर उठ आना चाहिये। ये देखनेके अन्तराय है ।।२४१।। सूखी हड्डी, सूखा चमडा, बाल आदिका स्पर्श हो जानेपर भोजन नही करना चाहिये । इसी प्रकार चूहा, कुत्ता, बिल्ली आदि घातक पशुओका स्पर्श हो जानेपर शीघ्र ही भोजनका त्याग कर देना चाहिये । ये स्पर्श करनेके अन्तराय हैं ॥२४२।। भोजनके अन्तराय और दोषोको जानने- वाले श्रावकोको मद्यको दुर्गन्ध आनेपर वा मद्यकी दुर्गन्धके समान दुर्गन्ध आनेपर अथवा और भी अनेक प्रकारकी दुर्गन्धोके आनेपर भोजनका त्याग कर देना चाहिये । ये सूंघनेके अन्तराय हैं ॥२४३॥ भोगोपभोग पदार्थोका परिमाण करते समय जिन पदार्थोंका त्याग कर दिया है अथवा जिन रसो का त्याग कर दिया है उनको भूल जानेके कारण अथवा किसी अन्य पदार्थका भ्रम हो जानेके कारण ग्रहण कर ले तथा फिर उसी समय स्मरण आ जाय, अथवा किसी भी तरह मालूम हो जाय तो बिना किसी सन्देहके उस समय भोजन छोड देना चाहिये ॥२४४|| कच्चे दूध दही आदि गोरसमे मिले हुए चना, उडद, मूग, रमास आदि जिनके वरावर दो भाग हो जाते हैं (जिनकी दाल बन जाती है) ऐसे अन्नका त्याग कर देना चाहिये, क्योकि कच्चे गोरसमे मिले हुए चना, उडद, मूग आदि अन्नोंके खानेसे मुँहको लारका स्पर्श होते ही उसमे उसी समय अनेक सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं ॥२४५।। यदि बने हुए भोजनमे किसी भी प्रकारके स जीवोका कलेवर दिखाई पड़े तो उसे देखते ही भोजन छोड देना चाहिये, इसी प्रकार यदि भोजनमे जड सहित वाल दिखाई दे तो भी भोजन छोड़ देना चाहिये ।।२४६॥ "यह भोजन चमड़ेके पानीसे बना है लाटीसंहिता १०७ श्रवणाद्धिसकं शब्द मारयामोति शब्दवत् । दग्धो मृत स इत्यादि श्रुत्वा भोज्यं परित्यजेत् ।।२४८ शोकाश्रितं वचः श्रुत्वा मोहाद्वा परिदेवनम् । दीनं भयानकं श्रुत्वा भोजनं त्वरितं त्यजेत् ।।२४९ उपमानोपमेयाभ्यां तदिदं पिशितादिवत् । मन स्मरणमात्रत्वात्कृत्स्नमन्तादिकं त्यजेत् ॥२५० सूतकं पातकं चापि यथोक्तं जैनशासने । एषणाशुद्धिसिद्धयर्थवजयेच्छ्रावकाग्रणी ॥२५१ एषणासमिति ख्याता संक्षेपात्सारसंग्रहात् । तत्रान्तराद्विशेषज्ञैर्ज्ञातव्याऽस्ति सुविस्तरात् ॥२५२ अस्ति चादाननिक्षेपस्वरूपा समितिः स्फुटम् । वस्त्राभरणपात्रादिनिखिलोपधिगोचरा' २५३ यावन्त्युपकरणानि गृहकर्मोचितानि च । तेषामादाननिक्षेपौ कर्तव्यो प्रतिलेख्य च ॥२५४ प्रतिष्ठापननाम्नी च विख्याता समितिर्यथा । श्रवद्धपुर्दशद्वारा मलमूत्राविगोचरा ॥२५५ निश्च्छिद्रं प्रासुकं स्थानं सर्वदोषविजितम् । दृष्ट्वा प्रमायं सागारो वर्षोमूत्रादि निक्षिपेत् ॥२५६ या इसमे चमडेके बर्तनमें रक्खे हुए घी, दूध, तेल, पानी आदि पदार्थ मिले हुए हैं और इसीलिए यह भोजन अशुद्ध या सदोष हो गया है" ऐसा किसी भी सूक्ष्म इशारेसे या किसी भी सूक्ष्म चेष्टा मालूम हो जाय तो उसी समय आहार छोड देना चाहिये । ये सब चखनेके अन्तराय है ।।२४७।। मैं इसको मारता हूँ इस प्रकारके हिंसक शब्दोको सुनकर अथवा वह जल गया, मर गया इस प्रकारके हिंसक शब्दोको सुनकर भोजनका परित्याग कर देना चाहिये। ये सुननेके अन्तराय हैं ॥२४८॥ अथवा शोकसे उत्पन्न होनेवाले वचनोको सुनकर या किसीके मोहसे अत्यन्त रोनेके शब्द सुनकर अथवा अत्यन्त दीनताके वचन सुनकर या अत्यन्त भयकर शब्द सुनकर शीघ्र ही भोजन छोड़ देना चाहिये । ये सुननेके अन्तराय हैं ।।२४९।। "यह भोजन मासके समान है या रुधिरके समान है अथवा विष्ठाके समान है" इस प्रकार किसी भी उपमेय या उपमानके द्वारा मनमे स्मरण हो आवे तो भी उसी समय समस्त जलपानादि- का त्याग कर देना चाहिए। (“यह भोजन मासके समान है" इस प्रकारका स्मरण हो आना उपमेयके द्वारा होनेवाला स्मरण कहलाता है तथा "मास भी ऐसा ही होता है" इस प्रकारका स्मरण होना उपमानके द्वारा होनेवाला स्मरण कहलाता है) ॥२५०॥ अणुव्रतोको पालन करने- वाले श्रावकोको अपने भोजनोकी शुद्धि बनाए रखनेके लिए अथवा एषणासमितिको शुद्ध रीतिसे पालन करनेके लिए जैनशास्त्रोमे बतलाए हुए सूतक पातकोका भी त्याग कर देना चाहिये ।।२५१॥ इस प्रकार अत्यन्त सक्षेपसे तथा सबका थोड़ा थोड़ा सार कहकर एषणासमितिका स्वरूप बतलाया। विशेष विद्वानोको यदि विस्तारके साथ इसका स्वरूप जानना हो तो अन्य शास्त्रोसे जान लेना चाहिये ।।२५२।। चौथी समितिका नाम आदाननिक्षेपण समिति है। अणुव्रती श्रावकोको इसका भी पालन करना चाहिए। वस्त्र, आभरण, बर्तन आदि घरके जितने पदार्थ हैं: या जितने पदार्थ घरके काममे आते हैं उन सबको देख-शोध कर उठाना या रखना चाहिये जिससे किसी जीवका घात न हो जाय, इसीको आदाननिक्षेपण समिति कहते हैं ॥२५३-२५४॥ पांचवी समितिका नाम प्रतिष्ठान समिति या उत्सर्ग समिति है । वह भी अणुव्रती श्रावकोको पालन करनी चाहिए। इस शरीरके दश द्वार हैं-दो नेत्र, दो कान, दो नाक, एक मुँह, एक गुदा, एक गुह्य न्द्रिय और (एक ब्रह्माड द्वार इस प्रकार दश द्वार हैं। इन दश द्वारोंसे मल सूत्र कफ मैल आदि पदार्थ सदा बहते रहते हैं । उन सब मलोको तथा विशेषकर मल मूत्रको ऐसे स्थानपर छोड़ना चाहिये जो छिद्र रहित हो, प्रासुक या निर्जीव हो और समस्त दोषोसे रहित हो ऐसे स्थानको देख कर और शोध कर अणुव्रती श्रावकोको मल आदि छोड़ना चाहिये जिससे किसी जीवका घात न हो ।।२५५-२५६।।

१०८ श्रावकाचार-संग्रह अस्ति चालोकितपानभोजनाल्याथ पञ्च ताः। भावना भावनीया स्यादहिसावतहेतवे ॥२५७ शुद्धं शोधितं चापि सिद्धं भक्तादिभोजनम् । सावधानतया भूयो दृष्टिपूतं च भोजयेत् ॥२५८ न चानध्यवसायेन दोषेणानवधानतः । मया दृष्टचरं चैतन्मत्वा भोज्यं न भोजयेत् ॥२५९ तत्र यद्यपि भक्त्यावि शुद्धमस्तीति निश्चितम् । तथापि दोष एव स्यात्प्रमादादिकृतो महान् ॥२६० सन्ति तत्राप्यतीचाराः पञ्च सूत्रेऽपि लक्षिता । त्रसहिंसापरित्यागलक्षणेऽणुव्रताह्वये ॥२६१ तत्सूत्रं यथा- बन्धबधच्छेदातिभारारोपणानपाननिरोधाः ॥४१ मत्रोक्तं बधशब्देन ताडनं यष्टिकाविभि. । प्रागेव प्रतिषिद्धत्वात्प्राणिहत्या न श्रेयसी ॥२६२ पशूनां गोमहिष्यादिछागवारणवाजिनाम् । तन्मात्रातिरिक्तां बाधा न कुर्याद्वा कशादिभिः ॥२६३ बन्धो मात्राधिको गाढं दुःखदं शृङ्खलादिभि । आतताया (?) प्रमावाद्वा न कुर्याच्छावकोत्तम ॥२६४ इस प्रकार चार भावनाओका स्वरूप कहा। पांचवी भावनाका नाम आलोकितपानभोजन है। आलोकितपानभोजन दिनमे सूर्यके प्रकाशमे देख-शोध कर भोजन करनेको कहते हैं। इसका पालन भी गृहस्थोको अवष्य करना चाहिये । इस प्रकार पांचो भावनाओका स्वरूप कहा । अणुव्रती श्रावकोको अहिंसावत पालन करनेके लिए इन पांचो भावनामोको अच्छी तरह पालन करना चाहिए तथा अच्छी तरह चितवन करना चाहिये ॥२५७। जो दाल भात आदि भोजन तैयार किया हुआ है वह चाहे शुद्ध हो और खूब अच्छी तरह शोध लिया हो तथापि उसे फिर भी अच्छी तरह देख कर बडी सावधानीके साथ भोजन करना चाहिये ॥२५८॥ अपने अज्ञानसे या किसी अन्य दोषसे अथवा असावधानीसे ऐसा कभी नही मानना चाहिये कि यह भोजन मेरा देखा हुआ है अथवा मेरा शुद्ध किया है तथा ऐसा मान कर बिना देखे शोधे कभी भोजन नहीं करना चाहिये ।।२५९॥ यद्यपि उस भोजनमे यह निश्चित है कि यह भोजन शुद्ध है, इसमे किसी प्रकारका सदेह नहीं है तथापि यदि बिना देखे-शोघे भोजन किया जायगा तो प्रमाद या अज्ञानसे उत्पन्न हुमा महा दोष लगेगा ॥२६०॥ तत्त्वार्थसूत्रमे श्रम जीवोकी हिंसाका त्याग करने रूप अहिंसा अणुव्रतके पांच अतिचार बतलाये हैं ।।२६१॥ मारना, बाँधना, छेदना, अधिक बोझा लादना तथा अन्नपानका रोक देना ये पांच अहिंसा अणुव्रतके अतिचार हैं ॥४१॥ आगे इन्हीका स्वरूप यथाक्रमसे दिखलाते है। यहांपर बध शब्दसे या मारना शब्दसे लकडी आदिसे मारना लेना चाहिये। प्राणोका नाश करना नही लेना चाहिये क्योकि प्राणोकी हत्या करना तो पहले ही छोडा जा चुका है, उसका त्याग पहले ही किया जा चुका है, प्राणोकी हत्या करना कभी कल्याण करनेवाली नहीं है इसलिये उसका तो सर्वथा त्याग करना बतलाया है और सबसे पहले उसका त्याग बतलाया है। प्राणोकी हत्याका त्याग करके किसी भी पुरुष या पशुको लकडी बेत थप्पड घुसा आदिसे मारना अतिचार कहलाता है ।।२६२॥ गाय भैंस बकरी हाथी घोड़ा आदि पशुओको कोडा, पैना, लकडी आदिसे उनकी शक्तिसे अधिक बाधा नही पहुंचाना चाहिये ।।२६३॥ अणुव्रत धारण करनेवाले उत्तम श्रावकोको अपने क्रूर परिणामोंसे अथवा प्रमादसे गाय भैस आदि पशुओको सांकल रस्सी आदिसे इस प्रकार कसकर नहीं बाँधना चाहिये जिससे उनको दुख पहुंचे अथवा जिस बन्धनको वह सहन न कर सके। उसको दुखदायी लाटीसहिता १०९ छेदो नासाविछिद्रार्थ' काष्ठसूलादिभिः कृत । तावन्मात्रातिरिक्तं तन्न विधेयं प्रतिमान्वितैः ॥२६५ सापराधे मनुष्यादौ कर्णनासादि छेदनम् । न कुर्याद भूपकल्पोऽपि प्रतवानपि कश्चन ॥२६६ भार काष्ठादिलोष्ठान्नघृततैलजलादिकम् । नेतं क्षेत्रान्तरे क्षिप्तं मनुजांश्चत्रिकादिषु ॥२६७ यावद्यस्यास्ति सामथ्यं तावत्तत्रैव निक्षिपेत् । नातिरिक्तं ततः क्वापि निक्षिपेद् व्रतधारकः ॥२६८ दासी-दासादिभृत्याना बन्धु-मित्रादिप्राणिनाम् । सामर्थ्यातिक्रम क्वापि कर्तव्यो न विचक्षणे ॥२६९ अन्नपाननिरोधाख्यो व्रतदोषोऽस्ति पञ्चम । तिरश्चा वा नराणां वा गोचर स स्मृतो यथा ॥२७० नराणां गोमहिष्यादितिरश्चां वा प्रमादत । तृणाद्यन्नादिपातानां विरोधो व्रतदोषकृत् ॥२७१ बहुप्रलपितेनालं ज्ञेयं तात्पर्यमानत । सा क्रिया नैव कर्तव्या यथा त्रसवधो भवेत् ॥२७२ इत्युक्तमात्रदिग्मानं सागाराहमणुव्रतम् । त्रसहिंसापरित्यागलक्षणं विश्वसाक्षिभिः ॥२७३ इति श्रावकाचारापरनामलाटीसहिताया त्रसहिंसापरित्यागप्रथमाणुव्रतवर्णनो नाम चतुर्थ सर्गः ॥४॥ कस कर बाँधना अतिचार है ॥२६४॥ प्रतिमा रूप अहिंसा अणुव्रतको पालन करनेवाले श्रावकोको नाक छेदनेके लिए सुई सूजा या लकडी आदिसे जो छेद करना पडता है वह भी उतना ही करना चाहिए जितनेसे काम चल जाय, उससे अधिक छेद नही करना चाहिये। दुख देनेवाला अधिक छेद करना अतिचार है ॥२६५।। यदि कोई राजाके समान व्रती मनुष्य हो तथा उसे अपराधी मनुष्योको दण्ड देनेका पूर्ण अधिकार हो तो भी उसे अपराधी मनुष्योके भी नाक कान आदि नही काटने चाहिए ॥२६६।। इसी प्रकार किसी मनुष्य या पशुपर उसकी सामर्थ्यसे अधिक बोझा लादना भी अतिचार है। यदि किसी व्रत्ती श्रावकको काठ, पत्थर, लोहा, अन्न, घी, तेल, जल आदि पदार्थ एक स्थानसे दूसरे स्थानमे ले जाना हो अथवा किसी मनुष्य या स्त्रीको डोलीमे बिठाकर दूसरे किसी स्थानमे ले जाना हो तो जिस मनुष्य या पशुकी जितनी सामर्थ्य है उसपर उतना ही बोझ रखना चाहिये, अणुव्रती श्रावकोको उनकी शक्तिसे अधिक बोझा कभी नहीं रखना चाहिये । अधिक बोझा लादना अहिंसाणुव्रतका चौथा अतिचार है ।।२६७-२६८॥ चतुर श्रावकोको उचित है कि वे दास दासी आदि नौकर चाकरोसे अथवा भाई मित्र आदि कुटुम्बीजनोसे काम लेवें तो उनकी शक्तिसे अधिक काम नहीं लेना चाहिये । उनकी शक्तिका अतिक्रम कभी नही करना चाहिये । शक्तिसे अधिक काम लेना या शक्तिसे अधिक बोझा लादना या शक्तिसे अधिक चलाना आदि सब अहिंसाणुव्रतका अतिचार है ॥२६९।। इस अहिंसाणुव्रतका पांचवां अतिचार अन्न-पान निरोध है वह भी मनुष्य और पशु दोनोके लिए होता है। भावार्थ-दासी दास भाई बन्धु पुत्र स्त्री आदि अपने आश्रित मनुष्योको या पशुओको समयपर भोजन न देना अथवा उनको भूखे प्यासे रखना या कम भोजन देना आदि अहिंसाणुव्रतका पांचवां अतिचार है ॥२७०॥ प्रमादसे दासी दासादिक मनुष्योको या गाय भैस आदि पशुओको भोजन या घास जल आदि खानेपीनेकी सामग्रीको उनको देनेसे रोक देना, न देने देना अहिंसाणुव्रतका अतिचार है ॥२७१।। बहुत कहनेसे क्या, सबका अभिप्राय यह समझ लेना चाहिये कि अणुव्रत धारण करनेवाले श्रावकोको ऐसी कोई भी क्रिया नही करनी चाहिये जिसमे त्रस जीवोकी हिंसा होतो हो ॥२७२।। इस प्रकार ऊपर जो कुछ कहा गया है, जो जो त्याग बतलाया है, जिन जिन क्रियाओका निषेध किया है, जिन जिन व्यापारोका निषेध किया है वह सब गृहस्थोंके द्वारा पालन करने योग्य त्रस जीवोकी हिंसाका त्याग करने रूप अहिंसाणुव्रत है ऐसा भगवान् सर्वज्ञदेवने कहा है ।।२७३।। इस प्रकार लाटीसहितामे त्रसहिंसाके त्याग करने रूप अहिंसाणुव्रत नामके प्रथम अणुव्रतको वर्णन करनेवाला यह चौथा सर्ग समाप्त हुआ ||४|| पंचम सर्ग अथ मृषापरित्यागलक्षणं व्रतमुच्यते । सर्वतस्तन्मुनीना स्याद्देशतो वेश्मवासिनाम् ॥१ ग्राह्या तत्रानुवृत्ति सा प्राग्वदत्रापि धीधनैः । प्रोक्तमसदभिधानमनृतं सूत्रकारकै ॥२ असविति हिंसाकरमभिधानं स्याद्भाषणम् । शब्दानामनेकार्थत्वाद्गतिश्चानुसारिणी ॥३ नात्रासदिति शब्देन मृषामात्रं समस्यते । साकारमन्त्रभेदादौ सूनृतत्वानुषङ्गतः॥४ देशतो विरतिस्तत्र सूत्रमित्यनुवर्तते । प्रसबाधाकर तस्मादचो वाच्यं न धीमता ॥५ सत्यमप्यसत्यता याति क्वचिद्धिसानुबन्धत । सर्वतस्तन्न वक्तव्यं यथा चौरादिदर्शनम् ॥६ असत्यं सत्यतां याति कचिज्जीवस्य रक्षणात् । अचक्षुषा मया चोरो न दृष्टोऽस्ति यथाध्वनि ।।७ तत्रासत्यवचस्त्यागवतरक्षार्थमेव या । भावनाः पञ्च सूत्रोक्ता भावनीया व्रताथिभिः ॥८ अब आगे असत्य वचनोका त्याग कर देना ही जिसका लक्षण है ऐसे सत्याणुव्रतका स्वरूप कहते हैं, यह सत्यव्रत पूर्ण रूपसे तो मुनियोंके होता है तथा एकदेश रूपसे गृहस्थोंके होता है ॥१॥ बुद्धिमानोको अहिंसाणुव्रतमे कहे हुए समस्त कथनकी अनुवृत्ति इस सत्याणुव्रतमे भी ग्रहण करनी चाहिये। सूत्रकारने कहा है "अदसभिवानमनृतम्' अर्थात् प्रमादके योगसे असत्य वचन कहना अनृत या झूठ है ।।२।। आगे असत् और अभिधान दोनोका अलग अलग अर्थ कहते हुए दिखलाते हैं। हिंसा करनेवालेको असत् कहते हैं तथा भाषण करने, कहने या बोलनेको अभिधान कहते हैं। इन दोनो शब्दोका मिलाकर अर्थ करनेसे यही अर्थ निकलता है कि जो जो वचन हिंसा करनेवाले हैं उन सबको अनृत कहते हैं। यद्यपि असत् शब्दके अनेक अर्थ होते हैं तथापि उनका अथं वही लिया जाता है जो प्रकरणके अनुसार ठीक बैठता है ।।३।। यहाँ पर असत् शब्दका अर्थ केवल झूठ बोलना मात्र नही लेना चाहिये, क्योकि यदि असत् शब्दका अर्थ केवल झूठ बोलना लिया जायगा तो साकार मन्त्र भेद आदि जो झूठके भेद हैं उनमे कुछ बोलना नही पड़ता इसलिये ऐसे झूठको सत्यमे ही शामिल करना पडेगा ॥४॥ सूत्रमे जो 'असदभिधानमनृतम्' लिखा है उसमे “एकदेश रूपसे त्याग करना" इस वाक्यकी अनुवृत्ति चली आ रही है। इस अनुवृत्तिको मिलानेसे इस सबका यही अर्थ होता है जो हिंसा करनेवाले वचन हैं उनका एकदेश त्याग करना सत्याणुव्रत है अतएव बुद्धिमान् श्रावकोको ऐसे वचन कभी नही कहना चाहिये जिनके कहनेसे त्रस जीवोकी हिंसा होना सम्भव हो ॥५।। जिस सत्य वचनके कहनेसे त्रस जीवोकी हिंसा होना सम्भव हो ऐसे सत्यवचन भी कभी कभी असत्य ही कहलाते हैं "जैसे इस चोरको चोरी करते हुए मैंने देखा था" ऐसा कहनेसे उसको दड दिया जा सकता है अतएव ऐसे सत्यवचन कहना भी हिंसा करनेवाले वचन हैं, ऐसे सत्यवचत भी असत्य वचन कहलाते हैं ऐसे वचन अणुव्रती श्रावकोको कभी नही बोलने चाहिये ।।६। इसी प्रकार कही कही पर जीवोकी रक्षा होनेसे असत्य वचन भी सत्य कहलाते हैं। जैसे मुझे दिखाई नही देता इसलिये मार्गमे मैंने किसी चोरको नही देखा ॥७॥ इस असत्यवचनोके त्याग करने रूप सत्याणुव्रतकी रक्षा करनेके लिए सूत्रकारने पांच भावनाएं बतलाई हैं । अणुव्रत धारण करनेवाले श्रावकोको उन भावनाओका पालन भी अच्छी तरह करते रहना चाहिये ।।८॥

लाटीसहिता १११ तत्सूत्रं यथा-- क्रोध-लोभ-भीरुत्व-हास्य-प्रत्याख्यान्यनुवीचिभाषणं पञ्च ॥४२ यत्र क्रोधप्रत्याख्यानं वचो वाच्यं मनीषिभि । स्वपराश्रितभेदेन तद्वचश्च द्विघोच्यते ॥९ स्वयं क्रोधेन सत्यं वा न वक्तव्यं कदाचन । न च वाच्यं वचस्तद्वत्परेषा क्रोधकारणम् ॥१० यथा क्रोधस्तथा मानं माया लोभस्तथैव च । तेषामवद्यहेतुत्वे मृषावादाविशेषत ॥११ हास्योज्झितं च वक्तव्यं न च हास्याधित क्वचित् । तदपि द्विविघं ज्ञेयं स्वपरोभयभेदतः ॥१२ स्वयं हास्यवता भूत्वा न वक्तव्यं प्रमादत । न च वाच्यं परेषां वा हास्यहेतुविचक्षणः ॥१३ हास्योपलक्षणेनैव नोकषाया नवेति ये । तेऽपि त्याज्या मृषात्यागनतसंरक्षणार्थिभि ॥१४ भीरुत्वोत्पादकं रौद्रं वचो वाच्यं न श्रावकै । अवश्य बन्धहेतुत्वात्तीवासातादिकर्मणाम् ॥१५ वह सूत्र यह है-क्रोधका त्याग, लोभका त्याग, डर या भयका त्याग, हंसीका त्याग और अनुवीचिभाषण या निर्दोष अनिन्द्य भाषण ये पाँच सत्याणुव्रतकी भावनाएं हैं ॥४२॥ आगे इन्ही पांचो भावनाओका स्वरूप बतलाते हैं बुद्धिमानोको ऐसे वचन कहने चाहिये जिसमे क्रोध उत्पन्न न हो, यही क्रोधका त्याग नामकी पहली भावना है। क्रोधसे उत्पन्न होने- वाले वचन दो प्रकारके हैं-एक अपने क्रोवसे कहे जानेवाले वचन और दूसरे दूसरेको क्रोध उत्पन्न करनेवाले वचन ॥९॥ अणुव्रती श्रावकको स्वय क्रोध कर सत्य वचन भी कभी नही कहने चाहिये तथा इसी प्रकार ऐसे वचन भी कभी नही कहने चाहिये जो दूसरे लोगोको क्रोध उत्पन्न करने वाले हों ॥१०॥ जिस प्रकार क्रोधसे कहे जानेवाले वचनोका त्याग करना बतलाया है उसी प्रकार मान माया और लोभका त्याग भी समझ लेना चाहिये । इसका भी कारण यह है कि क्रोध मान माया वा लोभसे उत्पन्न हुए वचन पापके कारण होते हैं अतएव असत्य वचनोसे उनमे किसी प्रकारकी विशेषता नही होती अर्थात् जो जो वचन कषायोके वशीभूत होकर कहे जाते हैं अथवा कषायोको उत्पन्न करनेवाले वचन कहे जाते है वे सब प्राणोको पीडा उत्पन्न करनेवाले या पाप उत्पन्न करनेवाले होते हैं इसलिये ऐसे वचन असत्य ही कहे जाते हैं ॥११॥ अणुव्रती श्रावकको सदा हास्य रहित वचन कहना चाहिये । हंसीसे मिले हुए वचन श्रावकोको कभी नही कहने चाहिये । क्रोध रूप वचनोके समान हास्य रूप वचन भी दो प्रकार हैं-एक स्वय हंसीसे कहे जानेवाले वचन और दूसरे दूसरोको या दोनोको हँसी उत्पन्न करनेवाले वचन ।।१२।। अणुव्रती श्रावकको प्रमादके वशीभूत होकर स्वय हँसकर वचन कभी नही कहने चाहिये। इसी प्रकार चतुर श्रावकोको ऐसे वचन भी कभी नही कहने चाहिये जो दूसरोको हंसी उत्पन्न करनेवाले हो ॥१३॥ यहाँपर हास्यशब्द उपलक्षण है इसीलिये हास्य शब्दसे नौ नोकषाय लेने चाहिये। असत्य वचनोके त्याग करने रूप सत्याणुव्रतको धारण करनेवाले श्रावकोको उस सत्याणुव्रतकी रक्षा करनेके लिए हास्यके समान हास्य रति अरति शोक भय जुगुप्सा स्त्रीवेद पु वेद और नपुंसकवेद इन नौ नोकषायोका भी त्याग कर देना चाहिये । अभिप्राय यह है कि कषाय या नोक- पायोसे कहे जानेवाले वचन अथवा कषाय या नोकषायोको उत्पन्न करनेवाले वचन किसी न किसीको दुख पहुंचानेवाले या प्राणोको पीडा पहुंचानेवाले होते हैं अतएव ऐसे वचन असत्य ही पाहे जाते हैं इसीलिए श्रावकोको ऐसे वचन नही कहने चाहिये ||१४|| अणुव्रती श्रावकोको डर उत्पन्न करनेवाले भयानक शब्द कभी नही कहने चाहिये क्योकि दूसरोको डरानेवाले भयानक ११२ श्रावकाचारसग्रह आलोचित च वक्तव्यं न वाच्यमनालोचितम । चौर्यादिविकथाख्यानं न वाच्य पापभीरुणा ॥१६ अनासत्यपरित्यागवतेऽतीचारपञ्चकम् । प्रामाणिक प्रसिद्ध स्यात्सूत्रेप्युक्तं महर्षिभि ॥१७ तत्सूत्रां यथा- मिथ्योपदेश-रहोऽभ्याख्यान-कूटलेखक्रिया-न्यासापहार-साकारमन्त्रभेदा ॥४३ तत्र मिथ्योपदेशाख्य. परेषा प्रेरण यथा । अहमेवं न वक्ष्यामि वद त्वं मम मन्मनात् ॥१८ रहोऽभ्याख्यानमेकान्ते गुह्यवाप्रिकाशनम् । परेषां शङ्कया किञ्चिद्धेतोरस्त्यत्र कारणम् ॥१९ कूटलेखक्रिया सा स्याद्वञ्चनार्थ लिपिम॒षा । सा न साक्षात्तथा तस्या मृषानाचारसम्भवात् ॥२० किन्तु स्वल्पा यथा कश्चित्किञ्चित्प्रत्यूहनिस्पृह । इद मदीयपत्रेषु मदर्थ न लिपीकृतम् ॥२१ न्यासस्याप्यपहारो यो न्यासापहार उच्यते । सोऽपि परस्य सर्वस्वहरो नैव स्वलक्षणात् ॥२२ शब्दोके कहनेसे आसातावेदनीय आदि अशुभ कर्मोका बन्ध अवश्य होता है ॥१५॥ अणुव्रती श्रावकोको जो कुछ कहना चाहिये वह सब समझकर शास्त्रोके अनुकूल वचन कहने चाहिये । विना सोचे-समझे शास्त्रोके विरुद्ध वचन कभी नही कहने चाहिये, इसी प्रकार पापोसे डरनेवाले अणुव्रती श्रावकोको चौर कथा, राष्ट्रकथा, भोजनकथा, युद्धकथा आदि विकथाएं कभी नही कहनी चाहिये ॥१६|| अणुव्रती श्रावकोको इस प्रकार ऊपर लिखी हुई सत्यव्रतकी पांचो भावनाओका पालन अवश्य करना चाहिये। इसके पालन करनेसे व्रतोकी रक्षा होती है। इस असत्य वचनोंके त्याग करने रूप सत्याणुव्रतके पांच अतिचार हैं। वे पाँचो ही अतिचार प्रसिद्ध हैं और उनको सब मानते हैं । बडे बडे महर्पियोने भी सूत्रोमे उनका वर्णन किया है ॥१७॥ वह सूत्र इस प्रकार है- मिथ्या उपदेश देना, किसी एकातमे की हुई क्रियामोको या कही हुई बातको प्रकट कर देना, झूठे लेख लिखना, किसीका धरोहर मार लेना और किसी भी चेष्टासे किसीके मनकी बात को जानकर प्रकट कर देना ये पांच सत्याणुव्रतके अतिचार हैं ।।४३॥ आगे अनुक्रमसे इन्हीका स्वरूप दिखलाते हैं- "इस बातको मै नही कहूँगा मेरे मनके अनुसार तू ही कह" इस प्रकार मिथ्यावचन कहने- के लिए दूसरोको प्रेरणा करना मिथ्योपदेश नामका पहला अतिचार कहलाता है ॥१८॥ “यहाँ पर कुछ कारण अवश्य है बिना कारणके एकान्तमे कोई बातचीत नही करता" इस हेतुसे शका उत्पन्न कराकर एकान्तमे किसी पुरुषके द्वारा या स्त्री पुरुषोके द्वारा कही हुई बातोको या की हुई क्रियामोको प्रकाशित करना रहोभ्याख्यान कहलता है ॥१९॥ दूसरोको ठगने के लिए झूठा लेख लिखना या लिखाना कूटलेखक्रिया है। इसमे इतना और समझ लेना चाहिये कि यह झूठा लेख साक्षात् नही लिखा जाता, न साक्षात् झूठा लेख लिखाया जाता है क्योकि यदि साक्षात् झूठा लेख लिखा जाय या लिखाया जाय तब तो वह असत्य वचन रूप अनाचार ही हो जाता है क्योकि ऐसा करनेसे किसी भी अशमे सत्यव्रतको रक्षा नही होती है किन्तु उसमे थोडे थोड़े झूठे शब्द मिलाये जाते हैं। जैसे कोई पुरुष अपने ऊपर आई हुई आपत्तिको दूर करनेके लिये कहता है कि "मैंने जो यह अपने पत्रमे लेख लिखा है वह अपने लिये नही लिखा है।" सत्याणुव्रतीको ऐसे अतिचार- का भी त्याग कर देना चाहिये ॥२०-२१॥ दूसरेकी धरोहरको अपहरण कर लेना, मार लेना, न देना न्यासापहार कहलाता है। उसमे भी इतना विशेष है कि वह दूसरेके समस्त धनका हरण करता है क्योकि रक्खी हुई धरोहरके कुछ भागको हरण कर लेना ही न्यासापहार कहलाता है ।

लाटीसंहिता ११३ किञ्च कश्चिधथा सार्थ कस्यचिद्धनिनो गृहे । स्थापयित्वा धनादीनि स्वयं स्थानान्तरं गत. ॥२३ वदत्येवं स लोकानां पुरस्तादिह निवात् । घृतं न मे गृहे किञ्चित्तेनाऽमाऽर्थेन गच्छता ॥२४ उक्तो न्यासापहार' स प्रसिद्धोऽनर्थसूचक । मृषात्यागवतस्योच्चै दोष स्वात्सर्वतो महान् ॥२५ साकारमन्त्रभेदोऽपि दोषोऽतीचारसंज्ञकः। न वक्तव्यः कदाचिद्वै नैष्ठिकै श्रावकोत्तमै ॥२६ दुर्लक्ष्यमर्थ गुह्यं यत्परेषां मनसि स्थितम् । कथचिदिङ्गितैत्विा न प्रकाश्यं प्रताथिभिः ॥२७ ननु चैवं मदीयोऽयं ग्रामो देशोऽथवा नर । इत्येवं यज्जगत्सवं वदत्येतन्मृषा वचः ॥२८ मैवं प्रमत्तयोगाद्वै सूत्रादित्यनुवर्तते । तस्याभावान्न दोषोऽस्ति तद्भावे दोष एव हि ॥२९ एवं संव्यवहाराय स्यादवोषा नयात्मके । नाम्नि च स्थापनाया च द्रव्ये भावे जगत्त्रये ॥३० न्यासापहारका यही लक्षण है, जैसे किसी पुरुषके पास कुछ धन था वह अपना सब धन किसी अन्य धनीके यहां जमा कराकर या रख कर स्वय परदेशको चला गया। उस धनको छिपानेके लिए या प्रगट न होने देनेके लिए वह धनी दूसरे लोगोके सामने यह कहता है कि वह पुरुष मेरे घर तो कुछ नही रख गया, वह तो परदेश जाते समय सब धन अपने साथ ले गया है ।।२३-२४॥ ऊपर जो न्यासापहारका स्वरूप बतलाया है वह प्रसिद्ध है और अनेक अनर्थोंको उत्पन्न करने- वाला है । असत्य वचनोके त्याग करने रूप सत्य अणुव्रतको पालन करनेवाले श्रावकके लिए यह सबसे बड़ा और बहुत बडा दोष है। इसका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥२५॥ साकारमन्त्र- भेद भी सत्याणुव्रतका अतिचार और दोष कहलाता है। नैष्ठिक उत्तम श्रावकको यह साकार- मन्त्रभेद भी कभी नही कहना चाहिये ।।२६।। दूसरेके मनमे जो छिपी हुई बात है अथवा कोई ऐसी बात है जो दूसरोको मालूम नही है उस बातको किसी चेष्टासे या किसी इशारे आदिसे जानकर प्रकाशित कर देना साकारमन्त्रभेद कहलाता है । व्रतो श्रावकोको ऐसी किसी दूसरे के मनकी बात कभी प्रकाशित नही करनी चाहिये ॥२७॥ कोई शका करता है कि "यह गांव मेरा है, यह देश मेरा है अथवा यह मनुष्य मेरा है" इस प्रकार जो यह समस्त ससार कहता है वह भी सब मिथ्या वचन हैं । व्रत्ती भी ऐसा बोलते हैं इसलिये असत्यका त्याग व्रतियोंसे भी नही हो सकता ।।२८। इसका उत्तर देते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि शकाकारकी यह शका ठीक नहीं है क्योकि तत्त्वार्थसूत्रमे जो असत्यका लक्षण “असदभिवानमनृतम्" लिखा है उसमे ऊपरके सूत्रसे "प्रमत्तयोगात्" पदकी अनुवृत्ति चली आ रही है। इस अनुवृत्तिके अर्थको मिला देनेसे असत्यका लक्षण "प्रमाद या कषायके निमित्तसे दूसरेकी अनुवृत्तिसे दूसरेकी हिंसा उत्पन्न करने- वाले वचन कहना असत्य है" ऐसा बन जाता है । जहाँ जहाँ प्रमाद या कषाय होते हैं वही असत्य होता है। जहां प्रमाद या कषाय नही होता वहाँ असत्य भी नही होता । ससारमे जो “यह गांव मेरा है या यह देश मेरा है" ऐसा वचन कहा जाता है उसमे प्रमाद या कषाय नही हैं केवल अपना निवासस्थान बतलानेके लिए ऐसा कहता है परन्तु जहाँपर उस गाँव या उस देशको अपनानेके लिए, उसपर अपना अधिकार जमानेके लिए कषायकी प्रवृत्ति होती है वहाँपर वही वाक्य असत्य हो जाता है अतएव उक्त शका सर्वथा निर्मूल है ।।२९।। "जहाँ जहाँपर कषाय होता है वही पर असत्यता होती है" ऐसा मान लेनेसे नयोके अनुसार जो एक ही पदार्थका स्वरूप भिन्न-भिन्न रोतिसे कहा जाता है, अथवा ससारमे अपना व्यवहार चलानेके लिए जो नाम स्थापना द्रव्य भाव चार निक्षेप बतलाये हैं उनसे भी पदार्थोंका स्वरूप भिन्न भिन्न रीतिसे १५ - ११४ श्रावकाचार-संग्रह अस्ति स्तेयपरित्यागो व्रतं चाणु तथा महत् । देशत सर्वतश्चापि त्यागद्वैविध्यसम्भवात् ॥३१ तल्लक्षण तथा सूत्रे सूक्तं सूत्रविशारदैः । अदत्तादानं स्तेयं स्यात्तदर्थ. कथ्यतेऽघुना ॥३२ अवत्तस्य यदादानं चौर्यमित्युच्यते बुधैः । अर्थात्स्वामिगृहीतार्थे सद्रव्ये नेतरे पुन ॥३३ अन्यथा सर्वलोकेऽस्मिन्नतिव्याप्ति पदे पदे । अनगारेश्च दुर्वारा विशद्भिर्गोपुरादिषु ॥३४ सर्वत सर्वविषयं देशतस्त्रसगोचरम् । यत सागारिणां न स्याज्जलादिपरिवर्जनम् ॥३५ देशत स्तेयं सत्यागलक्षणं गृहिणां व्रतम् । अवत्त वस्तु नादेयं यस्मिन्नस्ति त्रसाश्रय ॥३६ रक्षार्थ तस्य कर्तव्या भावना पञ्च नित्यशः । सर्वतो मुनिनायेन देशत श्रावकेरपि ॥३७ समझा जाता है। उसमे भी कोई दोष नही आता ||३०|| चोरीका त्याग करने रूप अचौर्यव्रत भी दो प्रकार है-एक अणुव्रत और दूसरा महाव्रत । एकदेश चोरीका त्याग करना अचौर्याणुव्रत है और पूर्ण रूपसे चोरीका त्याग कर देना अचौर्य महाव्रत है, इस प्रकार चोरीका त्याग दो प्रकारसे सम्भव हो सकता है ॥३१॥ सूत्र बनानेमे अत्यन्त चतुर ऐसे आचार्यवयं श्री उमास्वामी ने उस चोरीका लक्षण कहते हुए सूत्र लिखा है वह सूत्र "अदत्तादान स्तेयम्" है अर्थात् विना दिये हुए पदार्थका ग्रहण करना चोरी है। अब आगे इस सूत्रका अर्थ बतलाते हैं ।।३२।। किसी भी विना दिये हुए पदार्थका ग्रहण करना चोरी है ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। इसका भी अर्थ यह है कि जिन पदार्थोंका कोई स्वामी है तथा जो पदार्थ कुछ मूल्यवाले हैं ऐसे पदार्थोंको विना दिये हुए ग्रहण करना चोरी है। जिन पदार्थोंका कुछ मूल्य नही है अथवा जिन पदार्थोंका कोई स्वामी नही है ऐसे पदार्थोंको विना दिये हुए ग्रहण कर लेना गृहस्थोके लिए चोरी नही है ।।३३।। यदि चोरीका लक्षण यह माना जायगा तो इस समस्त ससारमे पद-पदपर अतिव्याप्ति दोष मानना पडेगा क्योकि सासके द्वारा वायुका ग्रहण करना, कर्म नोकर्म वर्गणाओका ग्रहण करना आदि सब बिना दिये हुए होता है इसलिये वहां भी चोरी समझी जायगी परन्तु वहां पर चोरी नही कही जाती इसलिये चोरीका ऊपर लिखा हुआ लक्षण ही ठीक है। दूसरी बात यह है कि मुनिराज नगरमे जानेके लिए नगरके बडे दरवाजेमे प्रवेश करते हैं वह भी बिना पूछे ही प्रवेश करते हैं इसलिये उसको भी चोरी ही मानना पडेगा तथा इस प्रकार माननेसे अचौर्यव्रतका पालना कठिन ही नही किन्तु असम्भव हो जायगा। इसलिये चोरीका लक्षण वही मानना चाहिये जो ऊपर कहा जा चुका है ॥३४॥ उस चोरीका पूर्ण रूपसे त्याग करना महाव्रत है अर्थात् अस और स्थावर दोनो प्रकारके जीवोको दुख पहुंचानेवाली चोरीके त्याग करनेको पूर्ण त्याग या अचौर्य महाव्रत कहते हैं, तथा केवल अस जीवोको पीडा पहुंचानेवाली चोरीके त्याग करनेको एकदेश अथवा अचौर्याणुव्रत कहते हैं। गृहस्थ लोग अचौर्याणुव्रत ही पालन कर सकते हैं क्योकि वे गृहस्थ जल मिट्टी आदि सर्वसाधारणके ग्रहण करने योग्य पदार्थों को बिना दिये ग्रहण करनेका त्याग नही कर सकते ॥३५॥ एकदेश चोरीका त्याग करना गृहस्थ श्रावकोका व्रत है। अणुव्रती श्रावकोको जिनमे स जीवोका आश्रय हो ऐसे कोई भी पदार्थ विना दिये हुए कभी ग्रहण नही करने चाहिये । यही उनका अचौर्याणुव्रत है ॥३६॥ इस अचौर्यव्रतकी रक्षा करनेके लिए पांच भावनाएँ हैं वे भी नित्य पालन करनी चाहिये। उन भावनाओका पालन मुनियोको पूर्ण रूपसे करना चाहिये और श्रावकोको एकदेश करना चाहिये ॥३७॥ इस अचौर्यवत्तकी रक्षाके लिए जो भावनाएँ सूत्रकारने बतलाई हैं वे ये हैं- लाटीसंहिता ११५ - तत्सूत्रं यथा- शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभक्ष्यशुद्धिसद्धर्माविसंवादाः पञ्च ॥४४ शून्यागारेषु चावासा भूभृतां गह्वरादय । तदिन्द्रादिविरोधेन न वास्तव्यमिहामुना ।।३८ किन्तु प्राक् प्रार्थनामित्यं कृत्वा तत्रापि सविशेत् । प्रसीदात्रत्य भो देव पञ्चरात्रं वसाम्यहम् ।।३९ निःस्वामित्वेन संत्यक्ता गृहा सन्त्युद्वसाह्वया । प्राग्वदत्रापि वसति न कुर्यात्कुर्याद्वा तथा ॥४० स्वामित्वेन वसत्यादि पर स्यादुपरुन्धितम् । परोपरोधाकरणमाहु सूत्रविशारदाः ॥४१ तत्स्वामिनमनापृच्छय स्थातव्यं न गृहिवतैः । स्थातव्यं च तमापृच्छय दीयमानं तदाज्ञया ॥४२ भैक्ष्यशुद्धचाविसंवादी भावनीयो व्रतार्थिना । सर्वतो मुनिनाथेन देशतो गृहमेधिना ॥४३ नादेयं केनचिहत्तमन्येनातत्स्वामिना । तत्स्वामिनश्च प्रच्छन्नवृत्त्या तत्स्याददत्तवत् ॥४४ आत्मधर्म सधर्मी स्यादर्थाज्जैनो प्रतान्वितः । तेन कारापितं यावज्जिनचैत्यगृहादि यत् ।।४५ सूने मकानमे रहना, छोडे हुए मकानमे रहना, किसीको रोकना नही, भोजनकी शुद्धि रखना और धर्मात्माओंके साथ यह तेरा है यह मेरा है, इस प्रकार धर्मोपकरणोमे विवाद नही करना ये पांच अचौर्यव्रतकी भावनाएं हैं ॥४४॥ आगे इन्हीका स्वरूप बतलाते हैं-वतियोको पर्वतोकी गुफा आदि सूने मकानोमें ठहरना चाहिये तथा वहाँ पर भी उस स्थानके इन्द्रसे या स्वामीसे विरोध कर नहीं रहना चाहिये। यदि व्रतीको किसी भी स्थानपर ठहरना हो तो उसे आज्ञा इस प्रकार लेनी चाहिये कि “यहां इस स्थानपर रहनेवाले या इस स्थानके स्वामी हैं देव प्रसन्न होओ, मै यहाँपर पांच दिनतक ठहरू गा या तीन दिनतक ठहरूंगा" इस प्रकार पहले प्रार्थना कर फिर उस स्थानमे प्रवेश करना चाहिये ॥३८-३९॥ अपना अधिकार न होनेके कारण जो घर छोड़ दिया गया है उसको छोड़ा हुआ घर कहते हैं । इस छोड़े हुए घरमे भी पर्वतकी गुफा आदि सूने मकानके समान बिना उसके स्वामीकी आज्ञा लिये कभी निवास नही करना चाहिये । यदि वहाँ निवास करना हो तो वहाँके इन्द्रकी या वहाँपर रहनेवाले व्यतरदेवकी ऊपर लिखे अनुसार आज्ञा लेकर निवास करना चाहिये ॥४०॥ जिस वसतिका आदि स्थानको अन्य लोगोने स्वामी बनकर रोक रक्खा है उसको शास्त्रोके जानकार पुरुष परोपरोधाकरण कहते हैं । गृहस्थोको ऐसे स्थानमे उसके स्वामीको बिना पूछे कभी नही रहना चाहिये । उसको पूछकर और उसको आज्ञा मिल जानेपर रहना चाहिये। यदि किसी गुफा आदिमे स्वय रह रहा हो और अन्य कोई व्रती उसमे आना चाहे तो उसे रोकना नही चाहिये, इसीको परोपरोधाकरण कहते हैं ॥४१-४२।। चौथी भावनाका नाम भक्ष्यशुद्धि और पाँचवी भावनाका नाम तद्धर्म अविसवाद है। व्रती श्रावकोको इन दोनो भावनाओका पालन भी करना चाहिये। मुनिराज इन दोनो भावनाओका पालन पूर्ण रीतिसे करते हैं और गृहस्थ श्रावक इनका पालन एकदेश रूपसे करते हैं ।।४३।। यदि कोई श्रावक भोजन देवे और वह भोजन उसका न हो किसी अन्यका हो तो उस व्रती श्रावकको नही लेना चाहिये । यदि वह भोजन उसीका हो और वह उसे छिपा कर देता हो तो भी उसे विना दिये हुएके समान ही समझना चाहिये । यही श्रावककी भक्ष्यशुद्धि है ॥४४॥ जो आत्मके धर्मको पालन करता हो, अथवा जो अपने धर्मको पालन करता हो उसको सधर्मी कहते हैं। इसका भी अभिप्राय यह है कि जो जैन धर्मको धारण करनेवाला व्रती श्रावक है उसको सधर्मी कहते हैं। उसने जो कुछ जिनेन्द्र भवन, चैत्यालय आदि ११६ श्रावकाचार-संग्रह तत्रापि निवसेद्धीमान् क्षणं यावत्तदाज्ञया । तदाज्ञामन्तरेणेह न स्थातव्यमुपेक्षया ॥४६ भावनापनकं यावदत्रोक्तं चांशमात्रतः । स्वर्णाद्यपि च नादेयमदत्त वसनादि वा ॥४७ अत्रापि सन्त्यतीचाराः पञ्चेति सूत्रसम्मताः । त्याज्या स्तेयपरित्यागवतसशुद्धिहेतवे ॥४८ उक्तंच- स्तनप्रयोगतदाहतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः ॥४५ परस्य प्रेरणं लोभात्स्तेयं प्रति मनीषिणा । स्तेनप्रयोग इत्युक्त स्तेयातीचारसंज्ञक ।।४९ अप्रेरितेन केनापि वस्युना स्वयमाहृतम् । गृह्यते धन-धान्यावि तदाहृतादानं स्मृतम् ॥५० नावेयं दीयमानं वा पुण्यदानेन चापि तत् । स्तेयत्यागवतस्यास्य स्वामिनात्महितैषिणा ॥५१ राजाज्ञापितमात्मेत्यं युक्तं वाऽयुक्तमेव तत् । क्रियते न यदा स स्याद्विरुद्धराज्यातिक्रमः ॥५२ कर्तव्यो न कदाचित्स प्रकृतव्रतधारिणा । आस्ताममुत्र तेनाति रिहानर्थपरम्परा ॥५३ ऋतुं मानाधिकं मानं विक्रतुं न्यूनमात्रकम् । होनाधिकमानोन्माननामातीचारसंज्ञकः ॥५४ बनवाया है उसमे भी यदि कोई श्रावक क्षण भर भी ठहरना चाहे तो उसकी आज्ञा लेकर ठहरना चाहिये, उसकी आज्ञाके विना उपेक्षापूर्वक उसे वहाँपर कभी नहीं रहना चाहिये । अथवा अपने भी बनवाये हुए धर्मस्थानपर यदि कोई सधर्मी आकर ठहरना चाहता है, तो उसे विना किसी विसवादके ठहरने देना चाहिये। इसको सद्धर्माविसवाद नामकी पांचवी भावना कहते हैं ॥४५-४६।। इस प्रकार यहाँपर पांचो भावनाओका स्वरूप बहुत ही सक्षेपसे अशमात्र कहा है। अती श्रावकको सोना चाँदी वस्त्र आदि कुछ भी बिना दिया हुआ ग्रहण नही करना चाहिये ॥४७॥ इस अचोर्याणुव्रतके भी पांच अतिचार हैं जो सूत्रकारने भी अपने सूत्रमे कहे हैं। चोरीके त्याग करने रूप अचौर्य अणुव्रतको शुद्ध रखनेके लिए व्रती श्रावकको इन पांचो अतिचारोका त्याग कर देना चाहिये ॥४८॥ सूत्रकारने अतिचारोको कहनेवाला जो सूत्र कहा है वह यह है-- चोरीको भेजना, चोरीका माल लेना, राजाकी आज्ञाके विरुद्ध चलना, तौलने या नापनेके बाँट गज आदि कमती-बढती रखना या और अधिक मूल्यके पदार्थमे कम मूल्यके पदार्थ मिलाकर चलाना, ये पांच अचौर्याणुव्रतके अतिचार हैं। आगे इसोका स्पष्टीकरण करते हैं ॥४५॥ किसी लोभके वश होकर अन्य मनुष्योको चोरी करनेकी प्रेरणा करनेको बुद्धिमान लोग स्तेन प्रयोग कहते हैं । अचौर्याणुव्रतका यह पहला अतिचार है ॥४९॥ जिस किसी चोरको चोरी करनेकी प्रेरणा नही की है, विना प्रेरणा किये ही वह स्वय चुराकर जो धन-धान्य आदि पदार्थ लाया है उसको ग्रहण करना तदाहृतादाननामका अतिचार कहलाता है ।।५०॥ अपने आत्माका कल्याण करनेवाले और अचौर्याणुव्रतको पालन करनेवाले व्रती श्रावकोको ऐसा चोरीका धन यदि कोई दे भी तो नही लेना चाहिए । यदि कोई पुण्य समझ कर दान देता हो तो भी नही लेना चाहिए ॥५१।। राजा ने कुछ आज्ञा दी है चाहे वह योग्य हो और चाहे वह अयोग्य हो, उसका पालन न करना विरुद्धराज्यातिक्रम नामका अतिचार कहलाता है ॥५२॥ अचौर्याणुव्रत' धारण करनेवाले श्रावकोको राजाकी आज्ञाके विरुद्ध कार्य कभी नही करना चाहिए क्योकि राज्यविरुद्ध कार्य करनेसे परलोकमे दुख होता है और इस लोकमे अनेक अनर्थ उत्पन्न होते हैं। अतएव व्रती श्रावकको इस अतिचारका भी त्याग कर देना चाहिए ॥५३॥ खरीदनेके लिए तौलनेके वांट या नापनेके गज पायली आदि अधिक या बढती रखना और बेचनेके लिए कमती रखना हीनाधिक- ११७ लाटीसहिता सर्वारम्भेण त्याज्योऽयं गृहस्थेन व्रतार्थिना । इहैवाकोतिसन्तानःस्यादमुत्र च दुःखद ॥५५ निक्षेपणं समर्थस्य महाघे वञ्चनाशया। प्रतिरूपकनामा स्याद् व्यवहारो प्रतक्षातौ ॥५६ स्तयत्यागवतारूढदिय श्रावकोत्तमै । अस्त्यतीचारसंज्ञोऽपि सर्वदोषाधिपो महान् ॥५७ उक्तातिचारनिर्मुक्तं तृतीयव्रतमुत्तमम् । अवश्यं प्रतिपाल्यं स्यात्परलोकसुखाप्तये ॥५८ चतुर्थं ब्रह्मचर्य स्यावत देवेन्द्रवन्दितम् । देशत श्रावकाचं सर्वतो मुनिनायकै ॥५९ देशतस्तद्वतं धाम्नि स्थितस्यास्य सरागिण । उदिता धर्मपत्नी या सैव सेव्या न चेतरा ॥६० ब्रह्मवतस्य रक्षार्थ कर्तव्या पञ्च भावना । तल्लक्षणं यथा सूत्रे प्रोक्तमत्रापि चाहृति ॥६१ तत्सूत्रां यथा- स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मतोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागा पञ्च ॥४६ प्रसिद्धं विटचर्यादि दम्पत्योर्वा मिथो रति । अनुरागस्तद्वार्तायां योषिद्रागकथाश्रुति ॥६२ मानोन्मान नामका अतिचार है ।।५४॥ व्रती श्रावकको इस हीनाधिकमानोन्मान नामके अतिचार को पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिए क्योकि जो गृहस्थ तौलनेके लिए बांटोको कमती-बढती रखता है या नापनेके गजोको कमती-बढती रखता है उसकी अपकीर्ति इस समस्त लोकमे फैल जाती है तथा बाँट या गजोको कमती-बढती रखकर वह दूसरोको ठगता है इसलिए परलोकमे भी उसे नरकादिकके महादु ख भोगने पडते हैं इसलिए व्रती गृहस्थको इस अतिचारका भी सर्वथा त्याग कर देना चाहिए ॥५५।। दूसरोको ठगनेकी इच्छासे अधिक मूल्यके पदार्थमे जो उसमे अच्छी तरह मिल सके ऐसा कम मूल्यका पदार्थ मिला देना प्रतिरूपक व्यवहार नामका पाँचवाँ अतिचार कहलाता है । इस अतिचारसे यह अचौर्याणुव्रत प्राय नष्ट हो जाता है ॥५६।। चोरीके त्याग करने रूप अचौर्याणुव्रतको पालन करनेवाले उत्तम श्रावकोंको यह अतिचार कभी नही लगाना चाहिए क्योकि यह अतिचार यद्यपि अतिचार कहलाता है तथापि यह अतिचार सबसे बडा और सब दोषोका अधिपति है ॥५७॥ व्रती गृहस्थोको परलोकके सुख प्राप्त करनेके लिए ऊपर लिखे अतिचारोको छोडकर इस तीसरे उत्तम अचौर्याणुव्रतको अवश्य पालन करना चाहिए ॥५८|| अब आगे ब्रह्मचर्याणुव्रतका स्वरूप बतलाते हैं। चौथे व्रतका नाम ब्रह्मचर्य व्रत है। सोलह स्वर्गोंके देवोके इन्द्र भी इस ब्रह्मचर्यव्रतकी वन्दना करते है, मुनिराज इसका पालन पूर्णरीतिसे करते हैं और श्रावक इसका पालन एकदेश रूपसे करते है ॥५९॥ घरमे रहनेवाले सरागी गृहस्थोको इस व्रतका पालन एकदेश रूपसे करना चाहिए। इसी ग्रन्थमे पहले जो धर्मपत्नीका स्वरूप कह आये हैं वह धर्मपत्नी ही गृहस्थोको सेवन करनी चाहिए। उसके सिवाय अन्य समस्त स्त्रियोके सेवन करनेका त्याग कर देना चाहिए ॥६०॥ इस ब्रह्मचर्यव्रतकी रक्षा करने के लिए जो पांच भावनाएँ बतलाई हैं उनका भी पालन करना चाहिए तथा उन पांचो भावनाओका लक्षण जो सूत्रकारने अपने सूत्रमे कहा है वही ग्रहण कर लेना चाहिए ॥६१।। सूत्रकारका वह सूत्र यह है- स्त्रियोकी रागरूप कथा सुननेका त्याग, उनके मनोहर अगोके देखनेका त्याग, पहले भोगी Vहुई स्त्रियोंके स्मरण करनेका त्याग, पौष्टिक रसका त्याग और अपने शरीरके सस्कार करनेका त्याग ये पांच ब्रह्मचर्यव्रतकी भावनाएँ है। इनके पालन करनेसे ब्रह्मचर्यकी रक्षा होती है ॥४६॥ आगे इन्हीका स्वरूप बतलाते हैं-व्यभिचारी लोग जो रागरूप कुचेष्टाएँ करते रहते हैं, अथवा कोई भी स्त्री-पुरुष जो परस्पर कामक्रीडा करते रहते हैं उनकी कथा सुननेमे प्रेम रखना ११८ श्रावकाचार-संग्रह उक्तं च- रतिरूपा तु या चेष्टा दम्पत्यो सानुरागयो । शृङ्गार स द्विधा प्रोक्त सयोगो विप्रलम्भक ॥४७ स त्याज्यो परदम्पत्यो सम्बन्धी बन्धकारणम् । प्रीति शृङ्गारशास्त्रादौ नादेया ब्रह्मचारिभि १६३ चक्षुर्गण्डाधरग्रीवास्तनोदरनितम्बकान् । पश्येत्तन्मनोहराङ्गनिरीक्षणमत्यादरात् ॥६४ न कर्तव्यं तदङ्गाना भाषणं वा निरीक्षणम् । कायेन मनसा वाचा ब्रह्माणुव्रतधारिणा ॥६५ रतं मोहोदयात्पूर्व सार्द्धमन्याङ्गनादिभि । तत्स्मरणमतीचारं पूर्वरतानुस्मरणम् ॥६६ ब्रह्मचर्यव्रतस्यास्य दोषोऽयं सर्वतो महान् । त्याज्यो ब्रह्मपयोजाशुमालिना ब्रह्मचारिणा ॥६७ वृषमन्नं यथा माषा' पयश्चेष्टरस स्मृत । वीर्यवृद्धि करं चान्यत्याज्यमित्यादि ब्रह्मणे ॥६८ स्नेहाम्यङ्गादिस्नानानि माल्यं सक-चन्दनानि च । कुर्यादत्यर्थमात्रं चेद् ब्रह्मातीचारदोषकृत् ।।६९ स्त्रियोकी राग-रूप कथाका सुनना कहलाता है। यहाँ पर रागरूप कथाके कहनेसे शृगारके कहनेका अभिप्राय है । शृ गाररसके सुननेमे प्रेम करना स्त्रीरागकथा श्रवण है ॥६२|| कहा भी है- परस्पर एक दूसरेको प्रेम करनेवाले स्त्री-पुरुषोकी जो काम-क्रीड़ारूप चेष्टा है उसको शृगार कहते हैं । वह शृगार दो प्रकारका बतलाया है-एक सयोगात्मक और दूसरा वियोगात्मक । स्त्री-पुरुषोके मिलनेसे जो शृगार-रस प्रगट होता है वह सयोगात्मक शृगाररस है और स्त्री-पुरुषो- के वियोग होनेपर जो परस्पर मिलनेकी उत्कट इच्छा होती है अथवा जो वियोगजन्य दुख होता है उसको कहना या सुनना वियोगात्मक रस है ॥४७॥ व्रती श्रावकोको अन्य स्त्री पुरुषो से उत्पन्न होनेवाले दोनो प्रकारके शृङ्गाररसके सुननेका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए, क्योकि ऐसी कुचेष्टामओके सुननेसे अशुभ कर्मोंका तीव्र बन्ध होता है। इसी प्रकार ब्रह्मचर्य व्रतको धारण करनेवाले ब्रह्मचारियोको शृङ्गाररसको कहनेवाले शास्त्रोमे भी प्रेम नही करना चाहिए ॥६३|| स्त्रियोके नेत्र, कपोल, अधर, ग्रीवा (गर्दन), स्तन, उदर, नितम्ब आदि मनोहर अगोको अत्यन्त आदरसे देखना तन्मनोहरागनिरीक्षण कहलाता है ॥६४|| ब्रह्मचर्य अणुव्रतको धारण करनेवाले व्रती गृहस्थोको मनसे, वचनसे और कायसे स्त्रियोंके मनोहर अगोका न तो कभी वर्णन करना चाहिए और न कभी उनको देखना चाहिए। ब्रह्मचर्य- व्रतकी रक्षा करनेके लिए यह दूसरी भावना है ।।६५।। मोहनीयकर्मके उदयसे पहले जो अन्य स्त्रियोके साथ कामक्रीडा की थी उसका स्मरण करना पूर्वरतानुस्मरण कहलाता है । यह पूर्वरतानु- स्मरण नामका दोष इस ब्रह्मचर्य व्रतका सबसे बड़ा दोष है । इसलिए इस ब्रह्मचर्यव्रतरूपी कमल- को प्रफुल्लित करनेके लिए सूर्यके समान ब्रह्मचारीको इस पूर्वरतानुस्मरण नामके दोषका त्याग अवश्य कर देना चाहिये। यह तीसरी भावना है ॥६६-६७। उडदकी दाल, दूध तथा अपनेको अच्छे लगने वाले जितने रस हैं वे सब पौष्टिक रस कहलाते हैं, अथवा वीर्यको बढाने वाले जितने भी पदार्थ हैं वे सब पौष्टिक रस कहलाते हैं । अणुव्रती श्रावकोंको अपना ब्रह्मचर्य सुदृढ बनानेके लिये ऐसे पौष्टिक रसोके सेवन करनेका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। यह ब्रह्मचर्यकी रक्षा करनेके लिए चौथी भावना है ॥६८|| तेल लगाकर नहाना, उबटन लगाकर नहाना, फूलोका शृगार करना, माला पहिनना, चन्दन लगाना तथा इनके सिवाय शरीरका सस्कार करनेवाले जितने भी पदार्थ हैं उनका अधिकताके साथ सेवन करना स्वशरीरसस्कार कहलाता है। यह स्वशरीरसंस्कार ब्रह्मचर्यको घात करनेवाला, उसमे अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न करनेवाला और - लाटीसहिता ११९ स्वशरीरसंस्काराख्यो दोषोऽयं ब्रह्मचारिण । सर्वतो मुनिना त्याज्यो देशतो गृहमेधिभि ॥७० भावना पञ्च निर्दिष्टा सर्वतो मुनिगोचराः । तत्रासक्तिर्गृहस्थानां वर्जनीया स्वशक्तित ॥७१ लक्ष्यन्तेऽत्राऽप्यतोचारा ब्रह्मचर्यव्रतस्य ये । पञ्चैवेति यथा सूत्रे सूक्ता प्रत्यक्षवादिभि ॥७२ तत्सूत्रं यथा- परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतानङ्गक्रीडाकामतीव्राभिनिवेशा ॥४८ परविवाहकरणं दोषो ब्रह्मव्रतस्य य । व्यक्तो लोकप्रसिद्धत्वात्सुगमे प्रयासो वृथा ।।७३ अयं भाव स्वसम्बन्धिपुत्रादींश्च विवाहयेत् । परवर्गविवाहांश्च कारयेनानुमोदयेत् ॥७४ इत्वरिका स्यात्पुंश्चली सा द्विधा प्राग्यथोदिता । काचित्परिगृहीता स्यादपरिगृहीता परा ॥७५ ताभ्यां सरागवागादिवपु स्पर्शोऽथवा रतम् । दोषोऽतींचारसंज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यस्य हानये ॥७६ दोषश्चानङ्गक्रीडाख्य स्वप्नादौ शुक्रविच्युति । विनापि कामिनीसङ्गाक्रिया वा कुत्सितोदिता ॥७७ अनेक प्रकारके अतिचार उत्पन्न करनेवाला है ॥६९।। ब्रह्मचर्य अणुव्रतको धारण करनेवाले ब्रह्मचारियोको यह स्वशरीरसंस्कार नामका दोष भी एक प्रबल दोष है । मुनियोको इसका त्याग पूर्ण रूपसे कर देना चाहिये और गृहस्थोको इसका त्याग एकदेश रूपसे करना चाहिये । यह ब्रह्मचर्यकी रक्षा करनेवाली पांचवी भावना है ॥७०।। इस प्रकार ब्रह्मचर्यकी पाँचो भावनाओका निरूपण किया। इन भावनाओका पूर्ण रीतिसे पालन मुनियोसे ही होता है तथा गृहस्थोको अपनी शक्तिके अनुसार इन सबमे आसक्त या लीन रहनेका त्याग कर देना चाहिये । तथा अपनी शक्ति- के अनुसार इनमेसे जितना त्याग बन सके उतना त्याग कर देना चाहिये। इस प्रकार पाँचो भावनाओका स्वरूप बतलाया ॥७१॥ इस ब्रह्मचर्य व्रतके भी पाँच अतिचार हैं जो सर्वज्ञदेवने बतलाये हैं तथा जो सूत्रकारने अपने सूत्रमे लिखे हैं ॥७२॥ वह सूत्र इस प्रकार है-दूसरेके पुत्र-पुत्रियोका विवाह करना, कुलटा विवाहिता स्त्रीके यहाँ आना जाना, अविवाहिता कुलटा स्त्रीके यहां आना जाना, अनगक्रीडा करना और काम- सेवनकी तीन लालसा रखना ये पाँच ब्रह्मचर्य अणुव्रतके अतिचार हैं ॥४८॥ आगे इन्हीका स्वरूप बतलाते हैं-दूसरेके पुत्र पुत्रियोका विवाह करना परविवाहकरण कहलाता है । यह भी ब्रह्मचर्यका एक अतिचार या दोष है। दूसरेके पुत्र पुत्रियोका विवाह करना ससारमे प्रसिद्ध है, सब कोई जानता है अतएव सुगम होनेसे इसके स्वरूपके कहनेमे परिश्रम करना व्यर्थ है ।।७३।। इसका भी अभिप्राय यह है कि अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले पुत्र-पुत्रियोका तो विवाह कर देना चाहिए परन्तु जिनसे अपना कोई सम्बन्ध नही है ऐसे पुत्र-पुत्रियोका विवाह न तो कराना चाहिए और न उसकी अनुमोदना करनी चाहिए। यह परविवाहकरण ब्रह्मचर्य अणुव्रतका पहला अतिचार है ॥७४॥ इत्वरिका शब्दका अर्थ पुश्चली या व्यभिचारिणी स्त्री है इसीको कुलटा कहते हैं। वह दो प्रकारकी होती है-एक परिगृहीता और दूसरी अपरिगृहीता। इन दोनोका स्वरूप पहले अच्छी तरह कह चुके हैं ।।७५॥ परिगृहीता व्यभिचारिणी स्त्री और अपरिगृहीता व्यभिचारिणी स्त्री इन दोनोके साथ रागपूर्वक बातचीत करना, शरीर स्पर्श करना, अथवा क्रीडा करना अतिचार है, यह अतिचार या दोष ब्रह्मचर्यको घात करनेवाला है ।।७६।। स्वप्नमे वीर्यपात हो जाना, अथवा किसी भी स्त्रीके समागमके विना खोटी चेष्टा करना, खोटी १२० श्रावकाचार-सग्रह कामतीव्राभिनिवेशो दोषोऽतीचारसंज्ञकः । दुर्वान्तवेदनाक्रान्तस्मरसंस्कारपीडित ॥७८ ननु चास्ति स दुर्वारो दुस्त्याज्या मानसी क्रिया । ब्रह्मवतगृहीतस्य सतोऽत्र वद का गति ॥७९ उच्यते गतिरस्यास्ति चूद्ध सूशे प्रमाणिता। यथा कथञ्चिप्न त्याज्या नीता ब्रह्मवतक्रिया ॥८० उक्तं ब्रह्मवतं साङ्गमतिचारविजितम् । पालनोयं सदाचारै स्वर्गमोक्षसुखप्रदम् ॥८१ उपाधिपरिमाणस्य सद्विधिश्चाधुनोच्यते । सति यत्रोविताना स्यादवताना स्थितिसन्ततिः ॥८२ मुनिभिः सर्वतस्त्याज्यं तृणमात्रपरिग्रहम् । तत्संख्या गृहिभिः कार्या त्रसहिंसादिहानये ॥८३ अवश्यं द्रविणादीनां परिमाणं च परिग्रहे । गृहस्थेनापि कर्तव्यं हिंसातृष्णोपशान्तये ॥८४ परिमाणे कृते तस्मादग्मूिर्छा प्रवर्तते । अभावान्मूछायास्तूचं मुनित्वमिव गोयते ॥८५ तस्मादात्मोचिताद्व्याद ह्रासनं तद्वरं स्मृतम् । अनात्मोचितसङ्कल्पाद ह्रासनं तन्निरर्थकम् ॥८६ अनात्मोचितसङ्कल्पाद ह्रासनं यन्मनीषया । कुर्युर्यद्वा न कुर्युर्वा तत्सर्व व्योमचित्रवत् ॥८७ क्रिया करना अनंगक्रीडा नामका दोष कहलाता है ॥७७॥ काम सेवनकी तीव्र वेदनाके वशीभूत होकर कामके विकारसे अत्यन्त पीडित हुआ मनुष्य जो कामसेवनकी तीन लालसा रखता है उसको कामतीव्राभिनिवेश नामका अतिचार कहते हैं ॥७८॥ यहाँपर शकाकार कहता है कि मनके विकारोका त्याग करना अत्यन्त कठिन है फिर भला जिसने ब्रह्मचर्य अणुव्रत धारण कर लिया है और मनके विकारोका त्याग कर नही सकता ऐसा मनुष्य उस व्रतका पालन किस प्रकार कर सकेगा, उसके व्रत पालन करनेका क्या उपाय है सो बतलाना चाहिए ॥७९॥ ग्रन्थकार इस शकाका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ऐसे मनुष्योके व्रत पालन करनेका उपाय भी है। जो कि वृद्ध पुरुषोने, बडे-बडे आचार्योने सूत्रोमे बतलाया है। उसका अभिप्राय यही है कि जो ब्रह्मचर्यन्नत धारण किया है उसको जिस प्रकार बने उसी प्रकार पालन करना चाहिए, उसको किसी भी प्रकार छोडना नही चाहिये ॥८०॥ इस प्रकार ब्रह्मचर्य अणुव्रतका स्वरूप कहा । अणुव्रतोको धारण करनेवाले श्रावको- को स्वर्ग और मोक्षके अनुपम सुख देनेवाला यह व्रत अतिचार रहित और भावनाओ सहित पालन करना चाहिए ।।८१॥ अव आगे परिग्रहके परिमाण करनेकी विधि कहते है। यह निश्चित है कि परिग्रहके परिमाण करनेसे ही ऊपर कहे हुए समस्त व्रत चिरकाल तक ठहर सकते हैं ।।८२।। तृणमात्र में परिग्रहका त्याग मुनियोको पूर्णरूपसे कर देना चाहिए। तथा अणुव्रती श्रावकोको असजीवोकी हिंसाके त्यागका पालन करनेके लिए अथवा त्रसजीवोकी रक्षा करनेके लिए उस परिग्रहका परिमाण नियत कर लेना चाहिए ।।८।। हिंसा और तृष्णाको शान्त करनेके लिए गृहस्थोको धन धान्य आदि परिग्रहका परिमाण अवश्य कर लेना चाहिए ।।८४॥ जो मनुष्य जितने परिग्रहका परिमाण कर लेता है उसकी लालसा वा मूर्छा उतने ही परिग्रहमे रहती है। उतने परिग्रहसे अधिक परिग्रहमे उसकी मूर्छा या लालसा नही रहती। किये हुए परिमाणसे अधिक परिग्रहमे उसकी मूर्छाका सर्वथा अभाव हो जाता है । अतएव किये हुए परिमाणके ऊपर वह परिमाण करनेवाला मुनिके समान समझा जाता है ||८५।। अतएव अपने योग्य जो परिग्रह है उसमेसे घटाना ही कल्याणकारी है। जो द्रव्य अपने योग्य नहीं है उसका घटाना या त्याग करना व्यर्थ है ।।८६।। जो परिग्रह या जो द्रव्य अपने लिए कभी संभव नही हो सकते उनका त्याग या उनका कम करना केवल मनके सकल्पसे होता है अतएव उनका त्याग करना या न करना दोनो ही आकाशके चित्रके समान हैं। भावार्थ-जैसे लाटीसंहिता १२१ प्रत्यग्नजन्मनोहेदमत्यन्ताभावलक्षणम् । तत्यागोऽपि वरं कश्चिदुच्यते सारजितम् ॥८८ तत्रोत्सर्गो नृपर्याय स्थितिमात्रकृते धनम् । रक्षणीयं व्रतस्यैस्तैस्त्याज्यं शेषमशेषतः ॥८९ अपवादस्तूपात्तानां व्रतानां रक्षणं यथा । स्याद्वा न स्यात्तु तद्वानिः संख्यातव्यस्तथोपधिः ॥९० रक्षार्थ तद्वतस्यापि भावना पञ्च सम्मता. । भावनीयाश्च ता नित्यं तथा सूोऽपि लक्षिता ॥९१ तत्सूत्रं यथा- मनोज्ञामनोजेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥४९ इन्द्रियाणि स्फुटं पञ्च पञ्च तद्विषया स्मृता । यथास्वं तत्परित्यागभावनाः पञ्च नामतः ॥९२ पञ्चस्वेषु मनोज्ञेषु भावना रागवर्जनम् । अमनोज्ञेषु तेषूच्चर्भावना द्वेषवर्जनम् ॥९३ अयमों यदीष्टार्थसंयोगोऽस्ति शुभोदयात् । तदा रागो न कर्तव्यो हिरण्याद्यपकर्षता ॥९४ आकाशके चित्रोका होना कल्पना मात्र होनेसे असंभव है । आकाशमे चित्र हो नहीं सकते उसी प्रकार जिन पदार्थोंका प्राप्त होना कभी सभव नही है उन पदार्थोंका त्याग करना या परिमाण करना व्यर्थ है। उनके त्याग करने या परिमाण करनेको व्रत नही कह सकते ॥८७॥ इस विषयमें कोई कोई लोग ऐसा भी कहते हैं कि इस जन्ममे जिस पदार्थका प्राप्त होना अत्यन्त असंभव है अथवा जो पदार्थ अत्यन्त सारहीन है व्यर्थके समान है उसका त्याग करना भी अच्छा है ।।८८|| इस परिग्रहके त्याग करनेका उत्सर्ग मार्ग यह है कि इस मनुष्य पर्यायको स्थिर रखनेके लिए जितने धनकी आवश्यकता है उतना धन तो रख लेना चाहिए और बाकीका जितना धन है या जितना परिग्रह है उस सबका अणुव्रती श्रावकोको त्याग कर देना चाहिए ।।८९|| इसका भी आवश्यक अपवाद यह है कि जो व्रत धारण कर लिये हैं उनकी रक्षा जिस प्रकार हो जाय जितने धन या परिग्रहसे हो जाय अथवा जितना धन या परिग्रह रखनेसे उन व्रतोमे किसी प्रकारकी हानि न हो उतने परिग्रहका परिमाण कर लेना चाहिए ।।१०।। अन्य व्रतोके समान इस परिग्रहत्यागवतकी रक्षा करनेके लिए भी पांच भावनाएं हैं जो कि तत्त्वार्थसूत्रमे बतलाई हैं । अणुव्रती श्रावकोको उनका भी पालन करते रहना चाहिए ।।९१।। उन भावनामोको कहनेवाला सूत्र यह है-मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो इन्द्रियोके विषय हैं उनमे रागद्वेषका त्याग कर देना परिग्रहत्यागकी पांच भावनाएं हैं ||४९।। आगे उन्हीका विशेष वर्णन करते हैं--इन्द्रियां पांच हैं और उनके विषय भी पांच हैं। उनका यथायोग्य रीतिसे त्याग करना ही पांच भावनाएं हैं ।।१२।। इसका भी अर्थ यह है कि पांचो इन्द्रियोंके जो विषय है उनमें कुछ मनोज्ञ विषय रहते है और कुछ अमनोज्ञ विषय रहते हैं। उनमे से जो मनोज्ञ विषय है इन्द्रियोको अच्छे लगनेवाले विषय हैं उनमें राग नहीं करना चाहिए तथा जो अमनोज्ञ विषय है इन्द्रियोको बुरे लगनेवाले विषय हैं उनमे द्वेप नहीं करना चाहिए। पांचों इन्द्रियोको अच्छे लगनेवाले विषयोमे रागका त्याग कर देना और बुरे लगनेवाले विषयों में पका त्याग कर देना हो इस व्रतको भावनाएं हैं ।।९३॥ इसका भी बुलाना यह है कि यदि उदयसे इष्ट पदार्थोफा संपोग हो जाय, सोना, चांदी, भोजन, वस्त्र मादि उत्तम पदार्थ प्राप्त हो जायें तो सोना चांदी सादि पदार्थोको घटानेको इच्छा करनेवाले श्रावकको उन पदार्पोमे राग नहीं करना चाहिए । शांत लौर मध्यप भायोसे उसका उपभोग करना चाहिए ।।९४१ यदि अशुभ गुम फोके १२२ श्रावकाचार-सग्रह अथानिष्टार्थसंयोगों दुर्दैवाज्जायते नृणाम् । तथा द्वेषो न कर्तव्यो धनसंख्यावतेप्सिना ॥९५ इष्टानिष्टादिशब्दार्थ सुगमत्वान्न लक्षित । रागद्वेषौ प्रसिद्धौ स्त प्रयास सुगमे वृथा ॥९६ अत्रातीचारसंज्ञाः स्यु दोषा. संख्यावतस्य च । उदिता सूत्रकारेण त्याज्या व्रतविशुद्धये ॥९७ तत्सूशं यथा- क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिकमा ॥५० क्षेशं स्यावसतिस्थानं धान्याधिष्ठानमेव वा । गवाद्यागारमा वा स्वीकृतं यावदात्मना ।।९८ ततोऽतिरिक्त लोभान्मूर्छावृत्तिरतिक्रम । न कर्तव्यो व्रतस्थेन कुर्वतोपधितुच्छताम् ॥९९ वास्तु वस्त्रादिसामान्यं तत्संख्या क्रियतां बुधै । अतीचारनिवृत्त्यर्थ कार्यो नातिक्रमस्तत ॥१०० हिरण्यध्वनिना प्रोक्तं वज्रमौक्तिकसत्फलम् । तेषां प्रमाणमाशेण क्षणान्मूर्छा प्रलीयते ॥१०१ अत्र सुवर्णशब्देन ताम्रादिरजतादय । संख्या तेषां च कर्तव्या श्रेयानातिक्रमस्तत ॥१०२ कर्मके उदयसे मनुष्योको अनिष्ट पदार्थोंका संयोग हो जाय, रोग या कुपुत्र या कलह करनेवाली स्त्रीका सयोग प्राप्त हो जाय तो धन-धान्यादिका परिमाण करनेवाले या घटानेकी इच्छा करनेवाले श्रावकोको उन अनिष्ट पदार्थोंसे द्वेष नही करना चाहिए। उन अनिष्ट पदार्थोंके सयोगको भी शात और मध्यस्थ भावोंसे भोगना चाहिए ॥९५।। इष्ट और अनिष्ट शब्दोका अर्थ सुगम है इसलिए उनका अलग लक्षण नही कहा है। इसी प्रकार राग और द्वेष शब्द भी प्रसिद्ध हैं अतएव उनका अर्थ भी नही बतलाया है क्योकि जिन शब्दोका अर्थ सुगमतासे मालूम हो जाय उनके अर्थ बतलानेमे परिश्रम करना व्यर्थ है ।।९६|| इस परिग्रहरिमाणवतके भी पांच अतिचार हैं जो सूत्रकारने भी अपने सूत्रमे बतलाए हैं। अणुव्रती श्रावकोको अपने व्रत शुद्ध रखनेके लिये उन दोषोका भी त्याग कर देना चाहिए ॥९७|| Vउन अतिचारोको कहने वाला जो सूत्र है वह यह है-क्षेत्र वास्तु हिरण्य सुवर्ण धन धान्य दासी दास और कुप्य पदार्थोंका जितना परिणाम किया है उसको उल्लङ्घन करना परिग्रहपरिमाण- इतके अतिचार हैं ॥५०॥ आगे इन्हीका विशेष करते हैं । क्षेत्र शब्दका अर्थ रहनेका स्थान है अथवा जिसमे गेहूँ, जो, चावल आदि धान्य उत्पन्न होते हैं ऐसे खेतोको भी क्षेत्र कहते हैं अथवा जिनमे गाय भैंस आदि पशु बांधे जाते हैं ऐसे स्थानको भी क्षेत्र कहते हैं। ऐसे क्षेत्रका जितना परिमाण कर लिया है उससे अधिक क्षेत्रमे किसी लोभके कारण मूर्छा रखना, मोह रखना, ममत्व रखना अतिक्रम या अतिचार कहलाता है । अणुव्रतोको धारण करनेवाले और परिग्रहको घटानेकी इच्छा करनेवाले श्रावकको ऐसे अतिचारका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ।।९८-९९।। वस्त्र आदि सामानको वास्तु कहते हैं । बुद्धिमान श्रावकोको अतिचार या दोषोका त्याग करनेके लिये वस्त्रादिकोका परिमाण भी नियत कर लेना चाहिये तथा जो परिमाण नियत कर लिया है उसका उल्लङ्घन कभी नही करना चाहिये ॥१००॥ हिरण्य शब्दका अर्थ हीरा मोती मानिक आदि जवाहरात हैं ऐसे पदार्थोंका परिमाण कर लेनेसे अणुव्रती श्रावकका ममत्व क्षणभरमे नष्ट हो जाता है ॥१०१॥ यहाँ सुवर्ण शब्दका अर्थ सोना, चाँदी, ताबा, पीतल आदि धातु समझना चाहिये। अणुव्रती श्रावकको ऐसी धातुओका परिमाण भी नियत कर लेना चाहिये तथा जितना परिमाण नियत किया है उसका .

लाटीसहिता १२३ ३ धनशब्दो गवाद्यर्थः स्याच्चतुष्पदवाचक । विधेयं तत्परिमाणं ततो नातिक्रमो वरः ॥१०३ धान्यशब्देन मुद्गादि यावदन्नकदम्बकम् । व्रतं तत्परिमाणेन व्रतहानिरतिक्रमात् ॥१०४ दासकर्मरता दासी क्रीता वा स्वीकृता सती । तत्संख्या व्रतशुद्धयर्थ कर्तव्या सानतिक्रमात् ॥१०५ यथा वासी तथा दास संख्या तस्यापि श्रेयसी । श्रेयानतिक्रमो नैव हिंसातृष्णोपबृंहणात् ।।१०६ कुप्यशब्दो घृताद्यर्थस्तद्भाण्डं भाजनानि वा । तेषामप्यल्पीकरणं श्रेयसे स्यावतार्थिनाम् ॥१०७ उक्ताः संख्याव्रतस्यास्य दोषा संक्षेपतो मया। परिहार्या प्रयत्नेन संख्याणुव्रतधारिणा ॥१०८ प्रोक्तं सूत्रानुसारेण यथाणुव्रतपञ्चकम् । गुणवतत्रयं वक्तुमुत्सहेदधुना कवि ॥१०९ दिग्देशानर्थदण्डानां विरतिः स्याद्गुणवतम् । एकत्वाद्विरतेश्चापि त्रेधा विषयभेदतः ॥११० दिग्विरतियथानाम दिक्षु प्राच्यादिकासु च । गमनं प्रतिजानीते कृत्वासीमानमाहत ॥१११ उल्लङ्घन कभी नही करना चाहिये ॥१०२॥ धन शब्दका अर्थ गाय भैंस घोड़ा आदि चार पैर वाले पशु हैं । अणुव्रती श्रावकको गाय भैंस आदि पशुओका परिमाण भी नियत कर लेना चाहिये तथा जितने पशुओका परिमाण नियत किया है उससे कभी बढ़ाना नही चाहिये ॥१०३।। गेहूँ, जौ, उड़द, मूंग आदि सब प्रकारके अन्नोको धान्य कहते हैं । परिग्रहका परिमाण करनेवाले श्रावकको इन धान्योका परिमाण भी नियत कर लेना चाहिये तथा जितना परिमाण नियत किया है उसका उल्लङ्घन कभी नही करना चाहिये क्योकि नियत किये हुए परिमाणका उल्लङ्घन करनेसे व्रतकी हानि होती है, व्रतमे दोष लगता है ॥१०४॥ घरका काम काज करनेवाली स्त्रीको दासी कहते हैं, चाहे वह खरीदी हो, नौकर रक्खी हुई हो अथवा और किसी तरहसे काम काजके लिये घरमें रख ली हो । अणुव्रती श्रावकोको अपना परिग्रह परिमाणव्रत शुद्ध रखनेके लिये दासियोकी संख्या भी नियत कर लेनी चाहिये तथा जितनी संख्या नियत की है उसका उल्लङ्घन नही करना चाहिये ॥१०५।। जिस प्रकार टहल चाकरी करनेवाली दासियाँ होती हैं उसी प्रकार दास होते हैं । अणुव्रती श्रावकको दासोकी संख्या भी नियत कर लेनी चाहिये और फिर नियत की हुई सख्याको कभी नही बढाना चाहिये क्योंकि नियत की हुई संख्याको बढा लेनेसे हिंसा और तृष्णाकी वृद्धि होती है ॥१०६॥ कुप्य शब्दका अर्थ घी तेल आदि रखनेके बर्तन अथवा रोटी पानी आदिके बर्तन । हैं । व्रतोको धारण करनेवाले श्रावकोको उन बर्तनोकी सख्या भी घटा लेनी चाहिये क्योकि ममत्व या परिग्रह जितना कम होता है उतना ही पाप कम लगता है तथा उतना ही आत्माका कल्याण अधिक होता है ॥१०७॥ इस प्रकार सक्षेपसे परिग्रह परिमाणके अतिचार या दोप बतलाये । परिग्रहपरिमाण नामके अणुव्रतको धारण करनेवाले श्रावकको प्रयत्न पूर्वक इनका त्याग कर देना चाहिये ॥१०८॥ जिस प्रकार पांचो अणुव्रतोका स्वरूप सूत्रके अनुसार निरूपण किया है उसी प्रकार अब तीनो गुणवतोका स्वरूप कहते हैं ॥१०९|| दिशाओका त्याग करना (दिशाओकी मर्यादा नियत कर उससे आगे आने जानेका त्याग करना) देशका त्याग (कुत्सित देशमे जानेका त्याग अथवा जो त्याग किया है उसको किसी कालकी मर्यादासे और घटाना) तथा अनर्थ दण्डोका त्याग (विना प्रयोजनके जिनमे पाप लगता है ऐसी क्रियाओका त्याग कर देना) इन तीनोको गुणवत कहते हैं । यद्यपि त्यागकी अपेक्षासे ये तीनो ही एक हैं तथापि जिनका त्याग किया जाता है उन विषयोमें भेद होनेसे तीन प्रकारके कहलाते हैं ॥११॥ भगवान् अरहन्तदेवकी आज्ञानुसार व्रतोको धारण करनेवाले श्रावकको पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि सब दिशाओको सीमा नियत कर १२४ श्रावकाचार-संग्रह सन्त्यत्र विषयाः सीम्न वननीवृष्नगापगा । अनु तानवघि कृत्वा गच्छेदग्नि तद्वहिः ॥११२ पूर्वस्या दिशि गच्छामि यावद्गङ्गाम्बु केवलम् । तद्वहिर्वपुषानेन न गच्छामि सचेतन ॥११३ एवं कृतप्रतिज्ञस्य संवर पापकर्मणः । तद्बहि सर्वहिंसाया अभावात्तन्मुनेरिव ॥११४ परिपाटयानयोदीच्या पश्चिमायां दिशि स्मृता । मर्यादोर्ध्वमधश्चापि दक्षिणस्या विदिक्षु च ॥११५ तत्करणे महच्छ्रेयो हिंसा तृष्णाद्वयात्ययात् । करणीयं ततोऽवश्यं श्रावकैर्वतघारिभि ॥११६ सन्ति तत्राप्यतीचारा पञ्चेति सूत्रसाधिता । सावधानतया त्याज्यास्तेऽपि तव्रतसिद्धये ॥११७ तत्सूत्र यथा- अधिस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥५१ उच्चैर्धात्रीधरारोहे भवेदूध्वंव्यतिक्रम । अगाधभूधरावेशाद्विख्यातोऽधोव्यतिक्रम ॥११८ क्वचिद्दिक्कोणदेशावौ क्षेत्रो वीर्घावतिनि । कारणाद् गमनं लोभाद् भवेत्तिर्यग्व्यतिक्रम ॥११९ उससे आगे न जानेका नियम लेना दिग्वत अथवा दिग्विरतिव्रत कहलाता है ।।१११॥ वन, देश, पर्वत, नदी और बडे बडे देश इस दिग्वतको सीमा कहलाते हैं। इनकी मर्यादा नियत करके उस मर्यादाके भीतर ही जाना चाहिये। मर्यादाके बाहर कभी नही जाना चाहिये ॥११२॥ जैसे मैं इस शरीरसे सचेतन अवस्थामे पूर्व दिशामे जहाँ तक गगा नदी बहती है वहाँ तक जाऊँगा इससे आगे कभी नही जाऊँगा ॥११३।। इस प्रकारकी प्रतिज्ञा करनेवाले श्रावकको मर्यादाके बाहर मुनिके समान समस्त हिंसाका त्याग हो जाता है। अतएव उस श्रावकके मुनियोंके समान पापकर्मोका सवर होता है ॥११४॥ जिस प्रकार यह पूर्व दिशाका उदाहरण दिया है उसी प्रकार उत्तर दिशामे, पश्चिम दिशामे, दक्षिण दिशामे, ईशान आग्नेय नैऋत्य वायव्यादिक चारो विदिशाओमे तथा ऊपरकी और नोचेकी ओर भी मर्यादा नियत कर उससे आगे न जानेकी प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये ॥११५।। इस प्रकार दशो दिशाओमे मर्यादा नियत कर उससे आगे न जानेको प्रतिज्ञा कर लेनेसे आत्माका बहुत भारी कल्याण होता है क्योकि इस प्रकारकी प्रतिज्ञा करनेसे हिंसा और तृष्णा दोनोका त्याग हो जाता है। मर्यादा नियत कर लेने पर मर्यादाके बाहर फिर किसी भी प्रकारका सम्बन्ध रखनेकी तृष्णा नही रहती है और न किसी प्रकारकी हिंसा हो सकती है अतएव व्रत धारण करनेवाले श्रावकोको यह दिग्वत अवश्य धारण कर लेना चाहिये ॥११६॥ अन्य व्रतो- के समान इस दिग्व्रतके भी पांच अतिचार हैं जो कि सूत्रमे बतलाये हैं। इस दिग्वतको अच्छी तरह पालन करनेके लिये, निर्दोष या शुद्ध पालन करनेके लिये इन सब अतिचारोका त्याग भी बडी सावधानी के साथ कर देना चाहिये ॥११७॥ उन अतिचारोके कहनेवाला वह सूत्र यह है-ऊर्ध्वव्यतिक्रम अर्थातु ऊपरकी मर्यादाका उल्लङ्घन करना, अधोव्यतिक्रम अर्थात् नीचेकी मर्यादाका उल्लङ्घन करना, तिर्यग्व्यतिक्रम अर्थात् आठो दिशाओकी मर्यादाका उल्लङ्घन करना, क्षेत्रकी मर्यादा बढा लेना और नियत की हुई मर्यादाको भूल जाना ये पांच दिग्वतके अतिचार हैं ॥५१॥ आगे इन्हीका विशेष वर्णन करते हैं। ऊंची पृथ्वी पर चढनेसे अथवा किसी पर्वत पर चढनेसे ऊर्ध्वव्यतिक्रम होता है। इस प्रकार किसी पर्वतकी बहुत नीची गुफामे जानेसे अधो- व्यतिक्रम होता है । भावार्थ-ऊपर और नीचेकी जितनी मर्यादा नियत कर ली है उसका उल्लङ्घन करना अतिचार है-३११८॥ कोई कोई देश ऐसे हैं जो दिशाओके कोनोमे हैं और बहुत लम्बे हैं लाटीसंहिता १२५ यथा सत्यमितः क्रोश. शतं यावद् गतिर्मम । क्रोशा मालवदेशीया क्षेत्रवृद्धिश्च दूषणम् ॥१२० स्मृतं स्मृत्यन्तराधानं विस्मृतं च पुनः स्मृतम् । दूषणं दिग्विरतेः स्यादनिर्णीतमियत्तया ॥१२१ प्रोचिता देशविरतिर्यावत्कालात्मवर्तिनी । तत्पर्यायाः क्षणं यामदिनमासत्तुंवत्सराः ॥१२२ तद्विषयो गतित्यागस्तथा चाशनवर्जनम् । मैथुनस्य परित्यागो यद्वा मौनादिधारणम् ॥१२३ यथाद्य यदि गच्छामि प्राच्यामेवेति केवलम् । कारणानापि गच्छामि शेषदिक्नितये वशात् ॥१२४ अथवा उनका जो मार्ग है वह बहुत ही लम्बा है । मर्यादासे बाहर ऐसे किसी देश या क्षेत्रमे किसी लोभके कारणसे जाना तिर्यग्व्यतिक्रम नामका अतिचार कहलाता है। व्रती श्रावकोको ऐसा अतिचार नही लगाना चाहिये ॥११९।। यह ठीक है कि वह नगर यहाँसे सौ कोश है तथा यहाँसे सौ कोश तक जानेकी ही मेरी मर्यादा है परन्तु ये कोश मालव देशके कोश है इसको क्षेत्र वृद्धि नाम- का दोष कहते हैं । भावार्थ-देशके भेदसे कोशमे भी भेद होता है। जैसे उत्तरकी ओर (मेरठ सहारनपुरकी ओर) सोलह मीलके बारह कोश गिने जाते हैं परन्तु आगरेकी ओर सोलह मीलके । आठ ही कोश होते हैं। कही कहीं पर तीन तीन मीलका भी एक कोश माना जाता है। जिस श्रावकने पहले सौ कोशकी मर्यादा नियत कर ली है वह श्रावक यदि काम पड़ने पर यह कहे कि कोश मालवदेशके कोशसे सम्भाले जायेंगे अथवा अन्य किसी देशके कोश मालवदेशके कोशसे भी बडे हो और वह श्रावक वहाँके कोशोसे अपनी मर्यादाके सौ कोश सम्भाले तो उसके क्षेत्र वृद्धि नामका दोष होता है क्योकि पहले उसने साधारण या उस देशमे प्रचलित कोशोसे मर्यादा नियत की थी और अब वह अपनी सौ कोशकी सख्याको तो नियत रखता है उसको तो नही बढ़ाता किन्तु कोशोको बड़ा मानकर क्षेत्रको मर्यादा बढा लेता है अतएव व्रतका एक देश भग होनेके कारण वह अतिचार या दोष कहलाता है। ऐसा दोष व्रती श्रावकको कभी नहीं लगाना चाहिए ॥१२०॥ जो मर्यादा नियत की थी वह पहले तो स्मरण थी, फिर कुछ दिन बाद उसे भूल गया अथवा नियत सख्याको भूल कर कोई और सख्या स्मरण हो आई ऐसे दोषको स्मृत्य- न्तराधान कहते हैं। निश्चय न होनेके कारण व्रतका निश्चय भी नही हो सकता इसलिए यह दोष व्रतका एक देशभग करनेवाला है। ऐसा अतिचार व्रती श्रावकको कभी नहीं लगाना चाहिए ॥१२१।। अब आगे देशवतका निरूपण करते हैं। किसी नियत समय तक त्याग करनेको देशविरति या देशवत कहते हैं। नियत समय तक अथवा थोड़े कालतकका अर्थ एक पहर, एक दिन, एक महीना, एक ऋतु या दो महीना अथवा एक वर्ष लेना चाहिए। भावार्थ-एक पहर, एक दिन, एक महीना, एक वर्ष आदि कालकी मर्यादा नियत कर किसी भी पाप रूप क्रियाका त्याग करना देशविरति नामका व्रत कहलाता है ॥१२२॥ इस व्रतका विषय गमन करनेका त्याग, भोजन करनेका त्याग, मैथुन करनेका त्याग अथवा मौन धारण करना आदि है। भावार्थ-यहाँ पर देश शब्दका अर्थ एकदेश है, व्रती श्रावकने जो जो व्रत धारण कर रक्खे हैं उनमे जन्म भरके लिए जिन जिन पापरूप क्रियाओका त्याग कर रक्खा है उन पापरूप क्रियाओको किसी कालकी मर्यादा नियत कर और अधिक त्याग कर देना देशवत है। यह व्रत समस्त व्रतोकी मर्यादाका और सक्षेप करता है, परन्तु करता है कुछ कालके लिये, इसीलिये इसको देशवत कहते हैं ।।१२३॥ जैसे यदि आज मैं कही जाऊंगा तो केवल पूर्व दिशामे ही जाऊंगा। यदि आज मुझे जानेके लिये कोई विशेष कारण भी मिल जायगा तो भी मै बाकीको तीन दिशाओमे नही जाऊँगा ।।१२४॥ .

१२६ श्रावकाचार-संग्रह यथा वा याववद्याह्नि भूयान्मेऽनशनं महत् । यद्वा तत्रापि रात्रौ च ब्रह्मचर्य ममास्तु तत् ॥१२५ यथा वा वर्षासमये चातुर्मासऽथ योगिवत् । इत स्थानाप्न गच्छामि क्यापि देशान्तरे जवात् ॥१२६ परिपाटयानया योज्या वृत्ति. स्याबहुविस्तरा । कर्तव्या च यथाशक्ति मातेव हितकारिणी ॥१२७ पञ्चातिचारसंज्ञा' स्युर्दोषा सूत्रोविता बुधैः । देशविरतिरूपस्य व्रतस्यापि मलप्रदा ॥१२८ तत्सूत्रं यथा- आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपा ॥५२ मात्मसङ्कल्पिताद्देशाबहि स्थितस्य वस्तुनः । आनयेतीङ्गितै किञ्चिद् ज्ञापनानयनं मतम् १२९ उक्त केनाप्यनुक्तेन स्वयं तच्चानयाम्यहम् । एवं कुविति नियोगो प्रेष्यप्रयोग उच्यते ॥१३० शब्दानुपातनामापि दोषोऽतीचारसंज्ञकः । संदेशकारणं दूरे तव्यापारफरान् प्रति ।।१३१ वोषो रूपानुपाताख्यो व्रतस्यामुष्य विद्यते । स्वाङ्गाङ्गदर्शनं यद्वा समस्या चक्षुरादिना ॥१३२ अथवा माज अवसे लेकर दिन भर तक मेरे चारो प्रकारके आहारका त्याग है और आजकी रात्रि- में अपना पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करूंगा ॥१२५॥ अथवा वर्षा होनेके समयमे अथवा वर्षा ऋतुके चार महीनेमे में मुनिराजके समान इसी स्थान पर रहूँगा इतने दिन तक इस स्थानसे अन्य किसी भी देश या गांवमे कभी नही जाऊंगा ।।१२६।। इस क्रमके अनुसार, इस परिपाटीके अनुसार इस देशवतका पालन करना चाहिये । इस परिपाटीके अनुसार इसका विस्तार बहुत कुछ बढ़ सकता है । व्रती श्रावकोको अपनी शक्तिके अनुसार इस व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये क्योकि यह व्रत माताके समान आत्माका कल्याण करनेवाला है ।।१२७॥ इस देश विरति नामके व्रतको दूषित करनेवाले पांच अतिचार हैं जो सूत्रमे बतलाये हैं। व्रती श्रावकोको उनका भी त्याग कर देना चाहिये ।।१२८॥ वह सूत्र यह है-नियत की हुई मर्यादाके बाहरसे किसीको बुलाना या कोई पदार्थ मंगाना, मर्यादाके बाहर किसीको भेजना या किसीके द्वारा काम कराना, मर्यादाके भीतर रहते हुए मर्यादा- के बाहर अपने शब्दसे ही काम निकालना अथवा अपना रूप दिखाकर अथवा शरीरके किसी इशारेसे मर्यादाके बाहर काम निकालना तथा ढेले पत्थर फेंक कर मर्यादाके बाहर रहनेवालोंके लिये कुछ इशारा करना या काम निकालना ये पांच देशवतके अतिचार हैं। आगे इन्हीका विशेष वर्णन करते हैं ॥५२॥ देशव्रतको धारणा करनेवाले व्रती पुरुषने उस देशवतकी जितनी मर्यादा नियत कर ली है उसके बाहर रक्खे हुए पदार्थको मंगानेके लिये किसी पुरुषको किसी भी इशारेसे बतला देना आनयननामका अतिचार है ॥१२९।। इसी प्रकार जिस किसी पुरुषको उस पदार्थको लानेके लिये आज्ञा नही दी है या कुछ भी इशारा नही किया है वह पुरुष यदि यह कहे कि मैं उस पदार्थको लाता हूँ उस पुरुषको 'तू ऐसा करना इस प्रकार करना' इस प्रकारकी आज्ञा न देनेको प्रेष्यप्रयोग कहते हैं ॥१३०॥ अपनी नियत की हुई मर्यादाके बाहर जो कोई व्यापार करनेवाले हैं या अपना काम करनेवाले मुनीम गुमास्ते नौकर चाकर हैं उनको अपने शब्दके द्वारा कोई भी सन्देश पहुँचाना, कोई भी कार्य बता देना अथवा वे अपने काममे लगे रहे इसलिए खकार मठार कर अपनी देखरेख या उपस्थिति बतला देना शब्दानुपात नामका अतिचार है। यह भी व्रतको दूषित करनेवाला है इसलिये व्रती श्रावकको इसका भी त्याग कर देना चाहिये ॥१३१।। मर्यादाके बाहर काम लाटीसंहिता १२७ अस्ति पुद्गलनिक्षेपनामा दोषोऽन संयमे । इतो वा प्रेषणं तत्र पत्रिकाहेमवाससाम् ॥१३३ उक्तातीचारनिर्मुक्तं स्याद्देशविरतिव॑तम् । कर्तव्यं वतिनाऽवश्यं हिंसातृष्णादिहानये ॥१३४ व्रतं चानर्थदण्डस्य विरतिर्गृहमेधिनाम् । द्वादशव्रतवृक्षाणामेतन्मूलमिवाद्वयम् ॥१३५ एकस्यानर्थदण्डस्य परित्यागो न देहिनाम् । प्रतित्वं स्यादनायासानान्यथायासकोटिभि ॥१३६ स्वार्थ चान्यस्य संन्यासं विना कुर्यान्न कर्म तत् । स्वार्थश्चावश्यमात्रात्मास्वार्थ सर्वो न सर्वतः ॥१३७ यथानाम विनोदार्थ जलादि-वनक्रीडनम् । कायेन मनसा वाचा तद्भदा बहवः स्मृता ॥१३८ कृतकारितानुमनस्त्रिकालविषयं मनोवच कायै । परिहृत्य कर्मसकलं परमं नैष्कर्म्यमवलम्बेत १३९ दोषा सूत्रोदिता पञ्च सन्त्यतीचारसंज्ञका । अनर्थदण्डत्यागस्य व्रतस्यास्यापि दूषिका ॥१४० करनेवाले नौकर चाकर अपना काम करते रहे इसके लिये अपनी उपस्थिति या देखरेख सूचित करनेके लिये अपना शरीर दिखलाना या और किसी प्रयोजनके लिये मर्यादाके बाहर वालोको अपना शरीर दिखलाकर अपना प्रयोजन सिद्ध कर लेना अथवा आंख आदि शरीरके अवयवोसे मर्यादाके बाहर वालोको कोई इशारा करना रूपानुपात नामका अतिचार कहलाता है। यह अतिचार भी इस देशव्रतमे दोष लगानेवाला है इसलिये व्रती श्रावकको इसका भी त्याग कर देना चाहिये ॥१३२॥ अपनी मर्यादामे रहते हुए मर्यादाके बाहर सोना-चाँदी वस्त्र चिट्ठी-पत्री आदि कोई भी पदार्थ भेजना अथवा मर्यादाके बाहर वालोको ढेले पत्थर फेंककर अपना कुछ भी प्रयोजन सिद्ध कर लेना पुद्गलक्षेप नामका अतिचार है। इस अतिचारसे भी इस व्रतका एकदेश भग होता है इसलिये व्रती श्रावकको इसका भी त्याग कर देना चाहिये ॥१३३।। इस देशव्रतको धारण करने- वाले श्रावकोको उचित है कि वे हिंसा और तृष्णा, ममत्व, लालसा, इन्द्रियोके विषयोकी लालसा- को दूर करनेके लिये ऊपर कहे हुए अतिचारोको छोडकर इस देशवतका पालन अवश्य करें ॥१३४।। अब आगे अनर्थदण्डविरति नामके व्रतका स्वरूप बतलाते हैं। अनर्थदण्डोका त्याग करने रूप अनर्थदण्डविरति नामके व्रतका पालन भी गृहस्थोको अवश्य करना चाहिये क्योकि यह अनर्थ- दण्डविरति नामका व्रत बारह व्रतरूपी वृक्षकी अद्वितीय या सबसे मुख्य जड है ॥१३५॥ इन अनर्थदण्डोमेसे किसी एक अनर्थदण्डका त्याग कर देना व्रत नहीं है क्योकि एक-एक अनर्थदण्डका त्याग बहुत आसानीके या विना किसी परिश्रमके हो जाता है तथा समस्त अनर्थदण्डोका त्याग करोड़ो परिश्रमसे भी नही होता है ।।१३६॥ जिसमे दूसरेके स्वार्थकी सिद्धि हो ऐसा कार्य सिवाय समाधिमरणके और कुछ नही करना चाहिये । वास्तवमे देखा जाय तो आत्माको अवश्य करने योग्य ऐसा आत्माका कल्याण करना ही स्वार्थ है। ससार सम्बन्धी और समस्त कार्य स्वार्थ नही हैं तथा वे पूर्णरूपसे स्वार्थ कभी नही हो सकते ॥१३७॥ जैसे चित्त प्रसन्न करनेके लिये जलक्रीडा करना, वनक्रीडा करना आदि सब अनर्थदण्ड कहलाता है। उसको मनसे करना, वचनसे करना, कायसे करना आदि रूपसे उसके अनेक भेद हो जाते है ॥१३८॥ मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदनासे भूत भविष्यत और वर्तमानकाल सम्बन्धी समस्त पाप रूप कार्योंका त्याग कर सबसे उत्तम उदासीन अवस्था धारण करनी चाहिये ।।१३९॥ इस अनर्थदण्डत्याग व्रतके भी पांच अतिचार हैं जो कि सूत्रकारने अपने सूत्रमे बतलाए हैं। ये अतिचार भी व्रतमे दोष लगाने वाले हैं इसलिए व्रती श्रावकको इसका भी त्याग कर देना चाहिए ।।१४०|| १२८ श्रावकाचारसग्रह तत्सूत्रं यथा- कन्दपंकोत्कुच्यमौखर्यासमोक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥५३ अस्ति कन्दर्पनामापि दोष प्रोक्तव्रतस्य य । रागोद्रेकात्प्रहासाहिमिश्रो वाग्योग इत्यपि ॥१४१ दोष कौत्कुच्यसंज्ञोऽस्ति दुष्टकायक्रियादियुक् । परागस्पर्शनं स्वाङ्गैरदिन्याङ्गनादिषु ।।१४२ मौखर्यदूषणं नाम रतप्रार्य वच शतम् । मतीव गहितं पाष्टर्याद्यद्वात्यर्थ प्रजल्पनम् ॥१४३ असमीक्ष्याधिकरणमनल्पीकरणं हि यत् । अर्थात्स्वार्थमसमीक्ष्य वस्तुनोऽनवधानतः ॥१४४ यथाऽऽहारकृते यावज्जलेनास्ति प्रयोजनम् । नेतव्यं तावदेवात्र दूषणं चान्यथोदितम् ॥१४५ भुज्यते सकृदेवात्र स्यादुपभोगसंज्ञकः । यथा सृक्चन्दनं माल्यमनपानौषधावि वा ॥१४६ परिभोग समाख्यातो भुज्यते यत्पुनः पुनः । यथा योषिदलङ्कारवस्त्रागारगजादिकम् ॥१४७ आनयंक्यं तयोरेव स्यादसम्भविनोयो । अनात्मोचितसंख्याया करणादपि दूषणम् ॥१४८ - उन अतिचारोको कहनेवाला सूत्र यह है-कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये पांच अनर्थदण्डव्रतके अतिचार हैं ॥५३॥ आगे इनका स्वरूप कहते हैं-रागकी तीव्रतासे हंसीसे मिले हुए अशिष्ट वचन कहना कन्दर्प कहलाता है। यह कन्दर्प भी अनर्थदण्डत्याग व्रतका पहला अतिचार है। कन्दर्प शब्दका अर्थ काम है। कामको बढानेवाले जितने हंसीके वचन हैं अथवा जितने अशिष्ट वचन हैं उनके कहनेको कन्दर्प कहते हैं। ऐसे वचन कहनेसे परिणाम मलिन होते हैं तथा व्यर्थ ही पाप कर्मोका बन्ध होता है इसलिए व्रती श्रावकको इस अतिचारका त्याग कर देना चाहिए ।।१४१॥ रागकी तीव्रतासे शरीरकी दुष्ट क्रिया करना कौत्कुच्य है। जैसे अपने शरीरसे अन्य स्त्रियोका शरीर स्पर्श करना, भौंह चलाना, आँखें भटकाना आदि सब कामको बढानेवाली शरीरकी चेष्टाओको, शरीरकी क्रियाओको कोत्कुच्य कहते हैं। इससे भी व्यर्थ ही पाप कर्मोका बन्ध होता है इसलिए प्रती श्रावकको इसका भी त्याग कर देना चाहिये ॥१४२|| कामको बढानेवाले अत्यन्त निन्दनीय सैकड़ो वचन कहना, अथवा धृष्टतापूर्वक बहुत वकवाद करना मौखर्य नामका अतिचार है । इससे भी व्यर्थ ही पापकर्मोंका बन्ध होता है इसलिए व्रती श्रावकको इसका भी त्याग कर देना चाहिये ॥१४३।। अपने प्रयोजन या आवश्यकताका विचार किये विना असावधानीके साथ पदार्थोंका अधिक सग्रह करना असमीक्ष्याधिकरण कहलाता है । व्रती श्रावकको इस अतिचारका भी त्याग कर देंना चाहिये ॥१४४॥ जैसे भोजनादि बनाने के लिए जितने जलकी आवश्यकता हो उतना ही जल भरना चाहिये, उससे अधिक जल भरना अनर्थदड है, अधिक जल भरनेसे व्यर्थका पाप लगता है अतएव आवश्यकतासे अधिक पदार्थोंका सग्रह कभी नही करना चाहिये ॥१४५।। जो पदार्थ एक बार भोगे जाते हैं, एक बार काममे आते हैं उनको उपभोग कहते हैं जैसे माला, चन्दन, फूल, भोजन, पानी, औषध आदि ॥१४६॥ जो पदार्थ बार-बार भोगनेमे आते हैं उनको परिभोग कहते हैं जैसे स्त्री, अलंकार, वस्त्र, घर, हाथी, घोडे आदि ॥१४७॥ उपभोग और परिभोग इन दोनोको आवश्यकतासे अधिक इकट्ठा करना अनर्थदडका अतिचार है। अथवा जिन पदार्थोकी सम्भावना ही नही है, जो पदार्थ असम्भव हैं उनका परिमाण करना, अथवा जो पदार्थ अपनी योग्यतासे बाहर हैं, अपनी योग्यताके अनुसार जिन पदार्थोंका प्राप्त होना असम्भव है ऐसे पदार्थोंका त्याग .

लाटीसहिता १२९ यथा दीनश्च दुर्भाग्यो वस्तुसंख्यां चिकीर्षति । गृह्णाम्यशाश्वतं यावन्न गृह्णामि ततोऽधिकम् ॥१४९ निर्दिष्टानर्थदण्डस्य विरतिम्निा गुणवतम् । अतीचारविनिर्मुक्तं नूनं नि श्रेयसे भवेत् ॥१५० शिक्षावतानि चत्वारि सन्ति स्याद्गृहमेधिनाम् । इतस्तान्यपि वक्ष्यामि पूर्वसूत्रानतिक्रमात् ॥१५१ तत्सूत्रं यथा- सामायिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागवतसम्पन्नश्च ॥५४ अर्थात्सामायिक प्रोक्त साक्षात्साम्यावलम्बनम् । तदर्थ व्यवहारत्वात्पाठ कालासनादिमान् ॥१५२ तत्सूत्रं यथा- समता सर्वभूतेषु संयमे शुभभावना । आतंरौद्रपरित्यागस्तद्धि सामायिकवतम् ॥५५ तदर्थात्प्रातरुत्थाय कुर्यादात्मादिचिन्तनम् । एकोऽहं शुद्धचिद्रूपो नाहं पौद्गलिकं वपुः ॥१५३ चिन्तनीयं ततश्चित्ते सूक्ष्मं षड्द्रव्यलक्षणम् । तत संसारिणो मुक्ता जीवाश्चिन्त्या द्विधार्थत ॥१५४ करना या परिमाण करना अनर्थदण्ड व्रतका अतिचार है ॥१४८।। जैसे कोई अत्यन्त दरिद्र पुरुष है और उसके अशुभ कर्मका उदय अत्यन्त प्रबल हो रहा है, वह यदि ऐसा प्रमाण करना चाहे कि ससारमे जितने अनित्य पदार्थ हैं उनको ही ग्रहण करनेकी मेरी प्रतिज्ञा है । अनित्य पदार्थोंके सिवाय नित्य पदार्थोंको में कभी ग्रहण नही करूँगा यह परिमाण असम्भव पदार्थोंका है क्योकि ससारमे ऐसा कोई पदार्थ नही है जो अनित्य न हो अथवा ऐसा पदार्थ होना सर्वथा असम्भव है जो सर्वथा नित्य हो अतएव ऐसा परिमाण करना उपभोगपरिभोगपरिमाणनामक व्रतका अतिचार है ।।१४९॥ इस प्रकार अनर्थदडविरतिनामक गुणवतका स्वरूप बतलाया। इस व्रतको अतिचार रहित पालन करनेसे ही आत्माका कल्याण होता है अतएव व्रती श्रावकोको अतिचाररहित ही व्रतोको पालन करना चाहिये ॥१५०॥ गृहस्थोके पालन करने योग्य शिक्षाव्रत चार हैं। अब सूत्रोके अनुसार उन्ही शिक्षाव्रतोका वर्णन करते हैं ।।१५१॥ उन शिक्षाक्तोका वर्णन करनेवाला सूत्र यह है-सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोगपरिभोग- परिमाण और अतिथिसविभाग ये चार शिक्षाव्रत हैं। व्रती गृहस्थ इन व्रतोका भी पालन करता है ॥५४॥ आगे इन्हीका वर्णन करते हुए सबसे पहले सामायिकका स्वरूप वर्णन करते हैं। शुद्ध आत्माका साक्षात् चिन्तवन करना सामायिक है अथवा शुद्ध आत्माका चिन्तवन करनेके लिए योग्य समय मे योग्य आसन से बैठकर सामायिकका पाठ करना भी सामायिक कहलाता है ॥१५२।। सो ही सामायिक पाठमे लिखा है-समस्त जीवोमे समताभाव धारण करना, सयम पालन करनेके लिए सदा शुभ भावना रखना और आर्तध्यान तथा रौद्रध्यानका सर्वथा त्याग कर देना सामायिकवत कहलाता है ।।५५।। उस सामायिक व्रतको पालन करनेके लिए प्रात काल उठकर शुद्ध आत्माका चिन्तवन करना चाहिये । मैं अकेला हूँ, शुद्ध हूँ और चैतन्यस्वरूप हूँ, पुद्गलका बना हुआ शरीर मेरा स्वरूप नही है, पुद्गल जड है मैं चैतन्यरूप हूँ अतएव पुद्गलसे सर्वथा भिन्न हूँ। इस प्रकार चिन्तवन करना चाहिये ॥१५३।। तदनन्तर अपने हृदयमे छहो द्रव्योका सूक्ष्म स्वरूप चिन्तवन १५ १३० श्रावकाचार-संग्रह तत्र संसारिणो जीवाश्चतुर्गतिनिवासिनः । कर्मनोकर्मयुक्तत्वाद् यायिनोऽतीवदु खिताः ॥१५५ पूर्वकर्मोदयाद् भावस्तेषा रागादिसयुतः । जायतेऽशुद्धसजो यस्तस्माद्बन्धोऽस्ति कर्मणाम् ॥१५६ एवं पूर्वापरीभूतो भावश्चान्योन्यहेतुक । शक्यते न पृथक् कर्तुं यावत्संसारसंज्ञक ॥१५७ एवं वाऽनादिसन्तानाभ्रमति स्म चतुर्गती । जन्ममृत्युजरातड्दु खाक्रान्त स प्राणभृत् ॥१५८ तत्र कश्चन भव्यात्मा काललब्धिवशादिह । कृत्स्नकर्मक्षयं कृत्वा ससारादि प्रमुच्यते ॥१५९ अस्ति सद्दर्शनज्ञानचारित्राण्यत्र कारणम् । हेतुस्तेषां समुत्पत्तो काललब्धि परं स्वतः ॥१६० इत्यादि जगत्सर्व स्वं चिन्तयेत्तन्मुहमुंह । नूनं संवेगवैराग्यवर्द्धनाय महामति ॥१६१ उक्तं च- जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥५६ चिन्तनानन्तरं चेति चिन्तयेदात्मनो गतिम् । कोऽहं कुत समायात क्व यास्यामि जवादित ॥१६२ करना चाहिये । फिर उन छह द्रव्योमेसे भी जीव दो प्रकार हैं-एक ससारी और दूसरे मुक्त । इस प्रकार जीवोके भेद प्रभेदोका तथा उनके स्वरूपका चिन्तवन करना चाहिये ॥१५४|| उन दोनो प्रकारके जीवोमेसे जो जीव चारो गतियोमे निवास करते हैं, कर्म नोकर्म सहित होनेसे जो सदा परिभ्रमण करते रहते हैं और अत्यन्त दुखी रहते हैं उनको ससारी जीव कहते हैं ॥१५५।। इस ससारी जीवके पूर्व कर्मोके उदय होनेसे गगद्वेष रूप अशुद्धभाव उत्पन्न होते हैं तथा उन्ही राग- द्वेष रूप अशुद्ध भावोंसे फिर नवीन कर्मोका बन्ध होता है ॥१५६।। जिस प्रकार बीजसे वृक्ष और वृक्षसे बीज होता है अर्थात् बीज वृक्ष दोनो एक दूसरेसे उत्पन्न होते रहते हैं उसी प्रकार पहले कर्मोके उदयसे रागद्वेष और उन रागद्वेषसे नवीन कर्मोका बन्ध, तथा उन कर्मोके उदयसे फिर रागद्वेष और उन रागद्वेषसे फिर नवीन कर्मोका बन्ध होता रहता है । जब तक यह जीव ससारमे परिभ्रमण करता रहता है, तब तक यह कार्य कारण सम्बन्ध कभी छूट नही सकता ॥१५७। इस प्रकार यह जीव अनादिकालसे नरक तिथंच देव मनुष्य इन चारो गतियोमे परिभ्रमण करता रहता है तथा जन्म, मरण, बुढ़ापा, रोग आदि अनेक दुःखोसे दुखी बना रहता है ॥१५८॥ उन ससारी जीवोमेसे कोई भव्य जीव काललब्धिके प्राप्त हो जानेपर समस्त कर्मोको नाश करके इस ससारसे छूटकर मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सामायिक करते समय जीवोंके इन भेदोंके स्वरूप को चिन्तवन करना चाहिये ॥१५९।। इसके साथ यह भी चिन्तवन करना चाहिये कि उन कर्मोसे छूटनेके लिए या मोक्ष प्राप्त करनेके लिए सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ही कारण हैं। तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र उत्पन्न होनेके लिए काललब्धि कारण है और काललब्धि अपने आप प्रगट होती है ॥१६०॥ इस प्रकार महा बुद्धिमान् श्रावकको आत्माका सवेग और वैराग्य गुण बढानेके लिए अपने आत्माका चिन्तवन करना चाहिये तथा इसी सवेग और वैराग्य गुणको बढानेके लिए इस समस्त जगत्का स्वरूप बार-बार चिन्तवन करना चाहिये ॥१६॥ तत्त्वार्थसूत्रमे लिखा भी है-जगत्का स्वरूप या स्वभाव चिन्तवन करनेसे सवेग बढ़ता है और शरीरका स्वभाव चिन्तवन करनेसे वैराग्य बढ़ता है ॥५६॥ इस प्रकार चिन्तवन कर लेनेके अनन्तर सामायिक करनेवालेको अपने आत्माका स्वरूप चिन्तवन करना चाहिये तथा विचार करना चाहिये कि "मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, किस गति से आकर इस गतिमे जन्म लिया है और अब यहाँसे जो मुझे शीघ्र जाना है सो कहां जाना होगा v लाटीसहिता १३१ हेयं कि किमुपादेयं मम शुद्धचिदात्मनः । कर्तव्यं कि मया त्याज्यमधुना जीवनावधि ॥१६३ इति चिन्तयतस्तस्य संवेगो जायते गुणः । संसारभवभोगेभ्यो वैराग्यं चोपबृहति ॥१६४ तत साधुसमाधिश्च सामायिकवतान्वित । तत' सामायिकी क्रियां कुर्याद्वा शल्यजित ॥१६५ तज्जिनेन्द्रगुणस्तोत्र पठेत्पद्यादिलक्षणम् । सिद्धानामथ साधूना कुर्यात्सोऽपि गुणस्तुतिम् ॥१६६ ततोऽहभारती स्तुत्वा जगच्छान्तिमधीय च । क्षणं ध्यानस्थितो भूत्वा चिन्तयेच्छुद्धचिन्मयम् ॥१६७ तत सम्पूर्णतां नीत्वा ध्यानं कालानतिक्रमात् । सस्तुताना यथाशक्ति तत्पूजां कर्तुमर्हति ॥१६८ स्नानं कुत्प्रियत्नेन संशु?' प्रासुकोदकैः । गृह्णीयाधौतवस्त्राणि दृष्टिपूतानि प्रायश' ॥१६९ ततः शनै शनैर्गत्वा स्वसदमस्थजिनालये । द्रव्याण्यष्टौ जलादीनि सम्यगादाय भाजने ॥१७० तत्रस्थान जिनबिम्बांश्च सिद्धयन्त्रान् समचयेत् । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं स्थाप्य समर्चयेत् ॥१७१ शेषानपि यथाशक्ति गुणानप्यर्चयेद् व्रती । अत्र संक्षेपमात्रत्वादुक्तमुल्लेखतो मया ॥१७२ अस्त्यत्र पञ्चधा पूजा मुख्यमाह्वानमात्रिका । प्रतिष्ठापनसंज्ञाऽथ सनिधीकरणं तथा ॥१७३ ॥१६२।। मेरे इस शुद्ध आत्माके लिए ऐसे कौन-कौनसे कार्य हैं अथवा ऐसे कौन-कौनसे पदार्थ हैं जो त्याग करने योग्य है, तथा ऐसे कौनसे पदार्थ हैं जो ग्रहण करने योग्य हैं। मुझे अब इस जन्म पर्यन्त क्या-क्या कार्य करने चाहिये और किन-किन कार्योंका त्याग कर देना चाहिये ॥१६३।। इस प्रकार चिन्तवन करनेसे सामायिक करनेवालेके आत्माका सवेग गुण बढता है तथा ससार, शरीर और भोगोसे अथवा ससारमे उत्पन्न हुए भोगोसे वैराग्य बढता है ।।१६४॥ तदनन्तर सामायिक करनेवाले व्रती श्रावकको साधु समाधि करनी चाहिये । अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपका चिन्तवन करने अथवा पचपरमेष्ठीके स्वरूपका चिन्तवन करनेको साधु समाधि कहते हैं। इस प्रकार चिन्तवन कर लेनेके अनन्तर उस व्रती श्रावकको माया मिथ्या निदान इन तीनो शल्योको छोडकर सामायिककी क्रिया करनी चाहिये ॥१६५।। आगे उसी सामायिकको क्रियाको बतलाते हैं। अनुष्टुप्, जाति, उपजाति, वसन्ततिलका आदि छन्दोमे भगवान् जिनेन्द्रदेवके गुणोकी स्तुति पढ़नी चाहिये, अथवा सिद्ध परमेष्ठीकी स्तुति करनी चाहिये या साधुओके गुणोकी स्तुति करनी चाहिये ।।१६६।। तदनन्तर भगवान् अरहन्तदेवकी कही हुई वाणीको अर्थात् सरस्वती देवीकी स्तुति करनी चाहिये और ससारकी शान्तिकी कामनाके लिए शान्ति पाठ पढना चाहिये ॥१६७।। तदनन्तर समय पूरा हो जानेपर उस ध्यानको समाप्त कर देना चाहिये और फिर जिनकी स्तुति की है उनकी पूजा अपनी शक्तिके अनुसार करनी चाहिये ॥१६८॥ भगवान् अरहन्तदेव आदिकी पूजा करनेके लिए यत्लाचारपूर्वक शुद्ध और प्रासुक जलसे स्नान करना चाहिये । फिर धुले हुए वस्त्रोको आँखोसे देखकर पहिनना चाहिये ॥१६९।। तदनन्तर जल चन्दन आदि आठो द्रव्योको किसी उत्तम थाल आदि पात्रमे लेकर धीरे धीरे अपने घरके चैत्यालयमे जाना चाहिये ॥१७०॥ उस चैत्यालयमे विराजमान अरहन्तदेवके प्रतिबिम्बोकी पूजा करनी चाहिये, सिद्धयन्त्रकी पूजा करनी चाहिये और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्रको स्थापन कर उनकी पूजा करनी चाहिये ॥१७१।। व्रती श्रावकको अपनी शक्तिके अनुसार आत्माके शेष उत्तम क्षमा आदि गुणोकी भी पूजा करनी चाहिये। यह पूजा करनेका विधान पहले आचार्योंके कहे अनुसार हमने अत्यन्त सक्षेपसे कहा है ।।१७२।। पूजा पचोपचारी होती है अर्थात् पाँच प्रकारसे की जाती है। सबसे हले आह्वान करना चाहिये, फिर स्थापन करना चाहिये, फिर सन्निधापन या सन्निधिकरण श्रावकाचार-संग्रह ततः पूजनमत्रास्ति ततो नाम विसर्जनम् । पञ्चधेयं समाख्याता पञ्चकल्याणवायिनी ॥१७४ तद्विपिश्चात्र निर्दिष्टुमहन्नप्युपलक्षित । स्मृते संक्षेपसकेताद्विधेश्चातीव विस्तरात् ॥१७५ एवमित्याधवश्यं स्यात्कर्तव्यं व्रतधारिभिः । अस्ति चेदात्मसामय कुर्याच्चाप्यपरं विधिम् ॥१७६ अर्चयेच्चैत्यवेश्मस्थानहद्विम्बादिकानपि । सूर्युपाध्यायसाधूश्च पूजयेद् भक्तितो व्रती ॥१७७ ततो मुनिमुखोद्गीणं प्रोक्तं वा सप्रसूरिभि । धर्मस्य श्रवणं कुर्यादावराद ज्ञानचक्षुषे ।।१७८ गृहकार्य तत कुर्यादात्मनिन्दादिमानयम् । ततो मध्याह्निके प्राप्ते भूय कुर्यादमु विधिम् ।।१७९ अतिथिसंविभागस्य भावनां भावयेवपि । मध्याह्नादीषदग्वैि नात. कालाधतिक्रमे ॥१८० भोजयित्वा स्वयं यावत्क्षणं शेते सुखाशया। धारयेद्धर्मश्रवणं पूर्वाल्ले यच्छुतं स्मृतेः ॥१८१ महापोहोऽपि कर्तव्य साद्धं चापि समिमिः । अस्ति चेद् ज्ञानसामथ्र्य कार्य शास्त्रावलोकनम् ॥१८२ गृहकार्य तत कुर्याद् भूय. संध्यावरिह । ततः सायंतने प्राप्ते कुर्यात्सामायिकी क्रियाम् ॥१८३ किञ्चापराल्लुके काले जिनबिम्बान् प्रागचंयेत् । तत' सामायिकं कुर्यादुक्तेन विधिना व्रती ॥१८४ ततश्च शयनं कुर्याधथानिद्रं यथोचितम् । निशीथे पुनरुत्थाय कुर्यात्सामायिकी क्रियाम् ॥१८५ । T करना चाहिये तदनन्तर पूजा करनी चाहिये और फिर विसर्जन करना चाहिये । इस प्रकार यह पूजा पांच प्रकारकी बतलायी है। यह पांच प्रकारसे की हुई पूजा पचकल्याणक फलको देनेवाली है ॥१७३-१७४।। पूजाकी विधि बहुत बड़ी है यद्यपि उसको पूर्ण रीतिसे मैं कह सकता हूँ तथापि मैंने उसका उपलक्षण मात्र कहा है क्योकि पूजाकी विधि तो बहुत बड़ी है और यह स्मृतिशास्त्र अथवा श्रावकाचार अत्यन्त सक्षेपसे केवल सकेतमात्र कहा है ॥१७५॥ व्रती श्रावकोको ऊपर लिखे अनुसार कर्तव्य तो अवश्य पालन करना चाहिये । यदि उसकी अधिक सामर्थ्य हो तो अन्य शास्त्रो के अनुसार उसे और विधि भी करनी चाहिये ।।१७६।। तदनन्तर उस व्रती श्रावकको जिनालयमे जा कर वहाँपर विराजमान भगवान् अरहन्तदेवके बिम्बोकी पूजा करनी चाहिये तथा आचार्य उपाध्याय और साधुओकी पूजा भी भक्तिके साथ करनी चाहिये ॥१७७|| तदनन्तर मुनिराजके मुखारविन्दसे कहे हुए धर्मका श्रवण करना चाहिये अथवा अपने ज्ञानरूपी नेत्रोकी ज्योति बढानेके लिये अपने घरके आचार्यके (गृहस्थाचार्य के) द्वारा कहे हुए धर्मका श्रवण बडे आदरके साथ करना चाहिये ॥१७८॥ तदनन्तर अपनी निन्दा करते हुए उस व्रती श्रावकको अपने घरके व्यापार-धन्धे करने (2 चाहिये और दोपहरका समय होनेपर फिर भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करनी चाहिये ||१७९|| दोपहरके कुछ समय पहले अतिथिसविभागवतकी भावनाका भी चिन्तवन करना चाहिये ।।१८०॥ फिर भोजन कर थोडी देर तक आराम करनेके लिये सोना चाहिये। फिर प्रात काल मुनियोंसे या गृहस्थाचार्यसे जो धर्म श्रवण किया था उसका मनन करना चाहिये, चिन्तवन करना चाहिये और धारण करना चाहिये ॥१८१।। इसी समय धर्मात्माओंके साथ बैठकर धर्म चर्चा करनी चाहिये। यदि अपने में ज्ञानकी सामर्थ्य अधिक हो तो शास्त्रोका अवलोकन करना चाहिये ॥१८२।। तदनन्तर फिर शाम तक घरके व्यापार-धन्धे करने चाहिये तथा शाम हो जानेपर सामायिक करना चाहिये ॥१८३।। इसमे भी इतना विशेष है कि शाम हो जानेपर पहले भगवान मरहन्तदेवकी पूजा करनी चाहिये और फिर उस व्रती श्रावकको ऊपर लिखी विधिके अनुसार सामायिक करना चाहिये ॥१८४॥ फिर सोना चाहिये । अपनी नीदके अनुसार तथा जितना उचित समझा जाय उतना सोना लाटीसहिता १३३ तत्रार्द्धरात्रके पूजां न कुर्यावहतामपि । हिंसाहेतोरवश्यं स्याद्रात्रौ पूजाविवर्जनम् ॥१८६ एवं प्रवर्तमानश्च सागारो व्रतवानिह । स्वर्गाविसम्पदो भुक्त्वा निर्वाणपवभाग्भवेत् ॥१८७ सामायिकवतस्यापि पञ्चातीचारसंज्ञका । दोषा सन्ति प्रसिद्धास्ते त्याज्याः सूत्रोदिता यथा १८८ तत्सूत्रं यथा-- योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥५७ सामायिकादितोऽन्यत्र मनोवृत्तिर्यदा भवेत् । मनोदुष्प्रणिधानाख्यो दोषोऽतीचारसंज्ञक' ॥१८९ वाग्योगोऽपि ततोऽन्यत्र हुंकारादिप्रवर्तते । वचोदुष्प्रणिधानाख्यो दोषोऽतीचारसंज्ञक ॥१९० काययोगस्ततोऽन्यत्र हस्तसंज्ञादिदर्शने । वर्तते तदतीचार कायदुष्प्रणिधानक ॥१९१ यदाऽऽलस्यतया मोहात्कारणाद्वा प्रमादतः । अनुत्साहतया कुर्यात्तदाऽनावरदूषणम् ॥१९२ अस्ति स्मृत्यनुपस्थानं दूषणं प्रकृतस्य यत् । न्यूनं वर्ण पदैर्वाक्यः पठ्यते यत्प्रमादतः ॥१९३ चाहिये। फिर आधी रातके समय उठकर सामायिक करना चाहिये ॥१८५।। इसमे भी इतना विशेष है कि आधी रातके समय भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा नही करनी चाहिये क्योकि आधी रातके समय पूजा करनेसे हिंसा अधिक होती है। रात्रिमे जीवोंका सचार अधिक होता है तथा यथोचित रीतिसे जीव दिखाई भी नही पड़ते इसलिये रात्रिमे पूजा करनेका निषेध किया है ॥१८६॥ इस ससारमे इस प्रकार ऊपर लिखी हुई क्रियाओको करता हुआ व्रती गृहस्थ स्वर्गादिकके अनुपम सुखोको भोगकर अनुक्रमसे मोक्ष प्राप्त करता है ॥१८७॥ अन्य व्रतोके समान इस सामायिक व्रतके भी पांच अतिचार हैं जो दोषोके नामसे प्रसिद्ध हैं और जिनका वर्णन सूत्रमे भी किया है। व्रती श्रावकोको उन अतिचारोका भी सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ॥१८८॥ उन अतिचारोको कहनेवाला जो सूत्र है वह यह है--मनोदुष्प्रणिधान अर्थात् मनके द्वारा अशुभ चिन्तवन, वचनदुष्प्रणिधान अर्थात् वचनके द्वारा अशुभ प्रवृत्ति, काय दुष्प्रणिधान अर्थात् शरीरके द्वारा अशुभ क्रियाका होना, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान अर्थात् भूल जाना ये पांच सामायिकके अतिचार हैं ॥५७|| आगे इन्हीका स्वरूप दिखलाते हैं । सामायिक करते समय अपने मनकी प्रवृत्ति सामायिक के सिवाय अन्य कार्योंमे लगाना-अपने आत्माके स्वरूपके चिन्तवनके सिवाय या पच परमेष्ठीके स्वरूपके चिन्तवनके सिवाय अन्य किसी भी पदार्थका चिन्तवन करना मनोदुष्प्रणिधान नामका दोष है जो सामायिकका पहला अतिचार कहलाता है ।।१८९।। सामायिक करते समय हुँ हुँ, हूँ, हाँ आदि रूपसे वचनोकी प्रवृत्ति सामायिकके सिवाय अन्य कार्यमे लगाना वचनदुष्प्रणिधान नामका दोष है। उस समय किसी भी कार्यके इशारेके लिए हूँ, हाँ करना सामायिकका दूसरा अतिचार है ।।१९०। इसी प्रकार सामायिक करते समय अपने शरीरकी प्रवृत्ति सामायिकके सिवाय अन्य किसी भी कार्यमे लगाना, हाथ, उँगली, माथा, आँख, भौंह आदिके इशारेसे किसी भी कार्यका इशारा करना, किसी पदार्थको इशारेसे दिखलाना कायदुष्प्रणिधान नामका अतिचार कहलाता है ॥१९१॥ यह व्रती श्रावक जब कभी आलससे, मोहसे या प्रमादसे या अन्य किसी कारणसे बिना उत्साहके सामायिक करता है तब उसके अनादर नामका चौथा अतिचार लगता है ।।१९२॥ जब कभी यह व्रती श्रावक प्रमादी होकर वर्णरहित (अक्षररहित) पदरहित या वाक्य- श्रावकाचार-संग्रह ख्यातं सामायिकं नाम व्रतं चाणुवतार्थिनाम् । अतीचारविनिर्मुक्तं भवेत्संसारविच्छिदे ॥१९४ स्यात्प्रोषधोपवासाख्यं व्रतं च परमौषधम् । जन्ममृत्युजरातकविध्वसनविचक्षणम् ।।१९५ चतुर्दाशनसन्यासो यावद् यामाश्च षोडश । स्थितिनिरवद्यस्थाने व्रतं प्रोषधसंज्ञकम् ।।१९६ कर्तव्यं तदवश्यं स्यात्पर्वण्यां प्रोषधवतम् । अष्टम्या च चतुर्दश्या यथाशक्त्यापि चान्यदा ।।१९७ धारणाह्नि त्रयोदश्या मध्याह्न कृतभोजन । तिष्ठेत्स्थान समासाद्य नीरागं निरवद्यकम् ॥१७८ तत्रैव निवसेद् रात्री जागरूको यथावलम् । प्रातरादिदिन कृत्स्नं धर्मध्यानेनयेद् व्रती ॥१९९ जलपानं निषिद्धं स्यान्मुनिवत्तत्र प्रोषधे । न निषिद्धाऽनिषिद्धा स्यादहत्पूजा जलादिभि ॥२०० यदा सा क्रियते पूजा न दोषोऽस्ति तदापि वै । न क्रियते सा तदाप्यत्र दोषो नास्तीह कश्चन ।।२०१ एवमित्यादि तत्रैव नीत्वा रात्रि स धर्मघी । कृतक्रियोऽशनं कुर्यान्मध्याह्ने पारणादिने ॥२०२ रहित सामायिकका पाठ पढता है या शीघ्रताके साथ पढता है या पढते-पढते भूल जाता है या कुछ छोडकर आगे पढने लगता है तब उसके स्मृत्यनुपस्थान नामका सामायिकका पांचवां अतिचार होता है ।।१९३।। इस प्रकार अणुव्रत धारण करनेवाले व्रती श्रावकोके लिये सामायिक नामके शिक्षावतका स्वरूप कहा । यदि इस व्रतको अतिचाररहित पालन किया जाय तो इस जीवके ससार परिभ्रमणका अवश्य ही नाश हो जाता है और मोक्षकी प्राप्ति अवश्य होती है ॥१९४।। आगे प्रोषधोपवासवतका स्वरूप कहते हैं। जन्म, मरण, बुढापा, रोग आदि ससार सम्बन्धी समस्त दुखो को, समस्त रोगोको नाश करनेके लिये यह प्रोषधोपवास नामका व्रत एक विलक्षण और सबसे उत्तम औषधि है ॥१९५॥ सोलह पहर तक चार प्रकारके आहारका त्याग कर देना और जिनालय आदि किसी भी निर्दोष स्थानमे रहना प्रोषधोपवासवत कहलाता है ।।१९६।। यह प्रोषधोपवास नामका व्रत अष्टमी और चतुर्दशी इन दोनो पर्वोके दिनोमे अवश्य करना चाहिये ॥१९७)। यदि चतुर्दशीको प्रोषधोपवास करना हो तो इस व्रतको त्रयोदशीके दिन ही ग्रहण करना चाहिये । त्रयोदशीके दिन मध्याह्नमे या दोपहरके समय एक बार भोजन करना चाहिए तथा भोजनके बाद किसी निर्दोष और रागरहित स्थानमे जाकर रहना चाहिये ॥१९८।। बाकी दिन उसे वही बिताना चाहिये, रात्रिमे भी वही निवास करना चाहिये । उस रातको अपनी शक्तिके अनुसार जगते रहना चाहिये । प्रात काल उठकर उस व्रती श्रावकको वह समस्त दिन धर्मध्यानसे बिताना चाहिये ।।१९९|| प्रोषधोपवासके दिन उस व्रती श्रावकको जल नही पीना चाहिये । आचार्योंने प्रोषधोपवासके दिन मुनियोके समान ही जलपानका निषेध किया है । इसमे भी इतना और समझ लेना चाहिये कि उस व्रती श्रावकको जलके पीनेका निषेध है, जल चन्दन अक्षत आदि आठो द्रव्योसे भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करनेका निषेध नही है ॥२००|| प्रोषधोपवासके दिन भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करनेके लिये आचार्योंकी ऐसी आज्ञा है कि व्रती श्रावक यदि प्रोषधोपवाससे दिन भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करे तो भी कोई दोष नहीं है। यदि उस दिन वह पूजा न करे तो भी कोई दोष नही है ॥२०१॥ उस धर्मात्मा व्रती श्रावकको वही पर उस दिनकी रात्रि व्यतीत करनी चाहिये तथा पारणाके दिन अर्थात् पूर्णिमाके दिन प्रात काल उठकर पूजा, स्वाध्याय, ध्यान आदि अपना नित्य कर्तव्य करना चाहिये और दोपहरके समय एक बार भोजन करना चाहिये ॥२०२॥ धारणाके दिनसे लेकर अर्थात् त्रयोदशीसे लेकर तीन दिन तक त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा इन तीनो दिन उसे ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिये। यह लाटीसहिता १३५ ब्रह्मचर्य च कर्तव्यं धारणादिदिनत्रयम् । परयोषिन्निषिद्धा प्रागिदं त्वात्मकलत्रके ॥२०३ स्युः प्रोषधोपवासस्य दोषा पञ्चोदिता स्मृतौ । निरस्यास्ते व्रतस्थैस्तै सागारैरपि यत्नत ॥२०४ तत्सूत्रं यथा- अप्रत्यवेक्षिताप्रमाणितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥५८ जीवाः सन्ति न वा सन्ति कर्तव्यं प्रत्यवेक्षणम् । चक्षुर्व्यापारमा स्यात्सूत्रात्तल्लक्षणं यथा ॥२०५ प्रमार्जनं च मृदुभि यथोपकरण कृतम् । उत्सर्गादानसंस्तरविषयं चोपबृंहणम् ॥२०६ अप्रत्यवेक्षितं तत्र यथा स्यादप्रमाजितम् । मूत्राद्युत्सर्ग एवास्ति दोषः प्रोषधसंयमे ॥२०७ यथोत्सर्गस्तथाऽऽदानं संस्तरोपक्रमस्तथा । तन्नामानो व्यतीचारा दोषाः प्रोक्ता व्रतस्य ते ॥२०८ ज्ञेय पूर्वोक्तसंवर्भावनुत्साहोऽप्यनादर । प्रोषधोपोषितस्यास्य दोषोऽतीचारसंज्ञक ॥२०९ स्यात्स्मृत्यनुपस्थानं दूषणं प्रोषधस्य तत् । अनेकायं तदेव स्याल्लक्षणादपि लक्षणम् ॥२१० ध्यानमे रखना चाहिये कि ऐसे व्रती श्रावकके लिये परस्त्रीका निषेध या त्याग तो पहले ही कह चुके हैं । अब यहाँ पर जो तीन दिनके लिये ब्रह्मचर्यका पालन बतलाया है वह अपनी विवाहिता धर्मपत्नीके सेवन करनेका त्याग बतलाया है ।।२०३॥ अन्य व्रतोके समान इस प्रोषधोपवासके भी श्रावकाचारोमे पांच अतिचार बतलाये हैं। व्रती श्रावकोको इन पांचो अतिचारोका त्याग बडे प्रयत्नसे कर देना चाहिये ।।२०४।। वह सूत्र यह है-अप्रत्यवेक्षित-अप्रमार्जित-उत्सर्ग अर्थात् बिना देखे बिना शोधे मलमत्र करना या कोई वस्तु रखना, अप्रत्यवेक्षित-अप्रमार्जित-आदान अर्थात् बिना देखे बिना शोधे कोई वस्तु उठाना, अप्रत्यवेक्षित-अप्रमार्जितसस्तरोपक्रमण अर्थात् बिना देखे बिना शोधे साथरा या सोनेका बिछौना बिछाना, अनादर अर्थात् व्रतको उत्साहपूर्वक नही करना और स्मृत्यनुपस्थान अर्थात् उस दिन मनको स्थिर न रखकर चचल रखना ये पांच प्रोषधोपवासके अतिचार हैं ॥५८॥ आगे इन्हीका विशेष वर्णन करते हैं । जीव हैं अथवा नही हैं इस बातको जाननेके लिये नेत्रोसे खूब अच्छी तरह देखना प्रत्यवेक्षण कहलाता है । प्रत्यवेक्षणका लक्षण सूत्रोमे यही बतलाया ॥२०५|| कोमल वस्त्रोसे पोछना झाडना प्रमार्जन कहलाता है। किसी वस्तुको रखना हो, उठाना हो या बिछौना या साथरा बिछाना हो तो उन सबको खूब अच्छी तरह देखकर या कोमल वस्त्रसे झाड-पोछ कर रखना या उठाना चाहिये तथा देख-शोध कर बिछौना या साथरा बिछाना चाहिये जिससे किसी जीवका घात न हो। ऐसा करनेसे व्रत निर्दोष पलता है, व्रतकी वृद्धि होती है ॥२०६।। बिना देखे बिना शोधे मल मूत्र करना या अन्य कोई पदार्थ रखना प्रोषधोपवासका पहला अतिचार है ॥२०७। जिस प्रकार बिना देखे बिना शोघे किसी पदार्थको रखना पहला अतिचार है उसी प्रकार बिना देखे और बिना शोघे झाडे किसी भी पुस्तक आदि धर्मोपकरणको उठा लेना अप्रत्यवेक्षित-अप्रमार्जित-आदान नामका प्रोषधोपवास व्रतका दूसरा अतिचार कहलाता है तथा बिना देखे बिना शोघे साथरा बिछाना या सोनेके लिये चटाई आदि बिछाना इस प्रोषधोप- वासवतका अप्रत्यवेक्षित-अप्रमार्जित-सस्तरोपक्रमण नामका तीसरा अतिचार है ॥२०८॥ अनादरका लक्षण जो पहले कह चुके हैं वही ग्रहण करना चाहिये अर्थात् इस प्रोषधोपवास व्रतको उत्साहपूर्वक न करना, बिना उत्साहके, बिना मनके करना प्रोषधोपवासका अनादर नामका चौथा अतिचार या दोष कहलाता है ॥२०९॥ प्रोषधोपवासके दिन मनको स्थिर न रखना, चचल या डावाडोल १३६ श्रावकाचार-संग्रह प्रोषधोपवासस्यात्र लक्षणं कथितं मया । इत संख्योपभोगस्य परिभोगस्य चोच्यते ॥२११ निर्दिष्टं लक्षण पूर्व परिभोगोपभोगयो । तयो संख्या प्रकर्तव्या सागारवंतधारिभि ॥२१२ सन्ति तत्राप्यतीचाराः पञ्च सूत्रोदिता बुधै । परिहार्या प्रयत्नेन श्रावकैर्धर्मवेदिभिः ॥२१३ तत्सूत्रं यथा- सचित्तसम्बन्धसन्मिश्राभिषवदु पक्काहाराः ॥५९ चिकीर्षन्नपि तत्संख्यां सचित्तं यो न मुञ्चति । दोष. सचित्तसंज्ञोऽस्य भवेत्संख्यावतस्य स ॥२१४ तथाविधोऽपि य कश्चिच्चेतनाधिष्ठितं च यत् । वस्तुसख्यामकुर्वाणो भवेत्सम्बन्धदूषणम् ॥२१५ मिश्रितं च सचितेन वस्तुजातं च वस्तुना । स्वीकुर्वाणोऽप्यतीचारं सन्मिश्राख्यं च न त्यजेत् ॥२१६ आहारं स्निग्धग्राहिश्च ? दुर्जर जठराग्निना । असंख्यातवतस्तस्य दोषो दुष्पक्कसंज्ञक ॥२१७ उक्तातिचारनियुक्तं परिभोगोपभोगयो । संख्यावतं गृहस्थानां श्रेयसे भवति ध्रुवम् ॥२१८ रखना स्मृत्यनुपस्थान नामका पांचवां अतिचार कहलाता है । इस अतिचारका यह लक्षण उपलक्षण- रूपसे कहा है। मनके समान वचन और शरीरको भी चचल रखना प्रोषधोपवासका अतिचार समझना चाहिये। इस प्रकार प्रोषधोपवासके पांचो अतिचारोका वर्णन किया। प्रोषधोपवासवत धारण करनेवाले व्रती श्रावकको इन पांचो अतिचारोका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥२१०॥ इस प्रकार प्रोषधोपवास व्रतका लक्षण बतलाया। अब आगे भोगोपभोगपरिमाणका लक्षण कहते हैं ॥२११॥ उपभोग और परिभोग दोनोका लक्षण पहले इसी अध्यायमे कह चुके हैं। व्रत धारण करनेवाले गृहस्थोको उपभोग और परिभोग दोनो प्रकारके पदार्थोंकी संख्या नियत कर लेनी चाहिये ॥२१२।। इस उपभोगपरिभोगपरिमाणव्रतके भी पाँच अतिचार हैं जो सूत्रमे भी बतलाये हैं। धर्मके स्वरूपको जाननेवाले विद्वान् श्रावकोको बडे प्रयत्नसे इन अतिचारोका त्याग कर देना चाहिये ॥२१३॥ उन अतिचारोको कहनेवाला सूत्र यह है-सचित्त पदार्थोंका सेवन करना, सचित्तसे सम्बन्ध रखनेवाले पदार्थोंका सेवन करना, सचित्तसे मिले हुए पदार्थोंका सेवन करना, रसीले पौष्टिक आहारका सेवन करना और दुष्पक्व अर्थात् जो अच्छी तरह नही पका है अथवा जो आवश्यकतासे अधिक पक गया है ऐसे पदार्थोंका सेवन करना ये पांच उपभोग परिभोगपरिमाणके अतिचार हैं ॥५९॥ आगे इन्हीका वर्णन करते हैं। उपभोगपरिभोगपदार्थोंका परिमाण करनेकी इच्छा करने- वाला अर्थात् उपभोगपरिभोगपरिमाणवतको धारण करनेवाला श्रावक यदि सचित्त पदार्थोंका त्याग न करे तो उसके उपभोगपरिभोगपरिमाणवतका सचित्त नामका अतिचार होता है ।। २१४॥ जो पदार्थ अचित्त हैं परन्तु उनका सम्बन्ध सचित्त पदार्थोंसे हो तो उपभोगपरिभोगपरिमाणवत करनेवाले श्रावकोको ऐसे पदार्थोंका भी त्याग कर देना चाहिए। यदि व्रती श्रावक ऐसे पदार्थोंका त्याग न करें तो उनको सचित्तसम्बन्ध नामका दूसरा अतिचार लगता है ॥२१५।। यदि उपभोग- परिभोगपरिमाणवत करनेवाला व्रती श्रावक सचित्तसे मिले हुए पदार्थोंका त्याग न करे, सचित्तसे मिले हुए अचित्त पदार्थों का सेवन करे तो उसके सचित्तसन्मित्र नामका तीसरा अतिचार या दोष लगता है ।।२१६॥ जो पदार्थ चिकने और रसीले हैं तथा जो पेटकी अग्निसे पच नही सकते ऐसे पदार्थोंका त्याग न करना अभिषव नामका अतिचार है ॥२१७|| जो पदार्थ अग्निके द्वारा अच्छी लाटीसंहिता १३७ - अतिथिसंविभागाख्यं व्रतमस्ति व्रतार्थिनाम् । सर्ववतशिरोरत्नमिहामुत्र सुखप्रदम् ॥२१९ ईषन्न्यूनं च मध्याह्न कुर्याद द्वारावलोकनम् । दातुकाम. सुपात्राय दानीयाय महात्मने ॥२२० तत्पात्र त्रिविधं ज्ञेयं तत्राप्युत्कृष्टमादिमम् । द्वितीयं मध्यमं ज्ञेयं तृतीयं तु जघन्यकम् ॥२२१ उक्तंच- उत्कृष्टपात्रमनगारमणुवताढयं मध्यं तेन रहितं सुदृशं जघन्यम् । निदर्शनं प्रतनिकाययुतं कुपात्रं युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदं हि विद्धि ॥६० एतेष्वन्यतमं प्राप्य दानं देयं यथाविधि । प्रासुकं शुद्धमाहारं विनयेन समन्वितम् ॥२२२ पात्रालाभे यथाचित्ते पश्चात्तापपरो भवेत् । अधमे विफलं जन्म भूयोभूयश्व चिन्तयेत् ॥२२३ कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथायथम् । केवलं तत्कृपादानं देयं पात्रधिया न हि ॥२२४ तरह पका नही है जैसे कच्ची रोटी, विना गली हुई दाल या भात, अथवा जो पदार्थ आवश्यकतासे अधिक पक गया जैसे, रोटी जली, जला हुआ शाक आदि, ऐसे पदार्थोंको दुष्पक्व कहते हैं । ऐसे पदार्थोंके सेवन करनेसे लोलुपता अधिक प्रतीत होती है तथा अधपके कच्चे पदार्थ पचते भी नही हैं, कठिनतासे पचते हैं अतएव उपभोगपरिभोगपरिमाणव्रत करनेवालोको ऐसे दुष्पक्व पदार्थोंका भी त्याग कर देना चाहिए। यदि इस व्रतको पालन करनेवाला ऐसे पदार्थोंका त्याग न करे तो उसके दुष्पक्व नामका पांचवां अतिचार लगता है। इस प्रकार इस व्रतके पांचो अतिचारोंका निरूपण किया। व्रती श्रावकोको अपना व्रत शुद्ध और निर्दोष रखनेके लिए इन पांचों अतिचारो- का त्याग कर देना चाहिए । इस प्रकार अतिचार रहित पालन किया हुआ यह उपभोगपरिभोग- परिमाण नामका व्रत गृहस्थोंके लिए अवश्य ही कल्याणकारी होता है ।।२१८|| व्रत पालन करने- वालोंके लिए अतिथिसविभागवत नामका भी एक उत्तम व्रत है। यह व्रत समस्त व्रतोके मस्तक का रल है तथा इस लोक और परलोक दोनो लोकोमे सुख देनेवाला है ॥२१९|| जिस महात्माके लिए, जिस देने योग्य सुपात्रके लिए दान देनेकी इच्छा हो ऐसे श्रावकको दोपहरके कुछ समय पहले द्वारालोकन करना चाहिये ॥२२०॥ जिनको आहार देना चाहिये ऐसे पात्रोके तीन भेद हैं पहले उत्तमपात्र, दूसरे मध्यमपात्र और तीसरे जघन्यपात्र ॥२२१॥ कहा भी है--मुनियोको उत्तम पात्र कहते हैं, अणुव्रती श्रावक मध्यमपात्र हैं, व्रतरहित सम्यग्दृष्टि श्रावक जघन्यपात्र हैं। सम्यग्दर्शनसे रहित और व्रतोको पालन करनेवाले मिथ्याष्टि कुपात्र हैं और जो सम्यग्दर्शनसे भो रहित हैं तथा व्रतोसे भी रहित हैं ऐसे मनुष्योको अपात्र कहते हैं ॥६॥ उत्तम मध्यम जघन्य इन तीनो पात्रोमेसे जो कोई मिल जाय उसीको विधिपूर्वक दान देना चाहिये। दानमे जो आहार दिया जाय वह प्रासुक होना चाहिये और शुद्ध होना चाहिये तथा विनयपूर्वक देना चाहिये ॥२२२॥ यदि देवयोगसे किसी पात्रका लाभ न हो तो अपने हृदयमे पश्चात्ताप करना चाहिये और इस अधम समयमे मेरा जन्म व्यर्थ जा रहा है इस प्रकार उसे बार बार चिन्तवन करना चाहिये ॥२२३॥ कुपात्र और अपात्रोको भी उनकी योग्यतानुसार दान देना चाहिये, परन्तु इसमे इतना विशेष है कि कुपात्र अपात्रोको दिया हुआ दान केवल करुणादान कहलाता है तथा करुणाबुद्धिसे ही देना चाहिये । उनको पात्र समझकर या पात्रबुद्धिसे दान कभी १८ 는 १३८ श्रावकाचार-सग्रह अस्ति सूत्रोदितं शुद्धं तत्रातीचारपश्चकम् । अतिथिसंविभागाख्यवतरक्षार्थ परित्यजेत् ॥२२५ तत्सनं यथा-- सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिकमा ॥६१ सचित्ते पद्मपत्रादौ निक्षेपोऽनादिवस्तुन । दोष सचित्तनिक्षेपो भवेदन्वर्थसंज्ञक ||२२६ अपिधानमावरणं सचित्तेन कृतं यदि । स्यात्सचित्तापिपानाख्यं दूषणं व्रतधारिणः ॥२२७ आस्माकीनं सुसिद्धानं त्वं प्रयच्छेति योजनम् । दोषः परोपदेशस्य करणाख्यो व्रतात्मनः ॥२२८ प्रयच्छन्नच्छमन्नादि गवंमुबहते यदि । दूषणं लभते सोऽपि महामात्सर्यसंज्ञकम् ॥२२९ ईषन्यूनाच्च मध्याह्नादानकालावधोऽथवा । अध्वं तद्भावनाहेतोर्दोषः कालव्यतिक्रम ॥२३० एतैर्दोषैविनिर्मुक्तं पात्रेभ्यो वानमुत्तमम् ।। अतिथिसंविभागास्यव्रतं तस्य सुखाप्तये ॥२३१ यथात्मज्ञानमाख्यातं सख्यावतचतुष्टयम् । अस्ति सल्लेखना कार्या तद्वतो मारणान्तिकी ॥२३२ नही देना चाहिये ।।२२४॥ अन्य व्रतोंके समान इस व्रतके भी सूत्रमे कहे हुए पांच अतिचार हैं अतएव इस अतिथिसविभाग व्रतकी रक्षा करनेके लिए, इस व्रतको निर्दोष पालन करनेके लिए उन पांचो अतिचारोका भी त्याग कर देना चाहिये ॥२२५।। उन अतिचारोको कहनेवाला सूत्र यह है-आहारदान देते हुए सचित्त वस्तुपर रखे हुए 1/पदार्थको दानमे देना, सचित्त वस्तुसे ढके हुए पदार्थको दान देना, दान देने के लिए दूसरेको आज्ञा देना, मात्सर्य या ईर्षा करना और समयको टालकर आहारका समय बीत जानेपर द्वारावलोकन करना ये पांच अतिथिसविभागवतके अतिचार हैं ॥६॥ आगे इन्हीका वर्णन करते हैं। सचित्त (हरित) कमलके पत्तेपर या केलेके पत्तेपर रक्खे हुए पदार्थको आहार दानमे देना सचित्तनिक्षेप नामका अतिचार है। जिसमे चेतनाके अश हों उसको सचित्त कहते हैं, ऐसे सचित्त पदार्थपर रखे हुए दाल भात आदि पदार्थोका दान देना सचित्तनिक्षेप नामका पहला अतिचार है ।।२२६।। अपिधान शब्दका अर्थ ढकना है । जो दाल, भात, रोटी आदि पदार्थ हरे कमलके पत्ते आदि सचित्त पदार्थोंसे ढके हुए हैं ऐसे पदार्थोंका दान देनेसे व्रती श्रावकके लिए सचित्तापिधान नामका दूसरा अतिचार लगता है ।।२२७|| "यह हमारा बना बनाया तैयार भोजन है इमको तुम दान देना" इस प्रकार दान देनेके लिए दूसरेको कहना व्रतो श्रावकके लिए परव्यपदेश नामका तीसरा अतिचार है ।।२२८॥ यदि कोई दान देनेवाला दाता दानमे किसी निर्दोष अन्नको देवे परन्तु उसको देते हुए वह यदि अभिमान करे और यह समझे कि निर्दोष अन्न मैंने ही दिया है इस प्रकारका समझना या अभिमान करना महामात्सर्य नामका अतिचार कहलाता है ॥२२९।। दान देनेका समय दोपहरके समयसे कुछ पहलेका समय है, उस आहार दान देनेके समयसे पहले अथवा उसके बाद यदि आहार दानकी भावना करनेके लिए द्वारावलोकन करे तो उसके कालातिक्रम नामका पांचवा अतिचार होता है ॥२३०।। जो व्रती श्रावक समयानुसार प्राप्त हुए उत्तम मध्यम जघन्य पात्रोको ऊपर लिखे पांचो अतिचारोसे रहित दान देता है और इस प्रकार इस अतिथिसविभाग व्रतको निर्दोष पालन करता है उसको स्वर्ग मोक्षके अनुपम सुखोकी प्राप्ति अवश्य होती है ॥२३१॥ इस प्रकार अपने ज्ञानके अनुसार चारो सख्यावतोका अथवा शिक्षाक्तोका निरूपण किया। तथा इन चारो व्रतोमे पापोका त्याग किया जाता है तथा नियतकाल तक त्याग किया जाता है या परिमाण किया जाता है इमलिये इन व्रतो लाटीसहिता १३९ - सोऽस्ति सल्लेखनाकालो जीर्णे वयसि चाथवा । दैवाद्घोरोपसर्गेऽपि रोगे साध्यतरेऽपि च ॥२३३ क्रमेणाराधनाशास्त्रप्रोक्तेन विधिना व्रती । वपुषश्च कषायाणां जयं कृत्वा तनुं त्यजेत् ॥२३४ धन्यास्ते वीर कर्माणो ज्ञानिनस्ते व्रतावहा । येषां सल्लेखनामृत्यु निष्प्रत्यूहतया भवेत् ॥२३५ दोषा सूत्रोदिता पञ्च सन्त्यतीचारसंज्ञका । अन्त्यसल्लेखनायास्ते संत्याज्या पारलौकिकैः ॥२३६ तत्सूशं यथा- जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥६२ आशंसा जीविते मोहाद् यथेच्छेदपि जीवितम् । यदि जीव्ये वरं तावदोषोऽयं यत्समस्यते ॥२३७ आशंसा मरणे चापि यथेच्छेन्मरणं द्रुतम् । वरं मे मरणं तूर्ण मुक्त स्यां दु खसङ्कटात् ॥२३८ दोषो मित्रानुरागाख्यो यन्नेच्छेन्मरणं क्वचित् । पुरस्तान्मित्रतो मृत्युवरं पश्चान्न मे वरम् ॥२३९ को सख्यावत कहते है । यहाँपर सख्या शब्दका अर्थ नियत की हुई सख्या अथवा परिमाण है इसीलिये इसको सख्याव्रत कहते हैं । अब आगे सल्लेखना व्रतको कहते हैं। व्रती श्रावकको मरण समयमे होनेवाली सल्लेखना भी अवश्य करनी चाहिये ।।२३२।। जब अपनी आयु अत्यन्त जीर्ण हो जाय अर्थात् सबसे अधिक बुढापा आ जाय अथवा दैवयोगसे कोई घोर उपसर्ग आ जाय (जलमे डूब जाय अथवा अग्निमे जल मरनेका समय आ जाय) अथवा कोई प्रबल और असाध्य रोग हो जाय तो वही समय सल्लेखनाका समय समझना चाहिये ।।२३३॥ व्रती श्रावकको आराधना- शास्त्रोंमे कही हुई विधिके अनुसार अनुक्रमसे शरीर और कषायोको जीतना चाहिये और फिर शरीरका त्याग करना चाहिये ।।२३४।। इस ससारमे वे ही व्रती श्रावक धन्य हैं, वे ही शूरवीर या वीर कर्म करनेवाले हैं और वे ही ज्ञानी है जिनका समाधिमरण विना किसी विघ्नके पूर्ण हो जाता है ॥२३५।। इस सल्लेखनाव्रतके भी पाँच अतिचार हैं जो सूत्रकारने भी अपने सूत्रमे बतलाये हैं । परलोकमे सुख चाहनेवाले व्रती श्रावकोको इस मरण समयमे होनेवाले सल्लेखनाव्रतके उन पाँचो अतिचारोका त्याग अवश्य कर देना चाहिये ॥२३६।। उन अतिचारोको कहनेवाला सूत्र यह है-जीवित रहनेकी आशा रखना, शीघ्र मरनेकी आशा रखना, मित्रोमे प्रेम रखना, भोगे हुए सुखोका अनुभव करना अथवा आगामी सुखोको चाह करना और निदान करना ये पाँच सल्लेखनावतके अतिचार है ॥६२।। आगे इन्हीका वर्णन करते हैं। मोहनीयकर्मके उदयसे जीवित रहनेकी आशा करना अथवा अपने जीवित रहनेकी इच्छा करना अथवा 'मैं यदि तब तक जीता रहूँ तो अच्छा' इस प्रकार नियत काल तक जीवित रहनेको इच्छा करे तो उसके जीवित्ताशसा नामका पहला अतिचार होता है ।।२३७।। "मुझे इस समय बहुत दुख हो रहा है, यदि मेरा मरण शीघ्र हो जाय तो मै इस भारी दु खसे छूट जाऊँ" इस प्रकार विचार कर शीघ्र ही मरनेकी इच्छा करना मरणाशसा नामका दूसरा अतिचार है ॥२३८॥ "मेरा मरण यदि मेरे मित्रके सामने ही होता तो अच्छा, मित्रके पीछे मेरा मरण होना अच्छा नहीं" इस प्रकार मित्रके सामने ही अपने मरणकी इच्छा करना मित्रानुराग नामका अतिचार है। मित्रानुराग शब्दका अर्थ मित्रोमे प्रेम रखना है। सो इस प्रकार मित्रके सामने मरनेकी इच्छा करना भी मित्रानुराग है । अथवा पहले जो मित्रोके साथ बालकपनमे क्रीडा की थी उसका स्मरण करना भी मित्रानुराग है। ऐसा स्मरण करनेसे भी परिणामोकी निर्मलतामे कमी आ जाती है इसलिये समाधिमरण धारण करनेवालोको इस १४० श्रावकाचारसग्रह दोष सुखानुबन्धाल्यो ययात्रास्मीह दु खवान् । मृत्वापि व्रतमाहात्म्याद भविष्येऽहं सुखी कचित् ।।२४० वोषो निदानबन्धाख्यो यथेच्छेन्मरणं कुधी । भवेयं व्रतमाहात्म्यावस्य घाताय तत्पर ॥२४१ यदि वा मरणं चेच्छेन्मोहोद्रेकात्स मूढधी । भवेयं चोपकाराय मित्रस्यास्य व्रतादितः ॥२४२ यदि वा मरणं चेच्छेदज्ञानाद्वा सुखाशया । भूपान्मे व्रतमाहात्म्यात्स्वर्गश्रीरद्विवाविनी ।।२४३ एतैर्वोनिर्मुक्तमन्त्यसल्लेखनावतम् । स्वर्गापवर्गसौख्यानां सुधापानाय जायते ॥२४४ उक्ता सल्लेखनोपेता द्वावशवतभायना । एताभिर्वतप्रतिमा पूर्णता याति सुस्थिता ॥२४५ इति श्रावकाचारापरनामलाटीसहिताया मृषात्यागादिलक्षणचतुष्क-गुणवतत्रिक- शिक्षावतचतुष्टयप्रतिमाप्रतिपादक पञ्चमः सर्गः ||५|| अतिचारका भी त्याग कर देना चाहिये ।।२३९।। "मैं इस जन्ममे बहुत दुखी हूँ, मैंने जो ये व्रत पालन किये इनके माहात्म्यसे में मर कर किसी दूसरे स्थानमे जाकर सुखी हूंगा" इस प्रकार चिन्तवन करना सुखानुबन्ध नामका अतिचार है । अथवा इस जन्ममे जिन-जिन सुखोका अनुभव किया है उनका स्मरण करना भी सुखानुबन्ध नामका अतिचार है ॥२४०॥ यदि समाधिमरण धारण करनेवाला कोई श्रावक अपनी दुबुद्धिके दोषसे यह चिन्तवन करे कि "मैं इस व्रतके माहात्म्यसे मर कर ऐसे स्थानमे उत्पन्न होऊँ जो इस अपने शत्रुका घात क्रू" यही सोचकर मरनेकी इच्छा करना निदान नामका अतिचार है ।।२४१।। अथवा कोई मूर्ख मोहनीयकर्मके उदयसे यह चिन्तवन करे कि "मैं मर कर इस व्रतके माहात्म्यसे ऐसे स्थानमे उत्पन्न होऊँ जो अपने इस मित्रका अच्छा उपकार करूं" इस प्रकार चिन्तवन कर मरनेकी इच्छा करना निदानबन्ध नामका अतिचार है ।।२४२॥ अथवा अपने अज्ञानसे सुखकी इच्छा करता हुआ वह समाधिमरण धारण करनेवाला यह चिन्तवन करे कि "मैं शीघ्र मर जाऊं जिससे मुझे इस व्रतके माहात्म्यसे स्वर्गकी अद्वितीय लक्ष्मी प्राप्त हो।" इस प्रकार चिन्तवन कर मरने की इच्छा करना निदान नामका अतिचार है ॥२४३।। जो व्रती मनुष्य ऊपर लिखे समस्त दोषोंसे रहित इस मरणसमयके सल्लेखना- प्रतको पालन करते हैं अर्थात् इस सल्लेखनाव्रतको अतिचाररहित पालन करते हैं उनको स्वर्ग और मोक्षके अनुपम सुखरूपी अमृत अवश्य पीनेको मिलता है ।।२४४।। इस प्रकार सल्लेखनाव्रतके साथ बारह व्रतोका तथा उनकी भावनाओका निरूपण किया । जो व्रती श्रावक इन सम्पूर्ण व्रतोको पालन करता है उसके प्रतप्रतिमा पूर्णरीतिसे पालन होती है। भावार्थ-इन सब व्रतोको निर्दोष और निरतिचार पालन करना व्रतप्रतिमा कहलाती है ॥२४५|| इस प्रकार व्रतप्रतिमाका स्वरूप कहा । इस प्रकार सत्याणुव्रत आदि चार अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चारो शिक्षाक्तोको निरूपण करने वाला अथवा दूसरी प्रतिमाके स्वरूपको पूर्ण कहनेवाला यह पांचवां सगं समाप्त हुआ ॥५॥ - षष्ठ सर्ग द्वादशवतशुद्धस्य विशुद्धश्चातिशायिन । युक्तमुत्कृष्टाचरणमिच्छतस्तत्पदं मुदे ॥१ स्यात्सामायिकप्रतिमा नाम्ना चाप्यस्तिसंख्यया । तृतीया व्रतरूपा स्यात्कर्तव्या वेश्मशालिभिः ॥२ व्रतानां द्वादशं चात्र प्रतिपाल्यं यथोदितम् । विशेषादपि कर्तव्यं सम्यक् सामायिकवतम् ॥३ ननु व्रतप्रतिमायामेतत्सामायिकवतम् । तदेवात्र तृतीयायां प्रतिमायां तु किं पुन ॥४ सत्यं किन्तु विशेषोऽस्ति प्रसिद्ध परमागमे । सातिचारं तु तत्र स्यादत्रातीचारविजितम् ॥५ किन्च तत्र त्रिकालस्य नियमो नास्ति वेहिनाम् । अत्र त्रिकालनियमो मुनेर्मूलगुणादिवत् ॥६ तत्र हेतुवशात् क्वापि कुर्यात्कुर्यान्न वा क्वचित् । सातिचारवतत्वाता तथापि न प्रतक्षति ॥७ अनावश्यं त्रिकालेऽपि कार्य सामायिक जगत् । अन्यथा व्रतहानिः स्यादतीचारस्य का कथा ॥८ अन्यत्राप्येवमित्यादि यावदेकादशस्थितिः । व्रतान्येव विशिष्यन्ते नार्थादर्थान्तरं क्वचित् ॥१ जो श्रावक बारह व्रतोके पालन करनेसे शुद्ध है तथा निर्मल सम्यग्दर्शनके प्रभावसे जिसकी विशुद्धि, जिसके आत्माकी निर्मलता अत्यन्त बढती जा रही है और जो अपनी आत्माका कल्याण करनेके लिए उत्तम मुनिपदको धारण करनेकी इच्छा करता है ऐसे श्रावकको उत्कृष्ट आचरण धारण करना चाहिये ॥१॥ तीसरी प्रतिमाका नाम सामायिक प्रतिमा है। व्रती श्रावकोको दूसरी प्रतिमाके पालन करनेमे निपुण हो जानेपर तीसरी प्रतिमा पालन करनी चाहिये ॥२।। इस तीसरी प्रतिमामे ऊपर कहे हुए बारह व्रतोका तो पालन करना ही चाहिये किन्तु इतना और विशेष है कि इसमे सामायिक नामका व्रत बहुत अच्छी तरहसे विधिपूर्वक करना चाहिये ॥३।। यहांपर शंकाकार शका करता है कि यह सामायिक नामका व्रत व्रतप्रतिमामे कहा है तथा वही सामा- यिक नामका व्रत इस तीसरी प्रतिमामे बतलाया सो इसमे क्या विशेषता है ॥४॥ ग्रन्यकार उत्तर देते हुए कहते हैं कि आपका कहना सत्य है जो सामायिक व्रतप्रतिमामे है वही सामायिक तीसरी प्रतिमामे है परन्तु उन दोनोमे जो विशेषता है वह शास्त्रोमे प्रसिद्ध है और वह विशेषता यह है कि व्रतप्रतिमामे जो सामायिक है वह अतिचार सहित पालन किया जाता है तथा इस तीसरी प्रतिमामे जो सामायिक है वह अतिचार रहित पालन किया जाता है ||५|| इसके सिवाय भी इसमें इतनी और विशेषता है कि व्रतप्रतिमामे श्वावकोको तीनो समय सामायिक करनेका नियम नहीं है किन्तु इस तीसरी सामायिक प्रतिमामे मुनियोके मूलगुण आदिके समान तीनो समय सामायिक करनेका नियम है ॥६॥ दूसरी प्रतिमाको धारण करनेवाला व्रती श्रावक मामायिक करता है और कभी किसी स्थानपर कारणवश नही भी करता है क्योकि वहाँपर वह सामायिक व्रतको अतिचारसहित पालन करता है इसीलिये कभी किसी स्थानपर कारणवश सामायिक न करनेपर भी उसके प्रतकी हानि नही होती ॥७॥ परन्तु इस तीसरी सामायिक प्रतिमामे यह बात नहीं है। सामायिक प्रतिमाको धारण करनेवाले व्रती श्रावकको तीनो समय अवश्य सामायिक करना पडता है। यदि वह तोनो समयमेसे एक समय में भी सामायिक न करे तो उनके व्रतोको हानि हो जाती है फिर भला अतिचारोंकी तो बात ही क्या है | जो यह नियम तथा दूसरी प्रतिमाको धारण करनेवाले श्रावकोंके तोते विशेषता इस सामायिकमे बतलायी है वही विगेपता १४२ श्रावकाचार-संग्रह शोभतेऽतीय संस्कारात् साक्षादाकरजो मणि । संस्कृतानि व्रतान्येव निर्जराहेतवस्तथा ॥१० स्यात्प्रोषधोपवासाख्या चतुर्थी प्रतिमा शुभा । कर्तव्या निराहेतु सवरस्यापि कारणम् ॥११ अस्त्यत्रापि समाधानं वेवितव्यं तदुक्तवत् । सातिचार च तत्र स्यादयातींचारवजितम् ॥१२ द्वादशवतमध्येऽपि विद्यते प्रोषधं व्रतम् । तदेवात्र समाख्यानं विशेषस्तु विवक्षित. ॥१३ अवश्यमपि कर्तव्यं चतुर्थप्रतिमावतम् । कर्मकाननकोटीनामस्ति वावानलोपमम् ॥१४ पञ्चमी प्रतिमा चास्ति व्रतं सागारिणामिह । तत्सचित्तपरित्यागलक्षण भक्ष्यगोचरम् ॥१५ इत पूर्व कदाचि सचित्त वस्तु भक्षयेत् । इत' पर स नाश्नुयात्सचित्तं तज्जलाद्यपि ॥१६ ग्यारह प्रतिमातक सब प्रतिमाओमें समझ लेना चाहिये क्योकि आगेकी प्रतिमामोमे वारह व्रत ही विशेषताके साथ पालन किये जाते हैं। उन आगेको प्रतिमाओमे उन्ही व्रतोकी विशेष विधिके सिवाय और कुछ नही है ।।९।। जिस प्रकार खानिमेसे निकला हुआ मणि स्वभावसे ही शोभाय- मान होता है परन्तु यदि उसको शानपर रखकर उसका विशेष सरकार कर दिया जाय, उसके पहल आदि कर दिये जाय तो वह और अधिक शोभायमान होने लगता है उसी प्रकार व्रत पालन करना स्वभावसे ही कर्मोंकी निर्जराका कारण है परन्तु वे ही व्रत यदि अतिचार-रहित पालन किये जायें, तथा विशेष विधिके साथ पालन किये जाये तो कर्मोंकी विशेष निर्जराके कारण होते हैं ॥१०|| चौथी प्रतिमाका नाम प्रोषधोपवास प्रतिमा है। यह प्रतिमा सबमे शुभ है, कर्मोको निर्जराका कारण और सवरका भी कारण है अतएव व्रती श्रावकोको इसका पालन अवश्य करना चाहिये ॥११।। व्रतप्रतिमामे भी प्रोषधोपवास व्रत कहा है तथा यहाँपर चौथी प्रतिमामे भी प्रोषधोपवास प्रत बतलाया है। इसका समाधान वही है जो ऊपर बतलाया है अर्थात् व्रत प्रतिमामे अतिचार सहित पालन किया जाता है तथा यहाँपर चोथी प्रतिमामे वही प्रोषधोपवास प्रत अतिचाररहित पालन किया जाता है ॥१२॥ जो प्रोषधोपवास व्रत बारह व्रतोमे वा व्रत प्रतिमामे बतलाया है वही प्रोषधोपवासवत यहाँपर चौथी प्रतिमामे बतलाया है, यहाँपर चौथी प्रतिमामे होनेवाले प्रोषधोपवासवतमे उससे कुछ विशेषता है और वह विशेषता यही है कि बारह व्रतोका पालन करनेवाला व्रतप्रतिमावाला श्रावक अष्टमी चतुर्दशीको प्रोषधोपवास करता है तथा कभी किसी स्थानपर कारण मिलनेपर नही भी करता है तो भी उसके व्रतकी हानि नही होती। किन्तु चौथी प्रतिमावालेको प्रत्येक पर्वके दिन प्रोषधोपवास अवश्य करना पडता है, यदि चौथी प्रतिमावाला किसी भी स्थानपर किसी भी कारणसे किसी भी समय प्रोषधोपवास न करे तो फिर उसके व्रतकी अर्थात् चौथी प्रतिमाकी हानि हो जाती है। यही व्रतप्रतिमा और चौथी प्रतिमाके प्रोषधोपवासमे अन्तर है इसलिये ऊपर कहा गया है कि व्रत प्रतिमावाला अतिचार सहित पालन करता है और चौथी प्रतिमावाला अतिचाररहित पालन करता है ।।१३।। यह प्रोषधोपवासवत कर्मरूपी करोडो वनोको जलानेके लिये दावानल अग्निके समान है, जिस प्रकार दावानल अग्नि करोडो वनोको भस्म कर देती है उसी प्रकार इस प्रोषधोपवासवतके पालन करनेसे करोडो जन्मके अनन्तानन्त कर्म नष्ट हो जाते हैं अतएव व्रती श्रावकोको इस चौथी प्रतिमाका पालन अवश्य करना चाहिये ॥१४॥ गृहस्थ व्रतियोकी पाँचवी प्रतिमाका नाम सचित्तत्यागप्रतिमा है। यह प्रतिमा केवल खाने योग्य पदार्थोंसे सम्बन्ध रखती है ॥१५॥ इस पांचवी प्रतिमाको पालन करनेवाला श्रावक इससे लाटीसंहिता १४३ भक्षणेऽत्र सचित्तस्य नियमों न तु स्पर्शने । तत्स्वहस्तादिना कृत्वा प्रासुकं चात्र भोजयेत् ॥१७ रात्रिभक्तपरित्यागलक्षाणा प्रतिमाऽस्ति सा । विख्याता संख्यया षष्ठी समस्थश्रावकोचिता ॥१८ इत' पूर्व कदाचिद्वा पय पानावि स्याग्निशि । इतः परं परित्यागः सर्वथा पयसोऽपि तत् ॥१९ यद्वा विद्यते नात्र गन्धमाल्यादिलेपनम् । नापि रोगोपशान्त्यर्थं तैलाभ्यङ्गादि कर्म तत् ॥२० किञ्च रात्री यथा भुक्तं वर्जनीयं हि सर्वदा । विवा योषिवतं चापि षष्ठस्थानं परित्यजेत् ॥२१ अस्ति तस्यापि जन्माद्धं ब्रह्मचर्याधिवासितम् । तदर्द्धसर्वसंन्याससनाथं फलवन्महत् ॥२२ नहि कालकलैकाऽपि काचित्तस्यास्ति निष्फला । मन्ये साधुः स एवास्ति कृती सोऽपोह बुद्धिमान् २३ सप्तमी प्रतिमा चास्ति ब्रह्मचर्याह्वया पुन । यत्रात्मयोषितश्चापि त्यागो नि शल्यचेतसः ॥२४ कायेन मनसा वाचा त्रिकालं वनितारतम् । कृतानुमननं चापि कारितं तत्र वर्जयेत् ॥२५ अस्ति हेतुवशावेष गृहस्थो मुनिरर्थतः । ब्रह्मचर्यव्रतं यस्माद् दुर्धरं व्रतसन्ततौ ॥२६ पहले अर्थात् चौथी प्रतिमातक कभी-कभी सचित्त पदार्थोंका भी भक्षण कर लेता था परन्तु अब इस प्रतिमाको स्वीकार करनेके बाद वह कभी भी सचित्त पदार्थका भक्षण नहीं करता है। यहाँ तक कि कच्चा जल भी कभी काममे नही लाता है ।।१६।। इसमे भी इतना और समझ लेना चाहिये कि पांचवी प्रतिमाको पालन करनेवाले श्रावकके सचित्त पदार्थोके खानेका त्याग होता है सचित्त पदार्थोंके स्पर्श करनेका त्याग नहीं होता । पाँचवी प्रतिमाको पालन करनेवाला श्रावक जलादिक सचित्त पदार्थोंको अपने हाथसे प्रासुक करके खा-पी सकता है ॥१७॥ इस प्रकार पांचवीं प्रतिमाका निरूपण किया। अब आगे छठी प्रतिमाका वर्णन करते हैं। गृहस्थ प्रतियोंको पालन करने योग्य छठी प्रतिमाका नाम रात्रिभक्तत्यागप्रतिमा है ॥१८|| इस प्रतिमाको स्वीकार करनेसे पहले अर्थात् पचिवी प्रतिमातक पालन करनेवाला श्रावक कदाचित् रात्रिमे पानी आदि पीता था परन्तु अब इस छठी प्रतिमाको स्वीकार कर लेनेपर वह श्रावक रात्रिमें पानी पीनेका भी सर्वथा त्याग कर देता है ।।१९॥ इस छठी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक रात्रिमे गन्ध, पुष्पमाल आदिका सेवन नही कर सकता, न कोई लेप लगा सकता है तथा अपने किसी रोगको शान्त करनेके लिये रात्रिमें तेल लगाना या उबटन लगाना आदि कार्य भी नही कर सकता ॥२०॥ इस छठी प्रतिमाको पालन करनेवाला व्रती श्रावक जिस प्रकार रात्रिमे भोजनका सर्वथा त्याग कर देता है उसी प्रकार वह दिनमे स्त्रीसेवन करनेका भी सर्वथा त्याग कर देता है ।।२१।। इस प्रकार जो श्रावक इस छठी प्रतिमाका पालन करता है उसका आधा जन्म तो ब्रह्मचर्यसे व्यतीत होता है तथा आधा जन्म सब प्रकारके आहारके त्यागपूर्वक व्यतीत होता है अतएव ससारमे वही जन्म सफल और महत्त्वशालो गिना जाता है ॥२२॥ इस प्रकार उसका दिन और रात्रि दोनो ही त्यागपूर्वक व्यतीत होते हैं इस प्रकार उसका एक समय भी निष्फल व्यतीत नही होता इसलिये ससारमे वही साधु है, वही कृती है और वही बुद्धिमान् गिना जाता है ॥२३।। इस प्रकार छठी प्रतिमाका वर्णन किया। सातवी प्रतिमाका नाम ब्रह्मचर्य प्रतिमा है। इस प्रतिमामे अपनी विवाहिता धर्मपत्नीका भी सर्वथा त्याग कर देना पड़ता है और अपना हृदय सर्वथा नि शल्य बना लेना पडता है ॥२४॥ इस ब्रह्मचर्य प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक मनसे, वचनसे, कायसे और कृत-कारित अनुमोदनासे भूत-भविष्यत् वर्तमान तीनो काल सम्बन्धी समस्त स्त्रीमात्रके सेवन करनेका त्याग कर देता है ।।२५।। इस सातवी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक किसी कारण यायकाचारगप्रह हेतुस्तत्रास्ति विख्यात प्रत्याख्यानावृतेयंया । विपाकात्कर्मण मोऽपि नेतुं नाहंति तत्पदम् ॥२७ उदयात्कर्मणो नाग्न्य कर्तुनालमय जन । क्षुत्पिपामादि दुख च सोढुं न क्षमते यत ॥२८ ततोऽशक्यः गृहत्याग. सपन्येवात्र तिष्ठते । वैराग्यस्य परां काष्ठामधिर ट स शुद्धघोः ॥२२ इत प्रभृति सर्वेऽपि यावदेकावशस्थिति । इयतस्त्रावृताश्चापि विजेया मुनिसग्निभा ॥३० अष्टमी प्रतिमा साऽय प्रोवाच पदर्ता धरः । सर्वतो देशतापि यग्रारम्भस्य वर्जनम् ॥३१ इत. पूर्वमतीचारो विद्यते यधकमण । सचितस्पर्शनत्याद्वा त्यहस्तेनाम्भसा यया ॥३२ इत. प्रभृति यद् द्रव्यं सचित्तं सलिलादिवत् । न स्पति स्वहस्तेन बबाझरम्भस्य का कया ॥३३ तिष्ठेत्स्वयन्घुवर्गाणा मध्ये प्यन्यतमाश्रितः । सिद्ध भक्त्यादि भुमीत ययालध्धं मुनिर्यया ॥३४ क्यापि केनावहूतस्य बन्युनाऽय सर्मिणा । तद्गेहे भुञ्जमानस्य न दोषो न गुण. पुन ॥३५ किवायं सप्रस्वामित्वे वर्तते तवानरि। मर्वागादशमस्यानानापरातपरायण ॥३६ विशेपसे गृहस्य या श्रावक कहलाता है । वास्तवमे देखा जाय तो एक प्रकारसे मुनिके ही समान है क्योकि समस्त प्रतोंके समुदायमे वह ब्रह्मचर्य ग्रत सबसे अधिक कठिन है, इसका पालन करना अत्यन्त कठिन है इसलिये जिसने इस यतको पालन कर लिया उसे मुनिके ही समान समझना चाहिये ॥२६॥ महावयंप्रतिमाको धारण करनेवाला प्रावक मुनिपदको धारण नहीं कर सकता, इसका प्रसिद्ध कारण प्रत्याख्यानावरणकर्मका उदय ही समझना चाहिये ॥२७॥ प्रत्याख्यानावरण- कपायके उदयसे वह नग्नपना (मुनिवेप) धारण करनेके लिए समर्थ नहीं है, और भूख-प्यास आदिके दु ग्वको भी सहन करनेके लिए समय नहीं है ।।२८|| इसीलिए वह घरके त्याग करनेमे असमर्थ होता है, गृहस्थ अवस्थाका त्याग नही कर सकता। अत्यन्त शुद्ध बुद्धिको धारण करने- वाला ब्रह्मचारी श्रावक अवस्थामे ही रहकर उत्कृष्ट वैराग्यको धारण करता है ॥२९।। इस सातवी प्रतिमासे लेकर ग्यारहवी प्रतिमातकके समस्त प्रावक अपने नियत किये हुए वस्त्र रखते हैं। अपने नियत किये हुए वस्त्रोके साथ साथ वे मुनियोंके ही समान माने जाते है ।।३०। इस प्रकार सातवी प्रतिमाका स्वरूप कहा। अब आगे वक्ताओमे श्रेष्ठ ग्रन्यकार आठवी प्रतिमाका स्वरूप कहते हैं । जिसमे आरम्भका सर्वथा भी त्याग है और एकदेश भो त्याग है। खेती व्यापार आदि आजीविकाके कार्योंके आरम्भका सर्वथा त्यागी होता है इसीलिये वह सर्वदेश आरम्भका त्यागी कहलाता है तथा सचित्त अभिषेक पूजन आदि क्रियानि आरम्भका त्यागी होता है इसी- लिए वह एकदेश आरम्भका त्यागी कहलाता है ||३१|| इस आठवी प्रतिमाके स्वीकार करनेसे पहले वह सचित्त पदार्थोंका स्पर्श करता था, जैसे अपने हाथसे जल भरता था, छानता था और फिर उसे प्रासुक करता था। इस प्रकार करनेसे उसे अहिंसाग्रतका अतिचार लगता था । परन्तु इस आठवी प्रतिमाको धारण कर लेनेके अनन्तर वह जल आदि सचित्त द्रव्योको अपने हाथसे छूता भी नहीं है, फिर भला अधिक आरम्भ करनेकी तो बात ही क्या है ॥३२-३३॥ आठवीं प्रतिमाको धारण करनेवाला व्रती श्रावक अपने वन्धुवर्गोमेसे किसी एकके आश्रय रहता है तथा उसके यहाँ जैसा कुछ बना बनाया भोजन मिल जाता है उसे ही मुनिके समान निस्पृह होकर कर लेता है ||३४|| कभी कभी यदि कोई अन्य कुटुम्बी अथवा बाहरका कोई अन्य सधर्मी पुरुष भोजनके लिए बुला लेवे तो उसके घर भी भोजन कर लेता है। इस प्रकार भोजन करनेमे न तो उसके व्रतमे कोई दोष आता है और न कोई गुण बढता है ॥३५॥ इस आठवी प्रतिमाको धारण लाटीसंहिता १४५ प्रक्षालनं च वस्त्राणां प्रासुकेन जलादिना । कुर्याद्वा स्वस्य हस्ताभ्यां कारयेद्वा सर्मिणा ॥३७ बहुप्रलपितेनालमात्लायं वा परात्मने । यत्रारम्भस्य लेशोऽस्ति न कुर्यात्तामपि क्रियाम् ॥३८ नवमं प्रतिमास्थानं नतं चास्ति गृहाथम् । यत्र स्वर्णादितव्यस्य सर्वतस्त्यजनं स्मृतम् ॥३९ इतः पूर्व सुवर्णादिसंख्यामात्रापकर्षण । इतः प्रभृति वित्तस्य मूलादुन्मूलनं व्रतम् ॥४० अस्त्यात्मैकशरीराथं वस्त्र वेश्मादि स्वीकृतम् । धर्मसाधनमात्रं वा शेषं नि शेषणीयताम् ॥४१ स्यात्पुरस्तावितो यावत्स्वामित्वं समयोषिताम् । तत्सवं सर्वतस्त्याज्यं निशल्यं जीवनावधि ॥४२ शेषो विधिस्तु सर्वोऽपि ज्ञातव्य परमागमात् । सानुवृत्तं व्रतं यावत्सर्वत्र वैष निश्चय ॥४३ प्रतं दशमस्थानस्थमननुसननायम् । यत्राहारादिनिष्पत्ती वेया नानुमतिः क्वचित् ॥४४ आदेशोनुमतिश्चाज्ञा सैवं कुवितिलक्षणा । यद्वा स्वत कृतेनादौ प्रशसानुमति स्मृता ॥४५ अयं भाव स्वत सिद्धं यथालन्ध समाहरेत् । तपश्चेच्छानिरोधाल्यं तस्यैव किल संवरः ॥४६ करनेवाला श्रावक व्रती होनेपर भी दशवी प्रतिमासे पहले पहले अपने घरका स्वामी बना रहता है इसीलिए वह दूसरेके घर भोजन करनेका नियम नही लेता ॥३६।। वह अपने वस्त्रोको प्रासुक जलसे अपने हाथसे धोता है, अथवा अन्य किसी साधर्मी भाईसे धुलवा लेता है ॥३७॥ वहुत कहने से क्या ? थोडेसेमे इतना समझ लेना चाहिये कि आठवी प्रतिमाको धारण करनेवाला व्रती श्रावक अपने लिए अथवा किसी दूसरेके लिए ऐसी कोई भी क्रिया नही करता जिसमे लेशमात्र भी आरम्भ हो ॥३८॥ इस प्रकार आठवी प्रतिमाका स्वरूप कहा । व्रती श्रावककी नौवी प्रतिमा का नाम परिग्रहत्याग प्रतिमा है। इस नौवी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक सोना चांदी रुपया पैसा आदि समस्त द्रव्यमात्रका त्याग कर देता है ॥३९।। इस नौवी प्रतिमाको स्वीकार करने के पहले सोना चादी आदि द्रव्योका परिमाण कर रक्खा था तथा अपनी इच्छानुसार वह परिमाण बहुत कुछ घटा रक्खा था अर्थात् बहुत थोडे द्रव्यका परिमाण कर रक्खा था परन्तु अब इस प्रतिमाको धारण कर लेनेपर वह श्रावक सोना चादी आदि धनका त्याग सर्वथा कर देता है ॥४०॥ इस परिग्रहत्यागप्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक केवल अपने शरीरके लिए वस्त्र, घर आदि आवश्यक पदार्थोंको स्वीकार करता है अथवा धर्मसाधनके लिए जिन जिन पदार्थोंकी आवश्यकता पडती है उनको ग्रहण करता है । इसके सिवाय बाकीके समस्त पदार्थोंका-समस्त परिग्रहोका वह त्याग कर देता है ॥४१।। इस नौवी प्रतिमाको धारण करनेसे पहले वह घर और स्त्री आदिका स्वामी गिना जाता था, परन्तु इस नौवी प्रतिमाको धारण कर लेनेपर उसे जन्म- पर्यन्ततकके लिए पूर्णरीतिसे सबका त्याग कर देना पडता है और तब सब तरहसे शल्य-रहित हो जाता है ॥४२॥ इस प्रतिमाको धारण करनेवाले श्रावककी शेष विधि अन्य शास्त्रोसे जान लेनी चाहिए क्योकि यह निश्चय है कि व्रतोका स्वरूप समस्त शास्त्रोमे एक-सा ही वर्णन किया है ॥४३॥ इस प्रकार नौंवी प्रतिमाका निरूपण किया। श्रावकोकी दशवी प्रतिमाका नाम अनुमति त्याग प्रतिमा है। इस अनुमत्तित्याग प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक आहार आदि बनानेके लिये भी कभी अपनी सम्मति नही देता ॥४४॥ किसी कामके लिये आदेश देना, सलाह देना, आज्ञा देना, अथवा 'ऐसा करो' इस प्रकार कहना अथवा जो कार्य किसीने पहलेसे कर रक्खा है उसकी प्रशसा करना आदिको अनुमति कहते हैं ।।४५।। इसका भी अभिप्राय यह है कि दरावी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक जैसा कुछ बना बनाया भोजन मिल जाता है उसीको ग्रहण १९ -

१४६
श्रावकाचार-सग्रह
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इदमिदं कुरु मैवेदमित्यादेशं न यच्छति । मुनिवत्प्रासुकं शुद्ध याववनावि भोजयेत् ।।४७
गृहे तिष्ठेद् व्रतस्थोऽपि सोऽयमर्थादपि स्फुटम् । शिर क्षौरादि कुर्याद्वा न कुर्याद्वा यथामति ॥४८
अद्य यावद्यथालिङ्गो नापि वेषघरो मनाक् । शिखासूत्रादि दध्याद्वा न दध्याद्वा यथेच्छया ॥४९
तिष्ठेदेवालये यद्वा गेहे सावधजिते । स्वसम्बन्धिगृहे भुक्ते यवाहूतोऽन्यसपनि ॥५०
एवमित्यादिदिग्मानं व्याख्यातं दशमवतम् । पुनरुक्तभयावत्र नोक्तमुक्तं पुन पुन ॥५१
व्रतं चैकादशस्थानं नाम्नानुद्दिष्ट भोजनम् । अर्थादोषन्मुनिस्तद्वानिर्जराधिपतिः पुनः ॥५२
समुद्दिश्य कृतं यावदनपानौषधादि यत् । जानन्नेवं न गल्लीयान्सूनमेकावशव्रती ॥५३
सर्वतोऽस्य गृहत्यागो विद्यते सन्मनेरिव । तिष्ठेद्देवालये यद्वा वने च मुनिसन्निधौ ॥५४
उत्कृष्ट श्रावको द्वेधा क्षुल्लकश्चैलकस्तथा । एकादशवतस्थौ द्वौ स्तो वो निजरको क्रमात् ।।५५
कर लेता है। वह कहकर कुछ नही बनवाता। इस प्रकार जो श्रावक अपनी इच्छाको रोकनेरूप
तपश्चरण करता है उसके कर्मोंका सवर अवश्य होता है ।।४६।।
इस दशवी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक 'ऐसा करो ऐसा करो' 'ऐसा मत करो,
ऐसा भी मत करो' इस प्रकारकी आज्ञा किसीको नही देता । उसे जो कुछ बना बनाया शुद्ध प्रासुक
भोजन मिल जाता है उसे ही वह मुनिके समान भोजन कर लेता है ॥४७॥ इस प्रतिमाको धारण
करनेवाला श्रावक व्रती होनेपर भी घरमे रहता है तथा अपने मस्तकके बाल बनवा लेता है
अथवा नही भी बनवाता । बाल वनवाने अथवा न बनवानेमे जैसी उसकी इच्छा होती है वैसा ही
करता है ॥४८॥ इस दशवी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक जबतक मुनिव्रत धारण नही
करता तबतक कोई विशेष वेष धारण नहीं करता। जैसा है वैसा ही बना रहता है । चोटी और
यज्ञोपवीत धारण करता है अथवा नही भी करता ॥४९|| इस दशवी प्रतिमाको धारण करनेवाला
श्रावक किसो देवालय (जिनालयमे या चैत्यालयमे) रहता है अथवा किसी निर्दोष या पापरहित
मकानमे रहता है तथा अपने सम्बन्धियोके घर कुटुम्बियोंके घर भोजन करता है अथवा बुलानेपर
किसी अन्य साधर्मीके घर भोजन कर लेता है ।।५०}} इस प्रकार अत्यन्त सक्षेपसे दशवी प्रतिमाका
स्वरूप कहा । पुनरुक्त दोषके भयसे जो ऊपरकी प्रतिमाओमे कहा हुआ विषय है वह बार-बार
नही कहा है ॥५१|| इस प्रकार दशवी प्रतिमाका स्वरूप कहा। अब आगे ग्यारहवी प्रतिमाका
नाम उद्दिष्टत्यागप्रतिमा है अथवा इस प्रतिमाको पालन करनेवाला अनुद्दिष्ट भोजन करनेवाला
है इसलिए अनुद्दिष्टभोजन भी इस प्रतिमाका नाम है। इस प्रतिमाको पालन करनेवाला
उत्कृष्ट श्रावक ईषत् मुनि अर्थात् मुनिका छोटा भाई गिना जाता है और कर्म निर्जराका स्वामी
होता है ॥५२॥ इस ग्यारहवी प्रतिमाको धारण करनेवाला श्रावक जो कुछ अन्नपान औषधि
आदि उसके लिए बनाया गया होगा उसको जानता हुआ वह कभी ग्रहण नही करता है ।।५३।।
इस ग्यारहवी प्रतिमाको पालन करनेवाला श्रावक मुनिके समान ही पूर्णरूपसे घरका त्याग कर
देता है। वह उत्कृष्ट श्रावक घरका सर्वथा त्याग कर या तो देवालयमे रहता है अथवा किसी
वनमे मुनियोके सघमे रहता है ।।५४॥ इस ग्यारहवी प्रतिमाको पालन करनेवाला श्रावक उत्कृष्ट
श्रावक कहलाता है तथा वह उत्कृष्ट श्रावक दो प्रकारका होता है-एक क्षुल्लक और दूसरा ऐलक ।
इन दोनोंके कर्मोकी निर्जरा उत्तरोत्तर अधिक-अधिक होती रहती है। भावार्थ क्षुल्लकके जितने
कर्मोंकी निर्जरा होती है उससे अधिक ऐलकके कर्मोकी निर्जरा होती है ॥५५॥

लाटीसंहिता १४७ उक्तंच- एयारम्मिट्ठाणे उक्किट्ठो सावओ हवे दुविहो । वच्छेयघरो पढमो कोवीणपरिग्गहो बिदिओ ॥६३ तत्रैलकः स गृह्णाति वस्त्रं कौपीनमात्रकम् । लोचं स्मश्रुशिरोलोम्नां पिच्छिकां च कमण्डलुम् ॥५६ पुस्तकाधुपधिश्चैव सर्वसाधारणं यथा । सूक्ष्मं चापि न गृह्णीयावीषत्सावधकारणम् ॥५७ कौपीनोपधिमात्रत्वाद् विना वाचंयमिक्रिया। विद्यते चलकस्यास्य दुर्द्धरं व्रतधारणम् ॥५८ तिष्ठेच्चत्यालये सद्धे वने वा मुनिसन्निधौ । निरवद्ये यथास्थाने शुद्ध शून्यमठादिषु ॥५९ पूर्वोदितक्रमेणैव कृतकर्मावधावनात् । ईषन्मध्याह्नकाले वै भोजनार्थमटेत्पु रे ॥६० ईर्यासमितिसंशुद्ध पर्यटेद गृहसंख्यया । द्वाभ्यां पात्रस्थानीयाभ्यां हस्ताम्या परमश्नुयात् ।।६१ दद्याद्धर्मोपदेशं च निाज मुक्तिसाधनम् । तपो द्वावशधा कुर्यात्प्रायश्चित्तादि वाचरेत् ॥६२ क्षुल्लक कोमलाचारः शिक्षासूत्राङ्कितो भवेत् । एकवस्त्रां सकौपोनं वस्त्रपिच्छकमण्डलुम् ।।६३ कहा भी है-ग्यारहवी प्रतिमाको धारण करनेवाला उत्कृष्ट श्रावक कहलाता है तथा वह दो प्रकारका होता है। एक तो खण्ड वस्त्रको धारण करनेवाला क्षुल्लक और दूसरा कौपीन- मात्र परिग्रहको धारण करनेवाला ऐलक । भावार्थ-क्षुल्लक श्रावक एक वस्त्र धारण करता है और कोपीन धारण करता है तथा ऐलक कोई वस्त्र नहीं रखता केवल एक कौपीन रखता. है ॥६शा इन दोनो प्रकारके उत्कृष्ट श्रावकोमेसे जो ऐलक है वह केवल कौपीनमात्र वस्त्रको धारण करता है। कौपीनके सिवाय अन्य समस्त परिग्रहका-समस्त वस्त्रोका त्याग कर देता है तथा दाढी मूंछ और मस्तकके बालोका लोच करता है और पीछी कमण्डलु धारण करता है ॥५६।। इसके सिवाय स्वाध्यायके लिये पुस्तक आदि सबके काममे आनेवाले धर्मोपकरणोको भी धारण करता है। परन्तु जो पदार्थ थोड़ी-सी भी हिंसाके कारण हैं या अन्य किसी पापके कारण है ऐसे पदार्थोको वह लेश मात्र भी अपने पास नही रखता है ॥५७॥ यह ऐलक श्रावक एक कौपीनमात्र परिग्रहको तो रखता है, इस कोपीनमात्र परिग्रहके सिवाय उसको समस्त क्रियाएँ मुनियोके समान होती हैं तथा मुनियोके समान ही वह अत्यन्त कठिन-कठिन व्रतोको पालन करता है ।।५८|| यह ऐलक श्रावक या तो किसी चैत्यालयमे रहता है या मुनियोके सघमे रहता है अथवा किसी मुनिराजके समीप वनमे रहता है अथवा किसी भी सूने मठमे या अन्य किसी भी निर्दोष और शुद्ध स्थानमे रहता है ॥५९।। यह ऐलक श्रावक पहले कहे हुए क्रमके अनुसार समस्त क्रियाएँ करता है तथा दोपहरसे कुछ समय पहले सावधान होकर आहारसे लिये नगरमे जाता है ॥६०॥ आहारको जाते समय भी ईर्यापथ शुद्धिसे जाता है तथा घरोकी संख्याका नियम लेकर भी जाता है। तथा वहाँपर जाकर पात्रोके समान केवल अपने दोनो हाथोसे ही आहार लेता है ॥६१॥ यह ऐलक श्रावक विना किसी छल-कपटके मोक्षका कारण ऐसा धर्मोपदेश देता है तथा बारह प्रकारका तपश्चरण पालन करता है और किसी व्रतमे किसी प्रकारका दोष लग जानेपर प्रायश्चित्त ग्रहण करता है ।।६२॥ इस ग्यारहवी प्रतिमाको धारण करनेवाले श्रावकका दूसरा भेद क्षुल्लक है। यह क्षुल्लक श्रावक ऐलकको अपेक्षा कुछ सरल चारित्र पालन करता है, चोटी और यज्ञो- पवीत धारण करता है, एक वस्त्र धारण करता है, कौपीन धारण करता है, वस्त्रकी पीछी रखता है और कमण्डलु रखता है ॥६३।। यह क्षुल्लक भिक्षाके लिये एक कासेका अथवा लोहेका १४८ - श्रावकाचार-संग्रह भिक्षापानं च गृह्णीयात्कास्यं यद्वाऽप्ययोमयम् । एषणादोषनिर्मुक्तं भिक्षाभोजनमेकश ॥६४ क्षौरं श्मश्रुशिरोलोम्ना शेष पूर्ववदाचरेत् । अतीचारे समुत्पन्ने प्रायश्चित्त समाचरेत् ।।६५ यथा निर्दिष्टकाले स भोजनार्थ च पर्यटेत् । पात्रे भिक्षा समादाय पञ्चागारादिहालिवत् ॥६६ तत्राप्यन्यतमे गेहे दृष्ट्वा प्रासुकमम्बुकम् । क्षणं चातिथिभागाय सम्प्रेक्ष्याध्वं च भोजयेत् ॥६७ दैवात्पात्रं समासाद्य दद्यादानं गृहस्थवत् । तच्छेषं यत्स्वयं भुड्क्ते नोचेत्कुर्यादुपोषितम् ॥६८ किञ्च गन्धादिद्रव्याणामुपलब्धौ समिभिः । अर्हद्विम्बाविसाधूनां पूजा कार्या मुदात्मना ||६९ किश्चात्र साधका केचित्केचिद्गूढाह्वयाः पुन । वाणप्रस्थाख्यका केचित्सर्वे तद्वेषधारिण ||७० क्षुल्लकोवक्रिया तेषा नात्युग्नं नातीव मृदु । मध्यत्तिवतं तद्वत्पञ्चगुर्वात्मसाक्षिकम् ||७१ अस्ति कश्चि द्विशेषोऽन साधकादिषु कारणात् । अगृहीतन्त्रता फुयुर्वताभ्यासं प्रताशया ||७२ पात्र रखता है तथा शास्त्रोमे जो भोजनके दोष बतलाये हैं उन सब दोषोंसे रहित एक बार भिक्षा भोजन करता है ||६४॥ दाढी मूंछ और मस्तकके बालोको बनवा लेता है तथा बाकीकी समस्त क्रिया पहले कही हुई प्रतिमाओके अनुसार करता है अर्थात् दश प्रतिमाओमे कही हुई समस्त क्रियाओका पालन करता है। यदि उसके किसी व्रतमे किसी प्रकारका दोष या अतिचार लग जाता है तो वह उसका प्रायश्चित्त लेता है ॥६५॥ भोजनके समयपर अर्थात् दोपहरके पहले वह भोजनके लिये नगरमे जाता है तथा भ्रमरके समान विना किसीको किसी प्रकारका दुख पहुँचाये अपने पात्रमे पांच घरोसे आहार लेता है ॥६६॥। वह क्षुल्लक श्रावक उन पांच घरोमेसे ही जिस घरमे प्रासुक जल दृष्टिगोचर हो जाता है उसी घरमे भोजनके लिये ठहर जाता है तथा थोड़ी देर तक वह किसी भी मुनिराजको आहार दान देनेके लिये प्रतीक्षा करता है। यदि आहार दान देनेके लिये किसी मुनिराजका समागम नही मिला तो फिर वह भोजन कर लेता है ।।६७।। यदि दैवयोगसे आहार दान देनेके लिये किसी मुनिराजका समागम मिल जाय, अथवा अन्य किसी पात्रका समागम मिल जाय तो वह क्षुल्लक श्रावक गृहस्थके ही समान अपना लाया हुआ भोजन उन मुनिराजको दान देता है। दान देकर फिर अपने पात्रमे जो कुछ बचा रहता है उसको वह स्वयं भोजन कर लेता है। यदि अपने पात्रमें कुछ न बचे तो उस दिन वह उपवास करता है ।।६८|| तथा यदि उस क्षुल्लक श्रावकको किसी साधर्मी पुरुषसे जल चन्दन अक्षत आदि पूजा करनेकी सामग्री मिल जाय तो प्रसन्नचित्त होकर भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा कर लेनी चाहिये अथवा भगवान् सिद्ध परमेष्ठी या साधु परमेष्ठीकी पूजा कर लेनी चाहिये ॥६९।। इस प्रकार क्षुल्लक और ऐलक दोनो प्रकारके उत्कृष्ट श्रावकोकी क्रियाओका निरूपण किया। जिस प्रकार उत्कृष्ट श्रावकके क्षुल्लक और ऐलक ये दो भेद हैं उसी प्रकार क्षुल्लक श्रावकोके भी कितने ही भेद हैं। कोई साधक क्षुल्लक हैं, कोई गूढ क्षुल्लक होते हैं और कोई वानप्रस्थ क्षुल्लक होते हैं। ये तीनो प्रकारके क्षुल्लक क्षुल्लकके समान वेष धारण करते हैं ।।७०॥ ये तीनो प्रकारके क्षुल्लक क्षुल्लकोकी ही क्रियाओको पालन करते हैं। ये तीनो प्रकारके क्षुल्लक न तो अत्यन्त कठिन व्रतोका पालन करते हैं और न अत्यन्त सरल व्रतोका पालन करते हैं किन्तु मध्यम स्थितिके व्रतोका पालन करते हैं तथा पच परमेष्ठीकी साक्षी पूर्वक व्रतोको ग्रहण करते हैं ।।७१॥ क्षुल्लकोंके जो साधक गूढ और वानप्रस्थ भेद बतलाये हैं उनमे कुछ विशेष भेद नही है किन्तु थोडा-सा ही भेद है। इनमेसे जिन्होने क्षुल्लकके व्रत धारण नही किये हैं, किन्तु क्षुल्लकके व्रत लाटीसंहिता १४९ समभ्यस्तव्रता केचिद् व्रतं गृह्णन्ति साहसात् । न गृह्णन्ति व्रतं केचिद् गृहे गच्छन्ति कातरा ॥७३ एवमित्यादि दिगमात्र मया प्रोक्तं गृहिवतम् । दृगाधेकादशं यावत् शेषं ज्ञेयं जिनागमात् ॥७४ अस्त्युत्तरगुणं नाम्नां तपो द्वादशधा मतम् । सूचीमानं प्रवक्ष्यामि देशतो व्रतधारिणाम् ।।७५ तत्सूशं यथा-- अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशा बाह्यं तप ॥६४ खाद्यादिचतुर्दाहारसंन्यासोऽनशनं मतम् । केवलं भक्तसलिलमवमोदर्यमुच्यते ॥७६ त्रिचतु पञ्चषष्ठादिवस्तूना संख्ययाऽशनम् । समादिसंख्यया यद्वा वृत्तिसंख्या प्रचक्ष्यते ॥७७ मधुरादिरसाना यत्समस्तं व्यस्तमेव वा । परित्यागो यथाशक्ति रसत्याग' स लक्ष्यते ॥७८ एकान्ते विजनस्थाने सरागाविदोषोज्झिते । शय्या यद्वासनं भिन्नं शय्यासनमुदीरितम् ॥७९ धारण करना चाहते हैं वे उन वतोका अभ्यास करते हैं ।।७२।। उक्त वानप्रस्थ आदिमेसे कितने ही व्रतोका अभ्यास करके साहसके साथ व्रत्तोको ग्रहण करते है और कितने ही कायर पुरुष व्रतोको ग्रहण न करके अपने घरोको चले जाते हैं ।।७३।। इस प्रकार ऊपर लिखे अनुसार दर्शन- प्रतिमासे लेकर उद्दिष्टत्यागप्रतिमातक गृहस्थोकी ग्यारह प्रतिमाओका स्वरूप मैंने अत्यन्त सक्षेपसे कहा है। इन प्रतिमाओके स्वरूप कहनेमे जो कुछ बाकी रह गया है वह अन्य जैनशास्त्रोसे जान लेना चाहिए ।।७४|| एकदेश व्रतोको धारण करनेवाले इन श्रावकोके (उत्कृष्ट श्रावकोके) उत्तर- गुण बारह प्रकारके तप कहलाते हैं। आगे मैं सक्षेपसे नाम मात्र इन बारह प्रकारके तपोको भी कहता हूँ॥७॥ तप दो प्रकार है-एक अन्तरग तप और दूसरे बाह्य तप। इनमेसे बाह्य तपके छह भेद हैं जो सूत्रकारने अपने सूत्रमे इस प्रकार बतलाये हैं-अनशन, अवमोदर्य, वृत्तिपरिसख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश यह छह प्रकारका बाह्य तप है ॥६४॥ आगे सक्षेपसे इन्हीका स्वरूप लिखते हैं। अन्ने पान लेह्य खाद्य इन चारो प्रकारके आहार- का त्याग कर देना अनशन तप कहलाता है। केवल भात और पानी लेना बाकीके समस्त आहारोका त्याग कर देना अर्थात् घोडा भोजन लेना अवमोदर्य तप है ॥७६।। मैं आज केवल दाल भात और पानी ऐसे तीन पदार्थ खाऊँगा बाकी सबका त्याग है अथवा चार या पांच पदार्थ खाऊँगा या छह खाऊंगा बाकीके नही अथवा पाँच घर तक जाऊँगा, पाँच घरमे आहार मिलेगा तो लूंगा नही तो नही । इस प्रकार खाने योग्य पदार्थोंका नियम कर अथवा जाने योग्य घरोका नियम कर आहारके लिए जाना अथवा आहारके लिए इस प्रकारका नियम कर लेना वृत्तिपरि- सख्या नामका तप कहलाता है ॥७७मीठा, खट्टा, चरपरा, कडवा, कषायला आदि रसोका अथवा मीठा, दूध, दही, घी, तेल और फलादिक सचित्त पदार्थ इन छहो रसोका पूर्ण रूपसे त्याग कर देना अथवा एक दो आदि अलग-अलग रूपसे रसोका त्याग करना, जैसी अपनी शक्ति हो उसीके अनुसार त्याग करना रसपरित्याग नामका तप है। यदि अपनी शक्ति हो तो समस्त रसोका त्याग कर देना चाहिए । यदि ऐसी शक्ति न हो तो फिर जितनी शक्ति हो उसके अनुसार एक दो चार आदि रसोका त्याग कर देवा चाहिए। इस प्रकारके त्यागको रसपरित्याग तप कहते हैं ।।७८|| जहाँपर मनुष्योका निवास न हो तथा राग-द्वेष उत्पन्न होनेके कोई कारण न हो ऐसे निर्दोष एकान्त स्थानमे सोने और बैठनेका स्थान बनाना विविक्तशय्यासन नामका तप कहलाता १५० श्रावकाचार-संग्रह आतापनादियोगेन वीर्यचर्यासनेन वा । वपुष क्लेशकरणं कायक्लेशः प्रकीर्तित ॥८० षोढा बाह्यं तप प्रोक्तमेवमित्याविलक्षणे । अपना लक्ष्यतेऽस्माभि.वोढा वाभ्यन्तरं तप ॥८१ तत्सूशं यथा-- प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥६५ प्रायो दोषेऽप्यतीचारे गुरौ सम्यग्निवेदिते । उद्दिष्टं तेन कर्तव्यं प्रायश्चित्ततप स्मृतम् ॥८२ गुर्वादीनां यथाप्येषामभ्युत्थानं च गौरवम् । क्रियते चात्मसामाद्विनयाल्यं तपः स्मृतम् ॥८३ तपोषनानां देवाद्वा ग्लानित्वं समुपेयुषाम् । यथाशक्ति प्रतीकारो वैयावृत्य. स उच्यते ॥८४ नैरन्तर्येण य पाठ क्रियते सूरिसन्निधौ । यद्वा सामायिकीपाठ स्वाध्याय स स्मृतो दुषै ॥८५ शरीराविममत्वस्य त्यागो यो ज्ञानदृष्टिभि । तप संज्ञा सुविख्यातो कायोत्सर्गों महर्षिभि ॥८६ कृत्स्नचिन्तानिरोधेन पुंस शुद्धस्य चिन्तनम् । एकाग्रलक्षणं ध्यानं यदुक्त परमं तप ॥८७ है ।।७९|| आतापन आदि योग धारण कर अथवा वीरचर्या आसन धारण कर शरीरको क्लेश पहुँचाना कायक्लेश नामका तप कहलाता है। नग्न अवस्था धारण कर एक स्थानपर खड़े होकर ध्यान धारण करना आतापन योग है तथा भ्रामरी वृत्तिसे भोजन करना, ग्रीष्म ऋतुमें पर्वतपर खडे होना, वर्षामे वृक्षके नीचे रहना और शीत ऋतुमे नदीके किनारे या चौहटेमे रहना आदि वीरचर्या है। इनके द्वारा शरीरको क्लेश पहुंचाना कायक्लेश नामका तप कहलाता है ।1८०॥ इस प्रकार अत्यन्त सक्षेप रीतिसे सबका लक्षण कहकर छहो प्रकारके बाह्य तपका निरूपण किया। अब आगे छहो प्रकारके अन्तरग तपका लक्षण कहते हैं ।।८१॥ उन अन्तरग तपोको कहनेवाला सूत्र यह है-प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह छह प्रकारका अतरग तप है ॥६५।। आगे इनका स्वरूप सक्षेपसे कहते हैं। किसी व्रतमे या किसी भी क्रियामे किसी प्रकारका अतिचार या दोष लग जानेपर उसको विना किसी छल कपटके अच्छी तरह गुरुसे निवेदन करना और उसके बदले गुरु महाराज जो कुछ आज्ञा दें, जो दण्ड दें उसे मन वचन कायसे पालन करना प्रायश्चित्त नामका तप कहलाता है ।।८२।। आचार्य उपाध्याय आदि गुरुओका अपनी सामर्थ्यके अनुसार आदर-सत्कार करना, उनके सामने खडे होना, पीछे-पीछे चलना तथा अपनी सामथ्र्यक अनुसार उनका महत्त्व प्रगट करना आदि विनय नामका तप कहलाता है ॥८३।। यदि देवयोगसे किसी मुनिके किसी प्रकारका रोग हो गया हो अथवा और किसी प्रकारकी शरीरमे बाधा हो गयी हो तो अपनी शक्तिके अनुसार उसको दूर करना, उस मुनिराजकी सेवा करना, पैर दाबना तथा जिस प्रकार वह व्याधि दूर हो सके उसी प्रकार निर्दोष यत्न करना वैयावृत्य नामका तप कहलाता है ।।८४॥ आचार्य महाराजके समीप बैठकर निरन्तर शास्त्रोका पाठ करनेको, अथवा सामायिकके पाठ करनेको विद्वान् लोग स्वाध्याय नामका तप कहते हैं ॥८५॥ ज्ञानरूपी नेत्रोको धारण करनेवाले महा तपस्वी लोग शरीरादिकसे ममत्वका सर्वथा त्याग कर देनेको प्रसिद्ध कायोत्सर्ग नामका तप कहते हैं ॥८६॥ योगी लोग जो अन्य समस्त चिन्ताओंको रोककर अपने मनकी एकाग्रतासे केवल शुद्ध आत्माका चिन्तवन करते हैं उसको ध्यान नामका परम तपश्चरण कहते हैं ॥८७॥ इस प्रकार हमने कृपापूर्वक एकदेश व्रतोको धारण करनेवाले श्रावकोंके लिए लाटीसंहिता १५१ एवमित्याविदिमात्र षोढा चाभ्यन्तरं तपः । निविष्टं कृपयाऽस्माभिर्देशतो व्रतधारिणाम् ॥४८ अक्षरमात्रपवस्वरहीनं व्यञ्जनसन्धिविवजितरेफम् । साघु भिरत्र मम क्षमितव्यं को न विमुह्यति शास्त्रसमुद्रे ॥८९ इति श्रावकाचारापरनाम लाटीसहिताया सामायिकाद्येकादश प्रतिमापर्यन्त- वर्णन नाम षष्ठ. सर्गः ॥६॥ छहो प्रकारके अतरग तपोका स्वरूप अत्यन्त संक्षेपसे बतलाया ॥८८|| इस ग्रन्थमे जो अक्षर, मात्रा, पद, स्वर आदि कम हो अथवा व्यजन सन्धि रेफ आदिसे रहित हो तो भी सज्जन लोगोको मेरा यह अपराध क्षमा कर देना चाहिए, क्योकि शास्त्र एक प्रकारका अगाध समुद्र है इसमे कोन गोता नही खाता है अर्थात् कौन नही भूलता है ? छद्मस्थ अल्पज्ञानी सभी भूलते हैं ।।८९।। इस प्रकार सामायिक प्रतिमासे लेकर उद्दिष्टत्याग नामकी ग्यारहवी प्रतिमा तक नौ प्रतिमाओके स्वरूपको निरूपण करनेवाला यह छठा सर्ग समाप्त हुआ।

परिशिष्ट
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॥ श्रीवीतरागाय नम ।। पहला परिच्छेद ( १ ) रत्नकरण्ड-श्रावकाचार हिन्दी-पद्यानुवाद अनुवादक-श्रीयुत पं० गिरधर शर्मा 'नवरत्न', काव्यालंकार (४) ( ७ ) सम्यग्दर्शन का लक्षण सर्वोत्तम पद पर जो स्थित हो, सकल कर्ममल जिनने धोये, आठ अगयुत, तीन मूढता- परम ज्योति हो, हो निर्मल। हैं वे वर्द्धमान भगवान। रहित, अमद जो हो श्रद्धान। वीतराग हो महाकृती हो, लोकालोक भासते जिसमे, सच्चे देव शास्त्र गुरु पर दृढ, हो सर्वज्ञ सदा निश्चल ।। ऐसा दर्पण जिनका ज्ञान ।। सम्यग्दर्शन उसको जान । आदिरहित हो अन्तरहित हो, बडे चाव से भक्तिभाव से, सच्चे देव शास्त्र गुरु का मैं, मध्य रहित हो महिमावान। नमस्कार कर बारवार। लक्षण यहाँ बताता हूँ। सब जीवो का होय हितैषी, उनके श्रीचरणो मे प्रणमू, तीन मूढता आठ अग-मद, हितोपदेशी वही सुजान ।। सुख पाऊँ हर विघ्नविकार॥ सबका भेद बताता हूँ॥ ( ८ ) ( २ ) बिना राग के बिना स्वार्थ के, जो संसार दुख से सारे, सच्चे देव का स्वरूप सत्यमार्ग वे बतलाते। जीवो को सु बचाता है। जो सर्वज्ञ शास्त्र का स्वामी, सर्वोत्तम सुखमे पुनि उनको, सुन सुन जिनको सत्पुरुषो के, भलीभाँति पहुचाता है। जिसमे नही दोष का लेश । हृदय प्रफुल्लित हो जाते॥ उसी कर्म के काटनहारे, वही आप्त है वही आप्त है, उस्तादो के कर स्पर्श से, श्रेष्ठ धर्म को कहता हूँ। वही आप्त है तीर्थ जिनेश । जब मृदङ्ग ध्वनि करता है। श्रीसमन्तभद्रार्यवर्य* का, जिसके भीतर इन बातो का, नही किसी से कुछ चाहता है, भाव बताना चाहता हूँ॥ समावेश नही हो सकता। रसिको के मन हरता है। ( ३ ) नही आप्त वह हो सकता है, धर्म किसे कहते हैं ? सत्य देव नही हो सकता ॥ ( 6 ) गणधरादि धर्मेश्वर कहते, शास्त्र का लक्षण सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान भूख प्यास बीमारि बुढापा, जो जीवो का हितकारी हो, सम्यक्चारित धर्म रम्य है, जन्म मरण भय राग द्वेप। जिसका हो न कभी खडन । सुखदायक सब भांति निदान॥ गर्व मोह चिन्ता मद अचरज, जो न प्रमाणो से विरुद्ध हो, इनसे उलटे मिथ्या है सब, निद्रा अरति खेद औ स्वेद । करता होय कुपथ-खडन । दर्शन ज्ञान और चारित्र। दोष अठारह ये माने है, वस्तुरूप को भलीभाँति से, भव कारण हैं भय कारण है, हो ये जिनमे जरा नही। बतलाता हो जो शुचितर। दुख कारण हैं मेरे मित्र ॥ आप्त वही है देव वही है, कहा आप्तका शास्त्र वही है, * आचार्यवयं नाथ वही है और नही ॥ शास्त्र वही है सुन्दरतर ॥

१५४ -- - ( १० ) निविचिकित्सित अग तीसरा, (१७) तपस्वी या गुरु का लक्षण यह सुजनो का प्यारा है। वात्सल्य विषय छोडकर निरारम्भ हो, पहले उद्दायन नरपति ने, कपट रहित हो श्रेष्ठ भाव से, नही परिग्रह रक्खें पास। नीके इसको धारा है। यथायोग्य आदर सत्कार- ज्ञान ध्यान तप मे रत होकर, करना अपने सामियो का, सब प्रकार की छोडें आस ।। ( १४ ) सप्तमाङ्ग वात्सल्य विचार ।। ऐसे ज्ञान ध्यान तप भूषित, अमूढदृष्टि इसे पालकर प्रसिद्धि पाई, होते जो साँचे मुनिवर। दुखकारक हैं कुपथ कुपथी, मुनिवर श्रीयुत विष्णुकुमार। वही सुगुरु है वही सुगुरु हैं, इन्हे मानना नहिं मन से । जिनका यश शास्त्रो के भीतर, वही सुगुरु हैं उज्ज्वलतर ।। करना नहिं सम्पर्क सत्कृति, गाया निर्मल अपरपार ।। ( ११ ) यश गान नहिं वचनो से ॥ सम्यक्त्व के अंग-नि.शकित चौथा अग अमूढदृष्टि यह, ( १८ ) जगमे अतिशय सुखकारी। प्रभावना तत्त्व यही है, ऐसा ही है, नही और, नहिं और प्रकार। इसको धार रेवती रानी, जैसे होवे वैसे भाई, जिनकी सन्मारग मे रुचि हो, ख्यात हुई जग मे भारी॥ दूर हटा जग का अज्ञान । कर प्रकाश करदे विनाश तम, ऐसी मनो खड्ग की धार ।। (१५) है सम्यक्त्व अग यह पहला, फैला दे शुचि सच्चा ज्ञान ।। उपगूहन नि शङ्कित है इसका नाम । तन मन धन सर्वस्व भले ही, स्वय शुद्ध जो सत्यमार्ग है, तेरा इसमे लग जावे। इसके धारण करने से ही, अजनचोर वज्रकुमार मुनीन्द्र सदृश तू, सुखधाम ।। अज्ञानी असमर्थ मनुजकृत, तब प्रभावना कर पावे ।। ( १२ ) उसकी हो निन्दामाला ॥ निकांक्षित उसे तोडकर दूर फेकना, ( १६ ) भांति भाँति के कष्ट सहे भी, उपगृहन है पचम अग। सम्यग्दर्शन सुखकारी है, जिसका मिलना कर्माधीन । इसे पाल निर्मल यश पाया, भवसन्तति इससे मिटती। जिसका उदय विविध दुखयुत है, सेठ जिनेन्द्र भक्त सुख सग ॥ अङ्गहीन यदि हो इसमे तो, जो है पापवीज अतिहीन ॥ शक्ति नही इतनी रहती ।। जो है अन्तसहित लौकिक सुख, ( १६ ) विषकी व्यथा मिटा दे ऐसी, कभी चाहना नहिं उसको। स्थितीकरण शक्ति मत्र मे है प्रियवर । नि काक्षित यह अग दूसरा, सद्दर्शन से सदाचरण से, अक्षर मात्राहीन हुए से, धाराऽनतमती इसको॥ विचलित होते हैं जो जन । मत्र नही रहता सुखकर ।। ( १३ ) धर्मप्रेमवश उन्हे करे फिर- ( २० ) निविचिकित्सित सुस्थिर, देकर तन मन धन ॥ लोकमूढता रत्नत्रय से जो पवित्र हो, स्थितीकरण नामक यह छट्ठा, गगादिक नदियो मे न्हाये, स्वाभाविक अपवित्र शरीर। अग धर्मद्योतक प्रियवर । होगा मुझको पुण्य महान । उसकी ग्लानि कभी नहिं करना, वारिषेण श्रेणिक का बेटा, ढेर किये पत्थर-रेती के, रखना गुण पर प्रीति सधीर ।। ख्यात हुआ चलकर इसपर ।। हो जावेगा तत्त्वज्ञान ॥ उत्तम सुख देने वाला। हुआ - १५५ - गिरि से गिरे शुद्ध होऊँगा, जले आग मे पावनतर । ऐसे मन में विचार रखना, लोकमूढता है प्रियवर ॥ ( २१ ) देवमूढता दई देवता की पूजा कर, मन चाहे फल पाऊँगा। मेरे होगे सिद्ध मनोरथ, लाभ अनेक उठाऊँगा । ऐसी आशाएँ मन मे रख, जो जन पूजा करता है। रागद्वेप भरे देवो की, देवमूढता धरता है। ( २२ ) गुरुमूढता नहीं छोडते गांठ-परिग्रह, आरभ को नही तजते है। भवचक्रो को भ्रमने वाले, हिंसा को ही भजते है ॥ साधु सत कहलाते तिस पर, देना इन्हे मान सत्कार। है पाखण्डि मूढता प्यारो, छोडो इसको करो विचार।। ( २३ ) आठमद ज्ञान जाति कुल पूजा ताकत, ऋद्धि तपस्या और शरीर। इन आठो का आश्रय करके, है घमड करना मद वीर ।। मद मे आ निजर्मिजनो का, जो जन करता है अपमान । वह सुधर्म के मानभग का, कारण होता है अज्ञान ॥ ( २४ ) अगर पापका हो निरोध नो, और मम्पदाने क्या काम । अगर पाप का आश्रय हो तो, ( २८ ) जौर सम्पदा से क्या काम ।। ज्ञान शक्ति है ज्ञान बडा है, मित्रो यदि पहला होगा तो, कोई वस्तु न ज्ञान समान । दुख का उदय नही होगा। त्यो चारित्र बडा गुणधारी, यदि दुसरा होगा तो सम्पद, सब सुखकारी श्रेष्ठ महान ।। होने पर भी दुख होगा। पर मित्रो, दर्शन की महिमा, इन सवसे बढकर न्यारी। ( २५ ) मोक्षमार्ग मे इसकी पदवी, सम्यग्दर्शन की महिमा कर्णधार जैसी भारी ।। समग्दर्शन की शुभ सम्पद, होती है जिनके भीतर। ( २६ ) सम्यग्दर्शन नहिं होवे तो, मातगज हो कोई भी हो, महामान्य है वे बुधवर ॥ ज्ञान चरित्र कभी शुभतर। गुदडी के वे लाल सुहाने, फलदाता नहिं हो सकते है, जैसे वीज बिना तरुवर ।। ढंकी भस्म की वे आगी। सम्यग्दर्शन विना ज्ञान को, सम्यग्दर्शन की महिमा से, मित्रो समझो मिथ्याज्ञान । कहे देव ये वडभागी॥ वैसे ही चारित्र समझ लो, ( २६ ) मिथ्याचरित सकल दुखखान ।। सुन्दर धर्माचरण किये से, ( ३० ) कुत्ता भी सुर हो जाता। मोहरहित जो है गृहस्थ भी, पापाचरण किये से त्यो ही, मोक्षमार्ग-अनुगामी है। श्वान योनि सुर भी पाता ।। हो अनगार न मोह तजा तो, ऐसी कोई नही सम्पदा, वह कुपथ का गामी है ।। जो न धर्म से मिलती है। मुनि होकर भी मोह न छोडा, सव मिलती है, सब मिलती है, ऐसे मुनि से तो प्रियवर । सब मिलती है, मिलती है। निर्मोही हो गृहस्थ रहना, है अच्छा उत्तम बहतर ।। ( २७ ) ( ३१) जिनके दर्शन किये चित्त मे, भूत भविष्यत वर्तमान ये, उदय नही होवे समभाव । कहलाते है नीनो काल। जिनके पढने सुनने से नहिं. देव नारकी और मनुज ये, उच्च चरित हो हो न मुभाव । तीनों जग हैं महा विशाल ।। जिन्हे मान आदर्श चले मे, तीनो काल त्रिजगमे नहिं है, मत्यमार्ग भूले पड़ जायें। सुखकारी मम्यक्त्व समान । ऐगे गोटे देव गाम्य गुरु, लोही नहि मिव्यान्य मदृश है, शुद्धदृष्टि से विनय न पायं ।। दुखदायक लीजे मुच मान । - 00 दूसर परिच्छेद ( ३२ ) मित्रो जो सम्यग्दर्शन से, शुद्धदृष्टि हो जाते हैं। नारक तिर्यक पढ-स्त्रीपन, कभी नहीं दे पाते हैं। व्रतविहीन वे होवे तो भी, नीच कुलो मे नहिं होते। नहिं होते अल्पायु दरिद्री, विकृतदेह भी नहिं होते॥ ( ३३ ) विद्या वीर्य विजय वैभव वय, ओज तेज यश वे पाते। अर्थसिद्धि कुलवृद्धि महाकुल, पाकर सज्जन कहलाते॥ अष्टसिद्धि नवनिधि होती हैं, उनके चरणो की दासी। रत्नो के वे स्वामी होते, नृपगण के मस्तकवासी॥ ( ३४ ) पाके तत्त्वज्ञान मनोरम, महान हैं हो जाते। सुरपति नरपति धरणीपति औ, गणधर से पूजा पाते। धर्मचक्र के धारक अनुपम, मित्रो तीर्थकर होते। तीनो लोको के जीवो के, शरणभूत सच्चे होते ॥ ( ३५ ) वाधा शका रोग शोक भय, जरा जहाँ है ज़रा नही। जिसमे विद्या सुख है अनुपम, जिसका क्षय है कभी नही॥ ऐसा उत्तम निर्मलतर है, शिवपद अथवा मोक्ष महान । उसको पाते हैं अवश्य वे, जो जन सम्यग्दर्शनवान ।। ( ३६ ) वैसे ही चारो गतियो को, है देवेन्द्र वक्र की महिमा, दर्पणसम है दिखलाता ।। कही नही जो जाती है। है उत्तम करणानुयोग यह, सार्वभौम की पदवी को सिर, कहता है यो सम्यग्ज्ञान। महिपावली झुकाती है। इसे जानने से मानवकुल, सब पद जिसके नीचे ऐसा, हो जाता है वहुत सुजान ॥ तीर्थकर है पद प्रियवर । ( ४० ) पा इन सबको शिवपद पाते, चरणानुयोग भव्य भक्त प्रभु को भजकर ॥ गृहस्थियो का अनगारो का, जिससे चारित हो उत्पन्न । वढे और रक्षा भी पावे, ( ३७ ) है चरणानुयोग प्रतिपन्न ॥ मित्रो इसका किये आचरण, सम्यग्ज्ञान का लक्षण चरितगठन हो जाता है। वस्तुरूप को जो बतलाये, नीके न्यूनाधिकता-हीन । करते हुए समुन्नति अपनी, ठीक-ठीक जैसे का तैसा, जीव महासुख पाता है। अविपरीत सन्देह विहीन ।। ( ४१ ) गणधरादि आगम के ज्ञाता, द्रव्यानुयोग कहते इसको सम्यग्ज्ञान । जीवतत्त्व का स्वरूप ऐसा, इसको प्राप्त कराने वाले, ऐसा है अजीव मा तत्त्व । कहे चार अनुयोग महान ॥ पापपुण्य का यह स्वरूप है, ( ३८ ) वन्धमोक्ष हैं ऐसे तत्त्व ॥ प्रथमानुयोग इन सबको द्रव्याणयोग का, धर्म अर्थ त्यो वाम मोक्ष का, दीप भली विधि दिखलाता। जिसमे किया जाय वर्णन । जो श्रुतविद्या के प्रकाशको, पुन्यकथा हो चरित-गीति हो, जहां तहा पर फैलाता॥ हो पुराण का पूर्ण कथन ।। रत्नत्रय औ धर्म ध्यान का, जो अनुपम हो महानिधान। तीसरा परिच्छेद कहलाता प्रथमानुयोग है, ( ४२ ) यो कहता है सम्यग्ज्ञान ।। सम्यक्चारित्र ( ३६ ) मोहतिमिर के दूर हुए से, करणानुयोग सम्यग्दर्शन पाता है। लोकालोक विभाग बतावे, उसको पाकर साधु समकिती, युग परिवर्तन बतलाता। श्रेष्ठ ज्ञान उपजाता है। वे - फिर धारण करता है शुचितर, ( ४६ ) मिथ्या वाणी ऐसी ही है, सुखकारी सम्यक्चारित्र। अहिंसा सब जग को सकटदाई। रहे राग ज्यो नही पास कुछ, तीन योग औ तीन करण से, इसे हटाओ नही लडाओ, और द्वेष नस जावे मित्र ।। त्रस जीवो का वध तजना। समझाओ सबको भाई ॥ ( ४३ ) कहा अहिंसाणुव्रत जाता, इसको नित पालन करना । ( ५० ) रागद्वेष के नस जाने से, इसी अहिसाणुव्रत के है, अचौर्य नही पाप ये रहते पाच । कहलाते पञ्चातीचार। गिरा पडा भूला रक्खा त्यो, हिंसा, मिथ्या, चोरी, मैथुन, छेदन, भेदन, भोज्यनिवारण, बिना दिया परका धन सार। और परिग्रह लीजे जाँच ॥ इन सबसे विरक्त हो जाना, पीडन, बहुत लादना भार॥ लेना नही, न देना परको, है अचौर्य, इसके अतिचार-।। सम्यग्ज्ञानी का चारित्र । ( ४७ ) माल चौर्य का लेना, चोरी- सकल विकल के भेदभाव से, इसी अणुव्रत के कारण से, ढग बतलाना, छल करना। धरे इसे मुनि गृही पवित्र ॥ जाति-पाँति का था चडाल । माल मेल मे नापतोल मे, तो भी सब प्रकार सुख पाया, भग राजविधि का करना । ( ४४ ) कीर्तिमान् होकर यमपाल । नही पालने से इस व्रत के, ( ५१ ) हिसारत हो सेठानी-1 इस व्रत को पालन करने से, गृही जनो का तीन प्रकार । हुई धनश्री ऐसी जिसकी, वारिषेण जग मे भाया। पाँच अणुव्रत तीन गुणव्रत, दुर्गति नहिं जाती जानी॥ नही पालने से दुखबादल, और भले शिक्षाव्रत चार ॥ ( ४८ ) खूब तापसी पर छाया ॥ क्रम से सभी कहो पर पहले, जो मनुष्य इस व्रत को पाले, पाँच अणुव्रत बतला दो। बोले झूठ न झूठ बुलावे, नही जगत मे क्यो भावे । उनका पालन करना सारे, क्यो नहिं उसकी शोभा छावे, कहे न सच भी दुखकारी। सागारो को सिखला दो। क्यो न जगत सब जस गावे ।। स्थूल झूठ से विरक्त होवे, ( ४५ ) है सत्याणुव्रतधारी॥ ( ५२ ) धरोड हरना, ब्रह्मचर्य कूटलेख लिखना परिवाद । हिंसा मिथ्या चोरी मैथुन, पापभीरु हो परदारा से, गुप्त बात को जाहिर करना, और परिग्रह जो है पाप । ये इसके अतिचार प्रमाद ।। नही गमन जो करता है। स्थूलरूप से इन्हे छोड़ना, तथा औरको इस कुमर्म मे, कहा अणुव्रत प्रभु ने आप ॥ ( ४६ ) कभी प्रवृत्त न करता है। निरतिचार इनको पालन कर, इस व्रत के पालन करने से, ब्रह्मचर्य व्रत है यह सुन्दर, पाते है मानव सुरलोक । पूज्य सेठ धनदेव हुआ। पाँच इसी के है अतिचार। वहाँ अष्टगुण अवधिज्ञान त्यों, नही पाल मिथ्यारत होकर, इन्हे भली विध अपने जी मे, दिव्य देह मिलते हर शोक।। सत्यघोष त्यो दुखी मुआ ॥ मित्रो लीजे खूब विचार ।। बारह प्रकार का विकल चारित्र बारह भेदरूप चारित है, - सत्य निन्दा करना, पाँच अणुव्रत १५८ (६० - ( ५३ ) भण्ड-वचन कहना, निशिवासर- अति तृष्णा स्त्री मे रखना। व्यभिचारिणो स्त्रियो मे जाना, औ अनग क्रीडा करना ।। औरो की शादी करवाना, इन्हे छोडकर व्रतपाला ॥ वणिक्सुता नीली ने नीके, कोतवाल ने नहिं पाला ॥ कोस से, . ( ५४ ) परिग्रहपरिमाण आवश्यक धन-धान्यादिकका, अपने मन मे कर परिमाण । उससे आगे नहीं चाहना, सो है व्रत इच्छा परिमाण । अति वाहन, अति सग्रह, विस्मय, लोभ लादना अतिशय भार। इस व्रत के बोले जाते है, मित्रो ये पांचो अतिचार ।। कहे श्रेष्ठ पुरुषो ने नीके, .) जिनसे होवे जन दुखहीन ॥ दशो दिशा की जो मर्यादा, दिग्वत और अनर्थदडवत, की ही उसे न रखना याद । व्रत भोगोपभोग परिमाण । भूल भाल उसको तज देना, इनको धारण करें भव्यजन, या तज देना धार प्रमाद ।। मान शास्त्रको सुदृढ प्रमाण ।। ऊँचे नीचे आगे पीछे, अगल वगल मित्रो वढना। ( ५७ ) दिग्बत के अतिचार कहाते, दिग्वत याद न मर्यादा रखना। अमुक नदी तक अमुक शैल तक, ( ६१ ) अमुक गाँव तक जाऊँगा । अनर्थदण्डविरति दशो दिशा मे अमुक आगे पद न बढाऊँगा। दिड्मर्यादा जो की होवे, उसके भीतर भी विन काम। ऐसी कर मर्यादा आगे, पापयोग से विरक्त होना, कभी उमर भर नहिं जाना। है अनर्थदडव्रत नाम ॥ सूक्ष्म पापनाशक दिग्वत यह, हिंसादान प्रमादचर्या, इसे सज्जनो ने माना ।। पापादेश-कथन अपध्यान । ( ५८ ) त्योही दु श्रुति पाँचो ही ये, जो इस व्रत का पालन करते, इस व्रत के है भेद सुजान ।। उन्हे नही होता है पाप । (६२) मर्यादा के बाहर उनके, हिंसा दान अणुव्रत होय मपावत आप ॥ प्रत्याख्यानावरण बहुत ही, छुरी कटारी खड्ग खुनीता, मित्रो कृशतर हो जाते। अग्न्यायुध फलसा तलवार । साँकल सीगी अस्त्र-शस्त्र का, इससे कर्म चरित्र-मोहनी, देना, जिनसे होवें वार ॥ मन्द-मन्दतर पड़ जाते ।। हिंसा दान नाम का मित्रो, ( ५६ ) कहलाता है अनरथदड। महावत तन मन वचन योग से मित्रो, ज्यो नहिं होवे युद्ध प्रचड ॥ कृत कारित अनुमोदन कर। होते हैं नौ भेद, इन्ही से, ( ६३ ) तजना पाँचौ पाप प्रखर ।। प्रमादचर्या कहे जगत मे ये जाते है, पृथ्वी पानी अग्नि वायु का, पञ्च महाव्रत सुखकारी। बिना काम आरभ करना। बहुत अश मे महाव्रती सा, व्यर्थ छेदना वनस्पती को, हो जाता दिग्वतधारी॥ वे-मतलब चलना फिरना ।। , ( ५५ ) • जयकुमार ने इस वर व्रत को, पालन करके सुख पाया। । वैश्य 'मूछ-मक्खन' नहिं पाला, 'हाय द्रव्य' कर दुख पाया ।। पाँच अणुव्रत कहे इन्ही मे, मद्य मास मधुका जो त्याग। मिल जावे तो आठ मूल गुण, हो जाते हैं गृही-सुहाग ॥ 1 बुधजन इसको तज देते हैं, ( ५६ ) चौथा परिच्छेद गुणवत मूल गुणो की वस्ती होवे, इसके लिए गुणव्रत तीन ।

१५६ औरो को भी व्यर्थ घुमाना, ( ६७ ) भोग और उपभोग त्याग के, है प्रमादचर्या दुखकर। अनर्थदण्डव्रत के अतिचार बतलाये यम नियम उपाय। कहा अनर्थदड है इसको, स्मराधीन हो हँसी दिल्लगी अमुक समय तक त्याग 'नियम' है, शुभ चाहे तो इससे डर ॥ जीवन भरका 'यम' कहलाय॥ करना, भडवचन कहना। बकवक कररा, आँख लडाना, ( ६४ ) ( ७१ ) कायकुचेष्टा मे बहना ॥ पापोपदेश या पापादेश नियम करने को विधि सजधज के सामान बढाना, जिससे धोखा देना आवे, बिना विचारे त्यो प्रियवर-। भोजन वाहन शयन स्नान रुचि, मनुज करे त्यो हिंसारम्भ । इत्र पान कुकुम-लेपन । तन मन वचन लगाना कृति मे, गीत वाद्य सगीत कामरति, तियंचो को सकट देवे, है अतिचार सभी व्रतहर ॥ बणिज करे फैलाकर दम्भ । माला भूषण और वसन । ऐसी ऐसी बाते करना, ( ६८ ) इन्हे रात दिन पक्ष मास या, पापादेश कहाता हे। भोगोपभोग परिमाण वर्ष आदि तक देना त्याग । इस अनर्थदड को तजकर, इन्द्रिय-विषयो को प्रतिदिन ही, कहलाता है 'नियम' और 'यम', उत्तम नर सुख पाता है । कम कर राग घटा लेना। आजीवन इसका परित्याग ।। है व्रत भोगोपभोगपरिमित, ( ६५ ) ( ७२ ) इसकी ओर ध्यान देना ।। भोगोपभोगपरिमाण के अतिचार अपध्यान पचेन्द्रिय के जिन विषयो को, रागद्वेष के वश मे होकर, विपय विषो का आदर करना, भोग छोड दे वे हैं भोग । करते रहना ऐसा ध्यान । जिन्हे भोग कर फिर भी भोगे, भुक्त विषयको करना याद । उसकी प्रिया मुझे मिल जावे, वर्तमान के विषयो मे भी, मित्रो वे ही है उपभोग । मिल जावे उसके धनधान । रचे पचे रहना अविवाद ।। वह मर जावे वह कट जावे, ( ६६ ) आगामी विषयो मे रखना, उसको होवे जेल महान । त्रस जीवो की हिंसा नहिं हो, तृष्णा या लालसा अपार । वह लुट जावे सकट पावे, होने पावे नही प्रमाद । है अनर्थदडक अपध्यान ॥ इसके लिए सर्वथा त्यागो, करना, ये भोगातिचार ।। ( ६६ ) मास मद्य मधु छोड विषाद ।। अदरख निम्बपुष्प बहुवीजक, दु.श्रुति मक्खन मूल आदि सारी। पाववाँ परिच्छेद जिनके कारण से जागृत हो, तजो सचित चीजें जिनमे हो, ( ७३ ) राग द्वेष मद काम विकार। थोडा फल हिंसा भारी ॥ शिक्षावत-देशावकाशिक आरभ साहस और परिग्रह, पहला है देशावकाशि पुनि, त्यो छावें मिथ्यात्वविचार ।। ( ७० ) सामायिक प्रोषध उपवास । मन मैला जिनसे हो जावे, जो अनिष्ट है सत्पुरुषो के, वैयावृत्य और ये चारो, प्यारो सुनना ऐसे ग्रन्थ । सेवन योग्य नही जो है । शिक्षाव्रत है सुख आवास ।। दु श्रुति नाम अनर्थ कहाता, उन विषयो को सोच समझकर, दिग्वत का लम्बा चौडा स्थल, कहते हैं ज्ञानी निग्रंथ ॥ तज देना जो व्रत सो है ।। काल भेद से कम करना। बिन भोगे विषयो का अनुभव, १६० - प्रतिदिन व्रत देशावकाशि सो, गृही जनो का सुख झरना ॥ ( ७४ ) अमुक गेह तक अमुक गली तक, अमुक गाँव तक जाऊँगा। अमुक खेत से अमुक नदी से, आगे पग न वढाऊंगा।। एक वर्ष छहमास मास या, पखवाडा या दिन दो चार। सीमा-काल भेद से श्रावक, इस व्रत को लेते हैं धार ।। ( ७५ ) स्थूल सूक्ष्म पाँचो पापो का, हो जाने से पूरा त्याग । सीमा के बाहर सध जाते, इस व्रत से सुमहाव्रत आप ॥ हैं अतिचार पाँच इस व्रत के, मँगवाना, प्रेषण करना। रूप दिखाय इशारा करना, चीज फैकना ध्वनि करना। सामायिक निश्चल साधूंगा, ( ८१ ) यो विचार कर, निश्चयतक ।। अपने साम्यभाव को तजकर, मार पलाठी भली भॉति से, कर देना चचल तनको। कायोत्सर्ग रमाया कर। वाणी को चचल कर देना, है बैठना खडा रहना या, कर देना चचल मन को। समय कहा जाता व्रत वर ॥ सामायिक का काल टालना, और पाठ रखना नहिं याद । ( ७८ ) ये अतिचार पाँच इस व्रत के, घर हो वन हो चैत्यालय हो, कहे गये है विना विवाद ॥ कुछ भी हो निरुपद्रव हो। ( ८२ ) हो एकान्त शान्त अति सुन्दर, प्रोषधोपवास परम रम्य औ शुचितर हो । सदा अष्टमी चतुर्दशी को, ऐसे स्थल मे वडो खुशी से, तज देना चारो आहार। तनको मन को निश्चल कर । यह प्रोपध-उपवास कहाता, एकभुक्त उपवास-दिवस या, दिनभर रहे धर्म व्यवहार ॥ प्रतिदिन ही सामायिक कर। अजन मजन न्हाना धोना, ( ७६ ) गन्ध पुष्प सजधज करना। आरभ पाँच पाप हिंसादिक, सामायिक के समय गृही, इस दिन विलकुल परिहरना ।। आरभ परिग्रह तजते हैं। पहिनाये हो वसन जिसे, ( ८३ ) ऐसे मुनि से वे दिखते हैं । तजना चारो आहारो का, साम्यभाव स्थिर रख मौनी रह, होय निराकुल, है 'उपवास'। सब उपसर्ग उठाते हैं। एक बार खाने को कहते, गरमी सरदी मशक डांस के, 'प्रोपध' जो हैं प्रभुपददास ॥ परिषह सव सह जाते हैं ।। दो प्रोषध के बिचमे करना, एक वास* का-कहलाता- (८०) शुद्ध 'प्रोषधोपवास' पूरा, अशुभरूप अशरण अनित्य यह, भव्य जनो का सुखदाता ।। परस्वरूप ससार महान । ( ८४ ) अतिशय दुःखपूर्ण है, तो भी, देखे भाले विन चीजो का- वना हुआ है मेरा स्थान । लेना, मलक तज देना। इससे बिलकुल उलटा सुखमय, मोक्षधाम शास्वत उत्तम । और विछाना विस्तर का त्यो, सामायिक के समय भक्तजन, व्रत कर्तव्य भुला देना ॥ ध्यान धरो ऐसा उत्तम ।। ( ७६ ) सामायिक । पूर्ण रीति से पञ्च पाप का, परित्याग करना सज्ञान । मर्यादा के भीतर बाहर, अमुक समय धर तमता ध्यान ।। है यह सामायिक शिक्षाव्रत, अणुव्रतो का उपकारक । विधि से अनलस सावधान हो, बनो सदा इसके धारक ॥ ( ७७ ) जब तक चोटी मूठो कपडा, बँधा रहेगा मैं तव तक। उपवास १६१ तथा अनादर रखना व्रतमे, है ये पाँचो हो अतिचार। इन्हे छोडकर व्रत को पालो, धारो उर मे धर्म विचार। मुनिको नमनेसे ऊँचा कुल, रूप भक्तिसे मिलता है। मान दास्यसे, भोग दानसे, स्तुतिसे शुचि यश वढता है। जिनपूजा को एक पुष्प ले, मेडक चला मोद धरके। मुआ मार्ग मे हुआ देव वह, महिमा महा प्रगट करके ॥ छट्ठा परिच्छेद (८५) ( ८८ ) वैयावृत्य बड का वीज भूमि मे जाकर, वेयावृत्य या दान के अतोचार जो अनगार तपस्वी गुणनिधि, हो जाता है तरु भारी। हरे पत्रके भीतर रखना, धर्महेतु, उनको दे दान । घेर घुमेर सघन धन सुन्दर, हरे पत्र से ढक देना। प्रतिफलकी इच्छा विन, है यह, देने योग्य भोजनादिक को, समय पाय छायाकारी ।। वैयावृत्य सुव्रत सुखखान ॥ वैसे ही हो अल्प भले ही, पात्र अनादर कर देना ।। गुणरागी होकर मुनिवर के, पात्रदान सुख करता है। स्मरण न रखना देने की विधि, चरण चापिये होय प्रसन्न । अथवा देना मत्सर कर । समय पाय वहु फल देता है, उनका खेद दूर कर दीजे, इष्ट लाभ वहु भरता है ।। हैं अतिचार पाँच इस व्रत के, सेवा कीजे जो हो अन्य ।। इन्हे सर्वथा तू परिहर ।। ( 48 ) 00 ( ८६ ) दान के भेद दान का स्वरूप भोजन, भेषज, ज्ञान-उपकरण सूनारम्भ* तजा है जिनने, देना और अभय आवास । धर्मकर्म हित, हर्षाकार। ( ६२ ) नवधाभक्ति भाव से ऐसे, चार ज्ञानके धारी कहते, सल्लेखना आर्यो का तू गौरव कर ॥ दान यही है चारो खास ।। आ जावे अनिवार्य जरा, निर्लोभीपन, क्षमा, शक्ति त्यो, इनके पालन करने वाले, श्रीषेणौर वृषभसेना। दुष्काल, रोग या कष्ट महान । ज्ञान, भवित, श्रद्धा, सतोप। कोतवाल कौण्डीशव शूकर, धर्महेतु तव तनु तज देना, निर्मलदाता के गुण है ये, सल्लेखनामरण सो जान ।। धारो इनको तजकर दोप ॥ हुए प्रसिद्ध समझ लेना ।। अन्त समय का सुधार करना, ( ६० ) यही तपस्या का है फल । (८७) देवपूजा अत समाधिमरण हित भाई, दान-फल करते रहो प्रयत्न सकल ।। जिसने घर धर्मार्थ तजा, प्रभुपद काम दहनकारी है, उस, अतिथिकी पूजा करना। वाञ्छितफल देने वाले। घर धदे से बढे हुए, उनका प्रतिदिन पूजन करिए, स्नेह, बेर, नम्वन्ध, परिग्रह, पापोका है सचमुच हरना।। वे सब दुख हरने वाले ॥ छोड, गुद्ध मन त्यो होकर । सूना . -पाटना १, पीसना २, आग जलाना ३, पानी भरना ४, बुहारी देना ५ । 5 नवधा भक्ति -ठिगाहना १, उच्च स्थान देना २, चरणोदक माथे लगाना , पूरा करना ४, प्रगाम पारना ५, मन वपन और पाय पो शुटि रखना ६-७-८ और एपणा शुद्धि अर्थात् मुद माहार देना है। - १६२ क्षमा करे निज जन परिजनको, ( ६७ ) (१००) याचे क्षमा स्वय सुखकर ।। सल्लेखना जो धारें, व्रतप्रतिमाधारी मनुज कृत कारित अनुमोदित सारे, पाते हैं वे निरवधि मुक्ति । पांच अणुव्रत सात शील जो, पापो का कर आलोचन । विद्या, दर्शन, शक्ति स्वस्थता, निरतिचार सुखसे धरता ।। निश्चल जीवन भरको धारे, हर्ष शुद्धि, औ अतिशय तृप्ति। शल्यरहित व्रतप्रतिमाधारी, पूर्ण महाव्रत दुखमोचन ॥ तीन लोकको उलट-पलट दे, वतियो मे माना जाता ॥ (६४) चाहे ऐसा हो उत्पात। शिक्षाव्रत हैं चार वताये, शोक, दुख, भय, अरति, कलुषता, नही कल्पशत मे भी होता, तीन गुणव्रत उपकारी। मोक्षप्राप्त जीवो का पात ।। ये सातो मिल शील कहाते, तज विपादकी त्यो ही आह । इन्हे धरे व्रत का धारी॥ शास्त्रसुधा को पीते रहना, (६८) धारण कर पूरा उत्साह ।। ( १०१ ) कीटकालिमाहीन कनक-सी, भोजन तजकर रहे दूध पर, सामायिक प्रतिमाधारी अति कमनीय दीप्ति वाले। दूध छोडकर छाछ गहे। तीन बार करके आवर्तन, तीनो लोक शिरोमणि सोहे, छाछ छोड ले प्रासुक जलको, चार दिशा मे चार प्रणाम । नि श्रेयस पाने वाले ॥ उसे छोड उपवास लहे ॥ करे, परिग्रह सारे तज दे, धन पूजा ऐश्वर्य हुकूमत, धर ले कायोत्सर्ग ललाम ।। सेना परिजन भोग सकल । (६५) खगासन या पद्मासन धर, होय अलौकिक अतुल अभ्युदय, कर उपवास शक्ति अपनी से, होकर मन वच तनसे शुद्ध । सत्य धर्म का ऐसा फल ।। सर्व यत्न से निज मनको। करे वन्दना तीन काल मे, णमोकार मे तन्मय कर दे, सामायिकधारी सो बुद्ध ॥ तज देवे नश्वर तन को। ( १०२ ) जीना चहना, मरना चहना, सातवां परिच्छेद प्रोषधधारी और सचित्तत्यागी डरना, मित्र याद करना । चारो पर्यों मे हर महिने, भावी भोग-वाञ्छना करना, धर्मध्यान मे रत रहकर । हैं अतिचार, इन्हे तजना ॥ (६६) शक्ति छुपाये बिन प्रोषध का, नियम करें वे 'प्रोषध-धर' । (६६) दर्शनप्रतिमाधारी जो नहिं खावें कन्द, मूल, फल, जिनने धर्म पिया है वे जन, ग्यारह पद होते श्रावक के, शाखा, पुष्प, बीज, कच्चे। हो जाते हैं सब दुखहीन । प्रति पद मे पहले गुणयुक्त । दयामूर्ति वे सचित्त त्यागी- तीररहित दुस्तर निश्रेयस, अपने गुण मिल होय पूर्णता, प्रतिमाधारी, हैं सच्चे। यो बुध कहे सुमति सयुत ॥ जहाँ नही है शोक दुख भय, (१०३ ) तत्त्वपथिक है शुचिदर्शन है, जन्म जरा बीमारी मौत। रात्रिभुक्तित्यागी और ब्रह्मचारी भोगविरागी है। है कल्याण नित्य केवल सुख, परमेष्ठीपद शरणागत है, जीवो पर होकर दयालु जो, पावन परमानद का स्रोत ।। दर्शन प्रतिमाभागी है। रजनी मे चारो आहार-1 1 ग्यारह प्रतिमा सुखसागर को पियें प्रवीन । भव-तनु जिनकी अनुमति सोती है । अनुमति त्यागी प्रतिमाधारी, वे सनमति कहलाते हैं। साध भली विधि इस पदवीको, ऊँचा पद पा जाते है ।। इसे पढेगा जो मानव । अच्छे से अच्छा सर्वोत्तम, ज्ञानी होवेगा वह ध्रुव ॥ ( १०६ ) करे नही सो 'रात्रिभुक्ति' का, त्यागी 'दयावान्' निर्धार ॥ मलकारण मलवीज घृणायुत, जान अग, तज देना काम । मित्रो है यह सप्तम प्रतिमा, ब्रह्मचर्य है इसका नाम ।। ( १०४ ) आरभत्याग और परिग्रहत्याग सेवा कृषि वाणिज्यादिक के' आरभसे बस हट जाना। हिंसा हो नहिं इस विचारसे, 'आरभत्याग' इसे माना। ममता तज निर्ममत्वरत हो, बाह्य परिग्रह दस तजना। स्वस्थ और सतोषी होना, परिग्रहत्याग इसे कहना ॥ ( १०८ ) है दर्शन चारित्र ज्ञान ये, तीनो रत्न बड़े सुन्दर । रत्नकरण्ड बनाते हिय को, जो जन धरे इन्हे शुचितर ॥ भली भांति पुरुषार्थसिद्धि हो, उनके चरणो की दासी। वरती है बन पतिव्रता-सी, देती है यो सुख राशी॥ उत्कृष्टश्रावक घरको तज मुनिबनको जाकर, गुरु-समीप व्रत धारणकर। तपते हैं भिक्षासन करते, खडवस्त्रधारी होकर ॥ उत्तम श्रावक का पद यह है, जो मनुष्य इसको गहते। उन्हे श्रेष्ठजन क्षुल्लक ऐलक, भाग्यवान् श्रावक कहते ॥ ( १०७ ) सत्य बात तो यह है मित्रो, पाप जीव का वैरी है। धर्मबन्धु है धर्म मित्र है, धरो इसे क्या देरी है। निश्चय करता हुआ इसी विध, ( १०५ ) अनुमति त्यागी नहिं जिनकी अनुमति आरभमे, परिग्रह मे नहिं होती है। सारे ही लौकिक कामो मे, ( १०६ ) कामी को ज्यो सुख देती है, रमणी, त्यो सुख दो मुझको। माता लाड लडाती सुत को, वैसे लाड करो मुझको ॥ ज्यो पवित्र करती है कुल को, अति पवित्र सुगुणा कन्या। करो मुझे पावन वैसे ही, सम्यग्दर्शन श्री धन्या ।। भारती -दर्शन केन्द्र ॥ समाप्त ॥ J HD पुरू मूलन नोट :-इस ग्रन्थ मे ४००० रुपये से अधिक का कागज लगा है, वह सब जैन पचायत दरियागंज, नई दिल्ली से, मारफत श्री शातीलाल जी जैन कागजी के प्राप्त हुआ है। इसलिए हम उपरोक्त सोसाइटी तथा ला० शान्तीलाल जी के अत्यन्त आभारी हैं।

Lati Samhita

Author
Sharma, Giradhar
Title
Lati Samhita
File name
Lati Samhita
Text
OCR done
Published
2010/06
Publisher
Shastra Sabha Ahinsa Mandir, New Delhi
Language
Sanskrit
Pages
172
Library
Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur
DLI number
327235
Barcode
99999990002718.00
Scanning centre
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Digital publisher
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