Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Kanchan Karat Kharao

Gopal Prasad · 2011/03

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कंचन करत खरौ
ब्रजभाषा-उपन्यास
गोपाल प्रसाद मुद्गल
राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी,
मी-267 भाभा माग, तिलक नगर, जयपुर
पारस्थान
प्रजमामा अकादमी
जयपुर

सम्पादक डा विष्णुचद्र पाठक अध्यक्ष राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी प्रकाशक सचिव राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी सी 267, भाभा माग तिलक नगर जयपुर लेखक गापाल प्रसाद मुद्गल आवरण सरत गोस्वामी पला सस्करन 500 प्रति माच 1990 मूल्प 50६ मात्र राजस्थान प्रजभाषा अकादमा मुस्पा बर्मा प्रिटस, भामर पर-

जिनी Hanरी दिव्य से सीन
"चन and है, जिसे
ऐसे तेजस्वी रिखि श्री तेजाजी के
21२२ सात ।
marne

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विस सूची पृ० स० प्रकासकीय उपन्यास के ताने बने 3 सांची साची बात लेखक की कलम ते 13 - छारी राजस्थान की 2 चिता 13 3 दौर धूप 23 4 सकल्प 23 5 विरोध के सुर 41 6 परित्याग गाम को 63 7 बंधे दोऊ बधन म 70 8 बज्रपात 78 9 उमग को रग 91 10 113 ऐसी करनी कर चलो परिसिप्ट -उपन्यास प्रतिक्रिया 11 133

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प्रकासकीय मारवाड राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी की स्थापना राजस्थान सरकार के सदप्रयत्नन ते जनवरी 1985 मे भई । अकादमी की स्थापना के सगई प्राधुनिक साहित्यिक प्रजभाषा गद्य की सुरआत भई है । अकादमी ने अपने पांच बरस के वायकाल में ब्रजभाषा गद्य के छत्र म आधुनिक विधान प अपनो मुख पत्रिका 'व्रजशतदल' के मच सौ कई नई परपरा स्थापित करव को किंचित प्रयास कोनो है। राजस्थान के अग्यात कवि अक, अप, हहोती ब्रज अक आदि विभिन्न अवन के द्वारा समीक्षा के क्षेत्र में अजभाषा गद्य की स्थापना करी गई अरु या सग व्रज सस्कृति अ क बज क्ला अब अरु नाथद्वारा अक के मच ते राजस्थान के विभिन्न भागन म फली भइ ब्रज कला सस्कृति कूपली दफै एक स्थान प लिखिये को प्रयाम कोनो गयौ। यावे सग कहानी अक, कवयित्री अक, रेखाचित्र अक एकाकी जक जरु उप यास अक के द्वारा गद्य की आधुनिक विधान पै ब्रजभापा म लिखवे को प्रयास कोनो गयौ। अपने या कायकाल म अकादमी न चार सौ पना को राजस्थान की मरुभूमि मे फली सरस ब्रज क्ला सस्कृति अज क्ला अरु सस्कृति' ग्रथ म समेटवे को प्रयत्न वीनो है। या सगई अकादमी ने आधुनिक बज गद्य विधा प रचनात्मक साहित्यिक वभव • उजागर करबे बारे तीन सौ पनान को 'माधुनिक ब्रजभापा गद्य ग्रय ऊ प्रकासित कीनी है । ब्रजभाषा म उप यास शिल्प को अभाव हो। याते पूर्व बृदावन के शरण विहारी गोस्वामी को पछरी को लौठा अरु श्याम सुदर शर्मा को 'मनसुखा लघु उप यास प्रकासित भये है। अकादमी द्वारा प्रकासित उप यास काल ऋम की दृष्टि सो व्रजभाषा उप यास जगत की तीसरी रचना है। आकार अरु आधुनिक जन-जीवन के सघपमय डगर एव भूत वतमान अरु भविस्य के सगम मानव जीवन के करनीय की यथाथ व्याय्या उप यास व मच ते ब्रजभाषा म अबई तानू देखबे मे नाय मिली ही। विद्वान लखक श्री गोपाल प्रसाद मुगदल ने 'कचन करत खरौ उपयास म उप यास क्ला की सपूण विसेसतान ब्रज अचर की सीधी साधी क्या में समटव को प्रयन 1 कीनी है। वचन करत खरी उप यास साहित्य जगत में जेऊ प्रमानित करगो के आधुनिक जन जीवन को क्या अरु मानव मूल्यन की स्थापना के आलोक मे, सामाजिक जीवन के विकास के भावन • प्रकट करने की ब्रजभाषा की शक्ति काऊ तरियां ते कम नाय। वचन करत खरी में आपकू अधुना राजस्थान के बज छेत्र के सामाजिक अरु पारिवारिक जीवन की मटीक झाकी क मिलेगी। ब्रज के गामन मे आधुनिक जन-चेतना जद्यपि धीरे धीरे फलवे लग है परि आजक ह्यां के निवासी अपनी सस्कृति की परम्परान बू धरोहर को तरियां अपने जीवन म धारन रे भये हैं । पुराने अधबिसवास अरु रूढिबादिता ते अबई ब्रज अचर पूरी तरियां मुक्त माय भयो है। भोरे परि स्वाभिमानी व्रजवासी निधनता अरु उपक्षा के सनास में पिसते भयेऊ अपने फटेहाल मेई मस्ती के आलम मे जीवे के कसे अभ्यासी बन गये है याको यथाय लेखों जोखी उपयामकार को लेखनी ते या उपयास मे निसरत भयो है। साहस सकल्प अरु कम निस्ठा की त्रिवेनी के संगम पं लेखक ने सफल जीवन के प्रयाग को निर्मान कचन करत खरौ म करके जन जन कू सफ्रता को रहस्य प्रक्ट कोनी है। स्यात ब्रज क नारी जगत ५ लेखक ने जो सधमसील पूजनीय आदश या उप याम म नीनी मितर गात पूर्व ग्रज ये माहित्य के छेत्र नाय दिया गया। आशा है ग्रजभाषा अकादमी को वचन परत खरौ' उप याम प्रकाशन को प्रयाम प्रजभाषा गद्य विधा के आगे बढाइरे मे मफ्ल हायगी ऐसी हमे आसा है । तिहारे मुपाव बर मागदमन को हम स्वागत परे है। डा० रामप्रकाश कुलश्रेष्ठ मचिव राजस्थान प्रजभाषा अबआदमी जयपुर १ या उपन्यास के ताने बाने राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी अपनी स्थापना के चौथे बरस मे आपके हाथन मे निमग ब्रजभाषा म 'कचन करत खरी' उपन्यास भैट कर रही है । ब्रजभाषा म गद्य मेऊ वू ई सौरभ भरी सुगध अरु वचन वक्रता भरी वाग्वदग्धता की भीनी-भीनी रमणीक शक्ति भरी पडी हैं जो पद्य मे है । याकै प्रमान आपफू भैया गोपाल पसाद मुद्गल के उपन्यास कैंचन करत खरी म मिलिगे। पचन करत खरी ब्रजभाषा मे राजस्थान की धरती प प्रकाशित पलो उपन्यास है। या उपयास मे राजस्थान के ब्रजभाषा भाषी भूभाग की कथा कू मूल आधार बनायो गयो है । नारी प्रधान कचन करत खरी' उपयास मे लेखक ने तीन पीढी की कथा कू ममेटचे को प्रससनीय प्रयास कोनी है। समाज के मृजन में नारी को महत्व अझ बाये सघससील जीवन ते निररे भये चेतना के सुर कस टूटे भये परिवार के निर्मान की श स्खलान क एक- एक करके जोडे हैं याको साचो खातो या उपयाम को मूल के द्र बिदु रही है । सघष के आलोक मेई सच्चो कम को पथ दीखे है। मानव जीवन मे अनेक उतार चढाव आम है। भौतेरे कष्ट होय, अध विस्वास अरु रुढिवादिता के कारन भौतरी पीडा झेलनी पडे, समाज के नये विचार, प्रगति की नवीन धारा को घनघोर विरोध करे है। परम्परा अरु नवीनता मे टकराव होय है । ई आज की नाय हर युग की कथा है । पर समाज में ऐसे लगनसोल अरु कमठ व्यक्तिक होय हैं जो परपरा को आदर करते भये नये विचारन को उवरा भूमि फ अपने कमठ कम को सक्ति त जोत क बाय नवीन चेतना के अनुकूल बना देय है । 'कचन करत खरी ने नायक चकोर अरु पदा याई तरियों के पान है । कम की निस्ठा इन दोनू पालन की चतना को मूलपि दु है । एक समैं तो ऐसौऊ आये है जब चदा अकेली रह जाये है। जीवन के स्थान स्थान पै बाय एक ते एक असहनीय दु ख यलने पहे है । लगे है के बू अब सदा सर्वदा यू टूट जायगी, पर निरासक्त भाव ते कर्म के प्रति निष्ठा चदा कू जीवन निर्मान को एक नया रास्ता आलोकित परे है। आखिर में जीत र्भ निष्ठा को होय है । नायिका प्रधान 'वचन परत खरो उपन्यास में नारी ये महत्व कू समाज अरु परिवार की प्रगति के सग उपयासकार ने बखूपी ते दिखायवे से प्रयाम कौनौ है । चन करत खरी 3 कर्म की निष्ठा की आराधना के संग सग 'वचन करत खरी उप यास म ब्रजभूमि के जीवन को अनूठी प्रस्तुतिकरन करिबे को लेखर ने उल्लेखनीय प्रयास कीनो है । ग्रजभूमि के गाम की रीति रिवाज, उत्सव, पारिवारिक जीवन के उतार-चढाव के सग सग भौरे ब्रजवासीन की सिगरी जीवन शैली लेखक ने बखूपी या उप यास की घटना अरु पात्रन के परस्पर वार्तालाप म उतारी है। ब्रजभूमि के पारिवारिक अरु सामाजिक जीवन मे बालक क ज म ते लक वाकी मृत्यु पयत तक यो परिस्थितीन म कहा कहा उतार चढाव आमै ब्याह सादी क औसर प बिचौलिया कैसे T मिलत भय परिवारन कू विस एण्ड सपन परिवे को प्रयत्न कर है। य सिगरी व्रजभूमि की जीवन सली अरु बिनको मर्यादान में उतार चढाव संघप को कंचन करत घरी उपयास मे लेखक की क्लम ते सटीक वनन भयो है । सतोसी मस्त भोला प्रा स्वा भिमानी ब्रजवासी के जीवन को सिगरी विससतान को निचोड 'क्चन परत खरी उपयास की एक एक घटना म प्रतिविम्वित भया है । 'कचन करत खरी' उपयास मे विद्वान उपयासकार ने औपयासिक शिल्प को आद्यो पात निर्वाह किया है। उप यास सिल्प की रक्षा करत भये लखक न बडी सादगी जरु सरसता के सग करनीय कू याम प्रस्तुत कीनी है। तीन पीढी की क्या म एक नारी के सघस कू उजागर कर उपयासकार न सामाजिक अरु परिवारिक जीवन के सच्चे रचनात्मक विकास म निरासक्त कर्म के महत्व कू मनाहर ढग ते प्रतिपादित कीनी है। औप यासिक शिल्प निकप कंचन करत खरो' की विवचना प्रस्तुत करनो चाह है। कचन करत परौ कथा की डगर क्थान अज अचर की है। सिगरी पंथा भरतपुर डीग अऊ गामन के आस पास की है। उप यास को क्थ्य सक्षेप मयौ है बोहरो धोखेलाल अरु बाकी बेटी चदा भरतपुर को चामेलाल कम ब्याज प बोहरगत करती। भलो आदमी हो । गरीय गुरपान व ताई भलाई की सोचती । वाकै भइ इकलौती वटी "चदा । बोहरे की छारी ठाठ बाट सी रहेई । समै नै पलटा खायो। कई साल अकाल रह्यो । पान बाकी कमर तार दई । बू हर साल अपने आसामीन को झोरी भरतो रह्यो । याए अपन पर चलाय 4 लाले पर गए। इत बाको छारी सोतह बरस की है गई। बाकी मैया अची सर बापी बहू बाए खोदि खोदि क माइ जा रही क छोरी पोरे हाथ पर जाएं। चामे पहा फहू जातो म्हाई लेन दन मोलभाव वाम ए विगार देतो। चदा स्पवती पढी लिखी हो। राब काम म हुस्यिार पर गाली हालत बिगर जाब त मोज ह नाय परती। चदा को वई पर दिपारी भयो पर माटी मह नई पड़ी। कचन परत परी होनी चइए। चदा अरु चफोर 1 अखीर मे चदा नई हल निकासी । बाको एक परिचित कालेज को साथी हो चकोर । वाद विवाद में हमेसा पहली के दूसरो नम्बर पाती। चदा ऊ वाद विवाद में भाग लेती। दोनोन की जान पहर्चान है गई। एक पोत दहेज के विरोध में चकोर ने वाजी 'जीत लई । बडी वाहवाही मिली। चदा न वाते पूछी, दहेज के विरोध में जो बात होठन सौ कही है बू होठन तकइ रहैगी के जीवन में उतारी जाइगी ?" ता समै चकोर ने कही 'या बात को उत्तर तो समैई देगी पर हो मा सबू अपनी बात को धनी इन बातन की याद दिबाबे के ताई चटा ने चकार की नब्ज टटोरी । चवोर चन्दा सों प्रभावित ती हतई हो। चदा के घर की गिरी हालत ने चकार के मन में और सहानुभूति जगा दई । घदा नै ई. बता दई क बू जाति ते बाढई बामन है । चकोर तो गुन को गाहक हो । बाने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। पोरे हाय चदा अरु चकोर के चदा ने अपनी बात चिठ्ठी के माध्यम सौ पिताजी सौ कहनी चाही । पाती निखिक बिनकी डायरी म धर दई । रात पू पाती पढी और राधा कू सुनाई । सबरे राधा नै मिगरी यात पूछी तो चदा नै मैया कू सतोस दिवा दियो। इतक चकोर चन्दा ते तो हाँ करगो पर गाम मे पहुँचते ई नथिया ए अतरजातीय ब्याह की बात पसद नइ आई। थान चकोर कू समझायो पर चकोर नै तो कलमाई नई भर्यो। बा अच्छे अच्छे ढोक लगा रहे पर चकोर तो बात को धनी हो । चकोर के अतर जातीय व्याह की बात गाम बारेन कू नागवार गुजरी। चकोर अपनी बात पै जमो रह्यो । गाम नाराज हो तो गयो। तबई एम ए को रिजल्ट आयो । चकोर ने एम ए टोप वियो। बिता चदा नैऊ बी ए पाम कर लियो । चकोर अतर जातीय व्याह कर रह्यौ है या बात कू लक अऊ गाम में पचायत भई । क्सिोर सरपच, मूला पच, परमात लम्बरदार नै नथिया क समझाई बात बंड गई। नथिया को सग देव बारी बाको धरम भैया बहोरी ही । नथिया अरू बहोरी के घर छेक दिये। बात ह्या तरई नाय रही। चकोर की मढया प पत्थर बरसने लगे। एक रात तो छप्पर म आग लगा दई । मैया बेटा बच तो गए पर गाम बारे ने हमदर्दी क बोनऊ नई बोले। जब वे अऊ छोडि चलवे लगता चकोर को लैक्चरारी को कागज भरतपुर ते पायौ । मैया बेटा दुखी दुखी भरतपुर पोच । भरतपुर मे चकोर के यार राजेन्द्र न वाकू बसायचे पूरी मदद करी । भरतपुर पौंचत ही चदा अरू चकोर को न्याह भाय समाज मदिर मे सादगी सौ भयो। चोखे गधा पर अची ने चदा के पोरे हाथ पर चैन की सास लई। चनी घरोबा टूटी ब्याह पाछ, चकोर के भाग्य ने जार मारो । बू आर ए एस भयो जस जी डी ओ है 4 डीग म ई आयो । थोरे दिनान मेई चू चारो और पुजगो। एक दिना मऊ गाम वारे समोर वे सग मापी मागवे आए अन्य बाए अपने गाम चुनाव को नौती" बचन करत खरी 5 गए। चकोर ने अपनो पुरानो घर भाव उठायब तार म रप दियो। सब गाम बारन सों बू प्यार सौ मिल्यो अर दूसरे दिना अझ पौंच गयो। म्हा सूब जलसा भयो । जय बू डीग कू लौट रह्यो। तवई एक्सीडट है गयौ-अस्पताल म बान दम तोर दियो । वाई समै चदा के छोरा भयो । नथिया ने अपने बेटा के मरवे की सुनी नो वानी हाटफेल है गयो। बूड चल बसी। रह गई चदा अरू यानी गोद म एप दिना वो छोरा । राजेन्द्र राधा अर चोवे च दाप छाती दकै परे रह । चदा सोसल एजूकशन आफीसर की नौकरी दिवाय राजद्र ने दम लई । राधा चदा डीग मे सम्हारनी रही। चासे अपनी मैया कू भरतपुर म सम्हारतो रह्यो। चीन अपन बेटा दिवाकर पू पायो लिखायो। पिलानी म बी ई करवायो। पिलानी मे दिवाकर चुनावन मे अध्यच्छ चुनी गयो । बाप कातिलाना हमला भयो पर जान बच गइ । चदा न म्हा जाइक अपन व्यौहार सा सबको मन जीत लियो । एक अच्छी मैया को उत्तम न्यौहार देखिक सब पदा + भक्त है गए । सवक प्रेम को पाठ पढायो। सघष अरु सजन की सुगध - दिवाकर भरतपुर आयकै फैक्ट्री में इजीनियर बन गयो । बानो ब्याह सादगी सौ रजनी के सग भयो। रजनी धार्मिक विचारन की महिला ई । एक वरस पीछे रजनी के छोरा भयो। नाम रखी गयौ प्रभात । घर म खुसी छा गई। थोर दिना पीछे जनम जाठ आई । घर मे ब्रत राखौ। रात कू प्रसाद लब दिवाकर अरू रजनी मन्दिर क गए। अचानक रनजीत नगर के चौराहे पं एक्सीडेंट है गयो । दुरभाग्य सौ दोनू मारे गए । चदा पं ओर ब्रजपात भयो। का करती सहनी परो। हो चदा न हिम्मत नई हारी । प्रभात कू लेके अऊ गाम पाँची। अपनी पेंशन ग्रेचुटी गोधन एक फारम बनायम म लगा दियो । एक खोली छोरीन को स्कूल । आवासीय स्कूल बाकी पदाई सेवा भाव दखिक सब दंग रह गए । दूर दूर तक नाम है गयो । प्रभात हूँ होनाहर निरस्यो । बान स्कूल मे प्रथम प्रायक खूब नाम कमायो । एन पोत बान एक लुटरेन के गिरोह कू पकडवायवे म कमाल कर दिखायो । वाकू राष्ट्रपति पुरस्कार मिल्यो । चदा सतुष्ट है गई + प्रभात कचन है गयो है। या तरिया सवकी सेवा करती रही । चदा कू एक रात लकुआ को अटक भयो चदा नऊ जान लियो पछी उडनो चाहै । वान सब इकट्ठे किए ट्रस्टीन के प्रभात सौंप के कहीं याको सादगी सो ब्याह कर दीजों प्रभात ते कही जब तुम आए जगत म जग हासो तुम रोइ। ऐसी करनी कर चलहु तुम हासौ जग रोइ । इतनी कह चदा सदा कू मौन है गई। कथा के ताने बाने अरु दरपन पावन को या कथानक म यो तो अनौख किशोर मूला परमाल रग्गी बहारी राजेन्द्र दिवाकर, वनुआ प्रभात भरत जादि पुस्प पात्र हैं पर चमोई प्रमुख है। चार की मत्यु के पाछ दिवाकर अरू प्रभात उभर के आए हैं। बीच बीच म राजेन्द्र बहारी भरत जम पारन के माध्यम सौ पानक आम बढी है महिला पाचन मे चन्दाई प्रधान है 6 कचन करत घरी राधा, अ ची नथिया सहयोगी स्त्री पात्र है। पात्र धरती क जपने बी7 के है। बिनक' त्रिया कलाप अपने जैसेई क्रियाकलाप है। जैसी समाज में देखो है बसोई पात्रन के माध्यम सौ ज्या की ज्यो उतार दिया है। दूसरे की वहदी कू देखिक जरवे, अरू कुढवे बारे रग्गो जस पात्र हैं । बन तो भजनानदी है, पर मुख मे राम बगल म छुरी विनको धरम करम है । चढी छान उतारखे मई बिनै मजा आव । बिनते कोऊ छोरान के नाते गोते पूछये को सहयाग माग ता सूधे म्ही बात नाय कर। सौ सौ एहसान दिखावै । अनौखे जसे पान हू है जो यसैष्णा क मारे भए है। अपने मित्र चोखे की मदद तो करै पर यसेष्णा के भूखे हैं। कबऊ कवऊ द्वद ये झूलान मऊ झून । बदनामी की सुनिक हिल जाए । छोरा छोरी कौन्याह अच्छी है जाय तो चेहरा प चमक आ जाय । किशार, मूला परमाल जसे सरपच अरू पच हैं, जो लकीर के फीर है के नई बातन न अपन गर नाय उतार। जब चकार वी डी मो है जाए तो भय क मार बिनकी आख खुले । राजद्र जसे यार भाजऊ मौजूद है जा शहर म नवयुवक मडल वनाय के दहन क विराध म धुजा ऊची करें। बदलाव , ताई नई मायतान कू स्वीकार। अपनो क्त य निभाइन म जीवन को सार समझे । चकार + मर जाबे के पीछे अपनी भाभी चदा कू नौकरी दिवाय कई दम लें। दिवाकर वो चरित्र बडो सतुलित अरू आदसमय है । वू पिलानी म अपने मानवीय गुनन सौ सबन को है जाए। सब वाके है जाय । अपने बुद्धि कौसल सौ अपनी अरु अपन कालेज को नाम कर । याही तरिया प्रभात दिवाकर सौ ह आगे निक्स जाए । बू मधावी दयालु सवाभावी निर्भीक वालक है । अपनी जान जाखिम मे डार कैऊ सवा कर अ नाम कमाव याही सो राष्ट्रपति पुरस्कार पावै । चोसे या स्थानक मे प्रारभ सोई दिखाई पर । भलमानसहत बाकी रग-रग म बसी है । तबई तो घर को घामा रक क्सिानन की मदद कर । रुपिया डूब जाए पर बू काऊ प जोर न जनाय । पाऊ व खिलाफ नालिस डिगरी नाय कराव। दुखन ने दो अरु झेले । समाज में, बिन पइसा सब सून' जब देखें तो अक्ल दुरूस्त है जाय । घर म दिन रात मैया अरू बहू के कुचरके सुने । सौ सौ ताने सुन । हिम्मत नाय हार । परिस्थितीन मो जूझ । बू दक्यिानूसी नाए-नएपन ए स्वीकारे। नई पीढी सौ मल कर चल । चकोर या उप यास को प्रमुख पात्र है जो कम के पथ पं सरटन भेलिक आग बढ़। दू मुसाग्न च.दि तानिय नुसल वक्ता, धर्मठ सहनसील समाज सवी, उदार हदय, मितभाषी, मधुर भासी है तबई तो सबसे हृदय को हार बन जाए । गाम में पपडेन ए सहतोभयो अग्यात अधार में निवस पर अपन हाथ पामन व बल प । एक दिए मरू तूफान की सीरहानी दिखाई पर । बान हिम्मत हार व ठनो तो शीयो ई नाए। नए विचारन मो युवर भवस्मात पल बस ई जाने कौनसी विडम्बना है। ई समस सौ परे ह । जा सबरे हित म रत ह वारी जीवन याही सो जाए ई रहस्य बनो रही है। कचन करत परी 7 कथा की बगिया मे नारीपात्र नारी पात्रन म चदा प्रमुख है। उपयास यी नायिका बूई है । कथानक ये सिगरे नाने बाने बाई क और ढोरै बुने भए हैं। जसी वहै क्यार पीठ तब तंसी दीज क अनुमार ठाठ बाट सो रह्येबारी चना भीखा पाते ई सादगी सौं रहै। मक्ट के समै स्वय हल निवास बारी सकट में सीना तान के ठ डी हैव वारी गुनन की 'यान है । लज्जा सौ विभूसित, समाज सेविका सहयोगिनी कमसीनता सवेदनसील प्रादि स्त्रीयाचित गुनन सौं रची पची है । समाज म महिलामडल बनायक बाल विवाह, मोमर दहेज, बहु विवाह जादि को विरोध कर समूह विवाह गरू गारगी सौ शिवाह करायकं पादश उपस्थित वर । युगानुम्प नए नए कामन म रूचि ले। छोरीन क आवामीय पाठसाला, पाम, घरेलू ग्रामीण उद्योग खोलिक मप्तीन के युग मे आत्मनिभता को पाठ पढावै । जो कोक नाके सपक म आबे बाइक वचन बनाय दे । सही मायने मे चदा पारस है । राधा अरू अची सामा य नारी है। बेसुख म सुखी अरु दुख म दुखी लिखाई परै । ची अपनी परम्पागत बिचारधारा सौं ग्रसित है । कब-कबऊ धुरपट्टीन सुनायक चायवेलो खडो वर दे । राधा टू पीछ रहबे बारी नाए। दू चोखे ग चोखो खबर ले । नथिया नारी पानन मे दया की पान है जो जीवन भर गरीबी मे रही है। मेहनत मजूरी कर छोरा लायक बनायो है । गाम बारेन ने बू दुत्कारी तऊ गाम को मोह नाय छोडी। गाम बारे जिन घर प्रजारो जब बाके पास आए तो बू खिल उठी रोम रोम नाच उठी । बाय देवी की सग्या दे तो कोई जतिस्योक्ति नाय । या तारिया सौं जितक पान ह वे समाज के नोगन को प्रतिनिधित्व करबे वारे हैं । नई पीढी अपने आप साचेगी 4 दिन पाचन को अनुसरन करे । किनक छोडे । बातचीत को बाकपन - - क्थानक क जागे बढाबे वारे मबाद याकी जान है। गोकभाषा मे कहैं के इनक लाक बोती मे वहै । जसो पात्र बसेई सबाद । थारे मे घनी बात कहब बारे । गागर मे सागर की नाई । कहावत मुहावरेन मी भर पूरा एक उदाहरन देखो-चोष न रग्गो ते पूछी- 17 -- अजी वोऊ और छोरा बतायो ।। चा नइ जची? । । अजी जची तो खूब पर तेते पाम पसारिये जेती लाबी मीर । 'अरे ताला यो कह ज्यो ज्या गोह मोटी होय त्यो-त्या बिल सकरौ होय । ठेठ ब्रजभाभा के ठाठ सम्बादन मे विखरे परे हैं । चकोर जब अ तरजातीय ब्याह वे नाई नक मौह खान दे तो लोगन के तरिया नरिया के क्थन दखौ. . -- - 8 कचन करत खरो - "हमारीई बिल्ली हमसी म्याऊ कर । कल परसौ को छोरा हमारी सामनी करें।" "अजी राड की माड है रह्यो है । "लाला ऊपर क मत थूकं ।' 'बेटा गाम मे रहबो भूल जाइगो ।' "अगर हमे मालूम तो होती एसी कोधई नई हौन देत जाप आज मक्खी भिन मिना रही है। 'बेटा ज्वानी में अची मत बन । ज्वानी हमपैऊ पाई। नागी पीछो मौचले। - इन क्थना में स्वाभाविक्ता अपन आप आ गई है। सामाजिक परिवेस - देम वाल अरु वाटावरा की परिधि मे ई उप यास आजादी क. पोछ घटनान क समट भए है । मज अचर माहि सन् 1948 के पाछै समाज म का परिवतन आयो है । गोमन म पुरानी लकीर पीटव मे अबई तक लोग चून बाधक पीछे पर जाय । पचायत बैठे ओर कहर उहावे म अवऊ पो नाप रहै। नए युग की तहर सौं अबई दूर अनेकन रूढिन मे वधे भए है । पास तौर सौ दहेज ने भूत सौ सबई सताए भए हैं। तोऊ पासा की किरन नई पीढी को बुलद हौसलो दिखायौ है। आजादी + पाई पचायत समिति, महिला मडल, नवयुवक मडल नइ रोशनी लाइने क है। उप यास जैसी बाताबरन वसी झाकी अनकन ठौरन पं बिखरी है। ऊ गाम म पचायत को सस्प देवा- - . - "गौम के मदिर में पचायत जुरबे लगी। गाम के लोग अपने अपने फैटान नै बाधक इकठोरे है गए । सब अपनी-अपनी मौछन पै हाथ फेरिबे लगे । गाम की इज्जन मै ताई म्यान म त निकसबे लग। या समै एसो लगी के राम के धनुस ताबि पं विराधी राजा बौखला कह उठे होय, का धनुम टटवे तई ब्याह थारइ है जान दिगें ।' याही तरिया होरी की त्योहार मनाते समै को बाताबरन चित्रित किया है "सान नै मिलिक पहल धुन्डी को उत्सव मनायो । धूल धक्कड सौं हठिक रग गुलान की सूब होरी खेली। ग्रज के खूब रसिया गाए। ढप ढोत चग ले नवयुवर' मडल भरतपुर की गलीन मे निकम परौं । 'माज बिरज म होरी रे रसिया होरी गामत-गामत हारी के रस में डूब गए । सबन के चेहरा रग गुलाल म एम रग गए पहचानव कचन करत बरी 9 1 मऊ नाय आय रहे । सय एष दूसरे के गर लग रहे। होरी यो मिलन रायन ये मन व मैल व दूर पर रह्यो । दुपैर तक घर में सब घूर घूर है गए।" याही तरिया माय ममाज में व्याह य समै यो चित्रन देयो-"पडित लखीराम 1 मुदर बेदी की रचना करी । चारों ओर हरटी, गुलाल, म्हदी प्राटी बन गई रगन वी अल्पना मादी गई। बैदी ये चारा और मुदर महप बनायो। मेरा के पात चारा पोनेन प लहरा रहे । बदी के चाग और पत्तरन प मामग्री सजा दई गई । एष और ध्यो को पात्र रखो गयो, जामे सू वा परयो । न्याह ने ताई मिगरी तयारी है गई। बानगी वैम्प म तीनो उदाहरन मुक्तरे हैं। - ठेठ प्रजभाषा कोठाठ - या उपन्यास की भाषा ठेठ प्रजभासा है। सरस अ6 सरस । सनी अपनी अनूठी है गई है वहावत मुहायरेन ये प्रयोग ते। वहावत मुहावरेन ने याये मिठास में और रम घोर दिया है। पाई एमो पना नइ होयगी जाम पहावत मुहावरे नई आए होय । वह कहू प्रजभापा ने सग उ, यश आ गए हैं बिन भाषा माधुय बढायो है घटायो नाय। देखी चार लाईन- 'चाले ने जय चकोर की बडाई सुनी नो बाछ खिल गई । सोचिये लगौ अधे से हाय बटर लग रही है । बाए ईक परसाकला याद आयो मेव मरी तय जानिए जव चालीसा होय । बडे बूटे यह गए हैं हरी खेती ग्यावन गाय जब जानी जब म्हौतर आय । बाऊ ने आधरी ते वही तेरो भया प्रायो है । बान वही भाा कह तो भौत रही ह पर जब भुजा भरव भेट लुउ गी तब मानू गो।' सोई चौबे ने कही माटी मड लग जाए तब है। मसखरान प ते भर चौख लई जाय तब है। और देखो दो लाइन मुहावरेन भरी-"अपनी करनी प वे अपन आप गढे जा रहे । पर अब पछताए होत का जब चिडिया चुग गई खेत । सब कानाफूमी करते यार हमा अपने पामन आप कुल्हाड़ी मारी है । अब तो जसी करनी वैसी भरनी है। याही तरिया चित्रावन उपयास मे ठोर ठौर प दिखाई पर । रेखाचित्र वी झलक देखो चदा के स्प बरनन म- बाकी आखिन मे डल योल की गहराइ, गालन प सेबन की ललाई, सासन म सालीमर अरू निसात माग की गध प्रम वाकी देह माहि केसर पी मलक वाए नस्मीरन समझिये कू भौतई ।" सदसौ उपयास को- या उप यास को उद्देश्य क्म अरु भाग म वम प्रधान है यही सिद्ध करक दिखायो है । हम मान ग्यान सर्वोत्तम है । पर ग्यान को चरम सीमा म सन्यास है जो गीता को मत्र है। वमयोगी को तो हर कम लोक कल्यान के ताई हाय । चकार मर चदा के माध्यम सो तथ्य – उजागर क्यिो है । म करते भए षस्ट क उठाने पर, 10 चन बरत परा तो उठान चइए । दुनिया म बई पुजे जो कर्म के पथ पै मर मिटै । चकोर नै नीतिपय पै चलक कम को पल्लो नाय छोडौ । सफलता अपने आप चरन तरे आ गई । चदा ने जब सौ होस सम्हारी तबई सौ 'चलबे को है नाम जिंदगी मत्रक आचरन मे ढारी । याही सौ बू पारस भई । याही सौ बान जाक छुनौ बाई कूकचन बनायो । समाज म फैली कुरीतीन मे दहेज प्रथा – दूर करने के ताई भासन नाय दिए । चदा अरू चकोर ने आदश रूप प्रस्तुत कर बतायो । या उप यास को एक उद्देश्य है व्रज सस्कृति की याकी प्रस्तुत करिबौ मस्तमौला प्रकृति के लोग ब्रज सस्कृति क सजोए भए है । लगन व्याह के औसरन पै गाइवे वार गीत सुनाई परै तो होरी प मस्ती भरे गीतन की गूज सुनाई पर । नई पीढी क ऐसी करनी कर चलहु तुम हासों जग रोई ' अध्यात्म को सदेस दे । बदलाब के ताई व वैग्यानिक दृस्टिकोन के ताई उपयास रचौ गयी है, जासौ जीवन मे नए आयाम खुल नई राह खुलै, नई मजिल दिखाई पर। हा ध्यान ई रखी है के अपने पुरान अच्छे - छाती त चिपकाय के राखं गले सडे कू काट छाट । नारी के तीनो स्प बेटी, पत्नी अरू मा, प्रस्तुत किए है चदा के माध्यम सौ । अबला सौ सक्ला रूप दरमाया है या उपयास म। थपेडे 4 थपेडे हू सहक नारी को स्प निखारी है या उपायास म। सवा समपण अरू धम के पथ प चल जीवन को सफलता अरू साथक्ता सिद्ध करी है या उप यास म। साथकता सीसक को - । एक बात उपयाम सीसक प कहनी है। लेखक ने याको सीसक सूधम सट्ट "चदा ' रखने की सोची। फिर बिचार बनौ उतार चढाव भरयो जीवन जीने बारी चदा को चित्रन है यासो 'उतार चढाव रखी जाए। फिर बिचार आयो ऐसी करनी पर चलहु सीसक रख, चौंके अखीर मे चदा ने ई बात प्रभात सौ कही है। पर बात 'चन करत खरौ'पै ठहरी। बात साची है। चन्दा नै कठिनाई झेली । भवरन मेते नया निकासी । मेहनत सौं बान समस्या हल करी पर चन्दा य्हाई तक नाय रही बान समाज मे अलख जगायो गाम गाम घूम के । महिला मडल बनाय के बान अपनऊ कचन बनाए अरू दूसरे याही सौ 'कचन करत खरी नाम दिया गया है । राजस्थान मे अजभाषा को जि उप याम गद्य को पैलो प्रयास है । अनेकन कमी हुगी । भाषा दोसक होयगी । एक सब्द के दोऊ स्प मिलिगे। विभक्तिन केऊ दो स्प- मिलिंगे पर अपनी भाषा है कृस्न कहैया के मुख सौ निकसी वू भाषा है जाम कहैया ने मचल मचल के माखन मिसरी मागी। फिर ई व्यो नई अच्छी लगगी। ऐसी ब्रजभापा अपनी आत्महत्या वरले कौन क अच्छी लगेगी ? नई पीढी यासौ वनित है जाए। या ई भाषा अजायबघर मे धर दई जाय यामे नौन सो भलो है। अपने अचर की भाषा की हत्या त बढवं कौन पाप होयगी। हम दखत रहे अरू याको हत्या है जाए ई कहाँ । पचन करत खरो

तब ठीय है । आप सोचा, अपनी मैया वीर प्यारी तय सग । मेरी पाह है प्रज
माधुरी यो बरसा या पद्य में होय मरू यायो गद्य आज भी गमस्यान भ. सुरगाने व
ताई अपने ओज य उतारै । सबों बड़ी बात है, नई पोटी भ अलगाव मरू
मटमार मो हटाम नह पी डारी म जाई ।
डा. विष्णुचद्र पाठक
अध्यक्ष
राजस्थान प्रजभाषा अगामी
चैत्र प्रतिपदा म 2047
27 माच 1990
1
-
12
वावरत परी

साची सांची यात लेखक की कलम ते 'सयाग सौं मोय जुलाई 1961 मे वर जानो परो । बिन दिनान मे डा गिय राघव वैर में ई रह रहे । स्कूल मा छुटटी मायके पवऊ-क्वऊ सांझ पू बिनो घर पौंच जातो मै बडी आवभगत पर है । शिसम पोलिवे पू यारवासी यो सौ ब्योहार पर है। दिनको सुभाव हो परना दवे घो। लिखिवे की प्रेरना । एक दिना यातई बातन म "माहवो" पाध्य लियचे व ताई मिगरी रूपरेखा बनवा दई। वातन के दौरान वे उपयास निखिये वी याक ममयायो पर है। धरती मेरा घर ' उपयास बिन दिनन में छोरान फ पढानी परती। बामै ओपलिक्ता को पुट मन कू वाघ लती। मन उपयास मे रम जातो। 'क्व तय पुकाम् ?' उप माम ये नामकरण को जय विनं रोचक प्रसग मुनायो तो मन औरळ पान द प्रायो। एक दिना पार बनवामते भए किन ऊपर घर पै मुनी क नट मागवे के ताई पुपारती पुकारतो हैरान है गयो है । अखीर म वान (नट) यही पत्र तर पुवार ? बस याही क लक निख मारो विने "क्य तक पुकारू उप यास ? डा माहव न बतायो के ग्रज अचर मे इतेष सामग्री विखरीपरी है फोक सम्हारवे यारोनाए । बम बिनयी प्रेरना भरी बातन न मन म एक वीज बो दियो। मैंने हू विचार कियो प्रज मस्कृति कू एक आचलिक उप याम मे उभाई बीज भौत दिनान तक अधेरे मे परी रही। न जाने या वीज प क्तेिक पत चढ गई । समै आयो सन् 1983 मे । 28 फरवरी कू कामो मे राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने समारोह करायौ। या समारोह में प्रजभाषा अकादमी बनायव ये ताई राजस्थान सरकार के सामई एक प्रस्ताव रखी गयो। ता समै श्री जुगल विशार चतुर्वेदी ने एक बात कही अज भाषा म पद्य लिख्यो जाय सके गद्य नाय लिम्पी जा मके। मैंने ता समैं बिनम्रता सौ कही गद्य कू नकारनौ सरलता की और बढ़वो है। ब्रज भाषा मे पद्य लिखौ जा सक गद्य नई ई तो बुई बात भई, आट की पूरी तौ वन मक रोटी नई । हो गद्य लिखिने मे जोर जरूर पर। कौन जोर उठावै। कविता लिखी पड़ी। वाहवाही लूटी अरू लिफाफे लकै चल दिए। यासो वाम नाय चल सके। अपा अचर की बात अपनी भासा मे लिखिको सरल है मग । अपन मन की बात अचर की भाषा मे अच्छी तरिया कही जा सके। या वात कू सुनिकै चतुर्वेदी जी चुप लगा गए बिनको महानता है, पर मैंने बाई टिना सवल्प ल लियो प्रजभापा गद्य मे आचलिक उप यास लिखिये की। वचन करत खरी 13 ता दिना मैने विचार फियो-जय गुजराती मर मराठी को गद्य गुजरात मरू महाराष्ट्र पर घर म ठोर पा सब तो मजभाषा गद्य तो जरूरई सुपो मा पद्यों जाइगौ । हा इतेव' जनर है बज गय लिन्यो जाय आधुनिय समस्यान पे । जाम थाधुनिर बोध होय । बरफ तोरिचे वारे हाथन यू दुनिया नमन मरती रही है । सन्नाटी तोरिबे को काम करवो एप साहित्यिक पुय है । यारे ताई कठोरता वादी रख छोहिक उदारतावाटी रुख अपनानी जारी है। समै व सग घलो जाय । जिन सदन बू दूसरी भासा सौ ल सर्व विन पचाय चलब म बुद्धिमानी है। भाषा तो प्रवाहमान है युग सग नए शब्द गढनऊ परे । लेसर को वाम तो सदन में प्रयाह म हारिवेरी है--सन्न मे दम होगी तो तर सरिंगे नई तो नती उठायर बिनै गहर फेंक देगी। मैं मनई मन बिचार वरतो रह्यो विसक नए लन चइएँ ? समाज म किन कुरीती। न अडडी जमा लियो है ? इन्ले से उखारी जाए । बालेज म का राजनीति चले ? समाज मे का या तरिया के लोग विखरे भए हैं ? वा का विचारधारा के लाग हैं १ बिनको चित्रन करची लग खतर ते खाली नाय । मैंन जानबूझ के दुस्साहस क्यिो है । नामन म थोरी सो उलटफेर करव अपनी धरती की कथा उठाई है। एक अबला कू सवला सिद्ध कर के ताई प्रयास किया है। समाज के कल्यान के लय कम परिबी ई धम बताया है। छपबै सौं पहलै उप यास कू श्री मोहन लाल जी मधुकर ने पूरी तरिया पढी। सशोधन क सुपाव दिए । श्री तजसिंह जी ने सिगरी उप यास धय सौ सुनो अरू अपने अमूल्य विचारन को समावेस करायो। श्रीमती द्रोपदी दवी ने लोकगीतन के नमूना प्रस्तुत किए। याही तरियो डा वी सी पाठक श्री हीरालाल सराज, डा राम कृष्ण शमा डा दाऊ दयाल गुप्ता श्री राम शरन पीतलीयज श्री महावीर प्रसाद कुमावत जैसे सहयोगजन को प्रोत्साह्न या उप यास क सनारव मे मिल्यो। इन सवन क सहयोग के प्रति हृदय सो प्राभार । अत मे मैं स्व श्री हरिशकर जी पाराशर क नमन कर जिनकी प्रेरणा मोय सदा मिलती रही। उपयास आपके हाथन मे है। आप भाव अ नई पीढी कवछू प्रेरना द सा तो मैं अपनी स्रम स्वय सफल मानगो। irra sh 14 पचन करत घरी चाये न अपन जीवन म सन्तान के नाम प इकलौती बेटी चन्दा ई पाई। याके पोछन छोरा भयो न छोरी। याके ताई पान यास-पास पूर दौड धूर करी। डीग में हती एक धूपा दाई । यो तो जान को कोरिन ई। चडी मली कुचली रहती पर जच्चा बच्चान क मामले मे लच्छे डाक्टरन ने चारा याने चित्त लाती। असम्भव के सभव पर देती। वान ना तो बहू पोऊ पढ़ाई पढ़ी ना पहू ट्रेनिंग पाई पर अपनी सास के सग रहवं जो अनुभव पायो चुई काम देतो। दिखावट, बनावट सजावट, मिलावट ते कासन दूर, पर करताउस्ताद होय। सन्तान के इच्छु वाके पास दूर दूर ते अपनी बहू वेटीन न तब आते। बु जहा हाय हारती पालो ना जाती। थोरे पईसान में हमारन को काम करती। बान चोरी कू भरपूर उपाय बताए पर बात नई बनी। भरतपुर नगर के नामी गैद्य रमस के सामई चौरी ने अपनी दुखड़ा रोयो । एमे नामी गिरामी रमेस नऊ चोसे कूदवाई दई पर भमाता के अवन न कौन मिटा सके। डीग म मनीराम पडित को नाम घोमे कू बाऊ न सुझायो। वाके यस कू सुनि के चोख मनीराम के पास खिंची चली गयो। अधे कू ऑग्न अरु मरते कू सजीवनी चइए। चोथे नेऊ अपनी दुखडा मनीराम के आगे रोयो । मनीराम न वा • उपाय बताए पर फ्ल दुई निस्सी जो पानी के विलो प निक्स । चोखे न या तरिया अनेकन स्यारे-भोपन की दहरी को धूरि लई । अनेकन गडा ताबीज कराए, जनेक्न जन्तर मन्तर कराए अनकन जादू टोना कराए, अनेकन दई देवतान की मनौती मनाई पर कछ हाय नई आयो। हार पखमार ३ सन्तोष कर लियो। निपुत्री हैवे के दोस त ती बची भयो है। नगर म अनेकन ऐसे हैं जिनकै छोरी हुनाए । परोस म प्रास जन के पास जमीन ज्यादाद सब कछू हत्ती पर विचारे की बहू क मरी भूसरी हूँ नई भई । मास अपने ते नीचे के मान्सन नै देख तो बाए सबर ना जाए। ऊपर वारेन न देखें तो पछताव । दुख पाव । सुख दुख तो आदमी के मन की बात है। मन की उपज है। काऊ नै कही है, 'मन के हार हार है,. मन के जीते जीव, ' "और मन पगा तो खटोटी में मान्स चाहे तो दुख म है मुख को अनुभव कर सक। सुख दुख तो अपने हाथ की बात है हल्को करल बाहै भारी करल । जव चोखे अरु वाकी वहू राधा नगर के हारा वारेन नै देखते तो छातीप स्याँप मी लाट जाती। दोनो जन करमन न फोर क रह जाते । विधाता की विधि कू मान क जीवन कू दाते। पर जब ई विचार आतौ क कु भी पाक नरक म जाइवे ते ती वच जाऊ गौ तब बाए बसई सन्तोस होतो जस पपीहा के स्वाति जल को दुद सो होय। गगा। 2 रचन परत परी मुत्र दुप फे मुसान म भूलते भए मासे चदा की मुख सुविधा को पूरी ध्यान रपती । हत तो यू पालीस बरस को पर अनुभव साठ को सौ। पुरानो विचारधारा को पर युग की नई वातन जीवन में उतारिव म पोछे नौओ। एक आर पदा पाये की होम लिए रहतो तो दूजी और बाए रटोर अनुसासन में रखती । जुस बस धन प आर लगाए रहे ऐसई पदाप चौरसी रखती। चौकसी रसवे मतलव ई नाना के चावदी के रूप म रहती होय । चन्दा मालेजहू जातो अरु मन्दिरन म हू जाती। मेले तामस हू जाती, बाजार हाट . हू जाती पर जाती देख रेय मई। ऐमो नाय ३ मुली छूट होग। चोरो न दुनिया देखी। समान म छोरी छोरा पा तरियां सौ विगर रहे हैं, यानी चोखेलाल क्य अनुभव हो। दही बारी गली में एक वामन सी छोरी धोवी व एक कार कलूटा छोरा पे सग भाजगई अरु चिट्ठी लिय के धर गई प्यार दिया तो डरना क्या ?' याही सरिया समाज मधाए दिन ये दिगरे भय हालात १ देखि व चोखेलाल कि फूकि क पदम धरती। विटिया प ओघ रयत भए या बात कोज ध्यान रखती व धन्दा गहू कठार दवाव म टूट नई जाए। वाय या वात शो अनुभव हू नई होय क याप निगाह रखी जाए रही है। याको ऐसई ध्यान रखती जम नागरि अपन सिर प धरी पानी की गागर को ध्यान रख। चोखे । भोजन, भजन अरु व्यवसाय प त जो सम मिल ओ वू सब चन्दा की बढती के ताई जातो। चदा के लाभ फू ई अपन हो तो। राजा दिलीपअरु बाको रानी में तो नदिनो की सेवा करी होगी पर चदा की बढ़ोतरी दोनी पति पत्नी ने कोई कोर कसर नाय छोडी। चिता लाड चाव म परी चन्दा सोलह बरस को भई। यौवन की देहरी प देखके बाके मया बापन • बाके व्याह की चिंता लगी। राधा चोसे कू कुचरके लगायब लगी। उठते बठते सोते-जागते चदा के व्याह की चरचा परती नाय थकती। चोखेलाल की मया माची जो साठ के आम पास ही दुई चाहे ई, के चदा के पीरे हाथ वाके सामई है जाएँ । पुन्य हाप लग जाए । बूढी सासन को का पतो क्व निकस जाएं? पको आम ह्वा के झोरे त कब टपक पर। नदी किनारे को पेड कब खिसक पर । माज मरी क्त दूजी दिन होय फिर चौ नई नातिनी को ब्याह कर के सुरग म ठोर बनाई जाएं। बुढापे म मोह हू कछू बढ जाए । मोह के ताने बाने इत्तक पुर जाएँ के बु बिनम ते निक्स ही नाय पाव । चुह अचक अवक, उरतो डरती चन्दा के व्याह को वचन करत खरो 3 बात चोखे के कानन म सरकाती रहती। या तरियो राधा अरु अंची नै चासे के दिन के भोजन अरु रात की नीद हराम कर दई । चोखे लाल अव तानू अंची अरु राधा की वातन कू', या कान सुनतौ अरु वा कान निकास दती । पर अव अनसुनी अरु अनदेखी करबो वाके बसको वात नाइ। चन्दा को उठतो भयो हाड वाए दीख रह्यो । वाको साहूकारी को काम इतेक फल रह्यो जासो बाए फुरसत नाय मिलई पर अव वान जान लई के फुरसत निकासनी परंगी। दूसरे चौसेउ कोऊ पत्थर को तो हत नाऔ जाप पानी की वू दन को काऊ असर नई होती हाय । अब तो चोखेलाल वा माटो के तरिया हो जो पानी की बू दन सौं तर बतर है जाए । भीतर ई भीतर वाए चिंता व्यापवे लगी। । चोखेलाल की लेन देन भरतपुर ते वाहर गावन मे ई। सोऊ किसानन प । कातिक की फसल पानी के अभाव म सूख गई यात किसानन प विपदा के बादर गहराय रहे है। जासामी चोखेलाल • चारा ओर ते घेरे रहत । वसाख की फसल के ताई रुपयान की जरुरत इ। चोखे को हिसाव किताव कौरवन की सना की भाति अरु रावन के कुनबा की नाई बढ गयो। वू हू जानतो रुपया त रुपया कमायो जाए। याही मों वू खुले मन ते रुपया द रह्यो। बू या बात कहू जानतो क वसाख की फसल के ताई रुपया नई दियो गयो तो पिछलौ रुपया हू डूब सक । मास, पुढेष्ना सा हार मान वठ पर वित्तेस्ना अरु लोकेस्ना • नाय छोडि सक । या कारन सो अपने आसामीन को सुश्री साधवे के ताई वक सौ बीस हजार रुपया निकास लियो। पोस्ट आफिस में कुल पन्द्रह हजार रुपया हो। बू हू निकास लियो पर तौक वू अपने मासामीन को झोरी नइ भर पायो। चौखे नेधीरे धीरे हाथ खीचवी प्रारम्भ कियो पर आसामीन ने जब भौत ज्यादा बीनती करी तो चोख कू झुकिनी परौ। चौख ने अपनी घरवारी अरु मया की मान मनुहार कर क बिनको सिगरौ जेवर जांठी ल लिया । वा सवकू गिरवी रख क आसामीन की मांग पूरी करी। चाखे जो अब तक बौहरी हो अब वू कजदार है गयो। पूजी जब गांठ म ते निकस जाए तब वाकी हालत कितक पतरी है जाए याए बू ही जान सक जाने याको अनुभव क्यिो हो। जाके पॉयन की विवाई नई फ्टी हाय वू विवाई फटवे क दुख कू का जान सक? या सम चोखे की वसी इ हालत है गई जस गुब्बारे म ते हवा अरु पखाल म ते पानी निकस जाव प गुब्बारे अरु पखाल की हालत है जाए। चोख नै आसामीन कू सूर समझा दियो क वाकी छोरी ब्याह लायक है गई है। वारी ब्याह करनी है। एसौ नई होय क व्याह व सम सब आँप दिखा जाएं। ता मम सब आसामोन नाती ठोक ठार क, मांछन न मगेर-मरोर धरती प धणी पचन परत परी मार मार के, ऐसी दिलासा दिवाई, ऐसे दिल्ली के धैसेरा मारे, क चोखे फूल के कुप्पा है गयो। बाए या बात को सतोस हो क बान आसामीन कू रुपया के अपनी प्रतिष्ठा बचा लई है, अपनी सरुप किरकिरी नाय हौन दियो। आसामीन सौ छुटूटी पाय के वान चदा के ताई वर ढू ढवे को निहच कियो। राधा तो वाके पोटुआन मांस नौचि म लगी रहती। जव मया हू वाक पीछ पर गई। समझायो- वान चोखे 'बेटा नौकरी अरु ब्याह के ताई कछू ना कछू उसीला चइए। विना जान पहिचान के सम्बघ नाय होम । फिर घर बठे तो वर काहू न पायो नाऐ । यासो परोस के रग्गो ते मिलनी चइए। चोखे, रग्गा को नाम सुनते ई ऐस विधकतो जस काऊ विझुकाए देखि क कोऊ सांड विधक । रग्गो … देखते ई चाखे नाक भी सिकोरतो। बाकी नजरन म रग्गो दो कौडी को मान्म हो। मैया जब हठ पर गई तो चोखे कू रग्गो के पास जानी परौ । अपन घर ते रग्गो के घर जात समै रग्गो के अनकन चित्र बाकी आखिन के सांमई घूम गए । रग्गो रग को कारी हतई हो। वात ज्यादा मन को कारो हो। सरक्डा सौ, गाल पिचके भऐ । वडे ढोग ढपांग ते रहती। देखिबे मे भजनानन्दी लग औ । पर मन को क्पटी हो। - सिगरी बातन नै जानते भए हू चाखे रग्गो की वठक माऊ वढतो गयो। जस रोगी भयकर रोग के निवारन के ताई कडवी ते कडवा दवा • आंख मीच क मन • करों करक'लवे • तयार हे जाए ऐसई रग्गो अपनी मैया की बात मान क रग्गो क दरवज्जे म पहुँचई गयो। ई जान के के काम परे पे गधा हू वाप बनायो जाए बान रग्गो की वठक माहि पांव धरे । राम राम करी । चोखे । देखते ई रग्गो सव समझ गयौ पर अनजानौ सौ है क बोली- आओ भैया चोखे आओ। आज सूब बायो। वहीं राजी खुसोती हो। "हां आपकी किरपा है।" कही कस बाईयो भयो। चाचे ने अपनी विटिया की बात सामई रखो। रग्गो मूढा प वठो भयो, या बात कूसुनिकै गहन विचारन म डूब सो गयो । चोख बाए एस देखती रही जस काल सम किसान आवारा मा देख। फिर धीर धीर गभीर वानी म वालो- फचन करत परी S चोसे या काम के ताई मेरे पास आयौ है। कहाँ राजा भोज कहां गगू तेली? कहा राम-राम कहाँ टोय-टांय ? आकास पाताल को अतर है।" 'अजी ऐसी बात ची करो, हम तो आपको ई सहा है।" "चोखे भया, तु आयो है तो तरी अनुरोध का टारो जाए पर सम भौत बुरौ आ गयो है । बेटा बारे म्ही फार । बारह बारह मनके है क वठे है। हाँन्ना को ज्वाव छ छ महीना मे देंम हैं। "पडितजी कछु होय, विटिया के पीरे हाथ तो करने ई हैं।" 'अरे लाला ! पोरे हाथ चौ करन हैं । बिटिया को ब्याह खूब धूम धाम ते कर । अकेली बेटी है। जनम भर कमाऔ है । चोखो बाहरगत चल रही है।" "अजी दूर के ढोल सुहावने लग । सर, कोक छोरा तो वताओ।" "भाई, कसौ लडका चइए ? 'कसौ? - हाँ क्तिक पढौ लिखो होय क्तेि तक को बतायी जाए ? अरु याहू बात कू जान ले लडका देखवे ना जाए । वजार म जसे धन सौ चीज खरीदी जाए याही भाति समाज की हाट मे छोरा खरीद जाए । इन्जीनियर, जे ई एन, एई एन, डाक्टर प्रोफेसर, वकील भाव के अनुसार लए जाए । छोरान के हू टडर भरे जाए अन्तर इतेकई है या सौदा मे अधिक की दडर स्वीकारी जाए । . रगो की बातन कू सुनिक चोखे कू झूझर आ रही । रग्गो उल्टी सीधी बात कर रह्यो पर मज वावरी होय । दवी दिल्ली मूसेन प कान कटाव याही सो चोखे रग्गो की सब बातन सुनि रह्यो। बु अपन मम्हार क क्सौ छोरा होय क्तिक पढौ लिखौ होय ' वितक तानू को हाय ? या विस में अपनी राय प्ररट करता रह्यो। अपीर म रग्गो अपने दोनो पोटू न प हाय धरिक मूढा प ते उठी। अलमारी पोली। एक पुरानी डायरी निकासी। डायरी दियाय के तारीफ के पुल बांधे। क्यू नोस र पल्ल प बछू भूभरि म पानी को दियान को भौति लोप है गए। डायरी देयिरे के ताई रग्गो न टीन की पुरानी स दूक म त एक डडी को चस्मा निकासो। चस्मा चढ़ाय के पापल म्हों त अ गुरिया प यूक लगाय + डायरी पना बड़ी सावधानी सौं पलट तो मर बिदाजींगुर मक्खी आदि निकसप र बार म एन पन्ना प बाकी नजर ठहरी, आंघ गढाइ । कछू साच समझ के गरदन ऊंची करी बरु गापिगढ़ एकडारा की बात कही छोराको नाम भगवती, एम ए कपड़ो ह। 6 कचन करत घरी पूरे पचास हजार व्याह मे चाह रह्यो। फिर बान दो चार पना अरु पलट। डीग मे करकल्लो पटवारी को नाती हो बाके बिस में बतायो क, "करकल्ली न अपनी छोरी के ब्याह मे चालीस हजार नकद दिए, वरात की ऐसी खातिरदारी करी क धौलपुर बारे मान गए । इतेक सामान दियो के सवन की आंख फटी की फटी रह गई। चारो ओर हल्ला मच गयो। ब्याह का किया लट्ठ गाढ दियो। ऐसौ न्याह तो करनी परगौ ई।' । या नात कूसुनिक चोखे कुंपसीना आ गयो । या सम चाखे की गांठ में कानी कोडी हू नाही । सिगरी पूंजी आसामीन म वट चुकी। वक अरु पोस्ट आफिस की पास वुक खाली है गई। सिगरो गहनो गाठो गिरवी रखके आसामीन के आंसू पोछे अरु अब पचास हजार साठ हजार की वात । आसमान के तारे दिखाई पर रहे। चोले ने म्हो लटकाए, मन मारे रग्गो ते कही, 'अजी काऊ और बताओ।" 'चौं नई ऊँची? "अजी जंचौ तो खूब पर तत पांव पसारिए जेती लांबी सौर।" "अरे लाला यो क्ह, ज्योज्यो गोह माटी होय त्यो त्या बिल सकरी होय ।' ऐसी बात नाए पडित जी।' 'एसी बात नाए तो ची पीछे हट रह्यो है। छोरा इजीनियर वनगी । हजारन म देखिवे दिखावे लायक है। घर अरु वर दोन जोरदार हैं। दरबज्जी छोरा ने दिप उठेगी।" - 'सांची कह रह हो, पर इतेक बोझ उठायवो मेरे बसको वात नाए । काऊ सहर के छारा को कोऊ अती पती होय तो बताओ।" सहर को नाम सुनते ई रागो तन गयो। आज म कर्राई आ गई। वासी कढी मे उपान आ गयो। बोली- 'सहरिया सब दिखावटी होय । बिनत मिालवे जानो तो देखने ई कन्नी काटें। भूल चूक ते मिल जाए तो नानी सी मर जाए। कहाँ त आए हो कर जाओग ? जस सवाल करखे लग जाए । विनवे धोरे-चौरे कपडा अरु चिकनी चुपडी बात इसमनौ। प्रेम भाव तो गधा के सीग की नाई समझो। बिटोरा इ समझो। ऊपरान के नाम तो ढोल म पाल है। भया पहार दूर त ही अच्छे लगे। वान अपने मथुरा क एक नातदार को एसो नक्सा याची क चामलाल दयतो ई रह गयो। रग्गो फिर मथुरा के नातदार को बचान करवे लगी। कचन परत यरो 7 "रधु हमारी खास नातेदार है या हमारी मन ब्याही है । वू हू धिनक सग रहके सहरिया है गई है। एक तो हम पवक वाके यहां जाए ई नाए क्वऊ मथुरा म जाखिरी वस निक्स जाए अरु रुक्यिो ऊ पर जाए तो वहीं सकोच हाय । नीठन ते दो रोटी मिल पावं । बहू म्ही ते निरस जाए के भय नाए तो फिर रात भूयो ई मोनो पर । यासौ सहर की रासली माऊ पार रपये ते पहल सूब अच्छी तरिय सोच समझ लीजी । अरु देख याऊ बात को ध्यान रखियो सस्तो रोव वारपार आरी राधे एक वार । छोरी कू जनम भर सुखी देखनी चाहे तो जी करो अरु हाथ ढीली करनी परंगो।" चोखे रग्गो की वातन नै सुनिद'ज रामजी पी पर चलवे लगी तो रग्गो न कही "चोखे मेरी समय म कोऊ मोर छोरा मायौ तौ वताउगो पर समै समै पे मिलितो रहिया" तेरी दुख मेरी ई दुख है । ई ताई प ना बीत रही सर पं वीतती पाई है। चोसे 'अच्छा कहर चल दियो। रग्गो नै मनई मन में कही, बडी फूती पूनी खाई है । माठूराम फू अब सब पतौ चल जाइगी । अव तानू कमायो ई कमायो है । जव सत्र की बात आई है तो साच विचार कर रही है । चोखे न अव तानू काऊ के तरुमा नाय सराए । काऊ की लल्ला चप्पा नॉय करी, पर या समै गज पावरी है रही। वान अपन अनुभवन सग जौरन के अनुभवन को लाभ उठानी चाही। वाए इ पनी क परोस म एक जन न बिना पूछ ताछ अपनी भैन को ब्याह कर दियो । छोरा कुपत्ती निक्सौ । वान वाकी भन कू छोडि दियो । बू बिचारी पोहर म अपन दिनान न फोर रही है । दुखी जीवन कूढो रही है । आज हू बाए देखि देखि के बाके मैया वापन की छाती धधक रही है । ऐसे उदाहरनन कू देखि देखि क चोखे को मन गे परती। पढी लिखौ समझदार मान्स अपने मान की टोच के उजेरे म आगे के पथ कूदेखिनी चाहै । देख ना सक तो अनुमान तो लगाव ई है। चोखे चादा के भावी जीवन के सुख के सपने सजोए घर माऊ बढौ जा रह्यो । वाकी नजरन मे सहर भा रह्यो । बाकी धारना ही क 'सहर बसन्ता देवानाम गाव बसता भूतानाम ।' चोखे गाव बारेन के जीवन सौ भली भाति परिचित हो । बाके पास तो आए दिना गाव के मान्स आते रहते । ना व खाइबौ जान ना परिवौ । बिनक घर जाय क' देखतौ तो गूदरे ही गूदर दिखाइ परने । साऊ मैले कुचले । सफाइ ते रहबौ बिन सीखोई नाय । दिन रात गावर करे ते माथी मार । गाव को पूरी नक्सा चोखे की आखिन के सामई घूम गयो । ऐसे बमेल चौखटा मे अपनी चदा सी तसवीर क्स लगाई जाय सक । वान अपने मन मे पक्को निहच कर लियौ क बू चन्दा क गाव म नई। याहवौं । इन विचारन मे खोयो खायो डगमगाते पायन त घर पहुँच गयौ। घर पहुँच के दरवज्जो खटखटायौ। राधा समझि गई भाजि क दरवाजा खोलो। चाखे क लटक भए चहरा कू दखिक समझ गई पर तौऊ पूछी कछू बात बनी ? चोखे वरवरायो । बूढी खूसट मूख है। पुराने नमाने की बात कर । दा छोरा बताए । एक गाविन्दगढ को अरु दूसरौ डीग को । गोवि दगढ गाव जसो है । नल बिजली कचन करत खरी 8 मा जाबे ते गाव, सहर थोरई है जाए । काऊ ने कही ह गधा गगाजी म नहा ले तो गया थोरई है जाए । गाव मे बहू चदा थोरई दई जाए । गाव के गमारन ते कौन मूड मागो। मोन सी बेटी, थोरे से लोभ के ताई नरक मे ढकेली जाय का ? धन काऊ को मैया-बाप नाए । हाय को मैल है । बडे बूढे यहै, धन तो चलती फिरती छाया है। आज कहू तो वल्ल कहू । धन बात कूक स्वाद होय ।" लम्बे चोरे भासन ए सुनिकै राधा ताहने मारते भए बोली घर ते निकसबे मे तो सरम लग । दिमाग जासमान छू रह्यो है । काऊ विचारे न छारा वताए तो बाकू गारी गुप्ता कर रहे हो । परे पराए की मानों नई आप जानी नही । गाठ मे हत नहीं । ब्याह बरौदन के मामले यो ई थोरई त हाय । कुल्ली म गुड थोरई फोरौ जाए । दो वात कही जाए तो दो वात काहू की सुनी हू जाए । याम बुरी मानवे की का वात ह । दूसरे उमर तो काऊ को बाट देख नाएं । हमारी चन्दा उजेर पच्छ के चदा की नाई दिन दूनी अरु रात चौगुनी बढ रही है । इकलौती छोरी है ताप तिहारौ ई हाल है। क्हू चार छ होतो तो चारो कोन चित्त आते।' चोखे नै मुट्ट बंच लई। राधा न कुरेदते भए फिर पूछो, 'हां डीग कोऊ तो छोरा बताया है डीग तो गाव नाए चोखो कस्वा है । म्हा तो जलमहल है, बाग है मरोवर है । दुनिया भर के सलानी डीग आवै । फोटु खच-खच के ल जाव फिर भरतपुर ते डीग आइवे जाइवे के चोखे साधन हैं।' या बात कू सुनिक चोसे बरस परो "अरे डोग की बात तो वह दई, पर बेटा वारे की बात हू पूछी है । वान अपनी छोरी के ब्याह मे पचास साठ हजार रुपैया लगाए है । हमारी का विसात है जो पचास साठ हजार की बात करै । अव या समैं तो गांठ माहि कानी कौढी हू नाय । डोग वारे नै जितक खच करे हैं, बु बाते ज्यादा की आस लगाए बठो है । राधा ने समझाते भए कही, 'या समै तो नाय पर का ऐसौई समै रहेगी ? कछू दिना की बात है फिर चादनी रात जीबगी। वरसात होयगी। नई फसल आवगी। आसामी रुपया चुकाइ गे। चोखे कू झूझर जा रही पर वू सुटट खचरयो । जस विसकी पोटरी निकस जावे प माप फन पोट के रह जाए, ऐस ई धन को पाटरी निकस जाइबे चोखेलाल झूझर खाय के रह गयो । समझदारी सौ काम लियो । मन ई मन घुटतो रह्यो । यस समझातो फसल नई आई तो सब गुड-गबिर है जाइगो। अत्री दोऊन की बात क कान लगाय के सुन रहो । सव समझ गई तोऊ बिनके बीच मे आइक बोली, कचन करत घरी 9 "ची चौखे कहा रही ?' मया, रगो ते काम नई चलगो।" 'अरे बेटा, कैसी बात करै । रग्गो बडो सुरझो भयो है। खेलो खायो ह ।" "मैया, पुराने जमाने को वातन . कर । छोरी का गाव मे दई जाए । ऐसे ते का राय लई जाए बेटा तू का समझ क्ल्ल को छारा है । वान दुनिया देखी है । तरे वाप के सग को है । तरी तो का विसात है तेरो वाप तो वाते पूछे बिना कळू करतो ई नाऔ। अच- नीच को जितेक वाए ध्यान है बितेक जच्छे अच्छेन न नाय । कल तो उमरते नाव । बोहरगत करिवी और बात है, सगाई सम्बध और बात है। सम्बध के मामले बडे सोच समझ के ते किए जाए । रग्गी इन वातन में पूरी तरी भयो है । चन्दा सिगरी वातन न बगल के कमरा मे बठी बड़े ध्यान ते सुनि रही। आख सामने की किताब पै टिकी पर कान म्हाई लगे। चोख अपनी मैया सौ पिंड छुडाय के कमरा के बाहर आयो। पूरब म मूरज वासन ऊपर उठ पायो । धूप बरामदे म फल रही । चिरया बरामदे मे घौसला बनाइच म लगी । बू चिरौंटा ते काम ल रही । चिरैया चिरौंटा दोनो काम में लग रहे । चोखे न हूँ सोची बहू अपने काम में लगी रहे । घरबारन ते चौं मूड भार । सुननी सवन की चइए पर करनी अपने मन की चइए। वान सोच लई कोऊ वितेकऊ कहे, पर बू अपनी चदा को ब्याह सहर तेई करेगी। अब तक बान जो ढील दे राखी वा ढील कु छोडि देगी । वाके सामई या समै अथ को सकट हो, पर बाए विसवास हो क नई फसल आवगी। रुपया लौटेगी । खूब धूम धाम ते ब्याह हायगी। कौन कौन • बुलानी है ? कौन कौन सी चीज कहां सौ इकठोरी करनी है ? कौन कौन ते कहां मदद लेनी है ? इनई विचारन में खोया खोयी घूमतो रह्यो । तबई पोस्ट मैन ने 'चोखेलाल आवाज लगाई । चोखेलाल ने लपक क एक लिफाफो ल लियो। लिफाफे एक सग खोलो तो चन की सांस लई । लिफाफे मे चिट्ठी 4 सग दारान के फोटो दवि के राहत मिली। विवट गरमी म था राहगीर कू ठडी छह मिली । फोटो के सग नाते गोते लिख भए । नात गोते मिलाए । नात गोत वच गए। चिटठी पड़ी तो चोखे कछू गभौर सौ है गयो । एक फोटो वकोल को पर दूनवर हो । घर चामतो पीता । बा एक लडवा हो चाख नई जचो तो राधा अरु मैया कू कस जगौ । चना हू दूजवर कबहू नहीं चाहेगी। चाय न वा फोटू सात व छरासी नाई उपेच्छा सो देखो। दूसरे छोरा पो ब्यौरा पड़ी। छोरा को नाम निरजन हो। निरजन को वाप एक नामी वरील हो । बू दो साल पहल हैना म चल बसो। घरको सिगरी भार 10 कपन करत परी निरजन प हो । वाफी तीन क्यारी भन ही। फाटो ते लगौं रंग उजरी है, बड़ी-बड़ी आँख, पतरे पतरे होठ, चिरमा म्हों, गलुमा भारी भारी । सरल सूरत त भलो लग रहीं । चोखे जंच गयो । वाके देविय ये ताई मन म विचार बना लियो। ताही समै राधा नै दु पर न भोजन ताई चोपे को ध्यान पंचो। चोखे ने आप उठाई तो देखी, राधा की लोरी चढ़ी भई हैं, वानी म परयरोपन अरु चहरा प चिन्ता की रेखा झलक रही। बोलो, 'मोजन करोगे के यो ही बठे रहोगे ?" जरी परमेसुरी भोजन कौन मना कर, में तैयार हूं।" लोटा म त पानी लके हाथ म्हों धोय के, चोसे भोजन करने लगी। म्हो यत्र के समान चल रह्यो मन कहू और हो। याही सों भाजनन मे वोऊ स्वाद नाय आ रहो । राधा गरम-गरम रोटी परोमती भई वाली 'चिट्ठी पहा ते आई है ?" चासे न चिट्ठी को सिगरी व्यौरा राधा कूद दियो। बोझ हल्को भयो। दूजवर को नाम सुनिक राधा नाक भौ सिकोरव लगी। दूसरे छोरा पो हालचाल जानक राधा · जान द नई आयो । जा पर में छोरा पइ सिंगरी भार होय । तीन-तीन क्वारी भन हाय । वा घर मे चदा कस दिना निकासेगी। पलोथन पीटते-पीटते मर जाइगी। राधा छोट परिवार की पच्छधर ही। लम्बे चौडे परिवार कू देखिक बाकी मनुआ धवराव औ। जोती मक्खी पैस निगल सकई । या वात कू चोय हू जानती। पर चोवे ने भोजन परव' जागर वारे यार की पाती एक पोत फिर पढ़ी। ता पार्छ निरनय लियो क यार के ताई चिट्ठी लिखी जाए । वान कलम-दवात निकारे रु अपने मन की घुटन कू हलको या तरिया कियो- भरतपुर 309-48 प्रिय अनोखे, तिहारी पाती पाई । मन कूतोस मिल्यो । सधे जांख मिली । भूखे । भोजन मिल्यो ।प्यासे कू पानी । आपने जो दो छोरान को विवरन भेजी है बिनमे ते हम निरजन जंची है। बाए देखिव के तांई में इतवार कुँआ रहा हूँ। मोय भरोसौ है के आप घर प ई मिलोगे । सम्बध करवे की मोय जल्दी है । आप लडका सी बातचीत वरलै । बाकी का मांग हैं जान ल । आप रुचि ल या काय कू पूरी करावे को प्रयास कर । कष्ट के ताई छमा । किरपा के ताई धन्यवाद । बाकी मिलवे प । जापको चाखेलाल श्री अनोखेलाल 9/120 वेलन गज आगरा कंचन करत खरी पाती लिखी के चाखलाल ने कपडा पहरे अरु पोस्ट ऑफिस कू चल परी । इतते जाते समै जरु उत्तते आते समै जनक विचारन म डूवती उतरतो रह्यो। विचारन को तातो लहरन की नाई आती जाती रह्यो । सोचे रह्यो-दुनिया म रोय राय क जीवन कौन बितानी चाहै पर परिस्थितीवस वाए रोनी झीकनी पर। सुख म मुखी अरु दुख म दुखी हर एक दिखाई पर । एस तो विरले ई हैं जो दुख मेऊ म्हों प उदासी नाय लाव । चोख हू घर अरु बाहर की समस्यान सौ जूझ रह्यो । घरबारी घर माहि जक नाप लन रती। बाहर छोरावारे म्ही पार ह । चखि दो पाटन के बीच पिस रह्यो । यही साचतो फिरतो घर आयद अपने कमरा प निढाल ह परि गयो । राधा ने आते ही व्यग्य वान छोडवो प्रारम्भ क्यिो । चोवे न पन कू सम्हारत भए राधा समझायो पर जो बद क्विार किए बठे हाय चिन्न कोन समयावै । राधा प समझाइवे वुयाइवे को कोऊ असर नई परी। बोली "ब्याह की चरचा चलते इ तिहारौ ई हाल है गयो है । आग जान का हाल होपगो ? 'भाई, जाजकल की और मोहलत दद।" 'अजी तिहारी आजकल की सुनते सुनते मैं तो तग आ गई हूँ। तिहारे क्स की बात नाए तो घर वठी मै ड निक्स के जाऊँ।" अरे । सबर तो रख अवको इतवार खाली नई जाइगी। "राम जान तिहारो इतवार क्व आवगौ । तुमकूना गढ ना डूव । दुनिया वितेक नाम धर रही ह याको कछू ध्यान चोखलाल ने खून की सी धूट पीकै कही- अच्छौ परमेसुरी, अब साझ ह रही ह दोना खन मिल रह है । दियो बती कर । भगवान को नाम ल ! दो नाम मोऊ कू लन द । मैं नवक इतवार प जवसि-अवसि जाऊगी । तू के नौ तिरवाचा भर दऊँ अरु देख याहू कू जान ल करवे धरबे वारी तो कोऊ और है हम तुम कौन हाय । इतवारऊ आयो जा रह्यो ह' याए कहक राधा सझा बाती क चली गई । सूरज डब रह्यो । अब वामैं तेज नाऔ। सिंदूरी फलाव के पाछ कारी परछाई चली आ रही । चाख या समै सिमटी सिमटी सो प्रकृति के या सरूप कू देख के सोच रह्यो क समै मदा एक सौ नाय रह । उवार- चढाव आते इ रहै । मूरज या कथा कू राज दुहराव । समझदार याए समझ । ना समझ या प ना सोन ना विचार । गुनीजन है अकलवद . इसारो अरु अहमक क फटकारी घराबर होय यही सोचतो सोचती भाख कबहू इतवार क्वहू आगरा, कबहू निरजन की अनकन कल्पनान म खाती-खोतो म्रो गयो । 12 कचन परत घरी दौरधूप चोखे इतवार • जनोखेलाल के ह्या आगर पहुंची। जनोखेलाल चोखे की वाट देख रह्यो। वाके पहुँचते इ दोना निरजन कू देखिवे बाके घर जा पहुचे। निरजन न अपनी वठक भलीभाति सजा राखी। आधुनिक ढग को फरनीचर लगी भयो। सागौन को सोफा सट जाप डनलप की गद्दी लगी भई बीच मे सटर टेविल प अखवार धरे। एक कौन में रडिया सजौ भयो। एक जोर तख्त प गददा बिछौ भयो ताप साफ चद्दर विछी भई । रीने ते मसनद लगे भए । कमरा के दोन दरबज्जेन पै रगीन परदा लटक रहे जा पखा की हवा में फरफरा रहे। निरन्जन को उमर तो नई पर वात सूझ बूझ भरी। सामाजिक व्यवहारिक सम्बधन के उतार- चढाव सौ भली भांति परिचित हा । याही सो बाने बठक एसे सजा राखी जसै काऊ सफल दुकानदार अपनी दुकान के सजाय के रासी। निरजन नै वडी विनम्रता सो चोन अरु अनोखे को स्वागत सत्कार किया। चोखे कू निरजन पहली झलक म ई जच गयो। रग गोरो बल लम्बी कटारदार मछ, वारन म बल पर रहे। निरजन चन्दा के अनुरूप लग रह्यो। वान एसौ अनुभव कियो के मदिर और देवता दाना ई दिव्य अरु भव्य है । चाखे मन म साचिवे लगौ या मौके कू नइ छोडिनो चइए। चोखे कू सब कछु चोखो इ चाखो लगी। राजी खुसी पूछ के चाखे नै सम्बध की चरचा चलाई। निरजन न सुनक नैन नीचे कर लिए। थोरी देर म मौन तोरी जरु कही बसे कर्ता धर्ता तो हमारे मामा हैं पर अम्मा पहले छारी देखिवे को कह रही है। ' चोखे नै छोरी की सुदरता की वात छाती ठोक्कै कही। छोरी दिखायवे की बात हू स्वीकार कर लई। लेन देन की बात साफ नइ है पाई। चोखे कू तो चट्ट मगनी पटट व्याह को लग रही । बान निरजन सौ कही के अपनी अम्मा सौ पूछिक छोरी देखिव की तिथि बताध । निरजन अपनी अम्मा सौ पूछिये भीतर गयो। या वीच म चास नै अनौस त, छोरा पसन्द आबे की बात कही। अनौस की छाती फूल गई। चेहरा प चमक आ गई। अफ्नो जस सुनिक कोनास नाय होय । वू चोख ते बोलो, छारा का है लाखन म हीरा है। दखिव दिखाब लायक है। अपने वाप कू गयी है। याको वाप इतक मिलनसार व्यवहार कुसल, हंसमुख, सहयोगी अरु समाजसवी हा क एक पात जा काऊ वातें मिल लतो वाई को है जातो। निरजन न हूँ अपन व्योहार अरु गुनन त पिता की छवि फू और निखार दिया है।" कचन करत यरी 13 निरजन को गुनगान सुनिक चोखे नै, पूछो, “निरजन की सगति कसी है? अनोखे नै फिर अपनी बात प्रारम्भ करी जसे पोस्ती कूडी के इतक वित याही भाति निरजन, क तो वालेज, क घर । सम मिल तो नागिरी प्रचारिणी सभा जरूर जाए । म्हा साहित्यकारन को जमघट लगे। साहित्य सौं निरजन को लगाव है।' इतेक म निरजन सलाह सूत मिलाइ क आ गया। दोनोन की बात रुक गई। दोनोन को ध्यान निरजन के हौठन प पोचौ । निरजन ने धीरे सौ कही, 'अम्मा यो कह रही है, जाप कही तबई हम चल दें। अनौख वालो, "छोरी देखिवे की बात तो तब होय जव देन की त है जाए। निरजन बोलौ ' मथुरावारी पारटी पचास हजार रुपया लगाइव की कह रही है । धौलपुर बारे साठ हजार रुपया की कह रहे। एक भरतपुर वारे औरऊ आए। बिनेऊ पचास साठ हजार रुपयान की कही है।' या बात । सुनिकै चोखे को चेहरा उतर गयो । अनौवे ने बाको हाथ मसक क, म्ही वाके कान के पास ले जाइक हौलें ते कही अर! यार आजकल लडका देखे नाय जाए', खरीद जाएं। हिम्मत बांध के चोखे नै निरजन सौ कही, जो काम करनी है वामै देरी चौं। तुरत दान महा कल्यान । हम चाहे के छोरी देखिये के हमारे सग ई चलो। निरजन कू इतेक जल्दी की प्रासा नाही। वू हा कसें कर देती एक पात फिर अम्मा ते पूछवे भीतर गयो । काम बनतो दखि क चाख कू राहत सी मिल रही। साचिवे लगो, चलो चोखो है दर दर प ठोकर ई पानी परी घर बठे ई छोरी कू वर मिल गयो। ब्याह म का ए रुपया ई तो बच करने हैं। छोरा पक्की भयो ना क साधो याह भयो ना । रुपया को हूँ का देविवो। रुपया तो वात क' के स्वाद । अनौख ह ई सोच रहा र बात बनती नजर मा रही है पर विचौलिया की कबहू कबहू भारी स्वारी होय। कबहू-वबहू दा पाटन क बीच म सावत बचौ न काइ यारो रात है जाय । कबहू कचहू वेटीवार अरु बटावारन र बीच म दिक्तव्य विमूढ़ की सो नौरत आ जाय । चना क सग पुन पिस जाए । बात बन जाए तो छारी को भाग विगर जाए तो बिचोलिया + युक्रा फजीत । इत मान गिर तो बुआ अरु उत माऊ कचन करत परी गिर तो खाइ। थोरे दिना पहल बू भरतपुर के रामदत्त बेटीवारे अरु कोटा के वालक्सिन वेटावार के बीच में बिचौलिया की दुरदसा देख चुको । विचौलिया ने बटीवारे को हित चाही वितकू वेटावारे को कहनावत ई क छोरा को सम्बच करायो जाए । छोरा के बड़े भया ने लव मैरिज कर लई यासो छोटे छोरा के कोऊ दाँतऊ नाय देख रह्यो । विचौलिया नै सम्बध तो करा दियो। सगाई हू है गई पर सगाई पीछ बेटावार की ओर ते जो पाती आई बाए पढिक बिचौलिया की भूख प्यास हराम है गई। पाती मे लिखो जो कपडा सगाई प दे गए वे जीव जन्तुन कू पहरवे जाग है क अजायब घर में रखने जोग है। विचौलिया न हूँ ऐसौ ज्वाव दियो कि क बेटावारी तिलमिला गयो। कार लक सीधौ बिचोलिया के दरवाजे प प्रा धमकी। विचौलिया न मना कर दई छोरा को व्याह और कही कर लेओ ऐसें निर्बाह नाय हायगौ तब बैटावारे को आख खुली। अखीर म काइली माकूली भई तब कहू जायक व्याह भयो। व्याह के सम बेटीबारौ कच्ची खा गयो । बेटावारे को चढ बती ता सम विचौलिया पै कहा बीती बुई जाने। अनोखे विचौलिया बनक एक ओर आबेवारी बदनामी ते बचिव की साच रह्यो अरु दूजी ओर सुख की हू अनुभूति कर रह्यौ तवई निरजन न आइक विचारन के ताने बाने कू तोरि दियो। अम्मा अरु भन सग चलबे कू तैयार हैं । ' निरजन बालो। तुमक तो चलो' अनोखे ने कही।' 'मै हु सग चनू ?' 'हा, यामे का बुराई है ।' अनोखे नै जोर दक कही । योरी देर पाछ निरजन, निरजन को मैया, निरजन की भन, अनौवे अरु चोखे आगरा सौं भरतपुर कू चल दिए। आगरा सौ भरतपुर तक बस म बठे बठे अपनी अपनी तरिया साचते चले आ रहे । चोखे कू या बात की चिन्ता व्याप रहो, के घर कह क नाय आए । घर बेढ गेपने ते परौ होयगी। वही एसो ना होय के कुढग कू देखि के अधे के हाथ ते बटेर निकस जाए। चोखे के मन म एक ई विचार आयो क घर पहुंचते इ मौहल्ला म हल्ला मच जाइगो। याते ई ठीक रहेगी क अपन यार के घर रनजीत नगर में सबकू ल जायो जाए । निरजन की मया सोच रही छोरी पमद आ गई तो अगूठी पहरानी परगी। नई पसद आई तो कसे पिंड छुडायो जायगी। निरजन सोच रह्यो क इकलौती बेटी है लाड चाव म परी है । कहू दिमागतार भई तो घर को काम काज कस चलगो? तीन-तीन भेनन को ब्याह करनी है। जमी दायजौ लियो जाइगो बसो इ दनौ परगी। कौन सी गल निकासी जाए। कचन करत खरी 15 निरजन को मन अपने ढग सौं सोच रही। भाभी को रूप रग कसो होयगो ? नाक नक्सा कैसे हुँगे? कसी मेहमानी होयगी ? वसो घर होयगो ? भाभी पी मया क्सी होयगी" . अनोखे एक आर अपनी वाहवाही लूटवे की मुसीम मिहर उटी तो दूसरी और विचौलिया की स्वारी हेवे को विचार आते ई हिल सो जाती। या तरिया सब अपनी अपनी उधेड वुन म हैं । मौन होते भए हूँ आप प्रापते कहते, आप आपकी सुनते भए पाचा जने भरतपुर पहुच गए। चोखे ने भरतपुर उतरते ई अपने मन की बात अनोखे कू बताई-अपने घर ना चलक रनजीत नगर म रामसरूप के घर चल । म्हाई छोरी दिखाई जाए। चाय पानी कलेऊ सव म्हाई करा दियो जाए। छोरी पसन्द आ जाए तो घर लिवाय के नाऔ जाए। बात अनाखे के गरे उतर गई। पाचा तागे म सवार है क रनजीत नगर रामसरूप के घर पहुच गए। रामसरूप समझदार मास हो। पलक झपकत ई सब समय गयो। बान अपनी बठक म निरजन निरजन को मया भन कू आदर सौ वठायो बिता चदा कू मोटर साइकिल सौं बुला लियो। रामसरूप के कमरा मे सीलिंग फन लग रह्यो पर तोक एक टेबुलफन अरु लगा दियो। थोरी देर म ही सीरी पानी आ गयो। ता पाछ ठडौ सरवत रु वाके सग मोठे अरु नमकीन की प्लेट आ गई। निरजन की मया अरु भन कू पल पल भारी पर रह्यो। वे तो अपनो ध्यान दरवज्जे प लगाए बठी कब छोरी आब, कब बाए देखें? अखीर मे चदा सज धज के कमरा म भाई। चन्दा के जाते ई कमरा में उजेरी सो छा गयौ। चदा काई, चला तो चदा की कोर सी एसी रूपवान क तिन धरवे ठौर नाही। तीनो देखते ई खिल गए । मन भर गयो। छोरी मूली लगडी तो नाय याकी जाच के ताई चन्दा प भीतर ते पानी मगवायो। चदा मौरत न झुकाय के गरदन नीची करके नाप नाप क डग धरती भई भीतर गई तब रामसरूप न कहो, हमारे यार की छोरी चदा तो वदा ई है। घर म पहुँचते ई घर चमक उठेगी सीतलता छा जाइगी। चन्दा पानी लक आई । निरजन की मया नं बार अपने पास बठा लियो। छोरी गूगी तो नाय । तुतलाव तो नाए। दात गदे तो नाए । आँख नाक सही है के नाए'। इन सब क देखिभालक बातचीत करके मव तरिया मन्तुस्ट है के चन्दा कू छुटटी दई। चन्दा जो कबऊ निचावली नाय रहती आज लाज मार अपनी पलकन ने मोरन ने नीच मुकाय के जगन कू सहेन ३ धीर धीरे चल दइ। धारी देर पोर्छ वचन परत परी 16 राधा, अरु रामसरूप की बहू, निरजन की मया अरु भन के पास आइ गई । बिनते चन्दा को बडाई करवे लगी। रामसरूप की बहू वाली, "हमारी च दा के सब तरियाते ठोक बजायक देख लेओ। काढवे बुनवे मे पारगत है। काऊ वात की कभी नाए ।' निरजन की मया बोली, "भैनजी ई बात तो चौरे म दीख रही है हाथ कगन कू पारसी का? पर राधा तो ई चाह रही क बिनकू उत्तर मिलनी चइए । निरजन की मया कू छोरी तो पसद जा गई तोऊ बात साफ नांय करी। कही, 'हम भर जायक खबर कर दिगे। मैं अपने भया सौ और सलाह सूत कर लउ गी।" बटीवारेन की आसा पं पानी सौ फिर गयो, फिरऊ ससार पासा प टिकी है कही है-'जब लौ स्वासा तब लौं आसा"। चोसे नै आदर सत्कार अरु मान मनुहार मे कोऊ क्सर नाय छोडी जा तरिया सौ बिनकू लिवाय क लायो, वाही तरिया सवन कू आदर सो विदा कियो। मन म सोचती रही कहूँ भौनी बिंगर न जाए। पहले गस्सा म ई माखी नई आ जाए । चढी छान उतर नई जाय । हाँ भरी उत्तर नई मिली तो चोखे के घर म उगमी छा गई। बेचनी बढ गई। सबकू चिन्ता व्याग गई। कई दिनान तक तो चोखे निरजन की जोर सा बाट बाही तरिया देखती रह्यो जस-मार उमडत धुमडत-गरजत बादरन की माऊँ टकटकी लगाय क देखें। जागरे ते जब कोऊ उत्तर नइ पायौ तौ राधा नैइ चोखे कू जागरे पठायो। चोखे फिर अनोखे कू सग लक निरजन के घर पहु चौ। अनायास दोनोन कू देखिक निरजन सपकागो। अबक निरजन की बैठक मे बू रोनक नाई जो पहल निखाई परी। सामान वरीने सो पहल जैसी नाऔ। मिलवे म हूँ पहले जसी ललक नाई। कही करै लाड परौसा मे बगन आए ब्याह के लक्खन तवई पाए । बिनके हाव भाव सौ इ चोखे नै अनुमान लगा लियो। वात यो विगरी क निरजन के घरवारेन कू चोखे की माली हालत को कच्ची चिटठा काहू भाति हाथ लग गयो। बिन्न मालुम पर गई क चाखे ठन ठन पाल मदनगुपाल है। इन तिलन मे तेल नाए । हीग के कायरा म वासई बास है। चिकनाई के नाम प या हाडिया कू धूप म धरवे पै हू हाथ कछू नई लगगौ। ब्याज 4 सिगरौ रुपया द राखो है। जेवर जाठी गिरवी रखकै किसानन कू रुपया ब्याज प दिया है। बरसात भई नाएँ। रुपैया लौटिबे के आसार नाए तो ऐसी ठौर कौन जुना खेल आवभगत के पाछ मतलव को वात भई। निरजन ने अपने मामा को बहानी लकें बात कू टारनी चाही। कचन करत खरो 'मामा चाह रह्यौ है के पहले मैन को व्याह क्यिो जाए।' 'या वात • जाप पहलई कह देते तो हम आपकू चौ क्स्ट दते ? ' खासत भए चोखे ने कही। 'का कर ? जम्मा की राजी तौ हती पर मामा के आगे पेस नाय खाय रही। 'भाई मामा ते हम वात कर ।' "अजी मामा नै तो दो टूक मना कर दई । वसे आप चाही तो मिल लेगी।' "भाई आए हैं तो मिल लवे म का हज है ? काजी याव नई करगो तो का घर हू नई आन देगी।' 'मापकी इच्छा। ता पाछ चोखे जरु अनोखे, निरजन के मग आगरे के बेलनगज म बाके मामा के घर पहुचे। निरजन को मामा, पर नानी। बू अपनी नौकरी ५ गयो । वाए लिवावे निरजन गयो। चोखे अरु अनोखे दोना विचारे बैठे वठ बतराते रहे बेटा वारेन के बड़े नखरे हैं। बड़े दिमाग है। सूधे म्हो कोऊ बातई नाय कर । कोऊ कितेक्ऊ सूधरौ होय पर टेढौ ई टेढी चल । बिल म हू सूधौ नाय जाए। सब बारह बारह मन के भए बठे हैं । सुरसा की नाई म्ही फार । करकटा की नाई रग वदले । बगुला भगत बनकै सिगरी मछला . हडपनी चाहे । - निरजन अरु वाके मामा आए। जो बात निरजन नै नही बुई बाते बाक के मामा नै दुहरा दई। घर के भीतर ल जाइकै अनौखे भीतरी-मूतरी बात कही पर निरजन के मामा नै तो कलमा ई नाय पढी। लन दन की सफाई की बात क्री पर बान तो हाथ ई नाय धरन दियो। बाए तो जंच गई क या बगुला में तो पाखई पाखन को ढेर है । मास तो नामऊ कू नाएं। जीमती माखी कैस निगली जाए ? बाके पास चित्तई चित्त हो वित्त को तो नामऊँ नाजी, याके बिना तो सव चारो खाने चित्त होय । हार झमार के चोखे अरु अनोखे अपनी सौ म्हों लेक बापिस आ गए। अनोखे • भारी दुख भयो। निरजन पहलई मना कर दो तो इतेक आइवे जाइवे अरु खर्चा को भार तो बचती। चाख के पाम जब पईसा हतौ तब तो नाय ब्यापती पर अब तो मुरगी Vतकुआ को घाव ई भारी है रह्यो पर बान अपने होठन प एसे भाव नई आमन दिए जिनौं जनौख धक्का लगती। चोखे नै अनौखे ते कही यार ? और देखियो पर पहत पक्की करक खवर गरियो। 18 कचन करत परी बनौरा योलो, "पनी ६ दौई पर परी नई तो पूरी घर छोरी देखिये भरतपुर काई जाती। ईतो वाद म यात विगरी है। प्राजाल एमो ई है रही है। ईओया तोई पै नाएँ चोग बढ़ती मई महंगाई अम पढ़ते भए दहना ने समाज म हार पदा कर दई है। यार मासार घटव र नाएं चतिवेई ममनो। चाग उताम सों म्हों नटराए मरापुर लौट आयो। जब यु पर पहुंची तो वार लटर भय युग भए वगन स पूपरे दगिक परवार रामा गए, दार म छुपागे है। जब गौसिारी राम कहानी सुनाई तो पल भर म पासो पलट गयो। जची बरु राधा न अपने अपने परम ठो।। राधा । सरडान आगरे बारे बर हजारन पागे सुनाई। चदा पना बीती युई जाने पर वाक सपने चूर चूर हे गए। यु जपन दुग सौं रम दुरी पर अपो मया-चाप अरु दादी के दुरा सों ज्याला दुखी हती। बाए या यात को और दुप हा के समाज म छारी की परण एस फर जस बाऊ ढोर की पग्य करी जा रही हाय । कान पूछ, दात रग, चाल ढाल सर दयें। तापाछ हू जो उत्तर मिल यु सरन यहिएन ने हिलाद । सिगरे घर वारत की भूग, प्यास नीद उड गई। चदा परक्ट पन्छी पीनाई गत नर करवट बदलती रही। चाय के सामइ रात भर सिार चित्रा की रीन मती रही। दिन प दिन बीतते गए। चा सुरल पच्छ के चदा वी नts बढ़ती गई, पर पन्ना र व्याह को यहू पाऊ हिमाव किताव नई वठो। जहाँ रहूं पाव धरत, म्हाई धरती खिसक्ती दियाई पर ई। चोरो को भलत यस्ता है गई है यानी कहानी वा चेहरा मोहरा ईनाय पहतो बाको पर कह दतो। कातिक की फसल के पोछ वसाय की फसल पदारसदार हो, पर वादरन मैं आय दिया दई। पिसानन को वीज हू नई लौटी। चारा मोर अपाल गहरा गयो। चोरीलाल के मासामी आय चुरावे लगे। चोये काहू त कहतो तो का म्ही ते कहती। बाकी आधिन के सामइ पाहि पाहि मच रही। गाते पीत परन म हू दो जन की राटी नाय मिल पा रहीं। ढोर डगर यार मार न्यारे तुज रहे । पावे के पानी की यारी रिल्लत है रही। मघवारन म यवर छप गई पानी अब रासन काड सौ मिलगी। बजार म सब चीजन प भाव चढ़ गए। घी के दरसन दुरलभ है गए । साग सब्जी की टोटो पर गयौ। ऐस म आमामीन की माऊँ देखियो, अपनी गांठ की खोयी हो। तौऊ चाय ने अपने दो चार गासामीन कूपरिचायक दयौ। जिन जिनत पान घात करी विनकी राम कहानी सुनिक चोखे की दिन म आँसूजा गये। जासामीन के घर को हुलिया विगर गयो । विनको घर बुद रोमतो सौ दिजाई पर और चोखे की हालत विनै दपिक कछू ते कळू है जाती। जब चासे घर माहि आती तो बाकी हालत और सराय है जाती। वाकी मया पापले म्ही ते कहती 'चाखो है, कपन करत परी 19 चोखे चोयो फल मिल रह्यो है। सव कछु जुरी जाठी तो मासामीन लुटा दियो अब घर को गाडी कमें चल ? चन्दा यो व्याह कैसें होय ? अची साची कहती। घर म रपैयान के दरसन दुरलभ है रहे । घर में दानेन के लाले पर रहे। चदा जो दिन म दस ड स बदलती जाके घर मे साज सिंगार को सव सामान भुसरा की नाई भरी रहती पाइवे पीव की कछु कमी नाई , म्हा मूसे ग्यारस कर रहे। बारन मे तो तेल डारिवो दूर रह्यो छोकवे के ताई हू तेल नॉओ। दात अरु राटी मे वर पर गयौ। चोखे ई कहक वाह छुडातो का बताऊ होम करते हाथ जर रहे हैं।' अकाल को छाया म वाको ही नाय, सबको दुरी हाल है गयो। अव वु काहू के आगे हाथ पसारतो तो का म्ही ते पसारतो। कोऊ या बात प हू विसवास करबे वागे नाऔ के चोखे को ई हाल है सक । लोग समझते चोसे ढोग रच रह्यो है । खैर काऊ तरिया चल्ही जर रह्यो। पर चदा के व्याह की चिता चोखे के घर . खाए जा रही । चोखे कू दिन ब दिन जरजर कर रही। चिता की जाग म बु दिा दिन तिल तिल जर रह्यो। बाकी कचन सी काया सूख के काटी हुई जा रही । घरवारी के दिन रात के ताहन बाइँ और छेदत । चोखे उक्ताय के एक दिना छोरा देखिवे डीग जाय पहुँचौ। डीग मे करकल्ली को घर चोखो मालूम परौ। पूछताछ करके करक्ल्ली की देहरी जाय ढोकी। करकल्ली न रामसिंह पहादीवारौ टेर लियौ। हुक्का पानी की पूछताछ करक करवल्ली चाखे ते पूछी 'कहो भया कस आइबी भयो ? चोखे ने अपनी किस्मा कही। फिर काए नाते गोतेन को मिलान भयो। नाते गोते वचते ई गमसिंह वरकल्ली की कहानी सुनावे लगौ । भया चोखे, इसे अवई अबइ अपनी छोरी को ब्याह किया है। व्याह की खातिरदारी अरु दन-लन जा तरिया को भयो है बु काउते छुपी नाएँ । चोस न कही ई बात मोय रग्गो ने बता दई है।' फिर काए जाप देख लेनो, सरूप के अनुरूप ब्याह है जाए । मौगिबे ताँगिवे को बात तो हतई नाएं आप तो नामी आदमी हो।' रामसिंह वोलो। के अनुरूप तौ है जाइगो पर पीछ खाल खिंचाई नई होय । समधी तो बन प्यार जोरिवे पर फिर प्यार में पायर नई पर, याते दन लन की बात साफ है जाए तो चोखो है। चोरो ने चिरोरी करी। चोखो सौ वचन वरस तो पाथर चौं परिंग ?' रामसिंह ने हंसते भए कही। अजी सरूप 20 कचन करत खरी ? थोरी देर म छोरा दिखवे कू मा गयौ। छोरा जयपुर म नौकर हो। कई ठौरन ते लोगवा पीछ पर रहे। चोमेन छोरा देखो तो वाकू' पसद आ गयो । अब करवल्ली की बारी आई वू बोलो, "भाई चाखे दन लन तो डोम भाट की वाज है पर सवमी पहल छोरी सुदर अरु पढी लिखी चइए । 'वौहरेजी मैं अपनी जरी वी बडाई अपन म्हो ते कस करू ? मालिन अपने वेरन न अरु हलवाई अपन दही • कब घट्टो वताव । आप चलक अपनी आखिन सौं देख लेगी। मन भर जाए तो बात जाग करियो नई तो तुम अपन पर अरु मै अपने घर । चाखे ने मचर अपनी बात सरकाई। 'ठीक है छोरी छोरा के अनुरूप है तो छोरा आपको है।' "तो छोरी । देखिये की बात बतानो कब, कस मरु कहाँ राखी जाए 'अजी एसी जल्दी काए आप हमारे विस म पूछताछ कर लेो । कछू हम हू सम देओ। अजी हम का पूछताछ करिंगे? हम तो पूछताछ करक ई आपकी सरन म पाए हैं। "अजी सरन तो भगवान की है, हम तो मान्स है। हाँ इतेक जरूर कह द के जब आप छोरा पसद है तो हम आपकू अपने आइबे की सूचना दे दिगे। चिट्ठी हार दिग। चोखे न मुक्तेरे हाय पॉम पीटे पर करकल्ली लाटक विलया ल गए। छोरी देखिव को छेता दियो ई नई । अखीर मे चोये मोह लटकाए भरतपुर लौट प्रायो। घर तो बाकी मह की सी बाट देख रहो। छारी • बहू छोरा मिल्यो के नई पाके काज अंची अरु राधा दरवाज की ओर जाँख लगाए वठी। चौखे न घर पहुँच क करक्ल्ली की सिगरी वात सुनाई तो थोरी सौ धीरज आयो पर ओस के चाटे त का प्यास बुझे ? चोखे ने करवल्ली की चिट्ठी की कई दिनान तक बाट देखी। रोज मुहल्ला म चिटठी रसाल पाती। चोख वात रोज पूछती पर चिट्ठी नई आई। चोखा न जवावी चिटठी डारी तब कहू जाइक चिट्ठी तो हाथ लगी पर सग म निरासा ई हाथ पाई। और छोरा देखिब के ताई चोरी न साहम बटोर के निगाह दौडाई । ईसुरी को सारौ गोविन्दगढ म बतायो। चोखे ईसुरी के लकै गोविदगढ पहुँची। याको सूचना पहलइ द दई । सयोग सौ छोरा अरु बाकी वाप गोविदगढ मिल गए । छोरा को वाप खूबसूरत है । याते ई चोखे सतुष्ट है गयो । सवमो पहले नाने गाते बचाए गए फिर छारा दिखावे की बात ग्राई। वचन करत खरो 21 चाखे न हँसते भए कही, 'अजी साचो अच्छो तो खिलौना सहा होय । याम काई दूसरी बात नाएँ।" इतेक में मूलचन्द आ गयो। इकरो हाड, रग गोरो, लम्बी वेल, चेहरा म्होरा चोखो। बात करवे म फरवट। वाए सामान्य ज्ञान की अच्छी ज्ञान हो । तबई तो प्राइवेट कालज में वाके पाव जम भए । खूब जखवार पढतो। वामन हूँ बाके हाथ मे अखवार लगी भयो । चोखे बाकी वातन सो भौत प्रभावित भयो । घर बर दोनो बाकू जंच गए। लन देन की बात करवे मे ईसुरी पतनछुरी हो। पेट म भीतर घुसक वात कू निकाम लाती। वान दोनो पच्छन सौं अलग अलग वात परके तालमल वठायो । छोरी देखिबे के ताई दूसरो दिना ई त कर दियो । दोना हँसते भए भरतपुर लौट आए। चाखे के घर म सुसी की लहर दौड गई। घर की सार सम्हार करी गई। घर खूब सजायो गयो। दूसरे दिना भगवती परिवार दलवल के सग छोरी कू देखिये कताई आयो। चाखे न विनकी खातिर म रुपया पानी को तरिया वहायो । जात पाते ई ठडी सरबत दियो । क्लेऊ म भाति भाति की मिठाई, पान बीडी सिंगरट सामई रख । चदा कू देखिकै सब खुस है गए । बात पूरी तरिया तुल गई । गोविदगढ के मद अब वेयर एक कमरा म बठकें विचार करने लग। ईसुरी हू विनके सग बैठो। आध घटा पीछ ईसुरी बाहर आयो। मन की घुडी खोली। जो पहले त करयो बाम और बढोतरी कर दई। याहू प गोवि दगढ पहुँच क अपने जमाई ते पूछक सूचना दवे की यह क चल दिए। या सम चोखे सौ मन वठ गयो। बान स्वीकारीक अथ विना सब अनथ है। अथ ईमर तो नाएं पर ईसुर ते कमऊ नाए । अब वाए मालुम परी क रगोन चित्रन क पीछ निरी सफेदी ई सफेदी है। दुनिया म हाथी के दांत दिखाव के और हाय खायिव क और हाय । मन की बात - साफ साफ नाय यह । काऊ कर्ता- धर्ता मामा बतावै चोक जमाई कूवताब , कोई मौसा कू बताव पर ये सब टारब की ऊपरी बात हैं। पढे लिखे समाज सुधारक पचन प लम्बी चौडी वात करव बारे पात तो यूर चनाव खूब लम्बी चौडी हाक । आदसन न खुव वखार अपने प पाव तो मव फिमर जाएँ चूक के चाट ल । जा मम सम्बर त परी जाए या सम बात और होय । सम्बध के पाछ छारा • नौकरी लग जाए तो छारा के भाव और बढ़ जाएं। सही बात है सम सम व भाव है पौडी पर दाव हैं। बेटो वारे की भलमनसाहत, प्रतिष्ठा सवा लडकी को रूप सिन्छा सालीनता पर जव 22 रचन परत परी . सब धूर मे मिल जाएँ । एक ओर ये सब दूसरी जोर धन को पस्लो हल्को भयो तो कांटो नई तुल पाब। चोखे मन ई मन सोचती रही। 'वर' कू बुही बात है के सुदर सृष्टि बलिदान चाहै दूल्हे बुई जो मिलिवे म दुलभ होय । दुहिता वुई जा सात पीडिन नक दोहन करै। इनई विचारन मे चोखें डूवतो उतरतो रह्यो। सिंगरौ घर सोच म पर गयो। चन्दा विस को सौ पूंट पीक रह गई। सकल्प कानिक की फसल गइ तो गइ पर वसाख की फसल के हू लाले पर गए । वैसाख अपने नाम कूसार्थक कर रह्यो। नाम वै साख । लोगने की इ मूखता है जो साख मानक चल । वाइ तरियां जसै रगी भइ कू नारगी जमी भई कू प्रखरी सार कू खाया अरु चलती भइ कू गाडी है । वादर आते गरजते पर बरसा के नाम प आँख दिखाय रहे। चाखे के आसामी बसाख की फसल पांख लगाय रहे। चोखे आसामीन माऊ आय लगा रह्यो पर न चोखे की मनचाही भइ न आमामीन की। कछू किसान तो खेतन म बीजहू नई डार पाए । जो रुपया करेजा करके लाए बू पेटन के हवाले है गयो। जिन्न धूरि म वीज डारी बू धूरि म इ गयो। चारो पोर भयकर अकाल परि गयो। चारा और त्राहि त्राहि मच गई। सेतन माऊँ देखिये म हूँ आँख पथरावे इ । गरीयन कोई नई अमीरन को जीबी दूभर है गयो। खेत की फसल इ नाय मारी गइ उगाइ की फसल को कचूमर निकस गयो। साची है खेत म होय तो म डी म आव। टकी मे होय तो घर की मटकी में आवै । चोखे कू चौरे में सब दिखाइ पर रह्यो पर वाके सौमई चदा के पीरे हाथ करने को सवाल हो। चोखे के पास कछू नाय रह्यो या वात कवछू मान्स इ जानते । ज्यादा मान्स द समझते के चोखे के पास काऊ चीज की कमी नाय। लोगन न बिसवास इ नाय होती। दूमरे चौखे नै अव तान दियो इ दियो, लियो नाऔ। कबहू काऊ ते मागो नानी। यासौ बा' होठ खोसिवी प्रखर रह्यो। जब जब चोखे अपने जासामीन टटोरौ फ्जीते इ भए। जो लबे के खन हाथ जोरते पाते । नाक रिगडत आते व दवे क सम आस शिवाय रहे। ठेगा वतात 1 साची बान है काज परे छु और है काज सरे कछु और। रहिमन भंवरी के परे नदी सिरावत मौर।। - कचन करत खंगै 23 चोखे मन मार के रह रह्यो। मा म कहते मरी हाथी विटोरा सो होय । दार विगर जाए तो काए साग की दर तो दइ है । डाारी मर जाए तो पिउन न येलेइ है । चोखे कौन कौन कस समझती क वू फाफान द फपीर है रह्यो। जेवर जाठी गिरवी रख दिया है। पौन सौ का म्हो ते कहता? अब तो पट भरवौ दूभर है रह्यो अब चाखे की नजर जेची अरु राधा के हाथ पामन ये बचे खुच जेवर प हू गइ । बिना सामई म्ही पोलिवी कोऊ मासान नाऔ । बिनक हाय पामन म त गहना लपी, नाहर की दाढ म ते मास निकासबी समझो। चोखे क्व लौ सुदृट खचती। अखीर में एक दिना म्ही खोलनी ई परौ। फिर तो राधा जरु अंची न धुर पट्टीन सुनाई । अ ची बोली, पहल खूब पही, अपने ताइ कछू तो रख पर ता सम तो दान क चबूतरा प वठ गयौ। अव फटहाल है गयो ना?' राधा न कही 'दुनिया दूर की सोच क चल आडे सम के ताई वचार राख पर या तो हरिस्चद्र बन गए। अब चालनी में दूध काढिक करमन कू टटार रय है।" अची प फिर बोले बिना नइ रह्यो गयो अरे चोखे तोय गढ न डूव । छोरी सयानी है गइ जित माऊँ तन हाथ डारो कछू हाथ नइ आयो । पता है चौ ? विना पइसा के मान्सन कू कोऊ दो कौडी कौऊ नाय पृछ। तन मुनी नाय जर है तो नर है नइ तौ पछी वे पर है। विना पइसान के जयपुर जमपुर है। बरम परी 'तब तो जासामीन के बड़े बडे गीत गात जब जानो न चिनके पास जो बढि बढि कै बात बनाते। गधा फिर - 7 अची बीच म इ बरस परी चोखे, बुरे सम म काऊ काम नाय आब याही सौ तौ कही है विद्या कठ की पइसा अट को । राधा नै पूछी, 'भव कहा गए वे निहोरे करवे वारे जो दिन रात घेरे रहते । जो इ कहते चदा हमारी बेटी नाय का ? कहा गए वे चदा को व्याह धूमधाम ते करबे वारे, अब बिनते जाय क कहो ना के बा सम का म्हों ते कही चोखे राधा अरु अची दोनान की सुनती रह्यौ । सुटट एसी खच गयो मानो स्याप सूघ गयौ होय। कहतौ तौ का म्हौ ते क्हती। बाते मूल है गई याकू चौखे अव जान रह्यो । पर अब पछताए हात का जव चिरिया चुग गई खेत । बू या बात कौऊ अनुभव कर रह्यो वं जो बिटिया के पीरे हाथ करबे कूछाती ठोक क दम भर रहे ये अव बाके पीरे परे म्हौ माऊँ झाकऊ नाय रहे । चोखे हिम्मत बाध क बोलो कौडी तो अच्छे दाव कूडारी पर का कर मव पट्ट पर गइ । चौवे जी छब्वे हैव की सोच रहे पर दुब्वे हू नाय रह । क्यिा तो अच्छे । हो कोऊ जुना तो खेलो नायो। अंची भराय के परी, 'हा इ कमी अरु रह गइ है याक करल । 24 कचन करत खरो "अरी मया, गलतो है गइ पर अब पेट तो रोज चइए, कहा ते लाऊँ, काक कुआ पोखर मे जा गिलं का ?" चोये रुग्रासौ सौ है के बोलो। राधा जरु अ ची ने जान लई अब रवर ज्यादाख ची तो टूट जाइगी । यासो दोनान न अपने पामन के खेंडुआ उतार के द दिए। आसपास वेचव मे तो घर की लाज जावे की यात ई यासा आगरा जाइक खड्डुआ बेचे गए तब कहू जाइक पेट कूदान जुरे । चदा सिगरे तमास कू अपनी आपिन सौ देख रही । बुद्धि ते समय रही। मन म विचार रही। समाज की कठोरता अरु परिवार की विवसतान चाके जीवन म मारी परिवतन ला दियो। धरती प जाके पाम नाय ठहरते, अव जसी बहे वयार पीठ तव तमी दीज के हिसाव ते सादा कपडा लत्तान म मा गई। पढी लिखी, यासों साफ कपडान प तो वाको ध्यान ही सफाइ पं जरूर ध्यान द ती। वान इ ऊ देख लियो क दुनिश म पइसा की बडी पूछ है । चदा या वात सौ वडी दुखी ई के छोरीन को ब्याह करवो हासी खेल नाए । व्याह के ताई छोरीन को दिखारी होय । बजार म जस चीज पसन्द जा जाए तो ल लर जाए नई तो उठाय क फ क दइ जाए। न कहु ना सोच दुकान की चीज पमद ना आव तो बाके फेसवे ते वा चीज प का असर पर वू तो निरजीव होय, पर छोरी के तौ वुद्धि होय दू मास को ही लोथग नाय, हियो हू होय । बाए जव उठाय के फर्क तो वाप का वीत वू ई जाने । छोरी के दिखारे के पीछ मोल तोल को ज्यादा महत्व है। छोरान की नीलामी सी होय । याम मान्स को मूल्य कम पद की पूछ ज्यादा होय। जितेक चे आसन प देवता बठो होय वितेका ऊ चौ चढ़ावी होय । एक ओर वात है-मोल तोल है जारे के पीछ मान्स बचन सौ अरु फिर जाए । व इ ना देखा जा छोरी • देखिवे आए हैं वाकै मन प का बीतगी ? बू रिचारी अपनी सहेलीन के बीच क्स म्हो खोलगी। वोलगी ती कसे बोलगी। मुहल्ला म वयरवानी क्तिक नाम रिंगी कइ जने देखि गए हैं। सम्रघ नाय है पा रह्यो जरूर, छोरी में कछु कमी होयगी।' कोऊ कछू कहेगो, काम कछु। जितेक म्ही रितेकइ वात । कौन कौन को म्ही रोगो जाइगी। कौन कौन के सामइ असलियत खोल क रखी जाइगी। चदा के मन में या तरिया के अनेक विचारन को तानो वानी पुरी रहती। दूसरी तरफ समाज के ठेकेदार अरु दहेज के लोभीन की ओर घिरना के वीज बुव गए। निहचे कियो, “मेरो बस चले तो या ढाचे . इ बदल दऊँ।' चन्दा के दिमाग म इ वात घर कर गइ क दहेज लेवे वारे ऐसे डाकू है जा माया । देखो न काया . । अगूठी कू' नाय उतार प्रागुरी कू इ काट । वे मुरगी ते एक एक सोने के जडा लबे के पच्छ म नाएं एक दिना मे ई मुरगी कू मारक सान क सिगरे अडान न लबी चा है। वे भैस समेत खोवा करवी चाहैं। वे ऐस सामाजिक सिकारी हैं जो अपने स्वारथ के ताई सिगरे छत्ता • तोरिक छोटी बडी मधुमक्खीन के छटपटाचे पै हू नकहु नाय पसोज । चन्दा क्या बात को सबसौं ज्यादा दुख हो कचन करत खरो 25 नाओ। क बाप पै कछू नाय रह्यो अरु वेदा वारे म्ही फार रहे हैं। ब्याह होय तो होय क्सें ? फसल अच्छी आ जाती तो वाप को रुपया आसामीन प ते लौट आती अब तो दानो फसल विंगर गइ । अव तो पूरौ रुपया डूब गयौ। एमे म पार परिवो आसान चदा जब अपने बारे में अपने परिवार दुखी देखती तो हिल जाती। एक माऊँ अपने जीवन पै युयलाहट होती तो दूसरी ओर दादी, मया अरु बाप की दमा देखिकै रोइयो आती। यासौं चदा । अपने मन में निरनय कर लियौ। कॉलेज जीवन मे चन्दा एक छोरा सौ भौत प्रभाविन भई । छोरा को नाम हो चकोर । जब जब कालेज की वाद विवाद प्रतियोगिता होती तव तव छोरीन के कालेज ते चदा जीतक आती अरु छोरान के कॉलेज ते चकोर जीत क आती। कवक चदा जीत जाती कवऊ चकोर जीत जाती। यासी दानो एक दूसरे त भली भाति परिचित है गए । एक पोत 'भारतीय समाज में-दहेज को दवी साथ है।" वाद विवाद को विस रखो गयो । कछू छोरा छोरी या पच्छ म हे क दहेज दियो जाए जासौ बाप की सम्पत्ति म त छोरान के सग छोरीन कू' हू हक्क मिल । वळू या पच्छ म है व दहज नई दियो जाए। चार नै या पच्छ म जी तक दिए बिन सुनिकै दहेज की माइ भरवे पार हारा बना रह गए। इतक तारी वजा क सिगरी हाल गूज उठो । चटा चकोर के तक भौत पसद आए। बाको भासन पमद आयो। बाको सुभाव पसद आयो। बाके व्योहार प बू रीझ गई। चकार जब विज की घासना भई तो बाके चेहरा प कोऊ अभिमान की रेखा ताई उल्टे विनय के भाव दिखाई परे । सच है फल पाइक वृच्छ नगई हैं। चकोर की विज प चन्दा ने एक सवाल पूछो, दहेज के विरोध में जो बात होठन सौं वही हैं बु होठन तकई रहिंगी व जीवन म हू उतारी जाइगी। चकार बालो, या बात को उत्तर ती सम ई देगी। हा मान्स ' अपनी वात को धनी होनी चइए। पाऊन वही है धिन नीति न नौष धनी धरनी क । चला अरु चार की वात या इ भई । चकार बी ए फाइनल म पढ रही हतो। वुडीग ये पाम अऊ गाम को रहववारी। इस हैरे हाड़ को रग गोरो, चहरा प गम्भीरता सलवती। कम पालती पर जब वोलतो तो फूल झरे है। नू बिनम त नामा जो अल्ल टल्त भारत रहैं। विरथा अपनी तारन कू पाये। था, रहन महन को रम वालिय से, सारा जीवन उच्च विचार जीवन म उतारव को ६ पल नियगो र पसेर न यूनिवमिटा म पहतो स्थाा पायो। पागे और हल्ला है गयो । एस गांव र रहनया में सहरन के पहरयान यू पटार दियो। नापरी महलन में जात गई। अयवार वारे वाको 26 कपन परत गरी इटरव्यू लवे के ताई दौरि परे। दूसरे दिना अखवारन के पहले पना प चकोर की फोटू अरु वाको इटर यू छपी। चदा ने जब ई समाचार पढी अरु अखवार म फोटू देखो तो फूली ना समाई। बाए ऐसी लगो मानो वा परिजन कूई सौभाग्य मिल्यो है। चन्दा न एक पाती भेज के बधाई दई। चोसोर कू वधाई सदेसन को अम्बार लग गयी पर चदा को बधाई सदेस ऐसौ लगौ मानी अपन परिजन को ई बधाई सँदेस मिलो होय । वान वू सबसौ अलग छाट क रख लियो । चकोर हू चदा के व्यक्तिस्व पै मन सौ मोहित हो । बू जानती क चदा एक अच्छे घर की छोरी है । बाप के पास खूप धन है तोऊ अभिमान को नाम नाए। फिर मन मन ते चन पर । मन की बात मन तक पहुँच । मन ई मन वात हाय। याही तरिया दोनून के बीच मन ई मन विचारन को आइवो जाइवो हौसो रह्यो । अब चकोर एम ए को छान हो अरु चदा बी ए वी दूसरी साल मा गई । - एक दिना चन्दा नै चकोर सौ अपनी समझ के अपने मन की व्यथा वह दई। चन्दा न कही क बाके घर की हालत खराब है गई है। चकोर ने चन्दा की राम कहानी सुनी तो चकार को रुथान चदा माऊँ और वढ गयौ। चकार ने आत्मीयता सो चन्दा साहस बढात भए कही, ये तो आते जाते रह । देख जिनके नाए झापडे निकै है गए घर। असर है गए सर, सर है गए ऊमर । बाने चदा क ढाढस बंधाते भए कही। सोच मई वित हानि को, जो न होय हित हानि । धन तो वादरन की छाया है। ग्राती जाती रहै । इन बातन त चदा कूबडो चन मिलो। चकोर के मन म एक ओर सहानुभूति उमटी चदा की गरीबी कू देखक पर दूसरी ओर चकोर के पास वडे बडे लोगन के औफर आ रहे। अच्छे अच्छे अधिकारी अच्छे अच्छे धनी मानी चक्कर लगा रहे। या बात कू सब जानते क चकोर गाँम को छोरा है गरीब घर को है पर लाइव वारे समै मे तो ऊजरी पच्छ दिखाई पर रह्यो है। या ई सी आए दिना बाके घर पे अच्छे अच्छे फिरकया लगा रहे। या समझो बेटीबारेन । बाकी देहरी की धूरि ल डारी चकोर की मया तौ चरखा कातती बाके पास दो बीघा जमीन ही। कच्ची घर हो। फोऊ आतो तो वठावे के ताई कोऊ ठौर नाई । जो कोऊ घर देखती बूई नाक भौंह सिकोरतो। चकोर बिन सबकी मनोदमा कू पढती पर मन की बात कह ना पातो। वाकी मया नै सिगरौ भार चकोर पै ही डार राखौ। व्याह के ताई कह राखी 'जसौ करनी चाह कर मै तो नदी किनारे को रूख हू ना जान कव बयार आ जाय अरु क्च उखर क वह जाऊँ। काम तो तोय है जसो तू चाहै बेमौ कर। चकोर कू सिगरी भार सौपि क वाकी मया निस्चित है गई। कोर कचन करत खरो बात जानती। पोर न साची वान मचन पदहन । विरोध म लम्र चौडे भासन दिए हैं अरु अब दहन के ताई म्हों फनायो तो नाग तान द द में मार दिग। यासी याने मन ई मन पछु त कर लिया। यानी ई निरनय घदा के मन तर न जाने क्स पहुच गयो ? घना । हू विसवास है गयो क पार बार प्रस्ताव क स्वीकार कर लेगी। चदा अपन पर पी विगरी हालत कू दस रही। हर वरम की मूगण सों आयामीन की हालत यस्ता है गई। जा अपना पट नाय भर पा रह व पजाए क्स चुकाते । चोसे कौ रुपया पूरी तरिया डूब गयो। पचहु गहू त पारी भौत उगाई है जाती तो वाई त घर को ढर्रा चल रही। थोरी उगाई पट की भेंट है जावेई। चदा ये पोरे हाथन यो का चलई । पट त छुट्टी मिलतो ता व्याह को यात सूझता। चदा के व्याह | ताई का हिल्लो नाप नग रहो। चास अ ची अरु राधा एक ओर रुपया इव जाये त दुग्री है तो दूसरी ओर चदा के ब्याह की विथा क्सका दती। घर म सदा दुरा को वातावरन छायी रहती। चदा या दुर क कव तानू देखती एक दिना वान अपन पिता कू एक पाती लिग्री- पूज्यनीय पितामी मै भौत दिनान सौ घर र वातावरण सौ घुटन को अनुभव कर रही है । हार माम की बनी है। भावन को उठियो स्वाभाविक है। मापन गरीबन कू करजा बाटिक अच्छी किया है। विनके प्रानन को रच्छा करी है पर का किया जाए, कई वरस सों सूखा परि गयो। मै देख रही हू आपका रुपया हूब गयो है। किसानन की वधिया वठ गयी है। वे बिल्कुल टूट गए हैं। कर्जा कस चुकाव । इतकू विना रुपयान के मेरे ब्याह के ताई आपक सामई विकट समस्या ठाडी है । विना रुपयान के घर को घरुआ है गयो है। बिना धन के मानस की पूछ नाय आप जहा कहू जाग्रो म्हा त निगस है क लौटौ। मोय कई बेटावारे देख गए हैं । मेरो कई बार दिखारी है चुकी है। मेरे स्प रग गुनन की ग्रोर ध्यान न दक धन की भार ध्यान द रहे है। धन ते बिनके फटे म्हौन ने सीद तो भली भला है नही तो म्ही सूज जाए । याही सौ बात बनती भई टूट जाए । याको आप प तो प्रभाव परई है माप हू प्रभाव पर। पाए मै होठन सो ना कह सकू न लेखनी सौ लिख सक। आप देख रहे हैं समाज की माग बढ गई है। प्रादमी के दो दो चेहरा होय तौऊ गनीमत है पर अब तो कई कई चेहरा अपनी जेब म रखें जब जसी जरूरत पर बमोई चेहरा लगा ल। जिनके म्हो लहू लग गयो है बा बिना कस रह सक। यह सब समय की बात है। जा देश म ब्याह को अाधार गुनन की बात ई वा देस मे अब दहज ई आधार है गयौ है । 28 कचन करत खरी - पर अव आपकू चिता करवे की जरूरत नाए । मैंने सावित्री की भाति सत्यवान को चयन कर लिया है । याम को व्यवधान नाय होयगो । जाप तो अनुभवी हो। प्राय ललना एक वार ई बरन करें। बिनके मन के तमचा मे तो एक ई गोली होय । मैने जो जीवन साथी ढूढो है, है तो वू गरीव घर को पर होनहार है। बी ए 7 प्रथम पास भयौ है। एम ए महू पहली ई स्थान पावगौ। ई मोय विश्वास है गयो है। बाकी विचारधारा मौ मै खूब परिचित हू । बू दहज बिरोधी है । माय जीवन थी वनाइस म गव को अनुभव करगी। आप दुखी न हो। ई ना समय क मै गरीब के घर जाऊ गी। आप विसवास कर मैं अपनी भाग लक जाऊगी। मया बाप कम के साथी होय भाग के नाय हाय । आप याहू वात को विसविास करियो क मै कोऊ ऐसी काम नाय करूगी जासौ आपकी प्रतिष्ठा कू बट्टी लग। मै जो जीवन साथी वरन कर रही हू बू जाति, धम ऊच नीच, गरीव अमीर के भेदभाव सौ ऊपर उठ गयो है । मैने रुकमनी की नाई कृष्ण कू पानी पठाय के अपने हैवे वारे साथी सो समयन पा लियौ है। याकी मैं क्षमा चाहू। आप अनुभवी हो। मैं ग्रापकू अपने दुख सौ और दुखी ना करनी चाहू। वसलापको समथन चाहू । आपकी प्यारी बिटिया चदा। चदा नै पाती लिखिक चोखे की डायरी मे धर दइ। अपने मन की विथा कागमन प उतार के, जपने कू हल्को अनुभव कियो। हा, भय जरूर हतो क पिताजी कहू नाराज न है जाए । अम्मा रु दादी कहू करमन ने न फोरिबे लग जाए । चाह तो यही के सबन को दुख दूर है जाए पर क्हू उल्टी न पर जाए। क्हू दुख मरु नई बढ जाए। पर मन की बात कू, मन की विथा क चदा कब तक रोकती। क्व तक घुटती। बाने सोची एक दिना जो होनी है बाए कर कर क छुटटी पाऊ। चोखें जब अपने कमरा मे आयो अरु बान डायरी में क्छु निकसे भए कागज देखे तो डायरी खोलिबी सुभाविक है। डायरी खोलिक देखी तो कछू लिखे भए कागज दीखे। मम्बोधन पिताजी कू अरु नीच आपकी प्यारी बिटिया चदा। च य समझ गयो चन्दा ने अपने मन की बात पाती के माध्यम सौ कही है। चोखे एक सपाट मे ही पाती कू पढ गयो। मन कू विश्वास ना भयो। मन नई मानौ। आखिन न मलक, म्हो प हाथ फिरा क धीरज सो धीरे धीर एक पोत फिर पाती कू पढ गयो। पढक बडी कचन करत खरी 29 अचम्भी भयो । छोरी के सुलझे भए विचारन ने वाकू झकझोर दियो । एक पोत तो वाकू लगौ मानौ वाके दिल दिमाग क लकुवा मार गयो होय | मन में उथल पुथल मच गई। माची पकरि के वठ गयो। चदा की बात मानी जाए तो कसे मानी जाए ? समाज थू थू करगी। लोग ताहने द द के मार दिगे। गल-गिरारेनम निवसवो दूभर है जाइगो। लोगन वो हाथ पकरी जा सक जीभ ना पकरी जाए। काऊ गछू रहेगी कोक क्छु। ar चोखे कू याद आई एम घटना। कोटा वारे बालविशन के छोरा ओम न मैया वापनकी बात नाय मान के जपने मनचाही अपनी जाति की छोरी ते ब्याह कर लियौ। व्याह तो चुपचाप है गयो पर थुनका फजीते भौत भए। मया वापन बू घर सौ निकास दियो । अब बू अपनी बहू ते लकै अलग रह रह्यो है। छोरा में तो ब्याह कर लियो पर छोट भैयान के ब्याह की गल रोक दई । समाज म ई ऐसी बरियर है जाए देखिकै सब साह्न रुक जाए । जब जव जोम के छोटे भयान के व्याह की चरचा चाई और ई वात मालुम परई तो लोग विधक जात । या बात कू चोखे अच्छी तरिया जानती। दोनो प छन – ऐसे व्याह सौ गरीबन के रस्ता बन्द है जाएं। धाए दूसरी ओर दूसरो उदाहरण याद आयो। गधे के छोरा शोक ने अन्तर जातीय ब्याह कियो। छोरी तो प्रभु गग की अरु अशोक वामन हो पर दोनोन को च्याह बड़ी धूमधाम सौ भयो। दोना पच्छ सुखी। दोनोन की मन चाही भई । फिर चोखे ने तुलनात्मक ढग ते सोची राधे बरु प्रभु तो देस के जाने मान मान्स है। विनकी गिनती बडे लोगन म होय । बड तो जो चाहै सो कर सके। कहाँ कर बडे कर सौ लीला, छोटे कर सो पाप। बिनते अपनी बराबरी कैसे करी जा सके । याही तरिया चोखे के मन में विचारन को तातो लग गयो। मन श्रोत भारी है गयो, नीद उचट गई। विचार आयो सयोगिता की नाई पथ्वीराज की मूरति पं वरमाला डार दई तो वा होगी। या विचार नै चोखे कू और अपचार दियो। अखीर मे बासौं नई रह्यो गयो बान राधा कू जगायो । राधा • जगाय के एक सग कसे कही जाए याकू त नई कर पायो। इत उत की बात करी पर राधा औगासूती कछु समझ नई पाई पाखे व तक आप बाय साय करतो अखीर म मुख्य बात प आयो। चन्दा की चिटठी की बात कही। राधा न चिटठी की बात सुनी तो नीद हवा है गई। अब वाकी समय म आई के चोखे नै बाकू चो जगायो है। राधा सुनत यम चौक परी। वान चदा को चिट्ठी कू सुननो चाहौ। चाखे ने रोसनी वरी। घोर धीर चदा की लम्बी चौड़ी चिटठी बाची। चिटठी कू सुराक गहरी चुप्पी छा गई। मौन तारो राधा न- 30 वचन करत पुरी * मै तो पहले ई कहती पर तुमने कछु, ध्यान ई नई दियो, अब चोखी नाक कटगी।' "चौ नाक कटवे की का वात है ? और का नाम उजागर हैबे की बात है ? भाई दुनिया मे लव मैरिज ह तो है रही हैं। लव मरिज करबे वारेन को नाम हाय का ? "नाम तो होय चाए नई होय, काम तो है जाए। 'ई तो हार को नाम हरिनाम है।' "राधा तेरी ई भूल है। लव मरिज में मन चाही जीवन साथी मिल जाए। "लव मरिज जितेक जल्दी होय वितेक ई जल्दी टूट जाए। आए दिना तलाक की कहानी अखबारन मे छपै । भावाबस म कर्यो गयो ब्याह क दिना टिक पाव । ‘ऐसे तलाक तो विन ब्याह्न म हू देखिवे कू मिल जिन ब्याहन कू मया बाप बडे सोच विचार करें। "अजी वा पछुआ हवा को चौ बखान करो जहा की बयरवानी अपने पुरखारेन ने जब चाहै तब दूध मे ते माखो की नाई निकास के फैक । हमारे यहा को सो रस कहा ? मया बाप छोरा क सोच समय के कन्या के अनुरूप चुने। फिर सगाई ते न्याह लौं जो जो नेगाचार होय विनते प्यार की गाठ ऐसी पक्की है जाए क दोनो एक दूसरे .जिए मरे। छोरी कू पति जाराध्य है जाए। परमेसुर है जाए। पति हू पत्नी कू बर्दा गोनी। दो दह एक प्रान है जाए । दोना जीवन साथी बनके जीवन भर सरस जीवन बितान।' पर अव का किया जाए। एक तो गाठ म पइसा नई । दूसरे जहा कहू जाए म्हां हमारी गरीबी कू देखिक वोऊ बातई नाय कर । तो कोऊ गरीब गुरबा ई देख लेओ। चार रोटी को ठोर प एक रोटी दक हाथ जोर गेि। तुम परीव गुरवा की बात कर रही हो। आज तौ वटा वारेन के म्ही फट रहे है । काऊ की छोटी सी हू नौकरी लग गई है तो वू हू लाखन के सपने देख । तो फिर चन्दा जाए देख रही है वू कौन है ? कौन जाति को है ? मैया बाप कौन है ? घर धूरी है क नाए ? सब कछू देखनी परगी । कचन करत खरो 31 । "अरी परमेसुरी चिटठी म सिगरी बात साफ गाफ लिए दई हैं जहा छोरा होनहार है भविष्य उजरो है म्हा फिर घर घूरे छान छारिया दबिब म का तुक है। चोखे की बेटी ने घोखो ई सोची है। बू खोट की बेटी नाए 'भाई जाति पाति तो देख लेगा। काऊ जान जात को भयो तो मौहल्ला बस्ती म कोऊ बोलन हू नई देगी। जाति म ते वाहर निकास दिए तो जीवो दूभर है जाइगी। "अब इन बातन कू चदा ते तू करियो। मै हू छारा को अतो पतो पाय जांच परताल करु गौ। पर देख, अव जात पात के दिन तो लद रहे हैं।" घनी रात तक चोखे अरु राधा वातचीत करते रहे। चासे न अपने मन की बात कहतं मन को बोझ हल्को कर लियो। अब राधा को मन उलथन म परि गयो। वाकी नीद उचट गई। रात भर करवट बदलती रही। कवक अपनी गरीनी को जरु कबऊ च दा के निहच को विचार करती। साचिवे लगी कव भोर हाय अरु कव च । सौ वात करी जाए। काल की गति काऊ कू रुक नाहैं। हा विपत्ति मे फसे मास कू लग कै सम धीरे धीरे निकस रह्यो है । परदा पार करवौऊ ऐसी लग मानो पहाड पार करनी पर रह्यो होय । सुखद जीवन वितावे वारेन के हाथन म ते मम बारू की रेत की नाई खिसकतौ सौ दिखाई दे। राधा कू रात भारी पर गई। राधा सम सौं पहलै उठिक काम काज माहि लग गई। वू तन ते काम म लगी जरूर ई पर मन चदा म ई उरय रह्यो। कब चदा जगै क्व बातन को अरघ दकै सकट दूर करू । बदली च दा जैसे ही जगी, राधा लपकी। और दिनान की ठोर मया सी देखिकै चदा समझ गई वि चिट्ठी की करामात है। पिताजी सो छनक बात मया तक आ गई। चदा हू तयार है गई। ओखरी मे सिर दियो तो मूसरन ते का डर ? या यो कही सेल पेट कू आयो तो लफावे ते का होय । अब राधा अरु चन्दा की बातचीत प्रारम्भ भई- 'चदा तैने अपने पिताजी कू तो चिट्ठी लिख दई मोते कछू ऊ नई कइ । अम्मा भय झिझक अरु सकोच के मार नाय कह पाई। * फिर इतेक लम्बी चौडी चिट्ठी लिखवे मे हाँ अम्मा कछू वात ऐसी हाय जिने म्हौ ते नाय वह पाब बिन लिखिक सुविधा सौ बता सक। 32 कचन करत खरी "पर बेटी जा छोरा तू देख रई हैं, वू कोन जाति को है ' मैया बाप हैं के नाय ? कहाँ को रहवे वागे है ?" "अम्मा, अव समै बदल गयो है अव जाति पॉति की वात सोभा आय दें। छोरा सुयोग्य हानी चइए । मैया वाप कब तानू कौन के सगी होय । हाँ मोय इतेक पती है क छारा को नाम चकोर है। वी ए म टीप आयो अरु अव एम ए मेऊ टोप वावगी।" 'कहा को रहवे वारी है ? इतेक तो पती होयगी?' 'चों नई डीग के पास अऊ गाँव की रहवे वारी है। घर म मया ई मया है। घर पूरी कछू नॉप । गरीव हालत है। चकोर अपने पॉयन प ठाडो है। अपने आप पढ रही है।" पर बिटिया गरीब के घर जाइये म 'चौं गरीव का मास नॉय होय । नीयत ठीक होनी चइए। हमऊ तो गरीव हैं । लच्छमी तो आती जाती रहै । फिर गरीब के घर जाइव म का चिंता की बात है। गरीब के घर जाइये म तौ सौभाग्य माननी चइए । जो अपनी विटिया • अपने त ऊँचे परन माहि द बिनके का हाल होय, वे काऊ त छुपे नॉय । छोरीन की कोऊ कदरऊ नाय पर। बाए तो घर की नौकरानी समझे । बार ऐसे दाव क राख मानौ जड परीद गुलाम होय । ठोकरन मे ठुकराव।" "पर तोय विसवास है क पकोर विना दहन के तोय स्वीकार कर लगी ?" "अम्मा, वाके विचारन सौं अरु वाके मच प भासनन है तो मोय पूरी मरोसी है।' 'विटिया, मच पं कहवी और बात है जीवन म उतारियो और पात है । हाथो के दात याइव ये मोर होय, दिखाइव के और हाय ।' 'नॉय अम्गा, चकार कोऊ ऐसी नता नाए जो यह कछु अरु पर रछू। वाकी कथनी करनी मे भेद नाए। दू तो गुड को पुआ है बाहर भीतर ते एक सौ । वारी सादा जीवन उच्च विचार तो सबक सुहाव ।' तेरी मरजी विटिया, पर याच समन के कदम उठाइयो, गहू एगो नइ हाप में पीछे युक्ता फजीते हाय ।' अम्मा, काम तो सोच समान के ईकरुगी पर भाग त तोऊ पीपरा नोय पाय । राजा राम पो साधि लगन घरी पर तोक बन-बन भटकनी परी द्वारा, दमयती पी विपदा यो क्पा पाहू त छिपी नाय । हमारी धम है, चरम पर। हो पाम परब म काम विगर रहलो हाय तो युनिर नई धिगरन दें। - वन परागरी 31 विटिया के इन विचारन कू सुनिक राधा कू मरासी है गयो क चन्दा पक्क पराएन प है। चदा न हू राधा क पूरी भरोसौ दिवा दियो क भाग्य जपन अनुरूप गति अरु मति दे । होनी बडी प्रबल होय । यही है, 'करम गति टारे नाय टर।" अब चदा कू चिता परी जपने सपना साकार करवे की। वह दवी आसान है पर करिवो मौत कठिन । पा कठिनाई चदा के सामई आ रही बात ज्यादा कठिनाई चकोर के सामई आवे की। एक तो वा ताइ एक त एक च धर क, अच्छे पइसान बारे ढोव ५ ढोर दैरहे। निहोरे पर रहे। दूसरे जाति पाति की अवई वाऊ कू पतो नाई । चन्दा न तो आनजात म ब्याह करय को निरनय कर लियो पर चकोर जानजात कू स्वीकार कर लगी, ई बडी टढी खीर ई। खर चन्दा ने चकोर सौ साफ साफ बात करवे मे ई सार समझो। गर्मीन के दिना हे । छुटटी चल रही। कालेज लगती तो आसानी सो भेंट है जाती। यासौ च दा नै पाती डार के चकोर कू भरतपुर वुलाइव को निहच कियौ। पाती गोल गोल लिखी गई। पर पाती को तोर या तरिया कियो क रोटी अऊ म खावै तो पानी भरतपुर नाइक पीव । पाती कू पाइकै चकोर की धडकन वढ गई। वान भरतपुर जाइवे की अपनी मया सौ पूछी और फिर हडबडातो भयो सूधौ भरतपुर गयो। पाती का मिली मानी बिल्ली के भागन ते छीको टूट परौ होय । याके पहल चकोर वाके घर नाय आयो, पर बाए चन्दा के घर को पूरी जती पती हतो। चदा वाकी मेह की सो बाट देख रही। चकोर के आते ई चन्दा, चदा की नाई खिल उठी। चन्दा चकोर कू बठक मे वठाय के जावभगत की बात तो भूल गई पहले अपनी पाती की बात पूछ बठी- अापकू मेरी पाती मिल गई होगी? पाती नइ मिलती तो चकोर चन्दा के पास चौ जाती । चकोर को आइबी इपाती मिलिवे को प्रमान है। •ई मेरो सौभाग्य है कुआ प्यासे के पाम जायौ है । चदा याको निहच करबो बडो कठिन है कौन कुआ है ? कौन प्यासौ है ? हा इतेक बात जर है क चकोर तो चदा के पास ई जाब । जाप तो कवि की सी बानी वोल रह ही कौन कुआ है कौन प्यासी है याको उत्तर तो मनई कर सक। "हा जो तिहारौ मन कह रहा है बुई मेरो मन कह रही है । 34 कचन करत खरी चदा वातन मे इतेक वह गई क यारी मीठी पानी की क बात भूल गई। बू भगी भगी भीतर गई अरु ठाडो पानी लकै पौन की गति सौ लोटि के आई। चदा के पायन म पख लग रह । पाव धरती प नाय ठहर रहे। रोम रोम हस रह्यो। ठडी पानी सामने रखत भए वोली, चाय पिओग क सरबत " जब तक चाय बन तब तक सरबत ई पी लिंगे।" कहकै चकोर खिलखिला उठी। वात ज्यादा खिलखिलाहट चदा नै विखराई । ऐसे परिहास को मधुर पान करते भए दोनों अलौकिक सुख म खो गए। चन्दा एक पोत फिर भीतर गई । चकोर पदा के कमरा की साज सज्जा कू देखती रही। पौराणिक चित्र टगे भए । एक भोर सकुन्तला की विदाई को चिन टग रह्यो, जामे कण्व रिसि को आस्रम दिखाई पर रह्यो। एक ओर सकुन्तला नन नीचे किए सासरे चलये की तयारी कर रही। हिरनी ने अपने म्ही ते वाको पल्लो पर रायो, लग रही पूछ रही होय "परदेसिन बनकै क्हा कू जा रही है । एक ओर वेलन व फूल पर रहे दूसरी जोर सकुन्तला के ननन सा जासू टपक रहे । काने म कण्व रिसि आसू बहा रहे। चकोर ऐसे भाव चित्र कू देसिक भाव विभोर है गयौ। मन ई मन सौचिवे लगी जब हिमालय जसी रो पर तो सासारिक जीवन को श्दन करिबौ सुभाविक है। चकोर की टकटकी चिन माऊ लग गई। चकोर फिर सोचिवे लगी, 'सपना देख रह्यो हू क मन की भावनान कू टगो भयो देख रह्यो हू । जो भीतर है सौई बाहर है । राम जान का होनी तबई चदा सरबत के गिलास ट्रे मे सजाइ क ल आई । धीरे धीर सरवत पीते भए चन्दा अरु चकोर बतरामते रह । चदा चिट्ठी तो ऐसे भेजी, मानौ कोऊ आपत्ति को पहार टूट परी होय पर अव कछ ऐसी बात मालूम नाय पर रही।' "आपकू तो मालूम नाय पर रई पर अबइ आपकू वताई कव है। जव सुनोगे तो मान जाओगे। "तो वताओ ना मेरो मन तो जव ते पाती पाइ है तबई ते धुकर-पुकर कर रह्यौ है। तिहारे होठन प हसी फूट रइ है। ई हसी तो आपकू देखि क मा रही है, मन का सदा एक सौ रहे। जब सुख की बात हाथ लग जाए तो मन सिगरे दुख दरदन न भूल जाए। जव दुख को पल्ली भारी है जाए तो सुख कपूर है जाए। ऐसे तो राजा राम इ हे राजतिलक की बात सुनाइ तो सुख को रेख हू दिखाइ नई परी अरु जब वनवास की सूचना दइ तो रचमात्र दुखनई ब्यापौ। समरसता को भाव हम सासारिक जीवन म वहा' कचन करत खरी 35 ‘चदा राजा राम हू तो हमारी तिहारी तरिया जमे। हमारी तिहारी तरिया बड़े भए। हमारी तिहारी तरिया सेले-कूदे, हसे हसाए। हा विनम ज्यादा गुन हे याही सौ बिन्नं दुनिया पूज। हमे याही को तो अभ्यास करनौ घइए। जितेक मा स क समरसता को अभ्यासी है जाए वितकई वाको मान बढ़ जाए। या अभ्यास को ई नो सिगरी खेल है। ई अभ्यास का बातन सी है जाए।" चदा, "ठीक है चना, अच्छे कामन मे मन लगाव के ताई बार बार अभ्यास करनी चइए। इ कष्ट साध्य तो है असम्भव नाए ।" "असभव तो क्छू नाए कल्पना सक्ति के बल पं सही है जाए । सक्ति नई होय तो झूठी पर जाए । जीवन दरसन की बात ई करती रहेगी के जाके ताई बुलायौ हू बा बातऊ कू बतायगी। वात अवइ बतानी बाकी है का? मरे घर को सिगरी सामान आपसौं सब वात कह रह्यौ है। समझ रही हू जव वोऊ वात कहवे की नाय । 'चदा तु पहेली बुझा रही है। मै जाननी चाह रही हू क मै चो बुलायौ हू 'तो सुनौ एक पोत 'भारतीय समाज म दहेज दनो साथक है' या विस प बाद बिबाद प्रतियोगिता मई। याद है ना . 7 " "हा खूब याद हैं। ता समै आपने दहेज के विरोध में जो विचार रखे विनकी याद है ना ? हा, बिनकी हू खूब याद है । मै न आपत वा सम ई कही क ये विचार होठन तकई है क जीवन में उतार जाइगे? 'बाहू को मोय खूब याद है।" तो अव बू सम आ गया है। अब कथनी अरु करनी कु कसौटीप क्सवे को सम आपके सामइ है।' - सम आन द दे। चन्दा मन जो कही बाए अब ऊ दुहरा रही है । 'अव समैं आके म का देरी है। जापको एम ए को पढाइ पूरी भई ।" 36 कचन करत खरी - 'पढ़ाई पूरी तो कर हे ई नाप सरु। पर पेट के ताई पढ़ाई पूरी है जावे । पोरई आव । अब तो जब तक छारा अपने पामन प नइ ठाडो है जाए तब तानू बात करिवो बिरया हैं। "मापकू पांमन पे ठाई है। म का दरी है। पनारे पर हैं तो चुनाविगे ई।' माही नासा प तो दुनिया टिको है पर अबई मेरे सामई वराडे म्ही फारे हैं? ना नोकरी ना चाकरी, ना घर ना पूरी, ना रोत ना व्यापार । फिर यता, रेनो के बिना कोरिया त लठम लठा करवे म कौन सी तुक है।' "अजी आप अपने मन मस्तिकल सकुचाओ पर मापके ताई तो अनेकन हाथ र रहे हैं। आपको परिच्छा परिणाम आवे की देर है । आपको पहलो स्थान आगो यूनीयरसिटी वापक हापा हाथ लगावंगी।' "चन्दा तू तो बड़ी भोरी है। बागे की बात कोन जानी है। पहला अरु स्थान नई आयो तो कोऊ टका सेर क नाय पूछो। फिर जती चटकामत नौ परंगो। देख ना रही बरोजगारी सौं का कुगति है रही हैं। पढे लिसे सय री चाही। काऊ मेहनत सी यमाय के खाइचो पसद नाय करें। नौकरी लग : बस या फिराक म डोल। नौकरी लग जावे के पीछे सरकार के मेहमान बन । मूछन प तात्र दक खामै अरु गुरावै ।' 'या बात तो मै सब ठौर देख रही हू कॉलेज मई देख लेनो कोन और पढ़ा।' चन्दा, सवन को आखन को पानी उतर गयो है। जब बिना पढाए काम [ जाए तो चौं पढ़ाये ? डर तो सबन को निकस गयो है।" पर ईसुर ते इरव वारे कम करवे वारे व क हत । "चदा दुनिया में ऐसे नई होय तो धरती कस टिक । हमारे कॉलेज म जी है अपन काम ते काम रख । घटी वजते ई कच्छा म माव । याही सौं भरतपुर सब लोग बिनके खूब गीत गाये।' 'सर्माजी कू तो मै हू जानू जो ट्यूसन कर।" 'हा व ई टूयूसन बारे साजो । टयूसन तो कर पर कालेज म हू खूब पढाये। यूसन करबो कोऊ बुरी नाय । कोऊ पाप नाय, पर कर ईमानदारी सौ। सर्माजी 5 जे ते ई मेहनत करें। मेहनत नई कर तो कौन विनक पास फटक । सब चमत्कार नमस्कार करें।" "आप का विनते कम परिगे। प्रोफेसर बनते ई हल्ला मच जाइगौ।" चन करत परो 37 "मैं फिर यह रही है, आग आरे वारे रामो सिम फहबो याहू क बस की बात नाय । मै एम ए मे टोप पर गयो तराई पडू रह सा गो।" 'आप भलई तव कहियों मै तो अवई मरिस्यवानी पर दॐ आप टोर जानोगे।' 'चदा वात सांचो भई तो तिहार म्हों म यी मार।" । 'मै तो घो-यूरो पीछ लुगी पहले आप मोय वचन ती देओ। मेरे पिताजी पी गरीवी की कहानी अब उजागर है गई ह । कवहू या पर की पूछ हती पर चार साल ते पर रही सूया न हमारी हालत खस्ता कर दई। जव पिताजी पर न गाढ़े कू से बच रह हैं वे ई जाा। विनो मामई मरे न्याह पो मवान ह । अम्मा अरु दादी या दुप सी प्राधी रह गई है। मैन आपक विचारन सी प्रभावित ह क अपनी विचार सिगरे घर के सामई रुप दियो है । अर प्राप जानी अरु जापको काम ।" "चदा त तो भौत जाग बढ गई है तन जाति-पांति पूछी नइ । नात-गोत वचाए नई । मरो घर पूरी देखो नई । मरी परिवार जानी नइ । मेरी माली हालत देखी नई। मेरी और तरी का मल? कहाँ राजा भोज, कहा गगू तली। 'चों उल्टी गगा वहा रहे हा ? सम्बध ईट चूने सौं नाय होय, सम्बध रोटी सौं नाय होय , सम्बध आदमीन सो हाय । सम को उल्टी बयार बह रही है। आज क्ल नाममय सम्बध कू रोटी, कपडा अरु मकान कू स्थान द रहे हैं । रुपया त सब चीज खरीदी जा रही हैं। रुपया तेई सम्व ध खरीदे जा रहे हैं। समझदार या बात • समय ।। वे कहें कुप्रा की माटी कुआ में ई लग जग। जो रुपया दे, बाए बेटी वारी ब्याह म पूरी खच कराले । नोन नोन वह जाए राई राई रह जाए। दूसरी बात जो जाति पाति नाते-गौत की मेरे सामई राखी है। ये सब हमारे ई बनाए भए हैं । ये कहूँ ऊपर ते वन के नाय आए । तू कह रही है वू बावन तोला पाव रती सही है। 'जाति पाति पूछ नई काइ हरि को भज सो हरि को होई मै तिहारी बात को समथक हू । मै तो समाज के या कोढ कू खुद हाथन सौ जर मूरि सौ उखाड दैनौ चाहूं।' 'अबई तो आप अकेले हो, जब हम और आप दोनो मिल जाइगे तो आपकू और सुविधा मिलेगी। 'चदा, सुविधा सौ काम नाय बन । सुविधा सौ मान्स और आलसी होय । मास के मन म कम की जाग लाग अरु लगन चइए फिर तो मजिल अपने आप पास आती जाएं। चन्दा जो 38 कचन करत खरी . "आपकी बात कू मै काट नाय रही, पर मेरी मतलव है, साध्य के पावे के ताई साधन हू मौत जरूरी है। "चदा जव मन में लगन होय तो साधन अपने आप जुटते चले जाय । महात्मा गाधी के मन म लगन हती तो सब साधन अपने आप जुटत चले गये। अपने आप मजिल आती गई मुनी है क नाय जहाँ चाह तहाँ राह ।' 'बिल्कुल सांची बात है, याको पुष्टि तो वाना तुलसीदास ने हू करी है 'सिमिट सिमिट जल भरहि तलावा जिमि सद्गुण सज्जन पहिं आवा ।' “यस तो ई कम की लगन हम तुम दोनो के मन मे होनी चाइए । “याही वात . तो मै दुहरा रही हूँ। जव एक विचारधारा के दो मास तुगे तो बात जल्दी पूरी होगी। काहू ने कही है एक अकेली दो को मेलो। एक और एक मिलिक ग्यारह हाय । जव तो आपकी स्वीकृति चइऐ । एक पथ दो काज हुगे । हमारे परिवार को सिगरौ चोझ हू हत्वो है जाइगो । 'चदा मोय चौ लगा रही है। ई तो मरी सौभाग्य होयगी । 'चदा' जैसी लच्छमी मर घर आवगी। मर घर म उजेरी है जाइगो मेरे सोए भाग जाग उठेगे।' "अच्छो उल्ट वास बरली कलाद दिए। मैं आपसी तक नाय कर सकें। वाद विवाद प्रतियोगिता में हू तो आप आगे रहे। फिर वातन म, मै जापसी कस जीत सकें। 'ई आपन च्छो हथियार चलायो । तरबार के वार ते कोऊ भलई बच जाए पर फूलन को मार त बचिवो कठिन है। अब हमारे पास कोऊ अाँखर नाएं जिन आपके सामई परोस । हाँ इतक जरूर है क अपने मया वापन सौ पूछ लेगी। जागे वडिक फिर पीछी हटिवी नइ चइए । "ई बात तो माय वहनी चइए क आप अपने मैया बाप ते पूछ लेऔ।' 'चदा तोय ई ऊ नाय पती के मेरे आगे पीछे मैया ई मैया है। वाप तौ मोय गादी म ई छोडि क चली गयो। ममा नै सिगरे अधिकार मरे ई ताई सौप राखे हैं। हा इतेक जरूर है मया ते ज्यादा गाम है । गाम की बात जरूर जरूर माननी पर। गाम में मास गांव के ताई होय। गाँम की बात मा स की हाय । मास की बात गांव की बात होय । 'या काम में गाम आडौ पायो तो फिर कस बात बनगी? रचन परत परी 39 गांम वारन . समझानो परंगो। गौम के लोगन । विसवाम म लनी परंगो। अर कछू और पूछताछ करनी है सो कर लेगी। पानी पीक जात पूछनी सोभा नाय दे। इतेक तो ध्यान म रखियो के हम जाति सौं वादई वामन हैं।" वामन तो हम हैं फिर तो कोऊ बठिनाई की बात नाय । वेसऊ जाति पाति की बात अब तो दूर हैं। हम सब एक हैं तेनेई तो कही है-~~जाति पाति हमार ई बनाए भए है। मैंने तो कही है, पर ग्राप मानी जब हो।' अरे हमई नई मानिगे तो कौन मानेगी। हम पढ़ लिख कक, इन समाज की कुरीतीनन समाज के ढकोसलान ने नई मिटाइगे तो कौन मिटावगी? नए स्वतन भारत की रचना कौन करगी ?" तो फिर वात आगे ह? सम स्थान, विधि विधान को त करिवो आपके हाथ है।' चदा जो काम नन मोफू सौपा है वाए मैं अपनी पूरी सामथ्य सौं पूरी करिव को पूरी प्रयास करू गौ। जो भार मोपो है, वाए उठाइव की पूरी कोसिस पर गौ। जा जुजा क मेरे कंधान ए रखी है, बाते मै कधा नइ डारू गौ। बात जर वाप बरावर होय। ई तो नए युग के मनचले छारान की बात है क गाडी को पइया नए राड की चरखा चलतो ई रहे। चदा पूरी भरोसो दक, चकोर अपन गाम लौट आयो। चदा ने चन की मास लई। बाने सिंगरौ किस्सा अपनी मया क सुनाय लियो । राधा या वात मुनिक वडी ग्वुस भई क चकोर वामन है पर एक आसका घर कर गई क वामनन को बादई वामनन के मग सम्बध नाय हाय ! कहू चकार की मैया न ई बात नई मानी तो सब गुड गोवर है जाइगो। चकार जा गाम म रहे बू या बात कू से स्वीकार करगो ? गांम नै चकोर • दवायो तो बात कैस बनेंगी?' राधा जब इन विचारन म र रई तबई चोखे बाहर सौ भायो । बाने चकोर के पाइये की बात सुनी तो भारी पछतायो। मोचिव लगो, “कहूँ मैं होती तो छोराए भली तरियां देख लती। दो दो बात है जाती। मन भर जाती। ने ममपायो बात बन गई तो सोन म सुगध समझो। घोष ने जब घोर की उडाई सुनी तो वा खिल गई । सोचिये लगी अधे हाथ बटर ता रही है पर वाए ईऊ परसोरला याद ग्रायो मब मरो तब पर राधा कचन करत परी जव जानिए जब चालीसा होय। बडे बूढे कह गए हैं, हरी खेती व्यावन गाय जानी जर म्हातर जाए", काऊन आंधरी त कही क तेरो भैया आयो है, वान कही भना कह तो भौत रही हैं, पर जब भुजा भरकै भट लुगी तव जानूंगी। सोई चोखे न कही माटो मड लग जाए तय है। मसखरान प वे भस चौख लई जाए तव है। विरोध के सुर भरतपुर ते चकार सीधौ अपने गांम बऊ बायो। मन कवऊ मौन नौय रहे। वाम तो विचारन को तातो आती जाती रहै। ताने बाने पुरते रह । मनऊ तो एक सागर त कम नाएं वामे विचारन को लहर बनती विगरती रह । भरतपुर ते नऊ तक आत समें चदा को रूप अरु व्यवहार चकार फूझकयोरतो रह्यो। चकोर हू तो हाड मास को पुतला हो ईट पत्थर को तो हत नाओ। जा कछ सुनौ अरु समझो देखो जरु समयौ वाको प्रभाव परिवी सुभाविक हो । च दा के रूप के सामई वू युर गयो। रूपक सा वाकी विचारधारा वागी समाज सुधार प्रवृत्ति मन ते मिलती भावना मव चकार के मन म बमती गई । प्रकृति मिलव ते मन ऐसे मिल जाए जस दही त दूध जम जाए। या तरियां वाको मन खूब पसा है गयो। कमी रही नो अपनी मैया को 'हाँ' की छाप लगवे की। घर आइक अपनी मया सों अपने मन की बात कहवे कू जौसर को ताक म लग गयो। जब-जब मन की बात होठन तक आती, लोक्लाज होठन कू खोलन नाय दैती। मन ई मन मे घुटिवे लगी। अर बाए दो चिता ब्याप रही। एक तो एम ए म टोप आश्वे की। चारा ओर हल्ला तो है गयो पर परिणाम म क्हू रोडा नई अटक जाएं। कहूं दूध में माखी नई परि जाए। कहू खीर म कबड नई पा जाए। दूसरी चिन्ता ई चदा की। कहूं बाकी मया अरु गाम मान जात की वहक बाधक नइ बन जाएँ। कच्चे धागन के ताने बाने ते वुने सम्बध कूच काय व नई तोर द नई तो चदा अरु चकोर की वसव वारी बस्ती बसबे सौ पहल उजर उजर जाइगी। जीवन नदिया क ऐम दो किनारे है जाइगे जो कबहू चाहब पं हू मिल नइ पाइगे। मया जर गांव वारे वाधक बन गए तो चदा के सामई कसै जायौ जाइगो, कमे चदा कूम्ही दिखायो जाइगो । याही सौ एक दिना सम पाइक चकोर न मया के पास बठि अपने मन की बात कही- 'मया अब कब तक तू चूल्हो फूकती रहेगी। कचन करत खरो "वेटा, जब तक मेरे भाग म है।" * मैया, भाग तो अपने हाथ की बात है।" "बरे बेटा कसौ वावरी है रह्यो है। सुनी नाय भाग सो अधिक अरु समै सौ पहल कछू नाय मिल ।' 'अरी अम्मा, भाग्य तो प्रारब्ध सों कहैं, प्रारब्ध को मतलब है पूर्व सचित करम, पहल जितेक करम किए बिनते अव भाग वनौ । अब जो करम कर रहे हैं विनत आगे को भाग्य बनगो। भाग्य तौ मया करमन सों बन । 'बेटा करम अरु भाग्य को झगरो तो युग-पुग सौ चली जा रही है । जग मे ऐसो कोन चाहै के वू घास खोद ? हर एक राज चाहे पर जाके भाग्य में हाय वू ई तो राज पाव। मया, सक्ल पदारथ हैं जग माही करमहीन नर पावत नाही ' करमन सौं जो हीन है बाकू पग पग प सक्ट उठाने पर। काऊ न वही है करमहीन खेती कर, बल मर क सूखा पर । मैया मान्स करम कर तो सुख पाव । करमन के आग भाग 1 झुकनी परे। सुदामा न द्वारका जावे को करम कियो तो भाग फलो।' 'बेटा भाग्य के आगे परम धरी रह जाए। भाग्य मे हाय तो छप्पर फार क दे। नौ निधि और बारह सिद्धि पूरी होय । भाग्य म ना होय तो सब खेल बिगर जाएँ नौलाख के हार कू खूटी निगल जाए।' मया बात समझ में नई आई। तो बेटा सुन, भाग के सामई लक्ष्मी न खूब कम दिए पर लक्ष्मी न हू हार मानी। कसमया? । भाग्य "एक पोत लक्ष्मी अरु भाग्य म होड पर गई। लक्ष्मी बोली मै बड़ी हूँ, बालो में बडो हूँ । जब दोना की तू तू मै मै ज्यादा बढ़ गई तो भाग्य बोलो दस लक्ष्मी सामने खेत मे किसान हर चला रह्यो है याए तू खूब सोने चादी, हीरा, मोतीन सौ निहाल कर द। दख ई मालदार है हू जाए। या बात कू सुनिक लक्ष्मी भजी भजी वा विसान के पाम गई। बाकू एक सोने की ईट दक कही, ल या सोने की ईटेल जा अरु मौज मार । अब खत जोतिब की जरूरत नाएँ । किसान न हो अरी पनमेसुरी अधे कूदो आख चहा। जव धर वठे मोय सर कछू मिल रही है तो मै काइक आऊँगी। 42 कचन करत परी किसान वा सोको ईटालक माने पर पहुंची। वा यन वारी बहू परोध म काहू प पर नाज पीखिये फू गई। किसान • इतक सवर कहा हो। या साने की ईट चूल्हे के राए म घर र यार राय ठक में अपनी बहू कू घुलावे चलो गयो। इतेक मे एक परोसन आँच लव आई । दान देयो पिसान के घर कोऊ नाएं। वान राए मे ते औन निवासी तो सौन पीईट दियाई परी। या हा करी ना धक्क चा सौन पी ईटें ला चपी गई। जब किसान अपनी बहू न ल हुलसो हुलसो घर आयो अरु जपने मालदार हैये को पिस्सा सुनात भए ल्ह पे राए म त सान की इट निकास क दव को तो दग रह गयो। रायो पाली पायो। रापई राय दियाई दई। किसान की बहू कू निह है गयो र बाके घरवारे र भैम है गयो है, के दिमाग पराव है गयो है, चों के राए म सोन की ईट को का चल माटी की ऊईट नाई। किसान की बहू न वाकू सूर मुनाई। विसान मूड पकर क अपनी म्हीं ला रह गयो।' गयो। चाक' "नैया ई नौ वात भई, पालनी म दूध का परमन टटार ।" 'बेटा नाग की बात तो सुन, दूसरे दिना किसान फिर सेत नोतिने पहुँच भाग्य न रही, लक्ष्मी, किमान मेत जातिये क्स जा गयो ? लदमा किसान के पाम पहुँची। किसान त पूछी तो किसान न नांची साँची बात कह दई । लक्ष्मी न एक नौलखा हार दियो अरु कही याए हिफाजत त रखियो। यासों जीवन भर, घर बैठे यइयो। सेत प आइव की जरूरत नाए । किसान वा नौलखा हार कू सैक भगी नगी घर लायो। दुरभाग्य सौ फिर बहू घर नाई । वाकू इतेक सबर कहा हो क बहू की बाट देखती। वू बा नौलखा हार कू भीतर सूटी प टांग क बहू कू दूढिव निवस परी। नौलखा हार कोठे के प्रधेरा म चकम रह्यो। चील ने समयी के म्योप है साइ बा नोलखा हार कू लेके अपने घोसला में जा पोचो। जब किसान अपनी वयर क लक लोटा बरु नोलखा हार दिखानी चाही तो बू प्रसमजस म जा गयौ । खूटी सूनी मिली। वाकी वैयर कू पूरौ विश्वास है गयो के वाकी वसम वावरी है गयो है। किमान कूबासी बहू ने हजारन सुनाई । किसान नऊ हजारन सौगध खाइ पर मोगध ते मा बिसवास आव'। + तीसरे दिना किमान फिर अपने हर बलन ने लक खेत मांहि दिखाई परी। भाग्य न पिर लक्ष्मी कुरेदी। लक्ष्मी दोरी दोरी फिर किसान के पास गई । क्सिान की राम कहानी कू सुनिक लक्ष्मी हू हैरान है गई। वान तीसरी अटा मोर वारी वात कहक किसान के ताँई एक वेसकीमती मोती दियो जरु कही किसान कान खालिक सुन ल ई तेरे ताई अाखिरी भेंट है । ई मोती इतनी कीमती है क याए वेचिक कचन करत खरी 43 तु जीवन भर बैठिम खा मा पर पाए राखियो अच्छी तरियां। मिसान मोती क अपनी जैर म घर के घर लोटो। रस्ता में परी नदी। वाए लगी याम, माई थुषि के पासत म भरकै पानी पियो। पर आपक वान अपने कुरता की जेब म त मोती निकास के अपनी बहू क् दनौ चाही, पर हाथ अर्यों तो जव चाली। किसान सकपका गया। भौचकको मो अपनी भरवारी क देखती रहो। घरवारी के माथे पै बन पर गए। घरवारी न अपनी सूझर मन करके निकासी । किसान ने अनुमान लगा लियो क बीच नदी म जा सम पानी पियो ता सम मोती नदी में गिर गयो होगी। किसान लम्बी सांस तक रह गयो। चौथे दिना किसान फिर खेत माहि तिक तिक करती दिखाई परो। भाग्य नै लक्ष्मी के फिर झकझोरो। लक्ष्मी उदास है गई सिगरे प्रयाम धूरि मे मिल गए। भाग वोनी अब मेरे येल देख । साई माग एक ताये के घोट पइसाए किसान के देवे पहुँचौ । किसान वाली, भया चो हसी पर आ गयो है ? जब सोने की इट, नौलपण हार, अमोती ई काम नई पाए तो ई तवे को घिमी सिक्का वा निहाल करगी ? यू नावे को खासी पइसा जबरन वा माथे मढ दियो । याते कही परे तोय ई नाय पत्तो खोटो पइसा बाटो बटा सक्ट म काम आये। पर आइक किसान नै देखो के घर म बाइब के कछू नाएं। बू बलन नै बाधक बाजार गयो। साझ है गई । बजार बद है रह्यो । एक मच्छी वारी बची भइ सडी मटीन नै औने पौने वेच रहो। किसान बा खाट पइसाए लकै बाके पास गयो । मच्छी बागे वोश हल्को करनो चाह रह्यो । वान एक सडी सी मच्छी या बीट पइसा के बदले म किसान कू ६ दई । मच्छी लाइक किसान ने अपनी घरवारी कूद दई। किमान न वही तू यार बनार । मै उपर नीम पडिक भूखी लकरिया तोरु । किसान की बहू ने मच्छी धोय पौछि के बनारी तो वाम मोती दिखाई परी। किसान न सूखी लपरिमा तोरी तो चौल के घाँसला म नौलपा हार घरो दखो। वू चिल्ला परी पा गई पा गई । या वात । सुनिक परोसिन घबरा गई क सोने की ईट को मालूम पर गई है । साई बान घबराय के साने की ईट किसान के घर म फेक दई। अब तो तीनो चीज एक सग मिल गई । दसत हो देखत एव पइसा तई पिसान मालामाल है गयो । अव किसान खेत प काहे कू जातो। बाके घर तो सव आनद है गए । भाग नै लक्ष्मी त कही देख लिए ना भाग क खेल । तो बेटा सब कही कर भाग फल तो सब फन भीख धज योपार। भैया तरी यात वडी मानू , ताय अनुभव है तरे यार धूप म धौर थोरई भए , पर विमान त जोतिर नई जाती, सान की ईट हार मोती नई तातो चन बरत सरौ मच्छी खरीदवे नई जाती, लकरिया नई तौरतो, कहवे को मतलबईए के इन सब कामन कूनही करतो, तो का वू मालदार है जानो।" इन कम कहैं का? कम तो हाड चाम घिसक, पसीना बहाय के वियो जाए। पसीना बहाय क जो धन कमायो जाए बू कर्म को फल है अरु जो अनायास हाथ लग सो माग्य को फल ।" मैया तोते मैं का तक करू । हा इतेक बनी चाहू क मचन प मैं कर्म के गुन गाऊँ, कर्म के हाथन सौं भाग की रेखन नै बदलवे की कहू । मै अपने जीवन को उदाहरण दऊँ। - 'अच्छी वेटा तू जीतो मैं हारी। मैंने तो जा दिना ते तू जनौ है बाई दिना ते तेरी हठ राखी है। बाल हठ के आगे तिरिया हठ हू हारी है। माय भरासौ है तू राजहठ ऊ हरावगी। "मया, मैं कम करू पर तरी जरु गुरुजनन को आसीस हाय तो मोकू बल मिल । हाथ की छाया घनी होय । 'बेटा आसीस की कमी नाएँ, जो चाहे वाकू भरपूर मिले । याम का खच हाय । हाँ होय कोई लव बारी।" तो मया मेरी इच्छा है क तौय अव आराम दियो जाए। अब मै अपनी सगिनी ल जाऊ। बेटा ई बात मोय कहनी चइए। मै रोज वा दिना की वाट देख रही हू क्व मेरी बेटा मेरे घर म उजेरी लाव ।' "उजेरी लाइब को भार जव तैनै मेर ऊपर डार राखौ है तो मै पूरी जतन करूंगो एसो उजीतौ लाऊंगी जा मेरे तेरे अरु सव घर के जधेरे दूर कर दे। चदा ती बहू लाऊँगी।" या बात को मोय पूरी बिसवास है। पर अब मेरी बूढी सासन को ज्यादा भरोसो नाएं। न जाने कव या पीजरा कू छाडि क हस उड जाए। याही सी आखिन क सामई तेरो घर मढ जाए। याए देखिवी चाहू । मौहल्ला अरु गाँव वारे तो मोय जक नाय लन द । भाति मांति के जरसोकला-परसाकला ढाब। कोऊ कहै छोरा पच्चीस के औरे दौर है गयो है, जाधी उमर तो बीत गई । कोऊ कह डोकरी छप्पन क्रोड की चौथाई डोल रही ह । काऊ कछू कह, काऊ कळू कह। कौन कौन को म्हौ रावो जाए ? कचन करत खरी 45 दियो जाए। "मया दुनिया तो या ई कहती रहगी, पर राम के अनुरूप चलनी चइए। अब यू सम नाय रह्यो जब छारो छोरान के गोदी म न्याह पर दिय जान । जब बू मम नाय रहलो क छारी छोरा प्रपन पायन पं गडे हू नाय भए अरु चिनको ब्याह कर अब यू हू समय नाय रह्यो व व्याह कर दियो जाए अरु छोरी छोरान ते पूरी हू नई जाय। जो समै को पुरार नई सुन पिन मूड पकरि के पटनानों पर।' "मै या वात - तो समय गई हू पर माम पो रहनो अरु चर्षयान की सुनिवी कसे सह्यो जाए ?' "मैया गाम के चवयान ते तो वां पर अपनी भलो युरो तो सोचि ल । हाँ इतेक जरूर है गांव कू खुस करिवो पोऊ यासान नाएं। तोय तो सब पती ए। तू ही तो मोय कथा सुनाती रही है। बाप बेटा एक घाडा में जा रए जव बाप बठो अर बेटा पायन चलवे लगी तो दुनिया वा पाप नाम धरवे लगी। जब छोरा बठिक चलवे लगी तो छोरा कू नाम धरी। जब दोनो यठिक चलब लगे तो दोनोन • कोसिवे जव दोनो पदल चनचे लगे तो दोनान की मूखता प हम लग । मया दुनिया की भली चलाई।' लगे। तोक बेटा समाज के रीति रिवाजन को तो ध्यान रखनी ई पर । अब दख तेरे व्याह को समऊ आ गयो है। अव काइकू देर कर ।' 'मैया मेरी परिच्छा को परिणाम आ जाए फिर देर नाए । पर हा, रीति रिवाजन को ध्यान तो रखें पर रीति रिवाज सम के अनुसार बदलते रहे । बच्चान के ब्याह को चल्ला उठि गयो। याही तरिया पूघट कौऊ तो रिवाज उठ रह्यो है । गामन मे घूघट भाई चल जाए सहरन म घू घट काढौ तो जीवो दूभर है जाय । बेटा नयो चल्ला गाव मे नाम चल सके । मैया सम सब अपने आप ही चला लगो। छोट छोटे छोरी छोरान के ज्याह को चल्चा अव गाव मे तेऊ उठती जा रही है। । 'सम सम की बात है जब तो छोरी छोरान की राय ते ई ब्याह हवे लगे है । युग की माग तो है । मैं हू नए युग की नई पीढी हू पर नए युग को अयो भक्त नाऊ । जो हमारी पुरानी थाथी है, पुरानी संस्कृति है पुराने अच्छे रीति रिवाज है बिनकी रच्छा करनी चाहू पर बिना सोचे समझ लकीर को फकीर होनी मोय नाय भाव । मै जो कछू करू गो तो ते पूछ क क्रू गौ। वेटा जो कछू करनौए कर करू ल। कहो कर, करले मो काम भजले सो राम। 46 कचन करत खरी

"तो सुन मैया मैने एक छोरी देख लई है । भरतपुर की है। अच्छे घर की
है। इकलौती बेटी है। पहले पातो पीतो पर हो। बौहरगत होती। कई सालन
को सूखा सो सब रुपैया दूब गयो है। या सम खस्ता हालत है।"
वेटा छोरी तो पढी लिखी होयगी ?"
'हा जम मैन एम ए की परीच्छा दई है वान बी ए की परीच्छा दई है।
माते दो दरजा नीचे है। है हुसियार चाहे तो देख ल !"
"मोय तो कोऊ ऐतराज नाय पर नाते-गोते तो बचा लिए हुगे।"
"मैया सो मैने कछू नाय कियो।"
"बेटा सवते पहल नाते नाते बचाए जाए ।'
"मैया नाते गोते वचाइवे की का जरूरत है
'देख वेटा एक मैया के चार पाच छोरा पहू दूर-दूर वस जाए । बिनम
आइवी जाइबो नई रहै। जान पहचान हूं नई रहे अरु कहू वे एक दूसरे के यहा
छारी छारा दखिय कू निकस पर तो भन भैया है सके।
"भैया तेरी बात बडी परके मानी पर एक जाति के नई होय तो नात गोते
बचाइबे की जरूरत नाए।"
"राम राम कैसी बात कर रह्यो है। कहू आन जाति की त ब्याह
करगी का?'
'मैया, जाति-पाति को थमेली तो हमने बनाया है। भगवान के यहा ते सब
एकई जाति के जाए है।
वेटा ई सांची है पर गांम रीति हू तो ध्यान मे रखनी है ।
"गाम रीति कू पाखि मू दि के मानिवे ते न अपनी भलौ है सके न गाम को,
अहन देस को।'
पर बेटा हमई रीति चौ वदल? हमई चौ बाग आवे ?
तो कोन जाग आविगे जो दोर चराब बे। बिन दुनिया ते का मतलव ?
तो मोय या बता के तने जा छारी देखी है बू आन जात की है का?
मया यामे का दौस है ?
'बेटा ऐसी बात मत कर हमारी नाक कट जाइगी। गाम म कोऊ बोलन
तब नई दगी।"
कचन करत खरी
47

? मया हम कोऊ बुरी काम थारई पर रह हैं? कोऊ चोरी नाय कर रहे कोऊ जुआ नाहि खेल रहे, काऊ यो मन बटी कू बुरी नजरन सौं नाय देय रहे । व्याह ही तो कर रहे हैं।" "बेटा कोऊ दुरी काम तो नाय कर रहे पर जाति अरु गाम त अपर मड हैक चलिची चोखो नाय । मड मरजादन कू तोरियो अच्छी नाए ।" 'तो पच अट कू विल्ली हैं तो का हमकू हू विल्ली कहनी चइए का चकोर अरु चकोर की मैया की कई दिनान तक य ई बात चलती रही। ना चकोर की मया टस ते मस भई ना चकोर। ई बात चकोर अरु चकोर की मया तकई नाय रही। चदा चकोर की चरचा, चौराहे प, चौक म, चौवारे म चारो ओर चल निकसी। कहो कर वात भई होठन की, भई पोटन की। चकार गाम म हैं क निकसतो तो सब वाए टोकते। गाम की वयरवानी एक एक करक चकोर की मया के पास आइवे लगी। भाति भाति सी ताने दवं लगी। चकोर की मया नथिया कू जार्ड हाथन लवे लगी। 'नथिया तेरे छोरा ए आन जाति म व्याह करवे की का सूयी है ? का जात को नापद है गई है का? नथिया, तेरो छोरा तो पढौ लिखी है। या सम तो वू अनपढ ते हू गयो वीतो निकस रह्यो है।" 'ऐसी मानूम पर छोरा तेरी बात नाय मान रह्यो के तेन ढोल दे राखी है। नई तो का मजाल है जो छोरा होठ हू खोल जाती।" 'नथिया कछू बोल बकर तो सही। ऐस सुट लगाए त का काम चलगौ ? जाज तेरो छोरा या काम ए कर रह्यो है क्ल्ल कोऊ दूसरो करगी परसो तीसरी फिर तो ई रोग फलती ही चली जाइगो। वात कहा जाइक ठहरगी। लोक मरजादा ई मिट जाइ गो। नथिया अपनी नाक को ध्यान मत रख पर गाम की नाक को तो ध्यान रख। चार जनीन की बात सुनिक नथिया वोली- जो तुम कह रही हो वू सही है पर का करो जाए ? ज्वान जवान छोरा ते वही तो जा सक। बच्चा तो हत नाए जाए बहला रियो जाए । तिहारी तग्यिा मै न वाक मुक्तरी समझाई है पर बाके तो बात गर ई नाय उतर । इतेक तरक दे + मैं तो वारे म्हों माऊ दखती रह जा3 1 वाप तो कछू जाटू सौ है गयो है। ऐसी बयार सी भर गई है क कछू मूब अब मैं वा करू । कितक जाऊ । इत गिरूं तो कुआं उत गिलं 48 रचन करत घरी खाई। ज्वान-जवान छोरा ते ज्यादा कह हू तो नाय सकू । बूढी दिखावै भरियो, ज्वान दिखावै भगिवा। ज्यादा कहनावत सुनावत कर दई अरू वह पहू इत विनक) निक्स गयो तो क वरकी बीतगी। फिर तुम सब जानो मरे तो ई हो होरी फूका है. रु ई ही प्रधाई वठा ह ।" नथिया इन पातन ते तो ई लगे जसे तेरी स होय । सब तेरी ई करामात मालूम पर रही है। लग मतर तू पढ रही है वामी म हाथ वू द रह्यो है । हम सब जान, छोटे, बर्डन के बल पंही नाच नाचे।" 'अरी भनाओ, माकू चौ लोना लगा रही हो। मै तो ई कह रही हू बिना पढौ लिखी होती तो सव वातन ने मान लती। पढे लिखे कू कसे समझाऊ ?' तबई ता कहै छोरी छोरान को व्याह वचपन म ई कर दनौ चइए।" 'मरे छारा त बात करक तो देखो। बू बाल विवाह को कट्टर विराधी है । बू कहै स याही मार गड्ढा म गयो है । जनसख्या को वढिवौ दस को स्वास्थ्य गिरवी बेरोजगारी फलिवी, घर घर म लडाइ झगडे होनौ याम बाल विवाह को ई दोस है। बन्चान को ब्याह करिवी विनके पायन म कुल्हाडी मारिपी है।' 'नथिया, वाए नए जमाने की हवा लग गई है। सहर म रहक वाक पख नकस आए है । हमारे तिहारे ब्याह पाच पाच सात सात की उमर म भए क नाएँ। 'अरी या वात कू सुनिक छारा कहै क तवई तो बयरबानीन क दात निक्स रहे है । जितक देखौ बितक ही हडडीन की माला सी दिखाई परे । काऊ की कमर युकि गई है। काऊ की आख खराव है। काऊ को जिगर खराब है। वचपन को ब्याह सो व्याधीन को घर बतावै। विदेसन क उदाहरण दक वताब क विनक मट वयर वडी उमर में ब्याह करै। खूब हट्टा कटटा रहै । 'नथिया सौ बातन की बात ई एक जाको पार निकस जाए, वाको पाव टिक ना सके जाकी जीभ चलबे लग जाए, वाकी जीभ फिर तारुए ते नांय लग । । या तरियाँ वयरबानीन के टोल के टोल नथिया कू समझाब आत । नथिया हूं चकोर सो वती पर बू सो सुनतो अरु लुक्क प ई लती। चकोर की जानजात म ब्याह की चरचा जोर पकर गई। गाम बारेन क ई बात अनकटौटी सी लगी। वे याम गाम की हटी समझबे लगे। यासों गाम क मुडडन न चकार क बुलाय क गाम की राय बताइवे को निरनय कर लियौ। एक दिना एक चौपार प बुलाय के वासी वात करी। चकोर न सबन की सुनी पर म्ही नई सालो। विसार मरपच न वातें कही। कचन करत खरो 49 "लाला तेरे ऊपर तो हम घमड हो कतु हमारे गाम को नाम उजागर करगी। तेने पढ़ लिखक हमारे गमि को नाम दूर-दूर तक कियो है पर जब एसो अमरथ चौ कर रह्यो है ? गम को मरजादा चौ मैट रह्यो है ? मूला पच बोलो बेटा गाँम की तौहीन मत कर अपने बाप . जा। तरी चाप क्तेिक भलौ हतौ ई हमपं ते जान ल । एक पोत वावी टोटकी ते एक पिल्ला मर गयो। वाकू गाव नै गाम वारेन की जूती कू अपने माथेप रखवे की कही। बान विचारे न नकहू ची चपड नाय करी वान गाम बारेन की बात राखी । तू वाई को छारा है तु बाई की वात नाय रख रह्यो। चकोर या कथा कू सुनिर मन ई मन भभको पर मन की बात होठन तक नई आमन दई। नार नीची करकै सव सुननो रह्यो। तबई परमाल लम्बरदार उफ्न परो--- लाला बोल चौ नाएं म्हो म मुराए का ? वोल पचन की मानगो क जपनी तानगो? गाम त मिलिक चलगौ क अपनी खिचडी जलग पकाचेगी। तू याहू बात . समय ल । गाम में रहना है तो गाम की मरजादा म रहनी होगी। ऊपर है। यहा नाँथ रह सक्गौ। अपनी ढपली जरु अपनी राग अलापो तो पाए गांम सहन नई कर सकगी। या बात कू सुनिक चकोर तिलमिला गयो । धीर ते एक बात सरकाई--- का गाम छाडिनी परैगौ ?' या ज्वाय कू सुनिक सिगरी चौपार विंगर उठी लोगन की ही तन गई, म्ही लाल है गए । कछू खडे है क घुरपट्टीन सुनावे लग- 'हमारी ही बिल्ली हमसो म्याऊ कर। कल्ल परसों को छोकरा हमारी सामनौ कर। जजी राड को साड है रह्यौ है।' 'लाला, ऊपर क मत पूर्व । बटा गाम म रहबी भूलि जाइगो।' "अगर हम मालूम होती तो एसी पौध ई नई होन दत जाप जाग मक्खी भिनभिना रही हैं। बटा ज्वानी म अधी मत बने । ज्वानी हम पऊ आई। जो तु मुपन देय रही है। हमन ऊ दस है भली भाति सोच ल नागौ पीछा विचार त।' मोग 50 कपन परत घरी नमतमाए परसोक्ता पं परसोकला ढारते रहे। हल्ला गुल्ला मच गयो तव वहोरी भगत ने हाथ जोरि के कही- + सिगरे मिरदारी आपन अपनी बात यापू बता दई याए नैक सोचिव विचारयेको तो औसर देना। आप इतेक जने हो ई अपेलो है। कौन-कौन की बात को का का ज्वाब दे। याकी तो बिमात ई काए अकला महारथी वीर अभिमन्यु हू चक्रव्यूह म फमकै जीतौ नाय लौटी।" या बात क सुनिक गाम वारे वहोरी १ ई विंगर पर। "अच्छो बहोरी अब मालुम पर रही है क चकोर के पीछे कौन हैं। चलो कोई बात नाए तेरे कहे ते औसर द रहे हैं। पर चकोर सुन ल वातन वे नई मानो तो लातन त वात करिंगे। गाव मे रहती भारो पर जाइगो ।' मूला ने जार दक चकोर प अब नई रह्यो गयो। हाथ जोरि के शाला सिगरे महानुभाव वाना बहोरी कू मेरे बीच म मन सानो, वाकू लोना मत लगायौ । इ व्याह को मेरी अपनी विचार है। सिगरी दोस मरी है। मोत जो चाही सो क्हो पर बहारी वावा सौ पछु मत कही। गांव वारे वहोरी की भोर सौ पिरिक चकोर पै फिर टूट परे देख लाला गांव में रहना है तो गाव की रीति रिवाजन की तरियां रहनो परगो।" चकोर सबन के बालन । सनिक घर नौट जायो। वाके उतरे भए चेहरा ते नथिया न अनुमान लगा लियो दार म कछू जारी है। कार गुम्म सुम्म सा निढाल है के परि गयो। नधिया ने दखी तो वाको हियो भर आयो । उ बानी---- 'बटा ऐसो मुस्त चौं है । मया लग रही है, गांव छोडिक चलनी परंगो। चौं गांव में ऐसी बहा कह दई ?' "मपा साफ-साफ वह रई है के गांव में रहती है वो गांव वारे जो कि सौ करनी परगौ।' वटा मैं तो पहले ई रुह रही गांव त अरु राम ते पैन नाय खाय ।" 'सो ठीक है पर मै अपने भले बुरे ए अच्छी तरिया जानू गाँव वारे का जान " कचन करत परी 51 'तो वेटा, एसो काम कर, साप मर न लाठी टूट । वाऊ वामन की पढा लिखी छोरी ए देख ल वामन की मुतगे छारी हैं।' ' मैया जा' वचन द दियो है बाको पा बनगो ? का मैं अपनी बात सों फिर जाऊँ ? थूक चाट लऊँ ?।" दख तू अपनी जिद्द प सवारहै, गाम अपनी जिद प । यात काम नई चलगो । तन सुनी नाएं का? लोग कहें-जाट कहै सुन जाटनी ताय गाम म रहनी ऊँट विलया लगी तो हाजी हाजी कहनी। ' मैया ये कहावत थोथी रह गई हैं। इनम सार नाएँ । अव तो सब अपन अपने घर के मालिक हैं। सब अपनो भलो बुरी अच्छी तरिया जान ।' अब तेरी मरजी, तू जान तेरो काम जाने । माय कितेक दिना रहनो ए पको पान हू। जा दिना यर जाऊँ सोई दिना है। गाम मे तोय रहनौ है गाम . तोय बरतनी है।' चकार नै मैया की मन की जान लई। गाम वारन की विचारधारा मालूम पर गई । अव वाए जीवन के कटु अनुभव हैने लगे । वाए याद आग लगी भरतपुर कालज का जीवन जामें मिलती जपने सगी साथिन को प्यार । जितकू जातो बितक ई लोग आख बिछाते। घर को सौ प्यार मिलती। तोऊ चकोर को मन जऊ के काज भटकतो । एक हूक सी उठती। गाम की गध के ताई बाकी वाछ खिल जाती। गाम को सुखद कल्पना सौं सिहर उठती। गाम कू देखते ही नौ नौ हाथ कूदिवे लगती । गाम की बयार लगते ही तन मन खिल उठतौ । आज वाई गाम मे बाकू इतेक सुनिनौ परो याकी वान सुपनेन में हू नाय सोची। चकोर की नीद हराम है गई । चकोर दुविधा मे परिगी। एक ओर चदा ते कौल करार जरु मचन प पीछे गये ढोल दूसरी ओर गाम को भय । चकोर गाम छाडि क भरतपुर जाबे कू तयार हो पर मया को मन गाम म फसौ परा । हायगी । मया झौंपरी ए नाहिं छाडि सक । झोपरी चुचाव गरमी सरदी बरसात कछू ए नाय रोक पाव । योपरी की कच्ची भीत कच्ची आगन गुवरौटी ते पाए दिना लोपनौ पर । चाकी ते रोज भूमरे ही भूमरे पीसनी पर । झारा बुहारी करते करते थक जाए पर तौऊ झौंपरी प्यारी लग । बाए बू मरेऊ मारे नाय छोडि सक । चकार इन सोच विचारन माहि डूब रह्यौ तबइ बाक दरवज्जे प प्राइक एक तागौ रुको । तागे म त हसतो भयो चाख लाल उतरी। बाके हाथ म एक अखबार हो । चावे लाल न अनुमान मौ जान लियौ क झोपरी म त निकसवे वारी हाय ना होय चकोर इ है । चोख न बिना पूचे ता विना परिच के चकोर कू वधाई दत भए बाकू अखबार मया कू पीरा गहा दियो। 52 कचन करत खरी चकोर ने अपनी रोल नम्बर टाप में दखिक पहल चोखे कू धयवाद दियो । जाभार प्रकट करयौ। खाट विछाय के चोखे कू खाट प बठायो। फिर घर के भीतर मैया के पास पहुँच के वाके पाम छिए । मैया कू खुस खबरी सुनाई। मैया की आखिन म ते खुसी के आंसू पर परे। दुढिया के ककाल मे नई लहर दौर गई। नथिया ने चकोर के सीस प प्रासीस को हाय फेरो। वोली- बेटा तेरौ सुपनी पूरी भयो मेरी एक कामना पूरी भई। अब दूसरी कामना और है बाए भगवान और पूरी कर दे। बाप और नई बाल्यो गयो । गरी रूध गयो। आखिन सों आंसू परवे लग 'अरी भया तू तो रो रही है ? 'अरे वेटा रो रही हूँ क खुस है रही हू । ये दुख के आंसू नाएं सुख के आंसू है । ई रोइवो नाएं, हसवे ते कऊ गुनौबढिके है । हा आज तेरो बाप होतो तो कितेक खुस होती। सिगरे गाम में फूलौ फूलो डोलतो । ना जाने कितेकन के घर जाती । ना जाने कितेकन के पर छतौ । गाठ म चाहै कछू नई हौंती पर मदिर जाती, भोग लगाती घर म कथा करवाती। कहते कहते नथिया को गरी और भर आयौ फिर बाते नइ बोल्यो गयो । चकोर मैया के जासून नै पौछ क बाहर आयो। वान नवागन्तुक सौ परिच पायो । चोखे बालो- नाम मेरो चोखे लाल है और ई जखबार चदा ने भेजी है। "अरे ! चन्दा के आप पिताजी हैं। धय है आपकू । आपन प्राइक जो किरपा करी है ताके ताई होठन सो कमै आभार प्रकट करूं। 'अपनेन के ताई जौपचारिक्ता नाय सुहाव । हा इतेक जरूर है, चन्दा नै अखबार देखते ई मोय भेज दिया है । बू हू जाइवे को कह रही पर मैं ही जान बूझक सोचि समझ के छाडि आयौ हू । 'ये आपन अच्छी पियो। पर ई तो बतानी चन्दा को का परिणाम रह्यो । । "चदा को परिणाम अवई आबे बारी है। आपने अखबार नॉय देखो का " "अजी गामन मे अखबार कहा? अवई गामन म कम चल्ला है । कोऊ आइवे वागेही भलई अखवार ल आव । ई तो आपन बडी किरपा करी । जाज अखवार निक्लोजराजई अखबार दखिवे मिल गयो 'फिर आपन किरपा जसे सब्दन को प्रयोग करी । अच्छे काम म योग दबी अच्छे काम कू देखिक खुस हैवो मान्स को सुभाव होनी चइए । एक दूसरे को बढ़ातरी मे हाथ बटावी अच्छी है। कचन करत खरी 53 "ई तो यापन पतयुग पी सी बात यह दई बलियुग म एस भाव बहू बहू मिले।" "यजी सतयुग कलियुग तो हमसा रहे हैं अरु प्राग हूँ रहिगें । हर मास के जीवन मे रोजीना इनपो चतको होय । जब जार जीवन म अच्छे विचार आवै तव सतयुग बाके जीवन माहिं हाय । जव बार जीवन म कलह वर, स्वाय लगाइ झगडे क विचार मावै तव कलियुग बत रह्यो होय । मास को कर्तव्य ई एम यू सात्विक विचारन क सम, सम को सदुपयोग करें । बाए हाथन सो निक्सन नहीं दे । ई साचले के प्रमु न वाप किरपा करी है। सात्विक विचारन प स्वारय को, मोह को माया को, ममता को आवरन नही चढन दे। "वाह ! भया वाह । नापर विचार भोत सुलझे भए हैं । तवई तो एम एम टाप आए हो। भगवान आपकू और मति अरु गति दे।" याके पाछ चकोर न चोये की लावभात के ताई दौड धूप करनी चाही पर चोख नै हाथ पकर के वठार लियो। चोर भरतपुर आइवे को नौती दक चोखे ने चार सौ विदा लई। चकार पी चाखे ने आवभगत स्वीकार नई करी । यारी मतलव चकोर समन गयो । जसी रेटी तमो वाप। हा चकोर के मन पै एक छाप जरूर पर गई। बाको मन चदा के माऊँ और झुक गयो। बापो सम्मान और बढ गयो । चकोर के एम ए मे टाप जावे की नरचा पूरे गाम म फल गई । गाम को नाम है गयो । यामी कछू लोग फूले न ममाए कछू लोगन कू वकार की बढ़ती भई वात अच्छी नाय लगी। ऐस कुटिल लोगन कू तुलसी ने सन की उपमा दई है जो अपनी खाल कढाय क दूसरे कू बधवाइवे म ही सुख माने । जब ते चकार ने खुशी को समाचार सुनो तब सो कोऊ ज्यादा उछल कूद नाय करी। सहज सुभाव सौ गाम की अथाईन प गयो । बडे बूढेन के पाम छोए । कछ लोगन के मन को मैल दूर है गयो । कीचड ते कीचड दूर नाय हाय ! कीचड तो साफ पानी सो ही दूर होय । हां, जिनके मन कारे हैं, बिनपं चढ न दूजो रग बारी बात भई । चकार न या समै या वात को विचार नई कियो के कौन किन भावना माहि बरत रही है। बान तो अपनी धरम निभायो। वाकी मैया न जो जादेस दियो बाको पालन क्यिो पर अब चकोर ने अपने मन में निरनय कर लियो। कछू गाम बारे चकोर के न्यौहार कू देखि के पसीजे, पर कछू तो मन ई मन बुद्ध के रह गए। मन ई मन कहने लगे, बेटा तु कित्तेक पॉम छोल आनजात म माह नइ करन दिंग । आनजात म ब्याह कियो तो जात म ते छिकवाय दिगे क गाम छोरनी परगौ।" S4 वचन करत खरो पथके पैराए वोखे नै भरतपुर आयकै मिगरी समाचार मुनायो । चन्दा मनई मन पिल गई। राधाको मन हल्को यो। जची वे गरे वान नही उतरी। अची को मन धुकर पुकर करिये लगी। आनजात मे व्याहवे की बात सुनतेई मन में घिरना अरु तन म आग मी लगब लगी। जिन बातन कू सुनि अची नाक भी विकडिो परई, बाको जो जरो, विन बानन कू अपन घर माहिं देखिक वाको राम राम काप उठी। चोखे ने जब सौं चकोर देखो तब सौ बू बावे भौत प्रभावित है गयो । बाके जीवन दरसन की बातन नै सुनिक तौबू चकोर,कोई है गयो । उठत्ती रेखन को गोरे रग को पट्ठा उठतो भयो हाड हंसमुख चेहरा, बात करती तो फूल से झरत । पातळ करोन की करतो। नपी-तुली सार भगे। का मजाल जो वातन म हल्कीपन झलक जाती। वात ऐमी गूद गम्भीर मानो काऊ साधव बोल रहयो होय । चोख कू चकार की रहन-सहन पूरी तरियो नो भा गई। हा बाने अपनी प्राखिन सौई देखो के बाको घर काए, मिट्टी में लौदान की दीवारन प छप्पर परयो भयो है । छप्पर हूँ सावित नाऔ। बामे पदा सूरज “यारे झाक रह । घर के दरवज्जे प एक पल्ला को किवार सौऊ तजान की बनी भई । चातरा ऊबड़ खाबड। घर के सामइ औंधक नीची धरती । जा खाट में धोखे कठो बू हू टढ़ी मढी पाटी सरन की। बानऊ छितरौं छितरौ। कन क्न ते कगाली झाक रही। सब तरिया सौ गाम को सौ ढर्रा हो । पर देखिक चोख का मन अवरचा रहयो । वर तो चदा के अनुरूप हतो पर घर की माते चोखे कू चिंता भइ । एक मन शिरतो ती ताई सम दूसरी मन कहतो, मोल करो तरवार को परी रहन देो म्यान । चोसे न जव चकोर के घर की रूपरेखा राधा के सामइ बची तो राधा तू घबरा सी गई इंडे बैल पं भोल नाथ नगन हालत म दखिक, मग म दिनकी अनक्टाटी बरात के देखिक जो सती की मया की हालत भइ साई दमा राधा की है गइ। नचिवे लगी बाको विटिया न कवर लोपो ना कबहू पोती। कच्चे आगन के कवऊ दरसनऊ नॉय करे। टूट छप्पन म जहा फूस झरेगी चदा कैस रहेगी ? साचत खोचते कुआ से मे पर गह । चोमे के पूटर प बान अपने मन को दरद खालि के चोष के सामइ धर रियो । चोखे न बासमपायों भरी सब दिन जात न एक समान ।" अरु ई क बात कही है पूा कपून तो क्या धन सच पूत सपूत तो क्या धन सच । 'पूत चोखो होय तो पीपरी " कोठी म बदलते देर नाप लग । भरी बावरी तन सुनी नाय का सावित्री न सक्रीया काटते राज्यहीन मधे भैपा बाप को वेटा सत्यवान चुनौ? फल का भयो ? तोप सब मालूम है । चकोर क अच्छे प्रासार दिखाइ पर रहे हैं। वार करवे तरवार कचन परत परी 55 की धार देखी जाए म्यान नाय देखें । नीति की बात है के गदी नाली मते हीरा ते जडी सोने की अ गूठी छोडिवो हिमालय जसो भूर है।' राधा समझाय के चासे ने चन की सास लई, पर राधा ने कराहत भए कहो, "अजी तुम मानम हो पिना हा, तक अम बुद्धि तिहारे पास है। मैं तो माहतारी हूँ मरे पास है मया को हियो । मैं और पडू नाय जानू ! तुम्ह भाव सा करो।' या तरिया राधा कू तो मनाय लियो । पर अ ची कसे समझायो जाती । मया तो पुराने विचारन की। नए विचारन मी परत चढतई नाय दती। पू तो अपनी भावभूमि प हिमालय की भाति अचल अरु अटल ईव अन्तरजातीय ब्याह के पच्छ म नाई । बाकू समझायो गयो क सम के सग चलनो चइए । ज्वान छोरी छोरान की बात माननी चइए नई मानी गई तो इत वितक हूँ निकस सक । यासों राजी खुशी ब्याह कर दियो जाए तो चोखो है । अचीन लाख ममयायो पर धोए हू मी र ते काजर होय न स्वत वारी बात भई । भरभू जा को भार सपोदी ते रितेवऊ पाती नाए पर दू सफद नाय हाय या ई भांति अ ची कू बदलबो अमम्भव हा । प्रची सबको मुनती रही पर मन ई मन कुढती रही बिचारी को का चलती। बूढी सास मरु हड्डीन की माला की कौन सुन ? चना के सामई अऊ गाम अरु चकोर को घर वार बार धूमवे लगी। चकोर क आगे वू सबन भूल जाती। चदा तो आग की माचिव वारी । बान इतिहास पढी जामै अनेक ऐसे गरीब मा सन को इतिहास पढौ जो कछू ते कछू है गए । वान सूव सोच विचार के पग प्रागै बढायो फिर मन माने की बात है, मना साति पाइए का कुटीर का महले ।" चदा तो अपने सोचे भए पूरी करने की माविवे लगी। अऊ गाम म जस चकोर को विरोध भयो याही भाति भरतपुर के गोपालगढ मौहल्ला मे चदा को विरोध भयो । दकियानूसी जर भुन उठे-- कैसी कलियुग आ गया है ? "अजी अब तो छोरी छोरा निरदह है गए हैं।' 'अबइ का देखी है ' आगे आगे दखियो का कर हाय ? मया बापन नै छोरी छोरा मूड प चढाय रामे हैं। या तरिया सौ गोपालगढ म चश्या हैव लगी । जा नइ विचारधारा के वे या सम्बध की चरचा मुनिक बड वुस भए । विनं अपनी सुपनी साकार हो तो दिखाइ परी। विन चन्दा अरु चाखे की वाहवाही करी। जो लोग अतरजातीय ब्याह रे विरोध में ह बिन चाख कू समझायो । जो याके पच्छ म ह वि ने वही के शुभ काम मे देरी चौ ? चोखे कू जा विचारधारा के 56 कचन करत खरो मा स मिलत विनको प्रभाव पं परतो । पहली विचारधारा तव तक धुमडती रहती जब तक दूसरी विचारधारा के लोग नाय मिलत । दूसरी विचारधारा के मिलतई पहनी विचारधारा कपूर की नाई उड जाती । चोषहू हाड मास को बनौ । हर विचारधारा को प्रभाव परना जरूरी हो । वारी मनोदसा या दीपक के लो की भातिई, जो बयार वे झोकान मे क्वऊ इतक और कवऊ वितक है जाय । चोखे न साच विचार के अलरजातीय व्याह को विचार वनाए रखा। या पोछे कई कारन है । एक तो गरीबी, दूजे चकोर की योग्यता । तीजे व दा चकार को पनी प्रेम और सवमी अपर समैं को माग । चकोर की चाह चोखे के चित म चाखी चुभ गई । पर वाके मन म अ देसो हमेसा बनी रहतौ के पार कस परगी ?' कञ्चो दूध पोवे के कारन चन्दा कोऊ मन कबहू कबहू कचा जाती । क्य- स्वक सोचती बी ए पास नई भई तो चकोर जानें स्वीकारगौ के नई १ परिनाम 4 जीवन को परिनाम टिको भयो । याही माँ बू अखबार की मह की मी वाट देखती। सवरी को नाइ राम दरसन की प्रतीच्छा म । आखीर म राम की भाति एक दिना सम पं अखबार आयो। मन के कान पान त जावाज पाई के दिल्ली के माग ते छीको टूट पर । बी ए कापराच्या परिनाम माट जाखरन म पदिय धडकन बढ गई । हाथ कापन लगे। 923 रोशन वर मिगर पानात प देख लियो कही दिखाई गई परी। चदा पसीनान म भोज गई । अखबार बई पोत देखो पर सफद स्याही म ई रोल नम्बर हो । क्स दिखाई परतो। वाके प्राधिन के आगे अधेरो छा गयो। बाए अपने सुपने चूरि चूरि होते दिखाई परे। चन्दा की दुरदसा देखिकै राधा अ चापे के चेहरा उतर गए। घर माहि मातम सौ छा गयो । सवन को भूख, प्यास, नीद, हिरन है गई । हायन के तोता उड गए । ऐसौ लगो मानौ जीती वाजी हार गए हाय । चोखे अरु राधा कू चन्ना को ब्याह दुलभ दिखाई परी। पहलेई गस्सा म माषी आ गई। ताही सम चकोर अपवार लकै पदा के घर बाई तरिया जायो जमै चोखं अखबार के चकार के घर गयौ। ई सयोग की बात ही चकोर वाई दिना भरतपुर लायो हतौ । वाए चदा को रोल नम्बर या' नॉओ पर या बात को पूरी विश्वास हो क चदा पास होयगी। चकोर न घर जाइक घर की स्थिति देखी तो चकरा गयो वाक पाम टूट से गए । पर को पानावरन कह रह्या के दार माहिं कारी है। चकोर को नाम सुनत ई चोखे जगवानी कू दोरि के आयो । वठक माहि बठाय क चटा कू खबर करी। पदा को चेहरा और उतर गयो । म्हौ प हवाई उड रही। बू साचिव लगी न जाने का कहर पाए हैं ? यू पूरी जोर लगाय के साहस वटोर क बठक माहि पहुँची। वार उतरे भए चेहरा ते चकोर सब समझ गयो। चदा नै चकोर के हाथ म बखवार देखो तो चदा बोली- कचन करत परी S7

"का अपवार मर ताइ लाए हो?"
"सोविक तो यही आयो ।'
"अयपार ग्रा चुना है, पर आप लाए हो या ताई धन्यवाद ।"
'ययाद तो तब दियो जातो जय तिहारो पाम बन जाती। अखवार जब
तिहार वामई नाय आयो तो धयवाद काए को।"
' अखबार मरे काम नहीं आयगोई यात तो अब मालूम परी है, पर आप तो
ई सोच के लाए के अखबार वाम आवंगो हो । ताई तो आप आए हो। तबई आपन
कष्ट उठायो है याही सौं धयवाद दो मेरी कतव्य है।"
'चदा तू तो औपचारिकता म आ गई। पर ई बात तो वना तरी रोल नम्बर
'माप रोल नम्बर पूछिक फा करोग ? रोल नम्बर दबि लियो । रोल नम्बर
चन्दा ऐसी तो आमा नाहीं।"
आप ठीक कह रहे हो पर भाग ते वा पेस पाए ।
चदा भाग तो करमन के आग नाचे । कम सोई माग रन ।
'कम अभाग कोन बडी है याप आप सौ वाद विवाद करक जीनियो
कठिन है। पर हा कम नौ भाग वन क माग सौ कमाए जाए ई सवाल युग युग सो
चलो पा रह्यो है । इनम कौन बढौ है द तो पानी विलोक मपखन निकारके जमी
वाल है । मैं तो कम की पच्छधर हू पर भाग क खेलन नै दखि पबहू वबहू हिल
जाऊ।
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'सो तो मुभाविक है अच्छ-अच्छे हिल जाएं। पर एस औसरन प जो सम्हर
जाएं बेई कमवीर दुनिया में बछू कर सके। हार जीत सफलता असफलता तो जीवन
के सग जुरे हैं पर मास गिर के मम्हर जाए वू ई मच्चो मान्स है।'
"पा सभै मैं और कछु तो समय नॉय पा रही। हा इतक जानू क या समै
मरे सिगरे सुपन धूरि धूसरित है गए है ।
एसी हारी हारी बात ची कर रही है ?
"हार कक हारी वात नई करू ता का वह ? ज्वारी दाव हार के सब क्छु
गवां और कमो बात करतो,
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कचन करत घरी

"तिहारी ई मानसिक दसा सदा एक सी नाय रहेगी या समैं पोरी सी निरासा झाक रही है । समै प सब ठीर हैं जाइगी । हिम्मत वाधौ फिर तयारी करो।' 7 "तयारी तो करू गी, भरपूर करू गी, देखु गी कहां कमी रह गई। कमी कू दूर करने कू फिर पूरी शक्ति सों जुटू गी पर मेर फेल हैये ते मरे तान वाने टूटते से दिखाई पर रहे हैं। चौं ई कने कह रही हो स्थात मेरे फेल है जावे ते आप 'चन्दा कसी बात कर रही है । हम अरु तुम डिगरोन ते पोरई मिल रहे हैं । हम तुम मित्र के रूप म रहे तो का या पास फेल ते बदल जाइगे। तुमने सुनी नाय एक सच्ची मित्र अपने सच्चे मित्र सौं वहा कहें 'मितर हम तुम एक हैं कहन सुनन कू दोय । मन त मन कू तौलिए कबहू न दो मन होम ।। और सुन नौन पानी म धुर जाए ता कौन निकास सक । गोपीन व मन म उद्धव निरगुन ब्रह्म नाई वठा सरी गोपीन ने कह दई-एक हुतो सो गयो स्याम सग या जवराध ईस।' या बातचीत के दौर कू तार दियो चोखेलाल अरु राधा के ITमन नै । राधा चाय लकै अरु चोखे नमकीन अरू मोठे की तसतरीन न लकै जा गए । राधा के हाथ त चदा नै केतली ल लई अरु मया ते कही- • मोय जावाज द लैंती मैं ल जाती। घर ता पाछ प्यालेन म चाय उडैलते भए चदा कछु हलकी पुलकी सी दिखाई परी । चकोर ने चुप्पी तोरी इतक चीजन की जरूरत ही इन सवमौ बढके स्वाद हमारे अरु आपके मधुर ब्यौहार में है । हम तो अापके घर की एक इकाई तो है। के अग है। 'तबई तो अपनी इकाई को स्वागत अरु सत्कार करनी चइए। जाप हमारे अतिथि हैं और कही कर 'अतिथि देवो भव । चोखेलाल न उत्तर दियो। फिर तो व तन को लरी वन गई । चकोर न च दा के फेल है जाइवे की घटना कू हल्लो सौ ग्लयो । चन्दा कू हिम्मत वाधिव की वात बार बार दुहाई। असफलता त मफलता को पाठ पढनौ चइए । चोखे अरु राधा नऊ दुखी मन त चकार की बात की पुष्टि करी। चकोर की बातचीतन कू सुनीक राधा अरु चोख क कछु नासा सो बधी । दूर सौं अधेरे म भटकते भए कू दीपक की चमक दिखाई परी । कचन करत खरी 59 अखीर मे चकोर वापिस लौटो। ऊपर ते वान हिम्मत तौ चन्दा कू वधाइ पर जाकू जीवन साथी बनाइवे को निहा कर लियौ वाके दुख सौ दुखी होनौ सुभाविक हा । च दा के पास गयो तो उमग ते हो पर बुझे बुझे मन त पानी परी । हाय मे लगी बटर निकर गई । लाटरी को नम्वर निक्सतो निकसतो रह गयो। सोचिवे लगो का म्ही त मया ते कही जाइगी ? कसै अपने यारनते कहेगी। बाकी फलती फूलती फसल प विजुरी गिर गई। चदा चकोर के बोलन कू सुनिक कछू देर कू सम्हर गई। धीरज हू वधौ । योरी देर पीछ फिर उदास है गई। ओस चाटवे ते का प्यास बुझे ? अखवार ने ना कछू दियो ना छू लियो पर चदा की हालत विगार दई । चन्दा वीमार सी लगवे लगी। राधा और चोखे नेऊ चदा कू दिलासा दई बेटी घोडा पे चढव बारी ही गिर गिर का पीसन हारी पर सहानुभूति के सब्दन न सुनिक फफक-फफक के रो परी। राधा नै च दा के आसू अपने पल्ले म बाध लिये । चोसे नै वाक सिर प प्यार को हाथ फेरो। चदा जोखिन सौ जासू वहाय क हल्की है गई । आसून को बहवो भौत सुखद होय चाहै वे सुख के हो चाहे दुख के । आसू नई बहैं तो स्यात मान्स वावगे है जाए । सयोग अरु वियोग म आसू वहाय क मन कू सवर वधाय पाव । हिए रुपी वाध के आखिन रुपी तरता नइ खोले जाए तो बांध टूट जाए। चदा कई दिना लो उदास रही । घर सौ वाहर नई निकसी। घर म परी परी मनई मन घुटती रही । सग की सहेली चदा कू घेरे रहै ई । पास हैवे वारीन के धीरज बधाइव के बोल घावन प नौन की भुरक्नी से लगते, पर चन्दा कछू कहना सकई। चन्दा अकेले म अपन परचान कू बेर बेर देखती। बर वर नम्बरन कू जारती । समझ ना पाती क कसे फेल है गई ? व राज पहली साल, दूसरी साल के नम्वरन कू देखिक रोती-प्रथम श्रेणी के पास पास के नम्बर, तबऊ फल । बाप भारी दुख के बादर छा गए । बाए तोस हतो तो एक बात सौं हौ-चकोर कह गयो "सम्बध डिगरीन सौ नाय हाय सम्बध मन सो होय।' ई बात बर बेर वाक ध्यान म आबई अरु घाव प मरहम को सौ काम कर जाव ई। दो दिना पाछ कालज मजक तालिका आई । चदा बोझिल मन सौं अक तालिका लव पहुंची पर अ क तालिका देषिक दग रह गई अव तालिका म लिखो द्वितीय श्रेणी पास । चदा पूली न समाई । पायन कू पख लग गए । पौन के वेग सों पर नाई। चोये के सामई अब तालिका धर दई अरु कही पिताजी अखबार म गल्ती त रोल नबर छपव त रह गया। ईदखो मैं ता सकिण्ड डिवीजन है। सिगर घर म सुसा की लहर गौरि गइ । मिगरी घर नाच उठो । मूखेधान र पानी मिल गयो। कुम्हलाए पौधा जी 60 कचन करत परी उठे। मरुस्थल में पानी की धारा बह निकली। पतझर में बहार आ गई । मृतप्राय कू सजीवनी मिल गई। चन्दा सुपने बुनव लगी। चकोर कू जब मेरे पास हैवे की खबर मिलेगी वे रह नई सपिंग । भगे भगे आमिगे । यो तो चकोर ने कह दई के सम्बध डिगरीन सौ नाय होय सम्बध मन सौ होय, पर मन में उछाह होय तो और बात है । पास हैवे की खवर ते चकोर को मन चौगुनी है जाइगो । चौगुने चाव सौ ब्याह हायगी। वात हू ऐसीई भई । चदा के पास हैवे की खबर जैसई चकोर कू मिली चकोर भगो भगो आयो। भरतपुर आइकई दम लई। चन्दा के घर आइक सावर खटखटाई । सयोग ते साकर खोलिवे चन्दाई पाई जसही दोनान के नैना मिले चेहरान प चमक दमक ला गई । मन नांगिवे लगे, नना हसिबे लगे । चदा ने हाथ जोरि के स्वागत कियौ । पोयो सूची ते पोयो को पूरी ब्यौरा मिल जाए। चकोर ने बधाई दैत भए रही- 'हम तो पूरी भरासो, तुम जरूर पास होऔगी। मोक कूपूरी भरोसो पर असवार नै तो मरी दमई निवार दई।" "तो अक तालिवाजा गई।' 'हाँ ये देखी ना।" चला नै जलमारी मे ते अक्तालिका निकास क चकोर के सामई धर दई । सकिड डिवीजन, सोऊ अच्छे नम्बर ते। याए देखिकै चकोर औरऊ नाच उठी। थोरी देर म राधा अरु चोख हू ठक म आ गए । चकोर कू खुस दखिक विनको खुशी को ठिनानी ना रह्यो । चाखे अरु रावा न चकोर की खूब आवभगत करी। पूर घर माहिं सुख को सागर उमड परो। घटा दो घटा रहकै चकोर जव चलवे लगौ तौ चोखे बाए पहुँचावे भरतपुर के बस स्टण्ड तक आयो । राह म चोखे नै वात छेनी-- लाला अव सम्बध के बारे मे का सोची है ?' पिताजी यामे सोचिव अरु बिचारबे कू ठौरई कहाँ है ? मैन तो पहलई कह दई सम्बध कोऊ डिगरीन त नाय हाय, सम्बध तो मन त हाय । पिताजी सम्बध तो पहलेइ है चुकौ अव तो जग की रीति निभानी है । "तिहारे इन बोलन न च दा कू बडो सहारी दियो है । नई तो 'नई तो का चदा फल जावे ते मैं अपनी बात सौ पीछे हट जाती। हमन तो पढी है "प्रान जाहिं पर बचन न जाही। - वचन करत खरो 61 'धन है तिहारे ताई । मोय तो पूरी भरोसो पर अब बात आगे कस बढ ? तुम वही तो गाम आइव, तिहारी जम्मा सों बात करने क चदा की मया क भेजू । "नाए पिताजी, मेरी खुशी म मेरी जम्मा की गुशी है । वान सव वात माप छोड राखी ह । करता घरता माइन बनाय रायी है। मैं आपकू, पदा की अम्मा कू और दूसरे काई कू परेसान नाय करनी चाहू । आप चिंता ना कर । भगवान सब भलो करगो।" 'फिर शुभ काम मे देरी चा।" 'मोय खुद चिंता है । अम्मा भोत बूढी है गई है। अब वाक हाथ पाव काम नाय दै । अब बाकी सेवा कूचदा की जरूरत है । 'ई तो चदा को सौभाग्य होयगी।" सौभाग्य तो हम सबको होयगो। चदा के आते ई हमारे घर मे उजेरो आ जाइगो । तपते भए जीवन म ठडक आ जाइगी। सच माना चना के सस्कार भरे व्यवहार न मेरो मन जीत लियो है पर अवई एक वाधा है । गाम जायक गाम वारेन त स्यात जुडड ल नी परगी। "लाला अच्छे काम मैं तो बाधा आवई है। "मोय बाधान की चिंता नाए । अच्छे काम भौतन कू बुरे लगे तो भोतन कू भावै । मै सब निपट लऊ गौ। आप निश्चित रही । "देख लीजी या गैल पं काटे दिखाई पर तो पीछे पग हटाबे म ई बुद्धिमानी जजी पिताजी कठिनाईन ते का बहते भए पाम एक सकिंगे। पेंटिन के मरके त का चलिबौ छोरि दिगे। कूकरान के भूकवे ते का हाथी राजमारग कू छोड देगी? बस स्टैड आबे प बातन की लरी टूटी । चोखे कू पक्को भरोसौ है गयो के चकोर पक्के पराएन प है। ज्याद बात करबो अच्छी नई समझौ। राजी राजी चकार क बिदा करके खुसी खुसी घोखे घर लौट आयो । 62 कचन करत खरी परित्याग गाम को चन्दा अरु चकार क व्याह की बात जब चौराहे की चचा बन गई तो अऊ गाम व्याई कुतिया की नाई हुरहुरायवे लगो। गाम बारेन पै आनजात म ब्याह हैवे की वात महन नाय भई । जुर मिलिक गाम उपाय ढू दिवे लगी। अखीर मे पचायत बुलाइवे को ते करी। दिना और ठौर ते कर दिए। गाम के मदिर प पचायत जुरबे लगी। गाम के लोग अपन-अपने फटान नै वॉध क मदिर पे इकठोरे है गए । सब अपनी अपनी मौछन प हाथ फेरब लगे। मौछन को सवाल हो । गाम की आवरू को सवाल हो । गाम की इज्जत के ताई म्यान म त निकसबे लगे। या समै ऐसौ लगो क राम के धनुस तोरबे प विरोधी राजा बोखला के कह उठे होय, का घनुस टूटबे तेई ब्याह थोरई है जान दिंगे । सवन को बोध चकोर की मैया प जी। सब बाई को दास बता रहे। सब या वात प तुल रहे, के तो ब्याह रुक नई तो नथिया को घर जडमूड ते उडा दियो जाए । क्सिोर सरपच न सब भैयान कू सात कर अपनी बात कही 'भयानो आप सवन नै गाम की नाक रखये ताई जो कदम उठाइवे की बात कही है मैं बाते दूर नाऊँ एक पोत वा बुढिया कू बुलाय के और पूछ ले ओ, बाके धरम भया वहोरी · बुलाय के पूछ लेयो। फिर कोऊ यो नई कहै क विचारेन कूवालिवे कू काऊ औसर नई दियो अरु कुल्ली म गुड फार लियो । ई बात सबन कू जंच गई । चकोर की मैया अरु बहोरी भगत बुलाए गए । नथिया अरु बहोरो भगत सौ पूछी गई भाई वहोरी, चदा अरु चकोर को जो बालाई वाला आनजात मे ब्याह हैवे जा रह्यो है ई रूक सक क नाय ? बहोरी न हाथ जोर के अपनी असमथता प्रकट करी। बाकी वात कू सुनिक सब बहोरी भगत प टूट परे। मांति भांति की आवाज कसबे लगे- - जजी घोटू पेट कई नव । भयाओ टूटी बांह गर मई पर। कचन करत खरी 63 सही है म तर मैं पढ बमई म हाथ तू दवे बारी बात है।' बहोरी प नई रह्यो गयो बालो-'सिरदारो तुम कछू कहो, आजकल क पढे लिये छोरान के हट कू जानी ही हो। हमारी कहा चल ।" किसोर ने इन बोलन कू सुनिक जपनी राय नई दई । वान नथिया सौं कही “नथिया तू कहा कहै तोय पतो है क तू या गाम क वसाए उस रही है नई तो वर क्वऊ को उपर जाती । दा वीषा झारन न कोऊ क्वऊ को हडप लती। हर माह ताक सीधे नई मिलते तो पेट भरवो दूभर है जाती । जा दिना चकोर को बाप मरो वा दिना तेई तोकू अरु चकोर कू गाम ने छत्तर छाया दई है । काऊ तरियां ते आंच नई आन दई है नई तो तिहारा खोजहू नही मिलती। नथिया ने सवसो हाथ जोरि क कही मैं गाम बारेन के बसाए वस रही हू, गाम के जिवाए जी रही हू । गाम वारे मोय मारै चाहै छोडे द पर मेरी छोरा ते पस नाय खा रही। मरी पस खामती तो मैं रोक लेती । अब तो किसोर लाल तातौ है गयो । लाग भमर उटे । बरसवे लगे। किसोर न सात करक अपनी निरनय सुनायो, भयाओ अपने हाथ क पौधा · काक नाएं काट पर जब वू काट बखेर, गाव को मड कू तोर तो का क्यिो जाए । यासौ जाज ते वहोरी अरु नथिया को घर छेको जाय रह्यो है जो इनको सग दगी बाके सग हू ऐसौ सचूक ई कियो जाइगी।" याको एलान होते ही पचायत उठ गई। सब अपने अपने घरन यू चल परे । बहोरी अरु नथिया हू घर लौटे । रस्ता मे वयरवानीन ने पूछी ' का रही नथिया ? नथिया बोली, 'रही का, जिन म बादर समझी वे धुआ क वादर निकस रच्छक भच्छक बन रहे है। एक नै नथिया वुरदौ, अरी उनीति तु कर रही है । वीज तू बो रही है अरु दोस दे रही है गाम वारेन कू। ई कहा की रीति है ? नथिया प नई रह्यो गयो बोली मेरो छारा कोनसी अनीति कर रही है । कोऊ धरेजो तो नाय कर रह्यो । काऊ • उडाय क तौ नाय ल जा रह्यो। फिर जा अपनी वचन द आयो है वू अपनी वातन त कस गिर जाए । जव चकोर चन्दा के बिना नाप रह सक और फिर छोराई मेरो नई रहेगी तो दुनिया म मरी रहई का जायगी। जह कट गई तो पेड कहा टिक्गो ? नीव खुद जाइगी तो घर कहा टिक्गौ ? और फिर महरन म तो याहू त ज्यादा है रहा है। प्राा वरस रही है । गाम कम प्रछूत रह जाइगे। गौम म हू आज नई तो बल्ल यही होयगो । सम पो ब्यार ना हम राक सर्क ना पच रोक सके। हानी तो हैक रहेगी। समय एक सो नाय रहै।" 64 वचन करत परी नथिया घर आय के निढाल सी पर गई । नथिया जान ही, गाम बारेन को विरोध माल लैक गाम म रहवी कठिन हो । 'जल म रहैं मगर सौ वैर' वारी बात ही। नथिया या समै फिर्तव्य विमूढ सी है रही। एक जोर गाम मे रहवे को सवाल है तो दूसरी ओर छोरा के जीवन की बात हो । अखीर मे नथिया न निहचे कर लियो रहटू उतर चाए बट्टा वू छोरा को ई पच्छ लेगी। छोरा न हू जा दिना टाप कियो बाई दिना ते बाके ब्याह के ताई आइबे वारेन की लन डोरी सी लग रही । अच्छे अच्छे बामनन ने देहरी की धूरि ल लई पर चकोर की मया न हाथई नाय धरन दियो। चकोर ने तो या विस मे बात करवौई छोडि दियौ । वाने साफ साफ कह दई जा गल जानौई नाय वाके कासननै गिनबे ते का फायदा ? चकोर जितेक मना करतो, बितेकई वेटीवारे दुने दूने आते। प्रलोभन देते। कोक नौकरी लगबाइवे की कहती। कोक हवेली देवे की कहती। कोऊ स्कूटर दबे की कहतो । कोक फ्रीज दवे की कहतौ । पर चकोर के चित्त पै चदा वढी भई । वान सबन की सुनी पर अपने मन की मानी। जपने यारवासन ते जपने मन के विचार साफ साफ बता दिए। या बात इतकू' अखवारन म अऊ गाम की पचायत की खबर छपी। चकोर ने पढी तो अचम्भे म आ गयो। वाकी मैया कू बुलाय के दवाव प दबाव डारे गए । कू पढिक चकोर प नई रह्यो गयो। बू दौरौ छूटौ अऊ पहुँचौ । गाम पहुँच के बान मैया सौं सिंगरे हालचाल जान । चकोर की मया रोते भए बोली, 'बेटा अब गाम मे रहवी बडी दूभर है गाम ने हम छेक दिए हैं। मया गाम नै ही तो छेके हैं, धरती तौ भौत वडी है। 'बेटा, धरती तो भौत बडी है पर अपने पुरखान के दो बीघे झार कम छोडे जाइगे । चलो इन झारन नै हू छोड दिंगे पर जा घर में ब्याह के आई हू, जाम तोकू जनम दियो है वाए कसै छोडो जाइगौ । "मया धरती तो एक है फिर घर ते का मोह ? सिगरी धरती हमारी घरई तो है । या घर मे जान क्तिक भए । सब ना जान कहा गए ? याए यही छोडि गए । काऊ दिना या घर कू' का या देही कहू छोडि जानी परगौ। मया इतेक मोह काइ कर तन सुनी होयगी, मोह मकल ब्याधिन कर मूला । बेटा सुनी तो सब है पर मन तो नाए मान। रहवे . घोंसला हू चइए, पहरबे कू पडाऊ चइएँ, पेट रे ताई दाने ऊ चइएँ ।' मैया मोय तो वा भगवान प खूब बिसवास है फिर अपन हाथ पमिन पं पूरी भरोसो है।' 1 वचन करत परी 65 जसी तेरी मरजी, तू जान तेरो काम जान | मैं नो भरी पचायत म कह आई, मैं अपने छोरा · नाय छोड सकू, गाम नाराज होय तो है जाए।" "मया ऐसें काइकू कही।' 'तो का कहती' 'या कहती, बेटा कोऊ वच्चा तो हत नाएँ बू अपनी भलो बुरी आप जान ? 'बेटा यो ही तो कही है मेरी बेटा के सामई नाय चल ।' "मैया तेरी चल चौं नाएँ ? मैं जो कछू कर रह्यो हू तोते पूछ कई तो कर रह्यो हूँ। 'गाम वारेन न कैस समझायो जाए। वे तो जा वात प तुल गए हैं, क तो छोरा बात मान जाए नई तो गाम म घर अरु हार म खेत तक नई रहन दिंगे।' 'मया कोऊ वात नाएँ याम घवराव को का वात है ? यहा नई वजी तो बाबा नद क बजगी। राम कू वनवास राम कुँ लाभदायक भयो क नाऔ ? हा फिर एक वर में और सिगर सिरदारन के हाथ जोरू गौ । पाम पकरूंगी जाग बिनकी मरजी।' मया कू समझा बुझाय के चकोर एक पोत गाम बारन कूमनाइवे कूनिक्सी। वू जा ठौर गयो बाई ठोर प दुत्कार दियो गयो। काऊ न सीधे म्हो बात नई करी । सवन न गाम ने छिक जावे को डर हो। गाम ते अरु राम ते कौन को वस चल । गाम ते कोऊ रार मोल लनो नाय चाहै। अखीर म चकोर भारी मन त अपनी सौ म्हों लकै अपने घर लौट आया। गाम बारे जब हाथ धाय क चकार र पीछ पड गए । कछू मन चले ना समझ अपनी ना समझी 4 उतर आए। चकोर की झोपडी पपायर फिकवे लगे। एक दिना एक पत्थर ते नथिया को कपार फूट गयो। वू लहू सा लथपथ है गई। चकोर को क्रोध जगो पर पस नई खाई । वान डीग जाइक मरहम पट्टी कराई पर गाम को एकक सग नई लगो। ताने और दिए। बिचारी फूस सौ युढ़िया म वित्तई कितक औ । मुरगी तो तकुआ कोई डाह काफी हाय । विचारी न पाट पर लई। चकोर मया की तीमारदारी म लग गयो । राटी पानी घर की चारा बुहारी सब बाए करनी परी। गाम वार फटक तर नई । काऊन तिनका तक को सहारी नई दियो । जा बुढ़िया मावछ पूनी सीधे दऔ करत वि सीधी दर्ग वन्द कर दियो । यहा तक बात रहती तोऊ कोऊ वात नाई । एकदिना वाफ मन म आग लगवा दइ । बुढिया न सुनी तो वाको हियो भर नायो। पूट फूट व रावे लगी व वाको धीर धरया तक नाओ। नथिया ने रामा लई क जब गाम नै पाम उबार दिए। पगार मया र दुप सौ पिघल गयो। 66 कचन करत परी अवेले मे रो लेती। बाए पतो, घर छाडिये म मैया दुपी होयगी। चकार के मन म दुविधा जनम लरे लगी। एक पोर मैया दूसरी ओर चदा। मन करो गाम वारेन त मापी माग के गाम बारेन ने मना ले। अपनी जाति की छोरी त व्याह करले खूब दैन गयजो अभावगो, घर बन जाइगो। दूसर न वाके माथे मे बिजुरी सो काधती। का म्हों ते चन्दा के पाम जाइगो। वाप जरु वात की तो एकसी ही बात है। चकोर गहर म इवती उतरती। मया के दुप में दुषी है के अपने मान गुमान . ताक म रस के चकोर एक पोन किसार के घर पहुँचौ । वाते हाथ जोरि क गाम वारन की जोमर्दी की बात कही। पर पं पत्थर फकव अरु सेत माग लगाइवे की सिकायत करी पर किसोर नै कह दई, मैं का कर सकू? गाम वारेन ते पस नाय खाय । गाम म रहनी है तो हानी हाजी कहनी परगी ।' या बात का धकार अ समय रह्यो क गाम बरु राम त बर मोल लक काज न पीरे नाय पहरे । चकोर न तोक छमा चाही पर किशोर नै अनसुनी कर दई । याई तरिया चकोर कई मुडडन के पास गयो पर निरासाई हाथ लगी अबीर म चकोर वोरी भगत के पास गयो । वहोरी भगत आध्यात्म कू ले बठो बोला-- बटा इन्द्रीन सौ वदिक मन है, मन त बडी बुद्धि है, बुद्धि ते बड़ी बात्मा है। पत्तान ते वडी मावा है, सामान सौ वतिकै पड पड सौ वढि के जड है। हम जड नई भुलानी चरए।" बहोरी न वाके दुख सो दुखी है क चकोर के मन क तसल्ली दवे कू एक बात और कही, "या ससार मे तू ई दुखी नाय, चारो ओर दुखियारे है । सबन के माथे प गठरिया धरी हैं। अगर कोऊ ऑखिन बारी है तो देख सकै क दूसरन के सिरन प दुख के गट्ठर बधे धरे हैं । जिनसौं दुख झोंक रहे हैं । भया भार म कहू सीरी नाएँ । इनते परेसान होनी सुभाबिक है । पर समझदार दुपन सौं दुषी है के नीति के पथ कू नाय छोड । जीवन · मन कार्ट पर ग्यानी काट ग्यानते मूरख काट रोय । काटनी रानोन पर । हा बुद्धिमान बुद्धि सो काम ले जरु वा बुद्धि सौ परेधात्मा अरु परमात्मा को ध्यान रख । दुख परवे प वाको सुमरिन तो सब कर, पर अपने कूसमरपन हू करें। हाँ दुख परवे पै सुमरन कोक काम को नाएँ । दुख परवे पं समरपन को कोऊ मजा नाएँ । सुय के सम सुमरन जरु समरपन को महत्व है। यई हमारी संस्कृति है । तोय मालुम नाएँ, यहा एसौ कौन पुन्यात्मा भयो है जाकी महिमा मृगी · दुष्टन की बानी के बानन ने नई भेदी होय ।" बहोरी के लम्बे चौडे भासन ते चकोर कू राहत सी मिली। हा बाए सतोस नई मिल पायो। बू अकेलो होतो तो पांव फटकार के चल दतौ पर मैया कू' कहा छाडतो? मैया कू गाम वारे दातन के बीच मे जीभ को तरियां हू तो नाय रहन दै रहे । वाए चौरे मे दीप रह्यो क वाकी मया की स्थिति ऐमी है जम अकेली नाहिन सिगरी धौल खेरी। बहोरी नै चकोर दुख सहन करबे कू पक्की कर दियो । दुख मान्सन प प्राव कचन करत खरी 67 पर मानसन • दुखन सौ भागनी नई चइए । नीति को पल्लो नई छोड नौ चइए । दुख तो मान्सन न घिस घिस के मालिग्राम बना द। इन भावन सौं चकोर मात्मिक बल मिली । वू हिम्मत बाधि क अपने घर लौटिवे लगो पर पर आते आते रात है गई । । घर आय के फिर मया की सेवा में लग गयो। मया अपने मन को दरद नई बतायो। बू नाय चाह रह्यो क मया • अपने दुख सौ दुखी करी जाए। मया वेर- बेर बहती क गाम मे रहवो दूभर है । घर छाडि के चलवे की बात मया ते कही तो बू रो पड़ी गली रुध गयो । नथिया को गाम ते वसो ही लगाव हो जसे मीन को नीर ते मधुमक्खी को छत्ता ते फनी को मनी ते । इन साच विचारन म दोनोन की आख लगवे कूई । तबई घर की छान प भक्काटौ सौ भयो । चकोर कू"समझ मे देर नई लगी। बान मर सौ पहले अपनी मया कू गोदी म भरकै झटपट बाहर निकासनी चाही । झोपडी में दम कितेक ही आग लगते ही छान स्वाह है गई। वू मया कू लकै दरवज्जे तक आयौ तो लपटन ने घेर लियौ । बान मया • धरती प रखो। झटपट साकर खोली और एक ही झपटटा मे मया कू लके बाहर निकस गयो। मया भौचक्की सी देखती रह गई । दहाड मारकै रो परी । गाम के तमासगीर जुर आए । काऊ नै नैकऊ दया नई दिखाई। चकोर की प्राखिन मनोध उमड पायौ पर विचारों का करतौं। चकार । आग बुझाब • हाथ पाव पीटे । नथिया न रोय रोय क गाम वारेन ते आग बुझाइवे की कही पर जाग लगावे बारे बुझाते चौं ? छान धू धू जर लगी, वास चटक्बे लगे। नथिया अरु चकोर के हादन प खटक्के लगी । देखते ही देखते घर को घरआ है गयो । क्छू दयावत बेपरवानी नथिया के पास आ गई। वे होठन सौं सहानुभूति के दो बोल बोल रही । नथिया के सग जो व्याह के आइ बे जरूर दुखी भई । रात गहराबे लगी । एक एक करके सव कनी काटवे लगे। घर के सामइ परे रह गए कोर नथिया जरु बहोरी। चकार नै निहच कर लियौ र दिन निकसते ही वू अपने प्यारे गाम कूछाडि क चल दगौ । रात भर तीनो अपनी दुखडौ रोमते रहे। विनकी झोपडी रात भर मिलगती रही। क्वक क्बऊ नथिया नै चकोर के ताई कोसा। ता समै चकोर नै सब अपनी दोस जानि क , चुपचाप सब बात सहन कर लई । । . दिन निकसते ई नथिया के घर के सामई मेला जुर गयो। कछु नधिया के दुख सौ दुखी है। पिघले पर मदद करते तो क्से करते । सब गाम ते छिकवे को डर हो । सब नमासो देखते रहे । वहोरी न बाई ठोर प छान डरवायवे को साची पर चकोर को मन भर आयो । बान साफ कह दई "अब मैं गाम म नाय रहूगो। मया कू लक भरतपुर ई रहूँगी। 68 वचन करत खगे या वात कू सुनिक क्छ व्यग्य कसवे लगे, 'नवई छोरा को बल नाय निकसौ जेवरी जर गई है पर ऐंठन नॉय गई।" या समै सूरज पख फैलाय क उडान भर रह्यो तवइ एक डाकिया डोग ते आयो । बानें चकोर के नाम को लिफाफो गहतायो। चकोर लिफाफो योलिक देखो। खुसखबरी निवसी। भरतपुर के कॉलेज म लक्चरार की नौकरी को कागज हो। या समाचार कू पढ़िक चकोर में अपनी मया के पाम छिए तो मैया कछु समझ नई पाई वोली, 'चो मोय छोडि के जा रही है का?" नई मया तोय छोडिक क से जाऊँगो । जाऊँगो तो कहा जाऊँगी । मया मेरी नौकरी लगवे का तार आयो है । भरतपुर में मोकू लक्चरारी मिल गई है।" 'अरे बेटा जुग जुग जियो मेरे मन को साध पूरी भई । अब मरे पांमन न का छीमे । सब गाम वारन के पाम छी। वा सम जितेक बडे पूढे खडे, वान सबन के पाम छोए । सव पानी-पानी है गए । सवन ने हाठन सौ ग्रासीस दियो। वा ममै को नजारो देयवे जोग हो । एक ओर सुख दूसरी ओर दुख मया- बटा सुख दुख के झूला म झूल रहे । चकोर तो भरतपुर चलव पहल तेई तयार हौ अब तो सुऔसर और आ गयौ । मैया ते बोली मैया अब यहां रुकब म कोक सार नाएं । मौय भरतपुर रहनी ही है। तू अकेली रहेगी तो कहा रहेगी। भगवान नै सुन लई । अब हम दोनो ई भरतपुर रहिंगे। वेटा जसौ चाहै वसी ही कर पर भरतपुर कहा चलिंग अपनी कोऊ ठौर ठिकानो तो हत नाए।" मया सव भगवान भली करगी। नौकरी लग गई है । अब ता जहा नौकरी म्हाई अपनी घर ।' पर या घर कू छोडि के के से चले।' मैया अव घर कहा रह्यो है अब तो ई तो घूरी है गयौ । वटा तू अकेली चली जा मैं तो एक छपरिया डारिक याई ठौर रह लउगो।' मया जब ऐसौ नाय है सकें। फिर अब अपनी यहा रहो ही काए । फिर ताय यहा रहन कोन देगौ ?' 'तु जसो चाहै बसौ कर तरी सुख मेरो सुख है।' वचन करत खरी 69 मैया-बेटा बतरामत रहे । गाम वार मुनत रह । कछु गाम वारे या दुख म मानरत रहे । पछु नथिया की जरी भई झोपड़ी अरु दो बीघे यारन नैहू हडपर्व कू तयार बैठे। जिनक मन म दया आई वे गाम के डरते बोलक नई सके । पोरी देर म चकोर अपनी मया के न चाहते भए हू बाए हाथ को सहारो दक होले-होले सडक प त चलो । नथिया जागे जा रही पर मन जरी भई झोपरी म ही फस रह्यो । मुड मुड क बाय देख रही । रो रही। मन म नाग लग रही पर विचारी विवस ई । सडक प नथिया नरु चकार तमास बन रहे। बस क आत ई नथिया भूपाटन ते रो परी । चकोर बाए हाथ परि क बठाव लगौ नथिया गिर परी। बोली, "वेटा में नाय जाऊँ', गौम कू नाय छाडूगी। या गाम मे व्याह के आई हू । गाम बारे मोय लक आए हैं । भीर में ते आगज आई, 'जो लक आए है बिन निकार दई है दूध की माखी की नाई । छारा ठीक कह रह्यो है गाम मे अब रह्यो ही काए।" चकोर ने कही, मया अव दन वातन न रहन द नथिया ने कही, 'अच्छो गांम वारेन सौं गलतीन की माफी तो माग लऊँ।' चकोर बोलो 'मया दोसी तू नाए-दोसी मैं हू मैं ही माफी मागू गौ।' वाने मया के आसू पोंछे । क डक्टर पिसिल देवे लगी। चकौर ने मया सम्हार के वठारी फिर दोनोन ने हाथ जोर क गांम वारेन सौ माफी मांगी। क उपटर ड्राईवर जोर सिगरी सवारी कछु समय नई पाए । गाडी चल दई। लोग लुगाई, धीरे धीर जपन घरन कू लौट परे। बधे दोऊ बधन मे भरतपुर म चकोर अपनी मया कूलकै चौमुखा महादेव के पास किराए के एक मकान में टिक गयो । बाके पास ना खाइब क' को ना पीव कू ना ओढिवे को, ना विछायव कू । बाके यार राजेद्र ने कछू रहब सहब, बार पीवे, ओदिबे विछायचे को परवध कियो । बान तन, मन अरु धन सौ पूरी मदर करी । भरतपुर कालेज म ड्यूटी जाइन करते ई चकोर के हल्ला है गए। वाकी पढाई और व्यवहार सौ छारा भौत प्रभावित भए । चकोर न अपने साथीन को हू प्यार पायौ। थोरे दिनान मइ वाकी धाक जम गई। फूल की सी गध फल गई। चकार की नौकरी की खबर सुनिक एप मत्री महोदय अपनी विटिया को सम्बध लकै आ गए । भांति मांति व प्रलोभन दवे लगे। चकार न दो ट्रक मना कर दइ । प्रलोभन के पीछ मत्रीजी न दड-नीति को हू अनुसरण करो, पर चकोर के वान प जुतक नई रंगी। 70 कचन करत यरी चदा के घरयारेन ने जब सौं चकोर के भरतपुर आइवे की सूचना पाद बिना भारी खुशी भई । दूसरी ओर गाम वारन के अत्याचारान कू सुनिक बिना भौत दुख भयो । लेक्चरार वनवे पचदा की कली कली खिल गई। वू चकोर पू बधाई दवे कालेज पहुँची। चाखे हू वघाई दवे गयो । सग में ब्याह की चरचा हू कर गयौ। च दा अरु चकार के अन्तरजातीय ब्याह की चरचा भरतपुर के अखबारन म है गइ । एक पच्छ याको समथन पर रह्यो । दूसरी याको विरोध करवे प तुलौ। दोनो पच्छन ने अपने-अपने पम्पलेट निकासे । देखते ही देखते एक नवयुवक मडल तैयार हैगो। चकार को यार याको अध्यच्छ बनी । वान नई विचारधारा के नवयुवकन · लक अतरजातीय ब्याह को समयन क्यिो। नवयुवक मंडल ने बाल विवाह, पदा प्रथा बेमेल विवाह जसी सामाजिक कुरीतीन वू दूर करबे के ताइ और घोसना करी। नवयुवक मडल न मौहल्ला मडली बना दई । नवयुवक मडल ने निरनय लियो जो अच्छे कामन म रोडे अटकाबगो तो बाको नवयुवक मंडल घिराव, पथराव अनसन, सत्याग्रह, वहिस्कार जैसे कामन को सहारौ लगी नई तो हम सबके हैं सब हमारे है । समाज की दहेज की दुनाली ते पीडित दुखिया आय-जाय क मिलिये लगे। जस छोटी नदी बडी नदीन म आइक मिलं वाके वेग ए वढा दे याही तरियां नवयुवक मडल को प्रभाव दिन दूनी रात चौगुनी बदवे लगी। नवयुवक मडल न ठौर और प सभा करी। रूढिवादी जर भुन के रह गए । बहुमत के आगे अल्पमत झुक गयो। मालोचना के बादर हट गए । बाद विवाद मिट गयो। जरजर जीवन, सक्ति रहित पुरानी पोरी पत्ती हरी भरी जीवन सक्तियुत नई पत्तीन क विकास कू कव तय' रोचे रहती। पतझर युग परिवतन लाब । चौखे नै सुभ दिना देखि क अपने चार भयान के सग चकोर के घर आइक चोर के माथे प तिलक कर दियो। कछू फल मिठाई बाकी गोदी म रख दिए । सकुन के रूप म एक रुपया भट पियो । पडित ने विधि विधान सौं सिगरी काम करायो। हाथो हाथ ब्याह को दिना त कर दियो । होरी की दौज को सायौ दाना पच्छन नै स्वीकार करी । चोखे की बहू राधा तो अब दिन गिनवे लगी। नथिया हू फूली फूली डोल रही। दोना ओर उठाह दिखाइ पर रह्यो । ब्याह त महीना भर पहले पीरी चिट्ठी आ गई । ब्याह को विधिवत नौती आ गयौ। जब नथिया के सामइ देहरी पूजन की बात पाइ। चकार न राजद की मन सो एक हडिया में मोती चूर के लडडू मगवाय क पूजन करा दियो । राजेद्र की भन ह खुस हैं गई । नथिया हूँ 'बुस है गई। देहरी पूजन कू जो ढकोसला बताव लग विन' नथिया न समझायो- कचन करत घरी देहरी म अमुर वाम पर, सवसों पहल विन्ने मनायो जाए जासौं मगल काय निर्विघ्न हाय।" चकोर न या स्वीकारो । राजेद्र जा या व्यथ समझ रह्यो वाकू चकोर ने बतायो-"तुलसीदास न हू तो अपनी रामायन म देवतान सों पहल अमुरा की वैग्ना करी है। फिर हमारी संस्कृति भुलाये रे ताइ थोरइ है। देहरी पूजन के लडुआ घर पर बंट। सवन क मालुम पर गई । नाक भी मिकोरपे वारो नाक मौह सिकोरच लगी। कहने लगी 'कही को इट कही को रोडो, भानुमती ने कुनवा जोगे।' जो भली वयरवानी विन सब प्रकार सौ सहयोग दियो । लग्न को छेना पांच दिनान को निक्सो । इत चकार । सलाह सूत करक मया के अनुरूप प्रयध कियो । दूसरी ओर चोखे । आसामीन घटपटायो। कइ आसामी तो अकाल के मार घर छोड गए । कछू मडक डारवे कू जात । रोज छोदते, रोज पीते । क्षून । पट रिखाय के कह दइ क माते बच तों कछु करें। चाखे ग्रासामीन की हालत देखि क कह न सको। जिनत कही, विन्ने टया सौ जबाव द दियो । हार झकमार क चोमे चुपचाप घर नौट जाओ। राधा नै चौम्वे त करजा लवे की बात कही पर जहा जहा हाय डारो कौडी पटट परी । अखीर म राधा और चामे त कियो के मकान के पास की 401 260 की जमीन वेच दइ जाए। मौत से सामाजिक गिद्ध तो याकी वाट देख रहे । बीच वस्ती म ऐसौ प्लाट मिलनी दूभर हो । प्लाट के साम सडक, नल, विजली सब सुविधा हती । प्लाट 10 000/ ते कम को नानो पर 50011 ते ज्यादा दवे बारी कोऊ नानी । सव जान गए गज बावरी होय । प्रऔने पौने म यौवनी परगी। आदमी तो समै देख । समै को लाभ उठावै । सब चोखे कू जूटिव क मंडरा रह । चोखे कू अपनी विटिया को ब्याह दिखाइ द रह्यो । वू मनइ मन कह रह्यो जाए लाख रहै साख । चकार क जौइ या बात की मालुम परी बाप नई रह्यो गयो । बू भगौ भगौ चोखे सौं जाइक मिल्यो । वान विनम्रता सौ कही, पिताजी प्लाट बेचक ब्याह करवे की सोच रहे हो । घर वरवाद करक व्याह करोगे ” फिर तो मरे सग ब्याह करव को नतीजा ही का निकमगो ? सव लोग माप थूकिंगे। हमारी करी धरी मटटी में मिल जाइगो । मरी ममय मे पदसान की जरूरत ही काए' चोखे का उत्तर दतौ । बा। चकोर के आगे प्लाट नाई वेचवे की सौग ध खाई । तव चकोर क स्वात आई । चोखे न सोग ध तो खा लई पर लगन म कछु तो भेजनौ । चार भयान के ताई घर प खारोमीठो पानी तौ पिवानी । दुनिया बसई नाम धर रही अब छोरी • 72 वचा करत खरी खाली हाथ भेजबी कहाँ लो उचित हो। का करतो, अकल कछ काम नाय दे रही। अखीर म राधा ने तीन तोला सोनी जो बचाय के रख राखौ चाखे के हाथ प धर दियो । चोखे के मन • राहत मिली। प्यासे पानी मिल गयो। लगन के दिना आगन म चौक पुराय के चौकी १ छोरी . वठाय क पडितजी ने लगन लिखी। लगन के ताई एक परात, ग्यारह सेर लड्डू कपडा को एक थान कछू फल फूल रखे गए । वयर वानीन न लगन लिखते समय लगन के गीत गाए। खीर म आरतो भयो बयरवानीन ने आरती हू गायो- 'झारे झमके को बरसनी मेर' सुक्लजी नै लगन पढक सुनाइ । बयरवानी जब घर चलबे लगी तो बतास बंट । बयरवानी चाखे के घर ते निक्सते ही गिरारे म गीत गाती चली- फिरगी नल मत लगवावे रे फिरगी नल मत लगवाव । नल को पानी भौत बुरी मेरी तवियत धवराव । सहर वे सा गए हलवाई, जी सहर के सो गए हलवाई । अब तो मुखडा खोल कलाकद लायो हूँ प्यारी।। चकोर के यहा साझ कू लगन पहुँच गई । दरवज्जे पै हरे हरे बदरवार लग गए। मांगन लिपवायो गयो । चोक पुराए गए। साय कू हमीदा ने नगाडो अरु वार छोरा नै नफीरी बजाइ । नवयुवर मडल ने मिलकै सब काम किए । फरस बिछाए चादनी विछाई । नथिया पोरी पहरकै पास-परोस की धयरवानीन • बुलावे गई। चकोर ने अपनी मया खुस करवे के ताइ मया के अनुसार सब काम पिए । लगन के लते समय लगन लेवे के गीत गवे, पारतो छात भयो । पडितजी न लगन पत्रिका वाचि क मुनाइ । पास परोसीन कू चाय पिबाई । चकोर न लगन को सामान अपनी मया को गादी मे रखक वाहर सबन · राम राम करी। बड़े बूदन को प्रासीम लब क ताइ पाच छिए । सवन ने आसीस को हाय फेरी। आनद क सग लगन को काम सम्पन्न भयो। लगन के पाछ चिटठी लिखी जाए। दूसरे दिना सवसों पहले गनसनी क चिट्ठी लिखी गई । फिर गुरुजी के चिटठी लिखी गई। ता पाछ सिंगरे नातेदार रु मिलिव पारेन चिटठी लिखी गई । नथिया के मन म प्राइ अझै गाम के मुड्ड- मुड्डन कूहू चिटठी लियो जाएं। चकोर न चिट्ठी लिखियो तो दूर गाम की ओर पाम करकै हूँ साये को नाय सोची। पर मया तो या विचारधारा को क वटी तो नमन को चाहे पर चों ना होय । यामों चकार ने मऊ गाम वारन के विदली लिखी। कचन करत परो 13 - . नपिया के मन म कोऊ चोर नाली बू ता पाहती जो है गई सा है गई । जबऊ गाम वार वात अऊ लौट चलव को पहें तो अऊ लोट जाए, पर गाम वारेन को कौनसी गज परी। जिस पर उजारो वे याइ जाये लग । गाम त बहारी जरूर आयो। व्याह के गति रिवाज नथिया वे यह अनुसार है रहे । पूरी पूजिये पै नवयुवक मडल जाना पानी पर लगौ । नथिया न सवन कू समझायो, बेटायो पुरखान पूरी पृजिवी या ई नाय रायो । याव पीछ जीवन दरमन है । पूरी पूजिक इ पाठ मिग्रा है 4 लव तय तो हस सेल क उमर विताय दइ । अव गृहस्थ जीवन म प्रवस परव पूरा जसो बननी है। पूरी जस सब भार ए झेल कूरी करक्ट, मल मूत्र सवन न सहन कर एसें ई अब सहनसक्ति को पाठ पूरे ते सीखनी है।" नवयुवक महल । जीवन को रहस्य समझो तो बात जच गई । चकोर । हसत हसत मया की बात मानी। वितक चन्दा २ घर बिना धन ये कोऊ प्रव ध नाय है पाय रहा व्याह के समै घर प सुफेदी, रग रोगन हाय हाथी, घोडा कद । पर हाय तो हायर से भटटी का वित्त प चेत । चासे की तो अटो पाली । इन साच विचारन म चासे डूब रह्यो । तवइ राजेन्द्र जपने दो यारन । लक चाखे के पास पहुची। व्याह की ब्यवस्था कसे होयगी। ई सवाल किया तो चोख को चहरा उतर गयो । मन वठ गयो । राजेन्द्र भाप गयौ गरीवी चारोबार सी यांक रही। राजेन्द्र ने समझायो, व्याह की चिंता मत करो व्याह माय समाज मदिर मे होयगो न तो बर पच्छ की आर सो काऊ ताम झाम प्रावगी, ना क या पच्छ के दरवज्जे प कोऊ धमरगज होयगौ। आज तक अपने अपन घरन पं जो चाहो सौ करो क्ल्ल दाना पच्छ जाय समाज मदिर मे आ जाइगे । ता पाछ सव काम नवयुवक मडल के हाथ म होयगी । वेटी बारे अरु बेटा बारे तो तमासी दविंग।" चोखे न ई समाचार सुनौ तौ सकपकावे लगी। बू विक्तव्यविमूढ है गयो। वाक मन कू राहत तो मिली पर बिना पइसा धेला कस काम हायगी? ई समझ म नाय आ रही। राजद्र नै समयायो दोनो तरफ की व्यवस्था प्राय समाज की आर ते हायगी । आय वालक बालिकान को जसै ब्याह होती बाई तरिया ब्याह होयगा । वादक सस्कृति का निर्वाह होयगौ । आदस रखनी है । अगड्दा रोचनी है, जासौ सब दुख दारिद दूर है जाइ ग। चाखे । अपनी सहमति द दई । अब नवयुवक मडल के सदस्य नथिया के पास पहुंचे। बिन्ने सिगरी वात नथिया कू हू समया दद बिहाय धाय क भूमर ही भूमर जाय समाज के मदिर म पहुच जानी है। सिगर पाम विधि विधान ते हुग ।' नथिया । हू बिना हुज्जे तुज्ज क नवयुवक मडल की बात मान लई । वू या वात कू जानती क बाके हितसी नवयुवक मडल क ई तौ है । ब जो क्छू करिगे भलौ ई करिगे। 74 कचन करत खरो नवयुवक मडल में दोनो पच्छन कू तयार करकं चन की सास लई । वा दिना धूरडी को उत्सव हो । दूसरे दिना दोज कूब्याह हो । सवन नै मिलिक पहले धूरडी को उत्सव मनायो। धूल धक्कड सौं हटिक, रग गुलाल सो खूव होरी खेली। ब्रज के खूब रसिया गाए । ढप ढाल चग लक नवयुवक मडल भरतपुर की गलीन म निक्स परो-सव जुर मिलक गा रह- आज बिरज म होरी रे रसिया होरी रे रसिया वरजोरी रे रसिया । अपने अपने मदिरवा सो निकसी कोक स्यामल कोऊ गोरी रे रसिया ।। अवीर गुलाल के थार भरे हैं, मारत भर मर झोरी रे रसिया ॥ बाजत चग, मृदग ढाल ढप, और नगारे की जोरी रे रसिया ॥ कौन के हाथ पिचकरा सोहै ? कौन के हाथ कमोरी रे रसिया ?" स्याम के हाथ पिचकरा सोहै। राधा के हाथ कमोरी रे रसिया ।। चन्द्र सखी कहि वाल कृष्ण छवि, चिरजीवहु यह जोरी रे रसिया ।" दुपरी तक सब याही तरिया होरी गामते गामते होरी के रस म डूब गए । सवन के चेहरा रग अरु गुलाल म ऐसे रग गए के पहिचानेवे महू नाय पा रहे । सर एक दूसरे के गरे लग रहे । होरी को मिलन, मन के मल कूदूर कर रह्यो। दुपर तक सव थक के चूर चूर है गए। धीर धीर सब अपने-अपने घरन कू चल दिए । सांझ कू' फिर सिंगरौ नवयुवक मडल आय समाज के मदिर म इकठोरी भयो। ब्याह के ताई सबन ने मिलिक अपनी अपनी काम बाटो। एक दल मडा वनावगी। दूसरी दल यन की सामग्री जुटाय के यज्ञ की व्यवस्था करगी। तीसरी दल वठक व्यवस्था सम्हारंगो । चौथो दल जलपान करावगी । सामान की मूची बनाय दई । ब्याह को काम दिन ई दिन होयगी ई ऊ निहच कर दियो। या काम के बटवारे के पाछ सब अपने अपने काम म लग गए । सवन सौ तालमेल के ताई राजेद्रत पियो गयो। दूसरे दिना नवयुवक मडल न माय समाज मदिर • झार बुहार क धोय पछि क विना तामझाम के सजा मवार दियो। दोना पच्छ हाय धोय क प्राय समाज म मा गए । प्राय समाअ के एक ओर के कमरान म वटी बारा पच्छ ठहर गयो दूसरी ओर बेटा वारी पच्छ। कचन करत बरी 75 चन्दा को सहेलीन ने चाकू सूब अच्टी तरियां सजायो । विना चमक दमय क सादा कपडान महू चदा, चन्दा को नाइ दिप रही । बिना कोक आडम्बर क चकार के मित्रगन इक्टठे भए । भरतपुर क समाज सेवक, समाज सुधारक चारा पोर ते एस खिंचे चल आए जस फूल पै भौरा चले जाव । जसे पोयर म गाम को पानी चलो आव । मास्टर आदित्यद्र, राज बहादुर जुगलकिसोर चतुर्वेदी, किसनलाल जासी, प रामकिसन मुकुट बिहारी लाल गोयल हरीसिंह वकील, हातीलाल पारासर जस नव- युवक अपनी समथन और नासीरवाद दव ताई पठारे है गए । आय समाज के साधुगन ऊ अपन भगवा वस्त्रन म एक ओर आलथी पालधी मारक मोभायमान है रहे । सिनसिनी के पडित लक्षीराम नै सुन्दर वेदी की रचना करी। चारो आर हरदी, गुलाल, महदी आटो और कई रगन की अल्पना माढी गई । वेदी के चारा पोर सुदर मडप बनायो । केरा के पत्ता चारा कोनेन प लहरा रहे । वेदी के चारा ओर पत्तरन म सामग्री सजा दई गई। एक ओर ध्यो को पात्र रयो गयो, जामे स वा परी । ब्याह के ताई सिगरी तयारी है गई। भारतीय संस्कृति की झलक सबन के आखिन 7 सामई है गई। व्याह की सही लगन म एक अोर सौ हल्की चम्पई रगीन सादा धावती म च दा जाई अरु दूसरी जोर सो सफेद खादी की धोती कुरता अरु जाक्ट म सजी सवरी सहज भाव सौ चकोर आयो । दानान न मडप क नीच ठार्ड हैक भारतीय परम्परा के अनुरूप सवन कूवरजारि क प्रनाम कियो । सबन अभिवादन स्वीकारी । ता समैं गोपाल गढ के रहवे वार मदनजी । एक मधुर गीत हारमोनियम प सुनायो। बोल हे- मने व दरवार सजाए।' या गीत सौ वर पच्छ को स्वागत कियो गयो । ता पाछ रामायन की बिन चौपाइन को सस्वर पाठ कियो गयो जिनम सीताजी रामचन्द्र जी कू माला पहिराव । विन चौपाईन के सग ई चन्दा । चकोर के गरे म वरमाला डारी । वू मन को माला तो पहले ही डार चुकी । याही भाति चकोर सालीनता सौं सहज भाव सौ चदा के गरे मे पुष्पहार पहिरायो। चारो ओर सौ फूलन की वर्षा भई। लोग लुगाइन न च दा रु चकोर की वरमाला को ई सरुप देखो तो त करी याही तरिया हम अपने छोरी छोरान की वरमाला को प्रायोजन करिगे। वरमाला के पाछै चदा अरु चकोर यन ५ बठे । पडित जी आय पद्धति सौ यज्ञ करात भा ब्याह सम्पन करायो । यन की सुगध सो सिगरी बातावरण सुवासित है गयो । जगरवत्तीन की गध सो वायुमडल महक उठी। कन्यादान करबे बारेन । यादान करो। समाज सुधारक अपने अपने विचार प्रकट करे। एक जने बाल विवाह के दोस गिनाए । बाल विवाह सौ बच्चान को स्वास्थ विगर जाए, मानसिक विकास नई है पाव 1 ना पढ़ पाव ना लिख पाव । बीमारी के मारे, दुखी भए जीवन गुजार । बाल विवाह के कारन विधवा है तो जीवन और भार सरुप है जाए। 76 कचन करत खरी बाल विवाह के पाछ दूसरे ने समाज की दूसरी बुराई पं प्रकाश डारो। एक बहू के हाते भर दूसरी ब्याह करल । पछु उजागर में कर कछू चुप्पचाप कर जव बात खुल तो लैबै के दव पर जाएं । एक के हौत भए दूसरे सौ ब्याह करबो एक के माथे के सिंदूर सौ खिलवार करती है । जिन्न दो दो ब्याह किए बिन्न अखीर म नरक ही भागो। समाज के तीसरे कोढ दहेज प कई लोगनो धोय धोय क ऊजरी करी । विन्नै उदाहरन दै दक आए दिना स्टोव फ्टवे, आग लगवे की बात कही । पाए दिना गर म फदा डारिक, जहर खाइके मरने की बात कही। दहेज के कोढ कू दूर करने कू नवयुवकन कू जागे आइक दहेज के भूत भगाइवे के ताई चकोर के आदस कू अपनाइक उदाहरन दवे की बात कही। याही तरिया सती की प्रथा, अमिच्छा परिवार नियोजन, स्त्री समानता कारज, विधवा विवाह प हू विचार प्रकट किए। ता पाछ स्वल्पाहार भयो। दिन ई दिन मे ब्याह को सिगरी काम काज है गयो। ना तासे ना बाजे ना रोसनी ना आतिसवाजी ना झाय झाय ना झिक झिक ना चाय चाय ना चिकचिक । सूत सौ क्त गयो । सोक सी सडी रही । न चै झै झ को कोई काम नाऔ। सानद ब्याह भयो । व्याह के गुन गाते गात सब अपने अपने परन कू चले गए। आलोचना करवे वारे हू मान गए । साच कू पाच कहाँ । चोखे में जब अपनी विटिया • विदा किया तो हिचकी भर भर के रोवे लगी। मैया दादी न्यारी रोवे लगी। बिन्न रोमत देखक अच्छे अच्छेन के हिया भर आए । चोखे । विदा के समय बिटिया के सिर प सनेह को हाथ फरो । दो बोल सोख के कहे । दादी ऊ रंधे कठ सौ कही, घर को नाम कतो बेटी कर क रोटी।' चोखे की आखिन सौ लग रह्यो के वे मौन है विटिया सौ छमा चाह रहे होय, 'बिटिया हम फटे पुराने जो कपडा पहराए सो तुमौ पहर, जो मोटी झोटो खाइवे कूदियो सो खायो पर कबऊ उराहनौ नाय दियो। जो सेवा करी वाको बदला चुकायो नाय जा सक । हमने जब अाधी आधी रात कू पानी मागी तव पानी दियो । बीमारी के सम, रात रात जाग के सवा करी। हमन कस्ट ई कस्ट दिए अब जाते समै छमा करती जा अपनी मया कू धीग्ज वैधाती मा" मुखरित है क चोखे बोलो बटी अपनी सास कू अपनी मया सौ वढ समझियो, अपने पति कू देवता मानियो । वा सम सब रोती छाडि क चदा चल दइ । सबन की जाखन मे आंसू छलकते रह गए । नथिया न चदा कू वडे चाव सौ विधि विधान सौ, सौन विचार के घर के भीतर लवे को गीत गायो-- लोग महाजन या कहैं या कृष्ण का ब्याह न होय कचन करत खरो 77 इनई मौहल्ला के देखते इनई लोगन के दखते लायौ है वहू है विवाह । दरवज्जे प सात कांसी की थारी एक के पीछे एक रखी। विनम पेडा चौर पइमा घरे । चकार थारीन ते छटी छुवाय के प्राग वढतो रह्यो चदा पीछ त सिर प जल भरी पीपर को डार परी गागर फूलक एक-एक थारी उठाती रही फिर साता पारी न लकै भीतर घर म घुसिक देवतान के आगे थारीन ने धर क बठे । वयरन न घेर गढी गाई। घेर गढी भाइ घेर गढी। सामू छोटी बहू बही। जितन सासू पानी जाए। वितनै बहू गिदौरा खाए। सवन न नथिया के भाग सराह । घर म चदा सी बहू आई है । सवन नई क कही पूना ना पापरी, गद्द बहू आ परी। हद नगी न फिटकरी, रग चोखो ही प्रा गयो। बज्रपात चटा चकोर के घर म लच्छमी बनके आई। घर में नौ निधि बरु चारह सिदि है गई । चा पर चकोर चर्चा करत, बाधा तो आई पर मांचा प्रेम, सही मसार, सही काम नाम्य मरु ईसुरी किरपा त मजिल मिलई गई । नथिया हू बटुआ म म्हों को मुघर सलोनी बहू पायफ सय दुर दरदन भूल गइ। चकोर नक्चरार तो बन गयो पर वासो ध्यान सदा पदव को मई गो रहतों । पोरे दिना पाछ बाने बार ए एम वी परीन्छा गई। याऊ म बाए सपनसा मिनी फिर तो यू बो मे का बना दियो । सौभाग्य यो बानी पास्टिंग रोग माहि है गयी। रोग र रिन म पुगन राजान के महल है। जब नामन-मामन हाई डी सी नर व महा किम म बनाए जात । मम म मुरार वाईन उपयागी राजारात गोलको काई पूछ नाच रही पर महन महा होय। बिन महसन माहि पपाया ममिति को नापिम अपर हिम्मा मरी में भी सागर पारोन नौपायाम हो । पहारी श्री 14 मपनी मैया गम पिन गरी पचायत समिति के ऊपर के हिस्सा म रहब लग गयो । चकोर कू सब सुविधा मिल गई वमला की ठौर वगला, जीप की ठौर जीप नौकरन की जगह नौकर । सव आनन्द है गए । चतुर लोग कही करें अव्वल सुख निरोगी काया, दूजे सुख घर मे होय माया, तीजे सुख पतिव्रता नारी, चौये मुख मुत नाज्ञाकारी। नथिया अपनी भाग सराहवे लगी। चकार को पद बढो, बतन बदी और बढ गयौ यम । । पचायत समिति म चकोर क रहन सहन, काय व्योहार क देखिक सय लाग दानन तर अगुरी दवावे लग । भारतीय पोसाक, सादा रहन सहन सबसौ प्यार सौ मिनियो, सब के काम का हाथा हाथ करवी, ईमानदारी सौ रहिवो खूब ई भातो पिच्छ वारे प्रशसा करते । दुस्ट सुभाव वारे ईयां करते । चारो ओर चकोर को छका पुज गयो । सव लाग कहने लगे 'ना तो ऐसी वी डी ओ आयो अरु ना ऐसी आवै ।' हा, जा दिना चकोर बी डी ओ वनक आयो अऊ गांम म हई मच गई। लोगन के मन म भय छा गयो । अऊ बारे भांति भाति की आसका करचे लगे। कछू कहने लगे चकोर गाम ते वदलो लक रहेगी। कछू । कहीं कुचलो भयो स्याप है । कछून है वही मैया के वर ए छर छर लेगौं। भाति माति के लोग भाति भाति की बात-"जसी जाकी पुद्धि है तसी कहे वनाय ।' - क्छ अपनी वरनी पर पछताइवे लग । कछू चकोर के सामई जाइवे ते कतराव लगे । जात तो का म्हों ते जात ? पद प्रतिस्ठा तो पामन ने आगे बढाती पर उनकी करनी उनके पामन मैं पीछ ढकेलती। कछू सामई गए ऊ तो आँख मिलाइवे म सरमावे लगे। क्छू भय शिक्षक अरु सकोच क छाडि के मिलेऊ तो म्ही खोलिवे को साहस नई कर सके । तोऊ चकोर गाम बारेन को काम रोको नइ । सच्चा सौ, ईमानदारी सौ कतव्य परायणता सों बदले की भावना क. भुलायक, ताही छन क्यिो । गाम पारेन ।गाम जाइक मन भरक शिकपेट चकोर की बडाई करी-ई वात सांची है~~बडे बडाई ना कर बडे ना बाले बोल।" बहोरी नै कही, 'भैयाओ चकोर तो पढ़ी लिखी ही नाएं', उदार हिए की है। फिर अपनी है। बावे बाइकी झिझक वात काइको डर । सज्जन लोग नकी कर पर कुए म डार पथ को अनुसरन कर । भल लाग हिंमा क हिंसा सो दूर कर । कीचड क साफ पानी सो साफ कर । चकोर आदमी क नई आदमी की नीयत क बुरी बताव । वावो सिद्धात ता वृच्छन को सौ है. इतते वे पाहन हो उतने व फ्ल देत।' वहोरी । लोगन क मुक्तेरो समझायो पर जिनक मन में चार बठो भयो बू के से निकसतौ जिगकी झोपडी म नाग लगाई, जि. वाकी झोपडी म पत्थर फो वे हर अफ लाजवे मार मरे जा रहे । अपनी करनी प वे अपने नाप गढे जा रहै। पर 'अब पछताए होत का जव चिडिवा चुग गई खेत।" सब कानाफूसी करते ‘यार हमी अपने पामन म आप कुल्हाडी मारी । अब तो जसी करनी बसी भरनी है। वचन करत घरी 79 मन की बात तो मन तक पहुँच । अऊ गाम वारेन की मन की बात चकोर अनुभव कर रह्यो । वान सब गामन के दौरा किए पर अऊ गाम को दौरा नाय कियो। अऊ म हैंड पम्प लगावे, चकोर ने अपनी औवरसियर भेज दियो । स्कूल को भवन वननी हो तो जूनियर इजिनीयर भेज दियो। और कम्प लगे तो दूसरे अफसर भेज दिए । यासौ गाम वारन कू विसवास है गयो क अव अऊ गाम को भलो नाएँ। गाम वारे गांम के विकास के ताई चकोर सौ का म्ही ते कहते ? वे समझ ही नाय पा रहे। एक दिना सिगरे जुरि मिलिक वहोरी के पास गए अरु कही भया अब या गाम की लाज तिहारे हाथ है । जो कछू होनी ही, सो तो है गई पर जब अपनी ई बी डी ओ आ गयो है तो गांम की तरक्की होनी चइए।" बहोरी बोली, "भया मौते का चाहो" परमाल नै कही 'वहोरी तू सव समय रह्यौ है । भाई गाम ते पाप वन गयो है यायो प्रायस्चित कसै होय ?" वहोरी बोली 'भाई सब जुरि मिलिक चलो। काहिली-माकूली है जाइगी । मैं कह रह्यो हू बू अपने मन में मल नाय रखगौ। पाप तो है गयो पर पाप क्तेिकऊ बडो चौं न होय वाको प्रायस्चित तो है सक । पर ई तन ते नई मन ते होनी चइए । किसोर बोलौ भाई बहोरी, चकोर मन म मल नई रखतो तो अक गाम को दौरा करबे जरूर जाती।" वहोरी बोलौ भाई । कस आतौ ? बाके मन म ऊ तो सकोच है, पर तुमम ते कोऊ बाए बुलावे गयो का? बाके जातेई वाकी चौपडी प ऊपरा थापचे लग गए । बाके दो बीघा झारऊ दूसरेन नै जोत डारे । काऊ न जायके वात वछू कही का ? काऊ न जायके व मनायो का ? वाके पांम पर तो गाम म का जाधार प पर । गाम म बाकी धरोई का है ? तुम करेजा प हाथ धरके देखो, तुम्हारे सग ऐसी चीतती तो तुम का करते ? खर, जो कछू भई सो भई, पर अब सब जुर मिलिक चल । अपने गाम की तरक्की के काजे कहैं तो बू पीछ नई रहेगी। भाई बहोरी कछू होय । वाके कामन ने ही हमारे मन को मल धो दियो है। हम वाके पास जायक रहिंगे। बाके पाम परिरंगे हाथ जोरिंगे ठोडी म हाय डारिंगे कहिंगे, के तू तो हमारी अग है या भाति वाए कसमें एक बेर यहां लाइक जरूर रहिंगे ।" परमाल ने कही। - वहोरी की वात . मान के मवन चोर 4 पास डोग जाइवे को निहच क्यिो। सिगरी गाम ता डीग जाय नाय सकेओ। योक गल एक एक चुनक रहोरी र मग चल गिए। मरन न चकार पर प मिलिवाई उचिन ममयो । 80 वचन करतपरी अऊ बारे डीग किले माहि घुसक पचायत समिति दे दफ्तर तक तो पहुँच गए पर अब पीछे कूविसकब लगे। अगडडो कोन पंच ? सकुचा सकुची पहली मजिल तक चढ गए। धीरे धीर खिसकते खिसकते दूसरी मजिल प पह च गए लम्ब चौडे क्मरान के दरवज्जेन प चिक परी । ता समै सबक तन-मन की दसा सुदामा की सी है रही जा द्वारिका म पहच के सकुचा रह्यो। बाहर चपरामी बठी। कडक के बोलो । सब रूक गए । सबके सब सुटट । सबके छक्क छूट गए । पाम म्हाई की म्हाई चिपक गए । माना 144 की धारा लगा दई होय । वहोरी न आगे बढक चपरामी सा कही, लाला बी ही ओ साहब ते वह द अऊ गाम बारे मिलिब आए हैं । क्छु जरज करती है।' चपरासी ने जाइक भीतर खवर करी चकोर अपवार पढ़ रह्यो । अऊ बारेन को नाम सुनतेई वान अखबार एक आर फको । नग पामन भगो भगौ वाई तरिया बाहर आयो जस कृष्ण सुदामा सौ मिलिवे धायौ। सबन कू राम राम बरी सबन क पाम छोए । बड़े भादर क सग भीतर जपने कमरा म लिवाय के ल गयो। लोग भीतर घुसब म झियकवे लगे तो चकोर बोली, 'भयानो झिझको मत चकार या सम वी डी ओ नाएं, एक मास हैं । मान्स ते मान्स की कमी झिझक । मैं हू तो आपम ते एक हू । । भीतर जब कछू फस प बठवे लग तो हाथ पकर-पकर के सवन क मोफा सट अरु मूढान प बैठायो । नथिया न देखो तो दोरी दोरी आई बहू कू लिबाय क लाई । बहू त कही, 'बहू ये सब हमारे गाम के हैं सवन को जासीस ले।' चदा ने सबनक पाम छिए । सवन नै आसीस दियो। चकोर ने चदा सौं क्लेऊ लाइवे को कही। चना न उलायते उलायते हलुआ बनायो । अऊ गाम वारेन को धीर धीर सोच दूर भया । वे चकोर के ब्योहार ते गदगद है गए । ऐसी लगौ मानौं बिनपै घडान पानी पर गयो होय । काटो तो खून नई । किसोर राधे परमाल मूला, चकोर के ठाठ वाः कू के दग रह गए । बढिया पलग साफ सुथरे ऊढं या बिछया बढिया कुरसी मेज मजी सजायों कमरा सब गाम वारेन की प्राखिन मे फब रहे। कमरा म चुप्पी थोरी देर कू छा गई। नथिया ने ललक के सिगरे गाम को राजी दुसी पूछी। अपनी सगीन को नाम ल लव विनके सुख दुख की पूछी । अपनेन की बानन में जो सुख होय, जो अपनीपन होय बाको बरनन नाय किया जाए । अनुभव ही करयो जाए । याही तरियां चकोर नऊ गांम के लोग लुगाइन को जानकारी लई । मदिर के पुजारी की बात पूछी। स्कूल के हैडमास्टर साहब की पूछी। इतेक देर मे चन्दा कलेक म हलुआ बनाय क ल आई। हनुआ परोम दियो सिगरे हलुआ खाते अरु बतराते रहे । या समै सबको दमा वमी ही है रही जस कृष्ण के भौन म सुदामा की भई । वचन करत खरो 81 क्सिोर ने माहस बटोर व कही, 'बी डी यो साहब हममी जो भूल है गई बाका छमा मागवे आए हैं।" चकार न तुरत उत्तर दियो पहले भूल मई जाने नांय भई, पर अव अबसि भूल है गई है । मोत बी डी ओ बहक ची मोय लजा रह हो? मै तो तिहारो बच्चा है । मौते वी डी मो इथे वारी दुनिया भौत है । 'चार कहरू प्यार ते पुकारव वारे क तो चइए । मोय तो आप अपनी छाटो सौ छोरा चपारई समझो। रही बात पाछे की वाम तिहारो कोऊ दोस नाएं। सव समै की वात होय । समै जनुकूल होय तो मटूटी हू सोनी है जाए । 'जव समै लोट तो सौनौ हू मटटी है जाए। क्वज-क्वऊ काऊ लहर आव । दुई लहर सवको बुद्धि के फेर दे। लहर निक्स जाए तो फिर बात साधारन है जाए। परमाल वोली 'भया तुम भलई कछु मत कहो पर गाम ते गलती है गई है। गाम त अनीति है गई है। हमारी दोस है। अब तो हिमा करनी होगी। गाम चलनी परगी।' चकोर न हाथ जोरि क कही 'सिगर सरदारी मोपै पाप मत चढायो। तुमम ते काऊ काका है कोऊ ताऊ, कोऊ बडी भया है । छिमा जस सवद विहारे म्हो त साभा नाय दै। तुम मोय परायो मत बनाओ। तिहारी हूँ तिहारोई रहू गौ। मै तो विनम त हू काऊ देस म रहिंगे काऊ वस म रहिंगे तोऊ रावरे यहाइगे।' राधे ने कही भया तू अपनी है याही सौ तौ घर आए हैं । सुख दुख की पूब आए हैं । तोय गांम लिवाव आए है । तरे घर ए तेरे खत ए, तोय सम्हारव आए हैं । या सग सग गाँम की बढोतरी क ताई आए है। तु अपनी है तो गाम की बढोतरी ताई गल निकास। चकार ने उत्तर दियो 'सिरदारौ मेरो घर कायको है घर तो गाम कोई है अरु खेत कू जब मै कौन सौ करवे जाय रह्यौ हू । आप मरो बताय रहे हो। ई तिहारी महानता है । मैंने तिहारी बात मान क इनकू स्वीकार कर लिया है पर अब इन दोनोन कू मै गाम कू राजी राजी सौप रह्यो हू । मरी झोपडी की ठौर प तो वनाओ पुस्तकालय जरु वाचनालय खत को ठोर प वनाओ सकण्डरी स्कूल । गाम की बढोतरी को सुभारम्भ जपने तेई कर रह्यो हू । रही बात सरकार की ओर सौ मदद की सो मैं विसवास दिवाय रहया ह क मै अपनी करनी म कोऊ कार क्सर नग्य छोड़ गो पर हा काऊ दूसरे के हक्क ए नइ छीनगौ। दूसरे के गरेन न नई काटगौ। और सुनौ मै अव तक नऊ नाय जायो द भूल मोत जरूर मई है याकी मै छमा चाहू। यदी म खिलाए चार की ऐसी महानता देख आख फटी की फटी रह गई । सव कहबला धय ह नथिया की कोखक जान एमो लाल जायो। 82 कचन करत परी वहारी बोली, भाई अब तो सबके मन को मैल दूर है गयो । जो मैने वही साची निक्सी। सव नै माथे हिलाए बोले, 'माई साची कही और जो कही बू साची निक्सी। ता पाछ एक पोत फिर सवन नै नथिया रु चकोर सौ छिमा चाही। अपने गाम बुलाइये को नौती दकै अक लौट आए कह्न आए भया का जरूर अइयो हम गाम बारे मह की नाई वाट देखिग तेरी।" . 'भाई ई राज जनता को है अरु जनता जनादन होय तो जनता जनादन की बात से टार सकू पचन की आग्या सिर माये। मैं वल जरूर आऊगी।' या बात सुनिक, बहोरी के सग गाम बारे लौट आए । रस्ता मर चकार व्यबहार की चरचा करते रहे। सब या वात कू मान एक फूल की मार बडो पनी होय । दूसरे दिना चकोर वायदे के अनुमार अऊ गाम जाय पहुँचो । गाम में चोर को खूब सत्कार क्यिो । सामियानो गायो गयो। वदनवार वाधे । झडी लावाई । बाजे बजवाए । स्कूल के छोरी छोरानगे स्वागत गीत गायो। भासन भए । चोर की जी भरक वडाई करी। चकोर में अपने मासन म सवन कू हाथ जोर के की, भयानो जो क्छ माय मिल्यो है, ई सब गाम वारेन को आमोस से फल है । प्रभु की किरपा है। मेहनत काऊ की अकारथ नाय जाय। मेहनत सों सब छू पायो जाय मकं । विना महनत हाथ को गस्मा म्हो म नाय जाए । कछू तकदीर की बात पर तकदीर बू बनाइवे बारी तदबीर होय । गाम वारे चाहे तो तदबीर सो गाम की काया पलट पर सक । गाम मे ते सामाजिक कुरीतीन · दूर परबी नई नई अच्छी बातन कटी- स्कोमन कू स्वीकार परवी भौत जरूरी है। जुर मिलिक नाम रिंग तो गोम उन्नति कर सकेगी। कही है. 'जहा सुमति तह सम्पत्ति नाना ।" आम्या अरु बिसवास के नग मागे बटिंगे तो गाम को विकास अबसि है सकेगी। भंगपो ! महनत ई भगवान है" भाग के भरोसे रहोगे तो समझ लेमो भाग टूट की मिफर हाय । करम को परय भाग नई पाम हैं । करम को मतलब है काम । काम सन्ची देवता है। या हाम कर वा हाय से काम को नरप है चई तो चाय प्रेम रम अरु परम ते गिरे तो चपना नूर । काऊ नई ऊपही है-करनी पर तो च्या हर च्यों करके के पष्ठताय, बाए पर यमुर र नाम वहात याय।' . चकोर ने अपने भागन रे भगीर महाप बारिक एक निरंत बोर नियो- 'भयापो! मैं अपनी पोपोरी ठोर कू वाचनालय अरु पुस्तामर र गाय का करन परत परी 83 सपल्प कर चुकी हू । दो बीघा जमीन कू सय डी स्कूल बनाइये व ताइ रह रही है । याए गॉम सम्हार अरु इनक निर्मान को प्रवध कर । मौते तो जो है सकगो सा मैं सहायता कर गो। अब काट अरु पूलन को मारग आपके सामई मुली परी है चलना हमारे अरु तिहार हाय है । एक बात और सुनी-सतरज के सल म दोनों ओर के विलारीन कू बगवर के मोहरा मिल पर अपनी चाल ते एक हार अरु एक जीते। करनी ते ही जय अरु पिजय होय।' चकार की साँची सारभरी वातन मुनि गाम वारेन न भूरि भूरि प्रससा करी । पूव तारी बजाई । सूव जकारे लगाए । चकोर नै जितेक मना करी वितेकई और दून दून है के जोस दिखायौ। गाजे बाजे के सग सिगरे गाम मे है | जस निकसवायो। चकोर न गाम वारेन की राजी म जपनी राजी दरसाई । हा वान बन चे पाम छोए वराबररन कू गरे त लगायो । अपने छोटन कू प्यार उ डेल + विनके माथे प हाय फेरी। ना काऊ जाति-पाति को अन्तर दिखायी ना काऊ गरीब अमीर को भेद बरती। सबसौ समान भाव सो मिल्यो। ठोर ठौर प लाग वाके भाग की सराहना कर रहे । एक गरीवनी को छारा जाको कोऊ धनी धोरी नाओ अपनो महनत ते पुज गयो । अपनी करनी ते वी डी मो बन गयो । वाक छोरान के प्रेरना मिली जब फूल छेदे जाएं तवई गर को हार बने । प्रच्छ पइसा बारे जो अपने छोरान ए पानी की नाई धन बहा रहे वे अपने करमन नै ठोक रहे । अधिकतर गाम क, चकोर के बी डी ओ है जावे ते गव को मनुभव कर रहे । वे दूसरे गाम बारेन ते कहबे कू तो है गए के हमारे गाम ौ छोरा की ओ ओ है । व याऊ सोच ए मोच रहे क बू कछू न कछू तो भलो करगोई । गाम बारे अपनी- अपनी तरियाँ सोचत्त रहे । चकोर सब सौ प्यार सौ मिलिक सबनते विदा लक डोग क लोट परयो । सवन के होठन पओ, जननी जन तो भक्त जन क दाता क सूर चकार ने सबन के मन प अपनी करनी को छाप छोडी । पत्थर की लकीर खच दइ । सवन के मन के मेल साफ कर दियो। सब सो मिल के चकार चल दियो । जीप डीग सडक प चली जा रही। चकोर अपनी जमभूमि मे आय के अपने भयान त मिलक भौत प्रसन हो । बिछुड़े मिल गए सवन को सकोच दूर है गयो, आपसी मन मुटाव छट गयो। नीम निमाने धरम ठिकाने आ गयो । डीग मे जीप जैस हो घुमी, दूसरी ओर ते आते भए ट्रक सौ जीर की टक्कर है गई। टक्कर भयकर भई । डाईवर अरु चकोर दोना गम्भीर रूप ते पायल है गए । दुघटना की चरचा हवा म तर गई। चारा ओर हाहाकार मच गयो। पूरी डोग अस्पताल म उमड आइ । चकोर के घर किले मे खबर भेजी तौ मालूम परी क चन्दा छोरा भयो है । नथिया खवर दई ता समै नथिया की गोद में नातो पा चुकी।बू नानी कूदपि क सिहा रही। जस ई ऐक्सीडट की सुनी भागी छुटी लीजी . 84 कचन करत घरी दीगो करक जस-तसे रोमती फिफामती अस्पताल प्राई । चकोर अचेत लहू मे लथपथ है रह्यो । नथिया प नई देखो गयो पछार खाय के गिर परी। ग्राप हू अचेत है गई। डाक्टरन ने देखी चकोर चलो सा चली बुढिया हूजा रही है । डाक्टर न दोनोन कू सम्हारो । चकोर कू आक्सीजन दई जा रही बुढिया क इन्ज क्सन दिए । ड्राईवर अरु चकोर कू भरतपुर ले जावे की सोची जा रही। डाक्टरन ने बताई हालत गम्भीर है । मारग मई कछू गडबड है गई तो बात बिगड जाइगी। डाक्टरन नै दौड धूप खूब कगे। चोटी को पसीना ऐडी तक आ गयो । अच्छी ते अच्छी दवाई दई गई । मान्स टूट पर। काऊ तरिया डाईबर अरु चकोर बचाए जाए । डाक्टरन की मेहनत सफल होती दिखाई परी जब ड्राईवर होस म आ गयो पर चकोर ने तो चेतइ नई कियो। धीरे धीर बाकी नारी कमजोर परती गइ । लम्बी लम्बी सास चलवे लगीं। डाक्टरन कू जच गई अव पछि उडिवे यारो है । बिनकी हालत खराब हैवे लगी। विनकी पाखन म आमू आ गए । चकोर ने तो सिगरे अफसरन को मन जीत राखो। चकोर तो डाक्टरन के गरे को हार हो । डाक्टरन को प्यारी, जिनके हाथन म ते देखत- देखते खिसको जा रह्यो । डाक्टर देखते रह गए अरु चकोर के प्राण पखेरू उड गए । सब यही कहके रह गए 'टूटी कू बूटी नहीं, नही काल कू दैद । योगे देर पीछ नथिया होस मे आइ तो फरफरामती भई चकोर कू देखिने के लपकी । वाए कौन बतातौ क अब वाको छोरा कहा है ? बाने आप फार के देखी, भीड उमड रही है बाकी आँखन म आसू है। वारे कानन म चकोर के नाय रहब की भनक सी परी। नथिया धाड मारेकै रोवे लगी मेरे बटा ए माय दिखाय तो देखो! मरे लात के मोय दरसन तो करा देप्रो । मेरे छोना क मोते मिलाती देओ।" पर लाल होती तो बाए मिलाते लाल की तो लास परी पोस्टमाटम हैव के ताई । नथिया रोती रोती उठी चकोर की और झपटी । लुगाईन नै वू सम्हारी पर बू तो तडफडा रही लाल ते मिलिब के । पानी त बाहर निकासी भइ मछरिया की नाई वैचेन हो । जब बू घिसट के चलवे लगी तो यया झोरी लकै बाकू चकोर की लास के सामई डार दियो अरु कही, दख चाकी दवाई है रही है। नथिया कूतसल्ली सी भई वाली 'डाक्टर भयामो याए बचाओ। वो कछु सच होयगो वाप मैं दउगी। मैं महनत करोगी, मजुरी करोगी पर एर एक पइसा चुकाऊगी। काऊ तरियाँ मेरे बेटा बचाऔ। मेरे लाल कू बचाओ !!' बुढ़िया त बात ए कब तक छुपाते । छुपाते भए हू यात मालुम पर गई । फिर काई नथिया अपन वटा की सास त लिपट गई। या म्हों प म्हो घर पुकारने लगी हाय मरे लाल ! हाय मेरे छोना ! माय काट रहा चल दियो ? पारी देर म वू अचत है गई। हाट फल सो है गयो नानी प्राव ठहर गई। अपनी गोरी म चिलाए नालक कचन करत परी 85 अपनी गोटी म लक सो गई। विपत्ति पै और विपति। मैया वेटा एक सग चल दिए रह गई चदा एक दिना के मास के लोथरा कू लक । चदा ते चकोर के ऐक्सीडेट हैवे की बात छुपाई जा रही। वू जरूर सोच रही डीग ते अऊ तीन मील है। फिर जीप त आइवे म पाच मिनट लग क दस मिनट । का सात हुई ? छोरा हैवे की बात पहुंच गई होगी ? अव त कस नई आए ? चदा कू अव अपनी सास हू दिखाई नाय पर रही। पडोस की बयरवानीन ने चन्दा कू सम्हार राखौ । चकोर आताई होगी । नपिया के बाहर जाइवे को वहानौ बनाय के चदा कू तमल्ली देती रही। चदा मन मे पछतायो कर रही ये इतेक निरदयी कसे है गए अपने छोरा क जनम की बात सुनिकऊ नई जा सके । जापे के समै ना जाने का का चोजन की जरूरत पर या बात कौऊ ध्यान नइ दियो । चन्दा अपने मन में परेखौ करती रही। क्व तक वू जेई सोचती रहती भौत देर तर जब सास नई दिखाइ परी तौ वू वयरवानी प यल्ला परी-'मरी सास कू वुलामी। विनते मिलाऔ।' जब कोऊ तसल्ली की सी बात हाथ नई लगी तो चदा समझ गई दार मे कछू वारी है। अब चदा की आखिन म ते आसू ढरकवे लगे । चन्दा बडबडाती रही । बाए सम्हारवे वारी सव महन करती रही। समझाती रही 'अरी कच्ची आख हैं राबे मत जाति चली जाइगी या मास के लायरा कू सम्हार । सब ठीक हैं । जितकू चकोर को पोस्टमारटम भयो । नथियारी अरथी मजी । सग म चकोर की काठी बनी। मैया बेटान की सग सग अरथी निकमी। डीग म का सिगरे जिले म हाहाकार मच गयो। रात कू जस ही चदा के मैया बापन न ई समाचार सुनो वे दौरे दौरे डीग पहुँचे । चकोर अरु नथिया के चल बसवे की बात सुनी तो पर कटे गिद्ध की भाति गिर परे । अपने सामई अपने ज्वान जमाई की मौत अपनी ज्वान विटिया के मांग को सिंदूर पुछतो देख वे फूट पूट के रोवे लगे। वितकू विटिया जच्चा अरु बच्चा क्लि क भीतर पचायत समिति के भीतर परे । वे दाना चदा के पास पहुँचे। च दा न बिनकू उदास देखो तो अपनी सास ग्रह चकोर की बात पूछो । मैया नाप का उत्तर दते । काऊ तरिया रात भर तसल्ली दक बहाने बनाय क रात निकासी पर भोर होत ही चदा न अपनी माम अरु चकोर की रट लगा दइ । अखोर म धीरे-धीर वात खोलनी ही परी। चदा कू बिसवास ई नाय भयो पर जब असलियत मामने पाई तो चदा क धीरज को बाध टूट गयो । जच्चा जच्चापन भूलिक धाड मारक रोने लगी। घर म कुहराम मच गयो । न जान जच्चा कू इतेक वल वहा सौ मा गयो बू विलाप करती पछाडसाबे लगी। विलाप करती रही । मैया वापन नै जित समझाई वितेवई रावे लगी। वाम विलाप कू सुनिके अच्छे अच्छे रावे लग गए। कछू कहवे सगे चाकू 36 रचन वरत परो खग्रास ह गयो है । चन्दा ए समझाबे लगे तू अपने छोरा को तो ध्यान कर, चकोर की घरोहर कू सम्हार क रख पर बाप इन वोलन को कोऊ असर नई परौ। बू तो उकरायवे लगी, "अरे । मोय कौन के सहारे छोड़ गए। अरे ॥ मोय अपने सगई ल जाते । अरे !!" मौते कछू कह तो जाते।" चदा चकोर को ना जाने कितेक बातन की याद करती भई तब तक रोमती रही जर तक चेत नाय है गई , डॉक्टर बुलाय क बातल चढवाई गई तब कहू जान म जान आई। - दूसरे दिना चकोर के यार राजेद्र क् जैमैई खबर मिली तो भगो भगो डोग पहुँची । बाको हाल बेहाल है गयो । फूट फूट के ऐसौ रोयो मानौ बाकी सगी भया मर गयो होय । बाने चन्दा के जासून कू थामने के मार अपने आसू थाम लिए । पासून न पोकै रह गयो। बू चकोर की बातन नै चकार के कामन नै याद करके अकेले मरा लैतौ पर चदा के सामई आंसू रोक क रह्या । अऊ गाव मे तो और ऊ हाहाकार मच गयो। चकोर को जलसा, चकार को भासन, चकोर को जलूस चकोर की जय जयकार साकार हैकै याद आवे लगे । अक वारेन ने अपने माये को क्लक मानक भारी सोक मनायो । रोटी खावै की वा चले काऊ के घर चूल्ही तक नई सिलगो। कछू तो अचेत है गए । कछू "होनी बडी बलवान है' कहके रह गए । चकोर के गुनन को बखान हर एक के होठन प होतो रह्यो। गाम वारेन के सुपने चकनाचूर है गए । चकोर अऊ गॉम कू आदस गाम बनानी चाहे औ । बाकी इच्छाई क सिगरी म साक्छर है जाए । सिगरे गाम मे चेतना आ जाए। पर पर मेरे मन कछु और है कर्ता के कछु और' बारी बात भई । चन्दा की तो दुनियाई लुट गई। प्रासा निरासा म, सम्प नता विपन्नता म प्रकास अ धकार में बदल गयो । चन्दा क सामई ता अधेरो ई अधेरी छा गयो कहो वर उगते सूरज कू सवई नमन कर उगते च दा क ही सव अध्य चढावै । सब जन वसती के ही गीत गाव जरत भए दिवरा प प्रान चढाव । हर एक की नपनन की चवर ब्याहुली पै ही दुरै । हर एक महल अरु मीनारन कू ही ललचा । फलते फूलत पौधान मई सब पानी दै। अग्नि कू ई सब हवन करें। वहवे को मतलव ई ए में बनी बनी व सब साथी है जाए । विाडी हस्ती को दुनिया म काऊ साती नाय होय । मोई बात चदा रे सग भई। चदा बिना चकार के बीच भवर माहि रह गई । यो कही चदा प मावस हा गयी । वाको सरवस लुट गयो । बाए तसल्ली दिवावे बारे आते रहे। कछू ऊपरले मन त अपनोपन निभात रह । कोऊ घरोर क गुनन को बखान परतो चकोर मानस नाही देवता हो कोक चदा ते चकोर की धरोहर कू पालन करने की कहती। काम न वचन करत घरी 87 सवार सों मदद दिवाइव के धीरज बंधायौ । काक ने चदा की नौकरी लगाइवे के ताई वही । चदा नै सवन के सातरे के बोल सुने पर जाने सातर क बोल निभा पाव । ताते धावन जो कछू है जाए सो है जाए। पीछ तो पोछई होय। चदा न सवन की सीख सुनी । सवन की बानन क सिरमाथे चढायो जिन जिनन सहानुभूति दिखाई तिनके ताई आभार प्रकट करयो । चदा के मैया वाप अपनी बिटिया पं जानी दक परे रहे । वे भीतरद भीतर रो लेते, जाते चन्दा दूं मालूम नई परे । वे सोचते च दा के भाग मे का लिखी है। लाड चाव म परी पर ब्याह के समय क्गाती रही व्याह पाछ बाको भाग जगों पर भाग के चमकते ही बजपात है गयो । विनके सामई छोरी विधवा है गई। विधवा को जीवन वा होय ? समाज मे विधवा का तरियां देखी जाए ? वि ने याको खूब अनुभव हो जवानी म विधवापन कितेक दुखदायी होय । याको अनुभव तो दूइ कर सक जाकी विवाइ फटी हाय । अब चदा को नया क्स पार लगगी ? गाडी कम आणे दरकगीया मोच फिकर में बिनकी भूख, प्यास, नीद सव उड गई । अऊ मे चकोर की ठौर और चरचा भई । बाक गुनन कू गात गात अऊ वारे अघाते नाय । चकोर न जपने सद्व्यवहार सौ सरन को मन जीत लियो । जा चकोर कू गाम बारेन सौ बदली लनो चइएऔ वान विनका सत्कार कियो । सम को फर बताय * सबके मन को मैल दूर कियो । गाम के ताइ नई नई योजना बनाई । सब सोचिबे लगे, अब वाकी विधवा के ताई गाम कुँ कछू करनी चइए । गांम बारेन ने तं क्यिो, चदा ' अऊ लायो जाए । वाको मकान सब गरम वार मिलक बनावै । वार खेत कू बाकू सौप । वे अपने प्रस्ताव कू लक चा के पास पहुँचे । चता न सपन की सुनी तो भभक के रोय परी। बान अऊ चलवे की बात तो स्वीकारी पर जो कछु बाको पति कह गयो जाको दान कर गयो वाए कसे अ गज लती वाके कह भए बचनन न कसै मैंट दती। वान हाथ जारि क गाम वारन सौ कहीं जो सहानुभूति दिखाई है बाके ताई मैं सवन को आभारी हूँ पर जो कछू च गाम बारन . दान कर गए अब वाप मेरो अधिकार नाए । समाज को अधिकार है बाए उल्टी लक मै पाप भी भागीरदार नइ बनू गी, बिनकी आत्मा कू कस्ट नाय दी। गांय वारन की मोप छत्र छाया बनी रह । गाम बारे मोय अपनी मान इतक मेरी विनती है। गारे चदा की नीति की वान क मुनिक चुप्प है गए । भारी मन ते वापिस लौट आए। याम चकोर क सिगर त्रियाकम विधिवत करायक चाखे न विटिया क सामई गत रामी, विटिया अब अपने घर लौट चलवे म सार हैं। चन्ग वोली, "अपनो घर तो अब कहू रहो ही नाएं। जा दिना मरे पोर 88 कचन वरत परी हाथ किए वाही दिन ते पीहर अपनी घर नाय रह्यौ। सासरी ही तो मरौ घर बनाय दियो । अब पीहर ए अपनो घर कस कह दऊँ ।' या बात ऐ मुनिक चोख अरु राधा को गरौं भर आयो । पाखन सा जास्न की धार बह निकसी। इतकू चदा को हिचकी बध गई । बा समै तीनो अपनी अपनी आखन सौ गगा जमुना वहाते रह । एक दूसरे सौ लिपट के राते रहे । नवजात सिसु मूक चिंतक की नाई दिखाई परी। बू का समयती दुनिया काए, दुनिया में सुख-दुख काएँ । थारी देर तक वे तीन प्रानो वा जालीसान भवन में सुख व सब साधनन के बाच छटपटाते भए करना भरौ विलाप करते रहे । फूलन को जो बातावरन कछ दिना पहल बनौ व सूलन सौ ज्यादा पीडा दर लगी। धीरे धीरे एक दूसर के आसून नै पौटते भए सान्त भए । एक गहरी चुप्पी छिन भर कू छा गई। नवजात सिसु नै राय के सवन की घ्यान बटायो। थोरी देर पोछ चन्दा नै मौन तोरी पिताजी आपन जो क्छु कि यो मेरे भले + ताई क्यिो अब आप चा दुखी होऔ? मोई कू जपने पायन प ठाडो होनी है मरे मामई कम छेत्र परी है । अब आप अपने घर कँसम्हारो मोय मेरे ऊपर छाडो ।' 'बेटी तोय बीच भंवरन मे छाडि के हम कहाँ जाएं ? हमारी बेटी अरु हमारी बेटा जो कछ है सो तू है । वा घर म हम कस रह पाइगे। हमारी जीवन आधार तू ही तो है । अब हमारे घर म सुख को साज नाएं । पर ईट पत्थरन को घेसुआ तो है । वा धेसुआ प तेरोई तो अधिकार है । वाए हम कौन कूछारि क जाइगे। चोखे अरु राधा चदा कू सब तरियां सौ समझायक हार गए, पर वाक गरे वात नई उतरी। बू खूब समझ रही चकोर वाए जा घर म छोरि गयो है वा घर म बू ज्यादा दिना नाय रह सके । पर बाए ई ऊ पतो क सरकार की ओर त बाए जो महायता मिलेगी वाको एक कुटिया बनाय के अपने बेटा कू पारेगी। सरकार चकोर की एवज म वाकू जो छोटी मोटी नौकरी देगी बामे अपनी गुजागे करगी। या बीच में चकोर को यार राजेन्द्र जपने कतव्य के निवाह म लग गयो । वा। रोइबी-फिफायबी छोडिक अपने करवे वार कामन कू सम्हारो । सवसा पहल बा चोये को मया अ ची क सम्हार के राखी । फूस सी बुढिया घी ना दीखतौ ना भारती। चोसे अरु राधा अपनी विटिया अरु जमाई सौ मिलिव गए हैं या बात कू जरूर जाननी। राजेद्र मची के पास रहयो वाकी रोटी पानी को जुगाड बठायो। जची कू ई वात बताय दइक चन्दा के छोरा भयो । दोनो जन जच्चा अरु बच्चा सम्हार रहे है। अची मनद मन मगन है रही पर बाए ई का पता क बाकी जवान नातिनी विधवा है कचन करत खरी 89 राजेन्द्र अची पो सार सम्हार तो करई रहो, यूनिधास सौ मिलिक, ताते. धायन मई चन्दा नौपरीते लगवाइवे को जतन कर रखो। कवक डोग गाती यज भरतपुर आती। एक साचे मित्र की भूमिका निभा रही। ए जानती जर, सौ कागजन को पेटी नॉय भर जाय सबलों को बात नॉय वन । अधिपारीन ने पदाक प्रमाण परन की वापी पाहो तो वे ल जाय के सामई परी। चोर की मृत्यु को प्रमाण पत्र जब लो हाफ्टरन ते प्रमाणित न होय तब लौ कौन मानने वारी । इन सब कामन क ताई दौड धूप जरूरी ही। राजेन्द्र ने मौन साधर की नाई मव करके दिखायौ। सब कागज जहा के तहा पहुँचाए । राजेद्र चन्दा भाभी रहके पुरार हो। याए भाभी को भावी को चिन्ता हो। बू चन्दा धीरज बंधातो, "भाभी भया चकोर तो अब आवे त रहो। मव तो चकोर यो या धरोहर को रच्छा करनी है । यार ऐमो बनानी है जामों ई, चकोर सो दो तिल मार्ग बढ जाए । सव चकोर के दुख ए भूल जाएँ।" चन्दा भावनान म बलों बहती । वाए तो कठोर धरती ५ उत्तर के जीवन बितानो । दुनियादारी हूँ निभानी। मया-बाप को भरतपुर चलब को हट बाए नकह माय मुहा रही। चाए पतो क कह दू मया वाप ये सग भरतपुर चली गई तो आफिस बारे जो बाकी नौकरी के ताई दौड धूप पर रह हैं वाए छोड दिगे। सब ठडे पर जाइगे। मैया वाप को वा पास ठहरवी क्बलों हे सां। ई विचार चन्दा शोरतो। क्वऊ वाए अपनी बूढी दादी की याद आती। यू विचारी अपने दिनान न कस पोर रही होगी ? दूसरे छिन विचार आती वारे मैया बाप चले गए तो यू अली रह जाइगी । अपने अकेले छोना ए लम्बे चौडे भोन म कैसे रख पाइगी ? भोन की ईट ईट याचे कू दौरगी। बू अकेली धाड मारके मर जाइगी। बाकी बुद्धि काम नाय द रही । क्वहू साचती आप काज महाकाज, आप मरे स्वग दीप । मॅवर म परे भए पत्ता की भांति बाकी हालत है रही। अखीर म वू एक तोर प जाई अपने पिताजी अरु मया म त एक कू भरतपुर भेज है। एक वाके सग रहे, जो बाए सम्हार एर बाकी दादी कू सम्हार । मैया बाप म कौन बाके पास रहेगी ? याहू को त करनी हती। सोच विचार के या निरनय प आई क पिताजी दादी देखे अरु मैया बाक छोरा पार। या बात कू मानकै चोखे भरतपुर के चल दियो। राधा चदा के पास रह गई। चोखे नै भरतपुर पहुँच के मया सौ राधा क नाय जाइये की कही । अची असमजस में आ गई। सोचिये लगी जब नथिगा चदा के छोरा ए सम्हारवे कू है तो राधा की रह गई ? चोम्वेज ची कू कसे समझातो। बू भेद ए कब तक छुपाती। अखीर म कच्चा चिटठा खोलनोई परो । अ ची ने सुनी तो मन रह गई । रोई फिफाइ । रोटी पानी छाड दिए। चोखे न जितेक वाकू समझायो वितेकई बू कचन परत खरी 90 भभक भभक के रोई । कई दिना तक बारे मासू नाय थमे । वू विचारी का करती राज रो लती अरु रोज राक रह जाती । जाकी फुलवारी वाई के देखते-देखत उजर गई वाप रोवे के मिवाय और कामो? राजेन्द्र दिन को भोजन अस रात की नीद छोडक चदा की नौकरी के ताई जी जान सौं जुटी भयो । बान भग्नपुर त कागज निकसवाय के जयपुर भिजवाए । कागज पचा तो दिए पर विनको उत्तर नई आयो । वाकी समय मे देर से आई के जब तक पागज के पीछ नई लगो जाइगो तब तक आनई खिसक स } कागज के पाम लगाए जाएं। कागज के पख लगाए जाएं । वागजन के पांम अरु पय लगाइव के तौर तरीकान सौं राजेन्द्र खूब परिचित हो। कागज के नीच हरे हरे भए भारत मरकार के कागज लगाए जाएँ । काऊ बडे आदमी को दवाब चिट्ठी त डरवायो जाए, क बा लाइक मिफारिस करवा जाए । कवऊ पता को जोर हूं काम आ जाए। जमानौ सक्ति को रही है। हमेसा सक्ति पुजी है। काऊ तरिया की सक्ति होय । विना सक्ति में काम नाय होय । सक्ति अय की होय, बुद्धि की होय चाहै देह की होय । सदा सो लाठी वारी भंग ए ले जाती रही है। राजेद्र ने अपनी बुद्धि को प्रयोग करो। अफमरन को चिरौरी करी, मनुहार करी । जहा आँख दिखाय की जरूरत परी आँख दिखाई । वाको पाली मौति भांति के लोगन सौ पर्यो । ऐस लोग हू मिले जो विना रुपयान में कागज ए निकास ही नाय मक जिनके चाहे कोऊ पटटा बठी राड ची न हे जाए विल अपने टका सौं ही काम है। ऐसे हूं लोगन सी पानी परी जो भए काम म राडा अटकाव । एम लोगन सौं हू मिनिबो भयो जो भूखे भेडिया की नाई लाल लाल आष दिखाव । एसे हू लाग सामई आए जा हुकम मोर नई फरी फोर नहीं : राजेन्द्र नै सब छू करो पर अपने सिद्धान्तन सौ नई गिरा। नीतिवान मानसन • पग पग प काटे लगे। पैंड पंड प पापड वेलने पर । राजेन्द्र मर महन कियो पर बाजी जीत के लोटो। पदाकू पचायत समिति डीग मे ई मामल ऐजुकेसन आफीसर के आदेस जव राजेन्द्र ने लायक बाके हाथ म दिए तो वाकी आखिन म आँसू झलक आए। वे प्रासू दुख के नए एहसान के है।

उमग को रग सम जात नहीं लागहि वारा की पहावत गबन सग है । शान दूसरी है क पाऊने दिना हसी गुमी म आनन फानन सो क्ट जाएं। पान दिना रामत रोमते क्ट । हा पाल को पइया रूक नाएँ। चन्दा के टिना क्ट तिल तिल रक क्ट । छती पूनि व ताइ सम के सिवाय और कछू उपाय नाएं । सम हो पावन ने भरे । अब तानून एक आलीसान भवन म रह रही पर नए वी डी ओ कपात ही वार वू भग्न पालो परनी परी। रही तोपूबाई भवन म पर पहली मजिल + एक कमरा बार जावास म आनो परो । गनीमत ई रही पाए मपन टाड कहूँ और नई लाटन पर। पाती चदा व जीवन म चशेर क जाए त धेरो छा गयो पर अपन छोरा को बगए सहारो हो । बू ही बाक जीवन म उजियार की किरन ही । अधेरी रात छाटिय बारी वू ही तो हो। या। सौ गको नाम रख लियो निवाकर। च क आग दिवाकर का पालन पोमन को जिम्मेवारी हो । राधा वाक सग रहक वाए पारिबी सिखा रही। चा जब सौ नौकरी मिली तबई मौ दिवाकर की देखभाल राधा प ही रहती । बाक मलमूतन न साफ करती बाए न्हयाती धुवाती लत्तान नै वलती वाकू दूध पिवाती । गए खिलौनान सौ खिलाती। पर मया तो मैया ही होय । साझ चदा नोकरी सा बाहो तरिया लोटती जस अलव्याई गाय जगल के हरे भरे चारे कोडक अपन बछरा के ताई चली आत्र वाते लिपटव चिपटबे चूमव चाटवे । दिवाकर हू दारि क वाको गोटी के ताई तुरानो चदा आत ही दिवाकर पै नेह की बौछार करती। नह को हाथ फेरती। सौ सौ वर चूमती। हंसती हँसाती। दिवाकर के ताई चदा हो मां ही चदा ही बाप चाक दोनो ही रूप धारन रन पर रहे। पदा दिवाकर ही आमा को केन्द्र हो। उड़ने पछी को अडा हो। चटाने इ ऊ बात पढ़ राखी क मां ही बालक की पहली गुर होय। गार्गी अरु मंत्रेयी के जीवन कू व दा न पढी। बान ई 5 पढी व शिवाजी • शिवाजी बनाव बारी वाको मा जीजीवाई ही। याही सो वा न हू अपन बटा कू बनाइवे क ताई कमर 92 रुचन करत खरो कसी । बू याहू वात जानती के आरम्भ की विगरी भई बात बन नाय सके। यासा वाल भगवान की सेवा माहिं लगी रहती। विचारी प हतक कामो ? दिवाकर ई तो वाकी निधि हो । च दा साहस बटार क दिवार के विकास म लग गई। यो तो चन्दा प कारे वादर आए । बाके जीवन कू ढक लियो पर वार साहस + सांमई नई ठहर सके । वाक सरूप मिटा नई सक । धीरे धीरे वादर छट गए फिर अमृत की बरसा भई। फिर बगिया म बहार आई। चन्दा न सुअन जल सीच सीच प्रेम बेल बोई । अपन वेटा पालन पोसन म लाड लडायो पर मोह नई दरसायो। थोरे दिना पार्छ आनन्द फ्ल जाये पो औसर आगयो। राधा न हू दिवाकर क पालन पोसन म पूरी पूरी हाथ बंटायो। राधा क्वहू भरतपुर चली जाती फिर चन्ना जरु दिवाकर कू सम्हार जाती। याही तरियां सौ ममय बीतती रही। दिवाकर तन ते मन त आचरन त मां के कहे अनुसार सुसांच में ढरतो रह्यो। चन्दा अपन पति के मारग प नौकरी कर रही । जस घरेलू जीवन म रुचि लनी वाई तरियां नौकरी कू लगन के मग निवाह कर रही। जीवन र झकझोरन नै वा सहयोग सहानुभूति प्रेम को पूरी-पूरी पाठ पढा दियो। चन्दा गाम गाम जाती घर घर वयरन सौ बरे नह मों वतराती। विनके दुख दरदन सुनती। दुखियान में ताई सहानुभूति के दा वाल बोलती। पूजाक पाम वठती वाही की है जाती। गाम की चैयरवानी तो बडी मोरी मारी होय । मन ते कोरे कागद हाय । विन जसी पटटी पढानो चा नैसी ही पट्टी पढ ल । तवई तो वे बहकाए में आ जाएं। आए दिना सुन अमुक वाबाजी जमुक ठौर प नैयरन न ठग क ल गयो । या बात कू' मान क वे नाभी हाय । लालची हाय । तबइ तो अपन गहनन न दुगनी करायबे के ताई उतार के वावाजी के दै आने और फिर हाथ मलती रह जाने। चैयरवानीन में भक्ति होय याही को लाभ क्पटी सडे मुमटडे उठा जाएँ । चदा न नारी समाज कू भ्रम, अनानता रूढिवादिता लोभ लालच ते छुटकारी दिवान क ताई गाम गाम म अलख जगायो । गाम गाम में महिला मडन बना दिए | पाक प्रभाव सो नारी जगत के नई विचारधारा मिली। नई ज्योति जगी। है चन्दा नै सच्च समाज सवक्न के सहयोग सौ घर घर म पढ़ाई को मन को। वान मैया भनन . समझायो क व पढ गइ तो घर को घर सुधर जाइगो गाम नगर सुधर जाइग अपने आप देस सुघर जाइगो । वान बतायो के मां ऐसौ साँचौ है जासौ नए खिलौना बन, जिनसी समाज अरु दस वन विगर । याही सौ च दा न गाम-गाम म प्रौढ मिछा को पटाइ प्रारम्भ करवाई। जा छोट छोटे छोरा दिन माहि पढब नई आ सक है, बिन के ताई साय के पढव को प्रवध कियो। -- कचन करत खरो 93 .

महिला मडलन की गाम गाम म धूम मच गई। गाम गाम म महिलान की मडली म वाल विवाह मौसर, दहेज जैसी कुरीतीन प चरचा होती। सादा ब्याह अरु सामूहिक वाहन + ताई वातावरण तयार थियो। चदा सबन के सोमई कहती भगवान ने बेटा • उमर दई तो सादगी सौं व्याह करक दियाउ गी। छोट परिवार व ताई उदाहरण द दक समनाती। राम लखन, भरत सत्रुध्न नो भए ही पर आज के जमाने गतिलक गाखल, जवाहरलाल नहरू पौळ उदाहरन दक अपनी कयनी प मोहर लगाती। दानव ज्यादा दव कम हाय । एक ही सूरजत रोसनी हाय । एक ही चदा धेरो दूर करै । बनगिन तारेन ते अधियारी नाय मिट । सख्या त राम नाय वर गुनन त वाम चल । बढती भइ भीड त का का दुस्परिनाम भुगतन पर रह हैं पाहू ए समयाती । चदा की वानी म कछू ऐसौ रस अरु प्रभाव हो । वाकी वातन कू गाम गाम में बडे चाव सौं सुनो जाती। वा इमारे पं लोगलुगाई मरव मारव कू तयार है जात । न जान बू का जादू सौ करती । कथनी और करनी चे तालमेल सो वाके कामन न देखिक सब कहते चन्दा देवी है दुर्गा है, अनपूर्णा है। बान न जाने कितेक गामन की काया पलट कर दई। बाहर सो पर आते ही चन्दा अपने बेटा इँ सम्हारती। वाकी पढाई लिखाई की ओर ध्यान दती। दिवाकर कचदा घर हू पढाती और विद्यालय माहि नेजती । दिवाकर बुद्धि मे जपने बाप . गगे। अपनी क्लास में सबसौं आग रहती । गुरूजी सौ ऐसे-ऐसे प्रस्न पूछतो के गुरूजी हू चार म आ जाते । बार उज्जवल जीवन की कामना करते और कहते, 'होनहार विरवान के होन चीकने पात । विद्यालय में जब काक दिवस मनाया जाती दिवाकर जरूर भाग लेती। कविता पाठ म भावन के अनुरूप हार भाव दिखाती । लगतो, कोऊ कवि ही बाल रह्यो होय । भासन देव ग बान मच्छे- अच्छेन के कान काट रामे। बाद विवाद म अपने विचारन को मडन अरु तकन सौ दूसर के विचारत को ऐसी खडन करतो क दूसरे को म्ही बद है जाती। लोग बाकी वाह-वाह करते । वाए बुद्धि को पूनरा बताते । बड़े बूढे कहते है है तो बाई बाप को बटा।' याही कारन सौ दिवाकर सिगरे गुरूजीन को प्यार पाती, बू अपने बराबर वारेन सोनार पाती। सिगरे छोरा बाए भयाजी बहक पुकार है। जव जब वासिक उत्सव मनायो जातो म्हा चदा हू जाती। अपने दिवाकर के मच प इनाम पातौ देखती तो बाको मन फूलो ना समाती । अपने जोखन म आंसू भर लाती । मन म साचती कहूँ व होते तो अपने बेटा । दखि के निहाल है जात । अपनी देखरय में पढ़ाते तो कछू ते कळू बना देते । कब-कब काली छाया हू सामने आ जाती जासौ बाको रोम रोम कांप उठती। समय निकसतो गयो । जीवन के ऊजरे भविस्य की चाह बाके जीवन रथ कू घर पर चलाती रहो। दिवाकर विना बाप को हा पर अपनी मेहनत अरु सवा सौं बाप पारेन सौ पदक निकसी। जमै बू पढवे लिखिबे म मागं ही खेल कूदवे मे हू सिरमौर 94 कचन करत घरी हो। फुटबाल टीम म कैप्टेन बनक राजस्थान को प्रतिनिधित्व क्यिो । सरकार की ओर सौं बाए खिलाडी को वजीफा मिलिय लगी। दूसरी ओर अनेक उद्योगपतीन ने वाक भासिक वजीफाऊ वाध दियो । दिवाकर को नाम अखवारन म छपव लग गयो याए देखिकै चदा सिहाती रहती अरु अपने भाग्य कसराहती रहती । बातहू सांची ही. दिवाकर तन ते पुस्ट, मन ते सबल अरु चरिन सौ दृढ हो । जसे पेड के तो अपने विकास ते ई मतलब होय बाए या बात की चिन्ता नाय हाय क कौन फल खायगो ? कौन बाकी छाया माहि बैठेगो ? कितेक मान्स अरु ढोर उगर लाभ उठाइगे ? वाते बाए कछू मतलब नाय होय । याही तरियां चदा दिवाकर के वढोतरी की ओर ले जा रही। दिवाकर ने अपने बाप की नाई हाई स्कूल की परिच्छा प्रथम पक्ति में सबसौ उपर पास करी। यो सौ वधाई को तार आयो । फोटोग्राफर बाकी इटरव्यू लवे के ताई आ जमे । दिवाकर ने अखबार बारेने के सवालन को जवाव जा तरियाँ दियो बाए सुनिक सव दांतन तरे ऊंगरिया दवा गए । चन्दा के दरवज्जे प वधाई दवे बारेन की भीड लग गई । चन्दा न सवन को म्हो मीठो करायो । आस-पास सवन फूमिठाई बाटी । अब दिवाकर . इजीनियरिंग के ताई डीग सो बाहर जानौ । वाने केऊ ठोर फारम भरे । सौभाग्य सौ जहा जहा फारम भरे म्हा म्हा ते बाबुलाबी आ गयो। चदा नै सिच्छा के अच्छ स्तर . देखते भए पिलानी ही चुनौ। चदा जापई एडमोसन दिवावे के ताई गई। बान म्हा सिगरे नियमन की जानकारी लई । वातावरण देखो। म्हाँ ते सन्तुस्ट है के आई। चदा बिन मैयान म सो नाही जो मोह के बसीभूत हैक अपने छोरी-छोरान न मरी बदरिया के बच्चा की नाइ छाती सौ लगाए डाले। बिनकी बढोतरी के मारग म रोड़ा बन जाएँ । विदेसन को बुलावी आव तो या मारै नाय भेज क का पती सागर म ते लौटिकै आवगो व नाएं । कछू या मारे नाय भजे क कहू म्हॉई नई बस जाए। कहू म्हाई व्याह नई करले। क्यू सागर पार भेजिवी पाप समझे । तो समझदार ही । बू ऐसी माता नाही सोन के टुकडा मौ राजी है जाती बू तो सोन आभूसन के रूप में देखनौ चाहैई। चदा न राजी राजी दिवाकर पिलानी म पढबे के ताई भेज दियो । या तरियां सौं एक ओर वापी आसान की नीव प सुख की दीवार उठती गई तो दूसरी ओर दुख को गड्ढा धीर धीर भरव लगी। अब चदा कहब कू ही अकेली रह गई ।' जब बाके आस पास क रहवैया बारे है चुके । बू हर घर की अग बन चुकी। काऊ के घर कोऊ करनी होती च दा सबसौ पहल बुलाई जाती। चन्दा हू अपना मोर सो ऐसौ निर्वाह करतो क सर देखते ही रह जाते । ना काई को सकोच ना सरम । ना कबहू लन दन म पीछ हटती। हर एक की बढोतरी कू देखती तो सिहाती। आग त लागे बढक बधाई देती । जाजसी सहायता की जरूरत होती बसी ही करती। कचन करत खरी 95 चदा - अव च । ममाज सवा मै और ग गइ, अब तक तो दिवाकर को व धन हो। बागी देखभाल क ताई बाए समै दनौ परती पर जा दिना सौं दिवाकर पिलानी गयो वा दिना सौ तो चाकू सेवा करव को प्रोसर धनी मिल गयो। जा समै दिवाकर व ताई जाती सो समाज सेवा म लगती। गाम गाम म जहा छोरी सयानी है रही, गरीबी के मार जिनको व्याह नाय है पा रह्यो परिवार में सांसत वढ रही दनिक जीवन गिर रह्यो तनाव बढ़ रहो, दहेज बिना ब्याह की समस्या म्ही फार खडी, म्हा चन्दा न महिला मडल के सहयोग ते पोर उदार दानी लोगन सौ मिलिक आस ब्याह कराए । पहूँ अवेले म अरु कहूँ समूह मे वदा न मब सौ पल लछमनजी के मदिर के पीछ डोग म 23 जोडान को सामूहिक ब्याह कराय के आदस उपस्थित करी । 21 जोडान के दोनो पच्छ डीग की पडेलवाल धमसाल मठहराए। हर एक सो पांच पांच सौ रुपया लिए। 21 वदी बनवाई गयी। वदिक उग सौ यन भयो । फेरा परे ता पार्छ 21 जोडान • मच प बठारौ। सवा सामूहिक आसीस दियो। सामाजिक अरु राजनैतिक नेतान सौ भासन दिवबाए। जा काऊ न सामूहिक विवाह को मरूप दखी ताही न सराहना करी । ब्याह य तामझाम सौ उकता भएन सामूहिक विवाह खूब भायो । यासों एक ओर छोरीन को दुख दूर भयो तो दूजी ओर माता पितान को भार हल्को भयो। तीजे नई पोढी नई डगर दिखाई । दहजवारेन की गरदन लटक गई। म्हो | कालिख लग गई। याही तरिया बदा न वाल विवाह के रोक्थाम क ताई काम कियो । जिनको सम्बध है गयो विनसौ मिलिक विन्न समयाय क बिन गरे वात उतार के दिन बाल- विबाहन रोको । जिन बाल विवाहन रोको, विन वाल विवाह करव बारेन के सामई छोट छाटे छोरा-छोरीन कूवठाय के विन फोटो खिंचवाय क अखवारन में प्रचार प्रसार करायौ। सग मे बाल विवाह क दोसन कूहू छपवायो । दुनिया की या तरिया सौ चटाने जाख खोल दई । गाम गाम म प्रौसधालय विद्यालय सत्सग भवन वनावायवे के ताई जन सहयोग मो धन उगायवो प्रारम्भ करो। यामे हू चदा मफ्लता हाथ लगी। बान ई सिद्ध कर दियो के चदा दवे के ताई दुनिया तयार रहै । हाँ, ए तो सबक भल को काम होय दूसरे नीयत साफ होय । फिर कोन नट ? बौन पीछ हद ' चन्दा नै चन्दा तो इकटठो कियौ पर हाथ सो नई छुऔ । जो गाम म च दा इकट्ठो कियो वाई गाम के ईमानदार जोगन की ममिति बनाय क धन विनकई सौप दियौ चदा न स्वजन पीडित असहाय वृद्ध सेवा सल्न खालिक तो कमालई कर दियो। जिन परन म बहू अपन मास समुर ' पीडा द या बेटा अपने मया वापन क रोटी पानी टव में आँख तरेर विन घरन के दुखियान कूराहत दिबाई । जनाथ जरु विकलान • जीवन निर्माण मस्था खोली जहा पढ़ो और क्मानौ । अपने पायन प खडे होनो सिखायो। दुनिया कहवे लगी राम राज की अब तक सुनी पर चन्ना के कामन न राम राज लायकै दिखा दियो। चन करत वरी 96 बित. पिलानी मे दिवाकर ने दो साल में ही चारा पार अपनी बुद्धि वो कौसल दिखायौ । फूल की गध वांधी नाय जाय सक बू तो फलई फल । बारी गध प भौरा मडरावे । तितलीन को जमघट हैवे लग । मधुमक्खी छा जाएं । याही तरिया पिलानी मे दिवाकर को यस चारो ओर तैरवे लगी। कॉलेज के छोरी छोरा प्रोफमर दिवाकर के व्यक्तित्व सौं प्रभावित भए बिना नई रह सके । खेल के मैदान मे धाक यारी जमाई । फुटबाल की टीम को प्टिन वनकै मैसूर खेलवे गयो। अपनी टीम कू जिताय के लायो। सालाना जलसा मे विडला भयान न हू दिवाकर की दुलकै सराहना करी । अखबारन मे दिवाकर के कामन को खवर जव चदा सुनती तो मन वासन उछलती। बाके फोटू दखिक चकोर को स्मरन है आतो। दिवाकर के बडप्पन के कामन कू दखिक वाके यारन नै चुनावन के सम वाकू प्रेसीडन्ट के पद प पडो कर दियौ। दिवाकर न मुक्तेरी मना करी, पर बाके साथी नई माने । एक न तो यहा लौं कह दई यासौं व्यक्ति की महिमा नई बढ़गी पद को गौरव बढगौ' यारन की बात मानक दिवाकर कूफारम भरनो परौ। दिवाकर के बढते भए यम कू देखिक कछू कुढवे लगे। कछू जरवे लगे। कछू पजरवे लगे। दिवाकर कू ज्यादातर छोरा चाहै हे पर जिनक मन मे मल हो वे होठन सी वाह वाह कर है। पर मन म आह भरके रह जाते। प्रेसीडेड के पद परिवाकर के सामई ठाडो हैवो काम रखग्रो पर पिछली साल को भरत सामई आ ही गयो। देखते ही देखते बू चौडे म आय दिवाकर की बुराई करवे लगी। वाम छेन बतावे लगो। अनेकन लौना लगाइवे लगी। बाकी गरीबी की हसी उडावे लगी। बाके कपडा लत्तान प फन्ती कसवे गौ। बाके वाप के ना हैबे की कमजोरी बतावे लगी। ज्यों ज्यौ भरत बाकी बुराई करती त्यों-त्यौ दिवाकर के समथक और पक्के हैबे लगे। भरत ने अपने सगी साथीन कू लकै एक दिना दिवाकर कू वाक कमराम समाझयो । दिवाकर सा अपनी नाम वापिस लेवे क ताई लोभ-लालच हू दियो पर दिवाकर पै कछू पर नई परौ। वान इतेक जरूर कही क मोय नाम वापिस लबे म कोऊ उजर नाय पर मेरे समयकन कू आप मना लेओ। मरी तो भार कम है जाइगो। ताही सम न जान कहा सौ दिवाकर क समथरन कू सूसर लग गई। वे दल- बल के सग दिवाकर के कमरा में जाधमके। भरत बिनकू देखक हक्को बक्को गयो क्मरा में गहरी चुप्पी छा गई । दिवाकर ही बोलो भैयाप्रो मेरो बडी भया मेरे सामई एक प्रस्ताव लक प्रायो है क मैं प्रेमीडन्ट के पद को अपना परचा वापिस ल लऊँ । मैं हू कमवादी पद को लोभी नाऊं आप जसो चाहो वैसौ करो।' मंचन करत खरो 97 या बात कू सुनिक सर घुसर पुसर परव लगे। कछू कमरा सौं वाहर निकस गए । भरत सब समझ गयो। वानै देखी सीधी अगरिया घी नई निकसगो। वान आँख वदली। वान दवे दवे सब्दन म सबक जतायौ क वात नई मानी तो परिनाम भुगतन परिंगे । दिवाकर नै भरत सो अनुराध कियो क यू अपने भयान की अनदेखी नाय कर सके। फिरऊ और विचार करने की कही। ता पाई भरत कमरा म नई रूको । भरत अरु बाके साथी चलते-चलते ताहन मार गए, 'लालमो अच्छी तरिया विचार कर लेओ।' अब कमरा मे दिवाकर के समयक ही रह गए बिन साफ-साफ कह दई, नाम वापिस नइ लियो जाइगौ। आज के युग में कोक अपनी देही के बल प काऊ की आवाज कू नई दबा सक।' दिवाकर ने एक पोत फिर सबसौ मरत की बात मानबे को कही, भयानो भरत हू अपनी भया है, पिछली साल सौ बू सवा करती जा रही है । बाकू एक पोन और जौसर दियो जाए । बाए एक चरस को अच्छौ अनुभव है।' सिगरे साथीन ने सुनी पर कह दई "रहटू उतर चाहे बट्टा नाम बापिस नई लियो जाइगौ । कहूँ बिना गुडागिर्दी को ज्यादा घमड है तो सठम साठये ममाचरेत वारी बात होगी। समथकन की बात सुनिक दिवाकर न भरत कू नाम बापिस लब मे अपनी असमथता की सूचना द दई । भरत या समाचार सुनिक आग बबूरा है गयो। बाके मगी साथी ऊटपटाग बकवे लगे। - गए । नाम वापिस लवे की तिथि निक्सते ई दोना पच्छ अपने अपने प्रचार मे जुट भरत बड़े घर को छोरा हो । वाके साथी हू बड़े घर के । पिछली बेर भरत परसा के बल जीती। बाके ब्यौहार सो सब पाती आ गए । भरत फिर बाई इतिहास दुहरानी चाह रही। पिछली बेर तो भरत की चढ़ बनी। नया चेहरा हो। भाति भाति के बान प्रलोभन दिए। कछू भय मे आ गए । कछू कन्नी काट गए । पर एक साल के कामन नै भरत की मिगरी पोल खोल दई । काठ की हाडी एक पोत चढ चुकी। वानै जातिवाद फलाया। हर छेत्र मे दादा टाइप के छारान · धुनी । विनकू' ही बटाबो दियो। गभीरता अरु गरिमा को ध्यान ही नाय राखी । पाए दिना हडताल कर पढ़ाई ठप्प कर दई । सवा के नाम प सवा जगूठा दिखा दियो । हा नव बाए प्रेसीडे टी को चस्का लग गयो । हर जलसा में ऊचे म प वडे बडे लोगन के सग वठिबी हाथ मिलावी फोटू खिचिबायबो चाहे जहा स्लाव दिखायबी बाए भा गए । याको लोभ बाए सतायबे लग गयो । याहो सौ फिर बाके म्हौ में पानी आ रह्यो। ज्या ज्यो चुनावन के दिना निक्ट आ रहे त्या-त्या प्रचार धुप्राधार हैबे लगी। भरत क नाम के पोस्टर दीवारन प पमर गए । सडकन प सफदी से वोट फोर भरत चमकती दिखाई परौ। भरत के नाम के बज छोरी-छोरान की छाती प छा गए। 98 कचन करत घरी भरत की ओर सौं दारू, कम्बर, साइकिलन सौ बोट उइवे की धम मच गई । पइसा पानी की तरिया बहामी गयौ। और ठौर पै खाइवे पीव की छोरी छौरान खुली घूट इतर दिवाकर के पास पइसा कहा हो ? वाकी मया अपने वेतन में ते वचा खुचा कै पूरी पार रही। कवक कवक इत वित ते लने और पर जाते । दिवाकर के हिमायतीन के पास दमखम तो हतो पर धन नायी। फिर प्रचार में कौन पइसा लगाती । लगाती तो कहा लौ लगातौ । याही सो वाके साथी प्रचार के ताई कछू ताम झाम नई जुटा सके । दिवाकर न प्रचार-प्रसार के ताई वनर, पम्पलेट पास्टर अरु सडक जरु दिवारन प लिखवे के ताई मना कर दई। तक ई दियो सब पढे लिखे हैं । सब जन फिर बनावटपन सौ कहा होय ? दिवाकर की बात वाक साथीन न सुनी पर जब भरत को हल्ला गुल्ला अरु जमो भयो अखाडी देखो दिवाकर के समथकन प नई रह्यो गयो । धीरे-धीरे स्पया इक्ठौरे करक गेरु ल आए। हाँडीन म गरू घोर लिया। कछू हाडीन मे मफेदी घोर लई । राता रात सडकन प सफेदी ते अरु दीवारन | गेरू ते वोट पोर दिवाकर लिख दियो। पर मरत की प्रदसनी के आगे दिवाकर को दिखावो नैकऊ नइ टिक सको। साँची बात है कहा राजा भोज अरु कहा गगू तेली? हा दिवाकर को प्रचार डोर टू डोर रह्यो । दिवाकर के साथी बिना कोऊ लाभ लालच के अपनी धम-कम ममा क प्रचार के काजे समर्पित है गए । प्रतिष्ठा को प्रश्न समाकं जुट गए । भरत के साथीन की उमग तो देखते ई बनती। बिन पाम धरती प नाय टिक रहे । वे नौ-नौ हाथ उछर रहे । खूर बढ चढ के बात कर रहे । मौछन प ताव द रहे । अपने घासना पन म खूब चमक दिखाई। भांति-भ ति की घोसना करी । वोटरन . ति भांति सौं फुसलायो। दिवाकर फू भीगी बिल्ली उजड्ड , ना समझ और न जान का-का उट पटाग सम्बोधन दिए ? विन दिवाकर की छवि धूरि मे मिलायवे क ताई कोई कार कसर नई छाडी। चुनाव जीतवे के जितेक हथकडे अपना सक ए सा मव अपनाए । दिवाकर ने न कबऊ बढ़ चढके वात करी न भयान कू कोऊ औधे-सू धे प्रलोभन दिए । मरत वे ताई कोऊ ऐसौ बोल नई कह्यो जो वाकू पुरी लगौ हाय । जव कवऊ मिले भरत · बडी भया कहकै राम राम करी पर भरत ने सूधे म्ही राम- राम हू नई लई । या चुनाव कूदेखि के पिलानी बारेन ने कही क अब को चुनाव राम रावण को युद्ध है । एक ओर राजा है तो दूजी बार वनवासी । या चुनाव म छोरी छोरा तो रूचि ल ई रहे पर गुरूवग : लालायित है क दख रह्यो। गुरू वर्ग को झुकाव दिवाकर की माऊ हतो पर कोऊ कछू कह ना सक हो । मवन न अपनी-अपनी इज्जत को स्याल हो । साचत स्याँप के विल मे कौन हाथ डार । चुनाव सौ दो दिना पहले भरत को अच्छी खासी जुलूस निकमी। धूम धडक्का दौड धूप, ज जकार खूब रहे। कछू समयक ती जुलूस मे हते, कछू मय के मार सग लग रहे । कछू प्रलोभन के मार जय हो जय हो कर रहे । भरत के जुलूम सो भरत को जीत कचन करत खरी 99 ५ मुहर लग गई । दियापर वे रामपपन की तो बधिया वठ गई। EN छूट गए । हालत पतरी पर गई। हापन क ताता उदगए। इन सब बातन को दिवार पाऊ प्रभाव नई परो। वान ज्या चिता नई करी। तनाव नई बढ़ायो। वान ई बात सिद्ध पर दई के अधड म तरु, गुलम अरु लता हिल पहारन का प्रभाव परं । वाने हिम्मत नई हारी। भाग के भरास हूँ नई वठी। ज्या ज्या भरत में द बढ़ते गए दिवाकर की कमान तनती गई। 'परवति' को मय और गहराती रही। दिवापर की सरलता अरू विनय को लाभ उठायदे भरत के साथी उल्टी सीधी सुनायव लग। चेतावनी हू दई गई। इन सो दिवापर न एक पाठ पढ़ लियो क भरत को पार्टी सौ सचेत रहो जाय। दिवाकर के साथीन न हू दिवाकर क अलो नई छाडो। बाके सग छाया को तरिया लगे रहे। चुनाव क दिना चाग्री तयारी है गई । भरत क समर्थकन क कलऊ के ताइ मिठाई अरु नमवीन आ गयो। भाजन के समै माजन आ गयो। दिवाकर के पास का धरयो ? वाकी फौज तो चनान के सहारे जूझ रही। पिलानी म पहली पात ऐसी चहल पहन भई । दोनोन ये खेमे म भागम भाग देखवे लायकई। कई बार दोनो दलन म तनाव की सी स्थिति आ जाती पर दिवाकर की सूप बूझ अरू विनम्रता सो टकराव वच जातो। काऊ तरिया दिन भर की गहमागहमी सांझ चार बजे जाय के यमी। चार सौ पाच बजे के बीच एक घटा को सम और बार डारव वारन क बची। अपनी-अपनी सूचीन मे देखिक ई मालुम करी जाय रही के वोट दब ते कौन कौन रह गए हैं। बिनै परि पकरि क समथक ला रहे। भरत के वाहन दौड धूप कर रहे। भांति भौति के धुआ के गुब्बारे दिखाई पर रहे। एक एक वोटर के पीछ चोटी सो एडी तव को पसीना बहा रह । एक वोटर कूआतो देखते तो दोनो दल टूट परते। एक बार अपनी ओर खीचतो तो दूसरी अपनी ओर । वाके कपड़ा एसे बचे जाते क बाको जानआफ्त में आ रही। बू विचारी आती आ जातो। दोनोन ते हा हू करती चुनाव के कच्छ तक पौंच के हो चन को सांस ले पाती। मतदान केन्द्र प रस्साकसी को सो बातावरन दिखाई पर रहो। या तरियां एक घटा निठ्ठन सौ बीती। पाच बजते ई उफान एक सग बठ गयो ज्वार उतार प आ गयो। गरम दूध प मानों ठडे पानी के छीटा पर गए होय । अब काऊ बोटर सी बात करवो तो दूर बाकी ओर देखबी ह पाप समझ रह । जस काऊ टोटका घरक पीछ मुड के नाय दखै बसे ई काम निक्स जावे व पीछ बोटरन की पार काऊ टू कऊ नाय रहो। कचन करत खरी एक घटा पीछे बाटन की गिनती हैब कूही। एक घटा सबन या बात कू दियो क सब सुस्ता ल । अपनी थकान मिटा ल । भौत तो इत वितक छंट गए पर जो नीच खत ह, बिनको सुस्ताबो कसो ? ब तो म्हाइ छाए रह । चील कोआन की 100 नाई मडराते रहे । वे तो ई चाह रहे क एक घटा पलक झपकत ई निकस जाए पर सियारीयान की उलायती ते बेर नाय पकै । फल तो समै प हो पाव । घडी की सुई ना काऊ की आतुरता देखे ना काऊ की छटपटाहट । समै तो अपनी गति सौ सरक । हा मान्स सुख मे समै कू भागती भयो अरु दुख में ठहरतो भयो अनुभव कर । खर, काऊ तरिया छ बजे। कालेज के विसाल सभागार मे बिजुरी जुर गई । मजन प गिनती करबे वारे जम गए । दोनो पच्छन के प्रतिनिधि चौकसी क ताई आख पसार के डटगए । यो तो सबन फू सिगरी सोटन को परिनाम जानव की चाह ही पर, प्रेसीडेट को चुनाव काट को भयो, सबन की निगाह प्रेसीडट के परिनाम पही । सबन की टकटको मतन की गणना के ताई ऐसे लग रही जस बगुला की मच्छी प हाय । सबकी आख निरनय सुनिवे के ताई, ऐसे लग रही, जैसे करवा चौथ पै उपासी बयरन की आख चन्दा माऊँ होय । निकस गए पहले और सीटन की मतगणना भई । एक एक करक और सीटन के परिनाम जीते भएन के जकारे लगे । जीते भए बाहर है गए बिना फूल माला चढाई गई हारे भए चुपचाप खिसक गए । अब वरी आई प्रेसीडेन्ट के मतन के गिनवे को । दोनान के भाग के डिब्बा खुलबे लगे । बोटन को गिडही वन गई। नाम पुकार- पुकार के बोट बाटो गई । पहले डिमा म भरत ही भरत चमको, दिवाकर को नाम आयो पर कम आयो । भरत के साथी चमक उठे नाचबे लगे। बाहर भागक ऐलान कर पाए। भरत क नाम के जैकारे लगाये लो। दिवाकर के समथकन के मन मर गए । बुझे वुझे से माथी पकर क रह गए । भरत बा कमरा म ई जमो भयो जाम बोट गिनी जा रही। बाके होठ नाचवे लगे। आँख नाचवे लगी। दिवाकर तो पहले ई अपने कमरा म चलो गयो। बाके समथकन मे ते एक न जाय के जव पहले डिब्बा के समाचार सुनाए तो दिवाकर के बहरापना को उतार आयो ना माथे प सरवट परी। मतगणना के कच्छ मे दूसरी डिब्बा खुली पर प्रवकी बेर पांसी ही पलट गयो। जब को वर दिवाकर इ दिवाकर को नाम सुनाई परी। भरत को नाम इक्का दुक्का ही रह गयो। भरत के समयकन के चेहरा उतरने लगे। तोऊ और डिब्बान १ पास लगाए जमे रहे । और डिब्बा खुले तो भरत को कई डिब्बान म ते नामई गायव मिली। बाको करेजा धक धक करब लगी। पायन के नीचे ते धरती खिसक लगी बिनके हाथन के तोता उड गए । भरत म्हों फारे रह गयो । जो मौछन प ताय द रहे बिनके चहरा लटक गए। 80 और 20 की औसत देखिकै भरत की आसा निरासा म पलट- गइ। कछू ती भरत ते बिना मिले ही खिसक गए । दिवाकर के समथकन के चेहरा प भोर की ललाई नांचब लगी। मुरझाए भए पौधान के पानी मिल गयो । तेल चुके दीपक म तेल पर गयो। अगले डिब्बान न तो भरत के पांमइ तार दिए । भरत ने कमरा छाडिवो ठीक समझो। वचन करत खरी 101 - वित' दिवाकर के साथी दिवाकर के कमरा प ते जबरन उठा लाए । परिनाम कच्छ में परिनाम की घोसना भई । दिवाकर भारी बहुमत सौं विजयी घासित भयो । ता सम हू दिवाकर एक्दम सात हो। विजय को उल्लास चेहरा पै जरूर झांक रह्यो, पर कोऊ अभिमान की रेख नाई । बाके यारन न वाकू बधाई दाई। काऊ न हाथ मिलाए, काऊ नै गोदी म भरो, काउ नै हिए सौं लगायो। वन नै वा अपने कधान पं उठा लियो। जो लोग माला लकै आए विन वाक' मालान सौं लाद दियो। क्छू भरत के ताई माला लाए पर जव विन दिवाकर की जीत देख लई तो मन के भाव दबाय के कारले मन सो अपनी दूसरी चेहरा चढाय के दिवाकर के गरे मे ही माला डार दई। फोटोग्राफर न अपनी कला दिखाई। - जसे ई दिवाकर माला पहर के बाहर आयो वाके नाम की जय जयकार है। लगी। काउ नै फूल माला डारी काऊ नै गुलाल लगाइ। थोरी देर मे ही भीड न एक जुनूस को रूप धारन कर लियो । सडक प दिवाकर की जय जयकार के नारे गूजब लगे । "जीत गयो भई जीत गयो भाई दिवाकर जीत गयो।' दिवाकर की जय हो" जसे नारे पिलानी मे गूज उठे। दिवार की आँख भरत ते हाथ मिलावे • ललक रही। पर भरत तो अपने कछू साथीन के मग मन मारे एक कमरा म जा बठो। और माथी बाए वसे ही छोड गए जसै क मरे ढोर कलीला छोड जाए । भरत के कमरा म मातम सौ छा गयो सबन के चेहरा प हवाई उड रही। वडवोला भरत के साथी कहवे लगे, 'अमुक धोखो दै गयो अमुक न पीठ म छुरा भाको है, अमुक न एन टम प लोम डीपन किया है। भरत हू निढाल परी चुपचाप सुनती रहा। कहतो तो का कहती? वाए अपनी तौहीन को ऐसो अनुमान नाओ। तो जीतवे के पाछ मधुर सुपने संजोए वठी। बाके मसूवे मर गए । ख्याली पुलाव धरे के धरे रह गए। सब सुपने ढह गए । विनम ते एकाध दिबाकर कूगारी गुप्ता करवे लगी। एक बोली न जान कहा ते गीच म ही बबर परो । दूसरी वोलो ' सब मालुम पर जाइगी प्रेसीडटी कस करी जाए। तीसरे ने कही 'अजी प्रेसीडट बन गयो है तो काए, हम बाए चन ते नई वठन दिग। चौधे न कही, जजी हमारी बात नाय मानवे को बाए मजा चखानी पाचवे न कही वान हमारी नाक काट दई है हम याको बदलो लक रहिगे।' परगौ । दिवाकर के सेमे म जीत की धूम मच रही। उल्लास को वातावरन छा रह्यो। मवन के चेहरा प गुलाल अरु उल्लाम की लालिमा नाच रही । होठ मुस्करा रह । रमरा म मिठाइ वट रही दिवापर को म्हो मीठो परायी जा रही। दिवाकर न अन्त म सरन कधयवाद दियो बान कही ई मरी जीत नार तिहारी जीत है। तिहारी महनत रगनाइहै।' सबन वे ताई आभार प्रकट वं विदा पियो। चिन परत मरी 102 वाके कमरा म रह गयो वाको लंगाटिया यार राकस । बान दिवाकर कू' या सम अकेली छोडिवो ठीक नई समझो। दिवाकर के मन म तो कोऊ मल नालो ना काऊ आसका ही पर बाके साथी बाते कान में कह गए क सचेत रहनौ है । फूक फूक के पांम रखनी है। ऐसो नई होय क रिसियाए भए चोट फैट कर जाएँ। दिवाकर न सवन की सुनी और अनुसुनी कर दई । - सबन के जायवे के पीछ दिवाकर के मन म विचार उठने लगे। मरत कहूँ काऊ भेडियापन नई कर दे। काऊ ने कही है गुडा वडे परमेसुर ते पर फिर दूसरो विचार प्रातो पढ़े लिखे है बिना कारण वोऊ ऐसी बात नाय कर सक । हाँ कछू कहनावत सुनावत करिगे तो सुन लिंगे। चुप्प लगा जाइगे। एक चुप्प सोन के हरावे । इनई विचारन म डूबतो उतरतो दिबाकर सो गयो। कई दिना को थको भयो । बिना दबोर नीद आ गई । ऐसी नीद आई क सबरे आँख खुली ही नई । भोर ते पहलैई बधाई देव बार जा गए विन्न हा हुल्ला करक दिवाकर कू जगायो। जा बोट डार क चले गए, विना अखवारन सौ सब पता चल गयो । अखबारन के सबते पहले पना दिवाकर का फोटू छपी। बाए देखिक दिवाकर के समथक खिल उठे। विरोधी पजर गए । पिलानी म कई दिना तक दिवाकर क नाम की चरचा रही। कॉलज म दिवाकर की धूम मची रही। भरत अरु बाके समथक कक दिना तक म्हौ छिपाते रहे । मनई मन कुढत रहे । विनकी बदले की भावना धीरे धीर जार पकरती गई । वे जान बूझक लरवे यगरबे के बहाने ढूंढवे लगे। दिवाकर न कोज प्रोसर ही नई दियो । एक दिना राकेस कू सग- लकै भरत के कमरा प पहुँच गयौ। भरत ने दुनिया दिखाइव कू मन म घुसे चोर कू दवाय क स्वागत कियो । बधाई दई । दिवाकर ने आभार मानी अरु सहयोग को प्राकच्छा प्रक्ट करी। उपरले मन ते भरत न सहयोग दब को कही पर मन को मैल दूर नई भयो । खीरा को सो रूप हो बाको, ऊपर ते तो मन मिलो भीतर फाक तीन । चुनावन • भए पद्रह दिना बीत गए । मामलो सव सान्त है गयो। दिवाकर के मन मे त मका धीर धीर निकस गई । एक दिना दिवाकर पिलानी बस स्टण्ड सों रात के नौ बजे के लास पास कालेज होस्टल की ओर लौट रह्यो। मुख्य दरवज्जे के भीतर घुमचे बारी ही हो क दस बारह छोरान न बाप भयकर हमला बोल दियो । दिवाकर सम्हर ऊ नई पायो । ना छू यह पायो ना सुन पायो। हक्का-बक्को देखती रह गयो। ऐसौ लगौ मानौ चक्रव्यूह के द्वार प निहत्थो अभिमन्यु दुस्ट कौरदन के घिराव म आप गयो होय । विनमे ते एक छुरा भौक के भाग गयो। वाक सग और सब सिरप पाम रख क भाग गए। दिवाकर छुरा लगते ई गिर परी। इतनी ई कह पायो भयाऔ अच्छी नई दियो।" बानै साहस करवं सवसौ पहल घाव प धोती कसक वांधी फिर कालेज हास्टल चलवे की ठार अस्पताल चलवे को साची। हिम्मत करक रचन करत घरी 103 लडखडातो बस स्टड की ओर सरको । तागे वार पुकारी। बाते छुरा लगब की बात करके तागे मे चढायबे की कही। तागे वारे न मदद करी अरु फुरती सौं बाए इमरजासो म ल गयो । तागे मे इ दिबाकर अचेत है गयो। - तागोवारी हत तो मुसलमान हो। पर दुख के समैं जाति पाति काऊ नाय देख । बाने दिवाकर कू गोदी मे उठायो और इमरजसी रूम म ल गयो। इमरज सी कच्छ मे डाक्टर अरू नस हस रहे। मस्ती मार रहे। चाय की चुस्की चल रई । लग रह्यो इमरजेंसी कच्छ, इमरज सी कच्छ ना हैक कोऊ रेस्टोरट होय । तागेवारे न गोदी म लेक दिवाकर कू लिटायो । डाक्टर अरू नसन न माथी ठोक लियो । मस्ती म खलल पर गई। बड़े नाज नखरेन ते उठे । तागेवारे न कही, "डाक्टर साहब कालेज को छोरा है' तव डाक्टर सावधान भए । फिर तो फुरती आ गई। दिवाकर टबिल प लिटा दियो जा समै वाको कमरपेटा खोलो दिबाकर अचेत ही हो । डाक्टर न फोन सौ कालेज के प्रिसीपल कू फोन कियो । होस्टल के वाडन कू फोन क्यिो । जासौ कोऊ सार सम्हार करवे वारी पाव । बाजार गो दवाई लाब । कमरवद खोलते इ खून बह निकसौ घाव भौत गहरी। खर इतेक रही १ छोरा, हुरा क घुमा नई पायो । डाक्टर ऊ धवडा गए । जोर डाक्टर बुलाय गए। दखते ई देखत रात में प्रिसीपल होस्टल वाडन, होस्टल के छोरा सव अस्पताल में इक्ठौरे है गए। डाक्टरन नै जाच पडताल करक घोसना करी घाव गम्भीर है, हालत अच्छी नाय । दिवाकर के मया वाप वगि सो ही वुला लिए जाएं। जा काक न सुनी सन्न रह गयो । प्रिसीपल न दिवाकर कू जपुर ल जाव की कही तो डाक्टर बोले अपनी जिम्मेदारी प ल जा सको रस्ता म ही कछु हैगो तो जिम्मेदार नाय । सब गहरी चिन्ता मे डूब गए। प्रिसीपल ने सबसौं पहल लाइटनिंग माल लगाय के डीग मचना दई । चन्दा विचारी मो रही। रात में फोन की सुन क करेजा धक धक करबे लगी। ल दकै भगी भगी गई। कांपते हाथन त टलीफोन कू उठायो । पिलानी को नाम सुनत इ चन्दा कांप गई अरू जसे ई मनी, दिवाकर की तबियत खराब है वेग ते चली आम्रो। तो याए सुनते इ चन्दा हिल गई। कार उठी गहरी कारी छाया के भय न झक्झोर दई । रात में अकेली कसे जाए, पर बाई छिन वाए याद आयो परोमी अपने इ तो हैं। फिर या सम काम नई आइगे तो कब काम माइग। वान रमग म ते कछु कपडा अपनी टोरी म रखे । कछू रुपया पइसा बांधे। आस-पास के लोग लुगाई जिन सुनी व भागे चले माए । चन्दा क मग चलब क हर एक तयार है गयो। सपन न निरजन एम ही आई रु सग दियो। निरजन परिश्रमा निष्ठावान अरु समनदार है । वेंग ई जीप परक भरतपुर पहुच गए। रात कदर पकर क जयपुर परच गए। जपुर त फिर बम पर पिनानी पोचे।निरजन न अनुमान त अस्पतान ही पहचवो उचित समझो। मनपरनगरी 104 पिलानी के अस्पताल के सामई छोरान के ठटठ जुर रहे । दिवाकर के बारे म बातचीत कर रहे। हर एक चिन्तित दिखाई पर रह्यो । चन्दा नै धडकते मन सौ जो कोऊ सामने आयो बाई सौं दिबाकर की पूछी। गम्भीर हालत जानक चन्दा के पाम टूट गए धडकन बढ गई, लम्बी सास चेहरा पं हवाई उड रही, तेज उड गयो। छोरान ने अनुमान लगा लियो दिवाकर की मया आ गई है । बाए देखिव छोरा इकठौरे है गए । निट्ठन ते बाए भीर म ते निकास क दिबाकर के वच्छ तक ल गए । बा सम दिवाकर कू आक्मीजन दिया जा रह्यो। बा समै कोळ कच्छ मे नई जा सक हो। डाक्टरन न पूरी तरिया सो भीतर घुसवे तक की मना कर राखी । चन्दा कू हू रोक दियो । च दा न डाक्टरन के हाथ जोर पाम पकरे पर डाक्टर नइ पसीजे। चन्दा माथों पकर क बठ गई । बाए पसीना आ गयो। भावी प्रासका सौं दिल की धडकन और बढ़ गई। चन्दा समझ गई हालत गम्भीर है । वाते बात छुपाई जा रही है। - दिवाकर के साथीन ने चन्दा • मुकतरी धीरज बधायो पर ज्यो ज्यो धीरज बंधामी त्यो त्यो पदा को मन भारी हैवे लगी। पाखन के प्राग अधियारी छा गई। आंसून की धार बह निवसी। चन्दा की हिचकी बंध गई। डाक्टरन ने देखी क चदा प कोऊ भारी आघात नई पर यासो कही क दिवाकर चेत में आ गयो है अरू खतरे सा बाहर है । या बात कूसुनिक बाकी जान मे जान आई । मुरझाई बेल कू पानी मिल गयो । बान डाक्टरन ते फिर बिनती करी, बू नेकहु नई वोलंगी। होठन नेऊ नई खोलेंगी । आसू हू नई गिरावंगी। नक देर कूनैनन के तारे ए देख तो लन देओ । डाक्टरन ने आधे घटा पीछे मिलने की आग्या दई । आधे घधे चन्दा कू भारी पर गयो । आधे घन्टा पाछ चदा दिवाकर के जोर पहुंची तो देखो सिलाइनवाटर की बोतल चढ रही हैं। दिवाकर चित्त लेटो भयो। दिवाकर नै जसे ही मैया देखी हाथ जोर के राम राम करो फिर पांव छूवे के ताई उठवे लगी पर भाक साथी राकेस नै वाकू रोक दियो। नस नै कडक के लेटे रहबे को कही। चन्दा दिवाकर कू देखि क कछू नई बोली पर बाके नैनन सों आंसून की बूंद परब लगी। दोनो ओर आंसून की बरसात देखिक, देखिबे बारे हू पसीज गए। दिवाकर न मदे सुर मे कही 'अम्मा तू आ गई ? 'हाँ । बेटा मैं मा गई अव चिंता मत कर ।' चन्दा नै दिवाकर के माथे प हाथ फेरते भए धीरज बधायो । दिवाकर 'अम्मा 'अम्मा' कहतो रह्यो अरू चन्दा अपनी आंखन म पात भए बांसून न रोक क, मेरे बेटा मेरे लाल तू ठीक है जायगौ कहती रही। कचन करत खरी 105 ---- दिवार सौ मिलिक चदा बाहर माई तो देखी सालेज के छोरान की भीड और बढ़ गई है। भौत से तो चटा के दरसनन के ताई आए। बिन्न चदा के समाज सविया हैब की बात सुन रायी। वे या मैया क देपिवे पाए जाने ऐसी लाल जायो है । मि'लवे वारेन म वे हूँ छोरा हते जो हमला करने वार है। चदा सौं दिवाकर के साथी वाले अम्मा तू चिन्ता मत कर हमारी भया ठीक है जाइगो।" सहानुभूति क बोल सुनिक चन्दा फफक करो परी “वटाओ दिवाकर मेरे जायो भयो अपलो बेटा है पर म्हो बोले तुमहू तो मेरे बेटा हो। जब इतेक वेटा सग रहरह है, तो मोय चिन्ता नाएँ, पर हां, माय तो वल्लई ऐसी भाय पर गई के वछू अनहोनी है। कू है । मोय तो कल्लई ते रोटी पानी अच्छी नाय लगी। बुरे बुर सुपने दीख रहे। चदा की बात सुनिक छोरा काप गए, बिन्न चदा त कही, अम्मा जो कछ हानी सौ है गयो अलावला सब टर गई पर तु चिता मत कर हम हमला करवे बारेन त बदली लेक रिहगे।' या बात कू सुनि के चन्दा एकदम गम्भीर है गई । सागर को ज्वार एक सग उतरिगो। सवन के समझाते भए कही, बेटाऔ । बदलो कोन ते लेओगे ? कौन 4 बार करोगे ? अपने भयान प । अपने भयान को लहू बहाओगे। कालेज म जितेक छोरा हैं सब मेरे बेटा की नाई है। तुम मेरे वेटान पइ बार सरोगे ? ना ना बटा ऐसी बात मत कही। ई घटना तो नासमझी मे घट गई है। का तुम और नासमझी करोगे ? का कीचड ते कीचड साफ करोगे? बेटाभी तुम सब पढे लिखे हो। जिनसी गलती है गई है वे दुख दकै सुखी हु गे का? ये हू पछता रहे हुगे। मौय मिल जाएँ तो मैं तो बिन गरे सौ लगा सऊँ प्यार करूं प्यार सौ समझाऊँ। या बात क सुनिक दिबाकर के साथीन प क्छू प्रभाव परी क नई, पर हा एक दो हमलावर जिन्न इन बातन कू सुनो व अपने घिनौन काम प मनई मन पछताव लगे। बिन चदा म अपनी मैया के दरसन किए। लियो पोरी देर लो चुप्पी छाइ रही। चदा न इ मौन तोरी, कही, 'का साच विचार मे पर गए ? मैने कछु अनहोनी बात नाय कही। एक मैया के मन की पीरा कही है । नक ठण्डे मन त सोचौ तुमने काऊ तरिया बिन बेटान को पता चलाहू जिनसी ना समझी भई है और तुमम ते काऊ न बिनके हाथ पाम तोर हू दिए तो का हाथ आवेगो पर जाके लाल को कुहाल करोगे बाके मया बाप प का बीतगी ? का ये मेरे नाई नइ रोइ ग का ? का तुम काऊ लाल के मया-बापन नै दुखायोग ? सोचो, समयौं अरू मोय वताओ। 'हिंसा त हिंगा उभरगी क मरंगी? कचन करत खरी 106 या वान . सुनिदै हमलावरन के मन में नाई के बदा पामन के पकरल पर सवन के समाई सकोच, लाज अरू भय के मारे व भीड मे चुपचाप खिसक गए पर विन्न अपने मन में कछू निहच कर लियो । व भागे छूटे भरत के पास गए । बिन्न दिवाकर की मया के बिचार बाके सामई रखे । भारत अचम्भे म मा गयो। विन सवन को मन पमीज गयो पर वित पुलिस को डर हो। पुलिस कू प्रिन्सीपल ने रपट कर दई। पुलिम जी जान ते याज मे लगी भई । बाए सुराग हाथ ना लग रह्यो। हमलावर पुलिस के डण्डा के डरत बात • छिपाने की सोच रहे पर चन्दा क विचारन न विनक' पक्यार दियो । वे बना सों घमा चाहवे कूआतुर है रहे । । सोच समझ के दस जने चदा सों छमा चाहब पहुच इ गए। चदा कू दिवाकर के साथी हरदम धेरे रहते । एक छिन हू ढील नाय दे रह । विन दमन न चला मी एकात मे बातचीत करनी चाही। दिवाकर के माथी समझ गए क जपराधी पलिस सौं डरके सरन म आ गए हैं । व दसह चन्दा सौं अवेल मे बात करने लग अ वितकूक दो याकी खबर दव दिबाकर के पास पहुच गए। चन्दा न सबन सौ प्यार सौ वाई तरिया वात करी जस दिवाकर ते करई। सवसों पहल सबन न अपनी-अपनी परिच दियो। परिन पायक चदा की आँख भरत प टिक गई । बान भरत ते कछु कहे मुने बिना ही वाकू गरे त लगा लियो । भरत नै चदा के पाम पकर लिए और रही मैया तू दिवाकर की ही मया नाए तू तो हम सवन की मया है । तेरे सर विचारन न हमारी हियो बदल दियो है । जो कछू गलती भई है वू हमारी भई है याकी हम सब छमा मागिवे आए हैं । या बात . सुनिष चन्दा गद्गद है गई। जांखन म सनेह के आंसू भरक बोली 'वेटा छमा मागिवे की बात कहक तुमन अपनी महानता को परिच दिया है । बच्चान ते गलती होती रहै । मया तो मया इ होय । ई तो इतिहास में एक स्कई ही ऐसी है गई जासौं मातुपद के माथे प करोंच लग गई, वान इतिहास कू पुठला दियो। आखीर म बू हूँ पछताई । बटानी ! छमा होठन ते ना तो मागी जाए ना होठन मो दई जाए। ई तो मनते मांगी जाए मरू मनत दई जाए। जव तिहारे मन न अपने मन म कछू निहच कर लियौ अरू जब तुम सवन न अपने मन की बात मेरे मन तक पहुचा दई तवई मेरे मनकू अनुभूति है गई । मेरे मन मे वात्सल्य वे भाव उमड परे । बैटाओ ! तुम भोय पराई मत मानो अपनी मया को नाई समझो। गलती है जाये प तुम अपने मया के पल्ले पकर क अधिकार के मग कहो करी के मया मात एसो है गयो, मैंने एमो कर दियो वस ई मैया ब्यौहार करो।' कपन करत गरी 107 छीए इन बातन सौ भरत के साथीन को मन को मैल धुव गयो। वे पानी पानी है गए । विने अपने म्हौ सौ कही, 'मया तो धन्य है।" विनम ते एक तो री परी बोली "मया अव जो कछू है गो सो तो है गौ अब दिवाकर हम भया ते हू वढक है बाते हम और छमा चाहिंगे। चदा नै सबन कू प्यार कियो सबन न चन्दा के पाम । चदा न सबकू छमादान दकै सवको मन ओरते ओर कर दियो। काऊ न कही है, 'छमादान सबसौ बडो दण्ड होय । या को प्रभाव तन ते बढक मन अरू आत्मा पं होय जव चदा अरू भरत के साथी बात कर रहे दिबाकर क साथी भाति भाति सो सोच रह । हो विन विसवास है गयो के भरत जरू वाक साथी दिवाकर सौं छमा मागबे आए हैं । जैस ई भरत अरू भरत के साथी चन्दा कू छोडि के गए सिगरे चदा के पास इकठोरे हैक ललचाई आखन सौं पूछब लग। चदा न सूधे सुभाव सौ सिगरी बात कह दई । बान ई ऊ कह दई क विन का कियो बिनके मन में कियो जव मन ई बदल गयो तो फिर का लवी दबी ? 'तो का मया तन सबन कू छमा कर दियो ?" एक न पूछी। बेटायो ! छमा किए ना जाएं । छमा मागिवे बारे के सामई मा स अपने आप झुक जाय सो हाल मेरो भयो। चदा बोली। दिवाकर के साथी मन मसोस के रह गए । भाव उठे । ज्वार आयो पर उतर गयो। दिवाकर नै सिगरी राम कहानी सुनी । वान हू अपन साथीन सौ कही भया पापन ते घिरना करी, पापी ते नई । स्याप म दोस ना होय जहर मे दोस होय जहर की पोटरी निक्स जानी चइए। दिबाकर के साथी चाह रहे + अपराधी कू पूरी सजा मिलनी चइए । कौआ मारकै टाकनी चइए जासौ सवन क ख है जाए । जिनने हाथन सो पाप कियो है बिनक हाथ काट दिए जाए । जिनकी प्रायन न दुरी बात करी है दिनकी भांख फोर दई जाए। दिवाकर न और समझाए भयाओ गरम पानी म म्होडी नाय दीख ठण्डे पानी म म्होडो दीख । हिसा ते हिंसा भड़क, घातक परिनाम निक्स । फिर बीछू जव अपनो सुभाव नाय छोडे तो साधु बाए बचावे को सुभाव क्सै छाह दे। या बात के सुनिय एव न वही मया स्थापन क किताऊ दूध पिवाया जाए व तो जहरई उगलिंग, यासों ई अच्छी है क विना दूध ना पिवाय क बिनयो यूपरी कुचली जाए। कुचलकै छाडे नई जाए जराय क राघ म मिला दिए जाए नई तो पुरवाई हवा मो अधमर ह जावित हैके पर निकाम । 108 करन करत परी ? दिवाकर न कही "अपने विगत इतिहास कू देखो दयानन्द, ईसा, मोहम्मद, गाधी ने का कही। महावीर के वानन मे खू टा ठोक दिए । बुद्ध की आलोचना प आलोचना भई पर अखीर में जीत विनको भई ? किनको नाम पुजौ ? फिर भोऊ ए तो सोचनी चइए मैंकोनसी मया को वेटा हू ? मेरे पिता कैसे भए ? का सवन नै भूल क नीति पथ कू छोड दऊ ? स्याप की जो बात कही है, हम कोऊ स्याप थोरई हैं हमम बुद्धि है, हम हानि लाभ जान, भलो दुरी पहचान । सुधार घर मान्सन कू ही तो बने है, स्थापन के ताई थोरई है । वीच मे ई एक न वात काट के कही "अरे भया मास तो स्थापन सौं हू बढक है गए है । स्यापन की तो मालुम तोऊ पर जाए पर आस्तीन के स्यापन की पतौ ई नाय चले । न जान कब चौट फट कर जाए । दिवाकर ने फिर समझायो जो आस्तीन के स्याप है बिना नरक म हू ठौर नाए जो जा हाडी म खायें बाई मे छेद कर, वे दीन के रहे न दोजख के । बे समाज की नजरन मे गिर जाए । वे जीब पर विनको जीब मे का जीबी। बेहा जीब बुरे हबाल' वारी बात होय । हां, एक बात जरूर है जो पुरे काम करके हू सुधर जाए, बिन्न दुनिया पूज । सबेरे को भूलो साझा घर आ जाए तो भूलो नाय कहाव । या सौं भरत के साथी न बरू भरत कू गरे हो लगानी चइए । अरे ! काऊ ए तरवार ते चौ मारी फूलन सों मारो। ऐहसान को वोझ भौत भारी होय । और अन्त मे बिनकी करनी बिनके मग, हमारी करनी हमारे सग। जो जसो वोबगो वसौ ई कटगो।' दिवाकर के अकाटय तकन क सुनिक सिगरे साथी ढीले पर गए । दिवाकर की सराहना करते भए बोल 'ई व्योहार तो इनके माता पिता की दन है।' ताही सम भरत हू अपने साथीन के सग दिवाकर के पास आयो । बाने पाते ई हक करी ना धक दिवाकर के पाम पकर लिए। अपनी गलती के ताई छमा चाही। दिवाकर न अपने पाम सिकोर लिए वान हाथ जोरि के बाए अपने पास बठायवे की कही, 'भरत भैया मोसों छमा चाह रहयो है । अरे ! यार मोय चौ लज्जित कर रहयो है ? हम दाना भया सग-सग रह रहे । भावावेस में कछु बात है गई तो है गइ । याको मतलब थोरई है क हम बैरी है गए । तू तो या बात जानै दूध उफनै नाये ई धन उफनाय दे । ई धन के बुझत ही दूध अपनी ठोर प आ जाए । अरे हमारे देस की तो ई सस्कृति है क भाई भाई लरै भले ही टूट सके का नाती ? हम वरी हू है जाएं तो हू या बात को ध्यान रहे क जब कवऊ मिले तो निगाहन मे नई गिर । भरत बोलो, भयादिवाकर हमसौ भारी भूल है गई, पर अब हमारी आँख खुल गई है । तिहारी मया न जो प्यार उ डेली है, बाके सामई हम झुक गए हैं। और एस खिने चले आए हैं जसं लोहे के कन चुम्बक की ओर आपई आप खिंचे आवै । कचन करत खरी 109 भया तिहारी मैया पूजव जोग है । तिहारी मया तो पारम है है। तिहारी जसी मया है जाए तो मसार म ते अपगध अपने आप दूर है जाएं। हमने तिहारी मया सों छमा माग लई है, अब हमारे पहार मे पाप क तुम हू छमा पर देयो।" दिवाकर न भरत के म्हों पे हाप रप कही, 'भा हम मर मा स हैं। मा सन ते भूल होय । माम ही सुधारी करै।' दियाार ने सामूधे मुभाव गौं गरे लगायो । सब सौं कही हम कुम्हार री माटी क पडा थोरई हैं मुनार के सोन के गहन के समान हैं । टूट के हू जुरं । भरत कूपूरी बिसवास है गयो क दिवाकर ने विनक छमा कर दिया है। भरत दिवाकर सौं छमा माग क प्रिसीपल के पास पहु चौ। प्रिंसीपल न सुनी तो पहल तो बाको पारो चढ़ गयौ पर जब कोऊ अपराध मान रहयो हाय छमा चाह रह्यो होय तो कोन पत्थर हियो होयगी जो नई पिघल । मान्स को हियो दूसरे वे हिए की धडकनन सुने । भरत ने प्रिंसीपल क ई वतारियो के वान दिवाकर ग्रह दिवाकर की मया सौ हू छमा चाह लई है। या रात . सुनिक प्रिमीपल और हूँ पिघल गयो । वाऊ न भरत अरु बाके साथीन कछमा कर दियो । वाऊ नै चन की सास लई। बाकी चिता दूर भई । बाको तनाव दूर भयो । भरत जो भच्छक बन रह्यो अब रच्छक बनक रहेगी। पसीना की ठौर लहू गिरावंगी। या बात कू जानके एक अच्छी बातावरन बनी। दिवाकर की अस्पताल म चिकित्सा होती रही। दिवावर के साथी तो सवा मे लगे ई रहे। भरत हू सेवा मे दिनरात लगो रहयो । या मेल देख क पिलानी की गली गलियारे घट पनघट, तिराह चौराहे सब ठौरन प दोनोन के मेल की चरचा ई चरचा सुनाई परी। दोनोन के फोटो अखवारन क पहले पना प छप । पिलानी ने रहवया या मेल कू देखिक दातन तरे अ गुरी दवा गए । - पद्रह दिन पाछै दिवाकर कू अस्पताल सो छुट्टी मिली। चदा नै चाही के बू दिवाकर कू अपने सग डीग ले जाए । प्रिंसीपल अरू छोरा चन्दा सौ हठ पकर गए क दिवाकर अच्छी तारिमा रखिंगे पर चदा ने जलवायु के बदलाव अरू सवसी मिला जुलबे को कही तो च दा की बात सबन नै मान लई । सव समझ गए मया को हियो तो मा कोई होय । चदा जब दिवाकर कू लक चली तो सिगरी कालेज उमड आयो । भरत के सग सबन नै चन्दा के पाम छिए । विदाई के समे सबन की आंखन मे पानी तरवे लगी। बान चलते-चलत सबन ते कही बटागोजो बीत गई गई सौ बात सम सदा एक सौ मा रहै । सतयुग त्रेता, द्वापर अरू कलियुग समय सो नाय होय ये तोहर पल हर छिन हमारे जीवन म पर्ट । युग तो मास के करमन अरू व्यवहार सो होय । चरवति 'चरैवेति को हमारी लच्छ होनों चइए । तुमने सुनी ए व्यक्ति होय चाहे समाज-कछू पडे सो रहे हैं, कछू अगडाई लक बैठ गए हैं कछू ठाडे है गए हैं कछू चल पड़े हैं जाना कचन करत खरी 110 अवस्था म होय वाए वाही युग माहि विचरन करतो भयो मानौ । हम अपनी अतीत की संस्कृति कू भुलावै नई जीवन म उतार।" या बात कू सुनि के छोरान की रंगन मे नई चेतना को अनुभव भयो । बान चलते चलते कही, 'बेटाजो, हम सुधिरगे युग सुधरगो याहू ए ध्यान रखियो । इन वातन कू कहकै चन्दा दिवाकर कू'लके चल दई । विदाई दवे बारे और सों और है गए । सबन के हिए म सात्विक भाव जाग गए । मन कू ऐमी प्रेरना मिली के सब नई उमगन सौं भर गए । गाडी म दिवाकर ने अपनी पूरी कहानी मया कू सुना दई ।" दिवाकर ढीग आयौ तौ वाए देखिये कू मेलो सौ जुर गयो । चन्दा के सिगरे हितसी मेह की सी बाट देख रहे । दिवाकर कू स्वस्थ दखो तो सब खिल उठे। सबन नै भगवान कू सराहो । काऊ । कही चन्दा के पुण्य आडे या गए ।' काऊ । कही "भैनामो पुरखान के भाग सौ छोरा वचौ।' सदन में अपन अपने ढग सौं कहक सतोस दरसायौ। दिवाकर दस बीस दिनान मे ही आराम करके भलो चगो है गयो । वाको घाब चोखी तरीया पुर गयो । वाके विरोधीन के हू मन को घाव पुर गयो पिलानी सौं बराबर पाती आती रही । बिन पातीन के सग वाको मन उडान भरतो रहयो । कबहू कबहू तो भरत की पाती कू पढक 'दिवाकर भाव विभोर है जातो। कई कई पोत पढ़ती। आखिन मे आँसू भर लाती। भरत की पाती कू मया कू पढ़क सुनाती। मया हू पढक भावन म बह जानी। इन पातीन सौ दिवाकर तन ते डीग म मन ते पिलानी के अतीत के बातावरन मे चली जाती। कवऊ-कबक तो पिंजरा के पछी की नाई पखन ने फडफडाती। मन करती उडक पिलानी पहुच जाए 1 जब दिवाकर पिलानी चलये की घरचा चलाती तो चन्दा काप जाती । चन्दा वाक स्वास्थ्य के ताई रोकनी चाह रही पर अबीर म कतव्य के पथ प ारुढ है के कठोर हियो करनी परी चन्दा के वात्सल्य कू दिवाकर के निहच के आगे झुकनो परो । कतव्य की विज भई । चन्दा दिवाकर ए करव एक पात फिर पिलानी पहुची। सब दिवाकर की याद म सूख के जबास है रहे । वाय पाय के सब हरे है गए । नई बहार प्रा गई। धो वे दिए जुर गए । दिवाकर की मया क दरसन करके फिर सबन ने अपन भाग सराह । चन्दा जब दिवाकर क पहुचाय क लोटवे लगी तो सबन नै कही 'अम्मा चिंता मत करियों जसो ई विहारी अकलो बेटा है वसई ई हमारी अबलो भया है।' पिलानी सौं चदा लौटी पर या सम बासी हालत वा गया का सो जा बछडा ए यूटा पवाधि के पास ताइ जगल कू जाए। पिलानी म आयकै दिवार छापन व हित क क ताइ जुट गयो । सम अनुसासन सयम अरू नियमन के सारे म ठरक कमर पथ प आरट है गयो । सम-सम प छान यूनियन की यठक कराती दिन के अधिकारन को म्यान करानी सग म बतभ्यन कोह रचन करत परी - भान कराती। वान अपनी मेहनत सौ कालेज की पढ़ाई को स्तर उठवायो। खल कूद की सुविधा जुटवाई। याचनालय-पुस्तालय म संग्रह करब याग साहित्य परीदवायो।बान छात्र हित के करनीय अनेकन काय किए। छात्रन अरू गुरुजनन के बीच दिवाकर सतु वन गयो । यासों गुरुजनन को सिर दद दूर है गयो । कालेज प्रसासन कू छात्र सहयोग भरपूर दिवायो। सव विघटन, संगठन में बदल गयो एकता म अनेरता समूल नष्ट कर दई । यूनियन के उदघाटन समारोह ते लके जितने उत्सव अरू सास्कृतिक कायम भए विनम एक सालीनता अरू उपादेयता के दरसन भए । छात्रन को परस भर हितई हित भयो। दिवाकर के कायकाल मे ऐसी सूत सौ क्तो ऐसौ कालेज को नाम भयो क देम के अनेक प्रातन के प्रतिनिधि महल याक क्रिया क्लापन क देखिवे आए। यहा के वातावरन कू देखिक निहाल है गए । ऐगी भाईचारी, ऐसो तालमेल ऐसी सहयोग ऐसी अनुसासन, ऐसी पढाई-लिखाई ऐसे खेलकूद देस म टू दे तऊ नई दिखाई परे । ये अपने-अपने कॉलेज में पिलानी कालेज को सौ बातावरन बनाइवे को सवल्प लकै गए । इ सब भयो दिवाकर के काय अरू व्यवहार सौ । वान मामाजिक पच्छ कू तो सम्हारी ही अपनी पढाई को हू ध्यान रखो । परीच्छा म अपने बाप की नाई अब्बल प्राय के सोन को बिल्ला पायो । बी ई म प्रथम प्राय क कालेज कू गौरव दिवायो सग म प्रपनो अरू अपनी मैया को नाम उजागर कर दियो। कचन करत खरी ऐसी करनी कर चलो - दिवाकर के इजीनियर के कोर्स कू पूरी करनई चदा के घर में बेटीवारेन के प्राइव को तातो लग गयो । माम बसोई नाऔ मगता पहल ई मा गए । दिवाकर जैसे वर क अपनी कन्या देबे मे अपनी यस अरूमा को सौभाग्य समझ रह । दिवाकर जब मौं पिलानी म पद रह्यो तवई ते बेटीवारे पोछ पर रहे। तब तो उनते ई जाती के भबई छारा पढ़ रही है । नौकरी ते लगन देओ । पर, अब नौकरी हू लगवे म देर नाहीं । बताओ, अव चन्दा काऊ ते का कहके मना करती। थोरे दिना पाछ ही भरतपुर की एक प्राइवेट कम्पनी ते दिवाकर कू औफर मा गयो । दिवाकर ने लजीत नगर भरतपुर मे रहको सिरू कर दियो । चन्दाऊ रनजीत नगर आ गई । अब दिवाकर के ब्याह की चरचा नई करवी समाज के मन म सदेह पदा करबो हो। दिवाकर के पास या सम गदवी प्रतिभा प्रतिष्ठा मब कछु हतो। बेटी चारन की ऐसी लन डोरी लग रही क दी जा रहे अरु चार पा रहे । जाए देपिक हेमो उहावे बारे कहते एक अनार सौ बीमार वारी बात है रही है। क्यनी त करनी की चाल आ गई । और ठोर पै चारचा है। तगी। प्रब मालुम परगी कयनी करनी की छू कहते, "अजी हाथो के दांत खाइये के और होय दिखाइवे के और होय ।" कछु कत घर आई नच्छमी कौन तू बुरी लग ।" या तरिया जितेक म्हों वितर बात सुनाई परई । चन्दा के सामई कोई धन की पोटरी ले आतो, तो काईप को एलबम । कू आपबीती याद आई । बाप की गरीबी के दिन याद पाए । बाकेशर घर माही दिनरात बुचरके लगते और घर के बाहर गरीबी देख के कोऊ सूध म्ही वात नाय परतो। वाकच्याह में काका बाधा आई बाए मय याद हो। तो चकोर जसो भलो, उदारमना, सादगीपसल, सुहृदय होतो और ना बाको ब्याह है पानी। बेटी बारन व दुग्न दरद कू वान भागो। वू या पीडा कू समूल नस्ट कर देवे के ताई अपने हिए म निहन कर चुकी। - चकोर के चल यसबे के पाछे चदा ने गाम गाम म महिना महल बनवा र दहेज लर के विरोध में मोगध बयाई । दहन के न्याहन क त्यागर की बात कही। पचन करत खरी 113 सादगी सौ ब्याह के नारे लगवाए। जव चदा के सामई कसोटी के छिन मा गए । हां सिद्ध और योगी प्रलोभन म नाय आये। साधक प्रताडना सौं भय नई खावै । बान प्रलोभन दवे वारेन कू विनय के सग समझा दियो। ब्याह वम को नाम चलायवे के जरूरी है पर और आडम्बर विरथा है। कछू लोग, दिवाकर कू नौकरी देब बारी फक्ट्री के अध्यच्छ के पास दबाव डरवायबे कू गए । अध्यच्छ ने कह दई, "नौकरी बाप दया करके नाय दई । बाक गुनन ने अपने आप ल लई है । फक्ट्री जाइन करके वान फक्टी प किरपा करी है । याते बाको गौरव नाय बढ यो हमारी फक्ट्री की प्रतिष्ठा बढी है । कछू बेटी बारेन ने दूसरेन ते चदा प पहुंच करवाई। चदा ने सबको सुनी । देखती रही। परखती रही। क कोऊ पास चदा के सूधे सुभाव · देखिकै कनुआ पडित वाके पास पहुँच गयो । लगौ बौना विराट क माथे प च दन लगायवे पहुंच गयो होय । कनुआ के एक छोरा और तीन छोरी। छोरा को ब्याह है गयौ पर बू निकम्मो निकस गयो। एक छारी को ब्याह है गयो । तीना छोरी पौर वण, सुदर, सुशील, मुसिच्छित पर विन पइसा सब सून बारी बात है रही। विना पइसा के कोऊ म्होऊ नाय छूतो। सूधे म्हों कोऊ बात नाय करती। साची बात है दमडी के आगे चमडी की का चल ? गरीब समझ क तक नॉय फटकन दतौ। कया अरु कगाली की रासि मिल जाए तो यो समझो करेला नीम पं चढ जाएँ। काम को वनवी टेढी खोर ही नई गूलर को फूल बरु गधा के सोग है जाएँ। बू विचारो दहेज कहाँ ते देती। बडौ छोरा बहू • लकै अलग है गयो प्राइवेट नौकरी में चार पाच सौ रुपैया मिल है। बात अपनी काम ल दक चलाती। क्नुआ छोरा ते पानी मांगतो तो वाको छोरा बाते अमृत की कामना कर प्रो। कनुमा पडित ऊ हिन्दी साहित्य समिति म नौकरी कर प्रो। अट्ठावन पूरे कर चुको । नौकरी दबे वारेन की किरपा प जी रह्यो। बाकी गरीबी कूदेखिकै दो बरस और बढा दिए । या तरियाँ सो बिचारी गुजर बसर कर रह्यो पर या गरीबी मे हू बाकी छोरी मेहनत ते पढ रही। दूसरी लडकी रजनी ने बी ए कर लियो। तीसरी एस टी सी की टेनिंग कर रही। रजनी पढ़वे के सग सग घर के सिगरे काम काज के धमरगज पीटती । अपन मैया बाप के दुख कू देखिके मन मसास के रह जानी । तन तोरिक काम करई मन लगाय के पढई। घर के काम काज की क्सौटी प कसक कचन है गई। हो गरीबी के मार और काऊ बेटावार नाय भाई। वचन करत परी कनुमा चन्दा को नाम सुनिक तो चलो मार्या पर भीतरई भीतर धुकर पुकर है रही । साच रहो कहाँ राम राम कहाँ टॉय टाय। कहाँ राजा भोज जरु कहाँ गगू तेली। कोऊ यो नाय कह दे ई म्हो अरु मसूर की दार। पर ई समय के, के ओवरी म सिर दियो तो मूमरन को का डर और काजी गाव ना करेगी तो का घर नाय मान देगी। कनुमा चदा के घर आ ही गयो। चन्दा कनुआ सौं भली भाति परिचित हो । क्नुमा के सेवा भावी सुभाव सों प्रभावित ही। जब बू पढई तबई ते कनुमा की मबा भावनांन सौ पििचन हो । पुस्तका लय मे पुस्तकन क लबो दबौ ललक क युकि के, हाय जारि के अभिवादन करवी, हाथो हाथ पुस्तक देबो सवन कू भातो। वनुआ वेतनभोगी की और सेवा भावी अधिक हो । चदा ऐसे समाज सेवी मास की तो हिए ते चेरी ही। जसैई कनुआ बार घर पहुँचौ चदा नै विनम्रता सो अभिवादन क्यिो। नासन दियौ। मीठे वचनन सौं बोली- १ T . . 1 . 1 'कहो पडितजी कम आए 'आपके दरसन 'दरसन तो पाप जस महानुभावन के हैं । मैं तो आपके पॉमन की धूरि है। ो कछु हन्त सो मापक सहयोग के कारन है। 'राम राम ऐसी चौं कही। आपको यस तो चारा योर फल रह्यो है । हम तो आपके गुन गाते गात नाय अधावं ।" 'पडितजी ई सब आपको महानता है। आपके मन के भावन की परछाई है । हो तो अपने आइवे की कारन तो बताओ " चन्दा के सद् न्यौहार सौ कनुआ को साहस बढ़ो। फिर बाने अपने मन को बात सकोच सौं कही। 'निवेदन ई है क अपनी बिटिया रजनी के ताई 'हाँ हाँ पडित जी बोलो हिचक क्यो रहे हो ? "निवेदन ई है क अपनी रजनी कू' आपकी सेवा मे अरपन करवे आयो हूँ ।" 'पडित जो पहले यो तो बताजो आपकू अती पतो कौन न दियो ? उत्तर सुनिक कनुषा सरपका गयो। पसीना आ गयो । बाए अपनी औकात याद है आई । अपनी भूल को अनुभव भयो के गलत आ गयो है पर तोऊ सम्हर क बोलो- अतो पतौ कौन दतो। प्यासे कूजलासय कौन बतादै ? पीडिन पीरा को ज्ञान कौन कराव । गज बावरी होय। जाको गज हाय वू मी रस्ता निकास सुदामा की भाति अपन जाग द्वारिका पहुँच जाए।" -- या F । , 1 T T पडित जी आप कहा कह रहे हो?" कचन करत खरो 115 "प्रजी, फल की गध कद नाय रहै । हवा के पमन प उडि के पहुँच । पूजी, प्रतिभा अरु यस जलासयन म तूमा की भाति तरें।" "पडित जी हम तो मौत बौने है । एक छोटी सी इकाई हैं।" "भगवान की आपण कृपा है । भगवान न आप सब कछू दिया है । हाँ आपके सामई तो मैं पासग म हू नाऊँ। बडे सकोच के सग आयौ हूँ। बुरी बावरी आपके सामई हूँ। माय जाच लेजी परप लेगी।' "पडित जी सोने की परीक्षा काट के, घिस क तपाय के करी जाए, वृच्छन की फलन ते और याई तरिया सिगरे पदारथन की परीच्छा छूक, दखिक, चाखकै सुनिक करी जाए पर मान्स की परीच्छा बाके न्यौहार सौं हाय । जीवन भौत लम्बी है। याको लम्बाई • ध्यान में रख के निरखौ पग्यो जाए।' "हलवाई अपने दही कू कब खदटो वताव ! मालिन अपने बैरन ने कव खटटे बताव पर मैं ई बिसवास दिबाऊँ क मेरी विटिया गरीबो म परी है। गरीबी मे ही वान बी ए किया है। आपने जैसे तन मन और धन सौं दिवाकर क बनायो है मैंने हूँ तन मन सौ बाए बनायवे म कोऊ कोर कसर नाय राखी। पडित जी बटी को तो मैंने कछू नाय देखो पर मैं आपके ब्यौहार सौ भौत प्रभावित हू । मैं ई चाहू दिवाकर कू सुयोग छोरी मिल जाए । दो इकाई मिलक दोना परिवारन को समाज को अरु दस को कल्यान कर ।' T "यही मेरी चाह है पर अब बात जागे कस बढ ? बात तो बढी बढ़ाई है । छोरी छोरा को जोडी ठी बन जाए। दोनो एक दूसर सौ बात करले। दोना राजी है जाएँ बस फिर काऊ रुकावट नरए।' चदा की बात सुनते ही कनुमा क प्रान हरे है गए । तडफडाती मच्छी कू जल मिल गयो। बू उमगनी उमगतो घर लौट के आयो। घरवारी कू सिगरी बात बताई बाकी घरवारी के गरे बात नई उतरी। जो इजीनियरिंग करक आयो है बू गरीब की छोरी कू काइकू अगेजगो। दूसरी ओर और बेटीवारेन ने जब मालुम परी ती बे भजे दौरे चदा के पास पहुँचे । अपनी बडाई के पुल बाधबे लगे। प्रलोभन दबे लग। चदा नै सवन की सुनी पर बान अपन मन म निहच कर लियो । चदा क सकेत पै भरतपुर में बिहारी जी के मरि म पडित कनुमा अपनी बिटिया रजनी कु ले पायौ । उतते चदा अरु दिवाकर आ गए। चटा ने रजनी त बात की तो रोम रोम खिन उठी। चदा अरु रजनी के योग सो ठडक आ गई । अमृत 116 कवन करत खरी को सी वरमा हैवे लगी। रजनी के चेहग ते भोरोपन झलस्तौ । हंसई तो फूल झर हे । रजनी अरु दिवाकर न एक दूसरे सौ बात करी। दानो एक दूसरे क पाय के ऐस लग मानों दोनो एक दूसरे कू भोत दिनान ते जानत हो। दिवाकर ने रजनी सो बडी सालीनता सौ पूछी- 'कहो रजनी हमार सग रहोगी ?' रजनी न उत्तर दियो रजनी तो दिवाकर की सदा सो पिछलग्गू रही है।' याए सुनिक दिवाकर को मन भर गयो। चन्दा न हू पायो कै रजनी अरु दिवाकर मणि काचन योग है । लगो सौनो अरु सुहागौ मिल रहे हाय । वाइ सम त दोना मन ते वध गए । वस देर रह गई वो अग्नि कू साच्छो करबे की । दिवाकर अरु चदा दोनोन कनुआ कू अपनी स्वीकृति द दई । कनुमा अरु चाकी धरवारी को सुपनो साकार है गयो अधे के हाथ बटर लग गई। ब्याह की पक्की होते ही ब्याह की तैयारी की बात चल परी। जिन लागन ने सुनी व भौचक्के से रह गए । जो चन्दा कू परखनी चाह रहे विनकी आख खुल गई । बिनकी सका दूर है गई। दरिद्र क कुबर ने गोद मे बठा लियो। चन्दा नै वनुआ क बुलाय के सिगरी बात समझा दई । ब्याह सादगी सौ होयगी। 25 बराती हु ग । ना तासे वाजे की धूमधाम हायगी ना रोसनी अरु फुलझडीन की चकाचौंध । एक-एक रुपैया के नेग हुगे। अपनी भारतीय संस्कृति के अनुरूप सिगर काम हुगे । सादी है तो सादी ही रहेगी। कनुआ ने सब बातन की हा कर लई । अधे कू चइए ई दो आख सो कनुआ कु मिल गई । लोगन न कनुआ ते कही 'खूब तीर भारी पडित जी चदा प का जादू कर दियौ का मतर फूक दियो ?' पडित जी सहज मुभाव मौ बोलो म नाय बजा रह्यो मेरी तो करतार बजा रहा है।' जिन लोगन ने ई चरचा सुनी बिनमे ते कछु च दा को नासमझी प ह से । कछू भाग के खेल प हसे । व्याह को सायौ सुझाय के सब अपने अपन काम म लग गए। कनुआ न पीरी चिट्ठी भेज दई । चदा नै भात नौतिव के ताई दो चार बयरबानी लई अरु भात नौत पाई। भात नौति के चदा व्याह के दूसर कामन म लग गई। अपन कहब क अनुसार सिगरे काम किरा । माह कू सादगी सौ सपन कराया जाए याको पूरी ध्यान रखो गयो । ब्याह सौं एक दिना पहल चदा नै भात पहरी । चास नै ता चन्ता क्ली जनी बाको कोई मा जायौ भया नाऔ । चोस ने मामा पूपी २ दो चार भया और दी चार गोपालगड क छारा भेज नै भात पहरबायो। 117 रुचन करत घरी दूसरी ओर नुआ के घर हू याही तरिया रगल मगल सी काम चल रहे । व्याह सौ पहले रजनी के रूप में निखार लाइवे क बाए उबटन सो नवाह्यो गयो। रजनी की नाई दिवाकर क ह उवटने ते नवाह्यो गयो। दूल्हा बनकं वरात कू जब दिवाकर घोडी १ बठा चली तो देखतई वनयो। दिवाकर की बरात मे बेई गिनती के पच्चीस बराती निक्से । बडी सालीनता मौ बेटी वारे के दरवज्जे पहुचे । रनजीत नगर सौं चौबुर्जा तक भरतपुर को भरतपुर म पहुचवे मे आधा घटा लगो होगो । सब जाने पहचाने लोग । कनुआ न खूब आवभगत करी। दरवाजे पं विधि विधान सौ तोरन भयो । मत्र परितन ने वोल । वयरवानीन ने भगल गीत गाए । आरतो भयो गीत गायो- - यारे यमके को वरसगो मेह ।' बारोठी के पाछै ब्यारू के मम गीत गाए गए मीठ-मीठे। मीठी मीठी गारी गाइ गई 'राम रग बरसगो। रंग बरस अरु इमरत वरस अरु बरस कस्तूरी ग्ग बरसगौ। ऐसी गारीन ने सुनिकऊ बराती जमते रह अरु मन ही मन मुस्करामते रह । फेरा परे । तबहु गीत गायौं । जावो जीवन दरसन छठे फेरा को बतायो- “छठी फेरा, अबहु बेटी बाप की' चदा न जसी कही वसे ही सादगी सौ ब्याह सम्पन भयो । उसभव सभव है गयो तो कछू चन्दा अरु दिवाकर की सहजता परीझ गए सराहना करबे लग । आदस की बड़ाई करने लगे। अध बिसवासी निंदा करने लग पाम कुम्हाडी दत है मूरख अपने आप ! चन्दा न ब्याह कू सहज भाव मौ स्वीकारी। रजनी धार्मिक परिवार सा आई धार्मिक मस्कारन म ढरी । चदा क रीति नीति मय पादस व्यवहार को सग पाइक और निखर उठी। रजती दिवाकर के एक दूसरे कू पायक एक दूसरे के प्रेरक बन गए । अच्छी जोडी बनी। एक दूसरे के पूरक बने । रजनी मौतनता को प्रतीक अझ दिवाकर ताप और जाज नी भ डार । विचार और भावनान को सुखद सयोग भयो। रजनी क सात वार और नी त्यौहार । प्रत की ठौर प प्रत र उत्सब की ठोर प उत्सब । काया राखे धम को हू निर्वाह करते भए रजनी की धार्मिक जीवन समुरार म हूँ चलती रही। दिवाकर क भोजन रायक भोजन करवी, अपनी साम कमाज क पाम 1 113 चन करत खरी दावबो घर कू सफाई मौं रखबी, घर, म सामान क यथा स्थान रखवी दीपक, दियासलाई, सुई डोरा सदा एक स्थान प रखबौ, अधेरे म हू हाथ डारो जाए तो चाही भयो सामान आसानीसो मिल जाए । ऐसो नीतिपरक जीवन देखिके पास परोस वार रजनी के काम को अरु चन्दा के भाग की सराहना करत । -- न दिवाकर जा पक्ट्री में नौकरी करतो म्हा अपने काम और त्यौहार सौ चमक उठी । सामाजिर कामन म खूब हाथ बटातो । परिवार नियोजन के कैम्प लगत विनमे तीमारदारी खूब करती। एक पोत फक्ट्री की महिला क्लब न विकलागन क उपकरण बाटे । समाज सवीन न निहत्थन क हाय, कट पैरबारन क टाग दई । निवाकर ने हू अपनी और सौ एक विकलाग कू हाथ दियो। फक्ट्री में कोऊ सास्कृतिक कायम होती तो दिवाकर विनम भाग लनी । योग आसन को सिविर लगी तो योग सिविर के सचालक मनहर कू पूरी पूरी सहयोग दियो । आए दिन अखबार म दिवाकर को नाम आती। - N - F - दिवाकर अक्लो ही काम करती हाय, सो बात नाही । जा तरिया जलासयन सौं जल लक वादर बरसा करै याही भानि दिवाकर अपन सखान को मडल बनाय क समाज के दीन हीन पोडिनन क मदद करतौ । चिनक मन्ताम और सान्ति दतौ। घर माहि चन्दा अपनी सआचरन बारी बहू कू पायक निहाल. है गई। दिवाकर को सहयात्रा क एसी सहचरी मिली के बाक जादस रूप क देखिकै भरतपुर बार बाकी सराहना करते । सेठ बरसानेलाल की मील पनत्र सिविर लगी बाम दोनान की सवा देखिकै सिगरे जन धन धन कह उठे । जिन गरीब गुरबान को कोऊ नाओ बिनके दिवाकर अरु रजनी है । बिना मल मूतन कू उठाबौ दवाई दारू दैबा, रात क बिना पाम दावबो जस कामन कू देखिके लोग लुगाई हिए ते प्रामीस दते । भरतपुर में जो नवयुवक मडल काम कर रह्यो वाम तो दिवाकर, अरु रजनी नं जान डार दई । चकोर के यार राजेन्द्र क. दिवाकर न हर काम में पूरी पूरी सहयोग दियौ । दहेज प्रथा के विरोध मे मौहल्ला म नुक्कड मीटिंग करवी अन्तरजातीय ब्याहन के ताई प्रोत्साहन दबी बाल न्याह राकिबो , विधवान को ब्याह करबो जसे कामन म निवाकर अरु रजनी को पूरी पूरी सहयाग रहती । ब्याह के दो ,बरस पाछ रजनी के पाम भागे है गए । चन्दा नै फल सौ पहन फूल को अनुमान करक अपन घर माहि दाहद व गीत गबवाए। 'पहली महीना लागिए बाको फूल गयो फ्ल लीजिए । प्रभु की किरपा त मिवन की सुभ कामनान त अरु गुरजनन पासीसन सों रजनी के छोग भयो । मुडगेली प चटक कासी की पारी वजाइ । चन्दा घर म एक चन परत परी 119 पूल सौ खिलौना आयो बू फूली ना समाई। बच्चा जव छ दिना को भयो तो छटी पूजी। रजनी ने नवजात सिसु कू गोद म के देवी देवतान ते धन सम्पत्ति की कामना वरी, गीत गायक सीता अरु उरमिला को सुमरिन क्यिो- छठी पुज तर बहू पाई सीता छठी पुजन्तर बहू आई उरमिला, छठी पुजन्तर कहा फल गार्ग, अनु माग धन मार्ग अपने पुरखन को राज मार्ग, वारी जडला गोद माग । थोरे दिनान पाछ बच्चा को नाम करन सस्कार भयो । जच्चा के घर ते छोछक आयो या औसर प जच्चा ने अपने मया वाप के घरते पाए समान क देखिक खुमी मनाई। मगलकारी गीतन के माहि चौक पुरायो पौहर ते पाए भए कपडान कू पहर क रजनी के सग दिवाकर वठी। हवन भयो। नामकरन सस्कार भयो। छोरा को नाम निकस्यो प्रभान । नाम घर के अनुरूप रह्यो । अधेरी दूर भयो । घर म साच माच को प्रभात आ गयौ। दिवाकर अरु प्रभात को सुखद मयोग होय । सबन ने चदा अरु दिवाकर क वधाई प बधाई दई । या औसर प जमन जूठन भयो। गरीब गुरवान क. दान पुन्न दियो । साझ क कुआ पूजन भयो जामे खूब लोकगीत गाए गए । खूब नाच कूद भऐ बयरवानीन न खूब अपने मन की निकारी । सवन न खूब मनखत मनाई । चन्दा को मनचाही पूरी भई। छोटो परिवार सुखी परिवार मान क भाग सराही । जच्चा बच्चा दोनो स्वस्थ है। दादी और पिता तन मन ते खूप स्वस्थ रजनी राज प्रभु को ध्यान करती भगवान कूध यवाद दती । अपने स्वभाव के अनुरूप व्रत त्योहार, उत्सव, पव विधिवत मनाती। कोऊ माह ऐसो नई जातो जाम रजनी प्रत नई रहती। -- सामन पीछ भानों को महिना मायो । जमास्टमी क दिना चदा दिवाकर और रजनी तीनो व्रत रहे । रजनी ने हाय धोय क व्रत को सामान बनायो। नियों जी । वाम वूरी मिलायो । पचामृत बनायो । मिगी पार बनायो । जल म नीवू सार में सक्कर मिलाय य च ग अरु रिवापर कू पिवाय यत रागो। भगवान को माप सजायो। प्रभुन ताई पूल माला गू थी । बडी लगाई । निन भर तीनों प्रभात मो बलत रहे । हसत रहे । हमात रहे । रात रेरियो । मयुरा ते जमाठ को आरान मे हाल मुन रह । नव नारियाधीम क मन्दिर त, ववक कृष्ण प्रमभूमि त कृष्ण को ज मात्सव को हान मुनायो 120 एनन परत गरी जा रह्यो । रात के बारह बजते ही द्वारिकाधीस के मदिर में सुख वो पुजारी अर पडित क मनोचार भए । नई मडी भरतपुर के मन्दिर सालिग्राम महू झाखर घन्टा वज उठे। लोग लुगाई छारा छोरो जो रदियो ५ आनद ले रह वे मदिन की शाला चल पडे । दिवाकर अरु रजनी हू हाथ म कटाग लक प्रभु को प्रसाद लंबे कनिकस परे । दिवाकर की आयन मे नीद युकि रही । तन मे उपवास की सिथिलता मन म प्रभु दरसन की लालसा । रजनी पीछ पीछे चली जा रही एक मोड प जम ही दाना मुद्दे दूसरी ओर सों तेजी ते आते भए ट्रक की चपेट म दाना आ गए । भयकर एक्सी टेट है गयो । दोना वीच सडक प ढेर है गए । लहू वह निकसौ । सडक लाल है गई । दोनोन + एक दम दम तार दियो । दृकवारी एकऊ छिन नाय रुको। ट्रक ए लकै फरवट हे गयो । दिवाकर अरु रजनी ना हिन ना डूले । सदा कू सो गए । जीवन म एक रह अखीर म अलग कैस होत । दोनोन के सामइ, परसाद क लायो भयौ कटौरा औंधा परी रह गयो। भादों की कारी रात में परमार लवे बारेन को जाइवा जाइवी है रह्यो । दसनार्थीन ने एक्सीडट की सुनी और अपने सामई दो लोग लुगाइन क मरी भयो देखो तो कछ तो घबरा गए । कछू अयट सौ बचवे के मारे इत वितक है गए । कछून प नाय रह्यो गयो । जोरे जायक आख गढ़ाय क देखो तो समयवे म नैकऊ देर नाय लगी। अपनी ही वस्ती रनजीत नगर को जानो पहिचानी दिवाकर हो । देखते ही हक्के बक्के रह गए सग म रजनी कू मरो देखक और हू ब्याकुल है गए । रनजीत नगर की एक भली जोडी अचानक चल बसी। जमाठ को दिना अरु एक नही दो दो ज्वान मौत । देखव बारे काप गए कछू भगे भगे वाके घर गए । वाकी मया ते जाय के कही तो बाकी मया कू विसवास नाय भयो । पाच मिनट पहले ई तो दोनो बात जलग भए। ई कर्म है सक व प्रभात क लक भाजी गरी तिराह प पहँची । मा सन २ ठठठ जुर रहे । वाम मन धक धक कर रह्यो । भीर कू चीर क भीतर जाय के दखो तो देखती ही रह गई। जाख फार के रह गई पछार खाय क गिर परी । ताई ममै प्रभात क् एक परोसन नै सम्हारो । चदा रुदन करवे लगी 'हाय मेरे लाल, हाय मेरे बेटा अरी मेरी बहू अरी मेरी विटिया" कहक विलाप करब लगी। अरे । मरे छोना मोय कौन के सहारे छोड गयो, मरी फूल सी सुकुमारी कितकू चली गई। हाय राम ई का है गौ अरे । विधाता तन ई का कर दई । तोय एमाई करनी तो एक कू तो छोरतो या प्रभात प दया करतौ । अरी मेरी बहू या प्रभात ए कौन प छाड गइ-ई कौन ते मया कहेगी। जर बेटा । मोकू अपन सग ल जाती । मैं तो ताई कू देसिक जी रही अव कौन के सहरे जीऊ गी। जरे निठुर विधाता तनै ई वज्रपात सौ कर दियौ । हाय राम । मोय ई पतौ होतो तो म बेटा तोय ची भेजती। मैं ही जा जाती। अव मैं कौन क दखिक जीकगी। चदा के विलाय क सुनि सुनवे वार हू भूभाटन ते रो परे। सिंगरी वस्ती म हाहाकार मच गयो । मदिर जाइबी, परसाद लाइबो व्रत खोलिवो सब भूल गए । सरन की भूख प्यास उड गई । नीद उचट गई। कचन करत खरी 121 लोग दानोन को लामन कलर, चदा के घर आए । चदा क बड़ी निन सा लाए । चदा के घर म लाग लुगाईन के उठ जुर गए । चदा दहाड मार मारप' राती रही। वाए जित समयाव ह र विताइ विहल है व रुदन करती । रुदन चौं नाय वरती वाको तो दुनिय उजर गई। लका लुट गइ । प्रभात विचारो एक साल को तो हतर औ । कछू नाय समझ पा रहा । तो इ समझ रह्यो बा मैया वाप चादर तान क सा रहे है । वाए ई का पती ३ व ऐस सार है जा कवक उडिंग ही नई । तकडो मा बयर पार पर रात भर वट रह रात नियाममा भारी पर गयो । - भोर होत ही काठी कफ्फन गौ प्रवध करव दानान की सग सग जरयो उठाई। रथी उठत समै चदा अरथी त लिपट गयी। क्वऊ एक कू पकरती तो कबऊ दूमरी कू । वाकी तो दोनो ही प्राव ही । वधरन ने चग बडी निटठन न अरयी त छुडाई । वाम एकन समझायो 'चन्दा ये अब तेर ना रह । तर होते तो तीत बोलते। तरी इतकई दिना को सग हो । धीरज धर। चा कैसे धीरज धरती अरथीन क जात ही और जोर-जोर त रुदन करव लगी। पछाड खायक गिर परी। अखीर म अचेत हे गइ । प्रत की भूमी प्यामी ताप रात भर को रुन्न । हातत पराव है गई । किरन नर्सिग हाम पास में ही हो । डाक्टर बुलायो गयो। बडी निटन त नब्ज सम्हारी । घातल चढाई गई । चन्दा वेहास परी। वैयरवानी वा आस पास वठी रही। प्रभात कू सम्हारो वाकी नानी न । दिवाकर अरु रजनी क फूकिक जब चदा २ दरवज्ज प आए तो मालुम परी क चन्दा २ बातल पढ रही हैं । भौर स भया वाए सम्हारवे कू रुम गए । रतजीत नगर की वस्ती म मातम छा गयो। कई घरन म तो चूल्ह तक नाय जरे। जरते तो कैसे जरले विनकी यस्ती की एक एमी जारी चल बसी जो सबक दुख ददन म आज ही आग रहता । चदा कबऊ नक आखन न टिगटिमाती तो बड़ी बूढी वाक प्रभात क वाक गर त लगा दती। बूफिर आखन न वद कर लती। साथ तक याही क्रम चलती रही मौहल्ला वारे हू बारी बारी सौ सम्हारत रह। साझ समै जब बाए होस आयौ तौ दिवाकर और रजनी की हाय धक लगा दई डाक्टर ने मुकतेरी मना करी क बुढिया प्रा चिरलाव नई रोब नई । बयरवानी हू वाए मुक्तेरी समझा रही। पर समझ नाय पा रही । बाके पेट मे तो आग लग रही। घर मे ते एक सग दा ज्वान मौत। विक्लाग की मानी दोना बसावी टूट गई हाय । सबर बाधती तो कस वाधती । पच्चीस बरस पहल चकोर के चल बसवे क पीछ दिवाकर कू छाती ते लगाय क सवर बाधो । अब तो दुरभाग्य सौं दूसरी चोट और हू जबरदस्त परी । कस धीरज धरली। रोती रही रोती रहा, तब लो रोती रही जब लो दुवारा अचत नाय है गइ। मौहल्लावारन न रात कूवारी वारी त चन्दा सम्हारर की त परी। चदा व नातदारल को और दुरी हाल हो। चदा के पीहरवार यारे परसान है, रजनी व पीहरवार यार । विनयू सबर बधादो और हू कटिन पर रह्यो । चकार व मार 122 कचन करत परी राजेन्द्र में बडी टहल चाकरी करी । जा जैस जसै सम्हारी जा सक हो वैमै वम सम्हारों । दो दिना पोछ चदा की हालत सही भई । बाके रोवे ते फिर हालत विगर जाती । खायबी पीवी वान विल्कुल छोड रायो। दो दिना ग्लूकोज की वोतल और चढी । समझाय बुझाय के वा चाय पानी दियो । मुक्तेरौ च दा क समझायो पर घाव ए तो सम ई भर । । 12 दिन पाछ दोनान के बारह वामन किए। जो नातेदार आए वे अपने अपने घरन चल दिए। वे अपने काम काज कू छोडिक क्व तक रहते । सव जपने अपने सामन ते लगे। घर मे रह ाई चदा अरू एक बरस को नाती प्रभात । दुभाग्य की दूसरी विस्त मानक चदा न प्रभात कू गरे ते लगायौ। विधि को विधान मानक परि- स्थितीन सौ समझौता कर प्रभात कवनाइवे को क्मवीर मवला न निहच क्यिो । जीवन को गाडी फिर ते हिम्मत वध के जाम बढाव को निरनय कियो। वान घरवति का मय दुहरायो । प्रभात दिवाकर की नाई पारवे को दृट सक्ल्प रियो । चवोर अरु दिवार की आकस्मिक दुघटनान की मृत्यु सौं ई निरनय कर तिया के चदा लोटिक अऊ जाइगी। चकोर के अधुरे कामन कूप्रभात सौं पूरे करावेगी। जऊ जाइक वैनानिक ढग सो खेती करगी। गाम में जलख जगावगी। चदा की थोरे दिना पीछ पिसन है गई। बू बीमा ग्रेचुटी जर पम्यूटमन को मवा लाख रुपया पायर्क अऊ गाम पहुँच गई। बान 10 वीघा जमीन खरीद के एक फारम बनायो । वनानिक ढग सों खेती प्रारम्भ करा दई । वाई फारम प बुक्कुट पालन मूत बताई पापड विताई, बासी कागजन के लिफाफे बनबाई मसाले पिसाई जस कई काम प्रारम्भ कर दिए । गम की बयरवानी . काम मिल्यो। झगरे दूर भए । गरीबी गाम ते दूर हैबे लगी। चकार जा ठौर कू वाचनालय जरु पुस्तकालय कू द गयो पू खोल तो दियो पर मरो सौ परी । वामे अच्छी अच्छी पोथी अखबार मंगाय क जान डार दई चदा नै । सिगरी गाम चदा के चेताए त चेत गयो। नइ चेतना आ गई । यजादस गाम बन गयो। । प्रभात गाम में स्वस्थ वातावरण में पहल तन ते स्वस्थ दियो फिर बाक मानसिक रूप सौ सवल कियो। मम सम प बाके बाबा पाप अरु मया के करमन की कहानी सुनाय क करम करव की प्रेरना देती। कच्छा आठ तक अऊ म पढाई करायक जाग पदव कूडोग के ताइ भेजो। चदा न अपने जीवन के अनुभवन को निचोर प्रभात डेलौ । पढवे को सही तरीका, लिखिवे को उचित ढग अपनी बात कू निर्भीक हैक कहबे को कोसल सबको ऐसौ अभ्यास करायो क प्रभात दिवाकर कहू पीछ छोड गयो। प्रभात साइकिल' सौ मवेरे डीग पढबे जाती। धापर कूलीटिक जाती। चदा के प्रभात की चिंता लगी रहती । कबऊ दुघटना की ग्रामका, कबळ छोरान की लराई चन परत खरी 123 कर छोरान ने उडाय कल जार चारे बावाजीन की याद आ जाती। जब तक लोट क नाय आ जाती। चिंता में दकी रहती । तीन मौतन नै जरजर कर दई पर वान हिम्मत नाय हारी । हो प्रभात कुजारे म देर है जाती तो मन वाको धुकर-पुकर जरूर करब लग जाती । सही वान है दूध को जरो छाछ के फूक फूक क पीव । बू धापर कलब्याई गया की नाई रंभाव लग जाती। डीग के स्कूल म प्रभात की तूती बोलिये लगी। हर भर म प्रभात ही प्रभात दिखाई पर लगी । प्रभात क प्रतिभा मिली, दिवाकर अरु रजनी ते पर चक्षक वातावरन नै वा सान प चढाय व निखार दियो। किताबी पढाई सौ ज्यादा करके सोचो, अनुभव वटारयो चदा न ई सिखायौ। बाकी चतुराई • देखिक बडे-बूढ कहते, 'चदा तेरो नाती तो अपन यावा और वाप दोनो के सस्कार तक कायो है।' एक पोत डोग में स्कूल में छात्र सघ के चुनाबन क सम प्रभात कुंजव बढे करव की बात आई तो चाकू दिवाकर के चुनावन को सिगरी चित्र ध्यान में आगयो । कोऊ टूसरी होती तो वाए क्वऊ खडी नाय होन दैती। पिछले आघात को ध्यान करक रोक लती। पर वान भाको आसका कू निकास क प्रभात कू स्वीकृति द दई । प्रभात नै अध्यक्ष पद को चुनाव लडौ। अपनी प्रतिभा काय अ६ व्यवहार सौ एसौ जादू कियौ क प्रभात नै विजय पाई। प्रभात लोनी ध्यो क लोदा की नाई छाछ म उभर क आ गयो। एक दिना प्रमात और दिनान को भाति अॐ सो डीग जा रह्यो । साइकिल सडक के किनारे किनारे चली जा रही। वाए कार अरू वसन प पड़े भए नम्बरन क पदव को चाव हो। जो कोऊ वाहन जागे ते आती तो वाक नम्बरन न पढती। पीछ त आती तो नम्बरन कू पढतो। वा दिना एक कार बाके पीछ त आइ । फर सौं आगे निकस गई। थोरी दूर जाय के पार पल भर कू रुको । बाने बामे ते एक माम कू बाहर ढकलतो देखो । ढक्का दवे बारन ने सोची पाप क्टो हत्या मिटी काम बनो। पर विन ई ना पतो मरते भए सुग्रीव यू बचाव कू राम हाडे है जो सुग्रीव कू बचाय + बाली कू मागि। प्रभात नै वा कार को नम्बर पढ लियो। बान कार सौ ढकलत भए मादमी कू देखई लियो साई बान पडल तेज मारे। पास पहुँची तो देखो आदमो खून सौं लथपथ है रही है। गुडा छुरा भोंक के चले गए। बू मान्स अबई चत म हो वान इतकई बतायो क वू वैक सौ साठ हजार रुपया लैक आयौ गुडा वाक रुपयान ने लक भाग गए है। प्रभात न अपनी कुरता फारक लह वहवे की ठौर प कमक पट्टी बाधी । सयोग सो दूसरी ओर डीग ते साईकिल ते आव वारे अपने यार कू वाए डीग लाइवे को काम सोपिक आप साईकिल सौं डोग टलीफोन एक्मचज पहुँची। कार नम्बर बताय के कार को रग बनाय के टलोफोन दिल्ली राड प कामा, अरु अलवर राड प नगर । करा दिए। ग म पुलिस वायरलेस हू करा दियो। या भाति चतुर प्रभात न गुडान की पूरी नवाबदी करा दइ । गुडा कामा तक हू नाय पहुँच पाए नकको रोक दियो। सपर कार दधिकं कामा की पुलिस ने कार अर कारवारे हिरासत मल लिए । वदमासन के छमा 124 कपन रितसरी छूट गए । हक्के बक्के रह गए । विन बदमासन ने मुक्तरी सफाई दई नम्बर मिलायब की कही पर पुलिस लौटायक कार कूडीग थान मे ल आई। पुलिस ने कामा ते डीग क' टेलीफान कर दियो, क जान टलीफोन करायो है वा. डीग थान में ल आव प्राधा घटा म कार डीग थान में आ गई। - . प्रभात बाई ठोर प बैठा गखो । कार के आदमी जसे ही कार मे त उतर बिनको सकल सूरत गुडान की सी लग रही। बिनकी पहिचान करव की बात कही प्रभात सौं। प्रभात न साफ साफ कह दई आदमी व हत के नाएँ या बात कू नाय कह सकू पर हो इतेक जरूर कह सकू कार वुई है।' वान कही, 'नम्बर प्लेट बदल दई है कार की तलासी लई जाए।" गुडान नै प्रभात कू आंबई आंखन म डरायो पर प्रभात तो ऐसी नानी को नाती हो जान निरभीकता सो अपनी बात कहवो सिखायो। वाई सम कार को तलासी लई गई। जा नम्बर को प्रभान ने टतीफून करायो बू प्लेट गद्दी + नीचे छुपी मिल गई और मिल गए 60,000/-रु साठ हजार रुपैया। पुलिस की बन परी। गुडान के होस उड गए। हाथ जोरि क पायन मे गिर परे। गिडगिडावे लगे। घुसर-पुमर प्रारम्भ हुई। प्रभात सब समझ गयो । वू घटना कू मंजिल पे पहुँचाये के ताई चटा की नाइ चिपक गयो। प्रभात की चतुराई की सब बडाई करवे लगे । चारो ओर प्रभात की चरचा सुनाई परी । वितजा साईकिल वार यार कू वा घायल • सौपिक बायो वू वा घायल बस सौ रोग अस्पताल ल लायो पर वू अचेत परौ । बाकी इतेक लहू निकस गयो के वू मरनासन है रह्यो। वाकू बोतल चढ रही। बू बोल न सको। डाक्टर बाए बचाव की चिंता म दाड धूप कर रहे । बाकू खून की दो बोतलन की जरूरत ही, पर कोई द ना पा रह्यो । प्रभात तो अपने दल बल के सग हो। सवसौ पहले प्रभात ने लहू की बोतल देव की कही । लहू दान करय कू दूसरे छोरान कही तीसरे छोरा ने कहो फिरतो लन लग गई । विना गुरू मानसिंह ने गौरन कूरोक क पहलो नम्बर अपनी लगा दियो । डाक्टर हैरान है गयो । कौन त ले कौन ते नई । लहू को ग्रुप मिलवाय क दो बोतल लहू चढायो गयो । रात भर घायल अचेत रह्यो पर सवेर बू चेत में आ गयौ । वान अपनी अतो पता दियो । बतायौ, म बूडली गांव की रहबे बारी हू बक ते साठ हजार रुपया लकै आ रह्यो । भरतपुर म कुम्हेर बस स्टण्ड के चौराह पै एक सफेद कार रुकी। कार वारेन न बस के किराए म ही डीग तक लाइब की बात कही । मै बैठक चली जायो। कुम्हर तक तो मात गुडान ने कछू नाय कही। पर कुम्हेर क निक्सते ही मोत पूछताछ व रव लग । मन मुकतेरी मना करी मोप कछू नाएँ पर बिन मोकू जबरन पकरक 60,000/-रूपया छुरा लिए । मैं रोव फ्फिार लगौ तौ अऊ क पास मोम दुरा मारक और कार मे ते धक्का दक डार गए। एक साइकिल वारे छारा न अपनी कुरता फारक मेरे घाव प बाचौ । वाके पीछ का भयो माय पतो नॉए। वात पूछी, 'अगर व गुडा बाके सामई लाएं जाए तो बू पहिचान लेगो क नाय ? वान छाती ठोक क हाँ कचन करत खरो 125 कर लई। वाकू ई ऊ वताय दियो के बाके 60,000/-रुपैया कब्जे म जा गए हैं गुडा पकर लिए हैं। याए सुनिक वाकी जान म जान आ गई। चदा न अपने नानी के माहसिक काम की कहानी सुनी तो गव सौ फूल उठी। याको रोम-रोम खिल उठी । वान प्रभात अपनी छाती सौ लगा लियो । बाली, जा धन है तन अपने क्तव्य को निवाह करके मोकू प्रास्वस्त कर दिया है । त् दिवाकर को नाम उजागर करगी।" पुलिस गुडान के सवेरे अस्पताल पहिचान के ताई लाई। घायल हालत म हू भूडली गाय बारे न दोनो गुडान • जरु डाईवर कू पहिचान लियौ। बाई दिना जखवार म खबर निकसी ' एक अग्यात मान्स के 60,0001 म्पया छीनकै अरु घायल करके दिल्ली जाबे बारे गुडान · पुलिम नै बहादुरी सो पकीर लिया है। कामा पुलिस थानेदार क या काम के ताई आई जो न एक प्रमाशन द दियो। डीग ते टेलीफोन करने वारे कू एक ध्यौ को पीपा जर पाच सौ रुपया को इनाम दियौ गयो । पर वा प्रभात : डाक्टरन को कहू नाम नाऔ जिन अपनी चतुगई अरु सूयवूय मो अपने प्रानन की बाजी गाय के जारदार भूमिका निभाई। हा डीग स्कूल के प्रिंसीपल न प्रभात के माहमिक काय की प्राथना स्थल प भूरि भूरि प्रशसा करी । बाकू स्टज प बुलाय के वाकी पीठ थपथपाई । अखवार म दूसरे दिना पूरी ब्यौरा दियो गयो । सबन क्सलियत मालुम परी क प्रभात दौड धप नई करतो तो पछ् नई होती। प्रभात की बहादुरी की सूचना कलक्टर मिली तो बाने राज्य सरकार मौं वीर बहादुर बच्चान म वाको नाम लिखवायद की भरपूर कोसिस करी। कलक्टर कू या काम म सफलता मिली। 26 जनवरी कू वीर बहादुर बच्चान की सूची में प्रभात को नाम पहले नम्बर प आयो । चन्दा की खुमी को ठिकानो ना रह्यो। वाए लगी साधना की पहली सीली मिल गई हो। 26 जनवरी प्रभात जब राष्ट्रपति सौ पुरस्कार लब गयौ तौ चन्ा मग डीग स्कूल की प्रिसीपल नारायन स्वरूप हू संग गर्यो । एक भव्य समारोह में राष्ट्रपति न वीर बहादुर बच्चान के माला पहराई । पुरस्कार दियो। पोटू खिचे । टी वी पै बिनकी रील बनी। रात कूटी वी प प्रभात कभरतपुर जनता न देखो तो लगौ जसं विनको छोरा ही इशाम पा रह्यो हाय । गइ - की जब प्रभात दिल्ली ते लाट क आयो तो डीग म वाको जुनूम निकसी। प्रभात की जय जयकार भई । फूल माला पहराई । ठौर ठौर प दरवज्जे बनाय क स्वागत क्यिो गयो। याही तरियाँ अऊ गाम म स्वागत क्यिो गयो। मवन न इ स्वीकारी क या सबको स्रय चदा ' है जान प्रभात कू ऐमो अच्छी सिच्छा दई है। काज काऊ न तो ई कह दई के ऐसी सवला नारी हो तो एक नई जना प्रभात बन सक । नव जागरन जा सर । प्रभात के ताई चदा के पास बहुतरे बधाइ पर जाए। घटा कौन कौन । 126 वचन करत पुरी जवाब देती। वान अपवार म वधाई दैवे बारेन के आभार प्रकट करके अपने सहयोग की कामना करी। वात टहाई तक नाय रही प्रभात की बहादुरी चतुराई अरु सहासिक गाय को कहानी टलीबोजन प उतारवे के साई एक टीम अऊ गाम बाई । टी वी पप्रभात क घर को चित्र रिकार्ड कर्यो गयो । फारम प त जपनी दादी के पर छ्क साईकिल ते चलवो दरसायो गयो। अऊ ते डीग की सडक चलबो पीछे ते सफेद कार को आइबी, कार के नम्बरन प्रभात सौ पढिबो घायल कू कार त ढकेलबी, प्रभात को घायल के पट्टी वाधबो साईकिल सौ दौरि क टलीफून करवौ, कामा के पास कार पकरबी, गुडान की डीग में पहचान करावो गुडान जेल भेजवी प्रभात पुरस्कार मिलिवी ज्या की त्यो सिगरी कहानी टलीविजन वारेन न रिकाड करी फिर याकू इतवार के दिना दिखायौ गयो । घटना की सही स्थिति कान अरु पाखिन के माध्यम सौ मन के कोने कोन म समा गई। सबन के म्हो त निक्स परी मा स को चाम नहीं काम प्यारी होय । प्रभात स्कूल की पढ़ाई पूरी करक डीग के कालेज में भरती है गयो । दादी अरु नाती गाम म कहवे • अकेले हे पर हर घर के सदस्य बन गए । चदा को फारम अरु चदा को घर सबके ताई खुली। सबके दुख दरद चदा के दुख दरद है ! चदा नै प्रभात कू एस साच म ढारौ क प्रभात-प्रभात की बला सी हूं ज्यादा सुखद लगवे लगी। कालेज म प्रभात की कथनी करनी ए देखिके प्रोफैसर हू अपन छारा छोरीन न प्रभात की नाई बनायब को साचत । सब कहते प्रभात की दादी ने वाक् पढायो ही पढायो नाएँ वा गुनायो हू है। प्रभात की कथनी करनी को एक उदाहरन देखिकै तो और हूँ दग रह गए । डीग की भारतीय कला संस्थान ने एक पोत कॉलेज म निवध प्रतियोगिता कराई । निबध को विस रयो गयो मानव धम । डोग कालज म सवरे 10 बजे को सम दियौ गयो। प्रभात रोटी खायक दादी सो पूछि क सवरे साढे नौ बजे डीग कू चली। कालेज के पास वान एक बुडढी देखी जो सडक के सहारे परी परी कराह रह्यो। कोऊ साईक्लि बारी छोरा वामें टक्कर मार गयो। बिचारी प्यास क मार पबरा रह्यो । पानी पानी चिल्ला रह्यो । पर काऊ कू इतेक टम कहाँ हो जो बुडढे की आवाज प ध्यान द तो दो घूट वाक गरे म डार ६ तौ। हर एक छारा कू निवध लिखिर को पर रही। सब साईकिल प हरा है रह । समन न लग रहो दस बजे पोछ पहुँच तो फिर विन वाऊ कमरा माहि नाय घुसन दगौ । सबन न मानव धम पै निबध जो लिपनी हो। प्रभात न बुडढे देखो वाकी आवाज सुनी। वू एकदम साईक्लि सौं उतरी। वाक घोटून त लहू बह रह्यो। वान रुमाल सो बुड्ढा क लहू के पौठो। बुड्ढो पानी चिल्ला रही। बू पास ते कही त पानी लायो । बुड्ढे पानी पिवायो। यानी जान म जान आई। प्रभात बाए साईकिल पवठायब अस्पताल तक ल गयो। असताल म भरती करायी ता पाछ वालेज पहुँचौ। ता सम माढ़े दस बज गए। जस ही वू कालज पहुँचौ परिवीन्छन । बार कमरा म नार धुसन दियो। वात रह दई सम निकस चन परत परो 127 गयो है । वान परिवोच्छन . सोची सांची वान बताई पर नियम म बंधे परिवीच्छर सुट्ट बंच गए। प्रभात विचारो निवध लिखिये ते रह गयौ। पर बाए सन्तोस हो क वाने अपनी मानव धम निभायो है । बुड्ढे कू सुख दिया है। यू बैठो बैठौ टुकुर-टुकुर देखती । , थोरी देर पाछ प्रिन्सीपल साहव आए। वे प्रभात . भली भांति जानते है । प्रभात कूबाहर बठौ देखिकै पूछी 'ह्यो वैठो है ? निबंध प्रतियागिता में भाग चौ नाय ल रह्यो' प्रभात ने देरी हैवे को सिगरी चिट्ठा कह सुनायो। प्रिसीपल सुनिक द्रवित ह गयो। बान प्रभात की पीठ थपथपाई। सब छोरा निवध लिखिके वाहर पाए। प्रभात कू लेट लतीफ कहके हंसी उडाते भए फर साइकिलन ते निवस गए। निबंध की कारी जची। चौथे दिना परिनाम सुनायो गयो। परिनाम सुनिक सब अचरज में आ गए। प्रथम स्थान प्रभात के मिल्यो । सब छोरा हा हुल्ला करवे लगे, साब प्रभात नै तो निबध लिखो ही नाह। प्रिंसीपल न सबकी बात सुनी फिर सवकू सात करके बात कही 'छाम्रो मानव धम विसं पं आपन तो निय ध लिखी है। प्रभात नै निबध के विस कू अपने जीवन म उतारो है । कालेज के बाहर गैल में परे बुड्ढे कू को टक्कर मार गयौ । बाने पानी के आवाज लगाई पर कोऊ न मानव धम नाय निभायो । प्रभात नै बाकू पानी ही नई पिवायो बाकू अस्पताल हू पहुँचायो। या तरियां सौं प्रभात नै मानव धम जीवन मे उतारके दिखायौ। पोथीन में जो कछू लिखी है रट के सुनाव कू नाएँ जीवन म उतारचे कू है। जीवन मे नई उतार सके तो पढबो लिखिको विरथा है। जैस धी दूध म रमौ भयो है। ऐस ही ईसुर घट घट वासी है। सब व्यापी है । ऐसे कहबे बारे तो भौत हैं पर दूध मथक लोनी के लोंदा ए निकासवे बारे बिरले हैं वही काम प्रभात ने किया है। मानव धम में प्राचार पहल विचार पीछ है । याको निवाह प्रभात ने किया है। या बात कू सुनिक सबके म्हीं लटक गए। जीभ तरए त लग गइ । साँच कू आँच कहा । कछू कुसमुसाते रह गए होठन सो वडवडाए पर हिए ते स्वीकारी के प्रभात न मानव धम निभाय के साची निबन्ध लिखौ है । जो छोरा टक्कर दक गयो बू हूं या समै म्हाई खडी। बात सिगरी राम कहानी सुनी तो बान हू अपने मन में कछू विचार लियो। गार बांध लई। - चन्दा न या घटना कू सुनो तो प्रभात का गरे ते लगा लियो । अव चादा प्रभात की ओर सौ निस्चित है गई। बाए सतोस है गयो क बाको काम पूरी भयो । - । जब दा को बढापो बड़ी तेजी के सग आधे लगो पर मन म साहस । उमग अरु उत्साह में काम कमी नाही। आखिरी दिनान मे बान अपन फारम प एक कला विद्यालय खोली। बस तो म्हा सरकारी स्कूल हतो, पर वान अपन ढग सों सले 128 कचन करत खरी

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खर्चा को सवाल हो पर दान दातान की कमी ना बताय क चदा न कर दिखायो। च दा के पास पइमा बरसवे लगौ । दानदाता आवे लग । ३ अपनी माग सराहव ल3 जिनको पदमा चदा न स्वीकारी। काम और वढब लगी। बालिकान घरेलू उद्यागन की ट्रेनिंग दइ जाव लगी । अऊ गाम म गलीचा वुनये, आसन वनाइव द त मजन सावुन, सफ, तल, अमृ चारा जसी दनिक वस्तुन कू बनाइव को ट्रेनिग दई जावे लगी। कछू महिला चदा क.. सहयोग दवे अपने पाप आब लगी। वछून न वालिकान व जीवन निर्माण के ताइ अपन कसमरपित कर दियो। धीर धीर वालिका विद्यालय को सरूप फलतो गयो । वाको नाम वालिका विद्यापीठ है गयो। प्रब दान दातान न अपने अपने नाम क बालिका विद्यापीठ म कमरा बनवा दिए । एक दान दाता नै दस बीघ जमीन की चाहर दीवारी करवा दई । एक न विसाल दरवज्जो बनवाय के बाप माट आंखरन म जऊ वालिका विद्यापीठ लिखवादियो काम इतक फल गयो के चटा वाए सम्हार नाय पा रही बाको बुढ़ापो जु आ रह्यो । याही सौ बाने एक ट्रस्ट बना दियो। बान सब काम ट्रस्टीन क छाडि दियो । लगनसील, इमानदार सवाभावी ट्रस्टीन के हाय म काम सौप के चटाने छुटटी पाव की प्रापना करी पर एसौ कैसे है सके औ। ट्रस्ट ने च दा के सामई ई वात राखी क बू आजीवन विद्यापीठ को सरक्षिका रहेगी । चदा नाम ते नई काम त सरक्षिया ही। बू कपिन के अनिमान सौं दूर कमवादी बना रही, पर वान कही तोपको पान है नदी किनारे की स्व है न जान कव चलदे मामौ या काम कसम्हार के धन की साम लइ। सयोग सौ भले मास विद्यापीठ क मिलते रहे । बालिका विद्यापीठ को काम और अच्छी चल निकसी। प्रधानमत्री न राष्ट्रीय साक्षरता मिसन को एलान किया। दस क साक्षर करवे के ताई गाम गाम में प्रोढ सिच्छा को विगुल बज उठी। स्वच्छिक सस्थान क केन्द्र चलायबे के ताई न्योती दियो गयो। अऊ बालिका विद्या- पीठ · 300 केद्र मिले। 15 लाख रु सालाना मिलिवे लगो। वालिका विद्यापीठ न 300 केद्र खोले 30 जन शिक्षण निलियम बनाए जहा प्रौढन कूपुस्तकालय वाच नालय खेल कूद पढवे की सामग्री रखी गई। वालिका विद्यापीठ को काय क्षेत्र बढ़ती गयो। धोर धीर प्रभात न वी ए कर लियो । चदा चाहती प्रभात वज्ञानिक तरोतान त खेती कर बालिका विद्यापीठ व काम कू देख । वाकू ट्रस्ट को सदस्य बना दियो । बदा की वात क मानक प्रभात या काम म लग गयो । चन्दा जब धीर धीर सरीर त जर जर है गई । इन्द्री सिथिल है गई। बुढ़ाप की बीमारी सबसी बुरी बीमारी होय । प्राखिन मो दीखरी कम है जाए । सुनियो मद पर जाए । जनक राग घर ल । खामी सुर्रा पारे। हाथ पाव यार मग नाय द । 130 चन रतसरा जान जनम लियो है वायो एक ना एक दिना तो भार ही है। वहान अनर बन जाए । काऊ काऊ बीमारी ते याऊ गाज बीमारी त चलो जाए । सदा को नियम है जो फूल पिलो है चू एक दिन मुरझापगी। जरब बारी दीपक बुझ जरूर है । साइ बात चन्दा क सग भई। और दिनान को माति सवेर चार बज चन्दा जस ही विचार पोलिव क उठी। उठत ही गिर परी। पायन नै वाम नाय सम्हारो । चन्दा हू नई समक्ष पाईप पा भयो । वारी पायन क माग अधेरी छा गयो सिर म चार जाव लग पाप लड़यडाव लगे। पान प्रभात 4 मावाज दई। प्रभात दौरा चलो जायो पूरी दादी का भयो ?" दादी क -ठायो पर पौयन त जम सत निक्स गयो हाय । प्रभात ने दादी सूब उठाई पर पायन न वान नई सम्हारो। दादी वराहती भई बाली, बटा माय पाट प लिटा द । प्रभात नै वार, गादी म लकै घाट ५ लिटा दियो। इत वित सो सिगरी बालिश दोरी दोरी चली माई । दादी अम्मा २ वहा है गयो ? अध्यापिरा हू इसठोरी है गई । मालुम परी चदा र सकुआ मार गयो । चतुर प्रभात समा गयो दादी पी सध्या निस्ट आ गद है । दीपक चुपच वारी है । पछी उडव बारी थारी देर म ही चदा की हालत बिगरव लगी। गाम क लाग-लुगाईन न सुनी तो सब काम हाडि चल आए । लाग सुगाईन को तातो लग गयो । लाग-लुगाई पूध्ये लगी। चन्दा कौन कौन क का उत्तर दती। प्रभात न डाक्टर बुलायो । डाक्टर न ज्वाब द दियो लकुप्रा को गहरी नापात भयो है। चन्दा न हू धीमी प्रावाज म नही, अब बुलायौआ गयो है । जाइवे के छिन जा गए हैं । जानो परगो लाम प्रिय समाज सविका कमवृत्ति क दरसनन क दृस्टी मा गए दुनिया उमड परी । चन्दा ने हाथ जोरि प ट्रस्टीन सो रही, विद्यापीठ तिहारे हाथ है याम ईमानदार मानस रखियो। सबन न समझा दीजो कोऊ भपने मग लप नाय जाय सब क हाई छोड जाए।' वान प्रभात के माऊ इसारो क्यिो, 'ई तिहारी गाद म है' प्रभात ने सुनी तारा परो। च दा बोली बेटा रा मत य सव ट्रस्टी तरे मैया बाप है इन सबन की सवा करियो । बाम सौ पाछ मत हटियो । भाग्य, सस्वार अरू भगवान कम व रोल हैं। परोसो भयो भाजन हू म्ह म नाय जाय । चली हू जाए तो म्हो चलाए बिना खायो नाय जाए । भगवान हूँ तो कम क अवतार ले। अजुन य हू तो कृष्ण न कम को सदम दियो। - चदा न ट्रस्टीन सौं फिर हाथ जारि के एक वात कही देखी, या प्रभात को ब्याह काऊ पढी लिपो सुयोग्य छारी सौ कर दीजो पर या वात को ध्यान रखियों क ब्याह सादगी सौ विना दहेज का हाय ।" धीर धीरे च दा की घडी निकट जावे लगी। अव वाकी जीभ लडपडाव लगी । वान प्रभात कू इसार ते कही, मर निकट आ' वचन करत परी 131 प्रभात वा जोरे आ गयो चदान वाको हाथ अपने हाथ म लियो अ6 टूटत भए आखरन म धीर धीर इतक कह पाई- जब तुम आए जगत मे, जग हामी नुम रोइ । ऐसी करनी कर चलो, तुम हाँसो जग रोइ॥" या वात क रहती कहती चदा मौन है गई । आँख फ्टी की फटी रह गई। पछी उड गयो पिंजरा खाली परी रह गयो। रचन करतापगे 132 परिशिष्ट प्रतिक्रिया एक सम सामयिक उपन्यास खरौ कपन कलानाथ शास्त्री ग्रज भापा अकादमी की प्रकासन योजनान में व्रज शतदल' पत्रिका को नियमित प्रकासन तो हैई, नथन की माला हू अपने सोदय सौं राजस्थान कू सुरभित कर रई है, ई प्रसनता की बात है। राजस्थान के जाने माने ब्रजभाषा के कवि अरु साहित्यकार श्री गोपाल प्रसाद मुदगल को प्रजभाषा उपयास अकादमी को नयो प्रकासन है । याको सीसक 'कचन करत परी' सूर के पद को सुरति कराध अरु पारस पत्थर को सदभ देय है । उपन्यासकार ने नायिका चदा कू पारस के रूप में चित्रित करयो है । बान जाकू छुप्रो है बाई कू सोनी बना दियो । सग मे मैं या उप यास कू खरी कचन पा रह्यो । मुदगल जी की पारस रूपी लेखनी ने याकू कचन बना दिया है, ऐसौ माय लग रह्यो है। कचन करत खरी मध्यकालीन लोक भाषा के अभाव की पूर्ति- राजस्थानी जैसी लाक भाषा अरु ब्रज जसी साहित्यिक भाषा मे पद्यमय काव्य सृजन की जितेक लम्बी परम्परा रई है अरु काव्य साहित्य जितेक विपुल रह्यो है बितेक गद्य साहित्य नाय रह्यो । वार्ता साहित्य (84 अरु 252 बस्नवन की वार्ता आदि) अरु पुरानन या योग वसिष्ठ जसे प्राचीन ग्रथन के अनुवादन तकई बजभाषा को गद्य साहित्य सीमित हो । याही सों व्यक्ति व्यजक निवध लघु कथा, व्यग्य विनोद उपयारा जसी गद्य विधान को लोक भाषा अरु मध्य कालीन साहित्यिक भापान में अभाव रह्यो । या अभाव की पूर्ति ऐसे उप यास ई कर सकिगें। हिदी मे आचलिक उपल्यासन की एक लम्बी परम्परा रही है । श्री फणीश्वर नाथ रेणु जैसे लेखकन ने अपने अपने छेत्र की सस्कृति अरु भाषा को पूर्ण प्रतिबिम्ब लिए भए जो उपयास लिखे बिनसों श्री रेणु ने हिदी साहित्य में अपनी अलगई पहचान बनाई । वे ई उपयास आचलिक भापान म लिखे जाते तोऊ विन की उत्कृष्टता अरु पहिचान अलग ई होती । है सक बिनकी ख्याति इतेक नही है पाती है सके बिनको प्रचार व्यापक छेन मे नहीं है पातौ किन्तु भावनान की तीव्रता अरु लेखनी की धार तो वैसी ही रहती। कचन करत खरौ समसामयिक आचलिकता को सौदय । स्यात इन सब दृष्टिकोणन सो मुदगलजी ने आचलिक उपन्यास हिदी मन लिखि के आचलिक भाषा म यानी बाई अचर की भाषा में लिखिवी अधिक पसद कियो । या उप यास की दो विससता विसेस उल्लेखनीय हैं । एक तो याकी आचलिकता अरु दूसरी सम सामयिकता। कचन करत खरो 133 - . राजस्थान के प्रजभापी अचरम परी भई एकछारी की प्रेरक जीवन यात्रा उपयास म चित्रित है। बाकी साधना, कर्मठता, प्रतिभा, लगन, त्याग तपस्या कोई, ई परिणाम निक्सौ के यान अगली तीन पीढीन तक अपनी तपस्या की जगमगाती ज्योति को उजियारी रेखा विखेरी । या अचर के सामाजिक रीति रिवाज, समस्या, अर अच्छाई तुराईन को उप यास भै भली भाति वरमन भयो है। पैनो प्रसग "राजस्थान की छोरी' सो सिरू भयो है । या तरिया तो प्रारम्भ मई मुगलजी ने राजस्थान अरु अभापा के अटूट सम्बध की सरस सरल अरु सफल पाकी कराई है। आचलिक प्रभाव के सगई उपन्यास माहि समसामयिक स्थितीन को बडौं अच्छी प्रतिफलन है । राजनतिक गतिविधि, सामाजिक कुरोति बरु परम्परागत रुढीन के कारन महिलान कू मिलिबकारे कष्ट, रुढीग्रस्त समाज को दरियानूमी मान्यतान अरु उन रूढीन को तोरिवे को माहम यो अकुर फूटिवो इन सवन को सूधो सांची प्रतिविम्न पाम दखिय कू मिले है। याके मगई आधुनिक युग के आगमन की झाकी समाज सुधार की संभावना याम उजागर भई हैं । लेखक नासावादी है या ही धो निरासावादी अरु धूमिल चित्र प्रस्तुत नाय किए हैं। कुरीतीन के निवारण अरु दीन के सुधार सो समाज सुधारक अरु लगनसील मास का तरियां सौ धुप अधियारे म उजियार को किरण फला सके याको असरदार तानो वानी उप पाम म पूरी गरी है। चदा अरु घकोर को अ तजातिय ब्याह नवयुवक मंडल सौं वाको समथन, कालेज जीवन बरु प्राम राजनीति के सध्यत्र के होते भए हूँ लक्ष्य की दी और प्रगति सब कडू यथाथ अराइस को समन्वय करत भए चले हैं । अखीर में कर्मठता सकल्प अरु निस्ठा का जीत होय । जेई लेखक को स देस प्रतीत होय । तम्छेदार कहावत अरु आंचलिक मुहावरेन को सटीक गुम्फन- कथानक के सग सग चरित्र चित्रन अरु सिल्प हू सृजनात्मन उत्पष्टता लिए भए है। लोक भापा को टटकापन तो सलो मे होनी मुभामिक हती ई औ। लखकन प्रामवासीन के मुख सो कही जावे वारी लच्छेदार कहावत जरु आचनिक मुहावरन को सटीक गुम्फन किया है। कथानक के चरितन म व्यक्ति अरु देस को मजीव वरनन करक लेखक न चित्रायमता पैदा करी है । सो को ये विसेसता या उर यास एक अच्छे उपयास की पक्तिम ला वठार । एक उल्लेखनीय वान ई है क कथानक में सुभाविक गति है जासौ पाठक उकताव नाहैं । सुनरता क सुखद भोर के पास म जो कछू है रह्यो है बाकी झाको राजस्थान के ब्रजभापी अचर म का तरिया परी है याको दसन या उपन्यास म स्वच्छ दरपन की भॉति देखी जा सक। या कृति को स्वागत प्रजभापी जनता राजी राजी करगी पाम नक सइनाए । उप यास के लेखक तो अभिनन्दन के पात्र है, कथा साहित्य के या सुमन सो ब्रजभारती को अचन करव बारी अकादमी हू जो याकी प्रामक है, बधाई की पाय है। निदेशक, भाषा विभाग-राजस्थान 1 134 कंचन बरत खरी व्रज अचर क सास्कृतिक परिवेस की रसमयी कृति कचन करत खरो डा सुरेद्र उपाध्याय जब नवऊ काऊ गद्य रचना 4 कोऊ काम करे तो अपन ताई जोखिम मोल ले। इत्तफाक ते बू जन कवि हू होय तो ई जोखिम औरऊ बढि जाय । ई सुखद अचरज की बात है के मुदगल वा जोखिम कू झेलते भए स्वय कू ऊपर राखवे म सफल भए हैं । वे उपन्यास में कविताई के चाव सौं मुक्ति पायक गद्य के सुभाव कू बनाय राखबे में गद्यकारको दायित्य निभाव सफल भये है । , व्रज बासीन के भाव-लोक को सफल चिनन- "कचन परत परो' उप यास कू मुद्गल आचलिक उपन्यास कहै हैं कथा सून डीग, मऊ भरतपुर अरू पिलानी तानू फले भये हैं । व्रज अ घर की जीवन सैली या उपन्यास में बखूबी ते उभर क पाई है। जाते आचलिक रचना धम की कथानक अरू चरित्र चित्रन मे एक अलग पहिचान बरवस मन कू भानदित कर है । या उपयास को महत्व जा कारन ऊ आको जाइगो क बू राजस्थान मे व्रज भाषा माहि लिखो भयो पलो उपयास है। जसी सरल सीधी सादी ब्रजभापा है बसे ही सरल सीधे ब्रजवासीन के भाव लोक कू 'मुद्गल उजाार करबे म सफल भये हैं । जगर मुद्गल की नजर ब्यौरान अरू स्थूल प्रसगन सौ हटिक भीतर की जोर धूमती तो चदा अरू चकोर रजनी अरू दिवाकर क नाम रूपकन म काळू नए सकेत भरे जा सक हे किन्तु लेखक को ध्यान बा माऊ कम गयो है । अरू बिना दाव पच के सीधे अरू सरल ढग सौ अपने क्या सूत्रन कू अरू बाम सास लते, मघर्ष करते लोगन कू स्थापित करौ है । अगरचे धूतता, धोखाधडी, चरित्र हीनता कू ई यथाय न मानो जाए तो या उपायास को यथाथ मानवता के साक्षात को यथाथ रूप मानी जा सक। थोरै मे मौत फहनो उपयासकार को अतिरिक्त सूक्ष आदमियत की जो वतनी लेखक ने या उपयास म गढी है वू मन बदल अम् मानवता में आस्था की वतनी है । समस्या- तरजातीय ब्याह, दहेज प्रथा, पिछडीपन अरू गरीबी ही हैं । एक खास अथ म इन समस्यान पै जाज को पाठक इतनी उद्ग्रीव नई होनी चाहै तोऊ मुनष्यता के रिस्ते भरू समाजिर सद्भाव के सदभ में ये समस्या वर- बेर उठनी रहिंगी । चदा के माध्यम सौ या समूचे उपयास कू लेखक ने सघप गाथा ये प म चित्रित करनी चाही है। प्रादमी प विपत्ती आब जिनसों बु टूट जावे तबई कोऊ दायित्व प्रेरना, कोऊ क्तव्य बाए सघप के ताई सतत क्यिासील करदे है । चदा माना याही विचार को प्रतिस्प है अरू जा तरिया वू कबहु न थकवे वारे जीवन के कचन करत खरी 135 प्रतीक रूप म चित्रित है पाव । जि सफलता लेखक को निर्विवाद है, पर तीन पीढीन की क्था उठायदे में उप यास कूजा वहत्तर कलेवर की दरकार होय है यासों क वाम चित्रित चरित्र अपनी समूची प्राकार अरू विकास पाय सर वाये ताई या उप यास म कम अवकास बच पाव है। दिवाकर अरू रजनी के चरित्र व्यक्तित्व तो लेखकीय वाक्यो क्तीन के अधिक आस्रित रहे हैं । कम छत्र सौं विनकी तस्वीर पछु कम अभर पाई है। वू एक पीढ़ी को व्यक्तित्व मरू कथा सूत्र को विकास है। लगभग दुई सिल्प के स्तर प दूसरी पीढी के व्यक्तित्व व कथा मूत्र को पर्याय है गयो है । यासों औपन्यासिक ढांच फोऊ सिल्प कौशल वाकी विसिस्टता कू रेखाकित नाय कर पायो । लेकिन ईऊ हाय क अतिरिक्त सिल्प कौसल के चाव सों या उप यास की सादगी बची रह जाय है जो अखीर तक या कृति की ताकत ऊ है । पर ध्यान राखये की मूल वात जि है के थाडे म भौत कछू कहकै लेखक ने अपने औप यासिक कौसल की छाप पाठक के चित्त म परोक्ष रूप सौ छोडी है बू प्रससनीय के सग-सग लोक मे रची पची भाषा म बखूवी ते उतरने के कारन जनुकरनीय एव प्रेरनाप्रद बन गई है । मैं याकू लेयक की जीप यासिक कला की अतिरिक्त सूझ नाम देनो ज्यादा उचित समझू हू । ब्रज के ठेठ आचलिक जीवन को सांस्कृतिक निचोड ब्रज अ चर के सास्कृतिक परिवेस को सफल निचोड मुद्गल या पयास मे जा भावना लोक को सृजन कर वाम बिनके चरित्र, सदभाव अरू सेवा भाव के प्रतीक बन जाए याम कोऊ बुराई नाय । रचना मे बुराई तबई आव है जब सद्भाव अरू सदासयता परिस्थितीन के साक्ष्य सौं वचित है जाय है। दरअसल चरित्रन में पनपे द्वन्द्व अरू परिस्थितीन की विसमता सों जब सदासयता उग है तब बाकी प्रामाणिक्ता असतिग्ध होय है । मुद्गल भावुक चित्रन के चलते या माऊ सटीक ध्यान दे है । लेकिन पाठक याए नोट कर क मुद्गल को जि पलो उपयास है अखीरी नाए अरू ब्रजभाषा मे गद्य रचना की कठिनाई कू जो लोग समझ है । व्रज के लोक मुहावरे सौ जो लोग परिचित है लेखन म अरू बेऊ रचनात्मक लेखन मे रचना सदभ मे लेखक की कठिनाई कू चीन सक हैं । अलबत्ता जि कहवे की जरूरत समयी जाइगी क मुद्गल न यदि इन तीन पीढीन के सघप म राजनीतिक यथाथ प्रस्तुत करिब म सफलता पाई है यामे दो राय नाय है सक। लेखक ने ब्रज के जाँचलिक जीवन विसयक कछू सास्कृतिक परिवेस के लालित्य को निचोडऊ या कृति म प्रस्तुत कर्यो है । यथा ब्याह के औसर के मगलगीत भात गीत, बढार के औसर प गायवे बारी रसीली गारी भात नौतबी दाहद के गीत या सगई व्रज के अनुपम पव, होरी के रसीले रूप की एक यलकऊ लेखक ने याम दिखायवे की कोसिस करी है। दुस अरू पीडा मेऊ ब्रज की मिठास भावुकता अरू सरसता ब्रज छन की अपनी निजी विसेसता है । मुदगल के चरित्र दुख अरू पीडा कू है । स्यात मुद्गल कू हू यई सर्वाधिक प्रिय है। येई दू आस्था है जासौ खोट मिल्यो हक वाए बनाए रखे 136 कचन करत घरी 'कचन' खरी है उठे हैं पारस सौ सरक में मायक कोऊ हू धातु कचन में बदल जाए है लेकिन खरो कचन हूँ काऊ के सरक मे आई वस्तु 4 अपनो आलोक बिखेरे है । मुदगल के नरित्र चाहै चना हो या चकोर हो दिवाकर हो या प्रभात हो ऐसोई आलोक बिखरवे वारे चरित्र है। हिदी उप यास मे सस्थान के माध्यम सो मुनस्बता के निर्माण अरू परामश की आस्था रही है। प्रेमचद को 'सेवा सदन' सस्था खुलवाम, फणीश्वर 'लोकनाटय" कू मच वनौहैं । मुद्गलऊ कही याई आस्था सो जुडक विद्यापीठ को निर्माण कर हैं। दृस्ट बनावें हैं अरू बेर बेर ईमानदार अरू सेवा भावी लोगन को गुहार हू करे हैं। दरअसल आज जो कछु है इतेक कुरूप, इतेक विकृत है के बाके ऊपर कोऊ रचना ठाडी करनी है तो वा विकृति सो ऊपर उठिनो होयगो । मुद्गल अपने या औपन्यासिक सस्कार में बाई विकृति सौ ऊपर उठने की कोसिस मे है। पाठकन कू काऊ स्तर पवू अव्यावहारिक लग सक है । हा आस्था के स्वर प बाए जीवे की ललक मुनुस्यता की क्सोटी है । मुनुस्यता म जिन लोगन की आस्था है वे मुद्गल के संग हू गे। किस्साकोताह जि है के राजस्थान की धरती प गोपाल प्रसाद मुद्गल ने देस के पाच करोड लोगन की जबान ब्रजभाषा में उप यास लिखक ब्रजभूमि के मुहावरे, लोकोक्ती को जगै जग सफल प्रयोग के सग व्रजभूमि की आचलिक जन जीवन, धात प्रतिधात को सफलता पूर्वक 'कचन करत खरो' में उतारबे को जो प्रयास कोनो है बाकी मै तारीफ करू हू . बजमाषा अकादमी ने स्थायी महत्व को काम कीनौ है । मैं या उप यास के लेखन के ताई मुदगल कू साधुवाद दंऊ अरू ई मान क चलू हू के जि विनको प्रखीरी उपयास नाय अरू राजस्थान माहि ब्रजभापा में पले उपन्यास के पाठक की नाए स्वागत करू हू । राजस्थान ब्रज भाषा अकादमी ऊ याके सा भारी प्रससा की पात्र है के इतेक जल्प समय मे बाने ब्रज गद्य की विभिन्न विधान मे दूढ के लेखक उत्पन कीन है अरू नये विसयन प नये साच के सग लिखवायो ह । 'कचन करत सुरो 'याको ज्वलत प्रमाण है। ब्रज भाषा अकादमी जा वात के लय सुधीजन की प्रससा पाती रहेगी क वाने रास्ट्रभाषा के समाना तर ब्रजभाषा मे साहित्य को विविधविधान कू प्रकाशन देके स्थायी महत्व को काम कियो ह । अस्तु । अध्यक्ष हिदी विभाग जोधपुर विश्वविद्यालय जोधपुर 1142/ जाज कचन करत खसे 137 नोको करनी को नीको उपन्यास मोहन लाल मधुकर 'कचन करत खरी' उपयास को कथानक व्रज सस्कृति पूरी तरियां उजागर करिवे वारी है। भैया गोपाल प्रसाद मुद्गल ने या उपयास माहि हमारी भाजु की समस्यान के सरूप के सग सग बिनको साचो समाधान हू प्रस्तुत करि दीनौं है । विनें इन समस्यान के अतीत, वतमान अरू भविष्य तोनू न सो जोरिके व्यापक बनायो है, समाज की नई नई हलचलन को जीतो जागतो दिगदसन कराया है। लेखक को सबते जादा ध्यान सामाजिक कुरीतीन प प्रहार करिब प रही है । हमारे देस कू खोखली करवे वारी कुरीतीन की दीवार याम एक मग अहिमें गिरि परी हैं। जवला नही जाइवे वारी नारी • लेखक ने पूरी तरियां सबला सिद्ध करि दीनो है। उप यास की नायिका पटा प विपदान के पहार प पहार दूटि परे परि दु अपने कम पथ त नेकऊ टस ते मम नाइ भई। चदा अपने जनम त लके जोवन अरू बुढापे ताने धियार कू पीके उजियारो लामती रही। कम अरू भाग्य को द्वन्द या उप यास मॉहि बड़ी वारीको अरू खूबी सौं दरसायो गयो है । अत मे कम को मौन मुखरित भयो है। चदा अपने आचरन ते ऐसी मारग दिखामती रही जाप चलिबे ते भाग की ठौर करम की महिमा सबक घट म बठि जाइ। चदा को ऐसौ ऊजरी आदस है जो भारत की नारीन • अपने पामन पै ठाडी करिक कम पथ प जरूर अग्रसर रगी। जि उप यास मानुस जीवन को सार बताइक वाय पाइवे वी मृधी साधी राह दिखाइवे बारी है। उपयास की पूरी कथा या अचर के कहावत मुहावरेन के तान बानेन ते बुनी गई है। मोइ जि कहिब म नेकऊ हिचक नाइ कि जि आचलिक उप यास व्रज लोकोक्ति, मुहावरे अरू सबदन को भरोपूरी पिटारी है । या रोचक उप यास के सिल्प अरू सवादन माहि प्रजभापा को माधुय अरू लालित्य सहज हए सौ छलक्यो पर है । 28 फरवरी 1983 कू कामयन के बिहारी समारोह के औसर प ब्रजभाषा के सबल बम धी युगलकिशोर चतुर्वेदी ने ब्रजभाषा Tद्य माहि साहित्य रचिव को जो चुनौती दई बु मुद्गल जो न सिरमाय लई अझ वाइ दिना वि में या उपायास लिखिबे को भीडा उठायो। ब्रजभाषा गद्य माहि कहानी, रुपक रेयाचित्र सस्मरन रिपोतजि, यात्रा बनन, निव ध जर वार्ता साहित्य तो खूप लिप्यो जाइ रह्यो है परि उपयास लिखिव को मुद्ग। जो को जि अनूठी प्रयाग कितनी सफ्ल है याय पदिय वार ही बतामिंगे। मरी समा म तो जन-मन को जीवन सफल परिव को सदेसी व वारी नीको करनी यो जि नीको उप याम है। 16, आदश कोलानी भरनपुर (राज.) 138 कचन करत परी “कचन करत खरौ औपन्यासिक कचन 1 डा विश्वम्भर नाथ उपाध्याय श्री गोपाल प्रसाद मुगदल सो ब्रजभाषा को साहित्यिक जगत सुपरिचत है। 'कचन करत खरो' उप यास सौ श्री मुद्गल ने एक औप यासिक कचन' की रचना कीन्ही है। क्ला की चमचमाहट चाए कम होय, परि खरोपन पूरी है। मोय पासा है के मुद्गल जी आगामी उपन्यास मे कलात्मक चमक्ऊ लाइगे । 'कचन करत खरी माहि लेखक ने चन्दा की सिगरी जीवन कथा कही है अरु वथा को द तीन पीढोन तानू तानो वानो दुनो है। याते उपयास कथात्मक नेरटिव ज्यादा है गयो है, चित्रात्मक कम । किस्सागोई सो लेखक पात्रन के अनमन को उत्खनन कम कर पायो है ध्यान कहानी कहबे 'फरि का भयो ' पर रह्यौ है । अत मनोवग्यानिक गहनता की कमी उप यास कू पारम्परिक बनाय दे है । लेखक ने पावन के व्यक्तित्व, प्रतिभानन अरु ढांचेन कू पूर्व निस्चित कर लोनी है । दू आदस चरित्र या Ideal Types की सष्टि करनी चाहे है अरु वाम वाय पूरी सफलता मिली है। चन्ता के द्रीय पान है जाके आदर्सीकरन कू लेखक ने बाय दुघटना के माध्यम सो विधवा बनायके वाके समूचे जीवन के दायित्वन को नर तय द दीनो है जात बू जपने तपस्थी जीवन सौ निभावे है अरु वू उत्तरदायी गहस्वामिनी की भूमिका को भव्यता कू चरम सीमा पं पहोचावे है । घरेलू जीवन के विम्ब अरु बातचीत मन कू मोहित कर ले है- पर, प्रौपयासिक कचन • दुघटना को सहारी लेनी जरूरी नाय हो । नाटकीयता क काज ग्रामीन जीवन के द्वद अरु बदलते विकत होते सवध-परिदृश्य बर विसगतीन म गहरे उतरव बिनको चित्र देवे ते ई उप यास मे मास्वरता आ जाय अरु नवीनता । तथापि जा रूप म लेखक न चदा अरु वाके पति वाको सतान परपरा कू प्रस्तुत कोनो है वू म्वाभाविक रु सहज लग है। दूसर या रचना म पावन म ग्रामीनता के मौतरे प्रामानिक रग ढग है। विनवू लेखक वा (चदा कू छाउक) या टिपिकल पात्र बना सके हो अरु जि कोसल मामूली नाय । जाके काज लेखक म जा पावन सुभाव को परिवेच्छन चइये वू लेयर म है । तबई वू चन्य चकोर, चोखेलाल, रग्गी पडित राधा जसे पारन को चित्र दे सकी है। एसौ है के नगर जीवन समाना तर अरु सग में क्षु विदुन प भरतपुर प्रमग। टकरातो भयो ग्रामीन चिथापन, प्रकृति अरु परलू जीवन के विम्ब एव बातचीत के बांक अन्दाज मन कू माहित कर ल है । वस्तुत लेखद की सवाधिक सफलता पान की अवधारना (Conception), पिनको ग्रामीन पि चियन म मिली है। पचन करत परी 139 ठेठ बज बोली को पूरी रस वास्तविक जीवन की सरस झांकी- भरु लेखक प्रचलित मे वाई गाम को ठेठ व्रज बोली को पूरी रस ल लक प्रयोग कर है। अकेलो ये प्रसग उपन्यास कू पठनीय वनाचे कू पर्याप्त है। चौके आधुनिकता मे ऊबे डूबे अतिशिक्षित, प्रशिक्षित महानगरीय पाठक जब या तरियां की रचनान कू पढ़ है तो वू ई विरोधी रग उभर है गोया जम्स ज्वॉयस को 'यूलिसिस' कापका को दुग' पढ़वे के पाछ आधुनिक जीवन की जटिलता सो व्याकुल सूरदास, मीरा, देव ग्वाल, अरु गोपाल प्रसाद मुदगल कू पढक लोकभाषा की अकृत्रिम बोली बानी 4 मुग्ध है रह्यो होय । या दष्टि मौऊ गोपाल प्रसाद मुदगल की जि रचना कलात्मक प्रयोग की जटिलता सौ रहित है, पर वाम प्रकृत, वास्तविक जीवन की ऐसी सरल झावी है के वाय पढते समय सहज मनुष्यता को रूप अफ रस उभरे है। अकादमी प्रबध फौसल की प्रससा करू -- मैं समझू हू के श्री गोपाल प्रसाद मुद्गल ब्रजभाषा के साहित्य म उपन्यास की कमी के पूरी कर रहे हैं। अत सुरू के प्रयत्नन को महत्व है जाय है । व्रज भाषा म कविता की परपरा अद्वितीय हैं पर बामे आधुनिक विधान को अब सुभारभ है रह्यो है । या दृष्टि मी डा. विष्णु चद्र पाठक अध्यक्ष राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी को मैं प्रससा करू हू क विनकी प्रेरना अरु प्रवध कौसल सौ ई आसा बध रही है कि ब्रज भाषा आधुनिक अरु समकालीन 'सजन एव चित्रन के छत्र में अन्य भारतीय भापान की प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रहेगी अर अपनी प्रनत सजनात्मक छमता के कारन ब्रजभाषा एक वेर पुन बूई स्थान महत्व अरु महिमा एक मूल्यवत्त प्राप्त करेगी जो मध्ययुग में बाय प्राप्त ही। राजस्थान की अतरात्मा डिंगल अरु अरु पिंगल की धूप छह सौ बनी है। प्रत राजस्थान को आन्तरिक न्यक्तित्व राजस्थानी अरू बज भाषा एव अय बोलीन के साहित्य अरू सस्कृति सौं समृद्ध हायगी। श्री गोपाल प्रमाद मुद्गल को जि उप यास याई दिसा मे पलो कदम है जो स्वागत योग्य हत । गगाप्रयाग ड/25 जवाहर नगर जयपुर। 114121 JIS192 कपन परत परी

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AV "कवन कर खरों' उपन्यास में प्रज की सस्कृति र भैया गोपाल प्रसाद मुद्गल ने पूरी तरियां उजागर कीनों है। लखक न उपन्यास माहि हमारी आज की समस्यान का सरूप क सग सग बिनको साचों समाधानऊ पातुत करवे को अतीत, वतमान अरु भविस्य क ताने बानन क सग उल्लखनीय प्रयास कीनों है। समाज की नइ-नड हलचलन कों जीता जागतो दिग्दसन याकी अपनी एक अलग विससता है। सामाजिक कुरीती एव कम अरु भाग्य को उद या उपन्यास में बड़ी बारीकी अरु खूबा सौ दिखायो है। पूरी कथा वन अचल कहावत मुहावरन क ताने बान त बुनी भड है। माय जि कहब में नेक हिवक नाय कि जि आवलिक उपन्यास प्रज- लाकोक्ति अरु मुहावरेन को भरा-पूरों पिटारो हैं। शिल्प अरु सयादन में यज भाषा को माधुय अरू लालित्य सहज रुप सौ छलक्या है। Hal मोहन लाल मधुकर, भरतपुर SajTIODS

Kanchan Karat Kharao

Author
Gopal Prasad
Title
Kanchan Karat Kharao
File name
Kanchan Karat Kharao
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2011/03
Publisher
Rajasthan Braj Bhasha Akadami Tilak Nagar Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
163
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551171
Barcode
4990010031939.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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G6fj8ZAb2UE
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