Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Nama Mala
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ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला [ संस्कृत ग्रन्थाङ्क
NHIYAMANNAMAMINAINMMYHINMAYANMAMImy
महाकवि धनञ्जयविरचिता
नाममाला
अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता
अनेकार्थनिघण्टुः एकाक्षरीकोशश्च
MAMATALA
सम्पादक
पं० शम्भुनाथ त्रिपाठी व्याकरणाचार्य, सप्ततीर्थ
भारतीय ज्ञानपीठ काशी
म
Hy
प्रथम आवृत्ति
१००० प्रति
चैत्र, वीरनि० सं० २४७६
वि० सं०२००७
अप्रैल १९५०
{ साडे तीन शपये
मूल्य
साढ़े तीन रुपये
भारतीय ज्ञानपीठ काशी स्व० पुण्यश्लोका माता श्री मूर्तिदेवी की पवित्र स्मृति में तत्सुपुत्र सेठ शान्तिप्रसाद जी द्वारा संस्थापित ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला इस ग्रन्थमाला में प्राकृत संस्कृत अपभ्रंश हिन्दी कन्नड तामिल आदि प्राचीन भाषाओं में उपलब्ध आगमिक दार्शनिक पौराणिक साहित्यिक और ऐतिहासिक आदि विविध विपयक जैनसाहित्य का अनुसन्धानपूर्ण सम्पादन, उसका मूल और यथासम्भव अनुवाद आदि के साथ प्रकाशन होगा। जैन भंडारों को सूचियाँ, शिलालेख- R693 संग्रह, विशिष्ट विद्वानों के अध्ययनगन्थ और लोकहितकारी जैन साहित्य गन्थ भी इसी ग्रन्थमाला में प्रकाशित होंगे। ISUA 4372/ Gar ग्रन्थमाला सम्पादक और नियामक (संस्कृत विभाग) प्रो० महेन्द्रकुमार जैन, न्यायाचार्य, जैन-प्राचीनन्यायतीर्थ, आदि बौद्धदर्शनाध्यापक संस्कृत महाविद्यालय हिन्दू विश्वविद्यालय काशी संस्कृत ग्रन्थाङ्क ६ प्रकाशक- अयोध्याप्रसाद गोयलीय मन्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ काशी, दुर्गाकुण्ड रोड, बनारस सिटी मुद्रक-पं पृथ्वीनाथ भार्गव, भार्गव भूषण प्रेस, गायघाट, काशी । विक्रम सं० २००० । स्थापनाद फालान कृष्णा९ वीर नि० सं० २४७० सर्वाधिकार सुरक्षित १८ फरवरी १९४४
नाममाला
'ता:
स्व० मूर्तिदेवी, मातेश्वरी सेठ शान्तिप्रसाद जैन
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NAMAMALA With the riti. eft Full नामः BO BHARATIYAJNANA PITHS ANA-PITHA MOORTI DEVI JAIN GRANTHAMÁCA SANSKRIT GRANTIIA No. 6 BY MAHAKAVI DHANANJAYA BHASHYA 774 or AMARAKITI AND Tlc Anckartha nighantu and Ekakshari Kosha भारतीय ใน) angit +1.2 पुस ताना अर्हम. EDITED WITH NOTIS By Pt, SHAMBHU NATHA TRIPATHI Vyakaranacharya, Sapta Tirtha 1 Published by BHARATIYA JNANA-PITHA KASHI irst Edition '00 Copics. CIIAITRA, VIR SAMVAT 2-176 TIKRANA SANTAT 2007 APRIL 1950. Price Rs.3/8 BHARATIYA JNANAPITHA KASHI Founded by SETH SHANTI PRASAD JAIN In memory of his late benevolent mother SHRI MOORTI DEVI JNANA-PITHA MOORTI DEVI JAIN GRANTHAMALA In this Granthamala critically cdited, Jain agamic, Philosophical, Pauranic literary, historical and other original texts available in Prakrit, Sanskrit, Apabhransha, Hindi, Kannada, Tamil Etc. will be published in their respective languages with thcir translations in modern languages AN) Catalogues of Jain Bhandaras, inscriptions, studies of competent scholars and Jain literature of popular interest will also be publishea. GENERAL, EDITOR OF THE SANSKRIT SECTION Prof. MAHENDRA KUMAR JAIN VY.YACILARYA, JAIN-PRACHINA NYAYATIRTILA Elc. Professor of Bauddha Darshana, Sanskrit Mahavidyalaya Banaras Hindu University SANSKRIT.GRANTHA No. 6 Publisher AYODHYA PRASAD GOYALIYA SECY. BHARATIYA JNANAPITHA KASHI DURGAKUND ROAD, BANARAS CITY. Founded in Falguna Krishna 9, Vir Sam. 2470 All Rights Reserved Vikram Samvat 200 18th Feb. 1944.
FOREWORD with a very The Bharatiya Jnanapitha, Banaras, founded by Shri. Shantiprasad Jain to perpctuate the memory of his mother Murtidevi, lias undertaken an ambitious plan of scholarly publications dealing with all aspects of Ancient Indian Culture broad outlook and vision, and has already issued a few worksinvarious languages such as Snskrit, Prakrit, Pali ctc. The undertaking has secured a lcarned scholar of proved ability in Pandit Maliendra Kumar, Nyayacharya, of the Sanskrit Mahavidyalaya of the Banaras Hindu University as a General Editor. The Jnanapitha has alrcady published a few works and has a number of others in active prcparation. The present volume contains two small works of the famous lexicographer Dhanamjaya. The first is called N AMAMAL A, a collection of synnonymns, while the other is called ANEKARTHA-NAMAMALA, recording words with plurality of senses. The first work contains just 200 stanzas, while the other is smaller still. The inost important feature of the first work is that it publishes for the first time the Bliashyas of AMARAKIRTI, who gives etymological explanations of cach and every word in the work, and adds a few more synonymous words from his own observation. His Bhashyas follows the same methods as are used by Ksairasvamin in his famous commentry on AMARAKOSA The entire work is very carefully cdited with appropriate references to authorities by Pandit Shambhunath Tripathi, a Saptatirtha and also a Vyakaranacharya reputc. On reading his foot-notes, I often felt that Pandit Tripathi excels the Bhsyakara both in ingenuity and accuracy, nay, I would further and say that liis ctymological explanations are happicr still. I am sure the scholars will admirc his work in the foot-notes. The volume is further cquipped with several indexes. They include naturally the word-indexes of both the works edited, but there are in addition index recording additional words from Amarakirti's Bhasya, a list of Yaugika words, a list of works and authors cited and a list of quotations cited in the work, all this being done by Pandit Mahadeva Chaturvedi, Vyakaranacharya. In fact the cditorial part of the volume is as thorough as is humanly possible, and I have nothing but high admiration for the ability of Pandit Mahendra Kumar, the Gcncral Editor, in sccuring such a team of scholars to produce this volume. go Banaras Hindu University 6th Scptember 1949. P. L. VAID Y A, M. A.; D. Litt, Mayurbhanj Professor and Head of The Department of Sanskrit & Pali. 11 प्राक्कथन (हिन्दी अनुवाद) अपनी पूज्य माता मूतिदेवीजी की स्मृति के लिए साहु शान्तिप्रसाद जी जैन द्वारा संस्थापित भारतीय ज्ञानपीठ बनारस ने विद्वत्तापूर्ण प्रकाशनों की एक उत्साहवर्षक योजना हाथ में ली है । प्राचीन भारतीय संस्कृति के विशाल दृष्टि व कल्पना वाले सभी अंगों का प्रकाशन इस योजना के अन्तर्गत हैं तया अब तक इस संस्था से संस्कृत, प्राकृत, पाली, आदि विभिन्न भाषाओं के कतिपय ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। इस योजना के सम्पादन के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत महाविद्यालय के सुयोग्य विद्वान् पं० महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य, प्रधान सम्पादक के रूप में प्राप्त हैं। ज्ञानपीठ से अब तक कई एक अन्य प्रकाशित हुए हैं और कई एक प्रकाशन के लिए तैयार हैं। वर्तमान ग्रन्थ में प्रसिद्ध कोशकार धनञ्जय की दो कृतियां सम्मिलित है। पहली नाममाला कहलाती है जिसमें पर्यायवाची शब्दों का संग्रह है और दूसरी अनेकार्य नाममाला, जिसमें अनेक अर्थ- वोधक शब्दों का संग्रह है। पहली कृति में २०० श्लोक है जव कि दूसरी कृति उससे काफी छोटी है। प्रथम कृति के सम्बन्ध में उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इस पर लिखा गया अमरकीति का भाष्य पहले पहल प्रकाश में आ रहा है। अमरकीति ने नाममाला के प्रत्येक शब्दों को व्युत्पत्ति देकर स्पष्टीकरण किया है और अपनी दृष्टि में आए कुछ और पर्यायवाची शब्दों को शामिल कर दिया है। उनके भाष्य की वही सरणि पद्धति है जो कि अमरकोश की प्रसिद्ध टीका में क्षीरस्वामी ने अपनायी है। सम्पूर्ण कृति का सम्पादन ख्यातनामा पण्डित शम्भुनाथ त्रिपाठी व्याकरणाचार्य सप्ततीर्य ने बड़ी सावधानी से तया प्रमाणों का उपयुक्त उद्धरण देते हुए किया है। उनकी टिप्पणियों का अध्ययन करने से, मुझे अनेक वार प्रतीत हुआ है कि पण्डित त्रिपाठी-युक्ति और शुद्धि दोनों में कहीं-कहीं भाष्यकार को भी मात कर गये हैं। इतना ही नहीं, उनके व्युत्पत्ति संबन्धी स्पष्टीकरण और भी अच्छे हैं। मुझे विश्वास है कि विद्वान् लोग टिप्पणी में त्रिपाठी जी के प्रयत्न की प्रशंसा करेंगे। ग्रन्थ में अनेक. अनुक्रमणिका लगा दी गई हैं। उनमें सम्पादित दोनों कृतियों की शब्द सूची का सम्मिलित होना तो स्वाभाविक ही है परन्तु इसके अतिरिक्त अमरकीति के भाष्य के अतिरिक्त शब्दों की सूची, यौगिक शब्दों की सूची, उद्धृत ग्रन्थ और ग्रन्थकर्ताओं की सूची तथा ग्रन्थ में उद्धृत वाक्यों की सूची भी सम्मिलित की गई हैं। यह सब पण्डित महादेव जी चतुर्वेदी व्याकरणाचार्यने किया है। सचमुच में ग्रन्थ का सम्पादकीय भाग उतना पूर्ण बना दिया गया है जितना मानवी शक्ति से संभव था । और इस सव के लिए में प्रधान सम्पादक पण्डित महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य की योग्यता की सराहना करता हूं जिन्होंने ऐसे ग्रन्य के प्रकाशन में इस प्रकार की विद्वन्मण्डली को एकत्रित किया है। . काशी हिन्दू विश्व विद्यालय ६ सितम्बर, १९४९ पी० एल० वैद्य एम० ए० डी० लिट मयरभंज प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, संस्कृत पाली विभाग। ..... ग प्रस्तावना : :.1 श्रोरो "शब्दब्रह्मणि निष्णात परब्रह्माविगच्छंति"-ब्रह्मबिन्दु शब्दब्रह्म में पारंगत व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्ति कर सकता है। यह सिद्धान्त 'इस बात को सूचना देता है कि साधक को पहिले शब्दशक्ति और उसकी मर्यादा तथा भाव का ज्ञान आवश्यक है। यदि उसे शब्द के वाच्यार्थ भागर्थ और तात्पर्थिको प्रक्रिया का बोध नहीं है तो वह भटक सकता है। वस्तुतः शब्द भावों के टोने का एक लंगड़ा वाहन है । जब तक संकेतग्रहण न हो तब तक उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं है। एक ही शब्द संकेतभेद से भिन्न भिन्न अर्थों का वाचक होता है । इसीलिए दर्शनशास्त्रों में एक पक्ष यह भी उपलब्ध होता है कि शब्द केवल वक्ता की विवक्षा को सूचित करते हैं, पदार्थ के वाचक नहीं हैं। 'घट' शब्द का संकेत वक्ता ने जिस रूप में जिस श्रोता को ग्रहण करा दिया है उसी अभिप्राय का द्योतन वह शब्द उस श्रोता को करा देगा। शब्द विद्यमान अर्थ को भी कहता है और अविद्यमान को। एक खरविषाण भी शब्द है जिसका अखंड वाच्य पदार्थ इस संसार में नहीं है और घट शब्द भी है जिसका वाच्य घड़ा मौजुद है। अतः शब्द के सम्बन्ध में यह निश्चय करना कि-यह शब्द अर्थवाची है और यह अनर्थवाची-टेली खीर है । फिर भी शाब्दिकों ने यह प्रयत्न किया है शब्द के सार्थकत्व और अनर्थकत्व का विवेक हो जाय। उसका मुख्य उपाय है शक्तिग्रह या संकेतग्रहण । जिस अर्थ में जिस शब्द का संकेतग्रहण होता है वह उस अर्थ का वाचक हो जाता है। यह संकेत कब किसने ग्रहण कराया इसका निर्णय कठिन है। ईश्वर को संकेत ग्रहण कराने के लिए घसीटना श्रद्धा की वस्तु है। इसका इतना ही अर्थ है कि वृद्धपरम्परा से शब्द संकेत का ग्रहण बराबर होता आया है और वह अनादि है । उसमें विशेष हेर फेर होकर भी सामान्यतया संकेत को परम्परा अनादि है। जब से यह जीव है तभी से शब्दसंकेत है । इस संकेतग्रहण के उपाय निम्न लिखित हैं:-- "शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च । वाक्यस्य शेषाद् विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः ॥" अर्थात्--व्याकरण, उपमान, कोश, आप्तवाक्य, व्यवहार, वाक्यशेष, विवरण और प्रसिद्ध शब्दके सान्निध्य से संकेत ग्रहण होता है। इनमें व्याकरण से यौगिक शब्दों का व्युत्पत्ति द्वारा संकेत ग्रहण हो भी जाय पर रूढ़ और योगरूढ़ शब्दों का संकेत ग्रहण व्याकरण से नहीं हो सकता। अन्ततः कोश ही एक ऐसा उपाय बचता है जिससे सभी प्रकार के शब्दों का संकेत-ग्रहण हो जाता है। कोश अर्थात् खजाना या भंडार। व्याकरण से सिद्ध या वृद्धपरम्परा से प्रसिद्ध कैसे भी यौगिक रूढ़ या योगरूढ़ आदि शब्दों का अनेकार्थ के साथ संग्रह कोश में होता है। भाषा वही समृद्ध और जीवित समझी जाती है जिसका शब्द भंडार पर्याप्त हो और जिसमें व्यवहार और परमार्थ के लिए उपयोगी सभी शब्द विद्यमान हों। जिसमें अन्य भाषाओं के या विदेशी शब्दों के पचाने को या उन्हें स्व-स्वरूप करने की सामर्थ्य हो। इस दृष्टि से संस्कृत भाषा उतनी समृद्ध नहीं बन सकी। इसका कारण यह रहा है कि इस भाषा पर एक वर्ग का प्रभुत्व रहा और उसने इसको पाचन शक्ति को धर्म अधर्म के कल्पित बन्धन से जकड़ दिया था। उस वर्ग ने उस युग में प्रचलित अपभ्रंश और प्राकृत बोलियों का जो उस समय को जनवोलियां थीं उच्चारण करना पाप घोषित किया था। फिर भी संस्कृत की जो प्रकृति प्रत्यय उपसर्ग आदि के योग ते शब्दोत्पादन शक्ति थी . ८ नाममाला उसीके कारण यह बन्धनबद्ध होकर भी विद्वद्भोग्य अवश्य बनी रही। संस्कृत को लोकभाषा का पद या सबकी बोली होने का सौभाग्य नहीं मिल सका । इस भाषा सम्बन्धी धर्माधर्म विचार ने संस्कृत के कोशागार को भी सीमित कर दिया। भाषा के एकाधिकारियों ने तो यहां तक कह डाला है कि अपभ्रंश या अन्य लोकभाषा के शब्दों में वाचक शक्ति ही नहीं है। यष्टि का अपभ्रंश लट्ठी या लाठी है। ये लट्ठी या लाठी शब्द में वाचकशक्ति स्वीकार नहीं करना चाहते। इनका कहना है कि वाचकशक्ति तो 'यष्टि' शब्द में ही है । लट्ठी या लाठी शब्द सुनकर जो श्रोता को लाठी पदार्य का ज्ञान होता है उसकी विधि इस प्रकार है-प्रथम ही श्रोता लाठी शब्द को सुनकर संस्कृत 'यष्टि' शब्द का स्मरण करता है और फिर उस 'यप्टि' शब्द से पदार्थबोध होता है। अर्थात् ऐसे श्रोता को जिसने स्वप्न में भी 'यष्टि' शब्द नहीं सुना उसे भी लाठी शब्द से पदार्थ बोध के लिए संस्कृत 'यष्टि' शब्द का स्मरण आवश्यक है। इस भापाधारित वर्गप्रभुत्व से संस्कृत भाषा एक विशिष्ट वर्ग की भाषा बन कर रह गई। पा० महाभाष्य के पस्पशा आह्निक में लिखा है कि-"तस्माद् ब्राह्मणेन न म्लेच्छित वै, नापभापित वै, म्लेच्छो ह वा एप अपशब्दः।" अर्थात् ब्राह्मण को न तो म्लेच्छ शब्दों का व्यवहार करना चाहिए और न अपभ्रंश का हो। अपशब्द म्लेच्छ हैं। अपशब्द का विवरण भी वहीं यह दिया है--"यदि तावच्छब्दोपदेशः क्रियते, गीरित्येतस्मिन्नुपदिप्टे गम्यत एतद् गाव्यादयोऽपशब्दा इति ।" अर्थात्-गौ शब्द है और गावी गैया आदि अपशब्द हैं । यद्यपि भाषा को संस्कृत रखने के लिए व्याकरण का संस्कार आवश्यक है तभी वह एक अपने निश्चित रूप में रह सकती है, लिंग और वचन का अनुशासन भी इसीलिए आवश्यक होता है, परन्तु उसके उच्चारण में किसी जाति विशेष का या वर्ग विशेष का अधिकार मानने से उसकी व्यापकता तो रुक हो जाती है । नाटकों में स्त्री, शूद्रों तथा दासों से प्राकृत भाषा का वुलवाया जाना उक्त रूढ़ि का हो साक्षी है। इतना ही नहीं, धर्मक्षेत्र में साधु शब्द अर्थात् संस्कृत शब्द का उच्चारण ही पुण्य माना गया। इसका यह सहज परिणाम था कि धर्म का ठेका भी भाषा प्रभुत्व के द्वारा एक वर्ग विशेष को मिला । हुआ भी यही। धर्म का अधिकार और उससे आर्थिक सम्बन्ध एक वर्ग का हो गया। इस सम्बन्ध में मौलिक क्रान्ति महाश्रमण महावीर और बुद्ध ने की । उनने भाषा के इस कल्पित बन्धन को तोड़ कर जनभाषा में धर्म का उपदेश दिया और स्त्री शूद्र तथा पामर से पामर व्यक्तियों के लिए धर्म का क्षेत्र खोला। धर्म के उच्च पद के लिए जाति का कोई बन्धन इनने स्वीकार नहीं किया। इस भाषाक्रान्ति से प्राकृत भाषाओं का विकास हुआ। यह नहीं है कि प्राकृत भाषाएँ व्याकरण और लिंगानुशासन से मुक्त हों। उनके अपने व्याकरण हैं, अपने नियम हैं, जिनके अनुसार वे पल्लवित पुष्पित और फलित होती रही हैं। महावीर और बुद्ध के काल से लेकर ईसा की तीसरी सदी तक प्राकृत भाषाओं को गति मिलती रही। अशोक के शिलालेख प्राकृत भाषा में उपलब्ध होते हैं। शासनादेश प्राकृत भाषा में चलते रहे हैं। पुनः संस्कृत युग में इन भाषाओं की गति मन्द पड़ी। इस युग में जैन और बौद्ध आचार्यों ने भी ग्रन्यरचना संस्कृत में ही की । यही कारण है कि दोनों के विपुल साहित्य से संस्कृत का कोशागार भरा हुआ है। दार्शनिक क्षेत्र में उथल पुथल तो नागार्जुन दिग्नाग समन्तभद्र सिद्धसेन अकलंक आदि के ग्रन्थों से ही मची। तात्पर्य यह कि श्रमण परम्परा ने मध्यकाल में संस्कृत भाषा के विकास में भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया ।
प्रस्तावना M । - । -- प्रस्तुत ग्रन्थ- नाममाला कोश का एक सुन्दर और व्यवहारोपयोगी आवश्यक शब्दों से समृद्ध ग्रन्थ है। मही-:: कवि धनञ्जय ने २०० श्लोकों में ही संस्कृत भाषा के प्रमुख शब्दों का चयन कर गागर में सागर भर दिया है। शब्द से शब्दान्तर बनाने की इनकी अपनी निराली पद्धति है। जैसे पृथिवी के नामों के आगे 'घर' शब्द जोड़ देने से पर्वत के नाम, 'मनुष्य' के नामों के आगे 'पति' शब्द जोड़ देने से राजा के नाम, 'वृक्ष' के नामों के आगे 'चर' शब्द जोड़ने पर बन्दर के नामों का बन जाना आदि। इसपर अमरकोति विरचित भाष्य सर्वप्रथम प्रकाशित किया जा रहा है। इस भाष्य में प्रत्येक शब्द की व्याकरणसिद्ध व्युत्पत्ति सूत्रनिर्देश पूर्वक बताई गई है। उणादि से सिद्ध हो या अन्य रीति से पर कोई भी शब्द निव्युत्पत्ति नहीं रह पाया है। इन व्युत्पत्तियों की प्रामाणिकता के लिए महा- पुराण, पद्मनन्दि शास्त्र, यशस्तिलक चम्पू, नीतिवाक्यामृत, द्विसन्धानकाव्य, बृहत्प्रतिक्रमण भाष्य, महाभारत, सूक्तिमुक्तावली, शब्दभेद, अनेकार्थध्वनिमञ्जरी, अमरसिंह भाष्य, आशाधर महाभिषेक, नीतिसार, शाश्वत, हैमीनाममाला आदि ग्रन्यों तथा यशःकोति, अमरसिंह, आशाधार, इन्द्रनन्दि, क्षीरस्वामी, पद्मनन्दि, श्रीभोज, हलायुध आदि ग्रन्थकारों को नाम निर्देशपूर्वक प्रमाणकोटि में उपस्थित किया है। अनेक व्युत्पत्तियां तो अमरकीति की कल्पना के अच्छे उदाहरण हैं। यथा-- "म्रियन्ते क्षुद्रजन्तवोऽस्य स्पर्शेनेति मरुत्" अर्थात् जिसके स्पर्श से क्षुद्र जन्तु मर जाय वह मरुत् है। “न नन्दति भ्रातृजाया यस्यां सत्यां सा ननान्दा" जिसकी मौजूदगी में भौजाई खुश न हो वह ननांदा-ननद है। "यज्ञानां पशुकारणलक्षणानामरिः यज्ञारिः" अर्थात् पशुयज्ञ का विरोधी महादेव हैं । आदि । इसके साथ ही एक अनेकार्थ निघण्टु भी मुद्रित किया गया है। इसके अन्त में निम्नलिखित पुष्पिका लेख है :--"इति महाकविधनञ्जयकृते निघण्टुसमये शब्दसंकीर्णे अनेकार्थप्ररूपणो द्वितीय- परिच्छेदः ।" इसको एक मात्र अशुद्धतम प्रति पं० जुगलकिशोरजी मुख्तार अधिष्ठाता वीरसेवा- मन्दिर से प्राप्त हुई थी। रचना शैली आदि से यह निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि यह उन्हीं धनञ्जयकी कृति है, यद्यपि पुष्पिका वाक्य में स्पष्ट रूपसे धनञ्जय का उल्लेख है। इसके साथ ही एक अज्ञातकर्तक एकाक्षरी कोष का भी मुद्रण किया है। इसकी हस्तलिखित प्रति भी वीर- सेवा-मन्दिर से ही प्राप्त हुई थी। प्रस्तुत संस्करण- अमरकोतिकृत भाष्य को एकमात्र अशुद्ध प्रति ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन झालरा- पाटन से प्राप्त हुई थी। इसोके आधार से इसका सम्पादन पं० शम्भुनाथजी त्रिपाठी ने किया । संस्करण में जो अनेक परिशिष्ट हैं वे सब पं० महादेवजी चतुर्वेदी व्याकरणाचार्य ने तैयार किये हैं। टिप्पणियां पं० शंभुनाथ जी त्रिपाठी ने बड़े परिश्रम से लिखी है। मुझे यह लिखते हुए आनन्द होता है कि उनके सर्वतोमुखी अगाध पाण्डित्य का परिचय टिप्पणों में पद पद पर मिलता है। को - नई त म बोई । ।" ग्रन्थकार [ महाकवि धनञ्जय ] नाममाला के कर्ता महाकवि धनञ्जय हैं। इन्होंने स्वयं अपने किसी ग्रन्थ में अपने समय आदि के बारे में निर्देश नहीं किया है। ये गृहस्थ थे। द्विसन्धानकाव्य के अन्तिम श्लोक की व्याख्या में उसके टीकाकार ने धनञ्जय के पिता का नाम वसुदेव, माता का नाम श्रीदेवी और गुरु का नाम दशरथ सूचित किया है। इनकी ख्याति 'द्विसन्धानकवि' के नाम से थी। नाममाला के अन्त में पाया जानेवाला यह श्लोक स्वयं इसका साक्षी है :-- "प्रमाणमकलङ्कस्य पूज्यपादस्य लक्षणम् । द्विसन्धानकवेः काव्यं रत्नत्रयमपश्चिमम्।।" अर्थात्-अकलङ्कदेव का प्रमाण शास्त्र, पूज्यपाद का लक्षण-व्याकरण शास्त्र और द्विसन्धानकवि का द्विसन्धानकाव्य ये तीनों अपूर्व रत्नत्रय है। यह श्लोक नाममाला के भाष्यकार अमरकीति के सामने था, उनने इसकी व्याख्या भी की है। इसमें इनका उप-नाम 'द्विसन्धानकवि' सूचित किया गया है। ठीक भी है। क्योंकि महाकवि धनञ्जय को सर्वश्रेष्ठ चमत्कारिणी कृति द्विसन्धानकाव्य ही है। वादिराज सूरि ने पार्श्वनाथ चरित के प्रारंभ में द्विसन्धान काव्य की प्रशंसा करते हुए लिखा है :- "अनेकभेदसन्धानाः खनन्तो हृदये मुहुः । वाणा धनञ्जयोन्मुक्ताः कर्णस्येव प्रियाः कथम् अर्थात् धनञ्जय के द्वारा कहे गए अनेक सन्धान-अर्थभेद वाले और हृदयस्पर्शी वचन कानों को ही प्रिय कैसे लगेंगे जैसे कि अर्जुन के द्वारा छोड़े जाने वाले अनेक लक्ष्यों के भेदक मर्मभेदी वाण कर्ण को प्रिय नहीं लगते? द्विसन्धान काव्य अपने समय में पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका था। इसका उल्लेख धारा- धीश भोजराज के समकालीन आचार्य प्रभाचन्द्र ने अपने प्रमेयकमलमार्तण्ड (पृ० ४०२) में किया है। जल्हण (१२वीं सदी) विरचित सूक्ति मुक्तावली में राजशेखर के नाम से धनञ्जय को प्र- शंसा में निम्नलिखित पद्य उद्धृत है:-- "द्विसन्धाने निपुणतां स तां चक्रे धनञ्जयः । यया जातं फलं तस्य सतां चक्रे धनञ्जयः ॥" इस श्लोक में राजशेखर ने धनञ्जय के द्विसन्धानकाव्य का मनोमुग्धकर सरणि से उल्लेख किया है। धनञ्जय कवि के द्वारा एक विषापहार स्तोत्र भी बनाया गया है । यह अपने प्रसाद ओज और गाम्भीर्य के लिए प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यह स्तोत्र कवि ने अपने सर्पदष्ट पुत्र का विष उतारने के लिए बनाया था। समयविचार- इनके समय निर्णय के लिए निम्नलिखित प्रमाण हैं:- (१) प्रमेयकमलमार्तण्ड आदि के रचयिता प्रभाचन्द्र (ई० ११वीं सदी) ने इनके द्विसन्धान- काव्य का उल्लेख किया है अतः ये ११वीं सदी के बाद के विद्वान् तो नहीं हैं।
प्रस्तावना -- (२) इसी तरह वादिराज सूरि ( सन् १०३५ ) ने पार्श्वनाथ चरित में धनञ्जय आर- हिसन्धान का निर्देश किया है अतः ये ११वीं सदी के बाद के नहीं हैं । (३) जल्हण (१२वीं सदी) ने राजशेखर के नाम से सूक्तिमुक्तावली में जो पा उद्धृत किया है, वह राजशेखर काव्यमीमांसाकार राजशेखर हैं। इनका उल्लेख सोमदेव (ई० ९६०) के यशस्तिलक चम्पू में पाया जाता है अतः राजशेखर का समय ई० १०वीं सदी सुनिश्चित है। राजशेखरके द्वारा प्रशंसित होने के कारण धनञ्जय का समय १०वीं सदी के बाद का नहीं हो सकता। (४) डॉ० हीरालालजी ने षट्लंडागम प्रथम भाग को प्रस्तावना (पृ० ६२) में यह सूचित किया है कि जिनसेन के गुरु वीरसेन स्वामी ने धवला टीका (पृ० ३८७) में अने- कार्थ नाममाला का निम्नलिखित श्लोक प्रमाणरूप में उद्धृत किया है :- "हेतावेवं प्रकाराद्यैः व्यवच्छेदे विपर्यये । प्रादुर्भावे समाप्तौ च इतिशब्दं विदुर्बुधाः ।।" यह श्लोक अनेकार्थ नाममाला का है। धवलाटीका वि० सं० ८७३ सन ८१६ में समाप्त हुई थी अतः धनञ्जय का समय ९वीं सदी के बाद नहीं हो सकता। (५) धनञ्जय ने अकलंक देव का उल्लेख 'प्रमाणमकलङ्कस्य' श्लोक में किया है । अकलंक का समय ई० ७वीं सदी निश्चित है, अतः धनञ्जय ७वीं सदी से पूर्व के नहीं हो सकते। संस्कृत साहित्य का संक्षिप्त इतिहास के लेखकद्वय ने धनञ्जय का समय ई० १२वां शतक का मध्य निर्धारित किया है। (पृ० १७४) उनने अपने इस मत की पुष्टि के लिए डॉ० के० बी० पाठक महाशय का यह मत' भी उद्धृत किया है कि--"धनञ्जय ने द्विसन्धान महाकाव्य की रचना ई० ११२३ और ११४० के मध्य में की है"। पर उपरोक्त प्रमाणों के आधार से धनञ्जय का समय ई० ८ वी सदी का अन्त और नवीं का पूर्वार्ध सिद्ध होता है। जल्हण को सूक्तिमुक्तावली में जो ई० १२वीं सदी की रचना है, राजशेखर के नाम से उद्धृत 'द्विसन्धाने निपुणतां' श्लोक काव्यमीमांसा- कार राजशेखर का ही हो सकता है, न कि प्रबन्धकोश के कर्ता राजशेखर का। संस्कृत साहित्य के इतिहास के लेखकद्वय यहां भान्ति कर बैठे हैं, वे स्वयं जल्हण को १२ वीं सदी का विद्वान् लिखकर भी उसमें उद्धृत राजशेखर को १४वीं सदी का जैन राजशेखर बताते हैं ! अतः धनञ्जय का समय उपयुक्त प्रमाणोंके आधार से ई० ८वों का उत्तर भाग और नवीं का पूर्व भाग प्रमाणित होता है। भाष्यकार अमरकीर्ति- महापण्डित अमरकोति ने नाममाला के भाष्य के अन्त में यह पुष्पिका वाक्य लिखा है :- "इति महापण्डितश्रीमदमरकोतिना विद्येन श्री ऐन्द्रवंशोत्पन्नेन शब्दवेधसा कृतायां धनञ्जयनाम- मालायां प्रथमकाण्डं व्याख्यातम्" इससे इतना ही ज्ञात होता है कि अमरकोति 'विद्य' उपाधि से विभूषित थे और वे सेन्द्रवंश (सेनवंश) में उत्पन्न हुए इन्होंने अपने को 'शब्दवेधा' उपाधि से अलकृत किया है। मंगल श्लोकों में पूज्यपाद अकलङ्क विद्यानन्दि और समन्तभद्र के साथ ही साथ एक कल्याण- थे। - १. इसी के आधार से कल्पद् कोश की प्रस्तावना ( P. Xxxii ) में श्री रामावतार शर्मा ने भी भी धनञ्जय का समय १२वीं सदी लिखा है।
१२ नाममाला फोति को भी नमस्कार किया है। इन्होंने अन्य के बीच में जहां आवश्यकता भी नहीं है वहां भी अपना नाम देने में संकोच नहीं किया है। कई स्थानों पर धनञ्जय के श्लोकों को उत्थानिका में भी "सम्प्रति मनुष्यवर्ग आरभ्यते अमरकोतिना" (पृ० १३) आदि लिखा है। जो स्पष्टतः भ्रम उत्पन्न करता है। एक जगह तो धनञ्जय के इस श्लोकांश की व्याख्या करते हुए स्वयं अपना ही नाम लिख दिया है--"वारिधिर्वर्ण्यतेऽधुना । अधुना इदानों वारिधिर्वयेते कथ्यते । केन भाष्यकर्ता श्रीमदमरकोतिना। स्पष्टतया यहां 'केन' का उत्तर 'धनञ्जयेन' होना चाहिए था। अमरकोति नाम के तीन विद्वानों का पता लगता है :- (१) 'छक्कम्मोवएस' आदि ग्रन्यों के रचयिता अमरकोति'। इन्होंने वि० सं० १२४७ भादों सुदी १४ के दिन छक्कम्मोवएस ग्रन्थ समाप्त किया था । अर्थात् ये ईसवीय १२ वीं सदी के अन्तिम भाग और तेरहवीं के प्रारम्भ में विद्यमान थे। ये अमितगति याचार्य को परम्परा में हुए हैं। इनको गुरु परम्परा यह है :--अमितगति, शान्तिपेण, अमरसेन, श्रीषेण, चन्द्रकीति और चन्द्रकीति के शिष्य अमरकोति । (२) वर्धमान के प्रगुरु अमरकोति । इनकी परम्परा इस प्रकार है ।....देवेन्द्र विशालकीति, शुभकीति, धर्मभूषण, अमरकोति, ....धर्मभूषण वर्धमान । वर्धमान ने शक संवत् १२९५ वैशाख सुदी ३ वुधवार को धर्मभूषण को निषद्या वनवाई थी। इस शिलालेख के अनुसार अमरकीति का समय शक १२५० के आसपास सिद्ध होता है। ये ईसवीय १४वीं सदी के विद्वान् थे। इनके इस समय का समर्थन शक १३०७ में उत्कीर्ण वि- जयनगर के शिलालेख से भी होता है। (३) दशभक्त्यादि महाशास्त्र के रचयिता वर्षमान के समकालीन, विद्यानन्द के पुत्र विशाल- कोति के सधर्मा अमरकोति । इनके सम्बन्ध में दशभक्त्यादिशास्त्र में लिखा है :- "जीयादमरकीाख्यभट्टारकशिरोमणिः । विशालकीतियोगीन्द्रसधर्मा शास्त्रकोविदः ॥ अमरकीर्तिमुनिर्विमलाशयः कुसुमचापमदाचलवज्रभृत् । जिनमतापहृतारितमाश्च यो जयति निर्मलधर्मगुणाश्रयः ॥" अर्थात्-शास्त्रकोविद विमलाशय कामजेता निर्मलगुण और धर्म के आश्रय तथा जिनमतके प्रकाशक अमरकोति भट्टारक विशालकोति के सधर्मा थे। विशालकोर्ति के पिता विद्यानन्द का स्वर्गवास शक १४०३ सन् १४८१ में हुआ था। यह उल्लेख दशभक्त्यादि महाशास्त्र में विद्यमान है। अतः उनके पुत्र विशालकीति के सधर्मा अमरकोति का समय करीब सन् १४५० अर्थात् ईसवीय १५ वीं शताब्दी सिद्ध होता है । दशभक्त्यादि शास्त्र का समाप्तिकाल १४०४ शक अर्थात् १४८२ ई० है। १. देखो डा० हीरालाल का 'अमरकीर्तिगणि मऔर उनका पट्कर्मोपदेश' लेख । जैन सि० भास्कर भाग २ अंक ३ २. जैन शिलालेख संग्रहका १११वाँ शिलालेख । ३. प्रशस्तिसंग्रह के सम्पादक पं० के० भुजवली शास्त्री ने 'शाके वह्निखराब्धिचन्द्रकलिते संवत्सरे का अर्थ शक १४६३ किया है। जब कि दशभक्त्यादि शास्त्र की समाप्ति सूचक 'शाके वेदखराधि- चन्द्रकलिते' का अर्थ १४०४ शक किया है। दोनों जगह ख का शून्य लेना चाहिये। यदि दशभ- क्त्यादि शास्त्र शक १४०४ में समाप्त हुआ है तो उसमें शक १४६३ में हुई विद्यानन्द की मृत्यु की चर्चा कैसे आ सकती है ? ४. देखो प्रशस्तिसंग्रह, पृ० १२८ ।
ग्रन्थकार - इन तीन अमरकीति में प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता छक्कम्मोवएस के रचयिता नहीं हो सकते क्योंकि उनका काल वि० १२४७ के आसपास है, जब कि नाममाला के भाष्य (पृ० ६२) में आशा- घर के महाभिषेक से उद्धरण दिया है। आशाधर ने अपना अनगारधर्मामृत वि० १३०० में समाप्त किया था। अतः प्रथम अमरकोति इस ग्रन्थ के रचयिता नहीं हो सकते । इस से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रस्तुत ग्रन्थ के भाष्यकर्ता अमरकोति वि० १३०० अर्थात् ईसवीय १२४३ तेरहवीं सदी के पहिले के विद्वान् तो नहीं हैं । इन्होंने भाष्य में भोज (११वीं सदी) इन्द्रनन्दि (१०वीं सदी) पदानन्दि (१२वीं सदी) सोमप्रभ (१२वीं सदी) हेमचन्द्र (१२-१३वीं सदी) आदि के ग्रन्थों से भी नामोल्लेख पूर्वक अवतरण लिए हैं। शेष दो अमरकोर्ति पृथक् व्यक्ति तो हैं ही। द्वितीय अमरकोति की प्रशंसा में विजयपुर के शिलालेख में निम्नलिखित पद्य मिलते हैं - "शिष्यस्तस्य गुरोरासीदनर्गलतपोनिधिः। श्रीमानमरकीार्यो देशिकाग्रेसरः शमी॥ निजपक्षपुटकवाट घटयित्वानलरोधतो हृदये। अविचलितबोधदीपं तममरकीति भजे तमोहरणम् ॥" अर्थात्-अमरकोति महान् तपस्वी शान्त और लम्बी समाधि लगानेवाले योगी थे। इस वर्णन से ज्ञात होता है कि ये अमरकोति शास्त्रकार को अपेक्षा योगी और तपस्वी ही विशेष रूप से थे। नाममाला भाज्य में जिस प्रकार की यशोलिप्सा टपकती है वह एक योगी और तपस्वी में नहीं हो सकती। अतः मेरे विचार से द्वितीय अमरकीर्ति भी प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता नहीं है । तुतीय अमरकोति के वर्णन में 'शास्त्रकोविद' विशेषण उनके पाण्डित्य का निर्देश कर रहा है। अतः हमारे प्रकृत ग्रन्थकार दशभक्त्यादि महाशास्त्र के रचयिता वर्षमान के समकालीन, विद्यानन्द के पुत्र विशालकोति के सधर्मा अमरकोर्ति हैं। ये सन् १४५० के आसपास अर्थात् पन्द्रहवीं सदी के विद्वान् थे। इस समय का साधक एक प्रमाण यह भी हो सकता है कि इनने कल्याणकोति को नमस्कार किया है। कल्याणकीर्ति का एक जिनयज्ञफलोदय ग्रन्थ मिलता है।' उसको प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि ये भट्टारक ललितकीति के शिष्य थे। कल्याणकोति ने जेठ सुदी ५ शक संवत् १३५० में जिनयज्ञफलोदय समाप्त किया था । अर्थात् सन् १४२८ में यह ग्रन्थ समाप्त हुआ था । यदि यही कल्याणकोति अमरकोर्ति के द्वारा स्मृत हुए हैं, तो मानना होगा कि अमरकीर्ति पन्द्रहवीं सदी के विद्वान् हैं। आभार- इस ग्रन्थ के सम्पादक पं० शम्भुनाथजी त्रिपाठी व्याकरणाचार्य सप्ततीर्थ अनेक शास्त्रों के गंभीर विद्वान् हैं। वर्षों तक उनने जैन विद्यालय इन्दौर में साहित्य और त्याकरण का अध्यापन कराया है। वे जैन परम्परा से पूरी तरह परिचित हैं। उनके जैसे अगाध ज्ञानी निरहङ्कारी और विद्याजीवी विज्ञान विरल हैं। उनके तलस्पर्शी गंभीर पाण्डित्य का निदर्शक यह संस्करण है। ज्ञानपीठ इस ग्रन्थ के सम्पादक के रूप में उन्हें पाकर गौरवान्वित है । डॉ० पी० एल० वैद्य ने इस ग्रन्थ का प्राक्कथन लिखकर हमें उपकृत किया है। पं० हर- गोविन्दजी शास्त्री व्याकरणाचार्य ने अनेकार्थ निघण्टु का सम्पादन किया है। पं० महादेव चतुर्वेदी ने सम्पादन परिशिष्टनिर्माण और प्रूफ संशोधन में पूरा योग दिया है । पं० व्रजनन्दनजी मिश्र व्याकरणाचार्य ने भी प्रेस कापी आदि में पूरा सहयोग दिया है। गुलावचन्द्रजी व्याकरणाचार्य एम० ए० १ देखो प्रशस्ति संग्रह पृ० १६ । - १४ नाममाला ने प्राक्कथन का हिन्दी अनुवाद किया है । पं० जुगलकिशोर जी मुख्तार ने अनेकार्यनिघण्टु और एकाक्षरी कोश को प्रति भेजी। पं० श्रीनिवासजी शास्त्री ने भाष्य को प्रति भेज कर अनुगृहीत किया है। भारतीय ज्ञानपीठ के संस्थापक सेठ शान्तिप्रसाद जी तथा अध्यक्षा सौ० रमा रानी जी की संस्कृतिनिष्ठा, उदार दृष्टि, ज्ञानानुराग और सौजन्य इस संस्था के जीवन हैं। अपनी स्व० पुण्यश्लोका माता मूत्तिदेवी के स्मरणार्थ मूतिदेवी ग्रन्यमाला के संस्कृत विभाग का यह छठवाँ अन्य प्रकाशित हो रहा है। इस भद्र दम्पति से ऐसे ही अनेक लोकोदयकारी सांस्कृतिक कार्यों की आशा है। इस संस्था के कर्मनिष्ठ मन्त्री श्री अयोध्याप्रसाद जी गोयलीय की कार्यदृष्टि, सत्प्रेरणा और प्रयत्न से इस संस्था का इस रूप में सञ्चालन हो रहा है। मैं इन सव का आभार मानता हूँ। 'भारतीय ज्ञानपीठ काशी, पौष शुक्ल १५ वीर सं० २४७६ ३।११५० -महेन्द्र कुमार जैन ग्रन्थमाला सम्पादक प्रकाशन-व्यय ४००) कागज २० रोम २२४२९/३२ पौण्ड ९७५) छपाई पृष्ठ १९६ दर ५०) प्रति फार्म २००) जिल्द बंधाई ६०) कबर छपाई ४०) कवर कागज ५४५॥) कार्यालय व्यवस्था प्रूफ संशोधन आदि ४२६८) सम्पादन ५००) भेंट आलोचना, विज्ञापन आदि ७८७॥) कमीशन कुल लागत ३९३४॥3 १००० प्रति छपी। लागत एक प्रति ३॥3) मूल्य ३॥)
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सभाष्या नाममाला
अनेकार्थनिघण्टुः एकाक्षरी कोशश्च
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महाकविधनञ्जयप्रणीता
नाममाला
अमरकीतिविरचितभाष्योपेता
५
स
श्रीपूज्यपादमकलङ्कमनन्तबोधं विद्यादिनन्दिनमिनं च समन्तभद्रम् ।
कल्याणकीर्तिममलं प्रणिपत्य वीरं भाष्यं करोमि परमं बुधबुद्धिसिद्धर्थ ॥१॥
सरस्वत्याः प्रसादेन रच्यतेऽमरकीर्तिना।
भाष्यं धनञ्जयस्येदं बालानां धीविवृद्धये ॥ २ ॥
यद्यपि धनजयो ( येनो) क्तो भावो वक्तुं न शक्यते ।
तथाऽप्यहं प्रवक्ष्यामि वाग्देव्याश्च प्रसादतः ॥ ३ ॥
पूर्वाचार्यकृता प्रायो व्युत्पत्तिरुपदिश्यते ।
क्वापि क्वापि स्वबुद्ध थाऽपि क्षम्यतामत्र मे बुधैः ॥ ४ ॥
शिष्टासमाचार (ष्टाचार ) परिपालना नमस्कारसमुद्गतधर्मद्वारेण निर्विघ्नशास्त्रसमाप्त्यर्थं
च धनञ्जयबुधः इष्टाधिकृतदेवतानमस्कारार्थे श्लोकमाह-
१०
तन्नमामि परं ज्योतिरवाङ्मनसगोचरम् ।
उन्मूलयत्यविद्यां यद् विद्यासुन्मीलयत्यपि ॥१॥
तत्परं ज्योतिः-
"णमो' अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसा-
हूणं ॥" ईदृग्विधम् । नमामि नमस्करोमि । किंविशिष्टम् १ वाङ्मनसगोचरम् वाक् च वाणी मनसं२ १५
च चित्तं वाङ्मनसे तयोर्वाङ्मनसयोन गोचरं न प्रत्यक्षीभूतम् अवाङ्मनसगोचरम् अलक्ष्यस्वरूपत्वात् ।
तथा चोक्तं शब्दभेदे-
."नभन्तु नभसा साधं मनसं मनसाऽपि च । तमसेन तमः प्रोक्तं तपन्तु तपसा सह ।।"
तथा च पद्मनन्दिशास्त्रे--
"स्वानुभूत्यै भवेद् गम्यं रम्यं यच्चात्मवेदिनाम् । जाने तत्परं ज्योतिरवाङ्मनसगोचरम् ॥"
१ एतत्पश्चनमस्कारात्मकमन्त्रप्रतिपाद्यमर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुरूपमत्र ज्योतिः । २ नभं तु
नभसा सार्धमित्यादिशब्दभेदोक्तप्रमाणतोऽकारान्तोऽपि मनसशब्दः साधुः । ३ साम्प्रतं निर्णयसागरयन्त्रा-
लयमुद्रिते शब्दभेदप्रकाशनन्थे एतत्पद्यं किञ्चिदन्यथोपलव्धम् । तदित्थम्-
कुमुदं कुमुदा चापि योषित्स्याद् योषिता सह । तमस्तु तमसा प्रोक्तं रजसाऽपि रजः स्मृतम् ॥३४॥
अन कालप्रकर्षाद्यद्यपि मनसशब्दः प्रभ्रष्टस्तथापि तदानीन्तनमूलपुस्तके तत्तथैवातीदिति ध्रुवम् ।
४.प०प० २२॥१॥
२ ५ । तथा अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता यत् अविद्यां पापविद्याम्, चाटुकारसूत्रम्, वैद्यकसूत्रम्, चित्रकर्मादिसूत्रम्, नृत्यसूत्रम्, गन्धर्व- सूत्रम्, पटहसूत्रम्, अगदसूत्रम्, यौद्धसूत्रम्, मद्यसूत्रम्, द्यूतसूत्रम्, राजनीतिसूत्रम्, चतुरङ्गसूत्रञ्च । गज- तुरगपुरुपत्रीछत्रगोखड्गदण्डाञ्जनानां [ च विद्या पापविद्या ] कथ्यते, ताम् उन्मूलयति मूलादुच्छेदयति । यत् विद्यामपि उन्मीलयति स्थापयतीत्यर्थः । द्वयं द्वितयमुभयं यमलं युगलं युगम् । युग्मं द्वन्द्वं यमं द्वैतं पादयोः पातु जैनयोः ॥२॥ दश युग्मे । द्वौ अवयवौ यस्य तद् द्वयम् , "द्वित्रिभ्यामयड् वा ।" द्वितयम् द्वौ अवयवौ यस्य तद् द्वितयम् । उभयम् उभौ अवयवो यस्य "द्वित्रिभ्यामयट्" इत्यनुवर्तमाने "उभाभ्यां नित्यम्" इत्ययट न तु तयट् । यमलं यमं लातीति यमलम् । युगलं युगं लातीति युगलम् । युगडं युगडकं च । युगं १० युज्यते धर्मवृत्त्या युगम् ! समाश्रयत्यन्यं युगम् । युग्मम् युनक्ति द्वितीयेन युज्यते श्लिप्यते युग्मम् । "युजिरुचितिजां मम्५ ।” द्वन्द्वम् द्वौ द्वावित्यर्थः द्वन्द्वम् । यच्छत्युपरमत्येकत्वात् यमम् । द्वाभ्यामितं द्वीतम्, द्वीतमेव द्वैतम् । पातु रक्षतु | ऋपिर्मुनिर्यतिर्भिक्षुस्तापसः संशितो व्रती । तपस्वी संयमी योगी वर्णी साधुश्च पातु वः ॥३॥ १५ द्वादश मुनौ । ऋपति कालत्रयं जानातीति ऋषिः । “रिपिशुचिगृनाम्युपधारिक:६" च यशस्तिलके - "रेपणात्क्लेशराशीनामृपिमाहुर्मनीपिणः ।" यतिः यो देहमात्रारामः सम्यग्विद्यानौलाभेन तृष्णासरित्तरणाय योगाय शुक्लध्यानधर्म- ध्यानाय यतते स यतिः । तथा च यशस्तिलके' "यः पापपाशनाशाय यतते स यतिर्भवेत् ।" मुनिः, तपःप्रभावात् सर्वैर्मन्यते मुनिः । “मन्यतेः किरत उच्च१० ।" तथा च- "१ मान्यत्वादाप्तविद्यानां महद्भिः कीर्त्यते मुनिः ।" भिक्षुः भिक्षते इत्येवंशीलो भिक्षुः । “सन्नन्ताशंसिभिक्षामुः१२ ।' तापसः, तपो विद्यते यस्य स तापसः । "यण१३ च ।" तपःसहस्राभ्यां न केवलमस्त्यर्थे विनीनौ अण् च, वृद्धिः। संशितः संशायते २५ स्म संशितः । “१४श्यते ते नित्यम् ।" व्यवस्थितविभापया शो तनूकरणे इत्यस्य व्रतेऽर्थे नित्यमिकारो भवति, विकल्पो नास्ति । व्रती, "हिंसाऽनृतस्तेयाऽब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम्१५" व्रतं विद्यतेऽस्य व्रती । तपस्वी "अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशा बाह्य १६ " "प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् । ७ तपश्च विद्यते यस्येति तपस्वी । संयमी, सयमनं संयमः इन्द्रियप्राणलक्षणः । संयमो विद्यते यस्येति संयमी । योगी, * युजिर् १८ १. यत् इत्यस्य पूर्वम् 'तथा' इति पदं योज्यम् । २. हे० श०७।१।१५१ । ३. एतत्सूत्रं हे० श० नोपलब्धम् । परंतु द्वित्रिभ्यामयड्वा इत्यनुवर्तमाने उभाभ्यां नित्यमिति टीकोक्तवचनात्तस्थमेवै- तत्सूत्रमिति निश्चीयते । ४. कालवाचकयुगपरतयेयं व्युत्पत्तिः, प्रकृतार्थे तु युगं लातीत्येव । ५. का० उ० ११५७ इति ध्मक् प्रत्ययः कुत्वं च । ६. गृनाम्न्युपधात्किः का० उ० ३.१५ इति किप्र० । ७. यशस्ति श्रा० ८. क० ४४ । ८. यती प्रयत्ने । इः सर्वधातुभ्यः का० उ० ३११४ इप्र० । ६. यश० श्रा० ८ कल्प ४४ । १०. का० उ० ४३ इति किप्र० । मनु अवबोधने । ११. यश० प्रा० ८ कल्प ४४ । १२. का. सू० ४१ ४१ ५१ । १३.पा० सू ० ५।२।१०३ । १४. श्यतेरित्वं व्रते नित्यमिति पातञलभाष्यम् ७४/४१ । १५. त० सू० ७।१ । १६ त० स० । १७ त० सू० ! १८. *एवञ्चिह्नितांशस्थाने युजिर् योगे रुधादौ परस्मैपदी युज् समाधौ वा दिवादौ यात्मनेपदी इत्येवम्पाठः सुगमः । - २० । तपः नाममाला ३ योगे, युज समाधौ पर० युज् समाधौ वा० दि० । आत्म० युज् रुधादौ । पर० युज समाधौ वा दि० । प्रात्म० * युनक्ति युज्यते वा इत्येवंशीलः योगी । युजभजेत्यादिना' विनिण् । वर्णी, वर्णो ब्रह्मचर्यमस्त्यस्य वर्णी । साधुः, शिष्याणां दीक्षादिदानाध्यापनपराङ्मुखः सकलकर्मोन्मूलनसमर्थो मोक्षमार्गाऽनुष्ठानपरो यः स साधुः । सिद्धिं साधयति साधययिष्यति वा साधुः । "स व्याख्याति न शास्त्रं न ददाति दीक्षादिकं च शिष्याणाम् । कर्मोन्मूलनशक्तो [धर्म ] ध्यानः स चात्र साधु यः॥" "२कृवापाजिमीस्वदिसाध्यशूदृषणिजनिचरिचटिभ्य उण" । वो युष्मान् पातु रक्षतु । दीक्षितं मौण्ड्यं शिष्यं च तमन्तेवासिनं विदुः । चत्वारः शिष्ये । [दीक्षितम्] दीक्षा संजाताऽस्येति । उतारकितादिदर्शनात्संजातेऽर्थ इतन् । मौण्ड्यम् मुण्डे मस्तके भवं वपनादिकं मौण्ड्यम् । शिष्यम् , शिष्यते व्युत्पाद्यते गुरुणा शिष्यः । १० "वृञ्जुषीणशासुस्तुगुहां स्यप्५ ।” गुरोरन्ते वसत्यन्तेवासी तम् । विदुः कथयन्ति । कृतान्ताऽगमसिद्धान्ताः त्रयः सिद्धान्ते । लोकानां सन्देहस्य कृतः अन्तो विनाशो येन सः कृतान्तः । आगच्छतीत्यागमः, आगमनमागमो वा । सिद्धान्तो [ सिद्धोऽन्तो ] निश्चयो यस्य स सिद्धान्तः, समयोऽपि । सर्वे पुंसि । ग्रन्थः शास्त्रमतः परम् ॥ ४ ॥ १५ ग्रध्नाति रचयतीति ग्रन्थः । शास्ति शास्त्रम् । भूमि ः पृथिवी पृथ्वी गह्वरी मेदिनी मही । घरा वसुमती धात्री क्षमा विश्वम्भराध्वनिः ॥ ५ ॥ वसुधा धरणी क्षोणी क्षमा धरित्री क्षितिश्च कुः । कुम्भिनीलोरा चोर्वी जगती गौर्वसुन्धरा ॥ ६ ॥ सप्तविंशतिभूमौ । भवति सर्वमत्र भूमिः। “ऊर्मिभूमिरश्मयः ।' भवत्यस्मात्सर्व भूः । रेफान्तञ्चाव्ययम् । प्रथते पृथिवी पृथ्वी च । गुहयतीति गहरी । रुहरीति पाठः । न्याये मेद्यति स्निह्यति कैटभमेदोयोगाद् वा मेदिनी। मह्यते मही। मह पूजायाम् । धरत्यगान् धरा । वस्वस्त्यस्याः वसुमती । दधाति संगृह्णाति भेषजार्थे वैद्यो यामिति धात्री । “कर्मणि धेटःष्ट्रन् ।” केचिद्दधातेरपीच्छन्ति क्षमणं क्षमा । “षाऽनुबन्धभिदादिभ्यस्त्वङ्११ ।" विश्वं बिभर्ति विश्वम्भरा।"नाम्नि तृभृवृजिधारि- २५ तपिदमिसहां संज्ञायाम् १२" खप्रत्ययः । भूतानवति अवनिः । स्त्रियामीः । १३"ऋतृसधृञ्धम्यश्यविवृति- अहिभ्योऽनिः ।" अनिः प्रत्ययः । वसु दधातीति वसुधा । धरति पर्वतानिति धरणिः। “धृञोऽनिः१४" क्षौति क्षुपम् क्षोणिः। स्त्रियामीः । क्षोणी । "टु क्षु रु कु शब्द" । क्षमते भारं क्ष्मा क्षमा च । धरति सर्वे धरित्री । क्षयति क्षयं प्राप्नोति प्रलयकाले क्षितिः । कायति कूयते वा कुः। कुम्भो रत्नोत्पत्तिद्वीपो- ऽस्त्यस्याः कुम्भिनी । एति जन इमाम इला। "इरासुराकपिलिकादिदर्शनाल्लत्वम् ।” १५शूद्रादयः- ३० १. युजभजभुजद्विषद्दुहानीडत्यजानुरुधाङ्यमाङ्माङ्यसरजाऽभ्याङ हनां च इति पूर्ण का० सू० ४।४।२२। २. का० उ० १११। ३. तदस्य संजातं तारकादेरितच इति का० रू० पू० सू० ५०८ । ४. मौण्ड्यमस्यास्तीत्यपि विग्रहे निवेश्यम् । अर्श आदिभ्योऽच् । ५. का. सू० ४।२।२३ । ६. अध्यते रच्यते इति कर्मणि विग्रहो योग्यः । ७. का० उ० ३।३२ इति भवतेर्मिप्र० कित्त्वं च । ८. गूहतीति गहरी रुहरी इत्यपि पाठ इति युक्तम् । ६. का० सू० ४/४/६० इति ष्ट्रन् । १०. वस्तुतत्तु क्षमते इति क्षमा, पचादित्वादच , टाप् । ११. का० सू० ४।५।८२ । १२. का० सू० ४।३।४४ । १३. का० उ० २१४३ । १४. का० उ० २।४३ ऋतृसधृञइत्यादिसूत्रम् । १५. का० उ० २।१७ | २० ४ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपता -- - - "शूद्रोग्रवनविप्रभद्रगौरभेरीराः' एते रक्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । क्लेशमुर्वति हिनस्ति फलेन उर्वरा । उनी । उवा थुवी दुवा धुर्वी हिंसाः । सर्वमूर्वति व्याप्नोति उर्विः । स्त्रियामीः उवीं । राजान्तरं गच्छति जगतिः । स्त्रियामोः,जगती । पूजां गच्छति गौः । स्त्रीनोः। गमेडीः । 'गोरी धुटि' इत्यौत्वम् । धृञ् धारणे । धुः। धरति धरते । इञ् । अस्य वृद्धिः । धारि जातम् । वसु वसूनि वा धारयति वसुन्धरा । नाम्नि ५ तृभृ०२ खप्रत्ययः । कारितस्या० कारितलोपः। अभिधानात् हस्वः । “हस्वारुयोमीऽन्तः ।" "त्रिया" मादा ।' भूतधात्री, रत्नगर्भा, विपुला, सागराम्बरा, रत्नवती, रसा, अचला, अनन्ता, ड्याम्- काश्यपी, गोत्रा, स्थिरा, सर्वसहा । तत्पर्य्यायघरः शैलस्तत्पर्य्यायपतिनृपः । तत्पर्य्यायल्हो वृक्षः शब्दमन्यं च योजयेत् ॥ ७ ॥ १० योजयेत् योध्येत् अन्यं शब्दं च । तत्पर्यायधरः शैलः । भूमिधरः, भूधरः, पृथिवीधरः पृथ्वीधरः, गहरीधरः, मेदिनीधरः, महीधरः, धराधरः, वसुमतीधरः, धात्रीधरः, विश्वम्भराघरः, अवनीधरः, वसुधाधरः, धरणीधरः, क्षोणीधरः, माधरः, धरित्रीधरः, क्षितिधरः, कुधरः; कुम्भिनीधरः, इलाधरः, उर्वराधरः, उर्वीधरः, जगतीधरः, गोधरः, वसुन्धराधरः । सप्तविंशति नामानि शैलस्य ज्ञेयानि। तत्पर्यायपतिर्नृपः । भूमिपतिः, भूपतिः, पृथिवीपतिः, पृथ्वीपतिः, गहरीपतिः, मेदिनीपतिः, महोपतिः, धरापतिः, वसुमतीपतिः, १५ धात्रीपतिः, क्षमापतिः, विश्वम्भरापतिः, अवनीपतिः, वसुधापतिः, धरणीपतिः, लोणीपतिः, आमापतिः, धरित्रीपतिः, क्षितिपतिः, कुपतिः, कुम्भिनीपतिः, इलापतिः, उर्वरापतिः, उवीपतिः, जगतीपतिः, गोपतिः, वसुन्धरापतिः । सप्तविंशति नामानि नृपस्येति ज्ञातव्यानि । तत्पर्यायरुहो वृक्षः । भूमिरुहः, भूरुहः, पृथिवीरुहः, पृथ्वीरुहः, गहरीरुहः, मेदिनीरुहः, महीरुहः, धरारुहः, वसुमतीरहः, धात्रीरुहः, क्षमाम्हः, विश्व- म्भरारुहः, अवनीरुहः, वसुधारुहः, धरणीरुहः, क्षोणीरुहः, मारुहः, धरित्रीरुहः, क्षितिलहः, कुरुहः, कुम्भि- २० नीरुहः, इलारुहः, उर्वरारुहः, उारुहः, नगतीरुहः, गोरुहः, वसुन्धरारुहः । सप्तविंशतिपर्यायनामानि वृक्षस्येति ज्ञातव्यानि । दरीभृदचलः शृङ्गी पर्वतः सानुमान् गिरिः । नगः शिलोचयोऽद्रिश्च शिखरी त्रिककुन्मस्त् ॥ ८ ८ ॥ द्वादश पर्वते । दरी विभत्तीति दरीभृत् । स्वस्थानात् न चलति अचलः । शृङ्गमस्यास्तीति २५ शृङ्गी । पर्वाणि सन्त्यस्य पर्वतः । ६पर्वमरुभ्यां तः ।" सानुरस्त्यत्य सानुमान् । जलं गिरतीति गिरिः । "गृनाम्युपधात्किः ।" नं गच्छतीति नगः । ““डोऽसंज्ञायामपि"। नाम्न्युपपदे गमेडों भवति । शिला उच्चीयन्तेऽत्र, शिलोच्चयः। खम् अाकाशम् अतीति अद्रिः । “भूस्वदिभ्यः क्रिः ।" शिखरमस्त्यत्य शिखरी। त्रिकं पृष्टाधरं स्कुम्नाति विस्तारयतीति त्रिककुत् । वर्ण विकारत्वाद् भकारस्य १तकारः । स्तम्भु स्तम्भुस्कम्भुस्कुम्भुस्कुञ्भ्यः श्नुश्चेति वक्तव्यमत्रात्य धातोः प्रयोगः ।" नियन्ते क्षुद्रजन्तवोऽस्य स्पर्शेनेति मरुत् । “१२मृग्रोरुतिः" | शैलः, क्षितिधरः, गोत्रः, याहार्यः, कुभ्रः, ग्रावा । प्रस्थं पाश्चं तटं सानुर्मेखलोपत्यका तटी। नितम्बमन्तो दन्तश्च तद्वानपि गिरिः स्मृतः॥ ६ ॥ १. का० सू० २१ २२३३ । २. नाग्नि तृभृवृजिधारितपिदमिसहा संज्ञायाम् इति पूर्ण का० सू० ४१३१४४ । ३. कारितत्यानामिड्विकरणे इति पूर्णम् का सू० ३।६।४४ । ४. का०सू० ४।१।२२ । ५. का० सू० २१४|४०। ६. पर्वमन्तस्तः श०चं०स० ४४११७३ । ७. का०3० ३।१३। ८..का०सू० ४३४७ } ५. का०७०३१५३।१०. वर्णविनाशेन सकारत्व लोपोऽपि बोध्यः। ११. शच०२।१।२६ । त्रीणि ककुदानि शृङ्गाण्यत्येति विग्रहोऽन्यत्र। त्रिककुत्पर्वते पा०सू ० ५ । ४।१४७ इत्यकारलोपः । १२. का० उ० ११३० । - ३० नाममाला २ ५ पर्वतमेखलायां दश । प्रस्थीयते जनेनात्र प्रस्थम् । “१ नाग्निस्थश्च" कः । उभयम् । पाति रक्षति जनान् पार्श्वम् । तटति उच्छायं गच्छति तटम् । त्रिषु लिङ्गषु । सनोतीति सानुः । कृवापा- जिमीस्वदिसाध्यशूदृषणिजनिचरिचटिभ्य उण् ।" "पण दाने" अस्य धातोः प्रयोगः । मेहनस्य खं तस्य मां लातीति निरुक्तिः । मिनोति प्रक्षिपति कामिचित्तानिति वा मेखला। उपत्यका उप समीपे भवा उप- त्यका । “उपाधिभ्यां त्यकन्नासत्तारूढयोः ।" तटमस्यास्ति तटी। क्रीडाथै जनस्ताम्यतीति नितम्बः । अमतीत्यन्तः । "मृगृवाहस्यमिदमिलूपूयस्तः “एभ्यस्तप्रत्ययो भवति । दम्यतेऽ (भ) क्ष्यतेऽनेन दन्तः । "मृगवाहत्यमिदमिलूपूभ्यस्तः ।" तप्रत्ययः । तद्वानपि गिरिः स्मृतः । प्रस्थवान् , पार्श्ववान् , तटवान् , सानुमान् , मेखलावान् , उपत्यकावान् , तटीमान् , नितम्बवान् , अन्तवान् , दन्तवान् । राजाधिपः पतिः स्वामी नाथः परिवृढः प्रभुः । ईश्वरो विसुरीशानो भर्तेन्द्र इन ईशिता ॥१०॥ १० चतुर्दश राशि । न्यायमार्गेण राजते. इति राजा । “वृषितक्षिराजिधन्विप्रदिवियुभ्यः कनिः ।" को यण्वभावार्थः। एभ्यः कनिः प्रत्ययो भवति । अधि ऐश्वर्या पाति रक्षतीति अधिपः । तथा च उपसर्गवृत्तौ-अधि वशीकरणाधिष्ठानाध्ययनैश्वर्यस्मरणाधिकेषु।" पात्यवति पतिः। पातेर्डतिः। अस्माड्- डतिमत्ययो भवति । "अमु गतौ" सुपूर्वः । शोभनममतीति स्वामी । "सावमेरिन्' दीर्घश्च ।" सावुपपदे अमेर्धातोरिन् प्रत्ययो भवति । नाथयति रिपु नाथः । “तृहि वृहि वृद्धौ" । ढो वृदः । अत एव वृहः १५ परिपूर्वात् परिवहति परिवर्हति स्म वा परिवृढः । ०१ गत्यर्था०" इति क्तः । ६५ परिवढदृढौ प्रभुबलवतोः" एतौ प्रभुबलवतोरर्थयोर्यथासंख्यं निपात्येते । परिपूर्वस्य वृहेरिडभावो नलोपश्च । वृहतहोः प्रकृत्यन्तर- योरपीत्यन्ये । ये तु प्रकृत्यन्तरयोरिच्छन्ति, तेषाम्मते "तृह तृहि वृह वृहि हह वृद्धौ"इति पाठान्तरं वर्तते । तेन पाठान्तरेण दृहस्य वृहस्य वा "तृढः वृढः" इति निपातः । तत्र वर्हति स्म दहति स्म इति वाक्यं क्रियते । प्रभवतीति प्रभुः।१२भुवो डुर्विशम्प्रेषु च" "१३डानुबन्ध.” ऊकारलोपः । “ईश ऐश्वर्ये" ईष्टे इत्येवंशील ईश्वरः । “१४कशिपिसिभासीशस्थाप्रमदां च ।" एषां वरो भवति तच्छीलादिषु । विभवतीति विभुः । डुप्रत्ययः । ईष्टे शक्नोति सृष्टिस्थितिप्रलयान् कर्तुम् ईशानः । आश्रितजनान् बिभर्ति पोषयति भर्ता । इन्दति परमैश्वर्य युक्तो भवतीलि इन्द्रः। तत्कायितञ्चिवञ्चिशकिक्षिपिक्षुदिरुदिमदिमन्दिचन्द्युन्दीन्दिभ्यो रक् ।" एतीति इनः । “१६इजिकृषिभ्यो नक् ।” ईष्टे ईशिता । अनोकहस्तरुः शाखी विटपी फलिनो नगः । द्रुमोऽनिपः फलेग्राही पादपोऽगो वनस्पतिः ॥ ११ ॥ द्वादश वृते। अनसः शकटस्य अकं गति हन्तीति अनोकहः । श्रोकहप्रत्ययेन वा अनोकहः । तरन्त्यनेनात तरुः । “१८भृमृतचरित्सरितनिमस्जिशीभ्य उः ।"शाखाः सन्त्यत्य शाखी। विटपो विस्तारो- १. का०सू० ४।३।५। वस्तुतस्तु नाम्नि स्थश्चेति करत्ययस्य कर्तरि विधानात्र घजथे कविधान- मिति कः । २. का०3० १।१ । ३. पा० सू० ५।२। ३४ इति त्यकन् प्रत्ययष्टाप् च । ४. कीडाथै जनस्त- म्यते कायते इति कर्मणि विग्रहो न्याय्यः । ५. का० उ० ४।२७ । ६. का० उ० २।३ । ७. उ० वृ० ११ । ८. का० उ० ३१५२ इति पातेर्डतिप्र० टिलोपश्च । ९. काउ० ६/६८। पाणिनीयैस्तु त्वामिन्नैश्वर्ये पा०स० ५।२।१२६ इति त्वशब्दादामिन् प्रत्ययेन साधितः । त्वमैश्वर्यमत्यातीति विग्रहः । १०. गत्याकर्मकश्लि- षशीत्यासवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च इति पूर्ण का० सू० ४।६।४६ । ११. काल्सू० ४।६।९५ । १२. कार सू० ४।४।५९ । १३. डानुबन्धेऽन्त्यत्वरादेर्लोप इति पूर्ण का० सू० २।६।४२ । १४. का० सू० ४।४।४७ । १५. का० उ० २११४ । १६. का० उ० २५१ । १७. धन प्राणने । अनिति श्वासोच्छ्वास दरोतीति : अन धातोरोकहप्रत्यय औणादिक इत्यपेक्षितांशः । १८. का० उ० ११५ । २० २५ - ६ ५ . . १५ "जटा अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता ऽस्त्यस्य विटपी। फलानि सन्त्यस्य फलिनः । १"फलवाभ्यामिनच् ।" न गच्छतीति नगः। "डोs. संज्ञायामपि' । द्रवति वृद्धि गच्छति अथवा द्रु वृक्षकदेशोऽस्यास्तीति द्रुमः । अदिभिश्चरणैः पिबति पाति वा अधिपः । अनिपश्च । फलानि गृहणातीति फलेग्राही । अभिधानादीर्घः। ॥ १ फलमलरजामु ग्रहे। पादैः पिबति पानीयं पादपः। न गच्छतीत्यगः । ४ नगस्याऽप्राणिनि वा" विकल्पेन नकारलोपः । वनस्य पतिः वनस्पतिः। "पारस्करादित्वात्सुट् । महीरहः, कुटः, शालः, पलाशी, दुः, वृक्षः, कुजः, विष्टरः, अगश्चापि । तत्पर्य्यायचरो ज्ञेयो हरिर्वलिमुखः कपिः । वानरः सवगश्चैव गोलाङ्ग्रलोऽथ मर्कटः ॥१२॥ एकोनविंशति नामानि हरौ । अनोकहचरः, तरुचरः, शाखिचरः, विटपिचरः, फलिनचरः, १० नगचरः, द्रुमचरः, अधिपचरः, फलेग्राहिचरः,पादपचरः, अगचरः,वनस्पतिचरः, । इत्यादिद्वादशनामानि मर्कटस्य ज्ञेयानि । हरतीति हरिः । "हः सर्वधातुभ्यः ।" वलयो मुखेऽस्य वलिमुखः । कम्पते वायुना शरीरे कपिः । "हिकम्प्योन लोपश्च ।" ग्राभ्यां किः प्रत्ययो भवति नलोपश्च । वनं वनति सम्भजते वानरः, नरोऽपि । प्लवेन उत्फालेन गच्छति प्लवगः । 'डो' संज्ञायामपि" च । गां भूमि लङ्गतीति गोलाङ्ग- लम् . गोलाङ्गलमत्यासौ गोलाङ्गलः उणादित्वात् "लंगे दीर्घश्च" } "मृङ् प्राणत्यागे ।" म्रियते मर्कटः । ५०मर्कटो" एतावटप्रत्ययान्ती निपात्येते । वनौकाः । प्लवङ्गमः । कीशः । शाखागः । विपिनं गहनं कक्षमरण्यं कानन वनम् । कान्तारमटवी दुर्गम् नव वने । वेप्यते कम्प्यते भयेनात्र विपिनम् । ११"वेपितुह्योह स्वदच" इतीनच् । उणादी उप्यते । ०१२वृजिनाऽजिनेरिणविपिनतुहिनमहिनानि ।" एतानि इनप्रत्ययान्तानि निपात्यन्ते । १३ गाह्यते २० मृगादिभिर्गहनम् । उभयम् । कपति धर्पति कक्षम् । अर्यते गम्यते श्वापदैः अरण्यम् । प्रतिभ्राम्यन्ति अत्र वा अरण्यम् । १४"अर्तेरन्यः" अरमादन्यः प्रत्ययो भवति । उभयम् । कन्यते गम्यतेऽस्मिन् काननम् । वन्यते सेव्यते वनम् । कान्तम् जलान्तम् गच्छति इच्छति वा कान्तारम् । अन्त्यस्यामटविः । स्त्रियामीः। अटवी । दुःखेन महता कप्टेन गम्यते दुर्गन् । नानाऽर्थे । सत्रम् , हव्यम् , दावम् , अरण्यानी , फलम् (१६अफलम्)। १. पात० भाप्य० ५।२।१२२ । २.का०सू० ४।३१४७ इति गमेर्डः । ३. का०सू० ४।२।४७ अनेन ग्रहेरिन् । एवं सति वृद्धयभावात् फलेपहिरिति रूपं सम्भवति । तत्राभिधानादीर्घ इति टीकाकारः। तथाभिधायकवचनाभावात्कोपान्तरेषु फलेग्रहीति दीर्घरहितस्यैव दर्शनाच्च फलेग्राहीति रूपं चिन्त्यम् । ४. नेदृशं किमपि सूत्रं कातन्त्रे । नगोऽप्राणिनि वा इति हे० श० सू० ३१२१२७) ५. पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् पा० सू० ६११।१५७ ६. अत्र अ० चि० ४।१८० प्रमाणम् । तदुक्तम्-वृक्षोऽगः शिखरी च शाखिफलदावद्रिहरिद्रुमो जीर्णोद्रुर्विटपी कुटः दितिरुहः कारस्करो विष्टरः । नन्द्यावर्तकरालिको तरुवसू पर्णी पुलाक्यंहिपः सालानोकहगच्छपादपनगा रूक्षागमौ पुष्पदः ॥ इति । ७. का० उ० ४।४। ८. का. सू० ४१३१४७१ ९. खर्जिकृपिमसिपिजादिभ्य ऊरीली का० उ० ३१६० ० इत्यूलप्र० उणादित्वाल्लगे दीर्घश्चेति दुर्गवृत्तिः । १०. का० उ० ३१५८ । ११. पा० उ० २।५५ । १२. का० उ० २।२२ । इतीनप्रत्ययः वपेर- कारेकारश्च । १३. गाहू विलोडने । बहुलमन्यत्रापीति यु । कृच्छ्रगहनयोरिति निर्देशाद्भस्वः । १४. का ०७० ३।२। १५. कानयति दीपयति स्मरादि । कनी दीप्तौ । युच् । कम् जलम् अननं जीवनमस्य वैति विग्रहोप्यूह्यः । १६. फलपुप्परहिते वन्ध्य-अवकेशि-अफल-शब्दाः कल्पद्रुकोशे दृष्टाः । तदुक्तम्- . "नअर्थात्फलपर्यायोऽवकेशी वन्ध्य इत्यपि । फलपुप्पै विरहित एते वन्ध्यादयस्त्रिषु ।। ।
नाममाला तच्चरः स्याद् वनेचरः ॥१३॥ चरशब्देन युक्ते शवरत्य नव नामानि । विपिनचरः, गहनचरः, कक्षचरः, अरण्यचरः, कान- नचरः, वनचरः, कान्तारचरः, अटवीचरः, दुर्गचरः ।। पुलिन्दः शवरो दस्युनिषादो व्याधलुब्धको । धानुष्कोऽथ किरातश्च सोऽरण्यानीचरः स्मृतः॥१४॥ पोलति भ्रमति महत्त्वं याति गच्छति पुलिन्दः । पुलीन्दश्च । शवति' निर्दयत्वं गच्छतीति शवरः । तालव्यः । शवति अरण्यं शवरः । दस्यति अन्यमुपक्षिणोति दस्युः । "जनिमनिदसिभ्यो युः२ ।" एभ्यो युः प्रत्ययो भवति । निषीदति पापकर्मान निषादः । निषदश्च । वा ज्वलादिदुनीभुवो णः । “व्यध ताडने" व्यध विध्यतीति व्याधः । "दिहि लिहिश्लिषिश्वसिविध्यतीणश्यातां च ।” एषां णो भवति । तुभ्यते गृध्यते मांते लुब्धः । त्वार्थे का लुब्धकः । धनुषा" सह वर्तते इति धानुष्कः । किरति शरान्६ १० किरातः । अरण्यस्य भरण्यानी (तत्र) चरतीति अरण्यानीचरः। इन्द्र वरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमयमारण्ययव- यवनमातुलाचार्याणामानुक ईश्च । अरण्यानीति । वारि कं पयोऽम्भोऽम्बु पाथोऽर्णः सलिलं जलम् । सरं वनं कुशं नीरं तोयं जीवनमव्विपम् ॥ १५ ॥ अष्टादश पानीये । वारयति तृषामिदम् वारि, वृणोति वा वारि । ' शृवसिवपिराजिवृहनिन- १५ भेरिज ।" एभ्य इत्र प्रत्ययो भवति । ञकार इज्वभावार्थः । रान्तम् वार । स्त्रीक्लीवे । काम्यते इष्यते कम् , कायतीति (वा)। .१ "कायतेर्डतिडमौ" प्रत्ययौ भवतः । पीयते पयते वा पयः। “पीङ् पाने ।” "सर्व धातुभ्योऽतुन् ।" अमति गच्छति त्वादुत्वं सान्तम् अम्भस् ।"श्रम गतौ। 'अमे १२ ऽन्तश्च । अकार उच्चारणार्थः । "अत्रि शब्दे" "अम्बु"इति सौत्रो वा "सेवायाम् ।' अम्ब्यते तृष्णातॆरित्यम्बु । “१३अम्बि- कम्बिभ्यामुः। "आभ्यामुः प्रत्ययो भवति । पीयते पाति वा पाथः। “१४रमिकासिकुषिपातृवचिरिचिसि- २० चिगुभ्यत्यक ।" एभ्यस्थक् प्रत्ययो भवति । को यण्वद् भावार्थः । ऋणोत्यर्णः । गम्यते "लानपानार्थैः सान्तम् अर्णस् । सरति गच्छति सलिलम्। उणादौ"षच तेचने।' ॥१६धात्वादेः षः सः।" "सचते ७ इति सलिलम् । “सचेलिलश्च चत्य लुक्स।" सचेलिल : प्रत्ययो भवति चस्य लुक् च । जडति नीचं गच्छति जलम् । जडं च शृणाति हिनस्ति तृष्णाम् इति शरम् । वन्यते तेव्यते एनत् वनम् । कोशते कुशम् । प्राणिचेष्टां वृद्धि नयतीति नीरम् । मीयते हिनन्ति तृषां मीरम् च । तुदति तृपाम् तोयम् । “तुः” २ सौत्र आवरणार्थो वा । जीव्यतेऽनेन जीवनम् । जीवनीयम् च । प्राप्नुवन्ति समुद्रमित्यापः । प्राप्नोतेः क्वि प्रत्ययो भवति । ह्रस्वश्च । अप नियां बर्थः। क्वचिदेकत्वम् । क्लीवत्वम् । अपशब्दो बहुवचनान्तः १. शव गतौ भ्वादिः । बाहुलकादरः। २. का. उ० ४।१। ३. का० सू० : ४।२।५५ । ४. का० सू० ४।२।५८ । ५. धनुः प्रहरणमत्येति व्युत्पत्तियुक्ता । प्रहरणमिरण । ६. किरतीति किरः । कृ विक्षेपे । कप्रत्ययः । अततीत्यतः । अत सातत्यगमने । पचाबच्। किरश्चातावतश्चेति किरात इति पूर्णव्युत्पत्तिः । ७. महदरण्यमरण्यानी तत्र चरतीति विग्रहो युक्तः । ८. इदं पाणिनीयं ४/११४९ अत्र यमेत्यधिकः पाठः। ९.का० उ० ४।५ । १०.का उ० ५/५० । ११.का० उ० ४.५६ । १५.का-उ० ४.६६ । अमति स्वादुत्वं गच्छतीति शेषः । रामाश्रमस्तु अमिशन्दे इत्यतोऽतुन् प्रत्ययमाह । १३. का० उ० ५।३५ । १४. का० उ० २।१० । १५. अर्यते इत्यत्य पर्यायो गम्यते । यतोऽर्णत् शब्दो नत्प्रत्ययान्तः । ऋगतौ । १६. काल तू० ३।८।२४ । १७. सलति गच्छति निम्नमिति विप्रहे तल गतौ इत्यत्मात् तलिकल्यनि इत्यादि ११५४३० सूनेण साधितोऽन्यत्र । १८. का. उ०६।३९ । .
८ । . अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता "अपश्च' " इति घुटि दीर्घः । श्रापः । अत्रुटस्वरत्वात् शसादर्न दीर्घः । अपः। "अपार भेदः।" इति विभक्तिभे पस्य दः । अद्धिः। अद्यः । अन्यः । अपाम् । अप्मु । "3 वर्गादः शपसेषु द्वितीयो वा ।' अफ्सु । अप्सु । श्रामन्त्रणे हे श्रापः । वेवेष्टि देहं शत्येन व्याप्नोतीती विषम् । उभयम् । धनरसः, पुष्करम्, मेघपुष्पम्, पानीयम्, उदकम, क्षीरम, भुवनम्, दकम, कमलम्, कीलालम, अमृतम्, कबन्धम् , सर्वतोमुखम्, ५ श्रानर्त इति नानार्थे । तत्पर्य्यायचरो मत्स्यस्तत्पर्य्यायप्रदो धनः । तत्पर्य्यायोद्भवं पद्म तत्पर्यायघिरम्बुधिः ॥ १६ ॥ तस्य पर्यायस्तत्पर्यायः, तत्परं चरशब्दे प्रयुज्यमाने मत्स्यनामानि भवन्ति । वार्चरः, वारिचरः, कञ्चरः, पयश्चरः, अम्भश्चरः, अम्बुचरः, पाथश्चरः, अर्णश्चरः, सलिलचरः,जलचरः, शरचरः,वनचरः, १० कुशचरः, नीरचरः, तोयचरः, जीवनचरः, अपचरः, विपचरः । प्रदप्रयोगे वारिपर्यायशब्दाने धनस्य नामानि भवन्ति । वाम्रदः, वारिप्रदः, कम्प्रदः, पयःप्रदः, अम्भःप्रदः, अम्बुप्रदः, पाथःप्रदः, अर्णःप्रदः,सलिल. प्रदः,जलप्रदः, शरप्रदः, कुशप्रदः, नीरप्रदः, तोयप्रदः, जीवनप्रदः, अप्प्रदः, विपप्रदः । इत्यादीनि धनना- मानि । तत्पर्यायोद्भवं पद्मम् । वारिपर्यायशब्दाने उद्भवंप्रयुज्ये उद्भवशब्दप्रयोगे कमलनामानि भवन्ति । वारुद्भवम्, वायुद्भवम्, कमुद्भवम् , पयउद्भवम्, अम्भउद्भवम्, अम्बूद्भवम्, पाथउद्भवम्. अर्णउद्भवम्, सलिलोद्भवम्. जलोद्भवम्, शरोद्भवम्, वनोद्भवम्, कुशोद्भवम्, नीरोद्भवम्. तोयोद्भवन, जीवनोद्भवम्, अबुद्भवम्. विपोद्भवम् । तत्पर्य्यायधिरम्बुधिः । वाः शब्दा ( शब्दपर्याया) ग्रे धिप्रयुज्ये धिशब्दप्रयोगे अम्बुधिनामानि ज्ञेयानि । वार्षिः, वारिधिः, कन्धिः, पयोधिः, अम्भोधिः, अम्बुधिः, पाथोधिः, अर्णोधिः, सलिलधिः, जलधिः, शरधिः, वनधिः, कुशधिः,नीरधिः, तोयधिः, जीवनधिः, अधिः, विपधिः । पृथुरोमा पडक्षीणो यादो वैसारिणो झपः । विसारी शफरी मीनः पाठीनो (s) निमिपस्तिमिः ॥१७॥ एकादश मत्स्ये । पृथूनि विस्तीर्णानि रोमाण्यस्य पृथुरोमा । पट अक्षीणि स्पर्शन-रसन-प्राण- चक्षुः-श्रोत्र-मनांसि यस्य सः पडक्षीणः । याति गच्छति जले, यादः । विसरति "ग्रहादेर्णिन्। विसारी मत्स्य इति | स्वार्थेऽण् । वैसारिणः । झपति जन्तून् हिनस्ति झपः । “सृ गतौ”। सृ. शृ ऋ गतौ वा'। सृ. विपूर्वा० वितरति विसर्ति वा इत्येवंशीलः,विसारी । ""विप्रतिभ्यामाङः सत्तेणिन् प्रत्ययः । अत्यो० (स्य ) वृद्धिः । विसारिन् इति जाते सिः । इन्हन् [ पूर्ववत् ] ( पूपार्यम्णां शौ च )" । शफिति २५ शफरः । शफाः (न् ) त्रायन्ते ( राति ) शीघ्रगत्वाच्छफरी । मीयते हिंस्यतेऽन्योऽन्यतः, मीनः । बहुदंष्ट्र- त्वात पाठयति भक्ष्यत्वेन पाटयते वा पाठीनः । निमिपति परस्परं हिनस्ति हन्तीति वा निमिपः । "नाम्युपध (धात् ) पृकृगृज्ञां कः" । तिम्यति जलेनार्दो भवति तिमिः । मत्स्यः, अण्डजः, शकली, विसारः, जलचरः, शल्की । घनाधनो घनो मेघो जीमूतोऽभ्रं वलाहकः । १५ १ २० ८६ " पर्जन्यो मिहिरो नभ्राट १.का० सू० २।२।१९ । २. का. सू० २।३।४३ । ३. का० सू० पू० सू० २५७ । ४. का०सू० ४।२।५० इति णिन् प्र० । ५. पा०सू. ३२१७६ उत्प्रतिभ्यामाडि सर्तेरुपसंख्यानम् इति काशिकावृत्तिः । ६. का सू० २।२।२१ । ७.निमेपरहितत्वान्मीनानाम् । कोपान्तरेषु तेपामनिमिपसंशा- दर्शनाच्च अत्राप्यनिमिप इत्येव छेदो युक्तः । न तु निमिप इति । तदुक्तम्-'विसारः शकली शल्की शंवरोऽनिमिपस्तिमिः' अ० चि० ४।११० १८. का० सू० ४।२।५१ ।
नाममाला ५ नव मेघे । हन हिंसागत्योः । हन्तीति घनाधनः । “अच् 'घनाघनः" इति सूत्रेण घनाघन इति निपातः। अथवा “२चिक्लिदचक्नसचराचरचलाचलपतापतवदावदघनाघनपाटूपटा वा' इति नामभूता संज्ञा रूढाः । तत्र स्लिदेः " नाम्युपधात्" का । क्नसिचरिचलिपतिवदिहनिपाटयतिभ्योऽच्प्रत्ययो द्विर्वचननिपातनं चेति । वाशब्दात् क्लिदः, क्नसः, चरः, चलः, पतः, वदः, घना, पटः, इत्यपि भवति । हन्यते वायुना घनः । "मूर्ती घनिश्च ।" अल् । मिह सेचने । मेहति सिञ्चति भूमिमिति मेघः । "अच्य "चाम् ( दिभ्यश्च )' अच् । नामिनो गुणः। “न्यङ कुः६" इत्येवमादीनां चजोः कगौ भवतः । हश्च (हस्य च) घो भवति । जीवनस्य जलस्य मूतः पुटबन्ध इति निरुक्त्या जीमूतः। जीवन्त्यनेन भूतानि वा जीमूतः । जीव प्राणने । अभ्रन्त्यपो राति वा अभ्रम् । अन गत्यर्थः । न भ्रश्यति तपो यस्मादित्येके । आप्नोति सर्वा दिशो वा अन क्लीवे । बलाकादिभिहीयते वलाहकः । वारिवाहको वा । प्रवर्षति जलं पर्जन्यः। उणादौ “पृजी सम्पर्के" पृङ्क्त पृणक्ति वा पर्जन्यः। पर्जन्यपुण्ये" १० इति अन्यप्रत्ययान्तो निपात्यते । मेहति सिञ्चति विश्वं मिहिरः। महिरः मुहिरश्च । न भ्राजते न शोभते नभ्राट् । “क्विन्भ्राजिपूधुर्विभासाम्" एषां क्विन् भवति । अब्दः, स्तनयित्नुः, पयोधरः, धाराधरः, धूमयोनिः, तडित्वान्, वारिदः, अम्बुभृत् , मुदिरः, जलमुच् । शम्पा सौदामि (म) नी तडित् ॥१८॥ आकालिकी क्षणरुचिर्विद्युत् १५ षट् शम्पायाम् । शाम्यति शीघ्र शम्पा । शम्बा च । शम्पिबति वा शम्पा । सुदाम्ना अद्रिणा एकदिक् सौदामि (म) नी । ५ तेनेकदिगित्यण् । शोभनत्य दाम्नो बन्धनरजोरियं सदृशी सौदामि (म) नी । सौदाम्नी । सौदामिनी च । ताडयति तडित् । ताडयतेर्णिलुक् । ताडयति मेघं ताडयतेऽसौ वेति तडित् । तान्तम् । आकलयति स्तोककालं रोचते वा आकालिकी' १ । “श्राङ् मर्यादाऽभिविध्योः।" क्षणे क्षणे रोचते शालते क्षणरुचिः । विद्योतते विद्युत् । चपला, क्षणिका, शतहदा, हादिनी, अचिरांशुः, २० ऐरावती, चञ्चला, चटुला, दिश्या । तत्पतिरम्बुदः । विद्युच्छब्दाने पतिशब्दे प्रयुज्यमाने अम्बुदनामानि भवन्ति । शम्पापतिः, सौदामनीपतिः, तडित्पतिः, श्राकालिकीपतिः, क्षणरुचिपतिः, विद्युत्पतिः, निर्घातपतिः, अशनिपतिः, वज्रपतिः, उल्कापतिः, इत्यादिमेघनामानि स्युः। निर्यातमशनिवज्रमुल्काशब्दं च योजयेत् ।।१६॥ चत्वारो वजे । निहन्यतेऽनेनेति निर्घातम् । पर्वतादीनश्नाति, अशनिः । “१२ऋतृधन्य- १. हन्तेर्घत्वं च का० वार्तिकम् । अच् घनाधन इत्याकारकं वचनं न क्वचिदु- पलब्धम् । शा० सू० ४।१।५५ घनाघन पाटूपटम् इति । २. इदं तु नोपलब्धम् । चरिच- लिपतिवदीनां वा द्वित्वमच्याक् चाभ्यासस्य वक्तव्यम् इति कात्या० वा० । सू० ४।२।५१ । ४. का० सू० ४।५।५० इति हन्तेरलप्र० घनिरादेशश्च । ४।२।४८ । ६. न्यवादीनाम् इति का० सू० ४।६।५७ इति हस्य घः । ७. बलाकाभिहीयते । श्रोहाङ् गतौ । कर्मणि क्वुन् । अथवा बलेन हीयते श्राहायते वा क्युन् इति रामाश्रमः । पृपोदरादित्वाद् वारिवाह- कशब्दस्य बलाहक इति निपातश्च । ८. काउ० ३।४। ६. का० सू० ४।४।५७ । १०. तेन प्रोक्तमित्यतत्ते- नेत्यधिकारे 'एकदिक्" इति जै० सू० ३।३।८१ । ११. समानकालावावन्तौ यत्या इति विग्रहे अाकालिकडा- द्यन्तवचने इति पा० सूत्रेण समानकालशब्दत्याकाल आदेश इकट् प्रत्यये टित्वान्डीपि त्राकालिकोति मूलोक्तमपि साधु । १२. का० उ० २।४३ । -- . २५ । ३. का. ५. का० सू० २ १० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपता श्यविवृतिग्रहिभ्योऽनिः।" एभ्योऽनिः प्रत्ययो भवति । "टु उ स्फूर्जा वज्रनिर्धापे" स्फूर्ततीति वज्रम् । शूद्रादयः२-"शूद्रोग्रवज्रविप्रभद्रगौरभेरीराः" एते रक् प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । पर्वतेप्वपि वनति बज्रम् । उपति ज्वलति उल्का । उल् इति सौत्रोऽयं धातुर्वा । परिपत्कर्दमः पङ्कः त्रयः कर्दमे । परि समन्ताद् भाराकान्तः सीदति गन्तुं न शक्नोतीति परिपत् । “सत्सू द्विपद्रु. हटुयुनविदभिदच्छिदजिनीरानामुपसर्गे" एपामुपसर्गेऽनुपसर्गेऽपि नाम्युपधात्क्विप्। कृणोति चेष्टां हिनस्तीति कर्दमः । “पृप्रथिचरिकर्दिभ्योऽमः" | पञ्च्यते विस्तार्यते वर्षाकालेन पकः । उभयम् । उणादौ 'पन च' पनायते पन्यते वा पढ़ः । “पसिपनिभ्यां कः"" याभ्यां कः प्रत्ययो भवति । तथा चामरसिंहः- निपद्वरस्तु जम्बालः पङ्कोऽस्त्री शादकर्दमी।" निपवरः, जम्बालः, शादः, इचिकिलः, चिकित्सश्चानेकार्थे । ५ १० तज्जम् तस्मात् जम् उद्भवम् पङ्कजम् , कर्दमजम् , परिपनम् , इत्यादीनि कमलनामानि भवन्ति । तामरसं विदुः । कमलं नलिनं पद्म सरोजं सरसीरुहम् ॥ २० ॥ खरदण्डं कोकनदं पुण्डरीकं महोत्पलम् । १५ दश कमलनामानि भवन्ति । ताम्यति जलं काङ्क्षति तामरसम् । श्रमरसिंहभाप्ये-""तामः प्रको रसोऽस्य तामरसम् । तमः प्रकर्षाऽर्थस्तारतम्यवत् ।' केन मस्तकेन मल्यते धार्यते कमलम् । श्रिया वासाऽर्थ काम्यते वा । 'पटिकमिमुशिकुशिभ्यः कलः ।' एभ्यः कलः प्रत्ययो भवति । कम्मलं च । नलाः सन्त्यस्य नलिनम् । नलति अाकर्पति श्रियं वा नलिनम् । पुलिनलितलिमलिद्रुहिभ्यः २० किनः" । नलं च । पद्यते पाति लक्ष्मीरत्र पद्मम् । “१ अर्तिघृहुसुधृक्षिणीपदभायास्तुभ्यो मः।" उभयम् । सरसि तडागे जातम् सरोजम् । सरस्यां रोहति प्रादुर्भवति सरसीरुहम् । ११खरञ्च तद्दण्डञ्च खरदण्डम् । कोकाश्चक्रवाका नदन्त्यत्र कोकनदम् । क्लीवे । [ रक्त ] कुमुदम्१२ । रक्तकमलञ्च । विशेषणम् [ कुमुदकमलविशेपे ] | पुणति माङ्गल्यात्वात्पुण्डरीकम् । मट (मुट) प्रमर्दने स्थाने । पुण्डिरित्येके । पुण्डति पुण्डरीकम् । भाप्यकर्तृमते पुण शोभे । पुणति जल्पति २५ शोभा पुण्डरीकः13 | "अनुनासिकान्ताड्डः" अनुनासिकान्ताद्धातोर्डः प्रत्ययो भवति । महञ्च तदुत्पलं च महोत्पलम् । तथा च हुलायुधः- "पुण्डरीकं१४ सिताम्बुजम् ।" .. - । १. स्फूर्जतीति विग्रहे स्फूर्तघातो वनादेशो रकप्रत्ययश्च निपात्यः । वन गौ। वनतीति विग्रहे केवलं रक् । २. का० उ० २।१७। ३. का० सू० ४।३।७४ । ४. का० उणादौ एतत्सूत्रं नास्ति । पा० उ० सू० ४८४ कलिकद्यारम इप्यमप्र० । ५. का० उ० ५।३० । रामाश्रमस्तु पचि विस्तारे कर्मणि हलश्चेति घञ् इत्याह । ६. अमर० १।१०।९ । ७. क्षी० भा० १।९।४०१ ८. का उ० ६.१ । ९. का० उ० ६६ । १०. का०७० ११५३। ११. खरो दण्डो यस्येति विग्रहो न्याय्यः । १२. अथ कोकनदं रक्तकुमुद रक्तपंकजे इति मेदिनी तद्विशेपे प्रमाणम् । १३-पर्फरीकादयश्च पा० उ० ४।२० इति मुढघातो रीकन्- प्रत्ययान्तः पुण्डरीकशब्दो निपात्यते । रामाश्रमस्तु पुडिधातोररीकन्प्रत्ययमाह । भाप्यकर्त मते पुण धातोररीक्प्रत्ययो डान्तागमश्चेत्युभयं विवेयम् । केवलं डप्रत्ययस्तु न युक्तः । १४. हलायुधः ३।५८ ।
नाममाला । १० इन्दीवरं चारविन्दं शतपत्रं च पुष्करम् ॥२१॥ स्यादुत्पलं कुवलयम् सप्त नीलोत्पले । इन्दति शोभैश्वर्यं प्राप्नोति इन्दीवरम्। अरान् राजीः विन्दति इति अरविन्दम् । विद्लु लाभे, विद् अरपूर्वः। अरान् विन्दतीति अरविन्दः। “कर्मणि च विदः" श- प्रत्ययो भवति । इति परसूत्रम् । स्वमते-अन्यत्रापि चेति [कर्मण्यण] अण बाधकः । ४२साहिसाति- वेद्युदेजिचेतिधारिपारिलिपि(म्पि)विन्दां त्वनुपसर्गे' एषामनुपसर्गे शो भवति । चक्रस्याऽवयवः अर- विन्दम् । पिण्डी (पुण्डरीक) कमलेऽथे तु (अपि) अरविन्दम् । राजविशेषस्तु अरविन्दः। केचित्कम- लेऽपि पुस्त्वं मन्यन्ते । शतं पत्राण्यस्य शतपत्रम् । क्लीवे । शोभा पोषयति पुष्यति वा पुष्करम् । शोभामुत्कर्षेण पलति गच्छतीत्युत्पलम् । कौ वंलते प्राणिति कुवलयम् । कुक्षितो बहिर्वलयः पत्रवेष्टन- मस्येति श्रीभोजः। विशेषमाह- अथ नीलाम्बुजन्म च । इन्दीवरं च नीलेऽस्मिन् सिते कुमुदकरवे ॥२२॥ नीलास्वुजन्म । इन्दतीन्दीवरम् । कुवलय [दलनीलेति] सामान्यस्य [ नीले ] विशेष- वृत्तिः। अस्मिन् सिते । रात्रौ विकासं करोति चन्द्रेण काम्यते वा कौ मोदते वा कुमुदम् । दान्तञ्च । १५ के उदके जले रौति केरवो हंसः, तस्येदं प्रियं कैरवम् । क्लीबे । तद्वती तस्य कमलस्य पर्याये 'वती' इति प्रयुज्यमाने कमलिनीनामानि भवन्ति । तामरसवती, कमलवती, नलिनवती, पद्मवती, सरोजवती, सरसीरुहवती, कोकनदवती, पुण्डरीकवती, महोत्पलवती, पर- विन्दवती, शतपत्रवती । २० विसिनी ज्ञेया दिनविकासिन्यामेकः । विसमस्त्यस्या विसिनी। नलिनी । पुटकिनी । मृणालिनी । व्रततीर्वल्लरी लता। वल्लीनामानि योज्यानि- चतुर्व" ( चत्वारो व ) लाम् । तृणोतीति व्रतती । प्रकृष्टा ततिरस्या व्रततीः६, व्रततिश्च । २५ जपादित्वाद्वत्त्वम् । वल्लते वल्लरी । लाति ललति चित्तं वा लता । वल्लते वेष्टते वल्ली । वल्लादीः । वल्लिरिदन्तोऽपि । स्त्रियामीः । वल्ली। बातश्च । वीरुक् (५ ), गुल्मिनी, प्रतानिनी, शारिवा', किर्मी च । वृक्षशाखायामपि । १. का० सू० ४।३।१ । २. का० सू० ४।३-५४ । ३. इन्दतीतीन्दीः लक्ष्मीः । सर्वधातुभ्य इन् उ० सू० ४।११७ इतीन् । कृदिकारादक्तिन इति ङीष् च । तस्यावरमिष्टम् इति व्युत्पत्त्यन्तरमप्यूह्यम् । ४. एकः विसोनीशब्द इत्यर्थः । ५. अत्र चत्वारो वल्लामिति युक्तम् । ६. प्रतनोतीति व्रततिः । तन् धातोः क्तिच् । क्तौ च संज्ञायामिति क्तिच् । पृपोदरा-. दित्वात्पस्य व इत्यन्यत्र । ७. लतिः सौत्रो धातुर्वेष्टनार्थों लततीति लता । पचायच् इत्यन्यत्र । ६. सारिवाशब्दोऽनन्तमूलनामकौषधिविशेषवाचकः । किर्मिः स्त्री स्वर्ण पुत्र्यां स्यादपि मालापलाशयो- रिति-विश्वलोचनप्रमाणतः किर्मिशब्दः। किर्मीशब्दो स्वर्णपुत्री-माला-पलाशवाचकः । वृक्षशाखायों लतायां वा उभावप्यप्रसिद्धौ । अतोऽत्रेदमेव प्रमाणम् .. ।
। . १२ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता वारिधिर्वर्ण्यतेऽधुना ॥२३॥ श्रधुना इदानी वारिधिर्वय॑ते कथ्यते । केन ? भाष्यका मुनिश्रीमदमरकीर्तिना । साम्प्रतं समुद्रनामानि प्रारभ्यन्ते- स्रोतस्विनी धुनी सिन्धुः सूवन्ती निम्नगाऽपगा। नदी नदो द्विरेफश्च सरिनामा तरङ्गिणी ॥२४॥ एकादश नद्याम् । स्रोतः प्रवाहोऽस्त्यस्याः स्रोतस्विनी । धुनोति कम्पते धुनिः। स्त्रियामीः । धुनी । स्यन्दति जले चलति सिन्धुः । त्रिपु । “स्यन्देः सम्प्रसारणं धश्च ।" तटेभ्यो जलं लवति स्रवन्ती । निम्नं गच्छति निम्नगा। श्रा समन्तादाप्नोति अभिरगति वा श्रापगा । श्रापेन वा गच्छति आपगा। नदत्यव्यक्तं शब्दं करोति नदी । नदति नदः । “अच् पचादिभ्यश्च" अच् । द्वौ रेफौ तटौ यस्य द्विरेफः । १० सरति समुद्रं गच्छति सरित् । तान्तम् । तरङ्गाः सन्त्यस्यां तरङ्गिणी । तटिनी, निर्भरिणी, कूलङ्कया, शेवलिनी, सरस्वती, समुद्रकान्ता, हादिनी, स्रोतः, कप:", कुल्या, द्वीपवती, रोधोवस्त्रा। तत्पतिश्च भवत्यब्धिः, तस्या धुन्याः पतिर्धनीपतिरित्यादिसमुद्रनामानि भवन्ति । स्रोतस्विनीपतिः, धुनीपतिः, सिन्धु- पतिः, स्रवन्तीपतिः, निम्नगापतिः, अापगापतिः, नदीपतिः, नदपतिः, द्विरेफपतिः,सरित्पतिः,तरङ्गिणीपतिः । १५ पारावारोऽमृतोद्भवः । पारवारकूपारौ रत्नमीनाभिधाऽकरः ॥२५॥ समुद्रो वारिराशिश्च सरस्वान् सागरोऽर्णवः । नव समुद्रे । पारमावृणोति पारावारः। अमृतस्योद्भवः अमृतोद्भवः । अपारं वार जलं यत्राऽसौ अपारवाः । न कुं पृणोति मर्यादापालनादकूपारः । हलायुधे-"न कुं पृथिवीं पिपर्ति व्या- २० प्नोतीति अकूपारः।" अकूवारोऽपि । रत्नमीनशब्दयोरने आकरे प्रयुज्यमाने समुद्रनामानि भवन्ति । रत्नाकरः, पृथुरोमाकरः, षडक्षीणाकरः, यादाकरः ६, वैसारिणाकरः, झषाकरः, विसार्याकरः, शफराकरः, मीनाकरः, पाठीनाकरः, निमिषाकरः, तिम्याकरः । 'उन्दी क्लेदने सम्पूर्वः । समन्तादुनत्त्यस्मादिति समुद्रः । "स्फायितञ्चिवञ्चिशकिक्षिपिक्षुदिरुदिमदिमन्दिचन्द्युन्दीन्दिभ्यो रक्” “अनिदनुवन्धानाम- गुणेऽनुषङ्गः" । तथा च हलायुधे १०-“मुदन्ति मिश्रीभवन्ति भौमाऽन्तरीक्षनादेयजलान्यत्रसमुद्रः।" २५ अमरसिंहे-१ 'समुनत्ति समुद्रः" । वारीणां जलानां राशिर्वारिराशिः । सरांसि जलप्रसारणानि सन्त्यस्य सरस्वान् । सागरस्यापत्यं सागरः, सगरतनयः खातत्वात् । अणांसि सन्त्यस्य अर्णवः । , । १. धुनोति कम्पयति वेतसादीन् । धुञ् कम्पने । विप् । पृषोदरादित्वान्नुक् । नान्तत्वान्डीप् धुनी इति रामाश्रमः । २. का० उ० ११७। ३. अभिरगतीति विग्रहेऽपः पकारस्य जश्त्वाभावोऽकारस्य दीर्घत्वं च पृपोदरादित्वेन निपातात्साध्यम् । ४. का० सू० ४।२।४८ । ५. अत्र कर्पूरिति दीर्घोकारान्तपाठो युक्तः । तदुक्तम्-क' नंदी करीषाग्न्योरिति शाश्वतः ६७२ । ६. यादस् शब्दस्य सकारान्तत्वाद् याद आकर इत्येव न तु यादाकरः । ७. समन्तादुनत्ति आर्दीकरोति भूभागानेतावानेव विग्रहः । अत्रास्मादित्यपा- दानार्थष्टोकोक्तो नापेक्षणीयः । समीचीना मुद्रा जलचरविशेपा यस्मिन् सह मुद्रया मर्यादया वर्तते वेति व्युत्पत्त्यन्तरमप्यूह्यम् । ८, का० उ० २।१४ । ६. का० सू० ३।६।१ । १०. मुद संसर्गे चुरादिः सम्पूर्वः । कथादावदन्ते तत्पाठाच्चुरादिणिचो वैकल्पिकत्वान्मुदन्तीत्यपि पक्षे । समो मकारलोपः पृषोदरादित्वात्तत्र वोध्यः । ११. क्षी० भा० १शक्षा नाममाला - - १३ तथा च क्षीरस्वामिभाष्ये-"१ अर्णोऽस्यास्त्यर्णवः । 'अर्णसो लोपश्च' इति वः सलोपश्च ।" उदधिः, उदन्वान् , तोयनिधिः, जलराशिः, वीचिमाली, शशध्वजः । तद्भेदाः सप्त-लवणोदः, क्षीरोदः, सुरोदः, इतूदः, स्वादूदः, दध्युदः, घृतोदः । सीमोपकण्ठं तीरश्च पारं रोधोऽवधिस्तटम् ॥२६॥ सप्त समीपे । षिञ् बन्धने । सिनोति बध्नातीति सीमा ! "3धर्मसोमाग्रीष्माऽधमा" एते मक्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । कण्ठस्थ समीपे उपकण्ठम् । तरन्त्यस्मात्तीरम् । तरति प्लवते इव के तीरं वा। "पिपति वृणोति जलेनेति पारम् । पार्यते समाप्यतेऽस्मिन्निति वा। रुणद्धि जलं वेगेन रोधस् । सान्तम् । उभयम् । अवधानम् अवधिः । “६उपसर्गे दः किः" । तथ्यते पाहन्य- तेऽम्भसा तटम् । त्रिषु । तटः। तटी। इदन्तो वा । तटिः । स्त्रियामीः, तटी । कूलम्, कच्छः, प्रपातः. तीरम् । १० भङ्गस्तरङ्गः कल्लोलो वीचिरुत्कलिकाऽवलिः । पाली वेला तटोच्छ्वासौ विभ्रमोऽयमुदन्वतः ॥२७॥ एकादश तरङ्ग । भज्यते जले स्वयमेव भङ्गः । तरति प्लवते तरङ्गः । "तृपतिभ्यामङ्गः" आभ्यामङ्गप्रत्ययो भवति । 'कल्ल्यन्तेऽनेन नद्यः कल्लोलः । कुत्सितं लोडति कल्लोल इत्येकः । याति ( वयति) गच्छति वीचिः । स्त्रियामीः, वीची। वृद्धिमुत्कर्षेण कलयति उत्कलिका। स्त्रि- १५ याम् । श्रा समन्ताद् वलते प्रावलिः । पाल्यते पालिः । स्त्रियामीः । पाली । वेलयति पूर्णिमादि- कालमुपदिशति वेला। स्त्रियाम् । तटश्च उच्छ्वासश्च तटोच्छ्वासौ। तटति तटः। उच्छवसनम् उच्छ्वासः। विभ्रमति विभ्रमः विकारः । कस्य १ उदन्वतः समुद्रस्य । ऊर्मिः, लहरी । सम्प्रति मनुष्यवर्ग प्रारभ्यते श्रीमदमरकीर्तिना- मनुष्यो मानुपो मयों मनुजो मानवो नरः । ना पुमान् पुरुषो गोधा एकादश मनुष्ये । मनोरपत्यं मनुष्यः । *१°कुरुनिषादेभ्यः प्रथमाऽपत्येऽपि' । कुरुनिषादाभ्या- मणीपि मनोः सान्तश्च । क्वचिद्विस्वरस्य न वृद्धिः । अण्वा । * मनुष्यः । मानुषः । उणादौ च । मन्यते सुखदुःखादिकमिति मनुष्यः। ४११मनेरुस्यः" उस्यप्रत्ययः । मानयति मान्यते इति वा मानुषः । ॥१२मानेरुसः" उस्पत्ययः । उभयम् । २० २५ १ क्षी० भा० १६ । २. कोषान्तरेषु समुद्रस्य शशध्वज इति नाम नोपलव्धम् । कथं चित्समाधानापेक्षायां शशिध्वज इति पाठो बोध्यः । शशी चन्द्रो ध्वजश्चिह्न वंशप्रख्यापकं यस्येति तद्विग्रहः । चन्द्रस्य समुद्रप्रभवत्वं पुराणप्रसिद्धम् । ३. का० उ० ११५६ । ४. तु प्लवनतरणयोः । क- प्रत्यये ऋत इर् दीर्घत्वं च । अत्रोणादिः शरणम् । सरलः पन्थास्तु पार तीर कर्मसमाता । ततस्तीरय- तीति विग्रहे पचाद्यच् । ५. पालनपूरणयोः पृ धातुस्तेन पिपर्तीत्यस्य पूरयतीति पर्यायो युत्तो न तु वृणोतीति । ज्वलादित्वापणः । क्षीरस्वामी तु परे पार्वे भवं कूलम् पारम् इत्याह । ६ का० सू० ४।५।७० इति किः। ७. का० उ० ५।२२ । ८. कल्ल अव्यक्ते शब्दे कल्लन्ते इत्यस्य शब्दायन्ते इत्यर्थः । उणा- दित्वादोलचप्र० । कं जलम् तस्य लोलश्चञ्चलोऽवयवः । अनुस्वारस्य परसवर्णो लकार इति रामाश्रमः । ९. वे संवरणे । वेञो डिच्च उ० सू० ४१७२ इतीचिप्र० । १०. *एवं चिह्नितांशस्थाने “मनोः पण्प्या का०रू०पू० ४९३ इति ष्य षण् प्रत्ययौ इति पाठो युक्तः । ११. का० उ० ६.१० । १२. का० उ०६।११ । . ।
म्रियते मयः । १० - १५ १४ अमर की निविरचितभाप्योपेता "नीय वाञ्छितं यान्तो वरमेते भुजङ्गमाः । न पुनः पक्षहीनत्वात् पङगुप्रायन्तु मानुपम् ॥" १. ङस्त्यः" । स्वार्थे त्यो वा । मनोर्जातः मनुजः । मनोरपत्यं मानवः । तृणाति विनयति नरः, ‘णीञ् प्रापणे' नयतीति वा । "3नियो डाऽनुबन्धश्च" । अस्मात् ऋन् प्रत्ययो भवति, स च डाऽनुबन्ध इष्यतेऽन्त्यस्वरादिलोपार्थः । पूर्यते कुलमनेन सान्तः-*पुमान् । उणादौ पूङः पवते पुनातीति वा पुमान् । ""सिर्मनन्तश्च ।” अस्मासिः प्रत्ययो भवति, अस्य च मन् अन्तः चकाराद् ह्रस्वत्वं च । इकार उच्चारणार्थः । पुरि पुरि शयनात् पूरणाहा पुरुषः । पृणाति पूरयति वा स्त्रीणामुदरं गर्भेणेति पुरुपः६ । "पृणातेः कुपः” । अस्मात्कुपः प्रत्ययो भवति । कोऽनुबन्धः । अन्येषा- मपीति वा दार्घः । पूरुषः । लत्वे पुरुपः, पुलुपश्च । "गुध परिवेष्टने' । गुध्यति गोधाः । धवः स्यात्तत्पतिनृपः ॥२८॥ तस्य मनुष्यशब्दस्याने धव-पतिशब्दप्रयोगे नृपनामानि भवन्ति । मनुष्यधवः, मानुपधवः, मर्त्यधवः, मनुजधवः, मानवधवः. नरधवः, नृधवः, पुन्धवः, पुरुषधवः गोधाधवः । मनुष्यपतिः, मानुपातिः मर्त्यपतिः मनुजपतिः, मानवपतिः, नरपतिः, नृपतिः, पुस्पतिः, पुरुपपतिः, गोधापतिः । भृत्योऽथ भृतकः पत्तिः पदातिः पदगोऽनुगः । भटोऽनुजीव्यनुचरः शस्त्रजीवी च किङ्करः ॥२६॥ एकादश सेवके । भियते इति भृत्यः ! “भृञोऽसंज्ञायाम्" | भ्रियते राज्ञा भृतः । स्वार्थे कः । भृतकः । पतति अधो गच्छति पत्तिः१०, पतनं वा । [पादाभ्याम्] अतति [पदातिः११] । पादातिकः । श्रेणादिक इकः । १ विनयादित्वात्स्वार्थे ठण। पद्भ्यां 3 गच्छतीति पदगः । श्रनु पश्चाद् गच्छति अनुगः । भटति युद्धं बिभर्ति भटः । अनुजीवतीत्येवंशीलः अनुजीवी । अनु पश्चाचरतीत्यनुचरः । शस्त्रेण आयुधेन जोवतीत्येवंशीलः शस्त्रजीवी । किं कुत्सितं कायें विदधाति किङ्करः। सहायः, सेवकः, पदजेयः, पद्गः, पदिकश्च । तथा च यशस्तिलके-(श्लो० १३०) "सत्यं दूरे विहरति समं साधुभावेन पुंसां धर्मश्चित्तात्सह करुणया याति देशान्तराणि । पापं शापादिव च तनुते नीचवृत्तेन सार्धं सेवावृत्तेः परमिह परं पातकं नास्ति किञ्चित् ॥" स्त्री नारी वनिता मुग्धा भामिनी भीरुरङ्गना । ललना कामिनी योपिद् योषा सीमन्तिनीति च ॥३०॥ १. का० उ० ६।१२ । ५. वाणपत्ये का० रू. पू० ४७३ इत्यण् । ३. का० उ० २।४१ । ४. पाति पुनाति वा पुमान् । पातेथुम्सुन् पूजी डुम्सुन् , पा० उ० ४।१७० इति डुम्सुन् इति प्रक्रियाऽन्यत्र । ५. का उ० ४।४२ । ६.पुरि शयनादिति तु निरुक्तप्रकारो विग्रहस्तु पृणातीत्यादिरेव । ७. का०उ० ३५४ । ८. गोधाशब्दस्य पुरुषार्थे कोषान्तरप्रमाणं नोपलब्धम् । तदुक्तम्-"गोधा तलनिहाकयोः" वि०लो० । गोधा प्राणिविशेषे स्य.ज्ज्याघातत्य च वारणे । प्राकारान्तस्त्रीलिंगत्वं च सर्वत्रास्योक्तम् । अ०सं० २४३। अतोऽस्य मूलं मृग्यम् । गोद इति पाठे तु गोदो मस्तिष्कमस्यास्तीति गोदः मुख्यमस्तिष्कवत्त्वात् पुरुप इति समाधेयम् । तदुक्तम् गोदं तु मस्तकस्नेहो मस्तिष्को मस्तुलुङ्गकः अ० चि० ३।२८९ । ६. का० सू० ४।२।२५ इति क्यप् । १. . औणादिकस्तिः, क्तिच् क्तौ च संज्ञायामिति वा क्तिच् । पतनं वा इति व्युत्पत्तित्वप्रासङ्गि- कत्वापेक्ष्या । ११. अज्यतिभ्यां च पा०3० ४।१३० इत्यतेरि । पादस्य पदाच्यातिहतेषु इति पदादेशश्च । १२. विनयादेष्ठण जै० सू० ४।२।४० । १३. पदाभ्यां पादाभ्यां वेति वक्तव्यम्, न तु पद्भ्यामिति । पाद इत्यापत्तेः । पादस्य पदाज्यातीति पादस्य पद । २० १ २५ नाममाला १५ । नितम्विन्यबला बाला कामुकी वामलोचना । भामा तनूदरी रामा सुन्दरी युवती चला ॥३१॥ द्वाविंशतिः छियाम् । “रतृञ् श्राच्छादने" स्तृणात्याच्छादयति स्वदोषान् परगुणानि- ति स्त्री। उणादौ । स्तृणात्याच्छादयति लज्जयाऽत्मानमिति स्त्री। स्तृणातेष्टत्'' प्रत्ययो भवति । अकारमात्रः । "रमृवर्णः” । अथवा ड्रटपाठः । डाऽनुबन्धोऽन्त्यस्वरादिलोपार्थः । डकारो ५ नदाद्यर्थः । रकारमात्र एव । अमरसिंहभाष्ये?-"स्त्यायत्य(तेऽ) स्यां गर्भः स्त्री।" तथा च हलायुधे- "स्तृणाति विवेकमाच्छिनत्ति स्त्री" । नरस्य स्त्री जातिश्चेत्नारी । नरं वनति भजते वनिता । मुह वैचित्ये कार्येषु मुह्यति मुग्धा । "मुहेर्धक् हस्य गः ।" भामते कुप्यते (ति) भामिनी ! [भामः] क्रोधोऽस्त्यस्याः वा भामिनी । बिभेत्यस्माद्(त्यसौ)भीरुः । ""भियो रुग्लुकौ च ।" भीरुः । प्रशस्तान्यङ्गान्यस्या अङ्गना लाडयति, (लडति) विलसति, ललयति (ललति) नरमीप्सते वा ललना । "लल ईप्सायाम्" । भोगान् १० कामयते कामिनी । युषः सौत्रोऽयं धातुः सेवाऽर्थे । योषति पुरुषं गच्छति रतेच्छया आत्मनो योषा। "कष शिष जष झष दष मष रुष रिष यूष जृष हिंसाः” । योप्रति हिनस्ति हन्तीति योषित् । “६हृस्तडि- रुहियुषिभ्य इतिः" एभ्य इतिप्रत्ययो भवति । इकार उच्चारणार्थः । अमरसिंहे-"यौति पुंसा योषित् ।" अजादित्वादाप्प्रत्यये योषिता च । सीमन्तोऽस्तस्याः सीमन्तिनी । बध्नाति चित्तं वधूः । नितम्बोऽस्त्यस्या नितम्विनी । न विद्यते बलमस्या अबला। 'बा' सौभाग्यं लाति गृह्णातीति बाला । “कमु कान्तौ” कम् । १५ “कमेरिनिङ् कारितम्" इन् । “अस्योप०" दीर्घः । कामयते इत्येवंशीला कामुकी । ""शृकमगमहनकृष- भूस्थालषपतपदामुकञ् ।” १°कारितलोपः । ४१ :निमि०" दीर्घाभावः । ञकाराऽनुबन्धत्वात्पूर्वस्योप०दीर्घः । वामे सुन्दरे लोचने नेत्रे यस्याः सा वामलोचना। "भाम क्रोधे” चुरादौ । भामयति । “भाम क्रोधे" भवादावकाराऽनुबन्ध अात्मनेपदी। भामते भामा। चक्षुर्दोषादिदर्शनात् । तनु सूक्ष्ममुदरं यस्याः सा तनूदरी। नरेषु रमते, मनांसि रमयति वा रामा१२ । सुष्ठु द्रियते अाद्रियते जनोऽत्र, शोभनो दरो २० वराङ्गच्छिद्रमस्या वा १३सुन्दरी । अथवा 'सुन्दर' इति सौत्रोऽयं धातुः । युवत् शब्दान्नदादिविहितस्तिः१४ युवतिः। यु मिश्रणे यौति नरान् मिश्रयति औणादिको वा अतिः युवतिः । स्त्रियामीः । युवती । यूनीत्यन्यः । तथाहि प्रयोगः- "भर्ता संगर एव मृत्युवसतिं प्राप्तः समं बन्धुभिः, यूनी काममयं दुनोति च मनो वैधव्यदुःखाद् वधूः २५ बालो दुस्त्यज एक एव च शिशुः कष्टं कृतं वेधसा, जीवामीति महीपते प्रलपति यद्वैरिसीमन्तिनी ।।" चलचित्तान्पुरुषान् चालयतीति चला' १५ । वामनेत्रा, पुरन्ध्री, वासिता, वर्णिनी,प्रमदा, रमणी, । १. का० उ० ४।३६। २. का० सू० १।२।१०। ३. क्षी० भा० २।६।२। ४ काउ० ६।६८४ इति धिक् प्र० हस्य गश्च । ५. का०सू० ४।४।५६ । ६. का०० १।३५ । ७. क्षी० भा० २।६।२ । ८. का० रू० उ० ४६२ । ९. का० सू० ४।४।३४ । १०. कारितस्यानामिड्विकरणे का० सू० ३।६।४४ इतीनो लोपः । इनः कारितसंज्ञा कातन्त्रव्याकरणे । ११. निमित्तापाये नैमित्तिकत्याप्यपायः इति परिभाषेन्दुशेखरे अकृतव्यूहपरिभाषार्थरूपः । १२. रमते रामा । ज्वलादित्वाण्णः । रमयतीति तु न युक्तम्, ण्यन्तस्य ज्वलादित्वाभावात् । १३ सु-अतीव उनचि सुन्दरी । उन्दी क्लेदने । वाहुलकादरप्र० । शकन्ध्वादि- त्वादुकारस्य पररूपम् । गौरादित्वान्डीप् इति रामाश्रमः । १४. का० सू० २४१५० । १५. चलचितः पुरुपैश्चलती'त चलत्येव विग्रहः । पचायच् । णिजन्तातु चाला इति स्यात् ।
--- १६ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता दयिता, प्रतीपदर्शिनी, कान्ता, वशा, महिला, महेला च । भार्या जाया जनिः कुल्या कलत्रं गेहिनी गृहम् । महिला मानिनी पत्नी तथा दाराः पुरन्ध्रयः ॥३२॥ दश कलत्रे । इभृञ् धारणपोपणयोः" । भ्रियते पुण्यते गर्भण भार्या । “ऋवर्णव्यञ्जना- ५ न्तात्थ्यण्" । यकारमात्रः । अत्योपधावृद्धिः । भार्या इति जातम् । स्त्रियामादा" | याप्रत्ययः । प्र. सिः । “३ श्रद्धायाः सिर्लोपम् ।" सिलोपः । “च्या वयोहानी" जा (जि) नाति जाया। 'जनी प्रादुर्भावे च' । सुखी जायते अात्मा बजाया। ""सन्ध्यादयः-सन्ध्या वन्ध्या जाया इत्यादयः शब्दाः यक्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । जनयति पुत्राअनिः । ६:". सर्वधातुभ्यः" । कुले साधुः कुल्या यदुगवादितः" | "कड मदे" कड तादादिक । कडति मायति यौवनेनेति कलत्रम् । "अमिनक्षिकडिभ्योऽत्रः" अत्रप्रत्ययः । १० कडत्रम् । डलयोरक्यम् । प्रथ, सि० नपु० अका० मुरा० । 'मोऽनु० । गेहमस्त्यस्या रोहिनी। 'ग्रह उपादाने" | गृह्णाति प्रत्युपार्जितं गृहम् । “१°गेहेत्वक" अक्प्रत्ययः । “अहिल्या'१' -सम्प्रसारणम् । मयते पूज्यते । महिला । मानः प्रणयकोपोऽस्या मानिनी । पति पतति याति पत्नी । 'दृ विदारणे" । ६० क्र० । दोर्यते शतखण्डीभवति पुरुष एभिरिति दाराः । "१२भावे" घञ् । अकारमात्रः । वृद्धिः । दार इति जातम् । प्रथमा जस् । प्राया बहुत्वं च । पुरं धमयन्ति, नेत्रान्ते पुरं शरीरं धरन्तीति १४पुरन्ध्रयः। १५ क्षेत्रम्, सहधर्मचारिणी, गृहाः, सहचरी, सहचरा ।१५ वल्लभा प्रेयसी प्रेष्ठा रमणी दयिता प्रिया। इप्टा च प्रमदा कान्ता चण्डी प्रणयिनी तथा ॥ ३३ ॥ एकादश वल्लभायाम् । वल्लते पत्युश्चित्तं संवृणोतीति वल्लभा । १६कृशलिगर्दिरासि- वलिवल्लिभ्योऽभः” अभः प्रत्ययः पाप्रत्ययः । अतिशयेन प्रिया प्रेयसी । “तर "तमेयस्विष्ठः" प्रकर्षाऽर्थे २० 'तर तम ईयसु इष्ट' इत्येते प्रत्यया भवन्ति । अतिशयेन प्रिया प्रेप्टा । रमते ननोऽत्र, मनांसि रमयति '. का० सू० ४।२।३५ इति ध्यण् प्रत्ययः । २. का० सू० २।४/४१ । ३. का० सू.० २।१।३७ । ४. का० उ० ४।३० । ५. का० उ०३११४ । ६. का० सू० २१६११ इति यत्प० । ७. का०3० ३॥५ गड सेचने । गहति गड्यते वा "गडेरादेश्च कः" पा० उ० इत्यत्रन् । डलयोरेकत्वम् । कड शासने मद । कडति कड्यते वा बाहुलकादत्रन् । कलं मधुर ध्वनि त्रायते रक्षति वा । त्रैङ् पालने कः इत्यन्यत्र । ८. अकारादसम्बुद्धी युश्च इति पूर्ण का० सू० २१२१७ इति सेलोपो युरागमश्च । ९. मोऽनुस्वार व्यञ्जने इति पूर्ण का०सू० १।४।१५ इत्यनुस्वारः । १०. का० सू० ४१२१६० । ११. का० सू० ३।४।२ ग्रहिल्यावयिव्यधिवष्टिव्यचिपच्छित्रश्चिभ्रस्जीनामगुणे इति पूर्णसूत्रम् । १२ का० सू० ४।५।१३ । १३ का० सू० ३।६।५ । अस्योपधाया दी| वृद्धिर्नामिनामिनिचक्षु इति सूत्रस्वरूपम् । १४. स्यात्तु कुटुम्बिनी पुरन्धी २।६।६ । इन्यमरादिकोशेषु दाकारान्तपुरन्ध्रीशब्दत्यैव सत्वादत्र पुरन्ध्रय इति पाठोऽयुक्त इति न भ्रमितव्यम् । पुरं धरन्तीति विग्रहे 'श्रच इ.'' पा० उ० ४।१३९ इति इ: । पृषोदरादित्वात्पुरोऽकारान्तत्वं मुमागमश्चेति रीत्या तस्याप्युपपत्तेः । अत एव " ती स्नातकैर्वन्धुमता च राज्ञा पुरन्धिभिश्च क्रमशः प्रयुक्तम्" इति रघुः । पुरन्धमयन्तीति न विचारसहम, तत्साधकानुशासनविरहात् । १५. भार्यादिपुरन्ध्यन्त- शव्देषु सामान्य विशेषभावादर्थभेदो न विस्मर्तव्यः । तद्यथा-भार्या, जाया, कुल्या, कलत्र, गेहिनी,गृह,पत्नी दारा परिणोतीवाचकाः । महिलामानिन्यो विशिष्टनायिके । पुरन्धी पतिपुत्रवती । १६. का०3० ३।१२ । १७. एतच कातन्त्रसूत्रं नोपलव्यम् । गुणाङ्गाद्वेष्टेयसू शा० सू० ३।४१७५ इतीयसुप्रत्ययो बोध्यः । - नाममाला १७ । . वा रमणी । नरेषु दयते गच्छति ईष्ट वा दयिता। प्रीणाति पतिचित्तं रञ्जयति प्रिया। इज्यते इप्यते वा इष्टा । प्रकृष्टो मदोऽस्याः प्रमदा । काम्यते नरेण कान्ता । चण्डते कुप्यति चण्डी । चण्डिका च । प्रणयोऽस्या अत्तीति प्रणयिनी। सती पतिव्रता साध्वी पतिवत्येकपत्यपि । मनस्विनी भवत्यार्या- सप्त पतिव्रतायाम् । एकः पतिरस्तीति सती' । पतिव्रतं करोति,पतिरेव व्रतं सेव्यो नान्यो यस्या इति वा पतिव्रता । पतिसेवैव व्रतं यस्याः पतिव्रता । यत्स्तृतिः-"नास्ति' स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतमिति ।" साधयति साध्वी । पतिरस्या अस्तीति पतिवती । एकः पतिर्यस्याःसा एकपती। मनोऽस्या अस्तीति मनस्विनी । अर्यते सेव्यते आर्या । सुचरिता । विपरीता निरूप्यते ॥ ३४ ॥ मया धनञ्जयेन, भाष्यका अमरकीर्तिना वा कथ्यते विपरीता असदृशा। वन्धकी कुलटा मुक्ता पुनर्भूः पुंश्चली खला । षड् बन्धक्याम् । बध्नाति तरुणचित्तानि बन्धकी। कुलमटति कुलटा। तथा चोणादौ "टल ट्वल वैकल्ये' हेताविन् । अत्योपधाया दीर्घः । कुलपूर्वः । कुलं टालयति कुलटा । "कुले टाले- रिलुक् डश्च" कुले उपपदे टालेरिन्नन्तस्य डः प्रत्ययो भवित इल्क् च । स्वाचार मुच्यते (स्म ) पत्या जनैर्वा मुक्ता । पुनर्भवतीति पुनर्भूः । पुमांसं चालयति पुश्चली। खं पञ्चेन्द्रियोत्पन्नसुखं लाति गृह्णातीति १५ खला, अन्यपुरुषलम्पटत्वात् । पांशुला, स्वैरिणी, असती, इत्वरी, धर्षणी, अविनीता, अभिसारिका, चपला। स्पर्शाऽभिसारिका दूती स्वैरिणी शम्फली तथा । पञ्च दूत्याम् । 'स्पृश संस्पर्श' । स्पृशति, स्प्रक्ष्यति, अस्पाक्षीत्, पस्पर्श वा घन । स्पर्शः । “पद५. रुजविशस्पृशोचां घन' । नामिनश्च गुणः । "स्त्रियामादा" आप्रत्ययः । स्पर्शा। पुरुषान्तरमभिसरति अभिसारिका । दूयन्तेऽस्या मौखर्यात् दूती। 'ईर् गतौ कम्पने च'। ईर् । ईरणम् ईरः । “भावे"८ २० घन प्रत्य: । स्वस्य ईरः स्वैरः । स्वैरो विद्यतेऽस्या स्वैरिणी। "तदस्याऽस्तीति मन्त्वात्वीन्" इन् । "१°नदाद्यविवाह' ई प्रत्ययः। "रघुवर्णेभ्यः ११" नस्य णत्वम् । शं सुखम् फलति निष्पादयतीति शम्फली । तथा तेनैव प्रकारेण । गणिका लञ्जिका वेश्या रूपाजीवा विलासिनी । पण्यस्त्री दारिका दासी कामुकी सर्ववल्लभा ॥ ३६ ।। २५ नव वेश्यायाम् । गणः पेटकोऽस्त्यस्याः, गणयतीश्वरानीश्वरौ वा गणिका । 'लजि लाजि लाजा लज तर्ज भर्सने' । लञ्जयति निः स्वान्पुरुषान् तर्जयतीति लक्षिका । वेशे वेश्यावाटे भवा वेश्या'२ रूपेण या समन्ताजीवतीति रूपाजीवा। विलासोऽस्याऽस्तीति विलासिनी। तथा चोक्तम्- "हावो मुखविकारः स्याद् भावश्चित्तसमुद्भवः । विलासो नेत्रजो ज्ञेयो विभ्रमोऽत्र गन्तयोः ।। १ अस्धातोः शतृप्रत्ययान्तो ङीवन्तः सतीशब्दः। २ "नास्ति स्त्रीणां पृथग यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् । पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे न हीयते” इति मनुस्मृतिः ५।१५५। ३. पतिवत्नी, एकपत्नी इति पाठो युक्तः । ४. का० उ० ५।४७ । ५. का० सू • ४/५।१ । ६. का०सू० ।५।२ नामिनश्नोपधाया लघोः इति पूर्णसूत्रम् । ७. दूयन्ते परितप्यन्ते । अस्य कर्तारः स्त्रीपुमांसः । ८. का० सू० ४१५।३ । ९. का० २.० २।६।१५ । १०.का० सू० २।६।५०। ११. का० सू० २।४।४८। “रपृवर्णेभ्यो नोममन्त्यः स्वरहयकवर्गाऽन्तरो ऽपि" इति पूर्ण सूत्रम् । १२. वेशेन नेपध्येन शोभते, “कर्मवेशाद्यत्" इति यत् । वेशे भवा दिगादित्वाद्यत् । , । । MY ३ १८ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता ५ पण्यस्य स्त्री परयस्त्री । परिमाणं कृत्वा रमयतीत्यर्थः । दृणाति विदारयति कामिनम् दारिका । दत्यति परिकर्मणा क्षयति, ददात्यात्मानं वा दासी। दाशी । तालव्यदन्त्यः । कामयते इत्येवंशीला कामुकी । सर्वेपी पुरुषाणां वल्लभा सर्ववल्लभा । सैरिन्ध्री। चितुःपष्टिकलाभिज्ञा शीलरूपादिसेविनी । प्रसाधनोपचारज्ञा सैरिन्ध्री कथ्यते बुधैः॥" गन्धकारिका । पण्यस्त्री च । कान्तेष्टौ दयितः प्रीतः प्रियः कामी च कामुकः । वल्लभोऽसुपतिः प्रेयान् विटश्च रमणो वरः ॥३७॥ त्रयोदश कान्ते । काम्यतेऽभिलप्यते कान्तः । इप्यते इष्टः । दया कृपा संजाता अस्येति दयितः । १० २तारकितादिदर्शनात्संजातेऽर्थे इतच् ।' '3इवर्णावर्णयोर्लोपः स्वरे प्रत्यये पे च ।' श्राकारलोपः । सौरेफः । प्र प्रकर्षण ई कामसुखम् इतः प्राप्तः प्रीतः । पृपोदरादित्वात् श्राकारलोपः। प्रीणातिस्म प्रीतः। प्रीणाति प्रीणीते वा प्रियः । “नाम्युपधप्रीकृगृज्ञां कः' । ""स्वरादाविवर्णावर्णान्तस्य धातोरिजुवौ।" कामोऽस्यास्तीति कामी । कामयते इत्येवंशीलः कामुकः । वल्लते वल्लभः । “कृशलिगर्दि- रासिवलिवल्लिभ्योऽभः ।" अभः प्रत्ययः । असूनां प्राणानां पतिः असुपतिः । अतिशयेन प्रियः प्रेयान् । १५ "प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणां प्रस्थस्फवहिगर्वपित्रबद्राघिवृन्दाः ।” विट शब्दे विटति कामोद्रेकशब्दं करोतीति विटः। 'इगुपधेति कः । 'रमु क्रीडायाम् ।' रम् । रमते कश्चित् । तं प्रयुक्त इन् । अस्योपधादीर्घः । “मानुबन्धानां हस्वः ।" रमयतीति रमणः । “१०नन्द्यादेयुः ।" ११"युवुझानामनाकान्ताः" अनः । "१२कारितस्य०" कारितलोपः। "१3रपृ०" नस्य णत्वम् । वृणोति वर- यति वा वरः । कमिता। पतिः । वरयिता । भर्ता । भोक्ता । धवः । रुच्यः । श्रभीकः । ॥१४अम्य- २० नुभ्यां कामपितरि को वा दीर्घश्च" जनयति का। अभिकः । अमुकः । प्राणाधिनाथः । सेक्ता। सवित्री जननी माता त्रयः मातरि । सूते जनयति सवित्री। जनयति जायतेऽस्यां वा जननी । माति गर्भोऽत्र १५मानयति वा माता। अम्बा । जनकः सविता पिता। त्रयः पितरि । जनयति उत्पादयतीति जनकः । पुत्रान् सृजते (सूते ) सविता । अहितात् पाति रक्षतीति पिता । "उणादौ" पा रक्षणे, पातीति पिता । 'स्वस्रादयः'१६ | "स्वसनप्तनेष्टुत्वष्ट क्षत्तृहोतृप्रशास्तृपितृमातृदुहितृजामातृभ्रातरः" एते शब्दास्तृन्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । २५ १. चतुष्पष्टिकलाऽभिज्ञा शीलरूपादिसेविनी । प्रसाधनोपचारज्ञा सैरन्ध्री स्ववशेति चेति कात्यः" इत्यमरकोशे क्षी० स्वा० । २. का० रू० पू० ५०८ । ३. का० सू० २।६।४४ । ४. का० सू०.४।२।५१ । ५. का०सू० ३।४।५५। इतीप् । ६. का० उ० सू० ३।१२ । ७. पा०सू० ६।४।१५७। इति प्रियशब्दस्य प्रादेशः । ८. "इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः" पा० सू० ३।१।१३५। ६. का० सू० ३।४।६५। इति हस्वः । १०. का० सू० ४।२।४९| इति युप्रत्ययः । ११. का० सू० ४।६।५४। इति योरनादेशः । १२. का० सू० .३।६।४४| इतीनो लोपः। १३. का० सू० २१४/४८। १४. कातन्त्रे नैतत्सूत्रमुपलब्धम् ! जैनेन्द्रव्याकरणे-"शृङ्खलि. कोदरिके" त्यादि सूत्रम् ४११११७) तेन कप्रत्ययान्तः पक्षे दीर्धान्तश्चाभिकोऽभीक इति निपातितः। १५. मानयतीर्थः, विग्रहस्तु मातीत्येव । मा माने । तृच् प्रत्ययान्तः । १६. का० उ० २१४२ ।
नाममाला १६ देहापघनकायानं वपुः संहननं तनुः ॥ ३८ ॥ कलेवरं शरीरं च मूर्तिः दश देहे । देहश्च अपघनश्च कायश्च अङ्ग च । समाहारसमासत्वादेकवचनम् । दिह । देग्धीति देहः । “१दिहिलिहिश्लिषिश्वसित्यध्यतीषश्यातां च" । एषां णो भवति । अपहन्यते अपघनः । "मूतौ २ घनिश्च" अल् । चिञ् चयने । चि । चीयतेऽसौ कायः । “3शरीरनिवासयोः कश्चादेः" ५ चिनोतेः शरीरे निवासे चार्थे घञ् भवति आदेश्च को भवति । उख, रणख, वख, मख, रख, लखि, इखि, वल्ग, रगि, लगि, अगि, वगि, मगि, स्वगि, इगि, रिगि, लिगि गत्यर्थाः । अङ्गति मरणं गच्छतीति अङ्गम् । उप्यन्ते पुरुषार्था अनेनेति वपुः । 'ऋपृवपिचक्षिजनितनि- धनिभ्य उस्" एभ्य उस् प्रत्ययो भवति । संहन्यन्ते संपद्यन्ते धातवोऽत्र संहननम् । धातुभिः रसासृगमांस- मेदोऽस्थिमजशुक्रैस्तन्यन्ते तनुः । तनूः। उणादौ तनुवित्तारे। तनोतीति तनूः। "कृषि"चमितनिधनि- १० बधिसर्जिखर्जिभ्य ऊः" एभ्य ऊप्रत्ययो भवति । कलते स्थिरत्वं गच्छति कलेवरम् । कडति माद्यति वा कलेवरम् । कडेवरं च । अमरसिंहभाष्ये 'कल्यते कलेवरम् ।' शीर्यते क्षयं गच्छति रोगज्वरादिभिः शरीरम् । “कृशृशौण्डभ्य ईरः ।" एभ्य ईरप्रत्ययो भवति । उणादित्वात् । 'मूर्छा मोहसमुच्छ्राययोः' मूर्छ । मूर्छनं मूर्तिः । स्त्रियां' क्तिः । “घोषवत्योश्च कृति',१०इति नेट् । “राल्लोपः (प्यौ)'१' इति छकार- लोपः । "नामिनार्वोदकुछु रोय॑ञ्जने” १२ दीर्घः । व्यञ्जनम् १३ । प्रथ० सिः । "रेफ०१४ । विग्रहः । १५ वर्म । पुरम् । पिण्डम् । क्षेत्रम् । गोत्रम् । घनः । पुद्गलः । प्रतीकः । अवयवः । अस्मिन् भवः अस्मिन् काये भवः कायभवः। देहभवः । अपघनभवः । श्रङ्गभवः । वपुर्भवः । संहनन- भवः। तनुभवः । कलेवरभवः । शरीरभवः । मूर्तिभवः । कायजः । देहजः । अपघनजः । अङ्गजः । वपुर्जः । संहननजः । तनुजः । कलेवरजः । शरीरजः । मूर्तिजः । एतानि पुत्रनामानि भवन्ति । भव २० प्रयोगे। - । सुतः। । पुत्रः सूनुरपत्यं च तुक् तोकं चात्मजः प्रजा ॥३६॥ अष्टौ पुत्रे । सूयते सुतः । पुनातीति पुत्रः । “१"पूजो ह्रस्वश्च ।” अस्मात् त्रक्प्रत्ययो भवति धातोह स्वश्च । कोऽगुणार्थः । तथा च सोमनीत्याम१६-“य उत्पन्नः पुनाति वंशं स पुत्रः। अथ २५ पुन्नाम्नो नरकात्त्रायते वा पुत्रः । सूयते सूनुः । १७सूविपिभ्यां यण्वत् ।' प्राभ्यां नु प्रत्ययो भवति, स च यण्वत् ।" पूङ प्राणिगर्भविमोचने ।” पल शल पत्लु पथे च गतौ।" पत् नत्र पूर्वः । न पतन्ति येन जातेन पूर्वजा नरकादौ तदपत्यम् । “नञि१८ पतेर्यः" यप्रत्ययः । नत्य १९ तत्पु० सिः । नपु० १. का० सू० ४।२।५८। २. का० सू० ४।५।५८। इत्यल् घन्यादेशश्च । ३. का० सू० ४।५।३५ । ४. का० उ० २।४६। ५. का० उ० १।३१। ६. कले शुक्रे मधुराव्यक्तध्वनौ वा वरं श्रेष्ठम् । "हलदन्तादि" ति सप्तम्या अलुक् । इत्यन्यत्र । ७. क्षीर० भा० २।६।७०। ८. का० उ० ३।४८। ६. का. सू० ४।५।७२। इति तिप्रत्ययः। १०. का० सू० ४१६८०। ११. का. सू ० ४११५८। १२. का. सू० ३।८।१४। १३. "व्यञ्जनमस्वरं परं वर्ण नयेत्” इति पूर्ण कातन्त्र सूत्रम् ।१।१।२१। इति व्यञ्जनत्य पर- वर्णयोगः। १४. "रेफसोर्विसर्जनीयः" इति पूर्णम् । का० सू० २।३।६३। इति सकारत्य विसर्गः । १५. का० उ० ४।४१। १६. नी० वा० समु० ५ सू० ११ । १७. का० उ० २।८। १८. का० उ० ६.६०। १९. "नस्य तत्पुरुषे लोप्यः" इति पूर्णम् । का० सू० २।५।२२। इति नलोपः । --- -- --- -- २० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता जाता प्रजा - ।११ . अका० १ । मोऽनु०२ । तोजति तुक् । स्तूयते तोकम् । आत्मनो जातः श्रात्मजः । प्रकोण ५सप्तमीपञ्चम्यन्ते जनेर्डः।" बालः, पाकः, अर्भकः, गर्भपोतश्च । पृथुकः, शिशुः, शावः, डिम्भः, वटुः, माणवकः, भ्रणः । उद्वहस्तनयः पोतो दारको नन्दनोऽर्भकः । स्तनन्धयोत्तानशयो- ५ अष्टौ बालके । उदहतीति उद्वहः । खश् । तनोति विस्तारयति वंशम, तनयः। "तनेः क्यः ।" पवते वातेन पोतः । दारयति दृणाति वा तरुणीनां मनांसि 'दारकः। 'टुनदि समृद्धौ ।' नद् । अत एव नन्द । नन्दति कश्चित्तमन्यः प्रयुक्ते । "९धातोश्च होतो ( हेतौ )" इञ् । नन्दयतीति नन्दनः । “नन्दि' वासिमदिदूपिसाधिशोभिवर्धिभ्य इनन्तेभ्योऽसंज्ञायाम्” युप्रत्ययः । स्वमते "नन्द्यादे- युः" यु प्रत्ययः 'युवुझानाम०"- इति युस्थाने अनः। “१२कारितस्यानामि० कारितलोपः । १० 'अर्ह मह पूजायाम्' अईत्यर्भकः । " १३मूकादयः ।' मूकयुकाऽर्भकपृथुकवृकसकभूकाः एते कप्रत्य- यान्ता निपात्यन्ते । स्तनौ धयतीति स्तनन्धयः । १४"शुनीस्तनमुचकूलास्यपुष्पेषु घेटः ।" खश् । उत्तानः शेते उत्तानशयः । १५"उत्तानादिपु कर्तृपु" श्रच । स्त्री चेद् दुहितरं विदुः ॥४०॥ पुत्र्यां दुहितरं१६ दोग्धि मातृकुलं दुनोति वा विदुः कथयन्ति । तनया, पुत्री । १५ वयस्याऽली सहचरी सधीची सवयाः सखी । षट् सख्याम् । वयसा तुल्या वयस्या। वयसी च। या समन्ताच्चित्तं लाति श्रालिः । स्त्रियामीः । आली। सह साधं चरतीति सहचरी । सहाञ्चतीति सध्यङ्। १७"सहसन्तिरसां सधिसमिति- रयः।" ईप्रत्यये सधीची । सह वयसा वर्तते सया:१८ । समानं ख्यातीति सखिः (खा)। स्त्रियामी: सखी। १९"सख्यादयः" सखि अश्रि प्रहि इत्यादयो डिप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । आलीविवर्जितं मित्र सम्बन्धो मित्रयुक् सुहृत् ॥४१॥ २० चत्वारो मित्रे । श्राली रहितानि वयस्यादीनि नामानि मित्रवाच्यानि स्युरित्यर्थः । 'जिमिदा स्नेहने' । मेद्यति स्म मेदते स्म वा स्नेहयुक्तो भवति स्म वा मित्रम् । २० "चिमिदिभ्यां त्रक्" श्राभ्यां २१ १. “अकारादसम्बुद्धी मुश्च” इति पूर्णम् । का० सू० २१२१७। इति सेर्लोपो मुरागमश्च । २ "मोऽनुस्वारं व्यञ्जने" इति पूर्णम् । का० सू० १।५।१५। ३. "तुज हिंसाबलादाननिकेतनेषु"। चुरादौ वा णिच् । तोजति पितृधनमादचे "तुक्” इति टीकाशयः । ४. तौति पूरयति पितृकार्य पितुरभावेऽपीति तोकम् । तुः सौत्रो धातुर्हिसावृत्तिपूर्तिषु । बाहुलकात्कः इति व्युत्पत्त्यन्तरमप्यूह्यम् । ५. का० सू० ४।५।५१॥ इति जनेर्डः। ६. का० उ० २।२५। इति तन् धातोः कयप्रत्ययः । ७. पवते वातेनेति विग्रहस्तु नौका- वाचकपोते बोध्यः । पुत्रार्थे तु पुनाति पवते वा वंशं पोतः । 'मृगदाहस्यमि" - इति का० उ० ४।२७। सूत्रेण तप्रत्ययः । ८. युवतिमनोदारणं बालद्वारा न घटते । अतो दृणाति दारयति वा मातुर्योवनम्, पित्रोनिस्सन्तानता जन्यातिवेति तदाशयोऽभ्युन्ने यः। ६. का० सू० ३।२।१०। १०. का० सू० ४।२।४९। "नन्द्यादे युः” इति सूत्र दुर्गवृत्तिः। ११. का० सू.० ४।६।५४ । १२. का० सू० ३।६।१४। इतीनो लोपः । इनः कारितसंज्ञा कातन्त्रे । १३. का० उ० २।५८१ १४. का. सू० ४।३।३१। १५. का० सू० ४।३।१८ अत्र दुर्गवृत्तिः । १६. दोग्धि पितृकुलं दहति दुनोति वा मातृकुलं दुहिता । स्वस्रादित्वातन्प्रत्यय इत्याशयः । १७. का० सू० ४।६।७१॥ इति सहस्य सध्यादेशः। १८. समान वयो यस्या इति विग्रहो न्याय्यः । ज्योतिर्जनपदेति समानस्य सादेशः। १९. का० उ० ४।९।२०. का० उ० ४।४० । २१. मेद्यति मेदते इति वर्तमानकालिको विग्रहो युक्तः, न तु भूतकालिकः । ।
नाममाला 3 अक् प्रत्ययो भवति । ककारो यण्वद्भावाऽर्थस्तेनागुणत्वम् । सम्यक् स्नेहेन बध्नातीति सम्बन्धः । मित्रं युनवतीति मित्रयुक् । सुष्ठु हरति चित्तं सुहृद् । शोभनं हृदयं यस्य वा । सखा, स्निग्धः । सहकृत्वा सहकारी सहायः सामवायिकः । चत्वारः सहाये । सहकृतवान् सहकृत्वा । "कृञश्च२" कनिप् प्रत्ययः । प्र० सि० । "धुटि चा." दीर्घः । सह समन्तात्करोतीति सहकारी। "नाम्न्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये" | सह सार्धम् श्रयते 'गच्छति सहायः । समवाये नियुक्तः सामवायिकः । इकण् । सनाभिः सगोत्रो बन्धुश्च सोदर्यः चत्वारों भ्रातरि । समाना नाभिर्यस्य सनाभिः। समानं गोत्रं यस्य सगोत्रः । बध्नाति स्नेहेन बन्धुः । “पट्यसि" वसिहनिमनित्रपीन्दिकन्दिबन्धिब्रह्मणिभ्यश्च" एभ्य एकादशभ्य उः प्रत्ययो भवति । सोदर्यः । समानोदर्यः, सगर्भः, सोदरः, समानोदरः, श्रात्मीयः, स्वजनः, प्राप्तः, ज्ञातिः, १० सनामेयः, सपिण्डः। अवरजोऽनुजः ॥४२॥ कनीयान्- द्वौ (त्रयो) लघुभ्रातरि । अवरं पश्वाजातः अवरजः । (अनु) पश्चानातः अनुजः । “सप्तमी-६ पञ्चम्योर्ज (म्यन्ते ज) नेर्ड:"। अयमनयोरतिशयेन युवा कनीयान् । “युवाऽल्पयोः कन्वा । कनिष्ठः। १५ अग्रजो ज्येष्ठः अग्रे जातः अग्रजः। प्रकृष्टो वृद्धो ज्येष्ठः । “वृद्धस्य ज्यः'' वृद्धशब्दस्य ज्य श्रादेशो भवति । पूर्वजः, वरिष्ठः, वर्षीयान्, अग्रियः । भ्रातृजानी स्वसाऽनुजा। त्रयो भगिन्याम् । म्रातुर्जाता भ्रातृजानी । स्वस (स्य) ति क्षप्यति क्षिपति चित्तं स्वसृ१। २० ऋदन्तः । अनु पश्चाजाता अनुजा । भगिनी । भग्नी च । जामिः । यामिश्च । भर्तुः स्वसा ननान्दा स्यात्- स्यात् भवेत् । भर्तुःस्वसा भगिनी । ननान्दा । “टुनदि समृद्धौ” । नद् । "अत११ नञ् पूर्वः। न नन्दति म्रातृजाया यस्यां सत्यां सा ननान्दा । "नजि१२ च नन्देऋन् दीर्घश्च" नजि उपपदे . । एव०" -- १.सुष्ठ, हरतीतिव्युत्पत्तिस्तु तान्तसुहृतशब्दे सम्भवति । मित्रवाचकदान्तसुहृद्शन्दे तु शोभनं हृदय यस्येत्येव । हृदयस्य हृदादेशः समासे । २. का०सू० ४।३।९०। ३. "घुटि चासम्बुद्धौ'।४.का०सू० २।२।१७ । का०सू० ४।३।७६॥ ५.का उ० १।६। ६. का०सू० ४।३।९१। ७. वर्तमानकातन्त्रे नोपलब्धम् । ८. वर्तमान- कातन्त्रे नोपलब्धम् । ९. नान्यस्मिन्कोषे भ्रातृजानीशब्द उपलब्धः, नाप्येतत्साधकं किमपि व्याकरण- सूत्रम् । भ्रातुर्जातेति विग्रहोऽपि भगिन्यर्थेऽसंगतः । तथापि भ्रात्रा सह मातुर्जाते ति विगृह्य बाहुलकादो- णादिकमण्प्रत्ययं जनधातोः प्रकल्प्य अणन्तत्वान्डीपि भ्रातृजानीति शब्दो ग्रन्थकारप्रत्ययात् कथञ्चित् समाधेयः । १० स्वस्यति क्षिपति चित्तं भ्रातः स्वसेति विग्रहो बोध्यः । “अतु क्षेपणे" दिवादौ । सुपूर्वकात्ततः "सुज्यसेनन्” इति मन्प्रत्ययः । कातन्त्रोणादौ तु "स्वसादयः" इति 'श्वस् प्राणने' इत्यत ऋन्प्रत्यये शकारस्य सकारे च "श्वसितीति स्वसा" इत्याह । अत्र क्षिपतीति दर्शनात् 'ऋतु क्षेपणे इत्येव भाष्य- कर्तुरभिप्रेत इति ज्ञायते । ११. "अत एव वर्जनादिदमनुबन्धानां नोऽस्तीति" दुर्गवृत्तिः । का० सू० ३।६।१०। १२. का० उ० सू० २।३९।
२२ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता सति नन्देर्धातोन् प्रत्ययो भवति अकारो दीर्वश्च भवति । ननान्दा इति जातम् । मातुलानी नियाम्बिका ॥४३॥ द्वौ मातुलभार्यायाम् । मातुलस्येयं भार्या मातुलानी । "इन्द्र 'वरुणभवशर्वरुद्रहिमयमारण्य- यवयवनमातुलाचार्याणामानुक ईपच" । अम्चैव अम्बिका। "अम्बादिन्यो डलेकाः" ड, ल, इक, प्रत्यया ५ भवन्ति । प्रिया चासौ अम्बिका प्रियाम्बिका। वैर्यारातिरमित्रोऽरिट् िसपत्नो द्विपद्रिपुः । भ्रातृव्यो दुर्जनः शत्रुदु यो द्रुपी खलोऽहितः ॥ ४४ ॥ पञ्चदश शत्री। विशिष्टाम् ई लक्ष्मीम् ईरयति निर्गमयति वीरः, वीरस्य कर्म वैरम् । [ वैरमस्यास्तीति वैरी।]. वैरिपुरमियति गच्छति श्रारातिः अरातिश्च । न मित्रम् अमित्रम् । Po अधर्मान्तादिवत् । “विपक्षे नत्र" इति सारस्वत सूत्रम् । शत्रुत्वमियत्ति अरिः । द्वेष्टीति द्विट् । "सत्"सू द्विगु हदुहयुजविदभिदछिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि" कि । एकार्थाऽभिनिवेशेन समानं पतति सपत्नः। द्विण्टे द्विपन् । निष्ठुरं रयति रिपुः। "3रज्जुतर्कुवल्गुफल्गुशिशुरिपुपृथुलघवः ।" एते उप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते। निपातनमप्राप्तप्रापणार्थं प्राप्तस्य बाधनार्थम् । लक्षणेन यद्यदसिद्धं तत्सर्व निपातनात्सिद्धम् । तथा क्षीरस्वामिनः-७"रेपयति रिपुः। रेपृ गतो । भ्रातरं व्ययति मारयति १५ 'भ्रातृव्यः। दुष्टजनः दुर्जनः । परमभट्टारकश्रीयशःकीर्तिसम्भापितग्रन्थे- "प्रशस्या न नमस्याऽपि दुजंनैर्या विधीयते । कण्टकः पादलग्नोऽपि न शुभाय प्रजायते ॥" तथा च सूक्तिमुक्तावल्याम..- "वरं क्षिप्तः पाणिः कुपितफणिनो वक्त्रकुहरे वरं झम्पापातो ज्वलदनलकुण्डे विरचितः । वरं प्रासप्रान्तः सपदि जठरान्तर्विनिहितो न जन्यं दौजन्यं तदपि विपदा सद्म विदुषा ।।" अत्र ये केचिद् दुर्जनाः सन्ति, तेषां मस्तकेऽशनिपातो भवतु । तथा च १०-- "दुज्जण सुहियउ होउ जगि सुयणु पयासिउ जेण । अमिउ विसें वासरु तिमिण जिमि मरगउ कच्चेण ॥" शृणाति शीर्यते वा शत्रुः । दूष्यते निन्द्यते लोके दुष्टः। द्वेष्टि १२द्वेषोऽस्त्यस्य वा द्विपन् । २० - १. पा० सू ० ४।११४९। अत्र सूत्रे यमेत्यधिकः पाठः । २. "हायनान्तयुवादिभ्योऽण"युवादित्वादण् । ततो मत्वर्थे "अत इन्छनौ” इतीन् । ३. "ऋ गतौ” । प्राङ्पूर्वकाद् ऋधातो हुलकादातिप्रत्ययः । अन्यत्र तु न राति सुखं ददातीति नत्र पूर्वकात् 'रा' (दाने) धातोः क्तिच् क्तौच संज्ञायामिति क्तिच् । ४. "तदन्यतद्विरुद्धतदभावेषु नत्र वर्तते" इति वक्तव्यम् । "अन् स्वरे" सार० समा० १४ सू० । ५ का. सू० ४।३।७४। ६. का० उ० सू० १।६। ७. क्षीर० भा० २।८।१०। ८. "व्येज संवरणे" धातूनामनेकार्थ- त्वादिसाऽर्थे वृत्तिः । आतोऽनुपर्गे कः । ९. निर्णयसागरयन्त्रालयप्रकाशितकाव्यमालासप्तम गुच्छेसूक्ति- मुक्तावलौ ६१ श्लो० । १० सावयध० दो० २ । ११. “जब्वादयः । जत्रुश्मनु शिग्रुशत्रवः । एते रुप्रत्य- यान्ता निपात्यन्ते"। इति का० उ० दुर्ग० वृ० ३१६६। १२. द्वेपोऽस्त्यस्येति केवलमर्थाऽभिप्रायेण । 'विग्रहस्तु द्वेष्टीत्येव । शतृप्र० । ।
नाममाला २३ - . .. । खलति सज्जनगुणानाच्छादयतीति खलः । न मैत्री हिनोति गच्छति, न हितो वा, 'अहितः । अभियातिः, प्रतिपक्षः, असहनः, जिघांसुः, परिपन्थी, परः, असुहृत्, अपथी, पर्यवस्थाता, शात्रवः, प्रत्यनीकः, द्वेषणः, दुहद्, दस्युः, अभिमन्थी। दीधितिर्भानुरुखोंऽशुर्गभस्तिः किरणः करः । पादो रुचिमरीचिर्भास्तेजोऽचिंगौद्युतिः प्रभा ॥४॥ षोडश किरणे। दिधीते दीप्यते दीधितिः। 'दीधीडो डितिः" दीधीङो धातोर्डितिः प्रत्ययो भवति । 'भा दीप्तौ' भाति भानुः । 3"दाभारिवृञ्भ्यो नुः ।" एभ्यो नुः प्रत्ययः स्यात् । वसति रवौ उनः । पुंसि । अश्नुते जगद् व्याप्नोति अंशुः । स्त्री। उणादौ । अनच् । अनितीति अंशुः। अनेः" शुः" अनेर्धातोः शुप्रत्ययो भवति । ["भा दीप्तौ" भाति भानुः । “दाभारी" ] गां भुवं वभस्ति गभस्तिः । १० ""वर्णागमो गवेन्द्रादौ सिंहे वर्णविपर्यायः । षोडशादौ विकारस्तु वर्णनाशः पृषोदरे।।" कीर्यते किरणः। हलायुधे-"किरति विक्षिपति तमांसि किरणः ।" "९ कृभूभ्यां कनः । कीर्यते फरः । पद्यते पादः। “१ पदरुजविशस्पृशोचा घन ।" रोचते रुचिः । म्रियते तमोऽनेन मरीचिः । स्त्रीनोः । उणादौ । म्रियते मरीचिः। "१ मृकणिभ्यामीचिः" आभ्यामीचिः प्रत्ययो भवति । भासते २५ किपि सान्तो भास्। स्त्रीनोः।" पुस्येवेति शब्दभेदः । भाः । भासौ । भासः । तेजयतीति तेजस् । अर्चयतीति अर्चिए । अय॑ते पूज्यते अर्चिः । “अर्चि' 'शुचिरुचिहुसूपिछदिछर्दिभ्य इसिः।" गच्छति तमोऽत्रोदिते गौः। स्त्रीनोः । द्योतनं द्युतिः। द्योतते (वा) द्युतिः। प्रभाति प्रभा। रोचिः, अभीशुः, प्रद्योतः, रश्मिः, घृणिः, रुचिः, विभा, धाम, वसुः, केतुः, प्रग्रहः, उपधृतिः, धृष्णिः, पृश्निः, मयूखः, विरोकः, शेकश्च । २० दीप्तियॊतिमहो धाम रश्मिरूजों विभावसुः । सप्त तेजसि। दीप्यते दीप्तिः। द्योतते ज्योतिः । 'ज्योतिरादयः१३ । ज्योतिर्बहिरादयः । महति महः१४ । सान्तम् । धीयते सूर्येण नान्तम् धामन् । रशिः सौत्रः । रशति अश्नुते रश्मिः । “ऊर्ज बलप्राणनयोः।" ऊर्जयतीति ऊर्जः । कः । [ ५५विभा वसुर्यस्य स विभावसुः । ] ( विभा । वसुः । ) शीतोष्णप्रायपूर्वाञ्चौ तदन्ताविन्दुभास्करौ ॥४६॥ तयोरन्तौ तदन्तौ। इन्दुभास्करौ। इन्दुश्च भास्करश्च इन्दुभास्करौ । कथंभूतौ ? शीतोष्ण- १. न मैत्री हिनोतिस्मेति भूते विग्रहो बोध्यः । गत्यर्थत्वाकर्तरि क्तः। न हितमस्मादिति रामाश्रमः । २. का० उ० सू०६।२६ । ३. का० उ० सू० २।७) ४ "वस् निवासे वस् धातोः 'कायि तञ्ची" त्यादि उ० सूत्रेण रक्प्रत्ययः सम्प्रसारणं च । ५. का० उ० सू० ५।४८ । अंशयति विभाजयति "ग्रंश विभाजने" उप्रत्ययः व्युत्पत्त्यन्तरं च । ६. पुनरुक्तत्वात्परिहार्यः । ७. बभस्ति दीपयति । "भस भर्त्सनदी- प्योः"। तिप्रत्ययः । पृषोदरादित्वात्षोडशादी वर्णविकारवदोकारत्याकारः। ८. शा० सू० २२२२१७२। ''पृषोदरादयः" इत्यत्र कारिकारूपेण पठितः। ९. का. उ० सू० ६।१४। १०. का० सू० ४।५।१। ११ का उ० सू० ३१४३। १२. का० उ० सू० २।४४१ १३. का० उ० सू० २१४५। १४. महनं महः । मयते पूज्यते वेति रामाश्रमः । १५. वस्तुतस्तु "विभा" इति "वसु" इति च तेजसः संज्ञा । समुदितो "विभावसु" शब्दस्तु सूर्याग्निवाची । तदुक्तं "सूर्यवह्नी विभावसू" इति अम० को० ३।१२२६ । १६. ते दीधित्यादयः शब्दा अन्ते ययोस्तौ तदन्तौ इत्येवं समासो बोध्यः । तयोरन्ताविति समानस्तु लेखकप्रमादात्प्रयुक्तः । । - २४ अमरकोर्तिविरचितभाप्योपेता ( प्राय ) पूर्वाञ्चौ। शीतीप्णी (प्रायेण ) पूर्वाञ्ची ययोरिन्दुभास्करयोः (ती) शीतोष्ण (प्राय) पूर्वाञ्चौ। शीतदीधितिः । शीतदीधितिमान् । शीतभानुः। शीतभानुमान् । शीतांशुः । शीतांशुमान् । शीतगभस्तिः । शीतगभस्तिमान् । शीतकिरणः । शीतकिरणवान् । शीतपादः । शीतपादवान् । शोत- रुचिः। शीतरुचिमान्। शीतमरीचिः । शीतमरीचिमान् । शीतार्चिः । शीतार्चिष्मान् । शीतभाः । ५ शीतभावान् । शीतगुः। शीतगोवा (मा) न् । शीतद्युतिः । शीतद्युतिमान् । शीतप्रभः। शीतप्रभावान् । शीतदीप्तिः । शीतदीतिमान् । शीतज्योतिः । शीतज्योतिष्मान् । शीतमहाः । शीतमहस्वान् । शीतधामा । शीतधामवान् । शीतरश्मिः । शीतरहिमवान् । शीतोर्जः । शीतोनवान् । शीतविभावसुः । शीतविभावमुमान् । किरणशब्दानां (ब्देभ्यः) पूर्व शीतशब्दप्रयोगे चन्द्रनामानि भवन्ति । उप्णशब्दप्रयोगे सूर्यनामानि भवन्ति । उपणदीधितिः । उप्यदीधितिमान् । उपभानुः । १० उष्णभानुमान् । उप्णोन्नः । उप्पोखवान् । उप्णांशुः । उप्णांशुमान् । उप्णगभस्तिः । उप्णगभस्तिमान् । उप्णकिरण. | उपाकिरण वान् । उप्णपादः । उप्रण पादवान् । उप्परुचिः । उगु- चिमान् । उप्णमरीचिः । उप्णमरीचिमान् । उप्णभाः । उप्पणभावान् । उप्णतेनाः। उप्णतेनत्वान् । उप्णार्चिः । उप्णार्चिष्मान् । उप्णगुः । उप्णगोमान् । उप्णद्युतिः । उप्राद्युतिमान् । उप्णप्रभः । उप्ण- प्रभावान् । उप्णदीतिः । उष्णदीप्तिमान् । उप्णज्योतिः । उप्पज्योतिष्मान् । उप्णमहाः। उप्णमह- १५ स्वान् । उप्णधामा। उणधामवान् । उप्णरदिमः । उप्यरश्मिवान् । उम्णोर्जः । उप्णोर्जवान् । उप्ण- विभावसुः । उपविभावनुमान् । शशी विधुः सुधामतिः कौमुदीकुमुदप्रियः । कलाभृचन्द्रमाश्चन्द्रः कान्तिमानोपघीश्वरः ॥ १७ ॥ दश चन्द्रे । शशोऽस्यास्तीति शशी । विदधात्यमृतं विधुः । "वो धानश्च२५ । सुधा अमृतं सूयते सूधासूतिः । कुमुदानामियं विकाश (स) हेतुत्वात्कौमुदी (ज्योत्स्ना तस्याः प्रियः कौमुदीप्रियः)। कुमुदानां प्रियः अभीष्टः कुमुदप्रियः । कलां विभीति कलाभृत् । “मा माने" चन्द्रं मातीति चन्द्रमाः । “चन्द्रे मातेः" चन्द्र उपपदे अस्मादसन् प्रत्ययो भवति । अगुणवभावादकारलोपः । भिन्नयोगः स्पष्टार्थ एव । चन्दतीति चन्द्रः । "कायि"तञ्चिवञ्चिशकिक्षिपिचदिरदिमदिमन्दिचन्द्युन्दी- न्दिभ्यो रक्” । कान्तिरस्यात्त कान्तिमान् । श्रोषधीनामीश्वरः श्रोपधीश्वरः। इन्दुः, सोमः, राजा, २५ रोहिणीवल्लभः, अन्नः, ऋषेशः, अत्रिनेत्रप्रसूतः । तथा चोक्तं यशस्तिलके- "आहु नेत्रोत्थमः स्त्रुतममृतनिवे यं हरेनर्मबन्धु मित्रं पुष्यायुधस्य त्रिपुरविजयिनो मौलिभूपाविधानम् । वृत्तिक्षेत्रं सुराणां यदुकुलतिलकं वान्धवं कैरवाणां, सम्प्रीति वस्तनोतु द्विजरजनियतिश्चन्द्रमाः सर्वकालम् ॥" २० - १. "मादुपघायाश्च०” इत्यादि वत्वविधायकं सूत्रम् । मवर्णाऽवर्णान्तान्मवर्णावणोंपधाच मतोर्मकारस्य वकारं शान्ति । अत्र तथात्वाभावात् “शीतगोमान्” इति वक्तव्यम् । वस्तुतस्तु शीत- गोशब्दत्य कर्मधारये ततो “गोरतद्धितलुकि" इति च्चो दुर्वारत्वात् "शीतगववान्" इति सुवचन् । सिद्धान्ततस्तु नेहशत्थले मनुविष्टः । तदुक्तं "न कर्मधारयान्मत्वीयो बहुव्रीहिश्चेत्तदर्थप्रतिपत्तिकरः” । २. का० उ० स० ५।२। कुरत्ययः । ३. चन्द्रं कर्पूरं माति तुलयति साहवेनेति ग्रन्योक्तविग्रहार्थः । चन्द्रमाह् लादं मिमीते तुलयति सादृश्यनेति विग्रहान्तरमप्यूह्यम् । ४. का० उ० सू० ४।५७ ५. का० उ०म० २११४१६. श्राश्वा० ३४७ श्लो०। - .
४ नाममाला २५ . . -- प्रालेयांशुः, श्वेतरोचिः, शशाङ्कः, द्विजराजः, रजनिकरः, पीयूषरुचिः, निशीथिनीनाथः, जैवातृकः, मृगाङ्कः, दाक्षायणीरमणः, मा' अप्युच्यते, सत्यभामेतिवत् । सुधामूर्तिः अमृतनिर्गमः, समुद्रनवनीतम् । देश्याम् । उनि भानि तारखं नक्षत्रम्- चत्वारो नक्षत्रे । अवति प्रभाम् उडुः । स्त्रीक्लीवे । तथा चामरसिंहे ४. "नक्षत्रमृक्षं भन्तारा तारकाऽप्युडु वा स्त्रियाम् ।" भाति दीप्यते भम् । क्षीरस्वामिनि-५"भा विद्यतेऽस्य भम् ।" तरन्त्यनया तारा । तारयति वा। ऋणोति हिनस्ति तम् ऋक्षम् । नक्षति खे याति न तमः क्षि (क्ष) णोति वा नक्षत्रम् । "अमि नक्षिकडिभ्योऽत्रः" । तारकं क्लीवेऽपि । यच्च शाश्वतः-- "नक्षत्रे वाऽतिमध्ये च तारकं तारकाऽपि च । लक्ष्यं च- द्वियोम्नि पुराणमौक्तिकघनच्छायैः स्थितं तारकैः" तत्पतिः ( नक्षत्र पर्यायेभ्यः परं ) पतिशब्दप्रयोगे चन्द्रनामानि भवन्ति । उडुपतिः । तारापतिः । ऋक्षपतिः । नक्षत्रपतिः । उडुराजः । उडुस्वामी । उडुनाथः । नक्षत्रेश्वरः । तारेन्द्रः । १५ निशा। २० क्षणंदा रजनी नक्तं दोषा श्यामा क्षिया सप्त रात्रौ । निशाति तनूकरोति चेष्टामिति निशा, निशो वा । "पात१०श्चोपसर्गे"। क्षणमवसरं ददातीति क्षणदा। तमसा रक्षति रजनिः। स्त्रियामीः। रजनी। रजनशब्दाद् वा नदा- दित्वादीः । नेनेक्ति नक्तम् । दुष्टं दूषयति याऽत्र दोषा । श्रादन्तोऽव्ययाऽनव्ययः । श्यायन्ते गच्छन्ति रात्रिञ्चरा अत्र श्यामा । तथाऽनेकार्थ११ (ध्वनि) मञ्जर्याम्- "श्यामा रात्रिस्तु विझ्यामा श्यामा स्त्री मुग्धयौवना । श्यामा प्रियङ्गुराख्याता श्यामा स्याद् वृद्धदारिका ।" क्षिप प्रेरणे। क्षिप् । क्षेपणं क्षिपा । “१२षाऽनुबन्धभिदादिभ्यस्त्वङ् ।" क्षिप्यते स्वापेन जनैः, निर्गम्यते वा । तमी। तमा अादन्तोऽव्ययानव्ययः । तमिस्रा । तमस्विनी । विभावरी । नक्तमुखा । शर्वरी । २५ प्रियामा । निशीथिनी। यामिनी। वसतिः । वासतेयी । रात्रिः । कृताऽमरभाष्येऽपि १. "लोपः पूर्वपदस्य च अच्प्रत्यये तथैवेष्टः" इति कात्यायनवार्तिकम् ।५।३।८३। पा० सूत्रस्थं पूर्वपदलोपविधायकमत्र प्रमाणं बोध्यम् । २. “देशी" शब्दः प्रान्तभाषावाचकः । क्षीरस्वामि- बहुत्र उपलभ्यते साधुत्वमस्य पचादेराकृतिगणत्वात् "देवी" इतिवद् बोध्यम् । वस्तुत- स्त्वयं शब्दो दैशिक एव । ३. अवति प्रभां रक्षतीति ऊः । “अव रक्षणे" किप् । “ज्वरत्वरे" त्यू । डयते इति डुः। ड़यतेईप्रत्ययः। ऊश्वासौ डुश्चेति कर्मधारयः। नक्षत्राणां रक्षणार्हत्वादाकाशोत्पतनशीलत्वाच उडुत्वमुपपनम् । "इको हस्वः" इत्यूकारस्य ह्रस्व इति टीकाशयः । ४. अम० को० १।३।२१। ५. क्षीर० भा० १।३।२२। ६. भिदादित्वादङ् । अङि परे गुणः । निपातनाद्दीर्घः । ७. ऋषति गच्छति "ऋपी गौ" तुदादिः । प्रौणादिकः सप्रत्ययः किन् । षत्वकत्वक्षत्वानि । क्षमिति । ८. का० उ० सू० ३।५। ९. "यच शाश्वतः" इत्यारभ्य "स्थितं तारकैः” इत्यन्तः पाठः श२।२२। क्षीरस्वामिभाप्यस्थोऽत्र गृहीतः । १०. का० सू० ४।५।८४॥ ११. ९६ श्लो० श्लोका० । १२. का. सू० ४।५।८२ ।
२६ अमरकीतिविरचितभाष्योपेता - करः ॥४८॥ (निशापर्यायात्परं) करशब्दे प्रयुज्यमाने चन्द्रनामानि भवन्ति । निशाकरः । नणदाकरः । रजनीकरः । नक्तकरः । दोपाकरः । श्यामाकरः । क्षपाकरः । तरणिस्तपनो भानुर्बधनः पूपाऽर्यमा रविः । ५ तिग्मः पतङ्गो घुमणिमार्तण्डोऽकों ग्रहाधिपः ॥४६॥ इनः सूर्यस्तमोध्वान्ततिमिरारिविरोचनः । सप्तदश सूर्य । तरन्त्यनेनेति तरणिः। "ऋतृ सधृज धम्यश्यविवृतिग्रहिभ्योऽनिः ।" तपति त्रिलोकी तपनः । भाति दीप्यते करैः भानुः। “२दाभारिवृत्र्भ्यो नुः" नुः प्रत्ययः । “बन्ध बन्धने" बध्नाति जन्तुष्टी धनः । ""यन्धेन धिश्च" । अस्मान प्रत्ययो भवति अध्यादेशश्च । इकार उच्चारणार्थः । १० पुष पुष्टौ । पुष्णाति वर्धते तेजसा पूपा । पूपादयः- “पूपन्नयमनुक्षत्र्श्वनप्लोहन्मातरिदवन्क्लेदनल्नेहन्- मूर्धन्यूपन्दोपन" एते कन्यन्ता निपात्यन्ते । इयत्तीति श्रर्यमा । 'ऋ गती" । त्यते स्तूयते रविः। "इ: "सर्वधातुभ्यः" । तीतिक्षतीति तिग्मः । "युजिरुचितिजा हिम' । पतति नक्षत्रपथे पतङ्गः । "तृ- ७पतिभ्यामङ्गः" । ग्राभ्यामङ्गः प्रत्ययो भवति । दिवो मणिरिव धुमणिः | मृतण्डस्यापत्यं मार्तण्डः । मृतण्डश्च । अाकाशमियर्ति अर्कः । उणादौ "पर्च पूजायाम् ।” अर्च्यते अर्कः । “इभीकापाशल्य- १५ चिकृदाधाराभ्यः कः" एभ्यः कः प्रत्ययो भवति । ग्रहाणामधिपः स्वामी ग्रहाधिपः । एतीति इनः । "९इजिकृषिभ्यो नक्' । सुवति (प्रेरयति कर्मणि) लोकान् सूर्यः । “सूर्यरुच्याव्यथ्याः५० कर्तरि”। सूर्य इति यप्रत्ययान्तो निपातः । तमश्च ध्वान्तं च तिमिरश्च तमोवान्ततिमिराः,तेषामरिः,-तमोऽरिः, ध्वान्तारिः, तिमिरा रिः । विरोचते इत्येवंशीलो विरोचनः । ११"रुचादेश्च व्यञ्जनादेः" । रुचा- देर्गणाद् व्यञ्जनादेर्युः भवति । श्रादित्यः, सविता, सहस्रकिरणः, प्रद्योतनः, भास्करः, तिग्मांशुः, दिनमणिः, २० भास्वान् , विवस्वान् , हरिः, विकर्तनः, भगः, गोपतिः, दिनकरः, सूरः शूरश्च, अंशुमाली, मिहिरः, तिमिर- रिपुः, अंशुमान् , अंशुः, हरिदश्वः, सप्ताश्वः, प्रभाकरः, भानुमान् , हंसः, खगः, मित्रः, चित्रभानुः, अहर्पतिः, कर्मसाक्षी, नगच्चक्षुः, द्वादशात्मा, त्रयीतनुः । दिनं दिवाऽहर्दिवसो वासरः-- पञ्च दिवसे । "दोऽवखण्डने" द्यति खण्डयति अन्धकारमिति दिनम् । "दोनात१२ इ (द्यतेरि) २५ च्च" द्यते प्रत्ययो भवत्याकारस्येच्च । रविर्दी [ _न् दी] प्यतेऽत्र; अादन्तमव्ययम् दिवा । अदन्तं क्लीवम् । दिवं विदन् । न जहाति काल (रवि)महः । “नजि13 जहातेः" इति विप् (कनिः)। दीव्यतीति दिवसः १४। दिवसम् । '१"वेतसवाहसदिवसफनसाः" एतेऽस्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । वासयत्यत्र वासरः१६ । वासोऽपि । उभयम् । “देविश्वटिनठिम्रमिवासिभ्योऽर: '' एभ्योऽर् प्रत्ययो भवति । युः । घस्रः । १. का० उ० सू० २।४३ । २. का० उ० सू० २१७ । ३. का० उ० सू० २१५२। दुर्गवृत्तिश्च । ४' का० उ० सू० २।५ । ५. का० उ० सू० ३।१४। ६. का० उ० सू० ११५७ ७. का० उ० सू० ५।२२॥ ८. का० उ० सू० २।५७। ९. का० उ० सू० २।५१। १०. का० सू० ४।२।३०। ११. का० सू० ४/४/३१ । १२. का० उ० सू० ६॥३७॥ १३. का० उ०सू० २।४। १४. दीव्यन्ति कीडन्ति प्राणिनोऽत्र दिवस इत्यपि । १५. का.उ०सू० ३।११ । १६. "वास उपसेवायाम्" वासयति सूर्यालोकं प्राणिनं वा वासरः । विग्रहे "अत्र" इति पदमधिकम् । १७. नैतत्सूत्रम् काठणादौ लब्धम् । तत्र “कृवाभ्यः सरक' ३/६२। इति सूत्रम् । वातीति वासरः,वाधातोः सरक् प्रत्यय इत्युक्तम् । तत्रैव चतुर्थपादे ३३ तमपरमपि सूत्रम् “मद्यसिवशिवासिभ्यः सर" इति वासिधातोः सरप्रत्यय उक्त: । वासयतीति वासरः । कौमुदीस्थमुणादिसूत्रम् “अर्तिकमिचमिन्न- मिदिविवासिभ्यश्चित्" ३११२७/ इति वासिधातोररप्रत्ययः । . - -- नाममाला २७ १५ तत्करश्च सः ॥ ५० ॥ दिनकरः, दिवाकरः, अहस्करः, दिवसकरः, वासरकरः, इत्यादि सूर्यनामानि भवन्ति । चक्रवाकाब्जपर्यायबन्धु:- चक्रवाकश्च अन्जं च चक्रवाकाजे, तयोश्चक्रवाकाजयोः (परत्र) बन्धु शब्दप्रयोगे सूर्य- नामानि भवन्ति । चक्रवाकबन्धुः । अब्जबन्धुः । पद्मबन्धुः। कमलबन्धुः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । कुमुदविप्रियः। कुमुदानां (परत्र) विप्रियशब्दे प्रयुज्यमाने सूर्यनामानि भवन्ति । कुमुदविप्रियः । कैरवविप्रियः । कुमुदविवल्लभः । इत्यादि । यमुनायमकानीनजनकः सविता मतः ॥ ५१ ॥ यमुनाजनकः । यमजनकः। 'कानीनजनकः । सविता । मतः कथितः । १० वाहोऽश्वस्तुरगो वाजी हयो धुर्यस्तुरङ्गमः । सप्तिरर्वा हरी रथ्यः- एकादशाश्वे । वाह्यते गम्यतेऽश्ववाहैर्वाहः । तथाऽनेकार्थ २ ( ध्वनि) मञ्जर्याम्- "वाहो युग्यं धनो वाहो वाहके वाह इत्यपि । वाहो मानविशेषश्च वाहो बाहुरिति स्मृतः॥" "अशू व्याप्तौ ॥ अश् । अश्नुते व्याप्नोति वेगेनाभीष्टस्थानमित्यश्वः । अथवा "अश भोजने" अनाति भक्षयति मुद्गादीनित्यश्वः । "3अशिलटिखटिविशिभ्यः कः" । वमात्रः । “घोषवत्योश्च४ कृति" नेट । "उरो ( रसा) गच्छतीति उरगः। "डोऽ संज्ञायामपि" । पूर्वमश्वानां वाजा अभूवन्निति श्रुतिः । वाजाः सन्त्यस्य वजतोत्येवंशीलो वा वाजी । इदन्तोऽपि, वाजिः । तथा हैमनाममालायाम् - "वाज वाजस्तु पक्षेऽपि मुनौ निःस्वनवेगयोः।" हिनोति गच्छति वर्धते (वा) अनेन हयः । धुरि सङ्ग्रामे साधुर्धयः । ९ यदुगवादितः" । तुरं (रेण) गच्छति तु (तो) तोर्ति त्वरते वा तुरङ्गमः१०। “गमश्च ११" नाम्न्युपपदे गमेश्च संज्ञायां खो भवति "धावादेः १२ पः सः" । सपत्यध्वानं गच्छतीति सप्तिः । “१३सपेस्तिततितनः" सपेर्धातोस्ति तति तन् एते प्रत्यया भवन्ति । अति गच्छति अनेन नान्तः, १४अर्वन् । हरत्यनेन हरिः । रथे साधू रथ्यः१५॥ गन्धर्वः, तायः, ययुः, घोटकः, अर्दनिः१६, वीतिः, पीतिः । २५ १. कानीनः कर्णः । कन्याऽवस्थायां कुन्त्याः कीदुत्पन्न इति पौराणिकी कथा ऽनुसन्धेया । २. ११ श्लोरलोका० । ३.का०उ०सू० २।१।४. का०सू० ४।६।८०।५. भ्रान्तोऽयं पाठः । उचितस्तु तुरेण वेगेन गच्छतीति तुरगः । ६. काळसू० ४१३१४७।७. अने०स० २।७८। ८. धुरं वहतीति धुर्वः। 'धुरो यड्दको" इत्यन्यत्र । ९. का०सू०२।६।११। १०.तुरपूर्वकाद्गमेः "गमश्च" इति खे तुरङ्गमः । तोतोर्ति त्वरते वेति विग्रहे तत्सिद्धिप्रकारोऽन्यथा कल्पनीयः । ११. का० सू० ४।३।४५६ १२. का० सू० ३।८।२४। १३. का० उ० सू० ५।३८] •४, "अर्व गतौ" बाहुलकात्कनिन् । १५. "रथं वहतीति सुवचः। “तद् वहति रघयुगतासङ्गम्' इति यत् । १६. अर्दनिशब्दस्याश्वार्थे प्रमाणं मृग्यम् । कोशान्तरेऽर्दनिशब्दार्थश्वेत्थम्--"बर्दनी चार्दनि- रपि लियः स्युः प्रार्थनाऽर्थना" कल्प० को० १९९२११ अर्वतीशब्दोऽश्विनीपर्यायत्तु सर्वसम्मतः । “वीति" "पीति" शब्दयोरश्वार्थे प्रमाणमघस्तात् “वीतिः सप्तिर्दधिकावा वातस्कन्धार्थ इत्यपि” कल्प० को० ११५। . १९३। “पीतिः पाने सपूर्वा तु सहपाने हये पुगान्" विश्व० । २० -- ५ सप्ताद्यश्वो मयखवान् ॥ ५२ ॥ अश्वशब्दस्य (ब्दात् ) पूर्व यदि सप्तादि . ( स शब्दः ) तदा सूर्यनामानि भवन्ति । सतवाहः । सप्ताश्वः । सप्ततुरगः । सप्तवाजी। सतहयः । सप्तधुर्यः । सप्ततुरङ्गमः । सप्तसतिः । सप्तार्वा । सप्तहरिः । सप्तरथ्यः । खं विहायो वियद् व्योम गगनाकाशमम्बरम् । यौनभोऽभ्रोऽन्तरीक्षं च- एकादश गगने । खनति शुन्यत्वेन खन्यते वा 'खम् । विजहाति सर्व विहायः। अवाय विहायसां पक्षिणां मार्गे विहं यच्छतीति वियत् । (अथवा वीनां पक्षिणां माग यच्छति वियत् ) । अमरेन्द्रभाप्ये- "वियच्छति विरमति वियत् ।" वायुना वीयते (व्यवति व्यव्यते वा) व्योमन् । "स्रिव्यविमविज्वरि- १० त्वरामुपधायाः" एपामुपधाया वकारस्य चोट भवति । "सर्वधातुभ्यो मन्"" (इति विपूर्वकादवेर्मन्) । गम्यते सर्वमनेन गगनम् । क्लीवे वा । गच्छत्यनेन गगनं वा । श्राकाशन्ते सूर्यादयोऽत्राकाशम् । न काशते वा छान्दसो दीर्घः । अम्बते शब्दायते अम्बरम् । दीव्यन्ति पक्षिणोऽत्र द्यौः । स्त्रियाम् । नाति बध्नाति सर्वमात्मना सान्तम् नभः । नभम् इत्यदन्तम् नभसं च । न भ्राजतेऽभ्रम् । अन्तः ऋक्षाण्यत्र अन्तरीक्षम् । पृपोदरादित्वम् । द्यावाभूम्योरन्तरीक्ष्यते वा अन्तरिक्षम्, अन्तरीक्षं च । मरुवर्मन् । तारापथः । पुष्करम् । १५ विष्णुपदम् । त्रिदिवम् । नाकम् । अनन्तम् । सुरवम । महाब (वि) लम् । देश्याम् । मेघवायुपथोऽप्यथ ॥ ५३॥ मेघशब्दाने वायुशव्दाग्रे च पथशब्दे प्रयुज्यमाने याकाशनामानि भवन्ति । मेघपथः । मेघमार्गः। घनपथः । धनमार्गः । पर्जन्यपथः । पर्जन्यमार्गः । मिहिरपथः । मिहिरमार्गः । नभ्राटपथः । नभ्राण्मार्गः । तडित्पतिपथः । तडित्पतिमार्गः। सौदामिनीपतिपथः। सौदामिनीपतिमार्गः । वायुपथः । वायुमार्गः । २० वातपथः । वातमार्गः । अनिलपथः । अनिलमार्गः । मरुत्पथः । मरुन्मार्गः । समीरणपथः । समीरण- मार्गः । गन्धवाहपथः । गन्धवाहमार्गः । श्वसनपथः । श्वसनमार्गः । सदागतिपथः । सदागतिमार्गः । तच्चरः खेचरः- तत्र आकाशे चरतीति तच्चरः। श्राकाशाग्रे चरशब्द प्रयुज्यमाने विद्याधरनामानि भवन्ति । खचरः । विहायश्चरः । वियच्चरः । व्योमचरः । नभश्वरः । गगनचरः। अम्बरचरः । आकाशचरः । अन्तरिक्ष- २५ चरः । मेघपथचरः । मेघमार्गचरः । वायुपथचरः । वायुमार्गचरः । धनपथचरः। घनमार्गचरः । घनाधन- पथचरः । घनाघनमार्गचरः । जीमूतपथचरः। जीमूतमार्गचरः । अभ्रपथचरः । अभ्रमार्गचरः। बलाहक- पथचरः । बलाहकमार्गचरः । पर्जन्यपथचरः । पर्जन्यमार्गचरः । इत्यादिनामानि विद्याधरस्य ज्ञेयानि । तद्गः, तत्र गगने गच्छतीति तद्गः । गगनाऽग्रे "ग" शब्दे प्रयुज्यमाने शकुन्तनामानि भवन्ति । ३० खगः । विहायोगः । वियद्गः। व्योमगः। नभोगः । गगनगः । द्योगः । अाकाशगः। अन्तरिक्षगः। १. "खनु अवदारणे" डप्रत्ययः । "खर्व गतौ" खर्वत्यस्मिन्निति वा विग्रहः । अत्रापि डः । २. उक्त- विग्रहे "श्रोहाक् त्यागे" हाधातोः “वहिहाधाञ्भ्यश्छन्दसि" ४।२२। इत्यसुन् णित्त्वं च । णित्त्वाद्युक् । विशेपेण हाययति गमयति विमानादीन् इत्यपि बोध्यम् । “हय गतौ"ण्यन्तादसुन् । ३. क्षीर०भा० १।२।२। ४. का० सू० ४।११५७। ५. का० उ० सू० ४।२८१ ६, “गमेर्गश्च” इति युच् गश्चान्तादेशः । ७. महाविल. शब्दस्याकाशवाचकत्वेऽमरकोपमधस्तात्प्रमाणम्-"तारापथोऽन्तरीक्ष च मेघाध्वा च महाविलम्" १।२।२। क्षेपक। । । ।
नाममाला २६ १ मेघपथगः । मेघमार्गगः । इत्यादिनि ज्ञातव्यानि । पक्षी पत्री पतव्यपि । शकुन्तिः शकुनिर्विश्च पतङ्गो विष्किरोऽन्यथा ॥५४॥ सप्त पतङ्ग । पक्षाः सन्त्यस्य पक्षी । पत्राणि सन्त्यस्य पत्री । नान्तः । पततीति पत्रिः। त्रिप्रत्यये इदन्तः । पतत्राणि सन्त्यस्य पतत्री । नान्तः । पततीति पतेः परतोऽत्रिप्रत्यये इदन्तो वा पतत्रिः । हलायुध- भाष्यकारेण डालणिकेन-पनिशब्दः पत्रिन नकारान्तः पत्रिरिकारान्तश्च व्याख्यातः । अमरसिंह- नाममालायाम्- "पतत्रिपत्रिपतगतत्पत्ररथाण्डजाः। नगोकोवाजिविकिरविविष्करपतत्रयः ॥" इकारान्तः पत्रिशब्दः पठितोऽस्ति । भाष्यका क्षीरस्वामिना पतत्रिरिकारान्तो निषिद्धः। १० "पतेरनिरिति” भ्रान्त्या पतत्रिं ग्रन्थकृदिदन्तं मन्यते । एवं कथितमस्ति श्रीमदमरकीर्तिना द्वयोर्वचनं प्रमाणम् । शब्दानां वैचित्र्यं वर्तते । नभसा गन्तु शक्नोति शकुन्तः । शकुन्तिः । एवं शकुनिः । एवं शकुनी । शकुन्तः । शकुनः । द्वौ अदन्तौ । वयतीति विः । “वैजो डि:३७ । पतेन वेगेन गच्छतीति पतङ्गः । विकिरति पत्राणि विष्किरः । "वर्णागमो गवेन्द्रादौ सिंहे वर्णविपर्ययः । १५ षोडशादौ विकारस्तु वर्णनाशः पृषोदरे ॥" सुडागमः । विकिरश्च । जाङ्गलं पिशितं मांसं पलं पेशी च- पञ्च मांसे । गल्यते अद्यते जागलं जङ्गलं च । पिश्यते रुधिरादिभिः पूर्यते पिशितम् । मन्यते सम्भाव्यते शरीरोपचयोऽनेनेति मांसम् । “वृतृ वदिहनिमनिकस्यशिकषिभ्यः सः" । एभ्यः सः प्रत्ययो २० भवति । पलयते ( पालयते ) देहं पलम्। रुधिरादिभिः पिश्यते (पिंशति) शरीरम् पेशी । श्रामिषम् । रुच्यम् । तरसम् । तत्प्रियः। तस्य मांसस्य प्रियः । आमिषशब्दाने प्रियशव्दे प्रयुज्यमाने राक्षसनामानि भवन्ति । जाङ्गल- प्रियः । पिशितप्रियः । मांसप्रियः । पलप्रियः । पेशीप्रियः । यातुधानस्तथा रक्षो- द्वौ यातुधाने । यातूनि यातना धीयन्तेऽस्मिन् यातुधानः । रक्षतीति रक्षः । राक्षसः । कौणपः । क्रव्यादः । नैऋतः । नैकसेयः । नैकषेयश्च । विपुसेऽपि कर्बुरः । अस्रपः) । कीनाशो नानार्थे । रान्यादिचर इष्यते ॥ ५५ ॥ । १. अम० को० २।५।३४। २. क्षीर० भा० २।५।३४ । ३. का० उ० सू० ४।। रामाश्रमस्तु . वातीति विः । “वातेर्डिच्च" इत्याह । ४. पतेन वेगेन गच्छतीति विग्रहे तत्साधुवं कल्पनीयम् । तादृशसूत्राऽ- नुपलम्भात् । पतत्युड्डयते इति पतङ्गः । "तृपतिभ्यामङ्गः" का० उ० सू० ५।२२। इत्या प्रत्ययस्तु युक्तः । "तृपतिभ्यामङ्ग"इत्यङ्गप्रत्ययः । ५. "पृषोदरादयः” २।२।१७२। शा० कारिका । ६. "पिश अवयवे' पिंशति पिश्यते स्म वा पिशितम् । "पिशेः किच्च" उ०तू० ३।६५। इतीतन् । अथवा क्तः। इति रामा- अमः । ७. का० उ० सू०४।५३ । ८. रक्षन्त्यस्मादिति रक्षः । “सर्वधातुभ्योऽसुन्" । "भीमादयोऽपादाने" इत्यन्यन।
३० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता रात्रिशब्दाग्रे चरशब्द प्रयुज्यमान राक्षसनामानि भवन्ति । रात्रिचरः। निशाचरः। क्षणदा- चरः। रजनीचरः । नक्तश्चरः । दोपाचरः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । प्रारभ्यते स्वर्गवर्गः सुतोऽदितेस्- अदितिशब्दाने सुतशब्दे प्रयुज्यमाने दैत्य ( देव ) नामानि भवन्ति । अदितिसुतः । अदिति- तनयः । अदितिपोतः । अदितिदारकः । अदितिनन्दनः । अदित्यर्भकः । अदितिस्तनन्धयः ।। अदित्युत्तानशयः । तडिद्धन्वा सेन्द्रो देवः सुरोऽमरः । पञ्च देवे । सह इन्द्रेण वर्तते इति सेन्द्रः । "दिबु क्री०"--| दिव् । दीव्यन्ति क्रीडन्ति स्वर्गs १० प्सरोभिः सह विलसन्ति देवाः । यचा सिद्धम् । अथवा दीव्यति क्रीडति परमानन्दपदे देवः। सुष्टु राजते सुरः । तथा सुरन्ति सुराः । सुर ऐश्वर्य"सुरा एपामस्तीति वा । “अर्शसादिभ्योऽ'च्"। यतोऽधिजा सुरा तैः पीता । न म्रियते अमरः। आदित्याः । त्रिदशाः । सुमनसः । स्वर्गीकसः । देवताः । गीर्वाणाः । ऋभवः । मरुतः । वृन्दारकाः । निर्जराः । अस्वप्नाः । विबुधाः। त्रिविष्टपसदः । लेखाः । सुपर्याणः । अमृताशनाः । अनिमिपाः । दैवतम् । १५ स्वोः स्वर्गोऽथ नाकञ्च, चत्वारः स्वर्गे । मुदितो जनः स्वरति शब्दं करोत्यत्र रान्तमव्ययम् । स्वर् | "दिवु क्रीडादिपु” । दीव्यन्ति क्रीडन्ति अत्र पुण्यवन्तः इति द्यौः। "दिवेर्डिविः' प्रत्ययो भवति । असौ सुष्ठु अय॑ते स्वर्गः। "स्वृ३ भृभ्यां गः" गप्रत्ययः । नास्त्यकं दुःखमत्र नाकः । उभयम् । तद्वासस्त्रिदशो मतः ॥ ५६ ॥ तस्य स्वर्गस्य वासः,तद्वासः-स्वर्गवासः । द्योवासः,स्वर्गवासः,इत्यादीनि देवनामानि भवन्ति । तत्पतिः तस्य देवस्य ( स्वर्गस्य च) पतिः, तत्पतिः । देवपतिः, सेन्द्रपतिः, स्वर्गवासपंतिः, स्वर्गपतिः, नाकपतिः, नाकेन्द्रः, इत्यादिपर्यायनामानि इन्द्रस्य ज्ञेयानि | शक्र इन्द्रश्च शुनासीरः शतक्रतुः । प्राचीनवर्हिः सुत्रामा वज्री चाखण्डलो हरिः ॥ ५७ ।। २५ शत्रुर्वलस्य गोत्रस्य पाकस्य नमुचेरपि । वृत्रहा च सहस्राक्षो गीर्वाणेशः पुरन्दरः ॥ ५८ ॥ विडौजाश्चाप्सरोनाथो वासवो हरिवाहनः । मरुतश्च मरुत्वाँश्च वृपा चैरावणाधिपः ॥ ५४॥ शतमन्युस्तुरापाट् च पुरुहूतश्च कौशिकः । ३० संक्रन्दनोऽथ मघवान् पुलोमारिर्मरुत्सखः ॥ ६० ॥ त्रयस्त्रिंशदिन्द्रे । पातुं शक्नोतीति शक्रः । ""स्फायितञ्चिवञ्चिशकिक्षिपिक्षुदिरुदिमदिचन्द्यु- २० - १. "अर्श श्रादेरः" जै० सू० ४११११५०। २. का० उ० सू० ६।५३। ३. का० उ० सू० ५।६।। ४. तस्मिन् स्वर्गे वसतीति तद्वासः । णप्रत्ययः । स्वर्गपर्यायार्थात् परत्र वासशब्दे प्रयुज्यमाने त्रिदशनामानि भवन्तीत्यर्थः । ५. का० उ० सू० २०१४ नाममाला ३१ . " न्दीन्दिभ्यो रक्"। इन्दति परमैश्वर्ययुक्तो भवति इन्द्रः। रक् । शुन श्रादित्यः शीरो वायुस्तयोरपत्यमणो लुक्यभेदावा, दीर्घ शुनाशीरः । तालव्यद्वयम् । शोभनं नासीरं कटकं वा यस्य स सुनासीरः । द्वौ दन्त्यौ। शु अव्ययं तालव्यमपि । अत्र पक्षे प्रथमस्तालव्यो द्वितीयो दन्त्यो भवति । तथा च शोभना नासीरा अग्रेसरा श्रस्य, शुनासीरः । शुः पूजायाम् , श्वशुरवत् । शुनासीरयोरपत्यमित्येके । शतं कृतवो यज्ञा यस्य शतक्रतुः । प्राचीना प्राचीनमुखा बर्हिषी दर्भा यस्य सः । सुष्टु त्रायते नान्तः सुत्रामा । वज्रं विद्यते यस्य स वजी। श्राखण्डयति भिनत्त्यरीनाखण्डलः । ह्रियते शचीकटाक्षहरिः । "शत्रुर्बलस्य गोत्रस्य पाकस्य नमुचेरपि"- बलशत्रुर्गोत्रशत्रुः पाकशत्रुर्नमुचिशत्रुः, इत्यादीनि इन्द्रनामानि भवन्ति । वृत्रं दानवे यशं वा हतवान् वृत्रहा । किम् । “(२किब्)ब्रहाभ्रूणवृत्रेषु" विप् सहस्रमक्षीणि यस्य स सहस्राक्षः । गोर्वाणानां देवाना मीशः (गीर्वाणेशः) । विट्सु प्रजासु प्रोजो यस्य | पृषोदरादित्वाद् वृद्धिः । विड भेदने वा । विडं भेदकमोजो १० यस्य वा (विडोजाः )। अप्सरसां नाथोऽप्सरोनाथः । वस्वपत्यं वासवः । हरिर्वाहनं यस्य हरिवाहनः । पुण्यक्षये म्रियते च्यवते मरुत् । तान्तम् । मरुतो देवाः सन्त्यस्य मरुत्वान्" । वर्षति, नान्तम्,वृषा । ऐराव- णानामधिपः (ऐरावणाधिपः) । शतं मन्यवः क्रतवोऽस्य शतमन्युः । "यह मर्षणे" ।। षट् । “धात्वादेः षः सः" । सहते कश्चित्तमपरः प्रयुङ्क्ते "धातोश्च हेतौ" इञ् । अस्योप० दीर्घः । साहि जाते । तुरपूर्वकः । तुरं त्वरितं साहयत्यभिभवत्यरीनिति तुराबाट । “सहश्छन्दसि" पिण् । “कारितस्या०९ कारितलोपः । वेर्लोपः१०। “नहि १ वृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु को किबन्तेषु प्रायकाराणां दीर्घः । तुरा जातम् । तुरासाह १५ निष्पन्नः । सिः । “व्यञ्जनान्ताच १२"सिलोपः । “हशष १३च्छान्तेजादीनां डः" हस्य डः । “सहेः साडः षः१४" सस्य पत्वम् । रपरत्वात्परपदेऽपि सस्य षत्वम् । स्वमते अपिशब्दबलात् । अथवा तुरं वेगं सहते तुरापाट । "सह "श्छन्दसि" विण पूर्ववत् । पुरु प्रभूतं हूतं यज्ञे यज्ञेष्वा ( जे श्रा) हानं यस्य पुरुहूतः । जातमात्रोऽ- दित्या कुशैराच्छादितत्वात् (कौशिकः) । तथा पुराणम्१६- "जातमात्रोऽथ भगवानदित्या स कुशैर्वृतः । तदा प्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ॥" कुशैर्दभैश्चरति वा । अरिस्त्रीः सङ्कन्दयति सक्रन्दनः । मय्यते पूज्यते नान्तो मघवा । "मधेर्नलुगवन्तश्च" मधेः कनिः प्रत्ययो भवति, नलुगवन्तश्च । पुलोमस्या (ग्नोऽ) रिः पुलोमारिः । मरुतां पवनानां सखा मित्रः (बं) मरुत्सखः । दुश्च्यवनः । वृत्रारिः । बलसूदनः । वृद्धश्रवाः । जिष्णुः । वज्रधरः । वास्तोष्पतिः । गोपतिः । पर्जन्यः । हरिहयः । पूर्वदिक्पतिः । स्वराट् । गोत्रभिद् । अग्रधन्वा । हरिमान् । पाकशासनः । दिवस्पतिः । - २० कार २५ १. शु पूजायाम् अश्नुते व्याप्नोति "श्वशुरः" इति व्युत्पत्त्या "श्वशुर" शब्दो निप्पन्नः । तद्व- च्छुनासीरशब्देऽपि शु शब्दः पूजार्थ इत्याशयः । २. का० सू० ४।३।८३। ३. वैवेष्टि व्याप्नोति विट् । "विष्ल व्याप्तौ' कि । विड् व्यापकमोजो यस्य स विडोजाः । पृषोदरादित्वादोकारस्यौकारः । इत्यप्यू- खम् । ४. त्वक्केशवालरोमाणि सुवर्णाभानि यत्य तु । हरिः स वर्णतोऽइवस्तु पीतकौशेयसप्रभः । इति शालिहोत्रोक्तप्रकारोऽश्वो हरिः । ५. मरुतो देवाः शास्यत्वेन सन्त्यस्येति यावत् । ६. का० सू० ३।८।२४। ७. फा० सू० ३।२।१०। ८. कार सू० ४।३।६०। ९. का० सू. ३१६॥४४॥ १०. "वेरपृक्तत्य" पा० स० ६।१६६७ । ११. पासू० ६।३।११६। १२. का० सू० २।११४९। १३. का० सू० २।३।४६॥ १४. पा० सू० ८।३।५६। १५. का० सू० ४।३।६०। १६. श्लोकोऽयम् अभि. चि० २।८७। टीकायामप्येवमेवोपलभ्यते । १७. का० उ० स० ५।४। पनि ३२ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता काष्ठा ककुछ दिगाशा च दक्षकन्या तथा हरित । पड् दिशायाम् । काशन्ते राजन्ते (नक्षत्रादयोऽत्र) काष्टा' । कं स्कुनाति विस्तारयति फकुप् । भान्तम् । दिशत्यवकाशं दिक् । । “ऋत्विग्दधृक् सदिगुष्णिहश्च' इति साधुः । श्राइनुते पाशा । दक्षः प्रजापतिः, तस्य कन्या, दक्षकन्या । हरत्यनया हरित् । तत्पर्यायपरं योज्यं प्राजः पालगजाम्बरम् ॥ ६१ ।। काष्ठादिनामतः परं योज्यं प्राः विद्व दिभः पालगजाम्बरम् । काष्टापालः । ककुप्पालः । दिक्पालः । श्राशापालः । दक्षकन्यापालः । हरिपालः । पालप्रयोगे दिग्गजनामानि भवन्ति । काष्ठागजः । ककुगजः । दिग्गजः । श्राशागजः । दक्षकन्यागजः । हरिद्गजः । अम्बरशब्दप्रयोगें दिगम्बर- नामानि भवन्ति । काष्ठाऽम्बरः । ककुवम्बरः । दिगम्बरः । आशाऽम्बरः। दक्षकन्याम्बरः । हरिदम्बरः । १० तथा च--- "गिरिकन्दरदुर्गेपु ये वसन्ति दिगम्बराः। पाणिपात्रपुटाहारास्ते यान्तु परमा गतिम् ॥" एवं विधा मुनयो भव्यानां शरणं भवन्तु जन्मनि जन्मनि । पवनः पवमानश्च वायुर्वातोऽनिलो मरुत् । समीरणो गन्धवाहः श्वसनश्च सदागतिः ॥ ६२ ॥ नभस्वान् मातरिश्वा च चरण्युर्जवनस्तथा । प्रभञ्जन:-- पञ्चदश वायौ । पवते जगत् पवित्रीकरोति पवनः। युच् । "पूङ पवने ।" पू । पवते पवमानः । ""पूङ्यजीः शान" अानमात्रः । अन्वि०६ अनिच०७ नाम्यन्तगुणः । “ो अव् ।" "अान्मो ऽन्त २० पाने" मोऽन्तः । वातीति वायुः । १°कृवापाजी"-ति उण् । वाति सर्वत्राऽस्खलितं वा वायुः । वाति अस्खलितं याति, वातः । मृगवाहस्यमिदमिलूपूभ्यस्तः" । अनेन जगत् अनिति प्राणिति, न निलति वा अनिलः । “निल गहने" । क्षुद्रजन्तवो म्रियन्ते स्पर्शेनास्य मरुत् । तान्तम् । “१२मृनोरुतिः" उतिप्रत्ययः । समन्तादीरयति समीरणः । गन्धं वहति गन्धवहः । गन्धवाहः । गन्धवाही । श्वसन्त्यनेन श्वसनः । सदा सर्वकालं गतिर्यस्य स सदागतिः । नम आकाशमस्यास्तीति नभस्वान् । मातरि २५ रेतः श्वयति वर्द्धते नान्तो मातरिश्वन् । मातरिश्वेव भवति १३मातरिश्वा । चराचरं याति चरे- १५ ॥११ १. "काश दीप्तौ” "हनिकुशि" इत्यादि २।२। पा०उ० सूत्रेण क्थन् । २. कं वातं स्कुम्नाति विस्तारयति । क्रिप् । पृषोदरादित्वात्सलोपः । केनादित्येन जलेन वा कुत्सितानि भानि नक्षत्राणि यस्या- मिति “ककुभा” इत्यावन्तोऽपीति केचित् । ३. का०स०४।३।७३। ४. हरन्ति नयन्ति अनया हरित् दिग्- ज्ञानेनैव कञ्चित् कुतश्चित् कुत्रचिन्नयति । "दृसृरुहियुपिभ्य इतिः" इतीतिः । ५. का०सू० ४।४।८ । ६. “अन्विकरणः कर्तरि" इति पूणे सूत्रम् । का० सू० ३।२।३२॥ इत्यन्विकरणः । ७. "अनि च विकरणे" का० सू० ३१५॥३॥ ८. का० सू० १।२।१४। ९. का० सू० ४।४।७। १०. का० उ० सू० ११११ ११. का०3० सू० ४।२७। १२. का०३०सू० १।३०। १३. मातरि जनन्यां रेतः प्रसिक्तं यथा वर्धते, तथाऽन्तरीक्ष वर्धमानो वायु: 'मातरिश्वा" इत्याशयः । क्षीरस्वामी तु-~"मातरि खे श्वयति" इत्याह । रामाश्रमस्तु--"मातरि जनन्यां श्वयति वर्धते सप्तसप्तकरूपत्वात्" इत्याह । आपन्नसत्त्वाया दितेर्निद्रावस्थायां तत्कुक्षिप्रविष्ट नेन्द्रेण कुलिशद्वारा तद्गर्भस्यैवोनपञ्चाशच्छकलीकरणस्य पुराणप्रसिद्धत्वात्सप्तसप्तकत्वमुपपन्नम् । “टु अोश्वि गतिवृदयोः।" शिवधातोः "श्वन्नुक्षन्नि" ति कनिन्नन्तो निपातः सप्तम्या अलुक् च ।
५ नाममाला ३३ ५ । भरण्युः । “केवयुभुरण्य्वध्वर्वादयः" केवय्वादयः शब्दा डुप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । तथा च द्विसन्धानकान्ये. "असूययाऽगम्य निशाम्य यां पुरो विलज्जयाऽम्भःपरिणामिनीदशाम् । गता इवाभान्ति कुलाद्रिपेशला- श्वरण्युलोलाः परिखाऽम्बुवीचयः ॥" "जु" इति सौत्रो धातुर्गतौ । सौत्रा धातवोऽपि भ्वादौ पठ्यन्ते । जवतीति जवनः । “जुचङ्- कम्यदन्द्रम्यसयधिज्वलशुचपतपदाम्" एभ्यो युर्भवति । सर्वा दिशाः प्रभनक्ति प्रभञ्जनः । जगत्प्राण: । पृषदश्वः । स्पर्शनः । समीरः । हरिः । महाबलः । श्राशुगः । अस्य पर्यायपुत्रौ भीमाञ्जनात्मजौ ॥६३॥ अस्य पर्यायात् प्रभञ्जनादिशब्दात्परत्र पुत्रशब्दो दीयते तदा भीमहनुमतो मानि भवन्ति । १० पवनपुत्रः । पवनतनयः । पवमानतनयः । वायुपुत्रः । वायुतनयः। वातपुत्रः । वाततनयः । अनिलपुत्रः । अनिलतनयः । समीरणपुत्रः । समीरणतनयः । गन्धवाहपुत्रः । गन्धवाहतनयः । श्वसनपुत्रः । श्वसनतनयः । सदागतिपुत्रः । सदागतितनयः । नभस्वत्पुत्रः । नभस्वत्तनयः । मातरिश्वपुत्रः । मातरिश्वतनयः । चरण्युपुत्रः । चरण्युतनयः । जवनपुत्रः । जवनतनयः । चलपुत्रः । चलतनयः । प्रभञ्जनपुत्रः । प्रभञ्जन- तनयः । भीमस्य हनुमतश्न नामानि ज्ञातव्यानि । १५ तत्सखाऽग्निः, तस्य वायोः सखा, तत्सखः । वायुशब्दाग्रे सखशब्दे प्रयुज्यमाने अग्निनामानि भवन्ति । पवनसखः । वायुसखः । अनिलसखः । वातसखः । मरुत्सखः । गन्धवाहसखः। समीरणसखः । श्वसनसखः । सदागतिसखः । नभस्वत्सखः । मातरिश्वसखः । चरण्युसखः । जवनसखः । चलसखः । प्रभञ्जनसखः । पवनेष्टः । पवमानेष्टः । इत्यादीनि अग्नेर्नामानि ज्ञातव्यानि । शिखी वह्निः पावकश्चाशुशुक्षणिः । हिरण्यरेता सप्तार्चिर्जातवेदास्तनूनपात् ।। ६४ ॥ स्वाहापतिर्हताशश्च ज्वलनो दहनोऽनलः । वैश्वानरः कृशानुश्च रोहिताश्वो विभावसुः ॥ ६५ ॥ वृषाकपिः समीगर्भो हव्यवाहो हुताशनः । २५ एकविंशतिरग्नौ । "अक अग कुटिलायां गतौ ।" अगति वायुवशादूचं गच्छतीत्यग्निः । शिखाऽस्त्यस्य शिखी। उह्यते वह्निः । ""अगिश्रुश्रियुवहिन्यो निः" एभ्यो धातुभ्यो निः प्रत्ययो भवति । पुनाति पावकः। अाशु शोषयति रसान् श्राशुशुक्षणिः । “अाशौ शुपेः सनिक्" । "शुष १. चरण्युशब्दोऽयम्; न तु चरेण्यः । द्विसन्धानेऽपि चरण्युशब्दस्यैव दर्शनात् । एतत्साधकमुणा. दिसूत्रम् अभिधानचिन्तामणिटीकायाम् (३।४८३ ) उपलभ्यते; नैवान्यत्र । वस्तुतत्तु वैदिकोऽयं प्रयोगः । "चरण वरण गतौ" कण्ड्वादौ चरण धातुर्यक् प्रत्ययान्तः । ततः "क्याच्छन्दसि' पासू० ३।२१७० । इत्यु- प्रत्ययः । सुम्नयु, तुरण्यु, भुरण्य, सपर्यु, श्रादिशब्दवदस्य सिद्धि। विशेषत्तु "क्याच्छन्दसि" इत्यस्य तत्त्वबोधिन्यां द्रष्टव्यः । चरण्यतीति चरण्युः । २. स० १ श्लो० १९ । ३. का० २.० ४।४।३२ । ४. वद्दति हव्यं वल्लिरिति व्युत्पत्तिरन्यत्र । ५. का० उ० सू० ३१५०। ६. आशोष्टुमिच्छतीति प्रापर्वकान्छुपेः समन्तात् "याङिशुपेः सनश्छन्दसि" पा० उ०सू० २।१०६ । अनिः। श्राशु शीमन्, माशुं मीहिं वा शु सुष्टु क्षणोतीति वा । "सर्वधातुभ्य इन्" इत्यन्यत्र । ७. का० उ० सू० ५११५ । २० - अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता । शोपे ।” अन्तभूतकारितार्थीऽयम् । श्राशुपूर्वः। श्राशाजुपपदे शुपेः सनिक् प्रत्ययो भवति । हिरण्यं रेतोऽस्य स हिरण्यरेताः। यत् स्मृति:'--"अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णम्" | सतार्चिपो यस्य स सप्ता- चिः । भवन्ति "हिरण्या, कतका, रक्ता, कृष्णा, प्रसुप्तभावाऽन्या । अतिरिक्ता बहुरूपेति सप्त सप्ताचिपो जिताः।" जाते जाते विद्यते सान्तो जातवेदस् । जाता वेदा अस्माद् वा जातवेदाः । ५ तनू न पातयति तनूनपात् । अपि तान्तो दान्तो वा । "स्वाहा” इत्यस्य . ( स्याः) पतिः भर्ता स्वाहापतिः । हुतं वपट्कारकृतं वस्तु अश्नासीति हुताशः । हुतम् श्राशो भोजनं यस्य वा । ज्वलती- त्येवंशीलो ज्वलनः । दहतीत्येवंशीलो दहनः । अनिति प्राणित्यनेन अनलः। विश्वानरस्यापत्य वैश्वानरः । कृश्यति तनूकरोति कृशानुः । रोहिताऽख्यो मृगोऽश्वो वाइनमस्य रोहिताश्वः । विभा वसुर्धनं यस्य स विभावसुः । वृपो धर्मः कपिराहः श्रेष्ठश्च तद्पात् वृपाकपिः । "पुराणम्- १० "कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृप उच्यते । तस्माद् वृपाकपि प्राह काश्यपो मां प्रजापतिः ।।" हमीनाममालायाम "वृपाकपिर्चासुदेवे शिवेऽग्नौ च ।" शम्यां गर्भो यस्य स शमीगर्भः । हव्यं वहतीति हव्यवाट् । हुतमरनातीति हुताशनः । बहुलः । १५ वसुः । सितेतरगतिः । अर्चिष्मान् । धूमध्वजः । बहिज्योतिः । उपर्बुधः । चित्रभानुः । शुचिः । कृपीट- योनिः । दमुना । कृष्णवर्मा । अपांपित्तम् । वीतहोत्रः । वृहद्भानुः । श्राश्रयाशः । धनञ्जयः । तमोघ्नः । दमूना इत्येके । दमेरूनसि । तदादिसनुः, अग्निसूनुः । वह्निपुत्रः । वृपाकपिसूनुः । वृपाकपिपुत्रः । इत्यादीनि स्कन्दनामानि भवन्ति । सेनानीः स्कन्दश्च शिखिवाहनः ॥६६॥ कार्तिकेयो विशाखश्च कुमारः पण्मुखो गुहः । शक्तिमान् क्रौञ्चभेदी च स्वामी शरवणोद्भवः ।। ६७॥ द्वादश स्कन्दे । सेनां नयतीति सेनानीः। “सत्सू द्विपदुदुहयुजविदभिदछिदजिनीराजामुप- सर्गेऽपि'' एषामुपसर्गेऽप्यनुपसर्गेऽपि नाम्न्यनाम्न्युपपदे किव् भवति । स्कन्दत्यरीन् स्कन्दः । स्कन्न २५ शुष्कं रेतोऽस्य वा । शिखी मयूरो वाहनमस्य शिखिवाहनः । कृत्तिकानामपत्यं कार्तिकेयः । दानव- बलौजस्तेजांसि इयति विशेपेण तनूकरोति विशाखः । विशाखासुतो वा। कुमारो ब्रह्मचारित्वात् । २० १. अम. को० क्षीर० भा० १११।५५ । २. सर्वत्रोत्पन्नपदार्थे वर्तमानत्वादः वेदोत्पत्तिका- रणत्वेन चाग्नेरुक्तत्वाच्च । जातं वेदो धनं (मुवर्ण) यस्मात्, जातं वेत्ति वेदयते वा इति व्युत्पत्तिरपि । ३. तनूं स्वस्वरूपं न पातयति दहतीत्यर्थः । विप् । “नभ्राण्नपात्" इति नलोपाभावः । तनूं न पाति रक्षति जाते जाते विनष्टत्वादिति वा । पातेः शतृप्रत्ययः । तन्वा ऊनं पाति रक्षतीति तनूनपं घृतं तदत्तीति । "पादोऽनन्ने" इति विट् । इत्यप्यूह्यम् । ४. कृशोऽप्यनिति वर्धते कृशानुरिति वा । ५. श्लोकोऽयम्, अभि० चि० . २।१२९ । टीकायामेवोपलभ्यते । ६. अनेका० सं० ४।२१८ । ७. का० सू० ४।३।७४ । ८. स्कन्नं रेतोऽस्येत्यर्थाभिप्रायेण । विग्रहस्तु स्कन्दति शुष्करेता भवतीति स्कन्द इत्येवंरूपः । ब्रह्मचारिणां शुष्करेतस्त्वमागमात्सिद्धम् । पचायच् । ९. विपूर्वात् "शो तनूकरणे" इत्यस्माद् बाहुलकात्खप्रत्ययः, विशाखानक्षत्रे बातो वा । विशाखयति विशेपेण व्याप्नोति दानवबलमिति वा । “शाख व्याप्तौ ।" पचायच् ।
नाममाला ३५ कुत्सितो मारोऽस्येति कुमारः१ । पण्मुखानि यस्य स षण्मुखः । गृहति रक्षति देवसैन्यं गुहः । “२नाम्युपध- प्रीकृगशां कः ।" शक्तिर्विद्यतेऽस्य शक्तिमान् । क्रौञ्च पर्वतं भिनत्तीति क्रौञ्चभेदी । स्वमस्त्यस्य स्वामी । शराणां वनम्, शरवणम्, तस्मिन्नुद्भवः शरवणोद्भवः । गौरीपुत्रः । शक्तिपाणिः । तारकारिः । अग्निभूः । बाहुलेयः । गाङ्ग यः । ब्रह्मचारी । महासेनः । महातेजाः । पार्वतीनन्दनः । तत्पिता शङ्करः शम्भुः शिवः स्थाणुमहेश्वरः । त्र्यम्बको धूर्जटिः शर्वः पिनाकी प्रमथाधिपः।। ६८ ॥ त्रिपुरारिविशालाक्षो गिरीशो नीललोहितः । रूद्रेन्दुमौलिय॑ज्ञारिस्त्रिनेत्रो वृषभध्वजः ॥ ६६ ॥ उग्रः शूली कपाली च शिपिविष्टो भवो हरः । उमापतिविरूपाक्षो विश्वरूपः कपर्यपि ॥ ७० ॥ १० एकोनत्रिंशदीश्वरे । तस्य स्कन्दस्य पिता । शं सुखं करोतीति शङ्करः । शम्भवती (त्यस्मादि) ति शम्भुः । "भुवो"डुर्विशम्प्रेषु च ।" शेते प्रलयकाले जगदत्र शिवः। जगति प्रलीनेऽपि तिष्ठति स्थाणुः । महाँश्चाशौ ईश्वरः महेश्वर । त्रीण्यम्बकानि अक्षीण्यस्य त्र्यम्बकः । त्रयाणां लोकानाम् अम्बकः पितेत्यागमः । धूर्भारभूता जटयो जटा यस्य, धूर्गङ्गा जटिपु यस्य वा धूर्जटिः । शृणाति दैत्यान् शर्वः । ""शर्वजिह्वाग्रीवा" एते कप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । पिनाकमस्त्यस्य पिनाकी। प्रमथाया 'यधिपः, प्रम- १५ थाधिपः । त्रिपुरासुरस्यारित्रिपुरारिः। विशाले विस्तीर्णे अक्षिणी यस्य विशालाक्षः । ९सक्थ्यक्षिणी स्वाङ्ग ।” गिरीणामीशो गिरीशः । कालकूटभक्षणान्नीलं कृष्णं लोहितं यस्य स नीललोहितः५० । "नील:११ कण्ठे लोहितश्च केशे इति नीललोहितः" इति पुराणम् । रोदयत्यरित्री रुद्रः । "स्फायितञ्चिवञ्चि-१२ शकिक्षिपिक्षुदिरुदिमदिमन्दिचन्द्घन्दीन्दिभ्यो रक् ।" इन्दुर्मीलिमुकुटं यस्य (सः ) इन्दुमौलिः१३ । यज्ञानां पशुकारणलक्षणानाम् अरिः, यज्ञारिः । त्रीणि नेत्राण्यस्य त्रिनेत्रः । वृषभो क्लीवों ध्वजायां २० यस्य स वृषभध्वजः । कोपमूर्जति उग्र१४: । शूलमस्त्यस्य शूली । कपालं मनुष्यकरोटिरस्त्यस्य कपाली। शिवः पिण्टो हतौ अस्थिरूपो (विष्टे) मूर्ध्नि यस्य स शिपिविष्टः१५ । भवतीति भव'६:। हरत्यघं हरः । । . -- - .... -- . १. "कुमार क्रीडायाम् ।” कुमारयतीति पचाद्यच् । कौ पृथिव्यां मारयति दुष्टानिति वा विग्रहो बोध्यः । २. का० उ० सू० ६।६८ । इतीन्प्रत्ययः । ३. स्वशब्दादामिन् प्रत्ययः । "स्वामिन्नेश्वर्ये" पा० सू० ५।२।१२६ । अथवा शोभनममति रक्षतीति स्वामी । “सावमेरिन् दीर्घश्च' का० उ० सू ० ६।६८ इतीन प्रत्ययः । ४. शम्भवति भावयतीत्यर्थो वा । अन्तावितण्यर्थोऽत्र भवतिः । ५. का० सू० ४।४।५६। ६. उक्तविग्रहे शेते_हुलकाड्ड्वप्रत्ययः । शिवं करोतीति शिवयति, ततः पचाद्यचि शिवो वा । शिवन- स्यास्त्यस्मिन्वेत्यपि विग्रहो बोध्यः । ७. का० उ० सू ० २।२। ८. प्रमथाया दुर्गायाः। परन्तु “प्रमथाः न्युः पारिपदाः" इत्यमरादिपु प्रमथशब्दस्य शिवपर्यायत्वेन प्रसिद्ध, दुर्गात्वेनाप्रसिद्धेः प्रमथानामधिपः इति सुवचम् । ९. "राजादीनामदन्तता" का० सू० २।६।४१वृत्तिः ५०। १०. नीलं कण्टे लोहितं जटाया- मक्ष यस्येति विग्रहार्थः । तदुक्तम्-"नीलं येन ममागन्तु रसाक्तं लोहितं विपा । नीललोहिन इत्येष ततोऽहं पारेकीर्तितः ॥ इति स्कान्दे” इति मुकुटः । ११. अम०को क्षीर०भा० १११।३३। १२. का० उ०१० २।१४। १३. इन्दुमौली यस्येति विग्रहः सरलः । १४. उच्यति क्रुधा समवैति उग्रः । “उच समवाये" उच् धातुः । ततो रक् । गवान्तादेशः। ऋजेन्द्रादि उ० सू० । १५. शिवपिष्टशब्दयोराबक्षरोपादान शिपिशब्दोs । १६. भव्याय भवति कल्पते इत्यर्थः । -- ...
३६ अमरकीतिविरचितभाप्योपता उमायाः पतिः उमापतिः। विरूपाण्यक्षीण्यस्य विरूपाक्षः । विश्वेषु रूपं यस्य स विश्वरूपः । कपदीड स्त्यस्य कपर्दी । कपदों जटाजूटः। कं शिरः पिपीति कपर्दः । पौणादिको दः। अपिशब्दात्-ईशानः । शशिशेखर : । पशुपतिः। शम्भुः । गिरिशः । श्रीकण्ठः । सर्वगः । त्रिपुरान्तकः । भूतेशः । परमेश्वरः । अन्धकरिपुः । दक्षाध्वरध्वंसकः । स्रष्टा । वामदेवः । कामध्वंसी । व्योमकेशः । वहिरेताः । भीमः । भर्गः । ५ कृत्तिवासाः । वृपाकः । भागीरथी त्रिपथगा जाह्नवी हिमवत्सुता। मन्दाकिनी- पञ्च गङ्गायाम् | भगीरयेन राशाऽवतारितत्वात्तस्यापत्यं वा भागीरथी। त्रिभिः पथिभि- गच्छति त्रिपथगा' । त्रिमार्गगा च । ज{ना पीता श्रोत्रेण त्यक्ता जाह्नवी । जहीरपत्यं वा जाह्नवी । हिमवतो हिमाचलस्य सुता हिमवत्सुता। मन्दाका मन्दा गतिरस्त्यत्या *मन्दाकिनी । सुरसरित् । विष्णुपदी। सरिवरा । त्रिदशदीर्घिका । त्रिस्रोताः । भीष्मसू : । सुरनिम्नगा। धुपर्यायधुनी अाकाशशब्दतो (तः परत्र ) नदीपर्यायेषु गङ्गानामानि भवन्ति । खस्रोतस्विनी । विहायो- धुनी । वियसिन्धुः । व्योमस्रवन्ती । नभोनदी। गगननिम्नगा । अम्बरापगा । योनदी । अाकाशनदी। १५ अन्तरीक्षद्विरेफा । मेवपथसरित् । यायुपथतरङ्गिणी । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । गङ्गानदीश्वरः ॥ ७१॥ भागीरथ्यादिशब्दतः (परत्र ) ईश्वरपर्यायेषु हरनामानि भवन्ति । भागीरथीराजः । त्रिपथ- गाधिपः । जाह्नवीपतिः । हिमवत्सुतास्वामी। मन्दाकिनीनाथः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । विधिर्वेथा विधाता च द्रुहिणोऽजश्चतुर्मुखः । पद्मपाययोनिश्च पितामहविरश्चिनौ ॥७२॥ . हिरण्यगर्भः स्रष्टा च प्रजापतिस्सहस्रपात् । ब्रह्मात्मभूरनन्तात्मा कः सप्तदश ब्रह्मणि । विधति सृजति विधिः । विधत्ते वा विधिः । "उपसर्गे दः किः ।" विधति सृजति वेधाः । ""सर्वधातुभ्योऽसन् ।" "विध विधाने ।” विदधाति धारयति भूतानीति विधाता। २५ द्रुह्यत्यसुरेभ्यो द्रुहिणः । न जायतेऽजः । चत्वारि मुखानि वक्त्राण्यस्य चतुर्मुखः । “पद्मपर्याययोनिः"- पन्नायशब्दाने योनिशब्द प्रयुज्यमाने घातुर्नामानि भवन्ति । तामरसयोनिः। कमलयोनिः । नलिनयोनिः । पद्मयोनिः । सरोजयोनिः। सरसीरहयोनिः । खरदण्डयोनिः । पुण्डरीकभवः । महोत्प- लनः। अरविन्दयोनिः । शतपत्रयोनिः । पुष्करयोनिः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । दक्षमन्त्रादीनां लोक- पितृणां पिता पितामहः । यात्मनो भूतानि यिरिङ्क्ते पृथक् करोति विरिञ्चनः । विरिञ्चः । विरिञ्चिश्च । १. त्रयाणां पथां समाहारस्त्रिपथं तेन गच्छतीति वां। इत्थं च पूर्व समाहारद्विगौ कृते तत्र समासान्तविधानेन त्रिपथशब्दस्याकारान्तत्वं सूपपाद्यं भवति । गंगायात्रिपथगामित्वे भारतोक्तं वचनम् "क्षितौ तारयते मान् नागाँस्तारयतेऽप्यधः । दिवि तारयते देवाँस्तेन त्रिपथगा स्मृता ।।" २. मन्द- मकितुंगन्तुं शीलमस्या इति वा । “अक कुटिलायां गतौ ।” णिन् । डीप् । ग्रन्थोक्तविग्रह मन्दाकशब्द- स्य मन्दगत्यर्थं प्रमाणं मृग्यम् । ३. “विध विधाने" । तुदादिः । सर्व धातुभ्य इन् कित्त्वं च । ४. का० सू० ४५९० ५. का० उ० सू० ४५६ २० ।
नाममाला ३७ हिरण्यं गर्भे यस्य, हिरण्यं गौं वा यस्य हिरण्यगर्भः। 'पुराणम्--- "हिरण्यगर्भमभवत्तत्राण्डमुदके तथा । तत्र यज्ञे स्वय ब्रह्मा स्वयम्भूर्लोकविश्रुतः ||" सृजतीत्येवंशीलः स्त्रष्टा। प्रजानां पतिः प्रजापतिः । “पद गतौ ।”. पद् । पद्यन्ते गम्यन्ते (गच्छन्ति ) प्राणिनः, तान् पद्यमानान् जन्तून् चरणा एव प्रयुञ्जते । “२धातोश्च हेतौ" इ । अत्योप० दीर्घः । पादि जा० । पादयन्तीति पादः। किप च | "3कारितस्या०" कारितलोपः । वेर्लोपः । पाद् । सहस्र पादो यस्य स सहस्रपाद् । बृहन्ति वर्धन्ते चराचराण्यत्र ब्रह्म । उभयम् । इदं ब्रह्म । अयं ब्रह्मा । अथवा वृंहन्ति व्रतानि यस्मिन्निति ब्रह्म । वृहे: ४मन् प्रत्ययो भवति. अच्च हकारात् पूर्वम् । आत्मना भवति प्रात्मभूः । न अन्तो विद्यते यत्य सोऽनन्तः, अनन्तो विनाशरहित आत्मा यस्य सः अनन्तात्मा। कायतीति "कः। परमेष्ठी। सुरज्येष्ठः । शतानन्दः । स्वयम्भूः । जगत्कर्ता । शतधृतिः। स्थविरः । १० तत्पुत्रोऽथ नारदः ॥७३॥ तस्य पुत्रस्तत्पुत्रः। ब्रह्मणः शब्दात् (परत्र ) पुत्रशब्दे प्रयुज्यमाने नारदनामानि भवन्ति । विधिपुत्रः । वेधःपुत्रः । विधातृपुत्रः । विरिञ्चिपुत्रः । द्रुहिणपुत्रः। अजपुत्रः । चतुमुखपुत्रः ! पद्म- योनिपुत्रः । पितामहपुत्रः । हिरण्यगर्भपुत्रः । प्रजापतिपुत्र: । सहस्रपात्पुत्रः । ब्रह्मपुत्रः । श्रात्मभूसुतः । अनन्तात्मपुत्रः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । १५ कृष्णो दामोदरो विष्णुरुपेन्द्रः पुरुषोत्तमः । केशवश्च हपीकेशः शाङ्गी नारायणो हरिः॥ ७४ ॥ केशी मधुर्वलिर्वाणो हिरण्यकशिपुर्मुरः । तदादिसूदनः शौरिः पद्मनाभोऽप्यधोऽक्षजः ॥७॥ गोविन्दो वासुदेवश्च- एकविंशतिर्नारायणे । कर्षयरीन् कृष्णवर्णत्वाद्वा कृष्णः । “६इ जिकृषि यो नक् ।" दाम उदरे यस्य स दामोदरः । - यल्लक्ष्यम् -बालो हि चापलादाम्ना बद्धोऽभूत् । वेवेष्टि व्याप्नोति विष्णुः । 'सूविषिभ्यां यण्वत् ॥" उपगतमिन्द्रमुपेन्द्रः । इन्द्र उपगतोऽनुजत्वाद् वा उपेन्द्रः । पुरुपेषु उत्तमः पुरुषोत्तमः । केशाः सन्त्यस्य केशवः । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशो वशित्वाद् हपीकेशः । शाङ्ग धनु- रस्त्यस्य शा8ः । नारा प्रापः अयनं यत्य नारायणः । यत्स्मृतिः१०-- "आपो नारा इति.प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । अयनं तस्य ताः पूर्व तेन नारायणः स्मृतः ॥" २० १. "पुराणम्" इत्यारश्य "लोक विश्रुतः" इत्यन्तम् अभिधानचिन्तामणिटीकायान् २।१२७ उपलभ्यते। २. का० सू० ३।२।१०। ३. का. सू० ३।६।४४) ४. 'सर्वधातुभ्यो मन्" का० उ० सू० ४।२८१ ५. "कै शब्दे" वेदध्वनिकतृत्वेन ब्रह्मणि कायतीति क इति विग्रहः । "कच दीती" फचते वा । "प्रन्येभ्योऽपि दृश्यते" पा०सू० ३।२।१०१। सूत्रवार्तिकेन डः । ६. का उसू० २।५११७. बालकृष्णो हि यशोदया तच्चापल्यनिवारणाय कटिप्रदेशे बद्ध इति पौराणिकी कथा "लक्ष्यम्" इति पदेन स्मार्यते ८. का० उ० सू० २।। ९. नराणां समूहो नारम्; तदयनं यस्य, नराद् विराट् पुरुषान्नातं तत्यं नारम्; तदयते जानाति वा, माययति प्रवर्तयति वा, “नारायणः" इत्यपि पुत्पत्तिरत्र । १२. मनुस्मृतिः ।। तृतीयचरणे "ता पदस्यायनम्पूर्वम्" इति पाठो लभ्यते ।
- -- । अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता नरस्यापत्यं वा । नरानयते इति वाक्येन नरायणोऽपि । हरत्ययं हरिः । केशाः सन्त्यस्य नशा। 'मन्यते जनः मधुः । ""मनिजनिनमा मधजतनाकाच" एपामुप्रत्ययो भवति मयजतनाकाच यथासंख्य. मादेशा भवन्ति । "वल वल्ल च ।" बलतीति बलिः । "इ: सर्वधातुभ्यः ।" बण्यते वाणः । तदादि. सदनः । तदादीनां कश्यादीनां सूदनी नाशकर्ता-रिः । केशी, मधुः, बलिः, वाणः, हरिण्यकशिपुः, मुरः, ५ एभ्यः शब्देभ्यः परत्रारिशब्द प्रयुज्यमाने नारायणनामानि भवन्ति । केशिवरी । केल्यरातिः। वेश्यमित्रः । केशिविट् । केशिसपत्नः । मधुवैरी । मध्यरातिः । मध्वमित्रः । मध्वरिः । मधुद्विट । मधुमपत्नः । मधुरिपुः । बलिवरी । बल्यरातिः । बल्यमित्रः । बलिहिट । अलिसपत्नः । बलि रिपुः । वाणवैरी । बाणारातिः । बाणा- मित्र । बाणारिः । बाणहिट । बाणसपत्नः । वाण रिपुः । हिरण्यकशिपुहिट । हिरण्यकशिपुसपनः । हिरण्यकशिपुरिपुः । मुरवैरी । मुरारिः । मुरारातिः । मुरविट् । मुरसपत्नः । मुररिपुः । मधुशत्रुः । वाण- २० शत्रुः । मधुसूदनः । बलिसूदनः । बलिवन्धनः । वाणसूदनः । हिरण्यकशिपुसूदनः । केशिसूदनः । इत्यादि पर्यायनामानि । शूरस्तस्यादिपुरुपस्तस्यापत्यम्, शौरिः। सौरिर्वा । पद्म नामावस्य पद्मनाभः। •संज्ञायां नाभिः।” अधोक्षाणां जितेन्द्रियाणां जायते प्रत्यक्षीभवति, अधोक्षजः" । गां भुवं विन्दति गोविन्दः । वसुदेवस्यापत्यं वासुदेवः । मझुकेशः । श्रीवत्साकः । श्रीपतिः । पीतवासाः । विष्वक्सेनः । विश्व- रूपः । मुकुन्दः । धरणिधरः। सुपर्ण केतुः । वैकुण्ठः । जलशयनः । रथाङ्गपाणिः । दाशाहः । ऋतुपुरुषः । १५ वृषाकपिः । अच्युतः । इन्द्रावरजः । वभ्र: । विष्टरश्रवाः । वनमाली। सनातनः । जिनः । शम्भुः । इत्यागृह्यम् । लक्ष्मीः श्रीर्गामिनीन्दिरा। चत्वारः श्रियाम् । "लक्ष दर्शनाकाङ्क्षयोः।" लक्षयति दर्शयति पुण्यकर्माणं जनमिति लक्ष्मीः । लक्षेमोऽन्तश्च" अस्मादीप्रत्ययो भवति मोऽन्तश्च । “भज् श्रिञ् ( सेवायाम् )।" पुण्यकृतं श्रयतीति २० श्रीः । 'वचिच्छिश्रिद्रुग्रुज्वां क्रिब्दीर्घश्च" एभ्यः किप्प्रत्ययो भवति दीर्घश्च स्वरस्य चैप.म् । गां मिनो- तीति गोमिनी | इन्दति परमैश्वर्ययुक्ता भवति इन्दिरा । कमला। पद्मा । पद्मवासा । हरिप्रिया । क्षीरोदतनया । माया । मा । ता१५ । ई। या । रमा । सीता । वला (चला) । भर्भरी । अधिजाऽपि । तत्पतिः शैलभूम्यादिधरश्चक्रधरस्तथा ॥ ७६ ॥ तस्याः पतिस्तत्पतिः । लक्ष्मीपतिः। श्रीपतिः । गोमिनीपतिः । इन्दिरापतिः । इत्यादीनि हरि- २५ नामानि स्युः । शैलभूम्यादिधरः । पर्वतधरः । शैलधरः । दरीभृद्धरः । अचलधरः । शृङ्गिधरः । सानुम- धरः । गिरिधरः । नगधरः । शिलोच्चयधरः । भूमिधरः । भूधरः । पृथ्वीधरः । गह्वरीधरः । मेदिनोधरः । - १. मन्यते जनैः "खलत्वेन" इति शेषः । २. का० उ० सू० १३८ । ३. का० उ० सू० ३।१४। ४. का० सू० २१६१४१ । वृत्तिः । ८। ५. अधः कृतमक्षजमैन्द्रियकं ज्ञानं येन, अधो न क्षीयते जातु इति वा विग्रहोऽधिकोऽन्यत्र । ६. "मझुकेश" शब्दस्य "विष्णु" पर्यायत्वे कल्पद्रुरपि प्रमाणम्-'मञ्जुकेशः कौस्तुभोराः सोमगों धराधरः ।" ३।२१७ । ७. अभ्र शब्दस्य नारायणार्थेऽमरोऽपि प्रमाणम् । "विपुले नकुले विष्णौ बभ्रुः स्यापिङ्गले त्रिषु ।” ३।३।१७० । ८. का० उ० सू० ३।३५ । ९. का० उ० सू० २०२३ । १०."गोमिनी” शब्दस्य लक्ष्म्यर्थे प्रमाणं मृग्यम् । अत्रत्यविग्रहोऽपि चिन्त्यः । मत्वर्थे गोशब्दा. मिनिप्रत्यये टीपि गोपालिकार्थे तस्य प्रसिद्धौ कोपान्तरसंवादः । ११. ता, ई,आ, एषां लक्ष्म्यर्थे प्रमाणम्- "लक्ष्मी पदमा रमा या मा ता घी कमलेन्दिरा" अभि० चि० २११४० । "या" इत्यत्र ई या इति च्छेदः । “लक्ष्म्यान्तु भर्भरी विष्णुशक्तिः क्षीराब्धिमानुपी।” इति तट्टीकायाम् ।
नाममाला ३६ ५ महीधरः । धराधरः । वसुन्धराधरः । धात्रीधरः । क्ष्माधारः । वसुमतीधरः । विश्वम्भराधरः। अवनीधरः । धरणीधरः । क्षमाधरः । धरित्रीधरः । क्षितिधरः । कुधरः (ध्रः)। कुम्भिनीधरः । इलाधरः। उर्वरीधरः । उर्वीधरः । गोधरः । जगतीधरः । इत्यादीनि हरेर्नामानि ज्ञातव्यानि । तथा चक्रधरोऽपि । तत्पुत्रो मन्मथः कामः सूर्पकाराति (कारि) रनन्यजः । कायपर्यायरहितो मदनो मकरध्वजः ॥ ७७ ॥ षट् कामे। तत्पुत्रः । कृष्णपुत्रः । दामोदरपुत्रः । विष्णुपुत्रः । उपेन्द्रतनयः । पुरुषोत्तमसूनुः । केशवपुत्रः । हृषीकेशपुत्र । हृषीकेशतनयः । शाङ्गिनन्दनः । नारायणोद्वहः । हरिसूनुः । गोविन्दतुक् । इमानि मदनस्य पर्यायनामानि ज्ञातव्यानि । मनाति चित्तं 'मन्मथः । कामयते जनः (अनेन) कामः । २सूर्पकारातिः। मनसोऽन्यस्मान्न जायते अनन्यजः । कायपर्यायरहितः । विदेहः । अकायः । अनङ्गः । अनपधनः । अवपुः । असंहननः । अकलेवरः । श्रमूर्तिः । इत्यादि (दीन्यपि तस्य) पर्यायनामानि । जनं १० मदयतीति मदनः । मकरो ध्वजे यत्य स मकरध्वजः। प्रद्युम्नः । मनसिजः । सङ्कल्पजन्मा। अङ्गजः । पञ्चेपुः । श्रीनन्दनः । हृच्छयः । मधुसखः । शिलीमुखः शरो बाणो मार्गणो रोपणः कणः । इपुः काण्डं क्षुरनं च नाराचं तोमरं खगः ॥ ७८ ॥ द्वादश बाणे। शिलीव सूक्ष्मायं मुखं यस्य शिलीमुखः । "श हिंसायाम्" । शृणन्त्यनेनेति १५ शरः । ४"पुसि संज्ञायां घः' घप्रत्ययः । बणति "बाणः । ६"ध्यञ्जनाच्च" घञ्। मार्गयति अन्वेषयति मार्गणः । रोप्यते देहे निखन्यते रोपणः । कणति कणः । "इप गतौ" । इष्यते गम्यते शत्रुसम्मुखमिति 'इपुः । जन्तुमिष्यति हिनस्तीति वा इपुः । इषिधृषिभिदिगृधिमृदिपृभ्यः कुः” । काम्यते रिपुवधाय काण्डम् । उभयम् । खनति भिनत्ति ११क्षुरप्रम् । नारं नरसमूहम् अञ्चतीति १२नाराचम् । स्तोम्यते श्लाघ्यते तोमरम्१३ । खमाकाशं गच्छतीति खगः। कङ्कपत्रः । चित्रपुङ्खः । विशिखः । कलम्बः । २० कदम्बोऽपि । सायकः । प्रदहः । पृषत्कः । रोपः । गार्धपक्षः । १४खरुः । भल्लिः । भल्लः । १. विग्रहे चित्तस्थाने मनःशब्दपाठो योज्यः । मनसटलोपार्थ पृपोदरादिगणपठायासो ऽपि तस्य कार्यः । क्षीरस्वामिरामाश्रमौ तु मननं मत् चेतना। मथ्नातीति मथः । पचायच् । मतश्चेत- माया मथः “मन्मथः" इत्याहतुः । २. छन्दोभङ्गभयाच्छूपकारिरिति पाठो बोध्यः । शूर्पको नाम कश्चिद् दानवस्तस्य नाशकारित्वात्कामः शूर्पकारिः। तदुक्तम्- अभि० चि० २।१४२ । 'पुप्पाण्यस्येषुचापात्रा- एयरी शम्बरसूर्पको ।” ३. शिली नाम गण्डूपदः । "केचुवा" इति लोके ख्यातः । ४. का० सू० ४।५।९६ । ५. बणति शब्दायते पुखोऽस्मिन्निति पूर्णो विग्रहः । ६. का० सू० ४।५।९९ । ७. करणति शब्दायते करणः । पचाद्यच् । ८. इपति गच्छति शत्रुसम्मुखमिति वा । ९. का० उ० सू० १११० । १०, फनति दीप्यते काण्ड इति रामाश्रमः । “कनी दीप्तौ” । “कादिभ्यः कित्" उ० ११२ । इति डः । अनुनानिकत्येत्यु- पधादीर्घश्व । अमरकोत्युक्तविग्रहे “कमु कान्ती” कमधातोः स एष प्रत्ययः। करणत्यनेनाहतः काष्ट इति हेमचन्द्रः । “कण शब्दै" इत्यतो डः। ११. क्षुरं तैदयेन प्राति गच्छतीति क्षुरप्रम् इत्यपि । भुरानं लोह प्राति गच्छति वा । १२ नारमाचामतीति रामाश्रमः । नरमन्नतीति नराची, नराम्यातुल्यो नागवति हेमचन्द्रः। १३. "तु गतौ" सौत्रः । तौतीति तोः। विच् । नियतेऽनेनेति मरः । पुंलि संज्ञायां घः । तमाम मरश्चेति तोमर इत्यन्यत्र । १४. खाणः । तदुक्तं कल्पद्रुकोशे ११५१२६९ । “विदः पश्याः चित्र पुखः शरः खरुः ।" इति ।
४० १० अमरकीतिविरचितभाप्योपेता. कामुकं धन्य चापं च धर्म कोदण्डकं धनुः । शिलीमुखादेरसनम्- पड़ धनुपि । कर्मणे शत्रुवधलक्षणाय प्रभवतीति 'कामुकम् । दधन्ति मारयत्यनेन धन्यन् । अदन्तम् धन्वम् । चपस्य वेणोविकारश्चापम् । उभयम् । धरति धर्मन् । धर्म च । “कुह अनृतभापणे" । ५ कोदयत्यनेन 'कोदण्डम् । शत्रुवधार्थ धन्यते अर्यते धार्यते वा धनुः । उभयम् । उगादी दधन्तीति धनुः (नः) । “"कृषिचमितनिधनिवधिसनिर्जिन्य ऊः" । शिलीमुखादेरखनम् । शिलीमुखासनः । शरासनः । मार्गणासनः । रोपणासनः । कणासनः। इप्यासनः । काण्डासनः । क्षुरपासनः । नाराचासनः ! तोमरासनः । तत्कोटिमटनी विदुः ।। ७९ ॥ तस्य धनुपः कोटिमग्रभागम् । कामुककाटिः । धन्यकोटिः । चापकोटिः । काण्डकोटिः । धनुष्कोटिः । शिलीमुखासनकोटिशः। शरासनकोहिः । वाणासनकोटिः। रोपासनकोटिः । मार्गणासन- कोटिः । इत्यादिकमटनीति कथ्यते । अति गच्छति भूमिमटनिः। झ्याम् । श्रटनी । हा स्त्रियाम् । पुप्पं सुमनसः फुल्लं लतान्तं प्रसवोद्गमौ । प्रसून कुसुमं ज्ञेयम्- पद (अष्ट) पुष्पे । पुण्यति विकसति पुप्पम् । सुष्ठु मन्यन्ते अाभिः सुमनसः । स्त्रीत्वबहुत्वे । "निकला विशरणे ।” फल । फलति स्म फुल्लः । फुल्लं वा । “गत्याऽकर्मक' तः । 'पादनुबन्धाच" इति नेट् | "" अनुपसर्गात्फुल्लक्षीवकृशोल्लाघाः” निष्ठातकारस्य लत्वम् । “१"चरफ्लोरुदस्य” तकारादावगुणे उत्त्वम् । सि: । रेफः । लताया अन्तं पतितं लतान्तम् । प्रसू (य) ते प्रसवम् । उद्गच्छति प्रादुर्भ- वति उद्गमः । श्रियं प्रसूते प्रसूनम् । सूनं सुनकं च । एता उभयम् । को शोभां सूते १'कुसुमम् । २० सुमं च । ज्ञेयं ज्ञातव्यम् । तदाधस्त्रशरः स्मरः ॥ ८० ।। पुष्पपर्यायतो ( तः परत्रा ) स्वपर्यायेपु तथा बाणपर्यायेप्वपि स्मरनामानि भवन्ति । पुष्पेषुः । पुष्पबाणः । पुप्पशिलीमुखः । पुप्पशरः । पुष्पमार्गणः । पुष्परोपणः । पुप्पकाण्डः । पुष्पकणः । पुप्पक्षुरमः । पुप्पनाराचः । पुप्पतोमरः । सुमनःक्षुरप्रः । सुमशिलीमुखः । सुमनोनाराचः। लतान्तेषुः । १. “कर्मण उक" पा० सू० ५।१।१०३ । इति प्रभवत्यर्थे उका । टिलोपः । २. "धन धान्ये" जुहोत्यादिः । वन्प्रत्ययः । धातूनामनेकार्थत्वान्मारयतीत्यर्थः । धात्वर्थानुरोधे तु दधति धान्यमर्जयत्यनेने- त्यों बोध्यः । वीराणां धनधान्यार्जनसाधनत्वाद् धनुपः । धन्वति गच्छति धन्वेति क्षीरस्वामिरामाश्रम- हेमचन्द्राः । कनिन्प्रत्ययः। ३. धरती रक्षत्यापन्नसत्त्वानित्यर्थः । मनिन्प्रत्ययः । अकारान्तधर्मशब्द- स्य धनुर्वाचित्वे मेदिनी प्रमाणम्-"धर्मोऽत्री पुण्य प्राचारे स्वभावोपमयोः ऋतौ । अहिंसोपनिपन्याये ना धनुर्यमसोमपे ॥" मान्तव० १६ श्लो० ॥ ४. बाहुलकादण्डप्रत्ययः । रामाश्रमस्तु "कुट अनृतभाषणे" कोटती विग्रहमाह । स एव प्रत्ययः। पृषोदरादित्वादृस्य दः । कदिः सौत्रः। कचतेऽनेनेति हेमचन्द्रः । "कु शब्दे" कौतीति कौः । कौः शब्दायमानो दण्डोऽस्येत्यप्यन्यत्र । ५. का० उ० सू० ११३१ । ६. सुप्रीतं मन याभिरिति मुकुटः । ७, का०सू० ४।६४९८. का०सू० ४।५।९११ ९. का०सू० ४.६।११५। १०. का० सृ० ४।१।७६ | ११. कुस्यति कुसुमम् । “कुस संश्लेपणे" दिवादिः । “कुसेरुग्भोमेदेताः" पाउ० सू० ४।१०६। इत्युमप्रत्ययः । इति रामाश्रमः । -- ६ नाममाला लतान्तकाण्डः । लतान्तक्षुरप्रः । लतान्तनाराचः । लतान्ततोमरः । प्रसवमार्गणः। प्रसवरोपणः । प्रसवकणः । प्रसवेषुः । प्रसवकाण्डः । प्रसवक्षुरप्रः । प्रसवनाराचः । प्रसवतोमरः । उद्गमशिलीमुखः । उद्गमशरः । उद्गमबाणः । उद्गममार्गणः । उद्गमरोपणः । उद्गमकरणः । उद्गमेषुः । उद्गमक्षुरप्रः । उद्गमनाराचः । उद्गमतोमरः । प्रसूनशिलीमुखः। प्रसूनशरः । प्रसूनबाणः । प्रसूनरोपणः। प्रसूनकरणः । प्रसूनकाण्डः । प्रसूनेषुः । प्रसूनक्षुरप्रः । प्रसूननाराचः । प्रसूनतोमरः । कुसुमशिलीमुखः । कुसुमशरः । कुसुमबाणः । कुसुम- मार्गणः । कुसुमरोपणः। कुसुमकण:। कुसुमेयुः। कुसुमकाण्ड: । कुसुमक्षुरप्रः । कुसुमनाराचः । कुसुमतोमरः । पुप्पशब्दाने धनुषि शब्दे प्रयुज्यमाने कन्दर्पनामानि भवन्ति । पुष्पकार्मुकः । पुष्पधन्वा । पुष्पचापः । पुष्पधर्मा । पुप्पकोदण्डः । पुष्पधनुः (वा) । लतान्तकामुकः । लतान्तधनुः (न्वा) । लतान्तचापः । लतान्तधर्मः (र्मा) । लतान्तकोदण्डः । लतान्तधन्वा । प्रसवचापः । प्रसवकोदण्डः। प्रसवधनुः (न्वा) । प्रसूनकामुकः। कुसुमधन्वा। कुसुमचापः। कुसुमधर्मः (मा)। कुसुमकोदण्डः । कुसुमधनु: (न्वा) । १० इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । स्वान्तमास्वनितं चित्तं चेतोऽन्तःकरणं मनः । हृदयं विशिखाऽकूतम्- नव चित्ते । “स्यम स्वन ध्वज शब्दे ।" प्राङपूर्वः । स्वनति स्म, अास्वनति स्म इति स्वान्तम्, पास्वान्तम् । “गत्यर्था०"१ निष्ठा क्तः । “वा रुष्यमत्वरसंघुषाऽस्वनाम्" एभ्यः क्ते विभाषयेड १५ भवति । वेट । “पञ्चमो०"3 । “मनोरनुस्वारो धुटि" । मनोऽर्थे "क्षुभिवाही". त्यादिना क्त .नेट् । कथि- तत्वकथनेऽपि परत्वात्पूर्वोक्तपरोक्तयोः परोक्तविधिर्बलवान् इति वचनात् । अनेन सूत्रेणायमेव विकल्पो भवति । मनोऽभिधानेऽपि परत्वादयमेव ६विधिर्भवति । चेतति चित्तम् । चेतति जानाति अनेनात्मा चेतस् सान्तम् । अन्तः निश्चयः क्रियतेऽनेन, अन्तःकरणम् । मन्यते बुध्यते ऽनेन सान्तम् मनस् । बुद्ध्याऽर्थं हरति हृदयम् । “हजो दोऽन्तश्च" । दान्तं च हृद् । विगतं (ता, नष्ट (टा) शिखं (खा) २० यस्य तत्, विशिखम्१ ० । श्रा समन्तात् कूयते आकूयते ( आकृतम् ) । तथा चाष्टसाहस्याम११- "जाताकृतेनाकारेणेति मानसम्' । मारस्तत्रोद्भवो मतः ॥८१ ॥ तत्र चित्ते उद्भवो मारो मतः कथितः । स्वान्तसम्भवः । स्वान्तजः । श्रास्वनितजः । चित्त सम्भवः । चित्तजः । चेतस्सम्भवः । चेतोजः । अन्तःकरणसम्भवः । हृदयसम्भवः । हृदयजः । विशिखसम्भवः। २५ विशिखजः । प्राकृतसम्भवः । इत्यादीनि कन्दर्पनामानि ज्ञातव्यानि । मौर्वी जीवा गुणो गव्या ज्या- पड् गुणे । मूर्वति हिनस्त्यनया मूर्वा । तदाख्यस्य तृणस्य विकारो मौवीं । धनुरनया जीवतीति । १. का० सू० ४।६।४९। २. का० सू० ४१६१९७१ ३. का० सू० ४११५५। 'पञ्चमोपधाया धुटि चागुणे” इति पूर्ण सूत्रम् । ४. का० . ० २।४।४४। ५. का० सू० ४।६।९३ । ६. प्रास्वनितमित्यत्र मनोऽर्थेऽपि परत्यात् “वा रुप्यमत्वरे" ति चेट । पाङ्पूर्वकत्वाभावे तु स्वान्तमित्यत्र "क्षुभिवाही' त्यादिनेट- प्रतिपेधः । तेन स्वान्तमित्येकमेव रूपम् । यापूर्वकत्वे तु अास्वनितमारवान्तमित्युभयमित्याशयः । ७. "ज्यनुबन्धमतिबुद्धिपूजार्थेभ्यः क्तः” इति का० ४/४/६६। सूत्रेण ज्ञानार्थत्वावर्तमाने तः । ८. अन्तः- शब्दस्याऽत्राधिकरणशक्तिप्रधानरेफान्ताव्ययत्वेनान्तो निश्चय इति व्युत्पत्तिन वृत्ता । अन्तर्गतं फरसन, करणानामन्तर्गतं वेति व्युत्पत्तिवाध्या। ९. का० उ० सू० २।२६ । १०. विशिखशब्दस्य हदयाथै न किम- प्यन्यत्र प्रमाणमुपलब्धम् । अधोमुखपुण्डरीकाकारत्वाद्धृदयस्य शिखारहितत्वं कचिन्नेयम् ।
. ४२ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता जीवा । गुण्यते अभ्यस्यतेऽनेन गुणः। पुंसि । गोभ्यो हिता गव्या'। जीयतेऽनया ज्या। बाणासनम् । द्रुणा । अलि नः शिलीमुखः। भ्रमरः पट्पदो ज्ञेयो द्विरेफश्च मधुव्रतः ॥ ८२॥ . सप्त भृङ्ग । अलति मण्डयति पुष्पजातीः अलिः । मधुना बिभात्मानं भृङ्गः । ४"शृङ्ग- ५ भृङ्गाङ्गानि' एतेऽङ्गप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । शिलीसदृशं शिलासदृशं वा मुखमस्य शिलीमुखः । भ्रमन रीतीति निरुक्त्या भ्रमरः । "शकन्ध्यादयः"" शकन्धुप्रभृतीनाम् अकारस्य लोपो भवति । ग्रादिशब्दात् नकारस्य लोपः । उणादी "भ्रमु चलने" । भ्रमतीति भ्रमरः। "देविघटिनटिभ्रमिवासिभ्योऽरः" । पट् पदानि चरणा अस्य पट्पदः । हो रेफो यस्य द्विरेफः । मधु बतयति भुङ्क्ते मधुव्रतः । मधुकरः । पुष्पलिङ् । इन्दिन्दिरः । पट्चरणः । पडमिः । चञ्चरीकः । भसलः । रोलम्बः । देश्याम् । १० मौर्व्यादिप्रान्तमल्यादिकन्दर्पस्यैक्षवं धनु । इक्षार्विकार ऐक्षवम् । अलिमौवीं (कम्) । भृङ्गमौवीं (कम) । शिलीमुखमावी (कम्) । भ्रमरमौवीं (कम्) । पट्पदमौर्वी (कम्) द्विरेफौवीं (कम्) । मधुवतमौवीं (कम्) । अलिजीवा (वम्) । भृङ्गजीवा (वम्) । शिलीमुखजीवा (वम्) । भ्रमरजीवा (वम्) । पट्पदजीवा (वम्) । द्विरेफजीवा (वम्) । मधुव्रतजीवा (वम् । अलिगुणः (णम्)। भृङ्गगुणः (णम्) । शिलीमुखगुण: (णम्) भ्रमरगुणः (णम्) । १५ पटपदगुण: (णम्) । द्विरेफगुणः (णम्) । मधुव्रतगुणः (णम्) । अलिज्या (ज्यम्) । भृङ्गज्या (ज्यम्)। द्विरेफज्या (ज्यम्) । मधुव्रतज्या (ज्यम्) । इत्यादीनि कन्दर्पशिलीमुख (धनुः) नामानि ज्ञेयानि । हेतिरस्त्राऽयुधं शस्त्रम्- चत्वारः शस्त्रे । हिनोति अनया हेतिः । स्त्रियाम् । 1 °सातिहेतिजूतियूतयंश्च” । एते क्तिप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । अस्यते क्षिप्यतेऽनेनेति अस्त्रम् । श्रायुध्यतेऽनेन श्रायुधम् । उभयम् । २० शस्यतेऽनेन शस्त्रम् ।११ नीदाप्शसुयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदंशनहीं करणे"ष्ट्रन् । त्रमात्रः ।"व्यञ्जनम्१५" इति सपरगमनम् । ननु अस्येटप्रतिपेधाभावात् ट्रनि प्रत्यये इंडागमः कथं भवति । अागमशास्त्रमनित्यमिति वचनात् शसुधातोः ट्रनि प्रत्यये इट् न भवति । "युग्यं 13 पत्रे” इति ज्ञापकादेव (द्वा)। पुष्पाद्यस्त्रः स्मरो मतः ॥८३ ॥ पुष्पपर्यायतः अस्त्रपर्यायेषु शरपर्यायेषु तया चापपर्यायेष्वपि स्मरनामानि भवन्ति । पुष्प- १. गोभ्यो बाणेभ्यो हितेत्यर्थः । २. जिनाति जीयतेऽनया । "ज्या वयोहानो"। "अन्येप्वपि दृश्यते" इति डः। ३. अल भूपणादौ । सर्वधातुभ्य इन् । ४. का० उ० ११४८१ ५. का० सू० वृ० । ६. कातन्त्रोणादी नोपलब्धम् । ७. भ्रमरपदे रेफद्वयसत्त्वाद् द्विरेफः । ८. कन्दर्पस्य धनुरक्षवम् । इक्षुदण्ड- निर्मितम् । अत एव काम इक्षुधन्वेत्युच्यते । मौर्यादयः शब्दा अन्ते यत्य, अलिः अलिपर्याय श्रादौ यस्येशं तधनुरिति यथाश्रुतपाठार्थः । अस्मिन्नर्थे धनुर्विशेपणतया अलिमौर्वीकम् भृङ्गमौकिम् इत्यादि टीकायां वक्तव्यम् । वस्तुतस्तु मौयादिप्रोक्तमल्यादिरिति पाठो युक्तः । तत्र पदार्थयोजनाऽपि साधु संगच्छते । अल्यादिः कन्दर्पस्य मौर्व्यादि धनुश्च ऐक्षवम् इत्यर्थः । तदुक्तम्- "मौवी रोलम्बमाला धनुरथ विशिखाः कौसुमाः पुप्यकेतोः" इति साहित्यदर्पणे । टीकैपा तु यथाश्रुतपाठानुगामिनी । ६. "हि गतौ वृद्धौ च'। इयं व्युत्पत्तिरग्निशिखार्थे बोध्या । शस्त्रार्थे "हन् हिंसायाम्" हन्यतेऽनयेति सुवचम् । १०. का० सू.० . ४।५।७३ | ११. का० सू० ४।४।६१। व्यञ्जनमस्वरं परवर्णं नयेत्' । १२. का० स० १।१।२१॥ इति सकारत्य परगमनम् । १३. का० सू० ४/२।३३॥ । ।
नाममाला ४३ ५ हेतिः । पुष्पास्त्रः । पुष्पायुधः । पुष्पशस्त्रः । सुमनोहेतिः । सुमनोऽस्त्रः। सुमनश्रायुधः। सुमनश्शस्त्रः । लतान्तहेतिः । लतान्तास्त्रः । लतान्तायुधः । लतान्तशस्त्रः । प्रसवास्त्रः । प्रसवायुधः । प्रसवशस्त्रः । उद्ग- महेतिः । उद्गमायुधः । उद्गमशस्त्रः । प्रसूनहेतिः । प्रसूनास्त्रः । प्रसूनायुधः । प्रसूवशस्त्रः । कुसुमहेतिः । कुसुमात्रः । कुसुमायुधः । कुसुमशस्त्रः । इत्यादिकानि नामानि ज्ञातव्यानि । ध्वज पताका केतुश्च चिह्न तद्वैजयन्त्यपि । पञ्च पताकायाम् । 'ध्वजते (ति) धूयते ध्वजः । तथाऽमरसिंहे-"२ध्वजमस्त्रि याम् ।" ध्वजिश्च । पताकादण्डे ध्वज इत्यन्यः । पत्यते क्षिप्यते वातेन पताका। बलाकादयः 3-'बलाकापिनाक- पताकाश्यामाकशलाकाः" एते अकप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । पटाका च । स्त्रियाम् । कीयते सैन्यमनेन केतुः। ४केत्वादयः- “केत्वृतुक्रत्वाप्तुपीत्वेधतुवहतुजीवातवः” एते तुन्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । चह परिकल्कने । चयति ( अनेन) चिह्नम् । विजयतेऽनया वैजयन्ती । जयन्ती च । स्त्रीत्रोः । वैजयन्तः । जयन्तः । १० 'तत्तदन्तो झपाद्यादिः शम्भोर्विघ्नकरः स्मरः ॥ ८४ ॥ झषध्वजः । झषपताकः । झषकेतुः । झषचिह्नः । झषवैजयन्तिः । षडक्षीणध्वजः। पडक्षीण- पताकः। षडक्षीणकेतुः । षडक्षीणचिह्नः । षडक्षीण वैजयन्तिः। सफरध्वजः । सफरपताकः । सफर केतुः । सफरचिह्नः । सफरवैजयन्तिः । अनिमिषध्वजः । अनिमिपपताकः। अनिमिषकेतुः । अनिमिपचिह्नः । अनिमिपवैजयन्तिः ।तिमिध्वजः । तिमिपताकः । तिमिकेतुः । तिमिचिह्नः। तिमिवैजयन्तिः । मीनध्वजः । मीन- पताकः मीनकेतुः। मीनचिह्नः । मीनवैजयन्तिः । पाठीनध्वजः । पाठीनपताकः । पाठीनकेतुः । पाठीनचिह्नः । पाठीनवैजयन्तिः । शम्भोर्विघ्नकरः । हरविघ्नकरः । इत्यादीनि स्मरनामानि ज्ञातव्यानि । कौक्षेयकासिनिस्त्रिंशकृपाणाः करवालकः । तरवारिमण्डलाग्रं खड्गनामावलिं विदुः ॥ ८५ ॥ अष्टौ खड्गे । कुक्षौ भवः कौक्षेयकः । कौक्षेयः । अस्यते क्षिप्यतेऽसिः। निष्कान्तलिंशतोऽ २० डुलिभ्यो निस्त्रिंशः । तालव्यान्तः । शत्रून् हन्तुं कल्पते याचते कृपाणः । "कृपेः काण:' । करे वलते करवालः ११ करपालः । तरति (तरं) लवमानं वारि यत्रेति निरुक्त्या तरवारिः। मण्डलं वर्तलम यत्य तन्मण्डलायम् । खण्डति परमर्माण्यनेन खड्गः । “खण्डेगक" ' । स्त्रीत्रोः । ऋष्टिः । चन्द्रहासः । अक्षौहिणी बलानीकं वाहिनी साधनं चमूः । ध्वजिनी पृतना सेना सैन्यं दण्डो वरूथिनी ॥८६॥ द्वादश सेनायाम् । अक्षाणां रथानामूहिनी अक्षौहिणी। अक्षस्यौत्वमूहिन्याम:' अथवा धात्वर्थन साध्यते भाष्यका श्रीमदमरकीर्तिना । अशू व्याप्तौ । श्रश्नुते व्याप्नोतीति अक्षः । . वृतृ- - १६ ५:." श्रौत्वम् । - १. "ध्वज गतौ' । पचाद्यच् । २. श्रम० को० २।८।९९। ३.का० उ० ३।४०। ४. का० उ० १।२८। ५. विजयते विजयन्तः, विजयशाली पुरुषः । श्रोणादिको झच्प्रत्ययः । झत्वान्तादेशः । विजयन्तस्येयं पताका वैजयन्तीति । ६. ते ते ध्वजपाया अन्ते यत्य झपादिमानपर्यायवादी यल्प ईदृशस्तथा शम्भुविघ्नकरश्च स्मरः कामः। तेऽपि स्मरपायाः । तद्यथा झावजेत्यादि । ७. कुलकुति- जीवान्यः श्वाऽस्यलकारेषु" पासू० ४।२।२६। इति खगार्थे ढकञ् । ८. कृपां नुदति कृपाण इत्पति । ५. का उ० सू० ५।१७। १०. "वल वेष्टने'। ज्वलादित्वाप्णः । वलनं वालो वेष्टनम । फरे वालो पत्य, करेगा वल्यते वोभयमप्यन्यत्र । ११. का. उ० पू० ५।५२। १२. कासू० वृ० १२ १३. काउ०२० ४५ः।
४४ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता ५ वदिहनिमनिकम्यशिकप्रिभ्यः सः" स प्रत्ययः । "छशोध" | "पढोः कारसे" अक्प | "कपसंयोगे क्षः"। अक्ष इति जातः । ऊहनं ऊहः । अहो विद्यते यस्याः सा ऊहिनी । अक्षाणामूहिनी अक्षौहिणी । “समा. सान्तसमीपयोरसुवादेः” अस्यार्थः समासस्य यन्ते समासस्य समीपे च नकारस्य पूर्वपदस्यात् निमित्तात् (परस्य ) णो भवति वा । इदानीम् अक्षौहिणीप्रमाणं क्रियते । यद्भारतम्- ४४एको रथो गजश्चैको नराः पञ्च पदातयः । त्रयश्च तुरगास्तज्जैः पत्तिरित्यभिधीयते ।। पत्त्यंगैत्रिगुणः सर्वैः सर्वः क्रमादाख्या यथोत्तरम् । सेनामुखं गुल्मगणी वाहिनी पृतना चमूः ।। अनीकिनी" पत्तेस्त्रिगुणं सेनामुखम् | गजाः ३, रथाः ३, अश्वाः ९, पदातयः १५ इति सेनामुखम् । गताः ९, रथाः ६, अश्वाः २७, पदावयः ४५ इति गुल्मम् । गजाः २७, रथाः २७, अश्वाः ८१, पदातयः १३५, इति गणः । गजाः ८१, रथाः ८१, अश्वाः २४३, पदातयः ४०५ इति वाहिनी । गनाः २४३, रथाः २४३, अश्वाः ७२६, पदातयः १२१५, इति पृतना । गजाः ७२६, रथाः ७२६, अश्वाः २१८७, पदातयः ३६४५ इति चमूः । गजाः २१८७, रथाः २१८७, अश्वाः ६५६१, पदातयः १०९३५ इत्यनीकिनी । दशानी". १५ किन्योऽक्षौहिणी। गजाः २१८७०, रथाः २१८७०, अश्वाः ६५६१०, पदातयः १०९३५० । बलतं संवृणोति परभूमि बलम् । उभयम् । अनिति प्राणिति तूर्यस्वनैः न नीयते पराभयं वा अनीकम् । वाहा अश्वाः सन्त्यस्यां वाहिनी । साध्यते (अनेन ) साधनम् । परान् शत्रून् चमति ग्रसते चमूः । कृषि- चमितनिधनिवधिसजिखर्जिन्य ऊः।" चमुश्च । ध्वजाः सन्त्यस्यां ध्वजिनी । नायकं पिपर्ति पृतना । अङ्गैः सिनोति बध्नाति सेना | "सिनोतेन:"। सेनायाः स्वार्थे यणि सैन्यम् । दाम्यति दण्डः । वरूथो रथ- २० गुप्तिरस्त्यस्या वरूथिनी । पताकिनी । चक्रम् । अनीकिनी । 'गूढः । तन्त्रम् । कदनं समरं युद्धं संयुगं कलहं रणम् । संग्रामं सम्परायाजी संयदाहुमहाहवम् ॥ ८७ ॥ एकादश युद्धे । कद्यते कदनम् । समिति प्रतिविकला भवन्त्यत्र नराः समरम् । युध्यते. (त्रा) रिभियुद्धम् । भटाः संयुज्यन्ते मिलन्त्यत्र संयुगम् । कलं मधुरं वाक्यं हन्त्यत्र कलहः । रणन्ति २५ दुन्दुभयोऽत्र रणम् । संग्रस्यन्ते सत्वान्यनेनेति संग्रामः१०। पुंसि । संपरैति मृत्युरत्र सम्परायः। भटा अज्यन्ते क्षिप्यन्तेऽत्र श्राजिः । स्त्रीत्रोः । संयतन्तेऽत्र तान्तं संयत् । महाश्चासौ ग्राहवः११महाहवः । तम् आहुः -- - १. का० सू० ३।६।६०। २. का० सू. ३२८।४। ३. "कषयोगे क्षः"। का० रू० पू० २५६ सू० । ४. प्रथमः इलोको महाभारत उपलभ्यते । तस्योपलब्धिस्तु द्वितीयाध्याये पञ्चदशश्लोकत्वेन । इतरस्तत्र नोपलभ्यते। तत्र "एको रथः" इति श्लोकानन्तरम् - "पत्तिन्तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः । त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ त्रयो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रयः । स्मृता- स्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ॥ चमूस्तु पृतनास्तिनस्तितश्चम्बस्त्वनीकिनी । अनीकिनी दशगुणां प्राहुः सेनामुखं बुधाः ॥ इति । श्लो० १६, १७,१८ । ५. अभि. चि० रा४१३॥ ६. का० उ० सू० ११३१॥ ७. का० उ० सू० ६॥३६॥ ८. गृहशब्दस्य सेनार्थेऽन्यत्र प्रमाणं मृग्यम् । ९. "कद वैक्लव्ये" । कद्यते विक्लूयतेऽनेनास्मिन्वा । करणेऽधिकरणे वा ल्युट । १०. सङ्ग्राम युद्धे" । सङ्ग्रामयन्तेऽत्रेति । हेमचन्द्रः । सङ्गामणं सङ्गाम इति रामाश्रमः । ११. श्रादूयन्ते योद्धारोऽत्रेत्याहवः । - नाममाला ४५ ५ १ बुवन्ति । श्रायोधनम् । जन्यम् । प्रधनम् । प्रविदारणम् । मृद्यम् । आस्कन्दनम् । संख्यम् । समीकम् । अनीकम् | विग्रहः । समुदायः । अभ्यागमः । संस्फोटिः (टः)। समितिः। समित् । द्वन्द्वम् । सम्मदः । संगरः। गजो मतङ्गजो हस्ती वारणोऽनेकपः करी । दन्ती स्तम्बेरमः कुम्भी द्विरदेभमितङ्गमाः ॥८॥ शुण्डालः सामजो नागो मातङ्गः पुष्करी द्विपः । करेणुः सिन्धुरः- विंशतिर्गजे । गजति माद्यति गजः । अच् । मतङ्गाहर्जातो मतङ्गजः । सप्तमीपञ्चम्यन्ते जनेर्डः । हस्तो विद्यतेऽस्य हस्ती। "जातौ तु दन्तहस्ताभ्यां कराच्चैव इनेव हि । वारयति परान् शत्रून् वारणः । न एकेन पिबत्यनेकपः। करोऽत्यस्य करिन् । इदन्तोऽपि करिः । दन्तो विद्यतेऽस्य १० दन्ती। स्तम्वे तृणे रमते स्तम्वेरमः । "४स्तम्बकर्णयो रमिजपोः" खच् । कुम्भो विद्यते स्य कुम्भी । द्वौ रदौ यस्य द्विरदः । एति गच्छति शत्रुसम्मुखमितीभः । "इणो" वण्वत्" भप्रत्ययो भवति स च यण्वन् । मितं गच्छतीति मितङ्गमः । “गमेरच्" खप्रत्ययः । “हत्वा रुपोमोन्तः ।" शुण्डां लाति गृहातीति, शुण्डालः । साम्नः सामवेदाज्जातः सामजः। नगे पर्वते भवो नागः। मन्यते जनेन मातङ्गः । पुष्करं विद्यतेऽस्य पुष्करी । द्वाभ्यां पिबति द्विपः । करोति कार्य करेणुः । “हकृभ्यामेणुः"५: १५ आभ्यामेणुः प्रत्ययो भवति । स्यन्दते सवति मदं सिन्धुरः११ । दन्तावलः । पनी १२ । पीलुः । कालिङ्गः । तेषु यन्ता याता निपाद्यपि ॥८६॥ त्रयो हस्तिपके । यच्छतीति यन्ता। यातीति याता। निषीदति इत्येवंशीलो निपादी। गजयन्ता । गजयाता । हस्तियन्ता। हस्तियाता । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । अपिशब्दात्-अाधोरणः । हस्तिपः । हस्त्यारोहः । गजाजीवः । महामात्रः । नागाधरिः कण्ठी (ण्ठि) रखो मृगेन्द्रः केसरी हरिः । चत्वारः सिंहे । नागारिः। गजरिपुः । मतङ्गवैरी । हस्तिद्विट् । वारणवैरी । अनेकपसपत्नः । करिरिपुः । दन्तिवैरी । स्तम्वेरमरिपुः । क्वचिदृश्यते ईदृशः पाठः । कुम्भिवैरी । इभवैरी। मतङ्गशत्रुः । शुण्डालरिपुः । सामजद्वेषी । नागारिः । पुष्करिरिपुः । द्विपवैरी । करेणुरिपुः । सिन्धुरवैरी। इत्यादीनि पर्यायनामानि सिंहत्य ज्ञातव्यानि । कण्ठे रवो ध्वनियंत्य कराठीरवः । -- -- १. गजति माद्यति गर्जति वा गजः । २. का. सू० ५।३।११। ३. का० स० २।६।१५। वृत्तिः । ४. का० सू० ४।३।१६। ५. का० उ० सू० २।२६। ६. का. सू० ४।३। ४५। ७. का० सू० ४। ८. शुण्डास्त्यस्येत्यपि । 'प्राणिस्थादातो लजन्यतरत्याम्" पासू० ५।२।१६। इति मत्वर्थीयो लच्प्रत्ययः । ए. सामवेदो हि गीतपरः । तत्स्वरेण समाकृष्टा हस्तिनो बद्धा श्वभवन् । यद्धाचाहय जनपदे समानीताः गीतमूढा यतो बद्धतमानीताः । अत एव सामजा इत्युच्यन्ते । इति सातिः । प्रमाणान्तरमरि मृन्यम् । सामवेदमुचारयन् विधिर्गजान् ससर्ज । सान्ना तह जातत्वात्तामजा इति । १०. दा० उ० मा ! ११. स्यन्दधातोरकर्मकत्वात्स्वति मदमित्यर्थ चिन्तनीयः । १२. श्रम कल्पकोपः।५।१४४१ माला- "करी मतङ्गजः पद्मी सूर्पकों लतारसः" । इति । १६. छन्दो नङ्गनिया-न प्टिव इति पाठः प्रतिनानि । वर्णागमो गवेन्द्रादावित्येकारत्य इकार ईकारन विधेयः ।
५३ अमरकीतिविरचितभाप्यांपेना ""वागमो गवेन्द्रादी सिंह वर्णविपर्ययः । पोहशादी विकारस्तु वर्गानाशः पृपोदर ।। इत्यनेन एकारस्य ईकार: । मृगाणां चतुष्पदानां मध्ये इन्द्रः मृगेन्द्रः । कसराः म्यन्वयाः मन्यन्य कसरी । क्रमप्राने हरति 'हरिः । पञ्चाननः । हर्यनः । नवरायुधः । मृगरिपुः । सिंदः । व्यावश्चमूरः गाईल:- त्रयो व्या । व्याभित्रति प्राणान आदने व्यावः । चमति अत्ति परान चमूरः । परान. गाति हिनन्ति शार्दूलः । बीपी । पुण्डरीकः । तरः । चित्रकायः । मृगारिः । शरभोऽष्टापदोऽष्टपात् ।। ६० ॥ त्रयोऽयापदे । नाति दिनस्ति शरमः । "शालिगर्दिरामवलिबलिन्याभः" । अौ १. पदान्यत्य अष्टापदः । अटी पादा यस्यामा प्राप्टपात । क्रोडी वराहो दंष्ट्री च वृष्टिः पात्री च शूकरः । अष्टा ( प ) शुकरे । पल्वलं संक्रमति क्रोडः"। वरानाहन्ति वराहः । दंष्टाः सन्त्यस्य दंष्ट्री। घर्षतीति वृष्टिः । गृष्टिश्च । पृढ पबने । पृ । भा० । पूत्र पवने वा । है । उभयपदी । पूयतेऽनेनेति पोत्रम् ""हलशकरयाः पुवः" छन् । त्रमात्रः । नाम्यन्तगुणः । सि. न । पोत्रमत्यस्य पोत्रो । सृते प्रचुरा. २५ पत्यानि, वयति वर्धते वा पीनत्वन करः । शुकरश्च । दन्यतालव्यः । कोलः । किर: । किरिश्च । उष्टो मयः शृंखलिकः कलभः शीघ्रगामुकः ॥ ११ ॥ पञ्चोष्ट्रे । उप्यते दह्यते मरी उष्ट्रः । १० सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्” । मद्यते गच्छति मयः५५ । मयंते इत्येक | गृहलं बन्धनमस्य शृङ्खलिकः१२. 1 कं शिरो रभते उन्नमयतीति कलभः । करभश्च । शीन गञ्छतीति शीतगामुकः । दासरकः । दीर्घनदः । ग्रीवी । रवणः । धू प्राकोः (धूपकः)। कौलेयकः सारमेयो मण्डलः श्वा पुरोगतिः । जिह्वापो ग्रामशार्दूलः कुक्कुरो रात्रिजागरः ॥ ९२ ॥ नव सारमेयं । कुले गृह भवः कौलेयः५३ ( यकः ) । सरमाया अपत्यं सारमेयः । मण्डं लाति मण्डलः । चारादीन, श्वयति गच्छति श्या । श्वानोऽदन्तोऽपि । पुरो गच्छति पुरोगतिः (१४ जिवां शरीरं १. "पृषोदरादयः" इति शा० सू० २।२।१७२। कारिका । २. प्राणान् हरतील्येता- वानवान्यत्र । ३. यदवा शारयतीति शार् । किम् । दूयते इति दूलः । अन्तर्भावितणिजों दूङ् । शार चामा दूलचेति विग्रहः । 2, का०३०सू.० ३।१२। ५. "क्रुड घनत्वे" । क्रोडनं घनत्वं सोस्यास्तीति कोडः । "यश प्रायच्" इति रामाश्रमः । ६. वरमाहन्तीति, वर पाहारो यस्येति वा पृषोदरादित्वात् । ७, का०सू० ४६॥३२८. नुवं प्रसवं करोतीति । शुक्रोऽन्त्यस्य शुकरः खररोमत्वात् । शुकं राति वा । श इतिध्वनि रोति वा । १. वष्टि इच्छति काकिवृक्षादनं मरुभूमि वा इति उष्ट्रः । “सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्" इति का० उ० ४१२६। सूत्रे दुर्गसिंह:--"वश कान्ता" । वष्टाति उष्ट्रः करभः । अत्य ट्रन्नन्तस्य सम्प्रसारणं निपातना. पत्वं च" । इत्याह । १०. का००सू० ४।३१ । ११. मीनात्यहीन मयः । ''मीज हिंसायाम्" । पचाउच । इति वा । १२. शृङखलमस्य बन्धनं करमे" पा० सू० ५।२७९ । इति कन् । तेन शृङ्खलक इति साधुः । "न तु शृङ्गालकः काष्टमय ः स्यात्पादबन्धनैः” । इति अभि० चि० । १३."कुलकुक्षिग्रीवाभ्यः श्वाऽस्यलङ्कारेषु" पा० सू० ४।२।९६॥ इति श्वार्थ ढकन् । ११. जिद्दया रमनया पिवतीति विग्रहः सुवचः । निया शरीरं पातीत्यपि सम्भवति । २० नाममाला. ५ पाति रक्षति जितापः । ग्रामाणां शार्दूलो व्याघ्रः ग्रामशार्दूलः । कुक् शब्दं करोतीति कुक्कुरः१ । कुर् शब्दे । कुकुरश्च । रात्रौ जाग्रति रात्रिजागरः । लेड्वहः । वुक्कणः । भषणः । मृगदंशः । शालावृकः । हेम चाष्टापदं स्वर्ण कनकार्जुनकाञ्चनम् । सुवर्ण हिरण्यं भर्म जातरूपं च हाटकम् ॥ ६३ ॥ तपनीयं कलाधौतं कार्तस्वरशिलोद्भवम् । पञ्चदश स्वर्णे । हिनोति वर्धतेऽनेन हेमन् । नान्तम् । अदन्तं हेमं च । अष्टसु लोहेसु पदं प्रति- टाऽस्य श्रष्टापदम् । “अष्टनः२ संज्ञायाम्" इति दीर्घः । शोभनो वर्णोऽस्य स्वर्णम् । उकारलोपः। अथवा समासे वर्णस्य वा वलोपमाहुः। यथा पञ्चाणों मन्त्रः । कनति दीप्यते कनकम् । 'कनिचनिभ्यामक:3' । कनी दीप्तिकान्तिगतिपु । अर्ज सर्ज अर्जने । अर्जतीत्यर्जुनम् । 'ऋकृतृवृञ्यमि"- दार्जिन्य उनः" । काञ्चति शोभा बध्नाति काञ्चनम् । शोभनो वर्णो यस्य सुवर्णम् । उभयम् । पुण्यं जिहीते १० हिरण्यम् । अथवा अोहाक त्यागे । हीयते हिरण्यम् । “हो हिरश्च" अस्मादन्यः प्रत्ययो भवति हिरादेशश्च । भियते धार्यते नान्तम् भर्मन् । अदन्तं च भर्मम् । जातं रूपं यस्य जातरूपम् । क्लीवे । तथा च यशस्तिलके-"असङ्गस्पृहोऽपि जातरूपस्पृहः।" हटति हाटकम् । हट दीतो। अग्निना तप्यते तपनीयम् । कला धावति गच्छति कलधौतम्' । कृतस्वराकरे भवं कार्तस्वरम् । शिलायाः १५ पाषाणादुद्भवो यस्य शिलोद्भवम् । शातकुम्भम् । गाङ्ग यम् । कचुरम् । चामीकरम् । महारजतम् । • रक्मम् । रुम्मम् । जम्बूनदम् । कल्याणम् । गिरिकं । चन्द्रवसु च । रूप्यं रजतं गुलिका- त्रयो रूप्ये । रूप्यते जना मुह्यतेऽनेन रूप्यम्११। जनं रजति रजतम् । रज्यते हेम्ना रजतं वा । गुड रक्षायाम् । गुडति रक्षति आपदः सकाशाद् गुलिका । गुडिका च । कलाधौतम् । तारम् । सितम् । .दुर्वर्णम् । खजूरम् । श्वेतम् । शुक्तिज मौक्तिकं तथा ॥ १४ ॥ द्वौ मौक्तिके । शुक्त्या जलादियानोपकरणद्रव्यविशेषाज्जातम् शुक्तिजम् । मुक्तानां समूहो मौक्तिकम् । समूहेऽर्थे इकण् । वित्तं वस्तु वसु द्रव्यं स्वार्थ रा द्रविणं धनम्- कस्वरं २० । - दश धने । विन्दति पुण्यकृतं वित्तम् । धात्वर्थेन व्युत्पत्तिः क्रियतेऽमरकीर्तिना । 'विद्लु लामे । विद् । विद्यते स्म भुज्यते (स्म) वित्तम् । निष्ठात्ताः । “भित्तर्णवित्ताः१२ शकलाधमा भोगेपु” वित्तमिति । -- १. कुक् इति शब्दं कुरति उच्चारयतीति विग्रहः । दगुपधत्वात्प्रत्ययः । यद्रा कोयने ऽस्थ्यादिकमादत्ते कुक् । “कुक् श्रादाने" । किप् । कुरति शब्दायते कुरः । कुक् चासी कुरीति विग्रहः । २. पा. सू० ६।३।१२५ । ३. का. उ० सू० ३१४८ । ४. अर्यते पुप्यै रमुनन्। ५. पा. उ० सू० २।६०। ६. का० उ० सू० ३।३। ७. अमृतकरूपमित्यर्थः । अथवा प्रशस्तं जातं तकन: प्रशंसायां रूप प्रत्ययः । ८. सुदत्तमुनिवर्णने या०। ९. हाटकाकराभवत्वाद् वा हाकन । ... कला सुवर्ण कलिका धौता गता धावति गच्छति वा रत्मादिति कलधौतम् । ११. रूप रूपत्रिवायान्न । यतः ! मचा यत् । १२. का० सू० ४।६।११४॥
४८ अमरकोर्तिविरचितभाष्योपेता - निपातः । निपातस्येड् न भवति । "दादस्य' च" तो नो न भवति । वसति सुखमनेन वस्तु । "कमिर. मनिजनिवसिहिभ्यश्च" एभ्यस्तुन् प्रत्ययो भवति । वसति सुखमनेन वसु । "पव्य सिवसिहनिमनि- अपीन्दिकन्दिवन्निवाणिभ्यश्च” एभ्य एकादशभ्यः उः प्रत्ययो भवति । द्रूयते गम्यते द्रव्यम् । परं स्यति अन्तं नयति अथवा पुण्यं स्वनति स्वः स्वम् । उभयम् । पुण्यकृतमिति अर्थम् । गुणान् राति । ५ "राते"ः ।" स्त्रीत्रोः । द्रूयते गम्यते द्रविणम् । दधाति धारयति सारत्वं धनम् । कश गतौ । कशतीत्येवं शीलं कस्वरम् । “६कसिपिसिथातीशस्थाप्रमदां च" वरप्रत्ययः । झुग्नं । सारम् । स्वापतेयम् । . क्थम् । रिक्थम् । हिरण्यम् । विभवः । तत्पतिं प्राहुः कुवेरं चैकपिङ्गलम् ॥ १५ ॥ वैश्रवणं राजराजमुत्तराशापति तथा । अलकानिलयं श्रीदं धनपर्यायदायकम् ॥६६॥ सत कुवेरे । तस्य पतिः तत्पतिः तं कुरं प्राहुब वन्ति । वित्तपतिः । वसुपतिः । वस्तुपतिः । द्रव्यपतिः । स्वपतिः । अर्थपतिः । रा(रे)पतिः । द्रविणपतिः । धनपतिः । कस्वरपतिः । इत्यादिपर्यायनामानि कुवेरस्य ज्ञातव्यानि । कुत्सितो वेरो देहः कुब्जत्वाद्यस्य स कुवेरः । पिङ्गलैकनेत्रत्वादेकपिङ्गलः । विश्र- वसोऽपत्यमणि शिवादित्वात् । णादेशो वैश्रवणः । राज्ञां यक्षाणां राना राजराजः। उत्तराशायाः पतिः १५ उत्तराशापतिः । अलका निलयो गृहं यस्य अलकानिलयः । श्रियं दयते श्रीदः । धनपर्यायदायकः । धनदायकः । धनदः । वित्तदायकः। वित्तदः। वसुदायकः । वसुदः । द्रव्यदायकः । द्रव्यदः । स्वदायकः ।। स्वदः । रैदायकः । रैदः । द्रविणदायकः । द्रविणदः । कस्वरदायकः । कस्वरदः । राष्ट्रं जनपदो निगों जनान्तो विपयः स्मृतः ।। पञ्च जनपदे । राजते राष्ट्रम् । तथा च सोमनीती-“पशुधान्यहिरण्यसंपदा राजते शोभते इति राष्ट्रम्” । जनी प्रादुर्भावे । जन् । जायते कश्चित्तमन्ये प्रयुञ्जते ।"धातोश्च हेतौ"इन् प्रत्ययः । अस्योप० दीर्घः । जानिरिति जातम् । 'जनिवध्योश्च" ह्रस्वः । जनि जातम् । जनयन्ति प्रजां धनमिति जनाः । “अच् पचादिभ्यः'अच् प्रत्ययः । 'कारितस्याना०५१"कारितलोपः । पद गतौ । पद्।जनैर्वर्णाश्रम- लक्षणैः पद्यते गम्यते प्राप्यते पाश्रीयत इति जनपदः ।"अच् पचादेः१२"अच् प्रत्ययः । जनपद इति जातः । तथा च सोमनीतौ-१३जनस्य वर्णाश्रमलक्षणस्य द्रव्योत्पत्तेर्वा स्थानमिति जनपदः । निर्गम्यते यस्मिन्निति निर्गः । “निगी १४ देशेऽधिकरणे'' इति डप्रत्ययः । देशादन्यत्र-निर्गम्यते यस्मिन्निति निर्गमनो गिरिः । जनानामन्तो निकटे जतान्तः । पिन बन्धने । “धात्वादेः१५ पः सः" सि० विपू० । विषिण्वन्ति अस्मिन्निति विपयः । "पुंसि संज्ञायां ६ घः 'नाम्यं० १७.” गुणः । “ए१८ अय्" तथा । च सोमनीतो- विविधवस्तुप्रदानेन स्वामिनः सद्मनि गजान नृवाजिनश्च सिनोति बध्नातीति विपयः ।" पू: पुरी नगरं चैव पट्टनं पुटभेदनम् ॥ १७ ॥ २५ -- १. का० सू० ४।६।१०२। २. का० उ० सू० ११२७। ३. का० उ. सू० ११६। ४. "पोऽन्त- कर्मणि" । वप्रत्ययः । "स्वन शब्दे" उप्रत्ययो वा । ५. का० उ० सू० २।२७। ६. का० सू० ४।४।५७) ७. जन० समु० १। ८. का० सू० ३।२।१०। ९. का० सू० ३।४।६७। १०. का० सू० ४।२।५८। ११. का स्० ३।६।४४। १२. घार्थे कविधानम्, पुंसि संज्ञायां घः इति कर्मणि कप्रत्ययो घप्रत्ययो वा वक्तव्यः । न तु पचायच; तस्य कर्तरि विधानात् । १३.जन० समु० ५। १४.हे०२० ५।१।१३३॥ १५.का०सू० ३।८।२४। ' १६. का० सू० ४/५/६६। १७. का० सू० ४/५/११ १८. का० सू० श२।१२।१६. जन० समु०३ ।
नाममाला ४१ । षट् (पञ्च) नगरे । पृ पालनपूरणयोः । पृ । ० । पृणातीत्येवंशीला पूः । ""क्विन्भ्राजिपृधुर्वि- भासाम्" किप । “२उरोष्ठयोपधस्य च' उर् । पुर् जातम् । “3नामिनोर्वोर०” पूर् । वेर्लोपः । सिः । "व्यञ्जनाच"" सिलोपः । ॥६रेफसोर्विसर्जनीयः" रस्य विसर्गः । पूः । अदन्तः । पुरं पुरी च । इदन्तोऽपि पुरिः । नगाः सन्त्यत्र, ग्राम्यत्वं नश्यत्यत्र वा नगरम् । क्लीवे । नगरी च । नानादिग्देशागतानां वणिजां भाण्डानि पतन्त्यत्र पत्तनम् । पट्टनं च । अत्र स्मृतिभेदः "पट्टनं शकटैगम्यं घोटकनौं भिरेव वा। नौभिरेव तु यद्गम्यं पत्तनं तत्प्रचक्षते ॥" पुटा वासा भिद्यन्तेऽत्र पुटभेदनम् । क्लीवे । अधिष्ठानम् । निगमः । द्रङ्गः । स्थानीयम् । वक्त्रं लपनमास्यं च वदनं मुखमाननम् । षण्मुखे । वच परिभाषणे । उच्यतेऽनेन वक्त्रम् । “सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्" । रप लप जल्प व्यक्तायां १० वाचि। लप्यतेऽनेन लपनम् । युट् । अत्यतेऽस्मिन्नास्यम्'। '१°कृत्यल्युटो बहुल''मिति ण्यच् । वद व्यक्तायां वाचि । उद्यतेऽनेन वदनम् । महति मुह्यति स्तोत्रेण वा मुखम् ११ । खन्यते वा मुखम् । उणादौ । सुख दुःख तक्रियाम् । चौरादिकत्वादिन् । सुखयति अन्नादिखादनेनेति मुखम् । "सुखेः१२ को मुखिश्च” । सुखेः कः प्रत्ययो भवति धातोर्मुखिश्च । इकार उच्चारणार्थः । श्रा अनिति श्वसित्यनेन आननन् । तुण्डम् । श्रवणं श्रोत्रं श्रवश्चापि कर्णं चैव श्रुति विदुः ॥ १८ ॥ १५ पञ्च कर्णे । श्रूयतेऽनेन श्रवणम् । श्रूयतेऽनेन श्रोत्रम् । क्लीवे । शृणोत्यनेन सान्तम् श्रवः । क्लीवे । करोति शब्दावधानं कर्णः१३ । कर्णयति वा कर्णः । छिद्रः कर्णभेदे । श्रूयतेऽनया श्रुतिः । स्त्रियाम् । विदुः कथयन्ति । दृगक्षि चक्षुर्नयनं दृष्टिनेंत्रं विलोचनम् । सप्त नेत्रे । दृश्यतेऽनया दृक् । तालव्यान्तः । अशू व्याप्तौ । अश्नुते व्याप्नोत्यनेनात्मा घटादीन- २० निति अक्षि । “१४अशिकुषिभ्यां सिक्” । चष्टे हृदयाकूतं सान्तम् चक्षुः । ॥५"पृवपिचक्षिजीव- तनिधनिभ्य उस्" । नीयते चित्तं विषयेषु अनेन नयनम् । दृश्यते प्रकटार्थोऽनया दृष्टिः । नीयतेऽनेन दृश्यं नेत्रम् । उभयम् । विशेषेण लोच्यते अवलोक्यतेऽनेन विलोचनम् । अक्षम् । तारका । ज्योतिः । कटाक्षं केकरापाङ्गं विभ्रमस्तस्य वैकृतम् ॥ ६६ ॥ तस्य नेत्रस्य वैकृते पट (पञ्च )। कटयतीति १६कटाक्षम् । उभयम् । के (शिरसि ) २५ । १. का० सू० ४।४।५७। २. का०सू० १३:५।४३ । कारस्योत्वम् । ३. का०सू० ३।८।१४इति दीर्घः । ४. का० सू० ४।११३४। ५. का० सू० २।११४६। ६. का० सू० २।३१६३। ७. "नगपांमु- पाण्डुभ्यश्चेति" पा० सू० ५।२।१०७। वार्तिकेन मत्वर्थीयो रः । अथवा नश् धातोरोणादिकोडरमत्ययः शस्य गत्वे च । ८. का० उ० सू० ४।३१। ९. श्रास्यन्दतेऽम्लादिना प्रस्रवत्यत्रेति । १०. "कृत्यल्युटो:- न्यत्रापि" इति का० सूत्रम् । ४।५।९२। टीकोक्तयथाश्रुतसूत्रन्तु पाणिनीयम् ३।३।१९३। ११. सन्यतेऽ. वदार्यते फलादिकमनेनेत्यपि ! “दित्खनेर्मुट चोदात्तः" उ० अच् स च डित् मुडागमश्चेत्यन्यत्र । "मुदि- तानि खानीन्द्रियाण्यवेत्येके" इति क्षीर० स्वा० । १२. का.उ.सू० ६।६५। १६. टीकोतविग्रह करीतरोगा- दिको प्रत्ययः । कीर्यते शब्दग्रहणाय क्षिप्यते, कीर्यते शब्दोऽस्मिनिति वा, किरति शरीरे सुखमिति वा : १४. का० उ० सू० ६।५७) १५. का० उ० सू० २१४६। १६. कटेऽतिशयितेऽक्षिणी यत्र, कटं गडनदलि व्याप्नोति चेति रामानमः । कटे आक्षिपतीति क्षीरस्वा० ।
५० अमरकीतिविरचितभाप्योपता - - किरति विक्षेपं क्षिपतीति (कर्पतीति) केकरः । न पाति कामिनमपाङ्गः' 1 टभयम् । विभ्रमणं विभ्रमः। विकृतस्य भावो वैकृतम् । दन्तवासोऽधरोऽप्योप्ठे वर्णितो दशनच्छदः । चत्वारश्चतुर्थे अोष्टं । दन्तानां वासी दन्तवासः । अति शोभामधरः । "धो भवी घरी ५ या । श्रोष्ठाभ्यां सहितावरी वा । अपरोऽप्योष्टमाने वर्तते"। उपति दहति सपानीहृदयमोष्टः। उप्यते तीक्ष्णाहारेणोप्टो वा । वर्णितः कथितः । दशनत्य छदो दशनच्छदः । शिरोघरो गलो ग्रीवा कण्ठश्च धमनी घमः ।। १०० ।। पड़ गले । शिरो धरति शिरोधरः । शिरोधरा च । गलति भोजनं गलः । गृणाति गिति वा ग्रीवा । उणादी गशब्द गणातीति ग्रीवा । "शर्वजिहाग्रीवा:४" एते कप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । कति १० कराटः । "कर्णष्ठः "" अस्माप्रत्ययो भवति । धमः सौत्रो धातुः । धम्यतेऽनया धमनिः । इदन्तः । स्त्रियामीः । धमनी । धमति धमः । मन्या । कन्धरा । दोपा च भुजो बाहुः- चत्वारो बाही । दम्यते विनीयते परोऽनेन दोः। सान्तम् । “दमेडोस्" । दूषयति दुष्टं या इति दोपा । श्रादन्तः । अव्ययः । न व्ययते । भुल्यतेऽनेन भुजः । निपातनात् चजोः कगत्वं न भवति । नामिन १५ इति गुणश्च न भवति । "भुजन्युजी' पाणिरोगयोः' इत्यस्मिन्नर्थे निपातनात् । भुजा च । वइत्यनेनेति वाहुः । "बहिस्वदि (रहि) तलि पंशिभ्य उण" । प्रकोष्ठः । पाणिहस्तः ': करस्तथा । त्रयो हस्ते । पणायते व्यवहरत्यनेन पाणिः । अनिजन्यतिरशिपणिभ्यः" एभ्य इल भवति । हसते हस्तः । हसेस्तः । कीर्यते क्षिप्यतेऽनेन करः । शयः। शम इत्यन्यः । पञ्चशाखः । ग्राहुर्बाहुशिरोंऽसश्च- बाहुशिरसोः अंस इति संज्ञां प्राहुः कथयन्ति । अस्यते भारेणांसः१२ हस्तशाखा कराङ्गुलिः ॥ १०१ ।। द्वौ अगुल्याम् । हस्तस्य शाखा इव हस्तशाखा । श्राकुञ्चनादिकर्माणि अङ्गति गति अङ्गुलम् । स्त्रीक्लीवे । अङ्गुली । करस्या करस्याङ्गुलिः कराङ्गुलिः । एवमगुरम् । अगुरी । नासा घ्राणम्- २५ १. अपाङ्गतीत्यपाङ्गः । "अगि गती"। अच् । २."अधो भवः" इत्यारभ्य "वर्तते" इत्यन्तं क्षीर- स्वामिभाष्यमत्रोद्धृतम् । तद्भाप्ये "श्रोष्टाघरौ तु" इत्यमरोक्तमूलपदत्य व्याख्यारूपम् "पोष्ठाभ्यां सहितावघरौ” इति वाक्यमन्धानुसरणेनात्रोद्धृतमप्रस्तुतमिति विवेकः । ३. दन्ताश्छाद्यन्तेऽनेनेति तदाशयः । पुंसि संज्ञायां घः । ४. का० उ० सू० २।२। ५. का० उ० स० ११४२। ६. का० उ० सू० २१३११ ७. का० सू. ४१६/६४। ८. का० उ० सू० ११३ । ६. का० उ० स्.० ४।६। १०. का० उ० १०.४४२७/ "भृगुवा- हत्यमिदमिलूपूभ्यस्तः" इति पूर्ण सूत्रम् । ११. अत्र प्रमाणम्-"पाणिः शयः शमो हस्तः" इत्यमरमाला । "पञ्चशाखः शयः शमः" इति अभि० चिः । १२. अस्यते समाहन्यते इत्यर्थः । “धेस समाघाते" | अंस धातुश्रुरादिः । यद्वा "श्रम गतौ" श्रमति अम्यते वा अंसः । श्रोणादिकः सन्प्रत्ययः । १३. अङ्गुल इत्यत्र "अङ्गलः” का० उ० सू० ६।४८इत्यङ्गधातोक्लप्रत्ययः । श्रङ्गुलिशब्द नु "अङ्गयतिभ्यामुलीथि' का० 1201 इत्यालिप्रत्ययः । त्रियामी: । शकली दति। २० स्कन्धश्च । 13 - - नाममाला द्वौ नासिकायाम् । नासते शब्दायते नास्यतेऽनया वा नासा । नेस्नाः च । जिघ्रत्यनेन घ्राणम् । क्लीवे । सिङ्घनी । नासिका । घोणा। उरो वक्षः ... ५ - । १० द्वौ भुजमध्ये । अर्यते गम्यते उरः3 | ४"अर्तेरुश्च" अस्मादसुन्प्रत्ययो भवति अस्य उरादेशी भवति । ऋ गतौ । अस्य धातोः प्रयोगः । वक्ति वाणी वक्षः। "वचेः सोऽन्तश्च" अस्मादसन् प्रत्ययो भवति सोऽन्तः । अकार उच्चारणार्थः । ६चवर्गस्य किः । “७निमित्तादि" त्यादिना पत्वं च । कुक्षिः स्याजठरोदरम् । त्रयो जठरे। कुषति (कुष्णाति ) निष्कर्षत्याहारं कुक्षिः | पुसि । कुक्षम् । क्लीवे । जमति जठरम् । अथवा जठ सौत्रोऽयं धातुः । उणादौ निपातोऽस्ति । उनत्ति क्लेदयत्याहारमुदरम् । एते उभयम् । पिचण्डम् । तुन्दम् । स्तनः पयोधरकुचौ वक्षोज इति वर्णितः ॥ १०२ । चत्वारः कुक्षौ । स्तन्यते बालैः 'स्तनः । पयो धरतीति पयोधरः१० । कोचते स्त्री मृद्य- मानेऽत्र, कुच्यते मर्दनेन आकुलीक्रियते वा कुचः । कूचश्च । वक्षसि जातो वक्षोजः । उरसिजः । वक्षोरुहः । कटिनितम्बं श्रोणी च जघनं- चत्वारः कस्याम् | कटयते वस्त्रैराच्छाद्यते कटिः । कटी । कटः । कटम् । नितरामतिशयेन तम्यते काक्ष्यते ११नितम्वः। श्राश्रीयते कामिभिः श्रोणः। नदादित्वादी। श्रोणी । इदन्तोऽपि श्रोणिः २। स्त्रियामीः । श्रोणी। हन्ति चित्तमिति जघनम् । "१३हने पश्च" । चकारात् काञ्चीपदम् । कलत्रम् । कडनम् । जघनम् । ककुद्मती । आरोहः । कटीरम् । त्रिकस्थानकम् । स्थानपदाभावेऽपि त्रिकम् । फलकं च । जानु जहु च । द्वौ जानौ । गन्तुजायते जानुः१४ । १५"कृवापाजिमिस्वदिसाघ्यशूटसनिजनिचरिचटिभ्य उण्” । जहाति १६जद्दुः । अष्ठीवान् । जङ्घा चलनं चरणं पादं क्रमोऽहिश्च पदं विदुः ॥ १०३ ॥ १. "णास शब्दे" । नास् धातुः । अच् धञ् वा । २. नेदमतोऽन्यत्र समुपलब्धम् । ३. अर्यने गम्यते बलेनेति शेषः । अथवा उरस् चलार्थः कण्ड्वादिः । उरस्यति बलमाधत्ते उरः । किम् । ४. काल उ० सू० ४।६७। ५. का०उ०सू० ४।६२। ६. का०सू० ३।६।५५। “चवर्गस्य किरसवर्णे" । इति पूर्ण सूत्रम् । ७. का० सू० ३।८।२६। "निमित्तात्प्रत्ययविकारागमस्थः सः षत्वम्" इति पूर्ण सूत्रम् । ८. "कुप निष्क" "अशिकुषिभ्यां सिक्" का उ०सू० ६१५७। ६. "स्तन गदी शब्दे" स्तनति कथयति यौवनोदयम् । स्तन्य- ते वर्ण्यते कामुकैर्वा स्तन इत्यन्यत्र । १०. धरतीति धरः । पचायच् । पयसो धरः पयोधरः । इति बोध्यम् । टीकोक्तविग्रहे तु कर्मण्यणि पयोधार इति स्यात् । “११. तम्ब गतौ" नितम्बति गच्छृतीति, निभृतं तन्यते कामुकैः निभृतं ताम्यति सुरतसम्मर्दाद्वा नितम्ब इति रामाश्रमः । १२. श्रूयते किरिणिध्वनिरत्र "शु अवस" श्रोणादिको णिः । इति हेमचन्द्रः । "श्रोण सङ्घाते" श्रोणति विविधशरीरावयवैः तड्यातीभवतीति श्रोणिः । 'सर्वधातुभ्य इन्” इति रामाश्रमः । १३. का. उ० सू० २।३७। १४. जायते ऽनेनानादि जानुरिति हेमचन्द्रः । १५. का उ०पू० १११॥ १६. नात्र कोषान्तरप्रमाणमुपलब्धम् । १७. यद्यपि जानोरथ आगुल्कान्तं जहा, जहाजघनयोः सन्धिर्जानुरिति भेदः । तथापि जहागमीयाद भेदाविवदया बानु- पीयो जोत्युक्तम् । तत्र भेदस्तु न विस्मत्तव्यः । २० ५२ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता नाहताः पट् चरणे । चाल्यते चलनम्' । चरत्यनेन चरणम् । पद्यतेऽनेन पादः । पञ् । दान्तोऽपि पाद् । 'क्रमु पाद विक्षेपे' । क्राम्यत्यनेनेति क्रमः । 'अहि गताः । इदनुबन्धत्वान्नागमः : अंहत्यनेनेत्यहिः । "२हेरिः" अंहेर्धातोरिप्रत्ययो भवति । अनिश्च । पद्यते पदम् । क्लीवे | शिरो मूर्वोत्तमाग कम्- चत्वारो मस्तके | 2 हिंसायाम् । शीर्यते हिंस्यते शिरः । “उपिरंजिश यी यावत्" एभ्योऽसन् प्रत्ययो भवति स च यण्वत् । तेनागुणः । अनुपडलोपः । 'मूर्छा मोहसमुन्टाययोः ।' मूर्छन्त्य- प्राणिनो मूर्धा । "पृपादयः--"पूपनअर्यमन्मनन्नुक्षन्ट्वन्सीहन्मातरिश्वन्क्लेदनस्नेहन्- मूर्धन्यूपन्” एते कन्यन्ता निपात्यन्ते । उत्तमं च तद् अङ्गम् उत्तमाद्गम् । के गै शब्दे | कायतीति कम् । शीम् । मस्तकः । "कन्याङ्ग च नानार्थे । १० प्रारभ्यं प्रेरितेरितम् । त्रयः प्रेरणे । प्रारभ्यते प्रारभ्यम् । शकिसहिपवर्गान्ताच्च" यः प्रत्ययः। ईर गती कम्पने च । प्रेर्यते प्रेरितम् । ईरितम् । "नपुंसके भाव क्तः" । साम्प्रतं सरस्वतीनामानि प्रारभ्यन्ते याचार्य श्रीमदमरकीर्तिना- वाग्वचो वचनं वाणी भारती गीः सरस्वती ॥ १०४ ॥ १५ सप्त वाण्याम् । उच्यते वाक् । "वचिपच्छिश्रिद्रुश्रुग्रुज्यां किब दीर्घश्च" एभ्यः विप् प्रत्ययो भवति दीर्वश्चरवरस्यै पाम् । वक्ति वचः । “सर्वधातुभ्योऽसन्” । उच्यते वचनम् । वाण्यते वाणि: । स्त्रियामीः। वाणी । विभर्ति जगद् धारयति, भरतो ब्रह्मा तस्येयं भारती । तथा च- "आत्मनि मोक्षे ज्ञाने वृत्तौ ताते च भरतराजस्य । ब्रह्मेति गीः प्रगीता न चापरो विद्यते ब्रह्मा ।।" गीर्यते उच्चार्यते रान्तं गीः । सरः प्रसरणमस्तस्याः सरस्वतीः। ब्राह्मी । तथाहि- "गोर्गौः कामदुधा सम्यक् प्रयुक्ता मर्यते बुधैः । दुष्प्रयुक्ता पुनर्गोवं प्रयोक्तः सैव शंसति ।।" सिंहद्विपघने गर्ज:- सिंहे कण्ठीरवे, द्विपे गजे, घने मेवे च गर्ज कथ्यते । गर्जनं गर्जः । २५ हेपाऽश्वे अश्वानां शब्दे हेपा । हेपणम् । हेपा हेपा च । बृंहितं गजे। गजशब्दे वृहितम् । वहणम् । स्फीत्कृतं धेनुकलभे- २० १ शब्दः १. चलत्यनेनेति चलनमिति सुवचः । २. अत्राभिधानचिन्तामणिः प्रमाणम् -"चरणः नमः पादः पदोंऽहिश्चलनः क्रमः" । इति । ३।२८० ३. का० उ० सू० ४१५९। ४. का०3० सू० २।५। ५. अत्र प्रमाणान्तराभावः । वराङ्ग कमनीयाङ्गमिति वा स्यात् । ६. का०सू० ४।२।११। ७. का उ०० २२३। ८. उच्यते वच 'इति कर्मणि विग्रहो युक्तः । ९. का० उ० सू० ४१५६। .१०. “यण शब्द" चुरादिः । ११. सिंहगजमेघध्वनो गर्जशब्दः प्रयुज्यते । एवं वक्ष्यमाणतत्तद्ध्वनौ सर्वत्र योज्यम् ।
नाममाला ५३ १० १५ धेनुकलभे शिशुवत्से स्फीत्कृतं स्फीत् शब्दः कथ्यते । स्तमितं जलदे तथा ॥ १०५॥ जलदे मेवे मेघानां शब्द स्तनितं कथ्यते । स्तन्यते स्तनितम् । स्यन्दने चीत्कृतं मन्त्रे सटे च हुङ्क्तं तथा । स्यन्दने रथशव्दे चीत्कृतं कथ्यते । मन्त्रे भटे च हुशब्दः कथ्यते । हुं मन्त्रे, हुं परिप्रश्ने हुं सत्त्वं सुष्टु ते भयादौ राक्षसोऽयम् । कुत्सने हुं निर्लजा । अनिच्छायाम् हुं हुं मुञ्च । सीत्कृतं मणितं कामे- कामे कन्दर्पभोगप्रस्तावशब्दे सीत्कृतं मणितम् । सीक्रियते सीत्कृतम् । मण्यते मणितम् । खन्कृतं शृङ्खलायुधे ॥ १०६ ।। शृङ्खलाऽयुधे खस्कृतम् । सुगमम् । मञ्जीरकं तुलाकोटिर्नू पुरं- त्रयः स्त्रीणां चरणाभरणे । मञ्जिः सत्रः । मञ्जत्याकर्पति चितं मक्षीरम् । अथवा मञ्जु मधुर- नीरयति मञ्जीरम् । तुलाकृतेर्जङ्घाया कोटिरिव तुलाकोटिः । स्त्रीगतिं नौतीति नूपुरम् । शिजिनी । पादकटकः । हंसकम् । पदाङ्गदम् । कलापो नानार्थे । तत्र संसृतम् । तत्र तस्मिन् मञ्जीरके तच्छन्दे संसृतं कथ्यते । झाङ्कृतं चाथ मरुति- मरुति वायौ तच्छन्द झाकृतं कथ्यते । क्रेकृतं क्रौञ्चहंसयोः ।। १०७ ॥ क्रौञ्चश्व हंसश्च क्रौञ्चहंसौ तयोः क्रौञ्चहंसयोः कृतशब्दो मतः कथितः । तथा चामरसिंहः- "निषादर्पभगान्धारषड्जमध्यमधैवताः । पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्रीकण्ठोत्थिताः स्वराः॥" तथा च भरतनाटके- ६ "पड्जं मयूग ब्रुवते गावस्त्वृषभभाषिणः । आजाविकं तु गान्धार क्रौञ्चः कणति मध्यमम् ।। पुष्पसाधारणे काले पिकः कूजति पञ्चमम् । धैवतं हेषते बाजी निपादं वृहते गजः ।। नासाकण्ठमुरस्तालुजिह्वादन्तांश्च संस्पृशन् । षड्भ्यः संजायते यस्मात्तस्मात्पड्ज इति स्मृतः ॥" १. नवप्रसूता गौ धेनुः त्रिंशदब्दो हस्तिशावकः कलभस्तयोः शब्दः सीत्कृतमुच्यते दति शब्दार्थः। टीकास्वारस्यन्तु गोवत्सशब्दः स्कीकृतमित्येव प्रतिभाति । अत्र कोशान्तरप्रमाणानावाकवि- प्रयोगादर्शनाच मूलशब्दार्थाऽनुसरणमेव शरणम् । २. तुला तुलया वा कोट्यति । कुट प्रतापने चुरादिः । श्रच इः । यहा तुलाकारः कोटिरममस्येति रामाश्रमः । ३. नुवन नूयते वा नः । सुन्तयने । सिन् ! नुवि पुरति नूपुरम् । पुर अग्रगमने। गुपधेति कः । ४. शब्दभेदप्रताद् अन्यान्तरोत मन्पशब्दभेट स्वरभेदं चाह । ५. अम० को० ११७१। ६. "पड्ज" इत्यारन्य "इति तः" इत्पन्तः "तथा व भरतनाटके" इत्येवं टीकायामुपन्यत्तः पाठः “निपादर्पभगान्धार"--इति तीरत्वानिमामोऽविकल उपलभ्यते । २० अमरकीतिविरचितभाष्यापेता १० प्रतीतं संस्तुतं लब्धं दृष्टं परिचितं स्मृतम् । पट् स्मृते । प्रतीयते प्रतीतम् । ष्टुञ् स्तुतौ । ष्टु । "धात्वादेः पः सः।" स्तुः सम्पूर्वः । सम्यक्- प्रकारेण स्तूयते स्म संस्तुतम् । लभ्यते स्म लब्धम् । परिचीयते स्म परिचितम् । स्मर्यते स्म स्मृतम् । संस्थितं दशमीस्थं च परासुं च मृतं विदुः ॥ १०८ ।। ५ चत्वारो मृते । संतिष्ठते स्म संस्थितः । सम्पूर्वकस्तिष्ठतिः । दशमी तिष्ठतीति दश- मोस्थः । तथा च-- "प्रथमे जायते चिन्ता द्वितीये द्रष्टुमिच्छति । तृतीये दीर्घनिःश्वासश्चतुर्थे भजते ज्वरम् ।। पञ्चमे दह्यते गात्रं पण्ठे भुक्तं न रोचते । सप्तमे स्यान्महामूर्छा उन्मत्तत्वमथाष्टमे ।। नवमे प्राणसन्देहो दशमे मुच्यतेऽसुभिः । एतैर्वर्गः समाकान्तो जीवस्तत्त्वं न पश्यति ।)" दशानां पूरणी दशमी तत्र तिष्ठतीति वा दशमीस्थः । परागता असवोऽस्य परास्नुः । म्रियते स्म मृतं विदुः कथयन्ति । खेदो द्वेपोऽप्यमर्पश्च रुटकोपक्रोधमन्यवः । १५ सप्त क्रोधे । खिद परिघाते । तुदादौ खिन्दति । दैन्ये रुधादिपाठात् खिन्ते (ततः खेदनं ) 'खेदः । भावे घञ्प्रत्ययः । द्विप अप्रीतौ अदादौ । द्वेपणं वेपः । मृप तितिक्षायाम् । चुरादौ । शक मृप क्षमायाम् । दिवादी विभापितः । मृणु सहने भ्वादौ परस्मैपदी । अमर्पणम् अमर्पः । कुप क्रुध रुष रोपे । रोषणं रुट । सम्पदादित्वावे क्विप् । कोपनं कोपः। क्रोधनं क्रोधः । मन ज्ञाने । मन्यते मन्युः । “3जनिमनिदसिभ्यो युः" । एभ्यो युप्रत्ययो भवति। उणादित्वाद्योरनादेशो न भवति । हर्पः प्रमोदः प्रमदो मुक्तोपानन्दमुत्सवः ॥१०६।। सप्त हर्ष । हर्पणं हर्पः । प्रहर्पश्च । प्रमोदनं प्रमोदः । मदी हर्षे । प्रमदनं प्रमदः । ४मदेः प्रसमोह" प्रसमोरुपपदयोर्मदेरल् भवति हर्थेि । मोदनं मुद् दान्तः स्त्रियाम् । तुप तुष्टौ । तोषणं तोपः । अानन्दनम् आनन्दः । पुसि । टुनदि समृद्धौ । उत्सवनम् उत्सवः । प्रीतिः । उत्कर्षः । उद्धवः"। कृपाऽनुकम्पानुक्रोशोऽहन्तोक्तिः करुणा दया । षड् दयायाम । क्रप कृपायाम् । क्रपणं कृपा । “६षानुवन्धभिदादिभ्योऽङः' इत्यङ् । "क्रपेः सम्प्रसारणम्" इति परसूत्रेणाङ् सम्प्रसारणं च । स्वमते क्रप कृपायाम् इति ज्ञापकात् सम्प्रसारणम् । "स्त्रियामादा।" अनुकम्पनमनुकम्पा । अनुक्रोशन्त्यनेन अनुक्रोशः । पुंसि | न हन्तोक्तिः अहन्तोक्तिः । करोति विपादं चित्तं किरति वा करुणा । उणादौ डुकृञ करणे । क्रियते करुणा । "ऋकृतृवृदमिदार्य- CG २० । २५ 15 - १. द्वेषपर्याये खेदपाठश्चिन्तनीयः । खेदपर्यायस्तु "शोकः शुक् शोचनं खेदः" इति अभि० चि०। क्रोधपर्यायस्तु -"कोपक्रोधाऽमर्परोषप्रतिघा रुटक्रुधौ स्त्रियौ" इत्यमरः । २. मन्यते त्या- ज्यत्वेनेति शेषः । ३. का० उ० सू० ४।११ ४. का० सू० ४।५।४४। ५. उद्धवशन्दस्योत्सवार्थे प्रमाणम्-- "उद्धवो यादवभिदि महे च ऋतुपावके" । इति मेदि० को० वा. व० ३२ श्लो० । ६. का० सू० ४।५।८२। ७. “क्रपेः सम्प्रसारणं च" पागण सू० ३१३।१०४।८. कातन्त्रमतमत्र स्वमतम् । पाणिन्यादि- सूत्रं परमतम् । ९. का० उ० सू० २१६० नाममाला । । र्जिन्य उनः" एभ्य उनः प्रत्ययो भवति । दयनं दया । दय दानगतिहिंसादानेषु । भिदायङ् । शेमुषी धिपणा प्रज्ञा मनीषा धीस्तथाऽशयः ॥ ११० ॥ षड् बुद्धौ। शे इत्यव्ययम् । मोहः । तं मुष्णाति शमयति इति शेमुषी' । धृष्णोत्यनया धिषणा । प्रज्ञानं प्रज्ञा । मनुते जानात्य नया मनीषा। मनस ईषा मनीपा वा । "हल लाङ्गलयो- रीपे मनसश्च" इत्यनेन अन्त्यस्वरादेर्लोपः। अत्र सलोपश्च । चकाराधिकारालोकोपचाराद्वा सलोपः। ५ स्मृध्यै चिन्तायाम् । ध्यानं धीः" । सम्पदादित्वाद्भावे क्विप्६ । 'ध्याप्योः सम्प्रसारणम्" "अनेनैव सम्प्रसारणं दीर्घत्वं च । प्र० सिः । .८रेफसोविसर्जनीयः" । आशेते तिष्ठति सर्वमत्राशयः । तथा-प्रेक्षा । प्रतिभा । बुद्धिः । मतिः । मेधा । संख्या । संवित्तिः । उपलब्धिः । प्राज्ञमेधाविनौ विद्वानभिरूपो विचक्षणः। पण्डितः सूरिराचार्यो वाग्मी नैयायिकः स्मृतः ॥ १११ ॥ १८ दश रिदुषि । प्रजानातीति प्रज्ञः । प्रज्ञादित्वादण प्राज्ञः । भेधास्त्यस्य मेधावी । 'माया- मेधास्रजो विन्" वाधिकारात्सर्वे एवैते विभाषया विभाषिताः। शेषेभ्यो मतुरिष्यते । मतिमान् । बुद्धिमान् । विद ज्ञाने । विद । वेत्ति जानातीति विद्वान् । वर्तमाने श०। शतृङ् । ५१ 'अन्वि०" अदादि १२| "वेत्तेः १३शतुर्वसुः" । शतृङ् स्थाने वसुः । तदादेशास्तद्वद्भवन्ति इति वचनात् वसोः शतृङ्वद्भावेन सार्वधातु- कत्वात् “अर्तीण घयेसै कस्वरातामिड्वसौ" अनेनै कस्वरत्वात्प्राप्त इड् न भवति । विद्वन् संजातम् । १५ "सिः । १"सान्तमहतोनोंपधायाः” दीर्घः । विदुषोऽपि । अभिगतं रूपं येनाभिरूपः । रूपं विद्या । "कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रता। विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।" चक्ष धातुर्षिपूर्वः। विविधं चष्टे विचक्षणः। नन्दादेयुः। योरनः । १६रपृ० णत्वम् । विचक्षणो विद्वान् इत्यनेन विचक्षण इति निपातः । निपातस्य फलं ख्यादेशो न भवति । पण्डा बुद्धिः । २० पण्डा संजाताऽस्येति पण्डितः। ॥१७तारकितादिदर्शनात्संजातेऽर्थे इतच् ।" "' 'वर्णावर्ण" श्राकार- लोपः । सिः। रेफः । पूङ प्राणिगर्भविमोचने । सूते बुद्धि सूरिः । ५ भूस्वदिभ्यः क्रिः'' एभ्यः क्रिप्रत्य- यो भवति । को यण्वदर्थः । २ अाचर्यते श्राचार्यः। "चरेराङि चागुरौं"। तथा चोक्तम्-२'इन्द्र- नन्दिनीतिशास्त्र- "पञ्चाचाररतो नित्यं मूलाचार विदग्रणीः । चतुर्वर्णस्य सङ्घस्य यः स आचार्य इप्यते ॥" १. शेते इति शेर्मोहः । विच् । तम्मुष्णातीति, मूलविभुजादित्वात्कः । गौरादिटीम् । शमेः कसौ एत्वाऽभ्यासलोपे उगितश्चेति डीपि शशामेति शेमुपीति क्षी० स्वा० । २. "धिप शब्द" । देधेष्टीति । क्षी० स्वा० । ३. प्रज्ञायतेऽनयेत्यन्यत्र । ४. का० रू० पूर्वा० २८ २० । ५. च्यायते नया धीरित्यन्यत्र । ६. “सम्पदादिभ्यः किप' का० रू० उ० ८०५ सू० । . का० रू० मा० ६५८ ० । ८. का० सू ० २।३।६३। ६. का० सू० २।६।१५। अत्र दुर्गवृत्तिः। १०. "वर्तमान शन्नुदानशाय- प्रथमैकाधिकरणामन्त्रितयोः”। का० सू० ४।४।२। ११. "अन्विकरणः कर्नरि" का० सू० ३।२।- ३२। १२. "प्रदादेलु ग्विकरणस्य" का० सू० ३।४१९२। १३. 'शन्तुर्वनुः' । का० ० ४।४।४। १४. का० सू० ४।६।७६। १५. का० सू० २१२।१८। १६. का. सू० २।४।४८। १७ का रू० पू० ५०८ । १८. का० सू० २।६।४४। १६. का० उ० सू० ३३५३ । २०. का० स० ४ाना१४ । २१. नीतिमा १५ श्लो। २५ ५६ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता प्रशस्ता वागस्त्यस्य वाग्मी। न्याये विचारे नियुक्तो नैयायिकः। धीरः । लब्धवर्णः । विपश्चित् । वृद्धः । श्राप्तरूपः । सन् । मनीपी । ज्ञः । दोषज्ञः । कोविदः । प्रबुद्धः । सुधीः । कृती । कृष्टिः' । कविः । व्यक्तः । विशारदः । संख्यावान् । मतिमान् । पारिपद्यो चुधः सभ्यः सदः संसत्सभोचितः । पट सभापुरुपे । परिपदि सभायां भवः पारिपद्यः । यण् । बुध अवगमने । बोधीति वुधः ! सभायां साधुः सभ्यः । कुशलो योग्यो हितश्च साधुरुच्यते । सदसि उचितो योग्यः सदउचितः । संसदुचितः, सभोचितः । सभासद् । सभास्तारः । सामाजिकः । परिपत्सभाऽस्थानपती- त्रयः सभायाम् । परिपोदन्त्यस्यां परिपद् । सह भान्त्यस्यां सभा । अासमन्तात्स्थीयतेऽ १० स्मिन् श्रास्थानम् । (अधिपति राजा)पतिः-यास्थानं सभा इत्यादिपर्यायनामतोऽधिपतिः पतिरित्यादिपर्याय शब्देषु सत्सु राज्ञो नामानि भवन्ति । परिषदधिपतिः । परिपत्पतिः । समाधिपतिः । सभापतिः । आस्था- नाधिपतिः । श्रास्थानपतिः । राजसूयो नृपक्रतुः ॥११२॥ मण्डलेश्वरप्रजायां (प्रयाजे ) द्वौ। पुञ् अभिपवे । पु । "धात्वा०" सः । राजन् पूर्व राजा सोतव्यो राज्ञा सूयते वा यस्मिन्निति राजसूयः । "राजसूयश्च"। घ्यणप्रत्ययान्तो निपातः । नृपाणां राज्ञां क्रतुः नृपक्रतुः। तथा च "स्मृतौ-- "गोसवे सुरभि हन्याद्राजसूये तु भूभुजम् । अश्वमेधे हयं हन्यात् पौण्डरीके च दन्तिनम् ।।" विष्टरं मल्लिकापीठमासन्दीमासनं वेन्दुः । पडासने । स्तृज अाच्छादने । विपूर्वः । विस्तरणं विष्टरः । “स्वर वृदृगमिप्रहामल ।" अल् । नाम्यन्तगुणः । “वोस्तृणातेः”। संज्ञायां सस्य षत्वम् । “तवर्गस्य पटवर्गावर्गः ।" मल्ल्यते धार्यते मल्लिका | पेठतीति पीठम् । “पृपोदरादित्वाद्दीर्घः । श्रा समन्तात्सीदति तिष्ठत्यस्यामासन्दी। श्रास्यते - २५ २० १. अत्र प्रमाणम् अभि० चि० ३।५। “विद्वान् सुधीः कविविचक्षणलब्धवर्णा ज्ञः प्रासरूप- कृतिकृष्टयभिरूपधीराः । मेधाविकोविदविशारदसू रिदोपज्ञाः प्राज्ञपण्डितमनीषिबुधप्रबुद्धाः ॥ व्यक्तो विपश्चित्सङ्ख्यावान् सन् .” इति । २. “अधिपती राजा" इति प्रतीकमाश्रित्य व्याख्यादर्शनादयं मूल. पद्यांश इति, न भ्रमितव्यम् । पूर्वापरपादयोर्मध्ये तत्समावेशासम्भवात् पड़क्षरत्वेन स्वतन्त्रपादत्वा भावात्, अत्र राजवर्णनस्याप्रसरत्वाच्च । एवं च सभाप्रसङ्गन तदधिपते राजव्यपदेशार्थ-टीकाक्र्तुवि- शेपवचनमित्येव युक्तं भाति । ३. का० सू० ३।८।२४। ४. का० सू० ४।२।४१। ५. स्मृती' इत्युक्तम् । परमविकलः श्लोको यशस्तिलके ग्रा० ७ क० ३० श्लो० ३ उपलभ्यते । ६. का० सू० ४/५/४१ । ७. का. सू. ३८1५1८. शा० सू० २१२।१७२। ६. "प्रास उपवेशने" । श्रन्दाद्यः" पा० उ० सू० ४६८। इति दप्रत्ययो भवति, अमागमटित्वं च । टित्त्वान्डोप । तथा चोक्तम्--"स्याद् वेत्रासनमासन्दी" इति ३।३४८ । अभि० चि०।
नाममाला -- १० उपविश्यतेऽस्मिन्नासनम् । “'कृत्ययुटोऽन्यत्रापि च” युट् । विदुः कथयन्ति । विष्टपं भुवनं लोको जगत्- चत्वारो जगति । विष्टपन्त्यत्र विष्टपम् । भूतानि भवन्त्यस्माद्भुवनम् । लोक्यते लोकः । गच्छत्तीत्येवंशीलं जगत् । “४द्युतिगमोढ़े च" क्विप् । गमो द्विर्वचनम् । अभ्यासमकारलोपः । । "कवर्गस्य चवर्गः" गस्य जः । ज गम् जातम् । “६पञ्चमो०"। दीर्घः । “७यममनतनगमां कौ" पञ्चमलोपः । आत् अत् । " धातोस्तोऽन्तः पानुबन्धे" तोऽन्तः । वेलोपः । सिः । नपुसकम् । तस्य पतिर्जिनः ॥ ११३॥ तस्य भुवनस्य पतिर्जिनः कथ्यते । अनेकभवगहनव्यसनप्रापणहेतून् · कर्मारातीन जयतीति जिनः । “१०इनशजिकृषिभ्यो नक्" । विष्टपपतिः । लोकपतिः । जगत्पति । इत्यादीनि जिनस्य पर्याय- नामानिज्ञातव्यानि । वर्षीयान् वृषभो ज्यायान् पुरुरायः प्रजापतिः । ऐक्ष्वाकुः (कः) काश्यपो ब्रह्मा गौतमो नाभिजोऽग्रजः ॥११४।। द्वादश वृषभे । अतिशयेन वृद्धो वर्षीयान् । “११प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घ- वृन्दारकाणां प्रस्थस्फबर्बहिगर्वर्षित्रब्दाधिवृन्दाः”। वृपेण अहिंसालक्षणोपेतधर्मेण भातीति ५ वृषभः । "१३ऋषिवृषिभ्यां यण्वत्" । अाभ्यामभः प्रत्ययो भवति स च यण्वत् । अयमेषां मध्ये प्रकृष्टो १५ वृद्धः प्रशस्यो वा ज्यायान् । “वृद्धस्य १४ च ज्यः" वृद्धशब्दस्य उयादेशो भवति । पृ पालनपूरणयोः । पृणाति पालयतीति पुरुः । ४१"इषिधृषिभिदिगृधिमृदिपृभ्य कुः" एभ्यः कुप्रत्ययो भवति। अस्मिन्नहनि श्रद्य१६ । इदमोऽद्भावो यश्च परविधिः "सद्योऽद्या १७ निपात्यन्ते" इति वचनात् । (श्रादौ भव श्राद्यः) प्रजानाम् इन्द्रधरणेन्द्रचक्रवादीनां पतिः स्वामी प्रजापतिः । इषु इच्छायाम् । वाञ्छयते लोकैः ऐक्षवाकः । तथा चार्षे महापुराणे- "अङ्कनाच्च तदेक्षणां रससंग्रहणे नृणाम् । इक्ष्वाकुरित्यभूद्देवो जगतामभिसम्मतः ॥'' काश्यं क्षत्रियतेजः पातीति काश्यपः । तथा च महापुराणे- "काश्य मित्युच्यते तेजः काश्यपस्तस्य पालनात् ।" बृहतीति ब्रह्मा। " । २० १. का० सू० ४।५।९२१२. "एप स्तप प्रतिघाते" श्रम० को० क्षी० स्वा० भाप्य एवोपलन्यने, न तु पाणिनिधातुपाठे । ३. विशन्त्यत्रेति रामाश्रमः । विशन्त्यस्मिन् जीवाजीवा इति रेमचन्द्रः । ४ का म ४।४।४८। ५. का० सू० ३।३।१३ । ६. का० सू० ४।११५५। ७. का० स० ४१११६९।८. काम ४।१।३०। ९. का० सू० ४१।३४!' वेलोपोऽपृक्तस्य' इति पूर्ण मूत्रन् । १०. का. उ० ० २१५१। ११. पा० सू० ६।४।१५७। १२. वृषेण भातीति विग्रहे भातोऽनुपसर्गे कः । मादीतौ । वर्षाति धर्मामृतमिनि विगहे "प्रट पिपिभ्यां यण्वत्" इत्यभः । "वृपु सेचने" । १३. का०७० सू० ३।१३ । १४ १ ० ४.५.३ १५.फा० उ० सू० १।१०। १६. अत्र श्रायशव्दो न त्वद्यशब्दः । तेनादी भव बान इति चुनः प्रतिभाति । १७. का सू० २।६।३७॥ १८. इतूणाम् वा ( रसापकार्पणम् ) प्रतीति माहः । सन ऐन्त्राः। नत्र प्रमाणमाह-"अकनाच्चेति' सङ्गतिः ।
५८ ५ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता "आत्मनि मोक्षे ज्ञाने वृत्ती ताते च भरतराजस्य । ब्रह्मेति गीः प्रगीता न चापरो विद्यते ब्रहा ।।" अतः परो ब्रह्मा नास्ति । गौतमो गोत्रोऽवताराट् गौतमः । श्राप महापुराण--- "गी: स्वर्गः स प्रकृष्टात्मा गोतमोऽभिमतः सताम् । स तस्मादागतो देवो गीतमश्रुतिमन्वभूत् ।।" नाभेर्जाती नाभिजः । अग्रे जातोऽग्रजः । अष्टत्वात् । सन्मतिर्महतिवीरो महावीरोऽन्त्यकाश्यपः । नाथान्वयो वर्धमानो यत्तीर्थमिह साम्प्रतम् ।। ११५ ।। सती समीचीना मतिर्यस्य स सन्मतिः । महापुराणे- १० "तत्सन्देहे गते ताभ्यां चरणाभ्यां च भक्तितः । अस्तावि सन्मतिर्देवो भावीति समुदाहृतः ।।" ( मह्यते पूज्यते इति महतिः ) । महती पूजा यस्य स महतिः । विशिष्टाम् इन्द्राद्यसम्भाविनीम् ईम् अन्तरङ्गां समवसरणानन्तचतुष्टयलक्षणां लक्ष्मी रात्यादत्ते इति वीरः । वीर इति नाम कस्माज्जातम् ? जन्माभिपेके चालघुशरीरदर्शनादाशङ्कितवृत्तेरिन्द्रत्य सामर्थ्यख्यापनार्थ पादाङ्गुष्ठेन मेरुसंचालनादिन्द्रेण १५ वीरनाम कृतम् । महाँश्चासौ वीरः महावीरः । तथा च वृहत्प्रतिक्रमणभाष्ये- "कुमारकाले आमलकीक्रीडायां क्रीडतः सङ्गमदेवेन विमानस्खलनाद्भगवत्पो (चो)दनाथ महाफटाटोपोपेतं भयानकं सर्परूपं विकृत्य वृक्षो वेष्टितः । भगवाँस्तस्मान्मस्तकादिपादन्यास कृत्वा वृक्षादुत्तीर्णः । ततस्तेन महावीर इति नाम कृतम् ।", अन्त्यं काश्यं तेजः पातीति अन्त्यका- श्यपः । ततः परस्तीर्थकरो नास्ति । नाथोऽन्वयो यस्य स नाथान्वयः ।.तथा च- "चत्वारः पुरुवंशजा जिनवृपा धर्मादयस्ते पुन- नेलिश्रीमुनिसुव्रतौ हरिकुले वीरोऽथ नाथान्वये ।। शेषाः सप्तदशाधिका जिनवरा इक्ष्वाकुवंशोद्भवाः प्रोद्यमोहविनाशनैकनिपुणाः सङ्घस्य सन्तु श्रियै ।" अव समन्ताद् ऋद्ध परमातिशयप्राप्तं मानं केवलज्ञानं यस्यासौ वर्धमानः । "वष्टिभागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा ॥" इत्यवशब्दस्याकारलोपः । तथा ऋषिश्च प्रत्यक्षवेदी -भगवतो हि गर्भावतारादौ पित्रे- न्द्रादिविनिर्मितां विशिष्टां पूजां रत्नवृष्टिं स्वत्य च ऋद्धिवृद्धयादिकं दृष्ट्वा वर्धमान इति नाम कृतम् । इह अस्मिन् पञ्चमकाले यस्य तीर्थ यत्तीर्थम् साम्प्रतम् अधुना वर्तते । सर्वशो वीतरागोऽहन केवली धर्मचक्रभृत् । ३० तीर्थङ्करस्तीर्थकरस्तीर्थकृहिव्यवाक्पतिः ।। ११६ ॥ नव जिनेन्द्रे । ज्ञा अवबोधने। ज्ञा । सर्वज्ञः । सर्वे जानाति वेत्तीति सर्वज्ञः । "यातोऽनुपस- र्गात्कः" अप्रत्ययः । “के यण्वच योक्तवर्जम्" इति यण्वभावात् अालोपः । विशिष्टा ई तां प्रति इतः प्राप्तो रागो यस्य स वीतरागः । अरिहननादजोहनन (स्या) भावाच्च परिप्रातानन्तचतुष्टयस्वरूपः सन् इन्द्रनिर्मिता- - २० १. का० सु० ४।३।४। २. का० सू० ४/११७/ नाममाला - ५ na २० - मतिशयवती पूजामर्ह तीति अर्हन् । घातिक्षयजमनन्तज्ञानादिचतुष्टयं विभूत्पाद्यं यस्येति वाऽर्हन् । त्रिकालं केवलज्ञानमस्त्यस्य केवली। जिनधर्मचक्र सहस्रारयुक्त तीर्थकृदने निराधारतया विहारकाले गगने गच्छत् सर्वजीवदयासूचकं रत्नमयमायुधविशेषं बिभर्ति तद्वाऽनुभवत्तीति धर्मचक्रभृत् । तीर्थे द्वादशाङ्गशास्त्रं करोतीति तीर्थङ्करः । तीर्थे करोतीति तीर्थकृत् । दिव्यवाचाम्पतिः दिव्यवाक्पतिः । तथा चोक्तम्ः- "यत्सर्वात्महितं न वर्णसहित न स्पन्दितोष्ठद्वयं नो वाञ्छाकलितं न दोषमलिनं न ३वासरुद्धक्रमम् । शान्तामर्षविष समं पशुगणैः संकर्णितं कर्णिभि- स्तद्वः सर्वविदः प्रनष्टविपदः पायादपूर्वं वचः ।।" चेलं निवसनं वासश्चीरमम्बरमंशुकम् । षड़ वस्त्रे । चिल्यते वस्यतेऽनेन चेलं चैलं च । निवसत्यनेन निवसनं, विवसनं, वस्नं च । वस्यते ऽनेनाङ्ग वासः। सान्तम् । चिनोति उपार्जयति सारतां चीरम् , चीवरं च । अम्बते गच्छति शोभा- मनेन अम्वरम् । उभयम् । अंशून् कारयति अंशुकम् । क्लीवे । कर्पटम् । आच्छादनम् । वस्त्रम् । सिचयः । पटः, पटम्, पटी । पोतः । प्रावरः । प्रावारः । संव्यानं च । वस्त्राधन्तः दिगाद्यादिसंज्ञितो वृपमेश्वरः । वस्त्रादयः वस्त्रपर्याया अन्ते दिगादयो दिक्पर्याया आदौ यत्य तत्संज्ञितो वृपभेश्वरः । वस्त्रादिकं १५ नाम अन्ते दिगादिकं नाम श्रादौ यथा-दिक्चेलः । दिग्वासाः । दिग्वसनः । दिगम्बरः। दिगंशुकः । दिग्वस्त्रः । काष्टाचेलः । काष्ठानिवसनः। काष्ठावासाः । काष्टाचीरः । काष्ठाम्बरः । काष्ठांशुकः । काष्ठावनः । ककुप्चेलः । ककुन्निवसनः । ककुव्वासाः । ककुप्चीरः । ककुबम्बरः । ककुबंशुकः । ककुबस्त्रः । श्राशाचेलः । श्राशानिवसनः । श्राशावासाः। श्राशाचीरः। आशाम्बरः । पाशांशुकः । श्राशावस्त्रः । दक्षकन्याचेलः । दक्षकन्यावासाः । दक्षकन्याचीरः । दक्षकन्याम्बरः । दक्षकन्यांशुकः । दक्षकन्यावस्त्रः । हरिच्चेलः । हरिनि- २० वसनः । हरिद्वासाः। हरिचोरः । हरिदम्बरः । हरिदंशुकः । हरिद्वस्त्रः । इत्यादीनि वृषभेश्वरनामानि ज्ञातव्यानि । कुङ्कुमं रुधिरं रक्तम्- त्रयः कुझुमे । काम्यते जनैः कुङ्कुमम्' । रुधिर् श्रावरणे । रुणद्धि रुधिरम् । “तिमिरुधि- मन्दिधिरुचिशुषिभ्यः किरः" । रज्यतेऽनेन रक्तम् । कस्तूरी मृगनाभिजम् ।। ११७ ॥ द्वौ मृगमदे । के स्तूयते कस्तूरी । मृगनाभेर्जातम् मृगनाभिजम् । मृगनाभीजं च । कर्पूरं घनसारं च हिमं सेवेत पुण्यवान् । कृपू सामर्थे । कल्पते कर्पूरः । "कृपेरूरप्रत्ययः । " नाम्यन्तगुणः ।" "पे रोलः” कथन. १. कुक्यते आदीयते कुकुमम् । कुक् आदाने। “कुदकुकोनुन च" भो० उ० इति उम प्रत्ययो नुमागमश्च । इति रामाश्रमः । कुं कौतीति क्षीरस्वामी । २. का० उ० २१ ३. तथा चोरुन मेदिन्दाम् ता०व० श्लो० ४६ । "रक्तोऽनुरक्ते नोल्यादि रजिते लोहिते त्रिए । क्लीबन्तु फको ताने प्राचोनामलके ऽसजि" । इति । ४. के शिरसि स्तूयते प्रशत्तधार्यत्वेन मन्यते इत्यर्थः । विक्सति गप्पा स्या इति क्षी० स्वा' । “फस गतौं' कसति गच्छति गन्धोऽन्या इति रामाधमः। "वविहादिन्य जी- लचौ" । पा० उ० ४।९०। इत्यमरः । पृषोदरादित्वात्तुट, गौरादित्वान्डी च । ५. “हिमिनिकिता दिग्य उरोलो" इति का० उ० ३१६०।। ६. नान्यन्तयोर्धानुदिकरलपोगुनः" का. १०.१६ । ७. फा० सू० १६९७ - ६० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता । सत्यम् । उणादयो हि बहुलम्, तेन- "कचित्प्रवृत्तिः कचिदप्रवृत्तिः कचिद्विभापा क्वचिदन्यदेव । विधेविधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं वाहुलकं वदन्ति ।।" घनस्येव सारोऽस्य घनसारः । हि गत।। हिनोतीति हिमम्' । "3इन्धियुधिश्याधूहिन्यो ५ मक्" । चन्द्रसंज्ञः । सिताभ्रः । हिमवालुकः । समालम्भोऽङ्गरागश्च प्रसाधनविलेपनम् ।। ११८ ॥ चत्वारो रागे । सम्यक् प्रकारेगालभ्यते "समालम्भः । अङ्गस्य रागोऽङ्गरागः । प्रकर्षण साध्यते मण्ड्यते प्रसाधनम् । विलिप्यते विलेपनम् । भृपणाभरणं रुच्यम्- १० त्रय श्राभरणे । तसि भूप अलङ्कारे । भूप्यते मण्ड्यतेऽनेन भूपणम् । या समन्ताद भ्रियते शोभा धार्यते ऽनेन श्राभरणम् । रोचते रुच्यम् । अलकारः। परिप्कारः । मण्डनम् । माल्यं मालागुणस्त्रजः । चत्वारः पुप्पमालायाम् । मालेव माल्यम् । चातुर्वर्णादित्वात्प्यण् । माल्यते धार्य ते माला। अथवा मालान्ति पुष्पाण्यत्र माला । अयाम् । गुणतीति गुणः । “नाम्युपधप्रीकृगज्ञां" कः" । सृज्यते १५ स्त्रक् । 'ऋत्विदधृवस्रगिति" साधुः । मेखला रसना काञ्ची। त्रयः काञ्च्याम् । मेहनस्य खं तस्य मां लातीति निरुक्तिः। मिनोति प्रक्षिपति कामिचित्तमिति वा मेखला । रसति शब्दं करोतीति रसना । रस कान्तौ ( शब्दे ) सौत्रोऽयं धातुः । श्रोणी शोभा कचति( काञ्चते ) बध्नातोति काञ्चिः । स्त्रियामीः । काञ्चो । तप्तकी । कलापः । कटिसूत्रम् । सारसनम् । २० शिञ्जिनी१० च । हेमपर्यायसूत्रकम् ।। ११६ ॥ हेमशब्दात्सूत्रशब्दे प्रयुज्यमाने मेखलापर्यायनामानि भवन्ति । हेमसूत्रम् । अष्टापदसूत्रम् । स्वर्ण सूत्रम् । कनकसूत्रम् । अर्जुनसूत्रम् । काञ्चनसूत्रम् । हिरण्यसूत्रम् | जातरूपसूत्रम् । शातकुम्भसूत्रम् | हाटकसूत्रम् । कलधौतसूत्रम् । तपनीयसूत्रम् । कार्तस्वरसूत्रम् । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । २५ श्रोणीविम्बं कटीसूत्रं मानसूत्रमिवाहितम् । त्रयः पट्टसूत्रे । श्रोण्याः कट्याः बिम्बं प्रच्छादकं श्रोणोविम्बम् । कटी सूत्रयति वेष्टयतीति १. शा० सू १।३।१४९। अत्र कारिकारूपेण पठितः । २. हिनोति गच्छतीत्यर्थः । कपूरस्याशूत्प- तनस्वभावात् । हन्ति औप्ठ्यमिति रामाश्रमः । ३. का० उ० ११५५। ४. बालभ्यते विलिप्यते इत्यर्थः । ५. का०सू०४।२।५१। ६. का०सू० ४।३।७३। ७. मखं गतिं लातीति पृपोदरादित्वान्मेखलेति रामाश्रमः । मुहुः स्खलतीति हेमचन्द्रः । मीयते प्रक्षिप्यते इति क्षी०स्वा० । "मिञः खलच्चैच्च" २।३।१७। सर० क० । ८. अश्नुते कटिम्,प्रश्नाति कामिचित्तं वैति रामाश्रमहेमचन्द्रौ । 'अरो रश्च" इति यूरशादेशश्च । ९. "काचि दीतिबन्धनयो."। "सर्वधातुभ्य इन्" । १०. शिञ्जिनी नूपुरम् । मेखलापर्याये तत्पाठोऽयुक्तः । तदुक्तम्- "नूपुरन्तु तुलाकोटिः पादतः कटकाङ्गदे। मञ्जीरं हंसकं शिचिनी,~-अभि० चि० ३।३३० - नाममाला ६१ ។ - - कटीसूत्रम् । मानं प्रमाणीभूतं सूत्रयतीति मानसूत्रम् । केचिद् रागसूत्रं पठन्ति पट्टसूत्र च । मदिरां मद्यमैरेयं शीधु कादम्बरीमिराम् ॥ १२० ॥ प्रसन्नां वारुणी हालां मधुवारां सुरां विदुः । एकादश मद्ये । माद्यत्यनया मदिरा । मधिष्टा च । मद्यतेऽनेन मद्यम् । “यमिकदिगदा त्वनुपसर्गे" । इरायां ग्रामसीमायाम् साधु ऐरेयम् । शेरतेऽनेन शीधुः । “२शीडो धुक्' । शीपो(घो)रित्येके ५ पठितत्वात् शीधुप्रकृतेः क इति व्याख्यत् । अथवा पीतेऽत्र जनः शेते शीधुः । उभयम् । तालव्यः । कुत्सितं नीलमम्बरं यस्य स कदम्बरो बलदेवः । तस्येयं प्रिया कादम्बरी । कुत्सितमम्वते यात्यनया वा कादम्बरी । एति परिभ्राम्यत्यनया इरा । आत्मा प्रसीदत्यनया प्रसन्ना । आदन्तः । वरुणस्यापत्यं वारुणी। जहति लज्जामनया हाला। स्त्रियाम् । मधु वारयतीति मधुवारा । सुवति सूते भवं सुरा। तथा द्विसन्धानभाष्ये--"अतिप्रलापभावेन समुद्रमथनान्निष्कासिता सुरैः सुरा।" "लक्ष्मीकौस्तुभपारिजातकसुरा धन्वन्तरिश्चन्द्रमा गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवाङ्गना ।। अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः शङ्खो विपं चाम्बुधः रत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ।। विदुः कथयन्ति । मधुः । श्रासवः । परिप्लुता । स्वादुरसा । शुण्डा'। गन्धोत्तमा । माधवकः । १५ माधवः । कल्यं, कल्या। कश्यं, कश्या । परिश्रुत् । तान्तं स्त्रियाम् । तालव्यदन्त्यः । हारहूरं । कापि- शायनम् । मृद्वीकम् । माध्वीकम् । शुण्डासवः- मद्य विशेषौ द्वौ । सुन्व(न)न्ति तृप्तिं गच्छन्त्यनया शुण्य (न्य) ते पातुमभिगम्यते वा शुण्डा" । स्त्रीत्रोः । शुण्डः । पासूते जनयति मदम् पासवः । पुंसि । तद्विधायी शौण्डो गद्येत मद्यपः ।। १२१ ।। द्वौ कल्यपालके । शुण्डायां मद्ये भवः शोण्डः । मद्यं पिबति पाययतीति वा मद्यपः । सक्तोऽक्षयूतपानेषु विचित्रा शब्दपद्धतिः । त्रयो मद्यासक्ते । अक्षेप द्यूतेषु सक्तः अक्षसत्तः । द्यूतसक्तः । पानेषु सक्तः पानसक्तः। विचित्रा नाना प्रकारा शब्दानां पद्धतिः श्रेणिः शब्दपद्धतिर्वर्तते । अक्षशौण्डः । अक्षधूर्तः । अक्षकितवः । ""सप्तः। २५ शौण्डैः" । व्याल, अधि, पटु, पण्डित, कुशल, चपल, निपुण, स्वेत्यादि शौण्डादिराकृतिगणः । सर्पिहैं यङ्गवीनाज्यं- त्रियः सर्पिषि । सप्त धातवः सर्पन्त्यनेन सान्तं सपः । क्लीवे । “अर्चिशुचिरुचिहुषि- छादिछर्दिभ्य इसिः'। सुप्लु गतौ। हो गोदोहस्य विकारो हैयचीनम् । इदं हयगवानं यातनदिन- गोदोहे सजातम् । उक्तं च-- "तत्तु हैयङ्गवीनं यद् ह्योगोदोहोद्भवं घृतम् ।' - ३० १. का० सू० ४।२।१३। २. का. उ० सू० २।३३। ३. सोधुरिति दन्यो पन्त्र पाटः। ४. “शुण्डा हाला हारहूरं प्रसन्ना वारुणी सुरा।" अभि० चि० ३४५६७ ५. शुष्टागदो महिनावानी पानमदस्थानमपि । तदुक्तम्-"शुण्डा हाला हारहूरम्' अभि० चि०६५६४ मा माननमान अभि० चि०३५७०। ६. शुण्डायां मदिरापानागारे नव इति रामाधमः । 'शुदा मदिराल्पनिक नादित्वादणः' इति हेमचन्द्रः । ७. पा०सू० २।६।४०। ८. काड०० २४४ ! ६.कोम ६२ . अमरकीतिविरचितभाप्योपेता ५ । ० .८ तथा चाशाधरमहाभिके- "आयुः पीयूपकुण्डैः स्मृतिमणि खनिभिः शेमुपीवल्लिकन्द- मेधासस्याम्बुबाहेरफलतभिनेत्ररत्नाधिदेवः । निष्टतंगपेयप्रचुरमधुरिमस्नेहधूमोऽपि येषा कुर्मा हेयनवीनः स्नपनमपनय ध्वान्तभानोर्जिनस्य ।।" वीयते क्षिप्यते पित्तमनेनाव्यम् । तथा क्षीरस्वामिनि-"या अञ्जनीयमाज्यम्"। "श्राङपूर्वादञ्जः संज्ञायाम्' क्यप् । घृतम् । अाधारः । स्पृह्यम् । याज्यम् । हविः । दुग्धं क्षीराऽमृतं पयः ॥१२२ ।। चत्वारो दुग्धे । दुह प्रपूरणे । दुह्यते दुग्धम् । घस्लु अदने। सौत्रोऽयम् । घस्यते क्षीरस् । १० 'घसे: किच" ईरमात्रः । गमहनजनेत्युपधालोपः । अयोपेप्वशिगं प्रथमः" कः । "शासिबसि- घसोनां च" पत्वम् । क् पसंयोगे क्षः । “व्यञ्जनमत्व' | उणादी क्षिणु क्षणु हिंसायाम् । क्षणोतीति क्षीरम् । क्षीरोशोरगभीरगम्भीरा" एते ईरप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते। न म्रियतेऽनेन अमृतम् । अजरामरकारित्वात् । पीयते वा सरसत्वात् पयः । अमुन् । ऊधत्यम् । स्तन्यम् । पीयूयं, पयूपं च । उदश्चिन्मथितं तक्रं कालशेयं पिवेद् गुरुः । १५ चत्वारस्तके । उदकेन श्वयति वर्धते उश्चित् । तान्तरतालव्यमध्यः 1 मध्यते (स्म ) मथितं घोलं च । तञ्चति द्रवं गच्छति तक्रम् । उभयम् । "तकं विभागभिन्नं तु केवलं मथितं स्मृतम्' इति धन्वन्तरिः। कलश्यां गर्गयाँ भवं कालशेयं पिवेत् गुरुः । तत्कालीनं गरिष्ठम् । अरिष्टम् । दण्डाहतम् । प्रायो वयो दशानेहा पूर्ण यौवनकं विदुः ।। १२३ ॥ तारुण्यं यौवनं च अष्टौ तारुण्ये । प्रकर्षण परलोकमेत्यनेन प्रायः पुंसि । सान्तोऽपि वयः । दशति चुम्बति स्त्रीमुखं दशा । न ईहते १२ चेष्टते अनेहा। "अनेहसोऽप्सरसोऽङ्गिरस:५३" एते सन् प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । ईइ चेष्टायाम् । पूरी याप्यायने दिवादी अात्मनेपदी। अदन्तानां प्राक तृ(ऋ)तीयः परस्मैपदी । पूर्यते कश्चित्, पूरयति कश्चित् । इन् चुराद्यपेक्षया वा । ५१४कारित." का रितलोपः । उभयथा पूरि जातम् । पूर्यते स्म पूर्णः । निष्ठाक्तः । "पदान्तशान्तपूर्णदातस्पष्टछन्नज्ञप्ताश्चेनन्ताः" इत्यनेन पूर्णेति निपातः । यूनो भावो यौवनम् । स्वार्थे कः । यौवनकम् । १६ युवादित्वाद्भावेऽण् । वृद्धौ । तरुणस्य १. पा० सू० ३।१११०९ । वार्तिकम् । २. पा० उ० सू० ४।३२ । ३. का० सू० ३२६६४३ । ४. का० सू० ३।८।९। ५. का० सू० ३।८।२७ । ६. का० रू० पू० सू० २५६ । ७. "ध्यञ्जनमस्वरं परं वणं नयेत्” का० सू० १।१।२१। ८. का. 3) सू० ३१४६। ९. अत्र प्रायादयोऽनेहोऽन्ताश्चत्वारो वयोवाचकाः। पूर्णपूर्वका एते चत्वारो यौवनकतारुण्ययौवनानीति त्रयः । एवं च सप्त तारुण्ये इति वक्तुं युक्तम् । १०. प्रकर्पण शरीरत्य क्रमेणायते गच्छति इति है० च० । ११. शरीरस्य क्रमेण वियन्ति वयः, वाल्यादीनि दश्यन्ते दशा इति हैमः । १२. नाहन्ति नागच्छति नाहन्यते नागम्यते वेति रामाश्रमः । “नत्र्याहन एह च" इति साधुः । १३. का० उ० सू० ४।१८) १४. का० स० ३१६४४१ १५. का० १० ४१६१०० १६. हे० शु० ७।१।६७। युवादेरण इति सूत्रम् । २० प्रायस् । वयते नाममाला भावस्तारुण्यम् । भावार्थे यण । यूनो भावो यौवनम् । अन्त्यो वार्ड्सनः स्थविरो मतः । त्रयो वृधे । अन्त भवोऽन्त्यः। वृद्धे नियुक्तो चार्झनः' । सिष्टतीति स्थविरः । गति- भङ्गान्मतः कथितः । प्रवयाः । यातयामः । दशमीस्थः । जरन् । जरठः । जीर्णः । वृद्धः । वंशोऽन्वयोऽन्ववायः स्यादाम्नायः संततिः कुलम् ॥ १२४ ॥ षड् वंशे । उश्यते काम्यते जनेन वंशः । पुसि । अन्वयते सन्ततिरत्रान्वयः । अन्ववैत्य- पत्यमत्रान्ववायः । आम्नायते आम्नायः" । सम् सम्यक् प्रकारेण तनोति विस्तारयतीति सन्ततिः । सन्तननं वा सन्ततिः । कु (को) लति सर्व भवत्यत्र कुलम् । उभयम् । गोत्रम् । अभिजनः । ओघो वर्गश्च सन्तानः त्रयः समूहे (वंशस्यावान्तरवर्गभेदे )। श्रोह्यते श्रोधः । वृज्यते विजातीयेन पृथक क्रियते १० वर्गः। सन्तन्यते सन्तानः। विकरः । निकायः । निवहः । विसरः । व्रजः । पुजः । समूहः । सञ्चयः । समुदयः । समुदायः । सार्थः । यूथः । निकुरम्बः । कदम्बम् । पूगः । राशिः । चयः । समवायः । मण्डलम् । चक्रवालम् । जालम् । स्तोमः । व्यूहः । काव्यमेव कविस्थितिः। द्वौ काव्ये । कवेर्भाव: काव्यम् । तथा च यशस्तिलके- १५ "दुर्जनानां विनोदाय बुधानां मतिजन्मने । मध्यस्थानां न मौनाय मन्ये काव्यमिदम्भवेत् ॥" कवीनां स्थितिः कविस्थितिः । पक्षिवर्ग: प्रारभ्यते श्रीमदमरकीर्तिना-- हंसो मरालश्चक्राङ्गः त्रयो हंसे । विसं हन्ति खण्डयति, चारुगत्या हन्ति गच्छति वा हंसः । हन्तेः सः । मरं मलं कमलमण्डिततडागमियति गच्छतीति मरालः । चक्रमणति चक्राण्यङ्गानि वा यस्य चकाङ्गः । मानसौकाः । श्वेतच्छदः । हंसवाहः सनातनः ॥ १२४ ॥ हंसशब्दाद वाहशब्द प्रयुज्यमाने ब्रह्मणो नामानि भवन्ति । हंसवाहः । मरालवाहः । चा २५ वाहः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । मयूरो चर्हिणः केकी शिखी प्रावृपिकस्तथा ।। नीलकण्ठः कलापी च शिखण्डी- अष्टौ मयूरे। मयां रौति मयूरः । मीनाति वाऽहीन् मयूरः । उणादौ । मीन हिंसाचा: । मयले १. अनान्यत्प्रमाणं नोपलब्धम् । २. यौवनमतिकन्य तिटतोति २०१०। "अजिशिशिरेवादि पाउ० ११५३ इति किरप्रत्ययो जुगागमो हस्वत्वं च । ३."श कान्ती" पम् । नुम् । बापते कन्यो नति स्वामी । ४. अन्ववैति अन्वीयते । अन्वयः । "इण् गती" । अन् । इत्यन्यत्र ५ अ नाराम--- मनापः कुल पागमे उपदेशे" इति हैमः ।३।५।११। ६. सन्तन्यते सम्यग्वितारयतीति समापनः । उह वितर्के । न्यडक्वादित्वाद् हस्य घः । ८. बा.१ श्लो:५।९. का. द. निमतिकत्यशिकषेभ्यः सः" । इति ।
अमरकोर्तिविरचितभाप्यता इति मयूरः । "मयते' हरो खा" । बईमस्यास्ति वहीं । “फल बहायामिनच्" । केका वाणी अस्यमय केकी। शिखारत्यस्य शिखो । प्रापि वर्षाकाले प्रयुक्तः प्रावृषिकः । नीलं काट यस्य म नीलकण्ठः । कलापोल्यत्य कलापी। शिखण्डोऽत्यस्य शिखगडी । प्रचलाकी। मशिनः । शिवायलः । श्याम- कण्ठः । चन्द्रकी । शुक्लापाः । तत्पतिगुहः ।। १२६ ॥ तस्य पतिस्तत्पतिर्मुहः कार्तिकेयः । मयूरशब्दात पतिशब्द प्रयुज्यमान कार्तिकेयपर्यायनामानि भवन्ति । मयूरपतिः । बर्दिापतिः । किपतिः । शिविपतिः । प्रावृषिकपतिः। नीलकण्ठपतिः । कलापि- पतिः । शिखण्डिपतिः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । वरटा वारली हंसी- १० त्रया सभायाम् । वरं विशिष्टमति गच्छति बरटा । वरलस्य भार्या वारली । स्वार्थेऽणि । वरला च । हन्तीति हंसी। कोक ईहामृगो वृकः। अजादिकं कोकते श्रादत्त कोकः । ईहा मृगेप्यस्य ईहामृगः । ईहां मृगयते वा ईहानृगः । कुक वृक आदाने । वर्कते 'वृकः । अरण्यदया । हरिणो मृगश्च पृपतः- १५ त्रयो मृगे । गीतेन बियते हरिणः । व्याधैमुग्यते मृगः । पर्पति सिंचति मूत्रेण पृपतः” । तान्तोऽपि पृपत् । एणः । कुरङ्गः । कुरङ्गमः । सारङ्गः। ऋश्यः । रिश्यः । ऋष्यश्च । ममः । न्यः । वात- प्रमी। शम्बरः । शवलः | कृष्णसारः। कालसारोऽपि । तदकः शर्वरीकरः ॥ १२७॥ हरिणपर्यायादवपर्याये प्रयुज्यमाने चन्द्रस्य नामानि भवन्ति । हरिणाङ्कः । मृगाङ्कः । पृपताङ्कः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । पन्नगोऽहिविपधरो लेलिहानो भुजङ्गमः ॥ नागोरगौ फणी सर्पः- नव सबै । पद्यां न गच्छतीति पन्नगः । नभ्राणनपादित्यस्योपलतत्वात् । अंहत्य (तेs) २५ हिः । "अंहि कम्प्योनलोपश्च" नलोपः। विषं धरति विषधरः । लिलेहेति लेलिहानः । भुजाभ्यां गच्छति भुजङ्गमः। न गच्छतोति ' नागः। उरमा गञ्चतीत्युरगः । “११उरो विहायसो हरविही च" उरो विहायसोरुपपदयोगमश्च संज्ञायां खो भवति तयोश्च उरविही यथासंख्यं भवतः 1 फणाऽन्त्यस्य फणो। १. का० उ० सू० ६१४७ १ २. पा० ५२२१२२ वार्तिकम्--"फलवाभ्यामिनच्य। ३: ईहया महताध्यासेन मृग्यते याखेटीक्रियते इत्यन्यत्र । ४. वर्कतेन्जादिकमादत्ते, वृणोति वा वृकः । ५. रामाश्र- मतु-'पृपता विन्दवो बिन्दुसदृशलनणान्यस्य पृषतः । अर्श श्राद्यच् इत्याह । पृपतो बिन्दुचित्र इति क्षो. वा० । ६. पन्नं पतितं यथा त्यात्तथा गच्छतीति रामाश्रमः । सर्वपन्न योरिति वार्तिकन ढः । ७. का. उ०स०४।४। क्रिप्रत्ययो नलोपश्च । अहिं गतौ । अंहति वेगेन गच्चति । ८. भृशं लेढीत्येवंशीली लेलिहानः । लिहेर्यजुगन्तात्-"ताच्छील्यवयोवचनशक्तियु चान" पा० सू० ३।२।१२६॥ इति चानश् । ९. भुमेन कौटिल्येन गच्छति, भुज इव गच्छति वेत्यन्यत्र । “गमश्च" का० सू० ४।३।४५॥ इति । 'विहङ्गातुरङ्ग भुजङ्गाश्च" का० सू० ४३१४८) इति खचि, डे च, भुजङ्गमः, भुजङ्ग इति । १२. नगे पर्वते भवो नागः । अथवा न गञ्छतीत्यगः, न अगः, नाग इत्यन्यत्र । ११. का० सू० ४।३।४६। २० -- -- नाममाला ६५ - र सर्पति गच्छति सर्पः । पृदाकुः । भुजगः। अाशीविपः । चक्री । व्यालः । सरीसृपः । कुण्डली । गूढपात् द्विरसनः । चक्षुःश्रवाः । काकोदरः । दर्वीकरः । दीर्घपृष्ठः। दन्दशूकः । विलेशयः। भोगी । जिह्मगः । पवनाशनः । गोकर्णः । कुम्भीनसः । कञ्चुकी। राजसर्पः । भुजङ्गभुक् । दृक्श्रुतिः । तद्वैरी विनतात्मजः ।। १२७ ।। तस्य पन्नगस्य वैरी शत्रुः विनतात्मजः गरुडः । पन्नगवैरी । अहिरिपुः । विषधरारातिः । लेलिहान रिपुः । भुजङ्गशत्रुः । नागद्विट् । भुजङ्गसपत्नः । फणि द्विट । सर्पहृत् । सर्पद्वेपी। इत्यादीनि गरुडनामानि स्युः। सुपर्णो गरुडस्ताक्ष्यों गरुत्मान् शकुनीश्वरः । इन्द्रजिन्मन्त्रपूतात्मा चैनतेयो विपाशयः ॥ १२८ ।। नव गरुडे । शोभनं स्वर्ण मयं पर्णमस्य सुपर्णः । तथा च-"सुपर्णी१ हेमपक्षत्वात् ।" डीह १० विहायसा गौ । गरुत्पूर्वः । गरुद्भिः पक्षर्डयते गरुडः । "२वर्णागमो गवेन्द्रादौ सिंहे वर्णविपर्ययः । पोडशादी विकारस्तु वर्णनाशः पृपोदरे ।।" इत्यनेन श्लोकेन गरुत्शब्दस्य तकारस्य लोपः । लत्वे गरुलः । गरुटेश्च । तृक्षस्यापत्यं तायः । गरुतः पक्षाः सन्त्यस्य गरुत्मान् । शकुनीनां विहङ्गानामीदवर: स्वामी शकुनीश्वरः । इन्द्रं जितवान् १५ इन्द्रजित् । मन्त्रेण पूतः पवित्र आत्मा यस्य स मन्त्रपूतात्मा । विनताया अपत्यं वैनतेयः । विनं क्षयतीति विषक्षयः । काश्यपनन्दनः । विष्णुरथः । पन्नगाशनः । नागान्तकः । खमिन्द्रियं हपीकं च श्री (स्रो ) तोऽक्षं करणं विदुः । पडिन्द्रिये । स्वर्गमोक्षी खनति विदारयतीति खम् । इन्द्रस्यात्मनो लिङ्गमिन्द्रियम् । हृप्यति हर्ष प्राप्नोति विपयेषु शब्दस्पर्शरूपरसगन्धेषु हपीकम् । शृणोत्यनेन सान्तम श्रोतः" । तालव्यादिः । अक्ष्णोति विपयं व्याप्नोति अक्षम् । नियते मनोऽनेन विषयेषु करणम् । शेवं [विपयि] | कम्बलम् । पुण्यं भाग्यं च सुकृतं भागधेयं च सत्कृतम् ॥१२६।। पञ्च पुण्ये । पुण शोभे । पुणति शोभते पचते वा "पुण्यम् । “पर्जन्यपुण्ये" । भगस्यैश्वर्या देरिदं [कारणम् ] भागम् । भागमेव भाग्यम् । "भागाद्यच्च" ! सुष्टु क्रियते सुकृतम् । ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । वैराग्यस्याथ मोक्षस्य पण्णां भग इति स्मृतिः ।।" २० २५ १. क्षी० स्वा० भा० १११।२९ । २. शा० सू० २।२।१७२ । श्रत्र कारिकारुपेग पठितः । ३. खन्यते; तत्तदिन्द्रियाधिष्टानस्य खातसदृशत्वदर्शनात्, खम् । ‘खनु अवदारणे' । उप्रत्यय न्यन्यत्र । ४. इन्द्रियमिन्द्रलिमित्यादिना घच । घस्येयः । ५. तालव्यश्नोतश्शब्दः कर्णेन्द्रियवाच यः । दयनीताद इन्द्रियवाची, सोऽत्र पठितव्यः । तदुक्तम्- "हपीकमदं करणं सोतः ग्यं विश्वीन्द्रियम् प्र. वि. 'सोत इन्द्रिये निग्नगारये" इत्यमरः ३।३।२३३। ६. नावान्यामागनुपलब्धम् । विपनामाधान. प्रकारस्तु-कमिति सुखार्थकमव्ययम् , तस्य बलं साधनमिन्द्रियमिति । ७. पुणतीति पुरण । शुभ कर्मणि । गुपधेति कः । पुणमर्हति पुण्यम् । “तदर्हति"। पा० ० ५।१६६३ । इति वा । नानि पयते चेत्यन्यत्र । ८. का. उ० सू० ३।४ । ९. श्लोकोऽयं विष्णुपुराणस्थलेगोलिदिल नमः क्षी० स्वा० भाष्ये १११११३ 1 अमरकीतिविरचितभाप्योपेता भगत्येदं भागं भागमेव भागधेयम् । 'नामरूपभागेभ्यो धेयः" | सत्समीचीनं क्रियते (स्म) सत्कृतम् । अघमंहश्च दुरितं पाप्मा पापं च किल्विपम् । वृजिनं कलिलं ह्येनो दुष्कृतम् दश पापे । न जहाति प्राणिनम् अधम् । ग्रंहति गच्छति नरकादिकमनेन अंहः । सान्तम् । दुरितम् । दुर् सौत्रोऽयं धातुः । पाति सुगतेरियति पाप्मा।' पुसि । “सर्वधातुभ्यो मन् ।" पाति सुगते- रियति पापम् । ४"पातेः पः" । निन्यत्वेन कल्यते मुहुर्मुहुः, किरति सङ्गतिं वा किल्विपम् । "किल्विपा" व्यथिपो' एतौ टिपप्रत्ययान्तौ निपात्येते । वृज्यतेऽपनीयतेऽनेन वृजिनम् । कलयति कलिलम् । "कलेरिलः" । एति गच्छति [सुखम्] अनेन एनः । सान्तम् । दुष्क्रियते स्म दुप्कृतम् | तमः । कल्कम् । १० कल्मपम् । अशुभम् । प्रतिकिट्टम् । पङ्कम् । किण्वम् । मलः । अनेकार्थे । तजयी जिनः ।। १३०॥ तस्य पापत्य जयी तजयी । अघजयी । दुरितजयी। पापजयी । इत्यादीनि जिनस्य नामानि भवन्ति । सदनं सद्म भवनं धिष्ण्यं वेश्माथ मन्दिरम् । गेहं निकेतनागारं निशान्तं निवृतं गृहम् ॥ १३२ ॥ वसत्यावसथावासं स्थानं धामास्पदं पदम् । निकायं निलयं पस्त्यं शरणं विदुरालयम् ।। १३३ ॥ चतुर्विंशति है। जनाः सीदन्यत्र सदनम् । क्लीवे। सीदन्ति सुखं गच्छन्त्यत्र सम । “सर्व- धातुभ्यो मन्" प्रायेण । भवति भूतान्यत्र भवनम् । धिप शब्दे । देधेष्टि शब्दं करोत्यत्र धिण्यम् । "धिपेयंक' प्रत्ययो भवति । विशन्त्यत्र वेश्म । नान्तम् । माद्यन्ति जना अत्र मन्दिरम् । स्त्री- २० क्लीवे । मन्दिरा । गेहः सौत्री निवारणग्रहयोः। गेहति शीतवातातपादिकं निवारयतीति गेहम् । गृहाति वा गेहम् । “गेहे ५१त्वक्" । सुखं निकितन्ति जानन्त्यत्र निकेतनम् । अङ्गन्ति गच्छन्त्यत्र श्रागारम् अगारं च । निशाम्यन्त्यत्र निशान्तम् । नित्रियते अाच्छाद्यते निवृतम् । गृह्णाति नरेणोपार्जितं धनं गृहम् । वसनं वसतिः । श्रावसन्त्यत्र जना श्रावसथम् । 'श्रा समन्तादुप्यतेऽत्रावासः । स्थीयते जनेनात्र स्थानम् । दधाति धनादि धाम । नान्तम् । अदन्तं च धामम् । क्लीवे । श्राप (प)द्यतेऽत्रास्पदम्१४। पद्यते २५ गम्यते पदम्। निचीयतेऽसौ निकायः । “१५शरीरनिवासयोः कश्चादेःघञ् । निलोयते अाश्लिप्यते (श्रत्र) निलयम् । पसिः सौत्रो निवासे । जनाः पसन्ति वसन्त्यत्र पस्त्यम् । वस्ती वासे साधु वस्त्यम् । वस्ती १२ । १. पा० सू० ५।४।३५ (वार्तिकम् । २. अयते गच्छति दानादिनाऽघम् । "अघि गतो' । पचायच । आगमशास्त्रस्यानित्यत्वान्न नुम् । ३. दुष्टमितं गमनमनेनेति रामाश्रमः । ४. का० उ० मू० २१५५। ५. “किल्विपाव्यथियौ' का० उ० सू० १।२२। ६. "वृजी वर्जने ।' "वृजे: किच्चेतीनच् । पृज्यते वृजिनमित्यपि । ७. कलयति जनयति दुःखमिति शेषः । ८. का० उ० सू० ४।२८ । ६ का० उ० सू० ३६०। १०. "तिमिरुधिमदिमन्दिचन्दिवधिरुचिशुषिभ्यः किरः” का० उ० सू० १।२३ । ११. का० स० ४।२।६०। इति निर्देशाद् गेह इति निपातः । १२. श्रा अङ्गति अङ्गयते वाऽत्र बाहुलक अारप्रत्ययः । 'अगि गतो" आपूर्वः । नलोपश्च । १३. निशाया अन्तोत्रेत्यन्यत्र । निशायाम् अम्यते गम्यते स्मेति रामा- श्रमः । "अम गतौ"। क्तः । १४. "श्रास्पदं प्रतिष्ठायाम्" पा० सू० ६।१।१४६। इति मुट्। १५ का०स० ४१५१३५॥ १६. अपस्त्यायन्ति सङ्वीभवन्त्यत्र पत्यम् । “स्त्यै शब्दसङ्घयोः" ।
नासमाला ६७ - वासे साधु वस्त्यमिति श्रीभोजः । शीर्यते हिंस्यते शीताद्यत्र शरणम् । पालीयते जनेनात्रालयः । पुंसि । विदुः कथयन्ति । पुरम् । कुलम् । संस्त्यायः । खेयं खातं च परिखा प्रयः परिखायाम् । खनु अवदारणे । खन् । खन्यते खेयम् । “पात्खनोरिच्च” यप्रत्ययो नकारत्येकारः । “3 अंवर्ण इवणे ए" अवर्णे वर्णयोरेकारः । खन्यते [स्म खातम् । परिखायते परिखा। ५ वर्ग स्याद्ध लिकुट्टिमम् । द्वौ प्राकारे । शुल्कादिकं वपन्त्यत्र वरम् । धूल्याः कुट्टिमं धूलिकुट्टिमम् । वद्धभूमिकम् । धूलिकुट्टिमम् । प्राकारः परिधिः सालः त्रयो दुर्ग। प्रकुर्वन्ति तमिति प्राकारः४ । "श्रकर्तरि च" कारके संज्ञायाम" पञ् । परि १० समन्ताद् धीयते परिधिः । श्यति तनूकरोति स्वनगरपर्यंतं शालं सालं च । प्रतोली गोपुराकृतिः ॥ १३४ ॥ द्वौ विशिखायाम् । प्रविशन् जनः प्रतोल्यते परिमीयतेऽत्र प्रतोली। गोप्यते रक्ष्यते गोपुरं तस्याकृतिः गोपुरारुतिः। प्रासादसौधहाणि १५ प्रयः सोधे । प्रासादश्च सौधं च हयं च प्रासादसौधहाणि । प्रसीदन्त्यस्मिन्नयनमनासीति प्रासादः । “अकर्तरि च कारके संज्ञायाम'। सुधायां लिप्तायां भवं सौधम् । चन्द्रकरान् परति हर्म्यम् । नियूँहो मत्तवारणः । द्वौ अपाश्रये । निव्यूह्यते निय॒हः । मत्ताः प्रमादिनः पतन्तो वार्यन्तेऽनेन मत्तवारणः । वातायनं मतालम्बम् द्वौ गवाक्षे । वातस्यायनं मार्गों वातायनम् । उभयम् । मतमभीष्टम् मालम्बम् मतालम्पम् । जालकम् । जालम् । आलम्व्यसुखमासनम् ।। १३५ ।। राशामवष्टम्भे द्वौ । श्रालम्ब्यस्य अवलम्बनस्य सुखम् श्रालम्ब्यसुखम् । सुखेनात्यते श्रासनम् । २५ समः सवर्णः सज्ञातिः सदृक्षः सदृशः सदृक् । तुल्यः सधर्मरूपश्च तुला कक्षोपमा विधा ॥ १३६ ॥ १. यद्यपि मूले वस्त्यशब्दो नास्ति, तथापि पाठभेदात् “निशान्तवस्त्यसदन" २१२१५॥ इत्यमरे वस्त्यशब्दपाठात् टीकाकृता तदपि विगृहीतम् । २. का० स० ४।२।१२। ३. का० म.० ६।२।। ४. प्रक्रियते इति कर्मणि घञ्। इति रामाश्रमः । ५. का० स० ४।५।४।६ परितो धीयते वेट्यने नगरमनेनेति रामाश्रमः । ७. दन्त्यपाठे तु सल्यते सालः । “सल गती"। घन । ८ पुवान्न गो भटरक्षितम् । तस्याकृतिरिवाकृतिर्यस्यास्तत्सदृशीत्यर्थः । ६. का. सु. ४।६।४। १०. नुवा लिए। शेपे ऽण् । ११. हरति मनांसि हर्यमित्यन्यत्र । प्रासादसौधहाणामंत्राविशेपेशीपादाना । पर ललित न विस्मर्त्तव्यः । तदुक्तम्-"हादि धनिनां वासः प्रासादो देवन्दजान् । सौधोली नमा रा२।१०। इत्यमरः ।
- १० ६८ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपता 'एकादश समान । समानं मातीतिः समः । समानः सहशी वर्णात्य सवर्णः । समाना शातिः अस्य सज्ञातिः । समान इव दृश्यते । लक्षः । “समानान्ययोश्चः' सक् प्रत्ययः । शस्य च पत्वम् । 'पढी:४ कस्से' पस्य कत्वम् । "कप्रयोगे" क्षः" । समान इव दृश्यते सहाः । समानान्ययोश्च टक्प्रत्ययः । अमात्रः । कानुबन्धत्वाद्गुणनिषेधः । टानुवन्धत्वान्नदादी पब्यते । “हक दृश" इति समानस्य ५ सभावः । समान इव दृश्यते सदृक् । " समानान्ययोश्च" कि । तुलया सन्मितन्तुल्यः । सम नो धर्मा यस्य सधर्मः । समानं रूपं यस्य स सरूपः । "" रूपनामगोत्रस्थानवर्णवयोववन्मुइति समानस्य सादेशः । तोलनं तुला । ''तोलेक्च" अप्रत्ययः । श्रीकारन्यांकारश्च । कपति कक्षा। उपमा। विधा । प्ररव्यः । प्रकाशः । प्रतिमः । सन्निभः । प्रकारः। विन्मान्यो विद्यमानश्च गुरुस्थानाम्बुजाननाः । सिंहादीनि च पर्यायमुपमानेषु योजयेत् ॥ १३७ ॥ योजयेत् जोध्येत् । पर्यायं विशेषणम् उपमानेषु । वित्समः । वित्सवर्णः । वित्स- जातिः । वित्सदृक्षः । वित्सदृशः । वित्सदृक् । वित्तुल्यः । वित्सधर्मः । विसरूपः । वित्तुल्यः । विकाः । अनेन प्रकारेण मान्यविद्यमानगुरुस्थानाम्बुजाननसिंहादिशब्दा उपमानेषु प्रयोजनीयाः । व्यपदेशो निभं व्याजः पदं व्यतिकरश्छलम् । १५ छन सप्त कैतवे । व्यपदेशनं व्यपदेशः१५ 1 पुंसि । निर् अतिशयेन भाति निभम्१२ व्यज्यते व्याजः। पुंसि । पद्यते गम्यते कैतवेन पदम् । व्यतिकरणं व्यतिकरः । छलति छलम् । क्लीव छादयति । नान्तम् । क्लीवम् । कैतवम् । कपटन् । कूटम् । उपाधिः । मिपम् । लक्ष्यम् १६ ! वृत्तान्तमुत्प्रेक्षा शब्दमन्यं च निर्णयेत् ।। १३८ । दो वार्तायाम् । वृत्तस्य चरितस्यान्तोवृत्तान्त. उत्प्रेक्षणम् उत्प्रेक्षा । वार्ता । प्रवृत्तिः । उदन्तः। उम५ २० १. अत्र समादयः तरूपान्ता नव समाने । तुलाकक्षोपमा विधा इति चत्वारस्नुलायामिति पार्थक्येन वक्तव्येऽपि सहशाऽभिप्रायेण तदाह । कचिदभिवेति पाठः । परन्तु तुलार्थकविधाशब्दोऽत्र युक्तः । एवं च त्रयोदश इति वक्तव्यम् । अभिधापाठे तु "उपमाभिधा" इत्यनयोरुपमावाचकत्ते सति “एकादश" इति सङ्गच्छते । २. मकारे परे समानस्य सादेशविधायकवचनाभावात्समानं मातीति विग्रहश्चिन्त्यः । "सम वैलव्ये" समति वैक्लव्यं करोतीति समः । समः समत्य वैक्लव्यं करोत्येव । पचाद्यच् । ३. "कर्मण्यु पमाने त्यदादी दृशष्टक सको च" का० सू०४।३१७५। यत्र वृत्तिः । ४. का० स ० ३।८।४।५. का० ० . पू०२५६ । सू० ६. “समानान्ययोश्चेति वक्तव्यम्" इति वार्तिकरूपणोपलभ्यते ।२।६०। काशिकायाम् । कातन्त्रसूत्रन्तु नैतादृशमुपलब्धम् । वृत्तिरपीदृशी कापि नास्ति । काशिकायां टीकोक्तवचनसाम्ये पि प्रत्य- यत्वरूपसाम्यं नास्ति । ७. "गह शहक्षेपु समानस्य सः" का० मू० ४।६।६५। ८. का० सू० ४ १२।७५॥ वृत्तिः । ६. "ज्योतिर्जनपदरात्रिनाभिनामगोत्ररूपस्थानवर्णवयोवचनबन्धुपु” इति पा० स० ६।३८५] १०. वाचनिकं नैतत्. अतुलोपमाभ्यामिति ज्ञापितमिति प्रतिभाति । ११. व्यपदिश्यते व्यपदेशोऽतद्रूपस्य तादृप्यम् । १२. नि नितरां तदिव भाति निभम् इत्यन्यत्र । १३. व्यजन्ति विक्षिपन्ति अनेन व्याजः । “ग्रज गतिक्षेपणयों:' । घन् । १४. छ्यति छिनत्ति वस्तुतत्त्वमनेनेति वा । छो छोदने । कल प्रत्ययः । १५. छाद्यते रूपमनेन छद्म । मनिन् । हृत्वः । “छद अपवारणे" । चुरादिः । १६. लक्ष शब्दोऽप्ययम् । १७. वृत्तोऽनुत- धानीयो गवेषणीयोऽन्तः समाप्तिर्यस्येति रामाश्रमः ।
नाममाला ६१ , पशुपु १." बातः पूगः समाजश्च समूहः सन्ततिव्रजः ज्यूहो निकायो निकुरो निकुरम्बं कदम्बकम् ॥ १३६ ॥ ओघः समुदयः सङ्घः सङ्घातः समितिस्ततिः । निचयः प्रकरः पङ्क्तिः विंशतित्समूहे । वृणोति छादयति व्रातः। पूज्यते पूयते वा पूगः । संघीयते सपाजः १ घन् । सभूखते सम्यग ढौक्यते समूहः । संतन्यते सन्ततिः । व्रजन्त्यत्र ब्रजः । उभयम् । विशेपेण उह्यते व्यूहः । ५ निचीयते ऽसौ निकायः । कायश्च । निकीर्यते निकरः । समन्तानिकुरन्ति वदन्ति (छिन्दन्ति) निकुरवः । कुत्सितम् अम्बते कदम्बम् ।स्वार्थे के कदम्बकम् । द्वौ. क्लीवे । उह्यते योघः । “न्यवादीनां' हश्च धः।" समुदीयतेऽत्र समुदयः । समुदायश्च । संहन्यन्तेऽस्मिन्नवयवाः सङ्घः९ । संहन्यते संघातः । हन्तेर्घः । इण् गतौ सम्पूर्वः । समयनं समितिः। स्त्रियां क्तिः । तननं ततिः । निचीयतेऽसौ निचयः । १० उच्चयः । प्रचयः । सञ्चयः । प्रक्रियते प्रकरः । पचि विस्तारवचने । पञ्च । इदनुबन्धानां धातूनां नलोपो नास्तीति । पञ्चनं पतितः । स्त्रियां क्तिः । पशूनां संमजो व्रजः ॥ १४० ॥ पशूनां व्रजः समूहः समजः कथ्यते । अज क्षेपणे । अञ् सम्पूर्वः । समजनं समजः । “समुदोरम: अल। समीपास्यासमासनमभ्यर्ण सन्निधिं विदुः । अविदूरं च निकटमबलग्नमनन्तरम् ।। १४१ ।। नव समीपे । समाप्नोति समीपम् । अभ्युपेत्य चात्यते अभ्यासः । धन । प्रासद्यते रम श्रासन्नम् । अर्द गतौ याचने च । अर्द अभिपूर्वः। अभ्यर्दति स्म अभ्यएर्णः। निष्ठाक्तः । “सामीप्य भे::' नेट् । 'दाद्दत्य च" दकारतकारयोर्नत्वम् । “रष्ट०:४-धातोर्नकारत्य गत्वम् । " "तवर्गस्य०"निटा-२० नस्य णत्वम् । सन्निधीयते सन्निधिः। श्य(व)विदुनोतीति अविद्वरम् । “दुनोतेदी ५६ "टुनोतेरक प्रत्ययो भवति दीर्घश्च । टुद उपतापे । निकटति निकटम् । (नि) नास्ति कटो-स्येति व निकटः । केटे वर्षा-वरायोः । : अवलगति (स्म) अवलग्नः । न अन्तरम् अनन्तरम् । सनीडन् । समर्यादन् । बारात् । तदेशन । उनक- १. चेतनाचेतनसर्वसमूहे वातादयो विंशतिशब्दाः प्रयुज्यन्ते । अोघो दर्गा सन्तान नि वंशस्यावान्तरवर्गभेद इति द्रष्टव्यः । परन्तु व्यवहारे प्रयोगसाकमपि दृश्यते । २. "ज वो । साना प्रत्ययः । अन्यत्र तु प्रत्यते एकस्मिन् राशौ नियन्यते इति मुण्डमिक्ष इति प्यन्ताहतेन । कालोनित निर्देशाद् दीर्घः । ३. पूज्यते राशित्वेन मन्यते, पूयते जनसमुदायात् गशिभेदेन निर्वाच्यते वा पुनः । "छापूखडिभ्यः फित् । उ० सू० १२४। इति पूनः पूजो वा किद् ग प्रत्ययः । पृरायतेः पृगलामुले पनि स्थानिवत्त्वेन ण्यन्तात्कुत्वं दुस्साध्यम् । ४. "ज गतिक्षेपणयोः" । घम् । ५. "कुर : ग. लकादम्बच् । प्रत्योत्त्वे निकुरुग्ध इत्यपि । ६. प्राज्पूर्वाहतेर्वम् । "उए कि । ७. ८. सन्-उद्यूर्वकः " गतो धातुः । कालि रुनुयः । यदि सटा ... गणप्रशंसयोः" का सू० ४।५।६४। इति हन्तेईप्रत्ययो धादेशच । १०. कानु० ११५: । ...। आपोऽस्मिनिति विरहे समासः । असमासान्तः । “चन्तरूपसर्ग-योपत्तीरः । मानदपार मपि समीपम् । १२. का. सू०४।६।६७ । ६३. पा. स. १०...::.:.. १५. "तवर्गस्य पटवर्गारवर्ग:" का स्टू. ३८५। ६६. ला० ० ० ६५ । - ४।६१५७ ॥
७० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता एटम् । अन्यग्रम् । सन्निकटम् । श्रासन्नम् । जित्या हलिहलं सीरं लाङ्गलम् पञ्च हले। जि जये। जि। जीयते जित्या । " जयतेईलो क्यवेव" क्यम् । "धातोस्तोऽन्तः पानुबन्धे । “३स्चियामादा"। इलति हलिः | महलं हलिरुच्यते । भूमि हलति विलिखति हलम् । ५ सीयते वध्यते वरत्रया सीरम् । लङ्गति भूमिं गच्छति लागलम् । तत्करो बलः । । हलपर्यायतः करपर्यायेषु बलभद्रनामानि भवन्ति । जित्याकरः । इलिकरः । हलकरः । मीरकरः । लाङ्गलकरः । इलपाणिः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । रेवतीदयितो नीलवसनः केशवाग्रजः ।। १४२ ॥ १० त्रयो बलभद्रे । रेवत्या दयितो भर्ता रेवतीदयितः। नीलं कृष्णं वर्ण वसनं यस्य स नीलवसनः । केशवस्याग्रजः केशवाग्रजः । कालिन्दीकर्षणः । बलः । प्रलम्बघ्नः । अर्जुनः फाल्गुनो जिष्णुः श्वेतबाजी कपिध्वजः । गाण्डीवी कार्मुकी सव्यसाची मध्यमपाण्डवः ।। १४३ ।। वृपसेनः सुनिर्मोको दैत्यारिः शक्रनन्दनः । कर्णशूली किरीटी च शब्दभेदी धनञ्जयः ।। १४४ ।। सप्तदशार्जुने । अर्ज सर्ज अर्जने । अजति (कीर्तिम) अर्जुनः । “ऋकृतृवृञ यमिदार्यजिभ्य उन।" फल निष्पत्ती । फलतीति फाल्गुनः ! ""पिशुनफाल्गुनी" एतो उनप्रत्ययान्ता निपात्येते | जयतीत्येवं. शीलो जिष्णुः । “६ जिभुवोः स्नुक्" । श्वेता वाजिनो यस्य स श्वेतबाजी। कपिर्वानरो ध्वजे यत्य स कपिध्वजः । गां जोवतीत्येवंशीलो गाण्डीवो। कार्मुकं धनुरस्तीत्यत्य कार्मुकी। सव्ये साचयतीति 'लव्यसाची। मध्यमश्चासौ पाण्डवः मध्यमपाण्डयः । युधिष्टिरभीमयोः सहदेवनकुलयोमध्येऽर्जुनः, तेन मध्यमपाण्डवः कथ्यते । वृपं सिनोति बनातीति वृपसनः । सुनिमुच्यते शत्रुभिः सुनिर्माकः । दुःसा- ध्यत्वात् । दैत्यत्यारि: शत्रुदैत्यारिः। शकस्येन्द्रस्य नन्दनः शक्रनन्दनः अर्जुनः कथ्यते । यमस्य पुत्री युधिष्ठिरः । वायोभीमः । इन्द्रस्यार्जुनः. अश्विनीकुमारयोनकुलसहदेवी पुत्र! । असत्यमेवं तत् । कर्णे शूलं विद्यते यस्यासो कर्णशूली। किरीटं शेखरं विद्यते यस्यासौ किरीटी। शब्दभेदोऽस्त्यत्य शब्दभेदी । - " २० १. का० सू० ४।२।२६ । अत्र दुर्गबृत्तिः । २. का० सू० ४।१।३०। ३. का० सू० २।४।४६ । ४. का० उ० सू० २१६० । ५. का० उ. सू० २६१ | "फल निप्पत्तौ" उनप्रत्ययो गोऽन्तश्च । फलति कर्मसिद्धिमयते इत्यर्थः । ६. का० सू० ४।४।१८ । ७. गां जीवयतीति बोध्यम् । विराटनगरे पाण्डवानुसन्धानाय भीष्मकर्तृकगवाक्रमणेऽर्जुनद्वारारक्षणस्य महाभारतोक्तत्वात् । गाण्डीवमिति अर्जुनधनुषो नाम, तदस्त्यास्तीति गाञ्जीवी इति मत्वर्थीय इन् । तदुक्त कल्पद्रुकोपे "गाण्डीवो गाण्डिवो स्त्रियाम् । गाजीवो गालिवोऽप्यत्री" इति ११५/४४। मूले गाण्डीवीशब्दस्तु गाण्डी ग्रन्थिरत्यास्तीति गाण्डीवम् | "गाण्ड्यजगात्संज्ञायाम्” पा० सू० ५।२।२१० । इति मत्वर्थीयो वः । तदत्यास्तीति मत्वर्थीय इन् । ८. सन्येन वामपाणिना-पि सचते वाणान वर्पतीति सव्यसाची। वस्तुतस्तु गाजीवं नाममाला -- ५ फेचित् शब्दवेदीति पठन्ति इत्यपि स्यात् । जि जये । धनपूर्वः । धनं जितवान् धनञ्जयः। "नाम्नि" खः । “२नाम्यन्त०" गुणः । “ए'अय्" । "हस्वा रुषोमोन्तः।" धनञ्जयेति कर्नामाभिधानमपि ज्ञातव्यम् । स कथम्भूतः ? शब्दभेदी । श्रतः परः कोऽपि नास्ति । पाण्डवनाम मिपेण स्वनाम कथितमस्ति । कुरुकीचकयोरी वायुपुत्रो वृकोदरः । कुरुवैरी। कीचकवैरी । कुरुशत्रुः। कीचकशत्रुः । कुरुरिपुः । कीचकरिपुः । अनिलतुतः । पवनात्मजः । इत्यादीनि. भीमस्य पर्यायनामानि ज्ञातव्यानि। वृकोऽरण्यश्वा तद्वत् उदरं यत्य स वृकोदरः । समवर्ती यमः कालः कृतान्तो मृत्युरन्तकः ॥ १४५ ॥ षड् यमे । सर्वेषु समं तुल्यं वर्तते समवर्ती । नान्तः । रिपौ मित्रे च समं वर्तते इति वा । यम- यति निगृह्णाति प्रजां यमः। यमलजातत्वाद्वा । कलयति जन्तून् विनाशहेतुत्वेन कालः । कृतोन्तो विनाशो येन स कृतान्तः । म्रियतेऽनेनेति मृत्युः । “भुजिमृङोः युक्त्युकौ"। अन्तं करोतीति अन्तकः । १० शमनः । प्रेतपतिः । पितृपतिः। कीनाशः। वैवस्वत: । कालिन्दीसोदरः । धर्मराजः । दण्डधरः । हरिः । दक्षिणापतिः । श्राद्धदेवः । तदात्मजो जातरिपुः कौन्तेयो भरतान्वयः । कौरव्यो राजयक्ष्माऽसौ सोमवंशो युधिष्ठिरः ।। १४६ ।। सप्त युधिष्ठिरे । तस्य धर्मस्यात्मजस्तदात्मजः । समवर्तिपुत्रः । यमोहहः । कृतान्तपोतः । मृत्युनन्दनः। अन्तकदारकः । इत्यादीनि युधिष्ठिरपर्यायनामानि ज्ञातव्यानि । जातस्य स्वगोत्रत्य रिपुः ''जातरिपुः । कुन्त्या अपत्यं पुमान् कौन्तेयः । भरतोऽन्वयोऽस्य भरतान्वयः । कुरोरपत्यं पुमान् कौरव्यः। राजभिर्नरेन्द्र यक्ष्यते पूज्यते राजयक्ष्मा। १५सर्वधातुभ्यो मन्" । राजलक्ष्मा चेति केचित्पठन्ति । सोमो वंशोऽस्य सोमवंशः । युधि संग्रामे तिष्ठतीति युधिष्ठिरः । श्वेतार्जुनो शुचिः श्वेतो वलक्ष सितपाण्डुरम् । शुक्लावदातं धवलं पाण्डुः शुभ्रं शशिप्रभम् ॥ १४७ ॥ त्रयोदश श्वेते । श्वेतते श्वेतः१२ । अय॑तेऽर्जुनः " 3 । शोचतीति शुचिः श्यायते श्येतः१५ । अवलक्षयति अवलक्षः । वलक्षश्य ६ । सिनोति बध्नाति(मनः)सितः । पण्डते याति मनोऽत्र पाण्डुरः । अथवा "नगपांशुपाण्डुभ्यो रः" पाण्डुत्वमत्यात्तीति पाण्डुरः। पाण्डुः । पाण्डरः । शोकाति मनोऽस्मिन् शुक्लः। शुक गतो । अवदायते शोध्यते अवदातः' धवति धवलः । पण्डते याति २५ १. "नाग्नि तृभाजधारितपिदमिसहां संज्ञायाम' कासू० ४।६।४४ । २. दा० ३।५।१। ३. का० सू०१।२।१२ । ४. का० सू० ४.१ ।२२ । ५. धनञ्जयावरं कधिचन्दर्भ वेना नास्तीत्यर्थः । ६. वृको भीमजठराग्निः स उदरे यस्येत्यपि । कलयतीत्यस्य स्थाने मालपतीति वक्तव्यम् । ८. का० उ० सू० २।३४ । ९. अन्तारोत्यन्तयति, अन्तयत्यन्त इति पावन । १०. कोशान्तरप्रमाणान्महाभारतादिकथासंवादात् महाकविव्यवहाराच नातरिपुः इनिच्छदोन म । न जाता रिपवो यस्येति युधिष्ठिरस्य 'अजातशत्रुः" इति संज्ञा । तदुक्तम्-माता शल्पाधिको युधिष्ठिरः" । अभि० चि० ३।३०८ । ११. का.उ.सू. ४१२८ । १२. “श्विता द" । बालिका पचायच् । १३. अद्यते सगृह्यते जनैः । १४. शुन्युज्ज्वलवस्तूनां सर्वसम्मानपत्यं लोकानुनिलः शोचति निर्मलीभवति शुचिः । शुच दीप्ती । म् । १५. वैः ली। पायो । नीलादिवर्णविशुद्धत्वम् । “श्याभ्यामितन्" । पा. 3. सू० १९३ । इतन् । १६.रला लक्ष्यते वा अन्यवर्णापेक्षया उत्कृष्टत्वेनेति । वष्टि भागुरिल्लोप त्यल्लीपर। ५. मा. दैप शोधने । कर्मणि क्तः । १८. धुनोत्यशोनाम् इति ऐमचन्तः । धापति मनोज ! कलच्, हत्वश्चेतीति रामाधमः । । शुच शोके।
७२ अमरकीतिविरचितमाप्यापेता मनोऽस्मिन् पाण्डः । । शोभते शुभ्रः । शशिन इव प्रभा यत्य शशिप्रभम् । गौरः । हरिणः । कृष्णं नीलासितं कालम् चत्वारः कृष्णे । वर्णान कर्पति कृष्णः। नीलति नीलम् । उभयम् । न सितम् असितम् । कं सुखमालाति कालः | कालयति वा मनः कालः । मेचकम् । श्यामलम् । श्यामं च । पालाशम् । ५ हरित् । शिखिकण्ठाभः इति दुर्गः । घूमं धूम्रमलिप्रमः । विशिष्ट कृष्णे त्रयः । धूनाति धूमः । धूनोत्यभिभवति रागं धूम्रः। धूमलश्च । अलि- वत्पमा यस्य सोलिप्रमः । तमोऽन्धकार तिमिरं ध्वान्तं संतमसं तमम् ॥ १४८ ॥ ताम्यति मन्दीभवति चक्षुरत्र तमः । सान्तम् । क्लीवे । अन्धं दृष्टयु पयातं करोतीति अन्ध- कारम् । तिम्यते अाच्छाद्यतेऽनेन तिमिरम् । कान्तारे ध्वन्यते ध्वान्तम् । सम, सम्यक् प्रकारेण तमः सन्तमसम् । ताग्यतीति तममित्यदन्तम् । क्लोवे । अवतमसम् । अन्धतमसम् । तमिस्त्रम् । भूछाया भवायम् । दिगम्बरम् । लोहितं रक्क मातानं पाटलं विशदारुणम् । पड् रक्ते । रोहति जायते शोभाऽत्र लोहितः' । रज्यते रक्तम् । श्राताम्यते कादयते १५ कणेपु ताम्रः पाच्यतीति पाटलः । पाटेरलः । विशीयते विशदः । ऋच्छति इयर्य- (ति वाs) रुणः। पीतं गौरं हरिद्राभम् हरिद्रारक्तवर्ण त्रयः । पीयते मनोऽनेन पीतम्'५ । गाते गच्छति वर्ण विशेषः गौरः१२ । तथा च नाममालायाम् १3-"गोरः श्वेतेऽनणे पीते विशुद्ध चन्द्रमस्यपि । विशदे । हरिद्रावत् आभा २० छविर्यस्य हरिद्रामः । पालाशं हरितं हरित् ॥१४॥ हरिट्वर्ण त्रयः । पलाशस्य वर्णस्यायं पालाशः । पलाश इत्याह ४-'राक्षसे । किंशुके वणें पलाशाख्या । हरित्यपि" । हरति चित्तं हरितम् । हरित् । १. पन्यते स्तूयते पाण्डुः। "पनेदीर्घश्च' इति डुः । इति हेमचन्द्रः । २. कर्पति मन इति रामाश्रमः । कृपेर्वर्ण इति नक् । ३. “णील वर्ण" | नाम्युपधेति का० सू० कः । ४. कालयति मन इत्यन्यत्र । ५. अयं पाठोऽत्र न युक्तः । “पालाशं हरितं हरित' इति पद्यस्य टीकायामग्रे द्रष्टव्यः । ६.कृष्ण- मिश्रितलोहिते धूम्रधूमलशब्दाविति वैशिष्वार्थः । तदुक्तम्-"धूम्रधूमलौ कृष्णलोहिते' इत्यमरः । १।५।१६ । ७. कान्तारप्रदेशादिपु तमसोऽविच्छिन्ननिवेशात्तदाह -"कान्तारे ध्वन्यते" इति । सर्वरोगहरतया ध्वन्यते ध्वान्तमिति हेमचन्द्रः । ८. अत्र द्वौ रक्ते, त्रयो विशदारुणे, इति वक्तव्यम् । विशदं च तद्रूपम्, श्वेत- विशिष्टरक्तमित्यर्थः । तदेव पाटलम् । तदुक्तम्---"श्वेतरक्तस्तु पाटलः” इत्यमरः । ६. "रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे" | "नहे रश्च लो वा" । पा०3०सू० ३।१४ । इतीतन् , लत्वं च वा। १०. रञ्जति स्म रज्यते स्म वा रनमित्यन्यत्र । ११.पीयते वर्णान् पीतः । “पीङ् पाने" । दि०। इत्यपि । १२.गूरते उद्युक्ते मनोऽस्मिन् गौरः । “गरी उद्यमने"। ऋजेन्द्र इत्युणादिसूत्रेण व्युत्पादितः । "गूयते गौरः" इति हेमचन्द्रः । “गुड संश्लेषणे । १३. अने० स० २१४२५। १४. शा० को० ५२२ ।
१० नाममाला ७३ - । । 1 । १५ हरिणी लोहिनी शोणी गौरी श्येनी पिशङ्गन्यपि । षड रक्तवणे" । "श्येतैतहरितलोहितेभ्यस्तो न:२" अनेन ईप्रत्यये तकारस्य नकारश्च । हरिणी। तथा च हलायुधे-"शुकामा हरिणी स्मृता।" हरिता च । रोहति जायते शोभात्र लोहितः । रलयोरेक्यम् । "येतैतहरितलोहितेभ्यस्तो नः" अनेन ईस्तकारस्य च नकारः । लोहिनी जाता। हलायुधे- "जपाकुसुमसंकाशा लोहिनी परिकीर्तिता" शोणते शोणी। गाते गौरः। नदादित्वादीः । गौरी। श्यायते गच्छति श्रियं श्येनी। हलायुधे"--"श्येनी कुमुदपत्रामा ।" श्येना च । पेशति पिशङ्गः । ईप्रत्यये पिशङ्गी । सारङ्गी शवरी काली कल्मापी नीलपिजरी ॥१५०॥ षट् पञ्च वर्णे । सारयति गमयति [ बहुवर्णान् ] सारङ्गः । ईप्रत्यये सारङ्गी। शवति याति वर्गान् शवरः शवलश्च । ईप्रत्यये शवरी। कालयति कालः । ईप्रत्यये काली । कलयति वर्णान् कल्मायः। ई: कल्माषी। नील गन्धे । नीलति नीलम् । ईप्रत्यये नीली । पिजति विजरः । ईप्रत्यये विजरी। परागं मधु किञ्जल्कं मकरन्दं च कौसुमम् । पञ्च कुसुमरेणौ । परं प्रकर्षमग्यते सम्भाव्यते पुष्पेषु परागः । उभयम् । मन्यते सम्भाव्यते पुप्पे मधु । उभयम् । किं जल्पति किअल्कम् । मङ्कयते मण्डयते पुष्पमनेन मकरन्दम् । कुसुम- स्येदं कौतुमम् । उपचाराद्रजः पांशुरेणुधूलीश्च योजयेत् ।।१५१॥ चत्वारो धूल्याम् । रंज रागे । रजत्यनेन रजः । "उषिरंजिशृभ्यो यण्वत् निष्क धाक पशि नाशने । पंशयते पांशुः । “१२वहिरहितलिपंशिभ्य उण् ।" रीङ् गतौ । रीयते रेणुः । 'दाभारीभ्यो नुः" । धूयते धुनोति दृष्टिं वा धूलिः । उपचारात् पुष्परजः । सुमनःपांशुः । पुष्परेणुः । लतान्तधूलिः । प्रसवरजः । प्रसूनरेणुः। इत्यादोनि पुष्परजो नामानि ज्ञातव्यानि । कलङ्कावद्यमलिनं किञ्जल्कं लक्ष्म लाञ्छनम् निवोधमधमं पङ्कमलीमसमपि त्यजेत् ॥१५२॥ १. अन षट्स्रीलिङ्गवाचके तत्तवर्णविशिष्टे इति वक्तव्यम्, न तु रक्तवर्णे । तत्तवर्ण- भेदो यथा---हरिणी शुकाभा, लोहिनी जपाकुसुसङ्काशा, शोणी कोकनदच्छविः, गौरी हरिद्राभा, श्येनी कुमुदपत्राभा, पिशङ्गी पीतरता । २. “येतैतहरितभरितरोहिताद् वर्णान्तो नः" हे श०२४१३६ १ : "पेनी कुमुदपत्राभा शुकाभा हरिणी स्मृता। जपाकुसुमसाशा रोहिणी परिकीर्तिता।" इति पूर्णः श्लोषः । ३. इलायु० ४१५३ । ४. हला० ४।५३ । ५. हला० ४/५३ । ६. अत्र पट् नीति काबरे तर वर्णविशिष्टे इति वक्तव्यम् । तद्भेदो यथा-सारङ्गीशम्बरीकल्याण्यश्विनवणः। काली नील्यायमित । पिजरी पीतरक्ता । ७. अब परागकिज्ञल्कशब्दौ पुष्परजोवाचकौ, मधुमकरन्दशब्दो पुपरसबाची काम शब्दस्तदुभयवाचकः, इति विवेकः । ८. पराग ति परमुत्कर्षमगति वैति विहः मारुः । ९. किञ्चिज्जलति, “जल अपवारणे"। बाहुलकाकः । किशिजलति जडीमति इति नीचा ! १०. मकरमपि धति कामजनकत्वान्मकरन्दः । "दो अवखण्डनें" । कः ! मकरमपि सन्दति वादिया। "दि बन्धने" । कर्मण्यम् । शकन्भ्वादिः । इति रामाश्रमः । ११. का. स. ४१५६ । :: : सू० १।३। १३. का० उ० सू०.२७ । । २० ৩৪ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता । - दश कलङ्के । कल्यते लक्षणेन कलङ्कः । न वद्यं समीचीनम् अवद्यम् । मल्यते धार्यतेऽपयशो- ऽनेन मलिनम् । किं कुत्सितं जल्पति किअल्कम् । लक्षयति परं नान्तम् लक्ष्म | लाञ्छयतेऽनेन लाञ्छनम् । निबुध्यते निवोधम् । नत्र पूर्वी धात्र । न दधातीत्यधमः । “धर्मसीमाग्रीमाधमाः" । "पञ्च्यते पकम् । मलिना कदर्येण मस्यते परिमाणीक्रियते मलीमसः । तं त्यजेत् सत्पुरुपः । जनोदाहरणं कीर्तिं साधुवादं यशो विदुः । वर्णं गुणावलिं ख्याति सप्त यशसि । जनानां लोकानामुदाहरणं, जनेन लोकेनोदाहियते वा जनोदाहरणम् । कृत संशब्दे । कृत्-"चुरादिश्च ।" इन् । कृतः कारिते इर् | किर्ति जातः । नामिनोर्वा' । कीर्ति जातम् । कीर्तनं कीर्तिः । कीतीपोः क्तिश्च १०" क्तिप्रत्ययः । कारितलोपः । त्रिपु व्यञ्जनेषु सञ्जातेषु स्वजातीयानां मध्ये १० एकव्यञ्जनलोपः । एकस्तकारो लुप्यते। सिः । रेफः । साधूनां सत्पुरुषाणां वादः साधुवादः । कुशलो योग्यो हितश्च साधुरुच्यते । यज देवपूजादिषु । इज्यते यशः । “१ 'यजः शिश्च” अस्मादसन् प्रत्ययो भवति स च यण्वत् । जस्य शिः । इकार उच्चारणार्थः । वय॑ते साधुजनेन वर्णः । गुणानामवलिः श्रेणिः गुणावलिः । ख्यायते ख्यातिः । श्लोकः । अभिख्या । समाख्या । अवघानं तु साहसम् ॥१५३॥ १५ साहसे द्वौ । अवधीयतेऽवधानम् । अवदानं च । साह्यते १२साहसम् । प्रेप्यादेशनिदेशाज्ञानियोगाः शासनं तथा । पडादेशे । प्रेष्यते इति प्रेण्यः । या समन्ताद् दिशतीत्यादेशः । निदिश्यते निदिशतीति वा निदेशः । श्राजानातीत्याज्ञा१४ । नियुज्यन्ते नियोगाः । शास्यते प्रतिपाद्यते शासनम् | शासु अनुशिष्टौ। सन्देशः प्रिययोः स्त्रीपुरुपयोः मुखवार्तायां सन्देशः । सन्दिशति १५ "सन्देशः । अमरसिंहनाममालायाम् ६- "सन्देशवागवाचिकं स्यात् ।” वार्ता प्रवृत्तिः किंवदन्त्यपि ।।१५४॥ त्रयो नवीनवार्तायाम् । वृत्तिलोकवृत्तं विद्यतेऽस्या वार्ता । “१"प्रज्ञाश्रद्धाऽर्चावृत्तिभ्यो णः" २० १. कं ब्रह्माणमपि लङ्कयति हीनतां गमयतीत्यन्यत्र । २. न वदितु योग्यमित्यवा गर्यम् । "अवद्यपण्यवर्यागडंपणितव्यानिरोधपु” इति यत् । ३. नात्र प्रमाणान्तरमुपलब्धम् । निबुध्यते निश्चयेन ज्ञायते कलङ्किजनोऽनेनेति करणे घन । कलकिनां राजशासनचिह्नितत्वदर्शनात् । ४. का० उ० सू० १२५३ । ५, पच्यते दुःखमनेन । पचि व्यक्तीकरणे विस्तारे वा । कर्मणि घञ्। ६. "मसी समी परिमाणे" | पुंसि संज्ञायां घः । यद्वा मलोऽस्यास्तीति "योस्स्नातमिस्र त्यादिना मत्वर्थीय ईयस् प्रत्ययः । टीकोक्तविग्रहश्चिन्त्यः । तत्र मलिमस इत्यापत्तेः । ७. का० स० ३।२।११। ८. कीर्तीपोः क्तिश्चेति निर्देशात् कृतः कारिते इर् । ६. "नामिनोर्वोऽकुछ रोय॑ञ्जने" का०सू० ३८।१४ | १०. का०सू० ४।५।८६ । ११. का उ० सू० ४१६० । १२. सहसि बले भवं साहसम् । १३. श्रादेशनम् अादिश्यते वेति विग्रहः । १४. अत्रापि अाज्ञायते अाज्ञानं वेति विग्रहः । १५. सन्दिश्यते इति कर्मणि घन न्याय्यः । १६. श्रम० को० ११६/१७ । १७. पा० सू० ५।२।१०१ ।
नाममाला स्त्रीक्लीबे वाः च । प्रवर्तते जनोऽनया प्रवृत्तिः । स्त्रियाम् । किं कुत्सितं वदत्यत्र किंवदन्ती । वृत्तान्तः। उदन्तः । कठोरं कठिनं स्तब्धं कर्कशं परुपं दृढस् । षड् दृढे । कठति कृच्छेण जीवति कठोरः२ । कठति कठिनः । स्तभ्नोति स्म स्तब्धः । कर्कः सोत्रोऽयं धातुः । कर्कति करोति निर्दयत्वं कर्कशः। परुष्यति कुप्यतीति परुषः । कुप ध रुष रोपे । ५ हह हि वृद्धौ । हति स्म दृढः । “४परिवृढदृढौ प्रभुबलवतोः।" क्रूरः। कक्खदः । खरः। चण्डः । निष्ठुरः । जरठः । मूर्तिमत् । मूर्तम् । प्रवृद्धम् । प्रौढम् । एधितम् । सर्वे त्रिषु । अश्लीलं काहल फल्गु निस्सारे वचसि त्रयः । न श्लीयते न श्लिष्यते सतां चित्तम अश्लीलम्" | वचनम् | कं शिरः आ समन्तात् हलति अशोभमानं करोतीति काहलम् । लोहलञ्च । लुहः सौत्रः । फल निष्पत्तौ । १० फलति फल्गुः । “रज्जुतकुंवल्गुफल्गुशिशुरिपुपृथुलघवः । कोमलं मृदु पेशलम् ॥ १५५ ॥ त्रयः कोमले । कौ पृथिव्यां मलते फोमलम् । मृद क्षोदे। मृनातीति मृदु । पिंशति पेशलम्११ । सुकुमारः। मृदुलम् । प्रत्यग्रं साम्प्रतं नव्यं नवं नूतनमनिमम् । १५ षड् नवीने । प्रत्यप्रगति प्रत्यग्रम् १२ । सम्प्रति भवं साम्प्रतम् । नूयते नव्यम् । नौति नवम्।४ । नूयते नूतनम् १५ । अग्रे भवम् अनिमम्१६ । 'पृथ्वादिभ्य इमन्वा" । अभिनवम् । १. कोऽपि वादः । किम्पूर्वाद् वदेरौणादिको झच् प्रत्ययः, झत्यान्तः । गौरादित्वान्डीम् । इति रामाश्रमः । २ "कठिचकिभ्यामोरः” का० उ० सू० ४३७ । "कठ कृच्छजीवने"। ३. वष्टि- भागुरिरल्लोपमित्यपेरल्लोपो नत्वपस्येति दीकोक्त विग्रहश्चिन्त्यः । रामाश्रमस्तु-"पिपर्ति पूरवति प्रलं बुद्धि करोति । "पृ पालनपूरणयोः" । "पृनहि” इत्यादिना उ० सू० ४।७५ । उपच् । इत्याए ।" पृणाति पूरयति परं कोपेनेति हेमचन्द्रः। ४. का० सू० ४।६।९५ । ५. न धियं लातीति अश्लोलम् । कात्ययः। कपिलकादित्वाल्लत्वम् । इति रामाश्रमः । न श्रीरस्यास्तीति सिध्मादित्वान्म- त्वीयो लः। ६. काहलोऽस्फुटवागिति हेमचन्द्रः । ७. फलति विशीर्यते इत्यन्यत्र । ८. का उ० र १।९। इत्युप्रत्ययः गश्च । ९. कौ पृथिव्यां मलते धारयति भियम् इत्यर्थः। “मल मल्ल घारते" पचायच् । परमेवं कुमल इत्येव सिध्यति । वस्तुतस्तु "कोमल' शब्दस्य सिद्धिः प्रकारान्तरेणैव साधनीया । कौतीति कोमलः इति विग्रहोऽभिधानचिन्तामणौ । काग्यते जनैः इत्यन्यत्र । १०. मृयते इति कर्मणि कु.- प्रत्ययो न्याय्यः। ११. पिंशत्येकदेशेन सर्व करोतीति औणादिकोऽलच् । रामानमस्तु-'पिश समा" पेशनं पेशः समाहितचित्तता, सोऽस्यास्तीति सिध्मादित्यादलच् इत्याह । पेशलशब्दस्य दक्षायों मः कोमलार्थो गौणः । तदुक्तम् -'दक्षे चतुरपेशलपटवः सूत्थान उपश" इत्यमरः । "दक्षस्तु पेशलः।" इति अभिः चि० ३।४८ । १२ "अन गौ। उः । तिनमानोति चौरवामि- रामाश्रमौ । प्रतिगतमामनेनेति हेमचन्द्रः। १३. 'णु स्तवने"। बचो यत्। १४. पने नपा : प्रदोदप् । एवं कर्मणि विग्रहो युक्तः । १५. नवमेव नूतनम् । “नवत्य नरादेशलनमा :: वा० ५।४।३० । इति तनप् प्रत्ययो नूरादेशश्च । इत्यत्र । १६. 'मादिशामियाः निमन नात्र पृथ्वादिभ्यः , इमन् , तस्य भावकर्मणोविधानात् पृथ्वादी पाटानावा! लागि । मन: निष्टरूपापत्तः । .
अमरकीर्तिविरचितभायोपेता १० नूत्नश्च । सर्वे त्रिषु । पुराणं जठरं जीर्णं प्राक्तनं सुचिरन्तनम् ॥ १५६ ॥ पञ्च पुरातने । पुरा भवम् पुराणम् । जठ इति सौत्रोऽयं धातुः । जठतीति जटरम्' । जीर्यते जीर्णम् । प्राक् पूर्व भवम् प्राक्तनम् । सुष्टु चिरं भवं सुचिरन्तनम् । प्रतनम् । प्रत्नम् । भो रे हं हो यामन्त्रे एते शब्दा अामन्त्रणार्थे वर्तन्ते । भू सत्तायाम् । भोः । रेपृ लवगती । रे। हनु हिंसागल्योः । हं । हु दाने । हो । हि गतौ। हे। कश्चित् किञ्चन संशये । सन्देवार्थे द्वौ शब्दी वर्तेते । अविशेषाभिधाने चिच्चनशब्दो अवगन्तव्यौ । तथा चोक्तम्- "किमः सर्वविभक्त्यन्ताञ्चिञ्चनौ ।” कश्चित् । कश्चन । कौचित् । कौचन । केचित् । केचन इत्यादि । स्त्रियां काचित् काचन इत्यादि । क्लीवे किञ्चित् । किञ्चन । इत्यादि । "द्राक्षणेऽहाय" सपदि शीघ्रार्थे त्रयः शब्दा वर्तन्ते । निषेधे मा न खल्बलम् ॥१५७ ॥ निपेधे चत्वारः शब्दा वर्तन्ते । उच्चैरुच्चावचं तुङ्गमुच्चमुन्नतमुच्छ्रितम् । पड् दीर्घ । उच्चीयते उच्चैस् । अध्ययः । उच्चं च अवचं च उच्चावचम् । तुजति दैर्घ्यमादत्ते तुगम्' । उच्चीयते उच्चम् । उन्नमत्युनतम् । उच्छीयते उच्छ्रितम् । प्रांशुः१ ° तालव्यः । उदग्रम् दीर्घम् । यायतं च । नीचं न्यगातनं कुब्जं नीचैह स्वं नयेत्परम् ॥१५॥ पड् हृत्वे । निचीयते नीचम्। न्यञ्चतीति न्यक् । आतन्यते श्रातनम् १२। कौति व्याधि कुन्जः | २० १. यद्यपि जरठशब्दो जीर्णे प्रसिद्धो जठरशब्दस्तूदरे, तथापि कचिजठरशब्दोऽपि जीणे पठितस्तदाशयेनाह-जठत्तीति जटरमिति । यदुक्तम्-'जठरः कुक्षिवृद्धयोः" अने० स० ३१५५१ । २. भातीति भोस् । डोस्प्रत्ययः । यथा-भो भार्गव । रिणातीति रे । विच् । यथा रे चेटाः । हं, हो, इति पृथक्सम्बोधनद्वयमुक्तम् । परन्तु नाटकादौ 'हं हो' इत्यखण्ड एव सम्बोधने प्रयुज्यते ! हं जुहोतीति हहो। यथा हहो तिष्ठ सखे । हिनोति हे । "हि गतौ वृद्धौ”। विच् । यथा हे हेरम्ब । ३. अविशेपार्थ इत्याशयः। ४. द्राति द्राक् । "द्रा कुत्सायां गतौ” । बाहुलकात्कः । अकार इत् । स चासौ क्षणो द्राक्क्षणः । ५. बाह्नवनम् ग्राह्रायः "हनुङ् अपनयने" । घन । पृषी- दरादित्वाद् वस्य यः । ६. सम्पद्यते सपदि । “पद गती" । इन् । पृपोदरादित्वात्समोऽन्त्यलोपः। ७. तुजति दैध्य पालयतीति । धञ् । कुत्वम् । ८. उन्नमति स्म उन्नतम् । ९. ऊर्ध्व श्रयते उच्छितम् । १०. प्राश्नुते दैर्घ्य प्रांशु । “अशुङ् व्याप्ती”। ११. निकृष्टामों लक्ष्मी चिनोतीति । डः । इति रामाश्रमः ! निम्नमञ्चति, नीचैरस्त्यस्य वा । अर्श आदित्वादच । अव्ययानां भमात्र टिलोपः । १२. नात्र प्रमाण- मुपलब्धम् । १३. कौति व्याधिविशेषं ब्रूते सूचयति । को पृथिव्याम् उन्जति ऋजूभवति । "उन्ज अार्ज।।" अच् । शकन्थ्वादिः । कु ईपद उन्जमार्नवमस्य वेति रामाश्रमः । - नाममाला न्युजश्च । निचीयते नीचैस् । हसति ह्रस्वः । अमा सह समं साकं साई, सत्रा सजूः समाः। अष्टौ सार्धे । अमति अमा' । सह हन्ति गच्छति सह । सह मिनोति समम् । सह अकति गच्छति साकम् । सह ऋद्धम् सार्द्धम् । सह त्रायते सत्रा। जुपी प्रीतिसेवनयोः । जुम् सहपूर्वः। सह जुषते सजूः । विप्च वेर्लोपः। सि: । व्यञ्ज०२ । सिलोपः । समन्ति समाः । सह मान्ति वर्तन्ते ऋतको यासां वो। स्त्रीबहुत्वे । सर्वदा सततं नित्यं शश्वदात्यन्तिकं सदा ॥१५६।। षट् नित्ये । सर्वस्मिन् काले सर्वदा । “काले कि सर्वयदेकान्येभ्यः एष दा" । संतन्यतेस्म सततं” सन्ततम्' च । नियच्छति नित्यम् । श्वसतीति शश्वत् । अत्यन्ते भवमात्यन्तिकम् । सदा इति निपातः । सर्वशब्दात्परी दाप्रत्ययो भवति सर्वस्य सभावश्च । सर्वस्मिन् काले सदा। सना- तनं, सदातनम् । ध्रुवम् । शाश्वतम् । शाश्वतिकम् | अनश्वरम् । अविनश्वरम् । सर्वे त्रिषु । वियोग मदनावस्थां विरहं पल्लकं विदुः । चत्वारों विरहे । वियोजनं वियोगः । मदनत्य कन्दर्पत्यावस्था मदनावस्था। विरहणं विरहः । मल मल्ल धारणे । मल्लस्थाने केचित्पल्ल इति पठन्ति । पल्लते पल्लः । स्वार्थ का १० पल्लकः । । ११ प्रेमाभिलापमालस्यं रागं स्नेहमतः परम् ।।१६०॥ पञ्च स्नेहे । प्रियस्य भावः कर्म वा प्रेमा। प्रिय१ स्थिरेति प्रादेशः । अभिलप्यते ऽभिलापः । लप श्लेषणक्रीडनयोः । श्रालभ्यते आलभ्यम्' । “१२सकिसहिपवर्गान्ताच्च" । रज रागे । र । रञ्जनं रागः ।-भावे घञ् ।' १३रञ्जर्भावकरणयोः पञ्चमलोपः । अस्यो० दीर्घः । “चजोः ८ की धुट घानु- बन्धयोः।" जकारगकारः । प्रसिः । रेफः । अथवा रज्यतेऽनेन रागः । “व्यञ्जनाच्च', '1 करणे घञ् । . 'रजे वकरणयोः" पञ्चमलोपः । अत्यो० दीर्घः । चजोः कगाविति जकारगकारः । स्निहाते स्नेहः । संहितं सहितं युक्तं संपृक्तं संभृतं युतम् । संस्कृतं समवेतं च प्राहुरन्वीतमन्वितम् ।।१६१।। २० १. न माति सह मापिनामनेकत्वान्मयतां न गच्छति । डप्रत्ययः । कात्यया था। २. "व्यञ्जनाच" का० सू० २।११४६ । ३. "मसी समी परिमाणे" | सम धातुः । पचायच् । सममिति मान्नम- व्ययम् । सहार्थकमत्रोक्तम् । तद्भिन्नः समा शब्दो वर्षवाचको न तु सहार्थवाचकः । तदुतमापनीती शरत्समाः" इत्यमरः । अतोऽस्मिन्नर्थे एतत्य प्रामाण्यं चिन्त्यम् । सह मान्ति सातवो पाम मिति विहीर वर्षवाचकसमाशब्द एव सङ्गच्छते । तत्रैव प्रातूनां सहमानात् । ४.का० सू० ३८।५. नु विस्तारे" । क्तः । “समो वा हितततयोः" इति नलोपः। ६. पन्ने निलमिति का निदान । नियच्छति नियतं भवतीत्यर्थः । ७. अत्र शशतीति वत्तु गुत्तम् । यस हप्तगतौ । कलमला। ८. सनातनादिशब्दानां विशेष्यनिप्नानां यथोक्तशाश्वदादिशब्दसमानार्थतपा कहतीनि। ६. मल्लकपल्लकशब्दयोर्विरहार्थत्वे प्रमाणान्तरं नोपलब्धम् । १०. पा० ० १५५ प्रादेशः । इमनिचप्रत्ययः । पृथ्वादिम्य इमनिज्वा इति । ११. बालपादप साका संवादो नोपलब्धः । १२. का० सू० ४।२॥११ । १३. का. मूल १६८ । (४. दा ... ! १५. का० सू० ४५.९९ ।
अमरकीर्तिविरचितभाप्यापेता दश सहिते । संहीयते संहितम् । सहितम् । "ग्लुम्पेदवश्यमः कृत्ये तुम्काममनसोरपि । समो वा हितततयोमासस्य पचि युड्ययोः।।" योजनं युक्तम् । पृची सम्पर्के । पृच् । सम्पृण क्ति स्म सम्पृक्तम् । “गत्यर्याकर्मक०४" इति ५ कर्तरि क्तप्रत्ययः । “चजोः कगौ""-चस्य कः । सम्भ्रियते स्म सम्भृतम् । यौतिस्म युतम् । संस्क्रियते स्म संस्कृतम् । समवेयते स्म समवेतम् । अन्दीयते स्म अन्धीतम् । अन्वितम् । वाऽध्या सरणिः पन्थाः मार्गः प्रचरसञ्चरौ । सप्त मार्गे । वर्तन्ते प्रतिपद्यन्ते बना येन तत् चर्म । नान्तम् । "सर्वघातुभ्यो मन्" | गच्छति अतति चलति अनेन नान्तोऽध्या । सरत्यनया सरणिः । दन्ततालव्यः । सृतिश्चास्त्रियाम् | हौ। १० पतन्ति गच्छन्ति अनेन पन्थाः । नान्तः । इदन्तोऽपि । पथिः। पथः । पथानः । पन्थ इत्यपि । एते पुसि । मानं मार्गयन्त्यनेन वा मार्गः । पुस । प्रकर्येण चरत्यनेनेति प्रचरः। सञ्चरत्यनेनेति सञ्चरः। पद्धतिः । एकपदी । वर्तनी । अयनम् । पदवी । पद्या। निगमः । त्रिमार्गनामगा गङ्गा मार्गपूर्व त्रिशब्दे प्रयुज्यमाने गङ्गानामानि भवन्ति । त्रिवर्मा । त्र्यध्वा । त्रिसरणिः । त्रिपया । १५ त्रिप्रचरा । त्रिसञ्चरा । घोपो गोमण्डलं व्रजः ॥१६२॥ त्रयो गवां स्थाने । घोपन्ते १ गावोऽत्र घोपः। गवां मण्डलम् गोमण्डलम् । गावो । व्रजन्त्यत्र व्रजः । गोकुलम् । गोष्ठम् । शृङ्गो इतिहरिनाथहरिस्तिर्यक्च शृङ्गिणः । पञ्च महिपादिकं । परं शृणाति हिनस्तीति शृङ्गः११ (म्) । त्रिपु । हञ् । हरणे । ह दृति- पूर्वः । दृतिं चर्मरसेवकं बलभाण्डं हरति वहति इतिहरिः। "हरते तिनाथयोः१२ पशौ” इप्रत्ययः । नाम्यन्तगुणः ! नाथं स्वामिनं हरतीति १३नाथहरिः। "हरतेढ तिनाथयोः पशो"। तिरोऽञ्चयतीति . १. संहीयते इति विग्रहो न युक्तः । सम्पूर्वस्य हाकल्यागार्थकत्वात्प्रस्तुताप्रितीतेः । अतः सन्धीयते स्म संहितम् । सम्पूर्वाद्धाञः क्तप्रत्यये धात्रो हिरिति ह्यादेशः। २.६।१।१४४ का० सू० । ३. युज्यते स्म युक्तम् । ४. का० सू० ४।६।४९ । ५. का० सू० ४।६।५६ । ६. का० उ० सू० ४।२८ । ७. श्रतति सन्ततं गच्छति जनोऽत्र अव्वा । "यत सातत्यगमने" । "वनिस्तस्य घः” का० उ० सू० ६।५९ । इति वनिप्रत्ययः, तकारस्य धकारश्च । “यत्ति बलं पथिकानाम् । अतेर्ध- श्चेति कनिषु धश्चान्तादेशः ।" इति रामाश्रमः । ८. "पल पतने" | पतेस्थश्चेतीति थोऽन्तादेशश्चेति ग्रन्याशयः । पथन्तेऽनेन । “पये गो' । पथन्तेऽनेन । “पये गतो" । पथिमथिभ्यामिनिः । इति रामाश्रमः । ६. मृज्यते वितृणोक्रियते पादैः । मृञ् शुद्धौ । बञ् | वृद्धिः । कुत्वं च । माग्य॑ते इति वा । "मार्ग अन्वेपणे" । १०. वासन्ते शब्दायन्ते इत्यर्थः “वास शब्द" । ११. "शृङ्गभङ्गाऽङ्गानि" का० उ० सू० १।४।४८ । "शु हिंसायाम्" । अङ्गप्रत्यये निपातः । शृङ्गं गवादीनां विषाणमिति तत्रैव दुर्गः । ततः शृङ्गमत्यास्तीति अर्श अादिभ्योऽच् । एवं सति महिपादिसंज्ञा संगच्छते । अजभावे वियाण- मेवार्थः स्यात् ।.१२. का० सु० ४।३।२६ । १३. नायं नासारज्जूं हरतीत्यन्यत्र ।
नाममाला ७१ . तियञ्चः । शृणातीति शृङ्गम् । "शृङ्गभृङ्गाङ्गानि" एतेऽङ्गप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । शृङ्गानि विद्यन्ते येषां ते शृङ्गिणः। गौश्चतुष्पात्पशुः त्रयो गवि । पूजां गच्छतीति गौः । चत्वारः पादा यस्यासौ चतुष्पात् । स्पश इति सौत्रो धातुः । स्पशते [ बाधते ] इति पशुः। अपष्ट्वादयः-“अष्टुटुष्टुसुष्टुहरिद्रुमितद्रुशतद्रुशंकुधनुम- ५ युपशुदेवयुजटायुकुमारयुमृगयवः” एते शब्दाः कुप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । तत्र महिषी नाम देहिका ॥१६३।। . द्वौ महिण्याम् । तत्र तस्मिन् मह्यतेः महिपः । नदादित्वादीः । महिपी। दिहाते उपचीयते दुग्धेन देहिका। कृती नदीष्णो निष्णातः कुशली निपुणः पटुः । १० चण्णः प्रवीणः प्रगल्भः कोविदश्च विशारदः ॥१६४॥ एकादश कुशले। प्रशस्तं कृतं कर्मास्य कृती। नद्यां स्नातीति नदीप्णः । "निनदीभ्यो स्नातेः कौशले" इति षत्वम् । नितरां संस्नाति स्म शुचित्वमाप्नोति स्म निष्णातः । कुत्सितं श्यति कुशलः । अथवा कुशान् लाति कुशलः । निपुणतीति निपुणः । शोभनकर्मत्वात् । पटति जाना- तीति पटुः । क्षुणत्ति स्म शुरणः । क्षुदिर् सम्पेषणे । प्रकृष्टा वीणास्य प्रवीणः इति मुख्यार्थे परित्यज्य १५ निपुणे रूढा । तदाहुः- "७निरूढा लक्षणा कैश्चित्सामर्थ्यादभिधानवत् । क्रियतेऽद्यतनैः कैश्विकैश्चिन्नैव त्वशक्तितः ॥" प्रगल्भते प्रगल्भः। गल्भ धाष्टय । को वेत्ति तदभिप्रायमिति निरुक्त्या कवते कोविदः । विशेषेण पापं शृणाति विशारदः । क्षेत्रज्ञः । कृतहत्तः । हत्तसुखः । कृतकर्मा । दक्षः । शिक्षितः । २० विदग्धश्चतुरः द्वौ चतुरे । विदह्यते विदग्धः । पुरुषार्थान् चतते याचते चतुरः । धूर्तश्चाटुकृत् फितवः शठः । १. "तिर्यञ्च" इत्यकारान्तपाठश्चिन्त्यः । वप्रत्ययान्तेऽञ्चतायेव तिरसस्तिर्यलो' ति तिलादेश इति चकारान्तस्यैव युक्तत्वम् । चकारान्तत्वे चाष्टाक्षरपादे एकाक्षरोनवेन मूले इन्दोलनमा मनपा- रान्तस्तिर्यशशब्द: केनाऽप्यन्यकोषकारेण पश्वर्थेऽभिमतः । तदुक्तम्--'पशुस्लिप गरिः: दि. ४।२८१ । २ सामान्य विशेषार्थत्वादेषां पर्यायवाभावात्त्रयो गीति पाठश्चिन्त्यः । गोशमः पशुषित बलीवर्दादौ। चतुष्पात्पशुशब्दयोः सर्वपशुवाचकत्वात्पर्यायत्वमिति विवेकः । ३. सा. ३० मा ११५ ! ४. “महिल वृद्धौ। मंहते वर्धते वा विशालकायत्वात् । श्रोणादिनपिन् । हाम: स्यानित्यत्वान नुम् । इत्यन्यत्र । ५. नात्र कोपान्तरसंवादः । ६. पा० . ८१६१.४६ । ७. न्य ध्वन्यालोकलोचने १६ कारिकाटीकायामेवमुपलभ्यते "निमहालक्षणाः काश्चित्सामा बदनिक। उत्तरार्धस्तु न समुपगतः । ८. कौति प्रतिपादयति धर्मादि कादिदः । कुधातार्दिन्। नदिद: धेति कः । कोविदः। अथवा कवि वेदे विदा यस्ते समापनः । ६. वि . प्रत्यमो वा विशारदः। इति हेमचन्द्रः। विशिष्टो विपरीतो वा पारदः दक्षि बना... मेलचितं दहति स्म विदन्धः । । - अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता चत्वारो धूर्त । धूर्तति स्म हिनस्ति स्म सदाचारं धूर्तः । चाट करोतीति चाटुकृत । कितयोऽस्त्यस्येति कितवः । शठयतीति शटः । दाण्डाजिनकः । कुहकः। कार्पटिकः । जालिकः । कोस. तिकः' | व्यत्वकः । मायावी । मायी कापि नागरिको ज्ञेयः कापि कुत्रापि शेयः ज्ञातव्यः । नगरे भवो नागरिकः । गोत्रसंज्ञाङ्कनाम तत् ॥१६॥ चत्वारो नाम्नि । गवा वाण्या स्वाचारेण त्रायते रक्षति पालयति गोत्रम् । संज्ञानं संज्ञा । अङ्क च नाम च समाहारत्वादेकवचनम् । अङ्कयते लक्ष्यते असम्" । नमनम् नाम । गुग्धो मूढो जडो नेडो मूको मूर्खश्च कद्वदः । सप्त मूर्ख । धर्मकार्येषु मुह्यति संशयं प्राप्नोतीति मुन्धः। मुह वैचित्ये । मुह्यति स्म मूढः । गत्यर्थत्यादिना क्तः । हो ढः । । 'तवर्ग०। ढे ढो लोप० । सिः । रेफः । जडति न पुण्यं गच्छति जडः । जाल्मश्च । न ईड्यते न स्तूयते केनापि १. १'नेडः । मूङ बन्धने । मूयते मूकः। 'मूकादयः-'मूकयूक- अर्भकपृथुकवृकसकभूकाः" एते कप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । मुह वैचित्ये। मुह्यति कार्येषु मूर्खः । "मुहे-13- मू" । कुत्सितं वदति कहदः । विधेयः । वालिशः । वाडिशः । बालः । १४वद्धरः । सलिः१५। १६नालीकः । पशुः। स देवानां प्रियोऽप्राज्ञो मन्दः त्रयो मन्दे । देवानां प्रियः१७ । ग्रथि (न्थि)ल इत्यर्थः । न प्राज्ञः अप्राज्ञः । कार्येषु मन्दते स्वपितीवेति मन्दः। १० । १५ १. कुसृत्या चरतीति कोसृतिकः । तेन चरतीति ठक् । २. धूर्तसामान्यार्थ इत्यर्थः । ३. वचसा याचारेण च स्वस्य रूपं रक्ष्यते । नामाऽपि स्वानुरूपाचारवचोभ्यामात्मानं प्रतिष्ठा- पयति । रामाश्रमस्तुदगूयते शब्दयते उच्चार्यते इति व्युत्पत्तिमाह । “गुङ् शब्दे" । ४. तदुक्तम्- "संज्ञा त्याच्चेतना नाम इस्ताद्यैश्चार्थसूचना" इति । अम० को ३३१३३ । ५. अडक्यतेऽनेनेति शेषः । नाग्ना जनोऽङ्कितो भवति । ६. नमनं नामेत्यसङ्गतम् । भावे घञि प्रणामाथक दन्त्यनामशब्दसाधुत्वापत्तेः । अतः 'ना अभ्यासे" म्नायते उच्यते ऽभिधीयतेऽर्थोऽनेनेति विग्रहो न्याय्यः । नामन् सीमन् इति निपा- तितः । ७. अत्र "मुहादीनां वा” का० सू, २।३।४६ । इति तकारस्य धकारः। ८. "तवर्गस्य पटवर्गा- दृवर्ग:' का० सू० ३।८।५। इति धस्य दः। ६. "ढे ढलोपोदीर्घश्चोपधायाः'। का० सू० ३८६। इति दलोपो दीर्घश्च । १०. जलति तीवो न भवति । डलयोरक्ये जड इति हेमचन्द्रः। ११. नेडशब्दः कोषा- न्तरे नोपलभ्यते । एडमूकशब्दोऽवडमूकशब्दो वा वाक्स तिवर्जितार्थे लभ्यते । तदुक्तम्---"एडमूकस्तु वक्तुं श्रोतुमशिक्षिते' इति । अम० को० ३।११३८ । “एडमूको त्वावाक्श्रुतो” अभि० चि० ३।१२। अतोऽत्रापि अनेडमूक इति पाठः सम्भाव्यते । जडविशेपवाचकत्वेऽपि तस्य सामान्याभिप्रायेण जडे प्रयोगः अनेडशब्दो वा वधिरार्थः सामान्याभिप्रायेण प्रयोगः। १२. का० उ० सू० २।५८ । १३. का० उ० सू० ४११७ । १४. नात्र प्रमाणान्तरमुपलब्धम् । १५. अनापि नान्यत्प्रमाणम् । १६. अत्राऽने- कार्थसङ्ग्रहः ३५४ । प्रमाणम् । तदुक्तम्-नालीकोऽज्ञ शरे सन्धे नालीकं पद्मनन्दने" इति । १७. 'देवानां प्रिय इति च मूर्खे” वा० ३।३।२१ । “पष्ट्या अलुक्” इति पा० सूत्रे । .
ow नाममाला घीनामवर्जितः ॥ १६६॥ १ धीवर्जितः । बुद्धिवर्जितः । प्रतिभावर्जितः। प्रज्ञावर्जितः। मनीषावर्जितः । धिषणावर्जितः । मतिवर्जितः । संख्यावर्जितः । इत्यादीनि मूर्खनामानि भवन्ति । षाष्टिकः कलसः शालिवाहिः स्तम्बकरिस्तथा । चत्वारः शालिभेदे। षष्टिरात्रेण पच्यन्ते पाष्टिकाः । षष्टिदिवसैरुत्पन्ना इत्यर्थः। ५ कलयति पुष्टिमनेन कलमः । शालते धान्येषु शालिः । अथवा सहालिना भ्रमरेण युतः सालिः । वर्हति वर्धते ब्रीहिः । स्तम्बकरिः । वत्सः शकृत्करिर्जातः पोडन् पड्दशनः स्मृतः ॥ १६७ ॥ चत्वारो वत्से । मातरमभीक्ष्णं वदति वत्सः । शकृत् करोतीति शकृत्करिः । (:)। "तम्ब- 3शकृतोरिति” व्रीहिवत्सयोरुपसंख्यानादिन् । षड् दन्ता यस्य स पोडन् । “समासे दन्तदशधातु १० षष उत्वं दधोर्डदौ" षड् दशनाः यस्य स षड्दशनः । शौण्डीरो गर्वितः स्तब्धो मानी चाहयुरुद्धतः। उद्ग्रीव उद्धरो दृप्तः नव गर्विते । शौण्डतीति शौण्डीरः। “४कृशशौण्डभ्य ईरः" । गर्वोऽहंकारः संजातोऽत्य गर्वितः । तारकितादिदर्शनात्संजातेऽर्थे इतच् । स्तभ्यते स्म स्तब्धः । मानः पूजादिलक्षणो गर्वो विद्यते १५ अस्य मानी। अहम् अहंकारोऽस्त्यस्य अहंयुः । "उर्णाऽहंशुभंभ्यो युः” । उद्धन्यते रूपेण उद्धतः । उद् ऊर्ध्वा ग्रीवा यस्य स उद्ग्रीवः । उद्धरति गर्वेणान्यम् उद्धरः । दृप्यते दृप्तः । नीचश्च पिशुनोऽधमः ॥१६८॥ त्रयो दुर्जने । नितरां पापं चिनोति नीचः । मैत्री पिंशति मैत्रों पेशयति वा पिशुनः । तालव्यः । पिनष्टि वा पिशुनः । "पिशुनफाल्गुनौ” नअपूर्वो धान । न दधातीत्यधमः । १०धर्मसीमागीमा- २० धमाः" । दुर्जनः । क्षुद्रः । कर्णजपः । दोषग्राही । द्विजितः । चौरकागारिकस्तेनास्तस्करः प्रतिरोधकः । निशाचरो गूढनरो हेरिकः प्रणिधिश्च सः ॥१६६।। ११नव चौरे । चोरयतीति चोरः । स्वार्थे ऽणि चौरश्च । एकागारं प्रयोजनमत्येत्यै कागारिफः । . - १.. "षष्टिकाः पष्टिरात्रेण पच्यन्ते" पा० ५।१९० । इति फन् प्रत्ययो रात्रशब्दलीप २. स्तम्बं करोतीति, स्तम्बकरिः । ": स्तम्बशकृतोः" । का० सू० ४.३।२५ । इति प्रम परः । ६. का०सू ० ४।३।२५ । ४. का० उ० सू ० ३।४८ । ५. "अर्णऽहंशुभमोस्" इति १० १० १२१५ ६. उत्कण्ठं हन्ति गच्छति हिनस्ति वा० उद्धतः इति हेमचन्द्रः । ७. हस्वार्थे ऽयं शब्दो गतः । तत्रपति विग्रह उक्तः । अन पिशुनार्थानुरोधेन विहभेदः । निपूर्वका दिनोदिलवाडः । । भन्यत्र तु निकृष्टमञ्चतीति विहः । ८. पिंशत्येकदेशेन सूचयति “अधिनिसिमिहिन्यः पिट" .. ३१५५। इत्युनन् । पिशुनयति भपिशुनति वा । "अपिश्यति सुजपतीति भोः" इति मर:: ९. का० उ० सू० २।६१ । १०. का. ३० सू० ११५६ । ६'. चौरादयो निशाचराल पर करे। रादयः प्रणिभ्यन्तास्नयो गुप्तचरे । इति पाठ उचितः। तदुसम्-हरिकी पुरतः। - अभि० चि० ३३६७ ।
अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता स्तेनयति स्त्यायति वा स्तेनः । उभयम् । तस्यति परद्रव्यं क्षयं नयति तस्करः । “तसेः२ करः" । अथवा कृञ् तत्पूर्वः । तत्करोतीति तस्करः । तदाद्यङ । नाम्यन्तगुणः । रूढित्वात्तस्य सकारः । प्रतिरुणद्धि मार्गः प्रतिरोधकः । निशां चरतीति निशाचरः। गूढश्चासौ नरः गूढनरः । हिनोति परराष्ट्रं गच्छति हेरिकः । प्रकर्पण नितरां गुप्तो धीयते ध्रियते वा प्रणिधिः । दस्युः । परास्कन्दी । मलिम्लुचः । ५ मोषकः । प्रतिमोषकः । प्रस्तरोपलपापाणपद्धातुः शिला धनः । प्रस्तृणात्याच्छादयति "प्रस्तरः । काठिन्यमुपलाति उपलम् । उभयम् । पिनष्टि सर्वे पाषाणः । पासानश्च । दृणाति चूर्णयति द्रियते श्राद्रियते वा कार्यार्थ दपत्। स्त्रियाम् । दधाति धातुः। शिनोति तनूकरोति १ शिला। शिली च१११ स्त्रियाम् । हन्यते १२धनः। अश्मन् । ग्रावन् । पुलकश्च१३ तत्र जातमयो लोहम् १० द्वौ लोहे । तत्र तस्मिन् पाषाणे जातम् उद्भवम् तत्रजातम् । प्रस्तरोद्भवः । उपलोद्भवः । धातूद्भवः । दृषदुद्भवः । शिलोद्भवः । घनोद्भवः । इत्यादि लोहनामानि भवन्ति । अयते सर्वविकारं सान्तम् श्रयः । लुनाति सर्व लोहम् । शातकुम्भं नयेत्परम् ॥ १७० ॥ तत्र पाषाणे उद्भवानि सुवर्णनामानि भवन्ति । १५ क्षामं शान्तं कृशं क्षीणं हीनं जीणं च वैरिणाम् । शीर्णावसानं दूनं च नव कृशे । क्षायति स्म क्षामम् । शाम्यति स्मशान्तम् । कृशम् । क्षीणम् । हीनम् । १. "स्तेन चौर्य" । चुरादिः । पचाद्यच् । २. का० उ० सू० ६।३ । ३. "तदाद्याधन्तानन्त- कारबहुबाह्नहर्दिवाविभानिशाप्रभाभाश्चित्रकत नान्दीकिंलिपिलिविबलिभक्तिक्षेत्रजङ्घाधन्वररुःसङ्ख्यासु च" का० सू० ४।३।२३ । इति कृअष्टप्रत्ययः । ४. दस्युप्रभृतयः प्रतिमोपकान्ताश्चौरपाया न तु गुप्तचरपर्यायाः । गुप्तचरपर्यायास्तु-यथार्ह वर्णः । अपसर्पः। मन्त्रविद् । चरः । वार्तायनः । स्पशः । चारः । ५. "स्तृञ् श्राच्छादने" । पचाद्यच् । ६. अथवा पलतोति पलः । श्रोः शम्भोः पलो वोपलः । ७. “पिप्लृ सञ्चूर्णने"। बाहुलकादानच् । पृषोदरादित्वादिकारस्याकारः । “पष वाधे ग्रन्थे च" । हलश्चेति घञ् । पषत्यनेनेति । अणतीत्यणः । "अण शब्दे"। अच् । पापश्चासावणश्चेति विग्रहोऽप्य. न्यत्र द्रष्टव्यः । ८. "दृणातेः पुग् ह्रस्वश्चे" ति साधुः । ६. "धातुस्तु गैरिकम्" अभि० चि० । 'धातुर्मनः- शिलाद्यद्रेगैरिकन्तु विशेषतः" श्रम० को० । इत्यादिकोपप्रमाणतः सामान्यप्रस्तरपर्यायेऽस्य पाठोऽयुक्तः । १०. शिनोतीति तालव्यशिधातुर्न कचिदुपलभ्यते । “शो तनूकरणे" । तस्य श्यतीति रूपम् । तनूकरो- तीत्यर्थः । ततः शिलेति निपातो बाहुलकादौणादिकार्थेन समायाति । रामाश्रमादिव्युत्पत्तिकारस्तु "शिल उञ्छे" शिलतीति शिला । इगुपधेति कः इत्युक्तम् । तत्रान्तरतम्यं सुधीभिर्विचारणीयम् । १'. उदुम्बरश्वाथ शिली शिला चापि शिलिः स्मृतः" इति कल्पद्रुकोपवाक्यमत्रोपोद्वलकम् । १२. "मूर्ती धनिश्च" का० सू० ४।५।५०। हन्तरत्र घनादेशश्च । १३. तदुक्तम्-"पुलकः कृमिभेदै स्यान्मणिदोषे शिलान्तरे । गजान्नपिण्डे रोमाञ्चे गल्वर्कहरितालयोः ।" वि० को० का० १० ११६ । - नाममाला - जीर्यते स्म जीर्णम् । शीर्यते स्म शीर्णम् । अवस्यते अवसानम् । दूयते स्म दूनं च । हे राजेन्द्र, तव वैरिणां शत्रूणां भवतु इति प्रयोजनीयम् । धैर्य शौर्य च पौरुपे ॥१७॥ त्रयः२ पौरुषे । धीरस्य भावो धैर्यम् । शूरस्य भावः शौर्यम् । पुरुषत्य भावः पौरुपम् । युष्माकं भवतु इत्यध्याहार्यम् । क्षिप्राशुमवरं शीघ्रं सहसा झटिति द्रुतम् । तूर्ण जवः स्यदो रहो रयो वेगस्तरो लघुः ॥१७२॥ षोडशः वेगे । क्षिपति निरत्यति क्षिप्रम् । रक्प्रत्यय उणादौ ज्ञातव्यः । अश्नुते श्राशु । कृवापाजीति उण् । मज्जति महति वा मक्षुः५ । इयर्ति मान्तमव्ययम् अरम् । अदन्तं च अरम् । शेते कार्ये शीघ (शिव) ति व्याप्नोति वा शीघ्रम् । सहते सहसा । अव्ययम् । झटति संघातीभवति इदन्तमव्ययम् । झटिति' । द्रवति स्म द्रुतम् । त्वरते स्म तूर्णम् । जवनं जवः । जु गतौ। त्यन्दते स्यदः । "स्यदो जवः" इति साधुः । रहयत्यनेन रहः । रयते रीणाति वा ऽनेन रयः । वीय (विज्य) ते वेगः' । तरत्यनेन तरः। "१ सर्वधातुभ्योऽसुन्' । लङ्घते भूमि लघुः । संवेगः । गतिवचनो जवो धर्म- वचना आशुशीघ्रादय इत्यर्थभेदः । सदागतिप्रस्तावादाइ- १५ साधीयोऽत्यर्थमत्यन्तं नितान्तं सुष्टु चै भृशम् । सप्त भृशे । साधुभ्यो हितः साधोयः११ । ईयतुः । प्रतिक्रान्तोऽर्थ वेला मात्राम् अन्तं च अत्यर्थम् । अत्यन्तम् । अतिवेलम् । अतिमात्रं च । नितान्यति स्म नितान्तम् । मुष्टौति सुष्टु । १० १. अनावसान भिन्ना अष्टावपि शब्दा विशेष्यनिघ्नास्तेन कुटुम्बमिति विशेषमध्याहार्य है राजेन्द्र तव वैरिणां कुटुम्वं क्षामं भवतु । एवं शान्तं कृशमित्याद्यपि योज्यम् । अवसानशब्दस्य भावल्यु- डन्तत्वात् तव वैरिणामवसानं नाशो भवत्विति विवेकः । अवस्यते ऽवसानमिति दीकोक्ताविप्रतिसातः । अवपूर्वस्य "षोऽन्त कर्मणि" इत्यस्य भावलटि अवसीयते इति रूपम्, नत्वत्यते इति । कर्तरि लरिदिपादी अवस्यतीति परस्मैपदमेव । नापि कतान्तोऽवसानशब्दः । क्तप्रत्यये "अवसित" इति रूपन्यैव सर्वसम्मत- त्वात् । तस्मादवसायतेऽवसायो वा अवसानमिति विहो युक्तः । २. कोपान्तरप्रमाणतो वहान धैर्यादिशब्दानां परस्परकर्मभेदात्पर्यायानहत्वेऽपि वलसामान्यविवक्ष्या त्रयः पौरुपे प्रत्युतम् । ३. गलिद- चनो जवो धर्मवचना प्राशुशीघ्रादय इत्यर्थभेदत्य वक्ष्यमाणत्वात् क्षिप्रादपरतीता नर , जवादयो लप्वन्तास्त वेगार्थे इति सुवचम् । "द्राक् क्षणेऽलाय माटिति तीवारपालपापा कर्तव्येऽपि पृथगस्य पाठो झटितिशब्दपुनरुक्तिश्च दोपः। ४. दिपति विलयमिति दोषः । ५ "मालो शुसौ" । बाहुलकात्तुः । मस्जिनशोरिति नुन् । कोरिति सलोपः । मजति पालापमा ! ६. " मर्पणे । बसा प्रत्ययः यहा सहपति। "पोऽन्तपर्मषि"। ब्राप्रपोरित् । दिनपरिकामा रान्तमव्ययम् ! उदाहरणम्-"सरसा विदधीत न शिवामित्यादि । ७. “कर ला" पर इतिः। ८. का. सू० ४।६।३५। स्पन्देज नलोसो दीपाभावः । चन्द, ८द हमारी न्यायः। 8. 'यो विजी भपचलनपोः । १०. कार उ० ० ४१५६ । ११. विन साधीय इति । साधुन्यो हित इति दीको विनास न हो। अतिसादको ना इति मूलोकपदस्थ जीवन हित रति विनोऽपि तव । ।
८४ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपता 'अष्टवादयः-अपष्टु दुष्टु सुष्टु हरिद्रु मितद्रु शतद्र, शङ्ख धनु इत्यादयः । वै अव्ययम् । विभर्ति भृशम् । स्फुटं साधु खलु स्पष्टं विशदं पुष्कलामलौ ॥१७३|| सप्त निर्मले । स्फुरत्यभिप्रायोऽस्मात् स्फुटम् । माध्यतीति साधु । खलतीति खलु । सश्यते स्म स्पष्टम्। विशति चित्ते विशदम् । पुष्णातीति पुष्कलम् । न मलमस्मिन श्रमलम् । ५ प्रकाशम् । प्रकटम् । चित्राश्चर्याहृतं चोद्यं विस्मयः कौतुकोऽप्यहो। पट् कौतुके । चित्र चयने । चिनोतीति चित्रम्" 1 श्राचरतीत्याश्चर्यम् । पारस्करादि- त्वात्सुट् । भू सत्तायाम् । अद् पूर्वः । अह विस्मितो भवत्यत्र अद्भुतः । "यदि भुदो डुतः" । चोद्यते इति चोद्यम् । विस्मीयते इति विमयः । कुतुकस्य भावः कौतुकम् । अहो लोका प्राश्चर्यम् इति -- - १० प्रयोजनीयम् । अभियोगोधमोद्योगा उत्साहो विक्रमो मतः ॥१७४|| पञ्चोद्यमे । अभियोजनम् अभियोगः । यमु उपरमे । यम् उपूर्वः । “चुरादेश्च"-इन् । "प्रत्योप०१५-दीर्घः । उद्यामि इति जातम् । “मानुवन्यानां'१" हृत्वः । उद्यमि जातम् । उद्यमनमुद्यमः । भावे घञ् । “कारितत्य०१२।" उद्योजनम् उद्योगः । उत्सहनमुत्साहः । विक्रमणं विक्रमः । रहोऽनुरहसोपांशु रहस्यं च मिनत्ति कः । ५१ चत्वार एकान्ते । रहति त्यति ननः सङ्गं यत्र सान्तं रहः । क्लीवे । अव्ययं च । अनुगतं रहः अनुरहसम् । १३अन्ववतप्तेभ्यो रहस्' । उपाश्नुते अव्ययमुदन्तम् उपांशुः । रहसि भवं रहस्यम् । कः पुमान् मिनत्ति विदारयति । प्रच्छन्नम् । एकान्तम् । । निःशलाकम् । उपहूरम् । विननम् । विविक्तम् । जनान्तिकम् । कीनाशः कृपणो लुब्धो गृध्नुर्दीनोऽभिलापुकः ॥ १७५ ॥ पट कृपणे । लोमेन क्लिश्यति बाध्यते "कोनाशः । की वाणी याचकानां नाशयति विनाशय- तीति कीनाशः । कल्लते रक्षितुं न तु दातु कृपणः । लुम्यति स्म लुब्धः । गृध्नाति गृनः । गृध्नुरित्यपि त्यात् । लोमेन द्योतते शोभते (दीयते क्षयति ) दीनः। दीङ क्षये । कचित् होनः इति पठन्ति । लप कान्तौ । अभिपूर्वः । अभिलपतात्येवंशालः अभिलापुकः । “कमगमहनवृषभूस्थालसपतपदामुका"" | २० । १. का० उ० सू० १११५ । इति कुप्रत्ययः । २. भूधातोः शप्रत्ययः किदित्यर्थः । भृश्यतीति भृशं वा । "भृशुभ्रंशु अधःपतने" | दिवादिः । इगुपवेति कः । भृशिरत्रान्तर्भावितण्यर्थः । ३. स्फुटतीति कर्तृ विग्रहो न्याय्यः, नत्वपादानकः तत्र घजि स्कोट इत्यापत्तेः । अत्रे गुपवेति कः । ४. "खल सङ्घर्ष" । बाहुलकाः । खलुशब्दो नानार्थे । तदुक्तम्-"निषेधवाक्याऽलङ्कारे जिज्ञासाऽनुनये खलु" । श्रम को ३।३।२२५ । ५. "चित्र चित्रीकरणे।" चित्रयतीति चित्रम् । पचायच् । इत्यन्यत्र । ६. श्रा इति चर्यवेऽभिनीयते इति विग्रहोऽन्यत्र । 'याश्चर्यमनित्ये” इति सुट् ।७. का० उ० सू० ४२५ । ८. चोद्यशब्द आश्चर्याथें । तदुक्तम्-"चोद्यन्तु प्रे] प्रश्नेऽदभुतेपि च" अने० स० २।३६२ । 6. का० सू० ३।२।११ । १०. का सू० ३।६।५ । ११. का०स० ३१४१६५ १२. का०सू० ३६४४इतीनो लोपः। १३. का०सू० ३।४।४१ । अत्र रानादिवृत्ति: २९ । १४. "क्लिश विवाधने" | "ल्लिशेरीचोपधायाः कन् लोपश्च लो नाम् च" पा० उ० सू० ५।६६।१५. का. सू० ४४४४३४ ।
नाममाला ८५ । । कदर्यः । किम्पचानः । मितम्पचः । क्षुल्लः । क्षुल्लकः । क्लीबः । क्षुद्रः । वराकश्च । पाशनीतः सितो बद्धः सन्धानीतो नियन्त्रितः । नियामितः शृङ्खलितः पिनद्धः पाशितो रिपुः ॥ १७६ ॥ नव बद्ध । पाशं नीतः पाशनीतः । सीयते स्म सितः। बध्यते स्म वद्धः । सन्धां प्रतिज्ञां नीतः प्रापितः सन्धानीतः। नियन्त्रं संजातमत्य नियन्त्रितः। नियामो जातोऽस्य नियामितः । शृखला ५ संजाताऽस्येति शृङ्खलितः । तारकितादिदर्शनादितच् । पिनह्यते स्म पिनद्धः । पाशः संजातोऽस्य पाशितः । कः रिपुः शत्रुः। कान्तं च कमनं कर्म कमनीयं मनोहरम् । अभिरामं र(रा)मणीयं रम्यं सौम्यं च सुन्दरम् ॥ १७७ ॥ दश वरिष्ठे (अतिसुन्दरे) । काम्यते कान्तम् । काम्यते कमनम् । कामयते इत्येवंशीलं १० कम्रम् । काम्यते वाञ्छयते कमनीयम् । “१तव्यानीयौ”। मनोहरति मनोहरम् । मनोहारी मनोरमम् । अभिरमणम् अभिरामम् । रमणस्य (गाय) हितं रमणीयम् । रम्यते रम्यम् । सोमस्य भावः सौम्यम् । सुन्दः सौत्रोऽयं सुन्दति सुष्टु नन्दयति इति निरुक्त्या सुन्दरम् । चारु श्लक्ष्णं च रुचिरं प्रशस्तं हृयवन्धुरम् । दर्शनीयं मनोज्ञं च अष्टौ मनोज्ञे । चरन्ति नेत्राण्यत्र चारु । शिष्यते युज्यतेऽनेन श्लक्षणः । रोचते सर्वेभ्यो रुचिरम्। प्रशस्यते स्म प्रशस्तम् । हृदयस्य प्रियम् हृद्यम् । चित्तं बध्नाति वन्धुरम्। दृश्यते दर्शनीयम् । मनो जानातीति मनोज्ञम् । चित्तपर्यायहारि च ॥१७॥ चित्तहारि । मनोहारि । इत्यादीनि मनोहरनामानि शातव्यानि । अवश्यायं तुपारं च प्रालेय तुहिन हिमम् । नीहारम् षड् हिमे । अवश्यायते श्रवश्यायः। “दिहिलिहिश्लिपिश्वतिव्यप्यतीणश्यातांच णप्रत्ययः । तुष्यन्त्यनेन तुषारः। प्रलयादागतं प्रालेयम् । तोहयत्ययति तुहिनम् । नुदिन अन । हिनोति वर्धते जलमनेन हिमम् । निहियते नीहारः । मिहिका । धूमिका । देश्याम् । २५ १: का० सू० ३७।९ । २. रमणाय हितमिति विग्रहो युक्तः । तस्मै हितमिनि चाना। मूले छन्दोभङ्गदोषवारणाय रमणीयमेव रामणीयम् इति स्वार्थिकोऽपि वार्यः। ६. काय नाव: विग्रहोऽयुक्तः । "प्रकृतिजन्यबोधे प्रकारीभूतो भावः" इति सिद्धान्तात् गाय इत्पल - पत्तेः । अतः सोमो देवताऽस्येति व्युत्पत्तिः, "तोमाट्यम्" | रति व्यग् ! काम ततश्वतुर्वर्णादित्वात्ष्यण् इति रामाश्रमः । ४. सुष्टु द्रियते प्राधियते। पताः । प्रयोग सुष्ठ उनत्ति आद्रीकरोति चित्तं वा । सुपूर्वकात् "उन्दी पोदने" उन्धाता। दित्वात्पररूपम् । इति रामाश्रमः । ५. नेत्रं मनो पैति शेषः । "दिला लिने" । कि: उ० सू० ३१९ । इति नः। उपधाया मार। ६. का.सु. ४: ५। .. प्रवेति प्रलयो हिमाचलः । तस्मादागतं प्रारुपा । त्! पनि .. ७।३।२ । पति पादेरिपादेशः । ३० ५ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता तत्करं विद्धि मृगाङ्क रोहिणीपतिम् ॥ १७६ }} तस्य करस्तत्करस्तम् । हिमशब्दात्करशब्द प्रयुज्यमाने चन्द्रनामानि भवन्ति । अवश्यायकर । तुषारकरः । प्रालेयकरः । तुहिनकरः। हिमकरः । नीहारकरः । मृगाङ्कः । रोहिणीपतिः। अष्टौ नामानि विद्धि जानीहि । पुन्नागं सन्नरं पाहुः द्वौ प्रधानपुरुपे । पुमाँश्चासी नागः श्रेष्ठः पुनागः । संश्चासौ नरः सन्नरः । पाहुः व वन्ति ! तिलकं च विशेषकम् । ललाटिका ललामापि पूर्णवाहं तथा द्रुमम् ॥१८०॥ 'पट तिलके । तिलकाकृतिः तिलकः । तिलतीति तिलकम् । विशिनष्टीति विशेषः । स्वार्थे कः । १० विशेषकः । लल्यते ललाटम् । के प्रत्यये ललाटिका । लल्यते ललामा । पूर्ण वाहयतीति पूर्णवाहः । द्रषति वृद्धि गच्छति द्रुमः । तमालपत्रम् । चित्रकम् । अञ्जनं कज्जलं नागं गजपाटलमारुणम् । षट्' कज्जले । अज्यतेऽनेनेत्यञ्जनम् । कपति नेत्रवैरूप्यं कज्जलम् । न शोभाम् अगति गच्छति नांगम् । गजति शोभया माद्यति गजम्। पाटलाया इदम् पाटलम् । ऋच्छति गच्छति १५ शोभाम् श्रारुणम् । सालं परिधि वृक्षं च त्रयः प्राकारे। सरति गच्छति कालान्तरं सालः। परिधीयते वेष्टयते अनेन परिधिः वृणोति नगरमाच्छादयति वृक्षम् । कुल्यां स्त्री सारणी विदुः ॥१८१॥ त्रयः५ पानीयनिर्गमनमागें । कुले गृहे साधुः कुल्या। स्तृणाति वैरूप्यमाच्छिनत्ति स्त्री। सरत्यनया सारणी । तां विदुः कथयन्ति धनञ्जयकवयो भाष्यकर्तारोऽमरकीर्त्याचार्याश्च । चारोऽवसः प्रणिघिर्निगूढपुरुषश्चरः । पञ्च चारे। चरति शत्रुमण्डले चारः। अवसर्पति अवसर्पः । - अपसर्पश्च । प्रकर्षण २० । - १. अत्र तिलकविशेपके टीकोक्ततमालपत्रचित्रके च ललास्कृततिलकाऽलङ्करणे । तद्- क्तम् -"तिलके तमालपत्रचित्रपुण्ड्रविशेषका :' । अभि० 'चि० ३।३१७ । ललाटिका पत्रसमूहकृत- ललाटभूपणम् । तदुक्तम्-"पत्रपाश्या ललाटिका" अभि० चि० ३।३१९ । ललामा तु सीमन्ताग्रे मरुर- मणीभिरिव धार्यमाणं रत्नादिकृतभूपणम् । तदुक्तम्-"पुरोन्यस्तं ललामकम्" अभि० चि० ३१३३६ । पूर्णवादुमयोस्तु कोषान्तरे पाठो नोपलब्धः । २. पद् कनले । इत्यविचारसहम् । अञ्जनकजली समानार्थों । नागगजपाटलारुणा प्रोष्ठकपोलादिरञ्जकलोहितरङ्गविशेषवाचकाः । तदुक्तम्-अनेकार्थ- सङ्ग्रहे-"नागो मतङ्गले सर्षे पुन्नागे नागकेसरे" २१३४ । “पाटलन्तु कुसुमश्वेतरक्तयोः” १७०१ । "अरुणोऽनूरुसूर्ययोः । सन्ध्या रागे बुधे कुष्ठे निःशब्दाऽव्यक्तरागयोः' ३३१९८ । ३. अरुणमेव अारुणम् । ४. वृक्षशब्दस्य सालार्थे कोषान्तरसंवादो नोपलव्धः । ५. अत्र द्वाविति वक्तव्यम् । स्त्रीशब्दोऽत्र कुल्या- सारण्योः स्त्रीलिङ्गबोधकः; तत्पर्ध्यायः। ६. पूर्वमुक्ते ऽपि सिंहावलोकनन्यायेन चारेऽर्थेऽन्यानपि शब्दान् समुच्चिनोति । ७. चरति शत्रुमण्डले चरः , चरेरच। ततः स्वार्थिकोऽण् । चर एव चारः ।
नाममाला ५ नितरां गुप्तो धीयते प्रणिधिः। निगूढश्चासौ पुरुषः निगूढपुरुषः । चरतीति चरः । स्पशः। 'यधार्थ- वर्णः । मन्त्रज्ञश्च । तद्वानुक्तः सहस्राक्षः तस्मात् पूर्वोक्तशब्दात् परं वान् इति प्रयुज्यमाने सहस्राक्षनामानि भवन्ति । निगृह- पुरुषवान् । चरवान् इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । सत्यार्थे सूनृतं ऋतम् ॥१८२॥ सत्यार्थे द्वौ । सु सुष्टु ऋतं सत्यं सूनृतम्। पृषोदरादित्वान्नाडागमः। ऋच्छति गच्छति जनः प्रत्ययमत्र ऋतम् । तथा चामरकोषे२-"सत्यं तथ्यमृतं सम्यक् ।" निस्तलं वतुलं वृत्तम् त्रयो वर्तुले । निर्गतं तलं प्रतिष्ठाऽस्य निस्तलम् । अथवा निर्गतं तलादधोभागान्नित्तलम् । भूमौ न तिष्ठति वा । वर्तते भ्रमति वर्तुलम् । वृत्यते स्म वृत्तम् । सर्वे त्रिषु । स्थपुटं विषमोन्नतम् । विषमोन्नते स्थपुटम् । स्थापयत्यात्मनो विषमोन्नतत्वे स्थपुटम् । प्रायः क्लीवे । दीर्घ प्रांशु १५ द्वौ दीघे । दृणाति दीर्घम् । प्राश्नुते व्याप्नोतीति प्रांशु" । विशालं च बहुलं पृथुलं पृथु ॥१८३॥ चत्वारो विस्तीर्णे। विस्तारं विशति विशालम् । बहून् लातीति बहुलम । प्रथते वर्धते पृथुलम् । गुणमात्रवृत्तेलः । पर्थते पृथुः । वृहत् । उरुः । गुरुः । विस्तीर्णः । उल्वणं दारुणं तिग्मं घोरं तीव्रोग्रमुत्कटम् । सप्त घोरे । उल्वणत्युल्वणम् । पृषोदरादित्वात्पक्षे लः । दारयति दारुणम् । तितिवतीति तिग्मम् । घुरति घोरम् । तीवति तीब्रम् । तीव स्थौल्ये रक्। उच्यति उग्रम । उत्कटते उत्कटम् । प्रतिभयम् । भीमम् । भयानकम् । भाभीलम् । भीषणम् । भीष्मम् । भैरवम् । शीतलं तिमिरं याथं मन्द विद्धि विलम्बितम् ॥ १८४ ॥ १. यथार्थ यथा अर्थः प्रयोजनं वर्णो जातिः प्रसिद्धिर्वा यस्पेति तदर्थः । २. . १७।२२। ३. वस्तुतस्तु प्रांशुदीर्घयोरर्थभेदः । दीर्घविस्तृतायतशब्दाः पर्यायाः । गुणस्त । सः- 'दीर्घमायतम्". अम० को० ३।११५० | ४. "द विदारणे': । बालकाया । सानिमा मिति दी ! ५. प्रकृष्टा यंशवोऽस्येत्यपि । ६. "विश प्रपेशने" । बालकादलः । समाधमाल-दः EE: इति० पा० सूत्रेण विशब्दाहालप्रत्ययमाए । ७. उदरातति उत्पः ! योगदा: पाठोन युक्तः । “यण शब्दे । शन् । उल्पशब्दो वस्तुतः स्टारः, नाम: सुवेजको भवति खलानान् । सत उजफत्वसामान्यानपा । ३. नितीक : : युक्तम् । "तिज निशाने" । निशानं तिक्ष्णोकरगन् । तेजपतीति लिना । पात्र. : . शिब्दयोः" । घोरयतीति घोरम् । पन्तादच् । १०. उच्चति दुधा सादापोरन दिवादिः । “राजेन्द्र इत्यादिना रक गधान्तादेशः ।
८८ अमरकीतिविरचितभाप्योपेता ५ . १० पञ्च कार्यविलम्बे (म्बिते)। शीतं लाति मन्दो भवति कार्ये शीतलम् । ताम्यति स्वकार्य- मिच्छति तिमिरम्' । स्तिमितं स्थिमितं वा पाठः । यथा भवं याथम् । मन्यते मन्दम् । विलम्ब्यते स्म विलम्वितम् । विद्धि जानीहि । स्वभावः प्रकृतिः शीलं निसगों विश्वसो निजः । पञ्च स्वभावे निजे। स्वः स्वकीयो भावः स्वभावः। प्रकरणं प्रकृतिः। शील्यते शीलयति वा शीलम् । निसृज्यते निसर्गः । विश्वसितीति विश्वसः । विश्वासश्च । विश्रम्भः । योग्या गुणनिकाऽभ्यासः त्रयोऽभ्यासे | युज्यते योग्या । गुण्यते ऽहर्निशं गुणनिका । अभ्यसनमभ्यासः। स्यादभीक्ष्णं मुहुर्महुः ॥ १८५ ॥ मुहुर्मुहुर्वारं वारं स्यात् भवेत् । अभीक्ष्णम् । अभीक्षणम् अभीक्ष्णम् | अभिमुखमीक्षते वा अभीक्ष्णम्" । नितराम् । मृपालीकं मुघा मोघम् चत्वारोऽलीके । मृष्यते सहते नारकं दुःखमनेन मृपा । अादन्तमव्ययम् । अलति स्वस्वाङ्गा- (स्वर्गा)निवारयति अलीकम् । मुञ्चति त्यजति निमित्तं मुधा । श्रादन्तमव्ययम् । मुह्यतेऽत्र चित्तं मोघम् । विफलं वितथं वृथा । निष्फलवचने त्रयः। विगतं फलं विफलम् । विगतं तथा सत्यं यस्मात् वितथम् । वृणो- त्याच्छादयति गुणान् वृथा । अव्ययम् । विधुरं व्यसनं कष्टं कृच्छ् गहनमुद्धरेत् ।। १८६ ॥ पञ्च कष्टे । कष्टेन विधुनोति शरीरं विधुरम् । व्यस्यते अनेन व्यसनम् । कष्यते (कपति) कष्टम् । कृणोति छिनत्ति दुःखेन कृच्छ्रम्" । गाह्यते गहनम् । उद्धरेत् निस्तरेत् । समस्तं सकलं सर्वं कृत्स्नं विश्वं तथाऽखिलम् । पट समस्ते । समस्यते एकीकरोति समस्तम् । समं असते समग्रम् । समानं कलयतीति १ सकलम् । सरति सर्वम् । कृन्तति वेष्टयति व्याप्नोति कृत्स्नम् । विशति तिष्ठति सर्वत्र विश्वम् । नास्ति खिलं शून्यमस्याखिलम् । निखिलं च । १५ । १. “तिम याद्रीभावे"। तिम्यति श्राद्रीभवति तिमिरः। विलम्बशीलो जनः सर्वदा इव शीतः स्फूर्तिरहितश्च भवति'। २. विश्वसशब्दस्य प्रकृत्यर्थे प्रमाणान्तरं नास्ति । एवं विश्वासो विशम्भोऽपि । विश्वसशब्दाऽन्वाख्यानमपि व्याकरणादस्पष्टम् | अतोऽत्र त्रिप्वपि मूलटीके एव प्रमाणम् । ३. योगे चित्तैकाग्र्ये साध्वीति योग्या "तत्र साधु"रिति यदन्यत्र । ४. गुण्यते गुणना। चुरादिणिजन्ताद् भावे "ण्यासश्रन्येति युच् । ततः स्वार्थे कः । गुणनैव गुणनिका । ५. अभिक्ष्णौति अभीक्ष्णम् । “घणु तेजने" । बाहुलकाड्डमुः। अन्येपामपीति दीर्घः । इति रामाश्रमः । ६. अत्र मृपाऽलीकशब्दो वक्ष्यमाणो वितथ- शब्दश्चासत्यवाचकः । मुधामोघशब्दौ विफलवृथाशब्दी च वक्ष्यमाणो व्यर्थवाचका इति विवेकोs- न्यत्र । तदुक्तममरे-"मृपा मिथ्या च वितथे' ३।१५ । 'अलीकं त्वप्रियेऽते” ३।३।१२ । “मोघं निरर्थकम्" ३।११८१ । व्यर्थके तु वृथा मुधा" ३।४।४ । “वितथं त्वनृतं वचः" १८४२१ । इति । ७. कर्पति कृन्तति वेति क्षी० स्वा० । ८. समस्यते स्म समस्तम् । "असु क्षेपणे"। कर्मणि क्तः । ६. सङ्गतमग्रमत्य समग्रम् । १०. सह कलाभिर्वर्तते सकलम् ।
१२ नाममाला ८६ शकलं विकलं खण्डं शल्कं लेशं लवं विदुः ॥ १८७ ॥ षट् खण्डे। शक्नोति काये शकलम् । शल्कं च । विगता कला यस्मात् तद् विकलम् । खण्ड्यते खण्डः । लिश्यते लेशः । लिश विच्छ गतौ । “अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् २' ।रौति शब्द फरोति लवः । विदुः कथयन्ति । अर्धम् । नेमः । सामि । असम्पूर्णम् । दलं च । मर्म कोपं च द्वौ मर्मणि । म्रियतेऽनेन मर्म । नान्तम् । कुष्यते कोषम् । कलहं परिवादं छलं नयेत् । करेण हन्त्यत्र कलहः । परिवदनं परिवादः । छलयती (त्यत्रे)ति छलम् । शोणितं लोहितं रक्तं रुधिरं क्षतजासृजम् ॥ १८ ॥ षड् रुधिरे । शोण्यते वर्ण्यते देहोऽनेन शोणितम् । तालव्यः । रोहति देहे जायते लोहितम् । १० रजति रसं रक्तम् । रुणद्धि रुधिरम् । क्षताद प्रणाजायते क्षतजम् । अस्यते क्षिप्यते असक् । सन्ततानारताजस्रान्वहं कन्यापतिवरः । त्रयः (चत्वारः) सन्तते । सन्तन्यते स्म सन्ततम् । न भारतम् अनारतम् । न जत्यतीत्येवंशील. मजस्रम् । अन्यहम् । कन्यापतिर्वरः नन्दतु इति प्रयोजनीयम् । उद्वाहः परिणयनं विवाहश्च निवेशनम् ॥ १८६ ।। १५ चत्वारो विवाहे । उद्वहनं उद्वाहः । परिणीयते परिणयनम् । विवायते विधाहः । निवेश्यते निवेशनम् । शपिरं विवरं रन्ध्र छिद्रम् चत्वारश्छिद्रे । शुष्यति जलमत्र 'शुपिरम् । उपशुषीति रः। विप्रियते भूमध्यमनेन विवरम् । रणति वातेन रध्यति हिनस्ति प्राणिनं वा रन्ध्रम् । छिद्यते तत् छिद्रम् । कुहरन् । विलम् । नियं. २० थनम् । रोकम् । श्वभ्रम् । वपा । शुपिः । गर्ता च गह्वरम् । गर्तायां द्वौ । पतितं प्राणिनं गिरति गर्ता । गतः । गूदतीति गतरम् । श्वभ्र रस्यं च पातालं नरकं यान्त्यमेघसः ॥ १६० ।। चत्वारो नरके । इवयते वर्धतेऽत्रोपरि चरतो शहा, स्वभिर्मान्तं वा स्वभ्रम् । मायामा रस्यम् । पतन्त्यस्मिन् पातालम् । नराः कायन्त्यत्र नरकः । नारकः । पुंसि । श्मेधसः भिरि १. "लिश शल्पीभावे" । दिवादिः । ततो पविधानमा नलान !! .. ४।५।४ । ३. लूयते छिपते लवः । दोरप् । टीकोन विहन्तु न लनानिमा । ... शब्दः पेशीवाचको मेदिन्यां लन्यते । पेशोना मर्मस्थानन्दमादे सामना । 7 मर्मेत्यभ्युन्नेयम् । तदुतम्-'कोपोली कुरमले पाने दिव्ये विधान। ... शब्दादिसाहे" । पाल्वर्गः ६ । ५. "तिमिरधिमदिमन्दिचदिवधिविकिप: ::::::: सुपिरस्यात्तीति विाहे तु 'उपतुपिनुममधोर" पासू. ५.२ ३०.5 इति : उपसुपीति पा. सूने दन्त्य एष पाटः। शीरखान्यपि दन्त्य : -- ८८ ५ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता पञ्च कार्यविलम्वे (म्बिते)। शीतं लाति मन्दो भवति कार्य शीतलम् । ताम्यति स्वकार्य: मिच्छति तिमिरम्' । स्तिमितं स्थिमितं वा पाठः । यथा भवं याथम् । मन्यते मन्दम् । विलम्ब्यते स्म विलम्वितम् । विद्धि जानीहि । स्वभावः प्रकृतिः शीलं निसगों विश्वसो निजः । पञ्च स्वभावे निजे। स्वः स्वकीयो भावः स्वभावः। प्रकरणं प्रकृतिः। शील्यते शीलयति वा शीलम् । निसृत्यते निसर्गः । विश्वसितीति विश्वसः' । विश्वासश्च । विश्रम्भः । योग्या गुणनिकाऽभ्यासः त्रयोऽभ्यासे । युज्यते योग्या । गुण्यते ऽहर्निशं गुणनिका । अभ्यसनमभ्यासः। स्यादभीक्ष्णं मुहुर्महुः ॥ १८५ ॥ मुहुर्मुहुरं वारं स्यात् भवेत् । अभीक्ष्णम् । अभीक्षणम् अभीक्ष्णम् | अभिमुखमीक्षते वा अभीक्ष्णम्" । नितराम् । मृपालीकं मुधा मोघम् चत्वारोऽलीके । मृप्यते सहते नारकं दुःखमनेन मृपा । श्रादन्तमव्ययम् । अलति स्वस्वाङ्गा- (स्वर्गा)निवारयति अलीकम् । मुञ्चति त्यजति निमित्तं मुधा । श्रादन्तमव्ययम् । मुह्यतेऽत्र चित्तं मोघम् । विफलं वितथं वृथा । १५ निष्फलवचने त्रयः । विगतं फलं विफलम् । विगतं तथा सत्यं यस्मात् वितथम् । वृणो- त्याच्छादयति गुणान् वृथा । अव्ययम् । विधुरं व्यसनं कष्टं कृच्छ् गहनमुद्धरेत् ।। १८६ ।। पञ्च कष्टे । कप्टेन विधुनोति शरीरं विधुरम् । व्यस्यते अनेन व्यसनम् । कष्यते (कपति) कष्टम् । कृणोति छिनत्ति दुःखेन कृच्छ्रम्" । गाह्यते गहनम् । उद्धरेत् निस्तरेत् । समस्तं सकलं सर्वं कृत्स्नं विश्वं तथाऽखिलम् । पट् समस्ते । समस्यते एकीकरोति समस्तम् । समं ग्रसते समग्रम् । समानं कलयतीति सकलम् । सरति सर्वम् । कृन्तति वेष्टयति व्याप्नोति कृत्स्नम् । विशति तिष्ठति सर्वत्र विश्वम्। नास्ति खिलं शून्यमत्याखिलम् । निखिलं च । - । २० १. "तिम आद्रीभावे"। तिम्यति आद्रीभवति तिमिरः। विलम्बशीलो जनः सर्वदा इव शीतः स्फूर्तिरहितश्च भवति'। २. विश्वसशब्दस्य प्रकृत्यर्थे प्रमाणान्तरं नास्ति । एवं विश्वासो विश्राभोऽपि । विश्वसशब्दाऽन्वाख्यानमपि व्याकरणादस्पष्टम् । अतोऽत्र त्रिप्वपि मूलटीके एव प्रमाणम् । ३. योगे चित्तैकाग्र्ये साध्वीति योग्या "तत्र साधु"रिति यदन्यत्र । ४. गुण्यते गुणना। चुरादिणिजन्ताद् भावे "ण्यासश्रन्येति युच् । ततः स्वार्थे कः । गुणनैव गुणनिका । ५. अभिक्षणौति अभीक्ष्णम् । "पणु तेजने" । बाहुलकाड्डमुः। अन्येपामपीति दीर्घः। इति रामाश्रमः । ६. अत्र मृपाऽलीकशब्दो वक्ष्यमाणो वितय- शब्दश्चासत्यवाचकः । मुधामोघशब्दी विफलवृथाशब्दो च वक्ष्यमाणौ व्यर्थवाचका इति विवेकोऽ- न्यत्र । तदुक्तममरे-"मृपा मिथ्या च वितथे” ३।४।१५ । "अलीकं त्वप्रियेऽनृते” ३।३।१२ । “मोघं निरर्थकम्" ३।११८१ । व्यर्थके तु वृथा मुधा" ३।४।४ । “वितथं त्वनृतं वचः" ११८२१ । इति । ७. कर्पति कृन्तति वेति क्षी० स्वा० । ८. समस्यते स्म समस्तम् | "असु क्षेपणे"। कर्मणि क्तः । ६. सङ्गतमग्रमस्य समग्रम् । १०. सह कलाभिर्वर्तते सकलम् । .
१२ नाममाला ८९ -- शकलं विकलं खण्डं शल्कं लेशं लवं विदुः ।। १८७ ॥ पट् खण्डे । शक्नोति काये शकलम् । शल्कं च । विगता कला यस्मात् तद् विकलम् । खण्डवते खण्डः। लिश्यते लेशः । लिश विच्छ गती । “अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् २' । रौति शब्द फरोति लवः । विदुः कथयन्ति । अर्धम् । नेमः । सामि । असम्पूर्णम् । दलं च । मर्म कोपं च हो मर्मणि । म्रियतेऽनेन मर्म । नान्तम् । कुष्यते कोषम् । कलहं परिवादं छलं नयेत् । करेण हन्त्यत्र फलहः । परिवदनं परिवादः । छलयती (त्यत्रे)ति छलम् । शोणितं लोहितं रक्तं रुधिरं क्षतजासृजम् ॥ १८८ ॥ पड़ रुधिरे । शोण्यते वर्ण्यते देहोऽनेन शोणितम् । तालव्यः । रोहति देहे जायते लोहितम् । १० रजति रमं रक्तम् । रुणदि रुधिरम् । क्षताद प्रणाजायते क्षतजम् । अस्यते क्षिप्यते असृक् । सन्ततानारताजस्रान्वहं कन्यापतिर्वरः । त्रयः (चत्वारः) सन्तते । सन्तन्यते स्म सन्ततम् । न भारतम् अनारतम् । न जस्यतीत्येवंशील- मजनम् । अन्यहम् । कन्यापतिर्वरः नन्दतु इति प्रयोजनीयम् । उद्वाहः परिणयनं विवाहश्च निवेशनम् ॥ १८६ ॥ १५ चत्वारो विवाहे । उद्वहनं उद्वाहः। परिणीयते परिणयनम् । विवाह्यते विवाहः । निवेश्यते निवेशनम् । शुपिरं विवरं रन्ध्र छिद्रम् चत्वारश्छिद्रे । शुष्यति जलमत्र "शुषिरम् । उषशुषीति रः। वित्रियते भूमध्यमनेन विवरम् । रणति वातेन रध्यति हिनस्ति प्राणिनं वा रन्ध्रम् । छिद्यते तत् छिद्रम् । कुहरम् । विलम् । निर्य- २० थनम् । रोकम् । श्वभ्रम् । वपा । शुपिः । - गर्ता च गह्वरम् । । गर्तायां द्वौ । पतितं प्राणिनं गिरति गर्ता । गतः । गृहतीति गह्वरम् । श्वभ्र रस्यं च पातालं नरकं यान्त्यमेधसः ॥ १० ॥ चत्वारो नरके । श्वयते वर्धतेऽत्रोपरि चरतो शङ्का, श्वभिमा॑न्तं वा श्वभ्रम् । रसायां भवं रस्यम् । पतन्त्यस्मिन् पातालम् । नराः कायन्त्यत्र नरकः। नारकः । पुंसि । अमेधसः बुद्धिरहिताः १. "लिश अल्पीभावे" । दिवादिः । ततो घविधानमर्थाऽनुरूपम् ।। २. का० सू० ४।५।४ । ३. लूयते छिद्यते लवः । ऋदोरप् । टीकोक्तविग्रहस्तु न लवनाऽभिधायो । ४. कोप- शब्दः पेशीवाचको मेदिन्यां लभ्यते । पेशीनां मर्मस्थानत्वमायुर्वेदे सम्मतम् । अत उपचारात् कोपोऽपि मर्मेत्यभ्युन्नेयम् । तदुक्तम्-"कोपोऽस्त्री कुड्मले पात्रे दिव्ये खगपिधानके । जातिकोपेऽर्थसङ्घाते पक्ष्यां शब्दादिसाहे" | पा०वर्ग० ६ । ५. "तिमिरुधिमदिमन्दिचन्दिवधिरुचिशुषिभ्यः किरः" का उ० ११२३ । सुपिरस्यास्तीति विग्रहे तु "उपसुषिमुष्कमधोरः" पा०सू० ५।२।१०७ । इति रः । रप्रत्ययपक्षे दन्त्यादिरयम् । उपसुपीति पा० सूत्रे दन्त्य एव पाठः। क्षीरस्वाम्यपि दन्त्यमेव पपाठ ।
अमरकीर्तिविरचितभाष्योपता । सम्यक्चारित्ररहिता यान्ति गच्छन्ति नरकम् । निरयः । दुर्गतिः । अदभ्र भूरि भूयिष्ठं वंहिष्ठं बहुलं बहु । प्रचुरं नैकमानन्त्यं प्राज्यं प्राभूतपुष्कलम् ॥ १६१ ॥ द्वादश प्रभूते । न दभ्रमभ्रम् । भवति प्राचुर्यमत्र भूरि, भूरिष्ठ च । अतिशयेन बहु भूयिष्टम् । "बहो लोपो भू च बहोः" "इष्ठस्य यिट्चेति" भूरादेशो यिडागमश्च । अतिशयेन बहुली वहिष्टः । वहति प्राचुर्य बहुलम् । प्रचुरति प्रचुरम् । न एकं नैकम् । अनन्तस्य भाव अानन्त्यम् । प्राज्यते प्रकरण वीयतेऽनेन वा प्राज्यम् । प्रामवति स्म प्राभूतम् । प्रभूतं च । पुप्यति पुष्कलम् । पुष्कं च। पुरुनम् । पुष्टम् । भयो भावश्च संसारः संसरणं च संसृतिः । तयज्ञश्चतुरो धीरस्त्यजेज्जन्माजवं जवम् ॥ १६२ ।। अष्टौ संसारे । भवतीति भवः । भवतीति भावः । ."वा ज्वलादिदुनीभुवो णः" । संसरति अस्मिन् संसारः । संस्रियते अस्मिन् संसरणम् । संसरणं संसृतिः । जनयतीति जन्म । अाजब- तीति श्राजवम् । जवति चतुर्गत्यां भ्रमति (अत्र) जवः । ऊर्जस्फूर्जस्वी तरस्वी तेजस्वी च मनस्व्यपि, । चत्वार (पञ्च) स्तेजोयुक्तपुरुपे । ऊ ऊर्जा वाऽत्त्यत्येति ऊर्जस्वी । स्फूर्जीऽस्यास्तीति १५ स्फूर्जस्वी । तरोऽस्यास्तीति तरस्वी। तेजोऽस्यास्तीति तेजस्वी । मनोऽस्यास्तीति मनस्वी। भास्वरो भासुरः शूरः प्रवीरः सुभटो मतः ॥ १६३ ॥ पञ्च सुभटे । भासते इत्येवंशीलो भास्वरः । भासुरः। “भिदि भासिभंजा घुरः" । शूरयति शूरः । शूर वीर विक्रान्तौ । प्रवीरयते प्रवीरः । सुष्टु भटः सुभटः । विक्रान्तः । तनुत्रं वर्म कवचमावृतिर्वाणवारणम् । पञ्च कवचे । तनु शरीरं त्रायते रक्षति तनुत्रम् । वृणोत्यङ्गं वर्म। कच्यते वध्यते शरीरम् अनेन कवचम् । श्रावरणमावृतिः । वाणानां वारणं निषेधनं वाणवारणम् । कूपसं कञ्चुकम् । द्वौ कञ्चुके । करोति शोभां कृर्पासम् । कर्पासं च । कञ्च्यते बध्यते कञ्चुकः । छत्रमातपत्रोष्णवारणम् ॥ १६४ ॥ त्रयश्छत्रे । वर्षातपो छादयतीति छत्रम् । त्रिपु | छत्रः, छत्री । आतपात् त्रायते श्रातपत्रम् । उष्णस्य वारणम् उष्णवारणम् । नृपलक्ष्म । केशं शिरोरुहं वालं कचं चिकुरमीहयेत् । पञ्च केशे। के मस्तके शेते केशः। शिरसि रोहति शिरोरुहः । वल्यते संवियते वालः । मस्तके चीयते कचति वा कचः । चीयते यत्नेन चिङ्गुरः । चिकुरश्च । मूर्धजः। शिरसिजः । - २५ १. पा० सू० ६४/१५८। २. पा० सू० ६।४।१५६ । ३. प्रचोरति प्रचुरम् । चुर स्तेये । चुरादीनां णिज्वैकल्पिकः । इगुपधेति कः। प्रगतं चुरायाः प्रचुरमिति वा रामाश्रमः । ४. प्राज्यते काम्यते "अञ्जू व्यक्त्यादौ" अञ्जः संज्ञायामिति क्यप् । यद्वा प्रवीयते "अज गतिक्षेपणयोः" क्यप् । वोभावो नेति टीकाशयः । ५. का० सू० ४।२। ५५ । इति णः । ६. "कपिपिसिभासीशस्थाप्रमदां च" का० सू० ४|४|४७ । इति वरः । ७. का० सू० ४।४।४१ ।
नाममाला ९१ जिनः । कुन्तलः। चूडापाशं च धम्मिल्लं कवरी केशवन्धनम् ॥ १६५ ॥ चत्वारः केशबन्धने । चुद संचोदने । "चुरादेश्च" इन् । नामिनो गुणः । चोदनं चूडा। "उन जूदपीडमृगयतिन्य इनन्तेभ्यः संज्ञायाम्" अङ् प्रत्ययः । कारितलोपः । निपातनात् उपधाया स्वत्वम् । दस्य उत्वम् । चूडायाः शिखायाः पाशः चन्धनं चूडापाशः । धम्मिः सौत्रः । धम्यन्ते केशा ५ वध्यन्ते धस्मिल्लः । कं मस्तकं वृणोति करो नदादित्वादीः । कवरी। इदन्तोऽपि कचरिः । श्रावन्तो वा कबरा । केशस्य बन्धनं केशवन्धनम् । वेणी । प्रवेणी । वीणा च उररीकृतमप्यूरीकृतमङ्गीकृतं तथा । त्रयोऽङ्गीकारे । उरीप्रभृतीनां कृना सह समासो वा भवति । तथाहि-उरी उररी अङ्गी- करणे विस्तारे च । आश्रुतम् । प्रतिज्ञातम् । उपगतम् । १० अस्तुंकारोऽभ्युपगमे अभ्युपगमे अङ्गीकारे अस्तुङ्कारः कथ्यते । अस्त करोतीति (करणम्)अस्तुङ्कारः । “कर्मण्यण' श्रण प्रत्ययः । अस्योप० वृद्धिः । व्यंजनम | ""सत्यागदास्तूनां कारे" । मकारागमः । सत्यङ्कारः पणार्पणे ॥ १६६ ॥ सत्यापणे सत्यं करोतीति लत्यकारः । १५ सौहार्द सौहृदं हार्द सौहृद्यं सख्यसौरभम् । मैत्री मैत्रेयिकाजयं सहाय्यं संगतं मतम् ॥ १६७ ॥ दश (एकादश) सख्ये। सुहृदां भावः सौहार्दम् । । सौहृदम् । हार्दम् । सौहृद्यमेकमेव वाक्यम् । सख्युर्भावः सख्यम् । सुरस्येदं (भेरिदं) सौरभम् । मित्रस्य भावो मैत्री। मैच्या नियुक्तो मैत्रेयिकः । न जीर्यते अजर्यम् । सहाजी (य्य) ते सहाय्यम् । संगमनम् सङ्गतम् । क्षेमं कल्याणमुभयं श्रेयो भद्रं च मङ्गलम् । भावुकं भविकं भव्यं श्वोवसीयं शिवं तथा ।। १६८ ॥ दश (एकादश) कल्याणे। क्षिणोति क्लेशान् क्षेमम्। कल्यते ज्ञायते कल्याणम् । कल्यं नीरुजत्वमनिति वा कल्याणम् । प्रकृष्ट प्रशस्यं श्रेयस् । सान्तम् । भदते हादते सुखीभवत्यनेन भद्रम् । मं पापं गालयतीति मजलम् । भवनशीलं भावुकम् । "कमगमहनवृषभूस्थालषपतपदामुकञ्:"। प्रशस्तो २५ भवोऽत्यास्तीति भविकम् । पुण्यकृतो भवितव्यं भवति भव्यम् । श्वः शोभनञ्च वसीयः श्वोवसीयः । श्वोवसीयसं च । 'श्वसो' 'वसीयस्" । शीयते तनूक्रियते दुःखमनेन शिवम् । भाष्यविधातॄणां श्रीमदमर- कोर्तीनां शिवं भवतु । २० । १. वृजिनशब्दो भङ्गुरवाची । तदुक्तम्--"वृजिनं भगुरं भुममरालं जिह्मभूतिमत्' अभि० चि० ३।९३ । लक्षणया भङ्गुरकेशेऽपि वृजिनशब्दप्रयोगः । २. का० सू० ३।२।११ । ३. का० सू० ३।५।२ । ४. का० सू० ४।५।८२ । अत्र दुर्गवृत्तिः "ऊनचुदपीड मृगयतिन्य इनन्तेभ्यो यो प्राते वचनम्" इत्येवंरूपा । ५. अखकरणमस्तुङ्कारः । ६. का० सू० ४।३।१ । ७. "व्यजनमत्वरं परवणे नयेत्” का० सू० १।१।२१ । ८. का० सू० ४।१।२३ । ६. सत्यत्य करणं सत्यकारः । भावे पम्। क- विहष्टीकोक्तस्त्वयुक्तः । १०. का० सू० ४।४।३४ । ११. काल सू० २।६।४१ । वृत्तिः २७ । .
५ १० ९२ अमरकीर्ति विरचितभाष्योपेता वक्ता वाचस्पतिर्यत्र श्रोता शक्रस्तथापि तो। शब्दपारायणस्यान्तं न गतौ तत्र के वयम् ॥ १६६ ॥ अस्य श्लोकस्य सुगमव्याख्या । तथापि किञ्चित् कस्मैचित् प्रतिबोधाय सूचितम् । वोधयेत्कियदुक्तिज्ञो मार्गज्ञः सह याति किम् ॥ २० ॥ तथापि मया घनश्चयकविना सूचितं कथितम् कस्मैचित् प्रतिबोधाय ज्ञानाय | उक्तिशो बोधयेत् ज्ञापयेत् । मार्गज्ञः किं सह याति गच्छति, अपि तु न गच्छति । । प्रमाणमकलङ्कस्य पूज्यपादस्य लक्षणम् । द्विःसन्धानकवेः काव्यं रत्नत्रयमपश्चिमम् ।। २०१ ।। एतद्रत्नत्रयमपश्चिमं नवीनमपूर्व वर्तते कवर्धनञ्जस्येयं सत्कवीनां शिरोमणेः । प्रमाणं नाममालेति श्लोकानां हि शतद्वयम् ॥ २०२ ॥ धनञ्जयस्य कवेः सत्कवीनां शिरोमणेः इति अमुना प्रकारेण इयं नाममाला इलोकानां शतद्वयं २०० प्रमाणमस्ति । ब्रह्माणं समुपेत्य वेदनिनदव्याजात् तुपाराचल- स्थानस्थावरमीश्वरं सुरनदीव्याजात् तथा केशवम् । अप्यम्भोनिधिशायिनं जलनिधिध्वानोपदेशादहो फूत्कुर्वन्ति धनञ्जयस्य च भिया शब्दाः समुत्पीडिताः ॥२०३॥ अहो लोकाः धनञ्जयस्य च भिया कृत्वा शब्दाः समुत्पीडिताः सम्यक प्रकारेण पीड़िताः २० फुत्कुर्वन्ति । किं कृत्वा पूर्व वेदनिनदव्याजात् मिपात् ब्रह्माणं समुपेत्य प्राप्य, ईश्वरं तुपाराचलस्थान- स्थावरं सुरनदीव्याजात् प्राप्य, केशवं श्रीविष्णु किं विशिष्टं अम्भोनिधिशायिनं जलनिधिध्वानोप- देशात् समुपेत्य सुगमोऽयं इलोकः । इति महापण्डितश्रीमदमरकीर्तिना विद्यन श्रीसेन्द्रवंशोत्पन्नेन शब्दवेधसा कृतायां धनञ्जयनाममालायां प्रथम काण्ड व्याख्यातम् श्रीमद्धनञ्जयकविविरचिता अनेकार्थ नाममाला ५ .' १० जिनेन्द्रं पूज्यपादं च चैलाचार्य शिवायनम् । अर्हन्तं शिरसा नत्वाऽनेकार्थ विवृणोम्यहम् ॥ १ ॥ गम्भीरं रुचिरं चित्रं विस्तीर्थप्रसाधकम् ।। शाब्दं मनाक् प्रवक्ष्यामि कवीनां हितकाम्यया ॥२॥ गम्भीरं रुचिरं मनोज्ञं चित्रं विस्तीर्णार्थप्रसाधकम् । सुगमव्याख्याऽस्ति । अर्हत्पिनाकिनी शम्भू शम्भू इति द्विवचनान्तं पदम् । जिनावहत्तथागतौ। जिनो कथ्यते । वेदसूयौं विवस्वन्तौ वेदश्च सूर्यश्च वेदसूर्यो विवस्वन्तौ सूयौँ कथ्यते । विष्णुरुद्रौ वृपापी ॥३॥ विकुण्ठाविन्द्रगोविन्दौ अनन्तौ शेषशाझिणौ ।। शेषश्च धरणेद्रः, शाी च विष्णुः शेषशाङ्गिणौ । जीमूतौ तु करिक्रीडौ पर्जन्यौ शक्रवारिदौ ॥ ४ ॥ वनमम्भसि कान्तारे अम्भसि कान्तारे वनम् । भुवनं विष्टपेऽर्णसि सुगमव्याख्या । १. शं कल्याणं भवतीति शम्भुः । डुप्रत्ययः । केशवब्रह्मवाची च । तदुक्तम् –“शम्भुः स्याद् ब्रह्मशिवयोरर्हत्यपि च केशवे', । इति वि० लो० भा० व० ९। हेमे च-"शम्भुराहतोः शिवे" । २१६ । इति च । २. विष्णु, अतिवृद्ध, जित्वर, इत्येतेष्वपि जिनः । तदुक्तम्---"जिनस्त्वर्हति बुद्धेऽतिवृद्धजित्वरयोस्निपु" वि० लो० ना० व० ८ । हैमे- "जिनोऽर्हबुद्ध विष्णुपु' २।२६९ । ३. "विवस्वान् देवसूर्ययोः" अने० स० ३।३१७ । अत्र देवशब्दपाठात्प्रस्तुतेऽपि देवशब्द एव युक्तः । ४. अग्निश्च । तदुक्तम्-"वृषाकपिर्वासुदेवै शिवेऽग्नौ च" अने० सं० ४१२१६ । ५. अनवधिरप्यनन्तार्थः । "अनन्तः केशवे शेषे पुमाननवधौ त्रिषु" इति मेदिनी । ६. “जीमूतो वासवेऽम्बुदे । घोपके द्रौ भृतिकरे" इति० अने० सं० । ७. पर्जन्यो मेघगर्जितेऽपि । तदुक्तम्--"पर्जन्यो मेवशब्देऽपि ध्वनदम्बुद- शक्रयोः" इति मेदिन्याम् । १५ .
६४ अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता . घृतं सपिपि पानीये विपं हालाहले जले ।। ५ ॥ तल्पं दारेषु शय्यायां ज्योतिश्चक्षुपि तारके ! घवले सुन्दरे रामो वामो वक्र मनोहरे ॥ ६ ॥ नक्षत्रे मन्दिरे विष्ण्यम् देधेष्टि शब्दं करोत्यत्र जनो धिययम् । नपुंसकम् । घिष शब्दे । वसने गगनेऽम्बरम् । वसने गगने अम्बरं वर्तते । अम्बं शब्दं राति ददातीति अम्बरम् । परिवी पादपे सालः परिधौ पादपे सालो वर्तते । सां लक्ष्मी लातीति सालः । "सालः शर्जतरी वृक्षमात्रप्राकारयोरपि" इति हैमः' । सिन्धुः स्रोतसि योपिति ॥ ७॥ स्रोतसि योपिति सिन्धुः । स्यन्दते सिन्धुः। सारसः शकुनौ धूर्ते सरसि तडागे भवः २सारसः! केतनं दीधितौ ध्वजे। केतन्ति जानन्त्यत्र केतनम् । तथा च- "कृत्ये निमन्त्रणे चिह्ने मन्दिरे केतनं विदुः।" १० मयूखः कीलके दीप्तौ २० मयते विस्तारं यातीति मयखः । पतङ्गः शलभे रवौ ॥८॥ एततीति पतङ्गः । पत्लु गती । अञ्जनः कञ्जले नागे कजले नागे अजनो वर्तते । अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिसु । विक्रमेण3 अज्यते प्रकटी- क्रियते अजनः । २५ सारङ्गः पृपते गजे। सरतीति सारङ्गः । सरलः प्रगुणे वृक्षे ऋजुत्वात्सरलः। पुन्नागः' सन्नरे तरौ ॥४॥ ३० पुमाँश्चासौ नागः श्रेष्ठः। १. अने० स० २१२२७ । २. २१२२७ । २. धूर्तपक्षे तु अरसेन द्वेपेण सहितः सारस इति विवेकः । ३. गजोऽपि विक्रमेण ज्ञायते, कनलोऽपि विक्रमणवलेन म्रक्ष्यते । ४. सारं दृढमङ्ग यस्येत्यपि । सरतीत्यस्य स्थाने सारयतीति युक्तम् । ५."पुन्नागस्तु सितोत्पले । जातीफले नरश्रेष्ठे पाण्डुनागे द्रुमान्तरे।'' इति मेदिनी अनेकार्थ-नाममाला १० पाञ्चजन्योऽनले शाले पशजने पाताले भवः पाञ्चजन्यः । कम्युः शङ्ख मतङ्गजे। सौत्रः कन्च्यते वर्ण्यते कंबुः । अथ वा कवृ वर्णे उणादित्वादस्मादेव नकारागमश्च । कस्बरो घुभवे घुम्ने धुभवे स्वगोंडवे घुम्ने सुवर्णे कस्वरः । कुत्सितं स्वरति कस्बरः । स्यन्दनं शकटेऽम्बुनि ॥ १० ॥ त्यदन्ते स्यन्दनम् । अद्रिगिरिवनस्पत्योः गिरिश्च वनस्पतिश्च गिरिवनस्पती तयोगिरिवनर पत्योः । अत्ति श्राकाशमियाद्रः । शिखरी तरुभूध्रयोः शिखरमस्या तीति शिखरी। राजा चन्द्रमहीपत्योः। राजते इति राजा। द्विजो दशनविप्रयोः ॥ ११ ॥ द्विर्जातो द्विजः। मोचामरस्त्रियो रम्भा ब्रह्मपानपि रमयतीति रम्भा । कदली ध्वजमोचयोः। केन वायुना दल्यते विदार्यते कदली। अशोकः सुमनस्तोः न शोको यस्माद्यस्य वा अशोकः । सुमनाः सुरपुष्पयोः ॥ १२ ॥ सुरश्च पुष्पं च सुरपुष्पे तयोः सुरपुष्पपोः । शोभनचित्तः सुमनाः । मुक्तारजतयोस्तारः तीर्यते तारः। भूरि भूयःसुवर्णयोः। पुण्यवत्सु भवतीति भूरि। क्लीवे । पानीयदुग्धयोः क्षीरम्" घस्तृः अदने । सौत्रोऽयम् । १५ . २५ ३० १. "पाञ्चजन्यस्तु विष्णुश द्रुमान्तरे" इति मेदिनी । २. "कम्युः पुमान् गजे। वलये शाह- शम्बूककन्धरामलके स्त्रियाम्" इति वि० लो० बा० ० २ । ३. "स्यन्दनं प्रलवे नीरे स्यन्दनत्तिनिशे रथे" वि० लो० ना० व० १५१ । ४. राजा प्रभौ च नृपतौ क्षत्रिये रजनीपतौ । पक्षे शके च पुंसि त्यात्' इति मेदिनी । ५. घस्यतेऽद्यते क्षीरम् । “घस्लु अदने" । पत्तेः किन्चेति कीरः ।
अमरकीतिविरचितभाप्योपेता १६ पयः सलिलदुग्धयोः ॥ १३ ॥ पीयते पयः। कालनकर्पयोः काष्ठा कालश्च त्रुट्यादिलक्षणः । ५ "स्वस्थे नरे सुखासीने यावत्स्पन्देत लोचनम् । तस्य त्रिंशत्तमो भागस्त्रुटिरित्यभिधीयते ।।" अथवा- "सर्पपस्य प्रयत्नेन क्षिप्तस्य पततोऽम्बरात् । द्वियवं यावदध्वानं कालः स (च) त्रुटिः स्मृतः ।।" प्रकर्षश्च प्रकर्षता उत्कृष्टता वा। कालश्च प्रकर्षश्च कालप्रक्रया तयोः कालप्रकर्पयोः काष्टा १० कथ्यते । काशते भासते काटा। टान्तोऽयम् । कोटिः संख्याप्रकर्पयोः। कुटतीति कोटिः । "कियती पञ्चसहस्री कियती लक्षा च कोटिरपि कियती । औदार्योन्नतमनसां रत्नवती वसुमती कियती ।।" १५ रन्ध्रसंश्लेपयोः सन्धिः सन्धान सन्धिः। "सन्धि-नो सुरङ्गायां नाट्ये ऽङ्गे श्लेपभेदयोः” इति हैमी' । सिन्धुर्नदसमुद्रयोः ।। १४ ॥ स्यन्दते सिन्धुः । निपेघदुःखयोर्वाधा बन्धनं ( वाधनं ) वाधा । वाध प्रतिघाते । व्यामोहो मूर्खमौढ्ययोः। व्यामुह्यते व्यामोहः। कौपीनाकारयोर्गुह्यम् २५ गुह्यते गुह्यम् । गुहू संवरणे । “गुह्यमुपस्थे रहस्ये च" इति हैमी । कीलालं रुधिराम्भसोः ॥ १५ ॥ कीलां लातीति कीलालम् । "कीलालं रुधिरे नीले” इति हेमी” । मूल्यसत्कारयोरर्थः अर्धते पूज्यतेऽनेनेत्यर्थः । “६व्यञ्जनाच' वञ् । होपधत्वादी? ना "न्यवादीनां हश्च घः" । ३० जात्यः श्रेष्ठकुलीनयोः । २० ० . १. अने० स० २।२५७ । २. व्यामोहशब्दस्य मूर्खार्थे मूलं मृग्यम् । ३. अने० स० २।३५८ । ४. कीला ज्वालामलति वारयति । अल पर्याप्त्यादी । इति जले विग्रहः । रुधिराथे तु टीकोक्तः । ५. अनेक स० ३१६८३ । ६. का० सू० ४/५/९९ । ७. का० सू० ४१६/५७ । .
अनेकार्थ-नाममाला -- . श्रेष्ठकुलीनयोर्जात्यः । जात्यां भवो जात्यः । मेघवत्सरयोरन्दः अवतीति अब्दः । कुन्दादयः१-"कुन्दतृन्दमन्दाब्दाः" । "अब्दः संवत्सरे मेघे मुस्तके गिरिभिद्यपि।" ताक्ष्यों हयगरुत्मतोः ॥ १६ ॥ तृक्षस्यात्पर्य तायः । पुंसि । स्तब्धतास्थूणयोः स्तम्भः स्तम्भु इति सौत्रोऽयं धातुः । चर्चा चिन्तावितर्कयोः। चर्चणं चर्चा। हरकीलकयोः स्थाणुः तिष्ठतीति स्थाणुः । २० स्वैरः स्वच्छन्दमन्दयोः ॥ १७ ॥ त्वत्य ईरः स्वैरः । स्वस्यात ऐतमारेरिणोरपि वक्तव्यम् । तथा चालङ्कारे- "स्वैरं विहरति स्वैरं शेते स्वैरं च जल्पति । भिक्षुरेकः सुखो लोके राजचौरभयोज्झितः ॥" "स्वैरो मन्दे स्वतन्त्रे च'' इति हैमी । शङ्खः सङ्कीर्णविवरे पलालाग्नौ च कीलके । संख्यायाम् शं कायति कूयते वा "शङ्कुः । काननोद्भूते वह्नौ दावो दवोऽपि च ॥ १८ ॥ काननोद्भते वह्नौ दावो दवोऽपि च । दुनोतीति दवः । दावः । “वा ज्वलादिदुनीभुवो णः" । कीनाशः कृपणे भृत्ये कृतान्ते पिशिताशिनि । तथा पुण्यजनान् प्राहुः सजनान् राक्षसानपि ॥१६॥ लोभेन विलश्यते बाध्यते कीनाशः । तालव्यः । विरोचनो रचौ चन्द्रे दनुसूनौ हुताशने । विरोचते इत्येवंशीलो विरोचनः । हंसो नारायणे ब्रघ्ने यतावश्वे सितच्छदे ।। २० ।। हन्तीति हंसः। सोमश्चन्द्रोऽमृतं सोमः सोमो राजा युगादिभूः । सोमः प्रतानिनीभेदः सोमपोऽगस्त्यदिग्पतिः ॥ २१ ॥ २५ ३० १. का० उ० सू० ॥६४ इति दप्रत्ययः । २. अने० स० २१२२६ । ३. "त्वस्येरेरिणीरिपु" का० रू० पू० ३८ । ४. अने० स० २।४८२ । ५. शकतेऽस्मात् शङ्कुः । “शकि शायाम्' । श्रोणा- दिक उः। ६. का० सू० ४१२।५५। इति णप्रत्ययः "टुद् उपता" ।
हट अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता ५ १० घुञ् अभिषवे । अनेन सर्वेषां साधनिका ज्ञातव्या । अजो विधिरजो विष्णुरजः शम्भुरजस्तमः । अजस्त्रैवार्पिको व्रीहिरजो रामपितामहः ।। २२ ॥ न जायते नोत्पद्यते अजः । शुद्धेऽनुपहते वह्नौ ब्राह्मणे सचिवोत्तमे । आपाढेऽध्यात्मसंवित्तौ ब्रह्मचर्ये शुचिर्मतः ॥ २३ ॥ मतः कथितः । एतेष्वर्थेषु शुचिशब्दः । शोचति जनो देहलग्नेऽत्र शुचिः । तथा च यश- स्तिलकचम्पूकाव्ये- "न स्त्रीभिः सङ्गमो यस्य सर्वद्वन्द्वविवर्जितः । तं शुचिं सर्वदा प्राहुः मास्तं च हुताशन मिति ॥" अर्थोऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु । अर्थशब्दः पठ्यते । अभिधेयश्च शब्दो वाचकः, शब्दमध्ये योऽसावर्थः स वाच्यः अभि- धेयश्च कथ्यते । राः सुवर्णम् । वस्तु-अस्य्यादिर्लोहितादिर्वा । गैरिकान्वितं ( दिकं च ) वस्तु । प्रयोजनं कार्यम् । निवृत्तिश्च मुक्तिः । तासु । ऋ गतौ । अर्यते इत्यर्थः । भावः पदार्थचेष्टात्मसत्ताभिप्रायजन्मसु ॥ २४ ॥ १५ एतेष्वर्थेषु भावः पठ्यते । भवतीति भावः । “वा' ज्वलादिदुनीभुवो णः।" प्रायो भूमोपमातयंप्रभृत्यन्ननिवृत्तिषु । एतेष्वर्थेषु प्रायः शब्दः । अन्तः पदार्थसामीप्यधर्मसत्त्वव्यतीति' ।। २५ ॥ एतेष्वर्थेषु अन्तः । अक्षो छूते वरूथाङ्गे नयनादौ विभीतके । द्यूते वरूथाङ्गे रथचक्रावयवे, नयनादौ, विभीतके पूतनायाम् श्रक्षो वर्तते । सारः श्रेष्ठे वले वित्ते कोशे जलचरे स्थिरे ॥ २६ ॥ श्रेष्ठे, बले, वित्ते, कोशे, क्रोशे वा पाठः । जलचरे, स्थिरे सारो वर्तते । सरत्यनेनेति सारः । 3"बलमत्स्ययोश्च" इति परसूत्रेण घञ् । स्वमते "अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्" इति घञ्। “सारो मञ्जस्थिरांशयोः, बले श्रेष्ठे "च" इति हैमी। वाचि वारि पशौ भूमौ दिशि लोम्नि रखौ दिवि । विशिखे दीधितौ दृष्टावेकादशसु गौमतः ॥ २७ ।। पूजां गच्छतीति गौः । गमेझैः । चन्द्र सूर्ये यमे विष्णौ वासवे दर्दुरे हये । ३० मृगेन्द्रे वानरे वायौ दशस्वपि हरिः स्मृतः ॥ २८ ॥ हरतीति हरिः। २० १. का० सू० ४।२।५५ । २. प्रकृष्टमयनं प्रायः । "इण गतौ" | एरच् । ३. "सर्तेःस्थिरव्याधि- मत्स्याले" हे श०५।३.१७ । ४. का० सू० ४।५।४ । ५. अने० स० २।४७८ ।
अनेकार्थ-नाममाला . १० १५ पने करिकरप्रान्ते व्योनि खड्गफले गदे । वाद्यभाण्डमुखे तीर्थे जले पुष्करमष्टसु ।। २६ ।। पुष्णातीति पुष्करम् । शृङ्गारादौ कषायादो घृतादौ च विपे जले । निर्यासे पारदे रागे वीर्येऽपि रस इष्यते ॥ ३० ॥ शृङ्गारादौ- "शृङ्गारहास्यकरुणारौद्रवीरभयानकाः । बीभत्साऽद्भुतशान्ताश्च नव नाटये रसाः स्मृताः ॥" कषायादौ-तिक्ताम्लमधुकटुकषायेषु । घृतादौ--दुग्धदधिघृततैललवणेक्षुरसेषु । विषे जले, निर्यासे वृक्षरसविशेषे, पारदे रागे, वीर्येऽपि रस इष्यते । तीर्थ प्रवचने पात्रे लध्वाम्नाये विदांवरे । पुण्यारण्ये जलोत्तारे महासत्ये महामुनौ ॥ ३१ ॥ एतेष्वर्थेषु तीर्थम् । धातुः पञ्चसु लोहेषु शरीरस्य रसादिषु । पृथिव्यादिचतुष्क च स्वभावे प्रकृतावपि ॥ ३२ ॥ पञ्चनु लोहेषु सुवर्णरजतताम्ररीतिकांस्येषु । शरीरस्य रसादिषु रसासृङ्मासभेदोऽस्थिमजशुक्रेषु । पृथिव्यादिचतुष्के च पृथिव्यतेजोवायु (वनस्पति) पु, स्वभावे, वातपित्तश्लेष्मादिषु एतेष्वर्थेषु धातुः पठ्यते । दधातीति धातुः । प्रधानशृङ्गलाशूलभूपापुण्ड्रप्रभावना । ध्वजलक्ष्मतुरङ्गेषु ललामो नवसु स्मृतः ॥ ३३ ॥ एतेष्वर्थेषु ललामः । ललामन् । आकृतावक्षरे रूपे ब्राह्मणादिषु जातिषु । माल्यानुलेपने चैव वर्णः षट्सु निगद्यते ॥ ३४ ॥ प्राकृतौ, अक्षरे, रूपे, ब्राह्मणादिषु जातिषु. माल्यानुलेपने च वर्णो निगद्यते । अकारादावुदात्तादौ षड्जादौ निस्वने स्वरः। एतेष्वर्थेषु स्वरः कथ्यते । अकारादौ-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ. ए, ऐ, ओ औ । उदात्तादौ-उच्चैरुपलभ्यमान उदात्तः," "नीचैरनुदात्तः" “समवृत्या त्वरितः” । षड्जादौ- "निषादर्षभगान्धारषड्जमध्यमधैवताः । पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्रिकण्ठोत्थिताः स्वराः ।।" निस्वने शन्दे । सङ्केताचारसिद्धान्तकालेषु समयः स्मृतः ॥ ३५॥ समयते समयः। १. तरति तीवते वाऽनेन तीर्थम् । २. "लड विलाते" । डलयोरभेदात् ललतीति ललामः । ३. “वर्ण शब्द" । वर्णयति वर्ण्यते वा वर्णः । घञ् कर्मणि, अज्वा कर्तरि । ४. सारस्व० ० २ । ५. अमः को० १७१ । २० २५ ३० १०० अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता ५ तन्वं प्रधाने सिद्धान्ते सैन्ये तन्तौ परिच्छदे । तन्त्र्यन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति तन्त्रम् । अप्रत्ययः । सत्त्वमोजसि सत्तायामुत्साहे स्थेम्नि जन्तुषु ॥ ३६ ॥ एतेष्वर्थेषु सत्त्वम् । रूपादौ तन्तुषु ज्यायामप्रधाने नये गुणः । गुणयतीति गुणः। ज्ञानचारित्रमोक्षात्मश्रुतिषु ब्रह्मवाग्वरा ।। ३७ ॥ वरा विशिष्टा। अवकाशे क्षणे वस्त्रे बहियोगे व्यतिक्रमे । मध्येऽन्तःकरणे रन्ध्र विशेपे रहितेऽन्तरम् ॥.३८ ॥ एतेष्वर्थेषु अन्तरः। हेतौ निदर्शने प्रश्ने श्रुतौ कण्ठसमीकृतौ । आनन्तर्येऽधिकारार्थे माङ्गल्ये चाथ इष्यते ॥ ३६॥ इण्यते कथ्यते । श्रथ एप्वर्थेषु । हेतावेवंप्रकारादौ व्यवच्छेदे विपर्यये । प्रादुर्भावे समाप्तौ च इतिशब्दः प्रकीर्तितः ॥ ४० ॥ प्रकीर्तितः कथितः इतिशब्दः एतेष्वर्थेषु । इण् गतौं। इ। एति एवमादिकमर्थमिति । "इति 'अमुर्पणि प्रभृतिभ्यो यण्वत्" इत्यनेनेतिप्रत्ययः । इति जातम् । प्रय० सि: । “अन्य- २याच" सिलोपः। धर्मो धनुष्यहिंसादावुत्पादादावये नये । द्रव्यक्रियाश्रये वित्ते जीवादौ दारुवैकृते ॥ ४१ ।। एतेष्वर्थेषु धर्मः । धरतीति धर्मः । मूर्तिमत्सु पदार्थेषु संसारिण्यपि पुद्गलः । एतेष्वर्थेषु पुद्गलः । अकर्मकर्मनोकर्मजातिभेदेषु वर्गणा ॥ ४२ ॥ (अकर्म-पुद्गलस्कन्धः ) कर्म-शानावरणादि, नोकर्म -शरीरादि । जातिर्गोत्रादि । एतेषु वर्गणा १५ २० । २५ वर्तते । ३० ३ ऐश्वर्यस्यासमग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्याववोधस्य पण्णां भग इति स्मृतः ॥ ४३ ।। भजन्त्यस्मिनिति *भगः । प्राहुः कैवल्यमार्हन्त्ये विविक्ते निवृतावपि । १. कातन्त्रेऽस्य शुद्धं रूपं नोपलब्धम् । २. का० सू० २।४।४ । ३. पूर्यन्ते पुनः पुनः सत्यधर्मे इति पुरः । गलन्ति विलीयन्ते गलाः। पुरश्च ते गलाश्च, पुद्गलाः। पृषोदरादित्वाद्रस्य दः। ४. भज्यते सेन्यते धार्यते वा भगः ।
अनेकार्थ-नाममाला १०१ केवलस्य भावः कैवल्यम्। लब्धिः केवलबोधादाविष्टाप्तौ नियतौ श्रियाम् ॥ ४४ ॥ लम्भनं लब्धिः । अनेकान्ते च विद्यादौ स्यान्निपातः श्रुते क्वचित् । 'स्यात् भवेत् एतेष्वधेषु निपातः। भट्टारको धर्मचन्द्रस्तत्पट्टे धर्मभूषणः । तत्र देवेन्द्रकीर्तिः श्रीकुमुच्चन्द्रस्नतः परम् ॥ १ ॥ धर्मचन्द्रस्ततो ज्ञानसागरस्तत्पदेऽभवत् । तेन पुस्तकमेतद्धि दत्तं (लोकहितेच्छया )॥२॥ ५ इति धनञ्जयनाममाला सटीका समाप्ता १. स्यात् इत्याकारको निपात एतेष्वर्थेषु इति सम्बन्धः । २. इतः परं मुद्रितपुस्तकेष्वधिकः पाठ उपलभ्यते, तद्यथा--"दर्शनादौ मणौ रत्नं भव्यः शस्ते प्रसेत्स्यति ॥४५॥ परमात्मा जिने सिद्धे पर- मेष्ठयईदादिषु । सिद्धाः सिद्धनिषद्यायामह सिद्ध श्रियामपि ॥४६॥ अर्हत्तिद्धमिति द्वाप्यर्हतिदाभिधा- यिनौ। अहंदादीनपि प्राहुः शरणोत्तममङ्गलान् ॥४॥ इति । ३. अत्राशुद्विदोषाकिचित्पाठभेदः, स च शोधित इत्यरूपः संवृत्तः । ।
अनेकार्थ-निघण्टुः
गम्भीरान् रुचिरांश्चित्रान् विस्तीणार्थप्रसाधनान् । कप्टशब्दान् प्रवक्ष्यामि कवीनां हितकाम्यया ॥१॥
वाग्दिग्भूरश्मिवज्रपु पश्वक्षिस्वर्गवारिषु । नवस्वर्थेषु मेधावी गोशब्दमुपलक्षयेत् ॥२॥
कः प्रजापतिरद्दिष्टो को वायुरभिधीयते । कः शब्दः स्वर्गमाख्याति क इत्यात्मा मतः क्वचित् ॥३॥
सलिलं फमिति ज्ञेयं शिरः कमिति चोच्यते । देवाननिमिपानाहुमत्स्याननिमिपस्तिथा ॥४॥
अग्निश्च वहिणः चैव वृक्षः कुक्कुट एव च । शिखिनोऽभिहिताः शस्त्रः पृथुकश्च मतः शिखी ॥५॥
हंसो नारायणः प्रोक्तः क्वचिद्धंसो दिवाकरः । अश्वश्चापि स्मृतो हंसो हंसश्चापि विहंगमः ॥६॥
सारसस्सरसिजेन्द्रोः पतत्र्यपि च सारसः । राजाऽपि नृपतिज्ञेयो राजा चोक्तो निशाकरः ॥७॥
विभावसुर्हताशः स्याच्छ्वेतच्छत्रं क्वचिद्भवेत् । हिमारातिः स्मृतो वह्निः हिमारातिश्च भास्करः ॥८॥
धनञ्जयोऽग्निाख्यातो पार्थश्चापि धनञ्जयः । वीभत्सश्च मतः पार्यों बीभत्सो विकृतः स्मृतः ॥९॥
अग्निविरोचनः प्रोक्तो भास्करस्तु विरोचनः । विरोचनश्च चन्द्रः स्यात्क्वचिदैत्यो विरोचनः ॥१०॥
पाञ्चजन्यः क्वचिद्वह्निः क्वचिच्छो निगद्यते । कम्बुश्च गदितः शङ्खः कम्युरिष्टश्च कुजरः ॥११॥
भास्करोऽग्निः समुद्दिष्टः सहस्रांशुरपि क्वचित् । पतङ्गो दिनकृद् ज्ञेयः पतङ्गः शलभः स्मृतः ॥१२॥
फौशिको देवराजः स्यादुलूकश्चापि कौशिकः । शम्भुर्ब्रह्मा च विष्णुश्च शम्भुश्चव महेश्वरः ॥१३॥
वृषकेतुर्मतः शङकुः शङ्कः कोल इहोच्यते । जम्बुको वरुणो ज्ञेयः शृगालश्चापि जम्बुकः ॥१४॥
अर्क इष्टस्तु मघवान् धर्माशुरर्क उच्यते । मन्थी राहुश्च चन्द्रश्च ग्रहो मन्यो निरुच्यते ॥१५॥
केतवो रश्मयो ज्ञेयाः केतवश्च महाध्वजाः । तमोमुदः सहस्रांशुरग्निश्चापि प्रकीर्त्यते ॥१६॥
मयूखाः किरणा ज्ञेया मयूखाश्चापि कोलकाः । सप्तपिरुत्सवः प्रोक्तः सप्तान्ये ऋषयः क्वचित् ॥१७॥
वसवः शंवरा उक्ता देवाश्च वसवो मताः । नक्षत्रं धिष्ण्यमित्युक्तं गेहं धिष्ण्यं मतं क्वचित् ॥१८॥
वासोऽम्बरमिति ख्यातमम्बरं च नभःस्थलम् । पयः सलिलमुद्दिष्टं पयः क्षीरं मतं क्वचित् ॥१६॥
शिवं पानीयमुद्दिष्टं शिवं श्रेयः शिवं सुखम् । शिवं व्योमपति प्राहुः शिवं श्रेष्ठं प्रचक्षते ॥२०॥
क्षरं जलं विजानीयात्क्वचिन्मेधं विदुः क्षरम् । स्यन्दनं चाम्ब निर्दिष्टं स्यन्दनश्च महारथः ॥२१॥
कृष्णं तमः समाख्यातं कृष्णश्चाधोक्षजस्तथा। अमृतं क्षीरमित्युक्तं क्वचिच्चेष्ट समुद्रजम् ॥२२॥
शवं च सलिलं प्रोक्तं मृतमाहुः शवं तथा । तोयं घृतमिति प्रोक्तं घृतं सपिः क्वचिद्भवेत् ॥२३॥
पानीयं च विषं प्रोक्तं क्वचिद्धालाहलं विषम् । हस्तिहस्त: करः प्रोक्तः करो हस्तः प्रचक्ष्यते ॥२४॥
कोलालं रुधिरं प्रोक्तं नीरं चैव प्रशस्यते । भुवनं सलिलं प्रोक्तं आकाशं भुवनं स्मृतम् ॥२५॥
प्रवालं कोमलं ज्ञेयं कोमलं स्पष्टवाचकम् । सदनं च स्मृतं तोयं सदनं वेश्म उच्यते ॥२६॥
तोयं सझेति गदितं निलयं सद्म निगद्यते । संवरं च जलं प्रोक्तं संवरः पर्वतो भवेत् ॥२७॥
संवरश्चाऽसुरः ख्यातो यो बिभर्ति रसां प्रियाम् । स्वरवादमास्विडां प्राहुरिडा चाम्बरदेवताम् ॥२८॥
पत्नी चन्द्रेरिडां प्राहुरिला तत्समतां गता । अदितिः पृथिवी ज्ञेया देवमाताऽदितिः क्वचित् ॥२९॥
अध्यूढा भार्या परित्यक्ता त्वद्भिदिश्च निगद्यते । वृषो धर्मः क्वचिज्ज्ञेयो गवामपि पतिर्वृषः ॥३०॥
वृषा कर्णश्च गदितो वृषा चोक्तः शतक्रतुः । रोहिणेयो बलः प्रोक्तो रोहिणेयो बुधः क्वचित् ॥३१॥
वलदेवो मतः शेपो नागो वा शेष उच्यते । रामस्तु लांगली ज्ञेयो रामो दाशरथिः क्वचित् ॥३२॥
रामश्च शुक्लो वर्णों रामश्च क्षत्रनाशनः । वराहः केशवः ख्यातो वराहो जलदः क्वचित् ॥३३॥
वराहः शकरो ज्ञेयो विष्णुळंघो हरिस्तथा । अजाराट्स्मरेन्दवो ज्ञेयास्त्रिनेत्रश्चाप्यजो मतः ॥३४॥
अजः पशुश्च विख्यातो तथाजो ब्रह्मकेशवी । शरीरजः स्मृतो रोगः पुत्रश्चापि शरीरजः ॥३५॥
अनेकार्थ-निघण्टुः
१०३
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जयं पुष्करमजं च नागनासाग्नमेव च । कूलं नभः समाख्यातं कूलं रोधः प्रचक्षते ॥३६॥
चानन्तमिति प्रोक्तमनन्तं च बलं क्वचित् । विष्णुः क्वचिदनन्तः स्यान्नागश्चानन्त उच्यते ॥३७॥
प्रजापतिः स्मृतो राजा ब्रह्मा चापि प्रजापतिः । प्रजापतिः स्मृतः क्षत्ता क्षत्ता च चर उच्यते ॥३८॥
वामः पयोधरः प्रोक्तो वामः स्यादविणं हरः । वामश्च मदनः प्रोक्तो वामश्च प्रतिकूलके ॥३९॥
आगोपो गोपको ज्ञेयः क्वचिदागोपको ध्वजः । उरश्चाङ्कः समाख्यातः स्थानमङ्कः स्मृतस्तथा ॥४०॥
वासरस्तु स्मृतो नागो वासरो दिवसो मतः । विभावसुर्निशा ज्ञेया गन्धर्वश्च क्वचिन्मतः ॥४१॥
शर्वयों रात्रयःप्रोक्ताः शर्वर्यश्च स्त्रियो मताः । सान्द्रं धनमिति प्रोक्तं स्निग्धं सान्द्रं निगद्यते ॥४२॥
स्वः स्वर्गस्य मतं नाम स्वः सुखं क्वचिदुच्यते । स्व आत्मा चैव निर्दिष्टः स्वः प्रोक्तो गृहमूषिकः ॥४३॥
कदुश्छन्दोविशेषज्ञो मतः शास्त्रपि ना ककुप् । ककुम्महीरहः प्रोक्तो ज्ञेयास्तु ककुभो दिशः ॥४४॥
क्षयं वेश्म समुद्दिष्टं क्षयं रोगं प्रचक्षते । जलदस्तु प्लवो ज्ञेयः प्लयो ज्ञेयस्तथोडुपः ॥४५॥
प्रासादो मण्डपः प्रोक्तो विहारश्चापि कथ्यते । घनं . धनं विजानीयाद् घनं विपुलमुच्यते ॥४६॥
प्रयुज्यते च कस्मिश्चिद् घनं सङ्घातवाद्ययोः । वरूथं स्यन्दनाग्रं स्याद्वरूथं वेश्म उच्यते ॥४७॥
चमूश्च वर्म सहसा प्रवदन्ति मनीषिणः । असुराश्च सुरा ज्ञेयाः क्वचिद्देवारयोऽसुराः ॥४८॥
नागाश्च द्विरदा ज्ञेयाः पन्नगाश्च क्वचिन्मताः । गन्धर्वश्च तथा वायुः क्वचित्स्याद् देवगायनः ॥४९॥
ताक्ष्यों हयः समुद्दिष्टस्ताक्ष्यश्चापि पतविराट । बालेयानसुरानाहुलेयांश्च क्वचित् खरान् ॥५०॥
तृणी वनस्पतिः प्रोक्ता क्वचिदाश्चि कथ्यते । शिखरी वृक्ष उद्दिष्टः शिखरी पर्वतः स्मृतः ॥५१॥
द्विजो विप्रश्च दन्तश्च द्विजः पक्षी निगद्यते । चौरो मलिम्लुचो ज्ञेयो वातश्चापि मलिम्लुचः ॥५२॥
आत्मजं रक्तमुद्दिष्टं, सुतः कामस्तथैव च । कीनाशो मृतको ज्ञेय: कीनाशश्चापि राक्षसः ॥५३॥
कोनाशोऽग्निः कृतघ्नश्च कृपणो यम एव च । कीनाशः कर्षको ज्ञेयः कीनाशश्च वृकोदरः ॥५४॥
अवदातं प्रधानं स्यादवदातं च पाण्डुरम् । ज्योतिर्लोचनमुदिष्टं ज्योतिर्नक्षत्रमुच्यते ॥५५॥
ज्योतिश्च गदितो वह्निः काव्येषु मुनिपुङ्गवैः । प्रधानं सज्जनं ज्ञेयं प्रधानं श्वेतमुच्यते ॥५६॥
अब्दः संवत्सरो ज्ञेयो मेघश्चापि क्वचिन्मतः । बलाहका महामेघाः शिखरी च बलाहकः ॥५७॥
तोयदं जलदं प्राहुस्तोयदं कथ्यते घृतम् । जीमूतश्च मतो नागो जीमूतः क्वचिदम्बुदः ॥५८॥
पौलस्त्यं तु मतं युद्धं पौलस्त्यं पौरुषं विदुः । शुचिकृद्रजकश्चैव प्रोक्तो नित्यं वुधै रसः ॥५९॥
पर्जन्यं जलदं प्राहुः पर्जन्यं तु शतक्रतुः । शिलीमुखाः स्मृता वाणा भमराश्च शिलीमुखाः ॥६०॥
लेखा सीमेति विज्ञेया लेखा चित्रकृतौ मता । अम्बरीषं स्वचि झाष्ट्रं क्वचिद्युद्धं निगद्यते ॥६१॥
पुस्त्वं चापि मतं . युद्धं पुस्त्व पौरुषमुच्यते । विद्वांसोऽरिपवो ज्ञेया विद्वांसस्त्वसवो मताः ॥६२।।
मायाऽविद्येति विज्ञेया क्वचिन्माया तु सांवरी। मधु द्राक्षीति विज्ञेया क्वचित्स्यान्मधु माक्षिकम् ॥६३।।
मधु चाम्बु समाख्यातं सुरा च मधुसंज्ञका । खं रंधमिति विज्ञेयं खं गृहं नभ एव च ॥६४॥
खमिन्द्रियमिति ख्यातं खं च नक्षत्रमुच्यते । धार्तराष्ट्रा महाहंसा धृतराष्ट्रसुताः क्वचित् ॥६५॥
प्रभाकरो मतः सूर्यो वह्निश्चापि प्रभाकरः । सितं शुक्लमिति ज्ञेयं सितं बद्धं प्रचक्षते ॥६६॥
असितं कृष्णमित्युक्तं अशितं भक्षितं स्मृतम् । वास्तु नकुलो ज्ञेयः पाण्डवो नकुलस्तथा ॥६७॥
त्रिश कुमाहुर्मार्जारमृषिश्चापि तयेष्यते । यमस्तु वायसो ज्ञेयो यमः प्रेताधिपस्तथा ॥६८॥
लक्ष्मणं सारसं विद्यात्तथा दशरथात्मजम् । लक्ष्म चन्द्रस्य काष्ण्यं स्याल्लक्ष्म्यः केतुः प्रकीर्तितः॥६९॥
केतुश्चापि मतः काव्ये लक्ष्मेति मुनिपुङ्गवः । आरुणेयः स्मृतो दक्षो दक्षश्चाचेतसः क्वचित् ॥७॥
आशुकारी भवेद्दक्षः स्यादली तोमरः स्मृतः। आदित्यं च रवि विद्याद् दैत्यश्चाप्यदितेः सुनः ॥७१॥
रोगो रजस्तथा रेणू रजो लोहितमुच्यते । स्कन्धो नितम्बसंज्ञः स्यान्नितम्बं जघनं तटम् ॥७२॥
हेम वस्विति विज्ञेयं वसु तेजो निगद्यते । सारङ्ग चातकं प्राहुः स्वर्णं चापि सितासिती ॥७३॥
रम्भाश्च कदलीः प्राहू रम्भा स्वाङ्गना मता। ग्रावाणो गिरिजाः प्रोक्ता मेघाश्चापि मनीषिभिः ॥७॥
१०४
अनेकार्थ-निघण्टुः
निगद्यते । औषणं रसमुद्दिष्टमृतं सत्यमपि क्वचित् ॥७५॥
अक्ष आत्मेति विज्ञेयः केचिदाहुविभीतकम् । ज्ञेयमिन्द्रियमक्षं च शाकटं कर्ष एव च ॥७६॥
अक्षं च पाशकं विद्यायावहारिकमेव च । पद्ममिन्द्रियमित्युक्तं पद्मं तामरसं विदुः ॥७७॥
चैत्यमायतनं प्रोक्तं नोडमायतनं तया । पुष्पं लोहितमुद्दिष्टं पुष्पं च कुसुमं तथा ॥७८॥
याजी तुरङ्गमो ज्ञेयो वाजी श्येनो विहङ्गमः । विविन्द्रसिंहमण्डूकचन्द्रादित्यास्तु वानरान् ॥७९॥
वशिवानिलहयान् हरोनिच्छन्ति कोविदाः । पुरुपच्वजलिङ्गेषु हयभूषणलक्ष्मपु ॥८०॥
रामशेषावनीन्द्रषु ललामं नवसु स्मृतम् । शुक्रा स्मृताऽक्षिदोपोना लवली मञ्जरी तया ॥८१॥
यक्रवाः शुको ज्ञेयः कोकिला वचनप्रिया । पुलिनं जलविच्छेदः पङ्कजं स्यात्कुशेशयम् ॥२॥
रतं पापमिति ज्ञेयं सत्वरं शीध्रमुच्यते । पिशङ्गं रोचनाभं स्यान्मेचकस्तिलको नतः ॥८॥
ललाटेऽवस्थितं चिह्न विद्भिस्तिलकं मतम् । परिचर्य च कटकं निकपस्तु कपो मतः ॥८॥
नानारत्नरुपचिता मञ्जूप रागिणी स्मृता । दिनकृद्वाजिसिंहेप केसरित्वं विघीयते ॥८५॥
अव्यक्तो मधुरः शब्दः कल' इत्यभिधीयते । अलातमुल्मुकं ज्ञेयं छेदो नाम भयङ्करः ॥८६॥
भावः शृङ्गारमाधुर्य भावोऽवस्याप्ररूपणम् । विलासः कामजो दोषस्तदेव ललितं मतम् ॥८७।।
उत्तमाङ्गं विना देहं कबन्धं चेति शस्यते । शिरसो वेप्टनं यद्वै तदुष्णीषं निगद्यते ॥४८॥
आहतं समवीर्घ स्यान्निविडं पीडितोन्नतम् । मण्डूको भेफसंज्ञः स्यादृर्षाभूश्चातको मतः ॥८९॥
शिवा पिङ्गवती ज्ञेया विशालं सबलं मतम् । दुश्चर्ना शिपिविष्ट: स्यात्कर्षकस्तु कृपीबलः ॥१०॥
कन्याजातश्च फानीनो पण्डः क्लीव इति स्मृतः । उत्कृष्टः श्वसुरः स्यातां म्लिप्टमव्यक्तयाचकम ॥११॥
रदनो हस्तिदन्तः स्याहानं कटकसंज्ञितम् । तोदनं चाकुशं विद्यादालानं हस्तिबन्धनम् ॥१२॥
घनाघन इति स्यातः शास्त्रेप्वधिकपोल्पः । अपाचीनं मनोज्ञं च
बुद्धिज्ञेया तु शेमुषी ॥१३॥
अर्कस्तु पादपे ज्ञेयो नदी स्यात्फेनवाहिनी । अश्वारोहो मरुद्यानोऽश्वानां हृदये ध्वनिः ॥१४॥
आफन्द इति विज्ञेयः खुराश्च शफसंज्ञिताः । आममासं भवेत्क्रव्यं पक्वं पिशितमुच्यते ॥९५॥
शुष्कं तु विरसं ज्ञेयं मृष्टं सरसमुच्यते । शङ्खजं शुक्तिजं चैव वाराहं तिमिमौक्तिकम् ॥१६॥
वंशादाशीविपान्नागाज्जीमूताच्च तथाष्टमम् । लोकज्ञो दक्षिणो शेयो दक्षिणश्च तुरः स्मृतः ॥९७॥
आकृतं तु मतं विद्यात्कण्टकं गहनं मतम् । आननं चाकुले नेत्रे चिकुरं चापि शस्यते ॥१८॥
पापः श्याम इति प्रोक्तो वभ्रस्तु कपिलो मतः । स्थविष्टं स्थावरे चैव दविष्टं दूरमुच्यते ॥१९॥
परमेष्ठी मतः श्रेष्ठः प्रेम प्रियमुदाहृतम् । प्रकाशः स्त्रीगृहेरक्तः शैलूष इति संज्ञितः ॥१०॥
पदकृच्चम्मकारः त्यान्नापितस्त्वजयः स्मृतः । लावण्यमाहुर्माधुर्य चित्रं च शुभकर्मजम् ॥१०॥
व्याधयश्चामयाः प्रोक्ताः पानीयं तु समुच्चयः । आघयस्तु स्मृताः प्राजश्चित्तोत्पन्ना उपद्रवाः ॥१०२॥
रंहो वेगः समाख्यातः सत्रं सच्चरितं स्मृतम् । आलवालं स्मृतं सद्भिरपां वेगनिवारणम् ॥१०३॥
चटकः फलविङ्कः स्यात्तुल्यं सदृशमुच्यते । किलासं पाण्डुरं ज्ञेयं दोला प्रेङ्घति शस्यते ॥१०४॥
मन्दिरं नगरं ज्ञेयं निलयं चापि मन्दिरम् । सहस्रनयनोऽगारिः प्रधनं युद्धमुच्यते ॥१०॥
पलाशो हरितो वर्णो मेचको नीलपिञ्जरः । उक्षाणं वृषभं विद्याल्लुलायो महिषो मतः ॥१०॥
उला वंध्या वसा वेहत् पृष्ठोही गर्भिणी हि या । व्याख्यातो मस्करो वेणुस्त्वचिसारः परिकोतितः॥१०७॥
हिलं कामं शपं चैव रोपमाहुर्मनीषिणः। कलभोऽल्पवयो नागः कलुपं चाविलं मतम् ॥१०॥
वृजिनं कुटिलं विद्यात्सम्राट् राजा च भूभुजौ । रत्नं वज्र विजानीयात्नियामा क्षणदा मता ।।१०९।।
दीर्घ प्राशु विजानीयात् ह्रस्वं नीचकमुच्यते। भूरि प्रभूतमुद्दिष्टमभितः सर्ववाचकम् ॥११०॥
पवनश्चानिलो ज्ञेयः पवनश्चाधमो जनः । प्रियवाक्यो भवेदार्यः स्नातश्च परिकीर्तितः॥११॥
आडम्बरश्च पटहो व्यञ्जनं वोपनं मतम् । विपंची वल्लकी ख्याता वीणा चैव निगद्यते ॥११२॥
मालती सुमना ज्ञेया सुमना मुदितो जनः। वल्लरी मञ्जरी ख्याता प्रपाऽशाला प्रकीर्तिताः ॥११॥
१४ अनेकार्थ-निघण्टुः १०५ . - आयुनिरुच्यते तोयं तेन जीवति पाकम् । तस्य पनाक्षिमानेन रामो राजीवलोचनः ॥११४।। उत्कृत्य कवचं देहादसृग्दग्धं च यत्पुरा । इन्द्राय दत्तवान्कर्णस्तेन वैकर्तनः स्मृतः ॥११५॥ तीक्ष्णश्चैव प्रचण्डश्च वृको नामानलो मतः । स पाण्डवस्य उदरे तेन भीमो वृकोदरः ॥११६॥ यस्य श्रुतिमुखा वाणी पुण्य-श्लोकः स उच्यते । यः खेदी चानिवर्ती न युद्धशौण्डः स उच्यते ॥११७॥ महासंसर्गसङ्घातं महेष्वासं प्रचक्षते । स्वविक्रमस्तापयेच्च परं......यूथं तापयेत् ॥११८।। यूधं तापयेद्यस्तं विज्ञेयश्च स यूथपः । तस्मादपि च यो वर्यः स तु यूथपयूथपः ॥११९॥ सिंहान्नितान्तसौवीरः स नृसिंह इति स्मृतः। ये हि स्पष्ट प्रवक्तारो मतास्ते व्यक्तदादिनः॥१२०॥ यो यमित्यं च नाम्नाति स कोनाश इति स्मृतः । योऽप्रबुद्धोऽल्पबुद्धिश्च स तु मन्द इति स्मृतः ॥१२१॥ उपकारं तु यो हन्ति स कृतघ्न इति स्मृतः। हर्षे गर्वे सुखे खेदे वृद्धौ च प्रतिभासते ॥१२२॥ स्नेहभाग्यक्षये चैव मन्दशब्दो निगद्यते । नातीत्य वर्तते यत्र तदध्यात्म प्रचक्षते ॥१२३॥ चेतसश्च समाधानं समाधिरिति गद्यते । सर्वक्लेशविनिमुक्तिो स हि दान्त इति स्मृतः ॥१२४॥ निर्ममो निरहङ्कारो विज्ञेयः छिन्नसंशयः। प्रदाता देशकालज्ञः समाधिस्थः स उच्यते ॥१२५।। मुखरोऽल्पमतिर्यस्तु सक्रोधश्चैव कीटकः । वृत्तिर्यत्र तु गृहयानां परोक्षे बहिः तक्रिया ॥१२६॥ आहारव्यवहारेषु सा प्रीतिनिरुपस्करा । परस्परं स्वदारेषु सतां येषां प्रवर्तते ॥१२७।। विश्रम्भात्प्रणयाद्वापि सा प्रीतिनिरुपद्रवा। यशः ख्यातिरिति प्रोक्तं तद्योगात्प्राहुरुच्यते ॥१२८॥ कोतिख्यातियशोयोगाद् भगवन्निति चोच्यते । प्रियदानेषु यः शुद्धः स उदार इति स्मृतः ॥१२९॥ रजस्वला तु या नारी सा चोदक्या प्रकीर्तिता । प्रीतिर्भावक्रिये स्वच्छरक्षालिंगितनु विपुम्?॥१३०॥ तेजो रेतसि दीप्तौ तपो हि स्याद् वृषार्थकः । योऽन्यजातो हनो जीवः स शरारू इति स्मृतः॥१३१॥ मिथ्यादृष्टिरहमानी नास्तिकः सः प्रकीत्तितः। कामः क्रोधश्च वै पूर्वे लोभोऽसत्यं च मध्यमे ॥१३२॥ अन्ते मोहो विषादश्च यस्य ज्ञेयः स षड्वदः । अमृते जारजः कुण्डो मृते भर्तरि गोलकः ॥१३३॥ अनयोर्योऽन्नमश्नाति त कुण्डाशी निगद्यते । भ्रूणस्त्री गर्भिणी बाला ब्राह्मणी बह्मजीविनी ॥१३४।। परचित्ते यवीयान् योः ज्येष्ठपत्नी परामृशन् । यः पश्चिमश्च ज्येष्ठोऽपि परचित्तः स उच्यते ॥१३५॥ पुष्पजं क्षोमजं चर्मकोशजं भर्मजं तथा। गुणजं च समुद्दिष्टं तद्भेदा वस्त्रजातिषु ॥१३६।। बिम्बारक्तधरा या स्त्री विम्बोष्ठों तां विनिद्दिशेत् । या स्यात् संक्रीडनपरा ललनो तां विनिर्दिशेत् ॥१३७।। दूर्दाकाण्डप्रतीकाशा कुंभौ यस्यास्तनू कुचौ । सर्वरूपविविक्ताङ्गो सा भवेद्वरणिनी ॥१३८।। लावण्ययुक्ता या नारी ललितां तां विनिद्दिशेत् । या मत्ता मत्तवज्ज्योतिः सा ज्ञेया मत्तकाशिनी।।१३९।। भूरिश्च भूरिमुद्दिष्टं अन्नं श्रव इति स्मृतम् । भूरि श्रवो ददातोह तस्माद् भूरिश्रवो हि सः ॥१४०।। चतुष्पाविंशतिभुजो लोहितसीव एव च । निसर्गाद्दारुणात्क्रूराद्रवणांद् रावणः स्मृतः ॥१४१॥ रोषणा या भवेनारी भामिनी तां विनिद्दिशेत् । न्यग्रोधलक्षणं विद्याधाना परिमण्डलम् ॥१४२॥ ताभ्यामुपेता वनिता न्यग्रोधपरिमण्डला । तत्तुल्ये चाक्षिणी यस्याः सा स्त्री राजीवलोचना ॥१४३।। वर्णप्रमाणनिर्घोषोऽछिन्नसंपद्भिरन्वितः । राजीवमन्ये शंसन्ति स्निग्धवर्ण सितासितम् ।।१४४।।* किंचिदुत्तरतद्योगात्सीता राजीवलोचना । बलिभिर्यास्त्रिभिर्युक्ता शङ्खकण्ठी उदाहृता ॥१४५।। ......जराकराकारं स्यन्दनानमिवाग्रतः । वस्त्वे...ति तज्ज्ञयं तस्यैवानं.........॥१४६।। त्तं मर्मसंयुक्तं तत्तथालिनमुच्यते । ग्रहणे धारणे सामे वाहने धर्मसंयुता ॥१४७॥ रमणे क्रीडने सङ्गे भार्या नाम प्रवर्तते । मूढतायां सविद्यायां सप्ताश्वस्त्वंशुमालिनि ॥१४८॥ विषमाक्षदरा एते ज्ञयाग्नं तैः विसंस्थिताः । कोटरस्था इति ज्ञेयाः सर्पकोटखगादयः ।।१४९।। आताम्रपल्लवो यस्तु वृक्षाणामचिरोद्गमः । ॥१५॥ सौकुमार्य किसलयं कोमलत्वं च तत्त्मृतम् । शतानां च चतुर्हस्तं नत्वं तदिहतंज्ञितम् ॥१५॥ * नोट -~मूल प्रतिमें १४४ मे १४८ तकके पद्योंपर उनके नम्बर नहीं पड़े हैं। । .
१०६ अनेकार्थ-नाममाला ॥ -- कुम्भो वाहः प्रस्थः समं नल्व इति विधीयते । विपिनं शून्यमित्युक्तं विपिनं गृहमेव च ॥१५२।। रुक्म वणं च धामं च दर्शनीयार्यवाचकः । सर्वार्थश्चाप्युवर्णश्च पानीयं शीतमुच्यते ॥१५३॥ नोहारं शीतमित्युक्तं प्रदोषान्तो निशीयकः। . इति महाकविश्रीधनञ्जयकृते निघण्टुसमये शब्दसंकीर्णे अनेकार्थप्ररूपणो द्वितीयपरिच्छेदः ॥२॥ एकाक्षरी-कोपः विश्वाभिधानकोशानि प्रविलोक्य प्रभाप्यते । अमरेण कवीन्द्रेणकाक्षरनाममालिका ॥१॥ अः कृष्णः आः स्वयंभूरिः काम ई श्रीररीश्वरः । ऊ रक्षणः ऋ ऋ ज्ञेयो देवदानवमातरी ॥२॥ लदेवसूलृाराही भवेदेविष्णुरः शिवः । ओधा औरनंतः स्यादं ब्रह्म परमशः शिवः ।।३।। को ब्रह्मात्मप्रकाशाकें कः स्याद्वायुयमाग्निपु । कं शो सुसुखे कुस्तु भूमी शब्दे च किं पुनः ॥४॥ स्यात्क्षेपनिन्दयोः प्रश्ने वितः च समिन्द्रिये । स्वगर्गे व्योम्नि मुखे शून्ये सुखे संविदि खो रवी ॥५॥ गस्तु गातरि गंधर्वे गा गीतो गो विनायके । स्वर्गे दिशि पशो वजे भूमाविन्दी जले गिरि ॥६॥ धस्तु सुघटीशे घा किंकिण्या च घुलनी। डं मञ्जने को वृप भेजिने चः चन्द्रचौरयोः ॥७॥ च:सूर्ये कच्छपे छं तु निर्मले जस्तु जेतरि । विजये तेजसि वाचि पिशाच्यां जिः जवेऽपि च ॥८॥ झो नष्टे रवे वा यो जो गायने घर्घरध्वनी । टं पृथिव्यां करटे च ठो ध्वनी ठो महेश्वरे ॥९॥ शून्ये बृहद्धवनौ चंद्रमंडले डं शिवे ध्वनौ । ढो भये निर्गुणे शब्द ढक्कायां णस्तु निश्चये ॥१०॥ ज्ञाने तस्तस्करे क्रोडपुच्छयोस्ता पुनर्दया । यो भीत्राणे महीधे दं पल्यां दा दातृदानयोः ॥११॥ वन्धे च धा गुहये केशे धातरि धीर्मती । पूर्भारकंपचितासु नो नरे वन्धुवुद्धयोः ॥१२॥ निस्तु नेतरि नुः स्तुत्यां नौः सूर्ये पस्तु पातरि । पावने जलयाने च फो झंझाजलफेनयोः ॥१३॥ भाः कांतो भूर्भुवः स्याने भी ये मः शिवे विधौ । चंद्रे शिरसि मा माने श्रीमानोरणेऽव्ययम् ॥१४॥ मुः पुसिर्व धने यस्तु मातरिश्वनि यं यशः । यास्तु यातरि खट्वांगे याने लक्ष्म्यां च रो घृतौ ॥१५॥ तीवे वैश्वानरे कामे राः स्वर्ण जलदे ध्वनी। री भ्रमे रुर्भये सूर्ये ल इंद्रे चलनेपि च ॥१६॥ लं तैले लीः पुनः श्लेपे ली भये वो महेश्वरे। वः पश्चिमदिशास्वामी व इवार्थे स्मरेऽप्ययम् ॥१७॥ शं शुभे शा तु शोभायाँ शी शयने शु निशाकरे। पः श्लिष्टे पुनर्ग) विमोक्षे पः परोक्षके ॥१८॥ सा लयां हो निपाते च हुस्ते दारुणि शूलिनि । क्ष क्षेत्र रक्षसीत्युक्ता माला प्रासूरिसम्मता ॥१९॥ । इति एकाक्षरी नाममाला समाप्ता ॥छ।। ----- धनञ्जय-नाममालागतशब्दानुक्रमणिका शब्द श्लोक पृष्ठ पृष्ठ अ शब्द अत्यर्थ पृष्ठ ८३ श्लोक १७३ १९१ शव्द अन्तक अन्तरिक्ष श्लोक १४५ ४५ ९० २३ ५९ अन्त्य ११७ अदभ्र अदितिसुत अद्भुत अद्रि २८ ६३ ५८ ३ १२४ ११५ ४ ८४ अंशु अंशुक अंस अंहस् अंहिप अकूपार ५० १७४ अन्त्यकाश्यप अन्तवासिन् अन्धकार ४ ८ ७२ ५ अधम १४८ १२४ (७३ ८१ ५० १५४ १६८ १०० अन्वय १३० ११ २५ १२२ १३० ९९ mr अधर अक्ष {६६ १२ ६१ ६५ ४९ ४३ ७९ १० अधिप अधोक्षज १८९ १६१ ७७ ३७ ७५ अन्ववाय अन्वह अन्वित अन्वीत अह्राय अप ७८ ८६ १८७ अध्वन् अनन्तर १६२ १४१ ७६ ८८ अक्षि अक्षौहिणी .अखिल अग अग्नि अग्निसूनुः ६९ १५७ १५ ७ अनन्तात्मन् अनन्यज ७३ ७७ अपघन ३८ ३३ ६४ ३९ अपत्य ३९ अनभ्राट ८ १९ ४९ अपाङ्ग ९९ अनल ३३ अग्रज २१ ५७ १८ ६५ १८९ १३५ अपारवार १३ २५ अनारत ८९ अग्रिम ७५ ६७ अप्राज्ञ अप्सरोनाथ ८० ३० ५९ अज ८ १७ अवला १५ ४३ ११४ १५६ १३० १६५ ३८ ३० ११९ १९७ ८० अनालम्ब अनिमिष अनिमेष अनिल अनीक १९ १४ ३२ ६२ अङ्क अङ्ग अङ्गना अङ्गराग अङ्गीकृत अब्ज अब्धि १२ ४३ ८६ ५४ ११० ९१ ८४ ३१ ५१ २५ २०० १७४ १७५ १११ १६० १७५ ३५ अघ्रि '५१ १०३ १४ ८५ २९ अङि सप 30 अभय अभियोग अभिराम अभिरूप अभिलाष अभिलाषुक अभिसारिका अभीक्ष्ण अभ्यर्ण ७७ अचल ८ २१ ४२ ८४ ४३ ७२ १९७ अनुकम्पा अनुक्रोश अनुग अनुचर अनुज अनुजा अनुजीविन् अनुरहस् अनेकप अनेहस अनोकह अन्त अन्तःकरण २१ १४ ८४ ८८ १७५ अज अजय अजस्त्रं ८९ अजातरिपु ७१ अञ्जनात्मज ३३ अटनी ४० अटवी १८९ १४६ ६९ ४५ ८८ १८५ १४१ १४१ १८५ १८ अभ्यास ६२ ८६ १३२ ११ ७९ २८ ५ ४१ ९ ८१ अत्यन्त १७३ लमर ३० ५६ १०८ धनञ्जय-नाममाला शब्द अमर्ष शब्द अवरज पृष्ठ २१ ५४ श्लोक १०९ १७३ १५९ अमल ८४ अवलग्न ७४ अमा ७७ अमित्र ४४ २२ अवसथ अवसान अवसर्प ८२ ८६ ६२ १२२ अमृत अमृतोद्भव १५ ८५ २८ अवश्याय अविदूर अशनि अश्लील अम्वर १२० ९ ५९ ७ अश्व ६८ २५ ५३ ११७ १५. १३७ १६ १५ १७२ १३ अष्टपात् अम्बु अम्बुजानन अम्बुधि अम्भस् अयस् अरण्य ८ २८ ૪૬ ४६ । ४७ ० ७ अष्टापद ८२ ४३ ६ ७२ ७ १८ ८३ अरण्यानीचर अरम् अरविन्द अराति अरि १४ १७२ २१ ८२ ४४ ९० ४४ असि असित असुपति असृज अस्तुकार अस्त्र अहंयु अहन् अहन्तोक्ति अहि अहित अहो ४२ ८१ २२ २२ ७२ २६ २३ श्लोक शब्द पृष्ठ श्लोक ४२ आत्यन्तिक ७७ १४१ आदेश १५५ १३३ आनन ४९ ९८ १७१ आनन्त्य १९१ १८२ आनन्द ५४ १०९ १७९ आपगा १४२ १९ आभरण ११९ १२५ आद्य ५७ ११४ आम्नाय ५२ १२४ ४२ आयुध ८३ ९० आर्या १७ ३४ ९३ आलम्व्यसुख ६७ १३५ आलय १३३ आलभ्य ७७ १४८ १६० आली ३७ २० ४१ | आवलि १८८ १३ १२६ | आवास १३३ ८३ | आवृति १९४ १६८ । आशय ५१ ११० आशा ६१ ११० आशु ८३ १७२ १२८ आशुशुक्षणि -६४ ४४ ८४ १७४ (५६ ११३ आसन ६७ १३५ आसन्दी ११३ ५३ आसन्न ६९ १४१ ८१ आसव ६१ १२१ आस्थानाधिपति ५६ ११२ ४ आस्पद १३३ १३३ आस्य ४९ ९८ आस्वनित ४१ ८१ ८७ १५४ १० १२२ इन ५० २६ १५८ इन्दिरा ३८ ७६ १९४ इन्दीवर १४९ ११- २१,२२ इन्दु २३ ४६ ७३ इन्दुमौलि ३५ ६९ अरुण अर्क अचि १५० ४९ ४५ ५४ ४७ २२ आश्चर्य १७४. अर्जुन ८४ ७० ७१ १५ आ अर्णव अर्णस् अर्थ अर्भक १४३ १४७ २६ १५ ९५ ४७ आकालिकी आकाश आकूत आखण्डल २० ४० २८ ४१ ३० ३ ५७ अर्यमन् ४९ ५२ ११६ अर्वन् २७ अर्हत् ५८ अलकानिलय ४८ अलि ४२ अलिप्रभ ७२ अलीक ८८ आगम आगार आचार्य आजि ४४ ܀ har आज्ञा ७४ आज्य ६१ ७६ आतन ८२ १४८ १८६ १४७ १५२ २६ ७१ आतपत्र ९० अवदात अवद्य अवधि अवनि आताम्र आत्मज १३ ३ ७२ १९ ३६ ३ ५ आत्मभू w १०४ शब्दानुक्रमणिका पृष्ठ श्लोक श्लोक पृष्ठ श्लोक १७४ शव्द ऐक्ष्वाकु पृष्ट ८४ शब्द ११४ उद्योग ओ ६३ २० ओघ ८ ९ १२५ १४० ११० इन्द्रजित् ५७ १२८ १२९ ८८ १२० १८९ १५८ ६५ ६५ ४५ उहाह उन्नत ओष्ठ ओषधीश्वर ४७ ५० २४ क २६ १३ इभ उपकण्ठ ४ ९ उपत्यका १५ ३ इला उपमा क उपमान ६८ इक्षु इष्ट १३७ १७० ५२ ३२ उपल १०४ ६१ १३ irror or car o ८२ ८४ ककुप कक्ष इष्टा १७५ ६ उपांशु उपेन्द्र ७४ कक्षा ६७ ५२ १९५ २ ईरित ईशान २ कच उभय ७० १९४ उमापति ३५ १० १० ईशित ९९ ईश्वर ईहामृग १०३ १२८ १९६ १०२ ६५ १२७ ६४ ९१ ५१ उ उरग उररीकृत उरस उर्वरा उर्वी कञ्चुक कटाक्ष ४९ कटि (कटी) ५१ । कटिसूत्र कटीसूत्र कठिन ७५ कठोर कण ३९ १६० १२० ७० ३ ३५ ८७ उन १५५ ६ ३ ७६ ९ उल्का १९ १८४ ७८ ८७ उल्वण १८४ १५८ १५८ १५८ १५८ ४८ १८४ १०० " उष्ट्र उष्णवारण कण्ठ कण्ठीरव कदन १९४ ४५ ४४ ९० ८७ २३ उच्चावच उच्चस् उच्छित उडु २५ उत्कट ८७ उत्कलिका उत्तमान ५२ उत्तराशापति ४८ ४५ उत्र १३९ ६९ कदम्वका ऊ ८० २७ १०४ कद्वद कनक ४७ ९१ २३ ऊरीकृत ऊर्जस् ऊर्जस्विन् १९६ ४६ १९३ ९३ ४३ ८३ ७० ४० उत्तानाय २१ ४२ ३५ ३५ ४८ कनीयस् कन्दप कपर्दिन् कपालिन् कपि कपिध्वज २५ ११ ६८ ७० उत्पल उत्प्रेक्षा उत्सव क्ष ऋत ८७ १८२ २२ १३८ १०९ १७४ २७ ६ २ my ७० ऋषि १२ १४३ १९५ १७७ कवरी ९१ ए ३४ 43. कमन कमनीय १०२ १२३ ४८ ९५ ८५ उत्साह उदन्वत् उदर उदश्वित् उद्गम उद्ग्रीव उद्धत एकपत्नी एकपिङ्गल एकागारिक एनस २० ८१ कमल १० ८० १३१ कम्र १६८ ८५ (२३ ८१ ८१ ऐ १७७ ४५ १०१ १२९ ४२ ८३ -. उद्धर १६८ १७४ ऐक्षव ऐरावणाधिप ३० ५९ करण ... उद्यम ८४ ११० धनञ्जय-नाममाला शब्द पृष्ठ श्लोक इलोक श्लोक ४६ करभ १८ ११ २२ ४३ ९१ ८५ १०१ ३ शब्द कामिन् कामिनी कामुक कामुकी २४ ४७ करवालक कराङ्गुलि करिन् करुण १४ १८ १५ ३७ २७ ४५ ८८ ५० ४५ ५४ ४५ ८८ -20 RU 1 १७ ३ ६ करेण ८९ काय १९ ३८ ८४ ४७ ९४ ७५ ४९ १५४ ९८ १४५ १२४ ३४ शब्द कुमुद कुमुदप्रिय कुमुदविप्रिय कुम्भिन् कुम्भिनी कुरुशत्रु कुल कुलटा कुल्या कुवलय कुश कुशलिन कुसुम कूपार कूर्पास ६७ कार्तस्वर कार्तिकेय कामुक कामु किन् ६३ १७ १६ ७० कर्कश कर्ण कर्णशूलिन् कर्दम कर्पूर कलङ्क कलत्र कलधीत ४० ७० १० ५९ २२ ७ काल १७३ ७१ ७२ ६२ ७९ १६४ १६ ४० १४३ १४५ १४८ १२३ १५० ११५ १५५ कालशेय काली १४४ २० ११८ १५२ ३२ ९४ १०५ १६७ ८७ १८८ १२६ ८० ४७ १२ कलभ कलम ५२ ८१ ४४ ८९ ९० काश्यप काहल ५८ ७५ कृच्छ ८८ कलह काष्ठा ३२ कृतान्त काष्ठापाल ३२ ३२ ७१ ७९ . २४ ४७ ६१ १५४ कृतिन् कृत्स्त ७४ ८८ कलापिन् कलामृत कलिल कलेवर कल्मापी काष्ठाम्बर किंवदन्ती किकर किंचन २५ १९४ १८३. ८ १४५ १६४ १८७ १७५ ११० ८५ १७१ ६५ ७४ १४८ १४ १३१ ३९ १५० कृपण ८४ ७६ कृपा ५४ ७३ कृपाण ४३ किंजल्क कल्याण कल्लोल ७३ ।७३ कृश ८२ १३ १९८ २७ १९४ १८६ २९ १५७ १५१ १५२ १६१ ४५ १४ १४४ कृगानु ३ कवच ९० २३ ८८ कृष्ण १७३ ३९ ७२ कस्तूरी कस्वर ७० ४९ ४७ कितव किरण किरात किरीटिन किल्विप कीचकशत्रु कीर्ति कीनाश १२५ ४७ काञ्चन काञ्ची ७१ ४३ ८४ ६० ११९ ७८ १४५ १५३ १७५ ५८ ७८ ८४ ३. ९० १९५ काण्ड कादम्बरी कानन कानीनजनक १२० १३ कु ६ ३ ४६ ४५ ५१ केकर केकिन केतु केवलिन् केश केशवन्धन केशरिन् केशव केशवाग्रज केशिन् करव कोक कोकनद ३७ ६१ ६ २७ १८ ८५ १६ ६ २४ कान्त ९० ७४ १४२ १९ ९२ १०२ ११७ १०२ ९५ १५८ १७७ कुक्कुर कुक्षि कुंकुम कुच कुवेर कुब्ज कुमार ७० ५१ ४८ कान्ता कान्तार कान्तिमद १३ ४७ ७५ २२ १२७ ११ ६४ १० ७६ ३४ काम ७७ १११ शब्दानुक्रमणिका पृष्ठ श्लोक श्लोक श्लोक १३७ पृष्ठ शब्द ६८ ३९ खग ४० ४७ ४० खङ्ग ४३ ३४ ८१ ६७ १६९ खण्ड खन्कृत ५४ ७५ ७९ ८४ खरदण्ड खल १०९ १५५ १६४ १८८८ ८५ १७४ १४६ ८९ ४३ शब्द कोटि कोदण्डक कोप कोमल कोविद कोष कोगेयक कौतुक कौन्तेय कौमुदी कौरव्य कोलेयक कौशिक कीसुम क्रतु ७८ गुरुस्थान ८५ गुलिका १८७ गुह १०६ गूढचर २१ गृध्नु ४४ ३५ गृह १५९ गेह १७३ गेहिनी १३४ गो १५५ ३२ १३२ १३२ १० २२ १७ ७६ ८४ खला im ८४ खलु ३२ १६ ३ २३ ७९ ६ ४५ ४७ २४ ६७ २८ ५४ ६७ ७४ खात खेचर खेद खेय ख्याति ५४ १०९ १३४ ४६ ८० १६५ ५८ ३० १४६ ९२ ६० १५१ ११२ १०७ ३० ग १३ २८ गगन २८ ६७ ७३ ५६ ५३ ४६ ७८ कृत गङ्गा ७८ १६२ ८८ ४५ ३८ ६ ३७ ५४ क्रोड क्रोध कौंच क्रौंचभेदिन क्षणे १०९ १०७ ६७ १५७ ४८ गोत्र गोत्रशत्रु गोधा गोपुर गोमण्डल गोमिनी गोलागूल गोविन्द गौतम गौर गौरी ग्रन्थ ग्रहाधिप ग्रामशार्दूल ग्रीवा १७ ३२ १२४ १६२ ७६ १२ ७६ ११४ १४० १५० ४ ६२ ४५ १२८ गज गणिका गन्धवाह गभस्ति गरुड़ गरुत्मत् गर्ज गर्ता गर्वित गल ५७ ७२ ७३ ३ ६५ २५ ६५ ९ क्षणदा क्षगरुचि क्षतज क्षपाकर ४९ १८८ ४८ ८९ २६ ३ ९२ १०० ५२ ८९ ८१ ५० ४१ ५ ४६ ५० ग ८ क्षमा ८२ १७१ गव्या १०५ १९० १६८ १०० ८२ १३ १८३ १९० ५ १४३ घन १४२ ३ ६ ८२ ४८ गहन ८८ १८ १७० ११८ १८ ९१ ८९ २५ ८३ ६२ ८ ४६ ३ क्षाम क्षिति क्षिपा क्षिप्र क्षीर क्षीण क्षुण्ण क्षुरप्र क्षेम क्षोणी घनसार घनाघन घृष्टि घोर घोष ७० ८२ १७२ १२२ १७४ १६४ ७८ गहर गहरी गाण्डीविन् गिर गिरि गिरीश गीर्वाणेश ८७ ७८ ५२ १०४ १८४ १६२ १०२ ७९ ८ घ्राण ३९ ५० च ३८ ९१ १९८ ७६ चक्रधर ३५ ३० ४१ ६० ३ ur ८२ चक्रवाक २७ गुण क्षमा ३ ६३ १२५ ख गुणनिका चक्राङ्ग चण्डी ११९ १५३ १२३ ८८ ७४ ૬૨ गुणावलि गुरु १६५ २८ ६५ ७९ चतुर १२९ -- ११२ धनञ्जय-नाममाला इलोक शब्द चतुर्मुख चतुप्पात् पृष्ट ३६ श्लोक ७२ १६३ हाद जननी पृष्ट १८ ८८ पृष्ट ८ जनपद २४ ८७ ४८ १६ १३ जनान्त जनि "जनोदाहरण चन्द्रमस् चमू चमूर २४ ४३ २७ १८ इलोक शब्द ३८ तट ९७ तटी तटोच्छ्वास ૩૨ तडित १५३ । तडिदधन्वा १०३ तनि १५ तनय १०५ तनु १७२ तनुत्र ८६ ८८ द ४६ ८६ ५६ १४० जल ६९ २० ४० चरण ५३ १८२ १०३ ६३ १०३ चरण्यु ३२ जब ८५ जवन ९० १५ ३८ १९४ ३१ ६४ चला तनूदरी २९ ८१ ૨૨ १६५ जात १६७ चाटुकृत चाप ८० जातरूप ८७ तनूनपात तपन तपनीय तपस्विन तम २६ ४७ ९४ चार १८२ १७८ जातवेदस् ८६ ८५ ९० ३ ६४ १०३ । जानु २ ७२ १४८ ४१ तमस् तमोनि ८४ m. nor 931 ४३ चिकुर चित्त चित्र चिह्न चिराय चीत्कृत चीर चूड़ापाम चेतस् चेल चौद्य चीन १४२ ११२ १४३ ૨૬ ८३ १३ १२ २६ ४३ ५० १७२ २७ २४ ४९ ५३ ५.९ तर तरंग तरंगिणी तरणि तरदारि तरस्विन् तरु तस्कर ८ ४१ १९५ जाया ८१ जाह्नवी १७४ जिन्या ८४ जिन १८२ जिष्णु १०६ ११७ जिहाप १९९ जीमूत ८१ जीर्ण ११७ १७३ । जीवन १७९ जीवा ज्या १९४ ज्यायस १३८ ज्येष्ठ ज्योति १३८ ज्वलन १८८ १९३ १८ १५६ १७१ 5७६ 1८२ ५ ८१ ८४ ८१ २ ८२ ८२ तापस तामरस छ ४२ ९० ५७ तारा ११४ ४३ तारुण्य ૬૨ १६९ ३ २० ४८ १२४ १२८ ४९ १८४ १७ ६८ छन् छिद्र २१ तादर्य २३ ८९ ६८ 1८९ ज ६५ तिग्म २६ ८७ झ तिमि ८ झटिति ८३ १७२ तिमिर जगत् जगती { ४२ ७२ ८७ झप ८ ६ १०३ ३ ५१ (५१ झपकेतु ४३ जघन ८४ १४८ १८४ ५० ૨૬ ११५ ११६ झपध्वज जठर १०२ १५६ झङ्कृत तिमिरारि तीर तीर्थ तीर्थकर तीर्थकृत १०१ ५८ ५८ ८० जड़ जनक त ६२ १८ ३८ १२३ ५८ १५ ११३ पृष्ठ ४९ शब्दानुक्रमणिका पृष्ट श्लोक दशमीस्थ ५४ १०८ दशा ६२ १२४ श्लोक ९९ श्लोक ११६ १८४ ३९ १५८ ५८ ३० ८० १८ ७ १४ ६५ दस्यु दहन दामोदर ७६ शब्द दृष्टि देव देवानांप्रिय देह देहिका दैत्यारि दोस् दोप १९ २७ ५२ ७९ १६३ १४४ दारक ४० ७० २७ " ३७ २० १६ १७ . ३० ६० ३२ दारा दारिका mr mr २५ ६७ १२४ ५० ५० १०१ ४५ १०७ १८४ द्युति धुमणि २३ २६ ६७ ६१ द्यधुनी शब्द तीर्थ कर तीन तुक तुङ्ग तुरग तुरंगन तुरासाह तुला तुलाकोटि तुल्य तुषार तुहिन तूर्ण तेजस् तेजस्विन् तोक तोमर तोय तोष निककुत् विदश त्रिनेत्र त्रिपथगा त्रिपुरारि त्रिमार्गगा ८५ ८५ १७९ १७९ ارا لا لاں घुस r r mir muro si » ४९ ७१ ५३ ७१ १२२ ५३ ५६ ९५ १७२ ४५ १९३. २३ द्यूत द्यो ५० द्रविण ४७ १९ ३९ दारुण ८७ दासी १७ दिक-दिश् ३२ दिक्पाल ३२ दिगम्बर ३२ दिग्गज दिन २६ २८ दिव-दिव ३० दिवस २६ दिवा २६ दिव्यवाक्पति ५८ दीक्षित ३ दीधिति २३ दीन दीप्ति २३ दीर्घ ८७ {३० द्रव्य ४७ " ७८ ५० ५० ७ १५ ५४ १०९ ११६ द्राक् द्रुत द्रुम द्रुहिण १५७ १७२ ११ ७१ २ ४ ८ ४ ३० ५६ ४५ २ ३५ ८४ १७५ ४६ १८३ २ २ ७१ द्वय द्वितय द्विप द्विरद ४५ ८९ ७८ १६२ ६८ त्र्यम्वक ६२ ६६ १२२ १३१ द्विरेफ ८८ २४ ८२ ४४ ६ ४६ दंष्ट्रिन् दक्षकन्या २२ ४४ ३२ ४३ दुग्ध दुरित दुर्ग दुर्जन दुष्कृत दुष्ट दुहित दूती दून द्विष द्विषत् द्वेष -द्वेषिन् ४५ (१२ ४२ २२ २२ ५४ २२ २ घ १३१ १०९ दण्ड ८६ । २२ ४४ ४४ दन्त ४ २० 40 २ दन्तवास १०० १७ दन्तिन् ४५ ८८ धन ४७ दया ८२ ७५ १७१ १५५ दृढ़ १४४ १८ '३७ ३३ धनंजय धनद ४८ दयित दयिता दरीभृत दर्शनीय ७८ ८१ ४८ ४ दृतिहरि दृप्त दृश दृषत् दृष्ट ४० धनदाय धनुष धन्वन् घमनीधन ८५ १७८ १०० ८२ ४० १७० १०८ दशनच्छद १०० ११४ धनञ्जय-नाममाला . श्लोक शन्द धम्मिल्ल घरणी पृष्ट ९१ ३ श्लोक १९५ ६ पृष्ट २१ ४३ २० ४० श्लोक १५९ १५४ १६४ १५२ ३ शब्द ननांदृ नन्दन नभस् नभस्वत् नभ्राट नमुचिशत्रु नयन ३ ६ धरा धरित्री धर्म धर्मचक्रभृत् धर्मात्मज २८ ३२ ४० ८ १८ १३८ ५८ ११६ १४६ ३० ५८ २४ ४९ धव १४ ७१ नर १३ २८ १७६ १७६ १५४ २८ १४७ १७० घवल ८९ १९० धातु धात्री नरक नलिन ८२ ३ १० २० ९ नव ७५ १५६ धानुष्क नव्य २३ धामन् १२३ १४ ४६ १३३ mr or नाक ३० ५६ १३५ १३३ ११७ १३२ १८९ ५५ नाग (४५ ६४ धिषणा धिष्ण्य धी धुनी ११० १३२ ११० ८९ १२८ १६५ ८० ४८ २४ ४५ ५ नागरिक नागारि नाथ नाथहरि नाथान्वय नाभिज ९० १० वर्य ५५ १२ २७ ७२ ३५ ५२ १४८ शब्द पृष्ट नित्य ७७ निदेश ७८ निपुण निवोध निभ ६८ निम्नगा १२ नियन्त्रित ८५ नियामित नियोग ७४ निर्घात निव्यूह निलय निवसन निवृत निवेशन ८९ निशा २५ निशाचर ८१ निशान्त निपाद निपादिन् ४५ निष्णात ७९ निसर्ग ८८ निस्तल ८७ निस्त्रिश ४३ नीच ७६ १८१ नीचस् ७६ नीर ७ नील ७२ नीलकण्ठ ६२ नीलपिञ्जरी ७३ नीललोहित ३५ नीलवसन नीलाम्बुजन्मन् ११ नीहार ८५ नूतन ७५ नूपुर ५३ न १३ ७८ ५८ ५७ ८० ११५ ११४ १६५ ७९ नाम धूम धूर्जटि धूर्त धूलि धूलिकुट्टिम धेनु धैर्य नारद ७३ ६७ ३७ ७३ १६९ १३२ १४ ८९ १६४ १८५ १८३ ८५ १५८ १६८ १५८ १५ १४८ नाराच ३९ ७८ ६८ १६५ १५१ १३४ १०५ १७१ ८४ ८६ ५० ५२ ८३ ४३ ७४ नारायण नारी १४ ध्वजा ५० ४३ ध्वजिनी ध्वान्तारि नासा निकट निकर ३० १०२ १४१ १३९ २६ न निकाय १ १२६ . १३३ १४० ७६ नक्तम् २५ ४८ ६९ १५० ६९ १४२ ७० नक्षत्र २५ निकुरम्ब निकेतन निगूढपुरुप निचय निज ५ ११ 'नग नगरी ८६ ६९ १३२ १८२ १४० १८५ २२ १७९ ४८ ९७ ८८ २४ १५६ १०७ नितम्ब नद १२ नदी १२ नदीश्वरी-नदीश्वर ३६ नदीष्ण ७९ १५६ ९ १०३ २८ ७१ नितम्विनी नितान्त ५१ १५ ८३ ७ R १६४ १७३ नृप १४ २८ शब्दानुक्रमणिका ११५ शब्द नृपक्रतु नेड श्लोक ११२ पृष्ठ ५४ श्लोक १०८ श्लोक १७८ १६६ शब्द परासु गरिखा परिचित परिणयन परिधि ६७ ५४ १३४ १०८ १७६ १७० ४९ ९९ ८९ नत्र नेक नैयायिक ६० ७२ ६७ १६१ १११ १५८ ३८ १८९ १३४ १८१ १८८ १० (८६ न्यच परिवाद ८६ प पक्षिन् २९ ५४ २० १० ७५ १० ७३ पक २० १५५ १८ १७६ ६८ ५५ १६८ १५० ११३ १४९ ३५ १५२ परिवृढ परिषत् परुष पर्जन्य पर्वत पल पल्लक पवन ८ पंक्ति १४० ४ ८ ७९ ७२ ४८ पटु पट्टन पण्डित एण्यस्त्री १६४ ९७ १११ २९ ७७ ३२ १६० ३२ ५५ ९७ . १७ १२९ पवनपुत्र पवमान ३ ६२ ४६ ३२ ३३ .२१ २६ २६ पतङ्ग पवनसख ५४ पशु ७९ २९ ५४ ३५ mr शब्द पृष्ट पाशित ८५ पाशनीत ८५ पाषाण ८२ पितामह पितृ १८ पिनद्ध ८५ पिनाकिन ३५ पिशित २९ पिशुन ८१ पिशंगी पीठ पीत पुश्चली पुटभेदन ४८ पुण्य ६५ पण्डरीक १० पुत्र पुनर्भू १७ पु.मस् १३ पुर पुर ४८ पुरन्दर ३० पुरन्ध्री-पुरन्ध्रि १६ पराण ७६ पुरी ४८ पुरु पुरुष पुरुषोत्तम पुरुहत ३० पुरोगति ४६ पूर्ण ६२ पुलिन्द पुलोमारि पुष्कर पुष्करिन् (८४ पुष्कल २८ ३० ५ १० ४८ ९७ पांसु पाकशत्रु पाटल पाठीन पाणि ७२ १७ ३४ ८ १७ पतत्रिन् पताका पति पतिवत्नी पतिव्रता पत्तन पत्ति पत्नी पत्रिन पथिन् ३४ ५८ ५० ४८ ७१ १४ पाण्डु पाण्डुर पाताल १६३ १५१ ५८ १४९ १७ १०१ १४७ १४९ १९० १५ ४५ १०३ ११ १३१ २९ ३२ ५४ १६१ १०३ १३३ २६ ८९ १५६ ९७ ११४ २८ ७८ पाथस ७ ६५१ पाद (२३ ५१ ७४ पद पादप ६० २ ५१ ६६ ६८ १४ १४ १० ३७ पाप ६६ ९२ पदग पदाति पाप्मन १२३ १४ पद्म १ २० पार २६ २५ पद्मनाभ ७५ १२ ६० पन्नग ६४ पारावार पारिषद्य पार्श्व २१ १२८ १५ १२२ ४ ९ ४५ ८९ पयस् {६२ ६२ पालाश १४९ पयोधर पाली १० ५१ २७ १०२ १५१ १३ ३३ १७३' १९४ ८. पराग पावक ६४ पुष्प ४० ११६ धनञ्जय-नाममाला पृष्ट शब्द पृष्ट इलोक पृष्ट ४२ ६९ शब्द प्रवृत्ति प्रशस्त ७४ ८० श्लोक ८३ १३९ ४९. ८६ इलोक १५४ १७८ १२१ 5 व २६ प्रसन्ना ६१ प्रसव ४० ८० १७६ ५ प्रसाधन ६० ११८ शन्द पुष्पहेति पूग पूपन् पृतना पृथिवी पृथुरोमन् पृथुल पृथु पृथ्वी पृषत पेशल ३५ ८५ १७ २१ वह वन्धकी वन्धु वन्धुर ३ ८ ४० ८० ४२ प्रसून प्रस्तर ८७ १८३ ८२ १७० ८५ ८७ प्रस्थ ९ ४३ १७८ ८६ १४२ वल ३ ७० १६ ८७ ६४ ७५ १२७ १५५ १२१ १८३ १३४ १५६ ५८ १८ ७५ पेशिन् २९ २० ४६ ५५ ४० पोत पोत्रिन् पौरुप प्रसन्ना प्रांशु प्राकार प्राक्तन प्राचीनहि प्राज्य प्राज्ञ प्राभूत प्रायस् प्रारभ्य प्रालय प्रावृपिक प्रासाद ६७ ७६ ३० ९० ५५ ९० बलात्रु बलाहक वलिसूदन ३७ वंहिष्ठ ९० बहु ९० ८७ बहुल ९० बाण (वाण) ३९ वाणवारण १९१ १११ १९१ १२३ ८३ १९१ १९५ १८३ १९७ १६० प्रकर प्रकृति प्रगल्भ ८८ ७८ ६२ ५२ १०४ १९४ प्रचर ७८ ७५ ९० प्रचुर प्रजा ८५ ६३ ६७ १७९ १२६ १३५ बाणसूदन ३७ वाणी (वाणी)५४ वाल ९० वाला १५ १९ ९१ १७१ १४० १८५ १६४ १६२ १९१ ३९ ७४ ११४ ११० ३३ १६९ १८२ १६९ १०८ १३४ १५६ १०४ १९५ ३१ प्रजापति १५७ प्रिय १८ (७४ १०१ ५५ प्रज्ञा प्रणयिनी १५४ ३३ ४३ वाहु वाहुशिरस् विसिनी ५० ११ २३ प्रणिधि २२ १८ ७७ mr (८१ ८६ ८१ ११२ बुध १६० जन ४९ प्रिया प्रियाम्बिका प्रीत प्रेमन् प्रेयस् प्रेयसी प्रेरित प्रेष्ठा प्रेप्य १८ प्रतिरोधक प्रतीत प्रतोली ३ २६ ७३ ब्रह्मन बीहि ११४ १६७ ६७ ७५ ८१ प्रत्यग्र १०४ ५२ प्रभञ्जन भ प्रभा ७४ भ २५ ४८ २३ ५ १५४ १२ ४५ १० प्लवग ६ भंग ३५ फ (१४ भट प्रभु प्रमथाधिप प्रमद प्रमदा प्रमोद प्रवीण ६८ १०९ ३३ १६६ २७ २९ १०६ १९८ ६४ १६ ९१ ५ ५ ५४ फणिन् फलिन् फले ग्राहिन फल्गु फाल्गुन १०९ १२८ ११ ११ .१५५ १४३ भद्र भर्तृ भर्तु:स्वसा भर्मन् ७९ ७५ २१ ४३ प्रवीर १६४ १९३ ९० ७० ४७ ।
शब्दानुक्रमणिका पृष्ठ श्लोक १४८ शब्द भ्रातृजानी भ्रातृव्य पृष्ठ २१ श्लोक ४३ श्लोक १०९ भरतान्वय ५४ ३५ २२ ४४ भव १२९ ९१ ९० १९२ म भवन शब्द पृष्ठ मन्यु मंत्रपूतात्मन् ६५ मय ४६ मयूखवत् २८ मयूर ६३ मराल मरीचि २३ मरुत ३० मकरध्वज ७७ १३२ १९८ १९८ भविक मकरन्द ७३ ५२ १२६ १२५ ४५ ९१ भागधेय भागीरथी मंक्षु मंगल १७२ १९८ ३० भाग्य ७१ १३० ४५ ४९ मद्यवत् मंजीरक ४ मरुत् ८ ६२ भानु ४६ ६५ (२३ २६ १५ १४ ५२ १०७ ९२ ८५ ३० ४३ मरुत्वत् मरुत्पुत्र मंडला मणित मतंगज भामा भामिनी भारती भार्या له سه لله मरुत्सव ८८ ६४ ४५ ६७ मतालम्ब ६ १२ १०४ ३२ १९२ १९८ मन्स्य भाव ९० १३५ १६ १३५ १२३ ६७ मत्तवारण मथित ८९ ७३ २८ १८८ १५२ ur भावुक भास भासुर २३ मदन ७७ ५९ ९० १९३ मदिरा भास्कर २३ . १२० १२० मद्य mr Wur 9 ४६ १९३ ३ ५८ २३ ९० १५२ ११५ ૪૬ ११५ मद्यप भास्वर भिक्षु भीरु ६१ २ ७३ १४ ८७ १२१ १५१ १२१ ८२ ७५ १०१ १२८ ४२ ३२ मर्कट मर्त्य मर्म मलिन मल्लिका मलीमस महति महस् महावीर महाहव महिला महिषी मही महेश्वर महोत्पल मांस मा नातंग मातरिश्वन् मातुलानी मातृ मानव भुज भुजंगम भुवन भ ७९ मधु मधुवारा मधुव्रत मधुसूदन मध्यमपाण्डव मनस् मनस्विन् मनस्विनी मनीपा ११३ ३ ७० १४३ ३ ५ ४१ ३५ ८१ ६८ २२ भूमि १३६ ९० ३ ३८ ३८ १० २९ ७६ १७ ११० २८ १५९ ८९ ९० १९१ . मनुज मनुप्य मनोज्ञ मनोहर भूमिधर भूयिष्ट भूरि भूषण भृग मृतक भृत्य भृशम् भो ६३ ४३ ८५ ३२ २२ १८ १७८ १७७ ४२ ८२ मंद ८० २८ १६८ ८७ मानिन् ८१ १४ १४ ८३ ७६ ४२ २९ २९ १७३ १५७ ८२ १८४ ७१ ३ মানিনা मन्दाकिनी मन्दिर १३२ मानुष २८ ८१ मन्मथ ७७ , ११८ धनञ्जय-नाममाला पृष्ट श्लोक श्लोक १६२ पृष्ठ श्लोक ७८ २९ शन्द मार्ग मार्गण मार्तण्ड शब्द रक्षस् रजत रजनी ७८ ९१ ४७ ३९ २६ ९४ ४८ ४९ शब्द मंत्री मयिक मेरेय मोघ मौण्ड्य मौक्तिक मौर्वी १९७ १२० १८६ २५ ७३ माला ८८ रजस् १५१ माल्य ३ ८ रण ४४ ८७ ६० ४५ २० ८८ ४७ ९४ रत्नाकर २५ ४१ ८२ ५२ ४१ य ३५ २० १२ २७ ८९, १८ १९० रथ्य रन्ध्र रमण रमणी रमणीय ८ ८ ३ २ ४५ ३३ १७७ १२ * ८५ २ रम्य ८५ ८३ ८० १७२ १४ २७ १४५ ५१ २ मिनंगम मित्र मित्रयुक् मिहिर मीन मीनाकर मुख मुग्ध मुग्धा मुक्ता मुद् मधा मुनि मुरसूदन मुहमुहुः मूक मूर्ख मूढ मूर्ति रय रवि रश्मि २ १७ ४६ २७ ५१ १५३ ६० रसना रस्य ११९ १९० ८८ ८१ २९ ५५ २ m. ८४ ४५ रहस् रहस्य ३७ ८९ १७५ १७५ ८४ ८८ ८७ १८४ राग ८ १६० १० ८० ५ १८ यज्ञानि १७ यति २५ यन्त ९८ यम १६६ ३० यमजनक यमल ३५ १०९ यमुनाजनक १८६ यशस् ३ यातुधान ७५ यात १८५ याथ १६६ यादम् युक्त युग युगल १०४ युग्म १२७ युत ११७ युद्ध युधिष्ठिर १७९ । युवति ९० योगिन् योग्या १४५ योपा १५५ योपित् १८६ यौवन ९ यौवनिक ७७ १६१ २ ७१ १४६ २ ४८ २ २ राजन् राजयक्ष्मन् राजराज राजसूय रात्रिचर रात्रिजागर ५६ १९ •५२ २ २ २९ ४६ ११२ ५५ ९२ ६४ ४४ ८७ रामा १५ ७१ . ४८ ९७ ८६ ४५ २२ ४४ मृग मृगनाभिजा मृगांक मृगेन्द्र मृत मृत्यु मृदु मृपा ८४ राष्ट्र रिपु रुचिर ধৰি १०८ २ ८५ १४ १८ १७८ १४६ ६१ ३ १८५ ३० ३० १२४ १२३ २३ ८८ ३५ मेखला १६० ૬૨ ६२ ४ ६० रुधिर 5५९ ८९ ५४ ६९ ११८ १८८ १०९ र रुप १८ ५३ रंहस २८ रूपाजीवा १७ मेघ मेषपथ मेदिनी मेघावी .३३ ८३ (५ ७२ ८१ १७२ ११८ १४९ १८८ ३ ५ ४७ रक्त १११ रे ७६ १५७ शब्दानुक्रमणिका १११ पृष्ठ श्लोक शब्द पृष्ठ पृष्ठ ८१ श्लोक १६७ वत्स वस्त्य श्लोक १३३ ११७ ७३ ७० वदन ४९ ९८ १५१ १४२ ९५ २६ वस्त्र वाग्मिन् वर्ष १४ ४७ शब्द रेणु रेवतीदयित "₹ रोधस् रोपण रोहिणीपति रोहिताश्व वाच वन Ur9 ५९ ५५ ५२ ९२ २७ ३२ ६७ १०४ १९९ ५२ वाचस्पति वाजिन् वात ७८ १५ ११ ३० १३ ८६ १७९ १४ ६५ ६ वातायन ल वनस्पति वनिता वनेचर वह्नि वपुस् वन १३५ १२ ६४ वानर ६ १५२ १९ ३८ १३४ वाण ( वाण ) ३९ ७८ ६७ वाणवारण ९० लक्ष्मन् लक्ष्मी लक्ष्मीपति लघु लंजिका " . २९ ७२ ३८ ३८ ८३ १७ ११ १७२ वयस १२४ ४१ १९४ ७५ १०४ ३१ ६२ ५३ mr लता वर. वाणस दन ३७ वाणी (बाणी)५२ वामलोचना १५ वायु ३२ वायुपथ २८ वायुपुत्र वार् वार्ता ७४ लतान्त ४० ८० ९८ लपन ४९ १४५ लब्ध १०८ १८९ ११७ ९१ ८६ १२५ १५३ १५ ४३ ५४ १४ ८९ ललना लव ४५ ८८ ७० ६४ १२७ लांगल लांच्छन ७३ वयस्या २० १८ ८९ वरटा ६४ वराह ४६ वरूथिनी वर्ग वर्ण ७४ वणिन् २ वर्तुल ८७ वर्मन् ७८ वर्द्धमान ५७ वर्मन् वर्षीयस ५७ वहिण( वहिण)६३ वलक्ष ७१ वलिमुख (बलीमुख)६ वल्लभ १८ १९७ १४२ १५२ १७५ १४ १२८ ३ १८३ ७ ८४ १२ वारण वारली वारि वारिधि वारिराशि वारुणी वार्थीन १६२ ११५ ७ १२ ६४ १९४ लुब्ध लव्धक लेलिहान लेश लोक लोह ६१ ८६ ५७ २६ १२१ १२४ ५० ५९ ११७ ११४ १२६ १४७ वासर १८७ ११३ १७० १४९ १८८ १५० २६ ८२ वासव ३० ७२ १४९ १२ -लोहित लोहिनी ५९ ३७ ३७ ७६ ७३ ३३ २७ व ९२ १६ ११ ५२ ८६ वक्ता वल्लभा वल्लरी वल्ली वसति २३ २३ २९ १६९ ९८ १०२ १०२ वक्त्र वक्षस् वक्षोज ८९ वासस् वासुदेव वाह वाहिनी वि विकल विक्रम विचक्षण विट विटपिन् विडोजन ५४ १८७ १७४ ५१ ८४ ४७ ६ वचन ५२ ३ १०४ ३ ६ १८ वनस ५२ वसु वसुधा वसुन्धरा वसुमती वस्तु १०४ ३ ५ ९ 'वज वचिन् ४७ ५७ १२० धनञ्जय-नाममाला ८८ ४७ ७९ ३ ८६ ७ ९ ५५ ૩૬ शव्द वितथ वित्त विदग्ध विद्यमान विद्युत् विद्वत् विधातृ विधि विधिपुत्र विद्यु विधुर विनतात्मज विन्मान्य विपिन विफल २४ ८८ ६८८ ६ विभावसु विभु ८८ (२३ ३३ wws विभ्रम (१३ ४९ ३८ इलोक शब्द पृष्ट १८६ विश्वरूप ३५ ९५ विश्वस १६६ विश्वम्भरा १३७ विप १९ विपक्षय ६५ विपवर ६४ ७२ विपय ४८ ૭૨ विकिर २९ ७३ विष्टप ४७ विप्टर १८६ । विष्णु विस्मय ८४ विहायस २८ वीचि १८६ वीतराग ५८ ૪૬ वीर ५८ ६५ वृक ६४ १० वृकोदर २७ वृक्ष ८ वृजिन ५३ वृत्त ८७ १६० वृत्तान्त ६८ ७२ वृत्रहन् ३० १६० वृथा ८८ वृपन् ५० वृपभ १८४ वृषभध्वज ११८ वृषभेश्वर ५९ वृषसेन वृषाकपि १८९ वृहित ५२ १४८ वेग ८३ १७३ ६७ वेधस् १५६ वेला १३ १७ वेश्मन् १८३ वैजयन्ती ४३ वैनतेय १८१ वैरिन् २२ इलोक शब्द पृष्ट श्लोक ७० वैद्यारिण ८ १७ १८५ वैश्रवण ४८ ५ वैश्वानर वंग ६३ १२४ १२८ व्यतिकर ६८ १३८ १२७ व्यपदेश ६८ १३८ ९७ व्यसन ८८ १८६ ५४ ध्यान ४६ ११३ व्याज ६८ ११३ व्याघ १४ ७४ व्यूह ६९ १३२ ६९ १७४ व्रज ६९ १४० ५३ ७८ १६२ २७ व्रतती (व्रतति) ११ २३ ११६ । व्रतिन् २ ३ ११५ व्रात १२७ व्योमन् २८ ५३ १४५ श ७ शकल ८९ १८७ १३९ शकुनि २९ ५४ १८३ शकुनीश्वर ६५ १२८ १३८ शकुन्ति २९ ५४ ५८ शकृकरि ८१ १६७ १८६ शक्तिमत् ३४ ६७ शक ५७ ११४ ९२ शक्रनन्दन ७० १४४ ११७ ! शंकर ३५ ६८ १४४ शंपा १८ शंभु ६८ १०५ शंभुविघ्नकर ४३ ८४ १७२ शठ ७९ १६५ ७२ शतक्रतु ३० ५७ २७ शतपत्र २१ १३२ शतमन्यु ३० ६० यात्रु २२ ४४ ८४ दाकटी ८ शबरी. शब्दभेदिन् ७० १४४ 5m ७७ ३५ ० वियत वियोग विरंचिन् विरह विरूपाक्ष विरोचन विलम्बित विलेपन विलोचन विवर विवाह २६ ३० ८७ ४९ ७० ८९ विगद (७२ ८४ ३४ ८ विशाख विशारद विशारिन् विशाल विशालाक्ष विशिख विश्व ८७ वेश्या M ३५ ४१ . ८८ ४४ १६ शब्द {S श्लोक १५ ७८ १२१ ३९ १३३ ६७ যায় शरभ ४६ शरवणोद्भव ३४ शरीर शर्व शर्वरी ६४ शर्वरीकर ६४ १९ १२६ १२७ शब्द पृष्ठः श्लोको श्रीद ४८ श्रुति ४९ ९८ श्रेयस् १९८ श्रोणि(श्रोणी )५१ १०३ श्रोणीविव ६० १२० श्रोतस् १२९ श्रोता श्रोत्र ४९ ९८ श्लक्ष्ण ८५ १७८ श्वन् ४६ ९२ श्वभ्र ८९ १९० ३२ ६२ श्वेत १४७ श्वेतवाजिन् १४३ श्वोवसीय ९१ १९८ शल्क ८९ शब्दानुक्रमणिका शव्द पृष्ठ श्लोक ३५ ६८ शिव ९१ १९० शिष्य ३ शीघ्र ८३ १७६ शीघ्रगामुक ४६ ९१ शीतल ८८ १८४ शीधु १२० शीर्ण ८२ १७१ शील ८८ १८५ शुक्तिज ९४ शुक्ल ७१ १४७ शुचि ७१ १४७ शुडा-शुड १२१ शुडाल ८९ शुनासीर ३० ५७ शुभ्र ७१ १४७ शुषिर ८९ १९० शूकर शूर १९३ शूलिन् ३५ शृखलिक ४६ शृखलित ८४ १८७ ४७ १४ ४७ श्वसन् १४७ ८३ २९ प शवर ७ शशिन शशिप्रभ ७१ शश्वत् ६७ शस्त्र ४२ शस्त्रजीविन १४ ५ शातकुम्भ ८२ शान्त ८२ शारंगी-सारंगी ७३ शाङ्गिन शार्दूल ४६ शालि ८१ शाखिन् ४६. ४२ ८१ १७२ १७१ १५० ८२ १६७ १७ ९० ८ षट्पद षड्दशन षडक्षीण षण्मुख षाष्टिक पोडन् ३४ ६७ ७४ ८१ १६७ ९० ८१ १६७ १६७ १५४ ८ १६३ स ७८ शासन ७४ गिन् शेमुषी ४४ २ ५५ ११० ८७ ३ २ ७ ८ • शैल १३४ ४ ३८ संयत संयमिन् संयुग संशित ४४ ८७ ६४ १२६ ७६ ७६ ३८ २ ny ८९ १८८ संसरण ९० १९२ शास्त्र शिवरिन् शिखिन् शिखिवाहन शिखंडिन शिपिविष्ट शिरस् शिरोधर शिरोरुह शिला mr ur ९० ३४ ६३ ३५ १२६ शैलधर शोणित शोणी शौंड शौंडीर शौरि शौर्य ७० १५० १२० १६८ ६१ ८१ ९० ७७ ५२ १०४ ५४ ७५ १७१ संसार संसृति संस्कृत संस्तुत संस्थित संहनन संहित सकल ८३ ५४ १०८ १०८ ३८ ८२ १७० २५ ४८ {३२ ७८ ८२ श्यामा श्येत श्यनी ७१ ७३ १४८ १५० ९८ ८८ १८७ श्रव ४९ शिलीमुख शिलीमुखासन ४० शिलोच्चय शिलोद्भव २० ४१ ४ श्रवण, श्री सक्त सखी सख्य ४९ ३८ ९८ ७६ ९० ४७ ९४ १२२ धनलय-नाममाला पृष्ट पृष्ट इलोक ૬૪ पृष्ट मलिल इलोक १५ ४१ २७ ५२ ११ सवयम् सवर्ण शब्द सगोत्र संक्रन्दन संगत संग्राम संघ संघात सजाति १३६ ४४ २० ६७ १८ 1 २७ ५६ ६७ ७७ ११२ ११२ १३६ १६९ १४० सवित ३८ ५१ १८ इलोक । शब्द ८२ सप्ताचिप सप्ति १९७ सभोचित ८७ सन्य १४० सम १४० १३६ समज १५९ समर १६२ ममवर्तिन १६५ समवायिक १८९ समवेत १५७ समस्त ३४ समाज ६९ ७० ३८ १४३ १५९ ४२ ७७ ४४ ८७ 33 ७८ सजु मंचर संजा নরন ८० २१ १४५ ८२ १६२ १८७ २१ २१ २० ४२ ७७ ८८ सतत सती सवित्री सव्यसाचिन् सह सहकारिन् सहकृत्वन् सहचरी सहसा सहाय सहस्रपात सहस्राक्ष सहित साकम् सागर ६४ ८३ २२ १७२ ४२ सत्कृत ६५ ११८ १४० ८७ ६९ ३० सत्य सत्यंकार ९१. ३ ३ ७७ १६१ सत्रा ६९ ૨૨ १४१ ૬૨ - १२ ૨૬ ५६ १२९ १८२ १९७ १६० १३२ ११२ १५९ ६२ ११२ १३६ १३५ ६ १८० ८६ २६ सदन सदरचित सदा सदागति सचित सहक्ष सावन साधीयस् ८३ १७३ ६९ ८४ १८ साधु २ ८० ८७ ५६ ६७ ३ १७० १५३ ७७ १६१ ७४ साधुवाद साच्ची १७ ३५ १७ ९ ६७ ६७ ૬૬ ६७ १३२ सहा सह समन् सधर्म सची सनातन सनाभि २० ८ समिति समीगर्भ समीप समीरण समुदय समुद्र समूह सम्पराय सम्पृक्त सम्फली सम्भृत सम्बन्ध सरणि सरसीरह सरस्वत् सरस्वती सरित् सहप सरोज सर्प सपिप सर्व सर्वन सर्वदा सर्ववल्लभा १६१ ४१. १६२ सानु सानुमत् सामज ७८ ८२ १० २० १२६ १२ साम्प्रतम् सारमेय मार्द्ध ४६ २१ (६३ सन्तति ४१ १२५ ४२ १२८ १३९ १८८ १२५ १५४ १२ 18 १५९ १३५ १८१ ૬૭ ८६ ७४ सन्तमस ६७ १०४ २४ ૨૨૬ २० १२८ १२२ ७२ ६३ ७४ १० ६४ साहस साहाय्य ६२ १९७ सन्तान सन्देश सन्वानीत सन्निधि सन्मति ७१ ८५ सित १७६ ८८ १८७ १८५ ३ १२ १४१ ११५ ८ ११६ ५८ २२ ८४ सिद्धान्त सिन्धु सिन्धुर सिंह सपत्न सपदि ७७ २४ ८९ १०५ १५७ १७ ३६ शब्दानुक्रमणिका १२३ पृष्ठ श्लोक पृष्ठ पृष्ठ श्लोक , शब्द सीत्कृत सीमन सीमन्तिनी सीर ३३ ५३ १३. ६५ श्लोक १९७ १९७ ६६ १०६ २६ शव्द सौहृद सौहृद्य स्कन्द शब्द स्वाहापति स्वैरिणी १७ १४ ३४ स्तन १०२ he w w ६३ १४२ १२१ १५६ १२५ १२५ ६५ ६३ स्तनंधय स्तनित ७६ ६४ १०५ १५६ १६८ हंस हंसवाह हंसी हंहो हन्तोक्ति हय हर स्तब्ध २० ५३ ७५ १८१ ८१ ४५ ८१ २४ १२७ १५७ ११० ५२ ४७ ७६ ५४ २७ ३० ७० ७० ५७ १४४ १७७ ३१ १२९ स्तम्बकरि स्तम्बरम स्तेन स्त्री १६७ ८८ १६९ ३५ ६ २७ ८५ १५ ६५ १४ हरि ३० १२ ५२ ५७ ७४ ९० ८७ ९० १९६ ur m १८३ १२४ ६८ १३३ ३७ (४५ ६४ ४० ३५ हरिण हरिणी ३० ६६ सुकृत सुचिरंतन सुत सुधासूति सुनाशीर सुनिर्मोक सुन्दर सुन्दरी सुपर्ण सुभट सुमन सुर सुरा सुवर्ण सुष्ठु सुहृत सूनामन् सूतु सूनृत सूरि सूर्य सूर्पकारि सेना सेनानी सेनानीपितृ ५६ १२१ UP १२७ १५० ६१ १४९ ७७ स्थपुट स्थविर स्थाणु स्थान स्नेह स्पर्शा स्पष्ट स्फीत्कृत स्फुट स्मर ७३ ३२ ७२ . हरित् ४७ १७ ८४ ८३ २० ७२ १६० ३५ १७३ १०५ १७३ १७३ ४१ ५२ ७२ ३० ५७ ८४ हरित हरिद्राभ हरिवाहन हर्म्य हर्ष १४९ १४९ ५९ १०५ १०९ १४२ ४० ८० ६७ ३९ १८२ १११ ५५ २६ ३९ १०८ १७२ १०६ ११९ ७३ हलि ७० ७७ ४३ स्मृत ५४ स्यद ८३ स्यन्दन ५३ स्त्रज् ६० स्रष्ट्र सवन्ती १२ स्रोतस्विनी १२ स्रोतस्विनीपति १२ स्व ४७ ८६ १०१ १०१ ३४ २४ ६६ ६८ २४ ८८ ९२ १९७ २१ स्वभाव ८८ २५ ९५ १८५ ५६ ५६ ८६ ४२ १४६ १८ १३५ १७७ हव्यवाह हस्त हस्तशाखा हस्तिन ४५ हाटक ४७ हार्द ९१ हाला (५९ हिम ८५ हिमवत्तता ३६ हिरण्य ४७ हिरण्यकशिपुसूदन ३७ हिरण्यगर्भ हित्यप्रेतस् ३३ १२१ ११८ ३० सैन्य सोदर्य सोमवंश सौदामिनी सौव सौम्य सौरभ सौरि सौहार्द ९ 3. A ३० ६७ स्वर स्वर्ग स्वर्ण स्वस स्वान्त ४७ ८७ २१ ४३ ८१ १० ३८ ७५ ७३ ६४ ७५ १९७ ५ स्वामिन् । " m १२४ धनखय-नाममाला पृष्ट इलोक पृष्ठ ८२ शोक १७१ ६५ ८५ शब्द हीन हुताश हुताशन हूंकृत हृदय शब्द हृद्य हुपीक हृपीकेश शोक ! झब्द हेमन् हेरिक १७८ १२२ ७८ हेपा १५६ हेयंगवीन हस्व १६९ १०५ ५२ ३७ ७६ ४२ १०५ ८१ १२२ १५८ ४१ हेति -2-16 अनेकार्थनाममालास्थशब्दानुक्रमणिका पृष्ट श्लोक ! शब्द पृष्ट श्लोक शब्द पृष्ट श्लोक १८ अ १०० ४८ दाव कवल्य कोटि क्षीर अक्ष ९८ १०० २६ २१ १५ १३ द्रव्य हिज ४१ १२ ३ ९८ अज ९४ ९५ ग १०० घ अञ्जन अथ अद्रि धर्म ३७ १५ १०० ९५ ४१ गुण गुह्य गो ३२ वातु धिष्ण्य अनन्त ९८ घ ४ ९४ अन्त २५ प अन्तर १०० ३८ वृत ९४ च ९७ १३ ९४ १७ ४ ज अम्वर अर्घ अर्थ अशोक ९८ १७ चर्चा १६ । २४ जात्य १२ जिन जीमूत ४० ज्योतिप् १० ४२ ९५ ३ पतंग पयस् पर्जन्य पाञ्चजन्य पुद्गल पुन्नाग पुष्कर प्राय-प्रायस् वावा ब्रह्मवाच ९४ ९ 5 ४ ६ इति २९ १०० क ९८ २४ तंत्र कदली कम्बु १२ १० ९४ त १०० . ९४ ९५ १०० ९५ भ 4 १० १४ तल्प तार ताऱ्या तीर्थ भग १०० २४ ९७ ३ काप्ठा कीनारा कीलाल केतन ७. भुवन भूरि ९४ दव ९७ १८ . -03 १२५ शब्द पृष्ठ पृष्ट श्लोक म ९४ मयूख ९४ ९४ ८ र ९४ ७ (९४ ७ ३० ९९ १४ ९५ राजन् राम भाष्यस्थशव्दानुक्रमणिका श्लोक } शब्द पृष्ठ इलोक शब्द विवस्वत् ३ सारंग विष सारस वृषाकपि ३ साल वैकुण्ठ सिन्धु व्यामोह ९६ १४ श सुमनस् शङ्क ९७ १८ सोम शम्भु ३ स्तंभ शिखरिन् ११ स्थाणु २८ २३ स्यन्दन । स्यात् सत्त्व स्वर ४२ सन्धि स्वैर ३४ समय ६ हंत सार ८ ! हरि १२ २१ ६ ९७ ल १०१ ९९- ४४ ९७ लब्धि ललाम १७ शुचि ९५ ११ च स ९९ वन वर्गणा वर्ण १४ ३५ ho ९४ ९७ २० वाम विरोचन २८ नाममालाभाष्यस्थंशब्दानामकारादिसूची शब्द पृष्ठ पृष्ट अ १२ अंशु अंशुमान् अंशुमाली ~-- .पंक्ति शब्द २० अन्धकरिपु १५ अन्धतमन २८ अपथी १८ अपसर्प अपांपित्त २६ २६ २६ २३ २ ८६ ३३ -- ४९ १८ १६ २४ अग ur पंक्ति शब्द पृष्ट अचिरांशु ९ अच्युत ३८ २१ अण्डज २० अतिमात्र २३ अतिवेल अभिनेत्रप्रसूत २४ अधिष्ठान ४९ २६ अनन्त २८ १८ १२ | अनावर ७७ २४ अनिमिष २४ अनीक ३ जनीबिनो ४४ ३ २४ ९ अग्निभू अराधन्वन् अप्रिय अङ्गज २१ ६ ३८ १८ अङ्गुर ५० अभिया अनला ४ १२६ धनञ्जय-नाममाला पृष्ठ पंक्ति शब्द पृष्ट पंक्ति पृष्ट पंक्ति शब्द उदधि ३ २ २३ २३ आ ३८ १ आ उदन्त ।६८ शब्द अभिमन्थी अभियाति अभिसारिका अभीक अभीशु अभ्यग्र १७ २ १७ १८ आच्छादन आत्मीय १२ १० १९ उदन्वान् २ २१ उद्धव ५४ २३ १८ आदित्य २६ १९ १२ २४ १३ . १ 1३० ६२ उघस्य उपकण्ठ ७ अभ्यागम ४५ १८ २ २० आधार आनर्त ८ उपगत ९१ १० आप्त ८ ४ १० २ १२ ८ अमुक अमृत अमृतनिर्गम अमृतागन अम्बा २५ ३० ८७ ८ २ १८ २३ १३ आप्तरूप आभील आमिप आयत आयोधन उपवृति उपमा उपलब्धि उपहूर उपाधि उरसिज ६८ ५५ ८४ ६८ १८ २१ १८ १८ १८ ९ अग्नुभूत अयन ८५ १ ७८ १२ १४ ५१ ८७ ३८ १८ १५ ६४ आरात् आरोह आशीविप उपर्बुध ५१ ६ २३ १८ ६५ अरण्यश्वा अरण्यानी अरिष्ट अचिष्मान् अर्दनि १ ૬૨ ३४ ८ ऊमि on १७ १५ आशुग आश्रयाश १६ ऋ २७ २५ १० ऋक्थ ८८ ७ ८९ ४ ७० १ ऋक्षेग २४ २५ अर्व अर्भक अलंकार २ २० ६० आश्रुत आसन्न आसव आस्कन्दन आहार्य ६१ ४५ १५ १ ११ ऋभु ऋश्य ऋष्टि १३ १७ २३ अवतमस ७२ ६४ ४३ ६४ अवदान १२ १५ १६ ११ ७८ " hor ऋप्य १७ ११ .0 अवयव अविनश्वर अविनीता ७७ ए १० ७८ १७ एकपदी एकान्त एण १२ १८ ८८ अव्यय इर्द इचिकिल इत्वरी इन्दिन्दिर इन्दु इन्द्रावरज १७ १६ १० ८८ ४२ ६४ ६६ ८२ २४ २४ ६८ १५ ऐरावती ९ ऐ क ३१ २२ १७ ३ chur १७ अशुभ अश्मन् अप्ठीवान् असती असम्पूर्ण असहन अनुहृत अन्नप ८९ ८ ३८ २२ २ ककुद्मती ५१ ईशान १९ २० २२ २ २ उ १३ २९ २८ उत्कर्ष ५८ २४ कङ्कपत्र कच्छ कञ्चुकी कटिसूत्र कटीर ३ उदक ८ अहर्पति २२ उदग्र ७६ १८ ५१ 1 - भाष्यस्थशब्दानुक्रमणिका पृष्ठ पंक्ति पंक्ति पंक्ति १८ कडन {३९ कदम्ब ८ ६३ १९ २१ १२ १ १५ ७ १५ ८५ कदर्य कनिष्ठ शन्द पृष्ठ कालिन्दीसोदर ७१ काश्यपनन्दन ६५ काश्यपी किण्वं किम्पचान ८५ किर किरि किमि १० २ २८ १ कन्धरा २ ९ कन्याज कपट. ५२ ६८ १५ पृष्ठ कैतव ६८ करवविप्रिय ३७ कोल ४६ कोविद कौणप २९ कौसृतिक ८० कतुपुरुष ३७ कव्याद २९ क्लीव क्षणिका क्षितिधर क्षीर ८ क्षीरोद १३ क्षीरोदतनया ३८ १४ १८ २८ कवन्ध २७ २८ ११ कीनाश १ ८ { २९ कमल कमला कमिता २१ २० ३८ १८ कीलाल ८ ४ ४ ३० : कोश ६ ६५ ८१ ६ ५ कम्बल कर्णजप कर्दमज कर्पट २१ २१ १२ २ कुट ६ ५ ६५ १ ५९ २९ ४७ १२ । कुण्डली २८ । कुन ८१ ८५ * * * कर्बुर १ ८५ १ भुल्ल क्षुल्लक कर्मसाक्षी क' M १२ १५ कुन्तल ९१ २२ । कुमुदविवल्लभ २७ कुम्भीनस ६५ १८ कुरंग ६४ २० कुरंगम ३ १७ क्षेत्र १५ ६४ क्षेत्रन २० कलागौत ४७ २ १४ सग कलाप कुल्या कुहक १२ ८० २१ ६० २ २१ कल्क ९ ८९ २१ सरु खजूर ४७ कल्मष कल्य ६८ १८ ग १८ ६ कल्याण ९ २४ on 9) १० २० ६१ गन्धदारिका गन्धर्व गन्वोत्तमा गरिक गर्भपोत १५ कवि कश्य काकोदर काञ्चीपद ६१ 2 ६५ ७ कूच १६ कूट १५ कल २ कूलङ्कपा कृतकर्मा २ कृतसुख १८ । तहस्त १. कृती १६ कृत्तिवासा कृपीटयोनि २ कृष्टि कृष्णवर्मा २० २० 04 २० गाङ्गेय २ 1४७ . ३९ २१ कापिशायन कामध्वंसी कार्पटिक ८० कालसार ६४ कालिङ्ग कालिन्दीकर्पण ८० ५६ गार्द्धपक्ष गिरिक निरिक्षा गीर्वाण गुडिका २ १६ ३ ३४ ६४ केतु १ १ ८९ १८ १२८ धनञ्जय-नाममाला पंक्ति पंक्ति पंक्ति पृष्ट ११ शन्द्र चन्द्रहास पृष्ट ८३ पृष्ट २५ २ ८८ शब्द गुल्मिनी गढ गूढपात् गृहा गोकर्ण गोकुल चपला ९ १७ शब्द जैवातृक न जाति ज्योति २० १७ १२ २२ २ १० १ २? चंय १५ .U ३८ ४७ ६५ ७८ ड १८ डिम्भ २० २ ८ ३० १६ १० १० गोत्र त ६३ ११. तटिनी चामीकर चिङ्गर चिकित्स चित्रक चित्रकाय चित्रपुल चित्रभानु चीवर ८६ ४६ गोत्रभिद् २६ ३१ ० गोपति {२, २० तटी तडित्वान् तनया ९ २० २१ १५ ११ ३१ १८ ३४ ७८ १८ २० १ तप्तकी ६० १९ गोप्ठ गीर गौरीपुत्र ग्रावन् ग्रावा ग्रीवी ज ૨૬ ९ जगच्चक्षु जगत्कर्ता २२ -१० तमाल तमस्विनी ૬૬ २५ ७ २५ ८ जगत्प्राण ७ तमालपत्र ८३ ८६ १९ ११ १२ जघन ५१ घ ७२ २५० घन १९ जका जनान्तिक जन्य १८ तमित्र तमिना तमी तमोघ्न २५ २५ घनरस ८ ३ १ ४५ १० १६ जम्वाल २८ १९ १० १५ ४६ ४७ तरक्षु तरस ६२ पत्र घृणि वृत घृतोद घोटक घोणा जम्बूनद जयन्त जयन्ती ४३ ४३ ता ३८ १३ ३ तार २७ २५ जरठ १२ २३ २ जरन् ६३ ४ तारका तारकारि ३ ३ च जलचर ८ ४९ ३५ २८ २७ १८ चक ८८ २० जलमुच जलराशि २५ चकवाल .६३ १३ २ १३ ३८ २६ १९ ६२ २५ जलशयन चकाङ्गवाह चक्री २० ६५ १ जाल {६३ १३ २३ ६७ ,६७ १० १४ चक्षुःथवा चञ्चरीक तारापथ ताक्ष्य तिग्मांशु तिमिररिपु तीर तुण्ड तुन्द तोयनिधि त्रयीतनु त्रिक विकस्थानक विदश ४२ ५१ ८० ९ ८० २ १० चञ्चला ९ २१ २३ २ ३ जालक जालिक जिघांसु जिन जिप्णु जिह्मग जीर्ण ३८ चटुला चन्द्रकी २६ ६४ ३ ८७ १९. १५ ६५ २ चन्द्रवसु चन्द्रसंग ६० ६३ भाष्यस्थशब्दानुक्रमणिका १२९ १८ २५ ७६ ४६ धूमिका धृष्णि ध्रुव ८५ २३ १५ १९ ६५ २ ७७ ११ दीर्घ दीर्घजध दीर्घपृष्ठ दुर्गति दुर्जन दुर्वर्ण ३ ९० or न ८१ २१ त्रिदशदीपिका ३६ त्रिदिव २८८ त्रिपथा ७८ त्रिपुरान्तक त्रिप्रचरा ७८ त्रियामा २५ विवर्मा २७ त्रिविष्टपसद् ३० त्रिसंचरा ७८ त्रिसरणि ७८ त्रिस्रोता २५ ४७ दुर्हत् २३ ३ १५ २६ १५ १३ १५ १४ २५ २२ १५ ६५ ३ ३० १५ ३० ११ १४ २ १२ १४ २१ त्र्यध्वा दुश्च्यवन दृकश्रुति देवता दैवत दोषग्राही दोषज्ञ धु द्युम्न द्रङ्ग ७८ १८ ८१ ५६ ho २ २८ १२ दक ८ ४ ४८ . ६ २४ २० ४९ ८ '८ ४ huyo ६ ४२ १ १२ ११ १८ द्रुणा द्वन्द्व १२ ११ १ २ ४५ २६ नक्तमुखा २५ नखरायुध ४६ नलिनी ११ नाक २८ नागान्तक ६५ नालीक ८० नासिका ५१ निःशलाक ८४ निकाय नि कुरम्ब निखिल ८८ ४९ निगम ७८ नितराम् ८८ निरय ९० निर्जर ३० निर्झरिणी १२ नियंथन ८९ निवह निशीथिनी २५ निशीथिनीनाथ २५ निपद्वर १० नूत्न नृपलक्ष्म नेम ८९ नेस्ना ५१ नकषेय २९ नकसेय २९ नैऋत २९ ६४ द्वादशात्मा २२ १२ ३ दक्ष ७९ दक्षाध्वरध्वंसक ३६. दक्षिणापति ७१ दण्डधर दण्डाहत ६२ दध्युद १३ दन्तावल ४५ दन्दशूक ६५ दमुना ३४ दमूना ३४ दयिता दर्वीकर ६५ द्विजराज २५ १० द्विजित २१ २ २ ६३ ८१ ६५ १२ ४६ २३ द्विरसन द्वीपवती द्वीपी द्वेषण २१ ११ २६ १ १७ १ २ १० २ १७ घ ८९ ४ दल दशमीस्थ २६ ४ ३४ ४ 5२३ ३ ३८ १४ धनञ्जय धरणिधर धर्मराज धर्पणी १ ७१ दस्यु ८२ दाक्षायणीरमण २५ दाण्डाजिनक ८० ११ २८ २ २८ २ धव धाम १७ १८ २३ १७ १९ १९ २३ २८ १७ न्यक ३८ १४ धाराधर धीर ४६ १९ प दाव दाशाह दासेरक दिगम्बर दिनकर दिनमणि दिवस्पति ७२ पङ्क १३ २० १० १२ १ १९ १५ १३ ४६ ३४ १२ धूपक धूमध्वज धूमयोनि धूमल २६ २६ ३१ ९ पञ्चदास १९ ५० ४६ २७ ७२ ७ पञ्चानन १३० धनञ्जय-नाममाला पञ्चेषु पट १२ १३ पटी ७१ ८४ १३ १८ ३८ ४ १ ४४ २० पिण्ड पितृपति पीतवासा पीति पीयूप पीयूपरुचि पीलु पुज २७ २७ १९ ६२ पट्टसूत्र पताकिनी पति पदजेय पदवी पदाङ्गद पदिक १० १८ १४ ३० २५ १० १ ७८ ४५ २३ २ १२ १४ ५३ १४ १४ २२ १७ ३० ११ ३० ८ पुटकिनी पुण्डरीक पुत्री पुद्गल ४६ २० ७ ७८ १२ ५ १६ ६५ ३८ २१ पुर (१९ १ ३८ १६७ २१ ४५ १५ २ २८ २ ११ ७८ ९० पुरन्धी पुरुज पुलक पुलप पुष्क ६२ or ९ له سه ر س س ११ १९ १२ ८२ १४ ९० २६ २३ ११ प्रतन १३ प्रतानिनी ११ १५ प्रतिकिट्ट प्रतिज्ञात ९१ प्रतिपक्ष १६ प्रतिभय ८७ १७ प्रतिभा प्रतिम २२ ६८ प्रतिमोपक ८२ प्रतीक १४ प्रतीपशिनी १६ १६ प्रत्न ७६ प्रत्यनीक २३ प्रदह प्रद्युम्न प्रद्योत प्रद्योतन ९ प्रधन ४५ प्रपात १३ १४ प्रवुद्ध प्रभाकर २६ प्रमदा १५ १२ प्रलम्वघ्न १८ प्रवयाः २६ प्रविदारण २ प्रवृत्ति ६८ प्रवेणी ९१ प्रांशु प्राणाधिनाथ १८ २१ प्रालेयांशु २५ १३ प्रावर प्रावार प्रीति ८ प्रेक्षा ८ प्रेतपति १६ प्लवङ्गम पुष्कर १ ८ २८ ३ ३७ १० १० पुष्ट ८२ ९० ७ पुष्पलिट २ २१ ४२ पद्ग पद्धति पन्नगाशन पद्मवासा पद्मा पद्मी पद्या पयूप पयोघर पर परमेश्वर परमेष्ठी परास्कन्दी परिपन्थी परिप्लुता परिपज्ज परिष्कार पर्जन्य पर्यवस्थाता पलाशी पल्ल पन्नाशन पशु पशुपति पांशुला पाक पाकशासन पानीय पार्वतीनन्दन पिचण्ड २३ २ १५ १२ २८ ११ २१ १० ४ ६० ४५ २० १ ३१ २३ २६ २ पूर्वज पूर्वदिग्पति पृथुक पृदाकु पृदिन पृपदश्व पृपल पोत २० १ ७ ५ ३३ ७७ १४ १८ २० .१ m ८० प्रकट RO ८४ १५ ३ १७ प्रकार १७ ५४ १३ २३ २० प्रकाश २ ३१ ६८ ( ૬૮ (८४ ५० ६८ ५ २७ प्रकोप्ट - ११ ८ प्रख्य ६ १५ ३५ ४ ८ फ प्रग्रह प्रचलाकी २३ १० फल १९ ३ ६ फलक ५१ भाष्यस्थशब्दानुक्रमणिका ब .६७ ८ बद्धभूमिक वद्ध र व ७ माधव ८० ७२ १४ १३ ३८ ६१ ६१ बल १५ میں ७० भुवन भूच्छाय भूतधात्री भूतेश भैरव भोक्ता भोगी भ्रूण बलसूदन ३ १५ १७ ८७ बहिज्योति बहुल २५ १५ ३४ ३४ १८ २२ १९ ૨ २३ २२ ३८ ८० वाडिश ६५ २० mr १४ १४ ८० माधवक माध्वीक मानसौकस् माया मायावी मायी मितम्पच मित्र मिष मिहिका मिहिर मुकुन्द ३ ८० बाणासन ३ ४२ १ मञ्जुकेश १ माल २० म ३८ ६० मण्डन ८५ २६ ६८ ८० २ १४ १३ ११ १२ ८ ८० ८५ १८ २५ १४ ५५ ३५ ४७ ४ २६ २० ५६ २ ३ ३८ १४ बालिश याहुलेय बुक्कण बुद्धि वृहत् बृहद्भानु ब्रह्मचारी ब्राह्मी ५५ ८ मुदिर सूर्तिज २८ ८ ९ ६१ १३ ८७ १८ १५ १९ मूर्धज २० ४२ ३४ ३५ १६ ९० ८ ३९ ४७ मण्डल मति मतिमान् मत्स्य मधु मधुकर मधुसख मनसिज मनीसी मन्त्रज्ञ मन्या मयूख मरालवाह मरुत् मरुद्वर्मन् २ ५२ ४६ २० ११ भ २ मृगदंश मृगरिपु मृगाङ्ग मृगारि मृणालिनी मृदुल मृद्य २ भग ८७ ४६ २६ ७ २० ५० भयानक भर्ग ८७ २२ २३ २ ११ १९ २५ ७५ २२ १४ भर्ता ४ ४५ मृद्वीक १ ३० मेघपुष्प भर्भरी भल्ल भल्लि १८ ३८ ३९ ३९ १९ २२ २१ २८ ८ ४ १४ १.- मेधा मोपक ८ भपण २१ ८२ ४७ ८२ ५२ ५ २ ४२ ९ य or यथार्थवर्ण भसल भानु मान् भास्कर भास्वान् २६ २६ २१ ८७ mr ८ मलिम्लुच मस्तक महातेजस् महावल महाबिल गहारजत महासेन महिला महीरुह महेला २८ ययु याज्य २७ १९ २० २६ २५ ४७ १५ १५ ६२ भीम २८७ ३५ ४ यातयाम यामिनी यूप ४ २२ २५ ८७ १ ur भीषण भीम भीष्मतू भुज भु ८७ २२ २२ पूनी १ ११ ( २५ 7 (३८ ३ २ २२ रजनीकर माणमा २५ २० १ रलवती ६ धनञ्जय-नाममाला पांडपाणि रमणी 1008 १४ वरयिता १८ ८९ ३८ १५ विल विलाय २८ वरला ६४ ११ १ २१ २ १० विवसन रमा ३८ ४६ २२ १९ ८५ २१ १८ २० खण रहिम २३ १९ २८ १८ रसा ४ ६ ७८ राक्षस ३ २० २७ वराक वरिष्ठ वणिनी वर्तनी वीयान वर्म वर्हण वशा वसति १२ १८ १६ २१ १९ १ २९ ६१ ६५ २४ २५ ३ ५२ २८ १३ रागसूत्र राजसर्प राजा रात्रि राशि रिश्य ६ २४ २६ १६ २५ २३ ६ १५ १२ १७ वसु २६ १९ १५ १२ ६४ ३४ - १५ ११ वस्त्र ४७ रुक्म १५ रुग्म ४७ ४ रुचि २३ १९ ३६ ૬૪ १३ १७ विवस्वान् २६ विविक्त ८८ विशारद ५६ विशिख ३९ विथम्भ ८८ विश्वनाप ३८ विश्वास ८८ विष्टर ६ विप्टरश्रवाः ३८ विष्णुपद २८ विष्णुपदी विष्णुरथ ६५ विष्वक्सेन ३८ विसर ६३ विसार ८ विस्तीर्ण ८७ वीचिमाली १३ वीणा ९१ वीतहोत्र ३४ वीति २७ वीरु ११ वृक्ष ६ वृजिन ९१ वृत्तान्त ७५ वृत्रारि ३१ (५६ वृद्ध ૨૨ ૨૬ ८ २९ १५ १८ २८ १३ ९ २ २९ ६४ रोक ८९ रोचि ૨૨ रोषोवका १२ ३९ रोलम्ब ४२ रोहिणीवल्लभ २४ २२ १८ ११ २१ ९ वस्न वह्निरेता वातप्रमी वामदेव वामनेत्रा वारिद वार्ता वासतेयी वासिता वास्तोप्पति विकर विकिर विकर्तन विक्रान्त ७ ६८ २५ १५ २० २६ २८ १६ २५ २७ २५ २६ ल ११ ૬૨ २९ १ ६८ १८ २६ २ ५६ १ ९० १७ २० १८ १५ २ लक्ष्य लव्ववर्ण लवणोद लहरी लेख २५ २ १३ १३ १ १७ विग्रह (१९ ।४५ २ ४ ३० ८४ १८ ३१ १ २५ लेड्वह ४७ २ ६८ ८८ वृद्धश्रवाः वृन्दारक ३० ३८ व ८० १४ २ ५ १४ ૨૬ ४ ६ ९१ विजन विधा विधेय विपश्चित विपुला विवुध विभव विभा विभावरी विरोक वृषाकपि बृपाङ्क वेणी वैकुण्ठ वैजयन्त वैवस्वत ३० ३८ १४ २० ४८ ७ वक्षोह वजवर वह वनमाली वनौकस् वपा वयसी ४३ १० ३८ ११ ६ १५ १५ २२ ३ २५ व्यक्त ५६ ८९ २५ २३ ३ ८० व्यञ्जक २० .
भाष्यस्थशव्दानुक्रमणिका व्याल ६५ १ व्यूह व्योमकोश am - १३३ ६४ ३४ ३ व्रज ३ सदेश सन् २३ वात ११ शुक्लापाङ्ग शुचि शुण्डा शुपि शूर शेक शेवलिनी १५ १५ २२ ११ ६९ ४६ । ३८ ७७ २७ ८९ सनातन २. १५ १० २६ २० २१ ८ २८ २३ १२ २० १० ३५ ३७ शकली शक्तिपाणि शतवृति शतहृदा शतानन्द शबल ३ शैल सनाभेय सनीड सन्निकट सन्निभ सपिण्ड २३ ४ ७० m १० ३० ९ ८ m २० १० १७ २१ श्यामकण्ठ श्राद्धदेव श्रीकण्ठ श्रीनन्दन श्रीपति ६४ ७१ ३६ १० सप्ताश्व सभासद शम २६ ३ ५० २१ ७ शमन १९ ३ ११ शम्बर ७१ १ श्रीवत्साङ्क ३८ ३८ १ ७ ६४ श्लोक शम्भु ३ ६९ १३८ ३६ ७४ १४ २३ शय शर्वरी शल्की ५० ३ १५ १९ २५ १२ १३ १३ २२ १९ श्वभ्र श्वेत श्वेतच्छद श्वेतरोचि ८९ ४७ सभास्तार समय समर्याद समवाय समास्या समानोदर समानोदर्य समिति समीक ७४ २५ २१ ६३ २५ २३ १० ८ शशध्वज २९ १ १० २ प ४५ ४५ २ १ । समीर २५ ३६ ६ शशाङ्क शशिशेखर शाखामृग शातकुम्भ शानव पट्चरण षडज्रि ४२ १ ३ ९ समुदय ४२ ९ ४७ १५ १५ समुदाय स ८ १२ २ १२ १२ ४५ ६३ १२ २३ २ शाद शारिवा १० १० १ ११ २५ शाल २७ ८ ६ २ ११ ३ my ४७ ४५ २ ३ समुद्रकान्ता समुद्रनवनीत समूह सम्म सम्मित् सरस्वती सरिद्वारा सरीसृप सपशिन २० mr शालावृक शाव शाश्वत शाश्वतिक शिक्षित शिखावल ८ ७७ संख्य संस्था संख्यावान् संगर संवित्ति संवेग संव्यान संस्त्याय संस्फोट ससा सगर्भ सङ्कल्पजन्मा १२ my ७१ ४५ ५५ ८३ ५९ ६७ ४५ २१ २१ २ ११ ११ १ ११ ७९ २० ६५ ६४ २ ६४ सर्व सहा ३ ३ २ शिजिनी (५३. सर्वज्ञ २ सर्वतोमुख ar ९० ८ शिरसिज হিহ शीर्ष १० ११ ४ २९ सञ्चय ८० २० २ सलि सविता सहचरा सहवरी सहधर्मचारिणी १६ ६ ९ १९ सदातन २३ १५ ७७ १५ धनलय-नाममासा १९ २८ ३ १५ १० १४ सुरवत्म सुरसरित सुरोद १३ ८८ ३० सहन किरण सहाय सागराम्बरा सामाजिक सामि स्वादूद स्वापतेय स्वैरिणी ८ ६ ३ ६ १७ '१७ ३ ३ ० ५६ ७ hcv ८ ૨૬ १८ १४ १० २० ३० १८ २६ २ २१ सायक सेक्ता सेवक सरिन्धी सोदर २१ हंस हंसक ८८ १८ १४ ६४ २१ २६ १० हरि २० ८ ११ ૬ १७ १९ १२ ४ ६० स्वन्ध २१ ९ ६३ ४६ १२ १३ ७२ २१ २१ ५१ n. 2. m. " २ १२ १२ ३८ १० स्तनयित्नु स्तन्य स्तोम स्थविर स्थानीय स्थिरा स्निग्य स्पर्शन २७ ४७ ४९ ८ ૨૬ ४ ३१ ४६ ४ ६० ३८ सारङ्ग सारसन सार्थ सिंह सिवनी सिचय सित सिताभ्र सितेतरगति सीता मुकुमार सुचरिता सुधामूर्ति सुधी सुपर्णकेतु सुपर्वा सुमनस् मुरज्येप्प दुरनिम्नगा २ ५ १५ २२ १४ ३८ ८ स्पश ८७ १ हरिण हरिदश्व हरिप्रिया हरिमान् हरिहय हर्यक्ष हविः हव्य हारहर. हिमवालुक हिरण्य हृच्छय हेपण हैपा ह्रादिनी हपा २३ १६ ६१ ९ ६० ५ २ ८ ४८ १७ २५ ५६ ३८ स्पृह्य स्वप्टा स्रोतस् स्वजन १२ ११ ३९ २ १४ १२ २६ ५२ स्वयम्भू स्वराट् १० २६ ३० ३१ • • • १४ १२ १० ११ ११२ स्वगी कस् २० ११ १२ ५२ स्वादुरसा ६१ १५ २६ यौगिकशब्दानुक्रमणिका ७७ अग्निपर्यायसूनुः सेनानी अघपर्यायजयी जिनः १३१ अदितिशब्दात्परं सुतपर्याय- प्रयोगे देवनामानि ५६ आकाशपर्यायगः खगः ५४ आकाशपर्यायचरः खेचरः ५४ उडुपर्यायपतिः चन्द्रः ४८ काष्ठादिनामतः परं पालप्रयोग गजप्रयोगे अम्बरप्रयोगे च दिग्पाल नामानि ६१ कायपर्यायरहितः मन्मथः कार्म कपर्यायकोटि: अटनी ७९ किरणवाचिभ्यः पूर्व शीतशब्द- प्रयोगे चन्द्रनामानि,- यथा- शीतकिरणः किरणशब्देभ्यः पूर्वम् उष्णशब्द- प्रयोगे सूर्यनामानि , यथा- उष्णकिरणः ४६ कृष्णपर्यायपुनः मन्मथः गङ्गानदीश्वरः सिन्धुः ७१ चित्तपर्यायहारि मनोहरम् १७८ जाङ्गलपर्यायप्रियः राक्षसः ५५ जित्यापर्यायकरः बलः १४२ झषाद्यादिः ध्वजाद्यन्तःस्मरः ८४ तामरसपर्यायवती विसिनी २३ दिनपर्यायकरः सूर्यः ५० देवपर्यायपति इन्द्रः ५७ देहपर्यायभवः सुतः ३९ द्युपर्यायधुनी गंगा धनपर्यायदायकः कुवेरः ९६ धीनामवजितः मूर्खः १६६ नागपर्यायारिः मृगेन्द्रः निशापर्यायकर: चन्द्रः ४८ पन्नगपर्यायवैरी गरुडः १२८ परिषत्पर्यायज कमलम् २० पवनपर्यायपुत्रः भीमः पवनपर्यायपुत्रः हनुमान् पवनवाचिसखा अग्निः पुष्पपर्यायशरः स्मरः ८० पुष्पपर्यायास्त्रः स्मरः ८० प्रस्थपर्यायवान् गिरिः भूमिपर्यायधरः शैल: भूमिपर्यायपतिः नृपः भूमिपर्यापरुहः वृक्षः मनुष्यपर्यायपतिः नृपः १४ मयूरपर्यायपतिः गुहः १२६ मेघपर्यायपथः आकाशः राविपर्यायचरः राक्षसः ५५ लक्ष्मीपर्यायपतिः हरिः ७६ वायुपर्यायपथः आकाशः ५३ वार्पर्यायच रः मत्स्यः १६ वापर्यायधिः अम्बुधिः वार्यर्यायोद्भवं पद्मम् १६ वित्तपर्यायपतिः कुवेरः विधिपर्यायपुत्रः नारदः विपिनपर्यायचरः वनेचरः १३ विष्टपपर्यायपतिः जिनः ११३ सम्पापर्यायपतिः अम्बुदः १९ शैलभम्यादिधरः हरिः ७६ सेनानीपर्यायपिता शङ्करः ६८ स्रोतस्विनीपर्यायपतिः- अधिः स्वर्गपर्यायपतिः इन्द्रः स्वर्गपर्यायवास: त्रिदशः ५७ स्वान्तपर्यायोद्भव: मारः हिमपर्यायकरः, चन्द्रः १७९ ६४ २४ ७७ ९ ७ ७ ७ , अनेकार्थनिघण्टुगतशब्दानामकरादिसूची अ har . ७६,७७ इडा १०२ २९ अक्ष अगारि १०४ १०४ केसरिन् कोकिला कोटरस्थ कोमल कौगिक १०५ उ ८५ ८२ १४९ २६ १३. ९५ ४० पड़ अज अदिति • १०४ १०५ १०५ १०६ १३० १०४ १०४ १०५ १०२ १०२ १०४ १०३ १०३ १०२ उक्षन् उदक्या उदार उणीप नव्य क्षत्ता अध्यात्म १०४ क्षय ८८ १०७ ३८ ४५ २१ उस्रा १०४ क्षर अध्यूढा अनन्त अनिमिप अपाचीन ऋत ख १०३ ख १०४ ओ ६४,६५ ग औपण अब्द अमृत अम्बर अम्बरीप १०२ ३४.३५ १०२ २९ १०५ १२३ १०२ १०२ ३७ १०२ ४ १०४ १०३ ५७ १०२ २२ १०२ १९ १०३ (१०२ १५ ९४ १०४ १०३ ५५ १०४ ९४ १०३ १०३ ४८ १०४ ७५ गो गोलक १०२ १०५ १०३ २ १३३ क क ७४ अर्क १०४ क कुप कवन्ध घ अलात ४६,४७ १०३ १०४ अवदात अश्वारोह धसित असुर कम्बु कर कर्पक १०२ २३ च कल १०४ आ १०४ १०३ ४८ ९८ आकूत आकन्द आगोप १०४ १०४ १०३ कलभ कलप कानीन किलास कीटक ९५ ४० १०२ ग्रावाण १०३ ४४ १०४ ८८ घन १०२ ११ घनाघन १०२ २४ १०४ ९० घृत १०४ ८६ १०४ १०८ चटक १०४ १०८ चमू १०४ ९० १०४ १०४ छेद १०५ १२६ (१०३ ५३,५४ १०५ १२१ जम्बुक १०२ २५ जीमूत १०५ १३३ ज्योति १०५ १३४ १०३ १०५ १२३ तपस् १०२ २२ । तमोनुद १०२ ताऱ्या १०४ ८६ आडम्बर ११२ ज कीनाश १४ आत्मज आदित्य आवि कीलाल १०२ १०३ १०३ ५८ ५५,५६ १०२ ७८ आयतन आर्य १०३ १०३ १०४ १०४ १०४ २०४ .१०४ १०४ त १११ १०.३ कुण्ड कुण्डाशी कूल कृतघ्न कृष्ण केतु १०५. १३१ आलवाल १६ आलान १०२ १०३ ५० धाहत ८९ अनेकार्थ निघण्टुशब्दानुक्रमणिका १३७ १०४ ८४ पपड १०४ भार्या १४८ १२ भाव ८७ १०४ ५१ पतझ पद कृत १०४ भास्कर तिलक तुल्य तृणी तेजस तोदन तोपद त्रियामा १०५ १०४ १०२ १०२ १०५ १२ २५ पन ७७ १०५ १०४ भुवन भूस्थिव ९२ १०२ १३५ १०० म पय परचित परमेष्ठी परिचर्य पर्जन्य १०४ . त्रिशच ६८ १०४ ८४ द पलाश १०४ मज्जूषा ८५ मण्डूक १०४ ८९ मत्तकाशिनी १०५ १३९ मधु १०३ ६३,६४ मन्थिन् १०२ १५ मन्द १०५ १२१,१२३ ७०-७१ दक्षिण दविष्ठ १०४ १०४ पवन पानीय १११ १०२ ९९ पाप दान १०४ ९२ १०२ ; मन्दिर १२४ ११ ८३ १०४ १०२ ११० दान्त दीर्घ दुश्चर्मन् दोला १०४ १०४ १०४ ९५ ११७ १७ ५२ १०७ ११८ १०४ १०४ १०४ ८२ ५२ पाञ्चजन्य पिशङ्ग पिशित पुण्यश्लोक पुलिन पुकर पुष्प पुस्त्व पृष्ठीही पौलस्त्य प्रजापति मयूब मलिम्लुच मस्कर महेष्वास माया मृष्ट मेचक मिलष्ट घ १०४ ७८ १०२ १०४ ८३,१०६ १०४ ९१ धनञ्जय धार्तराष्ट्र धिप्पण ६५ १०७ १०२ १०३ ५९ य २८ न ६८ प्रधान १०३ १०४ यम १०३ युद्धशौण्ड १०५ यूप १०५ यूपपयूथप १०५ प्रपा • - प्रभाकर १०३ प्रासाद र ४५ रहा नकुल ६७ नल्व १०५ १५१,१५२ माग '४९ नापित नास्तिक १०५ १३२ निकष १०४ नितम्ब निरुपद्रवा १०५ १२८ निरुपस्करा १०५ १२७ निविड ८९ नसिंह पतोषपरिमण्डला १०५ १४३ रजन् फ फेनवाहिनी १०३ ९४ १०४ व वनु बीमल १०२ भ प राजीनामा १०५ भगवन् भामिनी ८२ +4.mmPM धनञ्जय-नाममाला रावण १४१ १०५ १०२ ८ ४१ रोहिणेय ९३ १३७ गुप्त शेमुपी शेप शंलूप १०४ १०४ १०२ १०४ ल १० १०० लक्ष्म लक्ष्मण विलास ८७ प ९० पड्वद ललना १०३ १०३ १०५ १०४ १०५ १०४ ६९,७० ६९ १३७ ८१ १३९ ८१ स ललाम ालता लवली (१०२ विभावगु १०३ विम्बोष्ठी १०५ विरोचन १०२ १०४ विशाल १०४ विष १०२ वृकोदर १०५ वृजिन १०४ वृप १०२ वृपा १०२ बेहत् वैकर्तन व्यक्तिवादिन् १०५ व्यञ्जन १०४ च्यावि १०४ २४ ११६ १०२ सबर सत्र लावण्य १०४ १०१ सत्वर . १०४ लुलाय लेखा सदन १०३ १०४ १०५ ३१ १०७ ११५ १२० ११२ व वक्रवक्त्र १०२ वन्ध्या वरणिनी ८२ १०७ १३८ श शङ्क १०२ २७, २८ १०४ १०४ ८३ १०२ १०२ २७ १०२ १०५ १४८ १०५ १२४ १०५ १२५ १०४ १०९ ४२ १०३ १०२ ७ १०३ ६६ १०४ १०४ १०२ २१ १०३ ४३ १०४ १०४ १०५ १०२ १०३ १०४ १०३ १०४ १०४ १०३ सद्म सप्तपि सप्ताश्व समाधि समाधिस्थ सम्राट सान्द्र सारंग सारस सित सुमना स्थविष्ठ वराह वल्य वर्षाभू वलाहक वल्लरी ४७ सडकण्ठी १४ १४५ १३ ८९ १३१ शम्भु शरान शरीरज शर्वरी वसा ११३ १०७ १८ ३५ ४२ २३ { १०२ वसु स्यन्दन १०२ १०५ १०२ १०५ १०२ १०३ १०२ १०३ १०२ १०२ १०४ १०३ १०६ १०४ स्वर वाजी ५ ho वाम वालेय १०३ १०४ १०३ १०३ १०३ याव शिखरिन् शिखिन् गिव शिवा शिलीमुख शीत शुक्रा शुचिकृत ९० ६ ८० ६० १५३ ८ वासर विद्वान् विपच्ची विपिन हंस १०२ हरि १०४ हिमाराति १०२ हिल १०४. हस्व १०४ ११२ १०८ १०४ १०६ ง १५२ उद्धृतवाक्यानामकारादिसूची १ २ १ वाजं वाजस्तु १० ५५ - ३ अङ्कनाच्च तदेक्षणां णमो अरहंताणं भर्ता संगर एव मृत्यु वसति १५ अतिप्रलापभावेन ६१ तत्तु हैयङ्गवीनं यद् मान्यत्वादाप्तविद्यानां २ अनशनावमौदर्यवृत्ति- तत्संदेहे गते ताभ्यां ५८ मुदन्ति मिश्रीभवन्ति १२ दुज्जण सुहियउ होउ २२ यः पापपाशनाशाय असूययागग्य निशाम्य यां ३३ २ आत्मनि मोक्षे ज्ञाने ५२,५८ दुर्जनानां विनोदाय य उत्पन्न ः पुनाति वंशं १९ आपो नारा इति प्रोक्ताः ३७ दियोम्नि पुराण- २५ यत्सर्वात्महितं न वर्णसहितं ५९ आयुः पीयूषकुण्डैः स्मृत्ति- ६२ न कुं पृथिवीं पिपति १२ रेषणात् क्लेशराशीनाम् २ आहुनॆत्रोत्थमः सुत- २४. नक्षत्रमृक्षं भं तारा २५ लक्ष्मीकीस्तुभपारिजांतकसुरा६१ वरं क्षिप्तः पाणिः नक्षत्रे वाक्षिमध्ये च २२ उड्डीय वाञ्छितं यान्ति १४ २५ वांगमो गवेन्द्रादौ एको रथो गजश्चको ४५ नभन्तु नभसा सार्ध २३,२९,४६ ५९,६५ ऐश्वर्यस्य समनस्य ६५ नवमे प्राणसन्देहो ५४ पक्षेऽपि २७ कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च ३४ नासाकण्ठमुरस्ताल वाहो युग्यं घनो वाहो २७ काश्यमित्युच्यते तेजः ५७ निषद्वरस्तु जम्बाल- वृषाकपिर्वासुदेवे ३४ कियती पञ्चसहस्री ९६ निषादर्षभगान्धार ५३ श्यामा रात्रिस्तु विट् श्यामा २५ कुमारकाले आमलकी- पञ्चमे दह्यते गात्रम् ५५ ५४ षड्ज मयूरा ब्रुवते ५३ कोकिलानां स्वरो रूपं पञ्चाचाररतो नित्यं सत्यं दूरे विहरति समं १४ क्वचित्प्रवृत्तिःक्वचिदप्रवृत्तिः ६० पट्टनं शकटगम्यं ४९ सन्धिर्योनौ सुरङ्गाया गिरिकन्दरदुर्गेषु ३२ पतत्रिपत्रिपतग- २९ सर्षपस्य प्रयत्नेन गोसवे सुरभिं हन्यात् पत्त्यङ्गस्त्रिगुणैः सर्वैः ४४ स व्याख्याति न शास्त्रम् गौः स्वर्गः सप्रकृष्टात्मा ५८ पुण्डरीकं सिताम्बुजम् १० स्वस्थे नरे सुखासीने ९६ गोगों: कामदुधा ५२ पुष्पसाधारणे काले ५३ स्वानुभूत्यै भवेद् चतुःषष्टिकलाभिज्ञा १८ प्रथमे जायते चिन्ता ५४ हावो मुखविकारः स्यात् १७ चत्वारः पुरुवंशजा ५८ प्रशस्या न नमस्यापि २२ हिंसानृतस्तेया- २ जातमात्रोऽथ भगवान् ३१ प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त हिरण्यगर्भमभवत् भाष्यगता ग्रन्था ग्रन्थकाराश्च अकलङ्कः १ विद्यानन्दी अनेकार्थध्वनिमञ्जरी- द्विसन्धानभाष्यम् शब्दभेदः १७ २५ २१ नाममाला ७२ २० शाश्वतः २५ २७ १३ पद्मनन्दिशास्त्रम् श्रीभोजः अमरकोषः २५ पूज्यपादः समन्तभद्र: १ १० वृहत्प्रतिक्रमणभाष्यम् ५८ १५ सूक्तिमुक्तावली २२ १२. १८ अमरसिंहः १५ भरतनाटकम् ५३ २२ ४३ ४८ १९,२४,२७ ६ सोमनीतिः भारतम् २४ २० ५७ २२,२३ १० महापुराणम् अमरसिंहनाममाला २९ २६ ६ 1५८ ३,९ हलायुधः १२ २४ अमरसिंहभाष्यम् १९ १२ यशःकीर्ति २२ १५ आशाधरमहाभिषेकः ६२ हलायुधभाष्यम्- २१६,१९ इन्द्र नन्दिनी तिशास्त्रम् ५५ २३ १४ यशस्तिलकम् हैमः कल्याणकीतिः २ २४ २५ हेमनाममाला क्षीरस्वामी ६२ १६३ हमी ९६ १७, २५,२७ डाल्लणिकः २९ ६ यशस्तिलकचम्पूकाव्यम् ९८ ८ हैमीनाममाला १ २ द्विसन्धानकाव्यम् १ or {२७ ९ ९ ८७ ८ ८ १ १ १ ४४ १ ९४ १० १ १ ६ ३४ १२ सङ्केतविवरण सं० चि० अभिधानचिन्तामणि अनेका० सं० अनेकार्थसङ्ग्रह अम० को० अमरकोश अम० को० क्षी० भा० अमर- कोश क्षीरस्वामी भाप्य अमर. अमरकोश अ० सं० अनेकार्थसंग्रह उ० सू० उणादि सूत्र का० सू० कातन्त्रमूत्र यश ति० मा० क० यशस्तिलक क्षी० भा०क्षीरस्वाभिभाष्य आश्वास कल्प क्षी० ० स्वा० क्षीरस्वामी वि० को० का० विश्वलोचनकोश. जन० समु० जनपदसमुद्देश कान्तवर्ग जै० सू० जैनेन्द्रसूत्र वि० लो० विश्वलोचन कोश त० सूतत्त्वार्थसूत्र नीतिसा० नीतिसार श०च० शब्दार्णवचन्द्रिका नी० वा० समु० सू० नीति वाक्या. श० च ० मू० शब्दार्णवचन्द्रिका यामृत समुद्देशसूक्ति प०प० पद्मनन्दिपञ्चविशंतिका शा० कारिकाशाकटायन कारिका पा० उ० पाणिनि उणादि शा० सू० शाकटायन सूत्र पा० गणसू० पाणिनि गणसूत्र सर०क० सरस्वतीकण्ठाभरण पात० भाष्य पातञ्जलमहाभाष्य सार० समा० सू० सारस्वत पा० सू० पाणिनिसूत्र समास सूत्र भो० उ० भोजउणादि मे० को० वा०व० मेदिनीकोश हे० च० हेमचन्द्र वान्तवर्ग · । हे० श० हेमशन्दानुशासन सूत्र कल्प० को० कल्पद्रुकोश का० उ० कातन्त्र उणादि का० रु० उ० कातन्त्र रूपमाला उत्तरार्थ का० रू० पू० कातन्त्र रूपमाला पूर्षि का० रू० पू० सू० कातन्त्ररूप- माला पूर्घिसूत्र शुद्धिपत्रम् पृष्ट प० अशुद्धयः शुद्धयः पृष्ठ प० . अशुद्धयः शुद्धयः १४ सरं शरं विपाशयः विपक्षयः स्तमितं स्तनितं ६९ निकुरो निकरो ५४ २१ मुक्तोपा- मुत्तोपा- ७१ श्येतो ६५ ९ २ २ २१, श्वेतो
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