Adarsh Library, Jaipur
Talash Manzil Ki
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तलाश मंजिल की
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विनोद प्रवासी
M
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दो शब्द वन्द अन्धेरे कमरे में बंटने पर भी मन की दृष्टि दूर प्रशात अनजान क्षितिज की ओर भटकती है । जिन्दगी वहां से शुरू की, यहां- कहां पडाव हारे और कितना सफर वाली है घरका हिसाव विताय अवकाग के क्षणों में चलता है । अवकाश के क्षण जीवन में हैं कितने ? एक न्यायाधीग का व्यस्त जीवन, हर रोज़ टेविल पर नई मोटी फाईल, नये कायन, नरें तर्क, नये निर्णय । इसी प्रम में नये व्यक्ति और नये अनुभव....। इस मापा-धापी से समय चुराने की बला मैंने सीस ली है । जितना समय शेप मिलता है उसमे ईमानदारी से लिखता हूं। मध्यप्रदेश की धरती का यहसान नहीं भूलूगा । जय विल्वुल पककर टूटने लगता हूं तो इस सुन्दर धरती पर फैले विशाल मनमोहक जंगलो को पारण में चला जाता है। सागर से ४० किलोमीटर दूर स्थित पामोनी के जगल और घामोनी के मजार का माकर्षण मेरे लिये सदा रहस्यमय रहा है। उसी के मोहपाश में बंधकर घुछ पात्र बुनने के स्वप्न का परिणाम यह उपन्यास है । क्था के प्रवाह को, पात्रों को मनोवैज्ञानिकता को रग रूप देने के प्रयास मे अनजाने में एक काल-सदर्भ मनायास जुड़ गया है । कथा मे भाई राजनैतिक प्रतिच्छाया वा ध्येय येवल प्रशान्त के चरित्र के निर्माण का पाकस्मिक माध्यम है। मेरा उद्देश्य परिवेश को उभारना रहा है ताकि इस परती का कर्ज उतार सकूँ। सागर की धरती पर 'शिला सीमान्त मे मागे' के क्रम में यह मेरा दूसरा उपन्यास है। -विनोद 'प्रवासी
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"माक्षी है आकाग तुम्हारे प्यार का
ददं तुम्हारा एक निशानी बन गया,
मैंने जो कुछ दिया, भूल तुम तो गये
तुमने जो कुछ दिया कहानी बन गया"
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१ "वटुन मरदी है पारो! लगता है, रात-भर में मारे ठंड के मकड़कर सतम हो जाएगै ।" सगर ने दांत किटपिटाते हुए कहा । "तू तो सूत्र कांप रहा है रे...ऐना कर, दोनों चादरें मिला लेते है-हम दोनो एक साप मोएंगे तो मर्दी कुछ कम लगेगी।" पारो ने रागर को स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं की। मा मर गई तो क्या हृया, वह बड़ी वहिन है-मगर के लिए मान्याप मभी कुछ इस मसार में वही है। उसने अपना फटा-पुराना चादरा उतारा और सगर के चादरे पर हालकर स्वयं भी उमीमें दुबक गई। सगर के शरीर का स्पर्श पाते ही उमे ऐमा प्रतीत हुप्रा कि वह ज्वर मे तप रहा था। वह चौंक उठी-मगर कापे जा रहा था। बाहर वारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी । जाड़े की रात, माहुट का पानी और वर्फीली हवाएं। टूटा- फूटा पण्डहरनुमा मजार, लम्बा-चौड़ा एक तरफ से खुला बरामदा । घटाटोप पंधकार में दोनों वहिन-भाई भोर की प्रतीक्षा मे सुकड़े पड़े थे। विजली वो चमक से दोनों का दिल दहल जाता था। पारो का मन हर चार छिटककर गांव की मोर भागता या। विधवा मां, पारो भौर सगर-यही छोटा-सा परिवार पा। मां गाव के दो घरों में रोटी बनाती थी। महाराजिन ने दोनों बच्चों को बचपन से मेहनत-मजदूरी करके पाला या । सानदानी माठ बीघा भूमि उसके देवर श्रीराम के कब्जे में थी। फमल के समय एक-दो बोरा गेहूं संरात के रूप में महाराजिन को मिल जाता था। मां के साए में दोनों बच्चे सुखी ये 1 पारो ने सावन मे सोलह वर्ष पूरे कर'. म । अगले वरग ही महाराजिन उसका व्याह कर देना चाहती थी। मगर उनसे एक वर्ष छोटा था बस । दो-चार बरस में कुछ मामाने योग्य हो जाएगा तो घर की हालत सुधर जाएगी। पारो को अपने मन की बात वतनाती हुई महाराजिन दालान की देहरी पर बैठी गूपा में चावल फटक रही थी। सूब काले बादल घिरे थे। बार-बार विजली कड़क रही थी- बादल गरज रहे थे। पारो नहानी के पास वासन गांज रही थी । सहसा ही भूगलाधार बारिश शुरू हो गई। सगर बाहर पीपल के नीने बच्चों के साथ गुल्ली-डंडा सेल रहा था । वह भागता हुमा प्राया । पारी यतन- मांड़े उठाकर रसोई की ओर भागी। विजली पुन: कड़की पोर भयंकर चकाचौंध के साथ जोरदार धमाका हुआ। पारो को लगा कहीं पास में ही बिजली गिरी है। पलक मापकाते ही मांगी चील और दहलान छप्पर के गिरने की अावाज सुनाई दी । उसको अन्तरात्मा कांप उठी। सुगर मारे भय के चीनने लगा और उससे लिपट गया-मां सरे हुए वांसों के टूटे छप्पर के नीचे दबी पड़ी थी। पारो ने गाज गिरने की कहावत सुनी थी। माज उसने स्वयं अपनी प्रांतों से देखा था। मां का गरीर नीला-स्याह और काला पड़ गया। साल की कार वाली परत उघड़ गई थी। पारो और सगर फिर प्रनाप हो गए। काका के हृदय में भौजाई का जो भय था वह भी समाप्त हो गया। तेरहवीं की सम होते-होते मकान पर भी उनका कब्जा हो गया। पारो को काफा की बातों से लगा कि दो-चार दिन में वह उसे भी कहीं ठिकाने लगाकर दाम नीधे करेंगे । ग्रान गांव से कोई विधुर ठाकुर पाया था। उसने काका के साथ दारू पी थी और बुक्का फाड़-फाड़कर कहा था-"बम्मन को बेटी है तो क्या हुया, ठाकुर के घर जाएगी तो ठकुराइन कहलाएगी, हम शानदानी लोग हैं...।" फिर फाका की मुसफुसाहट और ठाकुर फा स्वर-~''हां मंजूर है-पांच सौ रुपये और कपर, मेरी तरफ से।" फिर काका का बुझा-बुझा स्वर-"ठाकुर साहब, विनती यह है कि किसीको कानोंकान खबर न हो कि लड़की मैंने आपके गहां भेजी है। विरादरी से डाल देगे और तूफान सड़ा हो जाएगा।" ठाकुर ने आश्वासन दिया-पंडित जी, सालों तक तो किसीको ।
- यह भी पता नहीं चलेगा कि लड़की गई कहां।" पारो को लगा कि सौदा पूरी तरह से पट गया है। उसे इस नरक में टकेत दिया तो सगर का क्या होगा? माघी रात गए उसने सगर को उठाया। उसे समझाया कि काका उसे बेच देंगे तो वह अकेला रह जाएगा। चलो भाग चलें। उसी रात एक भनाज के साली बोरे में पहनने-प्रोढने के दो-चार कपड़े लेकर वह लोग भाग खड़े हुए। सारी रात बदहवासी में भागे। मुवह जंगली पोखर पर मुंह-हाथ धोया...पास के खेत से चना-बूट उसाड़ें और जंगल से करविरिया के बेर तोड़कर कलेऊ किया। कितने डरे-सहमे थे वह दोनों, लेकिन इसके बावजूद कैद से छुट- कारा पाने की स्वशी मजीव थी। पोसकणों से लदी करौंदे की झाडिया लाल-लाल मुरम वाली कंकरीली धरती पर उगा पलाश वन और उनके बीच मुस्कराती हुई झरविरिया की झाड़ियावह लोग एक जगली नाले के किनारे पहुंच गए थे। तभी पारो ने एक काली भारी भरकम माकृति को झाडियो में घुसते देखा । उसे समझने देर न लगो कि जंगली सुपर उन्हें देखकर झाड़ी में पम गया था। उसने सगर से पुछ भी न यहा लेकिन मन को अनचीन्हे भय ने झकझोर हाला। उसने येरी के कांटों को बचाकर एक डाल झुकाई और तब तक उससे झूमाझटकी करती रही जब तक वह टूट न गई। पत्पर से काटों को कुचला मोर एक मन्छा-वामा डहा बना लिया। उसके सिरे पर बोरे वाली पोटली लटकाकर वह उसे कंधे पर टिकाकर निसफिकर होकर चलने लगी। दोनों भाई-बहिन किसी अनदेगी भनजानी मजिल की मोर बढ़ते रहे। पारो को गाव वाली रामलीला के विदूषक का गीत सहसा ही याद माया मोर वह उसे धुन मे प्रलाप भरकर गाने लगी : "जतन से रासियो वावा को भोरी भगा नई वेरी के बेर झराए, वई को टोरो डडा जतन से राखियो बाबा को भोरी झंगा।" सगर के बदन को कंपकंपाहट ने उसको तन्द्रा तोड़ दी-बहुत १२ पारो ने कहा--"कुछ खाने को भी तो नहीं है। गाली पेट ठंड लगती है।" फिर वह मोचने लगो-क्या इलाज है गया ? उसे एक तरखीव मूनी। बोरे में जितने कपड़े थे उसने निकालकर रागरको पहना दिए। अपनी पुरानी पोती उसपर लपेट दी गौर गाली बोरा गिलाफ की तरह मगर पर चढ़ाकर स्वयं भी उसके पास ही लुढ़क गई। दोनों चादरें गले और पान से लपेटने के बाद भाई बहिन को कुछ गरमाहट मिली। बोरे में मिमटा-मुकड़ा दिनभर की थकान से टूटा सगर सो गया। गुबह होने तक ग्राममान साफ हो गया। बूटी अम्मा वर्षों के नियम-गंयमों से जगाली मूरज की पहली फिरण नाय बुहारी लेकर यात्रा की मजार पर या गई। बाया की गान में कुछ-कुछ गुनगुनाते हुए उसने भाड़, बुहारी पूरी की। मगार से निकल- फर वह वरामदे की ओर बढ़ी तो उसको भाग्चर्य की सीमा न रही । गूरज की किरणें बरामदे में भर रही थीं । स्वर्णिम मिलमिनाते प्रकार में उसने एक भरा हुया बोरा पड़ा देखा । पान गई तो उगे लगा उसमें कोई आदमी का बच्चा भरा था। उसके मिर के बाल बाहर निकले दिग्य रहे थे। अम्मा की प्रात्मा कांप उठी फिगी पागंका रो-'हाय अल्ला, कोई लाग तो नहीं बोरे में भरकर फेंक गया है।' वह मुगाकर घोरे के पास बैठ गई। उसने माहम बटोरकर थोड़ा-सा वोरा गुमाया। शान्त सरोवर के खिले कमल के पुष्प-सा भोरगी किरणों में जग- मगाता मुखमंडल । सुगर का चम्पई रंग, माथे पर उलझे हुए बाल, पोमिल-बोभिल पलकों के नीचे कितनी मुन्दर प्रां होंगी, अम्मा को समभते देर न लगी। गहरी निःश्वास छोड़ती नासिका और उसके नीचे कोमल फड़कते हुए अघर । अम्मा को लगा-यह तो किसी अच्छे घर- सानदान का बच्चा है । गायद देर से सोया हो-उसे न जगाया जाए। लेकिन जिज्ञासाओं के पर्वत शीम उठाने लगे। उस अयोध अनाय थालया से बात करने को अम्मा लालायित हो उठी। उसने बालक के सिर को सहलाकर धीमे-धीमे उसे पपको देना भारम्भ किया। सार स्नेहिल स्पर्श से जाग पड़ा। पनायास हो उस प्रारिरिता दना को सम्मुरा पाकर उसके मुरा से निक्ला-"अम्मा तुम कौन हो ?" पारो का 'विचार प्राते ही उतर की प्रतीक्षा किए बिना अपने बगल में पड़ी पारो को सगर ढूंढने लगा। पारो वहां नहीं थी। "क्या है, क्या ढूंढ रहा है ?" मम्मा ने उत्सुातावश पूछा । "मम्मा मेरी बहिन थी मेरे साप । रात उसने हो मुझे यहां मुलाया था।" अम्मा एक बार फिर से चौंकी । तेरी बहिन भी थी ? स्यात जगल- झारे को गई हो। मैं देवत हो," सगर के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा-"तू तो जूडी में तप रहा है, तू रुक, मैं जात हों।" जंगली फल, वेर मकोरे, सीताफल मौर विही लादे हुए पारो सामने से चली आ रही थी। अम्मा रास्ते में ही टकरा गई। सगर ने अम्मा को पारी का हाथ पकड़कर माते हुए देना। अम्मा ने इत्मीनान से चटकर पारो का घर-पता पूछना शुरू किया। अम्मा का स्नेह देखकर उसने रोते-रोते सक्षेप में अपनी कहानी सुना डाली। अम्मा की पापों से झर-झर मांसू टुलक चले। फिर पारो को समझाते हुए बोली- मेरी सारी उन्म इसी दरगाह में बाबा की खिदमत में गुजरी है। यही रोज लोभान जलाती हूं, चिराग जलाती हूं, मजार की साफ-सफईपत करती हूं। बगल में एक झोंपडा डाल रखा है। लोग दूर-दूर से माकर मुराद मागते हैं। यही जो घेला-टका मिलता है उसने इस पनपोर जगन में गुजर-बसर करती हूं। तुम लोग तो खुद-व-सुद नहीं पाए हो-मालिक ने तुम्हें यहां बुलाया है, अपनी छत के नीचे पनाह दी है। तुम लोग चाहो तो यहीं मेरे पास रहो-जो रूपा-मूसा हो, मेरे साय पायो।" "अम्मा, भैया का बुगार उतर जाए-मैं इसे सागर ले जाऊगी। हम मेहनत-मजूरी करेंगे। भा को पढ़ाऊंगी, मैं भी पहूगी। मैंने मन में कुछ ठान रगी है, उसे पूरा करूंगी।" मम्मा उस भयोष वालिका का अदम्य साहस भोर पडाई की मोर मों में कर चौक उठी। उसने उस वालिका के उन्नत सुबह की धूप में झिलमिलाती हुई फूली कांस की प्रामा सम्मा ने कहा-"यावा तेरे मन को मुराद पूरी करेंगे। तू कोई लड़की नहीं है-एक दिन तेरा कबाल जम्र चुलन्द होगा। वा से और परवरदिगार से तेरे लिए दुपा करती रहूंगी । लेकिन रुक जा। मैं वच्चे को जंगल की जड़ी-बूटी बकरी के दूध में ऊंगी। इसका बुखार उतर जाएगा। रात-भर रुक जा, सुबह होते चली जाना । देख यह सामने ही घामोनी तिगडा है, दाहिने को एगी तो बरोदिया छ: कोस पड़ेगा । वहां से नीची मोटरगाड़ी मिलेगी हर के लिए। लेकिन यह रास्ता लम्बा है सीधी निगती जाएगी तो पहरोल पांच-छ: कोस पड़ेगा, यहां से फिर मोटर से सागर पास है।" "लेकिन अम्मा मेरे पास तो मोटर का किराया भी नहीं है। घोड़े-से पंसे हैं उन्हें दो-तीन दिन के रोटी-पानी को दबाए हूं ।" "मैं दूंगी मोटर किराया, मुझे खरात मिन्नती रहती है। तू रक, में फूटे किले से बूटी तोड़ लाऊं भैया की दवाई के लिए।" और अम्मा विना उत्तर की प्रतीक्षा किए चली गई। पारो ने सगर के माथे पर दुलार से हाथ फेरफर पूछा-"पोसा जो हो रहा है रे?" "अव कुछ जाड़ा कम हुया है।" "घाम में बड़ी गर्मी है।" घाम के लालच में सगर वोरे से बाहर निकल पाया। चादरें बदन लपेटता हुमा बैठ गया। सोचा पारो से कहे- 'बड़ी भूख लगी है लेकिन इस जंगल में वह क्या खाना दे पाएगी उसे ? उसका मन और दुखेगा। पारो ने उसके मन की बात समझ ली। सोचा, वा करना व्यर्थ है । अम्मा से ही कुछ जुगाड़ भिड़ाई जाए। सगर ने चारों ओर देखते हुए कहा-"पारो, यह कौनसी ज वोरे पर पर है ?" "किसी फकीर की दरगाह है।" "दरगाह क्या होती है ?"
"मरे ने अपने गांव में कटला वाले मेन पाम पोषन के तरे पीर बाबा का चबूतरा था । तुझे याद है अपनी वाई के गांव में मावन में हम गए थे ? एक सायू महात्मा स्वर्ग सिधार गए थे। गाव वालों ने उनका चौतरा बनाया या उनके स्थान पर । रम ऐमें ही मुगलमानों के किमी पहुंचे हुए फरीर का स्थान है यह।" पारो मजार के दान को चली गई। मगर का मन अपनी बाई के गांव के पासपास भटकने लगा। सगर बाई के माथ नानी के घर जाता था। किरना वाले ताल में पूर्व मुटार लगाना था। अमराइयों में दिनभर भटक्ता, कन्चो यकी माप पाना और दौर चराने वाले बच्चों के माय लवृदिया लेकर दूर-दूर तक हारों में घूमना। मव कुछ याद माने लगता है। अब क्या कमी भाव वापस जा सकेगा ? पारो उमे नानी के पर क्यों नहीं ले गई ? नानी मर गई तो क्या, मामा नो हैं, गाय बैल है, घर के मेन है। वह भी तो गेतो कर मकता है । प्रमी टोर चरा सकता है। कहा ले जारी है उसे पटकने को ? हर बीमा होता होगा ? मगर का दिमाग पूमना रहा । वह उठ खड़ा हुया प्रौर दहलान के बाहर की मोर वटा। उसने देखा, सामने अम्मा टपरा तरे यसरी लगा रही थी। दकरी का कच्चा दूच “अरे बाप रे ! किता पमन्द था उमे ! पाम-कूप में छापा गया टपरा इस अम्मा ने इतने घनघोर जगत में क्यों बनाया इमे जानवर नहीं सात? पौधे को पदचापों से वह चौंका । पारो मा गई थी। बिना कुछ कहे उसका हाय थामा पोर उमे टपरा को मोर ले गई। मम्मा में पर से लेकर नीचे तक सगर को देवा । उममा मुडौल शरीर देखकर मुस्कुरा दी। मम्मा भट से अन्दर गई। बूटी को उमने पीसकर रखा था। उनकी दो गोलिया दनाई।-'प्रा, दूध के नाय दवाई ना ले, जंगनो यूटो है, बुखार छू मन्तर हो जाएगा।' "मैं करवा दूध पिऊंगा।" मगर ने महमने हुए कहा । 'टीक है, कच्चा ही पीना होला, मोटगी वहां से, अभी तो लाही बीननी है..." मम्मा ने पहा । मम्मा ने सिलवर के टोननुमा गिलास में समर को दूध १ पहले गोली गुटका दीं फिर दूध पिला दिया । पारो को उसी गिलास में दूध देकर चाकी दूध एक बड़े फूटे कटोरे को टेढ़ा करके डाला और दो वार में उस दूध को गटक गई। फिर बोली-"बेटा, तू धूप में लेट, मैं अभी लकड़ी बीनकर लाती हूं, तभी तो रोटी कर पाऊंगी।" पारो बोली- मैं भी तेरे साथ चलती हूं। आगे करौदे की गाड़ियां हैं, फरीदे की चटनी बांदूंगी।" अम्मा ने कहा- वो कुल्हाड़ियां उठा ले, एक इकड़ा मुंगरा बहुत दिक्कत करता है कभी-कभी, जानता है, बूढ़ी हूं तो पूब दिटाई देता टपरे के छप्पर से पारो ने कुल्हाड़ी खींचकर निकाल ली और अम्मा के पीछे चल दी। सगर पंगार पर चादरा प्रोढ़कर लेट गया। बूटी के प्रभाव से उसके रक्त का प्रवाह बढ़ गया। माथे पर म्येद-कग उभरने लगे। उसे गरमाहट अच्छी लगी। एक अजब-मी खुमारी उसकी पलकों को वोझिल करती चली गई। पता नहीं कब उसे नीद प्रा गई। अम्मा सिर पर लकड़ी का गठ्ठा लादकर टपरे की पोर चल दी। पीछे-पीछे फुदकती हुई पारो...मांचर मे करीदे और भरविरिया के बेर भरे, हरी कच्ची इमली चबानी हुई। अम्मा ने उसे गूपी सूची लकड़ियों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए देखा था। उसकी बांहों में बल था। उसके मन में आज भी उत्साह था। मंजिल का ठिकाना नहीं, घर का पता नहीं, अपना कहने को छोटा भाई और सामने पहाड़-सी जिन्दगानी । जंगल से ज्यादा डरावने गहर और जंगली जानवरों से ज्यादा चतरनाक वहां का आदमी। क्या होगा इन अबोध बच्चों का ? मन ही मन घबराकर उसने कहा--"विन्न , सागर जाकर क्या करोगी? कहां रहोगी? वहां कैसे गुजर-बसर करोगी? मैं सोच-सोचकर घबरा रही है।' "अम्मा, तुम्हारा वोझ बनकर नहीं रहूंगी। भगवान हमारे साथ हैं, बस यही विश्वास रक्षा करेगा इतनी कम उम्र में ऐसी गजब की अक्ल ? इसके मां-बाप साधा- रण व्यक्ति नहीं होंगे ! अम्मा इन्हीं ख्यालों में डूबी-डूबी मटेलनी से - सवार का भाटा निकालने लगी। जितना माटा था उसने सभी कोपर में डाल लिया और पानी डालकर उसे माड़ने लगी। पारो से रहा न गया तो उसने कह डाला-"अम्मा, पाटा मोत . "मरी विनू, एक जोर ही तो बनाती हूं। अंथ को भी यही रोटी मानी होगी। भुसारे तुम लोग जानोगे तो क्या चार रोटी भी तुम्हारे माय न वाचूंगी ?" अम्मा पाटा मांड़ती रही। पारो के मस्तिष्क में मां के चित्र उभ- रने लगे। ऐसे ही पाटा मलते-मलते मां उसे वेद-पुराणों की कहानियां मुनाती थी । दुनिया-मर की सदाचार और ज्ञान की बातें बतलाती थीं। पारो के नाना कथावाचक पंडित थे। पारी के पिता गांव के ही स्कूल में मास्टर थे। मां को धार्मिक पोथियां यांचने का शौक था। उसे ढेर सारी पौराणिक गायाएं कंठस्य यो। पारो के पिता को प्राकस्मिक मृत्यु पर धार्मिक संस्कारों ने उन्हें टूटने नहीं दिया, उन्होंने कभी भिक्षावृत्ति नही अपनाई। काका ने घोप्रेबाजी की। मां ने उसे प्रमु इन्या मानकर स्वीकार कर लिया। कितना परिश्रम करती थी और बच्चों को लाड़- 'प्यार में पालती थी। पारो में शायद वही मंस्कार जागे थे और सब कुछ पीछे छूट जाने पर भी वह एक अनजान डगर पर नये संकल्पो के साथ 'कर रही यो । उसे ईश्वर में घोर ग्राम्या यो। अम्मा पाटा माडकर पीछे तलया में सपरने चली गई। पारो ने “उठकर चौक का उसार करने की ठान ली। वह अन्दर टपरे मे धुमी तो पुनः एक वार चौकी। मंली पुरानी हजार येगरा सिलकर बनाई गई कयरी प्रोदने के नाम पर। दो फटे 'पुराने बोरे यांना का विधौना । चूल्हा काला स्याह, चौका मुद्दत से दिना लिपा-पुता । चूल्हे में भरी हफ्तों की राख । दो डवुलियों मिट्टी की-एक में नमक तथा दूसरे में राई । छप्पर से लटकती एक बोतल में लगभग प्राधा, जलाने वाला घासलेट । दूसरी बोतल पर इतनी गर्द चही हुई है कि समझ में नहीं पाता ग्रंदर क्या है उसे लगा इसमें विपनाई है। एक मटेलनी में ज्वार एक कुरईया से कम दाल, चावल ।
। होली गुटका दीं फिर दूध पिला दिया । पारो को उसी गिलास में कर बाकी दूध एक बड़े फूटे कटोरे को टेढ़ा करके डाला और दो में उस दूध को गटक गई। फिर बोली-"बेटा, तू धूप में लेट, मैं लकड़ी बीनकर लाती हूं, तभी तो रोटी कर पाऊंगी।" पारो वोली-"मैं भी तेरे साथ चलती हैं। आगे करौंदे की झाड़ियां करौंदे की चटनी बांटूंगी।" अम्मा ने कहा-"वो कुल्हाड़ियां उठा ले, एक इकड़ा सुंगरा बहुत दक्कत करता है कभी-कभी, जानता है, बूढ़ी हूं सो खूब ढिटाई देता टपरे के छप्पर से पारो ने कुल्हाड़ी खींचकर निकाल ली और अम्मा के पीछे चल दी। सगर पुंगार पर चादरा प्रोढ़कर लेट गया। बूटी के प्रभाव से उसके रक्त का प्रवाह बढ़ गया। माथे पर स्वेद-कण उभरने लगे। उसे गरमाहट अच्छी लगी। एक अजब-सी खुमारी उसकी पलकों को वोझिल करती चली गई। पता नहीं कब उसे नींद आ गई। ? अम्मा सिर पर लकड़ी का गठ्ठा लादकर टपरे की ओर चल दी। छेि-पीछे फुदकती हुई पारो पांचर में करौंदे और भरविरिया के बेर भरे, हरी कच्ची इमली चबाती हुई । अम्मा ने उसे सूखी-सूखी लकड़ियों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए देखा था। उसकी बांहों में बल था। उसके मन में आज भी उत्साह था। मंजिल का ठिकाना नहीं, घर का पता नहीं अपना कहने को छोटा भाई और सामने पहाड़-सी जिन्दगानी । जंगल ज्यादा डरावने शहर और जंगली जानवरों से ज्यादा खतरनाक वहां आदमी। क्या होगा इन अबोध बच्चों का ? मन ही मन घबराकर उन कहा-"विन्न , सागर जाकर क्या करोगी? कहां रहोगी? वहां गुजर-बसर करोगी ? मैं सोच-सोचकर घबरा रही हूं।" "अम्मा, तुम्हारा बोझ बनकर नहीं रहूंगी। भगवान हमारे सा बस यही विश्वास रक्षा करेगा। इतनी कम उम्र में ऐसी गजब की अक्ल ? इसके मां-बाप रण व्यक्ति नहीं होंगे ! अम्मा इन्हीं ख्यालों में डूवी-डूवी मते १७ पवार का घाटा निकालने लगी। जितना पाटा था उसने सभी कोपर में हाल लिया और पानी डालकर उसे मोड़ने लगी। पारो से रहा न गया तो उसने कह डाला--"अम्मा, आटा मौत "प्ररी चिन, एक जोर हो तो बनाती हूं। अंपऊ को भी यही रोटी पानी होगी। भुसारे तुम लोग जानोगे तो क्या चार रोटी भी तुम्हारे साथ न बांधूंगी ?" अम्मा पाटा मोड़ती रही । पारो के मस्तिष्क में मां के चित्र उभ- रने लगे। ऐसे ही पाटा मलते-मलते मा उसे वेद-पुराणों को कहानियां मुनाती थीं । दुनिया भर की सदाचार और ज्ञान की बातें बतलाती थी। पारो के नाना कथावाचक पंडित थे। पारो के पिता गाव के ही स्कूल में मान्टर थे। पाको धार्मिक पोथियां वांवने का शौक था। उसे ढेर सारी पौराणिक गाथाएं कंठस्प थी। पारो के पिता की प्राकस्मिक मृत्यु पर धार्मिक संस्कारों ने उन्हें टूटने नही दिया, उन्होंने कभी भिक्षावृत्ति नही अपनाई। काका ने धोखेबाजी की। मा ने उसे प्रभु इन्छा मानकर स्वीकार कर लिया। कितना परिश्रम करती थी और बच्चों को लाड़- 'प्यार मे पालती यो। पारो में शायद वही मस्कार जागे थे और सब कुछ "पोये छूट जाने पर भी वह एक अनजान डगर पर नये संक्ल्यों के साय यह रही थी । उसे ईश्वर में घोर पाल्या यो। प्रम्मा ग्रादा मांडकर पीछे तलैया मे सपरने चली गई। पारो ने 'उठकर चौके का उसार करने की ठान ली। वह अन्दर टपरे में घुसी तो पुन: एक वार चौकी। पेली पुरानी हजार थेगरा सिलकर बनाई गई कथरी प्रोढने के नाम पर। दो फटे 'पुराने वारे अम्मा का विछौना। चूल्हा काला स्याह, चौका मुद्दत से बिना लिपा-पुता । चूल्हे में भरी हफ्तों को राख । दो डबुलियां मिट्टी धी--एक मे नमक तथा दूसरे में राई। छप्पर से लटकती एक बोतल में लगभग पाया, जलाने वाला घासलेट। दूसरी बोतल पर इतनी गर्द ची हुई है कि समझ में नहीं आता अंदर क्या है उसे लगा इसमे निकनाई है । एक मटेलनी में ज्वार एक कुरईया से कम दाल, चावल १८ - मिर्च, मसालों का कोई नामो-निशान नहीं। छप्पर से लटकता हुआ एक घंघरा, दो चादरें हरे रंग की, पुरानी चांदर से गूंथे हुए हरे रंग के पोलका । पारो ने मजार पर हरे रंग की चादर चढ़ते देखी थी। यह भी शायद उसी तरह की चादरें थीं। लोग मजार पर चढ़ाने लाए होंगे। पारी को फिर अपनी मां की गृहस्थी याद पाने लगी : 'साफ-सुथरे कनस्तरों में बाटा, दालें, चावल और घी, तेल, मसाले के चमकते हुए डिब्बों में । सुबह का वासी चौका लीप-पोतकर शाम के लिए तैयार और शाम का चौका सुबह फिर पोतनी मिट्टी से लिपा-पुता साफ। देहरी द्वारो गोबर की लिपाई, पाटे की रांगोली। नित्य प्रति प्रातः ठाकुर जी के स्थान पर पूजा-पाठ, भारती और सायं- काल तुलसी-चौरा पर दीया तो स्वयं पारो जलाती थी ।...अम्मा गया करती होगी दिनभर ? कोई गिरस्ती नहीं, कोई झंझट नहीं ।' पारो फो न जाने क्या सूझी-वह एक पुराना कपड़ा लेकर फिर डांग की भोर भागी। उसने लाल मुरम वाली धरती पीछे छोड़ी थी। वहां पहुंचकर उसने लाल माटी चटोरी, साड़ी के पल्लू में वांध ली और फिर एक बार घर की भोर भाग दी। पारो भागती है-चलती नहीं है । पता नहीं उसे भाग-भागकर काम करना अच्छा लगता है। जब वह बहुत कुछ सोचने लगती है तब उसकी चाल धीमी पड़ जाती है। जब एक. वात दिमाग में उठती तव उसे पूरा करने को वह भागती है। कभी गुनगुनाने लगती है। घर पाकर उसने टपरे के बाहर पुराने घड़े से पानी निकाला...फिर कुछ सोचकर पानी को वहीं रख दिया। झाड़. उठाकर अन्दर गई, चूल्हे की राख निकाली, बाहर हरे-हरे पत्ते तोड़कर चूल्हे की कालिख छुड़ाई, फिर छान-छप्पर से कपड़े और वोतलें उतार- कर बाहर रखे । झाड़, से ठोक-ठोककर छप्पर का कचरा गिरा, दीवारों पर झाड़, फेरी । फिर सारा कचरा और राख बुहारकर वाहर फेंकी। अम्मा ने ज्योंही पारो की शक्ल देखी, वह खीसें निपोरकर पोपले मुंहः से हंसने लगी और बोली-"यह क्या हालत बना ली है ?" "तेरा टपरा साफ कर रही हूं अम्मा, कित्ता गन्दा पर रखती है तू। बाहर बैठ, मैं अभी लीप-पोतकर ढिक लगाऊंगी, फिर तुझे रसोई:
१६ करने दूंगी।" पारो फिर भागी-इस बार गोबर लेकर पाई। उसने पानी डाल- कर टपरा गोदर और लाल मिट्टी से लीपा। चूल्हे को ढेर-सी लाल मिट्टी डालकर पोता, पूरा चौका पुराने कपड़े को पुतड़ी यनाकर पोता। टपरे के चारों ओर ढिक लगाई, टपरे की देहरी लीपकर ज्वार के घाटे की रागोली बनाई...। फिर उसने चूल्हे मे लकड़ियों को सलीके से सजाकर चूल्हा जला दिया...। कुछ सोचकर उसने अम्मा के कपड़े पूर्ववत् टांग दिए किन्तु एक हरा चादरा कांधे पर प्रोढते हुए अम्मा से बोली--मैं भी तलया मे नहाऊंगी। नेरा चादरा ले जाऊंगी। उसने संकोचवश पलकें झुकाकर कहा-मेरा स्नान हो जाएगा और फिर तेरा चादरा फीच लाऊंगी।" "अरे इनना शर्मा क्यों रही है.. ले जा ना।" पारो फिर एक वार भागी तलैया की प्रोर। उसने फटाफट कपड़े उतारे, चद्दरा लपेटा और पानी में उतर गई...। सपरने के बाद उसने अम्मा के चद्दरा को पत्थर पर फीचा और कपड़े धोकर घर को चल दी। उसने देखा कि अम्मा चूल्हे पर तवे के स्थान पर टूटे मटके का खपरा चढाए थी । इस बार अम्मा का संकोच फूट पड़ा-"ब्राह्मण की बेटी है । मैं चौके में बैठ गई, फिर ख्याल माया कि मेरे हाथ की रोटी खाने से तेरा पमं चला जाएगा। मव भी तू चाहे तो अपने टिक्कर सेंक ले।" पारो ने अत्यन्त ही सहज भाव से कहा-"सुबह जंगल में लकड़ी काटते समय मन में यह प्रश्न उठा था। लकड़ी पर कुल्हाड़ी चलाते-चलाने मैंने मन की उस गाठ को भी छोल लिया है। मेरे गाव मे एक मास्टर माया था।" फिर कुछ लजाकर बोली-"गांव के स्कूल में एक पडित था, देखने में बिल्कुल सिलविल्ला...न जाने कित्ता सोचता रहता था। उसने कभी अपनी बिरादरी नहीं बतलाई। वह कहता था-'मैं तो प्रादमी हूं ये जात-पात के झगड़े क्यों पाल रखे हैं ?' कोरी, चामरों के टपरों पर जाता था। उनके घर रोटी खा लेता था। गांव में सबकी सेवा करता था। उसने सब गाय वालों को यही सम- झाया कि भैया मेहनत करो, अपने अधिकारों के लिए लड़ो, अन्याय के - सामने मत झुको।" पारो और भी अधिक पानी-पानी होकर बोली- ."मुझे पढ़ाता था पंडत । हर दिन मेरे घर पाता था।" पारो का मन फिर पीछे की ओर भागने लगा। उसे याद पाने लगा : जाड़े की बर्फीली रात, पारो को रखवाली के लिए काका ने फूटे. 'ताल वाले सेत पर भेजा था। गेहूं-चना की फसल बीता-दो बीता उठ 'प्राई थी। रात में झुंड के झुंड सांभर और चीतल फसल चरने को पाते 'थे। आधी रात तक सगर मचान के ऊपर पड़ा-पड़ा हल्ला करता रहा 'फिर वह सो गया। पारो जागती रही। ठंड बढ़ जाने से उसने मचान के नीचे पुपाल इकट्ठा करके झाड़-झंकाड़ों के ढेर लगाकर आग जला ली। जब वह पागी ताप रही थी तभी उसने किसी यादमी की चीख सुनी, वह बेतहाशा भागता पा रहा था, भाग देखकर उसके मकान को 'पोर मुड़ गया । प्राग के पास एक प्राकृति को देखकर वह भागती हुई “परछाई पुनः चोली-भालू .. बचानो।" पारो को समझते देर न लगी 'कि किसी किसान के पीछे भालू लग गया है। उसने जलता हुआ चैला 'पाग से निकाला और कुल्हाड़ी उठाई । बायें हाथ में जलता हुआ चला और दाहिने हाथ में कुल्हाड़ी लेकर पारो तनकर खड़ी हो गई। पाऊना कोई किसान नहीं बल्कि पंडित जी थे। पारो ने लूघर (चला) उनके हाथ में पपाड़ा दिया और दूसरा लूघर शाग से निकालकर वह 'चिल्लाई-"अर-र-र-र, हो.", हई-ई-ई, हू...) आप्रो पंडत ।" कहकर यह भागी भालू की पोर, और उसका साहस देखकर गुरुजी भागे उसके पीछे-पीछे। देखते-देखते भालू मुड़ गया और पलक झपकते ही नौ दो ग्यारह हो गया। वह दोनों मचान को लौट आए। जिस जगह पुपाल बिछाकर “पारो बैठी थी उस ओर संकेत करते हुए पंडित को बैठने को कहा। "डर गए थे..." पारो ने मसखरी से पूछा । पंडित के होश-हवास अब तक वापस पा चुके थे। पारो पास में "पुपाल डालकर बैठ गई। उसने पूछा-'इत्ती रात गए, कहां निकल 'प्राए ?"
-कनुमा के हां माहाराजार उन्हेन।
स्ननादर खाने जाना पाटनर से
गया । दार नौट हा या किनाते के नगर
मानपर नागरनारा दो पोदेरा
पारोको पाद मायाकन वह है। पड़ोसी
की पानी-पानी हो गए थे। पारी में मसरो को-स.स
तो कदम-कदम पर भालू और तदुए हैं। प्रारट होनेर.
मागे न जाएं, नहीं मचान पर तो जाएं।"
और तुम ?"
देव रन्दाने माई हू, सोने नहीं।"
पहित जी रहने को तैयार हो गए थे। नई राज दर पर रन
तापते रहे। पंडित फिर सरकार को बुराई करता रहा। समारलेले
दूर नहीं कर पाई है। भूमिहीन क्सिानो को भूमि निम्नी गहरा
गाव के लोगों को ऊपर उठाने के लिए सरकार को नई-नई भोजनाएं
बनानी चाहिए। पुलिस, प्रदालत वाले मामलों में मानूनी सहायता
निर्घन किमानों को मिलनी चाहिए। पारो ने समनापा-रकार'
का विरोध करने पर नौकरी से निकाल दिए जामोरे। परिज रत्ता पा
वह खुद नौकरी छोड़ देगा।
उसकी बात सुनकर पारो वैचारी चिन्तित हो उठी। पति को
नौकरी को चिन्ता नहीं थी। शिक्षा को वर्तमान पनि से पति गंतुष्ट
नहीं था। प्रब वर्तमान परिस्थितियों में तो उसके लिए नौकरीपरना
सम्भव नहीं था।
पारोको प्रघकचरी प्रबल उसको कची-ऊंची बातों को पूर्ण रूप से नहीं
समझ सकी लेकिन वह इतना जान गई कि वह कोई सामान्य मध्यापक
नही था। उसके सोचने का प्रपना ढंग था, उसके विचारो का अपना
एक मंसार था। नई उमर का जोश था, शायद साल दो सास नौकरी
की होगी वस। पता नहीं कितना पढ़ा-लिमा पार पहां होगा ?
पया करते होंगे?
२२ . अम्मा ने गरम-गरम रोटियां सेंकना शुरू कर दिया था। पारो ने झट से उठकर करौंदे की चटनी वांट ली । सगर सिल-बट्टे की आवाज से जाग उठा । पारो ने उसे छूकर देखा, बुखार उतर गया था। अम्मा ने कहा-"जाड़े का बुखार था, जड़ी ने अपना काम किया है.. अव रोटी खाने में कोई डर नहीं है ।" दोनों भाई-वहिन ने अम्मा के साथ ज्वार की रोटी चटनी के साथ सागोन के पत्तों पर रखकर खाई। रात का अंवेरा आसमान से लगा । पारो का मन न जाने क्यों पंडित की वातों में उलझ जाता था।.. गांव के ताल के उस पार का पीपल उसे याद याता है, वह खेतों से लौटती थी, पंडित उसे वहीं मिलता था। कभी खेतों का चित्र बनाता हुआ, कभी फूटे मंदिर को रंगों से रंगता हुग्रा । कहता था, पारो एक दिन तेरा चित्र बनाऊंगा. उसमें ऐसे-ऐसे रंग भरूंगा कि चांद, सितारे, सूरज, फूल, कलियां, झरने, नदियां और समुन्दर भी शरमा जाए। उस दिन पंडित बहुत बहकी-बहकी बातें करता रहा। फिर उसकी बदली हो गई। जाने वाले दिन कहा था-नौकरी छोड़ दूंगा, फिर तुम्हारे गांव आऊंगा, अपना नया पाठ पढ़ाने लोगों को..." उसे याद है कि पंडित के जाने पर वह कित्ता रोई थी। अकेले में उसी पीपल के नीचे रोती रही.. पीपल के पत्ते हवा के झोकों से करते थे। उस दिन पहली बार पारो को लगा था-तालाब की लहरों की एक आवाज है, उन लहरों के अोठों पर दर्द का गीत छिड़ा था; सूरज चलता है.. उस शाम उसकी चाल धीमी पड़ गई थी, शाम के रंग फीके थे, किरणों की सांसों पर राख की परत चढ़ गई हो जैसे । हर रात जंगल सुनसान की चादर ओढ़कर सोता है... पारो को लगा था सुनसान की वह चादर बहुत बढ़ गई थी। उसका दूसरा छोर बढ़ता चला गया था वहां तक, जहां धरती आसमान से मिलती है। पारो को लगा था पंडित भी उसी रास्ते पर चला गया था जो कहीं खतम नहीं होता है, न जाने कहां जाकर रुकेगा वह ? कभी लौट भी पाएगा या नहीं ? पारो रोती रही। पारो रोती रही, आसमान से अंधेरा वरसता रहा । उस रात उसके मन ने उसी बरसते हुए अंधेरे से कोई सम- २३ झौता कर लिया था। वरसते हुए यंधेरे के कुछ टुकड़े उसने उठाकर अपने सीने में लगा लिए, जो आज भी उसके साथ हैं । सोचते सोचते बहुत रात हो गई...पारो सो गई। बुन्देलखण्ड में बेटी को विदा बड़े बाजे-गाजे से की जाती है । अम्मा के पाम क्या था प्यार के सिवा ! अपनी जोड़ी हुई रकम में से दम रपये पारो को दिए, ज्वार को रोटियां साय वाय दी और प्रसीस के माय मजार के दो हरे चादरे दोनों बच्चों को देकर मश्रुपूरित नेत्रों से विदा किया। जाते समय पारो पौर सगर को बहुत-बहुत समझाया--- जब कोई दुःख हो तो वापस घामोनी पा जाना । मन्त में मन नहीं माना तो मम्मा बहरोल तक उन लोगों के साथ गई और बस में चढाकर ड्राइवर कण्डक्टर को बता दिया कि कबुला पुल के पास वाली सराय पर बच्चों को उतार दे। बस के चलते-चलते अम्मा को लगा उसने अपनी जाई बेटी को बिदा किया है । भारी मन लेकर वह घामोनी को लौट आई। २ सानाबदोगों की बस्ती। लावारिसों का डेरा-शहर से दूर नहीं महर के बीच-1 प्रासपास निम्न, मध्यम एव उच्च वर्ग के लोगों की बसाहट है। मांसी रोड से कुछ हटकर यह सराय है। यहां छोटे-मोटे व्यवसायी रुकते हैं। चोर-उचक्के और जेबकट व्यवसायियों के लिवास में माकर ठहरते हैं । भूमे, नंगे, कंगाल यहां नौकरी की तलाश में प्राकर डेरा जमाते हैं। दिन मे अधिकार समय धर्मशाला में सोते बीतता है। रात को पता नहीं कहां देचारे नौकरी की तलाश में निकल जाते हैं । कण्डस्टर की सिफारिस पर पारो पोर सगर को एक कोठा मिल गया।
२४ . घामोनी की मजार वाली अम्मा के कोई हैं, काम की तलाश में आए इतना परिचय पर्याप्त समझा गया। कण्डक्टर ड्राइवर से प्रांतरे दिन: अम्मा घासलेट, आटा, सुई-धागा, मिट्टी की हांडी और बांस के टोकरे आदि जरूरत का सामान मंगाती है । घामोनी वाले बाबा की मजार पर सभी किस्म के लोग मन्नत मांगने, चादर चढ़ाने जाते हैं, इसी नाते पारो और सगर को यहां पांच दिन के लिए जगह मिल गई । सराय से दिनभर दोनों नहीं निकले। कोठे की छत काली थी, दीवारें चितकवरी, किवाड़ों पर पीक के ढरके । चूने पुछाव देखकर एक अजीव- सी ग्लानि मन को बुदबुदाने लगी। भाई-बहिन दहलीज के बाहर बोरा विछाकर बैठ गए। एक अधेड़ व्यक्ति सिर पर भरा वोरा लादे पाया और उसने बोरा सीधा सिर से प्रांगन में पटक दिया। वोरा फट गया और अन्दर से रबर और प्लास्टिक के जूते, चप्पलें विखर गए । सगर अचरज करने लगा कि इतने सड़े-पुराने, फटे-फटाए जूते-चप्पलें बटोरकर क्यों लाया है यह आदमी ? तभी उसकी औरत दूसरा वोरा लादे आ गई। मरद ने बोझ को इस बार सहारा देकर उतारा । बिखरे हुए जूते-चप्पलें बोरे में भरकर उन लोगों ने दोनों वोरे कमरे के अन्दर रख लिए। मरद- औरत दोनों बीड़ी सुलगाकर बैठ गए। उनके कपड़े-लत्तों का रंग और पहनने का तरीका उनके गांव के लोगों से भिन्न था। दिन ढल रहा था। बगल वाले कोठे वाला पीठ पर एक बड़ा-सा गट्ठर बांधे हुए पाया। ताला खोलकर उसने अपना गट्ठर कमरे में रख लिया। वापस पाने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी। कालिख से पुते व्यक्ति शायद कोयला बेचकर या ढोकर लौटे थे। गट्ठर वाले ने गट्ठर खोलकर अंग्रेजी और हिन्दी अखबारों को अलग-अलग छांटना शुरू कर दिया। इस बार पारो के मन ने यह प्रश्न किया-इतने सारे अखबारों का क्या करेगा यह आदमी? थोड़ी देर बाद सराय धुएं से भरने लगी। रोटी वाली दहलानों में चूल्हे सुलग उठे, कंडों ने अांच पकड़ ली। कुछ लोग चूल्हे पर रोटी सेंकने लगे, कुछ लोग कंडे की प्रांच में टिक्कर सेंकने लगे। गेंहू के आटे के पकने की खुशबू अलग थी। एक कोने में तवे पर एक तिलकधारी आदमी रोटी सेंक रहा था। पारो को लगा-वही एक २५ बत मार-मुभरा है, पति हो स्मारा। पारो कोठा मन्द करके उसीरे न को भारत। उसने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि वह रितीने पहनबहेलो कि बह गनाप है गौर सहारा है। स्मात नाग मग फायदा जमाने कोमोसिस करें। 'दादा राम राम!" महतर यह नल्हे के पास पंच गईमा के मी, नगर के याहर। परना न उस पाक्ति का गा- कोन ठाकुर हो " . "गे हो? पागे मन योत की। गने मनी बतही मोलाना। सोना गहों या । सने मात्र इतना नरा-माग को तलाम निको है।" •या कर करोगी।" "नो कमि आएगा।" गले. सहा-भोगी बात करती हो। इनकारी- नमर्ग का कामपामा " "पेट मेलिना करना होगा । मा-बार नही है। " मन छोड़ दो, मैं तो मामानी पड़ा हु न च । गंन्यामा है महा मर ।" को ले पा राई वार दिना देव " कारोबार नगर मही उनके मारे करने का मुरसल गरेका मोन कारगारमन का मामला है। मान्ने सालानाराम् का है, दिनकर सरकार में चयन होलार रोकता है और फिर रम्पत रोग देता । मेगाकर नया मान बनाने होग। बनना, गरग वीर सा है। दिन के हिसान देख निए, सनमानीmari" पाiran+-दिन सोमा योनौजन कराना पा। मुरगी। पदर दिनार दर में बोली-"माटा ने माती पर नार गाँटमा रासने दो।"
'पंडित ने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर बोला-"ब्राह्मण की बेटी हो इसलिए नहीं कह पा रहा हूं लेकिन चौका साफ तुम करोगी और बासन तुम्हीं मांजोगी।" ' इतना आप न कहते तो भी करती। मैं बाटा लेने जाती हूं।" पारो उठकर चल दी । सगर को वहीं छोड़ दिया। बूढ़ा पोटली में पाटा बांधने लगा। पारो ने सुबह तक के लिए रोटी बनाकर रख लीं। सगर भोजन के पश्चात् सो गया । वह आज कल से ज्यादा स्वस्थ लग रहा था। पारो को जल्दी नींद नहीं आई। वह सोचने लगी, कल से कोई धन्धा शुरू करना होगा। रहने के लिए आगे-पीछे कोई ठिकाना तो होना चाहिए। धरती बहुत ठंडी थी। फिर वही ओढ़ने-विछाने की समस्या हर दिन, हर रात की समस्या । टाट का बिछौना ठंडा हो रहा था। चादर तार-तार थी, यदि जोर से तान लो तो फट जाए। शरीर से लिपटे चिथड़ों की जान निकल चुकी थी । कहीं कोई गरमाहट नहीं थी। वदन थर-थर कांप रहा था। "कौशल खोल!"-बगल के दरवाजे पर किसीने बाहर से दस्तक दी। पारो चौंक पड़ी। दरवाजा खुलने की आवाज-और फिर अंधेरे में तैरती हुई फुस- फुसाहट-पांच बोरी निकाला न, पांच रुपये चाहिए।" दूसरा स्वर-लेकिन अाज तो दो वोरी विका है। सुबह कालू हलवाई ने लेने को कहा है-पैसा मिल जाएगा तव दूंगा।" पहला स्वर-- और देख अंधेरा होने के बाद कल ले आना । लोको शैड में नया अफसर पाया है । स्साला बदमाश है-कड़ी नजर रखता "एकड़ने वाले तो आप हैं-सया भए कुतवाल, फिर डर काहे का।" "नहीं भाई, हमको भी अपनी इज्जत प्यारी है। क्या फायदा, जल्दबाजी में काम बिगड़ जाए और तुम्हारा धंधा बन्द हो जाए। 'फिर दियासलाई जलने की आवाज, बीड़ी का धुआं किवाड़ की सांसर से छनकर पा रहा था।
२७
फिर स्वर मुनाई दिया--"हजूर कोयला दोन-दोते काले हो गए।
एकाय वैगन कटवा दी तो कुछ दिन लेटकर साएं, ऊँने काम ऊंचे दाम।
कोयले की दलाली में मापको भी नया मिल रहा है। दस लोगों से पास
चोरी भी उठवामागे तो पचास सये मिलेंगे। उस पर भी थानेदार का
"देग वंगन का काम सूमकेला न कर पाएगा । गेंग बनाना पड़ेगा।"
"हुनर, पोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं । गंग बनाते या देर लगती
"तो फिर हो जा पालू, अभी तो दरोगा दमदार है। मरे हो.
योना का मुना तूने एक सिक मंगन हिना पड़ा था, रातों रात माल
निकल गया। साठ हजार रूपये की चाय पी। मोस हसार रूपया तो
दरोगा जी पा गए।"
"बस, ऐमा ही कोई काम करा दो।"
"दरोगा जी को खुश करना पड़ेगा।"
"जो हुक्म करो सो कर दू।"
"राई, बहनी का शौक है उनको । बोल, कर सकेगा इन्तजाम ?
इसके बाद तो यस अपनी मुट्ठी मे, पूरा स्टेशन लूट लो।"
यात समफमाहट से भारभ हुई थी और धीरे-धीरे वह दोनों मावा
प्रय तक गुन धुको यौ। इस बार एक स्वर युछ-कुछ फिर से वुझने
सगा--"बगल वाले कोठे में निन्यान्वे नम्बर का दाना टहरा है।"
"कौन है ?"
"पता नहीं, पन्द्रह-सोलह मार पी जवान लौडिया है -साप में
शायद छोटा भाई है।"
"पकेले हैं-
•~मा वार नहीं है ?
बिल्कुल अकेले।
'तो पब तक क्पा भाउ भोक रहा था, पहने पो नहीं बताया?"
"कल मुबह दोनों को दिया दूगा।"
"उल्लू के पट्टे, कल सुबह किसने देखी है।-अभी से
4.
"वहां?"
२८ -- - "थाने पर ।" "कैसे ?" "अवे, तू पुलिस के हथकंडे नहीं जानता। तेरे पास दो-तीन वोरा कोयला रेलवे की चोरी का है-अभी है। मैं थाने जाता हूं रोजनामचे में रपट डालता हूं कि मुखविर से खबर मिली है कि चोरी का कोयला सराय में फलां जगह है । वस फिर जाते हो जप्ती बनाएंगे। दोनों को गिरफ्तार करके थाने ले चलेंगे। दरोगा जी का पेट भरने के वाद जूठन मेरी और मेरी जूठन तेरी।" "हुजूर की मर्जी । विल्कुल नई कली है, दरोगा जी खुश हो जाएंगे।" "अच्छा, तो मैं चलता हूं।" "मैं भी चलता हूं। इस खुशी में पहले कुछ दारू-शारू हो जाए। शाम को पऊया लगाया था। स्साले पानी मिलाते हैं क्लारी वाले। आघा घंटे में उतर गई।" "अच्छा, तो चल, हो जाए पहले ।" कुंडी चढ़ी और दोनों के कदमों की आहट सराय के दरवाजे की. ओर मलिन होती गई। पारो को काठ मार गया था। काटो तो खून नहीं। अभी-अभी उसने जो सुना, वह क्या सच हो सकता है ? रेलवे के सिपाही चोरों से मिल- कर चोरी कराते हैं । सिपाही-दरोगा-सव के सब एक से...! उसकी अन्तरात्मा कांप उठी। निर्दोष लोगों को कैसे फंसाया जाता है। उस अंधेरे कमरे में बन्द लोगों पर दुनिया की बुरी नजर थी। उसकी इज्जत खतरे में थी । उसमें यह समझ सकने की अकल थी-~-क्या कुछ हो सकता है, आज की रात । एक ही रास्ता है वचने का, यहां से भागना । लेकिन कहां जाएगी वह ? जाड़े की रात-अनजान शहर ? कहीं भी तो जाएगी, लेकिन उसे यह जगह छोड़नी है तुरन्त । थोड़ा विलम्ब उसका समूचा जीवन बर्बाद कर देगा। उसने भाई को झकझोरा-"सगर उठ, भाग, यहां खतरा है ।" सगर नींद से जागा अांखें मलता हुआ; लेकिन पारो की घबराहट ने उसे सचेत कर दिया। उसे इतना समझ में आया कि उसे तत्काल भागना है यहां से । पारो ने वोरे में क्या भरा, क्या छोड़ा, कुछ , २६ पता नहीं। सगर का हाय जोरों मे पकड़कर वह माग पड़ी उस पोर जहां ढेर-सी रोशनी विवरी दिख रही थी, जहां चोर था, वहाँ से माया पा रही थी। उसे अंधेरे में डर लग रहा था-उमे सामोशी सील पाना चाहती थी। वह भीड़ में सो जाना चाहती थी, वह चार मादमियों के साथ चरना चाहती थी जहा वह चीग सके, लोग उसकी शिकायत सुन सकें। वह भाग रही थी रेल की पटरियो के किनारे-किनारे .."वह भाग रही थी मोर अन्नतः वह एक विशाल जनसमूह में मिल गई। भाई का हाप पकडे-गकड़े वह भीड़ में गो गई। उमने रेलगाड़ी के.यारत सुना था, पढ़ा भी था। रेलगाड़ी चल दी-तब उसे लगा कि उसे इस गाने में बैठ जाना चाहिए था। गाडी चली गई, पेटफार्म की भीड छटने लगी। भीड का एक छोटा सा टुकड़ा जहा जा रहा था वह उसके माय हो मई। एक बढ़ा सा परनुमा था-इतना बडा"इतना ऊचा, परपर और सोमेंट का बना । जगमग विजली के तट्टमो के अलावा जलते हुए डडे । लाल, नीली रोशनी.. शोर"। उसने देखा कुछ लोग विस्तर सोल रहे हैं... सैटने की, मोने की पारी कर रहे हैं। कुछ लोग मोकर उठे हैं ." विस्तरे वाध रहे हैं, शायद उनको कही जाना हो । स्टेशन है, रेलगाड़ी भाती हैं, लोग आते हैं लोग जाते हैं। पारो का दिमाग तेजी से काम कर रहा था। यह किसी एक यात्री का घर या मकान या कमरा नहीं है। यात्रियों के लिए बनाया गया स्थान । जमे गाव मे मन्दिरो में दह- लागें होती हैं. जहा साधु, संन्यासी, यात्री पाकर वियाम करते हैं, सोते हैं। उमी तरह बाहर शहरों से पाए लोग यहा रुकते हैं। यहा माना. बाना लगा रहता है। यह स्थान पाने पर जाने वाले यात्रियों के लिए है। वह भी यात्री है, कही तो जाना है उन्हे... शायद मुबह हो जाना पड़े। उसका दिमाग दौडना रहा । फिर उसने एक कोना चुना पोर बोरे से एक टाट का टुकडा निराला । सगर उसके इशारे करने पर लेट गया । चादर उठाकर वह स्वयं भी उसीमे दुबक गई। इस बार चादर उसने सिर में मोटी थी ताकि कोई उन्हें देग सके, पहनान न ३० सगर ने धीरे से पूछा-"वहां से क्यों भाग पाए, यहां कब तक पड़ें रहेंगे ?" पारो ने नि:श्वास छोड़ते हुए कहा-"सुवह होने तक ऐसे ही पड़ें रहना। सुबह कहीं चलेंगे। हम स्टेशन पर हैं. कहीं भी गाड़ी में चलेंगे।" सगर चुप हो गया, पता नहीं कब सोया? रात ढलती रही- पारो सोचती रही अपने अस्तित्व के बारे में। दुनिया की काली करतूतों के बारे में और उस विधाता के बारे में जिसने यह सारा खेल रचाया था। सुबह होने में न जाने कितनी देर थी। कहां गांव के घरों की टिम- टिमाती हुई डिब्बियां, लालटेनें और कहां यह ऊचे-ऊंचे खंभों पर लगे चकाचौंध कर देने वाले बड़े-बड़े बल्ब ? झिलमिलाती हुई इस लम्बे- चौड़े चबूतरे की रोशनियां"जगमगाते हुए डंडे...। पता नहीं चलता रात कितनी शेष होगी। दूर-दूर तक कहीं लड़ाइयों की आवाज का पता नहीं है.. कोई कुत्ता नहीं भौंकता । बार-बार धरती कांप उठती है... पहली बार सगर डरकर उठ बैठा-"पारो, धरती क्यों कांप उठती है... इतना क्यों घड्घड़ाता है ?" पारो उसे समझाती है.---'रेल का इंजन है, भारी होता है, चलने धरती में धमक पैदा होती है। तू सो जा, डरता क्यों है, मैं जो "डरता तो मैं भी नहीं हूं, जाने कैसा कैसा लगता है सगर ठीक ही कहता है, पारो को भी जाने कैसा कैसा लगता है! घड़धड़ाते हुए इंजन, घूमते हुए बोझिल पहियों की आवाज, दूर संटिंग करते हुए मालगाड़ी के इंजनों की आवाजें, प्लेटफार्म पर हर क्षण उत्पन्न होने वाली एक नई हलचल । कुल मिलाकर शोर-भरी नई दुनिया। प्लेटफार्म पर वर्दी लगाए सिपाही घूम रहा है। पारो डरती है। कहीं यह वही तो नहीं ? उसकी तलाश तो नहीं है उसे ? मुंह अच्छी तरह ढांप लेती है। वह मन ही मन देवी-देवताओं को सुमरती है-भगवती, रक्षा करना इस राक्षस से । ठंड काफूर हो जाती है, माथे । - पर स्वेद-विन्दु झलक पाते हैं। फटी चादर के छोर से झांकती है। सिपाही कहीं दूर जा चुका है। सोचती है इन सब रेलों को रसवाली करते होंगे यह पुलिस थाले । कोई यात्री, कोई चोर यह बल्व न गोल से जाए, इंजन मे कोयला मा डिब्बों से और कोई सामान न घरा ने जाए ? फिर दिमाग में एक सवाल उठना है 'माबिर लोग चोरी क्यों करते हैं ?' उत्तर तरमाल मिल जाता है उनके पाग घरती नहीं होगी, उन्हें मजदूरी नहीं मिलती होगी, सायद गाहकार का पैगा देना होगा। फिर यह सिपाही घोरी क्यों कराते हैं ? पैमों के लिए, धन के लिए ? पायद उसके बच्चे ज्यादा होंगे, पिया कम मिलता होगा या फिर जल्दी मे रुपया कमाकर साहकार बनना चाहता होगा! यह मय कुछ भी सही मान लिया जाए तो फिर दूगरे घर की बहू-बेटियों की इज्जत से मेल क्यों करना चाहते हैं ? यहा उपवा दिमाग उलन जाता है...इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। बदमाश होंगे... .."लम्पर 1 उनके सभी काम ऐसे होते होंगे ! पारो को लगा वह फिजूल की वाती में मपना दिमाग उलमा रही है। उने कल के बारे में सोचना चाहिए। क्या करना है सुबह होने पर, बहा जाना है ? वह माने दिमाग पर जोर हालने लगी। कौनसा काम वह कर मकेगी ? बोड़ी बनाना सीप सकती है, उसमें कुछ समय लगेगा । जगल कही पासपास हो तो लगाड़ी काटकर लाएगो, पाजार में बेचेगी। वह परेलू काम भी कर सकती है जैसे लम्बरदार के यहां राधा यच्चों को लिलाती थी, यशोदा रोटी बनाती थी। यह पाहर है, बहुत से लम्बरदार होगे मोर भी बडे-बड़े भादमी होंगे। किमीके यहा गाय-भैस हो"वह गाय-भैस लगा सकती है, सानी दे सकती है, ढोर घरा सकती है. मगर भी ढोर घरा ममता है । पास कही मुगां घोला । पारो को तन्द्रा टूट गई। मुबह होने को है। फिर स्टेशन के बाहर पेडों पर मोए कौए काय-काव कर उठे । प्लेटफार्म पर गरम पाय को मावाज भाने लगी। सगर पादर खींचता हुमा दुनमुनामा-"बहुत ठंड है, घरा चाप पोते हैं।" पारो ने उसे पुका-"ममी नहीं। पाल, वहीं नदी हैं, मुंह-हाथ धोकर पाएंगे।" तभी उसके दिमाग में एक बात उठी- ल से नीम तोड़ेंगे, उसकी दातीन बेचेंगे। चलती गाड़ी में कौन न लेकर चलेगा। ताजी दतोन पैसे की चार कोई भी खरीद लेगा।' : यह ख्याल आते ही वह दोनों रेलवे लाइन के किनारे-किनारे. जंगल. योर भागे। चलने वाले को राह मिलती जाती है। रेलवे लाइन के किनारे- किनारे ढेर से नीम के पेड़ थे। भाई-बहिन ने मिलकर खूब नीम की डालियां काटी, दतौन बनाई, गट्टे वांधे और प्लेटफार्म पर घुसने के पहले ही घंटे भर में सारी दतौन बेचकर उन्हें एक रुपया मिल गया। प्लेटफार्म के बाहर कतार की कतार हलवाइयों की दुकानें, छोटे-बड़े होटल...। पारो ने सोचा.. भैया को चाय जरूर पिलाएगी। एक होटल की बैंच पर दोनों बैठ गए-चाय पीने लगे। तभी चौदह-पन्द्रह साल के दो लड़के आए, उनके सिर पर कोयले की डलियां थीं। उन्होंने झट से होटल वाले से सौदा किया और पैसे लेकर चलते बने । पारो का कौतूहल बढ़ा। उन लड़कों को भी यह कोयला स्टेशन मिला होगा। होटल वाले से वह पूछ बैठी-रेल्वई का कोयला ' लगता है सीवी गांव से आई है, देखती नहीं जला हुया कोयला पारो की निरीह मुस्कान देखकर होटल वाले को लगा वाकई गां के भोले-भाले बच्चे हैं। भला आदमी था अतः उसे बच्चों में अच्छ' दिखाई दी। पारो ने उसके विस्मय को शान्त कर दिया- "कल ही ग से आई हूं, मां मर गई।" बात करते-करते उसकी अांख भर पा फिर साहस बटोरकर पूछ बैठी-"कोई काम मिलेगा ?" होटल वाला माथे पर तिलक लगाए था। इतने समय पं० नहा कर पूजा कर चुका था। सामने शिवजी की मूर्ति पर उसने अगरबत्ती रखी थी। यही देखकर पारो इस होटल पर रुकी थी। कोई काम मिलेगा?' शंकर काका ने एक बार फिर गौर से की मोर देगा। देखने में माफ-मुपरे पे, पता नहीं कौन जात हों, कमे एक्दम अपने होटल पर रग ले ? फिर वोला-"स्टैगन है...यहां कोई गानी नहीं रहता, एक पेटी उठाार वा पर चा दोगे तो भी कोई मिसा फर देगा। रेल की पटरी से जला हुमा पोयसा वीन लापोगे तो भी एक टोरी का रे रुपया मिल जाएगा । काम तो बहुत है...काम करने वाले नहीं मिले।" पारो को लगा कि उसके कानों में प्रमी-प्रभो शिमोने मिश्री पोली है। काम बहुत है...कोई साली नही रहता स्टेशन पर। उसे भी कोई न कोई गाम मिल जाएगा। इग वीन दोनी चाय पी चर थे। लेकिन पारो का मन नोहे की परियों के प्रामपास भटकता रहा । रेलवे एंजिन से फिका हुमा कोयला पटरियों के किनारे विपरा हुमा है। वह सगर के साथ लूट-लूटकर, उछल-उधाकर कोयला बीन रही है, जैसे गांव में माघी मे पाम बीनती थी । टोकरे, दो टोकरे, चार टोकरे कोयले के भर गए हैं। वह छलागे लगाती हुई होटल की पोर भाग रही है । हलवाई उमका कोपला गरी रहे हैं.. मे वरम रहे हैं...पारो पुनः स्कूल में दागिल हो गई है । सगर को पटा रही है...वह भी पड़ रही है । चाय का कर रगते न रखने यह सगर को लेकर दूर पटरियों के किनारे-किनारे भागती गई। गाली बोरे में एजिन का जला दुपा कोयला यहिन माई भरते रहे। मील, दो मोल, घार मील, पता नहीं कित्ती दूर, कोई पन्त नही, दूरी का कोई नाप-जोख नहीं। मब टागे भर गई, सांस कुल गई, वोरा मारी हो गया। दसती दोपहर में भागों के पागे तिलगिया नावने लगों, दिमाग घूमने लगा, पेट दोहरा होने सगा, मुग गूगने लगा तब कहीं जाकर पारो माई का हाथ पकडे बोरा सिर पर सादे स्टेशन की भोर को मुड गई। शितना पागे बढ़ गई पी वह जोश मे--पर पता चला। पांव उठने का नाम नहीं लेते । राती पहान, सारे दिन का थम, उनकी रग-रग तोडने सगा। गिरते-पडते. गाम तर कोपले को यदानों में काम करने वाले मजदूरों की हलिया लिए पह सोग उसी होटल पर वापस पाए जहां से सुबह पले ये पर्यात सार चलते हैं, मुंह-हाथ धोकर पाएंगे।" तभी उसके दिमाग में एक बात उठी- 'जंगल से नीम तोड़ेगे, उसकी दातीन बेचेंगे। चलती गाड़ी में कौन दातीन लेकर चलेगा। ताजी दतोन पैसे की चार कोई भी खरीद लेगा।' बस यह ख्याल आते ही वह दोनों रेलवे लाइन के किनारे-किनारे. जंगल. की ओर भागे। चलने वाले को राह मिलती जाती है। रेलवे लाइन के किनारे- किनारे ढेर से नीम के पेड़ थे। भाई-बहिन ने मिलकर खूब नीम की डालियां काटी, दतौन बनाई, गढ़े बांचे और प्लेटफार्म पर घुसने के पहले ही घंटे भर में सारी दतौन वेचकर उन्हें एक रुपया मिल गया। प्लेटफार्म के बाहर कतार की कतार हलवाइयों की दुकानें, छोटे-बड़े होटल...। पारो ने सोचा.. भैया को चाय जरूर पिलाएगी। एक होटल की बैंच पर दोनों बैठ गए—'चाय पीने लगे। तभी चौदह-पन्द्रह साल के दो लड़के आए, उनके सिर पर कोयले की डलियां थीं। उन्होंने झट से होटल वाले से सौदा किया और पैसे लेकर चलते बने । पारो का कौतूहल बढ़ा। उन लड़कों को भी यह कोयला स्टेशन से मिला होगा। होटल वाले से वह पूछ बैठी-'रेल्बई का कोयला ' लगता है सीधी गांव से आई है, देखती नहीं जला हुआ कोयला है पारो की निरीह मुस्कान देखकर होटल वाले को लगा वाकई गांव के भोले-भाले बच्चे हैं। भला यादमी था अतः उसे बच्चों में अच्छाई दिखाई दी। पारो ने उसके विस्मय को शान्त कर दिया-"कल ही गांव से आई हूं, मां मर गई।" बात करते-करते उसकी आंख भर आई । फिर साहस बटोरकर पूछ बैठी-कोई काम मिलेगा?" होटल वाला माथे पर तिलक लगाए था । इतने समय पं० नहा धो- कर पूजा कर चुका था। सामने शिवजी की मूर्ति पर उसने अगरबत्ती लगा रखी थी। यही देखकर पारो इस होटल पर रुकी थी। कोई काम मिलेगा?' शंकर काका ने एक बार फिर गौर से दोनों की मोर देगा। देखने में साफ-सुथरे थे, पता नहीं कौन जात हों, कमे गएकदम अपने होटल पर रख ले ? फिर वोला-"स्टेशन है...यहां कोई गाली नहीं रहता, एक पेटी उटारर बस पर चदा दोगे तो भी कोई मिनका फेंक देगा। रेल की पटरी से जला हुमा कोयला बीन लामोगे तो भी एक टोकरी का रेट रुपया मिल जाएगा । काम तो बहुत हैं. काम करने वाले नहीं मिले।" पारी को लगा कि उसके कानों में अभी-अभी किसीने मिश्री घोली है। काम बहुत है...कोई साली नहीं रहता स्टेशन पर। उसे भी कोई नं कोई काम मिल जाएगा । इस बीच दोनों चाय पी चुके थे। लेकिन पारो का मन लोहे की परियो के प्रामपास भटकता रहा । रेलवे एंजिन से फिका हुमा कोयला पटरियों के किनारे विपरा हुमा है । वह सगर के साथ लूट-लूटकर, उन-उपलकर कोयला बीन रही है, जैसे गांव में प्रांघी मे पाम बीनती थी। टोकरे, दो टोकरे, चार टोकरे कोयले के भर गए हैं। वह छलागें लगाती हुई होटल को पोर भाग रही है । हलवाई उसका कोयला खरीद रहे हैं."मे वरम रहे हैं.. पारो पुनः स्कूल में दाखिल हो गई है । सगर को पा रही है... वह भी पड़ रही है । चाय का कर रयते न रखने वह सगर को लेकर दूर पटरियों के किनारे-किनारे भागती गई। पाली बोरे में एजिन का जला हुअा कोयला बहिन-भाई भरते रहे। मोस, दो मोल, चार मोल, पता नही कित्ती दूर, कोई पन्त नही, दूरी का कोई नाप-जोख नहीं । प्रब टागे भर गई, सांम फुन गई, वोरा भारी हो गया। ढलती दोपहर में माखो के मागे निलगिया नायने लगीं, दिमाग घूमने लगा, पेट दोहरा होने लगा, मुम भूगने लगा तब कहीं जाकर पारो भाई का हाथ पकड़े बोरा सिर पर सारे स्टेशन की मोर को मुः गई। कितना पागे दड गई पी वह जोश 'मै-पर पता चला। पांव उठने का नाम नहीं लेते । रात की थकान, सारे दिन का श्रम, उनकी रग-रग तोडने लगा। गिरते-पडते. शाम तक कोयले को गदानों में काम करने वाले मजदूरों को हलिया लिए वह सोग उसी होटल पर वापस पाए जहां से सुबह चले थे अर्थात् शंकर ३४ - पापा के होटल पर। शंकर फाफा को समझते देर न लगी कि दोनों बरे दिनगर पटरियों के किनारे कोयला बीनते रहे है। उसने तीन इंग गुस्कान से उनका स्वागत किया, हाथ-मुंह पोने को पानी दिया, पाय पिलाई, गोयला खरीदा । रात का भोजन दोनों ने यहीं से खरीदा।। शंकर फाफा संक्षेप में उन दोनों की समस्याओं से परिचित हो चुका पा । रात को होटल की बेंग पर भट्टी फी गरमाहट में दोनों गाई-बहिन' कांफर फाफा पी अनुगति से सोए। कोई क्षण कभी कहीं नहीं ठिठाता । पहिए घूमते है, आगे बढ़ते है। पारो आगे बढ़ती गई रागर का हाथ पकड़कर । स्टेशन पर गुसाफिरों का गाल होया, पोयला बीना, होटल पर पाय-नाश्ते मे वर्तन पोए । शंकर गाना पिपल गया उनके बड़े श्रम से, उनकी लगन से, उनकी गानदारी से। उनके प्रति एक अशात प्रेम उसके मन में पलने लगा। उराने मन को अधिक नहीं भटगाने दिया। पारो और सगर का मेहनत- गजदूरी के लिए बाहर जाना बन्द हो गया। पोनों उसमे होटल पर ही काम करने लगे। रागर सूबह चार बजे उठगर सिगड़ी में कोयला भरता है, भट्टी जलाता है, होटल में झाडू लगाता है, पुरी-मेज साफ करता है तथा दिनभर कप प्याले पोता है। पारो सब्जियां काटती है, मैदा गूंधती है, रा गोरी का मसाला भूनती है, मानोड़ी की पिट्ठी पीराती है । शंगर काका' शिवजी का पूजन करके हार-फूल चड़ागर साहकों को पलाता है। यह सुष है। हर माग रागग पर होता पाता है। उसका हाथ बटाने वाले लोग' उसे मिले थे। उसका गोकरों पर पीसना-चिल्लाना कम हो गया । रात गो नींद अच्छी आती है। गनमे संशय समाप्त हो गए। पहले फिकरें पी, सुबह वाला नौकर नहीं भाया तो भट्टी समय से नहीं जलेगी, पाय-नाश्ता देर से बना तो गोकर लोग खाने-पीने की वस्तुओं पर हापः साफ करेंगे। दिनभर के हारे-धगो भाई बहिन रात को होटल पर ही सो जाते थे। शंकर पागा बारह बजे रात को होटल बन्द करणे पला जाता है ।। सुबह पांच-छ: बजे तक आ जाता है । मेहनत का धन्धा है लेकिन पामाई: .
५ घहुत अच्छी है । जिन्दगी की गाड़ी बड़े मजे में चल रही है। ३ पारो को भाशा नहीं थी कि होटल दाना काका दो जून की रोटी के मनावा महीने के अन्त मे पचास रुपया मोर देगा। रुपया हाय में माते ही उसने शंकर काका से प्रार्थना को कि यह पढ़ना चाहती है. हायर सेकेन्डरी की परीक्षा देगी। होटल का काम सुबह-शाम देनेगी। स्कूल में दाखिला लेगी...दिन मे स्कूल जाएगी, रात को पढ़ेगी। कर काका के रूप में उमे देवता मिले थे। पारो ने सरकारी स्कूल मे नाम लिखवाया, कितायें खरीदी और परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। सगर का मन पढने में नहीं है । पारो उसे सूब समझाती है, पढ़ाने की कोशिश करती है। वह पकार सो पाता है । पारो ने सोच लिया गर्मियों को छुट्टियों के बाद उसका नाम स्कूल में लिखवाएगी-फिर वह दोनों पड़ेंगे...। पारो रोज नया सपना देखती है। रोज कल्पनामों के भाकाश में उड़ती है। बाड़ा भागने नगा। बसन्त के भागमन ने पारो के मंग-मंग में नई भाग भर दी। सगर भी पहले से अधिक स्वस्थ दिखने लगा पारो जानती है पुरे-पड़ोग की भूमी नजरें उसे पूरती हैं। पारो का मन रही नहीं भटकता । होटन का काम, स्कूल को पढाई उसे घेरे रहती है। परीक्षाएं माई। पारो ने होटल के काम से छुट्टी ले लो। काका ने एक मौर नौकर रम्म लिया है । पारो मन लगाकर पढती रही। परीक्षाएं समाप्त हुई। पारो ने कमा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। शंकर ने गणेश जी को नामों का भोग लगाया। रात के बारह बजे और संकर काका होटल बन्दरसे पसे गए । मामा को मलाह मानकर पारो अभी तक होटल के दर सोती है।
३६ गर्मी लगती लेकिन क्या करे । अासपास तमाम लुच्चे-लफांगे धूमते हैं। नया नौगार गनेश बाहर बेंच पर सोता है। पांकर काका चले गए तो गनेशगे दरवाजे से मुंह राटाकर पाहा-पारो, फस्ट क्लास पारा हुई हो । काका ने लड्डू बांटे हैं, अभी तेरे लसुन खाने हैं।" पारो ने अन्दर से उत्तर दिया-या लेना।" पाव खिलाएगी?" पारो फो उराकी पायाज की तदप अच्छी नहीं लगी। फिर भी बोली-भी भी।" और गारवट लेकर सोने की चेष्टा करने लगी। गोपा को नींद नहीं पा रही थी। वह सोना ही नहीं चाहता था। वह सोच रहा था...गयों न प्राज की ही रात...?' लेकिन पारोगे अन्दर से गांगी लगा ली है। सहज में प्रावाज देने पर शायद न खोले । फिर अन्दर रागर भी सो रहा है। लेकिन पारो ने गाहा है-लर कभी भी ग्या लेना"' जरूर राजी हो जाएगी। पाम तक इन्हीं मयालों में 'उलझा रहा फिर उसका गयाल उरो फसता गया। बदन ऐंठने लगा, कान रागरागाने लगे । वह गांपकंपाहट को साथ उठा । दरवाजे पर हल्की थपकी गारपार गराहते हुए बोला-"पारो, मर रहा हूं पेट के दर्द से" "थोड़ा-सा काला नमक दे दे।" पारो ने शायद नहीं सुना। उसने थपगी और तेज की...प्रावाज को और पीला बनाया गारो, गोल न...बढ़ा दर्द है पेट में।" अन्दर रो निन्दासा स्वर फूटा--"ॐ 55..." "एरयाणा सोल... गर रहा हूं दर्द से।" "काहां दरद है रे ?" नींद में सूबी पारो ने कहा । "पेट दुखता है-जैसे पिसीने गाया भोंक दिया हो । देग, सिनिया में काला नमक रगा है, थोड़ा-गममा दे दे।" गोश को लगा शायद पारो उठी है, यह अंधेरे में बिजली का बटग टटोल रही होगी। गोश ने फिर नाटक पिया--"तू क्यों परेशान होती है। दरवाजा सोल, गुफ पता है नाममा पी डिबिया पाहां धरी है।" पारो ने दरवाजा RAama - तोल दिया। गनेश ने अन्दर घुसते ही दरवाजा बन्द कर लिया । पागे पर अप्रत्यापित हमला हपा सो वह पदरा गई। इसके पहने कि यह मुछ धीमे-चिनाए, मनेग ने एक हाथ में उसका मुंह दवा लिया दूसरा हाय छाती पर रखकर रोर से मपने बदन से सटा लिया और बोला- "विस्तुन मी प्रावाज निकाली तो चाक मार दूंगा, मुझे भरपेट नहा मा मेने दे।" पारो निलमिला उठी। वह चोदना चाहकर भी चीन न सको। गनेश के हाय की पकड़ सीने पर उसके दाहिने बगल से थी। पारो से लगा, उसका दाहिना हाय जानी है। उसने गनेग को लिमटा-समटी में दीवाल की तरफ खीच निया मोर दाहिना हाय दहा- कर बिजली का बटन दवा दिया। मारे कोठे में प्रकार विमर गया । मगर मोया पड़ा था, उसे जगाना जरूरी था। पारो पूरा जोर लगाकर गनेश ममेत धम्म से घरती पर गिरी...गनेश को पकड छूट पारो चोवी-या...!" सगर जाग पडा । गनेश ने दूध बनाने का बौदा उठा लिया और दबी अावाज में धमकी दी- अगर किसीने भी मावाज निकाली तो दोनो का कतल कर दूंगा।" मगर अब तक मपटा था। उनके बगल में पनिया-मिर्च की डलिया पड़ी यो, मगाला वाटने का बट्टा भी था। चाक उठाकर वार करने के पहले गनेश कोंचे को चोट घर देगा.. सगर के दिमाग में बिजली कोयो। उमने बट्टा वाया मोर पलक झपकते ही बट्टा फेंका मौर गनेश का सिर फूट गया। पर कोचा हाय मे गिरा, कब वह धरती पर गिरा और कब सगर चाकू सेवर उसके मोने पर सवार हो गया"किसीको पता न चसा । सगर ने पारोका म्लाउज फटा देखा था, उसके सीने पर नानून के निशान देगे थे। उमरा सिर मन्ना गया था। गनेश बदमाश है, वह बदमागी के लिए घुसा था। सगर और मधिक नहीं सोच सका। उसरा हाय उठा और चाकू गनेश को पसलियों में फंस गया। पारो चोग उटी- "उ-ई-६!" पोर वह जोर-जोर से रो पड़ी। गनेग की गर्दन मुद्रा गई यो-स्पात वह गैरहोश हो गया था। पारोसे चीन पर पड़ोन का रातको होटल वाला उठ गया। उसकी आहट से सगर घबरा गया। वह पीछे का दरवाजा खोलकर भाग निकला। बगल वाले होटल का रामविश्वास अन्दर घुसा तो दृश्य देखकर अवाक् रह गया। धीरे-धीरे भीड़ जमा हो गई। पारो रोए जा रही थी। रेलवे पुलिस के सिपाही आ गए, वे पारो को थाने ले गए। शंकर काका खबर मिलते ही भागे। थाने गए तो पारो लिपट गई-फूट-फूटकर रोई और घटना का हाल सुनाया। वह बार-बार सगर के लिए चिल्ला रही थी--"उसे ढूंढो काका, भैया कहां गया ?" काका किसी भी हालत में पारो को थाने पर अकेला छोड़ने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अपने पहचान वालों को सगर की खोज में भेजा। । छ: माह की दौड़-धूप सारी रात बीत गई, सगर का कहीं पता नहीं चला। पारो ने घटना की रिपोर्ट पुलिस में लिखाई। घटना-स्थल के परीक्षण से तथ्यों की पुष्टि हुई। सगर के विरुद्ध कत्ल का मामला दर्ज कर लिया गया। शंकर काका के होटल पर थानेदार साहब ने सैकड़ों बार चाय पी थी, थाने पर भी उसीके होटल से चाय-बिस्कुट जाते थे । उन्हीं के सम्बन्धों के कारण पारो को पुलिस ने अधिक परेशान नहीं किया। कल के फरारी मुलजिम की जोरों से तलाश जारी है। थाने के सिपाही बीना, कटनी, भोपाल रवाना हो गए थे के बाद सगर कटनी में गिरफ्तार हो गया। उसे जी० आर० पी० थाने पर लाया गया। उसने पुलिस को सच्चा बयान दिया। पारो की रिपोर्ट में जो बात लिखाई गई थी उसी प्रकार घटना का ब्यौरा सगर ने दिया। शंकर काका और पारो सगर से मिलने हवालात में गए। छः माह में सगर की उम्र चार-पांच साल बढ़ी हुई लगती थी। पारो बहुत रोई। रो रोकर पूछती रही-"कहां भटकते रहे भैया ! रोटी कहां खाते थे ! सोते कहां थे !" सगर तो जैसे इतने दिनों में बिल्कुल बदल गया था। उसका मन खूब भरा हुआ था लेकिन उसके चेहरे पर कोई नया भाव नहीं पाया। सीखचों के पास शून्य में देखता हुआ बोला "पारो, अपना कोनसा घरबार है, कौनसे खेत-जागीरें हैं। जहां रात हो जाती है, सो जाते हैं, भूख लगी, खा लेते हैं।" - तेरे पास पैसे तो ये नही, रोटी कहां से खाता था?" "पारो, घर के बाहर निकलो तो पता चलता है दुनिया बहुत बड़ी है । हम जैसे वैकारों के लिए बहुत काम हैं, बहुत धन्धे हैं । मुझे अपने जैसे कितने वे घर-बार मिले, वेरोजगार मिले । हमारी एक पूरी विरादरी है । संकडों बच्चे स्टेगनों पर भीख मांगते मिले, तेल मालिश, जूता पालिस से लेकर चोरो-चपाटी पोर गिरहक्टो...।" "तू क्या करता था?" "पहले भीख मांगता था, मुसाफिर लोग रोटी-पूड़ी कुछ भी देते थे.. लेकिन फेंककर देते थे। मुझे अच्छा नहीं लगा। फिर भीख नहीं मांगी।" "तो क्या फिर जूता पालिग करने लगा ?" "ब्राह्मण का वेटा हूं, जूता पालिश क्यों करूंगा, बाटू उस्ताद की सागदी कर ली थी।" "ये कौन-कौनसे नये शब्द बोलने लगा है ?" "अरे भाई, किसी गुरु का चेला बन गया था।" "तेरा गुरु क्या करता था?" "यहां का माल वहां करता पा।" "क्या मतलब ?" "जिनके पास बहुत ज्यादा पैसा है-उन पर हाथ साफ करके हम जैसे वे घर-बार लोगों को रोटी खिलाता था।" "लेकिन यह तो चोरी है, गलत काम है।" "यह क्या जरूरी है कि दुनिया का हर इन्सान सही काम करे । सही काम करके भी इन्सान कहां बच पाता है ?" "ये तू, कैसे कहता है ?" "गनेग को चाकू मारकर क्या मैंने सही काम नहीं किया ? फिर हवालात में में क्यों बन्द हूं और वाटू के साथ जेद काटकर क्या मैंने गलत काम नहीं किया था? लेकिन उसके बाद हम लोगों ने मौज- मजे उडाए थे।" "मैं कानून तो नही जानती; लेक्नि गनेश को मारकर तूने सही । काम किया है तो अदालत तुझे छोड़ देगी। लेकिन चोरी करके तू अपने... आप को भी क्षमा नहीं कर सकेगा। तू इसके लिए बना ही नहीं था। दुर्दिन इन्सान को लाचार कर देते हैं । मैं जानती हूं, तू मजबूर था। सब ठीक हो जाएगा सगर भैया, तुम घबरइयो मत, अभी पारो जिन्दा है।" बोलते-बोलते पारो को लगा सीने से उठने वाला गुबार गले में आकर अटक गया है। आवाज कांपने लगी, घुटने लगी और टप-टप बड़े- बड़े गरम आंसू उसके नेत्रों के कोरों से टपकने लगे। पीछे हवलदार खड़ा था, बोला--"मुलाकात का समय खत्म हो गया, बाहर चलिए । - - - पारो वापस तो आ गई लेकिन एक बात उसके मन को मथती रही कि किसी प्रकार सगर को जमानत पर छुड़ाना है। इतने थोड़े दिनों में वह पोर-बदमाशों का साथ पकड़ कर वहकने लगा था। जेल में न जाने कैसे-कैसे चोर-बदमाश उसे मिलेंगे। उनकी सोहबत में वह नया- क्या नहीं सोखेगा? पारो ने अपने मन की बात शंकर काका को बतलाई तो उन्होंने उसे विश्वास दिलाया कि वकील से उसकी जमानत की अर्जी लगवाएंगे। उसी दिन पूजा-पाठ से निवृत्त होकर शंकर काका कचहरी चले गए । फौजदारी मुकदमे लड़ने वाले एक बड़े वकील से शंकर काका ने सम्पर्क साधा । वकील साहब ने घटना का पूरा हाल सुनकर उसे यकीन दिलाया कि जमानत हो जाएगी। अपराधी की उम्र सोलह बरस से कम बतलाएंगे तो मजिस्ट्रेट साहब भी जमानत ले सकते हैं। उसी दिन उन्होंने जमानत की दरख्वास्त लगा दी। मजिस्ट्रेट महोदय ने थाने से केस डायरी बुलाने का आदेश दे दिया। कोर्ट साहब (सरकारी वकील) को नोटिस देकर दरख्वास्त की सुनवाई के लिए अगली पेशी लगा दी। शंकर काका शाम के समय होटल के ग्राहक चला रहे थे। थाने से हवलदार साहब आए और वोले-पंडित जी, काल बच्चे को जमानत पर विचार करेगी अदालत ।" "आपको कैसे पता चला?" "अरे भाई, कायमी हमारे थाने की है,. स्पट दरोगा जी लगाएंगे,
तर तो जमानत मंजूर होगी। मय पुछ रपट पर तो होगा।"
'तो भैया, दरोगा जी के हाथ जोड़ मूगा। प्रच्छो रपट लगा दें
तो बच्चा बाहर पा जाए।"
“मे घोड़े ही रपट लगनी है ?"
"परे भैया, दरोगा जी तो मुझ पर वैसे ही मेहरयान है, मेरे
पाम में उन्हें क्या मकोच होगा?"
"बात यह है पडित जी, घोड़ा धान में पारी करेगा तो साएगा
या?"
पिया मलद?
"पडिन जी, पुलिस और अदालन किमीका मुलाहिजा नहीं करती।
यहां का मूलमन्त्र है--दाम कराए वाम..."
"तो बनानो न, क्या करना पड़ेगा ?"
"दरोगा जी की पूजा कर दो। काम को शुरूपात मच्छी होगी..."
हवलदार ने गंकर काका के नजदीक आकर धीमे से रहा ।
"माप तो सुलासा बता दो, क्या करना होगा ?"
कम से कम दो सौ रुपये तो अभी लग ही जाएगे।"
दो मो तो बड़ी रकम है।"
"जमानन भी तो परल के मुकदमे की है, ऐसे पता नहीं कितने दो
सौरपये पर्च करने पड़ेंगे।"
उगी समय पारो निकल पाई। उसके हाय में दो सौ रुपये थे।
यह माई में पड़ोसड़ी सब सुन रही थी। उसने रपये गकर काका की
मोर बहाने हुए कहा-"यह रपये इन्हें दे दो। भैया को कल ही छूट
जाना चाहिए।" शंकर काका के हाप से हवलदार ने बिना कुछ कहे-
सुने, विना मंकोच के रपये उठा लिए। बोडी मुलगाकर इत्मीनान
से का मीचा मोर बोला-“बल डायरी लेकर मैं खुद अदालत पाऊंगा,
रिपोर्ट बदिया लगवाने की जवाबदारी मेरी।"
दूसरे दिन शंकर कामा पूजा करके तिलक लगाकर नई धोती.
कुर्ता पहनकर सारे दस बजे कचहरी पहुंच गए। मजिस्ट्रेट महोदय
की तबियत पराव थी। यारह बजे उन्होंने कचहरी शुरू की।
४२ - .. पूछा। जैसे राशन की दुकान पर भीड़ लगती है उसी प्रकार वकील और मुवक्किलों ने अदालत को घेर लिया। एक आवाज, दो आवाजें, दस आवाजें । अदालत का अर्दली पक्षकारों को पुकारता रहा। पेशियां वड़ती रहीं। दो बज गए, शंकर काका का नम्बर नहीं आया। वेचारा घबराकर वकील साहब के पास भागा गया । वकील साहब किसी दूसरी अदालत में जिरह कर रहे थे, बोले "अदालत के वाहर वैठे रहो, तीन बजे साहव जमानतों की सुनवाई करते हैं।" शंकर काका फिर जाकर पीपल की छाया में जम गए। थोड़ी ही देर में उन्हें थाने का हवलदार आता हुआ दिखाई दिया। उनका वुझा मन खिलने लगा। अोठों पर मुस्कान थिरक गई। पपड़ाए होंठों पर जीभ फेरकर हवलदार साहव से राम-राम की और रपट के बारे में हवलदार ने खीसें निपोरकर कहा-"रपट तो बढ़िया लगवा ली है, लेकिन कोर्ट साव टांग मार रहे हैं।" "क्या मतलब ?" "अरे, सरकारी वकील साहब जो होते हैं उनका कहना है कत्ल का मुकदमा है, चश्मदीद गवाह हैं । मुलजिम का कोई घर-ठिकाना नहीं है, जमानत पर छूटते ही फरार हो जाने का पूरा अंदेशा है इसलिए कहते हैं, जमानत नहीं होने देंगे।" "भैया, मैं तो पारो को वचन देकर आया हूं, शाम तक सगर को हाजिर करने का वचन दिया है मैंने । अब तो जैसे भी हो, मेरी मदद करो।" "मदद, मैं क्या करूंगा। नगद नारायण की जय बोलो, कोर्ट साव चांदी के जूते से ठंडे हो जाएंगे।" "पचास-साठ रुपये में काम होता हो तो मेरे पास हैं ?" "अरे राम का नाम लो पंडित जी, दो सौ रुपये से घेला कम नहीं लेंगे लेकिन काम सोलह आने करके देंगे।" "दो सौ रुपये तो मेरे पास नहीं हैं।" "तो फिर रास्ता पकड़ो। कचहरी-अदालत बिना पैसे के आता है कोई ? जमानत भी कराना चाहते हैं और पैसा भी खर्चा करना नहीं ४३ चाहते ?" "अभी पाप कहोगे, मरिस्ट साहब पांच सौ मेरम नहीं लेंगे, तो मैं कहां में लाऊंगा।" "प्रापको फिम्मत अच्छी है, यह माहब घोन है, इसरो पन-दौलत वा कोई लालन नहीं है।" "तो फिर, दो गौ रुपये में सेकर पाता हूं।" "पौर मी पाये कारगनंको रग सेना।" "कार गर्ने क्या होगा?" "परे माप अभी से घबराते क्यों है, जैना में पहना जाऊं, मार करते जामो, शाम तक बच्चा बाहर पा जाएगा।" मागिरी वाक्य ने कर वावा के गरीर में प्राण फूदिए मोर यह रपये लेने चले गए। तीन बजे कोर्ट साहा पान पनाते दए पाए । बलदार को देगार भारारती मुम्मान देते हुए महा-"क्यों है मात्य, बुध काम बना ?" "हरका हुम कभी माली गया है। निहिया मरने जान में है, वम पाता ही होगा।" माटो रिस्मा मा, मकर कारा उतरे तो कोटं माहब, कोट मोहरिर मोर हानदार ने उसे घेर लिया । मीषा पीपर के नीचे से गए कर कामा ने दो मौ यपये निकालकर हवनदार को दिए। हातभार माहम ने सये कोर्ट साहब की पोर बरा दिए पोर कर कागा मे पहा- "एकदम फा नोट पोर निकालो।"पनि जी ने बिना क्तिीमानाकानी के दस रुपये का नोट फोटं मोहार मोमोर या दिया। पोटं माहापदालत को पले गए । दस मिनट में प्रकरण की पुकार हो गई। बचाव परा के बोल जब तक भाए सब दरबोटं साहब ने रहम चारपरी । महम गुलजिम के पक्ष में घो-"सरके को मायु मोलह वर्ष में दम है, यह मेहनत-मजदूरी करने वाला है, कभी कोई अन्य अपराप नही किया, फरार होने की कोई संभावना नहीं, साप बिगाने की क्षमता भी उसमें नहीं है, प्रतः जमानत पर छोड़ा जा सरता है।" मजिस्ट्रेट महोदय ने दम हमार कारे की जमानत पर मगरले छोरे जाने पादेशि
के
कील साहब आ गए. वहस के नाम पर उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए
-"हुजूर मामले को देखते हुए और मुलजिम की गरीबी पर रहम
हुए पांच हजार रुपये की जमानत पर छोड़ने की गुजारिश करता
अतः मजिस्ट्रेट साहब ने इंसाफ करते हुए कहा-"ठीक है, पांच
र रुपये की एक जमानत और इतनी ही धनराशि का मुचलका प्रस्तुत
ने पर मुलजिम सगर को जमानत पर छोड़े जाने का आदेश दिया
ता है।"
शंकर काका के चेहरे पर फिर मुस्कान नाच गई । वकील साहब
गोछे-पीछे काका बाहर आए। वकील साहब ने पूछा-"जमानत कौन
देगा?"
"मेरे सिवा और कोन है उसका ?"
"आपके पास जमीन-जायदाद है कुछ ? हैसियत क्या
आपकी ?"
"जमीन-जायदाद है, भैंस-गाय हैं, होटल है।"
"बस, इतना काफी है, आप खसरा-खतौनी या मकान का बैनामा
ले पाइए।"
"अभी?"
"आज रिहाई-परवाना वनवाना है तो आधा घंटे में सब कागजात
ले आइए। चार बजने को हैं, अदालत कभी भी उठ सकती है, अगर साहब
उठ गए तो मामला कल को चला जाएगा।"
"वकील साहब, अभी-अभी तो एक घंटा चाय पीकर लोटे
साहब । अभी इतने मुकदने वाले उनका इन्तजार कर रहे हैं, अभी साह
कसे चले जाएंगे ?"
वकील साहब ने कर्कश स्वर में कहा-"अजीब आदमी हो, स'
को जब जाना होता है, चले जाते हैं। पेशकार साहब तारीखें व
रहेंगे।" पेशकार साहव पान गाल में दाहिनी ओर दवाए हुए
दिखे। वहीं से नाटकीय स्वर में बोले-पेशकार की याद कर
वकील साहब, पेशकार हाजिर है।"
वकील साहब ने कहा-नया मुवक्किल है, कुछ जानता-
नहीं है। हैमियत का कोर मयूठ नहीं सापा है. पर जाकर कागजात साने
को कह रहा है।"
"तर तो जमानत कल ही होगी।"
"श्यों ?"
"माय उठने के मूर में है। मैं मिगरेट मोहिनी मेने गरा था,
सिगरेट जेब में डाली प्रौर माह गए।"
पेशकार साहय, जिगी भी तरह हो, काम तो पास होना है ?"
"तो फिर भरवाए जमानतनामा, हैमियन वा गर फिर पेश
कर देना। पाच हजार साये की जमानत है, पयाग रया होगा।
रिहाई-परवाना तयार है । मैं अभी साहर के दस्तगत करा तूंगा।"
कर काका ने यत्ररत् पचाग रुपये के नोट निकालकर पेशकार
साहब
के हाप पर सदिए। वकील राय ने जमानत मुवासरा भरे।
कागजात पेगकार साहब को दिए गए. वह दो मिनट में साहब ये दस्त मत
फरा लाया । साहर चले गए।
पेगार ने कर पाकासीमोर देकर कहा-गामारने, अगर
दस मिनट की देर हो जाती सो माम मटक जाता। परमीशकार
साहर ने गारे में बुलाया।
पंदित जी, पाय पपा चपरामी पो दे दो, पही रिहाई-परवाना
लेकर जेल जाएगा।" परित जी ने तुरन्त पाच रपये का नोट पाया।
तभी हवान हार माहय हाजिर हो गए। पडित जी को यागारदा ममाम
करणे योले--पंडित पी, पल से मामा काम मागे-मागे कर रहा हूं,
मेरा इनाम पापको श्रमा पर निर्भर है।"
पंडित जी रुपाने हो प्राय । मिर भी रमाई रोयर दम गाये
का नोट उन्होंने हमार साह्य पी मोर वा दिया।
पररामी बोला-चलिए पंडित जी जल्दी । पाप बज गए तो देर
चाले परवाना नहीं लगे। पारासी पनि जोगाए बाहर प्राय पोर
योगा-"माटो सिमा नाइए. साइरिल पर जाएगे तो दर हो जाएगी।"
दोनों लोग माटो रािमा पर मपार होकर जेल परे गए।
धारामी ने माटो रिता से उतरने ए रा-"पदि रिहाई पार
से करानी है तो आखिरी पूजा और कर डालिए।" "अव क्या रह गया है ?" "रिहाई-परवाने के साथ दस रुपये का खजूर छाप नत्थी कर दो। इस अभी एक घंटे में रिहाई हो जाएगी; वर्ना मामला कल तक को टल जाएगा।" पंडित जी सारे दिन के बाद अब नोट निकालते-निकालते चिड़चिड़ा "क्या लूट-खसोट मचा रखी है, गरीब आदमी का तो गुजारा ही मुश्किल हो जाए।" चपरासी कुछ भृकुटि टेढ़ी करके कहे इसके पहले पंडित जी ने दस रुपये का नोट उसके हाथ पर रख दिया। चपरासी ने दस रुपये के नोट के साथ रिहाई-परवाना गेट पर पकड़ा दिया। जेल वार्डर और अदालत के चपरासी के बीच रहस्यमयी मुस्कानों का श्रादान-प्रदान हुआ। वार्डर वोला-..-"याज एक ही परवाना लाए हो।" चपरासी ने खीसे निपोरते हुए कहा-'आफत के दिन हैं। लोगों को अपराध करने में डर लगता है। आजकल काम बहुत ही सम्भलकर करना चाहिए।" गइसी डर में तो भूखों मर रहे हैं गुरू। पहले तो मुंहमांगा इनाम, बख्शीश मिल जाता था, आजकल तो लोगों की श्रद्धा का काम है।" "अरे भैया, हमारे पेशकार साहब को जब तक खजूर छाप नोटों का पंखा बनाकर हवा न करो तव तक सिर उठाकर नहीं देखते । कहते हैं-~-बेटा वाबूलाल, अगर कभी पेशकार का हार्ट फेल हो जाए तो बड़े खजूर छाप नोटों का पंखा बनाकर फल देना, प्राण वापस लौट आएंगे।" बार्डर हंसता हुआ चला गया । एक घंटे बाद सगर को रिहा कर दिया गया। होटल की दुर्घटना के बाद शंकर काका पारो तथा सगर को अपने पर ते पाए। कर काका ने नगर की परवी में दिन-रात एक पर दिया । पान- दार की ममाम"गवाहों का अंगद, दोन गाहब दो सवा, यही पोई कसर नहीं छोड़ी उन्होंने । नगर मोर पारी में उन्हें प्यार हो गया पा। गंकर फावा ने जी घोलकर म्पदा गचं रिया, पूरा तीन हजार पाया लग गया। अन्तत: मगर वरी हो गया। मानन ने मे निदोप पोपिन किया। मगर जानता है कर कावा ने कितना सया गचं किया है। यह उनसा ग पटाना चाहता है लेकिन उनकी नौकरी कर पाद तर यह कर्जा पटा पाएगा? उसने स्वयं कोई काम परने की बात मन में टानी है। रेलवे स्टेगन के पास वह काफी दिनों तक रहा था। मगर पर गांय यात्रा सगर नहीं था। हजारो ग्राहको रो होटल पर घनाया पा कोट-कचहरी जाकर भी मन गुन गया था। वह अलग से कोई काम फरेगा, बार-बार यही मोचता है । उनको जिद देवकर पारो ने भी एक दिन अनुमति दे दी। पारो को बी० ए० प्रथम वर्ष को परीक्षा है। वह दांकर फाका के काम में कोई हार नहीं बटा पाती है । वह कर पारा पर वोझ बनकर भी नहीं रहना चाहती है। इसीलिए मगर को मतग से पन्या करने की अनुमति दे दी। पारी ने कंधे पर लगने वाली एक बड़ी-गो मोनो सगर के लिए नेवार को है। उममें मूंगफनी भरते हुए उदाम हो जाती है। महत पाहार भी स्वयं को रोक नहीं पाई और नया ने बोली-"माम मा मेल है. सोचनी पी तुझे सूप पड़ाऊंगी...डॉक्टर, इंजीनियर नाऊंगी-पान तेरा पोमचा मगाकर तुझे भेज रही हूं।" पारो रो परी। मगर भो बहुन युग नहीं है. लेकिन यहिन का दिन न टूट जाए, इसलिए में रामभाता है-"पारो काम छोटा हो या बडा, मि शाम होता है। पार पापार पहले छोटो पूजी सगाकर गुरूपिए जाते हैं। देगना एप रुपयों का देर लगादगा फमारर, नू दान गयों होती है ?"
४० "वस, यूं ही मन भर पाया, जा ईश्वर तेरी रक्षा करे।" सगर प्रातः सात बजे की पैसिंजर से दमोह गया और बारह बजे तक सारा माल वेचकर वापस आ गया। थोड़ा-सा आराम करने के बाद वह उठा, उसने वोरा उठाया। काका से बांट, तराजू ली और सिविल लाइन्स की तरफ रद्दी अखबार खरीदने को निकल गया। छ: बजे तक उसने १५ किलो रद्दी अखबार और मैगजीन खरीद लीं। वोरा पारी के सामने उतारता हुया बोला-"ले पारो दीदी, तेरे लिए भी काम ले । आया ?" "ये क्या है ?" "नगद नोट, एक किलो और पावा किलो वाले लिफाफों के नमूने लाया हूं। इन रद्दी अखबारों को और मैगजीनों को काटकर लिफाफे बनाने हैं। तू कागज काटकर तैयार कर, मैं लेई बनाता हूं। मैदा और नीला थोथा ले आया हूं।" पारो सगर का उत्साह देखकर बहुत खुश है। कागज काटते पूछती है--सुबह के माल को वेचकर कितना कमाया ?" "ग्यारह रुपये की बचत । अब सुबह ये लिफाफे कोमल की दुकान पर पहुंचा देगी तो सात-पाठ रुपये का मुनाफा और हो जाएगा। अगर हम दोनों मिलकर वीस रुपया रोज भी कमाते हैं तो तीन सौ रुपया प्रतिमाह तक काका का अदा कर सकते हैं। इस हिसाब से दस माह में कर्जा अदा हो जाएगा।" पारो को अाश्चर्य हो रहा है, कहां से सगर के दिमाग में यह बात पाई ? कितना परेशान है वह कर्जा पटाने के लिए...। यही सोचते- सोचते पारो कागज काटती रही। सगर लेई बनाकर पारो के साथ रोटी खाने बैठ गया। रोटी खाने के वाद सगर को नींद आ गई। पारो सो नहीं सकती, उसके भैया ने पहली बार उसे कोई काम सौंपा है । उसे काम पूरा करना है । बोरा विछाकर पारो दहलान में बैठ गई। जलती हुई ढिबरी ताक में से उठाकर पास में रख ली और लेई से जोड़कर लिफाफे बनाने लगी...। एक घंटा.. दो घंटा...नींद आने लगी। उवा- सियां आती हैं. पारो उठकर घड़े से ठंडा पानी निकालती है, मुंह पर ।
४६ पानी के छोटे मारती है...नोंद मागे तो काम हो। फिर बैठती है।... रात दसने लगी...ाम भी निपटने लगा। बदन का पोर-मोर करने लगा. कमर पाउने लगो"पारो यही धरती पर नुहाई...अभी चलेगी किर काम करेगी। लेकिन कौन दटना है""मौन काम करता है । अन्तिम कुछ लिफाफे बचे पे, पारो वेमुच मोती रही। गिनी रात मंद-विन्दुओं मे नहाई, पारो काम में डूबी रही, स्तिने उर्ग -ममय दीतता गया। पारो की परीक्षा समान हुई...वर्ष चौता । गार काका का कर्जा प्रदा हो गया। दूसरा वर्ष बीतने लगा। पारोबी०ए० द्वितीय वर्ष की तैयारी में लगी है । ममी भी लिफाफे बनाती है । मगर हर दिन नई-नई गवर लाता है । मगवारी की गारों ने भी नया मोड़ लिया है। पारो की मारमा भीतर ही भीतर कारती है... पता नहीं क्या होने वाला है इस देश का मावारों में हर रोज गरम-गरम मवर पती हैं। बड़े-बड़े कार- गानी में नोहे और कोयले की यदानों में मजदूरों की हड़तान, पारेर मोर पिराविद्यालयों में विद्यार्थियों की हडताने, निसरों द्वारा विरोध. सिम, राजनैतिक पार्टियों द्वारा काला दिवस' मरवारी सारी में यो मधिकारियों का घेराव, बड़े-छोटे शहरों में मानाशपिक भाई, ये मोगम प्रापनी की घटनाएं, रेल दुर्घटनाएं, राज्य परिवहन के कर्मचारियों द्वारा हाताने, देशव्यापी रेल कर्मचारियों की हातात, फिर एक दिन पटना बन्द, विधान सभा का पेराव, जुलूम के दिल्ली तक जाने को नेवारी, 'इमको हटापो', 'उमको बनायो' 'इमा निराम्रो', 'उसको उठानो' की प्रावा, दमों दिगामो में गूजने लगी। गुबह ताना अपवार भाता, न्यून प्रिन्ट छूने से गरम लगता है। मानून गौरबमा मिल रही है, लोग मनमानी कर रहे हैं, पजदूर हादान करते हैं। दियाषी गुगळं करते हैं, शासकीय पारी घूमगोरी करते है। सागरी पाता याजारी पौर मुनाफागोरी परते है. पुनिम जनता को मुरमा करने में प्रगफन है। कंती मोर बरल की वारदार ढंग से हो रही हैं. नागों पर को बैंक हतियां, घनती हुई रेलगाडिरों में जूटमार, दिन-दहाड़े फल और बनातार को पटनाए ति पर निक, - रही हैं । अखवार पढ़कर लगता है सदियों का सोया ज्वालामुखी धधक उठा है, चारों ओर प्राग का दरिया बह रहा है, आसमान धुएं से भरा है, हवानों में जहर घुल गया है, सांस लेने से सीना दुखने लगता है, सोचने से दिमाग की नसें तड़कने लगती हैं, धमनियों में खून का बहाव बढ़ जाता है, अपनी घड़कनें आप सुनाई देती हैं। नये-नये नारे हर दिन सुनाई देते हैं । लोकतन्त्र खतरे में है, लोकतन्त्र बचाओ, लोकनायक पागे साम्रो, हम तुम्हारे पीछे हैं, हम तुम्हारे इशारे पर आसमान में आग लगा देंगे। शासन तन्न हिल रहा है, बुनियाद कांप रही है, सब कुछ क्या यूं ध्वस्त हो जाएगा? इतने वर्षों का श्रम क्या व्यर्थ जाएगा? बोया हुमा पसीना कैसे उगेगा? लोगों के सपने कैसे पूरे होंगे ? बड़े-बड़े कारखानों की करोड़ों रुपयों की योजनाओं का क्या होगा। कारखाने वन्द हो जाएंगे तो उत्पादन कैसे होगा? जनता को दिए गए वायदे पूरे कैसे होंगे ? देश से गरीवी कैसे हटेगी ? युवा नेताओं को आगे आने का मौका कैसे मिलेगा ? अभी-अभी तो उन्होंने मोर्चा सम्भाला है। उनकी तस्वीर का साइज हर दिन बड़ा होता जा रहा है। लोकतन्त्र की रक्षा करनी है, कल-कारखानों की रक्षा करनी है, खेत-खलिहानों को बचाना है, युवा मोर्चे को आगे बढ़ाना है क्योंकि अन्ततः हमको इस देश की गरीबी दूर करनी है ? इसके लिए क्या करना चाहिए, शासन के कर्णधार चिन्तित हैं ? योजनाएं प्रारम्भ हो गईं। विरोधियों का जब तक पूर्ण दमन नहीं होगा तब तक कोई योजना काम नहीं करेगी। विरोधी नेताओं की गिरफ्तारियों से प्राग और भड़केगी। जनता विद्रोह कर देगी। कोई विद्रोह न हो पाए, कोई कोर्ट-कचहरी का दरवाजा न खटखटा सके, ऐसा कोई नया कानून बनाया जाए। देश को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। धरती जल रही है, आसमान धुएं से भरा हुआ है, दिशाएं खो गई हैं अतः नये कानून के अधीन कार्य- वाही प्रारम्भ हो गई। ये आग किसने लगाई थी, उसे पकड़ो, गिरफ्तार करो। ये तूफान किसने उठाया था, उसे चुपचाप कैदखाने में डाल दो। ये हड़ताल किसने । । ।
कराई थी, उसका मुंह वाला पर दो। ये विद्रोह फैलाने वाले भाग विमने दिए थे, प्रभो जुवान काटकर पोंठ सोल दो। पटरिया गिने सोही पी, उन्हें देरोजगार पर दो। ये पौन पे जोहर रोज मानी मेगनी से जहरीरी बात लिखते थे, उन्हें हवा मोर रोपनी से दूर से परे मन्द पमरों में डाल दो। इन माप महात्मामी को भी यम-दिल से उटा लो जो नई गुबह के लिए हवन करने बैठे हैं। मुनापागोरी और मालाबाजारी करने यापारियों के दरीर में जो रिपा दो ताकि उनका गन चुम जाए। और हा, जन साधारण को बरगा नही जाना पाहिए । जनशक्ति में विद्रोह होता है, जनक्ति प्रालिको जन्म देनी है, उनके टोटे-मोटे पवमायों की चिन्ता मत करो, उन्हें रोजगार, वैघरवार हो जाने दो, उ मदकः मिलना चाहिए। बहर मारु होने पाहिए, महके पौडी होनी चाहिए। नया गून मागे पा रहा है उनके स्वागत के लिए दुकानें तोडो, मकान गिरानो, मुग्गी-झोपी जपामो, गये-नये बाग सगाप्रो, नरेगन याने नेतामों के लिए नई उसकी नई-नई पौध लगानो ताकि नये फल मिलें, नई गगबू पैदा हो, देशरा नव-निर्माण हो। पौर नये पाक नई तेजी के साप पूमने लगे। तिने नेता लोग पर गए । कतम की नोक से रोटी कमाने वाले पाहे गए और पन- कारखानों में काम करने वाली से लेकर मेत भोर गलिहानों में काम करने वालों को घेर लिया गया। जेल मौर हवाता भर गई। जनमों के पोर की जगह बुलडोजरों का गोर बढ्ने सगा। गंबर काशमी दुवान मोर मकान को भी ऐसे ही किमी युलो- पर ने पारा मार दिया। स्टेशन के सामने वाली कतारको कतार गार हो गई। सगर को प्रसग एक कोटा किराये पर मार रहना पहा। कर भागा हाप ठेले पर गमोमा, कोही पौर भुमिया रेयने फिरने लगे । इस उम्र में बेचारे मारे दिन घूमते हैं. वहीं महा होने की निग- रानी करने वालों को पूजा परो या फिर पालान नरामो पोर भारत के पार लगानो, इमलिए कर याहा सारे नि गरर बी परिवना परते हैं।
- सगर को लगता है, पुलिस के भाव बढ़ रहे हैं। रेलवे स्टाफ पहले से ज्यादा परेशान करने लगा है । मूंगफली क्या इतनी सस्ती है कि कोई भी सिपाही बिना पूछे झोले में हाथ डालकर मुट्ठी भर ले, चटर-चटर तोड़कर खा जाए। टिपिट बाबू को अखबार में बांधकर देना जरूरी है। साथ में नमक की पुड़िया भी होना चाहिए। सगर ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी । उसने लागत बढ़ा दी । मूंगफली की जगह दाल चने ने ले ली, झोली को उतार दिया, बड़ी डलिया टांग ली। पहले एक मुट्ठी मूंगफली लुटती थी तो पांच पैसे जाते थे, अब एक मुट्ठी दाल लुटती है तो पन्द्रह पैसे जाते पैसे जाते हैं। पहले टिपाट बाबू नमक की पुड़िया लेता था अब पूरा निबुमा निचोड़ने को बाहता है। सब धन्धे कच्चे हैं, सन्तरा, कोला, चना मूंगफली सभी पुछ वेचकर देख लिया उसने । ट्रेन में चलते- चलते काफी दुनिया देय ली। इस धन्धे से मन उचटने लगा। कितनी हरामग्योरी है दुनिया में, इसे वह खूब समझने लगा था । ट्रेन कण्डक्टर उसके सामने बिना टिकट मुशाफिरों की गे काटता है। स्लीपर कोच में पलने वाला तो राजा है। वह अपनी बहिन को छोड़कर सुबह निक- लता है। सारे दिन कड़ी मेहनत करता है । उसकी प्राधी कमाई पुलिस वाले और रेलगाड़ी में चलने वाला चैकिंग स्टाफ लूट लेता है। उस दिन एक घटना और हुई। फटनी पैसिंजर की प्राऊटर सिग- नल पर चेन बिच गई। यह कोई नई बात नहीं थी, रोज का नियम है। सगर पुश था, सारा माल बिक गया था। पिव्वे में अधिया मुसाफिर नहीं थे। शाम जब कटनी से चला, बड़ी उमस थी, थोड़ी बूंदा-बांदी हो चुकी थी । वह डिव्ये का दरवाजा खोलकर पायेदान पर पैर लटकाए बैठा था। अाज पुल माल बेचनार बत्तीस रुपये मिले थे। वह सोच रहा था राखी पाने वाली है, इस बार त्योहार पर पारो को राखी बंधाई में धोती देगा। हर दिन कुछ न कुछ रुपया उसके लिए निकालता जाएगा, पारो को बताएगा भी नहीं कि वह राणी पूनो के लिए रपया जोड़ा रहा है। रात के दस बजने को था, गाड़ी फिर चली और दमोह प्लेटफार्म पर घुसी। साढ़े ग्यारह बजे तक सगर पहुंच पाएगा। रात हो जाने - . - ।
पर भी पारी उसकी प्रतीक्षा करती है, उसके साथ ही रोटी माती है। गादी बने.रकने दमोह प्ले फार्म पर गड़े हवलदार ने उमरी पोर पूरकर देगा। यह तो दूसरे चौथे दिन मिलता ही रहता है.. माजतो जने मेरा ही इन्तजार कर रहा है । सगर का स्याल ठौर ही निकला। गाटी सकते हो मगर की मोर वढा मोर बोला-'यो बेटा, चना मूंग- पली वेचते-चते जेब भी काटने लगे?" सगर वा सून नौल गया। वह बोला-"हवलदार जी, मेहनत की रोटी माते है। वाटी शुरू कर दूगा तो तुम्हारी तरह मोटा हो जाऊंगा।" "क्या धक्ता है, उतर मीचे पौर चल पाने । बिनागपुर गादी में एक मुमाकिर ने जेवन टी की रिपोर्ट दर्ज कराई है। जेब काटने वान का जो हतिया लिगाया है वह तुझसे मिलता है । तफ्तीग मेरे पास है. पात्र की रात तू हालात का मेहमान रहेगा।" "लेकिन मैं तो बिलासपुर गाडी पर था ही नहीं। मैं तो बिल गुबह निकला था। ताराचद टिक्ट या मे पूछ लेना, उनमो मैंने पाय पिनाई थी।" "अच्छा, तो मुझे दार पिला दे, में ताराचन्द टिपट बाबू गे पूल लेकिन .....?" "लेषिन-वैरिन कुछ नहीं, जल्दी से बता कितने पात्र हैं ?" "मगर झूठ महो वोलता या उसके मुह से निकला-"वत्तीम।" "मस्या तो बीस रपये इधर बडा।" "सेपिन, वरों ?" "कारण पूछता है तो थाने चल, रात भर हालात में पाटना । गुवह बातचीत होगी।" हवलदार ने सगर की कलाई परडी। मगर ममझ गया कि वह कलाई तभी छोड़ेगा जब बीग पाये मेगा । उमने सीम में हाप डाला और दो दस-दस के नोट निवार हसदार सो प्रोर बड़ा दिए । हवलदार ने पामो हुई ar - तीन इंच की मुस्कान उसके अोठों पर नाच गई, फिर वोला-"बेटा इस लाइन पर चलना है तो हप्ता दो हप्ता में सलाम कर जाया करो।" तभी ट्रेन ने सीटी मारी । सगर फिर रेलगाड़ी में चढ़ गया । डिब्बे पहले से ज्यादा खाली थे। सगर का दिमाग घूम रहा था, वह एक खाली बर्थ पर लेट गया। कितना खुश था कुछ ही देर पहले । अव बुझा-बुझा-सा पड़ा था। सोचते-सोचते वह बुदबुदाया-"हरामजादा! । क्यों बे, किसको गाली निकालता है..." पीछे से आवाज आई । सगर ने पलटकर देखा, वाटू सिगरेट का घुयां उगलता हुआ उसके सिरहाने खड़ा था। सगर ने कुतुहलवश पूछा--"तू कहां से आ गया उस्ताद ?" "बगल वाले डिब्बे में था। तुझे प्लेटफार्म पर इस डिब्बे में चढ़ता देख लिया था।" -बाटू ने बात का उत्तर देकर फिर एक कश सिगरेट का खींचा। "तो फिर मेरे ही डिब्बे में क्यों नहीं बैठा ? चलती गाड़ी में रात के समय डिब्बे बदलने में खतरा भी रहता है।" "खतरा तो दोस्त कदम-कदम पर है, उससे कहां तक डरूंगा। देख मैं सौदा बनाकर पाया हूं।" "और मैं कमाई लुटाकर आया हूं....." सगर ने दुःखी स्वर में कहा। "किस कोठे पर गया था कमाई लुटाने ?" "यार तू हमेशा ऐसी ही बातें करता है," फिर कुछ रुककर बोला-'हरामजादा बीस रुपये खा गया।" "कौन ?" "वही दमोह का मोटू हवलदार ।" "अच्छा तो अब साला मेहनत-मजदूरी वालों को भी सताने लगा "कहता था, विलासपुर गाड़ी पर किसी मुसाफिर की जेब कट गई । उसने जो हुलिया रपट में डाला है, वह मुझसे मिलता है।" - वाटू ने दात भींचते हुए कहा-बदमाग, यह गोश तो मैंने बनाया था-पोर मुन, मोट हवलदार मेरे माय पा। मात गजासोत पा, मैंने तीन तो दवा लिए। मोटू को पार गज बताया तो दो उसने दटा लिए।" "पार तेरी बात मेरी समझ में नहीं पाती। सात गज सा होता "देन पर नमते-चलते दुनिया भर की भाषाएं मोर गया है, अभी मेरी भापा पौर मीन। सात गज का मतलब मात मो रसपा । देग धन्य वाली दात है, तेरे को सर मीरा-ममझ लेना चाहिए। रब में ममझा रहा हूं पह कबाडी वाला धन्या छोड़ दे, कुछ मार्ट सौग। हम गुच्च भाई अपनी भाषा में पब्लिक के बीच बात कर लेते हैं। पोई समझ नहीं सकता।" "मुच्च भाई रिसको बोलता है?" "मपने वार को, जो हमारे मारिक पन्या करता है।" "जेवरट को मुच्च भाई वोलता है ?" "पार हमारे माटं याता मुन्च कहलाता है । पन्दी पोर पड़ी पलग- मग होते हैं यानि मपना-अपना मलग पार्ट है।" "तू क्या करता है ?" "हम तो गोपा रेजर मारता है, मात जेवों के अन्दर का सौदा बाहर निकाल मेता है।" "सौदा याने माल ?" "हां मोता माने रुपया। सौ रपया बराबर एक गज के। एक हगार रसपा वरावर एक पान के। अगर कोई मुमाफिर दम-बारह दगार रुपया लेकर चल रहा है तो हम अपने मन भाई को इशारा कर देंगे। दम यारह पान का सौदा है उसमे मा सेनी है तो बता दूगा उगरा हिस्सा स्तिना है ?" "तो पान शितना सौदा बनाया ?" "ववाया न, सात गर मुबह, उममें पाच मेरे से मी-प्रभी बनाया है।"
"तुम्हारा ही धन्धा अच्छा है उस्ताद। हम तो रात-दिन मरते है कहीं रोटियां जुड़ती हैं । वहिन आगे पढ़ना चाहती है।" "तू दो-चार दौरे मेरे साथ कर डाल, फिर देख रुपया कैसे वरसता ?" - "नहीं भाई, मुझसे यह काम नहीं होगा।" "और सोच ले, तुझे तो जाने क्यों बहुत यार मानता हूं। तेरे जैसे दर्जनों शागिर्द बनाकर छोड़ दिए."तू शागिर्द बन गया तो जिन्दगी- भर साथ रक्खूगा । चोल, चुप क्यों है ?" "कभी जरूरत पड़ी तो याद करूंगा। लगता है पुलिस ईमानदारी से जीने नहीं देगी।" "यह उम्र है दोस्त कमाने और खाने की।" सगर का मन पका हुआ था वोला- मैं भी तंग आ चुका हूं इस धन्धे से।" "तो फिर ग्राज जश्न हो जाए । इसी बात पर लगा यह सिगरेट।" वाटू ने सगर के पोठों से सिगरेट लगा दी, सगर मना नहीं कर सका। सिगरेटें जली...धुग्रां सीने में उतरा-सगर को लगा यह गलत काम है । वाटू तभी बोला-"दुनिया में कुछ गलत नहीं है। वैसे तो गाड में बिना टिकट चना वेचना भी अपराध है-लेकिन रोजी-रोटी लिए आदमी क्या नहीं करता। कुछ लोग मेहनत करते-करते मर हैं-और कुछ लोग पड़े-पड़े ऐश करते हैं, जिसको जैसी जिन्दगी आए।" , "मैं भी पड़े-पड़े यही सोच रहा था-मैंने सारे दिन जान और मोटू ने दो मिनट में बीस रुपये झटक लिए।" "और मैंने पलक झपकते ही तीन सौ मार दिए। ले यार- क्या याद करेगा, एक गज तू ले जा।" "नहीं, नहीं।" "प्रवे शरमाता है ? ले रख । यह कहकर उसने सौ रुपये सगर की जेब में डाल दिया।
मैं नामरूंगा इतने रुपयेपा?"
"पर में नाम मा जाएगा। हां, पल पल मेरे गाय-मय टीम हो
जाएगा।"
"लेकिन उम्नार, तू इतने सालों का क्या करता है ?" पाद पहली
वार मगर के इस प्रश्न पर पु.युध चुभासा नगा ।
वाट ने मिगरेट का एक गहरा कर लगाकर कहा- मेरे मा-बार
नहीं है, कोई भाई-बहिन नहीं है। मामू के पाम परवरिश पाता था
लेकिन उनके घर में भी हालत गम्ना पी। पडोग के लहरों की पुरी
गोहवन में फम गया पौर घोरे-धोरे इस धन्धे में पा गया। एनदो
हफ्ते में एक बार मामू के पर जा पाता हूं। दो-चार गो जोमा, वहीं
दे देता हूं। पुलिम-कचहरी मे जो माल बचे वह यारोंपा।"
"ममी बहीं जाएगा"
'बीना।"
हा सरना है
"गुजायज्ञान के कोठे पर।"
"देर मेरा स्टेगन मा गया उस्ताद में यहा उतरूंगा।"
• वाह, तुझे फैले छोडगा पाज को रात, मेरे माप पल बीना, वहा
दारू पिएगे, मनी मारेंगे।"
'मनी नहीं, पारो मैग इलजार करेंगी। रितीनि उससे मोल.
कर पाऊंगा, दोरा लम्या है, इन्तजार मत करना।"
किर मिनेगा कहा
"इनवार को पटनी में, गाम को ९ बजे।"
याट्र धोना पना गया । सगर ने स्टेशन से परका रामा पका।
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४ । र का शरीर ठोस परिश्रम के कारण और नियमित व्यायाम के बूब गठ गया है। बदन में गजब की फुर्ती है। बाटू को ऐसा आज तक नहीं मिला था। सगर ने. वाटू का पूरा आर्ट सीख है। भोपाल और बुरहानपुर वाले सारे अड्डे घूम लिए हैं । पह भी पता चल गया है कि इतना सारा धन कैसे खर्च होता है ? ने मुफलिसी के दिन देखे थे। मांगकर भी रोटी खाई थी-झुग्गी- पड़ों में रहा था। सागर से फरार होकर। उसे वह सव दिन याद -वह सब झोंपड़े याद हैं जहां उसे पनाह मिलता था। वह आज भी हां जाता है-उसे वहां अच्छा लगता है लेकिन उसका दायरा बड़ी जी से बढ़ रहा है । बाटू बहुत पीछे रह गया है। जेवकटी का धन्धा बहुत पीछे रह गया-और बड़े धन्धे उसने हाथ में ले लिए । वाटू जैसे दर्जनों लोग उसके झंडे के नीचे हैं। दिन-रात सगर अपने काम में व्यस्त रहता है। उसने सिविल लाइन में एक साफ-सुथरा मकान ले लिया है। उसका कमरा अलग है। पागे के कमरे में स्टडी टेबल, लैम्प, स्टील अलमारी और खूब- सूरत पलंग लगा हुअा है। सामने खुला बरामदा है। पारो ने वी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है प्रथम श्रेणी में। एम० ए० में उसका विपय दर्शन शास्त्र है । अब उसे विश्वविद्यालय जाना पड़ता है। जीवन का क्रम कितना बदल गया है। शिक्षा का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ा है कितना निखार आया उसके व्यक्तित्व में...। कितना बोलती थी पारो-लेकिन अब बिल्कुल बदल गई है। बातचीत बहुत कम करत है। अपने कमरे में अपनी टेबल पर सिर औंवाए न जाने क्या-कर सोचती रहती है । बुक शेल्फ में किताबों की संख्या दिन पर दिन बद जा रही है। संसार के सभी महान् लेखकों की पुस्तकें खरीदने का शौक है । उसका भाई कमाता है-क्यों न वह अपने शौक की पुन खरीदे-- कमरे की स्वच्छ व्यवस्था है। अपने पलंग पर सफेद जै ।
मे मच्छा लगता है । कमरे के मटिम प्रकार की व्यवस्था है ।न्न माने के लिए सगर ने रिकार्ड प्लेयर खरीद दिया है । उमरी पसंद के गत पोई से रिकार्ड स हैं। उसके लिए सगर टेर रिकार्डर खरीदना चाहता है । पारो का मन घबराता है-सगर इतना काम कैसे करता है दिन- रात पपने काम में सोया रहता है । काम के सिलसिले में काफी बाहर रहना पड़ता है । पारो अकेली रह जाती है । वह एकाकीपन से घबराडो है। हर बार सोचती है सगर से बात करेगी। लेकिन मगर बढ़त बन्द- बाजी में माता है । वह हर बार नई-नई योजनाए पारो को समन्मता है। हर रोन अपने पन्चे बदलता है । उसको हुलिया और मापा रिकुल बदल गई है। वह एकदम स्मार्ट लगने लगा है । सफारी शर्ट और वन- बाट म उसे अच्छी लगने लगी है । चौड़े वक्षस्थल की रोम-रासि सुले कालर से बाहर झाकती है। हर कोई चौंकता है-एक वर्ष में इतने सापन कहा से जुटा लिए सगर ने । सगर को अपनी मेहनत पर नान है । मटनी, जबलपुर, भोपाल के बाजारों में माल के प्रार्डर व्यापारियो से दुम करता है, फिर दिल्ली यम्बई के थोक बाजार से माल लाकर सन्नाई करता है। पारो पूछती है-इतनी मेहनत क्यों करते हो ? दो- दो, धार-चार दिन वाहर रुकना पडता है, हमें नहीं चाहिए तुम्हारी कमाई! सगर हवा से बात करना सोस गया है। हर बात का उतर उसके पाम है । बहिन को शादी के लिए रुपया चाहिए। कोई घर मातदान नहीं है। मा-चाप नहीं हैं, रुपया होगा तो पन्छा वर मिल जाएगा। उसकी जिन्दगी बदल जाएगी।" पारो कहां तक समझाए। कल ही की बात है कितना माहित पारो ने । सगर को हल्का बुनार या । उसने अधिकारपूरक महापा- "पार तुम वहीं नहीं जानोगे।"
. त बीत गई। दिन ढल गया। पारो का मन कांपने लगा- चुग्यार न बढ़ गया हो। परदेश में होटल या घरमशाला में पड़ा ! कौन उसकी देखभाल करेगा ? फिर अपने मन को समझाती शायद रात तक वापस ही पा जाए। बाहर खूब अंधेरा घिरा है, वर्फीली हवा चल रही है । किसी मोटर आवाज है। हां, शायद दरवाजे पर रखी है। पारो को लगा शायद या पा गया है। वह दरवाजे की भोर भागती है, दरवाजा खोला। सामने कोई अनजाना व्यक्ति खड़ा था। उसका चेहरा सूखा हुया था, ओंट पपड़ाए हुए थे । गला साफ करते हुए बोला- मैं सगर का साथी हूं। भोपाल स्टेशन पर रेलवे पुलिस से उसका झगड़ा हो गया। इसी रंजिश के कारण पुलिस ने उसे गिरपतार कर लिया है । मैं भी झगड़े में था। मैं किसी प्रकार बचकर निकल भागा। पुलिस को मेरी तलाश है, यदि मैं जमानत के लिए भोपाल जाता हूं तो पुलिस गिरपतार कर लेगी। तुमको जाना होगा, तुम्हारे पास शायद रपया नहीं होगा ?" वह व्यक्ति एक क्षण को ठिठका, फिर बिना किसी झिभाक के उसने वि से नोटों का पुलिन्दा निकाला और बोला---'"एक हजार रुपया है और जरूरत पड़ने पर मिल जाएंगे। जी० पार० पी० थाने का मुकदमा है, वकील को इतना बतला देने से काम हो जाएगा।" वाटू ने अपना नाम नहीं बतलाया। नोटों का बंडल पारो के हाथ में थमाकर वाटू चला गया । जिस गाड़ी से वह पाया था वह कुछ दू पर खड़ी उसका इन्तजार कर रही थी। पारो ने गाड़ी स्टार्ट होने आवाज सुनी। वाटू चला गया । पारो ठगी-सी खड़ी रही। फिर कुछ सोचकर उसने मकान में र लगाया और वह शंकर काका के घर की ओर भागी। काकी घर उन्होंने बताया--"कल संक्रान्ति है ना? तुम्हारे काका बरमान का करने गए हैं । कल शाम से पहले क्या आएंगे ?" पारो बहुत घबराई । सोचा था काका को लेकर वकील जाएगी। वकील को भोपाल साथ ले जाएगी ताकि वहां भटकना लेकिन अब क्या होगा?
प्रश्न के साथ ही पारो के मन में उमरा उतर कर गया । का भी हो, भैया को छहाना है। यह मानी भोपाल लाएगो, भया का छूटना जारी है। फल वारे मुकदमे में जो वो उन्ही को भोग से जाना ठीक होगा। उन्ही ने तो भंग को कस मुराद मे बरी कराया था। पारो ने एक प्रॉटो रिसमा को रोरा और मोपी दान माहर के घर को चल दी। वरील साहर का पर उसने देखा था। परन वाने मुकदमे के मामय में यह कहा ग की थी। यकीन गाहर पालनपाने में उठ चुके थे। मगोत्री ने पहा- "पार मुबह मा जाप, पभी तो वोर मार मेहमान पाए है. उनसे जरूरी बासनीत पर रही है। ममी नहीं मिगे।" "उनमे कहिए, मगर मोगल में यन्त हो गया है। उगापाल का मुकामा पोल साहब ने लगा था। जमानत के लिए भोगान से नाना है यकील साहब को।" मुगीजी को लगा शायद कोई या मुरम्मा है। भोगन तक गाने की फोग भी तगटी मिलेगी, यरीन माहब को बना देने में पगलं है। मुंगोत्री कील साहर के कमरेगा पर्दा उठार गामने हुए प्रदर पुम गए पोर बोले-"हर, गुम्नानी माफ हो, मामता जरूरी पाम- निए पाना पला । वो मरेशन याने रस के मामले वारा साफिर किसी मामले में भोपाल में पारा गया है । उमरी बहिन माई है। एक मिनट के लिए मिलना चाहती है। कहती है, वीर माहरो भोगन में जाना निहाया जरूरी है। मपार फीम भी पच्ची ने गोवार पीर साहस के दिमाग मे उन मनपाम राजा पोर पो। वह मना नहीं कर मरे भोर यो-"यहीं पाए उने ।" पारो ने माना प्रानल ममारा, मारोतरण पर पोटा पौर वरीत माह में गामने मस्पिा हो गई। मामने गोरे पर परीन गाहर पौर मितठे । मासयन पर गापा टेन मंग मरे में मस्मि प्रकार फैला रहा था। मोरा पास होने में वह दो L - 4 ... मित्र को भली भांति पहचान सकी । पारो बुरी तरह से चाका सने अपने मनोभावों को प्रकट नहीं होने दिया। पंडित ने डाढ़ी. ली, वाल भी खूब बढ़े हुए हैं लेकिन वह उन्हें पहचान रही । पंडित हैं जो उसके गांव में पाया था, जिसे उस जाड़े की रात ने खदेड़ा था, जिसके जाने के बाद पीपल सूख गया था । पारो ल साहब को नमस्कार करने के बाद बड़े प्रेम से पंडित को कार किया और पूछ बैठी-"आपने मुझे पहचाना?" पडित हां करे या न ? यही प्रश्न था । वह पारो को पहचान गया था लेकिन पारो इस प्रकार यहां मलेगी, उसने सोचा भी न था। गांव की लड़की पारो क्या यहां आ सकती है ।...कितनी बड़ी हो गई, कितना बदल गई है."यह साड़ी" यह शाल, पूरी तराशी हुई पारो लेकिन वह इन्कार नहीं कर सकता। मुंह से अनायास ही निकला-"पारो, तुम यहां कैसे ?" पारो को लगा उसका उफनता हुआ खून सहसा नसों में जमने लगा है। दमकता हुआ चेहरा मुरझाने लगा, आवाज वदल गई-"मां अचा- क चल बसीं, काका ने गांव छोड़ने को मजबूर कर दिया। यहां भैया साथ थी, भैया को भोपाल में पुलिस ने पकड़ लिया है।" वकील साहब समझ गए-वे दोनों पूर्व परिचित हैं। लेकिन इससे क्या? उनके लिए भोपाल जाना सम्भव न था। उन्होंने सीधी बात करना ठीक समझा-"देखिए, मेरा कल एक जरूरी मुकदमा है, मैं भोपाल नहीं जा सकूँगा। आप सुबह पाएं, मैं अपने एक वकील मित्र के नाम पत्र दे दूंगा। आप पत्र लेकर उनके पास चली जाएं, जमानत है जाएगी।" पारो ने बिना किसी संकोच के कहा-लेकिन मैं रात की वस ही जाऊंगी, आप पत्र अभी लिख दें।" वकील साहब ने अपने मित्र की ओर देखा। उन्होंने बड़ी सादगी से कहा-"आप पत्र लिख दें। रात में १३ जबलपुर वस मिलेगी। मुझे भी तो उसी बस से जाना है, पारो है -
पोनी हो परेशान होगी?"
सीर माह ने पत्र मिय दिया। पारी ने जम गंमानगर ग
लिया। फिर पूछ बंटी-वाह पंजे ने पहले कोई म नही है
सा"
मगोजी बोर पर -बारह हम भी कोई म नहीं है।"
'ती में चलती हू।" पति की मोर देगार उसने रा--"मा
यमस्टर पर मिनगेन?"
'हा मुझे भी उमी यम में जाना है।"
को टोक है. मैं मापको यहीं मिलगी।"
पर पाकर पारो ने कुछ मायाका बारे रगे। भंसा रे गा एक
जोडाकपड़ा रगा. रपयों का यानों के बीच में रसन में दरा
दिया । मकान याद करीबग टेलिएनिम्न पो-बारह बरने
को एक पटा यागी है, इतनी हयती गया है बस स्टेंड जाने की?
परित में इनना पपनापन जताने बोयोन रूस पी? उगने पहा
frवह यग स्टर पर मिलेगी? क्यों इतनी रस्दी मानी जानी ?
परित पहना पुरुप पा जिगरी गाप में मिलकर उगे प्रा मना पा।
उसमे बात करके उसे पटा लगना पा मेपिन वह यहत दल गया।
पहले ही दुबला-पतला पा, अब तो रिन्कुल गूग गया है. आगी
रायनी सगने लगी हैं । उनी पुनियों में पगार की हर।।
कितना गुममुम-परेशान । यहा बों पाया होगा पीन ग, पाम ?
होगा दुध फाग, हने परा?' पति के बारे में सोचते-गोपने पागं मोटर
स्टेट तक पांच गई।
गोर के उस पार अपरार मी बाहों में सोई हुई पराजित
एप मागमान में निमिमा एमिनार, गार झोन सासामागा
प्रतीत होता है जब कोई यग पा जिन पराता है। पारो वही मीर
मेरिनारे रने में नही हो जाती है। यह निमीती दर सी।
पंरित भी तापों नहीं मारा? मी पगली है-पिमहानगर
जगे? पनि मौन है ? नहीं पाएगा तो माहोगा? मनोनिने
दूर ... है। इतना हल्ला-गुल्ला क्यों है यहां? झील के किनारे बस स्टैंड बनाया, किसने बनाया? यहां ग्रामों की अमराई क्यों नहीं है, घाट के किनारे पीपल क्यों नहीं ा है ? झीगुरों की झनकार उसे क्यों नहीं सुनाई देती ? वहां फूटा न्दिर होना चाहिए था-1 क्यों नहीं यहां वह खामोशी है जो पारो को पच्छी लगती है । इस खामोशी में वह कबूतर की गुटर गूं सुन सकती है, रंभाती हुई गाय की आवाज उसे अच्छी लगती है, वृक्षों पर पंख फड़फड़ाती सोन चिरैया उसे भाती है। वह भूल गई कि वह अकेली है। उसके आसपास दो-चार मनचले मंडराने लगे हैं। उसे डर नहीं लगता...शायद इसलिए क्योंकि वह सगर की बहिन है, जिससे बाहर के सारे बदमाश डरते हैं...। मनचलों ने आवाजें कसना शुरू कर दिया है, शायद उसे वह लोग पहचानते नहीं हैं ? वह उन्हें बतला देगी-वह सगर की वहिन है। फिर तो सभी दुम दबाकर भाग जाएंगे। सगर कातिल है, लोग यह बात जानते हैं यह सोचकर पारो को बुरा लगता है। गुंडे-बदमाश उससे डरते क्यों । क्या वह बड़ा.. वह आगे सोच नहीं सकी। उसका भैया ऐसा हो ही नहीं सकता। जब-जब उसने भैया की गतिविधियों के बारे में सोचा है, उसे मर्मान्तक पीड़ा मिली है। कितना चाहा उसका मन पढ़ाई में लगे। वह स्वयं रात-रातभर पढ़ती है । सगर ने तो स्कूल ही छो दिया है । जासूसी उपन्यास पढ़ता है और अपने वन्वे में लगा रहता है कैसा थका लौटता है। धीरे-धीरे उसकी हिम्मत बढ़ती जा रही है। पर छुप-छुपकर वीड़ी पीता था, अब तो खुल्लमखुल्ला सिगरेट चौंकता एक दिन पारो को लगा उसके कदम लड़खड़ा रहे हैं। और दिन भांति सगर ने चारपाई पर लेटकर कोई बातचीत नहीं की-भोज नहीं किया। सिरदर्द का बहाना करके सो गया। पारो को नीं श्राई । उसका संदेह सही निकला था, उसने भैया का मुंह सू उसने दारू पी रखी थी। सुबह वह कुछ कहे-सुने, इसके पह निकल गया। उसके बाद सगर धंधे के नाम पर रातों को बाह लगा। पारो को लगा शायद दारू पीने के वाद घर पाने में हैं - पारोमा दिन पान उठा ही दी-"भया, दारू पीने लगा है ?" सगर मप रहा। उगने मोचा भी नहीं पा पारो दम तह माफ मगी। पारो ने उसे झामोरा-बोलता यों नहीं?क्यों पीता है दार? गुन-गनिदान ना कोई बात नहीं है ?" मार ने घोटा-गा उत्तर दिमा--'या जाता हूं।" "कौन-मा पहाः परंपता है जो पकान हो जाती है ? ममी तो समापभी गे पांगा तो जिन्दगानी मैतर होगी ?" "दिमाग पर बड़ा योग रहना है ? "दिमाग पर बोझ गलत पाम परने वालों के सा है। पना काम मारो. मेहतर करो. ईमानदारी से छोटा काम करो...किर दारूकी परत नहीं पड़ेगी।" पारो ने पायद उगकी नगरसी पी। frमी काम का बहाना फरोमगर भाग गया पा सग्निपारोगी बात कारोपिगर नहींपा। गगर को पता नहीं पा जाती है-यह बहत नेत्री मे पागे मर रहा है। मन्त में यही हुमा जिमका उमेर पार गगरी निरपतारी के पोधे कोई और यात मीही मरती है। इस पर वह उसने पूदगी-हमरा फग्ला है ? ययों गत रातभर याहर रहता है ? नहर में हो गई म पो नही करता? -पारो नोक गई. स्मिा हाय है उनी पंधे पर पनटार देशा-पारो टर गई । उन्हीं मनचलों में में रोई एरपा। पूछने लगा- "महामोगी" पारो ने जुमान में उत्तर नहीं दिया-ससे एक तमागा उमर गाल पर दिया। उमो समगा पाय पीरमाहर की पारी मी । उसो देगने ही दादा लोग रफ पार हो गए। सी मार पंदित या हाप पार रहे पे- मैं पगा. गंगन की सारी परनी है । तुम्हारी बग भी पाने वाली है।" पारो मधेरे में पड़ी रही नीधे । गाशे पानी पी पre दुसरी मोर बहने लगा तो पारी में नही रहा पग-" मनिा..." १ - वहित पलटगार देना। परे में सही पारो को गहमान लिया.-. रे तुम गाय भा गई?" "रा पगी।" पा, भीमोड में भी गगा। सराने पर शोलेरो कन- वा मिला और पहन लिया। यह मोटा-सा मादी गा गोल गोद पपा । उसने गाना---गुम नहीं भगो, मैं गरा गे: रिगट निगाला । म साथ होगी तो लोग तुम्हारे साथ-साग गुम भी पूरेंगे। पहजार की MRIT ए मिना खा गया। इस पीप जमलपुर की ओर से गोपाल का नाली सभी भाग । गाड़ी पी से मस में पड़ा और भिल्लाल पीय पाली सीट पर निगरा गा । उसका रांगेरा रो पारो गो मुलागा। पारी के लिए खरा मिकी मे पास सीट सपा रखी थी। यह स्वर्ग गांगल में निकाला था। पराल दी। पारोमेनालिगों से जिसकी शोर दिखा। उसकी पालों को लगा हो गया है ? गहतरा रागग भी सोश- निधार गे मा RAHAT Iा किन सोनी इसने गहरे गाळे गा। गे, इसी गुरिया गीगाहा जी ? राम गुरु बालीम-लगा। मेहर सूग गगामिल पुतली की गहराई मह गई है...गु गार-सा तार गार हो गगानि गन में जो लाल रखा है, उस धमक धारमा मेषों में। गंगा की आंखों में एक ही पगा दिसती सरोकिन रामो देखकर हिंसा का भाग भागडित भागों की पगमा मिल्ल गाई है राम लिए। साधु-संन्यासियों भाभी गदी। गोर समतों माली लाग भी है। माशा Eगा भुपयों रहने लगा मारानी गति ?पारो सोपतो-सोपी होली गोरजोललाकार भीतीभिमा लगगा?' साही तो।" तमाड़ा काम गमोंसपेट रसा? सो प्रकार से माहो?" गरगाहर भी लगती।" मामाम से भमा गोगा?"
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"समय ने जुगान पर तामा मगा दिया है।"
"रको लना गे मुगा गिया ?"
"सर पुरष प्रभी यताना मायया है पा?" फिर छ ।
मौन रहकर परत स्वरं बोला-"सार मुझे गिरनार परला पालो
१.दिन-रात छुपकर काम करता हूं। सागर पाऊंगा दो दिन पार
अपना पता मुबह को निग देना। कभी तेरे पारा पाने की जरूरत पर
गाती है... तनाबहार पहिल पुप हो गया।
पारो फिर नये घर में पिर गई। पापातकालीन स्पिति ।'
उटमा हुमा दूकान पोर, युलोजर की पावा, गिरोए माँ,
माती पत्तियां, येशुमार गियारिया, भागनामा पति...।
गलि भाग रहा है, जोर लिए पुनिम उगरे पोरे भाग रहो पनि
पर भागते-भागों मनुहान है... प.पोने पैरों में पड़े ए.
गरीर को भू-गून रिमबार निकल गई है. पति का पापा Tant
मांगे स्याहगाहों में पंग गई. पमही गिर गई। परम पोहे
टोरा मगाए पुलिग मे अपना-भागता हुपा नरकलाम । पारोको लगा
यह फूट-फूटकर रो पड़ेगी। पह यम के रोच के बाहर देगो समी।
मागतो बस-भागती रात । जिन्दगी में एक मपा गदेश मेपर
पाने बानी रात खिोटी-छोटी रितारों में पड़ीबो-गरी पात, पारोकी
मागों के मागे नापने सगी । जिन बातों यह रिता पसर उग
गमय नहीं समझ पाई थी, यह पप बगको समझ में माने मगा। गारे
प्रश्नचिह पहने मगे, उसर के परे होने मगे। जिन्दगी मान
,मरने हिसाब से जिगी जीने पाकिर गोदारले
मिगन के लिए मान स्थप यो भूम जाता है। मति छोटा होगा।
मिशन या होता है। मग पायापक है लिए पनि पीएम
गई है, इसलिए उमरी प्रावों एक माहै। गरा पियाग १
Tोता । जितना पारो मोपनी गई उतना उमरा मन पा
गया-यह परित मिशन में गापा र उमा
माप देगी। पारी ने पति की मोर मापूर पिरामी। उसने मंत्र,
से थे, उसे लगा पंरित किसी पूजा में लिप्त है-उसका मुख मंडल ज था किन्तु पूर्णतः निर्विकार एपं निलिप्त । पारो को लगा बल से लिपटा शरीर ठंडे लोहे की भांति प्रकला हुआ है, उसके स्पर्श पारो सिहर उठी है। पारो सिहर रही है-उसे प्रब ठंड लगनी शुरू गई है, यह कम्बल में सिमट जाना चाहती है। पारो ने अपना. साल और अधिक फसपार लपेटा । अपनी पल्पना में यह ठंडा लोहा ती रही। उसे ऊष्मा देती रही। अपनी कल्पनामों पर मन ही मन एंगती रही पारो... ठंबा लोहा तपाया गया है, टंडा लोहा तप गया है-ताप रो लोहा पिघल रहा है, पिघला लोहा नये गांचों में डाला जा रहा है, एक नया लौहपुगप जन्ग ले रहा है, कमजोर इंसान टूट रहा है-लोहपुगप जन्म ले रहा है।" इन्हीं पालनामों में सूबते-उतराते रात ढल गई। भोपाल-एन० ई० एल०-बस स्टैट। पॉटो रिमशा में पंधित पारो को वकील साहब के यहां ले गया। यो गिगट वगील साहम से बात करो पंधित चला गया अपने जरूरी माग से तणा पो-गार दिन में सागर पाने का वायदा करके। वकील साहब से पारो गो गो जानकारी मिली यह चौंका पाली थी। पुलिस गोरा गेअनुसार सगर इस क्षेत्र ना राबरो बड़ा पाटर था। मालती हुई गालगाड़ी के डिब्बों को काटमार माल कर ले जाने में उसका मुकाबला करने वाला कोई अन्य अपराधी क्षेत्र में नहीं था। पूरा गेंग था उसका। वैगन पाटने वाले उराको सहयोगी, रेलवे लाइन से गाल पाले उसके पेले। दुकों में माल लादकर व्यापारियों तक पहुंच उसमे गार्गनारी । जिरा आवश्यक वस्तु की बाजार में कमी हो गीगन काटने का रागर बीड़ा उठाता है। पाराल बायु, लोहिंग वायू उस पर्यगिर्द चाकर काटते हैं। किरा स्टेश को गया गाल लोड हो रहा है इसकी सूचना रागर के गेंग या -रागर योजना बनाता है-उराने कितनी योजनाएं बन
यानं बारी-बार पहली बार पाना है। फिर भी मानस
तोहीही जाएगी-जमानतारा नाम करना पड़ेगा।
यह गर दुष्प पारो को सुनना प वा । उसकी प्राण पपराने मी,
घोट पा गए. दिली गोड पारनों में उमरीर को मार
'दिया। एप मापन पोर-पोर में सहयों पून पुमाने वाली
गिरन, मासोपा? भंगा में जा पा लिया? गिनिए
मिया? सीमाई नही पाग-१६ गोवा मे लिपट
गया है-यह रंग ना गा गाना दाहाहै-गलिए या धोरोरा
रागार बन गया है। सिर उमरे जीवन मारेगमी पटनों
मरिनारे कोयला खानने वाला भोगा-माना भंगा इतना बदल गया?
पारी गोविण्याम ही नहीं हो रहा था।
दम बार मन्तिम निर्णय होगा, भंपा जमानत पर एर झाप, उमेर
में रहना होगा । शहर में दुगन गोलेगा, गोमा मगाएगा।
भाहर नहीं जाने देगी।-पारोबार उटी ग माल में--पर जगने
पारीपराहना नहीं माना तो पसा होगा? भाई पट जाएगा। मार
दिने र गंमार में रेती रहनाएगी। पारो रो पटो, गा नही हो
पता। वह गारो मसभाएगी, जो बीत गनी। गारमा
भाई-उमरीर में यही गन है।
पारी ने यसीम साहब की फोम निकासार मनोजोकोपी।सी
जी माप वह कचहरी गर्ग, कचहरी मे बाट मिरा, नगानगर 1
इनमाम पा। गनजाम पाहा से बरपानारीपरी
प्रमानन कराने को पूम रहे थे । मगर गाधारन मादमी नहीं पा । पागे
हरबान ने घोर रही थी।
पारो रामन पदमारे सागर में वाहमा है। मगर यी मा.
मन उसने फिर रामी है। दोनो वा में मार को पन दिए, मगर
उग. पास एक ही सीट पर है-लेरित नजरें मिलाने मेरा हा
है। पारोबार-बार मर जरती है पर उगमा माई यानर मना
पराधी है तो वेरको मनामों में पोदएना माहित
तो वह लेकिन फिर विरोधी भाव टकराता है। उसके साथ उससे फायदा उठाने वाले क्या उसे जेल में रहने देंगे ? पारो ने, यदि उसका साथ छोड़ दिया बिल्कुल बरवाद हो जाएगा। पहले ही मां-बाप के प्यार से वंचित हो चुका है। परिस्थितियों ने उसे अपराधों की दुनिया में धकेल दिया। पारो ने उसे ठुकराया तो बेचारा कहां जाएगा? नहीं नहीं... वह उसे सही रास्ते पर लाएगी, वह हार नहीं मानेगी। सगर उसका भाई है, वह उसे बरबाद होते नहीं देख पाएगी।-उसकी जिन्दगी का क्या अर्थ है-क्या प्रयोजन है ? बस यही कि उसका विवाह हो जाए और वह अपना घर बसाकर बैठ जाए? कदापि नहीं-उसके जीवन का भी कोई मिशन है-वह सगर को राह पर लाएगी--पंडित का साथ देगी-देश के लिए कुछ करेगी। शादी-ब्याह का बन्धन उसे नहीं बांध पाएगा। वह भैया से कह देगी कि वह शादी नहीं करना चाहती है। उसकी जिन्दगी इतनी सस्ती नहीं है । वह सगर से बात करेगी घर पहुंचने के बाद । वह भैया की पैरवी करेगी। हां, उसे भी लड़ना होगा। अंधेरी राह पर चलने वाले को अपने प्राणों की आहुति देकर भी उस अंधेरी राह पर दीया जलाएगी। रास्ते भर पारो इसी अन्तद्वन्द्व से घिरी रही। घर पहुंचते ही वह सगर पर बरस पड़ी.-"किसने तुमसे कहा था, रुपया कमाकर लाओ? क्या होगा इस पाप की कमाई का ?" सगर चुप है-~~ "हमारे घर में कोई झूठ नहीं बोलता था। तूने झूठ बोलना सीखा कहां से ? मुझसे कहता था--मेहनत का धन्धा करता हूं, रात-रातभर बाहर रहना, चोरियां करना, डाके डालना-बोल-क्या यह सच नहीं "यह सव सच है।" "क्यों किया तूने ऐसा ?" "पता नहीं, कैसे होता चला गया। पहले सोचता था-शंकर काका का कर्जा चुकाना है। फिर सोचा वकील की फीस देनी है। कल के मुकदमे में बरी होने के बाद लगा-रुपया बड़ी चीज है, उससे इन्सान - खरीदा जा सकता है, समाज के कायदे-कानून खरीदे जा सकते हैं, अदा- सत का न्याय खरीदा जा सकता है और एक ऐशो-पाराम की जिन्दगी गुजारी जा सकती है। जिन्दगी मे भीख मांगकर रोटी खाई.-मेहनत, मजदूरी करके रोटी खाई-फिर चोरी करके रोटी खाई। अपराध की दुनिया एक चिकनी गोली ढलान है-एक बार पर फिसला तो फिर संभलता ही नही है।" पारो फट पड़ी-"मैं देखती हू कैसे नही संभलता है ? अभी पारी जिन्दा है। माज तू इस घर मे कंद है, मैं मेहनत करूगी-में मजदूरी करूगी-तेरे पेट के लिए रोटो मैं कमा सकती हूं।" सगर चुप रहा, वह इस तरह पकड़ा जाएगा, पारो के सामने इस तरह पर्दाफाश हो जाएगा, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। शाम फिर से घिर पाई। सगर का मन बाहर को भागता है- उसके पांव बाहर की ओर बार-बार बढते हैं । दरवाजे के पास कुर्सी पर पारो बैठी है । सगर को बाहर जाने की मनाही है। अन्दर ही अन्दर कुछ भडक रहा है, खून का दौरा बदन में रुकता सा लगता है । रगों में दम नही, सारा बदन टूटता है। शायद इसीको मादत कहते हैं- शराब की लत, तम्बाक् का नशा । पारो जानती है भैया परेशान है । शाम को उसने घर में रहना छोड़ दिया था। वह जानती है भैया नती हो गया है। उसने पुस्तक बन्द कर दी, भैया का मन बहलाने के लिए कुछ करना चाहिए । उसे मिस्सी रोटी पसन्द है-बेसन वाली, भरवां भी यह चाव से खाता है-वह उसे बढ़िया भोजन बनाकर खिलाएगी। सगर उदास पलग पर बैठा है। पारो उसे छेडती है-"क्यों रे सगर, बाहर की ठडी हवा खाने का मन है ? रुक, प्राज तेरे साथ पिक्चर चलूगी--सैकिंड शो । अभी खाना बनाती है। भोजन करके हम पिक्चर चलेंगे।" पारो का उत्साह देखकर सगर मुस्कुराता है, उसे पारो का प्रस्तार अच्छा लगता है। पारो भजिया तल रही है, सगर पास बैठा गरम-गरम भा ।
. 1. पारो उसे पंडित से हुई मुलाकात की पूरी कहानी सुनाती है । । बतलाती है-शायद एक दो दिन में यहां आकर ठहरे सगर ने प्रेम से पारो के साथ बहुत दिन बाद भोजन किया। इसके वह लोग पिक्चर चले गए। रात को साढ़े बारह बजे दोनों घर वापस आए तो पंडित को दर- जे के बाहर पड़े हुए तख्त पर विराजमान पाया। पंडित ने बिना किसी संकोच के कहा-"तुम्हारे यहां मेहमानी करने आना पड़ा।" फिर सगर की ओर देखकर कहा-"अरे इतना बड़ा हो गया।" तब तक पारो ने ताला खोलकर मकान खोला। शाम की दाल- सब्जी ढकी रखी थी, रोटी कटोरदान में पड़ी थीं। पारो ने दाल-सब्जी स्टोव पर गरम की । पंडित शायद बहुत थका था। उसने बहुत थोड़ा- सा भोजन किया। पारो को क्या पता था कि उसने रातभर जागने की तयारी की है। पारो ने पंडित का बिस्तर लगाने की बात उठाई तव पंडित को ना पड़ा-"रात को काम करता हूं, बहुत काम है । सारी रात में । नहीं निपटता है ।...बस दिन में थोड़ा-सा आराम कर लेता हूं।" पंडित ने अपने लिए चटाई विछा ली, अपना पुलन्दा और दोनों झोले पास रख लिए। पारो सामने वाले कमरे में चारपाई पर पड़ी टुकुर-टुकुर ताक रह थी-पंडित क्या काम करता है ?' पंडित ने ड्राइंग शीट फैलाई, पेन्ट्स निकालकर वह तरह तरह रंग तैयार करने लगा। फिर उसकी तूलिका चल उठी, कागज रं लगा, पोस्टर तैयार होने लगा।.. रात ढलती रही, पंडित की तूनि दौड़ती रही, पोस्टर पूरा तैयार होते-होते पंडित चटाई पर लुढ़क गः पारो को ऐसा प्रतीत हुआ शायद रातभर का थका-हारा गिरकर सोने की चेष्टा कर रहा है। उसका शरीर निष्प्राण-सा पड़ा था। वह उठे और उसको विस्तर पर जाकर सोने को कहे य पड़ा रहने दे ? कोई भी निर्णय करने की स्थिति में वह नहीं थी ૭૨ अनिश्चय के क्षण अधिक नहीं थे। पंडित चन्द ही मिनटों में उठकर बैठ गया। उसने पड़े से पानी निकालकर मुंह पर पानी के छोटे मारे । हाथों को फैलाकर भरपूर जम्हाई ली यौर पुनः चटाई पर जमकर बंक गया । इस बार उसके हाथ में तूलिका नहीं थी, लेखनी थी। पंडित को इतना अधिक विचारमग्न उसने पहले कभी भी नहीं देखा था..किस कल्पना-सागर में डूब गया है पडित ? क्या लिख रहा है ? सारा संसार जब निद्रा मैया की गोद में दुबका सो रहा है, यह व्यक्ति किस प्रेरणा से जाग रहा है ? पारो उस रात सो न सकी। पडित लिखता रहा, उसने कई पन्ने लिये भौर उनको श्रमानुमार स्वाता गया। फिर उनको पट्टा, मशुद्धियो को दूर किया और एक लिफाफे में रखकर बन्द किया । उसके झोले में लिफाफे थे, उसे पाश्चर्य हुमा जब उसने देखा कि पडित का झोला नहीं मानमती का पिटारा था। उसने गोंद को शीशी निकाली। पोस्टर को भी अन्य अनेकों चित्रों और व्यंग्य चित्रों के साथ पैक किया। पकिट बनाया, उस पर कोई पता लिखा और उसे भी लिफाफे के साथ संजोकर रख दिया। पारो ने समझा पंहित का कार्य प्रध समाप्त हो गया है, रात के नगभग तीन बजे थे लेकिन पडित ने शायद रात के अंधेरे में न सोने को कमम खाई थी। उसने अपना झोला खोला, इस वार डायरी उसके हाय में भाई-पंडित डायरी लिख रहा था। पारो की समझ मे पाया कैसे मन दरीर और आत्मा को नियत्रित करके लिखा जाता की मान्यताएं भूठी है.-लेखक को वातावरण बनाना पड़ता है। चाय नही...सिगरेट नहीं..ाराब नहीं.. कुछ नहीं, मन्तःप्रेरणा चाहिए और बिल्कुल कुछ नहीं। पारो का मन श्रद्धा से भर उठा। मन में नमन किमा उमने अपने सामने बैठे इन्सान को-उसके कलाकार को उसकी कला को... पारो ने भी डायरी लिसी थी लेकिन इतनी लम्बी नहीं। पटित के लिखने का कोई अन्त नही है। उसका पाकोश उसके मुखमंडल पर उभर माया था। पारो कुछ-कुछ समझने लगी--केसे पडित ने अपनी कंधन मी काया को घुलाया था? । संसार T: की पहली किरण के साथ पंडित ने डायरी बन्द की-उसे • डाला और इस आशा में अपने आसपास दृष्टि डालकर देखने के कोई तो अब जागेगा। पारो ने विस्तर छोड़ दिया। पारो के सामने खड़ी थी-सारी रात काम किया है ? पंडित प्राडम्बर- न व्यवित है। बात को घुमाने की आदत नहीं है । पारो की बात स्वीकार करता है-"हां सारी रात काम किया है-इसी प्रकार या जाता है । जरूरी काम हैं, उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।" "अच्छा, अब तो हो गया न । चाय बना दूं ?" "तू चाय बना तब तक में तैयार होता हूं।" "अब कहां जाएंगे आप ?" "बस, थोड़ी दूर एक मित्र का घर है, यह सामग्री दिल्ली भेजनी है । इसके लिए उसको सौंपनी होगी।" "मैं दे पाती हूं, आप आराम कीजिए।" "नहीं, यह काम स्वयं मुझे करना चाहिए। चाय पीकर मैं जाऊंगा फिर पाकर कुछ घंटों तक सोऊंगा।" "मैं आपका बिस्तर लगाती हूं, पहले आप चाय पी लीजिए।" पारो, मेरा बिस्तर यही धरती है, यही चटाई। देश में कितने लोग वे परबार हो गए हैं, वह कहां सोते होंगे ? हम लोगों ने शपथ उठाई है विस्तर त्यागने की।" "लेकिन कब तक...?" "सुबह होने तक । हमारी सुबह की हमें प्रतीक्षा है।" पारो चाय बना रही है । पंडित के दिमाग में दुष्यन्तकुमार की एक पंक्ति दस्तक दे । . "कहां तो तय था चिरांगा हर एक घर के लिए कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए" ऐसे कितने स्वर उसे बौखलाए रहते हैं। नाय का प्याला एक ओर रखकर वह चल दिया। उसने और व्यंग्यचित्र दोस्त को सौंपते हुए कहा-"यह सामग्री लेक स्वयं जाएगे । प्रेस का काम पूरा हो जाने पर वालंटियर्म के द्वारा उन्हें वितरित किया जाए। कोई सामग्री हाक से नही भेजी जाएगी। दिल्ली का संदेश लाकर मुझे दीजिए। तब तक में दो-चार दिन को भोपाल और इन्दौर का फिर एक चक्कर लगाऊगा। पंडित बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए चल दिया। कोई क्षण व्ययं गंवाने के लिए नहीं। वापस पाकर पुन: एक बार वह चटाई पर लुढ़का और कम्बल प्रोढकर सो गया। रात का अंधेरा घिरते-घिरते पडित कही चला गया, अपना सामान भी अपने साथ ले गया। फिर चार दिन बाद एक रात चोरो की तरह आया-कुछ देर पारो और सगर से परिवार के सदस्य को मांति प्रात्मीयता से बात की, भोजन किया और चटाई बिछाकर काम करने को बैठ गया। उसने पारो और सगर को भली भांति समझा दिया है कि उसका पाना-आना नितांत गुप्त रखा जाए । सगर उसके रहस्यमय व्यक्तित्व से निरन्तर प्रभावित हो रहा था...। पारो उसके काम में हाथ बटाना चाहती है लेकिन पडित अपना काम स्वयं करता है। पारो से कहता है-"अपने कमरे में पढी, परीक्षा की तैयारी करो...।" पारो अपने कमरे में पढ़ती है, सगर कैदियों की भांति पढ़ा रहता है। अपने कमरे मे कथा-कहानियां पढ़ता है मनो. रजन के लिए। पारो उसे एक क्षण को भी बाहर अकेला नहीं जाने देती। सगर को शहर में ही कोई धन्धा कराने की योजना बना रही एक माह बीत गया। सगर के हाथ-पांव मचलने लगे-कैसे बाहर निकले घर से ? ईश्वर ने शायद उसकी सुन ली। भोपाल से वकील साहब का पत्र आ गया। मुकदमे की पेशी पर सगर को बुलाया या। पारो सगर के साथ पंडित को भेजना चाहती है लेकिन उसे दिल्ली जाना है कोई आवश्यक मोटिंग हैं। सगर दो दिन में वापस पाने का वायदा करके भोपाल चला गया।
닛 - रो तीन दिन से सगर की प्रतीक्षा कर रही है। भोपाल की 1 में पुलिस ने मुकदमा पेश कर दिया था। पेशी की सूचना साहब ने भेजकर सगर को बुलाया था। सगर पेशी पर भोपाल या। दो दिन में उसको वापस पा जाना चाहिए था। आज चौथा दिन था, सगर के न आने से वह चिन्तित थी। पंडित पार्टी की गुप्त बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली गया था। उसको वापस आ जाना चाहिए था। पारो ने अखबार में पढ़ा था-दिल्ली कुछ पोस्टर निकले हैं। एक सप्ताह के अन्दर देश के महानगरों की वारों पर रातोंरात पोस्टर गुप्त रूप से चिपका दिए गए थे। जनता को तानाशाहों से आगाह किया गया था, पोस्टरों के साथ ही साथ ढेर सारा गोपनीय साहित्य जनता में वितरित किया गया था-दमन की नीति क्यों आवश्यक नहीं है, अदालत के दरवाजे क्यों बन्द किए जा रहे हैं, विचारों की अभिव्यक्ति पर पावन्दी क्यों लगाई गई, प्रेस सैंसर का उद्देश्य क्या है, सन्त और साहित्यकारों की गिरफ्तारियों के पीछे राज क्या है ? इस साहित्य के द्वारा जनता को विस्तृत जानकारी दी गई। जन आन्दोलन उभारने की चेष्टा की गई। किसी भयंकर विस्फोट की आशंका से राज-सिंहासन फिर डोलने लगा। पुलिस और गुप्तचर विभाग पागलों की भांति इस साहित्य के सृष्टा की खोजबीन कर रही है। पोस्टर किसने बनाए, कलाकार कौन है, विस्फोटक लेख किसने लिखे, जागरण के गीत किसने गाए ? पुलिस को उसकी आवश्यकता है। केन्द्रीय गुप्तचर विभाग से आस्था उठने लगी । विशेष अनुसन्धान केन्द्र की स्थापना की गई । भूमिगत कलाकार की खोज है उन्हें । पारो जानती है, वह पोस्टर इसी कमरे में बनाया गया है, वह भी यहीं इसी घर में लिखे गए हैं। उस डेढ़ पसली के इन्सान तलाश में पुलिस और सम्पूर्ण गुप्तचर विभाग घूम रहा है।
७७ पंडित क्यों नहीं पाया? उसे गिरफ्तार तो नही कर लिया पुलिस ने? दहलान की धूप सरस्ते-सरकते जीने तक जा पहुंची। संध्या प्रांचल लपेटने लगी."पारो घर खोले सारे दिन चटाई पर पड़ी रही. शायद भैया आए.."शायद पहित ही लोट पाए। रात हो चली, कोई नहीं माया । पारो ने उठकर तुलसी चौरा पर दोश जताया। हाय जोड़कर प्रभु से प्रार्थना की-"सबको रक्षा करना।" फिर स्वयं चौंक पडी.."मन पडित के लिए प्रार्थना करता है। कौन है पंडित ? प्रश्न अनेको वार मन में उठा है। गांव की पहचान, फिर वर्षों का अन्तराल । सब कुछ भूल गई थी वह। कभी-कभी सूने उदास क्षणों में मन को लगता था-दूर क्षितिज के उस पार से कोई उसे अावाज दे रहा है...वह पहचानने की चेष्टा करती है...यह स्वर किसका है. ढलते हुए सूर्य को उसने देखा है । रगीन बादलों के पर्दे के पीछे उसे एक परछाई दीपती है। कभी-कभी बादलों में एक माकृति उभरती है वह चेहरा उसका चिरपरिचित चेहरा है-ऐमा क्यों होता है ? गाव की पहचान के बाद उस रात उमने पुनः पडित को देखा। इस बार तेजी से घटनाचक्र धूमा है। उसका साधिकार यहां आना... इस घर को कर्मभूमि बनाना पारी को मञ्छा लगा। इस बार तो मपना एक वडा झोला पंडित छोड गया है, उसमे भी वही लिने लिखाए कागज, किताबें, डायरिया । पारो के मन का चोर जागा। समय व्यतीत करने के लिए क्यों न झोले को सामग्री खोली जाए। विचार टकराने के साय-साथ उसने झोले की सामग्री को पलटना शुरू कर दिया-उसे तलाश थी डायरी की । सब कुछ छोडकर उसने डायरिया निकाल ली। तीन डायरी थीं। पारो कांपते हुए हाथों से एक डायरी के पृष्ठ पल- टने लगी। डायरी के पृष्ठों में भी पडित के प्राक्रोशी पुरुष का चेहरा उमागर हो रहा था। "नौकरी नहीं करूगा, अपनी मात्मा को नहीं वेचूंगा। मेरी तूलिका मचल रही है, मानस मंथन को तूलिका से मुखर करूगा। क्ल ही ७५ . त्यागपत्र दूंगा, अब गांव नहीं जाऊंगा। फिर तो गांव छोड़ना पड़ेगा ?...गांव का ताल अच्छा लगता है, रात को अलाव पर बैठना अच्छा लगता है, भोलेभाले गांव वालों को उनके अधिकार की बातें बताना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूं। गांव वाले मुझे मानते हैं-~-मेरा बहुत कहना मानते हैं, गांव के लोग अच्छे हैं। पारो एक अच्छी लड़की है, उसमें प्रतिभा है.. लेकिन परिवेश? सब मोह त्यागना पड़ेगा। जिन्दगी एक मिशन है, सब कुछ पीछे छूट जाने दो, मुझे आगे बढ़ना है.. मेरी पार्टी को आगे बढ़ना है। मैं कल ही त्याग- पत्र दूंगा। प्रशांत" तो पंडित का नाम प्रशांत है । पारो कितनी पगली है। गांव के लोग मास्टर होने से उसको पंडित वोलते थे-वह भी उनके साथ पंडितजी' बोलने लगी--फिर कव पंडित जी से वह सिर्फ पंडित हो गया। पारो जिसे एक भोलाभाला देहाती इन्सान समझती थी.वह कितना बड़ा कलाकार था--कितना महान् विचारक-इसका ज्ञान पारो को अब हुप्रा है । 'प्रशान्त' सागर की भांति गंभीर है। कितना अच्छा नाम है । अब वह कभी पंडित जी कहकर नहीं पुकारेगी प्रशान्त जी को। प्रशान्त का एक नया व्यक्तित्व उसके समक्ष उभरा था। प्रशान्त मास्टर नहीं .... प्रशान्त कलाकार लेखक'। डायरी के पन्ने पारो पलटती गई- "पार्टी को घन की आवश्यकता है, लोगों ने चन्दा किया है.-.-मैंने भी चन्दा दिया है। मैंने अपनी अंतिम पूंजी तक चन्दे में दे डाली है लेकिन इससे क्या होता है । काम महत्त्वपूर्ण है. उनकी प्रदर्शनी करूंगा, सब चित्रों को वेच दूंगा। फिर चित्र वनाऊंगा, रात-दिन काम करूंगा। जो भी काम मिलेगा वह करूंगा। मां सरस्वती के चरणों में बैठकर कुछ लिलूँगा।" फिर चन्द पृष्ठों के वाद- "रेणुजी की आज की मुलाकात नहीं भूलूंगा। कितनी छोटी-सी ५६ मुलाकात थी। रातभर लिखते-लिखते थक जाता हूं। मुबह घूमना मच्छा लगता है, रातमर को यकान निकल जाती है। क्रिश्चियन कनि- स्तान की ओर से यूनिवसिटी रोड पर चटने में मजा माता है । उन दिन देखा लायब्रेरी के मामने रेगुजी की कार खड़ी थी, पास वाले अमलतास के पेड़ के नीचे रेगुजी एक सौंटी ने अमलताश के फूल तोड़ने का प्रयास कर रही हैं, सौंटी मारते ही पीले-मीले गुच्छों वाले फूल से पोले मोती से दाने झर जाते ये-गुच्छा हाय नहीं लगता। मुझे देखते ही रेणुजी ने प्रावाज दो-'प्रगान्त जी नमस्कार ।' मैं समझ गया रेणुजी ग्रासानी से नहीं छोड़ेंगी। टिटर कर पड़ा हो गया, दोनों हाथ जोड़ दिए। रेणुजी बोलीं-'मार लम्बे हैं, यह अमलतास का गुन्हा नोड़ दीजिए।' मैंने ढेर सारे फूल तोड़ दिए । रेपजी फूलों के गुच्छों में लदो पड़ी थी, मुस्कुराकर कहने लगीं-मैंने आपका वह चित्र देता है जिसमें मादिवासी वालाएं जंगल में लकड़ी के गट्टर मिर पर लादे चली या रही हैं । पार मेरा चित्र बनाइए इसी तरह फूलों के साथ । मुझे पूर्ण दिश्वास है आपकी तूलिका से जो रंग भरे जाएगे उनकी तुलना ताजे अमलताश कुम्हलाए-से प्रतीत होंगे।' मैंने कहा-'जो चित्र मन के परदे पर अपनी छाप छोड़ जाते है, वही कभी न कभी तूलिका से उभर माते हैं।' रेणुजी का प्रश्न या--'पापने उन मादिवासी वालामों को कहां देखा था?' मैंने बात सप्ट करने की चेष्टा की-'वह तो मेरी जिन्दगी है, मैं एक मजदूर हूं, दिन-रात मेह्नत करता हूं तव दो जोर की रोटी जुडती है । मेरी जिन्दगी के प्रामपास इसी प्रकार के दृश्यों की भीड है।' रेजी मुस्कुरा दी-'वेर और बबूल मे जिन्दगी को उलझार रखा है। कभी ऐमा नहीं लगता कि रजनीगंधा की क्यारी के पास दे. स्वीट पोज़ को मादक गन्ध मे डूब जाए, नस्ट्रेशियन के प्राकार से पानी तूलिका सजाएं...।'
- मैंने उनकी बात काटते हुए कहा-'आप तो बहुत ही दिलचस्प बातें करती हैं, कभी बैठकर हम लोग बात करेंगे।' 'फिर कब मिलेंगे?' मैंने छोटा-सा उत्तर दिया-'कभी भी शीन।' शायद शीघ्र कहे बिना पीछा छुड़ाना असंभव था। मैं चल दिया लेकिन रेणुजी की बातें मन की दीवार पर कहीं अंकित हो गई। सौन्दर्य कितना मादक होता है ? व्यक्तित्व का अपना एक आकर्षण होता है। रेणुजी सौन्दर्य और व्यक्तित्व की धनी हैं, वैसे भी धनवान हैं, कितने सामाजिक कार्यक्रमों में उनसे मिल चुका हूं। हर बार मुझसे बातचीत का बहाना ढूंढती रही हैं । आज कहां से टकरा गई-खैर छोड़ो-रात बहुत हो गई है।" पारो नितान्त अकेली है। वह एकाग्रचित्त होकर डायरियां पढ़ रही है । लेकिन यह क्या हुआ ? अचानक एक अव्यक्त वेदना उसे सालने लगी। वह रेणुजी कौन है ? उसकी जिज्ञासा बढ़ने लगी.. रेणुजी के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में चंद ही शब्द लिखे थे.. लेकिन प्रशान्त को बहुत अच्छा लगा होगा तब उसने इतना लिखा है। वह प्रशंसा में कुपण है । फिर कब मिली रेणुजी प्रशान्त को कितनी बार मिली. कहां-कहां मिली.. उनकी पहली मुलाकात ने क्या गुल खिलाया ? पारो तिलमिला उठी "ज्यों-ज्यों डायरी के पन्ने पलटती गई उसका परिचय रेणुजी से बढ़ने लगा। रेणुजी ने कौनसा मन्त्र फूंका या प्रशान्त पर ? प्रशान्त के मनोभाव स्पष्ट है डायरी में। नितांत ईमानदारी से लिखी गई डायरी। सब कुछ स्वीकार किया है प्रशान्त ने। यूनिवसिटी लायब्रेरी के सामने रेणुजी अमलताश के फूलों से लदे वृक्ष के नीचे उछल रही हैं---अमलताश पीले मोती से दाने कर रहे हैं-यह चित्र रातभर प्रशाल के दिमाग में पूमता रहा-सपना भी देखा चौंककर घबराकर उठा--भोर होने में देशाथी.. उसे लगा पहाड़ी की ओर से उसका बुलावा है, एक आवाज पाती है। उन उनीदी पहाड़ियों से। प्रशान्त अपना बिस्तर छोड़कर उठ जाता है-अंधेरा झरने लगा है-प्रशान्त फिर भाग रहा है- वही मोड़ क्रिश्चियन कविस्तान वाला, वही चढ़ाई-प्रशान्त बॉयन हॉस्टल की ओर से उतरने वाले नाले को पार कर रहा है-बस एक मोड़ चढाई-दूसरा मोड़, फिर चढाई-फिर शीश उठाए सड़ा अमल- नाश-शायद रेणुजी माज भी आएं--शायद न पाएं । उन्होंने ही तो पूछा था फिर कब मिलेंगे। प्रशान्त का मन कहता है रेणुजी भी पाएंगी-यूनिवर्सिटी से नेपाल पैलेस की ओर उतरने वाली ढलान इस रास्ते से पूरी दीसती है । रेणुजी की कार उसी रास्ते से पाएगी-मभी कुछ-कुछ अषेरा बाकी है लेकिन कार पहचानी जा सकती है। प्रशान्त का ध्यान उसी रास्ते पर है-वह ममलताश के नीचे पहुंच गया है। बरसात में बॉयज हॉस्टल की ओर से गिरने वाले नाले का जल झर- झराकर गिरता है-वह उस नाले के पास खड़ा होता या-उस स्वर को सुनता था। उसे लगता या कोई अदृश्य सुन्दर, अनिन्द्य सुन्दरी 'सिलखिलाकर हंस रही है लेकिन अभी बरसात कहां है-यह स्वर उसी सुन्दरी का है -सिलखिलाकर हंसे जा रही थी रेणुजी । प्रशान्त तो 'किंकर्तव्यविमूढ-सा सहा था। रेणुजी सामने सड़ी हंस रही थीं। प्रशान्त की गम्भीर मुद्रा देखकर रेणुजी ने हंसना बन्द कर दिया। रेणुजी ने कहा---'मुझे पता था तुम भामोगे।' 'क्यों, ऐसा क्यों सोचा आपने ?' 'क्योंकि मुझे रातभर नीद नहीं प्राई, सोचती रही सुवह होगी मैं धूमने जाऊंगी-फिर तुमसे मुलाकात होगी-तुमसे फिर ढेर से फूल- तुडवाऊंगी और अपने ड्राइंग रूम में सजाऊंगी...।' प्रापने ऐमा क्यो सोचा कि मैं मिल ही जाऊंगा?' 'क्योकि करवटें बदलने पर भी मुझे नींद नहीं पाई और ऐसा लगता या तुम भागते हुए पहाड़ पर चढ रहे हो, मैं तुम्हारा इन्तजार कर रही हूं। तकलीफ हमेशा दोनो तरफ होती है । सच बतलानो, रात क्या पाराम से सोए थे ?' प्रशान्त को झूठ बोलना नहीं पाता। वह कोशिश करे तो भी शायद झूठ नहीं बोल पाएगा। इसीलिए सच-सच कह डाला-'मुझे लगता था इस पहाड़ी को प्रोर से एक आवाज पा रही है-- एक बुलाया मेरे लिए मुझे लगा, माप अमलताश के नीचे खड़ी हैं:
'अरे, मैं तो कब से खड़ी हूं-तुम्हें देखकर उस ट्री गार्ड के पीछे गई थी। देखो उस मोड़ के नीचे से तुम्हें आते हुए देख रही ...' 'इतनी दूर से पहचान लिया ?' 'तुम लम्बू हो न इसलिए।' 'पायो तुम्हारे लिए फूल तोड़ दूं।' 'सूरज उगने के बाद-अभी तो हम उस और घूमने चलते हैं।' 'कहां?' 'उस पोर-जहां से सूरज उगेगा। वह ढलान बड़ी प्यारी है- ढाना की ओर जाने वाला रास्ता...' 'हां वह मुझे भी अच्छा लगता है।' दोनों ढलान पर उतर रहे हैं। रेणुजी के पर निकल पाए है-पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं-वह उड़ रही हैं। मन हवा में तैर रहा है । वह प्रशान्त से कहती हैं-'मैं बहुत खुश हूं-इस ढलान पर भागने का मन करता है-आयो, हम दोनों साथ-साथ भागें'-रेण जी प्रशान्त का हाथ पकड़े हैं-वह दोनों उस ढलान पर दौड़ रहे हैं- हंस रहे हैं-उनका मन बल्लियों उछल रहा है।" और डायरी पढ़ते-पढ़ते पारो का मन डूबता गया-डूबता गया- कहीं कोई थाह नहीं है-पारो रो पड़ी। "ऐसा क्यों होता है ? प्रशान्त कौन हैं मेरे ? उन्होंने किस मुझसे प्रणय निवेदन किया था। पागल पारो, प्रशान्त पर कब से अधिकार समझने लगी लेकिन हां, समय कौन-सा बन्धन है इस खेल रेणु को क्या समय लगा था-प्रणय निवेदन करना क्या आवश्य यह मेरे मन का अधिकार है। इस भावना का प्रदर्शन भी क्या अ है ? रेणु अपना खेल खेल रही है-मैं अपने तक सीमित हूं- प्रशान्त ने कभी रेणु का जिक्र नहीं किया। डायरी तो अभी भी हैं-जरूर कुछ न कुछ लिखते होंगे रेणु के बारे में-मैं पढूंगी अभी तो दूसरी डायरी शेष है. शेष हैं। -इसके भी कुछ पृष्ठ पारो पुन: डायरी के पन्ने पलटने लगी। -~-एक स्वर निरन्तर रेणुजी के गति और उनका प्यार प्रशान्त को पागल बनाता गया। प्रशान्त की पार्टी वाले नाराज हैं उमके प्राचरण गे। उसको रेणुजी के चंगुल से निकालना चाहते हैं। प्रशान्त पहले को समान पार्टी को समय नहीं दे रहा है । देश की राजनीतिक गति- विधिया एक नया मोड़ ले रही हैं। सारे देश में क्रान्ति का नया बिगुल बज रहा है। प्रशान्त स्वयं चिन्तित है। कर्तव्य पोर भावना का द्वन्द्व युद्ध चलता है लेकिन रेणु जी बुरी तरह हावी हैं। गुण भी कितने हैं। अपने पिता के लाड़-प्यार में पली एकमात्र सन्तान । लक्ष्मी जी की कृपा तो उन पर है ही, सरस्वती का भी घरद हस्त प्राप्त है। प्रशान्त ने अपनी डायरी में लिखा है-रेणुजी को प्रभु ने सब कुछ उन्मुक्त हृदय से दिया है। सुन्दरी, पपिनी, सम्मानी, भावुक स्वप्नशील कलाकार गायिका. लेकिन मैं भागना चाहता हूं। रेणुजी बहुत तेजी से मेरी मोर बढ़ रही हैं । रेणु जी का चुम्बकीय क्षेत्र इतना विशाल है। मेरी मात्मा कापती है सोचकर । पार्टी के काम से उदयपुर जाना था। रेणुजी मिली और घोषणा की-दस तारीख को जन्मदिवस था उनका। इस बार बहुत धूमधाम से मनाने का इरादा था। लेकिन मुझे उदयपुर जाना था। रेण ने प्रादेशात्मक स्वर में कहा था-माप नहीं जाएंगे। लेकिन पार्टी का काम कसे टालता। मुझे जाना था, गया। लेकिन रेणुजी ने भी क्रोध मे जन्मदिन न मनाने का फैसला कर लिया। उदयपुर तो चला गया लेकिन येन केन प्रकारेण चेप्टा यह रही कि काम रामाप्त हो और मैं वापस दस तारीख को सागर मा जाळ । काम ममाप्त किया । उदयपुर से मन्दसौर रातोरात ट्रक मे लदकर पाया, मन्दसौर से भोपाल और पाखरी सफर भोपाल से सागर। शाम सूरज टूबते-डूबते सागर पहुंच गया। रेणु मुझे देखकर विश्वास नहीं कर सकी, कितनी नाराज थी । प्राज पहली बार अजीब-सा लग रहा है, यह सोचकर उस दिन कैसे-कैसे मनाया रेणु को। कसे मौका पाकर वह मुझसे लिपट गई थी। मेरे वक्षस्थल मे मुह छुपाकर रोने लगी थी, मैंने प्यार से उसको पपको देते हुए वहा या चलो तुम्हे नाव की सैर करा मैं तो कब से खड़ी हूं-तुम्हें देखकर उस ट्री गार्ड के पीछे थी। देखो उस मोड़ के नीचे से तुम्हें आते हुए देख रही. तनी दूर से पहचान लिया ?' तुम लम्बू हो न इसलिए।' पायो तुम्हारे लिए फूल तोड़ दूं।' 'सूरज उगने के बाद-अभी तो हम उस और घूमने चलते हैं।' -- 'कहां? -- 'उस ओर-जहां से सूरज उगेगा। वह ढलान बड़ी प्यारी है- ना की ओर जाने वाला रास्ता।' 'हां वह मुझे भी अच्छा लगता है।' दोनों ढलान पर उतर रहे हैं। रेणुजी के पर निकल पाए हैं-पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं-वह उड़ रही हैं। मन हवा में तैर रहा है । वह प्रशान्त से कहती हैं-मैं बहुत खुश हूं-इस ढलान पर भागने का मन करता है-ग्रामो, हम दोनों साथ-साथ भागें'-रेणु जी प्रशान्त का हाथ पकड़े हैं-वह दोनों उस ढलान पर दौड़ रहे हैं- हंस रहे हैं-उनका मन वल्लियों उछल रहा है।" और डायरी पढ़ते-पढ़ते पारो का मन डूबता गया-डूबता गया. कहीं कोई थाह नहीं है-पारो रो पड़ी। "ऐसा क्यों होता है ? प्रशान्त कौन हैं मेरे ? उन्होंने किस दिन मुझसे प्रणय निवेदन किया था। पागल पारो, प्रशान्त पर कब से इतना अधिकार समझने लगी लेकिन हां, समय कौन-सा बन्धन है इस खेल में रेणु को क्या समय लगा था-प्रणय निवेदन करना क्या आवश्यक है यह मेरे मन का अधिकार है। इस भावना का प्रदर्शन भी क्या आवश्य है ? रेणु अपना खेल खेल रही है-मैं अपने तक सीमित हूं-गे प्रशान्त ने कभी रेणु का जिक्र नहीं किया। डायरी तो अभी भी लि हैं-जरूर कुछ न कुछ लिखते होंगे रेणु के बारे में-मैं पढूंगी.-ले अभी तो दूसरी डायरी शेष है. -इसके भी कुछ पृष्ठ शेष हैं । A म पाये पुनः हापरीके पन्ने पलटने लगी। ~एक स्वर निरन्तर पुषी के गति मोर उनका प्यार प्रशान्त को पागल दनाता गया। प्रशान्त की पार्टी दाले नारा है उसकेमाचरण से। उसको रेपुरी के चंगुल से निकालना चाहते हैं। प्रशान्त पहते के समान पार्टी को समय नहीं दे रहा है। देश की राइनीतिक गति- विधिया एक नया मोड़ ले रही हैं। सारे देश में क्रान्ति का नया विमुन बज रहा है। प्रशान्त स्वयं चिन्तित है। कर्तव्य मोर भावना का द्वन्द्र मुद चलता है लेकिन रेणु जो दुरी तरह हावी हैं। गुण भी कितने हैं। अपने पिता के साह-प्यार में पली एकमात्र सन्तान । सक्ष्मी जी की कृपा तो उन पर है ही, सरस्दवी का भी वरद हस्त प्राप्त है। प्रशान्त ने अपनी डायरी में लिखा है-रेपुटी को अनु ने सब कुछ उन्मुक्त हृदय से दिया है । मुन्दरी, पचिनी, सम्रानी, मादक स्वप्नशील कलाकार गायिका. लेकिन में भागना चाहता हूं। रेगुजी बहुत तेजी से मेरी मोर बढ़ रही है । रेप बी का चुम्बकीय क्षेत्र इतना विशाल है 1 मेरी मारमा कांपती है सोचकर । पार्टी के काम से उदयपुर जाना था। रेणुजी मिनी पौर घोषणा की-दस दास को जन्मदिवस या उनका। इस बार बहुत धूमधाम से मनाने का इरादा था । लेकिन मुझे उदयपुर जाना था। रेज़ ने प्रादेशात्मक स्वर में कहा पा-माप नहीं जाएंगे। मैकिन पार्टी का काम कैसे टालता। मुझे जाना था, गया। लेकिन रेणुजी ने भी कोष में जन्मदिन न मनाने का फैसला कर लिया। उदयर तो चला गया लेकिन येनकेन प्रकारेग चैप्टा यह रही कि काम समाप्त हो और मैं वारस दस तारीख को सागर मा जाऊ। काम समाप्त किया । उदयपुर से मन्दसौर रातोंरात ट्रक में लदकर पाया, मन्दमौर से भोपाल और ग्राखरी सफर भोपाल से सागर। शाम सूरज टूबरे-वने सागर पहुंच गया । रेणु मुझे देखकर विश्वास नहीं कर सकी, कितनी नाराज थीं ! आज पहली दार अजीब-सा लग रहा है, यह सोचकर उस दिन कैसे-कैसे मनाया रेणु को। कैसे मौका पाकर वह मुझने लिपट गई पी। मेरे वक्षस्यल में मुह छुपाकर रोने लगी थी, मैंने प्यार हैं टमको यात्री देते हुए कहा था चलो तुम्हें नाव की सैर करा - हम लोग पहली बार साथ-साथ नाव पर बैठे। मैं नाव चला रहा मोटर स्टैंड से पुलिस ट्रेनिंग कालेज और फिर बरियाघाट, Tक टोरी.. पूरी झील घूम डाली। रात का एक बज गया लेकिन दगी का एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सामने आ गया। उस दिन डायरी लिख पाया। दो बजे घर वापस आया था। पाज भी थक गया -आज नींद भी अभी से आने लगी है । काम बहुत बाकी है.. डायरी 1 एक महत्त्वपूर्ण अंश बाकी है। निर्णय वाली बात बाकी है.. लेकिन नाज सोऊंगा। कल रेणु से खुलकर बात करूंगा। फिर मेरा अन्तिम निर्णय होगा। बात गंभीर होती जा रही है...बाई रेणु.. मैं सोने जा रहा हूं। कौन-सा निर्णय था जिसके लिए प्रशान्त इतना चिन्तित था ? क्या बात हो गई ? पारो ने डायरी के पृष्ठ पुन: पलटे। डायरी १४ तारीख को लिखी गई थी। फिर तीन दिन कुछ नहीं लिखा गया । १८ सितम्बर की डायरी पढ़ने के पहले ही किसी भावी आशंका से पारो का मन घबराने लगा। १८ सितम्बर की डायरी बहुत लम्बी थी- हिन्दी विभाग में 'समकालीन कथा साहित्य' के संबंध में एक विचार-गोष्ठी थी। रेणु मेरे लिए भी एक निमन्त्रण-पत्र ले आई थी। गोष्ठी में बहुत मजा आया। एक आदनी के कितने रूप हो सकते हैं 'प्रादमी सड़क का', 'आज का आदमी', 'आम आदमी', निम्न मध्यवर या निम्न वर्ग के औसत आदमी को ही हीरो बनाकर समकाली -साहित्य के सृजन पर विशेष जोर दिया जा रहा था। संघर्षशी शोपित, दलित, वेरोजगार, महानगर, नगर या कस्बे के आदमी कहानी पर विशेष जोर था। रूमानी कहानियों की खिल्ली उड़ाई 'ऐतिहासिक साहित्य की ओर किसीने ध्यान ही नहीं दिया। यथा नाम पर दायरे सिकुड़ते जा रहे हैं । अन्त में जब अध्यक्ष मही समकालीन कथा साहित्य पर सामान्य पाठक की राय जाननी र रेणु उठकर खड़ी हो गई। उसने पूरी गोष्ठी धो डाली। उसने ती निर्भीक स्वर में कहा-'समकालीन कथा-साहित्य को आप सपनी नेतागीरी कहां तक चलाएंगे।
गुट विदोप नेतागीरी मे माप अच्छे साहित्य का सृजन नहीं होने देते । मैं की पत्रिकाओं में प्रकाशित कथा-साहित्य पढतो हूं। अधिकांश कहानियां मन में जब पंदा करती हैं। दर्जनों कहानियां तो पूरी पढ़ी नहीं जा सकी, दर्जनों कहानियां पढ़ने के बाद एक भी कहानी याद नहीं रहती है। माम मादमी के नाम पर बदहवास पसीना पोंछता हुआ, पंचर साईकिल घसीटता हुमा, लोहा पीटता हुमा, तांगा चलाता हुमा, चना मूंगफली बेचता या गैस के गुब्बारे वेचता हुमा प्रादमी आपके लिए कहानी का विषय बन सकता है तो मालीगान कोठी में रहने वाले प्रादमी की जिन्दगी का कोई अंश कथावस्तु क्यो नहीं बन सकता। पपायं के नाम पर हर बार कहानी मे मक्खी मिनके, पमीने पर धूल की पर्त जमे, कपड़े फटकर तार-तार हो जाएं और रसोई मे खाली बर्तन खनके और मकड़ी के जालों से मढ़ी, भरते हुए चूने वाली दीवार पर बैठ छिपकली के मुंह में दिखाया गया कीड़ा मामान्य पाठक कब. तक सहन करेगा। पाठक पब मनोरंजक सस्ता पाकेट बुक साहित्य पढ़ता है, मत्य कथा-साहित्य खरीदता है पोर जासूसी कहानियों से अपना मनोरंजन करता है । जब से यह नये-नये मान्दोलन चलाए गए हैं, मेगे जानकारो मे संसार श्रेष्ठ साहित्य की तुलना में कोई सृजन नहीं हुआ। कहानी वह है जो मन को भाए और जो अच्छी लगे। साथ-साय सम- कालीन समस्यामों का समाधान प्रस्तुत करे अथवा किसी सामयिका स्पिति का चित्रण करे । समस्या 'ग्राम भादमी' को हो नहीं है, हर वर्ग के मादमी की है। समाज मान सड़क छाप भादमी से ही नहीं बनता है उसके सदस्य और भी वर्गों के लोग हैं। माम आदमी के लिए नारे बुलन्द करने वाले लेखक शाम को काफी हाउस में बैठकर माने वाली रातों की रंगरेलियो की योजना बनाते हैं, बढिया ह्विस्की पोते हैं, महगी सिग- रेट पीते हैं। कहानी प्राम प्रादमी को लिखते हैं और दिमागी ऐयाशी में उनकी हीरोइन के कपड़े परियों मे सफेद होते हैं। यह एक नाटक है, यह एक देहूदा लेख है, यह व्यर्थ की नेतागोरी है । माम आदमी की नई कहानी के नाम माहित्य को नए मत करो। माज का सामान्य पाठक समकालीन क्या-साहित्य में मंतुष्ट नहीं है और साहित्यिक मठा- - आचरण से नाराज है । मैं एक और सवाल उछालती हूं- री हूं, निश्चित रूप से उस वर्ग की नहीं जहां से पात्र छांटकर की होड़ आप लगाए हैं, क्या मुझे पात्र बनाकर कोई कहानी नहीं जा सकती है ? क्या मेरे समान पात्र अब से पूर्व के साहित्य में थे? क्या वह साहित्य सारे संसार में नहीं पढ़ा गया है और नहीं हा गया है ? घृष्टता के लिए क्षमा। ये मेरे अपने विचार हैं। चारों की अभिव्यक्ति पर कोई पाबन्दी नहीं है।' सभागृह तडातड़ तालियों से गूंज उठा । बहुत से चेहरों पर आक्रोश की रेखाएं उभरी, बहुत-सी मुट्ठियां कसी, दांत भींचे गए। रेणु मुझको लेकर समागृह के बाहर आ गई। रेणु रोप में थी। दूसरा प्रश्न उसने मेरी ओर उछाल दिया। मुझसे बोली-'प्रशान्त, तुम भी आम आदमी की नकल मार रहे हो, कब तक यूं ही ट्रकों पर लदकर सफर करोगे और बसों में धक्के खामोगे? इस संबंध में पापा ने मुझसे बात की थी। उनका सुझाव है कि तुम दिल्ली या वाम्बे में एक बड़ा भारी कामशियल आर्ट सेन्टर खोलो। इन्टीरियर डेकोरेशन का विजनिस भी अच्छा है। दुकानों के बोर्ड कब तक पेन्ट करोगे ? पिक्चर टाकीज के वैनर्स कब तक बनायोगे ? जिन्दगी में आगे बढ़ना है तो यथार्थ का ढोंग छोड़ो, कला, और साधना वाली भावुक बातें बन्द करो। पापा की बात मान लो। अच्छा विजनिस जमा लो । पूंजी पापा लगाने को तैयार हैं । फिर हमारी शादी हो जाएगी। अव मेरे आक्रोश की बारी थी। मैंने बताया-रेणुजी में जिन्दगी का एक विशेष ध्येय है। मेरी अपनी विचारधारा है। मैं पार्टी का सदस्य हूं, उसका कार्यकर्ता हूं, मुझको अपनी जिन्दगी के क रास्ते पर चलकर अपना लक्ष्य प्राप्त करना है। वैनर्स या बोर्ड ब जीविका अजित करने के लिए आवश्यक है लेकिन अपना अधिकांश ही मैं अपनी कला को और अपनी पार्टी को देता हूं। दिल्ली या जाकर यह सब छूट जाएगा। सिर्फ व्यवसाय रह जाएगा। व्यापारी बनना नहीं चाहता।'
53 रेणु ने कितना साफ-साफ कहा था-वह इस टीन टप्पर वाले मकान में नहीं रह पाएगी वह बसों में यात्रा नहीं कर पाएगी। वह रसोई में रोटी नही पका पाएगी। उसे बगला चाहिए, कार चाहिए, नौकर चाहिए। उसे सड़क छाप धादमी नहीं चाहिए"" मैं सडक छाप प्रादमो हूं.. मैं एकदम से फटीचर भादमी हूँ। मैंने अपना अन्तिम निर्णय रेणु को सुना दिया मेरे जीवन के सिद्धान्त और जीवन का लक्ष्य कुछ और है"। मैं उसकी जिन्दगी से हट जाऊंगा, में उसकी जिन्दगी से जा रहा हूं। अन्यया भी पार्टी के हैड माफिस से मेरा बुलावा आया है। कल एक पत्र रेणु को लिखूगा। अलविदा रेणु :: मैं जा रहा हूं."हो सके तो मुझे माफ कर देना। -प्रशान्त यही कहानी का अन्त है--आगे डायरी में पार्टी की बातें हैं, जिन्दगी के संघर्ष की बातें हैं। कला और साधना की बातें हैं...रेणु का कही नाम नहीं है। पारो ने एक गहरी सांस खींची। उठकर मटके में से पानी निकालकर पूरा गिलास एक सांस में चढ़ा गई । बहुत रात हो गई थी। सगर नहीं पाया । प्रशान्त भी नहीं लौटा। ६ सगर पेशी पर भोपाल गया था। पेशी के बाद ही बाटू से भेंट हो गई । उसे इसी बात का डर था। सगर वाटू से डरने लगा है । बाद ही ने सबसे पहले गुरुमन्त्र दिया था। भीड़-भरे प्लेटफार्म पर, रेलवे के टिकटघरों की लम्बी कतारों में, मेने की बड़ी-बड़ी भीड़ों में उसने बाटू के ही साथ जेबें काटी थी--फिर चलती हुई रेलगाड़ी के डिब्बों से मुसाफिरों का सामान चुराया था। बाद ही जीवन में पहली बार उसे ।
के कोठे पर ले गया वाटू ने ही उसे शराब पीना सिखाया था। नपुर में नगमा जान के कोठे पर जव शवनम से उसकी पहली कात हुई, उस दिन भी वाटू उसके साथ था। बाटू ही उस शाम उस कोठे पर ले गया था इसीलिए वह बाटू से डरने लगा है। उस शाम से ही उसकी जिन्दगी में वह खतरनाक मोड़ पाया था। बनम संसार की सामान्य वेश्याओं की भांति नहीं थी। वह डेरे ले कलाकार के रूप में कोठे पर बैठती थी। दूर-दूर से बड़े-बड़े धनाढ्य व्यक्ति उसका मुजरा सुनने बुरहानपुर आते थे । सगर उस दिन कुछ उदास था- जब कभी उसे अपने घर, खानदार या गांव की याद आती है, वह उदास हो जाता है । उसे पता है जिस रास्ते पर वह आगे बढ़ा है वह ठीक नहीं है । जव-जब वह चोरी करता है उसका मन उसे धिक्कारता है। कभी-कभी मन विद्रोह करता है..."अब वह चोरी नहीं करेगा।' फिर वाटू उस्ताद आते हैं-गंग के लोग आते हैं, उसे समझा बुझाकर ले जाते हैं। कभी-कभी उसे अबूझी वेदना सालने लगती है, एक अदृश्य उन्माद उस पर हावी हो जाता है-वह लम्बी-बम्बी यात्राओं पर निकल जाता है। उस शाम भी वह बहुत उदास था। वाटू उसे शवनम का मुजरा सुनाने को ले गया था। उसे लगा कि शवनम बुझी हुई शमां का धुन है, उसकी बोलती हुई आंखें, लगता था अभी रो पड़ेंगी। आवाज व सांज हजारों समन्दरों की गहराई लिए हुए था। जल से भरे हुए वादव को जब होले से पुरवा धकेल देती है तब रिमझिम फुहार धरती भिगो देती है और घरती से उठी सौंधी खुशबू सबका मन मोह लेती शवनम महफिल में उसी अन्दाज से आई -सबके दिलों में छींटे प3 एक खुशबू ने सभी को पागल बना दिया। शबनम घुटना ते वैठी...सगर को लगा सांध्यनगगन का सप्त रंगी वादल पर्वत की पर एक घड़ी विश्राम करने को ठहर गया है। सारंगी के स्वर लगे--तवले पर थाप पड़ी, शवनम ने अलाप ली, सगर को लग के ताल वाले दलदल को वासन्ती हवा ने छेड़ा है-एक संगीत - गया है, चल दल के चिकने पात झर रहे हैं। शबनम ने पहली बार एक गीत गाया था—फिर उमने और भी जाने क्या-क्या गाया था। सगर येमुघ सा मुनता रहा । संगीत समाप्त हुमा, सगर की तन्द्रा टूटी। वह पावनम से मिलने को आतुर पा"वाटू ने कोशिश भी की थी. लेकिन बहुत मुश्किल था। सगर को लगा शायद बहुत पैसा चाहिए उससे मिलने के लिए"| फिर दौलत कमाने का भूत सवार हो गया सगर के सिर पर । नये सिरे से जमे कोई व्यापारी प्राना व्यापार जमाता है-मे ही सगर ने योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू कर दिया। उसने बहे गंग में शामिल होकर बड़ा काम सीख लिया। मालगाडियों के पहियो मे बाल' बेरिंग चुराने दाला सगर पूरी की पूरी वैगन काटने लगा। उमे रुपया चाहिए या। दो-तीन दिन काम न करे तो हाथ-पाव फडकने लगते हैं । एक उन्माद उने घेर लेता है, मन मे एक तूफान-सा उठता है और वह रेलवे यार्ड को पोर भागता है । चलती हुई मालगाडियों के नीचे लटक जाता है। पारो की आवाज उसे सुनाई देती है-भया वापस मा जामो। तभी चिलमन के पीछे गवनम की तस्वीर डोल जाती है- उसकी पावो में एक इशारा है, वह शायद सगर को मूक निमन्त्रण देती है। सगर भी उससे मिलना चाहता है, यही सोचकर उसमे फुर्ती पा जाती है, उसके हाथ-पाव चुम्त हो जाते हैं, औजार काम करने लगते हैं, वंगन का लोहा कटने लगता है, माल टपकने लगता है । सगर का धंधा चल निकला । रुपयों का ढेर लगने लगा। वन्द दरवाजे युलने लगे... शबनम के कोठे पर उसका इन्तजार होने लगा-दावनम कुछ ही दिनों मे सगर को शत्रो बन गई।-सगर ने समझ लिया-दुनिया में दौलत बड़ी चीज है..." उसे वे दिन याद हैं जब वह सागर से फरार होकर भागा था। उस जिंदगी को मारी शामे झुग्गी-झोंपड़ों और फुटपाथों पर बिताई थी. उसके पुराने संगी माथी साज भी वही पड़े हैं । उनका दर्द मान भी उतना ही जवान है- -ग्राज भी वह रोटी के लिए उतने ही मोहताज हैं, उनको याद मगर को उस मोर ले जाती है। वह उनका मसीहा बनकर जाता है । वह उन पर दोनो हाथो से रुपया लुटाता है। अभी उन झोपड़ियों में अपनी रात काट देता है। उनके स्वर में स्वर मिला र गाता है. उसे ये सब अच्छा लगता है। उसे मुर्दो की यह वस्ती पच्छी लगती है। उसने कुछ मुर्दो से दोस्ती पाल रखी है। जब-जब मन भटकता है वह शबनम से मिलने बुरहानपुर की ओर भागता है । वाटू ने सारी रात रेलवे लाइन के किनारे वाली झुग्गियों में बिताई थी। वह जानता था-रमुग्रा सगर का दोस्त था, वह कई दिनों से बीमार था। सगर की याद वरावर करता रहा। शाम उसने वहुत ताड़ी पी-शायद जान-बूझकर उसने मौत को दावत दी थी। रमुना ताड़ी पीते-पीते चल वसा"। सुबह मुर्दी की वस्ती में उसके कफन-दफन की बात चलने लगी । वाटु को पता था-याज सगर की पेशी है, वह कत्रहरी पाएगा। वाटू सीधा कचहरी की ओर भागा दुर्भाग्यदश सगर उसे लगभग तीन बजे टकराया। रमुया की मौत का समाचार सुनकर बाटू के साय सगर झुग्गी-वस्ती की ओर भागा-लेकिन तब तक सब कुछ समाप्त हो चुका था। रमुपा का पार्थिव शरीर अग्नि में जलक धूल में मिल चुका था। सगर ने उस धूल को माथे से लगाया, बिल बिलखकर रोया अपने दोस्त की याद में...। शाम भर वाटू केस मटकता रहा और शराब पीता रहा. वह इस जिदगी से थकने लगा इमलिए बाटू को देखकर डर जाता है । वह जानता था बाटू गम करने के लिए उसे किसी नई जगह ले जाएगा लेकिन सगर को देखकर वाटू का साहस नहीं हुआ। उसने सगर के सामने प्रस्ता रखा। सगर के ही अनुरोध पर वाटू ने उसे अकेला छोड़ दिय भटकता-मटकता सगर रेलवे स्टेशन जा पहुंचा। उसे एक वा शब्बो की आवाज सुनाई दी। शब्बो को उसका इन्तजार होग दिन ने नहीं गया है वह । उसे बुरहानपुर जाना होगा, शब्बो है... पारो भी उसका इन्तजार कर रही होगी, फिर उसे कंद फिर पाबन्दियां लगाएगी यह सब कुछ उससे नहीं होगा। पागल बना रखा था.. उसे कोई नहीं रोक सकता है। व जाएगा...1 ६१ - ट्रन मे उसे वर्थ मिल गई लेकिन नीद नहीं आई। होशंगाबाद, हरदा, इटारसी स्टेशन निकल गए। रात ढलती रही। पंजाब मेल भागता रहा, सगर जागता रहा-रमुना उसका दोस्त था। रमुपा को पहली मुलाकात, रेलवे लाइन के किनारे बीन का जादू भरा स्वर, उसकी मुफलिसी, उसकी दोस्ती, उसका प्यार, उसके जीवन का दर्शन, सब कुछ सगर को याद आता रहा ।-कितनी बार वह रमुआ के कंधे पर सिर रखकर रोया था। कितनी रातें उसने रमुना के झोंपड़े में गुजारी थी। दूर-दूर तक बसी उन सुनसान बस्तियों के अंधेरे में सगर का मन भट- कता रहा। ताड़ीघर में ताड़ी पीते-पीने रमुना चल बसा. "उसका कोई घर-बार नहीं, कोई परिवार नही, अकेला रमुना किसके लिए जीता ? क्यो जीता ? किसको उसकी जरूरत थी? वस्तीवालों को, समाज को, देश को? किसको उसकी जरूरत थी? उसका जीना क्या अर्थ रखता है ? सगर मरेगा तो पारो रोएगी, शायद शबनम भी रोए ? हम सब क्यों जिंदा हैं ? इतना बडा देश, इतनी ग्राबादी, इतनी भुखमरी, कीडे- मकोडों की तरह बिलखते हुए इंसान, भूखे नगे इसान । उनकी जिंदगी का क्या मकसद है ? सगर सोचने लगा-? जब-जब यह सवाल उठता है वह उलझता चला जाता है। इस बार वह पडित से यह प्रश्न करेगा। ऐसे कितने ही सवाल उसे परेशान करते हैं । उसे कोई ऐसा पादमी चाहिए जो उसके सवालो का उत्तर दे।...रात ढलती रही, सगर का मन दूर-दूर तक भटकता रहा। बुरहानपुर पहुचते-पहुंचते उसके प्राण निचुड़ गए। शराब के नशे का उतार उसके शरीर के अंग- अग को तोड रहा था। मन की उदासी ने उसकी नस-नस को मसल डाला था। रेंगता-लडखड़ाता बहुत परेशान-सा वह शब्बो के कोठे तक पहुचा। शब्बो उसके सामने परेशान-सी खडी थी। उसने सगर को नशे में देखा था । उसने सगर को परेशान भी देखा था लेकिन इतना टूटा हुमा कभी नहीं देखा था। शब्बो ने मसनद के सहारे सगर को विठाया, ठडा पानी लेक पाई। सगर ने पानी पिया और एक गहरी सांस ली।
बैठी। - "क्या हुआ है तुम्हें ? शब्बो "मन उदास है।" "वयों ? उदास तो पहले भी आपको देखा है लेकिन इस हाल में नहीं।" शब्बो ने उंगलियों से सगर के उलझे हुए वालों को सहलाते हुए. कहा । सगर ने शबो को उदास होते देखकर कहा-"प्रायो, हम कुछ. और शराव पिएं। अभी रात वाकी है, इन सवालों में कहां तक उलझेगे? नाज रमुना मरा है, कल वाटू मरेगा, परसों में मर जाऊंगा।" "हाय अल्ला-ये तुम्हें क्या हुआ है आज ! रमुआ कौन था ? कैसे मर गया ?" शब्बो ने घबराकर पूछा "रमुना मेरा गरीब दोस्त था । वह मुझे प्यार करता था। उसकों गरीवी और तन्हाई ने मिलकर मार डाला । लगता है मैं भी थक गयां हूं। जिंदगी का सफर मुश्किल लगता है..." पलकें झपकाते हुए बुदबुदाते स्वर में सगर ने कहा। शब्बो ने इतना ज्यादा उदाम सगर को कभी भी नहीं देखा था । खिड़की के बाहर बूढ़ा और मरियल चांद हांफ रहा था । शब्बो ने सगर का सिर अपनी गोद में रख लिया, उसे बच्चों की भांति दुलारते हुए वोली-सो जानो सगर, थोड़ी-सी रात चाकी है, तुम थके हुए हो, तुमको शराब नहीं पीने दूंगी।" "पारी भी यही कहती है। शराब नहीं पीऊंगा तो नींद नहीं आएगी।" "तुमको एक वेहद हसीन गजल सुनाती हूं। मैं दिलरुवा छेडूंगी। तुमको नींद आ जाएगी।" "नहीं शब्बो, यह सही है कि तुम्हारी गजल मुझे अच्छी लगती है। तुम्हारी महफिल के लिए बेताब रहता हूं। लेकिन आज का यह माहौल ऐसा ही रहने दो-बस तुम मेरे पास रहो।" "लगता है जाने वाला आपका बहुत अजीज दोस्त था !" "हर मुफलिस मेरा अजीज है, हर मजबूर इंसान मेरा हमसफर है । शायद तुमसे भी दोस्ती हो गई है। तुम क्या अपनी मर्जी से इस कोठे पर आई थी ?"
"नही सगर, बहुत मजबूरी में पाई थी-बहुत लम्बी कहानी है।. कभी कोई ऐसा नही मिला जो मेरे दिल का हाल पूछता। पाज तुमने यह बात क्यों उठाई ?" "पहली बार जब तुमसे मिला था तब लगा था तुम कोठों के लिए नहीं बनी थी। तुम्हें शायद परिस्थितियों ने वैश्या बना दिया जैसे मुझे वक्त ने चोर और कातिल बना दिया। बाप का साया उठा, माने माथ छोड़ दिया। अब एक तरफ पारो है और दूसरी तरफ तुम । पारो मेरी मस- लियत पहचान गई है-इसलिए उसकी नजरों से बचना हूं-दूर भागता हुया फिर रहा हूं उससे । खुद की नजरों में गिर गया हूं इसलिए अव किसी काम में मन ही नहीं लगता । जहा अपने जैसे लोग मिल जाते हैं वहां वक्त कट जाता है। पात्रो, बहुत नजदीक से देख लिया जिन्दगी को । सच, बहुत घिनौनी चीज है."। तुम जानती हो अपनी शाम शहर से दूर सानाबदोशों की बस्तियों में कटती है। वह बस्ती जहां हर इन्सान टूटा हुमा है. हर जिन्दगी घायल है, रमुपा की मौत पहली मौत नहीं है, वहा तो हर रोज हर घड़ी मौत का साया मंडराता है। रमुपा की झुग्गी में मुझे अच्छा लगता था, इसलिए रात में अक्सर उसके साथ विताता था। वहा प्यारा प्रादमी था। बचपन मे अनाय । अनाथालय में परवरिश पाया हुमा इन्सान । वचपन से ढोल मोर बासुरी बजाकर अनाथालय के लिए शहरों माहरों, मुहल्लों-मुहल्लों में भीष मागता रहा । सितारों का खेल समझती हो ?" "क्या होता है सगर सितारों का मेल?" "पडित लोग गृह-नक्षत्रो की बात करते हैं । मैं भी जाति का ब्राह्मण हूं। लेकिन वचपन से अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जो है, अपने को जो रंग भाते हैं उनसे अपनी भोर रंगता हू, अपनी मंध्यारों को सजाता हूं। इसीलिए ग्रह नक्षत्रों के मेल को सितारों का सेल कहता हूं। कुछ अपर जरूर होता है सितारो का । रमुपा को गिमा मनायालय वाली थी-जिन्दगी-मर अनायालय के लिए भीव मागता रहा । लेकिन मन कलाकार का पाया था। दासुरी मन से बजाए तो पत्थर का दिल पिघलने परों वाली वीन झील के किनारे बैठकर बजाता था, लहरें नाचने थीं, हवाएं झूमने लगती थीं, डूबता सूरज क्षितिज पर थम जाता सके संगीत में जादू था। उसका कलाकार मन नशा मांगता था । भी सामान्य उसे अच्छा नहीं लगता था-मालूम नहीं कब उसे व पीने की लत लग गई । इसीलिए अनाथालय वालों ने उसे निकाल । शादी-ब्याह में वाजा बजाने वालों के साथ वह बाजे बजाने लगा। राब के नशे में धुत होकर बाजे वजाना उसको अच्छा लगता था । उस त रमुना किसी बारात के साथ बैंड में गया था। उसके साज की आवाज पर बाराती लोग नाचे थे, उसे खूब शराब पिलाई थी, क्लब के पीछे रेलवे लाइन के किनारे से बांसुरी की पागल बना देने वाली धुन ने मुझे उस ओर आकर्षित किया। सिर पटरियों पर टेके और गिट्टमों पर पड़ा रमुना बांसुरी बजा रहा था-मैंने उसे पहली बार उस दिन' देखा था। मैं चौंक पड़ा-कैसा वेहूदा आदमी है--सारी दुनिया छोड़ कर यहां पड़ा है। फिर मन में विचार उठा शायद आत्महत्या करने के इरादे से यहां पड़ा हो ? इसीलिए चौंककर पूछा-क्यों भाई, क्या मरने का इरादा है क्या ? मेरी बात उसने नहीं सुनी। मैंने फिर उसे झकझोर कर कहा-'ट्रेन आने वाली है-मरना कटना है क्या ?' वह बेतुकी हंसी का ठहाका लगाकर उठकर बैठ गया और हंसते हंसते वोला-कितने बोझिल पहिए इस सीने के ऊपर से निकल गए मैं कभी नहीं मरता। मुर्दा लोगों को और कोई क्या मारेगा ? रमू मेरी विरादरी का था, मेरी तरह अनाथ और बेघरवार । वस इसी हमारी पटरी बैठ गई। रमुना मुझे मुर्दो की बस्ती में ले गया । लाश की अपनी एक अलग वदवू थी। हर टूटी हुई जिन्दगी की एक कहानी, अपना एक दर्शन होता है । शंकर सट्टा खेलते-खेल में डूबता गया, मेहनत-मजदूरी के पैसे सट्टे में, उधार लिए हु सट्टे की भेंट । बदन के कपड़े तार-तार हो गए, कर्ज में चोटी गया-फिर पागल हो गया। दिनभर वकवास-आज पंजाब दुग्गी पर पांच रुपया, सत्ते वाला तबाह.."। उसकी भी वह थी। दुनिया में कोई प्यार करने वाला नहीं, किसके लिए कमाए ! किसके लिए जिए? दांव लगाने में सुख मिलता था। एक नया था जुए का-नशे का सुम्प-उसको अपने मुख को तलाश थी...। रममा को अपने सुख की तलाश थी। तन मन प्रात्मा को वेमुघ कर देने वाला नशा दाराव का नशा और संगीत का नशा..." "अपने प्रामपास इतनी गरीबी है, इतने दुःख हैं-मैंने तो मानी कोठे वालियां और उनकी जिन्दगी के नरक देखे हैं वस ।" "मैंने इतनी कम उम्र में नरकों के रेगिस्तान देसे हैं गब्बो। इस रेगिस्तान को पार करने वाला हर मुमाफिर मेरा भाई है-मैं जो रोटी कमाता हूं उममै उनका भी हिस्सा है और तुम्हारा भी।" "मुझे तुम्हारे रुपयों की जरूरत नहीं है सगर । मुझे तो इम नक से ले चलो।-देखो सितारों की चमक धीमी पड़ चली है--रात मांचल ममेटने लगी है । तुम बहुत थके और परेशान हो । मब तुम सो जाम्रो।" सगर ने प्रांमें मूंद लीं । शन्यो ने झुककर अपने सदं प्रोठ सगर के माये से छुमा दिए...। सगर यह सोचते-मोचते सो गया कि प्यार करना नारी का जन्मजात अधिकार है वह नारी वेश्या हो, अयदा देव कन्या! "नई दिल्ली में गुप्तचर विभाग ने एक अड्डे का पता लगाया है और दो व्यक्तियों को गिरतार किया है। हजारों पोस्टर पर्चे और कार्टून जप्त किए गए हैं। पोस्टर और कार्टून बनाने वाला कलाकार इन दो शक्तियों के माय इमी अड्डे पर एक रात पहले तक देखा गया था। उसके बाल उलझे हुए हैं, दाढी बढ़ी हुई है व ल कर का । ? दुबला-पतला पादमी है। गुप्तचर विभाग का छापा पड़ने पर वह किसी प्रकार इचकर निकलने में सफल हो गया है। सरकार ने उसको गिरफ्तार कराने वाले व्यक्ति को पांच हजार रुपये पुरस्कार में देने की घोषणा की है। उसके दोनों साथियों से पूछताछ जारी है। यह बात स्पष्ट हो गई है कि देश भर में जो क्रान्तिकारी साहित्य भेजा गया है और पोस्टर लगाए गए हैं उसके पीछे इसी दाढ़ी वाले कलाकार का हाथ है...।" नई दुनिया पढ़ते-पढ़ते पारो की आंखों के सामने अंधेरा छा गया... अखबार हाथ से छूट गया। उसका दिमाग घूमने लगा, कनपटी की नसों की सनसनाहट का स्वर पारो स्वयं सुन रही थी। दिल की बड़- कनों ने उसे पागल बना रखा था, प्रशान्त का मलिन मुख उसके नेत्रों के सम्मुख नाचने लगा। उसके पीछे पुलिस भाग रही होगी-गुप्तचर विभाग वालों ने अपना पूरा जाल फैलाया होगा? वह कभी भी गिरफ्तार हो सकता है ? वह अपने मिशन में जुटा था इसलिए इतने दिनों से गायब था । अब यदि गिरफ्तार हो गया तो पता भी नहीं चलेगा कि किस जेल में ढूंस दिया गया-सोचकर पारो की नसें सनसनाने लगीं। सगर भी कहीं समाधि लगाकर बैठा है। पारो परेशान है । सुबह यन्त्रवत् उठती है"बार-बार द्वार की ओर जाती है, हर आहट पर चौंक उठती है-शायद प्रशान्त पाए-शायद सगर पाए ? या उनका कोई सन्देश लेकर आए । सगर भी तो पुलिस के चंगुल में फिर से प्रा सकता है ?--सारा दिन निकल जाता है । भोजन बनाने की और खाने की इच्छा नहीं होती। चने का सत्तू उसे आज भी अच्छा लगता है। कभी भूख लगती है तो सत्तू खाकर पानी पी लेती है । अकेली जान के लिए कौन खाना बनाए ? दिनभर नई पुरानी मैगजीन पढ़ती है-शाम तुलसी विरवा पर दीया जलाना उसे अच्छा लगता है। पीछे छोटा-सा आंगन है । रात में अकेला घर काटने को दौड़ता है। सन्नाटा उसे बूंद- बूंद करके पीता है । दीवारों की नाचती परछाइयां उसे डराती हैं । मन को एक अज्ञात वेदना कचोटती रहती है। जब मन पके हुए फोड़े-सा दुखने लगता है तो वह कुछ न कुछ लिखने बैठ जाती है। प्रशान्त डायरी लिखता है। पारो ने भी पिछले दिनों सैकड़ों पन्नों को रंग डाला है। ।
तनहाई की तस्वीर को कितने रंगों से रंगा है उसने । दिन की धूप रात के अंधेरों को कितने नाम दिए हैं उसने । प्रशान्त की प्रतीक्षा करते. करते उसकी रग-रग दुखने लगी है। सगर का ख्याल माते हो मन प्रशान्ति से भर उठता है। फिर किसी वैगन को काट रहा हो, कहां सोता होगा, कहा रहता होगा? होटलों का साना क्या उसे महा लगता होगा? पता नहीं कर घर पाएगा? रात है कि कटने का नाम ही नहीं लेती है । पुलिम लाइन्स का गजर कितनी देर बाद बजता है...। उसने कमरे की बत्ती बन्द कर दी। भाज स्ट्रीट लाईट भी गोल थी। घर-बाहर सब तरफ अघेरा-सब तरफ सन्नाटा। उसने ग्यारह के घण्टे सुने । फिर लगा सदियां गुजर गई। वक्त पम गया है-बारह कर बनेंगे ? अपनी कापती हुई उंगलियों को टकराहट उसे सुनाई देती है। नीरवता में कोई स्वर गूजता है, शायद मन का कोलाहल है । मन को अनजान साये छूते है । दर्द के साये, उदासी का घुमा-क्या यही जीवन है ? यदि-इस जीवन कहा जाए तो मौत की तस्वीर कैसी होगी? दर्द भरी तनहाई कब खत्म होगी ? बारह कब बजगे? मारमा पर जैसे कोहरे को एक धनी पर्त छाती जा रही है-सब पोर धुधलका शेष है। इस धुंध मे सुबह पोर शाप सो गए हैं, पता नहीं यह प्रात्मा का कोहरा है या रात का धुमा। कभी लगता है रात सुलगने लगी है-उसको सामो से धुमां उठा है, उसकी सौंधी-सौंधी खुशबू ने मन पगलाया है। आममान इतना भ्रामक क्यो हैं-~ऐसा क्यों लगता है कि धुएं के ये बादल विपर जाएगे-इन्द्रधनुषी मासमान मे फिर नूर बरसेगा?-- पट-गद-खट !ये किसकी अावाज है ? द्वार पर कौन है ? सट-खट-सट ! द्वार पर लगता है वाकई किसीने दस्तक दी है । "कौन है दरवाजे पर?" 5-" एक मावाज कांपती हुई। ये कौन मुझे डराना चाहता है ? मैं नहीं डरती-नहीं-नही पारो नही डरती । मैं दरवाजा खोलूगी, कोई मुझे डरा नही मकता। पारो का मन पता है- हाय- पांच भी कापते है। वह दरवाजा सोलही है-मामन अवकार में एक आकृति सड़ी है-दुबली-पतलो प्राकृति-अंधेरे का तिवाम मोहे.. वाहर गली सुनसान है-एकदम अंधेरी। अन्दर भी अधरा है।।
कुल अंधेरे कमरे में थी। पारो ने कांपते हुए स्वर में पूछा- कोन?" "पारो मैं हूं प्रशान्त ।" प्रशान्त आगे बढ़ता है। अंधकार में ये किसने वाहें फैलाई हैं ? वह किसकी बांहो में है ? अरे, निढाल-सा यह किसका बदन उसके बदन से सिमटा हुआ उसके कदमों में गिर जाना चाहता है ? प्रशान्त की निष्प्राण बांहों में बिजली दौड़ गई। उसने ढहते हुए शरीर को संभाल लिया है.. उसके बाजुओं में ताकत आ गई है। उसके वाहों के घेरे में अंधेरा नहीं है । पहले वह खुद पारो की बांहों में था। पारो उससे लिपटकर ढहती हुई दीवार-. सी गिरने लगी। प्रशान्त ने उसे संभाला, सहारा दिया। अब पारो उसकी बांहों में थी। अंधेरे में वह उसके दिल की धड़कनों को सुन रहा था । पारो वेसुध थी जैसे उसने कोई गहरा नशा किया हो.. दर्द का नशा कितना जहरीला होता है । प्रशान्त ने पारो की दुखती रगों के दर्द को पहचानने की चेष्टा की और वुदबुदाया-"पारो, तुम्हें क्या हुआ है ?" पारो पता नहीं किस संसार में थी. वह कहां है, क्या बोल रही से इस बात का होश नहीं है। प्रशान्त ने इस बार कुछ जोर देकर कहा-"पारो !" "हां 5 ग्रां...मैं बिल्कुल नहीं डरती। यह अंधकार मुझे पी सकता। यह तनहाई मुझे निगल नहीं सकती। कौन कहता है मैं जाऊंगी.. मैं प्रशान्त की बाहों में हूं, मैं अंधकार की बांहों में नहीं पारो की वांहें कसने लगीं. अकड़ने लगीं। प्रशान्त की पकड़ ढील और अचानक धम्म से धरती पर लुढ़क गया पारो का शरीर...। घबरा गया...वह घरती टटोलकर पारो के पास बैठा...पारो उसकी गोद में था.. पारो वास्तव में वेसुध है."वेहोश.."प्रशा संभलकर उठा। उसने बत्ती जलाई...ठंडा पानी मटके से नि पारो को संभालने की चेष्टा की... मुंह पर पानी के छींटे । पानी उसके मुंह में डाला.. अखवार से उसके मुंह पर हवा पसीने से सराबोर थी...।
। पोड़ी देर में पारो को होश माने लगा, उसके मद्धं निमीलित नेत्रों पर प्रशान्त ने उगलियां फेरी.. उसके वालों को सहलाया मोर बहुत ही प्यार से पुकारा-पारो! इस बार पारो का स्वर फूटा-"जी" | उसने नेत्र खोले, प्रशान्त को देखा--एक सदं मुस्कान उसके घरों पर एक क्षण को थिरको और पुन: नेत्र मूंद लिए । प्रशान्त उसका माया दवाता रहा-अपनी बांहों का सहारा देकर थोडा-सा उठाया और ठंडे पानी का गिलास उसके मुह से लगाकर बोला-"पानी पी लो। अभी मन अच्छा हो जाएगा।" पारो ने एक सास मे पानी का गिलास चढा लिया। पारो को होश आने लगा-उसे याद भी पाने लगा कि वह बेहोश होकर प्रशान्त की बांहों में गिरी थी-उसे यह भी समझ मे माने लगा कि वह अभी भी प्रशान्त को बाहों में थी। उसे अजीब-सा लगा- अच्छा भी लगा दो क्षण का सुख । वह हौले से उठी और दीवार के सहारे बैठ गई “उसने बारह घंटों को पावाज सुनी । मलसाए और पके हुए स्वर में उसने पूछा- कब पाए ?" "बस अभी-मी..." "इतनी देर क्यों कर दी."?" कहते-कहते पारो रो पड़ो। प्रशान्त ने कघे पर यपकाते हुए कहा--"रो मत पारो तुम जानती हो पारो मेरा कहीं माना-जाना मेरे वा की बात नहीं है, मेरा काम ही ऐसा है ?" पारो और अधिक सिसकने लगी-"मुझे अकेले बहुत डर लगता है। अब मैं अकेली रही तो बीमार पड़ जाऊंगी।" "तुम तो अभी भी बीमार हो, मूरत देखी है-कितनी दुबली हो गई हो। पारो को याद प्राया-उसने कितने दिनों से माईना ही नहीं देखा था। दुबला तो होना ही था। एक दिन भी भरपेट अन्न नहीं खाया । उसे ख्याल आया प्रशान्त भी तो भूखा होगा? उसने कहाँ पाना खाया होगा? पारो उठी। उसने थाली में चावल निकाले -"तुम हाथ-मुंह धो लो-मैं अभी गैस पर जीरे से चावल छोंक "मैं नहीं खाऊंगा, भूख नहीं है।" "मैं खाऊंगी-बहुत भूख लगी है।" पारो ने जीरे के नमकीन चावल छोंक दिए। ठंडे पानी से मुंह- हाथ धोया। प्रशांत पारो की स्टडी टेबल पर बैठ गया। पारो ने चावल की प्लेट उसी टेबल पर रख दी। प्रशान्त ने कहा-"तुम भी मेरे साथ सायो?" "खाऊंगीन !" पारो प्रशान्त के पास चेयर डालकर बैठ गई। दोनों चुपचाप खाने 'लगे। प्रशान्त ने पारो की ओर देखा और मुस्कुरा दिया। पारो के मन में सैकड़ों बिजलियां कौंध गई। पारो स्वयं को रोक नहीं सकी और बोली-"याज भी तुम नहीं पाते तो सुबह तक मेरी लाश मिलती।" "सगर कहां है ?" "वह कई दिनों से गायब है।" "कहां रहता है ?" "चोर-उचक्कों के साथ उकैतियां डालने लगा है।" "तू मुझे उसका पता दे । मैं उसे वापस घर लाऊंगा। उसे राह लाना मेरा काम है ।" प्रशान्त और पारो ने भोजन समाप्त करके हाथ-मुंह धोया। बजने को था। पारो ने कहा-"दिनभर के हारे-थके हो, प्राय पाराम से भैया के कमरे में सो जायो।" "यह कैसे सम्भव है ?" "क्यों ?" "तुम्हें बता चुका हूं न, मैं धरती पर ही सोऊंगा, पर शायद मुझे नींद भी न आए।" "अच्छा, गद्दा लगा देती हूं।" पारो ने भैया के कमरे में पास दरी बिछाकर गद्दा लगा दिया, सफेद चादर बिछा दी 1 लेट गया। उसे लगा पारो अपने कमरे में जाकर सो .
लेकिन नहीं। पारो कुछ ही क्षणों में हाप में तेल की शीशी लेकर कमरे में प्रविष्ट हुई। वह नि:संकोच भाव से प्रशान्त के सिरहाने बैठ. गई मोर बोली-"सानो तुम्हारे सिर में तेल लगा दूं। कितना मूम्बा मिर है। पता नहीं कितने वर्षों से तेल नहीं डाला।" प्रशान्त चुप रहा.1. पारो ने हथेली पर तेल निकालकर प्रशान्त के ताल पर टोकना शुरू कर दिया। सिर में खूब तेल ठोककर वह बालो को उंगलियों से सहलाने लगी। प्रशान्त को कितना मुख मिला, जीवन में पहली बार स्नेहिल स्पर्ग। उसको प्रात्मा रस-सिक्त हो उठी मारमा का स्थर फूटा- "मोह इतना मुम्न है तुम्हारे स्पर्ग में...कहां छुपाकर रमा था अपना यह प्यार?" पारो लजा गई, एक मधुर मुस्कान उसके प्रघरों पर थिरक गई। ...उमके मोंठ कापे नेत्र म्वतः मुंद गए । पूजा भाव से उसने कहा--- "मन की गहराइयों में दवा हुमा प्यार माज स्वतः मुगर हो उठा ।। गहरे बहुत गहरे, कभी मन की दीवार पर प्यार को कोमन नन्ही उग- लियों ने तुम्हारा नाम लिख दिया पा समय का भ्रामकः कोहरा उन दीवारों पर छाया हुआ था। इस बार मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करती रही। तुम नहीं पाए तो एकांत ने मुझे बहुत समय दिया। मुझे लगा कोहरा हट रहा है तुम्हारा नाम शोलो की भांति दहकने लगा. मैं पगली हो उठी तुम्हारी प्रतीक्षा में प्रधकार में कितनी बार बाहें पसारी मैंने... थो मेरी बाहे तुम्हारे लिए “तुम माज भी नहीं पाते तो जाने क्या होता ?" कहते-कहते पारो रो पड़ी। प्रशान्त ने अपनी होली मे उसके मांसू पोंछते हुए कहा-"मेरे मिसन में मेरा साथ दो। रेगू की भांति पीछे नहीं हटना-मुझे एक साथी को मापश्यकता है। तुम्हारा प्यार मेरो प्रेरणा बनेगा।" "रेणु जो अब कहां हैं ?" "तुम क्या जानती हो उन्हें ।" कितनी प्रातुर "कैसे! "बहुत अकेली थी इस वार, तुम्हारी डायरी चोरी से पदी णुजी का परिचय प्राप्त हुआ। अब कहां हैं रेणुजी। आप कब से मिले ?" पारो ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की। प्रशान्त के अधरों पर घृणा उभर आई। फिर स्वयं को संभालते ए प्रशान्त बोला-"शायद मैं इस खेल को नहीं जानता । मैं प्यार को मनुभूतियों के स्तर पर सहलाता रहा। अब लगता है रेणु को आग का खेल पसन्द था। उस खेल की मैंने कल्पना भी नहीं की थी जो रेणु ने डाक्टर गौतम के साथ खेला।" "कौन डाक्टर गौतम ? फिर क्या हुआ ?" पारो विस्फारित नेत्रों से प्रशान्त की ओर देख रही थी। प्रशान्त भी चुप न रह सका-"मैं सड़क छाप आदमी हूं न, शायद इसीलिए रेणुजी की नजरों में गिर गया। नाटक उन्होंने बहुत किया था-मैंने फैसला कर लिया था कि अव कभी रेणु से नहीं मिलूंगा। रेणुजी यह ट्रेजडी सहन नहीं कर सकी। बीमार पड़ गई। डाक्टर गौतम उनका इलाज कर रहे थे। बीवी-बच्चों वाला वेचारा डाक्टर रेणुजी का इलाज करते-करते उनका मरीज बन गया । मिसेज गौतम को मैं जानता हूं । जब उन्होंने मुझे बतलाया तो विश्वास करना ही पड़ा। उन्होंने अपनी आंखों से रेणु और डाक्टर गौतम को बैड रूम में देखा है। उन दृश्यों का वर्णन मिसेज गौतम ने किया है.. परवंटेड .."बीस्ट.. उनका भी कितना बड़ा स्केन्डल है शहर का ?" "छोड़िए भी, भूल जाइए उस कहानी को !" पारो ने निश्वा छोड़ते हुए कहा। पारो, रेणु मेरे कल्पना-लोक की देवी थी...पहाड़ों की रानी ...भरी बरसात में जब यूनिवर्सिटी वाली ढलान पर सूर्योदय के रेणुजी को सतरंगी छतरी लगाए उतरते हुए देखा तो मेरे मन ने -हियर कम्स दि क्वीन आफ दि हिल्स (पहाड़ों की रानी चली रही है) वासना के स्फुलिंगों को पहचानने की शक्ति मुझमें थी।" "छोड़ो भी प्रशान्त, रेणु एक नारी है, किन कुण्ठाओं से न मन का शैतान कब जाग गया हो, कैसे उस आग के दरिया ..
१०३ होगी हमे क्या पता ?" पारो ने यह बात इतने सहज भाव से कही कि प्रशान्त आश्चर्य में डूबा उसकी पोर देखता रह गया । पारो ने चौंककर पूछ लिया-"मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?" "नहीं, गलत कुछ भी नहीं है.. मैं यह सोच रहा था कि गांव की सीधी-साधी बालिका कितनी चतुर हो गई"दुनिया-भर की किताबें पढकर कितना कुछ सीख गई है।" "इतने वर्ष हो गए मुझे गांव छोड़े हुए। अब तो मैं विश्वविद्यालय की छात्रा हूं-माप अभी भी मुझे गांव के ताल के किनारे पत्थरों से इमलियां झुराने वाली पारो मानकर चलते हैं।" "हां पारो, मैं तुम्हें आज भी उतना ही अबोध मोर निरीह पाता हूं." "उतनी अबोध तो नहीं हूं। मैं बिना किसी संकोच के आज यह स्वीकार करती रही हूं-तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पाने के लिए तड़पती रही हूं। आज मंघकार की आड़ मे तुम्हे अपनी बांहों में एक क्षण को पाकर मेरी युग-युग की प्यास बुझी है । नारी के लिए पुरुष का पहला स्पर्श उसके जीवन को चिर स्मरणीय घटना और एक बड़ी पूजी होती है । प्राग के खेल की कल्पना कभी मन मे नही उठी-लेकिन तुम्हारे एक मधुर स्पर्श के लिए मैं तरस रही थी। यह सच है प्रशान्त ।" पापाण मे भी छिद्र होते हैं। प्रशान्त पाषाण भी नही पा किसी अन्तरणा से प्रशान्त के अघर पारो के माथे पर झुक माए-दो क्षण को वह भूल गया कि किस संसार मे था-प्रशान्त संयत भाव से उठा- उसने पारो के कपोलों को थपकी देकर कहा-~~-बहुत रात हो गई है, अब सो जाप्रो-मुझे सुवह बहुत काम है।" पारो ने जितनी कभी कल्पना भी नहीं की थी वह उसे अनायास मिल चुका था-वह अत्यन्त ही तुष्ट भाव से उठी। भरपूर अंगड़ाई लेकर उसने कहा-"गुड नाइट।" और पारो अपने वंडरूम में चली गई। प्रशान्त का कोई साथी उसके नाम एक गोपनीय पत्र पारो को दे गया था। प्रशान्त दो दिन के लिए भोपाल गया था। वापस पाने पर पारो ने उसका पन उसको सौंप दिया। पत्र प्रशान्त ने तत्काल खोलकर पढ़ा । शायद कुछ अप्रत्याशित घटा है। प्रशान्त किन्हीं विचारों में डूब गया है-शायद कोई समस्या है। पारो ने प्रशान्त के मौन को भंग किया: - "क्या समाचार है ? कुछ त्रस्त दिखाई दे रहे हो ?" "पुलिस को यह ज्ञात हो गया है कि मैं सागर पहुंचा हूं- इस बात की भी सूचना उन्हें है कि सागर इन दिनों मेरा गढ़ है, मेरा कार्यक्षेत्र । किसी भी दिन तुम्हारे घर पर छापा मारा जा सकता है । मेरे साथ तुम लोगों को भी पुलिस परेशान करेगी।" "मुझे इसका कोई भय नहीं है-पापके साय मैं भी जेल जाने को तैयार हूं।" "प्रश्न जेल जाने का नहीं है-~-प्रश्न है उस महत्त्वपूर्ण कार्य का जो इस क्षेत्र में मुझे करना है। उसके लिए मैं चाहता हूं कि मेरी गिरफ्तारी के बाद तुम इस खेल में पूरी तरह से कूद पड़ो। क्या मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकता?" "प्रशान्त मुझे चुनौती मत दो, मैं तुम्हारे साथ हूं। चाहो तो मेरी परीक्षा ले लो।" पारो ने दृढ़ संकल्प के साथ कहा । "तो प्रायो, हम लोग गंभीरतापूर्वक इस चुनौती को स्वीकार करें।" प्रशान्त अत्यन्त ही संयत भाव से पारो की स्टडी टेबल पर बैठ गया । उसने अपने सामने एक कोरा कागज फैलाया और कलम हाथ में ले ली। प्रशान्त दो क्षण को मौन रहा। फिर अत्यन्त ही गंभीर स्वर में उसने फहा-"पारो यह एक युद्ध है जो हम छेड़ने जा रहे हैं । हमारे गुप्तचर विभाग ने रिपोर्ट दी है कि शीघ्र ही मध्यवर्ती चुनाव होंगे । जेल में जितने लोग ढूंसे गए हैं उन्हें छोड़ दिया जाएगा। विरोधी पार्टी का अनुमान है कि जनता शासन की नीतियों से प्रसन्न है-जनता शायद भयाक्रान्त है, उनका साथ देगी । उनका अनुमान है कि उनके विरोध में अच्छे प्रत्याशी नहीं आएंगे। जेल से छूटकर लोग घरों में बन्द हो जाएंगे। किसान उनका साथ देंगे। व्यापारी वर्ग में विरोध करने का १०५ साहस दोप नही है--शासकीय कर्मचारी विरोध की बात सोच भी नहीं सकते हैं । ममार उगते सूरज की पूजा करता है। यह नियम शाश्वत है । क्या तुम समझती हो कि यह सब कुछ सही है।" "माप स्वयं क्या सोचते हैं ?" "हम जनतन्त्रीय प्रणाली में विश्वास रखते है। विरोधी पार्टी को सशक्त बनाना चाहिए। जिन्होंने यातनाएं सही है वह कुन्दन की भाति तप चुके हैं। उन्हें कसौटी पर परखा जा चुका है। वह जेल के बाहर माकर भपने घरों को वापस नहीं जाएंगे—पार्टी का काम करेंगे। व्यापारी वर्ग उनका साथ नहीं देगा। कितना अन्याय हुआ है उनके साय, यह हम जानते हैं । भ्रष्ट अधिकारियो ने इन दिनों उन्हें बुरी तरह से निचोड़ा है। बड़े-बड़े व्यापार, संस्थानों को छापा मारने की धमकी दी गई, उन्हे कानून के शिकजे में कसने की धमकी दी गई और अन्ततः उनसे बड़ी-बड़ी धनराशियां वसूल की गई । व्यापारी वर्ग के मन में आग धधक रही है। जनता हमारे साथ है । यदि हमने निष्ठापूर्वक कार्य किया तो हम एक भयंकर विरोधी वातावरण का निर्माण करने में सफल हो सकेगे--बस तख्ता पलट जाएगा-यह चुनाव हमारे पक्ष में जाएगा।" प्रशान्त को बीच में ही रोकते हुए पारो ने कहा -"पिछले दिनों में कितनी अकेली रही हू-इस प्रश्न पर मैंने भी गर्भीरतापूर्वक विचार किया है। पीछे पलटकर देखिए, हम लोग किस मोड़ से गुजर रहे थे। देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा था-कानून-व्यवस्था भंग हो गई थी। लोगो के मन से सुरक्षा की भावना समाप्त हो गई थी-अनुशासन के नाम पर कुछ भी शेप नहीं रहा था। देश के नौजवानो और विद्यार्थियों को गुमराह किया जा रहा था, ऐसे विकट समय मे शायद सख्ती और अनुशासन से काम लेने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। योजना को कार्यान्वित करने वाली संस्था अथवा व्यक्ति गलत तो परिणाम गलत निकलता है और योजना गलत प्रतीत होती है। शायद ऐसा ही बुछ हो गया है। चन्द स्वार्थी पदलोलुप और भ्रष्ट व्यक्तियो ने एक गिरोह बना लिया और सब कुछ उल्टा हो गया ।" "नही पारो, यह विषय तुम्हारा नहीं है, तुम शायद इससे अधिक रोच सकोगी-यह सब क्यों हुआ, इसमें एक रहस्य है । इतिहास- पाल जब इस काल का इतिहास लिखेगा तब उसकी कलम को कोई नहीं पाएगा। तुम बस इतना समझ लो कि कल के दिन मैं यदि पतार हो जाऊं तो मेरी जगह तुम खड़ी हो जायो । तुम अपने हाथों वह परचम संभाल लो।"-प्रशान्त ने पारो की ओर देखते हुए तेश कहा। "तुम्हें कुछ नहीं होगा प्रशान्त, हम लोग साथ काम करेंगे।" पारो ने विश्वास दिलाया। प्रशान्त ने मन की बात कह डाली-"मेरा अन्तर्मन कुछ और 'कहता है इसलिए तुम्हें समझा दूं-तूम्हें क्या करना है, हमको इस संभावना फी माहट मिल गई थी। हमने अपनी बैठक में पूरा कार्यक्रम 'निर्धारित कर लिया था। हमारे साथी तुमसे सम्पर्क साधेंगे। तुमको गांव की ओर जाना है, हमारे हजारों वालिन्टियर गांव की ओर जाने को तैयार बैठे हैं-वह घर-घर जाएंगे, अपनी बात लोगों को समझाएंगे और उनका सहयोग मांगेंगे।तुम भी उनके साथ किसी दिशा में जानोगी। मम्भव है कभी तुम्हें भरपेट रोटी न मिले, चने चबाकर तुम्हें काम करना पड़े। चलते-चलते तुम्हारे पांव में छाले पड़ जाएं-लेकिन तुम्हें अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाना है। तुम चाहो तो अपने गांव की दिशा में जा सकती हो..." "हां प्रशान्त, मैं अपने गांव की ओर जाऊंगी। यहां से भोजपुरा- विलेनी-बहरोल-घामोनी और फिर अपने गांव...। एक बार मेरे साथ पामोनी चलो, यहां बाबा के मजार पर हम भी मिलकर प्रा करेंगे। हमारी मुराद भी पूरी होगी।" पारो के मुखमंडल की रे जीवित हो उठी-उसके नेत्रों में कोई सपना तैरने लगा-प्रशान्त विश्वास दिलाया-"हम एक दिन साथ-साथ वहां चलेंगे। काय में सगर पा जाता, यह तुम्हारा साथ दे सके तो तुम्हारा मनोव रहेगा।" "भैया जरूर आएगा। मेरा मन कहता है-भैया वापस सदर बाजार की तरफ कोई तान्त्रिक बाबा हैं, सोचती है कोई कपड़ा लेकर उनके पास पाऊंगी--वह अपनी तन्त्र विद्या से भया को वापस बुला देंगे।" पारो ने कहा। "तुम्हें विश्वास है इन दातों पर?" "क्यों ? क्या तुम देवी-देवता नहीं मानते ? क्या वन्त्र-मन्न कोई विद्या नहीं है?" "अच्छा बाबा सब सच है सब सही है। भगवान करे तेरा भैया जल्दी पाए।" "प्रब उठो मी, स्नान करके भोजन कर लो।" अभी मुझे अपना रूप भी बदलना है-दाढ़ी को विदा दे रहा हूँ। सोचता हू दाढ़ी काटकर सिर के बाल छोटे करने के बाद हुलिया काफी बदल जाएगी-सुबह होने से पहले यहा से भागना है." "तुप स्वयं जगल की तरफ क्यों नहीं भाग जाते हो-पामोनी चले जायो। घना जंगल है-मैं उसी दिशा में गांव-गांव जाकर अपना काम करूंगी और तुमसे मार्गदर्शन लेती रहूगी-तुम फूट कित में रह सकते हो।" "मुझे कुछ निर्देशों का पालन करना पड़ता है-मैं अपने मन से कोई भी काम नहीं कर सकता।" "तुम क्या इतने बिके हुए हो?" "हां पारो, यह सही है । मेरी पूरी जिन्दगी विकी हुई है।" "मैं समझ सकती हू - तुम्हें किमीने खरीदा नहीं है। तुम खुद विक गए हो। ईश्वर तुम्हारी सहायता करे--तुम जो कहोगे मैं कगी..." प्रशान्त ने कुछ सोचते हुए मन्तत: मन की बात कह डाली-फिर तुम्हें बतलाए देता हूँ मैं स्वयं गिरफ्तार हो जाऊगा कल शाम तक 1- सागर में लोग मुझे जानते हैं । दाही मुद्दाकर शहर में एक चक्कर लगाऊगा तो खलबली मच जाएगी-शाम तक तो अपनी मंजिल तक पहुंच जाऊगा।" 'जेल जाकर कौनसी योजना पूरी करनी है ?" इस क्षेत्र के प्रावगम जेलों में मेरी पार्टी के कुछ प्रम
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कुछ महत्त्वपूर्ण बातें करनी हैं। उन्हें बाहर के कुछ आवश्यक.
समाचार देने हैं-उनसे कुछ निर्देश प्राप्त करने हैं। हमारे संदेश तुम्हें
जेल से मिलते रहेंगे। तुम कहीं भी रहो-हमारे विशेष दूत तुम तक
आएंगे।"
"पहले क्यों नहीं बताया-इतनी बड़ी भूमिका बांधने की क्या
आवश्यकता थी ?"
"मैं उस आवश्यकता को समझता हूं।-तुम्हें अभी भी सब कुछ
कहां बताया है। अभी वहुत कुछ शेष है।"
"मैं प्रतीक्षा करूंगी उस क्षण की..."
मेरी प्रतीक्षा नहीं करोगी। कब मैं जेल से निकलूंगा, अभी
क्या कहा जा सकता है।"
"मैं जिंदगी-भर तुम्हारी प्रतीक्षा कर सकती हूं। मुझे डरानो
मत।"
"मैं जानता हूं तुम किसी बात से डरोगी नहीं। मैंने तुम्हारे मन को
बहुत पहले पहचान लिया था।"
"इसके बाद भी रेणुजी की बाहों में गिर गए ?"
"बांहों में तो क्या गिरा, हा...फिसल गया था। मैं थोथे आदर्शों
से घृणा करता हूं। मेरे जीवन की अपनी मान्यताएं हैं, अपने सिद्धांत.
हैं. लेकिन इस सबके
वावजूद मैं इन्सान हूं। पुरुप का नारी के प्रति
आकर्षित होना कितना सहज है-इसे स्वीकार क्यों नहीं करती हो.
लेकिन किसी आकर्षण के लोभ में मैं अपने सिद्धांतों को नहीं त्याग सकता
इसलिए शायद रेणु को अलविदा कहना पड़ा।
"कल सुबह तक मुझसे भी अलविदा कहोगे ?"
"नहीं, मैं तुमसे कहूंगा फिर मिलेंगे। अच्छा तुम्हारे लिए मेरा कोड
वर्ड भी यही होगा 'फिर मिलेंगे।"
"मैं फिर मिलेंगे नाम से प्रेषित संदेशों की प्रतीक्षा करूंगी."
"
८ दो दिन, दो रातें बुरहानपुर को सगर जीवन में कभी नहीं भूल पाएगा । सगर को समय मिला शबनम के साथ रहने का, उसे समझने का। उसे लगा शबनम अन्य किसी भी नारी की भाति पहले एक नारी है उसे कोठे पर लाया गया है, वेश्या बनाया गया है-सिर्फ इसी बात को लेकर कोई उसकी जिन्दगी से प्यार करने का अधिकार नहीं छीन सकता।-बदन का गुण शीतलता प्रदान करना है. बादलों को बरसने से कौन रोक सकता है-फूलों की खुशबू को कैद नहीं किया जा सकता " नारी को प्यार करने के अधिकार से वंचित नही किया जा सकता। उस रात सगर शवनम की मरमरी बाहो मे था-उमने शवनम को वचन दिया था कि उसकी हर बात का सही उत्तर देगा। व्यापालय के समक्ष गीता और गंगा की सौगघ उठाकर सासी घडल्ले से झूठा साध्य देता है--सगर का व्यक्तिगत अनुभव था। लेकिन शबनम की बांहों में प्यार के नाम पर सगर ने स्वीकार किया कि उसका धन्धा चोरी करना, जेबें काटना, वंगन काटना है। वह अपराधी है.. उसके पास पाप की कमाई है। विवश होकर वेश्यावृत्ति करने वाली कोठे वालिया उससे अधिक पवित्र है-वह अपना तन बेचती है-तब उन्हें कुछ मिलता है। सगर चोरिया करता है-डाके डालता है । अब सगर शबनम का ग्राहक नही या उसका प्रेमी या-उसके सपनों का राजकुमार। शबनम का सगर चोरी नहीं करेगा, डाका नहीं डालेगा, कोई अपराध नहीं करेगा । शबनम के माथे की विदिया चूमकर सगर ने यह शपथ उठाई थी। लोग जीवन-भर मन्दिर को मूर्तियों के समक्ष शोग झुकाते है- अपने अपराधों के लिए दामा प्रार्थना करते हैं और हर चार वही गलतियां करते हैं.."मस्जिदों में प्रजाने लगाकर ईमान के नाम पर झर बोलते हैं." सगर ने माथे की विदिया चूमकर जो सपथ उठाई थी उसका कोई साक्षी इन्सान नहीं था। उसने वेश्या के वोठे पर अपनी प्रियतमा को ११० - वचन दिया था। शवनम का प्रस्ताव सुनकर सगर मन ही मन हंसा था। एक चोर का वचन-वेश्या को? क्या मजाक है ? फिर शवनम गंभीर होती गई, रोई। उसने अपना अांचल फैलाकर सगर से भिक्षा मांगी- उसके प्यार से सगर का मन पिघल गया। एक विशाल दिव्य ज्योति उसके अंधेरे मन में जल उठी.. भागती हुई मालगाड़ी के बोझिल पहियों में उसने मंदिर के घंटों का स्वर सुना-शवनम साक्षात् देवी का रूप धारण किए थी-सगर की जिन्दगी फिर एक नये मोड़ पर आकर खड़ी हो गई...उसका सारा तन रोमांचित हो उठा, उसके अधर शवनम के माथे की विदिया पर झुके और मन ने एक नया निर्णय लिया-उसने शबनम को वचन दिया। बुरहानपुर से चलते समय उसने शवनम से कहा-“यदि वचन का पालन नहीं कर सका तो तुम्हें जीवन में फिर कभी मुंह नहीं दिख- लाऊंगा।" शवनम ने दृढ़ स्वर में कहा था--"मेरे प्यार में यदि शक्ति है तो तुम फिर लौटकर आयोगे-तुम अपना वचन निभाओगे।" विचारों की एक भीषण अांधी में लड़खड़ाता हुआ सगर वम्बई जा पहुंचा । वह कुछ दिन तक यूं ही भटकना चाहता है । मन की भटकन के समानान्तर कुछ चाहिए । सगर रात-रातभर समन्दर के किनारे भटकता है। उगते हुए फफोलों की जलन नहीं बुझती है । सगर ने शराव न पीने की कसम खाई है-उसने चोरी न करने का वचन शवनम को दिया है । रोग की रोक-थाम के लिए औपधि बीमार को दी जाती है। रोग के कीटाणुओं का युद्ध औपधि से होता है। पराक्रमी की विजय होती है। नशा न मिलने से रक्त विद्रोह करता है उसका स्वर सगर को सुनाई देता है। -माल से भरी मालगाड़ियां लोहे की पटरियों पर धड़- घड़ाती हुई गुजर जाती हैं -मुसाफिर अपना माल-असवाब लिए ट्रेन से उतरते हैं, टैक्सियों में बैठकर चले जाते है । समन्दर की अनगिनत लहरों की भांति बम्बई की सड़कों की भीड़, वाजारों में होने वाला लाखों- करोड़ों रुपयों का व्यापार देखकर सगर का मन बहकता है। कन्धे वार- - - बार उचकते हैं, मुबाओं की मांसपेशियां कसमनाती हैं, उंगलियां मच. मती है--फिर सहना ही कन्धे कुक वाते हैं, मांसपेशियों का तनाव दल जाता है-उंगनियों को पिरकन थम जाती है.-मन बुझ जाता है। एक भयंकर नमुद्री तूमान में घिरे पहार को कलना सगर के मन में बार-बार उनी है । बहार तट छूना चाहता है-नफानी लहरें उसे बारम्बार पीछे धकेल देती है । जहाज मनी भी साबुत है । रोग को रोक- थाम के लिए और अधिक कड़वी मोपधि चाहिए। भीड़ से मन भर गया. चोर में कान एक गए । सगर के मन को शांति चाहिए-वह पुनः फटियर मैर पर सवार हो गया-- कोटा से दिल्ली। दिल्ली भी बहुत बड़ा शहर है--फिर हरिद्वार, ऋपिका, लयनन भूला.. दोनों ओर उत्तुंग पर्वत शिखर-बीच में व्हती निर्मल गंगा-गंगोत्री उद्गम- इतनी महान् नदी का प्रोत."हिन मंडित पर्वत मालाएं... दूर-दूर तक मयंकर मन्नाटा, मन्नाटे का मौना चीरली हुई दीली हवाएं। वर्फ का पर हिमालय'। हिमालय में नगर ने मौनी दादा के दर्शन किए-यन्त्र के नाम पर एक कमांडर, अन्न लागे हुए कई वरम बीत गए। सगर का ज्ञान जागा, मनुष्य को पा मावस्यकताएं हैं ? कितना धन चाहिए उसे ? कितनी घरती चाहिए किवदा दहा मकान चाहिए? तृप्ता का गया अन्त है ? इतनी ग्रा-धापी क्यों और किसलिए? मन की शाति से बढ़कर और क्या है ? मन का सन्तोष चाहिए...गांति चाहिए । प्रेम स्रोत है--जीवन-गंगा के समान विधान है। उसे गगा की भांति पावन दनाए रखना है। तुकान घटने लगा-उत्ताल तरंग टूटने लगी। जहाज मंपर गति से तट की पोर बता रहा। नगर को पर की याद माने लगी-पारी का प्रेम उसे पुकारने लगा.. शबनम की स्वर-महरी उसके कानों में गूंजने लगी। सगर पहाड़ों के चक्करदार राम्तों को छोहर नीरे सम- तल मैदान की ओर बढ़ने लगा...वासन दिल्ली-मांमी और अन्ततः सागर। सगर मारी रिकता में बंदकर मंगन ने घर को चल दिया। पार्टी उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। इतने दिनों की पूरी कहानी उरी २ नाएगा...उससे क्षमा याचना करेगा.. पारो उसे क्षमा कर देगी। बह का भटका हुआ शाम को यदि घर वापस आ जाए तो भूला हुआ नहीं कहलाता है। मकान में ताला लगा देखकर सगर का माथा ठनका। क्या कारण हो सकता है ? पारो कहां जा सकती है ? सगर ने अपने पड़ोस में पूछ- ताछ प्रारम्भ की। जो कहानी उसे सुनने को मिली-वह सहसा ही उस पर विश्वास नहीं कर सका। प्रशान्त को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। प्रशान्त क्रांतिकारी था-उसका इस घर में आना-जाना था। पारो यदि घर छोड़कर न भागती तो पुलिस उसे भी गिरफ्तार करके जेल में डाल देती। किसी व्यक्ति के गिरफ्तार हो जाने का समाचार इन दिनों विशेष महत्त्व नहीं रखता था । प्रशान्त का किसी राजनीतिक पार्टी से सम्बद्ध होना स्वाभाविक था। सगर के लिए यह समाचार बिल्कुल नया नहीं था। वह मात्र पारी को लेकर चिंतित था। कहां जाएगी बेचारी अकेली पारो? यह प्रश्न सगर को मय रहा था। अन्त में उसने निश्चय किया-प्रशान्त का पता लगाना आवश्यक है ? प्रशान्त किस जेल में है यह मालूम किया जा सकता है। सुबह होते ही उसने परिचित पुलिस अधिकारियों से संपर्क सावा उनके सहयोग से जेल अधिकारियों से मिला। प्रशान्त अभी तक सा जेल में था। रविवार को दस बजे मुलाकात का समय निश्चत गया। पारो को गांवों में क्रांति जगाने के लिए भेजा गया था। उसका वि क्षेत्र भोजपुरा से लेकर घामोनी तक था । इसी रास्ते में आस-पास भी गांव में पारो अपने साथियों के साथ मिल जाएगी-उसे गांव जाना है। इस तरह कितनी ही टुकड़ियां भेजी गई हैं । दसों दिशा लोग गए हैं। किसानों और मजदूरों को जगाना है। किसान को सु नहीं मिलती, भूमिहीनों को भूमि नहीं मिलती, बीड़ी मजदूरों को तेतन नहीं मिलता, इन सबको मिलकर विद्रोह करना है. - उठानी है। इनको जगाने का काम पारो और साथियों को सौंपा गरा है। अच्छा काम है । सगर को भी इसमें हाथ बटाना चाहिए । बूंद-बूंद में समुद्र बनता है । सार जैसे नौजवानों को प्रावश्यकता है। देश का नया खून आगे आना चाहिए। तभी कांति सफल हो सकती है। प्रशात की बात सगर के मन में बैठ गई। उसे भी नया जीवन भारंम करने के लिए और प्रात्मशुद्धि के लिए एकांत की पावश्यकता थी। अनिश्चित भविष्य को शांति को खोज इस प्रकार मारम्भ की जा सकती है-वह पारो का साथ देगा। पारी उसको बहिन है, पावनम को दिए हुए वचन को पूरा करने का उमने बीड़ा उठाया था। पाबनम के लिए वह सब कुछ कर सकता है। पारी के लिए भी वह सब कुछ कर सकता है। पारो का और उसका मात्मा का सम्बन्ध है, मन का यह परम सत्य है कि मनुष्य के जीवन में एक शारीरिक भूम्य है, किन्तु उमसे भी वडी प्यास है उसकी मात्मा की । इन दोनों का मिलन समन्वय रेखा पर होना मावश्यक है अन्यथा जीवन में मूनापन भर जाएगा । वह पारो को अकेला नहीं छोड़ सकेगा। सगर की कल्पना ढाल वाली जंगली पहाड़ी पर फिसलने लगी."पारो ऐसो हो किमी पहाड़ी ढलान पर अपने साथियों के साथ घूम रही होगी। मनुष्य जव सञ्ची लगन से अपना ध्येय प्राप्त करने हेतु मप्रसर होता है तब कोई भी चट्टान उमकी राह नही रोक सकती। वाटू जमे अनगिनत साथी पीछे छूट गए, दुनिया के तमाम धन्धे सगर भूल गमा पौर वह पारो की सोज में निकल पड़ा । विद्रोह क्षेत्र को पोर जाने के पूर्व उसने पारो के लिए नये कपड़े खरीदे, ढेर साग भना हा घना, मूंगफली और गुड़ खरीदकर पोटली माघ लो। थोड़ो-मी मिठाई भी परीदकर रख ली। सगर ने सागर से बहरीन का टिकट कटवाया। ईश्वर ने उसकी सहायता की । बस धसान नदी का पुर पार करने लगी तो सगर ने नदी के जल के पास चट्टानी धरती पर पारों को राई हुए देपा । उसके साथ दो भजनवी व्यक्ति थे । सगर के गुलाबी ar फड़कने लगे, उसकी नीली निर्मल मांखों में T...उससे क्षमा याचना करेगा...पारो उसे क्षमा का भटका हुआ शाम को यदि घर वापस आ जाए तो भूला हुआ हलाता है। मकान में ताला लगा देखकर सगर का माथा ठनका। क्या कारण कता है ? पारो कहां जा सकती है ? सगर ने अपने पड़ोस में पूछ- प्रारम्भ की। जो कहानी उसे सुनने को मिली-वह सहसा ही उस विश्वास नहीं कर सका। प्रशान्त को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। प्रशान्त क्रांतिकारी -उसका इस घर में आना-जाना था। पारो यदि घर छोड़कर न गती तो पुलिस उसे भी गिरफ्तार करके जेल में डाल देती। किसी व्यक्ति के गिरफ्तार हो जाने का समाचार इन दिनों विशेष महत्त्व नहीं रखता था। प्रशान्त का किसी राजनीतिक पार्टी से सम्बद्ध होना स्वाभाविक था। सगर के लिए यह समाचार बिल्कुल नया नहीं था। वह मात्र पारो को लेकर चिंतित था। कहां जाएगी बेचारी अकेली पारो? यह प्रश्न सगर को मथ रहा था। अन्त में उसने निश्चय किया-प्रशान्त का पता लगाना आवश्यक है ? प्रशान्त किस जेल में है यह मालूम किया जा सकता है। सुबह होते ही उसने परिचित पुलिस अधिकारियों से संपर्क सावा। उनके सहयोग से जेल अधिकारियों से मिला। प्रशान्त अभी तक सागर जेल में था। रविवार को दस बजे मुलाकात का समय निश्चत हो गया। पारो को गांवों में क्रांति जगाने के लिए भेजा गया था। उसका विद्रोह क्षेत्र भोजपुरा से लेकर घामोनी तक था । इसी रास्ते में आस-पास किस भी गांव में पारो अपने साथियों के साथ मिल जाएगी-उसे गांव-गां जाना है। इस तरह कितनी ही टुकड़ियां भेजी गई हैं । दसों दिशाओं लोग गए हैं। किसानों और मजदूरों को जगाना है। किसान को सुविध नहीं मिलती, भूमिहीनों को भूमि नहीं मिलती, बीड़ी मजदूरों को पर वेतन नहीं मिलता, इन सबको मिलकर विद्रोह करना है-या । उदानी है। इनको जगाने का कार पारो मोर सापिनों को सोश Ret है। मन्टा काम है। समर को भी इसमें हाप साना माहिए। दुरपुर समुद्र बनता है । सगर ते नौजवानों को मायकता है। रेममा सून मागे माना चाहिए। तभी क्रोति सफल हो सकती है। प्रभात की बात सगर के मन मे बंडगई। उसे भी ना पर प्रारंभ करने के लिए मोर मात्मसुद्धि के लिए एक थी । अनिश्चित भविष्य की साति की सोज सरासो सकती है-वह पारो का साप देगा। पारो उसोवलि परमको दिए हुए वचन को पूरा करने का उसने मोड़ा गया। लिए वह सब कुछ कर सकता है। पारो के लिए भी वह हर र सकता है। पारो का और उसका प्रारमा का सt m 47 सम्बन्ध है। यह परम सत्य है कि मनुष्य के जीवन में एक है 'किन्तु उससे भी बडो प्यास है उसकी पारमा कोहामा समन्वय रेखा पर होना मायश्यक है भरमा और RC * जाएगा । वह पारो को अकेला नहीं छोड़ सकेगा। सपर am वाली जगली पहाड़ी पर फिसलने लगी."पा ऐसा हो Ra Nari ढलान पर अपने साथियों के साथ पूग रही होगी। मनुष्य जब सच्ची लगन से अपना पास 1 Ment होता है तब कोई भी चट्टान उगी राह नही । बाद में अनगिनत साथी पीछे छूट गए, दुनिया के Tum Hron ॥ और वह पारो की सोज में निकल पड़ा । नियोको "पूर्व उसने पारी के लिए नये माग गरीने, arougram पर मूगफनी और गुष्ट गरोदार पोटली पाती गाड़ी जी सरोदकर रस ली। रागरी सागर 0411 ईश्वर ने उसकी गहायता की। पागमा गगी 11tamil तो सगर ने नदी के जार में पागली . देगा । उमर गाय दो प्रगगी fan Attitiy" फड़कने लगे, आपी मामी fin unt Artim उसने अपने कोमल स्वणिम वालों को माथे से समेटते हुए कहा.---"कंड- फ्टर बस रोको, मुझे यहीं उतरना है।" बस रुकी। सगर अपना सामान लेकर उतरा "वह पुल से ही चिल्लाने लगापारो देख मैं पा गया।" पारो ने दृष्टि उठाकर देखा-बहरोल की ओर बढ़ती हुई बस पुल पार कर रही थी-पुल से पत्थरों पर उतरता हुआ सगर-उसका . यह भी पारो की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं.."पारो चट्टानों पर भाग रही है, अपने भैया से मिलने के लिए.. सगर भी भाग रहा है अपनी मात्मा के टुकड़े से मिलने के लिए। बहन-भाई का प्यार जाग उठा है । दूसरे ही क्षण पारो भैया के गले से लगी थी। फिर छिटककर उसने गर्दन उठाई। भैया को भुजदण्डों से पकड़ लिया और प्राक्रोश का वेगः फूट पड़ा-उसके प्रांसू झर-झर बहने लगे। पारो ने प्रश्नों और भारोपों की झड़ी लगा दी-"कितने निष्ठुर हो तुम..तुमने नहीं सोचा कि तुम्हारी वहिन विल्कुल अकेली है इस दुनिया में ? जिस घर में अधर्म की कमाई पाती है उसमें मैं नहीं रह सकती.. मैंने कल भी कोयला बीनकर रोटी कमाई थी, मैं आज भी मजदूरी करके जिन्दा रह सकती हूं। जब तक तुम राह पर नहीं पायोगे मैं घर वापस नहीं जाऊंगी।" सगर चट्टान की भांति अडिग खड़ा था। उसके नेत्र पथरा गए... उसके कोमल स्वणिम वालों को हवा के झोंके बिखेर रहे थे। पारो सगर की खामोशी से घबरा गई। उसे पता है.. भैया के मन में कोई बात घुटती है तब वह बोलता नहीं है। वह दांत भींचने लगता है। पारो को उत्तर चाहिए था.. उसने सगर को झकझोरा--"तुम चुप क्यों हो? लगता है पाप की कमाई का जादू तुम्हारे सिर पर चढ़ . चुका है...?" "नहीं, नहीं पारो...मेरी आत्मा ने उस संसार को कभी स्वीकार नहीं किया था...।" सगर के ओंठ घृणा से कांप रहे थे----मैंने बहुत घबराकर वह रास्ता अपनाया था, बहुत सोच-समझकर उस दुनिया को - प्रणाम किया है। प्रद मैं सदा-सदा के लिए वापस मा गया हूं। प्रशान्त भैया मे प्रेस में मिला था। उन्होंने मुझे इस क्षेत्र में भेजा है तुम्हारा साथ देने के लिए।" पारो के दोनों साथी अब तक यहां तक भा चुके थे। उन्होंने सगर का मन्दिम वाक्य मुना था। उन्होंने इतने दिनों के बाद पारो के पथराए मोटों पर हंसी देखी थी। पारो को सहसा ही भया की बात पर विश्वास नहीं हुपा। लेकिन उसे मानना पड़ा--"यह सच है। प्रशान्त मे नहीं मिलता तो यहां तक कैसे पहुंचता ?" भैया यहां पाता ही क्यों ? पारो के लिए इससे बड़ा सुख और कौनसा हो सकता था। माज का दिन सौभाग्यमूचक या। प्रातः प्रशान्त का संदेश मिला था फिर सगर की वापसी.. पारो का मन उछलकर भाकारा छूना चाहता है । सगर ने देखा पारो बहुत खुश है। वह अपना कन्धे का बोझ भी कम करना चाहता है । जानता है पारो को इमरती बहुत पसन्द है ।" मुस्कुराकर पूछता है-- पारो इमरती लाएगी ?" पारो को लगता है.. भैया चिढ़ा रहा है। अनजान डर की खोज में निकला व्यक्ति क्या इमरती लेकर पाएगा? लेकिन भया के कंधे पर दो बड़े-बड़े भोले लटक रहे हैं। पारो को लगा- उनसे इमरती की सुशबू फैल रही है। भैया, और दो मोले भरकर निकले ? जरूर कोई बात है लाया होगा मिठाइयां सूब भरकर । पारो को विश्यास हो गया तो बोली-कई दिन से भरपेट रोटी नहीं खाई है। प्राज तुपाया है तोजी भरके मिठाई खाऊंगी और अपने साथियों को खिलाऊंगी। देखो तुममे मिलने की खुशी में भून गई कि मेरे साथ भी कोई है । उनी तुम्हारा परिचय करा दू? देखो ये हैं प्रशान्त के बड़े पुराने साथी थीन और यह है."हमारे नये सापी चन्दू। इन्हें इस क्षेत्र की पूरी जानकारी है । पहले भी चुनाव के संबंध में गांव-गांव घूम चुके हैं। फिर मानिनी बहन की भांति तुनकार सगर से बोली-"जब तक छीनूगी नहीं... मिठाई नहीं निकालोगे। हम लोग यहीं नदी के किनारे टेंगे। घर पानी के पास मा जाम्रो..."
सगर ने झोला कन्धे से उतारा...! मिठाई के डिब्बे खोले...इम- रती, वालूशाही, लड्डू और रसगुल्ले.. सभी के चेहरों पर ललाई दौड़ गई। पिछले कितने दिनों से मोटी रोटी, साथ में कहीं चटनी-नमक, कहीं भटे का भुरता और कहीं कद्द का साग । सगर ने एक इमरती उठाकर पारो को अपने हाथों से खिला दी। पारो ने भैया के मुंह में रसगुल्ला डाल दिया । बीनू और चन्दू ने सभी प्रकार की मिठाइयों पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया। पारो खुश है उसके साथी उसे खुश देखकर उससे ज्यादा खुश हैं. उन्होंने अभी तक पारो की मुस्कान भी नहीं देखी थी। पारो का चम्पई रंग आज और निखार पर है। उसके 'झील से शांत गहरे नेत्र आज बोलते-से प्रतीत होते हैं.. उसने अपनी रेशमी कटि प्रदेश के भी नीचे लटकने वाली रेशमी-सी केशराशि को जतन से जूड़े में संभाल रखा था। हवा के झोंको ने चन्द लटें विखेर दी हैं। अन्य दिनों की भांति पारो को इस क्षण विखरी हुई लटों को संवारने का होश नहीं है। पारो के रक्ताभ ओंठ, उसके साथियों ने सदा पपड़ाए हुए देखे थे---आज पारोहंस रही है, रगों में खून भाग रहा है, इसलिए अोठों की चमक लौट आई है। उसका सम्पूर्ण मुखमंडल 'खिल उठा है । बादलों की ढेर-ढेर पते उतरती गई.. अन्ततः पूरे बादल साफ हो गए.."चांद निकल पाया। शांत, शीतल, निर्मल चांद की भांति दमकने लगा पारो का मुखमण्डल । तन्वंगी श्वेता सुन्दरी पारो ने अपना यह रूप कहां छुपाकर रखा था ? उसकी कपोत ग्रीवा के पल्लू में लिपटी रहीं. उसने अपने अंग-प्रत्यंग को संजोकर छुपाए रखा । सुरक्षा की भावना सगर प्रदान करता है...सगर आज उसके सम्मुख है। उसका सुरक्षा कवच । भैया के साथ पारो को थकान नहीं लगी.. सारे दिन पैदल घूमी 'शिशिर की मादक धूप अच्छी लगती है लेकिन वर्षों से चलने की आदत छूटी हुई है। सूर्योदय के साथ उनका अभियान आरंभ हो जाता है." नये-नये गांव नये-नये व्यक्ति । प्रत्येक व्यक्ति से उसके मानसिक स्त के अनुसार जूझना पड़ता है। जो निधन है, उन्हें रोटी-कपड़े का अधि । ...
कार समझाया जाता है। जो सम्पन्न है उनके जीवन स्तर मोर मुवि.. धानों की बात की जाती है। शासन का कर्तव्य है कि सामान्य व्यक्ति के जीवन स्तर को उठाए. देश की प्रधिकांश, जनता देहातों में रहती है, वहां के लिए बिजली होनी चाहिए...शिक्षा के प्रभाव मे सर्वतोमुखी विकास सम्भव नहीं है। जन-स्वास्थ्य के लिए जलपूर्ति योजनायो की मोर ध्यान दिया जाना चाहिए । गांव में बड़े अस्पताल होना चाहिए। ग्राम पंचायत पोर न्याय पंचायत का कार्य-क्षेत्र बढाना चाहिए। क्षेत्र के सभी शासकीय कर्मचारियों को सरपंच के माघीन, होना चाहिए." जहां जनता एकत्र हो जाती है वहा भाषण होता है। धीरे-धीरे पारो खुलने लगी है। उसके भाषण प्रोजपूर्ण होने लगे हैं । भी भड़का उठती है. भीड़ उसका साथ देने को तैयार हो जाती है । हर क्षेत्र में नये कार्यकर्ता उत्पन्न हो रहे है । वह अपने-अपने क्षेत्र का दायित्व संभा-- लने का वचन देते है। जिस गाव मे सूर्यास्त हुआ वहीं पड़ाव डाल दिपा । कितनी बार मूरज उगा, कितनी बार सूरज ढला...। शाम होते-होते पारो भपने साथियों समेत घामोनी पहुंच गई। मजार के पीछे कुमा है। सब लोग मुंह-हाथ धोने लगे। पारो मम्मा के टपरे को मोर भागी। कितने दिन से सोच रही थी, घामौनी जाएगी, अम्मा से मिलेगी। मम्मा उसे पह- चान लेगी.."हां, हां क्यों नही पहचानेगी? फिर एक बार अम्मा के हाय की सोंधी सौंधी ज्वार की रोटी चटनी के साथ खाएगी. इस बार तो उसके साथ बारह-पन्द्रह किलो माटा भी है। गांव वाले विदा करते हैं. साथ मे माटा, नमक, चना, चावल जो कुछ होता है, बाघ देते हैं । जंगल में भी पड़ाव डालने पड़े है. वहा माटा-नमक काम प्राया है । मम्मा सामने खड़ी है। पारो भागती हुई पाई है । अम्मा ने पारो को पहचाना""गले से लगा लिया। स्नेहवरा मामू टपक पड़े। किताव पृष्ठ एक के बाद एक पलेटने लगे."सागर के दिन सागर मे काटा समय । ' हा सगर भी माया है।" "वहाँ है मेरा लाल ?"
का
-
"अभी कुएं पर है.. शायद मुंह घोकर आए"बस आता ही
गा।"
सगर आ गया। उसके साथी आ गए । सगर को देखकर अम्मा की
नांख जुड़ा गई। पारो साधिकार कहती है-"अम्मा हम सब तुम्हारे
यहां रोटी खाएंगे !"
अम्मा को संकोच होता है इतना भाटा कहां से लाएगी?
पारो हंसती है.--"किस सोच में पड़ गई अम्मा ? देखा, इतना आटा
है"इसमें तीन-चार दिन हम लोग खा सकते हैं। अब तो यहीं डेरा
डालेगे। हम लोग देश का काम कर रहे हैं.. अभी तुझे सब समझा-
ऊंगी। हम लोग सुबह सलमपुरा जाएंगे।"
"अब कहीं नहीं जाने दूंगी।"-अम्मा लाड़ जताने लगी।
"हां हां, कभी भी नहीं जाऊंगी."सुबह काम पर निकलूंगी. शाम
तक वापस आ जाऊंगी."हम सब लोग सुबह-सुबह निकल जाएंगे।"
"अच्छा बावा, अभी तो बैठो.. थोड़ा सुस्ता लो। मैं अभी चूल्हा
जलाती हूं."
पारो अन्दर टपरे में घुसती है। अम्मा का चौका पहले जैसा नही
है।"अब शायद हर दिन लीपा-पोती करती है। पारो और अम्म
भोजन की व्यवस्था में लग गई।
सबने प्रेमपूर्वक भोजन किया। पारो और अम्मा के व्यवहार
सभी को ऐसा प्रतीत हुआ कि वह अपने घर में आ गए हों। रात को
बढ़ जाती है. पारो अम्मा के टपरे में सोएगी। बाकी लोग मजार
बरामदे में सोने के लिए चले गए।
पारो अम्मा के बगल में लेटी है, अम्मा को सागर में बिताए
दिनों की कहानी सुनाती है कुछ संकोच होता है फिर वह कह
है-"हमारा एक साथी है. वही हमारा नेता है। वह जेल
अभी परसों उसका संदेश प्राया था-लिखा था जेल के कोठे व
हैं.. कोई खिड़की नहीं है. ऊपर एक झरोखा है। पीछे पा
गन्दी गन्दी बदबू आती है। सीलन और बदबू ताजी हवा
. दिन-दिन बढ़ती जाती है। शायद इसीलिए वह बीमार रह्ने लगा है। खाना बहुत सराव मिलता है।" अम्मा का मन कांपने लगता है। घबराहट में बोल उठती है- "किस जुरुम में पकड़ा गया था, कितने साल की कैद हुई है ?" "अम्मा उमने कोई जुरुम नहीं किया, कोई मुकदमा नहीं चलाया गया---उसे कोई सजा नहीं सुनाई गई है।" मम्मा को विश्वास नहीं होता-"ऐसी अन्वेरगर्दी कैसी? विना जुर्म के, विना मुकदमा चलाए जैल में वन्द कर देते हैं ? माखिर क्यों ?" "ऐसा ही हो रहा है मम्मा। ऐसे लाखों लोग बन्द हैं। प्रशान्त उनमें से एक है। वह किसान मोर मजदूरों के लिए सरकार से लड़ता था। मव हम लड़ रहे हैं हम भी किसी दिन जेल चले जाएंगे।" मम्मा सोच में पड़ जाती है उसके लिए यह एक जटिल पहेली है । उसे पता है लोग जव चक्कर में फंस जाते हैं तद वावा के दरवार में माते हैं । इसी मजार पर दुमाएं करते हैं । उसने कहा-"चल पारो, तुझे मजार के दर्शन करा ताऊं। दादा सबका भला करेंगे। तेरे नेता के लिए मैं दुमा करूंगी.. तू भी दुपा करना।" पारो अम्मा के पीछे-पीछे चलती है । उसके सब साथी सो चुके हैं। सगर भी सोया पड़ा है । अम्मा अन्दर जाकर डिबरी जलाती है-मंदर के चमगादड़ उड़ने लगते हैं-बीच में एक ढेर है मजार के नाम पर...। मम्मा बताती हैं यही बादा की मजार है-यही लोग चादर चढ़ाते हैं। अम्मा अगरबत्ती सुलगाती है। पारो को देती है ..-पारो अम्मा की तरह रेत में अगरबत्ती गाड़ देती है। मम्मा घुटना मोड़कर इबादत के लिए वैठती है-पारो मम्मा की भांति सिर पर घोती डाल लेती है- उसी मुद्रा में बैठकर दोनों हाय मजार को मोर फैलाती है। बाबा से प्रार्थना करती है- अम्मा उठ गई- उसने देखा पारो मभी भी बैठी है । उसको बन्द पाखों के कोरों से मांगू चू रहे हैं। मम्मा ने उसके सिर पर हाय फेरा 'वावा उसकी जान की सैर करेंगे'...। उठ पारो'"वावा सबका भला करेंगे।" पारो उठी। उसने मांसू पोंछ लिए। वह प्रशान्त के प्राणों की १२० - । रक्षा की भीख मांग रही थी-जब अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा। पारो अम्मा के साथ टपरे पर वापस आ गई। अन्दर से कम्बल निकाल लाई-उसे कन्धों पर लपेटती हुई बोली-"अम्मा तू सो जा मुझे अभी नींद नहीं पाएगी । जंगल का अन्धकार अच्छा लगता है । मैं थोड़ी देर से सोऊंगी।" अम्मा सोने चली गई। पारो ने सितारों-भरे आसमान को देखा। आसमान से एक तारा अभी-अभी टूटा है, पारो बुरी तरह से चौंकती है। "क्यों सदा नीलगगन निहारती रहती हूं। इसका निस्सीम विस्तार, इसकी उनमादी ऊंचाई, इसके विविध रहस्यमय रंग शायद इसकी महा-- नता के द्योतक हैं। हमारी कल्पना वाले देवता इस पर्दे के पीछे किसी स्वर्गलोक में रहते हैं। हमारे प्रकाश का स्रोत इसी विशाल शून्य से उगता है और इसी में डूब जाता है। अंधेरे अांचल में अनगिनत नक्षत्र अपनी जगमगाहट से एक अत्यन्त ही रहस्यमय लोक की सृष्टि करते हैं-चांदनी के शहतीर इस मण्डप से गिरते हैं...। ओस और चांदी बरसाने वाला आसमान बांह पसारकर धरती को चूमने वाला आसमान, माग और पानी बरसाने वाला प्रासमान, घनी निर्धन, सुन्दर-असुन्दर प्रत्येक इन्सान के साथ समान व्यवहार करनेवाला नील गगन कभी किसी युग में बदनाम नहीं हुमा । इसलिए मैं बांहैं पसारकर आशावान दृष्टि से शायद तुझे निहारती हूं-मौन स्वर में एक अज्ञात निवेदन करती हूं-अपने साये में हमें पलने दें...। मन के गीत जो मुझसे दूर हैं उनकी तू रक्षा करना...'तुम्हारी छांह में एक दिन प्रशान्त आएगा. जब तक प्रासमान हैं, मन का यह विश्वास टूट नहीं सकता।" आधी रात बीत गई... सितारों से जगमगाहट के नाम पर एक मादक गन्ध वरस रही है.. सारा जंगल उस गन्ध में डूब रहा है, वृक्षों की ऊंची फुनगियों पर झिलमिल राख तैर रही है. वृक्षों के साये. अंधेरे हैं. दूर-दूर तक अंधेरा और सन्नाटा है"अंधेरे की अपनी कोई आभा है जो भयावह भी है और सुन्दर भी...ऐसे ही अंधेरे का. एक टुकड़ा उस दहलीज पर था...अंधेरे की उस अलौकिक आभा में प्रशान्त का प्रथम स्पर्श उसे मिला था.... •कितना सुन्दर था वह अन्ध-- कार मारा। ऐ३१ ६.१ ६॥1॥ है. नेमलाल है। 18110 सगर ने कभी पलना भी नहोस यो किसी शीन परिवर्तित हो सकता है। कामको पहिलों को 14 उसके कानों में नही गूंजती है। साविको की गार DET माती है। उसके नये सापिनों ने उसका मन जीत लिया। करके मन को शान्ति मिलती है। रात को बडीगार पाती सोते उसे पुलिस वालों को युटो की पापाग गी mansi nai अब माटो पर नहीं चौंकता है। उसकी गजर का 11: Hinks उसे गर्दन उठाने में अब डर नही गगता। गारो winni यावश्यकता नहीं पड़ती। शराब की याद नहीं पाती---Ft, 4001 याद पाती है। शवनम उसको प्रतीक्षा कर रही होगी। पागे III करती है, मगर इस बात को गमभने रागा है। जिathi 14 मन प्रशान्त को लेकर पागन रहता है...ठीगा उगीमा 11 (1fIf उसके नाम की माला जपती होगी ? कई दिन सोचने के बाद गगर ने गोरिया। भाबनम की जीत पर उसे बधाई दी। पगंत मिलती है। पचन दिया। पिछो गाई दिनों में पारोको प्रमान 100 नहीं मिला। पारो का गन महमा प्रधान है। विगी दिशा में कोई गमापार नदी fR रस कार्य पूर्ण हो चला है । 43: मी निer Time, वापस जाना ही चाहिए। उसने फिर एक बार अम्मा से विदा ली। फिर मजार के सामने माथा टेका, घामोनी को प्रणाम किया और सागर के लिए अपने साथियों समेत चल दी। कितने दिनों से मकान वन्द पड़ा था। मकान खोलकर कमरों की सफाई की। रात के अंधेरे के साथ मन का अन्धकार गहन होता गया। कल तक प्रशान्त का कोई संदेश नहीं मिला तो वह जेल जाएगी। प्रशान्त का स्वास्थ्य ठीक होता तो अब तक भविष्य के कार्यक्रम की रूपरेखा या गई होती। सड़क वाली खिड़की खुली है । सगर अपने कमरे में सोया पड़ा है। सामने वाले लैम्प-पोस्ट का मटमैला प्रकाश खिड़की के रास्ते कमरे की दीवार पर फैला है-पड़ोसी की मरियल कुतिया बार-बार रिरयाती है"। सामने की घाटी पर जब कोई ऑटो रिक्शा या टैम्पो चढ़ता है तो उसकी घरघराहट रात की खामोशी को थर्रा देती है। सामने वाली पहाड़ी पर ऊंचे-ऊंचे खम्भों पर दो लाल बल्ब टिमटिमा रहे हैं। यहां से वायर-लैस मैसेज (तन्तु विहीन सन्देश) दूर-दूर तक भेजे जाते हैं । पारो प्रभु से प्रार्थना करती है.--"उसके मन का संदेश । ऐसे ही किसी अज्ञात माध्यम से प्रशान्त तक पहुंच जाए।" वह मात्र उसका कुशल-क्षेम जानने को आतुर है । प्रशान्त का स्वर उस तक क्यों नहीं पहुंच रहा है। दवे पांवों की आहट प्रतीत होती है । हवा के साथ सूखे पत्ते सड़क पर उड़ते हैं-उनकी खड़गड़ाहट मे कोई पग-ध्वनि खो जाती है...। फिर नि:शब्द वातावरण में कोई पग-ध्वनि, यह मात्र भ्रम नहीं है । शायद कोई उसके द्वार तक पाकर एक गया है। पारो के हृदय का स्पन्दन तीव्र हो जाता है। अकुलाहट में स्वयं प्रश्न करती है-"कौन है ?" "बाहर कौन है ?" वाहर से एक दवी अावाज-मैं प्रदीप।" "प्रदीप ये तुम हो ?"
"हा पारो, दरवाजा जल्दी खोलो।" पारो को विश्वास नहीं होता। उठकर लाइट लाती है। फिर इत्मीनान करके दरवाजा खोलती है। पूरी बाहों की गहरे नीले रंग की दोहरी जैव वाली कमीज दंगकर पारो दो विश्वास हो जाता है- बाहर प्रदीप है। प्रदीप बुझा-बुझा-सा है । पागे के पास पुर्नी खोचकर बैठ जाता है । पारो का मन किसी पागका से कांपता हैदया दात है प्रदीप, चुप क्यों हो ?" प्रदीप का कंठ रंधा हुअा है- भैया यहत बीमार है।" पारो की पारमा को पादाज सही निकली है। "क्या हुआ उन्हे" पारी अपनी फूटती रलाई को दवा लेती है । उसका स्वर भीगने लगता है । "सब कुछ अप्रत्याशित रूप से पटा, कभी कल्पना भी नहीं की थी... ऐसा भी हो सकता है।" पारो धीरज छोड़ बैठती है, चीयना चाहती है, पुन. पावेग को संयम की डोर से वापती है । इससे उसका स्वर कर्कश हो जाता है-'मुभमें सुनने का साहस है -- बतानो क्या हुमा प्रशान्त को" "कई दिनों से ज्दर था, पता कहां चलता है वहाँ क्सिकी तषि- मत फंसी है। जेलर भैया का भक्त है। उनके व्यक्तित्व और पाचरण से सभी प्रभावित हैं वहां । उनके मौन मे भयंकर माकर्षण है। जेलर की पा से उनके सैल में रात को प्रकाश दिसता था। पहले किसीको पता नहीं या भैया रात-रात भर क्या लिखते हैं ? ...सारी रात दैठे- बैठे कागज रंगा करते थे। उनके पेल मे बामने की प्रावाज सुनाई देनी थी। धीरे-धीरे ज्वर बढ़ता गया । दानिवार की रात को उन्होंने जून को उल्टो को-उनको कराह किमने मुनी होगी उस रात के अन्धकार मे ? कब बेहोश हुए होंगे किसको पता मुबह मोबचो के बाहर बरता हया सून देखकर सल खोली गई-" पारी का धर्य का बांध टूट गया और वह विवर पनी- अब मे हैं वे ?" - .
१२४ । भैया अभी जिन्दा हैं-घदरामो मत, तुमसे विना मिले भगवान के यहां भी नहीं जा पाएगे-सुबह सब ओर भाग दौड़ मच गई। सबके प्रिय थे न, बस इसीलिए। " डॉक्टर पाया, उसने परीक्षण किया। शायद आधी रात के लगभग वेहोश हुए थे-खून के उल्टी के बाद पूरी मोमबत्ती जल-जलकर गल गई थी-कागज विखरे पड़े थे, खून में लिपटे हुए। सालों का पसीना पिया हुआ गन्दा बदबूदार कम्बल खोला गया तो उसकी तह में छुपे सैकड़ों लिखे हुए पृष्ठ.....कोई उपन्यास लिख रहे हैं-शीर्पक है 'तलाश मंजिल की।' सारी रात जाग-जागकर वही लिखते थे। शायद अपनी जिन्दगी की कहानी । "फिर होश कर पाया उन्हें ?" "डॉक्टर आश्चर्य में डूबा था. -नव्ज़ लगभग गायब थी.. शरीर ठंडा था लेकिन जान बाकी थी। डॉक्टर का कहना था किसी महान् शक्ति ने उन्हें जीवित रक्खा था-यह शनिवार की रात की वात है... इतवार दिन को दो बजे भैया को होश आया।" पारो विस्फारित नेत्रों से शून्य की ओर ताकने लगी। उसे याद पाया अम्मा के साथ बाबा के मजार पर वह शनिवार की रात को गई थी। उसी रात उसने प्रशान्त के प्राणों तो भीख मांगी थी-प्रम्मा ने उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रक्खा था-बाबा ने उसकी प्रार्थना सुन ली थी-प्रशान्त को नया जीवन मिला था-कितनी अंधेरी थी वह रात? कितनी उसकी यात्मा भटकी थी...? पारो और अधिक न सोच सकी । उसके नेत्र मुंद गए । उसका मन प्रशान्त से मिलने के लिए छटपटाने लगा। अभी भी उनका स्वास्थ्य कभी भी घोखा दे सकता है। खून की उल्टी होना कोई साधारण बात नहीं है । निरन्तर ज्वर बना रहना, आधी-साधी रात तक खांसी आना और अन्त में खून की उल्टी होना-निश्चित ही उन्हें तपेदिक ने ग्रस लिया है। अंधेरी कोठरी, दूपित वातावरण, अनियमित और हानिकार भोजन ने सम्भवतः उनके रोग को उभार दिया होगा। -- ।
१२५
यदि इन्ही परिस्थितियों में उन्हें रहना पड़ा तो-जीवन के लिए पातक
सकता है।
पारो प्रगान्त से मिलना चाहती है, उमने घुघलाए मे नेत्रों में नीली
शर्ट के चमकदार बटनों को निहारते हुए कहा-"मुझे तुम्हारे भैया में
मिलना है । मैं इसके लिए वांछित कार्यवाही करूंगी।"
"उनमे मिलने की अनुमति प्रापको नहीं मिल सकेगी। एक कोई
रेणु भी हैं। उन्होंने भी अधिकारियों को प्रावेदन गत्र दिया था, यह भया
से मिलना चाहती थी लेकिन उन्हें अनुमति नहीं दी गई।"
"मार लीग में मिल पाते हैं ?"
"हन कहा मिल पाते हैं ? कौन मिलता है, कैसे मिलता है-
उनके मदेश हमसाते है यह पार जानवर क्या करेगी...?"
पारो मान्ती है पहनद उना परत नहीं है-क्ति मन को
कैने नमनार दुर्ग होकर पूछती है-"हम लोगों के लिए नये निर्देश
क्या है ?"
"पागा को ही, मैना मद मनी मांगों को भीनही रिका
किया जाने वाग है। बिछ मामान्य मा हात योगा।
चुनाव की नियाक्तिी मरे देश में ग्राम बटाद हो।
यह पारिनी दिन नही नकदी है, नोनी नीटग है।"
पानमदिन बिना शादी है। मान्दगी
रिहाई की मन में डरती है।
६०
कर रही
दहले दर-दीटिरिअर
।।मैंने
रण नियत है। उसने अपने वकील से स्पष्ट शब्दों में कहा-
पराध किया है । मैं आरोप स्वीकार करना चाहता हूं।"
वकील ने आश्चर्यान्वित होकर पूछा-'लेकिन क्यों ? अभियोजन
क्ष के अधिकांश साक्षीगण हम लोगों के परिचित व्यक्ति हैं। थोड़ा-सा
खर्च करने से शेष गवाहों को भी फोड़ा जा सकता है । जुर्म इकवाल
करने से सजा हो जाएगी?
"मैंने जुर्म किया है इसलिए मुझे सजा मिलनी चाहिए।"
वकील साहब सगर की बात पर विश्वास नहीं कर सके। उनके
मुंशीजी ने वकील साहब को समझाया ।
"हुजूर, सगर ने अपने गैंग से नाता तोड़ लिया है। अब तो इसने
भोपाल आना ही छोड़ दिया है, बाटू बतला रहा था...।"
"इसके चोरी करने न करने से मुझे क्या फर्क पड़ता है। मैं तो
अपने मुकदमे की बात कर रहा हूं। यह इकबाल करेगा, सजा इसे होगी।
बदनामी मेरी होगी...। फलां वकील के मुवक्किल को सजा हो गई।"
वकील साहव किसी भी तरह नहीं चाहते थे कि सगर जुर्म इकबाल करे
सगर किसी भी शर्त पर अपने निश्चय से डिगने को तैयार नहीं है
वकील साहव ने हर तरह से समझा-बुझाकर देख लिया ।
अन्तत: मुंशी जी मतलव की बात पर आ गए.---"देखिए जन
वकील साहब का पूरा मेहनताना आप अदा कर दीजिए। आपके
अपना जुर्म इकवाल करें-आपको जेल नहीं जाने देंगे।"
"यह कैसे हो सकता है ?"
"यही होगा-आप मेहनताना निकालिए।"
"वाको मेहनताना तो मुझे वैसे भी देना ही था..."
साहब का वाकी मेहनताना..." सगर ने जेब से नोट निकालक
पर रख दिए।
मुंशीजी ने नोटों की गड्डी गिनते हुए कहा--"देखिए ज
अपनी उन इक्कीस वर्ष से कम वतलाएंगे..."
"यह तो सच भी है। मैंने अभी इक्कीस वर्ष पूरे भी कहां
पुरे किए हो या font -II भाभी
जी" पर पोसार दिया।
इस यारी गराRN HAIt
पपिनियम पापीग मामाभाग II:10
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पापको की नाही हेगी।"
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"TITE भी धोम | Amit Ram
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कोई पानी..."
"रदिय विमा?"
"Inीमा १५ नाग raj RHTRIA
करो मायानगी 1
गील की गाप: famfar HTRAI"
"Theart zvi !" RATHfarrint गाय
मोfarमाका fmammi pune
होगी।"
गारगोमा inamri AII HIT SAIRA
मा in -TAR HIT गान
मीदी jantu | Rint ki firsy.
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समक्ष प्रस्तुत हो जाएगा तब तक प्रशान्त भैया भी घर आ जाएंगे...। सगर अपना यह निर्णय पारो को बताना चाहता है। मन में कितनी वाते संजोए वह घर पहुंचा। घर के सामने कितनी भीड़ है ? कार, तांगे, ऑटो रिक्शा, साइकिलें, सगर चौंकता है. "क्या वात हो सकती है...?" घबराकर भीड़ के एक आदमी से पूछ बैठता है-"क्या बात है, यह भीड़ क्यों इकट्ठी है ?" "अरे आपको नहीं पता, अपने प्रशान्त भैया जेल से छूटकर आए हैं। हम लोग उनके दर्शन को पाए हैं-उनका अभिनन्दन करना चाहते हैं."लेकिन"" लेकिन क्या?" "वेचारे बहुत बीमार बीमार हैं। एक-एक करके लोग दर्शन को जा रहे हैं। सीधे पुलिस अस्पताल से घर लाए गए हैं। कल शाम तक तो वेहोशी थी।" सगर भीड़ चीरकर मकान के भीतर घुसता है। उसके ही कमरे में प्रशान्त भैया को लिटाया गया है। अासपास कितने लोग उन्हें घेरे खड़े हैं । सगर को देखकर प्रशान्त भैया आंखें खोलते हैंअपना निर्जीव हाथ उठाकर सगर की ओर बढ़ाते हैं । सगर अपने दोनों हाथों में उनका हाथ थाम लेता है-तपता हुआ हाथ.."बुझे-बुझे नेव.. अस्फुट स्वर-~~-"तुम आ गए ?" "हां भैया !" फिर पारो को देखकर पूछता है.---"इतनी भीड़ क्यों रोक रखी है, भैया को विश्राम चाहिए, भीड़ नहीं...।" "कुछ लोग बहुत दूर-दूर से प्रशान्त को देखने को आए हैं...।" सगर कुछ सोचकर उठता है, बाहर द्वार तक जाता है, हाथ जोड़- कर भीड़ को सम्बोधित करता है 'भाइयो, प्रशान्त भैया आप सबसे मिलने के लिए बहुत व्याकुल हैं। आपको पता है वह कितने बीमार हैं। डॉक्टर ने उन्हें पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी है। मेरी माप सबसे प्रार्थना है-भैया को पाराम करने दें। उनकी तवियत ठीक होते + - - हो वह फिर माप सबके बीच माएगे, माग पार उनके जीवन की मवमे बडी प्रेरणा है।" भीड छटने लगती है। डॉक्टर पीछे से पाकर मगर दी गोठ थप. थपाता है- जो काम में इतनी देर मे नही कर पापा पा वह तुमने कर दिखाया है। हम सब लोग चलते हैं। प्रशान्त भैया को नोदी दवा दे दी है, हम लोग मुबह मिलेंगे।" डाक्टर भी चले गए। प्रशान्त भैया के सभी गायी भी एक-एक करके चले गए। उनका अभिन्न मित्र रजनीग भर रह गया। पागे प्रशान्त के मिरहाने बैठी है। रजनीदा प्रशान्त के पलग पर उनका हाथ अपने हाथों में पामे चंठा है। सगर फुर्सी पाग मे मीचकर बैठ जाता । भीड़ एंट जाने का समाचार मुनकर पान का मन युछ हल्का हो 70 . . मुस्कराने की चेष्टा करते हुए प्रशान्त ने कहा-"तुम गयको देगने के लिए जिन्दा रह गया। रजनीग! तुम कब वापस पाए "यस कल । मापने मुना भैया वह लोग पापको चुनाव लड़ाने को तैयारी कर रहे हैं।" चुनाव लड़ने के लिए मोर भी बहुत से लोग है--मैं नहीं...।" "तेकिन यह निर्णय लिया जा चुका है।" "मैं विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करूंगा, नुनाव मडना मेरा पंप नही है-मनुष्य मात्र के अधिकारों के लिए मेरा मंघर्ष चलता रहेगा।" "उन्ही के अधिकारों की रक्षा के लिए मापको चुनाव लाना होगा। माहोल बहुत मन्या है, जीत निश्चित है। मैंने तुम्हें बतानापान, मैंने कभी सुनाव लड़ने का मनना भी नही को जीत निश्चित है-यह में भी जानता है, मेकिन फिर भी नही। हम लोग मत्ता में पाएंगे तो हमारे कुछ माघी भी गलिया करेंगे-उस समय के लिए कुछ लोगों का रहना भाषाया ताकि हम उनके पिलाफ भी मावाज उटा ग मोर पसीनो पह भी नही पता है कि उस दिन ना यह भरीर माप भी मोगा १२८ वैठता है- समक्ष प्रस्तुत हो जाएगा तब तक प्रशान्त भैया भी घर या जाएंगे...। सगर अपना यह निर्णय पारो को बताना चाहता है। मन में कितनी बातें संजोए वह घर पहुंचा। घर के सामने कितनी भीड़ है ? कार, तांगे, ऑटो रिक्शा, साइकिलें, सगर चौंकता है---"क्या बात हो सकती है...?" घबराकर भीड़ के एक आदमी से पूछ -"क्या बात है, यह भीड़ क्यों इकट्ठी है ?" "अरे आपको नहीं पता, अपने प्रशान्त भैया जेल से छूटकर आए हैं । हम लोग उनके दर्शन को आए हैं-उनका अभिनन्दन करना चाहते हैं"लेकिन..." लेकिन क्या?" "वेचारे बहुत बीमार हैं। एक-एक करके लोग दर्शन को जा रहे हैं। सीधे पुलिस अस्पताल से घर लाए गए हैं। कल शाम तक तो बेहोशी थी।" सगर भीड़ चीरकर मकान के भीतर घुसता है। उसके ही कमरे में प्रशान्त भैया को लिटाया गया है। आसपास कितने लोग उन्हें घेरे खड़े हैं । सगर को देखकर प्रशान्त भैया आंखें खोलते हैं-अपना निर्जीव हाथ उठाकर सगर की ओर बढ़ाते हैं। सगर अपने दोनों हाथों में उनका हाथ थाम लेता है-तपता हुआ हाथ..बुझे-बुझे नेन.. अस्फुट स्वर----"तुम आ गए ?" "हां भैया !" फिर पारो को देखकर पूछता "इतनी भीड़ क्यों रोक रखी है, भैया को विश्राम चाहिए, भीड़ नहीं...।" "कुछ लोग बहुत दूर-दूर से प्रशान्त को देखने को आए हैं..." सगर कुछ सोचकर उठता है, वाहर द्वार तक जाता है, हाथ जोड़- कर भीड़ को सम्बोधित करता है भाइयो, प्रशान्त भैया आप सबसे. मिलने के लिए बहुत व्याकुल हैं। आपको पता है वह कितने बीमार हैं। डॉक्टर ने उन्हें पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी है। मेरी आप सबसे प्रार्थना है.-भैया को पाराम करने दें। उनकी तबियत ठीक होते है - १२६ ही वह फिर आप सबके बीच पाएंगे, पारा प्यार उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है।" भीड छंटने लगती है। डॉक्टर पोछे मे भाकर मगर वो पीठ थप. थपाता है-'जो काम में इतनी देर में नहीं कर पाया था वह तुमने कर दिपाया है। हम सब लोग चलते हैं। प्रशान्त भैया को नींद की दवा दे दी है, हम लोग सुबह मिलेंगे।" डाक्टर भी चले गए। प्रशान्त भया के मभी मापी भी एक-एक करके चले गए। उनका अभिन्न मित्र रजनीय मर रह गया । पागे प्रमान्त के मिरहाने बैठी है। रजनीय प्रशान्त के पलग पर उनका दाय अपने हाथों में थामे बैठा है। सगर कुर्सी पाग में बीचकर बैठ जाता है । भीड़ छंट जाने का समाचार मुनकर प्रगान्त का मन कुछ हल्का हो रहा मुस्कराने की चेष्टा करते हुए प्रशान्त ने रहा-"मुम सबको देखने के लिए जिन्दा रह गया। रजनीग! तुम कब वापस पाए ? ?" "वम कल । मापने मुना भैया वह लोग प्रापको चुनाव लहाने को तैयारी कर रहे हैं।' 'चुनाव लड़ने के लिए और भी बहुत से लोग हैं---में नहीं...।" "लेकिन यह निर्णय लिया जा चुका है ।" "मैं विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करूंगा, चुनाव लड़ना मेरा ध्येय नही है--मनुष्य मात्र के अधिकारों के लिए मेरा संघर्ष चलता रहेगा। "उन्ही के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रापको चुनाव लड़ना होगा। माहौल बहुत अच्छा है, जीत निश्चित है। "मैंने तुम्हें बतलाया न, मैने कभी चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं की। जीत निश्चित है-यह में भी जानता है, लेकिन फिर भी नहीं। हम लोग मता में पाएंगे तो हमारे कुछ माघी भी गलिया करेंगे- उम ममय के लिए कुछ लोगों का रहना प्रावश्यक है-नाति हम उनके मिलाफ भी आवाज उठा सकें और अभी नो रह भी नहीं पता है कि जम दिन नक यह गरीर साय भी दे सकेगा " " १३० - "ऐसा मत कहिए ?" "क्यों, अब इस शरीर में शेप ही क्या है ? किसी भी क्षण प्राण- पखेरू उड़ सकते हैं ? पारो के नेत्रों की कोरों से दो अश्रु विन्दु लुढ़क पाए...। पारो चाहती है प्रशान्त के सामने कोई समस्या न उठाई जाए.-जब तक वह पूर्णरूप से स्वस्थ न हो । प्रार्थना के स्वर में रजनीश से कहती है. "अव इन्हें सो जाना चाहिए।" "हां भैया, आप अब विश्राम करें, मैं चलूंगा।" रजनीश उठकर खड़ा हो गया। रजनीश चला गया। प्रशान्त को भी नींद आने लगी। आंखें नींद के बोझ से झुकने लगीं। पारो और सगर के चेहरे धुंधलाए-से प्रतीत होते हैं."निद्रा ने तप्त अधरों से उसकी पलकों को चून लिया। यात्रा की थकान के कारण सगर भी शीघ्र सो गया। पारो जाग रही है, नींद नहीं आती.. बहुत देर तक प्रशान्त के सिरहाने खड़ी-खड़ी उसे निहारती रही.. अांखों के चारों ओर कितने गहरे काले गड्ढे पड़ गए हैं। दाढ़ी फिर बढ़ पाई है, सिर के बाल कितने उलझे हुए हैं । सिरहाने पड़ी पारामकुर्सी पर पारो पुनः बैठ जाती है. सुनहरे उलझे बालों को धीरे-धीरे सहलाती है.. मानसिक संताप ने पारो को भी भीतर ही भीतर खोखला करना शुरू कर दिया है। आरामकुर्सी पर पड़े-पड़े पारो को भी कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला। कितनी रात बीत गई कुछ पता नहीं ? प्रशान्त खांस रहा है... नींद में पारो को लगता है। खांसी की आवाज बढ़ती जाती है...पारो चौंककर उठ बैठती है। प्रशान्त पलंग पर बैठा है, सीने को थामे हुए झुका चला जा रहा है खांसी के साथ.. पारो उसकी पीठ सह- लाती है। पानी का गिलास भरकर देती है। खांसते-खांसते उसकी अांखों से आंसू निकल आए हैं.. पारो निःसंकोच भाव से अपने आंचल । के छोर से उमके प्रांमू छती है.""पानी पीने में उगे माराम मिनता है । तकियों के सहारे प्रशान्त बैठ जाता है। सांम का फूलना बंद होने लगता है लेकिन प्रशान्त के चेहरे पर एक मजीव-मी घबराहट है... एक काली परछाई उसकी प्रोपों में नाचती है...एक दुर को मावान उसके कानों से टकराती है। प्रशान्त घबराकर कहता है-पारो... यहाँ प्रामो, मेरे पास बैटो।" पारो यन्त्रवत् उसके पास बैठ जाती है । प्रशान्त उसका हाय मपने हायों मे थाम लेता है--'तुम्हें कुछ नहीं दे सका"एक उपन्यास लिसा है जेल में.."1 उसका नाम है 'तलाश मजिल की'। इस शरीर का मुझे भरोसा नहीं है...कव...?" पारो अपना हाथ उसके मुह पर रस देती है। पारो फफक-फफक- कर रो रही है। लेकिन प्रशान्त अपने मन की बात पूरी कहना चाहता है। उसका हाय मुह से हटाता है मोर कहता है-"किमी भी सत्य को झुठ- लाया नहीं जा सकता."मैं न रहूं तो मेरा यह उपन्यास छपवा सेना... मेरी इच्छा थी इसको पुस्तक के रूप में देखने की लेकिन..." पारो स्वयं को संयत करती है । उसके स्वर में तिलमिलाहट होते हुए भी एक अडिग विश्वास की झलक है-'पारो को प्रभु ने बहुत कुछ नहीं दिया है लेकिन जो कुछ दिया है उसे कोई वापस नहीं ले सकेगा जब तक माप बीमार हैं."माप पर केवल मेरा मधिकार है । जब माप स्वस्थ हो जाएं तब फिर दुनिया के अनुशासन पापको बाघ सकेंगे। अभी नहीं बिल्कुल नहीं...। मैं, जिस दिन डॉक्टर अनुमति देगा मापको अपने साथ ले जाऊंगी-वावा के मजार पर । उन्ही की गरण में रहकर पाप स्वस्थ होंगे । कल उपन्यास प्रेस मे चला जाएगा। सगर मेहनत-मजदूरी करेगा"इसे छपवाएगा.. फिर सारी दुनिया मापरे उपन्यास को पड़ेगी.. भापको कुछ भी नहीं हो सकता.. माप मेरे लिए जिन्दा रहेगे"माप दुनिया में तमाम दुग्वी प्रात्मानो के लिए जिन्दा रहेगे ।" पारो भावातिरेक से कापने लगी और पुन एक बार फूट फूटकर रो पड़ी." t २ प्रशान्त ने कांपते हाथों से पारो का सिर अपने वक्षस्थल पर साध लया-उसका सिर प्यार से सहलाने लगा। पारो का स्वर्ग यही है-यहीं उसे शान्ति मिलती है उसकी प्रात्मा की प्यास बुझती है--कोई शक्ति प्रशान्त को उससे अलग नहीं कर सकती। अंधेरे कमरे में प्रशान्त के सीने पर सिर रखे पारो की दृष्टि दूर- दूर तक भागने लगी कोई बहुत विशाल प्रायोजन है, ऊंचे ऊंचे मण्डप... असंख्य दीप और संगीत की मधुर स्वर-लहरी ऊंचे मंच पर बैठा व्यक्ति प्रशान्त है। लोग उसके गले में पुष्प मालाएं डाल रहे हैं. एक अन्य भव्य मूर्ति मंच पर है.."प्रशान्त के उपन्यास के विमोचन का आयोजन है-देश भर से बड़े-बड़े साहित्यकार पाए हैं... प्रशान्त का गला पुष्पमालाओं से भर गया है।
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