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Samkaleen Kahani Sandarbhon Ke Ghere Mein
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समकालीन कहानी सन्दर्भो के घेरे मे (मालोचना) दि दीपक पब्लिशर्स, माई होरा गेट, जालघर 144 008 समकालीन कहानी : सन्दर्भो के घेरे मे गीताली धर्मा
समकालीन कहानी सन्दर्भो के घेरे मे
(आलोचना)
गीताली वर्मा
प्रथम सस्करण
1990
प्रकाशक
दीपक पब्लिशज,
माई हीरा गट,
जालघर-144008
कम्पोजिंग
पलाहा कम्पोजिंग हाऊस,
एन० एच० 386, नीला महल, जालघर ।
मुद्रक
सटो प्रिंटज,
फगवाडा गेट, जाल घर ।
आवरण चित्र
सुखवत
मूल्य 40 रपय
SANDARBHOV KE GHERE MEIN
SAMKALEEN KAHANI
(Criticism)
Geetall Verma
First Edition 1990
Price
Rs 40
समपण
भाहित्यममज्ञ विदुषी ममतामयी मt
उपा निराला को
जिनका प्रकाश पुंज सदैव मुझे
प्ररणा देता रहेगा
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पूर्व आत्मकथ्य 'समकालीन कहानी सदों के घेरे मे' के रूप मे नयी कहानी को एक और सोपा न प्रदान करने का प्रयत्न किया गया है। इस प्रयत्न में कितनी सफलता मिली या यह प्रयत्न कितना साथक रहा, यह मेरे वश की बात नहीं है। इस पुस्तक को लिखना मेरे लिए सिफ लिखना ही नहीं था, बल्कि आधुनिक जीवन की पीडाओ को झेलते हुए व्यक्ति को सहभोक्ता भी बनना था, इसके जीवन को कही गहराई से, तमस से निकल कर एक नये उजास को देखने का अवमर मिले। इस पुस्तक को लिखने की अवधि में मुझ सामा य व्यक्ति की नजदीको प्राप्त करने का अवसर मिला और अमूल्य साहित्य का अध्ययन करने का भी, जो मेरे लिए अत्य त लाभकारी सिद्ध हुआ। मैं यह तो नही कहती कि यह पुस्तक हर दृष्टि से नवीनता लिय हुए है, लेकिन फिर भी नव्यता प्रदान करने का भरसक प्रयत्न किया गया है। समकालीन कहानी मे सदों के माध्यम से व्यक्ति की स्थिति को आकने का केवल प्रयत्न कर दिया गया है। इस पुस्तक को लिखते हुए मैंन सभी रूढिबद्ध औपचारिकताओ को तिलाजलि देते हुए किसी भी प्रकार के व्रम का पालन करन का प्रयत्न नहीं दिया और न ही किसी प्रकार के शोषका मे व्यक्ति और उसकी स्थितियो, विकृतियो को वाधन की चेष्टा की है। जिस प्रकार एक सामान्य व्यक्ति के जीवन मे जाने अनजान पडाव दर पडाव आते है चले जाते है, जिसका उसे गुमान भी नहीं होता और वह उह झेलन को तत्पर रहता है, वही इस पुस्तक के साथ हुआ। न कोई सिलसिला रहा और न कोई औपचारिकता। केवल आधुनिक परिवेश मे जीने वाले सामाय व्यक्ति की जिन्दगी का खुला दस्तावेज है, जो न जाने क्तिन मोड ले रहा है, और लेने की सभावनायें अपन अदर सजाय है, जिसका उसे पूर्वाभ्यास तो कतई नहीं है, इसलिए एसे व्यक्ति का शीपको और अध्यायो में विभक्त करना मैंने उचित नहीं समझा। एक प्रवाह है जो वहीं उठता, गिरता और टकराता है, निफ आग बढन की आकाक्षा में इस पुस्तक को लियत हुए मैंने डा. पुप्पपाल सिंह, डा. वेद प्रकाश अमिताभ, डा. गोविन्द मिश्र, कृष्णा अग्निहोत्री की पुस्तको से पूरा पूरा लाभ प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त और भी बहुत से लेखको की पुस्तका से महायता मिली है, जिनका उल्लेख मैंने अन्त म किया है। जिनका उल्लेख में, जाने अनजाने मा स्मृतिवश नहीं कर पायी उनपी में हृदय से क्षमाप्रायी हू । नय कहानीकारा की कहानियों और कहानी भग्रह, जितने मेरी दृष्टि और पहुच म आ सके, उह पढने और लाभ लने का भरपूर प्रयत्न किया, फिर भी जा सयोगवश उपलब्ध नहीं हो पायी, उनके लिए मैं क्षमा प्रार्थी डा० हरमहद्र सिंह वदी, जा इस काय के प्रेरणा स्रोत रह, उह मरा नमन । इसके अतिरिक्त श्री रणधीर सिंह वदी, पुस्तकालयाध्यक्ष नगर निगम, जाल घर की मैं मै आभारी हू, जिहोंने मुझे इतनी अमूल्य पुस्तकें उपलब्ध क्राइ, उनका स्मरण मैं अपना क्त्त व्य समझती हू । इन सब के स्रोत में स्थित मेरे श्रद्धय माता पिता, जिनके बार में मैं जितना भी बहू कम ही होगा, वैमे भी, जो भी किया गया है, उनका ही देय है, उमा मापन क्या कर ? उनके विषय में अधिर युछ कहना औपचारिक्ताओं का पालन करना होगा । यह सब उहीं की असीम मेहनत, लगन और निष्ठा का प्रतिपस है। मैं उनकी दीर्घायु होने की कामना सवव्यापी से सदव वरती रहूगी। 1171/8 सुरजीत नगर, गोताली वर्मा नयोदर रोड, जाल पर शहर 144001 समकालीन कहानो सदों के घेरे मे - जाधुनिक हिंदी कहानी अपने परिवेश के प्रति एक गहरी जागरुकता लिए हुए है। परिवेश के प्रति यह गहरी जागरुकता उसके चरित्र को सामाजिकता से सलग्न कर देती है । इस प्रकार अपने समाज का जीवन साक्षात्कार आधुनिक कहानी को सवेदना का मूल आधार कहा जा सकता है। कहानी के जीवन से गहर रूप मे जुडने के कारण स्वाभाविकता आयी, उसके कारण कहानीकार ने समाज और उसकी बहुविध समस्याओ का विविध आयामो में सशक्त चित्रण किया है। आज कहानी की मुख्य सवेदना सामाजिक समस्याओं के चित्रण से सबद्ध है । आज वह मनुष्य के उस भया- वह और त्रासद यथाथ को उकेरती है, जिसके कारण व्यक्ति की जीवन जीने की स्थितिया विपम से विषमतर होती जा रही हैं । इस प्रकार आज कहानी में सामाजिक परिदृश्य इस रूप म मूत हुआ है । एक ओर तो वह जीवन की विषमतालो और विसंगतिया को प्रत्यक्षा करता है साथ ही दूसरी ओर उसमे एक लेखकीय सोच भी है, जा निश्चय वी सडी गली व्यवस्था और भष्ट आचरण को जडमूल से उखाड़ फेंकने की समानातर सोच, एक सटीक, स्पष्ट सोच विकसित करने का श्रेष्ठ उपक्रम सिद्ध होती है । इसी रूप मे आज का कहानीकार एक रचनात्मक दायित्व का निर्वाह करता हुआ अपने सजनशील व्यक्तित्व को स्थापित करता है । आज की कहानी के प्रारभिक दौर 'नयी कहानी' के समय से ही सामान्य व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की आर्थिक तगियों से गुजरना पड़ा है। स्वतनता प्राप्ति के साथ ही जनता ने जो खुशहाली के स्वप्न पाले थे, स्त्रतत्रता के बाद के वर्षों में व बुरी तरह भरभरा कर टूट गए । नयी कहानी मे सामाय व्यक्ति की इस आर्थिक सगो का सशक्त चित्रण कुछ कहानिया में हुआ है । 'राजा निरबसिया' कमलेश्वर की, 'दोपहर का भोजन', अमरवात को 'मास का दरिया', कमलेश्वर की कहानियो में 'राजा निरवसिया मे चदा का पैसे के अभाव में पाउडर वचनसिंह के हाथा स्वय को सौंपना, जुगनू की बीमारी के साथ ही आर्थिक स्थिति से बिल बिलाना (मास का दरिया) माकण्डेय की कहानी 'दूध और दवा' की मुनी और उसकी मा का आर्थिक मार से टूटना, जिदगी और जोक (अमरकान्त) नहो (शिव प्रसाद सिंह) 'आदमी का आदमी' (काशीनाथ सिंह) आदि अनेक कहानियो मे सामा य व्यक्ति के अर्थाभावो का अत्यात सजीव चित्रण प्राप्त होता है। सत्तर के दशक मे मनुष्य की आर्थिक विपनता और 9 10 चढ गयी । मन० 1962 मे चीन से हुए प्रथम युद्ध और फिर 1965 एव 1971 मे हुए भारत पाक युद्ध की श्र खला ने हमारी कमजोर आर्थिक व्यवस्था के ढाचे को बुरी तरह चरमरा दिया। इन युद्धो ने अनेक म्पो म अथव्यवस्था पर दवाव डाल कर सुरसा की तरह मुह फाडती महगाई को और भी बढा दिया । अकाल, सूखा, अनिवप्टि ने दश मे अन और दूसरे खाद्य पदार्थों का सकट उत्पन कर दिया। मुद्रा-म्फीति और मुद्रा-अवमूल्यन के वारण मुद्रा को प्रय शक्ति का ह्रास कर जनता के लिए कमरतोड महगाई, करो का न वहन कर पाने वाला भार देकर सामाय वग को ऐस जजाल मे फसा दिया कि उमका पार पाना कठिन हो गया। चारो जोर व्याप्त भ्रष्टाचार, नौकरशाही की अक्मण्यता ने उसे जीवन की हर जरूरत म जोड तोड लगाने वाला बना दिया। आज व्यक्ति किसी प्रकार पंमा जुटाकर उसे हाथ में लेकर बाजार म घूम रहा है तो उसकी ज़रूरत की चीजें गायब होती जा रही है। जिंदगी की छाटी जरूरत के लिए व्यक्ति को कतार मे घटा खडा होना पडता है । वढती हुई जनसख्या के भयानक आक्डा न तो इन समस्याओं को और भी उलझाकर शिक्षित बेरोजगारी, वरोजगारी, आनोश और हिंसा को जाम दिया है । जीवन म ये अथ सक्ट सामाय यक्ति या निचले स्तरीय जीवन जीने वालो को ही भोगने पडे हो, एसा नहीं है । समाज के उच्चवग वेवल पूजीपति वग और उस वग को छोडकर जो काल धन पसे के बल पर जीता है, को भी आर्थिक समस्या का सामना करना पडता है । यही कारण है आज का साहित्यकार भी अधिकारात मध्यम वग से ही उठकर आया है और उसन भागी हुई नासदी को अपने लेखन का विषय बनाया है। समाय व्यक्ति द्वारा जीवन के प्रत्यक क्षेत्र में आर्थिक मोचों पर जा लडाई लडी जा रही है उसे आधनिक कहानी मे अत्यत विस्तार और गहराई से चिनित किया गया है । आज के व्यक्ति को जीवन म 'अधरे का सैलाब' (से० रा० यात्री) उमड आया है । आज की कहानी का यक्ति त्रस्त है आर्थिक पीडा से और कुछ रुपये अपने खर्चों मे से बचा कर दीवाली, होली की खुशिया खरीदना चाहता है। वही अपने से अधिक अमीर को देखकर मृगतप्णा का शिकार हो जाता है । वह भारी भूल तब कर वठना है जवकि अपनी स्थिति को दूसर अफसरो से तोलने लगता है । इस प्रकार उस अपनी विपनता और भी सालने लगती है । सामा य सी आय वाला व्यक्ति जिन इच्छाओं को लेकर जीवित रहता है वे उसकी विवशता से परिचित कराती हुई उसके जीवन मे दूर तक फैले तमस का परिचय देती है । आज का आदमी इस अथ ममस्या से जूझते हुए जिन्दगी का भार ढो रहा है और इघर सरकार 'गरीबी हटाओ' का खोखला नारा लेकर आयी । इस नार ने गरीबी तो क्या ही हटायी, वल्कि व्यक्ति के अदर आक्रोश और भर दिया। रवीद्र 11 कालिया ने तो इस गरीबी को देखते हुए, महसूस करते हुए 'गरीबी हटाओ' नाम का कहानी सग्रह ही लिख डाला। इस सग्रह ने इस नारे के थोथेपन को उजागर किया है। आज का युवा वग शिक्षित हो कर भी बरोजगार है । पढ लिख कर भी शिक्षित बेरोजगारी भी आज के जीवन का एक तरह से अर्थाभाव का ही शाप है । समकालीन कहानी ने इसे बहुत ही विस्तार से और उसके सभी सदर्भो मे चित्रित किया है। आज के जीवन की सबसे बड़ी समस्या युवा वग मे बेरोजगारी है। बेरोजगारी का एक सबसे बड़ा कारण उचित व्यक्ति को समुचित रोजगार का न मिलना है। आज के युग में योग्यता और शिक्षा को महत्व न देते हुए सिफारिश को अधिक महत्व दिया जाता है। इस स्थिति न युवा मन मे एक गहरी निराशा और आक्रोश का जम दिया है। निमल वर्मा की कहानी 'ल दन की एक रात' मे इस समस्या का बहुत ही जीव त चित्रण हुना है। "मैं दूसरी बार वहा गया था। पहली रात देर से पहुचा था। जाने से पहले ही सारा काम बट चुका था। मैं फिर भी अनिश्चित सा गेट के वाहर खडा था, सोच रहा था शायद आखिरी क्षण उह किसी आदमी की जरूरत पडेगी और वे मुझे बुला लेंगे। देर तक धडधडाती मशीनो के भीतर सोडे की बातला का स्वर सुनाई दे रहा था। हमम से जिह काम मिल गया था, वे जल्दी-जल्दी अपने सूट उतार कर काम के कपडे पहन रहे थे।" मजुल भगत की 'नालायक बहू' कहानी में भी शिक्षित बेरोजगारी और नियुक्तियों मे होने वाले घपलो का सशक्त चित्रण प्राप्त होता है । अधिकाश नियुक्तिया कॉलम व्यर्थ ही निकलते हैं। इसी प्रकार रमश बत्तरा की कहानी 'जिंदा होने के खिलाफ' का नायक अपरिचय, अकेलापन, एकाकीपन तल्खियत और खीझ से भरा रहता है। इसके साथ ही सवधो की निममता भी परिलक्षित होती है । इस प्रकार की वरीजगारी की समस्या पर समकालीन कहानी ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, जो सशक्त भी है और साथक भी। अर्थाभाव कारण ही सबधो पर भी प्रभाव पड़ा है। इस अभाव के रहते आज या तो सवध विखर चुके है या फिर शेष होने को हैं। आज के रिश्ते हमारी अथस्थिति पर टिके हुए हैं और चू कि अर्थाभाव है इसलिए वे दरक रहे है, विघटित हो रहे हैं । समकालीन कहानी सवधो के बिखराव की कहानी है। कही सवध प्रेम के अतगत टूटते दिखाई देते है तो कही पति पत्नी के बीच । इन सवधो पर उपा प्रियवदा की कहानी 'वापसी जिमम गजाधर बाबू अपनी रेलवे की नौकरी से रिटायर होकर जब अपने भरपूर परिवार मे लौटते हैं तो उह लगता है, ये सब अपन होकर भी पराये हैं, यहा तक वि उनकी पत्नी भी। और अत म यही परायापन उह 'वापसी पर विवश पर देता है। यशपाल की कहानी 'समय' भी वृद्ध पिता की वेचारगी और टटन वा - 12 दर्शाती है । विघटन के क्षण पिता पुन, भाई-बहन, भाई भाई मभीर बीच दिखाई देने लगे हैं। इसी अपरिचय यो वतात हुए पहा गया है कि हम अभिशप्त हैं । अपरिचित होने के लिए सिद्धेश की बहानी 'आयय' भी सवध विघटन का सही स्वरूप हमारे सामने लाती है, जिसमे मदलाल बाद एडवोकेट का छोटा पुत्र अपनी पत्नी को लेकर घर से अलग हो जाता है । वे सबधा के इस अलगाव से दुखी होते हैं। नानरजन की कहानिया इस दृष्टि से अवलोकनीय हैं-'कलह' 'पिता' 'सवध' ‘फेंस के इधर उधर', 'शेप होते हुए', आदि कहानिया में सबधा के दरवन की पीडा का अहसास कराया गया है । शेष होते हुए कहानी का मझला इसी दरकन का भाक्ता है । जय वो घर लोट पर देयता है कि एक ही घर में कई हिस्से हो गये हैं मानो ये सब अपने अपने पडाव डाले हुए हैं पास पास । इसी प्रकार 'सव' और 'क्लह' कहानी में भी परिवार के इसी टूटन की स्थिति का चित्रण है, जिससे आज का मध्यम वर्गीय जन गुजर रहा है। इसी प्रकार महीप सिंह की कहानी 'नाला' की प्रमुख पाय सबधा के इस विखराव को तीव्रता से अनुभव करती है । इस परिवार के सब सदस्य सवसे कटे हुए और घुटन म दिन गुज़ार रहे हैं । रमेश बक्षी की कहानी 'मातम' मे सवधा के शेष होने की स्थिति को बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्तर पर ले जाकर चित्रित किया है। सयुक्त परिवार के बिखरने की स्थिति को इस महानगरीय परिवेश में कथित नही सजित किया गया है। मा अपने पुत्र और बहू को अपने देवर और चाचा के मातम के लिए जबरदस्ती भेज देती है, रितु वे बेलूर म चाचा के घर टू ढने की परेशानी से बच कर निणय लेते हैं "चाचा स्वग से उतरकर भी मा से शिकायत करने थोडे ही आयेंगे। क्या मतलब ? लोट चलो ना।" वास्तव म चाचा का सबध बोध अगली पीढी को नहीं है, केवल मा ही शोकग्रस्त है। रश्मि तखा की कहानी 'चौथा वेटा' म भी परिवार के लोग एक दूसर से कटे हुए हैं कि कोई भी उहे एक परिवार का नहीं कह सकता। "अपने घर में उसने खुद को सदा एक बाहरी व्यक्ति जसा महसूस किया है । उसे लगता है एक ही परिवार मे रहने वालो, एक ही भाषा बोलने वाला के बीच भी 'लैंग्वेज प्राब्लम' हो सकती है। अगर उह बराबर यह महसूस होता रह कि दे आर नाट आन दी सेम वेव लें।" ममता कालिया की बहानी 'खाली होता हुआ घर मे लडकी सुमिना ससुराल से मायके आकर पिता को रिदायरमट और बुढौती के लिए तैयारी करती देखती है तो वह उनका अतीत से मिलान करती हुई देखती, सोचती है, “इह तो बूढा होने में अपार थम करना पडेगा" । गोविद मिश्र की 'धेरे' या कथानक भी ऐसा ही है जिसमे बुटापे और रिटायरमट को सही रूप में परिभाषित किया गया है, "रिटायरमेट 13 अवकाश प्राप्ति बधन से मुक्ति की ओर या जीवन मे ही मत्यु का पूर्वाभ्यास दोनो मे से क्या माना जाये इसे।" राजी सेठ की 'उसका आकाश' मे बडी बहू का उपक्षापूण, रूखा व्यवहार, इस सबके बीच, अपने एकाकीपन मे समपिता मत पत्नी की याद उसे रह रह कर सालती है। उसे पत्नी के चले जाने पर शारीरिव स्तर पर ही नहीं, मानसिक स्तर पर भी पक्षाघात हुआ है । सुरेद्र सुकुमार की कहानी 'पोषक भक्षी' के पात्र मिश्रा जी की वद्धावस्था की पीडा उभारी गयी है, जिहें अपने भरे पूर घर मे कही भी पत्नी के स्मृति चिह, पान की डिबिया रखने की आज्ञा नही है । आखिरकार वे पडासी के घर सभालने को कह कर ही निश्चित हो पाते है । इस अवहलना से क्रुद्ध होकर वे अपना आक्रोश भी व्यक्त करते है, "बच्चू, मुझे भी तुडवा डालो। मैं भी भददा और पुराना हो गया हूँ । आखिरकार क्या चाहते हो तुम लोग ?" ये कहानी ऐसे व्यक्ति की पीडा को दर्शाती है जिसन जिन्दगी भर गहस्थी बनाने के लिए कडा परिश्रम क्यिा। राकेश वत्स की 'गुलाम मे उस पिता की पीड़ा को उकेरा है जो अपनी बेटी के यहा उसका नौकर भी न होकर गुलाम बन गया है । जो उसे मानसिक स्तर तक पीडित करता है। नीता जैन की 'बाट' मे वद्धा मा का ऐसा ही हाल है, जिसका पति मर चुका है और वह अपने बहू बेटे की देहलीज पर एक शरणार्थी बन कर रह गयी है । मानो उसका यह अधिकार या कहना चाहिये कत्त व्य और गलती थी कि उसे शहर मे पढा लिखा सुख का स्वप्न देखा । सभी सबधो की सलीब ढो रहे हैं बेमन से, आत्मीयता का नामोनिशान तक नहीं हैं। इस प्रकार नई कहानी ने सबधो की दरार को बहुत बारीकी से देखा है और बहुत गहरे जाकर पहचाना है । विभाजन भारतीय समाज के जीवन मे भयकर विस्फोट के रूप में प्रक्ट हुआ, जिसके कारण आर्थिक समस्या के साथ 2 राष्टीय जीवन की आत्मा भी स्वाहा हो गयी। शतादियो से सहेजी गयी परम्परायें, सस्कृति, भाषा, संस्कार, मानवीय संघर्ष, मानवीय मूल्य और विवेक, साम्प्रदायिकता की बलि चढ गये । राजनतिकता के उलझाव ने भयावान्त किया कमजोर वग का और उसकी नीव जो सबधा की आस्था और पारिवारिप व धनो पर टिकी थी, हिला दिया । यह विभाजन जितना राजनतिक स्तर पर दु खदायक था, उससे भी कही ज्यादा मास्कृतिक स्तर पर । हिदू और मुसलमान एक ही धरती पर रहने के कारण एक दूसरे से भावनात्मक स्तर पर जुड़े हुए थे। पाकिस्तान चाहने वाले इस लगावट को खत्म कर देना चाहते थे। इसलिए उहोने दगा मा माहौल बना वर साम्प्रदायिक घणा की अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी। फिर भी कुछ लोग जो दोना ही वर्गों से सम्बद्ध थे, एकता स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे।
14 महीपसिंह की कहानी 'पानी और पुल' मानवीय क्रूणा के सदभ मे राजनतिक दुघटनायें विभाजन की निरथरता को बडे ही माथक ढग से निरूपित करती हैं। राजनैतिक हितो ने धरती को तो टुकडो म वाट दिया, परन्तु उनके हृदयो म अमिट छाप छोडी हुई सस्कृति, पत्थर और लोहे के पुल के नीचे आज भी प्रवाहित हो रही है। "मरी दष्टि नीचे की ओर जा रही थी। वहा घुप अधेरा था, पर मैं जानता था कि वहा पानी है, येलम नदी का कल कल करता हुआ स्वच्छ जल जो पत्थर और लोह के बने पुल के नीचे बह रहा था।' अज्ञेय की कहानी 'शरणदाता' म वाह य परिस्थितियो के दवाप में सवधो की और मूल्या को विघटित होने की प्रक्रिया के बीच मानवीय करूणा की शाश्वतता के प्रति आस्था के स्वर को गूज है। विपाक्त वातावरण, द्वेष, घणा, हिंसा फैलाने के लिए सम्प्रदायो वे अपने संगठन और उसे शह देने को पुलिस और नौकरशाही से सबंधित विवरण वातावरण की ओर उस वीभत्सता की ओर सकेत करते हैं जिससे व्यक्ति का आत्मविश्वास और मनाबल डोलने लगता है । कहानी का रफीकुदरीन पात्र अपने पुराने मित्र का शरणदाता है, जिसका नाम दविदर लाल है । साम्प्रदायिक हिंसा से विषाक्त परिस्थितिमा म उसकी मानवीय दष्टि भी घणा और प्रतिशोध के लिए हिंसक हो उठी है । वह दवि दर लाल के खाने म जहर मिला देता है परन्तु शरणदाता की पुत्री जेबुनिसा मानवीय करूणा के धम को निभा देती है, जिससे दवि दर लाल बच जाता है । जेबू का कहना है, "हि दुस्तान में भी अकलियत का कोई मजलूम हो तो इस धम को याद रखा जाय, भुला न दिया जाए यही क्या कम है साम्प्रदायिक अग्नि म नफरत के विपले धुए मे मागवीयता, दया, करूणा को बचा कर रखा जाये। विष्णु प्रभाकर की 'मेरा वतन' अपनी धरती से अपनी सभ्यता, संस्कृति और समाज से उखडे टूटे हुए उन व्यक्तियो की यातना यात्रा है जो विभाजन के हास का नही सह पा रहे है और उनकी विक्षिप्तता उह आग नहीं, पीछे की आर पोचती है । इस आग में जलते उसे भारत म पाक्स्तिान का समझ कर गोली मार दी जाती है। पाक्स्तिान में भारत का जासूस समझ कर । व्यक्ति हिदुस्तानी, पाकिस्तानी हो गया है । विभाजन से टूटा हुआ व्यक्ति न अतीत को भूल पाता है, न वतमान मे जुड़ पाता है । इस अवस्था मे वह विक्षिप्त सा हो गया है। कहानी की मून सवेदना गहरी है और त्रासदी को येलते हुए मत्यु तम की यातना वा चित्र प्रस्तुत करती है जो बहुत ही कारूणिक है । मोहन राकेश की 'मलवे का मालिक के विरोधाभास का उददेश्य, सास्कृतिक सहिष्णुता और मानवीय करणा को निरन्तरता पर राजनीति के आधार आपात की 15 ऐतिहासिक व्यथता पर प्रश्न चिह लगाती है। विभाजन के साढे सात साल बाद मुसलमान की टोली हॉकी मैच देखने लाहोर मे अमतसर आयी है। टोली का एक सदस्य गनी मिया भी है। उसने अपने मकान के मलबे को पहचान लिया है। पहलवान रक्खा अपन आपको उसका मालिक कहता है । वह गनी परिवार का मिन और विश्वासपात्र था । घणा के उमाद उसने गनी के पुत्र को मार डाला और पुत्रवधु का बलात्कार करके नदी मे बहा दिया। गनी इस सच्चाई का नहीं जानता था। पर तु रक्खा के हृदय म पश्चाताप की ज्वाला धधक रही थी। "उसके हाठ सूख रहे थे और उसकी आखो के इद गिद दायरे और गहर हा आरा थे ।" एक आर रक्खा का निमम रूप और दूसरी ओर गनी का सहज, सरल विश्वास, और स्नेह विराधी स्थितियों की विडम्बना को उभारता है । "मेर लिए चिराग नहीं तो तुम लोग तो हो । मुझे आकर इतनी तसल्ली हुई कि उम जमाने की यादगार तो है । मैंने तुम को देख लिया तो चिराग को देख लिया।' रक्खा का पश्चाताप और गनी का सहज विश्वसनीय मानवीय क्रूणा के आधार को मजबूत बनाता है । विभाजन से हुए मलब का मालिक न गनी है, न रक्खा है बल्कि एक कुत्ता है, जो अलगाववादी राजनीति का प्रतीक प्रतीत होता है । विभाजन के "यथता बोध म मानवीय करूणा की निरत रता का बोध उपजा है। यही स्वर अज्ञेय की कहानी 'बदला' और 'लैटर बाक्स' में भी उभरा है। भीष्म साहनी की 'अमृतसर आ गया' और कृष्णा सोबती की 'सिक्का बदल गया' स्थिति सापेक्ष और परिस्थिति सापेक्ष क्रूर मानसिकता का परिचय देती है। 'अमृतसर आ गया' म दुबला पतला बाबू भौगोलिक स्थिति बदलते ही हत्यारा वन गया और उससे पहले मुसलमान अपने क्षेत्र में उन थे और वाबू भयभीत था। इसी प्रकार 'मिक्या बदल गया के साहनी और शेरा की परिस्थिति म परिवतन के समान मानसिकता भी परिवर्तित होती है । विभाजन से सबधित कुछ कहानिया समाज और व्यक्ति के जीवन मे सास्कृतिक परिवतन की यातना के अनेक पक्ष सामने आये हैं। अपहरण की गयी, विस्थापित महिलाना की समस्या से पारिवारिक वातावरण मे जो कलह और सक्ट पदा हा गया है, जिमन पारिवारिक सवधा को ही नहीं, सास्कृतिक मूल्या को भी प्रभावित किया। इससे उतरन मानसिक विकृतियो और प्रन्थिया स कई कहानिया का मृजन हुआ है। अनेय की कहानी 'रमते तय दवता' म हिदू मुस्लिम दगे म व लक्ते म रहने वाली एक स्त्री अपने पति से बिछुड गयी है। सरदार विशन सिंह उसे सकट म देखकर उसकी सहायता करता है । उसे पति के साथ मिलन के लिए निश्चित किए गये स्थान पर पहुवाते हैं। वितु पति वहा नहीं मिलता आर रात हो गयी। सरदार माहब उस सी को अपनी विधवा बहन के माथ 16 गुरद्वारे में शरण दे देते हैं। सुबह होने पर विशन सिंह उसे उसके घर पहचान जात है तो पति जिसने मुसीयत की रात स्वय भी घर से बाहर ही विताई थी सहसा उसके चरित्र और विशन सिंह ने चरित्र को ही चुनौती देने लगता है । विशन सिंह को अपना ही नहीं सिख जाति के अपमान वा अहसास होन लगता है। वह पुन सम्मानित सिक्खो के साथ उम स्त्री को उसके पति के पास लेकर जात हैं। पति भयवश उसे घर मे तो रस लेता है किन्तु विशन सिंह को उसके व्यवहार से लगता है कि स्त्री पर लाछन और स्त्री पुरुष सबंध की वात खत्म नही हुई और उत्त स्त्री का क्या होगा? यह प्रश्न उसके सामन है। ऐसी स्थिति म स्त्रियो को समाप्ति हत्या या आत्महत्या म होती है। वापस लाई गयी स्त्रियो को उनके सवधिमा द्वारा पहचानने स इकार पर दिया गया था, सी का चरित्र समाज की दष्टि में इतना कच्चा धागा है कि वेवल सदेह मात्र का झटका ही उसे जीवन जीने में अधिकार से वचित कर सकता है। अशेम की कहानी 'मुस्लिम मुस्लिम भाई-माई' मे मुस्लिम स्त्रियो सकी और आमिना को पाकिस्तान स्पेशल गाडी मे जगह नहीं मिलती। अमजद उह गाडी मे धकेल देता है । सकीना खुदा की, इस्लाम की दुहाई देती है तो गाड़ी में सवार मुसलमान औरत कहती है "वडी पाक दामन बनती हा । अरे हि दुआ के बीच में रही और अब उनके बीच से भाग कर जा रही हो । आखिर कसे ? उहोंने क्या यो ही छोड दिया होगा ? सौ सौ हि दुआ स एसी-तैसी बराके पल्ला झाड चली आई अपनी पाक दामनी का दम भरने ।" सकीना और आमिना अव कौन सा प्रमाण कि उनकी पाक दामनी की सच्चाई सिद्ध हो सके । वीरता के बीच भी सास्कृतिक प्रश्न व्यक्ति की विवशता नही देखते। वैसे तो विभाजन का आधार तो दो राप्टो के सिद्धांत की राजनीति थी कि तु इस गजनीति के कारण हिंदू और हिंदू के बीच और मुसलमान मुसनमान के बीच सास्कृतिक सफ्ट पैदा हो गया है। इसी सकट की अभिव्यक्ति देवेद्र इस्सर को 'मुक्त' श्रवण कुमार की 'मामूली लोग मै भी हुई है। ये कहानिया विभाजन की राजनैतिक त्रासदी और मानवीय संवेदनाओ का एक दस्तावेज हैं। य नासदी भारतीय समाज को अनेक वर्षों तक प्रभावित करती रही है, इसलिए नयी कहानी के रचनात्मक परिवश में इसको अपनी विशिष्ट पहचान है। यह सौ फीसदी माय है कि विभाजन पे प्रमग की कहानियो न अपन श्रेष्ठ सजन स भौगो- निवता को समेट कर रखा हुआ है, बिखरन नहीं दिया, फिर चाहे वह सगीत का क्षेष हो, शायरी का क्षेत्र हो, सुर और ताल की पहचान हो । इनमे सोमा या सरहद जैसी कोई बात नहीं दिखती। समकालीन कहानी सवधो के दरकन की कहानी है । इन कहानियो मे सारे 17 सबधो से टूटता हुआ आदमी दिन-ब दिन अकेला और अपरिचय का शिकार होता जा रहा है। विगत पीढी के प्रति नफरत, अविश्वास, सदेह, अपरिचय, अनिश्चय को ही अभियक्ति प्रदान करती है । मारे पारिवारिक सबध टूटने लगते है। इस टूटन के क्षण बाप-बेटे, भाई-बहन सभी के जीवन मे उभरने लगते है। इसकी व्यापकत सलिष्ट रूप में दिखने लगती है। यही अजनबीपन और आत्मनिर्वासन है। इसके पूर्णत्व पर सार सामाजिक और मानवीय सबंध निरथर हो जात है। आज के व्यक्ति का अकेलापन और अपरिचय ही उसकी सबसे बडी त्रासदी है। यह अकेलापन आतरिक अधिक है औद्योगिक कम । गोविद रजनीश अकेलेपन से पीडित व्यक्तिया को दो रूपो में विभक्त करते है. "पहले वे जिनको निभर सम्पक्ति से पहचाना व टटोला जा सकता है । दूसर वे जिनको मानवीय मम्पों को असम्पत्ति स जाना व पहचाना जा सकता है समकालीन कहानी मे मूलत पीढिया के अलगाव से उत्पन थोपा हुआ अकेलापन और अमम्पक्ति वा अकेलापन है । आज की कहानी ने इसका सजीवता से प्रयोग न करके केवल परिस्थितिगत विषमताआ को ही स्थान दिया है और जिजीविषा के लिए चल रहे सघप के रूप में इसकी आवश्यकता को भी पुष्ट किया है। समकालीन कहानी मे अजनबियत का प्रयोग 'जिदगी और गुलाब के फूल' जैसे साहित्य मे बडी ही सजीवता से चित्रित हुआ है, जिसम 'वापसी' प्रमुख है। इस प्रकार निमल वमा की 'परि दे' का एक वाक्य-"पियानो का हर नाट चिरन्तन खामोशी की अधैरी खोह में निकलकर बाहर फली नीली धुध को काटता, तराशता हुआ एक भूला सा अथ खीच लाता है' और बाद की पक्ति- "क्या वे सब भी प्रतीक्ष कर रहे हैं-वह डाक्टर मुखर्जी, मिस्टर हयूबर्ट, लेकिन कहा के लिए ? हम कहा जायेंग: इस प्रश्न का उत्तर नही देकर सचमुच अजनवीपन की अनुभूति को गहराया गया है मानव की अनिश्चित नियति का सकेत दिया गया है। ' हम कहा जायेंगे का अजनबीपन एक व्यक्ति का अजनबीपन ही व्यक्त नहीं करता बरिव आज के व्यक्ति का भी सामाजिक अजनबीपन व्यक्त करता है । निमल वर्मा की ही 'लवस' में भी अजनबीयत का अथ है । "पिछली गमियो मे अजनवा व्यक्ति की ही कहानी है जो घर के बाहर रहता है। उसके चाहत भी तनाव खत्म नहीं होता, यह उसकी विडम्बता ही है-- उसे अचानक लगा, "मानो वे दाना जमीन के एक टुकडे के मामन खडे हैं जो बिलकुल अपरिचति और अजाना सा है । उनके बीच भाई बहन के बीच एक मुक समझौता है कि वे इस पर नहीं चलेंगे । वहा उनकी बढती हुई उम्र थी। उम वैसा ही छोड़ देंगे जैस वह है । वहा वे अकेले थे।" उपा प्रियवदा की कहानियो मे इस अजनवीपन को द प्रकार से ग्रहण किया गया है.-एक स्वच्छा से वरण करना और दूसरे वरण को विवश हो जाना । 'मोहबध' कहानी मे अचला को अवेलापन है तो अपनी इच्छा से वरण 18 किया हुआ । 'छुटटी के दिन' मे अपेलापन माया के जीवन मे है और वापसी' कहानी म इस अकेलेपन को झेलने के लिए गजाघर वा रिटायर होन के बाद विवश हैं । यह अजनबीपन का अहसास नयी कहानी म गहराता गया है । महानगरो के जीवन मे दो प्रकार का अलगाव, अपरिचय और परायापन देखा जा सकता है । पहले तो अपने परिवश स क्ट जाने पर और उस चिर परिचिति परिवश के जीवन मूल्य छूटन का दद है और महानगर की दौड धूप और एक दूमर के साथ तादात्म्य न होन का अलगाव जौर परायायन है । आधुनिक कहानी मे दोनो ही प्रकार की सवदना अभिव्यक्त हुई है । गाव कस्वे स महानगर म आकर सबधो मे एक खोखलापन पाना, औपचारिकता, मानवीय प्रेम की उपमा का अभाव, महानगरीय जीवन म स्वाथ और दिखावे की जिदगी के बीच जिम अकेलेपन और अलगाव को व्यक्ति को भागना पडता है, उसकी सशक्त अभिव्यक्ति नयी कहानी में हुई है । कमलेश्वर की कहानी 'खोयी हुई दिशायें' का नायक चदर जहा अपने परिवश और जीवन मूल्य छूटन के दद से पीडित है, वहा उसे महानगर में एक परायापन और अनगाव सालता है । अपन ही देश की भीड से भरी राजधानी दिल्ली चदर को कस्बे से आन पर अपरिचित और परायी लगने लगती है । इस भीड भरे शहर म उसका अपना कोई भी नहीं है । "तमाम सडके हैं, जिनपर वह जा सकता है, लक्नि वे सड के कही नही पहुचाती । उन सडका के किनारे पर बस्तिया हैं पर वह किसी घर म नहीं जा सकता। उन घरा के बाहर फाटक है, जिनपर कुतो से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड ने की मनाही है और घटी बजा कर इतजार करने की मजबूरी है । हाटल गेलाड मे आय जोडे मे महिला का जपने साथी से अजीव प्रकार का यवहार है जिससे बगानापन यलक्ता है । गराज का मालिक सरदार अपन यहा पद्रह सोनह साल म काय करत हुए भी उम पर विश्वास नहीं करता, उसकी मामो से परिचित चदर की पूर्व प्रेमिका के घर जर वह नाय पर जाता है तो उसस यह पूछती है कि 'चाय म वितगी चीनी दू' तो मानो पन स उमका भ्रम टूट जाता है कि उसकी प्रेमिका तो उसे शायद अच्छी तरह पहचानती है, उसके लिए पूरी दिल्ली अपरिचय क सागर म डूब जाती है । उसकी पत्नी निमला भी शारीरिक भूत मिटाने पर अजनबी सी लगती है। इस प्रकार 'खोयी हुई दिशायें एक प्रकार में अपरिचय, अलगाव और गानपन का व्यक्त करती है । एस म प्रतीक्षा भी ममाप्त हो गई है । इम गजनीतिक भ्रष्टाचार और अव्यवस्था मे मयके मव तसल्नीटाया वाक्य झूठे और जोयन पडत हुए नियत हैं । एम म अपरिचय, भीड शार, तनाव के अतिरिक्त प्राप्त हो क्या दिया जा सकता है । यह एक ऐसा वाश है जिस ढोता हुआ आज का व्यक्ति पेन रहा है । फणीश्वर नाथ रणु' की कहानी की फातिमा दी उसी शोर दे पातीपन में दिन काट रही है । मोहन राकेश की कहानी 19 'मदी' का बूढा अपनी नियति और परिस्थिति को एक चाय वे कप मे तलाश कर रहा है । देवेन गुप्त की 'अजनवी समय की गति' का रिटायड आदमी पुराने अतिपरिचित के अपरिचित हो जाने के कारण सशस्त है। राजेद्र यादव की कहानी 'टूटना' में किशोर एक तकनीकी सभ्यता के बीच पदा हुए मूल्यो में अपने अस्तित्व को झेल रहा है। रघुवीर सहाय की कहानी 'प्रेमिका' में प्रेमी क्लय अतिपरिचय के बीच पैदा हुए अपरिचय को येल रहा है । सबधा की जमीन पर वह शूय और भी अधिक भयावह और ठोस ६प मे उभरा है । उपा प्रियवरा के 'पचपन खम्भे लाल दीवारें म सारी ऊष्मता, लगाव और प्रेमजनित उत्साह के बावजूद एक महाशूय व्याप्त है, जिसमे प्रेमिका-अध्यापिका के लिए जैस सब कुछ निरय है-इतना अधिक कि वह ठोस निवेदन का भी साथक नही मानती। इन सब कहानियो मे मानवीय मक्ट, घर करता अपरिचय, जो किसी भी प्रकार के रकने की अनुपरिस्थिति म अनुभूति के घरातल पर होने की नियति, एक शूय है । यह खालीपन नकारने का नही अपन को इन परिस्थितियो म देखने का है। इस खालीपन को कहानीकार ने वास्तविक रूप में सशक्तता के साथ रेखाकित किया है। इसी प्रकार मोहन राकेश की कहानी 'पाचवे माले का फ्लेट' मे भो महानगरीय जीवन का यह जलगाव और अपरिचय स्पष्ट रेखाकित हुआ है । वडे नगरो म किसी को किसी का नाम या व्यक्ति को जानने की आवश्यकता महसूस नहीं होती है । यहा रहने वालो का परिचय पर्दे के पीछे ही छिपा रहता है । “जो भी जानता है घिस पिटे दफतरी नाम से ही जानता है। ए० कप के ए० को कोई गिनती में नहीं लाता । ए० का मतलब अविनाश है या अशोक, यह जानने की जरूरत किसी को नहीं है ।" महीप सिंह की 'सनाटा म मा बेटी के वीच जो विखराव और परायापन है, वह भी महानगर को व्यस्तता और भागमभाग की देन है । इस कहानी मे भी कोई उसे उसके नाम से जानता ही नहीं । बल्कि सब लोग मिमेज वर्मा के नाम से जानते है। शायद ही कभी कोई व्यक्ति दिवा के नाम की पहचान कर मवधो की निकटता जताता है । घर मे आया मेहमान जव पूछता है कि उसने अपनी बेटी के साथ कौन सी फिल्म दखी तो लगता है कोई यथ सी बात पूछ ली गई है क्योकि वे शायद ही कभी य जान पाती हागी कि वे एक दूसर के परिवार का हिस्सा है । "कैसी अजीब बात है कि हमारे बीच जर तक कोई तीसरा यक्ति न जाय हमे यह अहसास नहीं होता कि हम मा-बटी है । हम आपस मे कोई बात किए हफ्तो गुजर जात्त है । फलैट म एक दूसरे की छाया देख कर ही हमे बस एक दूसरे के होने का अहमास होता है। अलग अलग कमरे, अलग अलग बाथरम, यहा तक कि टूथपेस्ट भी जलग अलग।" दोना के जीवन का बधा नियम नौ बजत ही अपनी अपनी चाविया क गुच्छे सभालती, साडियो की धुनट पर हाथ फेरती, लिपिस्टिक लग होठो को शीशे म देखती बबई की भीड भरी सडको पर निक्लने की नियति उसके स नाट को 20 और अधिक बढा देती है। इस प्रकार इस फ्लैट में छाया सनाटा महानगरीय अलगाव और परायेपन को सशक्त ढग स उभारता है। महीप सिंह की ही कहानी 'ठडक' अलग ढग से महानगरीय जीवन मजलगाव और वेगानेपन वो अभिव्यक्त करती है। पति जो कि काफी समय से महानगर बबई मे रहन का आदी हो चुका है, गाव कस्बे के जीवन की अभ्यस्त पत्नी को जब शहर में लाता है तो पत्नी को महानगरीय बोध होता है । पर तु इस बोध के रहते भी वह सवेदना को नहीं खाती और 'एयरकडीशड' पिक्चर हाल में फिल्म देखते हुए भी पडोसन के खोय हुए लडके के विषय में सोचती है । इस प्रकार के सवेदना सागर मे डूबी वह फिल्म का भी आन द नही उठा पाती। उसके मुख पर वह 'ठडक' तभी आती है जब पड़ोसन आकर धन्यवाद देती है कि उसकी ही कृपा से वेटा मिल पाया। लेकिन पति जो कि महानगरीय जीवन म घुल गया है पत्नी सत्या की इस मनोदशा को नहीं समय पाता। ममकाल न कहानी में इस ऊब, परायापन, अलगाव समास को लेकर काफी कहानिया लिखी गयी हैं । नयी कहानी के लेखक कहानिया को अनुभूति के आधार पर ही नहीं, एक आवश्यकता के लिए भी लिखा है । वे कहानिया जिनम ये सोच सहज रूप से उभरी है जत्यत सफल और सशक्त माबित हुई है। निमल वर्मा से लेकर मानण्डेय तक इन कहानिया का फैलाव अलग अलग स्तर और परिस्थितियो के जाधार पर हुआ है। नमी कहानी की कथावस्तु इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आज का साहित्यकार जीवन की सच्चाइयो को बहुत ही पास जाकर देख आया है । उसे य पता चल चुका है कि सबधो म टूटन बिखरन और एकाकीपन बहुत दूर तक जा पहुंचा है। वह इन सवधो को भी अपनी कहानी म उदघाटित कर रहा है और वह भी बड़ी सशक्तता से । मानवीय सबधा म स दाम्पत्य प्रेम सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए नयी कहानी ऊब और तनाव से घिर दाम्पत्य सवधा को भी कहानी है । इस दरार को उसन अच्छी तरह स पहचाना है। आज के युग म नारी का या कहना चाहिय कि पत्नी का आर्थिक रूप से स्वतत्र हो जाना इस टूटन का पहला कदम है क्यादि पहल की नारी आर्थिक रूप से स्वतत्र न होन के कारण पति के अत्याचारों और दवाव को सहन करने को विवश थी। लेक्नि कथित स्वतत्रता पा लने के बाद कोई भी पति ऐसा करने की भूल नहीं कर सकता। भीमसन त्यागी की कहानी 'दीवारें ही दीवारें में इस पक्ष का उजागर किया गया है। पति जव य बताता है कि उसकी नौकरी छूट गयो है तो नौकरी करने " पत्नी का जरा भी दुख या अफसोस नहीं होता--'अच्छा ही तो हमा, पत्नी के 21 चेहरे पर विजय की रेखायें उभरी, इसम चिता की क्या बात है ? नौकरी के भाग जान पर जब एक दिन पति चाय बनाकर लाता है तो पत्नी पहले तो कहती है-'नहीं, यह काम तुम नही करोग ।' लेकिन जब अगले दिन भी पति चाय बना कर लाता है तो उसे कोई ऐतराज नहीं होता। इसमे पत्नी की जगह पति की दास के रूप मे परिणति हो गयी जो इस स्थिति के रहते अस्वाभाविक नहीं लगती। पति पत्नी का एक ही ढरें पर जीवन जिय जाना भी एक प्रकार के तनाव को जन्म देता है जिसमे एक नयेपन की माग छिपी हुई है। जहा यह नयापन नहीं मिल पाता वहा तनाव जीवन में जहर घोल देता है । सात्वना निगम की 'अधे दायरे' की 'मैं' अपने अपने दाम्पत्य जीवन की बोरियत और एक ढर्रे पर चल जाने के कारण इतनी तग आ जाती है कि फूट-फूट कर रोने लगती है। उसके लिए पति एक पुरानी किताव सा है। वह अपने पद्रह वप के दाम्पत्य जीवन का विश्लेषण करते हुए कहती है~"बहुत साल पहले इस घर मे दो प्रेमी रहते थे। एक साल बाद वे मर गय । फिर उनकी जगह एक पति पत्नी ने ले ली। दो साल बाद वे भी मर गय और उसके बाद से यहा सिफ दो पर टस रहते है ।" यह पेरटस बन कर रह जाने की विवशता तनाव और टूटन को ज म देती है । 'आखिरी रात' (काशीनाथ सिंह) मे पति पत्नी के साथ पूरी रात बिताने के बाद यह सोचने को विवश है- "हमारी रात का अन्त चाहे जब हुआ होता जसे होता-वह कुछ इसी प्रकार का रहा होता, बरिक इस से बेहतर तो शायद न ही हाता।" दाम्पत्य सवधो मे टूटन का कारण पर-पुरुष और पर स्री के माथ सबध होने का भी है । आज के युग में सतीत्व, एक पत्नी व्रत जैसे शब्द अपना अथ खो चुके है। इन अवैध सबधो मे न तो अपराध बोध झलकता है न पाप बोध । उन्टे इस जनैतिकता का कारण ढूढन पर जोर दिया जाता है । शैलेश मटियानी की प्रवृत्ति' महानी की विवाहिता दीपा अपने विवाहित प्रेमी को बडे ही खुले ढग स समझाती हुई कहती है कि प्रेम पति नाम के सज्जन से किया ही नहीं जा सकता । वह कहती है--"शादी के बाद प्रेम की भावना ज्यादा गहराई से और साफ साफ पहचानी जा सक्ती है। शादी से पहले तो यह बात स्पष्ट होती ही नहीं कि लोग वास्तव मे प्रेम कर रहे हैं " दीपा जिस प्रेम की बात इस कहानी मे करती है वह प्रेम अशरीरी नहीं है ! आज के युग मे तो प्रेम का सीधा सबध शारिरिक सबंधो मे ही सिमट कर रह गया है। दूधनाथ सिंह की शिनाख्त' के 'मैं' और 'वह' का सवध प्लेटोनिक न होकर देह के स्तर पर कायम है। पत्नी पूटी पर टगे अपने स्लीपिंग गाउन पर पति के उल्टे टगे बुश्शट को देखकर अपने प्रेमी से कहती है-"यह सच है। हमारे कपडे ही अब 22 एक दूसर का आलिंगन करत हैं ।" इससे ज्ञात होता है कि पति पत्नी के सवधा मे दूरी किस सीमा को पार कर चुकी है । पति पानी के बीच अभिरूचियो जोर आदतो का अलगाव भी अलगाव को विवश कर देता है । उस पर तो और भी जब दोना ही अलग-अलग वर्गों स आय है। निमला ठाकुर की कहानी 'अकुर' की सुमिता की घुटन और तनाव इसलिए है क्योकि वह प्रशात की नजरो से उन लोगो मे से है, जिनका मानसिक स्तर अभिजात वग के मानसिक स्तर से नीचे है, जिनका कोई टेस्ट नहीं है । पति समयता है कि उसके टेस्ट को घर मे सब से अधिक घर का नौकर क्सिन जान सकता है। लेकिन सुमिता जो कि मध्यमवर्गीय श्रेणी स जायी है उसके स्तर तक नहीं पहुच सकती। इस स्थिति के फलस्वरूप पति पत्नी म प्रेम होने के बाद भी एक दूसरे से क्टे रहते हैं और सुमिता उस परिस्थिति मे खुद को अजनबी समयने लगती है । उसे “महमूम होता है कि वह इस घर मे मेहमान की हैसियत से रह रही है। मेहमान की हैसियत से भी नहीं उसे यहा कोई जबरदस्ती छोड गया है, इसलिए पति पत्नी के बीच दूरिया, अधूरापन, अकेलापन दाम्पत्य सवधा को खोखला बना रहा है । जीने को विवश दपती चुपचाप इस अकेलेपन को ढो रहे हैं, चाहे जहर समझ कर ही। यह जहर दीप्ति खडेलवाल की कहानियो म स्पष्ट रूप से पता चलता है। इस कथावस्तु को विभिन्न स्तरो पर उठाया गया है । इनका क्थ्य एक होते हुए भी अलग-अलग प्रकार से चित्रित क्यिा गया है । इन कहानियो मे 'कडवे सच' और 'धूप के जहसास जस कहानी संग्रह तथा 'भितिज', 'शेप अशेप', 'एक पारा पुरवया' 'योका', 'देह की सीता', 'य भी कोई गीत है', 'वह' जैसी कहानिया हैं जो एसी नारिया की जीवन गाथा बखान करती हैं जिसमे वह दाम्पत्य जीवन को स्थापित करने के लिए सघप कर रही है- "बार वार हाता है ऐसा अनावृत्त शरीर निक्ट आत है, मन आवरणों मे जा छिपता है थालिंगनो म एक ठडी ऊब का अहसास है । पाश्व में सिमटता अस्तित्व बियाबानो मे भटक्न लगता है । निकटता म दमघाटू दूरी का अहसास होता है- विमी के मुस्करात रहते होंठ दद करने लगते हैं। और विसी तृप्ति के लिए नारी पेतना होश और मूच्छा के बीच छटपटाती रही।' पति पत्नी के इन मामीप्य क्षणाम भी जो तनाव है वह असहनीय है। इसकी अभि व्यक्ति लेखिका न बहे ही सशक्त ढग से की है। जब दोना म म एक युद को दूसरे पर थोपन की कोशिश करता है तो स्थिति भरगाय की ओर वरवस ही से जाती है । लेकिन यह असगाव भी पूरी तरह स पूर्णत ममम्या या ममाधान नहीं है। यह अलगाव पलायन यो जम देता है । गगा प्रगाद गम 23 विमल को सिद्धाथ का लोटना', म कहानीकार एक दम्पू आदमी है और वो सिद्धाध के पलायन को एक अलग व्याख्या देत हुए लियता है--"अभी न जाने कितने एसे लागू होंगे जो अपनी बीवियो के व्यवहार से तग जाकर भागने की सोचत होंगे। हमे लोगा ये दोस्तो म चार पाच ऐसे लोग जहर हैं, जिह घर से भाग जाना चाहिय था।" कुछ बहानिया ऐसी है, जिनमे मामा य स कुछ भी अधिक नजर नहीं आता, लेकिन उनमें छिपी हुई तीव्रता, कड़वाहट, असहनीयता, ब्रूरता, विवशता उह विशिष्ट बना देती है। ममता अग्रवाल की 'स्यामिनी' मे सुप्रिया की पीडा का कारण कोई घटना, वस्तु या व्यकि. त न होकर एक अजीव सा अहसास है । उस बक्सर लगता है वि आनद को पहती पत्नी मर कर भी जिदा है। घर पर एकछत्र राज्य कर रही है वह और द्वितीय स्वामिनी की भूमिका निभा रही है। पति पत्नी के बीच हमशा कोई दूसरा उपस्थित रहता है और वे अपनी सहजता खोकर एक विशेष साचे में ढली जिन्दगी जीते रहते हैं । सुरश सिन्हा की बहानी 'तट से छूटे हुए के परमात्मा बाबू और भगवती का दद अलग तरह का है । जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुचे वृद्ध दम्पती को पुत्र की उपेक्षा ने अर ही अदर खोखला बना दिया है । पुत्र में निराश परमात्मा बाबू अपनी प-नी चे वत्तीस वर्षों के रिश्ते के प्रति भी सदेह करने लगते है। एक ही घर में रहते हुए भी पति पत्नी एक अजनवी की तरह सगय म टिक हुए हैं । 'अनावत्त कौन' में पति पत्नी के बीच असताप वो अभिव्यक्ति मिली है, जिसमे सवों के चुन जाने को पीडा को उकेरा गया है । दाम्पत्य सवधों के विषय मे जो कहानिया लिखी गई हैं उनम सवधा की कड़वाहट, अलगाव, असतोप, आर्थिक विवशता, रचिया की भिनता, अनैतिक सबधा जैस पक्षो का चित्रण जलग अलग तरीक स हुआ है। आज के साहित्यकार को उनके बीच की दरकन का पूरी तरह से अहसास है । इन सब स्थितियो यो वह वेहद ईमानदारी से उतार रहा है अपनी कहानिया में। आधुनिकता के बहाव मे बहते-वहते जीवन म किसी बदलाव के आते मूत्य परिवतन बड़ी तेजी से घटा है । तकनीकी और मशीनी युग के कारण मूल्य परिवर्तन घटने के कारण पिछली पीढी का व्यक्ति, जो परम्परा से जुड़ा हुआ था, भीतर से टूट गया है । यहा तक कि आज का व्यक्ति भी इस परिवतन को स्वीकार नहीं कर पाया । यह मूल्य टूटने का दद बडे ही व्यापक रूप से व्याप्त है। सामाजिक वग मे प्रेम विवाह, वाम सबध, योन नतिकता के स्तर पर भी यह 'परिवान देखा जा सकता है, जिसे आज के कहानीकार ने अभिव्यक्ति प्रदान की है। मन्नू भडारी की कहानी 'त्रिशकु' स्पष्ट करती है कि हम परपरामो को झुठला कर भी सयी मूल्य दृष्टि को विकसित नहीं कर पाये हैं। इन परिवर्तित मूल्यो के बावजूद 24 प्रमुजाशी भी हम निशकु की स्थिति मे फसे है। क्योकि हम जान भी नियतिवादी हैं और परपराओ का पालन करने वाले हैं। नयी-नयी मा यतायें और तेजी से बदलती जा रही परपरायें हम सभी को घोर वितृष्णा देती है। 'पग-डडिया', मे (गिरिराज- किशोर) 'डिनर' पर जाते हुए पुत्र को देखकर पिता कहता है, "लुकिंग स्माट', तो बेटा राजीव थोडे बचपने के साथ हस कर तुरन उत्तर देता है-“बट नाट मोर दा यू।" भारतीय परपराओ मे रगे समाज के लिए य पाश्वात्य संस्कृति से आयी स्थिति असहच है । ये स्थिति कही हास्यास्पद हो जाती है तो कही खडित । पुराने मूल्यो के खडन को देखते हुए आज महसूस करना है कि उसकी हसी उडायी जा रही है । इसका सबसे बडा कारण पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है तो उसकी दूसरी ओर नास्तिकता। नान रजन को कहानी 'सवध' मे नायक कहता हैं- "कई बार मुझे ईश्वर को भददी गालिया देने का ताव भी आया, लेकिन यह सोच कर रह गया कि ससार के अधिकाश लोगा का अव ईश्वर से कोई प्रयोजन नहीं है ।' ये विचार आज की पीढी के हैं। लकिन पुरानी पीढी आज भी आस्तिक है । आज की कहानी म नयी और पुरानी पीढी के बीच आय गैप को नयी कहानी ने बडी पूर्वी से रखाकित किया है । गोविद मिश्र की कहानी 'उखडता हुआ बरगद' की कहानी के बूढे ज्योतिषी अपने पुना के पास पहुच कर नयी पीढी की जीवन पद्धति स बुरी तरह खीझे हुए है और क्दम कदम पर उनको निरथक्ता महसूस करते है । मृदुला गग की कहानी 'अलग अलग कमर' का नयी पीढी का डाक्टर सुरेन्द्र अपन किसी भी निकट व्यक्ति के लिए भी बिना फीस इलाज करने को तैयार नहीं है, जबकि फालिज स पीडित होन पर अपने मित्र बिना फीस देखने जाता है, क्योकि वह भी एक डाक्टर है । वह अपने बेटे की तरह परपराओ और सवेदनाआ की हत्या नहीं करता, बल्कि उनको निभाता है, उन पुरातन मूल्यों का सम्मान करता है । आज समकालीन कहानी ने यडित मूल्य वाल समाज को देखकर दुष का अनुभव दिया है । पभी कभी यह दुख मानोश के रूप में प्रकट हुआ है । सत्य और ईमानदारी जस शब्द खोयले सावित से हो चुके हैं । सुधा अरोरा की 'दमन पत्र' म दामू अपने पिता के आदर्शों और ईमानदारी का मञ्चार उडाता हुआ कहता है-"वावा, आपका जमाना गया । लात या लो, घुप रहो । इमानदारी से काम किया न, क्या रिया हम ? और आपके साथ मे लोग, निहाने वईमानी पी, आज मालीगज, टालीगज म दा मजिला मरान यनया कर ठाठ से रह रहे है, और उनम लहरे-सहरिया जान दिम रिम की सिफारिश पर एसी-ऐसी नौररियों पर मग हैं, जिनर काविल उना पास डिग्री मी नहीं है। माज ईमानदार आदमी मार जोर रहा है, और दर-दर की ठोपर या रहा है, इसलिए इन आरोकी मिमी युवा या द्वारा उगई जाती है। आपने बहुत 25 दाम्पत्य सबधो मे आयी कडवाहट, अलगाव और खालीपन की समाप्ति सबधो के खत्म हो जान मे होती है । कभी कभी पत्नी और पति के बीच का यह सवध कानूनी रूप ले लता है तो कभी आपसी समझौत के आधार पर अलगाव पैदा करता है। नयी कहानी न इन दानो ही पक्षो को उजागर किया है । इन सबधा के अलगाव के बाद एक पक्ष आता है मन स्थिति और आत्मसघप का । पुरुष तो फिर भी अपनी पूर्व पत्नी के सबध को एक बार मे गे घो कर भुला दे लेकिन नारी कोमल हृदया और सवदनशील होने के कारण ऐसा नही कर पाती । वह न तो पूरी तरह से अपने अतीत को भूल पाती है न सभाल पाती है और एक ऊहापोह की स्थिति उत्पन हो जाती है। 'पारू ने कहा था' (मणिका मोहिनी) की कहानी इस पक्ष को अलग ढग से रखावित करती है जिसमे पति की इच्छा होती है कि सबधा मे दरार आने के बाद, भी गहस्थी की गाडी किसी तरह चलती रहे, लेकिन नारी इस दोहरी स्थिति की सलीव को ढोने मे असमथता अनुभव करती है और इसे ढोने की अपेक्षा एक ही बार खत्म करन की कामना करती है। दोना के बीच जब कोई भावनात्मक और रागात्मक लगाव ही नहीं रह जाता तो उसे ढोने से क्या लाभ ! इसलिए इस किस्से को वही तमाम करना ही बेहतर है। इस कहानी में दूसरा पक्ष यह है कि पत्नी पूर्व पति से अलग होकर भी उससे पूण स्पेण नफरत नहीं कर पाती है। अपने वतमान प्रेमी मनीष की बाहो मे घिर कर भी अपने पूर्व पति का स्मरण करती हुई कहती है-"मुक्त होकर भी हम चाहे तो किसी को बहुत बहुत प्यार करते रह सकते हैं।" इसी मन स्थिति पर आधारित निमल वर्मा की 'धीक एण्ड' है जो नारी मन को सूक्ष्मता से अकित करती है और पयाप्त प्रभाव छोड़ने में सफल हो जाती है । सूयवाला की 'गुमनाम दायरे' भी इसी मन स्थिति को उभारती एक कडी है। पुस्प का अह और नारी का दप वैवाहिक सबधा की नीव को हिला देता है। दोनो एक दूसरे से अलग होते हुए अपने अपने अह और दप में खो जाते हैं। उनकी बेटी निधि वह सेतु है जो दोना अधेरो में प्रकाश का काम करती है। लेकिन वही अब उन लोगो स दूर होस्टल मे रह रही है । उसकी सहेली उसके घर माता पिता मे सुखी संसार की छाया दिखाने जा रही है, यह विडम्बना ही तो है जिसके पिता मा से अलग हैं, किंतु यहा भो मा शेप रह जाती है। पिता बेटी के लिए, उसके छुटटी आने तक के लिए, दो हफते के लिए भी अपना नया विवाहित जीवन जीना शुरू करने से नहीं रुक्ना चाहते । लेकिन मा विना पिता के ही अपनी बेटी को सब ख शिया और आनद देने के सपने देखती रह जाती है। यह कहानी पिता और मा के प्यार और ममता का अकन बडी गहराई से परती.
26 विजय चौहान की 'तलाक' में नारी मन की एक अजीब सी मन --~-स्थिति देखने को मिलती है । कहानी में पत्नी ने पति से स्वय ही तलाक लिया है किंतु जब वह यह जानती है कि उसका पूर्व पति विदेश दूसरा विवाह कर रहा है तो अपने वकील से कहती है उसे विवाह से रोके, विवाह न करने दे । वकील दलील देता है कि तुमने तो तलाक ले लिया है ता उसे विवाह का अधिकार है । वह इस ऐतराज के उत्तर मे अगले महीने पासपोट वनवा कर उसके पास जा कर विवाह करने से रोकेगी। वकील कहता है कि इस सबंध म वह स्वय ही पति को लिमे तो वह फिर जजीव सा प्रश्न करती है कि वह कैसे लिख सकती है, उसने तलाक जो ले लिया है । वकील औरत की इस दलील पर और मिजाज पर आश्चय व्यक्त करता है। यही वह स्थिति है जहा नारी को भारतीयता सबधो के मोह के आडे जाती है । केवल पत्नी ही नही, पति भी इन पूर्व सबधो से छूट नही पाता है। इस स्पिति का रेखाका दूधनाध सिह की कहानी "बिस्तर' में मिलता है । कुमार के बिस्तर का उपयोग करने उमका मित्र अपनी प्रेमिका को लाता है जो दो बच्चा को मा है । इसी क्रम मे कुमार को अपनी पत्नी की याद आ जाती है, जो उसे छोड कर उसके मिन राकेश से विवाह कर लेती है । कुमार सारी औरत जात को दाप दता हुआ बुरी तरह अपनी बीवी बच्चो की याद से आक्रात है । तलाक के बाद पुरुष का जो घर अव्यवस्थित होता है उसके घर की जो दुगति है, छोटे से लेकर बडे काम तन, जिनमे बच्चो के काम भी शामिल हैं करने की पीडा जो येलनी पडती है उसको उभारती है । माहेश्वर की 'किसी फूल का नाम लो' पत्नी को अलग करके सकर के बाद सकट आना, पति की नौकरी छूट जाना, आर्थिक अभाव, महगे मकान स सम्ते मकान मे, अच्छे जीवन स्तर स निचले स्तर पर माने की पीडा, 12 वर्षीया बच्ची का घर सभालना, परिस्थिनियो द्वारा उसको एक दिन मे ही मानो बुजुग बना देना, आर्थिक और सामाजिक तनाव उसे बुरी तरह से झकझोर कर रख देते हैं । यह कहानी अपन स्तर पर सशका और विचार अनुभूति मे अद्वितीय है। भ्ख मानव की मूलभूत कमजोरी है । इसी भूख के कारण आज वह जीवित है । लकिन भूख भी दो प्रकार की है-उदर तथा लैगिक । इसमें पेट की भूख जादमी को अस्तित्व प्रदान करती है तो लैंगिक भूख उसका सजन करती है । जहा तक पेट की भूख का सवाल उठता है वह एक पक्षीय है, व्यक्तिगत है, वही लगिक भूख बहुपक्षीय हो जाती है । व्यक्ति के जीवन के आचरण के साथ इसका सवध घनिष्ट है। इस भूख के साथ 2 सजन का दायित्व और परिवार की जिम्मेदारी भी है । स्त्री पुरप अपने आप को दोबारा लाने के लिए समाज के प्रति उत्तरदायी हैं । च कि मानव एक भावुक प्राणी है इस बिए वह उदर की भूख के साथ ' लैंगिक भूख से भी अलग नहीं हो पाता, जो प्रकृति प्रत्त्त है । यदि इस भूख का वह शमन करता है तो वह अ य प्रकार की यौन विकृतियों के रूप में सामने आती हैं। इस भूख के कारण व्यक्ति रूढियो से टकराने लगा और परम्परा की नीव को हिला 27 । स र रख दिया। उपभोग सस्कृति के विकास के साथ साथ आर्थिक दबाव =प से सामाजिक जीवन पर पडा, उसने भी योन सवधों को किसी -प्रभावित अवश्य किया। समस्त क्लाए मनुष्य की इस लगिक भूख से प्रभावित हैं। प्राचीन संस्कृत काव्य मे तो यह सौदय और जान द की मूर्ति बनकर सामने आई है तो कभी वलासिता के रूप मे । आज क साहित्य मे यह भूख अब वितृष्णा और घृणा बाकर आयी है । आज की कहानी ने इस भूख को खुले तौर पर प्रयोग किया है, जिसमे आसक्ति की कमी और विरक्ति का बाहुल्य अधिक है फिर भी इस भूख का शमन न तो उ मुक्त यौनाचार की छूट देने वाले समाज में हुआ है न नैतिकता की दमन कारी व्यवस्था मे | समकालीन कहानी म इस लैगिक भूख को कई प्रकार से उकेरा है। आज के युग मे जहा यौन वर्जनाओ पर पाब दी लगी है और दूसरी ओर जीवन को पूरी ईमानदारी से जीन को सहज दष्टि का विकास हुआ है । इस यौन धम की स्वीकृति यदि पुरुष कथाकारो ने यग्य और मजाक उडाने के लहजे से किया है तो महिला कथाकारो ने इसके मम को पहचान कर बडे ही दद अपनी कहानियो के माध्यम से जिया है। स्त्री पुरुष की काम विषयक भावना का एक मजाक के तौर पर नारी की भावनाओ के साथ खिलवाड किया गया है। नक्नि महिला कथाकारो ने अपने मन की कोमल भावनाआ और अनुभूतियो को बडे ही सशक्त ढग से अभिव्यक्ति दी है । इन क्थानको मे अधिकतर ऐसे पक्ष हैं, जिन पर अभी ध्यान नही गया है या अपनी परपगो मे वधे रहने के कारण उन पर ध्यान देने का साहस नही कर पायी ! आदिकाल की नारी रूढियो के बीच फसी हुई अपनी भावनाओ को दबाती हुई सहजता से अलग होती है, इस स्थिति को नयी कहानी मे रखाकित किया गया है। यौन धम की प्राकृतिक लालसा कहानी मे दो प्रकार से आती है । पहली तो सामाजिर मुहर के अतगत यानि विवाह के माध्यम से और द्वितीय इन बधनों मे बाहर उ मुक्त रूप से काम वासनाओ की तृप्ति । लेकिन एक नारी इन दाम्पत्य सवधो में भी इस लालसा को पूरा नहीं कर पाती, क्योकि उसने एक अनाम भय और लज्जा के कारण भारतीयत्व और गहणी का आवरण अपना रखा है, चाह अनिच्छा से ही । नयी कहानी की महिला क्थाकारों ने इसे बडी खबी से चिंत्रित किया है। उपा प्रियवदा, मनू भडारी, कृष्णा सोवती आदि नयी कहानीवारों ने इस पक्ष को बडी साफगोई से स्वीकारा है। इन महिला कथाकारो ने नारी के अन्तमन को सवेद- 28 . . नाआ का उदघाटन किया है और वह भी अनुभूति के साथ । पुम्प क्याकार तो इस स्थिति को केवल घटना या कल्पना के आधार पर ही लिख सका था, जो वाम नारी ने अनुभुति के स्तर पर किया है वह कल्पना के तौर पर ईमानदारी स सामने पूर्ण रूप से आ भी नहीं सकता था। भारी क्यापारी न इसे यही हिम्मत स उपरा है। इस पक्ति म शामिल सुधा अरोरा, कृष्णा सोबती, मनू भडारी, कृष्णा अग्निहानी, शशि प्रभा शास्त्री, मदुला गग, निरूपमा सेवती, सिम्मी हपिता, मणिका मोहिनी आदि कहानीकारो ने विशेष रूप से अपना स्थान बनाया है। इहान दो ही स्तरो पर नारी को काम विषयक भावनाओ को उभारा है। पुरप कथाकारो ने भी इस विषय पर कहानिया लिखी हैं, लकिन वे बहुत कम हैं, जिनमे कमलेश्वर, कष्ण बलदेव वंद, जगदीश चतुर्वेदी, महीप सिंह, माहेश्वर, अशोक अग्रवाल प्रमुख है। जगदीश चतुर्वेदी की कहानी म उत्तजना का ज्वार उतरते ही अपनी सहयोगी मिसेज़ लाल के गभवती होने में अहसास म अवता, भ्रूण हत्या का तक से उचित करार देता, जीव हत्या के बोध से पीडित होता हुआ अपने ही सच के अतविरोधा से आनात व्यक्ति देखा जा सकता है । मन्नू भडारी की कहानी 'तीन निगाहो की एक तस्वीर' म नारी दशना अपने पति से पूण यौन-सुख नही पा पाती। उसकी अतप्त यौन दशा का चित्रण स्वप्न प्रतीक के द्वारा दिया है, जिसमे दशना को बड़े अजीब से स्वप्न आते हैं जसे "देखा, म छोटी छोटी पहाडि यो की चोटिया से जल के मरने झर रहे हैं, पर फिर भी कही आसपास हरियाली नही, रेगिस्तान ही रगिस्तान है । कोई उस जल को पीने वाला नहीं है, कोई फूल फल उस जल मे मिलने वाला नहीं है । विचित्र सयोग था, जल के किनारे निजन रेगिस्तान । जल की इससे बढकर और क्या निरयकता हो सकती है।' इस कहानी में स्त्री पुरुष के बीच शारीरिक सवधो को स्वीकाय मिला है । जगदीश चतुर्वेदी की कहानी 'मुर्दा औरतों की झील' मे सहज ही प्राप्त किय यौन सुख से उकता कर नीद की गोलिया खाकर सोता है । महीपसिंह की कहानी 'गध' मे लगिक भूख एक विशेष प्रक्रिया के रूप मे देखी जा सकती है। मन्नू भडारी की 'बाहो का घेरा म अतप्त यौन भावना को चित्रित किया गया है। इसम नारी का कहना कि "ये अनभिव्यक्त इच्छायें अव दिन रात उसे मथा करती हैं । किमी को बाहा मे भर कर अपने को उसमे लय कर देने की और उसका सम्पूर्ण पा लने की दुदमनीय चाह एक अभिशाप की तरह उसके मन पर छायी रहती है।" पर अपनी इस भावना को तप्त करने के लिए वह किसी भी पुरप को चाहती है । उसमे एक ही इच्छा शेष रह जाती है ।--दुदमनीय चाह, एक ललक कि कोई हो, कोई भी- जो उसे क्स कर अपने में समेट ले, जिसकी आखों में प्यार हो, यपूणता हो । कम्मो 29 को पाने की पिपासा हो, और अपने को पूर्ण बनाने के लिए वह कम्मो को इतना भीचे कि इतना भीचे कि उसकी हडिडया तक चरमरा जाए, उसका दम ही धुट जाये । भानू भडारी की ही 'ऊचाई मे इस तृप्ति के अभाव में अपने पूर्व प्रेमी के समक्ष सभपण कर देती है, इसम वह काई बुराई नहीं देखती न ही अपने सतीत्व मे कोई दोष देखती है । वह इसे पूरी सच्चाई से एक सही कदम मानती है । दीप्ति खडेलवाल की कहानी 'क्षितिज' म इस काम भावना को स्त्री पुरप के लिए आवश्यक्ता माना है । लेकिन स्त्री ने इसम भावना अनुराग भी मिला दिया है, लेकिन पुरुष का विचार है--"लुक हियर बवी", अगर तुम रवि को पसद करती हो, जरूर उससे शादी कर लो। शादी एक बायलाजिकल नसेसिटी है, बाकी सब प्रेम प्रेम वकवास है।" नायिका का प्रेमी पति भी व्यवहार स इसी नैससिटी का पूरा करता है । वह वेवाक कहता है-"बहुत टेशन है हनी । क्या ओब्लाइज़ करोगी?" इसके बाद पति तो सो जाता है लेकिन पत्नी अपने पति के सबधो के अथ को खोजती रह जाती है। उसमें अपने पति के प्रति एक नफरत या वितष्णा, ऊब सी उत्पन्न हो जाती है। नारी की बदलती हुई विचारधारा भी पुरुष के साथ 2 बदली है । "अच्छा होगा मैं वि से तलाक ले ल , ऐसे ठडे सबध को कैस निभाया जा सकेगा जो विप बुझी सुइयो सा चुभना रहता है, चुभता रहता है जो स्लो पॉयजन सा धीरे-2 मेरी रग रेशो मे उतरता जा रहा है, जो एक बारगी ही ममाप्त नही कर देता वरन मेरी चेतना को अचेत किए देता है ।" इससे स्पष्ट होता है नारी भी अपनी एक अलग पहचान, अपना एक ठास अस्तित्व के होने का परिचय दे देना चाहती है कि वह भी एक जीवित व्यक्ति है, कोई वस्तु नहीं। शशिप्रभा शास्त्री की 'गध' में वह अपना शरीर नकुल को समर्पित करती है क्योकि उसे अपने पति से पूण सतोष नहीं मिल पाया है । वह कहती है- "वह यह सब कहा चाहती थी, पर जब घर का कुआ बिल्कुल ही सूख जाए तो आदमी एकदम प्यासा तो मरने से रहा । कितनी बार मोच चुकी है स्नियो के लिए चक्ले या पुरुष वेश्यालय क्या नही हुए, जहा वे भी स्वतत्रता से जा सकती ? पुरुष और स्त्री की नैतिकता के मानदण्डा मे अतर क्यो ? क्या स्त्री के मन नही है ? उसका अप्य नही है ?" शशिप्रभा की यह कहानी नारी के अतमन की सच्चाई को हमारे सामने लाती है। इस प्रकार नारी की बदती हुई विचारधारा स स्त्री पुरुष सवधो में बदलाव आया है । दाम्पत्य सवधा मे पुनमू ल्याकन की स्थिति पैदा हो गयी है। आज की नारी स्वय को पली, कुलवधु मोर मा के दायित्व के अलावा अपने मानवोचित अधिकार की भी जानकारी रखती है। वह इसके अतिरिक्त मित्र और यक्ति के रूप में भी स्वय को स्थापित करना चाहती है ।
30 . मृदुला गग की कहानी 'कितनी कैरें' मोन सबधो की सीमा का नान कराती है। मीना के मानस पटल पर विवाह से पहले इन सबधो के कारण जो समाज माता पिता के कठोर और कट व्यवहार से जो छवि बन गयी थी यौन सबधो से उसे नफरत सी हो गयी है। वह अपने पति की उपस्थिति से आक्रात सी रहती है। परतु एक दिन भय की स्थिति में ही रहती है-"तुम्ह पा कर मरा शरीर ही नही जगा, मैं भी यह जान गयी कि मैं भी प्यार कर सकती हूँ।" लक्नि मीना के इस विमोचन से पकज के सामने उसका अतीत झकझोरने लगता है-~"क्या मैं उसकी पिछली जिन्दगी के शिकजा से बरी हो सकू गा, इस औरत के साप जी सकू गा ? यही स्थिति एक अ य कहानी 'निश्चय' (कुलभूपण) मे देखी जा सकती है । 'निश्चय' मे उमिला प्रेम के उत्तर दायित्व मे भागने वाले प्रेमी की निशानी को मिटा देना चाहती है । प्रेम में कल्पना लोक से जलग होकर वह यथाय के धरातल पर खड़े होकर साचती है-"अपने दान को वह गुलाबी नही बनाएगी।" वह चिकित्सा सुविधाओ का लाभ उठाकर इस पाप से मुक्ति पा चुकी है। निरूपमा सेवती की कहानी 'सब मे से एक', 'सक्रमण', 'एक और विवाह', मणिका मोहिनी की 'करम की गोट', तथा 'उसका होना न होना' जसी कहानियो मे अतप्त काम भावना के अ तद्वद्व को बडी सूक्षमता से अकित किया है । दीप्ति खण्डेल वाल की यहानी 'आधार' में एक साधक जो नारी और विवाह से दूर भागता है परतु एक नारी के सुगठिन यौवन को देखकर उसके हृदय मे सुप्त काम भावनायें करवट लेती हैं और वह उसकी गुलाबी लस वाली ब्रा चुराकर रात गत भर उसे चूम चूम कर जागता है । व्यथ ही काम भावनाओ का दमन व्यथ है । 'सीमा' में भी पली सीमा का प्रथम प्रसव होन पर डाक्टर की सलाह पर पत्नी से तीन महीने अलग रहने के कारण तपन को बडी ही असहजता का अनुभव होता है लेकिन निर्देशित समय के वीत जाने पर उसे लगता है कि मरे प्राणी का अश कितना सुदर और कामल है। वह व्यथ ही अमामा य हो गया था प्रेम में। दीप्ति की 'वह' मे नीलम का पति उसमे मिलन के चरम क्षणा म पूछता है-"बाई द वे तुम मेरे पहल वितनों के साथ साई हो डालिग" ता वह एक्दम तपाक से उत्तर देती है, "मैंने फोई अबाउर नही रखा, इस हडिगी मरस ।' कमलश्वर की तलाश की विधवा मा वे मन म यौवन की चाह अभी बाकी है और इस सुख की प्राप्ति के लिए वह अपनी युवा बेटी सुम्मि के गनते अपने प्रेमी के साप बाहर जाती है। कमलेश्वर के अतिरिक्त अनर पुरुष क्याकारो की कहानिया 4 पात-पात्रा सोचत हैं.-"हमार जिस्म बागी हो चुके हैं वह कोई भी मन, हम कही भी हो सकते थे। उस समय कोई भी आ सकता था, कुछ भी हो सकता था। बहुत 31 देर बाद', (सीतेश आलोक) मे वीनू के द्वारा अपने पति से कहा जाना वह भी जव, नव कि वह शादी के तीन चार दिन बाद पति के द्वारा प्रेमी से आलिंगनवद्व स्थिति मे देख ली जाती हैं-"ओह कम-कम इतने दकियानूस मत बना । तुम भी चाहो तो किसी लडकी से दोस्ती वर लो मैं बुरा नहीं मानू गी ।" इस क्थन के माध्यय से वह अपनी झेंप मिटा रही है वरना क्या इससे पहले नारी अपने ही पति से ऐसा करने के लिए कह सकती थी । इब्राहीम शरीफ की 'मक्कार' में 'मैं' मित्र की पत्नी और बहन का उपभोग करता है लेकिन इतने पर भी अपने मित्र के दष्टिकोण म वह शरीफ है, लेकिन भीतर से मक्कार होने पर भी वह इस बात पर सतोष व्यक्त करता है कि-"उसने खुद को उजागर होने से एक बार नहीं, कई बार बचा लिया है।" इम पक्ष को लेकर लिखी गई कहानियो यी सख्या कम अवश्य है, लेकिन जो भी लिखी गई हैं उनमे इस पक्ष का बडी पूवी से उभारा और स्वीकारा है। केवल सहज रूप म स्वीकार करके ही इनका मम जाना जा सकता है जो अनुभूति करता है कि यौन धम सचसुच एक आवश्यकता है । जाज का युग और समाज, जिसमे आधुनिक दिखने का प्रदशन करना अच्छा समझा जाता है वही के लोग अपने देश से दूर शिक्षा और नौकरी पाने के लिए विदेश गय हैं। आज भी प्रमुखत पजाब के हर तीसर घर से एक न एक सदस्य काम पाने के लिए विदेश पहुचा हुआ है । लेकिन नयी कहानी में शिक्षा और नौकरी के लिए गय हैं। इस सदभ मे कुलदीप अग्निहोत्री की कहानी संग्रह 'धेरे से बदी है। निमल वर्मा की कहानियो मे प्राग चेकोस्लोवाकिया आदि जसे स्थानों पर रह रहे प्रवासी भारतीया की मन स्थितियो का चित्रण जिसम से वहा रहते हुए खुद का अजनबी महसूस करना, 'एडजस्ट' न कर पाना जैसे कारण शामिल हैं, का चित्रण किया गया निमल वर्मा के अतिरिक्त उपा प्रियवना, सोमा वीरा, सुनीता जन, आदि ने विदेश मे रहते हुए भारतीयो की मन स्थिति का अकन किया है। इसके अतिरिक्त स्वदश वापस लौट भारतीयो की कठिनाई को भी अनुभव किया है। निमल वर्मा की कहानिया विदश के होटल, पब, बार, क्लब, रेस्टा, आदि का मोह जाल बिछा कर भी अदरूनी तौर पर बिखरी हुई मन स्थितियो और समस्याओ से परिचय नहीं करवा पाती न ही उनके पूर्वी पश्चिमी भेदा, मस्कारा को ढोने और छोडन की स्थिति स्पष्ट हा पाती है । इनमे 'लदन की एक रात', 'पराये शहर', 'डेढ इच ऊपर', 'वीक एण्ड' जसी वहानिया ऊपर छूकर निकल जाती है, कुछ सोचने और समझने को मजबर नहीं करती। उनकी सोच स्पष्ट नहीं हो पाती कि वे क्या कहना चाहते हैं, क्या समझाना चाहते हैं उन लोगों के बारे मे जो इन स्थितियो से दो चार हो रहे हैं।
32 उषा प्रियवदा की कहानियो में यह स्तर कई जगह देयन को और समझन को मजबूर करता है । पाश्चात्य देशो म जहा नारी के लिए एक स्वच्छद उडान भरन के लिए भरपूर आकाश है, वहा भी वह अपन परम्परागत सस्वारी को नहीं छोड़ पाती और वेवल वैचारिक स्तर तक ही एक प्रकार से असर ले पाती है। कभी वह नशे की 'ट्रिप लेकर हाई होती है और कभी अपने सस्कारो को महेजन की कोशिश करती है । 'सुरग', 'स्वीकाति' आदि कहानियो में वह दोना सभ्यताओ मै रगे हुए पतिया, प्रेमियों के बीच झूलती है, जो दानो हो है अर्थात भारतीय भी, विदेशी भी। 'मलिया' और 'कोई एक दूसरा' में भी नारी की यही स्थिति है । इस प्रकार यदि देखा जाय तो इनकी कहानियों की नारियो ने खुद को जीने के स्तर तक तो विदेशी रग म ढाल लिया है, लेकिन उसके जैसा बन पाने में कुछ छूट सा गया है । यह दर्शाने की कोशिश की गई है कि भारतीय स्त्रिया विदेश जान पर भी अपन परम्परागत मूल्य और सस्कार नहीं छोड़ पायी है लेकिन वहा जाकर अपने व्यक्तित्व को अवश्य विकसित कर लिया है। सुनीता जैन की इस पक्ष को लेकर लिखी गई कहानियो मे--'कमाई' 'पावती जब रोयेगी', 'परदेस', 'एक और नील की नागिन', 'कुतिया का पिल्ला' जैसी कहानिया मे विदेश में रह रहे भारतीयो की मनोदशा का अच्छा वर्णन किया है। विदेश में विवाह करने के लिए विवश युवक 'पावती जब रोयेगी' मे भारत में रह रही पत्नी को छोड़ देता है, लेकिन फिर भी वह मानसिक स्तर पर उससे अलग नहीं हो पाता और उसे वह सस्कार और परम्परायें याद जाती हैं जिहे पावती निभाया करती थी। उसे पावती का तुलसी पूजना, मनौतिया मनाना तथा विसका कधा होगा, क्पन याद आते रहते हैं। कहानी 'कमाई' मे विदेश प्रवास के जीवन को एक दूसरे ढग से चित्रित किया है जहा कि हम अपने देश भारत मे बठे हुए विदेशो को स्वग और सुविधा सम्पन्न मानते नहीं थकते, तेकिन आशा का वहा जाकर भी घर की बहू सा सुख तो क्या हो मिलता उस पर अपने पारिवारिक सम्स्यो की इच्छाओ, जरूरतो को पूरा करने के लिए अस्पताल मे एक नस सहायिका का काम करना पडता है। इसी के लिए उसे भारत मे शौक से छिद्वायी हुई नाक की लोग उतारनी पड़ती है और जो टागे सदेव टखने तक ढकी रहती थी, उह ही शेव करके स्कट धारण करना पडता है। उसके सामने नब विदश का असली रूप आता है तो उसके लिए बडी दुख की बात होती है । उसका जो विदेश के प्रति एक विशेष आकषण था, एक कल्पना लोक सा सुदर या, वहीं झन से टूट जाता है, वही अब उसे एक दोजय से कम नहीं लगता। 'पिंधर' कहानी मे रेवा विदेश में अपने पति के साप रह रही है । उसने पति जगदीश 33 के किसी अय लडकी से मबध होने के कारण उसके पारिवारिक जीवन मे तनाव उत्पन हो जाता है । इस तनाव से तग गकर वह अपने बच्चो के साथ स्वदेश लौट आती है, कि तु बिना पति के उसे घर मे वह सम्मान नहीं मिलता । उमके बच्चे जा पहन तो 'इडिया' आन के लिए उत्सुर थे, वे दो चार दिन मे इस जीवन से तग आ गय थे। वे अपनी 'पैड मा' से भी नही जुड़ पात भाषा की समस्या के कारण क्योकि उह अग्रेजी नहीं आती। इसी सघष म रवा टूट जाती है । उसके सघष का क्षेत्र बदल जाता है, मन स्थिति नहीं। विदेश से स्वदेश वापस लौटने पर उनकी क्या मन स्थितिया होती हैं इसका चित्रण भीष्म साहनी की कहानी 'हराम जादे' का नायक पहले तो विदश में अकेलापन महसूम करता है और अपने देश भारत की याद आती है। लेकिन भारत लौट आने पर भी उसको अपना जाल धर का पुराना पुश्तैनी मकान टूटा-फूटा लगने लगता है । भाई से भी यह वसा प्यार नही पाता जसा था । क्योकि भाई सोचता है कि वह जायदाद में हिस्सा लेने आया है। उसकी विदेशी पत्नी हलना भी यहा भारत, जो उसके लिए विदेश है, की धरती पर स्वय को अपरिचित और अजनबी महसूस करती है। इसी अपरिचय से तग आकर वापिस विदेश चला जाता है। लेकिन वहा भी अपने बचपन के मित्र तिलकराज से 'ओ हराम जादे' जैसे सम्बोधन सुनने को तरस जाता है। इस प्रकार वह देशी और विदेशी दोनो धरती पर अजनबीपन की पीड़ा से पीडित है। रमेश बक्षी की 'अपरिचय' में अपने देश वापिस आयी नारी को टूटन की मन स्थिति का चित्रण है । लदन में ठडे मौसम के बावजूद नशीले पेय पदार्थो का छूती नहीं और अपनी बेटी को वहा की स्वतत्रता का दुष्प्रभाव न पडे, के कारण स्वदेश वापिस आ कर अपने पूर्व पति के साथ शराब पीना शुरू कर देती है। इनमे भारतीय स्त्री के मूल्य पाश्चात्य मूल्यो से टकराते हैं । इस स्थिति का मूल्याक्न बहुत ही सशक्त ढग से किया है। नयी कहानी इन मब पक्षा को हमारे सामने रखते हुए समाज का जीवन चित्र प्रस्तुत करती है। समाज का एक एक चित्र हमारे मामने इस प्रकार आता जाता है जसे एक फिल्म बनी हुई हम देख रह हैं और नायक-नायिकाओ की मनोदशा और सघर्षों से एक एक कर दो चार होते है और समाज की तस्वीग के कई रख देखते है। जीवन में आर्थिक अभाव का कारणे कभी अतिवष्टि है तो कभी अनावप्टि, इसस देश तो प्रभावित होता ही है, उससे भी अधिक ग्रामीण वग पर प्रभाव पड़ता है, जो सूखा .
- 34 और बाढ से पीडित हाता है । इसके फलस्वरूप इस वग म वीमारियो का प्रसार हो जाता है । तब इस वग के समक्ष सबसे पहले भूख का प्रश्न उठ खडा होता है और तव मानवता दानवता का रूप धारण कर लेती है। सारे के सार जीवन के श्रेष्ठ मूल्य धर के धरे रह जाते है। कमलेश्वर की कहानी 'इतने अच्छे दिन' में इस प्राकृतिक विभीपिका को सवेदनात्मक स्तर पर प्रस्तुति हुई है, जिनमे मानव इस विभीपिका से पीडित होकर एक घिनौना मुखौटा लगा लता है। कहानी का नायक 'बाला' को जब कोई काम नहीं मिलता ता वह मानवीय हडिडया का ही व्यापार करने लगता है । इस परिस्थिति म वह अपने जात्मीयजनो की तथा पशुओ की हडिहयों को भी व्यापारिक दष्टि से देखने लगता है। उसे उनके जीवन से नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद उनकी हडिडया से प्यार है । अकाल, सूखा, बाढ जमी विपत्तिया उसका दानवी और भयानक रूप सामन ला ही देती हैं। वाला को एक बोरी हडिडयों के बदले सवा रुपया चीनी मिल मे मिल जाता है । इस प्राकृतिक विपदा के समय मानव की हड्डिया भी मूल्यवान् हो जाती है। बाला सोचता है कि "गिद्ध और कुत्तं तो लाश को जल्दी साफ नहीं कर पाते, यदि झुलसता तपती धरती के नीचे लाश दबा दी जाय तो जल्दी साफ हो जायगी ।" रात के अधेरे मे कोई लाश को चुरा न ले, इसलिए पहर पर कोमल हृदया बहन कमली को बठा देता है । कमली इम परिस्थिति में ट्रक डाइवरों की सराये म पशा करने लगती है। इस पशे से उस चार पाच रपये तो मिल ही जाते हैं वाला अपनी दादी की हडिडया के बार को चादी के छल्ल से बचाता हुआ मानवीय सोच पर भी चोट करता है, जिसने उम इस स्थिति पर लाकर पटक दिया है । वही व्यक्ति आज मानवीय हडिडया का व्यापारी हो गया है । इन परिस्थितियों के माध्यम से इतने अच्छे दिन' कहानी प्राकृतिक विभीपिका ग्रस्त जीवन की दुखद और शाचनीय स्थिति पर मोचन को मजबूर करती हुई दस्तक देती है पाठक के हृदय में उत्प न हुई वितष्णा का। हिमाश जोशी की कहानी 'जलते हुए डने' म बाढ, सूखा, अकाल जैसी महामारी का चित्रण तो है ही, दूसरी तरफ राजनैतिक अवसरवादिता और सरकारी तब म नितियता, यूठा प्रचार का चित्राक्न दिया है । इम वस्तुस्थिति को प्रमाणित करते हुए--"इस आदिवासी क्षेत्र म भूख म नौ सौ पद्रह लोग मर मरवारी अनाज चोरवाजारी म बिक्ता रहा शहरा में दवाए देखन तक को न मिती । दुर्भिक्ष पीडितो न जुलूस निकाले तो उन पर गालिया बरसाई गयी । उहे विद्रोही करार दिया गया नेता लोग आय और फोटो खिचवा कर चले गय । थान ५ आग धरना दन पालो को चौराहा पर घसीटा गया । आदिवासी औरतो के माय बलात्कार किया गया।' मधुकर सिंह की यहानी 'बाढ' में भी प्रावतिक बाढ़ और राजनैतिक बाढ, जो निदयता और ध्रपटाचार को बाढ है जो कि मामा य जनता को पीसतो है, का चित्रण 35 etc "आदमी और प्रकति की निदयता में कोई फक नहीं रह जाता है । अफसर और क्लक सब के सब यमराज हैं।" इस कहानी की नायिका को "आफिस वालो के जवडे उतने ही भयावह लगते हैं जितने बाढ के।" 'अजनबी सुख' माहेश्वर की कहानी भी इसी विभापिका को रेखांकित करती है । अकाल मे ता उस घरो का जूठा भोजन भी नहीं मिल पाता है-"जब काई खाये तो जूठा बचे । खैराती कभी कमी आन गाव भी निकल जाता। मगर अब कही कुछ नहीं मिलता था। उसे देखते ही लोग दुरदुराने लगते थे । बहुत से लोग गाव छोड कर चते गए थे और रोज जा रहे थे । रात दिन नदी किनारे से चिताओ का धुना उठने लगा था । खैराती को याद नही पिछली बार उसने क्या खाया था । कुछ दिन वह जामुन के पत्ते तोड कर लाता और नेट कर चवाया करता ।' इस यातना का वरण और अमानवीय रूप ता तव देखने को मिलता है जहा गाव से बाहर टूटी फूटी झापडी म फेंके गये खैराती को उसकी कुतिया अतिम घडियो में खाती है और उसका मालिक खैराती यही समयता है तथा इस अनुभूति को लेकर मरता है कि कुतिया उमसे प्रेम कर रही है। परिस्थितिया इतनी दूर हो जाती हैं कि कुत्ता जसी वफादार जाति भी अपने मालिक को खा जाती है। इस प्रकार नयी कहानी न प्राकृतिक विपदामा बाढ, सूखा का चिनण तो किया ही है साथ ही इससे उत्प न भूख, बीमारी, गरीबी जैसी यनणाओ का भी सजीव चित्रण किया है। आज के भौयोगिक युग मे नारी विवाह के आधार का मातत्व नही मानती और न ही मातत्व म पूगता जैसे प्राचीन मूल्य मे विश्वास रखती है । तकनीकी सभ्यता ने उसकी सवेदनाओ को जग लगा लोहा बना दिया है । उसके हदय म मातत्व जैसी भावनायें एक ढकोसला और पिछडापन बनकर रह गयी हैं । 'टेस्ट ट्यूब बेबी' युग नारी मानत्व के गुणो को frस सीमा तक अब सुरक्षित रख पायेगी यह कहना कठिन है । आज के आर्थिक युग मे जब अभिभावक रात दिन पैसा कमाने के लिए पिले हुए हैं, क्या वही नारी मातत्व का बोझ सहने को तयार होगी? क्योंकि आज की नारी उच्च शिक्षित भी है । लेकिन उच्च वग से सम्बद्ध नारी को भी मातृत्व बोझ लगता है यह मानना पडेगा। क्योंकि नारी को इससे अपनी स्वतत्रता का बलिदान करना आवश्यक होता है। निरूपमा सेवती की कहानी 'तलफलाट' को नारी मातत्व को बोझ मानते हुए भी सत्तान के प्रति आकर्षित है । वह कहती है-"क्या बिटटू मेरी नौकरी की वजह से मेरे पास नहीं रह सकता ।" लेकिन आर्थिक सामथ् य को भी वह बहुत - 36 आवश्यक समझती है। शायद सतान से भी अधिक-~वह कहती है कि वह बच्चो को जीवन म "कुछ बनाने के लिए ही नौकरी कर रही है ।" इस प्रकार वह नारी मातृत्व के स्वीकार और अस्वीकार के बीच लटकी हुई है। 'ढाई आखर प्रेम' में नारी एक ओर तो पति द्वारा तलाक लेने पर और बच्चे छिन जाने पर स्वयं को मुक्त अनुभव करती है और दूसरी ओर अपनी मन स्थिति का वणन करती हुई कहती है--"बच्चे के लिए मैं इतनी व्याकुल हो उठनी हू विनियोग से सतानोत्पति की बात तक मोच जाती!' राजी सेठ की गलत होता पचत' मे नारी बच्चे के आने को अपने व्यक्तित्व के विकास को रुकावट मानती है। "बच्चे के आने से पहल वह जीवन मे कुछ करना और बनना चाहती है। इसीलिए वह पनि अजीत से लडती है।" कभी कभी नारी आर्थिक अभाव के कारण भी मतान की इच्छा नहीं रखती। सूयवाला की कहानी 'गुमनाम दायर म एक ऐसी नारी का चित्रण किया है जिसकी वेटी 'हास्टल में रहती है और पति अपने काप मे व्यस्त रहता है, इस पर पली, पति से एक और सतान का प्रस्ताव रखती है। लेकिन पति बहुत ही उपक्षा से कहता है "एक और बच्चे का मतलब है-थी हडेड पर मथ । इ पासिविल अभी ही पूरा नही पडता।' इस प्रकार के आर्थिक अभाव के कारण भी नारी अपने जीवन मे मातत्व का बोझ उठाने में असमथता का अनुभव करती है । वह चाह कर भी अपनी इस अभिलाषा को पूर्ण नहीं कर पाती। इस प्रकार इस विषय को लेकर लिखी गयी कहानियो मे इस दष्टिकोण को कई कोणा से उठा कर सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है। नयी कहानी में नारी इस विषय पर स्वीकार और अम्वीकार के बीच उलझी हुई है । कहीं वह इस मार को उठाने को तैयार हो भी जाती है तो आर्थिक मजबूरी उसके सामने मुह बाये खड़ी हो जाती है । दूसरी ओर एक अथ सम्पन नारी मानत्व को अपने विकास और स्वतत्रता मे वाभ मानती है । लेकिन पारम्परिक रूप मे तो युग युग से नारी का हृत्य मातृत्व प्राप्त करने को उत्सुक तो रहता ही है। विशेषकर मध्यमवर्गीय नारी तो पुत्र मुख देखन का लालसा सजोये ही रहती है। लेकिन उसकी मजबूरिया उसकी राह में बाधक बननी है, इसमे कोई सदेह नहीं। नयी कहानी मे आज के कहानीकारों ने बूढी पीढी के विषय म बहुत ही पम लिखा है यदि लिखा भी है तो उसमे खुद को ढ ढने की कोशिश कम है, बढती हुई सवधों की दूरी और अमानवीयता ही अधिक चित्रित की है। इसलिए बूढी पीढी के प्रनि एक उपेक्षा और क्रूरता का भाव बराबर अपनी ओर ध्यान खीचता रहा । लकिन बाद के समय के कहानीकार जो समकालीन कहानी के ही हैं उहोंने इस ओर अधिक ध्यान दिया है। - 37 , जिन कहानिया में पुरानी पीढी के एकाकीपन और जिन्दगी से क्ट जाने का दर्द चित्रित किया है, उनम राकेश वत्स की 'बटवारा', सूयवाला की निवासित , अकुलश परिमारी की 'दुलक्ती ओस', अचला शर्मा की खल नायक' श्याम ब्याम की 'डेथ क्लीनिक', दिनश विजयवर्गीय को 'खोया हुमा सुख, रणजीत कुमार साहा की 'बरामदे पर' आदि कहानिया उल्लेखनीय है । इनके केद्रीय पात्र अपनी रोजमर्रा की जरूरतो के लिए भी अपने बेटो पर आधित हैं, वही बेटे, जिनको उनके पिताओ ने अपना तन पेट काट कर उनकी सारी सुख सुविधाओ को पूरा किया और पढाया लिखाया, आज उन्हीं के जीवन म जपने ही पिताआ के लिए कोई स्थान नहीं है, न ही उनकी जरूरतो का उनके लिए कोई मोह है, उह वै पिछड़ा हुआ और असभ्य मानते हैं। सूथबाला की 'निर्वासित' मे माता पिता अपने बड़े बेटे राजन के बुलान पर अपना पैतृक घर किराय पर उठाकर उसकी अफसरी की छाया में 'पुलाव पकोडी' उडाने चल देते हैं । लेकिन जब वे वहा पहुच कर माजी का रामेश्वरम् वाला फोटो छिपा दिया जाता है तथा पिता जी को जोर से पाठ करने के बजाय उनको मन ही मन म पूजा करने का निर्देश दिया जाता है और दोस्तो के आन पर उह घर में ही रहने का थादेश दिया जाता है तो बूढे दम्पति अदर ही अदर टूटने लगने लगते हैं । उहे अपना वही पुराना मकान याद आने लगता है । वे उन उदास दिना को ज्यादा से ज्यादा एक दूसरे के करीब रह कर अखबार वेवजह पढ कर और माला फैर कर बिता देना चाहते है । सबसे बडा धक्का तो वह तब लगता है जबकि दोनो बेटे अधिक खच की दुहाई दे घर मा बाप तक को बाट लेते हैं । “अब जब दो बटे है तो एक ही दोनो का सच उठाये, ठीक नहीं लगता न " अलगाव की इस पीडा मे सतप्त पिता की "कापती उगलियों में कस कर अखबार और माखो मे कौच युगल की मूक पीडा थी, जिसे देखकर विसी आदि कवि का कोमल हृदय करूणा की अथाह लहरियो में वह चला मा निशाद प्रतिष्ठा त्वमगमह शाश्वती महा ।" यही स्थिति राकेश वत्स की 'बटवारा' कहानी मे दष्टिगोचर होती है। इसम गाव का पुराना मकान व दिया जाता है और बेट अपनी अपनी सुविधानुसार मा बाप को बाट लेते हैं । अकुलेश परिसारी की कहानी 'दुलकती ओस' का शेरू अपने बटों से अपमानित होने के बाद भी उनसे अपनी तरफ से तो सबध नहीं तोडता बल्कि उहे बच्चा समझ कर उनके कठोर व्यवहार को माफ कर देता है। वह 'नरेटर' से कहता है--"जो भी अभागा बाप होगा छोटे सरकार, वह अपने आप को ऐसे ही छलावा में छल कर अपन शेष दिनो को उसका बेटा बीरू उसे अपने पास दुवारा आने से मना कर देता है, क्याकि पट पुराने कपड़े पहनने वाले बाप से उनकी इज्जत पर था करेगा।
38 फक पड़ता हैं । "वह अपने उन आने जाने वालो को कैसे समझाये कि फटे पुराने चिथडे पहनन वाला आदमी उसका अभागा बाप है ।" इस प्रकार शेरू अपनो के ही वीच पराये हाने की तकलीफ झेलने को विवश है । अचला शर्मा की कहानी 'खलनायक' वा पिता भी निर्वासन झेल रहा है। यही स्थिति मणिका मोहिनी की 'दूरियो के बीच' में भी है। इस प्रकार अशोक अग्रवाल की कहानी कोई एक घर' मे पुत्र अपने पिता को एकाकीपन और आत्मनिर्वासन की स्थिति म पहुचते देख कर डुखी होता है जबकि उनकी इस स्थिति का जिम्मेदार वही है। जबकि वह इस स्थिति का आकाक्षी था, लकिन फिर भी वह इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता । द्विजे द्रनाथ 'निगु ण' की कहानी मे भी यह स्थिति बहुत क्रूण है । बहू की वेरुखी और उपक्षा सोभू के पिता को भीतर तक चीर देती है। तब और भी जब उसके कापते हाथो से कप प्लेट टूटते हैं तब बहू बहुत क्कश स्वर म कहती है-~"लो मरे इस खूसट ने बैठ विठाये कप प्लेट भी तोड दिय । बूढे का शौक तो देखो मरा पीतल के गिलास से ता चाय नही पीता। और देखो मरा बठे बिठाये एक बडल बीडी सुक सुक करके पी जायगा ।" ऐसी अपमानजनक स्थितियो से बचने के लिए वह बेंत म कृपे खजर खुद को खत्म कर देना चाहता है। सचमुच पिता की स्थिति दयनीय है। श्याम व्यास की कहानी 'डेथ क्लीनिक' बूढे वग का एक सशक्त उदाहरण है । आर्थिक दष्टि से मम्पन होने पर भी कहानी का युवा वग बूढ और फालतू पिता को नहीं रखना चाहता। पुनी अपर्णा टेलीग्राम से कहती है--"डंडी, सबका ‘टालरेस' पूरा हो गया । आप का भी और हम बच्चो का भी 1 वेहतर है, जब क्लीनिक को स्वीकारें।" अतत जव पापा 'डेथ क्लीनिक' जाने यो तैयार यानि मृत्यु का आलिंगन करने को तत्पर हो जात हैं तो सुनील और अपर्णा के तार "पापा इज़ सो नाइस एप्रिशिएट हिज डिसीजन निममता की चरम सीमा तक पहुच जाते हैं। सुरश उनियाल की कहानी 'योदा' मे बेरोजगार पुन द्वारा सिगरेट पीने पर उसका पिता दुखी जरूर हाता है, लेकिन कुछ कह नहीं पाता। व प्रकाश से केवल यही कहते हैं-"अगर तू चाहता है कि मैं कुछ और जी सकू तो कभी ऐसा काम मत करना, जिससे मेरा दिल दुसे।' फिर भी पुन अपनी इस हरक्त को छोड नही पाता । जबपि वह ऐसा न चाहते हुए भी करता है । नयी कहानी मे कही बूढो की दुदशा की जा रही है का चित्रण है तो कही युवा पीढी द्वारा वलात निर्वासन । इनमें बूढा के मन स्थिति का वणन और आतनाद भी सुनाई पड़ता है। महानगरो में निवास करने वाले व्यक्तियो का जीवन विस प्रकार से उक्ताहर और एक ही ढरें और नीरसता से परिपूर्ण है, इस स्पिति को नयी कहानी ने बहुत हो सम्लता मै उभारा है। उपा प्रिय ददा की कहानी 'छुटटी का दिन' म माया अपने .
39 परिवार में अलग दूर नौकरी करती है। धोने के लिए डाले गये ब्लाउज का र दूसरे कपडो पर लग जाने से उसके जीवन पर छायो अब और एकरसता उघड जाती है। उसे लगता है उसकी ज़ि दगी का पैटन भी बिगड गया है। उसके समस्त आकपक रग निकल चुके है और जिदगी रग निकले कपडे के समान ही भद्दी हो गयी है। निमल वर्मा की कहानी 'परिदे की नायिका लतिका भी जिदगी की इस कब और नीरसता से निकलना चाहती और किसी परिवतन की आशा रखती है। इसी प्रकार डा० हयूबट भी इसी स्थिति के शिकार है । शरण बधु की कहानी 'कुत्ते' मे भी इस ऊब की स्थिति को रखाकित किया गया है। कहानी का नायक अनुभव करता है कि जिन्दगी के सारे सदभ धीरे धीर खोते जा रहे हैं और खोखलेपन के सिवा वहा और कुछ शेष नहीं है " “यहा हर आदमी टूटी हुई जि दगी की प्रयचा से फिसने हुए उस तीर की तरह बेलाग होकर दौड रहा है, जिसका काई मतव्य नहीं।" कही कही यह अब अथ समस्या से भी उपजी हुई है, जिससे जीवन में कोई भी अथ टू ढना व्यथ हो जाता है। प्रणव कुमार वद्योपाध्याय की कहानी 'अर्लक्जेंडर' म व्यक्ति का यह कहना कि-"फैड जप हा गा हो तुम । लेकिन निल्ली शहर बुरा नहीं है", इम ऊब और एकरसता को ही उघाडता महानगरीय जीवन जीने वाले व्यक्तियो के जीवन मे इस अब और एकरसता का एक बहुत बड़ा कारण समाज में एक दूसरे से मिलना जुलना न होने के कारण भी पैदा हुआ है, क्योकि पैसा कमाने की आपाधापी और जगहो की दूरी उह एसा करने की इजाजत नहीं देती। यदि वे ऐसा करना भी चाहे तो परिस्थितिया उह रोक्ती हैं। इसीलिए महानगरा से अधिक आज भी कस्बो मे यदि वे वही रह गय हैं तो, आज भी आत्मीयता मिल जाती है, क्योकि उनके पास कुछ समय बाकी है, जिसे वह चौपालो में बैठ कर एक दूसर की बात सुन सकें, जिससे उह नित नयी घटनाओ के पता लगत रहने 4 कारण सोचने के लिए कुछ और भी मुदद मिल जाते हैं । लेकिन महानगरो में ऐसी स्थिति सभव नहीं है। इस स्थिति को समकालीन कहानी में कहानीकारो ने सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की है। समकालीन कहानी का पुरुष यदि स्वतत्रता चाहता है तो नारी भी इसके विरोध स्वरूप इस प्रकार की स्वतनता और आधुनिकता की ओर नहीं देखना चाटती। उसे अपना वही पुरातन परम्परागत नारी का शालीन रूप अच्छा लगता है। यह बहुत अधिक आधुनिक जीवन जीना नहीं चाहती। वह किसी पार्टी, मद्यपान, डास पाली सस्कृति नही अपना सक्तो । इन सव परिस्थितियो में स्वय को मिक्स या 'एडजस्ट' नहीं कर पाती और 'अन ईजी', महसूम करती है । आज नई कहानी की नारी इस दहशत सी घबराहट भी 40 सस्कृति से अपनी मस्कृति और परम्परा की ओर लौटने को उत्सुक है । मृदुला गग की कहानी 'तुक' म पति के जोर देन के बावजूद भी पत्नी ताश, विज का खेल और उसम पचि लेना नही सीख पाती तो उसे लगता है, "मैं इस युग म मिसफिट हू।" 'दुनिया का कायदा कहानी की पत्नी रक्षा का भी यह क्लब जीवन, डाम, कंबरे जादि कुछ भी अच्छा नहीं लगता । डास मे उसके पति सुनील मिसेज मेहता से उनये हुए हैं और 'मिस्टर मेहता, डास के बहाने रक्षा के माथ 'स्वतग्रतायें' अपना रहे हैं और "रह रह कर वह अपने से पूछती गयी कि आखिर वह यहा से चली क्या नहीं जाती ?" कितु पति का यह कहना कि "तुम बहुत असहिष्णु हो । नाचने मे थोडा बहुत यह सब चलता ही है।" उसे चौंकाने वाला उत्तर लगता है । वैवरे दखत हुए "इस वीभत्म विक्षिप्त माहौल के बीच एक ओर उसकी अपनी विवस्त्र देह याचग करती घूम रही है।" 'अनावत कौन' राजी सेठ की कहानी म भी पत्नी को कवर दखने जान से होती है, मुझे कबर में जाने से डर लगता है " "मुझे लगता है, मैं ही अनावृत हुई जा रही है।" समकालीन कहानी में ऐसी नारी की स्थितियो और क्लब सस्कति के पीछे छिपी असलियत को सामने लाया गया है । वह ऐसे जीवन को स्वीकार न कर पाने के कारण पूणत आधुनिकता की श्रेणी में नहीं आ पाती । उस नारी के सस्कार उसे यह मव स्वीकारने की प्रेरणा ही नहीं देते । नारी का एक ऐसा भी रूप है, जो न तो पूणत प्रेमिका बन पाती है और न ही मा । यह स्थिति नब आती है जबकि वह युवा तो होती है, परन्तु अपने पति के तलाक लेने या मत्यु हो जाने के कारण उसे किसी पुरुष की आवश्यकता होती है । लेकिन अपनी सतान के भय के कारण वह पूणत इस बात को व्यक्त नही कर पाती, भय के कारण । यदि वह एसा करती भी है तो बच्चो की अवमानना पाती है। इस ऊहापोह मे वह झूलती रहती है। कभी वह बच्चो की तरफ झुक जाती है तो कभी प्रेमी की तरफ । और यही से शुरू होता है आत्म सघष का एक अतहीन सिलसिला । समकालीन कहानी में नारी के इसी सधप को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है । मोहन राकेश की कहानी 'एक और जिदगी' म तलाक के बाद सतान प्रेम को लेकर कहानी लिखी गयी । लेकिन सवसे भावपूर्ण कमलश्वर की कहानी 'तलाश' है, जिसम ममी एक प्रौढा है और 40 वष उन है । वह चालीस की होने पर भी चालीस की नही लगती और अपनी बेटी की मा न दिखते हुए बडी बहन ही दिखती है । उसके जीवन में अभी प्रेम का रग बाकी है । इसलिए वह अपनी युवा वेटी मुमि की जानकारी में अपने मित्र चद्रा के साथ कालेज के काम के बहाने बाहर जाती है। उनके सुख और शाति के लिए सुमि उनके साथ पुरखिन की तरह व्यवहार करती है । इसी प्रकार मनू भडारी की बहानी 'बद दराजो' का साप । में नारी में और भी अधिक साहस है। अपने प्रेमी, पुत्र के प्रेम का तुलनात्मक अध्ययन करने पर प्रेमी को ही अधिक महत्त्व प्रदान करती है। "तब उसने दो निर्णय एक साथ लिय थे । वह असित को होस्टल भेज देगी। वह अपना अकेलापन समाप्त करने के लिए सही और स्वाभाविक माग ही अपनाएगी ।" वह वेटे की खुशी और सुख के लिए अपने प्रेम का बलिदान करना नहीं चाहती। वह एक ऐसी दिशा की ओर बढी है, जिसम नयी कहानी वी नारी नहीं बढ़ पायी थी। इस दिशा मे यह उसका पहला पदम है। लेकिन जरूरी नहीं है कि हर नारी अपने सुख, सतोप के लिए ऐसा साहसी कदम उठाय । ऐसी बहुत सी नारिया है जो अपने बच्चा के सुख के कारण अपनी इच्छाओ, माकासामओ की हत्या नही कर सकती । शशिप्रभा शास्त्री की कहानी 'धुली हुई शाम' मै नारी का यही रूप दिखाया गया है, जिसमे वह अपनी स तान के सुख के लिए अपने प्रेमी को छोड देती है । सीमा विधवा होने के 15 वर्ष वाद सिहा बाबू के प्रेम मे पडती है । लेकिन अपने किशोर उम्र के बच्चो की युझलाहट और उपक्षा, अपनी ही बेटी शोभा द्वारा सिहा बाबू को लकर कहे गये अपमानजनक व्यग्यपूण ढग से कही हुई बातें उसका एक एसे निणय पर ले जाते हैं जहा अतत वह अपने प्रेमी को छोड देती है । इसका अप यह नहीं कि वह आदश मा है ही नहीं, लेकिन कभी 2 परिस्थितिया और परिवेश उसे ऐसा करने पर विवश कर देते हैं कि उसको वह राह छोड ही देनी पड़ती है, जहा उसने अपनी अभिलापाओ की पूर्ति के लिए कदम रखा था । मह त्याग कभी उसे बच्चा की खुशी के लिए करना पड़ता है और कभी स्वय को ऐसी अपमान जनक स्थिति से बचाने के लिए जहा उसके बच्चे ही उमका तिरस्कार और व्यग्यपूण लहजे म अपमान करने लगे। कृष्णा अग्निहोत्री की कहानी 'ऑक्टोपस' म भी मा ऐसी ही परिस्थितिया मे फमी हुई है। उसकी युवा होती बेटी की सोच के बारे में चितन करती है-"नीता को इस अकलो से बेहद कम होती है। मवसे उसने होश सभाला है उसके इद-गिद इन अक्तों की भीड लगी रही है। इन अक्लो के कारण ही घर मे क्लह और झगडे होते रहे हैं।" इस सोच स दुखी होकर आखिर मम्मी यह सोचने पर विवश हो ही जाती है कि वह अब किसी अकल के कारण अपमानित ही होगी। वह इस अपमान और ऊब, कलह से बचने के लिए अपना अलग रास्ता बना लेती है । इस प्रकार नयी कहानी में नारी कही मा के रूप मे उलझनपूण परिस्थितियो म फसी हुइ है तो क्ही प्रेमिका के रूप मे। दो भागा मै वटी हुई ऐसी नारी को कही न कही समझौता तो वरना ही पड़ता है चाहे वह पारिवारिक स्तर या कही दायित्व बोध के कारण। समकालीन हिदी समाज में नारी की स्थिति में आये परिवतन का सबसे बड़ा -~- 42 कारण है पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर नोकरी करना और धन-अजित करना । इससे नारी की मानसिक प्रवृति, स्थिति, स्वातन्य और प्रेम म बहुत बड़ा परिवतन सामने आया है जिससे यह अदर तब टूट गयी है। शाम को जब वह थकी हारी घर लौटती है तो उसे घर की समस्याआ से उलझना पडता है। परिवार वे सार सत्स्य उससे कुछ न कुछ अप पायें लगाये रहते हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने उसकी अपेक्षाा के विषय म भी सोचने का प्रयास किया है ? पर हो, या नौकरी करन का स्थान, हर जगह उसे मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। लेकिन ऐसी हालत मे भी उसे परिवार और आफिस म सभी को अपन अपने वाम से संतुष्ट करना पडता है। इस प्रकार के तनाव और सपप को झेलती हुई नारी को आज के यहानीकार में बहुत सशक्तता से अभिव्यक्ति प्रदान की है । ऐसी नारी को बड़ी सजीवता म जीवन प्रदान किया गहा है। इम व खला मे उपा प्रियवदा को महानी 'सवय' में ऐसी नारी की व्यथा को चित्रित किया है, जो अपने परिवार को पोषित करने के लिए ही, करते करत टूट चुकी है । म न भडारी की कहानी 'ए खाने आवाश नाई' की नारी सुपमा यही सोचती रह जाती है कि "घर थोडा जम जाये तो वह अपने लिए भी कुछ सोचे क्याकि परिवार म कोई लौर तो उसके विषय में मोचना नहीं चाहता और जब वह अपने लिए उपयुक्त साथी पार विवाह को घोषणा करती है तो घर मे कुहराम मच जाता है।" इस प्रकार की कलह म विवाह तो कर लेती है लेकिन थोडे समय बाद घर में रहने के बाद वह पति के घर जाती है तो वहा भी नौकरी के कारण ही ससुर, ननद, देवर की जरूरता का पूरा करने का भरसक प्रयास उसे तोड देता है । वह जिस सुख शाति को बरसो से खोज रही थी, उसे वह विवाह के बाद भी नहीं मिल पाती है । यह दुख, व्यथा सिफ सुपमा का ही नहीं है, आज भारत में रह रही कितनी ही नारियो का दुख है । आज भी कितने भारतीय परिवार की स्त्रिया अपने परिवार को पालने में अपना जीवन स्वाहा कर रही हैं। 'योग दीक्षा' राजो सेठ की कहानी में एक ऐसी नौकरी करने वाली लडकी का दुख चित्रित किया है, जिसमें वह अर्थाभाव के कारण परिवार का पालन करती हुई यातना की अधी खाई मे यातना झेल रही है। वह अस्वस्थ भी रहती है और कोई भी काम ठीक से नही कर पाती इसलिए, इस पर भी वह काम करने को विवश है। चाहे वह शारीरिक और मानसिक रूप से समय हो या न हो। निरूपमा सेवती की कहानियो --कामकाजी स्त्री को समाज में जो पुरषो को गिद्ध दृष्टि का शिकार होना पड़ता है, व्यग्यवान सहने पड़ते हैं, उनके उपहासो और घिनौने प्रस्तावों को हसते हसते सहन करना पडता है, का बहुत बारीकी से अध्ययन 43 SNA करते हुए उसकी समस्याओ को उभारा है। इनमे 'सबमें से एक', 'पदमुष्टि' 'तनफलाहट', 'मा यह नौकरी छोड़ दो,' आदि कहानिया अपनी बात को बड़े प्रभावशाली ढग से यहती हैं। 'सय मे से एक' यहानी को नारी वो नौकरी करने से जो कुछ भहन वरना पडता है, उसके कारण उसका नौकरी करना मुश्किल हो जाता है। वह इन मव परिस्थितियो से बहुत तग आकर निणय कुरती है कि अपने प्रेमी के पिता के स्टूडियो मे "यूड मिटिंग' देवर पैसे कमाएगी। लेविच बहानावग्रस्त इसलिए है कि वह अपने वतमान प्रेमी को अपना अतीत नहीं बना सवतों क्योय ऐसा करने पर वह उस छोड देगा। लेकिन पहल तो वह एसा करने के लिए सोचती है कि वह पूरी ईमानदारी से अपना अतीत बता देगी। लेकिन इसके फलस्वरूप होने वाल परिणाम उसे दहला देते हैं । इस प्रकार वह दोनो स्थितियो को झेलती हुई अन्तद्वद्व की स्थिति म अपना जीवन गुजार रही है । निरूपमा सेवती की कहानी 'बदमुष्टि' मे वह नारी होटल रिसेप्शनिस्ट के रूप मे एक होटल मे काम करती है । वह अपने होटल के ग्राहनो से 'सो सोके छ पत्ते' इसलिए पाती है कि उनकी द्विअथर वातो ओर अश्लील कटाक्षों को बर्दाश्त करके भी मुस्कराय, उसे वह महमास बहुत सालता है, "सुदरता और तगहाली साथ साथ हो तो इससे ज्यादा मुसीबत दूसरी नहीं है।" नौकरी करना उसे तब और कष्टदायक लगता है, जब परिवार में भी उसे अपेक्षित सुख नहीं मिलता। समकालीन कहानी के कहानीकारो न भय से त्रस्त और आतकित, आज के मानव को वडी सजीवता से प्रस्तुत किया है । एक ओर जहा एक विशेष वग का व्यक्ति साधन सम्पन और हर दृष्टि से समय है, वही उसमें एक प्रकार का भय और आत घर कर गया है, जिससे वह लाख चाहने पर भी दामन नहीं छुडा पा रहा है । कमलेश्वर का कहना है कि-"आज का मनुष्य आस न सकट और अपनी सश्लिष्ट परिस्थितिया की ओर अभिमुख है। उसके अस्तित्व के लिए अणुयुद्ध और मौत का ही खतरा नहीं है, यह मौत तो बडी बेकार और क्रूरता से भरी अद्ध प्राकृतिक या अप्राकृतिक मौत है। इससे भी बडी दारूण मौत एक और है-वह आदमी के अपने विचारो, जीवन-स्रोता, स्वाधीनता, निणय शक्ति और जीवन तन्तुआ की मौत है । भयावहता तो इसी मौत की है। सत्रास और यातना भी इसी मौत के कारण है।" यह निर्विवाद सत्य है कि विज्ञान ने हमे एक से एक अमूल्य देन प्रदान की है। वहीं जीवन के प्रति एक अनिश्चि तता भी प्रदान की है। आज का व्यक्ति मृत्यु के प्रति विशष रूप से आतक्ति है। आज का व्यक्ति पुराने विश्वासों, आस्थाओं को लेकर भी डरा हुआ है। वह अपने ही बनाये विश्वासो से सनस्त है । रमानाथ अवस्थी के विचार आज के व्यक्ति के विषय में हैं कि- 44 भीड में भी रहता हूँ वीरान के सहारे जैसे कोई मदिर क्सिी गाव के किनारे। कभी वह विचारा की भीड म अकेला पड जाता है, कभी सभा की भीड मे, कभी सडक और बाजारों की भीड म, इस भीट में उसे हमेशा एक डर बना रहता है कि कही वह किसी मोटर गाडी के नीचे न आकर दव जाय, काई उसे कत्ल न कर दे, कब उसके विचारों की हत्या हो जाये, कोई निश्चित नहीं है, कुछ पता नहीं है, बब क्या हो जाए। मनुष्य का इस प्रकार इन सब तत्वों से प्रभावित होना सहज ही है । इसलिए इस प्रकार का व्यक्ति उठ कर आज की कहानी में आ गया है। निमल वर्मा ऐस व्यक्तिया को चित्रित करने वालो म सबसे पहले कहानीकार कहे जा सकते हैं । डा० शिवप्रसाद सिंह का कथन है-"आतक का वास्तविक रूप सिफ एक कहानी में मिलता है और वह कुछ दूसरी त्रुटियो के बावजूद निमल वर्मा को सफल और श्रेष्ठ कृति कही जा सकती है । कहानी है-'लदन की एक रात' । इस कहानी का आतक वाकई किसी अदृश्य नियति से प्रेरित है, जहा अबोध निरपराध इसान बलात अपराधी बना दिया जाता है । यह व्यक्ति व्यक्ति का आतक होकर भी समूची मानव नियति का 'आतक' मन जाता है । 'लदन की एक रात' का आतक सच्चा है, क्याकि वह वण विद्वेष से अमानवीय रूप से जुड़ा हुआ है। यह जाड या सबध अरूप है, कही इसकी चर्चा नहीं है । क्योकि आतक कभी भी स्पष्ट कारणो से जोडा नही जा सकता। वावजूद इसके इस आतक में आत्मा और शरीर को झिंझाड देने की पूरी शक्ति है । यह अदश्य आतक पहली बार स्थूल रूप में सामने आया है।" डा० सिंह का कयन निमल वर्मा की कहानी के सदभ म पूरा उतरता है । निमल वर्मा की कहानी 'लदन की एक रात' के पात्र सचमुच इसी आतक के शिकार हैं- "मुझे याद कुछ नही, सच पूछो तो मुझे यह नहीं मालूम कि मैं स्वय चिल्लाया था या काई बाहर की चीख मुझे सहसा झिझाड गयी थी। मुझे सिफ इतना भर लगा कि मेरी सास एक अधै चिमगादड की तरह मेरी छाती की दीवार से टकराती हुई बेतहाशा फडफडाने लगी थी निमल वर्मा की ही कहानी 'लवस' म यही हर दूसरे कोण से रेखाकित हुआ है- "उस शाम एक धु धली सी आकाक्षा आयी थी और मैं हर गया था। लगता है, आज वह डर हम दोनो को है । गेंद की तरह कभी उसके पास जाता है, कभी मेरे पास । वह अपनी पवराहट दबाने का प्रयत्न कर रही है, जिसे मैं नहीं देख रहा।"
45 इसी प्रकार उनकी कहानी-'अधेरे मे' के बच्ची को यही बात आतंकित किए रहती है कि जिनके कान छोटे होते हैं वे बहुत जल्दी मर जाते हैं-बच्ची कहता है- "उनके कान बहुत छोटे छोटे हैं, गुडिया के बानो से जिहें वे अपने बालो के भीतर छिपाए रखती हैं। जब कभी वे मुझसे सट कर लटती हैं, तो मैं उनके कानो को बालो के भीतर से निकाल लेता हूं। मुझे वानो की बात याद आती है, और सारे शरीर में एक हल्की सी झुरझुरी फैलन लगती है। जिनक कान छोटे होते हैं," बानो ने एक दिन कहा था, वे लोग बहुत जल्दी मर जाते हैं ।" मैंने यह बात मा को नहीं बताई है, सोचता हू, जब वह मरने लगेंगी तो कह दूगा कि वह अपने छोटे छोटे पानो की वजह से ही मर रही हैं।" निमल वर्मा की ही कहानी परिदे के दो पात्र मि० मुकर्जी और मि० ह यूवट भी अपने-अपने कारणो से भयभीत और आतक्ति हैं । डा० ह.यूबट को लगता है कि वे किसी दिन इसी प्रकार अपनी बीमारी का झेलते हुए एक दिन मर जायेंगे । कमलेश्वर ने श्रीकात वर्मा की कहानी 'ठण्ड' की व्याख्या करते हुए कहा है-- "यह कहानी नितात देशीय परिस्थितिया से उपजी है सड़कें, दुकानें, माहोल और सर के लिए निकला हुआ परिवार सभी सुपरिचित हैं पर इस परिवार के अभिशाप को ढोता हुआ वाप और सव की आत्माओ म समायी हुई सर्दी और उनके ठिठुरे हुए व्यक्तित्व-ये सब मिलकर भयकर समास की प्रतीति देते हैं । परन्तु लखक ने कही भी सनास शब्द का प्रयोग नहीं किया है । ठण्ड के प्रतीक मे ही कहानी की सम्पूर्ण यातना उभर आई है।" अपने अपने परिवेश से प्रभावित होते हुए भी आज की कहानी के पात्र जिस प्रकार की सकटपूर्ण स्थितियो स सबद्ध हैं-यह इनकी विवशता पूणत अपनी होती हुई भी, आज भी कही न कही, किसी न किसी साधारण मनुष्य की भी विवशता और सत्रास है । वह भी इसी स्थिति में जी रहा है। यह समास एक्दम यथाथ के धरातल से जुडा है। स्वतत्रता प्राप्त करने के बाद जब नयी पीढी के लेखको ने विभाजन के दुख को झेला और देखा तो उसके सामने परिवार के बोय को ढाता पिता, गृहस्थी में झझट मे फ्सी हुई मा, रसोई के काम मे फमी हुई बहन जैसा मामा य परिवार का ढाचा सामने आया। दूसरी मोर देश राजनतिक स्तर पर इतना टूट चुका था वि उपेन्द्रनाथ अश्व' ने लिखा--"वास्तव में दो महायुद्धो न समार भर यो जमे झकझोर कर रख दिया । आज के लेखक ने पूर के पूरे राष्ट्रो को दूसरी जातियो अथवा राष्ट्रों से एक अधी, क्रूर पाशविक्ता का व्यवहार करते हुए, एक अमानवीय कठोरता से - पद-दतित करते हुए उनका अस्तित्व तक मिटते हुए देखा और अनजाने ही उ 46 पुरानी मा यतायें बदल गयी।" व्यक्ति का सारा जीवन इस परिस्थिति में बिखर गया। उसके भाव, विचार और यथाथ का असली धरातल से जुड़ना भी कठिन हो गया। लेकिन उस समय के पाठक को हवाई किलो और नकली घटना स्थितियो से कपर उठकर बयाथ को प्रतीक्षा थी, जिसे वह खुद मोग रहा था । इमलिए लेखक वग उही की इच्छानुरूप ढल गया । इम बदलाव ने ऐम ययाय को नाम दिया जो सवेदना, मूल्य के स्तर पर बदल गया था और बदलता जा रहा था। उस समय के कहानीकारो ने झूठ को खोखला सिद्ध कर दिया था, जिनमे माकण्डेय के 'पान फूल', 'महुए का पड', कमलेश्वर के 'राजा निरवसिया, 'कस्व का जादमी', अमरकान्त की 'जिदगी और जोक', शेखर जोशी का 'कोसी का घटवार', शिवप्रसाद सिंह का 'क्मनाशा की हार', माहन राकेश का 'नये बादल' राजेन्द्र यादव का 'जहा लक्ष्मी कैद है', रेणु का 'डुमरी', कृष्णा सोबती का 'बादलो के घरे' और रामकुमार का 'एक चेहरा' जैसे कहानी संग्रह प्रकाशित और चचित हुए, जिनमे यथाय के नाम पर वह सभी कुछ था जो कि उस समय हो रहा था। इनमे परिवेश और परिस्थिति को सजोया गया था और उस ध्यान म रखते हुए ही कहानी सजन हुआ था। तद से आज तक का नहानीकार इसी यथाथ की प्रतिष्ठा में सलग्न है। जिनमें कामतानाय की लाशें, नानरजन की 'लाग, मोहन राकेश की "जरूम' शानी की 'एक नाव के यात्री, निमल वमा की 'शहर से ऊपर', गगा प्रसाद विमल की 'विध्वस , दूधनाथ सिंह की 'आइसवग', उया प्रियवदा को 'नीद', विजयमोहन सिंह की 'द दोनो', राजेद्र यादव को 'प्रतीक्षा', कृष्णा अग्निहोत्री को 'कुटुम्ब', काशीनाथ सिंह की 'सुख', 'कृष्णा सोबती की यारा के यार' जसी कहानिया भी इसी काय मे लगी हुई हैं अपनी पूरी शक्ति के साप । आज के औद्योगिक युग मे स्थितिया इतनी तजी स बदली कि पारिवारिक सबधो पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पहा, पहल जैसा प्यार नहीं रह गया, फेवन एक अनिवायता सी ही थी, जिसे सब ढोय जा रहे हैं। श्री राजेन्द्र कहते हैं- "विघटन का यह मिरमिला अनक सवध स्तरो पर मश्लिष्ट रूप म और साथ साप चलता है जिस 'रदा बघन' (विशवम्मर नाथ कोशिक) पर बहनें तड़पता थी और दसियों वर्षों में छूटे हए भाई जहा आकर मिल पात थे, वे भाई बहन 'कमरा और गली' (समाश्वर) गार्जियन (राजेन्द्र यादव) या उपा प्रियवदा को "जिदगी और गुलाब में पून की बदली परिस्थितियों में एक दूगरे से दूर जा पडे हैं, और भाई-बहन को शहर कबीर एक 'व' मान वर टाल देता है जो भाई शघनाद 'बरे घर की बटी' में मिसते थे, ये प्रयाग गुमन, राम कुमार, निमन वर्मा की अनेक बहानिया म यह स्थिति 47 आपम मै अपरिचित और एक दूसरे के प्रति करूण सहिष्णुता को मजबूरी से बधे दीखित हैं--रमेश बक्षी को 'शवरी' मे वे प्राय प्रतिद दी हैं और मनहर चौहान के 'घर धुसरा' मे लगभग एक दूसरे के दुश्मन (बहन-बहन) ता जाने कब से कहानियों का विषय बनती जा रही हैं। यह एक निविवाद सत्य था कि भाई अपनी बहनों से उतना प्यार नहीं करते जितना रहन अपने भाइयो से । परन्तु विभाजन के बाद जब सडकिया भी कमान ल! और परिवार का भरण पोषण करन लगी, तो घर मे उनकी स्थिति में बदलाव आया । अब घर मे भाइयों के लिए उन का व्यवहार यह हो गमा जो कि पहल भाइया का बहनो के प्रति था, यानि उपक्षापूण । न केवल उह हो, बल्कि उनके माता पिता को भी यह स्वाभाविक ही लगा। उपा प्रियवदा की कहानी 'जिन्दगी और गुलाब के फूल' में इस स्थिति को चिनित किया गया था। 'जिन्दगी और गुलाब के फूल' का नायक एक ऐसा युवक है जा जव नौकरी करता था तो, तब तो उसे मा की ममता, बहन का प्यार मिलता था और भाभा जैसी लडकी उसकी प्रेमिका थी, उसस मगाई भी हो गयी थी। नौकरी छूटते ही बहन का व्यवहार दैनिक अपमान म वदल गया, ममतामयी मां बहन की तरफदारी करने लगी और वह रोटी के लिए भी बहन पर आश्रित हो गया । इसलिए उसे हर तरफ से प्रताडना, उपेक्षा और घणा मिल रही थी जिन्दगी मे गुलाब के फूल नहीं अपितु काट ही वाटे रह गय थे, जो आज के किसी भी नवयुवक की जिन्दगी हो सकती है। स्थितियों के प्रति आत्मसमपण के अलावा वह और क्या सोच सकता है। सिफ इतना कि जिन्दगी में फेलियर है, कुछ नहीं कर सका जमे उसकी जिन्दगी में फुल स्टॉप लग गया है। उस उस यथाय के सामने नतमस्तक होना पडा कि प्यार से बडी एक और आग होती है, भूख की, पट की। समाज में इस वास्तविकता को आज न जाने कितने नवयुवक ढो रहे हैं। उपा प्रियवटा का यह चरिन स्वाभाविक आकाक्षाओ और जावश्यक्तामो वाले लागो म से है। वह जीवन को लेकर कोई बुनियादी सवाल नही उठाता। वह परिस्थितियो के द्वारा एक विशेष सवेदना को प्रमार सा देता लगता है। पारिवारिक आर्थिक स्थिति के साथ पति पत्नी का आपसी सम्बध भी वडा मायने रखता है। बाज की नारी आर्थिक स्तर पर आत्मनिभर हो गयी है । इसलिए वह पति के प्रति उन आदर्शो, परम्परा, भावनाओ से बध कर रह नहीं सक्ती जैसा कि विभाजन से पहले की नारी रहा करती थी। इसके परिणाम स्वरूप पति के अपने जीवन मे भी एक दगर सी आ जाती है। पति एक लतक, एक उपहास और भटकाव का शिकार होकर, एक और जिदगी की खाज करता है। यह 48 बात अलग है कि जिदगी उसे मिलती भी है या नहीं। इसी भटकाव को ही लिए है मोहन राकेश की कहानी एक और जिन्दगी'। यह कहानी एक ऐसे युवक की कहानी है जो अपनी पहली पत्नी से तलाय लेकर दूसरी शादी कर लेता है, लेकिन उस पहली पत्नी के प्रति भावनात्मक लगाव स अलग नहीं हो पाता। उसका पहली पत्नी से एक बच्चा भी है, जिमसे वह लगाव रखना चाहते हुए भी नहीं रख पाता। दूसरी पली मानसिक दृष्टि से विक्षिप्त निकल जाती है। इस तरह वह ठगा जाता है और स्वय को विक्षिप्त होता पाता है। उसने पहली पत्नी को छोड पर एक और जिन्दगी की तलाश की थी दूसरी शादी करने मे, लक्नि यहा भी भटकार उसका पीछा नहीं छोडता और वह मारा मारा फिरता है अब, घुटन, बदहवासी और अकेलेपन के गिद घिरा हुआ। जिजीविषा व्यक्ति को हर प्रकार से पासा फेंकने को मजबूर करती है । ऐसे समय मे व्यक्ति चाहता है आश्रय, सहारा । निष्कपत समकालीन हिदी कहानी में आधुनिकता बाघ, भाव बोध गहरा होता जा रहा है। आज का कहानीकार इन बोधो को पहचानता हुआ सोढी दर सीढी ऊपर उठता जा रहा है । जाज के सामाजिक जीवन को जीते हुए, उस परिवेश को आत्मसात करके अपने लेखन में उतार रहा है। आज का कहानीकार परिवेश से प्रभावित हा भी रहा है और उस प्रभावित कर भी रहा है। वह एक तटस्थ प्राणी की तरह न जीकर चेतनता म जी रहा है। व्यक्ति के जीवन पर छायी धुध उससे छुपी नहीं है । उसके लेखन मे आये ये व्यक्ति, घटनायें, इत्यादि सब काल्पनिक न लग कर जीव नता लिए हुए हैं और ऐसा लगता है कि यह सब लेखक का भोगा हुआ यथाथ ही उसके लखन में उतरा है । उनकी कहानियो म आम आदमी का सघप और उसकी विद्रूपमय विडवनापूर्ण जीवन स्थितिया मुखर हुई हैं । आज की नई कहानी का आदमी अपनी आत्मा की तलाश में लगा हुआ है जो न जाने किस अधेर मे गुम होकर रह मयी है । यह आत्मा की तलाश कही व्यवस्था के विरुद्ध है तो कही इस व्यवस्था से प्रतिशोध और स्थितियो के विरोध म है । क्या इसलिए व्यवस्था का विरोध है कि हम वहा नही हैं जहा से व्यवस्था की शुरूआत होती है ? क्या हमारे और उनके विचारा मे इतनी भिनता है कि उसकी खिलाफ्त करन पर आमादा हो जायें या फिर एक जुलूस के रूप में चलते हुए अपने को ही खो दें ? क्या सचमुच इस माध्यम से आत्मा को तलाश सभव है ? लेकिन हम यह नहीं देखते कि जैसे ही हम पार्टी सत्ता हथियाते हैं, प्रतिशोध और विरोध खत्म । लकिन यह भी कितना कठिन है, शायनीय है। "लग रहा था कि इसे मैं टाईम स्पेस की चोटी पर खडा हुमा विगत और के सीमाहीन विस्तार को देख रहा है। बोर कोई कर्ता न होकर एक ? ।
49 चिरतन कॉस्मिन लॉ का माध्यम हो गया हूँ और अपने विरोध के जरिए अपने इतिहास को उस निश्चित विंदु पर अपने लिए नियत उस नैतिक भूमिका का अदा कर रहा हूँ ।" "उस वक्त मुझे बतई माफ साफ महसूस हुआ था कि मेरे मदर एक आत्मा " वल्लभ सिद्धाय की कहानी 'ब्लैक-आउट' कहानी के 'जीनियस' में उम क्षण विद्रोह उत्पन्न होता है। भारत में आपातकाल के दौरान एक भयानक स्थिति म एक तरफ नेता और 'खाकी ददावर' दूसरी तरफ मैं (बुद्धिजीवी, आडियोलाजी से प्रतिवद्ध ही इज एनीवडोज फैला टचलर) और जीनियस बीच म लटके भारतीय निरीह जन के प्रतीक शिवदयाल और उसकी पत्नी चपा ये आमन सामन हैं, एक चीख (चपा के रेप) के ठीक नीचे ।" "वह एक घुटी हुई मगर तेज, धारदार और चमचमाती हुई आवाज थी। अपनी सम्पूर्ण दहशत और नफरत और प्रतिकार के साथ अपनी असहायता म खिची हुई, जैसे कि किसी बवर आततायो द्वारा अपने प्रतिरोध को पूरी हिंसा से कुचल सकती है।" इसके साथ माय वल्लभ सिद्धाथ की अय कहानिया म भी राजनीतिक भ्रष्टा चार, सामाजिक विसंगतिया चियित हुई हैं, जिसमे व्यक्ति की आत्मा की तलाश है । इसके अतिरिक्त भारतीय परिवश में जीवन जीन की पाठिनाई भी नई कहानी मे उभर कर आयी है। यह कठिनाई पिसी भी स्तर पर हो सकती है। राजी राठ की कहानियो मे यह तकलीफ उभर कर आयी है। राजी सेठ के दोनो कहानी सग्रहा "अधे मोड से आग' और 'तीसरी हथली' म इस प्रकार की तकलीफा को उठाया गया है, उहे सहेजने का प्रयास किया गया है। विशेषकर ऐसी तकलीफा का रखाक्न किया गया है जो दिखाई नहीं देती । जस कि मृत्यु की प्रतीक्षा करते-करते बूढ़े व्यक्ति की खिडकी से दिखते आकाश के हिस्से का सामन की उठी इमारत से तुप जाना, घर के बडे लडके का मत पिता की जगह लेना, नारी की एक पुरुष के मन की हिंसा और दूसर तन को हिंसाओ के बीच होने की यातना, नयी पीढी और पुरानी पीढी के अलग अलग इतिहास, मा और पिता के अलग-अलग दायर, प्रेम के बीच ठडापन, मा की अपनी प्राइवेट सबधो की दुनिया, बूढे को साथिन की मौत आदि इत्यादि । इन सब की एक ही समस्या है--वह है जीन की समस्या । यह एक आम समस्या है, जिससे राजी सेठ का जीवन जुड गया है । यह तकलीफ भारतीय परिवेश की तकलीफ है, जिससे जुडकर भारतीय व्यक्ति को जीना होता है । यह तकलीफ वहा वहा है, जहा भारतीयता सास लेने को छटपटाती है । .
50 वही मे बाप की मौत पर बहे लड़के का उनकी जगह लेने का अहसाम, 'अनावत कौन,' में नवविवाहिता का श्वसुर के लेने आने पर फिर से ससुराल चले जाना । श्वसुर का कहना “चल बेटी चल । घर खाने को दौडता है घर मे प्रकाश ही तो नहीं है न " गलत हाता पचतम' मे स्वत्व को बचाने के दम के स्वीकार मे भी यह भारती- यिता सामने आयी है। लखिका ने जीवन जीन की तकलीफ को समझन और व्याख्या यित करने का प्रयास किया है। राजी सठ की हो 'तीसरी हथेली' कहानी में समय या ठडेपन की स्वीकारोक्ति “ऐसी भीगी बरसात मे समय की छतरी के नीचे उसने क्षण भर अपने को सुरक्षित महसूस किया, एक्दम निद्व ट।" कहानी 'मेरे लिए नहीं', मे भी यह स्वीकार है---खुशी किसी एक ही रास्ते से नहीं आती -ज़ि दगी मरे लिए किसी एक विट पर खत्म नहीं हो जाती। 'किसका इतिहास' में भी पिता द्वारा लडके के इतिहास का स्वीकार, 'दूसरी ओर', मे मा से वात करन की तैयारी य अलग 2 तरह के अत, बाहर से पाजेटिव दिखते हुए भी निगेटिव लगते हैं और फिर भी एक ही स्वर में बोलते हैं-~-फिर यह स्वीकार, चाहे समय का हो या इतिहास का, वयिक्तकता का हो या जीवन के पाप का। ‘जनावृत म यह घर वहा यह वाकई जीने की तकलीफ को पाटता हुआ सा आता है, पर अक्सर ही यह स्वीकार व्यक्ति के अकेलेपन का है और उस हालत में जीन की तकलीफ का एक हताशा, त्रासदी या मानव जाति की नियति में बदल देता है । यह स्थिति उनकी एक बड़ी घटना' तथा 'तीसरी हथेली' और 'पुन वही म देखा जा सकता है। इनकी कहानियों में सवेदना का आधिक्य है-यह एक ऐसा गुण है जो मिलना दुलभ है । सवेदना और समझ का यह गठबधन जिस परिष्कृत भाषा मे उभर कर सामने आया है, जिसे ह. वाक्य म देखा जा सकता है। इस विशिष्टता के लिए वह प्रयत्न तो नहीं करती, हा जाती हैं। 'समझ' म-"समझ हमशा वाम को हो- यह जरूरी नहीं । गनीमत कि राजी अभी इस प्रकार की समझ से दूर है और सजग भी।' “जीवन अपनी झाली फ्लाय उस मीठी तोतली वावाज़ और आखा में निश्छल चमन लिए सोदय विखेरन को तत्पर खड़ा रहा । मेरा बधिर मन उन क्षणा को खाजन में व्यस्त रहा जा सौंदय की रचना कर सकें। मैंन उन सब क्षणा का, अवमगे का दरवाजे से ही लौटा दिया जो जीवन और जीवन के सौन्य को देखने और रचन के माध्यम थ। यह उदाहरण राजी सठ की ही कहानी 'गलत होता पचता' स है जिसम उनकी नसकीय समझ स्पष्ट रूप में मामने आती है । उनकी कहानियो का गार 'मेरे लिए नहीं में स्पष्ट होता है-"कसे बताया जाय कि पीडा का दश जब कौन' - 51 बस टूटना छू लेता है तो सील-2 हो जाता है । सब कुछ कोई जीवन दर्शन नहीं उभरता किरणे जात समेट लेती हैं घुल जात हैं सारे टाके कच्चा घाव टीसता है कही भीतर। इस दशन मे कहा है जीवन दशन 1 टूटना है सपनो अपेक्षाओ का टूटना।" हर कहानीकार का एक दृष्टिकोण और जीवन दशन होता है और इसी के अनुकूल वह अपनी कहानियों में जीवन-मूल्या का भी चित्रित करता है । विना जीवन- दशन के और जीवन मूल्यो के कल्पना को छोड कर किसी भी प्रकार का सजन सभव नहीं है । और फिर समकालीन कहानी-"आज की कहानी तो सामयिक सीमाआ के अतगत अपने यथाप युग समय और परिवेश को मूल्याकित करन की प्रक्रिया है जो यथाथ या उचित सदर्भो म अधिक सप्राणता के साथ अभिव्यक्ति देने के प्रयत्न करने की स्पष्ट घोषणा करती है।' कहानीकार समकालीन समान का दृष्टा हाता है और यथाथ का ही कहानी में उतारता है और अधिक कहा जाय तो कहानीकार सचेत भोगी भी है । वह सिफ कहानी लिखता ही नही, उसे जीता भी है। इसलिए नयी कहानी में झेलना और भोगना और फिर चित्रित करना अधिक महत्वपूर्ण है । इसलिए यथाथ से हट कर आज के लेखन का कोई अलग दशन नही हो सकता। आज कहानीकार का जीवन एक सघप स भरा पूरा रहता है । एक सामाय व्यक्ति के रूप में वह निराशामा से उबलता और समकालीन परिवेश की परिस्थितियो से मघष करता है । वह अनेक असफलताओ वो विसगतिया और उपेक्षा को झेल कर भी नित एक न एक नये कहानी संसार की रचना करता रहता है, एक सामा य सामाजिक उत्तरदायित्व को निबाहता है। नयी कहानी के कहानीकार की दष्टि जीवन की यथाथ अनुभूमि पर केन्द्रित रही है और उसी को वह प्रामाणिक परिवेश मे प्रस्तुत भी करती है । आज की कहानी पहले की तरह 'फाम ला' नही रही बल्कि वह अब प्रतिदिन बदलते हुए भाव- बोध के अवेषण और प्रश्नो की प्रक्रिया के रूप में सामने आ रही है । इन हताशाओ और निरागाओ के दौर को झेलते हुए नयी कहानी के कहानीकार को जीवन दशन' शन्द सचमुच एक बोझ सा लगता है और वह इस शब्द को प्रयोग करने से भी हिचकता है। किसी भी प्रकार का दष्टिकोण जो कहानीकार को प्रभावित कर जाये और उसकी अनुभूति मे समा जाये उसे ही वह नयी कहानी के रूप में चित्रित कर देता है । वह उसे अनुभव की आग मे तपा कर प्रमाणित करता है । कभी इस अनुभव को वह विद्रोह रूप मे, व्यग्यात्मक रूप में और कही उदासी के रूप मे, और कभी सरलता, सहजता से प्रस्तुत करता है । ।
52 नयी कहानी के कहानीकार को त्रासदियो ने जैसा सूक्ष्मदर्शी और सवेदनशील बना दिया है, ऐसा पहले तो नही था। क्तिने ही हानमो बोर निराशाओ ने उसे हर बार ययाय के तट पर ला वर पटक दिया है और कहा है कि इन आदशों, सिद्धातों की भीड मे कुछ नही रखा, इनमे खुद को गुम करने से कोई लाभ नहीं है। इसलिए इस धक्के से भयभीत हो कर और किसी प्रकार के छल कपट का शिकार नहीं बनना चहता । अगर आज आमी थक टूट रहा है, हार रहा है, नीच है, मोठा है तो इसम सकुचाने की कोई जरूरत नहीं है और फिर इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है। इसलिए उसने इही सब कमजोरियो को वेकार की हैकी पंकी को छोड कर स्पष्ट रूप से प्रामाणित रूप से प्रस्तुत कर दिया । वह तो केवल उस वतमान को ही अहमियत देता है जो परिवश और व्यक्ति के लिए अविभाज्य अग बन चुका है । जीवन को इस रूप मे प्रस्तुत करना ही आज की कहानी का कथ्य बन गयी है। परिवेश व्यक्ति जीवन को इनके भीतर से उभारने वाली सच्चाई के रूप म कहानी को वतमान स्थिति कहानीकार की जीवन दृष्टि के मनोविनान से अत्य त प्रभावित होने के कारण आई है। नई कहानी मे उपस्थित अस्तित्व का सबट, व्यक्ति की जिजीविषा भी मनो विनान की अतिशय प्रभाव समानता के कारण ही आई है । जीवन की सम्प्णता का ग्णन और व्यक्ति का उसको सम्पूणता मे चित्रण करने की प्रवृत्ति उसकी जीवन दष्टि की मनोविज्ञान की निकटता को ही पुष्टि होती है। स्त्री पुरुष के नवोन सम्बधों की वैनानिक्ता को भी नयी कहानी का विषय बनाया गया है । लेकिन इससे पहले के बहानीकार के मस्तिष्क में यह सबध केवल पति पत्नी और प्रेमी प्रेमिका के रूप म ही स्थापित था। यह सौ प्रतिशत परिवेश का प्रभाव था क्योकि यह घर को सीमा रेखा में बधी नारी के साथ पुरुप के सम्बध इसी स्तर पर सीमित थे। उस समय नारी को स्वतयता ही कितनी मिल पायी थी। उसे ता पुरप के व्यक्तित्व का ही एक अग समझा जाता रहा। लकिन जस 2समय गुजरा नारी में भी अपने व्यक्तिव के प्रति चेतना उत्पन हुई। उसने भी अपने लिए एक समानता को माग उठाई । सदा से ही नारी पर शामन करता आया पुरुष जिसे कि 'न' सुनने की आदत ही नहीं थी, उसके भी प्रस्तावो को उसने नकार दिया। उसने सम्मानित जीवन और पुरुष के बराबर अधिकारा की माग करके समानता पर आकर मत्री सम्बध स्वीकारना ही स्वीकार किया। इन परिस्थितिया ये पलटते स्थिति यह हो गई कि लडके लडकियो से जिस प्रकार के प्रेम संबंध की आशा रख रहे थे लडकियो ने उसे केवल उनके सवध म 'पिक्चर पोस्टकार्ड' भेसने क के औपचारिक सबध तक ही सीमित रख रही हैं, इससे पुरुप के हाथ घोर निराशा 53 ही लगी है। उसे शायद इस बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि सैक्स की पुडिया कही जाने वाली स्त्री अपने एकाकीपन को भूलने के लिए एक पुरप की वेचल मित्र बन कर भी आ सकती है। राजेद्र यादव की कहानी 'एक खुली हुई साथ', का शिवेन आश्चय चकित रह जाता है जब मधु अपने पति से उसका परिचय कराती है-"य मरे हस्वड हैं और आप आप मेरे मित्र ।" उसे लगता है उसन यह शब्द भी पहले सुन ही नहीं थे। इस प्रकार धीर धीरे पुरुप ने नारी से इस मैत्री सम्बध को झेल लिया । लेकिन रूढिवादी परिवार ता इसम अब भी काम सवधा की ही कल्पना करते हैं इसके भाव मे वह इस सबध का होना वे स्वीकार ही नही कर पात । मोहन राकेश और मन्नू महारी के क्या ससार में स्त्री पुरुष सम्बध विशुद्ध सामाजिक्ता में उभर हैं । मनू भहारी की 'तीसरा आदमी' के शकुन और आलोक का सम्बध विशुद्ध एक लखक और पाठन का है । लेकिन उनके वार्तालाप और व्यवहार में इतनी आत्मीयता है कि शकुन का पति इस सवध को स देह की दृष्टि से देखता है । उसने भी मन में एक शका है । मोहन राकेश की कहानी 'अपरिचित' के यात्री स्त्री पुरुप जीवन यात्री सहयात्री न होत हुए भी सहयात्री हैं, अनुभूति और विचारो के स्तर पर। व बडी ही आत्मीयता से एक दूसर को अपने विवाह की असफलता के दद को सुनाते हैं। अत मे कहानी मे जब पुरुष सो जाता है तो स्त्री उस पर अपना कम्बल उठा कर डाल देती है और पुरुष को लगता है, इससे ऊष्मा प्राप्त हो रही है। लेकिन यह अपमा और ताप काम सबधो से उत्पन्न नहीं हुआ बल्कि विचारो और अनुभूति के स्तर पर प्राप्त की हुई गर्मी से उत्प न हुआ है। मोहन राकेश की ही कहानी मिसपाल' की मिस पाल और रणधीर का सबध एक ही जगह काम करने वाले सहकर्मी अर्थात 'कुलीग' का है । मिस पाल रणधीर को अपने दुखपूण सवेदनाओ का आभास देती है। बास के रूप में नारी का चित्रण भी इन कहानिया मे हुआ है। परिवर्तित हाते परिवेश के साथ ही स्री पुरुष के बदलते प्रेम संबधो का भी कहानीकार ने मनोवज्ञानिक ढग से अवेपण किया है। प्रेम में असफलता और विवशता ने मनुष्य को मदैव ही मनस्तापी बना दिया है। जब व्यक्ति को प्रेम मे सफलता नहीं मिल पाती तो वह मन की बाधा बन जाती है । इस प्रकार भावुकता मे आकर वह अपने जीवन मे सदा के लिए आजीवन कु आरी रहन का व्रत धारण कर लती है । विशेषकर नारी क्योकि वह अधिक संवेदनशील और भावुक है । ढलती हुई उम्र उसकी अक्षमता और अभाव को गहराती है । राजेद्र यादव की प्रतीक्षा की गीता 'खुले पख, टूटे डने' की मीनल और निमल वर्मा की 'परिन्दे' की लतिका इसी दुखद स्थिति को भोग रही हैं। लेकिन आज प्रेम के मूल्य बदल गये हैं इसलिए किसी से प्रेम 54 करती हुई नारी और कही विवाह करने को तैयार हो जाती है उसका स्पष्टीकरण है कि प्रेम की किशोर अनुभूति के लिए अपनी जिन्दगी को होम करना कोई बुद्धिमानी नहीं है। अतत देखा जाय तो स्त्री पुरुष के बदलते नये सामाजिक सवधा और व्यक्तिगत सबधो पर दोनो ही स्तरो को समकालीन कहानी नै रेखाकित किया है । यह रखाक्न मनोवज्ञानिक सतह पर है। पुरानी कहानी मे जहा विचारो का प्राधा य रहता था वही आज नयी कहानी में वातावरण प्रमुख हो गया है। आज समकालीन पहानी मे वातावरण का अपना एक अलग विशिष्ट स्थान है । वातावरण ने भी कहानी मे अपन लिए एक विशेष जगह बना ली है । वह कहानी का एक अग बन चुका है। नयी कहानी म वातावरण की विशेष प्रस्तुति है। वातावरण को प्रस्तुति म आज कहानी देश काल से भी अधिक परिवेश की ओर पहले से अधिक सजग हुई है। विशेषकर उन कहानियो मे तो और भी यह सत्य दिखाई देता है जो वैयक्तिकता को लेकर लिखी गयी हा । यही सत्य अब सामाजिक कहानियों म भी परिलक्षित होन लगा है । इसमा विशेष कारण है कि-"आज की कहानी क्ला प्राय व्यक्ति के चरित्र के धरातल से निर्मित होकर अपने वास्तविक स्वरूप मे मनौवना निकता की ओर उन्मुख हो रही है । इसीलिए परिस्थिति चित्रण पर अधिक बल दिया जाता है, देश काल पर कम ।" इस प्रकार समकालीन कहानी में वातावरण परिकल्पना का अय और स्वरूष ही एकदम भिन हो गया है । यह केबल दश काल और परिवेश न होकर यक्ति की चतुर्दिक परिधि बन गया है। जिससे प्रतीत होता है कि आज का कहानीकार मनोविनान की परिवेश कल्पना मे प्रभावित हुआ । है परिस्थितिया एक और तो व्यक्ति के विचारो और कार्यों को प्रभावित करती है, दूसरी ओर उनके प्रभाव स्वरूप अपनी प्रकृति भी बदलती है। यह परिवर्तित होता परिवेश अगली पीढी के साथ बिया- प्रतिक्रिया में भागी होता है । इसलिए परिवेश व्यक्ति की वाह य सामाजिक स्थिति, शिक्षा और सस्कारो से जुड़ा होता है। यही उसके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होते हैं। समकालीन कहानी परिवेण के बीच व्यक्ति के मूल्याकन का प्रयास करती है। इसीलिए जीवन में परिवेश की कल्पना और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है । समकालीन कहानियो मे रेखाक्ति वातावरण' अपने साथ जीने वाले चरित्रा के कट मदु अनुभवो का सहमोगी है । यह सिफ उददीपन के लिए ही नहीं है । नयी कहानी का नायक जब अपने कमरे की खिड़की से दूर दूर तक फैला हुआ मैदान, पतझरमे जमीन 55 से लिपटी हुई अजीव सुगघि बिखरते हुए यूक्लिप्टस के पड और शाम को साय-साय करता हुआ सनाटा देखा करता है। तो मानो वाहर फैले हुए वातावरण के दश्य पट पर अपने को स्थापित करना चाहता है । और उसे अपनी अनुभूतियो का भोक्ता बनाना चाहता है । आपस मे गु थ गुथ वर धुल धुल कर घाटियो मे भरते तथा फिर वृक्षों, छता, बालक नियो से उतर कर खिडक्यिा के शीशा पर गीली भाप बन कर छा जाते हैं वादलाव्यथित हृदय की आतरिक घुटन और गीली पीडा के सहभोगी हैं- "हवा तेज हो आई है, बादल एक दूसरे में गु थते हुए नीचे उतर कर घाटियो मे भरने लगे थे । अब तो वे लम्ब लम्बे फैलते एक एक देवदार के ऊपर से होते हुए बढ आय हैं । लाल पीली छता से तैरते मकानों, खिडिकयों, बारजा, बालकनियो मे भी घुसने लगे हैं । बस जहा निशा का पलग या उसी खिडकी मे बद शीशा के पाम टहलने लग हैं। उन शाक्ते बादलो की गीली भाप कैसे शीशो पर झलक आई है ।" नरेश मेहता की कहानी 'निशाऽऽजी' कहानी से ली गयी यह पक्तिया निशा की मत्यु के बाद उसकी मा गोरा की मन स्थिति के साथ जुडी हुई है, जिसमे उसका साथ प्रकृति ने दिया है। नयो कहानी मे वातावरण कही मन स्थिति का सहजीवी बनता है तो कही अनुभवों का । मोहन राकेश की कहानी में प्रकाश की मानसिक स्थिति का चित्रण कथानक के अनुरूप ही है । अपनी पत्नी के साथ सवध विच्छेद होने पर तथा दूसरे विवाह से भी प्राप्त असफलता, पत्नी की विक्षिप्तावस्था के कारण उसे भी लगता है कि वह पागल हो गया है। खाते पीते, प्रकाश के सामन निमला के तरह तरह के रूप आते रहत और उसका मन एक अधे कुए म गिरन लगता। रास्ते में चलते हुए उसके चारो तरफ एक शूय सा घिर आता और वह कई बार भौंचक्का मा सहक के किनारे खडा हा कर सोचने लगता वह घर से क्यो आया है ? और कहा जा रहा है । उसका किसी से भी मिलन और वही भी आने जान का मन नहीं होता। उसका मन जिस शूय । मे भटकता रहता उसमे कई बार उसे एक बच्चे की किलकारिमा सुनाई दने लगती और वह बिल्कुल जड होकर एक ही जगह खडा या बठा रहता।" वस यदि देखा जाये तो सृष्टि के मूल मे 'काम' ही की प्रधानता है । 'काम जीवन और साहित्य का आभूषण है। लेकिन काम को अति प्रभु सत्ता स्वीकार कर जीवन और साहित्य म नई ब्राति का सेहरा प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिंगमण्ड फ्रायड के सिर बधा है। उनके ही सिदातो का प्रतिफत है कि आज काम को मनुष्य-जीवन मे प्रमुख जैविक और मानसिक प्रेरक के रूप मे स्वीकारा जाने लगा है । जीवन के स्वस्य विकास "उठते बठत, 56 के लिए काम के विषय में गोपनीयता और कोच कादि को तिनाजलि दी जा रही है। हि दो में समकालीन कहानी न भी काम के क्षेत्र मे इस नव्य चेतना को अपने क्थ्य का आधार बनाया है । आज कहानी में काम सबधी चचा रहस्यपूण ढग स या चोरी छुपे न करवे विना विसी सकोच अ य विचारो की तरह निब ध रूप में हुआ है । पाक, रेस्तरा में मिलने वाले अपरिचित स्त्री पुरुप भी इन विपया पर खुलकर नि सकोच बात करते हैं । स्त्री पुरुष बिना किसी हिचक के इस विषय पर बहस करते हैं । स्त्री (मधु) शिवेन (पुरुष) के सामने विना सकोच के कहती है कि एक दिन उसन हुगली के किनारे तटस्थ भाव से सम्भोग दृश्य देखा था। वह कहती है--"वाकायदा सर- भोग हो रहा था। मैं दर तक देखती रही । मुये कुछ भी नही लगा। इस प्रकार नारी मे भी अब काम सम्बधी छुई मुई वाली लाज अब नहीं रही। पुम्प का अब अपने मित्र की पत्नी सपरिवार नियोजन के सदभ प बात करने में कोई भी सकोच नहीं होता।" "प्रवोध ने मेरी ओर ध्यान से देखा, तुम लोग तो अब सावधान रहते हो न ? आज कल इस डा न रेट बढा दिए हैं । पिछले हफ्ते हम डेढ हजार देना पडा कैसी अजीब बात है महीना सावधान रहा और एक दिन के बालस्य मे डेढ हजार रुपये निकल जाये मन एक और आसान तरीका टूटा है। लीना इहें जरा पेकेट दिखजाना बस म्यान देने की बात है कि एक दिन भी भूलना नही चाहिये नही तो सारा कास डिस्टव हो जाता है। नौकर जव शाम को चाय में लाता है, तो मैं तभी गोलीट में रख देता हूं।" अपरिचित लोगों और मित्र की पत्नी के साथ काम विषय इतना अनावृत्त हो गया है तो फिर दम्पत्ति के बीच इस सकोव का क्या काम । पति अपनी पत्नी से कहता है- 'अगर तुम मुझे एक प्याला चाय दे दो तो मैं अपने का मोटाइटिस और तुम्हे प्रेगनेट होने में बचा लू गा।' इस प्रकार के यौन सदा अव स्वस्थ रूप म ग्रहण किए जाने -- लगे हैं। यौन जीवा अव केवल विवाहोपरात ही नहीं रह गया है । कुमारिया अब इसे विवाह स पहले ही प्रेम की आड म अपना रही हैं। राजेन्द्र यादव की कहानी प्रतीक्षा' को न दा को हर्ष न पहले ही बता दिया है कि उसकी शादी हो चुकी है और एम०काम के बाद वाकी रस्म हो जायेंगी। परतु न दा का यह कहना कि-"मैं तुम्ह शादी के लिए प्यार नहीं करती, अब तोहप के एक बच्चा भी है लेकिन उस यति मादा को लगता ही नहीं है कि हम अपना नहीं है। इसलिए यह जानकर भी हप 57 विवाहित होने के कारण आजीवन प्यार नहीं निभा पायेगा और उसे प्यार किए जाती आज साहित्य म भी राजनीति को घसीटा जा रहा है या कहना चाहिये कि जबरस्ती घुस आई है। भला साहित्य मे राजनीति का क्या काम ? लेकिन नहीं साहब ऐमा कैस हो सकता है आज जरा साहित्यकारो के खेमो में जाइये और जरा गहराई से अध्ययन करें तो पता लगेगा कि इनम आपस मे ही इतनी गुटबाजी और उखाड पछाड है कि देख कर मन धिना जाता है। हर कोई अपने 2 पक्ष को श्रेष्ठ बताता हुआ अड बड बयान देता है, गोया साहित्य न हुआ, कुश्ती का अखाडा हो गया कि भाओ मिया दखें तो कितने दावपेंच सीसे हैं । हर कोई स्वय को कभी किसी वाद का प्रवतक और प्रतिष्ठाता बताने पर तुला हुआ है । यहा तक कि जूनियर और मीनियर का भी झगडा मचा रहता है और साहित्यिक सभाओ मे इस बात पर मह फुला लिया जाता है कि फला तो हमस इतना जूनियर है और उसे बाद मे मौका दिया गया। जरे भई, साहित्म ही तो है, जैसा लिखोगे, पढोग, जनता, श्रोता के सामने ही आयेगा और दशक श्रोता आज वहुत जागरूक हैं उहे इन सब बेकार के पचडो म कोई दिलचस्पी नहीं है सिवाय अच्छा साहित्य पढने के। चलिए साहित्यकारो के आपस मी गुटबाजी तो अलग रही आज साहित्यिक सभाओ और कायक्रमो म मत्री आदि को बुलाकर उनका प्रशस्तिगान होता है और बेचार साहित्यकार मह उठाये सामने बैठे रहते हैं। क्या साहित्यकार इतना भी नहीं कर सकते कि इस सब का विराध करें और ऐसे कायक्रमों मे जायें ही न । लकिन वे सोचते हैं कि यह सब करने की जरूरत नहीं है, क्याकि हम लिख तो रहे ही है आज के जादमी को । लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि साहित्य रचना ममाज प्रति एक जिम्मदारी है। हम उस जिम्मेदारी को तभी निभा पायेग जब हम इन सब प्रवत्तियों से हट कर अपन लखन और व्यवहार के प्रति जागरूक होंगे। समय के साथ 2 पहानी का ट्रेंड तो बदला ही भाषा मे भी बदलाव आया । इस बदलाव के विषय म कमलश्वर ने कहा है-"आदर्शों, सदशा, उपदेशो, आश्वासनो, धन्यवाना, रिश्तो, और प्रतिवादो नादि सभी को भाषा उसके लिए झूठी और बेमानी सिद्ध हो चुकी थी । जीवन की गति इतनी तीव्र और सवेदनो की उम्र इतनी क्षणिक हो गयी थी कि नय कहानीकार को समझ मे नही आता था कि वह जनता से किस भाषा में बात करे । प्रेम जसा श द इन बदली हुई स्थितिया मे प्रेम की अनुभूति नहीं देता। पिता आदरणीय और अनुभवी व्यक्ति का प्रतीक ही नहीं रहा । परम्परा गौरव की वस्तु ही नहीं रही। विश्वास अथहीन हो गया। बहन और भाई का रिश्ता 'राखी' का नही रह गया । औरत और आदमी का समपण का सबघ ही बदल गया ।" जीवन के सारे प्रतिमान ही बदल गये तो फिर भाषा का भी बदलना संभव और स्वाभाविक ही था।
58 उसमे भी पहली सी स्थिरता का अभाव उत्पन्न हो गया । इसलिए नये कहानीकर ने यथाथ को पहचाना तथा सामाय व्यक्ति के जीवन को अपनी कहानिया का कथ्य बनाया। सामा य व्यक्ति के जीवन से जव कथ्य उठाया गया तो फिर वही से भाषा का जुडना भी स्वाभाविक हो गया । इसलिए उहाने जन सामा य की साधारण बोलचाल की भाषा को ही अपनी अथपूण साकेतियता और प्रतीको के माध्यम से सजन किया । आज ये सधपपूण, कठार यथाथ जसे युग म व्यथ को सवेदनशीलता और अलकाग का मोह छूटता जा रहा है । इसलिए नये कहानीकार न युगानुरूप ही भाषा की कलात्मकता और अलकरण के प्रति विद्रोह जताया। उहोने अपन चारा ओर फैले परिवेश की भाषा को ही अपनी अभिव्यक्ति वा साधन बनाया। कमलेश्वर की कहानी 'तीदिन पहल की रात' म भाषा की सहजता के दशन होते है-नौजवानो की फिक्र आपको नहीं होनी चाहिये। उनके प्रति जो रूख आप लोगो यानी पुरानी पीढी का है, वह कितना निकम्मा और वोदा है, यह आप खुद ही जानते हैं। वह गलत प्रेमाने बना रखे है आप लोगा ने । आप युवको को उनकी पोशाक स नाचने है फला यह पहनता है इसलिए वह जिन्दगी म क्या कर सकता है अपनी साथक्ना के लिए आज का नौजवान जिस मानसिक संघप से गुजर रहा है, वह कितना चितित है यह आपने नहीं देखा । आपने सडक से गुजरते गुजरत होटलो से आते ठहाके मुन हैं, लेकिन यह देखने की कभी कोशिश नहीं की कि सब ठहाको के बाद उनकी मेज पर कैसी उदासी छा जाती है क्तिनी ईमानदारी से वह सोचते हैं और छोटे बड़े कामो में लग जाते हैं। उनकी हसी आपको आवारागर्दी भरी लगती है, उनका सहज अहडपन सभ्यता की मीमा के बाहर दिखाई पडता है, उनका हसना बोलना, चलना फिरना, यहा तक कि उनकी रूचियो और मनोभावो से आप चिढते हैं, उदारता से बर्दाश्त नहीं कर पाते । यह वमी उनकी नही आपको है यह आपकी पीढी का दष्टिदोप है। इस उदाहरण मे कमलेश्वर ने बिना किसी लागलपेट के, न तो मुहावरो का सहारा लिया है, न प्रतीको का प्रयोग किया है बल्कि बडी सहजता से युवा जीवन के विरोधाभास और उसको मापने वाली पुरानी पीढी के गलत मापको और युवा वग • का रस आकलन से आक्रोश व्यक्त किया है। कुछ उर्दू शस्त फित्र, रूख, सुद, कद बर्दाशत, गलत, नमूना जसे आ गय हैं उहें भरने का बलात प्रयास नहीं किया गया है, वे स्वाभाविक ही लगते हैं, उनमे कही भी अलकरण या कृत्रिमता की बू नही आती। नये कहानीकार ने पुरानी भाषा के रूदिवद्ध प्रतिमानो को तोड़ कर युगानुरूप समस्पायों को अभिव्यक्त करने में मानवीय माण या प्रयोग किया । उसे नय प्रतिमानों से पूर्ण कर नथ्य भाव-बोध के अनुरूप ढाला। नई महानी की भाषा की समझ मे पाया कि हमे अपनी जीवन और अनुभूति को 2 लिखना चाहिये, हम वह लिखना चाहिये जो अब तक न लिखा गया हो, उह अपने शब्दो द्वारा अभिव्यक्त करें। आज समकालीन कहानी की भापा एक नयी सवेदना से मुक्त है । यह सवदना हर स्तर पर देखी जा सकती है, कही दृष्टि सवेदना के रूप मे, श्रवण सवदना के प और नही स्पश सवेदना आदि के रूप मे । पुरानी कहानी की भापा जब अभिव्यक्ति प्रदान करने मे अक्षम सिद्ध हो गयी हो तो नय कहानीकार को लगा कि यह भाषा तो मात्र शब्दजाल है इसलिए उसने लोक जीवन से भापा का चयन कर एक नयी सवेदना से सुसज्जित कर उसे व्यापकत्व प्रदान किया। फणीश्वर नाथ 'रेणु' की कहानी 'तीसरी कमम' में ऐद्रिय सवेदना की पलक मिलती है। "हिरामन टिकटी पर खडी गाडी पर बैठ गया । उसने टप्पर म याक कर देखा । एक बार इधर उधर हीराबई के तकिये पर हाथ रख दिया। फिर तक्यि पर केहुनी डाल कर झुक गया, झुकता गया। पुशबू उसकी देह मे समा गई । तक्यि के गिलाफ पर कढे फूलो को उगलियो से छूकर उसने ‘सू घा' हाय रे हाय इतनी सुगध हिरामन को लगा एक साथ पाच चिलम गाजा फूक कर वह उठा है । हीराबाई के छोटे आइन मे उसने अपना मुह देखा, आखें उसकी इतनी लाल क्यो हैं गाडीन सीटी दी। हिरामन को लगा उसके अदर से काई आवाज निकलकर सीडी के माथ ऊपर की ओर चली गयी ।-इ उ इ स्स । छि ई ई ई छन।" समकालीन कहानी न सवेदना का आश्रय लेकर व्यक्ति को मानसिक स्थिति को व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त कर ली है। पानू खोलिया की कहानी 'दुश्मन' मे भगपत की मन स्थिति का बहुत ही जीव तता और कुशलता से चित्रण किया है । भगपत के बच्चे की अर्थाभाव के कारण इलाज न हो पाने के कारण मृत्यु हो गयी है जिसके कारण भगपत की मन स्थिति कुछ इस प्रकार की है--"पाव रुक गये थे भगपत ने अर इस पारक मे तो परसा इतवार के दिन भी दो ढाई घटे गुजार उसने इसी फब्बारे के नीचे, आने को तो वह पहले भी शाम के टेम कभी कभी तफरी करने आ जाता है, जैसे दूसरे पचासो लाग आया करते हैं और जाज भी जाम हुए हैं, बीबी बच्चों के साथ, लेकिन पहले की बात दूसरी थी। छोडो उस । उस वक्त तो परसों का आना ही याद आ रहा है। परसा भी वह इसी तरह ठण्डी टण्डी फुहारें छोड़ रहा था, लेकिन परसों की बात दूसरी थी, लेकिन अब परसो और आज में कितनी दूरी आ गयी है । परसा इतवार को आया था ता वो घटा बनकर बेचैनी स उमडता धुमडता। उस दिन सास बहुत गरम थी - लू जैसी । मन ब-तरह धुक धुका रहा था। दो ढाई घटे पहाड हो गये थे जसे। किनार पर पटकी हुई ताजी मछली नहीं होती? फड फड फडक-फडर ! और आज होठ तो ववात म भी खिंच जाते है । हसी चाहे आप न आये ।-आज, आज भटा बरस चुकी है र, रीता-रीता वादर आकाश में लाश जसा 60 तर रहा है। सास भी तो भगपत की एकदम ठण्टी निरस रही है। आज अपर की तपिश बुझ गयी है न ? तभी और मछली । पहना यत्म हो गया है उसया । आत्मा लानी और पश्चाताप से भगपत की चाल ढीली पड गयी। लेजायचोट उठा। दुश्मन पोन रे ? सजो वि भगपत ? अब ता गाली मत निकाल निर्मोही त पाप है ? यही होता है वाप वा दिल ? अरे निठुर, एक सवा डेढ रपये के तेल तर या तूने वडा समया उम दिन । याद है, बंसी गाली निकाली तून-मर जाय कमवम्त' । कितना परेशान करने लगा है।" क्तिना परशान किया र उसन तुझे ? यौन सा राजाना लूट र गया वह ? तरे लिए यह नौररी लेकर आया, नौवरी। याद है ? अपजस परता है अव तेग श्या भला होगा।' इस प्रकार ममकालीन पहानी की मापा ने व्यक्ति को मनोदशा को पढ पर नयी रहानी वो एक नयी दिशा दी है । सवधा में सतु जितन कमजार और खोखते हात गय भापा उतनी ही गहराई म जा पर उस दीमक खाये जोडा को दखना शुरू कर दिया। भाषा न उसकी नीव तम को बडी ही निपटता से देखा है। जिस प्रकार टूटत मवधा म निर्मोह और बरता है उसी प्रकार भापा ने भी इसका अनुकरण किया है। ऐसे स्थाना पर भाषा सहज और सरल होते हुए भी सारगर्भित और अथभित है। उसम प्रयाम कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता। आधुनिक जीवन के यथाथ व्यक्तियो को जय नये कहानीकार ने चित्रित किया, ता उसके अनुरूप ही भाषा भी यथाथपूर्ण और सहन ही रखी। उसम कही भी बनावट का नामोनिशान नही था। वह पात्र परिस्थिति और स्थान का ही अनुगमन करती है। जैस निमल वर्मा की कहानी परिदे' म डा० गुकर्जी की भाषा, जो एक स्कूल मे पढात हैं "मिस लतिका, हम आपको निमश्रण देने आ रहे थे। आज रात मेरे कमर म एक छोटा सा व मट होगा जिसम मि० ह यूबर्ट शोपा और चाइकोव्स्की के कपोजीशन बजायेंगे और फिर बीम कॉफी पी जायगी। और उसके बाद अगर समय रहा, तो पिछले सात हमन जो गुनाह किए है, उह हम सब मिलकर क फेस करेंगे।' इसी प्रकार उपा प्रियवदा की कहानी 'कोई नहीं' में नमिता की भाषा भी पात्रानुकूल ही है । "नही, अव मैं भी नही रखती ? साल के माल बीतते चल हैं। स्पोट स, क वोकेशन, इम्तहान, छुट्टिया सभी नियमित रूप से होता रहता है। नोटस पीते पड जाते है फिर भी हम वही पढाय चले जाते हैं । इस जीवन म कोई गति नहीं बची । होस्टल से कभी कोई लड़की भाग गई। किसी लड़के ने आत्महत्या कर ली, मिसी अध्यापक को लकर कोई स्कहल हो गया। यही हमारी जिन्दगी के हाईलाईटस बचे है।" इस प्रकार दोनो ही उदाहरणा में मास्टर या प्राध्यापक द्वारा अप्रेजी शब्दो का प्रयोग करना सर्वथा सम्भावित और स्वाभाविक ही है। इसी प्रकार आज के शिक्षित स्त्री पुरुष मे आजक्ल हि दी, उर्दू, अग्रेजी मिश्रित 61 डाक्यो मे जो वार्तालाप होता है उसे सुदशन चोपडा ने अपनी कहानी 'पैचा मे खूबी उभारा है- "सुहागरात को भी वे तनिक भावुक नही हुए (स्वय उही के शब्दो म) गाया इम दो शरीर और हृदय न हाकर मात्र मस्तिष्क हो एडजस्टमट के हर पहलू पर वचार करते हुए हमने तला तक को सम्भावनाआ पर थड पसन की समस्या की तरह चर्चा की थी और तलाक लेो मे पड सकने वाली कानूनी दिक्कतो में से तर रास्ता खोज लिया था । उसी ने सुझाया था-"इल्जाम लगा द् गी।" मरे पति ने नसबदी की बात शादी के वक्त मुझसे छुपाई थी और मैं बच्चा चाहती है फिर थोड़ी देर बाद खुद का विकल्प सुझान लगी थी-"या तुम मुझ पर एडल्ट्री का आरोप लगा देना में स्वीकार कर लू गो।" यहा तीन भाषाओ के शब्दो का प्रयोग किया गया है। हिन्दी शब्द --- -- हृदय, मस्तिष्क, शरीर, सम्भावनाआ, विकल्प, आरोप, स्वीकार । अग्रेजी शब्द-एडजस्टमट, एडल्टी, उदू शब्द-गोया, इल्ज़ाम, कानूनी, दिक्क्त, इस प्रकार की भाषा के माध्यम से स्त्री पुरुप के सबधो का खोखलापन भी चितित हुआ है। मानव इतना कठोर और भावना तथा सवदना शूय हो गया है कि मधु यामिनी के क्षणा में भी उसके हृदय में प्रेम जसी कोई चीज जम नही लती। समकालीन कहानी की भाषा में अचल विशेष और भौगालिक परिवेश का भी बड़ा ही ध्यान रखा गया है । जस कि पूरब प्रात की कहानियो मे पूरची भाषा का ही प्रयोग किया जाता है । माकण्डेय की कहानी 'बीच के लोग म-"हुडदगी वहा बैठा था । ठठा कर हमा अब जलन म का होता है हरसू बडा सुराज सुराज चिल्लात फिरते थे, जब सुराज आवा तो काहे के पिराय रही है। यह तो समय जमाने की बात है। कभी गाडी नाव पर, कभी नाव गाडी पर । वेद सास्स झूठ थोडे ही कहता है कि कलयुग मे कलकी अवतार होगा, हरिजन बेट बाचगे और तुम्हारे जैसे विष लत्तड की तरह दुवार दुवार घूमेग ।' "कहो भाई वुझावन, बात ठीक कहता हूँ न । मैं तो तुम ही को आपन नेता मानता हू ।" भीमसेन त्यागा की कहानी मे अधिकाशत हरियाणवी भाषा का प्रयोग है। उनकी कहानी 'धू टे' मे भी~-"विगारी की रीत के अनुसार बचपन में ही उसका ब्याह हो गया, पर जिस कहते हैं ब्याह, वह कब हो सका कभी हो सक्गा? बापू ने बस पैमा देखा था बम पैसा । जटियो म “याह दी थी। चाम्मड की लोटिया गई जटियो वे, पैसे के उप्पर । लम्बा चौडा कारखाना था चमडा क्माण का पर ब्याह कारखान से थाडा ई होवे ? ब्याह होवे है मरद मै मरद बहा कहा था ? चूहा मरा हुआ। अरे वो उसरा बाप । दारु पी में आया था। नास हो तेरा जटिये । भाख फूट गयी वो आप जो बेटे की जारी जर - 62 - कहा, तक तक । तक अपनी मा क धीम् । मैं तो चली आई थी अगले ई दिना आया फेर कई दफ लिवाणे कू । पर मैं वहा जाती तेर लियो ? आये हमे कारखानेदार । आधुनिक युग में जिम प्रकार मानव उत्तगतर हर दिशा म आगे बढ़ रहा है, वही उसने पाश्चात्य संस्कृति और भापा की तरफ भी कदम बढाया है। इसलिए समकालीन कहानी के कहानीकार ने भी सामा य व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त किए गये अग्रेजी शब्दो का कहानी म ज्यो का त्यो नि सकोच उठा लिया है और उहे परिवेश के अनुरूप ही ढालने का सफल प्रयास किया है जो स्वाभाविक ता लगता ही है, जाम आदमी के और निक्ट भी हो जाता है। राजेद्र यादव, निमल वर्मा, उपा प्रिय वना, मनू भडारी, श्रीकात वमा, ज्ञान प्रकाश, प्रयाग शुक्ल, ममता कालिया, अविता अग्रवाल, गिरिराज किशार, मणाल पाडे नादि की कहानियो मे अग्रेजी भाषा का नि सकोच प्रयोग किया गया है। मणाल पाडे की कहानी 'हमसफर' म-"तभी तो कहते हैं कि एडजस्ट कर लो' लम्बा गरगराया। फिर बह और नाटा जोरा से हसने लगे। जैसे भारी मजाक किया हो । बडी गर्मी है, “बडी गर्मी है ' लम्ब ने काच ऊपर किया, हवा अभी भी उमस भरी थी, पसा बर था । अबवे अपुन एक बडा फिरिज ले लेंगे नाटेने बीयर जो है, जो उसक विना ठण्डी नहीं होती ।" इसी प्रकार निमल वर्मा की कहानी 'लदन की एक रात' म-"इट इज आल राइट" मैंने उसका हायर से अलग कर दिया तथा जैसे मैं आखिर तक अपनी टागो को इसी तरह हवा मे घुमाता रहू । “ओह डियर हाउ फनी इट इज । हाउ फनी। तथा दयर इज रियल लाइफ । हर कोने पर जवान लडकिया खड़ी रहती हैं विली ने कहा। इस प्रकार निमल वर्मा की कहानियो मे तो पूर वाक्य ही अग्रेजी म होते हैं। निमल वर्मा शिक्षित पापा के वार्तालाप । अग्रेजी वाक्याशो का प्रयोग करते दीखते हैं। जैसे नेट अस सलीट टू नाइट , यी यस मे वो नो, द वर लुकिंग लाइक से नस, हेल विद हर, डू दी स्टास टेल ? व्हाई डाट यू बिलीव भी, आइ लव यू सा मच, इट विल वी वण्उरफुल, यू वाट माइड रूनी विल यू ? सो दट दे डेट लार इन पीस, नाट इन द वे, इट इज नाट गन" अपनी कहानिया म प्रयोग क्यिा है। ग्रामीण परिवेश को जीवत बनान के लिए कहानीकार ने अंग्रेजी व शब्ता को जिम प्रकार ग्रामीण परिवेश म रहने वाल बोलते हैं उसी प्रकार हूबहू उतार दिया है-पोजीसन (पोजीशन) हिलबर (डाइवर) टरेन (टन) फिलिइस्टार (फिल्मस्टार) इगरजी (अप्रेजी) । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि समकालीन कहानीकार न भापा की स्वाभा- विकता बनाये रखने के लिए और परिवेश पथ्य की स्वाभाविक्ता को बनाय रखने के 63 लिए अग्रेजी के विकृत शब्दा का भी सहारा लिया है। इससे कहानी अपना उददेश्य सफल बनाने में और भी सहायक सिद्ध हुई है । समय परिवतन के साथ साथ जहा कहानियो का कथ्य परिवर्तित हुआ, वही शैली में भी बदलाव आया। समकालीन कहानीकार ने कल्पना पर अधिक ध्यान न देकर यथाय और अनुभव का अधिक महत्व प्रदान किया। कहानीकार ने ऐसी कोई भी शैली अपना ली है, जिसके द्वारा वह अपनी बात पाठका तक सरलता से पहुचा दे। इस प्रेषण प्रयास में उसने सम्मरण, पत्र डायरी, प्रतीक, निवध, रेखाचित, व्यग्यात्मक शलिया अपनायी है । वह एक ही शैली के खू टे से न वधते हुए विविधता की तलाश मे रहा है। कहानीकार कहानी लिखते समय अपनी शैली स्वय ही तय कर लेता है और फिर उसी का अनुगमन करते हुए अपने उददेश्य को स्पष्ट करने म सफल तो होता ही है वह भी अपन तथ्य के अनुरूप । समकालीन कहानी की महत्ता इसलिए और भी अधिक बढ़ जाती है कि उसने विभिन प्रकार की शैलियो को मिश्रित करके कहानी का सृजन किया है । निमल वर्मा ने अपनी कहानी 'परि दे' मे सस्मरण, सवाद, सगीत, और चित्र शली का मिश्रित रूप में प्रयोग किया गया है, जिससे कहानी जीवन हो उठी है । नान रजन की कहानी 'सम्बध म नाटकीय शली का प्रयोग किया गया है । जिसम प्रतीत होता है कि कहानी का 'मैं' किसी के समक्ष कहानी का प्रस्तुतीकरण नाटकीय ढग से कर रहा है.---"मैं बहुत प्रसन था। आज सुबह उठने के बाद से ही यह प्रसनता शुरू हो गयी थी। मुये यह समय नहीं आया कि आखिर इसका क्या कारण हा सकता है।' "शायद जापवा विश्वास ही नहीं हो रहा कि मैं दिन भर प्रस न रहा हूँ। पता नही आप इस तरीके से क्यो सोच रहे है कि एक हिंदुस्तानी युवक का प्रसनता से किसी तरह का सम्पर भी हो मकता है।" "यह क्तिना अविश्वसनीय लगता है कि दिन भर के बाद लौट कर ज्यो ही मैंने अपने घर की इमारत देखी मैं हताश हो गया ।" इस प्रकार कहानी मे निवाघ जैसी विचारोत्तेजक शैली का भी आभास होता है । भीष्म साहनी की 'भटकती राख' म लोक कथात्मक शैली का प्रयोग हुना है । बमलेश्वर को कहानी 'राजा निरबसिया' म भी लोक क्यात्म तथा समानातर चलती हुई कहानी में सवादात्मक और पत्र शली का मिश्रण है । लोष कया और लार मगीत का प्रयाग 'रेणु' की कहानियो मे हुआ। जिनमे रसप्रिमा' और 'तीसगे बमम' प्रमुख हैं। 'तीसरी कसम' म गीतो की रचना होने के वारण लोक गीतो का आभास तो होता ही है साथ ही उसमे कविता के गुणों का भी समावेश हुआ है।
64 ।' इसके अतिरिक्त कहानीकार ने नय स नय प्रयोग शली के नाम पर किए । दूधनाय सिंह ने अपनी कहानी 'रीछ' म जिस प्रकार किया है जिसम पात्र पर पली द्वारा प्रेम- सवधा का कही और का दोषारोपण दिया जाता है। इस पर नायर हताश और जड सा रह जाता है और अपनी पत्नी के समीप नटे-लेटे प्रेमिका की ममनि हो आनी है । "क्या बात है तुम बार बार घडी की ओर क्या देख रह हा ? कोई नहीं आने का। क्या तुम डरते हो। घडी का मुह दीवार की तरफ । अब ठीक है ? मुखें कोई डर नहीं है । आई फोल सब्लाइम । क्या तुम जानते हो, उनके साथ मुझे कमा लगता है जैसे कोई रीछ मर ऊपर झूम रहा हो । उबकाई आने को होती है । तुम विश्वास नही करते तुम्हारे साथ ? तुम तो एक बच्चे की मानिंद लेट जाते हो। इतने साफ्ट कोमल वह वेवल मैं जानती है माई चाइल्ड मेरे शिशु निष्कपत स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को व्यक्ति के माध्यम से पहचानने के प्रयास मे नये कहानीकार ने नय नय प्रयोग शैली के स्तर पर किए हैं जिनमे व्यक्ति का अतद्वद्व, मानसिक जटिलतायें, विकृतिया और न जाने कितनी बातें साफ स्पष्ट रूप में उभर कर सामने आई है। कहानकारा ने व्यक्ति के आतरिक सघष का सूक्ष्मता से अध्ययन किया है। व्यक्ति के मन की जटिल और सूक्ष्म स्पितिया नय प्रयोग से स्पष्ट की है। ममकालीन कहानिया म कहानीकार ने प्रतीका का सहारा भी लिया है जिसके माध्यम से वह अपनी बात और भी स्पष्ट रूप से पाठक के समक्ष ला सके । प्रतीक वसे भी अमूत की अभिव्यक्ति का सबसे सरल माध्यम है। जीवन के प्रवाह में ही प्रतीको के भी अथ परिवर्तित होते रहते है। नई कहानी की भाषा मे प्रतीका का प्रयोग बहुलता स हुआ है यहा तक कि शीपक भी प्रतीकात्मक रखे गये । कमलेश्वर कृत 'सीखचे' म सीयचे जहा पुरातन मा यताओ का आभास करात हैं वही वे बूढे होते हुए उनमे शक्ति है और अनुभव की गर्माहट है । 'नीली पील' में झील जहा व्यक्ति सौ दय का प्रतीक है वही 'मास का दरिया बढती वेश्यावत्ति और उसस उत्पन विकृतियो का प्रतीक है। निमल वर्मा की 'परि दे में जहा परि दे व्यक्ति के एकाकीपन और भय के प्रतीक हैं वही जलती झाडी' यौन का प्रतीक है। "पिक्चर पोस्टकार्ड' सम्बधा के खोखलापन का प्रतीक है 'वीच वहम मे' पुरानी और नयी पीढी के बीच का प्रतीक बहस है। उपा प्रियवना की 'टिप नशे का प्रतीक है। कच्चे धाग व्यक्ति के जीवन में उन क्षणिक सवधो और स्वाथ स्वरूप क्षणिक आवेशा का प्रतीक है। निदगी और गुलाब के फूल म कागज के फूल जीवन की गघहीनता और नीरसता के प्रतीक है ।
65 Ras मनू भडारी की कहानी 'एक प्लेट सैलाब' का सैलाब जिंदगी के यथार्थ का सैलाब है । यह सैलाब स्वप्नो को अपने साथ साथ बहा कर ल जाना है। साहित्य, साहित्य की प्रकृति भाषा और चेतना युगीन परिस्थितियों से प्रभावित हुए विना नही रह सकती । इही को समग्रता से इनकी विशेषताओ को ग्रहण कर के माहित्य आगे बढता रहता है, और इसी का अनुकरण समकालीन कहानी न भी दिया है । समकालीन कहानी जिसने कितने ही नये प्रयोग क्येि और आज अनेक सकटो से बचकर एक स्वतंत्रता और समृद्धि के रूप मे देखी जाती है। इस कहानी के कहानीकारो ने नये नय देप्टिकोण निर्धारित किए है। आत्माभिव्यक्ति को प्रेरणा कहानी का मूल है । इसी आत्माभियक्ति के माध्यम से व्यक्ति का जीवन दशन, चरित्र चित्रण, समाज में फैले भ्रष्टाचार और व्यक्ति के जीवन मे उपजी विकृतिया और स दभ नयी कहानी के माध्यम से प्रकट हुए हैं । इसी आत्माभिव्यक्ति मे जाज के व्यक्ति की पीडा और स्थितिया छिपी हुई है, फिर चाहे वे मानसिक स्तर पर हो, शारीरिक स्तर पर हो या जिन्दगी जीत हुए गाह ब गाहे पेश आती हो। उन सभी का रेखाकन नयी कहानी या समकालीन कहानीकारा ने सशक्त म्प म किया है। समकालीन कहानी न ‘फामू ला', जीवन को छोड पर युगीन परिवेश, यथाथ जीवन और अनुभवो मे अध्ययन का लक्ष्य रखा है। बाम, प्रेम, ममता, माहचर्य और स्वत प्रता सभी मूल्यों को जाचा परखा है । आधुनिकतावोध, भय, पीडा, सत्रास, और मत्युबोध की साहित्यिक सकल्पनाओ को भी समकालीन कहानी में स्थान दिया है। नई कहानी' में लिए गये सदभ संवेदना की सद्धि दृष्टि की नवीनता और अनुभूति यी गहरी पैठ यथाथ के धरातल पर आकर परवान चढ़े है । क्थ्य छाट हैं लेकिन अपने आप में एक विस्तार लिए हुए है जो टू ढने में और भी गुम होता जाता है। किन छोर हाथ मे अवश्य रहता है । ममफालीन कहानी का क्यान काम, मह, हीनता, सामाजिक वति म सिमटा हुआ है। स्त्री पुम्प के नवीन सम्बधा, नवीन सैक्स चेतना जैसे विषयो पर भी कहानी मागे ने अपनी लखनी चलाई है। 'समकालीन कहानी' म कही न कही, कोई न कोई कहानी मे चरित्रगत रूढिया टूटी अवश्य है । इसके स्थान पर सहज और यथार्थ में जीन वाला सामान्य व्यक्ति समकालीन कहानी मे आ गया। चरित्र चित्रण मे भी वहानीपार का उददेश्य मनुष्य के अतमन को जानने का ही रहा। जीवन यतलाव में पुरानी भाषा म अभिव्यक्ति सामन्य न पा कर नय कहानीकारो न जन सामाय की भाषा को अपनाया और उसम प्रतीवो और बिना म... नया अथ उत्पन दिया । उस भाषा मे आयु, शिक्षा और मौगोलिक परिवेश का 66 - पूरा ध्यान रखा गया जिससे वह कृत्रिमता से बची रही और सहज और मरल रही मनुष्य के चरिय स मल पाती रही। अग्रेजी शब्दा में प्रयोग न उस और भी सहज बना दिया और कही विकृत अग्रजी के शो ने जिस प्रकार नयी शैलिया का प्रयोग किया गया उसके द्वारा व्यक्ति को गहरे समझने में सामथ्य हासिल हुई । समकालीन कहानी में परिवेश को अधिक महत्व दिया गया। पुराने सदभॊ को छोड़ कर नये य स भ उठाए गय । भीड में गुम हुए व्यक्ति को अभिव्यक्ति प्रदान की गयी। विशेषकर ऐस “यक्ति का जो महानगर म अपना गाव, कस्वा ढूढ रहा था। समकालीन कहानी की व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य म देखा गया। ममकालीन कहानी या एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष है-अलगाव बाध । यह अलगाव कही परिवार के स्तर पर व्याप्त है कही प्रेम सम्बया में और कही दाम्पत्य मम्ब धो म । इसीलिए नये कहानीयारो द्वारा इम पक्ष को उठाना उचित ही है । यह प्रयास मवप्रथम पारिवारिक स्तर पर किया गया। पारिवारिक स्तर से मेरा आशय, पिता पुत्र और पिता पुगी के बीच उत्पन हुआ जलगाव बाध है, जहा रिश्त गहरे होते हुए भी एक गहरी दरार छिपाए है । मा पिता और स तान का सबंध मबम अधिक महत्त्वपूर्ण है। इमी को क्थ्य के रूप म फेरबदल करवे दोहराया भी गया है। इससे यह अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि यह कहानिया तखको ने अपने अनुभव ससार से छाटी है । लेकिन इसम क्तिना अश व्यक्तिगत है यह कहना कठिन ही नहीं, नागेपित भी होगा। इन कहानियो मे से कौन सा क्थ्य ऐसा है जो पाठको द्वारा अधिक स्वीकारा गया हो और किस भाव न उनम अधिन प्रतिक्रिया उत्पन की। मैंन उ ही तत्वा और कारणा को विशेष रूप से उठाया है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप स पारिवारिक सबधा मे दरार पदा कर रहे है । ऐस क्या कारण है और ऐसी कौन सी आशायें हैं जो परिवार के सम्बधा का तोडती मरोडती हैं । राजेद्र यादव की बहानी 'भविष्य के आम पास मडराता अतीत' पिता की न्यनीय स्थिति की आर सात करती है। अतीत म उसका अपनी पत्नी स अलगाव हो गया था और एक दुघटना के कारण वह कुरूप हो गया था। पिता के अपेक्षित भविष्य म उस बच्ची के साथ नय सिर स सम्बन्ध स्थापित करना व अतीत का भूलने की आकाक्षा है। अपनी बच्ची से सम्बध स्थापित बग्न की कामना है । उसे उम्मीद है कि वुलबुल कहानी के उस छोटे लडके जमी होगी जो फासी पे लिए जाते हुए पिता से दौड़ कर कहता है, "बापू तुमने कुछ नहीं किया, कुछ नहीं किया ।" लेक्नि आशका यह भी है कि इस बीच शायद मा ने उस पिता से घणा करना न सिखा दिया । पत्नी और पुत्री से इस व्यक्ति या अलगाव उसकी स्वय को गलतो का परिणाम ।
67 है। कहानी पिता की उस क्षण को मन स्थिति को अभिव्यक्त करती है जबकि वह स्कूल की लडकियो के साथ जाती अपने बेटी से भी बात करने का साहस नहीं कर पाता। कहानी का आशय समझौता करना नही वरन कुरूपता के कारण बच्ची मे वितष्णा का भय है जा ममयौत की राह म बाधक है। निमल वर्मा की अधेरे म' का वच्ची अपने पिता स इस सीमा तक डरता है और उहें असयत बताता है क्योकि उसके पिता सवसे पहले उसके हाथो के नारनो का देखत हैं । इसलिए वच्ची थटपट अपन नाखून दाता से काट लेता है- “आखो को गोल तौलिए से पोछ लेता है और हाथों को मुह पर रखकर फूक मारता है, और फिर उह सू घता हू-यह देखने के लिए कि मुह साफ है या नहीं।" उसका कहना है - 'बाबू के सग जो सकाच और तनाव रहता है, वह मा के मग बिल्कुल नही रहता। पिना कभी न मिट मक्न वाला असगाव बनाये रखते है। लेकिन इस कहानी का आशय या उददेश्य पिता पुत्र के अलगाव को दर्शाना नही, पारिवारिक स्थिति को उभारना है जिसमे मा बच्ची के चाचा से प्रेम करती है जिसके कारण तनाव की स्थिति बनी हुई है। पिता पुन म एक दूरी के होते हुए भी सम्बध सून जुडा हुआ है---"मैं उससे डरता हू, कोई भी फरमाइश करते समय मेरा दिल धडकने लगता है, कभी खुलकर मैंने उनसे अपने मन की बात नही की~-इसके बावजूद मुझे अपने अधिक निकट और पहचाने लगत हैं । कुछ एसा है, जो हम दानो यो मा से अलग कर देता है, इसीलिए मा को चाहते हुए भी उह देखकर कभी कभी मेर भीतर कुछ रूजासा हो जाता है ।" पिता पुत्र मे अलगाव होने के बावजूद अकेलेपन की अपनी-अपनी स्थितिया उ है आपस में जोडती है । राजकुमार की 'रिकाड मे पिता एक ऐसा बूढा व्यक्ति है जिसका अपने पुन से तनावपूर्ण सम्ब ध रहा होगा, लेकिन कुछ वष बीत जाने पर भी दोनो मे वही अलगाव बना हुआ है । बूढे व्यक्ति के छोटे पुत्र की मत्यु हो चुकी है और वह सोचता है कि बडे लडके के घर आने पर वह उस सोने से चिपका लेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता । इतना अरसा दूर रहने पर भी दाना म दूरी और अजनबियन बनी रहती है । उपा प्रियम्बदा की कहानी 'सुरग' में भी यही स्थिति है, जिसमे पिता की मत्यु वे वाद मा अपन आस पास अकेलेपन का घेरा इनना घना वुन लेती है कि अपनी पुत्रिया से एकदम अलग हो जाती है । इम अलगाव के कारण ही लडकिया सनस्त हो जाती हैं यहा तक कि बडी लड़की अपनी हाथ की नसें काट कर आत्महत्या तर्फ का प्रयास कर डालती है। छोटी लड़की भी इस अलगाव और अकेलपन के कारण अपन मर की भावनाओ को किसी को नहीं बता पातो और इस घटन को रात के अधेर मे मदूर करती है। कमलेश्वर की कहानी 'पराया शहर' मे स्थिति अधिक गम्भीर और शोचनीय ।
68 . है । बहानी म पिता बनतियतापूर्ण कार्यों में ग्रस्त है। इस लग्जाजनक ममत कर पुष घर छोड देता है। मा को मत्यु के पश्चात पुन को लज्जा का अनुभय होता है न मि मपमान या। सड़की का भगा लान पवाद पिता अपनी बदनामी चरम पर पहुच जाता है और पुलिम मे घिर मकान की छत से चिल्लाकर कहता है-"है मोई माई या लाल जो जमानत दद।" लहका आता है, लगिन डर और अबलपन में आमुआ ५ माथ अपना रस्ता लिए वह स्कूल की तरफ भाग जाता है ।-"धे गलिया और उसका वह मवान उसके लिए मा पराय थ ।' पिता उग लडकी स विवाह करता है तो यह घर भी उमरे अपना नही रह जाता। लगाया सहने मे असमय हो पर वह जल्दी हो घर छोड़ कर चला जाता है क्माकि लोग यह कह पर उसकी तरफ उगली उठान हैं कि "उमी दुर्गादयाल कानडा है यह, उमी वरमाश का।" कहानी का मुभ्य त र वह है जहा कि लडवे को नए शहर म आपर अक्लपन का अहसाम हाता है। इसी के विपरीत पिता का वक्तव्य है-~-"मुझे तुम्हारी जम्मत नहीं हैं, मर लिए मागे दुनिया पटी है। दस आदमी हैं जो मरा साथ दन को तैयार हैं। तुम्ह जगर हमारी बातें बर्दाशत नही होती तो न हो। लकिन इसके बाद भी पिता अतत म्थय को एक पराय शहर म काकी ही पाता है । गजेन्द्र यादव की कहानी 'विराटगे वार' म अलगाव पुषी और पिता के बीच है कारण पुत्री का पिता की इच्छा विद नीची जाति म विवाह करना है। पिता पारम टमी कारणवश लज्जा का अनुभव करता है। पिता मन ही मन सोचता है कि वह बाजार से गुजर रहा है और लाग पतिया क्सत हुए कह रहे है- "इही पारस बाबू की लडकी न गेर जान के लड़के से शादी कर ली है।" पिता न इम शादी को स्थगित करने के इरादे स कहा- 'मेरी लाश पर मालती की शादी होगी।" इस प्रकार विरोध प्रक्ट भी किया कि तु दिल के दौरे के कारण इससे आग कुछ नहीं कर पाय । दूसरे शहर मे सिविल मरिज हो गयी--"हा वे तो नही मर, लक्नि उस दिन मालती जरूर उनके लिए मर गयी। इस कहानी म जलगाव जो कि पिता पुत्री के बीच था वह मा क एक गभीर ऑपरशन के समय एक अजीब सी मन स्थिति के रूप मे जा उभर पर सामने आता है । इस मौके पर मालती पर पति के साथ आयी हुई है। अब समस्या यह है कि समयोत की पहल क्सिकी आर स होगी। पिता की ओर से ? लेकिन पिता कुछ दुलमुल से पड जाते हैं जिमम परोक्ष रूप से तो यही लगता है कि उहान समझौता कर लिया है। क्योकि वे चिली मजिल के एकात में से चुपके चुपके दामाद को दखत हैं और सोचते हैं पता नही, उसे ठीक से खिलाया पिलाया भी जा रहा है कि नही घर के बारे में उसका विचार क्या बना होगा ? "एक बार इस नय आदमी को दखें तो ही कि आखिर मालती ने इसमें ऐसा क्या पाया।'
69 इस परिस्थिति मे लडकी के घर आने से तो यह पता चलता है कि पिता के प्रति उसके मन मे कोई द्वेष नहीं है। वह पिता के स्वभाव से सुपरिचित है इसीलिए पिता के बडबडान पर कि-"अगर मालती खाना लाई तो वे उसे फर देंगे।" इसलिए वह उनसे मिलने नीचे नहीं जाती । इस कहानी में कुल मिला कर सारा दोष और दायित्व पुत्री पर नहीं है क्योकि आज का पाठक अतजातीय विवाह के पक्ष म अपने विचार देता है, इसलिए पिता का ही दायित्व है कि वह स्थिति को सुधारने की पहल कर । वरना इस पहल के अभाव म स्थिति सुधरन की अपेक्षा अलगाव को और बढावा ही देगी। कमलेश्वर की कहानी 'तलाश' मे मा बेटी के बीच अलगाव और तनाव होते हुए भी स्थिति अधिर गभीर नही है, पुषी का व्यवहार अपनी मा के प्रति स्नहपूण है । इस कहानी म लडकी 20 वर्षीया युवती है, इसलिए वह मा के सबधो से अच्छी तरह परिचित है । मा के तकिए पर क्मिी अय के सिर के निशान और ऐश ट मे सिंगरट की राख इस सबध को और भी स्पष्ट करते है । मादा एकाएर पूरी आस्तीन का ब्लाऊज पहनना तय करना, मेकअप से वाह पर पड़े निशान को छिपाने की कोशिश करना, कालेज के काम से शहर जान की बात करना और टक्सी में बैठे व्यक्ति के सिगरट की राख का बाहर गिरना, ये मव कारण मा के चरित्र को सदिग्ध बनाते हैं । इतने पर भी वेटी अपनी मा के साथ स्तहपूण व्यवहार करती है। घर का सारा काम अपन धो पर उठा लती है, इस पर भी मा सुमि की सारी साडिया एक एक कर समट लती हैं । आखिरकार सुमि वकिंग गल्स होस्टल में चली जाती है लकिन कारण बताती है कि उसके काम के समय की सुविधा। कहानी के जत म सुमि मा के जन्मदिन पर फूल ल कर जाती है, लेकिन फिर भी सोचती है उस ममी को पहले टेलीफोन कर लेना चाहिय । इस प्रकार वातावरण । किसी भी प्रकार बोझिलता मुक्त न होने के कारण कुछ भी कह नहीं पाती। मुमि सोचती है वह सिफ इतना ही कह पायगी, “ममी क्तिना बज गया है।" सारी कहानी में एसा महसूस होता रहता है कि या तो सुमि मा के सम्बधा के बार मे जानती नही या फिर जानबूय कर मा-बेटी के सम्बधो के बीच दरार न पैदा हो जाये इसलिए वह मूक दशक बनी स्थिति से समझौता कर लेती है क्योकि मा और वटी के बीच का अलगाव अत्यधिक दुखदायन है । क्यादि पिता के साथ तो फिर भी विद्रोह, विराध बर्दाश्त किया जा सकता है, मा के साथ नहीं । समकालीन कहानी में एक सीमा तक परिवार में अलगाव के कारण परम्परा से हन्न म है । पिता की छवि, चरितपूण, सहनशक्ति, और स्नेहपूर्ण हो, मा की छवि ममतामयी हो, बच्चो की खातिर लडाई अपने सिर लने वाली, धरती के समान धेयवान हो, बच्चो को छवि स्नेह और आदर प्रकट करने वाली हो, इसलिए जहा ra ३ 70 कोई भी अपनी एक भी इकाई से टूटा, समझो अलगाव की शुरूआत हो गयी। जहा कही एक दूसरे के प्रति उदासीनता, झु झलाहट का प्रदशन हुआ, वही क्षोभ उत्पन्न हो गया। इन दूरियो के पीछे पारिवारिक जिम्मेदारी की एक ही सी अपेक्षाये हैं, विश्वास है, इन के टूटते ही अलगाव शुरू हो जाता है। नयी कहानी में अलगाव की सतह में जान की कोशिश इस संसार के वासी नहीं करते, बल्कि एक दूसर पर दोपारोपण करते हुए दिखाई देते है । बजाय इस समस्या के उलझने के या तो हाथ पर ढीले छोड दो या फिर कुछ देर या समय के लिए खुद को गुम कर दो । यति कुछ न हो सके तो उसी तनाव और बोझिलता म घुटत रही। सवेदनशीलता से हटने पर इसके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है । प्रत्यक्षत समकालीन कहानियो में प्रेम कहानियो का चित्राकन कम ही हुआ है । इसे हम रूढिवादी होग कह सक्त हैं, जहा विवाद से पहले के प्रेम सम्बधो का अनैतिकतापूण कहा जाता है । कहानीकार जो कि इसी समाज से सम्बद्ध है प्रम सम्बधा के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखता है। माता पिता भी प्रेम सबंधो म वहीं विरोध प्रकट करते हैं, जहा जाति से बाहर प्रेम का क्षेत्र हो । जहा प्रेम सम्बध टूटने के बाद जीवन का सुख और सतोप सकट में पड़ जाता है। पारपरिक विवाह को स्वीकारने वालो के प्रेम सम्बध अस्थिर होते हैं, वहा केवल आकषण ही प्रमुख होता है, वात विवाह तक पहुच ही नहीं पाती। प्रेमियो मे से एक का विवाह हो जान पर प्रेम सम्बधा की समाप्ति हो जाती है । समकालीन कहानी लेखक ने प्रेमी युगल स ध्यान हटा कर विवाहित युगल के जीवन म उत्पन होने वाली समस्याओ को अपनी कहानियो का कथ्य बनाया है। इसके साथ ही प्रेमी और प्रेमिया की समस्या का भी उठाया है जहा कि प्रेम सबधो में भी एक प्रकार का अलगाव बोध उत्पन हो गया है, एसी बहानियो के लखको म निमल वर्मा, उषा प्रियवदा, कृष्णबलदेव वंद, राम कुमार प्रमुख हैं। इन कहानियो की पृष्ठभूमि अधिकतर पाश्चात्य है । इन कहानीकारो की कहानियो मे प्रेम के पक्ष को लेकर, प्रमी प्रेमिका के बीच उत्पन हुआ अलगाव, असतोप, अविश्वास को अजनबियत को चित्रित किया है जो सहज तो है ही साथ ही स्पष्ट भी है। निमत वर्मा की तीन कहानिया 'लवस' 'अतर' और 'दहलीज' में अलगाव बोध का अहसास अत्य त खूबसूरती से कराया गया है । दहलीज म छोटी लहरी रूनी सोचती है मि शम्मी भाई उससे प्रेम करते हैं लेकिन यह उसकी गलतफहमी है। वह जिस लिफाफे म अपने लिए प्रेम पत्र होने की आशा रखती है व उसके लिए एकत्रित किये गये डार टिकट निकलते हैं। वह अपनी कोमल भावनाओ को धक्का लगते हुए नहीं देख पाती या कहा जाए कि उसने सोचा भी नहीं होगा कि प्रेम म अलगाव और दुस भी शामिल है, उसके हृदय पर जो प्रेम की रूमानी वि अक्ति थी, जम वह टूटती है तो उसकी भावनामा का मत इस प्रकार होता है-"मेहरू बत्ती बुझा 71 देखती नहीं, मैं मर गयी है।" इसके अतिरिक्त--"रूनी छत की ओर एक क्षण तक देखती रही, उसने पीले चेहरे पर एक रेखा खिच आयी मानो वह एक दहलीज़ हो, जिसके पीछे वचपन सदा के लिए छूट गया हो।" निमल वर्मा की ही दूसरी कहानी 'अतर' में अलगाव वोध अलग ढग से चिनित किया गया है। 'अन्तर' मे गभपात के बाद प्रेमी प्रेमिका के बीच हुई औपचारिक बातचीत अलगाव बोध की ओर मकेत करती है। प्रेमी सोचता है कि गभपात के बाद भी उसके मम्बधो में बदलाव नही आयेगा। लेकिन ऐसा नहीं है क्योकि शारीरिक सबधों के बाद सतानोत्पत्ति का भार वहन करने के स्थान पर गभपात ने उनके सम्ब धो मे एक प्रकार की दूरी उत्पन्न कर दी है जो उनके वार्तालाप से साफ झलकती है--- इसके साथ साथ पानी के विचारा की गहराई का भी भास होता है-- ? --सुबह- -“यादा देर तो नहीं लगी। -नहीं उ होने क्लोरोफाम दे दिया था। मुझे कुछ भी पता नही चता । -मैंने तुमसे कहा था कि तुम्ह कुछ भी पता नहीं चलेगा तुम मानती नहीं --"कब हुआ -- थी। - हा, लकिन ----तुम अब सुखी हो? ----हम दोनो पहते भी सुखी थे। अब तुम सुखी हो? -तुम जानती हो यह हम दोनो के लिए ठीक था मैंने तुमसे पहले भी कहा था। ---देखो अब कोई फिक्र नहीं है । अब मैं ठीक है। -लेकिन तुम अब भी उसके बारे म सोचती हो। -~मैं किसी के बारे म नहीं सोचती।" अ त मे लड़की अपने प्रेमी के चल नाले के बाद उसके लाए हुए उपहार अस्पताल की खिडकी से बाहर फेंक देती है, जिससे अलगाव बोध का रंग और गहरा हो जाता है। तीसरी कहानी 'लवस' मे लडका लडकी से लिखित प्रेम निवेदन करता है, जिसे वह स्वीकार नहीं कर पाती, क्योकि वह इस निवेदन का स्वीकार करन क लिए स्वय को तैयार नहीं कर पायी है। इसके साथ ही यह दर्शाया गया है कि प्रेम शारीरिक सम्बध तक नहीं पहुंच सरता, इसीलिए उसका विनाश ही उचित है। कहानी का मत बहुत सादर और प्रतीकात्मक है। जहा पहले प्रेमी एक रस्तरा में मिलते हैं वही जय दोनों रस्तरां से बाहर निकलते हैं तो लडका पत्रिका घरीदने के लिए पीछे छूट जाता है ।
72 इसी प्रकार पाश्चात्य पष्ठभूमि पर लिखी जाने वाले कहानीकारो में उपा प्रियवदा भी हैं जिनकी कहानिया इस अलगाव-बोध को चिनित करती है। इनमें 'मछलिया' और 'पिघलती हुई वफ' कहानिया प्रमुख हैं। इसम प्रेमी स्वय मे अलगाव का कारण ढूढन के स्थान पर एक दूसर पर दोपारोपण करते हैं। कहानी 'पिघलती हुई बफ के दोनो प्रेमीगण भारतीय हैं लेकिन रहते अमेरिका मे है । एक अ य लडकी ट्रिनिडाड की है, चू कि लड़की पाश्चात्य देश की है इसलिए उसका किसी लडके के साथ घूमना उचित ठहराया जायेगा न कि उसे चरित्र की कसौटी पर कसा जायगा । उसका अपना प्रेमी एक पुस्तक लिखने के कारण एका तवास कर रहा है और जिस लडक के माथ रह घूम रही है वह उसका सहपाठी ता रह ही चुका है, साथ ही उनके परिवार भी एक दूसरे से परिचित हैं । डका, सुधीरा को तो उसकी बेवफाई के लिए माफ करता है लेकिन अपने प्रतिद्वद्वी को नही। इसलिए प्रतिशोध लेन के लिए अक्षय उसे जानबूझ कर खराब वे वाली कार दे दता है, जिससे लडका ता मरता ही है, मुधीरा की भी उस दुर्घटना मे मत्यु हा जाती है । कहानी का अत अक्षय का खुद को क्षमा करन और नया जीवन जीन के प्रयासो को लेकर है। वह यह सोच भी नहीं पाता कि इस प्रेम को परिवर्तित करने में सुधीग भी शामिल थी, बल्कि वह तो सोचता है कि उसके प्रति द्वी ने प्रेमिका को हथिया लिया है, जहा उसने प्रतिद्वन्द्वी का रास्ते से हटाया उसकी प्रेमिका वापिस उसके पास आ जायगी । इस कहानी मे पात्र अक्षय द्वारा उत्तेजना और नीव्रता से निणय लिया जाना अलगाव बोध का कारण होना सिद्ध हुआ है । इसी प्रकार की प्रतिद्वंद्विता का नकर लिखी गयी उपा प्रियवदा की दूसरी कहाणी मछलिया' है । कहानी की मुख्य पाना एक भारतीय और सस्कारी लडकी विजी है । वह अपन भगतर के साथ विवाह के लिए अमरिका आती है, लेकिन वहा आकर उस पता लगता है कि उसके भगतर की उसमे जब कोई रचि नहीं रह गयी है, वह इसका कारण एक वगाली लडकी मुकी को मानती है। पहले तो विजी एक परम्परागत लडकी की तरह यह आशा और प्रतीक्षा करती है कि शायद उसका व्यवहार उसके प्रति ठीक हा जाये, लकिन एसा नही होता। विजी अपन मगेतर के कनाडा चल जान के बाद जब देखती है कि कोई नाशा नही वाकी बची है, और न ही अब वापस भारत लौटा जा सकता है, वह नटगजन की आर ध्यान देना शुरू कर देती है, जिसस उसकी दोस्नी इस देश म पहला कदम रखत ही शुरू हो गयी थी । परतु नटराजन अब मुकी के साथ विवाह करने की योजना बना रहा है। नटराजन का मुकी और विजी के साथ शारीरिक संबंध नहीं रहा । नटराजन विजी के प्रति आक्षण का कारण समझ नहीं पाता फिर भी यह मकी के प्रति अधिक आकर्षित है। इसस विजी के मन में एक प्रकार 73 से खर पल हो नी है गाजर दान पुलों में से रिसी दर को भीन का सस्न के कार । इजानिए वह बाते ममप प्रतिरोध म्वरूप नुको से कह कर जाती है दिन-राकेन नन्बा उम्के साप है। पहा नुको भी पचधिक तोस्टिकर होन के बाद मोदन दिनी रे कहने पर नाराजन के नाप तर पपने विचार को HTF में नोट देती है। इन दोनों कहानियों ने यह सर होता है कि एक भारतीय चयन के भाग समन्वय नो जोड लेता है लेकिन अपने प्रेम के प्रति स्तिो सतरे का देवर नहन नहीं कर पाता और प्रतिशोध स्वरूप हीन भावना में भर कर कुछ मी क मरता है। दोनों कहानियों के पात्र रक्षर लौर विजी दूसरे की भावनापो कान कम हुरन्बर का ही दीन होन ममपते हुए, दूसरे पर दोषारोपप फरत है और एनही मिनिया और परिस्थिनिया अलगाव बोध को बम देती है । परो सर्क से मन न भावना का भाव अधिक लिया जाय तो फिर यही अत है। पारिवारिक स्तर और प्रेम संबंधो के लर पर उत्पन्न हुए पनगाय पोष के अतिरिक्त यही अताव वैवाहिक स्तर पर भी कायम है। कुछ ऐसी समाएरै पौर कुछ एना नागायें हैं, जिनके रहते यह अलगाव न चाहते हुए उत्पन हो ही जाता है। इमा एक कारण विवाह का माता पिता के चुनाव के आधार पर होना है जहा यह पाया हा की जाती है कि पति पत्नी जहा यजनबी होत हुए भी जब पियार हो तो ए आश पति की भूमिका निभा सके। प्रेम से रह । हमारा लेखक भी समाज से जहा हुना है इसलिए वह भी आयोजित विवाह को ही महत्व देता है । जबपि सत्यता तो यह है कि प्रेम विवाह मे भी टूटन यो किरच आ सकती है या यह यहा जाए कि आयोजित विवाह माता पिता की सहमति के होने के कारण उनमे प्रेग हो ही सक्ना, गलत है और फिर हमारे लेवर तो असफल और टकराहटपूण 4 शाहिम सबधो को लेकर अपनी कहानिया लिखते है। अधिक्तर यह देखा गया है कि बच्चे अपन माता-पिता द्वारा पति शिवार से वचन की कोशिश नहीं करते। बहुत ही कम पान ऐस उदाहरण हैं जहां ममो द्वारा अपनी पसद का विवाह करन के लिए मा बाप पर जोर डाला जाता है। अधिकांशरा जहा विवाह की इच्छा न होत हुए भी विवाह किया जाता है यही विषा परने का प्रयाम किया जाता है क्योकि प्रेम के क्षेत्र मे तो प्रेम या प्रेमिमा मे से एम का विवाह हो जान पर पुन लौटन की आशा न के बराबर ही होती है । कुछ कहानियो के पात्र या तो विवाह में अपने गाय को अधिक महत्व देते हैं या फिर परिवार में क्लेश न हो इसलिए माता पिता पे पुनाव कर लेत हैं । राजेद्र यादव की कहानी 'रोस खिलौने' पी नलिनी कहती है कि मत शादो की अपेक्षा मौत अधिक पसद दरेगी क्योकि शादी से उसकी कमान सौर वौद्धिक क्षमतायें नष्ट हो जायेंगी । वह माता पिता को उस प्रवृत्ति का यो चुपचाप स्वीकार 74 परती है जहा कि लडकी की प्रतिमामा के विकास में पीछे यह नहीं सोचा जाता कि उनयी बोद्धिय क्षमता प्रदर्शित हो, इसके विपरीत मादी के लिए मासानी हो, ममता जाता है। वह इस विवाह य लिए विद्रोह भी मरती है परतु प्रताहना ये वाद विवाह के लिए राजी हो जाती है और न विवाह पनि बहती है-"वम अव नहीं रोजगी क्यापि जो चीज मरे पाम असाधारण थी, जिसपा मुझे गव था और जिसस मुझ इतना मोह पा, अय सदा के लिए उसकी चाह छोड दी है । वस, अय में एक साधारण लडकी हू-दुवल और यमजार ।" नलिनी बहानी की एकमात्र एसो पाया है जो अपने माता पिता द्वारा चन गय व्यक्ति का नहीं, विवाह तय ये प्रति विद्रोह परती, वह विवाह ही नहीं करना चाहती। वह अपन एक दोस्त को लियती भी है-"मैं मानती हू, हजारा लडकियों का एर यही चरम और परम सय । पति का अधाघ घ प्यार, सान और चादी से भरा परवार, और निश्चित दिन । लकिन इतने दिन मैंन जो भी पढा, जो भी सीखा, जो आज भी मैं समझती हूँ लाखो लहरियो से अच्छा था, क्या मेवल इसलिए कि यहा आपर सह जायें।" पति वा प्रेम नलिनी के लिए घुटन सिद्ध होता है और यह आत्महत्या कर लेती है। कम नश्वर की प्रतीकात्मर कहानी 'सीराचे' म एक दुकानदार की औरत, विवाह स इतर एव एमे यादमी को देखती है जो उसे अपने पनि की तुलना म अधिक दिलफेंक और आशिव मिजाज प्रतीत होता है । पहले तो वह अपनी इस मन - स्थिति को अस्वीकार करती हुई रहती है-"दुनिया म सब ही सबको देखते है, पर उसम कुछ गहराई तो नही । वह यू ही देख नेती है । यह काई एसा विषय नही जिस पर बहुत कुछ सोचा विचारा जाय । अच्छे और बुरे का भेद किए विना भी तो बहुत से काम मनुष्य रोज करता है ।' परतु बाद म वह इन मनोभावा को स्वीकृति प्रदान करती हुई केवल विवाह को ही पवित्रता की क्सौटी मानती है-"अडोस पडोस म रहने वाले ज्यादातर गरीव जोडे विवाहित नहीं हैं। फिर उन सात फेरो म क्या विशेषता है ? क्या शक्ति है ? पडित लोग मन्त्र पढने के बहान कोई जादू टोना ता नहीं करते।" उसका विचार है कि पत्नियों को विवाह का मूल्य पति की मौत के बाद ही पता चलता है । वह भी यह ऐसा इसलिए सोचती है क्योकि आस पडोस की विधवायें दुख भोग रही हैं। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक सयुक्त परिवार म पति और पत्नी के बीच क्सिी आपसी सहानुभूतिपूण सबध के पनपने को ठीक नहीं समझा जाता । केवल विवाह के नाम पर पति पत्नी के बीच एक चलताऊ रिश्ता कायम हो ही जाता है। वैवाहिक सवधा मे इन अलगाव के कारणों के अतिरिक्त स तान भी कहीं - 75 अलगाव वाद का कारण है तो कही निकटता का कारण । जहा भी कहानीकारो ने परिवार में बच्चे का चित्रण क्यिा है वहा वही मुख्य पात्र बन कर रह गया है। क्योकि गृहस्थी मे अपने व्यक्तिगत सुखो से इतर बच्चे का सुख और काय महत्वपूर्ण हो गया है और जहा दोनो ही नौकरीपेशा हो वहा वही बच्चे को अधिक समय दे सकता है, जिसके पास समय हो। कभी कभी तो पत्नी को बच्चे के पालने के साथ ही किसी साथी को ज़रूरत नहीं रह जाती। मोहन राकेश की कहानी 'सहागिनें' में काशी कहती है-- 'बहन जी। इन बच्चो को न पालना होता तो मैं आपको जीती न नजर आती।” उसे अपने पति से, दूसरी औरत रखने से भी ज्यादा शिकायत इस बात की है कि वह तीन साल बाद घर आने पर भी बच्चो के लिए कोई उपहार नहीं लाया। जिन पति पत्नी में प्रेम और सहानुभूति का स्थान नहीं रह जाता वहा मतान एक प्रकार के आश्वासन का सून बनती है, साथ ही निक्टता को भी सभावना रहती है। रामकुमार की कहानी 'कितना समय' मे पत्नी के मन मे जाने वाली स तान के प्रति आशा थी--"शायद वह उन दाना के बीच की खाई को कम करने म सहायता दे, पर खाई बहुत लम्बी चौडी थी।" जहा अलगाव का कारण स तानहीनता हो वहा इस निकटता की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस प्रकार की कहानियो को पढने के बाद निष्कप यह निकलता है कि ज्यादातर दम्पतिया में अलगाव का कारण प्रायोजित विवाह यानि माता पिता द्वारा दो ऐसे अपरिचितों को जीवन व धन मे बाध देना, जहा प्रेम वाक्य कभी बन ही नहीं पात, हा जम जरूर लेते है। लेकिन लज्जा की डोर कही दूर खीच कर ले जाती है और बीच मे रह जाती है एक अनचाही दरार । यह दरार जितनी बढती जाती है पारिवारिक कलह और तनाव को स्थान बनाने में कोई परेशानी नहीं होती। इही के चलत अलगाव बोध का जम हो जाता है। यह अलगाव किसी प्रकार से भी कम होन के बजाय तलाक तक की स्थिति तक जा पहुचता है और उसका कारण हाता है अपरिपक्व मस्तिष्क, जिससे सकारात्मक रख की तरफ सोचना भी असम्भव हो जाता है। वे फिर स्थितियों से सघप के स्थान पर स्वयं को दीन हीन समझने मे ही गुम हो जाते हैं, बजाय दूरिया वाटने के। यह निर्विवाद सत्य है कि साहित्य समाज से प्रेरित है और उसकी स्थिति मनुष्य के मनोभावा और मनोविकारा पर निभर करती है। इसीलिए नयो कहानी ने उनके सदभ म उमवे वाह य और आन्तरिकता का विस्तृत रूप से समयने की चप्टा का एक अत्यत साहसिक कदम उठाया है। इनम से प्रमुख हैं--व्यक्ति को काम से उत्पान भावावलिया । यह भाव बहुत कुछ सी पुरुष की मानसिकता स उत्पन हात हैं। क्योकि आज के युग मे व्यक्ति वह नहीं है जो आज से सौ पचास वैप पहल था, 76 न ही उसकी जीवन चर्चा उतनी एक्सार और सपाट रह गयी है । हजारो समस्यायें आती हैं उसकी राहा मे । इसीलिए जहा एक ताजगी भर विचारो से साहित्य रगा जाना था, वही अब बीमार मानसिक्ता और विकारो का प्रवाह अधिक तेजी से जा गया । नयी कहानी ने भी उसे ही अक्ति क्यिा जो कि उसने आज के व्यक्ति म पनपता, टूटता देखा । नये कहानीकार राजेन्द्र यादव का भी मत यही है कि-"कहानी हमेशा ही क्सिी विशेष परिस्थिति म मनुष्य के मन और अनुभवो यानि मनोविज्ञान का समझने-सप्रेषित करने का एक प्रयत्न है ।" नयी कहानी के ही कहानीकार शिवप्रसाद सिंह का भी यही मत है-“यह लेखकीय मन की विशेषता है कि वह अपने और दूसरो के कर्मा को वस्तुओ की तरह उन पर अर्थों का लेवल' लगा कर खानो मे ही नहीं रख लेता, वरिक उनसे बार बार टकराकर उनके भीतर छिपे अथ को खोजने या उन तक पहुंचने की कोशिश करता है।' साहित्य मनुष्य को उसके आतरिक और बाह य दोनो ही पक्षो से देखता है। आतरिकता से साहित्य म आशय है -नर नारी को काम भावना के परिप्रेक्ष्य मे चिनित करना। , उषा प्रियवदा की 'पिघलती हुई बफ' का नायक अक्षय विदेश मे रहते हुए नारी के प्रति एक वितष्णा सी अपने मन म जमा कर चुका है लेकिन परिस्थितियो के बदलते छवि नाम की एक लडकी से मिलता है और उसके यौवन पर मुग्ध रह जाता है । वह आभव करता है—“उसन पास चलती छवि को देखा, पूण यौवन और उन रखाओ की कमनीयता छिपी नही थी । उसन जाना कि उसकी त्वचा अत्य त कोमल, स्निग्ध और ऊप्ण होगी छवि सुदर नहीं है, पर उसमे जपना एक विशिष्ट चाम और कई वप बाद एकाएक अक्षय ने अपने अ दर एक इच्छा का जागने पाया। एक ऊप्ण, स्वर्णिम शरीर को बाहो से जक्डने की तीव्र इच्छा ।" इसमे अक्षय का छवि के प्रति आक्षण दैहिक्ता के कारण है जो उसकी काम भावना की पुष्टि करता है। यही दूसरी प्रकार की स्थिति कमलेश्वर की 'एक अश्लील कहानी' मे है । कहानी का नायक चद्र नाथ के घर के सामन रहने वाले व्यक्ति के अपनी पत्नी को निवस्त्र करके बाहर निकाल देने पर बजाय उसके निकाल देने के कारण पर विचार करने के वह उसकी दैहिक सुदरता के प्रति अपने विचार प्रकट करता है-"जिस तन से फिरने फूटती हैं, और जो बदन अपनी ओर चुम्बक की तरह खीचता है, जिसके पोर पोर धीरे धीरे छूने के लिए मन ललक्ता है, जिसे बाहो मे घेरकर बेसुध हो जाने को मन करता है, यह केले सा शरीर-उस पर इतना अत्याचार ।" राजेद्र यादव की कहानी 'खुली हुई साझ' म पुरुष शिवेन रास्ते मै रुक्ती- ठिठक्ती एक स्त्री के प्रति, जो नितात अपरिचित है आकर्षित होता है। वह सोचता है कि सदेहास्पद स्थिति मे टहलती हुई स्त्री किसी पुरुष की तलाश में भटक रही है, जबकि ऐसा नहीं है । टहलती ठिठक्ती से दष्टि मिलते ही उसके हृदय का सतुलन डगमगा जाता है। उसकी मानसिक सोच अतप्त काम भावना के प्रति है जिसे उस स्त्री द्वारा पूर्ण करने की बात सोचता है और बेचैन हो उठता है । जब वह स्त्री उससे कुछ ही दूरी पर टहलती है तो वह सोचता है-"जरा सा पीछे पीछे घूम आने म हज ही क्या है? एक बार उधर का चक्कर लगा कर लोटन म हज़ ही क्या है ?" इस प्रकार सोचता हुआ वह मन ही मन कुछ विचार करता उसके पीछे पीछे चल पडता है, अपनी इस प्रतिक्रिया का समर्थन करत हुए वह उस स्त्री के साथ सबंध स्थापित करना चाहता है। स्त्री की ओर से उमुक्त सहयोग मिलने पर अपनी कामच्छा का कोई उचित सकेत की व्याकुलता से प्रतीक्षा करता है । स्त्री पुरुष के बीच उ मुक्त सबधो और सभोग के विषय की चर्चा करता है। उस स्त्री के खुले ढग से बातचीत करन के बाद अत म उस आभास होता है यह स्त्री एसी-वैसी स्त्री नहीं है, स्वस्थ चित्त और उ मुक्त मन को सतुलित क्षमतावान् है। तब स्वयं ही अपनी विकृति पर लज्जित हा जाता है। यही काम कभी कभी व्यक्ति के मन म सदेह, अनाक्षक भी उत्पन कर देता है। मनू भडारी की कहानी 'तीसरा आदमी' म इसी स्थिति का अकन किया गया है। इसमें पति सुरेश अपनी पत्नी के साथ स्वच्छ द रूप से बात करने वाले पर एक प्रकार से सदेह करने लगता है । इसके साथ साथ वह अपनी पत्नी पर भी सदह करन लगता है और मारुपण का स्थान विकपण और दरारें ने नती हैं । पत्नी शकुन से सतीश ने उसके प्रेमी द्वारा उसकी पलकें चूमन की बात सुनी थी, जिसके परिणाम स्वरूप वह स्वय उसकी पलकें चूमना छोड़ देता है-उसे अहसाम होता है---"जिस तरह उसने शकुन की पलकें चूमना छोड दिया था, वैम ही अब उसे बाहा मे नना भी छोड देना पड़ेगा जिस शकुन को पिछन पाच साल से वह अपने शरीर के अभिन अग की तरह प्यार करता आ रहा है, वह इस समय किसी और की बाहो मे पड़ी मस्ती मार रही होगी और वह है जो वे घरबार या दर दर भटक रहा है।" उसने घर वापस आकर देखा कि दरवाजा अ दर स बर है, उसकी पत्नी शकुन किसी मेहमान व्यक्ति के साथ घर मे है और इसीलिए वह चुपचाप लौट कर भी भटक्ता रहता है। वह ज्यो ज्यों उसके बारे में सोचता है, सदेह उतना ही अधिक बढ़ता जाता है। सोचता है - किसका घर और किमकी वीवी ? और घर आने पर मन के सदेह के आधार पर मेहमान व्यक्ति के साथ अपनी पत्नी के काम सबधो का कोई स्पष्ट सकेत या सबूत ढूढता है और स्पष्ट करना चाहता है.-- "तुमने गौर से शकुन का 78 देवा । उमये अग प्रत्यग को वह घर पूर पर देयन लगा वही कोई छाप है कोई लक्षण ? योई लाल नीला दाग है।" ऐसा नहीं है कि पुस्प मन ही नारी के सौदय में प्रति आक्पण का अनुभव करता है । नारी मन भी पुरुप व प्रति आकर्षित होता है यह भी स्यूल मोग के माध्यम से तृप्ति चाहना है । नारी मन ये आपण यी सवदना कई प्रकार से प्रकट होती है। न केवल शारीरिकता के प्रति वल्कि पुरष का व्यक्तित्व भी नारी को आकर्षित करता ६ जहा वह दान प्रतिदान की आशा अपक्षा रखती है। इस पक्ष को नयी कहानी में अत्यत गहराई से चित्रित किया गया है। उपा प्रियवता की कहानी 'कोई एक दूसरा' को युवा लडकी को यह सोच कर मन ही मन अत्य त सतोप होता है कि उसकी मुदरता, चपलता, हास किसी पुरुष के हृदय के खालीपन को भर सका है वह उसे कुछ दे सकी है। वह अपने नारीत्व और आक्पा व्यक्तित्व स किसी भी पुरप को आवपित करके बहुत सतोप का अनुभव करती और वह इस माफ साफ कहती भी है-"मादक द्रव्यो के सवन से कैसा लगता होगा यह मैं नहीं जानती, पर पुम्पो की चाहना--भरी दष्टि की मदिरा मुझे सदा गुदगुदा जाती है।' निलाजला व इस क्थन से साफ स्पष्ट है कि नारी भी चाहती है वि पुरुप उसके व्यक्तित्व और सोदय से आकर्षित हो, और जब वह इस बात को जान लेती है कि कोई उसके प्रति आकर्पित है और उसे चाहता है तो वह स्वयं को घय अनुभव करती है। कभी कभी यह आपण मात्र किमी चर्चा करने से ही उत्पन्न हो जाता है । रमेश बक्षी की कहानी 'क्वारी चोरी' की अविवाहित लडकी का ऐसे पुम्प की ओर आक्पण का अनुभव करती है, जिस उसने आज तक देखा नहीं है, मात्र उसके साथ विवाह की बात चल रही है। जब उसे पता चलता है कि रेखा जीजी के घर वह युवक आया है तो चिक को जाड मे ही बातें सुन कर प्रभावित और आकर्षित हो जाती है । कुछ समय बाद उसे स्वय ही पर शम सी आती है। यही आक्पण और काम मूलक प्रेम कभी कभी वेवल स्पश के माध्यम से ही उत्पन हो जाता है । मोहन राकेश की सीमाए' कहानी मे उमा को मदिर की भीड मे यह सोच कर प्रसनता होती है कोई अपरिचित युवक उसकी तरफ देख रहा है उसे लगता है कि भीड में एक यक्ति उसे हाथ से छू रहा है वह पलट कर देखती भी है--"उसे केवल एक नान था कि एक हाथ उसे छू रहा है, यहा बाजू के पास, यहा कधे के पास, पहा ।' यहा वाजू के पास, तेजी के साथ लहू उसकी नाडिया म मरसरा उटता है। किंतु यह स्पश, गले म पहनी हुई सोने की चेन को चारी करने के लिए या, किंतु वह इसे समझ भी नही पाती। यहा केवल एक पुरुष को दष्टि और स्पश ही उसे एक सुखद अनुभूति प्रदान करते हैं।
79 उपा प्रियवदा की 'कोई एक दूसरा' की युवती छवि को भी अपने निकट बठे हुए परिचित पुस्प अक्षय को स्पश कर लाजवन्ती सा सिमट जाना बडा प्यारा लगता है । उसे इस प्रकार स्पश करने से एक प्रकार से सतुष्टि मिलती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि न सिफ पुरुष बल्कि नारी भी पुस्प के प्रति विभिन प्रकार से आवषण काम के प्रति संवेदना अनुभव करती है। वह भी चाहती है, कोई उसके आकषण से आपित हो। व्यक्ति अपनी परिस्थितियो से गहरे जुड़ा होता है, चाहे वे आ तरिक और बाह य ही क्या न हो । मोहन राकेश की कहानी 'वासना की छाया मे बूढे जाट की वासना को उसके परिवेश में रख कर चित्रित किया गया है। वतन माजने वाली गढवाती लड़की जो विधवा भी है की बात सुनकर बूढा जाट उत्तेजना म आ जाता है । उस समय "उसकी आखों म भूषो विल्ली भी सी जलन दिखाई दी। उसके होठ बूटी वामना की लार से गोल हो रहे थे । उपका रस भग करन के लिए मैंन रक्कर जूतो को याडा और कहा- "इन कच्चे रास्ता पर सरदार जी जूता का वचूमर निकल जाता है।" जाट ने ध्यान नहीं दिया । अपनी ही धुन म कहा “बाबू जी, आज आपकी गढवाली से मुलाकात हो सकती है " मुझे लगा कि वासना का लार चू चू पर लम हा गया है और इसान के आकार मे धरती पर रेंग रहा है।" जाट को एक जमीनदारनी की आवश्यकता है, उस की पत्नी की मुत्यु हो चुकी है। एक जवान लडकी है उसका विवाह हो जायगा तो बूढे की देखभाल करने वाला कोई रह नहीं जायगा, यही उसकी चिता है। घर मे गाय और दो भंसें हैं । घरवाली आ जाने पर उनका चारापानी और दो रोटिया भी आ जायेंगी, ऐसा वह कहता है । पर तु वास्तव मे बूढे की कामवासना ही घरवाली की खोज को प्रेरित करती है उसके शब्दों को गज का अथ था- - "मुझे औरत के गम मास की जरूरत है चाहे बूढा हू पर मेर अकेल के पास नौ एक्ड जमीन है। घर मे गाय भैस सब कुछ है -सिफ औरत ही नहीं है । बूटी हडिडया नम भास का चारा अब भी भागती हैं। इनके लिए चारा चाहिए ।" उस बूढे को यह जता दिया गया है कि इस उम्र पडाव पर पहुच कर उसे जो भी स्त्री मिलेगी वह कई घरा में धूम चुकी होगी। क्योकि बूढ़े के गालो का मास लटक आया है, दात टूट चुके है फिर भी उस विश्वास है कि कोई स्त्री उसे मिल सकती क्योकि उसके पास जमीदार होने के नात पसे हैं घर मे गाय भैसे है, उसकी हडिडयो मे जितना ज़ोर है इससे यही ज्यादा उसकी गाठ म पैस हैं । इससे पता चतता है कि जाट इस बुढापे म भी काम- बासना को पूरा करने के लिए पैसे के बल पर स्त्री को पत्नी बना कर घर मे लाना चाहता है, जबकि उसको अपनी पुत्री विवाह योग्य है । जाट को काम वासना को उसके परिवेश से जोड कर देखा गया है।
78 देखा। उसके अग प्रत्यग को वह घर-घूर कर देखने लगा कही कोई छाप है कोई तक्षण ? कोई लाल पीला दाग है।" ऐसा नहीं है कि पुरुष मन ही नारी के सौ दय के प्रति आकपण का अनुभव करता है । नारी मन भी पुग्प के प्रति आकर्षित होता है वह भी स्थूल भाग के माध्यम से तप्ति चाहता है। नारी मन के आक्पण की सवेदना कई प्रकार से प्रकट होती है। न केवल शारीरिक्ता के प्रति बल्कि पुस्प का व्यक्तित्व भी नारी को आकर्षित करता है जहा वह दान प्रतिदान की आशा अपेक्षा रखती है। इस पक्ष का नयी कहानी में अत्य त गहराई से चित्रित किया गया है। उपा प्रियवदा की कहानी 'कोई एक दूसरा' की युवा लडकी को यह मोच कर मन ही मन अत्य त सतोष होता है दि उसकी मुदरता, चपलता, हास विसी पुरुष के हृदय के खालीपन का भर सका है वह उसे कुछ दे सकी है। वह अपने नागेत्व और आक्पक व्यक्तित्व से किसी भी पुरुप को आकर्षित करके बहुत सतोप का अनुभव करती है और वह इसे साफ साफ कहती भी है--"मादक द्रव्या के सेवन स कैसा लगता होगा यह मैं नहीं जानती, पर पुरषो की चाहना-भरी दष्टि की मदिरा मुझे सदा गुदगुदा जाती है ।" निलाजला के इस कथन से साफ स्पष्ट है कि नारी भी चाहती है कि पुस्प उसके व्यक्तित्व और सौदध से आकर्षित हो, और जब वह इस बात को जान लेती है कि कोई उसके प्रति आकर्पित है और उस चाहता है तो वह स्वयं को ध य यनुभव करती है। कभी कभी यह जाक्षण मात्र विमी के चर्चा करने से ही उत्पन हो जाता है। रमेश बक्षी की कहानी 'क्वारी चोरी' की अविवाहित लडकी का ऐसे पुरुष की ओर आक्पण का अनुभव करती है, जिसे उसने आज तक देखा नहीं है, मात्र उसके माथ विवाह की बान चल रही है। जब उस पता चलता है कि रेखा जीजी के घर वह युवक आया है तो चिक की आड से ही बात सुन कर प्रभावित और आकर्षित हो जाती है। कुछ समय बाद उसे स्वय ही पर शम मी आती है । यही आपण और काम मूलक प्रेम कभी कभी केवल स्पश के माध्यम से ही उत्पन हो जाता है । मोहन राकेश को 'सीमाए' कहानी मे उमा को मंदिर को भीड म यह सोच कर प्रस नता होती है कोई अपरिचित युवक उसकी तरफ दख रहा है उसे लगता है कि भीड म एक व्यक्ति उसे हाय से छू रहा है वह पलट कर देखती भी है--"उसे केवल एक नान या कि एक हाथ उस छू रहा है, यहा वाजू के पास, यहा धे के पास, यहा।' यहा वाजू के पास, तेजी के माथ लहू उसको नाडियो म मरसरा उठना है। किंतु यह स्पश, गले में पहनी हुई सोने को चेन को चोरी करने के लिए या, किन्तु वह इसे समय भी नहीं पाती। यहा केवल एक पुरुष की दृष्टि और स्पश ही उमे एक सुखद अनुभूति प्रदान करते हैं।
79 आरपित हो। - भी म विश्वाम है कि कोई स्त्री उसे मिल सकती है क्योकि उसके पाम जमीदार होन पारा उसकी गाठ मे पस हैं। इससे पता चलता है कि जाट इस बुढ़ापे में भी पाम वागना का पूरा करने के लिए पसे दे बल पर स्त्री को पत्नी बना पर घर में साना चाता है, जबकि उसकी अपनी पुत्री विवाह-योग्य है । जाट पो वाम पास उपा प्रियवदा की 'कोई एक दूसरा' की युवती छवि को भी अपने निकट बैठे हुए परिचित पुरुष अक्षय को स्पश कर लाजवन्ती सा सिमट जाना बडा प्यारा लगता है । उमे इस प्रकार स्पश करने से एक प्रकार से सतुष्टि मिलती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि न सिफ पुरुष बल्कि नारी भी पुरुष के प्रति विभिन्न प्रकार से आपण काम के प्रति सवेदना अनुभव करती है। वह भी चाहती है, कोई उसके आक्षण से व्यक्ति अपनी परिस्थितियो से गहरे जुड़ा होता है, चाहे वे आतरिक और वाह य ही क्यो न हो । मोहन राकेश की कहानी 'वासना की छाया' म बूढे जाट की वामना को उसके परिवेश में रख कर चिनित किया गया है। वतन माजने वाली गढवाली लड़की जो विधवा भी है की बात सुनकर बूढा जाट उत्तेजना म आ जाता है । उस समय "उसकी आखो म भूखी दिल्ली की सी जलन दिखाई दी। उसके हाठ बूढी वासना की लार से गीले हो रहे थे। उमका रस भग करने के लिए मैंन ग्यकर जूना का झाडा और कहा-- "इन कच्चे रास्तो पर सरदार जी जूता का कचूमर निक्ल जाता है ।" जाट ने ध्यान नहीं दिया। अपनी ही धुन म कहा "वायू जी, आज आपकी गढवाली से मुलाकात हो सकती है ।" मुझे लगा कि वासना का लार चू चू कर लम हो गया है और इसान के आकार म धरती पर रेंग रहा है ।" जाट को एक जमीनदारनी की आवश्यकता है, उस की पत्नी को मुत्यु हो चुकी है । एक जवान लड़की है उसका विवाह हो जायेगा तो बूढे वी देखभाल करने वाला भाइ र नही जायगा, यही उमकी चिता है। घर मे गाय और दो भैमें हैं । घरवाली का जान पर उनका चारापानी और दो रोटिया भी आ जायेंगी, एमा वह कहता है । परतु वाम्नव म बूढे की कामवासना ही घरवाली की खाज को प्रेरित करती है उसके श दो को गज का अथ था- "मुझे औरत के गम मास की जमरत है चाह बदा हू पर मेर अकेल के पास नौ एक्ड जमीन है। घर मे गाय मैम मब कुछ है । बूढी हडिडया नम मास वा चारा अव भी मागनी हैं। इनके लिए चारा चाहिय ।" उम बूढे का यह जता दिया गडा है कि इस उम्र के पड़ाव पर पहुच कर उसे जो भी स्त्री मिलगी वह कई घरा मे म चनी होगी। क्योकि बूढे के गाला का मास लटक आया है, दात टूट चुके हैं फिर नात पगे हैं, घर में गाय भैसे है, उसकी हडिहयों में जितना जार है इसस यही -~-मिफ औरत ही नहीं है। म परिवेश मे जोड कर देखा गया है।
80 महेद्र मल्ला की कहानी-'तीन चार दिन' का 'म' मित्र की पत्नी को दसपर उसम दिलचस्पी लेने लगता है । वह अपने जीवन में किसी भी सिद्धात को नहीं मानता । अपने मिन गिरि की पत्नी को वह बार-बार देखता है। वह उसे बहुत सुन्दर लगती है, उसके उठने-बठने के ढग को मुग्ध होकर देखता है, उसके कमर म आते ही वह एक प्रकार की ताजगी का अनुभव करता है। यह आश्पण भी कामजय है । 'मैं' के परिवेश मे उसको वाम भावना का पक्ष प्रस्तुत हुआ है । उसके स्वय के बयान से यह स्पष्ट होता है- "मेरी अपनी दिक्कत यह है कि जहा जाता है, वही से उठने को जी करता है । मन रमने न रमने की बात नहीं, बस हमेशा लगता है सब जाना मिफ औरतों में दिलचस्पी वची रह गयी है। उनसे घुलने-मिलने मै, खास कर जब उनके पति ईर्ष्याल हो, एक तिक्त सुख तो मिलता है ।" उसे लगता है कि उसके और उसके मित्र की पत्नी के रिश्ते को उसका मित्र यानि अरुणा या पति जानता है । अरणा अपनी सहेली से मिलने गयी थी, वह अपने मित्र के साथ सोन के कमरे में जाता है, उस परिवेश में वह सोचता है-- “पहला विस्तर अरणा का था। दूधिया पलग पोश के किनारो पर वाले डारा की दो लकीरें थीं। मैंने अण्णा के विस्तर पर वैटकर जूते उतारे वहीं लट गया। विस्तर बहुत नम और गुदगुदा था। लेटते ही मैंने महसूस किया कि मैं अरुणा के मम्पक मे हू मानो उसी पर लेटा हू-मुझे अजीब मजा आ रहा था, 'मजा' मैंने शब्द को पकडा और मेरी आखो के सामने कल रात म देखी अरणा की विखरी, आक्पक दह ना गयो । मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि बिना पिझक या जुम महसूस किए मैं अरुणा के बारे में सोचता है।" मित्र के मौजूद रहते भी उसकी पत्नी के लिए काम भावना के विषय मे सोचना कसा लगा-"अरणा | अरुणा! लेकिन गिरि के देखते अरणा के बारे में सोचना मुझे चच मे गाली देने के ममान लगा।" इसके अतिरिक्त गिरि के यहा पार्टी मे- 'हम नाचन लग । भरणा का नम छोटा हाथ मेरे बायें हाथ मै खुस्मिती से चमक रहा था। वहा से उतरती नगी बाह को मैंने देखा फिर तरल चमवती आखो में। दायी बाह उसकी सुडौल जीव त कमर मे थी ? एक क्षण के लिए मैं अपने पर वश खा बठा। मैंने आखें म द ली।' इस क्थन के माध्यम से 'मैं को काम विषयक भावना का चित्रण दिया है। यही स्थिति स्त्री के सम्बध में भी दखी जा सकती है । यक्ति अपने परिवेश के कारण ही कभी कभी ऐम ऐम मोदी पर आ जाता है जहा वह समझौते के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता। ऐसा करने पर परिवेश भी कुछ और ही बन जाता है 2 81 मन्नू भडारी की कहानी 'यही सच है' की दीपा का परिवेश भी उसे डगमगाता है और वह, वो नही बन कर रह पाती जो वह बनकर रहना चाहती है। ताज से पहले की स्नी जो एक पतिव्रता होती थी, वह स्थिति आज नही रह गयी है, वह अपनी इच्छानुसार कहीं भी बध सकती है । दीपा भी एक युवक के प्रति आक्पण का अनुभव करती है और उस आकपण का अनुभव करते हुए कहती है-'कमरे पर लौटकर मैं उसे बैठने को कहती हू, पर वह बैठता नही, बस, बाहो मे भर कर एक बार चूम लेता है । यह भी जैसे उसका रोज का नियम है। रात म सोती ह तो देर तक मेरी आयें मेज पर लगे रजनी गधा के फूलों को ही निहारती रहती है । जाने क्या मुझे भ्रम हो जाता है कि ये फूल नहीं है, मानो सजय की अनेकानेक आखें है, जो मुझे देख रही, सहला रही हैं, दुलरा रही है।" सजय निशीथ नाम के लड़के के साथ दीपा के प्रेम सबधो को सदेह की दृष्टि से देखता है। दीपा उस विश्वास दिलाती है कि वह निशीथ से नही, सजप से बंधी है --"सजय, यह तो सोचो कि यदि कोई भी बात होती तो क्या मैं तुम्हार आग, तुम्हारी हर उचित अनुचित चेष्टा के आग, यो आत्मसमपण करती ? तुम्हार चु बना और आलिंगनो मे अपने को यो बिखरने देती ? जानते हो, विवाह से पहले कोई भी लडकी किसी को इन सत्रका अधिकार नहीं देती। पर मैंन दिया । क्या केवल इसलिए नहीं कि मैं तुम्ह प्यार करती हू, बहुत-बहुत प्यार करती हूँ ? विश्वास करो सजय, तुम्हारा मेरा प्यार ही सच है, निशीथ का प्यार तो मान छल था, भ्रम था, 2 -झूठ था।" सजय को इस प्रकार विश्वास दिलाने पर भी वह निशीथ का साथ पात ही स्थिर नही रह पाती, उसकी वह स्थिरता टिक नहीं पाती, और वह अपना पूरा का पूरा परिवेश ही परिवर्तित अनुभव करती है-“यो सडक पर ऐसी हरक्ते मुझे स्वय पसद नही, पर आज जाने क्या किसी की बाहो की लपट के लिए मरा मन ललक उठता है। मैं जानती है कि जब उस समय ऐमी इच्छा करना, या ऐसी बात साचना भी जव निशीथ बगल में बैठा हा, अनुचित है पर मैं क्या करू । बार बार उसका मन करता है कि क्यो नही निशीथ उसका हाथ पक्ड लेता, क्या नही उसके कंधे पर हाथ रख देता ? वह जरा भी बुरा नही मानेगी। पर निशीथ कुछ भी नहीं करता ! इससे वह बर्चन होती है । निशीथ से वह अपने को इस सीमा तक आकषित पाती है कि उनके साथ विवाह करन की बात सुनन को उसका मन छटपटा उठना है। मन ही मन सजय को यह जताने का विचार करती है कि सजय के साथ वह स्वय दाई “ 80 हुआ है 4 महेद्र भल्ला की कहानी-'तीन चार दिन' का 'मैं' मित्र उसमे दिलचस्पी लेने लगता है । वह अपने जीवन मे किसी । मानता। अपने मित्र गिरि की पत्नी को वह बार बार देखता है लगती है, उसके उठने वठने के ढग को मुग्ध होकर देखता है, .. ही वह एक प्रकार की ताजगी का अनुभव करता है। यह आपण के परिवेश मे उसकी काम भावना का पक्ष प्रस्तुत हुआ है । उ यह स्पष्ट होता है- “मेरी अपनी दिक्कत यह है कि जहा जात जी करता है । मन रमने न रमने की बात नही, बस हमेशा सिफ और रह गयी है। उनसे घुलने मिलने मे, खास कर ज हो, एक तिक्त सुख तो मिलता है ।" उसे लगता उसके मित्र की पत्नी के रिश्ते को उसका मित्र या जानता है । अरुणा अपनी सहेली से मिलने गयी थी, वह अपने कमर मे जाता है, उस परिवेश में वह सोचता है- "पहला बिस्तर अरुणा का था। दूधिया पलग पोश के f की दो लकीरें थी। मैंन अरुणा के विस्तर पर बंटकर जूत लेट गया । बिस्तर बहुत नम और गुदगुदा था । लेटने ही मै अरणा के मम्पक मे हू मानो उसी पर लटा हूं-मुझे अजीव मज मैंने शब्द को पकडा और मेरी आखा के सामने कल रात में आक्पक देह जा गयो । मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि बिना किए मैं अरुणा के बारे म सोचता ।" मित्र के मौजूद रहते भी उसकी पत्नी के लिए काम भाव कसा लगा-"अरणा अरुणा लेकिन गिरि के देखते अरुणा के मे गाली देने के समान लगा।" इसके अतिरिक्त गिरि के यहा लगे । भरणा का नम छोटा हाथ मेरे बायें हाथ मे खुशकिस्म वहा से उतरती नगी बाह को मैंने देखा फिर तरलच चाह उसकी सुडौल जीव त कमर मे थी ? एक क्षण के लिए मैं मैंने आखें इस क्थन के माध्यम से 'मैं की काम वि क्यिा है। यही स्थिति स्त्री के सम्बध में भी देखी जा सकती है के कारण ही कभी कभी एस ऐसे मोहो पर आ जाता है जहा व बुछ नहीं कर सकता। ऐसा करने पर परिवेश भी कुछ औ म.द ली। 7 83 भ्रष्टाचार को व्यक्ति के जीवन के परिप्रेक्ष्य में रख कर देखा गया है। पारम्परिक आस्थाओ को जिनमे 'गजा निरवसिया' प्रमुख हैं, टूटता हुआ दिखाया गया है जो परिवर्तित मूल्यो के बोधक हैं। व्यक्ति के एकाकीपन का चित्रण किया गया है । मनुष्य को एकाकीपन सताता है इसलिए वह कोई न कोई साथ और सहारा देखता है, परन्तु आज के यात्रि- कता युग समुद्र सी फ्लो भीड मे 'खोई हुई दिशायें' का चदर, जव स्वय को अरेला महसूस करता है और परायपन, अपरिचय का शिकार होता है, ऐस मे उसे अपना छाटा सा वह कस्वा याद आता है, जहा हर दूसरा व्यक्ति तीसरे व्यक्ति को जानता है। विशेषकर कस्बे से शहर आय हुए व्यक्ति को यह अजनबीपन खलता है और वह कहता है-“अव ता यह शहर भी पराया सा लगता है। ऐसे मे व्यक्ति और कर भी क्या सकता है जहा जनसमुद्र के होते हुए भी परिचित काई नहीं है । जहा वह अब तक आमीयता के सूत्र मे बधे रिश्तो के बीच रहा है, चाचा चाची ताऊ-ताई जैसे किसी न किनी रिश्त से उसका भावात्मक सवध है। इसीलिए यह अपने सस्कारा और परम्पराआ से अभी तक जुडा हुआ है। दिल्ली जैसे शहर में आते ही वह जैसे अनजानी दुनिया मे आ जाता है। उनकी कहानियो के पात्र अपनी जिन्दगी का मकसद ढूढने मे लगे तो हुए हैं फिर भी उह अहसास है कि हर व्यक्ति एक दूसरे से अलग है, अपरिचित है। बदलता हुआ परिवेश और जीने के लिए सघप ही कमलश्वर की कहानियो का मुख्य तथ्य और उददेश्य है। 'खोई हुई दिशायें' का चदर, 'एक थी विमला' की विमला 'पराया शहर, का सुखबीर के पास अपनी स्थितियो मे ही जीने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं है। लोक्तात्रिक मूल्यो के पतन को लेकर लिखी गयी यहानियो मे 'जाज पचम की नाय' प्रमुख है । नेता और सरकार द्वारा जनता का शोपण वहा बहुमुखी है । स्वतनता ग कोई अर्थ ही नहीं रह गया है, सिफ सत्ता ही अग्रेजा से भारतीयो के हाथा । मन वचन अभी भी वही है । इस कहानी म हमारी विदेशी सत्ता के । करन पर व्यग्य किया गया , रानी एलिजावथ में स्वागत की १ नाक लिए इतना चितित होना हमारी चाटुकारिता ५ दिशायें', और 'जिदा मुर्दे' मे यात्रिय युग जादमी चिक्ति विपा गया तो 'मास का दरिया' आया । क्याकि उनका आग्रह यथाथ और नये- 10 विचारो की लीक पीटने से । व्यक्ति के 82 साल भ्रम मे थी। निशीय के सम्पक में आने पर भ्रम के सारे जाल छिन भिन्न हो गये है । परतु वह जब कलकत्ते से वापस वानपुर आती है तो सजय से उसकी भेंट होती है, तो वो विक्षिप्त सी दौडकर उससे लिपट जाती है। उससे कुछ भी बोला नही जाता । उम ममय की अपनी स्थिति को वह प्रक्ट करती है.---"वस मरी बाहा की जकड कसती जाती, बसती जाती है तभी मैं अपने भाल पर सजय के अधरा का स्पश महसूस करती हू और मुझे लगता कि यह स्पश, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या, अम था । और हम दोनों एक दूसरे के आलिंगन मे बधे रहत हैं चुक्ति प्रति चु वित ।' इस कहानी म शिक्षित दीपा का अविवाहित हात हुए पुरुष के प्रति, काममूलक भावना को नए पक्ष से प्रस्तुत किया है वाह य परिपेश के परिणाम स्वरूप उसम काम भावना की अनुभूति होती है। नये कहानीकारो का मूल्याकन कमलेश्वर-आजादी के बाद जहा देश के हर क्षेत्र म परिवतन आया, वही साहित्य मे भी परिवतन आ गया। हमारी जीवन दष्टि और जीवन मूल्य वदतन लगे। इसी बदलाव के रहत ज म हुआ-नयी कहानी का। नयी कहानी, जिसम नय मूल्य, नए विचार और प्रगतिवादी तत्वो ने जन्म लिया, जिसमे प्रेमच द की कहानिया 'कफन' और 'शतरज के खिलाडी जसी कहानियो का टड चल पडा, जिसम आम आदमी का दुख देखा सुना गया। नय कहानीकारो म राजेद्र यादव, मन्नू भडारी, सतीश जमाली, कृष्णा अग्नि- होत्री, कृष्णा सोबती, कमलश्वर जैस कहानीकारो ने नयी कहानी को विविधता प्रदान वो। आम आदमी की सामाजिक स्थितियो को उजागर करने म कमलश्वर अग्रणी रहे, जिनकी कहानिया, 'नीली पोल,' 'राजा निरवसिया , 'मास का दरिया, 'तलाश शिल्प और क्ला दोनो ही दष्टि से नये क्षितिज को स्पश करती दिखाई पड़ती है। कमलश्वर की पहले की लिखी कहानिया आदशवाद से अधिक प्रभावित दिखाई पडती हैं, जिनमें, प्रेमचन्द की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। जिनमे 'देवा की 'पानी की तस्वीर', 'गाय की चोरी', जसी कुछ कहानिया प्रमुख हैं जिसमें कि गाधीवादी सिद्धाता के प्रति आस्था प्रक्ट की गयी है। किंतु उनमे भी परिवर्तित मूल्या का आभास होता है। परिवतनबोध को लेकर लिखी गयी कहानियों म 'मुरदो की दुनिया', 'गर्मिया के दिन', 'चाय घर', 'भटके हुए लोग , और 'वकार' आदमी हैं, जिसमें उहें परिवतन का आभास ही नही बल्कि उस परिवतन को व अपन जीवन म ढोते भी हैं । मार्थिक सक्ट, हिलती जास्यायें, पारिवारिक सबंधो में विखराब और प्रदशन तथा 83 भ्रष्टाचार को व्यक्ति के जीवन के परिप्रेक्ष्य में रख कर देखा गया है। पारम्परिक आरथाओ को जिनमे 'राजा निरवसिया' प्रमुख हैं, टूटता हुआ दिखाया गया है जो परिवर्तित मूल्यो के बोधक हैं । व्यक्ति के एकाकीपन का चित्रण किया गया है । मनुष्य को एकाकीपन सताता है इसलिए वह कोई न कोई साय और सहारा देखता है, परतु आज के यात्रि- कता युग समुद्र मी फ्लो भीड मे 'खोई हुई दिशायें' का च दर, जव स्वयं को अकेला महसूस करता है और परायेपन, अपरिचय का शिकार होता है, ऐसे में उमे अपना छोटा सा वह कस्बा याद जाता है, जहा हर दूसरा यक्ति तीसरे व्यक्ति को जानता है। विशपकर कस्व से शहर आये हुए व्यक्ति का यह अजनबीपन खलता है और वह कहता है-"अब तो यह शहर भी पराया सा लगता है । ऐसे में व्यक्ति और कर भी क्या सक्ता है जहा जनसमुद्र के होते हुए भी परिचित कोइ नही है । जहा वह अब तक आमीयता के सूत्र मे बधे रिश्तो के बीच रहा है, चाचा चाची ताऊ-ताई जसे किसी न किमी रिश्ते से उसका भावात्मक सबध है। इसीलिए यह अपने सस्कारो और परम्पराआ से अभी तक जुडा हुआ है । दिल्ली जैसे शहर मे आते ही वह जस अनजानी दुनिया मे आ जाता है। उनकी कहानिया के पात्र अपनी जिन्दगी का मक्सद दू ढन में लग तो हुए है फिर भी उह अहसास है कि हर व्यक्ति एक दूसरे से अलग है, अपरिचित है। बदलता हुना परिवेश और जीन के लिए सघप ही कमलेश्वर की कहानियो का मुख्य तथ्य और उददश्य है। 'खोई हुई दिशायें' का च दर, 'एक थी विमला' की विमला 'पराया शहर, का सुखबीर के पास अपनी स्थितियो मे ही जीने के सिवाय कोइ दूसरा रास्ता नहीं है। लोकतात्रिक मूल्यो के पतन को लेकर लिखी गयी कहानियो मे 'जाज पचम की नाक प्रमुख है । नता और सरकार द्वारा जनता का शापण वहा बहुमुखी है । स्वतनता प्राप्ति का काई अथ ही नही रह गया है सिर्फ सत्ता ही अग्रेजो स भारतीयो के हाथा म आइ है। मन-वचन अभी भी वही है । इस कहानी में हमारी विदेशी सत्ता के प्रति सम्मान व्यक्त करन पर यग्य किया गया है। रानी एलिजावय के स्वागत को यारिया तथा जाज पचम की नाक के लिए इतना चितित होना हमार्ग चाटुकारिता में प्रतीक है। 'राजा निरबसिया', 'खोई हुई दिशायें' और 'जिदा मुर्दे' में यात्रिय युग में अवेलेपन की पीड़ा से तडपता हुआ आदमी चित्रित किया गया तो 'मास का दरिया' एम आनरिक यपाय धरातल पर से आया। क्योकि उनका आग्रह यथाय और नय मूल्या की तरफ था, न कि पुराने घिसे पिट विचारा की लीक पीटने से । व्यक्ति के 84 मन की गहराइयो को चित्रित किया। 'तलाश', 'मास का दरिया', और 'नीली झील" मानव मन के अतर की ही परिचायक हैं। 'मेरी प्रिय कहानिया' सग्रह म 'तलाश' कहानी इसी प्रकार के अतह न्य की अभिव्यक्ति है। इस कहानी मे यथाथ के ऐसे पक्ष प्रस्तुत किए गय हैं जो ननिकता के आग्रह के कारण छुए नही गये थे 'तलाश कहानी सुमि की मा को काम भावना की न होकर उसकी अभिलापाओ और इच्छाआ की कहानी है, जहा उनकी आयु अधिक न होने के कारण अभी उनम अपनी इच्छाओ का दमा करने की सामथ्य नहीं है । यही इच्छायें उनके क्रिया कलापो मम्मी का नयी माडी पहनना, सेंट लगाना, सुमि की साडिया हथियाना और अ तत एक पुम्प में शारीरिक सम्बधो की स्थापना, मे प्रक्ट हाती है । चू वि सुमि की विधवा मम्मी की आयु अधिक नहीं है इसकी ये सब क्रिया-कलाप और उनकी इच्छायें स्वाभाविक ही है, क्योकि उनम भी कामना है, जिहे कि वे पूरा करना चाहती है। कहानी 'मास का दरिया' भी एक अलग ही प्रकार वा दप्टिकोण प्रस्तुत करती है । इममे वश्यावत्ति अपनाये नारी की व्यथा क्या है। हमारे देश म शारीरिक पविनता को सर्वोपरि माना जाता है। पर तु वश्या के साथ ऐसा नहीं है, यह सोचना एक सीमा तक गलत ही होगा क्याकि वश्या को उसके पशे की दष्टि से न देखकर यदि उसकी भी नारी सुलभ अतर्भावनाओ, मसाभावा की ओर भी ध्यान देना चाहती है, जहा वह परिस्थितिवश इस काम को अपनाते हुए भी किसी एक पुरुष को अपने एकत्व के तल देखना चाहती है, एक ऐसा पुस्प, जो केवल उमका अपना हा, क्या एक नारी का ऐसा सोचना अनुचित है, चाहे वह वेश्या ही क्यो न हा । कमलेश्वर न अपनी इस कहानी मे नारी के इसी अपनत्व और भाव बोध को लेकर यह कहानी लिखी है । क्योकि केवल वेश्या हो जाने से उसकी नार्योचित भावनायें तो नहीं मरेंगी। 'नीली झील' प्राकृतिक प्रेम को लेकर लिखी गयी है। प्रकृति से प्रेम करने वाला महसा और एक मेम के पीछे धूमत हुए महसा को गलत व्यक्ति की सता तो कतई नहीं दे सकते, मूल रूप से वह सौ न्य के खिचाव के कारण ही मेम के पीछे जाता है । 'नीली झील' भावना जौर सवेदना का प्रतीक है न कि स्थूल शारीरि कताका। मकलन की एक अतिरिक्त वहानी 'दूसरी सुबह सूरज पश्चिम में निकला' में आधुनिकता से उत्पन नीरसता है । कहानी महानगरीय परिवेश पर लिखी गयी है । जहा इस जाधुनिकता के प्रति धीमा धीमा आजोश भी दिखाई दता है, जिसने एकरसता को जम दिया है ऐमी जाधुनिकता के प्रति । इस कहानी में दो चरित्र इस यात्रि कता के प्रति हल्का हल्का विद्राह करते दीखते हैं, वे दोनो रात के दो बजे, मूसलाधार 85 वर्षा मे निश्चित से बैठे हैं समुद्र के किनारे वाली बच पर अपने आस पास के वातावरण से वेखबर । पहली कहानी 'राजा निरवसिया' नवीन और पुरातन मूल्यो की तुलना करते हुए चलती है । कहानी दो घटनाओ को लेकर कर चलती है, जिसमें एक तरफ राजा निरबसिया का क्या चक्र है और दूसरी तरफ जगदीप और चदा का । राजा निरब- सिया की क्या में जहा जादश, महानता और शाश्वत मूल्या की स्थापना की गयी है वहीं चदा की क्या मेनार्थिक सक्ट और पारिवारिक सम्बधो म टकराव और बिखराव के चलते पति पत्नी मे अलगाव और अतत जगदीप का विप खाकर आत्महत्या के रूप मे परिणति होती है । कमलश्वर की यह कहानी प्रेमच द्र युग से प्रभावित तो दिखाई देती है, पर तु नय मूल्या को उठाती हुई कहानी अपनी श्रेष्ठताओ के साथ नयी कहानी की श्रेणी मे आ बैठी है। पति पत्नी के सम्बया को लेकर लिखी गयी कहानी 'बयान जिसमे तीसरे आदमी के कारण तनाव है। कहानी पूर्व सम्बन्धो को भूल कर उसे उमुक्त और विवेकपूण हाकर सामाय धरातल पर खडा हो कर सोचन को मजबूर करती है। 'बयान' की स्त्री इस सबंध म अपने बयान के माध्यम से सम्पूण यायसस्था को झकझोरती है । कहानी मे कहा गया है कि पत्नी का पूर्व प्रमी आज भी उसके जीवन म चला तो आया है, पर तु इसके लिए साथ उसे स्त्री के पति को दुर्घटना का कारण भी बताया गया है, यह अनुचित है, यही कहानी का मुख्य कथ्य है । इसके अतिरिक्त आर्थिक सकट और सघषपूर्ण जीवन का भी चित्रण किया गया है । कमलेश्वर अपनी सूक्ष्म सवेदनशीलता और अनुभव के विशाल जगत को सभाल रहन के कारण एक अच्छे कहानीकार सिद्ध होत है । उ हाने जहा राजनीति क्षेनो पर कहानिया लिखी, वही आधुनिक्योध, यात्रिक युग, महानगरीय बोध से उत्पन अकेलापन और अपरिचय को लेकर तथा स्त्री पुरप के सम्बधो को लेकर भी कहानियो को जिया। आम आदमी के तमाम सक्टो को लकर लिखी गई कहानिया शोषित और शोषक तत्व की जोर सकेत करती हैं | कस्बे से शहर मे आया हुआ आदमी और उसकी मवेदना का कमलश्वर ने अच्छी तरह पहचाना और पहचान तलाशते आदमी का भी गहराई में जा कर दुख देखा ।। मुक्तिबोध-मुक्तिबोध का स्थान समवालीन कहानियो में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मुक्तिबोध की सभी कहानिया मानवीय जीवन मे होने वाली गति, सधप, बिखरन, टूटन के बहुआयामी रूप प्रस्तुत करती हैं। कवि होते हुए भी गद्य के क्षेत्र मे उनका एक अलग स्थान है। जहा उनकी कविता मे राजनीतिक भ्रष्टाचार, मानवीय प्रपच सजीव रूप से उभरे हैं, वही यही स्थिति उनकी कहानियां - +- 86 मे भी दिखाई देती है। रहस्यों की परतें एक-एक कर के खुलती चली जाती हैं । हाहाकार करते आदमी की पीडा को मुक्तिबोध ने रचनात्मक वा सूत्र बना लिया। मुक्तिबोध की 'एक साहियिक की डायरी' एक जीवन के लिए सघप, भोग गये जीवन का यथाथ और बौद्धिक व्यक्तित्व के सजग प्रयासा की उपलब्धि है। 'काठ का सपना' सग्रह म भी उनकी कहानिया भी अपन रचना कौशल, क्थ्य और कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । ये सभी कहानिया न होकर डायरी के पने हैं, जिनमे जीवन का सच अपनी सम्पूर्णता के साथ उभर कर आया है, ऐसी डायरी के पने हैं, जिह मुक्तिबोध ने स्वय झेला है और सपप क्यिा है, यह सघर्प केवल उनका ही नहीं बल्कि जीवन के लिए सघप करते हर व्यक्ति का है । इस संग्रह म ग्यारह कहानिया है। कहानी विपात्र बुद्धिजीवी के सकट की और 'क्लाड ईथर लौ' सम्पूण मानवीय सभ्यता के आचार-व्यवहार को प्रकट करती हैं। 'विपात्र म राजनीतिक और मानवीय सम्बधा के चितन की परिचायक है। इस कहानी की रचना राजनीतिक विवाद, समाजिकता और वयक्तिक्ता के आधार पर हुई है। दो वग हैं, एक आर सभ्य और सम्भात कहे जाने वाले और दूसरी तरफ शोपित जोर दमन चक्र का शिकार होने वाल । वह वग स्वप्ना की दुनिया म विचरण करने वाला उच्च वग तक पहुचने की आकाक्षा लिए हुए जीने वाला वग है । 'प्रश्न' कहानी पवित्रता की स्थापना के लिए एक चुनौती है। स्वाभाविक स्नेहिलता, सहानुभूति व प्रेम मे किया गया समपण, समपण न कहलाकर समाज की परिधि म आकर कल की सज्ञा पाता है, परन्तु क्यो ? इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं मिल पाता । यह स्थिति अत्यत दारूण है । 'मोह और मरण' मे व्यम्ति के मन की शुद्ध और निष्कपट इच्छाओ से प्रेरित काय और उनसे उत्पन मानवीय संवेदना का दद्व है। जशन' म भी प्राकृतिक आचरण को मानवीय सवदनात्मक धरातल पर परखा गया है । 'नयी जिन्दगी में एक जिम्मेदार और व्यवहारिक और तटस्थ तथा फक्कडशाही के स्वाभाविक जीवन का द्वद्व, मुक्तिबोध की कहानियों में प्रकट हुआ है। इस प्रकार सभी कहानियो मे मानवीय सबधो के प्रश्नों के हल और जीवन की समस्याओ से जूझते आदमी के जीवन के सत्य को उकेरा है। इन सत्या का धरातल मानसिक अधिक है। अमरकान्त-अमरवान्त प्रेमव द युगीन परम्परा के कहानीकार हैं । सम कालीन कहानियो मे मानवीय मूल्यो को उकेरन का प्रयत्न किया गया है। यही प्रयास अमरवात की कहानिया मे भी दृष्टिगोचर होता है। मध्यमवर्गीय जन का दुख, उनकी परतो के नीचे छुपे गहरे मजाक और न जाने कितनी ही बातें भमरवात ने अपनी कहानियो मे उठायी है।
87 इहोने दो कहानी सग्रह हिदी कहानी को दिए है । 'जि दगी और जोक', 'दोपहर का भोजन', 'छिपकली', 'हत्यारे,' 'शाम', 'डिप्टी कलक्टरी', 'एक असमय हिलता हाथ', 'मौत का नगर', तथा 'निर्वासित' अत्यत उत्कृष्ट कोटि की कहानिया है, जिनमे मध्यमवर्गीय जीवन का यथाथ चित्रण किया है। आर्थिक सकट से गुजरते आम आदमी की वेबसी और पीडा का मार्मिक चित्रण किया है अमरकात ने। 'जिन्दगी और जोक' कहानी विशेष रूप से चर्चित और श्रेष्ठ कहानी है। कहानी का पात्र रजुआ कष्ट भोग कर भी जिजीविपा समेटे हुए है और एक पागल लडकी से प्रेम करता है, उसे भोजन देता है और किसी की स्तुति और निदा की तरफ ध्यान नहीं देता। जीन की अदम्य इच्छा रजुआ की उस समय और भी उभर कर आती है जव एक बार उसके सिर पर कौवा बैठ जाता है और वह अपने रिश्तेदार को लिखवा देता है दि वह मर गया है, परतु वह मरा नहीं है और कहता है-“सरकार, मैं मरा नही हू जिंदा हू सरवार, यह मौत वाली बात किसी सगे मवधी के यहा लिख देने से मौत टल जाती है । भजन राम वरई मेर चाचा होते है । मालिक, एक कारण और है, इस पर लिख दें सरकार वि गोपाल जिन्दा है।" कहानीकार अमरकात न अपना वक्तव्य देते हुए लिखा है--"उसके मुख पर मौत की भीषण छाया नाच रही थी और वह जिन्दगी से जोक की तरह चिपटा था-लक्नि नाक वह था या जि दगी ? वह जिदगो का खून चूस रहा था या जिदगी उस का । मैं तय न कर पाया।" उनकी कहानी 'पलाश के फूल' मे सामाजिक परिवतन पर व्यग्य किया गया है । आज जब आम आदमी भूख और जिन्दगी के लिए सघप कर रहा है, वही शोपक बग अपने अपने चेहरो पर नवाब और मुखौट ओढ हुए उनके ही शापण के अमानवीय और घृणित हथकण्डे अपना रहा है। केवल मुखोटो के बदलने से सामाजिक बदलाव नहीं कहलाता, बदलाव तो तब कहलाया जायगा जव कि शापित वग भी मनोप से परिपूर्ण होगा। 'छिपकली' म पूजीपति सामत वग से उठकर तो आय हैं ! परतु आज ठेकेदार व्यवसायी आदि के नामा से जाने जाते हैं। क्यादि व अपार सम्पति के मालिक है। इसी वग भेद को अफसर और मातहत नाम भी दे दिया गया है जिसमे अफसर अपनी स्वाय सिद्धि के लिए नीच से नीच हपकहे अपनान म लगा हुआ है क्योकि उसके पास शक्ति है। वह गिरगिट की तरह रंग बदलता हुआ अपनी शक्ति का उपयोग कर रहा है। समकालीन कहानीकारो म राजेद्र यादव का नाम अत्यत महत्त्वपूर्ण है।
88 गजेद्र स्वय को नयी कहानी का सस्थापर हान का दावा करते हैं अपनी कहानी 'खेल सिलोने से । उनका कहना है~"मयी कहानी का प्रारम्भ भय से माना जायेगा, मुझे नहीं पता। मगर आत्मस्वीकृति का अगर दम्भ और विनय से हटावर केवल सत्य क्थन के रूप म लिया जाय तो मैं अपनी ही वात वरूगा । सन् 51 के फरवरी या माच के मासिक 'प्रतीक म मरी एक कहानी निक्ली की 'सेल खिलौने ।' हम लोगा ने सन 50 के आस-पास से लिखना शुरू किया और कहानी तथा जीवन का लेकर वचारिक हलचल 54 25 स शुरू होने लगी थी।" कहानीकार राजद्र यादव, समाज म फ्ली विषमताजा और विसगतिया चितेरे हैं। उनकी कहानियो के अधिकाश पाय मध्यम वर्गीय श्रणी स उठवर आय हैं जो नियति के हाथा विवश हैं फिर भी उनमे जीवन का जीन को अदम्य चाह है। उनकी कहानिया का कथ्य यथाथ और सामाजिक्ता स परिपूर्ण है। उनका कहानी सग्रह 'अभिम यु की आत्महत्या' की कहानिया इसी तथ्य को समेटे हैं । महानगरीय परिवेश, सम्ब धा में विखराव इनकी कहानिया म मुख्य है। समाज की अपक्षा व्यक्ति इनके लिए प्रमुख है । वैयक्तिक जीवन में उत्पन सत्रास, अकेलापन, प्रेम सबधा म टूटन, पारिवारिक सबधो म टकराव इत्यादि को अपनी कहानिया में उकेरा है। नारी के प्रेम म आज के यानिक युग म जा परिवतन आया है उसे अपनी कहानी 'जहा लक्ष्मी कैद है' मे देखा है । लक्ष्मी अपने पिता स कहती है- 'ल, तूने मुझे अपने लिए रखा है, मुझे खा, मुझे चवा, मुझे भोग ।' यह उपभोग की आकाक्षा इतनी प्रवल और मुख्य हो गयी है कि व्यक्ति कामातुर होकर अपनी मोसी से भी काम सम्बन्ध स्थापित करन मे नही हिचकता। व्यक्ति इतना साहमी हो गया है कि पुरानी परम्पराओं को तोहन म क्षण भर को भी देर नहीं करता। उनकी कहानी 'प्रतीक्षा' की पात्रा गीता, नदा नाम की एक लड़की से सम्बन्ध जोडती है और उसकी बेटी, प्रिया, स्वामी, बधु सभी कुछ बन जाती है । 'लच टाइम' कहानी में अभिभावको के प्रति पुराना आदर भाव टूटता दिखाया है। 'बिरादरी बाहर में पुत्री द्वारा अतजातीय विवाह कर लेने पर पिता रोष प्रक्ट करते है कि सब यही कहगे पारस बाबू की लडकी जिसने विरादरी से बाहर ब्याह कर लिया । वे लडकी से सम्बन्ध तक बनाय रखने के इच्छुक नहीं है और एक मा के गभीर आपरशन के अवसर पर घर जाई लडकी के लिए कहते हैं कि अगर वह खाना लाई नो वे फेंक देंगे, परतु चोरी छिप यह भी जानने को उत्सुक है कि नये दामाद की अच्छी तरह खातिर की जा रही है या नहीं, अथवा 'देखें उस आदमी में सी क्या बात है जिसके कारण लडकी ने उससे ब्याह किया है।' उहें वस चिन्ता तो यह है कि लोग उहे विरादरी से बाहर कर देंगे।
89 उनकी कहानियां और सग्रह हैं-अभिम यु की आत्महत्या, जहा लक्ष्मी कैद है, किनारे से किनार तक, छोटे छोटे ताजमहल, प्रतीक्षा, अपने पार, ढोल, मेरी प्रिय कहानिया, राजेन्द्र यादव वी थष्ठ कहानिया । निमल वर्मा-समकालीन कहानीकारो मे निमल वर्मा का नाम विशेष रूप से उल्लखनीय है । यहुन स आलोचक उन पर विदेशी पृष्ठभूमि पर कहानी लिखने वाला वहानीकार होने का आराप लगाते हैं। उनकी कहानियो को विदेशी कहानिया कहते हैं। परन्तु निमल वर्मा इस आरोप का उत्तर देते हुए अपने कहानी संग्रह 'मरी प्रिय कहानिया की भूमिका म कहत है--“वर्षों विदेश मे रहने के कारण मेरी कुछ कहानिया म शायद एक वीराने किस्म का 'प्रवासीपन' चला आया है-मुझे नही मालूम यह इन कहानियो को अच्छा बनाता है या बुरा। कुछ भी हा इह 'विदेशी कहानिया' कहना शायद ठीक न होगा । या भी मुझे कहानियो, कविताओ को भौगोलिक खण्डो म विभाजित करना अरूचिकर और बहुत हद तक जथहीन लगता रहा है।" वे नारेस की कहानिमो और उपन्यासो का उदाहरण देत हुए यह भी कहते हैं- "मैं यहा यह चीज अपनी कहानिया को 'बचान' के लिए नहीं (इसकी मुझे कोई लालसा नही) केवल एक सीधी सी बात को सीधे ढग स रखने की कोशिश मे कह रहा हू ताकि हम निरथक वहसो से छुटकारा पा सके। दरअसल किसी लेखक की पप्ठभूमि विदशी या देशी, यह चीज बहुत ही गौण है। उसका महत्व है तो सिफ इसमे कि किस सीमा तक और कितनी गहराई से वह किसी खास स्थिति या नियति को खोल पाती है बल्कि यू कह, महत्व की काई चीज़ है, तो सिफ यह ही-बाकी सब राख है।" निमल वर्मा की कहानिया जहा व्यक्ति के एकाकीपन को उभारती है, वही स्त्री व्यक्ति पुस्प सबधो मे उत्पन हुए बिखराव और दूरी को भी व्यक्त करती हैं । स्त्री- पुरष सबधो म उत्पन्न तनाव और दूरी का उन की कहानी 'अ तर', लवस', 'अधेरे में देखा जा सकता है। 'अ तर' कहानी मे प्रेमी प्रेमिका ने विवाह से पूर्व ही शारीरिक सम्बध स्थापित कर लिय है जिससे प्रेमिका गभवती हो गयी है, पर तु प्रेमी इस उतरदायित्व को मभालना नहीं चाहता। कहने का आशय है कि प्रेम मे तो वह सहभागी रहा, परन्तु उस का परिणाम झेलने को वह तयार नहीं है, इससे प्रेमिका के अतर म प्रेमी एक प्रकार की दूरी और वितष्णा उत्पन हो जाती, जब प्रेमी उससे गर्भपात करवाने को कहता है। प्रेमिका इसके लिए तैयार न होते हुए भी गभपात करवा तो लेती है परन्तु अपना रोप भी प्रकट कर देती है अस्पताल मे प्रेमी का लाया सामान खिडकी से बाहर फेंक कर । प्रेम संबधो मे दूरी के साथ साथ पाश्चात्य देशो मे भी विवाह पूर्व 90 शारीरिक सवा को अनैतिक समझा जाता है, यह वात नस द्वारा प्रेमी को स्से ढग से देखने पर स्पष्ट हो जाती है। 'अधेर मे, कहानी दाम्पत्य सबधा में वायी दरार और तनाव की अभिव्यक्ति है। जिसम वाचक बच्ची की मा पोनी उसके चाचा वीरेन सप्रेम करती है, यह तथ्य यहानी म वार वार स्पष्ट किया गया है जैसे, बच्ची द्वारा धीरन चाचा की किताब म मा और चाचा की तस्वीर दय तना बच्ची के पिता की रात के समय मा स तीव्र स्वर में बोलने की आवाजें सुनाई पहना, दिल्ली जाने स पहल मा का धीरेन पे कॉटेज तक जाना और झूठ कहना वि या ही घूमन निकले थे। इस अनैतिक प्रेम प्रसग क कारण उनकी सतान बच्ची का भयभीत रहना आदि बातें हैं जिसस उनके दाम्पत्य सवधा म दूरी और तनाव स्पष्ट परितक्षिन होता है। 'परिद' निमल वर्मा की एक उत्कृष्ट और चचित कहानी है, जिसमें लतिका, मि० ह यूबट और डा० मुनर्जी के माध्यम से व्यक्ति के अकेलेपन की अभिव्यक्ति हुई है, इसके साथ ही तीना पान अपन-अपने अतीत को भूलन की कोशिश में लगे हुए ह । अवेलापन और प्रतीक्षा ही उनकी मानो नियति बन चुका है। अकेलेपन से आतकित लतिया गिरीश को भूल जाना चाहती है। यह अक्लापन विस्तत न होन पाय इसीलिए लतिका अत म जूली का लिफाफा उसके सोत हुए उसके तकिए के नीचे दवा कर रख आती है। मानव मन को सूक्ष्म और सवेदनात्मक अनुभूतियो को निमल वर्मा न अपनी कहानी 'दहलीज' म विशेष रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की है। कहानी माटी लडकी रूनी के मनोभावा को उकेरा गया है, जिसमे कि शम्मी भाई उसकी बडी बहन जेली से प्रेम करते हैं, पर तु रूनी समझती है कि शायद शम्मी भाई उमसे प्रेम करते है और कभी न कभी अवश्य अभिव्यक्त करेंगे, इस कारण रूनी का दिल धडक जाता है। यहा तक कि शम्मी भाई उसे जव लिफाफा देते हैं तो वह सोचती है शायद शम्मी भाई वही बात कहने वाले हैं, जिसे वह अकेल म, रात को सोन से पहले कई बार मन ही मन सोच चुकी है, शायद इस लिफाफे के भीतर एक पत्र है, जो शम्मी भाई ने चुपके से उसके लिए, केवल उसके लिए लिखा है ।" लिफाफा खालन पर जब उसमे से उसके एल्बम के लिए टिकट निक्लत हैं तो-“उसे लगा, जस उसके गने म कुछ फस गया है और उसकी पहली और दूसरी सास के बीच एक अधरी खाई खुलती जा रही है।" अत मे उसके मनोभावो को प्रकट करत हुए दिखाया गया है जब वह नौकरानी से कहती है-"मेहरू बत्ती बुझा दे उसने सयत निविकार स्वर में कहा- देखती नही, मैं मर गयी हू ।" बेरोजगारी और रग भेद की समस्या पर पाश्चात्य पष्ठभूमि पर लिखी गयी, 91 2 उनको अत्यत प्रभावी कहानी 'लन्दन की एक रात' है । कहानी से स्पष्ट होता है कि घरोजगारी की समस्या विदेशा में भी भीषण रूप स व्याप्त है । कहानी के प्रारम्भ म ही पात्र कहता है-"मैं दूसरी बार वहा गया था । पहली रात दर से पहुंचा था। जाने से पहले ही सारा काम वट चुका था। मैं फिर भी अनिश्चिन सा गेट के बाहर खडा था। सोच रहा था, शायद आखिरी क्षण उह किसी आदमी की शरूरत पडेगी और वे मुझे बुला लेंगे। देर तक धडधडाती मशीना के भीतर सोडे की वोतला का स्वर सुनाई दे रहा था। हम में से जिह काम मिल गया था, वे जल्दी जल्दी अपने सूट उतारकर काम के कपडे पहन रहे थे।" इसके अतिरक्त "यह तोमरी वार है जब पहा मैं आया हूँ ? कल जिस बाबू ने काम देन का वायदा पिया था, आज वह दिखाई नहीं दिया।" वरोजगारी के अतिरिक्त रग भेद को भी वहानी म दिखाया गया है, छात्रा में माध्यम से-~-"मैं वही रहता है। तीन दिन तक एक अग्रेज लडकी के घर छिपा रहा। जर व एक एक नीग्रा को चुन चुन कर लिंच पर रहे थे, मैं उस सफेद ह वोर के सग सोता रहा । उसने सोचा था, मैं उस चाहता हू लकिन मैंन उस उसके बाद दखा तक नहीं । उस नही मालूम, मैं बदला ले रहा था उसकी सफद चमडी के सग और उसने हाथ स इशारा क्यिा~-अश्लील उतना नहीं जितना जुगुप्सामय ।" सैक्स और यौन सम्बधो को लेकर लिखी गयी कहानी 'जलती बाडी' है। वहानीकार ने इन सवधो को अत्य त सजीव स्पस अभिव्यक्त किया है । एक पार म कोने की झाडी म होते हुए क्रिया कलापों के विषय में कहा गया है-"टापू म उस समय एक असीम, निर्भद्य मौन सिमट आया था और दूर की हल्की, दबी आवाज़ भी साफ सुनाई दे जाती थी। पिर वह झाडी मेर काफी करीव थी मुश्किल से तीन गज की दूरी पर । उन दानो की गहरी हाफ्ती, टूटती सी सासें मुझ तक एक धधकती सी गरमाहट झाडी के बाहर निकलती थी, बीच की हवा को छोलती, भेदती, मत्र-मुग्ध साप की तरह बल खातो हुई मुझे लपेट लेती थी। झाडी बार वार हिल उठती थी, माना उनकी गरम बोझिल मासो का भार न सभाल पा रही हो। उनके नीचे दवे पत्ते बार-बार चरमरा उठते थे।" इस प्रकार के दृश्य महसूसने के बाद कहानी का 'मैं कहता है-"मुझे आज भी यह सोच कर अपने पर हैरानी होती है कि मैं वहां से चला क्या नहीं आया। जो कुछ झाडी के पीछे हो रहा था, उसके प्रति मेरे मन म न कोई जिज्ञासा थी, न जुगुप्मा कोतूहल भी नहीं। फिर भी मेरे पाव नहीं उठे, मैं जडवत बैठा रहा।' 'जलती झाडी यौन माकाक्षा का प्रतीक है । निमल वर्मा की प्रमुख कृनिया है.---'बीच बहस में, 'परि दे', 'जलती झाही', पहुच जाती थी 92 . 'पिछी गमियो में', 'हिल स्टेशन', 'मेरी प्रिय कहानिया' । उनकी प्रमुख महानियों म 'ल दन की एक रात', 'लवस', 'पिक्चर पोस्टकार्ड', 'सितम्बर की एक शाम', 'परि दे' विशेष रूप स उरलेधनीय और उत्कृष्ट कहानिया है। निमल वर्मा के सम्पूण कथा माहित्य या अध्ययन करने पर ज्ञात हो जाता है कि जहा निमल वर्मा एक रूमानी रयावार हैं, वही प्रेम, काम मवध, स्त्री पुरुष सम्व घ और आतक तथा समास को भी अपनी कहानियो म बखूबी उभारत और निभात हैं। एक सवदनशील कथाकार हान के नाते शिल्प भी अत्यत सुगठित और पय्यानुसार ही है। उनकी कहानिया म व्यक्ति के जीवन को समझने की चाह है । वे व्यक्ति के माध्यम से समष्टि का मूल्याकन ररते है। उनकी कहानियो मे एक प्रकार की गति और सोच है जो पाठर को झरझोर कर रख देती है। वे यथाथ वे धरातल की भी एक ऐसी रोमाचक परिकल्पना कर देते हैं कि सत्य से कदापि दूर नहीं होती। भाषा मे सगीतात्मकता का माध्य है जो उह कहानीकार के साथ साथ एक कलाकार के रूप म भी प्रतिष्ठित कर देता है। उन की कहानियों में अपनी परिस्थिति और परिवेश की गभीरता को समझन की उत्कठा स्पष्ट परिलक्षित होती हैं। उपा प्रियम्वदा-समकालीन महिला रचनाकारा मे उषा प्रियम्बदा एक सुपरिचति हस्ताक्षर है। नारी के जीवन में आये परिवत न और उससे उत्पन परिस्थितियों को उषा प्रियम्वदा ने समझने की कोशिश की है, अपनी कहानियो के माध्यम से। उनकी कहानियो और सग्रहों के नाम हैं-'कितना बडा झूठ', 'फिर बसत आया', 'जि दगी और गुलाब के फूल' उनकी कहानियो म प्रमुख और उत्कृष्ट कहानिया हैं-मछलिया, कोई नहीं, खुले दरवाजे, वापसी, जिदगी और गुलाब के फूल । आधुनिक भारत के निवासिया तथा उनक परिवारो मे जम लेता हुआ नयी और पुरानी पीढी का टकराव उनको 'वापसी' कहानी में बखूबी उभर कर आया है । 'वापसी' के मुख्य पात्र गजाधर वावू एक अवकाश प्राप्त रेलवे कमचारी थे और अब तक घर से बाहर ही रहते थे । अवकाश प्राप्ति के पश्चात वे चाहत हैं कि बाकी जीवन अपने भरे पूरे परिवार के साथ आन दपूवक बितायेंगे। परतु उनकी इस आकाक्षा पर तब तुषारापात हो जाता है जब वे देखते हैं कि कोई भी उनके रहने से खुश नहीं है, यहा तक कि उनका बिस्तर भी अपार आदि रखने की कोठरी मे लगा दिया जाता है तथा उनकी पत्नी भी अपनी सतानो के समक्ष कुछ कह नहीं पाती। आखिरकार गजाधर बाबू घर छोड़ कर जाने का फसला कर लेते हैं । वे अपनी पत्नी को साथ चलने को कहते हैं तो वह भी तैयार नहीं होती। इस प्रकार वे अकेले ही चलने को विवश हो जाते हैं, विडम्बना देखिये, कि भरे-पूरे परिवार के होते हुए भी वे अकेले हैं तथा उनकी पत्नी भी उनकी नही हो पाती तया वे अकेले ही .
93 चलते हैं। उनके घर से निक्सत ही उनके कमर से उनकी चारपाई मोनिगा। दी जाती है । "आश्चय दखिये कि उनके घर से जान पर किसी को कोई दुस-नहीं- आपत्ति नहीं । इस समय कोई जामू नहीं, स्दन नहीं, कवल एक दष्टि उहान अपन परिवार पर डाली, फिर दूसरी ओर देखने लगे और रिक्शा चल पडा।" इतने बडे परिवार के होते हुए भी गजाधर वाबू अपनी वापसी और अकेलापन ढोन का विवश हैं। उनके बच्च उनसे इसलिए नाराज रहते हैं कि बढे लडके को वे हर वक्त बैठर मे लडको को लाने तथा हसी मजाक बग्न को मना करते है, लड़की को पड़ोसिया के घर आने जाने को मना करते हैं। अपने ही बच्चो द्वारा वे उपेक्षित हो कर एकाकी जिन्दगी व्यतीत करने को मजबूर है । उनके एवामी होने का दुख किसी को नहीं है। गजाधर वाबू जितने शोक और आकाक्षा सजोये आय थे अपने परिवार के साथ रहने को वे सब विचार धाराओं की टकराहट म चकनाचूर हो गयी। 'मछलिया' कहानी म उपा प्रियम्वदा न परम्परागत नारी सुलभ शका और ईर्ष्या की मन स्थितिया का सफलतापूर्वक मूल्याकन किया है। विदेश में रह रही मुकी व कारण विजी और मनीश के सवधो म अलगाव की स्थिति आ जाती है । इसके फलस्वरूप नटरा तन और मुकी वे सबधो को विवाह रूप म बदलत देख कर विजी को ईर्ष्या हो आती है । नटराजन विजी को सहानुभूतिवश हर प्रकार की सहायता प्रदान करता है परतु विजी को जब नटराजन के विवाह का समाचार मिलता है तो वह जान स पहन उन दोना के सवधा मे भी अनगाव उत्प न कर देती है और वह भी केवल ईप्यविश इस घटना से दुखी मुकी रोते कहती है-"जाने से पहले विजी मेरे पास आई थी। जिस सदा से उसने नफरत की, उसे यह बताय बिना कैसे चली जाती । उसी ने बताया कि तुमने प द्रह सौ डालर दिय हैं, डाक्टर के पास जाने और इण्डिया लौट जाने के लिए। पहले मैंने उस पर विश्वास ही नहीं किया। मुझे ख्याल भी न था कि तुम इतना आगे बढ जाओगे । पर पर आज फर्नीचर की दुकान स पान आया कि मैंने जो चैव उह दिया, वह वैक से वापस लौट आया कि वहा धन नहीं तब मुझे लगा कि ।" आर्थिक समस्या पर लिख गयी उनकी कहानी परम्बुलेटर' है। अथ समस्या का प्रभाव मानवीय भावनाओ पर भी पडा है, इस कहानी से पता चलता है। कहानी की पाना पेरम्बुलेटर के प्रति माहामक्त होत हुए भी बच्चे के स्वास्थ्य के लिए परम्वुलेटर वेच देती है। 'जि दगी और गुलाब के फूल' कहानी बेरोजगारी की समस्या का उदघाटन करती है। उषा प्रियम्बदा अधिकाशत विदेशी पृष्ठभूमि पर कहानियो की रचना है 94 करती है परतु उनमे भी सस्कारो और परपराओ की दृढता कायम रहती हैं। परम्परागत मूल्यो का टूटना उनकी कहानियो का मुख्य विषय रहा है। जीवन के यथाथ से चुने हुए कथानक उनकी कहानी रचने हैं। शिल्प के प्रति वै विशेष रूप से जागरूक रहती है, परतु ऐसा नहीं लगता कि इसके लिए वे विशेष प्रयास कर रही है, पाशानुकूल शब्द भाषा स्वत ही आते चले जात हैं। सवेदनशीलता के साथ- साथ विचार शक्ति और ठहराव की प्रधानता है । एक नारी होने के नाते उपा प्रियम्वदा नारी सवधी विचार दृष्टि को विशेष आधार प्रदान करती हैं । 'पचपन खभे लान दीवारें' म नारी एक प्रकार की कद मे घिर कर रह गया है और क्षण प्रतिक्षण मुक्ति की प्रतीक्षा कर रही है। मनू भडारी~अपने सहज रचना सजन के कारण मनू भडारी तमाम महिला कथाकारो से अलग अपना एक विशेष स्थान निर्धारित कर चुकी है। मनू भडारी ने नारी को एक नारी के रूप मे ही चिनित किया है न कि सती सावित्री के रूप मे, वह भी सुख दुख झेलने वाली एक सामा य नारी है इस बात को विशेष रूप से अपनी कहानिया मे दिखाया है। जीवन से उठाए गए क्थ्य और स्थितिया ही उनकी कहानी रचत है। उनके प्रकाशित संग्रह है-'मैं हार गयो', 'तीन निगाहा की एक तस्वीर', 'यही सच है', 'एक प्लेट सलाब', 'त्रिशकु' । उनकी प्रमुख कहानियो म-~'कील और क्सक', 'ईसा के घर इमान', 'नशा, 'सजा' पमुख है। 'रानी मा का चबूतरा' कहानी - नारी की नियति और दोन होन दशा का चित्रण किया गया है। ऐसी दीन हीन नारी भी समाज द्वारा निदा का पात्र बनाई जाती है । कहानी की नायिका गुलावी को सब लोग चुडल बहत हैं । उस एक कण और बुरी बहते हैं। परतु एमा है नही । वह तो अपन ही दुख से दुखी है। एक दिन जब गुलाबी अपन बच्चे का छाड पर काम करने चली जाती है तो उसका बच्चा नाली म गिर जाना है और मुहल्ले के लोग उसे उठाते नहीं । ऐसी परिस्थिति म वह हार कर यही कहती है-"आ हा । वडे आय वस्ती वाल। पहल कोठरी खोलकर जाती थी ता मग छोग मरक्त मरक्त मोरी म आकर गिर गया। किसी न उठाया तो नही । बडे अपने चनत है। छोरा भी ता जान किस माटी का बना हुआ है, सार दिन मोरी सडे पानी म सहता रहा, पर मरा नही, मर जाता ता पाप पटता। जीवन के कठोर यथाथ न उमे दुस्साहमी और दबग थे साथ-साथ स्वाभिमानी भी बना दिया है तभी तो वह पहती है-"हम क्या भिखमग हैं, जो विमी का लिया पहनेंगे । आज मेरे पर मयाई मूटा वाला नहीं बैठा है तो सब लोग भीख देन पल है यू है उन पर। 'आम' महानी को पाना बुन्नी एक शिक्षित नारी है परतु उमा रावजूद भी 95 व पर -- . . उस शिक्षा इत्यादि छोड कर अपने परिवार के पालन हेतु अध्यापिका की नौकरी करनी पड़ती है, ऐसे में उसे क्षयग्रस्त अपने पिता की देखभाल करनी पडती है, इन सब से घबराकर वह अपनी तुलना, अपने क्षयग्रस्त पिता से करती है- 'एकाएक कुती को लगा कि उसकी यह खासी, यह खोखली आवाज, पापा की खासी से कितनी मिलती जुलती है वैसी ही तो है सहमकर उसने पापा के चेहरे ।" यह स्थिति उसे दयनीय बना देती है । प्रेम और स्त्री पुरुष के बीच काम सम्बधा को लकर लिखी गइ कहानियो मे मन भडारी को 'एक बार और', 'यही मच है', 'नरेटर' । 'यही सच है' मे प्रेम के भ्रमजाल को तोडा गया है और उसे यथाथ धरातल पर ला कर सोचा गया है । नायिका इम द्वद्व म है कि वह निशीथ और सजय मे से किसे चुन । दीपा स्नेह की अभिव्यक्ति का सच मानती है मैं मब समझ गयी, निशीथ, सब समझ गयी । जा कुछ तुम इन चार दिनो मे ही कह पाय, वह तुम्हार इस क्षणिक स्पश ने कह दिया । विश्वाम कगे, यदि तुम मेरे हो, तो मैं भी तुम्हारी हू, केवल तुम्हारी, एकमात्र तुम्हारी ।" इसके विपरीत चार दिन वार कलकत्ता से कानपुर पहुचते ही उसकी यह विचारधारा बदन जाती है, उसे लगता है, जालिंगन जोर चु बन स ही प्रणय की अभिव्यक्ति हा सक्ती है, मान भावनाओ के प्रदशन से नही,-"तभी मैं थपन गाल पर सजय के अधरो का म्पश महसूस करती है और मुझे लगता है, स्पश, यह मुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सव झूट था, मिथ्या था, भम था दीपा के द्वद्व की परिणति आखिरकार निणयात्मक स्थिति में पहुच जाती है । 'स्त्री सुबोधिनी' म विवाहित व्यक्ति से प्यार मे ली गयी युवती अपने अनुभव के आधार पर इस प्रकार की युवतियो को शिक्षा दने मे नही चूक्ती-वह युवती को शब्दजाल म फसा कर अपना शरीर और भावनायें उसके जिम्मे कर देता है और सारी पारिवारिक खिच खिच पत्नी के नाम । वह प्रेमिका को बार-बार समझाता है कि बीवी बनत ही औरत बहुत ऊबाऊ और वास दायक बन जाती है। इस तरह यौन शोपन का क्रम एक अरसे तक चलता रहता हैं । 'तीसरा आदमी' पति की मानसिक कमजोरी स्पष्ट करती है इसमे कुछ तथ्य न होकर आधार मात्र शक ही होता है, निराधार । 'अकेली' कहानी की बुआ जो कि सग्माजिक संबंधों को बनाकर रखना चाहती हैं परतु पुत्र की मृत्यु के पश्चात पति जब सयास ते लते हैं तो समाज मे उनका अपना ही अस्तित्व नष्ट हो जाता है। नारी का व्यक्तिक और गृहस्थ स्तर पर परिवतन, रूढिमुक्त वामी हृदय का पटन और हद उमकी परिस्थितिया से उत्पन विद्रोहपूण प्रवृत्तिया कहानी 'ईसा के घर इसान' म मिलती है । मन भडारी का महिना क्थावारों में विशिष्ट होन का सब से बड़ा और ठोस कारण है शिल्प का अत्य त सुगठिन और सरल तथा व्यवहारिक होना । उपयुक्त कथ्य को उपयुक्त भाषा म ढालन को कला उह आती है इसलिए किसी भी प्रकार के भावा 96 को उहे शब्दो मे बाधने मे किसी परेशानी का सामना नहीं करना पडता । चाहे उह मुहावरेदार भाषा ही क्यो न लिखनी पडे । जैसे—'बद दराजो के साथ' में परेश की टिप्पणी--"विवाह होने से लेकर पति पर सदेह होने तक का यह वणन एक व्यजनामय भाषा का अद्वितीय नमूना है । एक एक वाक्य का एक एक टुक्डा देखने में लचीला, अथ मे कसा हुआ और नारी मन में क्षण-क्षण में परिवर्तित होने वाले गाढे रगा की छाया से रजित है । किसी भी टुकडे के आधे अक्षर को भी छुओ तो लगता है, रग ऊगली पर लगा आता है ।" 'स्त्री सुबोधिनी' की भाषा म तल्खी और आक्रोश भरा हुआ है- "लव्वो लुवाव यह कि तुरुप के सार पत्ते उमके पास और मुझे मिले उसके दिये हुए छक्के-पजे यानी टोटके की पुडिया में बधे, दाशनिक लफ्फाजी मे लिपटे हवाई प्यार के चन्द जुमले। इन टटपू जिया पत्ता के सहार में ज्यादा इतना ही कर सकती थी कि जि दगी भर उसकी पूछ पकडे रहती मनू भडारी अपनी कहानियो म स्पष्टता से काम लती हैं और पाठक को उलयाती नही। किसी भी प्रकार का पाठक इन कहानिया का रसास्वादन सरलता मे कर सकता है, बशर्ते वह सजग हो। माकण्डेय -माण्डेय आचलिक कहानिया लिखन बाल सफल कहानीकार है। ग्राम्य जीवन को उहोंने अपनी कहानियो म उतारा है । वे ग्राम कथा का महत्व "भूदान मे बताते हुए कहते हैं- "प्रेमचन्द की परम्परा को तोडती हुई शहरी जीवन पर आधारित कहानिया मरणो मुखी प्रवृत्ति की हो गयी है, उससे हि ती कहानी को उभारने का श्रेय ग्राम्य कथा को है।" माकण्डेय के प्रमुख कहानी सग्रह है---माही, बीच के लोग, महुए का पड, भूदान हसा जाइ अकेला, पान फूल, सहज और शुभ तथा 'पत्थर और परछाइ । उनकी प्रमुख कहानियो में हैं-हसा जाइ अकेला, प्रिया सैनी, भूदान, गुलग के बाबा, नौ सौ रुपए और एक ऊटदाना, माई, आदर्शों का नायक, बीच के लोग, सेमल का फूल, चाद का टुक्डा। 'हसा जाइ अकेला' माकण्डेय की चचित कहानी है जिसमें मानवीयता, और यथाथता का अकन है । कहानी 'लघु मानव' की है । उसके सम्पूण जीवन का जीपत चित्रण है। 'नौ सौ रपय और एक ऊटदाना' कहानी स्वात योत्तर परिवतित राजनीति की अभियक्ति है-"राजनीति तो ग ही महात्मा के साथ चली गयी बच्चन । विचार नही रहा अब अउर विना विचार के नति कहा ? देखा न अब काम घधा सव मे बविचारी आ गई । जो कुछ आग पानी हृदय मे रहा, वह बुस गया। हमको छोडा, नेता लोग को दखा, उनका भी वही हाल । जिस कुरसी पर बैठ गय-वस वह उनकी हो गई । अब तो कुरसी वी नेति है । गही महतमा या कुल काम धाम धरा रह गया। घरम के नाव पर ओट उगहान हैं । ठाकुर के ठाकुर, वाम्हन के बाम्हन कहा गयी गरीबी ? कहा गया छूवाछूत-अव रिचार नहीं रहा, बस ओट रह गया है।' - 97 अप सबट पर लिपी गयी उनको कहाणी 'शंदलो का एक टुक्डा' है । कहानी के पात्र जसमा और उसके पति को लिये पंस वा उधार चुकाने के लिए अपनी बकरी और उसका बच्चा भी बच दना पडता है-"अभी तो तुम्ही ने तय किया है वि मूर म बकरी और उसका बच्चा देगी और सूद मे काम करोगी ।" यहा तक कि खान के लिए थोडा सा अन्न और पानी की भी समस्या है-“यह आग पानी से नहीं बुझेगी-उसने सोचा । लकिन पानी पीने का बहाना करन में क्या हज है, आखिरकार तो जीना है-चाह किसी भी वहाने और वह हाथ का गिलास लिए फिर रसोई में लौट गया।" खाने के स्थान पर लप्सी बन हुए क्टोर को धोकर पीना ही उसका मानो भोजन है-“उसे ऐसी घबराहट महसूस होने लगी कि याडी दर पहले जिस दिमागी बलाव के कारण उस आराम महसूस हो रहा था, वही अब उसे सवसे दुखद मालूम होने लगा। उसने अपने दात कस पर भीच लिए और कुछ भी न मोचन का निश्चय करत हुए एक उगली से बटोर के पानी को चलाने सगा । जव धोल अच्छी तरह बन गया तो उसने दोनो हाथ से क्टोरा उठाया और एक मास मे गट गट सारा 'घोल पी गया । फिर गिलास का भी पानी पीपर रसोई मे निक्ला और झिलग म पडे हुए कुनाई को देखे बिना बाहर निकल गया।" स्त्री-पुरुष सवधो पर आधारित कहानी 'प्रिया मैनी' जाचलिकता से दूर है । कहानी की नायिका प्रिया सनी जिस पुस्प स वतमान म प्रेम करती है उसे, उसके बार- बार जिद करन पर साफ माफ सब कुछ बता देती है और अपनी नत्य नाटिका 'इसान की खोज' के माध्यम से बहुत प्रवट भी कर चुकी है परन्तु पुरुप का परम्परागत वही ईर्ष्यालु स्वभाव शकशी होने के माथ साथ सत्य का न सहन करना पाना है, जिसन अलगाव को जन्म दिया है--प्रिया अपन पूर्व पुस्प के विषय म माफ साफ लिखती है- "ऐसा कुछ भी बाकी नहीं है जिस मैं शब्दो म कह सकू । लेकिन इन सब लिए कोई खेद नहीं है-काई आत्मदश नहीं । हो सकता है, मरी जगह पर कोई दूसरी स्त्री होती तो उस होता पर मैं एकदम सहज रूप मे स्वीकार करती हूँ कि मेरे साथ जो कुछ हुआ उसम में सवथा शरीव यो-मन प्राण ही नहीं, शरीर से भी । यह इसलिए कह रही हूँ कि मरा सत्य यही है।" माकण्डेय अपनी बात को सरलता और सहजता से कहने मे पूणत समय है जिसका कारण शिल्प मा स्वाभाविक होना । आचलिक कहानिया लिखत ममय विशेष ध्यान रखा गया है कि भाषा इतनी कठिन न हो जाये कि पाठक का उलझन हाने तग समझने म । ग्राम्य परिवेश उनकी कहानियो का होता है। ग्राम्य समाज के रीति रिवाज़, व्यवहार और विकार का ब्योग देते हुए वे ग्राम्य समाज मे उत्पन होता शोषण, रूटिवादिता, अन्धविश्वास और यथाथ पर विशेष रूप से ध्यान देते हैं। हिमाशु जोशी --आम आदमी के जीवन को रेखाक्ति करन बाल क्थाकार हिमाशु जोशी किसी भी वाद या धारा से अपने आप को नहीं जोडते । न ही उनकी कहानिया किमी भी विशेष आदालन से प्रभावित है। इसलिए हिमाशु जोशी का कहना है- 'जो रचना जोवन के जितना निकट रहती है, वह उतनी ही स्वाभाविक होती है।" उनके इस कथन की पुष्टि उनकी कहानियो से हो जाती है। उनक कहानी संग्रह हैं ---अतत , रथचन, मनुष्य चिह, जलते हुए डैने ।
98 - हिमाशु जोशी अपनी कहानियो म आज के युग में अपनी अपनी यातना और सनास भोगत आदमी को विशेष महत्व देते है । डा. विवेकीराय का इस सम्बध मे क्थन है-"हिमाशु जोशी की कहानिया वस्तु रूप में मुख्यत तीन के द्राक्षे इद गिद घूमती है। प्रथम पवताचल का ग्राम जीवन, भोले भावुष जन की रोमाचक दरिद्रता, अनानता और शोपण नियति, द्वितीय समसामायिक पारिवारिक जीवन । उमके विविध आयाम, सवेदनीय कोण और परम्परा सघप नथा तीसरा महानगरीय मध्यवग का आधुनिक बोध ।" हिमाशु जाशी की कहानियो के पात्र असीम जिजीविपा ममटे है । व सघप के लिए ता तत्पर है पर तु मत्यु के लिए हा अगर वैसे ही मौत ना जाए तो ठीक है, पर तु आत्महत्या करने की बात वे नहीं सोचते । यही स्थिति उनकी कहानी 'जीना मरना' म है। घर म मा की ता मत्यु हो ही चुकी है, बीमार बच्चा मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है। कई वर्षों से घर में नय कपडे नहीं बने है । मानसिक स्थिति इतनी विगड चुकी है कि उसे हाजिरी रजिस्टर' पर दस्तखत के बाद तारीख भी याद नही आती । मा की मत्यु के बाद वह बहन वरखा से कहता है -"अम्मा गुजर गई तो क्या हुआ । हम सब तो अभी जिदा है 'वृ द पानी' कहानी समय की परिवत नशीलता का परिचय देती है । कहानी का पात्र विश्वेश्वर कहता है-"कभी क्लिा बडा हा जाता है यो थाल और कभी न हा, गुडही की गेंद सा। वैसे ही कालि दो हमारी जि दगी भी है न । दिन तो निकल जाते है । समय तो वीत ही जाता है। लकिन वतमान जिगो का न हा सा चार थात मा कैसे बनेगा।" कुल मिलाकर हिमाशु जाशी को सभी कहानिया अत्यत ममम्पर्शी हैं। ज्ञानरजन-समकालीन क्था साहित्य में ज्ञानरजन एक महत्वपूर्ण नाम है ज्ञानरजन ने अधिकाश कहानिया में शैली और जात्मालाप शैली में लिखी हैं। उनकी कहानिया म-बुद्धिजीवी, याद और याद, शेष होते हुए पिता, मनहूम वगला, फेंस के इधर उधर, रचना प्रक्रिया, वारूट का फूल, अमरून या पड, दिवास्वप्नी, छलाग और खननायिका प्रमुख है। उनके कहानी संग्रह हैं-पस में इधर उधर' 'सपना नहीं', मेरी प्रिप बहानिया । 'फेंस के इधर उधर ज्ञानरजन की विशिष्ट कहानियो मे स एक है जिसमें परिवर्तित परिवेश और मूल्यो या अपन है। यहानी म उल्लिखित 'पैस' है जिसमें भार पार दा घर हैं परतु उस फंस वा यात्री भी लाघा नहीं गया उनम इतना अजनवीपन है अपन पहोसिया के प्रति । म घर के मकान वाले साचत हैं कि वे भनि आधुनिर हैं और ममाज की परवाह करन वाल नहीं हैं, जबपि हम है समाज से हरन वाले । ब पहोसिया में विषय म व्यय ही तरह-तरह की बातें अपन मन ही मन म साचत और अदाग लगात रहत हैं । जबपि उधर पडासियों म यह नहीं है। "शेष होत हुए' बहानी पारिवारिक स्तर पर अलगाव को दृष्टिगत गर निधी 99 गई है जहा आपसी सबधो मे ही तनाव व्याप्त है। छोटे को लगता है कि वे सब एक ही घर में रहते हुए भी नितात अलग-अलग है । पानरजन अपनी रचना प्रक्रिया के सम्बन्ध में कहते हैं- "आज कहानी रचना बहुत कठिन हो गई है और अपने दयनीय, अभाग्यपूण और व्यग्यात्मक जीवन से असम्पक्त होकर कहानी निर्मित करना अब हमार लिए सभव नही रहा । सुविधाओ अथवा 'इस्टब्लिशमेट' को स्वीकार करके ईमानदार और सच्चा लेखन लम्ब ममय तक कर सकना काफी कठिन है, इसलिए सुविधाओ के अभाव म और 'इस्टब्लिशमेट' के प्रति विद्राही भाव के साथ अपन कम लिखन का मेर मन मे किंचित भी विचलन नहीं है।" 'दिवास्वप्नी' यहानी यौन जीवन की कठिनाइया को लेकर लिखी गयी है। कहानी म पात्र मानसिक रूप से कमजोर हैं। इसी प्रकार उनकी 'रचना प्रक्रिया', कहानी में एक अजनबी एक परिवार में अजनवीपन का खाकर फिर पा लेता है । इस अजनवियत को पाने में उसे क्या क्या भोगना पडता है, इसका जीवत चित्रण है। 'कलह' परिवारो के टूटन की कहानी है। 'आत्महत्या' मत्यु और उसकी नियति की परिचायक है । 'पिता' कहानी दो पीढिया की विचारधाराआ म टकराव की है । नानरजन की कहानिया म जो घटनाओ, स्थितिया और पात्रा की ज़िन्दगी की यथाथता और सवेदनशीलता उभर कर आती है उसे भापा द्वारा फैलाव और स्पष्टता न मिलन से एक प्रकार के अधूरेपन का अहसास रहता है। यही अधूरापन उनकी कहानिया की गभीरता को व्यक्त करता है । कृष्णा सोबती -आधुनिकता बोध को अभिव्यक्ति देने म अत्य त सफल है कृष्णा मोवती । पजाबी पप्ठभूमि उनकी कहानिया की विशिष्टता है। जहा उनकी कहानियो म वयक्तिक मूल्या का सप्रेषण है वही प्रेम, वासना और जीवन के सधप भी 'मित्रो मरजानी' उनकी बहु चचित कहानी है। कहानी की मुख्य पाया मित्रो एक बहुआयामी व्यक्तित्व को स्वामिनी है । जहा वह प्रेम और वासना की पुतली है वही ममत्व और गौरव की मूर्ति । इस कहानी में गुरुदास और धनवती बूढे माता- पिता के रूप में चित्रित है। वनवारी, मरदारी और गुलजारी उनके बेटे हैं और सुहाग, मिनो और फूला एम घर की बहुए हैं । जहा सभी पारिवारिक मर्यादालो को निभात हैं वहा सरदारी की पत्नी मित्रो एसा नहीं कर पाती । उसम काम भावना की अग्नि प्रज्ज्वलित है, इसस उसका व्यवहार परिवार के सदस्यो के साथ ऐसा है जिससे सब परेशान रहत हैं वह अपनी कटारी सी दो आखें नचा कर जेठ से कहती है- “सान सी अपनी दह झुर झुर कर जला लू या गुलजारी दवर की घरवाली की याई गुर सिलाई के पोछे जान खपा लू ? सच तो यू, जेठ जी, कि दीन दुनिया विसरा मैं मनुक्ख की जात से हस-खेल लती हू । झूठ यू कि खसम का दिया राजपाट छोड मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी।" उसका पति सरदारी उसके चरित्र पर शक करता हुआ उसस कहता है-"तू छिनालो की भी छिनाल ।" जक्ति है। ।
100 मिनो काम-पीडित होते हुए भी हृदय की सच्ची और साफ है । इस कहानी में पारिवारिक परिस्थितियो म काम भावना के पक्ष को उभारा गया है। कृष्णा सोबती की कहानी 'यारो के यार' कहानी ससार मे एक अत्य त साहसिक कहानी मानी जाती है जो क्लक के जीवन की गाथा है जिसे यथाथ के धरातल पर देखा गया है । आफिस में एक सवाद है-"याद रख गुरू का कहना-आदमी के हर पिल्ले को पैट और पतलून सताते है ।" आजकल जो उठता है रिश्वत के खमीर से नम्बर दो का पैसा जोड खानदानी अमीर बना फिरता है। यार लानत है तो हम सब पर है जो क्लक की कुर्सी पर ही पेशन पर जायेंगे।" व्यक्ति मन की अभिव्यक्ति उनकी कहानी 'बादला के घेर' म हुई है जिसे अत्यत सुगठित शिल्प के माध्यम से प्रस्तुत किया है। 'तिन पहाड' कहानी प्रेम पर आधारित जिसे का यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की गई है । फेटेसी का प्रभाव अधिक है। कृष्णा सोबती के कहानी संग्रह है-'मित्रो मरजानी', 'यारो के यार', 'तिन पहाड' । परिमाण में इतना जल्प लिखत हुए भी उन्हाने जितना लिया है वह ठास और महत्त्वपूर्ण है । भाषा और शली की सहजता, सरलता अत्यत महत्त्वपूर्ण है। निपत यदि देखा जाय तो समकालीन हिदी कहानी चिता मे फस हुए और जूझते हुए आम आदमी की अभिव्यक्ति है। समकालीन कहानी घटनाओ, स्थितियो चीजा और पात्रा के अनुभव पर नाधारित है। कहानीकारा की कहानियो के पात्र जीवन के मघप में चरित्रवादी और व्यवस्था के विद्ध खडे होन न होन की स्थिति म हैं। इसीलिए उनकी कहानिया यथाथ को छूती हुई विचार और मवेदना के स्तर पर गहराई में कुछ नया खोज कर सामन लाती हैं। यथाथ जिन्दगी से उसका रिश्ता गहरा है । य कहानिया किसी विशेष परिस्थिति की नहीं हैं बल्कि पूर जीवन के संघर्षों की कहानी कहती हैं । इनम आम आदमी एक विचित्र प्रकार की यात्रियता, घुटन, निराशा और हताशा का शिकार होकर समाज में जीन को विवश है । समकालीन कहानी म आदमी के परम्परागत मम्बार मौन सहिष्णुता और मामाकारिता टूटन के कगार पर आ गय हैं । 'नयी कहानी का बहानीयार कहानी लिखता नही अपितु जोता है, भागता है और अपने पापा के माध्यम से विचारा और सवेदनाआ का व्यक्त कर दता है। अपनी भाषा और शिल्प के माध्यम से सामाय पाठक साय एकात्मता स्थापित परन का प्रयास करता है, इसीलिए समकालीन कहानी के अनेक सदभ उसका यात उदघाटित करत हैं।
सदभ सामग्री 3 1 समकालीन कहानी-युगबोध का सम्भ----हा० पुप्पपाल सिंह 2 हिदी कहानी के सौ वप-डा वेद प्रकाश अमिताभ 3 नयी कहानी वो भूमिका-मतेश्वर 4 नयी कहानी के विविध प्रयोग-पाण्डेय शशिभूपण शीताशु 5 आलोचना और साहित्य-~-डा० इद्रनाथ मदान 6 एर दुनिया समानातर---राजेन्द्र यादव 7 स्वातन्योनर हिदी कहानी-कृष्णा अग्निहोत्री 8 आधुनिक हिदी कहानी -डा० लक्ष्मी नारायण लाल 9 साहिय और मदभ-गोविद मिश्र कथा साहित्य 1 अधेर का सलाब-सरा यानी 2 राजा निरबसिया-कमलश्वर (मेरी प्रिय कहानिया) मास का दरिया- कमलश्वर (मेरी प्रिय कहानिया) 4 दोपहर का भोजन-अमरका त 5 जिदगी और जोक--अमरका त 6 ल दन की एक रात -निमल वर्मा (मरी प्रिय कहानिया) 7 सिक्का बदल गया-सम्पादन-डा० नरेद्र माहन पप्ठ 12 8 य तेरे प्रतिरूप-अज्ञेय 9 मिक्का बदल गया-अज्ञेय 10 वही--पृष्ठ 176 11 वही- -पप्ठ 219 12 वही-पष्ठ 190 13 ये तरे प्रतिरूप-अनेय 14 वही --अनेय • सिक्का बदल गया--सम्पादक-डा० नरेन्द्र मोहन 16 जिदगी और गुलाब के फूल--उपा प्रियवदाछुट्टी का दिन 17 कितनी कद-मदुला गग 101 - ।
102 18 क्तिने सबध-सनाटा-महीप सिंह 19 ठडक-मरी प्रिय कहानिया--महीप सिंह पृष्ठ 91 20 छुटटी का दिन-राकेश वत्स 21 जि दगी और गुलाब के फूल-~-उपा प्रियवदा 22 वापसी जिंदगी और गुलाय ये फूल-उपा प्रियवदा 23 वापसी-जि दगी और गुलाब के फूल-उपा प्रियवदा 24 " " 25 26 कितना बडा झूठ 27 अभी तलाश जारी है, हम बुरे नही थे -मणिका मोहिनी पष्ठ-18 पुरस्स्त हिंदी कहानिया-~सम्पादक श्री कृष्ण 29 30 वद दराजा वा साथ-ए प्लट सलाबमन्नू भडारी 31 मेरी प्रिय कहानिया-'तलाश'-- कमलेश्वर 32 आक्टोपस-टीन के घेरे-कष्णा अग्निहोत्री 33 'एक और जि दगी'-एक दुनिया समानातर-मोहन राकेश 34 क्तिना बडा झूठ-सबध-उपा प्रियवदा 35 'एक खुली हुई साझ'-राजद्र यादव "टूटना तथा अ य कहानिया' पष्ठ-~-84 36 पिक्चर पोस्टकार्ड.-'परि दे' सग्रह-निमल वर्मा 37 लवर्स-जलती झाडी-सग्रह-निमल वर्मा 38 मरा तन मन तुम्हारा है-खेल खिलौने-सग्रह---राजेन्द्र यादव २१ झाडी-श्रीकात वर्मा 40 जिदगी और गुलाब के फूल-उपा प्रियवदा 'निशाऽ.जी' तथापि सग्रह-नरेश मेहता पष्ठ-42 42 'एक और जिन्दगी'--वारिस तथा म य कहानिया पष्ठ-21 22-~-मोहन राकेश 43 तीन दिन पहल की रात-राजा निरवसिया-सग्रह-बमलेश्वर पृष्ठ-~-115 44 बीच के लोग, बीच के लोग-माकण्डेय पष्ठ सग्रह-39 45 खटे, दीवारें ही दीवारें-सह-भीमसेन त्यागी 46 हम सफर-पष्ठ-78 मृणाल पाण्डे मग्रह--'एक स्त्री का विदा गीत' - 41 103 . 2 47 एक स्त्री का पिदा गीत-मुगाल पाण्डे पृष्ठ-108 48 मम्बध-पप्ठ 69-70, मरी प्रिय कहानिया सग्रह-गानरजन 40 'गेड -सपाट चेहरे वाला आदमी-पृष्ठ 27-दूधनाथ सिंह 50 'ए धान आपराश नाइ-पिशकु मग्रह स-मनू महारी पृष्ठ-178-179 51 वद्ध मुष्टि ट-~व्रत फलाहार-निरूपमा सेवती 52 घिर हुए क्षण, कीन' पप्ठ-16-महीप सिंह 53 आतम वीर, 'मव में स एम'-मग्रह-निरूपमा सेवती 54 'जीव'-प्रथम पुरष-मग्रह-मनी जमाली पप्ठ-~-3-~24 35 मेज पर टिकी कुहनिया-रमश बक्षी 56 जिन्दगे और गुलाब के फूल-उपा प्रियवदा 57 दुश्मन--एक विश्नी और पानू योलिया पप्ठ-128 58 'लग्न को एक रात', मेरी प्रिय कहानिया-निमल वर्मा पृष्ठ-149-146 पत्र-पपिकायें 1 मारिका--जनवरी-1986 शरण बधु-जुत्ते--1974--अक्तूबर प्रणव कुमार वद्योपाध्याय (अलपजै डर)-- आजकल' माच, 1971 राम कुमार वर्मा-(यात्रा)-सारिका, अक्तूबर 1962 पृष्ठ 15 5 सुदशन चोपडा--उत्कप विशेषाय 67 पृष्ठ 160 (पंचा) 6 राजी सठ-मनोरमा अक्तूबर, 1977 7 राजी सेठ (अनावत्त कौन)-सारिका, जनवरी 1979 8 माणका मोहिनी (ढाई आखर प्रेम पा)-सारिका जनवरी 1-1979 गगा प्रसाद विमल-सारिका-परवरी 1972 (सिद्धाथ का लौटना) 10 माहेश्वर-'भाजक्ल' '-कथा विशेपाक (किसी एक फूल वा नाम लो) सितवर--1977 11 शशि प्रभा शास्त्री~कहानीवार पूर्णान-41 (धुली हुई शाम)--मई जून--1974 राजी सेठ (योगदीक्षा)-महिला कथाकार विशेपाक 13 मालती जोशी (मध्यातर)-धमयुग-29 सितबर--1974 14 कृष्णा अग्निहोनी-साप्ताहिक हिदुस्तान (विडम्बना)-25 सितबर-1977 15 सुधा अरोरा (दमनचन)-सारिका, माच 1975 16 मुहम्मद ताहिर (समय)--कहानी अक्तूबर, 1970 3 4 9 12 104 अन्य सदर्भ 1 एक दुनिया समाना तर--राजेद्र यादव-भूमिका-पष्ठ-34-35 2 नयी कहानी की भूमियावमलेश्वर पृष्ठ-48 3 म्वातत्र्योत्तर हिंदी कहानी---कृष्णा अग्निहोत्री पष्ठ 8081 बातम्यात्तर हिनी कहानी-83- कृष्णा अग्निहोत्री 5 हिदी की नई कहानी का मनोवज्ञानिक अध्ययन-मिथिलेश रोहतगी पष्ठ 50,54 6 हिदी कहानी अलगाव का दशन-गाइन चाल्स गडरमल, अनुवादक राजेन्द्र 4 यादव 7 1 19 " " समकालीन पहानी की रचना प्रबिया-यदुनाथ सिंह अन्य सदभ राजेद्र यादर--भविष्य के आस पास मडराता अतीत 2 निमल वर्मा-अधेर मे (मरी प्रिय कहानिया, मग्रह से) पप्ठ 75,77 3 निमन धर्मा-दहलीज 4 राजेन्द्र यादव-खेल खिलौने-पृष्ठ 34-37 5 निमल वर्मा-(मेरी प्रिय कहानिया, सग्रह स) 'अतर' पृष्ठ 110 111 6 कमरेश्वर-~~मीखचे, पृष्ठ 16, 18, 19 7 मोहन गकेश-सुहागिर्ने पृष्ठ-75 8 रामकुमार-क्तिना समय, पृष्ठ-74 कमनेश्वर-~-पराया शहर-पाठ 135 उपा प्रियवदा-क्तिना बडा यूठ सग्रह से, सुरग, 11 राजेद्र यादव-'बिरादरी बाहर, किनार से किनारे तब', सग्रह से । 9 10
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