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Sanskrit Siksha-278

Gauri Shankar · 2006/06/25

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Piescribed as Text Book for Class VI
vide DPI PEPOU NO AB-4 (44)
51/1284, dated 24-3-1952
विश्वछात्र ग्रन्थमाला-३
संस्कृत
धिाक्षा
FAFET
प्रथमो भागः
लेखक,
गौरीशङ्कर M. A., B. T. B. Litt (Oxon), P. E. S.
.
PIS
ISTS.1
मूल्य

(छठी कक्षा के लिये उपयोमी)
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
संस्करण ४: सं: २०१२ (1955)
ॐ
प्रकाशक व मुद्रक:
-
श्री देवदत्त शास्त्री, विद्याभास्कर,
विश्वेश्वरानन्द वैदिक रिसर्च इन्स्टीच्यूट प्रैस
विश्वेश्वरानन्द संस्थान प्रकाशन,
साधु-आश्रम, होशियारपुर (पजाब)

Acc.No. 278 - 2 ( INSTITUTE OF TIBETAN HIR प्राक LIBRARY १. माला के क्षेत्र Acc No....... विश्वेश्वरानन्द वैदिक संस्थान द्वारा (१) 'शान्तकुटी वैदिक ग्रन्थमाला' (२) 'दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत ग्रन्थमाला' (३) विश्वेश्वोनन्द भारत मारती बन्थमाला', (४) 'सर्वदानन्द विश्व ग्रन्थमाला विश्व मधुर ग्रन्थमाला' और (६) 'विश्व छात्र ग्रन्थमाला' नामक मालाओ के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न प्रकार का प्रकाशन-कार्य चल रहा है। प्रस्तुत ग्रन्थ इन मालानो मे अन्तिम अर्थात् 'विश्व छात्र ग्रन्थमाला' में प्रकाशित हो रहा है। आज हमारे स्वतन्त्र-भारत के छात्र, यदि उनकी शिक्षा-दीक्षा उत्तम ढग से सपन्न हो, तो समस्त समन्वित संसार मे सांस्कृतिक कर्णधार के रूप मे अपने राष्ट्र द्वारा प्रतिष्ठा और सम्मान की प्राप्ति के आधार बन सकते हैं । उसी उत्तम शिक्षा-दीक्षा के अंग-भूत विविध पाठ्य विपयो से सम्बन्धित, परीक्षोपयोगी तथा सामान्यरूप से योग्यता-वर्धक श्रेष्ठ-ग्रन्थो का संपादन और प्रकाशन ही इस 'माला' का विस्तृत क्षेत्र निश्चित किया गया है। २. प्रस्तुत ग्रन्थ अनादि काल से चली आ रही भारतीय सभ्यता और संस्कृति का मूल, प्राण और आधार सभी कुछ संस्कृत-साहित्य है। प्रत्येक भारतीय छात्र जितना अधिक इससे अपना प्रेम और परिचय बढ़ाएगा, उतना अधिक वह सच्ची भारतीयता के आत्मा का दर्शन कर सकेगा। इसी बात को लक्ष्य मे रखते हुए, संस्कृत-भाषा सीखना प्रारम्भ करने 2 वाले छात्रो के हाथ में देने के लिए इस अति सरस और सुबोध पाठ्य- ग्रन्थ की रचना की गई है। इसके सुयोग्य रचयिता, प्राध्यापक श्री गौरीशङ्कर जी संस्कृत भाषा और साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान् है। साथ ही प्राप शिक्षा-विधि के भी ऊंचे दर्जे के विशेषज्ञ हैं। मुझे प्रसन्नता है कि उन्होने प्रस्तुत ग्रन्थ को प्रारम्भिक छात्रों के लिए अधिक से अधिक लाभदायक बनाने का पूरा और सफल प्रयत्न किया है। यह ग्रन्थ तीन गागो मे रचा गया है । इसका प्रथम भाग छठी श्रेणी के, द्वितीय भाग सातवीं श्रेणी के और तृतीय भाग आठवी श्रेणी के छात्रों के लिए बनाया गया है। प्रत्येक भाग के बनाने और उसकी पृष्ठ-सख्या आदि को सीमित करने में पंजाब सरकार द्वारा निश्चित किए गए पाठ्यक्रम और समय-समय पर दिए गए अध्यादेशों का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है और उनका पूरा-पूरा अनुसरण किया गया है। छात्रो के ही और अधिक लाभ को लक्ष्य में रखते हुए, 'माला' के सुयोग्य सपादव, श्री देवदत्त जी शास्त्री, तथा उनके सहयोगी श्री ब्रह्मदत्त जी वेदतीर्थ, श्री अमरनाथ शास्त्री, व्याकरणाचार्य ने इस ग्रन्थ का जिस उत्तम ढंग से संपादन किया है और हमारे मुद्रण-विभाग के श्री रेवतराम शर्मा आदि कर्मिष्ठो ने जिस सुन्दर और शुद्ध रूप से इसे छापा है, उसके द्वारा सभी अध्यापक और छात्र वर्ग पूर्णतया सन्तुष्ट और उपकृत होगे- ऐसा मेरा विश्वास है । विश्वेश्वरानन्द संस्थान, होश्यारपुर आषाढ १, संवत् २०१२ विशयन अथ संस्कृत शिक्षा प्रथमः भागः वर्णमाला स्वर (अच्) उ लु ह्रस्व स्वर। दीर्घ स्वर । सन्धि स्वर। अनुस्वार। आ ई ऋ ए ऐ ओ ओ औ (अं) : (अः) व्यञ्जन (हल) घ विसर्ग। कवर्ग। क ख च भ चवग। ट ठ ड टवर्ग । तवर्ग। पवर्ग। त थ द घ प फ ब भ म य र व अन्तस्थ। प स ह ऊष्म।

२ संस्कृत शिक्षा ऊपर के प्रत्येक व्यजन में उच्चारण की सुविधा के लिए 'अ' स्वर मिला कर लिखा गया है। व्यञ्जनों का शुद्ध रूप अर्थात् स्वर रहित इस ( ) चिह्न से दिखाया जाता है, जैसे-क ख ग आदि । स्वरों का स्वतन्त्र रूप अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ए ऐ ओ ओ स्वरों का पराधीन रूप (मात्राएँ) XI Î स्वरों का व्यञ्जनों से मेल कि की कु कू क+अ+श्रा क्+इ क्+ई क्+उ क्+ऊ क्+ऋ कृ क्ल को कौ क्+ऋक्+ल क्+ए क्+ऐ + ओ क+औ इसी प्रकार स्वरों का अन्य व्यञ्जनों से मेल जानें। ल ह - ८ क का कृ के कै यथा- - जल, मान, दिन, दीन, गुरु रूप, कृष्ण क्लृप्त, कैलाश, कोविद, कौरव इत्यादि । व्यञ्जनों का व्यञ्जनों से मेल नीचे लिखे शब्दों से जाने- वाक्य, व्याख्या, अङ्क, इच्छा, रक्त, विद्या अन्त,

प्रथमः भागः
३
मन्त्र, व्रत, अर्थ, हृदय, वस्त्र, क्षत्रिय,ज्ञान, स्थान,
स्नान, सर्वस्व, पश्चात् , उष्ट्र, चिह्न इत्यादि ।
'अ' 'ई' 'उ' आदि वर्णों को क्रम से 'अकार' 'इकार'
'उकार' आदि नाम से पुकारा जाता है-अर्थात् 'अ'
को 'अकार', 'ई' को 'इकार', 'उ' को 'उकार' आदि ।
इस प्रकार जिस शब्द के अन्त में 'अ' है, उसे अकारान्त
कहते हैं, जैसे-राम । नीचे दी हुई सूची से यह बात
और भी स्पष्ट हो जायगीः-
अकारान्त शब्द-राम, देव, नर, भवन, फल आदि ।
आकारान्त शब्द-लता,माला, कन्या, सीता आदि ।
इकारान्त शब्द--मुनि, मति, पति, कवि आदि ।
इसी प्रकार, नदी-'ईकारान्त', साधु-'उकारान्त',
वधू---'ऊकारान्त', पितृ-'ऋकारान्त' शब्द
--

४ संस्कृत-शिक्षा प्रथमः पाठः पट्-पढ़ना लट् लकार (वर्तमान काल) प्रथम पुरुष वह पढ़ता है वे दो पढ़ते हैं द्विवचन वे सब पढ़ते हैं बहुवचन मध्यम पुरुप पठति एकवचन पठतः पठन्ति पठसि एकवचन पठथः तू पढ़ता है तुम दो पढ़ते हो तुम सब पढ़ते हो द्विवचन पठथ बहुवचन उत्तम पुरुष पठामि मैं पढ़ता हूँ। एकवचन पठावः हम दो पढ़ते हैं द्विवचन पठामः हम सब पढ़ते हैं बहुवचन लट् लकार (परस्मैपद) के प्रत्यय पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष ति तः अन्ति मध्यम पुरुष सि थः थ उत्तम पुरुष मि वः

प्रथमः भागः
-
३.
स्मरणीय
१-क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं। धातु
और प्रत्यय के बीच एक आगम (चिह्न) आता है जिसे
'विकरण' कहते हैं । संस्कृत के धातु दस गणों में बांटे
गए हैं। प्रत्येक गण का विकरण अलग-अलग होता है।
२-भ्वादिगण का विकरण 'अ' है। यथा-
पठ-अ-ति-पठति । स्मरण रहे कि 'अन्ति' के 'अ' का
लोप हो जाता है । यथा-पठ्+अ+(अ)न्ति-पठन्ति ।
-उत्तम पुरुष के प्रत्ययों से पूर्व 'अ' दीर्घ हो
जाता है । यथा-पठामि, पठावः, पठामः ।
भ्वादिगण के (परस्मैपदी) धातु
भू (भव ) होना।
खाद्-खाना।
हस्-हंसना।
पत्-गिरना ।
वद्-बोलना।
पच-पकाना।
नियम-भ्वादिगण में धातु के इ, उ, ऋ में
परिवर्तन हो जाता है । यथा नी-नय , बुध-बोध, हृ-
हर् इत्यादि।
हिन्दी में अर्थ करो
भवसि
हसतः वदामि
खादाव:
हसन्ति
पचथ

ur संस्कृत-शिक्षा पचति वदन्ति वदथः भवामः हसामः पतथ पतन्ति वदामः पचथ: हससि पतामः खादथः संस्कृत में अनुवाद करो: मैं बोलता हूँ। तुम सब हँसते हो। वे सब गिरते हैं। वे दो पकाते हैं। हम दो खाते हैं। तू बोलता है। हम हँसते हैं। तू हँसता है। वह गिरता है। तुम दो बोलते हो। हम सब हँसते हैं। वह होता है। मैं गिरता हूँ तुम खाते हो। द्वितीयः पाठः भ्वादिगण के (परस्मैपदी) धातु वस-रहना। गम्- (गच्छ्)-जाना। नम-झुकना नमस्कार करना। जि-(जय) जीतना। हिन्दी में अर्थ करो: वससि गच्छतः वसामि गच्छामः जयामः वसावः गच्छामि गच्छावः नमन्ति ।

प्रथमः भागः नमतः जयति वसथ नमथ भवथः वसाम: गच्छथः जयसि हससि संस्कृत में अनुवाद करो:- में जाता हूँ। वे दो जाते हैं। तू नमस्कार करता है। तुम सब रहते हो। हम सब जीतते हैं। हम दो जाते हैं। वे सब रहते हैं। मैं जीतता हूँ। तुम दो नमस्कार करते हो। तुम सब जीतते हो। तू मुकता हम सब रहते हैं। वे दो जीतते हैं। वह मुक्तता है है तृतीयः पाठः भ्वादिगण के (परस्मैपदी) धातु दृश् (पश्य्)-देखना। स्था (तिष्ठ् )-ठहरना। स्मृ (स्मर)-स्मरण करना । नी (नय् )-ले जाना। हिन्दी में अर्थ करो स्मरन्ति पश्यामि नयथः तिष्ठतः स्मरथः पश्यामः - पश्याव: नयावः स्मरतः नयन्ति नयामः पश्यथ 5 संस्कृत-शिक्षा - तिष्ठसि पश्यति तिष्ठथ स्मरथ तिष्ठन्ति नयसि संस्कृत में अनुवाद करो:- तुम स्मरण करते हो। तुम दो स्मरण करते हो। तू ले जाता है। वे दो ठहरते हैं। तुम दो देखते हो। वे सब ले जाते हैं। हम दो ठहरते हैं। मैं ले जाता हूँ। वे सब देखते हैं। हम स्मरण करते हैं। तुम दो ले जाते हो। तुम ठहरते हो। वह याद करता है। हम दो देखते हैं। चतुर्थः पाठः भ्वादिगण के (परस्मैपदी) धातु धाव-दौड़ना, धोना। रक्ष-रक्षा करना। चल-चलना। बुधू--(वोध् )-जानना। कर्तृपद (पुरुषवाचक सर्वनाम जो कतो के स्थान में प्रयुक्त होते हैं) प्रथम पुरुष द्विवचन बहुवचन सः गच्छति ते गच्छन्ति वह जाता है वे दो जाते हैं। वे सब जाते हैं। एकवचन तौ गच्छतः प्रथमः भागः ६ बहुवचन तू जाता है। एकवचन मैं मध्यम पुरुष एकवचन द्विवचन त्वं गच्छसि । युवां गच्छथः। यूयं गच्छथ । तुम दो जाते हो। तुम सब जाते हो। उत्तम पुरुष द्विवचन बहुवचन अहं गच्छामि। आवां गच्छावः । वयं गच्छामः । जाता हूँ। हम दो जाते हैं। हम सब जाते हैं। स्मरणीय-१ प्रथमपुरुष में पुँलिन में सः-तौ-ते, स्त्रीलिंग में सा-ते-ता और नपुंसक लिंग में तत्-ते-तानि कर्तृपद के रूप होते हैं। मध्यम और उत्तमपुरुष के कर्तृपद के रूप तीनों लिंगों में समान होते हैं । २-क्रियापद का रूप तीनों लिंगों में समान होता है। जैसे-सः पतति, सा पतति, तत् पतति । हिन्दी में अर्थ लिखोः- अहं पठामि । तौ स्मरतः । युवां खादथः। ते नयन्ति । यूयं वसथ। अहं वसामि। त्वं धावसि । वयं हसामः। तौ जयतः । आवां पश्यावः। ते बोधन्ति । ते भवन्ति । त्वं गच्छसि । वयं गच्छामः। ते तिष्ठन्ति । यूयं पश्यथ । सः पतति । ताः पचन्ति संस्कृत-शिक्षा संस्कृत में अनुवाद करो:- वे सब पढ़ते हैं। वह स्मरण करता है। हम सब देखते हैं, तुम सब रहते हो। तू जाती है। वे दो बोलते हैं। तुम दो खाते हो। वह दौड़ता है। हम दो जीतते हैं। मैं गिरता तुम चलते हो। हम दौड़ते हैं। वह रक्षा करती है तुम जानते हो। पञ्चमः पाठः तुदादि गण के (परस्मैपदी) धातु तुद्-पीडा देना चुभोना । इष् (इच्छ)-इच्छा करना। लिख--लिखना। प्रच्छ (पृच्छ्)--पूछना। मिल-मिलना। मुच (मुञ्च )--छोड़ना। सिच (सिञ्च् )--सींचना । सृज-रचना । लट् लकार एकवचन द्विवचन बहुवचन तुदति तुदतः तुदन्ति तुदसि तुदथः तुदथ तुदामि तुदावः तुदामः नियम-तुदादिगण का विकरण भी 'अ' है, परन्तु इस में धातु के इ, उ, ऋ में कोई परिवर्तन नहीं होता। प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष प्रथमः भागः आवां मुश्चावः। यथा लिख--लिखति, तुद्--तुदति इत्यादि । हिन्दी में अर्थ करो :- सः तुदति। ताः पृच्छन्ति । सृजतः । वयम् इच्छामः। युवां लिखथः। त्वं पृच्छसि । यूयं सृजथ। अहं सिञ्चामि। ते तुदन्ति । सा पृच्छति। सा लिखति । यूयं मुञ्चथ । त्वं लिखसि । यूयं पृच्छथ । त्वं मिलसि । वयं लिखामः। ताः सिञ्चन्ति । संस्कृत में अनुवाद करो :-- वे सब इच्छा करते हैं। वे दो लिखती हैं। तू पूछती है। तुम सब पूछते हो। हम सब लिखते हैं। चाहता हूँ। वह सींचती है। वह चुभोता है। तुम मिलते हो। तू छोड़ता है। हम दो लिखते हैं। तुम चाहते हो। वे पूछते हैं। वे दो छोड़ते हैं। षष्ठः पाठः दिवादिगण के ) धातु दिव् ( दीव)--चमकना शुष् सूखना। ( परस्मैपदी जुआ खेलना संस्कृत-शिक्षा नश--नष्ट होना। नृत् --नाचना । क्रुध्--क्रोध करना। कुप्-कोप करना। तुष्-प्रसन्न होना। सिध-सिद्ध होना। लट लकार प्रथम पुरुष दीव्यति दीव्यतः दीव्यन्ति मध्यम पुरुष दीव्यसि दीव्यथः दीव्यथ उत्तम पुरुष दीव्यामि दीव्यावः दीव्यामः। नियम दिवादिगण का विकरण 'य' है और प्रायः इस गण के धातुओं के इ, उ, ऋ में परिवर्तन नहीं होता। हिन्दी में अर्थ करो ते नश्यन्ति । तौ नृत्यतः । ते तुष्यन्ति । ते क्रुध्यन्ति । सा नृत्यति । अहं तुष्यामि । तानि सिध्यन्ति । वं दीव्यसि । ताः कुप्यन्ति । सा कुप्यति। यूयं तुष्यथ । युवां कुप्यथः । तत् सिध्यति । त्वं नृत्यसि । सा दीव्यति। संस्कृत में अनुवाद करो :- वे सब नाचते हैं। मैं प्रसन्न होता हूँ। त क्रोध करता है। वह नाचती है। तुम चमकते हो। तुम दो कोप करते हो। युवां क्रुध्यथः । वयं तुष्यामः। आवां तुष्यावः ।

प्रथमः भागः हम सब प्रसन्न होते हैं। वह क्रोध करता है। तू जुआ खेलता है। वे सब प्रसन्न होती हैं। वह जुआ खेलता है। तुम दो नाचते हो। वे सूखते हैं। मैं कोप करता हूँ। सप्तमः पाठः चुरादिगण के (परस्मैपदी) धातु चुर ( चोर् )-चुराना। पूज--पूजा करना। तुल (तोल् )--तोलना। कथ-कहना। तड् ( ताड्)-पीटना। पीड--पीडा देना। क्षल-(क्षाल)-धोना । चिन्त--सोचना । लट् लकार प्रथम पुरुष चोरयति चोरयतः चोरयन्ति मध्यम पुरुष चोरयसि चोरयथः चोरयथ उत्तम पुरुष चोरयामि चोरयावः चोरयामः नियम--चुरादि गण का विकरण 'अय' है हिन्दी में अर्थ करो- अहं कथयामि । सा पीडयति। सा चोरयति । ते कथयन्ति । त्वं ताडयसि । ताः कथयन्ति । यूयं तोलयथ । यूयं क्षालयथ। आवां तोलयावः।

संस्कृत-शिक्षा an सा पूजयति । अहं चिन्तयामि । युवां ताडयथः । युवां चिन्तयथः। वयं ताडयामः। त्वं कथयसि । वयं क्षालयामः। ते पीडयन्ति । वयं पूजयामः । संस्कृत में अनुवाद करो- हम सब कहते हैं। वे सब पूजा करती हैं। तू क्रोध करती है। तुम दो तोलते हो। वे दो चुराते हैं। हम दो सोचते हैं तुम सब कहती हो। तू पीड़ा देता है। तुम दो धोते हो। हम सब सोचते हैं। तुम दो पीटते हो। तू सोचता है। हम पीड़ा मैं तोलता हूँ। देते thor :- अष्टमः पाठ हिन्दी में अर्थ करो और धातुओं का गण बताओ यूयं लिखथ । आवां क्षालयावः । तानि पीडयन्ति । खं जयसि । यूयं दीव्यथ । यूयं हसथ । सा चोरयति। ताः पठन्ति । अहं गच्छामि। तौ नश्यतः। ते लिखतः । सा पश्यति । तत् पतति । वयं नयामः । वयं स्मरामः। यूयं इच्छथ । अहं तोलयामि । ते पूजयन्ति।

प्रथमः भागः १५ - है संस्कृत में अनुवाद करो हम सब कहते हैं। वे सब चुराते हैं। तू क्रोध करती है। वह जाती है। वे दो इच्छा करते हैं। तुम दो देखते हो। तुम सब बोलते हो। हम दो पीटते हैं। तू नमस्कार करता है। मैं जीतता हूँ। मैं देखता हूँ। वे पकाती हैं तुम दो मिलते हो। हम धोते हैं। निम्नलिखित क्रिया-पदों के धातु, प्रत्यय, पुरुष और वचन लिखो। पश्यन्ति, इच्छामः, दीव्यथ, तोलयसि, गच्छतः, मुञ्चामि, सिध्यति, क्षालयावः । निम्नलिखित धातुओं के रूप लट् लकार में लिखो- नी, लिख , नृत्, तुल्, स्था, प्रच्छ, तुष, तड् । - , गच्छति आगच्छति अनुगच्छति नवमः पाठः उपसर्ग वह जाता है वह आ जाता है, आता है। वह पीछे जाता है।

१६
संस्कृत-शिक्षा
वह समझता
है
उपगच्छति बह समीप जाता है
अवगच्छति
निर्गच्छति वह बाहर जाता है।
पतति
वह गिरता है।
उत्पतति वह उड़ता है।
इसी प्रकार नयति-ले जाता है, आनयति-लाता
है, स्मरति-स्मरण करता है; विस्मरति--भूलता है;
विशति--दाखिल होता है; उपविशति--बैठता है;
दिशति--संकेत करता है; उपदिशति--शिक्षा देता है;
आदि रूप बनते हैं।
स्मरणीय--उपसर्ग (प्र, परा आदि शब्दांश ) धातु के
पूर्व जोड़े जाते हैं, और उनसे धातु के अर्थ में परिवर्तन
हो जाता है
हिन्दी में अर्थ करो:
ते आगच्छन्ति । तत् उत्पतति । त्वम् उपगच्छसि ।
वयं निर्गच्छामः। अहम् उपगच्छामि। ताः विस्मरन्ति ।
त्वं विस्मरसि । युवाम् आगच्छथः। तौ आनयतः
यूयं विस्मरथ । वयम् आनयामः । वयम् आगच्छामः।
तौ अवगच्छतः । त्वम् उत्पतसि । यूयं निर्गच्छथ ।
सा आनयति । ते अनुगच्छन्ति । सा विस्मरति ।
tin

प्रथम भाग १७ करो.- संस्कृत में अनुवाद करो वे सब समझते हैं। तू बाहर जाता है। वह लाती है। वह उड़ता है । तू समीप जाता है। तुम दो भूलते हो। हम दो पीछे जाते हैं। वे सब उड़ते हैं। तुम दो लाते हो। मैं भूलता Thick तुम सब लाते हो। हम दाखिल होते हैं। वह शिक्षा देता है। मैं संकेत करता हूँ। दशमः पाठः (१) अकारान्त 'नर' पुंल्लिंग प्रथमा विभक्ति ( कर्ता) नरः-एक आदमी, नरौ-दो आदमी, नराः-सब आदमी। अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्द देव--ईश्वर, देवता, अश्व-घोड़ा सिंह-शेर छात्र- -विद्यार्थी गज-हाथी मेघ-बादल कर्ता-कर्ता में प्रथमा विभक्ति- देवः रक्षति । छात्राः पठन्ति। मृग-हिरण काक-कव्वा - १८ संस्कृत-शिक्षा बालौ पश्यतः। बाली हसतः। नराः पूजयन्ति । मृगाः खादन्ति । सूर्यः तपति। सिंहौ धावतः। काकाः उत्पतन्ति। गजः भक्षयति। मेघः गर्जति । अश्वाः धावन्ति । संस्कृत में अनुवाद करो बालक खाते हैं। राम बोलता है। दो कव्वे देखते हैं। देव पढ़ता है । रोग पीड़ा देता है। बालक खाते हैं। दो हिरण भागते हैं । विद्यार्थी पढ़ते हैं। हाथी भागते हैं। बालक प्रसन्न होते हैं। कव्वे चुराते हैं। बादल बरसते हैं। (२) द्वितीया विगक्ति (कर्म) नरम् - --एक आदमी को, नरौ-दो आदामयों को, नरान् -सब आदमियों को। कर्म-कर्म में द्वितीया विभक्ति देवः लोकान् रक्षति । छात्राः पुस्तकानि पठन्ति । बालो चन्द्रं पश्यत। नराः देवं पूजयन्ति । मृगाः बालान् पश्यन्ति । देवाः अमृतं अमृतं पिबन्ति । बालो सूर्य पश्यतः। छात्रः पाठं सिंहाः मृगान् खादन्ति। नराः अश्वान् नयन्ति । -- पठति।

प्रथमः भागः
छात्राः पाठं विस्मरन्ति ।
देवः नरौ उपदिशति ।
संस्कृत में अनुवाद करो
बालक पाठ पढ़ते हैं । बालक चांद को देखते हैं
दो आदमी विद्यार्थी को पूछते हैं। देवता लोगों को
उपदेश देते हैं। दो कव्वे हाथी को देखते हैं। शेर हिरण
को देखता है । मैं आदमी को पूछता हूँ। तू पाठ पढ़ता
है । हम ग्राम को जाते हैं। राम घोड़े को छोड़ता है।
तुम विद्यार्थियों को उपदेश देते हो । हम पाठ पूछते हैं ।
(३)
अकारान्त 'फल' नपुंसक लिङ्ग
विभक्तिः
-फलम्
फले फलानि
द्वितीया
अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द
नेत्र--आँख
दुग्ध-दूध
वित्त-धन
गृह-घर
फलानि पतन्ति ।
नेत्रे पश्यतः ।
छात्राः पुस्तकानि पठन्ति। मृगाः पत्राणि खादन्ति।
बालौ क्षीरं पिबतः । जनाः वित्तम् इच्छन्ति।
'प्रथमा
क्षीर--दूध
पत्र--पत्ता
सत्य-सचाई
तृण-तिनका

२०
संस्कृत-शिक्षा
रामः वनं विशति । छात्राः गृहं गच्छन्ति ।
नराः पुष्पाणि* आनयन्ति । गजः जलं पिबति ।
वयं दुग्धं पिबामः देवाः अमृतं पिबन्ति ।
संस्कृत में अनुवाद करो
बालक फल खाते हैं। राम सत्य बोलता है। दो
कव्वे फलों को देखते हैं । मैं सच बोलता हूँ। तुम दूध
पीते हो । पत्त गिरते हैं । आंख देखती है। तू मित्र को
पूछता है । बालक घर जाते हैं । बालक दूध चाहते हैं।
वे फल खाते हैं। हाथी पत्ते खाता है।
।
एकादशः पाठः
(१)
तृतीया विभक्ति--(करण)
नरेण-एक आदमी से, नराभ्याम्-दो आदमियों से
नरैः-सब आदमियों से।
सूचना:-तृतीय विभाक्त म भी अकारान्त नपुंसक
लिङ्ग शब्दों के रूप भी नर की तरह होते हैं।
* एक ही पद में आने वाले ऋ, र और से परे स्वर,
कवर्ग, पवर्ग, ह, य, व, र, आङ् और नुम् का व्यवधान होने
पर भी न को ण हो जाता है यथा-रामेण, किन्तु पदान्त न
कोण नहीं होता यथा-रामान् ।

प्रथमः भाग.
अकारान्त शब्द
पुंलिस
नपुंसक लिङ्ग
नृपः-राजा
कार्यम् --काम
सर्पः -साँप
क्षेत्रम् -खेत
वस्त्रम् -कपड़ा
पठनम्-पढ़ना
मालाकारः -माली
उपवनम् -बाग
अकारान्त विशेषण शब्द
दण्डः-डंडा
तापसः-तपस्वी
कृपण---कंजूस
शीतल-ठंडा
वृद्ध-बूढ़ा
मधुर
-मीठा
तृषित-प्यासा
निर्धन-धन-हीन
करण-करण में तृतीया विभक्ति :-
जनाः नेत्राभ्यां पश्यन्ति । नृपः बलेन राज्यं रक्षति ।
नरः सुखेन कालं नयति । देवः दण्डेन सर्प ताडयति।
कृपणः वित्तेन तुष्यति । जलेन वस्त्रं क्षालयति ।
कृषक: जलेन क्षेत्रं सिंचति। अश्वौ वेगेन
वेगेन धावतः ।
दुःखेन जीवनं नश्यति । परिश्रमेण कार्याणि सिध्यन्ति ।
वृद्धाः दण्डेन चलन्ति । नरः हस्ताभ्यां वस्त्राणि क्षालयति ।

२२
संस्कृत-शिक्षा
से
से
संस्कृत में अनुवाद करो'-
छात्र ध्यान से पढ़ते हैं। धन से कार्य सिद्ध होते
हैं। हम आंखों से देखते हैं। लोग सुख से रहते हैं।
वह हाथों से वस्त्र धोती है । मूर्ख क्रोध से नष्ट होते हैं।
राजा बल से जीतता है। हम आंखों से देखते हैं। धर्म
सुख
होता है । पाप
दुःख
होता है । जल से शरीर
शुद्ध होता है। राम रथ से वन को जाता है।
(२)
चतुर्थी विभक्ति-(संप्रदान)
नराय-एक आदमी के लिये, नराभ्याम्-दो आदमियों
के लिये, नरेभ्यः-सव आदमियों के लिये ।
सूचना-चतुर्थी विभक्ति में भी 'फल' के रूप 'नर'
की तरह होते हैं।
संप्रदान-संप्रदान में चतुर्थी विभक्ति :--
छात्रः पठनाय गच्छति । तापसः मृगेभ्यः पत्राणि
आनयति । ज्ञानं सुखाय भवति । वृद्धेभ्यः क्षीरं
आनयामि । धनं दानाय भवति । क्रोधः नाशाय भवति ।
रामः तृषिताय जलं यच्छति । मालाकारः फलेभ्यः
उपवनम् गच्छति । नृपः युद्धाय सैनिकान् आदिशति ।
वयं शिष्येभ्यः शास्त्रम् उपदिशामः । कल्याणाय ईश्वरं
स्मरन्ति लोकाः । धनिकाः निर्धनेभ्यः धनं यच्छन्ति ।
.

प्रथमः भागः
२३
संस्कृत में अनुवाद करो
लोग भ्रमण के लिये जाते हैं। वह मृगों के लिए
घास लाती है । बालक ज्ञान के लिये पढ़ते हैं। मोहन
पढ़ने के लिये जाता है । तू बालकों के लिये पकाती है।
मैं विश्राम के लिये बाग को जाता हूँ। धर्म सुख के
लिये होता है । पाप नाश के लिये होता है। मैं पुष्पों
के लिये बाग को जाता हूँ। वह बालकों के लिये पुस्तकें
लाता है । हम स्नान के लिये आते हैं। तुम खेलने के
लिये जाते हो।
द्वादशः पाठः
(१)
पञ्चमी विभक्ति-अपादान
नरात् -एक आदमी से, नराभ्याम् -दो आदमियों से,
नरेभ्यः-सब आदमियों से।
सूचना-पञ्चमी में भी 'फल' के रूप 'नर' की
तरह होते हैं।
ऍडिङ्ग
हस्त:--हाथ
अकारान्त शब्द
नपुंसकलिङ्ग
बिलम-छेद

२४ संस्कृत-शिक्षा भिक्षुक--भिखारी शिखरम् --चोटी पाषाण:--पत्थर (जलाने की लकड़ी) कूपः--कूँ पानीयम्- -पानी इन्धनम् ----ईन्धन विशेषण शब्द शुभ--अच्छा -खारा, नमकीन न-नहीं सदा--हमेशा अधि- हरित-हरा क्षार-खारा, शून्य-सूना *अव्यय शब्द बहिर्--बाहर सर्वत्र-सब स्थानों में उपसर्ग सहित धातु निस्--सृ (सर) निकलना, प्र--भू ( भव ) पैदा होना, -गम् (गच्छ) प्राप्त करना, उद्-स्था (तिष्ठ् ) उठना, अपादान-अपादान में पञ्चमी विभक्ति:- वृक्षेभ्यः पत्राणि पतन्ति । सर्पः विलात् निर्गच्छति। रामः ग्रामात् आगच्छति । हस्तात् फलं पतति । बाल: अश्वात् पतति । रामः नगरात् वनं गच्छति । तिलेभ्यः तैलं निस्सरति | गृहात् गृहं भ्राम्यति भिक्षुकः । अहं कूपात् पानीयम् आनयामि । शिखरात् पाषाणा: * अव्यय शब्दों के रूप सारी विभक्तियों, वचनों तथा लिङ्गों में एक से ही रहते हैं, अर्थात् ये सदा अविकारी होते हैं।

प्रथमः भाग
।
पतन्ति । सूर्यात् सुखम् अधिगच्छति लोकः । न संतोषात्
परं सुखम् ।
संस्कृत में अनुवाद करो
वह घर से आती है। बादल से जल गिरता है।
मैं कूप से जल लाता हूँ। देह से स्वेद निकलता है।
दास बन से घास लाता है। दुर्जनों से सदा भय होता
है । आकाश से पानी गिरता है। देव क्रोध से दास को
पीटता है। हम विद्यालय से आते हैं। तुम घर से बाहिर
जाते हो। माली बाग से फूल लाते हैं। वे बन से ईंधन
लाते है । सांप बिल से बाहिर निकलता है।
(२)
पष्ठी विभक्ति
नरस्य-एक आदमी का, नरयोः-दो आदमियों का,
नराणाम् -सब आदमियों का।
सूचना-षष्ठी में भी 'फल' के रूप 'नर' की तरह
होते हैं।
सम्बन्ध-सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति:--
कृपणानां धनं नश्यति । समुद्रस्य जलं क्षारं भवति ।
बालानां रोदनं बलम् ।
लोभः पापस्य कारणम् ।
चन्द्रस्य प्रकाशः शीतलः भवति । कूपस्य जलं मधुरं,
निर्मलं शीतलं च भवति। कमलानां पुष्पाणि चित्तं हरन्ति ।

संस्कृत शिक्षा : सूर्यस्य प्रकाशः सर्वत्र प्रसरति । रामस्य सेवका आसनेभ्यः उत्तिष्ठन्ति । शुभस्य कार्यस्य शुभं फलं भवति । मूर्खस्य हृदयं शून्यम् । संस्कृत में अनुवाद करो हम राम का राज्य चाहते हैं। देव जल का पात्र लाता हैं । मित्र का दर्शन सुखद होता है। दुर्जन का हृदय मलिन होता है। सत्य का फल मीठा होता है। पहाड़ की चोटी से पत्थर गिरते हैं। समुद्र का जल नमकीन होता है। दो वीरों का युद्ध होता है। दुष्ट लोगों के चित्त को पीडित करते हैं। वृक्षों के पत्ते हरे होते हैं। हाथी तालाब का पानी पीते हैं। अपुत्र का घर सूना । PawanRHe- त्रयोदशः पाठः (१) सप्तमी विभक्ति (अधिकरण) नरे-एक आदमी में, नरयोः-दो आदमियों में, नरेषु-सब आदमियों में। सूचना--सप्तमी में भी 'फल' के रूप 'नर' की तरह होते हैं।

प्रथमः भागः
२७
खगः-पक्षी
--
अकारान्त शब्द
पुल्लिङ्ग
नपुंसक लिङ्ग
अजीर्णम्--अपची
खड्गः -तलवार विषम्--जहर
अकारान्त विशेषण
कुटिल-टेढ़ा
अव्यय शब्द
किम्-क्या
चण्ड--तेज
यत्र--जहाँ
तत्र--वहां
कथम्-कैसे
निर्भयम-विना डर के (क्रिया विशेषण)
अधिकरण-अधिकरण में सप्तमी विभक्ति :
वनेषु सिंहाः धावन्ति । सत्ये भयं न भवति । नृपः
सिंहासने उपविशति । खगाः वृक्षेषु वसन्ति । अजीर्णे
भोजनं विषम् । कुटिलेषु विश्वासः न भवति । हिमालयस्य
शिखरेषु हिमं पतति । योधस्य हस्ते खङ्गः भवति । ग्रीष्मे
सूर्यस्य प्रकाशः चण्डः भवति । वनेषु सिंहाः निर्भयं
वसन्ति । सूर्यस्य उदये अन्धकारः नश्यति । चन्दनं न
वने वने ।
संस्कृत में अनुवाद करो:
वे नगर में रहते हैं। पक्षी वृक्षों पर रहते हैं। छात्र
विद्यालयों में पढ़ते हैं। प्रकाश में भय नहीं होता है ।
:

संस्कृत-शिक्षा
में
-
समुद्र खारा जल होता है। आकाश में तारे चमकते
हैं। वृक्षों पर पक्षी बैठते हैं । गुणों में आदर होता है।
दिन में सूर्य चमकता है, अन्धकार नष्ट होता है। आकाश
में पक्षी उड़ते हैं। वसन्त में बहुत पुष्प होते हैं।
(२)
संबोधन
नर ! हे आदमी !, नरौ ! हे दो आदमियो !, नराः !
हे सब आदमियो । फल ! हे फल ! फले! हे दो
फलो !, फलानि ! हे सब फलो !
संबोधन-संबोधन में प्रथमा विभक्ति
छात्राः ! किं यूयं पाठं न पठथ ? सिंह ! त्वं मृगं
न मुश्चसि ? ईश्वर ! त्वं संसारं सृजमि पालयसि च ।
बालाः ! यूयं सत्यं न वदथ ? दुष्टाः ! यूयं सज्जनान्
पीडयथ । त्वम् एव सर्व मम देव देव । वालः पृच्छति-
खगाः ! यूयम् आकाशे कथम् उत्पतथ ? मूर्ख ! किं त्वम्
असत्यं वदसि ?
संस्कृत में अनुवाद करो
बालको ! मैं पाठ पढ़ता हूँ। मूर्ख ! तू नहीं जानता
ज्ञान से सुख होता है। मित्र ! तू क्या पूछता है ?
लोगो ! मैं सत्य बोलता हूँ। दुष्ट ! क्या तू देखता
नहीं है ?

प्रथमः भाग.
प्रथमा
सब देवों से
अकारान्त देव (ईश्वर, देवता, राजा,) पुल्लिङ्ग
विभक्ति एकवचन द्विवचन
बहुवचन
देवः देवौ देवाः
( कत्ता) देव ने दो देवों ने सब देवों ने
द्वितीया देवम् देवौ देवान्
(कर्म) देव को दो देवों को सब देवों को
तृतीया देवेन देवाभ्याम् देवैः
(करण) देव से दो देवों से
चतुर्थी देवाय देवाभ्याम् देवेभ्यः
( सम्प्रदान ) देव के लिये-को, दो देवों के लिये-को, सब देवों
के लिये-को
पञ्चमी देवात्
देवाभ्याम् देवेम्यः
( अपादान) देव से दो देवों से
षष्ठी देवस्य देवयोः देवानाम्
(संबंध ) देव का-के-की, दो देवों का-के-की, सबदेवों का-के-की
सप्तमी देवे देवयोः देवेषु
(अधिकरण ) देव में-पर दो देवों में-पर सब देवों में-पर
सम्बोधन देव देवौ देवाः
हे दो देवो,
हे सब देवो
सब देवों से
हे देव,

३०
संस्कृत-शिक्षा
अभ्यास
,
१. निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग संस्कृत-वाक्यों में करोः-
अश्वाः, नरम् , दण्डेन, फलेभ्यः, बालानाम् ,
पर्वतेषु, नराः।
२. निम्नलिखित पदों के विभक्ति और वचन बताओ:-
(क) नृपस्य, समुद्रे, बालानाम् , नगरेषु, दण्डेन ।
(ख) फलानि, नरेभ्यः, गृहात् , दर्शनाय, खगयोः।
(ग) सर्पः, छात्राभ्याम् , मूर्खान् , मित्रः, हे सिंह।
३. निम्नलिखित के लिये संस्कृत शब्द लिखोः-
ईश्वर का, वनों में, समुद्र से, हिरणों को, सुख के
लिये, दर्शन से, हे बालको, सब लोग, दो घोड़ों का ।
४. 'नर' और 'ज्ञान' के रूप सभी विभक्तियों में लिखो।
५. दसवें पाठ में प्रयुक्त अकारान्त शब्दों को चुन कर
उनके लिग का निर्णय करो।
-
,
चतुर्दशः पाठः
आकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'लता' (बेल)
विभक्ति एकवचन द्विवचन
बहुवचन
लता
लते लताः
द्वितीया लताम
प्रथमा

प्रथमः भागः ३१ तृतीया लतया लताभ्याम् लताभिः चतुर्थी लतायै लताभ्यः पञ्चमी लतायाः षष्ठी लतयोः लतानाम् सप्तमी लतायाम् लतासु संबोधन लते लते लताः आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द तृषा-प्यास अजा-~-बकरी व्यथा-पीड़ा शिला--सिल क्रीडा-खेल शिखा-चोटी ललना--स्त्री निशा--रात - अन्य शब्द मानवः मनुष्य जनकः--पिता भेकः---मेंढक मालाकारः--माली शिखरम् --पर्वत की चोटी । भूषणम् -- गहना चित्तम् -दिल सह (अव्यय)-साथ भ्वादिगण के (परस्मैपदी) धातु दह-जलाना सीद्-दुख पाना उद्-भू ( उद्भव् ) उत्पन्न होना, नि-सद् (निषीद् ) बैठना

३२
संस्कृत-शिक्षा
तृपया मुखं शुष्यति । वर्षासु भेकाः उद्भवन्ति ।
छायायां मृगाः निषीदन्ति । छात्राः क्रीडायै गच्छन्ति ।
जनकस्य आज्ञया सीतया सह रामः वनं गच्छति ।
देवस्य चित्तं व्यथया सीदति । लज्जया नमति ललना।
शिलासु कमलानि न उद्भवन्ति ।
अभ्यासः
१ संस्कृत में अनुवाद करो.-
बकरी जल पीती है । मैं खेलता हूँ। तुम पाठशाला
में पढ़ते हो । विद्या से शोभा होती है। वह सिल पर
बैठता है। पक्षी वृक्ष की चोटी पर बैठते हैं । वह माला
के फूल देखती है । सीता राम के साथ जाती है।
२ निम्न लिखित रूपों के विभक्ति और वचन लिखो।
अजाम् , शालायाम् , क्रीडया, शिलासु, शिखायाः।
३ इन के स्थान में संस्कृत शब्द लिखो।
बालिकाओं के लिए, आशा से, शिखर पर,
बकरी को।
"
४ 'अजा' सब विभक्तियों में लिखो।
*
सह के योग में तीसरी विभक्ति आती है।

प्रथमः भागः ३३ विभक्ति प्रथमा ते द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी पञ्चदशः पाठः सर्वनाम तद्, 'वह', पुंल्लिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन सः तौ तम् तान् तेन ताभ्याम् तैः तस्मै तेभ्यः तस्मात् तस्य तयोः तेषाम तस्मिन् तेषु तद्, नपुंसकलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन तत् तानि विभक्ति ते प्रथमा द्वितीया शेष तद् पुँल्लिन की तरह तद् स्त्रीलिङ्ग सा ते ताः प्रथमा द्वितीया ताम् संस्कृत-शिक्षा " तयोः " एकवचन तृतीया तया ताभ्याम् ताभिः चतुर्थी तस्यै ताभ्यः पञ्चमी तस्याः षष्ठी तासाम् सप्तमी तस्याम् तासु किम् (कौन) (प्रथमा विभक्ति) द्विवचन बहुवचन पुंल्लिङ्ग कः कौ नपुंसक लिङ्ग किम् कानि स्त्रीलिङ्ग का काः शेष 'तद्' की तरह सर्व (सब) (प्रथमाविभक्ति) पुंल्लिङ्ग सर्वः सौं सर्वे नपुंसक लिंग सर्वम सर्वे सर्वाणि स्त्रीलिङ्ग सर्वा सर्वे सर्वाः के के मयूरः-मोर शेष 'तद्' की तरह शब्द निपुण-(विशेषण) चतुर कलहः--झगड़ा यत्र—(अव्यय) जहाँ कुत्र-(अव्यय) कहां अत्र--(अव्यय) यहां

प्रथमः भाग
३५
धातु
दा* (यच्छ्) (भ्वा०)--देना। नृत् (दिवा०)-
नाचना । अनु-धावां (भ्वा०)-पीछे भागना । आ-कर्ण
(चुरा०) सुनना।
सिंहः कुत्र ताम् अनुधावति । अत्र तयोः कलहः
हानिकरः । ते यत् कथयन्ति लोकाः तत् न आकर्णयन्ति ।
तत् पर्वतस्य शिखरं यत्र नृत्यन्ति मयूराः । सीता रामेण
सह वने भ्राम्यति । तेषु यः निपुणः तस्मै सः पुस्तकं
यच्छति । निर्धनता कं न पीड़यति ? सत्पुरुषः मित्रं पापात्
निवारयति ।
अभ्यासः
१. सस्कृत मे अनुवाद करो:-
मोहन किसी को देखता है ? तू उसे क्या देता है ?
जो ईश्वर को स्मरण करता है उसके पाप नष्ट होते हैं
यह किस की पुस्तक है ? उस वन में शेर रहता है।
वह यहां कैसे खड़ा होता है ? देव यहां सब के साथ
पढ़ता है।
देना अर्थ वाली धातुओं के योग में चतुर्थी विभक्ति आती है।
अनुधाव के योग में द्वितीया विभक्ति आती है।

३६ संस्कृत-शिक्षा २. निम्नलिखित के शब्द, विभक्ति और वचन लिखो:- यस्य, केन, एतस्मिन् , तस्मै, कम , एतस्मात् । ३. निम्नलिखित के स्थान में संस्कृत के शब्द लिखो:- जिन का, इन पर, किन को, उस के लिये । ४. "एतद्" शब्द के रूप तीनों लिङ्गों में लिखो। षोडशः पाठः लोट् लकार (आज्ञा के अर्थ में) पुरुष प्रथम पुरुष वह पढ़े। मध्यम पुरुष तू पढ़। उत्तम पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन पठतु पठताम् पठन्तु वे दोनों पढ़े। वे सब पढ़े। पठ पठतम् पठत तुम दो पढ़ो। तुम सब पढ़ो पठानि पठाव पठाम हम दो पढ़े। हम सब पढ़े। लोट लकार के प्रत्यय तु ताम् x तम् त आनि आव ग्राम मै पहूँ। अन्तु प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष

प्रथम भाग
३७
आचार्यः-गुरु
पर्जन्यः मेघ; बादल
अनृतम-झूठ
शब्द
भद्रम्-भलाई
मा (अव्यय)-मत
हि (अव्यय)-निश्चय से
परस्मैपदी धातु
चर् (भ्वा.)—चलना त्यज (भ्वा.)-छोड़ना
अ-सद्-सीद्- प्रसन्न होना वर्ष-(भ्वा.)—बरसना
गै-गाय (भ्वा.)-गाना चिन्त् (चुरा)—सोचना
धम चर। अनृतं त्यज। वेदं पठ । गायकाः गीतानि
गायन्तु । मगाः संगीतम् आकर्णयन्तु । किं वयं नगरात्
निर्गच्छाम १ मा चित्त ! चिन्तय चिरम् । गोविन्द ! प्रसीद
उपविश च । काले वर्षतु पर्जन्यः। अहम् एकलः वने कथं
निवसामि ?
अभ्यासः
करो:-
१ सस्कृत
में
अनुवाद
पुत्र ! दुष्टों का संग छोड़। हिरण वन में दौड़ें।
लड़को ! पाठ पढ़ो । रे नोच ! बाल को मत पीट। क्या
हम लेख लिखें ? उसे मत छोड़ो। झूठ मत बोलो। वे
सब फल लाएँ।
२ तुद् , दिव् और चुर् के रूप लोट् लकार में लिखो।

३८ संस्कृत शिक्षा प्रथमा सप्तदशः पाठः इकारान्त पुंल्लिङ्ग 'कवि' कविः कवी कवयः द्वितीया कविम कवीन् तृतीया कविना कविभ्याम् कविभिः चतुर्थी कवये कविभ्यः पञ्चमी कवेः षष्ठी कव्योः कवीनाम् सप्तमी कवौ कविषुः संबोधन कवेः कवी कवयः इकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्द रविः सूर्य । कपिः-बंदर। अरिः-वैरी हरिः-विष्णु। अग्निः व्याधिः-रोग। वह्निः-आग। अलिः-भौरा। : " " -आग। अन्य शब्द अन्धकारः-अन्धेरा। शिशिरम् – सरदी, पतझड़ । निरामय (विशेषण)-नीरोग । वृथा—(अव्यय) व्यर्थ । कुतः -कहां से। यत्र " -जहां।

प्रथमः भागः ३६ ३ परस्मैपदी धातु स्थः प्रथम पुरुष हृ (हर्) (भ्वा०)-हरना । अस् (अदादि) होना। अस (लट् लकार) प्रथम पुरुष अस्ति स्तः सन्ति मध्यम पुरुष असि स्थ उत्तम पुरुष अस्मि स्वः स्मः अस् (लोट लकार) अस्तु स्ताम् सन्तु मध्यम पुरुष एधि स्त उत्तम पुरुष असानि असाव असाम रवेः प्रकाशः अन्धकारं हरति । कपयः वृक्षात् वृक्षं गच्छन्तु । अरीणां हृदयेषु दया कुतः ? न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः । व्याधिभिः शरीरं निर्बलं भवति । अमृतं शिशिरे वह्निः । शिशिरे रविः सुखकरः भवति । सर्वे सन्तु निरामयाः । अभ्यासः संस्कृत में अनुवाद करो:- मैं मुनियों के साथ जाता हूँ। आग वन को जला देती है । कवियों के वचन मीठे होते हैं । तू ऋषियों के लिए फल ला। देख, बन्दर नाच रहे हैं। हरि की :

संकृत-शिक्षा
-
कृपा से पाप नष्ट होते हैं । रोग लोगों को पीड़ित करते
हैं । भौरे फूलों पर उड़ते हैं।
निम्नलिखित पदोंके विभक्ति और वचन लिखो :
मुनीनाम् , अग्नौ, ऋषिभिः, हरिम्, अरिषु ।
३. इन के स्थान में संस्कृत शब्द लिखो।
सूर्य का, बन्दरों को, वर्षा से, आग को, आग में ।
४. 'हरि' के रूप सभी विभक्तियों में लिखो।
.
प्रथम पुरुष
अष्टादशः पाठः
विधिलिङ् विधि (प्रेरणा) के अर्थ में
पठ धातु
पठेत् पठेताम
पठेयुः
वह पढ़े वे दो पढ़ें वे सब पढ़ें
पठेः पठेतम् पठेत
तुम दो पढ़ो तुम सब पढ़ो
पठेयम् पठेव पठेम
हम दो पढ़ें हम सब पढ़ें
*विधिलिङ् सम्भावना, सामर्थ्य, निमन्त्रण प्रेरणा आदि
कई अर्थों में आता है।
मध्यम पुरुष
तू पढ़े
उत्तम पुरुष
3 पद

प्रथम भागः
४१
प्रकारः----ढंग
विधिलिङ् के प्रत्यय
प्रथम पुरुष
इत् इताम् इयुः
मध्यम पुरुष
इ: इतम इत
उत्तम पुरुष
इयम इव
इम
शब्द
विपरीत । (विशेषण)-उलटा
प्रसिद्ध (विशेषण)-विख्यात अपि (अव्यय)-भी
तृषित (")-प्यासा अति (')-अधिकता
पूत (")-पवित्र
क (")-कहां
सुखम् (क्रियाविशेषण) सुख से
वर्ज (चुरा०)-छोड़ना वि+चल् (भ्वा०)-हटना
तृषिताय जलं यच्छेत् । यदि यूयम् इच्छथ, गच्छेत ।
आर्याः वेदान् पठेयुः । येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः
पुरुषः भवेत् । हरेः कृपया वयं सुखेन वसेम । नरः
धर्मात् न विचलेत् । अति सर्वत्र वर्जयेत् । पण्डितानां
समाजे अपण्डिताः मौनं भजेयुः ।
अभ्यासः
१. संस्कृत में
अनुवाद
करो
यदि राम चाहता है, जाए। हिरण वनों में रहें।
तुम सत्य बोलो।

४२
संस्कृत-शिक्षा
तुम आंगन में खेलो। सब स्थानों में सुख हो। उसके
पाप नष्ट हों । प्राचार्य शिष्यों को उपदेश दे। मैं चाहता
हूँ, तुम दूध पियो।
२. 'तुदु', 'दिव' और 'चुर' के रूप विधिलिङ् में
लिखो।
एकोनविंशः पाठः
उकारान्त पुंल्लिङ्ग–'साधु'
प्रथमा साधुः साधू साधवः
द्वितीया
साधुम्
साधून्
तृतीया साधुना साधुभ्याम् साधुभिः
चतुर्थी साधवे
साधुभ्यः
पञ्चमी साधोः
षष्ठी
साध्वोः
साधूनाम्
सप्तमी साधौ
साधुषु
संबोधन साधो
साधू साधवः
उकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्द
भानुः
-सूर्य
तरुः--वृक्ष
इन्दुः-चांद
शत्रु:-वैरी

प्रथमः भागः
मध्यम पुरुष
उत्तम पुरुष
वायु:--पवन
बन्धुः-
-सम्बन्धी
शिशुः-बच्चा
बिन्दुः-द
अन्य शब्द
खल:--दुष्ट
साधुता-~~भलाई
यथा-(ययअठ)--जैसे
तथा (अव्यय)-वैसे
अस् 'होना' विधिलिङ्
प्रथम पुरुष
स्यात्
स्याताम् स्युः
स्याः स्यातम् स्यात
स्याम् स्याव स्याम
सिंहाः पशून् नखैः दारयन्ति । धर्मेण हीनाः पशुभिः
समानाः । इन्दोः प्रकाशः शीतलः भवति । शिशो !
पश्य, गर्दभः भारं वहति । धेनूनां दुग्धं मधुरं भवति । ये
भक्ताः स्युः तान् पृच्छ । मेघात् जलस्य बिन्दवः पतन्ति ।
सिंहातां भयं भवति । दुर्जनात् कस्य भयं न जायते ।
अभ्यासः
१. संस्कृत में अनुवाद करो
भलों के साथ जा । वैरी से डर होता है। पवन की
चाल मन्द है । बच्चे को दुग्ध दो । बच्चों के साथ खेलो।
*'हीन' और 'रहित' के योग में तृतीया विभक्ति आती है।
जिप्स से भय हो उसमें पञ्चमी विभक्ति आती है।

संस्कृत-शिक्षा
वृक्ष की छाया में बैठ । शत्रुओं पर विश्वास न कर ।
वायु के वेग से बादल चलते हैं।
बन्धवे--इन के
२. शत्रौ, भानो, वायुना, विधुम् ,
विभक्ति और वचन लिखो।
३. बच्चों को, बून्दों से, वृक्ष पर, सूर्य के लिये--
इनके स्थान पर संस्कृत शब्द लिखो।
विंशः पाठः
पठ् धातु लङ् लकार (सामान्य भूतकाल के अर्थ में)
प्रथम पुरुष अपठत् अाठताम् अपठन्
उसने पढ़ा उन दो ने पढ़ा उन सब ने पढ़ा
मध्यम पुरुष अपठः अपठतम् अपठत
तू ने पढ़ा तुम दो ने पढ़ा तुम सब ने पढ़ा
उत्तम पुरुष अपठम् अपठाव अपठाम
मैं ने पढ़ा हम दो ने पढ़ा हम सब ने पढ़ा
स्मरणीयः
लङ् लकार में धातु से पूर्व 'अ' जोड़ा
जाता है।

प्रथमः भागः
४५
लङ् लकार के प्रत्यय
प्रथम पुरुष त् ताम् अन्
मध्यम पुरुष
तम्
त
उत्तम पुरुष अम्
व
म
शब्द
ग्रीष्मः-गर्मी
शूकरः-सूअर
क्षेत्रम् - खेत
मूषकः-चूहा हरित--(विशेषण)-हरा
तडागः-तालाब ह्यः (अव्यय)-कल (बीता हुआ)
कृषकः-किसान
परस्मैपदी धातु
निन्द् (भ्वा.) निन्दा करना । व्यध् (विध्) (दिवा.)-
बींधना।
सीता रामेण सह वनम् अगच्छत् । मार्जाराणां
भयेन मूषकाः अनश्यन् । ग्रीष्मे तडागस्य जलम् अपि
अशुष्यत् । व्याधः बाणैः शूकरम् अविध्यत् । कृषकाः
क्षेत्रम् असिञ्चन् । सर्पः बिलात् निरगच्छत् । साधून
अनिन्दन दुर्जनाः । ह्यः वायोः वेगेन वृक्षाः अपतन् ।
अभ्यासः
१. संस्कृत में अनुवाद करो :-
मैंने पत्र लिखा। तुम नगर को गए । तूने पाठ
:-
-

संस्कृत-शिक्षा
पढ़ा । उन्होंने पुस्तकें पढ़ीं। बच्चे ने सांप देखा । मोहन
फल लाया। हम घर गए । किसान ने खेत को सींचा।
हम ने पुस्तकें पड़ी।
२. 'तुद्', 'दिव्' और 'चुर्' के लङ् में रूप लिखो ।
प्रथमा
"
"
एकविंशः पाठः
इकारान्त नपुंसक लिंग--वारि (पानी)
वारि
वारिणी वारोणि
द्वितीया
तृतीया वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः
चतुर्थी
वारिणे
वारिभ्यः
पञ्चमी
वारिणः
षष्ठी
वारिणोः वारिणाम्
सप्तमी वारिणि
वारिषु
संबोधन वारि, वारे वारिणी वारीणि
उकारान्त नपुंसक लिंग 'मधु' (शहद)
मधु मधुनी मधूनि
द्वितीया
शेष रूपावली परिशिष्ट भाग में देखें।
प्रथमा

प्रथम भाग वस्तु-पदार्थ । उकारान्त नपुंसक लिङ्ग शब्द सानु- -पर्वत की चोटी। अस्-(होना) के रूप लङ् में प्रथम पुरुष आसीत् आस्ताम् आसन् मध्यम पुरुष आसीः आस्तम् प्रास्त उत्तम पुरुष आसम् आस्व आस्म अन्य शब्द हेमन्तः-सरदी की ऋतु प्राविल-(विशेषण)-मैला निर्मल (विशेषण)-स्वच्छ विशाल--(विशेषण) बड़ा यावत् (अव्यय)-जब तक भेषजम-दवा च (अव्यय)-और कुरु--कर गोदावरी-तीरे विशाल: शाल्मलीतरुः आसीत् । मेघाः वारिणा पूर्णाः आसन् । हेमन्ते हिमालयस्य सानुषु हिमम् अपतत् । तडागस्य आविले वारिणि स्नानं मा कुरु । निर्मलेन वारिणा शरीरं शुध्यति । परस्य वस्तुनि कः विश्वासः। पश्य हरिणीनाम् अक्षीणि, तानि केषां चित्तं न हरन्ति । अजीर्णे भेषजं वारि । अभ्यासः संस्कृत में अनुवाद करो:- कव्वा चोटी पर बैठता है । नदी का पानी मत पी।

४८
संस्कृत-शिक्षा
हमने दही खाया । आँखों की रक्षा करो। बच्चों को शहद
दो । सब वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं। उसकी आँखों में
आंसू हैं । भ्रमर शहद पीते हैं।
।
द्वाविंशः पाठः
लट् लकार (भविष्यत् काल के अर्थ में)
प्रथम पुरुष पठिष्यति
पठिष्यतः पठिष्यन्ति
वह पढ़ेगा। वे दो पढ़ेंगे। वे सब पढ़ेंगे।
मध्यम पुरुष पठिष्यसि
पठिष्यथः पठिष्यथ
तू पढ़ेगा । तुम दो पढ़ोगे। तुम सब पढ़ोगे ।
उत्तम पुरुष पठिष्यामि
पठिष्यावः पठिष्यामः
मैं पढुंगा । हम दो पढ़ेंगे । हम सब पढ़ोगे।
स्यरणीय-१-लुट् लकार में धातु और प्रत्यय के मध्य
में 'स्य' जोड़ा जाता है।
२-'स्य' के सकार को षकार होने से 'स्य' का 'ष्य'
बन आता है।
लृट् लकार में धातुओं के रूप
पत्-पतिष्यति
दा-दास्यति
वद् -वदिष्यति
पा---पास्यति
गम्-गमिष्यति
ज्ञा-ज्ञास्यति
भू-भविष्यति
स्था-स्थास्यति

प्रथमः भागः ४६ .. शब्द व्याधः-शिकारी | श्वः-(अव्यय) कल आनेवाला अवकाशः-छुट्टी। अधुना-(अव्यय) अब याचकः-(विशेषण) मांगने वाला । यदा-(अव्यय) जब अनृतम्-झूठ तदा-(अव्यय) तब श्वः रामः वनं गमिष्यति । पश्य बाल ! व्याधः समागच्छति, अधुना खगाः उत्पतिष्यन्ति । बालाः ! तत्र न तिष्ठथ, हरिणाः पानीयं न पास्यन्ति । भरतः चिन्तयति-अहो ! कथं वने रामं ज्ञास्यामि ? ते दुष्टैः सह न स्थास्यन्ति । वयं तैः सह पाठं न पठिष्यामः । वायोः वगेन वृक्षेभ्यः फलानि पतिष्यन्ति। रामः याचकेभ्यः किं दास्यति ? अहं कदापि अनृतं न वदिष्यामि । अभ्यास १. संस्कृत में अनुवाद करो :- हम सदा सच बोलेंगे। हरिण पानी पीएँगे। राम कब आवेगा ? मैं कल पाठ नहीं पढूंगा। जब यहां गोपाल बैठेगा तब मैं वहां जाऊंगा। देव घोड़े से नहीं गिरेगा । क्या तू झूठ बोलेगा ? २. तोलयिष्यति, धाविष्यसि, मिलिष्यामः, चिन्त- यिष्यथ-इन के धातु, गुण और पुरुष बताओ। ३. हस् और भक्ष के रूप लूट लकार में लिखो।

संस्कृत-शिक्षा
त्रयोविंशः पाठः
संख्यावाचक
१ एक ६ षष्
११ एकादशन् १६ षोडषन्
२ द्वि ७ सप्तन १२ द्वादशन् १७ सप्तदशन्
३ त्रि ८ अष्टन्
१३ त्रयोदशन् १८ अष्टादशन्
४ चतुर् ९ नवन् १४ चतुर्दशन् १९ नवदशन्
एकोनविंशतिः
५ पश्चन् १० दशन् १५ पञ्चदशन् २० विंशतिः
स्मरणीयः-इन संख्या वाचक विशेषण की रूपावली
परिशिष्ट में देखें।
कन्दुक-क्रीडा
महेशः- रमेश ! कुत्र गच्छसि ? आगच्छ, तत्र
गच्छावः । तत्र कन्दुकस्य क्रीडा वर्तते।
रमेशः-कथय, कुत्र का क्रीडा अस्ति ?
महेश:-अस्माकं विद्यालये कन्दुकक्रीडा अस्ति ।
रमेश:- एते सर्वे कुत्र गच्छन्ति ?
:-पञ्च पुरुषाः चतुर्भिः बालकैः सह अत्र
एव आगच्छन्ति ।
एते अपि क्रीडां
द्रक्ष्यन्ति ।
महेश:

प्रथमः भागः
५१
रमेश:--तव श्रेण्यां कति छात्राः सन्ति ? तेषु च
अत्र कति क्रीडन्ति ?
महेशः--मम श्रेण्यां पञ्चत्रिंशत् छात्राः सन्ति । तेषु
च अत्र सप्त क्रीडन्ति ।
रमेश :--अत्र सर्वे कति छात्राः क्रीडन्ति !
महेशः-अत्र एकादश, तत्र एकादश, सर्वे द्वाविंशतिः
सन्ति ।
.
रमेशः-एतानि चत्वारि फलानि सन्ति । एकं फलं अहं
भक्षयामि, त्वं द्वे भक्षय, एकं च तस्मै यच्छ ।
महेशः-फलानि पश्चाद् भक्षयिष्यामः, प्रथमं तत्र
गच्छामः।
रमेश:----पश्य, महेश ! तस्मिन् उपवने तिस्रः अजाः
तृणानि चरन्ति, चतस्रः च पत्राणि भक्षयन्ति ।
तासु चतसृषु एका चकिता क्रीडां पश्यति ।
महेश:-कुत्र पश्यसि, रमेश ! पश्य, देवः कथं पादेन
कन्दुकंक्षिपति! द्वौ धावतः, त्रयः इसन्ति जन्ये
च विस्मिताः तिष्ठन्ति । देव अवध जैध्यति ।
( क्रीडा अन्तं याति सर्वे गल्छन्ति )
*कति शब्द नित्य बहुवचन
मे प्रयुक्त होता हायमारले
द्वितीया विभक्ति में “कति" रूप बनता है। शेष विभक्तियों में.
'कवि' की भाँति रूप होंगे।
HIGHER
STUDIES
278
ARNATH,
VARAN

संस्कृत-शिक्षा
कन्दुकम्-गेंद
शब्दाः
कति (सख्यावाचक)-कितने
कुत्र (अव्यय)-कहां
क्षिप (तुदादि)-फेंकना
उपवनम्-
-उद्यान
विस्मित (विशेषण)
अभ्यासः
संस्कृत में अनुवाद करो
प्राचीन काल में एक राजा था। उस के पुत्रों में
राम सब से बड़ा था। वह चौदह वर्ष वन में रहा
उस की स्त्री वन में साथ रही।
बलराज की तीन पुस्तकें हैं, सतीश की चार हैं,
पर धर्मवीर की एक भी नहीं है। स्कूल में पांच दिन
की छुट्टी है।
के रूप तीनों लिंगों में
लिखो।
चतुर्विशः : पाठः
एक, द्वि, त्रि
और चतुर्थ
युष्मद्-सर्वनाम
प्रथमा
द्वितीया
त्वम् युवाम्
त्वाम्-त्वा युवाम्-वाम्
यूयम्
युष्मान्-वः

प्रथमः भागः पञ्चमी त्वत् तव-ते प्रथमा आवाम् -नौ मह्यम्-मे तृतीया त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः चतुर्थी तुभ्यम्-ते युवाभ्याम्-वाम् युष्मभ्यम् -वः युवाभ्याम् युष्मत् षष्ठी युवयोः-वाम् युष्माकम् -व सप्तमी त्वयि युवयोः युष्मासु अस्मद्-सर्वनाम् अहम् आवाम् वयम् द्वितीया माम् -मा अस्मान् नः तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी आवाभ्याम्-नौ अस्मभ्यम्-नः पञ्चमी मत् आवाभ्याम् अस्मत् षष्ठी आवयोः-नौ अस्माकम् -नः सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु स्मरणीय-'विना' के योग में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी विभक्ति आती है। रामः--देवी ! मया सह गमनस्य विचारं त्यज । अहं त्वां वनं न नेष्यामि । तव स्वभावः कोमल: अस्ति । वने जीवनं दुःखमयं भवति । न तत्र गमने सुखं, न च निवासे । मार्गाः दुर्गमाः, जलं दुर्लभम् । *'नी धातु द्विकर्मक है। द्विकर्मक का अर्थ तथा प्रयोग अध्यापक विद्यार्थियों को समझा दें। मम-मे

संस्कृत-शिक्षा
मयि विश्वासं कुरु । मम मातृभिः समं गृहे सुखेन
निवस । आग्रहं त्यज ।
सीता-कथय नाथ ! कथं त्वां विना अहं गृहे
स्थास्यामि ? त्वया विना भवनं वनम् , देशः शून्यः ।
यथा छाया वृक्षं, चन्द्रिका च चन्द्रं न त्यजति तथा
अहं त्वां न त्यक्ष्यामि । यत्र त्वं स्थास्यसि, तत्र स्था-
स्यामि । तव दुःखे दुःखं, सुखे च सुखम् अनुभविष्यामि।
मयि कृपां कुरु, मां च वनं नय ।
शब्दाः
निनादः-आवाज दुर्गम (विशेषण)-जहां दुःख
से गमन हो सके।
गमनम्-
आग्रहः-हठ
स्वी- कृ—मानना
गुहा-गुफा
अनु-/भू-अनुभव करना
दुःखमयम्-दुःख वाला साकम् (अव्यय)-साथ
भयदम्-भय देने वाला
अभ्यासः
यह हमारा विद्यालय है। तुम्हारा निवासस्थान
कहाँ है ? हमारे गाँव में उद्यान है। क्या तुम्हारे नगर
में भी उद्यान है ? क्या तुम मेरे साथ वहाँ जाओगे ?
क्या तुम मुझ पर विश्वास करोगे ? तुम पर किस का
विश्वास है ? मैं तुम्हारे बिना नहीं जाऊँगा !
-जाना
शयनम्-लोना

प्रथमः भागः
५५
पञ्चविंशः पाठः
(क) देवः नगरं गतः (देवः नगरम् अगच्छत् । )
पालेन मृगः दृष्टः ( बालः मृगम् अपश्यत् ।)
(ख) पवनस्य वेगेन पतितं वृक्षं पश्य ।
( वायु के वेग से गिरे हुए वृक्ष को देख)
रजकेन ताड़ितः गदर्भः भारं वहति ।
(धोबी से पीटा जाता हुआ गधा भार उठाता है
१-'क्त' (त) प्रत्यय धातु के अन्त में लगता है।
२-इस का प्रयोग दो प्रकार से होता है।
(क) क्रिया पद के स्थान में ( लङ् लकार के अर्थ
(ख) विशेषण के रूप में।
स्मरणीय-अकर्मक धातु से कर्तृवाच्य और भाववाच्य
में तथा सकर्मक धातु से कर्म वाच्य में यह प्रत्यय
जोड़ा जाता है।
-पठित
भ्रम्-(भ्राम् ) भ्रान्त
भक्ष-भक्षित
स्था-स्थित
नी-नीत
इष्-इष्ट
दृष-दृष्ट
एकः शृगालः सिंहं कथयति--'मृगराज ! किं
त्वया सः गर्दभः दृष्टः ? अत्र सः आगतः, परं तव भयेन
पठः
गम्-गत
पत्-पतित

५६ संस्कृत-शिक्षा स गतः । अहं गच्छामि तं च पुनः आनयामि, त्वं तस्य मारणाय अत्र तिष्ठ । (शृगालः गर्दभस्य समीपे गच्छति कथयति च) मातुल ! अपि कुशलं ते ? अद्य चिरात् दृष्टः असि ? त्वं सुचिरं कुत्र स्थितः ? अपि ते कुशलं ? कथं दुर्बलः असि ? सः दुष्टः रजकः तुभ्यम् आहराय तृणानि न यच्छति ? सिंहः अस्माकं नृपः अस्ति । तस्य अमात्यस्य पदं रिक्तम् अस्ति । त्वम् अमात्यः भव तत्र च आगच्छ। यत् त्वम् इच्छसि नृपः तुभ्यं सर्वम् इष्टं दास्यति । शृगालस्य वचनैः भ्रान्तः गर्दभः वदति, रजकेन ताडितः अहं प्रतिदिनं तस्य भारं वहामि । स च दुष्टः मह्यं घासमुष्टिम् अपि न यच्छति । अहम् अमात्यः भवामि । अधुना तत्र शीघ्रं मां नय । अहं तत्र सर्वम् इष्टं सुखेन भक्षयिष्यामि । एवं शृगालेन गर्दभः तत्र नीतः, सिंहेन मारित, ताभ्यां च खादितः कविना सत्यं कथितम्- बुद्धिहीनाः विनश्यन्ति । शब्दाः -(अव्यय) आज कुत्र-(अव्यय)कहाँ मातुल:-मामा प्रतिदिनम् (अव्यय)हरदिन अद्य- रजकः--धाबी अमात्यः-मन्त्री

प्रथमः भागः
(१) संस्कृत में अनुवाद करो
मोहन ने पुस्तक दी । लिखा हुआ पत्र ला। मैंने
क्या पूछा । गिरे हुए फल को मत खा। बालक ने
कव्वा देखा । वह घर गया। उन्होंने पाठ पढ़ा। उसने
हरिण छोड़ दिये । हमने फल खाए। वृक्ष से पत्ते गिरे ।
उसने पुस्तक पढ़ी।
(२) इस पाठ में प्रयुक्त क्तान्त शब्दों को चुनो और
धातु बताओ।
(३) किन्हीं पाँच धातुओं से परे 'क्त' प्रत्यय लगा
कर अपने वाक्यों में प्रयोग करो।
उन
के
षड्विंशः पाठः
-त्वा*--प्रत्यय (करके) -तुम*-प्रत्यय (के लिये)
(क)
पठ्-पठित्वा-पठितुम् जि-जित्वा--जेतुम्
गम-गत्वा--गन्तुम्
नी-नीत्वा--नेतुम्
स्था-स्थित्वा—स्थातुम्
दृश् दृष्ट्वा--द्रष्टुम्
पा-पीत्वा -पातुम्
तुल्-तोलयित्वा-तोलयितुम् दा-दत्त्वा-दातुम
त्वा और तुम क्रमशः क्त्वा और तुमन् प्रत्यय के शेष हैं।
स्मृ-स्मृत्वा-स्मर्तुम्

५८
संस्कृत-शिक्षा
शब्दाः
मार्जारी-बिल्ली प्रभातं-प्रातः
उपदिश-शिक्षा देना
(क) एकदा कस्यचित् गृहस्य सर्वे मूषकाः मिलित्वा
अचिन्तयन्-अहो ! सा माजीरी प्रतिदिनम् अस्मान्
नाशयति। अस्मासु कः अस्ति, यः तां मार्जारी
मारायितुं प्रभवेत् ?
तेषु एकः वदति अहं तां मारयिष्यामि, द्वितीयः
च कथयति--अहं तां नाशयिष्यामि । एवं सर्वे वदान्त
नृत्यन्ति च । (तदा तत्र एका मार्जारी आगच्छति)
तस्याः शब्दात् भीताः सर्वे मूषकाः धाविताः । कथितं हि-
'निर्बलस्य सदा भयम् ।'
(ख) आचार्यः छात्रान् उपदिशति, छात्राः ! प्रभाते
ईश्वरं
स्मृत्वा
विद्यालयं गच्छत । तत्र गुरुं नत्वा पाठं
पठत । यूयम् अत्र पठितुं क्रीडितुं च समागताः । अतः
पठनस्य समये पठत, क्रीडनस्य समये च क्रीडत ।
अभ्यासः
१. संस्कृत में अनुवाद करो :-
बालक पाठ पढ़ कर गए। रावण सीता को हरने
के लिये गया। हरिण जल पीने के लिये दौड़े। हम

प्रथम भाग ५६ खेलने के लिये जावेंगे । सुनार सोने को तोलने के लिये बैठा । राम ने रावण को जीता। धर्म को छोड़ कर सुख नहीं होता है। राम रावण को जीत कर आया। बालक सांप को देख कर दौड़ गया। वह जल पी कर चला गया। हम कौतुक देखने के लिये वहाँ गए। (२) इस पाठ में प्रयुक्त 'त्या' और 'तुम्' प्रत्यय-अन्त वाले शब्दों को चुन कर उनके धातु बताओ। (३) किन्हीं पांच धातुओं से परे-'त्वा' और 'तुम्'प्रत्यय जोड़ कर उनका प्रयोग वाक्यों में करो। सप्तविंशः पाठः विद्या अस्ति दक्षिणदेशे महिलापुरं नगरम् । तत्र सक- लासु कलासु कुशलः सुदर्शनः नाम महीपालः आसीत् । तस्य त्रयः पुत्राः विद्यया रहिताः मन्दबुद्धयः च आसन् । एकदा तान् दृष्ट्वा तेन चिन्तितम्-अहो । मम एते निर्गुणाः पुत्राः राज्यस्य नाशं करिष्यन्ति । एतेषाम् आदरः न भविष्यति । यतः संसारे गुणानाम् एव आदरः भवति । गुणाः पूजास्थानं भवन्ति । उक्तं हि---

संस्कृत-शिक्षा
'काकः कृष्णः पिकः कृष्णः, को भेदः पिककाकयोः ।
वसन्तसमये प्राप्ते, काकः काकः पिकः पिकः ॥'
तत् यत्नं करोमि येन एते शिक्षिताः स्युः । अपि
च विद्यारहितः पुरुषः पशुः भवति । कथितं च--
'विद्याविहीनः पशुः।
शब्दाः
महीपालः-राजा सकल(वि०)-सम्पूर्ण
कला--हुनर
-चतुर
कुशल "
अष्टाविंशः पाठः
श्रीरामः
श्रीरामः बाल्ये सर्वाः विद्याः अपठत् । पितुः
आज्ञाम् अपालयत् । तेन भरतस्य कृते राज्यं त्यक्तम् ।
चतुर्दश वर्षाणि वनेषु भ्रान्तम् । दुर्जनानां नाशः कृतः ।
सज्जनानां रक्षा कृता। रावणः मारितः विभीषणः
रक्षितः। भ्रातृभिः सह मिलित्वा गज्यं कृतम् । प्रजाः
स्नेहेन पालिताः ।
श्रीरामस्य चरित्रं संसारे परमं पवित्रम् अस्ति ।
सत्यम् उक्तम् ।

प्रथमः भागः
"यावत् स्थास्यन्ति गिरयः, सागराश्च महीतले ।
तावत् रामायण-कथा, लोकेषु प्रचरिष्यति ।।"
शब्दाः
स्नेहः-प्रेम
बाल्यम्-बचपन
चरित्रम्-चरित
परम-(विशेषण)-अंत्यधिक
कृते-(अव्यय) के लिये
अधि-गम-प्राप्त करना
एकोनविंशः पाठः
सूक्तयः
(क)
१. ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ।
२. अनभ्यासे विषं विद्या ।
३. चिन्ता ज्वरो मनुष्याणाम् ।
४. चौराणाम् अनृतं बलम् ।
५. छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ।

संस्कृत-शिक्षा
कटा हुआ
शब्दाः
अनभ्यासः -अभ्यास न करना छिन्न-(विशेषण)
ज्वरः--ताप (बुखार)
मृलम्-जड़
(ख)
१. शठे शाठ्यं समाचरेत ।
२. मद्यपाः किं न जल्पन्ति ।
३. न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ।
४. अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः।
५.सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ।
शब्दाः
मद्यप-(विशे०) मद्य पीनेवाला । अर्थः--धन
शठः--बुरा, दुष्ट
काञ्चनम्--सोना, धन
शाठ्यम्--बुराई, दुष्टता जिल्प--(भ्वादि)
बकवाद करना
श्लोकाः
(१) उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
(२) यस्यार्थास्तस्य मित्राणि, यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाःस पुमान्लोके, यस्यार्थाः स च पण्डितः।।

प्रथमः भागः
(३) दुर्जनस्य च सर्पस्य, वरं सों न दुर्जनः ।
सो दशति कालेन, दुर्जनस्तु पदे पदे ॥
(४) हस्तस्य भूषणम् दानं, सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं, भूषणे किं प्रयोजनम् ।।
(५) एकेनापि सुवृक्षण, पुष्पितेन सुगन्धिना ।
वासितं तद्वनं सर्व, सुपुत्रण कुलं यथा ।
शब्दाः
पुष्पित-फूले हुए
श्रोत्रम-कान
पुमान्-पुरुष
कराठः-गला
वासितम् -सुगधिन्त किया
मनोरथः-मन की इच्छा - दंश्–डसना, काटना
पदम्-पैर

लिङ्-
परिशिष्ट
संस्कृत वाक्य बनाने के लिए क्रिया और कर्ता पर ध्यान
देना आवश्यक है।
क्रिया
१. लट्-वर्तमानकाल, लोट् आज्ञा, लङ्-भूत,
विधि ओर लूट लकार भविष्यत् में आते हैं।
२. प्रत्येक लकार में प्रथम, मध्यम और
मध्यम और उत्तम ये तीन पुरुष
होते हैं।
३. प्रत्येक पुरुष में एकवचन, द्विवचन और बहुवचन होते हैं ।
कर्ता
१. दूसरों के लिये प्रथम पुरुष-(एक०-सः, द्विः-तौ,
-
२. सामने वाले के लिए मध्यम पुरुष-(एक०-त्वम्, द्वि-
युवाम् , बहु०-यूयम् )
३. अपने लिए उत्तम पुरुष-(एक०-अहम्, द्वि०-आवाम्
बहु० -वयम्)
४. प्रथम, मध्यम, उत्तम कर्ता के साथ क्रम से प्रथम, मध्यम्
और उत्तम पुरुष की क्रिया का प्रयोग होता है ।
५. एक दो या बहुत कर्ता के साथ क्रम से एक वचन, द्विवचन
और बहुवचन की क्रिया का प्रयोग होता है । जैसे--
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथम पुरुष-स पठति
ते पठन्ति
मध्यम पुरुष-त्वं पठसि युवां पठथः यूयं पठथ
उत्तम पुरुष-अहं पठामि आवां पठावः वयं पठामः
तौ पठतः

अनुवाद
करते हुए इन बातों का ध्यान रखें-
१. वाक्य में जिस काल की क्रिया हो उसी काल के
अनुसार
लकार का प्रयोग।
२. प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष तथा उत्तम पुरुष के कर्ता के साथ
क्रम से प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष तथा उत्तम पुरुष की क्रिया
का प्रयोग।
३. कर्ता के एक, दो या बहुत होने से क्रिया के भी एकवचन
द्विवचन और बहुवचन का प्रयोग ।
कारक विभक्तियां
१. प्रथमा-कर्ता के योग में राम गच्छति ।
२. द्वितीया-कर्म (को) के योग में रामः वनं गच्छति ।
३. तृतीया-हेतु (कारण-ने, से) के योग में-रथः चक्रेण चलति।
४. चतुर्थी-देने ( संप्रदान-केलिए) में-स रामाय पुस्तक
यच्छति ।
५. पञ्चमी-अलग (अपादान-से) होने में वृक्षात् पत्रं पतति।
६. षष्ठी-सम्बन्ध (का, के, की) बताने में-रामस्य बाणः ।
(यह कारक विभक्ति नहीं है)
७. सप्तमी-आधार (अधिकरण-में, पर) के योग में--पात्रे
.
जलम् अस्ति।
८. प्रथमा--संबोधन (हे, भो) में-हे राम ! वनं गच्छ ।
उपपद विभक्तियाँ
किसी विशेष पद (शब्द अथवा शब्दांश) के उप अर्थात्
समीप अथवा योग में आ जाने से जो विशेष विभक्ति किसी

ग -- शब्द में लगाई जाती है उसे "उपपद विभक्ति” कहते हैं। 'संस्कृत-शिक्षा के प्रथम भाग में आई हुई कुछ उपपद विभक्तियाँ उदाहरण-सहित दी जाती हैं:-- द्वितीया-(१) विना के योग में-सीता रामं बिना गृहे न स्थास्यति । (२) 'अनु' उपसर्ग के योग में-सिही मृगीम् अनुधावति। तृतीया-(१) 'सह' के समानार्थक अव्ययों के योग में रामः सीतया सह (साक, समं सार्धं वा) वनं गच्छति । (२) 'हीन' के योग में-धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः। (३) 'विना के योग में-सीता रामेण विना गृहे न स्थास्यति। चतुर्थी-(१) कुप् , क्रुध, द्रह आदि धातुओं के योग में जो क्रोध आदि का पात्र हो उस में-राज्ञी दासीभ्यः कुप्यति (ऋध्यति)। (२) रुच तथा उसके समानार्थक धातुओं के योग में-रामाय मोदकः रोचते। पञ्चमी-(१) जिस से भय हो उस में-सिंहात् भयं भवति । (२) विना के योग में-रामात् विना सीता गृहे न स्थास्यति । . शब्द उकारान्त 'मधु' मधुनी मधु मधूनि " प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी मधुभ्याम् मधुना मधुने मधुभिः मधुभ्यः ध पञ्चमी षष्ठी सप्तमी संबोधन मधुभ्यः मधूनाम् मधुषु मधूनि ! " मधु, मधो! मधुनः मधुभ्याम् मधुनोः मधुनि मधुनी! संख्यावाचक 'एक' केवल एकवचन में पुल्लिग नपुंसकलिङ्ग एकः एकम् एकम् एकेन एकेन एकम्मै एकस्मै एकस्मात् एकस्मात् एकस्य एकम्य एकस्मिन एकस्मिन् स्त्रीलिङ्ग एका प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी एकाम् एकया एकस्यै एकस्याः " एकस्याम् स्त्रीलिङ्ग द्वे Thou sho the stor 'द्वि' केवल द्विवचन में पुंलिङ्ग नपुंसकलिङ्ग प्रथमा द्वौ द्वितीया द्वौ तृतीया द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी द्वयोः द्वयोः सप्तमी द्वाभ्याम् " " " द्वयोः " 'चतुर् ' केवल चतस्त्रः 'त्रि' केवल बहुवचन में पुंलिङ्ग नपुंसकलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग प्रथमा त्रयः त्रीणि तिस्त्रः द्वितीया त्रीन् तृतीया त्रिभिः त्रिभिः तिसृभिः चतुर्थी त्रिभ्यः त्रिभ्यः तिसृभ्यः पञ्चमी षष्ठी त्रयाणाम् त्रयाणाम् तिसृणाम् सप्तमी त्रिषु त्रिबु तिसृषु । केवल बहुवचन में पुंलिङ्ग नपुंसकलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग प्रथमा चत्वारः चत्वारि द्वितीया चतुरः तृतीया चतुर्भिः चतसृभिः चतुर्थी चतुर्व्यः चतुर्व्यः चतस्मृभ्यः पञ्चमी षष्ठी चतुर्णाम् चतुर्णाम् चतसृणाम् सप्तमी चतुर्ष चतुर्यु चतसृषु धातु-पाठः भ्वादिगण के परस्मैपदी धातु भू-होना-भवति, भवतु, भवेत् , अभवत्, भविष्यति । पठ-पढ़ना-पठति, पठतु, पठेत्, अपठत् , पठिष्यति । पत्--गिरना-पतति, पततु, पतेत् , अपतत्, पतिष्यति। " चतुर्भिः " रक्ष-रक्षा करना-रक्षति, रक्षतु, रक्षेत् , अरक्षत्, रक्षिष्यति । वद् -बोलना-वदति, वदतु, वदेत् , अवदत् , वदिष्यति । गम्-जाना----गच्छति, गच्छतु, गच्छेत् , अगच्छत् , गमिष्यति ह-हरना-हरति, हरतु, हरेन् , अहरन्, हरिष्यति। धाव दौड़ना-धावति, धावतु, धावेत् , अधावत् , धाविष्यति । हस्-हँसना-हसति, हसतु, हसेत् , अहसत्, हसिष्यति स्मृ-रमरण करना-स्मरति, स्मरतु,स्मरेत् , अस्मरत् , स्मरिष्यति। जि-जीतना-जयति, जयतु, जयत् , अजयत् , जेष्यति । नी-ले जाना-नर्यात, नयतु, नयेत्, अनयत् , नेष्यति । पच्-पकाना--पचति, पचतु, पचेत्, अपचत्, पक्ष्यति । त्वज् -छोड़ना-त्यजति, त्यजतु, त्यजेत् , अत्यजत् , त्यक्ष्यति । दृश् -- देखना-पश्यति, पश्यतु, पश्येत् , अपश्यत् , द्रक्ष्यति । स्था-ठहरना-तिष्ठति, तिष्ठतु, तिष्ठेत् , अतिष्ठत् स्थास्यति । पा-पीना-पिबति, पिबतु, पिबेत् , अपिबत् , पास्यति । दा-देना-यच्छांत, यच्तु, यच्छेत् , अयच्छत्, दास्यति । " तुदादिगण के परस्मैपदी धातु तुद-दुःख देना--तुदति, तुदतु, तुदेत् , अतुदत्, तोत्स्यति । मिल-मिलना-मिलति, मिलतु,मिलेत् ,अमिलत् , मिलिष्यति। इष-चाहना-इच्छति, इच्छतु, इच्छेत् , ऐच्छत् , एषिष्यति । क्षिप-फेंकना-क्षिपति, क्षिपतु, क्षिपेत् , अक्षिपत् , क्षेप्स्यति । लिख-लिखना-लिखति, लिखतु,लिखेत् ,अलिखत, लेखिष्यति । सृज-रचना-सृजति, सृजतु, सृजेत् , असृजत् स्रक्ष्यति । प्रच्छ-पूछना-पृच्छति, पृच्छतु, पृच्छेत् , अपृच्छत् , प्रक्ष्यति ।

, . TATH, VARAN दिवादिगण के परस्मैपदी धातु दिव्--चमकना, जुआ खेलना-दीव्यति, दीव्यतु, दीव्येत् , अदीव्यत् , देविष्यति । भ्रम्-घूमना-भ्राम्यति, भ्राम्यतु,भ्राम्येत् ,अभ्राम्यत्,भ्रमिष्यति। नश्-नष्ट होना-नश्यति, नश्यतु, नश्ययेत् , अनश्यत् , नशिष्यति-नंक्ष्यति । तुष्-प्रसन्न होना-तुष्यति, तुष्यतु, तुष्येत् , अतुष्यत् , तोक्ष्यति । क्रुध्-क्रुद्ध होना-क्रुध्यति, क्रुध्यतु, क्रुध्येत् ,अक्रुध्यत् , क्रोत्स्यति । नृत्-नाचना-नृत्यति, नृत्यतु, नृत्येत् , अनृत्यत् , नस्यति । चुरादिगण के परस्मैपदी धातु चुर्-चुराना-चोरयति, चोरयतु, चोरयेत् . अचोरयत् , चोरयिष्यति । कथ्–कहना -कथयति, कथयतु,कथयेत् ,अकथयत् ,कथयिष्यति । दण्ड्-दण्ड देना-दण्डयति, दण्डयतु, दण्डयेत् , अदण्डयत् , दण्डयिष्यति। भूष्-सजाना -भूषयति,भूषयतु,भूपयेत् अभूषयत् भूषयिष्यति। चिन्त-सोचना-चिन्तयति, चिन्तयतु, चिन्तयेत् ,अचिन्तयत् , चिन्तयिष्यति । भन्-खाना-भक्षयति,भक्षियतु भत्तयेती अमाप्तयत् अक्षयिष्यति । पाल-पालना-पालयति, पालयतु, पालयेत् । अमालयत् , पालयिष्यति । आ+ कर्ण-सुनना-आकर्मयति आकर्णयतु,आकर्णयेत् शाकर्णयत्, आकर्णयिष्यति । तड्-पीटना-ताडयति ताज्यतु,ताडयत् अताडयत ,ताडयिष्यति। ह-फाड़ना-दारयति,दास्यत्,दोरयेत, अदारयत् दारयिष्यति । "278 , , HIGH LIBRA

Sanskrit Siksha-278

Author
Gauri Shankar
Title
Sanskrit Siksha-278
File name
Sanskrit Siksha-278
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2006/06/25
Publisher
Visheswaranand Prakashan Hoshiarpur Punjab
Language
Sanskrit
Pages
74
Classification
Literature
DLI number
448279
Barcode
5990010124692.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Rights
In Public Domain
VMLT id
GHVNkSF7TEb
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