Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Isha Upnishad Atmagyan
Front matter
BY ईशोपनिषा यजुर्वेद अध्याय चालीस की भूमिका । - (१) यजुर्वेदकी संहितायें। यजुर्वेदकी कई संहितायें इस समय उपलब्ध है । (१)काण्य (२)माध्यदिन, पाजसनेयी, (३) मैत्रायणी, (४) काठक, (५) तैत्तिरीय । इनमें कार और माध्यंदिन वाजसनेयी संहि- ताके अंतिम अर्थात् ४० घे अध्यायमें " आत्मज्ञान" का विचार किया है। यही घेदका अंतिम अध्याय होनेसे, घेदका अंतिम भाग अर्थात् "घेदका अंत " होनेसे इस आत्मज्ञान विभाग को "घेदांत" (द+संत) कहते हैं। काण्व संहिताका जो अंतिम ४० वां अध्याय है, वही "ईशो- निषद् " नामसे इस समय सुप्रसिद्ध है। माध्यंदिन शाखीय वाजसनेयी संहिता के ४० वे अध्याय के मंत्र केवल १७ हैं, और काय शाखाकी संहिताके १८ मंत्र है। इसके अतिरिक्त कुछ पाठ भेद भी हैं। दोनों पाट इस पुस्तक में दिये हैं, तुलना करने पर पाठकों को पाठभेदादिश का सर पता लग जायगा।
शिोपनिषद्। का वर्णन (२) अध्याय का नाम ! यजुर्पद के प्रत्येक अध्यापका उद्देश विशेप होता है, और तद. नुसार उसका नाम होता है । इस ६० वे अध्याय का नाम "आत्म. शान "है। फोई इसको" आरमाऽध्याय, ब्रह्माऽध्याय, आत्मस्पत, ब्रह्मसूक्त, ईशसक्त " आदि कहते हैं । इन सब शब्दोंका भाष एक ही है। इसका नाम "ईशोपनिषद् " सुप्रसिद्ध है। इस नामका भाव भी यही आशय व्यक्त करता है, कि इसमें"ईश की विद्या" अथवा "आत्माका ज्ञान कहा है। जिस सक्तमें जो देवता हुआ करती है, उस देवताफे अनुसार उस सूक्तका नाम हुआ करता है। जैसा "ग्नि,इंद" आदि देवताओं के सूक्तोका नाम " अग्निसूक्त, इंद्रस्मत " आदि होता है। इसी रीतिके अनुसार इस अभ्यायमें "आस्मा अथवा ब्रह्म होने से इसका नाम आश्मा-याय, आरमसूक्त किंवा ब्रह्मविद्या' होना स्वाभाविक ही है परंतु यहां कई विद्वान ऐसी शंका करते है कि इस में " अग्नि " आदि भिन्न देवताओं के नाम आने के कारण यह सब अध्याय एकही देवताका वर्णन नहीं करता है. अथवा ईशवर्णनसे मिन्न जो अग्नि आदि देवोंका वर्णन इस अ- पाय में है, यह प्रविद्ध है। इसलिये इस आशंकाका यहां अधिक विचार करना आवश्यक है। इस अध्याय की देवताका विचार करने के पूर्व इस बात को कहना योग्य है कि जिस समय दशोपनीपद अश्या एकादशो- पनिषद का संग्रह का दुआ, अथवा एकत्रित किया गया, उस समयसे अग्नि आदि देवताओके मंघ इसमें, सर्व संप्रतिहे, माने गये हैं। उक्त उपनिषदोका संग्रह आजकलका नहीं । सहनों घर्ष पूर्व उनका संग्रह हो चुका है कि जिस समय वैदिक विद्याकी । "येत और जाप्रत थी। उस समय " ईशोपनिषद् . .
भूमिका। में उक्त मंत्र चले आये हैं, और ईशोपनिषद् का कोई ऐसा पाठ नहीं है कि जिसमें "अग्ने नय" आदि मंत्र नहीं है। इस परिपाठीके मको विचार कोटी रसनेस पता लग जायगाकि, "अग्ने नय" दि मंत्र प्रक्षिप्त नहीं है । तथापि देवता विचार फरके ही इस वातका निश्चय करेंगे। (३) हम सूक्त का देवता। जिस सूक्त अथवा मंत्रमें जिसका वर्णन होता है उस सूक्त किंवा मंत्रकी यह देवता समझी जाती है। किसी किसी सूक्त में देवता वाचक एकही शब्द प्रारंभसे अंत तक प्रयुक्त हुआ होता है परंतु कई ऐसे सूफ्त हैं कि, जिनमें पकही देवताके वाचक अनेक नाम उम स्फ्त के अनेक मंत्रों में प्रयुक्त होते हैं । जिसमें देवताका एक ही नाम प्रयुक्त होता है, उस लपत की देवताके विषय में संदेह ही नहीं होता, परंतु जिस सक्तमें विभिन्न नामोंका उप- योग होता है, उस सूक्तकी देवताके निश्चय करने में शंका उत्पन्न होती है । इसी हेतुसे इस अध्याय की देवताके विषयमें कई वि. द्वानोंको संदेह हुआ है, इस लिये इसकी देवताका यहां विचार करेंगे । देखिए, देवता निश्चय की रीति यह है कि प्रथम प्रत्येक मंत्रका देवता-सूचक शब्द देखना चाहिये जैसा- मंत्र देवतासूचक परिशेष (वाजसनेयो संहिता १ ईशावास्य २ कुर्वन्नेवेह ३ असुर्या नाम ४ अनेजदेक ५तदेजति 0 . 0 एक, एतत् . तत् .
शोपनिषद् । आत्मा आत्मा " " साकविः, 0 ६ यस्तु संवाणि ७ यस्मिन्नत ८ स पर्यगात् ९-१४ अंधं तमः १५ चायुरनिलं १६ अग्ने भय १७ हिरण्मयन ० . मो अग्निः सत्यं परपः ना अग्निः सत्य पुरुषः ग्रह्म (काण्व संहिता) १६ पूरक पूषा पूषा देवतावाचक जो शब्द है, उनमें सर्वनाम, विशेषण आदि छोड. कर जो मुख्य शब्द है, घे "ईश, आत्मा, ओम्, अग्नि, सत्या, पुरुष, मह, पूषा, यम" ये हैं। वैदिक रीतिसे ये सब शब्द एक ही देषताके स्थक हैं । " ब्रह्म, आत्मा, ओ, पुरुष, सत्य, शब्दों के विषय में किसी को शंका ही नहीं हो सकती। जो कोई शंका है, यह " पूषा, यम, अनि " इत्यादि शब्दों के विषय है। इस लिये इसका विशेष विचार करना चाहिये। " (४) अनेक नामांसे एक तत्वका वर्णन | यदि यह सूक्त " आरम-शान " का प्रतिपादक है. तो की आत्मा के सब नाम है "यह अध्यात्मशास्त्रकी कल्पना मान- से विभिन्न देवताओं के नामों में एकही" आत्मा" का प्रति- पादन होना संभव है. यह बात स्वयं ही सिद्ध होगी । वेदको मी यही कल्पना भूमिका। । दें मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ॥ एक सद्विमा बहुधा वदंत्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ।। .१११६४।१६॥ "एकही सहस्तुका ज्ञानी जन यहुत प्रकार वर्णन करते हैं । उसी एक को इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सुपर्ण, यम, मातरिश्वा आदि कहते हैं।" इस मंत्र में “अग्नि, यम" आदि शब्द हैं जो कि ईशोपनिषद में तथा चा० य० अ०४० में आगये है। इस मंत्र से यह बात सिद्ध होती है कि नामोंक भेदसे देवता भेद नहीं होता । यदि यह ऋग्वेद का कथन माना जायगा, तो बहुतसे वि- पाद मिट जायगे । परंतु शंका करने वाले युरोपीयन और उनके मतानुसार चलनेवाले पतद्देशीय विद्वानोंको यह मत माननीय नहीं हैं। इसका कारण इतना ही है, कि उन लोगोंने अबतक वह वैदिक दृष्टि प्राप्त नहीं की है, कि जिस की वेदाध्ययन के समय अत्यंत आवश्यकता है। तथापि यथा शक्ति उनकी शंका का निरसन करना आवश्यक ही है। उक्त ऋग्वेदके कथन के साथ निम्न मंत्र भी देखिये- तदेवाग्निस्तदादित्यसाद्वायुस्तदु चंद्रमाः ॥ तदेय शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥ य.३२।२ "वही अग्नि, वही आदित्य, वही वायु, और निश्चयसे वही चंद्रमा है। यही शुक्र, यही ब्रह्म, और वही आप तथा प्रजा- पति भी यही है।" इस मंत्र स्पष्ट कहा है कि अग्नि आदित्य आदि नामोसे उसीका वर्णन होता है, इतनाही नहीं परंतु अग्नि आदि की सब शक्ति उसीके कारण अग्निमें रहती है। वही एक आरमा अग्नि आदि रूपोम कार्य कर रहा है, इस लिये अग्नि वर्णनसे उसीका वर्णन होता है। जैसा उपनिषदों में कहा है कि ८ शोपनिषद् । वह आत्मा श्रीनका श्रोत्र, मनशमन, वाणीको वाणी, प्राणका माया और थोरका शोर है" (केन उ.११२) उसी प्रकार पाहा सृधिमें " यह आरमा जाग्निका अनि, सूर्यका सूर्य, घायुका थायु, जलका जल," है। इस वर्णनमें "अग्नि आदि शब्द जिस रीति- से आत्माके वायक होते है. उसी रीति से ईशोपनिषद् के "अग्नि, पूपा"ये दाद भी आत्माक पाचक है। इसके अतिरिक्त- योमपिता जनिता यो विधाता धामानि घंद भुवनानि विश्वा ।यो देवानां नामधा एक एव तं संप्रश्नं भुवना त्पन्या न.१०.८२/३,५.१७२७ स नः पिता जनिता स उत संघर्धामानि चेद भवनानि विश्वा ॥ यो देवानां नाम एक पचतं संप्रश्न भुषना यन्ति सी। अथ.२०१३ "यह आत्मा हम सबका पिता, जनक और बंध है। यह सय भुवनों और स्थानोको यथावत् जानता है। (य देवानां मामयः) यह सब देवोंके नाम अपने लिये धारण करता है। और यह फेवल एकही है। उस प्रश्न करने योग्य आत्माके आधारसे सब अन्य भुवन अर्थात पदार्थ मान रहते हैं। इस वर्णनमें निम्न याक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है- य एक पप, देवानां नाम-धः । जो की, देवों के नाम धारण करता है। "अग्नि" आदि ओके नाम उसीका वर्णन करते हैं, इसलिये ये नाम उसके घावक होते है । यह मंत्र मम्मेद, यज. घेद और अधर्ष वेद है। विशेषतः जिस यजुर्वेद के ४० पे आया- यका हम विचार कर रद है, उसके १७ अध्याय में यह मंत्र है। इसलिये इस अंतर्गत प्रमाणसे भी " अग्नि" आदि नाम उस भूमिका। आमाके चायक सिद्ध होते हैं । आत्माध्यायमें संगृहित होने से अग्नि आदि पदाका आत्मा अर्थ स्पष्ट ही था, परंतु इस अंतर्गत प्रमाणसे यही बात पुनः सिद्ध हो गई है। और देखिये- स्वमग्न इंद्रोध पमः सतामसि, व विष्णुरुषगायो नमस्यः ॥ त्वं ब्रह्मा रयिविब्रह्मणस्पते ॥३॥ त्वमग्न राजा वरुणो धृतवतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईडयः त्वमयमा सत्पतिला स्वमग्ने स्वष्टा० ॥५॥ त्वमग्ने रुद्रो असुरो महोदिवः ॥ ६ ॥ ऋ.११ "हे अग्ने ! तूंही इंद्र है, सद्वस्तुओंमै बलवान् तु ही है, चूहो नमन के लिये योग्य विष्णु है, तूं ही ब्रह्मा है| हे आने ! तू वरुण राजा है और स्तुत्य मित्र तूही होता , तही अर्थमा है ।। तू त्वष्टा है तू रुद्र है।" इत्यादि मंत्रों में अग्नि ही अन्य देव है," यह बात स्पष्ट कही है । इसी प्रकार अन्य देवताओं के सूक्तों में भी चे अग्निही है ऐसाभी वर्णन है। इस सब वर्णन का तात्पर्य ही यह है कि सब देवताओके नाम एक ही " आत्मतत्व का वर्णन करते हैं। तथा- अग्नायग्निश्वरति प्रविष्टः । य. ५। १) अथर्व ४।३९१९ एक अनिमें दूसरा अग्नि प्रविष्ट है। " इस वर्णन का तात्पर्य एक (जीय) आत्मामे दूसरा (परम) आरमा प्रविष्ट है यही है। इस प्रकार विविध मंत्र भागोका वर्णन देखनेसे" अग्नि" आत्मावाचक है, ऐसा शान हो सकता है । जिस कारण से अग्नि शब्द आत्मावाचक सिद्ध होगा, उसी कारणसे “ यम, पूषा' आदि शब्दभी आत्मावाचक ही सिद्ध होगे । इसलिये उस विषय. में अब यहां अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। इस विषय में हरएक देवताके संबंधो आवश्यक प्रमाण दिये जा सकते हैं।
ईशोपनिषद्।
परंतु ऊपर जो पैदिक वर्णन की रीति का नमूना बताया गया है.
उससे वक्तव्य पात सिद्ध होगई है। इसलिये अब इसके विषयम
अधिक प्रमाण देकर विषय लंबा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं
है। तात्पर्य यह कि इस अध्यायमें जो " अग्नि, यम, पूथा " आदि
शब्द प्रयुक्त हुए हैं, वे “ब्रह्म, आत्मा, ईश " के हो गुणयोधक
पर्याय शद हैं । इसलिये यह संपूर्ण अध्याय एक ही आमाका
घर्णन किंवा ब्रह्मका वर्णन कर रहा है। अर्थात् नामोकी भिन्नतास
एकही अभेद रूप सदस्तु का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। इस
का विचार करने के लिये अब ऋषिक नामका भी विचार करते हैं-
-
(५) इम अध्यायका मपि।
किसी किसी समय प्रापीका नाम भी देवताका निधय करने
फेलिये सहायक होता है। इसलिये इस अध्याय के ऋषिके नाम
का विचार करना चाहिये । अजमेर मुदित " यजुर्वेद संहिता
के ४०चे अध्यायका-
"ऋषिः दीर्घतमा ।"
पेसा छपा है। परंतु यह अशुद्ध है। क्योंकि यजु सर्वानुपामणी में-
"शावास्यमष्टौ । अंधतमौ नव । द्वे सप्तदश ।"
अनुवाक सूध्याय
ईशावास्यमारमदेवत्य आनुष्ठभोऽध्यायः । अनेजदे कं भिए
सपरि जगती । वायुगनिलं यजुषी ।
राजु. सर्वानुक्रमणी.
फवं वाचं पंचाध्यायी दध्याथर्वणो ददर्श।
यजु. सर्वानुक्रमणी ४।५
यज अ. ३६ से १० तक के पांच ह अध्यायोका "
दक्ष्य
अपर्चा "पिकदा । यही भार शतपयमें भी है-
भूमिका।
दध्यङ् ह या आथर्षण पतं शुक्रमेतं यज्ञं विदांचकार ।
श.प्रा.२४|११२०
इस प्रकार यजुर्वेदके अंतिम पंचाध्यायीका ध्यङ् अथर्या ऋषि
है । यही भाव अन्य भाष्यकार स्वीकार करते हैं-
(आत्मदेवत्य अनुष्टुप्छंदस्कोऽध्यायो दधीचाचणेन दृष्टः।
{महीधरभाष्य)
(२) ईशा वास्यं । तिस्रो ऽनुष्टमः । दध्यङ् आधण ऋषिः ।
(उपट भाष्य)
"ईशावास्य आदि अध्यायका ध्यङ् अथर्या ऋषि है।
अथर्वा का ब्रह्मवर्णन के साथ वेदमें संबंध है । प्रत्यक्ष आर्य वेद.
का नाम ही "ब्रह्मवेद "है। देखिये-
"
"
"
ब्रह्मवेद
श्रेष्ठो हि वेदस्तपसोधिजातो ब्रह्मशाना हृदये संबभूव ।।
(गो. ना.१।९)
"एतद्वै भूयिष्ठं ब्रह्म यद् भृग्यंगिरसः । येऽगिरसः स रसः।
ये ऽथर्माणस्तन्नेयजम्। यद् भेप तदमृतम्। यदमृतं तद्ब्रह्म।
(गो. मा. ३४)
"चत्वारो वा इमे वेदा ऋग्दो यजुर्वेदः सामवेदो ब्रह्मवेदः"
(गो. ग्रा.२-१६)
चार वेद है ऋग्वेद, यजुर्धेद, सामवेद और ब्रह्मवेद " इस
में अथर्य दफा नाम " ब्रह्मवेद " आया है । अथर्व वेदमें अस्मा
और ब्रह्मफे सूक्क बहुत ही है । इसलिये भी इसका नाम ब्रह्मवेद
अन्यर्थक है। इसी ब्रह्मविवार के साथ संबंध रखनेवाला
" अर्थवा " यह कपिनाम है, इसीलिये गोपथमे इस नामकी यु.
स्पत्ति निम्न प्रकार दी है-
" ईशोपनिषद्। तधदग्रयोदयापनि...अन्विच्छेति तदाऽभवत् । गो.ग्रा.१४ इस को अथर्षा इस लिये कहा गया कि इसने (अथ अर्वाक् एनं अन्विच्छ) इसको यहां हो टुंद ऐसा कहा। अप+अ- पांव ऐसा कहनेसे अपर्या' कहा गया। इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर को बाहिर कहाँ ढूंदते हो, यहां अपने अंदर इसको ढुंढो, ऐसा जिसने कहा यह 'अपर्या' नामले प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार 'अथर्वा शादका अर्थ सिद्ध कर रहा है कि, इसका आत्मविचार के साथ संबंध है। तथा- अथर्वागः अधनवन्तः । अयं तिश्चरतिकमा तत्प्रतिषेधः। निरु. न. ११००६ अध" का अर्थ "स्थिर" है।"" का अर्थ गति है, इस लिये "अ-धर्वा" का अर्थ गति-रहित होता है। योग साधन कर, नेके पश्चात जो मनको स्थिरता, एकाग्रता,अचंचलता सिद्ध होती है, उसका दर्शक यह शब्द है । स्थिरयुद्धि, स्थितप्रश, समाधिस्य, योगी यह इसका भाव है । इस प्रकारके योगीका ब्रह्मविचार के साथ संबंध होना स्पष्ट ही है। इसलिये इस अध्याय का "अथर्वा" शापिनाम यता रहा है कि, इस अध्यायमें ब्रह्मविचार किंवा आत्म- विचार झा है, तथा इसमें आये हुए " अग्नि, यम, पूषा, पुरुष" आदि शब्द इस प्रकरण में आत्मापाचक अथवा मह्मचाचा ही निश्चय से हैं। देवताका विचार और ऋपिनाम का विचार करने से "अग्नि" आदि शब्दोका मात्र आत्म विषयक हौस अध्यायमें होना योग्य है, यह बात सिद्ध होगई। + भूमिका। (६) ईश उपनिपद्का महत्व । सब अन्य उपनिषद् ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथोंमें हैं। यह एक- ही उपनिषद् ऐसा है कि जो मंत्र संहिताम है । ग्राह्मणों और आर. ज्यकों की अपेक्षा मंत्र संहिता का मान और प्रामाण्य विशंप होने सेही इस ईशोपनिषद को पहिला स्थान प्राप्त हुआ है। यही एक "मंत्रोपनिषद्' है । और इसोफे आधार पर अन्य उपनिषदों की रचना हुई है। जो ज्ञान अन्य उपनिषदो है वह इसमें है, परंतु जितना उपदेश इसमें है उतना अन्य उपनिषदोंमें है ऐला नहीं कहा जा सकता । अन्य उपनिषदोकी व्याख्या करने के प्रसंगमें इसका सप्रमाण विचार किया जायगा, और वहां ही किस उप- निषद् का इसके किस मंत्रसे कैसा संबंध है, यह बताया जायगा। उदाहरणके लिये यहां इतनाही कहना पर्याप्त होगा कि- (१) केन उपनिषद् - "नैनवा आप्नुवन्" इस ईशोपनिषद् के मंत्र भाग ( य०४०४, ईश उ०४) की व्यारया है। इसका विशेष स्पष्टीकरण "केन उपनिषद् ' की भूमिकामें किया गया है । (२) बृहदारण्यक उपनिषद् इशोपनिषद् की दौडती टीका ही है । संपूर्ण यजुर्वेदके ४० अध्यायॊपर “ दौडती टीका" ही शतपथ ब्राह्मण १४ कांड हैं। इससे स्पष्ट है कि, यजुर्वेदक अंतिम ४० चे अध्याय की टीका १४ ये कांडमें है ।१४ चा कांड ही वृहदारण्यक है । जो पाठक दोनोंकी परस्पर तुलना करेंगे, उनको यह विषय स्वयं स्पष्ट हो जायगा। इस प्रकार इस य. अ. ४० का अर्थात् ईशोपनिषद् का संपूर्ण मात्मविद्या प्रथमंडारमें अत्यंत महत्व है। ऐसा समझोये कि यह अध्याय सब आत्मविद्या के ग्रंथों में शिरस्थानमें अथवा मुख्य स्थानमें विराजता है। इसी कारण सब उपनिषदोंमें भी इसको प्रथम स्थानपर गिनते हैं।
ईशोपनिषद् । इस प्रकार एकही पातका विस्तार कमश इन अधिशाम हुआ है। प्रत्येक पद पद का परस्पर संबंध देखने से और सूक्ष्म' विचार के साथ उनका आशय समझने से वहा ही आनंद प्राप्त हो सकता है, और अध्यारम विद्याक गद सिद्धांत विशद हो सकते है। जैसा " एक ईयर" विषय में प्रथम अधिकार में वर्णित बातों का स्पष्टीकरण आगे के अधिकारों में हुआ है, उसी प्रकार अन्यान्य विषयों का भी है। इसलिये पाठक इस दृष्टिसे इस अध्याय का अभ्यास और मनन करें। १८) भाप्यकारों का कथन । कई भाष्यकारीने इस अध्याय के विषय में अवास्तविक बातों को प्रकट किया है, जैसा-- (१) यो संकराचार्यजी कहते हैं कि ईशावास्यमित्यादयो मशः कर्मयविनियुक्ता , तेषां अफर्मशेपस्यात्मनो याथात्म्यप्रकाश कत्वात् । यधात्म्यं व आत्मनः शुद्धत्वापापविद्धत्वैफल्यनित्य वाशरीरत्वसर्वगतत्यादिवश्यमाणम् । सच्च फर्ममा विरुष्यते । परेषा कर्मस्व विनियोगः ॥ ईशशाकर मार ॥ "ईशावात्य. आदि मंत्रों में चिनियुक्त नहीं हुए है, क्यों कि इन मंशे में आत्मा का उत्तम वर्णन है। आत्मा शुद्ध, अपार- विद्ध, प, नित्य, मशरीरी, सर्वव्यापक आदि गुणोंसे युक्त है, ऐसा जो वर्णन इस उपनिपद में है, यह कर्म से विरोधी है, इस लिये इन मंत्रो का विनियोग का में न होना ही युक्त है।" थो० पूज्य शंकराचार्यजी को यह युक्ति वास्तविक प्रयल नहीं है, यही पात यहा घतानी है। यदि आत्माका वर्णन होने से मंत्रों का विनियोग कमी में नहीं होना चाहिये, तो यजु अ० ३२ के मंगोमें पाकी आमा वर्णन है, तथापि "सर्वमेधयक्ष" मक यक्षकम में उस अध्याय का विनियोग दिया गया है। आमा इति युक्त ना.
भूमिका के जो “शुद्ध, निष्पाप, एक " आदि गुण इस अध्याय में वर्णन किये गये है, वही उसी अध्याय में है। देखिये- सर्पमेधकरणं। ईशोपनिषद् । (यजु अ ३२) ( यजु अ४०) शुक्र (मंत्र १) शुद्ध (मंत्र८) अमृतं (मं १०) अपापविद्ध (") तत् (मं १) एक (म ४) तं (मं१२) (सत्यं) नित्यं (मं १५) न प्रतिमा (मं.३) अकायं (म ८) विभू (मं ८) पर्यगात् (") इस प्रकार जो गुण आत्मा के वर्णन रूपमें दिये गये है ये सब अध्याय ३२ में हैं, तथापि अध्याय ३२ कर्म में विनियुक्त है और अध्याय ४० नहीं है । इसलिये उक्त हेतु ठीक नहीं है। वास्तष. में देखा जायगा, तो यह बात सर्वन दिखाई देगी कि, मनों का विनियोग जो सर्वत्र कर्मकाड में इस समय प्रचलित है, यह सब का सब प्राय अर्थहीन है । अर्थात् जो भाव मन में है, उसके अ नुरूप कर्ममें उसका विनियोग ही नहीं हुआ है । मनका भाव एक और उस से जो कर्म किया जाता है वह भिन्न ही है। जैसा "शर्माऽसि ।" यजु. अ १।१४ इस मंत्र का विनियोग ' चर्म " अर्थात् " कृष्णाजिन " उठाने कर्म में हुआ है। परतु" शर्म' फा“चर्म" के साथ क्या संबंध है ? चास्तर में कोई संबंध नहीं। इस मामें आत्मा के "शर्म " अर्थात् “ सुख " गुण का वर्णन किया गया है, आत्मा स्वयं शर्मरूप है, सुखस्वरूप अथवा आनदरूप है । इस वर्णन के साथ "चम उठाने का फर्म" कोई संबंध नहीं रखता। इसी प्रकार बहुधा मत्रों क विनियोग गलत हैं । ऐसे विनियोगों को प्रमाण - .
ईशोपनिषद् ।
मानना और अन्य वैदिक संहितायें यज्ञ फर्मों में विनियुक्त
होने से आमज्ञान प्रतिपादक नहीं है, ऐसा कहना सर्घया अयो-
+
ग्य है।
इस प्रकार के कथन से जो घृया दोषारोप वेद संहिताओपर
आतापा, और जिस से अन्य मंत्रों में आत्मा का वर्णन नहीं है,
ऐसा जो आशय व्यक्त होता था,उमीवातका खंडन यहां किया है।
मंत्रों को जबरदस्ती किसी कर्म में विनियुक्त करनेसे ही केव.
ल उनमें जो आत्मविद्या है, वह दूर नहीं हो सकती। इसका
उत्तम उदाहरण यजु अ० ३२ है। इसकी व्याख्या (एक ईश्वर
उपासना नामसे स्वतंत्र रूपसे छपी है। हरएक पाठक इस
म्यानपर उसको अवश्य देखें और अनुभव करें, कि उसमें मी
कितनी आत्मविद्या है । अस्तु । यहां करना इतनाही है कि, घेद.
की संहिनाका मुख्य पयतस्य " आत्मा का वर्णन " दी है।
परंतु फर्मकांडियों में उनको जबरदस्ती अपने अभीष्ट कर्नामें
चिनियुक्त किया है। परंतु अध को दाहिसे देखा जायगा, तो यह
स्पष्ट दिखाई देगा कि जिन कमि मंत्रा विनियोग हुआ है,
उन कर्मों के संबंध में मंत्र मुग्ध ही है।
इस प्रकार भाष्यकारोने अपने पूर्ण प्रहही स्थान स्थानपर यता-
ये हैं। इसका और एक उदाहरण देखिये--
९ वेदान्त के अध्ययन का काल ।
इस अध्याय के अध्ययन के काल के विषय में लिखते लिखते
थी. उघट और महीधर ये दोनों आचार्य लिखते हैं-
"समा कर्मकांड. इदानीं शानकांदं प्रस्तूयते ।।
। दध्या पि: पशिष्यं पर्व धा
गर्भाधानादिभिः संरफारः संस्कृतशरीरं, अधीतवेद,
भूमिका। १९ उत्पादित पुत्रं......शिक्षयन्नाह ॥' उवाटभाष्य अ.४०।१ "एकोनचत्वारिंशताध्यायैः कर्मकांड निरूपितं । इदानी कर्माचरणशुद्धांतःकरणं प्रति शानकांडमेकन अध्यायन निरूप्यते । ईशावास्यमित्यादि मंत्राणां फर्मसु विनियोगो नास्ति । तेषां शुद्धत्वैकत्वापाप- पिद्धत्वाशरीरत्यसर्यगतत्वाधात्मयाथात्म्पप्रतिपादनात् । तच्च फर्मणा विरुध्यते ।......ईशावास्यं .....अध्यायो दधीचाथणेन दृष्टः। गर्भाधानादिसंस्कारसंस्कृतं, अधीत. घेई, जनितसुतं,......शिष्यं पुत्रं वा ऋषिरुपदिशन्नाह । महीधरभाषय ४०।१ (१) यजु. अ.३९ तक कर्मकांड समाप्त हुआ. अय ज्ञान कांड का प्रारंभ होता है । इ० ॥" '(२) दध्यङ् आथर्वण ऋषि अपने पुत्र अथवा शिष्य को इस अध्याय का उपदेश करता है जो शिष्य अथवा पुत्र गर्भाधा- नादि संस्कारों से सुसंस्कृत है, जिसने वेदका अध्ययन समाप्त किया है, और पुत्र उत्पन्न किये हैं ॥" ये दो कथन उक्त दोनों भाष्यों में समान ही हैं । पहिले कथन का संडन श्री० शंकराचार्यजी के मतकी समालोचना करने के समय किया ही है । अब दूसरे कथन का विचार करना है। जिस. ने तो विरक्त वृत्ति से रहकर आजन्म ब्रह्मचर्य में रहना है, उस के लिये जिस समय चाहे ब्रह्म विद्या का अध्ययन करनेका अधि. कार होगा। पुत्र उत्पन्न करने के पूर्व वह ब्रह्मविद्या में प्रविष्ट हो सकता है, जैसे कि श्री० शंकराचार्य स्वयं हुए थे। परंतु जो गृहस्थी होना चाहते हैं ऐसे माधारण जनों के लिये जो मार्ग उक्त दोनों आचार्योन अपने भाष्य में लिखा है, उस से, पैसा २० . सोपनियत् । प्रतीत होता है कि, पुष उत्पन्न करने के पश्चात् ही यह इस ईश उपनिषद् का अध्ययन कर सकता है। अर्थात् ब्रह्मविद्याके अध्ययन का प्रारंभ करने का समय पुत्र उत्पन्न होने के पश्चात् है। परंतु यही बडा भारी भ्रम है। अथर्व वेदमें ब्रह्म साक्षात्कार फा फल घर्णन किया है, वह यहां देखिये- यो चै तो ब्रह्मणो घेदामृतेनावृतां पुरम् । तस्मै नहा च ब्राझाच चक्षुः मा प्रजां ददु ॥ २९ ॥ न तं वक्षर्जहाति न प्रायो अरसा पुरा ॥ पुरं यो ब्रह्मणो येद यस्याः पुरुष उच्यते ॥ ३० ॥ अधर्व १०१२ "जो अमृतमय प्रहपुरी को जानता है, उसको ब्रह्म और अन्य देव चक्षु, प्राण और मजा देते हैं। जो इस ब्रह्मपुरी को जानता है. उसके चक्षु और प्राण वृद्धावस्था के पूर्व उसको नहीं छोड़ता इसका स्पष्ट तात्पर्य यह है कि ब्रह्मशान होने से इस प्रा ज्ञानी को सुदृढ इंद्रिय, दीर्य आयुष्य और सुप्रजानिर्माण की शक्ति ग्रास होती है। यह ब्रह्मज्ञान का फल है। वेदांतशास्त्र के अनेक लाभों में "सुप्रजानिर्माण शक्ति की प्राप्ति " यह भी एक लाभ है। यदि यह सत्य है तो गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने के पूर्व ही ब्रह्मविद्याका अध्ययन होना चाहिये, और सह्मपुरोका पता लगना चाहिये । परंतु उक्त आचार्य इस वैदिक सिद्धांत के विरुद्ध ही कह रहे हैं, कि पुत्रोत्पत्तिके पश्चात् यह उपनिषद पढ़ें, इसलिये उनका मत चितनीय ही है। आत्मज्ञानसे गृहस्थ के आवरण पर परिणाम होता है, इसलिये प्रा विद्याका अध्ययन गृहरपाश्रम पूर्वदो होना आवश्यक है।
। भूमिका २१ पाठक भी इस अध्यापके मनन के पश्चात् जान सकते है कि, इसमें कोई ऐसी बात नहीं कही है, कि जो पूर्व आयुमै ज्ञात होने से हानिकारक सिद्ध हो प्रत्युत इस अध्यायके सबही उपदेश मायालवृद्धोंको अत्यंत लाभदायक है, ऐसा हरएक पाठक आय यनके पश्चात् अनुभव कर सकता है । इस लिये इसका अध्ययन पूर्व आयुमें ही होना आवश्यक है । (१०) निष्काम कर्मयोग । श्री. शंकराचार्यजी कहते हैं कि शान और कर्मशा विरोध इस उपनिषद् में है और सर्वत्र है। परंतु इस उपनिषद्का विचार करनेसे पता लग जाता है, कि ज्ञान और कर्मका समुच्चय इस को अभीष्ट है । यह उपनिषद् अथवा यह अध्याय कर्मयोगका निषेधक नहीं है और कर्मत्याग का प्रवर्तक भी नहीं है। देखिये इसके मंत्रोमें क्या क्या उपदेश कहा है। मंत्र १- "त्यक्तेन भुंजीथा" यह आशा यहां है। त्यागभावसे भोग करनेका उपदेश यहां मिलता है। " निष्काम कर्मयोग" का चीज इसमें है । श्रीमद्भगवद्गीतामें जिस निष्काम कर्मफी महती गायन की गई है, उसका मल चीज इस मंत्र के इन पदों में है। मंत्र २-" फर्म करते हुए सौ घर्ष जीनेकी इच्छा" करनेका उपदेश इस मंत्र है। प्रथम मंत्रमें कहे हुए निष्काम भावसे फर्म फरते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा धारण करनी चाहिये । यह दोनों मंत्रोंका इकठ्ठा तात्पर्य है। इस प्रकार प्रथम और द्वितीय मंत्रका वास्तविक कोई विरोध नहीं है, परंतु श्री० शंकराचार्यजी कहते हैं कि पहिला मंत्र ज्ञानीके लिये है और दूसरा मंत्र शानके अनधिकारी के लिये है। इस प्रकार दोनों का परस्पर विरोध है । स्पष्टीकरणमें इनकी परस्पर संगति जो देखेंगे उनको इनमें कोई विरोधही नही दिखाई देगा। "पर- ईशोपनिषद् । मेश्वर सर्वन है, त्याग भारस भोग करो, लालच न करो। निष्का म कर्म करते हुए सौ घपं जीने की इच्छा करो, यही पथ मार्ग है, दूसरा कोई मार्ग नहीं, मरको कर्मका लेप नहीं लगता। यह दोनों मंत्रों का तात्पर्य है । क्या इसमें परस्पर विरोध है ? भारत- वमें दोनों मौका आशय मिलकर ही पूर्ण मानवधर्म बनता है । और इसी एसे इन मंत्रोकी ओर देखना चाहिये। मन ३- आत्मघातक कर्म करनेवालोमा अघ पात होता है ऐसा तिसरे मंत्रमें कहा है । तात्पर्य यह है कि कोई इस प्रकारके आत्म- घातप कर्म न करें और सब आत्मोन्नतिकारक पुरुषार्थ फरक ही अपना अभ्युदय और निश्रेयस् का साधन करें। मनः इस चतुर्थ मनमे "मातरिया अप दधाति" यह वाक्य है। माता के दरमे रहनघाला गर्भस्थ जीन भी कर्माको धारण करता है, यह इसका तात्पर्य है। पहिले जन्म में किये हुए कर्म संस्कार रूपसे गर्भ में भी रहते हैं, यह इसका तात्पर्य है। कर्म छूरत नहीं हैं। निष्काम भावसे ही कर्मके पंधनको तोडना चाहिये। यह इस उपनिषद् का आशय है। मत्र ५- इस मंत्र " तद् पजति " बद्द ग्रह्म सरको गति देता है। ऐसा करने से उसके एक विशिष्ट कर्मशा लेख दिया है। आत्मा ही सय जड जगत में हलचल करता है। इसका तात्पर्य यह है कि बिलकुल कर्महीन रहना असंभव है। भगवद्गीतामें भी इसी हेतुसे कहा है कि 'कोई क्षणमात्र भी धर्म न परता हुआ रह नहीं सकता।"(म गो ३१५)क्यो कि आत्माका स्थमाष ही इल चल करना है। इसरिये यह मंगभी कर्म सूचक हो । मत्र ८-समपर्म आत्माके जो गणरोधका शाद है भी कर्म घोषक ही है। " एपि, मनीषी, परिमः " ये शब्द विशेष व्यापार केही घोघर हैं। तथा " अर्थान पदधात् " यह पाय तो नि २३ भूमिका। संदेह उसके कर्मका ही योधक है।" सब अधों को यह ठीक प्रकार करता है।" यही उसका पुरुषार्थ है अथवा स्वभाव है। मंत्र ९-१२- में “ विद्या और अविद्या" अर्थात् आत्मशान और प्रकृतिविज्ञान की उपासना करनका उपदेश है। यहां कई यो मतसे "विद्या अविद्या ये शब्द शान और कर्म के बोधक है। इस दृष्टीसे भी ये मंत्र ज्ञान और कर्म के समुच्चय का उपदेश कर रहे हैं, न कि ज्ञान और कर्म के विरोध का। मंत्र १२-१४- इन मंत्रों में "संभूति और असंभूति " अर्थात् संघभाव और व्यक्ति भावक कर्तव्यों का उपदेश है। संघभाव और व्यक्तिभाव के कर्तव्योंका विरोध नहीं है, प्रत्युत दोनों कर्तव्यों का समुच्चय ही इस उपनिषद् को अभीष्ट है। मंत्र १५- में कहा है कि " सत्यके आचरण को दूर करो और सत्य का अवलोकन करो। " इसमें भी पुरुषार्थका ही उपदेश है । मंत्र १७- में जीवात्मा का नाम "ऋतु ' कहा है । यह पुरुषार्थ का ही सूचक है। मंत्र १८-में" सय कर्मोके जाननेवाले परमेश्वरकी प्रार्थना है कि वह दुष्टता रूप शत्रुके साथ हमारे द्वारा युद्ध करवाके हमको अच्छे मार्ग पर से ले जाये।" यह भी पुरुषार्थ ही है। इस प्रकार इस अध्याय का प्रत्येक मंत्र श्रेष्ठ पुरपाका द्योतक है। तथापि फई कह रहे हैं कि, यह उपनिषद् कर्मयोग का खंडन करता है । क्या इससे और अधिक कोई आश्चर्य है ? वास्तव में जैसा इसमें "फर्म और ज्ञानका समुच्चय " स्पष्ट शब्दोसे कहा है वैसाही श्रीमद्भगवद्वीता भी कहा है। यदि गीता संपूर्ण उपनि- पदों का सत्व है, तो संपूर्ण उपनिषदोंका भी यही अभिप्राय होना चाहिये। और वैसा है भी। परंतु कई संप्रदायवाले अपने संप्रदाय के अहंकारसे इस शानकर्म समुच्चय का विरोध करते हैं। परंतु + ईशोपनिषद् । वह मत इन मंत्रोंमें नहीं है। घद उनका निजमत है। इस शोपनि- पद् का तो स्पष्ट भाव ज्ञान-कर्म-समुच्चय " ही है। (११) ज्ञान और कर्म के समुचय का मुख्य हेतु। आरमाकी चार अवस्थायें हैं । जापति, स्वप्न, सुपुत्ति और तुर्या । इन अवस्थाओमें आत्माकी सब शक्ति प्रकट हो रही है। उक्त अवस्थाओके नाम परमात्माके साथ वैश्वानर, तेजस, और आत्मा ये चार है। अर्थात् आत्मापरमात्माके साथ उक्त चा- रो अवस्थायें सुक्ष्म और वृहद्पले हैं। चारों अवस्था आमाका भय व्यक्त करने के लिये आवश्यक ही हैं। सनातन काल से इन चारों अवस्थाओं में आत्मा अपनी शक्ति का अनुभव देख रहा है। रमा परमात्मा अवस्था तुर्या शद्धात्मा सुषुप्ति प्राक्ष नधर्म अवस्था, (शान ) निवृत्ति स्वप्न... तेजस जागृति... श्वानर कर्म अवस्था (फर्म) प्रति. इनमें दो अवस्थायें कर्म की हैं और दो नैष्फर्य की है । चारों आवक होने के कारण ज्ञान और धर्मका समुच्चय होनाही आ. वश्यक है। यह कोई नहीं कह सकता है कि इनमें से किसी अवस्था की बिलकुल आवश्यकता ही नहीं। जो अयस्था नष्ट होगी, उस अवस्थामे व्यक्त होनेवाली आत्माकी शति गुप्त ही रहेगी, उत्त अवस्था विना पद प्रफट ही नहीं हो सकती। इसलिये जैसा आ- रमा सनातन है वैसी ये चारों अपरथायें भी सनातन ही। पर- मात्मा भी तेजस श्वानर आदि द्वारा कर्म करता ही है, जो सृ. शिरूपके अनादि प्रवाहसे दिखाई दे रहा है परिच्छिन्न जीवको भी उत्तः फारणसे ही चारों अबस्थाये है । " चतुष्पाद आरम 1 " इसी २५ । भूमिका। हेतुसे पाहते हैं । उसके दो पांव तोडने नहीं है । इस कारण कर्म और शान का समुच्चय ही उन्नतिका साधा है कई यहां ऐसा प्रश्न करेंगे कि मुक्त अवस्थामें जागृति आदि अवस्थाएं कहां है? इस शंकाके उत्तरमें निवेदन है कि शरीरके होने और न होनेसे मुक्ति और अमुक्तिफा कोई संबंध नहीं है। शरीर में रहते हुए भी आत्मा मुक्तिका अनुभव कर सकता है औ- र शरीरत्याग होनेपर भी आत्मा धंधन की अवस्थामै रह सकता है । मुक्तिका हेतु ही और है । “आत्माकी शक्तिका अनुभव करना और अपने आपको बंधनोंसे अलित देखना मुक्ति है । " इसलिये यह शरीरमें कार्य करते हुए भी प्राप्त होती है। और इसकारण चारो अवस्थाओंका होना इसके लिये घातक नहीं है। प्रत्युत आ- त्माको विकसित शक्तिका अनुभव करने के लिये इसको जागृति की आवश्यकता होगी । यही मुख्य हेतु है कि ईशोपनिषद् तथा भगवद्गीता आदिमें ज्ञान और कर्मका समुच्चय कहा है। और कि- सो एक ही का स्वीकार नहीं किया। आशा है कि पाठक इस समु- च्चयका महत्व जानेंगे। (१२) इस अध्यायमें आये हुए यात्मा वाचक शब्दों का विचार । पहिले मम " ईश" शब्द है, वह "स्वामी, मालिक, राजा,, का भाव बताता है। इससे आत्माका स्वामित्व अथवा राज्यशासन किसी दूसरे " अनीश" पर है, यह बात सिद्ध होती है और लिये इस जगत् में राज्य शासन रूप फर्म यह आत्मा करता है यह सिद्ध है। जैसा सेवक का फर्म है वैसा स्वामीकामी कर्म है। स्वामी होनेपर कर्म छूटता नहीं है, परंतु बढता है।
1 २६ ईशोपनिषद् । द्वितीय मंत्रम " नर" शब्द है। यह "नायक, नेता, चलानेवाला" इस आशयको बता रहा है। जिनका नेतृत्व इसके पास है, उनको चलानेका, और योग्य दिशासे बलारेका कार्य करना इसको आवश्यक हो है । इसलिये यह शब्द भी इसके पर्मका बोधक है। तीसरे मंनो "जना." शन्द जननमात्र कर्म करने वाले सामा- न्य लोगोवा बोधक है। इस अवस्थामें यह फेवल प्रजनन करनेका कर्म करता है, संतानकी उत्पत्ति करना ही इस अवस्थामें इसका कर्म। चतुर्थ मंत्रमें "अर्पत्" शब्द है । गत्यर्थक प् धातुसे यह शब्द बनता है, इसलिये इसका अर्थ गतिप्रधान ही है। गतिमी एक कर्मही है । ज्ञानार्थक भी यह शब्द है । तात्पर्य ज्ञान और कर्म का इस शब्दमें समुच्चय है। पष्ट और सप्तम मंघो में "आत्मा किरा सतत फर्म करने के अर्थयाला 'अत्' धातु इस शादमें है। इसलिये “ सतत धर्म करनेवाला" ऐसा इसका स्थयं अपना ही अर्थ है। इसीलिये आत्माके लक्षणों में "प्रयत्न " भी एक लक्षण संमिलित हुआ है। इच्छा, दुप, सुख, दुख, प्रयत्न, ज्ञान, ऐ आत्मा के छ. लक्षण है और उसका अत्' धातुके अर्थ के साथ संबंध है। अहम मंत्रों में " कयो, मनीपी, परिभू." आदि शब्द आत्मा के विविध गुण यता रहे हैं। इस में यह विचारणीय है कि ये दो विशेषण " अग्नि पता भी हैं। देखिये- वमने प्रथमो अंगिरस्तमः कविधामा परिभूपसि प्रतम् ॥ १।३११२ "हे अग्ने ! त् (अगि-रस-तमः) अंगोमें मुख्य सस्वरूप (प्रथम कवि )पहिला कवि है और (देवाना पनं )दियोका सातत्यगमन . ।
" भूमिका। बत, अथवा देवताओंका व्रत (परिभूपसि )सुभूपित करता है। शरीर में आत्मा सब अंगोका मुख्य सत्य है और वह इंद्रियोंके व्यापार चलावा है । तथा जगत् में परमात्मा मुख्य सत्वरूप है और सूर्यादिकोको वलाता है। इस मंत्रमें "अग्नि" शब्द आत्मा वाचक है और उसका कचि" यह विशेष है, जो यज० अ० ४० के आठवे मंत्रमें शुद्ध आत्माका विशेषण आया है। अग्निका अर्थ वेदमें आत्मा है इसका यह एक प्रमाण है । इस विषयक अधिक प्रमाण यहां देने की आवश्यकता नहीं है । इससे पूर्व जो अग्नि देवता का विचार किया है, उस में यह मंत्रभी देखने योग्य है । अस्तु । पंध्रहये मंत्रम "सत्य"शब्द आत्माका वाचक है।" सत् यमन करता है अर्थात् 'सत् का नियामक" आत्मा है। यह निय. मनरूप कर्म बता रहा है। सोलहवे मंत्रमें उक अर्थकाही "यम" शब्द है । नियामक शा- सका ये इसके अर्थ हैं। "ईश" शब्दक अर्थ के साथ ही इसका मं. बंध है। "पूपा" शब्द पोपण करने का भाव, ऋषि " शब्द ग. ति और शानका समुच्चय "सूर्य" शब्द प्रसव ऐश्वर्य वाचक 'सु' धातुसे बनने के कारण सब जगत् की उत्पत्ति और सब जगत् का ऐश्चर्य बढानेवाला आत्मा है यह भाव बताता है। इसी मंत्रमें "प्र. जा-पति" शब्द है उसका भाव प्रजापालनरूप कर्म है । यही मा- व प्रथम मंत्रके 'ईश' शब्दने व्यक्त किया है । "पुरुष" शब्द पुरि. योमरहनेका भाव बता रहा । पूर्वोक्त चार अवस्थायें चार पुरियोंमें रहने से ही इसके अनुभव माती हैं । इसलिये पुरुष श- दसे पूर्वोक्त चार पुरियों के साथ संबंध और यहां के कर्म व्यक्त मंत्र १७ में "तु" शब्द कर्म का ही बोधक है। यह शब्द इसका स्वभाव धर्म ही बता रहा है। "शतक्रतु " शन्द जो इंद्र याचक है ८ - ईशोपनिषद् । वह भी आत्माकाही पाचक है। सौ वर्प जीवित रहवर यज्ञ कर- नका भाव उस शब्दमें है। इसीलिये इस अध्याय के द्वितीय मंत्र में "कर्म करते हुए यहा सो घर्ष जीने की इच्छा करो' ऐसा उप- देश किया है । उसका "शतकतु ' शन्दसे निकट सपध है। अठारह मत्रमें "अग्नि " शब्द गतिवाचक ही है क्यों कि यह गत्यर्थक" अग " धातुसे बनता है इस प्रकार आत्मावाचक सयही शब्द पुरुषार्थ के चाचा है, यह यहा अत्यत विचार करने योग्य बात है। इन शब्दोंसे जो जो आ- रमाके गुणधर्म व्यक्त हो रहे हैं उनका विचार करनेसे आत्माये बा- स्तविक स्वरूपका पता लग जायगा । और कर्म करना उसका स्वमानही है यह बात भी इस विचार से सिद्ध होगी! अप इन शन्दोका परस्पर सवध पया है इसका विचार करना है- १३ इस अध्यायके विशेष नामाका परस्पर सबध । इस अध्यायमें जो विशेष नाम है, वे आस्माफी शानिषा वर्णन कर रहे हैं। कई शब्द विशेषतया केवल जीवात्मामा वर्णन करते है और कई विशेषतासे परमात्माका वर्णन कर रहे है । तथा का ऐसे हैं कि जो दोनोंका वर्णन समानतासे पर रहे हैं। साधारण अपस्थासे उच्च अवस्थातक उनका कैसा प्रमदे और उनसे हमें पया बोध मिलता है। इसका यहा विचार करना है। प्रथमत यहा इस बात को अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि, जो परमात्माके पाचक शब्द घेदिक वाङ्मयमें है, ये परिच्छित अर्थात् मर्यादित भाषक साथ जीवात्मा भी याचक है, और जो जीवात्मा के पाचर शब्द घे अमर्यादित अर्थ के साथ परमात्मा भीवाचक हैं। प्राय सरशार दोनों परिये समानतासे दी प्रयुक्त होते हैं क्यों भूमिका। कि दानोंके गुणधर्म बहुत अंशमै समानही है और दोनोंका पितापुत्र मंबध सुप्रसिद्ध ही है। "अज, इद् आत्मा" आदि शदों के साथ सय पाठक परिचित ही ६, और ये जानते है कि ये शब्द दोनों के लिये प्रयुक्त होते है । इसी दृष्टिसे इन शब्दोका यहा विचार करना है और उस के द्वारा जीवात्माशी उन्नतिका मार्ग देखना है। परमात्मा सदा पूर्णशानी है, परतु जीवात्मा किसी कारण मिथ्याशान अपना अशान से युक्त होता है, यह अज्ञानरूप जो अवस्था जीवात्माको किसी कारण विशेषसे प्राप्त होती है, यह कदापि परमात्माको नहीं होती। इस अवस्थाके घाचक जितन शब्द जीवात्माफे लिये प्रयुक्त होते हैं, वे कभी परमात्मा के लिये प्रयुक्त नहीं होते । यह विशेपेता रक्ष्यमें रखनी चाहिये। इन शब्दों में से एक "आत्म-हन्" शब्द तृतीय मत्रमें प्रयुक्त हुआ है। आत्मामा घात जो करता है यह आत्महन् हाता है । जिसपोजन्म और मरण नहीं है ऐसे अज और अमर "आत्माका घात होता है? 'अपनी शक्तिका पता न होने से ही आत्मघात होता है। इस अध पातका कारण अशान है। यह "आत्म हन" शब्द उन जीवात्माओंका बोध करता हे कि, जो स्वकीय शक्तिसे अनभिज्ञ होने के कारण अपने आपको कमजोर समझते हुए हीन अवस्थामें गिरते जाते हैं। ये आत्मघातकी लाग अपनी शारीरिक शक्निमें ही मस्त रहते हैं, नहीं नहीं, अपनी शक्तिके घमंडसे उन्मत्त होकर बडेही अनर्थ करने के लिये सिद्ध होते हैं, और प्रत्येक प्रयत्नसे गिरते ही जाते हैं। असु " प्राणो कहते हैं। उन प्राणोको जो शक्ति है वह 'असुर्ग' नामसे प्रसिद्ध है। यह वस्तुत आत्मा को हो शक्ति है, परंतु यह स्थूल शरीरमें कार्य करती है । इस शक्तिमें ही मस्त रहनेक अथवा इस शक्तिस स्माथा भोग बढाने के कारण इस की कैसा - ३२ হানি। मेरी उत्पत्ति नहीं हुई, मैं स्वयं ही हूं, इसीलिये " स्वयं-भू" मुझे ज्ञानी कहते हैं। इस रीतिका विचार करके इस अवस्थामें यह अप. ने आपको स्वकीय शक्ति से अवस्थित अनुभव करता है और अपनी आत्मशक्तोस यह शरीर चल रहा है ऐसा देखता है। आत्मा अपनी शक्ति से ही रहता है, परंतु शरीर के अस्तित्य के लिये आत्माका रस चाहिये, आत्माकी शक्ति चाहिये । इस रीति- फे विचार से पह अपनी स्वतंत्रता का अनुभव प्रात करता है और अपने आधार पर शरीरका अस्तित्व है, अतएव बद्द, परतंत्र है ऐसा देखता है। में 'एक' और मेरे पक के आधार से शरीरको अनेक शक्तियां हैं। उन अनेक शक्तियों में अपने ' एक्स्य ' का यह अनु- भव करने लगता है । अनेक भिन्न पदार्थोंमें एकत्वका अनुमय करने का अभ्यास इस रीतिसे उसको होता है। मैं कभी कंपायमान नहीं होता (अन्-एजत् ), क्यों कि शरीर बननेके “पूर्व " ही में था, और शरीर नष्ट हो जानेपर भी मैं रहे गा, और बीचकी अवस्था में शरीर को (अर्पत् ) गति दे रहा हूं। शरीर का अस्तित्व यीचकी अवस्था है, परंतु मेरा अस्तित्व शरीर से पूर्व और उत्तर कालमें भी एक जैसा ही है। इस ज्ञानसे यह निर्भय होता है और अपने भौरय का पद अनुभव क. रता है। मुझे कोई पाशवी शक्ती नहीं दवा सकती क्यों कि पाशवी शक्तिसे कई गुणा पलवत्तर जो आत्मशक्ति है वही मैं हूं. इस न. कारके मननसे बह आत्मिक पलसे परिपूर्ण होता है। यह तीनो कालों में उक्त प्रकार अपने आपको "सत्य" स्या- प समझता है। किसी काल में नहीं था पंसा कोई काल नही हैं. परंतु शरीर एक काल में आता है और दूसरे कालमें चला जा. ता है। उसके आने न आने से अपनी आत्मशक्तिमे कोई न्यूनाधिक । । भूमिका। ३३ नहीं होता। यह अतींद्रियताका अनुभव इस समय वह करत है इसलिये उसको इस समय " कविः " कहते हैं । जो साधारण लोग नहीं देख सकते उस यातको अपनी असाधारण दृष्टिसे कवि लोग देखते हैं। यह असाधारण दृष्टि उसको इस समय होती है । इस दृष्टिके कारण ही वह अपने अंदर विलक्षण बलका अनु- भव करने लगता ह वह देखता है कि शरीर धारण करने के पूर्व उस को माताके उदरमै रहना पड़ा है। "मातरि-श्वा" मैं ही हूँ पेसा यह इस विचार से समहाता है । स्वेच्छासे देह धारण करने के समय अथवा फर्म के प्रवाहमें पड़ने के कारण द्वितीय जन्म धारण करने के समय माताके उदर में जाना आवश्यक है । तथा एक शरीर छोडकर दूसरा लेने के पूर्व जो गर्भस्थानीय अवस्था है उसमें भी, पूर्व शरीर द्वारा मेरी प्रेरणासे कियेहुए कर्म, संस्काररूप से रहते हैं। अर्थात् किया हुआ फर्म नष्ट नहीं होता। कर्म शरीरों के द्वारा किया जाता है, परंतु संस्कार रूपसे जन्मजन्मांतर तक वह रहता है। इस लिये आवश्यक है कि प्रशस्ततम कर्म ही किये जाय । और कमी पेसे कर्म न हो कि जो गिरानेवाले हो । मैं आत्मा ही. इस कर्मभूमि-देहम-कर्मफर्ता हूं। मैं ही इस यज्ञशाला में-देहमें यशकर्ता हूं। मेरी प्रेरणासे ही यहां के यज्ञ हो रहे हैं । इसी लिये मुझे "ऋतु" कहते हैं। इस देहमें रहता हुआ मैं सौवर्ष यज्ञ करता हूं इसलिये ही में 'शत ऋतु' हूं । इस शतसांवत्सरीक यज्ञका बीच में ही विघ्नों के द्वारा घात होना उचित नहीं । कुविचार रूपी राक्षस सहस्त्रोंकी संख्या है जो कि इस यक्षका विध्वंस कर रहे हैं। परंतु मैं इसको अवश्य निर्विघ्नतासे समाप्त करूंगा। मैं 'प्पा " हूं, क्यों कि इस शरीर की पुष्टि मेरे से हो रही है । शरीर की पुष्टि मेरे बिना नहीं हो सकती ! मैं ही इस शरीर का ३४ ईशोपनिषद् । और मन आदि संपूर्ण इंद्रियों का नियमन करनेवाला होनेसे यहां यम "यम और नियमों के पालन करने मारा सपक पया योग्य रीतिसे नियंमन अपत्यही करूंगा। संपम पूर्वक ब्रह्मा- धर्यादिका यथायोग्य रीतिसे पालन करता हुआ सु-प्रजा उत्पन्न करके, उस सुप्रजा का उत्तम प्रकार से पालन करूंगा । क्यों कि मेरे विना मेरे संतानोका परिपालन फौन करेगा।" प्रजा-पति । का धर्म पालन करना मेरे लिये आवश्यक ही है। मैं"प्राजापत्य"ही है। इसलिये सुप्रजा निर्माण करके उनका योग्य पालन करना मेरा योग्य और श्रेष्ठ कर्तव्य है। सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । " (२६ १९९६१) स्थावर जंगमका आरमा ही सूर्य है । यहां शारीर में शरीरादि स्थावर और मन आदि जंगम पदार्थों का मैं आरमा हं इस लिये यहां मही" सूर्य" हूं। ये मेरे सप्तरदमी सात हिरण सप्त इंद्रियों में प्रकाश कर रहे है, यही मेरे ( समाव) सात घोडे है। यही "सम मपी " और ऋषियोका "ऋषि आरमापसे मैं यहां विराजमान हूं। यहां मेरी.उपस्थिति होनेसे सब शरीर पवित्र रहता है और मेरे जानेसे यहां सय अमंगल हो जाता है, इसलिये यहाँ का सया कल्याण करनेवाला मैं ही " कल्याण-तम "हूं। इस देहरूपी पुरीका "ईश्वर" मैं ही पूरीश ' मेरा नाम है। पुरीमै बसने के कारण मुझे “पुरुष" कहते हैं। इन चार पुरियों में रहता हुआ मैं जागृति, सप्त, सुषुप्ति और तुर्या इन चार अय. स्थाओंका अनुभव करता । येही ओकार के चार पाद क्रमशः अ, उ, म, अर्ध माना संज्ञासे सुप्रसिद्ध है । इस प्रकार "ओंकार" मेरे चारों अनुभवों का वर्णन कर रहा है । स्थूल सूक्ष्म, कारण और महाकारण ये इन चार पुरियों के नाम हैं और उनके चार समत ओंकार में हैं। चारों अस्थाओंका अनुभव करनेवाला इस है भूमिका मैं किसी अवस्था के होने न होनेसे नष्ट नहीं होता, इसी लिये मैं अपने आपको 'अ-हं" अर्थात् म-हेय समझता हूं। यह मेरी सानतन सत्ता है। पूर्वोक्त सप्तऋपि जिसमें हवन कर रहे हैं वह आत्माग्नि मैं ही हूं । यही आत्माका “ अग्नि " है जो इस शतसांवत्सरीक " पुरुष- यज्ञ" का अधिष्ठाता " देव " है । यही सब कर्मों को जानता हुआ, इस शरीर रूपी रथ में बैठकर अपने पूर्वोक्त धैभवका अनुः भव करता हुआ प्रगति करता है। अस्तु । में जो आत्माचाचक शब्द उनका जीवात्मा विषयमें जो अर्थ लेना आवश्यक है, और जिस अर्थका चिंतन करता हुआ अथवा परमात्माके जिन गुणोंका चिंतन करता हुआ जीवात्मा, अपने अंदर उन सक्दों का विकास करके उन्नत हो सकता है, उनका वर्णन ऊपर किया है। इन शब्दोंका परमेश्वर विषयक वर्णन प्रसिद्ध ही है और वह आगे आ जायगा । इस लिये उसका यहां पुनः वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है। १४ आत्मज्ञानकी आवश्यकता। जो ज्ञान प्रगति के लिये अत्यंत आवश्यक है वह "आत्म-ज्ञान" ही है । साधारणतः बाह्य सृष्टिके शानसे लोग अपनी उन्नति करने का यत्न करते हैं, और प्रायः ऐसे लोग आत्मा की शक्तिके विषय में अनभिज्ञ ही रहते हैं। इनके प्रयलसे ही फैलती है । येही आसुरी शक्तिसे काम करने वाले लोग हैं। जो देवी शक्तिसे युक्त होते हैं वे आत्माको शक्तिका ज्ञान संपादन करते हैं। और साथ साथ जगत के पदार्थों का भी विज्ञान प्राप्त करते हैं । और दोनों के संयोगसे ऐसी उन्नति करते हैं कि जो सब की भलाई के लिये कारणीभूत होती है। जगत् में अशांति 1 , म ईशापनिषद् । शारीर का संचालक आत्मा है और जगत् का प्रवर्तकपरमात्मा है। दोनोंके गुणध का ज्ञान प्राप्त करना आरमविद्याके अध्ययन से होता है । पहिले कदाही है कि बहुत अंशमै दोनों गुणधर्म एक जैसे ही हैं। एक का प्रमाण और कार्यक्षेत्र छोटा और दूसरेका प्रमाण और कार्यक्षेत्र अपरिमित है। इन क्षेत्रोंके परिमित और अपरिमितता को अलग किया जायगा, तो यहुतसे गुणधर्म दोनों के एक जैसे ही हैं। इसी लिये दोनों के नाम एक जैसे ही होते है। इस आत्माके गुणधर्म जानने से, अपनी शक्ति क्या है और मैं क्या कर सकता हूं इसका ज्ञान होता है, और यही शान उन्नति का हेतु है । जो जगत् के गुणधर्मो को जानता है, परंतु अपने गुणधर्मों को नहीं जानता, उसकी अवनतिकी कोई पद नहीं है। सीलिये आत्माके शान की अत्यंत आवश्यकता है। हरपक के आंख के सामने जगत है, इसलिये हरएक मनुष्य जगत् का कुछ न कुछ शान रखता ही है। परंतु आत्मा वस्तुतः जगत् से भी पास है, और जगत् से भी अधिक प्रत्यक्ष है, परंतु स्थल इंद्रियोंसे उसका दर्शन न होने के कारण उसके विषयका शान प्राप्त करनेमें बहुत थोडे लोग प्रयान करते हैं। इसी लिये घेद में इसीका मुख्यतः वर्णन विविध रीतियों और अलंकारों के द्वारा किया हुआ है। आप किसी देवता मंध लीजिये, उसमें अंशत: अथवा पूर्णतः इसी आत्मा का वर्णन दिखाई देगा। परंतु चैदिक रीतिसे ही उसको देखना चाहिये । अन्य यातोका वर्णन, गौण रीतिसे है, और हरएक प्रकरण में इसीका घर्णन मुख्य है, इसका हेतु यही है। आत्मा और जगत् इन दोनों के शानका समुच्चय उन्नति का साधक है, यह बताने के लिये ही इस अध्यायका "विद्या अविद्या" - " भूमिका। प्रकरण है। इसलिये अब इसी विषयका विचार करेंगे- (१५) विद्या और अविद्या "विद्या और अविद्या" से किसका योध लेता है इसका अर्थ विचार करना है। प्रायः भाष्यकारों में इन शब्दों के अर्थ के विषय में मतको एकता नहीं है। देखिये- विद्या"(श्री. शंकराचार्य.) देवता-शान। (श्री. रामानु- अशिष्य नारायण प्रकाशिका) ब्रह्मोपासना, परमात्मोपासना। (श्री. माध्य० जयतीर्थ विवरण) ईश्वरका यथार्थ शान. (श्री. स्वा. दयानंद सरस्वती ) शब्दार्य संबंधविज्ञानमात्र अवैदिक आचरण, आत्मशुद्धांत:करणसंयोगधर्मनित यथार्थ दर्शन । अ-विद्या" (श्री. शं०) कर्म । ( श्री. रा., ना. प्र.) कर्म । (श्री. मा. ज. वि.) अयथार्थ ज्ञानकी निंदा। (श्री. स्वा. द.) अनिस्पाशुचिःखानामप्सु नित्यशुचिसखात्मस्पातिरविद्या, इति ज्ञानादि गुणरहितवस्तु कार्यकारणात्मक जड परमेश्वरसे भिन्न । ये अर्थ इस समय तक किये गये हैं। इनमेंजोजगत्पूज्य आचार्य है उनके अथापर हस्ताक्षेप करनेमा हमें अधिकारही नहीं है।तथापि उक्त अर्थों में से कई अर्थों की स्वीकृति करनेपर मनोके अर्थोकी संगति लगती है या नहीं, इसका विचार यहां करना चाहिये। इस अध्यायमें विद्या अविद्या प्रकरणमें तीन मंत्र हैं। उनका शब्दार्थ निम्न प्रकार है-"(१) जो केवल अविद्या की उपासना करते हैं वे अंधेरेमें जाते हैं, और जो केवल विद्यामें रमते हैं ये भी उससे घोर अंधेरे में जाते हैं। (२) विद्या और अविद्या का फल भिन्न है ऐसा शानियों से हम सुनते आये हैं । (३) जो विद्या और अविद्याका समुच्चय करते हैं, ये अविद्यासे मृत्युको दूर करके विद्यासे अमृत प्राप्त करते हैं।"
३८ ईशोपनिषद् । थी शंकराचार्यजी विधा और भविधाका अर्थ क्रमशः देवता. शान और कर्म करते हैं। परंतु ये अर्थ तीसरे मंत्रक भावके साथ संगत नहीं होते । कर्मसे स्वर्ग प्राप्त होकर जन्ममृत्यु होता है। परंतु तीसरे मंत्रमें "अविद्या से मृत्युको दूर करने का वर्णन " है, इसलिये कर्मसे मृत्युको दूर करने की संभावना न होने के कारण यह अर्थ ठीक नहीं । तथा देवता शानसे भी अमृत अर्थात् मोक्ष मिलना नहीं है। इसलिये ये अर्थ ठीक नहीं दीखते। " अमृत शब्दका अर्थ बदलकर " देवतारममाव "ऐसा अर्थ इन्होंने किया है। यह भी टोक नहीं। विधा अविद्या अर्थ उक्त प्रकार कृत्रिम माननेसे अमृत शब्दका अर्थ मी यदलना पडा है। विद्या शब्दके व्यापक अर्थका संकोच करके "देवा" पेसा संकुचित अर्थ फरने, तथा " अ-विद्या"शदका कृत्रिम पनावटी अर्थ “कर्म पेसा करने के कारण हो "अमृत " मान्दफे अर्थका संकोच करना पड़ा है। परंतु ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं। इस आपतिको हटाने के लिये करयों ने यह उपाय लिखा है कि " अविद्या " शब्दका अर्थ "सकाम कर्म" करना । परंतु यह अर्थ तीसरे मंत्री कष्ट देता है क्योंकि वहाँ " निष्काम कर्म ।' ऐसा अर्थ उचित दीखता है। इसलिये ये अर्थ ठीक नहीं है। श्री मध्वाचार्यजीका अर्थ " अयथार्थ ज्ञान को निदा' यह पिल. क्षण ही है। यह अविद्या शब्दसे कैसा निकलता है यह भी सम- झना कठिन है। अन्य अर्थोका विचार करने के पूर्व हम अंतर्गत प्रमाणोस इन शब्दों का अर्थ फरने का यल करते हैं- इस अध्यायके प्रथम मंत्र प्रथम पादके साथ विद्या अविद्या" का संबंध है, ऐसा पहिले कहा दी है। यह प्रथम चरण यह "शावास्यं दसयो" "ईश्वर इस संपूर्ण विश्व व्याप्त है।" यह इसका भाव है। शशब्दकी सापेक्षता से यह विध "अनीश"हैपेसा । - A आत्मा सत्य भूमिका। स्वयं सिद्ध होता है । अनीशके ऊपर ही ईशका स्वामित्व है । जड के ऊपर ही चेतनका अधिकार है। ईश शब्दके घाचक अन्य शब्द इस अध्यायमें " आत्मा, ब्रह्म, सत्य, प्रजापति (प्राजापत्य), यम, पुरुप, एक" आदि हैं। इनको क्रमशः निम्न कोएकमें रखा है- ईश अनीश. सनात्मा जगत् असत्य यम यम्या नियंता नियम्य पुरुष प्रकृति अनेक प्रजापति प्रजा स्त्रष्टा सृष्टि (ईशा)......वास्य...... ( इदं सर्व) इससे ईश और इदं 'शब्दोंसे किस का बोध लेना है, इस यात का ज्ञान हो सकता है । दोही पदार्थ हैं, एक पुरुष और दूस- री प्रकृति । दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है। केवल किसी एक का ज्ञान होनेसे कार्यभाग नहीं हो सकता। इसलिये उक्त शब्दों के साथ विद्या शब्दका प्रयोग करेंगे- ईश -विद्या अनीश-विद्या आत्म-विद्या अनात्म-विद्या अब्रह्म -विद्या विद्या अ-१०-विद्या दोनों स्थानोंस समान शब्दोंको हटानेसे " विद्या अविद्या" में दोही शब्द अपशिष्ट रहते हैं । पूर्वोक्त कोटकों के अनुसंधान से इन . । - ब्रह्म -विद्या ०० ४० ईशोपनिषद् । साम्दोका अर्थ निम्न लिखित प्रकार होता है- (१)विद्या-आत्माका ज्ञान । (२) अविद्या-जगत् का विज्ञान । ये अर्धप्रथम मंयक अनुसंधानसे होते हैं। सब याहा प्रमा- जौको अपेक्षा अंतर्गत प्रमाण अधिक बलवत्तर होता है, इसलिये ये अर्थ अंतर्गत प्रमाणोसे प्राप्त होने के कारण अधिक प्रामाणिक हैं। इस विधा अविद्या विषयमं श्रुतिही फया कह रही है देखिये- विद्याश्च चा अविद्याश्च यच्चान्यदपदेश्यम् । शरीरं ब्रह्म प्राविशदचः सामायो यजः।। अध. ११ । ८२३ 'विद्या. अविद्या तथा और जो कुछ उपदेश करने योग्य है। पह ऋक्, यजुः, सास और (ब्रह्म)शान पसे शरीर में प्रविष्ट हुआ है। इस मंत्र में कहा ही है कि (विद्या) आरमशान जैसा उपदेशक- रने योग्य है, उसी प्रकार (अ-विद्या) सृष्टिविज्ञान भी पढने योग्य दै, तथा इससेमी भिन्न और(अन्यत् उपदेश्य ) अन्य ज्ञान उपदे- स करने योग्य है। पाठक पछगे विघद तीसरा यया है? विद्या अविद्या के "संघका ज्ञान " जो है वह तोसरा उपदेश शान है। (१) एक आत्माका ज्ञान: (२)दूसरा जगत् का विज्ञान और (३) तोसरा आरमा और जगत के परस्पर संघका परि- शान है । फेवल आत्मज्ञान अथमा केवल जगद्विज्ञान सा लाम- कारी नहीं हो सकता, जैसा दोनोंका इकट्ठा ज्ञान हो सकता है। अर्थात् दोनों संबंधफे परिझान का भी पड़ा भारी महाय है। यही पात इस अध्यायमें कही है । देखिये घेही पूर्वोक्त तीनों मंत्र- (१)केवल प्रति विद्याकी हो जो भक्ति करते हैंधे गिर- ने ही हैं, परंतु जो केवल आत्मविद्यामें ही रमते हैं ये उससे मी .
भूमिका। अधिक अवनत होते हैं। (२) आत्मशान का औरजगद्विज्ञानका फल भिन्न भिन्न है ऐसा हम शानियोंके उपदेशमै सुनते आये हैं। (३) जो आत्मज्ञान और जगद्विशान को साथ साथ लाभकारी समझते हैं वे जगद्विशानसे दुःखों को दूर करके, आत्मज्ञानस अमृतको प्राप्त करते हैं।" जगद्विद्याके शानसे ऐहिक योगक्षेम ठीक चलता है और आत्म- ज्ञानसे आत्मिक शक्ति और शांति प्राप्त होती है । यदि फेवल जगत् के विज्ञानमें ही लोग मस्त रहेंगे और आत्मज्ञानके तरफ् जायगे ही नहीं; तो इस अवस्था ये जगत् के भोग बहुत बढा- येंगे, यह बात ठीक है परंतु उनके प्रयत्न आत्मिक शति न होने के कारण लोग इनकी संगतिसे अधिकाधिक दुःखोंमें हो गिरते जायगे । तथा दूसरे पक्षमें जो लोग केवल आत्मज्ञानमें ही रमेगे और जगद्विज्ञानका विचार बिलकुल छोड देंगे, तो वे भी अवनत ही होंगे, क्यों कि ऐहिक तथा स्थूल देह विषयक स्वस्थता उनको विना सृष्टिविद्याके प्राप्त नहीं हो सकती। इस प्रकार ये दोनों केवल एक पक विद्याके उपासक होनेके कारण अधोगतिको प्राप्त होते हैं। इस लिये दोनों विद्याओंका समुच्चय करनेको सूचना इस अध्यायमें कही है। दोनों विद्याओंको यथायोग्य प्रमाणमें जान. से भौतिक विद्यासे ऐहिक सुख प्राप्त होते हैं और आस्मिक विद्यासे अमौतिक आनंद मिलता है । इस प्रकार मनुष्य सीधा उन्नतिक मार्गपर चलने का अधिकारी होता है। यह ४० वा अध्याय तत्वज्ञानका है, इसलिये इसमें जो यह सूचना दी गई है वह अत्यंत उपयोगी है। शिक्षा प्रणालीका विचार करनेवाले इससे अपनी शिक्षा प्रणाली ठीक कर सकते हैं । दूसरे लोक भी दोनों विद्याओंको जानने का यत्न करके अपना अभ्युदय -- .
ईशोपनिषद् । । और निधेयस्का मार्ग सुगम कर सकते हैं। आधुनिक मतमतांतर. के झगडों से यदि कुछ हानी होगई है,तो यही है कि इस सम वि. कास के तत्वकी ओर किसीने ध्यान नहीं दिया है । और हरपक मताभिमानी अपनी अपनी ही तार खींच रहा है। परंतु इन तीन मंत्रका पुनः पुनः विचार करनेसे सब शंकाओंकी निवृत्ति होकर योग्य मार्ग दिखाई देता है । आशा है कि पाठक इन मंत्रोका और भी अधिक विचार करेंगे। (१७) संभूति और अमभूति । पूर्वोक्त विद्या-अविद्या प्रकरणके समानही यह संभूति और असंमतिको प्रकरण अत्यंत विचार करने योग्य है। इन शब्दों के अर्थ जो इस समयतक भाग्यकारोने किये है ये नीचे दिये हैं- 'संभूति " ( श्री. शं०) सृष्टि, कार्यब्रह्म हिरण्यगर्भ आदि । (श्री रा० ना०प्र०) समाधि । (श्री०मा०) श्री हरिका जगाकत.. फत्व जो मानते हैं। (श्री स्वा०६०) महदादि रूपसे परिणत सृष्टि। अ-संभूति "- (श्री००) मूल प्रशति । (श्री रा० ना० .) समाधिके अंगभूत निषिद्ध कर्मसे निवृत्ति । (धी० मा०) हरीका जगत् का संहार करनेका धर्म को मानते हैं।(धोकस्या०६०) अनादि अनुत्पन मूलप्रतिरूप सत्वरजतमोगुणमय जड वस्तु । इन अ का विचार करने के पूर्व एक यात यहां कहना आय. श्यक है, यह यह है कि श्री शंकराचार्यजी संभूति असमति के अर्थ जो पहिले मंत्री मानते हैं घोड़ी अर्थ तीसरे मंत्रम मानते नहीं, परंतु उनके बिलकुल उल्टे अर्थ मानते हैं । उन्होंने लिखा है कि- संभूति च विनाशं चेत्याऽवणलोपेन निदेशी दरम्यः । प्रनिलय फलधुस्यानुरोधात् ॥ (ईश० उ० शाकरमाप्य १४) .
" - भूमिका। संभूति च विनाश च इस १४ वे मंत्र में संभूति और वि- नाश के पूर्व अकारका लोप हुआ है ऐसा समझना उचित है। अर्थात् संभूति शम्दो स्थान पर " असंभूति " की और असंभू. तिके स्थानपर "संभूति " की कल्पना करने को कहते हैं। इस कथन सेही स्वयं यह सिद्ध होता है कि इनके संमति असंभूतिके अर्थ तीनों मंत्रों में ठीक प्रकार नहीं लग सकते। जो अर्थ अपने प्रकरणमें ही सर्वत्र उपयोगी नहीं होते वे अर्थ किस प्रकार माने जा सकते हैं ? और जिन अथैक लिये 'अ' कारके लोप की कल्पना करनी पड़ती है ये ठीक भी किस रीतिसे हो सकते हैं ? तथा अकारलोप की कल्पना किस व्याकरण के किस नियमसे मानी जा सकती है ? यह व्याकरणविरद्ध कल्पना है ऐसा श्री० जयतीर्थ जी ही कहते हैं- अकारलोपेन संभूतिरव्याकृतमित्यपूर्व व्याकरणकौशलम् ॥ (श्री० जयतीर्थ विवरण १४) अकार लोपकी कल्पना कर के संभूति का ही अर्थ अध्या- कृत किंवा असंभूति करना यह अपूर्व व्याकरण का कौशल्य है !" यद्यपि यह भाषा उपहासात्मक है, और इसलिये हमें उसका स्वीकार नहीं करना चाहिये, तथापि मूल वक्तव्य यात असत्य नहीं है । तात्पर्य अकारलोप मानफर अर्थ करना श्रुतिप्रामाण्यकी दृष्टिसे भी उचित नहीं है। श्रुतिको प्रमाण मानते हुए उस के शब्दो के पूर्व अकार की कल्पना करने से शब्दों के विपरीत ही अर्थ हो सकते हैं । इसलिये ऐसी कल्पना करनी न पड़ेगी ऐसे ही अर्थ हम को ढूंढने चाहिये । इनका विचार करने के पूर्व सं. भूति असंभूति के तीनों मंत्रोका शब्दार्थ यहां देखिये- (१)जो असंभूति की उपासना करते हैं ये अंधेरे में जाते हैं परंतु उससे भी गहरे अंधेरे में ये जाते हैं जो कि समूति में ही - . । ईशोपनिषद् । रमते हैं । (२)मभूति और असंभूतिका फल मिग्न है ऐस हम शानियों के उपदेश में सनते आये हैं। (३) संभूति और असंभूति को एक साथ उपयोगी जो समझते हैं, घे असंभूति के द्वारा मत्यु को दूर करके संमति के द्वारा अमृत को प्राप्त करते हैं।" (प. अ.४० में ९-११॥ईशश. उ मं. १२-१४ ) अर पाठकही विचार करें कि पूर्वोक्त अयों में से कौन से अर्थ किस दृष्टिसे उपयोगी हो सकते हैं। हमारी दृष्टिसे इन शब्दों पा संबंध प्रथम मंत्र के द्वितीय पाद से है और उस के विचार फरने से इन शब्दों का अर्थ स्वयही स्पष्ट होना संभवनीय है और उस अवस्था में अकारलोप को कल्पना करने की कोई आवश्य कता भी नहीं। देखिये प्रथम मंत्रका द्वितीय पाद- यत्किच जगत्यां जगत् ॥ यह द्वितीय पाद है। प्रथम पादमें कहा है कि "ईश्वर व्यापता है इस सब विश्वमै ।" (ईशावास्थ इदं सर्व) इसके 'सर्व' पदकी प्यारया इस द्वितीय पादमें की है। जो है उस सप में ईश्वर व्यापक है। यह इन दोनों पादोंका अर्थ है। हमारे इस प्रकत प्रकरण का अर्थ निश्चय करने के लिये "जगत्यां जगत् " इन दो शब्दों का आशय देखना आवश्यक है। "जगत" के समुदाय का नाम है “जगतो"। इसलिये " जगत्यां जगत् ' शब्द में समुदाय और व्यक्तिकी करपना है " समष्टि व्यष्टिरूप से जो है उस सव विश्वमें ईश्वर व्यापता है।" यह आशय उक्त मंघार्ध का हुआ। अब और इसका अर्थ करने के लिये निम्न कोएक देखिये- जगत्यां जगत् जगती जगत् सृष्टि एक पदार्थ जगतीमें जगत् 1 - भूमिका। मानव जाती - । व्यक्ति समष्टि व्यष्टि संघ, जाती एक व्यक्ति Marshind, le ople Aman एक मनुष्य संभूति अ-संभूति "जगत्यां जगत् " इन पदों से जो गूढ भाव व्यक्त होता है यह उपत कोटक में दिया है । इनके कोने में दिये हुए अर्थ नीचे ता- (१)"सं+ "मिलना, एक होना, संबंधित होना। (२)संभव-मेल, मिलाफ, एकता,सहकार,सहयोग । (३) संमत-मिला हुआ (४) संभूति-संमेलन,मिलना, एक होना (५)संभूय-एक होकर, साथ होकर, सहकार्य करके संघ बनाकर (६)संभूय समुत्थान-व्यापारी संघ, हिस्सेदार हो. कर व्यापार करना,मिलकर ऊपर उठ. नेका यत्न करना, मिलकर एक होकर शत्रुपर हमला करना. ये अर्थ देखने से पाठकों को पता लग जायगा कि "संभूति " भादमें " संघ का भार है । इसका अधिक विचार करने के लिये " सं+भू" धातु से पने हुए शब्दों का प्रयोग ही देखिये- यणिकप्रभृतयो यत्र कर्म संभय कुर्वते ।। तत्संभूय समुत्थानं व्यवहारपदं स्मृतम् ॥ नारद स्मृति ॥
४६ ईशोपनिषद् । "वैश्य आदि लोग मिलकर (संभूप) सहकारिता के साथ ध्यवहार करते हैं, उस ध्यपहारको" संभ्य समुत्थान यह "संभूय समुत्थान " अर्थात् सहकारिताका व्यवहार ब्राह्मण, क्षत्रिय, पैदय, शूद्रों में अपने अपने कार्य के लिये हुआ करता है। (१) ग्राम्हण धर्मजागृतिके लिये, (२) क्षत्रिय शत्रुपर हमला करने के लिये, (१) वैश्य व्यापार व्यवहार करने के लिये और (४) शूद कारीगरी के संघ बनाकर अपना कार्य चलाने के लिये अपने अपने वर्णो में संघ ( Unions ) घनाते हैं । यद्यपि वर्गाके घाँके अनुसार प्रत्येक वर्षाका "संभ्य-समु- स्थान " अर्थात् सहकारी संघ भिन्न भिन्न हेतु के लिये हुआ करता है तथापि संघकी कल्पना सर्वत्र एफसी ही है। तथा- संभूय स्थानि कार्याणि कुर्वनिरिह मानधैः ।। अनेककर्मयोगेन कर्तःपांशप्रकल्पना ॥ हेमकारादयो पत्र शिल्प संभय कुर्वते ॥ कर्मानुरूपं निवेश लभैरस्ते यांशतः ॥ वृहस्पति स्मृति । "जो मनुष्य मिलकर संघ बनाकर अपने अपने व्यवहार कर- ते हैं उनके कर्मके अनुसार लाममें उनको भाग देना चाहिये ।" लनार आदि शिल्पी जहां संघ बनाकर कार्य करेंगे, वहां उनके कार्य प्रवीणताके अनुसार उनको लाम मिलना चाहिये।" इत्यादि स्थानों में "सं+" धातुसे बने हुए 'संभय ' शन्द का प्रयोग देखने योग्य है। यही कल्पना संमति " में है। तात्पर्य संभनि " शब्दमे संघमाय की कल्पना व्यक्त होती है। अर्थात् अ-समति " शब्दसे व्यक्तिभाव को भावना प्रकट होती है। संघधर्म और व्यक्ति वर्मका इस प्रकरण में घर्णन है यह याद - "
भूमिका।
४७
-
उपस स्पीकरणसे मात हो सकती है। अब इस अर्थ को स्वी.
कार करको उक्त मंघोंका भाव देखिये-
(१)ी केवल व्यक्ति स्वातंत्रए मान होते है ये गिरते
है, परंतु जो फेयल मंघशक्ति में ही रमते मी उनसे अधिक
गिरते है । (२) व्यक्तिमायका और संघमार का फल मिन्न
भिन्न है ऐसा हम शानियों के उपदेशसे मनो आये हैं। (३) जो
व्यक्तिमाय और संघमाय को सायसाय उपयोगी ममत
व्यक्तिमारसे दायोको दूर करके मंघमायमं अमर होते हैं । "
ध्यपिस धर्मका फल यादे कि उसके पालनसे व्यक्तिको मत्ता
उत्तम प्रकारम रहती है।स्मान, यान, भोजन, व्यायाम आदिस
ध्यक्तिधर्म का पालन हानि के कारण व्यक्ति को सता रह सकती
है। परंतु एक एक व्यक्ति सुरक्षित होनेपर मी संघमायक विना
उनमें यल नदी यसकता। संघधर्मस एकलाम और ध्यक्ति
धमं से दूसरा लाम है ! इसलिये उन्नति पादनेवाले मनुष्यों को
चादि कि पेस्यक्ति धर्मके पालनसे प्रत्येक व्यक्तिको उत्तम
यस्थामें रहने का असर दें, और संघ कपालासे अपनी
संघशक्ति पढाते हुर जातीयता के साथ अमर पर्ने । हरपक
मनुष्य
যখবি মালামাথাপি হয় না আবার মানুষ
अमरदी।
संभूति असंभूति " के प्रकरणमें यह उपदेश है की संघमा.
य और पक्तिमार का समविकास हो आवश्यक है. यक्तिक
शाप और संघशक्तिक पसे नियम बनाने चाहिये कि जिनसे
किसी परका घात न हो और दोनों समविकास होकर मय
की यथा योग्य उपाति दो सके। तमान के अध्याय संघधर्म
गौर व्यकिधर्म का अवश्य विचार होना ही चाहिये । व्यक्तिका
जाती और गटक साथ कैमा बार दोना चाहिये, तथा
४८ " दिशोपनिषद् । जातीका अधया राष्ट्रका व्यक्ति के साथ कैसा याय होना योग्य है, इसका योग्य उत्तर इस प्रकरण पाठक देख सकेंगे। जिप्त प्रकार ज्ञान क्षेत्र में मामाका ज्ञान और जगत का मान साथ साप आवश्यक है, उसी प्रकार कर्म क्षेत्रमै व्यक्तिक और समूहके पोका और परस्पर संबंधोका विचार होना चाहिये । यही विचार इस प्रकरण किया गया है। प्रथम मंत्र साथ इन प्रकरणोंका विचार करनेसे यह भाय स्पष्ट हो जाता है। यह अर्थ अंतर्गत प्रमाणों के विचारसे होने के कारण अधिक सयुक्तिक है। इस अर्थ में भाष्यकारों अर्थ आजाते हैं। परमाणुसंघ का ना म सृष्टि है और विखारे हुए अलग अलग विभक्त परमाणु होनेसे यही मूल प्रकृति है । अर्थात् परमाणुओंका संघ "संभूति शब्दसे भाग्यकारों ने लिया है, और परमाणुओंकी विभक्त स्थिति असंभूति " से ली है। अर्थात् "संघभाव और असंघमाय " येही अर्थ भाष्यकारोंकोभी अभीष्ट है । यदि येही सामान्य मूल अर्थ लिये जायगे तोअर्थका गौरव अधिक होगा। इसका पाठक भी अधिक विचार करें। (१८ वशद और अनवाद तत्वज्ञानका विचार करने के समय द्वैतवाद और अद्वैतवाद का विचार होना आवश्यक ही है, और उपनिपदोका विचार होने के समय इस वादको दूर नहीं किया जा सकता। तथापि सांप्रदा. यिक झगड़ों से दूर रहना ही विचारी पाठकोको उचित है ऐसा हमारा विचार हो रहा है । इस धाद को सांप्रदायिकोंने इतना खेचा है कि उसपर अब और खेचनेसे कोई लाभ होना नहीं है। पास्तविक द्वैत है या अद्वैत है, इसका विचार करने समय अनुमव की दो अंतिम कसौटी मानी जायगी तो निम्न प्रकार भूमिका। मानना पड़ता है- आत्माकी चार अवस्था (१) तुर्या .. अशेयस्थिति (म) सुषुप्ति...HTS] अद्वैतका अनुभवा, उ)स्वप्न... सविकल्पसमाधि (अ) जाग्रति.. उपासनाको अवस्था, देवका अनुभव आत्माकी चार अवस्थायें हैं, उनमें दो अवस्थाओ द्वैत का अनुभव है और दूसरी दो अवस्थाओंमें अद्वैतका अनुभव है। हर. एक मनुष्यको इन चारों अवस्थाओं का अनुभव है। यदि आत्माकी ये चारों अवस्थायें हैं तो द्वैतभी है और अद्वैत भी है। पाठको से यहां निषेदन है कि ये सांप्रदायिक इगडोंमें न जाय । उपनिषदों में और घेदमें भी ये आजकल के संप्रदाय नहीं है। वेद कहता है कि आत्माको चतुर्विध शक्ति उक्त चार अवस्थाओं द्वारा अनुभव. में आती है। यही "चतुष्पाद आत्मा" है । वेदमें आत्मा के चारों यादों का वर्णन कई स्थानों में है। दो पादों में हम द्वैतका अनुभव कर रहे हैं और अन्य दो पादों में अद्वैत का अनुभव ले रहे हैं । जाग्रति और स्थप्नके अनुभवमें निश्चित दैतका ज्ञान है। और "मैं- नहीं " ये दो पदार्थ इन दो अवस्थाओंमें हैं । " मैं, तू वह " स्यादिका अनुभव इनमें आता है। सुषुप्ति और तुर्या का अनुभव द्वैतका निश्चयसे नहीं है, का है। निश्चित एकत्वका है इस विषयमें किसीको शंका हो तो अद्वैत " का अनुभव मान सकते हैं। उस अवस्थाम " द्वैत " का अनुभव निश्चयसे नहीं होता है, परंतु एक "का अनुभव होता है या नहीं यह हरएक नहीं कह सकता जो कुछ अनुभव है वह शब्दों में प्रकट नहीं किया जा सकता, " . परंतु एकत्व " वह ईशोपनिषद् । पादों की गति वहां नहीं है। यहां रेसा अनुमय है कि जिसका वर्णन द्वैतषाचक शब्द नहीं कर सकते । पारतयिक द्वैत और अद्वैतका भाव यह है । जिस समय मतम- तांतर चल पडते है उस समय पडे झगडे खडे होते हैं। उनसे हमें कोई पास्ता नहीं है। आत्माकी चार अवस्थायें होने के कारण, द्वैत और अद्वैतका अनुभव होनेके हेतुसे, सर्वत्र द्वैतप्रतिपादक मी मंत्रों के साथ साथ देत मतिपादक भी मंत्र है। श्रीमद्भगवद्गीताम देखिये कई श्लोक शुभ द्वैत का प्रतिपादन कर रहे हैं, तो कई ऐसे है कि ओ शुद्ध अद्वैत विचार हो बोल रहे हैं। यही बात उप. निषदों में है।घेदमंत्रों में भी यही प्रकार है।पेसा होने का इंतु ऊपर दिया ही है। बहुत लोग इस मूल कारणको ध्यानमें नहीं घरते और कहते हैं कि प्रथोमे प्रक्षेप है। दूसरे कई समझते हैं कि एक प्रकार के मंत्र मुख्य है और दूसरे गीण है। कई लोग अन्य रीतिसे खेंचातानी करके किसी न किसी प्रकार निर्वाह करनेको चेष्टा करते हैं और स्वमत की स्थापना करते हैं। परंतु ऐसा करने से मंथका सच्चा आशय ग्यानमें नहीं आ सकता। उपत कारणसे ही अद्वैती लेग द्वैत प्रतिपादक मंत्रों को खींचते हैं और द्वैती लोग अद्वैव प्रतिपादक मंत्रोको खानते रहा ते हैं। परंतु उक रीति से यदि ये लोग वास्तविक यात को समझें- गे, तोखंचातानीका कारण ही नहीं रहेगा। इस यजु० अ०४० में यदि देखा जायगा तोधास्तविक रीतिसे सातवे के सिवाय सही अन्य मंत्र द्वैत प्रतिपादक ही है। सातवे मंत्रका आशय निम्न प्रकार है " जिस अवस्थामै सय मत मात्र आत्माही होगये, उस अवस्थाम एकत्व का अनुमध करने या. लं विज्ञानी को शोक और मोह कैसे हो सकते हैं? (य. ४०1७) यह एक अवस्थाका वर्णन है। इस अवस्थामें एकत्रका अनुभव भूमिका। होता है और उसी हेतुसे वहां शोक मोह नहीं बाधा करते । पूर्वो- त कोष्टकमें "सुषुप्ति, समाधि और जीवन्मुक्ति " की जो अवस्था पताई है, उस अवस्था का यह अनुभव है। यहां भेद दर्शन नहीं होता है। परंतु चार अवस्थाओंमें यह एक अवस्था है । सुषुप्ति, समाधि और मुक्तिमें ब्रह्मरूपता होती है ऐसा अन्य आस्तिक द- र्शनों में कहा है। यहां "ब्रह्म-रूप-ता" शब्द महत्व पूर्ण है। ब्रह्म के रूपके सदृश बनना है । इसी प्रकार सब भूत मात्र आत्मा ही हो जानेको अवस्था" है । आरमाके चार पादोंमें किस पादकी अवस्था में यह अनुभव हो सकता है, यह बात इस समयतक के वर्णन से स्पष्ट हो चुकी है। इस लिये इस विषयमें यहां और अधि. क लिखने की आवश्यकता नहीं है । चार पादों से किसी एक पादका अनुभव दूसरे पादोंके अनुभवोंको नष्ट नहीं कर सकता, इतनी ही यात यहां ध्यान में धरनी चाहिये। इस मंत्र सिवाय सय अन्य मंत्र स्पष्ट हो द्वैत प्रतिपादक हैं । उनके विषय में किसी को कोई शंका नहीं हो सकती। सारांश। इस प्रकार ईशोपनिषद् अथवा यज. अ.४० के विषयोंकी समा- लोचना है । इस पुस्तक में दोनों संहिताओंके पाठ दिये हैं और स्पष्टीकरणम घेदमंत्र, अन्य उपनिषद् के बचन तथा भगवद्गीताके श्लोकोंकी तुलना की है । इससे वैदिक धर्मके सदृश विचारोंके साथ पाठक अच्छी प्रकार परिचित हो जायगे। आशा है कि इस प्रकार तुलनात्मक विचारसे घेदका वास्तविक अर्थ समझकर आत्मज्ञान विषयक वैदिक सत्य सिद्धांत जानकर, पाठक अपनी उन्नतिका मार्ग आक्रमण करने के लिये सिद्ध होंगे। १ चैत्र सं. १९८६ श्रीपाद दामोदर सातवळेकर स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा) -
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HARE
ईश उपनिषद् ।
आत्म-ज्ञान।
公不公
एक मार्ग।
小小小小小杂
दानसे भोग कर । लोभ मत
कर । प्रशस्त पुरुषार्थ करता हुआ
ही सौ वर्ष जीनेकी इच्छा कर।
个小小小小來小小小小小小介於中中中中中中中中中中W
XXX
长长长长长长会会没学过
ॐ
वाजसनेयि माध्यदिन-शुक्ल
यजुर्वेद संहिता-पाठः।
-0
0-
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
ईशावास्यमिदधसर्व यत्कि च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।। १ ।।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरें ॥२॥
असुर्या नाम ते लोकाऽअन्धेन तमसावृताः ।
तास्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥
अनेजदेकं मनसो जीयो नै हेवाऽआंनुवन्पूर्वमर्शन ।
तद्धावतोऽन्यानत्यति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४॥
तदेजति तन्नेजति तरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥५॥
ईशोपनिषद् ।
यस्तु सीणि भूतान्यात्मन्नेमानुपश्यति ।
सुर्वभूतेषू चात्मानं ततो न वि चिकित्सति ॥ ६ ॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मपाभूद्विजानतः ।
तन को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
स पर्यंगाच्छुकर्मकायमणमस्नावर शुमपापविद्धम् ।
कृषिमनीपी परिभूः स्वयम्भ्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधा-
च्छाचतीभ्यः समाम्यः ॥८॥
अन्य तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो यऽ सम्भूत्याध रताः ॥ ९ ॥
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदांडुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तचिचाक्षिरे ॥१०॥
सम्भृति च विनाशं च यस्तदोमयं सह ।
विनाशे मृत्युं ती. सम्भृत्यामृतमश्नुते ।। ११ ।।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविधामुपासते ।
ततो भूपऽईक ने तमो योउ विद्यायाध रताः ॥ १२ ॥
अन्यदेवाद्यिायोऽअन्यदाहुरविद्यायाः ।
इति शुश्रुम, धीराणां ये नुस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥
'-पाठः। माध्यन्दिन-प विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्या विद्ययामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त, शरीरम् । ओ३म् ऋतौ सर । क्लिवे स्मर । कृत स्मर ॥ १५ ॥ अग्ने नय॑ सुपा रायेऽअस्मान्विश्वानि देव युनानि विद्वान् । युयोध्युस्ममुहुराणमेनो भूयिष्ठा ते नमऽउक्ति विधेम ॥१६॥ हिरण्मयेन पावण सत्यस्यापिहित मुखम् । योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम् । ओ३म् खं ब्रह्म ॥ १७ ॥ - [इति चत्वारिंशोऽध्यायः।]
शुक्ल यजुरेंदीय
काण्व-संहिता-पाठः।
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥
ईशा वास्यमिद सर्व यत्किन्ध जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीया मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥
कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविपेच्छुत समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेवोऽस्ति न कमै लिप्यते नरै ॥ २ ॥
असुर्या नाम ते लोका अन्धन तमसाताः ।
तारस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चारमुनो जनाः ॥३॥
अनैदेकं मनसो जीयो नैनवा आनुवपूर्वमशेद ।
तद्धायतोऽन्यानत्यति तिष्ठचस्मिन्नपो मातरिश्च दधाति ॥५॥
तेदेजति सनजति तदुरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्प तदु सर्वस्यास्प बातः ॥५॥
यस्तु सर्वाणि भूवान्यात्मनेघानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं वो न बिजुगुप्सते ॥६॥
फाव-पाठा
यस्मिन्साणि भूतान्यास्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्य॑तः ॥ ७ ॥
स पर्यंगाच्छुक्रर्मकायमणमस्नावर शुद्धमापविद्धम् ।
कविमनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधा-
च्छाश्वतीभ्यः साम्यः ॥ ८॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति ये विद्यामुपासते ।
ततो भूय॑ इव ते तमो य उ विद्यायाध रताः ॥९॥
अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तदिचचक्षिरे ॥ १० ॥
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्यु तीर्त्या विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इब ते तमो य उ सम्भूत्या५ रताः ॥ १२ ॥
अन्यदे॒वाहुः सम्भवादन्याहुरसम्भवाम् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तचिचाक्षरे ।। १३ ।।
सम्भूति च विनाशं च यस्तोभयं सह ।
विनाशेनं मृत्यु ती| सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥
६० ईशोपनिषद् । हिरण्मयन पात्रैण सत्यस्यापिहित मुखम् । . तत्वं पनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टय ।। १५ ।। पूपन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्तै रूपं कल्याणतमं तत् पश्यामि । योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमसि ॥ १६ ॥ वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तर शरीरम् । अ३ऋतो स्मरे कृतर स्मर ऋतो स्मर कृतरस्मर ॥१७॥ अनेन सुपथा राये अस्मान्विधानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मञ्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विद्यम॥१८॥ [इति चत्वारिंशोऽध्यायः 1]
शांतिमंत्र।
६१
ईशोपनिषद् का
शांति मंत्र
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णत्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ओम्
यह सत्य है, की
१ अदः पूर्णम्
वह पूर्ण है और
२ इदं पूर्णम्
यहभी पूर्ण है । क्योंकि,
३ पूर्णात् पूर्ण उदच्यते । पूर्णसे पूर्ण निकलता है।
४ पूर्णस्य पूर्ण आदाय पूर्णमेसे पूर्ण लिया तो भी
पूर्ण एव अवशिष्यते ।
पूर्ण ही अपशिष्ट रहता है।
(१) पूर्ण = परिपूर्ण, सम्पूर्ण, अनंत, जैसा चाहिए वैता, जिसमें
जराभी कमी नहीं है ऐसा, शक्तिमान् । (१,५) ओम् = है, ठीक,
निःसंदेह सत्य, सत्य । ( अवति इति ओम् ) रक्षक; सबका रक्षण
करनेवाला।
१ - अदः - वह (आदितत्व, ब्रह्म, परब्रह्म, आत्मा, परमात्मा, ईश)
२ - इदं = यह ( जगत्, सृष्टि, विश्व, भनाइमा, अनोश।)
भावार्थ- ब्रह्म पूर्ण है और उस पूर्ण मासे प्रकट हुआ हुआ
यह जगत् भी पूर्ण है। क्योंकि पूर्णसे पूर्ण बनता है । पूर्ण ब्रह्ममेंसे
यह इतना भारी जगत् प्रकट हुआ है, तो भी इससे उस ब्रह्ममें
किसी भी प्रकारको कोई भी कमी नहीं हुई है।क्योंकि यह पूर्ण है।
पूर्णमेसे पूर्ण निकाला जाए तो मूल पूर्णमें कोई भी कमी नहीं
आती।
"
दान . ६४ शानिषद् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥ ३ तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः | उसका त्यागसे उपभोग कर। ४ मा गृधः। लोभ मत कर। ५ कस्य स्वित् धनम् । किस एक व्यक्तिकामलाधन है! ३त्यक्त = स्यामा हुआ, दान किया हुभा, धर्म के लिए समर्पित किया हुआ। " भुञ्जीथा " (भुज् )- भोगना, खाना, उपभोग करना, स्वथ अपने लिए उपयोग करना, अपने अधिकार में रखना, शासन करना, अपनासा कालेना। स्यकेन भुजीया दान करके भोग कर, देकर भवशिष्ट रहे हुए का उपभोग कर, उपकार के लिए समर्पण करना यही अपना वास्तविक उपभोग है ऐसा समज । (४)"मा गृध. अपने अधिकार में जो जगत् का भाग आया हुआ हो, उसकामी छोम मत कर, उसका उपभोग काना हो तो दानकरके का। दुसोके पदार्थ का लोभ सो कभीभी मत कर । (५) "स्वित् "= शका, आश्चर्य, टोक है क्या भला ? " कस्य स्वित् धनम्।” = भरा धन किस एक व्यक्ति का है। धन मेरे अकेलेका है ऐसा मानने घाले लोग मयु के समय धन छोडकर चले जाते हैं, अत. धन यह किसी एक याचिका नहीं है यह बिलकुल सत्य है । तो यह हिप्स का है। इसका उत्तर " फस्य धनं"- (क) मजापति का धन है । प्रजापालन करने वाले का धन है, मथवा सर्व जन. सा का धन है, क्योंकि ग्यक्ति के मरने परमी समाज अमर रहता है, सप धन सब जनताका है और जनता का है इसीलिए व्यक्ति उसे जनता के अग्युदय के लिए भर्षश कर भवशिष्ट रहे हुए में हो सनुष्ट होकर उसका भोग करे। सब धन सम्पूर्ण जनता का है। वह ग्यक्ति का नहीं है, अतएव पति को धनपरका होभ छोड़ देना चाहिए और परोपकाराचं उसका व्यय करके जो कुछ शेष बचे, उससे अपनी जीवनयात्रा चराने के लिए उपभोग करना चाहिये । १ । भत आत्मोन्नतिका माग। . । कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत ५ समाः। ६ इह कर्माणि कुर्वन् एव, [ यहां प्रशस्त कर्म करता हुआ ही ७ शतं समाः जिजीविपेत् । सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे। (६) कर्म = प्रशस्ततम कर्म, श्रेष्ठ पुरषाथ, सकार संगति-दानात्मक कर्म, जनताकी उन्नति के कर्म, लोकसंग्रहकारक उपकारक कर्म। अकर्म': अकर्म दो प्रकारके है- (1) जो किये हुएभी न किए हुये के बराबर है, और वैयक्तिक अस्तित्व के लिये ही केवल जो कारणीभूत है ये । (२) नि- फाम कर्म ।" विकर्म"= विरद्ध कर्म, अयोग्यम, व्यक्ति और समाज की हानि करनेवाले धर्म । ये कर्म के तीन भेद है । इस मंत्र में प्रथम अर्थ विवक्षित है। "ह" = यहां, इस जगत्मे । (७) शतं समाः = सौ वर्ष, इच्छा शक्ति उत्पन्न होने के बाद के सौ साल, अर्थात् यदि २०वर्ष की उमर मे इच्छा शक्ति प्रकट होती है, ऐसा मान ले तो तबसे सी जीनेकी इच्छा प्रयत्न पूर्वक करे, इस प्रकार निदान १२० साल की मानवी आयु होती है । अत एव ज्योतिप् गणितकारोंने यह मान स्वीकारा है। इतना पूर्ण आयुष्य प्राप्त करनेकी प्रयत्न पूर्वक इच्छा रखनी चाहिऐ, ऐसा उपदेश यहां पर है। 'श्रेष्ठोंका सत्कार, परावरवालों के साथ संगति और नीचेको पौडी पर स्थितोको दान' ये तीन कर्म यज्ञम मुव्य है। इस कारण यज्ञद्वारा जनता का मेल तथा उन्नति होते है । सब यज्ञों का यही ध्येय है। सब यज्ञ ऐसे लोकसंग्रहकारक होनेसे ऐसे रोकसंग्रह कारक प्रशस्त कर्म के लिए अपने पास का धन खर्चना सबके लिए उचित है। (१) अशानियोंको शानदान, (२) बडों का आदर, (३) अतिथियों का सत्कार, (४) भूतमात्रपर दया, और (५) भूमि जल आदि दैवी शक्तियोंका आदर पूर्वक प्रयोग; ये पांच श्रेष्ठ (यन) में प्रत्येक मनुष्य के लिये करने आयश्यक है। साल ५ ईशोपनिषद् । CC एवं स्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥ ८ एवं त्वयि, यह (शान | तेरे में (हो), ९ इतः अन्यथा न अस्ति । इससे दूसरा (मार्ग) नहीं। १. कर्म नरेन लिप्यते। कर्म नरको क्षित नहीं करते। (८)"पवं त्वयि " = यहां तक जो सात उपदेश कहे, वे तुझ सरखे साधकर्मे स्थिर होवे । (९)"इतः अन्यथा नास्ति " - उतिके लिये इसके सिवाय भिष्ट मार्ग ही नहीं है। (१०) नरम् (न रमते) जो भोगों में रमता नहीं वह । कर्म नरेन लिप्यते जो भोगाम फंस कर अपने कर्मोसे च्युत नहीं होता, ऐसे मनुष्यको कमोसे होनेवाला दोप नहीं लगता। सूचना- यहां तक जो आमोतिका मार्ग कहा है यह यह है- "(१) ईश्वरका सर्वत्र अस्तित्व मानते हुए, यह हमारे कर्मोको देखता है ऐसा मानना, (२) सम्पूर्ण जनताके सुखमें व्यक्ति का सुख है ऐसा मानना, (३) दानकर के पचेहुपका स्वतः भोग करना। (४) लोभ न करना, (५) सप धन मुझ अफेलेका नहीं है पर चह सय प्रजाका है ऐसा मानना, (८)इसी पक आत्मोन्नति के मार्ग पर दृढ विश्वास रखना, (९) उसारका इसके सिवाय दूसरा मार्ग नहीं है ऐसा मानना, (१०) सत्कर्म कमी बन्धक नहीं है ऐसा मानना " |स मार्गपर चलकर अपने जीवनको सार्थक करने वाले लोक " समर्थ " पनकर जगत में आदर्शभूत पनते हैं और धंधनसे मुक्त हुए हुए अंत में उस स्थानको जाते हैं, जहां कि आत्मोन्नति करने वाले लोक जाते हैं। परन्तु इस मार्ग को न स्वी. कारते हुए जो लोक आरमधात के मार्ग से जाते हैं, उनकी क्या दशा होती है, इसको सीमो मंत्रम देवीए ।] .
. आत्मघातम मार्ग। २ आत्मघातका मार्ग। असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । ११ असुर्याः नाम ते लोकाः | बलकेलिए प्रसिद्ध ऐसे घे लोक, अन्धेन तमसा आवृताः। गाढ अंधकारसे व्याप्त हैं । (११) असुर्य-'असुर' = 'असु ' अर्थात् प्राण ! उस प्राण की शक्ति को जो (रा-देना ) देता है वह 'असु+र' है। यह ' असुर' शब्द वेदमें 'आत्मा, परमात्मा, ईश्वर,' इनका वाचक आया हुआ है। अत उनकी जो प्राण शक्ति है उसका नाम 'असुर्य' है। " प्राणि. योको प्राणशक्ति देनेवाले देवकी प्राणशक्ति " यह इसका अर्थ है । यह शक्ति जैसा वोम वेपीही राक्षसीम, और जैसी सजनोंमें पैसाही दु. जनों में आई हुई है। प्रत्येक शरीरमै जो बल है, वह इसी शक्ति के कारण है। शरीरमें प्राणशक्ति के नीचे जो इन्द्रियशक्ति और शरीर शक्ति कार्य कर रही है वे इसी ही असुर्य शक्ति के कारण ह। इससे पता चरेगा कि असुर्य' अर्थात् 'इन्द्रियों में और शरीरमें कार्य करनवाले बर।। इनमे जो भिन्न है ये आरमाके दूसरे वर है, और वे माणसेभी उकृष्ट है, यह बात अवशिष्ट मानसिक, बौद्विक और अध्यामिक शक्तिया द्वारा प्रकट होती है। युद्धि और मन, इनमें जो चैतन्य सामथ्र्य प्रक्ट हुआ हुआ ह वह इस 'असुर्य' नामक बरसे भिन्न है। ' असा नाम ते लोकाः' - केवल जो शा. रीरिक बल के लिए प्रसिद्ध है ऐसे जो लोक हैं, वे शारीरिक बल दिसाना, दगा फिसाद करना, मारामारी करना, जादि गडबड सडरड के व्यवहारके लिए प्रसिद्ध है। सत्य न्याय, धर्म, मानवीय उस आदर्श भादि पाताके समझनेकी योग्यता इगम नहा है। यद्यपि इनक शारीरिक बर आत्मासेही आए हुए यर ह तथापि ये अपने अज्ञान के कारण असन्मार्ग मरगे होते है, अतण्य "अधेन तमसा आता ": ये रोक अशानान्धकारसे यात हुप हुप है": ऐमा समझा जाता है।
१८ ईशोपनिषद। तास्त प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः || ते प्रेत्य तान् अभिगच्छन्ति चे मृत्युके पाद उनमें जाते हैं ये के च आत्महनः जनाः । जो कोई आत्मघाती जन है। "ये के च आत्महनः जना से तान् प्रेस्य अभि (अपि) गच्छ. ति" जो कोई आत्मघाती जन है, चे वैसे मूर्ख लोकों में मरने के बादभी जाते है, अर्थात् उनकी जीतेजी भी इन रोऊमें गणना होती है। जन' - जन अर्थात् केवल प्रजनन करके कसीभी संतति उत्पन्न करने में ही जो समर्थ है, जिनसे इसकी अपेक्षा अन्य कोई प्रशसनीय मानवी क- सभ्य होना सभव नहीं है। ये जन आत्मोन्नतिका पुरुषार्थ करने में असमर्थ है और इनके लहबाज होनेसे इनसे यदि कोई कार्य होभी गया, तो वह आत्मा की अवनति का ही कारणीभूत होता है, इस लिए इन्हें यहां भा. स्मघातकी ऐसा कहा गया है। पूर्वके दो मंत्रोंमें जो मार्ग बताया है, उस सामोलतिके मार्ग का अबलम्बन न करते हुए उसके विरुद्ध आत्मघाती मार्गोकाही ये अवलम्पन करते है। आरमघातका मार्ग यह है- "(१) घरका सर्ष अस्तित्व न मानना, (२) सम्पूर्ण जनता के आधारसे व्यक्ति स्थित है ऐसा न मानकर, व्यक्तिका यथा सं. भय स्वार्थ यदाते हुए उससे संघके नाशके कारणीभूत कुकर्मों को करते रहना, (३) स्वार्थ पूर्वक भोग करना, (४) लोभ क- रना, (५)सब धन केवल मेराही है ऐसा मानना, (६) सदा कुकर्म करना, (७)जिनसे आयु क्षीण हो ऐसे दोन कर्म करते जाना. (८) एक सन्मार्गपर मनको स्थिर न रखना, (९)विपरीत मागापर विश्वास रखना (१०)सार्म भी बंधक है ये सामानमा!" ये दर्श प्रकारके मार्ग आत्मघातके है । इन मागासे जो जाता है यह किस प्रकारसे अधोगति को प्राप्त करता है यह घात इस मंत्रने दिखाई है।
३ आत्मत्तत्वका वर्णन। - पूर्व, अर्पत, 4 " ३ आत्म-तत्वका वर्णन । अनेजदेकं मनसो जवीयो १२ एक, अन्-एजन्, यह पक चंचलता रहित, सबसे पूर्वका, स्फूर्ति देनेवाला, मनसः जवीयः। मनकी अपेक्षा वेगवान है। [प्रथम मंत्रमें ईश सर्वत्र वसता है, ऐसा कहा है, परन्तु वह एक है अथवा अनेकी और उसका क्या सामर्थ्य है? इस विषयमें कुछ नहीं कहा हो यद्यपि वहां ईशा' ऐसा एक पचन का प्रयोग है, तथापि यह संदेह हो सकता है कि शायद वह जातिवाचा एक पचन हो; अतः उपरोक शंका को करने के लिए इस मंत्रमें यह 'एक' ही है, ऐसा कहकर उसके गुणों का वर्णन किया हुआ है। वे गुण इस प्रकार है- 'एक' = वह पूर्ण ब्रहा एक है । 'अनेजत् वह हिलता नहीं अर्थात् यह स्थिर है। वह सर्वत्र व्याप्त होनेसे इधर उधर नहीं जाता, वह चंचल नहीं है। पूर्व' यह सबसे पूर्वका है । जगत् निर्माणके भी पूर्व वह था। 'अर्पत (ऋगति) सबको गति देनेवाला है, स्फूर्ति देनेवाला है, वह चालक, प्रेरक और निरीक्षक है। 'मनसः जवीयः' - बह मनकी अपेक्षा वेग- वान् है । आरमा, बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियां और शरीर इस क्रमसे देख तो, प्रथम की अपेक्षा दूसरेमें गति कम और तीसरेमें उससे भी कम इस प्रकारसे गति कम होती जाती है। इस लिए यह मनसे ऊपर दो तीन सोदीयां आगे होनेसे मनसे भी अधिक वेगवान है। मन चंचल है मही, पर मन जिसका भी चिंतन करता है यहां वह ब्रह्म पूर्यसेही व्याप्त होनेसे, मन उससे पहिले कहीं भी ला नहीं सकता क्यों कि मनसे पूर्व वही सर्वत्र फैला हुआ है । [मनमे यह अत्यन्त वेगवान् होनेसे मन उसे प्राप्त नहीं कर सकता यह बात स्पष्ट ही है, परन्तु इतर 'देव' (इन्द्रियां) उसे . , ईशोपनिषद् । नैनव्या आप्नुवन् पूर्वमर्पत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् १३ देवाः एनत् न आप्नुवन् इन्द्रियों इसे पहुँचती नहीं। १४ तत् तिष्ठन् धावतः वदधिर होता हुआदौडते हुए अन्यान् अत्यति । दूसरोंके आगे जाता है। प्राप्त कर सरते है या नहीं ? इस शंकामा उत्तर इस प्रकार है- (१३) देवाः पनत् न आप्नुवन्- देवोंके शान क्षेत्र है। व्यक्तिगत देव' य्यक्तिम आस, कान भादि इन्द्रियां देव हैं। ये इन्द्रिया बहिर्मुख होनेसे इन्हें अन्तरारमाका दर्शन नहीं होता। मानव-समाजस्थ देव" ज्ञानी (शब्द शास्त्री), शूर, ग्यापारी, कारीगर, ये मनुष्य समाज में देव है। ये ग्यवहार में जुटे रहते है अतः इनभी परमात्म साक्षात्कार नहीं होता। जगत में स्थित देव" = सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु आदि देव जगतम हैं। वे भी ब्रा साक्षारकारके अधिकारी नहीं है । इस प्रकार ये तीनो क्षे. मोके देव अन्तरारमाको पा नहीं सकते । व्यवहार में न फंसते हुए जो ई- धनसे छूटता है, व नि सग वृत्तिसे रहता हुआ उस परमारमाके लिए आ- रमसर्वस्वका समर्पण करता है वही सन्त उसे प्राप्त कर सकता है । (१४) तिष्ठत् "= वह ब्रह्म स्थिर है। ऐसा होते हुए अन्यान् अत्यति = दोदते हुए दूसरे पदार्थों के भी पहिले गया हुभा होता है । यतिमें इन्द्रिया दौड रही है, समाजमे मनुष्य भागदौड मचा रहे है, जगदमे सूर्य, चंदादि नक्षनभी दी रहे है। परन्तु ये सब जहा दौड़कर जाते हैं, वहाँ पहिले से ही ब्रह्म पहुंचा हुआ होता है। चाहे कोई क्तिनाभी तेज दीदता हो पर वह इससे पूर्व पहोंचने के स्थान पर पहुंच नहीं सकता। [ दूसरे मंत्रमें 'प्रशस्त में करते हुए सौ घर्ष तक जीने की प्रथान पूर्वक इच्छा करनी चाहिए,' ऐसा कहा है। परन्नु भी वह धावतः - ३ आत्मतत्वका वर्णन । . तस्मिनपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४॥ १५ तस्मिन् मातरिश्वा उसके आधारसे माताके (गर्भम) अपः दधाति । रहनेघाला (जीव)कोको धार. ण करता है। इस पर ऐसी शका उठती है कि एक्दम अन्तके जो धर्म होगे, उनका फल मृत्यु हो जानेसे उस व्यक्तिको नहीं मिलेगा और ऐसी दशामे वे उत्तम कर्म व्यर्थ जाएग' इसका उत्तर 'किए गए कर्म व्यर्थ नहीं जाते ऐसा अग्रिम मत्र भागमें दिया हुआ है, उसे अब यहाँ देसिए-] (१५) मातरि-श्या' = माताके उदरमै रहनेवाला जीव, जिसका पूर्व का शरीर छूट गया है और जिसका दूसरा देह बन रहा है, वह माताके गर्भमे आया हुआ जीव, 'तस्मिन अपः दधाति' - उस ब्रह्मके आ धारसे अपने कर्म धारण करता है। जिस प्रथम शरीरसे कर्म किय थे वह यद्यपि नष्ट हो गया और आगेका शरीर नहीं भी मिला, तो भी इससे पूर्व कृत अच्छे बुरे कर्म नष्ट नहीं होते। परमेश्वरके त्रिकाल स्थिर नियमोसे वे कर्म सस्कार रूपसे आत्मा के पास रहते हुए जीवको अच्छे उरे भोग देते ही है। [अथवा 'ब्रह्मपयाधाय कर्माणि संग त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन०1" (भ गी ५/१०) ब्रह्मको समर्पण करते हुए आसक्ति रहित कर्म जो करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। इस गीता पचनानुसार भी इस मत्र भाग का अर्थ हो सकता है। तस्मिन् अपः मातरिश्वा दधाति' = उस ब्रह्म को कर्म समर्पण करते हुए जो जाँच कर्म करता है, (वह पापसे बद्ध नहीं होता)। दूसरे मत्रमे 'मर कमसे लिप्त होता नहीं' = ऐसा कहा है, वह किस प्रकारस' यह इस मन भागने दिखाया है, ऐमा यहा सन्बन्ध जानना चाहिए। इस मत्रमे कहे गए प्रकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए। इस मन भागसे पुन जन्मकी कल्पना उत्तमतया दिखाई गई है।) - १२ ईशोपनिषद् । तदेजति तन्नैजति तरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस तदु सर्वस्यास्य वाह्य तः ॥५॥ १६ तत् एजति (एजयति ) यह हिलाता है, (परन्तु) १७ तत् न एजति । घह (स्वयं) हिलता नहीं। १८ तत् दूरे वह दूर है, (और) १९ तत् उ अन्तिके। वह निश्चयसे समीप (भी है) २० तत् अस्य सर्वस्य यह इस सबके अन्दर है। (और) यह निश्वयसे इस सब के बाहिर २१ तत् उ अस्य सर्वस्व पाह्यतः (भी है) (१६-२१) तत् = वह, महा, आत्मा, परमारमा, पूर्ण ईश्वर । (१६) तत् एज(प)ति " = यह सवको प्रेरित करता है, चलाता है, फिरा ता है परन्तु (१७)'तत् न एजति = वह स्वय हिरता नहीं, चचर नहीं होता 1 वह सदा स्थिर व अचर रहता है । (१८-१९) तत् दूरे, तत् उ अन्तिके' - वह दूर है और निश्चयसै पास भी है, अर्थात् यह सर्व समान रूपसे घ्याप्त है, अथवा यह अज्ञानी मनुष्यको अत्यन्त दूर और अप्राप्य प्रतीत होता है, इसके विरद्ध ज्ञानी भक्तको यह अत्यन्त स- मीप है ऐसा अनुभव होता है। (२०-२१) "तत् अस्य सर्वस्य अन्तः बाह्यतः च " = यह इस सबके अन्दर और बाहर है, वह कहीं नहीं ऐसा नहीं । वह सबके अन्दर है इसका अर्थ वह मनुष्य के अन्दर भी है ही। अत वह वस्तुत अत्यन्त मजदिक है, पर भनिहीन मनुष्यको उसके समीप होते हुए भी अनुभव नहीं होता। [प्रथम मम । ईश सर्वत्र घसता है। ऐसा कहा है। वहा पदश और ५ मनाने अधिव- स्पष्ट किया है।] ।
४ समबुद्धि। ७३ . ४ समधुद्धि। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥ २२ यः तु सर्वाणि भूतानि | जो वास्तवमै सब भूतोको आत्मनि एव अनुपश्यति । आत्मामें अनुभवसे देखता है, २३ सर्वभूतेषु च आत्मानं (और) सव भूतोंमें अपनेको अनुपश्यति । अनुभवसे देखता है। (वह) २४ ततः न विजुगुप्सते। उनका तिरस्कार नहीं करता। [पूर्वके दो मनोमें जो ईशके गुणोंका वर्णन किया है वह केवर शान्दिक बो धके लिए नहीं है, वे मनुष्यके स्वभाव और आचरणम आने चाहिए, मन में उस जाने चाहिए और कार्यम परिणत होने चाहिए। वे आचरणमें आ ने लगे कि मनुष्यमे कैसी समबुद्धि पैदा होती है वह इसम दिखाया गया है। (२२) या भूतानि आत्मनि अनुपश्यति ' - जो मनुष्य उत्प न हुए हुए सब पदार्थ, विशेषत सर्व प्राणिमान आत्माके अन्दर है अ र्थात् आत्मा उन सबको व्यास होकर स्थित है, ऐसा अनुभवसे विश्वास पूर्वक जानता है, और इसी प्रकार (२३) सर्वभूतेषु आत्मान- मर्व भूताम उस एक अद्वितीय भामाको अनुभवपूर्वक देसत्ता है, यह सब भूतोके अन्दर बाहर आत्माका विश्वास पूर्वक अनुभव रेनेके कारण, (२४) 'ततः न विजुशुप्सते - उन भूतमात्रका तिरस्कार नहीं घरता, उनसे दूर रहने का भाव उसके मनतमें नहीं आता, उनके विप. यमे कोईभी सदेह मनमें नहीं राता। (वाजस० पाठ.) ततो न विधि कित्सति उनके विषय में समय नहीं करता। सर्व भूतॉरे विषय में , ७४ ईशोपनिषद् । ५ सर्वत्र आत्मबद्भाव । यास्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । २५ यस्मिन् विजानतः जहां विज्ञानीका आत्मा एव आत्मा ही सर्वाणि भूतानि अभूतः सर्व भूत धनगया, वह समान आस्मभाव मनमें रखता है। उसकी सर्वन समष्टि होती है। [पूर्व ५ और ५ वे मत्रमें कथित उपदेश आ मसात् होने के बाद, उस उपदेशक निरन्त ध्यान करनेसे वृत्ति तद्प होजानेपर प्राप्त होनेवाही बघ भूमिका इस सम्पूर्ण मत्रसे दिखाई है। पूर्वक मनाम बहा अनुभव अधिक रन हुभा कि आगे 'सप भूत आत्मा और आत्मा सब भूतोंमें है।' इतनेही अनुभव पर स्थिर न रहते हुए, ज्ञानीभक्त उससे ऊपरकी भूमिका पर जाकर सर्वत्र आत्मकत्व की महिमा' प्रत्यक्ष करता है। यह अनुभव इस मभने बताया है-1 (२५) विजानत् ' = विशेष सतिसे जानने पाला, देखनेवाला, अनुभव रेने वाला, विशेष ज्ञानी । विजा " ऐसे ज्ञानी के लिए 'यस्मिन् ' - जन, जिस समय, जिस भव स्थाम, जिस भूमिपर पहुच जाने के बाद, जो अनुभव मिरा, वह है। 'आमा पप सर्वाणि भूतानि अभूत् ' भारमाही सर्व भूत मात्र यन गई, आरमस्वरूपही सब विश्व भासने एगा, इतना नहीं तो सर्व विश्वभी आमाकी महिमा है, सर्व जगत् उस जगदरमा का वादात्य है, सृष्टिमी उसके विरक्षण सामर्यकी प्रस्वक्ष साक्षी है, ऐसा जान कर अन्तम यह हिचाना कि सामथ्र्य समर्थका निज ऐश्वर्य है और वह उसमे मिल नहीं है। ऐसा तिसको पका अनुभव हुआ, उममे सर्यारमभाव स्थिर हुआ। - । नत - ६ परमात्माके गुण वर्णन । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥ ६ परमात्माके गुण वर्णन। स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमनाविर शुद्धमपापविद्धम् । २६ सत्र एकत्वं अनुपश्यतः वहां एकत्व अनुभव करनेवालेको का मोहः? मोह कैसा? और कः शोकः? शोकभी कैसा? २७ स पर्यगात्, वह सर्वत्र व्यापक है। अकार्य वह देह-रहित, अनाचिरं, अत्रणं स्नायु-रक्षित, प्रणरहित, शुद्ध, अपापविद्धं, शुक्र; शुद्ध, निष्पाप, तेजस्वी (समर्थ), (२६) तत्र = वहां, उस अनुभवको अवस्थाम; 'एकत्वं अनुपश्यतः सर्वत्र एक आत्मतत्वका अनुभव लेनेवाले उस ज्ञानी मनुष्यको, 'क: मोहः, काशोकः,'- कौनमा मोह भ्रमम डालेगा और कौनसा शोक भला दुःस उत्पन्न करनेमें समर्थ है ? ऐसे ज्ञानीको मोह और शोक जरामी कष्ट नहीं पहुंचा सकते, वे उसे भी नहीं सकते। [ ईश सर्वत्र है' ऐमा जो प्रथम मंगने कहा है, उसका पुनः अधिक स्पष्टीकरण इस आवे मंत्र ने किया है, और वह 'शुद्ध, समर्थ, सर्वत्र, स्वयंभू, व्यवस्थापक है,' ऐसा यह मंत्र बतला रहा है-] (२७) 'स पर्यगात्' आत्मा सय स्थानमें पहुंची हुई है, सर्व व्यापक है, वह सब जानती है, सर्वत्र है। 'अ-काय, अस्ताविर, अग्रणं' वह शरीर रहित है अत एव वह स्नायु और गणमे रहित है। 'अ-पाप विद्ध' - वह पापों- में प्रस्त नहीं है। वह निम्पाप है। 'शुद्ध, शुक्र' = वह पवित्र होनेगे . - वह । " इंशोपनिषद् । । कविर्मनीपी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधा- च्छाश्चतीभ्यः समाभ्यः ॥८॥ २८ कविः, मनीपी, द्रष्टा, ज्ञाता (मनका स्वामी), परिभूः, स्वयंभूः। विजयो और स्वयंभू है। २९ यथातथ्यत: (उसने ) योग्य रीतिसे शाश्वतीम्यः समाभ्यः भनादि कालसे सब अर्थान् 'अर्थोकी व्यवस्था की है। निष्पाप, तेजस्वी और समर्थ है। (२८) कवि ' = (क्रान्त दी) उसे अतीन्द्रिय ज्ञाम है। भाखासे जो दीखता है उसे देखता हुआ उससे परेकाभी देखनेवारा वह कवि है। मनीषी' = मनको स्वाधीन रख ने वाला है। 'परि-भूः' - सबसे श्रेष्ठ, सबपर प्रभाव डालने पारा । 'स्वयंभू '= अपनी शक्तियाँसही स्थित होनेवाला, जिसको दूसरेकी महायताकी गरज नहीं है ऐसी वह आत्मा है। (२९) 'अर्थः' : विषय, प्रास करवाने के साधन । 'शाश्वतीभ्यः समाभ्या याथातथ्यतः अर्थान् व्यद्धात् ' = अनादि कारसे इन्द्रिया और उनके विषयोंको योग्य रीतिसे तथा व्यवस्थासे उसने निश्चित कर रखा है। [पूर्वके सात मत्रो में दिखाया गया ज्ञान अनुभवसे आत्मसात् कर लेनेपर उस ज्ञानी भातकी योग्यता इस मनम वर्णन किए हुए के अनुसार हो जाती है। जी- घारमा परमेश्वरवा अमृत पुत्र होनेस, पूर्वोक्त मासे आत्मशक्तिका शि- कास करके अपने पिता के समान होता है। परमपिताके सर्व गुण पुग्ने विकसित हुए हुए दिखते है । इन गुणोंका मनुष्यमें आनाही उपासा पी भन्तिम सिद्धि है। है ७ ज्ञान क्षेत्र। ७७ . ७ ज्ञानक्षेत्र । अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ३० ये अ-विद्यां उपासते जो अनारमशानकी (ही केवल) उपासना करते हैं ते अन्धं तमः प्रविशन्ति । वे गाढ अंधकारमें जाते हैं। [मनुष्यके लिए प्रपंच और परमार्थ उत्तमतया करनेके लिए जो ज्ञान आवश्यक है, वह कैसे प्राप्त किया जाए। यह बात९-११ इन तीन मंग्राम कही गई है। ] (३०-३१) 'विद्या' : ईश-विद्या, ब्रह्म-विद्या, आत्म-विद्या, विद्या, 'अविद्या' अनीश-विद्या, अनारम-विद्या, [प्रकृति-विद्या, सृष्टिविद्या, जगद्विद्या ] अविद्या । प्रथम मंत्रम शा वास्यं इदं सर्व जगत् - ' ईशसे वसने योग्य यह सब जगत् ' है ऐसा कहा है। यही ज्ञान अनुभव से जानना है । यही मनुष्यका ‘ज्ञान- क्षेत्र है। इसे जाननेके लिए ईश' कोन है ? और। है ? इन दो बातोंका ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । ईश और अनीश (= जगत् )' इन दो पदार्थोंके ज्ञान प्राप्त करनेके लिए ईशकी विद्या और अनीश की विद्या अर्थात् सृष्टिरी विद्या प्राप्त करनी चाहिए । आ. रमाका ज्ञान विद्या' और आत्मासे भिन्न अनात्माका ज्ञान ‘अविद्या है। अविद्या अर्थात् अज्ञान- ज्ञान हीनत्व-यह नहीं, क्योंकि मनुष्यके परम- कल्याणार्थ जैसे आत्मा केसा है यह जानना चाहिए वैसे ही जगत् कैसा है यहभी जाननाही चाहिए । जगद्विद्यासे अभ्युदय-ऐहिक उत्कर्ष होता है और आत्मविद्यासे नि.श्रेयस अर्थात् आरिमा शक्तिमा विकास होता है। इसलिए परम कल्याण साधने के लिए इन दोन विद्याओंको प्राप्त करना चाहिए। ये दोनों ही ज्ञान प्राप्त न करते हुए यदि कोई मनुष्य किसी एकही विद्यामें रम कर दूसरी तरफ दुर्रश्य करेगा तो उसकी कैसी अर जगत् ' क्या ।
ईशोपनिषद् । ततो भृय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥९॥ ३१ ये उ विद्यायां रताः जो केवल आत्मज्ञानमै रमते है, घेतो उनसेमी मानी अधिक ते ततः भूयः इव तमः अंधकारमें जाते हैं । नति होती है वह इस मनमे उत्तमतया दर्शाया है। (३०) अधि. घोपासक ' - सृषिविद्या के हो जो केवल उपासक है, अर्थात् जो आल्म विद्यासे पूर्णतया दुर्लक्ष्य करके केवल सृष्टिविद्या के पीछे लगे हुए है, वे इस मसारमें व्यवहारके उपयोगी सुखके विपुल और उत्तमोत्तम साधन निर्माण सो कर लेंगे, पर केवल भोगेच्छा बढ़ा लेनेसे शरान्तरसे उनकी स्वार्थों भोगसृष्णा अत्यन्त बढ़ेगी और अत वे अपने सुखके लिए दूसरी की पलि रे नेत्री खदपट करेंगे, जिससे इनके प्रयत्नॉस जगत्म अशान्ति वडकर दुख पढेंगे, अतः वे 'अन्धं तमः प्रविशन्ति'- कारमे प्रविष्ट होते है ऐसा कहा है। (३१) विचारतः' - आरम विस है। उरे रमले है अर्थात् मष्टि विद्याकी ओर पूर्ण दुरंप काके छ लात्मविद्यामे ही रमते रहते हैं और उसके सिवाय और कुछ नहीं करते, वे सृष्टि विद्याके उपासकोसे भी अधिक गाढ अधकारम जाते हैं। क्यों किजीवनयात्रा चरानेके रिए अत्यन्त आवश्यक और उमीसे प्राप्त होने वारे व्यवहारके साधन इमिरने नहीं । इस प्रकार न प्रपच और न परमार्थ, प्रेमी इनकी स्थिति होजाती है । (केवर मृष्टिविद्योपासक प्रपन के माधन बढ़ाकर कुछ तो चन करते है, पर केवल भारमविद्याम रमने वारे और उसके सिवाय कुछ न करने वाले मनुष्य, यदि उनके लिए दमरोंने कुछ भी न दिया तो वे ऐहिक माधनोंके बिना जीतेही न रह सकने के कारण, कुछ साध नहीं सकते । अत उनको अधिक खराब स्थिति होती है, ऐसा जो इस मंत्र द्वारा कहा गया है, यह सृष्टि विद्याकी गर मनुष्य को है ऐमा दिवाने के लिए ही है। गाद अथ- ७ ज्ञान क्षेन। आहु, अविद्यया अन्यत् अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । ३२ विद्यया अन्यत् एव आत्मशानका (फल) और (है देसा) कहते हैं (और) ३३ अविद्यया अन्यत् आहुः। अनात्मशानका (फल) और (है ऐसा) कहते हैं। (३२) 1- आत्मज्ञानमे एक भिन्न ही फल मिलता है । इस आत्मविद्यायै आत्मशक्तिका विकास होता है, अमृतस्व प्राप्त होता है, यन्धन दूर होते है, अखण्ड आनन्द मिलता है, आस्मिक यल बढता है, मनुष्य निर्भय होता है और सनी शान्तिका अनुभव मिल. ता है। (३३) अविद्यया अन्यत् ' अनात्माकी अर्थात् जगत्की या दृष्टिकी विद्याके फल भिन्न है । सृष्टिविद्यासे ऐहिक ऐश्वर्य, सासारिक सुव्यवस्था, इस जगत्मे सुखरामकी समृद्धि, उपभोगके साधनीको विपु- रता प्राप्त होती है । जिसको अभ्युदय कहा जाता है वह सष्टिविद्यासे प्राप्त होता है । इस जगत्मे सुसपूर्वक रहनेके लिए जिन जिन साधनोंकी आव- श्यक्ता है वे सब इससे मिलते है । इस प्रकार ये दो भिन्न भिन्न फल इन दोनों विद्याओंके है । इनमेसे प्रत्येक विद्याके फलाम बहुतभारी प्रोमन है । इससे साधारण मनुष्य उन प्ररोभनाम गोता लगाकर फस जाता है। जगत् विद्यासे ऐहिक मोगके साधन बढानेसे ऐहिक ऐश्वयं बढता है, इस हिए जो साधारण मनुष्य इस सृष्टिविद्याके पीछे लगता है, उसे अपने भो. गके साधन जितने बढे उतने बढाओ, तथा जगत्को जीतो, ऐसा प्रतीत होने रगता है। इस कारण इस प्रलोभनमें यह मनुष्य फसता जाता है और उसे सामनेका वास्तविक क्रयाणका मार्ग दीयता नहीं । इसी प्रकार जो आत्मज्ञानमे रीन हो जाता है, उमे उससे विशेष शाति मिलती है और वह और और उसमें रमता जाता है और ससारम रहने के लिए अर्थात् जीवन व्यतीत रनेके रिये अत्यन्त आवश्यक साधनको जुटानेरा कामभी ।
८० ईशोपनिषद् । . इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१०॥ ३४ इति धीराणां शुश्रुम ऐसा हम धीरोदात्त लोकोंसे सु. नते हैं ये नः तद विचचक्षिरे । दिया। जिन्होंने हमें उस विषय में उपदेश छोड देता है और अत एव धीमे धीमे उसकी इस शेक्की यानाभी पहनी कठिन होजाती है । यदि तो उसकी औरोंने सहायता की तो तो उसे कष्ट नहीं होता, पर न की तो इस लोकी यात्रा चलनी कठिन हो जाती है। दोनों तरफ ये ऐसे दो प्रलोभन है। उन प्रलोभनोंका मोह हो जानेसे दोनों ही तरफ ये दो भय है। अतः दोनों भोरके प्रलोभनों में न उलझते हुए समतोल वृत्ति रखते हुए दोनो ही विधाओंसे लाम लेनेवाला जो ज्ञानी है, यही (३४) सच्चा 'धीर' वृत्तिवाला मनुष्य है । लाभ होने पर जो उन्मरा होकर किंकर्तव्य विमूद नहीं होता और हानि होने पर भी धीरता विहीन न हुआ हुआ जो संन्यसे नहीं गिरता उसे 'धीर' कहते हैं। मनुष्यके सामने सदा दोनों मार्ग आते हैं। पहिला 'धेयमार्ग' से प्रथम कष्ट सहन करता है तो अन्तमें उसका वास्तविक कल्याण होता है और दूसरा प्रेयमार्ग' से प्रथम सुख अनुभव करता है तो अतमें भयकर आपत्ति भोगता है। इस विषयमें 'कठ उपनिषद्' में कहा है- "थेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीय विधिनतिधीर । धेयो हिधोरोऽभिप्रेयसी घृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमावणीते ॥ कठ उ० १॥२।२" अर्थात् श्रेय भार प्रेय ये दो मार्ग पास आते है, उनमेंसे श्रेय मार्गका स्वीकार धीर शोक करते है और प्रेय मार्गको मन्दबुद्धिचाले पसद करते है और अन्तम फसने है। जो श्रेय मासे जाता है यह 'धोर' है, इस धौर वृत्तिके मनुष्य ही इन दोनों विद्याओंसे अपना सच्चा कल्याण किस प्रकारसे प्राप्त करना आता है यह अगले मत्रमे देग्यो- 4 ७ ज्ञानक्षेत्र। विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वदोभय सह । अविद्यया मृत्युं ती| विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥ ३५ या विद्यां च अविद्यां च जो आत्मज्ञान तथा अनामशान, | इन दोनोको एकत्र जानता है, तत् उभयं सह वेद । (वह) ३६ अविद्यया मृत्यु ती| अनात्मशानसे मुत्युको दूर करके, आत्मशानले अमरत्व प्राप्त कर. ३७ विद्यया अमृतं अश्नुते । 'ता है। (३५)"विद्या और अविद्या - आत्मासा ज्ञान और सृष्टिसा जान ये दोनों प्रकारकी विद्या मनुष्य की उन्नति के रिए समान उपयोगी है। आत्मविद्यासे आत्मिक बर बढ़ता है, शान्ति मिलती ह तथा मनका नित्य समाधान होता है। इसी प्रकार सृष्टिकी विद्यासे ऐहिक उत्सबके सा. धन प्राप्त होते हैं। इस रीतिसे इन दोनों विद्याआसे मनुष्यकी वास्तविक उन्नति होती है । यह बात जिसकी समझमे आगई ह वह मनुष्य (३६) 'अविद्यया मृत्यु ती ' = प्रकृतिको विद्यासे, पच महाभूतोंके ज्ञानसे, सृष्टिक शास्त्रकी सहायतासे मृ युको दूर करता है । मृत्यु अर्थात् अपमृत्य, दुःस, व्यवहारमै देनिक कार्योंम होनेवाली स्कावटे।ये रकावटे यो ज्यों सृष्टि विद्यासे विविध साधन तैयार होते होगे, न्यों ज्यों अन्न तथा पेय वस्तु निर्माण होता जाएगा, इसी प्रकार ज्यो ज्यों उपभोगके पदार्थ निर्माण होते जाएगे त्या त्या उनकी महायतासे दूर होती जाएगी, और इन साधनाथ इस क्षेत्र दु.ख कम कर रेनेके बाद (३७) विद्यया अमृतं अश्नुते' आमविद्यामे अमरता, मोक्ष अथवा कैरत्य प्राप्त किया जा सकेगा। यह अन्तिम साध्य है। इसी अतिम साध्यको मनुष्यने प्राप्त करना है । परन्तु केरल इतना ही साधन करूया और कुछ भी नहीं करगा ऐसा कहना योग्य नही है । अत: मनुष्य सृष्टिविद्या मीयर जपनी यहाको जीवनयाना ६ इंशोपनिषद ८ कर्म क्षेत्र अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभृतिमुपासते । ३८ ये असंभृति उपासते जो असंघभावकी (ही पल) उपासना करते हैं। (4) अन्धं तमः प्रविशन्ति । गाढ संघकारमें जाते है। सुखमय को और आत्मविद्यास अपने पारमार्थिक परम पत्याणको सिद्ध करे। [प्रथम मत्रमें 'जगत्यां जगत् ' जगतीम वर्तमान जगत्-पेसा गद- प्रयोग है। 'जगत् ! के समुदायको ‘जगती' कहते है । 'जगन्' नयात् एक पदार्थ और 'जगती' उस ही का समुदाय है। व्यक्ति और समुदाय ऐसा जगत् है। एक पदार्थ और उसकी आति ऐसी जगत् नं स्थिति है । इसीको 'व्यष्टि और समए' ऐसा साकेतिक शब्दसे कहने है। ऐसी स्थिति होनेसे व्यक्तिको समाजके रिये और समाजको पति के लिये कुछ कर्तव्य करने आवश्यक है। यों कि मनुष्य सामाजिक माहोले उसे अपने साफ पतय करने होते हैं उसी प्रकार निस समाजका वह घटक हे उसके लिये भी इसे कुछ कार्य करने पड़ते हैं। इस प्रकार व्यक्ति और समाज ' ये मनुष्य ' कर्म क्षेत्र है ऐसा समझा जा सकता है । इसी मबन्धका उपदेश "संभूति और असं- भूति " इस प्रकरणमे कहा गया है । इसका विचार अब देखिए---] (३८) 'संभूति और असंभूति ' - (स) एक होकर (भूति) होना, रहना, उत्कर्ष के लिये प्रयत्न करना, ऐश्वर्य प्राप्त करना, (स-भूनि) सघ बनाकर रहना, सहकार्य करके पैश्वर्य वृद्धिके लिए प्रयत्न करना, 'सं. भूय समुस्थान - सहकारितासे व्यवहार करना, मिलकर हमरा करना, मय बनाकर सम्मातिसे करना, सहकारी सस्था स्थापन करके जातिय नियन करना ! 'सं+' इस धातुका अर्थ एक होकर रहमा, संघ नाना, एक्स वर भगे याना, ऐसा है । 'संभूति- ' - सघ, जमाव, ८ कनक्षत्र। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ॥ १२॥ ३९ ते ततः भूयः इव तमः ये उनसे मानो अधिक अंधकार में जाते हैं, जो वस्तुतः (फेवल) ये उ संभूत्यां रताः । संघभावमें ही रमते हैं। समाज, सघठित समाज । विभक्ताकी विभिनता दूर करके उनका सघठन परना, भिन्न भिन्न प्राकृतिक परमाणुओको एकत्रित करके उनसे सृष्टिरूप संघठित कार्य करना, भिन्न भिन्न व्यक्तिका संघटन करके उनका प्रवर सघ बनाना, जाति, राष्ट्र और राष्ट्रसघ बनाना, सघसत्ता । 'अ+संभूति : असंघठित अवस्था । उपरोक्त प्रकारका सघटन न होनेपर जो स्थिति होती द वह । व्यक्ति की स्थिति, व्यत्तिक सत्ता, ये इस शब्दके मारिस अर्थ ह। (३८) असंभूतिफे उपासक ' = जो अमघभावना व्यक्ति सत्ता उपासक यानि वैयक्तिक स्वात यकाही वेवर आदर करने वार है, चे अध चारमे जाते है । जो अपना मघठन जराभी न करते हुए कवर व्यक्तिकी ही उन्नति ही हुई तो बस, ऐसा मानते है, उनमें सघ शक्तिके न बढनसे लघवलसे होनेवाले कार्य करने लिए वे सर्वथा अयोग्य होते है और इस कारण वे दिवसानुदिवस अवमत होते जाते है, क्या कि मनुष्य सधर्मेही रस्त होने वाला प्राणी है। (३९) संभूतिम रमण करनेघाले' पेवल सघभावक ही पूना या केनर सघशक्ति बढाने के लिए व्यक्तिका स्वातपय नष्ट करने वाले जो ह, “ केवल सधमत्तावादी" भी अवनत होते है, क्यों कि इनके कार्यक्रम में व्यक्तिस्वास य को जराभी स्थान न मिरनेसे और प्रत्येक व्यक्ति सबके नियमोसे जाडा हुआ होनसे धीरे धीरे उन्हें परतन्न होने की आदत पडनाती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में परतत्र सा की जड स्थिर होती गई कि व्यक्तिस्वातन्यसे होनेवारी सब उन्न तया धन्द होजाती है। और अन्ततोगत्वा उस राष्टमाही लय होनाता है । अत्यधिक सघसत्तावादियों के बहुमतके कारण राटम मर रोगासी मी अवनति ।
८ कर्मया इति गुश्रुम धीराणां ये नन्तद्विचचक्षिर ॥ १३ ॥ सम्भूतिं च विनाशं च यस्तदोभय ५ सह । ४२ इति धीराणां गुथुम ऐसा धीरोदात्तोसे सुनते हैं, ये ना तन विचचाक्षिरे । जिन्होंने हमें उस विषय उपपेश किया। ४३ यः संभूति च विनाशं च जो संघमाय और समंघमायान तत् उभयं सह बंद। दोनों को एकम जानता है, (पद) यगि र गुण राय विमिरा होते है, पर लोकों में मंपगि न पदनमे हम गिधानि होती। अतः दोनों मनाया ममता र रिचार करके সনি এমন দম থানা সম্বনা না না না নেয় गया 'धीर' है] (४२)पमे 'धीर' पुरुषों को इन दोनों मागों में कोई विलक्षण गुण दोगता है, जियमे ये लोक दोनों ही मागोममे गुण ते पसमा दोष छोरसे हुए अपने पुरणार्थमे अपने परम यस्याणको मात र मले। ये किस प्रकार अपना कल्याण माधने है यह पात आले मंत्रम दाई है उस मंगा राम विचार असलामतापूक देखिए- (४३) संभूति - मंशतिमे रहना संघनिरभी समाजनिहा, राधनिष्ठा, समागमतापाद निष्टा, इन दान्दाम दियाई जाती है। संघा. गि का काम भार उसके पिना या क्या हानियों है यह भी पिरली रिश्पणीमें दिपाया गया है। इस मंग्रमें दोनाम मे हानियों को दूर करके दानास लाभ मे होना चाहिये यह दिपाया है। "विनाश" यह शाद इम मंगम असमति' के लिए आया है। संमूति' का भय 'संघसता' की विरोधी व्यक्तिसत्ता है। इस तक मसाके लिए इस मंत्रमें 'विनाश' यह गाए प्रयुग किया गया है। विनाश' पाक दो अर्थ है- (१) विगतः नाश: परमात्' - रिसका नाश ८६ इसोपनिषद् । विनाशेन मृत्युं तीली संभूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ ४४ विनाशेन मृत्यु तीा असंघभावसे मृत्युको दूर करके, ४५ संभूत्या अमृतं अश्नुते । संघभावसे अमरत्व प्राप्तकरता है। नहीं होता ऐसा, अथवा (२) विशेषेण नाशः = विशेषनाग दोनों परस्पर विरोधी अर्थ इस शब्दमे है । यतिके मरते रहने पर भी संघ अमर रहता है। यह नियम हम समारम देख रहे है । प्रत्येक मनुष्य मरता है, पर सघ दृष्टि समाज सझा जीवित रहता है, इस लिए (४४-४५) सघभावसे रहते हुए "संभूत्या अमृतं अश्नुते " अमरल प्राप्त किया जा सकता है और यदि सघ टूट कर उसका प्रत्यर घटक भिन्न भिन्न होगया और उनकी सघ शक्ति नष्ट होगई तो एक एक व्यक्ति थोडेही समयमै नष्ट हो जायगा । संघका विभाग करते करते अतम एक व्यक्ति' पर आकर टहर जाना पड़ता है। इसमे आगे विभाग नहीं हो सकता। इसका इससे आगे और विभाग नहीं हो सकता इस लिए व्याक्ति को अविभज्य' अर्थात् 'उससे आगे विभाग करना असंभव' ऐसा कहा जाता है । इस व्यक्ति के लिए 'अहं' (अ+ - अहन् : हा = जिसका आगे हनन नहीं होता, जिसका इससे भागे नार नहीं होता, पेमा ) यह शब्द प्रयुक्त किया जाता है । " अविभज्यता" ( Individuality) की दृष्टि व्यनिका इससे भागे नाश होना समत्र नहीं। इस प्रकार प्रथम अर्थ ही यहा सगत है। व्यक्तिको स्व सत्ता स्थिर रखने के लिए वह अपम्युसे न मरे और अन्य कष्ट भी यह न भोगे, इसलिए वैयक्तिक सास्थय सरक्ष कर्म व्यक्तिको करने पड़ते है । उन्हे करता हुआ व्यक्ति 'मृत्युं तो = अपमृत्युस अपना बचाव कर सकता है, और 'संभूरया अमृतं अश्नुते = सघ शानिमे अमर होता है। इस प्रकार पक्तिनिष्टर और सनिष्टा इन दोनोंके दिन होनेवा- .
९ सत्यधर्मका दर्शन। सत्यधर्मका दर्शन। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुसम् । ४६ हिरण्मयेन पात्रेण सोने के पात्र से सत्यस्य मुसं अपिहितम् सत्यकामुख ढका हुआ है। ही हानियोको दूर करके दोनोंसे मनुष्य लाभ उदा सस्ता ह यह इस मत्र ने दर्शाया है। संघ पचमुसी परमेश्वरही है। इसके बाह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र और निपाद ये पाच ग है । मघठित सपके विषयमे ऐसी निष्ठा रखते हुए उसकी आत्मशक्ति अभेद्य ऐक्यसे सुदृढ़ करनेपर प्रत्येक राष्टम सक, उसमे व्यक्ति के मरते रहने परभी, अमर होगा और प्रत्येक व्यक्ति भी मांग लिए आत्मसमर्पणरूप सर्वमेध यज्ञ करके अपना जीवन सार्थक करती हुई अर्थात् सत सघरूम-विश्वात्मरूप-बनती हुई अमरत्व प्राप्त कर सकेगी। मनुप्योका 'कर्मक्षेत्र' इन तीन मनाने दर्शाया है। ( वाजसनेयी मा ध्यदिन सहितामे ये तीन मन्न पहिरे तथा विद्या अविद्याके बादमें है।) [सब आत्मोन्नति अपरिग्रहवृत्तिसे होती है। अपरिग्रहका अर्थ है नि स्वार्थ भावसे व्यवहार करना । परिग्रहका अर्थ है अपना सुस रहाने के लिये सुरु साधनों को अपने पास इकट्ठा करना । यही सुवर्णका प्रोभन है। इसके वे सब धर्मनिमय दब जाते हैं, इसरिये इस प्रकारका स्वार्थी मनुष्य धर्मक जान नहीं सकता। इस प्रलोभनसे मुक्त होनेका उपाय अगरे म म कहा है-(४६) 'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखं अपिहितम्'- सुर्वण के चमकीले बरतनसे सत्यका मुख ढका हुआ है। सोने के नीचे सत्य छिपा पडा है। यह अनुभर हम व्यवहारमै भी मिलता है । अपराध करने पर भी अ धिकारियों को घूस देकर उसे छिपाया जा सकता है। घूम न लेते हुए नं. व्य भ्रष्ट न होनेवारे बहुत थोडे है । घुम लुच्चाई आदिमै मलका मुख नद कर दिया जाता है इसका दैनदिनीय व्यवहारमै अनुभव हमे मिरता है। -
१० उपालना।
१० उपासना।
पूपन्नेक यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह ।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतम तत्ते पश्यामि ।
यम, सूर्य
,
४८ पूपन्, एक ऋपे,
हे पोषक ! एक दृष्टा!
नियामक ! तेजप्रदाता!
प्राजापत्य !
प्रजापालक!
४९ रश्मीन् व्यूह, (तेरी) किरणे एकत्र करके,
समूह ।
एक ओर कर।
५० यत् ते कल्याणतम
जो तेरा अत्यंत कल्याणकारी
(४८) परमामा 'पूरन् ' = सबका पोप है । वह 'एक' है और
वह ऋषि' = ज्ञाता, ज्ञानी, संज्ञ और अतान्द्रियार्थदी है। वही
यम' - सबका नियामक, सबको अपने नियमोंमें रखनेवाला, 'सूर्य'-
तन देनेगाला, प्रकाशित करनेवाला, आर 'प्राजापत्य' - जो प्रजाभास
पालन करनेवाला है वह प्रजापति । प्रनापतिसे उसत होनेवाले प्राजापत्य
अर्थात् उसके सामर्थ्य । इन सर सामथ्र्योसे युक्त वह देव है । इस देवको
भक्तियुक्त अन्त:करणसे इस मनमें पुकारा ह । 'हे पोपक, नियामक,
तेजस्वी, सामर्थ्यशाली, सर्यदेव ! मेरी सहायता फर। (४९)
'रक्ष्मीन व्यूह समूह ' = रिरणाको इकट्ठा करके एक ओर । हे देव'
इस जगतकी इस चरचनाहटके कारण मुझे तेरा स्प दिसता नहीं, जहा
देखता हू वहीं इस प्रकृतिकी चरुच राहद नजर आती है। उससे परे वर्त
नान तेरा रूप दिखता नहीं । इसमान्ते ये तेरी किरण पर ओर कर, और
ईसोपनिषत् । . - याऽसाबसा पुरुषः सोऽहमसि ॥१६॥ तेजोरूप, तेजोमय रूप है, तत् ते पश्यामि । यह तेरा रूप में देखता हूं। ५१ या असा असौ पुरुषः जो यह प्राणों में पुरुष है सः अहं अस्मि । पिद में हूं। मुझे तेरा स दीखे, उसके लिये तूही मेरे पर दया करके मेरी आँखोंको चक्र चौध करनेवाले ये तेरे तेज दूर कर, तूने ऐसा किया कि (५०) ते कल्याण तर्म तेजोरूपं पश्यामि' = तेरे अत्यन्त कल्याणमय तेजस्वी स्वरूपको मैं देखता हूं। हे देव 'तू ही करा कर और अपना रूप दिखा । सेरी कृपा के बिना ते मङ्गलमय और कल्याणमय रूप मुझे दीख नहीं सकता। (५१) या असौ असो पुरुषः = जो यह सरे ( असो-असुम) प्राण शक्ति के आधारमे रहनेवाला और (पुरुषः = पुरि+पसति ) इस शरीररूपी नगरी में रहनेवाला, देह धारण कर अभ्युदय और निःश्रेयसरी प्राप्तिको इच्छा करनेवाला, शरीर धारणकर परम पुस्पार्थ करनेकी इच्छा वाला जो तेरा भक्त है 'सआई अस्मि' = वही में हूँ। मैं तेरा एक- निष्ट भक्त हू, मुझे भक्त मानता हुआ तू 'अपना ' मान । ( इस मन्त्रक पहिले दो भाग वाजसनेयी मायदिन सहितामें नहीं हैं। मत्रका अन्तिम भाग इस प्रकार है- “योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसायहम् । ओखं ब्रह्म ॥१७॥" यह भन्न भाग वहाँ वो है और हिरण्मयेन इस मनका उत्तरार्ध है। इसका अर्थ- " (यः असो) जो यह ( आ. दिये पुरुरः) आदिरथम पुरस है , (सः असो अहम् ) वह यह में हु, (भौ खं ब्रह्म ) महा आकाशकी तरह म्यापक ओंकार द्वारा दिखाया जाना है " हम मन्त्र में कह गए अनुसार भक्तको परमेश्वरकी उपासन कानी चाहिए।
12 आन्नपरीक्षा
११ आत्म-परीक्षण ।
वायुरनिलममृतमथेदं भम्मान्त र शरीरम् ।
५२ वायुः अन्-डलं अमृतम् । प्राण अपाधिन अमृत है ।
और यह शरीर अन्तम भस्म
५३ अथ इदं शरीरं भन्मान्तम्।
होनेवाला है।
५४ क्रतो! ओं सर ।
हेमकर्ता पुरुष! सर्व रक्षक
आरमा का ध्यान कर।
(५१) हे मनु य । यदि तुम उन्नत होना है तो तू यह रक्ष्यमे रख कि-
(वायुः) यह हमारा प्राण (अन्+इल अमृतं) अपाथिव अमृत
रूप प्रचण्ड शक्ति है । (५३) और (इदं शरीरं मस्म+अन्तं) येर
रीर मात्र आम भस्म होनेबारा है । आ मर जानेवारे शरीरकी अपेक्ष
अमर प्राणशक्तिको विशेष आराधना करनी उचित है । मरनेचारे शरीरम
अमर प्राणशक्ति है और उम प्राणानि के अन्दर तू (असो पुरुषः जीव
आरमा) है । तेरी उमति के लिए ये याहिरके सर्व साधन है । इन साध
नोकी सहायतासे तुझे अपने अमरपनेका अनुभव रेना है।
त्य साधनाके योगसे तुझे वह नित्य स्थान प्राप्त करना है।" इसमाने
(५५) हे "तो" = कर्म करनेवाले पुरप' कर्म करना जिसका र
भाव है ऐसे है मनुष्य के स्मर' = (अप्रति इति ओम् ) उस सर्व
रक्षा परमात्माका ध्यान कर । उसके गुणोका चिन्तन कर। उसके कल्याण
मय गुणको निदिध्यासनसे अपने आरमबुद्धिमन में नित्यमति यहा ।
'कृतं स्मर' रोज प्रात: साय तूने जो केई कर्म किए हुए हो उनका
स्मरण कर । शान पूर्वक विचार करके देखा कि तूने तो कोई कर्म किए है
घे आरमाको उत्सति करनेवाले है अथवा अपनति । दिनभर किएए करें।
इन अनि
।
ईशोपनिषद् । ओ३म् क्रतो सर कृतरस्मर कतो स्मर कवर स्मर ।। १७ ।। कृतं स्मर किप हुए कोका स्मरण कर। कतो! स्मर हे कर्म करने वाले पुरुष स्मरण कर कृतं स्मर किए हुप कमौका स्मरण कर। का निरीक्षण सायकारको तथा रातको किए हुए काँका निरीक्षण सघरे कर । इस प्रकार अपने आचरणोकी परीक्षा तू स्वय कर और अपना तू स्वय निरीक्षक पन जिससे कि तेरी कहा भूर है भार वहो तुझे वास्तवमें वा करना चाहिए था यह अपने आप तेरे ध्यानमें आएगा हमें अपने आप आना उद्धार करना चाहिए। जिनसे अपनी अवनति होती हो ऐसे नाचरण हमें कभी भी करने नहीं चाहिए।" [वाजसनेयी माध्यदिन महिताम यह मत्र १५ वा है । और इसके द्वितीयाधम “पिलवे स्मर" पमा अधिक पाठ है । " किलब, क्लिप, फ्लप् ' इनका अब ‘समर्थ होना, योग्य होना एया है । अत फिलय स्मर' = अर्थात् 'अपने सामध्यकी वृद्धि के लिए यह स्मरण कर ।' अपने भाए ममर्थ होने के लिए अपर कहे गए अमुमार ईश स्मरण कर और स्त्रय कृत फमका स्मरण पर | ' अपने उद्वारके लिए इस धेट मार्गवा अवलम्बन कर । रोनहम धया करते हैं इस यातका निरीक्षण करना, यह भामरीक्षण आमोग्नति के लिए अन्यत सहायक है । इसके बिना किसी भी प्रकार की उन्नति होनी, सभव नहीं । साधकका शरीर पोषण तक इस परीक्षण के बिना नहीं होगा। भत हमारी आध्यास्मिक उन्नति आरमपरीक्षणके विना नहीं होगी, इस पवार घर पहनेकी आवश्यक्ता ही नहीं । इस वास्ते यह आमनिरीक्षण करना चाहिए ऐसा नो यहा सास करके कहा गया है उसका अभिप्राय यह है कि उसकी ओर साधक कदापि दुर्लक्ष्य न करे।
१२ प्रार्थना
१३
१२ प्रार्थना।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मञ्जुहुराणमेनो
६५ अग्ने! अस्मान् सुपथा हे प्रकाशक! हमें उत्तम मार्गसे
राये नय।
अभ्युदयको प्राप्त करा।
५६ देव! विश्वानि घयुनानि हे देव ! तू सय कर्म
विद्वान् ।
जानता है।
५७ अस्मद जुहुराणं एनः हमारे पाससे सब कुटिल पाप
युयोधि ।
५५) हे 'अग्ने ' = प्रकाश देनेवाले ईश्वर ' ' अस्मान् सुपधाराये
नय' हमें अच्छे मागसे अभ्युदयको प्राप्त करा । हमारेम कुमार्गसे जा.
नेकी बुद्धि कभी भी न हो। धन मिले, चाहे न मिले, पर हमारे आचरणका
मार्ग शुद्धही हो। हे देय! तू (५६) विश्वानि वयुनानि विद्वान्'-हमारे
मर्व कर्म जानता है । तुझे पता न चले इस प्रशर छिपकरके भी कर्म करने
असंभव है । क्यो कि तू सर्व साक्षी, सर्वज्ञ होता हुआ सर्वत्र है। इस
कारण हम जो कुछ करते हैं चाहे वह किननाभी चुपकेसे लिपफर किया
गया हो, तो भी यह तुझे उसी समय पता लग जाता है। इतना ही नहीं,
मनमें आया हुआ संकल्पभी तुझे मालम हो जाता है। ऐसी दशामें हम
सेरेमे छिपाकर कुछभी नहीं कर सकते। हमारे सब अच्छे बुरे कमौका
मुझे पता होने जिस मार्गमे जाने से हमारा उद्धार हो, उस श्रेष्ठ और शुद्ध
दूर कर।
-
--
*
ईशोपनिषद्
।
भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम || १८ ॥
५८ ते भूयिष्ठां नम उक्तिं वैरी विशेष नमन पूर्वक स्तुति
विधम ।
हम करते है।
मार्गमे तूं हमें ले चल | हमारे कटिलता और पापभाव भरे हुए है। चे,
(५७) जहुराणं पनः अस्मत् ययोधि'- कुटिरता और पाप,
हमारेसे सर्वदा के लिए दूर कर। इन पापोंके साथ युद्ध करके उन्हें दूर
करनेके लिये हमें शक्ति दे! (५८) इस तेरी कृपाये रिए. हम तुझे 'नमः
विधेम' = नमस्कार करते है। मुझे देनके लिए हमारे पाप नमस्कार
रन सिवाय दूसरा कर नहीं है । हे देव ' यह हमारा नमस्कार स्वीकार,
और हमारा उद्धार कर।
"ओ। पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेशवशिष्यते ॥
ओं। शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
,
परमेश्वरका नामसंकीर्तन । १५ परमेश्वरका नाम संकीर्तन । हमारे धार्मिक ग्रन्थों में ईश्वर के नामोंका संकीर्तन विशेष रूपसे किया हुआ सर्वत्र मिलता है। वेदोंमें अनेक नामोसे एकही सद्वस्तु के वर्णन किए हुए हैं ।। (ऋ. १ । १४६ ॥४६)। उपनिष. दोमें भी यही प्रतिपादित है । इतिहास और पुराणों में भी यह सं. कीर्तन मिन्न रीतिसे आया हुआहै। इस छोटीसी इशोपनिषदमें भी पुनः पुनः "परमात्म-गुणवर्णन" ही आया है। ऐसाजहां तहां पर- मात्माके गुणोंका संकीर्तन क्यों किया हुआ है? इस प्रश्नका विचार करना उपयुक्त है। इस संबन्धका मूल सिद्धान्त क्या है, उसे समझे विना इस नाम संकीर्तनका महत्व समझमें माना कठिन है, लिए इस विषयमै संक्षेपसे दो शब्द यहां कहने हैं। सबसे पहिले घहुतसी प्रास्ताविक ऊहापोह न करते हुए वैदिक धर्मकी एक मूल भूत घात यहां कहनी चाहिए और वह यह है कि "परमेश्वर संघका पिता है और हम सब उसके पुत्र हैं। यह कल्पना इस नाम संकीर्तनका मूलाधार है। मैं परमेश्वर का पुत्र हूं और गरमेश्वर मेरा पिता है, यह कल्पना मनमें उस जानेके दूसरे ही क्षणमें दूसरी कल्पना मनमें आती है, और वह यह कि 'पुर उन्नत होते होते कभी न कभी अपने पिताके सदृश हो जाए. गा, 'इस नियमानुसार परमेश्वर के भी पुत्र उन्नत होनेके मार्गमें है और वे कमी न कभी परमेश्वर के सदश स्वतंत्र (मुक्त) ' होंगे । इस विचार द्वारा आगेका सिद्धान्त हमारे ध्यान में आस- " -- ईशोपनिषद् । - . (१) परमेश्वर सपका परम पिता है। (२) हम सर उसके अमृत पुष हैं, (३) पिताके गुणधर्म अंशरूपले जन्मतः पुत्रोंमें होते ही हैं। (४) पुत्रक गुण धर्म पूर्ण विकसित हुए कि वह अपने पिता के समान होता है, (५)पुत्रके पढ़ने की भी परम सीमा है, और कभी न कतो घद उत्पतिको परम सीमा हर पकको प्राप्त होगी हो। जिन अोम पिता पुरके गुणधर्म पितामे पूर्णत्वको पहुंचे हुए हैं और पुत्र अंशरूप से है, तो ये समान ही हैं. उन अधो में जो गुण- योधक नाम होंगे थे पिता पुत्र रकसे ही होने चाहिए, इसमें संदेश नहीं। जैसे 'द (देखनेवाला), धोता (सुननेवाला) इत्यादि नाम फेवल गुण बोधक होने से, घे जैसे पिताके लिए प्रयुक्त हो सकते हैं से ही पुत्र के लिए भी प्रयुक्त दोसकते हैं। यह गोव्यायहारिक अनुभव है पद वैसा ही इस परमार्थमें भी एकदम सत्य है और इसी लिए पेद, उपनिषद् तथा इतर धर्म प्रधी में पर. मेश्वर के जो गुण संकीर्तन किए हुए है ये यदि परमेश्वरका पूर्ण तपा घर्णन कर रहे है तो घेदी कभी कभी इस जोपारमालिप भी लागू होंगे । जैसे परमेर जाता है यह जैसे आज परमे- परका सत्य घर्णन है तो जप यह जीव 'शाता 'दोगा, तप उत्त फामी यही घर्णन होगा। और इस समय भी थोडी दर लिए परमेश्वरको 'विशाल ब्रह्माण्ड पाप्ति'को तथा जीपको शरीग्में छोटसे विषय में प्यानिकी मनमें यदि न लाया जाप, तो शातत्य शक्ति दोनों में ही होनेसे जैसे 'शाना साद पूर्णतया परमेश्वर के लिए लगता है येसेही यह अंश से जोपर्क लिए भी यरप दी लागू होता है। इससे पता चलता है कि हमारे धर्म प्रयोमे पर. . - - . - परमेश्वरका नामसंकीर्तन । १७ मेश्वरके नामसंकीर्तनों में किए गए गुण वर्णन जीवात्माको उन उन गुणों के बढानेको सूचना दे रहे हैं, और इसीलिए वे साधकको अत्यन्त सरल उन्नतिका मार्ग दर्शानेवाले हैं, यह निसंदेह है। 'तेरा पिता शर, वीर और धीर था, उसने इतिहासमें ये ये महत्वके कार्य किए ' इत्यादि प्रकारके बडोके वर्णन लडकोंके सुन- नेपर उनके अन्तःकरणोम हम भी उनके सदृश बने 'ऐसा भाव. उठना एकदम स्वाभाविक है। यह हमारेमें उन्नति करलेनेकी स्फूर्ति-उत्तेजना नामसंकीर्तनसे होती है और वह जिस प्रकारसे वैसी होती रहे उसी प्रकारसे इन नामोका स्मरण करते रहना चाहिए। वेदोंमें जिन देवताओंका वर्णन है और उनमें जो परमेश्वरके वर्णन हैं, वे सय उपरोक्त कथनानुसार मनुष्यमै उन्नतिकी स्फूर्ति उत्पन्न करने तथा उसे उन्नतिके मार्गमें लगाने के लिए है । जैसे परमात्माका अंश यहाँपर जीवरूपसे आया हुआ है वैसेही अग्नि वायु, सूर्य, आदि तेतीस देवता अंशरूपसे इस जीवात्माके साथ साथ शरीर में आकर इन्द्रियों और अवयवों में बसे हुए हैं । इस. लिए चाहे किसीभी देवताका वर्णन हो तोमी यह हमारे शरीर में स्थित अंशभूतकाभी यह सूक्ष्म रूपसे वर्णन है ही। धन जलाने घाले दावानलका वर्णन छोटीसी चिनगारीकाभी अंशरूपले है ही। इसी प्रकार यहांमी समझना चाहिए। इससे यह बात ध्यानमें आती है कि हमारे घेदादि धर्म ग्रंथों में परमेश्वरका तथा इन देवताओंका वर्णनभी ब्रह्माण्ड व्यापी शक्तिका वर्णन होता हुआ वही पिण्ड- व्यापक अल्पशक्तिकामी है, और यह पिण्डमें उन उन अविकसित शक्तियोंको बढाकर पूर्ण करने के लिए हमें आदेश दे रहा है। इस प्रत्येक वर्णनले मनुष्यको घोध लेते हुए यथा संभव अपने आचरण में उसे घटाना है। इस योधका कैसे पताचले इस घातकों बताने के
९८
इंगोपनिषद् ।
है
लिए आगे कोष्ठों में उसकी डालकर दर्शायागया है, जिससे पाठक
सुगमतासे जान सकें। मूल वाक्य दर्शानेके लिए ऊपर मंत्राङ्क
दिया है। अर्थात् उस उस अङ्कवाले मंत्रका यह मूल वाक्य
परमेश्वरके वर्णनसे मनुष्य के ग्रहण
करने योग्य बोध ।
परमात्माके वर्णन।
मनुष्यके ग्रहण करने योग्य बोध ।
(शान्ति मंत्र)
१ अदः पूर्णम् । १ मनुष्य पूर्ण पनने के लिए पुरु-
(यह ब्रह्म पूर्ण है)
पार्थ करे । (इस जन्म में कुछ
नहीं तो किसी एक अच्छी बातमें
पूर्णस्व संपादन करे।)
२ओम् ।
1२ आत्मसंरक्षण की शक्तिशारीर
(यह रक्षक है) में लाकर पीडा देने वाले प्राणि.
योसे पीडितोंका संरक्षण करे।
(मंत्र०१)
३ इंशा इदं सर्व वास्यं ।
३ अपनी शक्तिपर स्वामित्व
(घरसे यह सप घसने योग्य संपादन करके जगत् में व्यवहार
है। ईश्वर ईश होकर सर्वत्र पसा करे । गुलाम वृत्तिमे रहते हुए
हुआ है)
अपने दिवस न बिताए।
बांधा ९९ दूर करे। (मं०४) ४ अन्-एजत् । ४किसीसे डरकर उसके सामने (यह कांपता नहीं, यह चंचल कांपे नही अर्थात कभी किसीसे नहीं) न इरे, चंचलपना छोड दे। ५ एकम् । जगतमें अद्वितीय यने, (किसी (यह एक, अद्वितीय है।) भी एक विद्याम तो अवश्य अद्वि. तीय बने।) ६ मनसः जवीयः। ६ अपना वेग बढाये, आलस्य (यह मनसे घेगवान है। ७ देवाः एनत् न आप्नुवन् ।। ७ अपनी साधनायें दूसरे सहसा (देव उसे प्राप्त नहीं कर सकते। समझले ऐसी थोथी न करे। वह देयोके चलते हुए भी उनसे (अथवा स्वयं दूसरोका संचा. लक बने, पर उनसे स्वयं न घेरा जाये ऐसे सुरक्षित स्थान पर रहे।) ८ पूर्वम् । दसबसे प्रथम स्वयं कार्य आरं- (यह सबसे प्रथम, पूर्वसे है) है ऐसा कहावे ।) भ करे। (इस काममें यह प्रथम ९ ज्ञान प्राप्त करे और जनतामें (वह शानी अथवा स्फूर्ति देने स्फूर्ति पढाये। १० तिष्ठन् । १० अपना पाया मजबूत करे। अपने स्थानपर स्थिर रहे। (यह स्थिर है) (युद्ध में अपना स्थान न छोडे) , अप्राप्य है) ९ अर्पद चाला है)
ईशोपनिषद्
अत्येति ।
११ तत् धावतः अन्यान् । १९ सब स्पर्धा करमेवाले पीछे
रह जाये और स्वयं उनसे आगे
(पह दौडनेपाले दूसरोके आगे निकल जाए ऐसी अपनी तैयारी
जाता है।
करे।
१२ तस्मिन् मातरिश्वा अपः १२ अपने आप स्वयं कर्म करे
दधाति ।
और दूसरोंसे कर्म करावे।
(इसके आधारसे जीव कर्म
धारण करता है)
(मंत्र५)
१३ वत् एजति तत् नएजति।। १३ स्वयं अपने स्थान पर स्थिर
(यह दूसरों को चलाता है. पर
रहे और दूसरोको अपनी ओर
स्वयं हिलता नहीं)
आकर्षित करके उन्हें सको में
'प्रवृत्त कराये।
१४ तत् दूरे वत् उ अन्तिके। १४ दुर्जमोसे दूर रहे और सदा
(यह अशानी के लिए दूर तथा सज्जनोंक पास रहे।
शानीफे लिए समीप है)
१५ तत् सर्वस अन्तः बाह्य-१५ अपनो अन्दरकी तथा पाहि-
तःचा
रकी अवस्थाओका निरीक्षण
(यह सबके अन्दर और बाहर है) करे।
वोध। 108 मंत्र६ १६ सर्वाणि भूतानि आत्मनि, २६ सयके सुखमें अपना सुख है आत्माच सर्व भूतेषु । ऐसा माने और अपनी शक्किस (सय भूत आत्मा और आत्मा सयको सुखी करना अपना कर्त- सब भूतों में है) व्य है ऐसा समझे। (मंत्र) १७ आत्मा एव सर्वाणि १७ मैसर्व जनता के लिए हूं ऐसा भूतानि । समझता हुआ व्यवहार करें। (आत्माही सर्वभूत है) (मंत्र८) १८ सा परि-अगात् । ११८ स्वयं अपने सय कार्यक्षेत्रों (वह सर्वत्र गया हुआ है) का निरीक्षण करे। १९ अकार्य, अस्लाविरम् । (१९शरीरको स्थूल शक्तिको च. (वह देह रहित, स्नायु रहित है) लानेवाली आत्मिक शक्ति बढावे । २० अत्रणम् । २० प्रण, घाव आदि न हो (वह शरहित है) पेसा आरोग्य माप्त करे। २१ शुद्धं, शुक्रम् । ३१ पवित्र और वीर्यवान् यते। (यह पवित्र और वीर्यवान है) TIDYA RATIYA 215 ईशोपनिषद् । २२ अपापविद्धम् । २२ पापसे विद्ध मत हो। (पाप (वह पापसे विद्ध हुआ हुआ मत कर) नहीं है) २३ कविः। |२३ मनुष्य केवल स्थलदर्शी न (वह अतीन्द्रियार्थदशी है) होता हुआ सूक्ष्मशक्तियोंका भी ज्ञान प्राप्त करे। २४ मनीपी। २४ हमें मनका संयम करना (बह मनका स्वामी है, विचार चाहिए तथा विचार पूर्वक शील है) कर्तव्य करने चाहिए। २५ परिभूः। |२५ अपनेको शत्रुके आधीन न (वह सबसे श्रेष्ठ अथवा विज करते हुए, विजय प्रात जिससे थी) होसके ऐसी अपनी शक्ति बढानी चाहिए। २६ स्वयंभूः । २६ अपनी शक्तिसे रहे, परावर (वह अपनी शक्तिसे स्थित है) म्बी न बने । २७ यायावथ्यतः अर्थान २७ कर्तव्य जैसे करने चाहिए। व्यदधात् । वैसे पिना भूल चूषके करता (करने योग्य कार्य यह करता रहता है) (मंत्र १६) २८ पूषा। २८ गरीय असमौका पाटन पोषण करना चाहिए। (यह पोपक है) रहे।
बोधन १०३ २९ एक ऋषिः। २९ विशेष शान संपादन करे। (वह पक, शानी है) ३० यमः। ३० हम अपनी शक्तिपर प्रभुत्व (वह नियामक है) प्राप्त करें, नियामक बनें। ३१ सूर्यः। ३१ दूसरोको प्रकाशका सन्मार्ग (वह प्रकाशक है) दिखा। ३२ प्राजापत्यः । ३२ आश्रितों का उत्तम रीतिसे (वह पालक शकिसे युक्त है) पालन करे। ३३ कल्याणतम रूपम् । ३३ नित्य प्रसन्नचित्तसे व्यवहार (उसका रूप अत्यंत कल्याणमय करे है) (मंत्र १८) ३४ सुपथा राये नय(ति)। ३४ स्वतः उत्तम मार्गसे ऐश्वर्य (धह उत्तम मार्गसे ऐश्वर्य के प्राप्त करे और दूसरोंको उत्तम पास ले जाता है) मार्गस उन्नतिको पहुंचाए। ३५ विश्वानि ययुनानि विद्वान्। ३५ सय कर्तव्याकर्तव्य कर्माका (वह सर्व कर्म जानता है) ज्ञान प्राप्त करे। ३६ जुहुराणं एनः युध्यते ।। ३६ कुटिलता और पापसे (स. (वह कुटिलता और पापसे त्यका पक्ष लेते हुए) युद्ध करके उनका पराभव करें। युद्ध करता है) १०४ इशोपनिपद्। सूचना यहां पर जो ईशोपनिषद् के मंत्रोंसे लेने लायक मोध दिया गया है, वह उस सूचक मंत्रसे उतनाही मिलता है ऐसा किसीकोमी यहां समझना नहीं चाहिए। मंत्रका अर्थ मनमें समझकर उसका घोडा थोडा मनन करनेसे परमेश्वर के गुणोंका शान धीरे धीरे स्वयं होने लगेगा। परमेश्वर इस विश्वव्यापकसंसारमें जैसे प्रच. ण्ड कार्य अतुल स्व शक्तिसे कर रहा है वैसे थोडेसे कई हमें, मारे छोटेसे क्षेत्रमें करते हुए अपने पिताके समान बनने का प्रयत्न करना चाहिए। येही कर्म मनुष्यको जन्मसे मृत्युपर्यन्त करने हैं और इसी फर्म मार्गसे अपनी उन्नति साधनी है। परमेश्वरके गुणोंका शांत चि. त्तसे जितना अधिक मनन होगा, उतना अधिक स्वकर्तव्योंका स्फुरण साधकको होगा और इस मार्ग जाते जाते साधकका स्वभावभी वैसा बन जाएगा। और ज्यों ही साधकका स्वभाव पैसा पनगया अर्थात् वह स्वाभाविकतया अकृत्रिमतासे पैसे कम करने लग गया कि वह साध्य के समीप समीप पहुंचने लगा ऐसा मानने में कोई दोष नहीं है। 'परमेश्वर के नाम तराते हैं यह कैसे, यह इस विवेचनसे समझा जा सकता है। घेदमंत्रों में ईश वर्णनका यह ऐसा उपयोग साधकके लिए है। इस प्रकार घेदमंत्रोका अर्थ ज्ञान पूर्वक विचार करके पोध प्राप्त कर 'धेदका पकाय सूक्त अथवा एक मंत्र या आधामंत्र किंवा परमेश्वरका एक नामदी मन- प्यको परम उत्कर्षके लिए पर्याप्त है, ऐसा जो समझा जाता है। यह कितना यथार्य है, यह पाठको ध्यान में आएगा। अय इम ईशोपनिषद् का घोडीसी मिन्न रीतिसे मनन करते हैं.
उन्नतिका मार्ग। ईशोपनिषदमें वर्णित मनुष्यकी उन्नतिका मार्ग। (१) मनुष्यका साध्य । मनुष्यका साध्य 'तीन शांति स्थापना करना और उन तीन शान्तियोंका अनुभव लेना है। (१) वैयक्तिक शान्ति-शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि और आत्मा किसीभी प्रकारकी अशान्ति न रहे और यहां पूर्ण शान्ति स्थिर रहे, उसेही "आध्यात्मिक शांति" कहते हैं। योगादि साधन इसी अनुभव के लिपदी हैं । (२)सामा. जिक शान्ति समाजमें विभिन्न मनोवृत्तिवाले लोगों में शान्ति स्थापनी, यह दूसरा साध्य मनुष्यको साधना होता है। सर्व प्राणि यो विषय में प्रेम और दया भावको तथा विचार और आचारको घढानसेभी यह शान्ति स्थापित हो सकती है। इसेही आधिभौति. क शान्ति कहते हैं । (३) जागतिक शांति-सब चलाचल जगत्में शान्ति और समताका स्थापन करना यह अन्तिम साध्य है। इसे आधिदैविक शान्ति' कहते हैं। प्रत्येक मनुष्यको ये विविध साध्य साधने हैं । इन कर्तव्योंका स्मरण प्रत्येकको करानेके लिए 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः" इस प्रकार तीनचार उच्चारण किया जाता है। (देखो शान्ति मंत्र) (२) साधन । उपरोक्त तीन लायोको साधने के लिए ज्ञान और फर्म ये दो साधन हैं । इन साधनों को प्रयोगमें लाने के लिए प्रत्येक मनुष्य के शरीरमै ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को स्थापित किया गया है शानेन्द्रियोंसे शान प्राप्त किया जाता है और कर्मेन्द्रियोंसे कम किए जाने हैं। - शरोपनिषद्। . - - , शानेन्द्रियों के लिए 'शान क्षेत्र' और कौन्द्रियों के लिए 'कर्म- क्षेत्र है। जगत् में जानने योग्य वस्तु का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना। शानक्षेत्रको व्याप्तिके अन्तर्गत है । पुरुष और प्रकृति, ईश्वर और सृष्टि, आत्मा और अनामा, ये दोही प्रकारफे पदार्थ संसारमें हैं। अतः इन दोनौका यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना यह ज्ञान क्षेत्रका सा. ध्य है । पच ज्ञानेन्द्रियोंसे तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इस अन्तःकरण चतुष्टयसे यह शान प्राप्त करना है। ईशावास्यं इदं ' (म०१ ) 'शि घ्याप्त करता है इस सृष्टिको ऐसा जो प्रथम मंत्र में कहा है, उससे हमारा शान क्षेत्र व्यक्त हो रहा है। 'ईश'श. ग्दसे 'आत्मा या परमात्मा ' और 'इदं ' शन्दसे 'सटि, जगत्- अधया संसार' इनका बोध होता है। मनुष्यको जो ज्ञान प्राप्त करना है यह इसी सम्बन्धमें है । अभ्युदय और निश्रेयस प्राप्त करनेको इच्छा हो तो इन दोनों प्रकार के ज्ञानोको प्राप्त करना जारी है। सृष्टि विज्ञानसे अभ्युदय ' और आत्मज्ञानसे 'निये. पस'माप्त हो सकता है। और इन दोनोको साध लिया कि मनुष्य कृतार्थ हुआ ऐसा मानने में किसीभी प्रकारको आपत्ति नहीं दीख. ती। मनुष्य इनमे से कोईसा एक सुगमतासे साध सकता है। दि. शेषतापेक्षिक उन्नति प्रत्यक्ष होनेसे उसे प्रत्येक प्राप्त करने की को. शिश करता है। ईशोपनिषद्म 'क्षानक्षेत्र' सबन्धी तीन (९-११) मंत्रोने दोनों विद्याय प्राप्त करके ऐहिक और पारमार्थिक उन्नति विना विरोध किस प्रकार साधनी चाहिए, यह उत्तमतया दिखाया है। (३) कर्म-मार्ग। ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद यह शान कर्म द्वारा प्रकट होनाचा. दिए । इसके बिना शानका उचित उपयोग होना संभव नहीं!
आध्यात्मिक कार्यक्षेत्र। - खाना अर्थात् पेट भरना, 'ऐसा शान होने पर खाने के कर्म करने ही पड़ते हैं। ठीक ऐसा यहां परमी समझना चाहिए । परमेश्वर पूर्ण और सर्वश होने से इस जगत्में उसके थेष्ठ कर्म सर्वत्र जारी है। उसी प्रकार मनुष्यको जितना जितना ज्ञान प्राप्त होता जाएगा, उतना उतना उसका कर्मक्षेत्र बढता जाएगा, यह सुस्पष्ट ही है। दोनोंके सम्बन्धसे कर्म उत्पन्न होते हैं। इस जगत् में 'जगत्यां ज- गन् । (०१) जगतीके आधारसे जगत् है, अर्थात् संघ आ. धारसे व्यक्ति है, अथवा समटिके आधारसे व्यष्टि है। अतः इस सम्बन्धके होनेके कारण व्यक्तिको समाजके लिए कर्म करनेही चाहिए। इसके सिवाय गत्यन्तर नहीं । व्यक्ति भी आत्मा और शरीरका सम्बन्ध होनेसे शरीरको आत्माके लिए और आत्माको शरीर के लिए कुछ एक कर्म करने आवश्यक हैं। परमात्मा सर्व जगत्म होनेसे घह सर्व जगतको यथायोग्य गति देनेके पवित्र कर्म सर्वदा कर रहा है ही। अतः मनुष्यकोभी उसके लिए अपने फ- तव्य कर्म करने अत्यावश्यक है। इस प्रकार दोनोंका जहां संबन्ध पड़ता है वहां एकका दूसरेसे जो सम्बन्ध बनता है, उस संबन्धसे परस्पर के कुछ विशेष कर्तव्य उत्पन्न होते हैं। इन्हें करनेपर उन्नति और न करनेपर अवनति होती है। सारांश रूपसे मनुष्य के कर्म- क्षेत्रका यह स्वरूप है। (४) आध्यात्मिक कार्यक्षेत्र । मनुष्यका प्रथम कर्तव्य अपने शरीरमें सम विकास करना है। शरीरमें स्थूल और सूक्ष्म, इस प्रकारकी अनेक शक्तियां है । स्थूल शक्ति अधिक बढाने से सूक्ष्म शक्तियों की प्रगति रुक जाती है और सूक्ष्म शकियों के बढानेका प्रयत्न किया तो स्थूल शक्तियां क्षीण होती हैं। इस लिए इन दोनों शक्तियोंका समविकास करना मनु 104 ईशोपनिषद् । . ... । ज्यका प्रथम कर्तव्य है । मनुष्यके अंदरकी स्थूल और सूक्ष्म श. कियोका नामही " अध्यात्म शक्ति है ऐसा कहते हैं और इन शकियोका विकास करनाही आध्यात्मिक शकि-विकास' ऐसा कहा जाता है। 'वा"प्राणः चक्षुः • थो" त्यापामम् । (छां० उ० ३१८०२) पाणी, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, इत्यादि शक्तियां आध्यात्मिक शक्तियां हैं। इनका विकास आध्यात्मिक शक्तिका विकास है। स्थल शक्तियां बढकर सूक्ष्म शक्तियों की सहायक पर्ने और सूक्ष्म शकियां पढकर स्थूल शक्तियोकी योग्य मददगार पर्ने, इसका नाम है समविकास । 'आध्यात्मिक कार्यक्षेत्र' का मतलय वैयक्तिक शक्तियोंके पढानेका कार्यक्षेत्र है। (५) आधिभौतिक कार्यक्षेत्र । व्यक्तिकी यह शक्ति जैसे जैसे पढती जाएगी, त्यो त्यो उसके घाह्य कार्यक्षेत्र विस्तृत होते जाएंगे। उसके क्रमशः कुटुम्ब, परिवार, संथा जाति, राष्ट्र. मानवजनता, प्राणी समधि इत्यादि कार्यक्षेत्र एकसे एक उसको अन्तशक्तिके विकासानुसार विस्तृित होते जा. पंगे। मनुष्य व्यक्ति यदि सम्पूर्ण समष्टिके आधारसे स्थित है तो व्यक्तिकी शक्तिका उतना पूर्ण विकास होनेसे पूर्व वह समटिके कार्य के लिए योग्य नहीं हो सकती। अतः जितनी शक्ति बढाई जाप- गो और तदनुसार कार्यक्षेत्रकी मर्यादामें अपने कर्तव्यकामागमन ज्यने किया कि उसके कर्तव्य कर्म उसकी उन्नतिमें सहायक होते हैं। यह मनुष्यका "आधिभौतिक कर्तव्य क्षेत्र" है। भूत अर्थात् प्राणी इन प्राणियोंके संबन्ध में जो कर्वश्य है आधिभौतिक क. संव्य है । अपने आयात्मिक कर्तव्य करते हुए अपनी पैयक्तिक उन्नति जिस प्रकार मनुष्य कर सकता है, उसी प्रकार उससे जनताके अर्थात् संघके हित साधनेफे पवित्र कार्य योग्य रीतिसे होने संभव है, यह इससे विशद होता है, इस ओर पाठक उचित ध्यान दें।
यज्ञ और अयज्ञ) (६) आधिदैविक कार्यक्षेत्र । इससे अगला कार्य विश्वके सम्बन्धमें जो कुछ मनुष्यके करने लायक है वह है। इस जगत में जो फोई विश्वशक्ति है, उस शकिसे च्यति और संघकी सहायता करवालेगा, अग्नि, जल, वायु, वि. धुत् इत्यादि सर्व दैवी प्रचण्ड शक्तियां हैं उन्हें अनुकूल करके उनसे जनता और व्यक्तिक हितके कार्य करालेना, इसे 'आधिदैवि. क कार्यक्षेत्र' कहते हैं। (७) यज्ञ और अयज्ञ। मनुष्यको इन त्रिविध कार्यक्षेत्रोंमें अनेक कर्तव्य करने हैं। और उनद्वारा वैयक्तिक तथा सामुदायिक सुख और शान्ति प्राप्त करने है। यह मनुष्य के कार्यक्षेत्रकी व्याप्ति है । वैयक्तिक और सामुदायिक कर्तव्य करते हुए व्यक्ति के हित के लिए समाजके हितका अर्थात् व्यष्टिके हित के लिए समष्टिके हितका नाश होना नहीं चाहिए। इस ओर विशेष लक्ष्य देना चाहिए । व्यकिको समटिके लिए आत्म- समर्पण करना यह 'यज्ञ' और व्यक्तिका स्वतःके लिए समष्टिक हितका नाश करना यह 'अयश ' है। यशसे मनुष्यकी उन्नति और अयशसे अवनति होती है। अपर जो 'जगत्यां जगत् ' (०१) समष्टिके आधारसे व्यक्ति है, ऐसा कहा है उसका उद्देश यही है। जिस आधारसे व्यक्ति स्थित है,उस आधारको अपने सुखकेलिप उसी व्यक्तिको सर्वदा लिए नष्ट नहीं कर देना चाहिए, क्यों कि उस आधारका नाश हुआ तो फिर वह व्यक्ति कहां रहेगी? अतः अपने आधारको अपने आप नष्ट करनेका मतलब अपने आप अपना नाश करना है। अयशसे जो नाश होता है वह इस प्रकार है। । , -- ईशोपनिषद् । (८) कर्म, अकर्म और विकर्म । व्यति और संघ कर्तव्योंका कार्यक्षम परस्पर विरोध होते हुए किस प्रकार होना चाहिए, इसका स्पष्टीकरण 'कर्मक्षेत्र' के तीन मंत्रों में किया है। उसके अनुसार प्रत्येकको अपने कर्तव्य करने चाहिए । केपल अस्तित्व के लिए ही जी कर्तव्य करने है उनका नाम 'अकर्म है। क्यों कि उनका परिणाम व्यक्ति तक सीमित है। अकर्म' शब्दका निष्काम कर्मऐसासरा अर्थ भी है।] जो कर्तव्य व्यक्ति और समाज के हित करने वाले है और जो परो. पकार युद्धिसे किए हुए हैं. उनका नाम 'कर्म' है । इसेही यक्ष कहते हैं । यह पाचक सब शम्द इसी कर्मक पर्याय शब्द है और व्यक्ति तथा समाजका घात करने वाले जो फर्म हैं, उन्हें 'विषम' अर्थात् विरुद्ध फर्म या जो नहीं करने चाहिए ऐसे कर्म, कहते है। अकर्म तथा कर्म ये दोनों अविरोध पूर्वक करने हीचाहिए। केवल विकर्म न करने चाहिए। कर्म क्षेत्रों में यह कर्मको व्याति इतनी ध्यापक है, और 'अकर्म कर्म-विकर्म किसीको भी समझना रत. ना कठिन है कि कभी कभी विद्वान् लोक भी चक्कर खा जाते हैं, अत' 'कर्मकी गति गहन है ' (भ. गी० ४।१७) ऐसा कहा गया है। तथापि ज्ञान द्वारा अपने कर्तव्य कर्म पहिचान कर उन्हे योग्य रीतिसे करना यह मनुष्य की उन्नति के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसी लिए 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' (मं०२) 'कर्म करने चाहिए, ऐसा उपदेश किया गया है। इस मंत्र कर्म करने चाहिए ऐसा जोकदा है, ये कर्म कौनसे यह ऊपर दिखाया गया है। व्यक्ति और संघकी उन्नति करने वाले जो यमरूप कर्म है, घेही करने चाहिए और इन फर्मोको करते हुए 'जिजीविच्छतं समा ।। (3) सौ वर्ष जीए'। यह उपदेश मनन करने लायक है।
अमरत्व प्राप्तिका मार्ग। . कर्म लिप्यते नरे। (म०२) = फोका लेप मनुष्यको नहीं लगता' ऐसा जो कहा है, घे ये ही यशरूप कर्म है। ये मनुः प्यको पवित्र करते हैं, उच्च पदको प्राप्त कराते हैं और पूज्य बनाते हैं। . इस प्रकार 'शान और कर्म 'इन दो साधनौका साधकको कैसे उपदेश करना चाहिए और उन द्वारा आत्मोद्धार कैसे कर लेना चाहिए यह यहां दिखाया गया है। ये दो, एकहींकी दाई और बाई वाज हैं, अथवा एकही उन्नतिके रथके ये दोनों पहिये हैं। इनके द्वा. रा उन्नतिक मार्गपर समीपतया आक्रमण होता गया कि मनुष्यका विकास होकर, उसे अंतमें जो पद प्राप्त करना है वहां यह पहुंच जाता है। (९) अमरत्व प्राप्तिका मार्ग। कर्मक्षेत्र' का वर्णन करने वाले जो (१२-१४) मंत्र है उनमें वैयक्तिक कर्मों द्वारा अपना विनाश दूर करके, संघनिष्ठा द्वारा समुदायके लिए कर्म करते हुए अमृतत्वको प्राप्त करे" (मं०१४) ऐसा कहा हुआ है । इसका थोडासा यहां मनन करना चाहिए । संघनिष्ठाका क्या अर्थ है और उससे अमरत्व कैसे प्राप्त होता है। यह यहां विचार करने योग्य प्रश्न है। संघनिष्ठ पुरुष यदि वास्तव में अमर होता है तो क्या चोर डाकु कहीं किसीसे कम संघनिष्ठ नहीं है? ऐसो अवस्थामें यहां संघनिष्ठा' शन्दसे क्या दिखाया गया है इसका विशेष विचार करना चाहिए । इन (१२-१४) मंत्रों के अर्थ में "संधभाय और असंघभाव" ऐसा शब्द प्रयोग किया गया है। यहां 'भाव' शब्दका अभिप्राय भक्ति ऐसा समझना चाहिए। - , - ११२ इंशोपनिषद्। भाव अथवा भक्ति केवल ईश्वर परही रखनी चाहिए। ईश्वर हमारा पत्य पिता है और उसके हम अमृत पुष' है । अथर्व . दमे "अनुमतः पितुः पुषः " (अथर्व०३६३०२) पिताके कार्य आगे चलाने वाला पुन होवे' ऐसा कहा है। इस नियमानुसार इम सब यदि परमेश्वरके पुत्र है, तो उसके चलाए हुए कार्योको भागे चलाना या उसके कार्योका मागहमें अपने ऊपर लेकर उसे योग्य रीतिसे पूर्ण करना यह हमारा कर्तव्य ठहरता है। ईश्वरके कौनसे कार्य जगत में चले हुए है? ईश्वरके तीन प्रकार के कार्य यहां प्रचलित है । 'सजनोका संरक्षण, दुशका दमन और धर्मका संस्थापन !' (भ० गी०४८) ये तीन प्रकार के कार्य परमेश्वर कर रहा है ऐसा सय आर्यशास्त्र कह रहे हैं। येही कार्य हमने किप, या इन कार्यों में भाग लिया तो हम परमेश्वरक कार्य आगे चला रहे हैं ऐसा होगा। यही उसकी मक्ति या सेवा है। परमेश्यकी भक्ति अथवा सेवा करनी चाहिए ऐसा जो मानाजाता है, वई सेवा यही है । 'भक्ति, भजन,' इन शब्दोंका अर्थ 'सेवा और सेवन ' यही है। (भज-सेवाएं। मज् धातुका अर्थ सेवा करना है)पिताको सेवा पुत्रको करनी चाहिए का अर्थही यह है कि पिताद्वारा चलाए गए कार्यों में अपना माग पटाना चाहिए। सेवक यही कार्य मालिकफे लिए करता है। ईश्वर सेवकको भी यही कर्य परमेश्वरार्पण बुद्धिसे नित्य करने चाहिए। 'सज्जनोंका परिपालन, दुर्जनोंका शासन और मानवधर्मको स्थापना' ये ईश्वरके कार्य हमें करने चाहिप, यही भक्ति है। और इन कामोका फरना यह सच्चा 'भक्ति मार्ग' है। अपनी शक्तिके जोरपर अनेक प्रकारके दुख दुर्जन अशकोंको देते हैं। उन दुखों से अशकका संरक्षण करके उन्हें सुखी करना यह 'जनताम जनार्दनकी उपासना करना है। विद्यासे, शक्तिसे, अधिकार 1 .
अमरत्व प्राप्ति मार्ग। ११३ से वा धनसे सम्पनोंकी सेवा करने की जमरत नहीं है, क्यो कि उनके गुणोंसे उनकी सेवा करने वाले उन्हें चाहिए इतने मिल सकते हैं। परन्तु जो विद्वान् नहीं है, बलाढय नहीं है, अधिकारी नहीं है, या धनवान नहीं है, उसे कोई सहायक नहीं मिलता। अतः ऐसे दीन जनकी सेवा करना, उसकी स्थिति सुधारना, उसकी उ. नति के लिए अपने आपको समर्पित कर देना, यह 'ईश्वरकी सेवा है। दोनोंकी दया यह संतोका मूल धन है, (तुकाराम)। इसी मू- ल धनसे यह भक्तिका व्यापार करना है। जोसंघमापना, संघनिष्ठा या संघोपासना अथवा संभूतिफी उपासना इस ईशोपनिषदमें कही है वह यही है। ईश्वर 'दीनोद्धारक' है। इसी दीन जनोद्धार णके कार्यका करना जन संघकी उपासना है। 'गुरुकी सेवा करनी चाहिए' ' अर्थात गुरुको किसीभी यातकी कमी पडने नहीं देनी चाहिए । इसी प्रकार दीनोंकी सेवा करनी चाहिए अर्थात् उनका दीनपना हटाकर, उन्हें अदीन बनाकर उनके उद्धारार्थ जो कुछ करना आवश्यक हो वह करना चाहिए । यही दोनोद्धारका काम परमेश्वरकी भकि है । दुःखितोके दुःख देखकर अन्तःकरण खिन्न होना चाहिए यह इसीलिए ही है। इस विषयमें मथर्व वेदका मंत्र देखिए- 'ये वध्यमानमनु दीध्याना अन्वेक्षन्त मनसा चक्षपा च । अग्निष्टानने प्रमुमोक्तु देवो विश्वकर्मा प्रजया संरराणः | अथर्व०२॥३४॥३॥ "जो तेजस्वी लोक बद्ध मनुष्यको अपने मन और चक्षुसे अ. नुकम्पापूर्ण दृष्टिसे देखते हैं, उन्हेही मजाजनके साथ रमण करने चाला विश्वकर्ता तेजस्वी देव प्रथमतःविशेषरीतिसे मुक्त करता है। इस मंत्रमभी यही कहा है कि दीन, दुःखी, घद्ध और परतंत्र लोकोपर जो लोक दया करते हैं, उनकी दीनता दूर करने के लिए ईशोपनिषद् । । अविधात परिश्रम करते हैं, उन्हें ही सबसे प्रथम (प्रमुमोर) यह मुक करता है, क्यों कि विश्व निर्माता देय (प्रजया सरराण.) जनतामें रहता हुआ उसरे आगन्दसे आनन्दित होनेवाला है। इसीलिए वह जनताको दुष्ोसे दुखी देखकर खिम होता है और उन दुष्टो दर नके लिए प्रेरणा करता है। 'संघमति ' क्या है. कैसे करनी चाहिए, और उसे फरमेसे (अमृतत्वं) अमरपना कैसे प्राप्त होता है, यह इस विवेचन ध्यानमें आया होगा। वद प्रतिपादित 'भक्तिमार्ग' यह है । जिस मनुष्यको जितनी योग्यता होगी, उतने अधिकारक्षेत्रमें यह कार्य कर सभेगा। ५. काध वैद्य निधन रोगीका योग्य औषधोपचार करके अच्छा करके मेने ईश्वर सेवा की पेसा एमझ सकता है। दूसरा कोई तपितको थोड़ा जल देकर ये सोही ईश्वर सेवा कर सकता है। कोई वीर परतंत्र देशको पीडित करने वाले शको दूर करके जनताको स्वतत्र करफ परमेश्वरकी सेवा की ऐसा समझ सकता है। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानव '(म०पी०१८४६) स्वकास ईश्वरकी उपासना करके सिद्धि प्राप्त करने का यह मार्ग है। ये कर्तव्य क्षेत्र विविध हैं और कर्ताकी पुरुषार्थ शकिक अनुसार उसके कर्तव्य भी अनेक हैं, परन्तु उन सबका तत्व 'जनता जनार्दनकी सेवा' यही एक है। यही 'भक्तिमार्ग' है और पूर्वोक्त 'हानमार्ग और कर्ममार्ग' ये दोनों मार्ग इसके अन्तहित होते हैं। इस मार्गसे जानेवाला मकही सरल और जल्दी मुक्त होता है, यह उपरोक्त अर्थ पचनसे स्पष्ट प्रतिपादित है। आजाल प्रचलित भक्तिमार्गमे इस समसंघोपासनासे ईघर भकि होती है ऐसा कोईमी नहीं मानता, और पेवल "नाम-स्म रए" ही तारक है ऐसा माना जाता है । यह यद्यपि अन्त शुद्धि मारके लिए टोय होगा तथापि ईश्वरको पहिरग उपासना नहीं - , अमरत्व प्रालिका मार्ग। करते अतः उनके कार्य आधे होते हैं । (तत् उ अन्तः बाह्यतः च। मं०५) ईश्वर अन्दर है और वाहिरभी है, नाम स्मरणसे यदि उसकी अन्तःकरणमें पूजा हुई तो उस 'नाम' से दिखाए गए क. तव्य बहिस्थ जनता जनार्दन के लिए उसे करनेही चाहिए । और तभी कर्तव्योंकी आन्तरिक और बाहा पूर्णता होनी संभव है। एक अन्तर्यानी कर्तव्य किए तो साम्रा कार्य हुआ। दूसरे बहिस्थके फर्तव्य होनेतक कार्य पूर्णही न होनेसे चाहे कुछभी हो, उन बाह्य कर्तव्यों के न कर लेनेतक वह मनुष्य मुक्त होनेवाला नहीं। अब यहां एकही प्रश्नका विचार करना है और वह यह कि जन संघ भक्ति ' अथवा संभूतिकी भक्ति या पृथिवीपर संपूर्ण जनताको सेवा एक मनुष्यसे फैसे हो सकती है? वस्तुतः 'संभूति में सर्व प्राणियोंकी समष्टिकी कल्पना है। किसीभी एक मनुष्य के लिए सब मनुष्योतक अपनी सेवा पहुंचाना संभव नहीं। इस लिए अप. ना दया भाव और प्रेमभाव जितना संभव हो, उतना विस्तृत कर- नेसे, उससे जितनी जन संघ सेवा होगी, उतनी यह जनार्दन अर्पण होगी और उतनी उसकी उन्नतिम सहायक होगी। यच्च यावत् प्राणियों तक उसकी सेवा पहुंचनी कोई जरूरी नहीं है। केवल उसकी संघ भक्तिसे अधर्म बढना नहीं चाहिए। इतनी सावधानी उसे रखनी चाहिए इतना करने पर सप सिद्धी है। राक्षसभी संघोपासक थे, परन्तु वे अपने संघवलसे दूसरोंका नाश करके अपने भोगको बढाने का प्रयत्न करने के कारण उनके प्रयत्न जनताके दुःख बढाने के कारणीभूत होते थे। इसलिए ऐसे प्रयत्नोंसे अधोगति होती है। 'दुष्ट सब दूर हो, अथवा दृष्टोकी वृत्ति यदल जाए, सज्जनोफा संरक्षण हो और धर्मका उत्कर्ष हो। इस दिशा में जो संघकी भक्ति होती है वही उद्धारक है। इसमें दूस. रोक रक्तसे सने हुप भोग हमें मिले ऐसा उद्देश नहीं है, अपितु , + ईशोपनिषद्। सर्वत्र शांति प्रसरे,मानवधर्मकाउकर्ष हो और सप लोकसुखी हो, इस दृष्टि से प्रयत्न करना है। इसी कर्तव्यको दिशा इस उपनिषद्ने संभति प्रकरणद्वारा दर्शायी है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मच. र्य, अपरिग्रह, शुद्धता, संतोय, तप, स्वाध्याय, और ईश्वरमक्ति, यह जो शुद्ध सनातन धर्म है, उसका प्रारंभ अहिंसास अथांत् भूत- दयासे होकर अंत 'सर्वस्व समर्पण' में होता है। इससे राक्षसी स्वार्थको इस धर्म जराभी स्थान नहीं है यह जरा समझने ला. यक बात है। सत्यनिष्ठा। जगत्में शान्तिको स्थापना करना यह मनुष्यका साध्य है। और इस साध्यको साधने के लिए शान, कर्म और भक्ति ये तीन साध- न है । इन तीनों साधनोंका दुरुपयोग न हो इसलिए 'सत्य' की कसौटी मनुष्यको सदा अपने पास रखनी चाहिए ऐसा पंद्रह मंधने सचित किया है। 'सुवर्णका मोह छोड, एकदम सत्य दि- पेगा और सत्य पकडतेही तेरा पोषण होगा इत्यादि मायार्थ इस मंत्री हैं। 'लोम छोडना शाहिए ऐसा कहने के कारण संघ- भक्तिमसे सष राक्षसी स्वार्थसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थ दूर होगए है, ऐसा समझने में कोई रुकायर प्रतीत नहीं होती। ऐसी इस निौम सत्यनिष्ठासे पवित्र हुए हुए शान, कर्म और भकिसे सर्प शांति स्थापित करना मनुष्यका परम कर्तव्य है। सिंहावलोकन । 'हमने जो कुछ किया उसका क्या परिणाम दुआ.वह हमारे उद्धारफे लिए सहायक हुआ है या नहीं, फोनस प्रतियन्ध आप है, इसका सिंहावलोकन करते हुए उपरोक मार्गका अनुसरण करना चाहिए 'पेसा पुनः १७३ मंत्रमें बताया है। 'हतं स्मर'- सिहावलोकन । ११७ 'हमने क्या किया है वह देखी और फिर आगे जो कुछ करना है यह करो'। यह उपदेश सयकोही सदा कर्तव्य करते हुए ध्यान. मरखनेसे लाभदायक है। इस प्रकार ईशोपनिषद् के मुख्य उपदेशोंका मनन पूरा हुआ। इसका इस रीतिसे अधिक विचार करके साधक अपनी उन्नति करते रहें। शेप उपदेश यद्यपि विशेष योधप्रद हैं पर वह सुगम- ताले समझने योग्य होनेले उसका यहां अधिक स्पष्टीकरण नहीं किया है। वेदका आदेश। कितने लोक ऐसा समझते हैं कि वेदके मंत्रमागोंमें 'आशा (विधि) नहीं है । 'मनुष्य! त् अमूक कर और अमूक मत कर' ऐसी स्पष्ट आशा नहीं है, ऐसा जो समझते हैं, उसका अर्थ इतना ही है कि सप संहिताओं में सभी आशार्थक वायय नहीं है। परन्तु बेदोंमें पुश्कल आशायें हैं- (१)मा गधा - लोभ मत कर । (२) त्यक्तेन भुञ्जीथाः = दानसे भोग कर। (३) कृतं स्मर - किए हुए कृत्योंका स्मरण कर। इत्यादि आशा इस ईशोपनिषदमें (अर्थात् यजुः अ० ४० मही) है। उन्हें देखने पर वेदमें आशायें नहीं है ऐसा फिसीकोभी सम. झना नहीं चाहिए। परन्तु जो लोक, आशायें नहीं है पेसा मानते है, उसका अर्थ यह है कि उन्हें चाहिए उतनी आशायेंवेदमें नहीं हैं। आमा होने पर ही काम करना, नहीं तो नहीं' यह वृत्ति गुलाम (दास) मनुष्यों की है। स्वतंत्र मनुष्य आन्तरिक स्फूर्तिसे काम करता है। लोकोंको गुलाम बनाने की चेदकी इच्छा नहीं है, अतः वह किसीको बहुतसी आशा नहीं करता, परन्तु यह ऐसी शब्द योजना करके वर्णन .
१८ ईशोपनिषत् । - करता है कि उससे मनुष्यके अन्तःकरण में स्वयं स्कूति होवे और वह अपनी अन्त:स्कृति से स्वतंत्रताले अपने कनय करे तथा अपनी उन्नति करले। इससे पाठकों को पता चलेगा कि घेदमंत्रमें आसार्थक प्रयोग बहुतसे नहीं हैं, यह उलटो वैदिक धर्मक महत्वको बढानेवाली घात है । इन्द्र अपने बलसे शत्रुका नाश करता है ऐसा कहते ही, 'हमें अपना पल यदाकर शत्रुका नाश करना चाहिए' ऐसी स्फूर्ति मनमें उत्पन्न होती है। इसी प्रकार वेदों में जिस देवताकी स्तुति है वह उपासकके अन्त करणमें वैसी स्फूर्ति उत्पन्न करने के लिए ही है। अत यह आज्ञा नमी हुई तोभी आशाकाही काम करती है। इतनाही नहीं बल्कि उसका परिणाम उससे भी अधिक यडा होता है, यह विचारनेस स्पर प्रतीत होगा। इस रिसे वेद- के प्रशंसापरक मंत्र अत्यन्त महत्व है। इस हमारी ईशोपनिष- में बहुत मंन 'आत्मा' देवताकी प्रशंसा परक है। केवल तु तीय मत्र 'आत्मघातक' लोकोको निन्दा परक है। इस प्रकारसे निन्दा फरजेवाले जो मंत्र है, वे अपनतिकारक कर्म न करनेका उपदेश करते हैं। 'अमुक मत करो' ऐसी निषेधक आशा न कर ते हुए ऐसे आत्मघातक फर्म करने से ऐसी अधोगति होती है। ऐसा घेदमंत्रोम पहा हुआ है। यह निन्दा सुनकर ऐसे अधोगति कारक कर्म न करने चाहिए ऐसी स्वाभाधिक इच्छा मनमें उत्पन्न होती है । स्तुति के मंत्रोंसे मनुष्योकी सत्कोंकी और प्रेरणा तथा निन्दाके मंत्रोंसे होन कोको ओरसे नियत्ति होती है। मनुष्यको दुरकोसे निवृत्त करते हुए सस्को में प्रवच कराना यह धर्मका उद्देश इस प्रकारसे वैदिक धर्मने साधा है। आशा करफे मनुष्यों में गुलामीका भाव डालनेकी अपेक्षा इस प्रकारसे मनुष्यको अन्तः- प्रवृतिको ही पदलना यह सर्पधा श्रेयस्करही है, ऐसा सुगमतया " वेदका आदेश। - समझा जा सकता। अब चंद के सम्बन्धमें दूसरी एक बात यहां ध्यान रखने जैसी है। और वह यह कि वेदमें 'प्रशंसा' रुप मंत्रोंकी संरया बहुत अधिक होती हुई 'निन्दा' रूप मंत्रों को संरया बहुत थोडी है । हमारी इस छोटीसी उपनिषद्म अठारद मंत्रों में से केवल एकही मंत्र निन्दापरक है, शेष सय मंत्र प्रशंसात्मक है। इसका कारण यह है कि 'मनुष्यका मन जिस वातका अधिक मनन करता है तदनुसार यह बनता है।' मनका यह धर्म है। इसलिए मनके सामने कौनसी बात लानी चाहिए और कौनसी नहीं, इस विषय में अत्यधिक विचार करना चाहिए । निषेध रूपमै भी यदि बुरी कल्पना मनके सामने आवे तो भी उनका बुरा परिणाम मनपर होता है । बुरी बुरी कल्पनायें निषेधरूपमें बार बार मनके सामने आनेसे उनका प्रभाव धीरे धीरे मनपर पडताजाता है और अन्त में वह स्थिर रूपसे मनपर जम जाता है। इसवास्ते निषेधको आशायेंभी यहुत थोडी होनी चाहिए और वे ऐसी भाषामें होनी चाहिए कि उनका यथा संभव कम प्रभाव पड़े। 'चुरी बात मत करो' ऐसा कहनेमें प्रथम बुरी यातको कल्पना मनुष्यको दीगई और फिर उसका निषेध किया गया। इसलिए ऐसे ऐसे निषेध वारंवार मनके सामने आने लगे कि उनका अच्छा परिणाम होने के बदले अनिष्ट परिणाम आधिक्यसे होगा। इसीलिए मनके इस धर्मका विचार करते हुए वेदमें बुरी बातोंके निषेधोफेभी मंत्र बहुत थोडे हैं और प्रशंसा मंत्र प्रकाशके धर्मकी स्फूर्ति देनेवाले होने. से अधिक है । हमारी ईशोपनिषद में अथवा यजुधेदके ४० अ. न्यायमें २७ मंत्र प्रशंसापरक हैं और सिर्फ एक मंत्र निन्दापरक है। उपदेशभी केवल 'सत्यधर्मकी दृष्टि' (मं०१५) मनुष्यके मन में उत्पन्न करने के लिए ही करना चाहिए और यह सत्यको प्रशंसा ।
ईशोपनिषद् । करके किया जाना चाहिए न कि असत्यका निषेध करते हुए। घेदके उपदेशमें यह विवेक अवश्य विचारणीय है। इस बातको अधिक स्पष्ट करने के लिए ईशोपनिषद् का उपदेश सर्वथा सरल शब्दों में नीचे दिया जाता है। भावार्थ स्पष्टतया यानमें आनेके लिए उसमें कुछ शाद अधिक प्रयुक्त किये गए हैं और कहीं कही क्रियापदोंमें थोडासा परिवर्तन भी किया है। कहा क्या परि- वर्तन किया गया है यह पीछे दीए गप उपनिषद् वचनों से पाठ- कोंके ध्यानमें आसकता है। यह परिवर्तन इसवास्ते किया गया है ताकि किस मंघसे किस भावनाकी जाग्रति मन में उत्पन्न होती है, यह पाठकों के ध्यान में जल्दी आ सके । उपनिषद्का भावार्थ । शान्ति मंत्र । यह आत्मा पूर्ण है और उससे उत्पन्न हुआ हुआ यह जगत् भी पूर्ण है। पूर्णसे पूर्ण उत्पन्न होता है। यद्यपि उस पूर्णसे यहभी पूर्ण पैदा होता है तो भी वह जैसाका तैसाही परिपूर्ण रहता है, उसमें कुछभी न्यूनता नहीं आती। आत्मज्ञान । (१) वह आस्माईश पनकर इस सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है। इस जगत्में संघके आधारसे व्यक्ति स्थित है। अतः व्यक्तिको अपने स्वार्थका त्याग (यश)संघके लिए करना चाहिए और त्याग करके जो कुछ अवशिष्ट रहे उसका अपने लिए भोग करे। लोम न करे। धन किसी एक व्यक्तिका नहीं, यह सप जनसंघका है। (२) इस जगत में सर्पदा प्रशस्त कर्मही करता रहे, और सौ वर्ष सक जीने का प्रयत्न करे । यह इतनाही मनुष्यका धर्म है। इसे ध्या- नमें रखना चाहिए । इसके सिवाय दूसरा उन्नतिका मार्ग नहीं।
आत्मज्ञान । । सत्कर्म करने से मनुष्यको दोष नहीं लगता। (३) केवल शारीरिक शकिके लिए ही प्रसिद्ध कुछ लोक हैं, परन्तु उनमें आत्मिक ज्ञान जरामी नहीं है। जो आत्मघातकी लोक है वे मरने के बाद और जीतेजीमी, पेसेही लोकोमें गिन जाते हैं। (४) यह आरमा अद्वितीय, स्थिर, सबसे प्रथम, द्रष्टा, और मनकामी प्रेरक है । वह इन्द्रियोंको नहीं दीखता। सब घेगवान पदार्थोकी अपेक्षाभी उसका वेग अधिक है। उसके आधारसेही मनुष्य अपअपने कर्म धारण करता रहता है (५) वह स्वयं नहीं हिलता तोमी सबको चलाता है । यह दूर होता हुआमी सबके एकदम पास है। यह सबके अन्दर और बाहिर भी है। (६) जो सर्व प्राणियोको आत्मा और आत्माको सब प्राणि यो में देखता है वह किसीका भी तिरस्कार करता नहीं है। (७) जिस समय आत्माही सब भूत यनगया ऐसा अनुभव आया कि उस समय सर्वत्र पफरवका अनुभव प्रतीत होनेसे उसे किसीभी कारणसे शोक अथवा मोह नहीं होता। (८)वह सर्व व्यापक है। यह देह रहित, स्नायु और व्रणसे रहित है। उसी प्रकार वह शुद्ध, निष्पाप, तेजस्वी, अतीन्द्रियार्थ- दर्शी, मनका स्वामी, विजयी और स्वयंम् है, और वह सदा सब कर्तव्य योग्य रीतिले करता रहता है। (९) जो केवल जगत्की विद्याकेही पीछे लग जाते हैं वे अब नत होते है। इसी प्रकार जो केवल आत्माको विधाके पोछे लग जाते हैं वेभी अवनत होते हैं (१०) जगत्की विद्याका फल और आत्माकी विद्याका फल और है, ऐसा विचारशील उपदेशकोका कहना है। ।
१२२ ईशोपनिषद् । साधना (११) जगत्को विद्या और आत्माकी विद्या ये दोनोंही उप- बोगी हैं। जगत्की विद्यासे प्रापंचिक (सांसारिक) दुःख दूर करे और आत्माकी विद्यासे अमर होवे । (१२) जिनकी दृष्टि केवल व्यक्तितकही सीमित है घे अधोग- तिको प्राप्त करते हैं और जिनकी दृष्टि केवल संघतक सीमित है घे भी अधोगतिको पाते हैं। (१३) व्यक्तिक दृष्टिको सीमित रखने से और लाम होता है और संघतक सीमित रखनेसे और । ऐसा विचारशील उपदेशक कहते हैं। (१४) व्यक्तिका हित और संघका हित इन दोनों चाहिए। व्यक्तिको उपासनासे धैयक्तिक कष्ट दूर करके संघसेवनसे अमर होवे। (१५) सत्यका मुख सुवर्ण के ढक्कनसे चन्द हुआ हुआ है। अत: यदि सत्य देखना हो तो वह सुवर्णका ढक्कन दूर करना चाहिए। (१६) हे पोषक! सर्वन और नियामक प्रजापति देव! तेरी किरणे एक ओर कर और अपना मंगलमय रूप मझे दिखा, वह मुझे देखना है । शरीरधारण किया हुआ मैं प्राणशकिसे उन्नति होनेवाला तेरा उपासक हूं। (१७) प्राण अपार्थिव अमृत है और यह स्थूल शरीर नाशवान् है । अतः हे जीव ! ओकारका जप कर और अपने किए हुए कोपर विचार कर। (१८) हे देव ! हमें उत्तम मार्गसे अभ्युदयके पास लेजा। तूं हमारे सप कर्माको जानताही है। हमारेसे पुटिल पापोको दूर कर। इसके लिए हम तुझे नमस्कार करते हैं।
आलझान। १२३ यह ईशोपनिषद् का सरल रूपान्तर है। भापानर पूर्व दिया हुआ है हो । यह यहां पुनः देकर हिरुक्तिका दोष यद्यपि हुआ है तथापि किन्हीं मंत्रोका आशय केवल भाषान्तरसे पकदम ध्यानमें नहीं आसकता, अतः यह दौडते हुप शन्दोंसे यहां केवल रूपान्तर दिया है। इस आत्म सूक्तमें मुख्यतः आत्माके गणवर्णन हैं तथापि प्रार्थना, उपासना, निन्दा, स्तुति, प्रशंसा, आशा, याचना, आदेश आदि सब प्रकार के मंत्र इसमें है, इस टिले विचार करनेवालेको यह सरल रूपान्तर सहायक होगा यह निःसंदेह है। आशा और निन्दा कितनी थोडी है और प्रशंसा कितनी अधिक है, इनकी तुलना यहां देखने लायक है । बुराईको निन्दातक अधिक नहीं करनी चाहिए, और को भी तो एकदम थोडी। युरेशब्दोस जीभको जरासामी सराय करना नहीं चाहिए। सुविचारकै शब्दही उच्चा- रने चाहिए । यही वेदका आशय है । देखिए--- भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देयाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः मा० १२८९/८॥ अच्छी बाते कानोंसे सुने और अच्छीही आंखोंसे देखें किसीभी तरहले, निषेध करने के लिएभी बुराईका स्मरणतक न करें । वेदमें स्तुति और प्रशंसापरफ मंत्र अधिक तथा निन्दा और आशापरक एकदम कम है, इसका यही कारण है। मनका स्वभावधर्म 'मननसे तद्रपदोनेका' होनेसे वेदोंने प्रशंसनीय दिशा ही लोकों के सामने रसी है। सत्यकी पहिचान करवानेका यह उद्देश्य है । सत्यके सिवाय शेप जो कुछ है वह असत्यही है। उ- सका वर्णन करके मनको कलुषित करनेसे क्या लाभ ? इसके अतिरिक्त 'सत्य एक होने से उसको कहा जा सकता है पर अस. स्योकी गणना करके कहना असंभव है। उदाहरणार्थ एक और एक कितने होते हैं? इस प्रकार उतर एकमात्र प्तत्य 'दो है। इसके ईशोपनिषद्। सिवाय शेप सप संख्या असत्य उत्सर हैं। ऐसी दशाम उन सब असत्य उत्तरोका कहना कठिन है पर इस प्रश्नका एक मात्र सत्य उत्तर 'दो' अति सुगमतासे प्रकट किया जा सकता है। यही पात सब विपयों के सत्यासत्यके कपनमें समझनी चाहिए। उपरोक्त मंघोम जोस्तुतिविषयक मंत्र है,चे परमात्माके गुणोंकी प्रशंसा कर रहे हैं। परन्तु कभी न कभी इस उपासकको आत्मा उन गुणोंसे युक्त होनेवाली है अतः 'हमारे अन्दर विद्यमान आ- स्माके भावो स्वरूपका वर्णन यह है, अथवा 'सोऽहं' (मं०१६) पह मैं हूं, ऐसा समझते हुए वह वर्णन पढनेसे हमारी उन्नति कितनी हुई है और कितनी होनी है यह उससे ठीक ठीक पता चलेगी। इसके अतिरिक्त आरमाका वर्णन पढकर, यह क्या करती है यह देख और हमसे तत्सरश क्या हो सकेगा, यह पता करे। इस प्रकार करनेस अपना फर्ममार्ग पर किस प्रकार आक्रमण करना चाहिए इसका ज्ञान हर एकको हो सकता है। तीन मार्ग। ज्ञानमार्ग, कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग में तीन मार्ग है। इन्हें एक- ही स्तुति विषयक मंत्रमें अथया सूक्तम फैसे समजा जा सकता है यह अघ देखिए। उपरोक्त सूक्तम (१) जो परमात्मापरक स्तुतिका वर्णन है, वह हमारी आत्माकी, उसके पूर्णत्वको प्राप्त कर लेनेके बादकी अवस्था का है क्यों कि सोऽह(म०१६) = 'यह मैं होनेसे यह वर्णन जैसा उसका है पैसाही मेराभी है, पेसा समझते हुए यह आत्माका ज्ञान में कितना प्राप्त हुआ है, यह देखते जाना और आगे अनुभव प्राप्त करनेका प्रयन करते जाना यह, 'ज्ञान मार्ग' है। (२) परमात्मा क्या करता है यह उसके वर्णनसे या स्तुति समझकर तसशकर्म 'स (प) अहं' - 'उसके सदृश में , विरोधका परिहार। होऊंगा ऐसी भावनाले अपने कर्तव्य क्षेत्रानुसार यथा संभव नि- दोषपूर्ण करते रहना यह 'कर्ममार्ग' है। इसविषयम, क्या क्या घोध लेना चाहिए यह मंत्रखण्डोसे कोष्टक द्वारा पूर्व दिया गया है। (३) इन दोनों मामि कुछ समानताका नाता दिखाया जाता है। जगत्मे परमेश्वर के जो महानसे महान कार्य चल रहे हैं उनमें से यथा संभव भाग परमेश्वरार्पण बुद्धिसे घटाना, उससे जनता जनार्दनकी यथाशक्ति सेवा करनी और फलेच्छा की ज. राभी इच्छा न रखते हुए '(तस्य दालोऽहं )' = 'उसका मै अनुचर हूं' ऐसी भावनासे केवल ईश्वरार्पण बुद्धिसभी की गई सेवाको परमेश्वरकोही अर्पण करना, यह 'भक्तिमार्ग' है । एकही स्तुति विषयक सूतसे ये तीन मार्ग इस रीतिसे विचार और मनन करने वालेको सुगमतया समझमें आ सकते है। आधुनिक समयमें ये मार्ग प्रचलित हुए हैं यह बात नहीं है। अपितु वेदम पूर्वसही इस प्रकारसे हैं। इस हमारी ईशोपनिषद के मंत्रोसे ये तीन मार्ग पाठक समझ सकेंगे। भक्तिमार्गका उत्तम उदाहरण हनुमानजी का है। रामनामके जपसे अंतरंगउपासना करनी और श्रीराम ज. মাদ্ধ জামীক্ষা যথা কি স্লাল জব মা ই ক্ষছি। पहिरंग उपासना करनी, ये भकिमार्गके द्विविध कार्य श्री हनुमान- जोकी जीवनीक देखनेसे स्पष्ट प्रतीत होते हैं। ऐसे और भी बहुत भक्त हैं। उनके चरित्रों में भी यह बात दिखाई देगी। विरोधका परिहार। ईशोपनिषद् में विद्या प्रकरण' और 'संभूति प्रकरण' हो दनमें विद्या अविद्या' और 'संभूति असंभूति' इन शब्दोंके अनेक भाष्यकारोंने अत्यन्त विविध अर्थ किए है। इसीलिए इनके अर्थ अन्तर्गत प्रमाणोसे क्या होते हैं यह यहां दिखाना आवश्यक है। সুনঙ্কা থাকলে ফুল গন্ধা- ईशोपनिषद् ! . आत्मा -- आत्मज्ञान प्रथम मंघमें ईशावास्यमिदं सर्वं' ऐसा वाक्य है। इसमें देश और इदं ये दो पदार्थ एक दूसरे से भिन्न वर्णन किए गए है। इनका ज्ञान हो ज्ञानक्षेत्र है। इदं जगत् अनीश अनात्मा आत्म विद्या अनात्मविद्या -विद्या अ"विद्या इस प्रकार ये शब्द प्रथम मंत्रके अनुरोधसे धनते हैं। यही दाद विद्या अविद्या प्रकरणमें क्रमशः और जगत्का इस अर्थमें आए हुए हैं। पहिले मंत्रक पदों के विषय में विचार करनेपर अगाणे मंगोंका स्पष्टीकरण सुगमतासे होजाता है। और किसीभी प्रकारकी का नहीं रहती। इसी मंत्र भागके अगले 'जगत्यां जगत् ' ये माग्द जगत्का स्वरूप वर्णन करने वाले हैं। जगत् कैसे स्थित है ? इसका उत्तर है कि पद 'जगतीके आधारसे जगत् ' स्थित है। जगतोंके स- मह का नामही जगती है। संघके आधारमे व्यक्ति इस जगत्में रहता है' यह जगतका नियम है । 'एक और उसकी जाति', यह जगत् का रूप है। जगती जगत् सं+भूति असंभूति संघ व्यक्ति 'सं+' धातु का अर्थ 'एक होकर रहना' है। एक होकर न रहनेके भायको 'अ++भू' धातु दर्शा रही है। एक होकर जम करके रहने की एक कल्पना और एकके अकेले रहने की दूस- - .
चिरोधमा परिहार। . री करपना, ऐसी दो कल्पनायें 'संभूति और असंभूति' इन दो शब्दोंसे दिखाई गई है। इन दोनोंकी अंजीर बनाकर उससे मनुष्यको उन्नति किस प्रकार साधी जा सकती है। यह इस प्रकरणमें दर्शाया गया है। परस्पर विरुद्ध दीसनेवाली बातोंको इस योजना तथाकल्पनासे यदि हम उन्नतिकी ओर ले जा सके, तो उनसे एक दूसरेका पोषक परिणाम कैसे निकाला जासकता है यह बात इन दोनों प्रकरणोंके मननसे पाठकगण समझ सकेंगे। विरुद्ध दिशाले जानेवाले एकदम अन्तिम सिरे किस प्रकार एक स्थानपर आकर मिलते है। और उन परस्पर विरोधी से पफ दूसरेके लिए सहायता केले लेनी चाहिए, यह यात पाठक यहां अवश्य ध्यान पूर्वक देखें, क्यों कि जगत में सर्वदा परस्पर विरोधी विचारकों की यदी कहीं भेटभी होगई तो एक दुसरेके विचारोंकी एकता करना न आनेसे नाय झगडे होते है और उनके यह जाने से दोनोंका नाश होजाता है । परन्तु यदि दोनों विरुद्ध शक्तियोंको एक केन्द्रमै एक पाय- नाना आया, तो दोनों के अनेक प्रकार के कल्याण हो सकते हैं। विरोधी प्रतीत होनेवाली शक्तियोंको एक कैले बनाना चाहिए, यह इस प्रकरण पर विचार करनेवाला सुगमताले समझ सकता है। असुर्य लोक । 'असुर्य लोक ' गाढ अंधकारसे व्याप्त है ऐसा तृतीय मंत्रमें कहा है। ये असुर्य लोक कौनसे हैं, इस विषय में बहुतोंने यदुतसे तर्क किप है । फितनौने 'सूर्य जहां नहीं है ऐसे देश' ऐसा अर्थ किया । परन्तु यहांपर असुर्य' शब्द है ' असूर्य ' नहीं। दूसरे कुछ मानते हैं कि 'असुर' का अर्ध राक्षस है, और उनके देशका नाम 'असुर्यलोक' है। परन्त ये सब अर्थ ठीक प्रतीत नहीं होते। वेदम 'अमर' यह शब्द 'प्राणशक्ति (अस+r) देनेवाला - . है - - ईशोपनिषद् । . इस अर्थमें परमेश्वरके लिए आया है। वेदमें बहुत से देवताओं के लिए 'असुर' शब्द इसी अर्थमें विशेषण रूपसे आया है। 'असु रत्व' शब्द (ऋग्वेदमे २८ यार, वाज० यजुर्वेदमे ३ धार, और अथर्वमें २ बार) उपरोक्त अर्थमें प्रयुक्त हुआ हुआ है। 'असुर्य' शब्द येदमें अन्य दूसरे किसी अर्थममी नहीं आया है और केरल 'परमेश्वरसे मिलने वाले (असु-र्य)प्राणोंके यल' इसी एक अर्थम आया है। प्राण के ऊपरक यौद्धिक, मानसिक आदि बल इससे भिन्न हैं। इस अर्थको ठीक ठीक समझने के लिए यहां थोडासा भिन्न रो- विसे विचार करना आवश्यक है। शरीरमें (असु) प्राणोकी शक्तिको गति देनेवाला आत्मा है । उसके रहते हुए शरीरमें प्राण शक्ति कार्य करती रहती है और पद्द गया कि प्राणोंका कार्य बन्द हुआ। इस दशा में शरीरमें (अल+र) प्राणशक्ति देने वाला आत्मा ही है इसमें शंका नहीं। इस आत्माके जो पल शरीरमें दीखते हैं 'असुर्य' पल है । आत्मासे प्राप्त जो प्राणों के यल है वे यही हैं ये प्राणों के बल इन्द्रियों में और शरीरमें संचार करते है, इसीलिए प्राणों के बल इस स्थल शरीर में नजर आते हैं। रावणके शरीर में जैसे ये असुर्य पल थे पैसेही रामकेमी शरीरमें थे। सिर्फ दोनों में भेद रतगाकि रावण अपनी शकिसे दूसरोंको परतंत्र करके अपने शारीरिक भोग पढाता था और इसलिए राक्षस गिना जाता था और श्रीरामचंद्र समर्थ होते हुए भी स्वयं कष्ट उठाकर दुःखितोके दुखको दूर करने के लिए. आजन्म प्रयत्न करते रहे। और अतः उनको गणना देवों में है। असुर्य चल दोनोम होता हुआमी एक देव और दूसरा राक्षस बन सकता है। इसका कारण उत्कृष्ट आत्मिकशक्तिकी प्रवृत्तिमें भेद होना है। इसीलिए ही-- . ।
असुर्य लोक। - असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । * असुर्य बलसे प्रसिद्धी पाप हुए ये लोक है जो गाढ भंधकारसे याप्त है। इस मंत्रमें 'असुर्यलोको' का 'गाह अन्धकारसे व्याप्त' ऐसा विशेषण दिया है। यह इसीलिए कि प्रकाशसे प्रकाशित हो- नेवाले दूसरे असुर्य लोक भी हैं, उनका बोध इस मंत्रसे न हो। उनका वर्णन हम इस प्रकार कर सकते हैं- असर्या नाम ते लोका आत्ममासा प्रकाशिताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्मविदो नराः॥ 'असुर्य बलसे प्रसिद्ध थे लोक है कि जो आत्माके तेजसे प्रका- शित हैं। उनमें मरने के बादभी उनकी गणना होती हैं जो कोई आत्मशानी नर हैं।' ऐसा अर्थापत्तिसे और विशेपणके अनुसंधानसे श्लोकका हम निर्माण कर सकते हैं, और इससे पता चलेगा कि असुर्यलोक जैसे राक्षसों में हो सकते हैं, ठीक वैसेही देवोंमें भी हो सकते हैं। रायण और राम दोनोंही असुर्य शक्तिसे युक्त थे, पर प्रथम अंध- तमसे व्याप्त था और दूसरा आत्म प्रकाशसे पूर्ण था, क्यों कि प्रथमकी अन्तःकरण प्रवृत्ति स्वार्थी भोग तृष्णाले अन्ध हुई हुई थी और इसके विरुद्ध दूसरेकी शुद्धाचरण और जगदुद्धारकी प्रेरणाले प्रकाशित हुई हुई थी। अन्तः शक्तिभी जिनकी तरह है। वह केवल गति देती है। जिनकी शक्तिसे काटने के यंत्र जैसे फिरते है पैसेही जोडने के यंत्रभी फिरते हैं । इसी प्रकार यहांमी समझना चाहिए। लोक। 'लोक' शब्द देशबाधकमी है और अनवाचकभी है अमुक मनुष्यको स्वर्गलोक मिला, इसका अर्थ स्वर्गस्थानमें देवजनों में ९ ईशोपनिषद् । जाकर पसनकी योग्यता उसे प्राप्त हुई ऐसा है। स्वर्ग में निर्जन भूमि उसे मिली ऐसा अर्थ नहीं । स्वर्ग, मृत्यु और नरक घे यदि स्थान विशेष हैं तो यहा उस उस योग्यताके जन हैं, और कम अधिक भात्मिक योग्यता होनेसे उन उन लोकोंमें जाकर रहना होगा और योग्यता समाप्त होनेपर पापिस आना पड़ेगा। इससे यह पता लग सकेगो, कि क्सिीमी 'रोक की प्राप्ति का अभि- प्राय है कि यहाकी जनतामें जाकर घसनेको योग्यता । अधतम सात असुर्य लोक' और 'प्रकाश पूर्ण असुर्य लोक ' इनमें कौन जाल है और वहाके लोकोंमें उनकी गणना कैसे होती है यह बात ऊपर के विवेचनसे स्पष्ट ध्यानमै सुगमतासे आ सकेगी। लोक शब्दको देशवाचक, स्थानवाचार और जातिवाचर में में कोई भी यदि मान लिया जाये तो भी उन सरका मुख्य आशय एष ही है। यह हम उपरोक विचार करनेसे समक्ष साते हैं। धनका अपहार। प्रथम मत्रमें 'मा गृध कस्य स्विद् धनं' (म०१) पेसा एक चरण है। उसका, '(१) रोम मतकर, (२) धन भला किस एक व्यविशा है?' ऐसा अर्थ हम पहले कर आप है। कुछ रोक इस मत्रखण्ड के ऐसे दो भाग न मानते हुए 'कस्य स्विद् धनं मा गृध । विसीकेभी धनका लगेम मत रख, ऐसा अर्थ करते हैं। यद्यपि यह अर्थ घरा नहीं है तथापि इस मंत्रम जो 'स्चित् ' शब्द है यह प्रथाधक है। 'पया, भला' ऐप्साही उसका अर्थ होता है। कस्य स्वित्' इसका'षस्य चित् । ऐसा अर्थ नहीं होता। इसके सिवाय कुछ और जो दूसरा अर्थ करते हैं वह इस मन भागका अर्थ सीधे तौरपर नहीं होता। और खेंचातानीकरये उस प्रकार से अर्थ कियाभी तो उसका अर्थ 'दूसरे किमीकमी धनपर होम - धनका अपहार। - । दृष्टि मतकर' ऐसा होगा। दूसरेके धनका अपहार मतकर, दूसरे को लूट करके अपने उपभोग मत बढा। यह एक उत्तमही उपदेश है पर इससे अर्थापत्तिद्वारा एक पेसी ध्वनि निकलती है कि 'स्वयं कष्ट उठाकर प्राप्त की हुई जो धन संपत्ति हो और जो पैत्रिक संपत्ति अपने भागमें आई हुई हो, वह दूसरेकी न होनेसे और केवल अपनी ही होनेसे उस लर्व संपत्तिका हम स्वयं चाहिए जैसा उपभोग करें, उसमें कोईभी आपत्ति नहीं।" इस दृष्टिसे यह अर्थ धर्मकी दृष्टिम थोडासा गौणही प्रतीत होता है। धर्म ऐसा कहता है कि जो कुछ हमारा धन हो उसका लोभ न करते हुए उसका यज्ञ करना चाहिए अर्थात् “ उसका विनियोग सज्जनोंके सत्कार करने में, समान लोफोंकी संगतिकरणमें और जिनमें न्यू नता है उनको न्यूनता हराकर पूर्णता करने के लिए दान देने में व्यय करना चाहिए।" यज्ञ अर्थात् 'सत्कार-संगति-दानात्मक सत्कर्म।' अपने धनका इन कार्यों में उपयोग करना चाहिए। अ. पने धनका ऐसा उपयोग करना यही वास्तविक उपभोग त्यक्तेन भुजीथाः । (मं० १)] है ऐसा माने, और ऐसा अपने धनका यक्ष करके जो कुछ अवशिष्ट रहे उसका अपने लिए भोग करे। यश- शेष भक्षणा यह जो धर्म है, उसका यह ऐसा अर्थ है। यहाँपर दूस. रेक धनका लोम नहीं करना चाहिए इतनाही है यह बात नहीं अपितु अपने धनकामी लोभ न करे ऐसा दर्शाया है । (त्यक्तेन भुञ्जीथाः) दानसे अपने धनके भोगकी आशा मिलने परभी, (मा गृधः) धनका लोभ मत फर। (कस्य स्वित् धनं ) किस एक व्यक्तिका मला धन है ? इसका विचार कर। ऐसा मंत्रका अर्थ सीधा दीखता है। विचारफको उसी समय पता लग जाएगा किन किसी एक व्यक्तिका नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति धन मेरा है ऐसा मानता है वह व्यक्ति थोडेही समयमें सब धन यहीपर प ईशोपनिए । छोडकर चला जाता है। इसलिप धन किसीमी पक व्यक्तिका नहा यह सत्य है । धन सब जनताका, समाजका, संघका अथवा जातिका है, व्यक्तिका नहीं । यद्यपि धन कुछ काल के लिए एक व्यक्तिके आधीन होता है ऐसा अनुमय है, तथापि उस धनका वास्तविक स्वामी समाज है और यह व्यक्ति उस समाज धनके रफ भागका 'पंच' (ट्रस्टी) है। पंच आने आधीन धनको अ- पने लिए उपमोग नहीं कर सकता, यह जिसका है उसके लिए उसका उपयोग कर सकता है। ठीक इसी प्रकार यहां प्रत्येक व्य- किको अपने धनका यक्ष करनेका ही अधिकार है, अर्थात ज- नता के हितार्य कर्तव्यकर्म करने में ही खर्च करनेका उसे अधिकार है। उस धनका अपने भोगके लिए खर्च करनेका उसे अधिकार नहीं। . इस विवेवनसे पाठकों को पता चला होगा कि "मा गृधः कस्य स्वित् धन? " इस प्रकारके दो वाक्य मानकर इन दो यायोका हमने अर्थ किया है। इस प्रकार भिन्न भिन्न अर्थ करना यह चेदकी इतर शिक्षाका अनुसरण करते हुए है और दोनों वाक्योंका पत्र अर्थ करफे दूसरे जैसा करते हैं उस प्रकार अर्थ करना यह अर्थ गौरवको दृष्टिले पया, और घदके इतर उपदेशोंकी दृटिस क्या, गौण ही है । 'अपरिग्रह-घत्ति रखनी चाहिए, ' ऐसा जो यम नियामोके दशविध नियमोमें कहा है, उसका कारण यह ऐसा है। पाठक इसका विशेष विचार करें। अग्नि देवता। शोपनिषद्के अन्तिम मंत्रमें अग्नि' देवताकी प्रार्थना है। यहां अग्नि शम्दसे किसका पोध लेना चाहिए इसका विचार करना चाहिए । यहुतसे लोक अग्नि शब्दसे 'यहमें उपयोगमें आया - अग्नि देवता। १३३ लो आग' ऐसा यहां समझते हैं। यद्यपि अग्नि शब्दका ऐसा अर्थ है तथापि यह यहां इष्ट नहीं है। यह संम्पूर्ण सूत एकही देवताका वर्णन करता है। उसी एकही देवके लिए इस सूकमें निम्न नाम आए हैं- (मं०१) ईश, (मं०४) एक तत् पनत्, पूर्व, (मं०५) तत् , (मं०६-७) आत्मा, (म०८) सा, कविः, स्वयंभूः, (मं०९) सत्यं, (मं०१६) पूषा, कपिः, यमः, सूर्यः, (मं०१८) अग्निः। इन शब्दोंपर विचार करनेपर 'सः, तत्, ईशः, स्वयंभूः, कविः, सत्यः, पूपा, यमः, अग्नि, आत्मा,' इत्यादि सर्व नाम पकही परमात्माके हैं पैसा स्पष्ट दीखता है। एक सूक्तमें एक देवताकेही गुण दिलाने के लिए ये सब शब्द आए हुए हैं। 'आत्मा' के सि. घाय इस सूकका अन्य कोई देवता आजतक किसीनेभी नहीं माना है । अत: अग्नि आदि शब्द एक आत्माकेही चाचक इस सूक्तम आए हैं यह निर्विवाद है। यही आशय निम्न ऋचाभी दर्शा रही है।- "इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विमा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ ऋ. १६४॥४६॥ इस मंत्रमें एक आत्मा इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य सुपर्ण, गरुत्मान्, यम, मातरिश्वा ये नाम है ऐसा कहा है। इस घेद मंत्र को देखने से अग्नि, यम आदि शब्द उस एक अद्वितीय स्वयंम् परमात्माकही वाचक है इस विषय में शंका नहीं रहेगी। द्वैत और अद्वैत । इस स्क्तमें प्रायः बहुतसे मंत्र द्वैतपरक हैं। केवल सातवें मंत्रमें अद्वैतानुभव या एकत्यका अनुभव ' कहा गया है। अनेक लोक - अनुभव इन दो - ईशोपनिषद् । दैत और अद्वैतके विषय में वियाद करते हैं। परन्तु केवल दूत पाद या फेवल अद्वैत पाद सर्वथा नहीं है। 'जाति और स्वप्न इन दो अवस्थाओका अनुभव करती दुई आत्माको द्वैतका मिलता रहता है। उसी प्रकार 'सुषुप्ति और तुर्या' अवस्थाओंमें अद्वैतका अनुभव मिलता है। इस प्रकार यह द्वैत मिश्रित अद्वैत अथया अद्वेन मिश्रित द्वैत है। इसलिए यहुधाप्रत्येक ब्रह्मविद्या ग्रंथमें इन दोनों अनुभवोंका विचार किया हुआ होता है। उपासना, फर्म, भक्ति आदि सर्व अनुमान जाग्रत अवस्थाम होनेसे ' उसका मैं पासक' इस द्वैत भावनासे किए जाते है। परन्तु जब 'यही सर्वत्र समरस भरा हुआ है ' पेसा अनुभव हो. फर उस एकही आत्माका सयंत्र अनुभव होता है, तब यह उपा- सक ऊपरी भूमिकामें जा पहुंचता है। उस समयका अनुभव अद्वैतका होता है। ये दोनों अनुभव उपासकको मिलते हैं अतः ये दोनोही अनुभव सर्वथा सत्य है। इसलिए द्वैत और अद्वैतके विष- यमें झगडना करना व्यर्थ है। दोनों अनुभवों के मिलनेसे पूर्णानुभय होता है, यह स्मरण रखना चाहिए इस प्रकार ईशोपनिषद्का विचार है। यह उपनिषद् सयसे मुख्य है और इसीफे थोडे थोडे सिद्धान्तोका अधिक स्पष्टीकरण करने के लिए इतर उपनिषद् बनी हैं । इतनी इस उपनिषद्की महिमा है इसका जो जितना मनन करेगा वह उतना इससे ज्ञान प्राप्त होगा। ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः।। - ईशोपनिषद्के मंत्रोंका तुलनात्मक विचार। घेदके किसी सूक्तका विचार करना हो तो साथ साथ तत् सदश विचारवाले अन्य स्थानके वेद मंत्रोंका भी मनन करना अत्यंत आवश्यक है। इससे चेदकी गंभीरताका ज्ञान होता है और वैदिक सिद्धांत समझनेमें भी बडी सहायता होती है। इसलिए ईशोपनि- पदके मंत्रों के साथ अन्यान्य वेद मंनोकी तुलना अब करते हैं-- मंत्र १ - प्रथम मंत्रका सबसे प्रथमका कथन "ईशावास्यमिदं सर्वे" यह है। इसका अर्थ है "ईश इस सबमें व्याप्त है। अपवा ईश्वर द्वारा यह सब घेरा जाने योग्य है। यहां शिका अस्तित्त्व सबसे प्रथम कहा है । यह ईश सबके ऊपर शासक क्यों है, किन गुणोंसे यह सबका ईश्वर हुआ है, इसका विचार करने के समय निम्न लिखित मंत्र हमारे सन्मुख आते हैं- यो विश्वस्य जगतो देव ईशे । ऋ० ७१०१२ त्वं ोक ईशिपे । ४।३२१७ स्वमीशीय वस्य एक इत् । ० ८।१४।१ “जो संपूर्ण जगत्पर एक देव स्वामित्व करता है । तं ही एक इसका ईश है, इस सय जगत् रूपी धनका तु ही एक स्वामी है।" इस प्रकार इस ईश्वर के स्वामी होने के विषय में वेदमें अन्य स्थानमें कहा है। सय जगत्का यही एक देव है। यह ईशोपनिषदका भाव ही इन मंत्रोम है। अब देखिये कि यह किस कारण ईश बना है- ईगोपनिषद् । ईशानो अप्रतिपुतः । २० १७१८ विश्वस्येशान ओजसा ० ८१७९ ऋषिदि पूर्षजा अस्येफ शान ओजसा ० ८६४१ 'यह ईश्वर ऐसा है कि जिसका प्रतिकार कोई नहीं कर सक ता। पद सय जगत्का ईश्वर अपने पलसे हुआ हुआ है। वह शानी सघका पक पूर्वज अपने पलसे सबकाश हुआहुआ है।" इन तीन मंत्रोमें उसका सबसे अधिक सामर्थ्य है इसलिए अपने सामथ्र्यसे ही यह सबकाश पना है, पेसा स्पष्ट शब्दों में कहा है। इसके परायर अथवा इससे अधिक सामर्थ्य किसी अन्यका नहीं है, सय अन्यों के सामर्थ्य इससे कम है, इसलिए इस एकही का प्रमुत्य सबपर हुआ है । सामर्थ्यसे ही प्रभुत्व अथवा स्वराज्य मिल स- कता है. स्वराज्यकी प्राप्ति के लिए दूसरा उपाय नहीं है यह योध यहां मिल सकता है। उपनिषदों में भी यही बात कही है देखिये- रामानापोशते देव एकः । ० १० १११० यश अस्प द्विपदशतुष्पदः। वे उ०४।१३ घशे अस्य जगतः। भ्य० ६१७ सोटोपानीशत शिनीभिः। ये० उ० ३१ अधर्य शिरस्५ या सर्यान् देवानीरात शनीभिः । 'क्षर अर्थात् नाशपात जगत और जीवात्मा स्नपर एक पर- मारमा प्रभुत्य करता है। द्विपाद और चतुष्पादका यह एकही ईश है। सप जगका यह एपदी भयर है। सप लोकों का प्रभुरय यह अपनी शक्तियोंसे करना है। सब देयोंपर भी यह अपनी शक्ति योसे प्रभृत्य करता है। इन उपनिषदचनोम ईश्वर पालन शानियां दे जिस कारण यह सपपर स्वामित्व करता है. यह पाव वही है। यह तो शतिका प्रमाय हुआपरन्तु फेयल शक्ति होने सेही कार्य नहीं चल सकता, क्योंकि यलफे आधिपसे किसीने तुलनात्मक विचार । १३७ किसीपर अधिकार जमा भी दिया, तोभी उसके चशमें सदा के लिए सयका रहना कठिन हो जाता है। यदि उसने मयको चशमें किया और उनकी इच्छाओको चशमे किया तभी वह सदाके लिये स्वामी माना जा सकता है। परमेश्वरका सबपर पमुन्य इसी कारण है कि उसने सबकी इच्छाओंको पशम किया हुआ है, अर्थात् सबको संतोष देकर वशमें किया है, इस विषय में निम्नलिखित मंत्र देखिये- इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनपत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥ ३० १२१८ शृण्वन्तं प्पणं घयमिमनष्टयेदसम् । ईशानं राय ईमहे ॥१०६.५४।८ ईशान इमा भुवनानि वीयसे ॥ ३०९।८६।३७ तमीशानं जगतस्तस्थपस्पति धियं जिन्धमघसे हूमहे वयम्॥ ऋ० १८७ार इस ईश्वरके हजारों उपकार है, नहीं नहीं उसलेमी उसके अधिक उपकार है, इसलिए अपने बलसे प्रभु बने हुए उस ईश्वरकी स्तुति हम करते हैं। यह हमारी प्रार्थना सुनता है, हमारा पोषण करता है, वह अधिक प्रभावशाली है और उसका अक्षय धन है, इसलिये उस ईश्वरी स्तुति हम अपने कल्याण के लिये करते हैं। इन सय भुवनोको प्रगति यह करता है । उस स्थावर जंगमके ईशकी प्रार्थना हम अपनी रक्षा के लिये करते हैं।" इन मंत्र भागों मैं उसके वश आनन्दसे सय स्थिरबर जगत् क्यो रहा है, इसके हेतु दिये हैं। स्थिरचर जगत् पर उसके अनंत उपकार है, सबका पोषण उसके सामर्थ्यसे होता है, किसीकी उन्नति में किसीभी प्रका- रकी रुकावट नहीं होती, सबकी उत्तम प्रकारसे रक्षाका कार्य वही करता है, सबको धनादि पदार्थ देनेपर भी उसका खजाना जैसाफा तैसाही भरा रहता है, इत्यादि गुण उसमें होनेसे उसके " ।
ईशोपनिषद् । अधिकारके अंदर सब आनंदसे रहते हैं । अर्थात् जो राजा अप. नी प्रजाका शासन इस प्रकार करेगा, उसीके वश सय al रहेगी, अन्यथा जोराजा केवल पाशविक यलपर निर्भर रहता हुआ प्रजाका शासन करताके साथ करेगा, उनके मनोको आकर्षित करने का यत्न न करेगा और उनको वृद्धि करनेका विचार तक नहीं करेगा, उसका राज्य शासन चिरकालतक नहीं रहेगा। इन मंत्र भागोंसे यह बोध मिल सकता है। इतने गुपोंसे ईश्वरका शासन सयपर हुआ है। ईशावास्यमिदं सर्व। इस मंत्रमागके साथ इन मंत्रोंका विचार करनेसे दूसरोपर अधिकार चलानेफे विषयको वैदिक फापना अधिक सुल जाती है और घेदका आशय मनमें अधिक स्पष्टता साथ आसकता है। दान। प्रथम मंघमें दूसरा कथन त्यक्तेन भुजीया: यह दे। त्यागसे भोग कर । अर्थात् दूसरोके ऊपर उपकार करके पश्चात अपने लिये भोग कर, अपने भोगफ लिये दूसरोके पलोपर छुरा न चला। दूसरोफे लिए अपना आत्म समर्पण कर। यहीया है। इस विषयों अनेक चार पहिलेभी कह आप है। अनासकिरखकर व्यवहार क. रनेका भाव इस विधान है। दानके विश्यमें मुग्वेदमे एक सूक ही है और अन्य स्कोमें अनेक बार दानको प्रशंसा की है। प्रत्यक्ष परमेश्वर सहस्त्रो प्रक्षारके दान करता है पेसेमी अनेक मंत्र है, अर्थात् उसका अनुकरण करने की इच्छा हो गई तो भी दान करना चाहिए । ईश्वरत्यके गुणों में स्याग और दान एक विशेष गुण है, इस विषय में पेदके आदेश स्पष्ट है। यहां उदाहरण के लिये दान सूकके एक दो मंन देते हैं- तुलनात्मक विचार । ॥ उतो रयिः पृणतो नोपदस्यत्युताऽपृणन्मर्दितारं न विन्दते ॥ १॥ स इगोजो यो गृहये ददात्यन्नकामाय चरते कशाय । अरमस्मै भवति यामहूता उतापरीपु कृणुते सखायम् ॥२॥ न स सखा यो न ददाति सरये सवाभवे सचमानाय पित्वः । अपास्मात्प्रेयान तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत् ॥४॥ पृणीयादिनाधमानाय तव्यान्द्राधीयांसमनुपश्येत पन्याम् । ओहि वर्तन्ते रथ्येव चकाऽस्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः ॥५॥ मोघमन्नं विन्दते अप्रवेताः सत्यं घोमि वध इस तस्य । नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलायो भवति केवलादी॥ ६॥ ऋ० १०१११७ दान देनेवालेका धन निश्चयस कम नहीं होता। और जो (अपृणन् ) दान न देनेवाला होता है उसको सुस देनेवाला कोई नहीं मिलता ॥१॥ (कशाय) दुर्बल होने के कारण अन्नकी इच्छा करके (चरते) भ्रमण करनेवाला घर घरमै भीक मांगने की इ- च्छासे घूमता है, उसको जो मनुष्य अन्न देता है (स इत् भोजः) चही सच्चा भोजन करता है। उसके लिये पर्याप्त धन यक्षके लिये मिलता है और वह (अ-परीप) कठीण प्रसंगोंमें सहायक मित्र भी प्राप्त करता है ॥३॥ अन्नकी इच्छा करने वाले भले मनुष्यको भी समयपर दान नहीं देता, यह (नस सखा) वह सच्चा मित्र नहीं है । उससे (अपप्रेयोत् ) दूर भागना चाहिये, उसका घर (न ओकः) सच्चा घर नहीं है । इस लिये दूसरे दाताके पास जाना योग्य है | (तव्यान् )बलवान् (नाधमानाय पृणीयात) सहायताको इच्छा करने वाले के लिये अवश्य सहायता देघे । अपने जीवनका (द्राधीयांसं पंथां) अतिदीर्घ मार्ग अपने लिये काटना है, यह मनमें धारण करके दान देये। क्यों कि (रथ्येय चका) रथके वाफे समान एफसे दूसरेफे पास संपत्ति जाति ईशोपनिषद् । है॥५॥ (अप्रचेता ) दुष्टयुद्धियुक्त दान न देनेवाला मनुष्य (अमोघ विन्दते ) अन्नको व्यर्थ प्राप्त करता है। मैं सत्य कह- ताकि वह उसका बधही हे। जोश्रेष्टमनचालेका पोषण नहीं रता और मित्रकी सहायता नहीं करता, यह (केवल-आदी) कपल स्वय खाने वाला (फेवल-अघा) केवल पापरूप बनता है॥६॥ इस सूक्में दानका महत्त्व वर्णन किया है। इससे अधिक दानका महर पताना अशक्य है। पूर्वोद पट मंत्र कहता है कि दान न देने वाला और अपने लिये ही भोग करनेवाला पापी होता है। इस पापसे पचो के लिये ही ईशोपनिषद् के भत्रम त्यत्तेन भुजी था । अर्थात 'दात करके भोग कर ' ऐसा कहा है। मनुष्य के अन्दरका दाम भाव मनुष्यको कर्मशक्तिको सन्मार्गसे चलाता है। दान भाव मनमैग रहा तो मनुष्यका राक्षस पन जाता है। मनुष्यश देव धननेक लिये मनुष्य को दान माघ अपने अन्दर बढ़ाना चाहिये । आगे द्वितीय मनमें सकर्मका उपदेश इंग्ला है, उसके लिये अन्त करणको आवश्यक तयारी परनेके रियरस मममें दानसे भोग करनेकी आशा दीगई है। (मा गृध)ोन में फर, (रपरिबचन ) किसका भला धन है ये पाक्यमी मनुष्य कालोम धनपर न रहे, मनुष्य दान देनेपाला पने, इस भाषके ही सूचर है। इस प्रकार प्रथम मत्रकी अन्य मोके साथ तुलना परने पश्चात् द्वितीय मका विचार करते है- मंत्र २ द्वितीय मनका उपदेश यह है कि "मनुप कर्म करते हुए सी वर्ष जीने की सजा परे, उन्नतिका यही एक मार्ग है दूसरा नहीं। मनुष्यको सकर्मका लेप नहीं रगता" मनुप्पको कर्म भरने तुलनात्मक विचार। १४१ । लिये क्यों उपदेश किया है? इसके कारणका विचार करनेसे पता लगता है कि कम करना इसका स्वभाव ही है। मनुष्य प्रयत्न करे या न करे, इच्छासे करे अथवा अनिच्छासे करे, इससे फर्म होने ही हैं। इसी लिये इसको सत्कर्म करने का उपदेश किया है। कर्म करना इसका स्वभावही होने के कारण इसके प्रयत्नसे शुभ कर्मही हो और अशुभ कर्म न हो, इस बात के लिये प्रयत्न होने चाहिये। अन्यथा अशुभ कर्म होंगे और अवनति होगी। मनुष्यका स्वभाव कर्म करने का न होता, तो उसको यह उपदेश देनेकी आवश्यकता हीन होती। जिस प्रकार कोई एक यंत्र गति उत्पन्न कर रहा है और यह कभी स्थिर रहने वाला नहीं है। तो उसके मालिकको उचित है कि वह उसकी गतिका उपयोग शुभ कार्यमें ही करनेका यत्न करे। इसी प्रकार यहां है। मनुष्य आत्मा, बुद्धि, मन, वाणी, अन्य इंद्रियां और शरीर आदि साधनोंसे प्रतिक्षण कुछ न कुछ कर्म करता ही रहता है और कर्म-हीन नहीं रहता। ऐसी अवस्था में इसकी कर्म शक्तिसे सत्कर्म ही हो और कुकर्म न हो,इस विषयमें सावधानीसे प्रयत्न होने चाहिये । इसी कार्यके लिये संपूर्ण यजुर्पदफा उपदेश है। इसी ईश उपनिषदमै मनुष्यफा नाम "कतु " कहा है। ऋतुका अर्थ कर्म है। मनुष्य स्वयं कर्मरूप है, यह बात इस शन्दने बतादी है। इसकी आयु १०० वर्षकी है, और प्रत्येक वर्ष एक एक ऋतुके लिये है, इसप्रकार मनुष्य अपनी पूर्ण आयु में १०० ऋतु कर सकता है, इस लिये इसी मनुष्यको "शत ऋतु " कहते हैं । सौ वर्ष ल- कर्म करने में व्यतीत करने की उच्च कल्पना यहां कही है। आयुका कोईभी भाग कुकर्ममै व्यर्थ खर्च नहीं होना चाहिये, यह सूचना यहां मिलती है। इस विषयमें निम्न लिखित वेदमंत्र देखने योग्य हैं- या प्रथमः कर्मकृत्याय जातः । अथर्व ४।२४६ । .
ईशोपनिषद्। " देवस्य सवित: सबै कर्म कृण्वन्तु मोनुपाः ॥ अ० ६॥२३॥३ पहिला यह कर्म करने के लिये ही हुआ है। सूर्य देषका उदय होते ही सब मनुष्य कर्म करने का प्रारंभ करें।" इत्यादि सामान्य आनाएं मनुष्यको फर्मको प्रेरणा करने के लिये ही दी है। इसी भ. कार अपने मय अंगों और अवयवोंको उत्तम सत्कार्यमें लगाने की प्रतिक्षा निम्न लिखित मंत्री है वह यहां देखने योग्य है-. भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनभिव्यशेमहि देवहितं यदायुः ।। घा० यजु०२५/२१ हम कानोसे उत्तम वचन सुनेंगे, आंखोसे उत्तम पदार्थ देखें- गे, और जबतक आयु रहेगी, तयनफस्थिर अंगोंसे देवोंका हित करेंगे।" अर्थात् हरएक अवयव से शुभ कर्म ही करेंगे और कभी अशुभ कर्म नहीं करेंगे। यह वैदिक प्रतिज्ञा कर्मका विचार करने फ समय मनन करने योग्य है। इस प्रतिमाका पालन होनेसे मनुष्यका सुधार निःसन्देह होगा इसमें सन्देह नहीं है, क्योंकि इसमें हरपक अपयवासे उत्तम शुभ कर्म कराने का दृढ़ संकप व्यक्त किया है। मंत्र ३ । शीसरे मंधने "अन्धतमसे व्याप्त असुर्य लोकमे आत्मघातकी लोक जाते है " ऐसा कहा है। यहां असुर्य लोकका विचार करने के समय निम्नलिखित उपनिषद्धचन सबसे प्रथम देखना चाहिये- अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । तास्त प्रेत्याभिगञ्छन्ति अविद्वांसोऽयुधा जनाः ॥ वृद० उ० घाटा जहां आनन्द नहीं है ऐसे लोक अन्धतमले उन तुलनात्मक विचार। । लोकोंमें अविद्वान् और अज्ञानी लोग जाते हैं।" इस उपनिपद्वचन में "असुर्या नाम " के स्थानपर " अनन्दा नाम" शब्द है और 'आत्महनो जनाः" के स्थानपर "अविद्वांसोऽयुधा जनाः ये शब्द हैं। इन शब्दोसे स्पष्ट हो जाता है कि आत्मघातकी लोग'घेही है कि जो 'अविद्वान और अज्ञानी' होते हैं। और असुर्य लोक ' ये है कि जो 'आनन्द रहित है और जहां फेवल कट और दुःख है। उपनिषद्वचनों की तुलना करनेसे इस प्रकार अर्थ खुल जाता है। अब हम वेद मंत्रों के प्रमाणसे 'असुर्य' शब्दका अर्थ निश्चित करते हैं । असर्य शब्दके विषय में इससे पूर्व मंत्रकी टिप्पणीमें और उसके विवरणके प्रसंग में बहुत कुछ लिखा गया है, अब यहां वेद मंत्रोमें असुर और असुर्य' ये शब्द किस अर्थ में आये हैं इसका विचार करना है। इसलिए अग्वेद के एक दो मंत्र देखिये हिरण्यहस्ती असुरः सुनीथः सुमलीफा स्वयां यात्वर्याछ । अपसेधरक्षसी यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदीयं गृणानः ॥ ऋ० १॥३५॥१० "सुवर्णके आभूषण हाथमें धारण करनेवाला, उत्तम नेता, उत्तम स्तुति करने योग्य, आस्मिक बलसे युक्त (अस+रः) जी- चन देनेवाला देघ (अर्वाड यातु) हमारे पास आ जाये । (र- क्षसः अपसेधन ) राक्षसों का नाश करता हुआ और यातुधानो- को दूर करता हुआ, प्रतिदिन स्तुतिको ग्रहण करता हुआ यह देव है।" इस मंत्रमें राक्षसोंका नाश करनेवाला देव । असुर शब्दसे यहां वर्णित हुआ हुआ है। इससे सिद्ध है कि यह असुर शब्द परमेश्वरका यहां पाचक है। तथा और देखिये-- त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असर ये च मर्ताः॥ मा०२२७१01 " ।
१४४ ईशोपनिषद् । "हे असुर परुण ! जो देव है और जो मय है उन सबका तू राजा है।" इस मंत्र में देवोंके ज्येष्ठ देवका नाम असुर कहा है। इस प्रकार असुरसाद परमात्माका पाचक है क्यों कि यही प्राणशक्ति- का देनेवाला है, यही हमें जीवन देता है। इस असुर देवका अ- र्थात् परमात्माका जो सामर्थ्य है वह असुर्य है। अब इस असुर्यक प्रयोग मंयोमेखिये- धारयन्त आदित्यासी जगरस्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः । दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमानामानि । ऋ०२।२७४ 'सप भुवनोंके रक्षक और जगतमें रहनेपाले आदित्य देव इस (असुर्य)माणों के पलको रक्षण करते हुए धारण करते हैं। इस मंत्रम परमात्माफे इस असुर्य बलका धारण जगद्रक्षक आदि. स्यदेव करते हैं, पेसा कहा है । और देखिये- शानादस्य भुवनस्य भूरे या उ योपद द्रादसुर्यम् । ०२१३३१९ "यह भुयनों का स्वामी श्वर है, इसकी (असुर्य) शक्ति इससे कोईमी डीन नहीं सकता अर्थात् पद परमात्माकी निजशक्तिही- मेस उसके पास सदा रहती है और यह इस शक्तिस सपको जी- पन प्रदान करता है। अब स्वयं परमात्मा कहता है- आई राजा पक्षणो मां तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त । ०४ारा२ मैं राजा परण हूं मेरे लिये ही ये असुर्य पल सपसे पहिले धारा किये गये थे।" अर्थात् ये सप पल परमात्मा ही हैं और उनको सप अन्य देष धारण करते है और उस माणके पलसे यलयान होते हैं। तथा और देखिये- M तुलनात्मक विचार। सत्रा घाजानाममवो विभका यहेवेष धारयथा असुर्यम् ॥ ऋ०६३६१ यह ईश्वर अन धन अथवा बल सबको देता है और सूर्यादि देवों के अन्दर अपना यल धारण करता है। इस मंत्रमें कहा है कि परमेश्वर अपना दल संपूर्ण देवामे स्थापन करता है, अर्थात् इस बलसे सब देव बलवान होते हुए अपना कार्य करनेमें समर्थ हुए हैं। सूर्यके अन्दर वही पल प्रकाशके रूपसे दिखाई देता है । चायुमें गति, और अग्निमें दाहकता आदि गुण उसीके हैं, इसी प्रकार अन्यान्य देवों में अन्यान्य शक्तियां उसी के कारण दिखाई देती हैं। इसीकारण कहा है कि- महा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम् । ऋ० ८.१०१।१२ "संपूर्ण देवोका यह मुखिया है, इसका कारण यह है कि इसमें (अनुयः) जीवन देनेकी शक्ति है और इसमें (महा) महत्व भी विशेष है और इसके अन्दर न दयनेवाला व्यापक तेज है।" इसमें भी संपूर्ण देषोंका मुखिया यह असुर्य शक्तिवाला परमेश्वर है ऐसा स्पष्ट कहा है। अर्थात् परमेश्वरको विशाल सत्ता इस असुर्य शक्तिके कारणही सबफे ऊपर हुई हुई है। अन्य देवोंमें असुर्य शक्ति नहीं है और केवल इस परमेश्वरमें ही वह शक्ति है, इस कारण परमेश्वरका प्रभुत्व सबके ऊपर हुआ हुआ है। ये मसुर्य पल कितने प्रकारके हैं इस विषयमें निम्न लिखित मंत्र अवश्य देखने योग्य है- चत्वारि ते असुर्याणि नामादाभ्यानि महिपस्य सन्ति । त्वमंग तानि विश्वानि विसे येमिःकर्माणि मघवञ्चकर्थ ॥ ऋ० १०॥५४॥४ "तेरे न बनेवाले चार असुर्य बल है जिससे विविध कर्म त् इंशोपनिषद् । १ करता है | " इस विरकी यह अदम्य शक्ति है इसलिये ही इस जगत के अन्दर चलनेवाले अनंत कर्म वह कर सकता है। और इसी कारण यह सपने धेष्ठ है। " असूर्य' शब्द जिन मंत्रोमें प्रयुक्त हुआ हुआ है ऐसे मंत्र अनेक है, उनमेंसे कुछ मंत्र यहां दिये है।इनको देखने से पाठकों को पता लग जायगा कि 'असुर्य' शब्दका अर्थ जीवन शक्ति देने वाले ईश्वरका अदम्य घल ' ऐसा है । घेदमें इस असुर्य शब्दका दूसरा अर्थ नहीं है। ईशोपनिषदके इस तृतीय मंत्री जो 'असुर्य लोक शब्द है उसमें यह अर्थ स्वीकृत किया जाय तो."जीवन शकिसे युक्त लोक ' ऐसा अर्थ उस शब्दका बनेगा। जीवन शक्तिसे युक्त तो सपही लोक हैं, सब प्राणी तो हैं ही, विशेषतः सष मनुष्य इस जीवन शक्तिसे युक्त हैं। अन्योंका विचार हम यहां छोड़ देते हैं। और केवल मनुष्योंका ही विचार करते हैं। संघ मनुष्य यदि इस असुर्य शक्तिसे युक है तो उनमें भले और पुरे सभी लोक आगये, यह स्पटही है। जिस प्रकार यह असुर्य पल सज्जनोम है उसी प्रकार दुर्जनों में भी है । यह पढकर पाठक आब्धर्यसे चकित होंगे। परन्तु इतना आश्चर्य करने का कारण नहीं है, क्योंकि यह (असु-र्य) प्राणोका बल जैसा सज्जनोंके शरीरों में कार्य कर रहा है उसी प्रकार दुर्जनोफे शरीरोमें भी कार्य कर रहा है। क्या सज्जनोंके शरीरमें ही प्राणशक्ति है और दुर्जनोंके शरीरमें नहीं है? यह कोई नहीं कह सकता। प्राणिमात्र अदम्य प्राणशक्ति है। यह प्राण- शक्ति मारमाको दी शक्ति है । असु शब्दमाणघाचक है। 'असु-र' शन्द प्राणशक्ति देनेघाले आत्माका पाचक, और असुर्य शन्द उसके अदम्य पर का वाचक है। इससे स्पष्ट विदित होगा कि आत्माको असुर्य शक्ति प्राणिमात्रमें है। यह शक्ति सज्जन और दुर्जनमें समानतया व्याप्त है। दोनों स्थानोंपर यह कार्य कररही है।
तुलनात्मक विचार । ऋग्वेदादि चारों वेदो, 'असुर्य' शब्दका यही अर्थ है और दूसरा कोई अर्थ नहीं है। ऐसी अवस्थामै यजुर्घदफे ईशोपनिषद् (अ०४०) में आये हुए 'असुर्य' शब्दका भिन्न अर्थ मानना कठीन है । वेदमें किसी एक स्थानपर आये 'असुर्य' शब्दका भी भिन्न अर्थ होता, तो ईशोपनिषद् के 'असुर्य' शब्दका अर्थ भी मिन्न मानना संभव होता, परंतु वेदक असुर्य शब्दयाले संपूर्ण मंत्र हमने देखे हैं। उनमें पककामी अर्थ इससे भिन्न नहीं है, इस लिये ईशोपनिषद्के इस 'असुर्य' शब्दका अर्थ आत्माकी जीवन- शकि' ऐसा ही मानना उचित है । यह अर्थ लेनेपरमी बुरे और भले लोकोंकी व्यवस्था उत्तम प्रकार होजाती है, 'अन्धतमसे ज्यात असुर्य लोक" और "आत्म- प्रकाशसे प्रकाशित असुर्य लोक" पेसे दो भेद, इसके माननेसे इस शब्दका ठीक अर्थ ध्यानमें आ सकता है। इस विषय में अधिक विवेचन पूर्व स्थानमें लिखा ही गया है। इसलिए अब इसका अधिक विचार करने की अवश्यकता नहीं है। . - । मंत्र ४ " घह आत्मा एक, अद्वितीय, सयमें पूर्व, स्थिर, अत्यंत घेग- घान्, शानी और मनसेभी वेगवान है। यह गतिवाले अन्य पदा- थोके भी आगे पंहुचता है और उसीके आधारसे माताके गर्भमें आनेवाला जीव काँका धारण करता है। इस मंत्रमें जो आत्माके गुण वर्णन किये हैं ये सप प्रसिद्ध है और उपनिषदादि सब ग्रंथोंमें वे आगये हैं, इसलिये उनके विषय में अधिक लिसनेको आवश्यकता नहीं है । तथापि इस आत्मा एक होने के विषयमें यहां कुछ लिखना आवश्यक है- प्रथम मंत्रों "ईश" शब्द एकवचनान्त है, इसलिये ईश एकही S
इंशोपनिषद् ।
184
है यह बात सिद्ध होती है, तथापि अधिक स्पष्ट करने के लिये यहां
इस मंत्रमें 'ए'शम्द रख कर उमी चातका अधिक स्पष्टीकरण
किया है, इसके साथ निम्न लिखित मंत्र देखिये-
न द्वितीयो न तुतीयश्चतुर्यों नाप्युच्यते ॥
न पञ्चमो न पष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते ॥
नाएमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते ॥
तदिदं नगतं सहः स पप एक एकदेक एच ।।
अथर्य. १३२
यह ईश्वर दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचमा, छटा, सातमा,
माठमा, नवमा, दसमा नहीं कहा जा सकता, यह षडा भारी
बलशाली है, यह एकही है, एकही सर्वत्र घेरनेवाला, केवल
"
ईश्वरके एक होनेके विषय में कितना घल इस मंत्रमें दिया गया
है। उसका अवलोकन पाठक करें। ईश्वरके निःसंदेह एक होने के
विषयमें इस मंत्रको देखने के पश्चात कोई संदेह नहीं रह सकता।
तथापि उपनिषदोंके कुछ धचन यहां देखिये--
आरमा था इदमेक पर अग्न आसीत् । ऐ० उ० १११
कत्येष देवा" एक एव ॥ पृ० उ० ३।२।१
एको देधः सर्व भूतेषु गूढः ॥ श्वे० उ०६१
पकस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो पश्चि ।
फठ०५१०११
"प्रारंभमैं पकही आत्मा या ॥ कितने देव हैं? "केवल एकही
देव है । पक देव सब भूतोमें व्याप्त और गुप्त है ॥ सब भूतोका
अन्तरात्मा एकही है, यह प्रत्येक रूपके अंदर है और बाहर भी
॥
इन सप उपनिषद्वचनोंमें भी परमात्माके एक दोनेके विषय में
तुलनात्मक विचार १४९ । स्पष्ट शब्दोद्वारा कहा हुआ है। यह सब इसीलिये कहा गया है किजिससे ईश्वरके एक होनेके विषयमें किसीको थोडासा भी संदेह न रहे। सय एकही ईश्वरको माने और उसीकी उपासना करके उन्नतिका सानघ करें। इसी चतुर्थ मंत्रमें 'मातरि-भ्या' शब्द है। 'माताके अन्दर रहनेवाला' यह इसका अर्थ है। पूर्व देह जिसका छूट गया है और जिसका नया देह पन रहा है, यह जीवारमा माताके गर्भमें रहता है, यह पात सब जानते ही हैं। यही अर्थ यहां अपेक्षित है। द्वितीय मंत्रमें "सौ वर्षतफ प्रशस्त फर्म करो" ऐसा उपदेश है। इस उपदेशानुसार किसीने कर्म किये, परंतु अन्तिम समयके क- मौका फल प्राप्त होने के पूर्वही उसका देहान्त होगया, तोघे किये हुए कर्म कहां जाएंगे। इस शंकाका निराकरण करने के लिये, इस मंत्र में कहा है कि माताके गर्भ में रहनेवाला जीव भी संस्कार रूपसे कर्माका धारण करता है।' अर्थात् किये हुए फर्म विफल नहीं होते हैं, परन्तु हरएक किये हुए पुरे भले काँका बुरा भला भोग अवश्य मिलता है। वेदने यह बडी भारी महत्त्वकी बात यहां कही है। इसको जान कर पाठक उत्तम कर्म करें और स्मरण रखें कि अपना किया हुआ कर्म कमी व्यर्थ नहीं जाता। इस मंत्रमें 'मातरि-वा' शब्द विशेष महत्वका है इसलिये इस शब्दका आशय प्रकट करनेवाले कुछ मंत्र यहां देते हैं- इन्द्र मित्रं वरणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ।। ३०१०१६४।४६ अ०९।१५।२८ " एकही आत्माके इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सुपर्ण, गरुत्मान् , यम, मातरिश्या ये नाम हैं।" इनमें "सुपर्ण" शब्द है जो जीवात्मा परमात्माका वाचक प्रसिद्ध है द्वा सुपर्णा सयुजा १५० इंसांपनिरन् । " सखाया - इस मंत्री सुपर्ण सद जीवात्माकामी याचक है।न्द्र शम्द परमात्माका याचक्षसमें क्षितीको संदेह नहीं है। यह इन्द्रशद जोपामाकामी पाचक है और इसीसे 'इन्द्रिय' शरद 'इन्दशक्तिका' पावक बनता है। यदि इन्द्रियमें इनकी शक्ति है तो निःसंदेहन्द्रियके पोछे इन्द्र स्वयं है और यहन्द्र जीपारमाही है। इसी प्रकार 'मातरिश्मा' शब्दभी जीयामाका पाचक है। जिसके बाचक सुपर्ण, गमरमान् , इन्द्र ' ये शब्द हैं, उसीका या चक 'मातरिया' शब्द है यह ऊपर दिये हुए मंगसे सिद्ध होता है. यह पात इस मंत्रका विचार करनयालेको बहकी कोई आव- श्यकतानहीं है। पाठक यहां मातरिश्वा'शाहजीवात्माका गायक होने का अनुमान करें। और देखिये- माणमाहुर्मातरिभ्वानं चातो प्राण उच्यते ॥ अथर्व०१३६२५ "माणको मातरिश्या कहते हैं और इस बायको पापभी कहते है।" इस मंत्र में प्राणका नाम मातरिश्वा कहा है। प्राणभी जीवा- रमाको सहचारिणी जीवन शकि है। इन दोनों विषयका वर्णन निम्न लिखित में देखिये- मातरिश्वा गुहा सन्तं हन्यवाई समीय । क्र. ३१५१० यह मातरिश्या पुद्धिके अंदर रहनेवाला प्रत्यक्ष अग्नि ही है।" हमारी गुहाम अर्थात् यद्धि अथवा हृदयके अन्दर रहने पला अग्नि यहा आत्माही है। यह मंत्रमी इस मातरिश्वा शादका अर्थ जीवात्मा है यही बात सिद्ध करता है। और देखिये- प्रतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वादिशः पवते मातरिश्वा । स०१३।३.१९ "सत्यके तन्तुको मनसे मापने वाला मातरिश्वा सय दिशाओं. को पवित्र करता है या चलाता है।" यहां सत्यके तन्तुका अर्थ 14 ..
तुलनात्मक विचार। 4 . ' - परमारमा' है, जिसको सूत्रात्मा भी कहते हैं । इस सूत्रारमाको जीवात्माही अपने मनसे देखता है और स्वयं पवित्र होकर सब दिशाओंको भी पवित्र करता है। इसके विषयम और एक मंत्र देखिय- तन्नपादुच्यते गर्भ आसुरो नराशंसो भवति यद्विजायते । मातरिश्वा यदमिमीत मातरि वातस्य सगों अभवत्सरीमणि । २०३।२९।११ (तन्-न-पात् ) शरीरको न गिरानेवाला (मातरि-श्वा) माताके गर्भ रहनेवाला जीवात्मा ही (गर्भ: उच्यते) गर्भ है सा कहा जाता है । यही (असु-रः) असु नामक जीवनशक्ति देनेवाला है, उस समय (नर-आशंसः) सप लोक इसीकी प्रशं. सा करते हैं ( यत् विजायते ) जब यह उत्पन्न होता है। इस मंत्रभागमें इस मातरिश्वाका नाम 'तनु-न-पात् है। शरीरको न गिरानेवाला' यह इसका अर्थ है । जबतक शा रीरमें यह रहता है तबतक यह शरीर गिरता नहीं, और जब यह इस शरीरको छोड़ देता है तब यह शरीर ऐसा गिर जाता है कि फिर उठ नहीं सकता। यह सब वर्णन देखनेले मातरिश्वा शब्द जीवात्माका वाचक स्पष्ट प्रतीत होता है । इसके अन्य अर्थ बहुत है, परंतु ईशोपनिषदों मातरिश्या पद माताके गर्भ स्थित जीवा. स्माका वाचक प्रतीत होता है। पाठक इन मंत्रोंका विचार इस मंत्रके साथ करें और मारमाके गुण जानकर उनसे सचित होन- वाला आत्मोन्नतिका मार्ग आक्रमण करनेका यत्न करें। मंत्र ५ से ७ आरमा समीप और दूर, अन्दर और बाहर सर्वत्र है । (५) जो सब भूतोको आत्मा और आत्माको सब भूतोंमें देखता है कहा ' १५२ इशोपनिषद् । " यह किसीका तिरस्कार नहीं करता । (६)जिस समय आत्माही सप भूत प्रतीत होने लगा उस समय सर्वत्र पंफरव देखनेवालेको शोक और मोह नहीं होते। (७) "यह इन तीन मंत्रीका माब है। में आत्मा शब्द महत्वपूर्ण है । इस आरमाके गुणोंका विचार वैदिक मंत्रोंसे अब करते है। देयो न यः सविता सत्यमन्मा करवा मिपाति बजनानि विश्वा। पुरुप्रशस्तो अमतिन सत्य आत्मेव शवो दिधिषाय्योऽभूत् ।। स. १७३३२ 'जो सत्यविचारवाला सविता देव है यह अपनी फर्मशकि द्वारा संपूर्ण दुष्कृत्योंसे रक्षा करता है। यह अत्यंत प्रशंसनीय सत्य. निष्ठ देव आरमाके समान ही सेवनीय है। इस मंत्रमें कहा है कि जिस प्रकार आरमा सेवनीय है, उसी प्रकार सविता देव भी है । अर्थात् आत्माको परिचर्या अवश्यही करनी चाहिये। कई लोग बाह्य पदार्थोकी सेवा करते हैं, कई अपने शरीरकी, और कई लोग अपने रंदिगोको सेवाम रमते हैं। कई अपनी घुद्धीकी वृद्धि करते हैं और कई अपने मनकी तकना शक्ति बढाते हैं। इतने सय प्रयत्न करते हुए भी लोग अपने आत्माकी उतनी सेवा नहीं करते, कि जितनी आत्मासे भिन्न अन्य पदाथोकी किया करते हैं। यह षडा भारी आधर्य है। इसलिये इस मंत्रमें सूचित किया है कि आत्माही प्रथम उपास्य और सेवनीय अथवा संभजनीय है। इसलिये कहा है-- आरमा यशस्य पूर्यः । ३० ९।२।१० "आरमादी यज्ञमें सबसे पूर्व उपास्य है। इसका अर्थ यह है कि आरमा सुधार करने का विचार मनु प्यको सबसे प्रथम कर- नी चाहिए, और उससे भिन्न अन्य पदार्थो का सुधार करने का विधार उसके पश्चात् करना चाहिये । प्रायः लोग बाह्य पदार्थोके तुलनात्मक विचार । . सुधारका यन करते हैं, पर आमसुधारको ओर कम ख्याल फ. रते हैं । इस कारण मनुष्यको उन्नति जितनी होनी चाहिये उतनी नहीं होती। पाठक इसका विचार करेंगे तो उनको अपने सुधार के कार्यमें बहुत घोध प्राप्त हो सकता है। यह आत्मा सब देयो- कामी आत्मा है इस विषयमें निम्न लिखित मंत्र देखिये- आरमा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव पपः। घोपा इदस्य शृविरेन पं०॥ ऋ० १०१६८१४ यह देवोंका आत्मा, भुवनोंका गर्भ है। यह अपनी इच्छाके अनुरूप चलता है। इसका रूप नहीं दिखाई देता है फेवल इसका घोष सुनाई देता है।" इस मंत्रमें वायुफे वर्णनसे आत्माका य. न किया है । जिस प्रकार वायु का शब्द सुनाई देता है परंतु रूप नहीं दीखता, उसी प्रकार आत्माका रूप नहीं दीखता, परंतु उसके कार्य दिखाई देते हैं। यह सबमें रहकर सपको प्रेरणा देने चाला एक आत्मदेव सब देवोंकामी आत्मा है। शरीर में सब इंदि. यगण देवताओंके अंश हैं, उनको जीवन देनेवाला यह आत्मा है, और इन सब इंद्रियोंकी उत्पत्ति करनेवाला किंवा अपनी शक्तिको विविध इंद्रियों में विविध कार्य करने की योग्य स्थिति में रखनेवाला यह आत्मा है। पाठकोंको चाहिये किये अपने आत्माकी यह शक्ति अपने अंदर अनुभव करें और 'मैं आत्मा हूं' ऐसा समझकर, मैं अपनी शक्ति जिस इंद्रियमें चाहे रखंगा और जिसमें से चाहे वाप- स लेलंगा ऐसा निश्चय करके अपनी शक्तिपर इस प्रकारकाप्रमुख संपावन करें। जो आत्माकी शक्ति जिधर मरजी उधर भटक रही है उस शक्तिको अपनी इच्छानुसार सत्कर्ममें लगानेका नाम संयम है। यह इस अनुष्ठानसे साध्य हो सकता है। मैं इस संयम शकि से कदापि दूर न होऊ ऐसा संकल्प करने की सूचना निम्न लि- खित मंध देरहा है, उसको अप देखिये- , ईशोपनिन्द। F - माहं प्राणेन मारमना मा प्रजया प्रतिगृह विराधिषि । अथर्व० ३२९८ 'मैं आत्मा, प्राण और प्रजा इन शक्तियोंसे अलग न होऊं।" अर्थात् मेरे पास ये शक्तियां उत्तम अवस्था रहें और मेरी उन्नतिकी साधनामें इनसे सहायता प्राप्त हो। कभी ऐसा न हो कि अल्प आयुमें प्राण चला जाये, प्रजा नष्ट हो जाये और आत्मामी हीन प्रल होकर गिर जाने । कमी इस प्रकारकी संभवना उत्पन्न न होने पाये। मनुष्यको प्रयत्न करके आत्मिक, प्राणसंबंधी और सुप्रजानिर्माण विषयक पल अपने अंदर स्थिर और स्वाधीन करना चाहिये। केपल पल यदनेसे कार्य नहीं होगा परंतु उस घलपर अपना प्र. भुत्व होना चाहिये । इस प्रकार अपनी शाकि पढ़ते बढते सर्वात्म- भाव की स्थिति प्रास होती है जिसका वर्णन निम्न लिखित मंत्र में पाठक देखें- सूर्यो मे चक्षुर्वात प्राणोऽन्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरं । अस्तृतो नामाऽहमयमस्मि स आरमानं निदधे धापा- पृथिवीभ्यां गोपीचाय "सूर्य मेरा चक्षु है, वायु मेरा प्राण है, पृथिवी मेरा शरीर है और अन्तरिक्ष मेरा आत्मा है। मैं (अ-स्तृतः) कभी न मरने घाला हो ऐसा मैं अपने आपको द्यावापृथिवी द्वारा सुरक्षित होने के लिये समर्पित करता हूं।" परमात्मामें अपने आत्माको लीन करनेसे अपने अन्दर सर्वात्मभाव आजाता है। इस अवस्था में यह ज्ञानी अपने आरमाको सर्वात्मरूप देसता है। उस समय यह कह ता है कि मेरी आँख सूर्य है और पृथ्वी शरीर है तथा वायु प्रण है । अपने प्राकृतिक अनुभवकी दशामें भी यह सत्य है। क्योंकि सूर्यके विना हमारे नेत्र क्या कर सकते हैं? हमारे नेत्र देखते है तो ये सूर्यकी सहायतासे ही देखते हैं । इसी प्रकार हमारा शरीर अथर्व० ५।९।७ । ।
तुलनात्मक विचार। भी पार्थिव ही है । यह तो स्थूल अर्थमें सत्यही है। परंतु यहां सर्वात्मभावकी दृष्टि से कहा है। सर्यात्मभावकी दृष्टिसे ही जब जीवात्मा परमात्मामें लीन होता है तब वह साधक अपने आपको अपने शरीरसे भिन और महान समात्माले संयुक्त अनुभव करता है । इस समय इसका रक्षण इसके मातापिता नहीं करते प्रत्युत जगत्के मातापिता द्यावापृथिवी उसके रक्षक बनते हैं । यह भी अपने आपको उनके सन्मुख रख देता है और उनसे सुरक्षित होता हुआ अपने आपको अमर अनुभव करता है। इसी समय साधक का भाग्य खुल जाता है और उसमें दिव्य शक्तिका आवि. र्भाव होजाता है। दूसरोके दुःख दूर करने के लिये उनके दुःखोको अपने सिरपर लेता है और अपना सुख दूसरों की शांति बढाने के लिये उनके लिये अर्पण करता है तथा अपने अन्दर सुखदुःखोको सम देख कर सुखदुःख आनेपर हर्षशोक नहीं करता। इस प्रकार इस सर्वात्मभाव की सिद्धि है। यह आत्मा अमर है और शरीर नाशवंत है, ऐसा मानने शरीरको किसीसमय आमा छोडता है और पुनः धारण करता है, यह यात स्वयं सिद्ध होती है। इसीलिये साधक आत्मा ऐसी प्रार्थना करता है- पुनः प्राणः पुनरात्मा न एतु पनश्चक्षुः पुनरसुन एतु । वैश्वानरो अदधस्तनपा अन्तस्तिष्ठाति दुरितानि विश्वा । । अथर्व० ६५३१२ पुनरिवन्द्रियं पुनरात्मा ॥ अथर्व ७६१ "मेरी चक्षुः प्राण और आत्मा मुझे पुनः प्राप्त हो, सब इंद्रिय मुझे पुनः प्राप्त होन दयनेवाला, शरीररक्षक, विश्वका नेता, आत्मा मेरे अन्दर है।" इत्यादि मंत्र इंद्रियादियों को पुनः पुनः प्राप्ति होती है, इस पातको बता रहे है। इंद्रियादियोंकी पुनः पुनः १५६ ईशोपनिषद्। प्राप्ति होने का अर्थ पुनर्जन्मका होनाही है। जिस प्रकार इस जन्म में सय इंद्रियादिक यथायोग्य है उसी प्रकार अगले जन्ममें प्रास हो और मैं उनकी सहायतासे उन्नतिको प्राप्त करूं। यह आशय इल प्रार्थना का है। इस रीतिसे पुनर्जन्ममें वह चलता रहता है । इस मृत्युभयसे दूर होने का उपाय है या नहीं, अथवा जन्ममृत्युका दुःख इसको अखंड ही भोगते रहना चाहिये ? इस संकाका निरसन यह मंत्र फरता है- अकामो धारो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्च नो नः। तमेव विद्वान बिमाय मृत्योरारमानं धीरमजरं युपानम् ।। अथर्व० १०८४४ परमात्मा आप्तकाम, सदातृप्त, धीर, अमर, स्वयंम्, सर्वत्र व्याप्त, अजर, युवा और धीर है। उसको जान से मृत्युफा भय नहीं होता।" यह मत्युफे डरको हटानेका उपाय है। सर्यात्मभावसे युक्त पनने का अर्थ इन गुणों से युक्त बनना है। स्वयं तृप्त, संतुष्ट, निकाम, निर्भय और तरुण जैसे उत्साही बनने और अन्यान्य गुण अपने आत्माम बढ़ाने से यह निर्भय वृत्ति अपने स्थिर हो जाती है। एक बार यह भाव अपने में घढ गया तो फिर मृत्युका भय उसको नहीं रहता। इस प्रकार इन मंत्रों का मनन पाठक ईशोपनिषद्फे ५से७ तक के तीनों मंत्रों के साथ करें और आत्मोनतिके वैदिक मार्गको जानकर स्वयं अपने प्रयत्नसे अपनी उन्नति करें। शोपनिषद्के शेप मंत्रों का माव स्पष्ट है और उस कारण अन्य मंत्रोंसे तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहां ईशोपनिषद् के मंत्रोंका तुलनात्मक विचार समाप्त हुआ।
ईशोपनिषद्का रूपान्तर।
१५७
ईशोपनिषद्का रूपान्तर
श्रीमद्भागवतमें
ईशोप०
श्लोकांक
१ आरमावास्यमिदं विश्व यत्किय जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥
श्री० भागवत
६ सर्व भूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः ।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ।।
श्री० भागवत १९१२१४५
६ आत्मानं सर्व भतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।
अपश्यत्सर्वभूतानि भगवत्यपि वात्मनि ।
श्री भागवत ३२४४६
७ यदा तु सर्वभूतेषु दास्वग्निमिय स्थितम् ।
प्रतिवक्षति मां लोको जह्यातहोव कश्मलम् ॥
श्री० भागवत० ३११/३२
महाभारतमें
६ स्वयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चासि धै।
गुणानां हि प्रधानानामेकरवं त्वयि तिष्ठति ।
म० भारत सौतिकपर्व ५८
[इस प्रकार इतिहास और पुराणों के ग्रंथोंमें ईशोपनिषद्का
सपान्तर है। विद्वान पाठकों को उचित है कि इसकी अधिक
खोज करें और रूपान्तरके श्लोक निकाल कर उनकी तुलना
ईशोपनिषद् के साथ करें और सवित घोध प्राप्त करें।
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विषयानुक्रमणिका। १५९ विषयानुक्रमणिका. ४ विषय पृष्ठ विषय यजुर्वेदकी संहितायें। ३ संभूति और असंभूति। ર अध्याय का नाम द्वैतवाद और अद्वैतवाद । ४८ इस सूक्तका देवता। মাহা। अनेक नामोसे पक ईशोपनिषद् । तत्वका वर्णन । एक मार्ग। ५४ इस अध्यायका ऋषि। १० यजुर्घेद संहिता-पाठः। प्रह्मदेव। ११ काण्व-संहिता-पाठः। ईश उपनिषद्का महत्व। १३ । ईशोपनिषद् का शांतिमंत्र । ६१ इस अभ्यायको रचना। १४ आत्मोन्नतिका माग । মায়া কান। १६ / आत्मघातका मार्ग। ६७ वेदांत के अध्ययनका आत्म-तत्वका वर्णन १० समबुद्धि। ७३ निष्काम कर्मयोग। २१ सर्वत्र आत्मबद्भाव। शन और कर्मके समुच्चयका परमात्माके गुणवर्णन। मुरय हेतु। २४ । मान-क्षेत्र। आत्म वाचकशब्द। २५ । कर्म-क्षेत्र। ૮૨ विशेष नामोंका परस्पर सत्यधर्मका दर्शन। संघध। २८ उपासना। ८९ आत्मज्ञानकी आवश्यकता।३५ आत्मपरीक्षण । विद्या और अविद्या। ३७ । प्रार्थना। . ८७ ईशोपनिषद्। पृष्ट विषय विषय परमेश्वरका नामसंकीर्तन ।९५ तीन मार्ग। प्रहण करने योग्य गेध। ९८ पिरोधका परिदार सूचना। १०४ असुर्य लोक। मनुष्यका साया १०५ लोक। साधन। १०५/घनका अपहार। कर्ममार्ग। १०६ अग्नि-देयता। आध्यात्मिक कार्यक्षेत्रा १०७/दत और अद्धत। १३३ आधिभौतिक कार्यक्षेत्र। १०८ मंत्रोका तुलनात्मक पिचार।१३५ आधिदैविक कार्यक्षेत्रा १०९दान। यह और अयज्ञ। १०९ मंत्र २ १४० कर्म, अकर्म और विकर्म । ११० मंत्र३। अमरत्व प्राप्तिका मार्ग। १४७ सत्यनिष्ठा सिंहावलोकन ११६ श्रीमद्भागवत में और घेदका आदेश ११७ महाभारतम शोपनिषद्के उपनिषद् का मायार्थ । १२० मंत्रोंका रूपान्तर १४२ १११ मंत्र। ११६ मंत्र ५ से। ५७