Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Khilati Kesar Mahakata Uapavan
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श्री महावीराय नमः
जय गुरू नाना
जय गुरु राम
卐
खिलत केसर
महकता उपवन
प्रकाशक
रतनलाल अशोककुमार सुराणा
कोरमंगला, बेंगलोर
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5 खिलती केसर महकता उपवन- शासन समर्पित सुराणा परिवार आचार्य श्री रामेश के अनन्य भक्त गंगाशहर के सुराणा परिवार का सेवा, त्याग एवं उदारता का जाज्वल्यमान इतिहास रहा है। युग दृष्टा क्रान्तिकारी, ज्योतिर्धर श्रीमद् जवाहराचार्य से लेकर आचार्य श्री रामेश तक की श्रद्धा निष्ठ सेवा का सौजन्य उन्हें प्राप्त हुआ है। अपनी इस अनुपम उदारता का परिचय देते हुए सुराणा परिवार के सदस्यों ने "खिलती केसर महकता उपवन" के प्रकाशन हेतु सद्भावना पूर्वक जो सेवा का लाभ लिया, उसके लिए हम से आभारी है। कमल सिपानी आपके हृदय
-खिलती केसर महकता उपवन
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मेरी भावना.......
आगम वारिधि, प्रशान्तमना, नानेश पट्टधर भुरा कुल
भूषण श्रीमद् जैनाचार्य आचार्य प्रवर १००८ श्री
रामलालजी म.सा. की असीम अनुकम्पा से परम विदुषी
सरलमना चन्द्र सम शीतल १००५ श्री चन्द्रप्रभाजी
म.सा., विद्या वारिधी श्री सुजाताश्रीजी म.सा.,
विद्या
विनोदी श्री सुमेधाश्रीजी म.सा., सेवाभाविनी श्री
समिधाश्रीजी म.सा., मधुरगायिका महासती श्री
जीतयशा जी म.सा. के सं. २०६४ के फूलों की नगरी
(कोरामंगला सिपानी भवन, बेंगलोर) के वर्षावास पर
प्रार्थना, प्रवचन, स्वाध्याय के भक्ति रस से प्राप्त नवनीत
को खिलती केशर महकता उपवन के रूप में लय बद्ध
करने का एक लघुतम प्रयास किया है।
आशा है आप सभी देवाणुप्रियों को पसंद आयेगा। भक्ति
रस पिपासुओं की प्यास को शांत कर पायेगा। ऐसी हमारी
भावना है।
-कमला, उर्मिला, मधु, नयनतारा सुराणा
खिलती केसर महकता उपवन–'
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हुक्मगच्छाधिपति,
चारित्र चांदनी की चैतन्य आत्मा
संयम के सजग प्रहरी नानेश पट्टाधीश
आत्म निर्भर वर्ष के उज्जवल धवल हस्ताक्षर,
श्रीमद् जैनाचार्य श्रमण विभूति १००८
श्रीरामलालजी म.सा.
के चरण कमलों में
सादर समर्पित...
रतनलाल-सुन्दरदेवी सुराणा
जेठमल, इन्द्रचन्द, अशोककुमार, जसकरण,
राजेन्द्रकुमार, कमलचंद सुराणा
गंगाशहर-बेंगलोर
.
13 खिलती केसर महकता उपवन अनुक्रमणिका क्रम विषय पृष्ठ 01. नवकार मंत्र 02 आचार्य मंगल 13 03. नवकार मंत्र की महिमा 14 04. महामंत्र की आरती 16 05. महामंत्र जप सुखपासी 17 06. मंत्र जपो नवकार 18 07. सुबह और शाम की 19 08. हे प्रभु पंच परमेष्ठी 22 10. श्री पैसठिया यंत्र का छंद वंदन बारंबार 25 12. कभी वीर बन के 26 13. माता पिता की सेवा करना 27 14. उठ भोर भई टुक जाग सही 28 15. वीर जिनेश्वर सोई दुनियां 29 16. श्री शांतिनाथ स्तुति .30 17. 31 श्री शांतिनाथजी का छंद 34 18. तुमसे लागी लगन 21 09. सिद्ध स्तुति 23 11.
9 21. खिलती केसर महकता उपवन-卐 19. ओ पारसनाथ तुम्हारे 35 20. जयबोलो महावीर स्वामी की 36 21. अर्ज सुणावे थारो चाकरियो 37 22. चरणों में वंदन 38 वीर नाम है कितना प्यारा 39 24. निर्वाण कीर्तन 40 25. है संघ सदा जयकार 42 26. हुक्म मुनिवर है तपधारी 43 27. हुक्मीचंदजी का छंद 44 28. साधुमार्गी संघ है प्यारा 46 29. मेवाड़ी सांवरियो 30. मेरे नाना गुरु - भगवान 49 31. आप की जय-जय हो 50 32. नानेश कहो-रामेश कहो 52 33. जय जय सब बोलो 54 34. गुरु आज्ञा को धर्म जो माने 55 35. ओ देशाणा वाले 56 36. श्री राम नाम प्यारा 57 राम धुन मचाऊं 58 38. चरणों में वंदन बार बार 59 39. अनुशासक है मनहार 60 48 37.
13 40. 61 41. 62 42. -खिलती केसर महकता उपवन धन्य-धन्य गुरुवर मेरे जय बोलो श्री राम गुरु की करलो गुरु का भजन रामं शरणं गच्छामि एक तेरा सहारा श्री गुरु वंदन 63 43. 64 44. 65 45. 66 46. गुरुवर राम चरणों में 67 47. 68 48. नाना गुरु के चरण में राम गुरु गुणवान (सवैया) दे दो इसे किनारा 69 49. 70 50. नानेश पट्टधर गुरुवर 71 51. 72 52. 73 53. 74 राम चरणों में मस्तक झुकाते चलो सदा हो मन में इनका ध्यान गुरु राम की महिमा गायेंगे चरणों में वंदन हमारा गुरु बिना कोई नहीं है नाना गुरु का हार हिये का 54. 75 55. 76 55. 77 57. 78 शुभ मंगल 79 58. म्हारे शासन रा शिरमौर रामेश गुरु को वन्दन शत-शत वन्दन 81 59. 82 60.
11 M)-खिलती केसर महकता उपवन ॥ 61. 83 62. 85 63. 86 64. 87 65. 89 राम सबका कष्ट मिटाता गुरु रामलालजी महाराज सा. वर्तमान आचार्य श्री को सुबह शाम बोलो गुरु राम प्रभुरी वाणी लागे छुट सब जायेगा भक्ति करता छूटे म्हारा प्राण भगवान तुम्हारे चरणों में ओ मतवाले प्रभु गुण गाले मनुष्य जन्म अनमोल रे 66. 90 67. 92 68. 93 69. 94 95 70. 71. जीवन बनाना है 96 72. पल-पल उमर बीती प्रभु मन मंदिर में सुख-दुःख मिले रे 97 99 73. 74. 100 75. 102 76. 103 77. 104 तीन बार भोजन भजन एक बार कलिमल हरणी कल्याणी ओ चमत्कार दिन चार जिस दिन प्रभु का दर्शन होगा मेरी जिंदगी की शान हो रे मानव तू प्यार कर 78. 105 79. 106 80. 107 -- खिलती केसर महकता उपवन- 81. 108 82. 109 110 83. 84. 111 85. 112 86. 113 87. 114 88. चलो ना अकड़ के सत् संगत से सुख मिलता है वैराग्य उपज सकता है तपस्या जीवन सावन का महीना धुंधरु छमछमाछम एक बार आओ तप रा गीत तप में शक्ति अपार घड़ी तपस्या री तपस्या रो अद्भूत रंग आचार्य पाटावली नानेश चालीसा रामेश चालीसा संघ समर्पणा गीत आलोयणा 115 89. 116 90. 117 91. 118 92. 122 93. 125 94. 128 95. 131 96. गुरु वंदना 138 97. 139 98. 140 दिन का चौड़घिया रात का चौड़घिया २४ तीर्थंकर के नाम वीस विहरमान के नाम 99. 141 100. 142
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-खिलती केसर महकता उपवन-म
नवकार महामंत्र
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं।
एसो पंच णमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढम हवइ मंगलं।
आचार्य मंगल
सुधर्मादिक पाट भव्य यति, हुक्माधीश पूज्यादि को।
शैवादि प्रभु रूप उदै, श्री चौथ श्री लाल को।
वाचस्पत्य जवाहरादि कृति से, ज्योत्सना प्रपूर्णार्य को।
शास्ता शांत गणेश पूज्य, नमते नानेश रामेश को ॥
खिलती केसर महकता उपवन नवकार मंत्र की महिमा नवकार मंत्र है महामंत्र, इस मंत्र की महिमा भारी है। आगम में कथी गुरुवर से सुनी, अनुभव में जिसे उतारी है। टे। अरिहंताणं पद पहला है, अरि आरति दूर भगाता है। सिद्धाणं सुमिरन करने से, मन वांछित सिद्धि पाता है। आयरियाणं तो अष्ठ सिद्धि, और नव निधि के भंडारी है।। नवकार मंत्र है महामंत्र, इस मंत्र की महिमा भारी है ॥१॥ उवज्झायाणं अज्ञान तिमिर हर, ज्ञान प्रकाश फैलाता है। सव्व साहूणं सब सुख दाता, तन मन को स्वस्थ बनाता है। पद पांच के सुमिरन करने से, मिट जाती सकल बिमारी है।। नवकार मंत्र है महामंत्र, इस मंत्र की महिमा भारी है ।।२।। श्री पाल सुदर्शन मेणरया, जिसने भी जपा आनन्द पाया। जीवन के सूने पतझड़ में, फिर फूल खिले सौरभ छाया। मन नन्दन वन में रमण करे, यह ऐसा मंगलकारी।। नवकार मंत्र है महामंत्र, इस मंत्र की महिमा भारी है ।।३।।
15 खिलती केसर महकता उपवन नित नयी बधाई सुने कान, लक्ष्मी वरमाला पहनाती। अशोक मुनि जय विजय मिले, सुख शान्ति प्रसन्नता बढ़ जाती। सत्कार मिलेसम्मान मिलेसम्मान मिल, भव जल सेनैया तारी है। नवकार मंत्र है महामंत्र, इस की महिमा भारी है ॥४॥ एक होता है नरम एक होता है गरम, रह जाता है घर का धरम जब दोनों हो जाते हैं गरम, तब फूट जाते हैं सब के करम॥
खिलती केसर महकता उपवन
महामंत्र की आरती
ॐ जय अरिहंताणं, प्रभु जय अरिहंताणं।
भाव भक्ति से, नित्य प्रति प्रणमु सिद्धाणं॥ॐ जय॥
दर्शन ज्ञान अनंता शक्ति के धारी, स्वामी,
यथाख्यात समकित है, कर्म शत्रु हारी।।
हे सर्वज्ञ ! सर्वदर्शी बल, सुख अनंत पाये, स्वामी।
अगुरु लघु अमूरत अव्यय कहलाये।
नमो आयरियाणं, छत्तीस गुण पालक, स्वामी।
जैन धर्म के नेता संघ के संचालक।
नमो उवज्झायाणं चरण करण ज्ञाता,
स्वामी।
अंग उपांग पढ़ाते, ज्ञान दान दाता ।।
नमो सव्व साहूणं ममता मद हारी, स्वामी ।
सत्य अहिंसा अस्तेय ब्रह्मचर्य धारी।।
चोथमल कहे शुद्ध मन जो नर ध्यान धरे स्वामी।
पावन पंच परमेष्टि, मंगलाचार करे।।
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खिलती केसर महकता उपवन-
महामंत्र जप सुख पासी
(तर्ज : उड उड रे म्हारा.....)
जप जप रे...जप जप रे...जप जप रे...म्हारा अन्तर मनड़ा।
महामंत्र जप सुख पासी, महामंत्र जप सुख पासी।।
अरिहंत पद पहला है आया, अरि निज जिसने मार भगाया।
भज्यां कर्म सब कट जासी।। महा....॥१॥
दूजा पद श्री सिद्ध निरंजन, जिसने अचल जमाया आसन।
तूं बण जासी शिव वासी॥ महा...॥२॥
पंचाचार के जो पालक है, श्री संघ के संचालक है।
आचारज धम्म परकाशी। महा....॥३॥
स्व पर मत के जो ज्ञाता है, मिथ्या तम से छुड़वाता है।
उपाध्याय जी गुण-राशी।। महा....॥४॥
मुनिवर त्यागी
गुण
की माला, काटत है भव बन्धन जाला।
पाप पंक सब धुप जासी।। महा.... ॥५॥
सुदर्शन, श्री पाल भूपाला, मैना सुन्दरी, चन्दनबाला।
कट गई उनकी दुःख फांसी।। महा.....॥६॥
महामंत्र का ध्यान धरो तुम, रिद्धि सिद्धि भण्डार भरो तुम ।
गोतम धरम गुरु ध्यासी॥ महा....॥७॥
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खिलती केसर महकता उपवन-卐
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मीमांसा परिषद द्वारा मान्य प्रार्थना
हे प्रभु पंच परमेष्ठी दयाला
हे प्रभु पंच परमेष्ठी दयाला।
मुझे में कर दो ज्ञान उजाला ॥ टेर।
अरिहन्त सिद्ध को शीश नमाऊँ,
आचार्य उपाध्याय के गुण गाऊँ।
मुनिवर सब ही गुण की माला ।। हे प्रभु... ।
इनकी भक्ति का रस पीऊँ,
व्यसन मुक्त मैं जीवन जीउँ।
पीकर जिनवाणी का प्याला॥ हे प्रभु...॥
अन्तर्दृष्टा मैं बन जाऊँ,
सम्यक् ज्ञान की ज्योति जगाऊँ।
शुद्धाचार का ओढ़ दुशाला।। हे प्रभु... ।
मन वच तन के योग हो सुखकर,
जीवन हो यह स्व पर हितकर।
धर्म ध्यान का हो उजियाला।। हे प्रभु...।।
# खिलती केसर महकता उपवन 22 सिद्ध स्तुति सेवो सिद्ध सदा जयकार, जांसे होवे मंगलाचार।।टेर। अज अविनाशी अगम अगोचर, अमल अचल अविकार। अंतर्यामी त्रिभुवन स्वामी, अमित शक्ति भंडार ॥१॥ कर पणट्ठ-कमट्ठ अट्ठ-गुण-युक्त मुक्त- -संसार। पायो पद परमेष्ठि तास पद, वंदू बारम्बार ।।२।। सिद्धप्रभु को सुमिरन जग में, सकल सिद्धि दातार। मन-वांछित पूरण सुरतरु सम, चिंता चुरणहार ॥३॥ जपे जाप योगीश रात-दिन, ध्यावे हृदय मंझार । तीर्थंकर हू प्रणमें उनको, जब होवे अणगार।।४।। सूर्योदय के समय भक्ति-युत, स्थिर-चित्त दृढ़ता धार। जपे सिद्ध यह जाप तास घर, होवे ऋद्धि अपार ॥५॥ सिद्ध स्तुति यह पढ़े भाव से, प्रतिदिन जो नरनार ! सो दिव शिवसुख पावे निश्चय, बना रहेसरदार ॥६॥ माधव मुनि कहे सकल संघ में, बढ़े हमेशा प्यार। विद्या विनय विवेक समन्वित पावे प्रचुर प्रचार।।७।।
23 खिलती केसर महकता उपवन- श्री पैंसठिया यन्त्र का छन्द (चतुर्विशति जिन-स्तवन) 22 3 15 16 14 20 21 2 8 1 7 13 19 25 18 24 5 6 12 10 11 17 23 4 श्री नेमीश्वर संभव स्वाम, सुविधि धर्म शान्ति अभिराम। अनन्त सुव्रत नमिनाथ सुजाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।।१।। अजितनाथ चन्दाप्रभु धीर, आदीश्वर सुपार्श्व गंभीर। विमलनाथ विमल जग जाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ॥२॥ मल्लिनाथ जिन मंगल रूप, पंचवीस धनुष सुन्दर. स्वरूप। श्री अरनाथ नमूं वर्धमान, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण।।३॥
ॐ खिलती केसर महकता उपवन- सुमति पद्म-प्रभू अवतंस. वासुपूज्य शीतल श्रेयंस। कुंथु पार्श्व अभिनन्दन भाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण॥४॥ इणपरे श्री जिनवर संभारिए, दुख दारिद्रयं विघ्न निवारिए। पच्चीसे पैंसठ परमाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण॥५॥ इण भणतां दुख न आवे कदा, जो निज पासे रखो सदा। धरिये पंचतणुं मन ध्यान, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण॥६॥ श्री जिनवर नामे संकट टले, मन-वांछित सहु आशा फले। धर्मसिंह मुनि नाम निधान, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ॥७॥ प्रार्थना प्रार्थना पावन प्रभु की प्रीत है, प्रार्थना स्व-साथी है, प्यारा मीत है। प्रार्थना कल्याण आनन्द धाम है, प्रार्थना हृदय का गीत-संगीत है।। प्रार्थना मन का उज्जवल मोती है, प्रार्थना जीवन की मंगल ज्योति है। प्रार्थना भक्ति का सुंदर फूल है, प्रार्थना गंगा है, मन का पाप धोती है।
25 म खिलती केसर महकता उपवन 卐 वंदन बारंबार अरिहंतों को नमस्कार, श्री सिद्धों को नमस्कार, आचार्यो को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, जग में जितने साधु गण है उन सब को वंदन बारंबार ।।टे॥ ऋषभ अजित संभव अभिनंदन हो-२ सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय-२ चंद्र पुष्प शीतल श्रेयांस नमु, वासुपूज्य पूजित जिनराय॥१॥ विमल अनंत धर्म जस उज्जवल शांति कुंथु अर मलि मनाय नमी नेमी पार्श्व प्रभु वर्धमान पद शीश नमाय ॥२॥ मेरा वंदन बारंबार जिसने राग-द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया॥३॥ बुद्ध वीर जिन हरि-हर ब्रह्मा ऽऽऽ पैगंबर हो या अवतार सब के चरण कमल में मेरा वंदन हो बारंबार॥ मुनि सुव्रत
खिलती केसर महकता उपवन-6
कभी वीर बनके
(चौबीसी)
कभी वीर बनके, महावीर बन के, चले आना
प्रभुजी चले आना-२ ॥टेर ॥
कभी ऋषभ रुप में आना, कभी अजित रुप में आना
संभवनाथ बन के, अभिनंदन बन के
चले आना, दर्शन हमें दे जाना, कभी..... ॥१॥
कभी सुमति रूप में आना, कभी पदम रूप में आना
सुपार्श्वनाथ बनके, चंदाप्रभु बन के, चले आना
दर्शन हमें दे जाना, कभी वीर......... ॥२॥
कभी सुविधि रूप में आना, कभी शीतल रूप में आना
श्रेयांसनाथ बनके, वासुपूज्य बनके, चले आना
दर्शन हमें दे जाना, कभी वीर......... ॥३॥
कभी विमल रूप में आना, कभी अनंत रूप में आना
धर्मनाथ वनके, शांतिनाथ वनके, चले आना
दर्शन हमें दे जाना, कभी वीर ॥४॥
श-खिलती केसर महकता उपवन-卐 27 कभी कुन्थू रूप में आना, कभी अरह रूप में आना मल्लीनाथ बनके, मुनिसुव्रत बनके, चले आना दर्शन हमें दे जाना, कभी वीर ॥५॥ कभी नमि रूप में आना, कभी अरिष्ट रूप में आना पारसनाथ बनके, महावीर बनके, चले आना दर्शन हमें दे जाना, कभी वीर बनके, महावीर बनके चले आना, प्रभुजी चले आना ॥६॥ माता पिता की सेवा करना माता पिता की सेवा करना, पूजा है भगवान की। गुरुओं की अमृत वाणी से, बहती गंगा ज्ञान की। माता पिता के चरण छुए जो, चार धाम तीरथ फल पावे। जो आशीष वो दिल से देवे, भगवान से भी टाली न जावे। दुःख सहना माँ बाप के खातिर फर्ज है यह अहसान नहीं। कर्ज है इनका तेरे सर पर, भिक्षा या कोई दान नहीं।
ॐ खिलती केसर महकता उपवन-3 उठ भोर भई टुक जाग सही उठ भोर भई टुक जाग सही, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु। अब नींद अविद्या त्याग सही, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु।टेर। जग जाग उठा तू सोता है, अनमोल समय यह खोता है। तूं काहे प्रमादी होता है, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु।।१।। यह समय नहीं है सोने का, है वक्त पाप मल धोने का। अरू सावधान चित होने का, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु ॥२॥ तूं कौन कहां से आया है, अब गमन कहा मन भाया है। टुक सोच ये अवसर पाया है, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु ॥३॥ रे चेतन चतुर हिसाब लगा, क्या खाया खरचा लाभ हुआ। निज ज्ञान जगा तू संभाल हिया, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु।४। गति चार चौरासी लाख रुला, ये कठिन कठिन शिवराह मिला अब भूल कुमार्ग विपे मत जा, भज वीर प्रभु भज वीर प्रभु।।५।।
29 -खिलती केसर महकता उपवन-ई वीर जिनेश्वर सोई दुनियां जगाई तूने (तर्ज : कृष्णा दे द्वारे उत्ते.....) वीर जिनेश्वर सोई दुनियां जगाई तूने। ज्ञान की मधुर सुरीली, वंशी बजाई तूने।।टेर।। भारत की नैया डोली, मृत्यु आ सिर पर बोली। स्वर्ग से आकर भगवन्, पार लगाई तूने ॥१॥ पशुओं पर छुरियां चलती, रक्त की नदियां बहती। करुणा के सागर करूणा-गंगा बहाई तूने॥२॥ देवों की करना पूजा, बस काम था और न दूजा । मानव की अटल प्रतिष्ठा, जग में जताई तूने॥३॥ पन्थों का झूठा झगड़ा, जनता का मानस बिगड़ा। भेद सहिष्णुता की, रक्खी सच्चाई तूने ॥४॥ पापों का पंक धोना, नर से नारायण होना। अमर अमर पद की राह दिखाई तूने ।।५।। * -खिलती केसर महकता उपवन-ॐ श्री शांतिनाथ स्तुति साता कीजो जी, श्री शांतिनाथ प्रभु शिवसुख दीजो जी। साता की जो जी..॥टेर।। शांतिनाथ है नाम आपका, सबने साताकारी जी। तीन भुवन में चावां प्रभुजी, मृगी निवारी जी॥१॥ आप सरीखा देव जगत में, और नजर नहीं आवे जी। त्यागी ने वीतरागी मोटा, मुझ मन भावे जी॥२॥ शांतिनाथ मन माही जपतां, चाहे सो फल पावे जी। ताव तेज रो दुख दारिद्दर, सव मिट जावे जी॥३॥ विश्वसेन राजाजी के नंदन, अचलादेवी जाया जी। गुरु प्रसादे चौथमल्ल कहे, घणा सुहाया जी ||४ ।।
-खिलती केसर महकता उपवन- 31 卐 श्री शांतिनाथजी का छन्द शांतिनाथजी को कीजे जाप, करोड़ भवां रा काटे पाप। शांतिनाथजी मोटा देव, सुर नर सारे जेहनी सेव।। दुःख दारिद्र जावे दूर, सुख सम्पत्ति होवे भरपूर ।। ठग फांसी-घर जावे भाग, बलती होवे शीतल आग।। राज लोक मां कीर्ति घणी, शांति जिनेश्वर माथे धणी। जो ध्यावे प्रभुजी नो ध्यान, राजा देवे अधिको मान॥ गड़ गुंबड़ पीड़ा मिट जाय, द्वेषी दुश्मन लागे पाय। सघलो भाग्यो मन नो भर्म, पाम्यो समकित काटो कर्म।। सुणो प्रभु मोरी अरदास, हूं सेवक तुम पूरो आस। मुझ मन चिंतित कारज करो, चिंता आरति-विघ्न हरो। मेटो, म्हारा आल जंजाल, प्रभु मुझने तू नयन निहाल। आपनी कीर्ति ठामोठाम, सुधारो प्रभुजी म्हारा काम।। जो नित-नित प्रभुजी ने रटे, मोती बंधा फूला कटे।
-खिलती केसर महकता उपवन
चेप लावण दोनों झड़ जाय, बिन औषध कट जावे छांय॥
प्रभु नाम से आँख निर्मल थाय, धुंध पटल जाला कट जाय।
कमलो पीलो झर-झर झरे, शांति जिनेश्वर साता करे।
गरमी व्याधी मिटावे रोग, सज्जन मित्रनो मिले संयोग।
एहवा देव न दीखे और, नहीं चाले दुश्मन को जोर ।।
लुटेरा सब जावे नाश, दुर्जन फीटा होवे दास।
शांतिनाथ की कीर्ति घणी, कृपा करो तुम त्रिभुवन धणी॥
अरज करूं छू जोड़ी हाथ, आप सूं नहीं कोई छानी बात।
देख रह्या छो पोते आप, काटो प्रभुजी म्हारा पाप ॥
मुझ मन चिंतित करिये काज, राखो प्रभुजी म्हारी लाज।
तुम सम जग माही नही कोय, तुम भजवा थी साता होय॥
तुम पाल चले नहीं मृगी रोग, ताव तेज रो नाखो तोड़।
मरी मिटाई कीधी प्रभु सन्त, तुम गुण नो नहीं आवे अंत॥
तुमने सुमरे साधु सती, तुमने सुमरे जोगी जती।
3-खिलती केसर महकता उपवन
33
काटो संकट राखो मान, अविचल पद - आपो स्थान ।।
संवत् अठारे चोराणूं जाण, देश मालवो अधिक बखाण।
शहर जावरे चातुर्मास, हूं प्रभु तुम चरणा रो दास॥
ऋषि रघुनाथजी कीधो छंद, काटो प्रभुजी म्हारा फंद ।
हूं जोऊँ प्रभुजी नी वाट, मुझ आरति चिंता सब काट।
लाख खंड़ी सोना तणी,
लाख वर्ष दे दान।
सामायिक तुल्य नहीं,
भाख्यो श्री भगवान ॥
(९२,५९,२५,९२५) बियानवे करोड़,
उनसठ लाख, पच्चीस हजार नौ सौ पच्चीस
पल्योपम से अधिक नारकी का आयुष्य
तोड़कर देवता का शुभ आयुष्य बाँधे ।
34
iram
# खिलती केसर महकता उपवन
तुमसे लागी लगन
तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा।
मेटो-मेटो जी संकट हमारा॥ टेर॥
निश दिन तुमको जपूं पर से नेह तजूं जीवन सारा
तेरे चरणों में बीते हमारा ॥
अश्वसेन के राजदुलारे, वामादेवी के सुत प्राण प्यारे।
सबसे नेहा तोड़ा, जग से मुंह मोड़ा, संयम धारा ॥मेटो...!
इंद्र और धरणेन्द्र भी आये, देवी पद्मावती मंगल गाये।
आशा पुरोसदा, दुःख नहीं पावेंकदा, सेवकथारा । मेटो...॥
जगकेदुःखकी तोपरवाह नहीं है, स्वर्गसुख की भीचाहनहीं है।
मेटो जन्म मरण, होवे ऐसा यतन, तारण हारा॥ मेटो...॥
लाखों बार तुम्हें शीश नमाऊं, जग के नाथ तुम्हें कैसे पाऊं।
पंकज व्याकुल भया, दर्शन विन यह जीया लागे खारा ।।
मेटो-मेटो जी संकट हमारा ।।
35
खिलती केसर महकता उपवन-5
ओ पारसनाथ तुम्हारे
(तर्ज : बंधन तो प्यार का....)
वामा देवी के प्यारे, तुम अश्वसेन के दुलारे-२,
ओ पारसनाथ तुम्हारे चरणों में हम सबका वन्दन है।।टेर।।
जलती अग्नि से नाग का जोड़ा तुमने बचाया,
महामंत्र नवकार सुनाकर उनको देव बनाया,
चिंतामणि वाले स्वामी, प्रभु तुम हो अंतरयामी-२॥१॥
बन जाओ तुम ठाकुर मेरे, मैं सेवक बन जाऊँ,
सेवक बनकर प्रभु चरणों में, श्रद्धा समन चढ़ाऊँ,
जब जब धरती पर आऊँ तेरा ही शरणा पाऊँ -२ ॥२॥
श्रद्धा सुमनों से जो भी तेरा ध्यान लगाते,
उनके संकट क्षण भर में ही अपने आप टल जाते,
श्रद्धा से जो भी ध्याते, वो मन वांछित फल पाते-२॥३॥
-खिलती केसर महकता उपवन-29 जय बोलो महावीर स्वामी की जय बोलो महावीर स्वामी की। घट-घट के अन्तरयामी की ॥ टेर।। इस जगति का उद्धार किया।जो आया शरण वो पार किया। जिन पीड़सुनी हर प्राणी की ।जय बोलोमहावीर स्वामी की॥१॥ जो पाप मिटाने आया था। भारत को आन जगाया था। उस त्रिशला-नंदन ज्ञानी की।जय बोलोमहावीर स्वामी की॥२॥ हो लाख बार प्रणाम तुम्हें। हे वीर प्रभु ! भगवान तुम्हें। मुनि दर्शन मुक्ति गामी की। जय बोलो महावीर स्वामी की ॥३॥ जय बोलो महावीर स्वामी की। घट-घट के अन्तरयामी की ॥ प्रार्थना से बन्धुत्व भावना का झरना झरता है
37
खिलती केसर महकता उपवन
अर्ज सुणावे थांरो चाकरियो
(तर्ज : म्हारी
घूमर
छै.....)
म्हारे नैणां में आओ, बस जाओ महावीर,
अर्ज सुणावे थांरो चाकरियो।।टेर।।
अर्जुनमाली चण्डकोशिया, हत्यारा ने ताऱ्या।
अबे म्हाने भी तारो भगवान महावीर ।। अर्ज..... ॥१॥
चौरसी रा चक्कर काट्या, हाथ नहीं कुछ आयो।
भव अटवी रो छोर दिखाओ महावीर ।। अर्ज.....॥२॥
काम क्रोध री अग्नि जल रही, समता जल बरसाओ।
म्हाने समकित रोबोध कराओ महावीर ॥ अर्ज.....॥३॥
प्राणां रा आधार आप तो, मोक्ष जाय विराज्या।
म्हाने जल्दी सूं पास बुलावो महावीर ॥ अर्ज......॥४॥
जब तक मोह विछोह प्रभु थां, गौतम ने समझायो।
मोह बिन्दु सूं दूर हटाओ महावीर ।। अर्ज.... ॥५॥
भ-खिलती केसर महकता उपवन
चरणों में वन्दन
(तर्ज : बाइसा रा वीरा....)
महावीर प्रभुजी चरणों में वन्दन हो,
किरपा रखाओ, शासन रा स्वामी॥टेर।।
थे मग्गदयाणं, चक्खुदयाणं हो,
चौबीसवां भगवान मुक्ति रा गामी॥१॥
मंगलमय ज्योति, मंगलमय दीप्ति हो,
सुमिरण सूं पावां, गुण गण रा धामी॥२॥
म्हें भक्त बड़ा ही भद्रिक थारा हो,
देवाधि देव मोटा, तीर्थंकर नामी॥३॥
तीर्थंकर गणधर, सतिया सुहानी हो,
गुरु नाना राम है, जग में महाज्ञानी॥४॥
अर्जी चरणां में केसर सुणावे हो,
भव जल सूं तारो, शासन रा स्वामी॥५॥
39
खिलती केसर महकता उपवन-卐
वीर नाम है कितना प्यारा
(तर्ज : वीर नाम है......)
वीर नाम है कितना प्यारा जन-२ की आंखों का तारा
शासन का उजियारा हम लेते रहेंगे ये नाम तुम्हारा- २।टेर।
जिन शासन की शान वो......ज्योति पुंज महान-२
सागर सम गम्भीर वो महावीर भगवान-२
कितना पावन हो.२ प्रभु का जीवन वीतरागमय धारा ।।१।।
सत्य अहिंसा त्याग का प्रभु ने किया प्रचार...२
युग द्रष्टा महावीर ने, जग का किया उद्धार...२
अनुपम उद्गम-२ तप जप संयम, भव से तारण हारा,
कोटि-२ वन्दन करे वीरचरण में आज-२
श्रद्धा भक्ति के सुमन अर्पित है जिनराज-२
दर्श दिवाने ऽऽऽ नयन हमारे पाये दर्श तुम्हारा ।।
卐
40
-खिलती केसर महकता उपवन
निर्वाण-कीर्तन
(तर्ज : रघुपति राघव राजाराम .....)
वीर प्रभु केवल ज्ञानी, गौतम स्वामी चौनाणी,
महावीर केवल ज्ञानी, गौतम स्वामी चौनाणी।
वर्धमान केवल ज्ञानी, गौतम स्वामी चौनाणी,
त्रिशलासुत केवल ज्ञानी, गौतम स्वामी चौनाणी।
ज्ञात पुत्र केवल ज्ञानी, गौतम स्वामी चौनाणी।।टेर॥
अविरल बहे अमृत वागरणा, जीवन शोधन का शुभ झरना।
शुद्ध बने लाखों प्राणी, गौतम स्वामी चौनाणी ॥१॥
लोकोत्तर दीपक उजियारे, भक्तजनों के संकट हारे।
कर्म रोग हर कल्याणी, गौतम स्वामी चौनाणी ॥२॥
पद्मासन की छटा निहारी, मौहनी मूरत मन मत्थ हारी।
ध्यान धरे सो हो ध्यानी, गौतम स्वामी चौनाणी ॥३॥
सुन रहे सुर नर नृपदानी, कल्याण रूप प्रभु की वाणी।
आगम के अनुपम ध्यानी, गौतम स्वामी चौनाणी ॥४॥
41 खिलती केसर महकता उपवन-卐 नोट : उपरोक्त धुन दीवाली की अर्ध रात्रिपर्यंत गाई जाय एवं नीचे की धुन अर्धरात्रि के पश्चात् गाई जाए। वीर प्रभु पहुंचे निर्वाण, गौतम स्वामी केवल ज्ञान, महावीर पहुंचे निर्वाण, गौतम स्वामी केवल ज्ञान, वर्धमान पहुंचे निर्वाण, गौतम स्वामी केवल ज्ञान, त्रिशला सुत पहुंचे निर्वाण, गौतम स्वामी केवल ज्ञान, ज्ञात पुत्र पहुंचे निर्वाण, गौतम स्वामी केवल ज्ञान॥टेर।। गौतम की टूटी मोहताली, पावापुरी में देख दिवाली। सुरवर महोत्सव करे महान, गौतम स्वामी केवल ज्ञान ॥५॥ हुआ प्रकाशित लोकालोक, क्षणभर मिटा नरक का शोक। पाएं जीवन श्रेष्ठ निधान, गौतम स्वामी केवल ज्ञान ।।६।। पंचम आरे के नजदीक, अस्त हुआ लोकोत्तर दीप । बने सुधर्मा गादीवान, गौतम स्वामी केवल ज्ञान॥७॥ गौतम गौतम गाओगे, खोया गौरव पाओगे। और बनोगे लब्धिवान, गौतम स्वामी
ज-खिलती केसर महकता उपवन
42
..
हे संघ सदा जयकार
(तर्ज : हां होवे धर्म प्रचार....)
हे संघ सदा जयकार, प्यारे ध्यान धरो।
हे जन जीवन आधार, प्यारे ध्यान धरो॥
संघ हमारा अविचल मंगल, चाहे शहर या होवे जंगल।
हे शरण सदा श्रेयकार ॥१॥
संघ व्यवस्था जन हितकारी, वीर देशना कहे पुकारी।
तज दे निज अहंकार॥२॥
संघ को छिन्न-भिन्न जो भी करता, जन जीवन से धर्म को हरता।
दुर्लभ बोध निरधार ॥३॥
संघ सेवा को जो नर वरता, क्लिस्ट कर्म को वह क्षय करता।
स्थानांग अधिकार ॥४॥
पुज्य जवाहर का है कहना, गौरव गरीमा संघ की रखना।
वैसा हो व्यवहार॥५॥
नाना गुरु है तारण हारे, गुरु आज्ञा जो दिल में धारे।
"राम" रमे उसवार॥६॥
1 43 खिलती केसर महकता उपवन-卐 हुक्म मुनिवर है तपधारी (तर्ज : बोल बोल आदिश्वर....) सुमर-सुमर मन हुक्म मुनीश्वर, संकट टलसीरे। वयों नहीं सुमरे रेटेर॥ हुक्म मुनिश्वर थे तपधारी, उच्च क्रिया के धारी रे, जीवन उनका त्याग मूर्ति, कब-कब सुनसी रे॥१॥ गुरुवर करुणा के अवतारी, ज्ञान गुणों के है धारी, संयम सुमेरु पट आसीनकर, भवदधि तरसी रे॥२॥ दृष्टि से जहाँ संकट टूटे, रोग चरण रज छूटे रे, कृपा किरण यदि मिले एक, तो कारज सरसी रे॥३॥ वीर वाणी के है अनुरक्ता, जिनवाणी सुवक्ता रे, भाव सत्य और करण सत्य सुं, मुक्ति मिलसी रे॥४॥ नाना गुरुवर पाट बिराजे, सिंह गर्जना गरजे रे, संत सतिया भी घणा विराजे, “राम” सुमरसी रे॥५॥ संवत पचावन भाव पंचमी, शुक्ल पक्ष संघ धर्मी रे, उदयपुर की पौषधशाला में, जनता हरषी रे॥६॥ .
-खिलती केसर महकता उपवन-
पूज्य हुक्मीचन्दजी का छन्द
(समता संघ के संस्थापक आचार्य)
पूज्य शहर टोडा के थे वासी, सम्वत् अठारसौ गुण्यासी।
संयम ले जीवन सफल करे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥2॥
पूज्य महा त्यागी ने वैरागी, जाकी शिवपुर से सुरत लागी।
आतम ज्ञान में रमण करे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥१॥
पूज्य सब मीठा ने त्याग दिया, इक्कीस वर्ष तप बेला किया।
देवता जां की सेवा करे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥२॥
पूज्य नामे शत्रु मित्र बने, और राज पंच में श्रेष्ठ चुने ।
रिद्धि-सिद्धि भण्डार भरे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥३॥
पूज्य हुक्मीचन्दजी को जो ध्यावे, नित नई बधाई घर आवे।
भूत प्रेत भय दूर हरे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥४॥
पूज्य हुक्मीचन्दजी को नाम रटे, तो ताव तेजरो परी हटे।
पूज्य नाम से कुष्ट रोग टरे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥५॥
खिलती केसर महकता उपवन-ॐ 45 पूज्य हुक्मीचन्दजी का गुण गावे, वह सुख सम्पत्ति आनन्द पावे। चेला चेली पुत्र होय सरे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥६॥ पूज्य नाम लियां से आश फले, जय विजय लक्ष्मी आन मिले। पूज्य भव सागर सेतारे तिरे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥७॥ पूज्य अष्टक विमान में जावे, बलदेव विदेह हो शिव पावे। कहे चौथमल जयकार करे, पूज्य हुक्मीचन्दजी को ध्यान धरे ॥८॥ मुक्तक प्रार्थना प्रभु से मिलने का पीयूष पराग है, प्रार्थना प्रभु से मिलने का अनुराग है। प्रार्थना प्रभु की कर ली जिसने सच्चे मन से, प्रार्थना मोक्ष मार्ग को पाने का चिराग है।
46 केसर महकता उपवन साधुमार्गी संघ है हमारा (तर्ज : उड़ते पंछी नील गगन में....) : साधुमार्गी संघ है प्यारा गरिमा इसकी गाये, हम संघ की शान बढ़ाये, समता सेवा और समर्पण श्रद्धा से विकसाये • हम संघ की शान बढ़ाये।टेर।। संघ हमारा मंगलकारी तीर्थ न कोई दूजा, यही देव और गुरु हमारे करके इनकी पूजा। एक-एक से गणी वर इसकी सौम्य को महकाये॥१॥ हुक्म गणी और शिव लालजी उदय हुये अवतारी, चौथमल श्री लाल जवाहर, जग में चमके भारी। गणेश गुरु का त्याग निराला नहीं पद को ललचाये ॥२॥ शासन के सिरमोर सुहाने नाना गुरु हमारे, खिलती केसर महकता उपवन-卐 47 राम गुरुवर तप संयम से इसको खूब संवारे। जन जन के आधार बने, श्रद्धा सुमन चढ़ाये ।।३।। इन बलिदानी वीरों का है जोश भरा रग-रग में, नई स्फूरणा और ताजगी भरी हुई अंग अंग में। सुप्त चेतना जागृत करके, मनोरम मय बन जाये॥४॥ स्थानक में प्रवेश के नियम अभिगमन सचित त्याग अचित विवेक, उत्तरासग कर जोड़। कर मन की एकाग्रता, सब झंझट को छोड़।
मा-खिलती केसर महकता उपवन-48
मेवाडी सांवरियो
(तर्ज : नखरालो देवरियो.....)
मेवाडी सांवरियो, नाना गुरु प्यारो लागे।
प्यारो लागे, मोहनगारो लागे॥ टेर॥
मोडी लाल जी मोद मनाया, शृंगारा हर्षाई।
जन्म हुआ जब दाता गांव में घर घर खुशियां छाई॥
जन-जन ने सोहणियो-२॥ नाना....१॥
जेठ मास रे आसमान में, सूरज तेज सवायो।
दूजो सूरज ज्ञान किरण ले, भू पर इक प्रगटायो।
शासन में चमकणियो-२॥ नाना....२॥
पास रहे चाहे दूर रहे बस, नाना नाम सहारा।
जंगल हो समसाण भले हो, वो ही है रखवारा।
जन मन ने मोहणियो-२॥ नाना.....३॥
जोभी इणरे शरणे आवे, भव सागर तिर जावे।
आधि व्याधि छूटे सारी, आनन्द मंगल छावे।
मुगत गढ जावणियो-२॥ नाना...४॥
ध्यान समीक्षण समता दरसण, जब्बर देन तुम्हारी।
मुनि गौतम कहे सिगली दुनिया, आभारी आभारी॥
समय ने समझणियो-२॥ नाना....५
49 खिलती केसर महकता उपवन- 卐 मेरे नाना गुरु - भगवान मेरे, नाना गुरु भगवान देते सबको सच्चा ज्ञान ।।टेर।। पंच महाव्रत पालन करते, करते जग उत्थान । धर्मपाल तिरगए शरण से, करते हैं गुणगान । मेरे...१ जैन जगत के दिव्य सितारे, हुक्म संघ की शान। आयरियाणं पद पर शोभे, गुणरत्नों की खान ॥ मेरे..२ समता दर्शन ध्यान समीक्षण, जिनका है संधान। समझे ध्यावे जो भवि प्राणी, टूटे भव संतान ।। मेरे..३ गांव गांव और डगर-डगर में, देते ज्ञान का दान। भूले भटके राह जनों को, करवाते निज भान ।। मेरे..४ दीर्घ काल तक तेरी वाणी, सुनता रहूं अविराम। गुरुवर तेरी चरण शरण में, मेरा मन अभिराम। मेरे..५ 50 # खिलती केसर महकता उपवन- आप की जय-जय हो (तर्ज : राम गुरु की माला भजन) दांता के दातार, आपकी जय-जय हो, प्राणों के आधार, आपकी जय-जय हो। मंगलमय दिन आज का आया, गुरु कृपा से आनन्द छाया। वर्ते मंगलाचार आपकी जय-जय हो॥१॥ जेठ सुदी द्वितीया दिन आया, माँ शृंगारा रा भाग्य सवाया। पोखरणा कुल की शान, आपकी जय-जय हो॥२॥ मोडीलालजी के आंगण में, खुशियां छाई है प्रांगण में। जन्मा है पूत सपूत, आपकी जय-जय हो ॥३॥ यौवन वय में किया प्रवेश, धन्य हुआ है मेवाड़ देश।
51 खिलती केसर महकता उपवन-म पहना है संयम वेश, आपकी जय-जय हो॥४॥ हु शि उ चौ श्री ज ग नाना, गुरु चरणों में शीश झुकाना। राम जियो हजारों साल, आपकी जय-जय हो ॥५॥ दांता के दातार, आपकी जय-जय हो, प्राणों के आधार, आपकी जय-जय हो। सात कुव्यसन त्याग जुआ खेलन, मांस, मद, चोरी, पर - रमणी - रमण, सातों नरक द्वार।। वैश्या-व्यसन, शिकार। जो पाले धर्म बन्धुओं को, उसे धर्म वीर कहते हैं, जो मुसीबत को सहन करे, उसे गंभीर कहते हैं। बचाये लाज भक्तों की, उसे भगवान् कहते हैं, जो जीते आठों कर्म को, उसे महावीर कहते हैं।।
# खिलती केसर महकता उपवन
52
नानेश कहो रामेश कहो
नानेश कहो, रामेश कहो, दोनों ही मंगलकारी है।
एक अष्टम पट के धारी थे, एक नवम पट अधिकारी है।
नानेश कहो.........॥टेर।।
एक शृंगारा के जाये थे, एक मां गवरा के प्यारे हैं।
नानेश कहो.....॥१॥
एक दांता गांल में जन्मे थे, एक देशनोक अवतारी है।
नानेश कहो.........॥२॥
एक धर्मपाल प्रतिबोधक है, एक श्रीवाल प्रतिबोधक है।
नानेश कहो........॥३॥
एक ध्यान समीक्षण दाता थे, एक गुरु आज्ञा के धारी है।
नानेश कहो.... ॥४॥
एक मोड़ी नन्द कहाते थे, एक नेमी सुत कहलाते हैं।
नानेश कहो.......॥५॥
53 -खिलती केसर महकता उपवन 卐 एक समता के पुजारी थे, एक कठिन क्रिया के धारी है। नानेश कहो......॥६॥ एक २०वी सदी के दाता थे, एक २१वी सदी के विधाता है। नानेश कहो......॥७॥ दोनों ही सदियां धन्य हुई, हम सब तेरे बलिहारी है। नानेश कहो.....॥८॥ नवकार महामंत्र से बढ़कर इस संसार में कोई मंत्र नहीं हैं।
ए खिलती केसर महकता उपवन
54
..
जय जय सब बोलो
(तर्ज : चिरमी रा डाला चार.......)
राम नाम हृदय धरो, और चरणां शीष झुकाय।
जय जय सब बोलो।।टेर॥
गंवरा घर में जनमिया, भूरा नेमचंद हर्षाय ॥१॥
नाना गुरुजी परखिया, सिरि संघ ने घणो सुहाय॥२॥
जपिया तपिया शूरमां, हुक्मी रो पाट दिपाय॥३॥
दयावंत गुणवंत है, ए संत बड़ा सुखदाय ॥४॥
चिन्तन ऊंडो आपरो, आगम मर्यादा माय॥५॥
करड़ी आंरी पालणी, “गोयम” री याद दिलाय॥५॥
।
मान
समकित का पाठ
अरिहंतो महदेवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो ।
जिणपण्णतं तत्तं, इअ सम्मत्त मए गहियं ॥१॥
55
.....)
खिलती केसर महकता उपवन 卐
गुरु आज्ञा को धर्म जोमाने
(तर्ज : चांदी की दीवार न तोड़ी.......
गंवरा मां के लाल की, महिमा हम सभी मिल गाते हैं,
गुरु आज्ञा को धर्म जो माने, वे ही मुक्ति पाते हैं।।टेर।।
भूरा कुल में छाई खुशियां, अवतारे नेमी नंदन,
देशाणे की पावन माटी, महक गई जैसे चंदन।
वीर संघ के अनुगामी को, देवलोक करता वंदन,
जिनवाणी सुन-सुन नाना से बचपन राम सजाते है॥१॥
फिर वैराग्य उठा मन में, दीक्षा लेने की ठानी,
संयम पथ पर बढ़ गये रामा राहे जैसे पहचानी।
जाँच परख कर गुरु नाना ने कर दी फिर एक फरमानी,
त्याग तपस्या संत सेवा से मुनि प्रवर बन जाते हैं।।२।।
शास्त्रज्ञ और तरुण तपस्वी ने युवाचार्य का पद पाया,
केसर की होती बरसाते, चादर महोत्सव जव आया।
जन-जन के मन बस गये गुरुवर, अहंकार भी न आया,
उदयपुर में हुक्मी संघ के ये नायक बन जाते हैं।॥३॥
-खिलती केसर महकता उपवन-56
ओ देशाणा वाले
(तर्ज : वीर जिनेश्वर ....)
तारो जी तारो गुरुवर राम, ओ गुरु नाना वाले,
श्रद्धा से जपते तेरा नाम, ओ देशाणा वाले।।टेर।।
छत्तीस गुणों के धारी, ज्ञान क्रिया है भारी,
जैन जगत की तुम हो शान ।।१।।
वीरों के पथ पर चलते, कष्टों से तुम ना डरते,
कलियुग में रखली तुमने आन॥२॥
राम ये नाम तुम्हारा, लगता है सबको प्यारा,
भक्तों की सुनलो तुम अरदास॥३॥
तुम हो हरसाने वाले, तुम हो सरसाने वाले,
तुम ही हो नैया खेवन हार ॥४॥
ध्यान में सबके आओ, चेतन की ज्योत जगाओ,
प्रफुल्ल हो करना बेड़ा पार॥५॥
57 खिलती केसर महकता उपवन-卐 श्री राम नाम प्यारा (तर्ज : कुछ पल की.. श्री राम नाम प्यारा, भक्ति के रंग में गाना, आदर्श भावों वाले, गुरु का रहा फसाना ।।टेर।। गंवरा के नन्द प्यारे हुक्म संघ को सवारे, चरणो में आए तेरे महका दे मन हमारे, जग भा रहा ना, किंचित इनसे हमें बचाना ॥१॥ दिल में सुखद सुहाया, करुणा के दीप दाता, तु ही है मन को भाया, यह फैसला हमारा, अपना सा तू बनाना ॥२॥ द्वन्द भाव को मिटाना, समता से है सजाना, नानेश शिष्य रामा, दो आत्म धन खजाना, खिलता रहे है पंकज, दिव्य ज्योत है जगाना ॥३॥ आया है यह पर्व पावन, वढ़ता तपो का सावन, उपदेशना गुरु की, मिलती क्या मन भावन, संशुद्धि हेतु आये, कचरा रहा मिटाना ॥४॥ नयनों में तू समाया,
-खिलती केसर महकता उपवन
58
राम धुन मचाऊँ
राम धुन मचाऊँ गुरु राम राम राम
मेरा भजन रहे गुरु राम राम राम ।।टेर।।
मेरे हृदय में राम, मेरे होठों पे राम,
हृदय होठों पे रहे, गुरु राम राम राम ॥१॥
मेरे विचारो में राम, मेरे आचारो में राम,
विचार आचार में रहे, गुरु राम राम राम ॥२॥
मेरे ज्ञान है राम, मेरा ध्यान है राम,
ज्ञान, ध्यान में रहे, गुरु राम राम राम ॥३॥
मेरे श्वास में राम, उच्छवास में राम,
श्वासोश्वास में रहे, गुरु राम राम राम ॥४॥
मेरे तन में है राम, मेरे मन में है राम,
तन-मन में रहे गुरु, राम राम राम ॥५॥
मेरे घर में है राम, मेरे गांव में राम,
देश विदेश में रहे, गुरु राम राम राम ॥६॥
जन-जन में है राम, नाना गुरुवर का राम,
"प्रकाश” कहे, गुरु राम राम राम ॥७॥
खिलती केसर महकता उपवन-
59
卐
:
थे
चरणों में वंदन बार-बार
(तर्ज : पाया दर्शन मंगलकारा.. .......)
हुक्म संघ रा स्वामी, घट-घट रा अन्तरर्यामी
चरणों में वंदन बार-बार
मां गवरा बाई ने पाला, पिता नेमीचंदजी रा लाला।
दिया भूरा कुल को तार-तार, तार-तार ॥१॥
थे व्यसन मुक्ति प्रणेता, श्री संघ रा हो अभिनेता।
म्हारे हिवड़े रा हो हार-हार, हार-हार॥२॥
गुरु आगम रा हो ज्ञाता, जन-जन रा भाग्य विधाता।
कर दो भव से उद्धार-उद्धार, उद्धार-उद्धार ॥३॥
थे तपो तेजस्वी भारी, हो अष्ट सम्पदा धारी।
पाले है पंचाचार-पंचाचार, पंचाचार-पंचाचार ।।४।।
संसार सागर में घूमे, जीवन नैया यूं डूबे।
बनो नैया खेवनहार-खेवनहार, खेवनहार-खेवनहार ॥५॥
-खिलती केसर महकता उपवन-60
अनुशासक है मनहार
(तर्ज : ना कजरे की धार..............)
प्रगटे प्राणाधार, खुशियों की बजी सितार,
गुरु नाना के पट्टधार, गुरुवर रामा जनमे हैं।
अनुशासक है मनहार, नैया के खेवनहार है,
श्री संघ की शोभा सारा.......
गुरुवर रामा।।टेर॥
शुभ दिन था देशाणे में, गंवरा मां के आंगन में,
सबने मिल थाल बजाया, भूरा कुल के प्रांगण में।
दिव्य भानु, चन्द्रभानु, या कह दूं कोई अवतार.. ॥१॥
नेमी के लाल दुलारे, भैया मांगी के मैया,
बहिनों ने खुश हो गाई, मीठी-मीठी लौरिया।
सभी का मन, बना गुलशन, सर सज्जित हुआ अपार ।।२।।
जीवन नन्दन वन जैसा, संयम की शुभ बहारें,
दिल है मृदु मक्खन जैसा, भव्यों के सबल सहारे।
शुभ्र शक्ति, दिव्य भक्ति, भक्तों के तारण हार.. ॥३॥
बलदेव राम से ये, मर्यादा का ध्रुव धारे,
अनुशासन अनुशासन है हम सबके पूर्ण सहारे।
ध्याऊँ प्रतिदिन बढ़ो दिन-दिन, सती केशर है चरणार॥४॥
खिलती केसर महकता उपवन
61
धन्य-धन्य गुरुवर मेरे
(तर्ज : जिया बेकरार है)
खुशियां अपार है, चमन यह गुलजार है।
धन्य-धन्य गुरुवर मेरे, महिमा का नहीं पार है।।
नेमीचंदजी के राज दुलारे, गंवराबाई माता है-२,
जो भी आता चरणों में, वो ही सुख को पाता है।
साधना अपार है, झुकता यह संसार है..॥१॥
मंगलमूर्ति प्यारे गुरुवर, जन-उपवन के माली है-२,
धर्म ध्यान के सुमनों से, महकी जीवन डाली है।
कण-कण में झंकार है, आनंद की बहार है..॥२॥
रत्नत्रय की करे साधना, जग करता अभिनंदन है-२,
पथ आलोकित करनेवाले, शत्-शत् तुमको वंदन है।
श्रद्धा का उपहार है, गुरुवर की जयकार है.. ॥३॥
# खिलती केसर महकता उपवन जय बोलो श्री राम गुरु की (तर्ज : जय बोलो महावीर स्वामी की....) जय बोलो-जय बोलो श्री राम गुरु की जय बोलो-२ आप लिया अवतार, गुरु की जय बोलो...॥१॥ माँ गंवरा ने गोद खिलाया, सब के मन में हर्ष है छाया, होवे मंगलाचार, गुरु की जय बोलो... ॥२॥ यौवन वय में संयम धारा, गुरु नानेश के मन को प्यारा, पाया ज्ञान अपार, गुरु की जय बोलो......॥३॥ हुक्मसंघ के बने सिरताजा, जन-जन के मन में है विराजा, हो रही जय-जयकार, गुरु की जय बोलो....॥४॥ व्यसन मुक्ति का पाठ पढ़ाया, भेद भाव सब दूर हटाया, किया धर्म प्रचार, गुरु की जय बोलो....॥५॥ दीक्षाओं का ठाठ लगाया, जिन शासन को खूब दिपाया, बन गये तारणहार, गुरु की जय बोलो....॥६॥ हु शि उ चौ श्री ज ग नाना, राम चमक रहे भानु समाना, संघ करे सत्कार, गुरु की जय बोलो...॥७॥ .
खिलती केसर महकता उपवन 63 卐 करलो गुरु का भजन (तर्ज : तुम से लागी लगन....) करलो गुरु का भजन, सब मिल के सज्जन सुखकारा। गुरु राम को वंदन हमारा ।।टेर ।। देशनोक ये गाँव सुहाया, गवरा नेमी का पूत कहाया, भूरा कुल का चंदन, तोड्या मोह का बंधन, संयम धारा ||१|| माघ शुक्ला बारस सुखदाई, दीक्षा दिवस पर देवां बधाई, किया इन्द्रिय दमन, कषाय शमन, दृढव्रतधारा ॥२॥ व्याख्यान शैली ज्योतिर्धर जैसी सौम्य मूर्त गजानन्द जैसी, पाट पे देखू रामेश, याद आवें नानेश तारणहारा॥३॥ नाना गुरुवर महाउपकारी, संघ खिलता रहे गुलक्यारी, लाई श्रद्धा सुमन, करती भाव नमन शत-शत वारा ॥४॥ हु शि उ चौ श्री ज ग नाना, राम चमकते भानु समाना, केशर राम चरण, शीघ्र मुक्ति वरण अविकारा॥५॥ राम चरणों में वंदन हमारा, गुरु राम को वंदन हमारा ।।
है। केसर महकता उपवन- 64 रामं शरणं गच्छामि (तर्ज : रघुपति राघव राजा राम) हर पल मानव मुख से बोल, सद्गुरु शरणं गच्छामि सद्गुरु शरणं गच्छामि, रामं शरणं गच्छामि ।।टेर।। नाना नयन सितारे हैं, नवम् पट्ट अवधारे हैं, गंवरा पुत्र दुलारे हैं, भूरा कुल उजियारे हैं। अंतर के भावों से बोल, रामं शरणं गच्छामि॥१॥ हुक्म गुरु शिव उदयगणी, चौथमल श्रीलाल धणी, शासन की अनमोल मणि, पूज्य जवाहर लाल गुणी। अंतर घट के पट तू खोल, रामं शरणं गच्छामि ॥२॥ गणपति गण के नायक थे, जन जीवन उन्नायक थे, शांत क्रांति पथ अनुगामी, साधक परम सहायक थे। अंतर की आत्मा से बोल, रामं शरणं गच्छामि ॥३॥ नाना गुरु गुण धामी थे, जैन जगत में नामी थे, ध्यान समीक्षण ध्यानी थे, धर्मपाल उत्थानी थे। श्रद्धा और भक्ति से बोल, रामं शरणं गच्छामि॥४॥ नवम् पट्ट के धारी हैं, तरुण तपस्वी भारी है, पावन बाल ब्रह्मचारी, आगम के भण्डारी है। जपलो मन की गांठे खोल, रामं शरणं गच्छामि ॥५॥ ...
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खिलती केसर महकता उपवन'
एक तेरा सहारा (तर्ज : मेरे दिल ए नादान)
गुरुदेव मेरे तुमको, भक्तों ने पुकारा है,
आओ अब आजाओ एक तेरा सहारा हैं......
है चारों तरफ छाया मेरे घोर अंधेरा हैं,
अब जाये कहां बोलो, तूफानों ने घेरा हैं,
हे नाथ अनाथों को तेरा ही सहारा है....॥१॥
मझधार पड़ी नैय्या, डगमग डोला खाये,
मिल जाओ हमें आकर, हम भव से तर जाए,
बिन तेरे नहीं जग में एक पल भी गुजारा है.... ॥२॥
तेरे इन चरणों की धुल बस मुझको मिल जाए,
भटके हुए राही को निज मंजिल मिल जाए,
किस्मत भी चमक जाए जो चमके सितारा है...॥३॥
सेवा गुरु चरणन की, भक्ति भव तरणन की,
महिमा गुरु वर्णन की, ज्ञाता शुभ तर मन की,
गुरु ज्ञान संजीवन की बहती एक धारा है...॥४॥
ब्रह्म-सम गुरु शक्ति दो, कोई पार नहीं पाये,
दो दर्शन अब गुरुवर चरणों से लिपट जाये,
भक्त सदा करता, गुणगान तुम्हारा है... ॥५॥
66
-खिलती केसर महकता उपवन-
श्री गुरु वंदन
(तर्ज : नाना तेरा राम)
ले गुरु का नाम बन्दे ये ही तो सहारा है,
ये जग का पालन हारा है, ले गुरु का नाम ।।टेर।।
तारीफ क्या करूँ, इस दीन दाता की, दयालु नाम है।
दीन दुखियों के दामन को भर देना, गुरु का काम है।
लाखों की तकदीर-२ को इस मालिक ने संवारा है..
ले गुरु का नाम..... ॥१॥
क्या भरोसा है इस जिन्दगानी का, गुरु को याद कर।
क्या सोचता है रे, अनमोल जीवन को, ना तू बर्बाद कर।
सौंप दे पतवार-२ फिर तो पास में किनारा है।
ले गुरु का नाम....॥२॥
कौन है तेरा क्या साथ जाएगा, गुरु का ध्यान कर।
व्यर्थ है काया, धोखे की है माया, गुरु से पहचान कर।
श्रावक संघ नादान-२ तू गुरु को क्यों बिसारे है।
ले गुरु का नाम....॥३॥
खिलती केसर महकता उपवन-卐
67
गुरुवर राम चरणों में
.)
(तर्ज : श्री महावीर स्वामी की सदा जय हो .....
गुरुवर राम चरणों में हजारो बार वंदन हो।
नाज है तुम पे हम सबको। टेर।।
नानेश के चरणों में आए, बोधि सम्यक्त्व को पाये।
संयम के सजग प्रहरी को॥१॥
जवाहर जैसी ज्योति तुम, गणेश सी त्याग मूर्ति हो।
गुरु नाना की शक्ति को॥२॥
तुम्हें दिल से है जो ध्याये, भवोदधि से वो तिर जाए।
गुणों के दिव्य गुलशन को॥३॥
शास्त्र के गूढ ज्ञाता हो, भव्यों के तुम विधाता हो।
व्यसन मुक्ति प्रणेता को॥४॥
गुरु नानेश के अरमां, पूर्ण हम सबको है करना।
संघ के श्रद्धा नायक को॥५॥
राम का नाम नित रटना, इन्द्र गुरु आज्ञा में रहना।
मुक्ति पथ के प्रणेता को॥६॥
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खिलती केसर महकता उपवन- 69 卐 तेरी आज्ञा से कभी मुख नहीं मोड़ेंगे। समझेंगे गुरु तेरी आँखों का इशारा ॥४॥ चाहे आज कष्ट हो, चाहे विपदा भारी हो, नाना ने तुम में भरदी अपनी ऊर्जा सारी हो। संग तुम्हारे राम, श्री संघ सारा ॥५॥ राम गुरु गुणवान सवैया राम गुरु गुणवान, जिन शासन के भान, देते है धरम दान, बाल ब्रह्मचारी है। हुक्म गच्छ सिरताज, सिंह सम रहे गाज, सकल सुधारे काज, महा उपकारी है। श्रुतज्ञान है अपार, मौन तप से है प्यार, संयम निरतिचार, सम भाव भारी है। चमके है भव्य भाल, चले हैं आगम चाल, गवरां नेमी के लाल, वन्दना हमारी है।
-खिलती केसर महकता उपवन- 70 दे दो इसे किनारा (तर्ज : जन्म जन्म का साथ......) जनम जनम का दास हूँ गुरुदेव तुम्हारा। जीवन नैया डोल रही है दे दो इसे किनारा ।। टेर ।। अपने मन मंदिर में तेरी ज्योत जलाऊँ। अपने मन दर्पण में तेरा ध्यान लगाऊँ। तुम मेरे स्वामी हो मैं सेवक हूँ तुम्हारा ॥१॥ जीवन की सुनी राहे, आबाद करो वरदान से। भरदो जीवन में खुशियाँ अपने चमत्कार से। जीवन में कुछ करने, मांगू आशीर्वाद तुम्हारा ॥२॥ भक्तों की टोली आई श्रद्धा के फूल चढ़ाए। नर-नारी दर पे आये अपना शीष झुकाए। हम सबकी अर्जी यहीं है सबको दो सहारा ||३||
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-खिलती केसर महकता उपवन-5
नानेश पट्टधर गुरुवर
(तर्ज : रघुपति राघव राजा.......)
राम चरणों में शत-शत प्रणाम,
मिट जाते हैं कष्ट तमाम ।।टेर ।।
माता गंवरा के जाये, नेमीचंदजी हर्षाये।
भूरा कुल प्रकटे घनश्याम ॥१॥ राम चरणों....॥
मुनि अनाथी का पाठ पढ़ा, वैराग्य का रंग चढ़ा,
साधना पथ पे बड़े अविराम ॥२॥
गुरुवर का दिल जीत लिया, आयरियाणं पद है दिया,
सकल संघ का सुधरे काम ।।३।।
मेरा जीवन तेरे चरणार, दो शक्ति तिर जाऊँ संसार,
केसर समर्पण आठो याम॥४॥
हु. शि. उ. चौ. श्री जग लाल-जग में चमके नानालाल।
साल हजारो जिओ गुरुराम ॥५॥
तेरे चरणन निकले प्राण, पा जाऊँ मैं परि निर्वाण ।
जपती रहूँ में सुबह शाम॥६॥
केसर महकता उपवन-72)
卐
राम चरणों में मस्तक झुकाते
(तर्ज : सिद्ध अरिहंत में मन.....)
राम चरणों में मस्तक झुकाते चलो,
श्रद्धा भक्ति के दीप जलाते चलो।।टेर ।।
चैत्र शुक्ला चवदस को जन्म लिया।
माता गवरा के आंगन को पावन किया।
नाना गुणों से जीवन सजाते चलो॥१॥
तप त्याग से जीवन को महका दिया।
आगम वाणी को रग-रग में रमा लिया।
गुरु सेवा का अमृत पिलाते चलो॥२॥
तेरे चरणों के गुरुवर पुजारी बने।
तेरी सूरत में नानेश के दर्शन मिले।
हुक्म शासन का गौरव गुंजाते चलो॥३॥
व्यसनमुक्ति का संदेशा घर-घर रहे।
सारे भारत में राम का राज्य रहे।
इन्द्र नानेश सी समता बढ़ाते चलो॥४॥
73-खिलती केसर महकता उपवन-卐
मीमांसा परिषद द्वारा मान्य प्रार्थना
सदा हो मन में इनका ध्यान
(तर्ज - देख तेरे संसार की हालत....)
मेरे प्यारे देव, गुरुवर श्री जिन धर्म महान।
सदा हो मन में इनका ध्यान॥
इनके उपदेशों पर मेरा, जीवन हो गतिमान।
इन्हीं पर हो जाऊं, कुर्बान ।।टेर।
सिद्ध प्रभुवर को मैं ध्याऊं, अरिहन्तों को शीश नमाऊँ।
चौबीसी जिन जपता जाऊँ, मैं भी उनसा जिन बन जाऊँ।
अन्य देव नहीं मन को भाये, अरिहंत सिद्ध ही प्राण॥
सदा हो मन में इनका ध्यान....॥१॥
राम गुरु आगम के ज्ञाता, उच्च क्रिया से जिनका नाता।
ज्ञान ध्यान तप तेज सुहाता, जन-जन के जो भाग्य विधाता।
नाना गुरु के पाट विराजें, जिन शासन की शान ।।
सदा हो मन में इनका ध्यान.....॥२॥
जिनवाणी की महिमा भारी, जिनवाणी भविजन उपकारी।
आत्म शांति की सच्ची क्यारी, विषय कषायों की है आरी।
तुलना जग में नहीं है इसकी, गूंजे जय-जय गान ॥
सदा हो मन में इनका ध्यान....॥३॥
# खिलती केसर महकता उपवन
गुरु राम की महिमा गाएंगे
(तर्ज : जय बोलो महावीर स्वामी की .....)
गुरु राम की महिमा गाएंगे, चरणों में शीश झुकाएंगे।टे॥
संसारी वैभव त्याग दिया, संयम से नाता जोड़ लिया।
तप त्याग की ज्योति जलाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे॥१॥
गुरु आज्ञा जिनको प्यारी है, दिन रात वही सुखकारी है।
समता का पुष्प खिलाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे॥२॥
ये गवरा मां के नंदन हैं, ये नेमी कुल के चन्दन हैं।
व्यसन मुक्ति नाद गुंजाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे ॥३॥
ये ज्ञान क्रिया के पुजारी हैं, नहीं उसमें कहीं लाचारी है।
साधुमार्गी संघ दिपाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे॥४॥
गुरु हुक्मी की ये परम्परा, उसमें भी नवम पाट खरा।
इसकी ही क्रांति फैलाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे॥५॥
देशनोक में जन्में दीक्षा वहीं, मारवाड़ी धोरी संत सही।
गुण गौरव सब मिल गाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे।।६।।
अनुशासित संघ ही प्यारा है, नानेश गुरु का नारा है।
श्री संघ को ये विकसाएंगे, गुरु राम की महिमा गाएंगे॥७॥
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खिलती केसर महकता उपवन--9
चरणों में वन्दन हमारा
(तर्ज : वीर हमको भी तारो.....)
चरणों में वन्दन हमारा, गुरु राम स्वीकारो,
रामा स्वीकारो गुरु रामा स्वीकारो.....चरणों में वंदन ।।टेर।।
गवरा के जाये गुरु गवरां के जाये,
नेमी के नन्दन दुलारा । गुरु राम स्वीकारो॥१॥
नाना के शिष्य गुरु नाना के शिष्य,
नवम पट उजियारा। गुरु राम स्वीकारो॥२॥
ज्योति बढ़ाई नेत्र ज्योति बढ़ाई,
दुःखों से तुमने उबारा। गुरु राम स्वीकारो ॥३॥
जग उजियारे गुरु संघ सितारे,
जन जन का जीवन सुधारा । गुरु राम स्वीकारो॥४॥
आगम ज्ञाता गुरु संघ विधाता,
छतीस गुण के धारा । गुरु राम स्वीकारो॥५॥
हमको भी तारो, गुरु जन जन को तारो,
तारा है सारा संसार। गुरु राम स्वीकारो॥६॥
चरणों में आए राम चरणों में आए,
श्रद्धा से तुमको पुकारा । गुरु राम स्वीकारो॥७॥
-खिलती केसर महकता उपवन-6
गुरु बिना कोई नहीं रे
तेरे बिना गुरुवर हमारा नहीं कोई रे-२
तेरे बिना पुज्यवर सहारा नहीं कोई रे-२॥ टेर।।
भाई बंधु कुटुम्ब कबिला, सुत और नारी छैल छबीला।
बिगड़ी बात बनाया नहीं कोई रे।। तेरे बिना...||१||
गहरी नदियां नाव पुरानी, बड़े बड़े भंवरे गहरा पानी।
डुबन लागी नाव बचाया नहीं कोई रे।। तेरे बिना...॥२॥
जब से मैंने तुझको ध्याया, तुने मुझको अपना बनाया।
तेरे जैसा लाड़ लड़ाया नहीं कोई रे। तेरे बिना....॥३॥
घर-घर तेरा नाम जपाऊ तेरी महिमा सबको सुनाऊं।
तेरे जैसा प्यार जताया नहीं कोई के।। तेरे बिना..... ॥४॥
.
कहत कबीर सुनो भाई साधु, सुनो भाई साधु कहत कबीरा।
गुरु बिना ज्ञान बताया नहीं कोई रे॥ तेरे बिना.....॥५॥
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-खिलती केसर महकता उपवन-3
नाना गुरु का हार हिये का
(तर्ज : वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया....)
नाना गुरु का हार हिये का, राम सभी को है प्यारा,
नवम् पट्टधर पर है उदभाषित,
हुक्म क्षितिज का धुतिमय तारा ॥ टेर ।
मां गवरा की कोख दिपाये, नेमिचंद गुण चंदन हो,
पुज्य जवाहर वचनामृत पढ़, किये जीवन स्पन्दन हो,
तरुणाई में संयम लेकर, ब्रह्म वृत्ति को दृढ़तम धारा॥१॥
गुरु परिचर्या में प्रलीन हो, मानस सुमन खिलावे हो,
त्याग तपस्या ज्ञानार्जन से सम्यक दीप जलाये हो,
व्यसन मुक्ति संस्कार क्रांति का, दिये विश्व को उज्जवल नारा ||२||
क्रियावन्त साधक सुखकारी, समता भाव जगा देना,
निखिल विश्व में निबिड़ तिमिर को, गणिवर दुर भगा देना,
शान्त दान्त आदर्श रूप में, निखरे नित प्रति संघ हमारा ॥३॥
# खिलती केसर महकता उपवन 78 शुभ मंगल (तर्ज : हरि ॐ हरि ॐ.....) शुभ मंगल हो, शुभ मंगल हो शुभ मंगल मंगल मंगल हो।टेर॥ जिन मंगल हो, दिन मंगल हो, जीवन का हर क्षण मंगल हो॥१॥ जग मंगल हो, नभ मंगल हो, धरती का हर कण मंगल हो ॥२॥ गति मंगल हो, स्थिति मंगल हो। आयु का हर क्षण मंगल हो॥३॥ सुख स्पंदन हो। गुरु राम चरण में वंदन हो॥४॥ तन अर्पण हो, मन अर्पण हो। गुरु राम चरण में समर्पण हो।।५।। गुरु स्वस्थ रहे, गुरु व्यस्त रहे। कृपा का हर क्षण वर्पण हो॥६॥ बंधन हो, मुक्त
79
-खिलती केसर महकता उपवन-5
म्हारे शासन रा शिरमौर
(तर्ज : म्हारे हिवडामा....)
म्हारे शासन रा शिरमौर.....गुरु रामा....रामा
म्हारे कालजिये री कोर.....
गुरुवर रामा, है अभिरामा, श्री संघ के श्यामा......
म्हारे शासन रा शिरमौर ।।टेर।।
महावीर के चरण पूजारी है, ये पाट बयासी धारी है,
इनके वन्दन अभिनन्दन से मिट जाती कर्म बीमारी है,
निर्मल कीर्ति पावन ज्योति फैली चारूं धामा।
म्हारे शासन....॥१॥
गुरु नाना के पट्टधारी है, ये तरुण तपस्वी भारी है,
इनकी वाणी सुनते प्राणी, बन जाते मंगलकारी है,
करके दर्शन सुनके प्रवचन, पाऊं भव विश्रामा।
म्हारे शासन....॥२॥
80 # खिलती केसर महकता उपवन गुरु क्षमा दया के भण्डारी, है इस कलयुग में अवतारी, अवनि अम्बर महिमा फैली, गाते है गौरव नर नारी, भक्तों को मिले, सब दुःख टले शबरी को मिले ज्यूं रामा म्हारे शासन...॥३॥ गुरुदेव दया के दर्पण है, इनको तो सर्व समर्पण है, शुभ दृष्टि से शुभ सृष्टि से, कर देते जग का तर्पण है, जपलूं माला, हो उजियाला, पाऊँ मुक्ति धामा। म्हारे शासन...॥४॥ - जे केवि गया मोक्खं, जेवि य गच्छंचि जे गमिस्संति। ते सव्वे सामाइय, पभावेण मुणेयव्वं । जो भी साधक अतीत काल में मोक्ष गए हैं, वर्तमान में जा रहे हैं, और भविष्य में जायेंगे, यह सब सामायिक का ही प्रभाव है।
खिलती केसर महकता उपवन- 81 रामेश गुरु को वन्दन (तर्ज : जय बोलो महावीर स्वामी की....) रामेश गुरु को वंदन है, नवम् पट का अभिनन्दन है।।टेर। माता गंवरा के जाये हैं, भूरा कुल में प्रगटाये हैं। नेमी के प्यारे नन्दन है॥१॥ गुरु नाना के अनुगामी है, श्री संघ के पावन स्वामी है। सुज्ञान क्रिया के चंदन है।।२।। गुरु अष्ट सम्पदा धारी है, ये तरुण तपस्वी भारी है। सब छोड़ दिया मोह बंधन है॥३॥ हो व्यसन मुक्त सारे प्राणी, फरमाते ऐसी जिनवाणी। करते सब झुक-झुक वंदन है ।।४।। गुरु आत्मा नंदी पावन है, लगते सबको मन भावन है। जन-जन के दुःख निकन्दन है।।५।।
# खिलती केसर महकता उपवन 82 शत-शत वन्दन (तर्ज : चिरमी रा....) नवम् पट पर राजते, गुरु रामा गुण भण्डार, शत-शत वन्दन है ॥ टेर। गंवरा मां रा लाडला, श्रीनेमचंदजी रा नन्द....॥१॥ भूरा कुल में चन्द्रसा, श्री संघ में सूर्य समान ....॥२॥ मेरु सम संयम लियो, चरणार... ॥३॥ धरती जैसा धीर है, गुरु सागर सा गंभीर... ॥४॥ क्षमाशील अवतार है, गुरु समता रा भण्डार.... ॥५॥ आठ सम्पदारा धणी, गुरु गुण रतना री खान... ||६|| तरुण तपस्वी आप हैं, है नवम पट्ट भगवान.... ॥७॥ चरणां में विनती करां, प्रभु कर दो भव सूं पार... ॥८॥ rto गुरु नाना प्रशंसा जहरीले सर्प के समान है
83
खिलती केसर महकता उपवन-3
राम सबका कष्ट मिटाता
इण कलयुग रा भाग्य विधाता, राम सब रा कष्ट मिटाता
लाखो आंखडल्यां रो तारो हार हिए रो लागे,
म्हाने देशाणे रो लाल, प्यारो प्यारो लागे।
म्हाने नाना गुरु रो राम प्यारो प्यारो लागे. ॥टेर।।
यश कीर्ति री नहीं चाहना मान सदा पीछे राखे
पद पदवी सुं सदा दूर रह संयम सुप्रीति धारे
अनुशासन में आगे आगे पाखंडी तो दूरा भागे
वीर शासन रो संचालक हार हिए रो लागे
म्हाने देशाणे रो लाल
.॥१॥
झालर री झणकारां सुं भी प्रियकारी मधुर वाणी
सुनता ही मन मुग्ध बने यह समता छकणी सुं छाणी
आ है राम गुर वाणी, वाणी लागे घणी सुहाणी
ओ
मधुर मधुर बोलणियो हार हिए रो लागे
म्हाने देशाणे रो लाल.
॥२॥
ॐ खिलती केसर महकता उपवन-84 छवि अनोखी इण में देखी लाखां रो उद्धार कर्यो व्यसन मुक्ति रे आंदोलन सुं जीवन रो निर्माण कर्यो देन निराली निर्मल लागे, संघ सुधारे सागे सागे वीर सपूतो ओ रामेश गुरुवर प्यारो लागे म्हाने देशाणे रो लाल. ॥३॥ आगम दर्शन रा व्याख्याता ध्यान समीक्षण रा ध्याता द्वेष क्लेष जंजाल मिटाता समता रो रस बरसाता विपदावों ने दूर भगावे, जीवन ने सरसब्ज बनावे अद्भुत योगी ओ सांवरियो हार हिए रो लागे म्हाने देशाणे रो लाल.. गजब अतिशय झिलमिल झलक ज्योति सवाई है जागे अल्पायु में दीक्षा लेकर सूरा रो सूरो लागे महिमा सुरनर किन्नर गावे, दौड्या इन चरणा में आवे ओ तो ओजस्वी तेजस्वी हार हिए रो लगे म्हाने देशाणे रो लाल. ....॥४॥ ...
खिलती केसर महकता उपवन- 85 卐 गुरु रामलालजी महाराज (तर्ज : झीणी झीणी उड़े रे....) गुरु रामलालजी महाराज परम तपस्वी है। श्री संघ को है इन पर नाज, परम तपस्वी है।।टेर। नाना गुरु के शिष्योतम है, शिष्योतम है आचार्य हमारे, करे अपने गुरु के काज, परम तपस्वी है। गुरु राम.... ॥१॥ चितौड़ में हुई थी तैयारी, बीकानेर में चादर धारी, उदयपुर में पाट विराज, परम....॥२॥ आत्म ज्ञान लो आत्मज्ञानी, फिर से लिखो नई कहानी, नाना गुरु के शिष्य सरताज, परम....॥३॥ राम कहो आराम मिलेगा, आगम मन सुमन खिलेगा, ये तिरण तारण की जहाज, परम.....||४|| सदा ने कोयल बोलती, सदा न खिलते फूल। गुरु भगवंतों के दर्शन होवे, जब पुण्य होवे अनुकूल॥
-खिलती केसर महकता उपवन-06 वर्तमान आचार्य श्री को (तर्ज : देख तेरे संसार....) वर्तमान आचार्य श्री को, मेरा हो प्रणाम, जिनका अनुशासन है आज-२, प्रगटे है इस जगती तल पर, जैन जगत सिरताज जिन।।टेर॥ नेमीचंदजी के घर जाये, गवरा माँ के मन को भाये, नर नारी मिल मंगल गाये, मानवता का मान बढ़ाये, जन्म आपका देशाणे में, ओस वंश की शान ॥१॥ प्रलयकाल के बादल छाये, नानेश पूज्यवर स्वर्ग सिधाये, मुझये वो दीप जलाये, नवशक्ति चेतनता लाये। मिटा दिया है मोह तिमिर को, उज्जवल सूर्य समान ।।२। रत्नत्रय की साधना करते, जैनाचार्यजी आप कहाते, राग द्वेष को दूर हटाते, विश्व शांति संदेश सुनाते, शशि सम शीतल मधु सम मीठे, क्रांतिकारी महान॥३। सत्य आदर्शो को फरमाते, दया धर्म का पाठ पढ़ाते,
खिलती केसर महकता उपवन-卐
87
आत्म ज्योति को आप जगाते, मिथ्यातम को दूर हटाते।
त्यागी तपस्वी सरल स्वभावी, गुण रत्नों की खान ।।४।।
संयम से हो प्यार हमारा, असंयम से करे किनारा,
हम सब का यह सच्चा नारा, अमर रहे यह संघ हमारा।
कर्म शत्रु को करे नष्ट हम, पाए मोक्ष निधान ॥५॥
सुबह शाम बोलो गुरु राम
(तर्ज : छोटी छोटी गैया, छोटे छोटे ग्वाल.....)
सुबह शाम बोलो गुरु राम राम
नाम लिया सूं कटे कष्ट तमाम
बीकाणे री धरती, देशाणे रो राम-२
भूरा कुल में प्रकटै आप महान। सुबह शाम.....॥टेर॥
गंगाजल जैसा आप निर्मल, चंदा जैसा आप शीतल।
सुबह शाम..... ॥१॥
वाणी में बहावे नित अमृतधार, सुणकर हर्षे नर नार।
सुबह शाम .. ..॥२॥
-खिलती केसर महकता उपवन-69 नेमी के नन्दन है, जग में महान-२, नाना गुरु से पाया, निर्मल ज्ञान । सुबह शाम....... ॥३॥ गवरा के नन्दन है, जग में महान-२, पाता है जग जिन से, निर्मल ज्ञान । सुबह शाम...... ||४|| जीवन है जिनका गुणों की खान-२, नर नारी सारे, करें गुणगान। सुबह शाम....... ॥५॥ करिये कृपा अब करुणानिधान-२, भवजल से तारो, करो जगत्राण। सुबह शाम..... ॥६॥ गुरु राम गुरु राम मेरे भगवान, चरणों में अर्पित है, मेरे दसप्राण । सुबह शाम........ ॥७॥ आहार शुद्ध हो तो डर नहीं रोग का, व्यवहार शुद्ध हो तो डर नहीं लोक का। पाँचों इन्द्रियाँ वश में तो डर नहीं भोग का, मन वश में हो तो डर नहीं योग का॥
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खिलती केसर महकता उपवन-
प्रभु री वाणी लागे तर्ज : गंगाजी से
ज्ञान रस से भरीयोड़ी जिनवाणी लागे -२॥
म्हाने प्राणा सु भी प्यारी, प्रभुरी वाणी लागे। टेर।।
सत्य अहिंसा दया धर्म से जिनवाणी भरपूर ।
जिनवाणी सुनने से उनकी हर भव बाध दूर |
ओ जिनवाणी ही आत्म कल्याणी लागे॥१॥
जिनवाणी है प्रभु की वाणी, आगम शास्त्र प्रमाण ।
जिनवाणी का यश महा, शारदा दे नहीं सके बखाण ।।
ओ जिनवाणी वाणी -२, राणी महाराणी लागे-२॥२॥
जिनवाणी रो साचो परचो जाणे है संसार ।।
जिनवाणी है मुक्ति दाता और जीवन रो सार ।
जिनवाणी से सफल जिन्दगानी लागे-२॥३॥
जिनवाणी से पुण्य कर्म करने की मिलती शक्ति।
आओ हम सब मिलकर करले जिनवाणी की भक्ति ।।
जिनवाणी ही भक्ति की राजधानी लगे॥४॥
तन की नींद से सोये प्राणी जिनवाणी से जागे।
जप तप धर्म का बोध कराने में जिनवाणी आगे।
ओ जिनवाणी ही आगम आगवानी लागे ॥५॥
अखिलती केसर महकता उपवन-0
छुट सब जायेगा
(तर्ज : रेशमी तलवार.....)
नहीं प्रभु से प्यार, फिर क्या पायेगा।
रोना हैं बेकार, छुट सब जायेगा।।टेर।।
जो चमक रही है काया, जिसको तुमने नहलाया।
भोजन भी खूब खिलाया, और सुंदर साज सजाया।
साथ क्या जायेगा। रोना है.......॥१॥
जितनी जो जोड़ी माया, चाहे जो भवन बनाया।
रमणी को भी घर लाया, पर कितना साथ निभाया।
मन तड़फायेगा। रोना है.......॥२॥
चाहें तूं मन में फूला, पर ज्ञानी कहते भूला।
हे चार गति का झूला, जिसमें अब तक झूला॥
कहां सुख पायेगा। रोना है....... ॥३॥
मन में तू खूब लुभाया, है चार दिनों की छाया ।
रे चेतन क्यों भरमाया, क्यों शरण धर्म नहीं पाया।
फिर पछतायेगा। रोना है... ॥४॥
91 खिलती केसर महकता उपवन-5 जीवन में इतना कर ले, प्रभु प्रेम हिये में धरले। नाना गुरु को तू वरले, समता से निज को भरले। "राम" मिल जायेगा। रोना है......॥५॥ दिवसे दिवसे लक्खं, देइ सुवण्णस्स खंडियं एगो, एगो पुण सामाइयं, करेइ न पहुप्पए तस्स। एक आदमी प्रतिदिन लाख स्वर्ण मुद्राओं का दान करता है और दूसरा आदमी मात्र दो घड़ी (४८ मिनट) की सामायिक करता है, तो वह स्वर्ण मुद्राओं का दान करनेवाला व्यक्ति, सामायिक करनेवाले की समानता प्राप्त नहीं कर सकता।
-खिलती केसर महकता उपवन 92 भक्ति करता छूटे म्हारा प्राण (तर्ज : बयारे आवास घोर मुनिराज....) भक्ति करता छूटे म्हारा प्राण, प्रभुजी हूँ मांगू छू, रहे जन्म जन्म थारो साथ, प्रभु जी हूँ माँगू छू ।।टेर।। थारो मनोहर मुखड़ो जोया करूँ, रात दिवस गुण थारा गाया करूँ। रहे अंत समय थारो साथ, प्रभु जी हूँ माँगू छू ॥१॥ म्हारी आशा निराशा करणी नहीं, म्हारा अवगुण हिया मांही धरणो नहीं, श्वासो श्वास रहे थारो नाम, प्रभु जी हूँ माँगू छू ॥२॥ थारी भक्ति में रंग, मन लागी गयो, भय जन्म-जन्म नो, भागी गयो। दौड़ी आऊँ हूँ थारे द्वार, प्रभु जी हूँ माँगू छू ||३|| ज्ञान, दर्शन, चरित्र प्रभु, मुझ में भले ऐवी आशा धरूं प्रभु। आप कने आपो, शिवपुर ना संग्रात, प्रभुजी हूँ माँगू छू ।।४।। म्हारे पाप ने आप समा लीजो, थारो मुक्ति नो दास बना लिज्यो। ऐवी अंतर नी अभिलाष, प्रभु जी हूँ माँगू छू ।।५।।
-खिलती केसर महकता उपवन–
93
भगवान तुम्हारे चरणों में
(तर्ज : उठ भोर भई....)
मिलता है सच्चा सुख केवल भगवान तुम्हारे चरणों में,
यह विनती है पल-पल, छिन-छिन,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में॥टेर।।
चाहे वैरी सब संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने,
चाहे मौत गले का हार बने, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।।१।।
चाहे संकट न मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अंधेरा हो,
पर मन नहीं डगमग मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।२।।
चाहे अग्नि में मुझे जलना हो, चाहे कांटो पर मुझे चलना हो,
चाहे छोड़ के देश निकलना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।३।।
जिह्वा पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम रहे,
तेरी याद में आठों याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।।४।।
94
ज-खिलती केसर महकता उपवन
ओ मतवाले प्रभु गुण गाले
(तर्ज : फिरकी वाली तू....)
ओ मतवाले प्रभु गुण गाले, तू अपनी जुबान से,
कि तुझको जाना ही पड़ेगा, संसार से।।टेर॥
भूल गया जो तूने वादा किया था, गाऊँगा गुण गाऊँगा,
भक्ति करूँगा तेरी सांझ सवेरे, ध्याऊँगा तुझे ध्याऊँगा।
आकर भूला मन में फूला, तू वादे को भूला,
जग से जोड़ी, मूर्ख तूने तोड़ी लगन भगवान से॥१॥
महल अटारी, दौलत ये तेरी, सारी काम नहीं आयेगी,
कि है भलाई तू ने या कि बुराई, साथ तेरे वो जायेगी।
जैसा करले वैसा भरले, तू हृदय में धर ले,
जैसा देगा वहाँ वो मिलेगा, कि सुनले तू ध्यान से॥२॥
कैसा अनाड़ी नहीं सोचा अगाड़ी, अंत समय क्या होवेगा,
खाता खुलेगा जब कर्मो का एक दिन, सुन-२ कर तू रोयेगा,
पहले सोया पीछे रोया जो पाया सो खोया,
नहीं फेरी नजर गुण गान पे॥५॥
95
के गाया कर,
-खिलती केसर महकता उपवन-卐
मनुष्य जन्म अनमोल है
(तर्ज : चंदा मामा दूर के....)
मनुष्य जन्म अनमोल है, मिट्टी में न रोल रे,
अब जो मिला है फिर न मिलेगा,
कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं रे,
तु सत्संग में आया कर, गीत
प्रभु
सांझ सवेरे बैठ के बंदे, प्रभु का ध्यान लगाया कर,
नहीं लगता कुछ मोल रे, मिट्टी...
मोल रे, मिट्टी........॥१॥
तु है बुलबुला पानी का, मत कर जोर जवानी का,
सोच समझकर चलना रे, भाई पता नहीं जिंदगानी का,
सबसे मीठा बोल रे, मिट्टी.......॥२॥
मतलब का संसार है, इसमें न कोई एतबार है,
संभल संभल के कदम रखो भाई, फूल
नहीं अंगार है,
मन की आँखे खोल रे, मिट्टी.........॥३॥
गुरुदेव गुणवान है, ज्ञान के भण्डार है,
जो कोई इनके शरण में जावे, कर दे बेड़ा पार है,
ज्ञान है अनमोल रे, मिट्टी...
.
॥४॥
96
म. खिलती केसर महकता उपवन
जीवन बनाना है
(तर्ज : तारा है सारा...............)
जीवन बनाना है Best भैया स्थानक में आना,
थानक में आना भैया-२ जीवन बनाना है श्रेष्ठ भैया
थानक में आकर के नवकार जपना, प्रभु को बनाओ Dearest
थानक में आकर के नाना राम जपना, करना नहीं पहले Paste
थानक में आकर के सामायिक करना, बनना नहीं यहां Guest
थानक में आकर के प्रभुवाणी सुनना, टाइम नहीं करना है Waste
थानक में आकर के आगमवाणी पढ़ना, बन जाओगे Honest
थानक में आकर के प्रतिक्रमण करना, मुक्ति के बनों Nearest
थानक में आकर के बातें नहीं करना, हो जाओगे Arrest
थानक में आकर के प्रत्याख्यान करना, पाओगे दुःख से Rest
थानक में आकर के मुंहपत्ती लगाना, श्रावक का पहला Test
थानक में आकर के मांगलिक सुनना, केशर कहे Very best
1
1
-
कीड़ी, कमेड़ी, कागला, रात पड्या नहीं खाय।
मिनख जमारो पाई ने, रात पड़े किम खाय?
खिलती केसर महकता उपवन पल-पल उमर बीती जावे रे (तर्ज : ढोला ढोल मजीरा....) पल-पल उमर बीती जावे रे-जावे रे, चेतनिया तू गीत प्रभु का क्यों नहीं गावे रे।।टेर।। दुर्लभ नर का चोला पाया, विषयों में क्यों भटके, नदी पूर ज्यों है जवानी, फिर इतना क्यों छटके। पल में वेग उतरी जावे रे-जावे रे चेतनिया....॥१॥ माया के चक्कर में तू यहां, अन्धा बन कर डोले, इक दिन चलना होगा यहाँ से क्यों न हिया में तोले। साथ कुछ भी नहीं आवे रे, आवे रे चेतनिया....॥२॥ स्वार्थ की है दुनिया सारी, झूठी इनकी प्रीत, राजा परदेशी से पूछो, क्या नारी की रीत। जहर हलाहल पावे रे-पावे रे चेतनिया....॥३॥ बचपन तेरा बीत गया, और जवानी भी खोई, बुढ़ापे में केवल अखियां, आंसू भर-भर रोई।
-खिलती केसर महकता उपवन-08 भलाई कुछ भी न कर पावे रे-पावे रे, चेतनिया...॥४॥ बीती सो बीती चली रे, अब भी तू ले चेत, पछताने से होता क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। हारी बाजी हाथ नहीं आवे रे-आवे रे, चेतनिया...॥५॥ गणेश कहता सत्य बात है, कुछ तो धर्म कमा ले, अपना हित यदि तू चावे रे, चेतनिया तू गीत प्रभु का क्यों नहीं गावे रे॥६॥ सेवा करने वाले व्यक्ति को यह सोचना चाहिये कि मैं सेवा अन्य की नहीं कर रहा हूँ, अपितु अपने आपकी ही कर रहा हूँ। अन्य की सेवा के निमित से स्वयं की ही आत्मा का परिमार्जन कर रहा हूँ। आचार्य श्री नानेश खिलती केसर महकता उपवन- 99 卐 प्रभु मन मन्दिर में आओ (तर्ज : वीरा रुमक झूमक होय आइजो....) प्रभु मन मन्दिर में आओ, म्हारो जीवन सफल बनाओ जी॥टेर। अज्ञान नींद में सोयो, जीवन रो वैभव खोयो। थे ज्ञान रो दीप जलाओ जी॥१॥ भव-भव में भमतो आयो, नर तन यो उतम पायो। म्हारी नावा पार लगाओ जी॥२॥ मुझ ने शरणो थारो, प्रभु करुणा नजर निहारो। म्हारे दिल रा कोड पूरावो जी॥३॥ पल-पल में तुझ ने ध्याऊ, थारी कीरति मैं नित गाँऊ। म्हारे अन्तर में रम जाओ जी॥४॥ जीवो और जीने दो - भगवान महावीर -खिलती केसर महकता उपवन-100 सुख दुःख मिले रे (तर्ज : खम्मा खम्मा हो धणिया) सुख-दुःख मिले रे भाई, करमा रे परवाणे, करमा री गति कोई नहीं जाणे नहीं पहचाणे, ऐ तो करमा रे परवाणे...॥१॥ सुदर्शन पर लांछन लाग्यो, करमा रे ही कारणे, सती चंदनबाला बिक गई करमा रे परवाणे। गज सुकुमाल पर अंगारा रखिया, ऐ तो करमा रे परवाणे...॥२॥ करमा री बलवानी आगे कोई नहीं बच पायो रे, मेघमाली पारस प्रभु पर पाणीड़ो बरसायो रे, वीर प्रभु भी तेजो लेश्या झेली, ऐ तो करमा रे परवाणे...॥३॥ ब्याव रचावण गया नेमजी, छोड़ ब्याह वैराग्य लियो, पांचो पांडव वन वन भट्क्या, राम लखन वनवास लियो, करमा री गति कोई टाले ना टले, 100 खिलती केसर महकता उपवन-ज ॥४॥ ऐ तो करमा रे परवाणे...... जैसी करनी वैसी भरनी, करम तो इक परछाई है, दुःख की लड़ियां सुख की घड़ियां, करमा रे संग आई है, चावो तो मुक्ति काटो करम जंजाल ऐ तो करमा रे परवाणे....॥५॥ पल में बंधते पल में खुलते, करम सभी से न्यारे हैं, बात समझकर महापुरुषों ने, अपने करम संवारे हैं, गौतम मंडल कैवे, ऐ तो पल-पल में, ऐ तो करमा रे परवाणे.....॥६॥ पाप से डरने वाला विचक्षण है। अज्ञता हरने वाला शिक्षक है। अनन्त की यात्रा करने वालो, सुनो। मुक्ति ले जाने वाला प्रतिक्रमण है।।
-खिलती केसर महकता उपवन-102 तीन बार भोजन भजन एक बार तीन बार भोजन भजन एक बार, उसमें भी आते है, झंझट हजार। मन करता है स्थानक में जाऊँ, स्थानक में जाऊँ, जिनवाणी को पाऊँ। इतने में आ गए चार रिश्तेदार, उसमें भी आते हैं, झंझट हजार॥१॥ मन करता है सामायिक कर लूँ, सामायिक कर लूँ माला मैं जप लूँ। इतने में बज गई फोन की टंकार, उसमें भी आते है झंझट हजार ॥२॥ मन करता है दान मैं देऊँ, दान मैं देकर के पुण्य कमाऊँ। महंगाई ज्यादा बड़ा परिवार, उसमें भी आते है झंझट हजार॥३॥ मन करता है उपवास मैं कर लूँ,
॥
103 खिलती केसर महकता उपवन
उपवास कर लूँ बेला पचक्ख लूँ।
इतने में याद आया निमन्त्रण कार्ड,
उसमें भी आते है, झंझट हजार ।। ४।।
कलिमल हरणी कल्याणी
(तर्ज : जीरे री..............)
जय वीतराग री वाणी, आ वाणी गंगा पाणी रे, जय...
कलिमल हरणी कल्याणी, जय वीतराग री वाणी।
जो वीतराग ने ध्यावे, वो वीतराग बण जावै रे॥१॥
है राग-द्वेष री ज्वाला, रहे जलता दुनिया वाला रे॥२॥
ज्वाला में ठण्डक खोजे, इच्छावा में सुख सोझे रे॥३॥
करल्यू-२ कर दौड़े, रुख भौतिकता स्यूं जोड़े रे॥४॥
करणे रो अंत न आवै, उलटो उलज्यों ही जावे रे ॥५॥
ओ अजब-गजब रो खेलो है, अण जाण्या रो मेलोरे।६॥
खिण में पड़दो पड़ जावे, सब दृश्य विलप हो जावे रे।७॥
जब वीतराग निखरे, तो सहजावस्था पावरै रे॥८॥
म खिलती केसर महकता उपवन 104
ओ चमत्कार दिन चार
(तर्ज : वारी जाऊ चिरमी..........)
ओ चमत्कार दिन चार दुनिया मेलो हैं।
इमे राचै मूढ गिवार, दुनिया मेलो हैं।
सुबह जठै है रंगरैली, सिंज्या हुवै हाहाकार ॥१॥
कांच कटोरे ज्यूं खिरे, सांसारो के इतवार ॥२॥
आज करोड़ रोकड़ा, कल हो जावे कंगाल॥३॥
पटराणी बण बैठती, वा मांजे घर-घर थाल|४||
खावै पग-पग ठोकरा, अब ठण्डों पड़गयो कोप ||५||
रूप जवानी जोश में, भूल्या बुढ़ापो मौत ॥६॥
हृष्ठ पुष्ठ इंकाय में, भाई रोग छिप्यो है मौत ||७||
जीते जीरा ही हुवे सब, मात-पिता परिवार ||८||
मरयां पछै इंगात ने, नहीं राखै घर री नार।।९।।
स्वा. संसार में हैं कुण बेटो कुण बाप ॥१०॥
करयां कर्म है भोगणा, भाई करनी आपो आप॥११॥
जो परलोक सुधारणो, भाई धर्म ध्यान अब धार ॥१२॥
-VYXम:
16-खिलती केसर महकता उपवन
जिस दिन प्रभु का दर्शन होगा
(तर्ज : झिलमिल सितारों का)
जिस दिन प्रभु का दर्शन होगा,
धन्य वह घड़ी, वह धन्य दिन होगा,
नन्दन वन सा पावन मेरा तन मन होगा।।टेर।।
कोयल कूहू-कूहू कूके जैसे, पीपी पपीहा पुकारे रे।
चकवी देखे राह रवी की, चातक मेघ निहारे रे।
ऐसी लगन कब पूरन होगी ॥१॥
कान बनेंगे सफल वाणी से, अँखिया मुख कमल लखकर
जिह्वा मधुर-मधुर गुण गाकर, हाथ चरण का स्पर्श कर,
आनन्दमय मेरा क्षण-क्षण होगा।॥२॥
श्रद्धा दीप संजोकर आरती, मन ही मन में उतारूंगा।
चरण कमल की रज सिर धर, भाव विभोर निहारूंगा।
केवल मुनि धन्य जीवन होगा।॥३॥
-खिलती केसर महकता उपवन-100
मेरी जिंदगी की शान हो
भगवान तेरी आराधना, मेरी जिंदगी की शान हो
मुझे एक यही वरदान दो, मेरी आत्म बलवान हो।टेर।।
मुझे सुख की कोई परवाह नहीं, दुख में भी निकले आह नहीं।
बस एक तेरा ध्यान हो, होठों पे तेरा नाम हो॥१॥
दौलत रहे या ना रहे, खुशियां हो चाहे गम रहे।
चाहे आंधी हो तूफान हो, विचलित न मेरा ध्यान हो॥२॥
पथ में हजारों विघ्न भी आए डिगाने जो अगर।
चाहे सामने शैतान हो, मेरे प्राण भी कुर्बान हो॥३॥
तू सूर्य है मैं कमलिनी, तूं चंद्र है मैं कुमुदिनी।
तव कमल पद में स्थान हो, भक्ति ही मेरी तान हो ॥४॥
तू धर्म भानु लोक में, तेरे दिव्य ललितालोक में।
मिटे तिमिर ज्ञान विज्ञान हो, मुक्ति ही मेरा धाम हो॥५॥
--
रे।
100 खिलती केसर महकता उपवन-म
रे मानव तू प्यार कर
(तर्ज : यारी हो गई यार से......)
मानव तू प्यार कर भगवान से, हो हो....रे मानव
सुख
मिले
दुख टले प्रभु के नाम से ।। टेर॥
नश्वर है काया तेरी क्यों अभिमान करे, ऽऽऽ
करना है सो करले बन्दे काम ना टले,
जप ले, भजले, तू शुद्ध भाव से ऽऽऽ ।। रे मानव....
इस जग की है झूठी माया, झूठा ऽऽऽ झमेला
आया है तूं यहां अकेला, जाये अकेला
संग तेरे, ना चले, तूं सुन ध्यान से॥रे मानव.....
डगमग डोले नाव भंवर में ना है किनारा।।
आदेश्वर मण्डल को भगवन, तेरा सहारा
गुण तेरे, गा रहे, हम भक्ति भाव से॥रे मानव....
राम नाम सद्गुण भरा, अमृत रस की धार।
णमो-णमो शुद्ध भाव से-क्रोड़ो-क्रोड़ो बार।।
# खिलती केसर महकता उपवन-108 चलो ना अकड़ के (तर्ज :....) धरती के हो चांद सितारे चलो ना अकड़ के अपने जीवन को देखो जरा मुड़ के, तुम तो चलो ना अकड़ के ।।टेर। आये अकेले इस धरती पर, लौट अकेले जाओगे, बोवोगे जो बीज आक का आम कहाँ से पाओगे। रावण और कंस जैसेऽऽऽ गए मरके ॥१॥ फूल जैसी कोमल काया, खाक में मिल जाएगी, देख दशा यह प्यारे मित्रों, अंखिया नीर वहायेगी, झूठे बहारों के लिएऽऽऽ दिल ठग के॥२॥ चलो मानकर सबको भाई धरा स्वर्ग बन जायेगी, सत्य अहिंसा और धर्म की कलियां फिर खिल जाएगी, गुरुवर की महिमा गाओऽऽऽ जिया भर के॥३॥ तीन बाते मनुष्य को सुखी बनाती है .: १. कम खाओ २. गम खाओ ३. नम जाओ
109) खिलती केसर महकता उपवन-
卐
सत् संगत से सुख मिलता है
(तर्ज - जय बोलो महावीर.....)
सत् संगत से सुख मिलता है
जीवन का कण-कण खिलता है || टेर ।।
सत् संगत से सद्ज्ञान मिले, सत् संगत सेही भगवान मिले
पानी से पौधा खिलता है ।।१।।
सत् संगत से ही वैराग्य बढ़े, सत् संगत से ही सौभाग्य बढ़े
दीपक से दीपक जलता है ॥२॥
नास्तिक से आस्तिक बन जाता, पापी भी पावन बन जाता
चाबी से ताला खुलता है ॥३॥
कपड़े को जैसा रंग मिले, मानव को जैसा संग मिले
वस उसी ढंग में ढलता है ॥४॥
लाखों का भाग्य जगाया है, लाखों को पार लगाया है
सत्संग से सिद्धि मिलती है ॥५॥
॥
म खिलती केसर महकता उपवन-110
वैराग्य उपज सकता है
जीवन के किसी भी पल में वैराग्य उपज सकता है
संसार में रहकर प्राणी संसार को तज सकता है। टेर
कोई दर्पण देख विरक्ति, कोई मृतक देख वैरागी
बिन कारण दीक्षा लेते, वो पूर्व जन्म के त्यागी
निग्रंथ साधु जितने भी सद्गुणों से सज सकता है ।।१॥
आत्मा तो अजर अमर है, हम आयु गिने इस तन की
वैसा ही जीवन बनता, जैसी धारा चिंतन
वो खुद ही समझ सकते है, औरों को समझाता है ।।२।।
शास्त्रों में सुने थे जैसे देखे वैसे गुरूवर को
उपकारी परम तपस्वी, तेजस्वी राम गुरूवर
जिनकी मूदुवाणी सुनकर, हर प्रश्न सुलझ सकता है ।।३
दिया नहीं दान जब घर में सामान था।
भजा नहीं राम जब घर में आराम था।
m-खिलती.केसर महकता उपवन-卐
तपस्या जीवन
(तर्ज : तपस्या जीवन .....)
तपस्या जीवन रो श्रृंगार सारा ज्ञानी केवे,
तप में भारी चमत्कार सारा ज्ञानी केवे...॥टेर।।
हिम्मत री है कीमत भारी,
हिम्मत री है महिमा न्यारी।
तपस्या हिम्मत रो आधार-सारा ज्ञानी......॥१॥
वीर पुरुष ही तपस्या करसी,
जन्म-जन्म रा पातक झरसी।
सारो हिम्मत रो व्यापार-सारा ज्ञानी.....॥२॥
तप करने स्यूँ कुल चमकेला,
तप रे आगे देव झुकेला।
तप में शक्ति है अपार-सारा ज्ञानी......॥३॥
तप दीपक री ज्योति निराली,
अन्तर तप ने हरने वाली।
तपस्या इच्छित फल दातार-सारा ज्ञानी.......॥४॥
-खिलती केसर महकता उपवन-10
सावन का महीना
(तर्ज : सावन का महीना .....)
सावन का महीना तपस्या है चारो ओर,
देख-२ कर इनको सारे हो गये भाव विभोर ।। टेर।।
तपस्या की भावना तो कभी-२ आती,
नई-२ चीजे खाने जीभ ललचाती।
खाने पर भी लगती यह काया कमजोर-२ देख-देख..॥१॥
तपस्या की महिमा भारी कहते है सारे,
रोग शोक मिटते पल में तप के सहारे।
तपसरिता में नहाओकर मन को जरा कठोर-२ देख-देख..२
साधुमार्गी संघ तप की खान निराली,
रहती है पल-२ रामा गण में दीवाली।
बरसे घर-२ में तप की घटा घनघोर देख-देख.......॥३॥
जीतयशाजी म.सा. ने उग्र तप ठाया,
कोरमंगला संघ का भाग्य सवाया।
रामगुरु की कृपा से चहका "चन्द्र" चकोर देख-देख.....॥४॥
-खिलती केसर महकता उपवन-म
113)
घुघरू छमछमाछम
(तर्ज : घुघरू छमछमाछम......)
धुंघरू छमछमाछम छण णण णणण बाजै रे, बाजै रे।
तपसी रे आँगणिये, शासण देव विराजै रे॥ध्रुव ।
तप स्यूं होवे निर्जरा, तप स्यूं कर्म खपाय।
तप स्यूं बचगी द्वारिका, कह्यो सूत्र रे माय ॥१॥
घोर तपस्वी धन्ना मुनिवर, काढ्यो तन रो सार।
शालिभद्र भी करी तपस्या, मासखमण अवधार ॥२॥
हु शि उ चौ श्री ज ग ना रा, रसना ने दी मार।
झूम झूम गुण गाथा गावो, कटज्या कष्ट तमाम ॥३॥
तप रो ताप तपावै तन ने, तपज्या मनो विकार।
साचो तपसी करै सदाई, क्रोध मान परिहार ।।४।।
घर में जद गंगा वहै, करल्यो आंगण साफ।
मैली चादर धोयल्यो, मिटज्या मन रा ताप॥५॥
॥
का खिलती केसर महकता उपवन-14
एक बार आओ तप रा गीत
(तर्ज : एक बार आओ जी.....)
एक बार आओ तप रा गीत आपां गावां।
कर्मा रो मैल सारो धो पावां, तप रा गीत....
तप री नौका स्यूं भव जल तर ज्यावां स्थायी।
जनम-जनम रा कष्ट काटै, तप संयम री साधना,
काया कंचन-सी हो ज्यावै, मिटज्या मन री वासना।
आओ तप गंगा में न्हाकर सुख पावां॥१॥
खाणे में विवेक राख्यां, रोग सारा मिट ज्यावे,
जीबड़ी री स्वाद छोड्या, शेष संयम सध पावे।
तपसी सन्तां रा आपां गुण गावां॥२॥
हुक्म गच्छ में हुया तपस्वी, एक-एक स्यूं जबरा हो,
हो ज्यावो तैयार सारा, कसकर काठी कमरां हो।
बरसे है रिमझिम सावण आपां हरसावां ॥३॥
एक बास करणे वालो भी, कर्म खपावे है भारी,
मास खमण कर कर लाखां ही, अपनी आत्मा ने तारी।
रामगुरु रे शासन में सब मोज मनावां ॥४॥
118)-खिलती केसर महकता उपवन-卐
तप में शक्ति अपार
(तर्ज : ना कजरे की धार)
तप में है शक्ति अपार, है आधि-व्याधि-उपचार,
है चौथा शिवपुर द्वार वीर प्रभु ने गाया है।
तप को श्रेष्ठ बताया है।
तप है शुद्धि का शासन, तप है मुक्ति का आसन,
हो सत्य अहिंसा समता का जीवन में आराधन।
पाऐ उजाला, अमृत प्याला तप जीवन का आधार ॥१॥
तप की महिमा सब ग्रन्थो, धर्मो में है बतलाई,
जीवन को सफल बनाने तप है अतिशय वरदाई।
तप गुण गाऐ, मौज मनाएं, तप गंगा है सुखकार ॥२॥
जो मन से तप अपनाता, सुरपति भी शीष झुकाता,
तप आत्मशांति को देता गण-गौरव खूब बढ़ाता।
मन को साधे, तप आराधे, हो जाएं बडा पार ॥३॥
शासन में हुए तपस्वी है एक-एक से भारी,
तपसी के चरण कमल में हम बार बार बलिहारी।
तप नोका, पाले मोका, हो जाए जय-जयकार ॥४॥
-खिलती केसर महकता उपवन-110 घड़ी तपस्या री (तर्ज : तावडो धीमो बादली गहरी.....) घड़ी तपस्या री आई रे, घड़ी अनुमोदन री आई, कोई अठाई पक्खवाड़ा री झड़िया लागी रे । झड़ी तपस्यारी लागी रे...टेर ।। संत समागम मिलणो मोको, तरस-२ रह जावे। ओ भाई तरस-२ रह जावे। कोई इण जीवन स्यूं सफल आपरो जीवन कर जावे। झड़ी तपस्यारी लागी रे...॥१॥ सावण भादौ री बरसाता लागे ज्यों प्यारी, ओ मन में लागे ज्यों प्यारी कोई तपस्या करने वाला री, तो बात्या ही न्यारी झड़ी तपस्यारी लागी रे...॥२॥ कोई १५, २० मासखमण री झड़िया लागी रे झड़ी तपस्यारी लागी रे...॥ .
तो.....) M-खिलती केसर महकता उपवन-卐 तपस्या रो अद्भूत रंग (तर्ज : मिलो ना तुम तपस्या रो अद्भूत रंग लाग्यो सबरो मन हर्षायो कि मंगल कामना है यही शुभ भावना है जीतयशाजी ने म्है देवा बधाई, तप रो रंग रचायो कि मंगल कामना है यही शुभ भावना है ।। टेर।। तपस्या री आग में तपे, वो ही करे निर्मल आत्मा कर्म खपाणे स्यूं ही प्रकट हुवे है परमात्मा त्याग तपस्या स्यूं जीवन ने कुन्दन ज्यूं चमकायो कि मंगल कामना है यही शुभ भावना है ॥१॥ खावण पीवण में सगला ही करले होड़ा होड़ है खेलण कुदण में मिल जावे खाली सारी रोड है पर तपस्या रे संग खेलणिया शिव पथ ने अपनायो कि मंगल कामना है यही शुभ भावना है ॥२॥ अवसर रा बाया मोती चावै है सगला ही पावणा बढ़ता ही रहिज्यो तप में दिन दुना और रात चौगुना तप री पावन महिमा ऊपर निर्मल गीत सुनायो कि मंगल कामना है यही शुभ भावना है।।३।।
-खिलती केसर महकता उपवन आचार्य पाटावली जिनशासन में श्री साधुमार्ग सुखकारी, हुए एक-२ से पुण्य पुरुष गुणधारी।।टेर। प्रथम पाट पर हुक्म मुनीश्वर सोहे-२, कर छट-२ पारणा जन-जन का मन मोहे। बन्धन टूटा और कुष्ठ रोग हुआ दुरा-२, रुपये बरसे संयम में फिर भी शुरा। क्रियोधारक गुरुराज बड़े उपकारी....॥१॥ ज्ञान-क्रिया संयुक्त कवि विख्याता, शिवलाल महामुनि शिवमार्ग के दाता। थे तत्व ज्ञान में प्रमुख सिंह सम गाजे-२, किये तेतीस वर्ष एकान्तर मोक्ष के काजे । हुक्म गच्छ की खूब खिलाई क्यारी.....॥२॥ उदयसागर महाराज तत्व अनुरागी-२, तोरण पर जाकर मोह, माया को त्यागी।
थे 119 खिलती केसर महकता उपवन-म थे क्रिया निर्मल क्षमाशील गुण धामी, अनुशासन में वज्र संघ के स्वामी। महाप्रभावक विनयी उग्र-विहारी.........॥३॥ चौथे पाट पर चौथ पुज्य गुणवन्ता, थे शांत दांत गंभीर महा-निर्ग्रन्था। सहे कठिन परीषह तजकर ममता तन की, की शुद्ध साधना से शुद्धि चेतन की। स्वाध्याय रसिकथेपुज्यवर अल्पाहारी....॥४॥ पुज्य श्रीश्रीलालजी काम विजेता-२, जम्बू स्वामी सम अद्भुत योगी नेता। श्रीपति नरपति चरण शरण में आते-२, पा धर्म बोध निज जीवन को चमकाते। जीव दया का काम किया बहुभारी......॥५॥ पुज्य जवाहर लाल सुयश में गाता-२, थे महातेजस्वी ओजस्वी व्याख्याता।
120 म खिलती केसर महकता उपवन दया-दान का डंका तुमने खूब बजाया, हे राष्ट्रधर्मी तव क्रान्तिकारी माया। वादी मान मर्दक थे दृढ़ व्रत धारी...... ॥६॥ पुज्य गणेशीलाल महात्मा ज्ञानी-२, थे श्रमण संघ के संचालक अगवानी। पर यश-पद लिप्सा जरा कभी नही जागी-२, संयम रक्षा हित पदवी तुमने त्यागी। श्रमण धर्म के रक्षक शुद्धाचारी.....॥७॥ नानेश गुरु ने अष्टम पाट दिपाया-२, दीक्षाओं का भी जब्ब ठाठ लगाया। ध्यान समीक्षण समता दर्शन प्यारा-२, हे धर्म पाल प्रतिबोधक नयन सितारा। दीर्घ दृष्टा विचक्षण व ब्रह्मचारी.... ॥८॥ खिला संघ का भाग्य राम गुरु पाये-२, पा क्रियानिष्ठ अनुशासक सब हर्षाये। . .
12 120-खिलती केसर महकता उपवन-卐 है तपस्वी ध्यानी मौनी सरल स्वभावी-२, प्रशान्तमना शास्त्रज्ञ वे सेवा भावी। युग-युग जीओ है नवमें पट्ट अधिकारी....॥९॥ गुणग्राही बनकर सभी पुज्य गुण गाए-२, श्री चतुर्विध संघ से एक्य भाव अपनाए। दृढ़ श्रद्धा निष्ठा भाव समर्पण लाए-२, जिनशासन की हम महिमा खूब बढ़ाए। मुनिगौतम महापुरुषों का सदा पूजारी.. ॥१०॥ गुलाब के फूल में सोरभ सुरभ्य होता है। उदीयमान सूरज की आत्मा अक्षम्य होती है। लेकिन मानना पड़ेगा इससे भी बढ़कर भव्यो- गुरु भक्ति की शक्ति संसार में अगम्य होती है।
म-खिलती केसर महकता उपवन-122
श्री नानेश चालीसा
॥ दोहा ॥
भक्ति भाव शुद्ध मन पढ़े, प्रतिदिन जो नर नार ।
भवोदधि से वो पार है, शंका नहीं लिगार ||१||
अंतर शांति प्राप्त की, परचा हैं यह प्रत्यक्ष ।
एक बार अजमाईये, कहते हैं जन दक्ष ॥२॥
॥चौपाई॥
जय नानेश गणी अवतारी। विपद हरो गुरुदेव हमारी ॥१॥
माता शृंगारा के जाये । मोडी सुत जग में कहलाये ॥२॥
दाता गाँव में जन्म हैं पाया। जन्म भूमि का यश फैलाया ॥३||
नाम है नाना काम विशाला । पोखरना वंश को उजियाला ॥४॥
लघु वय में सब लोक निहारा । छोड़ दिया फिर सब संसारा ॥५॥
पूर्व प्रबल पुण्योदय आया । गणपति गण का गणी कहाया ॥ ६॥
सहन शीलता गजव तुम्हारी । लखकर प्रमुदित जनता सारी ।।७।।
लाखों धर्मपाल बनाया । समता का संदेश सुनाया |८||
गुरू परमारथ तुमने कीना | पंथ प्रभु महावीर का दीना ।।९।।
नयन-हीन इक वृद्धा माई । दर्शन की ज्योति प्रकटाई ॥१०॥
122-खिलती केसर महकता उपवन 卐 दैव नौका को उल्टी कीन्हा । भक्त उबार अभय वर दीन्हा ॥११॥ आधि व्याधि तन मन छाई । नाम रटा तब सब ही नसाई ॥१२॥ शुभ भावों से जो कोई ध्यावे । भव जल तरणी पार लगावें ॥१३॥ पंच अतिशय के तुम धारी । कलियुग में प्रगटे अवतारी ॥१४॥ सकलागम के तुम हो ज्ञाता । महादानी तुम शिव के दाता ॥१५|| तत्त्व ज्ञान नवनीत निकाला । देते भर भर प्रेम का प्याला ॥१६॥ वाणी में हैं ओज निराला । सुन नर-नारी कहते व्हाला ||१७|| नहीं तुमसा जग में कोई योगी । मोक्ष मार्ग में तुम सहयोगी ॥१८॥ धन्य-धन्य हैं जैन समाजा । पाया तुमसा गुरू महाराजा ।।१९।। नहीं जो शीतलता चन्दन में । पाई वह तेरे चरणन में ॥२०॥ हुक्म संघ के अष्टम नेता । हो तुम अष्ट कर्म विजेता ॥२१॥ सुर नर चरण शरण में रहते { पा वचनामृत हिय घट भरते ।।२२।। तुम सुख शांतिश्री के दाता । तुम भव्यों के भाग्य विधाता ।२३। तीन लोक में महिमा भारी । हैं हम सब तव चरण मझारी ॥२४॥ नहीं चिंतामणि तुम सम गुरूवर । वह तो हैं केवल जड़ पत्थर ।२५। नहीं उपमा रवि-शशि की देता । उष्ण सूर्य चंदा घट बढ़ता ।२६। कामधेनु हैं पशु बेचारा । प्रभु सागर सारा हैं खारा ॥२७|| खिलती केसर महकता उपवन–128 नहीं कोई उपमेय जगत में । इसलिये तव बना भगत में ॥२८॥ जिस जन-मन में आप बिराजे । अष्ट कर्म अरि दूरा भाजे ॥२९॥ श्रमण संघ के प्रवल सैनानी। नहीं तुमसा कोई दूजा सानी ॥३०॥ सिंह गज अग्नि विषधर सारे । भूतादिक भय दूर निवारे ॥३१॥ शुद्ध मन सेवा जो आराधे । मन-वांछित कारज वो साधे ॥३२॥ आयरिया पद के अधिकारी । शिष्य सम्पदा हैं बहु भारी ||३३|| गजब आपकी भाषण शैली। समवशरण की छटा निराली॥३४॥ दर्शन एक बार जो पाया । फिर दूजा कोई दाय न आया ॥३५॥ सकल संघ हैं ऋणि तिहारा कैसे उतरे कर्ज हमारा ॥३६॥ संगठन प्रेमी गहन गम्भीरा । दीपत ब्रह्म तेज शरीरा ॥३७॥ जय जय हो गणीवर नानेशा । संघअधिनायक जय अखिलेशा॥३८॥ तुमने लाखों प्राणी तारे । क्या हैं गुरु अपराध हमारे ॥३९|| वन्दन श्री चरणों में नाना | धर्म "गौतम" को पार लगाना ॥४०॥ : दोहा : समति गुप्ति नभकर, वर्ष भीम शहर चौमासा । "मुनि गौतम" पूर्ण करी, श्री नानेश चालीसा ॥
.. खिलती केसर महकता उपवन- (125) श्री रामेश चालीसा ॥दोहा॥ वीर प्रभु का ध्यान धर, ले सबल नानेश । गुरू गुण गाऊँ प्रेम से, जय जय जय रामेश ||१|| हुक्म गच्छ के नाथ हो, ज्योतिपुंज गुण धाम श्रद्धायुत् श्री चरण में, वंदन हो निष्काम ॥२॥ ॥चौपाई॥ जय जय राम नाम सुख कन्दा। जय जय जय भूरा कुल चन्दा॥१॥ पिता नेम के नयन सितारे । माँ गवरां के प्राण पियारे ॥२॥ दो हजार नो चेत सुहाना । सुद चौदस धारा तन बाना ॥३॥ देशनोक में मंगल छाया । मरूमाटी का मान बढ़ाया ॥४॥ जन्म नाम जयचन्द कहाया । पुर परिजन मन राम सुहाया ॥५॥ पढ़कर जैन जवाहर वाणी । तिरे अनेकों भवि जन प्राणी ॥६॥ कथा अनाथ सनाथ पढ़ी जब । धर्म शक्ति पहचानी थी तब ||७|| मुनि बनूं गर रोग नसावें । धारा मन में परचा पावें ॥८॥ फिर नानेश शरण में आये। संयम लेने को ललचाये ॥९॥ पूनम संत फतह अरू मोती । हुए प्रसन्न जब चर्चा होती ॥१०॥ ।
खिलती केसर महकता उपवन-120 । संयम पथ की करी समीक्षा । तब गुरूवर से लीनी दीक्षा ॥११॥ तन की ममता दूर निवारी । मन की समता खूब निखारी ॥१२॥ मनोयोग से सेवा साधी । वीतराग आज्ञा आराधी ॥१३॥ गुरू आज्ञा में मुझको खोना । धारा जल्दी पावन होना ॥१४॥ जो साधक लायक बनता हैं । वो संघ का नायक बनता हैं ॥१५॥ बने संघ के तुम अधिकारी । फैली महिमा जग में भारी ॥१६॥ नाना से तुम तुम से नाना । लगता चेहरा एक समाना ॥१७॥ पंचाचार पलावें पाले । मर्यादाओं के रखवाले ॥१८॥ सकल शास्त्र के तुम हो ज्ञाता । पंडित गण भी लख हर्षाता ॥१९॥ महाज्ञानी हैं महा तपस्वी । महाध्यानी हैं महा मनस्वी ॥२०॥ मौनी आत्म जयी कहलाते । महावीर का धर्म निभाते ॥२१॥ उपधि अल्प मेधावी राया । अतिशय धारी अद्भुत माया ॥२२॥ सम्यक् श्रद्धा शक्तिमान है। श्री बहुश्रुत जी सत्यवान है ॥२३॥ सादा जीवन गुरूवर त्यागी । ऊँचा चिंतन जिन अनुरागी ॥२४|| क्रिया चारू चरित सवाया। मानो चौथा आरा आया ||२५|| जीवन में दर्शन आगम के । राम गुरू सूरज सम चमके ||२६|| व्यसन मुक्त सन्देश सुनाया। सुख शांति का मार्ग दिखाया ॥२७॥ ।
खिलती केसर महकता उपवन-
(127
।
घट-घट ज्ञान प्रदीप जलाये । तत्त्व ग्रंथि को खोल बताये ॥२८॥
मिथ्या सम्यक् भेद बताया। जिन धर्मी का मान बढ़ाया ॥२९॥
नयनों से अमृत झरता है । पापी भी पावन बनता है ॥३०॥
कृपा किरण जब जिस पर पड़ती। मन की कलिये उसकी खिलती ॥३१॥
राम नाम संकट सब हर्ता । राम नाम संपत सब कर्ता ॥३२॥
राम नाम है जन हितकारी । राम नाम है मंगलकारी ॥३३॥
जपो राम सुख दुःख की बेला । जपो राम जन बीच अकेला ॥३४॥
क्षमा-श्रमण हे शांत सुधाकर । करूणा सागर धर्म दिवाकर ॥३५।।
सुनो सुनो गुरूदेव हमारी । आई है अब मेरी बारी ॥३६॥
मारग लम्बा घोर अंधेरा । साथ चलो या करो सवेरा ॥३७॥
टूटी नैया दूर किनारा । भव जल शोखो बनो सहारा ॥३८॥
पौरूष जागे आलस भागे । शुभ आशीष यही हम मांगे ॥३९॥
"गौतम की है यही पिपासा । अजर अमर दो शिव पद वासा ॥४०॥
॥दोहा॥
चालीसा गुरू राम का, संकट मोचन हार ।
पढ़े सुने जो भाव से, होवे भव से पार ॥१॥
काया रस नभ पद बरस, मास पोष बद ध्यान ।
"मुनि गौतम रचना करी, बालाघाट सुस्थान ॥२॥
मा-खिलती केसर महकता उपवन-
संघ समर्पणा गीत
संघ हमारा अविचल मंगल, नन्दन वन सा महक रहा ।
हम सब इसके फूल व कलियां, सुन्दरतम निज संघ अहा ॥१॥
वीर प्रभु के उपदेशों ने, संघ की महिमा गाई है ।
सुर नर वन्दन करें संघ को, संघ साधना भाई है ॥२॥
संघ समष्टि का हित करता, व्यष्टि उसमें शामिल है।
संघ हेतु निज स्वार्थ तजे जो, वही प्रशंसा काविल है ॥३॥
व्यक्तिवाद विद्वेष बढ़ाता, संघवाद दे प्रेम सदा।
व्यक्तिभाव को छोड़ समर्पण, संघ भाव में रहें सदा ॥४॥
व्यक्ति अकेला निर्बल होता, संघ सबल होता मानें।
संघे शक्ति कलौ युगे की, सत्य भावना पहचाने ॥५॥
एक सूत्र कोई भी तोड़े, रस्सी हस्ती को बांधे ।
एक-एक मिल बना संघ यह, दुस्सम्भव को भी साधे ॥६॥
संघ श्रेय में आत्म श्रेय है, ऐसा दृढ़ विश्वास मेरा |
संघ में मुझ में भेद न कोई, बोल रहा हर श्वास मेरा ॥७॥
129 खिलती केसर महकता उपवन-
卐
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संघ परम उपकारी हमको, संघ ने सम्यक् बोध दिया ।
संघ न होता हम क्या होते, संघ ने हमको गोद लिया ॥८॥
शैशव, यौवन, वृद्धावस्था, सदा संघ उपकारी है।
भव सागर से तारणहारा, हम इसके आभारी है ॥९॥
नगर, चक्र, रथ, पद्म, चंद्र, रवि, सागर, मेरू की उपमा ।
सूत्र नन्दी में संघ गौरव की, क्या कोई है कम महिमा ॥१०॥
प्रेम सूत्र में बन्धा संघ है, हिल - मिल आगे बढ़ते है।
निन्दा, विकथा तज गुणीजन के गुण गण मन में धरते है॥११॥
दूर हटा छल, छद्म, अहं को, सरल, सहज, सद्भाव धरे ।
परहित हेतु तज, निज इच्छा, सहज सुकोमल भाव वरे ॥१२॥
नाम अमर है उन वीरों का, जिनने संघ सेवा धारी।
अपना कुछ ना सोच किया, सर्वस्व संघ पे वलिहारी ।।१३।।
यही प्रार्थना वीर प्रभु से, ऐसी शक्ति दो हमको ।
संघ सेवा में झौंके जीवन और न कुछ सूझे हमको ॥१४॥
संघ हेतु कुर्बान हमारा, तन-मन-जीवन सारा है ।
संघ हमारा ईश्वर, हमको-संघ प्राण से प्यारा है ॥१५॥
-खिलती केसर महकता उपवन-130 चमड़ी कागज खून की स्याही, अस्थि लेखनी लेकर के। रचे भले संघ गौरव गाथा, उऋण न हो उपकारों से ॥१६॥ अरिहंत सिद्ध सुदेव हमारे, गुरू निर्ग्रन्थ मुनीश्वर है। जिन भाषित सद्धर्म दयामय, नित्य यही अंतर स्वर है ॥१७॥ सद् गुरू आज्ञा ही प्रभु आज्ञा, इसमें भेद न कोई है । शास्त्र-शास्त्र में जगह-जगह पर, वीर वचन भी वो ही है॥१८॥ संघ नायक! संघ मालिक, हम सब साधु मार्ग अनुयायी हैं। और नहीं दूजे हम कोई, बस तेरी पर-छाई हैं ॥१९।। रत्नत्रय शुद्ध पालन करके, तोड़े कर्मो की कारा । नाना गुण का धाम संघ है, घर-घर गुंजे यह नारा ॥२०॥ स्वार्थ मान को छोड़, संघ की सेवा जो नर करता है । इह-परलौकिक कष्ट दूर कर, सौख्य संपदा वरता है ॥२१॥ जो भी वैयावृत्य (सेवा) करते है, वे कभी न धोखा खाते हैं। यहाँ रोज सराहे जाते हैं, वहाँ उंची पदवी पाते हैं।
-खिलती केसर महकता उपवन-' आलोयणा अहोनाथजी! पाप आलोऊ पाछला, दिन रातरा, केइ जातरा, किया पंचेन्द्रिय विनाश, मार्या गले देइ फास, घणा खाया मद्य मांस, दीनानाथजी, सगला के संग, माफी मांगू आज जी, मानो बातजी। ते मुझ मिच्छामि दुक्कडं ॥ टेर॥१॥ अहोनाथजी! प्राण लूटया छः कायना, कई जाण में, केई आजाण में, मैं नहीं जाणी पर पीड़ा, चाप्या कुंथुवा ने कीड़ा, खाया पान सेती बीड़ा, दीनानाथ जी....... ॥२॥ अहोनाथजी! वनस्पती तीन जातरी, केइ भांतरी, छमकी सांतरी, तोड्या पत्र-फूल, सेक्या गाजर कंद मूल, खाया भर भर लूण, दीनानाथजी........॥३॥ अहोनाथजी!
का-खिलती केसर महकता उपवन-100
अचार घाल्या हाथ सूं, चीप्या दांत सूं, घणी खांत सूं
मांही भर्या है मसला, खादा भर भर प्याला,
आया फुलणियारा जाला, दीनानाथजी.....॥४॥
अहोनाथजी!
पानी आलोच्या तलाब रा, कुआं बावरा, नदियां नालरा,
फोड़ी सरवर नी पाल, तोड़ी तरूवर नी नाल,
हेम गिरा दिया गाल, दीनानाथजी.....॥५॥
अहोनाथजी!
अधर आकाश ना झोलिया,
भर भर मेलिया, ऊन ठंडा भेलिया,
दीना अर्थ अनर्थ ढोल, किया अणजाण्या अंघोल, जाणे
मांडी भैंसा रोल, दीनानाथजी...॥६॥
अहोनाथजी!
मातासुं बाल बिछोविया, घणा रोविया, दुधिया दोविया,
खोस्या नानडिया-सा बाल, पराये पेटां पाडी झाल,
तोड्या पांखियों रा माल, दीनानाथजी....॥७॥
-खिलती केसर महकता उपवन- . अहोनाथजी! जूं माकड़ ने मारिया, रोकिन राखिया, रस्ते नाखिया, तडके दिया माचा मेल, ऊपर उना पाणी ठेल, आगे होसी घणी हेल, दीनानाथजी ॥८॥ अहोनाथजी! सियाले सिगडी करी, खीरा भरी, चवडे धरी, मांही पड पड मरिया जीव, पाप किया निश दीव, दीधी नरकां री नींव, दीनानाथजी........॥९॥ अहोनाथजी! उनाले वाय विजिया, फूल बिछाविया, पाणी सिंचिया, कीधी बागां माहे गोठ, खाया चूरमा ने रोट, वांधी पाप तणी पोट, दीनानाथजी.. ॥१०॥ अहोनाथजी! चौमासे हल हांकिया, बैल भूखा राखिया, मार्या चाबूकिया, फोड्या पृथ्वी रा पेट, मार्या सांप सपलेट, दया नहीं आणी ठेट, दीनानाथजी.....॥११॥ Meen
-खिलती केसर महकता उपवन-134
अहोनाथजी!
जूना नवा कर बेंचिया, सुलिया संचिया,
अनसोया दीधा पीस, इल्यां मारी दस बीस,
दया नहीं आणी शीष, दीनानाथजी...॥१२॥
अहोनाथजी!
दूध, दही, छाछ, आछरा, शरबत दाखरा, केरीपाकरा,
वली घीरत ने तेल, दिया उघाडा ही मेल,
किडियां आई रेलम ठेल, दीनानाथजी........॥१३॥
अहोनाथजी!
कूड कपट छल ताकिया, नहीं भाखिया, छाना राखिया,
बोल्या मृषावाद झूठ, धाडो पाड लाया लूट,
जंत्र मंत्र मारी मूठ, दीनानाथजी......... ॥१४॥
अहोनाथजी!
पनारी धन चोरिया, होली खेलिया, गाइ गारिया,
देख्या तमाशा ने तीज, ताल्या पाड़ी होय हीज,
गाल्या गाई घणी रीज, दीनानाथजी.........॥१५॥
138)-खिलती केसर महकता उपवन-क अहोनाथजी! अवगुणवाद गुरू तणां, बोल्या घणां, अणसुहावरणा, मैं नहीं जाण्यो अज्ञानी, निंदा कीधी छानी छानी, मैं नहीं धाम्यो अन्न पाणी, दीनानाथजी....॥१६॥ अहोनाथजी! सूस किया मैं मोटका, केई छोटका, किया खोटका, छाने छाने किया पाप, सो तो देखी रह्या आप, मारे थें छो माय बाप, दीनानाथजी........ ॥१७॥ अहोनाथजी! भोजन भली भली भांतरा, केई जातरा, खाया रातरा, पीधा अण छाण्या पाणी, दया दिल नहीं आणी, पर पीड़ा न पिछानी, दीनानाथजी....... ॥१८॥ अहोनाथजी! सासु सोक सुहासणी, पाडोसणी, सताई घणी, मुख सुबोली मोटी गाल, मैं तो दिया कूडा आल, रोगी तपसी बूढा बाल, म खिलती केसर महकता उपवन-138 जाकी कीधी न संभाल, दीनानाथजी.........॥१९॥ अहोनाथजी ! स्त्री भांत पडाविया, गर्भ गलाविया, जीव जलाविया, मारी जू ने फोडी लीख, बैठी पापी रे नजीक, नहीं मानी सतगुरू सीख, दीनानाथजी....॥२०॥ अहोनाथजी! थापण राखी पारखी साहुकार की, कई हजार की, देतां किधी खटपट, मांग्या तुरत गयो नट, कीधा सगलाई गट, दीनानाथजी.....॥२१॥ अहोनाथजी! जप तप संयम शील रो, भणता ज्ञान रो, देता दान रो, इण तूं मोक्ष नहीं पाय, पड्यो करे हाय हाय, रूल्यो चौरासी के मांय, दीनानाथजी..॥२२॥ अहोनाथजी! माता पिता गुरूदेव तणां, अविनीत पणां, कीधा घणा, रूलिया चौरासी रे माय, ज्यासुंबांध्या वेर भाव, खिलती केसर महकता उपवन- (137) खमा, निर्मल भाव, दीनानाथजी.......॥२३॥ अहोनाथजी! सार करीने संभालजो, मती विसारजो, पार उतारजो, संवत उगणीसे बासठ, सुणी मती कीजो हठ, दर्शन दीजो म्हाने झठ, दीनानाथजी....॥२४॥ अहोनाथजी! आलोयणा ऐसी कीजिये, कर्म छीजिये, मिच्छामि दुक्कडं दीजिये, जयपुर में जडाव, ज्यारो निर्मल भाव, जोड किधी चित्त चाव, दीनानाथजी.......॥२५॥ जैन प्रतिज्ञा मैं जैन हूँ, मुझे जैन होने पर गर्व हैं, देवाधिदेव अरिहंत भगवान मेरे देव हैं, सुसाधु मेरे गुरु है, जहाँ दया हैं, वहाँ धर्म हैं, मैं अपने आपको देव-गुरु-धर्म और संघ के प्रति समर्पित करता हूँ। जय जिनेन्द्र !
-खिलती केसर महकता उपवन-138
गुरु वन्दना
हाथ जोड़ मान मोड़, तिक्खुतो के पाठ से
गुरुवर स्वीकारो म्हारी वंदना। टेर।।
पुण्य प्रबल उदय में आया, घर घर आनन्द छायाओ
सोने रो सूरज उग्यो आंगणे
मन मंदिर में आप विराज्या, कृपा अपूरब कीनीओ
ऐसी कृपा तो सदा राखजो हाथ जोड़.......॥१॥
जनम्या गुरुवर देशाणे में, नेमचंद हर्षायाओ,
सुरतरु उग्यो मरुधर मायने
धन्य माता गंवरा ने, ऐसा रतन जायाओ
भूरा कुल मांही कीनो चान्दणो, हाथ जोड़...॥२॥
क्रियाधारी पंचाचारी, नवम पट्टधर प्याराओ
चरणांरी शरण में म्हाने राखजो
आगम ज्ञाता संघ विधाता, राम गुरुवर म्हाराओ
भवसागर सूं नैया म्हारी तारजो, हाथ जोड़..॥३॥
139 खिलती केसर महकता उपवन ॥ दिन के चौघडिये गुरु | शुक्र | शनि लाभ | शुभ रवि | सोम मंगल | बुध उद्वेग | अमृत रोग लाभ | शुभ | चल काल चल | काल | उद्वेग अमृत | रोग लाभ शुभ चल काल | उद्वेग अमृत रोग अमृत रोग | लाभ | शुभ चल | काल | उद्वेगा काल | उद्वेग | अमृत | रोग रोग | लाभ | शुभ | चल शुभ | चल काल | उद्वेग | अमृत रोग | लाभ चल | काल उद्वेग अमृत उद्वेग अमृत रोग | लाभ | शुभ चल काला रोग लाभ | शुभ प्यास लगी है तो पतघटकीयाद आती है। लाज आती है तो धुंघट की याद आती है। इस इंसानियत का क्या कहना मेरे भाई- मौत आती है तो भगवान की याद आती है।
-खिलती केसर महकता उपवन-140
रात्रि के चौघडिये
शुक्र शनि
रवि | सोम मंगल
बुध गुरु
शुभ चल
काल उद्वेग अमृत रोग लाभ
अमृत रोग लाभ | शुभ चल काल / उद्वेग
चल काल | उद्वेग अमृत | रोग
লাম | হ্যাম
रोग लाभ | शुभ । चल काल उद्वेग अमृत
काल उद्वेग
लाभ
लाभ शुभ
चल काल | उद्वेग अमृत | रोग
उद्वेग अमृत रोग लाभ शुभ चल काल
काल | उद्वेग अमृत रोग लाभ
अमृत / रोग
शुभ चल
शुभ चल
चन्दना ने वीर मिल्या,
शबरी ने ज्यूंरामजी॥
आपाणे गुरु राम मिल्या
फलसी सारा कामजी।
47-खिलती केसर महकता उपवन- २४ तीर्थकर १. श्री ऋषभदेवजी १३. श्री विमलनाथजी २. श्री अजितनाथजी १४. श्री अनन्तनाथजी ३. श्री संभवनाथजी १५. श्री धर्मनाथजी ४. श्री अभिनन्दनजी १६. श्री शान्तिनाथजी ५. श्री सुमतिनाथजी १७. श्री कुन्थुनाथजी ६.श्री पद्मप्रभजी १८. श्री अरनाथजी ७. श्री सुपार्श्वनाथजी १९. श्री मल्लिनाथजी ८. श्री चन्द्रप्रभजी २०. श्री मुनिसुव्रतजी ९. श्री सुविधिनाथजी २१. श्री नमिनाथजी १०. श्री शीतलनाथजी २२. श्री अरिष्टनेमिजी ११. श्री श्रेयांसनाथजी २३. श्री पार्श्वनाथजी २४. श्री महावीरस्वामीजी १२. श्री वासुपूज्यजी मुस्करा के जिसको गम का घूट पीना आ गया। यह हकीकत है कि, जहाँ में उसको जीना आ गया। ,
ॐ खिलती केसर महकता उपवन-14
२० बिहरमान
१. श्री सीमंधर स्वामीजी ११. श्री वज्रधर स्वामीजी
२. श्री युगमंधर स्वामीजी १२. श्री चन्द्रानन स्वामीजी
३. श्री बाहु स्वामीजी
१३. श्री चन्द्रबाहु स्वामीजी
४. श्री सुबाहु स्वामीजी १४. श्री भुजंग स्वामीजी
५. श्री सुजात स्वामीजी १५. श्री ईश्वर स्वामीजी
६. श्री स्वयंप्रभ स्वामीजी १६. श्री नेमप्रभ स्वामीजी
७. श्री ऋषभानन स्वामीजी १७. श्री वीरसेन स्वामीजी
८. श्री अनंतवीर्य स्वामीजी १८. श्री महाभद्र स्वामीजी
९. श्री सूरप्रभ स्वामीजी १९. श्री देवयश स्वामीजी
१०. श्री विशालधर स्वामीजी २०. श्री अजितवीर्य स्वामीजी
तेल और बाती के बिना,
कैसे जले चिराग।
ज्ञान और क्रिया के बिना
कैसे बने हमें वीतराग॥
143-खिलती केसर महकता उपवन- श्रीमद् जैनाचार्य आचार्य प्रवर १००८ श्री रामलालजी म.सा. की असीम अनुकम्पा से परम विदुषी सरलमना श्री चन्द्रप्रभाजी म.सा., • विद्या वारिधी श्री सुजाताश्रीजी म.सा., • विद्या विनोदी श्री सुमेधाश्रीजी म.सा., • सेवाभाविनी श्री समिधाश्रीजी म.सा., • मधुरगायिका श्री जीतयशाजी म.सा. का सिपानी भवन, कोरमंगला में चातुर्मास सम्यग्ज्ञान-सम्यग्दर्शन-सम्यग्चारित्र-सम्यग्तप के साथ सुसफल हो इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ कोटि-कोटि वन्दन -सुराणा परिवार
-खिलती केसर महकता उपवन-144
ज्ञान और क्रिया के बेजोड़ संगम,
तरुण तपस्वी, तपोमूर्ति
श्रीमद् जैनाचार्य आचार्य प्रवर १००८
श्रीरामलालजी म.सा.
की आज्ञानुवर्तिनी
मधुरगायिका
श्रीजीतयशाजी म.सा.
के मासखमण तपस्या
की सुखसाता पूछते हुए
उत्तम स्वास्थ्य की मंगल कामना करते है
आपके चरण कमलों में
कोटि-कोटि वन्दन
- सुराणा परिवार
दिशा बन्धन
ईशान
शनि
णमोणाणस्स
णमो तवस्स
सिद्धाणं
णमो लोए
उत्तर
णमो
अरिहंताणं
णमो
आयरियाण,
सव्वसाहण
नक्षिण
णमो दंसणस्स
णमो चरित्तस्स
वायव्य
पश्निा