Adarsh Library, Jaipur
Kavve Or Kala Pani
Front matter
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कव्वे और काला पानी
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कव्वे और काला पानी
निर्मल वर्मा
राजकमल प्रकाशन
नयी दिल्ती पटना
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भोपाल के भले, मोले, अभूले दिनों की याद में
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धूप का एक टुकड़ा क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नही- मेरे लिए यह कोना ही काफी है । आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी वेंच पर मयो नही जाती ? इतना बडा पार्क-चारों तरफ खाली बेचें -मैं आपके पास ही क्यों धंसना चाहती हूँ ? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूं-जिस बेंच पर आप बैठे हैं. वह मेरी है। जी हां, मैं यहां रोज बैठती हूँ। नहीं, आप गलत न समझें । इस बेंच पर मेरा कोई नाम नहीं लिप्ता है । भला म्युनिसिपलिटी की बेंचों पर नाम कमा? लोग आते हैं, घडो-दो घडो वैठते हैं, और फिर चले जाते हैं। किसी को याद भी नहीं रहता कि फलां दिन फला आदमी यहाँ बैठा था। उमके जाने के बाद बैंच पहले की तरह ही साली हो जाती है। अव कुछ देर बाद कोई नया आगन्तुक आकर उम पर बैठना है, तो उसे पता भी नहीं चलता कि उससे पहले वहाँ कोई स्कूल की बच्ची या अकेली बुढिया था नशे में धुत्त जिप्सी बैठा होगा। नही जी, नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहाँ आदमी टिककर रहे-तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर को के- हालांकि कमी-कभी मैं सोचती हूँ कि कत्रों पर नाम न भी रहें, तो भी सास अन्तर नही पडता । कोई जीता-जागता आदमी जानवृझकर दूसरे की कब्र में घुमना पसन्द नही करेगा! बाप उधर देख रहे हैं-घोड़ा गाड़ी की तरफ ? नहीं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। शादीच्याह के मौकों पर लोग अब भी घोडागाडी इस्तेमाल करते हैं.. मैं तो हर रोज देखती हूँ। इसीलिए मैंने यह च अपने लिए चुनी है। यहां बैठकर आंखे सीधी गिरजे पर जाती हैं-आपको अपनी धूप का एक टुकड़ा/9 . गर्दन टेढ़ी नहीं करनी पड़ती। बहुत पुराना गिरजा है । इस गिरजे में शादी करवाना बहुत बड़ा गौरव माना जाता है। लोग आठ-दस महीने पहले से अपना नाम दर्ज करवा लेते हैं। वैसे सगाई और गादी के बीच इतना लम्बा अन्तराल ठीक नहीं । कभी-कभी बीच में मन-मुटाव हो जाता है, और ऐन विवाह के मुहूर्त पर वर-वधू में से कोई भी दिखायी नहीं देता। उन दिनों यह जगह सुनसान पड़ी रहती है। न कोई भीड़, न कोई घोड़ा-गाड़ी। भिखारी भी खाली हाथ लौट जाते हैं। ऐसे ही एक दिन मैंने सामनेवाली वेंच पर एक लड़की को देखा था। अकेली बैठी थी और सूनी आँखों से गिरजे को देख रही थी। पार्क में यही एक मुश्किल है। इतने खुले में सब अपने-अपने में वन्द बैठे रहते हैं । आप किसी के पास जाकर सान्त्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते। आप दूसरों को देखते हैं, दूसरे आपको। शायद इससे भी कोई तसल्ली मिलती होगी। यही कारण है, अकेले कमरे में जवं तकलीफ दुश्वार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं। सड़कों पर । पब्लिक पार्क में। किसी पब में । वहाँ आपको कोई तसल्ली न भी दे, तो भी आपका दुख एक जगह से मुड़कर दूसरी तरफ करवट ले लेता है। इससे तकलीफ का वोझ कम नही होता, लेकिन आप उसे कुली के सामान की तरह एक कन्धे से उठाकर दूसरे कन्धे पर रख देते हैं। यह क्या कम राहत है ? मैं तो ऐसा ही करती हूँ-सुबह से ही अपने कमरे से बाहर निकल आती हूं। नहीं, नहीं-आप गलत न समझें-मुझे कोई तकलीफ नहीं। मैं धूप की खातिर यहाँ आती हूँ-आपने देखा होगा, सारे पार्क में सिर्फ यही एक वेंच है, जो पेड़ के नीचे नहीं है। इस वेंच पर एक पत्ता भी नहीं झरता--फिर इसका एक बड़ा फायदा यह भी है कि यहां से मैं सीधे गिरजे की तरफ देख सकती हूँ-लेकिन यह शायद मैं आपसे पहले ही कह चुकी हूँ। आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं। पहले दिन यहाँ आये---और सामने घोड़ा- गाड़ी! आप देखते रहिए---कुछ ही देर में गिरजे के सामने छोटी-सी भीड़ जमा हो जायेगी। उनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं, जो न वर को जानते हैं, न वधू को। लेकिन एक झलक पाने के लिए घण्टों बाहर खड़े रहते हैं। । 10/कव्वे और काला पानी आपके बारे में मुझे मालूम नही, लेकिन कुछ चीजों को देखने की उत्सुक्ता जीवन-भर खत्म नही होती। अब देखिए, आप इम पेरेम्युलेटर के आगे बैठे घे। पहली इच्छा यह हुई, सांककर मोतर देणूं, जैसे आपका बच्चा औरों से अलग होगा। अलग होता नही । इम उम्र में मारे बच्चे एक जमे ही होते है-मुंह में चूमनी दबाये लेटे रहते हैं। फिर भी जब मैं किसी पेरेग्युलेटर के सामने से गुजरती हूँ, तो एक बार भीतर प्रोकने की जबरदस्त इच्छा होती है। मुझे यह सोचकर काफी हैरानी होती है कि जो चीजे हमेशा एक जमी रहती हैं, उनमें ऊबने के बजाय आरती मबसे ज्यादा उन्ही को देखना चाहता है. जैम प्रेम मे लेटें बच्चे या नव-विवाहित जोडे को घोडा- गाडी या मुदों की अर्थी 1 आपने देखा होगा, ऐमी चीजो के इदं-गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है। अपना बस हो या न हो, पांव पुद-ब-खुद उनके पाम विचे चले आते हैं । मुझे कभी-कभी यह मोचकर बडा अचरज होता है कि जो चीजें हमे अपनी जिन्दगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वे चीजे हमारी पकद के बाहर हैं । हम न उनके बारे में कुछ मोच माते हैं, न किसी दूमरे को बता सकते हैं । मैं आपसे पूछती हूं. क्या आप अपनी जन्म की घड़ी के बारे में कुछ याद कर सकते हैं, या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं, या अपने विवाह के अनुभव को हूबहू अपने भीतर दुहरा सकते हैं ? आप हम रहे हैं. “नहीं मेरा मनलब कुछ और था। कौन ऐसा आदमी है, जो अपने विवाह के अनुभव को याद नही कर सकता ? मैने सुना है, कुछ ऐम देश है, जहाँ जब तक लोग नगे में धुत नहीं हो जाते, तब तक विवाह करने का फैसला नहीं लेते "और बाद में उन्हें उमके बारे में कुछ याद नहीं रहता। नही जी, मेरा मतलव ऐसे अनुभव मे नही था। मेरा मतलब पा, क्या आप उस क्षण को माद कर सकते हैं, जब आप एकाएक यह फैमला कर लेते हैं कि आप अलग न रहकर किमी दूसरे के साथ रहेंगे "जिन्दगी भर! मेरा मतलब है, क्या आप सहो-मही उन बिन्दु पर अंगुली रख सकते हैं, जब आप अपने भीतर के अकेलेपन को थोड़ा-सा सरकाकर किसी दूसरे को यहाँ भाने देते हैं है-''जी हो"उमी तरह जैसे कुछ देर पहले पारने थोड़ा-सा सरकार मुझे बैंच पर आने दिया था और अब मैं आपमे ऐमे बातें कर रही हूँ, मानो आको बरसों से जानती हूँ।
- लीजिए, अब दो-चार सिपाही भी गिरजे के सामने खड़े हो गये। अगर इसी तरह भीड़ जमा होती गयी, तो आने-जाने का रास्ता भी रुक जायेगा । आज तो खैर धूप निकली है, लेकिन सर्दी के दिनों में भी लोग ठिठुरते हुए खड़े रहते हैं। मैं तो बरसों से यह देखती आ रही हूँ"कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि पन्द्रह साल पहले मेरे विवाह के मौके पर जो लोग जमा हुए थे, वही लोग आज भी हैं, वही घोड़ा-गाड़ी, वही इधर-उधर घूमते हुए सिपाही"जैसे इस दौरान कुछ भी नहीं बदला है । जी हाँ-मेरा विवाह भी इसी गिरजे में हुआ था। लेकिन यह मुद्दत पहले की बात है। तव सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के दरवाजे पर आकर ठहर सके। हमें उसे गली के पिछवाड़े रोक देना पड़ा था "और मैं अपने पिता के साथ पैदल चलकर यहां तक आयी थी। सड़क के दोनों तरफ लोग खडे थे और मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था कि कहीं सबके सामने मेरा पांव न फिसल पड़े। पता नहीं, वे लोग अब कहाँ होंगे, जो उस रोज भीड़ में खड़े मुझे देख रहे थे। आप क्या सोचते हैं "अगर उनमें से कोई माज मुझे देखे, तो क्या पहचान सकेगा कि वेंच पर बैठी यह अकेली औरत वही लड़की है, जो सफेद पोशाक में पन्द्रह साल पहले गिरजे की तरफ जा रही थी ? सच बताइए, क्या पहचान सकेगा? आदमियों की तो बात मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि वह घोड़ा मुझे जरूर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींचकर लाया था. 'जी हां, घोड़ों को देखकर मैं हमेशा हैरान रह जाती । कभी आपने उनकी आंखो में झांककर देखा है ? लगता है, जैसे वे किसी बहुत ही आत्मीय चीज से अलग हो गये हैं, लेकिन अभी तक अपने अलगाव के आदी नही हो सके हैं । इसीलिए वे आदमियों की दुनिया में सबसे अधिक उदास रहते हैं। किसी चीज का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं। वे लोग जो आखीर तक आदी नहीं हो पाते या तो घोड़ों की तरह उदासीन हो जाते हैं, या मेरी तरह धूप के एक टुकड़े की खोज में एक वेंच से दूसरी वेंच का चक्कर लगाते रहते हैं । क्या कहा आपने ? नहीं, बापने शायद मुझे गलत समझ लिया। मेरे कोई बच्चा नहीं यह मेरा सौभाग्य है । बच्चा होता, तो शायद मैं कभी अलग । 12/कव्वे और काला पानी - । नहीं हो पाती। आपने देखा होगा, आदमी और औरत में प्यार न भी रहे, तो भी बच्चे को पातिर एक-दूमरे के माय जुड़े रहते हैं । मेरे माय कभी ऐमी रुकावट नहीं रही। इस लिहाज में मैं बहुत सुखी हूं -अगर मुख का मतलब है कि हम अपने अकेलेपन को खुद चुन मकें। लेकिन चुनना एक बान है, आदी हो सकना बिलकुल दूसरी बात। जब शाम को धूप मिटने लगती है, तो मैं अपने कमरे में चली जाती हूँ। लेकिन जाने मे पहले मैं कुछ देर उस पव मे जरूर बैठनी हूं, जहां वह मेरी प्रतीक्षा करता था। जानते हैं, उस पर का नाम? बोनापार्ट-जी हां, कहते हैं, जब नेपोलियन पहली बार इस शहर में माया, तो उस पर मे बैठा था लेकिन उन दिनों मुझे इसका कुछ पता नहीं था । जब पहली बार उसने मुझसे कहा कि हम बोनापार्ट के सामने मिलेंगे, तो मैं मारी शाम शहर के दूसरे मिरे पर खड़ी रही, जहाँ नेपोलियन पोहे पर बैठा है। आपने कभी अपनी पहली डेट इस तरह गुगारी है कि आप सारी शाम पय के सामने सडे रहें और आपकी मगेतर पनिक-स्टेचू के नीचे। बाद में जो उमका शौक था, वह मेरी आदत बन गयी। हम दोनो हर शाम कभी उस जगह जाते, जहाँ मुझे मिलने से पहले वह बैठता था, या उम शहर के उन इलाको मे घूमने निकल जाते, जहाँ मैंने बचपन गुजारा पा । यह आपको कुछ अजीब नहीं लगता कि जब हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान मे उसके माप रहना चाहते हैं, बल्कि उनके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जब वह हमारे साप नहीं था। हम इतने लालची और ईर्ष्यालु हो जाते हैं कि हमें यह सोचना मी अमहनीय लगता है कि कभी ऐसासमय रहा होगा, जब वह हमारे वगैर जीता था, प्यार करता था, साता-जागता था। फिर अगर कुछ साल उसी एक आदमी के साथ गुजार दें, तो यह कहना भी असम्भव हो जाता है कि कौन-मी आदत आपको अपनी है, कौन-सी आपने दूसरे से धुरायो है "जी, हो. ताश के पत्तों की तरह वे इस तरह आपमें घुल-मिल जाती हैं कि आप किसी एक पत्ते को उठाकर नहीं कह सकते कि यह पत्ता मेरा है, और वह पत्ता उसका.. देखिए, कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि मरने से पहले हममें से हर एक को यह । छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें। अपने अतीत की तहों को प्याज के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जायें. आपको हैरानी होगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुंचेंगे, मां-बाप, दोस्त, पति'सारे छिलके दूसरों के, आखीर की सूखी डण्ठल आपके हाथ में रह जायेगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है । देखिए, अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेला मरता है। मैं यह नहीं मानती। वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था। वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया लेकर जाता है। इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी किस्म का दुख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए खत्म हो गया है। अरे देखिए ---वह जाग गया। जरा पेरेम्वुलेटर हिलाइए, धीरे-धीरे हिलाते जाइए। अपने आप चुप हो जायेगा 'मुंह में चूसनी इस तरह दवा- कर लेटा है, जैसे छोटा-मोटा सिगार हो! देखिए---कैसे ऊपर वादलों की तरफ टुकुर-टुकुर ताक रहा है। मैं जब छोटी थी, तब लकड़ी लेकर वादलों की तरफ इस तरह घुमाती थी, जैसे वे मेरे इशारों पर ही आकाश में चल रहे हों आप क्या सोचते हैं ? बच्चे इस उम्र में जो कुछ देखते हैं या सुनते हैं, वह क्या बाद में उन्हें याद रहता है ? रहता जरूर होगा।''कोई आवाज, कोई झलक, या कोई आहट, जिसे बड़े होकर हम उम्र के जाले में खो देते हैं। लेकिन किसी अनजाने मौके पर, जरा-सा इशारा पाते ही हमें लगता है कि इस आवाज को कहीं हमने सुना है, यह घटना या ऐसी ही कोई घटना पहले कभी हुई है और फिर उसके साथ-साथ बहुत-सी चीजें अपने आप खुलने लगती हैं, जो हमारे भीतर अरसे से जमा थीं, लेकिन रोजमर्रा की दौड़-धूप में जिनकी तरफ हमारा ध्यान जाता नहीं, लेकिन वे वहाँ हैं, धात लगाये कोने में खड़ी रहती हैं.-मौके की तलाश में-और फिर किसी घड़ी सड़क पर चलते हुए या ट्राम की प्रतीक्षा करते हुए या रात को सोने और जागने के बीच वे अचानक आपको पकड़ लेती हैं और तब आप कितना ही हाथ-पांव क्यों न मारें, कितना ही क्यों न छटपटायें, वे आपको छोड़ती - , 14/कव्वे और काला पानी नहीं। मेरे साप एक रात ऐसे ही हुआ या" हम दोनो मो रहे थे और तब मझे एक अजीद-मा सटका मुनायो दिया-- बिल्कुल वैमे ही, जमे बचपन में मैं अपने अकेले कमरे मे हडबडाकर जाग उठती थी और महसा यह भ्रम होता था कि दूसरे कमरे मे मो और बाबू नहीं हैं-और मुझे लगता था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं देख सकेंगी और तब मैं घोषने लगती थी। लेकिन उस रात में चीनी-चिल्लायो नहीं । मैं विस्तर से उठकर देहरी तक आयो, दरवाजा खोलकर बाहर झांका, बाहर कोई न था। वापस लौटकर उसकी तरफ देखा। वह दीवार की तरफ मुंह मोडकर सो रहा पा, जमे वह हर रात सोता था। उसे कुछ भी सुनायी नही दिया था। तर मुझे पता चला कि वह खटका कही वाहर नही, मेरे भीतर हुआ था। नहीं, मेरे भीतर भी नहीं, अंधेरे में एक चिमगादड की तरह वह मुझे छूना हुआ 'निकल गया था-न बाहर, न भीतर, फिर भी चारों तरफ फडफडाता हुआ। मैं पलंग पर आकर बैठ गयी, जहां वह लेटा था और धीरे-धीरे उमकी देह को छूने लगी। उमकी देह के उन सब कोनों को छूने लगी, जो एक जमाने में मुझे तसल्ली देते थे। मुझे यह अजीब-सा लगा कि मैं उसे छू रही हूँ और मेरे हाय माली-के-खाली वापम लौट आते हैं । वरसो पहले को गंज, जो उसके अंगों में निकलकर मेरी आत्मा में बस जाती थी, अब कहीं न थी। मैं उसी तरह उमकी देह को टोह रही थी, जैसे कुछ लोग पुराने संहहरो पर अपने नाम खोजते हैं, जो मुद्दत पहले उन्होंने दीवारो पर लिसे थे। लेकिन मेरा नाम वहाँ कही न पा। कुछ और निशान थे, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था। जिनका मुममे दूर का भी वास्ता न था। मैं रात-भर उसके मिरहाने बैठी रही और मेरे हाप मृर्दा होकर उसकी देह पर पड़े रहे "मुझे मह भयानक-मा लगा कि हम दोनो के बीच जो सालीपन या गया था, वह मैं किमी से नहीं कह सकती : जी हाँ-अपने वकील में भी नही, जिन्हें में अरमे में जानती थी। वे समझे, में मठिया गयी हूँ। कमा खटका! क्या मेरा पति किसी दूसरी औरत के माय जाता था? क्या वह मेरे प्रति कर पा ? जी हो.. उसने प्रश्नों को ही लगा दी और में थी कि एक ईडियट की तरह उनका -- पकाकतक-15 . ताकती रही। और तब मुझे पहली बार पता चला कि अलग होने के कोर्ट, कचहरी जाना जरूरी नहीं है। अक्सर लोग कहते हैं कि अपना दूसरों के साथ बांटकर हम हल्के हो जाते हैं । मैं कभी हल्की नहीं होती। हो जी, लोग दुख नहीं बांटते, सिर्फ फैसला करते हैं-कोन दोषी है और न निर्दोष मुश्किल यह है, जो एक व्यक्ति आपकी दुखती रग को सही- ही पहचान सकता है, उसी से हम अलग हो जाते हैं इसीलिए मैं अपने मुहल्ले को छोड़कर शहर के इस इलाके में आ गयी, यहां मुझे कोई नहीं जानता । यहाँ मुझे देखकर कोई यह नहीं कहता कि देखो, यह औरत अप पति के साथ आठ वर्ष रही और फिर बलग हो गयी। पहले जब कोई इत तरह की बात कहता था, तो मैं बीच सड़क पर खड़ी हो जाती थी। इच्छा होती थी, लोगों को पकड़कर शुरू से आखीर तक सबकुछ बताऊं,: 'कैसे हम पहली शाम अलग-अलग एक-दूसरे की प्रतीक्षा करते रहे थे-वह पव के सामने, मैं मूर्ति के नीचे। कैसे उसने पहली बार मुझे पेड़ के तने से सटा- कर चूमा था, कैसे मैंने पहली बार डरते-डरते उसके वालों को छुआ था। जी हां, मुझे यह लगता था कि जब तक मैं उन्हें यह सच नहीं बता दूंगी, तव तक उस रात के बारे मे कुछ नहीं कह सकूँगी, जब पहली बार मेरे भीतर खटका हुआ था और वरसों बाद यह इच्छा हुई थी कि मैं दूसरे कमरे में भाग जाऊं, जहाँ मेरे मां-बाप सोते थे लेकिन वह कमरा खाली था। जी, मैंने कही पढ़ा था कि बड़े होने का मतलब है कि अगर आप आधी रात को जाग जायें और कितना ही क्यों न चीखें-चिल्लायें, दूसरे कमरे से कोई नहीं भायेगा। वह हमेशा खाली रहेगा। देखिए, उस रात के बाद मैं कितनी बड़ी हो गयी हूँ! लेकिन एक बात मुझे अभी तक समझ में नहीं आती। भूचाल बमबारी की खबरें अखबारों में छपती हैं। दूसरे दिन सवको पता चल जाव है कि जहां बच्चों का स्कूल था, वहां खंडहर हैं, जहाँ खंडहर थे, व उड़ती धूल । लेकिन जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को व खबर नही होती-उस रात के बाद दूसरे दिन मैं सारे शहर में अवे घूमती रही और किसी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं "जब मैं पहली इस पार्क मे आयी थी, इसी बेंच पर बैठी थी, जिस पर आप बैठे हैं। 16कन्वे और काला पानी जी हाँ, उम दिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं उमी गिरजे के सामने बैठी हूं, जहाँ मेरा विवाह हुआ पातव सडक इतनी चौड़ी नहीं थी कि हमारी पोड़ा-गाडी सोधे गिरजे के सामने आ सके । हम दोनो पैदल चलकर यहाँ माये ये. आप सुन रहे हैं, ओगंन पर संगीत ? देखिए, उन्होंने दरवाजे सोल दिये हैं। संगीत की आवाज यहाँ तक आती है। इमे सुनते ही मुझे पता चल जाता है कि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा है, अंगूठियो की अदला-बदली की है। बस, अव योडी-सी देर और है-वे अब वाहर आनेवाले हैं। लोगो में अव इतना चैन कहां कि शान्ति से पड़े रहें, अगर आप जाकर देखना चाहें, तो निश्चिन्त होकर चले जायें। मैं तो यहाँ बैठी ही हूँ। आपके बच्चे को देखती रहूंगी। क्या कहा आपने ? जी हाँ, शाम होने तक यही रहती हूँ। फिर यहां सर्दी हो जाती है। दिन-भर में यह देखती रहती हूं कि धूप का टुकड़ा किम बेंच पर है-उमौ वेंच पर जाकर बैठ जाती है। पार्क का कोई ऐसा कोना नही, जहाँ मैं घड़ी, आध घड़ी नही बैठती। लेकिन यह बेंच मुझे सबसे अच्छी लगती है। एक तो इस पर पत्ते नहीं शरते और दूसरे बरे, आप जा रहे हैं ?... ।
दूसरी दुनिया बहुत पहले मैं एक लड़की को जानता था। वह दिन-भर पार्क में खेलती थी। उस पार्क में बहुत से पेड़ थे, जिनमें मैं बहुत कम को पहचानता था। मैं मारा दिन लायब्रेरी में रहता था और जब शाम को लौटता था, तो वह उन पेड़ों के बीच बैठी दिखायी देती थी। बहुत दिनों तक हम एक-दूसरे से नहीं बोले । मैं लन्दन के उस इलाके में सिर्फ कुछ दिनों के लिए ठहरा था। उन दिनों मैं एक जगह से दूसरी जगह वदलता रहता था, सस्ती जगह की तलाश वे काफी गरीवी के दिन थे। वह लड़की भी काफी गरीव रही होगी, यह मैं आज सोचता हूँ। वह एक माधा-उधड़ा स्वेटर पहने रहती, सिर पर कत्थई रंग का टोप, जिसके दोनों तरफ उसके वाल निकले रहते। कान हमेशा लाल रहते और नाक का ऊपरी सिरा भी-क्योंकि वे अक्तूबर के अन्तिम दिन थे--सदियां शुरू होने से पहले के दिन और ये शुरू के दिन कभी-कभी असली सदियों से भी ज्यादा क्रूर होते थे। सच कहूँ तो ठण्ड से बचने के लिए ही मैं लायब्रेरी आता था। उन दिनों मेरा कमरा वर्फ हो जाता था। रात को सोने से पहले मैं अपने सब स्वेटर और जुराचे पहन लेता था, रजाई पर अपने कोट और ओवरकोट जमा कर लेता था लेकिन ठण्ड फिर भी नहीं जाती थी। यह नहीं कि कमरे में हीटर नहीं था, किन्तु उसे जलाने के लिए उसके भीतर एक शिलिंग डालना पड़ता था। पहली रात जब मैं उस कमरे में सोया था, तो रात-भर 18/ कच्चे और काला पानी । उस हीटर को पंमे खिलाता रहा-हर आध घण्टे वाद उमको जठराग्नि शान्त करनी पड़ती थी। दूसरे दिन, मेरे पास नाश्ते के पैसे भी नहीं बचे थे। उसरे बाद मैंने हीटर को अलग छोड़ दिया। मैं रात-भर ठण्ड से वापता रहता, लेकिन यह तसल्ली रहती कि वह भी भूखा पड़ा है। वह मेज पर ठण्डा पडा रहता--मैं बिस्तर पर और इस तरह हम दोनों के बीच शीत. युद्ध जारी रहता। मुबह होते ही मैं जल्दी-मे-जल्दी लायनेरी चला आना। पता नहीं, कितने लोग मेरी तरह वहाँ आते थे-लायब्रेरी सुलने से पहले ही दरवाजे पर लाइन बनाकर खड़े हो जाते थे। उनमें से ज्यादातर बढे लोग होते थे, जिन्हें पेंशन बहुत कम मिलती थी, किन्तु सर्दी मबसे ज्यादा लगती थी। मेजों पर एक-दो पिता खोलकर वे बैठ जाते । कुछ ही देर बाद मैं देखता, मेरे दायें बायें मव लोग मो रहे हैं। कोई उन्हें टोक्ता नहीं था। एक-आध घण्टे बाद लायग्रेरीका कोई कर्मचारी वहाँ चक्कर लगाने आ जाता, खुली क्तिावो को बन्द कर देता और उन लोगो को धीरे-मे हिला देना, जिनके पुरटि दूसरो की नीद या पढाई मे खलल डालने लगे हो। ऐसी ही एक ऊंघती दोपहर में मैंने उस लड़की को देखा था- सायब्रेरी की लम्बी खिड़की से। उसने अपना वस्ता एक बच पर रख दिया था और खुद पेड़ों में पीछे छिप गयी थी। वह कोई धूप का दिन न था, इसलिए मुझे कुछ हैरानी हुई थी कि इतनी ठण्ड मे वह लहकी बाहर खेल रही है। यह बिलकुल अकेली थी। बाकी बचें साली पड़ी थी। और उम दिन पहली बार मुझे यह जानने की तो उत्सुकता हुई थी कि वे कौन-से खेल हैं, जिन्हें कुछ बच्चे अकेले में खेलते हैं। दोपहर होते ही वह पार्क में आती, वेंच पर अपना बैग रख देती और फिर पेड़ो के पीछे भाग जाती।मैं कभी-कभी किताव से सिर उठाकर उसकी ओर देख लेना। पांच बजने पर सरकारी अस्पताल का गजर सुनायी देता। घण्टे बजते ही, वह लहकी जहाँ भी होती, दोडते हुए अपनी वैच पर आ चली। वह वस्ते को गोद में रसकर चुपचाप बैठी रहती, जब तक दूसरी तरफ से एक महिला न दिखायी दे जाती। मैं कभी उन महिला का चेहरा ठीक से न देख मका। वह हमेशा नसं की सफेद पोशाक में आती थी। और ।
। - इससे पहले कि वेंच तक पहुंच पातीं-वह लड़की अपना धीरज खोकर भागने लगती और उन्हें बीच में ही रोक लेती। वे दोनों गेट की तरफ मुड़ जाते और मैं उन्हें उस समय तक देखता रहता, जब तक वे आंखों से मोझल न हो जाते। मैं यह सब देखता था, हिचकॉक के हीरो की तरह, खिड़की से बाहर, जहां यह पैण्टोमिम रोज दुहराया जाता था। यह सिलसिला शायद सदियों तक चलता रहता, यदि एक दिन अचानक मौसम ने करवट न ली होती। एक रात सोते हुए मुझे सहसा अपनी रजाई और उस पर रखे हुए कोट बोझ जान पड़े। मेरी देह पसीने से लथपथ थी, जैसे बहुत दिनों बाद बुखार से उठ रहा हूँ। खिड़की खोलकर वाहर झांका, तो न धुन्ध, न कोहरा; लन्दन का आकाश नीलो मखमली डिविया-सा खुला था, जिसमें किसी ने ढेर-से तारे भर दिये थे। मुझे लगा, जैसे यह गर्मियों की रात है और मैं विदेश में न होकर अपने घर की छत पर लेटा हूँ। अगले दिन खुलकर धूप निकली थी, मैं अधिक देर तक लायब्रेरी में नहीं वैठ मका । दोपहर होते ही मैं बाहर निकल पड़ा और घूमता हुआ उस रेस्तरां में चला आया, जहाँ मैं रोज खाना खाने जाया करता था। वह एक सस्ता यहूदी रेस्तरां था। वहाँ सिर्फ डेढ़ शिलिंग में कोशर गोश्त, दो रोटियाँ और वियर का एक छोटा गिलास मिल जाता था। रेस्तरां की यहूदी मालकिन, जो युद्ध मे पहले लियूनिया से आयी थीं, एक ऊंचे स्टूल पर बैठी रहतीं। काउण्टर पर एक कैश-वॉक्स रखा रहता और उसके नीचे एक सफेद सियामी विल्ली गाहकों को घूरती रहती। मुझे शायद वह थोड़ा-बहुत पहचानने लगी थी, क्योंकि जितनी देर में खाता रहता, उतनी देर वह अपनी हरी आँखों से मेरी तरफ टुकुर-टुकुर ताकती रहती। गरीवी और ठण्ड और अकेलेपन के दिनों मे विल्ली का सहारा भी बहुत होता है, यह मैं उन दिनों सोचा करता था। में यह भी सोचता था कि किमी दिन में भी ऐसा हो हिन्दुस्तानी रेस्तरां खोलूंगा और एक-साथ तीन विल्लियो पालूंगा। - रेस्तरां से बाहर आया, तो दोबारा लायब्रेरी जाने की इच्छा मर गयी। लम्बी मुद्दत बाद उस दिन घर से चिट्ठियां और अखबार आये थे। मैं उन्हें 20/कव्वे पोraar me पार्क की खुली धूप मे पढना चाहता था। मुझे हल्का-सा माश्चर्य हुआ, अब मेरी नजर पार्क के फूलो पर गयो। वे बहुत छोटे फूल थे, जो घाम के बीच अपना सिर उठाकर खडे थे। इन्हीं फूलो के बारे में शायद जीसम ने कहा था, लिलीज़ ऑफ द फोल्ड, ऐसे फूल, जो आनेवाले दिनो के बारे में नहीं सोचते । F-2785 वे गुजरी हुई गर्मियों की याद दिलाते थे। मैं घास के बीच उन फलो पर चलने लगा। 2BOI बहुत अच्छा लगा। आनेवाले दिनों की दुश्चिन्ताएँ करने लगी। मैं हल्का-सा हो गया। मैंने अपने जूते उतार दिये और घाम पर नगे पांव चलने लगा। मैं बेंच के पास पहुंचा ही था कि मुझे अपने पीछे एक चीख सुनायी दी। कोई तेजी से भागता हुआ मेरी तरफ आ रहा था। पीछे मुड़कर देखा, तो वही लड़की दिखायी दी। वह पेडो मे निकलकर बाहर आयी और मेरा रास्ता रोककर सही हो गयी। "यू आर कॉट,” उमने हंसते हुए कहा, "अब बाप जा नहीं सकते।" मैं समझा नही । जहाँ खडा था, वहीं खडा रहा। "आप पकड़े गये." उपने दोबारा कहा, "आप मेरी जमीन पर खड़े मैंने चारों तरफ देखा, घास पर फूल थे, किनारे पर खाली ब. थी, बीच में तीन एवरग्रीन पेड और एक मोटे तनेवाला और सड़ा था। उसकी जमीन कही दिखायी न दी। "मुझे मासूम नही था," मैंने कहा और मुडकर वापस जाने लगा। "नही, नहीं .''आप जा नहीं सकते," वच्ची एकदम मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। उसकी आँखें चमक रही थी, "वे आपको जाने नहीं देंगे।" "कौन नहीं जाने देगा?" मैंने पूछा। उसने पेडो की तरफ इशारा किया, जो अब सचमुच सिपाही मे दिखायी दे रहे थे, सम्बे हट्टे-कट्टे पहरेदार। मैं गिना जाने उनके अदृश्य फन्दे में चला आयापा। कुछ देर तक हम चुपचाप आमने-सामने खड़े रहे। उसकी आँखें बराबर मुल पर टिकी पी-उत्तेजित और सतकं । जब उसने देखा, मेरा भागने का । कोई इरादा नहीं है, तो वह कुछ ढीली पड़ी। "आप छूटना चाहते हैं ?" उसने कहा। "कसे?" मैंने उसकी ओर देखा। "आपको इन्हें खाना देना होगा। ये बहुत दिन से भूखे हैं।" उसने पेड़ों की ओर संकेत किया । वे हवा में सिर हिला रहे थे। "खाना मेरे पास नहीं है।" मैंने कहा। "आप चाहें, तो ला सकते हैं।" उसने आशा बंधायी, "ये सिर्फ फूल- पत्ते खाते हैं।" मेरे लिए यह मुश्किल नहीं था। वे अक्तूबर के दिन थे और पार्क में फूलों के अलावा ढेरों पत्ते विखरे रहा करते थे। मैं नीचे झुका ही था कि उसने लपककर मेरा हाथ रोक लिया। "नहीं, नहीं -यहां से नहीं। यह मेरी जमीन है। आपको वहां जाना होगा।" उमने पार्क के फेंस की ओर देखा। वहां मुरझाये फूलों और पत्तों का ढेर लगा था। मैं वहाँ जाने लगा कि उसकी आवाज सुनायी दी। "ठहरिए-मैं आपके साथ आती हूं, लेकिन अगर आप वचकर भागेंगे तो''यहीं मर जायेंगे।" वह रुकी, मेरी तरफ देखा, "आप मरना चाहते हैं ?" मैंने जल्दी से सिर हिलाया। वह इतना गर्म और उजला दिन था कि मरने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी। हम फेंस तक गये। मैंने रूमाल निकाला और फूल-पत्तियों को बटोरने लगा। मुक्ति पाने के लिए आदमी क्या कुछ नहीं करता। वापस लौटते हुए वह चुप रही। मैं कनखियों से उसकी ओर देख लेता था। वह काफी बीमार-सी बच्ची जान पड़ती थी। उन बच्चों की तरह गम्भीर, जो हमेशा अकेले में अपने साथ खेलते हैं। जब वह चुप रहती थी, तो होंठ विचक जाते थे-नीचे का होंठ थोड़ा-सा बाहर निकल आता, जिसके ऊपर दबी हुई नाक बेसहारा-सी दिखायी देती थी। बाल बहुत छोटे थे और बहुत काले-गोल छल्लों में धुली हुई रुई की तरह बंटे जिन्हें छूने को अनायास हाथ आगे बढ़ जाता था। लेकिन वह अपनी दूरी में हर तरह की छुअन से परे जान पड़ती थी। - 22 / कव्वे और काला पानी "अब आप इन्हें खाना दे मकते हैं।" उसने कहा। वह पेड़ों के पास आकर रुक गयी थी। "क्या ये मुझे छोड़ देंगे?" में कोई गारण्टी, कोई आश्वासन पाना पाहता था। इस बार वह मुस्करायी-और मैंने पहली बार उसके दांत देखे-- एकदम मझेद और चमकीले-जैसे अवसर नीग्रो लडकियो के होते हैं। मैंने वे पत्तियां रूमाल से बाहर निकाली, चार हिस्सो मे बांटी और बराबर-बरावर से पेडो के नीचे डाल दी। मैं स्वतन्त्र हो गया पा-कुछ खाली-मा भी। मैंने जेव मे चिट्ठियां और असबार निकाले और उस वेंच पर बैठ गया, जहां उसका बैग रखा था। वह कास चमडे का वंग था, भीतर किताबें रुसी घी, ऊपर की जेब मे आघा कुतरा हुआ मेर बाहर झांक रहा था। वह ओझल हो गयी। मैंने चारो तरफ ध्यान से देखा, तो उसकी फाक का एक कोना झाडियो मे बाहर दिखायी दिया। वह एक खरगोश की तरह दुबककर बैठी थी- मेरे ही जमे, किमी भूले-भटके यात्री पर झपटने के लिए । किन्तु बहुत देर तक पार्क से कोई आदमी नही गुजरा। हवा चलती तो पेडो के नीचे जमा की हुई पत्तियां घूमने लगती–एक मवर की तरह और वह अपने शिकार को भूलकर उनके पीछे भागने लगती। कुछ देर बाद वह बेंच के पारा आयी, एक क्षण मुझे देसा, फिर बस्ते की जेब से सेव निकाला। मैं अखवार पढ़ता रहा और उसके दांतो के बीच सेव की कुतरन सुनता रहा। अचानक उमकी नजर मेरी चिट्ठियों पर पड़ी, जो वेंच पर रखी थी जबडे "यह आपकी हैं ?" "हाँ ।" मैंने उसकी ओर देखा। "और यह ?" उसने लिफाफे पर लगे टिकट को ओर उंगली उठायी। टिकट पर हापी की तस्वीर थी, जिसकी संड कार हवा में उठी थी। वह अपने दांतों के बीच हंसता-सा दिखायी दे रहा था। - उसके हिलते हुए रुक गये कोई इरादा नहीं है, तो वह कुछ ढीली पड़ी। "आप छूटना चाहते हैं ?" उसने कहा। "कसे?" मैंने उसकी ओर देखा। "आपको इन्हें खाना देना होगा। ये बहुत दिन से भूखे हैं।" उसने पेड़ों की ओर संकेत किया । वे हवा में सिर हिला रहे थे। "खाना मेरे पास नहीं है।" मैंने कहा। "आप चाहें, तो ला सकते हैं।" उसने आशा वधायी, "ये सिर्फ फूल- पत्ते खाते हैं।" मेरे लिए यह मुश्किल नहीं था। वे अक्तूबर के दिन थे और पार्क में फूलों के अलावा ढेरों पत्ते विखरे रहा करते थे। मैं नीचे झुका ही था कि उसने लपककर मेरा हाथ रोक लिया। "नहीं, नहीं-~-यहां से नहीं। यह मेरी जमीन है। आपको वहां जाना होगा।" उसने पार्क के फेंस की ओर देखा। वहाँ मुरझाये फूलों और पत्तों का ढेर लगा था। मैं वहाँ जाने लगा कि उसकी आवाज सुनायी दी। "ठहरिए---मैं आपके साथ आती हूँ, लेकिन अगर आप वचकर भागेंगे तो 'यहीं मर जायेंगे।" वह रुकी, मेरी तरफ देखा, "आप मरना चाहते हैं ?" मैंने जल्दी से सिर हिलाया। वह इतना गर्म और उजला दिन था कि मरने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी। हम फेंस तक गये। मैंने रूमाल निकाला और फूल-पत्तियों को बटोरने लगा। मुक्ति पाने के लिए आदमी क्या कुछ नहीं करता। वापस लौटते हुए वह चुप रही। मैं कनखियों से उसकी ओर देख लेता था। वह काफी बीमार-सी बच्ची जान पड़ती थी। उन बच्चों की तरह गम्भीर, जो हमेशा अकेले में अपने साथ खेलते हैं। जब वह चुप रहती थी, तो होंठ विचक जाते थे-नीचे का होंठ थोड़ा-सा बाहर निकल आता, जिसके ऊपर दबी हुई नाक वेसहारा-सी दिखायी देती थी। बाल बहुत छोटे थे ---और बहुत काले-गोल छल्लों में धुली हुई रुई की तरह बंटे जिन्हें छूने को अनायास हाथ आगे बढ़ जाता था। लेकिन वह अपनी दूरी में हर तरह की छुअन से परे जान पड़ती थी। + - । . 22/कव्वे और काला पानी "अब आप इन्हें पाना दे सकते हैं।" उसने कहा । वह पेड़ों के पास आकर रुक गयी थी। "क्या वे मुझे छोड देंगे?" मैं कोई गारण्टी, कोई आश्वासन पाना चाहता था। इम वार वह मुस्फगयी और मैंने पहली बार उसके दांत देसे- एकदम मद और चमकीले-- जैसे अक्सर नीग्रो लड़कियो के होते हैं। मैंने वे पत्तियां रूमाल से बाहर निकाली, चार हिस्सो मे बांटी और बराबर-बराबर मे पेडो के नीचे डाल दी। मैं स्वतन्त्र हो गया था - कुछ खाली-मा भी। मैंने जेब से चिट्ठियां और अखबार निकाले और उम वेंच पर बैठ गया, जहां उसका बैग रखा था। वह काले चमडे का बैग था, भीतर किताबें हुँसी थी, ऊपर की जेब से आधा कुतरा हुआ मेब वाहर शौक रहा था। वह ओझल हो गयी। मैंने चारो तरफ ध्यान से देखा, तो उसको फाक का एक कोना झाडियों मे बाहर दिखायी दिया। वह एक खरगोश की तरह दुवककर बैठी थी- मेरे ही जमे, किमी भूले-भटके यात्री पर झपटने के लिए । किन्तु बहुत देर नक पार्क मे कोई आदमी नही गुजरा। हया चलती ती पेड़ो के नीचे जमा की हुई पत्तियां घूमने लगती-एक मेवर की तरह- और वह अपने शिकार को भूलकर उनके पीछे भागने लगती। कुछ देर बाद वह बेंच के पास आयी, एक क्षण मुझे देखा, फिर वस्ते की जेब से सेव निकाला। मैं अखबार पढता रहा और उसके दांतों के बीच सेव की कुतरन मुनता रहा। अचानक उसकी नजर मेरी चिट्ठियों पर पड़ी, जो बेंच पर रखी थी। उसके हिलते हुए जवडे रुक गये। "यह आपको हैं ?" "हो ।" मैंने उसकी ओर देखा। "और यह" उसने लिफाफे पर लगे टिकट को ओर उंगली उठायो। टिकट पर हाथी की तस्वीर पो, जिसकी सूंड कार हवा में उठी थी। वह अपने दांतों के बीच हंसता-सा दिखायी दे रहा था।
"तुम कभी जू गयी हो?" मैंने पूछा। "एक बार पापा के साथ गयी थी। उन्होंने मुझे एक पेनी दी थी और थी ने अपनी सूंड से उस पेनी को मेरे हाथ से उठाया था।" "तुम डरीं नहीं?" "नहीं, क्यों ?" उसने सेव कुतरते हुए मेरी ओर देखा। "पापा तुम्हारे साथ यहां नहीं आते ?" "एक बार आये थे। तीन बार पकड़े गये।" वह धीमे-से हंसी-जैसे मैं वहाँ न हूं, जैसे कोई अकेले में हँसता है, जहां एक स्मृति पचास तहें खोलती है। अस्पताल की घड़ी का गजर सुनायी दिया, तो हम दोनों चौंक गये। लडकी ने बेंच से बस्ता उठाया और उन पेड़ों के पास-पास गयी, जो चुप खड़े थे। बच्ची हर पेड़ के पास जाती थी, छूती थी, कुछ कहती थी, जिसे सिर्फ पेड़ सुन पाते थे। आखीर में वह मेरे पास आयी और मुझसे हाथ मिलाया, जैसे मैं भी उन पेड़ों में से एक हूँ। उसकी निगाहें पीछे मुड़ गयीं। मैंने देखा, कौन है ? वह महिला दिखायी दीं। वह नोंवाली सफेद पोशाक हरी घास पर चमक रही थी। बच्ची उन्हें देखते ही भागने लगी। मैंने ध्यान से देखा-यह वही महिला थीं, जिन्हें मैं लायब्रेरी की खिड़की से देखता था। छोटा कद, कन्धे पर थेला और बच्ची-जैसे ही काले-धुंघराले बाल। वे मुझसे काफी दूर थे, लेकिन उनकी आवाज सुनायी दे जाती थी--अलग-अलग शब्द नही, सिर्फ दो स्वरों की एक आहट । वे घास पर बैठ गये थे। वच्ची मुझे भूल गयी थी। मैंने जूते पहने । अखबार और चिट्ठियां जेब में रख दीं। अभी समय काफी है, मैंने सोचा । एक-दो घण्टे लायब्रेरी में बिता सकता हूं। पार्क के जादू से अलग, अपने अकेले कोने में। मैं बीच पार्क में चला आया। पेड़ों की फुनगियों पर आग सुलगने लग थी। समूचा पार्क सोने में गल रहा था। वीच में पत्तों का दरिया था, हर में हिलता हुआ। कौन-कौन है ? कोई मुझे बुला रहा था और मैं चलता गया, नहीं। कभी-कभी आदमीखुद अपने को बुलाने लगता है, बाहर से भीतर . । स 24/कव्वे और काला पानी और भीतर कुछ भी नहीं होता। लेकिन यह इलावा और दिनों की तरह नही था। यह रुका नही, इमलिए अन्त में मुझे ही रुकना पड़ा। इस बार कोई शक नहीं हुआ। सचमुच कोई चीख रहा था, "स्टॉप, स्टॉप..!" मैंने पीछे मुड़कर देखा, लडको खही होकर दोनो हाय हवा मे हिला रही थी। सच ! मैं फिर पकहा गया था-दोबारा से। बेवकूफों की तरह में उसकी जमीन पर चला आया था, चार पेड़ो से घिरा हुआ। इम यार मा और बेटी दोनो हंस रहे थे। ये मूठी गर्मियों के दिन थे। ये दिन ज्यादा देर नहीं टिकगे, इसे सब जानते थे। लायब्रेरी उजाड रहने लगी। मेरे पड़ोमी, बूढ़े पेंशनयाफ्ता लोग, मव थाहर धूप मे बैठने लगे। आकाश इतना नीला दिखायी देता कि लन्दन की घुन्ध भी उसे मैला न कर पाती। उसके नीचे पाकं एक हरे टापू-सा लेटा रहता। प्रेता (यह उसका नाम था) हमेशा वहाँ दिखायी देती थी। कभी दिखायी न देती, तो भी वेंच पर उसका वस्ता देखकर पता चल जाता कि वह यहीं कहीं है, किसी कोने में दुबकी है । मैं बनता हुआ माता, पेड़ो से, माडियों से, घाम के फलो से। हर रोज यह कहीं-न-कहीं, एक अदृश्य भयानक फन्दा छोड़ जाती और जब पूरी मतकता के बावजूद मेरा पाव उसमें फंस जाता, तो वह बदहवास चीखती हुई मेरे सामने आ खड़ी होती। में पकड लिया जाता। छोड दिया जाता। फिर पकड लिया जाता। यह सेल नहीं पा। वह एक पूरी दुनिया थी। उम दुनिया में मेरा कोई वास्ता नहीं था हालांकि मैं कभी-कभी उसमे बुला लिया जाता था। ड्रामे में एक एक्स्ट्रा की तरह । मुझे हमेशा तैयार रहना पड़ता था, क्योकि वह मुहो किमी भी समय बुला सकती थी। एक दोपहर हम दोनों बेंच पर बैठे ये, अचानक यह उठ घड़ी हुई। "हलो मिसेज टामस"।" उनने मुस्कराते हुए कहा, "याज आप बहुत दिन बाद दिसायी दी-यह मेरे इण्डियन दोस्त है, इनसे मिनिए।" मैं अवाक् उमे देसता रहा । वहाँ कोई न था। "आप बैठे हैं ? इनसे हाथ मिलाइए।" उसने मुझे कुछ शिड़कते हुए दूसरी दुनिया/25 मैं खड़ा हो गया, खाली हवा से हाथ मिलाया। ग्रेता खिसककर मेरे पास बैठ गयी, ताकि कोने में मिसेज टामस बैठ सकें। "आप बाजार जा रही थीं ?" उसने खाली जगह को देखते हुए कहा, "मैं आपका थैला देखकर समझ गयी। नहीं, माफ कीजिए, मैं आपके साथ नहीं आ सकती। मुझे बहुत काम करना है। इन्हें देखिए (उसने पेड़ों की तरफ इशारा किया), ये सुबह से भूखे हैं, मैंने अभी तक इनके लिए खाना भी नहीं बनाया-आप चाय पियेंगी या कॉफ़ी? ओह-आप घर से पीकर आयी हैं। क्या कहा-मैं आपके घर क्यों नहीं आती ? आजकल वक्त कहां मिलता है। सुबह अस्पताल जाना पड़ता है, दोपहर को बच्चों के साथ- आप तो जानती हैं। मैं इतवार को आऊँगी। आप जा रही हैं-" उसने खड़े होकर दोबारा हाथ मिलाया। मिसेज टामस शायद जल्दी में थीं। विदा लेते समय उन्होंने मुझे देखा नहीं । बदले में मैं बेंच पर ही बैठा रहा। कुछ देर तक हम चुपचाप बैठे रहे। फिर सहसा वह चौंक पड़ी। "आप कुछ सुन रहे हैं ?" उसने मेरी कुहनी को झिंझोड़ा। "कुछ भी नहीं।" मैंने कहा। "फोन की घण्टी-कितनी देर से बज रही है। जरा देखिए, कौन है ?" मैं उठकर बेंच के पीछे गया, नीचे घास से एक टूटी टहनी उठायी और जोर से कहा, "हलो!" "कौन है ?" उसने कुछ अधीरता से पूछा। "मिसेज टामस।" मैंने कहा। "ओह-~-फिर मिसेज टामस।" उसने एक थकी-सी जम्हाई ली, धीमे कदमों से पास आयी, मेरे हाथ से टहनी खींचकर कहा, "हलो, मिसेज टामस -~-आप बाजार से लौट आयीं ? क्या-क्या लायी ? मीट-बॉल्स, फिश- फिगर्स, मालू के चिप्स?" उसकी आँखें आश्चर्य से फैलती जा रही थीं। वह शायद चुन-चुनकर उन सब चीजों का नाम ले रही थी, जो उसे सबसे अधिक अच्छी लगती थीं। । - 26/ कव्वे और काला पानी 1 । फिर वह चुप हो गयी जैसे मिसेज टामस ने कोई अप्रत्याशित प्रस्ताव उसके सामने रखा हो। "ठीक है मिमेज टामस, मैं अभी आती हूँ-- नहीं, मुझे देर नहीं लगेगी। मैं अभी वस-स्टेशन की तरफ जा रही हूं-गुड बाई, मिसेज टामम " उमने चमकती आंखो से मेरी ओर देखा। "मिमेज टामस ने मुझे डिनर पर बुलाया है. -आप क्या करेंगे?" "मैं सोऊंगा।" "पहले इन्हे कुछ खिला देना नहीं तो ये रोयेंगे।" उसने पेड़ों की और इशारा किया, जो ठहरी हवा में निम्पन्द सहे थे। वह तैयार होने लगी। अपने बिसरे बालो को संवारा, पाउडर लगाने का बहाना किया-हथेली का शीशा बनाकर उममे झाका-धूप और पेड़ों की छाया के बीच यह सचमुच सुन्दर जान पड रही थी। जाते समय उसने मेरी तरफ हाय हिलाया। मैं उसे देखता रहा, जब तक वह पेडो ओर झाडियो के धने झुरमुट मे गायव नही हो गयी। ऐसा हर रोज होने लगा। वह मिसेज टामस से मिलने चली जाती और में बेंच पर लेटा रहता। मुझे अकेला नही लगता था। पार्क को अजीव, यदृश्य आवाजें मुझे हरदम धेरे रहती। में एक दुनिया से निकलकर दूसरी दुनिया मे चला आता। वह पार्क के सुदूर कोनों मे भटकती फिरती। मैं लायरी की कितावों का मिरहाना बनाकर वेंच पर लेट जाता। लन्दन के वादलों को देखता-वे घूमते रहते और जब कभी कोई सफेद टुकड़ा सूरज पर अटक जाता, तब पार्क मे अंधेरा-सा घिर जाता। ऐसे ही एक दिन जब मैं बेंच पर लेटा था, मुझे अपने नजदीक एक अजीव-मी सडसडाहट सुनायो दी। मुझे लगा, मैं सपने में मिसेज टामस को देख रहा हूँ। वे मेरे पास-विलकुल पास-आकर यही हो गयो हैं, मुझे बुला रही हैं। मैं हडबडाकर उठ बैठा। सामने वच्ची की मां खड़ी थी। उन्होंने ग्रेता का हाथ पकड़ रखा था और कुछ अममजम में वे मुझे निहार रही पी। "माफ कीजिए..." उन्होंने सकुचाते हुए कहा, "आप सो तो नहीं रहे थे?" मैं कपड़े झाड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ। "आज आप जल्दी आ गयीं?" मैंने कहा। उनकी सफेद पोशाक, काली बेल्ट और वालों पर बंधे स्कार्फ को देखकर मेरी आँखें चुंधिया-सी गयीं। लगता था, वे अस्पताल से सीधी यहां चली आ रही थीं। "हाँ, मैं जल्दी आ गयी," वे मुस्कराने लगीं, "शनिवार को काम ज्यादा नहीं रहता--मैं दोपहर को ही आ जाती हूं।" वे वेस्ट इण्डीज के चौड़े उच्चारण के साथ बोल रही थी जिसमें हर शब्द का अन्तिम हिस्सा गुब्बारे-सा उड़ता दिखायी देता था। "मैं आपसे कहने आयी थी आज आप हमारे साथ चाय पीने चलियेगा?.."हम लोग पास में ही रहते हैं।" उनके स्वर में कोई संकोच या दिखावा नहीं था, जैसे वे मुझे मुद्दत से जानती हों। मैं तैयार हो गया। मैं अरसे से किसी के घर नहीं गया था। अपने बेड- सिटर से लायनेरी और पार्क तक परिक्रमा लगाता था। मैं लगभग भूल गया था कि उसके परे एक और दुनिया है-जहाँ नेता रहती होगी, खाती होगी, सोती होगी। वह मागे-आगे चल रही थीं। कभी-कभी पीछे मुड़कर देख लेती थीं कि कहीं हम बहुत दूर तो नहीं छूट गये। उसे शायद कुछ अनोखा-सा लग रहा था कि मैं उसके घर आ रहा हूँ। अजीव मुझे भी लग रहा था-उसके घर माना नहीं, बल्कि उसकी मां के साथ चलना। वे उम्र में काफी छोटी जान पड़ती थीं, शायद अपने कद के कारण। मेरे साथ चलते हुए वे कुछ इतनी छोटी दिखायी दे रही थी कि भ्रम होता था कि मैं किसी दूसरी प्रेता के साथ चल रहा हूँ। रास्ते-भर वे चुप रहीं। सिर्फ जव उनका घर सामने आया, तो वे ठिठक गयीं। "आप भी तो कहीं पास रहते हैं ?" उन्होंने पूछा। "ब्राइड स्ट्रीट में", मैंने कहा, "ट्युब स्टेशन के बिलकुल सामने।" "माप शायद हाल में ही आये हैं ?" उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "इस 28/ कच्चे और काला पानी - इलाके में बहुत कम इण्डियन रहते हैं।" वे नीचे उतरने लगीं। उनका पर वेसमेण्ट में या और हमें सीढ़ियाँ उतरकर नीचे जाना पड़ा था। वच्ची दरवाजा खोलकर खड़ी थी। कमरे में दिन के समय भी अंधेरा था।बत्ती जलायो, तो तीन-चारसियो दिसायी दीं। बीच में एक मेज थी। जरूरत से ज्यादा लम्बी और नगी-जैसे उस पर पिंग-पांग सेली जाती है। दीवार से सटा सोफा था, जिसके सिरहाने एक रजाई लिपटी रखी थी। लगता था, वह कमरा बहुत से कामों के काम माता था, जिसमे साना, सोना-और मौका पड़ने पर--अतिपि-सत्कार भी शामिल था। "आप वैठिए, मैं अभी धाय बनाकर लाती हूँ।" वे पर्दा उठाकर भीतर चली गयीं। मैं और प्रेता कमरे में अकेले बैठे रहे। हम दोनों पार्क के पतझडी उजाले मे एक-दूसरे को पहचानने लगे थे। पर कमरे के भीतर न कोई मौसम था, न कोई माया। वह अचानक एक बहुत कम उम्रवाली बच्ची बन गयी थी, जिसका जादू और मातक दोनों भर गये थे। "तुम यहाँ सोती हो?" मैंने सोफे की मोर देखा। "नहीं, यही नही," उसने सिर हिलाया, "मेरा कमरा भीतर है-- आप देखेंगे?" किचेन से मागे एक कोठरी थी, जो शायद बहुत पहले गोदाम रहा होगा । वहाँ एक नोली चिक लटक रही थी। उसने चिक उठामी और दवे कदमो से भीतर पली आयी। "धीरे से आइए-वह सो रहा है।" "कौन?" "हिरा !" उसने अपना हाय मुंह पर रण दिया। मैने सोचा, कोई भीतर है। पर भीतर बिलकुल मूना था। कमरे की हरी दीवारें पी, जिन पर जानवरो की तस्वीरें चिपको पोकोने मे उसकी साट थी, जो खटोला-सो दिखायी देती थी। तकिये परपिगलियों में लिपटा एक भालू लेटा था, गुदड़ी के लाल-जैसा- "वह सो रहा है।" उसने फुमफुमाते हुए कहा।
। "और तुम ?” मैंने कहा, "तुप यहां नहीं सोती?" "यहां मोती हूँ। जब पापा यहां थे, तो वे दूसरे पलंग पर सोते थे। मां ने अव उस पलंग को वाहर रखवा दिया है।" "कहां रहते हैं वे ?" इस वार मेरा स्वर भी धीमा हो गया, भालू के डर से नहीं, अपने उस डर से, जो कई दिनों से मेरे भीतर पल रहा था। "अपने घर रहते हैं----और कहाँ ?" उसने तनिक विस्मय से मुझे देखा। उसे लगा, मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ हूँ। वह अपनी मेज के पास गयी, जहां उसकी स्कूल की किताबें रखी थीं । दराज खोला और उसके भीतर से चिठ्ठियों का पुलिन्दा बाहर निकाला। पुलिन्दे पर रेशम का लाल फीता बंधा था, मानो वह क्रिसमस का कोई उपहार हो । वह उन्हें उठाकर मेरे पास ले आयी-सबसे ऊपर- वाले लिफाफे पर लगा टिकट दिखाया। "वे यहाँ रहते हैं।" उसने कहा। मुझे याद आया, वह मेरी नकल कर रही है-~-बहुत पहले पार्क में मैंने उसे अपने देश की चिट्ठी दिखायी थी। बैठक से उसकी मां हमें बुला रही थीं। आवाज सुनते ही वह कमरे से वाहर चली गयी। मैं एक क्षण वहीं ठिठका रहा । खटोले पर भालू सो रहा था। दीवारों पर जानवरों की आंखें मुझे घूर रही थीं। विस्तर के पास ही एक छोटी-सी वेसिनी थी, जिस पर उसका टूध-ब्रश, सावुन और कंघा रखे थे। बिलकुल मेरे बेड-सिट को तरह-मैंने सोचा किन्तु मुझसे बहुत अलग। में अपना कमरा छोड़कर कहीं भी जा सकता था, उसका कमरा अपनी चीजों में शाश्वत-सा जान पड़ता था। मेज पर चिट्ठियों का पुलिन्दा पड़ा था, रेशमी डोर में बंधा हुआ, जिसे जल्दी में वह अकेला छोड़ गयी थी। "कमरा देख लिया आपने?" उन्होंने मुस्कराते हुए कहा। "यहां जो भी आता है, सबसे पहले उसे अपना कमरा दिखाती हैं।" वे कपड़े बदलकर आयी थीं। लाल छोंट की स्कर्ट और खुला-खुला भूरे रंग का कार्डीगन। कमरे में सस्ती सेण्ट की गन्धे फैली थीं। -- 30/कवे और कालापानी "आप चाय नही-दावत दे रही हैं।" मैंने मेज पर रखे मामान को देखकर कहा। टोस्ट, जम, मक्खन, चीज-पता नहीं, इतनी सारी चीजें मैंने पहले क्व देवी थीं। "अस्पताल की कंण्टीन से ले आती हूँ-वहाँ सस्ते में मिल जाता है।" वे परेशान लगती यो। हमती थी, लेकिन परेशानी अपनी जगह कायम रहती थी। पता नहीं, वच्ची कहाँ पो ? वे उसे चीखते हुए बुला रही पी और चाय ठण्डी हो रही थी। वे सिर पकडकर बैठी रही। फिर माद आया, में भी हूँ। "आप शुरू कीजिए-वह बाग में बैठी होगी।" "आपका अपना वाग है ?" मैंने पूछा । "बहुत छोटा-मा, किचेन के पीछे । जव हम यहाँ आये थे, उजाड पड़ा या। मेरे पति ने उसे साफ किया। अब तो मोडी-बहुत सन्जी भी निकल आती है।" "आपके पति यहाँ नही रहते?" "उन्हे यही काम नहीं मिला-दिन-भर पार्क मे घूमते रहते थे। वही मादत प्रेता को पड़ी है..." उनके स्वर में हल्की-सी थकान थी। खीज से खाली-लेकिन ऐसी पकान, जो पोली घुल-मी हर चीज पर बैठ जाती है। "पार्क में तो मैं भी घूमता हूँ।" मैंने उन्हें हल्का करना चाहा । वे हो भी गयौं । हमने लगी। "आपकी बात अलग है।" उन्होंने इवे स्वर में कहा, "आप अकेले हैं। लेकिन लन्दन में अगर परिवार साप हो, तो विना नौकरी के नही रहा जा सकता।" वे मेज की चीजें साफ करने लगी। वर्तनों को जमा करके में किचन में ले गमा। मिक के आगे खिडकी थी, जहाँ मे उनका वाग दिसायी देता था। बीच में एक वीपिंग-विलोराहा था, जिसकी शाखाएं एक उलटी छतरी की सलामो की तरह झूल रही थी। पोछे मुडा तो वे दिखायी दी। दरवाजे पर तोलिया लेकर सड़ी पी। "पया देख रहे हैं ?"
"आपके वाग को "यह तो कोई बहुत छोटा नहीं है।" "है नहीं.-पर इस पेड़ ने सारी जगह घेर रखी है। मैं इसे कटवाना चाहती थी, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ गयी-जिस दिन पेड़ कटना था, वह रात-भर रोती रही।" वे चुप हो गयीं-जैसे उस रात को याद करना अपने में एक रोना हो। "क्या कहती थी?" "कहती क्या थी -अपनी जिद पर अड़ी थी। बहुत पहले कभी इसके पापा ने कहा होगा कि पेड़ के नीचे समर-हाउस बनायेंगे--अब आप बताइए, यहाँ खुद रहने को जगह है नहीं, बाग में गुड़ियों का समर-हाउस वनेगा?" "समर-हाउस?" "हाँ, समर-हाउस-~-जहां ग्रेता अपने भालू के साथ रहेगी।" वे हंसने लगीं-एक उदास-सी हंसी जो एक खाली जगह से उठकर दूसरी खाली जगह पर खत्म हो जाती है-और बीच की जगह को भी खाली छोड़ जाती है। मेरे जाने का समय हो गया था लेकिन नेता कहीं दिखायी नहीं दी। हम सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चले आये । लन्दन की मैली धूप पड़ोस की चिमनियों पर रेंग रही थी। जव विदा लेने के लिए मैंने हाथ आगे बढ़ाया, तो उन्होंने कुछ सकुचाते हुए कहा, "आप कल खाली हैं ? "कहिए --- मैं तकरीबन हर रोज खाली रहता हूँ।" "कल इतवार है..." उन्होने कहा, "ग्रेता की छुट्टी है, पर मेरी अस्पताल में ड्यूटी है। क्या मैं उसे आपके पास छोड़ सकती हूँ ?" "कितने बजे आना होगा?" "नहीं, आप आने की तकलीफ न करें। अस्पताल जाते हुए मैं इसे लायन्नेरी के सामने छोड़ दूंगी शाम को लौटते हुए ले लूंगी।" मैंने हामी भरी और सड़क पर चला आया। कुछ दूर चलकर जेब से पैसे निकाले और उन्हें गिनने लगा। आज खाने के पैसे बच जायेंगे, यह सोच- 32/कन्वे और काला पानी .
कर चूगी हुई। मैंने दबी हुई रेजगारी को मुट्ठी में दवाया मोर पर की सरफ चलने लगा। मलायरी के दरवाजे पर खडा था। उन्हें देर हो गयी थी-शापद सर्दी के कारण । धूप कहींन थी। लन्दन की इमारतों पर अवसन्न-सा आलोक फला पा-पीली और जदं,जिसमे वे और भी दरिद्र और दुखी दिखायी देती थीं। मुझे उनकी सफेद पोशाक दिखायी दी। दोनो पार्क से गुजरते हुए मा रहे थे। आगे-आगे वे और पीछे भागती हुई प्रेता। जब उन्होंने मुझे देख लिया तो हवा में हाथ हिलाया, बच्ची को जल्दी से चूमा और तेज कदमों से अस्पताल की तरफ मुड गयीं। किन्तु बच्ची में कोई जल्दी न थी। वह धीमे कदमों से मेरे पास प्रायो। मर्दी मे नाक लाल-मुर्च हो गयी थी। उसने पूरी बांहोवाला ग्राउन स्वेटर हन रखा था-मिर पर वही पुरानी कंप थी, जिसे मैं पार्क मे देखा करता पा. वह निढाल-मो मडी थी। "चलोगी?" मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसने चुपचाप मिर हिला दिया। मुझे हल्की-भी निराशा हुई। मैंने सोचा था, वह पूधेगी, कहा-और तव मैं उसे आश्चर्य में डाल दूंगा । पर उसने पूछा कुछ भी नहीं और हम सड़क पार करने लगे। जब हम पार्क को छोडकर आगे बढ़े तो एक बार उसने प्रग्नभरी निगाहों से मेरी ओर देखा-जैसे वह अपने किमी सुरक्षित धेरे से बाहर जा रही हो। पर मैं चुप रहा और उसने कुछ पूछा नही । तब मुझे पहली बार लगा कि जब बच्चे मां-बार के साथ नहीं होते तो सब प्रश्नो को पुड़िया बनाकर किमी अंधेरे गड्ढे मे फेंक देते हैं। ट्यूब मे बैठकर वह कुछ निश्चिन्त नजर आयी। उसने मेरा हाय छोड़ दिया और खिड़की के बाहर देखने लगी। "वया अभी से रात हो गयो ?" उसने पूछा। "रात कसो?" । दूसरी दुनिया /33 "देखो-~बाहर कितना अंधेरा है।" "हम जमीन के नीचे हैं।" मैंने कहा। वह कुछ सोचने लगी, फिर धीरे से कहा, "नीचे रात है, ऊपर दिन।" हम दोनों हंसने लगे। मैंने पहले कभी ऐमा नहीं सोचा था। धीरे-धीरे रोशनी नजर आने लगी। ऊपर आकाश का एक टुकड़ा दिखायी दिया--और फिर अथाह सफेदी में डूबा दिन सुरंग के बाहर निकल आया। ट्यूब स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ते हुए वह रुक गयी। मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। "रुक क्यों गयीं!" "मुझे बाथरूम जाना है।" मुझे दहशत हुई। टॉयलेट नीचे था और वह इस तरह अपने को रोके बहुत दूर तक नहीं जा सकती थी। मैंने उसे गोद में उठा लिया और उलटे पांव सीढ़ियों पर भागने लगा। गलियारे के दूसरे सिरे पर टॉयलेट दिखायी दिया -पुरुषों के लिए मैं जल्दी से उसे भीतर ले गया। दरवाजा बन्द करके वाहर आया, तो लगा जैसे वह नहीं, मैं मुक्त हो रहा है। वह बाहर आयी तो परेशान-मी नजर आयी। "अव क्या बात है ?" "चेन बहुत ऊंची है।" उसने कहा। "तुम ठहरो, मैं खींच आता हूं।" उसने मेरा कोट पकड़ लिया । वह खुद खींचना चाहती थी। उसके साथ में भीतर गया. उसे दुवारा गोद में उठाया और तव तक उठाता गया, जब तब उसका हाथ चेन तक नहीं पहुंच गया। हम दोनों विस्मय मे टॉय- लेट में पानी को बहता देखते रहे, जैसे यह चमत्कार जिन्दगी में पहली बार देख रहे हों। हम मीढ़ियां चढ़ने लगे। ऊपर आये तो उसने कसकर मेरा हाथ भींच लिया। ट्रिफाल्गर स्कैयर आगे था, चारोंतरफ भीड़, उजाला, शोर । मैं उसे आश्चर्य में डालना चाहता था। किन्तु वह डर गयी थी। वह इतना डर गयी थी कि मेरी इच्छा हुई कि मैं उसे दोबारा नीचे ले जाऊं-ट्यूब-स्टेशन में, जहां जमीन का अपना सुरक्षित अंधेरा था। 34/कव्वे और काला पानी
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में वेंच पर बैठ गया। फवारों को देखने लगा, जिनके छोटे उड़ते हुए नों तक आ जाते थे। बादल इतने नीचे झुक आये थे कि नेल्सन का सिर र्फ एक काले धब्बे-सा दिखायी देता था। दिन बीत रहा था। कुछ ही देर में मैंने देखा, वह सामने खड़ी है। "मैं एक कप और लूंगी।" उसने कहा। "अव नहीं..." मैंने कुछ हिचकिचाते हुए कहा, "काफी देर हो गयी है । अव चाय पियेंगे-और तुम आइसक्रीम लोगी।" उसने सिर हिलाया। "मैं एक कप और लूंगी।" उस स्वर में जिद नहीं थी। कुछ क्षण पहले जो पहचान आयी थी, वह मानो मुझसे नहीं, उससे आग्रह कर रही हो। मैंने उसके हाथ से खाली कप लिया और दुकान की तरफ बढ़ गया। पीछे मुड़कर देखा । वह मुझे देख रही थी। मैं दुकान के पीछे मुड़ गया। वहाँ भीड़ थी और उसकी आँखें मुझ तक नहीं पहुंच सकती थीं। कोने में सिमटकर मैंने जेब से पैसे निकाले। चाय और आइसक्रीम के पैसे एक तरफ किये, ट्यूब के किराये के पैसे दूसरी तरफ-वाकी सिर्फ दो पेंस वचे थे। मैंने चाय के कुछ न उसमें मिलाये और दुकान के आगे लगी क्यू में शामिल हो गया। इस बार जब मैंने उसे कप दिया, तो उसने मुझे देखा भी नहीं। व तुरन्त भागती हुई उस जगह चली गयी, जहाँ सबसे ज्यादा कबूतर इकट थे। अब उसका हौसला बढ़ गया या । और कबूतर भी उसे पहचानने थे। वे आसास उड़ते हुए कभी उसके हाथों, उसके कन्धों, उसके सिर वैठ जाते थे। वह हंसती जा रही थी, पीला चेहरा एक ज्वरग्रस्त खिचा विकृत-सा हो गया था-और हाथ-वे हाथ, जो मुझे हमेशा इतने निरीह पड़ते थे- अव एक अजीव वेचैनी में कभी खुलते थे, कभी बन्द होते हैं वे किसी भी क्षण कबूतरों की फड़फड़ाती मांसल धड़कनों को दबोच उसे पता भी न चला, कब दानों की कटोरी खाली हो गयी-वह तक हवा में हथेली खोले बैठी रही। सहसा उसे आभास हुआ, कबू . 1 छोड़कर दूसरे बच्चों के आसपास मंडराने लगे हैं । वह खड़ी हो गयी और विना कहीं देसे चुपचाप मेरे पास चली आयी। वह एकटक मुझे देख रही थी। मुझे शक हुआ, वह मुझ पर शक कर रही है। मैं बेंच मै उठ खड़ा हुआ। "अब चलेंगे।" मैंने कहा। 'एक कप और लंगी।" "अब और नहीं-- तुम दो ले चुकी हो।" मैंने गुस्से में कहा, "तुम्हें मालूम है, हमारे पास कितने पैसे बचे हैं ?" "सिर्फ एक और उसके बाद हम लोट जायेंगे।" लोग हमें देखने लगे थे। में यहस कर रहा था-दानो को एक कटोरी के लिए। मैंने उसे उठाकर बेंच पर बिठा दिया, "प्रेता, तुम बहुत जिद्दी हो। अब तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।" उसने ठण्डी मावों से मुझे देखा। "साप बुरे आदमी हैं । मैं आपके माय कभी नही मेलूंगी।" मुझे लगा जैसे उसने मेरी तुलना किमी अदृश्य व्यक्ति से को हो। मैं घाली-सा बैठा रहा। कभी-कभी ऐसा होता है कि अपने लिए कोई उम्मीद नहीं रहती। सिर्फ धोर हैरानी होने लगती है, अपने होने पर, अपने होने पर ही हैरानी होने लगती है। फिर मुझे वह आवाज सुनायी दी, जो आज भी मुझे अकेले में सुनायी दे जाती है और मुंह मोड लेता हूँ। वह रो रही थी। हाप में दानों का खाली कप था, और उसकी कंप खिसककर माथे पर चली आयी थी। वह चुप्पी का रोना था। अलग-अलग सामों के बीच बिधा हुआ। मुझसे वह नहीं सहा गया। मैंने उसके हाथ से कप लिया और लाइन में जाकर खडा हो गया। इस बार पंसो को गिनना भी याद नहीं आया। मैं सिर्फ उसका रोना मुन रहा था, हालांकि यह मुझसे बहुत दूर पी, और बीच में कबूतरो की फडफडाहट और बच्चों को पीसो के कारण कुछ भी सुनायो नहीं देता था। पर इन मवर्क परे मेरे भीतर का सन्नाटा था, जिसके बीच उसकी धी सांसें पी-और ये मैं अन्तहीन दूरी से सुन सकता था। किन्तु इस बार पहले जैसा नहीं हुआ। बहुत देर सा कोई मायूसर दसरी निया/37 - उसके पास नहीं आया। उसकी अपनी घबराहट के कारण या घिरते अधेरे के कारण वे पास तक आते थे, लेकिन उसकी खुली हथेली की अवहेलना करके दूसरे बच्चों के पास चले जाते थे। हताश होकर उसने दानों की कटोरी जमीन पर रख दी और स्वयं मेरे पास वेंच पर आकर बैठ गयी। उसके जाते ही कबूतरों का जमघट कटोरी के इर्द-गिर्द जमा होने लगा। कुछ देर बाद हमने देखा, दानों की कटोरी औंधी पड़ी है और उसमें एक भी दाना नहीं है। "अव चलोगी?"मैंने कहा। वह तुरन्त वेंच से उठ खड़ी हुई, जैसे वह इतनी देर से सिर्फ इसकी ही प्रतीक्षा कर रही हो। उसकी आँखें चमक रही थीं-एक भीगी हुई चमक- जो आंसुओं के बाद चली आती है । उन दिनों ट्रिफाल्गर स्कयर के सामने लायंस का रेस्तरां होता था। गन्दा और सस्ता दोनों ही। सड़क पार करके हम वहीं चले आये। इस बीच मैंने जेब में हाथ डालकर पैसों को गिन लिया था--मैंने उसके लिए दो टोस्ट मंगवाये, अपने लिए चाय । माइसक्रीम को भुला देना ही बेहतर था। वह पहली बार किसी रेस्तरां में आयी थी। गहरी उत्सुकता से चारों तरफ देख रही थी। मुझे लगा, कुछ देर पहले का सन्ताप धुलने लगा है। हम करीव-करीव दोबारा एक दूसरे के करीब आ गये थे। लेकिन पहले जैसे नहीं-कबूतरों की छाया अब भी हम दोनों के बीच फड़फड़ा रही थी। "मैं क्या बहुत बुरा आदमी हूँ !" मैंने पूछा। उसने आँखें उठायौं, एक क्षण मुझे देखती रही, फिर बहुत अधीर स्वर में कहा, "मैंने आपको नहीं कहा था।" "मुझे नहीं कहा था?" मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा, "फिर किसको "मि. टामस को-वे बुरे आदमी हैं । एक दिन जब मैं उनके घर गयी, वे डांट रहे थे और मिसेज टामस वेचारी रो रही थीं।" "ओह !" मैंने कहा "आप समझे-मैंने आपको कहा था ?" कहा था?" -- 38/ कव्वे और काला पानी वह हमने लगी, जसे मैंने सचमुच वही मूर्खता की भूल की है और उसकी हमी देशकर, न जाने क्यो, मेरा दिल बैठने लगा। "हम यहाँ फिर कभी आयेंगे?" उमने कहा। "गमियों मे," मैंने कहा, "गमियो मे टेम्स पर चलेंगे, वह यहाँ से बहुन पास है।" 'क्या वहां कबूतर होंगे?" उसने पूछा। मुझे बुरा लगा, जैसे कोई लड़की अपने प्रेमी की चर्चा यार-बार छेड़ दे। किन्तु मैं उसे दोबारा निराश नहीं करना चाहता था। गर्मियों काफी दूर पी, बीच में पतझड और बर्फ के दिन मायगे--- 1--तब तक मेरा झूठ भी पिघल जायेगा, मैंने सोचा। हम बाहर आये, तो पीला-मा अंधेरा घिर आया था। हालांकि दोपहर अभी बाकी थी। उसने सोयी हुई आँखो मे बयर की तरफ देखा, जहाँ कबूतर अब भी उड़ रहे थे । मेरो जेब मे अब उतने ही पंसे थे, जिनसे टयूब का किराया दिया जा सके। इस बार उमने कोई आग्रह नहीं किया। बच्चे एक सीमा के बाद, बडी की गरीवी न मही. मजबूरी सूंघ लेते हैं । मैंने सोचा था, ट्रेन में बैठेगे, तो मैं उममे समर-हाउम के बारे में पूछंगा-उस विलो के बारे में भी जो अकेला उमके वाग में खड़ा था। मैं उमे दोबारा उमकी अपनी दुनिया में लाना चाहता था-जहाँ पहली बार हम दोनों एक-दूसरे से मिले थे। पर ऐमा हुमा नही । सीट पर बैठने ही उमकी आखें मुंदने लगी। ट्रिफालार स्कयर मे इमलिग्टन तक का काफी सम्बा फामला था। कुछ देर बाद उसने मेरे कन्धो पर अपना सिर टिका लिया और सोने लगी। इस बीच मैंने एक-आध बार उसके चेहरे को देखा था- मुझे हैरानी हुई कि मोते हुए वह हूबहू वैसी ही लग रही है, जैसे पहनी वार मैंने उमे देवा पा पार्क में पेडो के बीच- तल्लीन और मावुत । कनरो के लिए जो भटकाव आया था, वह अब कही न था। आमूरव के मूग चले थे।नोंद में वह उतनी ही मुकम्मिल जान पड़ती थी, जितनी माडियों के बीच और तब मुझे अजीब-मा विचार आया। पार्क में उमने कई बार मुझे पकडा या, किन्तु उसके सोते हुए तल्लोन चेहरे को देखकर मुझे लगा कि वह हमेशा दूसरी दुनिया /39 । कड़ी हुई लडकी है, जबकि मेरे जैसे लोग सिर्फ कभी-कभी पकड़ म हैं और उसे इसका कोई पता नहीं है और यह एक तरह का वरदान क्योंकि दूसरों को हमेशा छूटने का, मुक्त होने का भ्रम रहता है, जबकि ज्ची को इस तरह की कोई आशा नहीं थी। तव पहली बार मैंने उसे छने साहस किया। मैं धीरे-धीरे उसके गालों को छूने लगा, जो आंसुओं के बाद गर्म हो आये थे, कुछ वैसे ही, जैसे वारिश के बाद घास की पत्तियां हो जाती हैं। वह जगी नहीं। ट्यूब स्टेशन आने तक आराम से सोती रही। उस रात वारिश शुरू हुई, सो हफ्ते-भर चलती रही। झूठी गर्मियों के दिन खत्म हो गये । सारे शहर पर पीली धुन्ध की परतें जमी रहतीं। सड़क पर चलते हुए कुछ भी दिखायी न देता-न पेड़, न लैम्प पोस्ट, न दूसरे आदमी। मुझे वे दिन याद हैं, क्योंकि उन्हीं दिनों मुझे काम मिला था। लन्दन में वह मेरी पहली नौकरी थी। काम ज्यादा था, लेकिन मुश्किल नहीं। एक पब में काउण्टर के पीछे सात घण्टे खड़े रहना पड़ता था। वियर और लिकर के गिलास धोने पड़ते थे। ग्यारह बजे घण्टी बजानी पड़ती थी और पियक्कड़ लोगों को बाहर खदेड़ना पड़ता था। कुछ दिन तक मैं कहीं वाहर न जा सका। घर लौटता और विस्तर पकड़ लेता, मानो पिछले महीनों की नींद कोई पुराना बदला निकाल रही हो। नींद खुलती, बारिश दिखायी देती, जो घड़ी की टिक-टिक की तरह बराबर चलन रहती। कभी-कभी भ्रम होता कि मैं मर गया हूँ-और अपनी कब्र दूसरी तरफ से-वारिश की टप-टप सुन रहा हूँ। लेकिन एक दिन आकाश दिखायी दिया -पूरा नहीं-सिर्फ एक हबी-सी फांक-और उसे देखकर मुझे अकस्मात पार्क के दिन याद हो यहूदी रेस्तरां की विल्ली और बाजार जाती हुई मिसेज टामस । व छुट्टी का दिन था। उस दिन मैंने अपने सबसे बढ़िया कपड़े पहने और से बाहर निकल आया। लायनेरी खुली थी। सब पुराने चेहरे वहां दिखायी दिये । पान गौर काला पानी पडा था। पेड़ों पर पिछले दिनों की बारिश चमक रही थी। वे मिकुरेसे दिखायी देने थे, जमे आनेवाली मर्दियों की अफवाह उन्हें छू गयी हो। में दोपहर तक प्रतीक्षा करता रहा। ग्रेता वही दिवायो न दी, न वच पर, पेडों के पीछे। धीरे-धीरे पाक का पीला, पतगडी आलोक मन्द पड़ने लगा । पांच बजे अस्पताल का गजर सुनायी दिया और मेरी आंखें अनायास फाटक की ओर उठ गयी। कुछ देर तक वोई दिखायी नहीं दिया। पाटक के ऊपर लोहे का हैण्डिल शाम पी आमिरी धूप में नमक रहा था। उसके पीछे बम्पताल की लाल इंटोवाली इमारत दिखायी दे रही यो । मझे मालूम था, उन्हे घर जाने के लिए पार्क के बीच में निकलना होगा, किन्तु फिर भी मैं अनिश्चित निगाहों मे कभी फाटक को देखनाथा, कभी सडक को। यह सयाल भी आता या कि शायद आज उनकी ड्यूटी अस्पताल में न हो और वे दोनो घर में ही बैठे हो। सड़क की बत्तियां जलने लगीं। मुझे अजीव-मी घबराहट हुई, जैसे प्रतीक्षा का अन्त आ पहुंचा है और मैं उसे टालता जा रहा हूँ। मैं बच से उठ सड़ा हुआ---सड़े होकर प्रतीक्षा करना ज्यादा मासान जान पड़ा। किन्तु तभी मुझे फाटकके निकट सरमराहट सुनायी दी। उनके चेहरे को बाद में देखा, उनकी सफेद पोशाक पहले दिखायी दी। वे तेज कदमों से पार्क के धीच पगडण्डी पर चल रही थी। उन्होने मुझे नहीं देखा था। यदि वे मेरी दिशा में आ रही होती, तो भी शायद धुंधलके मे मुझे नहीं पहबान पाती। मैं भागता हुमा उनके पीछे चला आया। "मिसेज पाकर !"पहली बार मैंने उन्हें उनके नाम से बुलाया था। वे ठहर गयी और भौचकमी मेरी ओर देखने लगी। "आप यहाँ कसे ?"अब भी वे याने को नहीं संभाल पायी थी। "मैं यहां दोपहर से बैठा हूँ।" मैंने मुस्कराते हुए कहा। वे हायकाई-सी मुझे देख रही थी। उन्होंने मुझे पहचान लिया था, सेरिन जैसे उग पहचान का मतलब नही टोह पा रही थी। में कुछ असमंजम में पड़ गया और सहन स्वर में पूछा, "मात्र आप इतनी देर से लौट रही है ? पांच का गजर तो कब का वज चुका?" दमरीनिमा.
पांच का गजर?" उन्होंने विस्मय से पूछा। 'आप हमेशा पांच बजे लौटती थीं।" मैंने कहा। "ओह !" उन्हें याद आया, जैसे मैं किसी प्रागैतिहासिक घटना का ख कर रहा हूँ। "आप लन्दन में ही थे।" उन्होंने पूछा। "मुझे काम मिल गया, इतने दिनों से इसलिए नहीं आ सका । ग्रेता ती है ?" वे हिचकिचायीं-एक छोटे क्षण की हिचकिचाहट, जो कुछ भी मानी हीं रखती-लेकिन शाम के धुंधलके में मुझे वह अपशकुन-सा जान पड़ी। "मैं आपको बताना चाहती थी, लेकिन मुझे आपका घर नहीं मालूम था..." "वह ठीक है?" "हां, ठीक है," उन्होंने जल्दी में कहा, "लेकिन वह अब यहां नहीं है। कुछ दिन पहले उसके पिता आये थे, वे उसे अपने साथ ले गये." मैं उन्हें देखता रहा। मेरे भीतर जो कुछ था, वह ठहर गया-मैं उसके भीतर था, उस ठहराव के, और वहां से दुनिया विल्कुल बाहर दिखायी देती थी। मैंने कभी इतनी सफाई से बाहर को नहीं देखा था। "कव की बात है ?" "जिस दिन आप उसके साथ ट्रिफाल्गर स्कयर गये थे-उसके दूसरे दिन ही वे आये थे.'आप जानते हैं, उन्हें वहां काम मिल गया है।" "और आप ?" मैंने कहा, "आप यहां अकेली रहेंगी?" "मैंने अभी कुछ सोचा नहीं है।" उन्होंने धीरे से सिर उठाया, आवाज हल्के से कांपी थी, और एक क्षण के लिए मुझे उनके चेहरे पर बच्ची दिखायी दी, ऊपर उठा हुआ होंठ और भीगी आँखें, हवा में उड़ते हुए कबूतरों को निहारती हुई। "आप कभी घर जरूर आइयेगा." उन्होंने विदा मांगी और मैंने हाथ आगे बढ़ा दिया। मैं बहुत दूर तक उन्हें देखता रहा। फिर काफी देर तक वेच पर बैठा रहा। मुझे कहीं नही जाना था, न ही प्रतीक्षा करनी थी धीरे-धीरे पेड़ों के ऊपर तारे निकलने लगे। मैंने पहली बार लन्दन 42 / कव्वे और कालापानी आकाश में इतने सारे देखे ये, साफ और चमकीले, जसे वारि ने उन्हें भी धो डाला हो। "इट इज टाइम डियर!" पार्क के चौकीदार ने दूर मे ही आवाज लगायी । वह गेट की चाभिषा धनखनाता हुआ पा का घरकर लगा रहा था। टाचं को रोशनी में वह हर बेच, माही और पेड़ के नीचे देख लेता था कि कहीं कोई छूट तो नहीं गया--कोई सोया हुआ बच्चा, कोई दारावी, कोई घरेलू विल्ली। वहाँ कोई नहीं था। कोई भी पीज नहीं छूटी थी। मैं उठ खड़ा हुआ सोर गेट की तरफ चलने लगा। महमा हवा उठी थी। हला-मा झौंका अंधेरे मे भला आया और पैड सरमराने लगे। और तब मुझे धीमी-पी आवाज सुनायो दी, एक अमीम याग्रह में लिपटी हुई - 'स्टॉप स्टॉप...' मेरे पांव बीच पार्क में ठिठक गये। चारो ओर देखा । कोई नया । न कोई आवाज, न खटका ---सिर्फ पेड़ो की शाखाएं हवा मे होल रही थी। उस समय एक पगली-उत्कट, नंगी-मी, आकाक्षा मेरे भीतर जागने लगी कि यही वैठ जाऊँ। इन पेडो के बीच जहाँ में पहली बार पकहा गया था। मैरी अब और आगे जाने को इच्छा नही यो। मैं इस बार अन्तिम और अनिवार्य रूप में पकड़ लिया जाना चाहता पा. "इट इज क्लोजिंग टाइम !" धोकीदार ने इस बार बहुत पाम आकर कहा मेरी तरफ जिज्ञामा से देखा कि क्या मैं वही आदमी हूँ, जो अभी कुछ देर पहले बेंच पर बैठा था। इस बार में नहीं मुढा। पार्क गे वाहर आकर ही मांस ली। मेरा गना सूस गया था और देह सोनली-सी जान पडती थी। पार्क में सामने एवं की लालटेन झूलती दिखायी दो। मैंने जेब मे पर्स निकाला, पैमे गिनने के लिए। पुरानी गरीबी को यह आदत अव भी वची पो। मैंने हैरानी में देखा कि मेरे पास पूरे दो पौण्ड हैं --और तब मुझे याद आया कि में उन्हें कबूतरों के दानो के लिए लाया था।
जिन्दगी यहाँ और वहाँ - और तब फोन की घण्टी बजी और वह समझ गया, यह वह है-वह भागता हुमा मेज के पास आया, "हलो", उसने कहा, "यह मैं हूँ।" दूसरी तरफ सन्नाटा रहा, "हलो," जैसे वह उसकी सहमी, ठिठुरती आवाज सुन रही हो। "हलो, हलो", उसने थूक निगलकर कहा, "कौन है ? आप कौन हैं ?" - - उसने फोन के ऊपर देखा । खाली दीवार, जनवरी का महीना, एक खिड़की, जिसका पर्दा उठ गया था। मैं दस तक गिनती गिनूंगा, उसने सोचा, इस बीच कुछ नहीं बोलूंगा, वह फोन बन्द कर देगी और खतरा टल जायेगा। हुआ भी यही-दूसरी तरफ सन्नाटा हो गया और वह गिनने लगा-पर दूसरे ही क्षण उसका स्वर सुनायी दिया, धवराया-सा, नर्वस, फोन के काले सन्नाटे को भेदता हुआ, "फैटी, तुम सुन रहे हो ? तुम वोलते क्यों नहीं ? यह तुम क्या बुड़बुड़ा रहे हो "मैं सुन भी नहीं सकती।" "मैं गिनती गिन रहा था।" उसने खिसियानी-सी आवाज में कहा। "क्या कहा ? गिनती?" वह धीरे से हँसी-एक छोटी-सी हताश हँसी- जो फोन के भीतर एक घवरायी चिड़िया-सी धूम रही थी-"सुनो, आज मैं तुम्हारे घर नहीं आ सकेंगी 'मैं लायब्रेरी में रहूंगी।" उसने कहा, "क्या तुम वहाँ आ सकोगे?" मन में आया, कह दे, इरा आज नहीं, आज मुझे काम है। काम? वह उसकी आवाज को पकड़ लेगी, मरोड़कर उसका झूठ निचोड़ देगी-घर में अकेले रहना कोई काम है ? वह विश्वास नहीं करेगी-वह सोचेगी मैं फिर उसे सता रहा हूँ, कितना विचित्र है, जब तुम - 44/ कव्वे और कालापानी उनमे कहो, कि तुम अकेले रहना चाहते हो तो यह जानने हुए भी कि तुम अवेले घर में रहते हो-वे कभी तुम्हारा विश्वास नहीं करते । मगर तुम खाली हो--तो साली कम रह सकते हो? कोई फायदा नहीं । उमने फोन कोदोनो हायों मे पकड लिया --जैसे यह उमका छोटा-सा सिर हो, कन्धो पर गिरते बाल, माथे पर काली बिन्दी, दो फफाती-सी औखें-"नही, नही, मुझे कोई काम नही, मैं आऊँगा "मुझे कनाट प्लेस में एक काम भी है। उसे निपटाकर सीधा चला आऊँगा-या कहा? जरा ऊंचा बोलो, मैं कुछ भी नहीं सुन सकता..." "मैं दिन-भर लायब्रेरी मे रहूंगी"-उसकी आवाज सहसा बहुत धीमी पड गयो-जमे घूमती चिडिया बहुत पक गयी हो, निढाल-सी पसर गयी हो-"तुम किमी भी समय आ गकते हो। मुझे" ~एक सण वह मिसको-"मुझे तुममे कुछ काम है, -मुझे-" पर यहां वह पुर हो गयी। वह देख सकता था-उमके स्वर का पीला रग, जो फोन के मन्नाटे परतिरा आया था-डूबता हुआ, अपनी गूंज को तस्वीर दीवार पर ग्रीचता हुआ क्या तुम अब भी वहाँ हो? पता नही, वह क्या मोचती होगी? वह पूछनी नही थी। यह देखती मी नहीं थी। यह वीच का रास्ता निकाल लेती थी-देखने और पूछने के बीच-- जिसे वे 'जानना' कहते थे। किन्तु कभी-कभी वह भूल जाती। वह मोचती, वह उगके साप है। अचानक लाल बत्ती जन जाती-और वह ठिठक जाती। पीछे मुड़कर देखती तो वह कहीं दिखायो न देता। बाद में जब यह उससे मिलती. तो पूछने का माहम भी न कर पाती कि वह वहाँ गया था। वह दूसरे दिन फोन करती-और वह घर में होता । उमका पर में रहना- यह पक्की बात थी, एक ठोम चीज। इसमें कोई शक नही या कि यह फोन करेगी और वह घर में होगा। यह हमेगा कनॉट प्लेम के गलि- यारे में एक पकिक धूप में फोन करती थी। वह डायल घुमाती पी- और घण्टी बनने लगती थी। वह बूर के शीगे के बाहर देखने लगती- अगस्त का मीगा प्रकाश, कनॉट प्लेस के पेड़, लॉन पर बैठे हुए लोग "यह - जिन्दगी यहाँ और यहां/45 ढियां उतर रहा होगा। इतना बड़ा, अकेला घर, खाली । घण्टी जैसे किसी उजाड़ जर्जरित गिरजे के बीच प्रार्थना कर रही हो, त्थरों को छूकर वापस लौट आती हो। बारिश के दिन में बूथ के शीशे पर बुंदकियां छिटक जाती-धुंधले-से वादल छतों पर घूमते रहते-दिल्ली एक टिमटिमाता-सा दीया दिखायी देता-धुन्ध पर तिरता हुआ-"हलो हलो |---यह मैं हूँ, और तुम?" मैं यहां हूँ। यहां-अपने कमरे में-यहां जन की शामें बुरी नहीं होती, आकाश से राख झरती है और सूरज एक उपेक्षित कोने में सुलगता रहता। वह लायब्रेरी के एक कोने में बैठी रहती और वह अपने छतवाले कमरे में । अब कोई फोन नहीं आयेगा.''वह निश्चिन्त होकर बैठ जाता। कमरे में अंधेरा कर लेता। पंखे की हवा में समूची पीड़ा को पसीने के साथ बहा देता। अब कोई नहीं आयेगा । वह चली गयी है। उसने उसे जाते देखा है। वह महीनों को उल्टा गिनने लगता है- और जनवरी पर आकर रुक जाता है। हमेशा एक ही महीने पर-जैसे वैगाटेल की गोली चारोंतरफ टकराकर, वार-बार एक ही सूराख में घुस जाती हो। वे सर्दियों के दिन थे और वह बाहर अंधेरे में खड़ा था। उसके कमरे की बत्ती जल रही थी--वह ठिठुर रहा था-वह नीद नहीं है-वह एक दूसरा समय है-नींद की ही तर छांहदार, वह झाड़ियों के पीछे खड़ा है-उसके कमरे को देख रहा है- वही नींबू की झाड़ी और एक छोटा-सा लॉन-खाली और उजाड़।वहाँ कोई नहीं रहता। विश्वास नहीं होता, मैं वही आदमी हूँ, जो चार महीने पहले , उसके घर के बाहर अंधेरे में खड़ा था। फैटी, तुम, वही हो-सच ! तुम हो और विल्कुल नहीं बदले। मैं वही हूँ, जो पैतीस साल पहले इस दुनि आया था। यदि वे जीवित होते, तो एकदम उसे पहचान जाते। या वरसों बाद घर लौटकर आओ-तो वे एकदम पहचान लेते हैं- नहीं जानते, तुम कहां से लौटकर आये हो । वे कभी सोच भी नहीं कि इतनी यातना सहकर उन्होने जिसे जन्म दिया है, वह बड़ा होक यातना बर्दाश्त कर सकता है-इसीलिए वे चले जाते हैं। अपने - 46/कव्वे और काला पानी पहले ही उठ जाते हैं । सत्म हो जाते हैं.""मर जाते हैं ! और बच्चे? उन्हें कोई जल्दी नही. --एक बाली मकान और अन्तहीन समय । मैं उनमें हूँ। मैं बचा रह गया हूं। मुझे कोई जल्दी नहीं। - शुरू में ऐमा नहीं था। वह हमेशा जल्दी में रहता था। वह जब अकेला दिखायी देता, तो भी लगता जैसे कोई उमके साथ है. एक कुत्ते की तरह उसके पीछे घिमटता जा रहा है। वह कभी अचानक बीच सड़क पर बड़ा हो जाता-जैसे उमने किसी को देख लिया हो-पेड के नीचे कोई मद्भुत- सा कोहा, धूप में नहातो कोई तितली-या कोई ट्यून पियानो से बाहर माती हुई, जिसे सुनकर वह बंगले को दीवार मे सट जाता। मुस्कराने लगता~-और तब मुझे मजीव-मा भ्रम होता कि वह उन अकेले लोगों मे है, जो अकेला होने पर भी मारी दुनिया साय लेकर चलते हैं। मुझे कभी-कभी तीव्र-सी आकाक्षा होती है कि एक बार में दीवार पर चकर नीचे-वहां उसके अवेलेपन मे-मांककर देख सकू.'यह किमसे बोलता है, महाँ जाता है.~-ययो अचानक मुस्कराने लगता है। पर में लायोग मे बैठी रहती-और उसे दूर से देग्रा करती। जब कमी मैं लिखते-लिखते पक जाती तो रेस्क पर अपना माषा टिका देती-- अपनी घीसिम के बारे में भूल जाती-और उन दिनों के बारे में सोचने लगती--जब मैं शहर में घूमा करती थी। दिल्ली वड़ा शहर था। पर कुछ ऐसी जगहें पी, जहाँ एक-दो चेहरे वार-बार दिखायी दे जाते थे। पर से बाहर निक नती "जमे कुछ लोग जुआ रोलने या रेमकोर्स में जाते हैं--- क्या उन्हें सही पत्ता हाय सग जायेगा? कौन-सा घोडा सबसे आगे मागेगा? में अपने से रोमने लगती..'क्या वह इम कंसर्ट में बायेगा? या इनवार के दिन नेशनल म्युजियम के हाल में मुझे भ्रम होता, वह भी कही पोघे सडा है. सातवीं शती की किमो मूर्ति को देख रहा है। वह अचानक दिखायी दे जाता-और तब मैं जीत जानी। मेरा दिल तेजी से घड़कने लगता, किसी पियेटर से बाहर आते हुए या म्युजिक कार्फेस मे जो सर्दी को रातों में देर तक चलती रहती. "मैं टैक्मी को तलाश मे एक तरफ सही रहती और वह दूसरी तरफ बस-स्टैण्ड की तरफ जाता हुआ दिखायी दे जाता-जहाँ स्कूटर जिन्दगी महा और वहाँ 47 खड़े रहते। दिल्ली अजीव शहर है-~कुछ ऐसे स्थल हैं-जहाँ वे हमेशा दिखायी दे जाते हैं। एक चलती-फिरती दुनिया-जिसके सदस्य एक-दूसरे को नहीं जानते---फिर भी हमेशा एक-दूसरे से मिलते हैं, अंधेरे हाल में एक साथ ~पर एक-दूसरे को जानते नहीं, छूते नहीं-तमाशा खत्म होते ही अपने-अपने कोनों में खो जाते हैं। फिर गमियां आयीं और लोग बाहर जाने लगे-नैनीताल, मसूरी, शिमला-~-उन मौसमी परिन्दों की तरह जो सीजन बदलने पर अपने घोंसलों को छोड़कर उड़ जाते हैं। दिल्ली की सड़कों पर अब भी भीड़ दिखायी देती-किन्तु वे लोग, जिन्हें हम जानते थे--अब कहीं दिखायी नहीं देते थे। थियेटर के हाल बन्द हो जाते"म्युज़ियम के गलियारे उजाड़ दिखायी देते-जैसे बाहर का समय भी-भीतर की उनींदी कलाकृतियों की नींद में शामिल हो गया हो" एक दिन विचिम घटना हुई। मैं लायब्रेरी में बैठी थी.. पिछली सीट पर-जहाँ रोशनदान की रोशनी सीधे डेस्क पर पड़ती थी। एक गौरैया रोशनदान के शीशे पर तिनके जमा कर रही थी और उसकी छाया सीधे मेरे नोट्स पर गिर रही थी-मुझे यह डिटेल अच्छी तरह याद है-क्योंकि अचानक मुझे लगा, कि किसी ने आकर उस गौरैया को वीच में काट दिया हो और उसे अपनी ओट में छिपा लिया हो। मैंने सिर उठाया, तो वह दिखायी दिया। यह पहला मौका था, जब मैंने उसे पहली बार इतनी पास से देखा था। वह निश्चल खड़ा रहा "जमे वह गलत रास्ते पर है और वापस मुड़ना चाहता है क्या मैं आपको डिस्टर्व कर रहा हूँ ? मैंने सिर हिलाया और जल्दी से कागज समेट लिये जैसे मैं उन्हें उसकी आँखों से बचा रही हूँ-पर उमकी आँखें मुझ पर थीं, और उनमे एक दूर का दिलासा था-मैं मुस्कराने लगी । "क्या कुछ काम है ?" मैंने पूछा ---उसने एक मुड़ा-तुड़ा कागज मेरे नोट्स की कापी पर रख दिया। मैं उसे देखते ही पहचान गयी--कि वह कोई स्टेटमेण्ट है, कोई पिटीशन, कोई 'ओपन लेटर' जैसी चीज--ईश्वर ही जानता है, एसी चीजें उन दिनों कितनी निकला करती थीं। मैं उसे ध्यान - 48/कव्वे और काला पानी से पढ़ने लगी, पर मेरा ध्यान उमकी तरफ लगा था वह अब भी पड़ा था, मुझे क्या करना होगा। मैंने उसको ओर देखा। कुछ नही, उमने कहा, अगर माप इममे महमत हैं, तो माइन कर दीजिए। इसका कोई फायदा होगा? मैंने कुछ चिढाते हुए कहा ताकि वह बाहर निकल सके, मामने या सके। हागा क्यों नही उमने कहा-फायदा नही, लेग्नि मगर हम उनका ध्यान अन्याय की तरफ खीच मके कोई और कहता तो मैं हमने लगती, लेकिन वह लायब्रेरी के आधे अंधेरे में चुप सहा था . याहर जून की तपती, घुटती शाम थी। ऐमी घटी में न्याय-अन्याय की बात मुझे हिमालय की चोटी-सी जान पडी, ठण्डी और सफेद और पवित्र-पहुँच के परे-कुछ शब्द अचानक भीड में अलग हो जाते है-खोये से, सावारिस -प्रेम और पाप, ईश्वर, झूठ और न्याय और मौत -ठहरे पानी में अलग- अलग मावुत, चमाते, मुडौल पत्यरो की तरह मैंने जल्दी मे कागज उठाया और दूसरे नामों के नीचे अपना नाम लियने लगी और तब मुझे एक अदभुत-मा विचार आया -अपना नाम निम्रते हुए --कि मैं उसमे फिर मिलूंगी--किमी और दिन क्योकि मेरा नाम ठीक एक दूसरे नाम के नीचे था, जिसे यातना कहते हैं। पर यह दूर की बात थी और उस दिन मैंने उसे नहीं जाना पा। उन दिनो वे अकसर मिलते थे। दिल्ली में जन का महीना एक अलौकिक- सो चमक लेकर आता या-धूल के मन पर्दे पर सूरज एक मोमबत्ती-गा पिंपलता रहता और कोई वादल एक पतंगे-मा उठकर उसे अपने में ढक लेता । एक क्षण के लिए शहर पर अंधेरा घिर आता-. और एक पटी-फटी मफेदी लायनेगे के भीतर मौकने लगती। ये बडे हाल की पत्तियां जला देते और दरवाजे खोल देने । वह अपनी पको प्राय ठण्ड हैक पर मूंगती। वह घर की मोतियो उतरने लगना। बीच में बहन-गी सहक प्रानी मोर वह उनसे बचकर नॉट प्लेस के गलियारे में चना आनाटण्डे अंधेरे गलियारे में चरने लगता! बाहर धूप में औरतें मूलियो यानी-पानी में सर और तीसी -और उन परे गुलमुहर के पैड पा में दसवते रहो। दो गलियारों के बीच मड़ आती-और उन्हें पार करते हुए वह जिन्दगोरी और वहां 1.49 । - . का हाथ पकड़ लेती-तव तक पकड़े रहती-जब तक वे दुवारा अधर रीडोर में नहीं चले आते। पहली बार उन्होंने एक-दूसरे को इसी तरह आ था-डर में-रास्ते पर, सड़क पार करते हुए। यह ठीक नहीं था। रह एक तरह का अपशकुन था जो छाया की तरह आखीर तक मंडराता रहता है । वाद में, जब हम अकेले सड़क पार करते हैं, तो खाली हाथ हवा में डोलता है-पुरानी छुअन की याद में-उस अपाहिज की तरह, जिसे मौके मौके अपने कटे अंग की याद आ जाती है-यह एक छोटी-सी मृत्यु है। लोग वहुत धीरे-धीरे मरते हैं। मैं मलंगा नहीं-फैटी ने सोचा। अभी नहीं। मेरे पिता सत्तर की उम्र में मरे थे-और मां अभी कुछ वर्ष पहले तक जीवित थी। हमारे परिवार में लोग काफी लम्बी उम्र तक दुनिया को भोगते हैं। मरने के बाद भी वे जाते नहीं- वे यहां हैं, वे हस्तक्षेप नहीं करते, वोलते नहीं-किन्तु जब मैं कोई चीज खो देता हूँ, दुख सहता हूँ-तो वे अचानक अंधेरे कोने से बाहर निकल आते हैं, अपनी झोली में मेरे खोने और दुख को संभाल लेते हैं। वे मेरे जीने में नहीं, पर मरने में जरूर साझा करने को तैयार रहते हैं-जैसे मेरे कानों में फुसफुनाकर कहते हों.."डरो नहीं। तुम वेशक हमें भुला दो, हम तुम्हें नहीं मुला मकते। वह अंधेरे कॉरीडोर से बाहर निकल नाया-और उसकी आँखें चका- चौंध हो गयीं। एक क्षण के लिए उसे कुछ दिखायी नहीं दिया-फिर धीरे से किमी ने उसका हाथ पकड़ा और कहा-डू यू नोड चोप एयर-टिकट ? नेपाल? नेपाल ? उसने आंखें खोली और हमने लगा। वह बहुत महीने पी मुड़ गया-जब वे साथ चल रहे थे। वे तुम्हें विदेशी समझते हैं-उस कहा। मुझे देखकर नहीं-उसने कहा--जब तुम मेरे साथ नहीं होती, न मुझने कोई डॉलर मांगता है, न कोई नेपाल का टिकट वेचता है। देखकर? वह हैरान हो जाती-शायद वहाना करती-या सचमुच है हो जाती, अपने सिर का स्कार्फ उतारकर वालों को समेट लेती। वह कचे कद की लड़की थी, ऐनक के पीछे मांखें डरी हुई उत्सुकता में रहतीं। कन्धे पर थैला लटकता रहता और उसमें एक नीली फाइल । in/कन्वे और काला पानी फुलम्वेष कागज और सायरी की किताबें टुमी रहती । ईश्वर हो जानना है, उस थैले मे क्या भरा रहता था। "तुमने ते क्यो नहीं लिया?" उसने हंसी में आयें ऊपर उठायीं-- "इतने सस्ते में नेगल धूम मयते हो।" "सुनो-- -हम अगली गमियो मे जा सकते हैं..." उसने खुशी की री में अगली गर्मियों में ? उसके स्वर में इस्का-सा विस्मय था। वे धोसिस के आखिरी दिन थे और वह न सर्दियों के बारे में मोचती थी, न गमियों के । लायरी से घर और घर से लायरी--यह कितनी छोटी दुनिया की --और कितनी वही। इनके बीच नेपाल एक स्वप्न-सा जान पहता या| पर उम क्षण-कनॉट प्लेस के अंधेरे कॉगैडोर में चलते हुए उसे बजीय- सा मुख हुआ कि वह जा सकती है। इस दुनिया से बाहर निकल सक्ती सुख? क्या कोई ऐसी चीज है, जिस पर उंगली रसकर वहा जा सके, यह मुख है. यह तृप्ति है ? फंटो एक सम्भे के सहारे पडा हो गया-बाहर कनॉट प्लेस का फवारा दीवाली के अनार की तरह लग रहा था-तितीरी धूप में मफेट फुहार कर उठ रही थी. नीचे गिर रही थी- नही, मुण होता नहीं, मिर्फ याद किया जा सकता है-अपनी यातना में--जय तुम्हें अचानक पता चलता है-यह जन है, वह जनवरी था। तुमने सोचाया, उसके चले जाने के बाद तुम इस शहर मे नही रहोगे। पर तुम जीवित हो और सांस ले रहे हो.''भादमी की पाल क्तिनी पक्की होती है ! सबकुछ बर्दाश्त कर लेती है। पानी में डूबकर एक कुत्ते की तरह बाहर आ जाती है, जो एकबारगी अपनी देह मिमोड़कर सबकुछ माह देता है पानी का अंधेरा कितनी देर याद रह सकता है ? वह स्टेटसमैन की बिल्डिंग के सामने चला माया । वह खहा हो गया- लाल बत्ती को हरी बती मे वदसने की प्रतीक्षा मे~ऊपर तोतो का मण्ड उहा जा रहा था-कर्जन रोड के पेडो से उड़कर मिष्टो रोड के विज के ऊपर, हवा मे एक लहर की तरह उठना हुआ। एक वार पर रेल जा रही थी और ये नीचे थे। वे नीचे वम में बैठे । fata । थे। ऊपर मिण्टो रोड का पुल था। "तुमने कुछ मांगा?" उसने उत्सुकता से मेरी सोर देखा ... "इस वक्त तुम जो कुछ मांगोगे, वह मिल जायेगा।" मैं हमने लगा-~-मुझे नहीं मालूम था, वह इन चीजों में विश्वास करती है" "जल्दी मांगो, वरना रेल गुजर जायेगी।" एक क्षण के लिए हम दोनों चुप वैठे रहे और बस पुल के बाहर निकल आयी। वह बारिश की शाम थी और एक नवसन्न-सा उजाला उसके चेहरे पर गिर रहा था। "बोलो----तुमने क्या मांगा था?" उसने मुझे देखा -इतनी उदास आंखों से मैंने मुंह मोड़ लिया और बस की खिड़की से वाहर देखने लगा। उस शाम-मिण्टो रोड विज के नीचे -- जब ऊपर रेल गुजर रही थी उन दोनों ने एक ही इच्छा मांगी थी, एक दूसरे से अलग होने की वे जितना ज्यादा एक-दूसरे को चाहते थे, उतना ही एक-दूसरे से छुटकारा पाने के लिए तड़पते थे----जैसे चाहना कोई पाप हो, कोई बुरा स्वप्न, और तव हरी बत्ती हुई और वह सड़क पार करने लगा और कर्जन रोड के पीले, धूल में सने पेड़ों के नीचे चला आया। उनके नीचे चलते हुए उसे बचानक याद आया कि जीसस ने कहा था कि जिनके पास है, उसे और भी दिया जायेगा, और जिसके पास कुछ नहीं है, उससे वह भी ले लिया जायेगा जो कुछ उसके पास है। पता नहीं, इसका क्या मतलव था? मैं अभी जाऊंगा और उससे यही पूडूंगा और तब मेरे भीतर एक बहुत धंधली तस्वीर खिच आती है-वह लायब्रेन के एक कोने में बैठी होगी, अपनी रिसर्च की कापियों में डूबी हुई। वह सोच रही होगी --अब मैं नहीं आऊंगा । वह दुबारा फोन करेगी -- और घर में कोई नहीं होगा घर के सूने कमरों में फोन की घण्टी बेमतलव चीखती रहेगी क्योंकि मैं यहाँ हैं, कर्जन रोड के पेड़ों के नीचे अपर तोतों का झुण्ड शाम की धूप में मिण्टो ब्रिज की तरफ जा रहा है, वाइबिल का सिर्फ एक वाक्य दुहराता हुआ जिसके पास है और जिसके पास नहीं है। - वह एक बेल था। वे दोनों बेनते थे -खासकर उन दिनों-जब वह बहुत धक जाती ! लायब्रेरी ने मीधे आकर उसके कमरे में लेट जाती थी। वह अपने कमरे के दरवाजे खोल देता-नीचे के कमरों में सन्नाटा रहता, और 52/लेोकालापानी वे बन्द रहते थे। मिफंछन नी रहतीन का अंधेरा छोटे-छोटे टुकड़ों में आता। हर टुकडे पर देर मे तारे विधे रहते --वे उन्हें दरवाजे पर मरसता हुआ देखते रहते। वह एक सेत पा~ -जादू और चमत्तार- जहाँ वे दोनों बिना एक पद भी बोले एक-दूसरे की इच्छा भाप लेते थे। कुछ लोग इसे टेलिपी कहते हैं। --जब दो अलग-अलग व्यक्ति एक ही घडी में एक ही बार मोच लेते हैं । वे जब उनके कमरे में बात ये, तो वह अंधेरे में आ मुंदकर लेट जाती थो- यकी और निढाल । वह हीटर पर पानी व्यासने रख देता बार फिर उसके पास आकर बैठ जाता। दोनो अंधेरे में एक-दूसरे को सांस सुनने लगते। "सुनो," उसने सिर उठाकर कहा, "मैंने कभी तुम्हारे पादर को नहीं देखा।" "तुम्हें मालूम नहीं, वे मर गये।" "मुझे मालूम है," उसने कहा, "पर तुमने कभी उनकी फोटो भी नहीं दिसायी?" वह उठ बैठती-~और खेल शुरू हो जाता । वह काफी विचित्र गेल था, क्योंकि कुछ देर के लिए हम एक-दूसरे को बिल्कुल भूल बात पे "इस समय से छूटकर एक दूसरे समय में चले जाते थे, जहाँ मेरा घर धीरे-धीरे जागने लगता। वन्द कमरों के दरवाजे खुल जाते, जमे वह एक म्युजियम हो. में गाइड है और वह चुपचाप आँख फाइते हुए हर चीज को देखने लगती में एक मालमारी खोलता, फिर दूमरो -पता नहीं, वह फोटो कहाँ थी, जो तीस साल पहले ली गयी थी। उमे ढूंढते हुए दूसरी चीजें बाहर आ जाती। में उन्हें छिपाने की कोशिश करता और वह मेरा हाथ हटा देती-मुझे याद है, वह मां की नथ बहुत ध्यान से देखा करती थी। मैं उसमे नफरत करता पा, क्योंकि उसने मां की समूची नाक छोल हानी पो. 'मानमारी के दूसरे कोने में मेरे पिता के नकली दाँत रमे थे। मैंने उन्हें मंभालकर रखा था, समी गिलास में, जिसमें वे उन्हें उतारकर रखते थे। दोतो के पौष अब भी यस रोटी के कुछ टुकड़े फेसे पे, जो उन्होंने पिछली रात थाये थे.". ।
AN - "मरने से एक रात पहले ?" उसने पूछा । वह मेरे पीछे खड़ी थी--- उसका हाथ मेरे कन्धे पर था, जैसे वह मुझे बचाने की कोशिश कर रही हो। पर मैं बचाव के बाहर था। मैं बरसों से उस घर में अकेला रहा था। मैं उसके कोने-कोने को जानता था। मुझे किसी बचाव की जरूरत नहीं थी। "यह पलंग देखती हो यह विस्तर।" उसने कहा, "वे यहां लेटते थे। मैं ऊपर सोता था-वहाँ ऊपर वरसाती में -जहाँ तुम आती हो।" मैं उसके पीछे चलती गयी। वह एक लम्बा हाल था। कोने में एक तिपाई रखी थी। पीछे कपड़ों की वॉर्डरोब । उसने खिड़की खोली-और तब अचानक रोशनी का सैलाब भीतर चला आया, जैसे बरसों से बाहर जमा हो, भीतर आने की प्रतीक्षा में। रोशनी बिस्तर पर आ रही थी- एक उठा हुआ तकिया, दो कम्बल, बीच में एक गड्ढा-~-जैसे कोई वहां लेटा था--अभी-अभी बाहर गया था। "यह उनका विस्तर था?" मैंने उसकी ओर देखा-और तब मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मुझे लगा, जैसे मैंने किसी प्रेत को देखा है-कोने में खड़ा हुआ-मुस्कराता हुआ। तब मुझे अचानक याद आया, वह सड़क पर चलता हुआ इसी तरह मुस्कराता था--अपने आप-~-अकेले में-जैसे उसने किसी अदृश्य चीज को देखा है----भीतर की दुनिया से बाहर आते हुए-~-वह ठिठक जाता था। वह खुद अपने से बोलने लगता था." "फैटो," मैंने उसका कन्धा हिलाया। उसने मेरी ओर देखा-जैसे मैं कोई शीशे की दीवार हूँ-और वह मेरे भीतर गुजरकर मेरे पार देख रहा है, "हाँ-वे यहीं मरे थे।" उसने कहा, "मैं उनकी तिपाई पर दवा रख देता था। पेशाब की बोतल साफ कर देता था। मैं उनके सिरहाने की खिड़की खोल देता था। तुम जानती हो, दिल्ली में अगस्त की रातें कितनी साफ होती हैं --सोने से पहले वे आकाशगंगा देखते थे। उन्हें कभी नींद की गोलियों की जरूरत नहीं महसूस हुई। वे कहते थे -तारों के बीच सफेद लाइन पर चलते हुए मुझे नींद आ जाती है। मेरी तरफ हैरानी से मत देखो-वे सचमुच विचित्र आदमी थे। जब उन्हें पता चला कि मैं लिखता हूँ तो एक 54/कन्चे और काला पानी - - हूँ दिन उन्होंने मुझे अपना रजिस्टर दिखाया मरने से दो दिन पहले। प्लीज टनंट पेज नाइनरी सेवेन "उन्होने कहा। वे अपने बच्चों से हमेशा अग्रेजी में बोलते थे। मैंने रजिस्टर खोला, तो सत्तानवे पृष्ठ पर सारा पन्ना बाली पड़ा था~मिर्फ ऊपर लिखा था - लाइफ हियर-ऐण्ड हियर आफ्टर ! मैंने उनकी तरफ देखा-तो वे मुस्कराने लगे "यह टाइटिल है -उन्होने कहा। जब बैठने लायक हूंगा,तोसवकुछ लिख डालूंगा। मैं बहुत कुछ उन जैसा । मेरो बडी वहन मुझसे कहती थी कि मुझमे और बाबू के वीच एक बहुत पतला और महीन-मा धागा है, जो उनको दुनिया को मुझसे अलग कर देता है- जिम दिन मैं वह धागा तोड दूंगा, मैं वहीं हूँगा. जहाँ वह हैं बिल्कुल निरोप और पवित्र जगह में.."विट्टी, इधर देखो, यह फोटो है, अब तुम उन्हें देस सकती हो. "इधर नहीं "इधर, खिडकी के पास आ जाओ। रोशनी में देखो... मेरी उम्र कोई सात बरस की होगी। तुम हमोगी-- --पर मच बात यह है. मैं दिन-भर रोता रहा । मैंने सोचा, मेरी अन्तिम घडी आ पहुंची है। मेरा यह अन्धविश्वास था कि फोटो खिचवाले ही मेरे भीतर का फुरना (यह मां का पाम था, जिसका मतलब शायद 'मात्मा से रहा होगा। जब कभी मैं गुस्से में आकर धाना नहीं पाता था, तो वे मुझे हराती थी कि जब मैं मो जाऊंगा, मेरा फुरना मेरी देह मे निकलकर रमोई में चला जायेगा--रात-भर भूखा- प्यासा मंडराता रहेगा)-हो, तो मेराफुरना मुझे छोड़कर फोटो पर चिपक जायेगा-जैसे कोई तितली अल्वम के कागज पर चिपक जाती है, मर जाती है। मुझे डर था कि फोटो मे आते ही मैं इस दुनिया से चला जाऊंगा, क्योंकि आदमी एक ही समय मै दो जगह मौजूद नहीं रह मकता "यही कारण है कि मैं इस तरह आतक्ति, बदहवाम, गमगीन निगाहों से दुनिया को देख रहा हूँ। मेरी मां कुर्सी पर बैठी है, बाबू पोधे सड़े हैं । मैं आग हूँ, नपीये-दोनो से अलग माना हाय कुर्मी के हत्थे पर टिकाकर अपनी घातक नियति की तरफ पूर रहा हूं। मोटे बच्चे यों भी काफी दैजिक दिखायी देते हैं-उन्ही दिनों का नाम आज भी चला आता है, तुम्हें याद है, जब मैं सायरी मे पिटीशन लेकर आमा या, तब "तुमने सोचा था जैसे में कोई..." जिन्दगी यहाँ और वहाँ 155 -- ..- . बहुत चाहने वह नहीं सुन रही थी। वह खोयी आँखों से इन तीन अद्भुत प्राणियों को देख रही थी जो तीन साल पहले की फोटो में साँस ले रहे थे--- उसकी तरफ घर रहे थे, जैसे पूछ रहे हों, कौन है यह अजनबी लड़की, जो उनके घर में चली आयी है, खिड़की की रोशनी में उनके अंधेरे को टोह रही है- लाइफ हियर ऐण्ड हियर आफ्टर ! कौन-सी जिन्दगी यहाँवालो या वहाँ--- जहाँ वे हैं---जव मैं वत्ती जलाने के लिए उठने लगा, तो उसने मेरा हाथ पकड़कर विठा दिया."उसे कमरे में धीरे-धीरे अंधेरा माना अच्छा लगता था--जून की पीली तलछट, जो विस्तर पर विखर जाती और मैं उसके घुटने पर सिर टिकाकर लेट जाता, सोचने लगता, पता नहीं, वह वावू और मां के बारे में क्या सोच रही होगी । जव तुम किसी लड़की को लगते हो-~-तब भीतर की पट्टियाँ खुल जाती हैं -~और तुम्हें डर लगा रहता है कि कहीं उसके मुंह से हंसी या हिकारत का शब्द न निकल पड़े । एक उम्र के बाद तुम उन्हें (मां-बाप को) एक खुले जख्म की तरह भीतर लेकर चलते हो । अगर वे जीवित हों, तो कोई बात नहीं। वे अपने को स्वयं बचा सकते हैं । पर अगर वे नहीं हैं, तब-तब कोई भी हथेली पर उनकी राख फूंक मारकर उड़ा सकता है। "सुनो...", उसने धीरे से कहा-और तव उसका स्वर सुनकर मेरा दिल धड़कने लगा-मैं उसके स्वर को पहचानता था--जब उसने बहुत कड़वी, बहुत घातक बात कहनी होती थी उसका स्वर अचानक बहुत कोमल हो जाता था। "फैटी...," उसने कहा, "मुझे नहीं मालूम था, तुम इतने बदल जाओगे।" "कसे?" मैंने कहा। "फोटो में तुम विल्कुल निर्दोप दिखायी देते हो।" उसने यही शब्द कहा था, निर्दोष---जिसे सुनकर मुझे लगा, जैसे मैं गन्दगी में डूबा हूँ-तीम साल से जमा होते पाप, झूठ और धोखा। मैं हंसने लगा, "इरा-यह फोटो तीस साल पहले की है-मैं तब सात बरस का था।" "मुझे मालूम है।" उसने कहा। - 56/कन्वे और काला पानी "तुम्हें कुछ भी नहीं मालूम !" मेरी देह गुस्मे और पीने से परपरा रही थी। उसने मेरा मिर अपने घुटनो से हटा दिया-अलग कर दिया, जैसे मुझे कोई छून की बीमारी हो । इन्ठा हुई, उठकर कमरे की बत्ती जलाई, एक बार उसकी आँखो से दोबारा अपने को देखू - बैंक के जिस बाते में हमने अपना प्रेम जमा किया था, क्या उसमें से मैं एक पाई विश्वास नहीं भुना गकता? लेकिन मैं उठा नही । मैं अंधेरे में बैठा रहा। मुझे गा हुआ, वह मुझे दध रही है -ऐना कई वार होता है, जब अंधेरे मे तुम दूसरे को नहीं दे सकते-लेकिन यह पता चल जाता है कि वह तुम्हें देख रहा है, तोल रहा है, परख रहा है और तुम कुछ भी नहीं कर सकते, कोई दलील, कोई परवी, कोई यचाय तुम्हें नहीं बचा सकता-वह वायद समझ गयी। उसने अंधेरे में हाथ उठाया और मेरा चेहरा टटोलने लगी... भने उमे वीप में ही पकड़ लिया---"सुनो", उमने कहा, "क्या तुम मुझे मचमुच चाहते हो क्या मैं तुम पर भरोमा कर मकती हूँ ?" वह इतना हताग, इतना कातर, इतना सम्पूर्ण प्रश्न था कि मैंने जल्दी से उसका हाप अपने चेहरे से हटा दिया जैसे अचानक किसी ने मुझे रास्ते में पकहकर दिन-दहाड़ें पूछा हो, "फैटी, क्या तुम ईश्वर मे विश्वास करते हो?" एक पागल-मा विनार आता है-अगर इसका कोई जवाब नहीं है, तो तुम जी नहीं रहे हो-तुम बहुत साल पहले मर गये ये-जब तुम्हारा फोटो गीचा गया था-तुम्हारा फुरना कहीं और है-तुम्हें यह भी नहीं मालूम, तुमने उमे रास्ते में कहाँ गिरा दिया। मैंने अंधेरे मे उसे पकड़ लिया ---अपने पाम धमीट लिया और हम दोनो बहुत देर उन डरे हए बच्चों की तरह बैठे रहे, जो रास्ता भूनकर फुटपाथ पर बैठ जाते हैं--प्रतीक्षा करते हैं कि शायद कोई हाय पकड़कर घर पहुंचा जाये। पर कहीं न पा"दुस पार बोश दुख, जिसका कोई फल नहीं, जो एक- दूसरे में टकराकर खत्म हो जाता है और हम मे नही देखते जब तक आधा सिना पानी में नहीं टूव माता । तब हम घबरा जाते हैं, आतंक्ति- से होकर पानी को उनीचते हैं-पर फायदा कुछ भी नहीं है-जितना दुल हम बाहर निकालते हैं. उससे कही ज्यादा मुराख मे भीतर पत्ता आता है। फिर हम बार-बार वहीं लौट आते हैं, मेरा एक कमरा, पिता का जिन्दगी यहाँ और यहाँ /57 बिस्तर, मां की खाली कुर्सी-और जून का महीना। वह लायनेरी में बैठी रहती और फैटी स्टेटमेण्ट तैयार करता "न्याय और झूठ के बारे में- कोई भी चीज-जो किसी तरह सुराख को वन्द कर सके, बहते पानी को - रोक सके। फिर जुलाई का महीना आया-और मुझे पता चला सुख क्या होता है। कभी दिल्ली का आकाश देखा है --मेरा मतलव है-जुलाई में-टेलिफोन बूथ के शीशे के बाहर, जब बादलों के पीछे एक हल्का और पीला रोशनी का धब्बा दिखायी देता है-नहीं-दिखायी नहीं देता, सिर्फ आभास होता है ---कोई चीज चमक रही है । वह सूरज है--सूरज का एक संक्षिप्त धुला हुआ प्रेत । हमारा सुख बिलकुल वैसा था---एक डवडवायी रोशनी का भ्रम, माया और सच के बीच एक भागती हुई छांह । वह मेरे घर के ऊपर ठहर जाती-और हम अपनी चटाई और चादर बाहर ले आते। थोड़ी-सी बारिश की बूंदें छत की धून को समेट लेती और एक सोंधा, दुधला-सा धुआं हवा में उड़ने लगता । हम छत पर अकेले लेटे रहते । मुझे कोई खतरा नहीं था कि कोई हमारे सुख में दखल दे सकेगा क्योंकि वे बरसों पहले मर गये थे और सब कमरे और आलमारियां और मकान की छत मेरे हवाले कर गये थे। भूख की चिन्ता नहीं थी। वह अपना टिफिन-दान मेरे हीटर पर रख देती-- अण्डे की भुजिया, माल, टोस्ट-~~-और जब कभी उसकी मां बहुत खुश होती ~ तो पीले, नमकीन चावल-जिनमें मटर पड़े रहते । मेरे पास सूखी चीजें रहनी थीं-डबल रोटी, चीज़ और मछली के डिब्बे--कभी- कभी मैं उसे हैरान कर देता जब मैं उसे जबर्दस्ती बाहर छत पर बिठा देता -~~-आँखों पर रूमाल बांध देता, ताकि वह भीतर न देख सके-और चीज़ का आमलेट बनाकर उसके सामने रख देता। वह खाने लगती-हेगन होकर मेरो ओर देखती-और मैं उसकी पट्टी उतार देता-ताकि वह मुझे अच्छी तरह देख सके। "किसने सिखलाया तुमको ?" उसने पूछा-जैसे आमलेट वमाना दुनिया का आठवां विस्मय हो-"किसी ने नहीं," मैने कहा, "जब मैं बाहर - 58/कव्वे और काला पानी पा, तो सबकुछ पद बनाता पा।" "तुम खुद बनाते पे?" "हो.. क्यों ?" मुझे नहीं मालूम पा, इतनी मामूली-मी वात उमे छु डालेगी। 'याहर।" कुछ भी नहीं बना सकती।" उसने कहा.. और अपना सिर मेरे कन्ये के नीचे टिका दिया। उसका सिर मेरे गले के नीचे था और मैं उसकी सिर्फ प्रोफाइल देस मकता या-आधा माया, पलकों के बाल और खुले हुए होंठ -जमे बच्चे कुछ मोचते हुए मुंह सोल देते हैं--"तुम सोचते हो, अगर मैं बाहर जाऊँ तो अपने पर रह मकती हूँ।" "वाहर कहाँ ?" "कही भी...विदेश नहीं लेकिन अपने पर के "क्या करोगी?" मैंने धीरे से उसका सिर उठाया-उसकी आंखो को देखा, जो मेरे चेहरे पर टिकी थी..."पया अपना पर छोड दोगी?" सहसा उसकी देह सिकुड़ गयी। यह नक क्षण होता-जब वह अपने मे मिड जाती-और मुझे कुछ भी पता नहीं चलता था कि वह पया मोच रही है "जैसे उमकी देह मुझसे सटी हो-पर वह स्वयं मुझे छोह- कर चली गयी हो"उन जानवरों की तरह, जो खतरे को आहट पाते हो अपना रंग बदल लेते हैं । पेड या घास या पत्तो के बीच ये भो पेट और पास और पत्ते बन जाते हैं, होते हुए भी कहीं दिखायो नही देते "इरा," मैं उसे हिलाने लगता, और यह नोट आती है रानी से चारों तरफ देखती, मानो तय नहीं कर पा रही हो, कि वह कहा है, अपने घर में या मेरे कमरे की छत पर यह कमरे के भीतर जाती-पर बत्ती नहीं जलाती। कमरे में एक महीन रेत-गा उजाला रेंगता रहता-जुलाई की रोशनी-जो तारों से टपकनी हुई भीतर तक चली आती। मैं बाहर से उसे देखता---एक स्वप्निल सो मिलहट- :-~उमका सिर दिखायी देता, मुंह मे दवे क्लिप, मुर्मी पर किताबों के बीच उसकी जीम, पुर्ता, कन्धे का मेला, पंत में नीली फाइल, जिमके कागज पर निकले रहते । अब लगता है, वह जो जुनाई को एक साम देता या वह गलत है, घोया "पयोंकि जब हम पौधे मुहकर देखते हैं जिन्दगी यहाँ और तो सब शामें एक स्मृति पर टंग जाती हैं और हमें भ्रम होता है कि वह जुलाई की एक शाम हुआ था-जवकि उसमें अगस्त और सितम्बर और अक्तूवर की सव घड़ियां शामिल हैं-एक प्राचीन फॉसिल की तरह, जो ऊपर से सिर्फ एक पत्थर-सा दिखायी देता है किन्तु जिसमें बीती हुई सदियों की तमाम हड्डियां परत-दर-परत जमा होती जाती हैं। वह बत्ती जला देती और दरवाजे के बाहर झांकने लगती, "फैटी!" मैं चुप रहता और छत के अंधेरे कोने में खड़ा रहता। "फैटी," वह दोबारा बुलाती और कोई उत्तर न पाकर बाहर आ जाती, इधर-उधर देखती और फिर पानी की टंकी के सामने आ खड़ी होती। नल की टूटी खोल देती और अपने कुर्ते की बाँहों को मोड़कर मुंह धोने लगती। मैं देखता, कैसे पानी उसके चेहरे पर बहता हुआ उसकी नाक की टिप पर एक बूंद की चमक में थिर हो जाता है, जैसे वह कोई अटका हुआ आंसू हो "मैं उसके पास आता और वह चौंककर पीछे देखती, मेरे तपते होंठ उसके गीले चेहरे की ठण्डक को सोखने लगते, दुख में कोई डर नहीं होता, किन्तु जिसे हम सुख कहते हैं, वह हमेशा डरों से घिरा आता है। वह जाने की घड़ी होती-और हालांकि हम दोनों एक शहर में रहते थे, जाने से पहले लगता, जैसे हमें कोई चीथड़ों में फाड़ रहा है, तार-तार कर रहा है। मैं ताला-चाभी ढूंढ़ने लगता और वह खाली टिफिन अपने झोले में डाल देती, जहां उसकी थीसिस के नोट्स उघड़े रहते। "फैटी," उसने कहा। "तुम बैठे रहो.मैं चली जाऊँगी। अभी कुछ भी देर नहीं हुई।" "देर ? तुम जानती हो, क्या वजा है ?" मैं एक हाथ में उसका थैला उठाता, और दूसरे हाथ से टार्च जलाकर जीना उतरने लगता--दीवार पर उसकी दुवली, क्षीण-सी छाया मेरा पीछा करती--बीच की मंजिल पर ठिठक जाती- सारा घर खाली । वह एक-एक कमरे को जानती थी। मैंने उसे एक गाइड की तरह सबकुछ दिखाया था-वह कमरा, जहां बड़ी बहन शादी से पहले रहती थीं, दायीं तरफ वह कमरा, जहाँ बाबू मरे थे, पीछेवाली खिड़की, जहां से आकाश-गंगा दिखायी देती थी और वह कुर्सी, खाली और फटीचर--एक आमचेयर! वह सीढ़ियों पर खड़ी थी-सफेद और स्तब्ध-बरामदे की रोशनी - - 60/कव्वे और काला पानी मके वालों पर गिर रही पी। वह हमेशा बाहर जाते हुए उम कुर्मी को या करती थी, जो यौच छाने पर पड़ी रहती पो"तुम्हें याद है वह मे स्वर में पूछनी, "ही", मैं कहता, "मैं यही बड़ा था, वे इसो कुर्मी पर ठी थीं।" "उनके अन्तिम नाम्द क्या थे?" "कौन-से अन्तिम गन्द?"मैंने उसकी ओर देखा। "जब तुम जा रहे थे।" उसने कहा। "मैंने तुम्हें कितनी बार बताया है ।" मैंने कहा। "मैं दोबारा सुनना चाहती हूँ-तुम बाहर जा रहे थे। यह बरामदे में ठी तुम्हें ताक रही थी".."उसने कहा--जैसे वह कोई स्वप्न देख रही हो। "टिकट के बारे में..." मैंने कहा। "उन्होने पूछा, मैंने अपना टिकट जेव रसा है या वैलेट मे "उन्हें हमेशा यह हर लगा रहता था कि मैं अपना कट खोदूंगा।" एक क्षण यह बागी कुर्मी को देखती रही। "और तुमने उन्हें यो दिया।" "वे बहुत बूटी थी .." 'मैंने कहा, "उन्हें कुछ भी माद नहीं रहता था।" "फटी".. उसका स्वर परपरा-सा गया।"वे अकेले घर में मरी थीं।" मैंने उसकी ओर देसा-आयें एक विस्मयकारी आतक मे खुली थी" ही एक आईना है, सम्बे पेडो से घिरी विक्टोरिया स्ट्रीट और बीच में एक टा-मा पाई, गेलते हुए बच्ने और कार पूमते हुए यादल, लन्दन कापीला लोक "वेंच पर में बैठा हूँ, हाय में एक केवल लिये, एक साल कागज का डा, जिस पर पांच काले शब्द बाहर झांक रहे हैं, मदर हाइस घिदाउट ती पेन, और मैं शन्नी को बार-यार दोहरा रहा हूँ. विदाउट पेन, विदाउट पेन, उम तिम्तो भिक्षुक की तरह, जो प्रार्थना का पहिया पुमाता गा एक ऐमे दाने पर पहुंच जाता है जहाँ कोई मत्य है. कोईर, ई शून्यतम सूनापन--एक विस्मयलोक, वण्डरसण्ड, जिसके भीतर लस ने मौका होगा, देसा होगा, कोई दरवाजा दूमरी दुनिया को जाता "अकेले में? हाँ, अकेले में," मैंने कहा, "लेकिन बिना किमी कष्ट के, जिन्दगी यहाँ और बहार विदाउट एनी पेन-उन्हें आखिरी वक्त कोई दुख नहीं था, इरा, उनके माखिरी दिन अकेले में बीते, पर सुख में वीते" और तव मुझे लगा, वह रो रही है, थरथर कांप रही है-मैं उसे छूने के लिए आगे बढ़ता और वह मुझे ठेल देती, दीवार से सटकर त्रस्त निगाहों से मुझे देखने लगती-अजीव नफरत में..-नफरत भी साधारण नहीं, बल्कि ऐसी, जिसमें---एक ठण्डा, पथरीला, तिरस्कार छिपा रहता, "तुम यहां क्या कर रहे हो फैटी".."वह धीरे से कहती। "तुम यह घर वेच क्यों नहीं देते... वह कहती, "यह तुम्हारे पिता का घर है-और तुम इससे जोंक की तरह चिपके हो।" वह धीरे-धीरे उस फोड़े के आसपास नाखून धुमाने लगती, जिसमें टीस का घर था, एक पीली फूली हुई गुठली, जिसे वह निचोड़ने लगती। "जाते क्यों नहीं-- इसलिए कि तुम यहां सुरक्षित हो?" माँसुओं के बीच हंसने लगती ----पुचकारने लगती-ओ फैटी, डियर फैटी डियर-डियर फैटी"अब वह सीधा उसकी सुई तले होता, एक अधमरा जीव-जिसका धड़ कुचल जाता है, किन्तु पूंछ दीवार पर अपने को पटकती रहती है। उसकी पीड़ा दुवककर किसी कोने में भाग जाती-मालमारी में रखे बाबू के दांत, माँ की नथ- वह उनके पीछे छिप जाता, पोएट्री की किताबें, स्टेटमेण्ट, रिकार्ड-~~-अपने को बचाने के लिए उसने कितनी चीजें जमा कर रखी थीं-किन्तु वह उसे लकड़ी से बाहर निकालती-जैसे हम छिपकली, किमी छडूंदर को अंधेरे, सुरक्षित कोने से बाहर निकालते हैं। क्रूर उजाले में..'दीवार के एक कोने से दूसरे कोने में भागते हुए, तिलमिलाते हुए, हांफते हुए--- दुनिया के वह वाहर आ गयी-वाहर---जहां जुलाई का अंधेरा दिल्ली की छतों पर अटका था। वह स्कूटर लेती और उसके घर से दूर भागने लगती-कनॉट प्लेस, इण्डिया गेट, पुराना किला-सव एक-एक करके गुजर जाते। ऊपर सिर्फ वादल होते-और छितरे हुए तारे----जो जुलाई की रातों में धुले हुए बटनों-से चमकते थे। न कोई पुल, न रेलगाड़ी--जिसके नीचे मैं कोई इच्छा मांग सकती। उसने चाभी बाहर निकाली, गेट का ताला खोला और भीतर चली पायी। छोटा-सा लॉन, नींबू के पेड़ और इंटों की दीवार-यह उसका घर , 621 कच्चे और काला पानी । पा। वह कुछ देर मेघेरे में सडीरही-पिडकियां गुली थी-पागटेलिविजन देन रहे होगे-माकपडो पर इस्त्री कर रही होगी। वे जान लेते थे, वह मा गयो है-पर उमके कमरे में आने का माहस नही बटोर पाते थे-वह रसोई में जाकर टिफिनदान रमती, मुंह धोती-और भागकर अपने कमरे मे आ जाती। जल्दी मे कोई रेकाहं लगाती और बिना कपडे बदले विस्तर पर पसर जाती-बीच मे समय बीतने लगता-अगस्त के यले दिन और सितम्बर का उदास आलोक-झाडियो और घाम और पेड अपना रंग मदलने लगते-वह अपनी पकी आँसोको तकिये पर भीच लेती-- वह हॉल कमरे में आती--बिल्कुल दवे कदमो मे - कार पापा और मां सो रहे होते-यह बती भी नहीं जलाती, उसे फोन के मब नम्बर मालूम पे और अंधेरे में यह डायल घुमाती और दूसरी तरफ घण्टी सुनायी देती, वह मो रहा होगा, घाली घर के सन्नाटे में फोन की आवाज घीस रही होगी..."हलो, हलो" फैटी का स्वर उसे चौंका देता-वह मुन्न-मो सही रहती. "हलो, हलो, हलो"--और तब सन्नाटा हो जाता, वह रिमीवर रस देता-और यह फोन पर धीरे मे कहती, "फैटी, यह मैं हूँ, मैं सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनना चाहती थी..." वह नवम्बर का महीना पा-और उसकी आवाज को दिल्ली की हवा पकड़ लेती और सहक पर उडने लगती। चलते हुए लोग क्षण-भर के लिए ठिठक जाते-कौन है यह फंटी-ये सोचने लगते-किन्नुसहर की हवा मे इतने नाम, इतनी सांसें, इतने आंसू, तिरते रहते-कि यह अनुमान लगाना असम्भव हो जाता कि किमका नाम किसने पुकारा है-और वे गिर हिला- फर आगे बढ़ जाते, भूल जाते, भीड़ मे यो जाते। लेकिन वह कभी नहीं भूल पाती-'यह मेरा भेद है'--वह सोचती, 'मेरा मयमे बड़ा भेद, रहस्य--फैटी- मुझे देखो और तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम सबमे पाखण्डी, मूठो,-हिप्पोक्रेट-दुनिया की सबसे बड़ी हिप्पोक्रेट सड़की को देख रहे हो तुम हम रहे हो? लेकिन ठहरो-मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ। यह मेरी पोटली है- हेमो नहीं-योलो, धोनकर देखो-नहीं. ये पोमिस के नोटम नहीं-इन्हें अलग रहने दो-ये पोएट्री को पतली, पंगुइन किताबें नहीं"पसोओ, मन्ना अमानोवा, नेरूदा। नहीं, जिन्दगी यहा और वह - ये नहीं, ये कागज, ये नोट्स, ये सॉनेट्स नहीं"फिर, फिर क्या ? 'सुनो-तुम्हारे घर से जब मैं अपने घर लोटती हूं, तो बहुत देर तक में नीचे लॉन में खड़ी रहती हूँ-अंधेरे में ऊपर देखती हूँ--पीली ईंटों की दीवार, हरी खिड़कियां, खिड़कियों पर झूलती लताएं--पूरा एक बंगला, एक मकान-जानते हो, वे इसे मेरे लिये छोड़ जायेंगे 'मैं खुली आँखों से इन खिड़कियों, हवा में फरफराते परदों को देखती हूँ-वे अब डाइनिग रूम में बैठे होंगे। वे तब तक खाली प्लेटों के आगे बैठे रहते हैं, जब तक मैं नहीं आ जाती, अपनी इकलौती बेटी की प्रतीक्षा में, आधे जागते हुए, आधे सोते हुए-फैटी, जैसे तुम अपने मां-बाप के बारे में सोचते हो, वे मेरे बारे में सोचते हैं एक दिन जब वे नहीं रहेंगे, मैं उनकी वसीयत से वाहर आऊंगी --एक साँप की तरह-जो समूची जायदाद,घर-कोठी, गहने-जेवर पर फन फैलाता है और उन्हें अपने भीतर डस लेता है-एक कीड़ा--जो जिन्दगी- भर उनके खून से चिपका रहता है और उनके मरने पर कोनों में जाकर उनकी हड्डियों को कुतरता है, जब तक वे बिल्कुल साफ नहीं हो जाती- जिन पर खून और मांस का निशान भी नहीं दिखायी देता--इन पर बैठकर एक दिन मैं उन लोगों में मिल जाऊँगी, जो हर जगह हैं-तुमने उन्हें देखा नहीं-नैनीताल और मसूरी की सड़कों पर घोड़ों पर दौड़ते हुए-? दोपहर के समय अपनी ऊबी आँखों से समय कुतरते हुए वे अलग-अलग वेशों में माते हैं-दिल्ली की सड़कों पर गरीबों की चर्चा करते हुए-वे वल्गर नहीं हैं-वे बोल रहे हैं, लिख रहे हैं, पेण्ट कर रहे हैं। मैं उनमें हूँ, मैं अलग नहीं हूँ, वे कितनी साफ, कितनी निर्दोष, कितनी चमकदार हड्डियों पर बैठे हैं. फैटी, मैं उनमें हूँ, उनसे अलग नहीं हूँ, मैं सब देखती हूँ, वाग के उजले नीले अंधेरे में, और मैं भागने लगती हूँ, फैटी, मैं चीखती हूँ, मैं भागते गेट के पास आती हूँ--पर गेट का ताला बन्द है और तुम वाहर सड़क पर हो--अपने घर लौट रहे हो मैं अंधेरे में तुम्हें देखती और तब मुझे वह दोपहर याद आती है, जब तुम लायब्रेरी में आये थे."तुम एक स्टेटमैण्ट लाये थे -- मैं तुम्हें अकसर दिल्ली की सड़कों पर देखा करती थी, पेड़ों के नीचे, घास के स्क्वायर में----उस कंसर्ट में-जिसमें येहूदी मेनुहिन पहली बार हिन्दुस्तान आये थे मैं तुम्हें देखा करती थी और सोचती थी, - 64/कवे और काला पानी नही, मोचती कुछ नहीं यी हैरान-मो होती ही रेपे कुछ लोग दूसरों की मुक्ति के लिए घूमते है ये अमाधारण लोग होते होंगे, परमहंम, मदर टेरेमा, मार्टिन लूथर किंग"वे अपना हाय काये पर रखते होगे-- और मव कुछ बदल जाता होगा मैंने तुम्हें जब उम दिन सापयेगे में देसा-मैंने मोचा~में तुम्हारे कागज पर नाम लिगी--और हमेशा में लिए छुटकारा पा जाऊँगी फिर मैंने तुम्हें देवा --और सहता गयान आया। मैं तुममे ज्यादा भाग्यवान हूँ.. मैं अपना पर कभी भी छोड सकती हूँ, दिल्ली के बाहर जा पाती है। दूसरी तरफ से देयो-तो तुम मुममे फहीं ज्यादा भाग्यवान हो-तुम्हारे अपने विजन हैं, जरा-मा स्विच दवामो-- और ये चमकने लगते हैं, रोशनी के दायरे, जिन्हें तुम रियो भी समय बाहर निकाल मकने हो, करीने में मजाते हो पूग एक म्युजियम-जो पर्जन रोड में लन्दन की विक्टोरियान्द्रीट तक फैला है --नहो. तुम मपमुच मुझसे कहीं-रही ज्यादा भाग्यवान हो, तुम एक दिन अपने घर के कोने में 'उन दिनो' की पोटली भी राय लोग, जो मैंने तुम्हारे माय बिताये थे।' यह यह पोटली अपने साथ लायी है. जाने में पहले~वह उसे मुपुर कर देना चाहती है। इसमे मार्च के पत्ते जमा है और जुलाई पी रातें, गुलमोहर के फूल जो मई में शुरू मे कनॉट प्लेस में दहरते थे और रितावों को दुगने और टेलिफोन बूथ, "मिण्टो रोड का निज-निमके नीने उन्होंने एक दोपहर एक दूमरे से मुक्ति पाने की प्रार्थना की थी। क्या कोई ऐसी पीड़ा है, जो इस शहर के कोने से जपरकर बाहर नहो आती? यह मायरी से बाहर मायी-- मोर दरवाजे पर फैटी दिपायी दिया। वह जल्दी से उसके पास आया और उसका मन बंटने लगा."तुम कन्य माये?" उसने बहुत क्षीण स्वर में पूछा-"मैं बब में पहा हूँ"--उसने कहा--"तुम लिय रही गो-मैं बाहर से तुम्हें देख रहा था।" "मैं तुम्हें लिम रही थी-" उगने वहा और यह धीरे से हंगने लगा-." रही पी? दिखाओ!" "अभी नहीं।" उमने अपना मिर उगको छाती में दुवमा तिया- इसमे उमको बहुत शान्ति मिलती थी-से दिन-भर को पकी-मोदी चिड़िया अपने घोससे मे दुबक जाती है-"क्या लिप रही पो?" जिल्टी --"मुमें निय उसने उसके वालों पर अपना मुंह रख दिया--"एक भेद"..--उसने कहा- "एक रहस्य" ---उमने कहा--"एक मिस्ट्री", "तुमने मुझे इसीलिए बुलाया था?" उसने उसका चेहरा उठाया और तव वह हतप्रभ-सा हो गया-- उसकी आंखें चमक रही थीं, जैसे वह रोकर उठी हो, बुखार में हो, नींद में चल रही हो । "इरा!" उसने कहा-"हिश"---उसने उसके मुंह पर अपना हाथ रख दिया-"चलो", उसने कहा, "वे हमें देख रहे हैं।" . वे वाहर चले आये। कर्जन रोड की वत्तियां जनवरी की धुन्ध में जुगनुओं- सी टिमटिमा रही थीं। फैटी ने उसका थैला अपने कन्धे पर लटका लिया। वह ध्यान से उसे देखने लगी-जैसे पहली बार उसे देखा था-छोटे पैरों में पेशावरी चप्पल, काली कार्डरॉय की पैण्ट, लम्बा ढीला ब्राउन स्वेटर, जो हमेशा नीचे से फट जाता था और वह उसे काले धागे से सी देती थी... "स्कूटर लोगी?" उसने पूछा। "नहीं, पैदल चलेंगे. मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ.." "इरा-क्या बात है ?" वह बीच सड़क पर ठिठक गया-वह चलती गयी-सिर पर बंधा एक स्कार्फ, -सलेटी रंग का कुरता, माथे पर काली विन्दी-वह अपने भीतर की धड़कनों को समेट लेती है, जैसे कोई तैराक कूदने से पहले अपनी समूची देह को वटोर लेता है ----यह क्षण है, उसने सोचा -~-यह मौका है, मैं अभी नहीं कूदी,तो जिन्दगी-भर किनारे पर खड़ी रहूंगी ..."फैटी," उसने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर दूसरा, फिर उसका स्वेटर पकड़ लिया-वह आगे बढ़ी और आंखें मूंद लीं, अव वह हवा में थी। अव वह कूद रही थी-"मैं दिल्ली छोड़ रही हूँ," उसने कहा। वह शान्त थी। सबकुछ शान्त था। वह जनवरी की शाम घी और वे चुपचाप चलते हुए इण्डिया गेट के सामने खड़े हो गये थे -"कव ?" उसने पूछा, "कहाँ जाओगी?" वह खड़ी हो गयी "धुन्ध के बीच एक लो जल रही थी-किसी अज्ञात सैनिक की याद में, जो पहली लड़ाई में मरा था। "मैंने अभी कुछ नहीं सोचा," उसने कहा, "हिन्दुस्तान बहुत बड़ा है-" और वह धीरे से हंसने लगी--उसका हाथ पकड़ लिया-"फैटी", उसने कहा-"मैं कहीं भी जा सकती हूँ।" . 66/ कच्चे और काला पानी - "घर छोड दोगी? एक क्षण वह मूनी सड़क पर ठिठक गयी-याद माया--इम पडीमा अपने कमरे में इस्त्री कर रही होगी, साने की मेज पर तीन प्लेटें होंगी- पापा टेलिविजन देख रहे होंगे-मैं इन्हें छोड रही हूँ-घर नहीं, उनका पैसा नही, मैं कहीं भी हूँ, भूपीनही महंगी. मैं सेफ हूं. सेफ, मेपटी फस्ट.. एक पौर असीम हताशा में उसने इण्डिया गेट को देखा-हल्की चादनी में वह रेत का एक दूह जान पड़ता था-धारो तरफ लम्बी घाम, हवा हिलते पेट..."फैटी" उसने कहा, "मेरी एक बात मानोगे?" "क्या इरा?" उसने बहुत धीमे स्वर में कहा । वह रक गयी। "तुम कभी अपना पर नही छोडोगे?" "लेकिन उस दिन..." उसने विस्मय से उसकी ओर देया, "तुम मुझे बाहर आने को कह रही थी।" "बाहर?" "बाहर-दुनिया में।" "मुझे मालम है," उसने सिर हिलाया, फैटी के माथे पर विसरे वालो को ऊपर उठा दिया, "तर मैं नहीं जानती थी कि वे तुममें रहते हैं. वे पर "वे कौन ?" फैटी ने हिचकते हुए कहा, "इरा, वे कब के मर गये।" "मर गये।" वह धीरे से हंसने लगी.यरामदे में रखी कुर्मी, बिस्तर के पीछे आकाश, मिल्की थे..."ये वहाँ हैं, वे हमेशा वहाँ रहेंगे फैटी, मुझे देखो" और उसने अपना चेहरा कार उठाया-एक साँस कार आयी-- उसने झटके से उसे अपने पास खीच लिया-पीली चांदनी मे जमकी आ कार उठी और उसने कहा, "क्या मैं जीवित हूँ?" पुन्ध पर उठी और पेड़ सरसराने लगे। रात को हवा मे सबकुछ अमम्मव जान पडा, जीना, मरना, घर छोडना "फटी" उसने कहा, "तुम्हारे फादर का एक रजिस्टर पा । वह कुछ लिखना चाहते थे "तुम्हें याद फ्टी ने ऊपर देखा-पुन्ध के परे सारे छिटक आये पे"एक महीन- सा मालीक पेड़ों की फुगियों पर वियरा मा""साइफ हिमर जिन्दगी यहाँब हियर आफ्टर! लेकिन क्या दोनों एक साथ एक ही दुनिया में नहीं हैं, जिन्दगी यहाँ और वहां, वे हमारे साथ जी रहे हैं, हम उनके मरने में शामिल हैं ?" वे उसके घर के सामने खड़े थे। फाटक खुला था-दोनों तरफ यूक्लिप्टस के पेड़-बीच में बजरी की सड़क-एक नींबू की झाड़ी। "फैटी, तुम्हें याद है ? क्या बिट्टी?" कभी-कभी वह उसे बहुत प्यार में विट्टी कहा करता घा-एक निस्सहाय-सी बच्ची, जो उसका हाथ पकड़कर दिल्ली की सड़के लांघा करती थी । “क्या याद है ?" उसने पूछा-और तव देखा इरा फाटक का पल्ला पकड़कर कहीं भीतर अंधेरे में झांक रही है- "एक बार और कहो- "क्या?" "जो अभी कहा था।" उसने कहा। ."विट्टो !" उसने उसकी ओर देखा-आंखें उसके चेहरे को ढूंढ़ने लगी.---"हम पिछली जनवरी में मिले थे-मैंने तुम्हें फोन किया था। तुम गिनती गिन रहे थे। पूरे बारह महीने लॉन की भीगी, धमिल रोशनी में वह उसका चेहरा देखता रहा। "तुम आज क्या लिख रही थीं?" उसने पूछा। "लायनेरी में ?" उसने फैटी के दोनों हाथों को अपने गालों में धमा लिया--जैसे माचिस की लौ को बचाने के लिए हम उसे हाथ से ढक लेते हैं और वह हवा में कांपती रहती है-बुझने और जलने के वीच हिच- किचाती हुई"एक स्टेटमेण्ट," उसने कहा, "एक प्रार्थनापत्र, फैटी, मैं अपने को लिख रही थी, फिर मुझे अचानक पता चला कि जब कोई पाप का कनफैशन करता है, तो अपने लिए नहीं, ईश्वर के लिए भी होता है और मुझे लगा, तुम भी उसमें हो, जैसे एक बरस पहले जिस स्टेटमैण्ट पर मैंने अपना नाम लिखा था-~~जानते हो मेरे नाम के ऊपर किसका नाम था?" "किसका विट्टी?" "यातना का-" उसने धीरे से कहा-"जब तुम वाहर जाने लगे, तो 68/कव्वे बोर काला पानी मैंने सोचा मैं तुमसे, फिर मिलंगी." अंधेरे में पाभियों की मनसनाहट ई-और वे दोनों अलग हो गये। सालटेन की रोशनी में चौकीदार का चेहरा दिसायी दिया। "वीबीजी, गेट वन्द करना होगा।" उसने कहा । और स्नेहपूर्ण नजर से फैटी को देवा-- वह इन दोनो को असे से देसता आया है। फैटी ने उसका यंता कन्ये में उतारा-चला--जिसमे हमेशा पोसिस की फाइलें, किताबें-और सबसे नीचे-कटोरदान दवा रहता था। "तुम आओगे ?" उसने चौकीदार से अपनी आपास छिपाते हुए कहा, "मैं तुम्हें देगी।" गेट बन्द हुआ तो भी यह सहा रहा-बजरी की सड़क पर उसकी पप्पली की घरमराहट मुनता रहा। फिर वह भागने लगा ~ बंगले मे अहाते के बाहर एक छोटी लेन थी-वहाँ से उसका कमरा दिसायी देता था, टेरेस पर एक रोशनी का दीप-पर लौटने मे पहले वह हमेशा उसे देसा करता था। बहुत बरसो बाद वह मकान माली हो गया। अब वहाँ काई और सोग रहते हैं-किन्तु फैटी जब भी वहाँ में निकलता, एक क्षण के लिए अंधेरी लेन पर खड़ा हो जाता "जैसे मुद्दत पहले सड़ा हो जाता था। वही हया मै ममते यूक्लिप्टस के पेड़, नोवू की माड़ी, लॉन के ऊपर उसका कमरा "वह प्रतीक्षा करता, अब वह आयी होगी, कमरे को बत्ती जलायी होगी, कोई रेकार्ड लगाकर बिस्तर पर लेट गयो होगी-एक अलौकिक-सी आवाज इंटो की दीवार से, कांच के टुकड़ो पर फिसलतो, छिलती हुई उसके पास आती थी, उससे लिपट जाती पी, धीरे से फुसफुसाती पी, "फंटी, मैं यहाँ हूँ-यहाँ -~-म यहाँ हूँ।" जिन्दगी यहाँ यौर वहाँ 169 सुबह की सैर वे छड़ी उठाते हैं. सीढ़ियाँ दायें पैर से उतरना शुरू करते हैं; उनका यह विश्वास है कि दिन दायें पैर पर उठाया जाये, तो वे किसी विपत्ति में नहीं गिर सकते। वे सुबह उठते भी दायीं करवट से हैं और जब उनकी बायीं आँख फड़कती है, तो उन्हें अपने लड़के का खयाल आता है, जो बरसों से विदेश में पड़ा है। छड़ी घुमाते हुए वे नाले की तरफ चलने लगते हैं। वहाँ अब नाला नहीं है। तीन बरस पहले कमेटी ने उसे पाट दिया था, लेकिन आस-पड़ोस के लोग अब भी उनके घर को 'नालेवाला मकान' कहते हैं। पुराने दोस्तों की चिट्ठियां अब भी इस पते पर आती हैं : कर्नल निहालचन्द्र, नालेवाला मकान; और डाकिया भी उन चिठ्ठियों को सीधा उनके घर ले आता है। वे चलते जाते हैं । नाले के परे एक छोटी-सी पुलिया है, सफेद चूने में चमचमाती हुई। यहां आकर वे ठहर जाते हैं---यह उनकी सुबह की सैर का पहला स्टेशन है । वे अपनी छडी को पुलिया के सहारे टिका देते हैं, थैले को कन्धे से उतारकर मूठ पर लटका देते हैं, सीधे खड़े हो जाते हैं, लगभग में एक सांस खींचते हैं, भीतर ले जाते हैं, फिर एक गांठ में कसकर बाहर फेंक देते हैं । फिर दूसरी सांस खींचते हैं, वही कसावट, वही गांठ. वही ढील । फिर तीसरी साँस "इससे उन्हें कोई आराम मिलता है ? किसी को नहीं मालूम । वे अपने से पूछते नहीं और कोई दूसरा उनसे पूछनेवाला नहीं। उन्हें यह भी चिन्ता नहीं कि पुलिया के नीचे स्कूल जानेवाले लड़के अटेंशन की मुद्रा 70/ कव्वे और काला पानी उन्हें देखकर हैरत में गड़े हो जाते हैं -एक पतली सीक-सा सम्बा मादमी, हवा में मांस खींचता हुआ, दाम-सा हिलता हुआ। "कर्नल साव, कर्नल साव' कहाँ है आपकी बन्दूक-तलवार?" हमते, पीसते, करते हुए वे भागते जाते हैं । बारिश के पानी में उनके पर छाप करते हैं और हवा में घाम सरसराती रहती है। उस दिन निहासचन्द्र के कानो में देर तक बच्चो की आवाजें गूंजती रही। फिर मय कुछ शान हो गया। उन्होंने आखिरी सांस सोचो, जो एक गीली-सी उच्छ्वास बनकर बाहर निकल आयी। पुलिया से अपनी छडी उठामी और रूमाल में उसको मूठ साफ करने लगे। उमी स्माल में अपनी नाक मिनकी और आपोष्ठी। फिर पला उठाकर कन्धेपर लटका दिया। गले में मूजी-मी फिरक घुमने लगी। धुंधला-सा घपाल आमा, शायद कहीं भीतर कोई तरलीफ है, लेकिन इतनी जुरंत नहीं हुई कि इस तकलीफ को 'प्याम' का नाम दे सकें। वे तकलीफो को घुन्ध में रहते थे, नाम देने का मतलब था, पिण्डारे की पिटारी पोलना, जिसके भीतर में पता नहीं कितनी दूमरी तकलीफें बाहर निकल पड़ेंगी। ना भाई, इसमे बेहतर यह धुन्ध है, जहाँ सबकुछ एक जैसा है। निहालचन्द्र पुलिया पार करने लगे। नीचे, आगे, पीछे चारों तरफ मैदान फैला है। पूरा मैदान भी नहीं; माधा हिस्सा धोबीघाट है, बाकी हिस्मा पेड़ो मे ढक गया है। वह नाता जिम शहर में ढक दिया गया था, अब यहाँ देशर्मी से नंग-घडम वहता है। किनारे पर चोडे, मपाट पत्थर विखरे हैं, जो आँसो पे गल-से चूमते हैं। निहालचन्द्र ने येले मे धूप का चश्मा निकाला, पहनकर चारो तरफ देखा, तो ठण्डा-सा अंधेग दिखायो दिया, रात का ठहरा हुमा अंधेरा जमा नहीं, बल्कि काली रोशनी का दरिया, वे धीरे-धीरे उसमे उतरते हैं और पत्परों से मप-बधकर चलने लगते हैं। कहां जा रहे हैं कर्नल बाबू परपरोपर कपड़े पीटती हुई धोबिनों को आखें कपर उठती है। हाथ हवा में ठिठक जाते हैं। घोषियो के कुत्त-घर के न घाट केवल निहाल- सुबह की सैर/71 - - चन्द्र की एकनिष्ठ, नीरव, मन्द चाल को देखकर कुछ ज्यादा ही भभक जाते हैं, दांत निपोरते, खंखारते हुए उनके पीछे भागते हैं, किन्तु उनके पास आने की हिम्मत नहीं करते; उनकी मीटरभर लम्बी छडी को देखकर बीच में मीटर-भर का फासला छोड़ना नहीं भूलते। और निहालचन्द्र ? उनके लिए जैसे चिंघाड़ते बच्चे, वैसे रिरियाते कुत्ते, सब एक चलते हुए दृश्य का हिस्सा हैं, एक धुएं-सी ध्वनि, जिसमें सबकुछ समा जाता है... यह नजारा अगर टूटता है, तो सिर्फ एक जगह-जहाँ जंगल शुरू होता है। वहाँ कोई आवाज नहीं, न कोई रंग, न रोशनी "सिर्फ पेड़ों की लम्बी कतार के नीचे धूप के धब्बे टिमटिमाते हैं। यहां काले चश्मे की कोई जरूरत नहीं। निहालचन्द्र एक कन्धे से थैला उठाकर दूसरे कन्धे पर लटका लेते हैं। कोट के बटन खोलते हैं, तो नवम्बर की हवा सर्र-सर्र करती देह को खटखटाने लगती है । ऊपर पेड़, नीचे झाड़ियां, बीच-बीच में गुलमोहर की सुर्ख, लहराती लपटें, सुर्र-सुर-सी आवाजें, जिन्हें सुनकर निहालचन्द्र को ग्वालियर के जंगल याद आ जाते, जहाँ वे अपने फौजी दोस्तों के साथ शिकारपर जाते थे। वे अब उसे याद भी नहीं करते थे। खट-से कोई स्लाइड पर्दे पर चमक जाती थी"पुरानी जिन्दगी का एक हिस्सा सांस लेने ऊपर माता था--फिर छप से अंधेरे में डूब जाता-और निहालचन्द्र तेजी से कदम बढ़ाते हुए जंगल में गुम हो जाते। कुछ देर तक पता भी नहीं चलता था, वह कहाँ हैं, किधर गायब हो गये ? सिर्फ झाड़ियों में हल्की-सी सरसराहट सुनायी देती-जैसे कोई जान- वर भागा जा रहा हो-और तब अचानक उनका सिर दिखायी देता। अभी यहाँ, अभी वहाँ ! कोई छिपकर उन्हें दिखता, तो हैरत में पड़ जाता कि इतनी उम्र में भी वे इतनी तेजी से भाग सकते हैं, छड़ी और थैले के साथ। किन्तु निहालचन्द्र के लिए यह मामूली-सी कसरत होती। महज कसरत नहीं.-एक तरह का ध्यान । उनका चेहरा एक अलौकिक-सी तल्लीनता में डवा रहता। एक अजीव-सा भ्रम होता, मानो वे एक जगह स्थिर हो, सिर्फ उनकी लम्बी, सीकियां टाँगें भागी जा रही हों, फिर धीरे- धीरे उनकी टांगें भी स्थिर हो जातीं, सिर्फ बूढ़ा दिल हड्डियों के सींकचे पर टकराता रहता और 'वे रुक जाते, अधमुंदी पलकोंको खोल देते, चारों - - 72/कव्वे और काला पानी - तरफ देपने सगते। सामने हवामहल दिसायी देता, पीले पत्यरो का मुगतिया मानूमेण्ट । मवम्बर की मन्द धूप में मुलगता हुआ निहालचन्द्र के मफेद बालो में पीने का परनाला यहता हुआ उनकी कनपटियो पर पूने लगता। ये गिर को पटवा देते, म्मान में माया पोहते, छड़ी और घने को हवामहल को मीढ़ियों पर टिका देते । माम लेने । सर को थकान उनसरी देह में टूटकर टूटे हुए खंडहर मे जाती यह उनकी सर का दूसरा स्टेदान होता। यह हवापर यहुन पहले शायद मचमुच कोई 'स्ट्रेशन' रहा हो, एक पड़ाव, जहाँ मुगल सेनाएं दिल्ली से मार्च करती, यही पड़ी-दो-पडो हेरा पालती होगी। स्वयं शहंशाह शायद यहाँ छुट्टी के दिन पिकनिक के लिए आते हों। वरना इस उजाड जंगल में इतने नसरे नक्काशीवाली इमारत ही नयों बनाते ?निहालचन्द्र को यह छिपा यजाना अचानक ही मिल गया गा---एक दिन संर करते-करते यहाँ आ भटके और ओस उठाते ही हवा से हवापर उतर आया। सफेद मीडिया, हालरदार मरोगे, वही-बडी मालो. से रोशनदान--किन्तु जो चीज निहालचन्द्र को हमेशा अचम्भे मे डाल देती थी, वह पा नौला गुम्बद, भूरे पोले जंगल में वह नीलापन उनकी औयों को अजीव-मी राहत देता पाएक ठण्डे, स्वच्छ होरे-सा शिल. मिलाता हुआ। उम दिन भी निहालचन्द गुम्बद को निहारते रहे। फिर एक सम्बी सांस खोची, जो 'आह' और 'हे ईश्वर के बीच जमी कराहट मे बुरा गयी। फिर पैसे से एक साकी रग की बरसाती निकाली और हवापर की सीढ़ियो तले करीने में बिछा दी। यह उनकी प्रिय जगह यो"रोसो से माती हवा में डोलता गुम्बद, नवम्बर को घर-और मया पाहिए? कुछ भी नहीं । सारी हलचल बन्द । न कोई आवाज, न पोर, न किसी तरह को हलचल । एक तिनका भी हिनता तो उसकी गूंज निहातचन्द्र की नसों को पटमटा जाती। कभी-कभी किमी जंगली परिन्दे की पीस्कार हवा में परपग जाती में वह अपनी भूयी चीरा से निहालचन्द्र पीवी भूए को नुरेद रहा हो । उसको चीस मुनकर निहालचन्द्र को अपना संप गुबह की सैर/73 Hd- - - याद हो आया और उनका हाथ अनायास अपनी पोटली की तरफ मुड़ गया। उबला हुआ अण्डा, टमाटर और खीरे की सैण्डविचेज, थर्मस में कॉफी -देवीसिंह हर चीज बड़े करीने से रखता था, मानो वह सुबह की सैर के लिएनही, जिन्दगी के सफर पर निकल रहे हों। उस पहाड़ी छोकरे को सव कुछ याद रहता था, यहाँ तक कि वह नमक और काली मिर्च की पुड़िया भी रखना नहीं भूलता था। थैले के दूसरे कोने में ट्रांजिस्टर भी दुबका होता था, जिसे मुन्नू विदेश से उनके लिए लाया था- जर्मन ट्रांजिस्टर - उनकी हिन्दुस्तानी भव और शून्यता को भरने के लिए। वे उसे शायद ही कभी खोलते। कई बार इच्छा हुई थी कि उसे देवीसिंह को दे दें-वह भी तो दिन-भर सांय-सांय करते मकान में ऊंघा करता है, घड़ी-दो घड़ी इस खिलाने से ही खेल लिया करेगा। किन्तु फिर वे अपनी इच्छा दवा डालते; मूंगे ट्रांजिस्टर से वेटे की आवाज सुनायी देती, "आर दिन-भर खाली बैठे रहते हैं, जरा इसे ही सुना कीजियेगा।" और तब उन्हें अजीव-सा सन्नाटा घेर लेता, दम तोड़ती जम्हाई खींचते हुए वह वुडबुड़ाने लगते, "खाली कहाँ प्रभु, मुझे एक मिनट की फुरसत नहीं।" पता नहीं, यह बात वे अपने बेटे से कहते,जो विदेश में था, या अपनी पत्नी से, जो परलोक मे घी या सचमुच प्रभु से, जो कहीं न था। उन्हें शायद खुद भी पता नहीं होता था, कि वे अपने से क्या कहते हैं, हवा में जहां इतनी आवाजे बहती हैं, वहां उन्हें अपनी बातें भी उड़ती जान पड़ती थीं-कोई उनसे पूछता,आपको एक मिनट की फुरसत नही, आखिर आप फरते क्या हैं ? तो वह झट कह देते, देखते नहीं, खाना खा रहा हूँ। और यह सच भी होता-खाना, देखना, चलना, सोनाजीने के साथ-साथ ये काम एक गै में चलते थे-और निहालचन्द्र इस बीच अपने से बातें भी करते थे और अपने को ही मुनते थे। सुनना। वह मोते हुए भी होता था। खाने के बाद आँखें मुंदने लगती। निहालचन्द्र डबलरोटी के कण्डल और अण्डे के छिलके अखवार में बटोरकर अलग रख देते, थेले की गुड़मुड़ी बनाकर, वरसाती के मिग्हाने टिका देते, पैर पसारकर लेट जाते- किन्तु इससे पहले कि नीद आती, परिन्दों का रेला . - 74/कव्वे और कालापानी उनकी जूटन पर टूट पडना ।गट, सट, गट --निहालचन्द्र को गगता जैसे उनकी घोचें अपवार पर नही, उनकी नीद मे सुराय भेद रही हो । चिदियों के पीछे चीने आती और उन्हें पदेकर बचे-गुचे टुकड़ों को दबोचकर गायब हो जानों। हया में उनकी हाय और उठाईगीरी उडान ये बोन छाप.-मी आवाज होतो --जंगे नीद के बीचोंबीच किसी ने छाप लगायो हो-सिमटते सरने तितर-बितर हो जाते। वादानो की मरमती छापा में नीला गुम्मद युछ टेढा-सा हो जाना यौर निहालचन्द्र को नगता जैसे वे सबकुछ एक डोनने पद के पोरे में देश रहे हो, एक पटा हुआ आदमी, पिरहाने पर वायगा, हराम फडफड़ाती वरमानी - और तब उनका दिल तंजी से धड़कने लगना । वे प्रतीक्षा करने लगी। वह ऐमे ही आ जाती थी। वह आकर कुछ दूर फामले पर टिठा जाती पी। गले में झूमती रम्मी, येचन-गे टटोलते हाप, रोगों के भीतर किती अघि---उग आदमी पर टिकी हुई, जो मोटियों के नीचे मुद एक मोड़ी-सा लेटा था। "निहाली रे, ओ निहाली। तेरी गारी पाली हाय निहाली पया गयमुप यानी ?" निहालचन्द्र सेटे रहते, आवाज को अपनी गति से पाम आने देते, न हिनते, न लते, दम माधकर दिन को दाप रसते; उन्हें अनदेगा होता, जरा सी भी हरकत करेंगे तो वह विदा जायेगी, जंगल की अन्य बनर्गल आवाजों में खो जायेगी। असली बात विनाम को है: जब लड़की को विश्यारा हो जाता-कि आमपास कोई जोखिम नहीं है तो यह धीरे-धीरे पाग आती, पौरनी, मतक और शिमरती हुई, इसलिए नही किनिहाल. घाट पर जो भरोसा न हो, बल्कि इसलिए कि वे जोषित है, निरीह भी, सतरनाक भो; दोनो ही."मीलिए वह एकदम पास नही आती थी, एक हाप की दूरी बनाये रगती पी, दूगरा हापमान याती थी, उनकी बेजों को टटोलने लगती यो, आर्मी परकोट की लम्बी अंधेरी जै, जिन्हें उसकी धंगुलियां धीरे-धीरे सहलाने लगती-"निहाली, मो निहाली ?"
क्या पूछ रही है, कौन-सा भेद, जिसे वह खींच रही है, खाली जेवों के तीच ? उसकी छुअन लगते ही खून सुलगने लगता, दौड़ने लगता, पागल वैल की तरह अन्धाधुन्ध, बदहवास, लगी-बंधी लीकों को तोड़ता हमा, दिल को अपने साथ घसीटता हुआ, पुरानी हडिडयों से टकराता हुआ और निहाल- चन्द्र अपनी उम्र के बन्द सींकचे उठा देते, देह-पिंजर को खुला छोड़ देते, जाने दो, कोई भीतर कहता, भागने दो, कव तक इसे बचाकर रखोगे ? . वह शान्त घड़ी होती । नवम्बर की मुरझायी धुप हवाघर के कंकालीखंडहर पर धीरे-धीरे सरकने लगती। पेड़, पत्ते, झाड़ियाँ निस्पन्द खड़े रहते । निहालचन्द्र दम रोके प्रतीक्षा करते, एक तिनका भी हिलता तो उनकी देह तन जाती। पलकों को कसकर भींच लेते, जिनके भीतर आँखों के डेले धूप में रंग-बिरंगे गोले-से नाचने लगते और तब एक झटके से वे अपने से छूट जाते-देह अलग पड़ी रहती। और निहालचन्द्र ? वे दूसरी तरफ चले जाते, जहां उनका तीसरा और अन्तिम स्टेशन होता। वहां उन्हें कोई देखनेवाला नहीं था; न डर, न खटका, न कोई गवाह । खंडहर की छाया में उनकी देह औंधी पड़ी रहती। वह उनके पास सरक आती, अपनी चुन्नी को छाती से उड़काकर कन्धों पर फेंक देती, उनसे सट- कर उकडू वैठ जाती और तव निहालचन्द्र को भ्रम होता कि पलकों के पीछे जो धूप के धब्बे थे, वे असल में सलवार-कमीज की सुर्ख सुलगती बुंदकियां हैं---विल्कुल सामने, वे चाहें, तो उन्हें छू सकते थे। लेकिन वे अपने को रोके रखते । वहाना करते कि वे कुछ भी नहीं देख रहे; उसकी अंगुलियों को अपनी देह से खेलने देते.-.-"ओ निहाली, क्या सबकुछ खाली ?" नहीं, आज उनकी जेबें खाली नहीं थीं; आज मैं सबकुछ साथ लाया । देखोगी? वे अपना सिर थोड़ा-सा ऊपर उठाते, तो उसकी काली, कलपती आंखें उन्हें लीलने लगती; आँखें, जो पिछली जिन्दगी की घोखा घड़ी को एक निगाह में तौल लेती हैं। क्या दिखायेगा, भोंदू ! सड़ा हुआ अलूचा, मरा हुआ तीतर या" किसी झींगुर की झरी लोथ ? यही चीजें तो वह बहुत पहले लड़की व दिखाता था, निकर की जेबों में लूंसकर लाता था, एक-एक करके निकाला 76/ कव्वे और काला पानी पा,किमी बिल्ली की मछ, बुढ़िया का वाल? कुछ भी नही। उस दिन जेब में मे एक भी चीज ऐमी नहीं निकली, जिसे वे पहवान गकती। मिर्फ कागजों के ढेर । बैंक को पासबुक, नयी ताजी चिटिया, जायदाद के कागज और एक नीली-सी नन्हीं किताव, निम पर उमकी निगाहें जम गयों कर्नल निहालचन्द्र का पामपोर्ट निमें वे हमेशा माय लेकर चलते थे। सड़क पर कुछ हो जाये तो पुलिस उनकी फोटो, नाम- पता देवकर पर-ठिकाने का पतातो लगा हो सकती है। हर नीन माल बाद पागोटं बोफिम जाकर उसे रिन्यू करवाते थे.मोचते थे, कभी ताकेरी मिलने गये तो काम आयेगा। तेरी सालसा मरी नहीं, निहानी? सालसा ! एक तितलीमा उहता हुआ यह शमनिहालचन्द्र के इर्द- गिर्द पूमने लगा। क्या कोई ऐमी चोज बची रह गयी है, वहां वे एक क्षण मंठ सकें--जो सचमुच लालसा हो, जहाँ वे अपने पस ममेटकर माराम से, अकेले में पट ममें ? उन्होने अपने भीतर झोका, तो वही लालसा नहीं, लड़की बैठी पो-कौन है यह ? गले में फैमी पुन्नी, पीरा-मा गोल चेहरा, धूल में सनी नटें, और~-रस्सी, कूदनेवाली रस्सी जो मानो पिछले पचास सालो से उसके साथ घिसट रही थी। उसका सिर नीचे झुका पा और यह एकटक आंखो से उम फोटो को निहार रही थी जो अपानक कागजों के ढेर से बाहर निकल आयो पी। निहालचन्द्र अपनी उत्सुकता नही दवा सके। देखने के लिए नीचे मिर मुकाया तो लडकी की आय कपर उठ आयो। "कौन है मह औरत?" औरत ! उन्हें भटकामा लगा। "मेरी पली," उन्होंने कहा। "मच?" "हो सच नहीं तो क्या ऐमे हो।" निहालवन्द्र का स्वर कुछ संकुचित. सा हो आया T--मीनर-ही-भीतर कुछ दहलने-मा सगा। "और ये पहाड?" "पहाड ?" निहालचन्द्र का ध्यान भटकने लगा। नहीं, यह सपना नहीं पा। पौधे सचमुन पहाड पे, नगे और घूप मे चमकत हुए। उन दिनो उनको पोस्टिग सहारा में हुई थी। पोये मानेस्टरो थो, और यहाँ दो बोर मिस मुबह को संर/17 ले और काला पानी की पत्नी को देखते हुए सीढ़ियां उतर रहे थे और वह बाजार की तरफ जा रही थी- कैमरे से विल्कुल बेखबर। उनकी पत्नी? हाँ, यह वही थी; फोटो पर निहारता चेहरा, जिस पर आखिरी बीमारी का अन्देशा अभी नहीं बैठा था। पीड़ा बहुत आगे थी." क्या वह उसे देख रही थी? नहीं, नहीं, यह तुम देखते हो निहालचन्द्र, वह नहीं। कैमरे का क्षण ही उसका चेहरा था, होंठ हलके-से खुले थे और वह जानती थी कि तुम हो, पहाड़ है, सीढ़ियों पर पैर रखते हुए वौद्ध भिक्षु, दुकानों पर टंगे हुए मेकेण्डहैण्ड कपड़े, हवा में फड़फड़ाते हुए; उस दिन कितनी हवा थी, साड़ी का पल्लू बार-बार उड़ता हुआ उसके चेहरे को ढक लेता था--लेकिन आश्चर्य ! फोटो में सबकुछ शान्त था। वहाँ कोई हवा नहीं थी। वहां सिर्फ लड़की की अंगुली थी, धूल में सनी हुई, उस चेहरे पर गड़ी हुई, जो उनकी पत्नी थी, मैला कागज था, एक गोल सिफर, फोटो की छांह - "फिर तुम "निहाली", लड़की का स्वर वहुत धीमा था, "क्या वे कभी आते हैं ?" "कोन ?" उन्होंने कुछ विस्मय से पूछा, "कौन आते हैं ?" "तुम्हारा लड़का ?" "वह बाहर है।" "और यह ?" लड़की ने फोटो को देखा। "पागल !" निहालचन्द्र उसकी वेवकूफी पर हँस दिये, "वह अव इस दुनिया में नहीं है।" ?" "मैं क्या कट्टो?" पहली बार उनके मुंह से लड़की का नाम निकला-दहशत में क्या? क्या मतलब है इसका?" लड़की हकबकी आँखों से उन्हें देखने ला मुंह थोड़ा-सा खुला रह गया "निहाली?" "क्या?" "मुझे देखते हो?"
विहानचन्द्र उगे भूमी, पाली निगाहों में गारने रहे। अपाना ध्यान आपा, इनन बरसो बाद मी कट्टो कितनी गिनी और छोटी दिमापी देतो है धोनी-गी। मद्दत पहले जब यह उम्र में मचमुच छोटी थी, तो तिनी मम्ची-जवान दिखायी देवी पी, ग्या गमय त्या घनना है नही, मह उनका भ्रम है। मायद बचपन में हर चीज यही दिमायो देती है पर, पेट, मो चाप और अचानक निहालचन्द्र चौंक गये जमे बरी ने पीछे मुड़कर उनके कानो में फुसफुमाया हो,"और -प्रेम, नहीं तो का?" "प्रेम? क्या तुम किमी में प्रेम कर मर निहालो' कल निहाल- एक धमा-मागाकर ये होग में बाये । किमी आवाज थी यह-या मिफंघन और घोपापा। भीतर की अटपटी पुकार, जो बुढाऐ रे जंगल में उठनी है, लावारिरागी तपती आवाज, दावाजा गटपटाती है, सोनी, तो कुछ नहीं, गन्म का अनन्न चिन्तार दिपायी दता है. दूरदूर तक कोई नहीं, भोनर मान बाहर की झुलमती लूगर धधकता है, न प्रेम, न नगाय, म मोह को पीडा-पीटा भी नहीं, मुछ भी दियायी मही देवा, पत्नी का पेहरा और येटे को याद, कुछ भी नहीं मिर्फ मैं । तुम फोन निहालगन्द्र, पया हो तुम? पट-पट-गट "यह रम्मो कर रही थी। ऊपर-नीचे, नीचे करर--- घंडहर को सूने में उसके पैरो को गंज निहालगन्द्र यो मुंदी पलको कोटा- घराने मगी। सो रहे थे। पाने के माद वे पड़ो-दोपही जरूर मो मेने थे। जब धे मो रहे होते. मीनी-निहियो पापरवापर ये रोगोपर बैठ जाना । निहारचन्द्र को गटन गाकर अब उनको निगाहें निहामचन्द्र की देह पर टिक जाती- मानो मोच रहे हों, क्या यह देह भी उनके आहार मे शामिल है? उन्हें माफी निगमा जब निहालचन्द्र ने प्रण गोल दी गयी पर आगल दिसायी दिया "नवम्बर का नौना दादा । यह उनकी नौद में निकलकर गुम्बद पर मास्टराया। नीला और मफेद, गर्दी की धुध में स्वज के फाहेगा; वह नीद की पुश थी-जिगमें माघी देह मोची रहती है. आधी 9 - - - सिर वाहर निकालकर दुनिया को देखती है देवीसिंह ! उन्होंने धीरे-से आवाज लगायी, फिर अचानक याद आया, वे घर में नहीं, बाहर लेटे हैं। लेटे-ही-लेटे हाथ बढ़ाकर थैले को टटोला; वे थर्मस निकालकर बची हुई कॉफ़ी से गला तर करना चाहते थे; किन्तु उनका हाथ थैले पर नहीं--- कागजों के ढेर पर जा पड़ा। वे हवा में सरसरा रहे थे। पेंशन के दस्तावेज, फोटो, खत, खुला हुमा पासपोर्ट । निहालचन्द्र ने झटके से सिर मोड़ा 'ये यहाँ कैसे निकल आये ? उन्हें ठीक से याद नहीं पड़ा, कब उन्हें अपनी जेबों से बाहर निकाला था? कुछ चीजें उनकी चेतना की चौहद्दी के बाहर हो जाती थीं. ''अनदेखे घट जाती थीं-अपनी मौजूदगी को अचानक उनके सामने पटक देती थीं.' देखो, ये हम हैं, तुम्हारे सामने, और तुम्हें पता भी नहीं ? और निहाल चन्द्र खिसियाने से होकर उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। कभी यह पूछने का साहस नहीं हुआ. मैंने तो तुम्हें जेब में रखा था, तुम बाहर कैसे निकल आयीं? सच पूछो, तो निहालचन्द्र को चीजें आदमियों से कहीं ज्यादा सगी और समझ- दार जान पड़ती थी-पालतू जानवरों-सी-वे बरसों उनके साथ रही थीं और कभी उन्हें धोखा नहीं दिया था। वे आंख मूंदकर सिर्फ छूने-भर से उनकी पुरानी, पपड़ायी पहचान को पकड़ लेते थे---यह मुन्नू का पत्र है और यह है बैंक की पासबुक, यह लद्दाख का फोटो है,और यह ? अचानक उनकी टटोलती अंगुलियां ठिठक गयीं । आँखें खोलीं, तो देवीसिंह का पोस्ट- कार्ड दिखायी दिया, जो उसने छुट्टियों में गाँव से भेजा था.' देवीसिंह का ध्यान आते ही वे हड़बड़ा-से गये । वह बरामदे में गुड़मुड़ी- सा बना बैठा होगा-पता नहीं कितनी बार खाने को गर्म किया होगा, दरवाजा खोलकर बाहर झांका होगा। उन्हें अकसर देर हो जाती थी और अपनी बड़ी, पहाड़ी आँखें उठाकर गहरे आश्चर्य में उन्हें देखता था; कहता कुछ नहीं था, किन्तु हर वार एक ही प्रश्न उसकी गूंगी निगाहों में झलक जाता था--आप कहाँ जाते हैं ? सुबह की सैर और शाम तक गायव- अगर आपको कुछ हो गया, तो मैं कहाँ आपको ढूंढता फिरूंगा? निहालचन्द्र हर रोज कोई-न-कोई बहाना खोज निकालते-लेकिन भीतर एक धुकधुकी- सी मची रहती कि कही वह उनकी शिकायत मुन्नू को न लिख भेजे । विदेश . । .
राने से पहले वह बार-बार उनमे बह गया था, "देवीमिह के अलावा आपके पाम कोई नहीं वह चला गया, तो आप अपाहिज हो जायेंगे।" अपाहिज ! ठीक है, हो जाऊंगा। तुम तो देगने नहीं आओगे। रामदे में खटिया दाल- कर पड़ा रहूंगा- मुझे अब किमी की जरूरत नहीं। मेरे लिये बय माछ एक-जमा है"जमी रात वैमा दिन" उनका गुम्मा वहने लगा, एक सा बेवम बोध, उस पानी की तरह यांन और बेनुका, जो रेगिस्नान को सुलगती जमीन पर बरमता है, यह जाता है, मूग जाता है, अपने पोहे रत्ती-भर हरियाली नहीं छोड़ना। रेगिस्तान ' उनके हाथ विसरे हुए कागज पर टिठक गये। उनकी अन्तिम पोस्टिंग यही हुई थी, राजस्थान और पाकिस्तान के वार पर, चारों तरफ रेगिस्तान फेला पा। यव मोचते हैं, तो हमी याती है, मेक्नि उन दिनो वहीं यम जाने की इच्छा होती पो लगता था, ये अपनी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर आ पहुंचे हैं। घण्टो रेगिस्तान में पूमते रहने, रेत के कंगूरों पर बैठे रहते, न पली की याद आती, ग लडके सी, बोसी पड़ियों मे लगता जैसे वे धीरे-धीरे किमी सत्य फौ तरफ पहुंच रहे हैं, उस यधेरे पुएँ की पाह को छू रहे हैं, जो उन से अन्तिम छोर पर उन्हें इतना अकेला छोड गया था"कभी-कभी हैरानी भी होती थी कि जो सत्य नदास में बोट भिाओं मे नही मिल मका, वह भागीर में रेगिस्तान की साय-माय करती उड़ती धूल मे दिग गया?"गा मरय निहाली? निहालचन्द्र ने गिर मोडा, वे कुछ कहना चाहते थे, कोई यात, जो बरसों से भीतर घुमड़ती रही पी-नवालय गले में भर जाती पी, पान, उम्र और हिचकिचाहट को काटती हुई किन्तु वहां कोई न पा । झाड़ियों पर नवम्बर को धुप गिर रही पी। हवापर का गुम्बद एक निस्मन्द और नोसी मुट्ठी-सा हया में उठा पान चील, न चिहिया, नमोई आवार । रस्सी कूदने की पटपट भी नही । सिर्फ एक पपरायो सदरोगनीपो..'को भर एक मुरायी सफेदी-सी मारे जंगल पर फैली थी। निहासचन्द कुछ देर बिना हिले-डुले बैठे रहे फिर उन्होंने जबरदस्ती अपने को सहा किया, जैमें यह अपनी नहीं, किमी दूमर की देह पोपमोट रहे हों। पोटली, घड़ी, पर्मम,"जेवो मेठसे कागज । जब निहाल चन्द्र पनने तो सबकुछ उनके पास था। वह कुछ भी नहीं भूल नहीं छूटा था। , - छे मुड़ने का रास्ता वहीं था, जिस पर वे चलकर आये थे। पथरीली गडण्डी, झाड़-झंखाड़, दूर-दूर तक खड़े मिट्टी के दूह, पीले और सफेद दागों दगे हुए, जिन पर परिन्दों ने बीट कर दी थी। वे कब पीछे छूट गये, निहालचन्द्र को पता भी न चला। वे कुछ खास सोच भी नहीं रहे थे, जो उनकामन भटका देता, सिर्फ कोई भटका-साखयाल आ जाता, जो उनके मन को छूता हुआ निकल जाता, देवीसिंह का चेहरा, घर का कमरा जेब में ठुसे कागजों की खड़-खड़ --- इन नवकी छोटी-छोटी चिन्दियां उनके रास्ते पर उडती जाती; वे एक को पकड़ते, तो दूसरी उन्हें पकड़ लेती । सुवह की एकाग्र तन्मयता अब खत्म हो चकी थी, जब ये आँखें मूंदे हवाघर की ओर भागते जा रहे थे; अब सिर्फ बदहवासी थी, जिसमें आंखे खुली रहती हैं और दिखायी कुछ नहीं देता। फिर जंगल का टुकड़ा आया और निहालचन्द्र को लगा, जैसे वे धूप की सफेदी से उतरकर एक लम्बी छांह में चले आये हैं। आँखों को राहत मिली। पत्तों पर पर आसानी मे पड़ते जाते, कभी कोई झाड़ी उनके कोट से अटक जाती, तो वह खड़े हो जाते, बहुत कोमलता से अपने को रिहा करते, एक अजीब-सा भ्रम होता, जैसे कोई दबे पांव उनके पीछे आ रहा है। वे मुड़कर पीछे देखते तो कोई दिखायी नहीं देता... सिर उठाये पेड़ नीचे झुकी झाड़ियाँ बीच में नाचते धूप के छल्ले । उन्हें लगता, मानो ऐस कभी पहले भी हुआ है. मुद्दत पहले-~-जब वह उनके पीछे गायब हो जा थी और वे अपने घर के बाग में अकेले चक्कर लगाते थे-कट्टो? वह आव देने की कोशिश कन्ते, किन्तु कोई उनका गला पकड़ लेता--जाने दो, उ भीतर का शैतान कहता, तुम्हारे आगे सारी जिन्दगी पड़ी है। आगे आगे ''वह उन्हें घसीटता हुआ यहां तक ले आया था... कैसी जिन्दगी? ऊपर हल्की-सी फडफड़ाहट हुई और उनके पैर सहसा ठिठक गये उठाया, तो पहले क्षण कुछ दिखायी नहीं दिया। दोनों तरफ के पे 82/ कव्वे और काला पानी दूसरे पर एक थे। पत्तों के बीच मास की नीनी फोक चमर जाती थी। उन्हें समझ में नहीं आया, यह आपन वहां मे आयी है, फिर मोचा, कार की कोई गाय हिनी है, एक डाल गे जय बोट पक्षी ताई तो यह करती है, विन्तु दूगरी हाल भी योडा-मा हिलनी है, मिग पर यह अंटना है. लेकिन कार कोई पक्षी दिशानी नहीं दिया उम अनीय-गी सहवाट से. याद मयमुछ शान्त हो गया था। निहालचन्द्र आगे बढ़े और तव में एक बार मी ने फिर रोक लिया। इस बार कोई मायन नही थी। गिफं उनकी प्रागों के माम मुछ डोल रहा था। उन्होने अपने नामे को मोटा विपा, जो कार गम म नाचे गिमक आया था-- इस बार उनको आम उठी, नो यरी पिर होकर रह गयी। यह बरगद का छिनार पेठ पा। उसको बास नीचे बी बी एम. बूटी वाह की तरह मुदी हुई जिगर किनारे पर एक रम्मी नट की थी धीरे- धीरे हया में डोल रही थी, जमे को मार धीन गुनना आपन हिलाना है। उन्हें 7 आश्चर्य हुआ कि रस्मी को पेर में बाधा नहीं गया था. मिफं टहनी पर फेंक दिया गमा या और यह वही अट गयी थी, अधर में लटकी हुई, दोनो मिरों को हवा में झुलानी हुई। रम्मी के रिनारो पर दो नन्हें मेहंदी रंगे हाथों में बैनन जुटे थे, काठ में येसन, हलियो को पह, धूल और पसीने में पिम हए. पना नही. रितनी देर निहालचन्द्र में निहारने रहे, जमे वह गमी न होकर कोई मापापा हो.'नवम्बर बीधूप में अनती मनापाया ठहर गमी थी, मारा जंगल एका घोमने-मा निमट आया पा अपन भीतर ही सोम गींचता हुआ। यह गिर रठाये निश्चल या थे। को उन्हें देयता नो प्रम होता कि यह आदमी नहीं है जगम का ही बोई यहा, नम्या जनु कोई अनहोनी-मी आहद मुनकर बोम पगडण्डी पर गहा हो गया है। उनमा फदतना सम्बा था कि रामा हाय उटाते ही वे मी मोजमरते थे, पाटकर नीचे गीच मरते थे, फिन्तु ये दिना दिल-हले राई है, पट्टो- उन्होंने धौर मे फुसफुलाया, फिर आयात्र पुष्ट कार उठ गयो, हातो को बलगम के योच एक यंधारनी पुगार, जो भीतर मीश्नर से बाहर निकलने - को छटपटा रही थी। कुछ देर अभेद्य सन्नाटा सनसनाता रहा"फिर अचानक उन्हें अपनी चोख सुनायी दी, जो किसी तरह बाहर निकल आयी थी, और इस वार किसी ने उनको नहीं रोका, गला दबाकर उन्हें चुप नहीं कराया और वे उसे मुनते रहे, जो उनकी आवाज थी, जंगल के आर-पार, झाड़ियों और पेड़ों के बीच, बचपन के एक सिरे से बुढ़ापे के दूसरे सिरे तक गूंजती । कोई जवाब नहीं मिला। आसपास कहीं कोई न था। हवा उठी थी और पेड़ सरसरा रहे थे "रस्सी के दोनों सिरे नशे में झूल रहे थे। कुछ देर तक वे इस आशा में खड़े रहे कि वह अचानक झाड़ियों के बीच प्रकट हो जायेगी, अपनी रस्सी लेने दोबारा लौट आयेगी 'किन्तु बहुत देर तक कहीं कोई दिखायी नहीं दिया, न उसकी हंसी, न झाड़ियों की खड़खड़-कुछ भी ऐसा नहीं जो उन्हें विश्वास दिला सके कि वह उस दोपहर उनके पास आयी थी, उनसे सटकर बैठी थी, जेबों की तलाशी ली थी, जब वे सो रहे थे; और उनके कागज बाहर विखरे थे, जब वे जागे थे। निहालचन्द्र ? क्या तुम सचमुच जागे थे ? - -- अंधेरा होते ही हवा रुक गयी। कुछ भी नहीं हिल रहा था; न झाड़ी, न पत्ता, न पेड़। कभी-कभी जंगल के भीतर से एक गर्म उसांस-सी निकलती थी, सिर-सिर करती एक सीटी बजाती थी -ऊपर उठ जाती थी -धोवी- घाट के ऊपर 'कुत्तों को चौंकाती हुई आगे बढ़ जाती थी, गन्दे नाले पर उतर जाती थी और धीरे-धीरे सरकती हुई निहालचन्द्र के घर के फाटक पर आकर रुक जाती थी। देवीसिंह उसे ऊंघते हुए सुनता-और रह-रहकर हुड़क जाता। वह पहाड़ी था और वचपन से इस तरह की अंधेरी, स्वरहीन आवाजों को सुनता आया था-जो आवाजें भी नहीं थीं-केवल जंगल की देह की गूंगी वास- नाएं, जो पशुओं और पेड़ों की कराहों में सिसका करती थीं। वह बार-बार दरवाजे की तरफ भागता, बाहर झांकता और फिर वैसे ही भागता हुआ रसोई में लौट आता। उस रात वह रसोई में ही लेटा था। रात का खाना दो बार गर्म होकर 84/कव्वे और काला पानी अब ठण्डा पड गया था।ऐसा बहुत कम होता था कि कर्नल साहव सुवह की सैर को निकलें और दोपहर तक घर न लौट आयें। देरी हो जाती तो भी अंधेरा होने से पहले जरूर लोट आते थे। सीढियो पर छटी को खटखटाहट से ही देवीसिंह पहचान जाता था कि वे लौट आये हैं। कभी-कभी गुस्से में भरा वह रसोई में ही लेटा रहता, जैसे उनकी आहट सुनी ही न हो, ऐस दिनों में निहालचन्द्र उसे बुलाते नहीं थे, उसकी आंखें बचाकर दये पांवो से अपने कमरे मे घुम जाते, बिस्तर पर लेट जाते-और तब देवीसिंह का मन हुलसने लगता, जल्दी से चाय बनाकर उनके कमरे में से आता और वह आंखें मूंदकर बहाना करते, जैसे उसे देखा ही न हो। किन्तु उम रात उनका कमरा साली था, पलंग के नीचे उनकी चप्पलें पड़ी थी। कोने मे चिलमची और गर्म पानी का जग, जो अय एकदम ठण्डा पड गया था। देवीसिंह ने कमरे की अंगीठी मे आग जला दी, ताकि जब वे आयें, तो उसे परेशान न करें, खाना खाकर तुरन्त सो जायें। खुद उसकी आयें योझिल हो रही पी-एक वार इच्छा हुई कि पडोम के मकान मे खवर दे आये कि कर्नल साहब अभी तक नहीं लौटे, किन्तु फिर पैर रुक गये। पाहर में छोटी-से-छोटी बात पर पुलिस आ धमकती है। देवीसिंह को पुलिस देखते ही कंपकंपी छूटने लगती थी। चुप रहना ही देहतर था। अभी नहीं, कुछ देर में आते होंगे, अकेले आदमी, जायेंगे कहाँ ? और इस उम्र में भला? यह बहुत बड़ी सान्त्वना पी। निहालचन्द्र मचमुच ही कही नही जा सकते थे। सिर्फ लौट सकते थे-हर दोपहर साल मे तीन सौ पंसठ वार। बेनागा, उम्र के आखिरी दिन तक। धीरे-से कुछ सहका, तो वह चौंक गया। क्या दरवाजा खटका है । या मिर्फ हवा है ? देवीसिंह कुछ देर अंधेरे में बैठा रहा, फिर दबे पांव निहाल. चन्द्र के कमरे में गया। आग मे सुलगती लकड़ियां कड़क उठनी थीं, जिनकी आवाज ने उसे जगा दिया था। अंगीठी के पास रसी लोहे की सलाख से उसने नीचे दबी लकड़ियों को ऊपर खिसकाया, राख को कुरेदा और जब वे बल-बल करती हुई दुवारा जलने लगी तो वहीं लेट गया, निहालचन्द्र के पलंग के नीचे, आग की लपकती लपटो की गरमाई कब उसकी नीद को घेर लायी उसे पता भी नहीं चला। यह भी पता नहीं चला कि कब वह दरवाजे सुबह की सैर।
. सांकल खोलकर वाहर चला आया, उसी रास्ते पर चलने लगा, जिस पर हर रोज निहालचन्द्र सैर के लिए जाते थे, गन्दा नाला, धोवीघाट का मैदान, नहर की चमकीली, संकरी धारा पेड़ों के ऊपर चाँद निकल आया था और सारा जंगल एक अद्भुत उजाले में चमक रहा था। कुछ दूर पर वह दिखायी दिये, दोनों हाथों को हवा में डुलाते हुए। देवीसिंह के पैर ठिठक गये । उसे कुछ अजीब-सा लगा कि कर्नल साहब का वही चेहरा-मोहरा है, वही देह, वही कपड़े-लेकिन उस क्षण वे चौदह वरस के लड़के दिखायी दे रहे थे। साफ, कुंआरा, उत्सुक चेहरा --वे अपने दोनों हाथ हवा में हिला रहे थे। वे उसे बुला रहे थे- और तब वह निडर होकर भागने लगा। विल्कुल उनके पास चला आया, वहीं खड़ा हो गया, जहाँ वे पेड़ के नीचे झूल रहे थे। निहालचन्द्र के गले में रस्मी फैमी थी और रस्सी का सिरा पेड़ की टहनी से बंधा था। टहनी हिल रही थी और निहालचन्द्र लटक रहे थे। नीचे घास पर उनका थैला, उनकी थर्मस, उनकी आर्मी का कोट पड़ा था, दोनों जेवें उघड़ी पड़ी थीं-- नंगी और उल्टी, विल्कुल खाली। खट-खटखट.."उरे अजीब-सी आवाज सुनायी दी, सिर उठाया, तो बच्चों के कूदनेवाली रस्स दिखायी दी, चाँदनी में हिलते हुए दो नन्हे पीले वेलन, जो टहनी के हिल से बार-बार निहालचन्द्र के झूलते सिर से टकरा जाते थे। - ne Inवे और काला पानी
।
आदमी और लड़की
।
उमने
दुकान का दरवाजा खोला तो घण्टी की आवाज हुई -टन । जब वह
भीतर आया और दरवाजा मुडकर देहरी मे दुवारा सट गया, तो घण्टी
दुवारा बजी, इम दफा दो बार टन, टन ।
यह दूमरी आवाज काफी देर तक गूंजती रही। यह चेतावनी यो कि
कोई भीतर आया है।
दुकान में कोई नहीं था। उसे हमेशा लगता था कि यदि वह शेल्फ से
दो-चार कितावें उठाकर भाग जाय, तो किमी को पता भी नहीं चलेगा।
यह उसका भ्रम पा। घण्टी बजते ही काउण्टर के पीछे दो आंखें उसे
अनजाने मे ही पकड लेती थी-आँखें, जो नीली थी और गीली भी। ऐनक
के पीछे दो डबडबाये धब्ने उमे निहार रहे थे।
वह पितावो की अलमारियों के बीच रास्ता टटोलता हुआ काउण्टर के
सामने आ खडा हुआ।
"क्या हाल हैं ?" उसने पूछा।
अधेड मैनेजर ने उसकी ओर देखा; फिर कन्धे उचका दिये--जिससे
कुछ पता नही चला कि वह कमे मूड में है।
"मर्दी शुरू हो चली है।" उसने कहा। मौसम का खयाल अचानक
उसे मैनेजर की मछे देखने पर हो आया था, जो इतनी सफेद थी, मानो
अभी-अभी उन पर ताजा बर्फ गिरी हो।
'होगी हो।" बूढे ने तटस्थ भाव से कहा, "अक्तूबर का महीना है।"
"अभी हीटिंग शुरू नहीं हुई?"
यादमी और
२५7
. "नवम्बर से पहले नहीं, चाहे बर्फ ही क्यों न गिरने लग । पूरा पर ही महीन भाव से सरकार पर कटाक्ष करता था। मुद्दत पहले वह दुका का मालिक था, अव नये तन्त्र के नीचे, सरकार उसकी मालिक थी, उ किताबों की भीजो उसके बाप-दादाओं ने पहली लड़ाई के जमाने जमा की थीं। दुकान वही थी, लेकिन रातों-रात कानून की लकीर उस और वाप-दादा की विरासत के बीच एक खाई-सी खोल गयी थी। काउण्ट पर वह अब भी बैठता था-पहले की तरह-लेकिन अब किताबों उसका रिश्ता कुछ वैसा ही था, जैसे कोई बाप जीते-जी अपने बच्चों के अनाथालय में देखता है। "आप सोचते हैं, क्या बर्फ गिरेगी?" आदमी ने पूछा। बूढ़े ने ऐनक उतारी, मैले रूमाल से शीशे साफ किये, फिर नाक सिनकी-"वर्फ और मौत घण्टी बजाकर नहीं आती।" उसे लगा, जैसे बूढ़े का इशारा उसकी तरफ है। पिछले दिनों जव कभी वह दुकान की घण्टी बजाता था, बूढ़े के चेहरे पर एक बेचैन-सी झुंझलाहट झलक आती थी। सीधे-सीधे कुछ नहीं कहता था, पर लगता था जैसे उसे सामने देखकर पिछली जिन्दगी की सारी शिकायतें खुल जाती थीं। पहले लड़ाई और हिटलर, फिर कम्युनिज्म, और अव"वह वह आगे चला आया, अलमारियों के बीच । किताबों पर दुपहर की ठण्डी, म्लान रोशनी गिर रही थी। उसने चारों तरफ टटोलती हुई निगाह डाली, लेकिन वह कहीं दिखायी न दी। अचानक एक आशंका ने उसे पकड़ लिया--सम्भव है, वह आज दुकान नहीं आयी। वह ठिठुरने लगा। अपने कोट की जेव में हाथ डाला, तार के कागज को छुआ, फिर उसे झटके से बाहर खींच लिया । गरमाई कहीं न थी, न कोट के अन्दर, न वाहर। वह अब भी झिझक रहा था। लेकिन दुकान के बीच, बूढ़े की आंखों के सामने खड़े रहना असम्भव था। वह कुछ आगे बढ़कर एक लम्बी शेल्फ की ओट में छिप गया। उसने जेव से रूमाल निकाला और माथे का पसीना पोंछने लगा, सर्दी का पसीना, जो भीतर की देह से नहीं, बाहर की दहशत से टपकता है। वह फटाक से मुड़ गया। ट्रॉली के पहिए चूं-धूं करते हुए शेल्फ को . । 88/कच्चे और कालापानी दूमरी तरफ जा रहे थे। पीछे-पीछे वह आ रही थी, ट्रॉली के हैण्डिल को दोनों हायों से पकडे हुए-जसे वह कोई छोटी-सी प्रेम हो, जिसमे बच्चे की जगह बहुत-मी किताबें बैठी थी। लडकी का सिर ट्रॉली पर झुका था। वह एक-एक किताव उठाकर दोल्फ को दराज में रख रही यो। उसकी आँखें शायद बचपन से ही कमजोर रही होंगी। वह हर किताव को उठाती, उमे अपनी ऐनक के बहुत पास ले आती, लेखक का नाम और किताव का टाइटल पढती, फिर डस्टर से उसे झाड़-पोछकर दूसरी किताबो के सिरहाने टिका देतो। वह अपने काम में इतनी डूबी थी कि उसे गुमान भी न था कि शेल्फ की दूसरी तरफ कोई उसे देख रहा है। वह उसे देख रहा था। छत पर लटकी बत्ती का प्रकाश सीधा उसके चेहरे पर गिर रहा या; वह एक ठिकने कद की लड़की थी, लेकिन शेल्फ के पीछे सिर्फ उसका धड दिखायी देता था, कमर से ऊपर, जो उसकी टांगों से कही ज्यादा वयस्क दिखायी देता था। उसने एक लम्बा नीले रंग का एप्रन पहा रसापा, जो दुकान में काम करनेवाली लड़कियां पहनती थों- लेकिन उसके ऊपर वह ज्यादा नही फबता पा। शायद इसलिए कि वह उसमें पूरी ढंक जाती थी और तब कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि वह कितनी छोटी है, कि अभी कुछ दिन पहले उसकी बीसवी वर्षगांठ पर वह उसके लिए फूल लाया था, जो शायद अव भी उसके कमरे मे पड़े सूख रहे होंगे। अब वह सरकते हुए उसके वितकुल पास चली आपी थी-लगभग उसके सामने । शेल्फ की संकरी दराजों के बीच उसका सिर दिखायी दे रहा था। उमने हमेशा की तरह अपने बाल कसकर बांध रसे पे-पूरे जिनके बीच एक हिचकिचाती-सी मांग कुछ दूर चलकर उलझी हुई लटो में लोप हो गयी थी। इस बार वह अपने को नहीं रोक सका। जब लड़की ने मन्तिम किताब शेल्फ पर रखने के लिए हाथ उठाया, तो उसने आगे बढ़कर उसके हाप को पकड़ लिया, वही शेल्फ के ठण्डे लोहे पर। लड़की के मुंह मे हल्कीसी चीख निकल गयी और वह घबरा गया। उसने जल्दी से किताबों को टेलकर ओस्फ चमकीले बाल, आदमी मोरमहर्षी के बीच अपना सिर अड़ा दिया- - लड़की ने हकवकाकर आँखें ऊपर उठायीं; वह जैसे कोई जिन है किताबों के बीच मुस्कराता हुआ। "तुम ?" "हां!" "कव आये?" "कुछ देर पहले "तुम डर गयीं ?" "हाँ...", लड़की ने सिर हिलाया। वह छोटी बातों में भी झूठ नह वोलती थी। उसका हाथ अब भी आदमी की हथेली में भिचा था। एप्र के पीछे छोटा-सा वक्ष ऊपर-नीचे हो रहा था। वह सचमुच डर गयी थी- वह कभी दुपहर के वक्त दुकान में नहीं आता था। "तुम कुछ देर के लिए छुट्टी ले सकती हो?" "अभी?" लड़की का हाथ ठण्डा-सा हो गया-उसके हाथ के भीतर। "सिर्फ कुछ देर के लिए !" उसने कहा। "कोई बात हुई है ?" लड़की की आँखें उस पर फैल गयीं। "नहीं, ऐसे ही।" उसने उड़ते हुए स्वर में कहा। लड़की जिस तरह कभी झूठ नहीं बोलती थी, वह कभी सीधा सच नहीं बोल पाता था। "तुम भीतर बैठो, मैं अभी आती हूँ।" उसने अपना हाथ उसकी हथेली से बाहर निकाला; एक क्षण उसकी मोर देखा और फिर वह मुड़ गयी, कितावों की शेल्फों के पीछे छिप गयी। दुकान के पिछवाड़े एक स्टोर-रूम था, जहां लोग पुरानी कितावें वेचने आते थे। लड़की वहीं एक स्टूल पर बैठती थी। पीछे एक परदा लगा था, जो दुकान के मुख्य, अगले भाग को भीतरी हिस्मे से अलग कर देता था। परदे के पीछे एक छोटा-सा केविन था, जहां लड़की लंच-टाइम मे घड़ी-दो घड़ी सुस्ताने आ बैठती थी। वह यहाँ चला आया; कई वार यहाँ आया था; हर वार एक अजीब- सा भ्रम पकड़ लेता,मानो यह दुकान नहीं, लड़की के घर का प्राइवेट कमरा 90/कव्वे और काला पानी 1 हो। वहाँ वाहर की कोई आवाज नहीं आती थी:न आदमियों का शोर.न ट्रैफिक का कोलाहल, मिर्फ ट्राम की गडगडाहट जरूर सुनायी देती थी- बहुत गूढ और धीमी -जमे कही दूर शहर के किनारे पर बादल कहक रहा हो। वह वेंत की आरामकुर्सी पर बैठ गया। कमरे में अंधेग उलना नहीं था, जितना रोशनी का अभाव :न कोई बिडको, न रोशनदान । मिर्फ कितावों को वामी वू और दीवार के पीछे चूहों को सरसराहट । एक छोटी- सी मेज पर चाय-कॉफी का सामान रखा था--पुराने मिलाबी विस्कुट और याउन रोटी की स्लाइसें हमेशा तैयार रहती थी। कभी लड़की को भूख लगती, वह जल्दी से भीतर आकर कुछ-न-कुछ पेट मे डाल आती थी। उमने पहली बार लडको को इसी केदिन में देखा था। वह अपनी कुछ पुरानी किताव वेचने आया था। लडकी काउण्टर के पीछे स्टूल पर बैठी इबल रोटी की एक स्लाइस कुतर रही थी। गोद मे ब्राउन रग का अधदुना स्वेटर पड़ा था जिमकी ऊनी देह मे दो सलाइयां धुपी थी। उमकी आहट सुनकर लड़की हकंवकाकर उठ खड़ी हुई और तब पहले दिन, पहली बार उसने लड़की के चेहरे को देखा था। वह मार्च का दिन रहा होगा और अव~मक्तूबर पत्म हो रहा था। इन सात महीनों में वह तकरीवन अपनी सब किताबें येच चुका था, जिन्हें वह अपने देश नहीं ले जाना चाहता था। पुराने शब्दकोश, टूरिस्ट गाइड्स और वे सब उपन्यास, जिन्हें लडकी दुकान के लिए खरीद लेती यो-और खाली समय मे खुद पढती थी। उमे यह जानकर काफी हैरानी हुई थी कि वह अंग्रेजी पढ लेती थी और पोडी-बहुत बोल भी लेती थी। दरअसल अंग्रेजी को लेकर ही उनके बीच वोलचाल का सिलसिला शुरू हुआ था। एक दिन जब वह कुछ किताबें वेचने आया, वह कुछ देर तक उन्हें उलट-पलटकर देखती रही। फिर अचानक बोली, "क्या आपके देश मे सब लोग अंग्रेजी बोलते हैं ?" "नहीं, ऐसा नहीं है।" उमने कहा, "मैं भी ठीक से नहीं बोल पाता।" "आप बहुत अच्छा बोलते हैं।" उमने बहुत उदामीन भाव से कहा। फिर उसकी ओर से आंखें मोड़कर किताबों को समेटने लगी। "मैं अभी - ती हूँ।" उसने किताबों का वण्डल उठाया और पार्टीशन के पीछे चली यी। वह सोचने लगा-पता नहीं, आज कितनी कितावें चुनी जायेंगी। वहाँ कुछ ऐसा ही सिस्टम था। लड़की किताबों को मैनेजर के पास ले जाती वह उनमें से उन्हें चुन लेता, जो खरीदने लायक होती-बाकी वापि लौटा देता। सारा व्यापार जुए के खेल-सा होता था। कितावों को चुनने और ठुकराने का कोई ठोस आधार रहा हो, यह उसे कभी समझ में नहीं आया। जब कभी लड़की से वह इसके बारे में पूछताछ करता, तो वह अक्सर टाल जाती थी। जब वह बहुत जोर डालता (बाद के दिनों में) तो वह झुंझलाकर कहती-"हम वही किताबें पढ़ते हैं, जो हमारे लिए ठीक " सौभाग्य की बात कहिए, उस दिन सव कितावें 'ठीक' निकलीं, तकरीबन सव-सिवा एक किताव के, जो मैनेजर ने वापिस भिजवा दी, रेक्विएम फॉर द नन । लड़की ने कुछ कौतूहल से उसकी ओर देखा, "क्या यह कोई धार्मिक किताव है ?" "नहीं", उसने कहा, "यह एक वेश्या के बारे में है।" वह देखना चाहता था, उस पर क्या प्रतिक्रिया होती है। धर्म में रण्डीबाजी-दोनों ही वहां वजित थे; किन्तु लड़की के चेहरे पर कोई भी नहीं आया; उसने चीमड़ पेपरबैक को धीरे से काउण्टर के नीचे स- लिया, जिसे छिपाना' भी नहीं कहा जा सकता; काउण्टर के नीचे दराज उसकी अपनी थी, जिसमें वह दिन का टिफिन, रूमाल-तौलिया घर की चाभियां रखती थी। पता नहीं, उसकी कितनी कितावें इस काउण्टर के भीतर गा गयी थीं। "आज आपको काफी पैसे मिलेंगे।" उसने सरसरी निगाह से विल को देखा, जो खट-खट कर कम्प्यूटर मशीन के बाहर निकल आया था। उसका मन हुआ झांककर विल को देखे-फिर वह अपने को रोके रहा। यदि चौथाई किराया भी निकल सके, तो बाकी पैसे जुटाने में ज्या ला पानी नहीं पड़ेगी। "मालूम है, कितना है ?" उसने बिल को मशीन से सोचकर उसके सामने रख दिया। चालीस क्राउन ! पहले क्षण विश्वास नहीं हो सका। पहले कभी उसे अपनी कितावो के लिए इतनी बड़ी रकम नहीं मिली थी। लड़की उमकी और विजयोल्लास से मुस्करा रही थी। "इतना कसे ?" उसने पूछा। "ऐसे ही!" लड़की ने कहा, "ये अच्छे दिन हैं ! अच्छे दिन? दुकान के भीतर लडको की भाषा मोहनजोदड़ों की लिपि जैसी होती पी-छिपे मतलय बहुत कुछ और देखो तो कुछ मी नही। कभी-कभी रात को नींद न आने पर, बिस्तर पर पड़े-पड़े एक कंगला कोई लूला लफ्ज अंधेरे में चमक जाता-लड़की के साथ चिपका हुआ । अच्छे दिन; बुरे दिन; काफी बुरे दिन । सबसे बुरे दिन वे होते, जर सड़की उसको सब कितावें वापिस कर देती, सेद-भरी निगाहों से उसकी ओर देखती, 'आज कुछ भी नहीं और वह सब कितावो को अपने डफल बैग मे ठूमकर बाहर सड़क पर आ जाता। दुकान को लम्बी शीरोदार खिड़की पर एक छाया खड़ी हो जाती। वह देखती कि वह जा रहा है। वह सोचता, अगली बार कौन-सी किताबें लाऊंगा, जो खरीदने लायक होंगी। लडकी मोचती, कसा आदमी है जो सिर्फ अंग्रेजी किताबों को बेचने माता वाक्य, मैनेजर सबकुछ देखता, ऊँघने लगता। सोचता, वह किताबो के लिए नही, लड़की से मिलने आता है. लेकिन इस उम्र मे? लहकी भीतर आयी। वह अपना संच का टिफिन लेकर आयो यो; वह देहरी पर ठिठक गयी और उसे देखने लगी । आदमी कुर्सी के सिरहाने सिर टिकाकर आंखें मूंदे बैठा था। उसके चेहरे पर एक महीन-सी थकान थी, मानो उसकी नीद का फायदा उठाकर न केवल बीते हुए वर्ष, बल्कि माने. वाली उम्र भी उसके चेहरे पर सरक आयी हो। लड़की कुछ देर चुपचार उसके चेहरे को देखती रही। कोई और दिन होता तो आदमी का इस टए अचानक दुकान में प्रगट हो जाना उसे अच्छा लगता। लेकिन आज उसे यह अपशगुन-सा जान पड़ा। उसे प्रेतों में विश्वास नहीं था, किन्तु आज जव उसने आदमी को कितावों की शेल्फ के पीछे देखा-पुराने ओवरकोट के गर्दभरे कॉलर, जो काले डेनों-से उसकी गर्दन पर उठे थे, तो वह अवाक्- सी उसे देखती रही थी, जैसे आदमी के वेश में कोई दूसरा आदमी उसे ताक रहा है। दूसरा आदमी? वह धीरे से आगे बढ़ी, उसे सहलाने को मन हुआ, किन्तु फिर हाथ रोक लिया। सोने दो----उसने सोचा; अभी काफी समय है। दुपहर के समय कोई गाहक नहीं आता था। वह अपना टिफिनदान खोलने लगी, ब्राउन रोटी की सैण्डविच, जिसके भीतर सलामी दबी थी, एक छोटी बोतल में योगुत, चीज़ के क्यूब, सिरके में भीगा खीरा--यही उसका लंच था, जो वह हर रोज अपने साथ लाती थी। अगर उसे मालूम होता कि वह भी आ रहा है, तो वह उसके लिए भी कुछ ले आती---उसने कितनी बार आदमी से कहा था कि उसे घर में खाना बनाने की जरूरत नहीं; दुपहर का खाना वे एक साथ दुकान मे खा सकते हैं । लेकिन आदमी हर वार इन्कार कर देता था जैसे दिन की रोशनी में उससे मिलना खतरनाक हो। दिन के समय वह उससे तभी मिलता था, जव कोई ऐसी जरूरत हो जिसे टाला न जा सके। लेकिन आज; आज क्या जरूरत है ? वह कल रात ही तो उससे मिली थी। वह कॉफ़ी के लिए पानी गर्म करने उठी तो देखा, आदमी की आँखें खुली हैं ; पता नहीं, कितनी देर से वह उसकी हरकतों को देख रहा था। "कुछ खाओगे?" लड़की ने पूछा। आदमी ने सिर हिलाया, फिर सीधा होकर बैठ गया। आँखें सुर्ख थीं भोर शेव के बाद भी गालों पर पिछली रात की परछाई विछी थी। उसने माखें मलीं और बालों को पीछे समेट लिया। याद नहीं आया, वह सो गया था-सपने की एक चिन्दी अब भी डोल रही थी, धीरे-धीरे वह गायव हो गयी और उसकी जगह लड़की दिखायी देने लगी। लड़की ने अपना एप्रन उतार दिया था। अब वह हरे रंग की स्कर्ट पहने थी, जो हमेशा उसके घुटनों तक आकर रुक जाती थी। काली नॉयलन - - । । 94/कव्वे और काला पानी
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की जुराबों के पीछे उमकी टांगो का भोलापन झांक रहा था। कमर पर
काले रंग की पेटी कसी पी-बिल्कुल स्कूली लडकियो की तरह-जिमके
कपर भूरे रंग का ढीलाढाला काडींगन लटक रहा था। लड़की का चेहरा
छिपा-सा जान पड़ता था, लेकिन देह हमेशा खुली और उजली दिखायी देती
यो-दूमरी लडकियो से बिल्कुल उल्टी, जिनका चेहरा सावंजनिक होता
है, जबकि देह बहुत प्राइवेट जान पड़ती है।
पानी उबलने लगा था-अचानक भाप का झोंका उठा और लड़की
मुक गपी, दो मगो मे कॉफ़ी डाली और जब मुंह उठाया तो होठ खुल-मे
गये। पसीने की बूंदें माथे पर चमक रही थी।
'धर से आ रहे हो?"
आदमी कुछ हिचका–वह घर से आ रहा था, लेकिन सीधे नही।
उसका हाय जेब मे गया, फिर वही ठिठका रहा, टेलीग्राम पर।
"इन्स्टीटयूट गया था।" उसने कहा।
"पूरा कर लिया?" लडकी हमेशा यही एक प्रश्न पूछती थी।
"नही, एडवांम मांगने गया था।" उसने कहा।
"कितने पेज करने हैं ?"
"आखिरी चैप्टर बचा है-वाकी सब टाइप करना है।"
"क्या वे टाइा भी नहीं करवा सकते ?" लड़की ने कुछ झुंझलाकर
कहा।
"एक ही अंग्रेजी टाइपिस्ट और वह छुट्टी पर गया है।"
आदमी धीरे-धीरे उसका हाप सहलाने लगा। एक-दूसरे की चिन्ताओं
को ढांपने का यही एक तरीका बचा था। वे कहाँ-से-कहां चले जाते थे।
लेकिन सड़की की देह स्पिर रहती थी-स्थिर और ठण्डी। पर सबसे
ज्यादा। जब वह उसके कमरे में बाती थी तो सबसे पहले अपने पैर आग
फे सामने फैला देती थी। उमे काफी हैरानी होती थी कि इतनी कम उम्र
में लड़की के हाय-पाव इतने सुन्न रहते थे।
"कितने दिन में देना है ?"लडकी ने पूछा।
"दस दिन "ज्यादा-से-ज्यादा पन्द्रह दिन, क्यों?"
"क्या मैं कर सकती हूं?"
"तुम?" आदमी के चेहरे पर एक थकी-सी मुस्कराहट चली आयी। "क्यों नहीं"हर शाम किया करूंगी।" लड़की ने हाल ही में टाइप करना सीखा था-अंग्रेजी टाइपराइटर, पर। उसके लिए वह एक खेल-जैसा था। आदमी जितना भी अनुवादः करता, उसे डिक्टेट करवाता और उसकी अंगुलियों के नीचे से फटाफट अंग्रेजी शब्द फिसलते जाते। फिर दोनों बैठकर गलतियां छोटा करते। मादमी का कहना था, इस तरह वह अंग्रेजी और टाइपिंग दोनों एक साथः सीख जायेगी लेकिन उसे सीखने की चाह उतनी नहीं थी, जितना सकून- सा मिलता था; रात की वही एक घड़ी होती थी, जब वह आदमी के पास होती थी, खिड़की के बाहर तारे दिखायी देते, टाइपराइटर के अक्षरों-से टिमटिमाते हुए"खट, खट, वह उन्हें दवाती जाती और वे आकाश से उतर- कर सफेद, फुल-स्केप कागज पर उतरते जाते। केतली का पानी गुनगुना रहा था। लड़की ने स्विच बन्द कर दिया और ऊपर का रोशनदान खोल दिया, ताकि इस बार पानी की भाप वाहर जा - सके। . "यह गर्म है.." लड़की ने दूसरा कप बनाने के लिए सिर झुकाया तो गले के पिछवाड़े का जूड़ा कन्धे की तरफ लुढ़क आया। लड़की की देह पर ऐसी अनेक छोटी-छोटी घटनाएं घटती थीं और वह उनसे बेखवर रहती थी, जैसे जब वह कोई पुरानी किताब बेचने आता था, तो वह अपने थूक से अंगुली गीला करके पन्ने पलटती थी और होंठ हिलाकर पढ़ती थी। ऐसे मौकों पर वह उसे बहुत गौर से देखता था, क्या यह वही लड़की है जिसकी देह को वह पिछली रातों छूता रहा था और जो दिन में इतनी अछूती दिखायी देती थी? ऐसे क्षणों में उसे लगता, वह कहीं नीचे है, गढ़हे में, एक जानवर की तरह दुवका हुआ, बार-बार एक ही इच्छा में मथता हुआ कि जब तक लड़की उसकी ओर से बेखवर कॉफ़ी बना रही है, वह उछल- कर गढ़हे से निकल सकता है, उसकी सफेद और कुंवारी गर्दन को दबोच- कर एक छलांग में दुकान से बाहर हो सकता है-दुकान से, पछतावे से, पाप से-सबसे बाहर। लेकिन जब वह आंखें ऊपर उठाती, तो उसके सव. इरादे बुहर जाते । वह टकटकी लगाये उसे देखता रहता। लड़की पता नहीं, - 96/फन्वे और काला पानी किस खयाल मे मुस्कराने लगती। वह बंधा रहता-अपने गुस्से और सन्तान और दिल की दलदल मे। वह नीचे झुक आया, तिपाई पर, जहाँ लडकी का हाथ केतली पर टिका था और ऐसे कहा, जैसे अभी-अभी कुछ याद आया हो, "कल रात टेलीग्राम आया था।" "टेलीग्राम ?" लड़की के हाथ में कॉफी का मग हवा मे ठिठक गया। "वह बीमार है।" आदमी ने कहा, "मुझे बुलाया है।" उसने तार जेव से बाहर निकाला-लाल कागज की मुड़ी हुई, दयनीय चिन्दिया जिसे लड़की ने देखते ही आँखें मोड़ ली। "क्या बीमारी है ?" उसने लापरवाही से पूछा। "जाकर पता चलेगा।" आदमी ने कहा। "वव?" वह चुप बैठा रहा- मेज पर पड़े तार को देखता रहा। "कब जा रहे हो?" लहकी ने दुबारा पूछा, किन्तु अव उसके स्वर मे लापरवाही के बदले एक अजीव-सी कोमलता भर आयी थी। "मैं पत्र की राह देखूगा।" उसने कहा। "लेकिन अगर यह सचमुच बीमार है ?" लड़की ने कहा। "सचमुच का मतलब ? तुम सोचती हो, यह वहाना है ?" "मैंने यह नहीं कहा।" लडकी ने कहा "अगर वह बीमार है, तो तुम्हें जाना चाहिए।" "तुम्हें बहुत जल्दी है।" "जल्दी कैसी?" "मेरे जाने की! लहकी ने विस्मय से उसकी ओर देखा। "मैं समझी नहीं।" उसने कहा। "मुझसे ज्यादा तुम उसको फिक्र करती हो।" यह कटास था। वह कटाक्ष से भी आगे जाना चाहता था, जहां कुरता शुरू होती है, किन्तु वहाँ सिर्फ कमीनापन था और वह रुक गया। आगे कुछ भी न था-मिर्फ एक गंदलो-सी थकान और जलन पो । वह रात-भर नहीं आदमी.बोरसर, .
सोया था। "मैं अव चलता हूँ।" उसने कहा। "नहीं, व्हरो।" लड़की ने उसके घुटनों पर अपने हाथ रख दिये; "हमने अभी क्या कहा ? मैं बहुत जल्दी में हूँ?" लड़की की आंखें चुधियां गयी थी जैसे वह उसकी क्रूरता को ठीक से नहीं देख पा रही हो। "मैं हंसी कर रहा था!" आदमी ने धीरे से अपना हाथ उसकी बांह पर रखा। लड़की की समूची बांह थरथरा रही थी। "अगर मैं कहूँ, तुम रुक जाओगे?" "तुमने कभी कुछ नहीं कहा।" "क्योंकि..." कोई फायदा नहीं। वह जव-जव आदमी की परीक्षा लेती, आदमी का चेहरा दूर होने लगता। उसकी जगह अपना पाप दिखायी देने लगता, जो उससे वैसे ही प्रश्न पूछने लगता, जिन्हें वह आदमी से पूछती थी। यह चक्कर था; पाप का चक्कर, जिसका कोई अन्त नहीं था। "क्या वह अक्सर बीमार रहती है ?" उसने पूछा । वह कभी उसकी पत्नी का नाम नहीं लेती थी, सिर्फ 'वह' कहा करती थी, मानो इतनी बड़ी दुनिया में सिर्फ एक 'वह' उसकी पत्नी हो सकती है। उसे खुशी थी, उसने उसे कभी नहीं देखा था-वह दूसरे शहर में थी और उसने वह शहर भी कभी नहीं देखा था। आदमी चुपचाप लड़की को देखता रहा; लड़की के पीछे खिड़की थी और खिड़को के परे छतें जहां उगती धूप की सफेद थिगलियां निकल आयी थीं। "कल रात मुझे एक सपना आया।" उसने कहा। "कैया सपना?" "मैंने देखा, तुम नीचे खड़ी हो, तुम ऊपर मेरे कमरे को देख रही हो। मैं तुम्हें आवाज देकर बुलाना चाहता था, और तुम जाने लगी और मैं जोर- जोर मे दरवाजा भडभड़ाने लगा, नीचे भाने के लिए लड़की हंसने लगी, "सच?" "फिर मेरी आंख खुल गयी और मैंने सुना, कोई सचमुच दरवाजा खटखटा रहा है। मैंने सोचा, शायद तुम हो, लेकिन वाहर तारवाला खड़ा - . 98/कले और कालापानी था।" आदमी के चेहरे पर हमी थी, लेकिन लड़की की हमी बुझ गयी । उसे सपने में अपशगुन-मा दिखायो दिया। वह अपरागुनो के बीच रहती थी- इसलिए गिरजे में घडी-दो घड़ी बैठना उसे अच्छा लगता था। उसने यह दात कभी आदमी को नहीं बतायी थी, गिरजेवाली बात । यह नहीं, वह आदमी से कुछ छिपाती थी, किन्तु ईश्वर मे विश्वास करना, यह उमे एक प्राइवेट किस्म की बीमारी जान पड़ती थी, जिसमे वह आदमी को दूर रखना चाहती थी। ईश्वर के इदं-गिर्द वैमा ही अंधेरा था, जैसा उसकी पत्नी के आसपास और वह उसकी पत्नी के बारे में उतना ही कम जानती थी, जितना आदमी उसके ईश्वर के बारे में"उन दोनो को अकेले छोड़ देना ही अच्छा था। दरवाजे पर घण्टी पनखनायी और वे दोनो चौंक गये। एक-दूसरे से अलग हो गये । वह भागती हुई दरवाजे के पास गयो, सांकल खोलकर बाहर मांका-कोई गाहक आया था। "अभी लव-टाइम है", उसने कहा और जल्दी से दरवाजा भेड दिया। लेकिन वह मुड़ी नही; चौखट पर सड़ी रही, बन्द दरवाजे के मोशे से खुलता हुआ दिन देखने लगी। अक्तूबर का दिन युन्ध की परत से निकल रहा था; उसे बहुत पहले के दिन याद माये, जय यह आदमी से नहीं मिली थी; दुकान से पर अकेली जाती थी और शहर खाली-सा लगता था। जय वह आदमी की तरफ मुडी, तो मुस्करा रही थी। "कितनी दूर है ?" उसने पूछा। "क्मा ?" आदमी जाने के लिए तैयार खडा था। "तुम्हारी पत्नी का शहर?" इस बार उसने सचमुच 'पत्नी' कहा, जैसे वह उसको दूर बाहर की कोई सहेली हो। यादमी व्यस्त-मा हो उठा-"एक घण्टा लगता है।" उसने कहा। "कैसे जागोगे ?" "वस से, हर घण्टे बाद बस चलती है।" लडकी यादमी के पास आयो; ऊपर देखा, जहां उसकी आंखें थी, "मैं भी चलूँ ?"
"तुम ?' "वस-स्टेशन तक चलूंगी।" आदमी एक क्षण उसे देखता रहा; वह सुन्न सन्नाटे के बीच खड़ी थी -जहाँ टेलीग्राम पड़ा था और पीछे किताबों की कतार थी, जिनके भीतर जीने-मरने का ज्ञान भरा था, लेकिन जो उस क्षण न उसकी मदद कर सकता था, न लड़की की। उसने बैग उठाया और लड़की के पास चला आया, उसके छोटे-से सिर पर अपना मुंह रख दिया। वह उससे बहुत छोटी थी और एक स्कूली लड़की की तरह सुनसान खड़ी थी; और तब उसे लगा जैसे उसकी उम्र के चालीस साल एक गदले नाले की तरह दुकान के बीचोंबीच वह रहे हैं और वीच का पानी इतना उथला है कि वह उसमें डूबकर मर भी नहीं सकता-केवल लड़की को उसमें घसीटकर गैंदला कर सकता है। वह बाहर चला आया। वह जल्दी से भागकर खिड़की के पास आयो; मादमी दुकान से निकल- कर सड़क पार कर रहा था। वह खिड़की के लम्वे शीशे से उसे छोटा होते हुए देखती रही। . दूसरे दिन लड़की उसके फ्लैट पर गयी, यूं ही टहलते हुए, हालांकि उसे मालूम था कि वह शहर से बाहर है और मकान खाली है । वह पिछली रात को ही चला गया था। फ्लैट की डुप्लीकेट चाभी उसके पास थी, जो हमेशा उसके पास रहती थी और वह किसी भी समय उसके अपार्टमेण्ट में जा सकती थी। किन्तु उस शाम वहां कोई न था। सीढ़ियां अंधेरे में डूबी थीं और चौकीदार का केविन खाली पड़ा था। भीतर जाने के बजाय वह पीछे चलती गयी, ताकि दूर फासले से वह आदमी का कमरा देख सके, जोतीसरी मंज़िल पर था और जिसकी एक खिड़की पार्क की तरफ खुलती थी। पार्क में बच्चे खेल रहे थे। खिड़की वन्द थी। वह जाने से पहले परदा गिराना भूल गया था। शाम की धूप खिड़की के शीशों पर चमक रही थी, शों पर चमक रही थी, जिसके भीतर सबकुछ 100/कव्वे और काला पानी दिखायी देता था-मेज पर रखा टाइपराइटर, दीवार पर टैगी ममीर और खिड़की के माले पर रखा गमला, जो वह यहुत दिन पहले उगफे लिए साथी थी। एक बार मन भीतर जाने को हुमा, अंगुलिया परां में गयी और भीतर रखी चाभी से धैलने लगी-लेकिन यह च्याल कि यमरा गाली पड़ा होगा, जैसे अंगुलियों को भी छू गया। वह मुह गयी और धीमें कदमो से पाग पर चलने लगी। पार्क के बीच पौण्ड था, अंग्रेजी दगा तानाम, जिस पर परायें तर रही थीं। वह तालाब साथ-माय चलने लगी। वह गांधी भगी, लेकिन गांध का कोई ऐसा सिरा नही था, जिसे पकडकर वह भीतर की गारयोग गर्न। सारा मोच आदमी मे गुरू होता था, जब वह पहली यार दुकान में आया पा। वह एक साधारण-मा दिन या, लेकिन तय उम नहीं मालूम था कि उसके साथ रिश्ता इतना असाधारण हो जायेगा कि यह दिन-रान उसके बारे में सोचा करेगी। जब वह यपनी किताबाटण्टर पर छोड़कर पा जाता, तो वह उनके पन्ने पलटने लगती; पुरानी, मुरमुरी, अंग्रेजी की किताबें, जिन पर उसका नाम, टमक महर का नाम और नीचे या तारीम लिसी होगी, जब उसने वे किदा भरीदी होगी। उन सारीयों को देखकर ठने अजब-सी हैरानी होती कि जब वह दुनिया में नहीं थायी पी, वर माने शहर में घूमता होगा, पता होगा और उन उमका विवाह हा हाँगावर स्कम में पढ़ती पी"वह मुस्करानं लई, नार मी टमकी बेटी मममने है, मने मोचा। मायद इमीनिए वह दिन के समान में मेरे माय सपने में कतराता है। मुझे कमी उम्र याद नहीं बदी। जाम मारहंगा है, दो मुमें पता भी नहीं चला कि वह मुमकिनारा है। उसके बारे में का नोचना? वह राव की बहै। मंडापना मी परता, मुबह रटी तो फाटक पर ढेर-नौजनाही जाती है। बकी बाद में मात्र कामहीना काका, न मान बरपाली बार बारनी माय मागीयीमार की दिगंदगी और बदर आयी, तो मारी देद मुल; मारा शहर व दिरमामा अग्नी ने बहरला,किनु दमः मंतर कृठ दर रहा , जमरन्याको III " ख सकता था। वह चलती गयी, और जव उमसे बरदाश्त नहीं हुमा, स गिरजे में चली आयी जो बहुत पुराना था और खाली रहता था और जसमें वह अक्सर जाती थी और जिसके बारे में आदमी को कुछ भी नहीं मालूम था। वह भीतर चली आयी और सबसे आगे की बेंच पर बैठ गयी। कुछ देर पहले वह आदमी के विस्तर पर थी और अब यहाँ ? वह वहाँ क्या कर रही थी, यह उसे बहुत देर तक नहीं मालूम हो सका। सामने ऑल्टर पर एक आदमी टंगा था, पैरों, हायों, छाती पर कीलों से विधा हुआ-और बहुत देर तक उसे यह भी पता नहीं चला कि वह आदमी वहाँ क्या कर रहा है ? तब उसे अचानक लगा कि वह अकेली नहीं है; कोई उसके पास है, कोई विल्कुल पास बैठा है, जिसे उसने अंधेरे में नहीं देखा था। एक बूढ़ी औरत, जो उसके साथ बेंच पर बैठी थी, गुनगुनाती हुई, प्रार्थना करती हुई, हवा में मोमबत्ती की लो की तरह डोलती हुई; क्या वह कुछ मांग रही थी? वह ईश्वर से कुछ मांग रही थी और तव उसे हैरानी हुई कि इतनी लम्बी ज़िन्दगी गुज़ार देने के वाद--जब कुछ भी बचा नहीं रहता-ईश्वर से कुछ मांगा जा सकता है? वह बूढ़ी के पास सरक आयी, "सुनो, क्या यह पाप है ?" उसने धीरे से बूढ़ी औरत के कानों में फुसफुसाया, "एक आदमी के साथ सोना, जिसकी पत्नी जीवित है ?" "कौन ?" बूढ़ी ने उसके चेहरे को देखा, "कोन जीवित है ?" वह हम रही थी। उसके सारे दांत टूटे थे और खुले, पोपले मुंह शराव का भभका छूट रहा था; शराव और बुढ़ापे और आंसुओं से स उसका चेहग ऊपर-नीचे हिल रहा था। वह भागकर बाहर चली आयी। वहुत देर तक बूढ़ी का चेहरा पीछे-पीछे भागता रहा। फिर वह अचानक गायब हो गया और बर्फ गि वन्द हो गयी। वह मार्च का महीना था, जब वह पहली वार आदमी के सोयी थी। अव वह उसके घर के सामने बैठी थी। बच्चे अपने घरों को थे और बत्तखें? वे पता नहीं कहां डूब गयी थीं ! तालाव अंधेरे। था। न छप, न कुछ, न कोई आवाज़। आसपास मकानों की वरि . 102/ कव्वे और काला पानी रही थी। मिर्फ आदमी का कमरा सीमरे तल्ले पर एक अंधेरे खोखल-सा खाली पड़ा था। अब वहाँ न गमला था, न मेज, न दीवार पर लटकती कमीज्ञ। वह कहीं दूसरे महर मे था। वह अपनी पत्नी के माप लेटा पा । वह न जाग रहा था, न सो रहा था। वह मोच रहा था, जब वह सात महीने पहले सड़की की दुकान में आया या-और वगल में उसकी पत्नी मोम ले रही थी। वह तीन दिनों बाद लौटा था। तीन छोटे दिन और दो लम्बी रातें, जिनके बीच लडकी घर से दुकान गयी थी, वापिम घर लौटी थी, फिर दुकान, फिर घर। एक शाम वह बम-स्टेशन गयो यो, हालांकि उसके आने का समय उसे नही मालम था; दूसरी शाम उसके घर गयी थी, और पार्क में खेलते हुए बच्चो और तैरती हुई वत्तखो को देखती रही थी। आदमी अपनी पत्नी से मिलने पहले भी जाता था लेकिन लडकी की जिन्दगी में यह पहला मौका था जय उमने उस अजीब चीज़ को देखा था, जो कुछ भी नही पो, किसी का न होना, यह भी कोई चीज है ? लेकिन जहाँ वह जाती, वह चीज भी उसके साथ-साथ चलती; जब रात को लेटती, तो वह चीज भी उसके माप लेट जाती है और जब वह मोने लगती, तो वह जागते हुए उसका सोना देवती रहती--औरतब उसे समझ में आया था कि क्यो अकेले लोग गिरजो में जाते हैं, शराबखानी में, ऐसे घरो मे जहाँ और पेगा करती हैं और ऐसे लोग भी जो अपनी पलियों के साथ रहते हैं हालांकि साय का सुख कब का सूख चुका होता है- लेकिन सुख लडकी को नहीं सताता था। वह उसके बारे में सोचती भी न थी। वह सिर्फ यह जानना चाहती थी कि क्या वह उस योज़ के बारे में जानता है, जो वह जाने के बाद उसके पास छोड जाता था? क्या वह उस चीज़ को जानता था? कभी-कभी उसे लगता था; उसे जानता है, इसी- लिए उमसे अलग होना चाहता था; किन्तु वह अलग होता नहीं था, एक अजीव गुस्से में तना रहता था, जैसे उसकी आवाज़ फोन मे सुनायी दी थी- भर्रायो हुई, तनी हुई। - । . - वह फोन तीसरे दिन आया था, लंच की घड़ी में, जब मैनेजर बाहर । वह अपने केविन में थी और टिफिनदान खोल रही थी। घण्टी सुनायी दी । उसके हाथ डिब्बे पर पड़े रहे। यह उसका फोन है, उसने सोचा, हालांकि कोन की घण्टी हमेशा एक जैसी ही वजती थी। वह किताबों की अलमारियों के बीच भागती हुई काउण्टर पर गयी, फोन उठाया, आदमी की आवाज़ सुनी और जब वापिस अपने केविन में आयी तो उसे खिड़की के बाहर पेड़ दिखायी दिया, सड़क दिखायी दी, सामने की दीवार पर पोस्टर दिखायी दिया, जिसका एक मिरा उखड़कर हवा में फड़फड़ा रहा था। तीन दिनों बाद वह अपने शहर को नये सिरे से देख रही थी। फोन की आवाज अब भी उसके भीतर थी-एक उदास नाराज़गी में दवी हुई। पता नहीं, वह क्यों तना था? उसने यह भी नहीं पूछा कि उसके ये दिन कैसे बीते ? तीन दिन अपनी पत्नी के साथ रहकर उस पर गुस्सा जताना? क्या वह पागल था? उसने जल्दी-जल्दी वे किताबें वैग में डाली, जो वह उसके लिए जमा करती थी, अण्डरग्राउण्ड किताबें, जिन्हें न दिखाया जा सकता था, न वेचा जा सकता था, जो गोदाम में पड़ी सड़ा करती थीं। वह अपने पैसों से उन्हें खरीदा करती थी और गोदाम के अंधेरे कोनों में जमा करती जाती थी। वह उन्हें एक-एक करके अपने बैग में रखने लगी। फिर उसके हाथ ठिठक गये; उसे लगा, वह आदमी को देख सकती है। वह अकेला अपने कमरे में बैठा होगा। सर्दी का धुंधला दिन, टाइपराइटर और खाली, पन्ने, जिन्हें वह जाने से पहले ज्यों-का-त्यों मेज़ पर छोड़ गया था। कोरे वह उकडूं बैठा था। वह आग जला रहा था। वह अखबार के कागजों के अंगीठी में झोंक रहा था, जिसका धुंआ ऊपर उठता था, चिमनी में जात था, खांसने लगता था, फिर लौटकर पानी बन जाता था। आदमी वार वार अपनी कुहनी से आंखें पोंछने लगता था। लड़की काऊच पर लेटी थी। सिरहाने पर कुशन था, कुशन के नी किताबों का बैग, बैग के ऊपर टिफिनदान, जिसके भीतर से सलामी खट्टे दही की गन्ध आ रही थी। उसकी आंखें खुली थीं; सिर मुड़ा - 104 कन्वे और काला पानी वह आदमी को पीठ देख रही थी जहां उसकी कमीज पेष्ट से बाहर निकल थायी थी, नीचे झूल रही थी। आदमी ने सिर मोडा तो आग की लपटें भी उठने सगी; धुएं के पीछे: लड़की का चेहरा दिखायी दिया; हवहवाती आखो मे आग और लड़की एक- दूसरे की बांहों मे तैर रहे थे। यह उठ खड़ा हुया। वह काऊच के सिरे पर: आकर बैठ गया, जहां लड़की का सिर कुरान पर टिका था और पवि नीचे लटक रहे थे। और तब उसे ध्यान आया कि लड़की के पांव बहुत ठण्डे रहते थे, नॉयलन जुराबो के बीच सिकुडे हुए, लड़की इतनी स्थिर पी कि परों का हिलना उमे धोखा-सा जान पडा; "ठण्ड तो नहीं लग रही?" उसने कहा। सहकी के पैर हवा में ठिठक गये, 'नहीं' उमने सिर हिलाया। "वस में बहुत ठण्ड यो," उसने कहा, "सड़को पर पानी जम गया . "कब पहुंचे?" लड़की ने पूछा। "दुपहर को; तभी तुम्हें फोन किया था।" "क्या बीमारी थी?" लडकी ने पूछा। "घास कुछ नही," आदमी ने कहा। "कुछ भी नही?' "वह मुझे देखना चाहती थी।" आदमी ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा मानो खाल की सलवटों को सीधा कर रहा हो। "तीन दिन तक?" लड़की ने कहा। "वया?" "वह तीन दिनों तक तुम्हे देखती रही?" आदमी ने सिर उठाया, हैरत मे लड़की को देखा। उसका चेहरा आग की गुप्फ गरमाई में तप रहा था। वह अजीर आँखों से उसे निहार रही पी-जैसे कुछ पूछ रही हो। मादमी ने उसका हाप अपने हाप मे सरका लिया, महलाने लगा; सफेद कुंआरा हाथ, जिसने अभी तक केवल मेकेण्ड- हैण्ड किताबो को छा था, लेकिन उनके भीतर के भरभरे पलों को नहीं पड़ा था, जिनमें लोग विवाह करते हैं, rm anam मे जाने से "क्या तुम हो जाते हैं, अकेले कमरों में मर जाते हैं। आदमी के भीतर एक अन्धा-सा वासना उठी, जिसका उस समय लड़की की देह से कोई रिश्ता नहीं था उसने उसे अपने पास घसीट लिया, उसकी देह को अपने चालीस सालों के भीतर दबोच लेने के लिए और वह खिंच भी आयी-विल्कुल एक कबूतर की तरह उसके सीने से सट गमी। "क्या तुम उसके साथ सोये थे?" लड़की की आवाज इतनी धीमी थी कि आदमी को भ्रम हुआ कि जो उसने सुना है, क्या वह भी भ्रम है ! "तुमने कुछ कहा?" उसके साथ..." आदमी ने सिर उठाया; धीरे से उसके सिर को अपने सीने से अलग कर दिया। लड़की ने ऊपर देखा, जहां मादमी का चेहरा था, थकान, नींद और बीती हुई उन से लदा हुआ और तव उसे हैरानी हुई कि वह उससे प्यार करती है। वह जो कुछ कहेगा उसका कोई मतलब नहीं था। अंगीठी के कोयले अब खिलखिला रहे थे। कुछ देर बाद लड़की काऊच से उठी और कुर्सी पर बैठ गयी। टाइप- राइटर में फंसे कारे पन्ने को देखा और फिर आंखें खिड़की से बाहर ठहर गयीं। पार्क अंधेरे में ड्वा था और तालाव की जगह सिर्फ एक सफेद शीट दिखायी दे रही थी; सड़क की बत्तियां एक लम्बी झालर-सी शहर के आर- पार लटक रही थीं। उसने कुर्सी मेज के पास सरका ली और टाइप करने लगी, जिसे आदमी ने अनुवाद किया था। टाइप करते उसे अजीब-सा सकून मिलता था, जैसे वह दो भाषाओं के बीच फैले जंगल में अकेलो, निलिप्त और सब खतरों से मुक्त घूम रही है--जवकि पीछे काऊच पर लेटा आदमी उसे देख रहा था। वह उसके झुके सिर को देख रहा था-जिस पर भूरे बालों का जूड़ा शिथिल-सा होकर गर्दन पर लुढ़क आया था। वह उसके अनुवाद को पढ़ती, तो होंठ हिलने लगते, फिर उन्हीं फड़फड़ाते शब्दों को जल्दी-जल्दी कागज पर टीपने लगती। वह उसकी पत्नी को भूल गयी थी। वह अब उससे अलग गयी थी। सिर्फ कभी-कभी सिर उठाकर किसी शब्द का मतलब पूछ 106/कन्वे और काला पानी ।
- - लेती थी। और वह मोचने लगता। पिछनी रात वह पत्नी के माय था और अव यहाँ; कल दुपहर के समय वह किताबों की दुकान में आयेगा, लड़की में झूठ बोलेगा, फ्ली के पास जाकर लौट आमेगा-इमी तरह दिन बीतेंगे। इसका कोई मत नव है ? आदमी ने हाथ आगे बढाया-धीरे मे लड़की की पीठ को छुआ-- और वह चौंक गयो, पीछे मुडकर आदमी को देखा, पीले चेहरे पर दुवली. मी मुस्कराहट चली आयी। "कुछ चाहिए ?" "अब रहने दो, बाको फल कर लेना।" आदमी ने कहा। "बम थोड़ा-मा वचा है, तुम मो क्यों नहीं जाते ?" क्या इतनी उम्र में लडकियो मां बन जाती हैं, पत्नी होने से पहले ? उमने में मंद ली। पराकों के भीतर अंधेरे पर टाइपराइटर सिर्फ एक शब्द गोद रहा था, नीद, नीर, नीद और नींद कही न थी। बहुत गयो रात तक लडकी टाइप करती रही; वह धीरे-धीरे चेप्टर के अन्तिम अंश तक पहुंच गयी थी। कहानी के काले जंगल में जब कभी वह बीन में अटक जाती तो कभी आदमी, कमी शब्दकोश उसका हाथ पकड़कर अधेरी खाई पार करवा देते और वह अर्य की खुली रोशनी मे मा जाती, दुवारा चलने लगती । इस तरह रेंगते हुए जब वह अन्तिम पंक्ति पर पहुंची तो कुछ देर तक फुलस्टॉप को काली विन्दी पर टिकी रही, कागज के बाकी हिस्से को देखती रही जो बाली पड़ा था, उन तीन दिनों की तरह खाली, जब वह अपनी पत्नी के माय था और वह अकेली शहर की सड़कों पर पूनती पी और तव उमे अजीव लगा कि खालीपन का मतलब न वह आदमी से पूछ सकती है, न शन्दकोश उठाकर देख सकती है। उमने पट मे कागज बाहर निकाला, टाइपराइटर को बन्द किया, कुर्मी को पीछे घरेला और बीच कमरे में आकर सही हो गयो। फर्श पर फितावों की पोटली रखी थी और आदमो उमसे देखकर काऊच के सिरहाने लेटा था। अचानक उमे लगा किअगर वह जौना उतरकर नीचे चली जाय तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। फिर ध्यान भटक गया। खिड़की के शीशे पर रात का पतिगा फंस गया 1 अ था, कभी ऊपर जाता था, कभी नीचे, फेम से बार-बार टकराकर एक अजीव वदहवासी में छटपटा रहा था। लड़की ने झपाट से खिड़की खोल दी, पतिंगा ऊपर उठा और एक हल्की-सी जान उसके गालों को छूती हुई वाहर अंधेरे में उड़ गयी। वह कुछ देर तक खुली खिड़की से नीचे देखती रही। अक्तूबर की धुन्ध पर वॉर की नियोग-लाइट एक लाल चिन्दी-सी चमक रही थी। अचानक एक आदमी बाहर निकला और लड़खड़ाते कदमों से सड़क पार करने लगा। वह डोलता हुआ कभी एक तरफ जाता, कभी दूसरी तरफ-शीशे पर पतिगे की तरह डगमगाता हुआ---फिर न जाने क्या सोचकर फ्लैट की दीवार से सटकर खड़ा हो गया, बिल्कुल खिड़की के नीचे, अपने पैण्ट के बटन खोलने लगा। लड़की ने झट से खिड़की बन्द कर दी और वापिस कमरे में लौट आयी। उसने वालों को खोला, क्लिपों को उतारकर मेज पर रख दिया; फिर अपने वैग से वेसलीन की ट्यूब निकाली, अंगुली पर रखकर उसे दवाया और उसे अपने चेहरे पर, कानों से पीछे, वाहों पर मलने लगी। अचानक उसके हाथ ठिठक गये। उसकी पत्नी भी यह करती होगी, उसके पास जाने से पहले ? उसके भीतर कुछ हिला, सारी देह को मरोड़ता हुआ; उसने उसे पहले कभी नहीं देखा था-एक मैली-सी. पीड़ा-जो देह में कीड़े-सी उलट जाती है, उठने को तिलमिलाती है, नीचे धंसती जाती है। एक क्षण के लिए वह आतंकित हो गयी हलक में राख अटकने लगी; वह मुंह पर हथेली दवाकर वाथरुम में भाग आयी, वेसिनी पर दोहरी होकर झुक गयी, देह में जो कुछ उलट गया था, वह एक ही उलटी मे बाहर निकल आया, पानी में एक पीले चकत्ते-सा तैरता हुआ। उल्टी करने के बाद उसने मुंह धोया, आंखों पर पानी छिड़का, चेहरा पोंछने के लिए जब उसने तौलिया उठाया, तो उसकी आँखें वेसिनी के शीशे पर ठिठक गयीं। वहां उसी बूढ़ी का पोपला चेहरा झांक रहा था .-जैसा उसने गिरजे में देखा था; लेकिन अब वह हम नहीं रही थी; कुछ अफसोस के साथ उसे देख रही थी। वह उससे कुछ कहना चाह रही थी; लेकिन अब लड़की कुछ नहीं सुनना चाहती थी, न वीते हुए अपने पाप के बारे में, न आनेवाली जिन्दगी के बारे में "इससे पहले कि बूढ़ी अपना मुंह खोलती, लड़की उसे बाईने में अकेला छोड़कर कमरे में चली आयी। 108/कच्चे और काला पानी - वह लौट आयी। वह काऊच के पास चली आयी, जिस पर आदमी लेटा था। उसने कमरे की बत्ती बुना दी, किन्तु अंधेरा नहीं हुआ। माग की पीली, वुझती हुई रोशनी सब चीजो पर पह रही थी-टाइपराइटर, किताबों का बंग, कुशन पर टिका आदमी का सिर। उमने कपड़े उतारे, अलमारी से कम्बल निकाला. धीरे से उसे आदमी पर डाल दिया और फिर कम्बल का एक सिरा उठाकर खुद भी उसके नीचे लेट गयो। वह इतना निश्चल लेटा था कि कुछ देर तक उमे पता भी न चला कि वह जाग रहा है या सो रहा है। सिर्फ उसको सौस सुनायी दे रही थी- छाती के भीतर घुरपुराती हुई। उसने टटोलते उसे छुआ, खुली हुई कमोज के बीच नगी छाती को, जहाँ कुछ सफेद बाल उग आये थे-और फिर अपना सिर वहाँ टिका दिया। आदमी सिहरने लगा; एक गर्म-मी आहट उसके लहू को खटखटाने लगी; नहीं, नहीं, नहीं, उसके भीतर कोई कह रहा था; लेकिन जब उसने आंखें खोली, तो लड़की का सिर उसके ऊपर था, उसके बाल एक दूसरा अंधेरा थे, कमरे के अंधेरे पर विसरे हुए, वह हिल रही थी और कुछ देर तक आदमी को पता भी न चला कि वह रो रही है-उसकी छाती के वालों के बीच एक गर्म-सी लकीर बह रही थी। "सुनो", आदमी ने बहुत घोरे से कहा, "मैं मरना चाहता हूँ।" "क्या ?" लड़की ने पिर उठाया; उसकी ओर देखा । आदमी कमी. कभी उससे अपनी भाषा में बोलने लगता था, जिसे वह बिल्कुल नहीं समम पाती थी। "तुमने कुछ कहा?" वह धीरे-धीरे उसके सिर को सहलाने लगा वह मां से बच्ची बन गयो पो और आदमी उससे ऐसा सच बोल सकता था, जिसका अनुवाद वह कभी नहीं कर सकेगी।
कव्वे और काला पानी मास्टर साहब पहले व्यक्ति थे, जिनसे मैं उस निर्जन, छोटे, उपेक्षित पहाड़ी कस्बे में मिला था। पहले दिन ही"मैं बस से उतर ही रहा था, तो देखा, सारा शहर पानी में भीग रहा है; भवाली में धूप, रामगढ़ पर वादल और यहां बारिश-हमारी वस ने तीन घण्टों के दौरान तीन अलग-अलग मौसम पार कर लिये थे; और अब वह वाजार के बीच खड़ी थी-अपनी छत से मेरा सामान नीचे फट-फट फेंकती हुई; फटीचर सामान, जो मैं दिल्ली से ढोकर वहां लाया था-बाबू का एक पुराना होल्डॉल और पुराने ज़माने का टीन का ट्रंक, जिस पर पुरानी यात्राओं के लेवेल मुर्दा तिलचट्टों- से चिपके थे। मैं वीच वाजार में खड़ा था-पानी में चका डुब्ब; और मेरा सामान किनारे पर पड़ा था अपनी दरिद्रता में भीगता हुआ; पता नहीं कैसे वारिश में शहर और आदमियों की समूची लुटी-पिटी फटेहाली अपनी थिगलियां खोल वाहर निकल आती हैं। सिर्फ मेरे ब्रीफकेस से लगता था कि मैं वावू-जाति का हूँ और मैंने भी उसे सभ्यता की अन्तिम निशानी की तरह छाती से चिपकाकर रख छोड़ा था लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं इसलिए भी कि उस ब्रीफकेस में वह समूचा प्रयोजन छिपा था, जिसे लेक मैं अपना शहर और घर-गृहस्थी छोड़कर उस अजनबी, पहाड़ी शहर आया था। हिन्दुस्तान के छोटे, कस्बाई शहर वैसे ही त्रासदायी लगते हैं- से वारिश, ठण्ड और अंधेरा; जव वस चलने लगी तो; पागल-सा विच - 110/कव्वे और काला पानी ....'
, आया कि लपककर उममें घुस जाऊँ और कण्डक्टर में प्रार्थना करूं कि मुझे दोबारा भुवाली और हलद्वानी और दिल्ली की तरफ ले जाये "अपनी जिन्दगी की जानी और सुरक्षित रोशनी में, जहां न अजनवी शहर की पारिश पी, न पहाडी ढायो की गन्ध--लेकिन बस रुको नही --न वह मुड़ी, उमे कहीं और आगे जाना था, मैं घडा-खहा उसके पीछे की लाल सुखं रोशनी को देखता रहा जो बारिश की धुन्ध में एक मैले खून के धन्धे-सी दूर तक पीछे सरकती गयी। मैंने आमपाम देखा; सामने एक छोटा-मा बाजार था -मोटर रोड से थोड़ा ऊपर उठा हुआ-जिस पर तीन-चार खोखल दिसायी देते थे- पीली लालटेनों में धुंघमाते हुए। सबसे निचली सोह में, बस-स्टेशन से लगभग चिपटी हुई एक चाय की दुकान थी, जहाँ दो-चार लोग टाट की खपरैल के नीचे बैठे थे, मैंने अब अपने ब्रीफकेम को छाते की तरह सिर पर रख लिया था, किन्तु मेरे टीन के मन्दूक और होल्हॉल की हालत बुरी पी; मड़क के किनारे वारिश में भीगते हुए वे मुझमे भी ज्यादा दयनीय दिखायी दे रहे थे। कुछ देर इस उम्मीद में खड़ा रहा कि चाय की दुकान मे वंठा कोई यादमी जरूर मुझ पर रहम करेगा, लेकिन अब वे शायद मुझे देख भी नहीं सकते थे; बारिश की दीवार ने मुझे जमे अचानक अपनी ओट में वाकी दुनिया से अलग कर दिया था। मेरे माय तीन-चार सवारिया, जो वस से नीचे उतरी थीं, पता नहीं शहर के किम अंधेरे कोटर में गायब हो गयी भी। अचानक मुझे अपने सामने एक छाता दिखायी दिया, वह कुछ देर तक मेरे आगे डोलता रहा, मानो तय न कर पा रहा हो कि मैं कौन हूँ, आदमी या प्रेत? फिर छातं के भीतर मे एक पीला, पहाड़ी चेहरा बाहर आया, "यह आपका सामान है ?" उमने मेरे ट्रंक और होल्डॉल की ओर इशारा . किया। "जी..." मैंने कहा। "और आर?" "मैं?"
" . "कहां जाना है ?" उन्होंने पूछा। "पास में कोई होटल है ?" मैंने लगभग रिरियाते हुए पूछा। "होटल, यहां ?" उन्होंने मुझे कुछ ऐसे देखा, जैसे मैं जीते-जी स्वर्ग की कामना कर रहा हूँ। "कोई भी जगह रहने के लिए," मैंने कहा। इस बार उनके चेहरे पर हल्की-सी उत्सुकता चमक आयी। "कितने दिन के लिए?" उन्होंने पूछा। मैं असमंजस में खड़ा उन्हें देखता रहा; जब घर से चला था, तो दिन- महीनों का कोई हिसाव नहीं जोड़ा था मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही उन्होंने अपना छाता मेरे ऊपर कर दिया। पहले मैं ही भीग रहा था; अब एक छाते के नीचे हम दोनों आधा-आधा भीगने लगे। "एक रेस्ट-हाउस है लेकिन आपको तीन कि. मी. ऊपर चढ़ना पड़ेगा।" "कोई कुली मिल सकता है ?" "इस वक्त ?" उन्होंने बाजार की तरफ देखा, फिर मेरी तरफ-और तव सहसा कुछ सोचकर मेरे सन्दूक को हैण्डिल से पकड़ लिया। "चलिए, मेरे साथ आइए।" मैंने उन्हें रोकना चाहा, किन्तु वे मेरा सन्दूक उठाकर आगे बढ़ ग थे; मेरे पास कोई चारा नहीं था, सिवा इसके कि मैं भी अपना होल्ड उठाकर उनके पीछे-पीछे चल पड़। मुझे कुछ हैरानी हुई कि इतना दुव पतला मादमी एक हाथ में छाता, दूसरे हाथ में ट्रक पकड़कर इतनी से ऊपर चढ़ सकता है। वस-स्टेशन पीछे छूट गया। बाजार की दुकानें बहुत नीचे ढुलक -और हम ऊपर चढ़ते गये; शायद यह कहना ठीक होगा कि वे ऊपर गये और मैं उनके पीछे घिसटता रहा। वारिश की चहबच्चों और में मेरे पैर वार-बार रपट जाते थे। एक बार पीछे मुड़कर उन्हों कुछ कहा, जिसे मैं नहीं सुन सका । मैं सिर्फ अपने दिल की धुकधुक पा रहा था, जो हर कदम पर तेज हो जाती थी। माथे पर वह कितना पसीना था, कितनी बारिश, इसका पता चलाना भी अस 112/कव्वे और काला पानी उम दिन में अपनी यात्रा की थकान और भीतर की वेचनी के बाद- जूद अन्धाधुन्ध कितना कपर चढ गया था, यह सोचकर हैरानी होती है। मैं उम्र में ही ऊपर घढा हूं, पहाड़ पर नहीं; पहाड़ की चढ़ाई तो दूर, पर का जीना चढते ही भीतर की अलार्म घड़ी रिरियाने लगती है। जिन्दगी में पहली बार किसी अनजानी जगह आना हुआ था--- अपनी इच्छा से नहीं ----अपनी इच्छा होती तो देहरी के परे पांव नहीं रखता; कम-मे-कम इस जगह नहीं लेकिन वह जगह मैंने नहीं चनी थी, जिन्होंने चुनी थी, मैं उन्हें ही खोजने इतनी दूर चला आया था." "आइए, भीतर चले आइए," उन्होंने दरवाजा खोलकर मेरी ओर देखा। पहले क्षण कुछ दिखायी नहीं दिया, मैं देहरी पर खड़ा था, बारिश से बचता हुआ; फिर अचानक कोई चीज़ भक से जल उठी-~लालटेन की रोशनी । और तय मुझे पता नला कि वे मुझे किसी होटल या धर्मशाला में नहीं, सीधे अपने घर ले आये । मैं शायद कुछ देर असमजस मे वही घड़ा रहता, यदि बाहर से हवा का थपेड़ा मुझे धकेलकर भीतर न ले आता। कोई चीज है इच्छा? सायद वह आदमी का सबसे बड़ा माया-मोह है। इच्छा जिस लाइन पर चलती है, उससे कितनी दूर स्टिककर हम घिसटते हैं । वह हमें काट जाती है और हम दो में बंट जाते हैं। मेरा एक हिस्सा पर में पीछे छूट गया था; दूसरा उस शहर मे या, पानी और हवा में ठिठुरता हुमा--और शायद तीसरा हिस्सा भी था, जो वैवस-मा खडा हमें असंख्य हिस्सों में बंटता हुआ देखता है। फिर गुम्सा आता है-नपुंसक, बेबस और रुआंसा--जब पता चलता है कि जो हमारे साथ घट रहा है, उस पर हमारी इच्छा का कोई बस नही है, जैसे मास्टर माहब मुझे ऊपर ले आये थे, वैसे ही आंधी का झोका मुझे उनके घर घसीट लाया था""अरे, वैठिए."बाहर क्यो खड़े हैं ?" उन्होंने पलंग की ओर इशारा किया; वे खुद स्टूल पर बैठे थे और अपने चौकट जूतों के तस्मे खोल रहे थे। "मैंने आपसे होटल ले जाने के लिए कहा था," मैंने कुछ खोजकर कहा।
"अरे साहव, इसे होटल ही समझ लीजिए; इस मौसम में कहां जायेंगे?" वे हंसने लगे। एकवारगी इच्छा हुई, अपना सामान वहीं छोड़- कर बाहर निकल जाऊँ। उनकी हंसी, लालटेन में हिलता उनका फटीचर कमरा, कीचड़ में लिथड़ी मेरी देह-इनका कोई मतलव था? हां, क्यों नहीं, किसी ने मेरे भीतर कहा, तुम यहां आये हो, तो तुम्हें अपने पुराने मतलवों की गठरी छोड़नी होगी.. और तब सचमुच मैंने अपने पीछे दरवाजा बन्द कर दिया। अंधेरा, बारिश, हवा सव पीछे छूट गये और मैं मैं भीतर चला आया। पहली नजर में वह किसी आउटहाउस की धुंधुआती कोठरी जान पड़ती थी--बीच हवा में खुली हुई, जहाँ वादल विना रोक-टोक के भीतर आते थे, किन्तु भीतर का धुआँ बाहर जाने में हिचकिचाता था। कमरे से सटा एक गोदाम था, जहां मिट्टी के तेल का स्टोव और कुछ बरतन रखे थे। वहीं शायद उनकी रसोई थी। कोने में पानी से भरी वाल्टी, लोटा और पटरा रखा था, जिससे पता चलता था, कि शायद वे नहाते भी रसोई में हैं-दीवार में एक चौकोर सुराख खुला था--जिसके पीछे एक छज्जा दिखायी देता था; वहाँ तार पर उन्होंने कपड़े सुखाने के लिए टांग रखे थे, जो अब बारिश में भीग भी रहे थे। वे स्टोव जला रहे थे। बार-बार पीछे मुड़कर मेरी तरफ देखते जाते थे, मानो उन्हें डर हो कि उनकी आंख वचाकर कहीं अचानक लोप न हो जाऊँ, लेकिन अब मैं उनके पलँग में धंस गया था, मैं कोई भारी आदमी नहीं हूँ, किन्तु मेरे वैठते ही उनके पलंग की निवाड़ धूल चाटने लगी थी... मैं पलंग पर बैठा हुआ भी फर्श से चिपका हुआ था। वे चाय के दो गिलास लाये और सामने चटाई पर बैठ गये। "आप पहली बार यहाँ आये हैं ?" उन्होंने पूछा। "जी।" "वही तो मैं आपको देखते ही पहचान गया।" "कैसे ?" मैंने आश्चर्य से उन्हें देखा। चाय के गर्म धुएं में उन लम्बा पीला चेहरा पहले कहीं देखा हो, याद नहीं आया। "कोई मुश्किल नहीं; देखते ही पता चल जाता है, कौन यहां का . . - कोन याहर का। आप बस मे उतरकर वारिम मे खड़े हो गये, यहाँ का आदमी होता, तो मीधा अपने घर की तरफ भागता ।" वे हमने लगे। दाँत पीले पड गये थे, लेकिन गन्दे नहीं लगते थे, उनके पोले, मुरझाये चेहरे पर अपनी जगह फिट जान पडते थे । "वमे इस मौसम में यहां बहुत कम टूरिस्ट आते है ।" उन्होंने मेरी ओर छलछलाती उत्सुकता से देखा, जैसे उनकी बात सुनते ही मैं उन्हे इम अजीब मौसम में आने का कारण बताऊँगा, लेकिन मैं चुप रहा, अपने को रोके रहा । एक बार उनके माथ माने में जो गलती की थी, अब दूसरी बार नहीं दोहराना चाहता था "आप कव मे यहाँ हैं ?" मैंने यात बदलते हुए कहा । "पांच साल नही छह माल।" उनने चाय का गिलाम नीचे रख दिया और अंगुलियो पर बीते, पुराने साल जोडने लगे, "जिम माल शास्त्रीजी का तागकन्द में इन्तकाल हुआ, मैं यही या, मुझे याद है, मैंने यह दुरपदायी खवर अस्पताल में सुनी थी।" "आप अस्पताल में थे?" मैंने विनम्र-सी सहानुभूति दिखायी। "जी. वैसे अल्मोड़ा में भी डॉक्टरों की कमी नही, लेकिन यहाँ मेरे चाचा डॉक्टर थे; उन्होने मुझे यही अस्पताल में दाखिल करवा दिया जव ठीक हुआ, तो पता चला कि यहां हाईस्कूल में एक अंग्रेजी टीचर की जरूरत है, वम फिर यही टिक गया," उन्होंने कुछ मुस्कराकर मेरी ओर देखा, "बीमारी ठीक कराने आया था, यह नहीं मोचा था कि वेकारी की समस्या भी हल हो जायेगी।" "आपका घर यही नहीं है ?" मैंने पूछा "आप इसे घर रहेंगे?" उन्होने मरमरी निगाह अपने कमरे में डाली, मानो उसे पहली बार देख रहे हों। उस शिकायतभरी निगाह में कुछ रहा होगा कि रमोई में रसीवाल्टी, टिमटिमाती लालटेन, चौके पर रखा स्टोव-और मंजी में फंसा में सब कुछ एकाएक दयनीय-से हो गये। "आपको मदर्दी लग रही हो, तो आग जलाई?" उन्होंने यहा। "नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।" मैने वहा । मैं सचमुच ठीक पा, अगर ठीकरा मतलब है मन्द पड जाना, इतना मन्द कि थकान भी मिर मारकर - ।
पीछे मुड़ जाये। मुझे सिर्फ वाहर की चीजें दिखलायी दे रही थीं, बारिश में भीगती रात और टिपटिपाता उनका घर, और भीतर कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। मेरी इस रूखी उदासीनता को देखकर वे कुछ विचलित- से हो गये, मानो अपने घर लाकर उन्होंने कोई अपराध कर डाला हो। "यहां एक फॉरेस्ट रेस्टहाउस है, अगर आप चाहें..." उन्होंने मेरी ओर देखा। "वहाँ परमिट की जरूरत पड़ेगी-नहीं?" "हां, यह तो है," उन्होंने कुछ सोचते हुए कहा, "लेकिन एक-दो दिन की बात हो, तो चौकीदार हील-हुज्जत नहीं करता 'आपको कितने दिन रहना है ?" इस बार उनके स्वर में भेद लेने की उत्सुकता नहीं थी, सिर्फ मेरी मदद करने की इच्छा थी, वे एकटक मेरी ओर देख रहे थे। उस क्षण शायद मैं उन्हें सबकुछ बता देता-इतनी दूर आने का कारण, वह भी इन सदियों में मेरे विना वताये भी वे भांप गये थे कि न मैं कोई तीर्थयात्री हूँ, न सैलानी-टूरिस्ट; फिर कौन हूँ मैं ? और तव एक अजीब थकान और हताशा ने मुझे जकड़ लिया; मास्टरजी को यह बताने के लिए, कि मैं वहां क्यों आया हूँ, मुझे अपने सारे परिवार का इतिहास बताना होगा और उसके बाद भी क्या वे मेरे आने का कारण समझ पायेंगे? पता नहीं, उन्होंने माधे धुंधलके में क्या देखा-मेरा चेहरा या अघेड़ उम्र की बदहवासी-कि आगे कुछ नहीं पूछा; मुझे वहीं छोड़कर वे बाहर छज्जे पर चले गये और अपने भीगे कपड़ों को समेटकर रसोई में ले आये, और एक-एक करके उन्हें निचोड़ने लगे। मैंने चन को सांस ली, उनका ध्यान मेरी ओर से हट गया था, मैंने अपना बिस्तर खोलकर फर्श पर ही विछा लिया। लालटेन मेरे सिरहाने के पास तिपाई पर रखी थी; उसकी पीली रोशनी में मैंने ब्रीफकेस के कागज बाहर निकाले.. मैं उन्हें आखिरी बार देख लेना चाहता था-कुछ वैसे. ही, जैसे कोई विद्यार्थी परीक्षा से पहले अपने नोट्स पलटता है और अचा- नक सवकुछ व्यर्थ और अर्थहीन जान पड़ता है--जायदाद के बासी, भुरभुरे . । BIGIोराला पानी कागज जिसे वायू पीछे छोड़ गये और जो इम कोठरी में और भी अधिक विपन्न दिखायी दे रहे थे; उनके बीच बहुत संभालकर तीन पन रखे थे- बड़े भाई और छोटी बहन की लिखावट को अलग-अलग पहचानना मुश्किल नहीं था, किन्तु तीसरा मुद्दा-तुडा कागज? स्टेशन जाने से पहले मो ने सबकी औस बचाकर वह मुझे दिया था और मैंने उसे जल्दी बिना देसे, विना पढ़े अन्य कागजों के बीच फेंक दिया था-मां की चिट्ठी? वह जो होंठ फडफडाते हुए कागज पर अक्षर चौया करती थी, पता नही उन्होंने किस भाषा में अपना सन्देश भेजा था ? मुझे उस समय भी उमे पढ़ने की इच्छा नहीं हुई; लालटेन की टिमटिमाती रोशनी में मृत पिता के कागज उतने ही मृत जान पड रहे थे, जितने जीवित लोगों के पत्र; यदि उन सबको मास्टर माहब के स्टीव मे शोक , तो पल-भर में हमारा मकान, घर और गृहस्थी के लोग, मरे और जीवित रिश्तों का लेखा-जोसा एक सपट मे भस्म हो जायेगा"सिर्फ एक मैं रह जाऊँगा।मैं और वे-वे जिनसे मैं इतनी दूर यहाँ मिलने आया था सहमा मास्टरजी को छाया कागजों पर पड़ी; वे चौके को देहरी पर खड़े थे, हाय गोले ये और कमीज को आस्तीने बाजुओं पर पड़ी थीं। "लगता है, आप कोई मुकदमा लडने आये हैं ।" वे मुस्कुरा रहे थे। मैंने जल्दी-जल्दी सब कागज समेटकर पीफकेस में टुम दिये; सायद वे ठीक कहते हैं. कत पंजी का दिन होगा; दस सात बाद पागल-मी इच्छा हुई कि अभी घर पर उनमे मिलन और कल मुबह की वम में दिल्ली लौट जाऊं किन्तु मास्टरो ने मेरे पागलपन को दोष में हो तोड़ दिया, "चलिए, हाय हाय-मुंह धो लीजिए" पानी पर्म हो गया है।" उस रात में मास्टरजी के कमरे में ही सोया । मैं वरना होलार माय साया था, इसलिए उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई-हालांकि नंग को नहर वे थोडा दिफर गये। वे खुद फर पर सोना चाहते थे और मुझे पनंग देना चाहने पे; मैं उनमें कैसे रहता कि उनकी मंत्री पर दोरते हुए मे गत- भर भूकार का भ्रम होता रहेगा; मुझे डर था कि साने को लेकर एक और भूकम्प पड़ा होगा, मेरी पली ने जो टिफिन बांधकर दिया या दहन वस-यात्रा के लिए नहीं, जीवन-यात्रा के लिए काफी था। मैंने उनसे कहा कि खाना बनाने के बजाय मेरे टिफिन को हल्का कर देना बेहतर होगा, उण्डे मौसम के कारण वह इतना ही ताजा था, एक सुदूर गृहस्थी को चिन्ता में रमा-बसा भोजन, जो बारह घण्टे की चढ़ाई के वावजूद अपना शहरी स्वाद पहाड़ों तक खींच लाया था। मेरे खुले टिफिन को देखकर उनके चेहरे पर एक बीहड़-सी वीरानी उमड़ आयी-पुरी, आचार, सब्जी और पुलाव अलग-अलग कटोरियों में सजे हुए; शायद उन्हें अपनी गलती पर पछतावा भी महसूम हुआ कि मुझ जैसे व्यक्ति पर दया करना कोई बहुत जरूरी नहीं था, किन्तु उन्होंने कहा कुछ नहीं, चुपचाप स्टोप जलाकर खाना गर्म करने में जुट गये। उनकी रसोई जितनी साफ-सुथरी थी, कमरा उतना ही अस्त-व्यस्त था; फर्श पर धुल में अंटी किताबों और पुगनी पत्रिकाओं का ढेर लगा था; कोठरी की छत धुएँ की कानिख से पुती हुई थी। दीवार पर एक रंग-उड़ी अलमारी थी, जिसकी अधखुलो दराजों से कपड़े बाहर झांक रहे थे। कमरे में वैमी ही उजाड़ यतीमी थी, जैसी धर्मशाला के कमरों में होती है। मुझे यह सोचकर कुछ भयावह जान पड़ा कि वे यहाँ दिन-रात, गर्मी-सर्दी में अकेले रहते होंगे; शायद इसी अकेलेपन से बचने के लिए वे मुझे अपने साथ ले आये थे; उन्हें मरे वारे में कुछ नहीं मालूम था, इस बात पर मुझे उतना आश्चर्य नहीं था, जितना इस पर कि एक बार लाने के बाद उन्होंने मुझसे यह भी नहीं पूछा था कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ? तव एक अजीव-मा सन्देह मुझे कोंचने लगा, शायद उन्हें सबकुछ मालूम है। तभी तो वह बसस्टैण्ड पर पानी में भीगते खड़े थे; और मुझे देखते ही मेरे पास लपक आये, लेकिन किसने उन्हें बताया होगा? सिवा उनके, जिनसे मैं मिलने आया था; क्या किसी ने पहले से ही तो मास्टरजी को मेरे आने के बारे में सूचना नहीं दे दी थी ? "लीजिए, जल्दी खा लीजिए, नहीं तो एक मिनट में सब ठण्डा हो जायेगा।" उन्होंने मेरे टिफिन का खाना थाली मै परोसकर सामने रख । दिया। "आप नहीं खायेंगे?" 118/कन्वे और कालापानी - "मैं तो पाने के बाद ही बाहर निकल जाता हूँ। जब तक कुछ देर दहल नहीं लेना, ठीक से नीद नहीं आती थाप माइए।" वे मेरे मामने घटाई पर बैठ गये , अकेले खाते हुए मुझे कुछ अजीब- सी वीरानी ने पकड लिया, पता नहीं, वे इम घडी क्या कर रहे होंगे, पली शायद नीचे मां के पाम होगी और बच्चे अपने कमरो में स्कूल का काम कर रहे होगे • मास्टरजी की जर्जर कोठरी और धुंधुभाती रोशनी मे मुझे अपने घर के लोग किमी दूमरे ग्रह के प्राणी जान पड़ते थे, यह विश्वास करना नमम्भव था कि अभी चारह घण्टे पहले मैं उनके साथ "देखिए पानी रुक गया, कल मुबह तक मय माफ हो जायेगा।" मास्टरजी के स्वर में बच्चों का उल्लास छलक आया। मेरे हाय टिठक गये; टीन की ढलुओ छत मे पानी को घार नीचे गिर रही थी, किन्तु वारिश सचमुच थम गयो, छज्जे के बाहर घुन्ध अब भी थी, लेकिन इतनी हल्की और इकहरी-कि उसके पीछे धुले हुए तारे चमचमा रहे थे। "आपका स्कूल कही पाम मे है ?" मैंने पूछा। "मैं आपको बताना भूल गया। याप दरअसल स्कूल में ही बैठे हैं." वे मुस्कुराने लगे। "यह स्कूल है ?"मैंने विस्मय से चारों ओर देखा। "ओ, यह स्कूल का ही हिस्मा है। मुझे अभी तक मकान नहीं मिला, इसीलिए उन्होंने स्कूल का एक कमरा मुझे दे दिया; वैमे भी छुट्टियों में सारे कमरे साली पड़े रहते हैं." "आप छुट्टियों में कही नहीं जाते ?" "एक-आध दिन के लिए अल्मोड़ा उतर जाता हूं, लेकिन वहां मेरा मन घटता है। वही पुराने लोग आ घेरते हैं, जिनसे मैं बचना चाहता हूँ।" "यहो अकेला नहीं लगता?" वे कुछ देर चुप रहे, फिर कुछ मोचते हुए कहा, "यहाँ अकेला रहता हूँ तो भी वैमी ऊब नही होती जैसी अल्मोड़े म-फिर जब मन करता है, तो बाबा के पास जा बैठता हूँ।"
"वावा पान: उन्होंने मेरी ओर देखा, अपनी टोहती आँखों से, फिर एक छोटी-सा: मुस्कुराहट उनके चेहरे पर फैल गयी, "एक ही तो हैं, और कौन?" इस बार मैं अपने को नहीं रोक पाया, "क्या उन्होंने आपसे कुछ कहा था?" उन्होंने विस्मय से मुझे देखा, "किस बारे में ?" "मेरे यहां आने के..." "क्यों? आप उनसे मिलने आये हैं ?" इस बार उनकी आंखों में विस्मय था। "सुना है, बहुत दूर-दूर से लोग उनके दर्शन करने आते हैं।" मैंने कहा। "हां"लेकिन इस मौसम में ?" वे फैली आंखों से मुझे निहार रहे थे। "मैं यहां छुट्टी पर आया था; सोचा, उनके दर्शन भी कर लूं। क्या बहुत दूर रहते हैं ?" वे कुछ सोचते हुए चुप बैठे रहे, फिर अनमने भाव से बोले, "ज्यादा दूर नहीं"एक-डेढ़ कि. मी. की चढ़ाई होगी।" मुझे लगा, वे मुझसे कुछ नाराज हैं; शायद उन्होंने मुझ पर विश्वास भी नहीं किया; कौन ऐसा पागल है जो सदियों में अपना घर-बार छोड़कर इतनी दूर आता है और वह भी एक अज्ञात पहाड़ी शहर के लोकल महात्मा से मिलने? वे उठ खड़े हुए और मेरे वरतन बटोरने लगे। कुछ देर तक रसोई में लोटे-बाल्टी की खनखनाहट के अलावा कुछ सुनायी नहीं दिया। फिर उस रात उनके बारे में कोई चर्चा नहीं हुई। सोने की तैयारी भी चुपचाप हुई; उन्होंने दोबारा और अन्तिम बार जरूर आग्रह किया कि मैं उनके पलंग पर सो जाऊं, लेकिन मैं पहले से फर्श पर अपना होल्डॉल विछा चुका था और फिर वे भी चुप ही रहे, सिर्फ इतना पूछा कि क्या वे लालटेन जलाकर पढ़ सकते हैं और वे देर तक कोई अंग्रेजी का उपन्यास पढ़ते रहे, जिसके लेखक का नाम मैने कहीं पढ़ा-सुना नहीं था। . 120/कन्वे बोर काला पानी मैं ब्रीफकेम को सिरहाने रसकर लेट गया, लेकिन नींद देर तक नही भायी। इतनी लम्बी जिन्दगी में यह पहला मौका था कि किसी अजनबी के पर मैंने रात काटी हो, और वह सचमुच रात को 'काटना था, जहाँ एक तरफ मैं पा, दूसरी तरफ मेरा पर वार, नौकरी, गृहस्थी, जिसे मैं पहली बार छोडकर अकेला बाहर आया था। मेरी पत्नी को पता चलता कि घर छोड़ते ही मैं पहला पडाव किमी स्कूल-मास्टर की कोठरी में हातूंगा, तो उसे सचमुच हैरानी होती, वह मुझे हमेशा घर-धीन कहती पी और उसे हमेशा यह सदमा सताता था कि इतनी लम्बी विवाहित जिन्दगी में मैं कही उसके साथ यात्रा पर नहीं गया, कामचलाऊ सफर बहुन किये, किन्तु छुट्टी लेकर किमी तीर्थ स्थान मा पहाडी स्टेदान जाना नहीं हुआ। और अब यह जगह ? पहाड, लेकिन हिल स्टेशन नहीं और तीर्थस्थान व नाम पर पशुओं का अस्पताल; एक शिव का मन्दिर, जहां वह रहते थे..' क्यों-अब भी रहते हैं । मुझे अजीब-सा लगा कि दिल्ली की आदत अब भी मेरे साथ चिपकी पी, जहाँ सब लोग उन्हें 'अतीत में याद करते थे। ज्यों ही कोई व्यक्ति ही छोड़कर चला जाता है, हम उसे 'अत्तीत' मे फेंक- कर बदला चुका लेते हैं, बिना यह जाने कि वह अब भी मौजूद है, जीवित है, अपने वर्तमान में जो रहा है, लेकिन हमारे समय से बाहर है। उस रात मुझे देर तक नीद नही आयी। हवा के थपेड़ों मे कोठरी की छत और दीवारें परयराने लगती थी; नीचे मोटर-रोड पर कोई बस या सारी गुजरती, तो उसकी हेडलाइट्स में फंसे पेड़ और झाडियां दीवार पर सरकते हुए निकल जाते । पहियों की पुरपुराहट देर तक पहाड़ियों के बीच गूंजती रहती। कभी किसी वस के गुजरने के बाद मास्टर साहब किताव से सिर उठाकर पड़ी को देखते और लम्बी सांस खीचकर बहते, "मह मुवाली को बस है," या कुछ देर बाद जब दोबारा बस को पों-पों बजती, तो कहते, "यह रामनगर जा रही है ।" मैं बास मदै सोने का बहाना किये पड़ा रहा, फिर न जाने कब यह वहाना किमो नीद के सपने में उलझकर दूर तक घिसटता गया। आधी रात को आंख खुली, तो लालटेन बुझ गमी थी और भास्टर साहब करवट लेकर सो रहे थे; समूची कोठरी में अंधेरा या; एक साग तक मुझे याद नहीं आया कि पास पलंग पर कौन सो रहा है और मैं वहां क्या कर रहा हूँ? सुबह उठा तो धूप का चकत्ता बिस्तर पर बैठा था। ठण्डी, धुली हुई रोशनी कोठरी में फैली थी। मास्टरजी की मंजी खाली पड़ी थी-रसोई में पानी की बाल्टी और लोटा रखे थे। चूल्हे के पास चाय का सामान था; बाहर हवा में थपथपाती खट-खट की आवाज आ रही थी-शायद उसकी मावाज सुनकर ही मैं जाग गया था। घड़ी देखी, तो अचरज हुआ-दस बजे थे; शायद ही कभी मैं इतनी देर तक सोता हूं। जल्दी-जल्दी हाथ-मुंह धोया; थर्मस और गिलास थैले में रखे, ब्रीफकेस को खोलकर चिठ्ठियां बाहर निकालीं, जिनमें पोस्टकार्ड भी था, जो उन्होंने पन्द्रह दिन पहले भेजा था; उन सबको समेटकर कोट की अन्दरूनी जेब में रखा। मास्टरजी को देखने बाहर आया तो आंखें जिस चीज पर पड़ी, वह पहाड़ था। पहली बार ज्ञान हुआ कि यह पहाड़ है। सड़क पर चलता पहाड़ नहीं, जो कल बस की खिड़की से देखा था लेकिन एक जगह ठहरा हुआ, बाजार के ऊपर, शहर को छाँह देता हुआ; कल अंधेरे और बारिश में उसे नहीं देखा था। अब पहली बार विश्वास हुआ कि मैं घर के बाहर हूँ; यह महज यात्रा का स्टेशन नहीं, पूरी जगह है; एक अलग-थलग दुनिया, वह एकान्त जंगल नहीं था, जैसा मैं दिल्ली में सोचा करता था, वह एक पूरी वस्ती थी; जहां बाजार था, वस का स्टेशन, अस्पताल, एक मन्दिर, एक स्कूल" स्कूल मैदान में था, वाजार के ऊपर और नीचे पेड़ों का पीला झुरमुट था। और वहीं टहनियों के बीच अकस्मात दिखायी दिये मास्टरजी.. और तव मुझे उस खट-खट का रहस्य समझ में आया; वह कुल्हाड़ी से पेड़ों की शाखें काटते जाते थे और टहनियां छपाछप करती हुई नीचे गिर जाती थीं. मैं उसी पगडण्डी से नीचे उतरने लगा, जिसके सहारे कल ऊपर चढ़ा था। धीरे-धीरे बाजार की छतें दिखायी देने लगी, सांवले, सलेटी पत्थरों ने ढकी धूप में चमचमाती हुई; लोगों का शोर और दुकानों का धुमा एकसाथ ऊपर उठ रहे थे। बाजार के नाम पर कुछ भिनभिनाते ढाबे थे; वहीं में एक बेंच पर खुली हवा में बैठ गया; धूप सिर्फ माया थी, असली ब्रह्म सर्दी में व्याप रहा था; मैंने एक चाय मांगी, तो दूसरी बैंच पर दो आंखें ऊपर 122/ कव्वे और काला पानी ... - उठी, कैसर-सी लाल और मस्ती में धुत "साहनी, बस एक हो?" नंग-धडग महात्मा मेरी ओर निहार रहे थे। मैने दूसरी चाय मंगवायी, तो वे मुस्कराये, दांतों के बोर लाल मसूहे दाढ की कटी फोक से खुल गये। "कल ही पधारे हो?" अब तक यह दूसरे ढाये की बेंच पर बैठे थे, मेरे 'जी' कहते ही यह अपनी मेज का मोह त्यागकर मेरी वेंच पर आ विराजे, "क्यों, हमारे मास्टर के यहाँ ठहरे हो?" वे अन्तर्यामी जान पड़े, मुझे लगा, उनके सामने 'जी' कहने के अलावा मैं और कुछ नहीं कह सकूँगा। उसके बाद अगर वे यह बताते कि मैं दो बच्चो का बार हूँ और दिल्ली से आया हूं तो भी मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता। किन्तु उसके बाद वे एकदम चुप्पी साध गये; चाय पीने में ऐसे मगन हो गये जैसे सिर्फ उमी को पाने के लिए उन्होंने परिचय वाया था। "आप कहाँ से आ रहे हैं ?" कुछ देर बाद मैंने ही पूछा। चाय के गिलास को बेंच पर रखकर उन्होंने कुहनी से अपनी दादी पोंछी। "यह पूछिए, कहा जा रहा हूँ। यहाँ तो सिर्फ कुछ दिनों के लिए ठहरा हूँ।" उनको सुखं आँखों में एक रूपी-सी तापरवाही झलक आयी। "कहाँ डेरा लगाया है वावा ने ?" उन्होंने अंगुली से कार इशारा किया; पहले मैं 'ऊपर' का मतलर ईश्वर समझा, लेकिन सौभाग्य से उनकी अंगुनी ईश्वर से कुछ नीचे बैठी, बाजार के पीछे पहाड़ी गोमड़ पर, जो धुन्ध और धूप के निलमिले से बाहर निकल रहा था। "शिव के मन्दिर में ?" पहली बार मेरे भीतर एक जिगासु उत्सुकता जागी। "शिव नही, महाकाल का मन्दिर कहिए," उन्होंने हल्को हिकारत से मुझे देखा, "कमी वहाँ नही गये?"
. "मैं पहली बार आया हूं।" "पहली बार?" वे हंस पड़े, "आपको कैसे मालूम, आप पह रहे हैं. पहली बार कुछ नहीं होता...' "मैंने आपको भी पहली बार देखा है।" मैंने कहा। "सचमुच ?" उन्होंने मेरी ओर देखा, "और इसको ?" उन्होंने पाइन की ओर इशारा किया जो सड़क के किनारे नीचे खड्ड से ऊपर उठा था, हव में डोल रहा था। "पेड़ ?" मैंने जिज्ञासा से उन्हें देखा, "इसमें क्या है ?" "और मैं ?" उन्होंने लंगोट से बीड़ी निकाली और भट्ठी के सुल हुए कोयले पर उसे लगा दिया, "मुझमें क्या है ?" वीड़ी सुलग रही थी और धुएं की तीखी लट ऊपर उठ रही थी। मैंने उसकी नंगी देह को देखा, एक-एक हड्डी सर्दी की सफेद धूप में चमक रही थी, ठिठुरती, कृशकाय देह नहीं, बल्कि ऐसा पिंजर जो देह को अपनी ठठरी-गठरी में गरमाये रखता है"नहीं, मैंने उन्हें पहले नहीं देख. था, लेकिन उन्हें देखते हुए मुझे अचानक अपने पिता की अस्थियां याद हो आयीं, जिन्हें गठरी में बांधकर मैं दिल्ली से कनखल ले गया था-जैसे अगर रेल की खड़खड़ाहट में उनकी अस्थियां जुड़ जातीं, तो वे सामनेवाली देह की तरह एक बार फिर उठकर खड़ी होती और तब मुझे लगा, चेहर पहले न भी देखा हो, किसी का होना उसकी याद दिला सकता है, जो पहले कभी जीवित था और अब नहीं है। "घूमने आये हो?" उनकी तरेरती आंखें मुझ पर टिकी थीं। मुझे देखकर वे कुछ आगे सरक आये, "वावा के दर्शन करने आये हो-क्यों: कहा?" "जी?" मैंने उनकी ओर देखा। "रास्ता मालूम है ?" उन्होंने पूछा। इस बार उनके स्वर में न थी, न चिड़चिड़ाहट, सिर्फ एक मुलायम-सी नम्रता थी। "मन्दिर के रास्ते पर है," उन्होंने कहा, "सीढ़ियां छोड़कर पकड़ लेना; सीधी वहीं जाती है।" "इस समय दर्शन देंगे?" मैंने पूछा । 124/कव्वे और काला पानी "देख माओ, अगर बाहर बैठे हुए तो दर्शन होंगे ही लेकिन भीतर हुए तो रहने देना "आजकल पोड़ा बीमार चलते हैं।" "बीमारी कसी?" मेरे स्वर मे कुछ रहा होगा कि वे झुंझला उठे । अघवुझी वीढ़ी को फेंक दिया, "वीमारी वया, अन्दर की अवस्था है, बनती-बिगड़ती रहती है।" उनके स्वर में कुछ ऐसा नहीं था, जो मुझे चिन्तित करता; किन्तु पोड़ी-सी हैरानी जरूर हुई; अपनी चिट्ठी में उन्होने बीमारी के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा था: क्या उन्हें हर था कि मैं अपने साप मां को पसीट लाऊंगा; मुझे उनके डर पर हंसी आने सगी. वे जो घर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकती, बम मे घरके पाते हुए 2100 मी. की ऊंचाई पर आयेंगी? उसके बाद मैंने उनसे कुछ नहीं पूछा। वेंच से उठ खड़ा हुआ; अघोर बावा ने कुछ माश्चर्य से मुझे देखा, "क्या अभी जा रहे हो?" "जी. "ऊपर पहुंचने में कितनी देर लगेगी ?" "पुरी उम्र!" वे हंसने लगे, "लेकिन तुम भटके नही तो आधे घण्टे में पहुंच जाओगे !" मैंने दुकान से अपने यमंस में पानी भरवाया। जब चाय के पैसे देने के लिए बटुआ निकाला तो सहमा उनकी आवाज सुनायी दी, "तीन गिलासो के; मैं एक और लूंगा।" मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देता, पैसे दिये और ऊपर चढ़ने लगा। चदाई खड़ी हपेली की तरह उठी थी; चारों तरफ जगत रे, तेम गड़क पर एक पेड़ नही जो छाया दे सके। पहाड़ी पसीना परलानोकोप देह पर बह सकता है, ऐसा कभी सोचा भी न था। मुझे अाने म हर पा और दिल की धुकधुकी अलग से छाती को खटखटा रे' वागार बहुत नीचे छूट गया था, लेकिन उसकी जा हॉर्न अब भी एकः उनीदी गुनगुनाहट की तरह सुनार बाद वे आवाजें भी गुम हो गया और मनररर न जानवर, न हवा, न पता गो सरह चलता जाऊँ तो न मैं खाम हो कोई नहीं है- - । तरह ऊपर चढ़ता रहूंगा पसीने में नहाया हुआ, न कुछ देखता हुआ, न सोचता हुआ लेकिन तभी पांव ठिठक गये, जैसे मुझसे कह रहे हों, अगर तुम निढाल हो तो हमें कोई परवाह नहीं। आगे एक तिराहा था, उठी हुई हथेली पर तीन अंगुलियों की तरह खुला हुमा; दायीं पगडण्डी पर काला चोर्ड दिखायी दिया, जिस पर सफेद खंडिया से एक तीर वना था और तीर की नोक से विधे चार अक्षर मेरी तरफ ताक रहे थे--टू द फॉरेस्ट रेस्ट हाउस। और तव मुझे अघोरी बाबा की अंगुली याद आयी-ईश्वर की तरफ उठी हुई, जहां महाकाल का मन्दिर था; अगर नीचे की पगडण्डी फॉरेस्ट हाउस की तरफ जाती है, तो बीच की सड़क जरूर मन्दिर की ओर चढ़ती होगी "मैंने वही बीच का रास्ता पकड़ लिया। वह रास्ता भी नहीं था, सिर्फ एक उठान थी। शायद बहुत पहले वहां सीढ़ियां रही होंगी, लेकिन अब वहां सिर्फ पत्थर थे, काई और घास में लिथड़े हुए, उन पर पांव रखते ही जूते फिसलने लगते । हर पत्थर पर सांस अटकने लगती, एक रस्सी की तरह मेरे पैरों को ऊपर खींचती और जब मैं दूसरा कदम उठाता तो लगता जैसे मैं अपने पीछे सारी उम्र का बोझ घसीट रहा हूं। लेकिन वह बोझ उसके सामने कुछ भी नहीं था, जो मैं लादकर अपने साथ लाया था-घर के कागज और घरवालों के सन्देशे। उन्हें ढोता हुआ मैं खुद अपनी यात्रा का लदा-फदा सन्देशा जान पड़ता था; मुझे तब एक अजीव-सा खयाल आया; अगर उन तक सन्देश पहुंचाना है तो मेरा जाना क्यों जरूरी है ? मैं यदि सारे कागज- पत्तर, चिट्ठी-सन्देशे मास्टर साहब को सौंपकर शाम की वस से लौट जाऊं, तो कोई भी अन्तर नहीं पड़ेगा। वे उन्हें सुरक्षित उनके पास पहुंचा देंगे- फिर वे जैसा चाहें, करें। लेकिन इतने पास पहुंचकर ऐसे ही रूखे-सूखे लौट जाना? वे दस साल से यहां रह रहे हैं और मैं पहले ही दिन इतना हताश हो गया? वे भी तो पहले दिन ऐसे ही ऊपर चढ़े होंगे; लेकिन उनकी उम्र तव काफी कम रही होगी; मुझे अब भी उनकी फोटो याद है, जो पिताजी ने(तव वे जीवित थे) अखबारों में दिया था-एक हँसता हुआ चेहरा, जिसे अंग्रेजी में चियरफुल कहा जाता है और फोटो के नीचे वाबू के हाथ का लिखा टेक्स्ट--'प्लीज कम...' लेकिन न वे आये, न अपना पता भेजा और । am- । - 126/कव्वे और कालापानी तव स्टेशन और बसवालों के चक्कर शुरू हुए पुलिस के साप माचुअरी बाते मुझे रोकतार में उन्हें पहचानने की कोशिश करते, जो एक दिन महता पहचान के परेचने प... बचान, बीच राजे में मैं ठिठक गया। क्या अर मैं उन्हें पहचान मरमा? मिरका पसीना माये पर बहता हुया बागों पर चिर-चिर चूने लगा, या में पानी का पर्दा पा, बिमके पौधे सारा जंगल हिलमिला रहा था। मापिर वह मन्दिर दिसायो दिया-सफेद और शीतल-और उसकी शीतनता मेरो पकान को सोचने लगी। हवा मे पसीना सूखने मगा--- वहीं, सीढियों पर बैठ गया। आसपास बिलकुस सन्नाटापा-न कोई भक्त, न पुजारी, न कोई माधु-संन्यासी-सिर्फ मन्दिर की बगल में बाज के गेलवे बाजू पर एक लंगूर बैठा पा, अपनी मीटर-भर सम्बी पूंछ को हिलाता हुआ, उसने एक क्षण मेरी ओर पूरा और फिर हाक से मन्दिर की कार कूद गया। एक छपाक् और, पेड़ को शरतार मोर कुछ भी नहीं, जगन की अथाह नीरवता में जैसे मैं और वह संगूर एकसाए उस महासाग के दारणाी हों; कभी-कमी जानवर देवताओं की तरह भगाना हमारी दुनिस में प्रकट होकर हमारी सब दुविधामो को देते हैं. जाती जैसे अपनी पूंछ से मेरे गय संगयों को बुहार दिया --मोरगा मागे , तो सहमा मेरे पर हल्के हो गये थे। उसके बाद ज्यादा नहीं पसना पड़ा; माई गमतीमधीसा भार पेडों के बीच एक साफ-सुपरी, समराल पाण्डीपनगी गीता चीडों का हरा ममन्दर सहरसता मा-र-बार गुणगीने गिजीनी, मोर एक पुश्क, नशीली गन्ध र उनीगी। मधोरीमामा निकली; सौ मीटर धनने के बाद में एक मी, मान tatal जो घने जंगल में अचानक गल जाती है, जानी जहाँ मिर्फ मास योर परपर ये; में कुछ मागे माही Iftatin. एक चट्टान दियायी दी"किल्लुदूगर क्षण ही माना Antil मेरे पाव अपने-आप टिटक गये। माने 111121 ह चट्टान नहीं, एक पथरीला ठठर था, क गुफा की तरह, जिसका ऊपरी खण्ड पहाड़ी से चिपका था ला हिस्सा धरती में फंसा था; बीच में तीन पत्थर एक-दूसरे के ऊपर थे, ऊपर काठ का दरवाजा था। एक चित्र-पहेली की तरह पहली नजर: लो चट्टान जान पड़ी थी-अव वह एक कोठरी दिखायी दे रही थी; काठ, ट्टी और पत्थर की इमारत, जिसे देखकर पता नहीं चलता था कि उसका नि-सा हिस्सा आदमी ने बनाया है और कितना सिर्फ प्रकृति का अंग है: या यह सम्भव है कि वहां कोई रहता होगा? मैं पास आया; सफेद पत्थरों की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ दरवाजे के आगे ठहर गया; लकड़ी के दो पल्लों पर खुली सांकल लटक रही थी, भीतर कोई आहट, कोई हलचल नहीं थी; दरवाजे के भीतर संकरे सुराख से मैंने भीतर झांका-पहले क्षण कुछ भी दिखायी नहीं दिया; अंधेरे पर सिर्फ एक सफेद झाई-सी गिर रही थी; वह कहीं बाहर से आ रही थी लेकिन : भीतर कोई खिड़की दिखायी नहीं दी और तब मुझे पता चला कि जिस से मैं झांक रहा हूँ, वहीं से रोशनी भी आ रही है-धूप का मैला धन्वा--जिसे सूरज वहां फेंक गया था और फिर उठाना भूल गया था. वे शायद सो रहे थे;या सिर्फ बीमार थे और कहीं नीचे लेटे थे; सम्भव है, उन्हें मेरी चिट्ठी भी न मिली हो; उन्हें शायद यह भी नहीं मालूम कि में यहां हूँ। वे शायद कल शाम से मेरी प्रतीक्षा कर रहे हों और अब सोच लिया हो कि किसी कारण मेरा आना टल गया''यह सोचना था कि मेरा हाथ सांकल पर चला गया-गर्म काठ के दरवाजे पर सांकल हिल रही थी, मेरे अनजाने छूने से या भीतर दरवाजे के खुलने से, यह सोचना भी व्यर्थ था, क्योंकि दूसरे क्षण ही फटाक् से दरवाजा खुल गया-वे खड़े थे मुझ बहुत ऊपर और मैं एक सीढ़ी नीचे उतर आया, जैसे आखिरी क्षण मैं उन बचना चाहता था, लेकिन यह भी सम्भव है कि डर की जगह केवल उत्सुक थी, जो मुझे एक सीढ़ी नीचे घसीट लायी थी, ताकि मैं उन्हें पूरा देख जैसे कुछ पीछे हटकर दीवार पर टंगी तसवीर को पूरा-का-पूरा देव चाहता हूँ। लेकिन इस वीच उन्होंने मेरे हाथ को पकड़ लिया और लगा, वे मुझे ऊपर खींच रहे हों, जबकि मैं नीचे जा रहा था औ सुराख 128/ कव्वे और काला पानी खींचतान में मेरा ग्रीफकेस हाय से छूट गया, सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ ठक से नीचे आ गिरा, और गिरते ही उमने एक हिचकी में अपने भीतर के बोल को बाहर उगल दिया। कागज, चिटिठयां, मकान के दस्तावेज--- सब एक- एक करके बाहर निकल याये और हवा में उड़ने लगे। दाम में बौखलापा अपने को कोसता हुआ मैं मोदी पर ही बैठ गया और जल्दी-जल्दी उन्हें बीनने लगा। वे भी मेरे साय नीचे बैठ गये थे और कागजों को चुन-चुनकर मुझे दे रहे थे और मैं जल्दी-जल्दी उन्हें प्रोफकेस मै ठूस रहा था, बिना कुछ देवे, मैली-सी बदहवासी में, जबकि उन्होंने अपना हाथ मेरे उठे हुए घुटने पर रख दिया, जो पता नहीं कब से कांप रहा था। सहसा मैंने देखा, उनका चेहरा नहीं, मिर्फ उनके हाथ, दस वर्ष बाद पहली बार उनके हाय दिसायी दिये। कितनी देर हम ऐसे बैठे रहे ' धीरे-धीरे सिर उठाया, तो वे दिपायो दिये ! वही चेहरा - मुझे निहारती आंखें --मैं यह भी भूल गया कि उन्हें दाढ़ी में पहले कभी नहीं देखा था, मफेद-काली छिनरी हुई लटो में वे संन्यासी और भाई के बीच कोई पहचाने-मे अजनवी जान पड़ते थे। लेकिन घटने पर रखा उनका हाय ? उममे बीता हुया घर था, और ममूचा जमा हुआ अतीत-जो जरा-गा छूने पर बूंद-बूंद बहने लगता है। वे थोड़ा-सा नीचे झुके, मोदी पर रखे ग्रीफकेम को उठा लिया; "आयो, भीतर बैठेगे !" मैं उनके पीछे कोठरी के भीतर चना आया। "बैठो," उन्होंने धीरे मे मेरे कन्धे को छुआ। मैंने यममंजम में उन्हें देखा। "इधर," उन्होंने दरी की ओर इशारा किया और स्वयं दीवार के सहारे बैठ गये । कुछ मिनिट इमी तरह बीत गये; वे मेरे सामने ये; मैं उनकी कुटिया में था, इन सबके रहने भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरी यात्रा का अन्त आ पहुंचा है। "आपको मेरा का मिल गया था?" "हो, लेकिन तुम्हें तो कल आना था।" कले और काला पानी / 129.
। कुछ भीतर. "मैं कल ही आया था-वस तीन घण्टे लेट थी।" "कहां ठहरे हो?" "मास्टरजी के यहां; वे ही मुझे अपने साथ घर ले आये।" इच्छा हुई, उनसे पूछू, क्या उन्होंने ही मास्टरजी को बस-स्टेशन पर सजा था; लेकिन उनके नीरव, नियंक्त चेहरे को देखकर चुप रह गया। उनके आसपास एक घेरा था; मैं उतना ही पास आ सकता था, जितना वे आने देते थे-कुछ देर पहले देहरी पर उनकी छुअन से जो पिघला था, वह सिर्फ एक सतह थी-नीचे की सारी परतें सूखी पड़ी थीं। शायद इस सूखे से बचने के लिए ही उन्होंने मौन तोड़ा। "यहां आने में कोई मुश्किल तो नहीं पड़ी?" "नहीं"सीधा चला आया; वाजार में चाय पीने वंठा, तो एक वावा मिल गये "उन्होंने सबकुछ बता दिया।" "सवकुछ ?" उनके चेहरे पर हल्की-सी जिज्ञासा चमक आयी, "यौर क्या कहते थे?" "कुछ और नहीं..." मैंने एक क्षण उनकी ओर देखा, "क्या आप इन दिनों कुछ बीमार रहते हैं ?" "उन्होंने बताया होगा? कुछ खास नहीं "वही पुरानी सांस की तकलीफ है; इन दिनों कुछ ज्यादा बढ़ जाती है।" उन्होंने कुछ ऐसे कहा, जसे बीमारी का क.प्ट कुछ भी हो, उसके बारे में बताना ज्यादा कष्टमय हो। "इतनी ऊंचाई पर रहने के कारण तो नहीं है ?" उन्होंने सिर हिलाया, "तुम्हें याद होगा, जब घर में था, तव भी बरावर रहती थी।" घर का नाम पहली बार आया था। हमारे बीच आकर चुपचाप बैठ गया था। कुछ देर उनकी आंखें मिची रहीं;वाहर एक तिनका भी गिरता तो उसकी नाहट भीतर सुनायी दे जाती थी। "सव वहां ठीक है ?" एक रूखी सांस में उनका स्वर निकला; घर न छूता हुआ, फिर भी आसपास मंडराता हुआ "जी, हां," मैंने कहा। 130/कव्वे और काला पानी "अब तो नीचे की मंजिल खाली होगी?" "क्यों, माली कमे?"मैं तुरन्त उनका मतलब नही ममम सका; "भाँ रहती हैं।" वे कुछ देर हैरत मे मुझे देखते रहे। "अकेले ही?" उन्होंने कहा। "वे ऊपर तुम्हारे पास नहीं रहती?" "जी नहीं.."वे नीचे ही रहती हैं ?" वे मेरी तरफ इस तरह देखने लगे, बैसे पिछले दस साल में जो गुजरा- बदला है, ये उसे नही जानते "हालांकि मैंने चिट्ठी में उन्हें मवकुछ लिस दिया था। किन्तु उन्होंने अपनी आँखों से कुछ नहीं देखा था; बोर में जो सबकुछ जानता था, पहली बार उनकी नजरो से अपने घर को देखने लगा और तब मुझे उनका आश्वयं समझ में आने लगा--जिस औरत के तीन लहफे हों, वह मकान के अलग, अकेले कोने में पड़ी रहे, एक अजनवी के 'लिए इससे ज्यादा आश्चर्य की बात क्या हो सकती है? वाहर पेड़ों के बीच झनझनाहट हुई; कोई छत पर कूदा और खटाखट दौड़ता चला गया फर्श पर मिट्टी झरने लगी। वे उठ खडे हुए और दरवाजे के बाहर चले गये। कुछ देर में उनकी आवाज सुनायी दी- एक वार, दो बार-पहाड़ी गन्नाटे मे वह ऊपर उठती थी और फिर अपनी ही गूंज को सहलाती-सी गुम हो जाती थी। वे भीतर आये तो मैंने पूछा, "कोन या?" "लंगूर", वे मुस्कुरा रहे थे, "मन्दिर मे उतरकर यहां धूप मेंकने आते हैं"तुम अभी मन्दिर तो नहीं गये ?" "नहीं सुना है, बहुत पुराना है ?" "मन्दिर तो बहुत पुराना नहीं है किन्तु उसमे रखी शिव की मूर्ति को काफी पुराना माना जाता है। वह यही पहाड़ी पर जमीन में फंसी हुई मिली थी। अब तुम यहाँ हो तो, किसी दिन देसने चलेंगे। पाप पियोगे?" "आप बनायेगे?" "और कोन?"वे हंसने लगे, "अभी बन जाती है।" वे पर्दा उठाक नीचे चल गये; नीचे शायद एक दूसरी कोठरी थी, जिम मैंने सिर्फ बाहर कन्वे मोर कालापानी/13 - देखा था; वाहर से जो चट्टान दिखायी देती थी, उसे ही दो हिस्सों में कार दिया गया था; ऊपर की कोठरी में शायद उनके मेहमान बैठते होंगे, वह सिर्फ दो चटाइयां, एक दरी और एक आसन के अलावा कुछ भी नहीं था कोठरी आधी से ज्यादा नंगी दिखायी देती थी; चौकी के पास ही एक सुराह और पीतल के दो गिलास रखे थे-साफ-सुथरे, धुले हुए; खिड़की के नाम पर दीवार में एक खोखल था~जिसके बाहर पेड़ की कुछ शाखाएं दिखार्य देती थीं."उसके परे पहाड़ी का एक भूरा खण्ड और आकाश दिखायी देत ----और कुछ भी नहीं। सिर्फ सन्नाटा सुनायी देता था-और कभी-कर्भ हवा की सरसराहट; एक अजीव विचार आया कि वे बारह महीने इस अकेली कोठरी में रहते होंगे, दिन, रात, सर्दी, गर्मी-विल्कुल अकेले। लेकिन वह महज विचार था, उसकी नंगी वास्तविकता नहीं, जब हम किसी मृत व्यक्ति को देखते हैं, तो मृत्यु के बारे में सोचते हैं, या व्यक्ति के, किन्तु स्वयं मृत व्यक्ति की वास्तविकता के बारे में एकसाथ नहीं सोच पाते. किन्तु मृत्यु क्यों? वे जीवित थे मैं उनकी कोठरी में बैठा था, हालांकि मुझे अब तक भरोसा नहीं हो पाया था कि क्या ये वही आदमी थे, जिनसे मिलने में आया था? पर्दा हिला और वे भीतर आये। उनके हाथ में तांबे की थाली थी, जिस पर चाय के दो गिलास थे । एक तश्तरी में कुछ नमकीन शकरपारे रखे थे। "इस तरफ बैठ जाओ; दरवाजे से हवा आती होगी।" उन्होंने थाली चौकी पर रख दी। मैं चाय का गिलास लेकर दीवार से सटकर बैठ गया। कुछ देर तक हम दोनों ही चुप रहे; बीच-बीच में दरवाजा हुड़क उठता था। कुछ ऐसा लगता था, जैसे हम दोनों दुनिया के अन्तिम छोर पर बैठे थे----जहाँ हवा और पेड़ों की सरसराहट के अलावा कुछ भी सुनायी नहीं देता था। "चाय ठीक है ? यहां लकड़ियों की वान आती है।" उन्होंने मेरी ओर देखा। "आरके पास स्टोव नहीं है ?" मैंने पूछा। "तेल की झंझट पड़ती है। यहां आसानी से नहीं मिलता। सुबह टहलने 132/कव्वे और काला पानी
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निकलता हूँ तो पहिलो गामा मत है।
शकरपारे सो, तुम्हें तो गममीग मागता है।"
मैं साने सगा; इतोको पारी MRIME
रह गयी थी, हालांकि जय ये पर मै , तो पाणी arthIRHIT
में पता पसता हो । निपली निगमगा गrh hona
ऊपर आते थे। कभी-कभी मेरे मी पापा that HD,
तभी उगसे हरायोस सेते । ममी , I amh an in
घर के बारे में गुजरी एसी महो प्राठा गा'. ftir In Marath
था। दस साल की हिन्दी कहाँ । पूर्ण कर jaint
हमारे बीच जो रामम था, यही टीका मन बी ERRIANRAIL
हो चली थी और कोटरी आगगहा गाया माने
यही छाया हम दोनों के
मामा मामी
यौटती हुई-एक, नहीं ये गान, मान, MIL
पाम की संकरी,म्मान गंानी ,i.thphir Intuitml
पृछ देर तक हम दोरहर की गुण, Swastiman।
"बच्चे अंग है ?" श्रागिरीमा माना।
"टीक," मैंने पहा, माया, 18,1941
मा रहे.ती ने कहा, "मुली vिi"
"और छोटी?"
"वह काम: RAI".
"टमा Matrimindiyan
"टशिम: ४..."
"प्रार"Encirrrrrrrrr,
दिपाय htration
गरम Hiri Firiture
गhिt
बच्चों की वात वीच में छूट गयी; वे उठ खड़े हुए. और जूठे वतन समेटने लगे। "तुम बैठो, मैं अभी आता हूँ।" वे पर्दा उठाकर नीचेवाली कोठरी में चले गये। मैं कोठरी की मटियाली रोशनी में बैठा रहा। वाहर अब भी उजाला था। खुले दरवाजे से सब खुला दिखायी देता था "पहाड़ का निचला हिस्सा अंधेरे में डूवा था, लेकिन ऊपर पीठ पर अव भी धूप रेंग रही थी। कोठरी के नीचे कौओं की काली कतार नीचे उतर रही थी-अपनी कर्कश-चीखों मे समूचे वायुमण्डल को थरथराती हुई। वे निचली कोठरी से ऊपर आये, तो हाथ में लालटेन थी। उसे चौकी पर रखकर उन्होंने मेरी ओर देखा; एक क्षण के लिए लगा, वे मुझसे कुछ कहना चाहते हैं; कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण, लेकिन वे हिचकिचाहट में चुप बैठे रहे। उनका सिर चौकी पर झुका था -सोचताहुआ--टिमटिमाती रोशनीः में उनका सिर, सफेद होते बाल, पीछे की गर्दन और कन्धों का उभार; अचानक मुझे लगा, जैसे मैं उन्हें नहीं-वाबू को देख रहा हूँ, जव मैं बहुत छोटा था और वे स्लेट पर मेरे सवाल हल करते थे और मैं गणित को भूल- कर उनकी गर्दन को देखा करता था... "क्या वे घर आते हैं ?" "कौन ?" मैं कुछ सहम गया। बाबू ? दूसरे क्षण अपनी गलती पता चली; वे बड़े भाई की बात कर रहे थे, जो जीवित थे और दूसरे घर में रहते थे। "जी. 'आते हैं। उन्होंने ही मुझे यहां आने के लिए कहा था।" "तुम्हें ? किसलिए?" "वे मकान वेचना चाहते हैं; कागजों पर आपके दस्तखत कराने ही मैं आया था।" मैं हल्का-सा हो गया; जिस काम के लिए इतनी दूर आया था, वह इतनी आसानी से उनसे कह दूंगा, यह मुझे चमत्कार-सा जान पड़ा। उन्होंने चौकी से मिर उठाया, एक क्षण के लिए मेरे ब्रीफकेस को देखा, जो अभी तक उपेक्षित फर्श पर पड़ा था। पहली बार उन्हें उन कागजों का: मतलव समझ में आया, जो कुछ देर पहले उनकी सीढ़ियों पर हवा में उड़ 134/कन्वे और कालापानी रहे थे। "और मा?" उन्होंने मेरी ओर आगें उठायों, जिनमें एक अजीय-सी थकान छलक आयी थी, "वे कहाँ रहेगी?" "कही भी "जसा वे ठीक समझेंगी।" "और तुम "मैंने किराये की एक जगह देख ली है।" "फिर मुझसे पूछने की क्या जरूरत थी ?" "आपका भी तो मकान में हिस्सा है."मैंने कहा। वे धीरे-से हंस पड़े, "मैं यहाँ हूँ; मेरा हिस्मा पीछे कसे छूट गया?" मैं चुप उन्हें देखता रहा। "मकान बेचना क्या बहुत जरूरी है ?" उन्होंने अखें खोलकर मुने देखा। "नही. "जरूरी नहीं है। लेकिन बड़े देहरादून में जमीन खरीदना चाहते हैं। उसके लिए पैसा कहाँ मे आयेगा?" "मकान बेचकर?" उनके स्वर में हल्का-सा व्यंग्य उमर आया। "और कैसे ?" "लेकिन उमे वायू ने खरीदा था; उसमें अपनी सारी पेंशन के पैसे लगाये थे।" "हाँ; मुझे मालूम है लेकिन वावू अव नही है।" "जो आदमी नहीं रहता, क्या उसकी चीजें हमारी हो जाती हैं ?" मैंने विस्मय से उन्हें देखा; मन मे माया, गहूं, आप । सबकुछ छोड़ कर चले गये थे--अब मकान रहता है या विकता है, इसकी चिन्ता क्यों ? सहसा वे चौकी के आगे सुरु आये, एक अजीव मुस्कराहट में उनके होंठ खुल गये, "जानते हो, जय बाबू ने वह मकान खरीदा था, तुम एम. ए. का फाइनल कर रहे थे; उन दिनों उस इलाके में विनती नहीं आयी पो और तुम ऊपर बरसाती मे लालटेन जलाकर पढ़ते थे।" "जी, याद है। "तुम्हारा विवाह नीचे के आंगन में हुआ था।" आंगन, पता नहीं, वे मुझसे यह सब क्यों पूछ रहे थे? कम्वे और काला पानी/135. बरसाती, छत, नहीं, मकान नहीं वे शायद कुछ और वात कहना चाह रहे थे और मैं अपने गुस्से की उमठन में कुछ भी नहीं समझ पा रहा था" अचानक रोशनदान के खाली खोखल में कुछ चमका, जैसे कोई बनल जानवर अपनी चमकीली आंख से भीतर झांककर अंधेरे में गायब जाये मैंने कुछ भयभीत-सा होकर उन्हें देखा, "क्या है ?" "कुछ नहीं, विजली चमकी है।" मुझे किसी नयो आशंका ने पकड़ लिया था। "अव चलता हूँ, बारिश आपी तो नीचे उतरना मुश्किल होगा।" "तुम्हें जल्दी है ?" उन्होंने मेरी ओर देखा। "मास्टरजी परेशान होंगे; मैं उनसे विना कुछ कहे चला आया था।" "उन्हें मालूम होगा कि तुम यहां हो।" वे एक क्षण ठहरे और फिर कुछ झिझकते हुए कहा, "आज रात यहां क्यों नहीं रुक जाते ?" मुझे इसी का डर था; मैं तैयार होकर आया था। "मुझे ब्लड प्रेशर है"इतनी ऊंचाई पर रहना ठीक नहीं होगा।" यह मूर्खतापूर्ण वहाना था। एक बार पहाड़ पर आकर ऊंच-नीच क्या देखना ? किन्तु उनके साथ रात-भर रहना, यह मेरे लिए असह्य था। हम रात उसी के साथ बिताते हैं, जो बहुत आत्मीय हो, या विलकुल अजनवी; मेरा उनके साथ वीच का रिश्ता था, न इधर, न उधर; क्या इसीलिए घर- वालों ने मुझे उनके पास भेजा था? मैं झोला लेकर उठ खड़ा हुआ। "ठहरो, मैं अभी आता हूं।" वे नीचेवाली कोठरी में गये और जव कपर आये तो उनके एक हाथ में छतरी और दूसरे में टॉर्च थी, "इसे रख लो," उन्होंने छतरी मुझे दे दो, मैं तुम्हारे साथ मन्दिर तक बाताहूँ।" कोठरी की सीढ़ियां उतरे, फिर टॉर्च आगे करके मेरा हाथ पकड़कर नीचे उतार दिया। वे आगे-आगे चलने लगे, लेकिन मैं कुछ क्षण अंधेरे में खड़ा रहा; उनके हाथों की छुअन मेरी देह में धूमने लगी, एक शिकारी की तरह मेरी शिराओं में किसी दुवकी हुई याद को टोहती हुई-चीता हुआ स्नेह अंधेरे में जगमगा-सा उठा" क्या वे वही हैं, जिन्होंने घर छोड़ाया? वे ठिठक गये। पीछे मुड़कर मेरी ओर देखा, हंसने लगे, "मैंने सोचा, । 136/कव्वे और कालापानी सुम पीछे आ रहे हो?" में चलने लगा। चारो तरफ माफ धुला हुआ अंधेरा फेला पा। तारे विल्कुल मिर पर थे, एक दूमरे के इतना पाम मटे हुए कि आकाश में कहीं भी खाली जगह दिखायी नहीं देती थी। मुझे अचम्मा हुआ कि इतनी स्वच्छ रात में विजली कहाँ से कहकी होगी। ये टॉर्च जलाकर सधे परों से चल रहे थे-रोगनी के गोले में पेड़, साड़ियाँ, चट्टानें, धीरे-धीरे पीछे सरकते जाते थे। कभी-कभी कोई पक्षी अंधेरे में चीखता हुआ ऊपर मे उह जाता और फिर साड़ी में घटसटाहट गुनायी देती-जो शायद प्रम या-हाड़ी पहले खटकती थी और पक्षी की उदान वाद में सुनायी देती थी; मेरे येले में टिफिन का कटोरदान बार-बार मेरी धर्मस से टकराता था और तर अचानक मुझे याद आया । "मेरा श्रीफकेम?" "क्या?"वे भी ठहर गये। "मैं उसे आपकी कोठरी में ही भूल आया।" "कोई बात नही कल से लेना।" फिर बहुत ही सहज स्वर में पूछा, "क्या उगगे कोई तुम्हारी लिखी धौज है ?" पहली बार उन्होंने लिखने के बारे में पूछा पा; मैं समझा था, वे बरसा पहले की मेरी इस अवघ, गोपनीय बीमारी को भूल पके होगे। "नहीं, उसमें सिर्फ जायदाद के कागज हैं आपके लिए कुछ पर हैं। उन्हें देख लीजियेगा।" कुछ देर तक हम अंधेरे मे चलते रहे, पगडण्डी पर टॉर्च की रोगनी के अलावा कुछ भी दिसायो नहीं देता था। "बहुत दिनों से तुम्हारी कोई चीज नहीं देखी।" "लिखा नहीं; असयार में बहुत काम रहता है। आपको यहाँ पत्रिकाएँ मिल जाती है ?" "मास्टरजी स्कूल की सायरी से कभी कोई चीज से बाते हैं"बहुत पहले पापा तुम्हारी कोई कहानी देसी थी।" में धडकते दित को दबोचे अंधेरे में चलता रहा; एक गिनगिलाती धर्म में डूबा हुआ; यरसों पहले एक कहानी तो लिखी थी, दुर्भाग्यवश वह कय्ये योर माता पानो/137 छपी भी थी; बल्कि छपाने के लिए ही उसे लिखा था; वह उतनी नहीं थी, जो एक दिन अचानक घर छोड़कर चले गये थे, बल्कि उन. लोगों को लेकर थी, जो पीछे छूट गये थे। मां और बाबू सोचते थे (मां से ज्यादा बाबू आशावान थे; तब वे जीवित थे) कि उसे पढ़ते ही वे लौट मायेंगे लोटना तो दूर रहा, उन्होंने बीस पैसे का एक कार्ड भी नहीं भेजा था। मुझे खुशी हुई कि वे अंधेरे में न मुझे देख सकते हैं, न मेरी शर्म को लेकिन वरसों पहले की चोट मेरे भीतर के सब भटकावों को भेदकर सि उठाने लगी, "आप," मैंने कहा, "आपने खवर तक नहीं की?" यह कहते ही मेरा गला रुंध गया-यह दोहरी शर्म थी-दिल्ली से आते समय मैंने प्रण किया था कि उनसे यह प्रश्न कभी नहीं पूछूगा और अब वह हम दोनों के बीच में था-बियावान जंगल के बीच टॉर्च की गोल बिन्दी पर अटका हुआ। . "इसका कोई फायदा नहीं था।" उन्होंने कहा। "आपको मालूम है, हम आपको कहां-कहां ढूंढते फिरे ?" नहीं, फायदा कुछ भी नहीं था; इस पहाड़ की शान्त चोटी से क्या तलहटी के तिलचट्टों की बदहवासी समझ पायेंगे"अस्पतालों और स्टेर के चक्कर, पुलिस थानों की लिस्टों पर गुमनाम लोगों के नाम, मुर्दाघर शिनाख्त, अखवारों में इश्तिहार-प्लीज कम, मदर इज इल" "फायदा?" "एक लाइन यह तो लिख सकते थे कि आप कहीं जीवित हैं ?" "अगर तुम्हें मालूम होता कि मैं जीवित हूं, तो क्या तुम्हारी त कम हो जाती ?" "मैं तकलीफ की बात नहीं कर रहा।" "फिर?" मैंने अपने भीतर टटोला और कुछ भी हाथ नहीं आया-न न मां का बुढ़ापा, न अपनी असफलताएं-सवकुछ ऐसा ही है होना था। "फिर इतने दिनों वाद चिट्ठी भेजने का क्या फायदा पूछा। 138/कव्वे और काला पानी वे कुछ देर चुप खड़े रहे। "हो, शायद नहीं भेजनी पाहिए थी लेकिन." उन्होंने अंधेरे में एक लम्बी सांस ली। "मुझे दस साल लगे कि तुम्हें कुछ लिख सकू; मैंने सोचा, भव तुम्हें कोई फर्क नहीं पडेगा कि मैं जीवित हूं या नहीं" उनके स्वर में कुछ ऐसी उदास निस्सगता थी, जो हमे आमियों में नही-पेड़ और पत्थरों और पानी में मिलती है जो रिश्तो को सहूलुहान पोहा से बाहर जान पहती है-या यह निस्संगता उन्होंने पिछले वर्षों के अकेलेपन में मजितको यो' मैं चौंक गया। अंधेरे में कही नीचे एक हल्की-सी गडगडाहट सुनायी दी, जैसे कोई भारी पत्थर पर मे लुढकता नीचे की ओर जा रहा हो। "यह कैसी आवाज है " मैंने उनकी ओर देखा। "पहाडी मरना है, मैं यही से पानी लाता हूं।" "काफी नीचे जाना जाता होगा?" "नहीं"मेरी कोठरी के नीचे ही वहता है; कल आमोगे, तो देखने चलेंगे।" वे पानी साते हैं ? पता नहीं कमे -उस क्षण मेरी शर्म और पकान और पिछले वर्षों की जमी नाराजगी धुत-सी गयी; हम ठिठके हुए सन्नाटे में पानी का यहना सुनते रहे: कहीं ऊपर से मन्दिर की पण्टियो सुनायी दे रही थी--शाम की आरती शुरू हो गयी थी। "अव आप लौटिए"मैं चला जाऊंगा।" "अच्छा," उन्होंने कहा, पर वे गये नहीं और मैं उनके साप बंधा सड़ा रहा। "मैं कल आऊँगा", मैंने कुछ ऐमे कहा, मानो जो तसल्ली उन्होंने मुझे मय तक दी थी, अब उन्हें अकेला देखकर वापम लौटा रहा हूँ। "तुम्हे कोई तकलीफ तो नहीं है ?" "कसी तकलीफ?" मैंने उन्हें देखा। "मास्टरजी का पर काफी छोटा है"तुम रेस्टहाउस में क्यों नहीं मा जाते ?" कले और कालापानी।
हों, मैं ठीक हूँ; एक-दो दिन की ही तो बात है।" -दो दिन. 'मेरे मुंह से निकल गया; हवा और मन्दिर की घण्टियों ब्द पता नहीं कितनी देर तक झूलते रहे। स बार मैं रुका नहीं; सीधा मन्दिर की ढलान पर नीचे उतरता आखिरी मोड़ पर पीछे मुड़ा तो देखा कि वे वहीं वैसे ही खड़े थे, मैं उन्हें छोड़ गया था--अविचलित और एक ही जगह । व मोटर रोड की रोशनियां एक कतार में चमकीली झालर-सी टिमटिमा ही थीं। बीच में वह पहाड़ी शहर सफेद धुन्ध में लिपटा सो रहा था । क्या भी सो रहे होंगे? या अकेले अपनी कोठरी में बैठे होंगे?तुम पूरे दस साल बाद उनसे मिलने आये थे और एक रात भी उनके साथ नहीं रह पाये? तुम लिखते हो, लेकिन जब कोई अभूतपूर्व सच्चाई रास्ते में मिल जाती है तो तुम किनारा करके भाग निकलते हो जैसे जीने का सच्चाई से और सच्चाई का लिखने से कोई नाता नहीं है । तीनों चीजें मरे मुर्दो की तरह अलग-अलग फासियों पर झूलती रहती हैं ; और अगर भागना ही था-तो एक रात भी क्यों ठहरे ? मकान के कागजों पर दस्तखत कराते और अगली बस से वापस लौट जाते? क्या मतलव था रुकने का, अगर एक ही रात और शहर में अलग-अलग छतों के नीचे सोना था ?हमारा परिवार और भाई- वहन; आखिरी मौके पर पहुंचकर क्यों हम सब रूखे डण्ठल-से सूख जाते थे-सारा प्रेम कहीं राख और रेत में दव जाता था-और हम एक-दूसरे को अपनी हालत पर छोड़कर अलग हो जाते थे; क्या यह उदासीनता अपने में पाप नहीं थी? क्या इसी पाप से आतंकित होकर उन्होंने घर नहीं छोड़ा था? उस रात मैं नीचे उतरता गया; गड़हे में जाकर अपनी शर्म और लांछना के कीचड़ में लिपटकर सोना-शायद वह उतना ही सुख देता है जितना पहाड़ की स्वच्छ चोटी पर रहना । लेकिन गड़हा मेरे भीतर और जव मैं मास्टर साहब के घर पहुंचा तो सिर्फ एक इच्छा सुलग थी-उनकी आंखों से गायव होकर एक अदृश्य प्राणी की तरह बिस्तर पर जा लेहूं और सारी रात वहीं फाटकर दूसरे दिन दिल्ली र 140/कव्वे और काला पानी हो जाऊँ। मास्टरजी सायद रसोई में थे, उन्हें पता भी न चला कि मैं कव दरवाजा खोलकर भीतर आ गया हूँ। उस क्षण मुझमें मास्टरजी का सामना करने की न शक्ति पी, न इच्छा; मैं जल्दी से कपड़े बदलकर बिस्तर में छिप जाना चाहता था। कमरे में आग बलवल सुलग रही थी; जब मैं अंगीठी के पास वाया, मुझे अपने भीतर की ठण्ड और पकन का बोध हुआ; इसके साप ही अपने भीतर के तपते बुखार का खयाल बाया --कही देह के भीतर मन का बुखार और मन के भीतर देह की ठिठुरन साय-माय एक-दूसरे को सता और सहला रहे थे, जिसमें मेरा साना कही न था। यह अच्छा हो पा। हम गृहस्थ लोगों के लिए यही सबसे बड़ी सान्त्वना है, साधु-संन्यासियों की सरह हम संमार का त्याग मले ही न कर सकें, लेकिन कुछ देर के लिए अपने मन और गरीर मे छुटकारा पा सकते हैं--अलग हो सकते हैं, पोड़ा-सा हल्के हो राकते हैं। किन्तु उस रात मेरे भाग्य में यह नहीं यदा या । कपड़े बदलकर में बिस्तर पर लेटा ही था कि रसोई में हल्की-सी बाहट सुनापी दी; मैं चौंककर उठबंठा; पोके को देहरी पर मास्टरजी पड़े थे। वे मुझे ऐसे धूर रहे थे, जैसे मैं रंगे हापों पकड़ा गया है, "आप कब माये?" "अभी कुछ देर पहले "मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।" मैंने अपने को बचाते हुए कहा। ये कुछ ढीले पड़े; मेरे विस्तर के पास आये, "मैंने आपसे पलंग पर सोने के लिए कहा था। इन दिनों फर्श पर मीलन रहती उन्होंने मेरे माथे पर हाप रखा, फिर नाही को परखा, "बुखार तो नहीं है थोड़ी-सी यकन होगी। मेरे पास प्राण्डी रखी है-थोड़ी-सी लीजिए। हाप-पांव में गरमाई आ जायेगी।" उन्होंने अलमारी से एक छोटी-सी क्वाटर बोतल निकाली और चौके से दो गिलास ले आये। मैं विस्तर पर उठकर बैठ गया; कमरे की आग के सामने हम दोनों कुछ ऐसे जान पड़ रहे ये जमे पीने के लिए नहीं-किसी पहाड़ी देवता की पूजा के निमित्त बैठे हैं। बाहर अंधेरे में किसी पक्षी को मनव, आग्रहभरी आवाज सुनायी दे जाती पी--जंगल की खामोशी को अपनी चोंच से जिराती हुई। कम्वे और काला पानी/11 "निनीरा है। इसे सुनकर वच्चों को नींद आ जाती है।" उन्होंने ग्राण्डी का चूंट लिया और मेरी ओर देखा, "गर्म पानी चाहिए ?" "नहीं, ऐसे ठीक है."आपको यहां मिल जाती है ?" "नहीं, यहां कहां मिलेगी? कभी-कभी अल्मोड़ा या भुवाली से मंगवा लेता हूँ;वस के ड्राइवर ले आते हैं।" आग की गरमाई रही होगी या प्राण्डी का असर, मुझे लगा, मेरे देह की गांठें धीरे-धीरे खुल रही हैं ; कुछ देर पहले मन्दिर के नीचे जो विपाद् और विक्षोभ की भावना आयी थी, वह कहीं अलग न झूलती हुई मेरी आत्मा के चौखटे में फिट हो गयी थी; सहसामुझे लगा, इस दुनिया में कुछ भी बुरा नहीं है 'मास्टरजी का एकटक मेरी तरफ घूरना भी नहीं। वे अजीव उत्सुकता में मुझे ताक रहे थे। "मिल आये वावा से?" पहले क्षण मैं कुछ भी नहीं समझा, "कौन-से वावा ?" वे हंसने लगे, "आप भी खूब हैं, जैसे यहां बाबाओं की भीड़ लगी है।" मैं उनके खुले जबड़े और पीले दांतों को देखता रहा । जिन्हें वे 'बाबा' फह रहे थे, उनका मुझसे कोई रिश्ता हो सकता है, यह उन्हें नहीं मालूम था; साधु-संन्यासियों का घर-परिवार हो सकता है, इसके बारे में कोई कभी सोचता भी नहीं, और यह बात मुझे पहली बार काफी विचित्र जान पड़ी। "वे क्या अपनी कुटिया में ही थे ?" "जी"मला और कहां जायेंगे?" मैंने कुछ हैरानी से उन्हें देखा। "हर जगह पहले तो वे हर जगह घूमते थे; अपना सौदा-सुलुफ लेने भी खुद नीचे बाजार में आते थे।" कहीं मेरे भीतर हल्की-सी उत्सुकता जागी। "अब कहीं नहीं जाते?" "कभी-कभी महीनों गुजर जाते हैं और उनके दर्शन नहीं होते; पहले मैं हाल-चाल पूछने उनकी कुटिया में चला जाता था--लेकिन उनका व्यवहार कुछ ऐसा अजीव दिखायी पड़ा कि मैंने भी जाना छोड़ दिया।" "कैसा व्यवहार?" वे आग की रोशनी में अपनी हथेली को ऐसे देख रहे थे जैसे मेरी बात . का उत्तर वहां लिखा हो; फिर उन्होंने ग्राण्डी का छोटा-सा पूंट लिया और मेरी ओर देखा, "पिछली सर्दियों में मैं उनके लिए पानी लाता पा; वे बहुत मना करते थे, लेकिन मेरी छुट्टियां थी और में हर सुवह उनको कुटिया में पहुंच जाता था। एक मुबह मैं झरने से पानी भरकर ला रहा था कि मुझे रास्ते में मिल गये; मुझे रोककर बोले, 'क्या मैं उनके लिए सकड़ियाँ भी चुनकर ला सकता हूँ?'.."क्यों नहीं', मैंने कहा। वे कुछ देर तक मुझे देखते रहे, फिर मुस्कुराकर कहा, 'और रोटी ? क्या उनके लिए खाना भी बना सकता हूँ;' मैंने कहा, 'नो प्रॉब्लम 'दिन में एक यार खाते हैं। मला उनकी रोटी बनाने में कितनी देर लगेगी? और मैं ?' उन्होंने पूछा, 'मैं क्या करूंगा?..." मैंने कहा, 'वावा, आप ईश्वर का ध्यान कीजिए, इसीलिए तो आप सबकुछ त्यागकर यहां आये हैं ' जानते हो, उन्होंने क्या कहा ?" मास्टरजी रुककर आग की लपटों को देखते रहे, कुछ देर तक जलती हुई लकड़ियों की झिर-झिर के अलावा कुछ भी मुनायी नहीं देता पा। "क्या कहा उन्होंने ?" मैंने उनकी ओर देखा। कहने लगे, "जिमके बारे में कुछ मालूम नहीं, उसका ध्यान कैसे हो सकता है ?" "यह उन्होंने कहा ? "मैंने पूछा, अगर ऐमी बात है, तो घर-बार छोड़कर यहाँ जंगल मे आने की जरूरत क्यों ? जानते हैं, उन्होंने क्या कहा ? कहने लगे, मैंने कुछ भी नहीं छोड़ा-में सिर्फ यहाँ रहता हूँ। आप मेरा सब काम करेंगे, तो मैं पया करूंगा? मैंने पानी की बाल्टी रास्ते में ही छोड दी"जोआदमी अपनी मेवा नहीं कराना जानता वह 'उसकी' क्या सेवा करेगा ?" घे बैठे रहे, फिर एक लम्बी सांस ली। "मैं यहाँ अकेला रहता -नौकरी के लिए लेकिन वे यहाँ क्यो रहते हैं, यह कभी ममझ में नहीं आया । न ध्यान-शान, न पूजा-पाठ"लोग उनसे मिलने आते हैं, तो चुपचाप बैठे रहते हैं-मैंने कभी उन्हें उपदेश का एक सन्द कहते नहीं सुना..." "फिर भी लोग उनके पास आते हैं ?" मैंने पूछा। कव्वे और काला पानी/143 P से टकराता था, कभी मुझसे- - "क्यों नहीं माप भी तो आखिर इतनी दूर से आये हैं।" "नाम सुना था"" मैंने कहा। "कोई मनोकामना लेकर आये हैं-~~या सिर्फ जिज्ञासा ?" मास्टरजी की टोहती आँखें मुझ पर टिकी थीं; मैंने भीतर झांका- पुराने जालों के बीच जो चीज टॅगी थी, वह न मनोकामना थी, न जिज्ञासा -हवा में डोलता सिर्फ एक टूटे रिश्ते का धागा था-~~जो कभी मास्टरजी लेकिन जिसको न वे समझ पाते थे, न मैं हटा पाता था. "खाना लगाऊं, बहुत देर हो गयी है।" मास्टरजी रसोई में चले गये, लेकिन मैं अपने विस्तर पर बैठा रहा। बाहर झींगुरों का स्वर एक तान में बज रहा था। ग्राण्डी लेने के बाद एक मन्द आंच मेरे भीतर भी जलने लगी थी; अपने घर में था, तो गृहस्थी के बीच पता नहीं चलता था कि अरसे से मेरे भीतर कितनी ठण्ड और थकन जमा होती गयी है। "आप सो गये?" मैं चौंककर उठ बैठा। आग की हल्की गरमाई में मैं ऊंघने लगा था। उन्होंने दो थालियाँ फर्श पर रख दीं। दाल-सब्जी, मोटी गर्म रोटियाँ... अकेले ही उन्होंने सब बनाया था; उस क्षण मुझे मास्टरजी के जीवन से अद्भुत ईष्या हुई; मैं दो दिन से उनके घर में मेहमान बना वैठा था, जबकि उन्हें मेरे बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। एकवारगी इच्छा हुई कि उन्हें सब बता दूं, कह दूं उनके सहजी वावा और कोई नहीं-मेरे भाई हैं, जिनसे मैं मिलने आया हूँ लेकिन दूसरे ही क्षण कुछ भी कहने की इच्छा मर गयी; मेरी बात सुनकर वे अजीव संकोच में फंस जायेंगे और फायदा कुछ भी नहीं होगा कुछ सत्य विल्कुल अनावश्यक होते हैं, उन्हें कहने, न कहने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। "अभी तो आप कुछ दिन यहां रहेंगे ?" उनके स्वर में कुछ अजीब-सी मातुरता थी। "मुझे कल ही जाना है," मैंने कुछ झिझकते हुए कहा, "मैं सिर्फ दो दिन की छुट्टी लेकर आया था।" 144/ कव्वे और काला पानी - "कहाँ काम करते हैं बार?" उन्होंने पहली यार मुझसे मेरी नीचे. वाली जिन्दगी के बारे में पूछा था-उनके स्वर मे एक लगावभरी चिन्ता थी, जिसके कारण में उनका कृतन-गा हो माया । मैंने उन्हें अपनी असवार को नौकरी के बारे में बताया अपने बच्चो, गृहस्पी और घर के बारे में- वे चुपचाप सुनते रहे। जब मैं अपनी बात सत्म कर चुका और उनको ओर से फिर भी कोई उत्तर नहीं आया, तो मुझे थोड़ा-सा सन्देह हुआ, कहीवे सो तो नही रहे ? सिर उठाकर उन्हें देखा-कमरे को पौली चांदनी में उनकी आँखें मुझ पर टिकी पों; मुझे एक अजीव-सा सटका हुआ पता नहीं वे क्या सोच रहे थे? "एक बात कहूं-आप पर-गृहस्थी छोड़कर इतनी दूर आये है, कुछ दिन एक क्यों नहीं जाते?" "उसमे क्या होगा?" "वाया का साथ रहेगा और क्या वे भी इन दिनो कोठरी मे अकेले पडे रहते हैं।" "आप भी तो यहां रहते हैं. फिर भी उनके पास नहीं जाते।" "मुझे समझ में नहीं आता, उनसे क्या बात करूं-पहले उनका पोड़ा. बहुत काम करने चला जाता था--अब उन्हे उसकी भी जरूरत नहीं पड़ती "पता नही, दिन-रात अकेले क्या करते हैं ?' "देखिए-उन्होंने घर-बार अपनी इच्छा से छोड़ा होगा-और अकेले रहना इतना बड़ा सन्ताप भी नहीं है आप भी तो यहाँ विल्कुल अकेले रहते हैं ।" मैंने कहा। "मेरी बात बिल्कुल अलग है."मैं महीने में एक-दो बार अल्मोड़ा का चक्कर लगा आता हूं, अगर यहां कोई ढंग का मकान मिल जाता, तो फेमिली को भी यहां ले आता..." वे एक क्षण रुके, मेरी ओर एक अजीव; अयंभरी दृष्टि से देसा, धीरे से कहा, "एक बात मुझे समझ में नहीं जाती, बाबा को यहां आये इतने वर्ष बीत गये, लेकिन उनके घर-परियारका कोई बादमी उनमे नहीं मिलने आया।" मुझे सजीव-सा सन्देह हुआ कि उन्हें मेरे बारे मे सबकुछ मार शायद पहले दिन से ही उन्हें मालूम था, जब वह वस-स्टेशन पर . कले और काला ..
किन्तु उनके चेहरे से कुछ पता नहीं चलता था। "सम्भव है, उनके घरवालों को मालूम ही न हो कि वे यहाँ हैं।" "इतने वर्षों में भी?" उन्होंने कुछ अविश्वास से मुझे देखा। "शायद कोशिश की हो"इतना बड़ा देश है, कोई कहां तक छानता फिरेगा!" मैंने कहा। वे कुछ देर अंधेरे में बाहर देखते रहे, फिर कुछ सोचते हुए कहा, "मुमकिन है, उनका कोई न हो "कुछ लोग तो अपने अकेलेपन से घबराकर ही संन्यास ले लेते हैं।" "आपने कभी उनसे नहीं पूछा ?" "अपने बारे में वे इतना ही कहते हैं जितना.. ईश्वर के बारे में; कभी-कभी तो मुझे उनके संन्यासी होने पर भी शक होने लगता है।" संन्यासी नहीं, तो और क्या हैं ? दस साल पहले सवको रुलाकर घर छोड़ा था-अव ईश्वर को छोड़ कहां जायेंगे ? किन्तु उस रात इसका उत्तर कहीं न था"मास्टरजी अपनी मंजी पर लेट गये और मैं अपने विस्तर पर -विल्कुल पिछली रात की तरह । लेकिन पिछली रात की तरह कमरे में पूरा अंधेरा नहीं हुआ। चौके की खिड़की पर चाँद भीतर झांक रहा था और कमरे की हर चीज एक महीन, पीले चूरे में चमकती जान पड़ती थी; देर तक मुझे नींद नहीं आयी; घर की याद आती थी तो लगता था, वह कोई दूसरी दुनिया हो-और जव भाई की अकेली कोठरी के बारे में सोचता, तो लगता कि वह कोई तीसरी दुनिया है और ये सब दुनियाएं धरती पर अलग-अलग विखरी हैं- दिखती पास-पास हैं, किन्तु असल में एक-दूसरे से लाखों कि. मी. दूर हैं." क्या इनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं ? यह विचार ही मुझे भयंकर जान पड़ा; मैंने करवट ली ताकि इस प्रश्न को उठने से पहले ही बाजू में दवाकर . सो सकू। कपर कौए उड़ रहे थे। लश्कर-के-लश्कर; चीखते हुए वे नीचे उतरते और जहां थाह मिलती, वहाँ पसर जाते-पेड़, चट्टान, डगर, डाली; उनकी कांव-कांव से बाजार और मन्दिर के बीच का आकाश थर्राने लगता था: 146/कव्वे और काला पानी मैं बाजार में हो था -यस-स्टंण्ड के शेड के नीचे एक छोटी-सी भोर जमा यो; दायों के आगे कुत्ते और कुलो पा रहे थे। मास्टरजी रायको धकियाते हुए आगे बढ़ गये और टिपरको पिड़को के आगे गड़े हो गये; सिडको बन्द थी. 'मास्टरजी ने दो-तीन बार उसे अपने घूसो से खटयटामा, अचानक एक सिर बाहर आया और मास्टरजी उससे वतियाने लगे, कुछ देर बाद वे मेरे पाम आये “एडवाम बुकिंग नही होती-आपको वम में ही टिकट मिल जायेगा।" "आपने टाइम पूछा?" "शाम को एक ही यम दिल्ली जाती है-ह बजे । दूसरी बम आठ बजे; वह डायरेक्ट नहीं जाती-भुवाली से दूसरी बस लेनी पड़ती है।" छह बजे । समय काफी था। घर से निकलने से पहले मैं वपनामामान बांध चुका था"मास्टरजी की सलाह पर उसे बाजार में उनकी जान- पहचान के हलवाई की दृवान में रखवा दिया था, ताकि शाम को सौटने पर उसे लेने दोबारा घर न जाना पड़े। मेरे हाथ में सिर्फ अपना लाया -और उनका छाता। "साइए, एक-एक पाप और हो जाये आपको पूरी पढाई पार करनी है।" मास्टरजी ने कहा। सुबह की चाय हम उनके घर में ही ले चुके थे लेकिन टण्ड कुछ इतनी ज्यादा थी कि मैं ढाये में कुछ देर भट्टी के आगे बैठने का सालच नहीं रोक सका। सुबह से ही मास्टरजी चुप थे। एक-दो बार मुझसे रकने का आग्रह किया था, किन्तु जब मैंने उन्हें बताया कि अगले दिन ही मुझे अपवार में अपना कॉलम लिखना है, तो उन्होंने जोर नहीं डाला:न सहजी यावा के बारे में एक शब्द कहा; पिछली रात के बाद हमारे बीच एक मूक ममनौता- सा हो गया था कि हम उनके बारे में चाही रहेंगेन उन्होंने उनकी चर्चा छेड़ी, न मैंने कुछ कहा; हमारे बीच ये कुष्ठ वैसे ही अदम्य हो गये थे- -जैसे ऊँचाई पर उनकी कुटिया वह वादलो में छिप गयी थी;न मन्दिर दिधामो देता था, न फारेस्ट रेस्टहाउस; वह कुछ वैसा ही पहाडी दिन पा, जब बारिश नहीं होती, लेकिन धूप भी दिमायो नहीं देती-सिपं वादसों की कम्वे और माता पानी/147 कनात ऊपर से नीचे तनी रहती है। "ये सब भुवाली से आते हैं।" मास्टरजी ने बादलों को देखते हुए कहा, "चाकी सब रानीखेत-नैनीताल की तरफ उड़ जाते हैं "बची-खुची खुरचन यहाँ आती है"इनके लिए यह जगह काले पानी की सजा है और क्या..." . मैं चाय पीता हुआ रुक गया, "इसके आगे नहीं जाते?" वे हंसने लगे, "इसके आगे कौए जाते हैं"देखते नहीं इनके लश्कर? वे चारों तरफ थे 'मन्दिर की पहाड़ी पर, बाजार के ऊपर छतों और पेड़ों पर चक्कर काटते हुए" "आप सोचेंगे, इतना छोटा शहर और इतने कौए ? कहते हैं, इस शहर पर एक शाप पड़ा था कि यहां के सव निवासी मृत्यु के बाद कोए की योनि प्राप्त करते हैं।" "फिर भी लोग यहां रहते हैं ?" मैंने कहा। "हां, रहते हैं। -क्योंकि एक विश्वास यह भी है कि ये सब कोए मरने पर मोक्ष प्राप्त करते हैं ।" मास्टरजी ने कुछ गम्भीरता से कहा, "यह शहर एक तरह का ट्रांजिट स्टेशन है-कौए की योनि और निर्वाण के बीच।" इस बार वे मुस्कुराये नहीं "अपनी सूनी निगाहों से धुन्ध में डूबे शहर और उसके ऊपर फड़फड़ाते काले डनों को देखते रहेकाले पानी का शहर ""मुझे यह सोचकर कुछ अजीव-सा लगा कि भुवाली के वादल यहां आते हैं, आगे नहीं जाते. "जैसे यह दुनिया का अन्तिम छोर हो-मृतात्माओं और कौओं का प्रदेश! मैं आगे कुछ भी नहीं सोच सका; मास्टरजी ने भी जैसे अपनी मजाक- भरी कथा को आगे नहीं बढ़ाया-शायद वे भी अपनी जिन्दगी के बारे में सोचने लगे, जो आधी से ज्यादा इसी शहर में बीत चुकी थी... उन्होंने मुझे चाय के पैसे भी नहीं चुकाने दिये... "मैं शाम को इसी ढाबे के सामने रहूंगा"आप जरा जल्दी आ जाइयेगा -~-और.." वे एक क्षण झिझके; "उनसे मेरा प्रणाम कहियेगा।" "आप भी मेरे साथ चलिए वे बहुत खुश होंगे।" मैंने आग्रह किया, मैं इस बार उनके पास अकेले नहीं जाना चाहता था। 148/कव्वे और काला पानी मेरी वात मुनकर वे एकदम घबरा में गये, "नहीं"नही । मैं तो यही रहता हूं-किसी भी दिन चला जाऊंगा. आप कोई रोज पोड़े ही आते हैं।" वे जल्दी से मुट गये, बाजार की भीड़ में मो गये। चढाई पर कीचड थी, बूंदा-बोटी ऊपर से। दोपहर के बीच ही अंधेरा- सा पिरने लगा था। मैंने उनकी छतरी सोल ली और तेज कदमों मे ऊपर बढ़ने लगा । मन्दिर की सीहियो तर पहुंचते-पहुंचवे मेरी माँग फूल आयो, एक बार इच्छा हुई, कुछ देर वही बैठकर स्वस्थ हो, उनके पास इस तरह लम्तम-पस्तम जाना ठीक नहीं होगा, फिर पयाल आया, अगर शाम की बस पकड़नी है, तो जितना समय उनके पास विता सर्व, वही अच्छा है; दो-चार मिनट मीढियों पर सुस्ताकर मैं दोबारा पर पढ़ने लगा। पगडण्डी के नीचे सुन्दर पहाडो कॉटेज थी, अग्रेजो के जमाने की.. एक क्षण विश्वास नहीं हुआ कि वहां सम्भ्रान्त लोग रहते होगे-जिनका अघोरी बाबा के नंगेपन, भाई की कुटिया और मास्टरजी के अकेलेपन में कोई लेना-देना नहीं, कभी किमो खुले दरवाजे मे भीतर की झलक मिल जाती-सुलगती हुई फायरप्लेम कही गलियारे में लड़कियो की हसती आवाजें.. रेडियो का संगीत; यह वही दुनिया थी, जिसकी मुरक्षित नहार- दीवारी के बीच मैंने अपने पालीस वर्ष गुजारे पे-किन्तु बाहर पुन्ध मे ठिठुरते हुए वह दुनिया कितनी बेगानी जान पडतीपी; महसा एकरिरियाते. से हर ने मुझे पकड़ लिया अगर कोई मुझे अचानक इस मुन्दर और सुरक्षित दुनिया से बाहर फेंक दे तो मेरा क्या हाल होगा मैं उस टिड्की तरह अंधेरे में चक्कर लगाऊंगा जिसे एक अंगुली से पकड़कर डाइगरूम की खिड़की के बाहर फेंक दिया जाता है और जो कभी दोबारा भीतर माने का रास्ता नहीं हूँढ़ पाता; किन्तु अगते क्षण ही मुझे अपने हर पर हमी थाने लगी-मैंने अपने कोट के भीतर हाय हाला, वहाँ मेरे बैंक को पास- बुक धी; गले में लिपटे मफलर को छुआ, जो रिछनी वर्षगांठ पर मेरी पत्नी ने मुझे भेंट की थी, मेरे चमड़े के वैलेट में मेरे दोनों बच्चो की तमवीरें थीं, दिल्ली में मकान पा, कितावें थी, जिन पर मेरा नाम लिसा पासवठोग, और कालापानी/14 पक्की चीजें, जिनसे मेरा इस धरती पर होना सावित होता था; मैं वहा था,, जो चालीस साल पहले इस दुनिया में आया था, एक पोस में जड़ा हुआ जीव, एक निरन्तर प्राणी-जिसके वीच कोई काट-फांक नहीं थी, यह असम्भव लगा कि यह जीव मुझे एक दिन अनाथ पतंगे की तरह अंधेरे में छोड़कर गायब हो जायेगा. मैं जल्दी-जल्दी उनकी कुटिया की तरफ बढ़ने लगा; एक अजीव खुशी ने मुझे पकड़ लिया, कुछ घण्टों वाद शाम की वस से मैं अपनी जानी-पहचानी दुनिया में लौट जाऊंगा"डर का कोई कारण नहीं था। मैंने धीरज की सांस ली, जब देखा, उनकी कोठरी में उजाला है. ज्यादा नहीं-उतना ही, जितना एक धुंधली दोपहर में लालटेन से बाहर आता है; मेरे लिए उतना ही काफी था। लगभग दौड़ते हुए मैं कुटिया की तीन सीढ़ियां चढ़ गया; सांकल खटखटाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो वीच में ही ठिठक गया । क्या उनके साथ कोई भीतर है? उनकी आवाज सुनायी दी-ऐसी आवाज-जो न अकेली होती है, न किसी के साथ होती है, जैसे कोई नोंद या बुखार में वुडबुड़ाता है, आधे शब्द सुनायी देते हैं, आधे ऊपर से निकल जाते हैं..--क्या वे प्रार्थना कर रहे थे, या अपने से ही वोल रहे थे? लेकिन तभी वे दिखायी दिये-दरवाजे के पल्लों के वीच वे मेरी नजर के धेरे में आ गये; वे रोशनदान के आगे खड़े थे." में आज भी वह दृश्य नहीं भूल पाता; उसे 'दृश्य' भी कहना गलत होगा- दरवाजे के बीच सुराख से जो दिखायी दिया, वहां न सहजी बाबा थे, न मेरे भाई थे-वहाँ एक ऐसे आदमी खड़े थे, जो दीन-दुनिया से वेखवर अपने से वात कर रहे थे और बीच-बीच में खुद ही हंसने लगते थे"दरवाजे से चिपटा, लुटा-पिटा मैं उन्हें देखता रहा-एक सम्मोहित पशु-सा, जो भय और मोह के बीच जड़ पुतले-सा खड़ा रहता है. लेकिन मेरा दूसरा हिस्सा मुझसे छिटककर उनसे जा चिपटा था, हैरत में चीख रहा था--यह आप क्या कर रहे हैं ? किससे बातें कर रहे हैं ? किस पर हंस रहे हैं कहते हैं, जब आत्मा गूंगी पड़ जाती है, तब देह की आवाज सुनायी देती है; सन्नाटे में खून सनसनाता है और तब हम होश में आ जाते हैं, ? 150/ कव्वे और काला पानी अपने दिल की धडकन को पहली बार सुनते हैं। ऐसा ही मेरे मापहा, मुझे पता भी न चला, फर मैंने मौकल पटपटायो, कब उन्होंने दरवाजा खोला --मुझे अपने कन्धे पर उनका हाप और उनके मन्द एकमाय मुनायो दिये, "कहाँ रहे ? मैं मुवह मै तुम्हारे इन्तजार में बैठा था।" उनका स्वर इतना सहज और शान्त पा कि अनायाम मैंने अपर देखा -~ये मुस्कुरा रहे थे, क्या ये ये ही आदमी थे, जो मिनट पहले बरेने मे हम रहे थे? "आप"?"मैंने कहा फिर मैंने अपना वारय मधूरा छोड़ दिया; किसी ने मेरे भीतर की माफल लगा दी; मैंने अपने विगत जीवन में आंख मूंदकर इतने दरवाजे बन्द किये हैं--एक यह भी सही। "आपका हाय वहन गर्म है।" मैंने कहा, "तबीयत ठीक है?" उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे मन्ये मे अलग कर दिया, फिर ऐसे कहा, जैसे मेरी बात को सुना भी न हो, "बाहर सर्दी है-~-भीतर घले आओ।" मैंने उनकी छतरी कोने में रख दी, जूते उतार दिये, भीतर चतनी ही सर्दी थी, जितनी थाहर, नगे कमरे में लालटेन की रोशनी और भी अधिक ठण्डी और मैली जान पड़ती थी। "इतनी देर कहाँ रहे ?" उन्होंने पूछा। "मास्टरजी के साथ बाजार आया था"बस में सीट बुक करवानी वे चुप रहे: लालटेन के दायरे में उनका सफेद चेहरा, सलेटी दादी और घनी काली भवें एक निष्प्रम आकार में सिमट गयो थो"एक तपता पेहरा -जो न सौम्य पा, न कठोर-मिर्फ निर्विकार-सा मुझे ताक रहा था। "माज मुबह टहलता हुआ मैं फॉरेस्ट रेस्टहाउस गया था. उसके मैनेजर मुझे जानते हैं "वे आसानी से एक कमरा तुम्हारे लिए युक करवा प्रकते हैं।" "उससे क्या होगा?" "तुम कुछ दिन यहाँ आराग मे रह सकते हो"इतनी जल्दी क्या है ?" उनके स्वर मे पोड़ा-सा आग्रह पा, हल्का-सा शूमा स्नेह"जो दरकता कम्वे और काला पानी/151 नहीं था इसलिए उसे झेल पाना और भी दुखद और दुश्वार:जान पड़ता था। "आपको अच्छा लगेगा?" मैंने कहा। वे धीरे से हँस पड़े, "तुम सिर्फ मेरे लिए ही रुकना चाहोगे?" "और यहाँ कौन है ? मैं आपसे मिलने आया था।" "नहीं.. 'मैंने सोचा, शायद तुम कुछ दिन यहाँ रुकना चाहो"दिल्ली. में तो रहना ही है।" "आप सचमुच यह चाहते हैं ?" मैंने कहा। "मेरे चाहने की बात नहीं..." वे कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर धीरे से कहा, "अरसे से तुमने छुट्टी नहीं ली"तुम छुट्टी मानकर ही यहां रह सकते हो।" "वे सोचेंगे, मैं भी आपके साथ मिल गया है। घर में क्या एक संन्यासी काफी नहीं है ?" वे मुस्कुराने लगे, "क्या वे मुझे संन्यासी समझते हैं ? मैं तो यहां वैसे है रहता हूँ, जैसे घर में रहता था "सिर्फ जगह बदल जाती है।" "और आप? आप बिल्कुल नहीं बदले ?" मैंने कुछ कौतूहल से उन् देखा। . "तुम क्या सोचते हो?" उनकी आँखों में एक अजीव शरारती-स चमक तैर रही थी। "मैंने कभी नहीं सोचा था कि आपको इस जिन्दगी में देखना सम्भर हो पायेगा।" "इस जिन्दगी में ?" उन्होंने विस्मय से मुझे देखा, "इसके अलाव दूसरी जिन्दगी कौन-सी है ?" क्या वे मेरे साथ खिलवाड़ कर रहे हैं ? लेकिन उनकी आंखें स्थिर र्थ और चेहरे पर एक उदास-सी निमग्नता घिर आयी थी। "अगर एक ही जिन्दगी है, तो फिर जगह बदलने का भी क्या मतलब है"जैसे यहां वैसे वहाँ।" मैंने कहा। "अन्तर है"वहां दूसरों के लिए मेरा कोई मतलब नहीं था।" "और यहां?" 152/कव्वे और काला पानी " "यहाँ दूमरे नहीं हैं। वे मुस्कुराने लगे,"इसीलिए अपने मतलव के बारे में ही मोचना पड़ता है." "क्या यह सम्भव है"दूमरो को बिल्कुल छोड़ देना? दे कुछ मोचने लग; दोपहर के मलिन आलोक में उनका गिर पोको पर रुकवायापा, मिर्फ वालों को सफेदन दिपारी देतीपी-- पहले जिम चेहरे को हंमते देखा या यह अब एक अंग्रेरी बावडी पर ठिठकी छाया-मा दिसायी देता था। "नहीं" मम्भव नहीं है," उन्होंने कहा, "तभी तो मैंने तुम्हे चिट्ठी भेजी थी। संन्यामी होने के लिए सिर्फ छोड़ना ही काफी नहीं है." वे दीवार पर पीठ लगाये पोड़ा-सा मुक आये थे, आये मुंदी पी; दरवाजे का पल्ला घोरे-धीरे हित रहा था। हवा उठनी पी, और बाहर की धूल और पत्तियां भीतर ले आती थी। उन्होंने अचानक आगे खोल दीं। "कोई आया पा?" उन्होने कुछ हैरत से मुझे देखा। "नही,"मैंने कहा, लेकिन तभी बाहर पैरो की माहट मुनापो दी: पुछ लोग मोड़ियो के नीचे पड़े थे। "जरा देखो कौन है ?" उन्होने मेरो ओर देखा। मैं उठकर देहरी के पास आया; दरवाजा पूरी तरह घोल दिया; नीचे तीन-चार सम्प्रान्त-से दोसनेवाले व्यक्ति पडे थेसाप में दो महिलाएं भी यो । मुझे देखकर एक राज्जन आगे बढे, "क्या बापा भीतर हैं ?" मैं युछ कह पाता कि मुझे अपने पीछे उनकी आवाज सुनापी दी, वाहर बैठिए, में बाता हूँ।" उनका स्वर सुनते ही सबके हाय जुड़ गये। मैं बसा हट गया। वह नोचे मीढियों पर आये तो हर व्यक्ति आगे बढकर उनके पर लेता था। सबसे बाद में एक बहुत कम उम्र को महिला आयी, काली शॉल में लिपटी हुई~एक क्षण यावा को देखा और फिर यहुत देर तक उनके पैरों के पास मिर टिकाकर बैठी रहीं। ये निश्चल सड़े पेन एक पाल कहा, न हाप उठाकर कोई आशीर्वाद दिया। कुछ देर बाद वे मेरी तरफ मुड़े, "तुम बैठो, में अभी आता हूँ।" कब्वे और काला पानी/153. "माप ।
. उनके चेहरे पर अजीव-सा संकोच था; मैं निढाल-सा खड़ा रहा, क्या इन लोगों के सामने उन्हें मुझसे शर्म-सी आ रही थी? मैं भीतर आया और लालटेन की वत्ती धीमी कर दी.. सिर्फ इतनी रोशनी रहने दी कि बाहर का हल्का उजाला भीतर आता रहे; वे कुटिया के वाहर वांज के नीचे एक सफेद चबूतरे पर बैठे थे; कभी-कभी उनमें से किसी की आवाज भीतर आ जाती थी, अलग-अलग टुकड़ों में "वावा से कुछ कहती हुई, लेकिन उनका स्वर एक वार भी सुनायी नहीं दिया--और तब मुझे अपने प्रश्न पर ही शर्म आने लगी, जो मैंने उनसे पूछा था दूसरे लोग? उन्होंने हमें छोड़ दिया था, लेकिन ये लोग? उन्हें इनसे क्या मिलता होगा, जो यहां आते हैं, कुछ जरूर होगा, जिसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम, क्या मैं अपने भाई के रूप में एक अजनवी से मिल रहा था, उनसे वह सब पूछ रहा था, जिसका इस जगह कोई मतलब नहीं था और तब मुझे वरसों पहले की घटना याद हो आयी, जव मैं उन्हें ढूंढने अस्पताल के मुर्दाघर में गया था। मुझे लगा, चबूतरे के आगे जो लोग उनके दर्शन करने आये हैं, मैं भी उन्हीं की लाइन में खड़ा हो गया हूं, किन्तु वह कोई दूसरी जगह थी, दूसरा समय-वहां सफेद चबूतरे की जगह बर्फ की सिलें रखी थीं, जित पर लोगों की लाशें मछलियों-सी रखी थीं। मैं हर सिल के आगे रुक जाता था-क्या यह वे हैं ? लेकिन हर वार जव मैं रुकता, मुर्दाघर का अटेण्डेण्ट मुझे पीछे से धक्का दे देता था, जल्दी कीजिए, आपके ही नहीं दूसरों के मुर्दे भी पड़े हैं, पहचानिए और आगे बढ़िए"दूसरों के मुर्दे ? मैं धक्के खाता हुआ आगे बढ़ गया "दस साल आगे और अचानक समझ नहीं पाया कि मैं वर्फ की सिल पर लेटा हुआ उन्हें देख रहा हूं या वे ऊपर से झुककर मुझे निहार रहे हैं... "छोटे!" एक धीमी-सी आवाज सुनायी दी; मेरे ऊपर लालटेन थी और वे मुझे बुला रहे थे, दस साल बाद उनके मुंह से अपना घर का नाम सुनकर मैं हड़वड़ाकर उठ बैठा । लगा, मैं अपने घर में हूँ; आँखें फाड़ते हुए उन्हें देखने लगा, जो ऊपर से मुझे देख रहे थे। "तुम सो गये थे?" उन्होंने धीरे से कहा । मैंने देखा, मेरे ऊपर उनका 154/कव्वे और काला पानी कम्बल विठा है, मेरी देह मे गरमाया हुआ। "वे लोग चले गये ?" मैं हडबडाकर उठ बैठा। "बहुत पहले के..." "आप यह कम्बल कब दे गये?" "जब में भीतर आया, तुम ऐगे ठिठुर रहे थे, जमे अपं. पर लेटे हो।" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। वर्फ पर? म लगा, मैं किसी दस साल पुराने सपने मे बाहर निकल आया हूँ: कोठरी में हल्की पीली-मी रोशनी फैली पी, डूबने मे पहले मूरज बाहर निकल आया था; एक पोली-मी चमक पहाडो पर उतर आयी थी। वे मेरे पाम झुक आये, बहुत कोमल स्वर मे कहा, "थोडा आराम कर लो, अभी चाय बना लाता है।" मैंने उन्हें देखा--यही गान्त चेहरा और छोटी-मी मुस्कुराहट-जैसे दे भी अमी-अभी वर्फ की मिल से उठकर बाहर थाये हो, बाहर उजाले में, जहाँ उनकी दुनिया मेरे अतीत में मिल गयी पी, शाम को उस घटी मे मेरा उन्हें देखना और उनका चुप रहना एक तरह की तैयारी थी, जहाँ- पिछले वर्षों का गूंगा रेगिस्तान एक क्षण में नाप लिया जाता है शायद इसीलिए उन्होंने मुझे बुलाया या वे शायद अन्तिम बार मुझसे~~-परमे-- छुटकारा पा लेना चाहते थे। मैं धीरे में उठा, उनका कम्बल तहाकर कोने में रख दिया। फिर देहरी पर आमा, अपने जूते पहने और थैला उठाकर उन्हें देया; ये अब भी लालटेन लेकर राडे थे, हालांकि अब उजाले में उसकी कोई जरूरत नही पी "मैं चलूंगा-बस जाती होगी।" वे चुप खडे रहे। फिर धीरे से कहा, "व्हरो, अभी पाता हूँ।" ये नीचे के कमरे में गये। जब ऊपर आये तो उनके हाप में लालटेन नहीं थी। "तुम इसे फिर भूल गये," उन्होंने मेरा प्रोफोम मुझे लौटाते हुए कहा, "पत्र मैंने रख लिये हैं और..."वै एक क्षण स्के, फिर धीमे से कहा, "तुम देख लेना, कागजो पर दस्तसत मैंने कर दिये है।" मैंने उन्हें देवा; वे थोड़ा-सा मुह गये थे; बाहर पेड़ो से उनती धूप कच्चे और काला पानी/155. - - उनके पैरों पर गिर रही थी। मैं भी झुक गया, कुछ देर झुका रहा और मुझे लगा जैसे कोई मेरे सिर को सहला रहा है, एक गर्म तपती-सी छुअन जो धीरे-धीरे मेरी देह को ताप रही थी सिर उठाया, तो कोठरी में कोई नहीं था, रोशनदान से वांज के पेड़ की छाया नीचे ढुरक आयी थी और जहां वे खड़े थे, वहाँ धूप का एक चकत्ता चुपचाप सरक आया था। मेरी यात्रा का अन्त शायद ऐसे ही होना था। मैंने ब्रीफकेस उठाया और बाहर चला आया। उसके बाद कुछ नहीं है। मैं पेड़ों के वीच धूप में धुली पगडण्डी उतरने लगा -वह कितना नीचे उतरती थी। दिल्ली शहर और दोस्त, अखवार का दफ्तर, गर्मी की सनसनाती लू-भरी दोपहरें और मेरी सच्ची-झूठी कहानियाँ "मैं धीरे-धीरे उस ऊंचाई को भूल गया, जहां उनसे, मास्टरजी से, अघोरी बाबा से मिला था वे दोनों ही मुझे वस-अड्डे पर छोड़ने आये थे; उनके चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ गये हैं, लेकिन कभी-कभी अकेले क्षणों में सहसा मास्टरजी का प्रश्न उमग आता है। वस की खिड़की से सटकर उन्होंने असीम जिज्ञासा से पूछा था, "आप जो मनोकामना लेकर उनके पास गये थे, वह क्या पूरी हो गयी?" इससे पहले मैं कोई उत्तर सोच पाता, वस चल पड़ी; मास्टरजी कुछ दूर वस के साथ-साथ भागते आये, लेकिन अघोरी वावा मुझसे उदासीन ऊपर देख रहे थे पेड़ों के ऊपर हवा में फड़फड़ाता हुआ एक काला ववण्डर उठ रहा था; हजारों कोए जंगल पर चक्कर काटते हुए मन्दिर की तरफ उड़ रहे थे।
एक दिन का मेहमान उसने अपना मूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घण्टी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान घुप पा। कोई हलचल नहीं -एक दाण के लिए प्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह सालो मकान के आगे सा है। उसने रूमाल निकालकर पसीना पोंटा, अपना एपर-बैग मूटकेम पर रग दिया। दुवारा बटन दबाया और दरवाजे से कान सटाकर सुनने मगा, वरामदे के पीछे कोई युली खिड़की हवा मे हिचकोले पा रही थी। वह पीछे हटकर ऊपर देखने लगा। वह दुमंजिला मकान था-लेन के यन्य मकानों की तरह-काली छत, अंग्रेजी 'वो' की शक्ल में दोनों तरफ मे दलुओ, और बीच में सफेद पत्पर की दीवार, जिमके माथे पर मकान फा नम्बर एक काली विन्दी-सा टिमक रहा था। ऊपर की खिड़कियो बन्द पी और परदे गिरे थे। कहा जा सकते हैं इस वक्त ? वह मकान के पिछवाडे गया-वही लॉन, फैम और माड़ियों पों, जो उसने दो साल पहले देखी थी, बीच में विलो अपनी टहनियों का एक काले, बूढ़े रीछ की तरह अंघ रहा पा। लेकिन गैराज खुला और खाली पड़ा था; वे वही कार लेकर गये थे, मम्भव है, उन्होंने सारी सुबह उमको प्रतीक्षा की हो और मव किमी काम से बाहर चले गये हो। लेकिन दरवाजे पर उसके लिए एक चिट तो छोड़ हो सकते थे? वह दुबारा मामने के दरवाजे पर लौट आया अगस्त को पनवुन धूप उसकी आँखो पर पड़ रही पो। सारा शरीर रहा था। वह बरामदे में ही अपने सूटकेस पर बैठ गया। अचानक उमे सगा, सड़क के पार मकानों एक दिन मेहमान | 157 की खिड़कियों से कुछ चेहरे वाहर झांक रहे हैं, उसे देख रहे हैं। उसने सुना था, अंग्रेज लोग दूसरों की निजी चिन्ताओं में दखल नहीं देते, लेकिन वह मकान के बाहर बरामदे में बैठा था, जहां प्राइवेसी का कोई मतलब नहीं था इसीलिए वे निस्संकोच, नंगी उन्मुक्तता से उसे घूर रहे थे। लेकिन शायद उनके कौतूहल का एक दूसरा कारणं था; उस छोटे, अंग्रेजी कस्वाती शहर में लगभग सब एक-दूसरे को पहचानते थे और वह न केवल अपनी शक्ल-सूरत में, बल्कि झूलते-झालते हिन्दुस्तानी सूट में काफी अद्भुत प्राणी दिखायी दे रहा होगा। उसकी तुडी-मुड़ी वेशभूपा और गर्द और पसीने में लथपथ चेहरे से कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि अभी तीन दिन पहले फ्रेंक- फर्ट की कान्फ्रेंस में उसने पेपर पढ़ा था। 'मैं एक लुटा-पिटा एशियन इमीग्रेण्ट दिखायी दे रहा हूँगा'' उसने सोचा और अचानक खड़ा हो गया-मानो खड़ा होकर प्रतीक्षा करना ज्यादा आसान हो। इस बार विना सोचे-समझे उसने दरवाजा जोर से खटखटाया और तत्काल हकवकाकर पीछे हट गया-हाय लगते ही दरवाजा खट-से खुल गया। जीने पर पैरों की आवाज सुनायी दी --और दूसरे क्षण वह चौखट पर उसके सामने खड़ी थी। वह भागते हुए सीढ़ियां उतरकर नीचे आयी थी, और उससे चिपट गयी थी। इससे पहले वह पूछता, क्या तुम भीतर थीं? और वह पूछती, तुम बाहर खड़े थे ?.---उसने अपने धूल-भरे लस्तम-पस्तम हाथों से उसके दुवले कन्धोंको पकड़ लिया और लड़की का सिर नीचे झुक आया और उसने अपना मुंह उसके वालों पर रख दिया। पड़ोसियों ने एक-एक करके अपनी खिड़कियां बन्द कर दी। लड़की ने धीरे-से उसे अपने से अलग कर दिया, "बाहर कव से खड़े थे?" "पिछले दो साल से।" "वाह !" लड़की हंसने लगी। उसे अपने बाप की ऐसी ही बातें बौड़म जान पड़ती थीं। "मैंने दो बार घण्टी बजायी-तुम लोग कहां थे?" "घण्टी खराव है, इसीलिए मैंने दरवाजा खुला छोड़ दिया था।" "तुम्हें मुझे फोन पर बताना चाहिए था-मैं पिछले एक घण्टे से आगे- ।
पीछे दौड रहा था।" "मैं तुम्हें बतानेवाली थी, लेकिन बीच मे साइन कट गयी तुमने और पसे क्यों नही डाले ?" "मेरे पास सिर्फ दग पैसे थे वह औरत काफी घुल पो !" "कौन औरत?"लडकी ने उसका बंग उठाया। "वही, जिसने हमे धीच मे काट दिया।" आदमी अपना सूटकेस बीच ड्राइगरूम में घसीट तापा। लड़की उत्सुकता मे बंग के भीतर झांक रही पी-सिगरेट के पैकेट, स्कॉच को सम्बो बोतल, चॉकलेट के मण्डल-वे सारी चीजें, जो उसने इतनी हड़बड़ी में फेंक- फर्ट के एयरपोर्ट पर ड्यूटी-झी दुकान से खरीदी थी, अब बंग से ऊपर मक रही थी। "तुमने अपने बाल कटवा लिये?" आदमी ने पहली बार चन से महकी का चेहरा देखा। "हाँ सिर्फ छट्टियों के लिए । कैसे लगते है "अगर तुम मेरी बेटी नही होती, तो मैं ममता कोई लफमा घर में घुम आया है।" "ओह पापा!" लड़की ने हंसते हुए वैग से चाकलेट निकाली, रैपर खोला, फिर उसके आगे बढा दी। "स्विस चॉकलेट," उसने उसे हवा में डुलाते हुए कहा। "मेरे लिये एक गिलास पानी ला सकती हो "ठहो, मैं चाय बनाती हूं।" "चाय बाद में...", वह अपने कोट की अन्दरूनी जैर में स्टोमने नगा-नोटबुक, वालेट, पासपोर्ट-सब चीजें बाहर निकल आयौं, अन्त में उसे टेबलेट्स की डिम्बी मिली, जिसे वह टूट रहा पा। तहको पानी का गिलाम लेकर थायो तो उससे पूछा, "कमी दवाई 7" " "जर्मन", उसने कहा, "बहुत असर करती है।" उसने टेबलेट पानी के साप निगल ली, फिर सोफे पर बंट गया। सबकुछ वैमा ही था, जैसा उमने सोचा था। यही कमरा, शीशे का दरवाजा, प्ले हुए परदों के बीच वही एक दिन का मेहमान/159 गोमोर, हरेनमाल-सा लॉन, टी. वी. के स्क्रीन पर उड़ती पक्षियों की छाया, जो वाहर उड़ते थे और भीतर होने का भ्रम देते थे...! वह किचन की देहरी पर आया। गैस के चूल्हों के पीछे लड़की की पीठ दिखायी दे रही थी। कार्डराय की काली जीन्स और सफेद कमीज, जिसकी मुड़ी स्लीव्स वाहों की कुहनियों पर झूल रही थीं। वह बहुत हल्की और छुई: मुई-सी दिखायी दे रही थी। "मामा कहाँ हैं ?" उसने पूछा । शायद उसकी गावाज इतनी धीमी थी कि लड़की ने उसे नहीं सुना, किन्तु उसे लगा, जैसे लड़की की गर्दन कुछ ऊपर उठी थी। "मामा क्या ऊपर हैं ?" उसने दुवारा कहा और लड़की वैसे ही निश्चल खड़ी रही और तब उसे लगा, उसने पहली बार भी उसके प्रश्न को सुन लिया था। "क्या वह बाहर गयी हैं ?" उसने पूछा। लड़की ने बहुत धीरे, धुंधले ढंग से सिर हिलाया, जिसका मतलव कुछ भी हो सकता . - "तुम पापा, कुछ मेरी मदद करोगे?" वह लपककर किचन में चला आया, "वताओ, क्या काम है ?" "तुम चाय की केतली लेकर भीतर जाओ, मैं अभी आती हूँ।" "वस!" उसने निराश स्वर में कहा। "अच्छा, प्याले और प्लेटें भी लेते जाओ।" वह सब चीजें लेकर भीतर कमरे में चला आया। वह दुवारा किचन में जाना चाहता था, लेकिन लड़की के डर से वह वहीं सोफा पर बैठा रहा। किचन से कुछ तलने की खुशबू आ रही थी। लड़की उसके लिए कुछ बना रही थी और वह उसकी कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था। एक बार इच्छा हुई, किचन में जाकर उसे मना कर आये कि वह कुछ नहीं खायेगा--- किन्तु दूसरे क्षण भूख ने उसे पकड़ लिया। सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था। यूस्टनस्टेशन के कैफेटेरिया में इतनी लम्बी 'क्यू' लगी थी कि वह टिकट लेकर सीधा ट्रेन में घुस गया था। सोचा था, वह डायनिंग-कार में कुछ पेट में डाल लेगा, किन्तु वह दुपहर से पहले नहीं खुलती थी। सच पूछा जाय, तो उसने अन्तिम खाना कल शाम फेंकफर्ट की एयरपोर्ट में खाया था और जब रात को लन्दन पहुंचा था, तो अपने होटल की बार में पीता रहा था। तीसरे 160mme गिलास के बाद उमने जेब से नोटबुक निकाती, नम्बर देवा और योर के टेलीफोन बूय में जाकर फोन मिलाया था"पहली बार में पता नहीं पता, उसकी पत्नी की आवाज है या बच्ची की। उमसी पत्नी ने फोन उठाया होगा, क्योकि कुछ देर तक फोन का मन्नाटा उमके कान में मनानाडा रहा, फिर उसने सुना, वह ऊपर से बच्ची को बुला रही है। बौर तर उमने घड़ी देखी; उसे अचानक ध्यान आया, इम समय वह सो रही होगी, और वह फोन नीचे रखना चाहता था, किन्तु उसी समय उसे बच्ची का स्वर सुनायी दिया; वह आधी नीद में थी। उसे कुछ देर तक पता ही नहीं चला कि वह इण्डिया से बोल रहा है या फंकफर्ट से मा सन्दन से वह उसे अपनी स्थिति समझा ही रहा था कि तीन मिनट पत्म हो गये और उसके पास इतनी 'चेंज भी नहीं थी कि वह लाइन को कटने से बचा सके, तसल्ली मिर्फ इतनी थी कि वह नौद, धवराहट और नशे के बीच यह बनाने में मफल हो गया पाकि वह कल उनके शहर पहुंच रहा है कल यानी याज । ये अच्छे दक्षण थे। बाहर इग्बंण्ड की पीली और मुलायम धूप फैली थी। वह घर के भीतर था। उसके भीतर गरमाई की लहरें उठने लगी थी। हवाई अड्डों की भाग-दौड़, होटलों की होल हुज्जत, ट्रेन-टैक्सियो को यहाट- वह सबसे परे हो गया था। वह पर के भीतर या उमका अपना पर न राही, फिर भी एक घर--कुसियां, परदे, सोफा, टो. वी. । वह असें में इन लोगों के बीच रहा था और हर चीज के इतिहास को जानता पााहर दो-तीन साल बाद जब वह आता था, तो सोचता था-बच्ची कितनी बड़ी हो गयी होगी और पत्नो? वह कितनी बदल गयी होगी लेकिन ये चीजें उस दिन से एक धगह ठहरी थी, जिम दिन उसने पर छोड़ा पा; ये उनके माप जाती थी, उसके साथ सौट आती थी... "पापा, तुमने चाप नही हाली?" यह किचन में दो प्लेटें सफर पापी, और मसन थे, दूमरी में तले हुए मांगेज। "मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा था।" "चाम डालो, नहीं तो विकुल ठण्डी हो जायेगी।" वह उसके माप सोफा पर बैठ गयो। "टी वी. सौल चोगे ?" एक में दो
भी नहीं सुनो, तुम्हें मेरे स्टैम्प्स मिल गय थ
, पापा, थैक्स !" वह टोस्ट्स पर मक्खन लगा रही थी।
लेकिन तुमने चिट्ठी एक भी नहीं लिखी!"
मैंने एक लिखी थी, लेकिन जब तुम्हारा टेलीग्राम आया, तो मैंने
, अव तुम आ रहे हो तो चिट्ठी भेजने की क्या जरूरत ?"
"तुम सचमुच गागा हो।"
लड़की ने उसकी ओर देखा और हंसने लगी। यह उसका चिढ़ाऊ नाम
जो वाप ने वरसों पहले उसे दिया था, जब वह उसके साथ घर में रहता
, वह बहुत छोटी थी और उसने हिन्दुस्तान का नाम भी नहीं सुना था।
वच्ची की हंसी का फायदा उठाते हुए वह उसके पास झुक आया जैसे
वह कोई चंचल चिड़िया हो. जिले केवल सुरक्षा के भ्रामक क्षण में ही पकड़ा
जा सकता है, "ममी कब लौटेंगी?"
प्रश्न इतना अचानक था कि लड़की झूठ नहीं बोल सकी, "वह ऊपर
अपने कमरे में हैं।"
"ऊपर? लेकिन तुमने तो कहा था"
किरच, किरच, किरच-वह चाकू से जले हुए टोस्ट को कुरेद रही थी
मानो उसके साथ-साथ वह उसके प्रश्न को भी काट डालना चाहती हो।
हंसी अब भी थी, लेकिन अब वह वर्फ में जमे कीड़े की तरह उसके होंठों पर
चिपकी थी।
"क्या उन्हें मालूम है कि मैं यहाँ हूँ?"
लड़की ने टोस्ट पर मक्खन लगाया, फिर जैम-फिर उसके आगे प्लेट
रख दी।
"हाँ, मालूम है।" उसने कहा।
"क्या वह नीचे आकर हमारे साथ चाय नहीं पियेंगी?"
लड़की दूसरी प्लेट पर सॉसेज सजाने लगी-फिर उसे कुछ याद आया
वह रसोई में गयी और अपने साय मस्टर्ड और कैचुप की बोतलें ले आयी
"मैं ऊपर जाकर पूछ आता हूँ।" उसने लड़की की तरफ देखा,
उससे अपनी कार्यवाही का समर्थन पाना चाहता हो। जब वह कुछ न
वोली, तो वह जीने की तरफ जाने लगा।
162 / कव्वे और काला पानी
"प्लीज पापा।" उमके पांव ठिठक गये। "आप फिर उनसे लड़ना चाहते हैं ?" लड़की ने कुछ गुस्से मे उमे देगा। "सहना ।" वह शर्म से भीगा हुआ हंसने लगा, "मैं यहाँ दो हजार मील उनमे लड़ने आया हूं।" "फिर आप मेरे पास बैठिए।" लड़की का स्वर भरा हुआ पा। वह सपनी मां के साथ थी, लेकिन बाप के प्रति क्रूर नहीं थी। वह उसे पुरचाती निगाहो मे निहार रही थी-"मैं तुम्हारे पास हूँ, क्या मह काफी नहीं है?" वह खाने लगा, टोस्ट, समिज, टिन के उबले हुए मटर उमा भूया गयी थी, लेकिन लडकी की आंखें चम पर थी। वह उसे देख रही थी, और कुछ सोच रही थी, कभी-कभी टोस्ट का एक टुकड़ा मुंह मे डाल लेनी और फिर चाय पीने लगती। फिर उसकी ओर देखती और चुपवार मुस्कराने लगती, उसे दिलागा-मी देती, सबकुछ ठीक है, तुम्हारी जिम्मेदारी मुन्न पर है और जब तक मैं हूँ, डरने की कोई बात नहीं। डर नही था। टेबलेट का असर रहा होगा, या यात्रा की यमान-वह कुछ देर के लिए लड़की की निगाहो से हटना चाहता पा। वह अपने को हटाना चाहता था। "मैं अभी आता हूँ।" उसने कहा । लड़की ने सगंकित माखों से उसे देगा, "क्या वायरूम जायगे?" वह उनके साथ-साय गुमस- साने तक पली आयी और जब उसने दरवाजा बन्द कर लिया, तो भी उमे लगता रहा, वह दरवाजे के पीछे सही है... उसने बैंमिनी में अपना मुंह डाल दिया और नलका गोल दिया। पानी पर-मर उसके चेहरे पर बहने लगा - और वह मिसपने-गा लगा, माय बने हुए पाद उमकी छाती के सोखल से बाहर निकलने लगे, जरो भीतर जमी हुई काई उलट रहा हो, उलटी, जो मीधी दिन में बाहर आती है-यह टेवलेट जो कुछ देर पहले पायी थी, अब पोले चूरे-गो येसिनो के संगमरमर पर तैर रही थी। फिर उमने नल बन्द कर दिया और स्माल निकालकर मुंह पोछा। बाथरूम की यूटी पर स्त्री से मैले कपडे टंगे --- प्लास्टिक की एक चौड़ी बाल्टी में अण्डरवियर और प्रेसियर साबुन में एवं ये खिड़की यली पी और याग का विध्याडा धूप मे चमक रहा था। वहीं एक दिन का मेहमान / 163 - किसी दूसरे बाग से घास काटने की उनींदी-सी पुरी-धुरं पास मा रही थी" वह जल्दी से वापरूम का दरवाजा बन्द करके कमरे में चला आया। सारे घर में सन्नाटा था। वह किचन में आया, तो लड़की दिखायी नहीं दी। वह ड्राइंग रूम में लोटा, तो वह भी खाली पड़ा था। उसे सन्देह हुआ कि यह ऊपरवाले कमरे में अपनी मां के पास बैठी है। एक अजीव आतंक ने उसे पकड़ लिया। घर जितना शान्त था, उतना ही खतरे से अटा जान पड़ा। वह कोने में गया, जहां उसका सूटकेस रखा था, वह जल्दी-जल्दी उसे खोलने लगा। उसने अपने कान्फ्रेंस के नोट्स और कागज अलग किये, उनके नीचे में वह सारा सामान निकालने लगा, जो वह दिल्ली से अपने साथ लाया था---एम्पोरियम का राजस्थानी लहँगा (लड़की के लिए), तांबे और पीतल के दिवोट्स, जो उसने जनपथ पर तिब्बती लामा सिप्पियों मे खरीदे थे, पशमीने की कश्मीरी शाल (बच्ची की मां के लिए), एक लाल, गुजराती गरीदार स्लीपर, जिरो बच्ची और माँ दोनों पहन सकते थे, हैण्ड- लूम के वैडकवर, हिन्दुस्तानी टिकटों की अल्वम--और एक बहुत बड़ी, सचिम किताव, 'बनारस : द एटर्नल सिटी।' फर्श पर धीरे-धीरे एक छोटा- सा हिन्दुस्तान जमा हो गया था, जिसे वह हर बार यूरोप आते समय अपने साथ होलाता था। सहसा उसके हाथ ठिठक गये। यह कुछ देर तक चीजों के ढेर को देखता रहा । कमरे के फर्श पर विखरी हुई वे बिल्कुल अनाथ और दयनीय दिखायी दे रही थीं। एक पागल-सी इच्छा हुई कि वह उन्हें कमरे में जैसे का तैसा छोड़कर भाग खड़ा हो। किसी को पता भी नहीं चलेगा, वह कहाँ चला गया ? लड़की थोड़ा-बहुत जरूर हैरान होगी, किन्तु बरसों से वह उससे ऐसे ही अचानक मिलती रही थी और बिना कारण विद्युड़ती रही थी। 'यू आर ए कमिंग मैन एण्ड ए गोइंग मैन', वह उससे कहा करती थी, पहले विवाद में और बाद में कुछ-कुछ हसी में "उसे कमरे में न बैठा देख- पर लड़की को ज्यादा सदमा नहीं पहुंचेगा। वह ऊपर जायेगी और मां मे पाहेगी, "अब तुम नीचे आ सकती हो; वह चले गये।" फिर वे दोनों एक- साय नीचे आयेंगी, और उन्हें राहत मिलेगी कि अब उन दोनों के अलावा घर में कोई नहीं है। - । । - - 16Altrome- "पापा!" वह चौंक गया, जैसे रंगे हायो पकडा गया हो। जिसिरानी-सी मुस्करा. हट में लड़की को देसा-वह कमरे की चौसट पर पडी पी और पते हुए सूटकेस को ऐने देस रही थी, जैसे यह कोई जादू की पिटारी हो, जिसने अपने पेट में अचानक रग-विरणी चीजों को उगन दिया हो। मेक्नि उमगी मांतों में कोई सुशो नहीं पो, एक धर्म-सी थी, जब बच्चे अपने बाटोको कोई ऐसी ट्रिक करते हुए देखते हैं जिसका भेद उन्हें पहले से मालूम होता है; वे अपने मकोच को छिपाने के लिए कुछ पादा ही उन्मुक हो जाते हैं। "इतनी चीजें?" वह आदमी के सामने कुर्मी पर पंठ गयो, “कसे माने दों ? सुना है आजकल कस्टमवाले बहुत तग करते हैं।" "नहीं, इस बार उन्होंने कुछ नहीं किया", आदमी ने उत्साह मे आकर कहा, "शायद इमलिए कि मैं सीधे फेंकफर्ट से आ रहा था। उन्हें सिर्फ एक चीन पर पाक हुमा था।" उमने मुस्कराते हुए लड़की की ओर देखा। "किस चीज पर?" सडकी ने इस यार सच्ची उरगुरता से पूछा। उसने अपने बैग से दालवीजीका डिम्बा निकाला और उसे गोलकर मेज पर रख दिया। लड़की ने शिमकते हुए दो-चार दाने उठाये और उन्हे सूंघने लगी, "क्या है यह ?" उसने जिज्ञासा से आदमी को देगा। "वे भी इसी तरह सूंघ रहे थे," यह हमने सगा, "उन्हें पर पाकिमही इसमे घरस-गांजा तो नहीं है।" "हैना?" सड़की की मांखें फैल गयी, "गया इसमें सपमुप है। मिसी "साकर देखो।" लड़की ने कुछ दालमोठ मुंह में दाले और उन्हें पयाने सगी, फिर हलाट-सी होकर सी-सी करने लगी। "मिर्च होगी-यूक दो!" आदमी ने पुछ घबराकर वहा । किन्तु लड़को ने उन्हें निगल लिया और सहनाई बागों से यापको देसने लगी। "तुम भी पागल हो."मद निगत बैठी।" पादमी ने जल्दी से उरी पानी का गिलास दिया, जो यह उसके लिए सापी पी। एक दिन का मेहमान/165 -- "मुझे पसन्द है।" लड़की ने जल्दी से पानी पिया और अपनी कमीज़ की मुड़ी हुई वाहों से आँखें पोंछने लगी। फिर मुस्कराते हुए बादमी की ओर देखा, "आई लव ईट।" वह कई बातें सिर्फ आदमी का मन रखने के लिए करती थी। उनके बीच बहुत कम मुहलत रहती थी और वह उसके निकट पहुंचने के लिए ऐसे शार्टकट लेती थी, जिसे दूसरे बच्चे महीनों में पार करते हैं। "क्या उन्होंने भी इसे चखकर देखा था?" लड़की ने पूछा। "नहीं, उनमें इतनी हिम्मत कहाँ थी! उन्होंने सिर्फ मेरा सूटकेस खोला, मेरे कागजों को उलटा-पलटा और जब उन्हें पता चला कि मैं कान्फ्रेंस मे आ रहा हूं तो उन्होंने कहा, 'मिस्टर, यू मे गो।" "क्या कहा उन्होंने ?" लड़की हंस रही थी। "उन्होंने कहा, 'मिस्टर यू मे गो, लाइक एन इण्डियन को!' आदमी ने भेदभरी निगाहों से उसे देखा । 'क्या है यह ?" लड़की हँसती रही -जब वह बहुत छोटी थी और आदमी के साथ पार्क में घूमने जाती थी, तो वे यह सिरफिरा खेल खेलते थे। वह पेड़ की ओर देखकर पूछता था, ओ डियर, इज़ देयर एनीथिंग टू सी ? और लड़की चारों तरफ देखकर कहती थी, येस डियर, देयर इज़ ए को ओवर द ट्री। आदमी विस्मय से उसकी ओर देखता । क्या है यह ? और वह विजयोल्लास में कहती-पोयम ! ए पोयम ! बढ़ती हुई उम्र में छूटते हुए वचपन की छाया सरक आयी--पार्क की हवा, पेड़, हँसी। वह वाप की उँगली पकड़कर सहसा एक ऐसी जगह आ गयी, जिसे वह मुद्दत पहले छोड़ चुकी थी, जो कभी-कभार रात को सोते हुए सपनों में दिखायी दे जाती थी "मैं तुम्हारे लिए कुछ इण्डियन सिक्के लाया था.''तुमने पिछली बार कहा थान!" "दिखाओ, कहाँ हैं ?" लड़की ने कुछ जरूरत से ज्यादा ही ललकते हुए पूछा। आदमीने सलमे-सितारों से जड़ी एक लाल थैली उठायी--जिसे हिप्पी लोग अपने पासपोर्ट के लिए खरीदते थे। लड़की ने उसे उसके हाथ से छीन - - 166/कव्वे और काला पानी . लिया और हवा में मुलाने लगी। भीतर रपी चवन्निया, अठन्नियो, पह- चहाने लगी, फिर उसने थैली का मुंह मोना और मारे पगों को मेज पर विखेर दिया। "हिन्दुस्तान में क्या सब लोगो के पास ऐम ही मिक्के होते हैं ?' वह हमने लगा, “और क्या मनके लिए अलग-अलग बनेंगे?" उमने कहा। "लेकिन गरीब लोग?" उसने आदमी को देखा, "मैंने एक रात टी.वी. मे उन्हें देखा था ।" यह सिक्को को भूल गयी और कुछ असमंजस मे फर्श पर विवरी चीजो को देखने लगी। तव पहनी वार आदमी को लगा- वह लड़की जो उसके सामने बैठी है. कोई दूसरी है। पहबान का फेम वही है जो उमने दो माल पहले देखा था लेकिन बीच की तस्वीर बदल गयी है। किन्तु वह यदली नही थी, वह सिर्फ कही और चली गयी थी। वे मा-याप जो अपने बच्चों के माय हमेशा नही रहते, उन गोपनीय मजिलो के बारे में कुछ नहीं जानते जो उनके अभाव की नीव पर कपर ही ऊपर वनती रहती हैं, लड़की अपने बचपन की बेसमेण्ट में जाकर ही पिता से मिल पाती पी लेकिन कभी-कभी उमे टोड़कर दूसरे कमरो मे चली जाती थी, जिसके बारे में आदमी को कुछ भी मालूम नहीं था। "पापा!" नड़की ने उसकी ओर देखा, "क्या मैं इन चीजो को समेट- कर रख दूं?" "क्यों, इतनी जल्दी क्या है?' "नहीं, जल्दी नहीं लेकिन मामा आकर देखेंगी तr. !" उसके स्वर मे हल्की-सी घबराहट पी, जमे वह हवा में किमी अदृश्य सतरे को मप रही हो। "आयेंगी तो पपा?" आदमो ने मुछ विग्मय से लड़की को देगा। "पारा, धीरे बोलो"!" लडकी ने कार कमरे की तरफ देगा, ऊपर सन्नाटा पा, जैसे घर की एक देह हो, दो मे बंटी हुई, जिसका एक हिस्मा सुन्न और निस्पन्द पड़ा हो, दूमरे मे वे दोनो वैठे थे। और तब उमेघम हमा कि सहको कोई कटपुतली का नाटक कर रही है। कार के धागे से बंधी हुई, जैसे वह खिचता है, वैसे वह हिलती है, लेकिन वह न धान को देश एक दिन या मेहमान /167 . , सकता है, न उसे, जो उसे हिलाता है' वह उठ खड़ा हुआ। लड़की ने आतंकित होकर उसे देखा, "आप कहां जा रहे हैं ?" "वह नीचे नहीं आयेंगी?" उसने पूछा। "उन्हें मालूम है, आप यहाँ हैं ।" लड़की ने कुछ खीजकर कहा। "इसीलिए वह नहीं आना चाहती ?" "नहीं..." लड़की ने कहा, "इसीलिए वह कभी भी आ सकती हैं।' कैसे पागल हैं। इतनी छोटी-सी बात नहीं समझ सकते । "आप वैठिए, मैं अभी इन सब चीज़ों को समेट लेती हूँ।" वह फर्श पर उकडू बैठ गयी; बड़ी सफाई से हर चीज़ को उठाकर कोने में रखने लगी। मखमल की जूती, पशमीने की शाल, गुजरात एम्पो- रियम का वैडकवर । उसकी पीठ पिता की ओर थी, किन्तु वह उसके हाथ देख सकता था, पतले और साँवले, बिल्कुल अपनी मां की तरह, वैसे ही निस्संग और ठण्डे, जो उसकी लायी चीज़ों को आत्मीयता से पकड़ते नहीं थे, सिर्फ अनमने भाव से अलग ठेल देते थे। वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे, जिसने सिर्फ मां के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कन्दरा से उमड़ता हुआ वाहर आता है। अचानक लड़की के हाथ ठिठक गये । उसे लगा, कोई दरवाजे की घण्टी वजा रहा है लेकिन दूसरे ही क्षण फोन का ध्यान आया जो जीने के नीचे कोटर में था और जंजीर से बंधे पिल्ले की तरह जोर-जोर से चीख रहा था। लड़की ने चीजें वैसे ही छोड़ दी और लपकते हुए सीढ़ियों के पास गयी, फोन उठाया, एक क्षण तक कुछ सुनायी नहीं दिया। फिर वह चिल्लायी- "मामा, आपका फोन !" बच्ची वेनिस्टर के सहारे खड़ी थी, हाथ में फोन झुलाती हुई। ऊपर का दरवाजा खुला और जीना हिलने लगा। कोई नीचे आ रहा था, फिर एक सिर लड़की के चेहरे पर झुका, गुंथा हुआ जूड़ा और फोन के बीच एक पूरा चेहरा उभर आया... "किसका है ?" औरत ने अपने लटकते हुए जूड़े को पीछे धकेल दिया 168 / कव्वे और काला पानी । - . और सड़को के हाथ से फोन गीच लिया। आदमी कुर्मी से उटा"लड़की ने उसकी ओर देखा! "हलो",औरत ने कहा। "हलो, हलो", औरत की बावार कपर उठी और तब उसे पता चला, कि यह उस स्त्री की आवाज है, जो उसकी पत्नी थी, वह उसे वरमों बाद भी संकड़ों आदानो की भोर में पहचान सकता था"ऊंची पिच पर हल्के में कापती हुई, हमेशा में मस्त, माहत, परेशान, उसकी देह की एकमात्र चीज, जो देह में परे यादमी की आरमा पर खून की सरोच सोच जाती पो"बह में उठा पा से ही बैठ गया। लड़की मुस्करा रही थी। वह हैंगर के आईने से आदमी का चेहरा देख रही थी और वह पेहरा कुछ वैसा ही बेडौल दिखायी दे रहा था जैसे उम्र के आईने से औरत को आवाज-उल्टा, टेढा, पहेनी-सा रहस्यमय ' वे तीनो व्यक्ति अनजाने में पार में बंट गये थे-लड़की, उमको मा, वह और उसको पली"पर जब गृहस्थी में बदलता है, तो अपने-आप फैलता जाता है "तुम जेनी से बात करोगी?" औरत ने लड़की से कहा और बच्चो जमे इमी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी। वह उछलकर ऊपरी सौटी पर आयी और मां से टेलीफोन से लिया, "हलो जेनी, इट इज मी !" वह दो सौदिया नीचे उतरी; अब भादमी उमे पूरा-का-पूरा देस सकता पा। बेवस- "वठो.", आदमी कुर्सी से उट सहा हुवा। उसके स्वर में एक सा अनुनय था, मानो उसे डर हो किमही उसे देखकर वह उल्टे पावन सोर जाये। यह एक क्षण यनिश्चय में पड़ी रही । अव वारस मुन्ना निरपंक पा, लेकिन इस तरह उसके मामने सड़े रहने का भी कोई सुरु नहीं पा। यह स्टूल बीचकर टी.वी. के आगे बैठ गयी। "कब आये?" उसका स्वर इतना घीमा पाकिआदमी कोनमा, टेसीफोन पर कोई दूमरी औरत बोल रही थी। "कापी देर हो गयी"मुझे तो पता भी न था कि तुम कार कमरे मे एक दिन का मेहमान/169 - .. स्त्री चुपचाप उसे देखती रही। आदमी ने जेब से रूमाल निकाला, पसीना पोंछा, मुस्कराने की कोशिश में मुस्कराने लगा। "मैं बहुत देर तक बाहर खड़ा रहा, मुझे पता नहीं था, घण्टी खराब है। गैराज खाली पड़ा था, मैंने सोचा, तुम दोनों कहीं बाहर गये हो तुम्हारी कार?" उसे मालूम था, फिर भी उसने पूछा। "सविसिंग के लिए गयी है!" स्त्री ने कहा । वह हमेशा से उसकी छोटी, वेकार की बातों से नफरत करती आयी थी, जबकि आदमी के लिए वे कुछ ऐसे तिनके थे, जिन्हें पकड़कर डूबने से बचा जासकता था। कम-से-कम कुछ देर के लिए "तुम्हें मेरा टेलीग्राम मिल गया था? मैं फ्रेंकफर्ट आया था, उसी टिकट पर यहाँ आ गया; कुछ पौण्ड ज्यादा देने पड़े। मैंने तुम्हें वहां से फोन भी किया, लेकिन तुम दोनों कहीं वाहर थे." "कब ?" औरत ने हल्की जिज्ञासा से उसकी ओर देखा, "हम दोनों घर में थे।" "घण्टी बज रही थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं। हो सकता है, आप- रेटर मेरी अंग्रेजी नहीं समझ सकी और गलत नम्बर दे दिया हो! लेकिन सुनो।" वह हमने लगा, "एक अजीव वात हुई। हीथो पर मुझे एक औरत मिली, जो पीछे से बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखायी दे रही थी, यह तो अच्छा हुआ मैंने उसे बुलाया नहीं"हिन्दुस्तान के बाहर हिन्दुस्तानी औरतें एक जैसी ही दिखायी देती हैं।"" वह बोले जा रहा था। वह उस आदमी की तरह था जो आंखों पर पट्टी बांधकर हवा में तनी हुई रस्सी पर चलता है, स्त्री कहीं बहुत नीचे थी, एक सपने में. जिसे वह बहुत पहले कभी जानता था, किन्तु अव उसे याद नहीं आ रहा था कि वह उसके सामने क्यों बैठा या ? वह चुप हो गया। उसे ख्याल आया, इतनी देर से वह सिर्फ अपनी आवाज सुन रहा है, उसके सामने बैठी स्त्री विल्कुल चुप बैठी थी। उसकी ओर बहुत ठण्ढी और हताश निगाहों से देख रही थी। "क्या बात है ?" आदमी ने कुछ भयभीत-सा होकर पूछा। "मैंने तुमसे मना किया था; तुम समझते क्यों नहीं ?" 170/कन्वे और काला पानी , "किम लिए? तुमने किम लिए मना किया पा?" "मैं तुमने कुछ नहीं चाहती "मेरे घर तुम में मव भी क्यों नाते हो; क्या फायदा है इना?" पहल क्षग वह नहीं मनझा, कौन-मी ची? फिर इसकी निगाहें फर्ग पर गयीमान्ति-निनन का पर्म, डाक टिकटों का यल्बम, दारवीडी का डिब्बा-दे अब विल्युल लूटी-पिटी दिदापी दे रही थी, जो वह नीं पर बैठाया, दमी दे फर्श पर दिनुहुर। "कौन-मी ज्यादा है ?" उमने विमियान हुए कहा, "इन्हें न लाता टो आमा मूटकम दानी पड़ा रहता।" "लेकिन मैं तुमने कुछ नहीं चाहती "तुम क्या इतनी-नी बात नहीं माझ मनं?" स्त्री की वादार कास्टी कार ठी, विपके पीछे न जाने कितनी लहायों की पीडा, फिटने दरकों का पानी भरा था, जो बांध टूटते ही दमक पाम माने लगा, एक-एक इंच आगे बढ़ाया। उसने जेब से कमान निकाला और बरेलयाय चेहरे कोपाठने नगा। "वमा तुम्हें उतनी देर के लिए बागरा भी बुरा लगता है ?" "हाँ"" टनका वैहरा तन मया, चिरमजीव हताशा में बह टोनी पड़ गयी, "मैं तुम्हें देवना नहीं चाहती- क्या यह इतना बापान है ! वह रिटी नड़ो की तरह दन देखने समा, जोमबाल मनाने के बाद भी बहाना करता है कि मैं कुछ ममाम में नहीं आया।"दश!" उसने बारे में कहा, "प्लीच!" "मुम मा करो" योग्टन रहा। "दम चाहती का हो?" "नींद मी अनान"ाइनो ज्यान में कुछ और नहीं चाहती।" "मैं वच्ची मे मीनिने नहीं या मरदा?" "इस घर में नहीं, दूर उमट्टी बाहर निलम हो?" "दादर!"वादनी ने हायर निर दद्याना"बाहर कहाँ ?" व्यावहन गया किदाहामारी दुनियादला है,पार,मट होटन कमर-मका नाममार-दन्त्री रामदासांग पिगी? यह धन पर हंस रही थी। कुछ मट्टरह में दही.. दही आ सकती। डैडी घर में हैं, अभी-अभी आ रहे हैं।'नहीं, मुझे मालूम नहीं। मैंने पूछा नहीं ..।" क्या नहीं मालम? शायद उसकी सहेली ने पूछा था, वह कितने दिन रहेगा? सामने बैठी स्त्री भी शायद यह जानना चाहती थी, कितना समय, कितनी घड़ियां, कितनी यातना अभी और उसके साथ भोगनी पड़ेगी? शाम की आखिरी धूप भीतर आ रही थी। टी. वी. का स्क्रीन चमक रहा था, लेकिन वह खाली था और उसमें सिर्फ स्त्री की छाया वैठी थी, जैसे खबरें शुरू होने से पहले एनाउंसर की छवि दिखायी देती है, पहले कमजोर और धुंधली, फिर धीरे-धीरे 'ब्राइट' होती हुई "वह सांस रोके प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कुछ कहेगी हालांकि उसे मालूम था कि पिछले वर्षों में सिर्फ एक न्यूज-रील है जो हर बार मिलने पर एक पुरानी पीड़ा का टेप खोलने लगती है, जिसका सम्बन्ध किसी दूसरी जिन्दगी से है चीजें और आदमी कितनी अलग हैं ! बरसों बाद भी घर, किताबें, कमरे वैसे ही रहते हैं, जैसा तुम छोड़ गये थे; लेकिन लोग? वे उसी दिन से मरने लगते हैं, जिस दिन से अलग हो जाते हैं." मरते नहीं, एक दूसरी जिन्दगी जीने लगते हैं, जो धीरे-धीरे उस जिन्दगी का गला घोंट देती है, जो तुमने साथ गुजारी थी" "मैं सिर्फ बच्ची से नहीं." वह हकलाने लगा, "मैं तुमसे भी मिलने आया था।" "मुझसे ?" औरत के चेहरे पर हंसी, हिकारत, हैरानी एकसाथ उमड़ आयीं, "तुम्हारी झूठ की आदत अभी तक नहीं गयी! "तुमसे झूठ बोलकर अब मुझे क्या मिलेगा?" "मालूम नहीं, तुम्हें क्या मिलेगा-मुझे जो मिला है, उसे मैं भोग रही हूँ।" उसने एक ठहरी ठण्डी निगाह से बाहर देखा। "मुझे मगर तुम्हारे वारे में पहले से ही कुछ मालूम होता, तो मैं कुछ कर सकती थी।" "क्या कर सकती थीं?" एक ठण्डी-सी झुरझुरी ने आदमी को पकड़ - लिया। "कुछ भी।"मैं तुम्हारी तरह अकेली नहीं रह सकती; लेकिन अब इस उम्र में अव कोई मुझे देखता भी नहीं।" 172/कव्वे और काला पानी "बुक्कू"!" उसने हाप पकड़ लिया। "मेरा नाम मत तो वह सब खत्म हो गया।" वह रो रही थी; विल्कुल निस्संग, जिसका गुजरे हुए आदमी और आनेवाली उम्मीद-दोनों से कोई सरोकार नहीं थी। नासू, जो एक कारण से नहीं, पूरा पत्थर हट जाने से आते हैं, एक ढलुआ जिन्दगी पर नाले की तरह बहते हुए, औरत बार-बार उन्हें अपने हाथ से झटक देती थी.. वच्ची कब से फोन के पास चुप बैठी थी। वह जीने को सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी थी और सूची आंखों से रोती मां को देख रही पी। उसके सब प्रयत्न निष्फल हो गये थे,किन्तु उसके चेहरे पर निराशा नहीं थी। हर परि- वार के अपने दुस्वप्न होते हैं जो एक अनवरत पहिये में घूमते हैं, वह उसमे हाप नही डालती थी। इतनी कम उम्र में वह इतना बडा सत्य जान गयी थी कि मनुष्य के मन और बाहर की सृष्टि में एक अद्भुत समानता है- जब तक अपना चक्कर पूरा नही कर लेते, उन्हें बीच मे रोकना बेमानी है। वह विना आदमी को देखे मां के पास गयी; कुछ कहा, जो उसके लिए नही था। औरत ने उसे अपने पास बिठा लिया, बिल्कुल अपने से सटाकर। काऊच पर बैठी वे दोनों दो बहनो-सी लग रही थीं। वे उसे भूल गयी थीं। कुछ देर पहले जो ज्वार उठा था, उसमे घर डूब गया था लेकिन अब पानी वापस लौट गया था और अब आदमी वहाँ पा, जहां उसे होना चाहिए था-किनारे पर । उसे यह ईश्वर का वरदान जैसा जान पड़ा; यह दोनों के बीच बैठा है-अदृश्य ! बरसों से उसकी यह साध रही थी कि यह माँ और बेटी के बीच अदृश्य वैठी रहे। सिर्फ ईश्वर ही अपनी दया मे अदृश्य होता है-यह उसे मालूम था। किन्तु जो आदमी गढ़हे की सबसे निपली सतह पर जीता है, उसे भी कोई नहीं देख सकता। मां और बच्ची ने उसे अलग छोड़ दिया था; यह उसकी उपेक्षा नही थी। उसकी तरफ से मुंह मोड़कर उन्होंने उसे अपने पर छोड दिया मा-ठीक वही-जहाँ उसने बरसो पहले घर छोडा था। लड़की मां को छोड़कर उसके पास आकर बैठ गयी। "हमारा बाग देखने चलोगे?" उसने कहा। "अभी ?" उसने कुछ विस्मय से लड़की को देखा। वह कुछ अघोर एक दिन का मेहमान /1732 और उतावली-सी दिखायी दे रही थी, जैसे वह उससे कुछ कहना चाहती हो, जिसे कमरे के भीतर कहना असम्भव हो। "चलो," आदमी ने उठते हुए कहा, "लेकिन पहले इन चीजों को ऊपर ले जाओ।" "हम इन्हें बाद में समेट लेंगे।" "वाद में कव?" मादमी ने कुछ सशंकित होकर पूछा। "आप चलिए तो!" लड़की ने लगभग उसे घसीटते हुए कहा । "इनसे कहो, अपना सामान सूटकेस में रख लें।" स्त्री की आवाज सुनायी दी। उसे लगा, किसी ने अचानक पीछे से धक्का दिया हो। वह चमककर पीछे मुड़ा, "क्यों ?" "मुझे इनकी कोई जरूरत नहीं है।" उसके भीतर एक लपलपाता अन्धड़ उठने लगा, "मैं नहीं ले जाऊँगा; तुम चाहो तो इन्हें बाहर फेंक सकती हो।' "बाहर?" स्त्री की आवाज थरथरा रही थी, "मैं इनके साथ तुम्हें भी बाहर फेंक सकती हूँ।" रोने के बाद उसकी आँखें चमक रही थीं; गालों का गीलापन सूखे कांच-सा जम गया था, जो पोंछे हुए नहीं, सूखे हुए मांसुओं से उभरकर आता है। "क्या हम बाग देखने नहीं चलेंगे?" बच्ची ने उसका हाथ खींचा. और वह उसके साथ चलने लगा। वह कुछ भी नहीं देख रहा था। घास, क्यारियां और पेड़ एक गूंगी फिल्म की तरह चल रहे थे। सिर्फ उसकी पत्नी की आवाज़ एक भुतली कमेण्ट्री की तरह गूंज रही थी--बाहर, बाहर, बाहर! "आप ममी के साथ वहस क्यों करते हैं ?" लड़की ने कहा। "मैंने बहस कहां की ?" उसने बच्ची को देखा-जैसे वह भी उसकी . दुश्मन हो "आप करते हैं।" लड़की का स्वर अजीब-सा हठीला हो आया था। वह अंग्रेजी में 'यू' कहती थी, जिसका मतलब प्यार में 'तुम' होता था और नाराजगी में 'आप' । अंग्रेजी सर्वनाम की यह सन्दिग्धता बाप-बेटी के रिश्ते 174/कब्वे और कालापानी को हवा मे टगि रहती थी, कभी बहुत पास, कभी बहुत पराया-जिसका सही अन्दाज उसे सिर्फ लडकी की टोन में टटोलना पड़ता था। एक मजोय. से भय ने आदमी को पकड़ लिया। वह एक ही समय में मां और बच्ची दोनों को नहीं खोना चाहता था। "बडा प्यारा बाग है," उसने फुसलाते हुए कहा, "क्या माली आता "नही, पाली नहीं।" लडको ने उत्साह से कहा, "मैं शाम को पानी देती हूँ और छुट्टी के दिन ममी घास काटती हैं। इधर आओ, मैं तुम्हें एक चीज दिखाती हूं।" वह उसके पीछे-पीछे चलने लगा। लॉन बहुत छोटा था--हरा, पीला, मखमली ! पीछे गैराज था और दोनो तरफ झाडियो को फेंस लगी थी। बीच में एक पना, बूढा, विलो सहा था। लडकी पेड के पीछे छिप-सी गयी, फिर उसकी आवाज सुनायो दो, "वहाँ हो तुम वह चुपचाप, दवे-पांवो से पेड़ के पीछे चला आया और हैरान-सा खडा रहा। विलो और फेंस के बीच काली लकड़ी का वाहा था, जिसके दरवाजे से एक खरगोश बाहर झांक रहा या, दूसरा खरगोदा लहकी की गोद मे था। वह उसे ऐमे सहला रही थी, जैसे वह ऊन का गोला हो, जो कभी भी हाथ मे छूटकर झाडियों में गुम हो जायेगा। "ये हमने अभी पाले हैं। पहले दो थे, अव चार।" "बाकी कहाँ हैं ?" "बाडे के भीतर "वे अभी बहुत छोटे हैं।" पहले उसका मन भी सरगोश को छूने के लिए हुआ, किन्तु उमका हाय अपने-आप बच्ची के सिर पर चला गया और वह धीरे-धीरे उसके भूरे, छोटे बालो से सेलने लगा। लड़की चुप खड़ी रही और खरगोश अपनी नाक सिकोड़ता हुआ उसकी ओर ताक रहा था। "पापा ?" लड़की ने बिना सिर उठाये धीरे-से कहा, "वया आपने रे. रिटर्न का टिकट लिया है ?" "नही, क्यों?" "ऐसे ही; यहाँ वापसी टिकट बहुत सस्ता मिल जाता है।" एक दिन का मेहमान /175 - क्या उसने यही पूछने के लिए उसे यहां बुलाया था? उसन ना हाथ लड़की के सिर से हटा लिया। "आप रात को कहां रहेंगे?" लड़की का स्वर बिल्कुल भावहीन था। "अगर मैं यहीं रहूं तो ?" लड़की ने धीरे-से खरगोश को वाड़े में रख दिया और खट-से दरवाजा वन्द कर दिया। "मैं हंसी कर रहा था", उसने हंसकर कहा, "मैं आखिरी ट्रेन से लौट जाऊंगा।" लड़की ने मुड़कर उसकी ओर देखा, "यहां दो-तीन अच्छे होटल भी हैं। मैं अभी फोन करके पूछ लेती हूँ।" वच्ची का स्वर बहुत कोमल हो आया । यह जानते ही कि वह रात को घर में नहीं ठहरेगा, वह मां से हट- कर आदमी के साथ हो गयी; धीरे-से उसका हाथ पकड़ा, उसे वैसे ही सहलाने लगी, जैसे अभी कुछ देर पहले खरगोश को सहला रही थी। लेकिन आदमी का हाथ पसीने से तरबतर था। "सुनो, मैं अगली छुट्टियों में इण्डिया आऊँगी-इस बार पक्का है।" उसे कुछ आश्चर्य हुआ कि आदमी ने कुछ नहीं कहा; सिर्फ वाड़े में रगोशों की खटर-पटर सुनायी दे रही थी। "पापा' 'तुम कुछ बोलते क्यों नहीं ?" "तुम हर साल यही कहती हो।" "कहती हूँ.. लेकिन इस बार मैं आऊंगी; डोण्ट यू विलीव मी ?" "भीतर चलें ? ममी हैरान हो रही होंगी कि हम कहां रह गये।" अगस्त का अंधेरा चुपचाप चला आया था। हवा में विलो की पत्ति सरसरा रही थीं। कमरों के परदे गिरा दिये गये थे, लेकिन रसोई दरवाजा खुला था। लड़की भागते हुए भीतर गयी और सिंक का खोलकर हाथ धोने लगी। वह उसके पीछे आकर खड़ा हो गया; ऊपर आईने में उसने अपना चेहरा देखा-रूखी गर्द और बढ़ी हुई और सुखं आँखों के बीच उसकी ओर हैरत में ताकता हुआ-नहीं, लिए कोई उम्मीद नहीं "पापा, क्या तुम अब भी अपने-आपसे बोलते हो?" लड़की 176 कन्वे और काला पानी में भीगा अपना चेहरा उठाया-वह शीशे में उसे देख रही थी। "हो, लेकिन अब मुझे कोई सुनता नहीं"!" उसने धीरे से बच्ची के कन्धे पर हाथ रखा, "क्या फ्रिज में सोहा होगा?" "तुम भीतर चलो, मैं अभी लाती हूँ।" कमरे में कोई न था। उसकी ची वटोर दी गयी थी। सूटकेस कोने में खड़ा था; जब वे बाग में थे, उसकी पत्नी ने सायद उन सब चीजों को देखा होगा; उन्हें छुआ होगा। वह उससे चाहे कितनी नाराज क्यो न हो- चौगों की बात अलग यो। वह उन्हें ऊपर नहीं ले गयी थी, लेकिन दुवारा सूटकेस में डालने की हिम्मत नहीं की थी "उसने उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया था। कुछ देर बाद जब बच्ची सोडा और गिलास लेकर आयी, तो उसे सहसा पता नहीं चला कि वह कहाँ बैठा है। कमरे मे अंधेरा था-पूरा अंधेरा नहीं-~-सिर्फ इतना, जिसमें कमरे में बैठा आदमी चीजो के बीच चीज़ जैसा दिखायी देता है, "पापा 'तुमने बत्ती नहीं जलायो ?' "अभी जलाता हूँ...।" वह उठा और स्विच को ढूंढने लगा, बच्ची ने सोटा और गिलास मेज पर रख दिया और टेबुल लैम्प जला दिया। "ममी कहाँ है ?" "वह नहा रही हैं, अभी माती होंगी।" उसने अपने बैग से व्हिस्की निकाली, जो उसने फेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर खरीदी थी."गिलास में डालते हुए उसके हाथ ठिठक गये, "तुम्हारी जिजर-एल कहाँ है ?" "मैं अब असली वियर पीती हूं।" लड़की ने हंसकर उसकी ओर देवा. "तुम्हें बर्फ चाहिए?" "नहीं"लेकिन तुम जा कहाँ रही हो?" "वाहे में खाना डालने "नही तो वे एक-दूसरे को मार खायेंगे।" वह वाहर गयी तोखुले दरवाजे से वाग का अंधेरा दिखायी दिया- तारों की पीली तलछट में झिलमिलाता हुमा। हवा नहीं थी। बाहर का सन्नाटा घर की अदृश्य आवाजों के भीतर से छनकर आता था। उसे लगा, वह अपने घर में बैठा है और जो कभी बरसों पहले होता था, वह अव हो एक दिन का मेहमान / 177 . वह शॉवर के नीचे गुनगुनाती रहती थी और जब वह वाला 4 T साफे की तरह बांधकर बाहर निकलती थी, तब पानी की बूंदें म से लेकर उसके कमरे तक एक लकीर बनाती जाती थीं-पता नहीं कीर कहाँ बीच में सूख गयी? कौन-सी जगह, किस खास मोड़ पर चीज हाथ से छूट गयी, जिसे वह कभी दुवारा नहीं पकड़ सका? उसने कुछ और व्हिस्की डाली; हालाँकि गिलास अभी खाली नहीं ना था। उसे कुछ अजीव लगा कि पिछली रात भी यही घड़ी थी जब वह रहा था; लेकिन तव वह हवा में था। जव उसे एयर-होस्टेस की आवाज सुनायी दी कि हम चैनल पार कर रहे हैं तो उसने हवाई जहाज की खिड़की से नीचे देखा-कुछ भी दिखायी नहीं देता था-न समुद्र, न लाइट हाउस, सिर्फ अंधेरा, अंधेरे में बहता हुआ अंधेरा-फिर कुछ भी नहीं । और तव नीचे अंधेरे में झांकते हुए उसे खयाल आया कि वह चैनल जो नीचे कहीं दिखायी नहीं देता था, असल में कहीं भीतर है-उसकी एक जिन्दगी से दूसरी जिन्दगी तक फैला हुआ; जिसे वह हमेशा पार करता रहेगा, कभी इधर, कभी उधर, कहीं का भी नहीं, न कहीं से आता हुआ, न कहीं पहुँचता हुआ। "विन्दु कहाँ है ?" उसने चौंककर ऊपर देखा, वह वहाँ कवसे खड़ी थी, उसे पता नहीं चला था। "वाहर बाग में," उसने कहा, "खरगोशों को खाना देने।" वह अलग खड़ी थी, वेनिस्टर के नीचे। नहाने के बाद उसने एक लम्बी मैक्सी पहन ली थी। वाल खुले थे। चेहरा बहुत धुला और चमकीला-स लग रहा था। वह मेज पर रखे उसके गिलास को देख रही थी। उसक चेहरा शान्त था; शॉवर ने जैसे न केवल उसके शरीर को, बल्कि उस सन्ताप को भी धो डाला था। "वर्फ भी रखी है।" उसने कहा । "नहीं, मैंने सोडा ले लिया; तुम्हारे लिए एक बना दूं?" उसने सिर हिलाया, जिसका मतलव कुछ भी था; उसे मालूम गर्म पानी से नहाने के बाद उसे कुछ ठण्डा पीना अच्छा लगता था बाद भी वह उसकी आदतें नहीं भूला था, बल्कि उन आदतों के स - और काला पानी दोनों के बीच पुरानी पहचान लौट आती थी। वह रसोई मे गया और उमके लिए एक गिलास ले आया। उसमें थोड़ी-सी बर्फ डाली। जब व्हिस्की मिलाने लगा, तो उसकी आवाज सुनायी दौ--"बस, इतनी कापी है।" वह घुली हुई आवाज थी, जिसमे कोई रंग नहीं था. न स्नेह का, न नाराजगी का--एक शान्त और तटस्थ आवाज । यह सीढियो मे हटकर कुर्सी के पास चली आयी थी। "तुम बैठोगी नही ?" उमने कुछ चिन्तित होकर पूछा। उसने अपना गिलास उठाया और वही स्टूल पर बैठ गयी, जहाँ दुपहर को बैठी थी। टी. वी. के पास लेकिन टेबुल-लैम्प से दूर-जहां सिर्फ रोशनी की एक पतली-सी झाई उस तक पहुंच रही थी। कुछ देर तक दोनो मे से कोई कुछ नहीं बोला, फिर स्त्री की आवाज सुनापी दी, "घर मे सब लोग कैसे हैं ?" "ठीक हैं. ये सब चीजें उन्होने ही भेजी हैं।" "मुझे मालूम है," औरत ने कुछ थके स्वर में कहा, "क्यो उन बेचारो को तंग करते हो? तुम ढो-ढोकर इन चीजो को लाते हो और वे यहाँ बेकार पड़ी रहती हैं।' "वे यही कर सकते हैं," उसने कहा, "तुम वरसो से वहां गयी नहीं; वे बहुत याद करते हैं।" "अब जाने का कोई फायदा है ?" उसने गिलास से लम्बा बूंद लिया, "मेरा अब उनसे कोई रिश्ता नहीं।" "तुम बच्ची के साथ तो आ सकती हो, उसने अभी तक हिन्दुस्तान नहीं देखा।" वह कुछ देर चुप रही फिर धीरे-से कहा, "अगले साल वह चौदह वर्ष की हो जायेगी. "कानून के मुताविक तव वह कही भी जा सकती है।" "मैं कानून की बात नहीं कर रहा; तुम्हारे बिना वह कही नहीं जायेगी।" स्त्री ने गिलास की भीगी सतह से आदमी को देसा, "मेरा बग पले तो उसे वहां कभी न भेजूं।" "वयो?" आदमी ने उसकी ओर देखा। एक दिन का मेह धीरे-से हंसी, "क्या हम दो हिन्दुस्तानी उसके लिए काफी नहीं बैठा रहा। कुछ देर बाद रसोई का दरवाजा खुला, लड़की भीतर चुपचाप दोनों को देखा और फिर जीने के पास चली गयी, जहां न रखा था। 'किसे कर रही हो?" औरत ने पूछा। लड़की चुप रही, फोन का डायल घुमाने लगी। आदमी उठा, उसकी ओर देखा, "थोड़ा-सा और लोगी?" "नहीं...।" उसने सिर हिलाया। आदमी धीरे-धीरे अपने गिलास में लने लगा। "क्या बहुत पीने लगे हो?" औरत ने कहा । "नहीं...।" आदमी ने सिर हिलाया, "सफर में कुछ ज्यादा ही हो जाता है।" "मैंने सोचा था, अब तक तुमने घर बसा लिया होगा।" "कैसे ?" उसने स्त्री को देखा, "तुम्हें यह कैसे भ्रम हुआ?" औरत कुछ देर तक नीरव आंखों से उसे देखती रही, "क्यों, उस लड़की का क्या हुआ? वह तुम्हारे साथ नहीं रहती?" स्त्री के स्वर में कोई उत्तेजना नहीं थी, न क्लेश की कोई छाया थी "जैसे दो व्यक्ति मुद्दत बाद किसी ऐसी घटना की चर्चा कर रहे हों जिसने एक झटके से दोनों को अलग छोरों पर फेंक दिया था। "मैं अकेला रहता हूँ''मां के साथ ।" उसने कहा। औरत ने तनिक विस्मय से उसे देखा, "क्या बात हुई ?" "कुछ नहीं मैं शायद साथ रहने के काबिल नहीं हूँ।" उसका स्वर असाधारण रूप से धीमा हो आया, उसे अपनी किसी गुप्त वीमारी के बारे में बता रहा हो, "तुम हैरान हो? लेकिन ऐसे लोग होते हैं..." वह कुछ और कहना चाहता था, प्रेम के बारे में, वफादारी के बारे में विश्वास और धोखे के बारे में; कोई बड़ा सत्य, जो बहुत-से झूठों से मिल कर बनता है, व्हिस्की की धुन्ध में बिजली की तरह कौंधता है और दूस क्षण हमेशा के लिए अंधेरे में लोप हो जाता है।" जैसे वह काला पानी लडकी शायद इस क्षण को ही प्रतीक्षा कर रही थी; वह टेलीफोन से उठकर आदमी के पास आयो, एक बार मां को देखा, वह टेबुल-सैम्प के पीछे अंधेरे के आधे कोने में छिप गयी थी, और आदमी? वह गिलास के पीछे सिर्फ एक डबडबाता-सा धब्बा बनकर रह गया था। "पापा", लडकी के हाथ मे कागज का पुरजा था, "यह होटल का नाम है, टैक्सी तुम्हें सिर्फ दस मिनट मे पहुंचा देगी।" उसने लड़को को अपने पास खीच लिया और कागज जेब मे रस लिया। कुछ देर तक तीनों चुप बैठे रहे, जमे बरसों पहले यात्रा पर निकलने से पहले घर के सब प्राणी एकसाय सिमटकर चुप बैठ जाते थे। वाहर बहुत-से तारे निकल आये थे, जिसमे धूड़ी विलो, झाडिया और सरगोशो का बाड़ा एक निस्पन्द पोले आलोक मे पास-पास सरक आये थे। उसने अपना गिलास मेज पर रखा, फिर धीरे-से लडकी को चूमा, अपना सूटकेस उठाया और जब लड़की ने दरवाजा खोला, तो वह क्षण भर देहरी पर ठिठक गया, "मैं चलता हूँ।" उसने कहा । पता नहीं, यह यात उसने किससे कही भी, किन्तु जहाँ वह बैठी थी, वहाँ से कोई आवाज नही आयी। वहां उतनी ही घनी चुप्पी थी, जितनी बाहर अंधेरे मे, जहाँ वह जा रहा था।
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