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Sudip · 2011/03

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नीड़ सुदीप

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.. कस्वा चार-पांच सौ साल पुराना था। मुमकिन है, वह हजारों साल पुराना रहा हो, क्योकि वहां पुराण- काल के अवशेष भी मौजद थे-टीले, माधे मील में फैला किला, सदियों पुराने मंदिर, खंडहर बारादरियां, मकवरे, बड़ी-बड़ी मस्जिदें, पीरो के मजारलेकिन कस्बे की मौजूदा शक्ल उसे निश्चित रूप से चार- पांच सौ साल पहरो मिली थी : टेढ़ी-मेढी, संकरी गलियां, लखौरी ईंटो के छज्जो वाले, छोटे-छोटे कमरों वाले पर "इंटों से ही बनी ऊबड़- सावड़ सडक । ऐतिहासिक इमारतें... कुल मिलाकर एक अजीव-सा रोमास था उस कस्बे की हवा में, जो मक्सियो और गरमी और पसीने के बावजूद प्रादमी को उन फूलो की खुशबू मे सराबोर किये रहता था, जो किले पर बने बगीचो से पाती रहती थी, जहा गेंदे और गुलाब, चमेली और प्रकीक की क्यारियों के अासपास पाडू और अमरूद के पौधे लगे हुए थे। किले के नीचे कई फलांग तक फैले अनार और पपीते का याग देसने वाले को अपनी रगत मे बाघ लेना था । वाग के बीचो-बीच वनी करीव तीन सौ साल पुरानी बारादरी से अब भी सगीत की झकार उठती महसूस होती थी। कहते है, उने कस्बे के एक नवाय ने अपनी प्रेमिका के लिए बनवाया था। तब वह दुमंजिली थी, नीचे तहखाना था। कार की मजिल पर बैठकर नवाब साहब प्रेमिका के गायन का प्रानद लेते थे। प्राधी रात के बाद नीचे की मंजिल पर संगीतकार अपना सगीत जारी रखते थे और ऊपर की मंजिल पर नवाब साहब अपनी प्रेमिका को पागोस मे गम हो जाते - तहखाने । ऐयाशी का सारा सामान रहता था साथ ही प्रेमिका की सारी लत भी। अब तो ऊपर की मंजिल के नाम पर सिर्फ एक कंगूरा ही बचा । छतें ढह चुकी थीं। दीवारों की हालत भी खस्ता थी-जगह-जगह से ईंटों की'चमड़ी उधड़ रही थी। बीच-बीच में हर तरह के पौधे और लताएं उग आयी थीं। रात के वक्त चमगादड़ और उल्लू अपने पंख फड़फड़ाते रहते थे 'उसके बावजूद फिजा में सदियों पहले का संगीत अब भी बरकरार था-किसी खुशनुमा याद की तरह । मोहन को यह टूटी-फूटी वारादरी अजीव-सा सुकून देती थी। और उसका इस टेकरी से रिश्ता भी बहुत पुराना था. हालांकि अन्य लोग उस तरफ कम ही जाते थे। उस दिन उसका हाई स्कूल का रिजल्ट निकला था। रात उसे नींद नहीं आई थी। अजीव-सी उत्तेजना थी, धुकधुकी-सी लगी हुई थी। पास तो वह हो ही जायेगा, उसे पूरी उम्मीद थी, लेकिन नंबर अच्छे न आये, तो पिता जरूर उसकी खाल खींच लेंगे, यह भी वह जानता था। दो-एक परचे उसके अच्छे नहीं हुए थे, इसलिए वेचैनी-सी भी थी। सुवह वह बहुत जल्दी उठ गया था। उसका कमरा छत पर था। एक अकेला कमरा, जहां वह अपने-आप में गुम रहता था। कमरे से निकलकर वह सीढ़ियां उतर रहा था कि प्रांगन में ही पिता हैंड पंप पर नहाते मिल गये थे। मोहन को ताज्जुब हुआ था। इतनी सुवह तो पिताजी कभी नहीं नहाते थे। पिता का स्नान और 'कृष्ण स्तोत्र', दोनों, साथ-साथ चल रहे थे, बल्कि एक चीज और भी थी, जो स्नान-स्तोत्र के साथ चल रही थी हमेशा चलती रहती थी... "श्री कूल जमुना 'धेनु आगे 'अधर मुरली गिरधरं..." पिता में गा रहे थे---साथ ही मोहन की मां को निर्देश भी दे रहे थे---"तारो, पाजामे में नाड़ा डाल देना मेरा वटुग्रा भी रख देना..." ; - . अपनी धुन - । - और उसके साथ-साथ बदन पर ठंडे पानी के लोटे भी उंडेलते जा रहे थे। मोहन को सीदियो से उतरता देखकर अचानक उनपर रोक लग गई थी। "कहां चले सुबह-सुवह ?" उन्होंने पूछा या । मोहन के पाव वही प्राखिरी सीढ़ी पर जम गये थे। उसकी धड़कन एकाएक तेज हो गयी थी।' चौक तक जा रहा हूं..." "रिजल्ट देखने जा रहे हो, तो घर बैठो "मैं जा रहा हूं."मखवार ले पाऊंगा.. पिता ने कहा था और फिर व्यस्त हो गए मोहन वापस मुड़कर सीढियां चढने लगा था। पिता तयार होकर घर से निकल गये थे। तव मां ने मोहन को बुलाया था। वह नीचे आया था, नहाया था और नाश्ते के लिए बैठ गया था। चाय के साथ प्रालू के दो पराठे खाकर वह पटिया पर बैठा सोच ही इLथाFिiran-जी- दरवाजे पर नमूदार हो गए थे। मां ने सब्जी पूल्हे पर चढा दी थी। कड़ाही में से मालू-मेथी की सोधी-सोपी महक उठ रही थी और साथ ही सू-सू की प्रावाज भी। मा ने दोपहर के खाने के लिए प्राटा भी गूध लिया था। यडे कटोरे मे हाथ धोकर उसने अपने दुपट्टे से ही हाथ पोछ लिए थे। पिता के हाथो में मिठाई की टोकरी थी। उसीके नीचे उन्होंने अखवार भी दबा रखा था। उनके गोल चेहरे पर गर्व का भाव साफ- साफ चमक रहा था। "पास हो गया मेरा मोहन ?" मां ने उन्हें देखते ही कहा था। "होता कैसे नही भागवान!" पिता बोले थे। उन्होंने मिठाई वाली टोकरी मा की तरफ बढ़ा दी थी। "वैटा किसका है ? .."वडे मच्छे नंबरो से पास हुप्रा है" धस, छह-सात नंबरों से फर्स्ट क्लास रह गई- जरा-सी मेहनत मोर करता तो..." "चलो, इसकी मेहनत सुकारय हुई वैष्णोदेवी ने मेरी ली... सुन नी2/ देवी मां जब बुलावा भेजे, तो मैं जाकर चुन्नी चढ़ा आऊ.. पिता खटिया पर बैठ गए थे। "हां-हाँ "जरूर चढ़ाना, तुम्हें रोका किसने है ?" पिता बोले थे। फिर मोहन की ओर मुखातिव हुए थे। "बंस, अव चार साल और जम के मेहनत कर लो 'बी० ए० हो जानोगे, तो मेरी साध पूरी हो जाएगी। हमारे खानदान में तो किसीने मैट्रिक तक पास नहीं किया था ।..." बी० ए० भी हो जाएगा, फिकर क्यों करते हो !" मां ने कड़ाही पर से ढक्कन हटाकर सब्जी को चलाते हुए कहा था। फिर कड़ाही को नीचे उतारते हुए बोली थी, "अब अपना कौल पूरा करो-साइकल ले दो इसे.. "ले दूंगा, भागवान 'अाज ही ले दूंगा..." पिता ने पिता ने मुसकराकर मोहन की ओर देखा था। "अड्डे पर आ जाना मोहन ने सिर हिला दिया था। मां ने पल्लू से पसीना पोंछा था और फिर चूल्हे पर तवा रखते हुए बोली थी. "रोटी साथ ही ले जानोगे या मोहन के हाथ भेज दूं...?" "दे ही दो "वरना हाथ खाला-खाला लगगे..." मां रोटी बनाने लगी थी। बस अड्डे जाते पिता दुर्गादास जयचंद साइकल वाले के पास रुक गये थे। रास्ते से उन्होंने सोमनाथ हलवाई से लड्डू तुलवाकर टोकरी में डलवा लिए थे----वल्कि उस टोकरी में से एक लड्डू सोमनाथ को और एक उसके नौकर को भी दे दिया था, "तुम भी कव-कव खाते होगे लड्डू, सोमनाथ !" उन्होंने हंसते हुए कहा था। "शगुन भी हो जाएगा, तुम्हें अपने लड्डुओं का स्वाद भी पता चल जाएगा ! जयचंद की दूकान तक पहुंचते-पहुंचते आधी टोकरी खाली हो चुकी . -- थी। उन्होंने अपने सामने नयी साइकल निकलवाई थी और कहा था, "जयचंद अव खोती को दुल्हिन की तरह सजा दो"" "अभी सज जाती है, ला' जी।" जयचंद ने लड्डू का स्वाद लेते 8/नीड़ कहा था । "माप वस हुक्म करते जाइए।" जयचंद एकदम सीकिया जबान था। पंतीस-मैतीस की उम्र पतला, लंयोतरा चेहरा। पर उसने मूछ बड़ी जोरदार रखी हुई थी । दुर्गादास जी ने उमकी दूकान जमवाने में काफी मदद की थी और यह उनका अहसान मानता था। साइकल पर सामने की टोकरी, दोघंटियां, एक बड़ा-सा शीशा, पौर हैंडिल पर बत्ती और रूमाल-ये सब चीजें लग गई, तो जयचंद बोला, "ला' जी, पीछे वाली यत्ती भी लगाएं?" "लगा दो-वह भी लगा दो! लड़का मानने वाला थोड़े ही है उसके बगैर !" दुर्गादास सन्तुष्ट हो गए थे। बोले, "मैं अड्डे जा रहा हूं-देर हो रही है। साइकल भेज देना और बिल भी-वैसे वाजिव लगाना..." "दूकान मापकी है, ला' जी," जयचंद वहे विनम्र भाव से बोला था । "पंसों का क्या है..." दुर्गादास हंस दिए थे---उनकी आवाज जितनी रोवदार थी, हंसी उतनी ही खनकदार थी । चलते-चलते उन्हें किसी बात का ध्यान मा गया था और वह रुक गए थे, "जयचंद!" "हां, ला' जी..." "इम लोहे को घोडी को फुदने भी लगा देना..." "अच्छा जी...वो भी लग जाएंगे..." यम-अड्डे पर दुर्गादास जी का अपना छोटा-सा दफ्तर था, उनकी तीन बसें चलती थी। दोपहर होने को पा रही थी। सूरज धरती पर अपनी गरमी ऐसे उंडेल रहा था, जैसे वह मुद भी उसमे परेशान हो रहा हो। जमीन से तपिश की लहरें उठ रही थी। गलती से भी किसीके दाने जमीन पर गिर गए होते, तो विना-भाव भुन जाते। दफ्तर में एक ही टेवल फैन था, जो एक स्टूल पर रखा था। एक कोने में मुराही पड़ी थी, रेत से माघी दबी हुई। रेत भी गीली । पानी को ठंडा करने का इसमे अच्छा कोई तरीका नहीं था। नीड/9 " देवी मां जब बुलावा भेजे, तो मैं जाकर चुन्नी चढ़ा आऊं. पिता खटिया पर बैठ गए थे। "हां-हाँ "जरूर चढ़ाना, तुम्हें रोका किसने है ?" पिता बोले थे। फिर मोहन की ओर मुखातिब हुए थे । “वस, अब चार साल और जम के मेहनत कर लो "बी० ए० हो जानोगे, तो मेरी साध पूरी हो जाएगी" हमारे खानदान में तो किसीने मैट्रिक तक पास नहीं किया था।..." वी० ए० भी हो जाएगा, फिकर क्यों करते हो !" मां ने कड़ाही पर से ढक्कन हटाकर सब्जी को चलाते हुए कहा था। फिर कड़ाही को नीचे उतारते हुए बोली थी, "अब अपना कौल पूरा करो-साइकल ले दो इसे.. "ले दूंगा, भागवानाज ही ले दूंगा..." पिता ने पिता ने मुसकराकर मोहन की ओर देखा था। "अड्डे पर आ जाना मोहन ने सिर हिला दिया था। मां ने पल्लू से पसीना पोंछा था और फिर चूल्हे पर तवा रखते हुए बोली थी. "रोटी साथ ही ले जानोगे या मोहन के हाथ भेज दूं...?" "दे ही दो वरना हाथ खाला-खाला लगगे' मां रोटी बनाने लगी थी। बस अड्डे जाते हुए पिता दुर्गादास जयचंद साइकल वाले के पास रुक गये थे। रास्ते से उन्होंने सोमनाथ हलवाई से लड्डू तुलवाकर टोकरी में डलवा लिए थे-बल्कि उस टोकरी में से एक लड्डू सोमनाथ को और एक उसके नौकर को भी दे दिया था, "तुम भी कव-कव खाते होगे लड्डू, सोमनाथ !" उन्होंने हंसते हुए कहा था। "शगुन भी हो जाएगा, तुम्हें अपने लड्डुओं का स्वाद भी पता चल जाएगा!" जयचंद की दूकान तक पहुंचते-पहुंचते आधी टोकरी खाली हो चुकी थी। उन्होंने अपने सामने नयी साइकल निकलवाई थी और कहा था, "जयचंद अव खोती को दुल्हिन की तरह सजा दो..." "अभी सज जाती है, ला' जी।" जयचंद ने लड्डू का स्वाद लेते हुए 8/नीड़ कहा था। "माप वस हुक्म करते जाइए।" जपचंद एकदम सीकिया जवान था । पंतीस-मतीस की उम्न । पतला, लंबोतरा चेहरा । पर उसने मू0 बड़ी जोरदार रखी हुई थी। दुर्गादास जी ने उमरी दूकान जमवाने में काफी मदद की थी और यह उनका प्रहमान मानता था। साइकल पर सामने की टोकरी, दो घटियां, एक वड़ा-सा शीशा, और हैरिल पर बत्ती और रूमाल--ये सब चीजें लग गई, तो जपचंद बोला, "ला' जी, पीछे वाली यती भी लगाएं?" "लगा दो-वह भी लगा दो ! लड़का मानने वाला पोहे ही है उमके वगैर!" दुर्गादास रान्तुष्ट हो गए थे। बोले, "मैं अड्डे जा रहा ह-देर हो रही है। साइकल भेज देना और बिल भी-मे वाजिब लगाना..." "दूकान प्रापको है, ला' जी," जयचंद वडे विनम्र भाव से चोला पा।"पनों का क्या है..." दुर्गादास हंस दिए थे-उनको प्रावाज जितनी रोवदार थी, हसी उतनी ही सनकदार थी । चलते-चलते उन्हें किसी बात का ध्यान पा गया घा पोर वह एक गए थे, "जयचंद ।" "हा, ला' जी..." "हम लोहे की घोटी को कुंदने भी लगा देना..." "अच्छा जी.. वो भी लग जाएंगे..." यम-अड्डे पर दुर्गादास जी का अपना छोटा-सा दपतर था, उनकी तीन बमें चलती थीं। दोपहर होने को पा रही थी। मूरज धरती पर अपनी गरमी एंगे उहल रहा था, जैसे वह खुद भी उसगे परेशान हो रहा हो। जमीन गे तपिग की लहरें उठ रही थीं। गलती से भी किसीके दाने जमीन पर गिर गए होने, तो विना-भाव मुन जाने । दफ्तर में एक ही टेवल फैन था, जो एक स्टूल पर रखा था। एक कोने मे सुराही पड़ी थी, रेत में प्राधी दवी हुई। रंत भी गीली । पानी को ठंडा करने का इममे अच्छा कोई तरीका नहीं था।

दुर्गादास जी पंखे की हवा के वावजूद पसीना-पसीना हो रहे थे। रजिस्टर में हिसाब-किताब लिख रहे थे, लेकिन हाथ का पसीना रजिस्टर को भी भिगोये दे रहा था। उन्होंने पगड़ी को उतारकर मेज पर ही रख लिया था और कमीज के ऊपर वाले दो बटन भी खोल लिये थे। उनके खिचड़ी बाल और मूंछे, कानों की चमकती हुई सोने की सुरकियां- सब पसीने से सराबोर हो रहे थे। "रक्खे ! ..'यो रक्खे !" उन्होंने आवाज दी। रामरक्खा उनका नौकर था, लेकिन उस वक्त वह अपने स्टूल पर नहीं था। दुर्गादास जी को प्यास लगी थी, वह झंझला गये। फिर उठकर खुद ही पानी का गिलास भरकर पीने लगे। तभी बाहर एक वस आकर रुकी। दुर्गादास जी ने प्रावाज से ही पहचान लिया, उन्हींकी बस थी। थोड़ी ही देर बाद ड्राइवर मक्खन सिंह चिक उठाकर अंदर आ गया। "सात्रीकाल, ला' जी!" मक्खन सिंह ने आते ही कहा, दुर्गादास जी ने जवाब में अपनी गरदन हिला दी। मक्खन सिंह पचास के आस-पास का जाट था। लुंगी उसने जट के ग से ही बांध रखी थी और ऊपर कमीज पहन रखी थी। वह जूतियां बड़काता हुया पाया और दुर्गादास जी की मेज के पास रखी कुर्सी पर ठ गया। उसके हाथ में अलगोजा था, जिसे उसने मेज पर रख दिया। दुर्गादास जी वापस आकर कुर्सी पर बैठे, तो मक्खन सिंह की नजर नयी साइकल की तरफ चली गयी। "क्या वात है, ला' जी. सकल रख लई है ?" उसने पूछा। "नहीं, मक्खन सिंह ! मैं अब इस उम्र में क्या साइकिल चलाऊंगा! दुर्गादास जी हंसते हुए वोले, “मोहन के लिए है," फिर उन्होंने लड्डुओं वाली टोकरी मक्खन के सामने कर दी । “लो, लड्डू खायो ! मोहन पास हो गया है..." "इच्छा ! यह तो बड़ी चंगी खवर है जी!" मक्खन ने लड्डू उठा लिया, "मुवारकां! "और सुनायो-गाड़ी ने कोई तकलीफ तो नहीं दी रास्ते में ?" - . 1 " "नई जी-विल्कुल नई ! मेरे नांव की तरह चलदी रई है ! पवन ने लड्डू मुंह में डाल लिया। तभी मोहन मा पहुंचा था। "प्रा-मा पुत्त! तेरा ही जिकर हो रहा था!" मालन ने किमी रह लड्डू को गले में नीचे उतारते हुए कहा। फिर उमे मेज पर रखे चलगोजे का ध्यान पा गया। उसने अलगोजा उठाकर मोहन पी पोर बढ़ा दिया, 'यह लो, मेरा तोहफा!" मोहन ने अलगोजा ले लिया था। मलगोजा वाकई खूबसूरत था। बड़े उजले रंगों वाला और उसका तीच का हिस्सा बारीक तार के डिजाइन मे ढका दृप्रा था । वह अलगोजे को प्यार से देय ही रहा था कि दुर्गादाम जी के गब्द उसके कानों में करा गए, "क्या बात है मक्सन सिंह ! मेरे मोहन को सचमुच का प्ण पन्हैया धनाने का पयाल है !" माय ही उनकी सनपनाती हुई, रारत-भरी हंसी गूंज उटी थी। "नहीं, ला' नी। एक वस-अड्डे पर विक रहे थे-मैंने खरीद लया...॥ मोहन दीवार के साथ रखी नयी साइकिल को हसरत-भरी निगाही देखने लगा। पास जाकर उसने गद्दी पर हाथ रखा। गद्दी काफी नरम गे। हैंडल को छुपा, तो वह गरम लगा। दो-नीन पल वह ऊहापोह में सा मामोश रहा। फिर धीमे स्वर में बोला, "ले जाऊं, वाऊजी ?" "तुम्हारी चीज है, ले जानो"यहां पडे देने के लिए तो रसी नही है!"वाळजी बोले थे और मोहन ने प्रलगोजे को साइकिल को टोकरी डालकर हंडत मे पकड़कर साइकल को ठेल लिया था। वह बाहर नकलने को ही था कि दुर्गादाम घोल उठे थे, "प्रब मारा दिन इस सोती र प्रावारागर्दी मत करते रहना.." मोहन ने इफकर वान को सुन लिमा पा पौर फिर विना कुछ बोले हर चला गया था। जाने-जाते उसके कानो में दुर्गादाम जी के ये शब्द भी टकरा गए थे-"मुअर का पुत्तर ! लड़कियों की तरह परमाता नौह /11 मक्खन को और कुछ नहीं सूझा था, तो उसने अपनी हथेली फैला दी थी--"ला' जी, एक लड्डु होर..." दुर्गादास जी मुस्करा दिए थे और उन्होंने टोकरी मक्खन सिंह की ओर बढ़ा दी थी। साइकल मिलते ही जैसे मोहन को पर लग गए थे। उसे गरमी और लू की भी परवाह नहीं रह गई थी। वह भरी दोपहरी में ही पूरे शहर का चक्कर लगा गया था। जी० टी० रोड से होता हुआ वह शहर के पुराने मोहल्लों में उतर गया था, वहां से बाहर के खंडहरों की ओर । फिर खेतों के बीच बनी पगडंडियों से होता हुआ वह देवी मंदिर का चक्कर लगा आया था। किले पर बनी सड़क पर उसने चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन अधबीच ही उसका दम फूल गया था। बाकी की चढ़ाई उसने साइकल को अपने साथ ठेलते हुए पूरी की थी और फिर ऊपर पहुंचते ही साइकल पर दुवारा सवार हो गया था। प्रागे फिर ढलान थी, पैडल मारने की जरूरत ही नहीं थी। सड़क लखौरी इंटों की थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे थे। फिर भी उस ढलान पर साइकल को दौड़ाते हुए उसे बड़ा मजा पाया था । फिर किले के साथ-साथ गई सड़क से गुजरते हुए वह वारादरी में या गया था। अाजादी-भरी इस यात्रा' ने मोहन का दिल हवा की तरह हलका कर दिया था। लेकिन घर की दहलीज में पांव रखते ही उसका सारा हलकापन काफूर हो गया। वाऊजी घर पा चुके थे। वे बोलते जा रहे थे। उनकी आवाज में चिड़चिड़ापन था और खीज थी। मां खाना बनाने में व्यस्त थी और सिर झुकाए सुनती जा रही थी। "यही खरावी है तुम्हारे लाड़ले में ! रात होने को आ गई, उसका अभी तक पता नहीं है: "वस''अवारागर्दी! सारा दिन आवारा- गर्दी!"वाऊजी बोलते जा रहे थे। 12/नीड मोहन के पैरों में जमे कोले टोक दी गई थीं। वह दहलीज पार नहीं फर पा रहा था। "प्रा जाएगा" क्यों अपना खून जला रहे हो?" मां ने भी खोजकर कह दिया था। "खून न जलाऊं, तो क्या घी पियूं ?" वाऊजी के गुस्मे की माग पौर भी भड़क उठी। "मोहन की मां, जो भादमी वक्त की कद्र नही करता, वस्त भी उसकी कोई कद्र नही करता!" चाऊजी प्राप्त वचनों पर उतर पाए थे। दहलीज में सड़े रहने का कोई मतलब नहीं था। मोहन ने पाय प्रागे बढ़ा दिया। माइकल के पहियो की हलकी-हलकी मावाज ने दुर्गादास जी का ध्यान खीच लिया। मोहन के थके हुए चेहरे पर उनको पाखें दो क्षणी के लिए टिकी । मोहन ने प्रांख नहीं मिलाई, फिर बाजी मां से ही कहने लगे, "लो, देय लो अपने साहबजादे को मूरत ! मूरमा सारा हर फतह करय पाए है!" मोहन वैगे ही पिता के सामने मुह नहीं बोलता था। इस वक्त तो कुछ भी कहने का सवाल ही नहीं उठता था। अपनी साइकल को ठेलते हुए वह सीढ़ियों की तरफ चल दिया। सीढ़ियों के पास पहुंचकर उसने साइकिल को कंधे पर उठा लिया। उमने पहला कदम उठाया ही था कि वाऊजी का सवाल मामा: "कहा मे पा रहे हो ?" मोहन कुछ नहीं बोला। "बोलते पयों नही ? जवान गिरवी रख पाए हो क्या ?" मावाज मे तुर्गी बढ गई थी। मोहन को लगा, अब कुछ न कुछ कहना ही पहेगा। उसने कुछ बोलने के लिए मुंह सोना ही या कि बाऊजी की तेज आवाज ने उसका मुंह बद कर दिया। "हां-हां, सोच लो कोई बहाना"योल दो कोई झूठ! पर यह मत बहना कि सारा दिन सड़कें नापते रहे हो !."मरे, इतना टी रोड-ईस्पेक्टरी का तो पढ़-लिख लो, नौकरी मैं दिलवा दूंगा, प्रोवरसियर की ! सारा दिन सड़कें नापते रहना! !" "अव बस भी करो !" मां ने उन्हें टोक दिया, "तुम तो सवार ही हो जाते हो एकदम ! ..." फिर वह मोहन से वोली, "चल, हाथ-मुंह धो ले''मैं खाना लगा रही हूं..." दुर्गादास जी तारा की ओर घूरकर रह गए। मोहन साइकल को उठाकर सीढ़ियां चढ़ने लगा, तो दुर्गादास जी ने हुक्के की नाल अपनी तरफ खींच ली। दो-एक कश लेने के बाद वह वोल उठे, "नई दुल्हन है."चार-छह दिन कमरे में संवारकर रखेगा' बाद में गू खाती रहेगी आंगन में..." . ... : खाना खाते समय दुर्गादास जी तो सामान्य हो चुके थे। लेकिन मोहन मन ही मन कुढ़ रहा था। थोड़ी देर पहले की डांटे का असर तो था ही, यह खीज भी थी कि वाऊजी एक वक्त में एक काम करने में यकीन क्यों नहीं रखते ! नहाते हैं, तो बोलते हैं, चलते हैं, तो बोलते हैं, हुक्का पीते हैं, तो बोलते हैं । अब खाना खा रहे हैं, तब भी उनका बोलना जारी है ! वह चुपचाप सिर झुकाए खाना खा रहा था और बाऊजी खाते भी जा रहे थे और उपदेश भी देते जा रहे थे। "प्रादमी उद्यम से ही इन्सान बनता है "वरना आदमी और सूअर में फर्क ही क्या है ?" उन्होंने मोहन की तरफ देखा, लेकिन उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया न पाकर वह वोले, "मैं तुम्हींसे कह रहा हूं, सूअर!" मोहन ने चिहुंककर बाऊजी की ओर देखा, फिर सिर झुकाकर खाने लगा। दुर्गादास जी ने अपना भापण जारी रखा, "यादमी जी लगा के मेह- नत करे, तो फल उसे जरूर मिलता है । मुझे ही देख लो चौदह साल का था, जब तुम्हारे दादा की मौत हुई, क्या-क्या नहीं किया मैंने घर चलाने के लिए ! गांव-गांव कपड़े की फेरी लगाई. वसों में कुलीगीरी की "फिर अपना काम शुरू किया"घर बनाया 'शादी की.."आज तीन-तीन बसें है मेरे पास किस चीज की कमी है ! पंमा है, मान है, इग्जत है."लोग प्रदव और प्यार से बात करते हैं। इन्मान को पोर क्या चाहिए 'प्रादमी में मेहनत का माद्दा होना चाहिए। वम, फिर नो प्रॉब्लम!" मोहन का हाय पाली पर ही भटका रह गया था। दुर्गादास जी का ध्यान उधर गया, तो उन्होंने झिड़क दिया, "रोटी खामो''मैं तुम्हारा याप ह, कोई दुश्मन नहीं..." मोहन ने फिर साना शुरू किया, तो वाऊजी का एक माप्त वचन पोर मा गया, "इनसान को चाहिए कि वह अपने दिलो-दिमाग को लोहे का बना ले. ताकि कोई मुसीवत प्राए, तो इनसान न टूटे-मुमीवत टूट- कर पीछे हट जाए." साना सरम हुपा, सो मोहन ने चाहा कि वह तुरंत अपने कमरे में चला जाए । दिन भर की थकान, धूप-लू को गरमी पोर वाऊजी के उपदेशों ने उसे बहुत थका दिया था। लेकिन बाऊजी ने उसे फिर विठा लिया। दुर्गादास जी की प्रादत घी, साना साने के बाद वह पोडी देर कुरसी पर वैटकर प्राराम करते थे। थोडे-से सौफ खाते थे और फिर हुक्के के चार-छह का लगाकर सोने जाते थे। टाग पर टांग चढाए वह हाथों को रगडकर सौंफ को साफ कर रहे थे । फिर उन्होंने फूक मारकर तिनको को उडाया, सौंफ को मुंह में डाला पौर उमे चबाने लगे। मोहन हाथों में डायरी लिये खटिया पर बैठा था। दुर्गादास जी ने एक नजर उसपर डाली, मुह में भरे सौंफ के रस को गले में नीचे किया और फिर बोले, "यह हायरी मैंने तुम्हें इसलिए दी है कि अपनी गलतियां और अच्छाइयो का हिसाव-विताच रस सको। तुम मुझसे झूठ बोल लोगे, मा मे भी झूठ बोल लोगे, लेकिन डायरी से नहीं बोल पामोगे"इनसान अपनी गलतियों को समझे और उन्हें सुधारने की कोगिरा करे, तो समझ लो, जिदगी में नो प्रॉब्लम ! समझे ?" "जी, चाऊजी !" माहन ने फौरन जवाब दिया। अब मोर बैठे - रहना उसके लिए मुमकिन नहीं था। वह उठ खड़ा हुआ। "एक वात याद रखो," वाऊजी फिर वोलने लगे, लेकिन उनका स्वर पहले-सा तल्ख नहीं था। "हर बाप की यह स्वाहिश होती है कि उसकी प्रोलाद उससे बेहतर साबित हो मोहन सिर झुकाए खड़ा रहा। "समझे या नहीं ?" "जी, वाऊजी..." मोहन सीढ़ियों की तरफ चलने लगा, तो तारा ने दुर्गादास जी से पूछा, "तुम्हारा विस्तर कहां लगाऊं? आंगन में या अंदर?" "गरमी है, भागवान''प्रांगन में ही लगा दो-लेकिन रुको, पहले मैं पानी छिड़क देता हूं दुर्गादास जी ने नल से पानी की दो-तीन बाल्टियां भरकर आंगन में डाल दीं। तपते हुए फर्श से गरमी की लहरें उठ रही थीं। तारा ने खटिया विछाकर विस्तर लगा दिया। दुर्गादास जी विस्तर पर लेट गए। फिर जैसे खुद ही से वोले, "समझ नहीं पाता हमारे घर में इतना दब्बू लड़का कैसे पैदा हो गया। "दवू तुम्हीने बनाया है उसे !" तारा बोली, "पहले लाड़ लड़ाते रहे, अब डांटते हो..." "लाड़ तो तुमने भी कव नहीं किया !" "क्या करती "छह-छह बच्चे हुए और वचा एक भी नहीं..'मोहन होने वाला था, तो दिन-रात यही प्रार्थना दिल से उठती थी---इसे बचाए रखना, मेरे प्रमुहथेली के छाले की तरह रखूगी इसे..." "वह तो ठीक है, तारो "पर मुझे डर है, हथेली का यह छाला किसी दिन दिल का फफोला न वन जाए..." दुर्गादास जी ने एक लंबी प्राह खींच ली। "फिजूल की बातें बहुत सोचते हो !" तारा ने हल्के से झिड़क दिया उन्हें, फिर पूछा, "दूध अभी लाऊं या रुककर पियोगे ?" "ले प्रायो..." वह अनमने-से बोले । तारा रसोई की मोर चली गई।

मोहन प्रक्सर अपने प्रापमें गुम रहता था, लेकिन ऐसे दिन उसे और भी अंतर्मुखी बना जाते थे। शायद कोई ही दिन ऐसा हो, जब याऊजी उसे डाटते-फटकारते न हो। लेकिन वह इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाता था कि यह उनकी पादत है-और मादतों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए । बाबूजी एक विशालकाय दहशत बनकर उसको चेतना में पंट गए थे। वह डायरी खोले बैठा था। माघा साल निकल चुका था। उसे समझ में नहीं पा रहा था कि उस डायरी में वह क्या लिखे। चीजो को ज्यादा विश्लेपित करने की उसकी प्रादत नहीं थी, वरना शायद वह अपनी प्राज तक की जिंदगी और अपने रिश्तों को ही डायरी में लिख डालता । डायरी के पहले पन्ने पर उसने अपना नाम जरूर लिख दिया था और उमके बाद पाज की तारीस का पत्ता सोलकर बैठ गया था। पन्ने पर लिसी हुई तारीख कल इतिहास और प्रतीत की चीज हो जायेगी । इतिहास गंभीरता को अपेक्षा रखता है । झूठा इतिहास लोगों को गुमराह कर सकता है. इस पयाल से ही मोहन का सारा तनाव धुल गया। उसे लगा, वह किमी दानिक की तरह 'सोचने लगा है। किमी प्रोफेसर की तरह ...और उसकी कलम डायरी के उस बाली पन्ने पर चलने लगी। उसने लिखा: "प्राज बाऊजी ने यह डायरी मोर नयी साइकल मुझे दी है --मेरे पास होने की खुशी में । वाहते हैं, मैं सबसे झूठ बोल लूगा, डायरी में नहीं वोल पाऊगा। " याऊनी ऐमे क्यों है ? इतना गुस्सा उनमे कहा मे मा गया ? क्या मेल्फमेड प्रादमी ऐसा ही होता है ? " वाऊजी कहते हैं, काम कोई भी फरो, पूरी लगन और मेहनत से फरो, फल भाग्य पर छोड़ दो-तो, नो प्रॉब्लम ! ...लेकिन प्रॉटनम कैमे नहीं ?..." इसके पागे मे कुछ नही मूझा। थोडी देर वह वैसे ही बैठा रहा, फिर डायरी मोर पेन उठाकर विस्तर पर लेट गया। वाळजी ने उसके विचारो को ग्रस रखा था...

। - .."तंब मोहन आठवीं कक्षा में पढ़ता था" हकीम हीरालाल का बेटा चंदेर उसका सहपाठी और दोस्त था। दोनों अक्सर साथ रहते थे, साथ खेलते थे। चंदर के धुंधराले वाल मोहन को बहुत अच्छे लगते थे और अपने पिता की ही तरह चंदर सलवार-कमीज पहनता था । उस दिन दोनों में शर्त लग गयी थी। चंदर कहता था-पहली बार सिगरेट पीने से आदमी को चक्कर आ जाता है, खांसते-खांसते उसका दम निकल जाता है । मोहन ने कहा था, कोई जरूरी नहीं है । स्कूल से छुट्टी होने के बाद चंदर मोहन को अपने पिता की दूकान पर ले गया था। पिता दोपहर को घर खाना खाने जाते थे। तब चंदर को दो-तीन घंटों तक दूकान पर ही वैठना होता था । दूकान पर पहुंचकर चंदर ने अपनी कमीज की जेब से दो वीड़ियां निकाल ली थीं और मोहन को दूकान के पिछले कमरे में ले गया था। भगवान की मूर्ति के सामने से उसने माचिस उठाई थी और दोनों वीड़ियां सुलगाकर एक मोहन की ओर बढ़ा दी थी। मोहन ने एक भरपूर कश लिया था और दूसरे ही क्षण वह बुरी तरह खांसने लगा था। उसे सचमुच चक्कर आ गया था। चंदर हंसने लगा था। "क्यों वेटे ! हमने क्या कहा था! मोहन कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। उसकी हालत खराब थी। पूरा बदन पसीने से तर हो गया था। बीड़ी को वहीं फेंककर वह सिर पकड़कर बैठ गया था। चंदर ने वीड़ी को उठाकर दूकान से बाहर फेंक दिया था और एक चम्मच गुलकंद ले आया था। मोहन को देते हुए वह बोला था, "ले, खा ले, अभी ठीक हो जायेगा..." मोहन ने गुलकंद को निगल लिया था, पर उसका स्वाद भी अजीब लग रहा था। लगता था, जैसे उसमें भी तंवाकू धुल गया हो। फिर चंदर ने एक गिलास पानी उसे दिया था। पानी पीने से मोहन का सिर कुछ-कुछ ठीक हो गया था। "निकाल दस्सी!' उसे सामान्य होते देख चंदर वोला था। "शर्त हार गवान!"

"दस्सी में जहर देता." मोहन ने कहा, "पर तुमने बदमाशी की! शतं सिगरेट को थी, वीडी की नहीं!" "यह बात है ! "तो ठीद है । तुन सिगरेट का मसर भी देख लो।" "ठीक है, कल वह भी देख लेंगे।" और थोड़ी देर वहां प्रौर बैठे रहने तथा हकीम माहब के गुलकंद के मतवान को योड़ा-सा और साली कर देने के बाद मोहन वहाँ मे बना प्राया था। मोहन को जैव-सर्च के लिए दस पंमें रोज पिता से मिरते थे। बाजार से चीजें लेकर पाने की उसकी ज्यादा प्रादन नहीं थी। प्रामर वह पैमों को अपनी गुल्लक में डाल देता था। और जब गुल्लक भर जाती थी, तो अपने काम को कोई चीज खरीद लाता था। पवंग और डोर ऐसे ही पाती थी। एक बार वह बाजार में चमड़े को बैल्ट ले माया पा। 'चंदामामा' जैसी पत्रिकाएं भी इसी पैसे में माती थी। पर उस दिन उमने एक सिंगरंट सरीद लिया और उसे बस्ते में छिा- कर रख लिया। दुसरे दिन वह घर में सबसे पहले उठा था। सिगरेट को उमने निवकार की जैव मे रख लिया था। एक टूटी हुई दियासलाई यो डिबिया का ममाने वाला टुकड़ा तया नौन-चार तोलिया भी उमने जेब में साल लीपी। नव वह छन पर बने पापाने में घुस गया था। उमको नजर में मिम रेट का परीक्षण करने के लिए इससे ज्यादा मुरक्षित जगह प्रौर नहीं थी। पानाने में बैठे-बैठे कापते हुए हायो ने उसने सिगरेट को होठों में लगाया और फिर दियासलाई को जलाने की कोशिश करने लगा। दो सो कार हो गई। तीसरी विमी तरह जनी, पर सिगरेट के पाम तक पहुंचने-पहुंचते यह भी बुझ गई। मय एक ही सौंक बची थी । मोहन अमला उठा । उसने ज्यादा तीलियों पयों न रख लो ! संर, किसी तरह हमने तीली को सिगरेट के करीब रखकर हो जताया और भद मे उमें मिगरेट के पास रख दिया। दो-तीन मुझे सोचते ही सिगरेट मुलग गई, .

" साथ ही खांसी का दौरा शुरू हो गया। तभी प्रांगन से वाऊजी की आवाज आई थी, “मोहन की मां! मोहन कहां है ? अाज इत्ती जल्दी कैसे उठ गया ! "जोर पड़ा होगा.. रात को कहता था, दुखता है..." मां की आवाज पर सुनाई दी थी। और उसके साथ ही सीढ़ियों पर पिता के कदमों की घमक पाने लगी थी। मोहन की रूह कांप गई थी। उसने जल्दी से सिगरेट को मोरी में फेंक दिया और उसपर पानी डाल दिया, लेकिन दरवाजे की दरार में से बाहर निकलती धुएं की लकीर पर पिता की नजर पड़ गई थी। पिता मुलायम मन लिए ऊपर पाए थे, पर धुएं की लकीर देखते ही उनका माथा ठनक गया । कड़ककर उन्होंने अावाज दी, "मोहन !" मोहन की जान सूख गई। जल्दी-जल्दी पानी गिराकर उठा, तो हाथ कांप उठे। घबराहट में निक्कर के बटन ऊपर-नीचे लग गए। "बाहर निकल, हरामजादे !" पिता की दूसरी आवाज आई। मोहन ने दरवाजा खोला, तो पिता ने सीधे उसका कान पकड़ लिया। "क्या कर रहा था अंदर ? सच बता दे, वरना कान सिर से अलग हो जाएगा !" "कुछ नहीं, वाऊजी..." पिता ने कान को और जोर से उमेठ दिया था। मोहन की आंखों में असू मा गए थे। "सूअर की औलाद ! झूठ बोलता है ! कुछ नहीं कर रहा था, तो धुमां तेरी मां के पेट से निकल रहा था ! सच बता दे, सिगरेट पीना कहां से सीखा?...॥ "सीखा नहीं बाऊजी 'पहली बार.." "सच कहता है ?" "हां, बाऊजी. 'देवी की सौंह मोहन रोने को हो पाया था." पिता ने कान छोड़ दिया था। बोले थे, "जरूर तेरी सोहबत हकीम के पूत से है वही ये करतूतें करता फिरता है." मोहन को लगा; वात वढेगी। यों ही बोल गया: "महीं बालजी..." -- 20/नोड़ फिर झूठ ! चल भाग जा नीचे, वरना मान सुबह-सुबह तेरी साल हिल जाएगी। हकीम के बेटे से मैं अपने-माप निपट सूंगा."पौर पित पासाने याले डिब्बे में पानी उडेलने लगे थे। फिर भीतर घुसते हुए बोले, "जाकर नहा ले स्कूल को देर हो जाएगी. नीचे उतरफर मोहन नहाने-धोने में लग गया था। उसका मुंह फूला हुप्रा था। मां ने कुछ-कुछ बात सुन ली थी, पर बाप-बेटे के बीच साम- खाह माना उमे पसंद नहीं था। न ही वह किसीको तरफदारी करती पी पति या स्वभाव यह जानती थी। उस दिन मोहन स्कूल के लिए जितनी जल्दी तयार हुमा पा, उतनी जल्दी तैयार हो सकने की यह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। उनका मन याह रहा था, वह पिता के नीचे उतरकर पाने से पहले ही स्कूल चला जाए । लेकिन बहुत जल्दी तैयार होने के बावजूद वह मा को दी हुई दही-रोटी खा रहा था, जय पिता मा गए थे। यह तो अच्छा हुमा कि एक बार पूरकर देखने के अलावा पिता ने कुछ नहीं कहा। यह एक नजर ही मोहन के गले में रोटी को झटका देने के लिए काफी धी। पिता दातुन करने लगे और सौ.सो करके गला साफ करने लगे, पर मोहन से पोर नही साया गया। मा ने स्कूल के लिए नमकीन पराठा चीपडे मे बाधकर दिया। मोहन ने उसे जल्दी से बस्ते में रसा और स्कूल के लिए चल पड़ा। मांगन में नल के पास बैठे वाळजी नहाने लगे थे। मौर साथ ही अपना नियमित कृष्ण-स्तोत्र गायन भी करने लगे थे। मोहन ने उनकी प्रोर देशे बिना ही द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए कि पीछे से पावाज भाई थी, "हरामजादे, मय दुबारा गलती नहीं होनी चाहिए। तुमने सब बोल दिया, इसलिए बच गये, वरना दो पानी के बीच सिर कर देता..." मोर द्वार के बाहर होते हुए मोहन ने बाजी का तकिया कलाम मुना था, "सच्चे इनसान के लिए दुनिया मे"नो प्रॉग्लम..." .."प्रय विस्तर पर लेटे-लेटे उमे ऐसा लग रहा था जैने बानी ने एक बार फिर उसका कान उमेठ दिया हो और उसका पूरा सिर दर्द में , साथ ही खांसी का दौरा शुरू हो गया. तभी आंगन से बाऊजी की आवाज आई थी, "मोहन की मां! मोहन कहां है ? आज इत्ती जल्दी कैसे उठ गया!" "जोर पड़ा होगा. रात को कहता था, दुखता है मां की आवाज पर सुनाई दी थी। और उसके साथ ही सीढ़ियों पर पिता के कदमों की धमक आने लगी थी। मोहन की रूह कांप गई थी। उसने जल्दी से सिगरेट को मोरी में फेंक दिया और उसपर पानी डाल दिया, लेकिन दरवाजे की दरार में से बाहर निकलती धुएं की लकीर पर पिता की नजर पड़ गई थी। पिता मुलायम मन लिए ऊपर पाए थे, पर धुएं की लकीर देखते ही उनका माथा ठनक गया । कड़ककर उन्होंने अावाज दी, "मोहन !" मोहन की जान सूख गई। जल्दी-जल्दी पानी गिराकर उठा, तो हाथ कांप उठे । घबराहट में निक्कर के बटन ऊपर-नीचे लग गए। "वाहर निकल, हरामजादे !" पिता की दूसरी आवाज आई । मोहन ने दरवाजा खोला, तो पिता ने सीधे उसका कान पकड़ लिया। "क्या कर रहा था अंदर ? सच बता दे, वरना कान सिर से अलग हो जाएगा "कुछ नहीं, वाऊजी..." पिता ने कान को और जोर से उमेठ दिया था। मोहन की आंखों में प्रांसू पा गए थे। . "सूअर की औलाद ! झूठ बोलता है ! कुछ नहीं कर रहा था, तो घुत्रां तेरी मां के पेट से निकल रहा था ! सच बता दे, सिगरेट पीना कहां से सीखा?..." "सीखा नहीं वाऊजी''पहली बार'.." "सच कहता है ?" "हां, वाऊजी देवी की सौह..." मोहन रोने को हो पाया था.' पिता ने कान छोड़ दिया था। बोले थे, "जरूर तेरी सोहवत हकीम के से है. वही ये करतूतें करता फिरता है..." मोहन को लगा, वात बढ़ेगी। यों ही बोल गया; "नहीं वाऊजी..." 20/ नीड़ !"

"फिर भूट ! चल भाग जा नीचे, वरना माज सुबह-सुबह तेरी साल छल जाएगी। हकीम के बेटे मे में अपने प्राप निपट सूंगा."पौर पिता माने वाले डिब्बे में पानी उठेलने लगे थे। फिर भीतर घुसते हुए बोले, जाकर नहा ले स्कूल को देर हो जाएगी...' नीचे उतरफर मोहन नहाने धोने में लग गया था। उसका मुंह फला प्रा था। मां ने कुछ-कुछ बात सुन ली थी, पर वाप-बेटे के बीच साम- ह माना उसे पसंद नहीं था। न ही वह किसीकी तरफदारी करती थी। ति या स्वभाव वह जानती थी। ' उग दिन मोहन स्कूल के लिए जितनी जल्दी तैयार हुमा था, उतनी जल्दी तैयार हो सकने की वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। मका मन कह रहा था, वह पिता के नीचे उतरकर पाने से पहले ही कूल चला जाए । लेकिन बहुत जल्दी तैयार होने के बावजूद वह मां को हुई दही-रोटी पा रहा था, जब पिता प्रा गए थे। यह तो अच्छा हुमा एक बार घूरकर देखने के अलावा पिता ने कुछ नहीं कहा। यह क नजर ही मोहन के गले में रोटी को भटका देने के लिए काफी थी। रता दातुन करने लगे और ग्यों-खो करके गला साफ करने लगे, पर हिन री और नहीं पाया गया। मा ने स्कूल के लिए नमकीन पराठा चीथड़े में बाधकर दिया। रहन ने उसे जल्दी से बस्ते में रखा और स्कूल के लिए चल पड़ा। मांगन में नल के पास बैठे वाळजी नहाने लगे थे। भोर साथ ही पना नियमित कृष्ण-स्तोत्र गायन भी करने लगे थे। मोहन ने उनकी र देगे विना ही दार की मोर कदम बढ़ा दिए कि पीछे मे मावाज ई थी, "हरामजादे, भय दुबारा गलती नहीं होनी चाहिए। तुमने सच ल दिया, इसलिए बच गये, वरना दो कानो के बीच मिर कर देता... पौर द्वार के बाहर होते हुए मोहन ने घाऊजी का तकिया कलाम ना पा, "सच्चे নয়ান के लिए दुनिया मे"नो प्रॉब्लम..." .. "मय विस्तर पर लेटे-लेटे उमे ऐसा लग रहा था में पाऊजी ने एक पर फिर उसका कान उमेठ दिया हो और उसका पूरा गिर दर्द मे - साथ ही खांसी का दौरा शुरू हो गया। तभी ग्रांगन से वाऊजी की आवाज आई थी, "मोहन की मां! मोहन कहां है ? आज इत्ती जल्दी कैसे उठ गया !" "जोर पड़ा होगा.. रात को कहता था, दुखता है..." मां की आवाज पर सुनाई दी थी। पीर उसके साथ ही सीढ़ियों पर पिता के कदमों की धमक पाने लगी थी। मोहन की रूह कांप गई थी। उसने जल्दी से सिगरेट को मोरी में फेंक दिया और उसपर पानी डाल दिया, लेकिन दरवाजे की दरार में से वाहर निकलती धुएं की लकीर पर पिता की नजर पड़ गई थी। पिता मुलायम मन लिए ऊपर पाए थे, पर धुएं की लकीर देखते ही उनका माथा ठनक गया 1 कड़ककर उन्होंने आवाज दी, "मोहन !" मोहन की जान सूख गई। जल्दी-जल्दी पानी गिराकर उठा, तो हाथ कांप उठे । घबराहट में निक्कर के बटन ऊपर-नीचे लग गए। "वाहर निकल, हरामजादे !" पिता की दूसरी आवाज आई। मोहन ने दरवाजा खोला, तो पिता ने सीधे उसका कान पकड़ लिया। "क्या कर रहा था अंदर ? सच बता दे, वरना कान सिर से अलग हो - जाएगा !" 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"हां, वाऊजी देवी की सीह मोहन रोने को हो पाया था.' पिता ने कान छोड़ दिया था। वोले थे, "जरूर तेरी सोहवत हकीम के पूत से है वही ये करतूतें करता फिरता है..." मोहन को लगा, वात बढ़ेगी। यों ही वोल गया; "नहीं वाऊजी' 1 20 / नीड़ "फिर झूठ ! चल भाग जा नीचे, वरना आज सुबह-सुबह तेरी साल हिल जाएगी। हकीम के बेटे से मैं अपने प्राप निपर लूंगा."ौर पिता पावाने वाले डिव्ये में पानी उठेलने लगे थे। फिर भीतर घुसते हुए बोले, "जाकर नहा ले"स्कूल को देर हो जाएगी..." नीचे उतरफर मोहन नहाने धोने में लग गया था। उसका मुंह फला हुमा था। मा ने कुछ-कुछ बात सुन ली थी, पर वाप-येटे के बीच गाम- साह माना उसे पसंद नहीं था। न ही वह किसीकी तरफदारी करती थी। पत्ति या स्वभाव वह जानती थी। उस दिन मोहन स्कूल के लिए जितनी जल्दी तैयार हुमा या, उतनी जल्दी तैयार हो सकने की वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। उसका मन यह रहा था, वह पिता के नीचे उतरकर पाने में पहले ही स्कूल चला जाए। लेकिन बहुत जल्दी तैयार होने के बावजूद यह मां की दी हुई दही-रोटी सा रहा था, जब पिता मा गए थे। यह तो अच्छा हुमा कि एक बार घूरकर देखने के अलावा पिता ने कुछ नहीं कहा। वह एफ नजर ही मोहन के गले में रोटी को मटका देने के लिए काफी थी। पिता दातुन करने लगे और गो-सों करके गला साफ करने लगे, पर मोहन रोपौर नहीं पाया गया । मा ने स्थल के लिए नमकीन पराठा चीप में वायकर दिया। मोहन ने उसे जल्दी से बस्ते मे रसा और स्कूल के लिए चल पड़ा। भागन में नल के पास बैठे बाऊजी नहाने लगे थे। भोर साप ही अपना नियमित कृष्ण-स्तोत्र मायन भी करने लगे थे। मोहन ने उनकी पोर देगे बिना ही दार की प्रोर कदम बढ़ा दिए कि पीछे में प्रावात्र भाई पी, "हरामजादै, पर दुवारा गलती नहीं होनी चाहिए। तुमने मच बोल दिया, इसलिए बच गमे, वरना दो कानी के बीच मिर कर देता..." पौर द्वार के बाहर होते हुए मोहन ने बाऊजी का तकिया कलाम सुना था, "सच्चे इनसान के लिए दुनिया में.."नो प्रॉब्लम..." .."मय विस्तर पर लेटे-लेटे उसे ऐसा लग रहा था जैसे बाऊजी ने एक बार फिर उसमा कान उमेठ दिया हो मोर उसका पूरा मिर दर्द में - . सही खांसी का दौरा शुरू हो गया." तभी प्रांगन से वाऊजी की आवाज आई थी, "मोहन की मां! मोहन हां है ? आज इत्ती जल्दी कैसे उठ गया !" "जोर पड़ा होगा. रात को कहता था, दुखता है..." मां की आवाज र सुनाई दी थी। और उसके साथ ही सीढ़ियों पर पिता के कदमों की नमक पाने लगी थी। मोहन की रूह कांप गई थी। उसने जल्दी से सिगरेट को मोरी में फेंक दिया और उसपर पानी डाल दिया, लेकिन दरवाजे की दरार में से बाहर निकलती धुएं की लकीर पर पिता की नजर पड़ गई थी। पिता मुलायम मन लिए ऊपर आए थे, पर धुएं की लकीर देखते ही उनका माथा ठनक गया। कड़ककर उन्होंने अावाज दी, "मोहन !" मोहन की जान सूख गई। जल्दी-जल्दी पानी गिराकर उठा, तो हाथ कांप उठे । घबराहट में निक्कर के बटन ऊपर-नीचे लग गए । "वाहर निकल, हरामजादे !" पिता की दूसरी आवाज आई। ने दरवाजा खोला, तो पिता ने सीधे उसका कान पकड़ लिया। "क्या कर रहा था अंदर ? सच बता दे, वरना कान सिर से अलग हो जाएगा !" "कुछ नहीं, वाऊजी..." पिता ने कान को और जोर से उमेठ दिया था। मोहन की आंखों में प्रांसू आ गए थे। "सूअर की औलाद ! झूठ बोलता है ! कुछ नहीं कर रहा था, तो घुनां तेरी मां के पेट से निकल रहा था ! सच बता दे, सिगरेट पीना कहां से सीखा ?..." "सीखा नहीं वाऊजी 'पहली वार..." "सच कहता है ?" "हां, वाऊजी. देवी की सीह मोहन रोने को हो आया था... पिता ने कान छोड़ दिया था। वोले थे, "जरूर तेरी सोहबत हकीम के पूत से है'वही ये करतूतें करता फिरता है..." मोहन को लगा, वात बढ़ेगी। यों ही बोल गया; "नहीं वाऊजी.. मोहन . - । - 20/ नीड़ "फिर झूठ! चल भाग जा नीचे, वरना माज सुबह-गुरह तेरी सात छिल जाएगी। हकीम के बेटे से मैं पपने-माप निपट लूंगा और पिता पासाने वाले डिब्बे में पानी उंहेलने लगे थे। फिर भीतर घुसते हुए बोले, 'जाकर नहा ले.."स्कूल को देर हो जाएगी." नीचे उतरकर मोहन नहाने-धोने में लग गया था। उसका मुंह फला हुप्रा था। मां ने कुछ-कुछ बात सुन लो यो, पर बाप-बेटे के बीच साम- खाह माना उसे पसंद नहीं था। न ही वह किसीको तरफदारी करती थी। पति का स्वभाव वह जानती घो। उस दिन मोहन स्कूल के लिए जितनी जल्दी तैयार हुमा था, उतनी जल्दी तैयार हो सकने की वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। उमका मन कह रहा था, वह पिता के नीचे उतरकर पाने से पहले ही स्कूल चला जाए। लेकिन बहुत जल्दी तैयार होने के बावजूद यह मां की दी हुई दही-रोटी खा रहा था, जब पिता मा गए थे। यह तो अच्छा हुमा कि एक बार घूरकर देखने के अलावा पिता ने कुछ नहीं कहा। यह एक नजर ही मोहन के गले में रोटो को मटका देने के लिए काफी थी। पिता दानुन करने लगे और वो सों करके गला साफ करने लगे, पर मोहन रो और नहीं साया गया। मा ने स्कूल के लिए नमकीन पराठा चीयरे में पापकर दिया। मोहन ने उसे जल्दी से बस्ते में रसा और स्कूल के लिए चल पड़ा। मांगन में नल के पास बैठे वाऊजी नहाने लगे थे। पौर साप ही अपना नियमित कृष्ण-स्तोत्र गायन भी करने लगे थे। मोहन ने उनकी मोर देरो मिना ही दार की भोर कदम बढ़ा दिए कि पीछे से भावान भाई थी, "हरामजादे, मम दुवारा गलती नहीं होनी चाहिए। तुमने सच बोल दिया, इसलिए बन गये, वरना दो कानो के बीच सिर कर देता..." मोरदार के बाहर होते हुए मोहन ने याऊजी का किया सलाम सुना गा, "सगे इनसान के लिए दुनिया में 'नो प्रॉब्लम..." ."'पय विस्तर पर लेटे-लेटे उसे ऐसा लग रहा था जैसे वाऊजी ने एक बार फिर उत्सवा कान उमेट दिया हो मोर उसका पूरा सिर दर्द में झनझना उठा। । फिर उसे पता ही नहीं चला, कब वाऊजी पाकर उसके सामने खड़े हो गए। वाऊजी का कद काफी लंबा था। मोहन लेटा हुआ था। बाऊजी खड़े थे, नक्श उनके तीखे थे और टेबल लैंप की सीमित रोशनी में उनके नक्श और भी गहरे तथा तीखे हो उठे थे। मोहन ने डायरी को बंद करके सिरहाने के पास रख दिया । "क्यों बंद कर दी?" बाऊजी बोले, "फिक्र मत करो, तुम्हारी डायरी तव तक कोई नहीं पढ़ेगा, जब तक तुम नहीं चाहोगे। डायरी तुम्हें बहुत कुछ सिखा देगी। वह सब कुछ भी, जो मैंने तुम्हारे दादा से सीखा। मालूम है, मैं तुम्हारी उम्र का था, तो तुम्हारे दादा सारे घर का भार मुझपर छोड़कर चले गये थे। लेकिन उद्यमी आदमी जिंदगी से कभी नहीं घबराता। हाथ-पैर चलते हों, दिमाग काम करता हो, तो 'नो - - प्रॉब्लम..." मोहन को वाऊजी का उस वक्त याना अखर गया था, लेकिन बाऊजी ज्यादा देर रुके नहीं। वह उसके कमरे को यों ही देखते रहे। मेज पर बिखरी किताबों-कापियों पर भी उन्होंने उचटती-सी नजर डाली और फिर यह कहकर नीचे उतर गए कि "मां से कहा करो, कमरे की सफाई कर दिया करे 'या फिर खुद ही सफाई कर लिया करो..." ..'चाऊजी चले गए, तो मोहन ने डायरी को फिर उठा लिया। उसका जी चाहा कि वह एक बार फिर लिखने बैठ जाए, लेकिन फिर उसे लगा, मन में उत्साह होने के बावजूद शरीर की थकान उसे उठने नहीं देगी। उसने डायरी को सिरहाने के पास ही रख दिया। मक्खन सिंह का दिया हुअा अलगोजा अभी तक साइकल की टोकरी में ही पड़ा था। मोहन की नांखों में नींद समा रही थी. "नींद की गोद में चले जाने से पहले उसने सोचा, कल वह अलगोजा बजाने की कोशिश जरूर करेगा। 22/ नीड़ 2 रात फाफी हो चुकी थी, लेकिन यरमों के बाद पहली बार ऐमा हुमा था कि दुर्गादास जी को नीद नहीं मा रही थी। गरमियों के प्राममान में सारे टिमटिमा रहे पे। हलकी-हलको हवा चल रही थी, जिसमें तपिश भी थी, जमीन में उठती हुई भाप की गरमाहट भी। पास की पाट पर तारा कब की सो चुकी थी। नीद में ही उनका एक हाय दुर्गादाम जी के तकिये पर पाकर टिक गया था। दुर्गादास जी फाफी देर तक उस हाप को देखते रहे। तारों की मद्धिम रोशनी में उस हाय पर पड़ी हुई वक्त की लकीरें पुंधली होकर भी काफी स्पष्ट पो। भी यह हाथ कितना मुलायम हुमा करता पा."दुर्गादास जी ने यो ही एक बार उस हाप को छू लिया था, फिर अपना हाथ पीछे सीवर पासमान यी पोर देखने लगे थे। उनका बेटा पच्छे नंबरी से पास हो गया था। तारा को इमी वात का मनोप था और यह सतोप उमे गहरी नीद दे गया था। लेकिन इमी मंतोप के कारण दुर्गादास जी उत्तेजित महसूस कर रहे थे और उन्हें नींद नहीं पा रही थी। नींद न पाने को एक वजह यह भी थी कि दुर्गादास जी पुरानी यादी में घिर गए थे। उनका प्रतीत उनके सामने माकर पडा हो गया था पौर वह इम हिमाव किताव में लग गए थे कि पचास सात की जिदगी में उन्हें हासिल क्या हुमा है ! पया कुछ है, जो छूटता चला गया है." दुर्गादास जी के पुरगे कभी रियासत के दरवार मे दीवान हुमा करते ये। फिर जाने सिपाही के रिमी नौजवान ने राजाकीधान में गुस्तानी की पी पीर दीवान का पद उनने छिन गया था। पर दुर्गादाम ये दादा तक के जमाने में घर में दौलत पीडायों को पनपनाइट तवायफो के पपरमों को मनभनाहट को गरीदती भोर मात करती थी। नीट/23 दुर्गादास के पिता किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्हें एक ही काम सिखाया गया था-~घोड़े पर सवार होकर दिन-भर इधर- उधर भटकते रहना और वंदूक से शिकार करते रहना । दुर्गादास के दादा मरे थे, तो एक मकान और थोड़ी-सी जमीन अपने बेटे,जमनादास के नाम छोड़ गये थे। उन दिनों दुर्गादास मिडिल स्कूल में पढ़ते थे । फिर एक हादसा हुआ था। एक दिन जमनादास शिकार करने निकले थे...दिन-भर जंगलों में भटकते रहे थे । पर एक-आध परिदे के अलावा कोई जानवर हाथ नहीं लगा था। शाम को झुटपुटा हो रहा था। वह हताश-से लौट रहे थे कि तभी उन्हें एक झाड़ी के पास सफेद खरगोश-सा नजर पा गया था। घोड़े की लगाम खींचकर उन्होंने बंदूक दाग दी थी। घांय की जंगल-गुंजाती आवाज के साथ ही एक क्षणिक चीख भी उठी थी और यकवयक शांत हो गयी थी। जमनादास परेशान हो गए थे... उन्हें समझ नहीं पाया था कि वह चीख कैसी थी। कोई खरगोश तो आज तक कभी नहीं चीखा था... शिकार को उठाने के लिए उन्होंने घोड़ा आगे बढ़ाया था कि तभी किसी औरत की चीखें उसके कानों में पड़ गयी थीं। उस झुटपुटे में जाने किधर से एक औरत अपने बाल नोचती और विलाप करती हुई सामने आ खड़ी हुई थी और उसके हाथों में उसके एक-वीय बच्चे की खून से लथपथ लाश थी... जमनादास की समझ में कुछ नहीं आया था. उस भयावह दृश्य को देखकर वह अपने घोड़े को भगाते हुए वहां से ले पाए थे। घर पहुंचकर शिकार में मारे दो तीतरों और एक जंगली कबूतर को उन्होंने एक कोने में पटक दिया था। फिर निढाल-से होकर खाट पर * पड़ गए थे.. पली ने खाने के बारे में पूछा था, तो उन्होंने कह दिया था, उन्हें भूख नहीं है, वह दुर्गा को खिला दे, खुद खा ले और सो जाए: रात-भर वह खाट पर पड़े-पड़े जाने क्या सोचते रहे थे। यहां तक कि रात के तीसरे पहर घर में बिल्ली घुस आयी थी और वह कबूतर और तीतर उठाकर ले गयी थी. 'और जमनादास खामोशी से सब कुछ 24/ नीड़ देखते रहे पे प्रभात होने पर वह उठे थें। उन्होंने अपनी बंदूक उठायी थी और पर के पिछवाड़े के कुएं में उसे फेंक माए ये"पर तभी सब मोर मोर मच गया था। जंगल में रहने वाली वह मौरत अपने कबीले वालों के साथ मोहल्ले में चली प्राई थी। यह रो-चिल्ला रही थी पोर बच्चे की पून से लथपय लाश मब भी उसके सीने से चिपकी हुई थी। जमनादास को लगा पा, वे सूखार लोग उन्हें मार डालेंगे-अपनी कुरहाड़ियों से उनके, उनकी पत्नी के मोर दुर्गा के टुकड़े-टुकड़े कर देंगे... लेकिन, बड़े धीरज से उन्होंने स्थिति को संभाल लिया था। सुद ही जाकर उन लोगों के सामने सड हो गए थे और बोले थे, "गलती मुझसे हुई है । उसका खामियाजा भुगतने को मैं तैयार हूं।" पामियाजा क्या हो सकता था? क्या एक पादमी की जान लेने से दूमरी जान वापस लौट सकती थी ?... तप यह पाया गया था कि जमनादास बच्चे की जान की कीमत जमीन के रूप में पुकाय, जमनादास ने अपनी सारी जमीन उस बच्चे के मा-बाप के नाम लिप दी थी... दूमरी रात ही जमनादाम घर से गायव हो गए थे."उनका वही मुछ पता नहीं चला था। बरसो बाद किसीने खबर दी थी कि जमनादास जोगी हो गए हैं और ममरनाथ के रास्ते में पड़ने वाली एक गुफा में पूनी रमाए रहते हैं। दुर्गादाम को अपने पिता की याद माती तो थी, पर सताती नहीं थी। मां भी उनका जिक्र कभी नहीं करती थी। लोग उन्हें जरूर याद दिलाते थे, पर दुर्गादास को इतनी फुरसत कभी नहीं मिली कि वह ममरताप की यात्रा पर जाएं और पिता से मिल माएं या उन्हे पर ले पाएं। दुर्गादास की पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। मो से बुध पंगा लेकर उन्होंने कपड़े की फेरी लगाना शुरू कर दिया था। पदरी और रोगो की गटरी कंधे पर उठाए वह गांव-गांव घसर सगाते पे और दस-यारह दिनी में एक बार पर लौटते थे। रात रही भी, किसी जमीदार के यहो, पिसी नीड़ / 25 दुर्गादास के पिता किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्हें एक ही काम सिखाया गया था-घोड़े पर सवार होकर दिन-भर इधर- उधर भटकते रहना और बंदूक से शिकार करते रहना । दुर्गादास के दादा मरे थे, तो एक मकान और थोड़ी-सी जमीन अपने वेटे, जमनादास के नाम छोड़ गये थे। उन दिनों दुर्गादास मिडिल स्कूल में पढ़ते थे । फिर एक हादसा हुअा था। एक दिन जमनादास शिकार करने निकले थे.. दिन-भर जंगलों में भटकते रहे थे । पर एक-आध परिदे के अलावा कोई जानवर हाथ नहीं लगा था। शाम को झुटपुटा हो रहा था। वह हताश-से लौट रहे थे कि तभी उन्हें एक झाड़ी के पास सफेद खरगोश-सा नजर आ गया था । घोड़े की लगाम खींचकर उन्होंने बंदूक दाग दी थी। घांय की जंगल-गुंजाती आवाज के साथ ही एक क्षणिक चीख भी उठी थी और यकवयक शांत हो गयी थी। जमनादास परेशान हो गए थे। उन्हें समझ नहीं पाया था कि वह चीख कैसी थी। कोई खरगोश तो आज तक कभी नहीं चीखा था शिकार को उठाने के लिए उन्होंने घोड़ा प्रागे बढ़ाया था कि तभी किसी औरत की चीखें उसके कानों में पड़ गयी थीं । "उस झुटपुटे में जाने किधर से एक औरत अपने बाल नोचती और विलाप करती हुई सामने आ खड़ी हुई थी और उसके हाथों में उसके एक-वर्षीय बच्चे की खून से लथपथ लाश थी... जमनादास की समझ में कुछ नहीं पाया था "उस भयावह दृश्य को देखकर वह अपने घोड़े को भगाते हुए वहां से ले पाए थे। घर पहुंचकर शिकार में मारे दो तीतरों और एक जंगली कबूतर को उन्होंने एक कोने में पटक दिया था। फिर निढाल-से होकर खाट पर पड़ गए थे... पत्नी ने खाने के बारे में पूछा था, तो उन्होंने कह दिया था, उन्हें मूख नहीं है, वह दुर्गा को खिला दे, खुद खा ले और सो जाए... रात भर वह खाट पर पड़े-पड़े जाने क्या सोचते रहे थे। यहां तक कि रात के तीसरे पहर घर में विल्ली घुस पायी थी और वह कबूतर और तीतर उठाकर ले गयी थी और जमनादास खामोशी से सब कुछ 24 / नीड़ देसते रहे पे" प्रभात होने पर वह उठे थे। उन्होंने अपनी बंदूक उठायी घी पोर घर के पिछवाड़े के कुए में उसे फेंक पाए थे.."पर तभी सब पोर शोर मच गया था। जंगल में रहने वाली वह औरत मपने कबीले वालों के साथ मोहल्ले में चली आई थी। वह रो-चिल्ला रही थी और बच्चे की सून से लथपथ लारा अब भी उसके सीने से चिपकी हुई थी। जमनादास को लगा पा, वे खूखार लोग उन्हें मार डालेंगे-अपनी कुल्हाड़ियों से उनके, उनकी पत्नी के और दुर्गा के टुकड़े-टुकड़े कर देंगे... लेकिन, बड़े धीरज से उन्होंने स्थिति को संभाल लिया था। पद ही जाफर उन लोगों के सामने सड़ हो गए थे और बोले थे, "गलती मुझसे हुई है । उसका खामियाजा भुगतने को मैं तैयार हूं।" ग्वामियाजा क्या हो सकता था? क्या एक मादमी की जान लेने से दूसरी जान वापस लौट सकती थी ?... तय यह पाया गया था कि जमनादास बच्चे की जान की कीमत जमीन के रूप मे चुकायें, जमनादास ने अपनी सारी जमीन उस बच्चे के मा-बाप के नाम लिख दी थी... दूमरी रात ही जमनादास घर से गायब हो गए थे. उनका वही कुछ पता नही चला था। बरसो बाद किसीने खबर दी थी कि जमनादास जोगी हो गए हैं और अमरनाथ के रास्ते में पड़ने वाली एक गुफा में पूनी रमाए रहते हैं। दुर्गादास को अपने पिता की याद माती तो पी, पर सताती नहीं थी। मा भी उनका जिक्र कभी नहीं करती थी। गोग उन्हें जरूर याद दिलाते. थे, पर दुर्गादास को इतनी फुरसत कभी नही मिली कि वह ममरनाप को यात्रा पर जाएं और पिता से मिल माएं या उन्हें घर ले पाएं। दुर्गादास की पढाई बीच में ही छूट गई थी। मां से पुर पैसा लेकर उन्होने कपड़े की फेरी लगाना शुरू कर दिया था। पदो पौर सेसों को गठरी कंधे पर उठाए यह गाव-गांव चक्कर लगाते थे मोर दस-यारह दिनों में एक बार घर लौटते थे। रात कही भी, पिसी जमीदार के यहां, रिसी धर्मशाला में, या किसी वट वृक्ष के नीचे गुजर जाती थी। दिन भटकते हुए, कपड़ा वेचते हुए निकल जाता था। करीव चार वरस ऐसे ही बीत गए थे। फिर एक गांव के दूकानदार को बीस वर्षीय जवान दुर्गादास की मेहनतकशी पर प्यार आ गया था। दुर्गादास उसे भा. गए थे। वह उन्हें घर ले गया। खाना खिलाया, विस्तर दिया और तारों की छांव में कच्चे दूध की लस्सी पिलाते-पिलाते उसने दुर्गादास के सामने एक प्रस्ताव रख दिया था कि वह भी अपना घर वसा ले. ''कच्ची लस्सी का लोटा हाथ में लेकर आयी तारावंती लजाकर घर के भीतर चली गयी थी। दुर्गादास ने तारा का चेहरा नहीं देखा था--सिर्फ खाना खाते हुए उसकी प्रोढ़नी की एक झलक पायी थी या एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते उसके कदमों को देखा था। उस रात तारों की छांव में, उन्हें लगता रहा था कि जैसे वे पांव तारों पर चलते जा रहे हैं. एक तारे से उछलकर दूसरे पर जा खड़े होते हैं और थमकर इंतजार करने लगते हैं कि पीछे कोई आ रहा है या नहीं... सुबह उठकर अपनी गठरी उठाते समय दुर्गादास ने कहा था, कि वह अपनी मां से बात करेंगे। । - घर लोटकर आए थे, तो दुर्गादास ने मां को मरणासन्न पाया था। मां को भयंकर ज्वर था और वह करीव-करीव वेहोश थी। आस-पड़ोस के लोग ही उसकी तीमारदारी करते रहे थे और उन्होंने बताया था कि मां उसी दिन से बीमार थी, जिस दिन से वह फेरी पर गए थे। जाने कौन-सी ऐसी शक्ति थी, जो मां को अभी तक जिदा रखे थी. उसी रात लालटेन की रोशनी में मां ने अांखें खोली थीं-दुर्गादास को अपने सामने पाकर उनमें एक चमक पायी थी, अोठ कुछ कहने को खुले थे और उसके साथ ही एकाएक सब कुछ स्थिर हो गया था। दुर्गादास नितांत अकेले रह गए थे। - 26/ नीड़ एक माल मौर बीत गया था। दुर्गास लौटमर म गांव की पोर गए ही नहीं थे, जहां तारा रहती थी। अकेले हो जाने के कारण सब कुछ जैसे नीरग हो उठा था। सोचते थे, अब फेरी लगाने में फायदा ही क्या? किसके लिए भटके यह गांव-गांव ? ... मन में यह भी पाया था कि इतने दिनों तक कोई इंतजार भी कने करेगा? तारा के हाय पीले हो चुके होंगे यह मिसी पोर के मन के सारों में बजने लगी होगी। उस साल के कुछ महीने तो ऐसे ही बीत गए पे। फिर कर होने सगी थी। काम के बगैर कोई जी भी कैसे सकता है ?-दुर्गादास कदूर के मामा ने पाकर राममाया पा। मामा के अपने ट्रक चलते पे। दुर्गा को उन्होंने गमभाया था कि मगर उनका मन पुराने काम में नहीं लगता, तो वह उनके साप चले चलें, ट्रकों के पहरे पर जो काम पाहें, संभाल से "पौर दुर्गादाम उनके साप चल दिए थे। ट्रकों और ट्रक दायरों की दुनिया में उनका मन रम गया था। उम दुनिया में एषा प्रजीय-मी मस्ती थी, नुप्तापन पा, अपनापन पा । दुर्गादास को ट्रकों की सदाई का काम मोपा गया था और यह बड़ी सगन से अपना काम देपने लगे थे। दिन-भर काम करते और गत फो पककर घर लौट पाते "पर पर पाते ही प्रवेलारन उन्हें माटने को दौडता। कभी-कभी तारा के पैरों की भनक निको मागों के मामने कोप जानी पौर वह बेचन हो उटते। फिर स्याल पाता : तारा तो कहीं भोर चली गयी होगी। फिर मन ने जोरमारा था। एक दिन दुर्गादास सारा के गाव पी पोर घन दिए थे। सारा के पिता ने यर प्यार में उनसरा स्वागत किया था। शिका. यत कुछ नहीं को पी, बस इतना ही यहा पा, "बडी देर को पाने में ।" "मा गुजर गयी थी, इसीलिए नहीं पा मका," दुर्गादाम ने कहा था। "पुराना बाम छोड़ दिया? हमारी पहरें तो अभी तक चल रही हैं। बीच में एक मादी में जरूरत पड़ी थो, तो तुम्हारी बहुत याद : नी17 पाई। तुम आये होते, तो दस-बीस जोड़ी खरीद लेते.. पर तुम आय ही नहीं !" ! शादी के नाम पर दुर्गादास का मन बुझ गया था। एक क्षण वह खामोश रह गये थे, फिर बोले थे, "मैंने वह काम छोड़ दिया है. 'अव तो ट्रकों पर माल लदवाता हूं.." "अच्छा एक पल की खामोशी। फिर उत्साह । "घर चलोगे न ? तुम्हारी मासी बहुत याद करती थी तुम्हें !" दुर्गादास ने सिर हिला दिया था। घर पहुंचने पर दुर्गादास की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह अांखें उठाकर इधर-उधर झांक भी लें। 'बेहद परेशानी की हालत में थे वह । मन में बार-बार यह बात आ रही थी कि पूछ क्यों नहीं लेते कि तारा कहां है-पर जवान नहीं खुल रही थी। शाम गहरा रही थी, जब वे लोग घर पहुंचे थे। मासी आई थी और उसने आंगन में खाटें बिछा दी थीं। दुर्गादास और घर का मालिक आमने- सामने बैठ गये थे। दूकानदार हरिचंद दुर्गादास से उनके काम-धंधे के बारे में सवाल करने लगा था और दुर्गादास बड़े अनमने ढंग से उसके सवालों के जवाब देते जा रहे थे। पिछले एक साल में जो कुछ घटित हुआ था, उसे वह टुकड़े-टुकड़े जुम्लों में बता गये थे. इस बीच मासी कच्ची लस्सी से भरा लोटा और गिलास दे गई थी और पूछ गई थी कि रोटी अभी खायेंगे या थोड़ी देर में? "वोलो बरखुरदार !" हरिचंद ने अपनी बीवी का सवाल दुर्गादा की ओर बढ़ा दिया था। "अभी तो भूख नहीं है. वैसे..." "तो ठीक है। थोड़ी देर बाद सही ! यहां कौन जल्दी है ! 3 कौन-सी पसंद करते हो?..." "कोई खास पसंद नहीं है मेरी ।''जो भी मिलता है, खा -- "पर तुम हमारे मेहमान हो भाई ! कुछ न कुछ तो तुम्हारी 28 / नीड़ फा बनना ही चाहिए""योलो "सावुत उड़द मानोगे ?..."हरिपंदने पहा था। "पालगा..." दुर्गादास का मन ही नहीं पा साने में ज्यों-ज्यो रास घिरती मा रही थी, उनका मन उसमता जा रहा था। वैचनी इतनी ज्यादा हो रही पी कि उन्हें लगता था, याना वह पा ही नहीं पायेंगे। पर हरिचंद ने प्रपनी पत्नी में कह दिया था, "जा भलीलोफ ! सायुत उडद बना में.. पोर पकौड़ियों का रायता...सिर्वयों की सीर भी बना सको, तो मजा पा ... नाये...॥ ." "तुम योहा-मा मुम्ना लो बरपुरदार, मैं जरा फारिग हो जाऊं.. रहकर हरिचद उठा पा पौर सीदियो की पोर चल दिया था... दुर्गादाम हरिचंद को सीढ़ियां चढते देखते रहे ये पौर उनसरी निगाहें तब तक उसका पीछा करती रही थी, जब तक कि हरिनंद एत को मुर के पीछे गायब नहीं हो गया था फिर किसी बरतन में में किसी दूसरे, छोटे परतन-लोटे या हिन्चे में पानी टेलने की मायाज पाई थी... दरवाजे को फटी सहयने की मायाज पाई थी और फिर दरवाजा बंद होने की "दुर्गादाम की निगाह उपर से हट गई थी... दुर्गादाम साद पर सेट गये थे। सिर सकिये पर टिका हुमा था।... ग्राममान में इक्का-दुक्का सारे छिटक पाये थे मोर दुर्गादास के शरीर में पारा की याद में झनझनाहट-मी होने लगी थी... तारा को भुनाने के इरादे से उन्होंने भासमान रोपांमें हटा ली थी। करवट लेकर लेट गये पे प्रोर सामने के बरामदे की पोर सासी-गाली नगाहों गे तकने लगे थे।... "fशतभी ये पार यह मोड़नी-दिगाई दी पी."दुर्गादाम एप- गरमी कांप उठे थे."उनकी पडयन यड़ गई थी. गिर एकाएक गन के न्याय मे पकराने-मा लगा पापौर वह हावहार रखकर बैठ गये थे। तारा ये पाव. वह मोड़नी "वह तारों पर पनने कदम "उन्हीं पोर पने मा रहे थे... दुर्गादास की हालत ऐमी पो जगे वह नीद में प्रचानक उटरर चंठ गये हो.. कि जो कुछ सामने था, वह मुजस्सिम यथार्थ नहीं, सूक्ष्म स्वप्न हो"पर इसमें कोई शक नहीं था कि तारा उनके पास खड़ी थी... उसके माथे पर प्रोढ़नी थी-प्रांचल घुटनों तक लहरा रहा था। चेहरा उस अंधेरे में भी दमक रहा था। एक क्षण के लिए दुर्गादास को लगा, वह घिर गये हैं "तो साल-भर तक इन लोगों ने कोई फैसला नहीं किया था तो ये लोग मेरा इंतजार करते रहे थे पर दूसरे ही क्षण खयाल आया-यह भी तो मुमकिन है तारा की शादी हो चुकी हो और वह कुछ दिनों के लिए मायके आई हुई हो... पर तभी जैसे तारा ने सारे स्वप्नजाल, यातनादायी विचारचक्र को तोड़ दिया था। उसने अपनी बांहें आगे फैला दी थीं और सवाल उसके पोठों से फिसल पाया था, "मेरी चूड़ियां लाये हो?" दुर्गादास का पूरा अस्तित्व मोम की तरह पिघलने लगा था। उन्हें कुछ सूझ ही नहीं पा रहा था। जवाब में बड़ी कातर-सी निगाह उन्होंने सामने खड़ी तारा की ओर डाली थी, पर उन आंखों की मासूमियत, उनकी अवोधता, उनकी निर्दोप चमक ने उन्हें अधीर कर दिया था। उन्होंने आंखें झुका ली थीं. फिर धरती की ओर ताकते हुए बोले थे, "मैंने सोचा ही नहीं था 'तारा'"पर अव जरूर ले आऊंगा..." "फिर साल-भर बाद?" सवाल ने दुर्गादास को फिर वींध दिया था पर उनका उत्तर अब ज्यादा स्थिरता लिये था, "नहीं, इसी हफ्ते' तारा भीतर लौट गई थी... दुर्गादास अनजानी अनुभूतियों के तूफान-झंझावात से घिरे वैसे ही बैठे रहे थे... फिर सब कुछ बहुत जल्दी ही हो गया था। रात का खाना खाने के बाद वातें, वातों के बाद आंगन में लेटे-लेट, नींद के इन्तजार में, तारों की गिनती और उन तारों में साल-भर पहले वजने वाला संगीत "पिछले साल, बरखुरदार, तुम्हारे सामने मैंने एक सवाल रखा था..." हरिचंद ने कहा था, "उसका जवाब चाहो, तो अब भी दे सकते 30/ नीड़ - - हो..." उमके स्वर में मिमा बसेसष्ट थी। "पिछले साल में बंधा हपापा," दुर्गादाम बोने थे। "भव हालन वह नहीं है । तव अपने बारे में, अपनी जिंदगी के बारे में मोई भी फैमला लेने के लिए मैं मात्राद नहीं था। पाज हूं."और मेरा फेमसा यह है कि सारा मेरे पर मेरे साथ रहेंगी." हरिचंद विभोर हो उठा था। पृछ ही दिन बाद दुर्गादारा हारा गोव्याह र माने पर से पाए थे। लेकिन गली-सादी की गली, तारा को पानेने यो पुची-पत जन्मी दुपों में बदलने लगी थी। माल भर यार ही तारा ने एक बेटे को जन्म दिया था, जो मूतक काटने में पहले ही पल पमा पा। माल-भर बाद एक महकी हुई थी, जो पहती साम सेने में पहले ही मर गयी थी. किर एक-एक करके तीन बच्चे पोर हुए थे, वे भी साल छह महीनों में ही भगवान् के पाम सौट गए थे। मोहन जब पेट में पाया था, तो तारा का मन न्यूली की बजाय पादांकापी में भर उठा पा। दुर्गादास पद भी हर यात दुगी रहते थे । कारोबार सूप पच्छा पन नियाना था, उनकी पत्नी दो-नीन वमें दौडने मगी थी, यस-मास पर उन्होंने माना छोटा-सा दातर भी बना लिया था, पहर में मान पा, मोगानन में बात करते थे, लेकिन भीतर मन में कहीं एक बहुत बड़ा पला पार नाम को पर गोरते, तो जी चाहना रास्ते से मिठाई भी हनिया परीदते चलें, फली की टोरी लेने पले, मेकिन मूने मांगन का पान प्राते ही उनका मन कसोटने ममता और यह एक सदं प्राह गीच. पर रह जाने। फिर एक रात उन्होंने सारा को मापने पिता की पहानी सुना दीपी। तारा तय तो यही बोली थी कि "पिछले जन्म में उन्होंने जहर कोई पुष पिया होगा, तभी तो जोगी यन गरे।" मेरिन फिर उसके दिल में कोई पायका पर करने सगी पी । यही बदूक की गोली में मरा यह पोष यानाही तो प्रेत बनकर उनके बच्चों को नहीं पाये जा रहा है ? यही उमरीमा कोमाह ही उगपी गौर को सगातार मना नहीं यगाए ग रही है ? तारा बादन हिपरियों में पारने मापा । दुर्गादाम जी ने ।

... तव उसे सांत्वना दी थी। पर तारा का मन तव तक नहीं माना था, तक उसने कृष्ण कन्हैया के आगे मनोती नहीं की थी-हे मुरली वाले, अव के मेरी गोद सूनी मत करना "वेटा हुआ, तो उसका नाम तुम्हारे नाम पर ही रख दूंगी, ताकि उसके बहाने दिन-रात तुम्हारा नाम मुंह पर प्राता रहे मोहन बच गया था, कृष्ण के नाम वाला मोहन दुर्गादास जी ने अपना सारा लाड़-प्यार मोहन पर उंडेल दिया था। तारा तो उसे हथेली के छाले की तरह संभालती थी। मोहन बड़ा शर्मीला लड़का था। अंतर्मुख । अपने-आपमें लीन रहने वाला । चौदह-पन्द्रह साल की उम्र तक तो वह घर से निकलता ही नहीं था । बस, घर से स्कूल, स्कूल से घर । पिता के रौबीले चेहरे से उसे डर लगता । दुर्गादास इस मामले में रूढ़िवादी पिता थे। बच्चों पर पिता का रोब रहना चाहिए, ऐसा वह मानते थे। लेकिन बाद में यही चीज मोहन को उनसे दूर करती चली गयी थी... दुर्गादास जी को लगता था, मोहन अगर ऐसे ही गुम-सुम बना रहा, तो दुनिया के भेड़िये किस्म के लोग उसे निगल जाने में दो मिनट नहीं लगाएंगे। दुर्गादास जी ने करवट बदल ली। । 3 "मोहन ! ओ मोहन ! चिड़िया जाग गई.---तुम भी जागो !" बाऊजी की आवाज कानों में पड़ी, तो मोहन की अांख खुल गयी। बाऊजी नल पर स्नान कर रहे थे और कृष्ण स्तोत्र के साथ-साथ मोहन को आवाजें भी देते जा रहे थे। मोहन ने खिड़की से बाहर देखा-दिन अभी चढ़ा नहीं था । इक्का- दुक्का चिड़ियां जाग गयी थीं और आसमान में गोता लगा रही थीं। 32 / नोड़ मोहन को बहुत अच्छा लगा। वह मंत्रमुग्य-मा उन्हें देगता रह गया। पाऊजी का म्बर फिर उसके कानों में टकराया। वह तारा गे शिकायत कर रहे पे : "वड़ा भानसी है यह लड़का! परी भागवान, इमकी उग्न में तो हम मुबह उठकर चार मील की दौड़ लगा पाया मरते "पभी उठ जाएगा..." मां अपने ही परिचित ढंग से उन्हें समझा रही थी। भव मोहन उठ गया । उमे मालूम पा, प्रय पोर देर को, तो नाऊनी कार पाकर ही उमे लताड़ने लगेंगे। पाखाने के टिम्बे में पानी डालते हुए उसने नीचे माफरर दंग सिया-ताकि मां उमे देख ले और बाऊजी को बता दे कि यह उठ दुर्गादास जी ने जल्दी में कपड़े पहने और नापने के लिए तैयार हो गए। सारा ने पालू वाले पराठे मोर मस्मी उनके सामने राग दी। दुर्गादास जी ने पराठे गाए पोर पस्मो का गिलास एक ही माम में साली कर दिया। सारा लस्मी का लोटा लिये बड़ी पी । योसी, "मीर सो।" "वग, वाफी मोहन को पिला देना"प्रभी तक सो रहा है न !..." "उठ गया है।" "यह कोई यक्त है उटने का !" दुर्गादास जी को जंगे फिर माची लग गयी। "जयान प्रादमी है, मेरिन युदलों की तरह मोता है।" पिर उन्होंने प्रावाज सगा दी-"मोहन ! गनीमत थी कि मोहन तब तक फारिग हो गुफा पा मोर सीरिया उतर रहा था। "पापा, याऊजी!" यह वही गे पिल्लाया मोर तेजी मे मीडिया सनाने सगा। मोहन गोपा उनी मामने पाकर गा हो गया। बाकी बोने रा रहे पे-“परे, कभी सो यत में उठ जाया करो! हमार बार यह मुरा ' . हूं, देर तक सोने से शरीर में पालस. वना रहता है..." फिर उन्हें जैसे ध्यान आ गया, जेब से पैसे निकालते हुए बोले, "तुझे इंटर में दाखिला लेना है न.ले..." फिर याद आया; मोहन सीधा पाखाने से चलाया रहा है। उनकी त्योरियां चढ़ गयीं, "हरामखोर ! हाथ साफ किए ?" मोहन भागकर नल पर जा पहुंचा। उसने सावुन से हाथ धोए, कुल्ला किया और फिर वाऊजी के पास आ पहुंचा । वाऊजी ने सो का नोट निकाल लिया था। उसे देते हुए बोले, "आज ही जाकर दाखिला ले लो । पैसे कम पड़ें, तो अड्डे से पाकर ले जाना..." "जी, वाऊजी..." मोहन ने सौ का नोट जेब में रख लिया। दुर्गादास जी ने दहलीज के बाहर कदम रखा ही था कि मोहन मां की तरफ घूमा और बोला, "मां, मेरी चाय।" मां ने एक नजर लस्सी के लोटे पर डाली, फिर मुसकराकर बोली, "अभी वनाती हूं''तू-तब तक हाथ-मुंह धो ले।" .. मोहन फिर नल की तरफ चला गया। - . करीब आधे घंटे बाद नहा-धोकर मोहन घर से निकला। उसकी साइकल उसके साथ थी। दरवाजे से निकला, पैडल पर पांव रखने को ही था कि गली के दृश्य ने उसे रोक लिया। साथ वाले मकान के बाहर दो-तीन ठेले खड़े थे, जिनपर सामान लदा हुआ था। कोई परिवार इस मकान में आ रहा था । मजदूर सामान उतार रहे थे । एक महिला दरवाजे के पास खड़ी थी, एक पुरुप ठेलों के पास खड़ा मजदूरों को निर्देश देता जा रहा था। दो मजदूरों ने शोशे वाली अलमारी ठेले से उतारी। पुरुप ने कड़कती हुई आवाज में कहा, "ध्यान से ! ध्यान से ! गधों की तरह काम मत करो! शीशा टूट जाएगा।" मोहन ने पुरुप की ओर देखा । वह उसे अपने वाऊजी जैसा ही लगा। वस, कद कुछ छोटा था और मूंछ कुछ ज्यादा धनी। दरवाजे में खड़ी औरत का रंग जरा सांवला था, लेकिन उसकी प्रांखों में गहराई थी--एक अजीव-सी उदासी, जो शायद लगातार गुस्सा 34/नोड़ महने रहने में पैदा हो जाती है। "मां !" एकाएक कार में मावाज पाई मौर मोहन गो मगा में किमी झकार ने पूरे माहीम के तारों को मनम्ना दिया हो। उमरी नजर पोरन उधर घूम गई, जिपर में पायाज माई पी। मनान की कारी मरिन पर एक गिडी पी, ओगली पी- उगम मे एक भोला-सा पेहरा मांग रहा था । मोदन की प्रग्नी पोर दंगते देन, सड़की भिमाकर पुष्प पीछे हट गई, हानारि पीछे हटने- हटने भी उसने अपनी बात पूरी कर ही दी, "मां, यह पमरा में भूमी... यहाहा-ठंडा है।" पुष और महिला के चेहरे एकाएर लान हो उठे। मोहन का नहीं । उमने पंडल पर पाव रया, पोर मागे दर गया, लेग्नि महिला को वह बड़ाहट रसोपानो मे टकरा ही गपी--". --"मरजानी, मुछ नहीं गोचती"मात ही पिलाने ममी!..." पुरुष की पूरनी हुई निगाहों ने लड़की दो सिती बंद करने को मजबूर कर दिया 'पौर मोहन को मगा, वे निगाहें उमरी पीटी भी लगातार पूरती जा रही है। गली के मुहाने पर, बीचोबीच दो नाहिया गटी हुई थी। यहां तक पहुंचने से पहले मोहन ने एक बार पीपे मार देग निया'"पोर सदिली गे टरराने-टकराते बचा। पिन मन मेमही उगे पछा-पन्छा सा रहा था। करिन ना पहुंचने पर पते गली का यह दृश्य मोहन रे दिमाग में गायर हो चुका था। राम्ने में गई साठी उमे ननर प्राए थे, मेग्नि उमरा कोई दोरन नही पा । पयले रहने की उसपी पादत यन पीपीपौर पभले ही उसरा मन भी लगता पा। हम उप्रमोगी यो यातीवो में उसे कभी कोई रम नहीं पाता था- फिल्मी मेन पिम्मी मोगी, ननरसिलो में। यही वजह थी कि ये लोग भी उमणे मार बातचीत नही पसं थे। किगीगे गाड़ी दोस्ती होने तो गवान ही नहीं उठता पा-शिवे उसरा मजार ही दहशत में मोहन ने दाखिले का फॉर्म भरा, और जाकर लाइन में खड़ा हो गया। कॉलेज के दफ्तर के सामने गलियारे में जगह-जगह लड़के-लड़कियां खड़े थे। एक झुंड में कोई ऊंची आवाज में रोव झाड़ रहा था-"भाई लोगो, हम तो सरकार के नक्शे-कदम पर चलते हैं ! पूरा पांच-साला प्लान है बी० ए० पास करने का।" "कुछ प्लान पांच साल में भी पूरे नहीं होते, सुंदर जी!" किसी लड़की ने अपना तर्क दिया। "तो क्या हुया ! पांच साल और सही!" सुंदर नामक वह युवक कह रहा था । "हमारे बाप ने हमें नकेल तो डाल नहीं रखी है कि दुलकी चाल भी चलो और कोड़े भी खायो !" वात मोहन के लिए नहीं कही गयी थी, लेकिन मोहन को लगा, सुंदर का इशारा उसीकी ओर था। उसने कनखियों से झांककर देखा। सब लोग सुंदर की बात पर ठहाका लगाकर हंस रहे थे । चेक की कमीज और काली पैंट पहने सुंदर अपने लंबे-लंवे बालों में कंघी कर रहा था। लोग ऐसे कैसे हंस लेते हैं ? मोहन सोच रहा था । । लाइन धीरे-धीरे आगे सरक रही थी। लाइन में खड़े लड़के-लड़कियां तर खामोश थे । वस, झुंड बनाकर खड़े लड़के ही बतिया रहे थे। "सुना है नया प्रिसिपल आने वाला है..." "क्या फर्क पड़ता है !" "सुना है बड़ा सख्त आदमी है..." "कोई बात नहीं.. एक वाप और सही !" हंसी। क्या सारी दुनिया बापों से परेशान है ? मोहन ने सोचा । मोहन का नंबर आ गया। उसने फॉर्म दिया, फीस भरी, रसीद ली और फिर सीधा अपनी साइकल की तरफ चल दिया । 36/ नीड़ अभी दिन बहुत रोष था । मोहन को सगा प्रभी पर जाने में गया होगा! पहले तो वह पिले पाले पार्क में बंटकर मलगोजा बजाने की कोशिश करता रहा । वजा नहीं सका, तो उठकर पल दिया। पिने के साथ वाली महक के तीन-चार पाकर लगाार वह गेतों के बीच में होता हुमा देवी मंदिर की तरफ चला गया।हर में पापी बाहर होने के कारण यह इसारा वहा गांत रहता था। मंदिर के माप काफी लंबा-चौडा पका तालाब था, जिसके एक कोने में यरगान का पानी जमा रहता था। चारों तरफ कंगूरे बने हुए थे और घोड़ी-घोड़ी पारी सीरिया । मोहन मंदिर की दीवार के साथ बनी कच्ची सड़क पर उतर गया, जिसके एक पोर पाक, पारड़ और पवार गंदल उगी हुई थी। सरकंडों पर हलके वैजनी फूल भूम रहे थे। योड़ी ही देर बाद यह यही सड़क पर पा गया । वह मोर भी मागे निकल गया होता। लेकिन एक दावे पर उसे ट्रक ड्राइवरी की भीड नजर मा गई । मकान सिंह भी उनमे बंटा हुमा था। दावे के बाहर पा विधी हुई थी, लकही के कुछ बॅच भी थे। मगमन प्रसगोजा बजा रहा था। गाय वैठे ड्राइवरो पोर क्लीनर चाय पोहे पोर गंगीत का मजा उठा रहे थे। मरसन ने अलगोजा मुंह मे पलग किया और फिर उसने ढाये वाले को मायाज दी, "मोए यमे ! ल्या, चा।" दाय पाल ने नौकर यो मायाज दी, "प्रोए टुडे ! गिलास ला!" मोहन मपन के मामने जाकर गड़ा हो गया। मक्खन सा हो उठा। "माप्रो, बेटे! बैठो! चाय पियोगे ?" नहीं, पाचा!" मोहन ने वेंच पर बैठते हुए कहा । "मैं तो तुम्हारी तान मुनकर रक गया।" फिर अपना मलगोजा दिसाते. "मुझम तो यह बजता ही नही..."" ९हा नौकर पाय का गिलास मोर कप मवसन को दे गया। मरान ने गितास मौर कप को बेंच पर रस लिया पोरी "दिल में दर्द हो, तो मलगोजा मपन-माप बजने लगता है, पुत्तर!" "द मैं पर कहाँ से लाऊ, चाचा!" मोहन ने धीरे में। । हुए बोपा,

सिखादो...'
मक्खन ने चाय कप में संडेली और बोला, "अच्छा बैठ.."चाय पी
लें. फिर सिखा देता हूं...'
मोहन बैठा रहा । मक्खन चाय सुड़कता रहा।
त्रास-पास बैठे लोग अपने वीवी-बच्चों की बातें कर रहे थे। एक
जवान ड्राइवर ने कोई लोकगीत छेड़ दिया था।
चाय पीने के बाद मक्खन ने अलगोजा उठा लिया-फिर उसे इस
तरह वजाने लगा, जैसे नौसिखिये बजाते हैं । अंगुलियां कैसे रखी जायें,
सांस कैसे फूंकी जाये, अलगोजे को अोठों में कैसे दबाया जाये, वह सब
समझाता रहा । फिर मोहन से वोला, "ले, अव तू वजा .."
मोहन ने कोशिश की। उसे लगा, स्वर पहले से बेहतर निकल
"शाबाश ! शाबाश !" मक्खन ने उसका हीसला बढ़ाते हुए कहा,
"सांस और उंगलियों का खेल है सारा.."मशक करते रहो.-सीख
जानोगे...
थोड़ी देर बाद मोहन के अोठों पर मुसकराहट खेल रही थी।
वह उठा और उसने अपनी साइकल ठेल ली-देखते ही देखते वह
हवा पर सवार हो गया।
4
नये पड़ोसियों के बारे में मोहन को शाम को पता चला।
दुर्गादास जी घर लौटे। तारा उनका हाथ-मुंह धुलवा रही थी और
उसीने बात भी छेड़ दी थी।
"पता है, पड़ोस में नये लोग आ गये हैं।..." उसने बताया ।
"कौन लोग हैं ?" दुर्गादास जी ने यों ही पूछा।
"कोई चंदरसेन हैं। "सुना है, उनका मकान ढहा दिया गया है-
38 / नीड़

महप घोड़ी की जा रही है..." "अन्धा-अच्छा नियने मुहल्ले वामा होगा ।" दुर्गाराम जी ने तोलिये मै हाय पोरते हुए महा । "मे में जानता हूं..." मोदन ने मामम पिया, पिता के स्वर में हलका-सा तिरस्कार का भाव मा गया पा। "हमारे ही पंप में है-पर रेपूटेगन अच्छी नहीं है।" "क्यों ?" तारा ने पूछा। "लेन-देन मुपरा नहीं है."ट्रक असते हैं उनके..." फिर पूछा, "मफान परीदा है मा किराये पर लिया है?" "अभी तो किराये पर ही मामे लगते हैं।" "चलो.."हमें पया फां पहता है ?" यह मोहन के पाम मा । "दामिला ले लिया?" "मय हट के मेहनत करो पौर प्रत्यल माके दिशामो इस बार, ताकि मैं भी मीना चौड़ा करके घर मफू.. "कोगित करूंगा घाऊनी..." मोहन की मोखों के सामने सामा गिरधारी लाल बजाज की तम्बीर मा गई, जिनका बेटा हर साल पम्ट पाता था मार लाला जी भपने बेटे के बारे में जब भी बात करते थे, उनरा मीना जंगली कबूतर की तरह फूल जाता था। मोहन माजी चाहा वह हमें, लेकिन उसके होटों पर बड़ी पतली-सी मुमागहट पाकर रह गई 1 उम भुमकराहट को भी उसने मिर घुमाकर हादिया। अपने कमरे में एकास में मोहन मुसकर हम मुमारा मेगा था। माला गिरधारी लाल को याद करके उमे हमी मा गई । ममे ग्यादा हमी गोर. मटोल लाला जी के दुबले-पतले, घमीमा बेटे को याद करके पा रही थी। जी भर हंस लेने के बाद मोहन प्रपनी मेज पर जा बंटा। उसने बाळजी पी दी हुई वायरी उठाई मोर पुछ देर मोचते रहने रेगः वह निगने लगा। उगने वाऊजी के बारे में लिया, फिर सामा मिरपारी माम पोर उनमी रवूनरी गान मे यारे में लिया। फिर एक गया। मुबह याली गली का दृश्य उमरी मांगों के मारने मायापा- खास तौर पर ऊपर की खिड़की से झांकती दो भोली मासूम आंखें और गली के नुक्कड़ तक पीछा करती वह आवाज... "साथ वाले घर में एक नया परिवार आ गया है," मोहन ने लिखा। "उसमें एक लड़की भी है। उसे भी मेरी तरह ऊपर वाला कमरा पसंद है.. लेकिन वाऊजी कहते हैं -उनकी रेपूटेशन अच्छी नहीं है। क्या सिर्फ इसलिए कि दोनों एक ही पेशे में हैं ?" आगे वह क्या लिखे, उसे समझ में नहीं आया । डायरी उसके लिए अपनी शंकानों को व्यक्त करने का माध्यम बन गई थी। एकाएक उसकी नजर खिड़की के पास चली गई। दूसरे मकान के ऊपर वाले कमरे में बत्ती जल रही थी, हालांकि वहां किसी तरह की हलचल का कोई संकेत नहीं था। मोहन फिर लिखने लगा। "उसके कमरे की वत्ती जल रही है। क्या उसके पिता ने भी उससे डायरी लिखने को कहा है ?" उसने एक बार फिर खिड़की के पार देख लिया। दूसरे कमरे की बत्ती बुझ चुकी थी। उसने उधर से अपनी नजर घुमा ली । फिर दूसरे ही क्षण वह उधर देखने लगा । वहां अंधेरा था। खिड़की के पार अब भी कोई हलचल नहीं थी। दूसरे ही क्षण उसे लगा, अगर वहां कोई हलचल हो भी, तो उसे पता नहीं चलेगा। अँधेरे में खड़ा कोई उसे इस तरह देखतें देख ले तो? उसने डायरी बंद की, बत्ती बुझाई और विस्तर पर लेट गया। लेकिन काफी देर तक उसे नींद नहीं आयी। वे दो आंखें और वह आवाज बहुत देर तक उसका पीछा करती रही... सुबह मोहन घर से निकला, तो वही चेहरा फिर उसके सामने आ गया। वह अपने घर से निकल रही थी, उसने कितावों को अपनी बांह पर रखा हुआ था और उन्हें सीने से दवाये चल रही थी। स्कूल की यूनि- फार्म में वह काफी चुस्त लग रही थी। उसने दो चोटियां कर रखी थीं और गले में चुन्नी भी डाल रखी थी। मोहन को एक झटका-सा लगा-यह तो बहुत छोटी है ! मुश्किल 40/नीड़ से तरह-चौदह की होगी। लेकिन वे मायें !.."उनकी उम्र तो बहुत ज्यादा लग रही पो। उसके साथ उसकी सहेली थी और उसने सहेली से कहा था, "जल्दी घल, मुपी! माज तो सजा मिल के रहेगी।" महेली का नाम मुपमा है ! पर उसका नाम क्या है ? मोहन सोचता रहा । उसने साइकल को जान-बूझकर धीमा कर दिया ताकि उनकी बातें सुन सके । शायद सुपमा किमी बात में उसका नाम जोड़ है, लेकिन बहुत जल्दी गली का नुक्कड प्रा गया मोर मोहन मंभलकर साइकल चलाने लगा। कल यह गिरते-गिरते दचा था। प्राज गिरना टोक नहीं होगा। उसने मोह मुड़ने से पहले एक बार पीछे घूमकर जरूर देस लिया । धे दोनो तेज-तेज कदमो से चली पा रही थी, सुषमा की पांसें सामने देश रही थी लेकिन उसकी सहेली नीचे ही नीचे देसती चल रही थी। कॉलेज में भी मोहन की प्रादतों में कोई फर्क नहीं मापा या "वही भैप, यही गर्मीलापन, अपने प्रापमे गुम रहने को वही पुरानी मादत । लकियों ने उसका नाम रखा छोहापा-डाचीवाला। मोर यह नाम उगे पहले ही दिन मिल गया था। हमा यह कि मोहन अपनी सजी-सजाई साइकल पर कलिज पहुंचा। उमने गाइफल को स्टेड पर सड़ा किया। पास ही सड़कियों का एक भर पहा पा। कोई कह वठी : "हाय-हाय । मैं सदके जाऊं।" पौर साप ही उसने एक पजामी लोकगीत की पहली दो पक्तियां ऐड दो: "उम-एमकरदी गली विषों संघदी मी माई सजना दो हाची बदामी रंगदी..." "धादामी कहां री, यह तो कामी है।" किसी दूसरी लड़की ने उममी बात में सुधार करते हुए कहा । "शासी है तो क्या हुमा ! गहनो से सदी उमएम तो करती है।" बौध में कोई तीसरी बह उठी थी, "जय साइशल की यह हालत है, तो दुल्हन की क्या हालत होगी !" -- इसके साथ ही हंसी का एक तूफान आ गया था। मोहन उनकी ओर देखे बगैर ही गलियारे की ओर बढ़ गया था। "गहनों का इतना ही शौक है तो वन जा उसकी डाची!" किसीने पहली लड़की को छेड़ा था। और वह कुढ़ गई थी, "डाची वनेगी मेरी जूती।" हंसी फिर फूट पड़ी थी। मोहन को इस सवसे कोई सरोकार नहीं था। कॉलेज वह सिर्फ पढ़ाई के लिए जाता था। तफरीह उसकी आदतों में शुमार नहीं थी। लेकिन उसमें एक परिवर्तन भी पाया था। जब वह स्कूल में था, स्कूल के बाद बाहर खेतों की ओर निकल जाता था। वहां कच्ची सब्जियां तोड़-तोड़कर खाना उसे अच्छा लगता था। लेकिन जब से पड़ोस में नया परिवार आ गया था, तब से उसे अपना कमरा अच्छा लगने लगा तो वह शाम होती, तो वह अपनी खाट कमरे के वाहर डाल लेता। कितावें और अलगोजा उसके साथी होते। पड़ोस की छत पर वह लड़की बैठी रहती -फर्श पर चटाई या दरी बिछाए। किताव उसके सामने होती और किताब पढ़ते हुए वह पाठ को गुनगुनाती रहती। नीचे, प्रांगन से, मां के किसी लोकगीत के गुनगुनाने का स्वर हवा में तैरता-सा ऊपर प्राता रहता। बीच-बीच में वे एक-दूसरे को देख भी लेते। अक्सर उनकी आंख न मिलती, लेकिन जब मिलती, तो वे झेपकर रह जाते । उन क्षणों में मोहन के शरीर में सनसनाहट-सी फैल जाती। वह सब कुछ भूल जाता। पढ़ने की कोशिश करता, तो किताव पर शब्दों के बजाय तरह-तरह की खूबसूरत तस्वीरें तैरती दिखाई देती। वह किताव एक ओर रखकर अलगोजा उठा लेता। अंधेरा हो जाने तक यही क्रम चलता रहता। फिर दोनों कमरों में वत्ती जल जाती। इस नयी स्थिति ने मोहन को इतना व्यस्त बना दिया था कि वह बाऊजी 42/ नीड़

म.मौर को करीब-करीर पूल ही पुका पा।
एक रात यह अपने कमरे में बंटापा। किनार उमरे सामने गनी
हुई पड़ी थी, सेरिन उमरी नजरें गामने वामी गिटको पर टिकी
पी। मनातक मोहन से गानों में मीड़ियों पर पदमी की पाट गुनाई
दी। यानी बहुत दिनों के बाद कर पा रहे थे। मोहन ने भट में
पानी विहरी घंटकर दी।
दुर्गावागजी कार प्राए मोर मोहन के कमरे के दरवाने में राहो
गए । मोहन पढ़ाई में दब गया था। पाऊजी ने समरेरक पार माया
पौर फिर मोरन की पाट पर बंटने हुए बोर, मरेपी हासत या
बना रपी है सुमने ! तुमने तो विनियो हो नमी ! पपने मामाग
मफाई सो रगती हैं !"
मोहन ने एक उपटती-मी नजर कमरे में सी। गेममा, यानी
रहने सो टीम हैं । मय तरफ येतरतीवी है । मेरिन यह बीना पूरा नहीं।
"मा में रही, गफाई कर दियारे..." माजी ने कहा।
"जी, पदमा।"
फिर माकजी ने पूछा, "परी निगाहो"
हाप पर गिन
मे यह मातीमो पुरेद रहे थे।
"2ी, हो।"
"यमो, एक काम तो तुमने प्रयापका!" उन्होंने दामों में प
गोको निनो से पंगुमियों में पर:कर गीच मिरा। "पाः रगो,
गरी मे या कोई दोर नहीं होता। मरबा मोपहारी मिली है।
और निमे यहा बनना होता है. यह हमेगा परंता रहता है। मुगहो, तो
सारी दुनिया माप होती है ।हामीफ मामी को परेने ही मांगनी पाती
है "तुम्हारीगरी तुम्हारे दुर-मुग, दोनोशी मापी रहेगी। मगरमी
गुण्माना"मप निगते रहो-ग, नो नोग्निस ! मम गए
न?"
एकाएक यात्री पिपिहो । तीये पर योग, "तुम
गता परपरपणे गए?"

इसके साथ ही हंसी का एक तूफान आ गया था। मोहन उनकी ओर देखे बगैर ही गलियारे की ओर बढ़ गया था। "गहनों का इतना ही शौक है तो बन जा उसकी डाची !" किसीने पहली लड़की को छेड़ा था। और वह कुढ़ गई थी, "डाची वनेगी मेरी जूती।" हंसी फिर फूट पड़ी थी। मोहन को इस सवसे कोई सरोकार नहीं था। कॉलेज वह सिर्फ पढ़ाई के लिए जाता था। तफरीह उसकी आदतों में शुमार नहीं थी। लेकिन उसमें एक परिवर्तन भी पाया था। जव वह स्कूल में था, तो वह स्कूल के बाद वाहर खेतों की ओर निकल जाता था। वहां कच्ची सब्जियां तोड़-तोड़कर खाना उसे अच्छा लगता था। लेकिन जब से पड़ोस में नया परिवार या गया था, तब से उसे अपना कमरा अच्छा लगने लगा था। शाम होती, तो वह अपनी खाट कमरे के बाहर डाल लेता। किताबें और अलगोजा उसके साथी होते। पड़ोस की छत पर वह लड़की वैठी रहती-फर्श पर चटाई या दरी विछाए। किताव उसके सामने होती प्रौर किताब पढ़ते हुए वह पाठ को गुनगुनाती रहती। नीचे, प्रांगन से, मां के किती लोकगीत के गुनगुनाने का स्वर हवा में तैरता-सा ऊपर आता रहता। बीच-बीच में वे एक-दूसरे को देख भी लेते। अक्सर उनकी प्रांख न मिलती, लेकिन जब मिलती, तो वे झेपकर रह जाते । उन क्षणों में मोहन के शरीर में सनसनाहट-सी फैल जाती। वह सब कुछ भूल जाता। पढ़ की कोशिश करता, तो किताव पर शब्दों के बजाय तरह-तरह की खूबसूर तस्वीरें तैरती दिखाई देतीं। वह किताब एक पोर रखकर अलगोजा उ - लेता। अंधेरा हो जाने तक यही क्रम चलता रहता। फिर दोनों कमरों में वत्ती जल जाती। इस नयी स्थिति ने मोहन को इतना व्यस्त बना दिया था कि वह बा 42/ नीड़

केगोर को फरीय-दरीर भूल ही पापा ।
एक रात यह अपने एमरे में मेटा पारितार उसके सामने युगे
हई पड़ी पी, मेकिन उगी नजरें गामने यामी गिट्टो पर टिकी
पी।पमानक मोहन के.सानों में मोड़ियों पर कदमों पीपाट गुनाई
दी। यानी यान दिनों के बाद पर पा रहे थे। मोहन ने मद में
अपनी निरीदकर दी।
दुर्गाराम जी कार पाए मोर मोहन के कमरे के दरवाने में हो
गए। मोहन पढ़ाई में गया पायाजी समरे पाएक पकार पगाया
पौर फिर मोक्ष की पाट पर बंटनप योने, "कमरे मी हामत पा
पना राणी है तुमने ! तुम तो रिलिया हो भनी ! परने मारामाग
मफाई तो रगती है।"
मोहन ने एक उपटती-मी नगर परे में सनी । उगे ममा, पानी
पहले सो टीया है। गर तरफ. येतग्नीपी है । सेपिन यह योमा मुछ नहीं।
"मांगे पहो, गफाई कर दिया परे..."याकी ने महा।
"जी, पहगा।"
फिर यात्री ने पूछा, "परी लिगने हो?" हाय मे पर तिन
गे यह दाती पोरंद रहे थे।
"की,हा।"
"समो, एमकाम सो तुमने माछा पकड़ा!" उन्होंने दानों में में
गौर तिनके को पंगुनिया मे परकर मीप मिा ": रमी,
सापरी गया कोई दो मही होगा। गाय सोग शाररी मिगते है।
पौर निमे यहा बनना होता है, यह मेगा परमा एना है। मुगहो, तो
सारी दुनिया गाप होती है । नरमीप पानीपो परेन ही मोगनी पाणी
है "तुम्हारी सायरी तुम्हारे दुग-मुग, दोनोगी माथी रहेगी। गो कभी
मुमत नागप सिगने रो-, तो नोमॉलम ! गमझ पए
न?"
"श्री"
एकाएक पागी पिपिर हो उठे। गोरो पर में पाने, "तुम
सना पर-परसोरहोहो?"

.." . . मोहन उनके स्वर के पीछे की चिंता को समझ नहीं पाया।"कहां? ह वोला, "ऐसा तो कुछ नहीं है। "कुछ क्यों नहीं है ? जब देखो, खोए रहते हो.!" मोहन चुप रह गया.. बाउजी उठ खड़े : हुए और कमरे की सफाई के बारे में एक बार फेर हिदायत देकर चलने को हुए। मोहन को लगा, कुछ कह देना चाहिए । उसे एक ही बात ध्यान में आयी और उसने वही कह डाली, "वाऊजी, कल मुझे नयी कितावें खरीदनी ... - "तो इसमें इतना सोचने की क्या बात है?" वह नर्म पड़ गए । "सुबह मुझसे पैसे ले लेना..." फिर जाने से पहले बोले, "जवां मर्द हो' 'मर्दो की तरह रहा करो। ऐसे दुनिया से कैसे लड़ोगे?" .वह चले गए। मोहन,ने खिड़की की तरफ देखा। सामने वाली खिड़की.वंद हो चुकी थी। वह सोच में डूब गया-पिता क्यों उसके सामने खुलने वाली हर खिड़की के सामने आ खड़े होते हैं ? .:: यह स्थिति बचपन से ही चली आ रही थी। कुछ घटनाएं थीं, जो मोहन के अवचेतन में हमेशा के लिए वस गई थीं। फिर जरा-सी कुरेद लगते ही वे घटनाएं उसकी आंखों के सामने या जातीं। इन घटनाओं ने उसके मन में वाऊजी की जो तस्वीर अंकित की थी, उसमें आतंक के अतिरिक्त कुछ नहीं था। उसे,याद आई वह शाम, जब वह पांच-छह बरस का था और रोते हुए घर में दाखिल हुआ था । ::: वाळजी बरामदे में बैठे हुक्का गुड़गुडा रहे थे। .. "क्या हुआ, रोता क्यों है ?" उन्होंने पूछा था। मोहन गली में अपने से बड़े लड़के से पिटकर आया था। सिसक हुए उसने कहा था, "चन्नी ने मारा..." और मां की गोद में जगह ढूंत के लिए वह पास बैठी तारा की ओर बढ़ गया था। - नीड

याऊजी ने उमेबाहगे परदसराप मिया पा! मारमा
गेसाप्रा पर पा गया ! मूपर यापा, मार मे. पा!" और
उन्हनि उगे एक पपर रमीद करोए माहर को बार पति
पा।
मोहन गन्न रह गया था।
"साता नगें नहीं ?" वाजती हो।
मोहन विमूरता रहा था। "पानी मुन्ने बहा है..."
"यहाहा तो पापा! तेरे भी हायपर है...दो गाई पातो
एफ.ममा भी तो माना पा!"गरक्षार, पाक भी रोगापा
पर पायानो!..."
"पर छोटो भो..." मां ने मोहना पस मेने की निगमोदी,
को पाकीट दियापा, "मारनगर में ही सोप गिरी।
इरा मोम प्रग्नी गोद में..."
मा उटकर मोहन पोनरी पोर में मईपी और उगामामुपों
मे भरा पेहरा धोने सगी थी।
शिर रात को गाने में समर रिता शाप येटने परामरा मन नहीं
हो रहा था। यह बहाना बनाने समा पाकिग भूग नहीं है। पिन
पाऊजीने उगे जयरानी परने पाम यंटा लिया था।
ताराने सनी दाम पानी स्टोरी में पी छोरापा, तो परोप,
"इमरी हाल में भी छोगे।"
"पी नहीं गाता, मीनिए वो पिट के माता है !"पाऊरीन पहा
पा और मारा के हाप में घो पानी बहोरी मेपर उन्होंने तीन-पार
पामय पी मोहन ही दाम में राम पिपा। मोनानिए उस शाम
मोनियाना मुरिस हो गरा पा, मेक्नि उम माम्म पा, प्रगर उगने
दान नहीगा, तो मोर भी रिटेगा।
पूरा गाना उसने रिगो मारका, पापी मादी गाना
.

u । .." उस दिन धूप काफी तेज पड़ रही थी। लू भी चल रही थी। जमीन तप रही थी। बस अड्डे पर इक्का-दुक्का लोग ही थे। एक बस आई और रुक गई। दुर्गादास जी अपने दफ्तर के बाहर खड़े थे कि उनकी नजर अपने नये पड़ोसी पर पड़ गई। उनके हाथ में कपड़े में बंधी हुई टोकरी थी और एक छोटा-सा सूटकेस । दुर्गादास जी ने उन्हें बुला लिया, "मैंने कहा, चंदरसेन जी!" चंदरसेन ने धूरकर देखा और चेहरे पर मुसकराहट आ गयी। "पाहा! पाप हैं !" वह पास आ गये। "कहां से पा रही हैं सवारियां ?". "कांता के ननिहाल गया था। साले के लड़के की शादी थी।" "अच्छा-अच्छा ! क्या बात है-~परिवार साथ नहीं गया था ?" "वह लोग वहीं हैं। उन्होंने प्राने ही नहीं दिया. 'कल पाएंगे।" "प्राइए, वैठिए. चंदरसेन प्रॉफिस की कुर्सी पर बैठ गए, जो दरवाजे के पास ही छाया में रखी हुई थी। दूसरी कुर्सी पर दुर्गादास जी खुद बैठ गए। दुर्गादास जी ने रक्खे से कहा कि वह लेमन-सोडे की एक बोतल ले श्राए। "क्यों तकलीफ करते हैं, शाह जी, मैं घर ही तो जा रहा हूं," चंदर- सेन बोले । "घर भी चले जाना सफर से आए हैं, प्यास तो लग ही पाती है !" दुर्गादास जी ने कहा और नौकर चला गया। फिर वह बोले, "सुना है, आपने किराए का मकान लिया है। 'मुझे बताया होता, मैं सस्ते में खरीदवा देता-~-उगरसेन लंगोटिया है।" चंदरसेन थोड़ा-सा झिझके । फिर बोले, "वो तो ठीक है, पर खरीदने 46/नीड़ -

पीमियत नही है अभी "यरता में हो याग कर मैना..."
"गी भी बम बात है ! रिस बात कमी है ! दो-तीन ट्रकतो
परते ही है."
"मी तो टोर है"नि नारतो नहीं है न पने में..."
दुर्गाशरानीपोपाल गम में प्राप। नाहिर पा करमेन रा
माम रोक नही पस रहा था। बोने, 'हो, यह बात तो है"पम
मापार में ममी हो, तो उगे निरानना भी टीम नही...मे मरान तो यह
अन्धा ही है."हमा धूप राती माती है..."
"वनी देकर से लिया."
रममा मेमन सोरेरी योतन में पाया पौर उगने पंगुटा पार
कपर मीमारीमोर बोतम गोमार पंदन गोपमा दी।
"मा नहीं पियेंगे ?" पंदरगन ने पूछ।
"मागियो जो हमारा रा है ! ."". पहार दुर्गादास जी एपा.
एक उदागीन हो गए । बारमेन को मोरगा तो समा, मेरिन यह
पुरा को नहीं । योनम पानी की मोर जात मार पर भी पोर पास
हिए।
दूसरी बाम मोहन से उगमहीन्यही भौसी मासी पानी पारी
नाम मानमरमा
गरम उसने को हो पा । मोहन जीवार पर भागापा।
मांगन में मा उमा मिए स्वेटर युन रही पीरिया भागामी
पीपाट गुनकर उसने उपर देगापा।
नदी पोगिन मपनी पेटी में बह रही थी, "गत भीना! तेरी
मोसो मा पर है.""परमाती है?"
मोन हो गए।
योजनामा यह मासीता, प्रानी मारेमाप प्रांगन में
मी महाप में एक प्लेट पी. far Eमान पादा।
मापन मे तारा के पास पापार, उसने पीt forgni

ur
दिन धूप काफी तेज पड़ रही थी। लू भी चल रही थी। जमीन
रही थी । बस अड्डे पर इक्का-दुक्का लोग ही थे। एक बस आई और
गई।
दुर्गादास जी अपने दफ्तर के बाहर खड़े थे कि उनकी नजर अपने
नये पड़ोसी पर पड़ गई। उनके हाथ में कपड़े में बंधी हुई टोकरी थी
और एक छोटा-सा सूटकेस । दुर्गादास जी ने उन्हें बुला लिया, "मैंने कहा,
चंदरसेन जी !"
चंदरसेन ने घूरकर देखा और चेहरे पर मुसकराहट या गयी। "पाहा!
पाप हैं !" वह पास आ गये।
"कहां से आ रही हैं सवारियां ?"
"कांता के ननिहाल गया था। साले के लड़के की शादी थी।"
"अच्छा-अच्छा ! क्या बात है-परिवार साथ नहीं गया था ?"
"वह लोग वहीं हैं। उन्होंने प्राने ही नहीं दिया 'कल आएंगे।"
वैठिए..."
चंदरसेन प्रॉफिस की कुर्सी पर बैठ गए, जो दरवाजे के पास ही छाया
में रखी हुई थी। दूसरी कुर्सी पर दुर्गादास जी खुद वैठ गए।
दुर्गादास जी ने रक्से से कहा कि वह लेमन-सोडे की एक बोतल
श्राए।
"क्यों तकलीफ करते हैं, शाह जी, मैं घर ही तो जा रहा हूं," चं
सेन बोले।
"घर भी चले जाना.. सफर से आए हैं, प्यास तो लग ही
है !" दुर्गादास जी ने कहा और नौकर चला गया। फिर वह
"सुना है, आपने किराए का मकान लिया है"मुझे बताया होता,
में खरीदवा देता-उगरसेन लंगोटिया है।"
चंदरसेन थोड़ा-सा झिझके । फिर बोले, "वो तो ठीक है, पर
"पाइए,
46/ नीड़

को हैसियत नहीं है अभी"वरना मैं खुद ही दात कर लेता..."
"ऐसी भी क्या बात है ! किस बात की कमी है ! दो-तीन ट्रक तो
चलते ही हैं !"
"सो तो ठीक है. लेकिन नकद तो कुछ नहीं है न पल्ले में..."
दुर्गादास जी को दान समझ में आ गयी। बाहिर या चंदरतेन का
काम ठीक नहीं चल रहा था। बोले, 'हां, यह बात तो है"रकम
यापार में लगी हो, दो उसे निकालना भी ठीक नहीं. वैसे मकान तो वह
अच्छा ही है "हवा-घूप खुली पाती है..."
"यही देखकर ले लिया..."
रक्सा तेमन-सोडे की बोतल ले आया और उसने अंगूठा रखकर
कपर येलो मारी भोर वोतल खोलकर चंदरनेन को पमा दो।
"मान नहीं पियेंगे?" चंदरसेन ने पूछा।
"प्राप पियो जी"हमारा क्या है !..." कहकर दुर्गादास जी एका-
एक उदासीन हो गए। चंदरमेन को कुछ प्रत्रीब-सा तो लगा, लेकिन वह
बोले नहीं । वोतल खाली की और इजाजत लेकर घर की ओर चल
दिए।
दूसरी गाम मोहन को उस बड़ी-बड़ी भोली आखों वाली लड़की का
नाम मालूम हुआ।
नूरज ढलने को ही था। मोहन छत की दीवार पर झुका खड़ा था।
प्रांगन में मां उसके लिए स्वेटर बुन रही थी कि दरवाजे से प्राती कदमो
की ग्राहट मुनकर तमने उघर देखा था।
नयी पड़ोसिन अपनी बेटी ने कह रही थी, "चल भी न कांता ! तेरी
मौसी का घर है."गरमाती क्यों है ?"
मोहन के कान सड़े हो गए।
दोक्षन वाद ही वह लड़की, काता, अपनी मा के साथ मामन में
गमी । कांता के हाथ में एक प्लेट थी, जिसपर रूमाल पडा हमार
उनके पांवो मेझिझक थी।
मांगन में तारा के पास पहुचकर, उसने धीरे
-

कहा, "नमस्ते, मौसी जी..." मां ने जैसे और प्रोत्साहित किया, "अरी, मरी क्यों जाती है ? जोर से बोल ! घर में तो चहकती फिरती है।" कांता और भी सकुचा गयी। तारा के चेहरे पर ममता-भरी मुसकराहट विखर आयी। उसने ऊन का गोला और हाथ की बुनाई को एक प्रोर रख दिया और दोनों हाथ फैलाकर बोली, "प्रायो-पायो, बैठो..." कांता और उसकी मां, फूलवंती, चारपाई पर बैठ गयीं। "जी लग गया नये घर में ?" तारा ने कांता के सिर पर हाथ रखते हुए पूछा। कांता ने झुके सिर से ही जवाव दिया, "हां, जी।" "जी तो लगाना ही पड़ता है, वहन जी," फूलवंती ने कहा, "अपने- आप थोड़े ही लगता है।..." "क्यों, मेल-मिलाप रहे तो जी अपने-आप लगा रहता है..." तारा - ने कहा। कांता ने अपने हाथ में थमी तश्तरी तारा की ओर बढ़ा दी.--"मौसी जी..'यह"" तारा ने तश्तरी ले ली। उसपर से रूमाल हटाया। तश्तरी में थोड़े- से लड्डु और मिठाई थी। "कोई शादी थी?" ताराने तश्तरी को चारपाई पर ही रखते पूछ लिया। "हां," फूलवंती ने जवाब दिया, "मेरे भतीजे की..'आज ही लोट- कर पाए हैं।" तारा ने एक बार फिर कांता के सिर पर हाथ रख दिया और पूछा, "पढ़ने जाती हो?" "जी," कांता ने हौले से कहा । !"कौन-सी जमात में हो ?" "जी, नौवीं में..." : इसके साथ ही कांता ने जरा-सा सिर उठाया, उसकी आंख एक क्षण

के लिए छत की तरफ गयी, दूसरे ही क्षण उसने सिर झुका लिया।
मोहन लगातार उसे ही देखे जा रहा था और उसके पूरे बदन में
झनझनाहट हो रही थी।
"यह बड़ी लड़की है न?" तारा ने फूलवंती से फिर पूछा।
फूलवंती ने एक ठंही प्राह भर ली। "बड़ी या छोटी-अपनी तो
जो भी है, एकम-एक यही है, बहन जी!
तारा को लगा, फूलवंती को इस बात का कही गम है कि उनके लड़का
नहीं है । मुस्कराते हुए बोली, "बड़ी प्यारी बच्ची है ! .."बड़ी शर्मीली...
बेटों से भी बढ़कर !..." फिर काता के सिर को प्यार से झकझोरती-सी
बोली, "मां का हाथ बंटाती है न बेटी ?"
काता ने धीरे से पाहा।
"मेरी रानी, बेटी।..." उसने कांता का सिर चूमते हुए अपनी छाती
के पास खींच लिया, "कभी-कभी आ जाया कर''यह भी तेरा अपना
ही घर है..."
काता की झपकती हुई पाखें छत की पोर चली गयी। मोहन की
परछाई ही नजर आ रही थी।
"बोल, पाएगी न ?" तारा ने पूछा।
"जी, ग्राऊंगी
फूलवंती उठने को हुई । "अच्छा, बहन जी."अब चलते हैं..."
"लो ! इतनी जल्दी !" तारा ने फूलवंती के घुटने पर हाथ रख
दिया, "ऐसे में जाने नही दूगी..."उसने कहा और फिर मोहन को
प्रावाज दी।
मोहन ने छत से नीचे झांका, "क्या है, मां?"
"जा बेटा! जरा हलवाई से भागकर गरम-गरम समोसे तो ले
प्रा!"
"अभी लो, मां !" मोहन ने जल्दी से पांवों में चप्पलें उड़सी पौर
सीढियां उतरने लगा। लेकिन फूलवंती की बात सुनकर वही अटक
गया।
"नहीं, वहन जी "माज नही."अभी कई घरो मे जाना है. देर हो

जाएगी...' पांच-दस मिनट में क्या फर्क पड़ जाएगा!" तारा ने कहा, "ऐसे मन थोड़े ही भरता है। "मैंने कहा न फिर किसी दिन आ जाऊंगी..." तारा का चेहरा उतर-सा गया। मोहन का उत्साह भी ठंडा पड़ गया। "अच्छा..." तारा मिठाई वाली प्लेट उठाकर रसोई में गयी। मिठाई को दूसरी प्लेट में रखकर उसने खाली प्लेट पर थोड़ा सा गुड़ रख दिया और वह प्लेट उसने कांता को थमा दी। साथ ही वोली, "माना जरूर" "जी, ग्राऊंगी..." कांता ने कहा। कांता अपनी मां के साथ जाने लगी, तो एक बार कनखी से उसने सीढ़ियों में खड़े मोहन की ओर देख लिया। मोहन उसीकी ओर देख रहा था। कांता हलके से मुसकरा दी और फिर मां के साथ दहलीज पार कर गयी। उस रात मोहन ने अपनी डायरी में लिखा: "उसका नाम कांता है। नवी जमात में पढ़ती है । कांता ! कितना प्यारा नाम है ! कांता का मतलब क्या होता है ? कांत से ही कांता बना होगा. "कांत यानी पति.."कांता यानी..." । . उस दिन के बाद उनकी मुलाकातें करीव-करीब रोजाना होने लगीं। कभी हलवाई की दुकान पर, कभी वेकरी में, कभी गली में, कभी बाजार में । दोनों एक-दूसरे की तरफ देखते और उनकी प्रांखों में चमक आ जाती, चेहरे का रंग लाल हो जाता, प्रोठ मुस्कराने लगते । या फिर मोहन अपनी चारपाई पर लेटा अलगोजा बजाता रहता। कांता अपने कमरे में बैठी पढ़ती रहती-लेकिन उसका मन किताब में कम, अलगोजे की सुरीली आवाज में ज्यादा होता। फूलवंती का तारा से मेलजोल भी बढ़ गया। वे दोपहर के वक्त प्रांगन में बैठ सवैयां बताती रहती और बाबुल गाती रहतीं। या फिर चन्नियों पर सलमा-सितारे लगाती रहती और गाती रहती। मोहन प्रौर कांता के बीच प्रांखों ही प्रांतों में बातें होती रहती गुपचुप। छत पर। लेकिन सच वात यह भी थी कि मोहन कांता से बात करने को उता- वला हो रहा था। अपनी डायरी में वह जाने कितनी बातें उससे कर चुके था, लेकिन हायरी मुखरता का प्रतिरूप कभी नही बन सकती थी। एक दिन उसने नहीं हो रहा गया, तो वह तेजी से कमरे से निकला और सीढियां उतरकर बाहर चला गया । उसने काता को गली में जाते हुए देख लिया था। उसके हाथों में छोटी-सी टोकरी मे दाने थे, जिन्हें वह मुनाने जा रही थी। गली ज्यादा चौड़ी नही थी-पोर सामने से बड़े-बड़े सीगों वाली गाय पा रही थी। काता एकदम सहम गई। लेकिन तभी मोहन कांता और गाय के बीच ग्रा गया और उसने गाय को परे हटा दिया। इस आपाधापी में कांता की टोकरी से दाने उछलकर गली में विसर गए और उसकी मूरत रुमसी हो पाई। एकएक वह वापस पलटने लगी। "रे !" मोहन के मुह से निकला, "कहा चल दी?" काता कुछ नहीं बोली। उसने एक बार नजर भरकर मोहन की तरफ देखा और फिर घूम गई। "घर जा रही हो? और दाने लेने ?" मोहन ने पूछा। काता रक गई। धीरे से बोली, "हा।" "रहने दो"चलो, भट्टी वाली से ही ले लेंगे..." मोहन ने कहा। "न, बाबा !" कांता दोली, "प्रच्छे न मिले तो?" "मिल जायेंगे"चलो न !" मोहन के स्वर में इतना इसरार था कि कांना न नहीं कर सकी । चुपचाप उसके साथ चलने लगी। "तुम मेरे पीछे-पीछे क्यो प्राय ?" कुछ कदम चलते रहने के बाद काता ने बड़ा भोला-सा सवाल दिया। मोहन ने उसके चेहरे की ओर देगा। कुछ वोला नही। उसे लगा, काता अपने सवाल का जवाब खुद ही दे लेगी।

"मां से डरती हो ?" उसने पूछा। "नहीं, मां तो कुछ नहीं कहती। वाऊजी का गुस्सा. बड़ा खराब !" "सारे वाऊजी ऐसे ही होते हैं..." मोहन ने जैसे अपने-आपसे कहा। फर पूछा, "डांटते हैं ?" "डांट का क्या है ! वह तो रोज ही पड़ती है..." "क्यों ?" "डांटने के लिए भी किसी वजह की जरूरत होती है ! पड़ती है, सो पड़ती है---वस !" मोहन को हंसी आ गई। कांता भौंचक-सी उसकी तरफ देखने लगी। भट्ठी वाली बड़ी शोख थी। काली-कलूटी। चेहरे और गर्दन और हाथ- पैरों पर गहरी वारीक शिकनें। सर के बाल सन जैसे , मानो बरसों से तेल की एक वृंद न मिली हो। छीट का कुर्ता और काली सलवार पहने रहती। कानों में चांदी के झुमके। दाने भूनते-भूनते वह लड़के-लड़कियों से मजाक भी करती जाती। कांता भट्ठी के पास ही वैठ गई। भट्ठी में जलते हुए घास-फूस और इंधन, तपती हुई रेत, भुनते हुए दानों और धुएं की मिली-जुली महक में अजीव-सी मस्ती थी। "तुझे क्या चाहिए, री छोकरी ?" भट्ठी वाली ने कांता से पूछा, भट्ठी की तपिश से अब तक कांता का चेहरा लाल हो गया था और उसकी नाक पर पसीने के बारीक-बारीक मोती उभर पाए थे। कड़वे धुएं से प्रांखें भी पनीली हो उठी थीं। मोहन ने रास्ते में ही उसे अठन्नी थमा दी थी। उसने वह अठन्नी भट्ठी वाली को दी और बोली, "आठ आने के चने भून दो, चाची।" भट्ठीवाली ने डिब्बे को मापनी से मापकर चने कड़ाही में डा दिए । तभी मोहन बोल उठा, "चाची, दस पैसे के चने मुझे भी..." "अच्छा-अच्छा "रुमाल लाया है ?" 52/नीड़ 4 "रूमाल क्या करोगी, चाची ?" "दान किसमे ले जाएगा?" • "क्यों चाची, पतलून की जे तो हैं !" • "भट्ठीवाली हंस दी, "क्यों रे ! गरमी सह लेगा दानो की!' मोहन चुप रह गया। चाची कह तो ठीक रही थी, लेकिन उसने मुट्ठी भर दाने और कड़ाही में डाल दिए थे। कांता कड़ाही के पास विखरे ज्वार के फूले हुए दाने धुन-चुनकर एक-एक करके मुंह में डाल रही थी। चने भुन गए, तो भट्ठीवाली ने उन्हें रेत में ही दल दिया । फिर छलनी से रेत छानकर और छिलके उड़ाकर उसने दाने काता की टोकरी में डाल दिए । साथ ही बोली, "ले बेटी, मुट्ठी-भर दाने इसे भी निकालकर दे देना !" "अच्छा चाची!" काता ने कहा और टोकरी लेकर उठ सही हुई। मोहन उसके पीछे-पीछे चल दिया। फिर रास्ते भर वह दाने ही साता प्रया । गली के मोड़ पर पहुंचकर वे अलग हो गये, जैसे एक-दूसरे को जानते ही न हो। 6 उस दिन के बाद मोहन और कांता थोड़ा-थोडा और खुलने लगे, वाती के कई तरीके निकल पाये थे, कभी कागज पर कोई बात लिखी जाती मोर उसकी गेंद बनाकर दूसरी छत पर फेंक दी जाती। दूसरी तरफ से बात का जवाब उसी कागज की गेंद पर मा जाता। कभी दीवार के बीच घने झरोखों से मुंह सटाकर कुछ फुसफुमा दिया जाता। कभी बीच की दीवार का ऊपरी सपाट सिरा तस्ती बन जाता और उस पर इबारतें लिखी जातो और, मिटा भी दी जाती । यह सब भी मुमकिन न होता- किसी मरी छत . पर कोई खडा नजर मा जाता-तो प्रांखों ही माखों में बातें चलती रहतीं। मोहन का मन पढ़ाई में खूब-खुब लगने लगा वही किताबें जो पहले उबाऊ लगती थीं, अब अच्छी लगने लगी । कांता अपनी पढ़ाई से संबंधित कई तरह के सवाल भी पूछने लगी थी, जिनका जवाब या हल देना बहुत जरूरी था । इसलिए भी वह निरंतर कुछ न कुछ पढ़ता रहता। कभी- कभार अलगोजा वह जरूर उठा लेता, लेकिन साइकल का इस्तेमाल सिर्फ कॉलेज पाने-जाने के लिए ही होता। उस शाम हवा काफी तेज चल रही थी। भासमान में बादल भी थे, लेकिन बारिश के प्रासार नहीं थे । मोहन अपने कमरे में लेटा अलगोजा बजा रहा था कि छत पर कुछ गिरने की बड़ी हल्की-सी आवाज हुई। मोहन चौंककर उठा । कागज का गोला ठीक दरवाजे को पास पाकर गिरा था। मोहन ने गोले को देखा, फिर पांता के कमरे की तरफ । वह धीरे- धीरे मुस्करा रही थी। मोहन ने झुककर गोले को उठा लिया । उसे खोला, तो लिखा था : लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल। लाली देखन मैं गयी मैं भी हो गयी लाल ।। नीचे लिखा था: "इस दोहे का अर्थ लिख दो।" और साथ ही: "ग्राज अंदर क्यों छिपे बैठे हो ? बाहर कितनी अच्छी हवा चल रही " मोहन ने एक बार फिर कांता के कमरे की ओर देखा। वह सिर झुफाये अपनी किताव पढ़ रही थी। उसने उसी कागज पर दोहे का अर्थ लिखा और नीचे लिख दिया, "बाहर निकलकर होगा भी गया ?" फिर बाहर आकर उसने कागज का गोला बनाफर दूसरी छत की तरफ फेंका। कांता उम्मीद भरी नजर से उसीकी अोर देख रही थी। लेफिन सहसा उसका दिल धक से रह गया। गोला दीवार को पार करके प्रांगन में जा गिरा था। 54/ती

कांता ने मूह बनाया। मोहन को हंसी आ गयी।
कांता ने मुडेर के पास जाकर आगन मे भांका । यह देखकर उसकी
जान में जान मायो कि प्रांगन में कोई नहीं था और गोली दीवार के
पास लगे अमरूद के पेड़ के पास जाकर गिरा था।
वह तेजी से सीढियां उतर गयो। प्रागन में पहुंच कर वह अमरद की
तरफ बढ़ ही रही थी कि मां को प्रावाज सुनायी दी, "कांता?"
"हा, मां!"
"क्या बात है ?"
"कुछ नही, मां:..'
"फिर इतना घबरायो क्यो है ?'
"ऐमे ही बड़ी प्यास लगी थी."एक गियास पानी दे दो।"
"जाकर रसोई मे मे ले ले..."
काता रसोई में चली गयी और पानी का गिलास भरकर झट से
बाहर भी पा गयी। पानी पीते हुए उसने देखा, मा कमरे में चली गयी
थी। उसने दो घूट ही भरे, गिलास को खिड़की में ही रखा और भागकर
कागज के गोले को उठा लिया । वह सीढ़ियो की तरफ मुड़ी ही थी कि
फिर मा को प्रावाज प्रायो, "काना!
"हा, मां !"वह ठिठक गयी।
"स्कूल का काम जल्दी में पूरा करके प्रा जा । तेरे बाळजी माते ही
ही होगे।..."
"अभी प्रायी मां! "तुम फिक्र मत करो..."
मा के हाथों में छाजन थी। हर पन्द्रह-बीम दिनो वाद उनमें ने पानी
रिसने लगना था।
।
"
दूसरे दिन स्कूल जाते वक्त कांता की मुलाकात मोहन से होने लगी।
काता प्रभी तक मुह फुलाये हुए थी। कल, वस, पकडी गयी थी न !
मोहन उसके गुस्म को भांप गया । छेड़ते हुए बोला, "क्या हुमा!
पकड़ी गयी ?"
"धस, वच ही गयो "उसने काप कर कहा ।

अपनी साइकिल को ठेलते हुए मोहन ने कहा, "खुद आकर नहीं पूछ सकती थीं?" "नवावा!" कांता की आंखें और भी बड़ी होकर फैल गयीं। "तुम्हारे वाऊजी से बड़ा डर लगता है।" "क्यों?" "वह तो मेरे वाऊजी से भी ज्यादा गुस्से वाले लगते हैं !" "हूं.''तो ?" "तो क्या ?" "कुछ नहीं''वाद में बताऊंगा। चलो, तुम्हें साइकल पर छोड़ । "...मैं चली जाऊंगी।" मोहन धीरे से हंस दिया, "कभी तो साइकल पर बैठना ही पड़ेगा वह वोला । कांता देखती रह गई। मोहन साइकल पर सवार होकर निकल गया। मोहतं की उस बात को पूरा होने में ज्यादा दिन नहीं लगे। उसकी एक आदत-सी बन गई थी। कॉलेज से छूटकर वह खेतों और टीलों की ओर जाने की बजाय कांता के स्कूल के बाहर के घने वर- गद के नीचे जाकर खड़ा हो जाता। स्कूल खत्म होता और कांता बाहर निकलती। कुछ दूर तक वह अपनी सहेलियों के साथ चलती रहती। मोहन भी पीछे-पीछे चलता रहता। फिर कांता सहेलियों से विदा ले लेती और मोहन से प्रा मिलती। फिर वे दोनों सड़क पर साथ-साथ चलते रहते । खूब बातें होतीं। मोहन ज्यादा बोलता, कांता कम । फिर जव गली का मुहाना पा जाता तो कांता मुड़ जाती । मोहन साइकल पर सवार होकर आगे निकल जाता। एग दिन छत पर बैठे मोहन ने कागज पर लिखा--"अगले शुक्रवार को नहर पर मेला लगेगा-चलोगी?" और कागज की गेंद उसने साथ की छत पर फेंक दी। जवाब आया, "ले जाओगे तो जरूर चलूंगी।" 56/नीड मोहन ने फिर लिखा, "डरोगी तो नहीं ?" जवाब माया, "तुम हो तो डर कंमा?" "लेकिन गली से निकलेंगे कैम? घर में क्या कहोगी ?" "मैं मुषी को माय लेकर जाऊगी। सुपी बतायेगी, मैं उसके घर जा रही हू, तुम रास्ते में मिलना..." "ठीक है "यही ठीक रहेगा । बस, सुपमा को समझा लेना।" "उसकी फिक्र मत करो।" शुक्रवार अभी तीन दिन दूर था। दोनो के लिए ये तीन दिन काटने भारी हो गए थे। लेकिन वक्त कटता तो है ही। शुक्रवार भी प्रा गया और उस दिन पहली बार कांता मोहन को साइकल पर बैठी-मले में जाने के लिए। काता घर से सुपमा के साथ निकली थी-उसके घर जाने के लिए। मोहन सुषमा के घर से थोड़ा-सा इधर ही मिल गया था। सुपमा ने मुस• कराकर काता की ओर देखा था और फिर अपने घर की पोर बढ़ गई थी। मोहन ने काता को साइकिल की रॉड पर विठा लिया था और फिर वे तेजी से शहर से बाहर निकल गए थे। मेले में भीड़ ही भीड थी। काता और मोहन जी भरकर घुमे । मोहन ने उमे स्टील की एक अंगूटी लेकर दी, जिसपर साप बना हुमा था । दो-तीन हार लेकर दिए, मोतियों के, पोनल के बने झुमके भी। काता ने उन्हें अपने रूमाल में बाध लिया । फिर जब उन्हें लगा कि लोगों के लौटने का वक्त होने को है, वे वापसी के लिए चल दिए। भीड से अलग हटकर कच्चे रास्ते पर पहुंचे, तो काता बोली, "रुयो • जरा..." 'क्या हुआ?" मोहन ने पूछा । "कुछ नही "ऐसे हो..." काता ने गरमाते-मुसकराते हुए अपने कुरते को जेव से एक रूमाल निकाला और मोहन की ओर बढाते बोली, "यह लो।" नोट/57 ० के०' मोहन ने रूमाल लिया। उसकी तह को खोला, तो उसके एक कोने में उसे कढ़ाई में अंग्रेजी के दो अक्षर दिखाई दिए.---'एम० "यह क्यों ?" मोहन ने मन ही मन खुश होते हुए पूछा। "तुमने मुझे इतना कुछ ले दिया. 'एक रूमाल ही तो है !" कांता बोली। दूर पीछे छूटते मेले में कहीं ग्रामोफोन रेकार्ड बज रहा था-'छल्ला दे जा निशानी 'तेरी बड़ी मेहरवानी...' 7 भार वक्त पंख लगाकर उड़ने लगा था। मोहन के भीतर अजीव-सा अहसास घर कर गया था। उसे महसूस होने लगा था, दुनिया उतनी बुरी नहीं है, जितनी वह उसे समझे हुए था । इसमें अपनापन भी है। खूबसूरती भी है। उसकी डायरी इसी तरह की बातों से भरती गई । शब्द काव्यमय हो उठे। अपनी डायरी और अलगोजे और किताबों को लिए वह पहाड़ी पर बने बाग में घूमता रहता। जाने किस मस्ती में वह उसका पांच सौ सीढ़ियां उतरता चला जाता । अनार के वगीचे के बीच वनी वारादरी की ऊपर मंजिल पर वह जा वैठता और पेड़ों और दीवारों, पंछियों और फूलों हवाओं और फिजात्रों को बताता रहता कि उसकी जिदगी किस कदर बद गई है कि एक छोटी-सी, अवोध-सी परी ने, जिनका नाम कांता है, उसके जीवन में खुशनुमा इंद्रधनुपी रंग भर दिए हैं। वक्त सचमुच लगाकर उड़ रहा था, क्योंकि पता तभी चला, जव परीक्षाओं के दिन नजदीक पा गए। परीक्षाओं के दिन निकट या गए, तो मोहन और कांता के बीच मूक समझौता हो गया। "प्रव पढ़ाई में दिल लगाना होगा।" "हां, अब दिल पढ़ाई में लगाना होगा।"

.."
"लगता तो नहीं, पर लगाना पडेगा।"
"हां, लगता नही, पर लगाना पडेगा।"
"वरना रिजल्ट बिगड़ जाएगा।"
"हां, रिजल्ट नहीं बिगड़ना चाहिए।"
"मगर किताबो में प्रांखें दिखाई दें तो?"
"हां, अगर किताबों में अलगोजे की धुन सुनाई दे तो?"
"उन पाखो पर हाथ रख देना होगा..."
"अलगोजे के स्वरों को दया देना होगा
"कसे होगा यह ?"
"हां, सचमुच कैसे ?"
"जैसे भी हो करना तो होगा ही।"
"ठीक बात है..."
..'वात ठीक थी, लेकिन उतनी प्रासान भी नहीं थी कि बस कह
दिया और हो गया । दिल सचमुच छपे-लिखे अक्षरो से दूर-दूर छिटकता
रहता । प्रांखें एक-दूसरे के कमरों की प्रोर उठती रहती। लेकिन यह
कोई अच्छी बात नही थी। इम्तहान में फेल होकर एक-दूसरे की नजरों
में नालायक सावित होना कोई सुखद कल्पना नही थी।
फिर दोनों ने रास्ता निकाल लिया । काता ने मुपमा को अपने साथ
रखना शुरू कर दिया । कभी वह उसके घर चली जाती, कभी उसे अपने
यहां बुला लेती । सुषी मोहन के बारे मे कभी कोई यात छेड़ना चाहती
थी, तो कांता प्रांखों को एक ही चमक से उसे घरज देती।
मोहन ने पुरानी बारादरी को अपना मध्ययन कक्ष बना लिया।
.. लेकिन मोहन का पर से इतने-इतने लंबे समय तक बाहर रहना दुर्गा-
दास जी को फिर प्रखर गया । एक रात खाना खाने के बाद वह मोहन
के कमरे में जा धमके। वह अपनी कुर्सी पर बैठा था और सोच रहा
था कि किस विषय को पुस्तक उठाए।
"कसी तयारी चल रही है !" उन्होने सौंफ चबाते हुए पूछा।
"अच्छी ही चल रही है, वाळजी।"

"कितने दिन वाकी हैं इम्तहान शुरू होने में ?" "दस दिन हैं अभी।" वाऊजी आ कर उसकी खटिया पर बैठ गए और फिर उसकी पीठ की र घूमते हुए बोले, "खाने के वक्त पुछना मैंने ठीक नहीं समझा कई नों से देख रहा हूं. 'सारा-सारा दिन तुम रहते कहां हो?" मोहन जानता था, अगर उसने सच बता दिया, तो वाऊजी और गुस्से से बात करेंगे । फिर पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। एक दिन वरवाद हो जाएगा। "एक दोस्त के साथ पढ़ता हूं..." उसने उनकी ओर देखे बिना ही कहा, "हम एक-दूसरे से पूछ भी लेते हैं..." लेकिन उसकी बात से वाऊजी को तसल्ली नहीं हुई। "दोस्तों के साथ कितनी पढ़ाई होती है, मैं जानता हूं..." वह जरा तुर्शी से वोले, "पढ़ाई के बहाने आवारागर्दी होती होगी !" "पाप ऐसा क्यों सोचते हैं, वाऊजी ?" मोहन को खुद समझ नहीं पाया कि वह सवाल कैसे कर गया। "मैं जानता हूं, इसलिए ऐसा कहता हूं। तुम्हें अलग कमरा दे रखा है--इसीलिए न कि तुम्हारी पढ़ाई में खलल न पड़े ! फिर दूसरों के घर जाने की क्या जरूरत है ?" अब मोहन की हिम्मत नहीं हुई कि जवाव दे सके । वाऊजी उठकर उसके पास पा खड़े हुए। "डायरी लिखते हो कि वन्द कर दिया ?" "अाजकल 'कभी-कभी लिख लेता हूं..." "दूसरों की डायरी पढ़ना अच्छा नहीं होता, वरना पता चल जात कि तुम करते क्या, रहते हो..." मोहन को समझ नहीं पाया कि वाऊ यह बात उससे कह रहे थे या अपने-यापसे । मगर उनकी अगली उसकी समझ में जरूर आ गई, क्योंकि वाऊजी ने उसकी गर्दन पर कते वालों को पकड़कर खींचते हुए कहा था, "और अयाल किस में बढ़ा रखी है ?" वाऊजी अपने चेहरे को उसके चेहरे के सामने लाकर उसकी में काक रहे थे । मोहन ने अपनी नजर नीची कर ली। "सुवह पैमे ले जाना और नाई के सामने मिर झुका देना--तुम्हें मिरासी मे प्रादमी बना देगा--पाद रहेगा?" "जी।" बाऊजी चले गए। कुछ देर बाद मोहन अपने प्रापे में लौटा । फिर उसने मामने की बिडकी के पार देसा । काता के कमरे की खिड़की बंद थी, लेकिन अंदर बत्ती जल रही थी। उसका जी चाहा वह एक बार उसका दिया हमा रूमाल निकालकर देस ले। फिर उसने टाल दिया। धाऊजी फिर मा गए तो? कुछ ही दिन बाद दोनों की परीक्षाएं शुरू हो गयी । प्रोह ! कितना मुश्किल हो रहा था सवालों के जवाब लिखना ! 'वार-बार एक-दूसरे का चेहरा प्रश्नपत्र में झाकने लगता, लेकिन अब कोई मौका नहीं था उस चेहरे में झांकने का। वे अपना सिर झटक देते और फिर उत्तर- पुस्तिका पर झुक जाते। मोहन का प्रागिरी पर्वा हुमा। थकान उसके पोर-पोर मे समाई हुई थी। मां नीद को कमी के कारण लाल हो रही थी। चेहरे को रगत पीली पड़ी हुई थी। परीक्षा कक्ष से निकलकर वह कॉरीडोर में पाया । लड़के-लड़कियां रोज की तरह बतिया रहे थे-वस, निश्चितता कुछ ज्यादा थी। 'माज तो मजा पा गया "ए-वन पेपर हुमा है।" "अपने राम तो दो सवास कर ही नही पाए "तुम्हारी तो प्रादत ही यही रही है ! दो सवाल फरटं क्लास, दो घसीटे हुए, दो-एक वाकी फिर भी, साले, तुम फस्ट डिवीजन ले पाते हो!" "एग्जामिनर को छोले देभाना होगा!" हंसी। "माज तो पिक्चरें हो जायें!"

. "क्यों नहीं ! क्यों नहीं !!" "जैसे रोज नहीं होती थीं !" "हर रोज पिक्चर होती थी-ग्राज पिक्चरें !..." "हो-हो-हो!" हंसी। "क्या खयाल है, शीला ?" "खयाल तो अच्छा है, सुंदर ! • ''मगर एक शर्त है." "तुम्हारी सव शर्ते मंजूर! "पिक्चर सवको दिखानी पड़ेगी..." "पिक्चर नहीं.."पिक्चरें...?" "मंजूर.." "हुरे'..! हुरे !" "पाप लोगों के लिए तो वंदे और वंदे के बाप की सारी जागीर हाजिर है, सुंदरियो ! आखिर वह कमाता किसलिए है ! ...चलो !" "हीयर ! हीयर !!" "कन्हैया को भी ले चलो आज!" "कन्हैया को जाने दो पनघट पर !!" "हे ! हे !" हंसी की आवाजें, चीखें-चिल्लाहटें मोहन का पीछा करती रहीं। उसने अपनी साइकल उठाई और तीर की तरह मेन गेट से बाहर हो गया। - देवी मंदिर के पास, एक बड़ी-सी चट्टान की आड़ में बैठे थे वे दोनों। "कैसे हुए परचे ?" कांता ने पूछा। "अच्छे ही हो गए''तुम्हारे ?" मोहन ने कहा। "हमारा क्या है ! हमें तो सिर्फ पास होने लायक नंबर चाहिए' "क्यों ?" "हमें कौन-सी नौकरी करनी है ! चिट्ठी-पत्री लिखना-पढ़ना जाये, उतना ही बहुत है..." 62/ नीड़

मोहन को काता का यह घरूपन अच्छा लगा।
फिर कुछ क्षण वे दोनों खामोश बैठे रहे । कांता के चेहरे पर प्रचा-
नक उदामी उतर पायी।
"क्या हो गया ?" मोहन ने लक्ष्य किया। "अचानक ?"
"एक बात सोच रही हूं"
"क्या?"
"तुम्हारे साथ को इतनी प्रादत पड़ गयी है."अकेले वक्त में
करेगा?"
"अकेले.. मतलब ?"
"हमारी छुट्टियां हो गयी हैं । मां मुझे मामा के घर ले जा रही है।
हर साल यही होता है
मोहन को एक झटका-सा लगा । वह खामोश रह गया। फिर झटके
के प्रभाव में ही बोला, "सच कहती हो, कांता' प्रकले वक्त कैसे
कटेगा?"
"जाने का मन तो नहीं है. पर मजबूरी है..." फिर काता ने देसा,
उमकी बात ने मोहन को भी उदास बना दिया है । झट सामान्य होते हुए
वोनी, "चनो, क्या हुया !-कुछ ही दिनों की तो बात है."
"कब लौटोगी ?" मोहन ने पूछा।
"दो महीने बाद..."
''दो महीने !" मोहन ने प्राह भर ली।
"और कल ही चले भी जाना है"मां को भी, पता नही, किस यात
की जल्दी पड़ी हुई है ! ..."
काता ने फिर कुछ नहीं कहा। मोहन भी सामोश बैठा छोटे-छोटे
कंकड़ उठाकर सामने फेंकता रहा ।
काता ने मोहन का पलगोजा उठाया और उसके हाथो में पमाते हुए
बोली : “चलने से पहले अलगोजे की धुन तो सुना दो कोई ऐसी घुन,
जो दो महीनों तक कानों में गूजती रहे।
मोहन चुपचाप मलगोजा बजाने लगा। कांता खामोशी से सुनती
रही।

०० कांता दूसरे ही दिन मामा के गांव चली गयी। उसका कमरा बंद हो गया। मोहन जब भी बंद दरवाजे की ओर देखता, उसे लगता जैसे उसकी खुशियों के सारे दरवाजों को बंद कर दिया गया है। किसी चीज में उसका मन न लगतान अलगोजे में, न खेतों में, न वारादरी में । ऐसे वक्त में उसकी डायरी ही उसकी अकेली साथिन रह गयी थी। वह अपने दिल की सारी बातें खोल-खोलकर उसे बताता रहता । तरह- तरह से अपने और कांता के नाम को जोड़-जोड़कर लिखता रहता। लेकिन तसल्ली न होती। कभी-कभी वह बारादरी में जा बैठता और वहां से ऊंची-ऊंची आवाज में वह कांता को आवाजें लगाता रहता । जय थक जाता, तो चिड़ियों, तोतों, पेड़ों और टूटी दीवारों को अपनी डायरी पढ़कर सुनाता रहता। वाऊजी ने उसे अपने साथ काम पर लगाना चाहा । वह वहां भी थोड़ी देर रहता, फिर साइकल उठाता और सड़के नापने चल देता। वाऊजी का गुस्सा उबाल खाने लगता । लेकिन छुट्टियां होने की वजह से ज्यादा कुछ न बोलते। एक रात दुर्गादास जी घर पहुंचे, तो तारा ने बताया, "मोहन की बुआ की चिट्ठी पायी है। "क्या लिखा है ?" उन्होंने उदासीनता से ही पूछा। "लिखा है-बीमार हैं," तारा ने बताया। "अकेली रहती हैं कितनी बार तो कह चुका हूं कि यहां या जाएं."लेकिन वह उस घर को छोड़ना ही नहीं चाहती! "पाप भी कैसी बातें करते हैं ! कोई अपने घर को छोड़ सकता है ? खासकर बुढ़ापे में..." तारा ने कहा, "बुढ़ापे में तो यादें ही सहारा रह जाती हैं..." 64/नीड़ मोहन को युमा दुर्गादास जी की सगी वहन नहीं थी, वैसे भी उनके पति से दुर्गादास की खटपट हो गई थी। वहन बरसों पहले विधवा हो गई थी, फिर भी दुर्गादास जी की नाराजगी ज्यों की त्यो बनी हुई थी। "क्या करना चाहिए ?" "पता तो कर ही पाना चाहिए," तारा ने कहा। "मेरे लिए मुमकिन नहीं है जाना "नौकर भी छुट्टी ले गया है।" "कोई न पहुंचा, तो वहन जी को बुरा लगेगा "कहेगी, कोई देखने तक नहीं पाया।" दुर्गादास जी को एक वात सूझ गई। बोले, "ऐसा करो, अपने लाडले को भेज दो। अड्डे पर उसका जी ही नही लगता“जव देखो, गायव मिलता है ! आवारागर्दी करता रहता है सारा दिन । उसीको भेज दो."जा के मिल पाएगा।" "ठीक है," तारा ने कहा और खाना परोसने लगी। ऐसा क्यों होता है कि जो वरसों से अपने हैं, मन उनसे दूर-दूर भागता है पौर जो कुछ दिनों से मिले है, उनके संग के लिए तरसता रहता है ? वस सड़क पर दौडती जा रही थी। उसका रास्ता बंधा-बंधाया था। उसने बंधा-बंधाया रास्ता छोडा नहीं कि संकट सामने आया नहीं। लेकिन मन वध-बंधाए रास्तों पर कब चलता है ! बस में बैठे मोहन का मन प्राड़े-टेढे रास्तों पर दौड़ रहा था । बाऊजी में इतना गुस्सा क्यों है ? क्यों उन्हें दूसरों की तरह हंमना- मुसकराना अच्छा नहीं लगता? क्या इसलिए कि उन्होंने जिंदगी भर सघर्ष किया है ? क्या जिदगी का मघर्ष इनसान की मुसकराहटो को हमेशा के लिए छीन लेता है ?... क्या संघर्ष प्रादमी को दंभी भी बना देता है ?... क्यो कहीं भी जी नही लगता ?.."न घर में "न बाहर ? क्यो किसीके संग के प्रभाव में अकेलापन अच्छा लगने लगा है ? यह कैसा विरोधाभास है ?... बस ने झटके से एक मोड़ काटा । उस हुलारे से विचारो को कड़ियां बिखर गई। मोहन ने खिड़की से बाहर देखा और डायरी को बंद कर दिया। दूर, खेतों के पार एक गांव नजर ग्राने लगा था। मोहन को अचानक लगा, इस गांव को वह पहचानता है। वह उतरने की तैयारी करने लगा। वह एक पुराना, गिरता-ढहता मकान था-कॉटेजनुमा । वाहर लकड़ी का गेट, जिनका एक हिस्सा बारिश-धूप और बरसों के इस्तेमाल से जर्जर हो चुका था। गेट और मकान के बीच एक कच्चा रास्ता था और दोनों तरफ घास वाले जमीन के टुकड़े, जो कभी लॉन रहे होंगे। अब तो वहां की घास भी सूख-सड़ चुकी थी, पेड़-पौधों के वचने का तो सवाल ही नहीं उठता था। मकान की ऊंची, टाइलों वाली छत जगह-जगह से टूटी हुई थी और एक मुर्गा चिमनी पर बैठा किसी सिपहसालार की तरह आस- पास के इलाके का सर्वेक्षण कर रहा था। मकान के दाहिनी तरफ से मुगियों की कुड-कुड़ की आवाज या की आवाज पा रही थी-साथ ही पंखों की फड़- फड़ाहट। मोहन ने गेट पर लगी लकड़ी को खटखटाया और अावाज दी, . "घुग्रा जी!" युना मुर्गियों के दड़वे के पास बैठी उन्हें एक-एक करके बाहर निकाल रही थीं । वहीं से बोली, "कौन है ?" फिर उठकर खुद भी आगे प्रा गई। बुना के सारे बाल सफेद हो चुके थे। सलवार-कमीज, दुपट्टे प जगह-जगह मुगियों के पंख अटके हुए थे। अपने मोटे शीशों वाले चर को नाक पर ठीक से जमाती हुई वह फिर बोली, "कौन है ?" "मैं हूं, बुना जी-मोहन..." और उसने झुककर बुग्रा के प छू लिए। "अरे तू है ! इतना बड़ा हो गया तू बुमा ने हैरानी प्यार से कहा । "जीता रह ! जीता रह ! जुग-जुग जिए मेरा लाल ! चल"अंदर चल..." .. जीर बुमा ने उसका हाथ पकड लिया और उसे अंदर ले जाने लगी "मैं भी सोचू--यह 'वुअा-अा' कहने वाला प्राज कौन मा गया! ." मुझे क्या पता था!.."यहां तो कोई आता ही नहीं। मैं तो पहचान ही नही पाई ""नामुराद अखें बड़ो सराब हो गई है "ठीक से दिखाई हो नहीं देता. मोतिया उत्तर भाया था."पारसाल बनवाई थी पाएँ.."फिर भो.... अंदर पहुंचकर बुया ने उसे एक पुरानी-सी कुर्सी पर बिठा दिया। "तू बैंठ । म तेरे लिए शिकंजवी बनाकर लाती हूँ..." "रहने दो, बुआजी. अभी प्यास नही..." "नहीं रै''बडी गरमी है किनबी का जीन हो, तो चाय बना लाऊ?" " । बुप्रा बोली। "नही, बुना जी, अभी कुछ नहीं चाहिए । बस, पानी पिऊंगा.' "अच्छा, पानी हो ले पाती हूँ" बुमा गयी और शिकजवी बना लायो। साथ ही एक तफ्तरी में बर्फी की टुकड़ियो । तब तक मोहन ने अपने थैले में से कुछ पैवाट निकालकर मेज पर रख दिए थे "ले. "कुछ खाकर पानी पी ले ..." मोहन ने गिलास ले लिया। "मा ने आपके लिए कुछ धीजें भेजी हैं~~मेवयां, पापड़ बड़िया..." "वड़ा मोह करती है तारारानी!"क्या जरूरत थी यह रात्र भरने की! अब पूछो, भला कौन बनाएगा और कौन माएगा?.." मोहन चुपचाप शिकंजवी को घुट-घट कर पीडा रहा। "अकेली जान.. किसी तरह जी रही "बीही कितनी है !... यह भी कट ही जाएगी किसी तरह । बीच में मग्दिा हो गया था.. सामने की पहाड़ी पर तोगी रहती है न हीमा गडी मा । मुली और अदरक को चार बना जातीयो"दहीवारी दन्न, पनीर लोगना लिखा था, सो क्च रई..."हिर दुमा महाना हमने समी। 'मेरा भी दिमाग इन सा है ! का नोदं 17:

मुना, घर में सब लोग राजी-खुशी तो हैं न?" "सब ठीक हैं, वुना जी।" मोहन ने खाली गिलास मेज पर रख दिया । "वाऊजी खुद पाना चाहते थे, लेकिन जरूरी काम प्रा पड़ा और वह रुक गये..." .. "तू तो स्कूल जाता होगा, पढ़ने ?" "हां, वुग्रा जी कॉलेज जाता हूं.''आजकल छुट्टियां हैं ।" "जीता रह ! जीता रह ! इसी बहाने तुझे देख लिया. सा था, जब पिछली बार यहां पाया था। तब तेरे फूफा जिंदा थे. इसी मेज के नीचे तू छिप जाता था और अावाज लगाता था ~ 'फूफाजी, मुझे ढूंढो! और वह बिना नीचे देखे एक हाथ से तुझे ऐसे उठालेते थे, जैन तू विल्ली या खरगोश का बच्चा हो..." मोहन होले से मुसकरा दिया । उसको भीतर इस बात से कहीं गुदगुदी होने लगी थी। "वह तुझे मेज पर खड़ा कर देते थे और थाली बजाते थे. 'थाली वजने के साथ तू नाचता था. फिर कहता था-~-'फूफाजी, पैसे ! बुमा कहीं अतीत में खो गयी थीं। "तब की बात ही और थी।" उन्होंने क ठंडी प्राह भर ली। "तुझे तो यह सब याद ही नहीं होगा. "जाने क्यों दुर्गा इनसे नाराज हो गया. उससे पूछो, नाराजगी से कहीं भाई- बहन के रिश्ते भी टूट जाते हैं ? इनके मरने पर भी नहीं पाया 'तारा न होती, तो दुर्गा की जिंदगी पता नहीं क्या होती! तेरी मां वड़ी हुनर- वाली है। दुर्गा की जिंदगी बना दी उसने ! लेकिन दुर्गा उसकी कदर नहीं जानता'अब भी गुस्सा करता है ?" मोहन ने सवाल का जवाब नहीं दिया, बल्कि बात को दूसरी ओर मोड़ते हुए बोला, "प्रापका घर तो बिलकुल टूट-फूट गया है. घुग्राजी पर कोई बात नहीं मैं ठीक कर दूंगा..." ... खाना सा लेने के बाद बुमा मोहन को अपना दूसरा घर भी दिखाने ले गयीं। पास ही था। पिछवाड़े से सटा हुअा। छोटा था, लेकिन खूबसूरत था। "तेरे फूफा को बड़ा प्यार था इस घर में । यहां वह अपने सरकारी

अफसर दोस्तों को लाया करते थे। रात देर तक यहां लोग सात-पीते
रहते थे । उनको हंसी की पावाजें गूंजती रहती थी."
चुअा सामोश हो गयी। मोहन को लगा जैसे वुमा अचानक उन
खामोश हो चुकी आवाजों को फिर से सुनने लगी हैं।
"सब पत्म हो गया..."
'बुप्रा ने एक लंबी ठंडी माह भरकर कहा,
"वक्त कितनी जल्दी बीत जाता है ! तेरे फूफा को गुजरे दस साल हो
गए-~-फिर भी लगता है, अभी कल की बात है."
मोहन को झटका-सा लगा । वुमा कितनी अकेली थी। एक ही
लडकी हुई थी उनके, व्याह के बाद वह अपने पति के साथ सिंगापुर जा
वसी थी।
• एक काम करेगा, वेटे?" वुप्रा ने पूछा।
"दोलो, बुना जी !"
"तू पढ-लिरब ले फिर शादी करके इसी घर में प्राकर रहना में
मर जाऊगी, तो कौन रहेगा यहा?"
मोसन हम दिया । "कैसी बातें करती हो, बुपाजी ! मभी तो माप
बहुत बरस जिएंगी...'
"न बेटा ऐसी बद्दुमा मत दे ! अब तो एक-एक दिन पहाड
जैसा लगता है" अय तो बुलावा पा ही जाए, तो मच्छर..."
मोहन सामोश रह गया।
बाकी बचे दिन में मोहन ने वह बड़ी-सी मेज ठीक कर डाली, जिसपर
वह बचपन में नाचा करता था।
रात को बड़ी गहरी नीद मायी। दूसरे दिन जागा, तो उसे खुद
ताज्जुब हो रहा था कि वह इतनी गहरी नीद कैसे सो गया।
उसने खिड़की से बाहर देखाहनका-हतका उजाला फैल रहा था।
मीठी-मीठी ठंडी हवा अंदर पा रही थी। दूर पाटी से पापो को पावाजें,
पटियों की टुनटुन, किसीका ऊचे स्वर में गाना सब कुछ वातावरण
मैं तिरता हुमा-सा इपर पा रहा था।
मोहन एकदम तरो-ताजा हो उठा।

हाथ-मुंह धो और एक कप चाय पीकर मोहन कमरे की टूटी हुई खिड़को की मरम्मत करने में जुट गया । दो-तीन घंटों में ही उसने खिड़की ठीक कर डाली। नहा-धो कर उसने नाश्ता किया और फिर अपना अलगोजा उठाकर घूमने निकल गया। खुला-खुला दिन "नीलमणि-सा उज्ज्वल अाकाश'इंद्रधनुपी रंग पसीने को दवा देने वाली हलकी ठंडी हवा-~-मोहन को लगा, उसने किसी नई दुनिया में जन्म ले लिया है एक जगह उसे एक छोटा-सा तालाव दिखाई दिया। वह उसके पास जाकर खड़ा हो गया। दूर-दूर तक कोई नहीं था। न कोई प्रादमी, न कोई जानवर । सिर्फ कुछ पंछी थे, इधर-उधर फुदकते हुए । वह तालाब के किनारे की बड़ी-सी चट्टान पर बैठ गया। उस एकान्त और खूबसूरत माहौल में कांता की याद आ गयी । मोहन को एक झटका-सा लगा। फिर उसका मन उदासी में डूब गया। कांता उसके साथ होती, तो कितना अच्छा होता! यह दुनिया और भी खूबसूरत बन जाती। : कांता की याद में डूवै-डूवे ही वह तन्मय होकर अलगोजा बजाने लगा। उसे लगा, जैसे कांता उसके पास ही चट्टान पर बैठी है, उसके कंधे से अपना सिर टिकाये। कितनी देर हो गयी, मोहन को पता नहीं चला। अचानक अलगोजे पर उसकी अंगुलियां रुक गयीं। पीछे से आवाज आई थी, "अरे प्रो मुरली वाले !" मोहन ने घूमकर देखाबारह-तेरह वरस की एक लड़की कोई दस गज दूर खड़ी थी। इकहरे बदन की, अल्हड़, तेज, चुभ जाने वाली प्रांखों वाली, थोड़ी-सी ऊपर उठी हुई नाक, सामने वाले पर प्रश्न-सा उछालती हुई, पतले-पतले अोठ । आर का ओठ थोड़ा-सा उठा हुआ । एकाएक वह हंसने लगी । खनकती हुई हंसी । उस माहौल को झंकृत कर देने वाली। मोहन ने अपनी प्रांखें घुमा लीं। अलगोजा वजाने के लिए उसकी । । AN

अंगुलियां एक बार फिर छिद्रो पर जा टिको । लेकिन स्वर निकलने से
पहले ही उस लड़की ने फिर ग्रावाज दी।
"अरे प्रो! मैं तुम्हीसे कह रही हूं !"
मोहन ने फिर घूमकर देखा । लड़को थोड़ा-सा और पास मा गई
थी।
"तुम्हारी गवएं कहा है ?"
वह बोली।
मोहन कोई जवाब देने के बजाय उसे घूरता रहा ।
"अरे, मुह में जवान नहीं है क्या ? गूगे हो !
मोहन फिर भी उसे घूरता रहा।
"बहरे भी हो!"
मोहन धीरे मे मुसकरा दिया।
लडकी ने चारो तरफ ऐसे देसा, जमे वह मोहन की गड़मो को
तलाश रही हो । फिर जरा-सा पोर नजदीक माकर बोली, "मो...तो
गउएं नहीं चराते - मछली पकड़ते हो! पर, मुरलीवाले "तुम्हारी
तान मुनकर तो मलियो को नीद पा गई होगी एमे नहीं फेमगी
अब तक मोहन चिढ़ गया था। जोर से डाट के-मे स्वर में बोला,
"चल भाग!"
मडकी कमर पर हाथ रखकर खड़ी हो गई । "क्यो! गाव तुम्हारे
बाबा का है !"
"जाती है या!
लटकी खिलखिलाई।फिर भागने लगी। भागने भागते वह स्की,
उसने नाक ऊपर कर जीभ निकाली और फिर खिलखिलाती हुई भागती
चली गई।
मोहन वहा पोर नहीं बैठ पाया।
यह घर पहुंचा, तो हैरान रह गया । वही लडकी वरामदे में बड़ी वुमा मै
यात कर रही थी और हंसते-हमने दुहुरी हुई जा रही थी। दूधवाली
डोलची उमके हाथ में थी।

-- "बस, मजा ही आ गया, मौसी!" वह कह रही थी। "वह तो बुद्धों की तरह देखता ही रह गया और मैं मुंह चिढ़ाकर भाग पाई।" वह फिर हंसने लगी। "परी कमबख्त ! डोलची तो दे ! दूध कहीं गिर न जाए !" वुमा ने कहा ! “तू किसी दिन बुरी तरह पिटेगी ! देख लेना, हां..." बुना दूध की डोलची लेकर अंदर चली गई। लड़की उछलती हुई दरवाजे की तरफ आने लगी। मोहन दरवाजे पर ही अटका रह गया था। लड़की दरवाजे पर पहुंची । "अरे अरे ! तुम यहां क्या लेने या गए।" वह बोली । "मेरी तो मौसी है। ज्यादा गड़बड़ की तो शिकायत कर दूंगी-हां ! ..." मोहन न तो हटा और न ही कुछ बोला, तो वह फिर चहकी। "खड़े-खड़े घर क्या रहे हो! चलो, रास्ता छोड़ो, मुझे देर हो रही है ! ..." इसके साथ ही उसने बुना को हांक लगाई, "मौसी!" उसने मोहन को यों ही परे हटाने की कोशिश की और उसके पास से फिसलती-सी निकल गई। उसकी खनकती हुई हंसी बहुत देर तक फिजा में गूंजती रही। मोहन मंत्रमुग्ध-सा खड़ा था। बुप्रा बाहर आयीं । मोहन ने अपने कदम दरवाजे के अन्दर बढ़ाये । ?" बुमा न पूछा। "यह मिर्च कौन थी, वुधा जी?" "मिर्च ! कोन ? .." वह तोशी'' यही तो, वेटा 'यही तो बीमारी में मेरी सेवा करती रही "बातूनी बहुत है. 'बाप नहीं है बेचारी के ! ..." तोशी बहुत दूर चली गयी थी, लेकिन मोहन को लग रहा था जैसे उसकी हंसी की खनक अब भी हवा में गूंज रही हो । उसे कांता की याद वेतरह सताने लगी। "क्या हुआ । मोहन को बुया के घर पाये चार दिन हो चुके थे। इस बीच उसने घर की हालत काफी सुधार दी थी और अब वह वापसी की तैयारी कर रहा था।

बुप्रा उदास हो गई।
"मेरा मन नहीं भरा"कुट दिन तो और रहता."
"रह तो जाता, बुना जी, पर कालेज सुनने वाला है..."
"अच्छा, जैसी तेरी खुशी..." वुमा ने अपने प्रांचल की कन्नी से दस
रुपये का एक मुड़ा-तुडा नोट निकालकर उसी प्रोर बदा दिया । "यह
रख ले.."
"इसकी क्या जरूरत है, वुमा जी ?"
"घर में और कुछ है नहीं देने को "शहर अब जा नहीं पाती..."
बुमा ने कहा 1 "अच्छा, मोहन ''तू शादी करके रहंगा न यहाँ ?- दो
मकान है "तू जिसे चाहे, ले ले.. मेरे बाद तो इन्हें देखने वाला भी
कोई नहीं होगा वोल, पायेगा न यहा रहने?"
"अभी मेरी उम्र हो क्या है, बुमा जी ?..."
"बरम बीतते क्या देर लगती है..."
माहन ने झुककर बुमा के पाव छू लिये । मच्छा, बुमा जी...'
बुमा को पाखें नम हो गयी। "जुग-जुग जीयो "बहुत नाम पंदा
करो..."
मोहन ने अपना झोला उठा लिया ।
बुमा उसके साथ-साथ गेट तक मा गई।
"दुर्गा और तारावती को मेरा प्यार देना." वह भरे हुए स्वर में
बोलो, “दुर्गा से कहना, वह नहीं मामा तो कोई बात नहीं "उसने तुम्हें
भेज दिया, मुझे मेरा भाई मिल गया."
मोहन ने बुना के चेहरे को और देखा । बुप्रा ने माचल से अपनी
प्राय पोछ ली।
बुग्रा तव तक दरवाजे पर खडी रही, जब तक मोहन उनकी मानो
से पोझल नहीं हो गया।
तोसी रास्ते में ही मिल गई।
"अरे-भरे, बुद्धराम ! कहा चल दिए ?" वह हैरानी से बोली।
"अपने घर।"

.
"इतनी जल्दी! फिर कव आयोगे ?"
"क्या पता !"
तोगी की समझ में नहीं पाया, वह और क्या कहे । वह खामोश
खड़ी रह गई।
मोहन अपना बैग कंधे पर डाले आगे निकल गया।
तोशी थोड़ी देर तो खड़ी रही, फिर भागने लगी।
बुग्रा के घर पहुंची, तो वह हांफ रही थी।
"मोसी ! वह चला क्यों गया?" वह बोली। "कुछ दिन और नहीं
रुक सकता था!
"नहीं, बेटी."उसकी पढ़ाई में हर्ज होता..."
तोशी का मुंह उतर गया।
9
मोहन जब तक घर वापस पहुंचा, वह बहुत वेचैन हो चुका था। लेकिन
घर पहुंचने के बाद बेचैनी और भी बढ़ गई थी। बुग्रा के गांव से व
इसलिए जल्दी भाग पाया था, क्योंकि कांता वहां नहीं थी, लेकिन व
अभी यहां भी नहीं थी।
मां को हैरानी हुई थी। "इतनी जल्दी कैसे चले पाये ? ' उसने पून
था।
मोहन ने रूखा-सा उत्तर दे दिया था, "क्या करता! बुना जीठ
ठाक हैं । मलेरिया हुआ था. 'नजर बहुत कमजोर हो गई है उनकी
पाप सबके लिए प्यार भेजा है..."
"और कोई वात?"
"वस, इतना ही..."
मां ने उसका उड़ा-उड़ा रंग देख कर कहा था, "तुझे हुप्रा
है, मोहन ? तबियत तो ठीक है न तेरी ?"
74/नीड़

"हां, मां विल्कुल टोक है.." उसने यह तो दिया या, लेकिन वही जानता था, वह कितना वेचन है, कितना व्याकुल है । लेकिन वैचनी और व्याकुलता ऐसी थी, जिसे किसीके साथ बाटा नहीं जा सकता था। इम- लिए एक यार फिर उसको भटकन बढ़ गई थी। नदी तट, बारादरी पौर उसके चारों ओर फैला प्रनारो का याग, सेन, जंगल, सह, यूप.."उमे चैन कही भी नहीं मिल पाता था। रात होती, तो वह अपने कमरे में बंद हो जाता । डायरी पद्धता रहना । पुरानी बातें और भी ज्यादा कचौट जाती.. पोर ध्यानी में बैठे-बैठे यह तरह-तरह ने अपने नाम को लिखता रहता-मोहन कुमार मोहनलाल मोहन राय ""कुमार मोहन “मोहन कांत. "कांता मोहन उमे एक-एक दिन युगो जसा लवा मोर यातनादायी प्रतीत हो रहा घा... फिर तपती हुई जमीन पर जैसे एकाएक टडी बौछार पड गई। मोह्न प्रलमाया-सा अपने कमरे में लेटा था कि उसे कही दरवाजा मुलने की मायाग मुनायी दी। उसका दिल घटक उटा । उछलकर वह कमरे के दरवाजे के पास प्रा गया। सामने का दरवाजा खुल रहा था। दूसरं ही क्षण काता मामने मा गई। मोहन का पूरा गरीर मन मना रटा । एक साथ कई स्फूर्तिदायक लहरें उसके अंग-पग को झंकृत कर गई। फिर दोनों एक-दूमरे की भोर ऐमे भागे, जमे हवा के दो बगूलो की 'तरह एक-दूसरे में ममा जाएगे। लेकिन बीच की मुहेर वाघा वन गई। फाता खुद भी अचानक झिझकर दो फुट दूर ही रुक गई थी। पुछ पलों तावे यामोश खडे रहे, जैसे विश्वाम न हो रहा हो कि वे एक-दूसरे के पास हैं। फिर पांना ने ही उम स्तब्धता को सोडा : "मे हो ?" "अच्छा हूं"तुम?"

?" "क्या हुआ . "हूं. मैं भी अच्छी हूं।" "जी लगा रहा ?" "ऊंहू"तुम्हारा ?" "कैसे लग सकता था ? ..." फिर वह वात को जारी रखने के लिए पय ढूंढ़ने लगा। उसने कांता को देखा। उसका चेहरा पहले से कुछ निखर पाया था। शरीर पहले से ज्यादा भरा-भरा लग रहा था। सहसा वह बोला, "तुम्हारी सेहत तो बहुत अच्छी हो गई है !" कांता सकुचा गई। "क्या हुआ "कुछ नहीं..." लेकिन वह सिर झुकाए रही। एकाएक मोहन ने अपना हाथ उसकी बांह पर रख दिया। कांता के वदन में सिहरन दौड़ गई। उसने अपना हाथ खींच लिया। ?" उसने फिर वही सवाल दुहराया। कांता ने सिर्फ उसकी तरफ देखा, बोली कुछ नहीं। मोहन हैरान था। कांता में इतनी चुप्पी, इतनी गंभीरता एकाएक कहां से पा गई ? क्यों आ गई ? "देवी-मंदिर चलोगी?" "नहीं।" "क्यों ?" "अभी जाने की मनाही है..." मोहन फिर भी नहीं समझा। "कल?" "कल भी नहीं.. परसों..." "परसों ही क्यों?" "वुद्ध हो !" कांता ने अांखें उठाकर सिर झटक दिया। फिर किसी समझदार लड़की की तरह वोली, "परसों सिर नहाऊंगी..." मोहन वेवकूफों की तरह हंसने लगा। कांता भाग गई। । । 76/नीड

तीसरे दिन सुबह वे देवी-मंदिर में मिले।
काता प्रोसभीगी चंपा की कली-मी लग रही थी-उमके पाग पूजा
यी छोटी-मी इलिया थी। धूप, अगरबत्ती, फूल वह उसमें लाई यो।
नदी का किनारा । मंदिर की छांव, वरगद, धीरे-धीरे बहना पानी।
कुछ पंछी-रिले पानी मे किल्लोल करते हुए।
पाता और मोहन एक बड़े ने पत्थर की प्रोट में वैट गए। पूजा की
लिया को कांता ने अपनी गोद में रस लिया।
माता ने शायद पहली बार माडी पहनी थी और वह घटी-बढी लग
रही थी।
"प्रय बतायो," मोहन ने कहा, "मामा के घर में क्या करती रही ?"
"करना क्या या!" कांता ने जवाब दिया। "लगता था, जैन में
पड़ी हलकीरें वींचती रहती थी-काय छुट्टियां खत्म हो और कद ..."
"क्या सबके साथ ऐमा ही होता है ?" मोहन ने जमे यह सवाल
अपने-आपमे ही किया ।
"होता ही होगा..." काता की मावाज में फिर गांभीयं उभर माया
था। "न होता तो क्या वचना दुनिया मे ?"
"जानती हो, काता, मुझे क्या लगता है ?"
"क्या ?" कांता ने उसके चेहरे में झांका।
"तुम्हारा इंतजार न होता, तो इस बार छुट्टियां न कटनी!"
"पहले केमे कट जाती थी ?"
"पहले की बात और थी .." इन बार मोहन ने बड़े प्यार में माता
की प्राणों मे देसा।
"नहीं, मोहन," याता पंछियों की ओर देखने लगी। "एट्टिया तो
बहुत
डोटी चीज है लोग जिदगी काट लेते हैं..."
एकाएक पंखों की फड़फड़ाहट हुई-पंछी प्रासमान में उड गये।
मोहन का ध्यान उनकी उड़ान में खो गया । पंछियों ने पहले एक चक्कर
काटा, फिर दूर उहते चले गये।
काता मोहन की निगाह का पीछा कर रही थी।
मोहन को प्रावों में निरामा की मलय मा गई 1 पंछी तौट

नहीं पाये थे। "सुनो, मोहन।" कांता वोली । "कुछ चीजें जिंदगी में एक ही बार होती हैं..." "और जब वे हो जाती हैं, तो पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल जाती है..." मोहन ने जैसे उसकी बात को पूरा कर दिया । "अच्छा सुनो लेकिन उसकी बात उसके मुंह में ही रह गई। कांता ने एकाएक अपना प्रोट काट लिया था और वह कुछ घवरायी नजर आ रही थी। "मुसीवत! "क्या हुआ ?" मोहन ने पूछा। ..." कांता ने मंदिर की सीढ़ियों की ओर देखते हुए कहा, "गॉल इंडिया रेडियो..." मोहन ने देखा-दूर एक बेहद बूढ़ा प्रादमी खड़ा था । अांखों पर मोटा-सा चश्मा लगाये, वह उन दोनों की तरफ ही देख रहा था। "इतनी दूर से वह पहचान तो नहीं पायेगा लेकिन पूरे शहर में ढिंढोरा जरूर पीट देगा," कहते हुए कांता उठ खड़ी हुई। "अच्छा, फिर मिलेंगे..." वह तेजी से सीढ़ियां चढ़ने लगी। मोहन को कुछ समझ नहीं पाया । उसे क्या करना चाहिए। सामने नदी की पतली-सी छिछले पानी की धार थी। वह उसी तरफ कूद गया और पानी को चीरता भाग गया। उसने पीछे घूमकर भी नहीं देखा। कांता बुड्ढे के पास से निकल रही थी, तो उसने बड़े प्यार से पूछ लिया, "पूजा के लिए आयी हो ?" "हां, वावा..." वह रुकी नहीं, प्रागे बढ़ गई। वुड्ने की अांखें बेहद कमजोर थीं। मगर अपने मोटे चश्मे को ठीक से नाक पर जमाते हुए वह उस युवक को देखने की कोशिश कर रहा था, जो नदी को पार मारणे भागता चला जा रहा था। । -- मोहन भाग तो गया, लेकिन 'पोल इंडिया रेडियो' ने अपना काम कर एकजोरदार थप्पड पहने की मावाज आयो, तो वह कांप गया। की चीसमोर उसके सायही उठे ऋदन से तो उसकी रूह तक काता के बदन पर पडत एक-एक मापात को वह अपनी दिया । दोपहर तक जाने किस किसकी जवान पर कांता का नाम मा चुका था। अब रात हो चुकी थी और मोहन अपने कमरे में बैठे कांप रहा पा। घर वह तभी लौटा था, जव उसके कपड़े सूख गये थे। मां ने पूछा भी कि उमने पैट केसे कीचड में सान ली, तो उसने झूठ बोल दिया कि सिंघाडे तोडने के लिए तालाव में घुस गया था। लेकिन अब सच किसी झूग्वार जानवर की तरह उसके सामने था । काता की शामत प्रा गई थी। मोहन को उस पर से पाने वाली सारी मायाजें सुनाई दे रही थी और जाहिर था फाता को दुलारा तो नहीं ही जा रहा था। "अब भी बता दे, कौन था तेरे साथ !" काता के पिता पूछ रहे थे। उनका चेहरा तमतमाया हुअा था। मूछो के बाल विखरकर काप रहे थे। पौर प्रांसें प्राग यरसा रही थी। बता दे वरना खाल खीच लूंगा !" काता सिसक रही थी। "कितनी बार कहू, बाऊजी 'कोई नहीं पा, में अकेली गई थी देवी-मदिर..." "बकवास करती है, हरामजादी!" पिता ने उसकी चुटिया पकड़ ली धी, 'मारा शहर झूठ बोल रहा है ! अव भी बता दे, नदी-पार का कौन- सा मंगी-चमार पा तेरे साथ, जिसके साथ मुह काला करवा रही थी!... सुद ही बता दे, तो छूट जायेगी, वरना खाल खीचकर भूसा भरवा इम बार कांता सिर्फ रो दी थी, लेकिन उमे कहीं यह सुनकर तसल्ली भी हुई थी कि पिता का शक कही मोर था ! लकिन मोहन पसीने-पसीने हो रहा था । काता के पिता का एक- एक गम्द एक-एक बूद पिघला हुप्रा सीसा उसके कानो मे उडेलता जा रहा था और उसका चेहरा पीला पड़ता जा रहा था। पाव की तरह महसूस कर रहा था।

.. चंदरसेन ने एक बार फिर कांता की चुटिया पकड़ ली थी, उन्होंने विल्कुल वैसे ही उसे मरोड़ दिया, जैसे गांव के शरारती बच्चे गाय-बैल की दुम को मरोड़ देते हैं। कांता के गाल उखड़ने-उखड़ने को हो पाये। पूरा सर दर्द की भयंकर गांठ बनकर रह गया। पिता ने उसकी चुटिया मरोड़कर उसे जोर से धक्का दे दिया। कांता जाफर दीवार से टकरायी और वह "मां ! मां ! "वाऊजी ! चीसकर रह गई। कांता की मां कमरे में आने से भी डर रही थी। चंदरसेन ने दोनों हाथों से पकड़कर कांता को खींच लिया। "नामुराद ! इसी दिन के लिए पैदा हुई थी तू !" उन्होंने गरजते हुए कहा और फिर खींचकर कांता को फर्श पर पटक दिया। अब पास ही पड़ी खटिया को उन्होंने खींचा, कांता की दोनों हथेलियों पर उसके पाये टिकाये और खुद खटिया पर बैठ गए, "देखता हूं, कब तक तू नहीं बताती !" उन्होंने कहा, लेकिन कांता एक चीख मारकर बेहोश हो गई थी। - उसके साथ ही उस घर से आवाजें पानी बन्द हो गयी थीं, यह खामोशी मोहन को और भी ज्यादा परेशान कर गई, अब तक तो पता चल रहा था कि उस घर में क्या हो रहा है, यह शांति तो और भी वेचैनी पैदा कर रही थी। इस खामोशी और रहस्य को सीढ़ियों से ग्राती पदचाप ने भंग कर दिया, मोहन पहचान गया, यह ग्राहट बाऊजी के ही कदमों की थी। एका- एक वह घबरा गया, उसने जल्दी से अपना पसीने से सराबोर चेहरा साफ किया-आस्तीन से ही-~~-एक किताव उठायी और उसे ऐसे पढ़ने लगा, जैसे दीन-दुनिया की कोई खबर ही न हो। दुर्गादास जी प्राकर दरवाजे में खड़े हो गए। उनके चेहरे पर संजीदगी किसी रोगन की तरह पुती हुई थी। मोहन ने उनकी पोर नहीं देसा। "क्या बात है ?" अंदर प्राते हुए बोले, "तुम्हें मुनाई देना भी बन्द हो गया है ? कितनी अावाजें दी..." 80/ नीड़

हो, तो मां को बता दो""मुझे लगता है, यह करतूत तुम्हारी ही हो सस्ती
जब वह सीढियां उतरे, तब तक मोहन की मांखों से मासू बहार
"मैं पढ़ रहा था, बाऊजी "मोहन ने किसी तरह सफाई दी।
"खाना नहीं खाया है ?"
"नहीं. मेरा पेट दुख रहा है."
"वयों? कुछ अगड़म बगडम खा लिया होगा!"
"हा-मूली खा ली थी..."
"चुराकर खायी होगी खेत से !"
"नही, खरीदकर खायी थी..."
"सच कह रहा है या कोई और वात है ?" दाऊजी की प्रांखें उसकी
खाल में उतर जाना चाहती थी।
मोहन एक बार फिर पसीने-पसीने होने लगा था, किसी तरह बोला,
"सच कह रहा हूं, बाऊजी !"
"पसीने तो ऐसे छूट रहे हैं, जैसे कोई बहुत बड़ी चोरी को हो !"
"नही बाऊजी. "तवियत ठीक नहीं है..."
"तो नीचे जाकर कुछ चूरन-वूरन ले ले..." फिर बाऊजी के स्वर
मे रहस्य घुल गया। "तुझे पता है, क्या हुआ ?"
"चंदरसेन के घर मे..."
"मुझे कैसे मालूम होता!
"नही, तुम रोड इंस्पेक्टरी करते रहते हो, सोचा, शायद सुना
"नही वाऊजी..."
दुर्गादास जी बैठे नही । उसकी मेज के पास ही खडे-सड़े बातें करते
रहे। फिर जाने क्या सभी कि चलते-चलते बोले, "मुझसे डर लगता
है"तुम्हारी मां को बड़ी फिकर रहती है तुम्हारी
घूमकर मोहन के चेहरे
एक बार उन्हों
देखा और फिर बाहर निकल गए।
उसके चेहरे को भिगोने लगे थे।

इधर-उधर धक्के खाएगा, तो होश ठिकाने आ जाएंगे लोट पाएगा
फिर अपने-ग्राप !"
"नहीं. 'वह नहीं पाएगा। तुम उमे नहीं जानते, दब्बू जरूर है,
लेकिन तुमसे कम जिद्दी नहीं है..."
"ठीक है, यह भी पता चल जाएगा-देखते हैं, कितना जिद्दी
है..."
दुर्गादास जी विना कुछ खाए-पिए ही काम पर चले गए।
तारा रोती ही रह गई।
दुर्गादास जी उस दिन सारा समय भीकते रहे । वात-बात पर उनका पारा
गरम हो जाता । रक्खे को उन्होंने चुंगी पर भेजा था। चुंगी वैसे भी
काफी दर थी-बस-अड्डे से करीब एक मोल । रक्खे के पाने तक दुर्गा-
दास जी दो-तीन लोगों से झगड़ चुके थे।
रक्खा ग्राया, तो वह उसपर भी बरसने लगे, "तुझे वक्त का कोई
ध्यान भी रहता है ! जब देखो. तब गायब ! दस मिनट के काम में दो
घंटे लगा के प्राता है ! कामचोर ! कहां था सुबह से अब तक ?"
"प्राप तो खामखाह मुझपर विगड़ रहे हैं, ला' जी !" नौकर बेचा-
रगी ने बोला।
"चुप ! जबान लड़ाता है !"
"मेरी क्या मजाल है, ला' जी! यहां इतनी लंबी लाइन लगी हुई
थी ! दो घंटों में नंबर पाया। कोई एक्सीडेंट हो गया था यकीन न
हो तो मोहन जी से पूछ लो ''वह भी वहीं थे चुंगी पर..."
दुर्गादास जी चौंके । "वह वहां क्या कर रहा था ?" उन्होंने जल्दी
से पूछा।
"यह तो पता नहीं जी!"
"पूछ नहीं सकता था, नालायक ?"
"लाइन छोड़कर कैसे जाता, जी?"
दुर्गादास जी ने नौकर के लिए और दस काम सोचकर रखे
लेकिन सब कुछ छोड़-छाड़कर वह चुंगी की ओर भागे । रिक्शा किया।
84/ नीड़
थे।

रिकमा वाले पर बिगड़े भी कि वह इतना धोरे या चल रहा है, लेकिन
कोई फायदा नहीं हुआ। मोहन घुगी पर नहीं मिला।
चुगों के मासपास तीन दिशापों में सड़कें जाती पी । मोहन ने बस
परड़ी होगी, इतना तो वह समझ गए, लेकिन किम दिगा की बस पकड़ी
होगी, यह कौन बता सकता था?
निराश होकर वह लौट पाए।
अपने घर मे दूर मोहन उम नये नहर, दिल्ली, में भटका रहा था। पर मे
यह सिर्फ पंद्रह रूपये की चिल्लर लेकर चला गया था। न कोई वापस,
नकिताब न और कुछ। दो दिन उसे यहां माए हो चुके थे और दो रात
उसने स्टेशन के बैटिंग रूम में गुजार दी थीं । मुबह उसने चाय की प्याली
पो थी और अब दोपहर होने को पी। उनकी जैव साली पी।
जगह-जगह वह काम मांगना रहा था, लेकिन वाम ही नहीं था।
उब भी कोई होटल या ढावा उनके सामने माता उसके पवि पद
बबुद रुक जाते, लेकिन मासी व उसका मुह चिढ़ा देती और वह फिर
प्रागे बट जाता।
प्राखिर वह मोरी गेट के एक मैराज में मामने जाकर रुक गया।
गराज के कार बोर्ड सगा पा: "उस्ताद जी का राम" जगह की
हालत अच्छी नहीं लग रही थी। फिर भी काम तो हो हो रहा था।
मोहन वृष्ठ शामिनकता-मोचता रहा। फिर भी वह मांग बढ़
गया।
जम्नाद जी एक कार के नीचे लेटे टोका-टाकी कर रहे थे। दृष्ट
लड़के एक कार घो रहे थे।
मोहन मड़ा रहा।
दो-तीन मिनट के बाद तयार गदाहरमाए।
मौन यहीं सड़ा रहा।
उस्ताद जी की उचालीम और रोशन कहीं भी हो माली
पौ। उनका कहरा गरीर मट्टी मंदार दो रन्ने देता था। उनके पट्टी
पर ही में निम्दा हुमा पानि मस्टो और माउन नावार

हो ही नहीं सकता। प्रांखों में अद्भुत सरलता। कमीज-पाजामा नीज और तेल के धब्बों से भरा हुमा। वह मोहन को सिर से पैर तक देख गए। फिर बड़े प्यार से बोले, "काम चाहिए ?" मोहन को समझ नहीं पाया, वह क्या कहे । जो बात स्पष्ट थी, यह तो उस्ताद जी ने कह ही दी थी। उस्ताद जी ने चीथड़े से अपने हाथ साफ किए। फिर उन्हें साबुन से धोने लगे। मोहन वहीं खड़ा रहा। वह हाथ धोकर उसके पारा चले पाए। फिर लकड़ी और टीन के बने एक छोटे-से कैबिन की पोर बढ़ते हुए बोले, "प्रायो..." यह उसे अंदर ले गए। कमरे में एक छोटी-सी मेज पड़ी थी, दो फुसियां, एक स्टूल । उस्ताद जी मेज के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। "देखो बेटे..." वह बोले, "मेरा तो बड़ा छोटा-सा गैराज है । प्राज- काल उतना काम नहीं पाता, जितने काम मांगने वाले पाते हैं । और काम भी सबको चाहिए उस्ताद ज्ञानचंद के गैराज में देख रहे हो कितने लड़गो हैं मेरे पास । 'प्राधे लड़कों को तनख्वाह नहीं दे पाता हूं ...फिर भी काम करते रहते हैं. जब कोई काम सीख जाता है, तो कहीं और चला जाता है तभी एक महिला अंदर प्रा गई। उनके हाथ में खाने का डिब्बा था। यह डिव्वे को स्टूल पर रखकर बोलने लगीं। "या गई भागवान..." उस्तादजी ने महिला से कहा । "लामो, साना डाल दो बाहर लड़कों ने खाना शुरू कर दिया ?" "हां, जी," महिला बोली। "अब बतानो तुम्हीं बतायो। उस्ताद जी ने मोहन से कहा। "नाम क्या है तुम्हारा ?" "जी. 'मोहन'.." मोहन को अपनी आवाज अजनवी-सी लगी। "किसी अच्छे घर के लगते हो"भागकर आए हो?' मोहन ने गोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप सिर झुकाए बैठा रहा। तभी उस्ताद जी की पत्नी ने खाने से भरी प्लेट उसके सामने रख । 86 / नीड़

.."
थी। उनके मिर पर हाच पते हा प्यार गे योती, "पानापागो। भूग
लगी होगी।"
मोहन ने उनी बयों को पोरगा। उसे मौकीपाद ।
गला भरपाया।
"गा लो, परपुरदार।" उस्ताद जीने पपनी गेट में औरतोzi
हुए पहा । "काम हो या न हो, भूप सो लगने से नहीं रहमी!"
मोहन वैटा रहा । उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि यह कोर तद.
कर मुह में डाल ले । उसे लग रहा था, पाना गरी नी महारगा।
भएप कट में योला, "माप मुझे गलगिए, उस्ताद भी..."
उम्नाद जोगाते-गाते गोपने लगे। फिर योगे, "तुगतना गोरा
ली। प्रभी सोच लेते हैं कुछ
मोहन ने भिमकते हए फोर मोहा।
फिर माना गामोली में घगता रहा।
उम्नाद जी ने गाना Tम किया। पानी पिया गेट हीm
घोए और मोहन को देने मगे। गा मापा गाना भी यानी )
"गोचने क्या हो ?" उग्नाद बीपी गानी गरी योनी मोम
चारो..."
नाजीलिागला प्रामान हो गया।
"टीम है, यकिन नावाने ही मेरी गिरी।
माना-बाना तुम्हे मिल जाया बगा-चोग की..."
माजीहल्याही गया।
गरीबी पनी ने एक बार फिर गिर पर
दिया। नामी. A TRP माहीममता"
मोहनीप्रीमो माना पाया।
मंगया" यता न बनाया ! "गार, arti
माग गया था। घई है। मी बारामा मुगा, am-uilt
रहना । बमी मनाना र गुना, गोहना र
बमरे में दाट.म मरोग।" सिने माना।
"चलो, या, मामी..

मोहन ने खाना खत्म कर दिया। 11 तारावंती ने रो-रोकर अपनी प्रांखों को निस्तेज बना लिया था। एक ही बेटा । वह भी लाड़ला। जव भी उसकी याद आती, उसकी आंखें अपने- आप भीग जाती। दुर्गादास जी ने ज्यादा वात करना ही छोड़ दिया था। उन्हें तो जैसे घर से सिर्फ इतना-सा ही वास्ता रह गया था कि खाना खाना है और सो रहना है । लेकिन देखने वाले समझते थे, उन्हें अंदर ही अंदर कोई धुन खाए जा रहा है । वह मोहन के बारे में किसीसे कोई बात न करते । लेकिन जैसे-जैसे ववत वीतता जा रहा था, उन्हें यकीन होता जा रहा था, तारा ठीक कहती थी। उनका वेटा उनसे कम जिद्दी नहीं है । उनको तो यह भी लगने लगा था कि अव शायद वह अपने बेटे का मुंह फिर कभी न देख पाएं । जब कभी वेटे का खयाल आता, उनके मन में इतनी-सी बात आती कि कोई प्राकर उन्हें यही बता दे कि मोहन जहां भी है, खुश है, सुखी है। बस इतने से ही उनका मन शांत हो जाएगा। फिर एक दिन अचानक जैसे विन मौसम बदली वरस गई। मक्खन ने एक दिन पाकर खवर दी कि उसने मोहन को देखा है। "क्यों मेरे बुढ़ापे का मजाक उड़ाते हो, मक्खन !" दुर्गादास जी वोले । "कोई और बात करो।" "सौंह गुरां दी, ला' जी... मक्खन पूरे प्रात्मविश्वास से बोला। "मैंने उसे अपनी आंखों से देखा है। ज्ञानचंद के गेराज में ठोका-ठाकी कर रहा था।" "सच कहते हो? तुम्हें धोखा तो नहीं हुआ ?" "सोलह आने सच ।" "उसने तुम्हें देखा था ?" 58 / नीड़

"नही जी"मैं तो अपनी गड्डी में था।"
"मुझे ले चलोगे वहाँ ?"
"हा जी, जब चाहो..."
दुर्गादास जी ने फौरन कार्यक्रम बना डाला। बोले-"ठीक है, रात
को ही निकल चलेंगे।"
भगवन ने गर्दन हिला दी।
उसी दिन नाम,
कांता छुप-छुपाते प्राई और तारावंती के घुटने पर सिर
रखकर चुपचाप रोने लगी।
चंदरमेन का मकान दने कई महीने हो चुके थे। वे लोग नये मकान
में चले गए थे। काता मैट्रिक कर गई थी। उसके मागे अब पढ़ाई
सवाल ही नहीं उठता था।
"क्या बात है, बेटी?" तारा ने पूछा। मेकिन वा बस चुपचार
रोती रही।
यह वही अजीव वात थी। दुर्गादास डी पोर तारा गोदवना वो पना
चल हो गया था कि कांता की वह में ही मोहन घर में भागा पानि
इस बात पर वे कांता में कई नाराज नहीं थे। दकि उन्हें कांता में
ममता-मी हो गई पी। कांता बनी प्रावी, छात-झाने ही पाती।
तारा मे बात करके टमे भी तमन्ना मिनदी।ममर रोटी वह कभी नहीं
पी। मि उमा चेहरा मंजीवनी की परल मेंका रहता था। हमी
दम चेहरे पर कभी नही पाई थी।महंसी, न रोटा।
लेकिन भाज कांता ताग काटा परोसी पी।
"का हुमा, बेटी ? दुध बोर टो!.." द्वारा बार पूछा।
मादिर प्रब काता सब गे चुकी, दो दरला, "शानी हो रही
है, बी..."
उमटे बाद वह तिर रोने नीमध रहढे हो बना।
"शादी तो हर मडकी की होती ही है कि.." 'टागने पहा
नेग्नि मन में कहीं चमन-सी दीनदना होता, दो दह इन बांइ.
भीमारी लड़की को अपनी बह दन में दो-चाई म पनि मना

ही क्यों न जाना पड़ता । लेकिन अब क्या हो सकता था ? "लड़का तेरी संद का तो है न ?" उसने इतना ही पूछा। "मुझे क्या पता, वीजी? मैंने उसे देखा थोड़े ही है !" कांता ने रोते-रोते बताया। तारा चुप रह गई। कांता थोड़ी देर बैठी रही। फिर उसने अपना मुंह धो डाला । चुन्नी से मुंह पोंछा और जाते-जाते कहती गई, "मेरे लिए भगवान से प्रार्थना करना, वीजी " रात हो रही थी। तारा सब्जी काट रही थी और कांता तथा मोहन को याद कर रही थी। वेध्यानी में दरांती उसके अंगूठे को भी काटती चली गई। खून सब्जी में गिरने लगा। तारा ने पास ही पड़े पानी के कटोरे में अंगूठा डाल दिया । सारा पानी लाल हो गया। वह अंगूठे को वैसे ही पानी में डाले बैठी थी कि दुर्गादास जी घर माए। अपनी पगड़ी को खूटी पर लटकाते हुए वह बोले, "तेरे बेटे की खबर मिली है। तारा अपने जख्म को भूल गई। उसका हाथ उसके गाल पर जा पहुंचा। "सच !" गाल पर भी खून की धार-सी बहने लगी। "अरे! खून कैसे बह रहा है !" दुर्गादास जी ने चितित स्वर में कहा और उसके पास बैठ गए । "यों ही कट गया अंगूठा..." तारा बोली । "लेकिन इसे छोड़ो- यह बतानो, वह कहां है ? कैसा है ?" "बताता हूं..." दुर्गादास जी अंदर से एक पट्टी निकालकर लाए और उसे गीला करके तारा के अंगूठे पर बांधते हुए वोले, "क्या सोत्र रही थी सब्जी काटते हुए ? अंगून पूरा कट जाता तो ?" "क्या होता!..." तारा ने उदासीनता से कहा। "फिक मत करो' मोहन ठीक है. दिल्ली के एक गैराज में कार - - on the

...
कर रहा है..."
"हाय राम!..." तारा ने अपना कलेजा पकड़ लिया, "पता नहीं
उसे साने को भी मिलता होगा या नहीं. मे रहता होगा यही "यह तो
अकेला कभी रहा भी नहीं।
"फिर जाग उठी ममता! वही साह!":
"ममता मर तो नहीं जाती "येटे चाहे मेरी भी निकलें !...मैं तो
रात-दिन यही प्रार्थना करती रही हूं"जहां भी रहे, परा रहे"ठंडी
हया पाती रहे..."
दुर्गादास जी चुप रहे । उनको प्रायों में मंधेरा-सा पिर पाया।
"कब जानोगे उसे लेने ?" तारा ने फिर पूछा।
"माज ही जा रहा हूँ। तुम्हें बताने हो पाया पा।"
"देखो । तुम्हारा गुस्सा बड़ा सराव है । उससे पहना मुए मत !
यस, ले माना..."
"कह दिया न."तुम फिक्र मत करो."माएगा तो जरूर से
भाऊंगा।"
उसी रात पाखिरी बस पकडकर दुर्गादास जी पोर भवरान चल
दिए।
जव तफ ये उस बाजार में पहुंचे, जहां उस्ताद शानचंद का गैराज
पा, तब तक माफी दिन घढ़ माया था।
मक्सन ने दूर से ही दुर्गादास जी को इशारे में बताया, "सा' जी,
देख लो.."यह सड़ा है।
गैराज पोर उस जगह के बीच करीब पचास गज का फासला पा,
जहां वे लोग पड़े थे। मोहन गैराज में पपने साथियों के साथ काम में
मस्त था । बीच-बीच में यह बात भी करता जाता। कभी-कभी हंस भी
देता । एकाएक दुर्गादास जी को ममास हुमा, यह मोहन सो है, लेकिन
यह मोहन नहीं है, जो उनका बेटा है । दम्यू, पुप्पा, बात-बात में चुदने
वाला। यह मोहन इस नई दुनिया का हिस्सा है, जहाँ उसने पपनी स्वाभा.
विकता पा ली है । उसने हंमना सीग लिया है। उनका मन उस मस्ति

- मिलने को बेचैन होने लगा जिसने मोहन को यादमी बना दिया था। उन्हें लगा, वह गैराज में जाएंगे, तो उस दुनिया में कड़वाहट घोल तव शायद वह अपने बेटे को कभी वापस प्राप्त न कर सकें। उन्होंने अासपास देखा । एक ढावा उन्हें नजर या गया। वह उसी- चले गए। एक बेंच पर बैठते हुए ढावे के मालिक से वोले, "दो गिलास लस्सी !" फिर वह गिलास घो रहे एक लड़के से वोले, "नोए'क्या नाम है तेरा''सुन जरा..." लड़का पास आ गया। उसके हाथ में अब भी एक गंदा गिलास था। "सुन' 'वह सामने वाला गैराज है न..." "कौन-सा जी ?.."उस्ताद जी का?" "हां-हां, वही । तू जानता है उस्ताद जी को?" "हां जी । बड़ी अच्छी तरह ! रोज लस्सी पीने पाते हैं।... "जरा उन्हें बुला लाएगा?..'मुझे उनसे कुछ बात करनी है..." "क्यों जी ?..." लड़के ने मुंह खोला ही था कि ढावे वाले ने उसमे कहा, "ग्रोए, जा भाग के बुला ला उस्ताद जी को मेरा नाम लेना..." "अच्छा जी, अभी पाया लड़का दौढ़ गया। दुर्गादास जी ने ढाबे वाले से कहा, "लस्सी तीन गिलास बना लो, भाई..." दो-तीन मिनट बाद ही लड़का उस्ताद जी को लेकर लौट आया। "क्या बात है, हरवंशलाल !" उस्ताद जी ने ढावे वाले से पूछा। "कैसे याद किया ?" "मैंने नहीं. "वह वाऊजी बैठे हैं न ''उन्होंने बुलाया है..." उस्ताद जी ने दुर्गादास जी को देखा । वह कह रहे थे, "ग्रानो जी ...वैठो।" उस्ताद जी पास ही बैठ गए, तो दुर्गादास जी ने बताया, दास हूं."मोहन मेरा बेटा है... "पोह अच्छा कैसे हैं, हुजूर ? "गैराज में आ गए होते ! ..." 92/नीड़ " "मैं दुर्गा-

दुर्गादास जी पुष्ट नहीं बोले।
"उमे लेने पाए है ?" उस्ताद जी ने पूणा।
नहका लस्सी के तीन गिलास रस गया । दुर्गादाम जी ने एक गिलाम
मयगन को पकड़ा दिया। फिर दो बूंट सुद भी सस्मी पो पौर गिलास
को हाय में यामे-पामे ही बोले, "वस, देशने चला पाया. "कमे कर रहा
है माम?"
"काफी समनदार है."सौख जाएगा।" उस्ताद जी ने बताया।
"लस्मी लीजिए न !"दुर्गादास जो बोले ।
"यह मेवा तो मुझे करनी पाहिए पो प्रापको !"
"नहीं, उस्ताद जी" माप मोहन के उस्ताद है-उस्ताद का दर्जा
तो याप मे भी ऊचा होता है.."मुझे तो बताशे-पगड़ी कर पाना
चाहिए था..."
दुर्गादाम जी का सारा तनाव घुल गया था।
लस्सो परम करके उन्होंने मुह पौधा ।हाप मे मूंछों को साफ किया।
फिर पाहिस्ता से बोले, "पाप मुछ देते भी हैं उगे ?"
"देखिए..." उस्ताद जो भिमकते हुए मे कहने लगे, "प्रर में करा
बताऊ. "लेकिन सघ वात नहीं छुपाऊगा देना जर चाहता है लेकिन
मेरी हैमियत नहीं है प्रभी..."
"कोई बात नहीं, उस्ताद जी!"दुर्गादास जी की पावाज में हल्ला.
सा गुरूर पा गया । फिर उन्हें लगा, गुरूर गसत है । स्वर मुलायम पड़
गया। "प्राप बुरा न मानें, तो एक गुजारिश करू ?"
"कहिए न ! युरा क्यों मानूगा ?"
"पाप मोह्न के उस्ताद है-पाप ऐसा कीजिए."पाप मोहन
पच्चीस-तीस पए महीना देते रहिए..." उस्ताद जी की सवालिया नजर
के उटने से पहले ही उन्होंने जोड़ दिया, "से में भिजवा दिया करूंगा।"
उस्तादजी भिमफने सगे।
"देसिए. मैंने इसीलिए कहा था-माप पुरा मान गए..."
"प्राप इतनी दूर में पाए हैं।" उस्नाद जी ने यात को टाल दिया।
"पर पलिए"ये बातें भी हो जाएंगी।"

"नहीं"घर मैं नहीं जा पाऊंगा'"बस, आप इतना कह दीजिए कि आपने मेरी गुजारिश मान ली..." "पाप कहते हैं, तो ठीक है..." दुर्गादास जी उठ खड़े हुए। मक्खन उनके बर्ताव से हैरान अपना सिर खुजा रहा था। "मोहन को यह मत बताइएगा, उस्ताद जी" दुर्गादास जी ने कहा, "कि मैं यहां आया था। बड़ा अभिमानी लड़का है." उस्ताद जी ने उनके चेहरे की ओर देखा । उस चेहरे में कहीं दुख था, तो कहीं अभिमान भी था। ऐसे आदमी टूट जाते हैं, हार नहीं मानते। "पाप वैफिक रहिए..." उन्होंने आश्वासन दिया । "वह मेरे अपने लड़के से भी बढ़कर है-वह मेरे पास तो है..." दोनों बुजुर्गों की निगाहें टकरा गई। दुर्गादास जी ने एक बार गैराज की तरफ नजर डाली । मोहन एक मोटरसाइकल के पास खड़ा था। "अच्छा, अब इजाजत दीजिए..." . रात को दुर्गादास जी घर वापस पहुंच गए। उन्हें अकेले लौटा देख तारा सवालों की झड़ी लगा दी। दुर्गादास जी सफर से थके थे। उन्हो सारे सवालों का एक ही जवाब दिया :"लाना ठीक नहीं लगा।" "मगर' .." "देखो, भागवान'''काम सीख रहा है । ले पाता, । ले पाता, तो उसका सान होता है।" "मिले थे उससे ? वात हुई ?" "नहीं, सिर्फ दूर से देखा था। काफी खुश नजर आ रहा था। उस्ताद से वात हुई। भला आदमी है । मोहन वहां आदमी बन जाए "एक वार मिल तो लेते..." "क्या फायदा होता ! कल को वह वहां से भी भाग जाता कम से कम यह तो पता है कि वह कहां है, कैसा है"उसका मन - . तो युद ही चला पाएगा." सारा प्रव कुछ नहीं बोली। दुर्गादाम जी ने ही रहा, 'तुम उसे चिट्ठी लिसना । शायद तुम्हारे रिगने से घसा माए मिलने..." उमके बाद रात-भर कोई बात नहीं हुई। चौथे दिन उस्दाद जी ने मोहन को एक चिट्टी दी । चिट्टी पर अपना नाम लिपा देसकर मोहन हैरान रह गया। चिट्ठी सोली, तो उसकी हैरानी मोर भी बढ़ गयी !मो को उसका पता कहां से मिल गया? "किसकी चिट्ठी है ?" उस्ताद जी ने पूछ लिया। "मा की।" "क्या लिखा है ?-सब ठीक-ठाक है न ?" "हां-सब ठीक ही है । वस, उदारा हैं ।" "यह तो होंगी ही"मा हैं मातिर..." थोड़ी देर के लिए मोहन सो-सा गया 1 ममतामयी मां की याद ने उसे बांप लिया, उस्ताद जी ने उसे पोर नहीं घेड़ा, उन्होंने देश लिया पा, मोहन की मासें भीगने लगी हैं। उन्होंने अपने पापको उसके पास से हटा लेना ही बेहतर समभा। फिर जब मोहन ने चिट्टी को तह करके जेय में रम लिया, तो वह उसके पास माए और बोले, "मोहन, साने के वयत मेरे पास माना -मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।" "अच्छा, उस्ताद जी!" मोहन काम में उसका तो रहा, लेकिन मां को चिट्टी ने भी उसे काफी उसझाए रसा । फिर कार में उस्ताद जी की बात । वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसी क्या बात है, जिसे उस्ताद जी प्रफेने में बहना पाहते हैं ! इतना परसा उनके साथ हो गया था, उन्होंने कभी कोई पात इस तरह नहीं रही थी कि सब न सुन सके। उनका कुछ भी पिसीने छुपा नही था। उसने इस सारी उलझन को झटककर दिमाग से अलग कर देने को बहुत कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाया। यह इतजार करता रहा किकय दोपहर हो और वह उस्तास्त्री से जाकर बात करें, सेरिन् लगता था जैसे वक्त गुजर ही न रहा हो।

, - फिर किसी तरह दोपहर हुई । मोहन ने हाथ धोए और उस्ताद जी के पास पहुंच गया। चाची-उस्ताद जी की पत्नी को मोहन इसी संबोधन से बुलाता था-लेटों में खाना डाल रही थीं। मोहन वेंच पर जाकर बैठ गया। खाना डालकर चाची ने प्लेट उन दोनों के सामने रख दीं। उस्ताद जी खाने लगे, लेगिन मोहन बैठा रहा । "खाना खायो..."उस्ताद जी ने उसे वैसे ही बैठे देखकर कहा । "तुमने इससे बात की ?" चाची ने उस्ताद जी से पूछा । "कर लेंगे-जल्दी क्या है ?" उस्ताद जी बोले, फिर मोहन से गाहने लगे, "खाना खायो, भाई. ऐसे कैसे बैठ गए हो !" मोहन सिर झुकाकर माने लगा। अव उस्ताद जी ने कहा, "देखो, बेटे, दो बातें करनी हैं मुझे तुमसे गोहन ने प्रांख उठाकर उनकी तरफ देखा । उस्ताद जी खाते-खाते मुसकरा रहे थे। "पहली बात तो यह कि इस महीने से मैंने तय किया है कि तुम्हें तनख्वाह मिलनी चाहिए -सौ-पचास रुपये महीना तुम्हें मिल जाया परेगा..." "उस्ताद जी 'पर," मोहन फहना चाहता था, उसे पैसे की जरूरत हो पया है ? खाने को घर से मिल जाता है। सोने के लिए गैराज है ही। पिनचर-विपचर देखनी होती है, तो साथी ले जाते हैं और वह मलगोजा बजाकर उनका मनोरंजन कर देता है, लेकिन उस्ताद जी ने उसे बात पूरी नहीं करने दी। यह वोले,"मैं जानता हूं तुम क्या कहना चाहते हो। पैरो का तुम क्या करते हो, यह तुम्हारे ऊपर है। लेकिन मेरा खयाल है, तुम्हें कुछ पैसे हर महीने मां को भेजते रहना चाहिए। उन्हें अच्छा लगेगा। प्रब दूसरी बात-तुम्हारी चाची मेरी जान खाए हुए है कई दिनों रो..." मोहन ने चाची की ओर देखा। वह मुसकरा रही थी और उनकी प्रांखों से ममता के सोते फूट रहे थे। "यह पाहती है, 'मोहन से कहो, वह पर में "सुनो तो! ..." - रहा करे। फरे..."

"हां, बेटे!" भव पाची बोली। "तू हमारे साय ही रहने पला चल । वह पर भी तो तेरा ही है..." मोहन अभिभूत हो गया। पहले रहस्य के तनाव में उममे पाया नहीं जा रहा था । अव उमे लगा, यह स्नेह मोर ममत्व उमे माने नहीं देगा... उसी रात मोहन अपना मोसा उठाकर उस्ताद जी के माय उन पर चला गया। पर उमने पहले भी देखा था, फिन सिके द्वार और प्रोगन हो । और पुछ देगने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी थी। सब्जी मंडी के इलाके में कच्ची इंटों में बनी गली में वह भागिरी मकान या-कमंजिला । प्रांगन माफी मना पा। चारों तरफ कमरे बने हुए थे। पर में दो ही भोर प्राणी थे। चाची और एक बेटी, कृष्णा-पंद्रह- मोलह साल की। "लो, भई ! बहन पोछे पड़ी हुई थी न ! मे पाया हूं तुम्हारे बेटे को !" उस्ताद जी ने पानी में कहा । कृष्णा सामने भाई, नो वह बोले, "मोहन, यह है तुम्हारी छोटी बहन, पृणा.' भृष्णा मुमकरा दी। चाची ने मोहन को सीने से लगा लिया । उसका मापा घूमा। मिर पर प्यार मे हाप फेरा । उनका गला भर्रा माया पा-मुरबह न ममी। उस्ताद जी योले, "चलो, तुम्हें तुम्हारा कमरा भी दिया वह उगे कोने में बने एक कमरे में ले गए। दरवाजा मोसकर यती जलाई। मोहन ने कमरे को पूरी तरह देखा । उमे लगा, उमरी सफाई भान ही की गई है। कमरा करीब-करीव पासी पाएक पसंग, एक मैज, एक कुर्मी-पौर पस। "प्रग्या है ?" उस्ताद जी ने पूछा। "बहस अच्छा है।" "हमारा पता इमी में रहता पाभव तो, यंबई में जिस कमरे में यह रहता है, मुना है उममें पाठ-दम मोग उसके माय रहते है.." उस्ताद जी ने अनजाने हो एक ठंडी मांस सीप सी। मोहन ने माना रख दिया। वी ने आवाज देकर उन्हें बुला लिया। कृष्णा साना लगा रही चलो, हाथ-मुंह धो लो..." उस्ताद जी ने कहा। मोहन उनके पीछे ही कमरे से निकल गया। 12 नये परिवार में मोहन घी-खिचड़ी जैसा बन गया । बल्कि उसमें वह इतना . खो गया कि उसे किसी बात की सुध ही न रही। मां की चिट्ठियां पाती। कभी वह उन्हें पढ़ लेता, कभी वैसे ही मेज पर रख देता-पुरानी चिट्ठियों के ढेर पर। खुद कभी जवाब न देता। हर महीने पचीस- तीस रुपयों का मनीऑर्डर घर भेज देता-और बस । मां, वाऊजी, छूटा हुप्रा शहर, कांता, मंदिर, गलियां जैसे अतीत की चीजें हो चुके थे। उनकी खबरें चिट्ठियों में आती रहती-मां बीमार हो गयी थी, अब ठीक है, मां-बाऊजी वैष्णोदेवी की यात्रा पर गये थे। वुमाजी का स्वर्गवास हे गया है प्रादि-आदि । मोहन उन खबरों को अखवारी खबरों की तरह लेता-और कई वार अखवारी खवरों की ही तरह कई खबरें अनपढ़ी रह जाती। मोहन उस्ताद जी के घर का ही एक हिस्सा हो गया था। कृ का उससे बड़ा स्नेह था। अपने बड़े भाई के लिए सुरक्षित सारा उसने मोहन पर उंडेल दिया था। मोहन कई बार स्कूली पढ़ाई में : मदद भी कर देता। दिन के वक्त, मोहन की अनुपस्थिति में वह कमरे में बैठी पढ़ती रहती। शाम होती, तो खाना वगैरह वनाने में मदद करने लगती। वक्त बीतता चला गया। मोहन की मेज पर चिठ्ठियों का । चला गया। 98 / नीड़ मय मोहन तेईस-चौवीस का कड़ियल जवान हो चुका था। उसके नीचे अपनी मोटर साइकल मा चुकी थी मौर दुनिया साठ-सत्तर मील की रफ्तार में भागती नजर पाती थी। उस माम मोहन कुछ ज्यादा ही खा था। दिन में उस्ताद जी ने सब लोगों के मामने उसकी तारीफ की थी मौर कहा था, "भई, मैं तो सब रिटायर होने की सोच रहा हूं। भव नये लड़कों को मोहन ही ट्रेनिंग दिया करेगा। मुझमे काम होता नही..." "हां, उस्ताद जी!" मोहन ने कहा था, "प्रय मापको काम करने की जरूरत ही क्या है ? काम फस्ट क्लास चल रहा है। पाप सिर्फ प्राहकों मे निपटा कीजिए । गेराज चलता रहेगा...' उस्ताद जी ने मोहन को गले लगा लिया था। गैराज सचमुच बहुत भन्ठा चलने लगा था। काम इतना ज्यादा माने लगा था कि उसे पूरा करने में भी दिक्कत हो रही थी। उस्ताद जी की साप तो पहले से ही मच्छी थी। पय वह और भी पुख्ता हो गयी थी। सास बात यह हुई थी कि मेराज में प्रब एक भीमादमी ऐसा नही पा, जिने थोड़ा-बहुत पैसा न मिलता हो। इस सारी स्थिति के लिए उस्ताद जी मोहन कोही बधाई देते थे। उम खुशी के प्रभाव में मोहन उस दिन बड़े जोश मे अपनी मोटर साइरल को पहपड़ाते हुए ही गली से घर में भगाता ले गया। लेकिन भागन में पहुंचते ही उसके हाप ग्रेक लगाना भी भूल गये। रमोई के द्वार पर, हाथ में दूध का गिलास लिए, एक सौम्य मूर्ति ठिठककर सही रह गई थी। मोहन ने उसे पहले कभी नहीं देखा था। जोनेंट की सफेद साड़ी में लिपटी वह मूर्ति सगमरमर को तराशकर बनाई गई लगती थी। इतनी सूवमूरत ! .. मोहन की ऊपर को सांस कार पोर मीचे को नीचे ही रकी रह गई। फिर जब उसे ध्यान भाया कि मोटर साइकल का इंजिन अभी टक भडनहा रहा है, तो उसके शरीर मे हरकत हुई। उसने इंजिन बंदर दिया मोर मोटर साइकल को ठेलकर एक दीवार के पास सार झोला वहां रख दिया। चाची ने आवाज देकर उन्हें बुला लिया। कृष्णा खाना लगा रही थी। "चलो, हाथ-मुंह धो लो..." उस्ताद जी ने कहा। मोहन उनके पीछे-पीछे ही कमरे से निकल गया। 12 नये परिवार में मोहन घी-खिचड़ी जैसा बन गया । बल्कि उसमें वह इतना खो गया कि उसे किसी बात की सुध ही न रही। मां की चिट्ठियां पातीं। कभी वह उन्हें पढ़ लेता, कभी वैसे ही मेज पर रख देता-पुरानी चिट्ठियों के ढेर पर। खुद कभी जवाव न देता। हर महीने पचीस- तीस रुपयों का मनीऑर्डर घर भेज देता-और बस । मां, वाऊजी, छूटा हुमा शहर, कांता, मंदिर, गलियां जैसे अतीत की चीजें हो चुके थे। उनकी खबरें चिट्ठियों में आती रहती-मां वीमार हो गयी थी, अब ठीक है, मां-बाऊजी वैष्णोदेवी की यात्रा पर गये थे। बुधाजी का स्वर्गवास हो गया है आदि-आदि । मोहन उन खवरों को अखवारी खबरों की तरह पढ़ लेता और कई बार अखवारी खवरों की ही तरह कई खबरें अनपढ़ी भी रह जाती। मोहन उस्ताद जी के घर का ही एक हिस्सा हो गया था। कृष्णा का उससे बड़ा स्नेह था। अपने बड़े भाई के लिए सुरक्षित सारा प्यार उसने मोहन पर उंडेल दिया था। मोहन कई बार स्कूली पढ़ाई में उसकी मदद भी कर देता। दिन के वक्त, मोहन की अनुपस्थिति में वह उसीके कमरे में बैठी पढ़ती रहती। शाम होती, तो खाना बगैरह बनाने में मां की मदद करने लगती। वक्त बीतता चला गया। मोहन की मेज पर चिट्ठियों का ढेर बढ़ता चला गया। 98 / नीड़ प्रय मोहन तेईस चौवीस का कड़ियल जवान हो पुका था। उसके नीचे पपनी मोटर साइकल पा चुको यी पोर दुनिया साठ-सत्तर मील की रफ्तार से भागती नजर भाती थी। उस शाम मोहन कुछ ज्यादा ही खुश था। दिन में उस्ताद जी ने सब लोगों के सामने उसकी तारीफ की थी और कहा था, "मई, मैं तो अब रिटायर होने की सोच रहा हूं। पय नये लड़कों को मोहन ही ट्रेनिंग दिया करेगा। मुभमै काम होता नही..." "हो, उस्ताद जी !" मोहन ने कहा था, "मव पापको काम करने की जरूरत ही क्या है ? काम फस्ट यसास चल रहा है । पाप सिर्फ ग्राहको से निपटा कीजिए । गैराज चलता रहेगा..." उस्ताद जी ने मोहन को गले लगा लिया था। गराज सचमुच बहुत अच्छा चलने लगा पा । काम इतना ज्यादा माने लगा था कि उसे पूरा करने में भी दिक्कत हो रही थी। उस्ताद जी की सास तो पहले से ही अच्छी पी। पव वह और भी पुस्ता हो गयी थी। सास बात यह हुई थी कि गैराज में मब एक भी पादमी ऐसा नहीं था, जिमे थोड़ा-बहुत पैसा न मिलता हो। इस सारी स्थिति के लिए उस्ताद जी मोहन को ही बधाई देते थे। उस खुशी के प्रभाव में मोहन उस दिन बड़े जोश में अपनी मोटर साइकल को पड़पड़ाते हुए ही गली से घर में भगाता ले गया। लेकिन पागन में पहुंचते ही उसके हाप ग्रेक लगाना भी भूल गये रसोई के द्वार पर, हाय में दूध का गिलास लिए, एक सौम्य मूर्ति ठिटककर सड़ी रह गई थी। मोहन ने उसे पहले कभी नहीं देखा था। जॉजेंट की सफेद साड़ी में लिपटी वह मूर्ति सगमरमर को तराशकर बनाई गई लगती थी। इतनी सूबसूरत ! ."मोहन को कार को सास कार और नीचे की नीचे ही रकी रह गई। फिर जब उसे ध्यान प्राया कि मोटर साइकल का इंजिन मभी तक भडमहा रहा है, तो उसके शरीर में हरकत हुई। उसने इंजिन बंद कर दिया मोर मोटर साइकल को ठेलकर एक दीवार के पास खड़ा कर - झोला वहां रख दिया। चाची ने आवाज देकर उन्हें बुला लिया। कृष्णा साना लगा रही थी। "ालो, हाथ-मुंह धो लो..." उस्ताद जी ने कहा। मोहन उनके पीछे-पीछे ही कमरे से निकल गया। 12 नये परिवार में मोहन घी-खिचड़ी जैसा बन गया । बलिया उसमें वह इतना खो गया कि उसे किसी बात की सुध ही न रही। मां की चिट्ठियां पाती। कभी वह उन्हें पढ़ लेता, कभी वैसे ही मेज पर रख देता---पुरानी चिट्ठियों मे देर पर । सुद गाभी जवाब न देता। हर महीने पचीस- तीस रुपयों का मनीऑर्डर घर भेज देता---ौर वस। मां, बाऊजी, छूटा हुमा शाहर, फांता, मंदिर, गलियां जैसे अतीत की चीजें हो चुके थे। उनको खबरें गिट्ठियों में पाती रहती-मां बीमार हो गयी थी, अब ठीक है, मां-बाऊजी वैष्णोदेवी गी यात्रा पर गये थे। चुाजी फा स्वर्गवास हो गगा है प्रादि-मादि । गोहन उन राबरों को भलवारी खबरों की तरह पढ़ लेता---ौर पई बार अखबारी खवरों की ही तरह कई खबरें अनपढ़ी भी रह जाती। मोहन उस्ताद जी के पर फा ही एक हिस्सा हो गया था। कृष्णा का उरासे बड़ा स्नेह था। अपने बड़े भाई के लिए सुरक्षित सारा प्यार उसने मोहन पर उंडेल दिया था। गोहन पाई वार स्पाली पढ़ाई में उसकी मदद भी कर देता। दिन के पगत, मोहन की अनुपस्थिति में वह उसीके पामरे में बैठी पड़ती रहती। शाम होती, तो साना वगैरह बनाने में मां की मदद करने लगती। पगत बीतता चला गया। मोहन गी मेज पर चिट्ठियों का ठेर बढ़ता राता गगा। NO.

भय मोहन तेईस-चौतामील होमगारे नीचे पानी मोटर साइन मा चुसी और दुनिया में रफ्तार में भागती नजर पतो। उस शाम मोहन कुछ ग्यादा ही मासादिक के मामने उसकी तारीफ की पी मौर महापा,टोतिर होने की सोच रहा हूं। पद नरे दहा दही मुझमे काम होता नहीं..." "हां, उस्ताद जी!" मोहन ने कहा यासको जरूरत ही क्या है ? काम र सान वनहा है। से निपटा कीजिए । गैराज बनता रहता उस्ताद जी ने मोहन को गले नानिवार गराज सचमुच बहुन मन्डा वर्ग का । माने लगा था कि उसे पूरा करने में नदिलाई। को सास तो पहले से ही अच्छी पो । महद- सास बात यह हुई पो कि सरकार पा, जिने थोड़ा-बहुत पान निट है। उस्ताद जी मोह्न को ही बसाईट।

दिया।
फिर उराफी हिम्मत नहीं हुई कि यह रसोई की तरफ नगर घुमाकर
देवा भी समे।
अपने पामरे की पोर बढ़ते हुए उराने ष्णा को प्रायाण दी, तो उसे
ऐसा महसूस हो रहा था, जैरो उस मूर्ति की प्रारों उराणी पीठ को बींधती
जा रही हों।
गागरे में पहुंगफार वह पुरी में फंस गया।
सरदी मे गोराम में भी पसीना-पसीना होते गोहन गो देखकर गुष्णा
बोली, "गया बात है, गया?"
"पुछ नहीं''यह 'गोटर साइकल के पीछे संतरों की टोकरी रखी
है.''उतार लो..."
"घात गया है ? तुम्हारी तवियत तो ठीक है ?" साणा ने फिर
'पूछा।
"हां-तविगत पो गया होगा?..'जरा एक कप चाय बना दो..."
"प्रभी लाई..."
प्रष्णा पली गई। उसगो लोटयार पाने तफ मोहन ने अपने-मापको
। काफी संगत कर लिया था। दो चूंट पाय अंदर गई, तो यह और भी संभल
"घाउजी पावनायेंगे?" गष्णा ने पूछा।
"पाते ही होंगे-~पयों ?"
"गुन पानी पाई हुई है..."
"यह चाची ?"
"हा-विषया है धेगारी । बाऊजी एक दूर के भाई थे। फौज में
थे..."
मोहन गुपचाप पाय पीता रहा ।
"ज्यादा दिन रहेगी यहाँ ?" फिर उसने पूछा।
"नहीं-दो-तीन दिन । हर साल पा जाती है गाय से । दो-तीन
दिन रहती है और यहीं से शीधी ससुराल चली जाती है !'
फिर गोहन ने कोई सवाल नहीं किया। पुपचाप पाय पीता रहा।
।
100 / नीट

सरदियां हों या गरमिया, सारा परिवार प्रांगन में विछी चारपाइयों पर बंटकर ही रात का साना साता था। फिर सब लोग बैठकर पोड़ी देर बातें करते रहते थे, और जिसे नीद पाने लगती यो, वह उठकर कमरे में मोने चला जाता था। उम दिन रात का साना साथ-साथ हुमा । उस्ताद जी बिस्तर पर लेट गए थे और दिन की दूसरी सिगरेट उन्होंने सुलगा ली थी। चाची संतरे छील-छोलकर सबको दे रही थीं। उन्होने एक संतरा पाकुन को भी दिया। माकुन की नन्ही-सी छोटी, निक्की, फरां पर उछल-कुद रही थी। वह कहीं से पतली-सी बांस की छड़ी उठा लाई थी मोर उसपर सवारी करने लगी थी। मोहन की निगाहें बार-बार शकुन की प्रोर चली जातीं। उसने एक यात महमूस की पी-दाकुन का एक हाथ बार-बार अपने गले और उसके नीचे के भा पर घूमने लगता था, जैसे उसे प्यास लगी हो मोर यह मपनी प्यास को दवाने की कोशिश कर रही हो । मोहन अपनी निगाहों को दूसरी तरफ घुमाने की कोशिश करता, लेफिन निगाहें बार-बार गकुन की पोर खिंची चली जाती। मोहन को बड़ी उलझन होती। एकाएक निक्की ने अपनी पतली-सी छड़ी को हाथ में सीधा उठा लिया और तोतली जवान मे बोली, "मैं झांशी को लानी हूं!' "अच्छा!" उस्ताद जी ने कहा, "तू झांशी की लानी है तो तेला घोला यहाँ है ?" "पोला मल गया"उठने लंबी छलांग लगाई थी न.."उछकी ताग "मल गया !" मांगन में बैठे सभी लोग उस बातूनी वच्ची की बातों में रस लेने सगे पे। शकुन हौले-हौले मुसकराए जा रही थी। "तो पब क्या करेगी?" उस्ताद जी ने निक्की से प्रगला सवाल किया। निसरी किसी नाटक के रटे-रटाए संवादो की तरह जोश से भरकर तन गई...

- वोली, "अंगलेजों को माल भगाऊंगी! उनके छाले घोले छीन लूंगी !" भोर इसीके साथ वह छड़ी को ऐसे घुमाने लगी, जैसे वह तलवार चला रहो हो । छड़ी उस्ताद जी को जरा-सा छू गई और वह ऐसे दिखाने लगे, जैसे वह बुरी तरह घायल हो गए हों। सब लोग हंसने लगे। लेकिन निक्की एकदम गंभीर थी। उसका चेहरा तमतमा रहा था और अब वह मोहन के सामने खड़ी उसे ललकार रही थी : "होछियाल ! उथानो तलवाल ! मैं निहत्थों पल वाल नहीं करती !" मोहन हंस दिया। फिर उसने निक्की को कमर से पकड़ कर उठा लिया। पर निक्की छड़ी को घुमाती रही और छूटने की कोशिश करती रही। अचानक छड़ी का सिरा उसकी आंख को छूता हुग्रा निकल गया। मोहन ने निक्की को छोड़ दिया। मोहन फिर भी हंस रहा था, लेकिन उसकी प्रांख में पानी आ गया । "अब बोलो! प्राया मजा!" निक्की ने शरारत से कहा, मगर अब शकुन ने उसे डांट दिया। "निक्की !" उसने तीखी आवाज में कहा, "देख, मैं बहुत मारूंगी।" "मैं तुमछे नहीं बोलती !" निक्की मां की तरफ पीठ करके बैठ गई। मोहन ने उसे उठाकर गोद में बिठा लिया। शकुन गुस्से में थी। वह उठी और मोहन के पास आ गई । निक्की से बोली, "चल सो जा अब ! बहुत हो चुकी शरारतें !" निक्की मोहन से चिपक गई। "मैं नहीं छोऊंगी।" शकुन ने निक्की की बांह पकड़कर उसे खींचना चाहा, लेकिन मोहन की नजर में जाने उसे क्या नजर पाया कि वह पीछे हट गई। निक्की अव भी मोहन से चिपकी हुई थी। मोहन को काफी देर तक नींद नहीं पाई। निक्की उसके पास ही सो रही थी। पहले तो वह उसकी छाती पर मोनी रही, फिर मोहन ने धीरे मे मे बिस्तर पर लिटा दिया था। उमको एक बांह प्रद भी मोहन के बदन पर थी। पहन दिनों के बाद मोहन को कांता की याद हो पाई पी। और वह विचारों में टूदकर रह गया पा। रात थी और घर में सन्नाटा था। मोहन सभी सक जाग रहा पा उमे सगा, कोई पलकर उसके दरवाजे तक भाया है और यही रक गया है । दो-तीन पस पामोगी रही, फिर अपुन को मायाज माई- "निकी!" मोहन के कान सड़े हो गए। फिर एक पल के बाद दुवारा मावाज भाई-निक्की!" वह विस्तर में उतर पाया । दरवाजे के पास पहुंचा, तो शान वहा खड़ी थी। मोहन के पास में होकर कमरे में जाते हुए वह चोली, "सौ गई ! .."बड़ी जिदी है"क्सिीनी सुनती ही नहीं..." सोई हुई निक्की को उठाने के लिए वह अकी, तो मोहन बोला "रहने दीजिए न.."सोई रहेगी..." "नहीं.."पापको तंग करेगी."बहुत टांगें पलाती है नीद में..." "मभी बच्चे चलाते हैं..." मेकिन शकुन ने निक्की को उठाकर कंधे मे लगा लिया । वह बाहर झी मोर पसी, तो एक बार उसने मोहन की भोर देख लिया। पधेरे में उसकी पोल पमपती-सी लगी। "माप सो रहिए.." जाते-जाते वह कहती गई। मोहन मुन्न-सा बिस्तर पर बैठ गया। उसके माथे पर पसीना चुह- चुहा पाया था। कुछ दाग यह उस मावाज, उन पासो की चमक भौर मांसलता की गंप मे पिरा बैठा रहा। फिर जब वह वापस दिस्तर पर मैटा, सो उमका दिम युरी तरह घड़क रहा पा मोर कनपटियों की नसें मजीव तनाव मे कसी हुई थी। बहुत देर तर उसे नीद नहीं पाई। मुरह, रोजाना की तरह अपने पाप उमरी मांस नही मुली । कृष्णा दे- - तीन बार देख गई थी। फिर जब धूप निकल पाई, तो उसने उसे जगा दिया। चाय का प्याला वह साथ लेती पाई थी। मोहन उठा। उसने देखा, कृष्णा का चेहरा कुछ उतरा हुआ था। "क्या बात है, कृष्णा?" उसने चिंतातुर होकर पूछा। "वाऊजी की तवियत खराब है," कृष्णा ने बताया। "अरे! रात को तो ठीक-ठाक थे !" "हां-सुबह उठे, तो बुखार से तप रहे थे।" "प्रच्छा. मोहन ने जल्दी से नल पर जाकर कुल्ला किया और फिर लोटकर चाय का चूंट भरते हुए बोला, "डॉक्टर को बुलाया ?" "अभी तो नहीं बुलाया..." कृष्णा ने बताया। "वाऊजी अंग्रेजी दवा लेते ही नहीं।" "तवियत ज्यादा खराब हो तो..." मोहन ने उस्ताद जी को भी समझाया कि डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए, पर वह नहीं माने । उन्होंने इतना ही कहा, "एकाध दिन में ठीक हो जाऊंगा। ऐसे ही सरदी लग गई होगी। तुम काम पर जानो। शाम को जल्दी लोट माना..." लेकिन शाम तक उस्ताद जी की तबियत और भी ज्यादा विगढ़ गई। चाची उनके पास बैठी थीं । शकुन लगातार अंदर-बाहर हो रही थी। उसीने मोहन से कहा, "प्राप डॉक्टर को बुला ही लाइए ऐसे तो ठीक नहीं है. मोहन डॉक्टर को बुला लाया। उस्ताद जी उस समय करीब-करीव वेहोश थे। डॉक्टर ने उनकी जांच की और बताया कि उसे डर है, उस्ताद जी को न्यूमोनिया हो गया हो गया है। उसने इंजेक्शन दे दिया और दवा भी भिजवा दी। रात को एक धार वह फिर आफर देख गया । पर-भर में सन्नाटा छा गया था। उस रात न खाना बना, न किसीने खाया। सब लोग उस्ताद जी के विस्तर को घेरकर बैठे रहे। सुवह चार बजे के करीब उस्ताद जी ने मांस खोली। .

सरको जान में जान माई।
दोपहर को मोहन गैराज से एक बार निकलकर पर का चक्कर
लगा गया । उस्ताद जी की तवियत संभलने लगी थी।
रात तक यह बात करने लायक हो गये थे। मोहन उनके पास मा.
कर बैठा, तो यह बोले, "मुझे एक फिक्र लगी हुई है..."
"बोलिए न..."
"उमे कल जाना है।"
मोहन चुप सुनता रहा । लेकिन पास बैठी कुन कह उदो, “माप
मेरी फिकर मत कीजिए मैं चली जाऊगी। चिट्टी तो मैंने लिस ही दी
थी लेकिन जी तो यही अटका रहेगा..."
"नही प्रकेली नही जानोगी तुम "पौर-एकने की भी कोई जरूरत
नहीं। मैं प्रय ठीक हूं।" फिर वह मोहन से बोले, "इसकी ससुराल वाले
इतजार करेंगे."बड़े दाक्की मिजाज है."नही पहुंचेगी, तो जाने क्या-क्या
सोचेंगे "मौसम भी सराय चल रहा है-तुम छोड़ भामोगे इरो ?"
मोहन फौरन जवाव नही दे पाया। फिर हिचकिचाया। "मैं...
उस्ताद जी. "मगर ?..." उसकी निगाहें शकुन की तरफ उठ गई, फिर
पारवस्त-मा होकर बोला, "माप कहते हैं तो..."
उस्ताद जी बोले, "सुवह नत्य से कह देना, तुम्हारी मेर-हाजिरी में
यह काम संभाल लेगा..."
"जी," मोहन ने सिर हिला दिया।
13
दूसरे दिन मुबह को बस से वे लोग घस दिए ।
मूबसूरत पहाड़ी इलाका। ठंड का मौसम । ढलती हुई गाम। यस
करीब दो सौ मील का सफर तय कर पाईपी
सरदी इतनी ज्यादा पी कि सवारिया कंचना-लिहाफी में निपटी

.. सुरसुरियों की तरह सुन्न पड़ी हुई थीं। शकुन निक्की को अपनी गोद में लिए बैठी थी और उसने अपने शाल में उसे लपेट रखा था। मोहन लगातार खिड़की से बाहर ही देखे जा रहा था। चार-पांच घंटों की सहयात्रा के वावजूद शकुन और उसके बीच दो-चार शब्दों से ज्यादा का आदान-प्रदान नहीं हुआ था। लेकिन अांखें और मुस्कराहटें बहुत कुछ कहती-सुनती रही थीं। एकाएफ निक्की खिड़की की तरफ अंगुली दिखाते हुए बोली, "मैं वहां वैलूंगी।" "नहीं," शकुन बोली, "सरदी है-ठंड लग जाएगी।" लेकिन निक्की उसकी गोद से उतरकर नीचे खड़ी हो गई और बोली, "मैं बैठेगी।" "निक्की !" मगर निक्की पहले ही मोहन के पास सरक गई थी। वह खिड़की की तरफ बढ़ रही थी कि शकुन ने उसका कंधा पकड़ लिया, "अच्छा, रुक..." निक्की रुक गई । शकुन उसके सिर पर बंधा स्कार्फ ठीक करने लगी। फिर मोहन ने उसे उठाकर खिड़की के पास बिठा दिया। अनजाने में ही उसकी कुहनी शकुन के वक्ष से छू गई।' उसका पूरा बदन झनझना गया। दोनों की नजरें मिलीं और फिर झुफ भी गई । फिर दोनों नजरें चुराने लगे। मोहन के लिए यह सारी अनुभूति एकदम नई थी। उसकी चेतना में विजलियां-सी कौंध रही थीं-- रंगीन पट्टियां एक-दूसरे से उलझ रही थीं। निक्की खिड़की के कांच में से बाहर देखती हुई हर चीज पर तरह- तरह के मुंह बना रही थी और खुश हो रही थी। उसने एक वार मुंह उठाकर मोहन की पोर देखा, तो मोहन ने उसकी नाक पर अंगुली रखकर धीरे से दवा दिया। वह खिलखिलाकर हंसने लगी। उसका स्कार्फ फिर सिर से नीचे ढलक गया। शकुन ने हाथ बढ़ाकर 106 / नीड़ स्कार्फ ठीक किया-पौर इस बार भपने वक्ष का पूरा भार मोहन को योहों पर डाल दिया। मोहन का रोम-रोम कार उठा । पात्रा मजीर-गे रोमांचकारी मनुमय में बदलती जा रही थी। मोहन विचारों में डूब गया । इस पाना का अंत मया हो सकता है ? यह यात्रा, जो गरम होने के लिए ही गुरू हुई है"कुन क्या चाहती है ? यह गुदपा पाहता है ? और जो पुछ ये दोनों पाहते हैं, उसका पंत पमा हो मकता है ? यही न कि कुछ घंटों बाद यह यात्रा समान हो जायेगी पोर दोनों एप-दूसरे को मलविदा कह देंगे-शायद फिर कभी न मिलने के लिए। फिर इन क्षणिक सगाय का मतलव...? 1 बम एक झटके में रुक गई मौर मोहन की विचार-शृंगला भी टूट गई। बाहर अंधेरा घिरने लगा था। निकको जाने कत्र की मो पुकी थी। उमकी गर्दन मोहन को बाह पर टिकी हुई थी। शान भी प्रधनींदी-मी हो रही थी। धग की, तो उनको पार्न भी पूरी मुल गई। बम के पागे पोर पीछे गाडियां रफी हुई थी। सहक के दोनों पोर उन गाडियों के प्राइवर और कुछ पानी भी पड़े या बैठे पे। "क्या हुमा ?" वम के ड्राइवर ने बाहर राडे सोगों से पूछा। "पुल टूट गया है," एक मादमी ने जवार दिया। यस ये यात्री एक-दूसरे का मुंह देपने सगे। पूरी यम में महिम- मदिम भिनभिनाहट-सी फैल गई। "मिलिटरी फोर्स माई हुई है बेनी निज बन रहा है।" "कितनी देर लगेगी?" "रात तो सग ही जाएगी कुन के पेहरे पर हमपी-सी चिता उभर पाई। "प्रय क्या होगा?" यह बोनी ।

मोहन के पास कोई जवाब नहीं। सवारियां धीरे-धीरे उतरने लगी थीं। कंडक्टर छत से सामान उतार- कर उन्हें देता जा रहा था ,प्राखिर वे लोग भी नीचे उतर पाए । वाहर आते ही महसूस हुआ, ठंड बहुत ज्यादा थी। शाम ढल रही थी। ऊपर से बादल और वर्फीली हवा । शकुन ने निक्की को अच्छी तरह शाल में लपेट लिया। मोहन ने शकुन का सूटकेस संभाल रखा था। सरदी, ठंडी हवा, ऊपर से उतरती हुई रात । वारिश भी हो सकती थी। मोहन सोच रहा था--रात कहां कटेगी? उसने कंडक्टर से ही पूछना बेहतर समझा। "रात काटने के लिए कोई जगह है आसपास ?" उसने कंडक्टर से पूछा। "हां जी," कंडक्टर बोला, "एक होटल है-पीछे छोड़ पाए हैं हम - लोग...॥ "कितनी दूर होगा?" "डेढ़-दो फलांग-पर आप जल्दी से चले जाइए-बच्चा है प्राप लोगों के साथ "कहीं सारी जगह भर न जाए--सभी लोग वहीं जा रहे हैं. आगे वाली गाड़ियों के लोग भी गये होंगे..." मोहन चितित हो उठा। वे लोग तेजी से कदम उठाने लगे। - हुआ वही, जिसका डर था। कंडक्टर ने जिसे होटल बताया था, वह एक ढावा था, जिसके साथ तीन-चार कमरे लगे हुऐ थे । सभी कमरों में यात्री अपना-अपना सामान लगा चुके थे । और कहीं पांव रखने को भी जगह नहीं थी। दावे का मालिक भला ग्रादमी निकला। बोला, "अव एक ही रास्ता है, पाप लोग स्टोर में चले जाइए'"तकलीफ तो होगी, लेकिन और हो भी क्या सकता है ?" मोहन ने शकुन की तरफ देखा । जाहिर था, वह इस बात से परेशान था कि ढावे वाला उन्हें मियां-बीवी समझ रहा था। - 108/नीड

"ठीक है, भाई जी !" गान ने कहा । "हम सोग रटोर में ही पर
रहेंगे..."
मोहन ने पन को सांग ली।
ये सोग दावे याले के पीछे-पीछे चल दिए। बुजुर्ग ने गलियारे के
मागिर में बने एक कमरे का दरवाजा पोला और हाथ में पकडी लालटेन
एक पोर रणदी।
फिर वह यह पहते हुए चल दिया कि "किगी चीज की जरूरत हो,
तो मैं रसोईघर में रहूंगा।"
मोहन ने बुजुर्ग का शुक्रिया प्रदा किया पौर हाप में पकड़े मूटकेस
को फर्श पर रगफर कमरे में एक नजर दासी। एक दीयार के माय भरी
हुई योरिया रसी पी-एत तफ । उनमें पायद गेह, घायल, दानें थी।
एक तरफ मालू पौर प्यान के दो वोरे रगं हुए थे। तेल के कनस्तर ।
मसालों के हिम्मे पार जाने क्या-पया इधर-उधर रमा हुया था। कमरे
के बीचोंबीच ऐन दरवाजे के सामने एक धारलाई विछी हुई थी, जिसपर
दो मावल भोर एक मैसा-युचला तफिया रहा था। पूरे कमरे में प्याज पौर
मसाती की गंध व्याप्त थी।
एक मिनट तक ये सामोश पटे रहे।
फिर पकुन ने पारपाई पर एक मंचल विछा लिया पोर नियकी को
उमपर लिटा दिया। मोहन नुरन्त योन उठा, "मैं बाहर बरामदे में पर
रहगा। मारफे पाग एका पंवम तो होगा न..."
सन ने "हा" कहा पोर मूटरेम में मे कंबल निकालने लगी।
"निमसरी के लिए दूध यगरह की जरूरत होगी," कहते हुए मोहन
ने पर्मस उठा मी पोर जाते-जाते बोला, "मैं लेकर पाता हूं."दर.
याजा बंद कर लीजिए''हया बहुत ठंडी है..."
पाकुन ने कंबल निपालफर मूटसेरा पर ही रप दिया ।
मोहन जव तोटकर माया, तो शकुन पारपाई की पाटी पर बंटी
मिली।
मोहन ने पर्मस उमे यमादीशन ने आपाप अपना फयस उसकी
भोर पड़ा दिया।
नीर/ 100

"अरे! इसे रहने दीजिए--दूसरा दे दीजिए'''यह खराव हो जाएगा।" पूछा। "ठंड बहुत है । नीचे, फर्श पर कैसे सोएंगे। " शकुन ने "पड़ रहूंगा। रात ही तो काटनी है।" उसने खुद ही झुककर चारपाई पर पड़ा कंवल उठा लिया और बाहर निकल गया। फिर घूमकर बोला, "दरवाजा बंद कर लीजिए पौर चटखनी लगा लीजिए..." शकुन ने कोई जवावं नहीं दिया, तो मोहन ने पलटकर उसकी ओर देखा। उसकी नजर को देखकर वह कांप-सा गया। उसने बरामदे के कोने में ही कंवल विछा लिया। शकुन उठी और उसने दरवाजा बंद कर लिया। - रात बहुत भयानक हो उठी थी। तेज बारिश के साथ तूफानी हवा चल रही थी। हवा बर्फ के तीरों की तरह शरीर से टकराती थी। फिर भी मोहन का गला सूखा जा रहा था। उसका दिमाग अजीब उधेड़-बुन में उलझा हुआ था। वह कंवल पर लेटा हुआ था। बीच-बीच में वह उठकर बैठ जाता, फिर उठकर टहलने लगता. 'दो-तीन बार उसके कदम उसे कमरे के दरवाजे की ओर भी खींच ले गए थे। जी में आता था वह किसी तरह कमरे में चला जाए और अपने ठंडे बदन को शकुन के गरम वदन में गर्क कर दे, लेकिन दरवाजे तक हाथ उठाकर भी उसकी हिम्मत जवाब दे जाती थी। दिल के किसी कोने से आवाज आती थी~-यह गलत होगा । फिर एकाएक तूफान और भी तेज हो गया। मोहन फिर उठकर वैठ गया। उसकी नजरें कमरे के दरवाजे पर टिक गयीं। वह उठा और दरवाजे तक चला गया। दो-तीन पल यों ही गुजर गए । फिर उसने दरवाजे पर दस्तक देने के लिए हाथ उठाया। हाथ दरवाजे पर रखा तो वह थोड़ा-सा खुल गया। उसे हैरानी हुई -अंदर से चटखनी नहीं लगाई गई थी। 110/नीड

उमका सारा शरीर कांप गया। कान हायों से ही उगने दरवाजे
पोटेल दिया।
गएन पव भी पारपाईशी पाटी पर बंटी थी, उसी तरह जमे यह
कई पटे पहले बैठी हुई थी।
पान का रो-रोयो सता हा था। उमने मांग उटाकर मोहन
को मार देगा। उनकी नजरें मिली । वह उसरी पोर देने जा रही दी,
मैमिन मोहन की नजरें झुक गई। अपराधबोध ने उसे घेर लिया। वह
प्रय भी उसके चेहरे की पोर दंग रही थी। फिर उसके चेहरे का भाव
घदर गया।
यह उटी पोर बिना पुल बोले उसने दरयाजे को जोर से बंद कर
दिया।
मोहन की टांगें जवाब दे गयी। फिर उसे पता नहीं पता, यह वापस
कंचन तक गोरो पहुंचा पोर मुरदे की तरह रह गया !
सूफान गात हो चुका था। मोहन की मांग रासी, तो उसने देगा, दिन
पा पाया है। उसकी नगर दरवाजे की मोर गई, तो यह पसाहमा
यामरा गाली था।
रात की सारी घटनाएं उसके दिमाग में पूम गई और उसे लगा
परन परमानित महसूस कर निराणी को पर पहीं पली गई है।
सरदी में भी यह पसीने में नहा गया।
उसने तुरंत संयस छोड दिया । भागर यह दाये से याहर पाया,
तो उसकी जान में जान पाई। गरुन पोर नियमी बाहर सरी पी।
पास ही एक पुजुर्ग राई थे। लह-रात्रह साल का एक सहसा भी था।
गरुन के सिर पर पस्तू था ।रामा धूपट भी उसने सीप रा
पा। मोहन को देगा ही उगने उसरी तरफ पीट कर सी।
मोहन के कदम सुस्त हो गए, मेक्नि युनगं उसमी तरफ समाये।
"तुम ही मोहन हो, परारदार?" उन्होंने बी मोटी जबान से
पूछता
"श्री"माफमोत्रिए ने पापको..."

"अरे ! इसे रहने दीजिए-दूसरा दे दीजिए'''यह खराब हो
जाएगा।"
"ठंड बहुत है । नीचे, फर्श पर कैसे सोएंगे।" शकुन ने पूछा।
"पड़ रहूंगा। रात ही तो काटनी है।"
उसने खुद ही झुककर चारपाई पर पड़ा कंबल उठा लिया और
वाहर निकल गया। फिर घूमकर बोला, "दरवाजा बंद कर लीजिए
और चटखनी लगा लीजिए..."
शकुन ने कोई जवाब नहीं दिया, तो मोहन ने पलटकर उसकी
प्रोर देखा। उसकी नजर को देखकर वह कांप-सा गया ।
उसने बरामदे के कोने में ही कंबल बिछा लिया।
शकुन
उठी और उसने दरवाजा बंद कर लिया।
रात वहुत भयानक हो उठी थी।
तेज बारिश के साथ तुफानी हवा चल रही थी। हवा बर्फ के तीरों
की तरह शारीर से टकराती थी। फिर भी मोहन का गला सूखा जा रहा
था।
उसका दिमाग अजीव उधेड़-बुन में उलझा हुआ था। वह कंबल
पर लेटा हुआ था। बीच-बीच में यह उठकर बैठ जाता, फिर उठकर
टहलने लगता''दो-तीन बार उसके कदम उसे कमरे के दरवाजे की
भोर भी खींच ले गए थे। जी में प्राता था वह किसी तरह कमरे में चला
जाए और अपने ठंडे बदन को शकुन के गरम वदन में गर्क कर दे,
लेकिन दरवाजे तक हाथ उठाकर भी उसकी हिम्मत जवाब दे जाती थी।
दिल के किसी कोने से प्रायाज प्राती थी~यह गलत होगा ।
फिर एकाएक तूफान और भी तेज हो गया। मोहन फिर उठकर
बैठ गया। उसकी नजरें कमरे के दरवाजे पर टिक गयीं। वह उठा और
दरवाजे तक चला गया। दो-तीन पल यों ही गुजर गए। फिर उसने
दरवाजे पर दस्तक देने के लिए हाथ उठाया। हाथ दरवाजे पर रखा तो
वह थोड़ा-सा खुल गया। उसे हैरानी हुई-अंदर से चटखनी नहीं लगाई
गई थी।
110 / नीट

उमका मारा पारीर फांस गया । कांपने हायों से ही उसने दरवाजे को टेल दिया। गयुन प्रव भी चारपाई को पाटी पर बेटी थी, उसी तरह से यह कई घंटे पहले बंटी हुई पी। गनुन का गेयां-गेर्या तना हुप्रा था। उसने मांग उठाकर मोहन की मार देगा। टनरी नजरें मिली । वह उसरी पोर देने जा रही थी. लेकिन मोहन की नजरें झुक गई। अपराधबोध ने उसे घेर लिया। यह प्रय भी उसके चेहरे की पोर देख रही थी। फिर उसके पेहरेरा भार बदल गया। यह उटी पोर बिना मुछ बोले उमने दरवाजे को जोर से. दिया। मोहन की टांग जवाब दे गयी। फिर उसे पता नहीं पाता, ह मंबल तक यौमे पहुंचा और मुरदे की तरह सूकान गांत हो चुका था। मोहन की पोस गुमी, सेन पर पाया है। उसकी नजर दरवाजेपी पोर ने पामरा सालीपा। राम की सारी पटनाएं उसके सिर पर हमेशा परन परमानित महसूस करके, निको के हो है। सरदी में भी यह पसीने से नहा पता उमने तुरंत करन छोड निहारे बाहर माया, सो उगो जान में जान जारपोरनिको बाहर सजी थी। पास ही एक युजुर्ग साहलाइ साल का एक लडका भी था। पान के सिर पर पनाहका-साधूषट भी उसने लीय रसा पा। मोहन को देस होल्ले की तरफ पीठ कर लो। मोहन के नाम हो गए, लेकिन बुजुर्म उसकी तरफ मागे । "तुम ही कोहर हो. बरपुरधार?" उन्होंने बड़ी काल में पूछा। " पोक कौगिरने घासको."

"मैं निक्की का दादा हूं," वुजुर्ग ने बताया । फिर साथ आये लड़के की तरफ इशारा करते हुए बोले, "और यह निक्की का चाचा है। हमें तो बड़ी फिक्र हो रही थी कि वह कहां रह गई। फिर बस अड्डे पर पता चला कि पुल टूट गया है..." "अब तक तो बेली ब्रिज बन गया होगा..." मोहन ने सहज ही पूछ डाला। "हां-वर्ना हम लोग इस पार तक कैसे आते ?” बुजुर्ग ने मुसकरा- कर जवाब दिया। मोहन अपने सवाल की व्यर्थता पर शर्मिदा-सा हो गया। उसकी नजर बार-बार शकुन की तरफ उठ जाती थी और उसकी पीठ को देख- कर वह उलझ जाता था। अपराध बोध और भी गहरा हो जाता था। "चलिए, यह तो अच्छा ही हुआ कि आप लोग आ गये," अाखिर मोहन ने कहा, "मैं अब यहीं से लौट जाऊंगा।" "क्यों, बरखुरदार !" बुजुर्ग वोले । "इतनी दूर तक आ गये हो... हमारे साथ चलो । एकाध दिन रहकर लौट जाना।" मोहन ने शकुन की तरफ देखा । वह अब भी पीठ किये खड़ी थी। बोला, "चलता तो जरूर लेकिन वहां काम का हर्ज होगा'''उस्ताद जी की तबियत भी अच्छी नहीं है।" "हां, वह तो बहू ने बताया वुजुर्ग ने कहा। फिर निराशा-भरे स्वर में बोले, "अच्छा, फिर 'हमारी वस तो तैयार है, तुमने इतनी तकलीफ की। यहां तक पाये । घर चलते, तो हमें अच्छा ही लगता..." "फिर कभी सही"चलिए, मैं आपको बस तक छोड़ देता हूं..." वस प्रड्डे तक फिर कोई बात नहीं हुई । तब भी नहीं, जब वे लोग बस में सवार हुए। शकुन ने घुमकर मोहन की ओर देखा ही नहीं। निवको जरूर उसके पास आयी। वे लोग वस में चढ़ गये। मोहन नीचे ही खड़ा रहा । शकुन लगातार उसकी ओर से मुंह घुमाये रही। फिर वस स्टार्ट हुई। मोहन ने खिड़की की तरफ देखा । गकुन प्रव भी दूसरी ओर देख रही थी। बस चलने लगी, तो शकुन ने बाहर देखा~मोहन से उसकी नजर 112 लीड मिली । मोहन एक बार फिर कांप गया-उन निगाहों में शिकवे ही पिकावे । बस चली गई। उन पासों में भरे गिफवोंकामपं पौर उनकी संजीदगी मोहन मी ममम मै बहत दिन यादमाई। मोहन तौट गया था। फिर दिल्ली पहुंचा था, तो दो-तीन दिनों तक सो उस्ताद जो भी सेवा-रहल में ही निकल गये थे। फिर जिस दिन उस्ताद जी स्वम्प होकर गैराज में जाने सापक हुए थे, उगी नि एक सरजन उस्ताद जी से मिलने गैराज में पाये थे। उन्होंने उस्तादजी में भाछ यारा की थी और उस्ताद जी ने मोहन को प्राने यमरे में युना लिया था। "मापो येटा, मापो," उस्ताद जी ने उसे देगते ही महापा, "ठो" फिर यह उन राजन मे बोने पे, "यही है हमारा बेटा।" यह सज्जन उसकी पोर देगकर गिल उठे थे। उस्ताद जी ने परिचय कराया था, "यह मादीलात है "पवासा में गराज पनाते हैं। इन्हें एफ मोवाइस मफेनिक की जरूरत है। जाना पाहोगे?" “उस्तार जी, मैं..." मोहन सुरंत फोई फैसला नहीं पर पाया। 'चले जापो-बहुत अच्छी सनम्बाह देंगे-जिदगी यन जायेगी तुम्हारी..." "हो-हो, सोच मो-जबरदस्ती की कोई बात नहीं है-नाम तमः बता देना..." शादीसास ने पहा था। मोहन ने साफी सोपा था। गमन को मेकर यह रहीं पात भी था। उगे मगता था, वह उम्गाद जी को पिट्टी निगेगी पोर उममे उसके बारे में पता नहीं क्या कुछ यतायेगी । तर यह उस्ताद जी पो मग मुह दिगा- येगा? उसके भीतर का भगोडा एक बार फिर जाग उठा और उसने शाम होने से पहले ही पंवाला घले जाने पर फंगसा कर लिया। रात को उस्ताद जीने पर में जाकर रावर ती कि मोहना रहा है, तो सब लोग उदास हो गए । कृष्णा ने तो मोहन से बात ही नहीं की। चाची को पहले तो अच्छा नहीं लगा, फिर यह सोचकर उन्होंने मन को समझा लिया, आखिर मोहन कब तक उनके साथ रह सकता था? और फिर वह तरक्की करके जा रहा था। उनकी ममता ने उसे आशीर्वाद ही - दिया। दूसरे दिन वह चलने लगा था, तो कृष्णा सामने आयी थी। प्रांखों में आंसू भरकर बोली थी, "फिर कब प्रायोगे ?" मोहन का गला भी रुंध गया था। उससे कुछ कहते नहीं बना। उस्ताद जी ने ही कहा, "आता रहेगा''ऐसे कोई घर छूटता है !" .. कृष्णा की आंसू-भरी आंखें मोहन के कलेजे में गड़ी रह गई थीं। - एक बार फिर यायावरी जिंदगी शुरू हो गई थी। मोहन अपनी मोटर- साइकल पर सवार, अपना हैवरसंक पीछे जमाये सड़कों पर चक्कर काटता रहता और जहां कहीं कोई गाड़ी विगड़ी होती, उसकी मरम्मत करने लगता। रात हो जाती, तो किसी ढावे में सो रहता। वहीं खाना भी खा लेता। बीच-बीच में पैसा जमा कराने के लिए अंबाला लौटता। इस नई जिंदगी में एक नया रस था, जो मोहन को भा गया था। उस्ताद जी के पास लौटने, कभी उनसे मिलने जाने की बात मन में प्राती भी, तो वह उसे झटक देता। लेकिन एक बार वह अंबाला के गैराज में लोटकर पाया, तो वहां कृष्णा की चिट्ठी रखी हुई थी। उसने बड़े शिकायत-भरे स्वर में लिखा था कि उसे उन लोगों से ऐसी भी क्या नाराजगी है कि वह उनसे कभी मिलने ही नहीं पाया । क्या रिश्ते इसीलिए बनते हैं कि उन्हें इस तरह एक ही झटके से तोड़कर फेंक दिया जाये ? मोहन शमिदा हो गया था। उसने सोच लिया था, जो भी हो, वह एक बार दिल्ली जायेगा। अभी उसका सारा सामान भी तो वहीं पड़ा हुना था। एक दिन उसने अपनी मोटर-साइकल उठायी और उस्ताद जी से मिलने चल दिया। 114/नीड यह उम्नाद जी के गैराज में पहुंचा, सो वत्तियो जल पपो पौं। यार हाय-पर पो रहे पे-दिन-भरा बाम सरो पाये हए था। मेरिन मोहन को देखते ही सबके पहरे गिल उठे। "हंगे हो, भाई ?" एक ने रहा । "बहुत दिनों बाद प्राये !" दूसरे ने उसकी पोट पर हाय रगते हुए शिकायत की। "मय हमारी याद कहां पाती होगी!" तीसरे ने भी शिरवे-भरे लहजे में रहा। "नही, दोस्तो, ऐसी तो कोई बात नहीं है," पोन ने पहा । "तुम सयकी याद पाती है पोर पूब भाती है." "उस्ताद जी महाँ है ?" कैबिन में।" मोहन लेती दिन में पना गया । "परे, मोहन ! तुम कब मामे ?" उस्ताद जी का चेहरा गिज उटा। "पनी पाया हूँ. उस्ताद जी!" उसने उनसे पाच लिए। "पर गे होकर माये हो?" "नहीं । अभी तो नहीं गया।" "पर जामो, मई। पृणा तुमसे बहुत सफा है। पहले उसमे मिल सो।" "मुझे मालूम है-उसने मुझे चिट्टी लिपी पी।" "पाठा-पटा"चिट्ठी के नाम पर प्यान पाया। तुम्हारी कुछ चिट्टियो पाई थी। मैंने तुम्हारे पमरे में मेज पर रणदी है।" मूगा ।" उस्ताद जो मिनार मोहन पर जाने की मात सोप रहा पाकि पालक दम्नाद जो पूल बटे, "एक यात तो यताप्रो-गुमशान साप महोतर गए पे?" मोहन मा दिप पाका र उटा, " पोकामा?" उसने पूछा। "तुम्हारी उससे कोई बात हुई पो?" उन्होंने पूण। "उसने कुछ बनानापा मोहन ने सिर हिला दिया । "कैसी वात ?" "शकुन नहीं रही," उस्ताद जी ने ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा : "धर पहुंचते ही वह बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर को उसने पास नहीं फटकने दिया। दवा उठाकर फेंक दी. 'जाने उसे क्या हुमा--यह तो एक तरह की खुदकुशी ही हुई !" मोहन सन्न रह गया । उसका चेहरा फक् पड़ गया था। वह खामोश बैठा रहा । ढावे में बीती रात उसकी प्रोखों के सामने परछाईं बनकर नाचने लगी। वेचैन होकर वह उठ खड़ा हुआ । "धर जायोगे ?" उस्ताद जी ने ग्राह-सी भरते हुए पूछा। मोहन ने हां में सिर हिला दिया। लेकिन वह सीधा घर नहीं जा सका । दो-तीन घंटों तक अपनी मोटर- साइकल पर सड़कें नापता रहा । जव थक गया, तब घर पहुंचा । तव तक सब लोग खाना खाकर सोने की तैयारी कर रहे थे। उस्ताद जी ने पूछा, तो उसने झूठ बोल दिया कि वह दोस्तों से मिलने चला गया था और खाना भी वहीं खा पाया है। कृष्णा से उसने आधा घंटा वातें की, लेकिन उसके दिलो-दिमाग में अंघड़ चल रहा था, उससे उसे निजात नहीं मिली। सुबह तड़के ही वह वापस लौट गया। . 14 "गोगी की अच्छी कही ! उसकी भी सुन लो ! पिछली बार मैं पिंड गया, तो रात को भा गया। एकदम टल्ली ! आते ही गले से लिपट गया । कहण लग्गा भा जी, गाली दो ! मैं आख्या-नहीं, नोए,, सबके सामणे चंगा नहीं लगदा । बस, पर फड़के बैठ गया, पाखे भा जी, गाली दो, नहीं तो पैर नहीं छड्डूंगा ! वस, फड़ के ई बैठ गया। मैं तो तंग पा गया।-उड्ड पोए सूर दे पुत्तर ! मैं ग्राख्या-जा के छप्पड़ में मुंह धो! 116/नीड

वग, एकदम पम हो गया। बारी-मजा मा गया, भा जी!"
मर हंग दिये।
म. ट्राइवरों का यह अह सड़क में पाम बने दावे पर बैठापा।
गाम मन को पी। गूरज का यही पता नहीं पा, पयोकि यादन।
सवाहायों में पडे वाले पाय पिनाम थे।
"श्या हाँसी गेनता पा गोगी?" एक दायर पपनी बात मुनामा
पा। "गेंदतो उसरी स्टिक में निपसकर रह जाती थी। पग भारी
गोम तक जा पहुंचता था । धाम की बात में गोल ! मगर पोटिक्स ने
मार दिया। प्रब सारा दिन दारू पीना रहता है। पहला पा-गुरा दी
योह, मा जी, पय तो स्टिक उठाने का मन ही नहीं करता!"
निगीने भावान दी, "मैं पाग्या याक ! गरी टीर हो गई कि
नही ?"
!
ट्रक के नीचे मेटे मोहन ने जरा गा सिर बाहर निकाला और यहीं
मे बोला, "यग, पांच मिनट और..."
हाइपर फिर पपनी बातों में डूब गए।
"यंतासिंहा, सेरी गुरोकेरी हान है?"
"रट न पुष्ट, यार भभी तक नपा रही है...गिर नहा कोठे
पर पा जाती है- फटकारने लगती है तो ऐसे लगता है जग मीने
पर इंटर पर रहे हो."कलेजे से सरट रटने लगती है..."
"हाय ! हाय
गोरी न्हाएर पो निस्सी,
से मुम्फ दी माट बरगी!"
गरे मारतो टप्पों का मुरायमा-सा ही गुरू हो गया।
"जहा पर में गुरुदा नाम के
गाह्मनी गमागमानी !"
पौर गोपही किटषो पा मोर पूरी तरह प्रामीसता की तरफ
मुर जाता, मोहन दृका रे नी में निगमरमा गया। परना पर
यो पर समाए बोगा-"मो वाताहो, गहरी पार है !"
"मी पोबस्ने !"हादरी ने रापौर मोहन पाना

लेकर चलता बना। ड्राइवरों की खुली-खुली बातों का असर था या मौसम का-मोहन अपनी मोटर साइकल को ढावे में ही छोड़कर सड़क के नीचे उतर गया। दूर तक, जहां तक नजर जाती थी, सेवों के वाग थे। वह उन्हींमें धंसता चला गया। शायद तीन-चार मिनट चलते हुए होंगे कि अचानक कोई चीज उसकी पीठ से टकरायी। शायद कोई सेव प्राकर गिरा था। लेकिन जब उसने नीचे देखा, तो जो सेव उसे नजर माया, वह प्राधा खाया हुआ था । उसे हल्का-सा विस्मय हुआ । उसने ऊपर देखा, फिर आसपास के पेड़ों की भोर देखा। उसकी नजर इधर-उधर भटक रही थी कि एफ खनखनाती हंसी उसके कानों से टकरा गई। वह चौंक गया । फिर एक पेड़ पर उसे वह नजर आ गई। मोहन उसे हैरत से देखता ही रह गया । इस जंगल में, वस्ती से इतनी दूर, एक अकेली, जवान खूबसूरत लड़की ! वह भी पेड़ पर ! कैसे चढ़ी होगी? वह सोच ही रहा था कि यह तेजी से बोली, "ऐसे पूर-पूरकर क्या देख रहे हो ! कभी कोई लड़की नहीं देखी क्या ?.."चलो, मुझे नीचे उतारो।" मोहन उस पेड़ के निकट चला गया, चुपचाप उसने उसे नीचे उतार दिया। नीचे आते ही वह खिलखिलाकर हंसी-"पूछोगे नहीं, मैं उपर कोसे पहुंची!" मोहन जानता था, उन पेड़ों पर चढ़ना श्रासान नहीं था। फिर भी, अपनी उत्सुकता दबाते हुए बोला, "न' 'पता नहीं क्या सुनना पड़े !" यह चलने फो हुआ, तो वह 'च-च-च' फरने लगी। मोहन ने पलटकर उसकी भोर देखा, तो वह बोली, "मैं देखते ही समझ गई थी..." "पया समझ गई थीं?" "बहुत प्रयोले हो..." 118/नीड़

"परेमी तो तुम भी हो." पता नहीं गया सात पीरिमोहन रे
परम सरे रह गए थे।
"
कंग पात हम दोनों में मेशोई भी प्रोसा नहीं है।"
"तुम्हारे मापी कहा है ?"
"क्यों?"
"कोई तो साप होगा?"
"मपीहूं जवान हूं-गलिए?" उसकी प्रनि पमकी, "पही
सो कष्ट है, प्राणनाम! "र""मेरे सापी है कुछ..."
भी एक पापान पारों तरफ गूज उटी-"र-ज-नी!"
महली ने फौरन मोहन का हाप सीप लिया। पास ही एप गदा
पा। दोनों उसमें मुइफ गए।
मोहन ने हैरानी गे उगरोदेगा। यह फमकुमार योसी, "ये मोग
मा पहुंचे है.. पुप यठे रहो।"
ये पांप सांग पं । तीन युवक, दो पुतिया। दो-तीन बार उन्होंने
किर पायान दी। कोई जयाय नहीं मिसा, तो एक गहरी चोमी. "पता
नही रही मर गई!"
"मरे, घोडी भी ने की जरूरत हो गया है ? पाना होगा, तो
परने-पार मा जायेगी..."
पौर यसोग जग माये थे, यंगे ही लौट गए।
रजनी उठ गरी । मोहन भी अपने का मारना हुमा उठा।
"गारी, मामलान !"वह बोली। "पसो!"
"हाय में तुम्हारी मोटर साइप तो पहीं है न!"
मोहन को समा, जगे यह सही बोई सामूग है।
"रने देगी दी, सार!.."प्रय पमो..."
पे दो-गीन मिनट ही पने होंगे किचानक जोर गे जिसीरी
पौर एकत्र बारिश होने सगो। रमनी ने मोहन को एकपटक
नोपनीष सिया।

कुछ ही मिनट में वे पूरी तरह भीग चुके थे। - बारिश रुकी, तो मोहन चलने को हुया । रजनी ने उसकी बांह पकड़ ली। "अरे-अरे ! मुझे बस-स्टॉप तक नहीं छोड़ोगे ! मैं अकेले कैसे जाऊंगी ?" "जैसे पाई थीं !" मोहन ने जवाब दिया । "या तो गई थी--अब डर लग रहा है..." मोहन ने उसकी आंखों में झांका । उसे लगा, वह झूठ नहीं बोल रही "चलो..." मोहन ने कहा। "उघर से नहीं. इधर से..." रजनी ने दूसरी दिशा में इशारा किया। "इधर से शॉर्टकट होना चाहिए..." मोहन उसके साथ चल दिया। .. लेकिन वह शॉर्टकट नहीं, वेहद लंवा घुमावदार रास्ता सावित हुमा। जब तक वे बस-स्टॉप पर पहुंचे, तब तक अाखिरी वस भी जा चुकी थी। "यह तो बुरा हुआ..." रजनी ने कहा । "अब रात यहीं गुजारनी पड़ेगी. मैं भीग भी गई हूं मोहन रजनी का खेल कुछ-कुछ समझता जा रहा था । उसकी आंखों में उतरते रंगों को भी देख रहा था। "चलो, कुछ खा लिया जाये," रजनी वोली । “भूखे पेट तो नींद भी नहीं पायेगी।" व दोनों ढावे की ओर चल दिए । अभी प्राधा रास्ता ही पार कर पाए थे कि सामने से रजनी के साथी पाते नजर अाए । अव उनसे वचा नहीं जा सकता था। "तुम कुछ मत बोलना, प्राणलाल !" रजनी ने मोहन से कहा। वे लोग पास पाए, तो एक लड़का बोला, "कहां चली गई थीं, रजनी हम तुझे जाने कहां-कहां ढूंढ पाए !" "अरे यार ! यह अपना प्राणलाल है न, यही मिल गया था," रजनी ने कहा। "बी० ए० साथ पढ़ता था। आजकल जलंधर टेलीफोन में ... 120 / नीड़

है-बम, मोमेनिनकोबार होने मी...
"ग तो निमन गई," एक लसीयोमी। "पर गुबह ही या
पायेंगे..."
"टीर... पोदा-गा नाता-मानी कर पाती हूं. तुम सोग
समो..." रजनी ने पहा ।
ये मांग कंधे उगकाते, मह विषम पग गए।
मुट फासला हो गया, मो मोहन बानों में एक पीपी पापार
परी, ..."कोई फायदा नहीं है."
""रानको यह नहीं सौटेगी..."
दाय में दोनों ने यंटकर गरम-गरम पकौ पाए पोर पाप पो। पकोड़ों
में रानी मिमं पी किमयान जल रही पी, कानों से पो निरम रहा पा
और पानी सपा नाफगे पानी पहने सगा था। फिर भी रजनी गाती
रही. और पाती रही, "तुम भी पापो, प्रापतात ! परमाते पनी
हो?"
या पपने फेवार यह वोमी, "पसो..."
"महो ?" मोहन ने पूछा।
"जहा तुम्हारी मोटर मापन पड़ी है-तुम्हारा कमरा भी तो
यही होगा..."
मोहन का समरा उसी साये में था, नहीं ये गये। मिना पूण मोरे
मोहन पदर की पोर पूम गया, रजनी पोई-पौधे पहने लगी।
मोहन ने कमरा गोमा, तो यह मन्दर पती गई, एक उपटती-गी
नगर उगने पारों सरफरामी पौर बोसी,"मरा तो पाया है"पण्ठा,
तुम राम बापो में पड़े बदाम सू..."
"मैं याहर पसा जाता हूँ..." उमने परमर गाट पर गए
पगा। वाह सोपता ही रह परा कि उसका यहाँ, जिन्हें यह पर
गने वाली पी..."
पार निमार उसने दरवाजा बर पर दिया। पहले तो यह
दोही गा रहा, पिर पर-उपर देने समाएर, जाने पसी,
सिगरेट पीनेपा उसका मन हो पाया।

। वाहर आकर उसने एक फिल्टर सिगरेट ले ली। सुलगाकर दो-तीन कश लिए। कुछ अच्छा नहीं लगा । उसने सिगरेट को वहीं फेंक दिया। फिर वह कमरे की ओर लौट गया । रजनी की आवाज बन्द दरवाजे के पीछे से आ रही थी..."या जामो, प्राणलाल ! ..." मोहन ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला---और सन्न रह गया। रजनी सामने खड़ी थी। उसके सुडोल बदन पर सिर्फ एक कमीज थी -वह भी मोहन की। मोहन के पूरे शरीर में सनसनाहट की लहर दौड़ गई। उसने दरवाजे पर अटके अपने हाथ को नीचे खींचा, आगे बढ़ा और दरवाजा बन्द कर लिया। ढावे के किसी दूसरे कमरे में किसीने अपना ट्रांजिस्टर खोल दिया था और मुलतानी तोड़ी के स्वर फिजा में फैल गए । मोहन के लिए यह बिल्कुल नया, अनोखा अनुभव था। मांसलता की गंध उसे पहली बार इतने निकट से प्राप्त हुई थी-एक अदभुत कमा जिसने उसके वरसों के तनाव को पिघलाकर रख दिया था। खामोश था, फिर भी जाने कितनी आवाजें थीं, जो उसके कानों में गूंज गई थीं... सब कुछ आधी रात तक वे जागते रहे। उन कुछ घंटों में मोहन को यही लगता रहा कि वह खुली अांखों कोई सपना देखता रहा है। रजनी अब भी उसके पास लेटी हुई थी। एकाएक वह धीरे से हंस दी और बोली, "लगता है, आज तक सिर्फ बांसुरी ही बजाते रहे हो। चयों!.''जरा बजानो तो, मैं भी सुनें..." मोहन ने अलगोजा उठा लिया । एक उदास-सी धुन उसने छेड़ दी। अचानक कांता की तस्वीर उसकी प्रांखों के सामने नाचने लगी...फिर शकुन का पूरा बदन लहराने लगा । उसके हाथ रुक गए । रजनी ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया था। वोली, "रुक क्यों गए ?" 122/ नीड़ मोहन नहीं योगा। रिपोरीपाद पाई?" यह प्रम भी नहीं बोमा। "पाना प्यार पा! पनी सद?" "हा-ौर मेरे पिता ने उगे मुममकर रणदिपा।" रजनी उसके पोर पाम मरा. पाई। "बागुरी तो प्राणी बनाने हो, प्राणमाम!" "ह गोमुरी नहीं है, ..." "तो?" "प्रमगोगा यह पोले कभी नहीं बता!..." "मोह"तो यह भी हमारी-मुम्हारी तरह है।" रजनी ने उसे अपनी राहो में ममेट मिया। गुरद उमीना गुणी, तो कमरे में यह प्रोमा पा ! रजनी पाई गंगेत भी यही नहीं पा । मोहन गोगने मगा-रान उगने सपमुम कोई गपना तो नहीं देना था? मैपिन नहीं, यह गाना नहीं पा । उगरे पागवाग रजनी बी महसपर भी मोगरपी। सपी वहामीम, जिमने उग गार गनेस बीज बोया पा. उगरे परक पर परी पी-गारपुम पीताह । उगने पर पहने पोरस भटके में बाहर नियम गया। रजनी पभी ग्वादार नहीं गई पी। दाये मेगर पपाग मीटर पागे ही पह मूटोग उटाए पानी नगर पा रही थी। मोहन उगोपी भागा। फिर भागना पर यह तेर-सेर पमने मगा पौर सगों में ही रजनी के पास पाप गया। "गुनिए," उगने पीये गे पावार दी। मोहन पाद रगए। उगने मोहन बोपोर देगा। मोरन में उपरोपागों में मारा। पहजर होगमा । उन पानी में पापानापोई माप नहीं पा-ए परनील दी, पटोरना पीछाव पारिग- एक या भाव पदन गरा। मोहन राए बार देगर . । बाहर आकर उसने एक फिल्टर सिगरेट ले ली। सुलगाकर दो-तीन कश लिए। कुछ अच्छा नहीं लगा । उसने सिगरेट को वहीं फेंक दिया। फिर वह कमरे की ओर लौट गया । रजनी की आवाज वन्द दरवाजे के पीछे से आ रही थी..-"या जाम्रो, प्राणलाल! ..." मोहन ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला-और सन्न रह गया। रजनी सामने खड़ी थी। उसके सुडोल बदन पर सिर्फ एक कमीज थी-वह भी मोहन की। मोहन के पूरे शरीर में सनसनाहट की लहर दौड़ गई। उसने दरवाजे पर अटके अपने हाथ को नीचे खींचा, आगे बढ़ा और दरवाजा बन्द कर लिया। दावे के किसी दूसरे कमरे में किसीने अपना ट्रांजिस्टर खोल दिया था और मुलतानी तोड़ी के स्वर फिजा में फैल गए। मोहन के लिए यह बिल्कुल नया, अनोखा अनुभव था। मांसलता की गंध उसे पहली बार इतने निकट से प्राप्त हुई थी - एक अदमुत ऊष्मा जिसने उसके बरसों के तनाव को पिघलाकर रख दिया था। सब कुछ खामोश था, फिर भी जाने कितनी आवाजें थीं, जो उसके कानों में गूंज गई थीं... . आधी रात तक वे जागते रहे । उन कुछ घंटों में मोहन को यही लगता रहा कि वह खुली प्रांखों कोई सपना देखता रहा है । रजनी अब भी उसके पास लेटी हुई थी। एकाएक वह धीरे से हंस दी और बोली, "लगता है, आज तक सिर्फ बांसुरी ही बजाते रहे हो चयों ! .. जरा वजामो तो, मैं भी सुन मोहन ने अलगोजा उठा लिया । एक उदास-सी धुन उसने छेड़ दी। अचानक कांता की तस्वीर उसकी आंखों के सामने नाचने लगी...फिर शकुन का पूरा बदन लहराने लगा। उसके हाथ रुक गए। रजनी ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया था। वोली, "रुक क्यों गए 122/ नीड़

.
मोहन कुछ नहीं बोला।
"किसीकीयाद मा गई?"
वह अब भी कुछ नहीं बोला।
"वचपन का प्यार था! पप्पी लव ?"
"हां-ौर मेरे पिता ने उमे कुचलकर रख दिया।"
रजनी उसके और पास सरक याई । "वांमुरी तो मच्छी बजाते
हो, प्राणलाल!"
"यह वांमुरी नहीं है..."
"तो?"
"अलगोजा है-यह मकेले कभी नहीं बजता!..."
"ग्रोह"तो यह भी हमारी-तुम्हारी तरह है !"
रजनी ने उमे अपनी बांहों में समेट लिया।
मुबह उमकी नींद खुली, कमरे में वह अकेला था। रजनी का कोई
मंकेत भी वहां नहीं था। मोहन सोचने जमा-राठ उसने सचमुच
कोई सपना तो नहीं देखा था? लेकिन नहीं, वह सपना नहीं था। उसके
आसपास रजनी की महक अब भी मौजूद थी।
उसकी वह कमोज, जिसने उस सारे मपने का वीब वोया या, उसके
हैदरसैक पर पड़ी थी-सांप की केंचुल की तरह । उमने कपड़े पहने
और एक झटके से बाहर निकल गया।
रजनी अभी ज्यादा दूर नहीं गई यो। दावे में करीब पचास मीटर
आगे ही वह मूटवेम उठाए चलती नजर पा रही थी
मोहन उसके पोहे भागा। फिर भागना छोड वह तेज-तेज चलने
लगा और क्षणों में ही रजनी के पास पहुंच गया।
"सुनिए," उसने पीछे मे प्रावाज दी।
मोहन के पांव रक गए। उसने मोहन की ओर देखा। मोहन ने
उसको प्रांखों में मांका। वह जड़ हो गया । उन पाखो में पहचान का कोई
भाव नहीं था-एक अजनवीयत थी, कठोरता घी, दूरत्व था । फिर एका-
एक वह भाव बदल गया। मोहन के झुके हुए चेहरे की ओर देखते हुए

पानी तुम्हारा ..। वह मुसकरा दी और बोली, "गलतफहमी हो गई न?" "गलतफहमी !" "वहते हुए पानी के चुल्लू में आ जाने पर तुमने समझा, हो गया ! नहीं, प्राणलाल! बहता पानी किसीका नहीं होता...' "मैं समझा नहीं...". "अच्छा ही है और देखो, किसीसे जिक्र मत कर बैठना, लोग यकीन नहीं करेंगे यकीन कर भी लिया, तो गलत समझ बैठेंगेमुम- किन हो, तो कभी याद भी मत करना, हालांकि मैं जानती हूं, तुम भूल नहीं पानोगे-पहले प्यार की तरह..." मोहन को जैसे जबरदस्त झटका लगा। "देखो, मैं जानती हूं तुम्हारा नाम प्राणलाल नहीं है---तुम्हारे हैवरसैक पर छपे एम० एल० अक्षरों से प्राणलाल तो नहीं ही बनता" और मुझे बहुत अच्छा लगा कि तुमने मेरा नाम नहीं पूछा--एक और झूठ से बचा लिया तुमने मुझे "रजनी मेरा नाम नहीं है-यह नाम सिर्फ इस ट्रिप के लिए मैंने अपना लिया है..." मोहन चुपचाप सुनता रहा। तुम मेरा नाम पूछते, तो मुझे झूठ बोलना पड़ता': 'लेकिन नाम से फर्क भी क्या पड़ जाता ? अगर मैं कह देती कि मेरा नाम मोहिनी है, या श्यामा है या कांता है तो क्या फर्क पड़ जाता?..." मोहन का गला सुखने लगा था। "..'या मैं यह कह देती कि मेरा नाम नदी है, या बादल है, या हवा है.----तो क्या फर्क पड़ जाता ?" मोहन ने नजर घुमा ली। "न"ऐसे नजर मत चुरायो । इस सच्चाई से मुंह मत मोड़ो। जो घड़ी बीत गई, वह एक सच्चाई थी."नाम एक ढोंग होता और इस घड़ी के बारे में सोचना भी एक ढोंग ही होगा..." वह चलने लगी थी । मोहन मंत्रविद्ध-सा उसके साथ-साथ चल रह . था। "हर चीज की एक वजह होती है..." उसने उलझती हुई आवा 124 / नीड़ कहा। में "होती है, उन लोगो के लिए जो जीने के लिए वहाना ढूंढ़ते फिरते हैं. पर मैंने तो जिंदगी को ही बहाना बना लिया है." मोहन खामोशी से साथ-साथ चलता रहा । "मेरे व्यवहार से हैरान न हो!" वह सिर झटककर हंस दी। "सब होते हैं । मैं हूं ही ऐसी..." मोहन ने अजीव-सी नजरों से उसकी और देखा, तो वह बोली, "न ऐसे मत देखो "फिर गलत समझ जानोगे मैं वैसी भी नहीं हूँ जैसी तुम समझ रहे हो"मेरा घर है, पति है, नौकरी है "लेकिन कही कुछ नही है ""पिता कैसर से मर गए, भाई ने खुदकुशी कर ली, मा पागल हो गई. पति न होने के बराबर "मुझे खुद पता नहीं, मैं अब तक पागल क्यों नही हो गई "शायद मेरी भटकन ही मुझे जिंदा रखे हुए है-जब भी थक जाती हूँ, तो भटकने लगती हूं भटकन से थक जाती हूं तो लौट जाती हूं....."इन सिलसिलो का कोई मोर-छोर नहीं है."तुम मेरी भटकन के एक पडाव जरूर हो सकते हो, खुद मजिल नही हो सकते..." मोहन खामोशी से सुनता रहा । फिर बस-स्टॉप तक उनके बीच कोई बात नहीं हुई। वस इन्तजार कर रही थी। रजनी ने टिकट खरीदा और चुपचाप जाकर बस मे बैठ गई । मोहन ने भी यह देखने की कोशिश नहीं की कि वह बस कहा जाने वाली थी। उसने खिडकी की पोर नजर उठाकर भी नहीं देखा, न ही उसने वस के जाने का इन्तजार किया, वह उन्ही कदमों ढावे की पोर लोट पड़ा। 15 दिन""सप्ताह"महीने "लगातार वही चक्र"मड़कें, गाडियां, ढावे ""यह शहर, वह कस्वा, यह गाव"मोहन को यह जिंदगी रास आई थी। - उसका असर उसकी सेहत पर भी पड़ा था, इसीलिए इस बार उस्ताद जी ने उसे देखते ही कहा था, "सेहत तो तुम्हारी काफी अच्छी हो गई है, लगता है, खानावदोशी तुम्हें रास आ गई है."काम कैसा लग रहा है ?" "काम तो ठीक है, उस्ताद जी' 'पर आप लोगों की याद बहुत आती है..." मोहन ने कहा तो उस्ताद जी को कहीं अच्छा लगा~यानी मोहन इतना दुनियादार नहीं है कि आगे बढ़े और पीछे वालों को भूल गए! "धर गए थे ? ' उस्ताद जी ने पूछा। "नहीं तो क्यों आपने मनीऑर्डर तो भिजवा दिए थे न ?..." उस्ताद जी के चेहरे पर संजीदगी उतर पाई। उन्होंने उसकी बात का जवाब देने के बजाय दूसरा सवाल किया-"तुम मां की चिट्टियां पढ़ते भी हो या नहीं ?" मोहन का मन आशंकाओं से घिर गया, "क्या बात है, उस्ताद जी?" "एक चिट्ठी तुम्हारी मां को मेरे पास आई है," उस्ताद जी 'वोले, फिर वह सीधे उसकी आंखों में देखते हुए बोले, "हरामजादे! तेरे पिता गुजर गए हैं।" मोहन सन्न रह गया। "..'और इस बात को भी कई महीने हो चुके हैं."तुम कई महीनों से इधर पाए ही नहीं. पिछली चिट्ठियों में मां ने खवर दी होगी कम से कम पढ़ तो ली होती..." मोहन भरभराकर कुर्सी में ढह गया। "अब बहुत दुःखी होकर मां ने मुझे लिखा है--पितर पक्ष के श्राद्ध पा रहे हैं. 'तेरे बाऊजी का श्राद्ध होना है..." मोहन जड़वत् सुन रहा था । ''तुझे बुलाया है । लिखा है अगर तुम अब भी नहीं आते, तो फिर कभी पाने की जरूरत नहीं है..." उस्ताद जी ने अपनी जेब से तह की हुई एक चिट्ठी निकालकर 126/नीड़ उसकी ओर बढा दी। चिट्ठी लेते समय, उमे खोलते समय, मोहन के हाथ कांपने लगे। पढते समय पूरी इबारत भी कांपती-मी लग रही थी। चिट्ठी पढ लेने के बाद उसे अपना-पाप पूरी तरह निचुडा हुप्रा लगने लगा। बाऊजी की मृत्यु की मूचना उस चिट्ठी में जरूर थी, पर उसमे यह नहीं पता चलता था कि यह घटना कब घटी। मा ने उस्ताद जी को यही लिखा था कि मोहन तो चिठ्ठियों के जवाव ही नहीं देता। पता नहीं, वह चिट्ठियो को पढता भी है या नहीं। पिता के दाह-संस्कार और चौथे-तेरहवें के दिन तो वह नहीं पहुंच सका, पर अब वह जरूर चला माये । अव भी नहीं पाता तो फिर कभी पाने की जरूरत नहीं । वेटे सोच सकते हैं कि मां-बाप उनके लिए मर चुके, पर मा तो ऐसा नही सोच सकती."ठीक है. वह जहां भी है, जैसा भी है, सुखी रहे."अब पितृपक्ष के श्राद्ध पा रहे हैं.."वह पा सके, तो ठीक है.."रहा तो नहीं जाता. पर अकेले रहना ही पड़ा, तो किसी तरह जिन्दगी के दिन पूरे कर ही लूगी।" मामू मोहन की प्रांसो मे नही थे. पर उसको व्यथा उसके पूरे चेहरे पर उतर पायी थी। उस्ताद जो विचलित हो उठे थे। उनका सात्वना-भरा हाय मोहन की पीठ पर भा ठहरा था । पर मोहन को जैसे अपने प्रासपास की कोई खबर ही नहीं रह गयी थी। "जानोगे ?" उस्ताद जी अस्थिर स्वर में कह उठे। "तुम्हे जाना ही चाहिए।" मोहन का शरीर घबराया हुआ था । उमे कोई खबर नहीं थी कि उसने सिर हिलाकर हां या ना में कोई उत्तर भी दिया था या नहीं। "अभी घर जामो।" उस्ताद जी ने कहा था। "रात को बात करेंगे..." उसी घबराई हुई हालत में मोहन उस्ताद जी के कमरे से निकल माया और किसी तरह मोटर साइकल पर सवार हो गया ।

सभी लोग हैरान थे कि मोहन को एकाएक क्या हो गया था। - शाम के साये ढल रहे थे और आसमान में धूल छा रही थी। परिंदे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। पर हवा इतनी तेज थी कि उनके पंख नाकाम हुए जा रहे थे, सीधे उड़ने में उन्हें बड़ी कठिनाई हो रही थी- पंख लिफलिफ जाते थे। धीरे-धीरे सूरज डूबता जा रहा था और आसमान में छायी धूल का रंग खूनी होता जा रहा था। मोहन था कि घर जाने का उसका मन ही नहीं हो रहा था । मोटर साइकल पर वह गैराज से तो निकल पाया था, लेकिन उसके बाद उसे कहां जाना है, किधर का रुख करना है, उसे समझ ही नहीं पा रहा था। जमुना के साथ-साथ जाती सड़क पर वह मोटर साइकल दौड़ाये लिए जा रहा था. फिर लाल किले के पास से होता हुआ वह काफी दूर तक- निकल गया और जब भीड़-भाड़ वाला इलाका फिर पास आता दिखाई दिया, तो उसने मोटर साइकल मोड़ ली। एक बार फिर वह मोटर साइकल को जमुना की ओर दौड़ाता चला गया। एक वार मन हुग्रा, वह पुल के पार चला जाए, पर उधर ट्रकों, वसों, गाड़ियों, ठेलों का इतना लम्बा तांता लगा हुआ था कि उसे लगा, उस भीड़ को वह पार नहीं कर पायेगा---और यह भी कि उस अजीव-सी भीड़ में वह एकदम गुम हो जायेगा । उसने मोटर साइकल को नावों के पुल की ओर मोड़ दिया। पुल नदी के बीचोंबीच था। उससे पहले काफी लम्बी कच्ची सड़क थी, जिसपर लोहे की चादरें पड़ी हुई थीं। मोहन अपनी मोटर साइकल को उनपर दौड़ाता ले गया। फिर जव पुल पास अाता दिखाई दिया तो उसका मन बदल गया। उसने मोटर साइकल को सड़क से अलग कर लिया और रेती पर उसे दौड़ाने लगा। जी में पा रहा था, वह रेती को पार करता हुआ, सीधा सामने की जल-धारा में उतर जाये, लेकिन बीसेक फुट चलने के बाद ही मोटर साइकल के पहिये रेत में धंस गए। उसने मोटर साइकल को वहीं रेत पर लिटा दिया और खुद नदी की धारा और बड़े पुराने पुल की तरफ मुंह करके बैठ गया। पुल पर 128 / नीड़ - - से उठता गाड़ियों, घोडों और इनसानों का मिला-जुला दोर यहां तक बहुत महीन होकर पा रहा था । नावों के पुल की खड़खडाहट भी बहुत छनकर पा रही थी."रेत और पानी में कोई आवाज नहीं थी। उस्ताद जी के घर में उसने कितना लम्बा वक्त बिताया था! कितना प्यार मिला था उसे वहां ! फिर भी जाने को उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी... पर जाना तो होगा ही। जमुना की रेती पर वह कब तक यूं ही बैठा रहेगा? मासमान को खूनी लाली प्रब गहरे अंधेरे में तब्दील हो गई थी। दूर पत्तियां जल उठी थी। चार-छह बूदें भी प्रासमान मे टपक गई और दिन-भर को गर्मी सुकून भरी ठंडक में बदल गई। जाने कहां से मच्छरों का एक झुंड उड़ता हुमा प्राया और मोहन के सिर पर मंडराने लगा। मोहन को उनका संगीत बड़ा प्रोछा लगा और वह उठ खड़ा हुमा । उसने अपनी पंट को भाड़ा। मोटर साइकल को उठाकर खड़ा किया और उसे ठेलते हुए सड़क तक ले पाया। सहक पर पहुंचकर वह मोटर साइकल पर सवार हुप्रा, मौर उसे स्टार्ट करके भगाता हुमा मुख्य सड़क पर पा गया। जमुना के साथ-साथ चलती सड़क पर से गुजरते हुए उसे पिता का चेहरा उसका पीछा कर रहा है-रोबीली काली-पोली मूछे, पतले होंठ, नोकीली ठोडी, गोरा रंग, कानों में मुरकिया और सिर पर पगडी ."उस चेहरे मे दूर भागने के लिए उसने मोटर साइकल की रफ्तार बढा दी-पर पिता का चेहरा उतनी ही तेजी से उसका पीछा करने लगा। सामने एक चौराहा प्राया, तो लाल सिग्नल देखकर उमे एकाएक रोक लगा देने पड़े। मोटर साइकल उछलकर रुक गई.."फि तभी उसके कानों से पिता की मावाज टकराई-"संभल के बेटे ! ...इनसान गलती न करे, तो समझो-नो प्रॉब्लम।..." प्रात्मग्लानि पोर खीज से मोहन ने अपना सिर झटक दिया । सामने की लाल बत्ती जसे बरसों मे लाल ही चली पा रही थी ! ... लगा, सभी लोग हैरान थे कि मोहन को एकाएक क्या हो गया था। am- शाम के साये ढल रहे थे और पासमान में धूल छा रही थी। परिदे अपने घोंसलों की पोर लौट रहे थे। पर हवा इतनी तेज थी कि उनके पंख नाकाम हुए जा रहे थे, सीधे उड़ने में उन्हें बड़ी कठिनाई हो रही थी- पंख लिफलिफ जाते थे। धीरे-धीरे सूरज डूबता जा रहा था और पासमान में छायी धूल का रंग खूनी होता जा रहा था। मोहन था कि घर जाने का उसफा मन ही नहीं हो रहा था । मोटर साइफल पर वह गैराज से तो निकल पाया था, लेकिन उसके बाद उसे कहां जाना है, किधर का रुख करना है, उसे समझ ही नहीं पा रहा था। जमुना के साथ-साथ जाती सड़क पर वह मोटर साइकल दौड़ाये लिए जा रहा था फिर लाल किले के पास से होता हुआ वह काफी दूर तक निकल गया. 'पोर जव भीड़-भाड़ वाला इलाका फिर पास पाता दिखाई दिया, तो उसने मोटर साइकल मोड़ ली। एक बार फिर वह मोटर साइकल को जमुना की ओर दौड़ाता चला गया। एक बार मन हुआ, वह पुल के पार चला जाए, पर उधर ट्रकों, बसों, गाड़ियों, ठेलों का इतना लम्वा तांता लगा हुआ था कि उसे लगा, उस भीड़ को वह पार नहीं कर पायेगा-और यह भी कि उस अजीब-सी भीड़ में वह एकदम गुम हो जायेगा । उसने मोटर साइकल को नावों के पुल की ओर मोड़ दिया। पुल नदी के बीचोंबीच था। उससे पहले काफी लम्बी कच्ची सड़क थी, जिसपर लोहे की चादरें पड़ी हुई थीं । मोहन अपनी मोटर साइकल फो उनपर दौड़ाता ले गया। फिर जब पुल पास पाता दिखाई दिया तो उसका मन बदल गया। उसने मोटर साइकल को सड़क से अलग कर लिया और रेती पर उसे दौड़ाने लगा। जी में पा रहा था, वह रेती फो पार करता हुग्रा, सीधा सामने की जल-धारा में उतर जाये, लेकिन बीसेक फुट चलने के बाद ही मोटर साइकल के पहिये रेत में धंस गए। उसने मोटर साइकल को वहीं रेत पर लिटा दिया और खुद नदी की धारा और बड़े पुराने पुल की तरफ मुंह करके बैठ गया । पुल पर 128/नीड़ से उठता गाडियों, घोडों और इनसानो का मिला-जुला शोर यहा तक बहुत महीन होकर पा रहा था । नावों के पुल की खडखडाहट भी बहुत छनकर पा रही थी "रेत और पानी में कोई प्रावाज नही थी। 1 उस्ताद जी के घर मे उसने कितना लम्बा वक्त बिताया था। कितना प्यार मिला था उसे वहां! फिर भी जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी... पर जाना तो होगा ही। जमुना की रेती पर वह कब तक यूं ही बैठा रहेगा? पासमान को खूनी लाली अब गहरे अंधेरे मे तब्दील हो गई थी। दूर पत्तियां जल उठी थी। चार-छह बूदें भी प्रासमान मे टपक गई और दिन भर की गर्मी सुकून भरी ठंडक में बदल गई। जाने कहां से मच्छरो का एक मुड उड़ता हुआ पाया और मोहन के सिर पर मडराने लगा । मोहन को उनका मंगीत बड़ा पोछा लगा भोर वह उठ खड़ा हुप्रा । उसने अपनी पेट को माड़ा। मोटर साइन को उठाकर खड़ा किया और उसे ठेलते हुए सड़क तक ले प्राया । सड़क पर पहुंचकर वह मोटर साइकल पर सवार हुमा, प्रौर मे स्टार्ट करके भगाता हुमा मुख्य सड़क पर ग्रा गया। जमुना के साथ-साथ चलती सड़क पर से गुजरते हुए उने सपा, पिना का चेहरा उसका पीछा कर रहा है-रोबीली काली-घौली मदर होंठ, नोकोली ठोडी, गोरा रंग, कानों में मुरकियां और मिर पर पड़ी "उस चेहरे से दूर भागने के लिए उमने मोटर मादरन की दर बढा दी-पर पिता का चेहरा रतनी ही तेजी में उसका पीछा कन्द लगा। सामने एक चौराहा प्राया, तो लाल मिग्नल देदार ग्रेक लगा देने पड़े। मोटर साइकल उछलकर कई-टमा कानों से पिता को मादा टकराई-"मल द"मरन न करे, तो ममो-नो प्रॉब्लमा..." माना ने अपना निरन्टक दिया। सामने को नान दनों में दरों में नाव ही वन:- वह घर पहुंचा, तो उस्ताद जी उसका इन्तजार कर रहे थे । "कहां चले गए थे?" उन्होंने पूछा। "यूं ही.''जमुना की तरफ निकल गया था..." कहते हुए मोहन अपने कमरे में चला गया । मोटर साइकल उसने प्रांगन में खड़ी कर दी थी। कमरे में घुसते ही मोहन अजीब-से एहसास से घिर गया। सारा सामान उसका अपना था, पर ऐसा लग रहा था, जैसे वह और किसीके कमरे में छा गया है। वह जाकर चारपाई पर बैठ गया। पर इससे पहले कि अजनबियत और उसके घेरे उसे कस लेते, उस्ताद जी की पत्नी चली आयीं। पीछे- पीछे कृष्णा भी। मोहन कुछ नहीं बोला । सिर्फ उसने हाथ जोड़ दिए । उस्ताद जी की पत्नी ने प्रागे बढ़ कर उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। फिर भरे हुए स्वर में बोली, "आना-जाना तो दुनिया में लगा ही रहता है, बेटे. 'चल उठ, मुंह-हाथ धो ले और खाना खा ले..." मोहन को ऐसा लगा जैसे उसने बहुत दिनों के बाद कोई प्रावाज सुनी है-इनसानी आवाज'''और दूसरे ही क्षण उसकी अांखें नम हो पाई। "चलो, भैया," कृष्ण ने कहा, "बहुत दिनों के बाद पाए हो 'साथ बैठकर खायेंगे।" कृष्णा ने उसका हाथ पकड़कर उसे उठा लिया---और वह चुपचा' उसके साथ चल दिया। कृष्णा गुसलखाने के दरवाजे तक उसके साथ गई। वह भीतर गा और हाथ-मुंह धोने लगा तो वह दूसरे कमरे से धुला हुआ तोलिया प्राई। मोहन मुंह पर पानी के कतरे लिये घूमा तो कृष्णा ने तौलि उसकी ओर बढ़ा दिया." आंगन में विछी दो चारपाइयों पर उस्ताद जी और उनकी पत्नी बैठे थे । कृष्णा खाना लगाने लगी। "अव प्रा जानो, युरखुरदार !" उस्ताद जी ने कहा, तो मोहन 120 / नीड गरपाई की तरफ बढ़ गया । कृन्ना ने उसके लिए भी बाली लगा दी हम ऐमा कनी नहीं होता था । साना सामोगी में कभी नहीं चलता मोहन और उस्ताद जी लतीके मुनाते रहते हैं--कृप्या प्रपने स्कूल ती वाले मुनाती रहती थी।माज पहला मौका था कि साने के दौरान कोई दात ही नहीं हो रहो मी। सबको बढ़ा अजीब लग रहा था। 'मई कमाल है ! कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा!" माखिर उस्ताद ही ने बहही दिया। मवने एक-दूसरे की तरफ देसा, मोन की तरफ देखा, जिसकी मांच भी हुई थी, और धीरे-धीरे अपनी मंगुलियों में पमं कौर मुंह की तरफ बढ़ा लिये। बात फिर भी नहीं बढ़ पाई। खाना हो जाने के बाद मोहन अपने कमरे में चला गया। पीछे-पीछे उस्ताद जी भी चले पाये। मोहन चारपाई पर बैठ गया। चारपाई के संताने लिपटा हुमा विस्तर पड़ा या ! उसने उससे टेक लगा दी, उस्ताद जी उसके पास प्राकर बैठ गए। "तो क्या सोचा, वरखुरदार?" "अभी तो कुछ नहीं सोच पाया हूं, उस्ताद जी..." उस्ताद जी ने हैरानी से उसके चेहरे की ओर देखा । फिर वोले- 'तुम्हारी जिद यही थी न कि तुम जब तक अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते, घर नहीं लौटोगे. "अब तो खुद कमा रहे हो." "वहा मा अकेली हैं.. उनकी देखभाल करने वाला भी तो कोई चाहिए."तुम्हें जाना चाहिए..." "मापका कहना सही है, उस्ताद जी."फिर भी मुझे सोच लेने दीजिए..." "ठीक है."तुम्हारी मर्जी"मुझे जो ठीक लगता है, मैंने वह कह दिया. इससे ज्यादा मुझे हक भी क्या है !" मोहन को लगा, उस्ताद जी के स्वर मे तुझे और तल्खी धुल है। समझते हुए बोला,"मुझे थोड़ा-सा सोच लेने दीजिए, उस्ताद जी."

ह घर पहुंचा, तो उस्ताद जी उसका इन्तजार कर रहे थे। "कहां चले गए थे ?" उन्होंने पूछा। "यूं ही 'जमुना की तरफ निकल गया था.." कहते हुए मोहन पने कमरे में चला गया। मोटर साइकल उसने प्रांगन में खड़ी कर दी यी। फमरे में घुसते ही मोहन अजीव-से एहसास से घिर गया। सारा सामान उसका अपना था, पर ऐसा लग रहा था, जैसे वह और किसीके कमरे में गा गया है। वह जाकर चारपाई पर बैठ गया। पर इससे पहले कि अजनवियत और उसके घेरे उसे कस लेते, उस्ताद जी की पत्नी चली आयीं। पीछे- पीछे कृष्णा भी। मोहन कुछ नहीं बोला। सिर्फ उसने हाथ जोड़ दिए। उस्ताद जी की पत्नी ने आगे बढ़ कर उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। फिर भरे हुए स्वर में बोली, "आना-जाना तो दुनिया में लगा ही रहता है, बेटे''चल उठ, मुंह-हाथ धो ले और खाना खा ले..." मोहन को ऐसा लगा जैसे उसने बहुत दिनों के बाद कोई प्रावाज सुनी है-इनसानी आवाज' और दूसरे ही क्षण उसकी प्रांखें नम हो पाई। "चलो, भैया," कृष्ण ने कहा, "वहुत दिनों के बाद पाए हो साथ वैठकर खायेंगे।" कृष्णा ने उसका हाथ पकड़कर उसे उठा लिया और वह चुपचाप उसके साथ चल दिया। कृष्णा गुसलखाने के दरवाजे तक उसके साथ गई। वह भीतर गया पोर हाथ-मुंह धोने लगा तो वह दूसरे कमरे से धुला हुआ तौलिया ले प्राई। मोहन मुंह पर पानी के कतरे लिये घूमा तो कृष्णा ने तौलिया उसकी पोर बढ़ा दिया. मांगन में विछी दो चारपाइयों पर उस्ताद जी और उनकी पत्नी मा बैठे थे। कृष्णा साना लगाने लगी। "यव प्रा जामो, बुरसुरदार !" उस्ताद जी ने कहा, तो मोहन सीधे - चारपाई की तरफ बढ़ गया। कृष्णा ने उसके लिए भी थाली लगा दी दी। । । पहले ऐसा कभी नही होता था । खाना खामोशी में कभी नहीं चलता था। मोहन और उस्ताद जी लतीफ मुनाते रहते थे-कृष्णा अपने स्कूल की बातें सुनाती रहती थी। माज पहला मौका था कि खाने के दौरान कोई बात ही नहीं हो रही थी। सबको बड़ा अजीब लग रहा था। 'भई कमाल है ! कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा !" आखिर उस्ताद जी ने कह ही दिया। सबने एक-दूसरे की तरफ देखा, मोहन की तरफ देखा, जिसकी प्रान्वें झको हुई थी, और धीरे-धीरे अपनी अंगुलियो में धर्म कौर मुह की तरफ बढ़ा लिये। वात फिर भी नही वढ पाई । खाना हो जाने के बाद मोहन अपने कमरे में चला गया। पीछे-पीछे उस्ताद जी भी चले पाये। मोहन चारपाई पर बैठ गया। चारपाई के पंताने लिपटा हुमा बिस्तर पडा था ! उसने उससे टेक लगा दी, उस्ताद जी उसके पास पाकर बैठ गए। "तो क्या सोचा, वरसुरदार ?" "अभी तो कुछ नही सोच पाया हूं, उस्ताद जी..." उस्ताद जी ने हैरानी से उसके चेहरे की पोर देखा । फिर बोले- "तुम्हारी जिद यही थी न कि तुम जव तक अपने पैरो पर सडे नहीं हो जाते, घर नहीं लौटोगे" ''अब तो खुद कमा रहे हो.. यहां मा अकेली हैं... उनकी देखभाल करने वाला भी तो कोई चाहिए"तुम्हें जाना चाहिए "प्रापका कहना सही है, उस्ताद जी. "फिर भी "मुझे सोच लेने दीजिए..." ठीक है तुम्हारी मर्जी.."मुझे जो ठीक लगता है, मैंने वह कह दिया इससे ज्यादा मुझे हक भी क्या है !" मोहन को लगा, उस्ताद जी के स्वर मे तुर्शी प्रौर तल्खी घुल गई है। समझते हुए बोला,"मुझे थोड़ा-सा सोच लेने दीजिए, उस्ताद जी..." .."

उस्ताद जी उठकर चले गए। जाते-जाते जाने क्या सोचकर वह छत के पंखे का स्विच ऑन करते गए और दरवाजे को भी बंद कर गए। मोहन कमरे में अकेला था। यह कमरा उसका अकेले का कभी नहीं रहा था । कृष्णा उसमें बैठ- कर पढ़ा करती थी, खेला करती थी, खाना तक खा लेती थी। बस शाम के बाद वहां कोई नहीं जाता था। कमरे में एक मेज-कुर्सी लगी हुई थी, जिनका इस्तेमाल मोहन ने शायद ही कभी किया हो । कमरे में पहुंचते ही वह होता था, या उसकी खाट । लेटे-लेटे वह कोई किताव पढ़ता रहता और जब अांखें नींद से बोझिल होने लगतीं, तो थककर सो जाता। .."और अब फिर वही पथराहट की हालत उसपर तारी होने लगी । उसने जेब से मां की चिट्ठी निकाली और फिर से पढ़ने लगा." एक बार, दो वार' फिर तीसरी बार पढ़ लेने के बाद जाने उसे क्या हुआ कि उठकर वह मेज की तरफ बढ़ गया। मेज पर, उसके सामने, चिठ्ठियों का एक छोटा-सा ढेर था । अांखें उसपर स्थिर हो गई। हाथ कह रहे थे, चिट्ठियों को छेड़ो, पर मन कहीं अकुलाकर उसे रोके जा रहा था। किसी अज्ञात मंत्र के प्रभाव से बंधा वह आहिस्ता से कुर्सी पर बैठ गया । उसके दोनों हाथ मेज पर टिके हुए थे। फिर वेध्यानी में ही उसका एक हाथ चिठ्ठयों के ढेर की ओर बढ़ गया । हाथ जाने कब चिट्ठियों के ढेर को उठाकर एक ओर रखने लगे। अांखें हाथों का साथ दे रही थीं--यह जानने में मदद कर रही थीं कि कौन-सी चिट्ठी खुली हुई थी, कोन-सी बंद थी। बस, मन साथ नहीं था। एक ही शरीर के अलग- अलग हिस्से अलग-अलग क्रियाओं में लीन थे-बल्कि कुछ पूरी तरह सजग और सक्रिय थे, कुछ पूरी तरह सुन्न और सोए हुए थे। हाथों और प्रांखों ने मिलकर उन चिट्ठियों को ढेर से अलग कर लिया, जो अनखुली और अनपढ़ी रह गई थीं । फिर उन दोनों अंगों ने उन्हें खोल भी डाला और उनपर पड़ी तारीखें भी पढ़ डालीं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान चूंकि मस्तिष्क साथ नहीं दे रहा था, इस लिए हुआ . - 132 नीड यह था कि सबसे ऊपर वाली अनसुली चिट्ठी नये वने ढेर में सबसे नीचे जा पहुंची थी। उसीमें वह खवर थी-बावूजी के अचानक चल बसने की खवर"उनके दाह-संस्कार की खबर"उनके चौथे और तेरहवें की तारीख की खबर. चिट्ठी मां ने लिखी थी। उसके एक-एक शब्द में तकलीफ थी, एक-एक वाक्य बोझिल था। .."बस अड्डे पर, पाऊजी के पांव के अंगूठे में कोई जंग नगा लोहे का टुकडा घुस गया था। देखते ही देखते जहरवाद हो गया था और दो ही दिनों में वह चल बसे थे." मां ने चिट्ठी लिखी थी और मोहन को खबर दी थी. "पर मोहन ने पहली कई चिट्ठियो की तरह उस चिट्ठी को भी खोलकर पढ़ा तक नही था ! कितनी देर तक मोहन के हाथों में वह चिट्ठी थमी रही, उसे पता ही नहीं चला। फिर वह चिट्ठी को उठाए-उठाए ही उठकर चारपाई तक चला गया और लेट गया। उस्तादजी की दी हुई चिट्ठी का झटका प्रब गुजर चुका था, पर इस पुरानी चिट्ठी का प्रसर उसपर छाने लगा था। उस्ताद जी को चिट्ठी की खवर अव नई नही लग रही थी-धीरे-धीरे वह चिट्ठी किसी पुराने अखबार का रूप लेने लगी थी, बहुत पहले पढ़ी हुई खबर दुबारा सामने आ जाए, तो उसका मजमून महज दिलचस्पी का सामान बन जाता है-उस्ताद जी को दी हुई चिट्ठी का कुछ वैसा ही असर शेप रह गया था. उसके बावजूद यह तथ्य किसी प्रविजेय, ठोस चट्टान की तरह उसके सामने था कि बाऊजी नहीं रहे थे। और अव यह सवाल भी किसी फनियर सांप की तरह उससे पायें मिलाए लहरा रहा था कि उसे जाना चाहिए या नही । सवाल जहरीला पा, मगर जिस गति से वह लरज रहा था, उससे उसके मायाजाल और चमकीलेपन को नजरंदाज भी नही किया जा सकता था."सवाल की मासों में तात्रिक सम्मोहन था और एकबारगी मोहन को लगा कि वह सवाल और वह खुद ऐन एक-दूसरे के सामने हैं-दोनों की हरकत एक- सी-1122 दूसरे से बंधी है। दोनों ही मंत्रविद्ध हैं कि एक-दूसरे से टकराए बगैर वे कोई गति भी नहीं कर सकते." एक लंबे अरसे तक मोहन और वह सवाल एक-दूसरे के सामने वैसे ही बने रहे। फिर मोहन को एकाएक लगा, कमरे में सिर्फ टेवल लैंप की ही रोशनी फैली हुई है। उसका मन हुआ, वह दीवार पर लगे स्विच को दबाकर पूरे कमरे को रोशन कर दे, पर फिर जाने क्यों, उसे लगा, कमरे में रोशनी होते ही वह असहाय हो जाएगा। रोशनी का सीमावद्ध दायरा मेज पर स्थिर था और वहां पड़ी हुई हर चीज ऑपरेशन थिएटर की चीजों-सी लग रही थी। मोहन का सिर लिपटे हुए विस्तर पर था.. विना विस्तर की चार- पाई का मूंज उसके बदन में हलकी-हलकी सुइयां चुभो रहा था। उसने करवट बदली, तो उसका चेहरा बंद दरवाजे की ओर हो गया। हल्के से क्षण के लिए उसे लगा कि वंद दरवाजे के पीछे कोई खड़ा है, जो चारपाई की हल्की-हल्की-सी आवाज के कारण वहां से हट गया है। शायद इससे पहले दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक भी हुई थी। फुसफुसाकर शायद उसे किसीने आवाज भी दी थी "या मुमकिन है, यह उसका भ्रम रहा हो या कृष्णा रही हो ! "हां, वही रही होगी। पर उस वक्त ? ''पहले तो वह रात को ऐसे कभी इधर नहीं पाई थी... मोहन कदमों की आहट का इंतजार करने लगा। पर जब काफी देर के बाद भी कोई आवाज नहीं हुई. तो उसने यही मान लिया-~-इधर कोई नहीं प्राया था। सब तरफ दमघोंटू सन्नाटा पसरा हुआ था। मोहन का दिगाग दरवाजे के पीछे से भटककर फिर कमरे के भीतर चला आया । चारों तरफ की हर चीज खामोश और स्थिर थी-दीवारें मेज, कुर्सी, मेज पर रखी किताबें, टेवललैंप, रोशनी का दायरा, चिट्ठियां, रोशनदान, फर्श पर पड़ी चप्पलें, विस्तर, मोहन का अपना अस्तित्व'."उसकी धड़कन, उसकी सांसें--पर मोहन का मन ? .. क्या वह भी उस स्टिल लाइफ का एक हिस्सा था?... नहीं. वहां एक जीवंत, धड़कती हुई, पूरी दुनिया थी-उस दुनिया 234/नीड़ को गत्यात्मकता थी। चहल-पहल-रौनक थी, मावाजें पों, रंग थे, चेहरे "वाऊजी का चेहरा, मां का चेहरा "हरे-भरे सेत, पहाड़ियां और मंदिर, नदियां और झरने, चिड़ियों की चहचहाहट, मकान, मोहल्ले मोर लोग."ौर कांता... मोहन ने वेचनी से करवट बदल ली। कमरे के नीम उजाले में मा का चेहरा उभर पाया । सौम्य, मुम- कराता हुमा चेहरा और उसके साथ प्यारी मावाज-'तू जानता है, तेरा नाम मोहन यो रखा था, हमने ? तुझमे पहले तेरे तीन भाई पंदा हुए, पर एक भी न बचा "मैंने कृष्णा कन्हैया के मंदिर में मनौती मांगी थी कि तू पाए और मेरे प्रांगन में खेलता रहे तो तुझे मोहन पुकारूंगी...' चेहरा गुम हो गया 'प्रावाज भी सो गई। मोहन ने फिर करवट बदल ली बल्कि प्रौधा होकर लेट रहा। उसने अपने चेहरे को लिपटे हुए विस्तर में छुपा लिया। लेकिन मधेरे में फिर पिता का चेहरा उभर माया । मोहन रात-भर पसीना-पसीना होता रहा। मुबह-मुबह उस्ताद जी कमरे में प्राए । कृष्णा चाय रम्य गई। उसके उड़े हुए रंग पोर दोझिल प्रांगों को देखकर उस्ताद जी को थोडी चिता हुई। प्यार से बोले, "क्या हुमा-ठीक मे सोए नहीं ?" मोहन ने युझे हुए स्वर में जवाव दिया, "हां, नीद पाई ही नही." "क्या सोचा? जामोगे?" मोहन तुरंत जवाब नहीं दे पाया । फिर दुविधा भरे स्वर में बोला, "क्या होगा जाकर प्रब ?" उस्ताद जी के चेहरे पर गुस्से की रेपाए उभर माई "कैसी बातें करते हो तुम ! पाखिर वह तुम्हारे पिता घे!"मां वहां अकेली है । अब भी नहीं जानोगे, तो फिर कब जागोगे ?" मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया, तो उस्ताद जी का स्वर मोर भी तीसाहो उठा । "एक बात मैंने तुम्हें कभी नहीं बताई "तुम्हारे वाळजी की पारमा सुन रही है"मैं झूठ नही बोलू गा-तुम इतनी नालायकी न । कर रहे होते, तो मैं अब भी नहीं बताता, पर अब रहा भी नहीं जाता..." मन में आशंकाओं का गुवार लिये मोहन उस्ताद जी के रोप-भरे चेहरे की ओर देखने लगा। "तुम्हें पता है तुम्हारे वाऊजी तुमसे मिलने यहां पाए थे ?" "कव ?" मोहन हैरानी से बोला। "तुम्हें यहां आए तब ज्यादा दिन नहीं हुए थे। तुम क्या सोचते हो- मेरा कारोवार एकाएक ही इतना अच्छा हो गया था कि मैं तुम्हें तनखाह देने लगा! तुम्हारी तनखाह तुम्हारे वाऊजी ही भेजा करते थे..." "आपने कभी बताया क्यों नहीं ?" मोहन पीड़ा-भरे स्वर में वोला। "तुम्हारे बाऊजी ने मना न किया होता, तो यह भी बता देता..." उस्ताद जी ने कहा । फिर समझाते हुए बोले, "जवान बेटे के जुदा हो जाने का गम मैं समझता हूं, बेटे मैंने यह चोट सही है 'इकहरी नहीं, दुहरी "तुम्हें तो यह भी खबर नहीं कि बंबई में हमारे चतरू कत्ल हो चुका है." "नहीं ?" मोहन के लिए यह सब असह्य होता जा रहा था। "सच्चाई से कब तक मुंह चुराते रहोगे, मोहन !" उस्ताद जी ने संजीदगी से कहा । "अपने-मापसे कब तक भागते रहोगे?" अचानक सिसकियों की आवाज मोहन के कानों से टकराई। उसने घूमकर देखा-चाची और कृष्णा उसके पास खड़ी थीं और अपने मुंह में पल्लू दिए अपना रुदन दबाने की कोशिश कर रही थीं। रोते-रोते ही चाची ने अपना हाथ मोहन के सिर पर रख दिया। मोहन ने अपनी डबडवाती अांखों को बंद कर लिया। 16 क्या प्रजीव भटकन लगी है !.... एक के बाद एक यात्राएं"वसें, गाड़ियां, ट्रक मोटर साइकल... 136/ नीड़ हर तरह की सवारी और इसमे बंधा यह शरीर"शारीर गाड़ियों के साथ बंधा उनके साय मागे बढ़ता रहता है-पटरी पर, सीधी या टेढ़ी-मेढी सड़क पर, लेकिन मन पटरी पर नहीं चल पाता। वह यहां, वहां, इधर- उघर, दिगाहारा-सा भटकता रहता है, मागे नहीं बढ़ता "मागे को कभी सोचता भी नहीं। बार-बार पीछे की ओर, अतीत में, लौट जाना चाहता है। यात्राएं बहुत हुई हैं इन पिछले छह-सात वरसो में-सब तरफ । बम, जाना नहीं हो पाया, तो एक ही शहर की पोर---पहां, जहा मे यह मन भरीर को भगा लाया था. अजीब स्थिति है ! पादमी जिने अपना कहता है, अपना मानता है, उमीम दूर क्यों भागता है ? क्या सिर्फ इसलिए कि गुस्सा भी अपनों पर ही पाता है ! रूठना प्रौर मनाना भी सिर्फ अपनों से ही हो सकता "शायद, पर कोई गुस्सा, कोई नाराजगी, कोई ग्रंथि इतनी गहरी भी हो गकती है कि यह इतने बरसों तक बनी रह मकै ? कि चिठ्ठियां माती रहे, सदेश प्रात रहें, और पादमी उनकी तरफ कोई ध्यान ही न दे? यात्राएं वह करता रहे, लेकिन इधर का कभी रुख भी न हो । जिघर उसकी अपनी जहें पनपी हैं--पासकर तब, जब कही और जड़ें जम भी न पाई हों? पर मायद यह उम्र का भी असर होता है । एक साम उम्र होती है, जय मादमी जिद कर सकता है, और उस जिद पर कायम भी रह सकता है-उस उम्र को गुजर जाने के बाद अपनी जिद पर कायम रह पाना भी मुमकिन नहीं होता। जैसे वक्त पोर अनुभव के साथ भीतर की समस्त शक्तिया भी अपनी ऊर्जा खोने लगती हैं... या फिर कोई एक ऐसा क्षण पा जाता है, या कोई वारदात हो जाती है, जो जिद को जमी हुई वर्फ को एकाएक पिघलाकर रख देती है... यहां लोट रहा हूं मैं ! .."मन ययो भटक रहा है? क्या इसलिए कि जिस कारण यह भाग खडा हुमा था, वह कारण ही प्रव नही रहा ?' बस अपनी चपी-बंधाई गति से चली जा रही थी और मोहन का मन अपनी गति से। ''वह छाया वार-बार क्यों लोटकर भा रही है ? वह चेहरा जो अनंत में विलीन हो चुका, क्यों बार-बार यादों के द्वार पर दस्तक दे रहा रहा है ? क्या यह अपना देय मांग रहा है ? किनारे की सूखी रेत से नदी ही पानी मांग रही है ? मैंने पाया ही क्या है कि कुछ दे सकू ? ... ... । वरसों के बाद । फिर वही शहर । फिर वही सड़कें, वही गलियां, वही मकान । वही सतरंगी शाम। वही लोग, जैसे इस बीच कहीं कुछ बदला ही नहीं है। पर क्या सचमुच ? क्या एक रंग इन सबके बीच से हमेशा के लिए गायब नहीं हो गया है ? बस से उतरने के बाद मोहन के पांव अपने-आप ही उस कैबिन की ओर बढ़ गए, जहां कभी वाऊजी बैठा करते थे। लेकिन फिर एक झटका लगा। चिक वही थी, उसके बाहर स्टूल पर बैठा नौकर भी वही था, लेकिन ऊपर लगा बोर्ड बदल चुका था। परासी के उसे पहचानने से पहले ही उसने अपने कदम घुमा लिए। एक छोटा-सा लड़का उसके पीछे लग गया था। लड़के ने इसरार- भरी निगाहों से उसकी ओर देखा और मोहन ने बिना कुछ भी कहे, अपना सूटकेस उसके सिर पर रख दिया। रास्ता कटता गया। मोहन जैसे सपने में चल रहा था। लेकिन गली का मोड़ आते ही उसकी टांगें जवाब देने लगीं। जैसे-जैसे घर पास प्राता जा रहा था, उसकी हिम्मत जवाव देती जा रही थी। घर के बाहर पहुंचकर उसने सूटकेस लड़ने के सिर से उतार लिया। उसने जेब से अठन्ती निकाली और लड़के की हथेली पर रख दी। लड़का खुश होकर भाग गया। गुछ क्षणों के लिए मोहन ठिठका खड़ा रहा । दहलीज जैसे कोई लक्ष्मण-रेखा बन गई थी--अग्नि-रेखा-जिसे पार करते ही, उसे डर था, उसका पूरा अस्तित्व झुलस जाएगा। 138/नीड़ अनायास उसकी नजर साथ वाले मकान की तरफ उठ गई। क्या कांना प्रव भी वहां होगी? फिर ध्यान माया, ववत किसीका इंतजार नही करता-उनका तो कतई नही, जो उससे कन्नी काटकर भाग गए खिड़की बंद थी। अपनी पूरी हिम्मत बटोरकर मोहन ने दहलीज के अंदर कदम रपा । चार-छह छोटे-छोटे कदम उठाए, फिर ठिठक गया। प्रागन के पार फर्श पर चटाई विछाए मां बैठी थी। मगर क्या वह मां ही थी ? मोहन का कलेजा सिकुड़ गया। सामने बैठी औरत के बाल माधे से ज्यादा सफेद थे। चेहरा कांति- हीन था। कपड़े सफेद होने के बावजूद मलिन थे। माथे पर भुरिया थी-लेकिन वह मां ही थी। बहुत हल्के-हल्के कदम उठाता मोहन मा के पास जा पहुंचा। मां खाली-खाली प्रांतों से उसे देखती रह गई । मोहन ने झुककर पाव छुए, तो एकाएक जैसे कोई बांध टूट गया। मा ने उसे सीने में भी लिया। वह फूटकर रो पड़ी। मा के फंदन ने मोहन को पिघलाकर रख दिया । उसका गला भर्रा माया । पाखें नम हो गई। फिर धीरे-धीरे मा शात हो गई । मुह मे पल्लू दिए वह साली मा लिए मोहन के चेहरे को देखती रही, जसे उसे यकीन ही नहीं पा रहा था कि उसका बेटा लौट पाया है। फिर वह बड़ी मुश्किल से बोली, "जा बेटे"मुह-हाय घो ले..." मोहन ने उठकर हाप-मुह पोया। कपडे बदले,मा ने नापता दिया। उसने चुपचाप सा लिया। फिर मां बोली, "तेरे कमरे को चावी पाले मे रसी है." वह उठकर सीढ़ियों की तरफ चला गया। छत पर पहुंचा, चावी माले मे रखी थी। मजीय यात थी, उसमे जंग बिलकुल नहीं लगा कमरे का ताला सोलते वक्त अनायास ही उसकी नजर दूसरी छत पर बने कमरे की तरफ चली गई। वहां भी ताला लगा हुमा था। ।

उसने ताला खोलकर पाले में रख दिया। फिर दरवाजा खोला। अंदर अंधेरा था, उसने वत्ती जलाई। कमरे को देखकर वह सन्न रह गया। सव कुछ बड़े करीने से रखा था, जैसे अभी-अभी कोई उसकी सफाई करके गया हो । मेज पर किताबें थीं, फर्श पर कुछ नहीं था। उसकी टूटी हुई गुल्लक के टुकड़े एक तश्तरी में मेज पर रखे हुए थे। चमचमाती साइकल कमरे के कोने में खड़ी थी। वह संवेदनाशून्य-सा मेज के पास जाकर खड़ा हो गया। उसे पता ही नहीं चला, मां कव वहां आ गई है। "तेरे बाऊजी किसी को यहां आने नहीं देते थे," मां कह रही थी। "मुझे भी नहीं। खुद अपने हाथों से सफाई करते थे। हर रोज.. कोई चीज इधर से उधर हो जाती थी, तो जान खा जाते थे जाने क्या हो गया था उन्हें तूने उन्हें गलत समझा, वेटे..." मोहन चुप खड़ा मेज को घूरता रहा । "नहीं. वह तुझे बहुत प्यार करते थे..." मां ने कहना जारी रखा। फिर वह मोहन के पास आकर खड़ी हो गई। मोहन किसी तरह कुर्स पर बैठ गया । मां ने उसके सिर पर हाथ रखा, तो मोहन की आंखों में सवाल उतर आया। पर वह बोल नहीं सका। मां जैसे उस सवाल को समझ गई। "जाते वक्त कोई तकलीफ नहीं हुई। अड्डे पर ही जंग लगा लोहा पांव में लगा-बस, देखते ही देखते सब खत्म हो गया. टेटनस हो गया था..." मोहन के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। "उन्हें हमेशा विश्वास रहा, तुम लौट आयोगे । मुझसे कहते थे- भागवान, देखना वह जरूर लोट पाएगा. अपना गैराज संभालेगा। वसें देखेगा। घर संभालेगा तब मैं तुम्हें सब तीर्थ कराने ले जाऊंगा. बैठा । - मोहन चुप रहा। मां ने खाना बनाया। मोहन की सारी भूख जैसे गायब हो गई थी। फिर भी मां उसे खिलाए बगैर नहीं मानी। साना खा लेने के बाद वह उसी कुर्सी पर जा बैठा था, जिसपर 140/ नीड़ - चमी वाऊजी बैठा करते थे। मनायास ही उसकी टाग दूमरो पर समकोण बनाकर लेट गई। पाय भी पिता की मुद्रा में हिलने लगा। उसने खिड़की में पड़ा सौंफ का डिव्या उठाया और थोड़े में सौंफ साफ करके मुंह डाल लिए। मा पास ही बैठी वर्तन मांज रही थी। "उन्होंने तो तेरे लिए एक दूकान भी साली करवा ली थी। उममें मोटर के पुजों का माल भी भर दिया था" कहते थे-'हमारा मोहन जव भी प्राएगा, उमी दूकान पर बैटेगा। कहते थे, 'दूकान का नाम होगा- मोहनलाल दुर्गादास..'तू वी० ए० न कर मका"उनका यह सपना भी अधूरा रह गया मोहन का चलता हुप्रा मुह एक गया । सौंफ फा रम उसके गले में ही प्रटककर रह गया। -- . मोहन ने अपनी चारपाई बरामदे में विधा ली थी। प्रागन में सोने का मौमम नहीं था। मा उसके सिरहाने प्राकर बैठ गई। मोहन प्रांखें बंद किए सोने की कोशिश कर रहा था, मेकिन नीद उसमे कोसो दूर थी। मां की प्रायाज नीद को और भी दूर भगाए दे रही पी। "तुझे देसकर पाए थे, तो बडे सुश थे। कहते थे---'मुझे फहा है वह अपने पैरों पर खदा होने की कोशिश कर रहा है."इनसान बन रहा है।' पर वरमों के इतजार के बाद भी तू नहीं पाया, तो वह टूट गए । घटों तेरे कमरे में बैठे रहते थे और मुझसे बात भी नहीं करते थे..." कैसे लगते होगे वाऊजी? क्या उनका चेहरा झुरियों से भर गया होगा ?"एक टूटा हुमा बूढ़ा मादमी अपने बेटे के लौटने का इंतजार करता हुमा? क्या पाऊजी भी टूट सकते थे? "तू इतनी छोटी-मी बात पर घर छोड़कर चला गया ! ... कहते रहे, 'मेरा मोहन इतना डरपोक और कायर फमे निकल गया ! ऐसे तो कोई नहीं भागता!.."मुभमे रहता, मैं एक क्या, दस कालाएं "वह हमेशा ला कर उसके कदमों में डाल देता 'चंदरसेन की तो दस पुश्तें 'तर जाती!...पर सब खत्म हो गया सब खत्म हो गया..." मां फिर रोने लगी। उसके लिए अब और कुछ भी कह पाना संभव नहीं था। अंदर का दुख प्रांखों से रिसने लगा । मोहन विलखकर उससे लिपट गया। उसके भीतर की बाढ़ भी फूटकर बाहर आ गई। .. दूसरे दिन श्राद्ध था। मोहन ने सब काम अपने हाथों पूरा किया। मां सिर्फ बताती रही। ब्राह्मण-भोज भी हो गया । उनको दक्षिणा भी दे दी गई."और वे लोग पाशीर्वाद देकर चले गए। अव मोहन का मन कुछ हलका हो गया था। वह खाना खाने बैठा, तो मां बोली, "अाज पंडित जगन्नाथ से मिल अाना। पूछ श्राना, दूकान का मुहूरत किस दिन ठीक रहेगा "अच्छा" मां के चेहरे पर भी एक ही दिन में रंगत या गई थी। उसका कलेजा शीतल हो गया था। खाना खाने के बाद कुर्सी पर बैठे-बैठे ही मोहन को झपकी आने लगी थी। वह अंदर चला गया। अचानक उसे खूटी पर लटकी पिता जी की पगड़ी नजर आ गई। जाने क्या सोचकर उसने पगड़ी को उतार लिया और अपने सिर पर धर लिया। फिर वह दीवार पर लगे आईने के सामने जा खड़ा हुअा। अपना प्रतिबिंब देखकर वह चकित रह गया। उसे लगा, जैसे पाईने में से वाऊजी झांक रहे हों। उसके माथे पर पसीना चुहचुहा पाया । पगड़ी को उतारकर उसने वापस खूटी पर टांग दिया और अंदर पड़े दीवान पर औंधा होकर पड़ रहा। उसकी नींद उड़ गई थी। तभी चाहर के दरवाजे के पास से एक आवाज आई, "बीजी!" मोहन चौंक गया। यह तो कांता की आवाज थी। "अरे ! तू है।" मां ने कहा। "प्रा जा."या जा!..." मोहन के कान दरवाजे की ओर लग गए। "कव आई?" माने पूछा। "अभी थोड़ी देर पहले।" 142/नीड

"जंगी नहीं पाया ?"
"प्राए हैं-साम के पास बैठे ममसरियां कर रहे हैं..."
"पाएगान?"
"लो ! पाएंगे क्यो नही, वीजी ? अापके हाथ की बनी लस्सी पिए
बगैर उन्हें चन थोड़े ही प्राएगा!"
मोहन उलझकर रह गया। कांता पाई है ! यह यहां माती रही
है ! और यह जंगी?...
यह दीवान पर उठकर बैठ गया।
"माज बड़ी सुश लग रही हैं, वीजी? क्या बात है ?" काता ने
पूछा।
"मोहन पाया है।"
"सच, बीजी! सच ?"
दूमरे हो क्षण काता दरवाजे में पड़ी थी। उसकी बाहो में साल-भर
का बच्चा था। दरवाजे तक तो वह विजली की गति से पाई, मगर उसके
वाद ठिठक गई। अपने अंदर का सारा उत्साह उसने दवा लिया। फिर
बडे ठहरे-ठहरे कदमो ने वह अदर पाई और चुपचाप मोहन को देखती
खड़ी रह गई।
मोहन के लिए अपने पापको संभाल पाना मुश्किल हो रहा था।
लेकिन चुपी असहाय हो रही थी। प्राखिर काता ही बोली, ".. कैसे
हो?"
"प्रच्छा हूँ
"मत्र तो यही रहोगे न ?"
"हा..."
मोहन ने कांता की तरफ देवा । उमे लगा, नहीं, यह वह काता नहीं
है, जिसे छोडकर वह भाग गया था, जिसकी मुसकराहट, जिसकी प्रांखों
की चमक, जिसकी उस रात की चोमें उसकी जिदगी का सबसे बड़ा
माधार बनी रही थी। यह काना तो एक माधारण-मी पौरत थी। किसी
भी दूसरी औरत जैसी
दोनो खामोश थे। सामोशी बहुत भारी होती जा रही थी।
..

तभी वाहर एक भारी, खरजदार आवाज सुनाई दी, "मैंने कहा, बीजी ! मेहमान आए हैं..." आवाज को सुनते ही कांता ने बाहर की तरफ देखा । फिर मोहन की ओर भरपूर निगाह डालती हुई, अपने बच्चे को लिए वह बाहर चली गई। आने वाला एक लहीम-शहीम युवक था । आते ही उसने तारा के पांव छुए, मां ने आशीर्वाद दिया, और वह उसके पास ही बैठ गया। फिर कांता को देखकर बोला, "तुम्हें क्या हुआ ?" "कुछ नहीं. मोहन पाए हैं," कांता ने धीरे से कहा, लेकिन उसका उत्साह उसकी आवाज से छिप नहीं सका। "हैं !" वह बोला, "तभी सुवह मुझे हैरानी हो रही थी-सूरज पश्चिम से निकल रहा था ! कहां हैं ?" "अंदर है," मां ने बताया । "अख्खा !" आवाज और ऊंची हो गई । “ मैंने कहा, भाई साहब जरा वाहर तो निकलिए-हम भी दीदार कर लें ! बड़े चर्चे सुने हैं आपके। "बंदापरवर चिलमन तो उठाइए!" मोहन को बाहर निकलना ही पड़ा । उसे दरवाजे पर देखकर जंगी बोला, "वाह-वाह ! वाह-वाह !..." उसने आगे बढ़ कर मोहन का हाथ अपने हाथ में ले लिया। फिर परिचय देने के बाद वोला, "वंदे को जंगी- लाल कहते हैं। वैसे ग्रापका यह खादिम कांता देवी का शौहर कहलाता ! जंगी की इस नाटकीयता से कांता का चेहरा लाल हो गया। झिड़- कते हुए बोली, "अव छोड़ो भी यह नाटक ! "अरे भई, तुम भी कमाल करती हो ! पहली बार मिल रहे हैं, क्या एक-दूसरे से तारुफ भी न करें ?" फिर जंगी मां की पोर मुखातिव हुघा, "वीजी ! लाइए मेरा लस्सी का गिलास ! पूरी पाव-भर मलाई होनी चाहिए पिछली बार दो तोले कम थी। देख लीजिए, कितना दुवला हो गया हूं !" - ! 144/नीड़ " तारा हंसने लगी । मोहन के होठों पर भी मुसकराहट मा गई । "मलाई बाजार से ले पाया कर!" मां ने भी मजाक किया। "अाजकल पाय-भर मलाई प्राती भी है दूध पर!' जंगी बैठ गया। मां का घुटना पकड़ते हुए बोला, "मलाई नहीं है, बोजी, तो कोई बात नही, पाव-भर प्यार तो पाप डाल ही सकती हैं लस्मी में..." तारा ने उसके सिर पर हाथ रखकर प्यार से सहला दिया और बोली, "प्रभी लाई यह उठी और रसोई मे चली गई। काता भी पीछे-पीछे चली गई। जंगी ने मोहन को अपनी बातों में उलझा लिया। जंगी देखने मे जितना कठोर पोर क्रूर लगता था, मंदर मे वह उतना ही मीधा और मीदा था । वात-बात मे वह शेर गढ़ लेता मौर बातो के बीच उन्हें जोड देता। उससे एक बार मिल लेने के बाद कोई उसका दुश्मन हो ही नहीं सकता था। पहली मुलाकात मे ही जंगी ने मोहन को जीत लिया। उसे यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वह उस कांता का पति है, जो कभी उसके अपने सपनो का केन्द्रबिंदु थी। मुलाकात के दूसरे ही दिन जंगी मोहन को अपने जगलात दिसाने ले गया । जीप को उसने ऐन जंगल के बीच ला खड़ा किया और फिर माही प्रदाज में बोला, " यह सारा जंगल-दूर तक, जहां तक तुम्हारी नगर जा रही है, हमारी..." फिर उसने तुरत एक दोर भी जड़ दिया : "ये जगल ये पर्वत हमारे हैं दोस्त ! निगाहे- -करम के सहारे हैं दोस्त!" मोहन मुमकरा दिया। उस मुसकराहट को देखकर जंगी बोला, "साह देवी को ! मुसकाराते बहुत प्यारा हो!..."उसने बाह पकडकर मोहन को जीप में उतार लिया । "प्रापो !" थोड़ी देर तक दोनो पो ही चलते रहे । फिर जंगी बोला, "तुम्हें हैगनी तो हो रही होगी कि मेरे जैसा जगली प्रादमी शायरी कैसे करने लगा! "यह सय कांता देवो का चमत्कार है" "सच कहता हूँ, इस लड़की ने मेरी जिंदगी ही बदल दी है। हमारा सानदान सूनियो का सानदान कहलाता था-वात मुंह से वाद में निकलती थी, गोली पहले दागी जाती थी। पर कांता ने मुझे इनसान बना दिया..." मोहन चुप था। वह सोच रहा था-क्या मैं सचमुच कांता के योग्य था? वह जंगी के सामने अपने-आपको वीना महसूस कर रहा था। "मैं सच कह रहा हूं, दोस्त !" जंगी कह रहा था। "कभी-कभी तो में सोचने लगता हूं कि कांता मेरी जिंदगी में न आई होती, तो मेरा क्या बनता ! "अब तक चार-छह खून कर चुका होता..." फिर उसने मोहन का कंधा पकड़कर उसे रोक लिया। "तुम डरपोक निकले, दोस्त ! तुम्हारी जगह में होता न, तो मैं खुद भागने के बजाय कांता को भगा ले गया होता ! मोहन चौंक गया। तो, जंगी को सारी दास्तान पता है ! लेकिन जंगी ने उसे ज्यादा सोचने नहीं दिया। हंसकर बोला, "चलो तुम्हें एक चीज दिखाता हूं..." वह उसे जंगल के आसपास की खूबसूरत पहाड़ियां दिखाने ले गया। फिर एक पहाड़ी पर बने अकेले मकान की ओर इशारा करते हुए बोला, "क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम्हारा भी ऐसा ही खूबसूरत घर हो ?" "किसका घर है वह ?" मोहन ने पूछा। "हमारा!" दूसरे दिन कांता आई, तो मां से मोहन की बातें छेड़कर बैठ गई। "वीजी, मोहन की शादी कर दो. पांव में वेड़ियां पड़ जाएंगी, तो फिर कभी नहीं भाग सकेंगे..." "सोच तो मैं भी रही थी--कोई लड़की है तेरी नजर में ?" मां ने पूछा। "लड़कियों की क्या कमी है, वीजी? पर पाप पहले वीरजी से तो पूछिए हो सकता है, उनकी नजर में कोई हो "बात तो तुझे ही करनी पड़ेगी ?" मां ने कहा। "मुझे ! .."मैं कैसे...?" कांता सोचने लगी। फिर वोली, "अच्छा- 146/ नीड़ मैं इनमें कहूंगी." कुछ दिन मोर निकल गए। मोहन दूकान के वार में यह मया । उसने पंडिन में मिलकर मुहरत निकलवाया और फिर सब परिचितों को ग्राम- अगदने चल दिया। वह जंगी के पास पहंवा । तो वह पेड़ों की कटाई का निरीक्षण कर रहा था। मोहन को देखते ही वह चिल्लाया, "मामी-मानी।" "पाप प्राए हमारे जंगल में। "सब तरफ मजय महक फैल गई..." मोहन को उसने बडे उत्साह से अपने बगल में दवा लिया 1 वोला, " मे पाना हुमा "मेरी दूकान का मुहूरत है," मोहन ने बताया । "तुम लोगों को बुलावा देने माया हूं।" "कब?" "परसों।" "ठीक है पर विरादर, अगर मैं न पा सका तो चुरा मत मानना... कांता जरूर आ जाएगी।" वह फिर दिड गया। "मेरा सारा भार तो उसीपर है। इसीलिए तो कहता हूं, कांता न मिली होती, तो मैं तो वारह के भाव बिक गया होता । देख लो, तुम्हारा नुरुमान मेरा फायदा बन गया !" मोहन का चेहरा उतर गया। जंगी ने फिर कहा, "मुना है, तुम मलगोगा वहा पन्छा बनाने "धजाता था कभी.." "क्यों ! मैंने तो सुना था कि तुमने अलगोजे मे ही शादी कर ली है !" यह हसा । हंसते-हंसते ही बोला, "बोलो! शादी करोगे ? कांता ने एक बहुत अच्छी लहकी देव रखी है तुम्हारे लिए!" मोहन से कुछ कहते नहीं दना। "देखोगे तो ? जब भी मन हो. बता देना-मैं तुम्हें ले चलूगा भरने साथ । कांता से भी ज्यादा खूबसूरत है सोच लो, तुम्हारे अलगोजे को मुर मिल जाएगा..." मोहन फिर भी कुछ नहीं बोला। उसने फिर सिर झुका लिया। "कमाल है, यार !" जंगी ने ठहाका लगाते हुए कहा । "अभी तक शरमाते हो! तुम्हारी उम्र तक तो हम दस बार गैर-कानूनी शादियां कर चुके थे !" कांता दूकान के मुहूरत वाले दिन आई ! जंगी भी पाया । उस रात कांता मोहन के घर में ही रह गई। जंगी खाना खाकर चला गया। रात को कांता मोहन के पास जा बैठी। होले से बोली, "क्या सोचा है ?" "किस बारे में ?" मोहन ने पूछा। "इन्होंने वात नहीं की ?" "क्या बात नहीं की ?" "देखो, इनकी छोटी बहन है-बड़ी सुशील, बड़ी प्यारी''इनकी बड़ी ख्वाहिश है-इसमें शादी कर लो । अपना घर बसा लो । वीजी को भी थोड़ा-सा सुख देखने दो । बड़े दुख सहे हैं उन्होंने।" "यह तुम कह रही हो, कांता !" मोहन ने हैरानी से कहा। "सव जानते हुए भी !" "जिंदगी ऐसे ही चलती है..." मोहन कुछ देर खामोश बैठा रहा। फिर शिकायत-भरे स्वर में बोला, "तुम्हारी शादी हो गई कांता''तुम्हारा घर बस गया.''मुझे किसीने खवर तक नहीं की!" "वीजी तुम्हें लिखना चाहती थीं, पर मैंने ही रोक दिया। "तुमने ?--क्यों ?" "तुम्हें दुख होता।" एक मिनट की खामोशी के वाद मोहन वोला, "तुम 'सुखी कांता?" ठहरे हुए स्वर में कांता ने जवाब दिया, "हां 'मोहन मैं बहुत कुछ जानते .. - - उमका बच्चा पाम ही सेटा हुपा था। काता ने बगे गोद में उठा लिया। ठमके सिर को महलाते हुए योली, "मेरी बात का जवाब तो दो..." मोहन ने उसमें पांख नहीं मिलाई ! सामने देखते हुए बोला, "ठी है, जैसी तुम लोगों की मर्जी..." काता मुसकरा दी। सुशी में उसकी मा भर पाई। मव बुछ बहुत जल्दी हो गया । सगाई भी। शादी भी। काता भाग-भाग- कर मब काम करती रही। शादी मे सब लोग माए-कांना को मा भी, पिता चंदरमेन भी। काता ने अपनी ननद उमा की डोली को विदा किया। उसे अपनी वांहों में भरकर उसके कान में बोली, "उन्हें सुसी रणना, उमा ! ..." मोहन ने मुहाग रात वाले कमरे में कदम रसा। उमा बिस्तर पर बैठी थी। उसने देगा, मोहन कमरे में पाकर टिटर- कर एक गया है । वह विस्तर मे उतरी मोर मोहन के पास जा पड़ी हुई। मुफकर उसने मोहन के पांव यू लिए। मोहन चुप खड़ा रहा। "क्या बात है ?".."उमा ने बड़ी हिम्मत दिसाते हुए पूछा। "कुछ नाराजगी है ?" "नहीं..." मोदन ने कहा । "तुममे कैसी नाराजगी ?" "मुझमे न सही, पपने-मापसे है ?" "नहीं, उमा"मैं सोच रहा था, तुम्हें अंधेरे में रपना या ठीक होगा?" " "कसी बात कह रहे हैं ! उमा ने उसका हाथ पाम लिया। फिर उसे विस्तर की तरफ से गई। उमे बिठाते हुए बोली, "वैठिए, मैं प्रापरी गारी चिंताएं दूर किए देती है नीह/149

"
"पहले मेरी बात सुन लो, उमा..."
लो, उमा..." मोहन ने कहा ।
"मुझे कुछ नहीं सुनना है
उमा ने विस्तर का तकिया उठाया और उसके नीचे से एक पोटली
निकालकर खोलने लगी।
पोटली के खुलते ही मोहन की आंखों के सामने बरसों पहले के दिन
चक्कर लगा गए-वह रूमाल, वे मोतियों के हार, वह सर्प के आकार
की अंगूठी 'सब कुछ था उस पोटली में...
वह प्रश्न-भरी नजरों से उन चीजों को देखता खामोश बैठा रहा।
"यह कांता भाभी की दी हुई सौगात है मुझे
मोहन के गले में कुछ आ कर अटक गया।
वह पूरी तरह भीग गया।
"...और जंगी मैया ने यह अलगोजा दिया है-कहते थे यह अकेले
कभी नहीं वजता''क्या यह सच्ची बात है ?"
"हां, उमा..." मोहन ने भीगे हुए स्वर में कहा ।
उमा ने अलगोजा मोहन के होंठों से लगा दिया।

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Need

Author
Sudip
Title
Need
File name
Need
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
General
DLI number
552070
Barcode
4990010032800.00
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Digital publisher
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Copyright permitted
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