Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Diksha Visheshank [ Sarmanoupasak ]

Dr. Shanta Bhanavat · 2011/01

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। उसमें निहित मूल्य ঈলচ্চিা दीक्षा विशेषांक १० व २५ सार्च १६६२ A प्रवचन/निबन्ध A दीक्षा ग्रहण करने का पाठ एवं : श्री चांदमल कर्णावट दिगम्बर परस्परा में दीक्षा और दीक्षार्थी का स्वरूप : डॉ. उदयचन्द्र जैन १४ सुसाहुणो गुरुणो श्री उदयलाल जारोली १६ जैन दीक्षा, क्या ? क्यों ? ध कैसे ? : श्री जशकरण डागा २६ जैनागमों में दीक्षा का स्वरूप : पं. कन्हैयालाल दक शिक्षा और दीक्षा वर्तमान संदर्भ में : डॉ. महेन्द्र सागर प्रचंडिया ५१ शिक्षा का जीवन से आचरण करना ही दीक्षा है : श्री कन्हैयालाल लोड़ा ५४ दीक्षा एवं संयम : श्रीमद् गणेशाचार्य की दृष्टि में : श्री उदय नागोरी समता ही 'जीवन' और जीवन का स्वभाव है--आचार्य श्री नानेश : श्री हेम शर्मा आचार्य श्री नालेश की विलक्षण देन : समीक्षण-ध्यान : श्री भंवरलाल कोठारी ७४ दीक्षा का स्वरूप और महत्व : डॉ. नरेन्द्र भानावत ७६ हु शि उ चौ श्री जग नाना साधुमार्गी परम्परा के ज्योतित नक्षत्र : अष्टाचार्य : श्री जानकी नारायण श्रीमाली७६ जीवन का सारभूत तत्व है-दीक्षा : प्रो. सतीश मेहता ८१ समता समाज रचना : धर्मपाल प्रयोग : श्री भवरलाल कोठारी दीक्षा के सन्दर्भ में ज्योतिधर श्री जवाहराचार्यजी की आत्मानुभूति : श्री जानको नारायण श्रीमाली A कथा प्रसंग/सूक्ति A प्रवचन-पराग [३८] : श्रीमद् गणेशाचार्य इतिहास की पुनरावृत्ति : दो प्रसग : श्री राजेन्द्र प्रसाद जैन जैनागमों में साधक जोवन : श्री अमिताभ नागोरी ६८ विनीत कौन ? : श्री प्रमोद नागौरी : श्री प्रमोद नागोरी धर्म दृढ़ता की विजय : श्री राजेश कुमार जैन ७० : 1 ६० u w ur 9 w श्रमरण कौन ? M १४३ १०५ ११४ १३५ श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन संघ संक्षिप्त प्रवृति परिचय 1 श्री चम्पालाल डागा A बीक्षा महोत्सव प्रतिवेदन A क्षा ग्रहण करने वाले मुमुक्षु प्रात्माओं का संक्षिप्त परिचय.. । संकलित दीक्षार्थी-साक्षात्कार ! प्रो. सतीश मेहता दीक्षा समारोह हेतु प्राप्त शुभ कामनाएं: भव्य दीक्षा-महोत्सव : संकलित (संगीत संध्या, भव्य शोभायात्रा मुमुक्षु आत्मामों का भव्य अभिनन्दन, समारोह प्रतिवेदन एवं कवि सम्मेलन) दीक्षा की सूची प्राचार्य-प्रवर के युवाचार्य पद के समय विद्यमान संत-सतियांजी की नामावली: तदनन्तर दीक्षित हुए संत-सतियांजी की नामावली A कविता A : डॉ. नरेन्द्र भानावत मुमुक्षु-मुक्तक : श्री शशिकर दीक्षा : श्री रमेश मुनि शास्त्री कुडली : श्री सौभाग्यमल जैन - अभिनन्दन है : श्री 'खटका राजस्थानी' समता दर्शन गीत : श्री सुरेन्द्र दुबे गजल : श्री सौभाग्यमल कोटड़िया .: पाशा जैन समन्वय जरूरी है : श्री कुन्दन सुराणा A TAFT A A ४ आगम-वाणी : : संकलित सम्पादकीय : संयम पथ के पथिकों ६ का हार्दिक अभिनन्दन : डॉ. भानावत समाचार-संग्रह आदि : संकलित १३८ दीक्षा रा दूहा ७ १३ २२ २८ ४७ - ज ५६ । क्षणिकाएं .६४ ૨૨ २ १५८ । नोटयह आवश्यक नहीं कि लेखकों के विचारों से संघ अथवा की सहमति हो।

धन्यवाद एवं आभार बीकानेर के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है:१६:फरवरी १९६२ का दिन, जब २१ मुमुक्षु आत्माओं ने आचार्य श्री नानेश की नेत्राय में भागवती दीक्षा अंगीकार की । अणुव्रत की पगडंडी छोड़ उन्होंने महाव्रतों का राजमार्ग अपनाया और जिनशासन: की सेवा, प्रभावना हेतु स्वयं को समर्पित कर दिया । आत्मोन्नति के प्रशस्त मार्ग में अग्र- सर होकर इन भव्य दीक्षार्थियों ने स्व-पर कल्याण का - पथ चुना है उन्हें वन्दन, अभिवन्दन । इसी उपलक्ष्य में प्रकाशित श्रमणोपासक का यह दीक्षा विशे-' षांक पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है । दीक्षा के विभिन्न आयामों एवं सैद्धान्तिक-शास्त्रीय-व्यावहारिक पक्षों पर लेख, संस्मरण आदि सम- न्वित सामग्री से यह अंक संग्रहणीय बन गया है । पूर्ण प्रयत्न किया गया है कि सभी दृष्टियों से यह · अंक उपयोगी एवं मननीय बने । इस दिशा में सम्पादक मण्डल के अथक परिश्रम को सार्थकता प्राप्त हुई है एवं एतदर्थ धन्यवाद ज्ञापित करना मात्र पर्याप्त नहीं है । अन्य सहयोगी विद्वान लेखकों सहित सर्व श्री उदय नागोरी, जानकी नारायण श्रीमाली, प्रो. सतीश मेहता एवं नानालाल जी पीतलिया (कार्यालय सचिव) का विशेष सहयोग मिला है उसके प्रति.मैं आभारी हूं। दीक्षार्थी परिचय, साक्षात्कार, प्राचार्य-त्रय के दीक्षा सम्बन्धी विचार एवं अन्य पठनीय सामग्री जुटाने में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा है । श्री जैन आर्ट प्रेस के व्यवस्था प्रभारी, श्री राजेन्द्र रामपुरिया, कर्मचारियों एवं कम्पोजिटरों ने इसके मुंद्रण में अहर्निश कार्य किया है तदर्थ वे प्रशंसा के पात्र हैं । संक्षेप में इस विशेषांक को मूर्त रूप देने में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष संलग्न सभागियों के प्रति मैं आभारी हूं। आशा है यह विशेषांक मार्गदर्शक, उपयोगी एवं प्रेरक सिद्ध होगा। बीकानेर -चम्पालाल डागा २५ मार्च १९६२ मंत्री, श्री अ. भा.. सा. जैन संघ श्रमणोपासक म मंत्री न सम्पादक श्री अ. भा. साधुमार्गों जैन संघ पदाधिकारीगरण प्रध्यक्ष श्री भंवरलाल बैद, कलकत्ता उपध्यक्ष ( पाक्षिक ) श्री सुजानमल वोरा, इन्दौर पंजी. संख्या : आर. एन. ७३८७/६३ श्री उगमराज मूथा, मद्रास श्री किशनलाल भूरा, करीमगंज | वर्ष-२६ अंक-२३-२४ शश्री धनराज कोठारी, ब्यावर हौ श्री रिद्धकरण सिपानी, बैगलोर श्री सुन्दरलाल दुगड़, कलकत्ता १० एवं २५ मार्च १९६२ (संयुक्तांक) श्री चम्पालाल डागा, गंगाशहर सहमंत्री दीक्षा विशेषांक श्री राजमल चोरडिया, जयपुर श्री वीरेन्द्रसिह लोढ़ा, उदयपुर श्री उम्मेदमल गांधी, जोधपुर सस्त्री गौतमचन्द पारख, राजनांदगांव राित्री सुरेन्द्र कुमार दस्साणी, बम्बई इने श्री अनूपचन्द सेठिया, कलकत्ता डॉ. शान्ता भानावत कोषाध्यक्ष पाश्री केशरीचन्द गोलछा, नोखा मपी सु सु. सां. शिक्षा सोसायटी आगम-वाणी प्रध्यक्ष/मंत्री शिश्री सोहनलाल सिपानी, बैंगलोर साथी श्री धनराज बेताला, नोखा जे य कते पिए भोए, अन्य महिला समिति अध्यक्ष/मंत्री लद्धे वि पिट्ठि कुव्वई । श्रीमंती शान्तादेवी मेहता,रतलाम साहीणे चयइ भोए, श्रीमती रत्ना ओस्तवाल, से हु चाइत्ति वुच्चई ॥ राजनांदगांव वही सच्चा त्यागी कहलाता है समता युवा संघ, प्रध्यक्ष/मंत्री जो अपने को प्रिय और कान्त लगने श्री उमरावसिह ओस्तवाल,बम्बई | वाले मनोहर भोग प्राप्त होने पर भी सिर श्री सुरेन्द्र कुमार दस्साणी, बम्बई | स्वाधीनतापूर्वक उनको पीठं दिखा समता बालक मण्डली,अध्यक्ष/मंत्री देता है, अर्थात् सब प्रकार श्री गुलाब चौपड़ा, बालेसरसता भोगों को त्याग देता है । श्री गिरीश लोढ़ा, रतलाम -दशबैव जुगराज सेठिया - - श में संह मम्पाद । संयम-पथ के पथिकों का हार्दिक अभिनंदन आज चारों ओर भौतिक सुख-सुविधाओं का दौर है । प्रत्येक व्यक्ति इन्द्रिय-सुख की होड़ में बेतहाशा भाग रहा है । येन, केन, प्रका- रेण धन-सम्पत्ति इकट्ठी करने में लगा है । इसी आपाधापी और दौड़ धूप में हीरे के समान यह अमूल्य मनुष्य जीवन कौड़ी के बदले नष्ट हो रहा है । पर यह आत्मबोध बिरलों को ही हो पाता है । भगवान महावीर ने इस संसार में चार बाते दुर्लभ बताई हैं- मनुष्य जीवन, धर्म-श्रवण, श्रद्धा और संयम में पराक्रम । आकृति के रूप में तो आज मनुष्यों की कोई कमी नहीं है । बढ़ती हुई जनसंख्या से आज अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री बड़े चिन्तित और आतंकित हैं। पर प्रकृति से मनुष्य बहुत कम दिखाई देते हैं । अधिकांश मनुष्य तो खाने-पीने और मौज-मस्ती में ही अपना जीवन बीता देते हैं । ऐसा जीवन पशु जीवन है । पशु और मनुष्य में मौलिक अन्तर आत्म-बोध का है, धर्म-जागृति का है । जब इन्द्रियां बहिर्जगत से अन्तर्जगत की ओर मुड़ती है तब नई दृष्टि विकसित होती है, तब जीवन खाने के लिए नहीं वरन् खाना जीवन के लिए होता है । ऐसा होने पर धर्म- श्रवण, शास्त्र अभ्यास और स्वाध्याय की ओर प्रवृत्ति होने लगती है। पदार्थ ज्ञान से आत्मज्ञान की और बुद्धि चलती है ! धीरे-धीरे श्रद्धा पुष्ट होती है और ज्ञान प्रज्ञा मे बदलता है। तव लगता है कि इन्द्रिय- आश्रित सुख वारतविक सुख नहीं है । जो सुख दिखाई देता है वह सुख क्षणिक है, नीरसता में बदलता है, थकान पैदा करता है और अन्ततः दुःख में परिणत होता है। सच्चा और वास्तविक सुख वस्तुनिष्ठ नही, आत्मनिष्ठ है । वह भोग में नहीं त्यांग में है । आवश्यकता बढ़ाने में नहीं, इच्छाओ को नियंत्रित करने में है। प्राणीमात्र के प्रति मैत्रीभाव जगाने में है। ऐसा बोध होने पर सांसारिकता छूटने लगती है । क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषाय मन्द पड़ने लगते हैं तथा संयम की ओर परा- क्रम करने का भाव जागृत होता है । दीक्षा अंगीकार करने की यही पृष्ठभूमि है, भाव भूमि है ।

० १० व २५ मार्च १९६२ ३ दीक्षा एक प्रकार का नवीन संस्कार है, नया जन्म है । अन्ध- कार से प्रकाश की ओर बढ़ना है, असत्य से सत्य को ओर गमन करना है, अशुभ से शुभ में प्रवृत्ति करना है । यह मात्र वेश परिवर्तन नहीं, वृत्ति परिवर्तन है, एक प्रकार की अन्तयात्रा है । दीक्षा का अर्थ है- सही दिशा का बोध हो जाना और उस ओर दक्षतापूर्वक बढ़ना । यह बोध वहुत बिरल है । पूर्व संस्कारो और पुण्यों के उदय से, सन्त महा- त्माओं के सत्संग से, शुभ चिन्तन और स्वाध्याय-मनन से, सरल परिणामों से यह सम्भव होता है । सद्गुरु का इसमें बड़ा योगदान रहता है। इस दृष्टि से समता विभूति, समीक्षण ध्यानयोगी, चारित्र- चूड़ामरिण, पूज्य आचार्य श्री नानेश वर्तमान युग के विचक्षण सद्गुरु है । उन्होंने अपने व्यक्तित्व और संयम-साधना के प्रभाव से भौतिकता के प्रवाह में बहते हुए युवामानस को नई दृष्टि और नया सोच प्रदान किया है । इनके आचार्यकाल में २६३ भाई-बहिनों ने अब तक जैन भागवती दीक्षा अंगीकृत कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। प्राचार्य नानेश के ही सानिध्य में संवत् २०४० में २५ मुमुक्षों ने एक साथ रतलाम में दीक्षा अंगीकृत की थी । एक साथ इतनी दीक्षाओं का अंगीकार करना इस शती की महत्वपूर्ण घटना थी। इसी क्रम में १६ फरवरी १६६२ को वीकानेर में २१ मुमुक्षु आत्माओं ने एक साथ दीक्षा अंगीकृत कर भौतिकवादी युग को अपने आध्यात्मिक सयम-बल से फिर चुनौती दी है । इन दीक्षार्थियों में दो भाई व १६ बहिनें है। ये सभी सम्पन्न परिवार से है । इन्हें सब प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध थी पर इनका मन इनमें नही रमा । अखण्ड आनन्द की, खोज में, दु:ख रहित सुख की प्राप्ति में ये चल पड़े। आचार्य नानेश ने इन्हे सम्बल दिया, ज्ञान दिया और अपने चरणों में आश्रय दिया । ये दीक्षार्थी भाई-बहिन सुशिक्षित हैं । व्यावहारिक ज्ञान में भी बढ़े-चढ़े हैं । इनमें से अधिकांश मिडिल, मैट्रिक, हायर सैकण्डरी -परीक्षाएं पास हैं । तीन बी.ए. और दो एम.ए., एम कॉम हैं । धार्मिक तत्वज्ञान शास्त्र अध्ययन भी इनका उच्च है। इनमें से कोई भी अवोध ।

४ ० दीक्षा विशेषांक नहीं है । सब वस्यक हैं । १६ से लेकर २७ वर्ष तक की अवस्था के ये सब युवापीढ़ी की आध्यात्मिकता के प्रतीक है। इन्होने समय के प्रवाह में न बह कर नई दिशा की ओर गति की है । आज का युवामानस जहां एक ओर तोड़-फोड़, छीना- झपटी, भय, आतंक और हिंसक कार्यो में लगा हुआ है। वहां इन युवाओं ने अपने पराक्रम को सही दिशा में प्रवृत्त किया है । यह दिशा है-अपने विकारों पर विजय प्राप्त करके मानव मात्र को स्नेह के सूत्र में बांधना, प्राणीमात्र के प्रति यात्म तुल्य भाव रखना, कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना जिससे किसी को दुःख पहुंचे । इन मुमुक्षु अात्माओं ने अपने सद्गुरु आचार्य नानेश से यह प्रतिज्ञा ग्रहण की है कि मन -से, वचन से और काया से किसी प्रकार की हिंसा न वे स्वयं करेंगे, न दूसरों से करवायेंगे और न हिंसा करते हुए किसी का अनुमोदन करेंगे । ऐसी ही प्रतिज्ञा इन्होंने झूठ नहीं बोलने की, चोरी नहीं करने की, कुशील में प्रवृत्त न होने की, किसी भी प्रकार का परिग्रह-ममत्व न रखने की, ग्रहण की है। अब इनका जीवन विषमता से समता, भोग से त्याग, हिंसा से अहिंसा और राग से विराग की ओर उन्मुख हुआ है । आत्मकल्याण के साथ लोककल्याण इनके जीवन का लक्ष्य बना है। इन मुमुक्षु आत्माओं ने जो वैराग्य धारण किया है, वह किती विवशता या लाचारी का परिणाम नही है। यह प्रारोपित या थोपा हुआ नहीं है । स्वतः स्फूर्त है, आत्म-प्रेरणा का फल है। दीक्षा धारण करने से पूर्व श्रमणाचार को इन्होने भली-भांति समझा है । बुद्धि के स्तर पर ही नहीं, वरन् आचरण के स्तर पर भी । आचार्य श्री और उनके द्वारा निर्देशित साधु-साध्वियों के सानिध्य में इन्होंने श्रमण जीवन का अभ्यास किया है। इनका यह अभ्यास-काल एक दो दिन या एक दो मास का नहीं, वरन् दो वर्ष से लेकर ६ वर्ष तक का रहा है । इस अभ्यास-काल में इन्होने अपने पापको श्रमणाचार की कसौटी पर कसा है। श्रावक-श्राविका धर्म का पूर्ण पालन करते हुए ये शुद्ध श्रमणत्व की ओर बढ़े हैं । इन दीक्षार्थियों की एक विशेषता यह भी है कि ये सभी बाल ब्रह्मचारी है । इन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय का सतत अभ्यास किया है।

• १० व २५ मार्च १९९२ ५ जैन दीक्षा का महान एवं कठोर व्रत धारण कर इन्होंने आज की तथाकथित उपभोक्ता संस्कृति को चुनौती दी है । जिस पथ पर ये बढ़े हैं वह फूलों का पथ नहीं है, वह कंटकाकीर्ण है । संयम की साधना तलवार की धार पर चलने के समान है । इन्हें नंगे पांव पैदल चलना है । वर्षावास को छोड़कर किसी भी स्थान पर एक मास से अधिक नही रहना है अपने लिए किसी प्रकार का कोई संग्रह-परिग्रह नहीं रखना है । घर-घर जाकर अपने नियमानुसार मर्यादित, निर्दोष आहार ग्रहण करना है, अपना सारा समय स्वाध्याय, ध्यान, चिन्तन और समभाव की साधना में बिताना है । अब परिवार से, सगे-सम्बन्धियों से इनका कोई सांसारिक लाग-लगाव नहीं रहा है। अब इनका सम्बन्ध जुड़ा है अरिहन्त, सिद्ध रूप देव से जिन्होंने राग-द्वेष पर विजय प्रप्ति कर ली है । अब इनका सम्बन्ध जुड़ा है आचार्य, उपाध्याय साधु रूप गुरु से, जो उज्ज्वल चारित्र और विशुद्ध ज्ञान के धनी है । इन्ही की छत्र-छाया में अब ये बढ़ते रहे, अपनी साधना में निस्संग भाव से ये लगे रहें, इनका संयमी जीवन निर्दोष, उत्कृष्ट और यशस्वी बनें, यही हम सबकी मंगलकामना है । इनके तप, त्यांग, विराग से काश ! हम भी प्रेरित हों। -डॉ. भानावत - -- - - - प्रवचन-पराग (३८) श्रीमद् गणेशाचार्य कांच पर सूर्य की किरणें गिरती हैं तो उनके संसर्ग से कांच की अव्यक्त किरणें व्यक्त हो जाती हैं और वृद्धि प्राप्त कर फैलती हैं। इसी प्रकार आत्मा को जब परमात्मा के शुद्ध स्वरूप के साथ जोड़ दिया जाता है तो आत्मा की चिन्मय किरणे जो अप्रकट रूप में सोई पड़ी हैं, प्रकट रूप धारण करके वृद्धि प्राप्त करती हैं और फैलने लगती हैं। परमात्मा के प्रति समर्पित साधक अपने स्वार्थ के लिए नहीं, वरन् जगत के हित के लिए, प्राणिमात्र के कल्याण के लिए जीवित रहता है। अगर आपके मन में क्षुद्र स्वार्थ की भावना ही बलवती रही, आप अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हितों का हनन करते रहे, दूसरों पर आपको करुणा- न आई, देश के लाखों नंगों और भूखों को देखकर भी आपका दिल दया से द्रवित न हुआ- तो कैसे समझा जाये कि आपने धर्म के स्वरूप को समझ लिया है ? राष्ट्रधर्म, आत्मधर्म का आधार है। राष्ट्रधर्म-का भली-भांति पालन किये बिना आत्मधर्म की आराधना करने की योग्यता उत्पन्न नहीं होती । अतएव जो राष्ट्रधर्म के स्तर पर भी नहीं पहुंच सका है, उसे आत्मधर्म के पालन की आशा किस प्रकार की जा सकती है? स्वच्छ दर्पण के समक्ष जैसी वस्तु आती है, वैसी ही झलकती है। अगर कोई आदमी काला मुंह कर के दर्पण के सामने आये तो वह वैसा ही दिखाई देगा । लाल मुख करके खड़ा होगा तो लाल ही दीखेगा । इसी प्रकार भगवान के ज्ञान और दर्शन में तीनों लोकों और कालों के समस्त पदार्थ अपने असली रूप में प्रति- भासित होते हैं। उनकी चेतना इतनी निर्मल और निर्विकार है कि उसमें न तो कोई वस्तु अप्रतिभासित रहती है और न अन्यथा प्रतिभासित होती है। यही उसके शुद्ध स्वरूप की पहचान है । राजनीतिक या आर्थिक स्वाधीनता वस्तुतः स्वाधीनता का बाह्य रूप है-शरीर है । उसकी अन्तरात्मा सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्वाधीनता में निहित है । [ संकलन । रेखा भानावत, जयपुर ]

० १० व २५ मार्च १९६२
दीक्षा रा दूहा
A डॉ. नरेन्द्र भानावतं
[ १ ]
दीक्षा तम में जोत ज्यू, खोले हिय री आंख ।
जीवन-नभ में उडण नै, ज्ञान-क्रिया री पांख ॥
[ २ ]
विषय-वासना पर विजय, दीक्षा शक्ति अनन्त ।
तन-मन री जड़ता मिटै, प्रगटे ज्ञान बसन्त ॥
[ ३ ]
भव-नद उलझ्या 'जीव-हित, दीक्षा निरमल द्वीप ।
गुण-मोती निपजै सदा, विकसै मन री सीप ।।
[ ४ ]
करम - लेवड़ा उतरै, तप संयम रो लेप ।
आतम वै परमात्मा, मिट बीच से गैप" ।।
[ ६ ]
भटक्या नै मारग मिलै, अटक्या' नै आधार ।
मझधारा नै तट मिले, उतरै भव 'रो भार ।
--अध्यक्ष, हिन्दी विभाग,
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर-४-
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दीक्षा ग्रहण करने का पाठ एवं उसमें निहित मूल्य A श्री चांदमल करावट दीक्षा की सामान्य जानकारी: दीक्षा का धार्मिक प्रसंग में सरल अर्थ संसार का परित्याग कर साधु/साध्वी बनना है । 'दीक्षा' शब्द का विशेष अर्थ है संस्कार । जैन दीक्षा सम्पूर्ण त्यागमय, निष्पाप एवं पवित्र जीवन जीने का संस्कार है । यह आध्यात्मिक जीवन जीने का एक बृहत् संकल्प है । दूसरे शब्दों में कहा जाय तो दीक्षा-सांसारिक जीवन का परित्याग कर अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर होने का विराट उपक्रम है । दीक्षा के लिए संयम, चारित्र, प्रवज्या, अणगार धर्म आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है। श्रमण- दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् साधु-साध्वी सांसारिक माता-पिता एवं परिजनों को छोड़कर अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह के महान् व्रतों को पूर्णतया पालन करने की साधना करते हैं । वे पैदल चलते हुए, पास में, धन न रखते हुए, निर्दोष भिक्षाचरी से अपना जीवनयापन करते हुए, पूर्ण स्वावलम्बी बनकर आध्यान्मिक क्षेत्र में अग्रसर होते हैं । वे राग-द्वषादि आत्म शत्रुओं के विजेता बनकर स्वयं 'जिन' बनने.का पुरुषार्थ करते हैं । जिस पाठ से दीक्षा का महान् व्रत ग्रहण किया जाता है, वह पाठ निम्न प्रकार है- "करेमि भन्ते ! सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जावज्जी- वाए पज्जुवासामि तिविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, करतंपि अन्नं न समणुजाणामि मणसा वयसा कायसा तस्सभन्ते पडिक्कमामि, निन्दामि, गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।" दीक्षा पाठ का सामान्य विश्लेषण : उपर्युक्त पाठ में दीक्षार्थी साधक दीक्षा की प्रतिज्ञा या प्रत्या- ख्यान ग्रहण करते हुए अपने भावों को व्यक्त करता है कि हे भगवन्! मैं सामायिक व्रत (समता साधने का व्रत) ग्रहण करता हूं। मैं आजी- वन मन, वचन, काया से हिंसादि समस्त पापों का त्याग करता हूं। साधक यह संकल्प करता है कि मै इन पापों का सेवन स्वयं नहीं ० १० व २५ मार्च १९६२ - 7 करूंगा, दूसरों से नहीं करवाऊंगा और हिसादि पापों को सेवन करने वालों का अनुमोदन भी नहीं करूंगा मन से, वचन से और काया से । दीक्षा ग्रहण करने से पूर्व हुए पापों की भी साधक आलोचना करता है, निन्दा करता है, गुरुसाक्षी से विशेप निन्दा करता है और अपनी | आत्मा को उनसे विलग करता है । इसके साथ ही दीक्षा का साधक | गुरु महाराज और जिनेश्वर देव की आज्ञाओ का सान्निध्य ग्रहण । करता है। इस प्रकार उक्त पाठ के उच्चारण के द्वारा जीवन भर के लिए र पापों का त्याग कर, हिसादि पाप रूप विषमताओं से विलग होकर सिमभाव की साधना में निरत हो जाता है । दीक्षा पाठ में निहित मूल्य : दीक्षा पाठ मे अनेक जीवन मूल्य निहित है, जैसे- समता या समभाव, आत्मानुशासन, विनय/सत्सान्निध्य,शुद्धता या पापरहितता, आत्म निन्दा और आलोचना । १. समता या समभाव-समता या समभाव की साधना दीक्षा र पाठ का मूलभूत मूल्य है । हिसादि समस्त पापों या विषम भावों का त्याग करके साधक समभाव की साधना करता है । अर्थात् महावीर प्रभु ने विषमता को पाप माना है और समता या समभाव को धर्म । ; हिसादि १८ ही पापों के त्यागे बिना समभाव की साधना नहीं हो सकती । इससे यह स्पष्ट होता है कि समभाव का अर्थ सभी विषम- • भावों को या पापो को त्यागना है । समभाव का दूसरा अर्थ अनुकूल-प्रतिकूल सभी स्थितियों में प्रतिक्रियारहित होकर समस्थिति में स्थिर रहने का अभ्यास है । हर्प- शोक, निन्दा-प्रशंसा, दु.ख-सुख, मे राग और द्वेप की वृत्तियों से ऊपर उठकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप में लीन रहना' समभाव है । अनुकूल स्थिति में रागभाव पैदा होता है और प्रतिकूल स्थिति में द्वषभाव । ये राग-द्वेष की वृत्तियां ही हमारी अशाति का मूल कारण हैं । इन सभी स्थितियों में समभाव में रहकर ही आत्मा सच्ची शांति की अनु- भूति करने में सक्षम होती है । 'विशेषावश्यक भाष्य' में आचार्य जिनभद्र क्षमाश्रमण के अनु- [ सारं सभी जीवों पर मैत्रीभाव रखना 'साम' है और साग की आय -- १० ० दीक्षा विशेषांक - या मित्रभाव की प्राप्ति जिससे हो वह पति का सनभाव है। इस प्रकार समताभाव सभी जीवों के प्रति मित्रभावना का विकास : करता है । सभी जीव मेरे मित्र हैं, कोई शत्रु नहीं । इस प्रकार की उदार भावना समभाव का विषय है । जैनागम 'भगवती सूत्र' के अनुसार 'पाया खलु तामाइए आया सामाइयस्स अट्ठ' अर्थात् आत्मा ही सामायिक है और सामायिक का प्रयोजन आत्मा के शुद्ध स्वरूप को अधिगत करना है । अर्थात् । सामायिक या समभाव का अर्थ समस्त पापमय विकारों को दूर करके में आत्मा के शुद्ध स्वरूप में स्थित रहना है । यहां 'सामायिक' शब्द का द विश्लेषण 'समय' अर्थात् आत्मा से किया गया है । शरीर और अन्य स सभी पदार्थ प्रात्मा से भिन्न हैं। यह भावना जैसे-जैसे दृढ़ बनती है, प वैसे-वैसे पदार्थों के प्रति हमारी प्रासक्ति कम होती जाती है और तज्जन्य दुःख और अशांति का भी निवारण होता है । समभाव सभी जीवों के साथ समग का भाव तथा व्यवहार है । जो समो सव्वभूएसु, तसेसु थावरेसु य । तस्स सामाईय होइ, इइ केवलि भासियं ।। अर्थात् जो साधक छोटे-बड़े सभी. प्राणियों में कोई भेदभाव न करते हुए सबके साथ समता का व्यवहार करता है, सभी जीवों को ! अपनी आत्मा के तुल्य समझता है, वही उत्थान के मार्ग . पर अग्रसर । हो सकता है । यही आध्यात्मिकता भी है । 'शम' या 'शमन' के सन्दर्भ में भी समभाव की व्याख्या करते हुए बताया गया कि साधक को क्रोधादि कषायों का उपशमन कर : आत्मा में क्षमा, सन्तोष, सरलता और विनम्रता . का विकास करना चाहिए । क्रोधादि-आत्मा के वास्तविक शत्रु . हैं, इन्हें विजित करने । हेतु समभाव की साधना एक अमोघ शस्त्र है । द्वन्द्वों और तनावों के घिरे जीवन में समताभाव की साधना व ही सुखी एवं सन्तुलित जीवन जीने का राजपथ है। दीक्षा के पाठ में निहित 'समता' के मूल्य में सभी का समावेश हो जाता है और रागद्वोष की विजय की साधना हुए मुनि स्वयं 'जिन' बनकर मुक्ति के लक्ष्य को साध लेते हैं । २. मात्मानुशासन-दीक्षा ग्रहण करने का पाठ करेमि भन्ते! । . 10 .. १ ० १० व २५ गार्च १९६२ ११ साधक सामाइयं' पदों से प्रारम्भ होता है जिनका अर्थ है 'हे भगवन् ! मैं सामायिक व्रत ग्रहण करता हूं । 'दीक्षा का व्रत किसी भी साधक पर थोपा नहीं जाता है । इस पाठ से यह स्पष्ट है कि दीक्षा का इच्छुक साधक इस व्रत को स्वेच्छा से ग्रहण करता है । यही आत्मानुशासन भी है जहां व्यक्ति किसी दूसरे से अनुशासित न होकर स्वयं अपने आप से अनुशासित होता है । इस व्रत के निर्वहन और परिपालन में भी के आत्म-अनुशासन की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, किसी अन्य के अनुशासन की नहीं । यह ठीक है कि दीक्षा की प्रतिज्ञा आचार्य या बड़े मुनि ही कराते हैं परन्तु यह भी सही है कि साधक स्वयं ही स्वेच्छा से इसे ग्रहण करता है और उसका पालन करता है । ३. विनय और सत्सान्निध्य-विनयपूर्ण व्यवहार तो साधना का मूल है । आजीवन मुनिव्रतः अंगीकार करने वाले साधक के मन, वचन, कर्म में विनय गुण का होना आवश्यक है अन्यथा अभिमान से घिरी हुआ साधक समता भाव के परिपालन का अपना व्रत नहीं निभा सकता। दीक्षा-पाठ में दीक्षार्थी का यह व्यवहार भन्ते'-'तस्स भन्ते' : पदों में प्रकट हुआ है-जिनका अर्थ है 'हे भगवन्! मैं 'प्राचार्य या गुरु । महाराज' को महान् आदरणीय, वन्दनीय मानकर, उनको साक्षी मान- कर मैं इस महान् व्रत को ग्रहण करता हूँ । प्राचार्य या गुरु जो । भगवत्तुल्य है, उनके प्रति इस प्रकार का भाव दीक्षा-साधक के विनय । भाव को प्रकट करता है। दीक्षा पाठ में एक पद 'पज्जुवासामि' प्रयुक्त हुआ है जिसका है अर्थ है (मैं) (आपकी) सेवा करता हूं। गृहस्थ भी गृहस्थ जीवन में रहते हुए सामायिक व्रत ग्रहण करने के पाठ में इस पद का उच्चारण न करते हैं । दीक्षार्थी मुनि दनकर अपने आचार्य या गुरु की सेवा भी कर सकते है परन्तु इस पद जो अर्थध्वनित होता है, वह आचार्य या गुरुजनों का अधिकाधिक सान्निध्य करना है अन्यथा गृहस्थ तो साधु- वर्ग की सेवा नहीं कर सकता । साधु मुनिराज भी गृहस्थ से सेवा नहीं करवाते । दीक्षार्थी और गृहस्थ दोनों संत-सान्निध्य का अधिका- धिक लाभ देकर ही जीवन को सार्थक बना सकते हैं । - न न . a. E १२ ० दीक्षा विशेष ४. प्रात्मनिन्दा और मालोचना-दीक्षा पाठ में 'तस्स भते ! घोसिरामि' पाठांश में इन मूल्यों का समावेश हुअा है । हम प्रायः प निन्दा में ही लगे रहते है, अपने अवगुणों का विचार कर कभी पार निन्दा नहीं करते । दीक्षा का इच्छुक साधकः दीक्षा ग्रहण करने पूर्वकाल के जीवन में हुए पापकृत्यों की उक्त पाठ बोलकर आलोच करता है, निन्दा करता है, गुरु की साक्षी से विशेष निन्दा करता है जो भी स्खलनाए' या त्रुटियां हुई हैं, उनकी निन्दा, पालोचना । प्रतिक्रमण करके पुन: अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर होता है और आर को पूर्वकृत पापों से विलग करता है । आत्मनिन्दा और आत्म-आलोचना ऐसे मूल्य है जिनसे जीन के आन्तरिक व बाह्य स्वरूप पवित्र बनते हैं और जीवन में विका सोपानों पर आत्मा आरुढ होती है । ५. पापरहितता या शुद्धता-दीक्षा का इच्छुक साधक हिंसा समस्त (१८) ही विषमभावों का परित्याग करने रूप व्रत ग्रहण कर है-'सव्वं सावज्ज जोगं पच्चक्खामि' का उच्चारण कर साधक समर पापों का त्याग करता है । इन विषमभावों का त्याग करके । 'समता भाव' रूप आजीवन ग्रहण की जाने वाली सामायिक का पाल संभव है। इन १८ ही पापों या विषमभावों में से एक भी यदि जीव में रहा तो दीक्षा की प्रतिज्ञा या समभाव की प्रतिज्ञा का पालन ना किया जा सकता। पाप का ही विपर्यय या विपरीत व्यवहार 'धर्म' है । इस अर्थ यह है कि जितने-जितने अशों में हिंसा (प्राणातिपात) आदि १ हो पापों का जीवन में त्याग होता जायगा, उतना ही उतना ध जीवन में समाता जायगा और सम्पूर्ण पापप्रवृत्तियों का त्याग करने प जीवन सम्पूर्णतः धर्ममय बन जायगा । इसीलिए दीक्षा के प्रतिज्ञा पा में 'सावज्जं जोगं पच्चनसामि' कहकर समस्त पापों या सावद्य योग के त्याग का कथन किया जाता है। इस प्रकार दीक्षा सुसंस्कारयुक्त जीवन है, जिसे धारण क मुनि स्वयं तो धर्ममार्ग में अग्रसर होते ही हैं वे लोककल्याणकारी उपदेशों और अपने सद्व्यवहारों से जन-जन का मार्गप्रदर्शन में करते हैं। H १० व २५ मार्च १९६२ १३ अतः जैन दीक्षा जीवन में में पापों से संघर्ष करते हुए धर्म- मार्ग में विजयी होने का महत्संकल्प है जो जीवन में सच्ची शांति की अनुभूति और प्राप्ति कराने में समर्थ है । --३५ अहिंसापुरी, फतहपुरा, उदयपुर-३१३००१ मुमुक्षु-मुक्त्तक A भी शशिकर [१] वाणी नानेश की आपको भा गई, जिन्दगी आपकी लक्ष्य को पा गई । हो गये हैं उदय कर्म शुभ आपके, मुक्ति ही लक्ष्य है अब हवा गा गई ।। [ २ ] लग रहा है मुझे तुम डगर पा गये, जंगलों को छोड़कर तुम नगर आ गये । बन के बादल उठे तुम यहां जलधि से, बहार आ जायेगी तुम अगर छा गये ।। [ ३ ] शुभ है दिन शुभ है वार,और है शुभ घड़ी, द्वार पर दर्शनों को भीड़ भी है खड़ी। वीर का पुण्य पथ मिल गया आपको, मन ही मन छूटती मेरे तो फुलझड़ी ।। [४] मुक्ति आपके चरण चूमने को आयेगी, त्याग से जिन्दगी भी संवर जायेगी। तप की ज्वाला में सच कर्म जल जायेंगे, जिन्दगी देखना रास अब आयेगी ।। [५] शान्ति के दूत बन आपको चलना है, फूल बन शूल में आपको सिलना है। इक अन्धेरा सिमट आंख में आ गया, ज्योति बन अन्धेरे में आपको जलना है। -विजयनगर (अजमेर) - आपको दिगम्बर परम्परा में दीक्षा और - दीक्षार्थी का स्वरूप A डॉ. उदयचन्द्र जैन भारत की प्राचीनतम परम्परा में श्रमण परम्परा का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसकी प्रारम्भिक नींव आदिपुरुष तीर्थकर ऋषभ- देव ने डाली थी। जैन एवं जैनेतर परम्परा में इसका उल्लेख है। ऋषभ के बाद अन्य तेवीस तीर्थंकरों की परम्परा भी इसी क्रम में आती है । अन्तिम तीर्थकर महावीर के बाद से अब तक यही परम्परा है । महावीर और बुद्ध की यह धरोहर विकसित होते-होते कई परि- वर्तनों को प्राप्त होती गई, पर- श्रमण के स्वरूप में, साधु के स्वरूप में/मुनि के स्वरूप में बाह्य परिवर्तन तो देखा जाता है, परन्तु आगम एवं सिद्धान्त में. श्रमण का/मुनि का स्वरूप नहीं बदला है । श्रमण, मुनि, साधु, अनगार, आर्य, अहीक, अकच्छ, अतिथि, अचेलक, ऋषि, यति, तपस्वी योगी, गणी, निर्ग्रन्थ, निग्गंठ, श्रवण आदि कई नाम है । वीतराग, संयत, भदंत एवं दान्त भी इसके नाम है । मनन-मात्र भावतया मुनिः । (समयसार वृत्ति १५१) चिरप्रवजितः साधुः । जो चिरकाल से प्रबजित होता है, वह साधु है । साध यदि णिच्चसुद्ध साहू स मुणी (द्रव्य संग्रह टीका (गा.) ५४) .. : मुनि विषयों की आकांक्षा. से रहित, आरम्भ रहित, अपरि- ग्रही एवं ज्ञान-ध्यान में रत होते हैं । वे पंचमहाव्रती, त्रिगुप्तियों से गुप्त, मूलोत्तर गुणों के पालक होते है । तत्त्व, पदार्थ, रत्नत्रय आदि का चिन्तन करना;जिनका लक्ष्य होता है । वे शुद्धात्मा की साधना को ही सर्वोपरि मानते है । दिगम्बर परम्परा में मुनि प्रवज्या से पूर्व ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, ऐलक के पद को धारण करने के बाद मुनि दीक्षा को ग्रहण करते है । इनमें से कोई भी दीक्षा ऐसी नही, जो विना आचार्य की आज्ञा के ग्रहण की जाती हो । प्रत्येक अवस्था में प्राचार्य एवं मुनि संघ के सम्मुख श्रावक-श्राविकाओं के बीच दीक्षार्थी क्रमणः याचना करता है, वैराग्यभाव को प्रकट करता है । फिर मुनि पालन करने योग्य गुणो ."

१५ ० १० व २५ मार्च १९६२ की आराधना करता है। वद-समिदिदियरोधो, लोंचावस्सयमचेलमण्हाणं । खिदि-सयणमदंत धोवणं; ठिदि-भोयणमेभगत्तं च ।।प्र.सा. २०८ अर्थात् पाच महाव्रत, पंच समिति, पंचेन्द्रिय · निरोध, केशलोंच, षड् आवश्यक, अचेलकतत्व, भूमिशयन, अदम्त धोवन, खड़े-खड़े भोजन एक गर आहार ये श्रमणो के २८ मूलगुण हैं । अर्थात् जो क्षुल्लक-ऐलक के बाद मुनि दीक्षा धारण करता है, उसे इन २८ मूल गुणों का पालन करना पड़ता है । उनकी आराधना करनी पड़ती है । प्रव्रज्या/दीक्षा- यह वैराग्य की ऐसी अवस्था है, जिसमें मुमुक्षु संसार की समस्त विषय-वासनाओं से मुक्त होकर अपने आत्म-स्वरूप का चिन्तन करता है, वह सोचता है कि मैं उत्तम गुरु की शरण में जाकर वाह्य परिग्रह. का त्याग कर दूं। उत्तम भावना के साथ ज्ञाता भाव धारण कर समत्व/समता/समभाव पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करूं । + पंचमहव्वयजुत्ता, पंचिदिय-संजाया णिरावेक्खा । सज्झाय-झाण-जुत्ता; मुणिवर-वसहा रिणइच्छति ।।बोध पा. ४३॥ पंचमहावत आदि से युक्त ध्यान श्रेष्ठ मुनि की विशेषता है। परन्तु दीक्षा/प्रव्रज्या वही मानी गई है जो गह से मुक्त, परिग्रह से रहित, बाईस परिषह को जीतने वाला, कषायजयी, पापारम्भ से परे है । जो धन-धान्य, वस्त्रादि के दान, सोना, चांदी, शय्या, आसन, रुपया, पैसा छत्र आदि से मुक्त की दीक्षा, दीक्षा है. । शत्रु-मित्र, प्रशंसा- : निन्दा, हानि-लाभ, तृण-सुवर्ण में जो समभाव रखता है, वह जिन । दीक्षा का अधिकारी है । (बो. पा. ४६।। आचार्य कुन्दकुन्द ने 'बोध-पाहुड' में प्रव्रज्या का विवेचन करते हुए निर्दिष्ट किया। : जो उत्तम, मध्यम घर में दरिद्र एवं धनवान में कोई भेद ते नही रखता । जो निर्ग्रन्थ, निर्ग्रन्थ, नि.संग, निर्भान, अरात, निर्दोष, झ निर्मम, निरहंकार है वही प्रव्रज्या, है । जात-रूपधरों धीरो जैनी दीक्षा- ३ मुपाददे । मः पु. २०१) णिणेहा; णिल्लोहा णिम्मोहा णिव्वियार णिक्कलुसा । णिभय-णिरासभावा पध्वज्जा एरिसा भणिया ।। वो. पा. ४६ ।।

१६ ० दीक्षा विशेषांक प्रव्रज्या कर्मक्षय का कारण है "कम्मक्खय-कारणे भणिया।" यह अवस्था में तिल-तुस-मास-का परिग्रह नहीं होता है । निर्जन स्थान पर ध्यान एवं आत्मा में निवास करना ही जिसका लक्ष्य होता है। तव-वय-गुणे हि सुद्धा संजम-सम्मत्त-गुणविसुद्धा य । सुद्धा गुणेहि सुद्धा, पव्वज्जा एरिसो भणिया ॥वो. पा. ५७।। तप, व्रत, गुणों से शुद्ध, संयम सम्यक्त्व और मूल गुणों से विशुद्ध, गुणों से शुद्ध जो है वह प्रव्रज्या के योग्य है । दीक्षा की पात्रता-दीक्षित होने वाला सिह के समान निर्भीक एवं शुभ भावना से युक्त होता है । वह षडावश्यक गुणों का पालन करने वाला होना चाहिए । श्रावकं या मुनि के लिए अपने · उपयोग की रक्षा करने हेतु नित्य ही छह आवश्यक करने योग्य माने गये हैं। 'सूलाचार' एवं 'नियमसार' में इसका विस्तार से विवेचन किया गया है। आवासं जइ इच्छसि अप्पसहावेसु कुणदि थिरभावं । (नि. १४७) आवश्यक की इच्छा करने वाला आत्म स्वभाव में स्थिरभाव को धारण करता है । 'भगवती आराधना' में जिसे नित्य प्रति किया जाए, वह आवश्यक है । १. सामायिक, २. स्तुति, . ३. वन्दना, ४. प्रतिक्रमण, ५. कायोत्सर्ग एवं ६. ध्यान । ये छह आवश्यक कर्म है। प्रव्रज्या घारी के लिए तत्त्वज्ञान होना आवश्यक है । दीक्षा के योग्य वही व्यक्ति मान्य है जो तप में समर्थ एवं दोषों से रहित हो तथा जो निरन्तर ही आवश्यक कर्म करता हो । दीक्षा की अनुमति-- प्रापच्छि-बंधुवग्गं,..विमोचिदो गुरु-कलत्त-पुत्तेहि । पासिज्जं णाण-दसण-चारित्त-तव-वीरियायारं ॥ समणं गणिं गुणड्ढ, कुल-रूव-वयो-विसिट्टमिट्ठदरं । समणेहिं तं पि पणदो पडिच्छ मं चेदि अणुगहिदो ।प्र. चा. २,३॥ अर्थात् जो मुनि होना चाहता है, वह सर्वप्रथम बन्धु वर्ग से पूछकर गुरु, स्त्री एवं पुत्र से छुटकारा प्राप्त करे फिर आचार के पांच गुणों को अंगीकार करे-ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और वीर्य का पालन करे । वह आचार्य के पास पहुंचे, गुणों की वृद्धि हेतु प्रमाण पूर्वक निवेदन करे । वह सोचे- १० व २५ मार्च १९६२ 'णाहं होमि परेसि, ण मे परे णत्यि मज्झमिह किंचि' प्र. चा. ८५|| । दूसरों की नहीं, दूसरे मेरे नहीं और न इस संसार में मेरा कुछ है । शिक्षा गुरु और निर्यावक गुरु ये दो गुरु संघस्थ होते है । दीक्षा गुरु वीन शिष्यो को दीक्षा देते है और निर्यावक गुरु संयम में स्थिर करते है । दीक्षा के लिए कुटुम्बीजनों से अनुमति अपेक्षित है । दगम्बर 'परम्परा में दीक्षानों के विविध रूप- १. क्षुल्लक--साधु का एक अंग । जो श्रावक की ग्यारह मिकाओं में से सर्वोत्कृष्ट भूमिका से युक्त होता है । वह एक लंगोटी एवं दुपट्टा रखता है । सित. कौपीन. संव्यान: 'सागर धर्मामृत' पं. आशाधर ने विस्तार से उल्लेख करते हुए लिखा कि~क्षुल्लक पतनापूर्वक गमन, यतना पूर्वक शयन, विशुद्ध आहार को ग्रहण करता है। अपने योग्य व्रतों का सदैव आचरण करता है । क्षुल्लक पात्र में का हाथ में भोजन ग्रहण कर सकता है । एक · बार भोजन करने का ही नियम है । (वसुनंदि भा. ३०३) "वसेन्मुनिवने नित्यं शुश्रूषेत गुरुश्चरेत्” (सा. ध. ७/४७), अर्थात् वह क्षुल्लक सदैव मुनि के आश्रम में रहे और धर्माचार्य की सेवा में रहे । वह तप के भेदों का आचरण करे इत्यादि क्षुल्लक की पहचान है । क्षुल्लक के लिए मयूर पिच्छ का निषेध है । क्षुल्लक केशलोंच कर सकता है या केश बनवा सकता है। क्षुल्लक के भी दो भेद है-एक गृहभोजी, अनेक गृहभोजी । साधक की अपेक्षा से कई भेद है-१. साधक क्षुल्लक, २. गूढ़ क्षुल्लक, ३. वारण प्रस्थआदि । २. ऐलक-ऐलक भी क्षुल्लक की तरह तप, आहार आदि को ग्रहण करता है । केवल भेद इतना है कि वह एक लंगोटी । मात्र को धारण करता है । स्वयं केशलोंच करता है, करवाता नहीं । ऐलक का आहार हाथ में शुद्धि पूर्वक ग्रहण करना है । थाली या किसी पात्र में नहीं । संयम की साधना के लिए मुनि की तरह पिच्छी भी रखता है 'सागर धर्मामृत', 'वसुनंदि श्रावकाचार', 'लाटी संहिता' में इसका उल्लेख एवं विस्तार से वर्णन है । ऐलक पुस्तक आदि धर्मोपदेश के कारणों को रखता है। वह मुनि की तरह कठोर से कठोर व्रत, · अभिग्रह आदि धारण कर विचरण करता है । वह निर्दोष एवं शांत स्थानों में ही म निवास करता है । ऐलक "इच्छाकारं समाचार मिथः सर्वे तु नुर्धरी ।" माप (सागार धर्मामृत ४६) परस्पर इच्छाकार-इच्छामि इजलागि ० दीक्षा है । - समाचार करता है ! 'तद्वद् द्वितीयः किन्त्वार्यसंज्ञो लुञ्चत्यसौ कचान् सा. ध. ४८) इनकी आर्यसज्ञा भी है । ३. मुनि-"णिव्वाण-साधए जोगे सदा जुजंति साधव (मूलाचार ५१२) जो सदैव निर्वाण की साधना में रत होते हैं साधु हैं । मनन मात्र आधार होने से मुनि है । इनके अनेक भेदई प्राचार्य, उपाध्याय और साधु ये तीन मुनि के भेद हैं। प्राचार्य के नायक होते हैं । जो दीक्षा देते हैं, मुनियों को प्रायश्चित्त आदि देते हैं । उपाध्याय सदैव मनन-चिन्तन करते हैं। स्वयं पढ़ते हैं दूसरों को पढ़ाते हैं । मुनि जो न शास्त्रों की व्याख्या करते शिष्यों को दीक्षा आदि देते हैं, अपितु जो सदैव कर्मो के क्षय के ज्ञान, ध्यान एवं तप आदि में रत रहते हैं । आचार्य, उपाध्याय, स्वी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ ये दश भेद वृत्य की अपेक्षा से हैं । पुलाक, वकुश, कुशील, निम्रन्थ और भी मुनि के भेद हैं । मुनियों में सम्यक्त्व की प्रधानता होती है । क्षुल्लक की तरह क्षुल्लिका भी होती हैं। उनके भी नियम हैं । आर्यिका मुनियों की तरह चर्या आदि करती है । वे वस्त्र, पिच्छी-कमंडलू धारण करती हैं, वे वार भोजन लेती हैं । २ मूल गुण आर्यिकाओं के भी कहे गए हैं । सम्यक् चारित्र के दो भेद है (१). सकल चारित्र और (२ विकल चारित्र । विकल चारित्र में क्षुल्लक, क्षुल्लिका, ऐलक आते और सकल चारित्र में मुनि, आर्यिकाए । 'तिलोयपण्णत्ति', "में आदि आर्यिकाओं का उल्लेख है । अतः श्रमण-परम्परा के दीक्षा की दीक्षा विधिवत् आचार्य द्वारा ही प्रदान की जाती है क्योकि स का उद्देश्य रत्नत्रय की आराधना करना है । -पिऊ कुंज, अरविन्दनगर, उदयपुर-३१३०० धर्म साधना में सहायक धम्म चरमाणस्स पंच निस्साठाया पण्णता, तंजहा-छक्का गणो, राया, गिहवई, सरोरं । धर्म का आचरण करने वाले साधु के लिए पांच नि (अलम्बन) कहे गये हैं । जैसे-१. पटकाय, २. गण (श्रमण संघ) ३. राजा, ४. गृहपति, ५. शरीर । -ठाणं अ. ५, उ. ३ सूत्र ४० .

सुसाहुणो गुरुणो - *hica श्री उदयलाल जारोली जे स्वरूप समज्यां बिना, पाम्यो दुख अनन्त । समजाण्यो ते पद नमू, श्री सद्गुरु भगवन्त ।। जिस स्वरूप के नहीं समझने से मैंने अनन्त दुःख पाया, हे भगवन्त ! वह आपने समझाया, अतः आपके पद को नमन हूं। 'सद्गुरु' में पंच-परमेष्ठि का समावेश है। राग-द्वेषादि के -अनन्त चतुष्टय में स्थित अरिहंत परमात्मा परम सद्गुरु होते । ही शेष अघाती कर्मों के निःशेष होने पर सिद्ध होते हैं । i, उपाध्याय और मुनि जो रत्न-त्रय के आराधक और वीतराग के राही, स्व-पर कल्याणकर्ता होते हैं, वे सद्गुरु की परिभाषा जाते हैं। 'सुसाहुणो गुरुपों' जो 'सुसाधु' हैं वे ही गुरु होते हैं । 'उत्तरा- सूत्र मे सुसाधु (बहुश्रुत, विनयी श्रमण) कुसाधु (अविनीत पाप- ') का विशद विवेचन किया गया है । समतादर्शी-इसके लक्षण हुए कहा है- लाभालाभे सुहेदुक्खे, जीविए मरणेतहा । समोनिदा पसंसासु, तहा माणावमारणओ ।। लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, जीवन-मरण, निंदा-प्रशंसा, मान- नि, हर्ष-शोक, अनुकूल-प्रतिकूल में भी वह समता रखता है। वह 'मेत्र से रहित, गृह-त्यागी, अप्रतिवद्ध, निस्पृह, नीरस एवं अल्प- , मन्द कषायी नियमित-संयमित होता है । उसे महिमा-पूजा की नहीं होती । वाहवाही या जय-जयकार मन से भी नहीं चाहता याति और वंदन मे हर्ष नहीं करता। कोई प्रशंसा करे, वन्दन करे भी हर्ष नहीं और कोई वन्दनादि नही या गाली दे तब भी व रखे । वह व्रती, तपी, संयतधारी, आत्मान्वेषी श्रमण महान् , rics साधु वही है जो अात्मजागृतिपूर्वक सतत आत्मा में, मोक्ष ना में, अप्रमत्त-भाव से लगा रहता है । ब्रह्मचारी-वह नववाड़ सहित ब्रह्मचर्य का पालन करता है। राध्ययन सूत्र' के १६ वें अध्ययन में ब्रह्मचर्य के दस समाधिस्थानों २० ० दीक्षा विशे (२) सि . . का वर्णन है:-(१) स्त्रियों से व्याप्त स्थान में न रहे, की मनोरम कथा, न करे, (३) परिचय न करे, (४). उनकी इनि को कामोत्तेजक भावों से न देखे, (५) उनके मीठे-शब्द, विलाप- हास्यादि, न देखे-सुने, (६) पूर्व-भोगे भोगों का स्मरण न करे, गरिप्ठ आहार न ले, (८) अधिक आहार न करे, (९) शरीर शं न करे, (१०) मनोज्ञ शब्द-रूप-रस-गंध-स्पर्श-दुर्जय कामभोगों में लि न. रखे । उसे चेतावनी दी गई है कि यदि कहीं भी-कभी भी लेश छूट लेता है तो संयम से गिर जाएगा, कुछ नहीं तो : संयमी के ! शंका खड़ी हो जाएगी अतः उसे अत्यन्त सावधान रहना है । न मुण्डिएरण समरणो-केवल वेष बदलने से श्रमण नही जाता । बंधे-बंधाए कुछ नियम पाल लेने से या सिर मुंडा लेने श्रमण नहीं हो जाता । समता से श्रमण होता है । आतमज्ञानी श्र कहावे,-बीजा.तो द्रव्यालगी रे....(आनंदघनजी) 'आत्मज्ञान त्यां मु पणू' (यात्म-सिद्धि) में भी स्पष्ट है कि आत्म-ज्ञान के बिना मुनि नहीं कहलाता है । 'उत्तराध्ययन सूत्र' में साधु के लिए प्रावधान है वह प्रतिदिन के २४ घण्टों में १२. घण्टे स्वाध्याय और -६ घण्टे ध्य ३ घण्टे आहार-विहार-निहार और ३ घण्टे निद्रा में बिताए । भावलिंगी-वास्तव, में भाव. ही प्रथम या मुख्य. लिंग है द्रव्यलिग परमार्थ नहीं है क्योंकि भाव को ही जिनदेव गुण-दो का कारण कहते है । भावों की विशुद्धि के लिए ही बाह्य-परिग्रह त्याग किया जाता है । जिसके भीतर परिग्रह की वासना है उस बाह्य त्याग निष्फल है । जो देह आदि की ममता से रहित है, आदि कपायों से मुक्त है तथा जो अपनी आत्मा में ही लीन है पर साधु भावलिगी है । (समणमुत्तम् ३६० से ३६३) शास्त्रों में वर्णन आता है कि हमने 'ओधे-पात्रों के मेरुप जितने ढेर लगा लिए, नव में प्रवैयक तक हो पाए फिर भी सं परिभ्रमण नहीं मिटा अर्थात् मूल को-आत्मस्वरूप को जिनेश्वर वंतों ने जैसा फरमाया वैसा जाना नहीं, माना नहीं। उसकी श्रद्धा-दृढ़ प्रतीति हुए बिना व्रत-महाव्रत, समिति-गुप्ति सभी निरर्थक जाते हैं । . 4 • १० व २५ मार्च १९६२ भावों की, आभ्यांतर-परिणामों की कितनी महत्ता है कि प्रसन्नचन्द्र राजर्षि बाह्य में तो महाव्रतों को अंगीकार किए हुए, समिति- गुप्ति का पालन करते हुए, परिषहों को झेलते हुए, ध्यानस्थ खड़े थे परन्तु भावों में पुत्र-मोह में व्याप्त भयंकर युद्धरत होकर सातवीं-नारकी के दलिक एकत्र कर रहे होते हैं और वही पुनः (मुडित सिर पर, मुकुट से वार करने हेतु, हाथ जाते ही भान आता है आत्मा का, मोह : ग्रंथि टूटती है और धर्मध्यान से शुक्लध्यान में प्रविष्ट हो केवलज्ञान- केवलदर्शन के धनी हो जाते है । निग्रन्थ-जिन्होंने ममता की ग्रंथि, परिग्रह में ममता का त्याग कर दिया हो, राग-द्वेष की गठों तोड़ दी हों, मोहरूपी ग्रथिं का छेदन कर दिया हो वे निम्रन्थ कहलाते हैं। वे खेत-वत्त्थु आदि १० प्रकार के बाह्य और हास्य, रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, स्त्री-पुरुष-नपु- सक वेदों-क्रोध, भान, मांया, लोभ और मिथ्यात्व ऐसे १४ आभ्यंतर परिग्रह के-ग्रन्थियों के त्यागी होते हैं । कहा है- बाह्य तेम. अभ्यंतरे, ग्रंथ - ग्रथि: नहि होय । परम पुरुष तेने कहो, सरल दृष्टि थी..जोय । बाह्य त्याग धर्म चक्षुओं से ज्ञात होता है, परन्तु आभ्यंतर परिग्रह त्याग का परीक्षण उनकी श्रद्धा, प्ररूपणा और स्पर्शना से हो सकता है । ज्ञान चक्षु से जांचा-देखा जा सकता है। वे निरन्तर अप्रमत्त अवस्था में रहना चाहते हैं जब. प्रवृत्ति बाह्य में हो तो ईर्या-भाषा-एषणादिः समिति और मन-वचन-काय गुप्ति का पालन करते हैं । 'ईर्या भाषा एषणा, ओलखजो आचार । सुगुणी साधु देखकर, वन्दो' बारम्बार ॥ मैं ऐसे सुसाधुओं को शत-शत; वन्दन करता हूं और कामना करता हूं कि अपूर्व अवसर क्यारे श्रावशे, क्यारे थईशु बाह्याभ्यांतर 'निर्ग्रन्थ जो । सर्व संबंधनु बंधन तीक्ष्ण छेदी ने, विचरशु कब महत् पुरुष ने पंथ 'जो ।। -जारोली भवन, विजय टॉकीज के सामने, नीमच (म.प्र.)

संस्कृत काव्य - दीक्षा 7 श्री रमेश मुनि शास्त्री [ उपाध्याय श्री पुष्करं मुनि जी के विद्वान् शिष्य ] शार्दूलविक्रीडितम् दीक्षेयं शिवदायिनी द्रुततरं, कौंध विध्वंसिनी लोकालोकसमस्तवस्तुविषया, ज्ञानस्य सम्पादिनी । नाना दुःख दवानलं शमयितु, कादम्बिनी संनिभा तत्दीक्षां सुतरां श्रयन्तु मनुजाः, वाञ्छन्ति सौख्यं यदि ।।१।। वैराग्याश्रित मानसाः प्रतिपलं, सध्यान निष्ठान्विताः श्रद्धाशील विशेष भाव भरिताः, 'संपूत चित्ताललयाः । सारासार विचारचारु चरिताः, सद्भाव संपूरिताः । चैवंभूत गुणान्विताः नरवराः, दीक्षा ग्रहीतु क्षमाः ॥२॥ दीक्षायाः महिमानमाकलयितु', नाहं. स्वयं शक्तिमान् पूर्ण पूरयितु जलं जलनिधेः, मर्यो घटे नो क्षमः । तस्याः गौरवमेव गातुमतुलं, लीनं मदीयं मनः प्राप्तं मुक्तिफलं तदीय मखिलें, ना गौरवं ज्ञायते ॥३॥ कोऽसौ सम्प्रति मानवो जलनिधेः, कृत्स्नं जलं पूर्णतः कस्मिश्चित् क्षमते घटे घटयितु, श्रेष्ठ प्रमाणान्विते । नागस्त्योऽपि स साम्प्रतं वकचिदपि, क्षमाया स्तले दृश्यते येनापायि पिपासयेव सकलं, तन्नीर मालोकय ॥४॥ किं प्राप्यं ? सुखमुत्तमं कुत इदं ? मोक्षात् स लभ्यं कथम् ? सद्ररत्नत्रय धारणाद्, इदमपि, क्षिप्रं कथं लम्यताम् । मिथ्यात्त्वस्य विवर्जनात् कमिदं ? श्रद्धान भावात् दृढ़ात् सोऽप्यन्हायकुतो भवेज् ? जिनपतेः, वाचां विचारा श्रयात् ।।५।। दीक्षाऽसीम सुखांवहा प्रतिपदं, सम्मान नादायि नी क्षिप्रं सर्वमनोरथांश्च सफलान्, कतुं प्रकामं क्षमा । सर्वेषामपि कर्मणामथचयं, ध्वंसं नयत्यञ्जसा तस्मादात्महितैपिमिर्भविजनैः, सा धार्यदां मुक्तिदा ॥६॥ ४ ० १० व २५ मार्च १९६२ वसन्ततिलका दीक्षाऽऽहती सुखयति क्षमया विशिष्ठा, दीक्षां श्रयन्ति मनुजा धुत मोह मायाः । किं दीक्षया न सुलभं सुधियां मुनीनाम्, तद्गृहयतां सपदि बान्धव वर्य दीक्षा ॥७॥ जन्मान्तरेषु विहितं बहु पुण्यकर्म, तप्तं तपश्च विविधं चिरमत्र येन । दीक्षां स एव लभते भवभीतिभीतः, कर्मारिचकृत पीडननाश दक्षाम् ॥८॥ दीक्षां विना न हि कदाचन मुक्ति लब्धिः, सर्वातिशायिपदवी जगदर्चनीया । सांसारिकञ्च विविधाभ्युदयादिकं वा, हेतु विना प्रभवतीह न कार्य सिद्धिः ॥६॥ उपजाति विरागशीलः प्रशम स्वभावः, सुधी जनोऽयं विनयी विवेकी । दीक्षां समासाद्य समेति मुक्तिम्, सोऽयं पुनीतः शिरसा प्रणम्यः ॥१०॥ समेत्य पार्श्व गुरु पुष्कराणाम्, शिक्षा मया लम्भि तदावबुद्धम् । शिक्षाऽऽद्य हेतु र्भवतीह दीक्षा, तत्कार्य मस्तीह न संशयः स्यात् ।।११।। अनुष्टुप दीक्षायाः गौरवं गातु, प्रवर्ते मन्दधी रहम् । साफल्यं सुलभं नास्ति, घटे किं माति सागरः ॥१२॥ शब्ददृष्टया दरिद्रोऽपि, बहूदारो भवाम्यहम् । तवर्णने परं चित्रं, श्रद्धया कि न जायते ।।१३।। चेतसा दीक्षितो नाहं, वपुपा केवलं ततः । भ्रमाम्यहं भवारण्ये, साम्प्रतं मम दुर्दशा ॥१४॥ . .

२४
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० दीक्षा विशेषांक
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अनादिकालतो जीवो, ग्रस्तोऽयं कर्म रोगतः ।
चिकित्सा तस्य दीक्षेयं, स्वस्थो जीवो भविष्यति ॥१५॥
महाव्रतैरियं जैनी, दीक्षा पञ्चमि रन्विता ।
रसायनं परं पुंसां, हृदि धार्य मिदं वचः ॥१६॥
दीक्षा शिक्षा विना व्यर्था, शिक्षा दीक्षां विना तथा ।
ज्योत्स्ना विना वृथा चन्द्रः, ज्योत्स्ना चन्द्रं विना यथा ॥१७॥
ज्वाला समा ध्रुवं दीक्षा, प्रदग्धु कर्म' यष्टिकाम् ।
भव्यात्मन् गृहयतां चेयं, शुभं शीघ्र विधीयते ।।१८।।
दीक्षा रत्नं परं दिव्यं, दीप्ति दीप्तं दिवानिशम् ।
ग्रहीतुमीयते योऽपि, विज्ञयः पुण्यवानयम् ॥१९॥
दीक्षाकार्य द्रुतं कार्य, महत्कार्य सदुत्तनम् ।
प्रमादो नैव कर्तव्यः, कालो नायाति निर्गतः ॥२०॥
दीक्षा सुधा सदा पेया, क्षीयेत कर्मणां विषम् ।
जायेत सुतरां शान्तिः, शाश्वतं च सुखं भवेत् ॥२१॥
मोहमद्यं ध्रुवं त्यक्तं, मनसा येन धीमता ।
दीक्षां लब्धु भवेद् योग्यः, समर्थः सर्वथा तथा ॥२२॥
दीक्षितः साधुतां- लब्ध्वा, साधुः साधुः स उत्तमः ।
दीक्षितोऽसाधुतां यातः, साधुः साधु ने गद्यते ।।२३।।
समयस्य कृते कार्य, कार्यस्यापि कृते स च ।
सततं येन दीयेत, स साधुः- सफलो भवेत् ।।२४।।
जीवेऽजीवेऽपि पार्थक्यं; दीक्षिते जीवने मया ।
संज्ञातं तत्त्वतो नूनं, स्वानुभूतिः स्वयं प्रमा ॥२५॥
विरागतो भया प्राप्ता, यदा दीक्षा पराहती।
प्रतीतिः स्वात्मनो जाता, सत्ता जीवस्य सर्वतः ॥२६॥
जन्मिनां जन्मतः साम्यं, समेषां विद्यते ध्रुवम् ।
पुनर्जन्म भवेत् दीक्षा, भूमिका मुक्ति सद्मनः ॥२७॥
विश्व समस्ति सग्राहयं, श्रद्धया यदि केवलम् ।
श्रेयसी विद्यते दीक्षा, चेतसा गृहयतां ततः ॥२८॥

१०१ २५ मार्च १९६२ - - मुमुक्ष लभते दीक्षां, पर शिक्षां शिवास्पदाम् । शिक्षया भेद विज्ञान, दीक्षया कर्मणां क्षयः ॥२६॥ . समं या शिक्षया दीक्षा, लभ्यते गुरु सन्निधौ । सा दीक्षा वस्तुतो दीक्षा, ज्ञातव्या मुक्ति साधिका ॥३०॥ प्रयाताः यान्ति यास्यन्ति, तत्प्रशस्तं शिवास्पदम् । निधाय अदया दीक्षां, परां भन्या: विरागतः ॥३१॥ दीक्षां सुधां परां पातु, भो भव्य ! क्रियतांश्रमः । श्रमोऽसौ निष्फलो नास्ति, मुक्ति प्राप्ति यतो भवेत् ॥३२॥ दीक्षा द्रव्यं परं द्रन्यं, यत्पार्वे विद्यते ध्रुवम् ! महीयान् धनवान् चैव, तन्नित्यं धनभक्षयम् ॥३३॥ दीक्षानेत्रं परं दिन्यं, चर्मनेत्रं विनश्वरम् । तदिव्यं लभ्यते पुसा, तत्कर्म धीयते ध्रुवम् ॥३४॥ . कल्पलतां परां दीक्षां, फलं- लब्ध्वा प्रसीदति । ततो मुक्ति पदं प्राप्य, दुःखमुक्ति भवेत् द्रुतम् ।।३५।।. दीक्षा ज्योतिः परं ज्योतिः, परं ज्योतिः प्रकाशयेत् । अज्ञानं ध्वान्त संकाशं, निहन्तु, क्षमते ध्र वम् ॥३६॥ . दीक्षा शक्तिः परा शक्तिः, सक्ति या क्षयतां नयेत् । . विरक्ति भावनां भव्यां, पुष्टि नेतु क्षमाऽनिशम् ॥३७॥ दीक्षया-क्षीयते क्षिप्रं, कर्मणां संचयो ध्र वम् । शिक्षया वधते ज्ञान, निदानं मुक्ति वर्त्मनः ॥३८।। भो जन ! भोजनं ज्ञेयं, शरीरस्य शरीरिणाम् । किन्तु भन्यात्मनो नूनं, दीक्षयं भोजनं परम् ॥३६॥ समत्वं वर्धते भूयो, ममत्वं हीयते तथा । " दीक्षया लम्यते मोक्षः, तद्गौरवं ततः स्फुटम् ॥४०॥. केचित् वदन्ति काठिन्यं, दीक्षायां नास्तिका..जनाः । तन्न चारु यतस्तन्तु, सर्वकार्येषु दृश्यते ।।४।। प्रारम्भ एव कार्याणां, प्राक् काटिन्य प्रतीयते । तदभ्यासे तु सन्जाते, प्रलयस्तस्य जायते ।।४२।। h २६ ० दीक्षा नितान्तं कण्टकाकीणं, दीक्ष्य दीक्षायन त्वया । मनागपि न भेतव्यं, 'सदृष्टि निर्भयो मतः ॥४३॥ दीक्षा ध्र वं परं द्वीपः, पयोधि दुस्तरो भवः । श्रद्धया प्राणिभि हिया, भक्त्या भग्वैरियं ततः ॥४४॥ कर्मचक्रं परं रोद्ध, दीक्षयं साधनं ध्रुवम् । तन्ना समेति यो भन्यो, मुक्ति माप्नोति सोऽञ्जसा ।।४।। दीक्षालता परं रम्या, प्रशस्ता भाव भूमिका । शिक्षाबीजं फलं मोक्षः, जीवः समेति संयमी ।।४६।। संश्रुतं नाम पीयूषं, कृते यत्ने सहस्रशः । नो प्राप्त किन्तु दीक्षायां, तल्लन्धं पुग्यतो मया ॥४७।। पवित्रं वस्तु लोकेऽस्मिन्, सूक्ष्म दृष्टया विचार्यताम् । दीक्षेयं केवलं पूता, संज्ञाता चिन्तने मया ॥४॥ यथा माता शिशुप्रेम्णा, नित्यं रक्षति दुःखतः । तथात्मानं ध्रुवं दीक्षा, त्रायते भवरोगतः ॥४६।। दीक्षा मन्त्रो महान् मन्त्रः कौघं गरलं परम् । निहन्तु क्षमते क्षिप्रं, स्वस्थो जीवो भविष्यति ॥५०॥ आरम्भ एव दीक्षायाः, मनाक काठिन्यमीक्ष्यते । परं गुरुप देशेन, तन्नाशः सम्प्रजायते ॥५१॥ काठिन्या यस्य भीतिः स्यात्, स किं कार्य करिष्यति । भोजनेऽपि तदस्त्येव, तत् कि तन्न् विधीयते ॥५२॥ अज्ञाने तिमिरे घोरे, दीक्षयं दीपिका यतः । दीप्तिमान् जायते जीबः, सुखं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥५३॥ कायरथं समारुहय, शीघ्र मिन्द्रियवाजिनः । दीक्षया रश्मिना भव्य, स्वीय-वश्यान् कुरु स्वतः ॥५४॥ भो जीव ! सारथिन् शीघ्र', मनोरूपं तुरंगमम् । दीक्षया वल्गया वश्यं, कुरुष्व हित भावतः ।।५।। गरिष्ठो ज्ञानतः सम्यग्, वरिष्ठः क्रियया परम् । विशिष्टो दृष्टितो योऽच, दीक्षादाता गुरु महान् ॥५६॥ - ० १० व २५ मार्च १९९२ २७ 1 पालनेऽतीव माधुर्य, दीक्षायाः भव्य जन्मिनाम् । तन्माधुर्य परं वेत्ति, यो जनो दीक्षितः सुधी ॥५७।। अलौकिकं परं पुष्पं, दीक्षयं विद्यते ध्र वम् । भक्त्या समेति यो मर्त्यः, तज्जीवनं सुवासितम् ॥५८।। भव्य ते जीवनं दिव्यं, मन्दिरं जीव मूर्तिकम् । दीक्षयं कलशो रम्यो, देहोऽय तस्य भूमिका ।।५।। न कारणं विना कार्य, यथा सत्यमिदं वचः । तथा दीक्षा विना मोक्ष., भव्य पुसा न लभ्यते ॥६०।। यो जीवो विषये रक्तः, लिप्यते पापलेपतः । स प्रयातु कथं शक्तः, दीक्षायाः मगलेऽयने ॥६१।। असीममस्ति वैराग्यं, प्राणियो यस्य मानसे । दीक्षां क्षिप्रं परं प्राप्तु, प्रयत्नं कुरुते पुमान् ॥६२।। योद्धारं रक्षितु वर्म, युक्षेत्रे यथा क्षमम् । तथा दीक्षार्थिनं दीक्षा, कर्मणा क्षपणे विभुः ॥६३।। यथानलं विना स्वर्ण, निर्मलं नैव जायते । दीक्षामृते तथा जीवः, समेति नहि सिद्धतांम् ।।६४।। विषया विष संकाशः, सुखं तेषु न संभवम् । परं तत्र सुखाभासः, दीक्षायां वास्तवं सुखम् ।।६।। दीक्षया ज्ञायते भिन्नः, शरीरी स्वशरीरतः । अक्षयः प्रथमो ज्ञेयो, द्वितीयः क्षण भङ्ग रम् ।।६६।। क्षिप्रं पाशं दृढ़ तीक्ष्णा, घिनत्ति धुरिका यथा । तथा भिनत्ति जीवोऽयं, दीक्षया कर्मबन्धनम् ॥६७।। वस्तु भोत्तु निरीहस्य, न स्पृहा मात्रतः क्कचित् । तुष्टि. पुष्टी रसास्वादः, जायन्ते प्राण धारिणः ॥६८।। दीक्षच्छा मात्रतस्तद्वत्, पुसो मोक्षो न जायते । भविष्यति कथं कार्य, हेतोः स्मरण मात्रतः ॥६६।। (युग्म)॥६६।। यो भव्यो भावतो दीक्षां, समेति सुतरां यदि । असौ सद्यः स्वय सिद्धः, निरारेक मिदं वचः ॥७०।।

२८ ० दीक्षा विशेषांव जीवस्य जगतो रूपं, नित्यमेव विचारयन् । दीक्षायाः योग्यतामेति, जीवोऽयं शिववाञ्छकः ॥७१।। मत्पावें यदि दात्रस्या, न्नो वा हानि न संभवेत् । दीक्षायाः पात्रतामीहे, नित्यं श्रद्धा पुरस्सरम् ॥७२॥ दीक्षा प्रकाशतो भव्यो, मोह ध्वान्तं मनोगतम् । अपाकर्तु क्षमः क्षिप्रं, सूर्यो नैशं तमो. यथा ॥७३॥ उपजाति दीक्षा सुधेयं सुतरां सुखानाम्, परं निधानं शिववर्त्म दीप्तिः । भव्यो जनो यो लभते हितांताम्, नमोऽस्तुतस्मै मनसात्रिवानम् । ७४॥ दीक्षा-महत्त्वं मनसा विमृश्य, शिम्यो लघीयान् गुरु पुष्कराणाम् । मुनी रमेशो रचनां चकार, गुरु प्रसादाकिम साध्यमस्ति ॥७॥ -द्वारा-गौतमचन्द आंचलिया, खेतरपाली चबूतरा, जूनी धानमंडी, जोधपुर-३४२००१ कुंडली A सौभाग्यमल जैन, वकील आदत वृत्ति स्वभाव का, नित्य रहा सम्बन्ध, मानस शास्त्री बता रहे, न समझ सके मतिमंद । पड़ी आदत नहीं जाय, ये उक्ति बनी यथार्थ, दुनिया में तुम देख लो, हो रहा इससे अनर्थ । अनर्थ इससे ही हो रहा, चोर शराबी धूर्त, ठग लम्पट कपटी यहां, लूटे विना मुहूर्त । कहे सौभाग्य कपिराय, है नापत में अनुषन्य, आदत वृत्ति स्वभाव का, नित्य रहा सम्बन्ध ।

जैन दीक्षा, क्या ? क्यों ? व कैसे ? - A श्री जशकरण डागों जैन संस्कृति संयम प्रधान है । ज्ञानियों ने लोक का सार भी संयम कहा है । 'आचारांग नियुक्ति' गा. २४४ की टीका में कहा है- "लोगस्स सारं धम्मो, धम्मं पिय नाण सारियं विति । नाणं संजमं सारं, संजम सार च निव्वाणं ।।" अर्थात् समग्न लोक का सार धर्म, धर्म का सार आत्म ज्ञान, आत्म ज्ञान का सार संयम और संयम का सार निर्वाण है । संयम साधन है तो निर्वाण साध्य । इनकी प्राप्ति की प्रक्रिया का नाम ही जैन दीक्षा है । 'दीक्षा' शब्द 'दीक्ष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है धर्म संस्कारों से संस्कारित कर प्रात्मा को संयम की ओर अग्रसर करना । कवि की भाषा में- "दीक्षा अशुभ का बहिष्कार है, दीक्षा शुभ का संस्कार है । दीक्षा शुद्धत्व का स्वीकार है, दीक्षा स्व का स्व में संस्कार है।" यह 'दीक्षा' विभिन्न धर्मों में, विभिन्न प्रकार से वर्णित है । किन्तु आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण की दृष्टि से जिनेश्वर भगव- न्तों द्वारा प्ररूपित जैन दीक्षा का स्वरूप इन सबसे निराला और अपने आप में विशिष्ट व महत्त्वपूर्ण है । जैन दीक्षा 'आत्मवत् सर्व भूतेषु' के मंगलमय आदर्श को क्रियान्वित करती है । जैन दीक्षा का ही दूसरा नाम 'भागवती दीक्षा' है, जिसका अर्थ है, भगवद् स्वरूप प्राप्ति की विशिष्ट लोकोत्तर साधना की ग्रहण विधि । दीक्षार्थी का चरम और परम लक्ष्य होता है-जन से जिम, नर से नारायण और आत्मा से परमात्मा होना । इसीलिए उसका प्रथम लक्ष्य आत्म कल्याण व तदनन्तर लोक कल्याण का होता है। प्रत्येक आत्मार्थी के लिए दीक्षा ग्रहण आवश्यक है, कारण बिना दीक्षा ग्रहण के कोई भी आत्मा मोक्ष प्राप्त नही कर सकता । जैन दीक्षा मुमुक्षुओं के लिए सर्वोत्तम मोक्ष मार्ग रूप है, अनुत्तर है । इसका स्वरूप सर्वथा निर्दोष, शुद्ध एवं व्यावहारिक होने से, समग्न लोक के प्राणियों के लिए यह आदरणीय है । यह जैन दीक्षा मुख्यतः दो प्रकार से प्ररूपित की गई है- ) द्रव्य दीक्षा-कनक, कामिनी का त्याग कर केश लोंच कर, मुनि लिंग धारण कर व्यवहार में मुनि-मर्यादाओं की पालना करना । जैसे समस्त सावद्य एवं पापकारी प्रवृत्तियां, अठारह पाप व .

। ३० • दीक्षा विशेषांक में द्रव्य परिग्रह (संयम हेतु वस्त्र, पात्र, पुस्तकें मर्यादित रख शेप)1 का सर्वथा त्याग करना, पंच महाव्रतों को तीन करण, तीन योग से धारण करना, तथा समिति, गुप्ति व अन्य थमण चर्या सम्बन्धी नियमों की पालना करना । (२) भाव दीक्षा-केश मुडन के अतिरिक्त भाव से नव प्रकार का मुंडन (पांच इन्द्रियों व चार कषायों का) स्वीकारना । दर्शनत्रिक तथा कषाय चतुष्कत्रिक का (संचलन कषाय छोड़) त्याग करना । गृहस्थ सम्बन्धी मोह माया का त्यागी महात्मा बनता है। वह भावपूर्वक दीक्षा ग्रहण कर प्रायः सातवे छ8 गुणस्थान भूलता है । वह अप्रमत्त आत्म चिन्तन में या समत्व भावों में रमण करता है । उसके जीवन में ज्ञान, ध्यान, जप, तप, स्वाध्याय, आत्म-चिन्तन और सतत आत्म-साधना की प्रधानता रहती है । वह निन्दा, विकथा, राग-द्वेष आदि कर्मवर्धक प्रवृत्तियों से दूर रहता है । वह दुनियां मे रहकर भी दुनियादारी से दूर, संवर-निर्जरा की साधना में सतत रत रहता है। उपर्युक्त प्रकार से द्रव्य एवं भाव दोनों से, सद्गुरु के चरणो में प्रतिज्ञावद्ध हो यावज्जीवन के लिए तीन करण, तीन योग से संयमी जीवन ग्रहण करना जैन (भागवती) दीक्षा है । मात्र द्रव्य से या बिना द्रव्य के भाव से गृहित दीक्षा, जिनशासन में उसी प्रकार से मान्य नहीं है, जैसे विना मोहर का सिक्का या मोहर लगा खोटे द्रव्य का सिक्का । आगमकार कहते हैं- "न विमुण्डिएण समणो, न ओंकारेण बंभणो । न मुणी रज्जवासेणं, कुस, चीरेण न तावसो ॥" अर्थात् केवल केश मुंडन से कोई श्रमण नहीं होता, मोम का जाप करने से कोई ब्राह्मण नहीं होता, अरण्य में रहने से कोई मुनि १. साधु के लिए बहत्तर व साध्वी के लिए छिनवे हाथ वस्त्र तथा चार पात्र रखने की मर्यादा है । -भगवती श. २५, उ. ६ व वृहदकल्प नूत्र ३३ तथा व्यवहार चूम उ. २ व दशवै. अ. ४ । २: समण सुत्तं-मोक्ष-मार्ग गा. ५ .

० १० व २५ मार्च १९६२ ३१ १ नहीं होता और कुश-चीवर धारण करने से कोई तपस्वी नहीं होता है । इसी प्रकार से बिना द्रव्य लिंग के, भाव योग्यता होने पर भी व्यवहार मे वह मुनि रूप में मान्य नही होता है। निश्चय दृष्टि से वास्तव में श्रमण, ब्राह्मण, मुनि और तपस्वी कौन होते हैं ? समा- धान मे कहा है- "समयाए समणो होइ, वंभचेरेण बंभणो.। नाणेण मुणी होइ, तवेण होई लावसो।।"1 अर्थात् समता से श्रमण, ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण, आत्मज्ञान से मुनि और तप से तपस्वी होता है। अतः व्यवहार एवं निश्चय , अपेक्षा से द्रव्य एवं भाव दोनों से ग्रहित दीक्षा ही सर्वमान्य एवं जिनशासन में प्रामाणिक कही है । बिना भाव के ग्रहित दीक्षा ग्रहणकर्ता के लिए कठोर, कष्टदायक और दुःख पूर्ण होती है जबकि भावपूर्वक ग्रहित वही दीक्षा ग्रहणकर्ता के लिए नन्दनवन और कामधेनु गाय के प्रदत्त सुखों से भी विशेष आनन्द और शान्ति प्रदान करने वाली होती है । शास्त्रकार फरमाते हैं कि ग्रहित, दीक्षा का विशुद्ध भावो से एक माह तक पालन करने पर साधक वाणव्यन्तरों के सुखों का, दो माह तक पालन करने पर भवनपति - (असुरेन्द्र को छोड़) के सुखों का, तीन माह तक पालन करने पर असुर कुमार के सुखों का यावत् बारह माह तक पालन करने पर अनुत्तर-विमान के देवों के सुखों का उल्लंघन कर जाता है अर्थात् उनसे भी अधिक सुखों का अनुभव करने लगता है । जैन दीक्षा के सम्बन्ध में मुनि श्री चौथमलजी का यह कथन विशेष चिन्तनीय है- "जैन दीक्षा हकीकत में, जीवन निर्माण का मार्ग है । जैन दीक्षा सचमुच, आत्मानुसंधान का मार्ग है,।। मोम के दांतो से, लोहे के चने चबाना है, दोस्तो ! दरअसल जैन दीक्षा, त्याग और बलिदान का मार्ग है ।।" १. समण सुत्तं-मोक्षमार्ग गा. ६ २. भगवती सूत्र, १४/६ के आधार से ।

३२ • दीक्षा विशेष । 4 . - जैन दीक्षा क्यों ? जैन दीक्षा का मुख्य आधार वैराग्य है । वैरागी ही की ओर अग्रसर होता है। जिसने संसार की निःसारता, और जन्म-मरण, जरा-रोग के दु:खों को गहराई से समझ लिया है ऐसी मुमुक्ष आत्मा संसार को कारागृह समझ शम, संवेग और निर्व भाव से विषय भोगों से विरक्त हो, वैराग्य दशा को प्राप्त होता है ऐसे वैरागी आदर्श होते हैं । वैसे सामान्यतः यह वैराग्य दशा भी तो. प्रकार से उपलब्ध होती है- (१) दुःख गर्भित वैराग्य-अशुभ कर्मोदय से . किसी प्र।' का दुःखदायक,संकट आने पर संसार से विरक्त हो, कुटुम्ब आदि त्याग किया जावे । यह जघन्य वैराग्य है । (२) मोह गभित वैराग्य-इष्ट धन, जन आदि के हो जाने पर मोह वश साधु-संन्यासी हो जाना । यह मोहगर्भित वैरा 'ग्य होता है । इसे माध्यम वैराग्य कहा है । (३) ज्ञान गभित वैराग्य-पूर्व संस्कार या सद्गुरु, के उप देश अथवा सत्संग से आत्मज्ञान होने पर विरति भाव प्रगट होने असार संसार का द्रव्य और भावपूर्वक त्याग कर देना । यह ज्ञान र्गा वैराग्य है जिसे उत्कृष्ट वैराग्य कहा है । शास्त्रकारों ने दीक्षा का कारण वैराग्य की उत्पत्ति के में दस निमित्त बताए हैं, जो निम्न प्रकार हैं- १. छन्द प्रव्रज्या-स्वेच्छा या दूसरों की प्रेरणा से । जैसे गोविन वाचक नेली। २. रोज-रोष से दीक्षा ग्रहण करना, शिवभूति के समान । ३. परिघुना-निर्धनता से दीक्षा लेना । जैसे आचार्य सुहस्त्ति के एक भूखे भिखारी ने दीक्षा ली। ४. स्वप्ना-स्वप्न दर्शन से दीक्षा लेना । जैसे पुष्प चूला व पुष्प , ने स्वप्न में देवी बनी मां के द्वारा उद्बोधन देने पर ली। ५. प्रतिश्रुता-पूर्व प्रतिज्ञा से दीक्षा ग्रहण करना, धनाजी के ममान ! Train zा, १० १० व २५ मार्च १९६२ . स्मरण-पूर्व जन्म के स्मरण होने से दीक्षा लेना, मल्ली भगवती के समान । रोग-रोग से पीड़ित हो दीक्षा लेना, चक्रवर्ती सनत्कुमार के समान । अनादर-अपमानित होने से दीक्षा लेना, नन्दीसेण के समान । देव संज्ञप्ति-देव द्वारा प्रतिबोध से दीक्षा लेना, मैतार्य के समान । वत्सानुबन्धिका-दीक्षित होते पुत्रादि के स्नेह से दीक्षा लेना । जैसे सुनन्दा ने अपने पुत्र वज्र के कारण ली। न दीक्षा ग्रहण का उद्देश्य : जैन दीक्षा ग्रहण का कारण उसका मुख्य उद्देश्य प्राप्त करना. जैन दीक्षा का मुख्य उद्देश्य है-आत्मा से महात्मा हो, सर्वकर्म नाय कर परमात्मा होना । सिद्ध, बुद्ध, मुक्त, निरंजन, निराकार होना। स हेतु दीक्षार्थी को यावज्जीवन के लिए सतत सवर-निर्जरा की साधना अपनाना होती है । संवर निर्जरा क्या है ? आ. उमास्वाति कहा-"प्राश्रव निरोधः संवरः" तथा "तपस्च निर्जरा ।"1 अर्थात् नाव निरोध सवर और तपश्चर्या निर्जरा है । दीक्षार्थी को सतावन कार से संवर तथा बारह प्रकार से निर्जरा की जो निम्न प्रकार है- म्यग् आराधना व पालना करनी होती है । वर के सतावन प्रकार- (१-५) पांच समिति का धारण (६-८) तीन गुप्ति का लन, (६-१८) दस यति धर्म का आराधन (१९-३०) वारह भावना का चितन (३१-५२) बावीस परिषहों का सहन और (५३-५७) गांचे प्रकार के चारित्र का निर्वहन सदा तत्परता से करना । निर्जरा के बारह प्रकार- अनशन आदि ६ बाह्य तप तथा प्रायश्चित आदि ६ आभ्य- तर तप की सम्यंग आराधना व पालना करना । संवर निर्जरा की सतत अराधना व पालना से दीक्षार्थी का जीवन सरल, शुद्ध और पावन हो जाता है । उसकी कथनी-करनी एक- रूप हो जाती है, जो महात्मा होने की पहिचान है । कहा है- "मन- स्येक, वचस्येक, कायस्येकं महात्मा नाम ।" -- १. तत्त्वार्थ सूत्र अ ८ ३४ ० दीक्षा विशे जैन दीक्षा कैसे ? जैन दीक्षा कैसे होती है इसे समझने हेतु यहां पर संक्षेप दीक्षा-विधि, दीक्षा के लिए पात्रता-अपात्रता, उपयुक्त द्रव्य, क्षेत्र, काल भाद आदि पर प्रकाश डाला जाता है । दीक्षा विधि-दीक्षार्थी, दीक्षा हेतु धर्माचार्य या धर्म गुरु सम्मुख धर्म सभा में उपस्थित हो, दीक्षा से पूर्व के जीवन की आलोच कर आत्म-शुद्धि करता है । सर्वप्रथम दीक्षार्थी को, दीक्षा दाता द्वा नवकार मंत्र का पाठ श्रवण कराया जाकर उसे देव, गुरु को वन करने के लिए निर्देशित किया जाता है। फिर 'इरिया वहिया' पाठ के उच्चारण कर गमनागमन में जो भी जीवों की विराधना हो, उसकी आलोयणा की जाती है । तत्पश्चात् 'तस्स उत्तरी' का प उच्चारण कर, आत्मा को विशुद्ध एवं शल्य रहित बनाया जाता है इसके पश्चात् 'लोगस्स' का पाठ (चौबीस तीर्थकरों की स्तुति) : ध्यान में एकाग्रता से चिन्तन किया जाता है । ध्यान पूर्ण कर प्रगट ध्यानावस्था में कोई अशुभ ध्यान (रौद्र या आर्त) का चिन्तन हुआ हो, तो उसका पश्चाताप मिच्छामि दुक्कडं देकर किया जाना हे तत्पश्चात् प्रगट रूप से एक बगर लोग स्स का पाठ बोला जाता है इसके बाद दीक्षार्थी दीक्षादाता को सविधि वन्दन कर दीक्षा ग्रह कराने का निवेदन करता है । इस पर दीक्षादाता, दीक्षार्थी परिवार से, समाज के संघाध्यक्ष, मंत्री व आवश्यक हो तो सरपच, नग पालिका अध्यक्ष, नगर प्रमुख आदि से भी उन्हें आह्वान कर दीक्ष देने की आजा लेते हैं । सबकी तरफ से स्वीकृति मिलने पर (जिस वाद किसी प्रकार का विवाद या अशान्ति न हो) दीक्षादाता सव सम्मुख 'करेमि भंते' का पाठ उच्चारण कर दीक्षार्थी को यावज्जीवा के लिए तीन करण, तीन योग से दीक्षा प्रदान करते हैं। दीक्षार्थ 'करेमि भंते' प्रतिज्ञा पाठ का अनुमोदन 'अप्पारणं वोसिरामि' शब्द प्रगट रूप में बोलकर करता है और सब प्रकार की सावद्य प्रवृत्तिय एवं पापों से सर्वथा नदेव के लिए निवृत्त होने की दृढ़ प्रतिज्ञा करता है । इसके बाद में दीक्षा पाठ को श्रवण व ग्रहण कर दीक्षार्थी दीक्षा गुरु को पुन: वन्दन करता है जो उम्के विनय धर्म का मूनक है । इस प्रकार दीक्षा ग्रहण कर दीक्षार्थी 'ननोत्थुगां' के पाठ में दो बार बोल- • १० व २५ माच १९६२ ३५ - कर) सिद्ध अरिहन्तों की स्तुति करता है । दीक्षा के लिए पात्रता- नीति में कहा है कि "शिष्यं न शिष्या, न कुशिष्य शिष्या" अर्थात् विना शिष्य के रहना ठीक है,किन्तु कुशिष्य को शिष्य बनाना उचित नही है । कारण वह स्वयं को, गुरु को और समाज को भी असमाधि और अशान्ति का कारण बन जाता है । अतः दीक्षा उसी को दी जानी चाहिए जो पात्र हो और दीक्षा के लिए समुचित योग्यता रखता हो । स्व. पू. आचार्य श्री हस्तीमल जी म. सा. के शब्दों में "प्रथम शिक्षा, फिर परीक्षा, बाद में दीक्षा और तब भिक्षा योग्य होता है ।" इस हेतु निम्न बातें अवलोकनीय है- (i) वय-दीक्षार्थी की आयु कम से कम आठ वर्ष व अधि- कतम वृद्धावस्था मे भी साठ-सत्तर वर्ष की आयु तक-जब तक शरीर साधना हेतु सक्षम होने, दीक्षा दी जा सकती है । (1) दीक्षार्थी की प्रकृत्ति-वह संसार से विरक्त हो और शम, संवेग, निर्वेद, आस्था एवं अनुकम्पा-इन पांच विशिष्ट आध्या- त्मिक लक्षणों से उसका जीवन सुशोभित हो । (iii) सद्गुण सम्पन्न-दीक्षार्थी का जीवन व्यसन रहित और सद्गुणों से सम्पन्न हो । ये सद्गुण मुख्यतः सोलह बताए हैं जो इस प्रकार है-1 (१) आर्य देशोत्पन्न (२) जाति कुल सम्पन्न (३) क्षीण प्राय. अशुभ कर्मा (जिसके दीक्षा में बाधक अशुभ कर्म क्षीण हो गए हो), (४) विशुद्ध बुद्धि वाला, (५) विज्ञात संसार नैर्गुण्य (संसार की निःसारता जानली हो), (६) विरक्त, (७) मंद कलायी, (८) मंद नो कषायी (8) कृतज्ञ (१०) विनीत (११) राज सम्मत (राज्य विरोधी न हो), (१२) अद्रोही (१३) सुन्दराग (अंगपूर्ण व स्वस्थ हो) (१४) धर्म श्रद्धावान (१५) स्थिर वृत्ति (१६) समुप सम्पन्न (तीव्र इच्छा दीक्षा की हो) । (iv) दीक्षा के लिए अयोग्य- (१) बालक (आठ वर्ष से कम आयु का) (२) वृद्ध (शरीर १. धर्म संग्रह ग्रन्थ से । --- ३६ ० दीक्षा विशेष से आसमर्थ हो गया हो) (३) नपुंसक (जन्म से) (४) क (पुरुष आकृति होकर भी चेष्टाए स्त्री जैसी हाव भाव, कामुकता हो) (५) जड़ (वाणी व शरीर से संयम पालने के अयोग्य व्याधिनस्त (असाध्य रोगी), (७) स्तेन (चोरी करने की आदत हं (८) राजापकारी (६) उन्मत्त (१०) दृष्टि विहीन (११) (हीन कलोत्पन्न) (१२) दुष्ट (१३) मूढ़ (१४) ऋणी (१५) जु (कसाई मच्छीमार आदि होन संस्कार वाला या कोढ़ी, कुबड़ा, हीन) (१६) अनबद्ध (जो किसी से धन लेकर निश्चित अवधि लिए पराधीन बन गया हो) (१७) भृतक (वेतन लेकर किसी यहां गुलामी करता हो और मालिक दीक्षा की आजा न दे) (१८) निस्फेटिका (बिना माता पितादि पारिवारिकजनों की स्वीकृति भागकर पाया हो या भगाकर लाया गया हो )। उपर्युक्त अठारह प्रकार के पुरुष दीक्षा के अयोग्य कहे । स्त्रियों के लिए इन अठारह के अतिरिक्त दो कारण और भी हैं-एक गम वती हो व हमारा छोटे शिशु को स्तन पान कराने वाली हो । (v) दीक्षा के लिए व्यवहार शुद्धि दीक्षा ग्रहण करते पान प्रकार की शुद्धि का व्यवहार होता है, जो निम्न प्रकार है- (१) प्रश्न शुद्धि-दीक्षार्थी से दीक्षादाता पूछे तू कौन है कहां से आया है ? माता-पिता का नाम क्या है ? उनकी आज्ञा . ली है क्या ? धार्मिक ज्ञान, ध्यान व साधना क्या कर रखी है । दीक्षा के दायित्व को समझता है ? इत्यादि । कदाचित् दीक्षार्थी प्रश्न का उत्तर ठीक या सन्तोषप्रद न दे, तो अधिक छानबीन करनी चाहि तथा निमित्त शास्त्र आदि से भी दीक्षार्थी की परीक्षा करनी चाहिए (२) काल शुद्धि -दीक्षा के लिए शुभ मुहूर्त देखे, जि.. कोई असमाधि न हो । वैसे दीक्षा के लिए उत्तरासाढ़, उत्तरा मा उत्तरा फागुनी व रोहिणी-ये चार नक्षत्र उत्तम बताए गए है । ६. पक्षो की चौथ, छठ, अष्टमी, नवमी, बारस व पूर्णिमा, अमावसति वजित हैं। (३) क्षेत्र शुद्धि-ईख की बाड़ का स्थान, डांगर का खेत, 1 . १. आत्म तत्त्व विचार से ।

• १० व २५ मार्च १९६२ ३७ सरोवर का स्थान, बगीचा, उपवन आदि रमणीय, साताकारी व प्रासुक स्थान होवे [तथा संभव हो तो दीक्षा किसी वट, आम्र या अशोक वक्ष के नीचे दी जावे] । (४) दिशा शुद्धि-पूर्व या उत्तर दिशाभिमुख या गुरु सम्मुख दीक्षार्थी खड़ा होकर दीक्षा ग्रहण करे । (५) वन्दना शुद्धि-देव, गुरु को सविधि वन्दना, दीक्षा लेने .से पूर्व करके दीक्षा की आज्ञा लेवे । जैन दीक्षा सम्बन्धी जिज्ञासाएं-जैन दीक्षा के सम्बन्ध में, प्रायः केश लोच और पाद विहार क्यों ? इन दो विषयों पर शंका उठाई जाती है । इनका समाधान इस प्रकार है- (i) केश लोंच के सम्बन्ध में-केश लोच दीक्षार्थी के लिए आवश्यक कर्म है । जिसके चार कारण प्रमुख है1--(१) सर्वथा अप- रिग्रही जीवन के लिए-क्षौर कर्म बिना पैसे दिए दूसरे से कैसे करावे (२) केश कटाने हेतु पैसा किसी से मांगे तो दीनता दोष तथा मुनि- व्रत भंग होवे (३) केश लोच न करे तो जू लीक आदि पैदा होवे (४) कैची, उस्तरा आदि रखे तो संग्रह दोष लगे जिससे अपरिग्रही कैसे रहे ? इसके अतिरिक्त केश लोच इन्द्रिय-निग्रह की एक सशक्त साधना है । इससे सहज कर्म निर्जरा भी होती है । (ii) पाद विहार के सम्बन्ध में-पाद विहार के मुख्य ६ कारण इस प्रकार है- (१) जीवों की यतना-जो मुनि के लिए आवश्यक है । (इस कारण से जूते भी नहीं पहिनते (२) ग्राम-२ में धर्म जागरणा (३) स्वावलम्बी जीवन (४) अप्रमत्ततता (५) इन्द्रिय-संयम (६) 'परिषह सहन से कर्म-निर्जरा । जैन दीक्षा का महत्त्व : (१) दीक्षा से पापी का भी उद्धार-शास्त्रकार कहते हैं- "अपवित्र पवित्र स्याद दासी विवशता भजेत । मूों लभेत ज्ञानानि, मुक्षु दीक्षा प्रसादतः ।।" अर्थात् दीक्षा के प्रभाव से पापी पावन, सेवक जग स्वामी और मूर्ख २. धर्मामृत (अणगार) अ. ६, गा. ९७ ० दीक्षा विशेषांक हैं भी ज्ञानी हो जाता है। (२) दीक्षा से प्राश्रव का सिन्धु, बिन्दु रह जाता है-बिना संयम (त्याग-प्रत्याख्यान के, समग्र विश्व के समग्र जीवों और अजीव पदार्थो की, निरन्तर लगने वाली महाक्रिया रूप सिन्धु के पापाश्रव रूवी जल से, सभी अवती आत्माएं, निरन्तर भारी होती रहती है, किन्तु दीक्षा (संयम) ग्रहण करते ही आत्मा इस महा क्रियाश्रव से निवृत्त हो जाती है और मात्र बिन्दुवत क्रिया योगादि निमित्त से उतना, शेष रह जाती है। (३) शोध मुक्ति-दीक्षार्थी आत्माए जघन्य उसी भव और अधिक से अधिक ७-८ भव में मोक्ष को उपलब्ध हो जाती है। (४) बिना दीक्षा ज्ञान और तप का महत्त्व नहीं-ज्ञानी फरमाते हैं- "नाण चरित्र हीण, लिंग ग्रहण य दंसण-विहीण । संजम हीण च तव जो चरइ, निरत्थ य तस्स ।।"1 अर्थात् विना दोक्षा ( संयम चारित्र ) के ज्ञान और तप तथा बिना सम्यग् दर्शन के मुनि लिंग व्यर्थ हैं । (५) दीक्षा का दान से भी अधिक फल-महादानी भी एक दोक्षार्थी (संयमी) के समान नहीं होता । शास्त्रकार फरमाते हैं- "जो सहस्सं सहस्सारणं, मासे मासे गवं दए । तस्सावि संजमो से ओ, अदितस्स वि किंचरण ||" अर्थात् दस लाख गायों का दान प्रति मास देने वाले से भी, एक संयमी (दीक्षा ग्रहण कर्ता) जो कुछ भी नहीं देता अधिक श्रेष्ठ होता है । (६) अनुत्ततर सुख की उपलब्धि-दीक्षा धारक को जो दिव्य सुख की उपलब्धि होती है, उसके आगे देवलोक के ही नहीं, समग्न लोक के लौकिक सुख भी तुच्छ हैं । उपसंहार-वर्तमान स्थिति- यह निर्विवाद सत्य है कि जैन दीक्षा और जैन श्रमणों का स्थान, संसार में सदा से गौरव पूर्ण और सर्वोत्तम रहा है । किन्तु बढ़ते भौतिकवाद की ललक एवं सम्प्रदायवाद के दुष्प्रभाव से, आज जैन दीक्षा और जैन श्रमणों की महिमा-गरिमा घटने लगी है 1 द्रव्य १. श्रमण सूत्र । २. उत्तरा. अ. ६, गा. ४० ।

० १० व २५ मार्च १९६२ ३६ दृष्टि से तो जैन दीक्षाओं में पूर्वापेक्षा अभिवृद्धि हो रही है, सामूहिक दीक्षाएं भी खूब होने लगी है कित्तु भाव लिंग अपेक्षा शुद्ध संयम के पालन करने वाले मुमुक्ष गण अत्यल्प होते जा रहे हैं। आगमों में वर्णित पंच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति, पंचाचार, श्रमणों के सत्तावीस गुण आदि की धारणा व पूर्ण पालना उपेक्षित होती जा रही है । जिन आज्ञानुसार, दीक्षा की पालना गौण होती जा रही है, और जनरंजन, जनप्रियता के लिए लौकिक क्रिया काण्ड और प्रदर्शन खूब किए जा रहे है । अपने यश कीर्ति, वन्दन, पूजन को बढ़ावा दिया जा रहा है । अपनी-२ सम्प्रदाय में अधिकाधिक दीक्षाए हों, इस हेतु विना दीक्षार्थी की योग्यता व परीक्षा की जांच किए, प्रायः जल्दी में दीक्षा दे दी जाती है, जिसके परिणाम कभी-२ अच्छे नहीं होते हैं । आग आगमवेत्ता और तदनुसार संयम पालन करने वालों की संख्या घटती जा रही है । गुण पूजा के स्थान पर व्यक्ति पूजा हावी होती जा रही है जो जिनशासन की एकता व समुज्ज्वल भविष्य के लिए अवरोधक है। अतः आज जैन दीक्षा के स्वरूप और महत्त्व को आगमानु- (सार समझकर, भविष्य में तदनुसार दीक्षाओ का विधान किया जाना चाहिए । दीक्षार्थियों को भी पूरी तरह योग्य साधक बनाकर 'प्रथम शिक्षा, फिर परीक्षा और बाद में दीक्षा' इस आदर्श विधान पर अमल करके ही जब दीक्षार्थियों की योग्यता व पात्रता मे कोई संदेह न रहे, तव ही दीक्षा दी जानी चाहिए । इसी में दीक्षार्थियों का, दीक्षादाता गुरुप्रो का तथा जिनशासन का मंगल निहित है । - डागा सदन, संघपुरा, टोंक (राज) ३०४००१ - शिक्षा प्राप्त न होने के पांच कारण अह पंचहि ठाणेहि, जेहि सिक्खा न लब्भई । थम्भा कोहा पमाएणं, रोगेणालस्सएण य ॥ पांच स्थानों (हेतुओ से शिक्षा प्राप्त नहीं होती- : (१) मान, (२) क्रोध, (३) प्रमाद, (४) रोग, एवं (५) आलस्य । --उत्तरा. अ. ११, गा. ३ H जैनागमों में दीक्षा का स्वरूप A पं. कन्हैयालाल दक भारतीय संस्कृति मे 'दीक्षा' शब्द बहुत प्राचीन है और इसका अर्थ किसी विशेष प्रकार के संस्कारों से जीवन को संस्कारित करना है, । प्राचीनकाल में जब हमारे देश में आश्रम-परम्परा व गुरुकुल- परम्परा प्रचलित थी तव प्रायः ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था कि अमुक ने अमुक गुरु के पास जाकर दीक्षा ली-अर्थात् अपने नये शैक्षणिक जीवन का प्रारम्भ किया, या यों कहे कि 'दीक्षा' शब्द 'शिक्षा का ही पर्यायवाची है । जैन दर्शन में 'दीक्षा' शब्द बहुत गम्भीर तथा व्यापक अर्थ में लिया जाता है । जैन परम्परा में दीक्षा लेने का अर्थ है,-गृह-त्याग, कंचन-कामिनी का त्याग, सभी सांसारिक सम्बन्धों का विच्छेद, पांच महाव्रतों का निष्ठापूर्वक पालन, पांच समिति तथा तीन गुप्ति का पालन, पाद-विहार, परीषहों के प्रति आत्म-समर्पण रात्रि- भोज़न व पान को जीवन-पर्यन्त त्याग, केशलोच, भिक्षा-वृत्ति के द्वार जीवन-यापन तथा श्रम-प्रधान जीवन । इस प्रकार की दीक्षा अंगीकार करके साधक अहर्निश वैराग्यमय जीवन व्यतीत करता है तथा सतत आत्म-साधना में तल्लीन रहता है, अपनी आत्मा को परमात्म स्वरूप में विलीन करने के लिये सदा सचेष्ट रहता है । स्वाध्याय तथा ध्यान दीक्षित साधक के मुख्य अंग बन जाते हैं,.दीक्षा लेते ही पहिले के जीवन में और वर्तमान जीवन में जमीन-आसमान जैसा अन्तर स्पष्ट दृष्टि- गोचर होने लग जाता है । दीक्षा क्यों? संसार में जन्म लेने के पश्चात् प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी के सम्पर्क में अवश्य आता है । माता-पिताओं से प्राप्त संस्कार, गुरु- जनों की सत्संगति और समाज के सैकड़ों व्यक्तियों के जीवन-दर्शन से किसी विवेकवान् आत्मा को जीवन की असारता का बोध होने लगता है, लक्ष्मी की चंचलता, जीवन की क्षणभगुरता, रोगी की रुग्णदशा, विधवा का विलाप, माता-पिता या किसी अत्यन्त प्रिय व्यक्ति का वियोग अथवा स्वयं का विवेक जागृत होना, ऐसे स्वाभाविक कारण हैं कि संसार से उपरति हो जाती है और वह विरक्त-आत्मा संसार से उदासीन सा १० व २५ मार्च १९६२ ४१ हो जाता है और शाश्वत-सुख की प्राप्ति के लिए कृतसंकल्प हो उठता । वैराग्य के अकुर परिस्फुटित हो जाते है जो त्याग वैराग्यमय तावरण प्राप्त करके पल्लवित व विकसित होते है और दीक्षा के रूप परिणत हो जाते हैं। क्षार्थी की पात्रता दीक्षा लेना हर साधारण व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं है । भी माता, पिता, पत्नी या पुत्र की आज्ञा इसमें बाधक हो जाती है ो कभी अपना मनोबल स्वयं कमजोर हो जाता है तो मनुष्य चाहते ए भी दीक्षा अंगीकार नहीं कर सकता है । स्वस्थ व नीरोग शरीर झोना दीक्षा के लिये परमावश्यक है और दृढ़संकल्प शक्ति ही मनुष्य को अपने गन्तव्य स्थान की ओर ले जाने में सहायक होती है । इन बि बातों पर संक्षिप्त विचार कर लेने के पश्चात् हमें यह देखना है के शास्त्रीय दृष्टि से दीक्षा लेने वाले व्यक्ति के जीवन मे किन गुणों का होना आवश्यक है ? 'धर्म संग्रह' नामक ग्रन्थ मे दीक्षार्थी में निम्न- लेखित सोलह गुणों का पाया जाना आवश्यक माना गया है- १. आर्य देशोत्पन्न व्यक्ति 'दीक्षा के लिये सुयोग्य होता है । २. जिसका मातृपक्ष और पितृपक्ष शुद्ध हो अर्थात् खान-पान तथा आचार-विचार शुद्ध हो । ३. जिसके चारित्र के वाधक दोष नष्ट प्रायः हो गये हों । ४. जिसकी बुद्धि निर्मल हो, जिससे वह धर्मतत्त्व को समझ कर हृदयं गम कर सके। ५. जिसने ससार के स्वरूप का सम्यक् प्रकार से अध्ययन कर लिया है और जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का इच्छुक हो । ६. जो सांसारिक वासनाओ से उदासीन हो गया हो । ७. जिसके क्रोध, मान, माया और लोभ रूप कषाय मन्द हो गये हों। ८. जिसके हास्य, रति आदि नोकषाय अत्यन्त अल्प हों, जो गम्भीर स्वभाव वाला हो । हास्यदि नोकषाय ही कपायो को उत्तेजित करते हैं । और ये कषाय ही संसार के कारण है । 8. जो कृतज्ञ हो । कृतघ्न 'व्यक्ति 'दीक्षा के लिये अयोग्य शेता है १०. जो स्वभाव से नम्र तथा विनीत हो । नियोजनाच, मूल है। - ४२ • दीक्षा विशेष मनु 1 17 ११. गज-सम्मत-जो राजा, मंत्री आदि :शासन व्यवस्था के हो । या जो चोरी, बेईमानी आदि अपराधों से राजा से द.. न हो। १२. अद्रोही-जो कलहशील न हो, ठग, धूर्त और कपटी न हो । १३. जो सुन्दर अंग अवयव वाला हो, नीरोग हो । अपंग या विक लांग दीक्षा के योग्य नहीं होता । १४. जो धर्म के प्रति हृदय से श्रद्धा का भाव रखता हो तथा त५ सार आचरण करता हो । १५. दीक्षा के प्रति स्थिर विचार वाला हो, ऐसा न हो कि द. स्वीकार करने के पश्चात् विचारों की अस्थिरता तथा ' सि. कमजोरी के कारण दीक्षा का त्याग कर दें। १६. सम्यग्दर्शन ज्ञान तथा चारित्र का सच्चा आराधक हो तथा स्व" से दीक्षा लेने के लिये गुरु के समीप आया हो । यहां संक्षेप से दीक्षार्थी के १६ गुणों का वर्णन किया है । गुण तो उपलक्ष्य मात्र हैं । वास्तव में जैन दीक्षा जीवन को परिवर्तित करने की एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रक्रिया है, कोई नही । दीक्षादाता गुरु जिस दीक्षार्थी को दीक्षा देने जा रहे है, उसे दीक्षार्थी को सब प्रकार की कसौटियां पर अवश्य कसना चाहिये । जैन दीक्षा का एक शब्द में सार है-यतना अथवा विवेक । प्राणी जब तक ससार में है, चलता है, फिरता है, खाता है, सोता है, सभी आवश्यक क्रियाएं करता है और उसे कम या ज्यादा मात्रा कर्म-बन्धन होता रहता है, फिर दीक्षित व्यक्ति कर्म-बन्धन से मुक्त कैसे हो ? इस प्रश्न का उत्तर 'दशवैकालिकसूत्र' की निम्न गाथा में दिया गया है- जयंचरे, जयंचिट्ठ, जयंमासे जयंसए । जयं भुजंतो भासंतो, पावकम्मं न बंधई ।। अर्थात्-प्रतिक्षण व प्रत्येक स्थान पर यतना से उपर्युक्त सब क्रियाए करता हुआ भी साधक पाप-कर्मों से लिप्त नहीं होता। 'सूत्र- कृतांग सूत्र' की निम्न पंक्तियों को गुरु के द्वारा श्रवण करके दीक्षार्थी साधक निरन्तर चिन्तन करें- "बुज्झिज्जत्ति तिउटिज्जा बंधणं परिजाणिया ।" में १० व २५ मार्च १९६२ ४३ अर्थात्-कर्मवन्धन के ५ कारण है--मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, कषाय और योग । इन कारणों को आगमों के द्वारा या गुरु मुख से नानले और जानकर कर्मबन्ध के कारणों को नष्ट करे और संसार से 'मुक्त हो जाय । हमें यह जान लेना चाहिये कि जैन धर्म पुरुषार्ष प्रधान धर्म है। यहां कोई व्यवस्था ईश्वर कृत नही है। सारी व्यवस्थाएं एक मात्र आत्मा के अधीन है । आत्मा ही कर्मो का कर्ता है, वही भोक्ता है और वही परिनिर्वाता भी है । परिनिर्वाण का अर्थ है-मोक्ष । यह मोक्ष ही दीक्षार्थी का एकमात्र लक्ष्य है-साध्य है । और सम्यग्दर्शन, 'सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् चारित्र ये तीनों उसके प्राप्त करने के पवित्र व निर्दोष साधन है । इन साधनों की जितनी निर्मल साधना होगी, साधक के लिये मोक्ष उतना ही निकट होगा। जैन शास्त्रों में इन्हें 'रत्नत्रय' की संज्ञा दी गई है। दीक्षार्थी साधक को चाहिये कि वह अपनी आत्मा को अपना सच्चा मित्र समझे । 'आचारांगसूत्र' की इस सूक्ति को सदा ध्यान मे रखे कि-"पुरिसा ! तुमं चेव तुमं मित्तं, कि 'बहिया मित्तमिच्छसि" अर्थात्-हे पुरुष ! (आत्मा) तुम्ही तुम्हारे मित्र हो, अन्य बाह्य मित्रों की इच्छा क्यों करते हो ? संसार में जैन दर्शन ही एक ऐसा दर्शन है, जो आत्मा की इतनी उत्कृष्ट सत्ता को स्वीकार करता हो । दीक्षा विधि- पूर्व में दीक्षा लेने का संक्षिप्त अर्थ बतलाते हुए जिन बिन्दुओं की ओर संकेत किया था, उनका आवश्यक विवेचन करना बहुत जरूरी है, अत: दीक्षा की विधि पर प्रकाश डालना और उन बिन्दुओं का विश्लेषण करना प्रासंगिक है । दीक्षा का उम्मीदवार दीक्षा के लिये पूर्ण रूप से तैयार हो जावे, इतने मात्र से दीक्षा नहीं दे दी जाती । दीक्षार्थी के माता, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, पत्नी या पुत्र इनमें से जहां जो आवश्यक हो, उसकी लिखित रूप में आना प्राप्त होना अत्यन्त आवश्यक है । इसके बिना कई प्रकार के विवाद उपस्थित हो सकते हैं और सामाजिक वातावरण भी कलुषित हो सकता है, इसलिये परिवार के सदस्यो का आना-पत्र प्राप्त होना दीक्षा का अन्तिम अंग है । दीक्षा की तिथि तथा मुहूर्त - ४८ ० दीक्षा विशे करेगा। - और स्थान निश्चित हो जाने के बाद दीक्षार्थी दीक्षा योग्य वस्त्रों धारण करके उपस्थित जनसमुदाय के समक्ष उपस्थित होता अपने दीक्षा-दाता गुरु या आचार्य के समक्ष कर-बद्ध अंजलि जोड़ प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव ! मुझे दीक्षा देकर कृतार्थ कीजि तत्पश्चात् गुरु उसे योग्य शिष्य समझ कर 'करेमि भंते' के पाठ दीक्षा का पाठ विधिपूर्वक जनसमुदाय को साक्षी रखकर सुनाते इसका अर्थ यह है कि आज से और इसी क्षण से दीक्षार्थी यावर्ज के सावध कार्यो का त्याग करने की प्रतिज्ञा ग्रहण करता है । वह ज भर पांच महावतों को धारण करेगा, जिनका स्वरूप निम्न प्रकार १. यावज्जीवन किसी प्राणी की न हिसा करेगा, न दूसरों से करवा और न हिसा करने वाले का मनसा, वाचा, कर्मणा अनुमोदन २. यावज्जीवन न असत्य भाषण करेगा, न दूसरों से करवाएगा न असत्य भाषण करने वाले का अनुमोदन ही करेगा, मन, एवं काया से । ३. यावज्जीवन किसी की वस्तु विना अनुमति के लेगा नही, न ६ से लिवाएगा और न दूसरे लेते हुओं का अनुमोदन ही करेगा, वचन और काया से । फिर चोरी का तो प्रश्न ही कहां उठता ४. यावज्जीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करेगा। न किसी .. स्त्री सेवन करेगा, न दूसरों से वैसा करवाएगा और न स्त्री-सेवन : वाले की कभी अनुमोदना करेगा, मन, वचन तथा काया से । ५. यावज्जीवन अपने धर्मोपकरण के अतिरिक्त किसी वस्तु का न.. रखेगा, न दूसरों से परिग्रह रखवाएगा और न परिग्रह रखने । का अनुमोदन ही करेगा । यहां परिग्रह का अर्थ मूर्छा या ul. से. है । उपर्युक्त पांचो व्रतों का ग्रहण करना अत्यन्त कठिन है, . ग्रहण करके उनका यथेष्ट रूप से पालन करना तो तलवार की । पर चलने के समान महान् दुष्कर है । इसके अतिरिक्त दीक्षित न्य रात्रि भोजन का आजीवन त्याग करता है । जैन दीक्षा में पी साधु भोजन तो ठीक, पानी अथवा किसी पेय पदार्थ का भी रात्रि उपयोग नहीं कर सकता है, न रात्रि में मरणासन्न स्थिति होने पर ० १० व २५ मार्च १९६२ ४५ -औषधि का सेवन कर सकता है । इसे अशन, पान, खाद्य तथा स्वास पदार्थो का त्याग कहा जाता है । ये साधु के मूल गुण है । इसके साथ ही निर्दोषभिक्षा. गृहस्थों के यहां से मांग कर जीवन-निर्वाह करना दीक्षित के लिये आवश्यक होता है । पांच समिति तथा तीन गुप्ति के पालन करने का अर्थ है, चलना-लेकिन विवेकपूर्वक चलना, बोलना-लेकिन विवेकपूर्वक बोलना, :-आहार-पानी ग्रहण करना-लेकिन उसमें भी विवेक परमावश्यक है। -अपनी संयम सामग्री (वस्त्र, पात्र, शास्त्र तथा अन्य उपकरण) भी विवेकपूर्वक लेना तथा रखना । उच्चार (टट्टी) पेशाब, कफ, नाक का मैल आदि पदार्थो का परिष्ठापन भी अत्यन्त विवेकपूर्वक करना । जिससे किसी त्रस प्राणी की हिसा न हो। मन गुप्ति का अर्थ है, मन को वश में करना । मन बहुत चंचल है, इसे वश में रखना महान् योगियो के लिये भी कठिन है। वचन गुप्ति का अर्थ है, वचन को वश में रखना या यथा- सम्भव मौन धारण करना । काय गुप्ति का अर्थ है, काया को वश मे रखना अथवा शरीर के अंग अवयवों का भी निरर्थक संकोच-प्रसारण न करना, जिससे किसी प्राणी की विराधना हो । दीक्षित व्यक्ति को यावज्जीवन पाद-विहार करना अनिवार्य । होता है। दीक्षित व्यक्ति को यावज्जीवन एक वर्ष में दो बार अपने केश 1 का लोच करना आवश्यक होता है । दीक्षित व्यक्ति को शीत, उष्ण, भूख, प्यास, देशमशक (मच्छर) २ नग्नता, अरति, स्त्री, निषधा, आक्रोश, वय, याचना, लाभ, अलाभ, प्रज्ञा, अज्ञान, सत्कार, पुरस्कार आदि २२ परीषहो के उपस्थित होने पर अप्रमत्त भाव से समभाव पूर्वक सहन करना आवश्यक होता है । । यहीं उसको साधुता की सच्ची परीक्षा है कि परीषहों के उपस्थित होने : पर भी वह शूरवीर योद्धा की तरह संयम पालन से विचलित न हो, बल्कि 'आचारांग सूत्र' की इस सूक्ति का अनुचिन्तन करे.--"खणं जाणाहि पंडिए" पंडित पुरुष अवसर को पहचाने । वह इस बात का चिन्तन करे कि यह शरीर तथा संसार के सब पदार्थ क्षणभंगुर । न म Know ४६ ० दीक्षा विशेषां कालिक सूत्र के संयम शाश्वत सत्य की प्राप्ति का अमोघ साधन है, इसलिये मेरे संय पालन में कोई दोप न लगे । ये सब दीक्षित व्यक्ति के उत्तर गुण है इस प्रकार साधु के मूल तथा उत्तर गुणों का वर्णन करने पश्चात् यह भी जानना आवश्यक है कि दीक्षा का वय-सम्बन्धी के प्रतिबन्ध नहीं है । बाल-वय में अथवा युवावस्था में तो दीक्षा ली जा सकती है, किसी विरक्तात्मा को यदि वृद्धावस्था में भी संसार वैराग्य हो जाय और अपनी पिछली आयु में भी संसार का त्याग के दीक्षित हो जावे तब भी वह अपनी भावना के अनुसार उत्तमग का या देवगति का अधिकारी होता है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख आगमो मे अहिंसा, संयम, तप, रूप, धर्म इस प्रकार से अत्यन्त संक्षिप्त में जैन दीक्षा की विधि प्रकाश डाला । अब यह बताना जरूरी है कि जिस धर्म के प्रति र पित होकर दीक्षार्थी दीक्षित हो रहा है, वह धर्म कैसा है ? दश प्रथम अध्ययन की प्रथम गाथा में कहा गया है- धम्मो मंगलमुक्ति, अहिंसा संजमोतवो । देवा वि तं नमसंति, जस्स धम्मे सयामणो । अर्थात्-अहिंसा, संयम तथा तप रूप धर्म ही उत्कृष्ट रूप होता है । अहिंसा तथा संयम का वर्णन ऊपर कर दिया गया १२. प्रकार के तप में से जैसा भी तप दीक्षित व्यक्ति कर सके, क चाहिये । शास्त्रों में कहा गया है कि-'भवकोडिसंचियं, कम्म, त विणिज्जरिज्जइ" अर्थात्-करोड़ों भवों के संचित कर्म भी' एकर तपस्या से नष्ट कर दिये जा सकते है । इसलिये दीक्षार्थी को र ऊणोदरी, स्वाध्याय, ध्यान आदि तप का भी सहारा अवश्य लेना चा। इस प्रकार से दीक्षा अगीकार करके जो निर्दोष रूप से उर पालना करता है, उसे मानव तो क्या देवता भी उसके समक्ष मस्तक होते हैं । इस पवित्र अवसर पर हम भी उन सब चरित्रात्माओं वन्दन करते हैं, जिन्होंने सब प्रकार की भौतिक वासनाओं को कर जैन भागवती-दीक्षा अंगीकार की है । हमारी यही है कि ये भव्य आत्माए' अपने इष्ट मनोरथ की सिद्धि में सदा स हो । शत-शत वन्दन ! -२५३ सैक्टर ३, हिरण मगरी, उदयपुर-३१३० मं ★ अभिनन्दन है ! O श्री 'खटका राजस्थानी [ १ ] संयम के पथ पर चलने का, तुमने भाव संजोया है, सच पूछो तो आप सभी ने, बीज पुण्य का बोया है । जान लिया है इस जीवन को, तुमने बहती धारा है । संयम की पतवार हाथ तो, फिर क्या दूर किनारा है ।। संयम से जग नन्दन है। शत शत शत अभिनन्दन है ।। [ २ ] नश्वर मान सभी भोगों को, तुमने ठोकर मारी, नत मस्तक है आज आपके, आगे दुनियां सारी । मुस्का करके मोह माया को, तुमने पीछे छोड़ दिया, मुक्ति को पाने के खातिर, जग से बन्धन तोड़ दिया ।। अब टूठे सब बन्धन है । शत शत शत अभिनन्दन है ।। [ ३ ] मन बगिया नानेश गुरु पा, आज यहां हर्षाई है, वीतराग का पथ है पावन, पा करके मुस्काई है । वैराग्य भाव अपनाने खातिर, तज डाला शृंगार को, तुमको चन्दन करना है, अब जीवन में अंगार को ।। दूर हुआ सब क्रन्दन है। शत शत शत अभिनन्दन है ।। [ ४ ] त्याग तपस्या करके तुमको, नव इतिहास बनाना है, फूल मिले चाहे शूल मिले, बस आगे बढ़ते जाना है। सत्य अहिसा दया प्रेम का, निर्भर नित्य बहाना है, भेद-भाव की दीवारों को, 'शशिकर' सदा ढहाना है ।। मुमुक्षु आपको वन्दन है। शत शत शत अभिनन्दन है । --कवि कुटीर, विजयनगर-अजमेर (राज.)

समता दर्शन गीत
.श्री सुरेन्द्र
[ १ ]
समतामय होगा. परिवेश,
आगे तभी बढ़ेगा देश,
घर-घर गूजे यह संदेश ।
जय-जय-जय गुरु जय नानेश,
जय-जय-जय गुरु जय नानेश,
जय-जय-जय गुरु जय नानेश ।।
[ २. ]
हिन्दू मुस्लिम सारे सुन लें,
सिख इसाई सारे गुन ले,
चाहे नर हो या हो नारी,
गृहस्थ सुने, सुनलें ब्रह्मचारी ।
ऊंच-नीच का नाम नहीं है,
भेद-भाव का काम नहीं है ।।
गुरुवर कहते बात विशेष,
समतामय होगा परिवेश ।
.
।'
[ ३. ]
फैला..हो जब हाहाकार,
हिंसा करती हो संहार,
त्रस्त हो रहा हो' संसार,
तृष्णा फैले अपरम्पार,
विध्वंसों का हो सत्कार,
व्यसन बने हों जीवन सार,
मिट जाये तब सारे क्लेश,
समतामय होगा परिवेश ।
.

१० व.२५ मार्च १९६२
४९
[ ४ ।
महावीरवत समतापूत,
बुद्ध सरीखे करुणादूत,
करें अहिसा को मजबूत,
समता की जो शक्ति अकूत,
शब्द-शब्द हो वना सबूत,
वारणी ज्यों मीठी शहतूत ।
बन अंधियारे में राकेश,
समतामय होगा परिवेश ।।
[ ५ ]
ताकत का हो चरम विकास,
बढ़े साधना में विश्वास,
बाटे साधन भली प्रकार,
अस्तित्व करें. सबका स्वीकार ।
गुण ओ' कर्म से श्रेणी माने,
कर्तव्य चेतना को पहचाने ।
यह सिद्धान्त करे सब पेश,
समतामय होगा परिवेश ।
[ ६ ]
सत्य अहिसा सव स्वीकारे,
अपरिग्रह की बात विचारें,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य व्रत माने,
स्यादवाद को भी पहचानें ।
जिस पद से भी हो पहचान,
रखे मर्यादा का ध्यान,

५०
• दीक्षा
जीवन दर्शन का यह बेश,
समतामय होगा परिवेश ।
[ ७ ]
प्रतिदिन सूर्योदय से पहले,
दर्शन की सरिता में बहले,
नियत समय पर करें साधना,
सभी मिटायें विषय वासना,
सद्वृतियां व्यवहार में लायें,
दुष्वृत्तियों को दूर भगायें ।
सब अपने से कमो' बेश,
समतामय होगा परिवेश ।
[ ८ ]
सभी विकारों का हो नाश,
भक्तिभाव में हो विश्वास,
सच्चा अच्छा निर्मल निश्छल,
सब लोगों का चाहें मंगल,
परमात्ममयी हों जव प्रण-प्राण,
चाहें सब सबका कल्याण ।
मिट जाये सब राग ओ' द्वेष,
समतामय होगा परिवेश ।
-व्यावर (राजस्थान
अण्डों से हार्ट अटैक !
अण्डों से मौत
...

शिक्षा और दीक्षा : वर्तमान संदर्भ में A डॉ. महेन्द्रसागर प्रचडिया प्राणधारियों में मनुष्य का स्थान सर्वोपरि है । उसमें शिक्षा और दीक्षा प्राप्त करने की शक्ति और सामर्थ्य अन्य प्राणियों की अपेक्षा सर्वाधिक है । विश्वबोध की जिज्ञासा मनुष्य में स्वयंजात है। वह नित नई वस्तुओं के विषय में जानने की अभिलाषा रखता है। मां की क्रोड़ में उसकी प्रथम शिक्षा सम्पन्न होती है । वयस्क होने पर मनुष्य व्यव- स्थित रूप से किसी शिक्षाशाला में गुरु अथवा शिक्षक से विद्या करता है। शिक्षार्जन से मनुष्य के बोध-वातायन खुलने लगते है । उसकी मानसिक शक्तियों का विकास प्रारम्भ हो जाता है । अशिक्षित आदमी मूढ़ या मूर्ख की नाई सदा परावलम्बी जीवन जीता है। आज आदमी ते जागतिक विशेषकर वैज्ञानिक प्रगति कर आदमी को जीने के लिए, शिक्षित होने के लिए बाध्य कर दिया है। इस प्रकार विश्व-जीवन जीने के लिए, विश्व के अनेक सुलभ और दुर्लभ पदार्थो को जानना अत्यन्त आवश्यक है। जीवन के नाना उपकरणो को जाने बिना उनका प्रयोग या उपयोग करना प्रायः असम्भव ही है । आज आदमी धरती पर ही नहीं अनन्त आकाश में उड़ता है, चांद-तारो में प्रवेश करता है। सार में, संक्षेप में आज के वैज्ञानिक युग में शिक्षा और शिक्षार्जन की आवश्यकता असदिग्ध है । दीक्षा शिक्षा का पूरक शब्द है । दीक्षा के बिना शिक्षा का कोई मूल्य नही है । दीक्षा से स्थूल अभिप्राय यह है-शिक्षा या उपदेश द्वारा किसी के बौद्धिक तथा चारित्रिक विकास का रूप । शिक्षा गुरु- वाणी अथवा जिनवाणी से सीखी जाती है और दीक्षा उस सीख तथा शिक्षा को आत्मसात् करने-कराने की प्रक्रियात्मक शक्ति का उजागरण करती है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दीक्षा शिक्षा को सार्थक बनाती है, पूर्णता प्रदान करती है । शिक्षा और दीक्षा मनुष्य को दो प्रकार से दी जाती है- ५२ ० दीक्षा . . प्रथमतः जागतिक और द्वितीय आध्यात्मिक । जागतिक शिक्षा : दीक्षा ग्रहण कर मनुष्य सांसारिक सुखी जीवन जीने की शक्ति में सामर्थ्य उपलब्ध करता है, किन्तु आध्यात्मिक शिक्षा और दीक्षा । । कर मनुष्य जन्म-मरण के दारुण दुःखों से निवृत्ति प्राप्त करता है आध्यात्मिक संदर्भ में मनुष्य की शिक्षा और दीक्षा का भ सामान्य से हट कर विशिष्ट हो जाता है। काम, अर्थ, धर्म और मिलकर पुरुषार्थ चतुष्टय के रूप को स्वरूप प्रदान करते हैं । जीवन की सार्थकता इन्हीं पुरुषार्थो को उपलब्ध करने में निहित है इसके लिए मनुष्य को दीक्षा ग्रहण आवश्यक होता है। इससे । की भटकन समाप्त हो जाती है । संयम और तप के द्वारा उस यात्रा असत् से सत् की ओर, अज्ञान से अभिज्ञान की ओर, मृत्यु अमरत्व की ओर अग्रसर होने लगती है । दीक्षा में सम्पूर्ण मांगों और मनौतियों का विसर्जन हो ज... है । निरीह होकर साधक आत्मसाधना के सर्वोच्च सोपान पर च जाता है-साधना से सिद्धि तक की यात्रा का नाम है-दीक्षा ।। बहिर्मुखी विकास का साधन है जबकि दीक्षा अन्तर्मुखी साधना नाम है । दीक्षार्थी जब बाहर से भीतर की ओर उन्मुख होता है, 1 उसका अन्तर में प्रवेश होता है। शिक्षा से व्यक्ति में जीवन य करके के भाव उदय होते है, वह जीवन-परिधि के चक्कर लगाता है। फिर चाहे वह परिधि पर परिधावन पदयात्री बनकर करे, फिर पा किसी पशु-पीठ पर चढ़कर करे, यान से करे, चाहे वायुयान पर चढ़ कर करे, उसकी यात्रा की पहुंच परिधि पर ही रहती है, वह कम केन्द्र तक पहुंच पाता नहीं । परिधि से केन्द्र पर पहुंचने की यात्रा : नाम ही दीक्षा है। आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त्यर्थ साधक को दीक्षा ग्रहण .. पड़ती है । आहती दीक्षा ग्रहण करने के लिए साधक को राग से हट कर विरागमुग्वी होना आवश्यक है । दीक्षा ग्रहण करने वाले साधक में संसार एवं संसारी जनों के प्रति आसक्ति एवं मोह का त्याग भा पैदा होता है । राग के प्रति पूरा ज्ञान होना परमावश्यक है। ज्ञान होने पर • १० व २५ मार्च १९६२ ही रागजन्य चिपकन की बुराई सहज में प्रकट हो जाती है। वोध होने पर बुराई दुहराई नही जाती। रागी चित्त में विभाग के भाव तब उदय हुमा करते हैं । शिक्षार्जन से यह यात्रा प्रारम्भ हो जाती है किन्तु राग से विराग होने पर जब विराग के प्रति भी कोई राग नहीं रहता, तब वीतराग की स्थिति जाग्रत होती है। यह जागरण दीक्षा के द्वारा, सम्भव होता है । अब, आज के समय में सामाजिक की दशा बड़ी दयनीय है। उसको शिक्षार्जन का सुयोग भी प्राप्त नहीं है, इसलिए वह जिससे घिरा हुआ है, उसे जानने और पहिचानने में वह सर्वथा अनभिज्ञ है। जिसे आदमी ने पकड़ रखा है, उसका सम्यक् बोध आवश्यक है । शिक्षा इस बोध को दिलाने का काम करती है । जानने पर जब सत्य और तथ्य को प्रात्मसात किया जाता है, उसमें जब व्यक्ति दीक्षित होता है तब सब कुछ स्वयं छूट जाता है । अबोध बालक एवं बालिका गुड्डा- गुड़ियों की पकड़ा करते है । जब वे वयस्क हो जाते हैं अर्थात् उनमें जब ज्ञान हो जाता है तब उनका गुड्डा और गुड़ियों से स्वयं छूटना हो जाता है । ऐसी स्थिति में आज के समुदाय और समाज में शिक्षा और दीक्षा की आवश्यकता असदिग्ध है । शिक्षावाणी का विषय है । दीक्षा में शिक्षा को प्रयोगशाला में चरितार्थ किया जाता है । श्रमण संत जिन्होंने आर्हत दीक्षा ग्रहण करली है वे शिक्षा को आत्मसात करते है और सत्य को प्रयोग में लाकर सम्यक्त्व को जगाते हैं । दीक्षार्थियों की इस प्रकार की प्रयोग । साधना चरण को सदाचरण में परिणत करती है और फिर सदाचरण का सतत अभ्यास जीवन मे एक दिन अवश्य मंगलाचरण का प्रवर्तन करता है । इस प्रकार यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि शिक्षा और दीक्षा की आज के जन-जीवन में परम आवश्यकता है । -मंगल कलश ३६४, सर्वोदय नगर, आगरा रोड, अलीगढ़-२०२००१ शाकाहार कीजिये, तन-मन से स्वस्थ रहिये । ।

शिक्षा का जीवन में प्राचरण करना ही दीक्षा है -- > श्री कन्हैयालाल वर्तमान युग में किसी विषय के ज्ञान-अर्जन को शिक्षा । जाता है-जैसे गणित, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र भाषाविज्ञान, मनोविज्ञान आदि के अध्ययन कराने को शिक्षा देना । जाता है और इन विषयों के अध्यापक को शिक्षक तथा जहां य शिक्षण दिया जाता है उन्हें शिक्षणालय कहा जाता है । इस का मुख्य लक्ष्य है-अर्थोपार्जन कर विषय सुख भोगना, सम्मान करना व अपना वर्चस्व स्थापित करना । परन्तु प्राचीन काल में f. से अभिप्राय था अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, सरलता, उदारत सज्जनता, सहृदयता आदि सद्गुणों का, कर्त्तव्य परायणता का देना । इन गुणों के शिक्षण देने वाले को गुरु तथा जहां इनका दिया जाता था उन्हें गुरुकुल कहते थे । इन गुरुकुलों में समस्त मा बीय गुणों के विकास के साथ जीवन का सर्वतोमुखी विकास कैसे । यह शिक्षण भी दिया जाता था। उस शिक्षा का द्योतक शब्द 'स आज भी देहातों में प्रचलित है जिसका अर्थ हैं 'अपने हित कल्याण लिए सावधान करना ।' इसी प्रकार प्राचीनकाल में दीक्षा का अर्थ था जो शिक्षा प्र की उसे जीवन में उतारने का दृढ़ संकल्प करना, इसे ही दीक्षा ग्रह करना कहा जाता था और उसके अनुसार जीवन में आचरण करने दीक्षा पालन कहा जाता था । परन्तु वर्तमान में प्रचलित प्रथा अधिकतर किसी सम्प्रदाय, मत, पंथ आदि को अपना लेना दीक्षा और उस सम्प्रदा, मत आदि की रूढ़ परम्पराओं का पालन दीक्षा-पालन है । वस्तुतः दीक्षा का अर्थ है-मानव-जीवन के लक्ष्य का निर्णय कर उस पर चलने का दृढ़ संकल्प करना । मा जीवन का लक्ष्य है-दुःख से सदा के लिए मुक्त होना । दुःख से म वही हो सकता है जो स्वाधीन है । स्वाधीन वही है जिसे अपने से की, जो अपने से अलग हो जावे उसकी, पर की अपेक्षा या आवश्य न हो अर्थात् जो स्व में स्थित हो, स्व-स्थ हो, विकार रहित हो, अतः दु - ।

१. व २५ मार्च १९६२ । मुक्ति स्पस्थता, निर्विकारता, स्वाधीनता ये समानार्थक शब्द हैं । दीक्षा ग्रहण करने का अधिकारी या पात्र वहा है जिसका क मात्र लक्ष्य मुक्ति प्राप्त करना है अर्थात् स्वाधीन होना है । जो मि, भवन, धन, सम्पत्ति, वाहन आदि वस्तुओं की प्राप्ति में स्वाधी- ता मानता है वह पराधीनता में स्वाधीनता मानता है, अर्थात् वह अमुक्त को मुक्त मानता है, वह मिथ्यात्वी है। वह स्वाधीनता का पुजारी नही हो सकता । कारण कि धन, सम्पत्ति आदि परिग्रह परा- धीनता का ही द्योतक है । परिग्रह रूप पराधीनता का त्याग कर स्वाधीनता (मुक्ति) की ओर चरण बढ़ाना ही चारित्र है । चारित्र- पालन का निर्णय लेकर उसके पालन का व्रत ग्रहण करना ही दीक्षा है । अतः जो परिग्रह में पराधीनता का अनुभव करता है तथा परि- ; ग्रह से सम्बन्ध-विच्छेद करने में शान्ति व प्रसन्नता का अनुभव करता है वह ही दीक्षा लेने का अधिकारी होता है, दूसरे शब्दों में परिग्रह के त्याग का व्रत ग्रहण करना ही दीक्षा ग्रहण करना है । पराधीनता का मूल कारण है पर से सुख चाहना अर्थात् भोग, वासना । अतः भोग के त्याग को ही योग कहा जाता है । योगी वही है जो भोगी नही है । वही दीक्षित भी है । जितने भी दोष हैं वे भोग से ही पैदा होते है, और दोष ही समस्त दुःखों का कारण है। अतः साधक को हर क्षण आत्म-निरीक्षण कर यह देखना चाहिए कि मेरे जीवन में अशान्ति, चिन्ता, भय, पराधीनता, जड़ता, अभाव आदि कोई मानसिक व आत्मिक दुःख तो नहीं है, यदि है तो उसके कारण भूत दोप को जानकर उसे दूर करना अर्थात् निर्दोष-निर्विकार होने के लिए सतत सजग रहने, पुरुषार्थ करना ही दीक्षा का पालन करना । वस्तुतः दीक्षा का लक्ष्य निर्दोष, निर्विकार, स्वाधीन होना ही है । ऐसे पराधीनता-पराश्रय रहित-स्वाधीन जीवन को ही मुक्ति या मोक्ष कहा जाता है । दीक्षित-व्यक्ति की समस्त चेष्टाएं गा। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होती हैं । ऐसे ही मुक्ति प्रदायक ज्ञान को प्राचीन काल में विद्या कहा जाता था जैसा कि कहा है-"सा विद्या या विमुक्तये" अर्थात् विद्या वही जो मुक्ति की ओर ले जाये । इसके विपरीत जिसमें विषय-विकार-आसक्ति बढ़े उसे अविद्या कहते है। जैन दर्शन में मुक्तिप्रदायक ज्ञान को सम्यक् ज्ञान कहते हैं । इसके विपरीत जिसका लक्ष्य या उद्देश्य विषय-भोग के सुखों की उप- ना है। (न । | इस अपने या आवर जत ५६ ० दीक्षा - - लब्धि करना हों, विषय-विकार बढ़ाना हो ऐसे मिथ्यात्वी व्यक्ति भले ही अनेक पूर्वो का ज्ञान हो उसके ज्ञान को जैन दर्शन में . कहा है और अन्य दर्शनों में ऐसे ज्ञान को । अविधा कहा है।' आज इसी अविधा व अज्ञान को राजकीया विद्यालयों में ज्ञान विद्या कहा जाता है । वर्तमान में अर्थशास्त्र, वाणिज्य, विज्ञान, विज्ञान आदि का जो शिक्षण विद्यालयों, महाविद्यालयों, १५ १ में दिया जाता है, इसे विद्या कहा जाता है । इस विद्या का अर्ज संग्रह किया जा सकता है । यह विद्या शरीर की तरह उत्पन्न है, बढ़ती है, घटती है, नष्ट होती है, अपना अस्तित्व खो देती उदाहरणार्थ 'साम्यवाद' (कम्युनिज्म) का शिक्षण विद्यालयों में वर्ष तक दिया जाता रहा और एक ही धक्के में वह भूमिसान गया । अतः ये विद्याए शक्ति या सामर्थ्य हैं। इनका सदुपयोग किया जा सकता है और दुरुपयोग भी किया जा सकता है । " णार्थ-अणु शक्ति शिक्षण की विद्या को ही लें । 'अणु शक्ति' सीखकर कोई व्यक्ति अणु बम बनाकर संसार का विनाश करे तो अणु शक्ति विद्या का दुरुपयोग है और इसी अणु शक्ति का चिक्ति क्षेत्र में उपयोग रोग-निवारण के लिए करे तो वह अणु शक्ति का ५ है । जो शक्ति जितनी प्रबल होती है उसका सदुपयोग, पुरुपयोग उतना ही सबल होता है । 'विद्या रूप शक्ति,' तन शक्ति, धन आदि शक्तियों से अधिक सशक्त है अतः हानि-लाभ भी अधिक इसीलिए कहा है-'साक्षराः' विपरीत रूप धारण कर ले तो ' बन जाताहै अर्थात् अनपढ़ व्यक्ति उतनी हानि नहींपहुंचा सकता जितनी विद्योपार्जन किया व्यक्ति पहुंचा सकता है। तात्पर्य यह है कि जो प्राचीनकाल में जीवन के कल्याण के लिए थी, वह विद्या का साधनमात्र रह गई है । उसका कल्याणकारी प्राण निकल गर वह निष्प्राण हो गई है । परिणामस्वरूप आज चारो ओर शोषण होड़ लगी है । जिससे संघर्ष, युद्ध, हिंसा भड़क रही है । जीवन ग्रस्त, निष्प्राण व नीरस हो गया है । विद्या का सर्वहितकारी प्रवृत्ति में सदुपयोग कैसे किया इस कला का शिक्षण ही सच्ची शिक्षा है । शिक्षा के अभाव महाअनर्थकारी होती है । आज जो पूरे विश्व में आर्थिक, जन क में।

१० व २५ मार्च १९९२ . रिवारिक, प्रशासनिक, व्यासायिक आदि समस्याए खड़ी हो रही हैं, का कारण है विद्या के साथ शिक्षा का न लगना और जब तक द्या के साथ शिक्षा को न जोड़ा जायेगा तब तक विद्या का विकास तना ही होवे वह शोषण और संघर्प को ही जन्म देगा जो भयंकर नाश करने वाला होगा । अतः मानव जाति की समस्त समस्याओं समाधान है विद्या के साथ शिक्षा को जोड़ना । प्राचीन भारत में द्या' शिक्षा युक्त ही होती थी अत. विद्या और शिक्षा एक ही अर्थ द्योतक थी। शिक्षाहीन विद्या विद्या होती है क्योकि वह व्यक्ति को स्वार्थी ती है, उसके स्वार्थ का पोषण करती है, उसे शक्ति प्रदान करती । स्वार्थी व्यक्ति की दृष्टि अपने सुख-सुविधा, सम्मान प्राप्ति पर रहती है, भले ही उससे दूसरे को कितनी ही हानि हो । स्वार्थी क्ति नकली दवाइयां बनाकर लाखों लोगों के जीवन सुख को मृत्यु के ब में डाल सकता है, घी में गाय की चर्बी मिलाकर करोड़ों लोगों के । को भ्रष्ट कर सकता है । भयंकर संहारक अस्त्र-शस्त्र बनाकर माणु बम बनाकर लाखों लोगों की जान ले सकता है । आज जो श्व मे हिसा का ताण्डव नृत्य नजर आ रहा है, वह सब स्वार्थी क्तियो की देन है । और जो दूसरों के विषाद के विषैले श्रा व्यक्ति सदैव स्वयं भी चिन्तित व भयभीत रहता है व विश्व के लिए भशाप होता है । इसके एकदम विपरीत शिक्षा युक्त विद्या सर्व- याणकारी होती है क्योंकि वह व्यक्ति में सद्भावना पैदा करती है 'ससे व्यक्ति उस विद्या का उपयोग दूसरे के दु:ख दूर करने, उन्हे स्थ व प्रसन्न बनाने में करता है । यही नियम है कि जो जैसा बीज ता है उस बीज के अनुरूप ही फल सैकड़ों गुना होकर आते हैं । प्रसन्नता के बीज बोताहै उसे फलस्वरूप सैकड़ों गुणी प्रसन्नता मिलती है। ज बोता है उसे सैकड़ो गुणा विषाद ही भोगना पड़ता है । वाहर भले ही वह करोड़पति-अरबपति, अध्यक्ष, भूपति बने उसका आन्त- क जीवन निराशा, नीरसता, शुष्कता, रिक्तता, हीनता, भय, अभाव, वश्वास के ग्रस्त रहता है । वह सदा दीनता और अभिमान की ग में जलता रहता है । वह शान्ति, समता, प्रेम, स्वाधीनता रूप झय-अखण्ड-अनन्त रस का आस्वादन कभी नही कर सकता । वह ܕܓܕ ५८ ० दीक्षा अपनी नीरसता, रिक्तता भुलाने के लिए नशा करता है, विविध के भोग भागता है, किसा न किसो लोभ की प्रवृत्ति में अपने को स्त रखता है । दूसरे शब्दों में कहें तो उसका आन्तरिक हृदय, घोर नारकीय होता है । वहां सदैव द्वन्द्व, संघर्ष की ज्वाला : रहती है। ऊपर कह आए है कि शिक्षा का जीवन में आचरण म ही दीक्षा है । दीक्षा के दो रूप है-(१) निवृत्ति और (२) निवृत्ति के दो रूप है-(१) दूसरों के लिए अहितकर प्रवृत्ति त्याग जैसे हिसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, संग्रहवृत्ति, शोषण का । करना अर्थात् किसी का बुरा न चाहना, बुरा न कहना, करना तथा (२) अपने दोषों का त्याग करना अर्थात् राग- विषय, कषाय, मोह, विकथा आदि दोषों का त्याग करना अर्थात् को निर्दोष, निर्विकार बनाना । इसी प्रकार प्रवृत्ति के दो रूप (१) दया, दान, करुणा, अनुकम्पा, वात्सल्य, सेवा, मैत्री भाव से के दुःख व दोषों को दूर करवे रूप सर्वहितकारी सप्रवृत्ति तथा (२) अनित्य, अशरण, संसार, अन्यत्व आदि भावनामो चिन्तन करना, स्वाध्याय करना, धर्मकथा करना, सद् चर्चा, सत्चि सत्कार्य करना । समिति का पालन करना । दीक्षित के लिए और प्रवृत्ति दोनों दायें-बाये पैर के समान ही हैं जिन पर चल अपने गन्तव्य स्थल पर पहुंचना है-अर्थात् मुक्त होना है- होना है, बन्धन रहित होना है, अक्षय-अखण्ड-अनन्त सुख का अ करना है, अमरत्व की उपलब्धि करना है । यह तभी सम्भव है जीवन निर्विकार हो, निर्दोष हो जिसके लिए संयम या त्याग ही मात्र उपाय है । अतः त्याग संयम ग्रहण करना ही दीक्षा है, त्या ही धर्म है । त्याग ही जीवन है । जिस प्रवृत्ति या निवृत्ति से पुष्ट होता हो उसी का दीक्षित के जीवन में स्थान है । तात्पर्य है कि प्रवृत्ति या निवृत्ति का लक्ष्य राग-द्वप, मोह, विषय, आदि दोषों से मुक्ति पाना होना चाहिये । जो ऐसा जीवन जीता वही दीक्षित है। शिक्षा है दुःख से मुक्ति व मुक्ति के मार्ग का सम्यक्ज्ञान, उस सन्देह रहित दृढ़ विश्वास होना सम्यक्दर्शन है और ज्ञान-दर्शन के रूप आचरण करना ही सम्यक्चारित्र है । यही मुक्ति प्राप्ति का ७ । -- " १० व २५ मार्च १९६२ ५६ । यही दीक्षा का पालन है । अतः शिक्षा रहित दीक्षा-अन्धे व्यक्ति समान है और दीक्षा रहित शिक्षा चरणहीन लंगड़े व्यक्ति के समान । अन्धा व्यक्ति इधर-उधर भटकता रहता है, आगे नहीं बढ़ पाता और लंगड़ा व्यक्ति तो चल ही नहीं पाता है । अतः अन्धा व्यक्ति व ड़ा व्यक्ति दोनों अपने गन्तव्य स्थल नहीं पहुंच सकते, अांख व पैर लों से समर्थ व्यक्ति ही प्रगति कर अपने गन्तव्य-स्थल पर पहुंच पाता । इसी प्रकार शिक्षा और दीक्षा दोनों के मेल से ही दु.ख से सदा लिए मुक्ति संभव है । जिस व्यक्ति के जीवन में न शिक्षा है न झा है, वह अन्धा व लंगड़ा है । उसकी प्रगति सम्भव नहीं है । -श्री जैन सिद्धान्त शिक्षण संस्थान, साधना भवन, :-६, महावीर उद्यान पथ, बजाज नगर, जयपुर (राज.) ३०२०१७ चार्य नानेश के प्रति- गुरु भक्ति में मेरा मन सदा रमणीय बन जाये, तेरे दर्शन को पाकर नेत्र मेरे पवित्र बन जाये । रूठ जाये जगत सारा, पासरा एक बस थारा, तेरे गुणगान से मेरी कभी तकदीर बन जाये । तेरे चरणों की रज को मै बनाऊ आंख का अजन, समीक्षण ध्यान योगी की हृदय तस्वीर बन जाये। बनाये लाख जिन प्रेमी धरम को पालने वाले, धरम हो प्राण से प्यारा कभी वह स्वर्ग बन जाये। मिटाया जगत में अज्ञान तम को भास्कर बनकर, जगाई ज्योति समता की सुखी संसार बन जाये । शि उ चौ श्री जग नाना, अमर हो एक यह नारा, तेरे सद् ज्ञान से मेरी आत्मा परमात्म बन जाये । शरण “सौभाग्य" से मिल जाये, तेरे चरण-कमलो में, दया सागर कृपा से ताव, मेरी भव से तर जाये । -~-सौभाग्यमल का re- इतिहास की पुनरावृत्ति : दो " L FA श्री राजेन्द्र प्रसाद - (१) छोड़ चले तोरण-द्वार इतिहास के उजले पृष्ठ साक्षी है कि श्री अरिष्टनेमि, मतिजी को विवाहने चले तभी सामिष अतिथियों को भोजन के । वाड़े में बंद निरीह मूक पशुओं के आर्तनाद से पसीज दया, का एवं संवेदना के धनी श्री अरिष्टनेमि तोरण-द्वार छोड़ वापिस मुड़ और उन्होंने प्रवज्या ग्रहण कर ली। सदियों पश्चात् इस प्रसंग की पुनरावृत्ति हुई जबकि न. " किरपाशंकर सिह बारात लेकर मुडी के महाराजा कनकसिंह की . को व्याहने पहुंचे और बारात के स्वागत भोज के लिए बाड़े में निरीह पशुओं को देख पसीज उठे और पशुओं को स्वतंत्र कर, तोर द्वार से मुह मोड़ चल दिये और उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया इन प्रसंगों से मिलता-जुलता एक प्रसंग बना सूर्यनगरी पुर की पावन धरा पर तोरण द्वार पर । तोरण द्वार पर नाक ++ की परम्परा के अन्तर्गत नाक वचग्ने की क्रिया में वर की पगड़ी भू पर गिर पड़ी और....और....तभी उस चिन्तनशील भावुक युवक कहते हुए कि “जो चीज छुट चुकी उसे ग्रहण करना उचित नहीं तोरण द्वार से मुह मोड़ प्रवज्या ग्रहण करली और कालान्तर "जैनाचार्य उदय सागर जी महाराज" के नाम से विख्यात हुए । (२) एक मौर उजला पृष्ठ महाश्रमण का ब्रह्मचर्य पर मर्मस्पर्शी प्रेरक प्रवचन चल था । कच्छवासी सेठ अर्हद्दास के इकलौते भावुक पुत्र श्री का अभिभूत हो उठे और संकल्प ले बैठे कि विवाह होने पर वे जी पर्यन्त शुक्ल पक्ष में ब्रह्मचर्य का पालन करेगे । समय सरका और वे अपने ही नगर के सेठ धन्ना वाह पुत्री विजया के साथ परिणय वंधन में बंध गये। ने १० व २५ मार्च १९६२ ६१ .. सुहाग रात का शयनागार । प्रसंगवश विजय का कथन- 'देवी ! मैने शुक्ल पक्ष में ब्रह्मचर्य पालन करने का नियम ले रखा और....... और तभी-"मैंने भी बाल्यकाल में कृष्ण पक्ष में आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने का संकल्प ले रखा है" विजया ने होले से कहा -- ६ - नीरव एकान्त कक्ष मे नव-विवाहित जोड़े की इस चर्चा से कुछ क्षणों के लिए धरती डोल उठी, दीवारे कपित हो उठी और 'कुछ क्षणों चिन्तन में डूबे, उस संकल्पधारी शैय्या पर आसीन उस भद्र दम्पति ने जीवन पर्यन्त ही ब्रह्मचर्य पालन करने का संकल्प पुनः दोह- राया तो निरन्तर गतिशील समय के अभिन्न वे क्षण भी ठिठके, कुछ रूके और उस दम्पत्ति को नमन-यंदन किया....वह रात्रि इस वंदनीय अभिनन्दनीय दम्पत्ति को स्वयं को कृतार्थ मान रही थी, भाग्यशाली मान रही थी... उस रात्रि विजय ने विजया से वचन लिया कि इस संयुक्त संकल्प का माता, पिता या किसी को ज्ञान न हो पावे, जिस दिन यह भेद प्रकट हो जावेगा वे दोनों प्रव्रज्या ग्रहण कर लेगे। समय सरका और कालान्तर में अनजाने ही प्रसंगवण इस तथ्य की जानकारी केवलज्ञानी श्री विमल मुनि जी द्वारा चंपानगरी के सेठ जिनदास को एवं जिनदास द्वारा कच्छवासियों को मिल गई । चंदनीय अभिनंदनीय दम्पत्ति की चहुं दिशा जै-जैकार होने लगी....और । भेद से परदा हटते ही शीलवतधारी उस दम्पत्ति ने प्रव्रज्या ग्रहण कर १ ली । इतिहास में एक अनुपम अभूतपूर्व उजला पृष्ठ जुड़ गया। समय सरका....वर्ष, युग और सदियां गुजर गई कि विगत ३ का मार्च सन् ६१ को गाधीनगर बैगलोर की पावन धरा पर विवाह से । पूर्व ही शीलव्रतधारी भद्र वधु श्री जीतनभाई द भद्रा बहिन भारती । विवाह पश्चात् भी शीलवत का अनुपालन करने, प्रज्या गृहर विजय सेठ-विजया सेठानी के पावन प्रमंग की पुनरावृत्ति और अनुपम उजला पृष्ठ जोड़ दिया . र नन - देवधरा की माटी को मेगा: .

६२ ० दीक्षा शे. वस्तुतः वन्दनीय अभिनन्दनीय है संत-सतियों, ऋषि-मु।१५ की यह पावन धरा जहां मानव के परिवेश में देव बसते है:- सदियों पूर्व, पुण्य भूमि भारत की सभ्यता एवं महिमा मलि. सांस्कृतिक गरिमा का अध्ययन करने चीनी यात्री हेनसांग भारत श्री थे और सम्पूर्ण भारत की यात्रा करने व यहां की जीवन शैली का अध्ययन करने के पश्चात् उन्होंने कहा था-"अब मेरी समझ में ! कि चीन में प्रचलित लोकोक्ति में क्यों कहा गया है कि- 'जो पिर शुभ करता है, उसे भारत में जन्म मिलता है।' -एडवोकेट, भवानीमंडी (राज.) संडे हो या मंडे ! कभी न खाओ अंडे !! HTGS ACSR CORE WIRES IST conforming to IS-398 PT-2/1976 STEEL WIRES Also CHR QUALITY WIRES.M.SGI WIRES & STAY WIRES SHUTTER SPRING WIRES & SPRING WIRE, GRADE IN SHAPE WIRES, PC conforming to WIRES CABLE IS-398PT-5and IS-280 ARMOUR WIRES & STRIPS,FLAT WIRES, our speciality M.S. FLATS AND PROFILES Manufacturers : RATLAM WIRES PVT. LTD. Works :3, Industrial Estate, I Regd. Office.72. Gandhi Nagar,Drainage Channel Ratlam-457001. Road, Opp Municipal Industrial Estate, Worli, Phone 22920-20618-231071 Bombay-400018 Telex 07301-208RWPL IN Phones 492-6317,492-6249,492-4303, 492-6268 Gram Beststeels Telex 011 76660 ISCO IN Gram ISCOHINGES - दीक्षा एवं संयम : श्रीमद् गणेशाचार्य की दृष्टि में * उदय नागोरी, एम. ए. (दर्शन), जैन सिद्धान्त प्रभाकर हुक्मेश-संघ के सप्तमाचार्य श्री गणेशीलाल जी म. सा. शांत- क्रान्ति के अग्रदूत, शुद्धाचार के प्रतीक एवं वास्तविक विरक्ति के अनु- पम महामानव थे । रत्नगर्भा मेवाड़-भूमि के धर्मवीर रूप में आपने एक ओर अहिसक-क्राति का शंखनाद किया तो श्रमण संघ के नायक की महत्त्वपूर्ण भूमिका का भी सफलतापूर्वक निर्वाह किया । आपने सदैव शिष्यों को गुणात्मकता पर ही जोर दिया न कि संख्यात्मक वृद्धि पर । सघ-ऐक्यता ही उनका जीवन-सम्बल रहा था और शुद्ध संयम प्राणाधार । जिन्हे न पद-लिप्सा थी और न शिष्यों को बढाने का लोभ अथवा मोह । ऐसे महान् आचार्य के दीक्षा एवं संयम सम्बन्धी विचार ज्ञातव्य, मननीय एवं अनुकरणीय हैं । श्रीमद् गणेशाचार्य की दृष्टि में दीक्षा का अर्थ है--जीवन परिवर्तन, जिसमें है असत् से सत् की ओर तमस् से आलोक की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर बढने की ज्योर्तिमय यात्रा । अणुव्रतों से महाव्रतों का वरण, शुद्धत्व की सहज स्वीकृति एवं समरसता ही जिन्हें प्रिय हो वही दीक्षा का पात्र था उनकी कसौटी पर । इसी कारण उन्होने कभी भी अबोध बालकों, उदासीन, अबोध और अतृप्त मानव को दीक्षा देना उचित नही माना । आप फरमाया करते थे- "मै शास्त्रीय दृष्टि से दीक्षा का विरोधी नहीं हूं लेकिन वर्तमान समय में अबोध बालको को दीक्षा देना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता है । तत्व- ज्ञान का अधिकारी वही हो सकता है जो हेयोपादेय का विवेक करने में सक्षम है । जिसे अभी सीधा सादा जीवन व्यवहार भी चलाना नही आता, वह परमार्थ की विशेष स्थिति कसे साध सकता है । ऐसे व्यक्ति भी तत्वज्ञान एवं जीवन शुद्धि के क्षेत्र में आने के प्रायः योग्य नहीं होते है जिन्होने जीवन में असफलताओं के कारण पलायनवादी मनोवृत्ति को अपनाया है । सही मायने में ऐसे उदासीन, अबोध और अतृप्त मानव तत्त्वज्ञान का विकास नही कर सकते और न ही शुद्धि के मार्ग पर बढने का अध्यवसाय कर सकते हैं।" "दीक्षा लेना अति गंभीर उत्तरदायित्व है और उसका जीव- ० दीक्षा नान्त तक निर्वाह करना पड़ता है । अतः दीक्षा अंगीकार करने वा- की क्षमता को परख लेना जरुरी है । दीक्षा जीवन का मौलिक परि वर्तन है, इसमें क्षणिक आवेश के लिये अवकाश नहीं है, किन्तु ज पर्यन्त स्थायी रहने वाला मानसिक, वाचनिक और कायिक त्याग मार्ग है और वैसा त्याग सर्वाग रूप से अन्तर में व्याप्त वैराग्य' बिना नहीं टिक सकता है ।" (पूज्य गणेशाचार्य-जीवन चरित्र पृ. २०६) इसो सन्दर्भ मे अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आचार्य श्री ने फरमाया- A सिर्फ वेश परिवर्तन से ही कोई प्रतिष्ठा-प्राप्ति का अधि- कारी नहीं बन सकता है अतः दीक्षा अंगीकार करने वाला सक्षम समर्थ और विवेकबुद्धि युक्त होना चाहिये । तभी वह भलीभांति दीक्षा के महत्व को समझ सकता है और उसके प्रति समाज की आदर- सम्मान की भावना विकसित होगी। A क्रमिक विकास के अनन्तर मुमुक्षु को स्वाधीन भाव सोचने और अपने श्रेय का मार्ग निश्चित करने का अवसर दिया जाना चाहिये । ज्ञान और वैराग्य भावना आदि की पूरी तरह से परीक्षा हो जाने के पश्चात् ही दीक्षा देने की बात पर विचार करना चाहिये। (पूज्य गणेशाचार्य-जीवन चरित्र पृ. २१०) यही नहीं, शिष्य-लोभ से वैराग्य का आवेग आते ही दीक्षित कर देने को अनुचित बताते हुए आपने स्पष्ट किया कि “आवेग शान्त होने पर इस प्रकार दीक्षित व्यक्ति पुनः संसार के जाल में फंस सकता है और भोग-लालसा का गुलाम बन सकता है । अतः सामान्य मानव की तुलना में दीक्षा लेने वाले में महत्वपूर्ण आन्तरिक परिवर्तन की अपेक्षा है । तभी वह तत्व का तलस्पर्शी चिन्तन और सदाचरण करने में सफल होगा एवं अधिक विनम्र बनने का प्रयास करेगा।" वेषधारी साधु की चर्चा करते हुए प्राचार्य श्री ने स्पष्ट किया था कि आत्मोत्थान के लिए विना ज्ञानयुक्त त्रिया के कोई लाभ नहीं। वस्तुतः “बाहर की क्रियाएं और वेष व्यवहार-मात्र है । सम्यग्दृष्टि साधु बनने के लिए प्रत्याख्यान द्वारा अनन्तानुबन्धी कषाय का सताप शान्त करना आवश्यक है । जब तक अन्तःकरण में कषाय की तीव्र ज्वाला धधकती रहती है, सम्यग्दृष्टि की प्राप्ति नहीं हो सकती ।

-1 २ व २५ मार्च १९६२ ६५ -- मा की उत्क्रांति काषायिक विकारों के निरोध पर निर्भर है और मात्मा इन कषायों से छुटकारा नहीं पा सका है, उसकी क्रिया जहार-मात्र है ।" (आत्म दर्शन पृ. ६६) संयम लेकर समाचारी का -न न करना उन्हें बिल्कुल ही क्षम्य न था । आप श्रमण संघ के चार्य थे एव आचार्य के अधिकारों से युक्त थे, उस दौरान सयम- न के प्रश्न पर अपने महत्वपूर्ण पद को तिलांजलि दे दो परन्तु ही भी प्रकार की शिथिलता को क्षमा नही किया । उनका मानना कि "साधुता तो विशिष्ट शक्ति होने पर ही धारण की जा सकती " (चिंतन, मनन अनुशीलन १ पृ. २६) अतः पच महाव्रत के साथ पंच-समिति के पालन में सावधानी रखने के लिए निर्देश देते हुए होने कहा--"हे मुनियों ! तुम्हारा पद चक्रवर्ती राजाओं एवं देव- नों से भी बड़ा है । देवता, चक्रवर्ती के सामने अपना मस्तक नहीं माते परन्तु तुम्हारे आगे झुकाते हैं । चक्रवर्ती राजा भी तुम्हारे दर्शन लालायित रहता है । ऐसे प्रतिष्ठित पद को पाकर भी पांच मति के पालन में सावधानी न रखने पर तुम्हारी गणना कायरों पतितो में होगी । यदि तुमसे कोई गल्ती भी हो जावे तो उसका तशोधन करो लेकिन उसे बढ़ने मत दो । पहाड़ पर से एक पांव सला और दूसरे पांव से उसी समय सम्हल गये तब तो गिरने से रूक ता है और यदि दूसरे पांव को भी ढील देदी तो लुढ़कता हुआ चे ही चला जाता है।" -चिन्तन, मनन अनुशीलन १ पृ. २६-२७ निम्रन्थ-धर्म शूरों का धर्म है-कायरों का नही अतः इसे अप- के पश्चात् सांसारिक सुखों की इच्छा रखना सर्वथा अनपेक्षित । आपका मत था-"निर्गन्ध-धर्म शूरों द्वारा पाला जा सकता है; कायर लोग नहीं पाल सकते । कई लोग घर बार, कुटुम्ब, संसार अादि छोड़ भी देते है, ‘सयति का वेश भी पहन लेते है और फिर मना पूर्ण न होने पर साधुपने में दुःख पाते है ।" "कई लोग क्षणिक आवेश में सनाथ बनने की क्षणिक भावना प्रेरित होकर संयम ले लेते हैं और कई साधुओं की प्रतिष्ठा देखकर सी ही प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए साधु-वेश पहन लेते है, वास्त उन्हे सच्चा वैराग्य नहीं होता, याकांक्षा रहित सगम लेने । मा - पुद्धि रंगा पर ๆ को FOR 90 ० दीक्षा ॥ . उनकी भावना नहीं होती । वे संयम में दीक्षित होने के पश्चात् . ताप करते हैं, संयम में कष्ट अनुभव करते हैं और कीचड़ में हाथी के समान दुःखी रहते हैं । ऐसे लोग वीर नहीं, किन्तु और इसीलिए ऐसे श्रमरण धर्म के लिए भाररूप हैं।" (चिन्तन अनुशीलन (१) पृ. २०-२१) इसी विचार को स्पष्ट करते हुए आप फरमाते हैं - "जो साधु के आचार-विचार से विरुद्ध । फिर भी साधु का वेष धारण किये रहता है, वह प्राणी पामर ऐसा मनुष्य इस लोक के सुखों से भी वंचित रहता है और के सुखों से भी कोरा रह जाता है । ऐसा मनुष्य अनाथ ही बन जाता है ।" "कायर लोग संघम लेकर उसमें सांसारिक सुखो की रखते है और जब इनकी प्राप्ति नहीं होती तब वे संयम में मानते है । यद्यपि संयम लेने के समय सांसारिक सुखों को त्याग हैं, लेकिन कायर लोग, संयम में सुख चाहते हैं; उसे प्राप्त लिए वे अपने संयम के ध्येय को भुला देते हैं।" (चिन्तन-मनन अनुशीलन १ पृ. २३.' आचार्य श्री ने कभी भी अपनी कसौटी पर खरे उतरे। किसी को दीक्षित नहीं किया । न किसी अबोध को दीक्षा दी क्षणिक आवेग वाले वैरागी को । वि. सं. २००७ की घटना आपका चातुर्मास अलवर होना था परन्तु शारीरिक कारणवश दिल्ली ही विराजना पड़ा : वहां आपके मुखारविन्द से एक भाई व एक बहिन की दीक्षा सम्पन्न हुई । दीक्षा-सम्पन्न होने के पश्चात् दिल्ली के एक लालाजी १३-१४ वर्ष के एक लड़के को लेकर सेवा में उपस्थित हुए और लगे कि मुझे एक चेला भेट करना है, आप इसको ग्रहण क.. तब आचार्य श्रीजी ने फरमाया-"यदि दीक्षा लेने वाला दीक्षार्थी र दीक्षा लेने की भावना से आता है तो सबसे पहले उसकी भावना परीक्षा की जाती है और संयम को योग्यता मालूम होने पर : संरक्षकों की आज्ञा पूर्वक दीक्षा दी जा सकती है । लेकिन इस त' की भेट नहीं ली जाती है।" (पूज्य गणेशाचार्य-जीवन चरित्र पृ. २५ इसी प्रकार दूसरे भी पांच-सात व्यक्तियों ने दीक्षा ग्रहण - ) व २५ मार्च १९६२ ६७ . व व्यक्त किये, लेकिन कसौटी पर खरे नहीं उतरने से आचार्य म. सा. ने उन्हें दीक्षा नहीं दी । उनकी कसौटी के अनुसार- वह है जो पातक का घातक हो, आत्मा के समस्त पापों को : धो डाला हो ।" एवं "जो (१) आश्रव से निवृत हो गया है जिसने पापों के आगमन के छिद्रों को रूद्ध कर दिया है (२) पट, दंभ आदि पापों से दूर रहता है, (३) जो एकेन्द्रिय प्राणी व में भी आत्मवध मानता है और आत्मा के प्रति अत्यन्त श्रद्धा- है, (४) जो सृष्टि के समस्त प्राणियों को मित्र भाव से देखता ५) लाभ-अलाभ में समभाव रखता है, (६) जो अनासक्ति का न आदर्श है, (७) आत्म-रमण में ही परम आह्लाद की अनु- करता है और (८) जिसके लिये सन्मान-अपमान, निन्दा-स्तुति, T-तर्जना एक रूप हो गये है, वह सच्चा सन्त है ।" सन्त के स्वरूप की व्याख्या करते हुए आपने उसमें आकाश उदारता, भूतल की क्षमामीलता, चन्द्रवत सौम्यता, सूर्यवत दीप्तता वायु की भांति सतत परिव्रजनशीलता निरूपित की, जिसकी अमृत- एक ही दृष्टि भव्य मनुष्य के अन्तर में व्याप्त वासना-विप को कर देती है । [पृ. ६१ चि. म. अनु. (२)] स्पष्ट है कि आपके दीक्षा एवं संयम विषयक विचार क्रांति- ।, प्रेरक, स्पष्ट एवं आदर्श है जिन्हें कालजयी की संज्ञा देना - शयोक्ति नही। श्रमरण धर्म - दसविहे समणधम्मे पण्णत्ते, त जहा- खति, मुत्ति, अज्जवे, मद्कवे, लाघवे, सच्चे, संजमे, तवे, चियाए, बभचेरवासे। श्रमणधर्म दस प्रकार का कहा गया है । यथा- (१) क्षमा, (२) अलोभ, (३) सरलता, (४) मृदुता, (५) लघुता, (६) सत्य, (७) संयम, (८) तप, (६) त्याग एवं (१०) ब्रह्मचर्यवास । ठाणं. अ. १०, सूत्र ७१२ जैनागमों में साधक A अमिताभ ना A अप्पाहारस्स दंतस्स, देवा दंसेंति ताइणो । जो साधक अल्पाहारी है, इन्द्रियों का विजेता है, सभी ।। ५ प्रति रक्षा की भावना रखता है, उसके दर्शन के लिए देव आतुर रहते है। -दशाश्रुत स्कंध सूत्र। A साहुणा सागरो इव गंभीरेण होयव्वं । साधु को सागर के समान गंभीर होना चाहिए । -दशवकालिक चूरि A तयसं व जहाइ से रयं । जिस प्रकार सर्प अपनी केंचुली को छोड़ देता है, उसी । साधक अपने कर्मों के आवरण को उतार फैकता है । -सूत्रकृतांग सूत्र १/२२ A जीवियास-मरण-भयविप्पमुक्का । सच्चे माधक जीवन की आशा और मृत्यु के भय से सर्वथा , होते हैं। -भगवती सूत्र A पोक्खरपत्तं व निरुवलेवे.... आगास चेव निरवलंबे....! साधक को कमलपत्र के समान निर्लेप और आकाश के म निरवलम्बन होना चाहिए । -प्रश्नव्याकरण सूत्र १ A उवसंते अविहेड़ए जे स भिक्खू । जो शान्त है, और अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक है, वही । भिक्षु है । दशवकालिक सूत्र १०१ A देसविमुक्का साहू, सव्यविमुक्का भवे सिद्धा । साधक कर्मबन्धन से देशमुक्त होता है और सिद्ध सर्वथा मुक्त । -आचारांग-नियुक्ति २१ A अहवावि नाणदंसणचरित्तविणए तहेव अज्झप्पे । जे पवरा होति मुणी, ते पवरा पुंडरीया उ । जो साधक अध्यात्म भावरूप ज्ञान, दर्शन, चारित्र और विनय श्रेष्ठ हैं, वे ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ पुडरीक कमल हैं। -सूत्रकृतांग नियुक्ति १५ 1 • १० व २५ मार्च १९६२ ६६ -- ॥ - पबन्धं च A नवणीयतुल्लहियया साहू । साधुजनों का हृदय नवनीत (मक्खन) के समान कोमल होता है। -व्यवहारभाष्य पीठिका ४७ -सेठिया जैन लाईब्ररी, बीकानेर (राज.) विनीत कौन ? (१) अह पन्नरसहि ठाणेहिं, सुविणीए त्ति वुच्चइ । नीयावत्ती अचवले, अमाई अकुऊहले -पन्द्रह स्थानों (हेतुओं) से सुविनीत कहलाता हैं । १. जो नम्र व्यवहार करता है, २. जो चपल नहीं होता, ३. जो मायावी नहीं होता, ४. जो कुतूहल नहीं करता । (६) अप्पं चाऽहिक्खिवई, न कुव्वई। मेत्तिज्जमाणो भयई, सुयं लद्धा न मज्जई ।। -५. जो किसी का तिरस्कार नहीं करता, ६. जो क्रोध को टिका कर नहीं रखता, ७, जो मित्रभाव रखने वाले के प्रति कृतज्ञ होता है, ८. जो श्रुत प्राप्त कर मद नहीं करता । (३) न य पावपरिक्खेवी, न य, मित्तेसु कुप्पई । अप्पियस्सावि मित्तस्स, रहे कल्लाण भासई ॥ -६. जो स्खलना होने पर किसी का तिरस्कार नहीं करता, १०. जो मित्रों पर क्रोध नहीं करता, ११. जो अप्रिय मित्र की भी एकान्त में प्रशंसा करता है । (४) कलहडमखज्जए, वुद्ध अभिजाइए। हिरिमं पडिसंलीणे, सुविणीए त्ति वुच्चई ।। - १२. जो कलह और हाथा-पाई का वर्जन करता है, १३, जो कुलीन होता है, १४. जो लज्जावान् होता है, १५. जो प्रतिसंलीन (इन्द्रिय और मन का संगोपन करने वाला) होता है-वह बुद्धिमान मुनि विनीत कहलाता है । -उत्त. अ. ११, गा. १०-१३ -~~-संकलनकर्ता-प्रमोद नागोरी, बीकानेर - -- समता ही 'जीवन' और जीवन का स्वभाव है-आचार्य श्री नानेश A हेम शर्मा के साथ समता दर्शन को जैन धर्म का मूलाधार माना गया है। साधु- मार्गी जैन संघ के आठवें आचार्य श्री नानेश ने समता दर्शन से सम्पूर्ण मानव स्वरूप के परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति के जीवन से लेकर विश्व की अशांति, हिंसा और विषम मानसिक ग्रन्थियों को समता की नजर देखा गया है । नानेश ने समता दर्शन के माध्यम से सुखी एवं सुस- स्कारित व्यक्ति जीवन, समाज और राष्ट्र जीवन की व्याख्या की है इसी दर्शन को व्यक्ति के जीवन में धारण करने के आह्वान आचार्य श्री ने समता को विश्व शांति की उन्नायक बताया है । आध्यात्म साधना में समता से इहलोक सुधारने के साथ-साथ परमात्मा बोध का मार्ग प्रशस्त किया गया है । समता दर्शन के प्रति- पादित सिद्धान्त में जीवन दर्शन, आत्म दर्शन और परमात्मदर्शन की साधना के सरलतम उपायों की विवेचना है। व्यक्ति जीवन की कुप्र- वृत्तियों, सामाजिक जीवन की विकृतियों, राष्ट्रीय जीवन में हिसा और विश्व में व्याप्त तनाव का कारण सब जगह समता का अभाव माना है । नानेश का कहना है समता ही जीवन है और जीवन का स्वभाव है। इसी कारण जीवन के सभी यत्न स्वतः समता के लिए होते हैं । सहज स्वतः प्रकट स्वभाव की अवहेलना विषमता है । यही अशांति का कारण है । नानेश ने आध्यात्म क्षेत्र में जैन दर्शन के आधार पर कई सफल सिद्धांतों को पुनः परिभाषित कर शुद्ध जीवन संचालन के लिए प्रच- 'लित किया है । इसमें 'समता दर्शन' के साथ-साथ 'समीक्षण ध्यान पद्धति' है । जिसमें अपनी ही वृत्तियों का समता पूर्वक निरीक्षण करना होता हैं । इसके अलावा संस्कार क्रांति, धर्मपाल प्रवृति और वीरवाल संध भी हैं । जैन दर्शन में नानेश ने उक्त आध्यात्म आन्दोलनों के जरिए विश्व शांति और अहिसक समाज की रचना का मार्ग दिखाने का प्रयास किया है । उक्त आध्यात्म प्रयासों से समाज में बदलाव का उदाहरण मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के छ: सौ गांव हैं जहां के लोगों ० १० व २५ मार्च १९६२ जन की दुर्व्यसनों से मुक्ति एव उन्हें संस्कारित जीवन देने का कार्य किया गया । नानेश वर्तमान परिस्थितियों में जैन दर्शन के समता सूत्र को प्रासंगिक मानते है । उनका कहना है कि जीवन में विभिन्न प्रकार की विषम मानसिक ग्रन्थियां बनी हुई हैं। इसी के परिणाम स्वरूप व्यक्ति-व्यक्ति में तनाव है । समाज, राष्ट्र और विश्व तनाव के दौर में गुजर रहे हैं । ऐसी स्थिति में समभाव, सम दृष्टि और सम व्यवहार ही मानसिक क्लेशों को मिटा सकते है । यही समता सर्वव्यापक और सुखकारक बन सकती है । जैसे लोकतन्त्र राजनीतिक समता का प्रतीक है, परन्तु स्वार्थ- वश देश के कर्णधार इस लोकतन्त्र को समता व्यवहार से नहीं देखते। इसी कारण देश में जनतन्त्र का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है और लोकतन्त्र की कई बुराइयां सामने आने लगी हैं । इसी तरह समाज- वाद आर्थिक एवं सामाजिक समता का आधार है । अभी देश में सब जगह स्वच्छ प्रतिस्पर्धा की बजाय कटु प्रतिद्वद्धिता व्याप्त है जो समाज, राष्ट्र एवं यहां तक मानव जाति के हित में नहीं है। ऐसी विषम वृत्तियों का निराकरण कर समता के अवतरण से परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में शांति की स्थापना हो सकेगी। यह समता दर्शन का माहौल तैयार करके ही किया जा सकता है । पंजाब, कश्मीर में हिसा, समाज में तनाव, राजनीति में मूल्य ह्रास और व्यक्ति के जीवन में स्वार्थ परायणता । इन सब कारणों से पूरे राष्ट्रीय जीवन की विकट परिस्थितियों को नानेश ने विचार प्रदूषण की संज्ञा दी है। ऐसी विकट परिस्थितियों के निराक- रण के लिए समता दर्शन के माध्यम से 'संस्कार क्रांति' को जरूरी - बताते हुए सह अस्तित्व और सहिष्णुता के चिन्तन को अनिवार्य बताया है। नानेश ने देश के सभी राजनीतिक दलों से पार्टी की विचारधारा के साथ 'समता दर्शन' को अनिवार्य रूप से जोड़ने का आग्रह किया है । उनका मानना है कि इससे पार्टियों के जाचरण सुधरेगे । इसी प्रकार सही मायनों में राष्ट्रीय धर्म का पालन हो सकेगा। राष्ट्र धर्म तभी बच सकेगा जव सुसंस्कारित नागरिक अपने तुच्छ स्वार्थों का त्याग कर पहले दू के हितों की रक्षा के प्रति संवेदनशील बने । वर्तमान में व्यरि दृष्टिकोण ही दूषित हो गया है । हर व्यक्ति खुद के लिए पहले .

“७२ ० दीक्षा विशेषांक है । वह अपने स्वार्थो की पूर्ति करना चाहता है । इसी स्वार्थ पराय- रगता के कारण वह सह-अस्तित्व व समता को अनदेखा कर देता है। इसी से विषम परिस्थितियां पनपती है । कही आतंकवाद आता है तो कहीं हिसात्मक आन्दोलन तो कही विद्रोह । नानेश ने समता दर्शन की व्याख्या करते हुए बताया कि 'समता का अर्थ है 'समान' । यह समानता सभी क्षेत्रों में हों । व्यक्ति और समाज में समता होगी तो स्वच्छ व संस्कारित समाज होगा क्योंकि व्यक्ति-व्यक्ति के समूह से ही समाज में स्वतः समता आ जाएगी। इसी तरह सभी आत्माएं समान है । चाहे वह प्राणी मात्र की आत्मा 'हो या परमात्मा हो । दोनों में जो विषमता है कर्मों के कारण है। अगर एक-एक व्यक्ति समता को अंगीकार करें तो परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में समतामय वातावरण बन जाएगा । इससे सम्पूर्ण मानव जीवन ही समतामय आचरणों से परिपूर्ण हो जाएगा । फिर जीवन का हर पहलू राजनीति, अर्थनीति, समाज व्यवस्था और पारि- वारिक ढांचा समानता की नींव पर खड़ा हो जाएगा । तब भौतिकता और आध्यात्मिकता एक-दूसरे की पूरक बन जाएगी । कहीं संघर्ष तथा हिसा के लिए स्थान ही नहीं बचेगा । समाज और राष्ट्र के जीवन में जो बाध्य समस्याएं दिखाई देती हैं उनका समता के सुसंस्कार से स्वतः निदान हो जाएगा। समतामय सामाजिक चिन्तन से जो विकृत दृष्टि पहले अपने स्वार्थ का चिन्तन करती है वह सम दृष्टि से अपने आत्म स्वरूप देखेगी। इससे स्वार्थः परायणता की बजाय परोपकार की भावना पैदा होगी । मानव समाज में ज्यों-ज्यों समता का चिन्तन बढ़ता जाएगा त्यों. सार्वजनिक हित को प्रमुखता मिलेगी। इससे स्वयं पाने की प्रति- स्पर्धा के कारण होने वाला सामाजिक तनाव समाप्त हो जाएगा। ऐसे ही सामाजिक, राष्ट्रीय एवं विश्व जीवन में समता की ज्योति प्रज्वलित हो सकेगी। समता के अच्छे संस्कारों में पीढ़ी दर पीडी वृद्धि होने से समता का वायुमण्डल बन सकेगा। ऐसा वायुमण्डल समस्त प्राणी समाज के साथ सहानुभूति एव सहयोग की भावना स्थायी बना सकेगा । विश्व दर्शन तभी सार्थक हो पाएगा जब समता की साधना करने वाला योग दृष्टा अपनी अन्तदृष्टि से सम्पूर्ण ,, को त्यों . को १० व २५ मार्च १९६२ ७३ समतामय बना सके। नानेश का समता दर्शन को स्पष्ट करते हुए कहना है कि ता विचार में आए । दृष्टि और वाणी मे समता का आविर्भाव | आचरण में समता आए तभी जीवन के अवसरो को प्राप्ति । सत्ता और संपत्ति के अधिकार में भी समता का सोच होगा ो व्यवहार के सभी आयाम में इसे स्थापित किया जा सकेगा। । से समता का चिन्तन न्यक्ति के अन्र्तमन तथा समाज के जीवन आ सकेगा। -सह-सम्पादक, राजस्थान पत्रिका, बोकानेस श्रमरण कौन ? phot A संकलन-प्रमोद नागौरी समे य जे सव्वपारणभूतेसु, से हु समणे । जो समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखता है, वस्तुत: वही श्रमण है। -प्रश्न व्याकरण सूत्र २/५ न हु क इतवे समरणो । जो दभी है, वह श्रमण नही हो सकता । -आचारांग नियुक्ति २२४ नाणी संजमसहिरो नायव्वो भावओ समणो । जो शानपूर्वक संयम की साधना मे रत है, वही सच्चा श्रमण है । - उत्तराध्ययन नियुक्ति ३८९ समो सव्वत्थ मणो जस्स भवति स समणो । जिसका मन सर्वत्र सम रहता है, वह श्रमण है । -उत्तराध्ययन चूणि २ जह मम ण पिय दुक्ख, जाणिअ एमे व सव्वजीवाणं । न हणइ न हणावेइ अ, सममणइ तेण सो समणो ।। जिस प्रकार मुझ को दु:ख प्रिय नही है, उसी प्रकार सभी जीवों को दु:ख प्रिय नही है, जो ऐसा जानकर न स्वयं हिसा करता है, न किसी से हिसा करवाता है, वह समत्वयोगी ही सच्चा श्रमण है । -अनुयोग द्वार सूत्र १२६. सेठिया जैन लाइब्ररी, बीकानेर .

यह एक व्यवहार दर्शन है क्योंकि समाज के परिवेश में रहते हुए साथ आचार्य श्री नानेश की विलक्षण देन : समीक्षण-०यान A भंवरलाल आचार्य श्री नानेश का उदयपुर वर्षावास समाप्ति पर या कुछ प्रबुद्ध श्रावकों ने आचार्य-प्रवर से निवेदन किया कि आप म प्रवचन में समीक्षण-ध्यान की चर्चा करते हैं । हमें इसके व्यवहार दिशाबोध प्रदान करने की कृपा करें। इस पर आचार्य-प्रवर ने .. स्नेह पूर्वक अपनी साधना के अमृत को अपनी आत्मस्पर्शी अ. को समाज के जिज्ञासुओं हेतु अभिव्यजित किया और भौतिकता अस्त समाज को आध्यात्मिक अन्तरावलोकन का सुअवसर मिला। समीक्षण ध्यान आत्मदर्शन की साधना है "आत्मानं विद्धि । चित वृतियों का विरोध करते हुए मनःसाधना से इसका प्रारम्भ जाना चाहिए । बर्हिमुखी चित्तवृतियों को नियंत्रित करते हुए . बनना, अपने अन्तरंग में प्रवेश करना इस ध्यान की प्रथम सीढ़ी है इसके लिए तीव्रतम संकल्प, स्थान एवं वातावरण की शुद्धता और की नियमितता होना उपयोगी है । यथासंभव ब्रह्म मुहूंत में विधिपूर्वक वन्दन के पश्चात् . समीक्षण की अनत्तयात्रा पूर्वक चित का सृजन होता है । विनय वन के साथ त्याग भाव की ओजस्विता से संयुक्त साधक मन की वृत्तियों को नियंत्रित करते हुए विश्व मैत्री की उच्च भावना का आह्व करता है । इस प्रकार प्रारम्भ हुई उसकी आत्म-साधना शनैः अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर विश्वात्म साधना के पथ को :५९ करती है। समीक्षण शब्द का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ है-सम्यर प्रकार से अथवा समतापूर्वक देखना, निरीक्षण करना । सम+ईक्षण इ. दो शब्दों के योग से समीक्षण शब्द बनता है । सम का अर्थ है सभा अथवा सम्यक् और ईक्षण का अर्थ है-देखना । अतः समीक्षण के अर्थ हुअा अपनी ही वृतियों को सम्यग्रीत्या समभावपूर्वक निश्चित से देखना । इस प्रकार प्रकार समीक्षण ध्यान एक अन्तःप्रज्ञा चक्षु है . प . मनोवृत्तियों का समायोजन करता है । इससे आदर्श स्थैर्य प्राप्त होत । १० व २५ मार्च १९६२ ७५ । और सहज योग सिद्ध होता है । जिससे प्रत्यक्ष साधना का प्रभाव 'नदिन जीवन में भी प्रस्फुटित होता है । इससे अहं और मम का वेसर्जन हो प्राणीमात्र से एकात्म स्थापित होता है एकाग्रता और आत्म सक्ति का संचय होता है । श्वांस-प्रश्वांस के द्वारा शरीर समीक्षण भी नाधता है। परम श्रद्धेय समीक्षण योगी आचार्य श्री नानेश की पावन जानिध्य में साधक इस ध्यान साधना का अभ्यास करते हुए निरन्तर आत्म और परमात्म कल्याण में रत है । गुरुदेव की सानिध्य में बोरी- ली वम्बई में आयोजित समीक्षण ध्यान साधना शिविर स्वयं में अनूठा था । श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ द्वारा रतलाम के दिलीप- नगर छात्रावास परिसर में समीक्षण ध्यान के स्थाई केन्द्र की स्थापना की गई है । समीक्षण से सद्विचार और समता के भाव जागृत होते हैं और ये भाव ही विश्व कल्याण के हेतु है । आइए समीक्षण ध्यान साधना से अपनी चेतना को जागृत करें और आलौकिक, सत् चित् आनन्द धन स्वरूप में प्रतिष्ठित होवे । -बीकानेर जय नानेश श्री नानेशाचार्य नमः जय महावीर का . म. सा. आचार्य श्री नानेश द्वारा युवाचार्य चादर महोत्सव के शुभ अवसर पर युवाचार्य श्री श्री रामलालजी के यशस्वी तेजस्वी एवं दीर्घायु जीवन की शुभ कामना करते है । फर्मः- विनीत (२) रतनलाल कालूराम कालूराम नाहर (२) विनोद उद्योग एवं ६ महावीर बाजार, व्यावर समस्त नाहर परिवार दूरभाष : २१६२८/२००३८ दीक्षा का स्वरूप और ए A डॉ. नरेन्द्र ।। जो साधक परमात्म बनने की दिशा में सांसारिक माया और पापकारी प्रवृतियों से अलग हटकर, उत्कृष्ट वैराग्य भावना कर, गुरु चरणों में समर्पित हो आजीवन सम-भाव में रमग करने लिए प्रतिज्ञाबद्ध होता है, उस प्रक्रिया का नाम दीक्षा है । दीक्षा शब्द “दीक्षा" धातु से बना है जिसका अर्थ है धर्म-सस्कार के लिए अपने आपको तैयार करना, आत्म-संयम की बढ़ना । दीक्षा आन्तरिक चेतना के रूपान्तरण का नाम है । यह आध्यात्मिक जीवन का प्रवेश द्वार है । वृतियों के पवित्रिकरण संस्कार शीलता का नाम है दीक्षा । दीक्षा के मोटे रूप से दो स्तर है । एक श्रावक दीक्षा दूसरी श्रमण दीक्षा । श्रावक दीक्षा सद्गृहस्थ बनने और अपने आदर्श नागरिक के गुणों को आत्मसात् करने की प्रतिज्ञा ग्रहण का नाम है। श्रावक उसे कहा गया है जो श्रद्धा और विवेक पूर्वक शक्ति और मर्यादा के अनुसार हिंसा, भूठ, चोरी, कुशील, परिया त्याग कर आत्म-गुणो को प्राप्त करने की दिशा में सक्रिय बन और आंशिक रूप से व्रत-नियमादि ग्रहण कर वह संसार में रह भी अधिकाधिक संयमी जीवन जीता है। श्रमण दीक्षा श्रावक दीक्षा की अगली सीढ़ी है। प्रन अर्थ में श्रमण दीक्षा को ही दीक्षा कहा जाता है श्रावक दीक्षा व्रत धारण करने तक सीमित है। जो साधक श्रमण दीक्षा । करता है वह गृह और परिग्रह तथा उसके ममत्व से रहित होत वह आजीवन हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का तीन योग से अर्थात् मन, वचन, काया से इन पापकारी प्रवृतियों को न करने, दूसरों से न करवाने और उन्हें करते हुए का अनुमोद करने की प्रतिज्ञा धारण करता है। इस प्रतिज्ञा द्वारा वह नए अ त्मिक जीवन में प्रवेश करता है । दीक्षाधारक साधक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और स चारित्र की निरतिचार आराधना के लिए साधना के मार्ग में वाली कठिनाइयों और बाधाओं को हंसते-हंसते सहन करता है ।

० १० व २५ मार्च १९६२ नंगे पांव पैदल चलता है शरीर-रक्षण के लिए घर-घर जाकर मधुकरी वृत्ति से निर्दोष आहार ग्रहण करता है, कल के लिए कुछ भी सचित नही रखता । अपने पास कोई पैसा, नोट, गहना आदि कुछ भी नहीं रखता, वह इसका स्पर्श तक नहीं करता। रहने के लिए अपना निजी कोई मकान नही रखता । वर्षावास को छोड़कर शेष आठ महीने वह आध्यात्मिक उपदेश देने, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने, जीवन को व्यसन मुक्त कर सुसंस्कार डालने की भावना से गांवगांव, नगर-नगर पद विहार करता है और कहीं भी एक माह से अधिक नही रूकता। दीक्षा अंगीकार करते समय साधक अपने पुराने वस्त्रों को त्याग कर आध्यात्म जीवन के प्रतीक सादे वस्त्र धारण करता है और उनकी मर्यादा करता है। अपने भावी जीवन-व्यवहार को शुद्ध, पवित्र और निर्मल करने के लिए वह प्रतिज्ञाबद्ध होता है, साथ ही अतीत में उसके द्वारा जो भी दुष्कृत अर्थात् बुरे कार्य हुए हैं, उनके लिए सबसे क्षमा मांगता है, उनकी यात्म साक्षी से निंदा करता है। इस प्रकार विगत अशुद्ध जीवन और दुष्कृत्यों के प्रति निदा, गर्दी करके वह अपने हृदय को पाप रहित, भारहीन बनाकर नए जीवन की तैयारी करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि दीक्षा तथाकथित आधुनिक शिक्षा की अर्थकारी भोगोन्मुखी प्रवृत्ति से परे आत्मबोध की सहज स्फुरणा है, आत्म-साक्षात्कार करने की विशिष्ट प्रक्रिया है, चेतन का अपनी स्वानु- भूति में स्थित होने की साधना है, मन की ग्रंथियों को भेदकर निर्ग्रन्थ बनने की प्रतिज्ञा है। इसमें आत्म-सुधार, जीवन निर्माण, लोक कल्याण, अहिंसक समाज रचना और विश्वमंत्री का बहुत बड़ा आदर्श निहित है। -अध्यक्ष, हिन्दी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर वह पूज्य है तेसि गुरुणं गुण सागराण, सोच्चाण मेहावि सुभासियाई। चरे मुणी पंच रए तिगुत्तो, चउक्कसायावगरा स पुज्जो ।। -जो मेधावी मुनि उन गुण-सागर गुरुओं के सुभाषित सुनकर उनका आचरण करता है, पांच महाव्रतों में रत, मन, वाणी और शरीर से गुप्त तथा क्रोध, मान, माया और लोभ को दूर करता है, वह पूज्य -दशवै. अ. ६. उ. ३ -~~-~- al हुशि उ चौ श्री जग नाना साधुमार्गी परम्परा के ज्यो- तित नक्षत्र : अष्टाचार्य जानकी नारायण श्रीमाली भारतीय संस्कृति की अनादि और अनन्त प्रवाहमयी प्राध्या- त्मिक परम्परा की प्रतिनिधि परम्परा है साधुमार्ग । अतः सामान्यतः इसके उद्भव को अनादि व अनन्त ही कहा जा सकता है किन्तु विकास क्रम में सबसे पहले प्रथम तीर्थकर भगवान श्री ऋषभदेव ने जनमानस का ध्यान साधुमार्गी परम्परा की ओर आकर्षित किया । अतः वे इसके उद्गाता कहे जाते हैं और उन्हें आदिनाथ नाम से भी भी सम्बोधित किया जाता है । उन श्रीऋषभदेव भगवान से लेकर प्रभु महावीर तक सभी तीर्थकरो ने अपने-अपने शासनकाल में साधुमार्गी परम्परा का प्रति- पादन किया। प्रभु महावीर के पश्चात सुधर्मा स्वामी से प्रारम्भ हुई आचार्य परम्परा ने साधुमार्ग को आज तक अक्षुण्ण रखा । प्रथम आचार्य सुधर्मा स्वामी के पश्चात आचार्य पद पर विराजित होने वाले ७४ वे आचार्य श्री हुकमीचन्द जी महाराज साहब महान क्रियोद्धारक हुए और उनसे प्रारम्भ हुई पाट परम्परा के अष्टम पटधर हैं आचार्य श्री नानेश । आइये इस अष्टाचार्य के गौरव गाथा का विहंगावलोकन करें । [हु]-संयम की प्रदीप्त ज्योति, महान क्रियोद्धारक दीर्घ- तपस्वी आचार्य श्री हुकमीचन्द जी महाराज साहब का ३८ वर्ष की संयम साधना के बाद जावद में संवत् १९१७ में महाप्रयाण हुमा । आपने श्रमण संस्कृति को सुरक्षा हेतु नई क्रांति का शंखनाद किया और संघ का विस्तार किया। जिससे हुकम सम्प्रदाय का प्रादुभाव हुमा । [शि] -आचार्य श्री शिवलाल जी महाराज साहब अपने गुरु की भाति ही परम तपस्वी ओर प्रकाण्ड विद्वान थे । आपको बीकानेर में युवा. चार्य पद मिला और आपने १८ वर्ष के आचार्यत्व में चतुर्विध संघ में नवजीवन का संचार किया ! [उ]-आचार्य श्री उदयसागर जी महा- राज साहब विरक्तों के आदर्श थे। कहते है आप विवाह करने गए पर चंवरी में प्रवेश के समय साफा अटकर गिर गया तो आपने फिर मुडित मस्तक रहने का ही संकल्प लिया और दीक्षा ग्रहण कर ली।

• १० व २५ मार्च १९६२ ७६ न जोधपुर के खिविसरा परिवार में जन्मे प्राचार्य श्रीजी विलक्षण व्यक्तित्व और प्रतिभा के धनी धर्मयोद्धा थे । आपके कार्यकाल में चतुर्विध संघ का बहुमुखी विकास हुआ। [चौ]-प्राचार्य श्री चौथमल जी महाराज साहब आचार्य पद पर सं. १९५४ में विराजे । यद्यपि सं. १६५७ में आपका स्वर्गवास हो गया किन्तु आपने संघ के आन्तरिक विकास में महान भूमिका निभाई । [श्री]-आचार्य श्री श्रीलालजी महाराज साहब - अद्भुत स्मृति के धारक और काम विजेता थे । टोंक के बम्ब परिवार - मे जन्मे और बनेड़ा में दीक्षित हुए । सं. १६५७ मे आचार्य पद पर विराजे । आपने २० वर्ष शासन किया । जयपुर चातुर्मास से आपने - अहिसा प्रचार को अभिनव आयाम दिया । आपकी प्रेरणा से शिक्षा i, क्षेत्र में नए युग का सूत्रपात हुआ और जैन गुरुकुल की स्थापना हुई। - [ज]-ज्योतिधर श्री जवाहराचार्य जी महाराज साहब का शासनकाल : राष्ट्र में स्वातंत्र्य की चेतना का काल था । महान क्रान्तिकारी, युग- ; दृष्टा युगस्रष्टा आचार्य प्रवर ने राष्ट्रधर्म पर प्रखर प्रेरणा प्रदान की। उस काल के युग पुरुषों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, ह, सरदार पटेल व पंडित नेहरू जैसी विभूतियों ने आचार्य-प्रवर के स्व- देशी और स्वराज्य पर विचार-विनिमय किया । वि. सं. १९७६ से स. २००० तक आपने देश का व्यापक भ्रमण कर धर्म प्रचार किया। आपके प्रोजस्वी विचारों की संवाहिका जवाहर किरणावलियां उत्कृष्ट साहित्य की प्रतीक हैं । आपने संचोर "सद्धर्म मंडन" किया । [ग]- : आचार्य श्री गणेशीलाल जी महाराज साहब का जन्म बीरभूमि मेवाड़ । की उदयपुर नगरी में हुआ था । संवत् १९६२ में दीक्षित होकर ; संवत् २०१६ तक के ५७ वर्ष के दीक्षा पर्याय में आपने । शासन की महान सेवा की । आपने पतितोद्धार, अपरिग्रह और संयम साधना पर बल दिया । संत विनोबा भावे और जयप्रकाश वाबू ने आपसे राष्ट्र चर्चा की। सादड़ी के ऐतिहासिक साधु सम्मेलन में आप श्रमण संघ के नायक निर्वाचित हुए और दृढ़ता से शासन करते हुए आपने जब आवश्यक समझा शांत क्रांति की श्रीगणेश किया। [नाना]-समता विभूति आचार्य श्री नानेशः--गुरुणांगुरु श्री गणेशा- महाराज साहब के उत्तराधिकारी के रूप में श्री नानालाल जी महाराज साहब ने अष्टम पटधर बनकर शासन को प्रदीप्त किया । दांता - ग्राम जिला चित्तौड़गढ़ में श्री मोडीलाल जी पोखरणा औ " - । चार्यजी ८० ० दीक्षा विशेषांक श्रीमती शृगार ब ई के पुत्र रूप में आपने सं. १६७७ की ज्येष्ठ शुक्ला २ को जन्म लिया । वि. सं. १६६६ की पौष शुक्ला ८ को कपासन में दीक्षा ग्रहण की और सं. २०१६ की माघ कृष्णा द्वितीया को हो प्राचार्य पद पर आरूढ़ हुए। जिनशासन प्रद्योतक प्राचार्य भी नाने की पावन नेश्राय में २६८ भव्य मुमुक्षु आत्माए संयम पथ पर आरूढ़ हो चुकी है और वर्तमान दीक्षा प्रसंग इसी क्रम में एक वामन चरण है । समता-विभूति आचार्य-प्रवर ने आचार्य पदारोहण के प्रथम वर्ष में ही विषमता से ग्रस्त समाज को समता के अमृत मंत्र का आदर्श दिया और मालव अंचल के ६०० गांवों में वलाई जाति के सहस्रों जनों को उद्बोधन दे धर्मपाल के सवर्ण विरुद का अधिकारी बनाया । सदाचारी व समता. मय समाज-रचना के इस महनीय कार्य हेतु राष्ट्र धर्मपाल प्रतिबोधक आचार्य श्री नानेश का आभारी है। आचार्य-प्रवर ने समीक्षण ध्यान योग के दर्शन और व्यवहार प्रयोग से, समाज जीवन में एक नई आशा का संचार किया है। इससे प्रेरित हो "समत्वं योग उच्यते" के आदर्श को साकार बनाने हेतु साधक वर्ग देश भर में साधनारत है । प्रकृति से एकात्म प्राचार्य-प्रवर के पीयूष प्रवचनों से इस राष्ट्र के ग्राम-ग्राम, नगर-नगर, डगर-डगर, में समता की गूज-अनुगूज प्रतिध्वनित हो रही है, समस्त राष्ट्र के नैतिक व धार्मिक मूल्यों का अक्षय पाथेय प्राप्त हो रहा है । आपके अलौकिक व्यक्तित्व और आपकी कल-कल बहती भागीरथी सी पावन प्रवाहमयी संयम यात्रा राष्ट्र में परिव्याप्त मूल्यों के संकट का सहज समाधान प्रदान करती है । आगम निधि आचार्य- प्रवर की पावन नेश्राय में उपयोजित वर्तमान दीक्षा प्रसंग से बीकानेर की सारस्वत भूमि-पर एक अभिनव तीर्थ की स्थापना होने जा रही है। श्राप परम प्राचार्य श्रीसुधर्मा स्वामी के ८१ वें पटधर हैं । ऐसे महान आचार्य श्री को कोटि-कोटि वन्दन् ! ० प्रशंसा जहरीले सर्प के समान है । अगर इसका विष तुझे चढ़ गया तो तू नष्ट हो जाएगा । ० फल को देखने वाला अागे नहीं बढ़ सकता; कर्तव्य करने वाला ही पागे बढ़ सकता है । -बीकानेर -~-आचार्य श्री नाने 卐 जीवन का सार भूत तत्व है-- दीक्षा A प्रो. सतीश मेहता मस्परोपको ताज मरु प्रदेश के वीच स्थित बीकानेर में ऐतिहासिक भव्य दीक्षा होत्सव १६ फरवरी १९६२ को प्राचार्य श्री नानेश के सान्निध्य में । भारतीय संस्कृति आध्यात्म प्रधान संस्कृति है। उसमें भी श्रमण कृति में दीक्षा का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। दीक्षा कल्याण का 1 भाव है, जीवन का एक परिवर्तन है । अंधकार से प्रकाश की र अग्रसर होने की यात्रा है। दीक्षा अशुभ आचार विचार और वहार का बहिष्कार है, शुभ संस्कार है, शुद्धता का स्वीकार है। रन्तर साधना पथ पर चलते रहना ही दीक्षा है। अतः दीक्षा जीवन सार भूत तत्व है। कोई भी साधक जो आत्मा के कल्याण के लिए एवं शांति प्राप्ति के लिए मोह माया को त्यागकर वैराग्य की भावना ग्रहण गुरु के चरणों में समर्पित हो एवं समता का पालन करता है, इस घि को ही दीक्षा कहते है । सम्यग्ज्ञान, दर्शन, चरित्र ही मोक्ष का र्ग है । दीक्षा धारक इनकी आराधना के लिए साधना के मार्ग में ने वाली कठिनाइयों और बाधाओं को खुशी से झेलता है। वह च महाव्रत का पालन करता है। पैदल चलता है । अपरिग्रह का तया पालन करता है। रुपए, पैसे, सोना, चांदी कीमती वस्तु आदि ता भी नहीं है । जीवनपर्यन्त आध्यात्मिक उपदेश देते हुए समाज । बुराइयों को दूर करने का प्रयास करता हुआ जन-जन तक महा- हषों व अपने गुरु के संदेश को पहुंचाने के लिए पद यात्रा करता एवं चातुर्मास को छोड़कर एक माह से अधिक नहीं रुकता है । दीक्षा ग्रहण करते समय दीक्षार्थी ( मुमुक्षु आत्माए) राने वेष को त्यागकर मुनिवेश धारण करता है और प्रतिज्ञा करता कि वह पांच महावत का पूर्णतया पालन करेगा । साधुमार्गी परम्परा । जो आठवें आचार्य श्री नानेश ५२ वर्षों से संयम साधना में लगकर भु महावीर के संदेश को आम लोगोंत क पहुंचा रहे हैं । अपने आचार्य- व के २६ वर्षों में आप हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा कर जन- ८२ • दीक्षा ५ जन में सयता संदेश का प्रचार प्रसार कर ग्राम लोगों में नैतिक धार्मिक चेतना का संचार कर रहे हैं । भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक संतों, ऋषि मुनियों व त्माओं का विशिष्ट योगदान रहा है। हमारे देश में राम, कृष्ण, वीर, बुद्ध जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया है । इनके उपदेश आउ हमें मार्गदर्शन प्रदान कर रहे है। जैन दर्शन में भगवान महावीर अमूल्य योगदान है । प्रभु महावीर की वाणी को व उनके बताए सिद्धान्त को आचार्य श्री नानेश आगे बढ़ा रहे हैं । आचार्य श्री न ने समता का संदेश दिया। समता दर्शन को स्पष्ट करते हुए बता कि वर्तमान का युग कुठा, अशान्ति, आतंक व असंतुलन का युग आज संसार विविध विषमताओं से ग्रस्त है और देश में सामा आर्थिक, राजनैतिक, पारिवारिक क्षेत्र में विषमता व्याप्त है। कारण लोगों का जीवन अशांत है । आचार्य श्री नानेश ने इन सभी समस्याओं को हल कर लिए एक स्थाई सुख शांति और आनन्द प्राप्त करा देने वाली रा औषधि बताई है, समभाव, समदृष्टि, समता । उन्होंने कहा कि से ही विभिन्न क्षेत्रों में विषमता को समाप्त कर शांति स्थापि ना सकती हैं । समता, साम्य, समानता मानव जीवन एवं उसके का शाश्वत दर्शन है । आध्यात्मिक या धार्मिक क्षेत्र हो अथवा नीतिक या सामाजिक सभी का लक्ष्य 'समता' है क्योकि समता मन के मूल में है । आचार्य श्री ने समता को स्पष्ट करते हुए है कि मानव मानव में ऊंच-नीच की भावना को छोड़कर सहृदय हार करना समता है। इस प्रकार विपमता में समत्व की अनुभू समता है। आचार्य श्री कथनी व करनी में समानता की बात पर देते हुए कहते है कि यदि समता को जीवन में क्रियान्वित करें अवश्य ही समता द्वारा शांति सम्भव है। वर्तमान प्रदूषित सर शांतिमय जीवन व्यतीत करने के लिए प्राचार्य श्री नानश द्वारा का प्रचार प्रसार किया जा रहा है उन्होने चार सिद्धान्त । के बताए हैं - (१) सिद्धान्त दर्शन (२) जीवन दर्शन (३) आर.

ܘܕܳܨ ० व २५ मार्च १९६२ 1- , परमात्मदर्शन । इनका प्रतिपादन करते हुए आचार्य श्री ने बताया इनके पालन से जीवन उन्नतिकारक, शीलवान, अहिंसक होगा, से विश्व शांति और वसुधैव कुटुम्बकम की कल्पना सार्थक होगी। समता दर्शन का लक्ष्य है समता विचार में हो, दृष्टि और [ में हो तथा समता आचरण के प्रत्येक चरण में हो। तब समता न के अवसरों की प्राप्ति में होगी, सत्ता ओर सम्पत्ति के अधि- में होगी एवं व्यवहार के समूची दृष्टिकोण में होगी। अर्थात् मानसिक एवं आत्मिक शाति का मूल आधार समता व्यवहार है। परिवार में समता का पालन करने से सदस्यों में नैतिक गुणों वकास सहज हो जाता है । इससे परिवार समताशील व संस्कार- और शांतिप्रिय होते है । सामान्य व विपम भावों से ग्रस्त परि- में समता को पुष्ट करने के लिए आवश्यक है कि सामायिक व मण या धार्मिक अनुष्ठान की क्रियाएं समदृष्टिपूर्वक की जाए । स्पष्ट है कि परिवार से ही समाज का निर्माण होता है क्योंकि गार के प्रमुख सदस्यों का समता व्यवहार बच्चों में समता दृष्टि उर्जना करेगा । अतः पारिवारिक समता ही विश्व समता का आधार वर्तमान के तनावपूर्ण जीवन में हम आचार्य श्री नानेश के समता को व्यवहार में उतारने का प्रयास करेंगे तो हमारा यह सुख शांति व आनन्ददायक बन सकता है। आध्यात्म में ध्यान का विशेष महत्व है। प्राय: सभी धर्मो यान पर बल दिया गया है । ध्यान से व्यक्ति को शांति मिलती एव बौद्धिक शक्ति प्राप्त होती है। आचार्य श्री नानेश ने भी न पर बल दिया है जिसे समीक्षण ध्यान के नाम से जानते हैं । वार्य श्री नानेश द्वारा प्रतिपादित समीक्षण ध्यान से व्यक्ति तनाव व आत्मिक शान्ति को प्राप्त कर सकता है । आचार्य श्री के समता सन्देश से प्रभावित होकर मध्यप्रदेश ज्य के मालवा क्षेत्र के ६०० गांवों के बलाई जाति के एक लाख ग व्यसन मुक्त हो चुके है । आचार्य श्री नानेश के सन्देश से लोगों जीवन तनाव मुक्त, शीलवान व संस्कारवान बना हैं । आचार्य श्री ० दीक्षा विशेषर नानेश ने अब तक ३० वर्षों में २६८ व्यक्तियों (दीक्षार्थी) को दो प्रदान की है । वर्तमान समय में पूर्व के एवं इनसे दीक्षित ३६ २ व २३६ साध्वियां इनके सान्निध्य में धर्म का प्रचार प्रसार कर है । बीकानेर की मरुधरा पूर्ण धरती पर आयोजित इस भव्य ऐति हासिक समारोह में देशभर के १६८ साधु-साध्विया इस दीक्षा ल में सम्मिलित होने के लिए पैदल विहार कर बीकानेर पहुचे ।। महोत्सव में भाग लेने देश भर से श्रद्धालु आए हैं। इस अवसर : बीकानेर में करीब ५० हजार तक श्रद्धालु इस समारोह में भाग । हेतु देशभर से पहुंचे। श्री जैन पी. जी. कॉलेज, ब । क्षणिकाएं प्राशा सुख में ना खुशी, दुःख में न गम- यही है सच्चे मनुष्य का मर्म । (२) धर्म है जीवन, ज्ञान वसेरा- क्षमा है भोजन विनय महारा। द्वारा श्री लक्ष्मीचन्द छोटी कसरावद (खरगौन) ४५११६६ अन्तर ज्वालाओ को अनुभव किया और चेत्र शुमला " समता समाज रचना : धर्मपाल प्रयोग A भंवरलाल कोठारी परम पूज्य आचार्य श्री नानालाल जी म. सा. वि. सं. २०१६ में उदयपुर के राजमहलों में आयोजित एक भव्य समारोह में आचार्य पद पर विराजमान हुए और वहां से विहार कर आप श्री ने सं. . २०२० का चातुर्मास मालवधरा की हृदयस्थली रत्नपुरी रतलाम नगरी में किया । रतलाम-चौमासा पूर्ण करके आचार्य श्री म. सा. मालवा के मन्दसौर, उज्जैन, इन्दौर, देवास, शाजापुर आदि क्षेत्रों के वन बीहड़ों में, दुर्गम पहाड़ी वौर सपाट मैदानी क्षेत्रों में अपनी पीयूष वर्षिणी वाणी से जिन धर्म के उदात्त और शाश्वत मानवी मूल्यों को प्रसारित-प्रचारित करते हुए पाद-विहार करते रहे थे । आचार्यत्व के वन पद पर आरूढ़ होने के बाद आप श्री का चातुर्मास उपरांत यह प्रथम विचरण था । अतः देश भर से अगाध श्रद्धालु श्रावक-श्राविका वर्ग और श्रमण-श्रमणी वर्ग में विशेष आकर्षण था और वे देश के कोने-कोने से समय-समय पर दर्शनार्थ मालव आते रहते थे । मालव क्षेत्र मे श्रद्धा और उत्साह का मेला सा लग रहा था । इस प्रकार आचार्य श्री जी विचरण करते हुए दि १६ मार्च १६६४ को नागदा पहुंचे । यहां सार्वजनिक प्रवचन में स्थानीय सुश्रावको ने आग्रहपूर्वक अछूत समझी जाने वाली बलाई जाति के लोगों को दर्शन प्रवचन हेतु आमत्रित किया । गुरुदेव के भव्य व्यक्तित्व, सरल प्रवचन और पावन प्रेरणा से एक बलाई युवक सीताराम राठौड़ ने गुरुदेव की सेवा मे निवेदन किया कि हम कृषिकर्म करते है किन्तु समाज हमे सम्मान और समता नही दे रहा है । आप श्री के वचनो से हमे आत्मिक शाति- मिली है । आप हमारे विशाल सम्मेलन को उपदेश देने के लिए गुराडिया पधारने की कृपा करे । आचार्य-प्रवर ने बलाई जाति के समझदार लोगो में समता की अमर और अतृप्त प्यास और अपमान की दग्ध कर देने पर दिनांक २३ मार्च ६४ को ग्राम गुराडिया में ७० गांधी को 47 ० दाक्षा विशेषा वारों आदि की विशाल पंचायत में अपना वह अमर उपदेश दिया, जिससे बलाई समाज को 'धर्मपाल' का सवर्ण विरूद प्राप्त हुआ और वे समता पथ के पथिक बन गए । गुराडिया के बाद भी गुरुदेव का ग्रामानुग्राम विहार होता रहा और बलाई उपदेशामृत पानकर धर्मपाल जैन बनते रहे । श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ ने आचार्य चरण का अनु- वर्तन करते हुए इन सैकड़ों गांवों में फैले सहस्त्रों नव जैन बन्धुओं संगठन, विकास और व्यसन विकार मुक्ति अभियान के सुसंचालन का दायित्व ग्रहण किया और श्री धर्मपाल प्रचार-प्रसार प्रवृति की स्थापना की। धर्मपालों को शिक्षण-स्वास्थ्य के सुअवसर प्रदान करते हुए उन्हें स्वावलंबी बनने की प्रेरणा दी गई । इसके लिए संघ ने बहुआयामी प्रवृत्तियों की स्थापना की। संघ द्वारा धर्मपाल क्षेत्रों में प्रवास, युवा रैली, धर्मजागरण, पदयात्रा, क्षेत्रीय एवं समग्र सम्मेलन, संघ अधिवेशनों पर धर्मपाल सम्मेलन और शिविर आयोजनों से समाज को संस्कारित किया गया । रात्रि पाठशालाएं खोली गई, स्वास्थ्य परीक्षण शिविरों और चल चिकित्सालय वाहन से निरन्तर सेवा का क्रम चलाया। कार्यवृद्धि हो जाने पर क्षेत्रीय समितियों का गठन किया गया । संतों के विचरण भी होते रहे। संघ द्वारा धर्मपालों की शिक्षा और संस्कार पर कितना बल दिया गया, इसका अनुमान केवल इसी एक बात से लगाया जा सकता है कि धर्मपाल शिक्षकों को सुसंस्कार प्रदान करने हेतु विश्व विख्यात शिक्षाविद् पद्म विभूषण डॉ. डी. एस. कोठारी, श्री सत्यप्रसन्न सिंह भंडारी एवं श्री रणजीत सिंह कूमट आदि का भी योगदान रहा । शीघ्र ही धर्मपाल नवयुवकों ने 'नानेश युवक मंडल' का गठन किया। दिलीप नगर में प्रेमराज गणपतराज बोहरा धर्मपाल जैन छात्रावास की स्थापना हुई। आज धर्मपाल प्रवृति विषमताग्रस्त भारतीय समाज में समता की स्थापना के एक भागीरथ प्रयास के रूप में समाप्त है । व्यक्ति सुधार से ग्राम सुधार, व्यष्टि से समष्टि और ग्राम से राष्ट्र की एका-

• १० व २५ मार्च १९६२
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त्मकता पूर्वक और ग्रामोदय से सर्वोदय की आधारशिला पर एक पूर्ण
अहिंसक, व्यसनमुक्त, विकार मुक्त, सेवावृत्ति समाज ही धर्मपाल समाज
रचना का लक्ष्य है । इन प्राकृतिक, सरल, सहज, ग्रामीणों में मैत्री,
समन्वय और न्यासी भाव की प्रतिष्ठा हो । धर्मपालों के अचल सकल्प
को आने वाली पीढ़ियां उन्नत मस्तक से स्मरण करे और धर्मपालों को
उद्बोधन देने वाले धर्मपाल प्रतिवोधक आचार्य श्री नानेश का समता-
समाज प्रत्यक्ष हो, आईए तदर्थ हम सभी सेवार्पित हों। -बीकानेर
विनय के प्रकार
विणए सत्तविहे पण्णत्ते । तं जहा-
१. णाणविणए २. दंसरण विणए ३. चरित्त विणए ४. मणविणए
५. वइविणए ६. कायविणए ७. लोगोवयार विणए ।
विनय सात प्रकार का बतलाया गया है-
१. ज्ञान-विनय २. दर्शन-विनय ३. चारित्र-विनय ४. मनोविनय
५. वचन-विनय ६. काय-विनय ७. लोकोपचार विनय ।
-उववाई सूत्र २०/भगवती शतक २५ उद्देशा ७.
-
धर्म के प्रकार
दसविहे धम्मे पण्णत्ते, तं जहा-
गाम धम्मे, नयरधम्मे, रट्ठधम्मे, पाखंड धम्मे, कुलधम्मे, गणधम्मे,
संघ धम्मे, सुयधम्मे, चरित्तधम्मे, अस्थिकाय धम्मे ।
धर्म दस प्रकार का कहा गया है । यथा-
१. ग्राम धर्म २. नगर धर्म ३. राष्ट्र धर्म ४. पाखण्ड-धर्म ५. कुल
धर्म ६. गण धर्म ७. संघ धर्म ८. श्रुत धर्म ६. चारित्र धर्म १०.
पास्तिकाय धर्म ।
-ठाणं. अ. १० सू. ७६०
-

दीक्षा के सन्दर्भ में ज्योतिधर श्री जवाहराचार्यजी की आत्मानुभूति जानकीनारायण श्रीमाली बीकानेर में भव्य भागवती दीक्षाओं के महान् प्रायोजन का सुअवसर समुपस्थित है । २१ भव्य मुमुक्षु अात्माएं भागवती दीक्षा अंगीकार करने को प्रस्तुत हैं । केवल बीकानेर के जैन-अजैन नागरिकों के ही अन्तर्मन को नहीं अपितु ग्राज के भौतिकवादी युग के जन-जन के मन की उद्वेलित करने वाला एक यक्ष प्रश्न भी दीक्षा प्रसंग पर उपस्थित हुआ है और वह प्रश्न है कि ये आत्माए ससार के समस्त सुखों का परित्याग कर दीक्षा के पथ पर क्यों अग्रसर हो रही है। यह प्रश्न बहुत बेचैन करता है और समाधान मांगता है। इस समाधान की खोज में दीक्षार्थियों से अनेक जिज्ञासुजनों ने भेट वार्ताओं की और उनके अन्तर्मन को टटोलने का प्रयास किया है । इन भव्य दीक्षार्थियों के सम्मान में, इनके अभिनन्दन में स्थान-२ पर अभिनन्दन समारोह आयोजित हो रहे हैं, इन समारोहों को भी प्रत्यक्ष देखने पर प्रतीत होता है कि समाज अभिनन्दन करने को उत्सुक है पर जिनका अभिनन्दन हो रहा है, उनकी मनःस्थिति मान- सम्मान से परे दिखाई देती है मानो दीक्षार्थी को अभिनन्दन का भाव छू नहीं सका है, वह विरक्त सा दिखाई देता है, सभी समारोहों में भाग लेकर भी निष्पृह प्रतीत होता है । ऐसा क्यों होता है ? क्यों संसार में रहकर भी एक आत्मा इसे असार मानती है ? कैसे वैराग्य के भाव ने सांसारिक जीवन के दृश्य सुखों को क्षण मात्र में परित्याग कर देने का अमित साहस एक सामान्य से दिखने वाले प्राणी में संचरित कर दिया है और उसे असा- मान्य सकल्प के साथ निर्ग्रन्थ बनने को अभिप्रेरित कर दिया है ? ये लघुप्रश्न अपने कलेवर में एक विराट विचार यात्रा को जन्म देते हैं और इनके समाधान हेतु हमें शास्त्रीय मार्गदर्शन की आव- ण्यकता अनुभव होती है । हमारे शास्त्र “आचारः प्रथमो धर्म:' का उद्घोप करते हैं और इसलिए जिन महापुरुषों ने अपने श्रेष्ठ आचरण से समाज जीवन के समक्ष स्वयं को आदर्श रूप में प्रतिष्ठित किया है, उनके यशस्वी ८8 ) व २५ मार्च १९६२ - में झाक कर देखने और उनके आचरण व उनकी अनुभूतियों र्गदर्शन प्राप्त करने की परम्परा का अनुसरण करते हुए मैं इस [ प्रसंग पर युगपुरुष ज्योतिधर श्री जवाहराचार्यजी के जीवन से उद्धरण प्रस्तुत करना उचित समझता हूं। स्वर्गीय ज्योतिधर आचार्य श्री जवाहरलालजी म.सा. ने जिस [ संकल्प के साथ अपनी सुदीर्घ संयम यात्रा पूर्ण की और जिनके -रोम से राष्ट्र व समाज को प्रेरणा के स्वर प्राप्त होते रहे, जिनके विश्व मानवता के कल्याण हेतु पुकार-पुकार कर अाह्वान करते जिनकी वाणी के ओज और विचारों के तेज ने उन्हे ज्यतिधर, अष्टा और युगदृष्टा के रूप में सर्वसमाहत बनाया, उन आचार्य श्री हरलालजी म.सा. के शान्त-प्रशान्त जीवन में जब वैराग्य का ज्वार रे लेने लगा, तब उनके अन्तस् के उद्गार क्या थे ? वे उद्गार एक दीक्षार्थी की मनोभावनाओं को प्रत्यक्ष कराने में समर्थ है। स्वयं स्व. श्री जवाहराचार्यजी का विचार मंथन कुछ शीर्षकों आपके अवलोकनार्थ व अनुभूति की तीव्रता को हृदयंगम करने के ए प्रस्तुत है- राग्य : चैतन्य आत्मा ! तेरी यह गम्भीर भूल है कि तू अब तक त्मा को भुला रहा । अब मेरी बात मान ले अपनी भूल को सुधारने गे. चेष्टा कर । तू परमात्मा का भजन कर । परमात्मा का सान्निध्य ो तुझे अपना लक्ष्य बनाना चाहिये तू आप ही अपना कर्ता है और जगत् के अन्य पदार्थ तेरे सहायक है । परन्तु तू उनसे काम लेने वाला त्वामी है । पर तू यह बात भूल रहा है । तू जिनका स्वामी है उनका दास बन रहा है उनकी अधीनता मे आनन्द मान रहा है । इसलिये.. अपना अज्ञान दूर कर और देख कि तेरे साधन तुझे किस कटकाकीर्ण पथ पर घसीटे लिये जा रहे हैं । अज्ञान दूर होते ही दिव्य प्रकाश तेरा स्वागत करेगा और परम कल्याण का पथ प्रदर्शित करेगा । अनन्त काल व्यतीत हो चुका है फिर भी तूने धर्म की विशिष्ट आराधना नहीं की । इस कारण तू सिद्धरूपी कोयल होकर संसारी जीवरूप कौवा बना हुआ है। अब तुझे अत्यन्त अनुकूल हे आत्मन् • दीक्षा विशेक अवसर हाथ लगा है । यह अवसर बार-बार नहीं मिलने का। 3 समय तू अपनी शक्ति का प्रयोग कर । अपने पुरुषार्थ को काम में ला। अगर अब भी तू अपना जोश न दिखायेगा तो अनादि काल से अब तक जिस स्थिति में रहा है, उसो स्थिति में चिर-काल पर्यन्त रहना पड़ेगा। समाधान : हमारे अन्दर अनेक त्रुटियों में से एक त्रुटि यह भी है कि हम अपनी अन्तरंग ध्वनि की ओर ध्यान नहीं देते । अन्तरात्मा जिस बात को पुकार-पुकार कर कहता है उसे सुनने और समझने की ओर हमार ध्यान ही नहीं जाता । अगर मनुष्य अपने अन्तर्नाद की ओर ध्यान दे तो उसे प्रायः कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में विमूह न होना पड़े । कसौटी : तुम ऐसी जगह खड़े हो जहां से दो मार्ग फटते हैं। तुम जिस और चाहो जा सकते हो । एक संसार का मार्ग, दूसरा मुक्ति का- अर्थात् एक मार्ग बंधन का और दूसरा स्वाधीनता का। ससार के वधन के मार्ग पर चलोगे तो चलने का कभी अन्त ही नहीं आ सकेगा और लक्ष्य पर कभी पहुंच नहीं सकोगे । मुक्ति का मार्ग शीघ्र ही भव-भ्रमण का अन्त लाता है । शास्त्रकारो ने मोक्ष मार्ग पर चलने की प्रेरणा की है। जो मनुष्य इस अमूल्य मानव देह को पाकर भी मौज-शौक में इसे गंवा देता है उसके बराबर कोई मूर्ख नहीं कहला सकता । बुद्धि- मान मनुष्य इस देह को पाकर क्षण-क्षण में अपनी श्रेष्ठ-साधना का मंत्र जपता रहता है पर मूर्ख यही समझता है कि मनुष्य जन्म पाया है फिर ऐसी देह नहीं मिलेगी, इसलिये जो कुछ मौज-शौक करलू वहीं मेरा है। सफलता : हे पात्मन ! जब अन्तरंग शत्रु तेरे अपर आक्रमण करेगे उस समय तू छिपकर बैठा रहेगा तो उन शत्रुओं पर विजय कैसे प्राप्त कर सकेगा । युद्ध के समय छिपे रहना बीरात्मा को शोभा नहीं देता । इसलिये तैयार हो जा, तेन बल अनन्त है । तेरी क्षमता अपार है।

०१० व २५ मार्च १९६२ हे आत्मन् संसार की समस्त शक्तियां तेरी शक्ति के सामने पानी भरती हैं। तेरे शत्रु भले ही प्रबल हैं पर अजेय नहीं है । उन्हे जीतने का प्रबल संकल्प करते ही आधी विजय प्राप्त हो जाती है । ! अब उठ खड़ा हो । अपनी शक्ति को सम्भाल! अन्तरंग शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर डाल । शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने से तुझे अलौकिक वैभव प्राप्त होगा । तू सनातन साम्राज्य का स्वामी बनेगा। दीक्षा संस्कार : कर्म-रहित अवस्था प्राप्त करना अपने ही हाथ की बात है। सयम किसी भी प्रकार दुःखप्रद नही वरन् आनन्ददायक है । विवेक- पूर्वक संयम का पालन किया जाये तो संयम इस लोक में भी सुखदायक और परलोक मे भी। प्रभु की गोद में : मुनि जीवन धारण करने के महत् उद्देश्य को स्वयं उनके समय-समय पर व्यक्त निम्न उद्गारों के माध्यम से हृदयगत करना सर्वाधिक प्रासंगिक होगा :- (१) प्रभो ! जब तक मुझ में अपूर्णता विद्यमान है तब तक मुझे आपके चरणों की नौका का आश्रय मिलना चाहिये । आपकी चरण नौका का आधार पाकर मै संसार-सागर से पार पहुंचना चाहता हूं। (२) प्रभो ! मेरी आशा अभिलाषा ऐसी है कि तुम्ही उसे पूर्ण कर सकते हो । तुम्हारे सिवाय दूसरा कोई पूर्ण नही कर सकता इसलिये मैने तुम्हारी शरण ली है । मै तुमसे ऐसी ही आशा करता हूं जिसकी पूर्ति किसी और से ही हो नहीं सकती । मैने तुम्हारा स्वरूप जानकर तुम्हें हृदय में बसाया है और अपने हृदय को तुम्हारा मन्दिर समझने लगा हूं। (३) प्रभो मै भागकर तेरे चरण-शरण मे आया हूं। इन विकार विषधरों से मुझे बचा । मेरी रक्षा कर । विकार विप उतार कर मेरा उद्धार कर ।

० दीक्षा विशेषार
(४) प्रभो ! मैं उर्ध्वगामी होना चाहता हूं । प्रगति के महान् और
अन्तिम लक्ष्य की दिशा में निरन्तर प्रयाण करने की कामना
करता हूं। मुझे वह शक्ति दीजिये कि अधोगामी न बनू । विश्व
के प्रलोभन मुझे किंचित भी आकृष्ट न कर सकें। भगवन !
अगर आप मेरे कवच बन जाए तो मै कितना भाग्यशाली होजा
(५) प्रभो ! संसार की कामना मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी ओर
खींच रही है । इस कामना से बचने के लिये तेरी शरण
आना ही एकमात्र उपाय है प्रभो ! अगर तू मुझे अपनी शरण
में लेकर मेरी बांह पकड़ ले तो सांसारिक कामना तुझसे डर.
कर मेरा पल्ला छोड़ देगी । इसलिये इस कामना के फंदे में से
छुड़ाने के लिये मेरी बांह पकड़, मुझे अपनी शरण में ले ।
(६) प्रभो ! तीन लोक के समस्त पदार्थों में मुझे तू ही प्यारा है ।
तू मुझे प्राणों के समान प्यारा है। यही क्यों तू मेरे लिये प्रामो
का भी प्राण है । इसलिये प्राणों से भी अधिक प्यारा है ।
(७) भगवन ! यदि तेरा तेज मेरे हृदय पर प्रतिबिम्वित हो जाय तो
मै अनन्त शक्तिशाली बन सकता हूं। मेरी समस्त सांसारिक
वासना शांत हो सकती है । अतः प्रभो ! अपने अनन्त तेज की
कुछ किरणे इधर फैक दो, जिससे मोह ममता के तिमिर से
आवृत मेरा अन्तःकरण उद्भापित हो जाय ।"
इन दिव्य पथ को निदेशित करने वाले विचारों के प्रवाह
हम दीक्षार्थियों की मनःस्थिति को समझने का प्रयास करें, यही प्रेय है.
यही श्रेय हैं।
में
समन्वय जरूरी है
A कुन्दन सुराणा
हथियार के साथ साहस, जोश के साथ होश,
विद्या के साथ विनम्रता, भोजन के साथ मुख ।
धन के साथ उपयोग, रूप के साथ गुण,
तर्क के माथ श्रद्धा, प्रचार के साथ आचार ।

संस्मरण धर्मदृढ़ता की विजय -राजेश कुमार जैन बिहार के एक छोटे से गांव-निर्मली में इक्कीस वर्ष पूर्व बच्छावत परिवार में एक नन्हीं सुन्दर बालिका ने जन्म लिया । सादगी एवं धार्मिक संस्कारों में पलकर अभी सात बसन्त ही पार किये थे कि अचानक पिताजी का साया सदा के लिए उसके सिर से उठ गया । पितृ स्नेह से वंचित हो गई यह अबोध बालिका । सम्बल या उसे अपनी मां का एवं अन्य परिजनों का । गंभीर प्रकृति की इस बालिका को तदनन्तर अपने परिवार के साथ भीनासर आना पड़ा। यहां निरन्तर जैन संतों एवं साध्वियों के सद्सानिध्य, मां की शिक्षा एवं महापुरुषों के उपदेश से बालिका को अपनी मंजिल स्पष्ट होने लगी । उसने १५ वर्ष को अल्पायु में ही जैन साध्वी बनने का नर्णय कर लिया और त्याग, तपस्या एवं परीषहों को ही अपना जीवन- रथ चुना । यही नहीं, कठोर नियमों को अपने जीवन मे उतारना पारम्भ कर दिया तथा जैन साध्वियों के साथ पैदल यात्रा भी शुरू कर दी। उसकी प्रथम पदयात्रा बीकानेर से बम्बई तक थी। यह विरक्ति पूर्ण जीवन परिवार के लिए चिन्ता का विषय बना । कठोर संयमी जीवन अंगीकार करने के लिए उसे आज्ञा नहीं दी गई । उसे दिल्ली, बम्बई तथा अन्य सुरम्य स्थलों पर रखा गया के वह भौतिकता के माया जाल से आकर्षित होकर अपना हठ छोड़ दे । इस पर भी वह टस से मस नहीं हुई तो एक वर्ष तक जनकपुर- वाम (नेपाल) में रखा गया जहा न सत-साध्वी के दर्शन हो सकते हैं पौर न जैन धर्म का कोई वातावरण ही है । बालिका अपने विचारों पर दृढ़ रही और इस प्रकार पांच वर्ष और व्यतीत हो गये । उसने कहा- "मै अपने परिवार वालो की बहुत एहसानमन्द हूं कि उन्होंने मेरी परीक्षा ली । मेरा तो निश्चय है- रोकने वाले को मै, एक दिन यह दिखलागी । पांच महाव्रत धारण कर मै, संयम जीवन ही अपनाउंगी ॥" आखिर धर्म पर दृढता एवं निष्ठा की विजय हुई । परिजनों को झुकना पड़ा और उसे परीक्षा में उत्तीर्ण घोषित करना पड़ा । धन्य है कुमारी रीना वच्छावत को जिन्हें आचार्य श्री नानेश (शेप पृष्ठ १०४ पर)

समता विभूति आचार्य श्री नानेश के सानिध्य में
दिनांक १६ फरवरी ६२ को भागवती दीक्षा
ग्रहरण करने वाले मुमुक्ष आत्माओं का
संक्षिप्त परिचय
मुमुक्षु-श्री राजीव सेठिया, बोका
जन्म स्थान-फाजिलका-पंजाब
आयु-१६ वर्ष
माता-श्रीमती शशिकला सेठिया
पिता-श्रीमान् अवीरचन्द सेठिया
व्यवहारिक अध्ययन- ११ वी
वैराग्यकाल-लगभग तीन साल
धार्मिक अध्ययन-विशारद द्वितीय तर
मुमुक्षु-श्री इन्द्रेश कोठारी, चिकारड़ा
माता-श्रीमती वसन्ता बाई
पिता-श्रीमान् हरखचन्दजी कोठारी
उम्र-२० वर्ष
व्यवहारिक अध्ययन-सीनियर हायर
सैकण्ड्री
वैराग्यकाल-३ वर्ष
पदयात्रा-२००० कि. मी.
" धार्मिक अध्ययन-लघु दण्डक, गोववड़ा, ,
बड़ी गतागत, ५ समिति, तान
गुप्ति, २५ बोल, दशवैकालिका,
उत्तराध्ययन सूत्र, सामगदगाग
सुत्र, तत्वानुन ।
N

। १० म २५ मार्च १९६२
६५
मुमुक्षु-सुश्री सीमा सेठिया, बीकानेर
जन्म स्थान-रामपुरहाट, पश्चिम बंगाल
आयु-२२ वर्ष
माता-श्रीमती ऊषा सेठिया
पिता-श्रीमान् अनूपचन्दजी सेठिया
व्यवहारिक अध्ययन-१० वी
वैराग्यकाल-५ वर्ष
धार्मिक अध्ययन-रत्नाकर प्रथम खण्ड
मुमुक्षु-सुश्री जयन्ती जैन,' श्यामपुरा
।
माता---श्रीमती मंगला बाई
पिता-श्रीमान् माणकचन्दजी जैन
उम्र-२० वर्ष
व्यवहारिक अध्ययन-मिडिल
वैराग्यकाल-५ वर्ष
धार्मिक अध्ययन
विशारद द्वितीय
खण्ड, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन,
सुखविपाक, लघुदण्डक, नवतत्व,
गुणस्थान द्वार

६
• दीक्षा विशेष
मुमुक्षु-सुश्री जयश्री भूरा, देशनोक
माता-श्रीमती लक्ष्मीदेवी
पिता--श्रीमान् हनुमानमलजी भूरा
उन-१६ वर्ष
व्यवहारिक अध्ययन-मिडिल
वैराग्यकाल-४ वर्ष
NAGAR
धार्मिक अध्ययन--दशवकालिक, सुर
विपाक, नन्दीसूत्र, जैन सिद्धा
भूषण, साठ थोकड़े
मुमुक्षु-सुश्री अंजू हीरावत,देशनोक
.7
माता-श्रीमती शायरदेवी
पिता-श्रीमान् मोतीलालजी हीरावत
उन-२१ वर्ष
व्यवहारिक अध्ययन-सैकण्डरी
वैराग्यकाल-३ वर्ष
चामिक अध्ययन-विशारद प्रथम संड,
दगर्वकालिक, उत्तराध्ययन, ज्ञाता-धर्म
फमांग, अन्तगड़, मुखविपाक, नन्दीमुत्र,
सौ योगड़े कंठस्थ

० १० व २५ मार्च १९६२ मुमुक्षु-सुश्री मधु सुराणा, गंगाशहर माता-श्रीमती नानूदेवी पिता-श्रीमान् कस्तूरचन्द जी सुराणा उम्र-१६ वर्ष व्यवहारिक अध्ययन-मिडिल वैराग्यकाल-२ वर्ष धार्मिक अध्ययन- पच्चीस बोल, लघु- दण्डक पाच समिति तीन गुप्ति, तेतीस बोल, दशवकालिक सूत्र, छः काया आदि चालीस थोकडा मुमुक्षु-सुश्री रीना बच्छावत, भीनासर माता-श्रीमती विमलादेवी पिता-श्रीमान् निर्मलकुमारजी बच्छावत उम्र-२१ वर्ष वैराग्यकाल-६ वर्ष व्यवहारिक शिक्षा-मैट्रिक धार्मिक अध्ययन-जैन सिद्धान्त विशारद, दशवैकालिक, नन्दीसूत्र, विपाक- सूत्र, नमिराय, पुच्छिसुणं, उत्तरा- ध्ययन, ४० थोकड़े कंठस्थ, अनेक स्तोत्र

९८
० दीक्षा विशेष
मुमुक्षु-सुश्री इन्दुबाला हीरावत,देशन
माता-श्रीमती कमलादेवी
पिता-श्रीमान् गणेशमलजी होरावत
उम्र-२३ वर्ष
व्यवहारिक अध्ययन-मिडिल
वैराग्यकाल-४ वर्ष
धार्मिक अध्ययन-दशवकालिक, नर
प्रवज्जा, पुच्छिसुणं, भक्तामर
गुणस्थान, लघुदण्डक, गतागत
८० थोकड़े कंठस्थ
मुमुक्षु-सुश्री संगीता सांखला, बालेसर
माता-श्रीमती चम्पाबाई
पिता-श्रीमान् दुलीचन्दजी सांखला
उम्र-२० वर्ष
व्यवहारिक शिक्षा-हवी
वैराग्यकाल-३ वर्ष
धानिक अध्ययन-दशवकालिक, उत्तरा-
ध्ययन, सुखविपाक, रत्नाकर
पच्चीमी, लघुदण्डक, नवतत्न
गतागत

• १० व २५ मार्च १९९२
&s
मुमुक्षु-सुश्री सूरज नवलखा, जगपुरा
माता-श्रीमती उगम देवी
पिता-श्रीमान् फतेहलालजी नवलखा
आयु-२४ वर्ष
वैराग्यकाल-४ वर्ष
व्यवहारिक शिक्षा-मिडिल
धार्मिक अध्ययन-दशवैकालिक, उत्तरा-
ध्ययन, २० थोकड़े कंठस्थ अनेक
स्तोत्र
पदयात्रा-१५०० कि. मी.
तपस्या-११ व अनेक छोटी तपस्या
मुमुक्षु-सुश्री मन्जू नाहर, भदेसर
माता-श्रीमती उगम बाई
पिता-श्रीमान् पृथ्वीराजजी नाहर
उम्र-२६ वर्ष
वैराग्यकाल-२ वष
व्यवहारिक शिक्षा-बी. ए.
धार्मिक अध्ययन-७५ थोकड़े कंठस्थ,
दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, पुच्छि-
सुणं, नमिप्रवज्जा, रत्नाकर पच्चीसी
विशेष-आचार्य श्री के सांसारिक ननि-
हाल पक्ष से

दीक्षा विशेषांक -- . - J 1 - मुमुक्षु-सुश्री कुमुद दस्सारणी, बीकानेर माता-श्रीमती मिश्री वाई पिता-श्रीमान् पुनमचन्दजी दस्साणी उम्र-२७ वर्ष वैराग्यकाल-हवा व्यवहारिक शिक्षा-नव्य व्याकरणाचार्य, एम. ए. आध्यात्मिक शिक्षा आगम रत्नाकर सम्पूर्ण, न्याय शास्त्री, न्याय रत्नाकर प्रथम खण्ड, २० थोकड़े कंठस्थ पदयात्रा-१००० कि.मी. राजस्थान। मध्यप्रदेश विशेप-नव्य व्याकरण शास्त्री एवं नव्य. व्याकरणाचार्य में विशेष योग्यता, शास्त्री परीक्षा तक प्रथम स्थान . : M मुमुक्षु-सुश्री कविता जैन, श्यामपुरा माता : श्रीमती प्रेमलता पिता : श्रीमान् रमेशचन्दजी जैन उम्र : २१ वर्ष व्यवहारिक अध्ययन : मिडिल वैगन्य ताल : ५ वर्ष नाच्यात्मिनः अध्ययन : कोविद, दशव- कालिक, पुच्छिण, नमिराय, राघुदण्डप, तीस बोल, पच्चीन बोग, पांच मिति तीन गुप्ति न ।

• १० व २५ मार्च १९६२ १०१ मुमुक्षु-सुश्री अनिता लोढ़ा, खण्डेला माता-श्रीमती शान्तादेवी : पिता-श्रीमान् हीरालालजी लोढ़ा re आयु-२२ वर्ष वैराग्यकाल-३ वर्ष ! व्यवहारिक शिक्षा-बी. ए. धार्मिक अध्ययन-जैन सिद्धान्त विशारद, दशवकालिक, पुच्छिसुणं, लघु- दण्डक, गतागत, ३३ बोल, पाच समिति तीन गुप्ति पदयात्रा--५०० कि. मी. मुमुक्षु-सुश्री चन्दनबाला हीरावत, देशनोक पिता --श्रीमान् गणेशमलजी हीरावत माता-श्रीमती कमला देवी उम्र-२१ वर्ष वैराग्यकाल-५ वर्ष से तपस्या-८-१५ तक व्यवहारिक शिक्षा-८ वी आध्यात्मिक शिक्षा शास्त्री प्रथम खण्ड- दशवैकालिक सूत्र, उत्तराध्ययन, सुख विपाक-पुच्छिसुणं, भक्तामर, चिंतामरिण पार्श्वनाथ स्तोत्र, ज्ञान- लविहा, गतागत, गुणस्थान, लघु- दण्डक, ८०-६० थोकड़े कंठस्थ है।

१०२ ० दीक्षा विपर PM- मुमुक्षु-सुश्री कान्ता गोलछा, बीकानेर : माता : श्रीमती लक्ष्मीबाई पिता : श्रीमान् घेवरचन्दजी गोला आयु : २७ वर्ष वैराग्यकाल : ६ वर्ष व्यवहारिक शिक्षा : वी. ए. धार्मिक अध्ययन : आगम रत्नाकर सम्पूर्ण, न्याय शास्त्री, न्याय रत्ना. कर प्रथम खण्ड पदयात्रा : २५०० कि. मी. राजस्थान, मध्यप्रदेश विशेष : मासक्षमण, १५, १२, ११, ६. ८ आदि अनेक तपस्याएं एवं १४ अोली मुमुक्षु-सुश्री सरोज भूरा, बीकानेर माता : श्रीमती चान्ददेवी पिता : श्रीमान् नवलचन्दजी भूरा प्रायु : २६ वर्प वैराग्यकाल : ७ वर्ष व्यवहारिक अध्ययन : मेट्रिक धार्मिक अध्ययन : जैन सिद्धान्त ग्रागम शास्त्री प्रथम खण्ड, लघु सिद्धान्त कौमुदी, अनेक मोत व योकड़े कंठस्य

, १० व २५ मार्च १९६२
१०३
मुमुक्षु-सुश्री मणी प्रभा गुलगुलिया,
बीकानेर
माता : श्रीमती कंचनदेवी
पिता : श्रीमान् लहरचन्दजी गुलगुलिया
।
आयु : २२ वर्ष
वैराग्यकाल : ५ वर्ष
व्यवहारिक अध्ययन : मिडिल
धार्मिक अध्ययन : जैन सिद्धान्त शास्त्री
प्रथम वर्ष, दशवैकालिक, उत्तरा-
ध्ययन, सुखविपाक,स्थानांग सूत्र,
५१ थोकड़े कण्ठस्थ
Yw
हुमुक्षु-सुश्री धैर्य प्रभा, बीसणीया
मायु : २६ वर्ष
पता : रमेश्वरलालजी पोरवाल
माता : शान्ति बाईजी
नाध्यात्मिक शिक्षा : (थोकड़ा आगम
निधि) दोनो प्रतिक्रमण, भक्तो-
मर, पुच्छिसुणं, दशवैकालिक
४ अ. लघुदण्डक, गतागत,
बडी नौ तत्व, ३३ बोल, पांच
ज्ञान, ३५ आदि थोकड़े २
साल
तपस्या : १६ १८ आदि
पदयात्रा : मालवा, मेवाड, मारवाड़
२००० किलोमीटर

१०४
० दीक्षा विशाल
fear
मुमुक्षु-सुश्री लता काजल, जम्मू
व्यावहारिक शिक्षा : एम. काम.
संप्रति : सरकारी सेवा में व्याख्याता
(वेतन ६५०० रु. प्रतिमाह)
वैराग्यकाल : ३ वर्ष
विशेष : जम्मू मे शांति मुनि के चातुर्मास
समय प्रवचन सुनकर वैराग्य भार
जागा एवं दीक्षा अंगीकार का निर्णय
किया।
( पृष्ठ ६३ का शेष )
ने १६ फरवरी १९९२ को बीकानेर के भव्य दीक्षा समारोह में संयमी
जीवन में प्रवजित कर उज्ज्वल जीवन की ओर अग्रसर होने का अवसर
प्रदान किया । जो १५ फरवरी तक सांसारिक वेशभूषा में थी, आज
श्वेत वस्त्र धारण कर साध्वी "मनन प्रज्ञा" बन गई । इनकी सफल
संयम यात्रा के लिए मंगल कामना है।
-जनकपुर धाम (नेपाल)
विशेष सूचना
जो भी श्रीसंघ, समता प्रचार संघ-चित्तौड़गड़ के तत्वावधान
में दि. १२-६-१२ से १८-६-६२ तक आयोज्य ग्रोमकालीन वाघशानी
प्रशिक्षण शिविर प्रामंत्रित करना चाहें, कृपया अपना आवेदन-पत्र शीत्र
प्रस्तुत करें।
द्वारा---गौतम कनाथ स्टोर
-वंशीवान पोगरना, मंगो
३ ए, नेहरू बाजार, चित्तौड़गढ़

दीक्षार्थी-साक्षात्कार
साक्षात्कारकर्ता-प्रो. सतीश मेहता
मरु प्रदेश के बीच स्थित बीकानेर में १६
रवरी ६२ को समता विभूति आचार्य श्री नानेश
सान्निध्य में भव्य दीक्षा महोत्सव हुआ । इस
वसर पर २१ मुमुक्षु आत्माओं से साक्षात्कार कर
नकी भावना को जानना चाहा प्रस्तुत है । साक्षा-
कार के अंश
साक्षात्कार के दौरान दीक्षार्थियों से पूछे गये प्रश्न
१] आप दीक्षा क्यों ले रहे है, व कब से यह भावना
बनी है ?
१] दीक्षा लेने की प्रेरणा आपको कैसे और किससे मिली ?
१] दीक्षा लेकर आप क्या विशेष उपलब्धि करना
चाहेगे ?
१] आचार्य श्री नानेश में व उनके साधु संघ में आपने
ऐसी क्या विशेषता देखी है, जिससे प्रभावित व प्रेरित
होकर आप उनके सानिध्य में दीक्षित हो रहे है ?

१०६ • दीक्षा विजया उत्तर जो दिये गये- १. श्री इन्द्रेश जी कोठारी-चिकारड़ा मैं सर्वप्रथम आत्म कल्याण और पर कल्याण के लिए एर मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने हेतु दीक्षा ले रहा हूं। मेरी दीक्षा लेने की भावना पिछले तीन वर्षों से बनी है । दीक्षा लेने की प्रेरणा मुझे ५ मई १९८६ को चित्तौड़गढ़ में पंडित रत्न विद्वान श्री शानि- मुनिजी म. सा. से मिली है । दीक्षा लेकर में सबसे पहले आत्म-निता द्वारा स्वयं का आचरण प्रभावशाली बनाना चाहता हूं । उसके का मैं प्रभु महावीर एवं आचार्य श्री नानेश के सन्देश 'समता' को जन- जन तक पहुंचाना चाहूंगा । समता विभूति आचार्य श्री नानेश के संघ में मैंने-अनुशामन संगठन, आचार विचार की शुद्ध पालना, सेवा भावना, संयम सायन को देखकर इनके सान्निध्य में दीक्षा लेने का निर्णय लिया है। २. श्री राजीव जी सेठिया-बीकानेर वास्तविक, अव्यावाघ, परम सुख की उपलब्धि के घर लक्ष्य को सन्मुख रखकर वर्तमान जीवन में भी यथासंभव प्रारिम आनन्द में रमण करने के लिए मैं दीक्षा ले रहा हूं। इस भावना । प्रवल उभार लगभग ३ वर्ष ६ माह से है। पूर्व के संस्कारों से एवं दुनिया की पीड़ित दशा देखकर म भावना थी कि साधु बनना है। पहले डॉ. पनने के बाद दीक्षा ले की भावना थी परन्तु प्राचार्य श्री नानेश के प्रवचनों की पुस्ता जीए" को पढ़कर समय का मूल्य समझा और उसे व्यर्थ न गनाम शीत्र दीक्षा लेने का संकल्प बना । दीक्षा लेकर मेरा परम कर्तव्य होगा गुरु के प्रति न समर्पणा । सर्वतः निर्लिप्त रहकर विशुद्ध सयम पा भावना रसता हूं। जिस धर्म संघ का मानायक अट होता है, वह भी गिल्तर उन्नति के पथ पर पड़ना पा जाता है। आचार्य श्रीमान निगल गया के मरने परिपालना दे ! नि: ifts - पालन करते है ० १० व २५ मार्च १९६२ AN- १०७ " । - अडोल आस्था है । आधुनिकता के नाम पर वे मूल महावतों की उपेक्षा नही करते । त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ, प्रभु महावीर की आज्ञाओं से विनि चित् भी विपरीत चलना उन्हें इप्ट नहीं है । उनका विचार है कि नौका में छोटा-सा छिद्र हो जाए तो प्रारम्भ में भले ही उससे गीत- लता का आभास हो किन्तु अन्ततः वह पूरी नाव को डुबोने वाला बन जाता है । बाह्य पाचरण ही नहीं बल्कि उनकी आन्तरिक निर- भिमान एवं सरल वृत्ति भी अनुपमेय है । सहिष्णुता तो मानो उनकी छाया ही बन गई है । ऐसे समुज्जवल आदर्श के नेतृत्व में चलने वाला साधु-साध्वी सघ भी एक आज्ञा पर समर्पित होकर चल रहा है । आचार्य श्री नानेश के संघ में भिन्न-भिन्न शिष्य-शिष्याओं की परम्परा नही है । सभी साधु-साध्वी एक आचार्य देव की ही गुरु रूप में मानते है । उनकी आज्ञाओ मे ही शिक्षा, दीक्षा, प्रायश्चित, बिहार, चातु- मास आदि होते है। आचार्य श्री नानेश के संघ में दीक्षा लेने वालों के लिए जहां जिनोक्त मर्यादानुसार निर्मल चारित्र पालक साधु-माध्वी समुदाय का अवलम्वन है वही शास्त्रीय गूढ़ ज्ञान के रहस्यों को अना- वृत करने वाले प्रखर विद्वता के धनी महापुरुषों का सानिध्य भी है। योग और ध्यान साधना के लिए भी समीक्षण ध्यान के विशिष्ट ध्या- ताओं का संयोग है । विविध अलौकिक गुणो के अाकर इस भव्य संघ में दीक्षित होना मैं अपना सौभाग्य मानता हूं । प्राचार्य देव के चरण तले मेरा संयम जीवन सुविकसित हो, यही शासन देव से मंगल प्रार्थना है ३. श्रीमती लता जी काजल-जम्मू मै संयम साधना करने के लिए दीक्षा ले रही हूं, क्योंकि संयम जीवन का आन्तरिक विकास सूत्र है । 'संयम खलु जोवन' यानि संयम ही जीवन जीने की कला है। दीक्षा की मेरी भावना विगत ३ वर्षों से वनी है । दीक्षा लेने की प्रेरणा मुझे जम्मू में पडित रत्न विद्वान पी शान्ति मुनिजी से १९८६ मे जम्मू चातुर्मास के दौरान मुनि श्री प्रवचन सुनने से मिली। आत्म कल्याण करने हेतु सयम साधना के पथ पर निरन्तर 'ना चाहूंगो एवं मन, वचन, काया की पाप रूपी प्रवृतियों का THI. 71 १. ।

॥ । १०८ 41 सम्यक् प्रकार से नियन्त्रण करना ही दीक्षा लेने की मेरी विशेष लब्धि होगी। प्रभु महावीर के द्वारा प्ररूपित और पूज्य आचार्य श्री ना द्वारा बताये गये-जिन धर्म मार्ग को यथासम्भव उत्तरोतर उन्नत ! उज्ज्वल बनाना एव जनसामान्य को जैन धर्म के सिद्धान्तो से अब कराना ही मेरा लक्ष्य रहेगा । मैंने आचार्य श्री नानेश में आचरण शुद्धि देखी है अर्थात् : कार्य आचरण के प्रत्येक चरण में समाहित है । जैसे-पांच महावत कठोर पालना, कथनी व करनी में समानता, पारस्परिक स्नेह की भावना कठोर अनुशासन आदि आदि । ४. श्री सीमा जो सेठिया-बीकानेर मुझे लगा कि सुख शान्ति सिर्फ संयम साधना से ही मि सकती है । अत: दीक्षा ले रही हूं। मेरी ५ वर्ष पूर्व से दौता । भावना बनी है । मैने ३० जैनागमों के अध्ययन से प्रभावित हो। संयम मार्ग को चुना । मुझे दीक्षा की प्रेरणा स्वतः जलगांव चातुमा में आचार्य श्री नानेश के प्रवचन सुनने से मिली । वैसे मेरे दादी : दादीजी भी धार्मिक प्रवृति के थे, अतः सदैव धार्मिक वातावरण मित रहा । मैं प्रति वर्ष चातुमार्स में आचार्य श्री नानेश के दर्शनार्थ मा जी के साथ जाती रही, जहां प्रवचन का लाभ भी लेती थी । संयम मार्ग के प्रति प्रेरणा बनी। दीक्षा लेकर मैं आत्मकल्याण एवं परकल्याण करना चाहंगी सयम साधना में लगकर में मेरा जीवन उन्नत बनाना चाहगी। फपाय (काम, क्रोध, मोह, माया) को जीतना चाहूंगी । वैसे तो मेरे परिवार का इसी संघ मे सम्बन्ध है पर सभी जन संघ व धर्म को देखकर उसके बाद आचार्य श्री नाश । नियाओ में संयग की शुद्ध पालना को देखकर ही नो नाम लेने की मोनी । ५. मुश्री कुमुद जी यस्सारणी-चोकानेर निल, HIT मंचन की प्राप्ति बीमा

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११० ० दीक्षा विगत tar । श्री नानेश विशिष्टतम प्रतिभा के धनी एवं इनका स्वभाव समताना है, आप आत्मसाधक है अतः इन सभी से प्रेरित होकर इनके दीक्षित हो रही हूं। ८. सुश्री कान्ता जी गोलछा-बीकानेर मैं आत्मिक शान्ति की प्राप्ति के लिए एवं 'पर' कल्याण: लिए दीक्षा ग्रहण कर रही हूं। मुझ मैं दीक्षा की भावना ६ वर्षों में बनी है । मुझे दीक्षा की प्रेरणा आचार्य श्री के दर्शन एवं उनके क्तित्व को देखकर मिली । दीक्षा के बाद मैं आत्म साधना, संगम साधना के द्वारा ज्ञान प्राप्त कर प्रभु महावीर के सिद्धान्तो व आना श्री के उपदेशों को जनजीवन हेतु प्रकाश में लाऊंगी । मैं प्राचार्य श्री के सघ में समता, अनुशासन, एक निष्ठा से प्रभावित होकर इस पास दीक्षित हो रही हूं। ६. सुश्री चन्दनबाला जी हीरावत-देशनोक मैं तो सिर्फ आत्मकल्याण के लिए दीक्षा ले रही हूं ! में दीक्षा की भावना पिछले ५ वर्षों से बनी है । मुझे दीक्षा की प्रेरणा देशनोक में महासती भवर कंवर जी म. सा. एवं महासती श्री प्रा वती जी म. सा. के प्रवचन से मिली । दीक्षा लेकर मैं समता गतिः णुता एवं सहअस्तित्व को प्राप्त करना चाहती हूं । मे आचावं मं नानेश के समता दर्शन व साधु संघ की एकता, समन्वय, प्रेम को देश कर इनके पास दीक्षा ग्रहण कर रही हूं। १०. सुश्री इन्दुबाला जी हीरावत-देशनोक मैं अपनी आत्मा का कल्याण एवं पूर्ण अहिंसक बनने : दीक्षा ले रही हूं। मेरी दीक्षा की भावना ४ वर्ष पूर्व से बनी। दीक्षा की प्रेरणा मुझे महागती श्री प्रभावती जी म. गा. से और प्रवचन के माध्यम से संसार को अमारता का स्वम्हप समान जिनशासन को भव्य प्रभावना, पानी प्रतिभा का मर्वतोमती मि करना चाहूंगी । प्राचार्य श्री नानेग के गमतामय में सोतर दशा अंगीकार कर रही है।

० १० व २५ मार्च १९६२ , - ११. सुश्री अंजू हीरावत-देशनोक दीक्षा सत्य की खोज, परम सुख की प्राप्ति के लिए ले रही है । यह भावना पिछले ४ वर्षों से बनी है । दीक्षा को प्रेरणा स्वय एव महासती श्री ललिता श्री जी म. सा. के प्रवचन से देगनीक में मिली । दीक्षा लेकर मै आत्मकल्याण की ओर अग्रसर होऊगी एवं भगवान । महावीर व आचार्य श्री नानेश के सन्देश को जन-जन को बतानी । आचार्य श्री में नियमों के प्रति सजगता एवं जागरूकता के कारण इनके पास दीक्षित हो रही हूं। १२. सुश्री धैर्य प्रभा जी जैन-विसनिया-(म. प्र.) आत्म कल्याण के लिए दीक्षा ले रही हूं। दो वर्ष से दीक्षा लेने की भावना बनी है । दीक्षा की प्रेरणा महासती सुलक्षणा श्री जी म. सा. के प्रवचन एवं दर्शन से मिली। दीक्षा के बाद तपस्या में सेवा करना चाहूंगी । आचार्य श्री की दिव्य रप्टि समता रष्टि से प्रभा- वित होकर उनके पास दीक्षा ले रही हूं। १३. सुश्री संगीता जी सांखला-बालेसर मै सत्य की खोज के लिए एव चेतन देव आत्मा को जगाने हेतु दीक्षा ग्रहण कर रही हूं। (सर्वप्रथम ठेरागढ़ । (सर्वप्रथम ठेरागढ़ (छत्तीसगढ़) में महासती श्री तारा कंवरजी म. सा. के प्रवचन से प्रेरणा मिली ।) उसके पश्चात् यथा प्रसग अनेक महासतियां जी म. सा. के सानिध्य में पिछले काफी समय से साधनारत हूं। इनके सानिध्य से मेरी दीक्षा लेने की भावना विशेष प्रगाढ़ बनी । दीक्षा लेकर मैं अपनी आत्मा का उत्थान करना चाहती हूं। १४. सुश्री कविता जी जैन-श्यामपुरा मै आत्मा के कल्याण के लिए दीक्षा ले रही हूं। मेरी दीक्षा की भावना पिछले ६ वर्षों से बनी है। मुझे आनन्द मुक्ति (लेखक प. रत्न शान्ति मुनिजी म. सा.) पुस्तक पढ़ने से एवं महासती पेप कुंवर जी म. सा. से भी प्रेरणा मिली । दीक्षा के बाद संयम साधना करना चाहूगी । आचार्य नानेश की संयम साधना से प्रभावित होकर इनके सान्निध्य मे दीक्षा ग्रहण की है ११२ ० दीक्षा विशेषांक १५. सुश्री जयन्ती जी जैन-श्यामपुरा मैं आत्मोत्थान एवं मोक्ष रूपी मंजिल प्राप्त करने के लिए दीक्षा ले रही हूं। मेरी दीक्षा की भावना ५ वर्ष पूर्व में बनी थी। महासती श्री पेप कुवरजी म.सा. से एवं जैन तत्व निर्णय के प्रथम भाग एवं छठे आरे का वर्णन पढ़कर उसमें पुर्नजन्म नहीं लेना पड़े इससे प्रेरित होकर दीक्षा लेने की सोची । आचार्य श्री एवं इनके साधु संघ में भगवान महावीर की आचार संहिता की पालना देखी अतः मैं इनके पास दीक्षित हो रही हूं । १६. सुश्री सुरज कुमारी जी नवलखा-जगपुरा मैं अपने मानव जीवन की सफलता के लिए एवं संयम साधना करने हेतु. दीक्षा ले रही हूं। मेरी दीक्षा लेने की भावना पिछले ३ वर्षों से बनी है । दीक्षा की प्रेरणा महाराज भरत का चारित्र [पुस्तक तीर्थकर चरित्र] पढ़ रही थी तब मिली, एवं पंडित रत्न श्री शान्ति मुनिजी म. सा. से भी प्रेरणा मिली । संयम साधना के पथ पर अग्र- सर होकर आत्मकल्याण चाहूंगी । आचार्य श्री के आचार विचार को देखकर दीक्षा लेने का निर्णय लिया । १७. सुश्री मधु जी सुराणा-गंगाशहर मैं प्रात्मकल्याण के लिए दीक्षा ले रही हूं। दीक्षा की भावना दो वर्षों से बनी है । मुझमें दीक्षा की प्रेरणा नैसर्गिक थी महासती श्री सरदार कंवर जी म. सा. के सान्निध्य में रहते हुए उसमें प्रगाढ़ता आयी । दीक्षा के बाद मै संयम साधना में लगकर अपने जीवन को सार्थक बनाऊंगी । आचार्य श्री नानेश व उनके साधु संघ में अनुशा- सन, संगठन, समता को देखकर इनके सान्निध्य में दीक्षा ग्रहण की है। १८. सुश्री रीना जी बच्छावत-भीनासर मैं कषाय अर्थात् काम, क्रोध, मान, माया, लोभ से मुक्ति हेतु दीक्षा ग्रहण कर रही हूं। पिछले ६ वर्षों से दीक्षा लेने की भावना बनी है । मुझे दीक्षा की प्रेरणा महासती श्री इन्द्र कंवरजी म. सा, से मिली । मैं दीक्षा के बाद स्व परकल्याण की और अग्रसर होना ० २५ व १० मार्च १९९२ चाहूंगी । आचार्य श्री नानेश व उनके साधु संघ में संयम को शुद्ध पालना को देखकर ही इनके पास दीक्षित होने का निर्णय लिया । १६. सुश्री अनिता जी लोढ़ा-खण्डेला मै आत्मकल्याण के लिए दीक्षा ले रही हूं। यह भावना पिछले तीन वर्षों से बनी है । मुझे दीक्षा की प्रेरणा महासती श्री चेतन श्रीजी एवं श्री समता श्रीजी से जावरा (म. प्र.) में मिली। मै स्व को प्राप्त कर परकल्याण चाहूंगी । आचार्य श्री के नियम, मर्यादा, प्रेरणादायक है । अतः इनके पास दीक्षा लेने का निर्णय किया। २०. सुश्री मन्जु जी नाहर-भदेसर मै संयम साधना करने एवं आत्मकल्याण हेतु दीक्षा ले रही हूँ। दीक्षा की भावना पिछले ५ वर्षो से बनी है । महासती श्री सुल- सणा जी म. सा. से भदेसर में प्रेरणा मिली । दीक्षा के बाद अहिंसा का जीवन में पूर्ण पालना करना व संयम के मार्ग पर चलना चाहूंगी। आचार्य श्री के समताभाव, समता सन्देश से प्रभावित होकर इनके पास दीक्षा ले रही हूं। २१. सुश्री जय श्री जी भूरा-देशनोक मै परम सुख की प्राप्ति के लिए एवं सम्यग ज्ञान दर्शन चारित्र की आराधना के लिए दीक्षा ग्रहण कर रही है। पिछले ४ वर्षो से मेरे में दीक्षा की भावना बनी है । दीक्षा के पीछे सेवाभावी घायमातृ पद अलकृत श्री इन्द्रचन्द जी म. सा. से विशेष प्रेरणा मिली। वैसे देशनोक में विद्वान श्री ज्ञान मुनिजी म. सा. के प्रवचन "मानव के लिए संजीवनी बूटी" प्रवचन सुनकर एवं महासती श्री ललिता श्री जी म. सा. से मुझे प्रेरणा मिली ।. दीक्षा के बाद विनय, क्षमा, सर- लता, संयम, सम्यग ज्ञान, दर्शनं, चारित्र' की आराधना करती हुई आत्मकल्याण कर परकल्याण करना चाहूंगी । आचार्य श्री नानेश में उत्कृष्ट क्रियानों की पालना को देखकर इनके पास दीक्षा लेने का निर्णय किया ।

११४
• दीक्षा विशेषांक
दीक्षा समारोह हेतु प्राप्त शुभकामनाएं
रा. के. खांडेकर
प्रधान मन्त्री के विशेष कार्य अधिकारी
प्रधान मन्त्री कार्यालय
नई दिल्ली ११००११
आपका पत्र प्रधान मन्त्रीजी को प्राप्त हुआ । वे आपके निमं-
त्रण के लिए आभारी हैं । किन्तु पूर्वनियोजित कार्यक्रम के कारण वे
आपके निमंत्रण को स्वीकार करने में असमर्थ हैं।
शुभकामनाओं सहित
२७ जनवरी, १९६२
रा. के. खांडेकर
-
---
अशोक गहलोत
वस्त्र राज्य मन्त्री (स्वतंत्र प्रभार)
उद्योग भवन
नई दिल्ली-११००११
पूर्व निश्चित कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के कारण मेरे लिये
कार्यक्रम बनाना सम्भव न हो सकेगा अन्यथा मुझे आप लोगों के बीच
आकर हार्दिक प्रसन्नता होती।
महोत्सव के सफल आयोजन हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।
१४ फरवरी, १९६२
अशोक गहलोन

० १० व २५ मार्च १९६२ ११५ हरबीर सिंह अतिरिक्त निजी सचिव कृषि मन्त्री भारत सरकार नई दिल्ली-११०००१ आपका दिनांक ३० जनवरी, १९६२ का पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें आपने माननीय कृषि मंत्री जी को दि. १६ फरवरी, १९६२ को श्री साधुमार्गी जैन बीकानेर श्रावक संघ द्वारा आयोजित दीक्षा समा- रोह में भाग लेने हेतु आमंत्रित किया है, इसके लिए धन्यवाद । खेद है कि मंत्री जी अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में व्यस्त होने के कारण समारोह में भाग नहीं ले सकेंगे । वे समारोह की सफ- बता के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रेपित करते है । दिनांक ७ फरवरी, १९६२ हरबीर सिंह बी. के. बान अतिरिक्त निजी सचिव संचार राज्य मन्त्री भारत सरकार, नई दिल्ली-११०००१ भव्य दीक्षा महोत्सव में भाग लेने हेतु माननीय मन्त्री जी को आपका पत्र मिला । इधर चुनावों में व्यस्त रहने के कारण मन्त्री जी आ नहीं पाएंगे। दीक्षा समारोह की सफलता के लिए मंत्री जी की ओर से शुभकामनाएं स्वीकार करें। दिनांक १० फरवरी, १९६२ बी: के. बान

११६
० दीक्षा विशेषांक
गुमानमल लोढ़ा (एम. पी.)
चीफ जस्टीस (रिटायर्ड)
सी-१/१५, पन्डारा पार्क
नई दिल्ली-११०००३
---
आप द्वारा उत्सव में आने हेतु सप्रेम निमन्त्रण प्राप्त हुआ
धन्यवाद । उत्सव मंगलमय व सफल हो । यही मेरी शुभकामना है
धन्यवाद
दिनांक ३१ जनवरी, १९६२
गुमानमल लोढ़ा
शिव चरण माथुर (एम. पी.)
सी.-१/१६, पन्डारा पार्क
नई दिल्ली-११०००३
है
यापका ३०-१-१९६२ का पत्र मिला जिसमें आपने बीकानेर
नगरी में लगभग २० मुमुक्षु बहनों के दिनांक १६-२-१९६२ को दीक्षा
ग्रहण करने के समाचार दिये हैं । यह और भी प्रसन्नता की बात
कि यह दीक्षा समारोह आचार्य प्रवर श्री नानालाजी म. सा. के पावन
सान्निधि मे सम्पन्न हो रहा है ।
मैं दीक्षा लेने वाली बहनों के मंगल जीवन की कामना करता
हूं तथा समारोह की सफलता की कामना करता हूं।
दिनांक ५ फरवरी, १९६२
शिवचरण मापुर

• १० व २५ मार्च १९६२ ११७ SANTOSH BAGRODIA Member of Parliament (Rajya Sabha) 14, Talkatora Road New Delhi-110001 I thank you for your invitation of 30th January, 1992 for the celebration on 16th February, 1922. I wish che function a very great success. With best regards, 12 February, 1992 Santosh Bagrodia * चौधरी मनफूल सिंह भादू (एम. पी.) २३ फिरोजशाह रोड़ नई दिल्ली मैं इस पवित्र समारोह की सफलता की कामना करता हूं। सधन्यवाद । दि. १४ फरवरी, १९६२ मनफूल सिंह - पी. सी. जैन प्रमुख निजी सचिव, मुख्य मंत्री राजस्थान सरकार गुस्य मंत्री सनिताना - । माननीय मुख्य मंत्री महोदय को श्राप दिन ५.२.६२ प्राप्त हुना, जिसमें उन्हें दिनांक १५ फरवरी, १२ को भागोलिक दीक्षार्थी अभिनन्दन समारोह में प्रमुख अतिथि के रसा में आगनित किया गया है। इस सम्बन्ध में निर्देशानुसार लेख है कि पूर्व निर्धारित मा.. श्यक कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के कारण गुग्गा मंत्री महोदारा समा रोह में पधारने में असमर्थ रहेंगे । वे गहोरानकी गालInti | दि. १० फरवरी, १९६२ 1 ० दीक्षा विशेषांक हरिशंकर भाभड़ा अध्यक्ष, राजस्थान विधान सभा, जयपुर आचार्य प्रवर श्री १००८ श्री नानालालजी म. सा. के पावन सानिध्य में मुमुक्षु भाई-बहिनों की भव्य भागवती दीक्षा एवं अभिनन्दन समारोह के निमन्त्रण के लिए हार्दिक धन्यवाद । पावन दीक्षा समारोह की सुसम्पन्नता पर आप व श्रावक संघ के सभी पदाधिकारी बधाई स्वीकार करें। दि. १६ फरवरी, १९६२ हरिशंकर * - हीरासिंह चौहान उपाध्यक्ष, राजस्थान विधान सभा, जयपुर आपका दि. ३१-१-६२ का पत्र मिला । यह अत्यन्त सौभाग्य एवं गौरव का विषय है कि महान् सन्त, समता विभूति आचार्य प्रवर श्री नानालालजी म. सा. के पावन सानिध्य में २० भव्य मुमुक्षु आर्ट- माएं दि. १६-२-६२ को भागवती दीक्षा ग्रहण करने जा रही है । पू. आचार्य श्री के चरणों में मेरी वन्दना विदित करावे एवं उनकी कृपा से सारा कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न होगा ही यह मेरा विश्- वास है। दि. ५ फरवरी, १९९२ हीरासिंह चौहान की भव्य-दीक्षा-महोत्सव दिनांक १६-२-६२ को आयोजित भव्य भागवती दीक्षाओं के प्रसग से धर्मधरा भारत के कोने-कोने से आए धर्म श्रद्धालुओं के आवा- गमन की गहमागहमी से बीकानेर में भारी चहल-पहल दिखाई दे रही थी। बीकानेर के अतिथि प्रेमी नागरिक नित्य- नवीन आगन्तुकों का हार्दिक स्वागत करते, उन्हें मार्ग दिखाते हुए प्रमाद के भाव में आकंठ निमग्न थे । स्वधर्मी बन्धुओं स्वागत तथा आवास-निवास की समु- चित व्यवस्था हेतु बीकानेर जैन समाज के सभी सम्प्रदायों के बंधुओं ने अपने सभी संसाधन समर्पित कर दिए थे। बीकानेर की गरिमामयी आतिथ्य परम्परा के निर्वाह में अजैन नागरिक भी पीछे नही रहे और जहाँ जिसे अवसर मिला, वहीं वह सेवा में रत और तत्पर हो गया ।। आचार्य श्री नानेश के बीकानेर प्रवेश के पश्चात् से ही उनके विराजित स्थल श्री सेठिया धार्मिक भवन के चारों.. ओर हर समय धर्मानुरागियों की उल्लास उमंगमय उपस्थिति से नगर का वातावरण: आध्यात्मिकता से अोतप्नात हो गया । समता युवा संघ के युवकों और श्री साधुमार्गी जैन बीकानेर - श्रावक संघ के सदस्य व्यवस्थाओं को दक्षता से पूर्ण करने हेतु सजगता- पूर्वक सेवा समर्पित थे। जिला प्रशासन और जिला पुलिस प्रशासन का हार्दिक सहयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय-था । विद्युत · व जल आपूर्ति, सफाई और स्वच्छता की व्यवस्था में सम्बंधित विभाग पूरी: रूचि से कार्य कर रहे थे। चिकित्सा की व्यवस्था में पी. बी. पी. बी. एम. चिकित्सालय और सिटी डिस्पेन्सरियों के डॉक्टरों और सहयोगी जनों की भूमिका विशेष रूप से सराहनीय रही। विभिन्न नागरिक संस्थाएं और नगर । के गणमान्य नागरिक दीक्षा समारोह समिति के रांगड़ी चौक स्थित कार्यालय में स्वयं आकर योग्य सेवा का अवसर देने की प्रार्थना करते देखे जाते थे। इस प्रकार के सर्वविध सहयोग के उत्साह और उमंगमय वाता- वरण में दिनांक १४-२-६२ से त्रिदिवसीय समारोहों का शुभारम्भ : हुआ। AP .

संगीत संध्या बीकानेर में आयोजित भव्य और सामूहिक भागवती दीक्षाओं के प्रसंग से सम्पन्न त्रिदिवसीय समारोह की शृखला का शुभारम्भ ऐतिहासिक संगीत संध्या के साथ हुआ । दिनांक १४ फरवरी ६२ को ढढ्ढों के चौक में आयोजित इस संगीत संध्या के लिए एक भव्य दुग्ध- ध्वल और विशाल मंच का निर्माण किया गया था । मंच पर मुमुक्षु वर्ग, भजन मंडलियों व गायकों तथा संघ प्रमुखों के लिए पृथक-पृथक बैठने की सुरूचिपूर्ण व्यवस्था की गई थी । व्यवस्था का दायित्व समता युवा संघ के नौजवानों ने ग्रहण कर रखा था । और दीक्षा समारोह समिति के संयोजक श्री भंवरलाल कोठारी स्वयं उन्हें योग्य मार्गदर्शन प्रदान कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि बीकानेर की गौरव गरिमा के केन्द्र स्थल इस ढढ्ढों के चौक से गणगौर का प्रसिद्ध मेला अपनी पूरी शान के साथ प्रारम्भ होता है । इस दिन पूरा नगर इस चौक की ओर उमड़ पड़ता है और गवर की पूजा-अर्चना करता है । ढढ्ढों की गवर बीका- नेर की समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है । उसी ऐतिहासिक चौक में आज जब संगीत संध्या का समा. रोह प्रारम्भ हुआ तो बीकानेर के सभी वर्गों और धर्मो के सुज्ञ जन श्रवणार्थ पहुंच गए । ऐसा लग रहा था अपनी पंचरंगी शोभा में बीकानेर के नगरवासी स्त्री-पुरुष, आबाल-वृद्ध यहां एकत्र हो गए हों। दीक्षा के पावन प्रसंग से देश के कोने-कोने से पधारे धर्म श्रद्धालु भी त्रिदिवसीय कार्यक्रम शृखला की प्रथम कड़ी के प्रत्यक्ष द्रष्टा साक्षी बनने के लिए वहां उपस्थित थे। विशाल पांडाल विद्युत प्रकाश से जगमगा रहा था और शोभित वितान के तले तथा चौक के समस्त भवनों के गवाक्षों से उत्सुक नर-नारी संगीत-संध्या का रसास्वादन करने को तत्पर विराज- मान थे। भव्य मंच पर संघ अध्यक्ष श्री भंवरलाल जी बैद, उपाध्यक्ष और भावो अध्यक्ष श्री रिद्धकरण जी सिपाणी, दीक्षा समारोह समिति के संयोजक श्री भंवरलाल कोठारी, समारोह के मुख्य अतिथि उद्योग- पति कन्हैयालाल जी बोथरा, युवा हृदयों के आदर्श श्री पंकज शाह सहित गणमान्य जन विराजमान थे। कार्यक्रम का प्रभावी सुमधुर और १२१ १० व २५ मार्च १९६२ गुशासित संयोजन कर रहे थे बीकानेर आकाशवाणी के श्री शांतिलाल राणा । बीकानेर जैन समाज के नौजवानों की भजन मंडलियां अपने- पने जौहर प्रदर्शित करने को उत्सुक थी। श्री समता युवा संघ और सके युवा सदस्य सदस्याओं का उत्साह देखते ही बनता था। ऐसे । और उत्साहमय वातावरण में संगीत संध्या का कार्यक्रम मंगला- रण के साथ प्रारम्भ हुआ । पूरे समय संगीत संध्या की स्वर लहरी का केन्द्र समता भूति आचार्य श्री नानेश के प्रति श्रद्धापूर्ण प्रगति का भाव रहा । गीत संध्या के भव्य प्रायोजन में विभिन्न स्थानों से आये व स्थानीय वा मण्डलों ने विभिन्न तर्ज पर धार्मिक गीत प्रस्तुत किये। जिसमें न परिषद कोचरों का चौक की मगन कोचर एण्ड पार्टी के गीतों मे काफी सराहा गया। जैन मण्डल, जैन गौतम मण्डल, महावीन [ण्डल, नानेश बालक-बालिका मण्डल, वीर मण्डल आदि ने गीत स्तुत किये । मास्टर पुनीत बोथरा ने 'दिल में गाना, दिल से गाना, गुरुवर के गुणगाना, जय गुरु नाना" को प्रस्तुत किया जिसे श्रोताओं ने वेहद पसन्द किया । रायपुर के निर्मल बैद ने सयम साधना पर विशेष बल देते हुए गीत प्रस्तुत किया। व्यावर के प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य कवि श्री सुरेन्द्र दुबे ने देश की वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ते हुए अपना गीत सुनाया- "समतामय होगा परिवेश, आगे तभी बढ़ेगा देश । घर-घर गूजे यह सदेश, जय जय जय गुरु जय नानेश ॥" संध्या के दौरान श्री एवं श्रीमती पंकजशाह को सुरेन्द्र सेठिया व कुसुम सेठिया ने अभिनन्दन-पत्र भेंट किया। श्री पुखराज वैद ने पंकजशाह को स्मृति चिह्न भेंट किया । मुख्य अतिथि श्री कन्हैयालाल बोथरा ने भव्य आयोजन हेतु आयोजकों की प्रशंसा करते हुए युवा शक्ति को देश समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आगे आने का आह्वान किया । उन्होने अरस्तू और सिकन्दर का किस्सा सुनाते हुए गुरु की महिमा पर प्रकाश डाला। श्री केशरी चन्दजी सेठिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया । प्रो. सतीश मा । समता युवा संघ का सक्षिप्त परिचय दिया। श्री प्रथाtait बाठिया ने नानेश मण्डल को हारमोनियम देने की घोषणा की। " .१२२ • दीक्षा विशेषांक भव्य शोभायात्रा इसी उमंग भरे माहौल में दि. १५-२-६२ को प्रातःकाल से ही नगर के कोने-कोने से स्त्री-पुरुष, बाल-युवा, टैक्सी, ऑटो रिक्शा, कार और तांगा आदि उपलब्ध साधनों से जूनागढ़ की ओर लपके चले जा रहे थे । मंगल और बधावे के गीत गाती पैदल महिलाओ की टोलियां जूनागढ़ की ओर बढ़ी चली जा रही थीं। आज दीक्षार्थी आत्माओं की भव्य शोभायात्रा जूनागढ़ से प्रातः ८ बजे प्रारम्भ होकर नगर के विभिन्न भागो से होते हुए श्री सेठिया धार्मिक भवन तक पहुंचनी थी। गंगाशहर-भीनासर तक ठहरे हुए बीकानेर से बाहर के श्रद्धालुओं सहित बीकानेर, गंगाशहर, भीनासर, उदासर, उदयरामसर, देशनोक व नोखा आदि स्थानों से यात्रियो के काफिले शोभायात्रा में सम्मिलित होने के लिए बढे चले पा रहे थे। भव्य शोभायात्रा के इस विराट आयोजन को भी आयोजकों ने ठीक समय पर प्रारम्भ करके अपनी अद्भुत संगठन कुशलता का परिचय दिया । यात्रा की सुव्यवस्था और सम्पूर्ण यात्रा-मार्ग व यात्रा काल में शोभायात्रा के सहभागियों द्वारा प्रदर्शित आत्म अनुशासन बीकानेर के सांस्कृतिक आध्यात्मिक गरिमामय इतिहास का एक स्वर्ण पृष्ठ बनकर अमर हो गया है । शुभारम्भ-ऐतिहासिक जूनागढ़ से यह ऐतिहासिक यात्रा अपने निश्चित समय पर प्रारम्भ हुई। शोभायात्रा के अग्रभाग मे सुसज्ज वाल और किशोर घुड़सवारों के बीच एक प्रौढ़ अश्वारोही द्वारा जैन धर्म के ५ महाव्रतों का प्रतीक पंचरंगा ध्वज धारण किया हुआ था। थार मरुस्थल के प्राण तत्व माने जाने वाले रेगिस्तान के जहाज ऊंटों का एक सुसज्जित दस्ता भी शोभायात्रा की शोभा बढ़ा रहा था । २१ दीक्षार्थी मुमुक्षु आत्माओं के सम्मान में आयोजित इस शोभायात्रा में कुछ दीक्षार्थी भव्य सजे रथों पर स्थापित सिंहासनों पर आड़ तो कुछ बीकानेर की श्रेष्ठी परम्परा की उत्कृष्ट सवारी बगियो पर सवार थीं । सुडौल आकर्पक अश्वों से खीची जा रही ये बग्गियां कही बीकानेर कला के नयनाभिराम चित्रों से जनमन को आकर्षित कर रही थीं और कही स्वर्णखचित वेल-बूटों की चित्रकारी से जन-मन को मोह 1 -- , . - १२३ • १० व २५ मार्च १९६२ रही थीं । बीकानेरी इनकों ने बाहर से पधारे जनों को विशेष रूप से आकर्षित किया। २ दीक्षार्थी भाइयों और १६ दीक्षार्थी वहिनों में से प्रत्येक का नाम व स्थान रथ के आसन के पृष्ठ भाग में अंकित था । रथ में उनके आत्मीय परिजन बैठकर उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। सभी दीवार्थी पूर्ण विनय के साथ प्रणाम की मुद्रा में यात्रा-पथ के दोनों ओर सड़क पर तथा भवनों से किए जा रहे स्वागत को अंगीकार कर रहे थे। इन दीक्षार्थियो के प्रसन्न-आनन पर उच्च संकल्प की दीप्ति जन-जन को हर्पित कर रही थी। शोभायात्रा का अग्रभाग जब ऐतिहासिक कोटगेट में प्रविष्ट हुआ तब इसका पार्श्वभाग प्रस्थान स्थल जूनागढ को स्पर्श कर रहा था । इस विशाल जनमेदिनी के बीच-बीच में मधुर वाद्ययन्त्रो से सुमधुर स्वर लहरी प्रसारित की जा रही थी। बीकानेर राजघराने का बैंड, भारतीय सेना का घोष और स्थानीय श्री महावीर बैंड, श्री रबड़ी बैड आदि थोड़ी-थोड़ी दूर पर अपनी लोकप्रिय धुनें वजा रहे थे। कुछ भजन मडलिया ऊंट गाड़ों पर पूरे दल-बल तथा वाद्ययन्त्रों सहित बैठ कर भक्ति गीत गा रही थी जबकि कुछ उत्साही युवा स्त्री-पुरुपों के स्वतंत्र समूह हाथ गाड़ों पर ध्वनिवर्धक यंत्र आदि लगाकर उनके पीछे पीछे चलते हुए सहगीतों से वातावरण को गुजा रहे थे। देशभर से आए श्रीसंघ अपने-अपने वैनरों के तले जोश के साथ नारो और भजनों से वातावरण में धर्म रस घोल रहे थे । एक स्वतन्त्र रथ मे श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ के अध्यक्ष कलकत्ता निवासी श्री भवरलालजी बैद विराजमान थे और उनके अग्रभाग में श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन संघ के मत्री श्री चम्पालालजी डागा, कोपा- ध्यक्ष श्री केशरीचन्दजी गोलछा, केशरीचन्दजी सेठिया, पूर्व मंत्री श्री पीरदानजी पारख, पूर्व मंत्री श्री धनराजजी वेताला, पूर्व अध्यक्ष श्री दीपचन्दजो भूरा आदि चल रहे थे । इसी प्रकार एक रथ मे उच्च आसन पर श्री अ. भा. समता युवा संघ के अध्यक्ष बम्बई निवासी श्री उमरावसिह जी ओस्तवाल विराजमान थे।

१२४ ० दीक्षा विशेषांक एक स्वतंत्र समूह में समता युवा संघ के श्री मणिलाल घोटा, श्री मदनजी कटारिया और उनके साथ रतलाम के जोशीले युवकों की टोली चल रही थी। श्री समता युवा संघ की महिला शाखा की उत्साही और जोशीली युवतियां जयगुरु नाना के घोष और मधुर भजनों से वाता- वरण को आनन्द से भर रही थी । इसी प्रकार श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन महिला समिति की सदस्याएं और बीकानेर की सैकड़ों महिलाए हरी किनारी की केशरिया साड़ी की एकसी गणवेश में स्वयं की अनु. शासन व्यवस्था के साथ आत्म विभोर होकर मंगल गीत गाती हुई शोभायात्रा के साथ चल रही थी। वीर मंडल, नाना बालक मंडल, नाना बालिका मंडली ग्रादि के बाल और किशोर छात्र-छात्राएं एक-सी वेशभूषा में कतारबद्ध होकर भजन गाती और नारे लगाती हुई शोभायात्रा की शोभा बढ़ा रही थी। इस किशोर पीढ़ी में धार्मिक संस्कारों की गहनता और आत्म अनुशासन की प्रतिवद्धता देश के उज्ज्वल भविष्य का संकेत कर रही थी। पीपलिया-कलां के सैकड़ों श्रद्धालु अपने केशरिया साफे से पूरी शोभायात्रा में अपनी विशिष्ट पहिचान बना रहे थे । उनको दूर से देखने पर लगता था जवानी का एक केसरिया सैलाब नाना गुरु चरणों में अपनी धर्मश्रद्धा अर्पित करने को बढ़ा चला आ रहा है । स्वागत-इस भव्य शोभायात्रा का, जिसमें हजारों धर्मप्रेमी दीक्षा ग्रहण करने जा रही २१ मुमुक्षु प्रात्माओं के प्रति अपना हार्दिक सम्मान अर्पित करने के लिए सम्मिलित हुए थे, स्थान-स्थान पर बीका- नेर के धर्मानुरागी पाबाल-वृद्ध ने स्वागत किया। सर्वप्रथम जन मार्केट पर यात्रा का भव्य स्वागत हुआ और तदुपरान्त कोटगेट रेल्वे क्रांसिंग पर व्यापार-उद्योग मंडल के अध्यक्ष श्री सोमदत्तजी श्रीमाली की प्रेरणा से व्यापारियों ने यात्रा का स्वागत किया। कोटगेट में प्रवेश करते ही जोशीवाड़ा में श्री गोपीकिसन जी जोशी और श्री शंकरलालजी हर्ष के नेतृत्व में यात्रा या भावभीना स्वागत किया गया तथा मुमुक्षु आत्माओं को हार पहिना कर उनका अभिनन्दन किया गया । दाऊजी मन्दिर तेलीवाड़ा मार्ग पर मरु विकास परिपद की संयोजिका श्रीमती कमला ܐܼ، ० १० व २५ मार्च १६६२ १२५ श्रीमाली के नेतृत्व में महिलाओं के विशाल समूह दे यात्रा पर गुलाब के पुष्पों की वर्षा की और सभी मुमुक्षु आत्माओं का तिलक कर उनका मुंह मीठा कराया गया । इसी स्थान पर उत्तरप्रदेश के पूर्व राज्यपाल श्री मो. उस्मान आरिफ के युवा पुत्र श्री इरफान के नेतृत्व में भारी संख्या में उपस्थित मुसलमान भाइयों ने तहेदिल से यात्रा का स्वागत किया। यहां से तेलीवाड़ा होकर यात्रा बांठियों का चौक पहुंची जहां शोभायात्रा का अपूर्व स्वागत हुआ । दीक्षा समारोह समिति के श्री सुन्दरलालजी बांठिया के नेतृत्व में आबोल-वृद्ध ने यात्रियो को अल्पाहार भेंट किया और जलसेवा की। यहां से आगे का प्रायः सारा यात्रा- पथ जैन समाज की बहुलता का क्षेत्र था और पूरे क्षेत्र में धार्मिकजनों ने शोभायात्रा के स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा दिए । अपार भीड़ का कोई वारापार नहीं था। सड़कों पर, गलियों में, छतों पर, छज्जों पर, गवाक्षों में स्त्री-पुरुष अनिमेष, उत्सुक होकर यात्रा की अगवानी कर रहे थे। तेलीवाड़ा रोड़ से शोभायात्रा मोहतों का चौक, बैदों का चौक और मावा पट्टी होते हुए बांठियों के चौक पहुंची थी। बांठियों के चौक से शोभायात्रा आसानियों का चौक, राखेचा रामपुरिया मौहल्ला, गोलछा-खजांची मौहल्ला, नाहटा-सुखाणी मौहल्ला, बड़ा बाजार, डागा पिरोल, बागड़िया मौहल्ला, बेगानी चौक, कोचर चोक, डागा सेठिया, ओसवाल कोठारी, रांगड़ी चौक और मुकीम बोथरों में होते हुए शोभा यात्रा का सेठिया धार्मिक भवन पहुंचकर विसर्जन हुआ । इस शोभायात्रा ने एक नया इतिहास रचा और छह घण्टे की अवधि में बीकानेर के प्रायः सभी केन्द्र स्थलों को स्पर्श किया। शोभा- यात्रा में अपार जनसमूह था तो स्वागत में भी अपार जनमेदिनी उप- स्थित थी। इस प्रकार यह अविस्मरणीय शोभायात्रा सम्पन्न हुई। स्वयं सेवकों ने सभी व्यवस्थाए सुदाइ रीति से सम्हाली। पुलिस और याता- यात नियंत्रण सराहनीय रहा । -- ! . ५ १२६ ० दीक्षा विशेषांक , र मुमुक्षु आत्माओं का भव्य अभिनन्दन बीकानेर के ढढ़ा चौक में दि. १५-२-६२ को रात्रि में समता विभूति आचार्य श्री नानेश की पावन नेश्राय में दीक्षा ग्रहण करने को संकल्पित मुमुक्षु आत्माओं के सम्मान में भव्य अभिनन्दन समारोह आयो- जित किया गया । अभिनन्दन समारोह में भाग लेने के लिए भारतभर से सुश्रावक-सुश्राविका वर्ग बीकानेर की ओर उमड़ चुका था और इस चौक में समाने का यत्न कर रहा था । बीकानेर के सुधी धर्मानुरागी आबाल वृद्ध वहां उपस्थित थे । ऐसा भाव भरा भावुक दृश्य था कि देखते ही बनता था। श्री साधुमार्गी जैन बीकानेर श्रावक संघ और श्री समता युवा संघ के तत्वावधान में आयोजित इस समारोह के विशाल मंच पर प्रमुख अतिथि न्यायमूर्ति श्री यू. एन. भाचावत, विशेष अतिथि मुख्य अभियंता सिंचित क्षेत्र विकास श्री सज्जनराजजी कटारिया, संघ अध्यक्ष श्री भंवर- लालजी बैद, संघ मंत्री श्री चम्पालालजी डागा और पूर्व संघ अध्यक्ष श्री गणपतराजजी बोहरा, श्री गुमानमलजी चोरडिया, श्री दीपचन्दरी भूरा, श्री पी. सी. चौपड़ा विराजमान थे। संघ प्रमुख और स्थानीय संघ के प्रमुख सर्वश्री जयचन्दलालजी रामपुरिया, सूरजमलजी बच्छावत कलकत्ता, नवलमलजी पुगलिया नागपुर, दीक्षा समारोह समिति के अध्यक्ष श्री रिखवचन्दजी वैद व संयोजक श्री भंवरलालजी कोठारी तथा श्री अनोपचन्दजी सेठिया, श्री अवीरचन्दजी सेठिया, समता युवा संग के अध्यक्ष श्री उमरावसिहजी ओस्तवाल सहित देशभर के संब प्रमुख, श्रीसंघों के पदाधिकारी और महिला समिति संरक्षिका सौ. श्रीमती यशोदादेवी जी बोहरा, अध्यक्षा सौ. श्रीमती शान्तीदेवी मेहता, भगी श्रीमती रत्ना ओस्तवाल सहित संघश्री के प्रतीक पदाधिकारीगण समा- रोह की शोभा बढा रहे थे। सच्चे अर्थों में इस भव्य मच की शोभा थे वैरागी और गंग. गिन आत्माए । वे भव्य मुमुक्ष दीक्षार्थी आज रत्नखचित स्वर्णाभुपको दीप्रमान रत्नजटित स्वर्ण मुकटों और शोभायमान प्रदीप्त अंगवस्त्रों में शोभित थे, जो जन-जन के आकर्षण के केन्द्र थे और जो आज ३, श्री और अतुलित समृद्धि की गोद में बैठे थे और कल के उपागा १ . ।

• १० व २५ मार्च १९९२ १२७ -a- साथ सर्वस्व त्याग कर समाज समर्पित होने जा रहे थे। इन दिव्य प्रात्माओं के आत्मक्ल, अविचल और संकल्प और अविकल शासन सेवा को उद्दाम भावना का आदर्श तेजोवलय के रूप में उन सभी के मुख मंडलों पर स्पष्ट प्रभासित हो रहा था। उनके अभिनन्दन हेतु सहस्त्रों की जनमेदिनी श्रद्धा और हर्ष के साथ जयगुरु नाना के जयघोषों से अपनी अन्तर भावनाओं को समय-समय पर अभिव्यक्त कर रही थी। ऐसे हर्पद, सुखद वातावरण में जव अभिनन्दन समारोह प्रारम्भ हुआ तो मानो अभिनन्दन की होड़-सी लग गई । समारोह के प्रखर प्रतिभासम्पन्न सयोजक, संघ के पूर्व मंत्री श्री भंवरलालजी कोठारी ने आज संयोजन का गुरुतर दायित्व ग्रहण किया था और उनके अनुरोध पर दीक्षा समारोह समिति के अध्यक्ष श्री रिखबचन्दजी बैद ने स्वर्णाभ विशाल मालाए मुमुक्षु आत्माओं को समर्पित कर समारोह का शुभारम्भ किया । श्री लक्ष्मण बडेर, श्री धनराज डागा और उनकी सहयोगी बहिनो ने मंगल गीत प्रस्तुत करके समारोह के मंगल आरम्भ की मानो उद्घोषणा की। अभिनन्दन-पत्र भेट- समारोह में अभिनन्दन-पत्रों का क्रम चला और जब प्रमुख अतिथि श्री यू. एन. भाचावत ने दीक्षार्थी श्री इन्द्रेश कोठारी व श्री राजीव सेठिया को ससम्मान अभिनन्दन-पत्र भेट किया तो फिर यह भेट का क्रम सुदीर्घ काल तक चला पूर्व संघ अध्यक्ष श्री गणपतराजजी बोहरा एवं संघ मंत्री श्री चम्पालालजी डागा ने अभिनन्दन-पत्र भेंट किए । श्री अभा. साधुमार्गी जैन संघ को अोर से सभी मुमुक्षु आत्माओं को संघ अध्यक्ष श्री भंवरलालजी बैद व संघ प्रमुखों ने भेट किए । श्री जयचन्दलालजी रामपुरिया, श्री नवलमलजी पुगलिया, श्री जयचन्द- लालजी सुखाणी आदि ने अभिनन्दन-पत्र भेट और वाचन का पुण्य लाभ प्राप्त किया । इस प्रकार यह हर्पोत्पादक अभिक्रम आगे बढ़ा । इस अवसर पर श्री राजीव सेठिया और सुश्री सीमा सेठिया की भुआजी श्रीमती सरला बच्छावत सहित अनेक वक्ताओं ने अभि- नन्दन हेतु अपने विचार रखे और इस सत्साहस हेतु वैरागी-वृन्द को A १२८ • दीक्षा विशेषांक , बधाई देते हुए गुरुदेव का उपकार माना। सभी वक्ताओं ने मुमुक्ष आत्माओं के परिजनों का भी हार्दिक अभिनन्दन किया । शासन सेवा- अपने अभिनन्दन के प्रति विनम्र भाव से अपने भाव प्रकट करते हुए दीक्षार्थी मुमुक्षु आत्माओं ने शासन सेवा हेतु स्वयं को सम- पित करने के, आध्यात्मिक पथ के अमर पथिक बनने के अपने स्वप्न के साकार होने की पूर्व सन्ध्या पर चतुर्विध संघ के प्रति अपने हृदयोद्- गार से उपस्थित जनमेदिनी के हृदयों को भावाभिभूत कर दिया ! मुमुक्षु श्री राजीव सेठिया, सुश्री सीमा सेठिया, सुश्री अजु हीरावत, सुश्री मंजु नाहर, सुश्री रीना बच्छावत, सुश्री कुमुद दस्साणी व सुश्री सरोज भूरा ने जब अपने विचार प्रकट किए तो उनकी विपुल ज्ञान राशि और उस उद्बोधन में संकेतित ज्ञान, दर्शन, चारित्र की आराधना के अचल व स्वर्णिम संकल्प में जनसमूह शासन की भावी जाहोजलाली के दर्शन कर हर्पित हो उठा । इस अपूर्व अवसर पर आज के प्रमुख अतिथि पद से विशाल. जनसमूह को सम्बोधित करते हुए न्यायमूर्ति श्री उम्मेदलाल नंदलाल भाचावत ने कहा कि आज विश्व में अशांति का वातावरण बना हुआ है और मनुष्य-मनुष्य का शत्रु हो रहा है । वह संहार पर उतार हो गया है, जिससे चारों ओर विध्वंसक कार्य घटित हो रहे है। सर्वत्र बात तो शांति की जा रही है और हम अशांति को बढ़ते हुए देख रहे हैं । सारी गतिविधियां हथियार, शक्ति और पैसे के वल पर संचालित की जा रही हैं, ऐसी दशा में शांति की स्थापना कैसे हो सकती है न्यायमूर्ति श्री भाचावत ने अपने सारगभित विवेचन में आगे कहा कि शांति के लिए हमारी भावना में ताकत होनी चाहिये । इसके लिए आत्म नियंत्रण आवश्यक है । काम-क्रोध, लोभ और मोह रूपी शत्रु पर हम विजय पाए तभी शांति की कल्पना साकार होगी। श्री भाचावतजी ने कहा कि भारतीय दर्शन में निरत्न यानि सम्यक् ज्ञान, दर्शन और चारित्र का विशेष महत्व है। इन्हें सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है। ये दीक्षार्थी-मुमुक्षु आत्माए. इस त्रिरत्न की प्राप्ति हेतु जिनशासन में समर्पित होने जा रही हैं । हमें इनसे प्रेरणा लेनी चाहिये । .

• १० व २५ मार्च १९६२ १२४ के हम इनसे सच्ची प्रेरणा लें तो गृहस्थ जीवन मे भी संयम से रहने का उपक्रम कर सकते है । जैन धर्म भावना प्रधान है हम इन मुमुक्षु आत्माओं की भावनाओं का अभिनन्दन करते हैं और ऐसा करके स्वयं मे भी उन भावनाओं का संवर्धन करते हैं। जैनत्व का सम्बन्ध जन्म से नहीं, कर्म से है । हम अपने कर्मों को प्रभु महावीर के सिद्धांतों अनुरूप ढाले ~ ऐसा करके ही हम इन मुमुक्षु आत्माओं का सच्चा अभिनन्दन कर सकते हैं। समारोह के विशिष्ट अतिथि व सिचित क्षेत्र विकास विभाग के मुख्य अभियन्ता श्री सज्जनराजजी कटारिया ने कहा कि ये भव्य आत्माए जो पथ स्वीकार करने जा रही है, हम सभी उनके इस कार्य का हार्दिक अनुमोदन करते हैं । इस प्रकार यह भव्य समारोह प्रत्येक अंतःकरण पर हर्ष की अमर स्मृति अंकित कर सोत्साह सम्पन्न हुआ । जिनशासन प्रद्योतक, धर्मपाल प्रतिबोधक, समीक्षण ध्यानयोगी समता विभूति आचार्य श्री नानेश की पावन नेश्राय में २१ मुमुक्षु आत्माएं दीक्षित : सर्वत्र अपार हर्ष और उत्साह बाफना ट्रस्ट भवन, बीकानेर दि. १६-२-१२ थार की मरुभूमि के ऐतिहासिक नगर बीकानेर में जैन आचार्यो की गौरवशाली स्मृतियों में जिनशासन को प्रदीप्त करने वाला एक स्वर्णिम अध्याय और जुड गया । आज माघ शुक्ला त्रयो- दशी सं. २०४८ रविवार के पुनीत तेजस्वी दिवस पर जैन कॉलेज के समीपस्थ बाफना ट्रस्ट भवन के विशाल प्रांगण में समता विभूति प्राचार्य श्री नानेश ने २ दीक्षार्थियों और १६ दीक्षार्थी बहिनों को धर्म उत्साह से ओत-प्रोत आध्यात्मिक वातावरण में जैन भागवती दीक्षा प्रदान की। आज प्रातः से ही नगर की समस्त रादों, रागी विमानों से अपार जनसमूह को अपने अंक में भर-भर कर बाफना ट्रस्ट की ओर । - १३० ० दीक्षा विशेषांक पहुंचाने लगी। देश के कोने-कोने से आए स्त्री-पुरुष आवाल-वृद्ध अपरे अपने प्रदेश की विशिष्ट पहचान को प्रदर्शित करने वाली रंग-बिरं वेश भूषाएं और पगडियां, साफे धारण किए हुए दीक्षा स्थल की ओ बढ़े जा रहे थे । बीकानेर के तो सभी धर्मों और वर्गों के लोग इ पावन अवसर के साक्षी बनने के लिए उमड़ पड़े । विशाल पांडाल के दक्षिण छोर पर श्री अ. भा. साधुमा जैन संघ के अध्यक्ष श्री भवरलाल जी बैद आज के समारोह के प्रमु अतिथि पूर्व न्यायमूर्ति श्री गुमानमल जी लोढ़ा संसद सदस्य एवं विशे अतिथि माननीय न्यायमूत्ति श्री यू. एन. भाचावत, नवनिर्वाचित सं अध्यक्ष श्री रिद्धकरण जी सिपाणी सहित अनेकानेक संघ प्रमुख औ विशेष आमत्रित विराजमान थे । आज के समारोह के अध्यक्ष पशु पालन राज्य मंत्री श्री देवी सिंह भाटी के पधारने पर उन्हें स्वागत पूर्वक आसीन कराया गया ! संघ के प्रथम अध्यक्ष श्री छगनमल वैद सहित पूर्व अध्यक्ष सर्व श्री गणपतराज जी बोहरा, गुमानमल चोरडिया, पी. सी. चोपड़ा, दीपचन्द जी भूरा सहित गणमान्य सर प्रमुख विराजमान थे । समारोह का संयोजन दीक्षा समारोह समिति के अध्यक्ष रिखबचन्द जी जैन, संयोजक श्री भंवरलाल जी कोठारी एवं श्री न भा. साधुमार्गी जैन संघ के मंत्री श्री चम्पालाल जी डागा ने संयुक्त रूप से किया । सर्वप्रथम समाजसेवी श्री मानव मुनिजी ने मंगलाचरण ज प्रस्तुत किया। समता क्रांति ही समाधान समारोह के प्रमुख अतिथि सांसर न्यायमूर्ति श्री गुमानमलजी लोढ़ा ने अपनी प्रोजस्वी शैली में सहस्त्रों भी संख्या में उपस्थित जनमेदिनी के समक्ष विचार प्रकट कर जनसमूह को प्रेरक दिशा वोध प्रदान किया। श्री लोढ़ा जी ने परम पूज्य आचार्य-प्रवर के प्रति अपनी वन्दना व्यक्त की और उनके साथ हुई अपनी वार्ता के लिए आचार्य श्री जी के प्रति उपकार माना । सांसद श्री लोटा देदिप्यमान सघ पदाधिकारियों और धर्म संस्थाओं के अधिकारियों के प्रति इस भव्य आयोजन के लिए साधुवाद पूर्वक बीकानेर में विराजिन संत-सती वर्ग को अपनी भावभीनी वन्दना निवेदन की। न्यायमूत्ति श्री लोढ़ा ने कहा कि भगवान महावीर के fit.

। १० व २५ मार्च १९९२ १३१ तन सिद्धान्त आज और अधिक महत्त्वपूर्ण एवं सामायिक हैं । मैं दीक्षा के इस पावन अवसर पर महावीर पथ के अनुगामी बनने हेतु तत्पर भव्य मुमुक्षु आत्माओं को बधाई देता हूं और उनका हार्दिक अभिनन्दन करता हूं। जैन धर्म ने विश्व को ५ महाव्रतों की अनुपम देन देकर समृद्ध बनाया है । जिनशासन के अनुयायियों ने अपने तीर्थकरो के उपदेशों को आचरण में ढालकर समाज, देश और विश्व के समक्ष एक प्रादर्श उपस्थित किया है । इस कथनी-करनी की एकता को स्वयं महात्मा गांधी ने स्वीकारा था और तप की महिमा का सन्दर्भ उप- स्थित होने पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने कहा कि तप की महिमा पूछनी है तो जाकर जैनियों से पूछो । प्रभु महावीर ने अहिंसा को जो अमर सन्देश दिया है, आज वही सम्पूर्ण समाज की आशा है। हमारे समक्ष तो प्रत्यक्ष उदाहरण है । आज देखते-देखते हिंसा के बल पर विश्व राज्य स्थापित करने की अमेरिका और रूस की योजना विफल हो गई । भौतिक साम्यवाद का घोप करके महाशक्ति बना रूस आज छिन्न-विछिन्न, क्षत-विक्षत पड़ा है । प्राज अहिसा जितनी सामयिक और प्रासंगिक है, उतनी शायद पहले कभी नहीं रही । रक्तहीन समता क्रांति ही विश्व की समस्याओं का एकमात्र समाधान है । अतः हमें समता विभूति आचार्य- प्रवर के पावन उपदेशों को अपने आचरण में ढालकर जीवन को समता. मय बनाना चाहिये। पावन दिवस- इसके बाद बोलते हुए समाजसेवी श्री मानव मुनिजी ने कहा कि मरुप्रदेश के इतिहास में आज का पावन दिवस स्वर्णाक्षरों से लिखा जावेगा। समता सन्देश-संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री गणपतराज जी बोहरा ने कहा कि हम आचार्य श्री के अनुयायी कहलाने के अधिकारी तभी होगे, जब समता-सन्देश को जीवन में उतारे और तदनुसार अनुकरण करें। हमें इन दीक्षाओं से प्रेरणा लेकर आचार्य-प्रवर के विचारों को आचरण में ढालना चाहिये । संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री पी. सी. चौपड़ा दीक्षाओं का हार्दिक अभिनन्दन और अनुमोदन करते हुए भव्य मुमुक्ष आत्माओं के माता-पिताओं को धन्य निरूपित किया । युवानेता वीरेन्द्र कोठारी एडवोकेट उज्जैन ने भी अपनी शुभकामनाएं १३२ ० दीक्षा विशेष अर्पित की। वन्दन-संघ अध्यक्ष श्री भंवरलाल जी वैद ने सकल सर की ओर इस पावन अवसर पर शुभकामनाएं व्यक्त की। राजस्थान के प्रसिद्ध व्यवसायी श्री उमरावमल जी चोरडिया जयपुर ने अपनी गासि- त्यपूर्ण विचार शैली में कहा कि आज जो घटित होने जा रहा है वह युगान्तरकारी है । परम श्रद्धेय आचार्य श्री नानेश ने समस्त हिन्दु- स्तान में जिनशासन को प्रदीप्त किया है। मेरा उन्हें भावभीना : वन्दन । श्री नवलमल जी पुगलिया नागपुर ने भी अपनी शुभकामनाएं अर्पित की। दीक्षा रा दूहा-इसके बाद डॉ. नरेन्द्र भानावत जयपुर ने जैन भागवती दीक्षा के स्वरूप और महत्त्व पर अपने विचारों से प्रभावी रीति से प्रस्तुत किया । डॉ. भानावत जी ने "दीक्षा के दहे" भी सुनाए । प्रवेश-इसी समय सन्त-सती वर्ग के बाफना ट्रस्ट भवन में प्रवेश की सूचना मिली और ध्वनि विस्तारक यन्त्र आदि सहित सभी विद्युत उपकरण हटा दिए गए। शीघ्र ही ध्वल यश के प्रतीक धवलवेग- धारी साध्वी वृन्द का पधारना हुआ और सत्वर पश्चात् ही सन्तों का शुभागमन हुआ । सन्त-वृन्द के आगे धीर-गंभीर पद चापों के साथ समता-विभूति आचार्य श्री श्री नानेश दीक्षा स्थल उनके पधारते ही जनमेदिनी हर्पपूर्वक जय जयकार कर उठी । अपने शासन नायक को अपने बीच पाकर जन-मन में जो हर्प की तरंग उठी, वे शीघ्र ही श्रद्धा-भक्ति पूर्ण गीतों के स्वरों में मुखर हो उठी । गुरुदेव के आसन ग्रहण करते ही विद्वद्वर्य श्री विजय मुनियो म. सा. ने मधुर स्वर लहरी के साथ णमोकार मत्र का सामुहिक सस्वर पाठ कराया । हजारों कंठों से निकली समवेत मंत्र-वाणी में वातावरण में अद्भुत उत्साह भर दिया । आध्यात्मिकता का नाम तरगायित हो उठा । शीत्र ही सती मंडल ने एक सामुहिगीत प्रस्ता किया "ज्ञानी, ध्यानी, महाध्यानी शासन श्रृंगार को, बन्दना आचा को" जनमेदिनी अन्तः प्रेरणा से झूम कर गा उटी "जन मन । है, नाना गुरु हमारा है।" पर पधारे। - • १० व २५ मार्च १९६२ १३३ दीक्षा विधि-इस समय तक जिनशासन प्रद्योतक आचार्य श्री नानेश के समक्ष दीक्षार्थी मुमुक्षु आत्माएं साधुवेश धारण करके उप- स्थित हुई । २ दीक्षार्थी भाइयों और १६ दीक्षार्थी बहिनों के चेहरे लक्ष्य प्राप्ति के उल्लास से चमक रहे थे । समता विभूति प्राचार्य- प्रवर ने उपस्थित चतुर्विध-संघ के समक्ष दीक्षा का प्रसंग रखा और चतुर्विध संघ ने सहर्ष दीक्षा प्रदान करने की सहमति प्रदान की। चतुर्विध संघ से इस प्रकार आदर्श अनुमोदना प्राप्त करने के पश्चात आचार्य-प्रवर ने दीक्षा मंत्र का पाठ किया और दोनों दीक्षार्थी वन्धुओं के केशलुचन कार्य को आचार्य श्री जी ने अमित स्नेह से पूर्ण किया। शेष १६ मुमुक्षु वहिनों के केशलुचन का कार्य महासती मंडल ने किया। दोनो सन्त अपनी सन्त मंडलो में तथा सभी १६ सतियां अपनी चिरसंचित अभिलाषा की पूर्ति पर हर्षित होते हुए सतीमडल में समा. हित हुई। आचार्य-प्रवर श्री नानेश ने मंगलीक प्रदान की और उसके साथ ही हर्ष-हर्ष की ध्वनि से वातावरण गुजित हो उठा। सामूहिक दीक्षा समारोह सोत्साह पूर्ण हुआ । लगभग ५० हजार की जनमेदिनी के बीच सुसम्पन्न इस समा- रोह की सुव्यवस्था हेतु गत लगभग एक माह से प्रयत्नरत श्री साधुमार्गी जैन बीकानेर श्रावक संघ और श्री समता युवा संघ के कार्यकर्ताओं का अनथक श्रम और अपूर्व समर्यण समाज में यशस्वी हुआ । दीक्षा के इस भव्य आयोजन की सफलता हेतु गंगाशहर-भीनासर, देशनोक, नोखा आदि समीपस्थ श्रीसघों का भी जबरदस्त सहयोग मिला । श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ के बीकानेर स्थित पदाधिकारियों और श्री समता भवन तथा श्री जैन आर्ट प्रेस के कार्यकर्ताओ का श्रम सराह- नीय रहा। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु, धर्मानुरागी नागरिकों ने बीका- नेर पहुंचकर इस पावन प्रायोजन में सहभागी बन अनन्त पुण्य लाभ प्राप्त किया। राज्य शासन को साधुवाद : आज के दीक्षा समारोह के बीच समारोह समिति के संयोजक श्री भंवरलाल जी कोठारी ने हजारों की जनमेदिनी को सूचित १३४ दीक्षा विशेषांक किया कि राजस्थान सरकार के माननीय मुख्यमंत्री श्री भैरोसिह जी शेखावत ने इस भव्य दीक्षा प्रसग पर आज सम्पूर्ण राजस्थान में कसाई- खाने बन्द रखने की घोषणा की है। श्री कोठारी जी ने कहा कि यह घोषणा करके राज्य सरकार ने हजारों जीवों को वध से बचाया है । दीक्षा समिति इस घोषणा के लिए राज्य सरकार के प्रति हार्दिक आभार और साधुवाद ज्ञापित करती है । समारोह समापन से पूर्व राज्य सरकार के प्रतिनिधि और बीकानेर के मगरा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक एवं पशुपालन राज्य मंत्री श्री, देवी सिहजी भाटी ने स्वयं की तथा राज्य सरकार की ओर से शुभकामनाएं अर्पित की। घोषणाएं-इस पुनीत अवसर पर मुमुक्षु आत्मा श्री राजीव सेठिया और उनकी बहिन मुमुक्षु आत्मा सुश्री सीमा सेठिया के दीक्षा ग्रहण की खुशी में आप दोनों की परम पूज्य दादीजी श्रीमती रतनदेवी ज़ी सेठिया की ओर से परमार्थ खर्च की उदारतापूर्वक अनुमति दी गई और दोनों दीक्षार्थी बहिन-भाई के पितृव्य श्री अनूप चन्द जी एवं श्री अबीरचन्द जी सेठिया निवासी बीकानेर हाल कलकत्ता ने ग्यारह लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये शुभ कार्यो हेतु व्यय की घोपणा की। उल्लेखनीय है कि श्रीमती. रतनदेवी धर्मपत्नी श्री भंवरलाल सेठिया की अपने पोते व पोती को दीक्षा ग्रहणार्थ आज्ञा प्रदान करने व प्रोत्साहित करने में बड़ी सकारात्मक भूमिका रही और आपके दोनों आज्ञाकारी पुत्रों ने भी पूर्ण सहयोग दिया। दोनों मुमुक्षु आत्माओं की भुमा श्रीमती सरला बच्छावत और फूफा श्री धर्मचन्द जी बच्छावत ने भी परमार्थ खर्च के संकल्प व्यक्त किए। पूरे परिवार की भावना उत्कृष्ट और सराहनीय रही। समता विभूति आचार्य श्री की नेश्राय में सम्पन्न दीक्षाओ के क्रम को निरन्तर गतिशील रखने के लिए शासननिष्ठ जन संकल्पित है । इसलिए इसी पावन अवसर पर परम पूज्य आचार्य-प्रवर के चरणारविन्दों में निम्न आज्ञा-पत्र प्रस्तुत हुए- (१) सुश्री दिलखुश उपाख्य रेखा लोढ़ा बी. ए., विशारद निवासी उदयपुर (२) सुश्री रेणु गोलछा पुत्री श्री तेजराज जी गोलछा, बायतुः • १० व २५ मार्च १९६२ १३५ (३) श्री सूरजमल जी नाफोलिया, मोडी अन्य भी अनेक प्रकार की पारमार्थिक घोषणाएं और त्याग- प्रत्याख्यान हुए। इस प्रकार यह भव्य समारोह अपूर्व उत्साह सादगी और त्याग-तप से पूर्ण हुआ। कवि सम्मेलन यद्यपि प्रातःकालीन दीक्षा समारोह के बाद देश के अन्य भागों आए श्रद्धालुओं की वापसी प्रारम्भ हो गई थी किन्तु बीकानेर की कवि सम्मेलन प्रिय जनता और हजारों स्त्री-पुरुषों की उपस्थिति ने कवियों का उत्साह बढ़ाया और कवि सम्मेलन में कवियों ने अपनी बहुआयामी प्रतिभा से श्रोताओं का भरपूर लोकरंजन और लोक शिक्षण से किया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता बम्बई के कवि श्याम ज्वालामुखी ने की और कुशल संचालन हास्य व्यंग्य के प्रसिद्ध कवि श्री सुरेन्द्र दुबे व्यावर ने किया। यह कवि सम्मेलन श्री पंकजशाह पीपलियाकलां के सौजन्य से दि. १६-२ को रात्रि में ढढ्ढों के चौक, बीकानेर में सम्पन्न हुआ। कवि सम्मेलन में बम्बई के अलबेला खत्री, ब्यावर के श्याम अंगारा, शिव तूफान, लखनऊ के श्री वेदवृत वाजपेई ने भाग लिया। समता विभूति आचार्य श्री नानेश के सानिध्य में १६ फरवरी १६६२ को बीकानेर में हुई दीक्षा की सूची पूर्व नाम दीक्षा के पश्चात नामकरण १. श्री इन्द्रेश जी कोठारी श्री इन्द्रेश-मुनिजी म. सा. २. श्री राजीव जी सेठिया श्री राजेश मुनिजी म. सा, ३. श्रीमती लता जी जैन श्री सम्बोधि श्रीजी म. सा. ४. कुमुद जी दस्साणी श्री विपुला श्रीजी म. सा. ५, कान्ता जी गोलछा श्री विजेता श्रीजी म. सा. ६. सरोज जी भूरा श्री स्थित प्रज्ञा जी म. सा. ७ अजु नाहर श्री मनीषा श्रीजी म. सा. ८. धैर्य प्रभाजी जैन श्री धैर्य प्रज्ञाजी म. सा. ६. मणी जो गुलगुलिया श्री मणि श्रीजी म, मा.

० दीक्षा विशेषांक १०. सीमाजी सेठिया श्री वैभव श्रीजी म सा. ११. सुरजजी नवलखा श्री शील प्रभाजी म. सा. १२. इन्दुवालाजी हीरावत श्री अभिलाषा श्रीजी म. सा. १३. अनिताजी लोढ़ा श्री नेहा श्रीजी म सा. १४. कविताजी जैन श्री कविता श्रीजी म. सा. १५ अन्जुजी हीरावत श्री अनुपमा श्रीजी म. सा. १६. चन्दुजी हीरावत श्री नूतन श्रीजी म. सा. १७. मधुजी सुराणा श्री अंकिता श्रीजी म. सा. १८. संगीताजी सांखला श्री संगीता श्रीजी म. सा. १६. जयश्रीजी भूरा श्री जागृति श्रीजी म. सा. २०. जयन्तिजी जैन श्री विभा श्रीजी म. सा. २१. रीनाजी बच्छावत श्री मनन प्रज्ञाजी म. सा. आचार्य-प्रवर के युवाचार्य पद प्रदान के समय विद्यमान संत-सतियांजी म. सा. की शुभ नामावली मुनिश्री (१) श्री पन्नालालजी म. सा. (२) श्री बगतावरमलजी म. सा.. (३) श्री सूरजमलजी म. सा. (४) श्री धनराजजी म. सा. (५) श्री सागरमलजी म. सा. (६) श्री केसुलालजी. (७) श्री करणीदानजी म. सा. (८) श्री सुन्दरलालजी म. सा. (९) श्री ईश्वरचन्दजी म. सा. (१०) श्री गोपीलालजी म. सा. (११) श्री इन्द्रचन्दजी म. सा. (१२) श्री रामेश्वरजी म. सा. १३) श्री कंवरलालजी म. सा. (१४) श्री घेवरचन्दजी म. सा. (१५), श्री मांगीलालजी म. सा. (१६) श्री बाबूलालजी म. सा. . (१७) श्री तोलारामजी म. सा. (१८) श्री मगनलालजी म. सा- महासती श्री ) श्री तेजकंवरजी म. सा. (२) श्री वल्लभजी म. सा. (३) श्री गुलाबजी म. सा. (४) श्री पानकंवरजी म. सा. ५). श्री कस्तूरजी म. सा. (६) श्री चम्पाजी म. सा. (७) श्री सूरजजी म. सा. (८) श्री मोहनजी म. सा. (६) श्री मानजी म. सा. (१०) श्री प्यारकंवरजी म. सा. "म. सा.

१३७ ० १० व २५ मार्च १९६२ (११) श्री पार्वताजी म. सा. (१२) श्री केशरजी म. सा. (१३) श्री पानजी म. सा. (१४) श्री कंचनजी म. सा. (१५) श्री आनन्दजी म. सा. (१६) श्री चादजी म. सा. (१७) श्री विदामजी म. सा. (१८) श्री सुमतिजी म. सा. (१६) श्री वल्लभजी म. सा. (२०) श्री नंदकंवरजी म. सा. (२१) श्री झमकूजी म. सा. (२२) श्री भूराजी म. सा. (२३) श्री चम्पाजी म. सा. (२४) श्री पानजी म. सा. (२५) श्री मनोहरजी म. सा. (२६) श्री सायरजी म. सा. (२७) श्री चन्द्राजी म. सा. (२८) श्री धीरजजी म. सा. (२६) श्री सुगनजी म. सा. (३०) श्री बदामजी म. सा. (३१) श्री छगनजी म. सा. (३२) श्री भंवरजी म. सा. (३३) श्री इचरजजी म. सा. (३४) श्री पेपजी म. सा. (३५) श्री नानूजी म. सा. (३६) श्री फूलजी म. सा. (३७) श्री इन्द्रजी म. सा. (३८) श्री रोशनजी म. सा. (३६) श्री अनोखाजी म. सा. (४०) श्री सूर्य कान्ताजी म. सा. (४१) श्री सुगनजी म. सा. (४२) श्री धापूजी म. सा. (४३) श्री गुलाबजी म. सा. (४४) श्री शांताजी म. सा. (४५) श्री छोटाजी म. सा. (४६) श्री रसालजी म. सा. ( ४७) श्री लाडजी म. सा. (४८) श्री सरदारजी म. सा. (४६) श्री सोभागजी म. सा. (५०) श्री जीवणाजी म. सा. (५१) श्री गटूजी म. सा. (५२) श्री धापूजी म. सा. (५३) श्री चत्तरजी म. सा. (५४) श्री नगीनाजी म. सा. (५५) श्री श्रेयकंवरजी म. सा. (५६) श्री सुगनजी म. सा. ५७) श्री गुलावजी म. सा. (५८) श्री सम्पतजी म. सा. (५६) श्री ककूजी म. सा. (६०) श्री सूरजजी म. सा. (६१) श्री सायरजी म. सा. (६२) श्री सम्पतजी म सा. (६३) श्री सूरजजी म. सा. (६४) श्री कमलाजी म. सा. (६५) श्री उगमजी म. सा (६६) श्री रोशनजी म. सा. (६७) श्री गुलावजी म. सा. (६८) श्री टीपूजी म. सा. (६६) श्री नगीनाजी म. सा. (७०) श्री राजकंवरजी म. सा. ७१) श्री वरजूजी म. सा. (७२) श्री धापूजी म. सा. (७३) श्री हगामजी म. सा.

आचार्य-प्रवर के युवाचार्य पद प्रदान के पश्चात् दीक्षित हुए संत-सतियांजी म. सा. की शुभ नामावली (१) श्री सेवन्त मुनिजी म. सा. (२) श्री सुशीलाजी म. सा. (३) श्री वृद्धिचन्दजी म. सा. (४) श्री लीलावतीजी म. सा. (५) श्री शान्ताजी म. सा. (६) श्री शांति मुनिजी म. सा. (७) श्री कंवर मुनिजी म. सा. (८) श्री हरक मुनिजी म. सा. (६) श्री अमर मुनिजी म. सा. (१०) श्री कस्तूराजी म. सा. (११) श्री हुलासजी म. सा. (१२) श्री ज्ञानकंवरजी म. सा. (१३) श्री माणक मुनिजी म. सा. (१४) श्री सोहनकंवरजी म. सा. (१५) श्री रतन मुनिजी म. सा. (१६) श्री फूल मुनिजी म. सा. (१७) श्री वृद्धिकंवरजी म. सा. (१८) श्री सम्पत मुनिजी म. सा. (१९) श्री प्रेम मुनिजी म. सा. (२०) श्री पारस मुनिजी म. सा. (२१) श्री ज्ञानकंवरजी म. सा. (२२) श्री प्रेमलताजी म. सा. (२३) श्री इन्दुबालाजी म. सा. (२४) श्री गंगावतीजी म. सा. (२५) श्री पारसकंवरजी म. सा. (२६) श्री चंदनवालाजी म. सा. (२७) श्री धर्मेश मुनिजी म. सा. (२८) श्री जय श्रीजी म. सा. (२६) श्री चमेलीजी म. सा. (३०) श्री सुशीलाजी म. सा. (३१) श्री सुशीलाजी म. सा. (३२) श्री मंगलाकंवरजी म. सा. (३३) श्री शकुन्तलाजी म. सा. (३४) श्री सन्तोष मुनिजी म. सा. (३५) श्री जतनकंवरजी म. सा. (३६) श्री छगनकंवरजी म. सा. (३७) श्री चन्द्राजी म. सा. (३८) श्री कुसुमलताजी म. सा. (३६) श्री प्रेमलताजी म. सा. (४०) श्री सन्तोष मुनिजी म. सा. (४१) श्री रणजीत मुनिजी म. सा. (४२) श्री महेन्द्र मुनिजी म. सा. (४३) श्री विमलाकंवरजी म. सा. (४४) श्री कमल प्रभाजी म. सा. (४५) श्री पुष्पलताजी म. सा. (४६) श्री सुमतिकंवरजी म. सा. (४७) श्री विमलाकंवरजी म. सा. (४८) श्री गजानन्दजी म. सा.

was (२२) श्री सूरजकंवरजी म. सा. (५३) श्री कल्याणजी म. सा. (५४) श्री ताराकवरजी म. सा. (५५) श्री श्रीकाताजी म. सा. (५६) श्री चन्दनबालाजी म. सा. (५७) श्री कुसुमलताजी म. सा. (५८) श्री ताराजी म. सा. (५६) श्री चेतन श्रीजी म. सा. (६०) श्री रवीन्द्र मुनिजी म. सा. (६१) श्री भूपेन्द्र मुनिजी म. सा. (६२) श्री वीरेन्द्र मुनिजी म. सा. (६३) श्री हुलास मुनिजी म. सा. (६४) श्री जितेन्द्र मुनिजी म. सा. (६५) श्री राजेन्द्र मुनिजी म. सा. (६६) श्री विजय मुनिजी म. सा. (६७) श्री तेज प्रभाजी म. सा. (६८) श्री भंवरकंवरजी म. सा. (६६) श्री कुसुमकांतजी म. सा. (७०) श्री पुष्पाजी म. सा. (७१) श्री वसुमतीजी म. सा. (७२) श्री राजमतीजी म. सा. (७३) श्री मंजुबालाजी म. सा. (७४) श्री प्रभावतीजी म. सा. (७५) श्री ललित प्रभाजी म. सा. (७६) श्री सुशीलाजी म. सा. (७७) श्री समताजी म. सा. (७८) श्री निरंजनाजी म. सा. (७६) श्री सुधाजी म. सा. (८०) श्री पारसकंवरजी म. सा. (८१) श्री सुमनलताजी म. सा. (८२) श्री नरेन्द्र मुनिजी म. सा. (८३) श्री स्नेहलताजी म. सा. (८४) श्री विजय लक्ष्मीजी म. सा. (८५) श्री ज्ञान मुनिजी म. सा. (८६) श्री अंजना श्रीजी म. सा. (८७) श्री रंजना श्रीजी म. सा. (८८) श्री ललित प्रभाजी म. सा. (८६) श्री पुष्प मुनिजी म. सा. (६०) श्री बलभद्र मुनिजी म. सा. (६१) श्री विचक्षणा श्रीजी म. सा. (६२) श्री सुलक्षणा श्रीजी म. सा. (६३) श्री प्रियलक्षणा श्रीजी म.सा. (६४) श्री मोतीलालजी म. सा. (६५) श्री राम मुनिजी म. सा. (६६) श्री प्रीति सुधाजी म. सा. (६७) श्री सुमन प्रभाजी म. सा. (९८) श्री सोमलताजी म. सा. (६६) श्री किरण प्रभाजी म. सा. (१००) श्री किस्तूर मुनिजी म. सा. (१०१) श्री मंजुला श्रीजी म. सा. (१०१) श्री मंजुला श्रीजी म. सा. (१०२) श्री सुलोचनाजी म. सा. (१०३) श्री प्रतिभा श्रीजी म. सा. (१०४) श्री वनिता श्रीजी म. सा. (१०५) श्री सुप्रभाजी म. सा. (१०६) श्री प्रकाश मुनिजी म. सा. (१०७) श्री जयवंत मुनिजी म. सा. (१०८) श्री जयंत श्रीजी म. सा. (१०६) श्री गौतम मुनिजी म. सा. (११०) नी हंसकंवरजी म. सा.. (१११) श्री सुदर्शनाजी म. सा.

(११२) श्री. निरुपमाजी म. सा. (११३) श्री चन्द्र प्रभाजी म. सा. (११४) श्री प्रमोद मुनिजी म. सा. (११५) श्री प्रशम मुनिजी म. सा. (११६) श्री आदर्श प्रभाजी म. सा. (११७) श्री कीर्ति श्रीजी म. सा. (११८) श्री हर्षिला श्रीजी म. सा. (११६) श्री साधना श्रीजी म. सा. (१२०) श्री अर्चना श्रीजी म. सा. (१२१) श्री सरोजकंवरजी म. सा. (१२२) श्री मनोरमा श्रीजी म. सा. (१२३) श्री चंचलकंवरजी म. सा. (१२४) श्री कुसुमकांता श्रीजी म. सा. (१२५) श्री अशोक मुनिजी म. सा. (१२६) श्री सुप्रतिभा श्रीजी म.सा. (१२७) श्री शांतप्रभा श्रीजी म. सा. (१२८) श्री मुक्तिप्रभा श्रीजी म. सा. (१२६) श्री गुणसुन्दरी श्रीजी म.सा. (१३०) श्री मधुवाला.श्रीजी म. सा. (१३१) श्री मूल मुनिजी म. सा. (१३२) श्री ऋषभ मुनिजी म. सा. (१३३) श्री. राज श्रीजी म. सा. (१३४) श्री कनक श्रीजी म. सा. (१३५) श्री शशिकांता श्रीजी म. सा. (१३६) श्री सुलभा श्रीजी म. सा. (१३७) श्री अजित मुनिजी म. सा. (१३८) श्री चेलना श्रीजी म. सा. (१३६) श्री निर्मला श्रीजी म. सा. (१४०) श्री कुमुद श्रीजी म. सा. (१४१) श्री जितेश मुनिजी म. सा. (१४२) श्री पद्म मुनिजी म. सा. (१४३) श्री विनय मुनिजी म. सा. (१४४) श्री पद्म श्रीजी म. सा. (१४५).श्री मधु श्रीजी म. सा. (१४६) श्री कल्पना श्रीजी म. सा. (१४७) श्री अरुणा श्रीजी म. सा. (१४८) श्री श्री दर्शना श्रीजी म. सा. (१४६) श्री प्रवीणा श्रीजी म.साः (१५०) श्री पंकज श्रीजी म. सा. (१५१) श्री कमल श्रीजी म. सा. (१५२) श्री ज्योत्सना श्रीजी म. सा. (१५३) श्री पूर्णिमा श्रीजी म. सा. (१५४) श्री वन्दना श्रीजी म. सा. (१५५) श्री प्रमोद श्रीजी म. सा. (१५६) श्री गोविन्द मुनिजी म. सा. (१५७) श्री उर्मिला श्रीजी म. सा. (१५८) श्री हेमप्रभा श्रीजी म. सा. (१५६) श्री सुभद्राकंवरजी म. सा. (१६०) श्री सुमति मुनिजी म. सा. (१६१) श्री चन्द्रेश मुनिजी म. सा. (१६२). श्री ललित 'प्रभाजी म. ना. (१६३) श्री वसुमतिजी म. सा. (१६४) श्री लब्धि श्रीजी म. सा. (१६५) श्री इन्द्र प्रभाजी म. सा. (१६६) श्री ज्योति प्रभाजी म. सा. (१६७) श्री चित्रा श्रीजी म. सा. (१६८) श्री रचना श्रीजी म. सा. (१६६) श्री सुरेखा श्रीजी म. सा. (१७०) श्री विद्यावतीजी म. सा. (१७१) श्री विरक्ता श्रीजी म. सा.

(१७२) श्री पंकज मुनिजी म. सा. (१७३) श्री धर्मेन्द्र मुनिजी म. सा. (१७४) श्री विनय श्रीजी म. सा. (१७५) श्री सुप्रतिभा श्रीजी म. सा. (१७६) श्री अमिता श्रीजी म. सा. (१७७) श्री सुचिता श्रीजी म. सा. (१७८) श्री श्वेता श्रीजी म. मा. (१७६) श्री नम्रता श्रीजी म. सा. (१८०) श्री मुक्ता श्रीजी म. सा. (१८१) श्री जिनप्रभा श्रीजी म. सा. (१८२) श्री सिद्धप्रभा श्रीजी म. सा. (१८३) श्री मणि प्रभाजी म. सा. (१८४) श्री विशाल प्रभाजी म. सा. (१८५) श्री कनक प्रभाजी म. सा. (१८६) श्री सत्य प्रभाजी म. सा. (१८७) श्री रक्षिता श्रीजी म. सा. (१८८) श्री महिमा श्रीजी म. सा. (१८६) श्री मृदुला श्रीजी म. सा. (१६०) श्री वीणा श्रीजी म. सा. (१६१) श्री लक्ष प्रभाजी म. सा. (१६२) श्री धीरज मुनिजी म. सा. (१६३) श्री क्रांति मुनिजी म. सा. (१९४) श्री प्रेरणा श्रीजी म. सा. (१६५) श्री गुणरंजना श्रीजी म. सा. (१९६) श्री सूर्यमणिजी म. सा. (१६७) श्री सरिता श्रीजी म. सा. (१९८) श्री सुवर्णाजी म. सा. (१६६) श्री निरुपणाजी म. सा. (२००) श्री शिरोमणीजी म. सा. (२०१) श्री विकास श्रीजी म. सा. (२०२) श्री तरुलताजी म. सा. (२०३) श्री करुणा श्रीजी म. सा. (२०४) श्री प्रभावना श्रीजी म. सा. (२०५) श्री सुयशमणिजी म. सा. (२०६) श्री चितरंजना श्रीजी म. सा. (२०७) श्री मुक्ता श्रीजी म. सा. (२०८) श्री सिद्धमणि श्रीजी म. सा. (२०६) श्री रजतमणि श्रीजी म. सा. (२१०) श्री अर्पणा श्रीजी म. सा. (२११) श्री मंजुला श्रीजी म. सा. (२१२) श्री गरिमा श्रीजी म. सा. (२१३) श्री हेम श्रीजी म. सा. (२१४) श्री कल्पमणिजी म. सा. (२१५) श्री रवि प्रभाजी म. सा. (२१६) श्री मयंकमणिजी म. सा. (२१७) श्री चंदनबालाजी म. सा. (२१८) श्री नीता श्रीजी म. सा. (२१६) श्री पीयुष प्रभाजी म सा. (२२०) श्री संयम प्रभाजी म. सा. (२२१) श्री रिद्धि प्रभाजी म सा. (२२२) श्री वैभव प्रभाजी म. सा. (२२३.) श्री पुण्य प्रभाजी म. सा. (२२४) श्री सुबोध प्रभाजी म. सा. (२२५) श्री पराग श्रीजी म. सा. २२६) श्री भावना श्रीजी म. सा. (२२७) श्री उज्जवल प्रभाजी म. सा. (२२८) श्री दिव्य प्रभाजी म. सा. २२८) श्री कल्पराताजी म. सा. (२३०) श्री सुमित्राजी म. सा. (२३१) श्री इगिताजी (२३२) श्री लक्षिता श्रीजी म. सा. (२३३) श्री विकास श्रीजी म. सा. (२३४) श्री अक्षय प्रभाजी म. सा. (२३५) श्री सरोज श्रीजी म. सा. (२३६) श्री अर्पिताजी म. सा. (२३०) श्री श्रद्धा श्रीजी म. मा. (२३८) श्री समर्पिताजी म. सा. (२३६) श्री विवेक मुनिजी म. सा. (२४०) श्री किरण प्रभाजी म. सा. (२४१) श्री गरिमाजी म. सा. (२४२) श्री चरित्र प्रभाजी म. सा. (२४३) श्री कल्पनाजी म. सा. (२४४) श्री शोभा श्रीजी म. सा. (२४५) श्री रेखा श्रीजी म. सा. ' (२४६) श्री विवेक श्रीजी म. सा. (२४७) श्री पुण्य प्रभाजी म. सा. (२४८) श्री पुनिताजी म. सा. (२४६) श्री पुजिता श्रीजी म. सा. (२५०) श्री स्वर्ण प्रभाजी म. सा. (२५१) श्री स्वर्ण रेखाजी म. सा. (२५२) श्री स्वर्ण ज्योतिजी म. सा. (२५३) श्री स्वर्णलताजी म. सा. (२५४) श्री साधना श्रीजी म. सा. (२५५) श्री नंदिता श्रीजी म. सा. (२५६) श्री रत्नेश मुनिजी म. सा. (२५७) श्री प्रमिला श्रीजी म. सा. (२५८) श्री शर्मिला श्रीजी म. सा. (२५९) श्री सुमंगल श्रीजी म. सा. (२६०) श्री पावन श्रीजी म. सा. (२६१) श्री प्रज्ञा श्रीजी म. सा. (२६२) श्री मृगावती श्रीजी म. सा. (२६३) श्री श्रुतशीलाजी म. सा. (२६४) श्री सौम्य शीलाजी म. सा. (२६५) श्री सम्मति शीलाजी म. सा. (२६६) श्री सम्भव मुनिजी म. सा. (२६७) श्री विवेकशीलाजी म. सा. (२६८) श्री इच्छिता श्रीजी म. सा. स्वधर्मी सहायता भेट ५०००) श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन महिला समिति को स्वधर्मी सहायता योजना में श्री श्वेताम्बर साधुमार्गी जैन हितकारिणी संस्था, बीकानेर द्वारा भेंट ।

श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ, बीकानेर संक्षिप्त प्रवृत्ति परिचय A चम्पालाल डागा, मंत्री श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ श्रमण परम्परा में शुद्धाचार का समर्थक, पोषक व अभिवर्धक कार्यकर्ताओं का प्रबल संगठन है। इन समर्पित कार्यकर्ताओं के बल पर संभ की बहुआयामी प्रवृत्तियों का पूरे देश में संचालन हो रहा है । संघ प्रवृत्तियों के विशालकाय ढांचे का संक्षिप्त विवरण में हमारे माननीय अतिथिगणों को भेट करते हुए, समयाभाव को ध्यान में रखते हुए यहां केवल इस प्रतिवेदन को बहुत थोड़े-से शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूं। संघ की प्रवृत्तियों का आधार सम्यक् ज्ञान, दर्शन, चारित्र की आराधना है । ज्ञान के दर्शन से अर्थात् अनुभूति से सम्यक् चारित्र का निर्माण होता है । आज देश न समाज को चारित्र की सर्वाधिक आवश्यकता है । संघ की सभी प्रवृत्तियां ज्ञान, दर्शन, चारित्र की अभि- वर्धक हैं। श्रमणोपासक : संघ के पाक्षिक मुखपत्र श्रमणोपासक की देश भर में ५५०० प्रतियां प्रसारित होती है। इसके विशेषांक भारतीय साहित्य मे अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यह पत्र संघ और सदस्यों के बीच जीवंत सम्बन्ध बनाता है और आचार्य श्री नानेश के विचारों को जन-जन तक पहुचाता है । साहित्य प्रकाशन : संघ ने सदैव सत्साहित्य के प्रकाशन को लक्ष्य में रखा है और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फ्रेंकफुर्त के पुस्तक मेले तक इस साहित्य को बहुमान मिला है । साहित्य प्रकाशन का कार्य साहित्य समिति करती है । हम शीघ्र ही "जैन सिद्धान्त विश्व कोष" प्रकाशित करने जा रहे है । हमारे ७३० आजीवन साहित्य सदस्य हैं । धर्मपाल प्रवृत्ति : मध्यप्रदेश के मालव अंचल में आचार्य श्री नानेश के प्रवचनों से दलित-पीड़ित-अछूत माने जाने वाले जनों को समाज में 'धर्मपाल' के रूप में प्रतिष्ठा मिली। माननीय पटवा सा. इस प्रवृत्ति से भलीभांति परिचित हैं। उनसे हमारा निवेदन है कि इस प्रकार का विधान पारित करवावें कि बलाई जाति के जिन बन्धुओं ने हजारों की संख्या में व्यसन मुक्त और संस्कारी जीवन स्वी- वै १४४ ० दीक्षा विशेषांक - , कार कर लिया है, उन्हें 'धर्मपाल' लिखने पर भी अनुसूचित जाति की सभी सुविधाएं मिलती रहें । संघ इस धर्मपाल प्रवृत्ति के लिये प्रवास, चिकित्सा व शिक्षा सुविधा के साथ ही दिलीपनगर रतलाम में श्री प्रेमराज गणपतराज बोहरा धर्मपाल छात्रावास का संचालन करता है। प्रवृत्ति का गत वर्ष का सम्पूर्ण व्यय श्री रिखबचन्दजी बैद गंगाशहर हाल दिल्ली ने वहन किया है और पूर्व संघ मंत्री, योजक प्रतिभा के धनी श्री भंवरलालजी कोठारी ने रजत जयन्ती वर्ष संयोजक का दायित्व कुशलता से निभाया है। धार्मिक परीक्षा : संघ अपने श्री साधुमार्गी जैन धार्मिक परीक्षा बोर्ड के माध्यम से प्रतिवर्ष देशभर में हजारों छात्रों के अध्ययन और परीक्षा की व्यवस्था करके देश की भावी पीढ़ी में नैतिकता का वीजा- रोपण कर रहा है। स्वधर्मी सहयोग व छात्रवृत्ति : संघ द्वारा जरूरतमन्द बेसहारा स्वधर्मी बन्धु-वहिनों को आर्थिक सहयोग दिया जाता है । अर्थ वित- रण का यह कठिन दायित्व संघ के अनुरोध पर हमारी महिला समिति निभा रही है । अर्थ की व्यवस्था हेतु संघ श्रीमती जेठीदेवी कांकरिया स्वधर्मी सहयोग निधि, श्री उमरावबाई सज्जनराज मूथा स्वधर्मी गह- योग निधि तथा श्री कन्हैयालाल मूलावत सहयोग निधि के प्रति हृदय से आभारी है । महिला समिति ही देश भर के जरूरतमन्द छात्र- छात्राओं को छात्रवृत्ति का भी निर्धारण और वितरण करती है । श्री गणेश जैन ज्ञान भण्डार : रतलाम में स्थित हमारे इस ज्ञान मंदिर में ४७,००० से अधिक ग्रन्थ हैं जो देशभर के ज्ञानाराधकों और शोध अध्येताओं हेतु सुलभ हैं। भंडार के सुसंचालन हेतु हन संयोजक श्री रिखबचन्दजी कटारिया के प्रति आभारी है । श्री गणेश जैन छात्रावास एवं संस्थान : उदयपुर में उच्च शिक्षा पा रहे छात्रों हेतु स्थापित इस छात्रावास की • रजत जयन्ती पर हमने श्रमणोपासक विशेषांक लोकार्पित किया है। छात्रावास में २७ कमरों में ४० छात्र अध्ययन कर रहे हैं । प्रकृति की गोद में निर्मित इस छात्रावास भवन के ही एक भाग में आगम, अहिंसा, समता एवं प्राकृत संस्थान स्थित है । छात्रावास परिसर में इस संस्थान के स्वतंत्र • १० व २५ मार्च १९६२ १४५ भवन का निर्माण प्रस्तावित है । संस्थान शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है । सस्थान के महामंत्री श्री सरदारमलजी कांकरिया और निदेशक डॉ. श्री सागरमलजी जैन और उनके सहयोगी द्वय डॉ. सुभाष कोठारी एवं श्री सुरेश शिशोदिया साधुवाद के पात्र हैं । उदयपुर के सुखाड़िया विश्वविद्यालय में ही श्री गणपतराजजी बोहरा और सघ-सहयोग से स्थापित "जैनोलॉजी की पीठ" अच्छे प्रकार से कार्य कर रही है । किशोर छात्र-छात्राओं के देशव्यापी संस्कार शिविरों के आयो- जन हेतु सब श्री प्रेमराज गणपतराज बोहरा शिविर समिति के प्रति मानारी है । इस शिविर समिति के संयोजक संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री पी. सी. चौपड़ा रतलाम है । युवा संघ : संघ की युवा शाखा श्री समता युवा संघ नाम से देशभर में युवकों के सगठन, स्वावलंबन और सुसंस्कार के लिए क्रियाशील है । इस समय युवा संघ अध्यक्ष श्री उमरावमलजी ओस्तवाल एवं मंत्री श्री सुरेन्द्र दस्साणी बम्बई हैं। संघ ने बालक-बालिकाओं में संगठन हेतु अखिल भारतीय स्तर पर श्री समता बालक/बालिका मंडली का भी गठन किया है । संघ श्री कन्हैयालालजी तालेरा पुणे द्वारा अपनी मातुश्री की स्मृति में स्थापित निधि के सहयोग से धार्मिक शिक्षण शालाओं को । अनुदान भी देता है। श्री समता प्रचार संघ : संघ ने स्वाध्याय, सेवा और समर्पण । के धनी जनों की संस्था श्री समता प्रचार संघ के माध्यम से पर्युषण पर्व पर संत-सती वर्ग से वंचित क्षेत्रों में सेवा की व्यवस्था की है। इस कार्य हेतु श्री उमरावमलजी बम्ब टौंक और उनके परिवार जनों द्वारा स्थापित "स्व. आचार्य श्री श्रीलालजी म. सा. स्मृति निधि" से धन प्राप्त होता है । संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री दीपचन्दजी भूरा देशनोक समता प्रचार संघ को आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया है । हम श्री बम्ब और श्री भूरा के प्राभारी हैं। स्व. श्री मूलचन्दजी पारख स्मृति स्वाध्याय पुरस्कार की स्थापना करके श्री धर्मचन्द पारख नोखा ने प्रतिवर्ष स्वाध्यायियों को पुरस्कृत प्रोत्साहित करने की योजना क्रिया- m ने १४६ ० दीक्षा विशेषांक न्वित की है । इन पुरस्कारों के लिए व्यक्ति चयन का कार्य श्री समत प्रचार संघ करता है। जीवदया : संघ का प्रमुख कार्य है और इस क्षेत्र में हमें श्री अहिंसा प्रचार संघ रायपुर और श्री अहिंसा प्रचार संघ तामिलनाडु और श्री जीवदया प्रेमी मंडल कपासन की उल्लेखनीय सेवाओं पर गर्व है। साहित्य-पुरस्कार : संघ साहित्यसेवी महोपाध्याय श्री मानिक चन्दजी रामपुरिया द्वारा अपने पुत्र की स्मृति में स्थापित "स्व. श्री प्रदीपकुमार रामपुरिया साहित्य पुरस्कार" से प्रतिवर्ष ११,००० रुपये का पुरस्कार वितरित करता है । गत वर्ष यह पुरस्कार डॉ. श्री छगनलाल जी शास्त्री को उनकी कृति "जैन योग साहित्य : समीक्षात्मक परि- शीलन" पर प्रदान किया गया है । साहित्य के क्षेत्र में संघ प्रतिवर्ष ५१०० रु. का स्व. श्री चम्पालालजी सांड स्मृति पुरस्कार प्रदान करता है । यह पुरस्कार श्री शांतिलालजी सांड देशनोक हाल बैंगलोर ने स्थापित किया है। श्री समता सरिता सेवा निधि : संघ द्वारा संत-सती और वैरागी-वैरागिन भाई-बहिनों के विहारादि व्यवस्था हेतु श्रीमती रतन- देवी दस्साणी मातुश्री श्री भंवरलालजी दस्साणी बीकानेर हाल कलकत्ता के सहयोग से निधि स्थापित की है, जिसका बीकानेर और रतलाम से संचालन किया जाता है । श्री सु. शिक्षा सोसायटी, नोखा : यह संस्था साधु, सानी और वैरागी-वैरागिन के शिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सोसायटी ने उदयपुर में आगम संस्थान की स्थापना और श्री समता प्रचार संघ की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है । सोसा- यटी के मंत्री श्री धनराजजी बेताला हैं । श्री महिला समिति : श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन महिला समिति ने महिलाओं में शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन के कार्यों को बड़ी कुशलता से सम्पादित किया है। श्रीमती रसकंवर सूर्या उज्जैन समिति अध्यक्ष हैं और श्रीमती रत्ना ओस्तवाल राजनांदगांव, संप्रति समिति की मंत्री हैं।

• १० व २५ मार्च १९६२ १४७ श्री नानेश चिकित्सालय दांता : संघ मेवाड में आचार्य श्री नानेश के जन्म ग्राम दांता में श्री नानेश चिकित्सालय का संचालन कर रहा है। इस चिकित्सालय के माध्यम से उन पहाडी-पिछड़े क्षेत्रों मे चल चिकित्सा सहित बहुआयामी चिकित्सा सेवा तथा शिक्षा देने की हमारी योजना है जिस पर सुश्रावक श्री मीठालालजी मेहता आई. ए. एस. सहित अनेक संघ प्रमुख कार्य कर रहे है । श्री रिद्धकरण जी सिपाणी बैंगलोर एतदर्थ अर्थ सहयोग दे रहे हैं । इस प्रकार व्यापक सहयोग और अनुशासित कार्यकर्ताओं के बल पर संघ निरन्तर प्रगतिशील है । - चैत्र शुक्ला * माह मार्च एवं अप्रेल ६२ के आराधना दिवस * फाल्गुन शुक्ला १५ दि. १८-३-६२ सोमवार- पक्खी चैत्र बदी १४ दि. २-४-६२ गुरुवार-पक्खी ११ दि. १३-४-६२ सोमवार-दीक्षा दिवस आचार्य श्री उदयसागरजी म. सा. १२ दि. १४-४-६२ मंगलवार-दीक्षा दिवस-प्राचार्य श्री चौथमलजी म. सा. १३ दि. १५-४-६२ बुधवार-महावीर जयन्ती १४ दि. १६-४-६२ गुरुवार-पक्खी चैत्र शुक्ला चैत्र शुक्ला चैत्र शुक्ला सूचना श्रमणोपासक के ग्राहकों से निवेदन है कि जिनका वार्षिक शुल्क मार्च ६२ में समाप्त हो रहा है वे अपना शुल्क ३०/-तुरन्त एम. ओ. से भेजने का कष्ट करें। नाम, पता व ग्राहक संख्या अवश्य लिखे । शुल्क नहीं भेजने पर अंक भेजने में विवशता रहेगी। -व्यवस्थापक आचार्य-प्रवर कल्पकाल बीकानेर बिराजे इस अवधि में आजीवन शीलवत ग्रहण करने वाले व्यक्तियों की नामावली १. भवरलाल जी बांठिया २. पानमल जी सेठिया ३. गुलाबचन्द जो गुलगुलिया ४. उत्तमचन्द जी मणोत ५. मगनमल जी गुलगुलिया ६. जीवणमल जी ढढा ७. झवरलाल जी बोथरा ८. विजयचन्द जी बोथरा ९. सुन्दरलाल जी बाठिया १०. चन्दनमल जी पुगलिया ११. प्रतापसिह जी बैद १२. नवलचन्द जी भूरा १३. सोहनलाल जी बांठिया १४. उदयचन्द जी बरड़िया १५. सुरपतसिह जी बैद १६: हजारीमल जी बुच्चा १७. चन्दनमल जी ढढ़ा १८. सम्पतलाल जी डागा १६. रामलाल जी डागा २०. कन्हैयालाल जी बोथरा २१. रूपचन्द जी तातेड़ २२. डालचन्द जी श्री श्रीमाल २३. मांगीलाल जी पारख २४. बंशीलाल जी सुराणा २५. भवरलाल जी झाबक २६. लुणकरण जी बैगाणी २७. घेवरचन्द जी पटवा २८, धर्मपाल सिंह जी वैद २६. कुशलचन्द जी मुकीम ३०. कन्हैयालाल जी अभाणी ३१. सुन्दरलाल जी सेठिया ३२. रतनलाल जी गोलछा ३३. उत्तमचन्द जी. लोढा ३४. जोगीलाल जी सुराणा ३५. माणकचन्द जी आरी ३६. श्रीमती सम्पतलालजी डागा ३७. श्रीमती मोतीलाल जी बैद ३८. सूरजमल जी बच्छावत ३६. सम्पतलाल जी. बच्छावत ४०. आसकरण जी चुच्चा ४१. श्री चन्द्रकान्त जी सोनी ४२. लालचन्द जी बुच्चा ४३. श्रीमतो माणकचंदजी गुलगुलिया ४४. ओमप्रकाशजी मोदी (खत्री) ४५. जतनमल जी गोलछा और भी भाई-बहिनों ने प्रतिज्ञा ग्रहण की लेकिन उनके नामों के जानकारी न होने से नाम नहीं दिये गये है। आजीवन सचित के त्याग, रात्रि भोजन के त्याग आशातीत संख्या में हुवे । इसके अतिरिक्त अन्य मासखमण, पन्द्रह, तेरह, इग्यारह, नी, अठाईयां आदि तपस्याए भी विपुल मात्रा में हुई । विशाल दयावत का आयोजन भी हुआ जिसमें युवकों द्वारा विशेष अचिरूचि ली गई। . -प्रकाशचन्द बांठिया दीक्षा समारोह में मुख्य भूमिका साधुमार्गी जैन श्रावक संघ की 2 गोविन्द नारायण श्रीमाली आचार्य-प्रवर नानालाल जी म. सा. के पावन सान्निध्य में प्रस्तुत दीक्षा समारोह के भव्य आयोजन का दायित्व साधुमार्गी जैन बीकानेर श्रावक संघ बीकानेर निभा रहा है । आचार्य नानेश के चतु- विध संघ में बीकानेर संघ का विशिष्ट महत्व है । इस सघ की गौर- वशाली परम्परा भक्ति, श्रद्धा और सेवा पर आधारित बीकानेर संघ अपार उत्साह के साथ दीक्षा आयोजन हेतु सर्वभावेन समर्पित है। बीकानेर के प्रवासी बन्धु देश के कोने-कोने से चल कर अपनी प्रिय नगरी बीकानेर में प्रा पहुंचे है । अहर्निश धर्मसाधना के पर्याय बीका- नेर का चतुर्विध संघ दीक्षा आयोजन के सौभाग्य पर परमहर्षित है । सम्प्रति बीकानेर संघ के अध्यक्ष मानिकचन्द रामपुरिया और मंत्री रामलाल बांठिया है । बीकानेर संघ ने दीक्षा कार्यक्रमों की सफ- लता हेतु गठित समिति के अध्यक्ष पद पर रिखबचन्द जैन और सयो-, जक पद पर भंवरलाल कोठारी को मनोनीत किया है । बीकानेर संघ के युवको की संस्था समता युवा संघ बीकानेर स्वाध्याय और सेवा के क्षेत्र में अग्रणी है । इन युवको ने 'सेवा सदन', का निर्माण एक्यूप्रेशर चिकित्सालय के नियमित सचालन प्रादि के कार्य, सम्पन्न कर अपनी अपूर्व क्षमता का परिचय दिया है । इस समय बीकानेर सर्व का आबाल-वृद्ध दीक्षा समारोह की सफलता हेतु समर्पित है । सूचना जयपुर-श्री जैन सिद्धान्त शिक्षण संस्थान के तत्वावधान में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर की परीक्षाओं के अनन्तर एक पंच दिवसीय संस्कार निर्माण शिविर आयोजित किया जा रहा है । इसमें वर्तमान सत्र के कक्षा ११, १२ व बी. ए. प्रथम वर्ष के प्रवेशार्थी- छात्रों को प्रवेश दिया जायगा । प्रवेशार्थी अपना नाम, पिता का नाम, गौत्र, निवास, धार्मिक ज्ञान एव गत दो वर्षीय परीक्षाओं के प्राप्तांक (सूचिया संलग्न करे) विवरण सहित २० अप्रैल तक आवेदन करे । -कन्हैयालाल लोढ़ा (अधिष्ठाता) श्री जैन सिद्धान्त शिक्षण संस्थान, ए-६ महावीर उद्यान पथ, बजाज नगर-जयपुर-३०२०१५ तार : "साधुमार्गी" दूरभाष : २६८६७ श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमागीं जैन संघ (राजस्थान संस्था रजिस्ट्रीकरण अधिनियम १९५८ के अन्तर्गत रजिस्टर्ड) प्रधान कार्यालय-समता भवन, बीकानेर (राज.) साधारण सभा का विशेष अधिवेशन श्री जैन विद्यालय सभागार, बीकानेर दि. १५-२-६२ श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन संघ की साधारण सभा का विशेष अधिवेशन आज मिती माघ शुक्ला १२ सं. २०४८ शनिवार तदनुसार दि. १५-२-६२ को श्री जैन उ. मा. विद्यालय बीकानेर के सभागार में दोपहर बाद संघ अध्यक्ष श्रीयुत् भंवरलालजी बैद की अध्यक्षता में प्रारम्भ हुआ जिसमें भारी संख्या में सदस्यों ने भाग लिया । विशेष अधिवेशन का शुभारम्भ ज्ञानमंत्री श्री मोहनलालजी मूथा के शास्त्रीय मंगलाचरण पूर्वक हुआ। संघ मंत्री श्री चम्पालालजी डागा के अनुरोध पर इस अधिवेशन के एकमात्र विचारणीय विषय "आगामी सत्र हेतु संघ अध्यक्ष निर्वाचन" हेतु वयोवृद्ध संघ प्रमुख और पूर्व अध्यक्ष श्री गणपतराजजी बोहरा ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ के अध्यक्षों की एक गरिमा- मय परम्परा रही है । इस गौरवशाली आसन को वरेण्य संघ निष्ठा, शासन समर्पित जनों ने सुशोभित किया है । इसी क्रम को आगे बढ़ाने के लिए आगामी सत्र हेतु संघ अध्यक्ष के निर्वाचनार्थ मैं सदन के समक्ष श्री. रिद्धकरण जी सिपाणी उदयरामसर हॉल बैगलोर का नाम प्रस्ता- वित करता हूं । आप इस समय संघ उपाध्यक्ष हैं और प्रतिभाशाली, नवीन योजनाओं के सर्जक व सफल क्रियान्वयन कर्ता के रूप में आपने व्यवसाय और संघ में अपना स्थान बनाया है। श्री बोहराजी के प्रस्ताव पर सदन तुमुल हर्षध्वनि से गूज उठा । समस्त उपस्थित सदस्यों ने सर्वसम्मति से श्री रिद्धकरण जी सिपारणी को आगामी सत्र हेतु अध्यक्ष निर्वाचित किया । सदस्यों ने अपनी शुभ-भावनाए भी अर्पित की । पूर्व अध्यक्ष श्री गुमानमलजी चोरडिया ने कहा कि श्री बोहरा साथ ही • १० व २५ मार्च १९६२ जी के प्रस्ताव से अत्यन्त हर्ष हुआ । मै इसका अनुमोदन करता हूं और आशा करता हूं कि श्री सिपाणी जी व्रत-पचक्खाण ग्रहण करेंगे। यद्यपि व्रतधारण करना कठिन अवश्य है पर यह आवश्यक भी मेरा यह भी विनम्र निवेदन है कि आपश्री अध्यक्षीय गरिमा का निर्वाह करेंगे, हमें प्रमोद होगा। श्री वीरेन्द्र जी कोठारी ने नए अध्यक्ष को जवान व जोशीला बताते हुए हार्दिक बधाई दी । उन्होंने कहा कि महान् मानव सेवा का लक्ष्य लेकर अग्रसर श्री सिपाणी जी के अध्यक्ष बनने से संघ में नया सुकून व तेजगति का संचार होगा। श्री केशरीचन्दजी सेठिया ने कहा कि श्री बोहराजी ने बहुत गहराई से विचार करके प्रस्ताव रखा है। आपके अध्यक्ष बनने से प्रौढ़ और युवा का समन्वय होगा । हार्दिक स्वागत । संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री पी. सी. चौपड़ा ने कहा कि इतनी विशाल उपस्थिति के बीच सर्व- सम्मति से आपका निर्वाचन प्रत्येक संघ सदस्य के लिए हर्ष की बात है। पूर्व संघ अध्यक्ष श्री दीपचन्दजी भूरा ने कहा कि हम लोग अभी बूढ़े नहीं हुए हैं । आपको पूरा सहयोग देगे। श्री गणपतराजजी बोहरा ने कहा कि सभी पूर्व संघ अध्यक्ष कंधे से कधा मिलाकर आपका सह- योग करेंगे। पूर्व संघ मंत्री श्री पीरदानजी पारख ने कहा कि शासन सम- पित सिपाणी परिवार के रत्न श्री सिपाणीजी समाज की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे और उन्हें पूरा करेगे । सहमंत्री श्री राजमलजी चोरड़िया ने कहा कि संघ ने दक्षिण के अध्यक्ष को पदासीन किया है, ये संघ को, समाज को आलोकित करेगे । श्री पी. सी. जैन इन्दौर ने क्षेत्रीय प्रवास करने और क्षेत्रीय समितियों को साकार करने के अनुरोध सहित अपनी प्रसन्नता प्रकट की। श्री भंवरलालजी ओस्तवाल ने ब्यावर संघ की ओर से नवनिर्वाचित अध्यक्ष जी का अभिनन्दन किया। संघ कवि श्री समरथमलजी डागरिया रामपुरा ने भावपूर्ण स्वागत किया। श्री मोहनलालजी चौपड़ा बैंगलोर- संघ मंत्री ने कहा कि आज की सभा ऐतिहासिक महत्व प्राप्त कर चुकी है। इस हर्षद उपस्थिति के बीच हमने श्री सिपाणी जी को चुना है। गुरुदेव की कृपा से अवश्य संघ को नवगति मिलेगी।

१५२ दीक्षा विशेषांक ने - संघ सहमंत्री श्री गौतम पारख ने शुभकामनाएं अर्पित करते हुए कहा कि प्रशंसा तो एक वर्षीय कार्यकाल के बाद ही करना उचित होगा । श्री पारख ने कहा कि छत्तीसगढ़ संघ की अपेक्षा है कि आप त्याग, तप, साधना और आचरण के महत्त्व पर अध्यक्षीय परम्परा के अनुरूप व्यवहार करेगे । श्री अशोक सुराणा ने भी बधाई दी। कूचबिहार क्षेत्र की ओर से श्री कन्हैयालालजी भूरा कहा कि सर्वसम्मति से अब तक की सबसे कम आयु में अध्यक्ष पद पर आसीन होने के लिए मैं श्री सिपाणी जी का अभिनन्दन करता हूं। विश्वास है आप पूर्वाचल की ओर समुचित ध्यान देगे । श्री तोलारामजी बोथरा गंगाशहर ने कहा कि अच्छी टीम बना कर और समन्वयपूर्वक आप संघ की प्रगति करे, यही शुभकामना है । श्री समता प्रचार संघ के संयोजक श्री बंशीलालजी पोखरणा ने आशा प्रकट की कि आपके नेतृत्व में संघ का भविष्य उज्ज्वल होगा। श्री धर्मचन्दजी पारख ने नोखा संघ की ओर से अभिनन्दन करते हुए कहा कि आप देश भ्रमण करके सघ उन्नति करें, यही कामना है। श्री मनोहरलालजी जैन पीपल्यामंडी ने कहा आपसे हमें अच्छे नेतृत्व की आशा है । श्री उम्मेदमलजी गांधी ने जोधपुर संघ की ओर से तथा श्री समीरमलजी कांठेड़ ने धर्मपाल प्रवृत्ति की ओर से स्वागत किया । श्री कांठेड़ ने आशा प्रकट की कि आप धर्मपाल-भ्राता बनकर , प्रवृत्ति को आगे बढ़ावेंगे। श्री नथमलजी सिपाणी ने सिलचर तथा उदयरामसर की ओर से शुभकामना प्रकट की। श्री सागरमलजी चपलोत ने निम्बाहेड़ा संघ की ओर से स्वागत करते हुए आशा प्रकट की कि आप वटवृक्ष की भांति छाया प्रदान करेंगे व कर्मशूर बनेंगे । महिला समिति की ओर से मंत्री श्रीमती रत्ना ओस्तवाल ने अभिनन्दन किया । संघ मंत्री श्री चम्पालालजी डागा ने स्वयं की, अ. भा. संघ की तथा अपने परिवार की ओर से भी श्री सिपाणीजी का अभिनन्दन किया । समाजसेवी श्री मानव मुनिजी ने मंगलकामनाओं के साथ ही मंगलाचरण नामक पुस्तक भी भेंट की। अभिनन्दन के इस क्रम के प्रारम्भ में पूर्व संघ मंत्री श्री धन- राजजी बेताला ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री रिधकरणजी सिपाणी का " .१० व २५ मार्च १९९२ १५३ संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए बताया कि आप उदयरामसर के श्री भैरोंदानजी सिपाणी के सुपुत्र और संघ समर्पित श्री सोहनलालजी सिपाणी के अनुज है । सुसंस्कार आपको अपने परिवार से सहज ही प्राप्त हुए हैं और आपने व्यवसाय के क्षेत्र मे विशेप दक्षता हासिल की है । आप आज समाज मूर्धन्य उद्योगपति हैं । इसके बाद माल्यार्पण पूर्वक श्री सिपाणी जी का भावपूर्ण किया गया । सभाकक्ष में माल्यार्पण की होड़ सी मच गई । अध्यक्षीय उद्बोधन-अन्त में श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन सघ के अध्यक्ष श्री भंवरलालजी वैद ने अपने अध्यक्षीय आसन से साधारण सभा के विशेष अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए अपने प्रेरक उद्बो- धन में सदन में आज व्यक्त विचारों की चर्चा करते हुए कहा कि पारस्परिक वार्ता में श्री सिपाणीजी ने व्रत-त्याग आदि के पचक्खारण ग्रहण करने की अभिरुचि प्रदर्शित की है और यह स्वयं उनके लिए तथा समाज के लिए भी हितकर है। श्री बैद ने सघ-अध्यक्ष की गौरवमयी परम्पराओं की ओर संक्षेप में इंगित करते हुए आशा प्रकट की कि नवनिर्वाचित अध्यक्ष इन परम्पराओं का पालन करते हुए संघ गौरव की अभिवृद्धि करेगे । श्री बैद ने सम्पूर्ण सदन को इस सर्व- सम्मत निर्वाचन हेतु बधाई दी और सभा के सुसंचालन में सहयोग हेतु आभार व्यक्त किया । श्री वैदजी ने अध्यक्षीय आसन से इस विशेष अधिवेशन की सुव्यवस्थाओं हेतु श्री साधुमार्गी जैन बीकानेर श्रावक संघ, बीकानेर को भी स्वयं अपनी तथा संघ की ओर से हार्दिक साधु- वाद दिया, जिसका सकल सदन ने हर्ष ध्वनिपूर्वक अनुमोदन किया । प्राभार-नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री सिपाणी जी ने इस भाव- पूर्ण स्वागत और निर्वाचन के लिए संघ व समाज के प्रति हार्दिक आभार प्रकट किया । उन्होंने कहा कि आप उचित मार्गदर्शन करे, मैं तदनुसार चलने का प्रयास करूंगा । आपकी आशीप ही मेरा सम्वल है। मेरी यही मान्यता है कि पिता की आशीष-पुत्र को आगे बढाती है । सघ अध्यक्ष के रूप में मैं समाज को पिता तुल्य समझता हूं और आशीष की कामना करता हूं । मुझे समाज के, संघ के बारे में सोचने पर अनेक बार यह बात कचोटती थी कि गुरुदेव के प्रति भारी श्रद्धा होने पर भी लोग - १५४ ० दीक्षा विशेषांक संघ में कम रुचि लेते हैं । हम संघ के प्रति रुचि बढ़ावें और गुरुदेव का नाम रोशन करें, यही हार्दिक इच्छा है । मेरी यह भी इच्छा है कि संघ में घाटे का नाम न रहे। हम २ वर्ष की कार्य योजना बनावे और उसे दृढ़ता से लागू करें । संघ कार्य के लिए एक वृहत् कोष की स्थापना करें और उसके ब्याज से कार्य सुसम्पन्न करें। इस विषय की मेरी योजना में कार्यसमिति माध्यम से शीघ्र ही आपके समक्ष रखूगा। मैं फिर निवेदन करना चाहता हूं कि आइये हम सब मिलकर संघ एक्य की स्थापना करें और परम पूज्य गुरुदेव का नाम रोशन करें। इसके साथ ही जयघोषपूर्वक अधिवेशन सम्पन्न हुआ । विनीत चम्पालाल डागा मन्त्री राजमल चोरडिया वीरेन्द्रसिंह लोढ़ा उम्मेदमल गांधी गौतमचन्द पारख सुरेन्द्रकुमार दस्साणी सहमन्त्री - . अनूपचन्द सेठिया दूसरा रु. - श्रमरणोपासक में प्रकाशनार्थ विज्ञापन की दरें (प्रति अंक) कवर पृष्ठ चौथा रु. १०००/ विज्ञापन की दरों में निम्नलिखित तीसरा रु. ८००/- विशेष छूट :- ८००/ एक वर्ष (२४ अंक) पर २५% साधारण पृष्ठ रु. ५००/ छः माह (१२ अंक) पर १५% ३००/ तीन माह (६ अंक) पर १०% " चौथाई रु. २००/- 'श्रमणोपासक' पाक्षिक पत्र है । फिलहाल इसका प्रसारण ५६०० प्रतियां है । कृपया विज्ञापन देकर लाभ उठावें । नोट:-ये दरें साधारण अंक में काली स्याही में छपने की है। आधा रु.

श्रीरिधकरण सिपापी अखिल भारतवर्षीय
साधुमार्गी जैन संघ के भावी अध्यक्ष .
निर्वाचित
बीकानेर दि. १५-२-६२.-आज स्था-
नीय श्री जैन हाई स्कूल के सभागार में
सश्पन्न श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी
जैन संघ की साधारण सभा के विशेष
अधिवेशन में आगामी सत्र के लिए श्री
रिधकरण जी सिपाणी उदयरामसर निवासी
हॉल बैंगलोर को सर्वसम्मति से अध्यक्ष
निर्वाचित किया गया ।
श्री सिपाणी के नाम का प्रस्ताव
संघ के वयोवृद्ध सर्वमान्य प्रमुख और पूर्व
अध्यक्ष श्री गणपतराज जी बोहरा ने रखा
जिसका सम्पूर्ण सदन ने हर्ष-हर्ष की ध्वनि से समर्थन व स्वागत
किया।
श्री रिधकरण जी सिपाणी एक प्रभुत्व उद्योगपति हैं औ
इस समय संघ के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है । आप उदयरामस
के श्री भैरूदान जी सिपाणी के सुपुत्र और संघ समर्पित पूर्व उपाध्यक्ष
श्री सोहनलाल जी सिपाणी के अनुज है । सुसंस्कार आपको अपने परि-
वार से सहज ही प्राप्त हुए हैं और उद्योग क्षेत्र में आपने विशेष दक्षता
हासिल की है । आप आज समाज के मूर्धन्य उद्योगपति है । आप संघ
अध्यक्ष पद को सुशोभित करने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति है ।
श्री सिपाणी जी ने संघ के गत आसोज माह में पीपलिया-कलां में
आयोजित वार्षिक अधिवेशन मे चिकित्सा, स्वास्थ्य आदि सेवाओं के
लिए 'समता जन कल्याण निधि' की स्थापना का प्रस्ताव सहमंत्री श्री
राजमल चोरड़िया जयपुर के साथ मिलकर रखा था और तभी से
आप विशेष रूप से चर्चित हुए थे।
संघ की परम्परा के अनुसार श्री सिपाणी आठ माह वाद
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१५६ • दीक्षा विशेषांक अर्थात् आगामी पासोज सुदी २ सं. २०४६ को संघ अध्यक्ष का पद भार सम्हालेगे। इन आठ माह में वे वर्तमान अध्यक्ष श्री भंवरलाल जी बैद के सहयोगी रह कर विशेष कार्यदक्षता हासिल करेगे । अध्यक्ष निर्वाचित होते ही संघ प्रमुखों ने श्री सिपाणी को मालाओं से लाद दिया। श्री सिपाणी जी ने सदन को विश्वास दिलाया कि मैं संघ परम्पराओं के अनुरूप संघ प्रगति हेतु पूर्ण सम- पित भाव से सेवा करूगा । वर्तमान अध्यक्ष श्री भंवरलाल जी बैद के आभार पूर्वक साधारण सभा का विशेष अधिवेशन सम्पन्न हुआ। चम्पालाल डागा मंत्री * द्वि. पत्र भूल सुधार नवम्बर १९९१ की परीक्षा जैनागम रत्नाकर द्वितीय खंड के प्रथम प्रश्न-पत्र के ग्रंक तृतीय प्रश्न-पत्र के भूल से अंकित किए गए हैं जिन्हें अब प्रथम प्रश्न-पत्र के अंक पढ़े जावें । नामांक केन्द्र प्रथम पत्र तृ. पत्र च. पत्र ६१ बाबरा ५४ ६५ वा कानोड़ ४१ ५५ वा वा ६३ अजमेर ६० वा ६० ६४ बड़ीसादड़ी ५४ वा वा जयपुर ६८ बा वा पूर्णपल रांका पंजीयक ६२ ४८ वा • १० व २५ मार्च १९६२ १५७ साहित्य-पुरस्कार - साहित्य के क्षेत्र में प्रोत्साहन हेतु संघ द्वारा- (१) स्व. प्रदीपकुमार रामपुरिया स्मृति साहित्य पुरस्कार । एवं (२) स्व. चम्पालाल सांड स्मृति साहित्य पुरस्कार प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं जिनके अन्तर्गत आमंत्रित रचनाओं पर मूल्यां- कन पश्चात् विजेताओं को क्रमशः ११०००/- रु. एवं ५१००/- रु. की राशि से पुरस्कृत कर प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाता है । वर्ष १९९१ में दोनो प्रतियोगिताओं में निम्न विद्वानों को पुरस्कृत किया जावेगा- (१) स्व. प्रदीप कुमार रामपुरिया स्मृति साहित्य पुरस्कार- पुरस्कार राशि ११०००/- डॉ. संजीव भानावत, जयपुर को उनकी रचना "सांस्कृतिक चेतना और जैन पत्रकारिता" पर दिया गया । जिसका प्रथम संस्करण सन् १९६० में सिद्ध श्री प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हुआ है। पुस्तक ८ अध्यायो में विभाजित है, जिनमें सास्कृतिक चेतना और जैन धर्म, जैन पत्रकारिता उद्भव और विकास, सामाजिक चेतना और जैन पत्रकारिता,राजनैतिक चेतना और जैन पत्रकारिता धार्मिक आध्यात्मिक चेतना और जैन पत्रकारिता, साहित्यिक चेतना और जैन पत्रकारिता, कला एवं पुरातात्विक चेतना और जैन पत्रकारिता आदि पर शोधपूर्वक तथ्यात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है । पुस्तक में समस्त जैन पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशकों के विवरण सहित सूची भी प्रस्तुत की गई है। (२) स्व. चम्पालाल सांड स्मृति साहित्य पुरस्कार-पुरस्कार राशि ५१००/- रु. डॉ. प्रेमसुमन जैन, उदयपुर को उनकी रचना "जैन धर्म और जीवन मूल्य" । पुस्तक के प्रथम संस्करण पर दिया जायगा जो संघी प्रकाशन जयपुर-उदयपुर से वर्ष १९६० में प्रकाशित हुई है। पुस्तक में श्रमण धर्म की परम्परा, जैन संस्कृति का वैशिष्ट्य, ( शेप पृष्ठ १६० पर) के समाचार दर्शन आचार्य-प्रवर का आगामी चातुर्मास उदयरामसर में घोषित ’ अन्य चातुर्मासों की भी स्वीकृति परम श्रद्धय समता विभूति, समीक्षण ध्यानयोगी, धर्मपाल प्रतिबोधक, जिनशासन प्रद्योतक आचार्य श्री नानालाल जी म. सा. आदि ठाणा गंगाशहर-भीनासर (जवाहर विद्यापीठ) में सुख शान्ति से विराज रहे हैं। आचार्य भगवन् का स्वास्थ्य कुछ समय से सर्दी, जुकाम कारण नरम चल रहा है । कमजोरी एवं चिकित्सकों के परामर्शानुसार व्याख्यान नहीं फरमा रहे हैं । उपचार चल रहा है और पूर्वापेक्षा काफी सुधार है । चिन्ता जैसी कोई बात नहीं है । शेखेकाल बीकानेर में विराजने के दौरान २१ दीक्षाओं के ऐतिहासिक प्रसंग सहित त्याग-प्रत्याख्यान, शीलवत, उपवास, दया, पौषध, बेला, तेला, अट्ठाई आदि तपस्याए सम्पन्न हुई । नव जागरण, अभिनव चेतना एवं धर्म-प्रभावना की दिशा में अभूतपूर्व उपलब्धिमूलक रही यह अवधि । श्री संघ ने दर्शनार्थियों के आतिथ्य सत्कार आवासादि की व्यवस्थाए सोत्साह सुसम्पन्न की। ८ मार्च को आचार्य-देव का उदासर पदार्पण हुआ । चार दिन के प्रवास में उल्लेखनीय धर्म जागृति हुई । श्री संघ की भक्ति भावना प्रशस्त है । यहां आचार्य श्री अस्वस्थ हो गये परन्तु गंगाशहर- भीनासर में फाल्गुनी चौमासी स्वीकृत थी अतः वहां पधारना आवश्- यक था । संतों ने डोली से आपका विहार करवाया और १४ कि.मी. की यात्रा एक दिन में ही पूर्ण की । यह सन्त-महात्माओं की सेवा- भक्ति, समर्पणा एवं साहस का प्रतीक है । आगामी वर्षावास की घोषणा- होली चौमासे की विशाल जनसभा में दि. २० मार्च को देश के विभिन्न स्थानों से श्रीसंघो के श्रद्धालुजन एकत्रित थे। सभी अपनी विनंतियां प्रस्तुत कर रहे थे। जोधपुर वासी अपने संघ में आगामी चातुर्मास को आवश्यकता ज्ञापित कर रहे थे तो नोखा संघ भी आचार्य-देव के वर्षावास हेतु उत्साहित था । इधर देशनोक संघ का अत्याग्रह पा तो उदयरामसर संघ भी समय-२ पर विनंती कर रहा था। गंशाशहर- भीनासर संघ की भी निरन्तर विनंती चल रही थी और बीकानेर • १० व २५ मार्च १९६२ १५९ संघ को भी दीक्षा के प्रसंग मात्र से सन्तोप नहीं था। वे भी चातु- मसि पाने के लिए अपने प्रयास कर रहे थे तथा इसी क्रम में सरदार- शहर संघ की भी भावभरी विनंती थी । सबको उत्सुकता थी कि किस संघ को पुण्योदय से यह सौभाग्य व सानिध्य प्राप्त हो । आचार्य देव ने सभी संघों की भावना का समादर करते हुए उनकी विनतियों को अपनी झोली में ग्रहण किया तथा समस्त आगारों सहित एवं त्रिवेणी का आगार रखते हुए अपने श्रीमुख से वि. सं. २०४६ के वर्षावास की उदयरामसर सघ को स्वीकृति प्रदान की। उदयरामसर यहां से ५-६ कि.मी. के लगभग है । आचार्य श्री जी की इस घोषणा का श्रद्धालुओं ने अपूर्व हर्षध्वनि पूर्वक स्वागत किया। इसी धर्मसभा में अनेक श्रीसघों ने अपने-अपने क्षेत्रों में युवा- चार्य श्री व संत-सती वर्ग के चातुर्मासो की भी विनंतियां प्रस्तुत की। इस सन्दर्भ में आचार्य श्री की आज्ञा और निर्देशानुसार युवाचार्य श्री राम मुनिजी म. सा. ने निम्नांकित आगामी वर्षावासों व क्षेत्र खाली नहीं रहने की आगारों सहित घोषणा की- रतलाम-स्थविर प्रमुख त. त. ओजस्वी व्याख्याता श्री शांति मुनिजी म. सा., झ (बीकानेर)-आदर्श तपस्वी मधुर व्याख्यानी श्री रणजीत मुनिजी म. सा., सरदारशहर-शा. प्र. परम विदुषी महासती श्री पानकंवर जी म. सा., दुर्ग-शा. प्र. वि. महा. श्री इन्द्रकंवर जी म. सा., देवरिया-शा. प्र. वि. महा. श्री सम्पत कंवरजी म. सा., इन्दौर- वि. महासती श्री विमला कंवरजी म. सा., लूणकरणसर (बीकानेर) शा. प्र. वि. महा. श्री चांदकंवर जी म. सा., अंजड़-शा. प्र. वि. महा. श्री मंगलाकंवर जी म. सा., खैरोदा-वि. महा. श्री ललिता जी म. सा., छोटीसादड़ी-सेवाभाविनी महासती श्री सुमतिकंवर जी म. सा. एवं ब्यावर--शा. प्र. वि. महासती श्री ज्ञान कंवर जी म. सा. । तदनन्तर निम्नांकित क्षेत्रों के खाली नहीं रहने की स्वीकृति प्रदान की गई-सिन्धनूर, बालाघाट, बदनावर, नवसारी, निम्बाहेड़ा, पिपल्यामंडी, बड़ीसादड़ी, अलीगढ़ ( रामपुरा ), वल्लारी, चित्तोड़गढ़, उदयपुर, कंजार्डा, इरकल, गजेन्द्रगढ़ एवं देवगढ़ । इन क्षेत्रों में संत- सती वर्ग के नामों की घोषणा बाद में की जायगी। प्राज की विशाल धर्म सभा का कुशल संयोजन गंगाशहर- - ० दीक्षा विशेषांक मीनासर संघ के प्रमुख श्री चम्पालाल जी डागा ने किया। श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ के अध्यक्ष श्री भंवरलाल जी बैद सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे । उदयरामसर में चौमासे की घोषणा हेतु श्री सोहनलाल जी सिपाणी ने गुरुदेव के प्रति हार्दिक वन्दना पूर्वक आभार ज्ञापित किया । भीनासर -रतनलाल जैत दि. ३१-३-६२ विशेष सूचना आचार्य श्री नानेश द्वारा युवाचार्य पद प्रदान करने के उप- लक्ष्य में अखिल भारतीय समता बालक मण्डली द्वारा "बालकों एवं पालकों के परस्पर सम्बन्ध' विषय पर निबन्ध प्रतियोगिता आयोजित की गई है । इसमें प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार (क्रमशः २५१) १५१.) एवं १०१) रु.) सहित सात प्रोत्साहन पुरस्कार (प्रत्येक ५१) रु.) रखे गये हैं । प्रतियोगिता में १५ से २४ वर्ष आयु वर्ग के युवक- युवती/छात्र-छात्राएं भाग ले सकते हैं । निबन्ध मौलिकता पूर्ण हो तथा शब्द सीमा १५०० शब्द है । अन्तिम तिथि ३० अप्रैल तक निव- न्ध अ. भा. समता बालक मण्डली के अध्यक्षीय कार्यालय-जी/१/२० जेसल पार्क, भायन्दर (पूर्व), थाना-४०११०५ (महाराष्ट्र) बम्बई में पहुंच जाने चाहिए। गुलाब चौपड़ा गिरीश लोढ़ा (अध्यक्ष) (सचिव) ( शेष पृष्ठ १५७ का ) महावीर के चिन्तन कण, अनेकान्त, जैन धर्म का आचार 'समता', अहिंसा, स्वरूप एवं प्रयोग, अपरिग्रह के नये क्षितिज, स्वाध्याय, कर्म एवं पुरुपार्थ, पर्यावरण सन्तुलन और जैन धर्म आदि कई बिन्दुओं पर शोध पूर्ण चिन्तन प्रस्तुत किया गया है । संघ के आगामी अधिवेशन के अवसर पर दोनों विजेताओं को पुरस्कृत एवं सम्मानित किया जावेगा । चम्पालाल डागा मंत्री

* दीक्षा संबंधी कार्यक्रमों का चित्रात्मक विवरण *
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दीक्षार्थियों की शोभायात्रा
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श्री चम्पालाल डागा, मंत्री श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन
संघ द्वारा दीक्षार्थियों का अभिनन्दन

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शोभायात्रा कोटगेट में प्रवेश करती हुई

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मायमूर्ति श्री यू. एन. भाचावत द्वारा वैरागी श्री राजीव
सेठिया का अभिनन्दन ।

- Lan -- र x mammer Pan- Anshura - न t Sko वैराग्यवती सुश्री इन्दुबाला एवं चन्दनबाला हीरावत देशनोक, के पारिवारिकजन संयम उपकरणों के साथ । ६ " है दीक्षा कार्यक्रम में सम्मिलित दर्शनार्थीगण बाफना दर श्रमणोपासक का विवरण फॉर्म नं. ४ (नियन्ड संख्या ) १. प्रकाशन का स्थान बीकानेर (राजस्थान) २. प्रकाशन अवधि पाक्षिक ३. मुद्रक का नाम, नागरिकता जुगराज सेठिया, भारतीय, एवं पता श्री अ. भा. साधुमागी जन संघ बीकानेर (राजस्थान) । ४. सम्पादक का नाम, नागरिकता जुगराज सेठिया, भारतीय, एवं पता श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ बीकानेर (राजस्थान) ५. प्रकाशक का नाम, नागरिकता जुगराज सेठिया, भारतीय, एवं पता श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ बीकानेर (राजस्थान) ६. उन व्यक्तियों के नाम व पते श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ जो समाचार-पत्र के स्वामी हों समता भवन, तथा जो समस्त पूजी के एक बीकानेर (राजस्थान) प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों। मैं जुगराज सेठिया, एतद् द्वारा घोषित करता हूं कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं। दि. १० व २५ मार्च १९६२ (हस्ता०) जुगराज सेठिया - .

Diksha Visheshank [ Sarmanoupasak ]

Author
Dr. Shanta Bhanavat
Title
Diksha Visheshank [ Sarmanoupasak ]
File name
Diksha Visheshank [ Sarmanoupasak ]
Text
OCR done
Citation
1992
Published
2011/01
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
168
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548895
Barcode
4990010028978.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
GQ7IOtDbo5E
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