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अंक-विद्या (ज्योतिष) (NUMEROLOGY.)
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अंक-विद्या
(ज्योतिष)
( NUMEROLOGY)
लेखक
ज्योतिपकलानिधि देवज्ञशिरोमणि
पंडित गोपेशकुमार प्रोझा एम.ए., एल-एल. बी.
पुनर्मुद्रण : दिल्ली, १९६६, १९६६. १९७२, १९७७, १९८२, १९८६
मोतीलाल बनारसीदास
मुख्य कार्यालयः गलो रोड, जवाहरनगर, दिल्ली ११०००७
शाखाएं : चौक, वाराणसी २२१००१
अशोक राजपथ, पटना ५०००.४
२४ रेसकोस रोड, बंगलोर ५६०००१
१२० रॉयपेट्टा हाई रोड, मैनापुर, मद्रास ६००००४
मूल्य: १० १८
नरेन्द्रप्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली ७
द्वारा प्रकाशित तया जनेन्द्रप्रकाश जन,श्री जैनेन्द्र प्रेस, ए-४५
नारायगा, फेज-१, नई दिल्ली-२८ द्वारा मुद्रित ।
प्राक्कथन "वनं समाश्रिता येऽपि निर्ममा निष्परिग्रहाः । अपि ते परिपृच्छन्ति ज्योतिषां गति कोविदम् ॥" जो सर्वसग परित्याग कर बन का समाश्रय ले चुके हैं, ऐसे रागद्वप शून्य, निष्परिग्रह मुनिजन-संत-महात्मा भी ज्योतिप शास्त्र वेत्तानों से भविष्य ज्ञात करने के लिये उत्सुक रहते है; तब साधा- रण संसारी प्राणी की तो चर्चा ही क्या ? प्रायः इस भविष्य ज्ञान की प्राप्ति ज्योतिप शास्त्र के द्वारा होती है। ज्योतिष शास्त्र अथाह सागर है । जन्म-कुण्डली निर्माण के लिये, जन्म का स्थान, ठीक समय का ज्ञान आदि परमावश्यक हैं । शुद्ध लग्न, भाव स्पष्ट, ग्रह स्पप्ट, मान्दि स्पष्ट मित्रामित्रचक्र, सप्तवर्गी चना, दगवर्ग, दगा, अन्तर्दशा, अप्टक वर्ग, सप्टिक वर्ग आदि बनाने मे बहुत गणित करना पड़ता है और परिश्रम साध्य है। फलादेश में भी अनेक विचारो का सामञ्जस्य करना पड़ता है। वृहत् ज्योतिप शास्त्र की परिक्रमा लगाना वैसा ही कठिन है जैसा पृथ्वी की परिक्रमा लगाना । पृथ्वी की परिक्रमा के सम्बन्ध में पुराणों मे एक कथा' है कि एक बार स्वामी कार्तिक तथा गणेश जी दोनों ने प्राग्रह किया कि उनका विवाह हो। स्वामी कार्तिक चाहते थे पहिले उनका विवाह हो तथा गणेश जी चाहते थे पहिले उनका विवाह । तव उनके माता-पिता ने कहा कि जो पहिले पृथ्वी की परिक्रमा पूर्ण कर १. देखिये शिव पुराण (स्ट संहिता), कुमार खण्ड १६ वा अध्याय ।
31 उज्जन म० प्र० . . आवेगा उसी का विवाह पहिले किया जावेगा। स्वामी कार्तिक अपने वाहन मयूर पर चढ कर द्रुतगति से चले और देखते-देखते आँखों से प्रोझल हो गये। गणेश जी का शरीर भारी और वाहन छोटा-सा 'मूपक' । सो विचार में पड़ गये कि कैसे परिक्रमा पूर्ण करूं ? उन्होंने अपने माता-पिता को बैठाया, उनके चरणों का पूजन कर ७ वार माता-पिता की परिक्रमा की और प्रणाम कर कहा कि “मैंने पृथ्वी की परिक्रमा कर ली-भाई एक बार भी परि- क्रमा करके नही आये । अब पहिले मेरा विवाह कीजिये" । शास्त्रों में माता-पिता का पूजन और परिक्रमा पृथ्वी-परिक्रमा के समान है। इस युक्ति से गणेश जी का विवाह हो गया और उन्हें ऋद्धि, बुद्धि-यह दोनों विश्वरूप प्रजापति को दो सुन्दरी कन्याएं-पत्नी रूप में प्राप्त हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि जो सज्जन ज्योतिष शास्त्र की बृह- तपरिक्रमा में अक्षम हैं, यह गणेश जी के उपर्युक्त उदाहरण को लेकर "अक विद्या" का अभ्यास करे तो थोड़े परिश्रम से-केवल अंगरेजी की जन्म तारीस, नाम, किंवा प्रश्न से भविष्य का बहुत कुछ गुभाशुभ जान सकते हैं । अंगरेजी में Numerology की अनेक पुस्तकें है किन्तु हिन्दी में. अंक-विद्या (ज्योतिप) की कोई पुस्तक मेरे देखने में नहीं पाई। अनेक ग्रन्थों का अध्ययन तथा अनुशीलन कर यह पुस्तक पाठकों के सम्मुग्प रखी जा रही है । "शरण करवाणि कामदं ते चरणं वाणि चराचरोपजीव्यम् । फरणामसूणः फटाक्षपात: कुरुमामम्ब कृतार्थसार्थवाहम् ॥ विजया दशमी २०१४ पिनीत १३ दरियागंज, दिल्ली टेलीफोन नं.-२७२८ गोपेशकुमार प्रोझा .
पहला प्रकरण अंक-विद्या रहस्य-पृथ्वी के तत्वों की विभिन्नता-मूलतत्त्व '-शब्द और 'ब्रह्म' को एकता संख्या का महत्व और शक्ति- संख्या और क्रिया का घनिष्ठ सम्बन्ध--१०८ संख्या का महत्व- ५४ का महत्व-प्रन्य संख्यानों को विविध क्रियानों में उपयोगिता--नाम और संख्या का सम्बन्ध अनेक नामों में से मुख्य नाम का निर्णय-'नरपतिजयचर्या' का मत-नाम, संख्या तथा जन्म तारीख का सम्बन्ध-गीता में १८ अध्याय ही क्यों ?-१८ पुराण-महाभारत में १८ पर्व-रामायण का दिन में पारायण- भागवत का ७ दिन में--गायत्री में २४ अक्षर-देवतायो तथा तिथियों को संख्या का रहस्य । दूसरा प्रकरण क्या अंक-विद्या में कुछ सत्यता है-दो बादशाहों का ५३६ वर्ष के बाद एक-सी संख्या की तारीख मे जन्म-ठोक ५३६ वर्ष के बाद बिलकुल एक सो घटनाओं को पुनरावृत्ति-विक्टर ह्य गो का अंक-विद्या विषयक अनुभव-३२ वर्ष बाद बिल्कुल एक-सी घटना परम्परा-यहदियों के इतिहास में ४६० वर्ष का महत्त्व-ऐतिहासिक उदाहरण-'मिथ' तथा 'पैलेस्टाइन' के सम्बन्ध में 'कोरो' की भविष्यवाणी-१३ को संख्या को 'शुभता' तथा 'प्रशुभता' पर विचार--अमेरिका के इतिहास में '१३' को संख्या का महत्व--'कोरो' द्वारा दिया गया '१३' संख्या का अन्य उदाहरण~१४ संख्या से संबद्ध प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना-परंपरा तीसरा प्रकरण पुल अंक बनाने की विधि और उनका प्रभाव-१ से ६ तक के--मूल प्रक-प्रन्म संस्थानों के मूल अंक बनाने को प्रक्रिया- जिनका जन्म १, १०, १६ या २८ तारीख को हुमा हो उनका शुभाशुभ विवेचन (शुभ मास, शुभ अंक, शुभ रंग)-जीयन के महत्व. पूर्ण य; जिनका जन्म २, ११, २० या २६ तारीख को हुमा हो उनका शुभाशुभ विवेचन---जीयन के महत्वपूर्ण वर्ष-शुभ अंक, शुभ माम, शुभ रंग; जिनका जन्म ३, १२ या २१ तारीख को हुपा है उनका शुभाशुभ विवचनशुभ तारोप, मत्यपूर्ण वर्ष, शुभ रंग- जिनका जन्म ४, १३, २२ या ३१ तारीख को हुना हो उनका दाभाशुभ यियेचन-प्रति, स्वभाव, शुभ नारी-जीवन के महत्व पूर्ण यपं, शुभ रंग आदि; जिनको जन्म की तारीत ५, १४ या २३ हो उनको प्रति, गुण स्यभाय-शन पर्व, शुभ रंग, महत्वपूर्ण वर्ष प्राधि; जिनको जन्म तारोस ६, १५. या २४ ही उनकी प्रति मौर अभिनधि, गुन मारा, गुन ग, जीवन के महत्वपूर्ण, वर्ष, जिनको जन्म तारीख ७. १६ या २५ हो उनी प्रति, गुण, स्वभाय, भाभ विरेचन, गुन मास, शुभ रंग ग्रादिः मिनरी जन्म तारोह ८, १७ मा २६ हो उन प्राति तथा स्वभाव- शुभाशुभ विवेपन-शुभ पार पौर घेर-शुभ रंग; जिनको जन्म तारीरा ११८ पा २७ हो उनका गुभाशुभ विधनसभ गाण, रंग, नोन के महत्वपूर्ण वर्ष । चोया प्रकरण गंपाद घर-जम नागेन, नाम माग सपा नाम योगी तोहार गार पर पसा- गूनाइटेर ग उमार-मादार. '' रम-मार ..' आपतविभिन्न भासा में महार रल पारपर-ति माया या रोगा ७ "ईसवी सन् माछा जावेगा-भाग्यांक से सम्यन्धित शुभ वार, शुभ मास तथा शुभ तारीख का चार्ट-अंक-विधा मौर यंत्र-सूर्य आदि नवग्रहों के यंत्र । ५६-७१ पांचवां प्रकरण 'नाम' और अंक-विद्या का सम्बन्ध -यहूदियों में नाम का महत्व --भारत में जन्म नक्षत्र के अनुसार नाम का महत्व-प्रसिद्ध नाम का महत्व-अंग्रेजी के प्रत्येक 'अक्षर' को 'संख्या में परिवर्तन करने को प्रक्रिया--उदाहरण-प्रयोजन-'१०' से '७०' तक की प्रत्येक संख्या का गुण और प्रभाव-कोई नाम शुभ है या नहीं यह जानने का प्रकार--नाम और जन्म-तरीख का सामञ्जस्य-'नाम' के अनुसार कौन-कौन-सी तारीखें उपयुक्त होंगी--किस 'शहर' या 'मोहल्ले' में भाग्योन्नति होगी ७२-६२ छठा प्रकरण मास-वार तथा घंटे का महत्व इंग्लण्ड के राज घराने के उदाहरण-भारतीय मत-~-मास की शुभाशुभता-~वार को शुभा- शुभता-दिन का कौन सा 'घंटा' अनुकूल रहेगा-'होरा' विचार-- होरा चक्र-किस राशि वाले को किस ग्रह को होरा अनुकूल होगी--इस सम्बन्ध में नवीन मत-नवीन मत का खंडन भारतीय मत की प्रधानता-अमृत घटी का विचार । ६३-१०५ सातवां प्रकरण जन्म-मास के अनुसार फलादेश-'सौर' मास की महत्ता-पाश्चात्य मत-भारतीय मत-१३ अप्रैल तथा १२ मई के बीच में उत्पन्न मनुष्यों पर उच्चस्य सूर्य का शुभाशुभ फल-१३ मई तथा १४ जून के बीच जन्म लेनेवालों के लिये भविष्य फल-१५ जून और १५ जुलाई के बीच में उत्पन्न व्यक्तियों का गुण, स्वभाव भविध्य आदि- १६ जुलाई से १६ अगस्त तक पैदा होने बालों के जीवन की रूपरेखा तथा भविष्य फल-१७ अगस्त से १६ सितम्बर के बीच (८) जन्म लेने वालों को गुण, प्रकृति प्रादि पर स्वराशिस्थ सूर्य का प्रभाव तथा उनका भविष्य-~-१७ सितम्बर से १६ अक्तूबर तक जन्म लेने वालों का शुभाशुभ विवेचन एवं फलादेश-~-१७ अक्तूबर नवम्बर तक जन्म लेने वालों पर नीचस्थ सूर्य का प्रभाव:-१४ नवम्बर से १४ दिसम्बर तक जन्म लेने वालों पर वृश्चिक के सूर्य का प्रभाव तथा फलादेश-१५ दिसम्बर से १३ जनवरी तक उत्पन्न मनुष्यों का शुभाशुभ विवेचन एवं फल~१४ जनवरी से १३ फरवरी तक जन्म लेने वालों की प्रकृति, गुण स्वभाव तया भविष्य फलादेश-१४ फरवरी से १३ मार्च तक जन्म लेने वाले व्यक्तियों पर 'कुंभस्थ' सूर्य का प्रभाव-शुभाशुभ विवेचन-१४ मार्च से १२ अप्रैल तक जन्म लेने वाले व्यक्तियों का भविष्य फल-वराह मिहिर, सारावली 'होरासार' प्रादि संस्कृत ग्रंथों का मत । १०६ से १४१ पाठवां प्रकरण हस्तरेखा विज्ञान तथा अंक ज्योतिष का समन्वय हस्तरेखा से घटनामों का ज्ञान-जीवन रेखा, भाग्य रेखा प्रादि पर वर्ष निश्चित करने में अंक-विद्या को सहायता हस्तरेखा सम्बन्धी दो पूरे पृष्ठ के चित्र-उदाहण-जन्म-कंडलो तथा अंक ज्योतिष का सामञ्जस्य -~-दशा, अन्तर्दशा फल कथन में प्रक-विद्या की उपयोगिता--गोचर फल में ग्रंक-विद्या द्वारा फलादेश में साहाय्य-~वर्ष फल में अंक-विद्या की उपयोगिता-पताको कॅडतो-केतु कॅलीगुरु-कंडलो- अंग्रेजी ज्योतिष में अंक-विद्या का प्रयोग । १४२-१६४ नवां प्रकरण मंकों से प्रश्न विचार-~भारतीय मत-प्रश्न के प्रत्येक अक्षर को संख्या में परिवर्तित करने का प्रकार-उदाहरण-लाभ हानि विषयक प्रश्न-मुख-दुःष सम्बन्धी प्रश्न-तेजी भन्दो विषयक प्रश्न -अनेक प्रश्नों के उत्तर का प्रकार-पाश्चात्म मत-अंकों से मुक प्रश्न मान-३ से १४ तक के अंकों से मूक प्रश्न यताते की ज्योतिष पद्धति नाम के पारों से जय-पराजय ज्ञान~'समरसार' में वणित जय-पराजय चा उदाहरण-दुध पत्रों के । १६५-१८७ पहला प्रकरण ग्रंक-विद्या रहस्य संसार में हम जो भिन्न-भिन्न वस्तुएँ देखते है, उनके अनेक रूप है। विविध रंगों के मिलने से नये रंग बन जाते है । लाल और पीला मिलाने से नारंगी का रंग बन जाता है। पीला और नीला मिलाने से हरा । इस प्रकार सैकड़ों, हजारों रंग बन सकते हैं, परन्तु इनके मूल में वही सात रंग हैं जो इन्द्र धनुप में दिखाई देते । इन सात रंगों के मूल मे भी एक ही रंग रह जाता है जो सफ़ेद, किंवा रंगरहित शुद्ध प्रकाश है। सूर्य की प्रकाश रेखा को 'प्रिज्म' में पार करने से सात रंग स्पष्ट दिखाई देते हैं। वैसे, सूर्य की किरण शुद्ध उज्ज्वल बिनारंग के प्रतीत होती है । इसी प्रकार संसार की जो विविध वस्तुएं हमें दिखाई देती हैं उनमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्त्व हैं। उनमें तत्वों का सम्मिश्रण भिन्न-भिन्न अनुपात और भिन्न-भिन्न प्रकार से है। किसी में कोई तत्व कम है, किसी में कोई अधिक । परन्तु यह समस्त जगत् केवल पांच तत्वों का प्रपंच है। यह पांच तत्व भी केवल आकाश से उत्पन्न हुए हैं । आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी । पृथ्वी का गुण 'गन्ध', जल का १. त्रिकोण परातलों का एक घन क्षेत्र ।
मंक-विद्या (ज्योतिष) 'रस', अग्नि का 'तेज' (रूप), वायु का 'स्पर्श' और आकाश का गुण 'शब्द' है । जैसे संसार के सभी पदार्थों के मूल में आकाश तत्व है उसी प्रकार, हम यह कह सकते हैं कि संसार के सभी पदार्थों का मूल गुण 'शब्द' है। इसी कारण शब्द को 'शब्द-ब्रह्म-अर्थात् परम प्रभु परमेश्वर का प्रतीक माना गया है । परिणामतः तो राब शब्द ब्रह्म के रूप ही है किन्तु भिन्न-भिन्न शब्दों का गुण और प्रभाव भी भिन्न-भिन्न है और प्रत्येक शब्द को अंक या संख्या में परिवर्तित कर उसकी माप की जा सकती है। कोई शब्द (या शब्दावली) ७००० बार मावृत्ति करने पर पूर्णता को प्राप्त होता है तो किसी का १७००० बार प्रावृत्ति करने पर परिपाक होता है । 'संख्या' और 'शब्द' के सम्बन्ध से हमारे ऋपि- महर्षि पूर्ण परिचित थे, इसी कारण सूर्य के मंत्र का जप ७०००, चन्द्रमा का ११०००, मंगल का १००००, बुध का १०००, बृहस्पति का १६०००, शुक्र का १६०००, शनि का २३०००, राहु का १८००० और केतु का १७००० जप निर्धारित किया है। किसी देवता के मंत्र में २२ अक्षर' होते हैं तो किसी के मंत्र में ३६ । 'शब्द' और 'संख्या' का धनिष्ठ वैज्ञानिक सम्बन्ध है। इसी प्रकार संख्या और क्रिया का घनिष्ठ सम्बन्ध है । शून्य संख्या (०), निष्क्रिय, निराकार, निर्विकार 'यहा' का द्योतक है और '१' पूर्ण ब्रह्म की उस स्थिति का द्योतक है, जब वह पद्धत रूप से रहता है । कहने का तात्पर्य यह कि 'शब्द' और 'संख्या (अंक) में सम्बन्ध होने के कारण समस्त पदार्थों के मूल में जैसे 'शब्द' है- १. रेडिये मंत्र महोदपि सुतीय तपा एकाशतरंग पुरस्कान तुतीय माग ग्रंक-विद्या रहस्य वैसे ही'अंक' भी । शब्द के मूल-आकाश को-'शून्य' कहते हैं और अंक के मूल को भी 'शून्य । शून्य' से ही शब्द और अंक का प्रादुर्भाव होता है । यदि 'अंक' (संख्या) का किसी वस्तु या क्रिया से सम्बन्ध नहीं होता तो हमारे शास्त्र १०८ मरिणयों की माला बनाने का विधान नहीं करते । प्रत्येक संख्या का एक महत्व है। २५ मरिणयों को माला पर जप करने से मोक्ष, ३० की माला से धन सिद्धि, २७ की माला से सर्वार्थ सिदि, ५४ से सर्वकामावाप्ति और १०८ से सर्व प्रकार की सिद्धियां हो सकती हैं। किन्तु अभिचार कर्म में १५ मणियों की माला प्रशस्त है ।' १०८ की संख्या का क्या रहस्य है ? सूर्य राशिभ्रमण में जब एक पूरा चक्र लगा लेता है तो एक वृत्त पूरा करता है । एक वृत्त में ३६० अंश होते हैं । इस प्रकार सूर्य की एक प्रदक्षिणा के अंशों की यदि कता बनाई जावे तो ३६०४६०=२१६०० कला हुई। सूर्य छ: मास उत्तर प्रयन में रहता है और छः मास दक्षिण अयन में । इस हिसाब से २१६०० को दो भागों में विभक्त करने से १०८०० संख्या प्राप्त हुई। अब दूसरे प्रकार से विचार कीजिये । प्रत्येक दिन में सूर्योदय से लेकर दूसरे सूर्योदय तक 'काल' का परिमाण ६० घड़ी माना है। १ घड़ी के ६० पल और १ पल के ६० विपल । इस प्रकार एक अहोरात्र में ६०४६०४६०=२१६००० विपल हुए। इसके माधे दिन मे १०८००० और इतने ही रात्रि में । जैसे आजकल की नवीन वैज्ञानिक प्रणाली के अनुसार रुपये, १. देखिये शारदातिलक का २३वां पटस-राषषभट्ट कृत पदावि व्याख्या।
१२ अंक-विद्या (ज्योतिष) पैसे, तोल, माप, थर्मामीटर आदि एक ही दशमलव के आधार पर बनाये जा रहे है, वैसे ही हमारे प्राचीन ऋपियों ने 'काल' और 'संख्या' का समन्वय किया था। इसी के समीकरण और सामञ्जस्य स्वरूप १०८००० की संख्या उपलव्य हुई और दशमलव की प्रणाली के अनुसार बिन्दु छोड़ देने से १०८ की संख्या प्राप्त हुई । हमारे प्राचीन ऋषियों ने 'शब्द', काल, संख्या आदि सभी का इस प्रकार सामञ्जस्य कर दिया था कि प्रत्येक नामका-नाम के अक्षरों का संख्या पिंड, बनाने से उसके सब गुण उस संख्या से प्रकट हो जाते थे। इसी आधार पर जय-पराजय चक्र मागे 8 वें प्रकरण में दिये गये हैं। ऋणि और धनी-कौन किसका कर्जदार है अंक-विद्या, मंत्र-विद्या, आदि से सम्बन्ध रखता है, क्योंकि देना-पावना संख्या में ही होता है। नाम को संख्या में परिवर्तित करना-एक बहुत गंभीर विद्या है। आजकल के वैज्ञानिक प्रत्येक भोज्य पदार्थ को "कैलोरी" में परिवर्तित कर यह बताते हैं कि किस भोजन में कितना शक्ति-वर्धक साधन है। इसी प्रकार किसी नाम को संस्था में परिवर्तित करके यह बताया जा सकता है कि कौन से नाम का व्यक्ति, किससे अधिक शक्तिशाली होगा। प्रत्येक व्यक्ति का नाम उस व्यक्ति का प्रतीक है । विद्वानों के मत से मनुष्य जब सोया हुअा रहता है-तब भी उसके चैतन्य को एक कला जगी हुई रहती है । और उसे सावधान या सतर्क किये रहती है। यदि २० मनुष्य एक ही स्थान पर सोये हुए हों तो प्रायः जिसका नाम लेकर आवाज दी १. देखिये "तंत्रसार" तथा "" अंक ४-वर्ष १२-पृष्ठ ११४ .
- . अंक-विद्या रहस्य जाती है-वही जग जाता है । 'नरपति जय-चर्चा' नामक ग्रंथ में लिखा है कि मनुष्य के उसी नाम का विचार करना चाहिये जिस से उसे, आवाज़ दी जावे तो यह सोता हुया जग जावे । 'नाम' और नाम की प्रतीक 'संख्या' अनादिकाल से, फलादेश में उपयुक्त होते रहे हैं। जिस प्रकार रेडियो की सूई जिस 'संख्या' पर स्थिर कर दीजिये उसी 'संख्या' पर प्रवाहित शब्द रेडियो पर सुनाई देने लगते हैं- उसी प्रकार 'संख्या' विशेप और उस 'संख्या' के प्रतीक 'वस्तु' या व्यक्ति में प्राकर्पण होता है । अमेरिका में नवीन अनुसंधान द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि बहुत-से प्रकार के कीड़े, अपने सजातीय कीड़ों को सन्देश या संवाद भेज सकते हैं इसका कारण यह है कि जिस प्रकार एक खास संख्या पर सूई स्थिर करने से रेडियो में आवाज़ पाने लगती हैं उसी प्रकार यह कीड़े भी जो संवाद प्रेषित करते हैं उनको उनके सजातीय कीड़े ग्रहण कर सकते हैं । भिन्न-भिन्न प्रकार के कीड़ों को एक बड़े बाग के अलग-अलग कोनों पर छोड़ा गया है-वह एक ही केन्द्र स्थल पर जाकर मिल जाते है । एक खास प्रकार की मक्खी के झंड को दो स्थानों पर-परस्पर एक दूसरे से कई मील दूर-छोड़ कर देखा गया है कि वे एक ही स्थान पर भाकर मिल जाती है । या जुगनू को लीजिये । मादा जुगनू के पर नहीं होते, नर. के होते हैं । दोनों के शरीर से प्रकाश निकलता है किन्तु मादा जुगनू के शरीर से अधिक तेज रोशनी निकलती है और इस चमक से १. नरपति चर्चा अध्याय २०१५ जन्म-पत्रिका विधान पृ० २२५ ": "Number Please" by Dr. United Cross पृ० १४० मंक-विद्या (ज्योतिष) आकृष्ट होकर नर-जुगनू उसके पास आता है। भिन्न-भिन्न व्यवितयों में परस्पर क्यों आकर्षण या धृणा का प्रादुर्भाव होता है यह स्थूल दृष्टि से नहीं जाना जा सकता। किन्तु सव के मूल में वैज्ञानिक रहस्य है। जंगल में दाना डाल दीजिये। चिड़िया और कबूतर पाजावेंगे। चीनी फैला दीजिये; चीटियां इकट्ठी हो जावेंगी। मरा हुमा जानवर डाल दीजिये, गृद्ध और चील प्रकाश को आच्छादित कर लेंगी। और कहीं रात्रि में बकरा, या पाड़ा बांध दीजिये तो शेर, शिकार के लिये पाजावेगा । चीनी पर शेर नहीं आता । धंधे हुए बकरे की खुशबू से चिड़ियां नहीं पातीं। इसी प्रकार १' द्योतक की संख्या या वस्तु की ओर उसके सहधर्मी प्राकृष्ट होते हैं। '' घोतक संख्या या वस्तु या व्यक्ति की ओर '' के सहधर्मी आकृष्ट होंगे; अन्य वर्ग के नहीं। जिन व्यक्तियों या वस्तुओं में साधम्यं होता है उनमें परस्पर आकर्षण भी होता है, यह सामान्य नियम है । एक बच्चा यह नहीं समझता कि भिन्न-भिन्न ऋतुओं का भिन्न-भिन्न वस्तुओं और व्यक्तियों से क्या सम्बन्ध है, परन्तु जानने वाले जानते ही हैं कि माम गर्मी में पकते हैं और संतरे जाड़े में । कम उम्न का बच्चा, चिड़िया, कमेड़ी, कबूतर सब को 'चिड़िया' कहता है। परन्तु चिड़िया चिड़े के साथ ही जाकर रहेगी, कबूतर कबूतरी के साथ ही । इसी प्रकार अंक-ज्योतिप से मनमिश सब अंकों को एक-सा समझते हैं; परन्तु इस विद्या को जानने वाले यह जानते हैं कि १' मूल-अंक वाले व्यक्ति को '१' मूल-मंक गुम जावेगा और उसकी विशेष मित्रता भी '१' मूल मंक वाले व्यक्ति से होगी तथा '' मूल मंक वाले व्यक्ति को '' १५ पंक विद्या रहस्य मूल-अंक की संख्या शुभ जावेगी और उसकी विशेष मित्रता भी '' मूल-अंक वाले व्यक्ति से होगी। नाम और 'संख्या '-नाम और 'जन्म-तारीख' या यह कहिये कि व्यक्ति, वस्तु और संख्या में जो सामञ्जस्य है उसी कारण किसी व्यक्ति के जीवन में या यों कहिये किसी राष्ट्र के जीवन में किसी 'संख्या' विशेष का महत्व हो जाता है। इसको हम केवल 'कल्पना' या 'संयोग' कह कर नही टाल सकते। आगे के प्रकरणों में इसके अनेक उदाहरण दिये गये हैं। मकड़ी जाला युनती है-बुनते समय कोई कम दिखाई नहीं देता, परन्तु बनने पर क्रम नजर आता है। मधु मक्खियां छत्ता बनाती हैं; बाहर से कोई क्रम नज़र नहीं आता परन्तु भीतर कितना अधिक और सूक्ष्म क्रम रहता है, यह केवल इस विषय की पुस्तकों को पढ़ने से ही मनुष्य जान सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे एक बच्चे की दृष्टि मे- डाकिये के हाथ की सब चिठ्ठियां एक सी मालूम होती हैं, परन्तु डाकिया उन्हें मकान के नम्वर और नाम के क्रम से बांट देता है, उसी प्रकार हमारा जीवन-प्रत्येक का भिन्न-भिन्न 'अंकों के क्रम से चलता है और जब वह 'संख्या-उस 'संख्या' का द्योतक वर्ष या दिन प्राता है, तो हमारे जीवन में महत्त्व पूर्ण घटना होती है । इस अंक-विद्या का पूरी तरह उद्घाटन करना संभव नहीं। भगवत् गीता में १८ अध्याय ही क्यों हैं ? महाभारत में १८ पर्व ही क्यों ? १८ पुराणों की संख्या का वैज्ञानिक आधार क्या है ? इस '१६' की योग संख्या १+८= है । यह क्यों ? हमारे ऋषि मुनि दिव्य ज्ञान और ऋतम्भरा प्रज्ञा के कारण जो पद-चिह्न छोड़ गये हैं, हम तो केवल प्रक-विद्या (ज्योतिष) उनका अनुसरण मात्र ही कर सकते हैं। श्रीमद् भागवत में १२ स्कन्ध ही क्यों हैं ? दगम स्कन्य इतना बड़ा होगया कि उसे 'पूर्वा' और 'उत्तरार्ध-इन दो खडों में विभाजित करना पड़ा । ऐसा न करके १३ स्कन्ध ही क्यों न कर दिये ? रामायण का नवाह (६ दिन में पारायण) तथा भागवत का सप्ताह (७ दिन में पारायण) क्यों ? गायत्री मे २४ अक्षर ही क्यों है ? विवाह के समय 'सप्त- पदी' ही क्यों होती है । गणेश की चतुर्थी, दुर्गा की अष्टमी, सूर्य की सप्तमी, विष्णु की एकादशी तथा रुद्र की प्रदोप-व्यापिनी प्रयोदशी ही क्यों ?-~-आदि अनेक ऐसे अंक-विद्या सम्बधी वैज्ञानिक विषय हैं जिनका विवेचन करना, इस छोटी सी पुस्तक में संभव नहीं। अंक-विद्या का रहस्य इतना गंभीर है कि इसमें जितना अधिक नीचे उतरेंगे उतने ही बहुमूल्य रत्न हाथ लगेगे। यदि आप इसके नियमों का अध्ययन कर, अपने स्वयं की जीवन की घटनाओं से यह नतीजा निकाल सके कि कौन से दिन, और तारीख आप को 'शुभ' या 'अशुभ' जाती है तो केवल इस शान से आप अपने को बहुत लाभ पहुँचा सकते हैं। हाँ, यह कह देना आवश्यक है कि जिस प्रकार एक साधारण नियम होता है और उसका अपवाद होता है; उसी प्रकार अंक-विद्या के जो साधारण नियम बताये गये हैं उनके अप- वाद भी होते है। कभी-कभी उस अंक वाले दिन या वर्ष में, वह 'अंक' तो शुभ फल दिखाने की चेष्टा करता है किन्तु किसी अन्य ग्रह के प्रभाव के कारण फल ठीक नहीं बैठता । इससे. अनुत्साहित नहीं होना चाहिये। गंभीर अध्ययन तथा धैर्य पूर्वक लम्बे समय तक फल मिलाने से-कोनसा 'अंक' शुभ है कौन सा अशुभ---- यह अनुभवमिद्ध हो जाता है ।
दूसरा प्रकरण
क्या अंक-विद्या में कुछ सत्यता है ?
बहुत से लोग इस बात में विश्वास नहीं करते कि कुछ समय
के बाद एक-सी घटना घटित होती है। परन्तु बहुत बार ऐसा
देखा गया है कि आज जो घटना घटित हुई ठीक वैसी ही कुछ
वर्ष पूर्व हुई थी। बहुत से लोग यह तर्क करते है कि ऐसा केवल
संयोगवश हो गया। परन्तु बहुत बार जव उतने ही वर्ष के
फासले पर बारंबार एक-सी घटना घटित हो तो उसे हम केवल
'संयोगवश' कह कर नहीं टाल सकते। नीचे इसी प्रकार के
एक घटनाचक्र की कुछ प्रधान-प्रधान घटनाओं का विवरण दिया
जाता है । इसको देखने से विदित होगा कि एक या दो नहीं परन्तु
एक के बाद दूसरी-~~दसों घटनाएँ ५३६ वर्ष के अन्तर पर
घटित हुई।
(क) सेंट लूई का जन्म (२३ अप्रैल २+३=५) सन् १२१५
लूई XVI का जन्म (२३ अगस्त २+३=५) सन् १७५४
(ख) सेंट लूई की बहिन 'ईसा वेला' का जन्म सन् १२२५
५३६
लूई XVI की वहिन 'ईसा बेला' का जन्म सन् १७६४
(ग) सेंट लूई के पिता की मृत्यु
सन् १२२६
५३६
लूई XVI के पिता 'डाफ़िन' को मृत्यु
सन् १७६५
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१८ मंक-विद्या (ज्योतिष) (घ) सेंट लूई की बादशाहत का प्रारंभिक काल सन् १२२६ लूई XVI की बादशाहत का प्रारंभिक काल सन् १७६५ (ङ) सेंट लूई का विवाह सन् १२३१ ५३६ लूई XVI का विवाह सन् १७७० (च) सेंट लूई को वयस्काधिकार प्राप्त हुए ५३६ लूई XVI गद्दी नशीन हुए (छ) विजेता सेंट लूई मौर इंग्लण्ड के बादशाह हेनरी III में परस्पर युद्ध के बाद सन्धि . सन् १२३५ सन् १७७४ सन् १२४३ ५३६ सन् १७८२ विजेता लूई और इंग्लैण्ड के बादशाह जार्ज III में सन्धि (ज) एक पूर्व देशीय राजकुमार ईसाई बनने के लिये सेंट लूई के पास आया सन् १२४६ ५३६ सन् १७०८ एक पूर्व देशीय राजकुमार ने उपर्युक कार्य के लिये अपना राजदूत लूई XVI के पास भेजा। (झ) सेंट लूई को हार । उसके साथियों का उसे छोड़ देना और उसका वन्दी होना सन् १२५० सूई XVI का उसके दल ने परित्याग कर सन् १७८९
पया मंक-विद्या में कुछ सत्यता है ?
दिया; वह स्वयं भागा किन्तु गिरफ्तार कर
लिया गया।
(ञ) नवीन धर्मवादियों द्वारा क्रान्ति
सन् १२५०
५३६
'जेकव' धर्मवादियों द्वारा धामिक क्रांति
सन् १७६६
(ट) सेंट लूई की माता (राजमाता) का देहान्त सन् १२५३
फ्रांस से 'सफेद लिली' का अंत
सन् १७६२
(8) सेंट लूई ने 'जेकोवियन' (मत परिवर्तन)
कर विश्राम चाहा
सन् १२५४
५३६
'जेकोबियन' लोगों द्वारा लूई XVI का अंत सन् १७६३
उपर्युक्त विवरण अंग्रेजी की पुस्तक से लिया गया है और
यह स्पष्टतया प्रतिपादित करता है कि फ्रांस के दो बादशाहों के
जीवन में~~५३६ वर्ष के अन्तर पर बिल्कुल एक सी घटनाएं
घटित हुई।
सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखक विक्टर ह्य गो ने इस ओर विशेष
ध्यान प्राकर्षित किया है कि कई बार एक सा घटनाक्रम कुछ वर्षों
के बाद दोहराया जाता है और अपने इस कथन की पुष्टि में उसने
निम्नलिखित वृत्त लिखा है :-
(क) ड्यूक दी बेरी चासं दशम का पुत्र था। इसने एक
विदेश की राजकुमारी से विवाह किया और १३ फरवरी सन्
Complete Book of the Occult and Fortune Telling by
M.C. Poinsot, पृष्ठ ४१४०४१५ ।
अंक-विद्या (ज्योतिष १८२० को ड्यूक का कत्ल हुपा (इसी फरवरी महीने में लूई फिलिप का पतन हुआ था)। ड्यूक दी वेरी ने यह चाहा था कि वह सिंहासन छोड़ दे और उसका पौत्र, जिसकी १० वर्ष की अवस्था थी, वादशाह मान लिया जाय । परन्तु उसने यह निर्णय इतनी देर से किया कि वह कामयाब न हो सका । सन् १८३० की रक्त-क्रान्ति ३ दिन तक रही। इसका पिता चार्ल्स दशम ७४ वर्ष की अवस्था में सिंहासन च्युत हुआ-इंग्लण्ड चला गया और वहाँ देश निकाले की हालत में मारा गया। (ख) ड्यूक दी ओरलिअन्स, लूई फिलिप का लड़का था ! उसने एक विदेश की राजकुमारी से विवाह किया और १३ फरवरी १८५२ को दुर्घटना से मरा । इसी फरवरी महीने में लूई फिलिप का पतन हुआ था। ड्यूक ऑफ ऑरलियन्स ने चाहा कि वह सिंहासन छोड़ दे और उसका पौत्र, जिसकी आयु १० वर्ष की थी, बादशाह मान लिया जाय । परन्तु उसने यह निर्णय इतनी देर से किया कि वह कामयाब न हो सका । सन् १८४८ की रक्त क्रान्ति ३ दिन तक रही । इसके पिता लूई फ़िलिप ७४ वर्ष की अवस्था में सिंहासनच्युत हुग्रा-इंगलैंड चला गया और वहां देश निकाले की हालत में मारा गया। ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि ३२ वर्ष के अन्तर पर विल्कुल एक-सा घटना क्रम हुआ। यहूदियों के प्रारम्भिक इतिहास का आधार ७' की संख्या मानी गई है । उनके धार्मिक इतिहास मे ७. तथा ७४७ (=४६) तथा, ७४७० (-४६०) इन संख्याओं का विशेप महत्व है। 'बेबीलोन' में इनकी परतंत्र स्थिति ७० वर्ष रहेगी-यह पटना से बहुत पूर्व ही भविष्यवाणी कर दी गई थी।
पया अंक-विद्या में कुछ सत्यता है ? और 'जेरूसेलम' का ध्वंस तथा उनके वहाँ पुनः जमने में ७४७०= ४६० वर्ष लगेंगे इसकी भविष्यवाणी भी डेनियल ने कर दी थी। हेन्द्र जाति के जन्म से 'कनान देश' प्रवेश मे उन्हें ४६० वर्ष लगे। जोशुआ ने जब 'कनान देश' पर विजय की, उसके ४६० वर्ष बाद 'सॉल' के अधीन प्रथम यहूदी राज्य स्थापित हुआ । 'सॉल' इनका प्रथम वादशाह था। इसके समय से ठीक ४६० वर्ष बाद, नेबूचनेजार ने जेरुसेलम पर विजय प्राप्त की । और इस तिथि के ठीक ४६० वर्ष बाद रोमवासियों ने जेरुसेलम को नष्ट किया। '४६०' वर्ष के 'काल चक्र' के आधार पर यह घटना कब घटित होंगी । इनकी भविष्यवाणी बहुत पूर्व की जा चुकी थी। सन् ७० ईस्वी में टिटस ने इनका मन्दिर नष्ट किया । ७० वर्ष बाद रोमवासियों के विरुद्ध इनका द्वितीय विप्लव हुआ। यहूदी जाति छिन्न-भिन्न हो गई। ७०४७-४६० वर्ष तक यह लोग मारे मारे फिरते रहे। दूसरे ४६० वर्ष का 'काल चक्र' भी इनके लिये प्रतिकूल रहा और इन पर जगह जगह अत्याचार ही होता रहा । ६८० वर्ष (४६०+४६०-६८०) व्यतीत हो जाने पर मुस्लिम सत्ता और शक्ति ह्रासोन्मुख हुई और यहूदियों का प्रभुत्व मध्य एशिया में बढ़ने लगा। इसके ४६० वर्ष बाद 'अमेरिका का पता लगा । अमेरिका का पता सन् १४६२.में लगा और इस तारीख से अग्रिम ४६० वर्ष में अर्थात् सन् १९८० तक यहूदी लोग पुनः अपना राज्य स्थापित कर पुनः अत्यन्त शक्तिशाली हो जावेगे यह भविष्यवाणी कीरो' ने की थी। 'कीरो' की भविष्यवाणी के आधार पर पेलिस्टाइन (फिलिस्तीन) तथा मिथ देश दोनों में आर्थिक उन्नति और प्रौद्योगिक तथा व्यावसायिक समृद्धि यहूदियों तथा 8. Cheiro's World Predictions Future of Jews foreshadowed २२ अंक-विद्या (ज्योतिष) उनके सहयोगियों द्वारा होगी । 'कीरो' ने यह भी भविष्यवाणी की है कि जर्मनी और इंगलैण्ड एक दूसरे के मित्र हो जावेंगे और फिलिस्तीन तथा मिश्र में बहुत अधिक तादाद में अपनी अपनी फोजें भेजेंगे । रूस, चीनी तथा तारतारी फौजों को काम में लावेगा और सब मुस्लिम जातियां इम संघर्ष में सम्मिलित होंगी । अस्तु' यहाँ हमारा मुख्य विषय है 'काल चक्र' । जिस प्रकार सूर्योदय के बाद बारह घण्टे दिन रहता है और फिर वारह घण्टे रात्रि; इसके वाद पुनः दिन और रात्रि । उसी प्रकार देशों तथा जातियों के विकास अभ्युदय, उत्थान और पतन में भी कभी कभी हम 'काल चक्र' का पता लगा सकते हैं और उसके आधार पर भविष्य में होने वाली घटनाओं का पता लगा सकते हैं-प्रस्तुत पुस्तक का प्रधान विषय यही है । प्रत्येक मनुष्य के जीवन में इस क्रम का-"अंकों" या संख्या द्वारा पता कैसे लगाया जाये। कभी-कभी यह देखा गया है कि कोई संख्याविशेष या अंक- विगेप, किसी व्यक्ति या राष्ट्र-विशेष के जीवन से इतना सम्बद्ध रहता है कि उसे केवल 'संयोग' कह कर नहीं टाल सकते । बहुत से लोग १३ को अशुभ अंक मानते हैं। इसका कारण यह है कि ईसा मसीह की मृत्यु के पहले जो खाना हुआ उसमें १३ व्यक्ति थे। ईसाइयों में यह वहम बहुत प्रचलित है। बहुत से होटल के मालिक अपने होटल के कमरों पर नं० डालते समय १२ के बाद १. विशेष विवरण के लिए देखिये Hebrew Astroloiy by Sepharial,
क्या अंक-विधा में कुछ रहस्य है ?
१२ A फिर १४, १५--इस क्रम से आगे के कमरों पर नम्बर डालते
हैं । १३ का नम्बर इस कारण नहीं डालते कि बहुत से मेहमान
१३ नं. के कमरे से घबराते हैं।
प्रागे के प्रकरण में (देखिये प्रकरण ३) बताया गया है कि
अंक-विद्या में यदि कोई अंक से अधिक हो तो उसके विविध अंकों
को जोड़ कर जो अंक बने वह मूल-अंक कहलाता है। इस पद्धति
के अनुसार अमेरिका का मूल-अंक १३-१+३=४ प्रतीत होता
है क्योंकि '१३' की संख्या का अमेरिका से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
'१३' के दोनों अंक १' तथा '३' को जोड़ने से १+३-४ चार
बनता है। ४ का सम्बन्ध आधुनिक वैज्ञानिकों ने 'हर्शल' ग्रह से
माना है । 'हर्शल' का विजली, नवीन आविष्कारों तथा द्रुत प्रगति
से विशेष सम्बन्ध है और अमेरिका इन बातों के लिए प्रसिद्ध है ही।
यह भी आगे तीसरे प्रकरण में बतलाया गया है कि १ तया ४ अंकों
की '२' तथा ''अंकों से भी सहानुभूति है।
(क) वाशिंगटन प्रथम अमेरिकन
प्रेसीडेन्ट का जन्म दिवस २२ फरवरी (२+२-४)
(ख) स्वतन्त्रता का ऐलान
जुलाई
(ग) जाजं तृतीय (जिसके राज्य
काल में अमेरिका से युद्ध
हुमा) का जन्म दिन
-
४
(
पासिविल महायुद्ध की प्रपन
(च) समतर किले का पतन
२४ अंक-विद्या (ज्योतिष) १३ फरवरी १३ दिसम्बर . (छ) डोनाल्डसन किले का युद्ध (ज) फ्रेडरिक्सवर्ग का युद्ध (झ) एडमिरल डेवी का मनीला खाड़ी में प्रवेश (ञ) 'मनीला' पर विजय और कब्ज़ा २८ दिसम्बर (ट) प्रेसीडेन्ट वुडरो विल्सन का जन्म दिन (ठ) प्रेसीडेंट विलसन का फ्रांस में प्रागमन (ड) प्रथम महायुद्ध के समय जहाजी बेड़े की प्रारम्भिक १३ दिसम्बर १३ जून याना १३ सितम्बर (ढ) जनरल पाशिंग का जन्म दिन (ण) सेंट मितेल का निर्यात्मक १३ सितम्बर युद्ध (त) 'स्वतन्त्रता' ऐलान करने • वाले नेता जोसेफ़ जेफरसन का जन्म "अप्रैल (य) जोसेफ,जेरफेसन को निधन-ला तिथि 'जुलाई (द) प्रेसीडेन्ट मेक्किनले का.जन्म दिन २६ जनवरी नघ) मेन से महायुद्ध की घोषणा . २ ५ २० अप्रैल .
% 3D १ क्या अंक-विधा में कुछ सत्यता है ? (न) प्रेसीडेन्ट मोनरो (जिसके नाम से मोनरो- सिद्धान्त' सुविख्यात है) का जन्म दिन २८ अप्रैल (प) प्रेसोडेन्ट मोनरो की निधन तिथि ४ जुलाई ४ '१३' की संख्या 'नवीनता' की प्रतीक है। अमेरिका 'नई दुनिया' नाम से ही नहीं--कार्य क्रम से भी नवीन प्रगति वाला है। इसका श्रादर्श वाक्य भी नवीनताका प्रतिपादक 'Novus Ordo. Seclorun' है। जॉर्ज वाशिंगटन का प्रारम्भिक सत्कार १३ तोपों की सलामी से किया गया । अमेरिका की जो राष्ट्रीय ध्वजा है उसमें १३ पत्तियाँ हैं, १३ बाण हैं, 'ईगल' के ऊपर १३ सितारे हैं और 'ईगल' के प्रत्येक डैने में १३ पंख हैं । जब अमेरिका सर्वप्रथम राष्ट्र हुआ, तब उसमें १३ राज्य थे और १३ प्रतिनिधियों ने स्वतन्त्रता-घोषणा के राज्य- पत्र पर हस्ताक्षर किये थे । अमेरिकन झंडे में १३ ही धारियाँ है। 'कीरो' विश्व-विख्यात ज्योतिपी, हस्तरेखा विशारद तथा अंक- विद्या का पारंगत विद्वान् था। उसने श्री एच. सी. शेर्मन नामक व्यक्ति के जीवन की घटनाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि श्री शेर्मन की अपनी भावी पत्नी मिस वीक्स से प्रारम्भिक मुलाकात १३ तारीख को हुई, उसने विवाह का प्रस्ताव १३ तारीख को किया और मिस वीक्स ने विवाह को स्वीकृति भी १३ तारीख को ही दी। १३ जून सन् १९१३ को दिन के दस बजकर १३ मिनट पर वे विवाह-वेदी पर बैठे। पति-पत्नी दोनों की जन्म तारीखें भी १३ ही थीं । विवाह में १३ मेहमान आये और वधू के हाथ में जो गुलदस्ता था, उसमें १३ गुलाब के फल थे १. Cheird's World Predictions, पृष्ठ ११२ ।
२६ अंक-विया (ज्योतिष) एक अन्य सज्जन सेमुअल स्टोरे ने लिखा है कि उसके जीवन में '१३' की संख्या का बहुत महत्व रहा। वह १३ जनवरी; १८४० (१+++४+०=१३) को पैदा हुआ । वह १३ वर्ष की आयु से कमाने लगा और उसने प्रथम वार २६ जनवरी (१३४२) को राजनैतिक भाषण दिया। राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने के १३ वर्ष बाद वह पालियामेण्ट का सदस्य चुना गया। १३ वर्ष तक प्रथम पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन रहा। उसकी पत्नी २६ तारीख (१३४२) को मरी । वह ३ वर्ष तक 'मेयर' पद पर तथा १० वर्ष 'चेअरमन' पद पर-इस प्रकार कुल १३ वर्ष पदाधिकारी रहा। ५८ वर्ष की अवस्था मे (५+7=१३) उसने द्वितीय विवाह किया। विवाह के समय सन् भी १८९८= =(१+++ 3२६ =१३४२) था । वह लिवरल दल का सदस्य १३४३८-३६ वर्ष तक रहा । सन्डरलैण्ड के चुनाव में उसे १२३३४ वोट (१+२+३ +३+४=१३) प्राप्त हुई। उसके जीवन में महत्वपूर्ण वर्ष वही थे जिनमें १३ का भाग पूरा पूरा लग सके (अर्थात् १३, १३४२२६ १३४३= ३६, १३४४==५२) । इस प्रकार '१३' की संख्या के अनेक उदाहरण अनेक पुस्तकों में भरे पड़े हैं। सुप्रसिद्ध लेखक एम. सी. पोइनसोटर ने लिखा है कि Paul Des Chanel १३ तारीख को पैदा हुआ । उसका विवाह १३ तारीख शुक्रवार को हुआ । १.३ तारीख को चेम्बर ने इन्हें प्रेमी. डेन्ट के पद के लिए चुना । इनके नाम में १३ ही अक्षर थे ।' हेनरी क्रिस्टेमे कस के नाम में अंग्रेजी वर्णमाला के अधर थे। वह १३ अक्तूबर को पैदा हुए और उन्हें विश्वविद्यालय में माहिन्य १. The Complete Book of the occult qष्ठ ४१२ । ।
२७ या अंक-विद्या में कुछ सत्यता है ? की उपाधि १३ तारीख को प्राप्त हुई। उनको कृति 'भार्था' १३ तारीख को स्वीकृत हुई और उसका रिहर्सल भी १३ तारीख को हुआ। उनकी एक अन्य कृति १३ तारीख को पेरिस में दिखाई गई और पुनः बसेल्स नामक नगर में उसकी पुनरावृत्ति १३ तारीख को की गई। उनकी अन्य कृतियां भी--प्रत्येक-१३ तारीख को ही स्वी- कृत हुई और १३ तारीख को ही उन्हें विशिष्ट सम्मान की उपाधि से विभूपित किया गया। अब १३ तारीख के सम्बन्ध में एक उदाहरण ऐसा दिया जाता है जहाँ १३ ने अशुभ प्रभाव दिखाया हो । सुप्रसिद्ध उपन्यासकार विक्टर ह्य गो ने लिखा है कि जब सन् १८७१ में वह फ्रांस की राष्ट्रीय असेम्बली के लिये रवाना हुए तो १३ (फरवरी) तारीख थी। जिस डब्बे में वह गये उसमें १३ व्यक्ति थे और जब वह 'वोरदू' नगर में पहुंचे तब नं० १३ के मकान मे उन्हें ठहराया गया। १३ मार्च की रात्रि को उन्हें बिलकुल नोंद नही भायो । वह बेचैनी से करवटें बदलते रहे और विचार करते रहे कि जनवरी से-- लगातार---'१३' की संख्या उनका पीछा कर रही है। उसी समय उन्हें होटल के अध्यक्ष ने बुलाया और विक्टर ह्य गोसे कहा, कि "दिल को कड़ा कर लीजिये। जिस चार्ल्स ह्य गो की प्रतीक्षा में आप ठहरे हैं, उसकी मृत्यु का समाचार आया है !" कहने का तात्पर्य यह है कि कोई संख्या सर्वथा शुभ या सर्वथा अशुभ नही होती- किसी का कन्दे नगीने में नाम होता है किसी को उम्र का लबरेज़ जाम होता है।
अंक-विद्या (ज्योतिष) . - दुनिया में शामो सहर किसी का कूच किसी का कयाम होता है । किसी व्यक्ति के लिये कोई दिन बहुत शुभ होता है--वह शासन सत्तारूढ़ होता है, परन्तु उसी दिन उसके प्रतिद्वन्द्वी को फांसी लगाई जाती है। जो किसी एक के लिये 'शुभ' वही किसी दूसरे के लिये 'अशुभ' अंक हो जाता है । अंग्रेजी इतिहासकारों ने तारीख को. 'संख्या' पर बहुत गवेपरणात्मक अध्ययन किया है। हमारे. भारतीय इतिहास तथा महापुरुषों की जीवनी में इस प्रकार की गवेपणा नही की गई है । प्रस्तु कोई वैज्ञानिक सिद्धान्त चाहे यूरुप में प्रतिपादित किया जावे चाहे भारत में, उसकी वैज्ञानिकता में अन्तर नहीं पाता। यूरुप के इतिहास से, १४ की संख्या की पुनरावृत्ति का एक घटना- कम संक्षेप में यहां दिया जाता है :- (क) फ्रांस के प्रथम बादशाह का राज्याभिषेक १४ मई सन् १०२६ को हुआ और फ्रांस का अन्तिम बादशाह हेनरी १४ मई १६१० को मारा गया। फ्रांस तथा नयारे के १४वें बादशाह Henri de Bourbon के नाम में १४ अक्षर थे। फ्रांस का वाद शाह हेनरी १४ दिसम्बर सन् १५५३ को पैदा हुआ । ईसामसीह के जन्म के १४००+१४ दशक (१४०)+१४ वें में १४४१००-१४०० १४४१० “१४० १४४१ १५५४ 1. "Research in the Efficiency of Dates and Names in tho २० इस Annals of Nations" " 1 साल % 3D २६ पमा अंक-विद्या में कुछ सत्यता है ? अर्थात् १५५३ वर्ष पूरे हो गये थे और १५५४ वां वर्ष चल रहा था। १५५३ वर्ष का मूल अंक भी १४ ही होता है :१+५+५+ ३-१४ । १४ मई १५५४ को वादशाह हेनरी ने एक प्राज्ञापत्र निकाला। इसी कारण-परम्परा से १४४४=५६ वे वर्ष में वह वह कत्ल किया गया। (स्थानाभाव के कारण इस विषय का पूर्ण विवरण यहाँ नहीं दिया जा रहा है।) १४ मई १५५२ को हेनरी चतुर्थ की प्रथम पली पैदा हुई थी। १४ मई १५८८ को ड्यूक प्राव गाइज ने हैनरी तृतीय के विरुद्ध बग़ावत की। १४ मार्च १५६० को हैनरी ने ईवरी के प्रसिद्ध युद्ध में विजय प्राप्त की। १४ मई १५६० को हेनरी चतुर्थ पेरिस की लड़ाई हारां । १४ नवम्बर १५६२ को फ्रेंच पालियामेंट ने कानून पास किया। इसके अनुसार भविष्य के लिये उत्तराधिकारी नियुक्त करने का अधिकार हेनरी चतुर्थ से लेकर रोम के पादरियों को दे दिया गया । १४ दिसम्बर को ड्यूक प्राव सेवोय ने हेनरी चतुर्थ को प्रात्म समपर्ण किया। १४ सितम्बर को 'डाफिन (जो बाद में लूई XIII के नाम से प्रसिद्ध हुप्रा) का ईसाई मतानुसार नामकरण संस्कार किया गया। १४ मई १६१० को बादशाह का कत्ल किया गया। इस प्रकार और बहुत सी घटनाएँ दी गई है जिनमें १४ की सख्या वारंबार आती है । वास्तव में जो फ्रेंच इतिहास से जानकारी रखते हैं वहीं उपर्युक्त घटनामों के महत्व का असली मूल्याकन कर ' १. Complete Book of the Occult, पृष्ठ ४१३ ।
प्रक-विद्या (ज्योतिष) । सकते हैं । उन समस्त घटनाओं के महत्व पर प्रकाश, डालना इस छोटीसी पुस्तक में सम्भव नहीं । पुस्तकों में अंक-विद्या के प्रमाणमें सैकड़ों उदाहरण भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के जीवन से संकलित कर अंग्रेज ज्योतिषियों ने दिये हैं । यहाँ केवल बानगी के तौर पर कुछ उदाहरण दिये गये हैं। इस विषय में कहना केवल यह है कि बहुत बार किसी-किसी के जीवन में किसी तारीख-विशेष या अंक-विशेष का महत्व पाया जाता है । यदि हम अपने-अपने जीवन को गत घटनाओं का अध्य- यन कर, उस अनुभव तथा अंकविद्या के मूल नियमों के आधार पर अपने भविष्य के विषय में कुछ जान सकें तो हमें कितना लाभ हो ? साधारण जनता ज्योतिष शास्त्र पारंगत नहीं हो सकती परन्तु अंक-विद्या के नियम इतने सरल है कि साधारण पढ़ा लिखा मनुष्य भी इसे अपने जीवन में लागू कर लाभ उठा सकता है । बहुत बार जन्म-कुण्डली के अन्य ग्रहों के प्रभाव के कारण अंक-विद्या के नियम सर्वथा लागू न होंया किसी-किसी के जीवन में अनेक ग्रहों के प्रवल प्रभाव के कारण कई अंकों की प्रधानता हो और किसी 'अंक'-विशेष का नियम दिखाई न दे, किंतु इससे अंक-विद्या के मूल सिद्धान्त में कोई त्रुटि नहीं होती। नियम होते हैं और उनके अपवाद भी होते हैं। इस पुस्तक को पढ़ कर इसके नियमों को अपने तथा अपने परिचित व्यक्तियों के जीवन में लागू कर देखिये कि कितनी अधिक मात्रा में यह अंक-विद्या पको लाभ पहुँचाती है। Curious Blyths of the Middle Ages by Sabino Bario g Gould
३ री प्रकरण
'मूल अंक' बनाने की विधि और उनका प्रभाव
अब अंग्रेजी ज्योतिप के आधार पर यह बताया जाता है कि
यदि किसी तारीख में एक से अधिक अंक हों तो उनको जोड़ कर
मूल अंक कैसे बनाया जाए। १ से लेकर ६ तक तो मूल अंक
कहलाते है । इसके बाद के अंकों को निम्नलिखित प्रकार से जोड़कर
-मूल अंक बनाने चाहिएं
१० = १+ ० - १
२० = २ + ०२
१+१ %D२
२१% २+१% ३
१२ -१+ २-३
२२ २+२= ४
२३ - २+३=५
२४.२+४-६
१५ = १+ ५ =
२५ -२+ ५
+६ = ७
२६-२+६= ८
१७% १+७
२७ -२+७%38
१८ =१+ ८ = ६ २८ - २+८% १०
"१६-१+६= १०
यदि हमें २६ का मूल अंक निकालना हो तो २६%२+९=११
इस प्रकार दो अंकों की संख्या ११ पा जाती है। इसे उपयुक्त कम
से फिर.जोड़ना चाहिए, १+१%D२; इस प्रकार २६ का मूल अंक २
.
प्रक-विद्या (ज्योतिष) हुआ । ३० का ३+0%तथा ३१ का ३+१=४ हुमा । किसी भी तारीख का या किसी भी संख्या का मूल अंक ज्ञात करने का तरीका यह है कि उसमें ६ का भाग दीजिए। जो शेष बचे वही मूल अंक है । यदि शेप ० बचे तो मूल अंक होगा। अंक १ किसी भी महीने में ३१ से अधिक तारीख नहीं होती, इस कारण ३१ तक की संख्या के मूल अंक बनाना यहाँ बता दिया गया है । अव सव से पहले '१' मूल अंक के विषय में बताया जाता है। जिसकी जन्म तारीख का मूल अंक १ होता है वह व्यक्ति क्रियात्मक, अपनी विचार-धारा में स्थिर तथा निश्चित स्वभाव का होता है। अर्थात् उसको प्रकृति में अस्थिरता नही होती। जिस बात पर अपनी राय कायम कर लेता है उस पर स्थिर रहता है। ऊपर जो १ से लेकर ३१ तारीख तक के मूल अंक दिए गए है उनको देखने से पता चलेगा कि १०, १६ तथा २८ तारीख को जो व्यक्ति उत्पन्न हुये हैं उनका मूल अंक १ है । ऐसे व्यक्तियों को किसी भी महीने की निम्नलिखित तारीखें महत्व- पूर्ण जावेगी:- १,१०, १६, २८ इन तारीखों के अतिरिक्त उनके जीवन के निम्नलिखित्त वर्ष भी महत्वपूर्ण होंगे। १ ला वर्ष, १० वां वर्ष, १६ वा वर्ष, २८ वाँ वर्ष, ३७ वो वपं, ४६ वा वर्ष, ५५ वा वर्ष, ६४ वाँ वर्ष, ७३ वां वर्ष, इत्यादि । इसका कारण यह है कि ऊपर जो-जो वर्ष गिनाये गए हैं उनको १. देखिये "The Magic of Yumbers by Leo Markun. - -------- . 'मूल अंक बनाने की विधि और उसका प्रभाव जोड़ने से मूल अंक १ ही बन जाता है । यथा ६४%६+४=१०- १+०=१ । इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये । '१' संख्या पर सूर्य का प्रभाव विशेष माना गया है और अंगरेज़ ज्योतिषियों के मतानुसार जो व्यक्ति २१ जुलाई से २८ अगस्त तक के समय में पैदा होते है उन पर सूर्य का प्रभाव विशेष होने के कारण यदि कोई मनुष्य उपर्युक्त समय में भी पैदा हुआ हो और १, १०, १६ या २८ तारीख को पैदा हो तो, उस पर सूर्य का प्रभाव और भी अधिक होगा। जिन लोगों को जन्म तारीख का मूल अंक होता है, वह अनुशासन पसन्द नहीं करते। वह स्वयं अपनी संस्था के संचालक 'या अपने विभाग के अध्यक्ष होना चाहते हैं । इन लोगों को चाहिये कि अपने किसी भी नए काम की बुनियाद १, १०, १६ या २८ तारीख को हालें.... यदि साथ ही २१ जुलाई से २८ अगस्त के बीच वाले काल में वह कोई नया कार्य करें तो इन्हें विशेष सफलता होगी। '१'. अंक तो इनका अपना अंक हुआ, इस कारण शुभ होगा ही; किन्तु १ के अतिरिक्त २, ४ तथा ७ का अक भो , इन्हें शुभ होता है। इस कारण २,११ (१+१=२), २० (२+0=२) तथा २६ (२+६=११%१+१%२) तारीख भी इन्हें अच्छी जावेगी । ४, १३ (१+३-४), २२ (२+२-४), तथा ३१ (३+१-४) तारीखें भी शुभ जावेगी । ७, १६ (१+६=७), तथा २५ (२+५-७) तारीख भी इन्हें शुभ होंगी। ऊपर साधारण नियम बताया गया है। प्रत्येक . व्यक्ति को अपने जीवन के वर्षों में यह विचार करना चाहिये कि १, २,४ .अंक-विद्या (ज्योतिष) तथा ७ अंक वाले वर्ष उसे कैसे गये उदाहरण के लिए यदि कोई मनुष्य अपने गत जीवन के अनुभव से इस नतीजे पर पहुंचे कि. १, १०, १६, २८, ३७, वर्ष सो अच्छे गये किन्तु ७, १६, २५, ३४ या ४३ वाँ वर्ष अच्छा नहीं गया और महीने को ७, १६ या २५ वी तारीख उसे अच्छी नहीं जाती तो भविष्य में किसी महत्वपूर्ण काम के लिये उसे ७, १६ या २५ वी तारीख नहीं चुननी चाहिए। '१' अंक वाले मनुष्य को रविवार तथा सोमवार शुभ होता है। इसलिए यदि १ ता० को या १० ता०को या १६ ता० को या २८ ता० को रविवार पड़े तो उसे विशेष अच्छा जावेगा। इसी प्रकार यदि ४ या १३ या २२ तारीख को रविवार पड़े तो भी उसे विशेष शुभ होगा। गहरा या हल्का भूरा रंग या पीला अथवा सुनहरी रंग इनके लिये विशेष अनुकूल होता है। पुरुष गहरे या हल्के भूरे रंग के कपड़े पहिने तो उन्हें शुभ प्रभाव दिखावेगे। कपड़े का रंग पसन्द करते समय हमें लोक-रुचि का भी ध्यान रखना पड़ता है। पुरुप गहरे पीले या सुनहरी रंग के कपड़े नहीं पहन सकते किन्तु जिन स्त्रियों की जन्म तारीख का मूल अंक १ हो वे पीली या सुनहरी रंग की साड़ी या ब्लाउज पहन सकती हैं।' जीयन के महत्वपूर्ण वर्ष १ मूल अंक वालों के जीवन के निम्नलिखित वर्ष महत्व पूर्ण होंगे? (क) १, १०, १६, २८, ३७, ४६, ५५, ६४ । (ख) ४, १३, २२, ३१, ४०, ४६, ५८, ६७ । १. देखिये Harmony in Namber, Namo & Colour by Prof. Kielland.
१५
r
'मूल भंक' बनाने की विधि और उसका प्रभाव
(ग) २, ११, २०, २६, ३८, ४७, ५६, ६५ ।
-(घ) ७, १६, २५, ३४, ४३, ५२, ६१ ।'
अंक २
'२' अंक का अधिष्ठाता चन्द्रमा है। सूर्य और चन्द्रमा मित्र हैं ।
इस कारण '१' अंक वाले व्यक्तियों को २ का अंक भी शुभ बताया
गया है। परन्तु सूर्य में तेज होता है. चन्द्रमा में शीतलता। इस
कारण जिनका मूल अंक २ हो, वे व्यक्ति कल्पनाशक्ति वाले,
कलाप्रिय तथा प्रेमी होते हैं। शारीरिक शक्ति उनमें उतनी अधिक
नहीं होती किन्तु मस्तिष्क सम्बन्धी कार्य में बाजी मार ले जाते हैं।
महीने की निम्नलिखित- किसी भी तारीख को जिनका जन्म
हुमा हो, उन सब का भूल अंक २ होगा।
२
११%D१+१=२
२०=२+०२
२६%२६%११-१+१%२
अंगरेज ज्योतिपियों के मतानुसार जिनका जन्म २० जून
से २५ जुलाई तक हुअा हो उन पर चन्द्रमा का विशेष प्रभाव रहता
हैं । इस कारण जिन व्यक्तियों का जन्म उपर्युक्त काल में हुआ
हो और जन्म-तारीख का मूल अंक भी २ हो तो उन पर चन्द्रमा
१. इस विषय के विशेष जिज्ञासु कृपया देखें:-
· "The Science of Numerology : What Numbers Blean to
You" by Pelter B. Gibson.
२. Numerlogy : Its Practical Application to Life by
Clifford W. Cheasley. .
.
।
अंक-विद्या (ज्योतिष) का विशेष प्रभाव रहेगा। जिनका मूल अंक २ हो उन्हें कोई भी महत्वपूर्ण कार्य महीने की २ री, ११ वीं, २० वीं या २६वीं तारीख को करना चाहिए। यदि यह लोग नवीन कार्य २० जून से लेकर २५ जुलाई तक-इस बीच में कर और नवीन कार्य का प्रारंभ भी २ अंक वाली तारीख को हो तो विशेष सफलता की संभावना है । जिन व्यक्तियों का मूल अंक २ है, उन्हे १,४ तथा ७ की सख्या भी शुभ होती है। इस कारण २ अंक वाले व्यक्तियों को उचित है कि अपने गत जीवन की घटनाओं से यह नतीजा निकालें कि जीवन का १ ला, १० वां, १६ वाँ तथा २८ वाँ वर्ष उन्हें कैसा गया और प्रत्येक महीने की १ अंक वाली तारीखें इन्हें कैसी जाती है। यदि यह शुभ 'जाती हों तो इन तारीखों को भी वह नवीन कार्य प्रारंभ कर सकते हैं, तथा ३७, ४६, ५५, ६४ या वर्ष भी अच्छा जावेगा। इसी प्रकार ४ अंक की परीक्षा करनी चाहिए कि जीवन का ४ था, १३ वा २२ वो तथा ३१ वां वर्ष कैसा गया और महीने की यह तारीखें कैसी जाती है। ७ का अंक, २ का मित्र समझा जाता है । इस कारण जिन व्यक्तियों की जन्म-तारीस का मूल अक २ हो उन्हे प्रत्येक महीने की ७, १६ तथा २५ बी तारीख भी उत्तम जानी चाहिए। और इनके जीवन का ७ वां, १६ वां, २५ वां, ३४ वौ, ४३ वां, ५२ वां, ६१ वा तथा ७० वा वर्ष भी महत्वपूर्ण होगा। जिनका मूल अंक २ है, उनके लिये रविवार, सोमवार तथा शुक्रवार शुभ होता है। इसलिये यदि २ या ११ या २० या २६ तारीम को सोमवार भी हो तो इन्हें विशेष शुम होगा। जिनको जन्म तारीस का मूल अंक २ हो उन्हें इस बात "मूल अंक बनाने की विधि और उसका प्रभाव लिए प्रयत्नशील होना चाहिए कि अपने मस्तिष्क की बेचैनी और उलझन को कम कर, जिस बात का विचार पक्का किया हो उसे कार्यान्वित करने में जी-जान से जुट जावें । यह लोग प्रायः मुस्त-. किल मिजाज़ नहीं होते, एक बात के विषय में विचार पक्का करते है और फिर उसमें तब्दीली या तरमीम करते रहते हैं और फिर दूसरी कोई नई योजना बनाने लगते हैं। धैर्य और अध्यवसाय की कमी के कारण जिस बात का विचार करते हैं उसे पूरा नहीं करते । अपने स्वभाव की इस कमजोरी के कारण इन्हें सफलता में बाधा होती है । इनमें आत्म-विश्वास की कमी होती है; थोड़ी सी निराशा से उदासीन हो जाते हैं । यदि अपनी इस भावुकता पर विजय पा लें तो बहुत सी बातों में सफल हो सकते हैं । इन्हें सफ़ेद, काफ़री (चन्द्रमा के रंग का), हरा या अंगूरी रंग विशेष शुभ है। इस लिए इस रंग की पोशाक पहनना चाहिए। काला, लाल या गहरा रग इनके लिये अनुकूल नहीं है। अंक ३ इस अंक का अधिष्ठाता बृहस्पति है। जिन व्यक्तियों का जन्म निम्नलिखित किसी भी तारीख को हुआ हो उनका मूल अंक ३ होगा :- १२%D१+२%3D३ .२१%२+१%D३ ३०%D३+०३ अंगरेज ज्योतिषियों के मतानुसार १६ फ़रवरी से २१ मार्च १ देखिए The Science of Namerology : What Numbere Blean to you; by Walter B. Gibson.
अंक-विद्या (ज्योतिष) तक तथा २१ नवम्बर से २१ दिसम्बर तक-इन कालों में जिनका जन्म हुमा हो उन पर बृहस्पति का विशेष प्रभाव रहता है। इस कारण यदि किसी व्यक्ति का जन्म उपर्युक्त काल में हुआ हो और जन्म की तारीख का मूल अंक भी ३ हो तो उस पर वृहस्पति का प्रभाव विशेष मात्रा में होगा। ३ अंक वाले व्यक्ति महत्वाकांक्षी, शासन की इच्छा रखने वाले तथा अनुशासन में कठोर होते हैं। यदि फौज या सरकारी किसी विभाग के अध्यक्ष हों तो अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्य में शिथिलता नहीं होने देते । यह इतनी सख्ती से हुकमत करते हैं कि इनके बहुत से अधीनस्थ व्यक्ति इनके शत्रु हो जाते हैं। ३ अंक वाले व्यक्तियों को उचित है कि महत्वपूर्ण कार्य, किसी भी महीने की ३ री, १२ वी, २१ वीं या ३० वी तारीख को करें । यदि साथ ही १६ फरवरी से २१ मार्च तक के समय में या २१ नवम्बर से २१ दिसम्बर वाले काल में ३ मूल अंक वाली ता० को, नये काम की बुनियाद डाले तो विशेष सफलता की संभावना है। इस अंक वालों का ३ रा, १२ वाँ, २१ वां, ३० वां, ३६ वौ, ४८ वा, ५७ वा तथा ६६ वाँ वर्ष अच्छा जावेगा। ३ अक की ६ के अंक तथा : के अंक से भी सहानुभूति है। इसलिए जिन व्यक्तियों की जन्म-तारीख ३, १२, २१ या ३० हो उन्हें अपने गत जीवन के अनुभव से यह देखना चाहिए कि उनके जीवन का ६ ठा, १५ वां, २४ वां वर्ष कैसा गया तथा प्रत्येक महीने की यह तारीख कैसी जाती है। यदि विशेष अनुकूल जाती हों तो इन तारीखों को भी महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उपयोग में ला सकते है । यदि ६ ठा, १५ वा प्रादि ६ मूल अंक वाले वर्ष गत जीवन में ३६ 'मूल अंक बनाने की विधि और उनका प्रभाव शुभ गए हों तो भविष्य में भी ३३ वाँ, ४२ वां, ५१ वाँ, ६० वाँ वर्ष गुभ जावेगा। इसी प्रकार यदि उनके जीवन का है वाँ वर्ष, १८ वाँ वर्ष तथा २७ वां वर्ष अनुकूल गया हो और प्रत्येक मास की ६, १८ तथा २७ वी तारीख भी शुभ जाती हो तो इन्हें भी अपनी शुभ तारीखों में सम्मिलित कर सकते हैं । जीवन में ६ मूल अंक वाले-३६ वां, ४५ वो ५४ वौ, वर्ष भी शुभ जावेगा। ३ अंक वाले व्यक्तियों को बृहस्पतिवार, शुक्रवार तथा मंगल- वार शुभ होता है। इसलिए यदि ३, १२, २१ या ३० ता० को बृहस्पतिवार भी हो तो उनके लिए विशेष शुभ होगा । यदि ६ का मूल अंक शुभ जाता हो तो ६, १५ या २४ ता० को शुक्रवार भी पड़े तो विशेष शुभ होगा। ६, १८ या २७ ता० को मंगलवार हो तो और भी अनुकूल होगा। ३, १२, २१, ३०-इन सव अंकों का मूल अंक '३' ही है। जिनकी जन्म तारीख का मूल अंक '३' हो, उनमें परस्पर विशेष आकर्षण होता है। भिन्न-भिन्न जाति, कुल, शील, राजनीति, आर्थिक या सामाजिक परिस्थिति वश आकर्षण में भेद अवश्य होगा परन्तु उनकी मानसिक वृत्तियों में एक- मूत्रता अवश्य होगी और ३ मूल अंक वाले, ३ मूल अंक वालों के अच्छे मित्र हो सकते हैं । देखिये प्रेसीडेन्ट रूजवेल्ट की जन्म तिथि ३० जनवरी थो, चचिल की ३० नवम्बर "तथा स्तालिन की २१ दिसम्बर। तीनों की जन्म तारीख का मूल अंक ३. था। इसी कारण संभवतः लड़ाई के समय भिन्न-भिन्न राजनीति के पोषक होने पर भी, '३' मूल अंक होने के कारण, ३ राष्ट्रों के ३ कर्ण- धार द्वितीय महायुद्ध के समय अपने-अपने देश से आकर योरूप के एक रन पर गुप्त मंत्रणा के लिए एकत्र हो सके और शत्रु को । अंक-विद्या (ज्योतिष) अपनी सम्मिलित योजना के कारण परास्त कर सके । मेरा विचार है कि यदि स्तालिन, चचिल तथा प्रेसीडेन्ट रूजवेल्ट तीनों की ही जन्म तारीख का मूल अंक ३ नहीं होता तो यहतीनों एक स्थान पर सौमनस्यपूर्ण विचार-विनिमय के लिये एकत्रित नहीं होते। ३ मूल अंक वाले व्यक्यिों को चमकीला गुलाबी रंग, या . हल्का जामुनीरंग विशेष शुभ होता है। स्त्रियां इस रंग की पोशाक पहिनें तो उन्हें विशेष अनुकुल होगी। पुरुष वर्ग अपने कमरे की दीवालों पर यह रंग करावें या इस रंग का फ़रनीचर, परदे प्रादि अपने कमरे में लगायें तो शुभ होगा। अंक ४ अंगरेजी ज्योतिप के अनुसार '४का मुख्य अधिष्ठाता हर्शल नामक ग्रह है। 'हर्शल' नामक अंगरेज़ वैज्ञानिक ने सर्व प्रथम इसका पता लगाया । उसी के नाम से इसे 'हर्शल' कहा जाता है । हर्शल का मुख्य प्रभाव है सहसा प्रगति, विस्फोट, पाश्चर्यजनक कार्य, असं. भावित घटनाएं ग्रादि । इसलिए जिस व्यक्ति की जन्म-तारीसं का मूल अंक ४ होता है वह प्रायः औरों से संघर्ष करता है । जो अन्य लोगों की राय या विचारधारा होगी उसके विरुद्ध '४' अंक याला व्यक्ति अपना विचार प्रदर्शन करेगा; इस कारण उसके बहुत से विरोधी और शत्रु हो जाते हैं। किसी भी महीने में निम्नलिखित किसी भी तारीख को जिन व्यक्तियों का जन्म हुआ होगा, उनका मूल अंक ४' होगा :- ४-४ १३-१+३-४ २२-२+२०४ ३१-३+१-४ । 'मूल अंक बनाने की विधि और उनका प्रभाव अंगरेज़ ज्योतिपियों का मत है कि यदि जन्म की तारीख का मूल अंक '४' हो और यदि जातक का जन्म भी २१ जून से ३१ अगस्त तक के काल में हुआ हो तो उस पर '४' का प्रभाव विशेष मात्रा में रहेगा । यह लोग सुधारक, पुरानी प्रथा के उन्मूलक और नवीन प्रथा के संस्थापक होते हैं । सामाजिक या राजनीतिक क्षेत्र-किसी में भी पुरानी पद्धति को हटा कर नवीन पद्धति वैठाना इनके स्वभाव के अनुकूल होता है। यह लोग यासानी से ग्रोरों से मित्रता स्थापित नहीं करते । तथापि जिन व्यक्तियों की जन्म तारीख का मूल अंक, १, २, ७ या ८ हो उनसे इनका सौहार्द हो सकता है। '४' अंक वाले व्यक्ति रुपये जोड़ने पर इतना जोर नहीं देते जितना मौज उड़ाने पर । इन व्यक्तियों को उचित है कि संग्रहशीलता की ओर विशेष ध्यान दें। इन लोगों को रविवार, सोमवार तथा शनिवार शुभ होते हैं। यदि कोई नवीन या महत्वपूर्ण कार्य करना हो तो किसी भी महीने की अंग्रेजी ता० ४ या १३ या २२ या ३१ को करें तो सफलता होगी। यदि २१ जून से ३१ अगस्त के बीच में नवीन कार्य की बुनियाद डालें और साथ ही तारीख भी ४, १३, २२ या ३१ हो तो विशेष सफलता की आशा है । यदि '४' मूल अंक वाली तारीख को रविवार भी हो तो और भी शुभ होगा। यदि २, ११, २० या २६ तारोख हो और उस दिन सोमवार भी हो तो यह '२' का मूल अंक तथा सोमवार दोनों '४' अंक वालों के लिए शुभद होने के कारण और भी सत्प्रभाव दिखावेंगे। यदि '४ अंक वाले व्यक्ति सहिप्णु बनने के अभ्यासी बनें और अन्य व्यक्तियों से व्यर्थ संघर्ष कर अपने प्रतिद्वन्द्वी और, शत्रु न अंक-विद्या (ज्योतिष) बनावें तो विशेष सफल हो सकते हैं । 'धूप-छांह' का रंग, नीला तथा खाकी (भूरा) रंग इन्हें विशेष अनुकूल होगा । 'धूप-छांह' से तात्पर्य है दो प्रकार के रंगों का सम्मिश्रण-कहीं गहरा मालूम हो कहीं हल्का-ऐसा वस्त्र या कमरे, फरनीचर और परदों आदि का रंग इनके लिए शुभ है। जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष ४ अंक वाले व्यक्तियों को ४ था, १३ वाँ, २२ वां, ३१ वाँ ४० वा, ४६ वां ५८ वा और ६७ वा वर्ष महत्व पूर्ण जावेगा । साथ ही १ ला, १० वां, १६ वां, २८ वां, ३७ वां, ४६ वा ५५ वॉ तथा ६४ वा वर्ष भी महत्व पूर्ण होगा। ४ अंक वाले व्यक्ति को यदि २, ११, २०, २६ तारीखें शुभ जाती है तो, २, ११, २०, २६, ३८, ४७, ५६, ६५ और ७४ वा वर्ष भी शुभ जावेगा तथा '७' का मूल अंक अनुभव से शुभ सिद्ध हुआ हो तो ७ मूल अंक वाले जीवन के वर्ष भी शुभ जावेंगे। अंक ५ इस अंक का अधिष्ठाता 'बुध ग्रह है । जिन लोगों का जन्म नीचे लिखी किसी भी तारीख को हुआ हो उनका मूल अंक ५ होगा। टिप्पणी-इस सम्बन्ध में २२ वर्ष के विषय में यह स्मरण रखना चाहिए कि भारतीय ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के जीवन के २२ वर्ष का प्रधिष्ठात सूर्य होता है -इस कारण जिन लोगों को जन्म कुणाली में पूर्व बसवान् म राशि तपा म भाव में शुभ ग्रहों से युक्त बीक्षित है उन्हें २२ पी वर्ष अवश्य प्राया जायेगा मौर जिनकी जन्म कुशली में सूर्य अनिष्ट स्यान में स्थित है या नीच राशि पा रात्र मह में है गह २२ वर्ष पनिस्ट भायेगा। इसी प्रकार २८ वर्ष के विचार में भारतीय ज्योतिष के मनुसार भंगलको प्रधानता है।
मूल अंक बनाने का वाघ और उनका प्रभाव । न २३%3D२+३=५ अंगरेज़ ज्योतिषियों के मतानुसार २१ मई से २३ जून तक और २१ अगस्त से २३ सितम्बर तक प्रति वर्ष, बुध का प्रभाव विशेष रहता है। इस कारण यदि कोई व्यक्ति इस अन्तर में पैदा हुआ हो और उसके जन्म की तारीख का मूल अंक भी '५' हो तो उस पर बुध का प्रभाव विशेष होगा। यह लोग बहुत मिलनसार होते हैं और किसी भी व्यक्ति से शीघ्र मैत्रीभाव कर लेते हैं, इस कारण किसी भी अंगरेज़ी तारीख को कोई व्यक्ति पैदा हुआ हो इनका मित्र हो सकता है । परन्तु यदि किसी व्यक्ति की जन्म तारीख का मूल अंक ५ हो तो (अर्थात् वह ता० ५, १४ या २३ को पैदा हुआ हो), अपने समान ही-मूल अंक होने से, इनकी उससे हार्दिक घनिष्ठता हो जावेगी। बुध का प्रभाव व्यापार क्षेत्र में विशेष है। इस कारण यह लोग व्यापार-खास कर सट्टे या शीघ्र लाभ होने वाले व्यापार-को ओर विशेष आकृष्ट होते हैं । इनका स्नायुमंडल बहुत फुर्ती से कार्य करता है, इस कारण ये जल्दबाज होते हैं। इनकी प्रकृति में यह विशेषता होती है कि अधिक दिन तक किसी बात पर चिंता, शोक या पश्चात्ताप नहीं करते । किसी ने मानसिक आघात पहुँचाया- तो थोड़े काल में ही उसे भूल गए, और पूर्ववत् अपने कार्य में लग गए। 1. UNumber Please" पृष्ठ ६० भ अंक-विद्या (ज्योतिष) इन लोगों के लिए बुधवार, बृहस्पतिवार तया. शुक्रवार विशेष शुभ होते हैं। यदि यह किसी कार्य की नवीन आयोजना का प्रारंभ ५, १४ वा २३ ता० को करें तो विशेष सफलता होगी। यदि साथ ही उस दिन वार भी बुध हो तो और भी शुभ होगा । यदि २१ मई से २३ जून तक अथवा २१ अगस्त से २३ सितम्बर के बीच के काल में इनके लिए अनुकूल वार को ५,१४ या २३ ता० पड़े तो, उस दिन नवीन कार्य की बुनियाद डालने से अवश्य अधिक सफलता की आशा होगी। बुध का प्रभाव इन लोगों पर विशेष रहता है। बुध स्नायुमंडल का अधिष्ठाता है। यह लोग अपनी स्नायविक शक्ति इतनी अधिक व्यय करते हैं कि अधिक अवस्था में स्नायुमंडल की कमजोरी से (Nervous break down) मूळ आदि की आशंका होगी। इसी कारण इनके मिज़ाज़ में जल्दबाजी, चिडचिड़ापन, शीघ्र क्रोध पाने की प्रवृत्ति आदि के लक्षण पाये जाते हैं । हल्का खाकी, सफ़ेद, चमकीला उज्ज्वल रंग इनकी प्रकृति के विशेष अनुक्कल होता है । अथवा किसी भी रंग का हल्का रंग इन्हें शुभ होगा । गहरा रंग नहीं पहनना चाहिए। जीवन के महत्त्वपूर्ण वर्ष इनके जीवन का ५ वां, १४ वां, २३ वौ, ३२ वां, ४१ वर्मा, ५० वां, ५६ वां, ६८ वा तथा ७७ वां वर्ष महत्वपूर्ण होगा। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ३२ वें वर्ष मे बुध अपना पूर्ण प्रभाव दिखाता है। इस कारण जिनकी जन्म-कुण्डली में युध शुभ भाव में तथा बलवान् होगा उनको उस भावसम्बन्धी शुभ फल ४५ 'मूल अंक' बनाने की विधि और उनका प्रभाव करेगा। जिनकी जन्म-कुण्डली में अशुभ भाव में वलहीन बैठा होगा उनको ३२. वें वर्ष में उस भाव सम्बन्धी अनिष्ट फल देगा- इस अंक का अधिष्ठाता शुक्र है। जिन व्यक्तियों का जन्म निम्नलिखित किसी तारीख को हुआ हो उनका मूल अंक ६ है :- १५-१+५-६ २४%२+४-६ अंगरेज़ ज्योतिषियों के मतानुसार २० अप्रैल से २४ मई तक और २१ सितम्बर से २४ अक्तूबर तक शुक्र का विशेष प्रभाव रहता है । इस कारण यदि उपर्युक्त काल में किसी का जन्म हुआ हो और साथ ही जन्म की तारीख भी ६, १५ या २४ हो तो ऐसे व्यक्तियों पर शुक्र का प्रभाव विशेप मात्रा में होगा। ६ अंक वाले व्यक्ति बहुधा लोक-प्रिय होते हैं। उनमें आकर्षण शक्ति और मिलनसारी होती है और इस कारण उनके सम्पर्क में आनेवाले लोग उन्हें प्रेम करते हैं। इनमें सोन्दर्योपासना भी विशेप मात्रा में होती है । सुन्दर व्यक्ति, कला, चित्र, सुन्दर वस्त्र आदि इन्हें विशेष प्रिय होते हैं । यह अपनी सुचि सम्पन्नता के कारण आतिथ्य आदि में विशेष सत्कार करते है तथा ललित कलाओं को प्रोत्साहन देते हैं । परन्तु स्वभाव के हठी होते हैं और अपनी बात को अन्त तक निभाते है । किसी दूसरे की प्रतियोगिता सहन नहीं कर सकते और ईर्ष्या की मात्रा भी विशेप होती है।' Raphael's Guidc to Astrolojy
अंक-विद्या (ज्योतिष)
यह सहसा लोगों को मित्र बना लेते हैं या यह कहिये कि दूसरे
के मित्र बन जाने का स्वभाव जितना ६ मूल अंक वालों में
पाया जाता है, उतना, ५ मूल अंक को छोड़ कर, अन्य मूल अंक
वालों में नहीं होता।
मूल अंक ६ की अंक ३ तथा ६ से भी सहानुभूति है । इस
कारण ६ अंक वाले लोगों की मित्रता निम्नलिखित तारीखों में
उत्पन्न होने वाले लोगों से विशेप होती है :
२४
३, १२, २१, ३०
E, १८, २७
६ अंक वाले व्यक्तियों को मंगलवार, बृहस्पति तथा शुक्रवार
विशेष शुभ होते हैं इसलिए यदि ६, १५, २४-~-इन तारीखों में
से किसी पर शुक्रवार पड़े और उस दिन नवीन कार्य प्रारंभ या
सम्पादन किया जावे तो विशेष सफलता की प्राशा है। यदि अप्रैल
से २४ मई अथवा २१ सितम्बर से २४ अक्टूबर के बीच शुक्रवार
और ६, १५ या २४ ता० का योग प्राप्त हो सके तो विशेष कार्य
के लिए यह दिन और भी उपयुक्त होगा।
इन व्यक्तियों को हल्का नीला या प्रासमानी या गहरा नीला
रंग गुम होगा । हल्का गुलाबी रंग भी उपयुक्त है किन्तु काला या
गहरा लाल, ककरेजी मादि रंग अशुभ है।
जीयन के महत्त्यपूर्व वर्ष
यदि माप का मूल अंक ६ है तो आप के जीवन का ६ टा,
२०
४७ 'मूल मंक' बनाने की विधि और उनका प्रभाव १५.वाँ, २४ वा ३३ वां, ४२२ वां, ५१ वाँ, ६० वा तथा ६६ वां वर्ष महत्त्वपूर्ण होगा। ६ मूल अंक की ३ तथा ६ से भी सहानुभूति होने के कारण:- (क) अपने गत जीवन के ३ रे, १२ वे २१ वें ३० वें वर्ष में कैसी घटना घटित हुई यह विचार कीजिए । यदि यह वर्ष शुभ गए तो आगे के ३६ वां, ४८३ वां, ५७ वा तथा ६६ वाँ वर्ष भी शुभ जावेगा। (ख) यदि आप के गत जीवन का हवा, १८ वां, २७ वां, ३६४ वाँ वर्ष अच्छा गया है तो आगे का ४५ वाँ, ५४ वाँ तथा ६३ वाँ वर्ष भी अच्छा जावेगा। अंक ७ ७ अंक का अधिष्ठाता नेपचून ग्रह है। भारतीय ज्योतिष में 'नेपचून' का नाम या इसके सदृश गुणवाले किसी ग्रह का जिक १. स्मरण रहे कि अंक ज्योतिष के हिसाब से नहीं, किन्तु भारतीय ज्योतिष के मतानुसार यदि जन्म कुण्डली में चन्द्रमा, शुभ राशि और शुभ गह में पड़ा हो और शुभ ग्रह से यत, धीक्षित हो तो, २४ घां वर्ष बड़ा अच्छा जाता है और जिस भवन का स्थामी चन्द्रमा हो या जहां बैठा हो उस भाव का शुभ फल करेगा। प्रनिष्ट चन्द्रमा अनिष्ट फल करेगा। २. इसी प्रकार राह अपरा प्रभाव ४२ वें वर्ष में दिखाता है । ३. ४८ वा वर्ष भारतीय ज्योतिष के अनुसार केतु का होता है। प्राप की जन्म कुण्डली में केतु केन्द्र में स्थित होकर त्रिकोणेश से सम्बन्ध करता है या त्रिकोण में स्थित होकर केन्द्रेश से सम्बन्ध करता है तो विशेष भाग्योदय करेगा । यह वास्तव में ज्योतिष का विषय हैं। ४. इसी प्रकार भारतीय ज्योतिष के अनुसार ३६ यो वर्ष - ४८ अंक-विद्या (ज्योतिष) वास्तव में नहीं है । वहुत से ज्योतिपी 'नेपचून' को 'वरुण' कहते है। परन्तु यह नाम भ्रान्तिकारक है। जिन व्यक्तियों का जन्म नीचे लिखी किसी भी अंगरेजी तारीख को हो उनका मूल अंक ७ होगा। ७-७ १६-१+६-७ २५%D२+५-७ प्रायः चन्द्रमा की भांति नेपचून भी जल प्रधान ग्रह है। इस कारण चन्द्रमा के अंक '२' तथा नेपचून के अंक '७' में परस्पर सहानुभूति है। इस कारण ७ मूल अंक वाले व्यक्तियों की ७,१६, तथा २५ तारीख को उत्पन्न होने वाले व्यक्तियों के अतिरिक्त, २, ११, २० या २६ तारीख को पैदा होने वाले व्यक्तियों से विशेष मित्रता तथा सौहार्द होने की सम्भावना होगी। ७ मूल अंक वाले व्यक्ति सदैव परिवर्तन पसन्द किया करते हैं। यात्रा करना, तथा नवोन स्थान देखने का शौक उन्हें बहुत होता है। इनमें कल्पनाशक्ति विशेप होने के कारण यह लोग विशेष भावुक होते है । चित्रकला तथा कविता में यह लोग विशेष सफलता प्राप्त कर सकते है । द्रव्य के विषय में भाग्य इनका उतना सहायक नहीं जितना अन्य मूल अंक वालों का; इस कारण इन्हें आर्थिक सफलता विशेष प्राप्त नहीं होती। अधिक धन संग्रह करने पर धन नष्ट हो जाने का योग भी होता है । परन्तु ७ मूल अंक वाली स्त्रियों का विवाह धनी घरों में होता है । ७ अंक वाले व्यक्तियों के धार्मिक विचार भी कुछ असाधारण होते हैं। धार्मिक मामलों में यह रूढ़ि- वादी नहीं होते । प्रचलित परम्परा से भिन्न अपना धार्मिक मत रखते हैं । इन व्यक्तियों में अतीन्द्रिय ज्ञान (दूसरे को मन को बान ४६ 'मूल अंक' बनाने की विधि और उनका प्रभाव विना यताये हुए समझ जागा) विशेप मात्रा में होता है, तथा इन्हें स्वप्न भी अद्भुत प्रकार के पाते हैं । 'नेपचून' का जल तत्व से विशेष सम्बन्ध होने के कारण समुद्र पार की यात्रा-या विदेशों से माल मँगवाने या भेजने आदि के व्यापार में या जहाज सम्बन्धी कार्य में इन्हें विशेष सफलता हो सकती है। कुछ अंगरेज़ ज्योतिषियों के मतानुसार २१ जून से २५ जुलाई तक नेपचून का विशेष प्रभाव रहता है। इस कारण यदि कोई व्यक्ति ७, १६, या २५ तारीख को पैदा हुआ हो और उपर्युक्त काल में उसकी जन्म तारीख पड़े तो उसमें ऊपर वरिणत नेपचून के गुण विशेष मात्रा में मिलेंगे । रविवार तथा सोमवार इन्हे शुभ होते है । किसी भी महीने की निम्नलिखित तारीखे इन्हे विशेप अनुकूल होंगी :- १६, २८ २०, २६ (ग) ४, १३, २२, (घ) ७, २५ अपने अनुभव से यदि यह ज्ञात हो कि ऊपर (क) या (ग) के अन्तर्गत दी हुई तारीखें प्रतिकूल पड़ती है तो उन तारीखों को मुख्य या नवीन कार्य करने के लिये न चुने । ७ अंक वाले व्यक्तियों को हरा, काफूरी (हलका पीला), सफ़ेद आदि रंग विशेप शुभ होते है। गहरे रंग अशुभ होते है । जीवन के विशेष महत्त्वपूर्ण वर्ष ऊपर बताया जा चुका है कि ७ मूल अंक वालो को कौन- कौनसी अंगरेजी तारीखें अच्छी जावेगी। (क) वर्ग में नं० १ मूल (क) १, (ख) . २, ११, . ....
अंक-विद्या (ज्योतिष)
अंक वाली तारीखें हैं (ख) वर्ग में नं० २ मूल अंक वाली, (ग) वर्ग
में नं० ४ मूल अंक वाली तथा (घ) वर्ग में नं०७ मूल अंक वाली ।
अब अपने गत जीवन के घटनामों पर विचार कीजिये।
(क) आपके जीवन का १ ला, १० वा १६ वां वर्ष कसा
गया? यदि अच्छा-कोई शुभ घटना हुई तो आगे का २८ वां,
३७ वां, ४६ वां, ५५ वो अादि वर्ष भी अच्छे जावेंगे।
(ख) २ तथा ७ के अंक में विशेष सहानुभूति होने के कारण,
यदि आपका मूल अंक ७ है तो २, ११, २०, २६, ३८, ४७ प्रादि
वर्ष भी ग्रापके जीवन में महत्वपूर्ण होंगे।
(ग) इसी प्रकार अपने गत जीवन के ४ थे, १३ वें, २२ वें
वर्ष का सिंहावलोकन करके देखिये कि इन्होंने कैसा प्रभाव दिखाया।
भावी जीवन का ३१ वा, ४० वां, ४६ वां, ५८ वाँ, ६७ वाँ वर्ष भी
उसी प्रकार का प्रभाव दिखावेगा।
(घ) ७ वाँ, १६ वां, २५ वां, ३४ वां, ४३ वों, ५२ वां और
६१ वाँ वर्ष आपके जीवन में अवश्य असामान्य होंगे।
अंक ८
इस अंक का अधिष्ठाता शनि है। जो लोग निम्नलिखित किसी
भी अंगरेज़ी तारीख को उत्पन्न हुए है, उनका मूल अंक ८ होगा।
१७=१+७%3D८
२६-२+६%८
अंगरेज़ ज्योतिपियों के मतानुसार प्रत्येक वर्ष २१ दिसम्बर से
१६ फ़रवरी तक शनि का विशेष प्रभाव रहता है । इसलिये जो
लोग उपर्युक्त काल में पैदा हों और उनकी जन्म की तारीख का
'मूल अंक बनाने की विधि और उनका प्रभाव मूल अंक भी हो तो उन पर शनि का प्रभाव विशेष मात्रा में होगा। ८ मूल अंक वाले व्यक्ति बहुत महत्वपूर्ण कार्य करते हैं किन्तु अन्य लोग इनके साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार नहीं करते, इस कारण इनके चित्त में उदासी और अकेलापन रहता है। इन लोगों में बाहरी प्रेम प्रदर्शन की आदत नहीं होती, इस कारण बहुत से लोग इन्हें शुष्क और कठोर समझते हैं, परन्तु वास्तव में यह ऐसे नहीं होते। अपने कार्य की पूर्णता की ओर इनका विशेष ध्यान रहता है और यदि ऐसा करने में इन्हें किसी से शत्रुता भी उत्पन्न करनी पड़े तो उसकी परवाह नहीं करते । यह लोग उच्च महत्वा- कांक्षी होते है और उच्च सरकारी नौकरी या अन्य महत्वपूर्ण पद प्राप्त करने में यदि कष्ट उठाना पड़े या अन्य वलिदान करना पड़े तो उसके लिए भी उद्यत रहते हैं। ८ मूल अंक वालों को जीवन में प्रायः बहुत कठिनाइयाँ उठानी पड़ती है-इस कारण ८ को अच्छा अंक नहीं मानते है । इस अंक वाले व्यक्तियों का सबसे मुख्य दिन शनिवार होता परन्तु रविवार और सोमवार भी शुभ जाना चाहिये । इन लोगों को अपना नवीन या अन्य कोई महत्वपूर्ण कार्य ८, १७ या २६ ता० को प्रारंभ करना चाहिये। यदि साथ ही उस दिम शनिवार पड़े तो और भी अच्छा है। एक मत यह भी है कि ४, १३, २२ तथा ३१ ता० भी मूल अंक वालों को शुभ होती हैं । कोरो' के मतानुसार प्रत्येक वर्ष १. Cheiros Book of Numbers पृष्ठ ८५ ५२ , अंश-विद्या (ज्योतिष) में २१ दिसम्बर से २२ फरवरी तक शनि का विशेष प्रभाव रहता है । इस कारण यदि ८ मूल अंक वाले इन दो महीनों में किसी ऐसे दिन कार्य प्रारभ करे जिस दिन तारीख भी ८, १७ या २६ हो और वार भी शनि पड़े तो विशेष इप्टकर होगा। किन्तु एक दूसरा मत यह भी है कि ८ अंक वालो को ४ तथा ८ के अतिरिक्त नं० की संख्या (तारीख, मकान आदि) विशेष काम के लिये चुनना चाहिए। ८ मूल अंक वालों को गहरा भूरा, काला, गहरा नीला, ककरेजी आदि गहरे रंग शुभ होते है । हल्के रंग शुभ नहीं है । ८ का मूल अंक सब से पृथक् है । इस मूल अंक वाले की किन तारीखों में पैदा हुए व्यक्तियो से मित्रता होगी, यह कहना भी बहुत कठिन है । अपने जीवन की गत घटनामों से ही ८ मूल ग्रंक वाले यह सही नतीजा निकाल सकते है कि कौन सा अंक उन्हें कंसा गया । अगर उनके मित्रों में से अधिकांश का मूल अंक ४ है, और मूल अंक ८ वाले व्यक्ति के जीवन में ४ था, १३ वां, २२ वां आदि ४ मूल अंक वाले वर्ष विशेष महत्वपूर्ण गये तो भविष्य में ३१ वाँ, ४० वां, ४६ वाँ, ५८ वां, ६७ वा वर्प जीवन में महत्वपूर्ण जावेगा । यह तो निश्चय है कि ८ मूल अंक वाले व्यक्ति को ८, १७, २६, ३५, ४४, ५३, ६२, ७१, ८० प्रादि वर्ष महत्वपूर्ण जाते है। किन्तु '' के अतिरिक्त अन्य कौन से अक महत्वपूर्ण हैं, यह केवल जीवन की गत पटनायों से ही जाना जा सकता है। बहुत से लोग ८ के अंक को गनि का अंक होने के कारण अगुभ मानते है । परन्तु यास्तव में सव के लिए कोई मंक शुभ या 'मूल अंक' बनाने की विधि और उनका प्रभाव अंशुभ नहीं होता। अपनी-अपनी जन्म तारीख तथा ग्रह स्थिति वश भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न अंक शुभ या अशुभ होते हैं। अंक इस अंक का अधिष्ठाता मंगल है। निम्नलिखित किसी भी अंगरेजी तारीख को पैदा होने वाले व्यक्ति का मूल अंक ६ होगा। और २१ अक्तूबर .:- १०=१+438 २७%२+७-६ कोरो' के मतानुसार प्रतिवर्ष २१ मार्च से २७ अप्रैल तक से २७ नवम्बर तक मंगल का विशेष प्रभाव रहता है। इसलिये इस काल में जो व्यक्ति पैदा होते हैं, उनकी जन्म तारीख भी ६, १८ या २७ हो तो उन पर मंगल का प्रभाव विशेष मात्रा में होगा: : "मंगल करावे दंगल" यह प्रचलित लोकोक्ति है। इस कारण ६ मूल अंक वाले व्यक्ति साहसी तथा संघर्पशील होते है और कठि- नाइयों से जूझ कर सफलता प्राप्त करते है। परन्तु उनके स्वभाव में उग्रता तथा जल्दबाजी होती है। यदि उन्हे ६ मूल अंक वाली तारीखें, या ६ मूल अंक वाले जीवन के वर्ष (९, १८, २७ आदि) विशेष महत्त्वपूर्ण जावें तो समझिये कि उनका जीवन काफ़ी संघर्ष- मय रहेगा और उनके अावश्यकता से अधिक शत्रु रहेगे। ऐसे व्यक्ति पुलिस, फौज आदि साहस के कार्य में विशेष सफल होते हैं । इन्हे सब प्रकार की दुर्घटनागों (सवारी से टक्कर लगना 1 You & Your Birth Star by Cheiro अंग्रेसी को यह पुस्तक बहुत विस्तृत मौर पढ़ने योग्य है। TT .
मंक-विद्या (ज्योतिष) जाना, चोट लगना आदि) से विशेष सतर्क रहना चाहिये । अपने घर में तथा बाहर भी झगड़े से बचना चाहिये क्योंकि मूल अंक वाले को शीघ्र क्रोध पाजाने से वह झगड़ा करने पर आमादा हो जाता है । यह लोग असहिष्णु होते हैं और अपनी आलोचना वर्दाश्त नहीं कर सकते । इन लोगों में प्रबन्ध शक्ति अच्छी होती है । प्रेम-पात्र के लिये यह सब कुछ बलिदान कर सकते है। यदि कोई स्त्री इनसे प्रेम का अभिनय करे तो इन्हें काफी बेवकूफ़ बना सकती है-इस कारण इन्हें इस ओर से सावधान रहना चाहिये । '६' मूल अंक वाले व्यक्ति यदि अपने स्वभाव पर संयम रक्खें तो काफ़ी भाग्यशाली हो सकते हैं। इन्हें के अतिरिक्त ३ तथा ६ का अंक भी शुभ होता है । और मंगल, बृहस्पतिवार तथा शुक्रवार शुभ होते है। इसलिये सर्वप्रथम तो इन्हें किसी भी महीने की : या १८ या २७ वी तारीख महत्वपूर्ण कार्य के लिये चुननी चाहिये । यदि उस दिन मंगलवार का दिन पड़े तो और भी अच्छा है । विशेष कर यदि २१ मार्च से २७ अप्रैल तक या २१ अक्तूवर से २७ नवम्बर तक-इस बीच में ६, १८, या २७ ता. और मंगलवार का योग हो तो विशेष श्रेयस्कर है । ९ मूल अंक के अतिरिक्त, इन्हें ३ तथा ६ के अंक भी शुभ जाते हैं-इस कारण किसी भी महीने की ३, १२, २१, ३० तथा ६, १५ एवं २४ तारीखों की भी परीक्षा करनी चाहिये कि कसी जाती है । ३ या ६ के अंकों में जो (दोनो) अच्छे जावें उन्हें विशेष व्यवहार में लाना चाहिये । गुलाबी तथा गहरे लाल रंग इन्हें विशेष शुभ होंगे।
'मूल अंक' बनाने की विधि और उनका प्रभाव जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष ६ मूल अंक वाले व्यक्तियों के जीवन में वां, १८ वाँ, २७ पाँ, ३६ वॉ, ४५ वौ, ५४ वा, ६३ वां तथा ७२ वा वर्ष अवश्य महत्वपूर्ण जावेगा। इसके अतिरिक्त जिनको ३ की संख्या अनुभव से शुभ हो उन्हें ३ रा, १२ वां, २१ वां, ३० वा ३६ वा ४८ वां, ५७ वां तथा ६६ वा वर्ष भी महत्वपूर्ण होगा। तथा जिनको ६ का मंक शुभ जाता हो, उन्हें जीवन का ६ ठा, १५ वां, २४ वां, ३३ वां, ४२ वा ५१ वा ६० वा तथा ६६ वां वर्ष भी शुभ जावेगा।' १. २४, २६, ४२ वें एवं ४६ वर्ष पर प्रमाः पन्न, शानि, राह एवं केतु का विशेष प्रभाय रहता है। प्रतः दिनको मम्म पुगलियों में इन पारों मेरो यो ग्रह प पर है उन्हें वह वर्ष प्रन्या पागापा मिनको सम्म पुगलियों में यह पह भनिष्ट रातिमा भाष में है उन्हें यह पर मागे। यह भारतीय ज्योतिष का मत है।
४ था प्रकरण संयुक्त-यंक पिछले प्रकरण में जन्म तारीख से मूल-अंक निकालने की विधि बताई गई है-और इस प्रकार जन्म की अंग्रेजी तारीख के आधार पर, शुभ वर्ष, शुभ दिन, शुभ मास, शुभ तारीखे तथा किन तारीखों को उत्पन्न मनुष्यों से विशेष मैत्री या सद्भाव होगा, इसका निर्णय करना बताया गया है । अव एक कदम आगे चलिये। कुछ प्रसिद्ध अंग्रेज ज्योतिपियों का यह निष्कर्ष है कि केवल जन्म की तारीख से जो मूल अंक बनाया जाता है उससे उतना सही पता नहीं लगता जितना संयुक्त 'अंक' से । संयुक्त का अर्थ होता है संयोग करना, जोड़ना-अर्थात् जन्म की अंग्रेजी ता० अंग्रेजी महीना तथा अग्रेजी सन् तीनों की विविध संख्याओं को जोड़ कर 'सयुक्त' अंक बनाया जाता है । इसको डा० यूनाइट क्रॉस द्वारा दिये हुए उदाहरण से स्पष्ट किया जाता है: मान लीजिये कोई व्यक्ति २६ दिसम्बर सन् १८८८ को पैदा - हुआ। ___ $### Numver a91 Pease 'The Payoliology of Fate' atat पुस्तकें पढ़ने योग्य है । दोनों में अंक ज्योतिप से सम्बन्धित अनेक विषय हैं ।
१७
संपुरत अंक...
तारीख २६%२+९
=११:१+१-२
महीना १२:१+२
सन् १८८८-१+++८ =२५-२+५="
१२%१+२%३
तारीख, महीने तथा सन् की संख्यानों को जोड़ने से १२ की संख्या
आई । इसकी दोनों संख्याओं को जोड़ने से ३ की संख्या प्राई।
डा० यूनाइट क्रॉस के मतानुसार इस संयुक्त अंक का बहुत
महत्त्व है। वह तो इसको इतना अधिक महत्व देते हैं कि उन्होने इस
अंक का नाम 'भाग्य का चामत्कारिक अंक' रक्खा है। उनके
अनुसार इस अंक का जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। उन्हीं के
शब्दों में सुनिये : "एक युवती का जन्म २० मई १८६० को हुआ।
२०-५-१८६० के अंकों को जोड़ने से २++५+१++
+२५=२+५-७ भाग्यांक प्राया। वचपन में प्रायः जीवन
सम्बन्धी विशेष घटनाएं नही घटित होतों-इस कारण स्कूल में
अध्ययन पूरा करने के बाद की घटनाओं का सिंहावलोकन किया
जाता है:
4
भाग्यांक ७
स्कूल छोड़ा १९०६ (७) - जब उम्र थी १६ (७)
उसी वर्ष अपने भाई के साथ जुलाई (७) में
प्रास्ट्रेलिया गई .
उसका भाई सिडनी में, सड़क पर, दुर्घटना ग्रस्त हुआ
२८.८-१९०६ (२++++to+६) =७
.
५८
1-
मंक-विद्या (ज्योतिष)
आग लगने से २२-१२-१६०८ को सम्पत्ति नष्ट हुई
(२+२+१+२+१+k+o+८=२५=२+५-७) .....
१७-४-१६१२ को विवाह हुआ
{१+७+४+१+k+१+२-२५३२+५=७)
ता० ७-४-१९१३ को पुत्र उत्पन्न हुआ
(७+४+१++१+३=२५=२+५=3)
पति १०.८.१६१५ को फौज के हवाई बेड़े में मारा गया
(१+++१+६+१+५=२५२+५=७)
उसी वर्ष की जुलाई (७) में चाचा
के भरने पर वहुत धन प्राप्त हुआ.
जुलाई.(७) १९२४ (७) को ३४ (७)
वर्ष की उम्र में इंग्लण्ड वापिस आई..
भाग्यांक ५ का उदाहरण
स्वर्गीय डब्ल्यू. ई. ग्लेड्स्टन (जो इंगलैण्ड के प्रधान मंत्री थे) का
जन्म दिन २६-१२-१८०६
(२++१+२+१+e+o+१=३२=३+२=५) ......."५
.१८३२ में प्रथमवार पालियामेंट में, चुने. गये ।
(१++३+२=१४=१+४-५)
उनकी उम्र उस समय २३ साल की थी
(२+३=५)
प्रथमवार ५० मिनिट तक भाषण दिया
(५+५)
7
""""""
संयुक्त का २७ वोट प्राप्त हुए, (++७२३.२+३=५) मा की मृत्यु २३ ता० को हुई (२+३=५) २३ वी तारीख को चान्सलर पाव दि एक्सचेकर हुए · ......."५ २३ 'वी' तारीख को उपनिवेश-सचिव हुए फ्रीडम आ ग्लासगो १-११-१८६५ को प्राप्त हुई (१+१+१+१+++६+५=२३-२+३=५) मोडम प्राव डब्लिन ७-११-१८७७ को प्राप्त हुई (७+१+१+१+६+७+७)-३२ xxx . ५ . १८६८ में इंग्लैण्ड के प्रधान मन्त्री हुए (१+६+६+६-२३.२+३=५) उनकी प्रायु उस समय ५६ थी (५+६=१४-१+४-५) २-७-१८५६ को मिडलोथियन-तथा लीथ को वापिस पाये (२+७+१+++६-३२-३+२%५). २०-७-१८८६ को.त्याग पत्र दिया (२+++१+++६-३२-३+२%५); १८६८ को मृत्यु हुई. (१+६+५+१+cts+८=४१-४+१=५) २८ - ५ - १८१८ को दफनाये गये (२++५+१+-१४-१-५). . - ......
६०
अंक-विद्या (ज्योतिष
यूरोप के मध्ययुगीय इतिहास में भी इस प्रकार के उदाहरण
उपलब्ध होते है। जिन्हें अभिरुवि हो वे कृपया निम्नलिखित पुस्तको
का अवलोकन करें:
प्रोफेसर केल्लैण्ड ने अपनी पुस्तक में सर एडवर्ड क्लार्क के
जीवन की घटनाओं से एक अन्य उदाहरण संकलित किया है ।
इसमें बारंबार 'x' तथा '८' की संख्याएं आती हैं !
भाग्यांक ४
जन्म की तारीख १५-२-१८४१
(१+५+२+१+८+४+१=२२-२+२%४)
१३ वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ा (१+३=४)
.........४
अपने पिता के पास ४ वर्ष काम किया :: , . ,
स्वयं अपना काम स्वतन्त्र रूप से सन् १८५८ में प्रारम्भ
किया (१+८+५+८=२२-२+२=४). : 15
१७ वर्ष की उम्र में (१+७=८)
प्रारम्भिक वेतन हुमा ८० पौंड (+3८
नव १७-११-१८६४ को वह वैरिस्टर हुए तो उनकी
चिरकांक्षित इच्छा की पूर्ति हुई (१+७+१+१+
१++६+४-२६%२+६=११८१+१)=२
E
--
1. "Research in tho Efficiency of Daies and Names
la tho Andals of Nations " 97 Curious Blýtbs of Bliddle Ages.
2. Harmony in Norber, Name and Colour.
संयुक्त मक
,
विवाह २६-१२-१८६६ को हुआ
(२+8+१+२+१++६+६=३५
:
"
+4
जव उनको अवस्था २६ साल की थी।
३१ वर्ष की अवस्था में वे मेसन हुए
केलिडोनिया लौज नं० १३४ में प्रविष्ट हुए
(१+३+४=८) -
साउथवर्क क्षेत्र से पालिमेण्ट का 'चुनाव लड़ने के लिये
टिकट मिला १३-२-१८७६
(१+३+२+१++७+९-३१=३+१% ४)
सन् १५ में चुने गये
..........
(१+++0= १७-१+७२८).
पीलियामेण्ट में शपथ ग्रहण की.'
ता० १६-२-१८८० =(१+६+२+१+++.
=२६%२+६८)
ता० २-११-१९०८ को प्रिबोकौंसिल के मेम्बर बनाये गए
(२+१+१+१+t++५:२२३२+२८४)
'२
इनके दो पत्नियां थीं
उपयुक्त उदाहरणों से स्पष्ट होगा कि सिर एडवर्ड क्लार्क के
जीवन में उनका भाईयांक (संयुक्त अंक) वारंवार अपना प्रभाव
दिखाता था किन्तु '२' तथा '८' की संख्या भी उनके जीवन में
सम्बद्ध थी। डॉ. यूनाइट क्रौस के मतानुसार अंक ४ को २ तथा
इनके दो बच्चे थे,, -
-
अंक-विद्या (ज्योतिष)
८ से सहानुभूति है - Richard Wagner नामक एक अन्य व्यक्ति
के जीवन से सम्बन्धित '१३' एवं '४. के:-अंक.की -प्रधानता
निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होगी:--
नाम के अंग्रेजी अक्षरों की संख्या -१३,"
१३%१+३-४
सन् १८१३ में पैदा हुमा
(१++१+३-१३-१+३=४)
१३ वर्ष की अवस्था में स्कूल छोड़ा =१३:- ... ....... -४
१३ दुःखान्त संगीतमय नाटक लिखे 3१३ :
१३ स्त्रियों से अपने जीवन में प्रेम किया =१३
इसका टाइटिल Kapellmeister था जिसमें १३ अक्षर हैं- १३३४
१३ फ़रवरी १८८३ को मृत्यु हुई.
(१+३+२+१++++३)-१३+१३२६...
उसकी पत्नी की १६३० में मृत्यु हुई
(१++३+०-१३)
उसके श्वसुर का नाम था
Franz Von Liszt (१३ अक्षर)
उसके दो नाटक १३ को प्रारम्भ हुए
और १३ को ही समाप्त हुए
तीन नाटकों का प्रथम मभिनय
१३ तारीख को प्रारंभ हुमान
%D१३.:-:
उसके ग्रन्थों का सम्मिलित संस्करण (१९१२) -
में प्रथम वार प्रकाशित हुभा
': (१+१+१+२%१३)
}
संयुक्त मंक : -we- - . ग्रन्थों का सम्मिलित संस्करण. ::: प्रकाशित होना १६३० में समाप्त हुआ माता का नाम Johanna Wagner. .' था, इसमें १३ अक्षर हैं) =१३ डा० यूनाइट क्रोस के मतानुसार निम्नलिखित भाग्यांकों (संयुक्त-अंकों) की सहानुभूति उनके सामने लिखे अंकों से है :- भाग्यांक सहानुभूतिवाले अंक ३, ५ तथा ७ ४तथा १, ५, पौर ७, ६ तथा ६ तथा ८ १, ३ तथा ७ (और १०) ६ ३ तथा ६ १, ३, तथा ५ -२-तथा-४ ३ तथा ६ डॉ. 10 यूनाइट क्रौस के मतानुसार भिन्न-भिन्न भाग्यांक (या संयुक्त-अंक) वाले व्यक्तियों को निम्नलिखित ईसवी वर्ष महत्वपूर्ण गए होंगे या जावेंगे :- a ७ POST ६४ अंक-विद्या (ज्योतिष) भाग्य वर्ष भाग्यांक १ को भाग्यांक २ को भाग्यांक ३ को -१६०६ *१६१८ १६२७ १६३६ १६४५ १६५४ १६६३ १६७२ १९८१ १६१० १६१६ १६२८ १६३७ १६४६ १९५५ १६६४ १६७३ १६८२ :..; १६११ ८१९२० । १६२६ १६३८ १९४७ १९५६ १६६५ १६७४ १९८३ भाग्य वर्ष भाग्यांक ४ को भाग्यांक ५ को भाग्यांक ६ को १६१२ १६२१ १६१३ १६२२. १६१४ १६२३ १९३२ १६४१ . १६३६ १९४८ १९५७ १६४० १६४६ १९५८ १६६७ १६५६ १९६८ १९७७ १९८४ १९८५ संयुक्त मंक r भाग्य वर्ष भाग्यांक भाग्यांक.क.को भाग्यांक को १९०६ १९०७ १६०८ १६१५ १९१६ १६१७ १६२४ १६२५ १६२६ १६३३ १९३४ १६३५ १६४२ १६४३ १६४४ १९५२ १९५२ १६६०- ..१६६२ .. १६६६ १६७० .१६७१ १६७८. १६७६ १९८० यह स्मरण रखना चाहिए इस परिच्छेद में जिस भाग्यांक के अनुसार शुभाशुभ के लिए उपर्युक्त धर्प महत्वपूर्ण बताए हैं वह "भाग्यांक"-जन्म तारीख, महीना तथा सन् की संख्या के सब मंकों को जोड़ कर निकाला जाता है। उदाहरण के लिये महात्मा गांधी का जन्म २-१०-१८६६ को हुप्रा था। जन्म तारीख जन्म मास अक्तूबर 3१०%१+0%१. (१++६+६=२४=२+४=६) =६. योग इस पद्धति से महात्मा गांधी जी का संयुक्तांक : प्राया । इसी ' प्रकार अन्य व्यकियों को जन्म तारीख, जन्म मास तथा ईसवी सन् की संख्या जोड़कर संयुकांक बनाया जा सकता है। " Tv जन्म वर्ष १८६६ " E H- मा० यूमाट कास क मतानुसार भिन्न भिन्न भाग्याकयाला को शुभ दिन, शुभ मास तथा शुभ तारोखों का कोष्ठ चित्र अंक-विद्या (ज्योतिष) . | भाग्यांक शुभ वार शुभ तारोल रविवार, मृहस्पतिवार १ सोमवार, बुधवार २ शुभ मास जनवरो, मात्र मई, १०, १६, २८ जुलाई, और परतूबर. फरवरी, अप्रेल, अगस्त,.! २, ४, ८, ११, १६, २०, २२, २६, २६,३१ मौर नवम्बर मार्च, मई, जुलाई, जून, ३, ६, ६, १२, १५, १८, २१, २४,१७, २० सितम्बर और दिसम्बर अप्रेल, फरवरी और २, ४, ८, १३, १६, २०, २२, २६, ३१ मंगलवार, शुक्रवार ४ बुधवार, सोमवार अगस्त -- बृहस्पतिवार, शनिवार मई, जनवरी, मार्च, जुलाई ५, १०, १४, १६, २३, २५, २८ ५ शुक्रवार, मंगलवार जून, सितम्बर ६,६,१५, १८, २४ शनिवार, बृहस्पतिवार जुलाई, जनवरी, मार्च |७, १४, १६, २५, २८ मोर मई अगस्त, फरवरी, अप्रैल, ४, ८, १६, १७, २६ सोमवार, बुधवार - -- मंगलवार, शुक्रवार सितम्बर, मार्च, जनः E ६,१५, १८, २४, २७ - ६७ । संयुक्त प्रक पृष्ठ ६६ पर कोप्ठचित्र अंगरेजी' की पुस्तक से, दिया गया है। : जो तारीखें रेखांकित हैं उन्हें विशेषतया अनुकूल समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त किस भाग्यांक की किस अंक से सहानुभूति है यह पहिले वताया जा चुका है (देखिये पृष्ठ ६३), उसके अनुसार भी गत जीवन की घटनाओं से अनुमान लगाना चाहिये कि कौन सा अंक विरोप शुभ जाता है। श्री हेलिन हिचकोक ने भाग्यांक से शुभाशुभ वर्ष, मास तथा दिन निकालने का, तथा कौन सा दिन किस कार्य के लिये विशेष उपयुक्त होगा इसका विशद वर्णन किया है । इस विषय में विशेष अभिरुचि रखने वाले उनकी पुस्तक के पृष्ठ .६६ से १२१:पढ़ें तो ज्ञानवृद्धि होगी। -किन्तु इन पंक्तियों के लेखक के मतानुसार अंक ज्योतिप-विद्या के मूल सिद्धान्तों को इतनी सरल रीति से कार्य में लाना चाहिये कि हम लोग उसका दैनिक व्यवहार में उपर्योग लाकर लाभ उठा सके । इसलिये हमारे मतानुसार सर्व प्रथम जन्म की तारीख के अनुसार तृतीय प्रकरण में जो नियम बताये गये हैं, उनका अनुशीलन और व्यवहार विशेष उपयोगी होगा।' अंक विद्या मोर यंत्र गह बात नहीं है कि केवल पाश्चात्य ज्योतिपियों ने ही अंकों को शुभ या अशुभ माना है । कुछ मंकों को यां अंकों के समूहों को 2. "Psychology of Fata" Published by Horbort Jonkins Ltd. 3 York Stroot, St. Jomes. Londons. iv.i 2. "Your Number, Please" by Helyn nitchcock 'A.'R. Published by W. 11. Allon & Co: Ltd.' 43 Esso Street Strand " London W.C. 2, ६. अंक-विद्या (ज्योतिष) अनादि काल से शुभ मानने की परम्परा भारतवर्ष में भी चली आई है। 'सेफ़ेरियल नामक अंगरेज ज्योतिपी' ने लिखा है कि वर्गों को कोष्ठों में निम्नलिखित प्रकार से लिखना 'पूर्णता' का प्रतीक है देखिये (क) तथा (ख):- (ख) (ग) । ४ . २ لله १ ६ १ 1- ३ ५ ५ 2. १ ४ ४ ६ ज ६ २ उनके विचार से यह 'पूर्णता अथवा ईश्वर' का. प्रतीक है। परन्तु हम भारतीय इसे–देखिये (ग)-इस प्रकार लिखने के सदैव से अभ्यासी रहे हैं और प्रायः इस प्रकार का अंक-कोष्ठ चित्र दुकानों के मुख्यद्वार के पास भी ऋद्धि, सिद्धि तथा धन की पूर्णता के लिये वना दिया जाता है। यद्यपि अंगरेज ज्योतिपो इसे 'शनि' से सम्बन्धित मानते हैं किन्तु भारतीय ज्योतिप के अनुसार यह १५ का यंत्र (इसकी संख्याओं को किसी अोर से जोड़िये योग १५ ही होगा)-ग्रहराज 'सूर्य का प्रतीक है। भारतीय ज्योतिप तया मंत्रशास्त्र में इन 'यंत्रों का उपयोग अनेक काम्य तथा आपतिः निवारक प्रयोगों में किया जाता है और विधि पूर्वक केसर आदि सुगंधित द्रव्यों से भोज पत्र पर लिखकर सोने, चांदी या तावे के तावीज में वन्द कर शरीर पर धारण करने से शुभ प्रभाव दिखाता १. The Kabala of Numbers पृ०६३-६५ m 'भूत पंक, बनाने की विधि और उनका प्रभाव है। इसके विस्तृत विवरण के लिये 'यंत्र चिन्तामणि' तथा अन्य मंत्रशास्त्र के ग्रन्थ देखने चाहियें। पीछे (क) या (ख) में जो यंत्र दिया गया है, उससे भिन्न भारतीय शास्त्रानुसार १५ का यंत्र होता है। नीचे नवों ग्रहों के यंत्र दिये जाते हैं :--- सूर्य का यन्त्र चन्द्र का यन्त्र मंगल का यन्त्र . १ २ ८ ३ ५ ३ ३ ६ ४ ६ ७. ५ । ६ ३ ५ शास्त्रकार इन्हें बनाने की पद्धति-किस अंक को कहीं लिखना यह बताकर लिखते हैं "रसेन्दुनागा विलिख्य धार्य गद नाशनाय वदन्ति गर्गादि महामुनीन्द्राः" अर्थात् इसको धारण करने से रोगादि उत्पात शांत होते है, ऐसा गर्ग आदि महा मुनीन्द्रोंका कथन है । 'नगद्विनन्दा 'चन्द्रकृतारिष्ट विनाशनाय धायं मनुप्यः शशियंत्रमीरितम्' अर्थात् चन्द्रमा जनित पीड़ा को दूर करने के लिये इस चन्द्रमा के यंत्र को धारण करना चाहिये । 'गजाग्निदिश्याथ.:..."भौमस्य यंत्र क्रमतो विधार्यमनिष्टनाशं प्रवदन्ति गर्गाः । अर्थात् जब गोचर से या अनिष्ट राशि या स्थान में होने से मंगल अपनी दशा, अन्तर्दशा में पीड़ा करे या सन्तानकष्ट,रक्त विकार आदि मंगल जनित दुष्प्रभाव हो तो इस यंत्र के धारण से लाभ होता है। १. देखिये यह वजरंजन पृ०६६ । -- १ - ७० अंक-विद्या (ज्योतिष) शुक्र का यंत्र "बुध की यंत्र बृहस्पति का यंत्र १० ५ १२ ६ १० ६ है १२ १० १२ ७ ६ ८ ७ 'नवाब्धि रुद्रा ...विलिख्य धार्य गदनाशहेतवे वदन्ति यंत्रं. शशिजस्य धीराः।' यदि बुध जनित-रोग पित्त प्रकोप, चर्मरोग, व्यापार में हानि, मित्रों से विरोध अदि दुष्ट फल घटित हो रहे हों। 'और उनका कारण बुध ग्रह का अनिष्ट प्रभाव हो तो इस यंत्र को धारण करे। "दिग्वाणसूर्या शिव विलिस्य धार्य गुरुयंत्रमीरितं रुजा विनाशाय वदन्ति तद्बुधाः" । अर्थात् गुरु गोचरवंश या महा- दशावंश रोग आदि कप्ट कर रहे हों तो इस यंत्र को धारण करने से शांति होती है । 'गुरु' बृहस्पति को कहते है । 'रुद्रोग विश्वा" भृगोः कृतारि विनाशनाय धार्य हि यंत्र मुनिना प्रकीर्तिता अर्थात् शुक जनित पीड़ा (विशेषकर वीर्य सम्बन्धी रोग 'लक्ष्मी को हानि, स्त्री सुख होनि) को दूर करने के लिये यह यंत्र बहुत उपकारी है। । गनिका यंत्र राहु का यंत्र केतु का यंत्र -- . . . १२ १४.१।१३ ८ १४ IF १३ १४ १२ १० १५ १० 8 १० संयुक्त अंक "अर्काद्रि....."विलिख्य भू|परिचार्य विद्वत् शनेः कृतारिष्ट- निवारणाय" । भोज पत्र पर लिखकर इसे धारण करना चाहिये । शनि के महाप्रकोप से कौन ग्रस्त नहीं होता ? 'साढ़ेसाती शनि' किसे परेशान नहीं करती ? अनिष्ट शनि की दशा,"अन्तर्दशा तो मानहानि, द्रव्यहानि, शारीरिक क्लेश, मानसिक त्रास, अनेक व्याधि उत्पन्न करती है। उसको शांत करने के लिये अंक-विद्या, यंत्र विद्या का माश्रय लेना उचित है । राहु के लिये लिखते हैं 'विश्वाष्ट तिथ्या, विलिस्य यंत्रं सततं विधार्य राहोः कृतारिष्ट निवार- गाय ।". राहुंजनित पीड़ा को दूर करने के लिये इसे सदैव धारण करना चाहिये । 'मनुखेचर भूपा दुःखनाशकरः” यह केतु का यंत्र बनाने और धारण करने का विधान बताया है। उधर अंगरेज ज्योतिषी जिस यंत्र को बहुत थोड़े से शब्दों में बताते वहीं बात हमारे ग्रार्प ग्रन्थों में सुस्पष्ट और विस्तृत रूप से मिलती है। हमारे प्राचीन ऋपियों ने कसे यह ज्ञात किया कि इन अंकों को इस क्रम से लिखने से विशेप शक्ति या प्रभाव उत्पन्न होता है इसका रहस्य हमारी समझ से बाहर है । उनको यौगिक शक्ति और ऋतंभरा प्रज्ञा से इस प्रकार का ज्ञान संभव था ! हम तो केवल उनके चरण चिह्नों का अनुसरण कर सकते हैं और अंक-विद्या से 11 लाभ उठा सकते है।
५वां प्रकरण 'नाम' और अंक विद्या का सम्बन्ध सभी देशों में मनुष्य के नाम का विशेष महत्व माना गया है । कुछ देशों में सम्राट् या राजा के नाम के लिये कुछ नाम विशेष निर्धारित कर दिये जाते है और वारंवार उन्हीं नामों की पुनरावृत्ति होती रहती है । यथा जार्ज प्रथम, जार्ज द्वितीय आदि। जयपुर राज्य में भी यही क्रम था; माधव सिंह जी प्रथम, माधव सिंह.जी द्वितीय आदि । दक्षिणी भारत में कुछ कुटुम्बों में प्रथा है. कि जो नाम बाबा का होता है वही ज्येष्ठ पौत्र का । भारत के कुछ भागों में यह प्रथा प्रचलित है कि विवाह के उपरान्त कन्या के वैयक्तिक नाम का भी परिवर्तन कर दिया जाता है। पत्नी का कौटुम्बिक नाम (सरनेम) तो पाश्चात्य देशों तथा पूर्वी देशों में बदला हो जाता है किन्तु जैसा ऊपर बताया गया है कुछ प्रान्तों में कन्या का पितृ गृह का नाम सर्वथा परि- वर्तित कर उसका नवीन नाम रख दिया जाता है। इस नवीन नाम की योजना का अन्तर्गत भाव यह होता है कि नवीन नाम, पति के नाम के अनुकूल हो। इस कारण यदि पति का नाम हुआ हप सिंह तो पत्नी का नाम करण किया जायेगा हप्रिया, हर्षलता या अन्य इसी प्रकार का नाम । भारतीय पद्धति के अनुमार नाम के प्रथम अक्षर का विशेष महत्व है। इससे राशि तया नक्षत्र का निर्णय किया जाता है नाम का प्रथम मक्षर ही "वर्ण स्वर" मादि का आधार है। इस 'नाम' और अंक-विद्या का सम्बन्ध कारण पली के नवीन नाम का प्रथम शब्द भी यदि वही हो जो पति के नाम में प्रथम शब्द है तो दोनों में प्रेम रहेगा । पली के नवीन-नाम-करण का यही सिद्धान्त है । यहूदियों में प्रथा है कि जब मनुष्य मरने लगता है तो उसके सम्बन्धी दौड़कर मन्दिर में जाते हैं और रोगी के नाम का परिवर्तन कर दिया जाता है--इस आशा से कि शायद नाम बदलने से- प्राचीन नामजनित दुष्प्रभावों का अन्त हो जावे और बीमार बच - जावे। संभवतः सन्यास लेते समय जो नाम बदलने की प्रथा है उसमें भी यह सिद्धान्त निहित है कि गार्हस्थ्य जीवन के नाम से संश्लिष्ट सब संस्कार और वासनाएँ सदा के लिये छूट जावें। भारत में दो नामों की प्रधानता है । एक राशि नाम की; दूसरे प्रचलित नाम की। राशि का नाम जन्म नक्षत्र के चरण के अनुसार रक्खा जाता है और प्रचलित नाम वह है जो लोकव्यवहार में प्रचलित रहता है। इस पुस्तक में वारंवार जहाँ 'नाम' की चर्चा आती है वहां कौन सा नाम समझा गावे यह शंका होना स्वभाविक है । इस सम्बन्ध में शास्त्रीय मत निम्नलिखित है। विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रादौ ग्रहगोचरे जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत् । देशे ग्रामे गृहे युद्ध सेवायां व्यवहारके नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशि न चिन्तयेत् । अर्थात् सर्व मंगलकार्यों में, यात्रा में, ग्रहगोचर दिवार में जन्म १. ज्योतिनिबन्ध (पानन्दाश्रम पूना से प्रकाशित) ७४ ग्रंक-विद्या (ज्योतिष) राशि की प्रधानता है 'नाम' की राशि का विचार न करे । देश, ग्राम, गृह, युद्ध, सेवा (नौकरी), व्यवहार (मुकदमा या व्यापार) में प्रचलित नाम से ही राशि का विचार करे-जन्म 'राशि' का विचार न करे । “राजमार्तण्ड" के अनुसार-जिसकी जन्म राशि मालूम न हो उसके सब विचार में प्रचलित नाम से ही राशि का विचार करे । "दीपिका" का भी यही मत है। "जन्म न ज्ञायते येषां तेषां नाम्नो गवेष्यते।" सिद्धान्त यह है कि जहाँ जन्मनाम', यह विशेष निर्देश किया हो वहाँ जन्म कुंडली का 'नाम' समझना चाहिये अन्यथा प्रसिद्ध नाम ग्रहण करना चाहिये । किसी मनुष्य के कई प्रसिद्ध नाम हों तो किसका ग्रहण करना-इसके सम्बन्ध में शास्त्रीय व्यवस्था यह है कि सोता हुआ मनुष्य जिस नाम से जग जावे वह प्रधान है । प्रसुप्तो येन जागति,, येनागच्छति शब्दितः । तन्नाम्नश्चादिमो वर्णों ग्राह्यस्तस्माद् भ निर्णयः ॥' राशि, वर्ण स्वर आदि में नाम का प्रथम भक्षर ही लिया जाता है (जैसे किसी का नाम है "राम कृष्ण" तो 'नाम का प्रथम प्रधार 'रा' होने से उसकी राशि तुला, वर्ण स्वर 'ए', आदि) किन्तु प्रय नीचे पाश्चात्य अंक-विद्या के जिस सिद्धान्त से परिचय कराया जाता है उसके अनुसार सम्पूर्ण नाम को संख्या बना कर शुभाशुभ . १. देखिए नरपति जयचर्या प्रध्याप २ (१० १५) २. देखिये Your Number, Pleaso by Helyn Hitchcotk A.B. पृ. ११ तथा Numerology for Every body by sfontrose t०४ 'नाम' मौर भंक-विद्या का सम्बन्ध विचार किया जाता है । अंगरेजी वर्णमाला में २६ वर्ण हैं । नीचे प्रत्येक वर्ण तथा उसका "अंक" (संख्या में मान) दिया जाता है। फीरो का मत १ J D १ % 3D K - २ %3D ४ ५ द ५ %3D % % 3D ५ १ ७ A S - ३ B २ T = C = M= V E N = ५ W= F X = G Y H z I RE -कुछ अंग्रेजी, अंक-विद्या के विद्वानों को ऊपर जो कोरो' का मत दिया गया है वह मान्य नहीं है। उनके मत उपर्युक्त मत से भिन्न हैं । जिन्हें इस विषय में विशेष गवेपणा की इच्छा हो वे कृपया टिप्पणी में दिये गये मतों का अवलोकन करें। उदाहरण मान लीजिये हमें 'जवाहर लाल नेहरू' इस नाम की पाश्चात्य अंक-विद्या के अनुसार संयुक्त संख्या बनानी है, तो इस प्रकार बनाइये: १ " +7 १ 1. Choiro's Book of Numbers t० १०८ २. देखिये "Your Number Please" पृ० १६, The Kabals of Numbers पृ. ७७ तथा ८३, .
मंग-विया (ज्योतिष)
N=
E=4
H-५
R-२
U=६
A-१
W=६
A =१
H=X
A=१
R=२
L=3
A=१
२३
२४
"जवाहरलाल" इस नाम का अंक हुआ ' "२४" तथा "नेहरू"
इस नाम का : २३" । दोनों मिल कर "४७" हुए। इस प्रकार हम
प्रत्येक नाम को संख्या (संयुक्तांक) में परिवर्तित कर सकते हैं । इसके
अन्य उदाहरण मागे दिये जावेंगे। किन्तु उदाहरण देने के पहिले
यह बताना आवश्यक है कि 'नाम' को 'संख्या' (संयुक्तांक) में 'परि-
वर्तन' करने की उपयोगिता क्या है । अर्थात् इस पद्धति से क्या-क्या
विचार किया जाता है।
प्रयोजन:
नाम की 'संख्या' निम्नलिखित विचारों में भावश्यक होती है :
(१) नाम शुभ है या नहीं ? क्या 'नाम' बदलने की
आवश्यकता है?
(२) नाम जन्म तारीख के अनुकूल है या नहीं ?
'नाम'.और अंक-विद्या का सम्बन्ध (३) नाम के संयुक्तांक के अनुसार, कौन सी तारीख महत्त्वपूर्ण कार्य के लिये उपयुक्त होगी? इन तीनों विषयों पर आगे कमशः विचार किया जावेगा। किन्तु उसके पूर्व यह बताना आवश्यक है कि पाश्चात्य अंक-विद्या- विशारदों ने किस संख्या' का क्या लक्षण और प्रभाव माना है। १ से लेकर 8 तक के अंकों के लक्षण और प्रभाव पहिले बताये जा तुके हैं । अब, आगे १० से ७० तक की प्रत्येक संख्या के लक्षण और प्रभाव बताये जाते हैं । इन 'अंकों से (१० से सेकर ७० तक) 'प्रश्न विचार भी किया जाता है । इस विषय का विवेचन आगे प्रश्न खंड में किया जावेगा। १०' से ७० तक संख्या का गुण तथा प्रभाव : पाश्चात्य अंक विद्यावेतामों ने '१०' से लेकर '७०' तक संयुक्त नामाक्षरों के 'अंक' का फल निर्देश किया है। वह संक्षेप में निम्न लिखित है: १०. यह प्रतिष्ठा तथा प्रात्म विश्वास का अंक है। इस अंक वाला व्यक्ति, अपनी इच्छानुसार-गई या भलाई के लिये सुविख्यात होगा। इस व्यक्ति के इरादे पूरे होते है । - ११. यह अंक शुभ नहीं। ऐसे व्यक्ति को अन्य लोगों से भय, दगाबाजी मादि की प्राशंका होती है। प्रसंभावित स्थानों से भी अचानक धोखा होता है। १२. यह अंक मानसिक चिन्ता तथा कष्ट का द्योतक है और मन्य लोग अपनी कार्य साधना के लिये-अपनी स्वार्थ की वेदी पर १२ मंक वाले व्यक्ति के हितों की बलि चढ़ाते हैं। १३, यह मंक इस बात का घोतक है कि इरादों और कार्य - । ៤ अंक-विद्या (ज्योतिष) क्रमों में सदैव परिवर्तन होता रहेगा। स्थान-परिवर्तन भी द्योतित होता है। बहुत से लोगों की यह धारणा है कि यह अशुभ अंक है, किन्तु वास्तव में यह अशुभ है नही। १३ ऐसी शक्ति का प्रतीक है-जो उचित रूप से प्रयुक्त न होने पर ध्वंसकारी होती है । १४. इस अंक से गति, तथा जन एवं वस्तु की समुदायात्मक प्रवृत्ति प्रकट होती है। आंधी, पानी, तूफ़ान, अग्नि, भूकम्प आदि भय की आशंका होती है । कार्य-परिवर्तन, धन अथवा सट्टे के लिये यह अंक शुभ है। किन्तु जातक के अतिरिक्त अन्य मनुष्यों की गलती से कुछ भय की आशंका रहती है । १५. यह मन्त्र-शास्त्र किंवा रहस्य से सम्बन्धित अंक है । यदि किसी के नाम के एक शब्द (जिससे वह पुकारा जाता है) अंकों का योग '१५' आवे तो भाग्य का द्योतक है। किन्तु यदि ४ अथवा ८ का अंक-नाम के अन्य शब्दों का योग हो तो यह शुभ नहीं होता। दूसरों से धन की प्राप्ति के लिये यह अंक शुभ है। इस अंक वाले व्यक्ति संगीत तथा कला के प्रेमी और अच्छे वक्ता होते हैं । १६. इस अंक से यह प्रकट होता है कि मनुष्य बहुत ऊंचा उठेगा किन्तु बाद में उसका अधःपतन होगा। प्रतः इस मंक वालों को दुर्घटना से बचना चाहिये । यदि किसी के नाम के संयुक्ताक्षरों का अंक १६ हो तो समझिये कि उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के चूर्ण होने का भय है। १७. यह अंक प्रात्मिक शक्ति से विशेष सम्बन्ध रसता है। ऐसा व्यक्ति कठिनाइयों तथा विपत्तियों को पार कर, नाम कमाने में समर्थ होता है और उनके जीवन के बाद भी उसको कीर्ति रहती है । यह शुभ अंक है।
नाम और ग्रंकविद्या का सम्बन्ध ७६ । १८. इस अंक से कलह और शत्रुता प्रकट होती है। अर्थात् जिसके नाम के संयुक्ताक्षरों का योगांक १८ हो वह कोटुम्बिक कलह तथा अन्य जनों की शत्रुता से पीड़ित रहता है। प्रायः ऐसे व्यक्ति शत्रुता किंवा ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों द्वारा भी धन संग्रह करने में प्रवृत्त होते है । यदि किसी तारीख का संयुक्तांक १८ हो तो उसे भी सहसा किसी शुभ कार्य के लिये नही चुनना चाहिये; यथा १ जनवरी १६६०=१+१+१+६+६+०%3D१८ १६. यह शुभ अंक है। यह सूर्य का प्रतीक है। इससे हर्ष, सफलता, प्रतिष्ठा तथा मानवृद्धि प्रकट होती है । २० इस अंक को भी शुभ माना गया है। "जागृति" तथा 'न्याय' का प्रतीक यह अंक है । इससे नवीन योजना व नई महत्वा- काक्षाऐं प्रकट होती है। किन्तु निश्चय ही सांसारिक सफलता होगी, यह इस अंक से नहीं कहा जा सकता । यदि भविष्य विषयक में यह अंक प्रयुक्त किया जावे तो इससे विलम्ब तथा कार्य में कठिनाइयां या अड्चने प्रकट होती है । २१. इससे उन्नति, प्रतिष्ठा, पद वृद्धि आदि प्रकट होती है । प्रश्न में यदि यह अंक प्रयुक्त हो तो कार्य की सफलता प्रकट होती है २२. यह इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति तो अच्छा है किन्तु वह अपने स्वप्न की दुनिया में रहता है-मिथ्या प्राशा मे अपना समय व्यतीत करता रहता है और जब विपत्ति बिल्कुल सिर पर आ जाती है तब चौकन्ना होता है। इससे यह भी प्रकट होता है जो धारणा बना रक्खी है वह मिथ्या है। प्रश्न मे यह अंक हो तो भी यही अर्थ लगाना चाहिए। प्रश्न ९० ग्रंक-विद्या (ज्योतिष) २३. उच्चाधिकारियों की कृपा किंवा अपने से श्रेष्ठ जनों की सहायता द्वारा सफलता एवं उच्चपद प्राप्ति होती है। प्रश्न में भी यही समझना। २४. यह भी शुभ अंक है । अपने कार्य में उच्च पदाधिकारियों के संयोग तथा उनकी सहायता व्यक्त होती है। किसी पुरुष को, किसी स्त्री के प्रेम तथा सहायता से (और स्त्री को, किसी पुरुष-- पति, पिता, भाई या अन्य व्यक्ति के स्नेह और सहायता से) लाभ होता है । प्रश्न में भी फल शुभ है । २५. इससे प्रकट होता है कि अनुभव द्वारा शक्ति सम्पादित होगी और दूसरों की गति-विधि अवलोकन करने से लाभ होगा। एक प्रकार से इसे सर्वथा शुभ नहीं कह सकते क्योंकि प्रारम्भिक जीवन में बहुत संघर्ष और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तब कहीं जाकर सफलता प्राप्त होती है । भविष्य विषयक प्रश्न में इसका परिणाम शुभ है। २६. दूसरों के संयोग किंवा सहयोग से भारी माशंका तथा विपत्ति प्रकट होती हैं। दूसरों की सलाह, संयोग (साझेदारी, विवाह) तथा सट्टे प्रादि से घाटा या भारी नुकसान होने का मन्देशा जाहिर होता है। २७. इससे हुकूमत तथा उच्चाधिकारिता प्रकट होती है। पुद्धि के फलस्वरूप सुपरिणाम निकलेगा। ऐसे व्यक्तियों को अपने स्वयं के विचारों को कार्यान्वित करना चाहिए। भविष्य प्रश्न में भी यह सख्या बहुत शुभफल सूचित करती है । २८. इस संख्या से दो विरुद्ध दिशामों में जाने वाली शक्तियां भूचित होती है-ऐसे व्यक्तियों को अपने कार्य स्वरूप बहुत प्राप्ति नाम' और मंक-विद्या का सम्बन्ध तथा सफलता की आशा होगी किन्तु, यदि वह सावधानी न बरत तो-उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। दूसरों में अन्धविश्वास रखने किंवा व्यापार में प्रतिक्रिया विरोध, या प्रतियोगिता के कारण किंवा अदालत, मुकद्दमे या कानूनी कार्रवाई के कारण घाटे की संभावना प्रकट होती है । भविष्य विषयक प्रश्न में भी इस संख्या से शुभ परिणाम प्रकट नहीं होता। २६. इस अंक से अस्थिरता, या अनिश्चित स्थिति प्रकट होती है । ऐसे व्यक्ति के मित्र विश्वास के योग्य न होंगे और उनके कारण उसे धोखा, अचानक भय, कष्ट हानि आदि की संभावना रहेगी। जिन पुरुषों के नाम का संयुक्तांक २६ हो, उन्हें स्त्रियों तथा जिन स्त्रियों का संयुक्तांक २६ हो उनको पुरुषों से धोखा या कष्ट उठाना पड़ेगा । प्रश्न में भी यदि यह संख्या आवे तो शुभ नहीं । ३०. ऐसे व्यक्ति अत्यन्त बुद्धिमान् तथा प्रतिभासम्पन्न होते हैं और आर्थिक संचय की ओर विशेष ध्यान न देकर विद्या संचय की ओर चित्तवृत्ति तथा बुद्धि को लगाते हैं । इस कारण न इसे शुभ कह सकते है न अशुभ । ३१. इस संख्या का भी प्रायः वही फल है जो ऊपर ३० का दिया गया है। बल्कि इस संख्या वाला व्यक्ति और भी एकाकी, अन्तर्मुखी वृत्ति वाला, सबसे दूर और अलग रहने की प्रवृत्ति के कारण सांसारिक सफलता से हीन रहता है-इस कारण यह संख्या शुभ नहीं। ३२.. इस अंक में भी वही चमत्कार है जो ५ या १४ की संख्या में । इससे बहुत व्यक्ति या राष्ट्रों का समुच्चय या समुदाय इंगित ..
८२ अंक-विद्या (ज्योतिष) होता है। इस संख्या वाला व्यक्ति यदि स्वयं अपने इरादों को कार्यान्वित करे तो उसे सफलता होगी। किन्तु यदि वह अन्य व्यक्तियों की जिद या मूर्खता से पूर्ण सलाह को मान्यता देगा तो सफलता प्राप्त नही होगी । भविष्य विषयक प्रश्न में भी यह संख्या शुभ है । ३३. इस सख्या की अपनी कोई विशेष शक्ति नहीं है, इस कारण इसका भी वही प्रभाव समझना चाहिए जो २४ का बताया गया है। ३४. इस का भी वही प्रभाव है, जो २५ का ऊपर बताया गया है। ३५. इसका प्रभाव २६ के सहश है। ३६. इसका प्रभाव २७ के सदृश है। ३७. यह विशेप शक्ति सम्पन्न संख्या है। ऐसे व्यक्ति को प्रेम (स्त्री-पुरुप प्रेम) तथा मित्रता-दोनों में सफलता तथा भाग्योदय प्राप्ति होगी। ऐसे व्यक्ति किसी की साझेदारी में कार्य करें तो उन्हें उसमें भी लाभ होगा। ३८. इस संख्या का भी वही प्रभाव है जो २६ का। ३६. इसका प्रभाव ३० के सदृश है । ४०. यह ३१ के सदृश है। ४१. इसका प्रभाव ३२ के सहश है। ४२. ऊपर २४ संख्या का जो प्रभाव बताया गया है वही ४२ का भी ४३. यह अशुभ संस्था है। इससे असफलता, बाधा, लड़ाई- झगड़ा, गड़बड़, क्रान्ति आदि अशुभ परिणाम सूचित्त होते हैं । ४४. इसका प्रभाव २६ के सहश है।
नाम' और अंक-विद्या का सम्बन्ध २३ ४५. इसका प्रभाव २७ के सहश है। ४६. इसका प्रभाव ३७ के सदृश है । ४७. इसका प्रभाव २६ के सदृश है। ४८. इसका प्रभाव ३० के सदृश है। ४६. इसका प्रभाव ३१ के सदृश है । ५०. इसका प्रभाव ३२ के सदृश है । ५१. इस संख्या में बहुत शक्ति 1 इससे 'योद्धा' अथवा 'विजयी' इंगित होता है । ऐसा व्यक्ति जो भी कार्य करे उसे सफ- लता प्राप्त होगी । सैनिकों के लिए यह विशेप शुभ है। नेताओं के लिए भी सफलता सूचक है । किन्तु इस संख्या वाले व्यक्ति के बहुत से शत्रु भी होंगे -उनसे भय तथा उनके द्वारा कत्ल किए जाने की अाशंका भी रहेगी। ५२. इसका भी ४३ के सदृश प्रभाव है। ५३. इस संयुक्तांक वाला व्यक्ति गुप्तचर का कार्य अच्छा कर सकता है । सैनिक नेतृत्व मे सफलता प्राप्त हो सकती है। यह अंक उन्नतिसूचक है। ५४. इस अंक वाले व्यक्ति की लोग प्रतिष्ठा करते है । वह वाग्मी, विद्वान् तथा धनिक होता है, परन्तु लंगड़े होने का डर रहता है। ५५. यह नेतृत्व का अंक है । ऐसा मनुष्य प्रखर बुद्धि का तथा धार्मिक विचार का होता है और अन्य जनों का नेतृत्व करता है । ५६. यह अंक शुभ तथा अशुभ दोनों है । ऐसा व्यक्ति सौभाग्य- युक्त होता है तथा दूसरों पर नेतृत्व करने की चेप्टाकरता है परन्तु कई बार उसकी आकांक्षाएं निकृष्ट प्रकार की होती है। ऐसा ।
या प्रक-विद्या (ज्योतिष) व्यक्ति धवराया हुआ, बेचन सा रहता है। आत्मसंयम का उद्योग करना चाहिए। ५७. यह अंक कार्य या व्यवसाय में सफलता का द्योतक है। ऐसा व्यक्ति खुश मिजाज तथा क्रियाशील होता है। ५८. इस संख्या वाले अच्छे चिकित्सक हो सकते है। ऐसे व्यक्ति स्पष्ट व्यवहार वाले होते हैं तथा दूसरों से स्नेह करते हैं । ५६. इस अंक वाले व्यक्ति की भय और विपत्तियों से सदैव रक्षा होती है । ऐसा व्यक्ति बहुत प्रकार के कारवार करता है और यात्रा भी बहुत करता है। जलयात्रा विशेष सफलताद्योतक है। यदि लाली का कार्य करे तो पूर्ण सफलता हो किन्तु बेई- मानी की प्रवृत्ति भी होगी। ऐसा व्यक्ति प्रायः विजय प्राप्त करता है और दीर्घजीवी होता है । केवल दोप यही है कि ऐसे मनुष्य को सट्टे तथा बेईमानी की ओर प्रवृत्ति होती है । ६०. इस अंक वाला व्यक्ति खुशमिजाज़ होता है और उसे डाक्टर, नर्स, आदि के कार्य में सफलता प्राप्त हो सकती है। ६१. इस अंक वाला व्यक्ति यात्रा का शौकीन, शान्तिप्रिय तथा प्रात्म संयमी होता है। ६२. इसका प्रभाव वही है जो ५३ का ६३. इस अंक वाले व्यक्ति स्वस्थ, और दूसरों की उन्नति तथा उपकार के लिए कार्य करने वाले होते हैं । प्राचीन सामाजिक प्रथाओं के संशोधन की ओर उनका विशेष ध्यान रहता है। व्यापार में भी सफल होते हैं किन्तु अपव्यय की ओर भी प्रवृत्त होते हैं। हानि या लाभ के विपय में निर्णायकता से कुछ नहीं कहा जा सकता। ६४. इस अंक वाले व्यक्ति को व्यापार की अपेक्षा नौकरी या
'नाम' और मंक-विद्या का सम्बन्ध
अपना पेशा (डाक्टरी, वकालत आदि) विशेष लाभ प्रद होगा।
साहित्यिक प्रवृत्ति होती है। वैवाहिक जीवन के बन्धन से अरुचि
रहती है।
६५. इस अंक वाले व्यक्ति को बड़ों का पाश्रय प्राप्त होता है
वैवाहिक जीवन भी सुखमय रहता है किन्तु चोट लगने या दुर्घटना
का भय रहता है।
६६. इसका वही प्रभाव है जो ५७ का है।
६७. इसका वही प्रभाव है जो ५८ का
६५. इसका वही प्रभाव है जो ५६ का है।
६६. इस अंक से सम्मान, प्रतिष्ठा, सौभाग्य तथा कीति सूचित
होते है।
७०. यह सौभाग्यसूचक अंक है किन्तु उतना शक्तिशाली नहीं।
'अब नाम का संयुक्त बनाकर किस प्रकार विचार करना यह
बताया जाता है
नाम शुभ है या नहीं
किसी नाम की शुभता या अशुभता इस बात पर निर्भर है कि
(१) उस नाम का 'संयुक्तांक' क्या बनता है ? इस संख्या का क्या
गुरण और प्रभाव पिछले पृष्ठों पर दिया गया है. ।
(२) नाम का 'संयुक्तांक' जन्म तारीख के मूल अंक से सहानुभूति
रखता है या विरोध ।
ऊपर श्री जवाहरलाल नेहरू जी के नाम का 'संयुक्तांक' बना कर
बताया गया है कि अंगरेजी वर्णमाला के अनुसार "जवाहर लाल" का
संयुक्तांक २४', 'नेहरू' का २३ तथा दोनों नामों का ।
तथा कुल-नाम) सम्मिलित--संयुक्तांक ४७ बनता है। अब
. ८६ अंक-विद्या (ज्योतिष) पिछले पृष्ठों में देखिए कि २४ का क्या प्रभाव है; '२३' का क्या तथा '४७' का क्या ? यदि नाम के 'संयुक्तांक' का शुभ प्रभाव दिया है तो नाम को शुभ समझना चाहिए । बहुत से विज्ञ पाठकों को यहां यह शंकाहोना स्वाभाविक है कि नाम के 'सयुक्तांक' पर विचार करते समय' जवाहरलाल' इस पद पर विचार किया जाये या 'नेहरू' या 'जवाहर लाल नेहरू' पर । इस सम्बन्ध में यह निर्णय है कि जिसके जिस नाम से वह अधिक विख्यात हो वही नाम उसका-उपर्युक्त विचार में, ग्रहण करना चाहिए । हमारे खयाल से माननीय पंडित जी का 'नेहरू' नाम विश्व विख्यात है । भारतीय तो 'पडित जी' या 'जवाहर लाल जी' इन नामों का भी-पापस की बातचीत में प्रयोग करते हैं । परन्तु विश्व में 'नेहरू' नाम ही विशेष प्रसिद्ध है। अत: कुछ गुण तो '२४' (जवाहर लाल) का और कुछ '४७' का (जवाहरलाल नेहरू) भी मिलेगा। परन्तु मुख्य प्रभाव “२३' (नेहरू) का माना जावेगा। अब एक दूसरे नाम का उदाहरण दिया जाता है महात्मा गांधी का नाम यद्यपि मोहनदास था तथापि इस नाम काप्रयोग जनता ने नहीं किया। उनका गांधी नाम ही विश्व- विख्यात हुआ। G=३ A=१ N-५ D=४ H:५ I=१ . - ६ नाम और अंक-विद्या का सम्बन्ध ८७ देखिए इस. १६ अंक का प्रभाव बहुत उत्तम दिया गया है। कहते हैं कि 'नेपोलियन' जब तक अपना नाम Napolean Bounaparte लिखता रहा तब तक उसके नाम के संयुक्तांक' का शुभ प्रभाव रहा । किन्तु देव दुर्विपाक से उसने अपने नाम की हिज्जे बदल लिये और नवीन हिज्जे (अंगरेजी वर्णमाला के प्रयुक्त अक्षरों) Bonapart का प्रभाव बड़ा अशुभ रहा।' हमें कई भुक्तभोगी सज्जनों ने बताया कि जब तक वह अपना नाम प्राचीन प्रकार से लिखते रहे तब तक उनको उन्नति या भाग्य वृद्धि नहीं हुई। किन्तु जब उन्होंने नाम के हिज्जे बदल लिये तो संयु- तांक भिन्न हो जाने से, जो नयी संख्या बनी उसका शुभ प्रभाव होने के कारण भारयवृद्धि हुई। प्रायः 'नाम' बदलना, प्रासान नहीं है। परन्तु नाम की हिज्जे बदलना सुगम है। उदाहरण के लिए किसी सज्जन का नाम "कैलास चन्द्र " गोयल है। C%D३ HEX 0-७ A-१ Y-१ N-५ A=? D-४ R-२ K-२ A=१ IDR S:३ 3 १. देखिये Cheiros Book of Numbers पृष्ठ १४६ सपा Numerology for Everybody qe te XU!
६८ मंक-विद्या (ज्योतिष) अंगरेजी वर्णमाला के प्रतिवर्ण के योग के अनुसार कैलास चन्द्र गोयल नाम का संयुक्तांक ४७ हुआ । '४७' का वही प्रभाव होता है जो '२६' का (देखिए पृष्ठ ८१ तथा ८३) । '२६' का शुभ प्रभाव नहीं है । इसलिए यदि यह सज्जन अपना नाम नहीं बदलें (क्योंकि नाम बदलने में अनेकानेक झंझट है) किन्तु अपना नाम 'कैलास चन्द्र गोयल' के स्थान में केवल "कैलासचन्द्र" लिखें तो भाग्योदय कारक होगा क्योंकि इस नाम का संयुक्तांक ३२ होगा जो बहुत शुभ है। 'नाम' और जन्म तारीख का सामञ्जस्य यह एक विचार है। दूसरा यह भी विचार है कि नाम का संयुक्तांक 'जन्म तारीख' के अनुकूल पड़ता है या नहीं। उदाहरण के लिए 'कैलासचन्द्र' इस नाम का संयुक्तांक '३२' हुआ यदि •Kailas Chandra' के स्थान में 'Kailash Chandra' लिखा जाये ('s' के बाद एक •h' और जोड़ दिया जावे-क्योंकि 'कैलास' और 'कैलाश' दोनों रूप भाषा की दृष्टि से शुद्ध हैं) तो ' का अंक ५ और सम्मिलित हो जाने से, C=३ H=५ A-१ L=३ N=X D=४ A=१ R-२ H=4 K-२ A=१ I-१ S=३ A-
नाम' और अंश-विद्या का सम्यन्य
5
संयुक्तांक ३७' हुना। इस अंक का भी शुभ पाल है। (देखिए
पृष्ठ ८२) । अब कैलासचन्द्र को '३२ तथा '३७' में से उस अंक को
पसन्द करना चाहिए जो उनको जन्म तारीख के अनुकूल हो :-
३२%3D३+२=५
३७-३+७=१०-१+०-१.
यदि इनकी जन्म तारीस ५, १४ या २३ हो तो इन्हें ३२ को
मंख्या विशेष शुभ होगो । यदि इनको जन्म तारीख १, १०, १६,
२८ या ४, १३, २२. ३१ हो तो इन्हे '३७' की संख्या शुभ होगी।
यदि २, ११, २०, २६ अथवा ७, १६, २५ तारोग्य को जन्म हुआ
हो तो भी '३७' की संख्या शुभ होगी।
इम सम्बन्ध में एक बात और उल्लेखनीय है ।
(1) यदि जन्म-तारीख का मूल अक '४' हो और नाम का
संयुक्तांक '' पाना हो तो नाम के अक्षरों को इस प्रकार बदलिए
कि नाम के संयुक्तांक ३, ६ या ६ बन जावे ।
(ii) इमो प्रकार यदि जन्म तारीख का मूल अंक हो और
नाम का संयुक्तांक '४' आवे तो नाम के अक्षरों को इस प्रकार
बदलिए कि नाम का सयुक्तांक ३, ६ या ६ बन जावे ।
कहने का तात्पर्य यह है कि जन्म-तारीख का मूल अंक तथा
नाम का 'सयुक्तांक'-इन दोनों में से एक ४ और दूसरा ८ होना
शुभ नहीं।
जिस प्रकार हमने पिछले पृष्ठों में यह विचार किया है कि
जन्म-तारीस के 'मूल अंक और नाम के संयुक्तांक में सामञ्जस्य
होना शुभ है, उसो प्रकार यदि मनुष्य के जन्म-तारीख के मूल अंक,
नामांक तथा जिस शहर में वह पारवार करता है उस शहर के
अंक-विद्या (ज्योतिप)
नामांक में भी सामञ्जस्य हो तो, उस शहर में उस मनुष्य की
विशेष श्री-वृद्धि होगी। उदाहरण के लिए कोई सज्जन पूछते हैं कि
"मैं नई दिल्ली में कारवार कर रहा हूँ, यदि इलाहाबाद में दुकान
खोलूं तो कैसा रहेगा ?"
पिछली प्रक्रिया के अनुसार नई दिल्ली तथा इलाहाबाद दोनों
नामों के संयुक्तांक पृथक्-पृथक् बनाइये :-
NEX
A=१
L-३
W-६
E%
D५
L=३
H-५
I-१
A%D१
H=4
A-१
B२
D=8
३४-३+४०७
२१-२+१-३
अय यदि उनके जन्म तारीख के मूल अंक तथा नाम के 'संयुक्तांक
इन दोनों अंकों की '७' से विशेष सहानुभूति है तो नई दिल्ली ही
उनके लिए विशेष शुभ रहेगी। यदि '३' से विशेष सहानुभूति है तो
इलाहाबाद विशेष उपयुक्त होगा। इसी प्रकार मोहल्ले आदि
का विचार किया जा सकता है।
इसी प्रकार किराये का मकान लेते समय या अन्य अवसरों पर
१. Numerology For Every body by Montross पृष्ठ ५
'नाम' और अंक-विद्या का सम्बन्ध यह निर्णय करने में कि कौनसा मकान विदोप शुभ होगा, अंक-विद्या से लाभ उठाया जा सकता है। अथवा हम अपने मकान का ऐसा नाम रख सकते है जिसका सयुक्तांक' हमारे लिए अनुकूल हो । कोरो का मत है कि जिसका मूल अंक ४ या ८ हो उसे नवीन नाम रखते समय या मकान चुनते समय ४ या ८ वाला मकान नहीं चुनना चाहिए। नाम के संयुक्तांक के अनुसार कौन सी तारीख महत्वपूर्ण फार्य के लिए उपयुक्त होगी? ऊपर जो नाम के संयुक्तांक बनाने के उपयोग दिये गये हैं, उनके अतिरिक्त 'संयुक्तांक' की एक उपयोगिता और है । उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को यह देखना है कि यह वेतन-वृद्धि के लिए प्रार्थना पत्र किस दिन भेजे या अपने अफ़सर से किस दिन मिले । मान लीजिए उसकी जन्म-तारीख ११ अप्रैल है। जैसा कि तृतीय प्रकरण में बताया जा चुका है किसी भी महीने की तारीख २, ११, २०. २६ तथा ७, १६, २५ उसके लिए अनुकूल होंगी। इसके अतिरिक्त अंक १, १०, १६, २८ तथा ४, १३, २२, ३१ की भी मूल अंक २' से सहानुभूति है। इस कारण ये तारीखें भी अनुकूल होंगी। किन्तु इस विचार में 'रामलाल', 'श्याम- लाल', 'गोविन्द शरण', 'यज्ञदत्त' या 'देवदत्त'-सभी के लिए एक समान नियम लागू किया है; नाम के अलग-अलग होने पर भी क्या सब को एक ही तारीख समानरूप से अनुकूल होगी यह शंका होना स्वाभाविक है। इस कारण निम्नलिखित पद्धति से यह निश्चित किया जाता है कि रामलाल को कौनसी तारीस वेतन-वृद्धि के लिए प्रार्थना पत्र
६२
अंक-विद्या (ज्योतिष)
भेजने के लिए अनुकूल होगी।
(क) रामलाल नाम का संयुक्तांक बनाइये :-
R=२
A-१
M=४
L=३
A%१
L=३
१४
(ख) जन्म की तारीख का अंक ११%3D१+१%D२
(ग) मान लीजिए वह २१ जुलाई को प्रार्थनापत्र भेजना चाहते
हैं तो, २१%D२+१=३ ।
गाव १४, २ तथा ३ को जोडने से योग हुअा १६ । इस '१६'
'संयुक्तांक' का फल पिछले पृष्ठों में देसने से पता चलता है कि यह
शुभ अंक है । यह सूर्य का प्रतीक है। इससे हपं, सफलता, प्रतिष्ठा
नया मानवृद्धि प्रकट होती है । (देखिये पृष्ठ ७६)
इन कारण रामनाल' को (जिसकी जन्म-नारीश ११ है )
नारीरा २१ शुभ होगी।
इस प्रकार नाम के 'सयुक्तांक' और जन्म-तारीरा के मूल पर
ग. महयोग से निर्दिष्ट तारीस घुनने में भी 'नाग' या महत्व है।
कर ६ठा प्रकरण मास, वार तथा घराटे का महत्व इंग्लैण्ड के सम्राट घराने का ज्योतिपियो और ज्योतिप सम्वन्धी फलादेशों से बहुत सम्वन्ध रहा है । इंग्लैण्ड के बादशाह जार्ज प्रथम का डचेज आफ जैल से प्रेमसम्बन्ध हो गया और बादशाह ने उससे विवाह कर लिया। किन्तु बाद में इस महाराज्ञी का योरुप के काउन्ट कोनिरसमाकं से अनुचित सम्बन्ध हो गया और वह चाहती थी कि काउन्ट के साथ भाग जावे, किन्तु वादशाह ने महाराज्ञी को 'अलैन' के किले में वन्दी कर दिया और उससे अपना विवाह-विच्छेद कर लिया। तलाक दी हुई, इस डचेज ने बहुत उद्योग किया कि भाग निकले किन्तु वह असफल रही। अंत में उसने 'पार्ड जेप्ल' नामक एक अंगरेज ज्योतिषी की सहायता ली। इस ज्योतिषी ने जार्ज प्रथम की जन्म-कुण्डली वनाईजो इंग्लैण्ड के राजकीय पत्रों में सुरक्षित रक्खी गई। इस जन्म-कुण्डली में उसने फलादेश किया था कि जिस दिन 'डचेज़' की मृत्यु होगी उसके ठीक एक वर्ष और एक दिन बाद बादशाह की मृत्यु होगी। हुआ भी-ऐगा हो । 'डचेज' को मृत्यु १० जून १७२६ को हुई और बादशाह की ११ जून सन् १७२७ को। उपर्युक्त घटना का उल्लेख इसलिए किया गया है कि बहुत से लोग विशेष घटनाओं को केवल आकस्मिक संयोग कह कर टाल देते हैं। वास्तव में ऐसी घटनाएं ज्योतिष के गंभीर सिद्धान्तों पर ४ जून प्रक-नवद्या (ज्योतिष) अवलंवित हैं । कोई कोई महीने किसी देश, व्यक्ति या घराने के लिए बहुत महत्व पूर्ण होते हैं। नीचे जो ऐतिहासिक तिथियां दी गई है इनसे स्पप्ट होगा कि अप्रैल से लेकर जुलाई तक के मास इंग्लैण्ड के राज घराने के लिये बहुत महत्वपूर्ण हुए है। "जार्ज प्रथम की मृत्यु ११ जून जार्ज तृतीय का जन्म-दिन सामाजी विक्टोरिया का जन्मदिन २४ मई ड्यूक आफ योर्क का जन्मदिन ३ जून प्रिंसेज़ मेरी आफ तेक का जन्म दिन एडवर्ड अष्टम (ड्यूक ऑफ विंडसर का जन्मदिन) २३ जून साम्राज्ञी विक्टोरिया सिंहासनारूढ़ हुई २० जून वाटरलू की प्रसिद्ध लड़ाई १८ जून जार्ज द्वितीय सिंहासन पर बैठे ११ जून विलियम चतुर्थ गद्दी पर बैठे २६ जून सम्राट् सप्तम एडवर्ड की मृत्यु सम्राट् जार्ज पंचम की गही नशीनी सम्राट पंचमजाज की ताजपोशी सम्राट् पंचम जाजं का विवाह कोरो ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि उसने यह सब विस्तार से अध्ययन किया था और इंग्लण्ड के राजघराने के सम्बन्ध में जो उसने 'अक' विषयक या 'मास' विषयक निष्कर्ष निकाले थे पह उसने एटर सप्तम को स्वयं बताए थे। Cheiro's World Predictions page 82-83. . ६ मई ६ गई २२ जून ६ जुलाई" 'नाम' और प्रंक-विद्या का सम्बन्ध 'अनुभव से यह विदित होता है कि कोई कोई मास किसी किसी व्यक्ति को विशेष शुभ या अशुभ जाता है। किस तारीख में उत्पन्न व्यक्ति को कौन सा मास शुभ जावेगा? इस सम्बन्ध में पाश्चात्य मत तृतीय प्रकरण में बताया जा चुका है। भारतीय मत-~-अब भारतीय मत दिया जाता है। भारतीय मतानुसार ज्योतिष के सिद्धान्तों से यह निकाला जा सकता है कि अमुक सौर मास (संक्रान्ति से संक्रान्ति तक) अमुक व्यक्ति को कैसा जावेगा। केवल अंक ज्योतिष से भारतीय मतानुसार शुभाशुभ मास निर्णन करना कठिन है। ज्योतिप प्रेमियों की सुलभता के लिए नीचे को पंक्तियों में कुछ निर्देश मात्र किया जा रहा है सर्वतोभद्र का विचार बहुत गहन, विस्तृत और सूक्ष्म ज्योतिष नथा नक्षत्र विद्या से सम्बन्ध रखता है। इस कारण इस छोटीसी अंक-विद्या में उसका परिचय देना सम्भव नहीं है । परन्तु पाठकों के लाभार्थ यह लिख देना आवश्यक है कि जब सूर्य राशि विशेष में रहता है तब कुछ दिशा 'अस्तमित' मानी जाती है। तीन-तीन मास नक-एक एक दिशा 'मस्त' रहती है :- "नक्षत्राणि स्वरा व राशयस्तिथयो दिशः। - ते सर्वेऽस्तंगता ज्ञेया यत्र भानुस्त्रिमासिकः ॥' जिस मनुष्य के जन्म का नक्षत्र अस्त हो उसे रोग होता है, 'वर्ण' अस्त हो तो हानि होती है, 'स्वर' अस्त हो तो शोक होता है, राशि अस्त हो तो विघ्न होते हैं तथा जन्म-तिथि- अस्त हो तो १. विशेष विवरण के लिए देसिए नरपतिजयचर्या पृष्ठ १००, फल- दीपिका पृष्ठ ३०३-३१५ जासक-सारदीप पृष्ठ ६०४ जातकादेशमार्ग ०६ श्लोक १३॥
अंक-विद्या (ज्योतिष) भय होता है । 'पंचास्ते मरणं ध्रुवम्' । कर दशा अन्तर्दशा के साथ पांचों (नक्षत्र, वर्ण, स्वर, रामि तथा तिथि) अस्त हों तो निश्चय मरण होता है । प्रायः एक, दो या तीन के अस्त होने से भी काम- काज में उलझन और अडचन पैदा हो जाती हैं। किसी किसी व्यक्ति के जन्म-नाम के प्रथम अक्षर, वर्ण, स्वर आदि सर्वतोभद्र चक्र की विविध दिशानों में पा जाते है। इस कारण केवल अक्षर या स्वर प्रादि किसी एक के अस्त होने से उन्हें कोई खास महीना अशुभ नहीं प्रतीत होता । किन्तु जिनके नाम के अक्षर, नक्षत्र, तिथि प्रादि कई, एक दिशा में पड़ जाते है-उनके यह सब एक साथ प्रस्त होने से विशेष उत्पन्न करते हैं। इसलिए या तो सर्वतोभद्रचक्र सम्वन्धी पूर्व पृष्ठ में उल्लिखित पुस्तकों के आधार पर या अपने अपने गत जीवन के अनुभव से अपने लिए जो अशुभ मास हों उनमे विशेष सतर्क रहना चाहिए। भारतीय ज्योतिष के मतानुसार सूर्याप्टक वर्ग मे जिस राशि में अधिक रेसा हों उस सौर मास में सब शुभ कर्म करने चाहिए और जिसमें कम रेसा हों उसमे यात्रा या अन्य महत्वपूर्ण कार्य न करे। इस सम्बन्ध में पाश्चात्य मत तो पहले ही दिया जा चुका है कि कीरो के मतानुसार कोनसा मास किस अंक वाले को शुभ होगा। धार का महत्व-मास के बाद मुख्यता होती है वार की। जिस प्रकार किसी तारीख या मूल अंक का किसी के जीवन में विशेष महत्व रहता है उसी प्रकार किसी वार को भी प्रधानता या महत्व किसी व्यक्ति या राष्ट्र के जीवन में देखा गया है। प्रसिद्ध अन्वेपक कोलम्बस शुक्रवार में बहुत श्रद्धा रखता था । इसका कारण यह था कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ मात, यार तथा घंटे का महत्व . शुक्रवार को ही हुई । और जव वारम्वार उसने अपने को शुक्रवार से प्रभावित पाया तो इस वार मे उसकी श्रद्धा होना स्वाभाविक था। वह शुक्रवार ३ अगस्त १४६२ को अपनी लम्बी यात्रा के लिए रवाना हुआ। कोलम्बस ने शुक्रवार को ही एक द्वीप के पास-पास पक्षियों को देखा जिससे उसने अनुमान किया कि पास में कोई आबादी है । समुद्र मे यात्रा करते करते जब भूमि का लक्षण दिखाई देता है तो कितना अपार हर्ष होता है यह केवल भुक्तभोगी ही अनुभव कर सकता है । ७० दिन लगातार चलने के बाद शुक्रवार को यह एक छोटे से अमेरिकन द्वीप पर उतरा । तदनन्तर शुक्रवार (१७ मई) को उगने वारसेलोना में विज यात्रा की। शुक्रवार (३० नवम्बर) ही को उसने पियोरतोसान्तो में क्रास की स्थापना की और शुक्रवार (४ जनवरी) को ही वह स्पेन के लिए रवाना हुअा । वह जव विजयोल्लास के साथ पेलोस मे प्रविष्ट हुछा तब शुक्रवार ही था । इस प्रकार हम देखते है कि कोई कोई वार भी किसी के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है। पाश्चात्य मत पहले दिया जा चुका है कि किस तारीख मे उत्पन्न व्यक्ति को कौनसा वार विशेष शुभ होगा । भारतीय मता- नुसार जिसकी जन्म कुण्डली मे जो ग्रह बलवान् होगा तथा लग्नेश और चन्द्रराशीय का मित्र होगा वह शुभ होगा। किन्तु उपयुक्त निर्णय के लिए जन्म कुण्डली की आवश्यकता होती है । इस कारण अपने अनुभव के आधार पर यह निश्चय करना चाहिए कि कौनसा बार शुभ तथा कौनसा अशुभ जाता है । जो वार शुभ जाते हों उन्हें महत्वपूर्ण कार्यों के लिए चुनना चाहिए-जो अनिष्ट जाते हों उनगरों में कोई बड़ा कार्य न करे। बहुत से अनुभवशील पाठकों १८ प्रकवि (ज्योतिष) ने यह भी देना होगा कि गुछ बरसों राक कोई पार प्रमुभ गया- लेकिन बाद में उगने पशुभना दिवाना छोड़ दिया। इसका कारण यह है कि यदि जन्म-पुएटली के अनुसार फिगी मनिप्ट ग्रह की पशा रहती है तो यह अशुभ प्रभाव दिखाता है। उसकी दशा समाप्त हो जाने पर या गोचरवश उसकी अशुभमिति न रहने पर यह अशुभता नहीं दिगाना। बहुत से लोग प्राय: मंगल या शनि को-कर तार समझने के पारण-अशुभ रामभने हैं । परन्तु सर्वत्र ऐमा नहीं होता। यदि कोई वार अशुभ जाता हो तो उस दिन नमक नहीं खाना चाहिए। नमक नहीं गाने से शरीर में रक्तचाप कम रहता है। इस कारण मनुप्य के मस्तिष्क को विशेष उत्तेजित नहीं करता। दिन का कौन सा घंटा अनुकूल (माफिक) रहेगा ? पिछले प्रकरणों में यह बताया जा चुका है कि कौनसी तारीख किस व्यक्ति के लिए विशेष अनुकूल होगी। अब इस प्रकरण में यह विचार किया जाता है कि-किस दिन, फोनमा घण्टा विशेष माफ़िक रहेगा। इस विषय में पहिले भारतीय मत और उसके बाद पाश्चात्य मत बताया जावेगा। घण्टे का विचार, एक बजे से दो बजे तक, दो बजे से तीन बजे नक, इस प्रकार घड़ी के घण्टों से नहीं करना चाहिए-बल्कि मूर्योदय से प्रारम्भ करना चाहिए। जिम दिन जिस स्थान पर विशेष कार्य करना हो उस दिन उस स्थान का सूर्योदय काल निकालना चाहिए। उदाहरण के लिए ३ जून सन् १९५७ को कोई महत्व का कार्य दिल्ली में करना है। इस दिन दिल्ली में मर्योदय हुमा ५ बज कर २३ मिनट पर, तो प्रथम घण्टा हुअा ५-२३ मास, पार सया घंटे का महत्व RE से ६-२३ तक, द्वितीय घण्टा हुअा ६-२३ से ७-२३ तक । इस प्रकार सूर्योदय से प्रति घण्टा संस्कृत में "होरा" कहलाता है । ग्रहों में सबसे अधिक दूर गनि है, फिर बृहरपति, उसके बाद मगल, फिर सूर्य, उसके बाद शुक, उराके बाद बुध, और सबसे समीप चन्द्र । इसलिए शनिवार को प्रथम 'होरा' (मूर्योदय से प्रथम घण्टा) शनि की, दूसरी 'होरा' (घण्टा) वृहस्पति की। तीसरी होरा मंगल की, चौथी सूर्य की, पांचवी शुक्र की, ६ठी बुध की, सातवीं चन्द्र की होरा होगी। सात होरा पूरी हो जाने पर ८ से १४ तक फिर दानि, वृहस्पति, मंगल, सूर्य प्रादि यही क्रम चलेगा। १५ से २१ होरा तक फिर यही क्रम रहेगा । २२वी होरा फिर गनि की होगी २३वीं बृहस्पति को, २४वी होरा (घण्टा) मगल की, २५वी होरा सूर्य की क्योंकि २४ घण्टे पूरे हो जाने पर दूसरा दिन प्रारम्भ हो गया और दूसरे दिन प्रारंभ की अर्थात् पहली होरा (जो पहले दिन की २५वीं हुई) सूर्य की है-इस कारण शनिवार के दूसरे दिन का नाम 'रविवार' हुना। रविवार को पहिलो होरा 'सूर्य' की दूसरी शुक्र की इस क्रम से २२वी होरा सूर्य की, २३वी शुक्र की, २४वीं बुध को, २५वी चन्द्रमा की हुई। यह २५वी होरा दूसरे दिन की पहली होरा हुई। इस प्रकार रविवार के दूसरे दिन की होरा चन्द्र की होने के कारण इसका नाम चन्द्रवार या सोमवार (या Moon-day जिसे संक्षेप में Monday कहते हैं ) रक्खा गया । इसी प्रकार होरा के विचार से सातों दिन के सात नाम रक्खे गये है। आगे प्रतिदिन को कौनसी होरा किसकी होगी इसका चक्र दिया जाता है %3D १०० ग्रंया-विद्या (ज्योतिष) होरा २ ४ a है ११ १२ १४ १८ वार २२ २३ २४ रविवार . सोमवार चं. . मंगत वार मं. म. श. चं. दा. बुधवार दा. यू. मं. पृहस्पतिवार मं. . घं. शुवधार . यु. चं. य. शानिवार यू' मं. पं. गू. उदाहरण के लिये ३ जून मन् १९५७ को गोमवार था। इस दिन सूर्योदय प्रातः ५ बजकर २३ मिनट पर हुमा नो दोपहर को १.२३ से लेकर २.२३ तक स्वां पटा पा । पाही गति में मोमवार के गामने और सही पति में के नीचे 'ग' है। इसलिए दिन के १-२३ में एक घण्टे तक २.२३ तर मानि की होगी। होरा निरालने के लिए गर्योश्य मा टीक-ठीक मामूम होना परमापक है। सूर्योदय निफानने यो मारिणी पी हुई में नेगी मास, धार तथा घण्टे का महत्व चाहिए या शुद्ध पचाग में देख लेना चाहिए। यह स्मरण रहे कि 'अक्षांश' तथा 'देशांतर' दोनों के कारण-सूर्योदय काल भिन्न-भिन्न स्थानों का अलग-अलग होता है । कौनसी होरा अनुकुल होगी ? जिनको अपनी जन्म राशि मालूम हो उन्हें तो अपनी जन्म राशि से विचार करना चाहिए अन्यथा नीचे लिखे चक्र से-अपने नाम के प्रथम अक्षर से राशि निर्णय कर-यह विचार करना चाहिए कि कौनसे ग्रह की होरा गुभ होगी कौनसी साधारण और कौनसी प्रशुभ । शुभ होरा राशि साधारण होग(प्रतिकत) भमुभ नाम का प्रयम अक्षर १. चू, चे, चो, ल, ली है, लो,म मेष सूर्य, चन्द्र मंगत, बृहस्पति शुक्र, शनि बुध २. इ, उ, ए, ओ, वे, वो, बुध, शुक्र शनि वृष चू,चे, यो ३. का, की, कू, घ, 3, घा मिथुन | सूर्म, बुध, के, को. हा ४. ही, हू, हे, हो, डा, डी सूर्प, बुध, बृहस्पति । सूर्य, चन्द्र मगल मगल भहस्पति चन्द्रमा वानि. मंगल,बृहस्पति शुक्र कर्क शुक्र, दानि चन्द्र ५. मा, मी, मू, मे, मो, टा टी,टू सिंह गर्य, चन्द्र मंगलवृहस्पति शुक्र, शनि १०२ अंक-विद्या (ज्योतिष) शुभ होरा साधारण होण(प्रतिफूल) सूर्य, बुध - चन्द्र, सूर्य नाम का प्रयम अक्षर राशि प्रभुभ (अनुकूल) ६. टो, पा, पी, पू, , ण, मगल कन्या शनि चन्द्रमा ठ, पे, पो शुक्र बृहस्पति ७. रा, री, रू, रे, रो, ता, बुध, शुक्र मंगल ती, तू, ते तुला शनि बृहस्पति ८. तो, ना, नी, नू, ने, नो सूर्य, चन्द्र मंगल या, यी, यू वृश्चिक शुक्र, शनि | बुध बृहस्पति ६. ये, यो, भा, भी, भ, था सूर्य, चन्द्र पनु मंगल शनि फा, ढा, भे बुध, शुक्र बृहस्पति १०. भो, जा, जी, खी, सु, बुध, शुक्र मकर सूर्य, चन्द्र खे, खो, गा, गी शनि बृहस्पति मंगल ११. गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, द कुम्भ बुध, शुक्र शानि बृहस्पति सूर्य, चन्द्र मंगल युप १२. दी, दू, थ, झ, ञ, दे दो, चा, ची मीन सर्प, चन्द्र मंगल बृहस्पति सानि शुक्र टिप्पणी-किसी के नाम के प्रथम अक्षर में हस्य मामा हो- तो भी दीर्घ मात्रा की जो राशि बताई गई है वही ह्रस्य मात्रा वाले की भी होगी। उदाहरण के लिए किसी का नाम 'दिनेग' है। ऊपर 'दी' की राशि मीन बताई गई है तो 'दिनेश' को भी मीन राशि होगी।
मास, चार तथा घण्टे का महत्व अब प्रश्न यह है कि मीन राशि वाले व्यक्ति को मंगल को कोई कार्य करना है तो वह कब करे ? मंगलवार को जब सूर्य, चन्द्र, मंगल या बृहस्पति की होरा हो तो उसे विशेष अनुकूल होगा। यह प्राचीन आर्य सिद्धान्त पर अवलम्बित है। विशेप विवरण के लिए 'समर सार' नामक संस्कृत ग्रन्थ का यह प्रकरण देखना चाहिए जिसमें युद्धकाल में वजित होरामों का विवेचन किया गया है। शुभ कार्य करने के लिए ऊपर जो चक्र दिये गए हैं कि किस व्यक्ति के लिए कौनसे पण्टे अनुकूल होंगे-उनके साथ यदि 'अमृत घटी' का योग भी कर लिया जाये तो सोने में सुगन्धि हो जावे। अमृत घटी के चक्र प्रायः पचागो में दिए रहते हैं-यहाँ भी पृष्ठ १०५ दिये गये हैं। नवीनमत-बहुत से विद्वान् घण्टे की संख्या को मुख्य मानते है। उनके मतानुसार सर्वत्र सब स्थानों के लिए १२ से एक तक एक घण्टा, १ वजे से दो बजे तक दूसरा घण्टा--इस आधार पर । जो संख्या किसी व्यक्ति को अनुकूल हो उसी संख्या का घण्टा मनुक्कल होगा। उनके हिसाब से जो सप्ताह का दिन हो उसकी संख्या (रवि को १ तथा ४, सोम की २ तथा ७, मंगल की ६, बुध की ५, वृहस्पति की ३, शुक्र की ६, शनि की ८) तथा घण्टे की संख्या, दोनों यदि किसी व्यक्ति के अनुकूल हों तो यह धंटा रस । व्यक्ति के लिए अच्छा रहेगा। विंबई के प्रसिद्ध विद्वान् श्री वी० जी० रेले द्वारा लिखित एक १. Practical Astro Numerology से. यी थी. जी. रेते ।
अंक-विद्या (ज्योतिष) पुस्तक प्रकाशित हुई है। इसके विद्वान् लेखक के अनुसार सूर्योदय से पहला घंटा, फिर दूसरा घंटा, फिर तीसरा घंटा-इस प्रकार घंटा लेने से प्रत्येक स्थान का सूर्योदय भिन्न होने के कारण और किसी एक स्थान में भी सूर्योदय में निरन्तर अंतर पड़ते रहने के कारण होरा' के अनुमार अनुकूल या प्रतिकूल घंटा चुनने में बहुत प्रसुविधा होगी। इस कारण प्रतिदिन मध्याह्न से-१२ वजे मध्याह्न मे एक बजे तक-सोमवार को चन्द्रमा का घंटा, दूसरा घंटा मंगल का, तीसरा घटा बुध का इस क्रम से मानना चाहिए । मंगलवार मध्याह्न को प्रथम घंटा मंगल का, द्वितीय घंटा बुध का इत्यादि। और जो ग्रह जिस कार्य के लिए अनुकूल हो, उमे उम कार्य के लिए चुनना चाहिए-यथा मंगल का घटा क्रूर कर्म के लिए, शुक्र का घंटा आमोद-प्रमोद के लिए इस प्रकार से मध्याह्न से घण्टा गिनने की शैली फेरियल' नामक अगरेज़ ज्योतिपी ने भी अपनाई है। परन्तु हमारे विचार से इस प्रकार-मध्याह्न मे पएटों का प्रारम्भ करना अवैज्ञानिक और प्रशाम्नीय है । इसलिए हमारे विचार मे जो 'होरा' विचार हमने इस प्रकरण के प्रारंभ मे दिया है वहीं मास्त्र सम्मत पक्ष है। उसमे सही सिद्धान्त रखरखा गया है कि अपने राशि के स्वागी की या उसके मिन को होरा अनुगल, अपनी राशि के स्वामी के समग्रह (न शय, न मित्र) की साधारण और अपनी राशि के स्वामी के शत्रु ग्रह की होरा प्रतिकूल पड़ेगी। इस का प्राचीन शास्त्रीय माधार यही वचन है शि. . ....अरि- गगस्य सा दो।"२ १. देखिए habila nf Numbers पृष्ठ १६६ । २. समरसार . ५१ तो२० ।
मात, पार सया तारीख पर गहत्य
१०५
इसके अतिरिक्त किसी शुभ कार्य के लिए अनुकूल समय चुनने
का एक सहज तरीका है। पाठकों के लाभार्य चौघडिया चक्र नीचे
दिया जा रहा है। दिन को ८ भागों में विभक्त कीजिए। इसी
प्रकार रात्रि को ८ भागो में विभक्त कीजिए। इन अष्टमांशों के
नाम शुभ, अमृत, चर, (चंचल) रोग, काल, लाभ,
उत्पात हैं जो
नीचे के चक्र से स्पष्ट होगा।
प्रत्येक कार्य के लिए 'शुभ', लाभ' तथा 'अमृत' श्रेष्ठ हैं ।
अमृत घटी सर्वश्रेष्ठ है।
एक एक भाग करीब पौने चार घड़ी का होता है । इस कारण
इसे चौघड़िया कहते है परन्तु वास्तव में दिन मान का अष्टमांश दिन
मे
एक भाग होता है और रात्रि मानका अष्टमांश रात्रि का एक भाग
होता है । जाड़े और गर्मी में दिन मान के अनुसार प्रत्येक भाग के
मांन में अंतर हो जाता है।
दिन का चौघड़िया
रात्रि का चौघड़िया
| रच | म बु गु शु |श
काउरोल
.
रच मावागु
-
9.बाल
फाउप्र
AAAAE
12424
जाम
७वां प्रकरण । जन्म-मास के अनुसार फलादेश जन्म की तारीख से इस बात का अन्दाज लगाना कि कौन-कौन सा वर्ष अच्छा और ,महत्वपूर्ण जायगा पिछले पृष्ठों में बताया जा चुका है । किन्तु कुछ फल ऐसे होते हैं जो सूर्य जिस राशि में जन्म के समय हो उसके अनुसार घटित होते हैं । एक वर्ष के अन्दर सूर्य वारह (१२) राशियों में भ्रमण कर लेता है । और एक वर्ष के बाद वारहों राशियों में घूमकर फिर पहली राशि में आ जाता है। इसका कारण यह है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। और जैसे गोल चक्कर में घूमता हुआ मनुष्य फिर चक्कर पूरा होने पर अपने स्थान पर आ जाता है उसो प्रकार पृथ्वी भी ३६५ दिन ६ घन्टा १ मिनट १२ मैकिण्ड में घूम कर वही पा जाती है । वास्तव में चक्कर तो लगाती है पृथ्वी किन्तु लगता ऐसा है कि, सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहा है । इस एक साल के समय को १२ हिस्सों में बांटा गया है। पजाव नपा बंगाल में वैसाखी या प्रथम वैशाख से वर्ष का प्रारम्भ मानते हैं । इस दिन सूर्य पहली राशि (विभाग) के प्रारम्भ विन्दु पर होता है । फिर करीब एक- एक महीने, एक-एक हिस्से या राशि में रहता है। किन्तु ३६५ दिन ६ घन्टे १ मिनट १२ संकिण्ड को १२ से भाग दिया जावे तो प्रत्येक राशि या हिस्से में ३० दिन से अधिक समय आवेगा । वास्तव में है भी ऐसा ही । पहला, दूसरा, तीसरा,दसवां, ग्यारहवां, बारहवां-सूर्य १०७ जन्म-मास के अनुसार फलादेश के ये ६ महीने कुछ छोटे होते है-प्रत्येक करीब ३० दिन का । बाकी के ६ महीने कुछ बड़े होते हैं । इस सम्बन्ध में विष्णु-पुराण तथा श्रीमद्भागवत में द्वादश सूर्य के नाम तथा अधिकारियों का वर्णन किया गया है।' पाश्चात्य ज्योतिप में जन्म मास का बहुत विस्तृत विचार है । अमुक मास में पैदा होने वाले व्यक्तियों का गुण-कर्म स्वभाव, ऐसा होगा-अमुक वर्ष जीवन का अच्छा जावेगा, अमुक वर्ष कष्टप्रद होगा, इस सब का बहुत अधिक विचार अंग्रेजी ज्योतिपियों ने किया है। पिछले ३१ वर्षों में हमने इस विषय की अनेक पुस्तकों का अव- लोकन कर जव फलादेश मिलाया तो देखा कि कोई-कोई बात तो विलक्षण रूप से ठीक बैठती है-परन्तु कोई-कोई नहीं मिलती। इसका कारण यह हैं कि, इन सब पुस्तकों में सूर्य किस राशि में है इस आधार पर फल दिया हुआ रहता है किन्तु सूर्य के अतिरिक्त चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, हर्शल, नेपच्यून- जन्म लग्न आदि के अनुसार भी गुण-कर्म स्वभाव, भाग्योदय आदि में परिवर्तन होता है । पाश्चात्य ज्योतिष तथा भारतीय ज्योतिप में एक और अन्तर है। सूर्य करीब-करीब एक महीना प्रत्येक राशि में रहता है यह मत तो दोनों में समान है-किन्तु किस तारीख से किस तारीख तक किस राशि में रहता है-इस सम्बन्ध में दोनों के पृथक्-पृथक् मत है जो अगले पृष्ठ पर दिये जाते हैं। १. विष्णुपुराणं दशम अध्याय तथा श्रीमद्भागवत स्कन्ध १२ १० ११ २. देखिए You and Your Stsr by Cheiro तपा Be Your Own Astrologer by Iris Vorel.
. १०५ अंक-विद्या (ज्योतिष) पाश्चात्य मतानुसार भारतीय ज्योतिष के अनुसार १. २१ मार्च से २० अप्रैल तक १३ अप्रैल से १२ मई तक २. २१ अप्रैल से २१ मई तक १३ मई से १४ जून तक ३. २२ मई से २१ जून तक १५ जून से १५ जुलाई . ४. २२ जून से २३ जुलाई तक १६ जुलाई से १६ अगस्त ५. २४ जुलाई से २३ अगस्त तक १७ अगस्त से १६ सिता ६. २४ अगस्त से २३ सितम्बर तक १७ सित० से १६. अक्तू १७.२४ सितम्बर से २३ अक्तूबर तक १७ अक्तूबर से १३ नव० ८. २४ अक्तूबर से २१ नवम्बर तक १४ नव० से १४ दिस० ६. २२ नवम्बर से २२ दिसम्बर तक १५ दिस० से १३ जनवरी १०. २३ दिसम्बर से २० जनवरी तक १४ जन० से १३ फरवरी ११. २१ जनवरी से १६ फरवरी तक १४ फरवरी से १३ मार्च १२. २० फरवरी से २० मार्च तक १४ मार्च से १२ अप्रैल पाश्चात्य तथा भारतीय ज्योतिष में भिन्नता सायन तथा निर- यन गणना के कारण है। इस कारण इस छोटी सी पुस्तक मे इसकी बृहद् पालोचना सम्भव नहीं है । प्रागे के पृष्ठों में हमने भारतीय ज्योतिप के आधार पर फल दिया है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार सूर्य के प्रथम राशि में होने का जो फल, १३ अप्रैल से १२ मई तक जन्म लेने वालों का दिया गया है, वही पाश्चात्य मत के अनुसार उन लोगों पर लागू होना चाहिये जिनका जन्म २१ मार्च से २० अप्रैल तक हुआ हो । इसी प्रकार भारतीय तथा पाश्चात्य ज्योतिष की तारीखों का अन्तर पागे की राशियों में भी पड़ जाता है जो ऊपर दिये गये विवरण से स्पष्ट हो गया होगा। इस सम्बन्ध में एक बात की पोर पोर ध्यान दिलाया जाता है।
जन्म-मास के अनुसार फलादेश वह यह है कि ऊपर जो तारीखें दी गई हैं वे करीब-करीब ठीक हैं । किन्तु कभी तो १३ तारीख को संक्रान्ति होती है कभी १४ तारीख को। इस कारण एक दिन का अन्तर कभी-कभी पड़ जाता है । इस लिये जिनकी जन्म तारीख बिलकुल संक्रान्ति (जिस दिन सूर्य बदलता है) के दिन पड़े-उन्हे उस साल के पंचांग से निश्चय करना चाहिये कि सूर्य किस राशि में है। अंग्रेज़ ज्योतिपियों ने मास के अनुसार भी शुभ अक आदि दिये है वे आगे के प्रकरण में मास फलानुसार दे दिये गये है किन्तु हमारे विचार से तृतीय प्रकरण में जन्म-तारीख के अनुसार जो शुभ अक, आदि दिये गये हैं वे अधिक ठीक बैठते हैं । यदि आप का जन्म १३ अप्रैल और १२ मई के बीच हुआ है' पंजाब तथा बंगाल में जन्म की तारीख एक बैसाख से लेकर ३०. वैसाख तक हो तो यह फल मिलेगा। यदि आपको अंग्रेजी जन्म की तारीख मालूम नही है तो जिस साल आपका जन्म हुआ है उस साल की जन्त्री लेकर देखिए । ऐसे व्यक्ति. मे अभिमान, उदारता, साहस आदि गुण विशेष पाये जाते हैं । धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ कलात्मक प्रवृत्तियाँ, (सुन्दरता की वस्तुओ की परख, सिनेमा, राग-रंग, चित्रकारी आदि से प्रेम) भी होती हैं । चतुरता और व्यापारिक कुशलता के साथ- साथ दृढ़ता और दूसरे से मुकाबला करने का हौसला भी होता है । साहस के कामों में (यथा सैनिक या पुलिस विभाग में) ऐसे व्यक्ति बहुत शीघ्र उच्च पद प्राप्त करते है और खेल-कूद तथा शिकार के शौकीन होते हैं। किसी भी स्थान पर जहाँ हुकमत करने का काम १. प्रमेवी ज्योतिष के अनुसार २१ मार्च से २० अप्रैल तक ।
मंकविधा (ज्योतिष) हो या मशीन, अग्नि, भट्टी, (लोहा या अन्य धातुओं का ढालना या तपाना आदि) मे उन्हें विशेष सफलता मिलती है। इन व्यक्तियों को बहुत शीन क्रोध पा जाता है और फिर शीघ्र ही शान्त हो जाता है । इन व्यक्तियों का सहसा प्रेम-सम्बन्ध हो जाता है परन्तु बहुत स्थायी नहीं रहता। इनके धार्मिक किंवा राजनैतिक विचार बड़े प्रावेश-युक्त होते हैं परन्तु स्थायी नहीं होते। किसी कार्य को प्रारम्भ करते समय तो यह लोग बहुत ध्यान देते हैं, परन्तु कार्य की समाप्ति तक ध्यान में कमी हो जाती है । इन लोगों की आर्थिक स्थिति परिवर्तनशील होती है (कभी द्रव्य काफी मात्रा में रहा तो कभी तंगी का सामना करना पड़ा)। जमीन-जायदाद का योग भी होता है । और कभी-कभी जायदाद (मकानादि) विवाह से (पति या पत्नी द्वारा) प्राप्त होती है। स्त्रियों के कृपा-पात्र होने के कारण काफ़ी लाभ होता है । और व्यापार में भी, साझेदारी के कार्यों में भाग्योदय होता है । भाई-बहनों का सुख कम होता है : वाल्यावस्था में कुटुम्व में कुछ ऐसी कठिनाइयां हों जिनके कारण मार्ग में रुकावट पड़े। आधी रात के बाद और दोपहर के पहले इन १२ घण्टों में जिसका जन्म हो उसको पिता का सुख मध्यम रहे । ऐसे जातकों को भ्रमण (सैर-सपाटे; दूसरे स्थानों पर घूमने जाना) बहुत प्रिय होता है और कभी-कभी कौटुम्विक परिस्थितियों के कारण या शत्रुओं से बचने के लिए बाहर जाना पड़ता है । पहाड़ पर चढ़ने या हवाई-जहाज द्वारा यात्रा के भी अवसर हो । ७ (सात) १६ (उन्नीस), ३०(तीस),४४-इन वर्षों में जातक के कुटुम्ब में या स्वयं को क्लेश का अवसर हो 1 अपनी प्रदूरदर्शिता के कारण जातक अपनी प्रायु को अल्प करता है । अपने पति या अपनी पत्नी के साथ 'नाम' मोर भक-विद्या का सम्बन्ध झगड़े के काफ़ी अवसर पाते हैं । और अपने स्वभाव की गर्मी के कारण नाइत्तफाकी (असौमनस्य) हो जाती है। विवाह प्रायः कम अवस्था में होता है और सन्तानसुख साधारण होता है । ऐसे व्यक्ति उच्च पद पर पहुँचते है परन्तु वहुत संघर्ष का सामना करना पड़ता है। सेना विभाग, वकालत, खान (खनिज-पदार्थ), इंजीनियरिंग आदि के कामों में विशेप सफलता मिलती है । ऐसे व्यक्तियों के मित्र भी बहुत होते है और यदि जन्म दोपहर के वाद तथा प्राधी रात के पहले हुआ हो तो मित्रों की सहायता द्वारा जातक उच्च पद पर पहुँचता है । ईर्ष्या के कारण ऐसे जातक के शत्रु अवश्य उत्पन्न होगे परन्तु विशेष हानि करने में असफल होगे। ऐसे व्यक्तियों को सिर-दर्द, ज्वर या सिर में चोट लगने की आशंका रहती है । पेट का विकार तथा अधिक अवस्था में गुरदे की बीमारी और अधिक रक्त-चाप (ब्लड प्रेशर) की आशंका होगी । वराह मिहिर के मता- नुसार इस समय सूर्य:मेप राशि में होने से जातक चतुर, अल्पवित्त, और साहसी (अस्त्र, शस्त्र धारण करने वाला) होता है, यदि २३ अप्रैल को जन्म हो तो बहुत उच्च पदवी पर पहुँचता है । सारावली के अनुसार जातक शास्त्र द्वारा, कलापटुता से किंवा अन्य उत्कृष्ट कार्यों से प्रसिद्धि प्राप्त करता है; युद्ध का शौकीन और प्रचंड स्वभाव का होता है । उसकी हड्डियों की काठी मजबूत होती है और भ्रमण (घूमने फिरने) का शौकीन होता है । वह श्रेष्ठता को प्राप्त होता है।' अंग्रेज ज्योतिपियों के अनुसार लाल रंग, मंगलवार तथा ६ की Secrets of Astrlogy by W. J. Tucker aut Art of Synthesis by Alan Leo.
'मंक-विद्या (ज्योतिष) संख्या इनके लिये शुभ है । किन्तु प्रतिवर्ष जब सूर्य मेपराशि में रहता है तब अन्य ग्रहों की युति तथा दृष्टि से उपर्युक्त फलादेश में तारतम्य होना स्वाभाविक है । यदि प्रापका जन्म १३ मई और १४ जून के बीच हुमा है ।' इस समय सूर्य वृपभ राशि में होता है और वृपभ (बैल) के गुण और अवगुण इन लोगों में पाये जाते है । ऐसे व्यक्ति परिश्रमी और काम में लगे रहने वाले होते हैं । बहुत धैर्यपूर्वक लम्बे समय तक काम करने से यह लोग नहीं घबराते और ऐसे कार्यों में इन्हें प्रायः सफलता मिलती है । इन्हें क्रोध जल्दी नहीं आता, पर एक बार क्रोधित हो जाने पर महीनों और वषों तक क्रोध की भावना मन से नहीं जाती। ऐसे व्यक्तियों की इच्छा-शक्ति दृढ़ होती है परन्तु वह अपने मन की बात को दूसरे पर प्रकट नहीं करते और जय तक अपने लक्ष्य पर नही पहुँच जाते तब तक परिश्रम-पूर्वक उसमें लगे रहते हैं । इसलिए ऐसे व्यक्ति शासन में सफल होते हैं। बहुत से जातकों को कृषि कार्य में भी रुचि होती है । और यह लोग उत्तम भोजन करने के बहुत शौकीन होते हैं। धैर्य-पूर्वक काम में लगे रहते है परन्तु फिर पाराम भी सुभीते के साथ करते है । इनके प्रेम सम्बन्ध में दृढ़ता नहीं होती और बहुत अधिक ईर्ष्या की मात्रा होती है । अत्यन्त परिश्रम या अनियमित पाहार- व्यवहार के कारण रोग का डर रहता है। स्वयं जायदाद प्राप्त करने का सुयोग होता है परन्तु मुकदमे या पड्यन्त्र के कारण हानि होने की सम्भावना रहती है और यह भी सम्भव है कि वहुमूल्य जायदाद आकस्मिक रूप से पोरों द्वारा १. अंग्रेवी ज्योतिष के अनुसार २१ मत से २१ मई तक । जन्म-मास के अनुसार फलादेश प्राप्त हो। मित्रों और सम्बन्धियों के स्नेह से ऐसे व्यक्तियों को प्रायिक उन्नति में वृद्धि होती है । यदि मध्य-रात्रि के बाद और मध्याह्न के पूर्व जन्म हो तो ऐसे जातक का पिता अपने समाज में प्रतिष्ठित और उत्तराधिकारी होता है । भाई-बहनों में से किसी एक से कप्ट को सम्भावना हो और सम्भवतः किसी सम्बन्धी के कारण लम्बी यात्रा करनी पड़े । यदि मध्यरात्रि के बाद और मध्याह्न से पहले जन्म हो तो बहुन यात्राओं का योग है और किसी एक यात्रा में सांघातिक रोग का भी भय है। सन्तान की ओर से विशेष सावधानी की आवश्यकता है। विशेषकर प्रथम सन्तान यदि लड़का हो तो बचपन में उसको काफी भय है । इसके अतिरिक्त सन्तान उन्नति करेगी और उनके द्वारा सन्तोप प्राप्त होगा। ऐसे व्यक्तियों का जीवन शान्तिमय होता है । कोई विशेष बड़ी घटनाएँ नही होती परन्तु ऐसे व्यक्ति अपनी जिद के कारण स्वयं कठिनाइयां पैदा कर लेते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः तिल्ली, जिगर या वायु की बीमारियों से पीड़ित होते हैं । 'गुरदे भी जैसे मजबूत होने चाहिए वैसे नही होते । ११, २३, ३५वें वर्ष में रोग की सम्भावना होती है । चौपायों से या तेज औजारों से जख्म होने का डर रहता है। किसी एक प्रेम- सम्बन्ध में घोर दुःख या निराशा का सामना करना पड़ेगा या वैवाहिक जीवन में । अन्त में अपने प्रिय (पति-पत्नी) का. अन्त अपने जीवन-काल में ही होने के कारण शोक होगा। जीवन के शुरू काल में आर्थिक हालत साधारण रहती है परन्तु अपने परिश्रम द्वारा. ऐसे मनुष्य अपना भाग्योदय क हैं। ।
मंक-विद्या (ज्योतिष) मित्र बहुत होंगे परन्तु उनसे निराशा होगी। ऐसे मनुष्य दीर्घायु होते हैं परन्तु आहार और बिहार को नियमित रखना चाहिए क्योंकि ऐसे जातक माया से अधिक भोजन करने के इच्छुक रहते हैं। 'वराह-मिहिर' के मतानुसार यदि ऐसा मनुष्य वस्त्र, सुगन्धित वस्तु का व्यापार या दुकान करे तो जीविका उपार्जन करने में सफल हो । ऐसा व्यक्ति गाने बजाने में कुशल, विलासी किन्तु किसी स्त्री से शत्रुता रखने वाला भी होता है या कोई स्त्री या स्त्रियाँ भी ऐसे व्यक्ति से शत्रुता रक्खें । 'सारावली' के अनुसार ऐसे व्यक्ति से कोई बांझ स्त्री शत्रुता करती है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी होता है, और उसको मुख तथा नेत्र का रोग होता है । उत्तम भोजन, कपड़े और खुशबूदार वस्तुओं का शौकीन परन्तु पानी से डरता है। ऐसा व्यक्ति व्यवहार-प्रवीण, क्रिया-कुशल होता है। अंगरेजी ज्योतिष के मतानुसार इन्हें ६ की संख्या, शुक्रवार तथा सफेद या हलका पीला रंग शुभ होगा। यदि आपका जन्म १५ जून तथा १५ जुलाई के बीच में हुआ है ।। पंजाब तथा बंगाल में इस महीने को पापाढ़ या असाड़ कहते हैं । आपाढ़ की.१ तारीख से ३० तारीख तक जिन लोगों का जन्म हुया है उनको यह फलादेश लागू होगा । ऐसे व्यक्ति मिलनसार १. विशेष विवरण के लिये देखिये E... The Principles of Astrolorowe Zodiacal Infiucnces f Harte २. नंगरेजी ज्योतिष के अनुसार पा . 2 B. 2.
जन्म-मास के अनुसार फलादेश और दूसरों के साथ मिल कर काम करने वाले होते हैं। यदि क्रोधित हो जाएं तो क्रोध शान्त होने पर फिर पश्चाताप प्रकट करते हैं । विद्या-प्रेम तथा अध्ययनशीलता ऐसे व्यक्तियों में पाई जाती है और व्यापारिक बुद्धि भी होती है । अपने पसन्द के विषय पर ऐसे व्यक्ति प्रायः बहुत अधिक बातचीत करते हैं अन्यथा उनकी बुद्धि अन्तर्मुखी होती है । गान-वाद्य आदि भी इन व्यक्तियों को । प्रिय होते हैं। आर्थिक स्थिति में बहुत परिवर्तन होता रहता है । कभी बहुत सम्पन्न तो कभी द्रव्य-हीनता । इनके पद में भी इसी प्रकार परि- वर्तन होते रहते हैं । इनके जीवन में कौटुम्बिक रहस्य तथा अन्तर्द्वन्द्व का एक विशेष भाग होता है और पिता के निमित्त से कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं। इनके सन्तान कई होंगी परन्तु उनमें आपस में या माता-पिता के प्रति विद्वप की भावना हो जायगी। कुटुम्ब के व्यक्तियों का मातहतों तथा भृत्यों के साथ मनोमालिन्य रहेगा। निम्नलिखित रोगों से पीड़ा की सम्भावना रहेगी-जहरीले जन्तु, चौपाये या चौपायों द्वारा प्राघात, मलेरिया, खसरा, मोतीझरा आदि तथा मसानों की कमजोरी। प्रेम सम्बन्ध के परिणामस्वरूप बहुत दुःख, कष्ट और निराशा होगी। सम्भव है एक से अधिक विवाह हों या विवाह के अतिरिक्त किसी से स्थायी प्रेम हो । अनेक प्रकार के तथा अनेक स्थिति के लोगों से मित्रता होगी। इनमें से कई जातक के शत्रु हो जायेंगे । जीवन के मध्य काल में अभ्युदय के मार्ग में बहुत बाधाएं होंगी। इसमें मुख्य कारण शत्रुनों का प्रतिबन्ध होगा और इन शत्रुतानों के लिए जातक स्वयं उत्तरदायी होगा। जातक दो प्रकार अंक-विद्या (ज्योतिष) के काम करता रहेगा । एक मुख्य और एक गौण । एक मित्र से विश्वास-घात की आशंका है । सहयोगी, पड़ोसी तथा ससुराल पक्ष में ऐसे जातक के विरुद्ध काफी पड्यन्त्र चलते रहेगे । इन लोगों का शुभ रत्न पन्ना है। श्वास के रोग तथा ठंड से बचना चाहिए। 'वराह मिहिर' के मतानुसार जिनका जन्म इन तारीखों के बीच में हो वह विद्वान्, ज्योतिष शास्त्र में प्रेम रखने वाला तथा धनवान् होता है । 'सारावली' के मतानुसार ऐसा व्यक्ति मेधावी, मधुरवाणी वाला, उदार प्रकृति का, बच्चों से बहुत प्रेम करने वाला, बहुत धनी और निपुण होता है । ऐसा पुरुप विनीत तथा बोलने में चतुर और बहुत मित्र वाला होता है। सम्भव है अपनी माता के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री ने भी इसके लालन-पालन में विशेष योग दिया हो।' अंग्रेज़ी ज्योतिष के अनुसार इन्हे हरा या हलका पीला रंग, बुधवार तथा ५ की संख्या शुभ है। यदि प्रापका जन्म १६ जुलाई और १६ अगस्त के बीच में हुपा है' ऐसे व्यक्तियों का चित चलायमान और उद्विग्न रहते हुए भी निरन्तर क्रियाशील रहता है। ऐसे व्यक्ति हृदय की बात को सहसा प्रकट नहीं करते और पवित्र प्रादर्शों पर कायम रहने की चेष्टा करते है, परन्तु उनके विचारों में हवाई किले बांधने १. विझोप विवरण के लिये देखिये Elementary Astrology by Sepharial #41 Stor Dust by G. Hilda Fagan १. अंची ज्योतिष के मनमार २२ जून से २३ नसाई सका - जन्म-मास के अनुसार फलादेश की प्रवृत्ति बहुत होती है । उनको प्रकृति और मानसिक अवस्था में इतनी चंचलता रहती है कि दूसरे के साथ एकरस व्यवहार नहीं रख सकते। एक बात को छोड़कर नई पीछे लग जाना और उसमें सहानुभूति तथा सफलता की प्राशा करने का, इनका स्वभाव है । ऐसे व्यक्ति विवेकशील, स्वतन्त्र प्रकृति के तथा अनेक कार्यों में दक्ष होते हैं । ऐसे जातक व्यापार में कुशल होते है और धन तथा सम्मान के लिए ससृष्ण रहते हैं । इन व्यक्तियों में धार्मिक वृत्ति भी पाई जाती है। ऐसी स्त्रियां परिश्रम करने वाली तथा हुक्मत करने की इच्छा करने वाली होती हैं। चन्द्रमा की राशि में सूर्य होने के कारण इनकी चित्त-वृत्ति इतनी बदलती रहती है कि कभी एक स्वभाव को पोर तो कभी दूसरे स्वभाव की ओर हो जाती हैं । और इस कारण ऐसी स्त्रियां आवेश में आ जाती है, परन्तु थोड़ी देर में शान्त हो जाती है । धनसंग्रह बड़ी कठिनता से होगा और जो होगा उसको सन्तान या सम्बन्धी बरबाद करते रहेंगे। ताश, घुड़दौड़, सट्टे या चोरी द्वारा धन हानि की काफी अाशंका है परन्तु जीवन के उत्तरार्द्ध में धनी होने की सम्भावना है । युवावस्था में अपनी पसन्द के मुताबिक व्यवसाय करने के मार्ग में काफी रोड़े अटकाये जायेंगे। भाई या भाइयों से झगड़ा हो' या 'मृत्यु हो । अपने कुटुम्ब के अलावा दूसरे कुटुम्ब से विशेष सम्बन्ध रहेगा। सन्तान काफी चिन्ता उत्पन्ने करती रहेगी । उनको अच्छी प्रकार कारोबार में लगाने में कठिनता होगी, परन्तु सबसे बड़ी सन्तान उच्च पद पर पहुँचेगी । ऐसे व्यक्ति प्रायः विवाह करना नही चाहते और विवाह हो जाने पर भी पति- पत्नी सम्बन्ध प्रेम मय रहीं रहता। और पति या पली को जायदाद , ANK अंक विधा (ज्योतिष) T मिलने की सम्भावना है परन्तु मुकदमे के बाद इसमें सफलता मिल सकेगी। यात्राएं काफी लम्बी होंगी और उनसे लाभ भी होगा और एक बड़ी मात्रा के बाद उसको प्रसिद्धि भी प्राप्त होगी। स्थान परिवर्तन से धन तथा व्यवसाय दोनों को हानि होगी क्योकि ऐसे मनुष्यों के सम्पर्क में आना होगा जिनसे १४, २६ और ३० वर्ष की आयु में क्षति की सम्भावना हैं । ३५वें वर्ष के करीब जातक के जीवनक्रम में एक परिवर्तन पाएगा, अच्छे से बुरा या बुरे से अच्छा । उसके बाद एक सा कम चलता रहेगा । जातक के बहुत से मित्र और सहायक होंगे। और इस समय में उत्पन्न स्त्रियों को सम्बन्धी पुरुषों द्वारा, तथा ऐसे पुरुषों को उच्च श्रेणी की स्त्रियों द्वारा लाभ की सम्भावना है परन्तु किसी ऐसे सहायक की सहसा आर्थिक क्षति हो जाने के कारण जातक के भाग्य पर नाशकारी प्रभाव पड़ेगा। • २०, ३२तथा ४०वें वर्ष में मित्र रूप में ज्ञात होते हुए परन्तु वास्तव में गुप्त या प्रकट शनुओं के पड्यन्त्र से या विश्वासघात से क्षति की सम्भावना है । साधारणतया स्वास्थ्य अच्छा रहेग परन्तु फेफड़ों तथा पेट को विशेष सुरक्षित रखना चाहिए.। शस्त्रों के आघात की भी आशंका है । इन जातकों पर चन्द्रमा का विशेष प्रभाव रहने के कारण जल मार्ग से, समुद्र पार की वस्तुओं से तथा साहित्य आदि से इन्हें विशेष लाभ हो सकता है। इन्हें निष्कारण चिन्ता होती है इसलिए चित में हढ़ता रह्नी चाहिए। मोती, प्रोपल (opal) तथा Moonstone (मून स्टोन) पहनना लाभदायक है।
जन्म-भात के अनुसार फलादेश "वराह मिहिर' के मतानुसार ऐसे व्यक्ति तीक्ष्ण, शीघ्र कार्य करने वाले तथा दूसरों के अधीन काम करते हैं । इन्हें काफी क्लेश और परिश्रम उठाना पड़ता है। 'सारावली' के मतानुसार ऐसा व्यक्ति कम करने में चपल, विख्यात, अपने पक्ष से भी द्वेप करने वाला, पिता आदि की आज्ञा न मानने वाला, दूसरों के कथन तया देश के विषय में जानकारी रखने वाला होता है । इसे जीवन में काफी श्रम उठाना पड़ता है । कफ तथा पित्त कुपित होने से रोग होते हैं । जिस समाज में मद्यपान प्रचलित है उस समाज के लोग मद्य-प्रिय भी होते हैं । यह स्वयं देखने में स्वरूपवान होते हैं, परन्तु इन्हें पति या पत्नी उतने सुन्दर नही मिलते ।' कभी कभी अन्य ग्रहों की दृष्टि के कारण उपर्युक्त फल में अन्तर हो जाता है । अंगरेजी ज्योतिप के अनुसार कुछ बैंगनी या हल्का जामुनी रंग, सोमवार तथा २ को संख्या शुभ होगी। यदि आपका जन्म १७ अगस्त से १६ सितम्बर के बीच में हुआ है। इस समय सूर्य सिंह राशि में होता है । इस कारण इस समय में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति सिंह के समान निर्भीक, उदार और अभिमानी होते है । उनके चित्त में दृढ़ता, साहस तथा धैर्य विशेष मात्रा में पाये जाते हैं और वह अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने १. विशेष विवरण के लिये लिये "Lyndoes' Plan with the Planets. २. देखिये Some Principles of Horoscopic Delineation by c. E.O.Carter ३. अंगरेची ज्योतिष के अनुसार २४ जुलाई से अगस्त तक अंक-विद्या (ज्योतिष) में ईमानदारी और प्रकट व्यवहारी काम में लाते है। ऐसे आदमी अभिमानी होने के कारण बहुत जल्दी नाराज़ हो जाते हैं परन्तु उनमें न्याय-प्रियता की मात्रा इतनी अधिक होती है कि उनके कोष से लोगों को अकारण हानि नहीं होती और बुराई का बदला भी भलाई से देते हैं । इनका प्रेम भी दृढ़ होता है । सिंह राशि मे सूर्य अपनी राशि का होता है इसलिए इस राशि में सूर्य तथा सिंह दोनों की प्रकृति विशेष पाई जाती है। वीरता सम्पन्न होने के कारण ऐसे व्यक्ति सैनिक विभाग में शीघ्र उन्नति प्राप्त करते हैं और शासन सम्बन्धी कार्यों में विशेष सफल होते हैं । ऐसे व्यक्ति अपने परिथम से सम्पत्ति उपार्जित करते हैं परन्तु जुग्रा, सट्टा तथा उधार देने के कारण द्रव्य को हानि की भी सम्भावना है । द्रव्य के विषय में भाई-बहनों की ओर से उचित व्यवहार नहीं प्राप्त होगा। किसी एक निकट-सम्बन्धी को मृत्यु के कारण इनको प्राधिक स्थिति को धक्का लगने की सम्भावना है। किसी एक यात्रा में कुछ विपद् की सम्भावना होगी। जायदाद के बंटवारे के कारण सम्भवतः सम्बन्धियों से .मन-मुटाव हो। किसी एक याना के समय पिता को भी विपद् की सम्भावना होगी। ऐमी स्त्रियों को कभी कभी जुडले बच्चे होते है अथवा प्रसव के समय या उसके बाद विशेष कप्ट होता है। पति या पत्नी के विचारों से संघर्ष के कारण सुख का अभाव होता है । वसीयत , के द्वारा धन-जायदाद पाने की सम्भावना है जिसमे सम्बन्धियों द्वारा रोड़े अटकाये जायेंगे । यात्राएं काफी करनी पड़ेंगी । और एक विशेष यात्रा के बाद भाग्योदय होगा। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः ऐसे पद मिलते हैं जिनमे सम्मान ज्यादा होता है परन्तु माय कम । मित्रों की संख्या
जन्म-मास के अनुसार फलादेश
चाहे अधिक हो परन्तु उनसे लाभ की सम्भावना कम और हानि
को अधिक । परन्तु शत्रु ऐसे जातक से दवे हुए रहेंगे।
निमोनिया, वातज-व्याधि तथा तिल्ली, हृदय और मसाने की
बीमारियों से बचना चाहिए।
पाश्चात्य ज्योतिषियों के मतानुसार इस समय पैदा हुए
व्यक्ति बहुत खुशामदपसन्द होते हैं और यदि उनकी आवश्यकता
से अधिक भी चापलूसी की जाय तो भी प्रसन्न ही होते हैं। एक
अंगरेज ज्योतिषी के मतानुसार ये प्रेम करने के शौकीन और
स्वभाव से बहुत जल्दवाज होते हैं ।
'वराह मिहिर' के मतानुसार यदि सिंह राशि में सूर्य हो तो
इस समय में उत्पन्न हुए मनुष्य को वन, पहाड़ और गार्यों में विशेष
प्रीति होती है और मनुष्य वीर्यान्वित और बुद्धिमान् होता है ।
'सारावली' के मतानुसार जिसके जन्म के समय सिंह का सूर्य
होता है वह व्यक्ति स्थिरसत्व, गम्भीर, विख्यात, क्षिति-पालक तथा
धन-सम्पन्न होता है किन्तु वृद्धावस्था में ऊँचा सुनने लगता है।
एसा व्यक्ति उत्साही, शूर, क्रोधी और तेजस्वी होता है । भौर सपने
शुत्रुओं का नाश करने में समर्थ होता है। रपिगार, १ सपा ४ को
संख्या तथा पीला, सुनहरा और नारंगी का रंग हगने लिए शुभ है।
यदि आपका जन्म १७ सितम्बर से १६ मपयूमर के भीगा है।
कन्या का सूर्य प्रायः १७ सितम्बर से १६सागर तक रहता
१. विशेष विवरण के लिये देखिये
Practical Astrology liy Saint Germain MITT Astrok
Aspects by C. E. O. Carter.
२. अंप'ची ज्योतिष के अनुसार गत से
.
१२२ अंक-विद्या (ज्योतिष) है। पंजाब मौर बंगाल में प्रायः १ माश्विन से ३० माश्विन तक जो देशी तारीखें प्रयुक्त होती हैं उनमें से किसी दिन यदि जन्म हो तो यह विवरण विशेष मिलेगा। इस समय जो जातक पंदा होते हैं वह स्वयं अपनी योग्यता से उन्च पदों पर पहुँचते हैं । इनको प्रकृति में न्याय-प्रियता तथा दयाशीलता रहती है और यह प्रत्येक कार्य पर ठंढ़े दिमाग से विचार करते हैं । इसका अधिष्ठता बुध है इस कारण बुध के अच्छे गुण, विचारशीलता, बुद्धिमत्ता आदि इन जातकों में विशेष मात्रा में पाए जाते हैं । परन्तु जैसा इस राशि का नाम है अर्थात् कन्या, उस राशि के अनुरूप गुण ' अर्थात् नम्रता तथा लज्जा का स्वभाव भी बहुत अधिक प्रभाव रखता है। शिक्षा की उन्नति तथा समाज में विशेष सम्पर्क में आने से अधिक अवस्था में लजीलेपन में कमी आ जाती है परन्तु यह इन का प्राकृतिक गुण है। इन जातकों को सहसा क्रोध नहीं आता परन्तु क्रोधित होने पर शान्त भी बहुत समय बाद होते हैं । अच्छा यह है कि इनके क्रोध से किसी को हानि नहीं होती और इनको अनुचित क्रोध पर पश्चात्ताप भी होता है 1 ऐसे व्यक्ति प्रायः वाग्मी होते हैं मोर चित्र तथा कलाओं में विशेष प्रेम होता है और पसन्द की छोटी-छोटी चीजों के संग्रह में विशेष रुचि होती है। अधिक शिक्षित लोगों में दार्शनिक तथा वैज्ञानिक अध्ययन में रुचि तथा तत्परता पाई जाती है। बचपन में शारीरिक चोट लगने का विशेष अन्देशा होता है। प्रारम्भिक जीवन में आर्थिक सफलता भी नहीं मिलती, बहुत परिश्रम और व्यक्तिगत योग्यता के. कारण जो द्रव्य या उच्च पद प्राप्त करते हैं उसकी सहसा हानि की सम्भावना रहती है।
जन्म-मास के अनुसार फलादेश यात्राएं भाग्योदय में सहायक होती हैं । सम्बन्धियों से कोई विशेष सहायता की अपेक्षा नहीं । भाई-बहन बहुत से होंगे परन्तु उनसे सुख नहीं होगा। वैवाहिक जीवन में भी अन्य प्रेमों के कारण बाधा की सम्भावना है। ऐसे जातकों को चाहिये कि अपनी सन्तान की रक्षा में विशेष प्रयत्न-शील हों क्योंकि इन (सन्तानों) का ऊंची जगह से गिर कर या डूबने से या चौपायों द्वारा हानि की सम्भावना रहती है। इन जातकों के प्रेम सम्बन्ध में बहुत बाधाएं होती है और इन वातों को लेकर सम्बन्धी तथा मित्रों में या पति-पत्नी के बीच झगड़े हो जाते है। यह व्यक्ति धार्मिक विचार के होते है । सम्भवतः ऐसा मनुष्य दूसरी शादी करे। दूसरे विवाह से इसके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जायगा । विरासत में कोई विशेष सम्पत्ति नहीं प्राप्त होगी और जो मिलेगा भी वह मुकदमेबाजी के बाद । यात्राएँ विशेष करनी. होंगी और शायद विदेश भी जाना पड़े। इन यात्राओं का सम्बन्ध या तो अपने धनोपार्जन से होगा या किसी उच्च-पदाधिकारी की आज्ञा से । ऐसे व्यक्ति बहुत परिश्रम के बाद धन-उपार्जन करते हैं और जिस कार्य को करते हैं, उसमें शारीरिक भय की भी सम्भा- वना रहती है। मित्र थोड़े होते हैं और उनसे कोई विशेष लाभ की सम्भावना नहीं होगी। कला जगत् तथा व्यापारिक' जगत् के कुछ लोग ऐसे जातक से शत्रुता का भाव रखेंगे और नुकसान के कामों में रुपया लगवा कर आर्थिक क्षति करवायेंगे । पेट, जिगर तथा पैरों को विशेष रक्षा करनी चाहिये । पाश्चात्य ज्योतिषियों के अनुसार ऐसे पुरुष अन्य स्त्रियों को और इस समय पैदा होने वाली स्त्रियां अन्य पुरुषों को * . भाक- अंक-विद्या (ज्योतिष) पित करने का विशेष गुण रखती हैं और इनके स्वभाव में स्थिरता नहीं होती । पेट की खराबी या स्नायु जाल की कमजोरी के कारण इन्हें रोग होते हैं। “वराह मिहिर" के मतानुसार जिनका जन्म इस समय होता है उन पुरुषों का शरीर स्त्री के शरीर की भांति कोमल व स्निग्ध होता है और ऐसे व्यक्ति चित्रकारी, काव्य तथा गणित में विशेष चतुर होते हैं। 'सारावलो' के मतानुसार ऐसे व्यक्ति लज्जालु, मेधावी, गाने- बजाने में निपुण, मृदु तथा दीन वचन बोलने वाले होते हैं । बहुत बार स्थिर-नक्षत्रों से संयोगवश, एक राशि के अन्तर्गत सूर्य-चार के फला- देश में बहुत भिन्नता हो जाती है । परन्तु ऊपर सामान्य फल दिया गया है । अंग्रेज़ी ज्योतिष के अनुसार बुधवार, ५ की संख्या तथा अंगूरी या काफूरी रंग इन्हें शुभ होता है। यदि आपका जन्म १७ अक्तूबर से १३ नवम्बर के बीच में हुआ है। इस महोने में सूर्य नीच का होता है परन्तु तुला का स्वाभाविक गुण है समता इसलिए ऐसे जातक दयालु, प्रेम करने वाले तथा शुद्ध विचार के होते हैं । क्रोध जल्दी आता है परन्तु जल्दी ही शान्त भी हो जाता है । सूर्य प्राणी की आत्मा है इस कारण प्रात्मिक शक्ति १. ग्रहों के प्रभाव के विशेष संदान्तिक: पावन के सिपे देखिए :- Too Modern Text book of Astrology by Margaret E. Hone. #97 Tho Fixod Stars & Constellations in Astrology by V. E. Robson. २. अंग्रेजी ज्योतिष के अनुसार २४ सितम्बर से २३ अक्टूबर जन्म-मास के अनुसार फलादेश १२५ निवल होती है । सूर्य ग्रहराज है; इसके चारों ओर अन्य ग्रह परि- वर्तित होते रहते हैं। हमारी पृथ्वी सूर्य-मंडल का एक भाग है । इस कारण तुला में सूर्य के नीचस्थ होने के कारण बहुत से राजयोग अपना प्रभाव नहीं दिखा सकते हैं । तुला के सूर्य से राजयोग में इतनी कमी आ जाती है कि वराह मिहिर के पुत्र पृथुयशस ने तो यहाँ तक लिख दिया है कि यदि परम नीच सूर्य हो (करीब २७ अक्तूबर को जन्म हो) तो राजा का पुत्र भी हो तब भी भीख मांगेगा। इसलिए जिन कुण्डलियों में अच्छे ग्रह पड़े हों परन्तु जन्म १८-२० अक्तूबर या २८ अक्तूबर को हो, अच्छे ग्रह अपना प्रभाव नहीं दिखा रहे हों, तो यह समझना चाहिये कि यह अच्छे प्रभाव को रोकने वाला ग्रह तुला का सूर्य है और सूर्य की आराधना करनी ऐसे व्यक्तियों के विचार में और कार्यों में अनिश्चितता रहती है परन्तु ऐसे व्यक्तियों के दिमाग में उपज बहुत होती है और कला, विज्ञान तथा मशीनरी के कार्यों में प्रवृत्ति होती है परन्तु प्रात्मा में इतना बल नहीं होता कि इन सब बातों को अच्छी तरह पूरा करके लाभ उठा सकें । जीवन के मध्य भाग में ऐसे व्यक्ति का प्रायः चाहिए। १. स्वत्रिकोणाहं फेचित् स्वोच्चं याताः स्थमन्दिरम् । प्रति नांची रविश्चको न तेषां फससंभवः ।। उच्चस्थोपि तुलाशेवा स्थितः कमसबोधनः । सार्वभौमस्य पुत्रोऽपि नीचस्वमधिगच्छति ॥ तुलापो दशमे भागे स्थितः कमलयोधनः । पहले राजयोगानां नाशयरयाशु जन्मनि ।। -होरासार पृष्ठ २३६ १२६ अंक-विद्या (ज्योतिष भाग्योदय होता है । जल यात्रा से सम्बन्ध या जल से चलने वाली मशीनरी से लाभ होने की सम्भावना है। धन की रक्षा के लिए अदालत में जाना होगा, जिसमें विजय होगी परन्तु स्थायी शत्रता भी हो जायगी और अपनी पत्नी या पति से मतभेद भी हो सकता है । भाई-बहन बहुत हों उनमें से कुछ सम्भवतः सौतेले हों। भाई बहनों से सम्बन्ध प्रेम मय नहीं रहे। माता-पिता से कुछ मन-मुटाव रहेगा, विशेप कर पिता के साथ । यदि जातक मध्याह्न के बाद और मध्यरात्रि से पहले पैदा हुआ है तो उसको पितृसुख अल्प होगा। सन्तान थोड़ी होंगी और उनमें से एक के कारण काफी चिन्ता उठानी होगी। कौटुम्बिक जीवन में समय-समय पर उथल-पुथल होती रहेगी और यह सम्भव है कि ऐसा व्यक्ति किसी को गोद ले या किसी को गोद स्वयं जाए या किसी परिवार के साथ सम्मिलित हो । मसाने तथा मलाशय कमजोर रहें। विवाह से धन की सम्भावना है और सम्भव है किसी सम्बन्धी की मृत्यु से आकस्मिक धन-लाभ हो । समुद्र-यात्रा से कोई लाभ नहीं होगा प्रत्युत् हानि की सम्भावना है। जीवन के मध्य भाग में पद-हानि की सम्भावना है और सम्भवतः साक्षात् या परोक्ष रूप से माता का इस पद-हानि से कुछ सम्बन्ध हो । ऐसे व्यक्ति के पृष्ठपोषक भी बहुत से होंगे और उनकी सहायता से अच्छी जगह विवाह तथा ऊंचे स्थान की प्राप्ति भी होगी, परन्तु उन्हीं सहायकों में से एका का ऐसा जात महा अपकार भी करेगा । कौटुम्बिक मामलों को लेकर कुछ धार्मिक क्षेत्र के व्यक्तियों से शत्रुता भी होगी तया यकील और विद्वानों से भी ऐसे व्यक्ति को शत्रुता होगी। ऐसे व्यक्ति स्वयं अपने लिए कप्ट पंदा करते हैं और एक प्रकार १२७ करते रहते हैं। जन्म-मास के अनुसार फलादेश से अपनी मृत्यु के कारण भी स्वयं ही होते हैं । इसमें पैदा होने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य तो अच्छा रहता है परन्तु शारीरिक ढांचा बहुत मजबूत न होने के कारण वह अपने स्वास्थ्य के विषय में चिन्ता नीला या हल्का नीला रंग ऐसे लोगों के लिए विशेष अनुकूल होता है । शुक्रवार और ६ की संख्या भी इन्हें विशेष महत्वपूर्ण होती है । 'वराह मिहिर' के मत से ऐसे समय पैदा होने वाले मनुष्य यदि मद्य (सराव), डिस्टलरी, हाथी, पान, रास्ता चलने का काम (धूम धूम कर वेचना) इन्सपेक्टर, स्वर्ण का काम, या धन के लोभ से किसी भी होन काम को करें (जो अच्छा नहीं समझा जाता हो) तो इन्हें अच्छा लाभ होता है। 'सारावली' के मतानुसार ऐसा व्यक्ति बहुत व्यय करने वाला, विदेश में घूमने वाला, लोहे या दूकानदारी के कार्य से जीविका उपा- जन करने वाला होता है या दूसरों को नौकरी करता है ।' यदि आपका जन्म १४ नवम्बर से १४ दिसम्बर के बीच में हुआ हो। वृश्चिक का सूर्य प्रायः १४ नवम्बर से १४ दिसम्बर तक रहता है । इस समय जो जातक पैदा होते हैं वह लोग तीक्ष्ण युद्धि वाले परंतु चंचल स्वभाव के प्रादर्शवादी, अपनी धुन के तथा धार्मिक-विचार के होते हैं । इच्छाशक्ति हद होती है और धर्य के साथ काम में लगते है। स्वभाव जोशीला और क्रोधीला होता है । भय के काम :- १. विशेष विवरण के लिये देखिये Astrology For Every One by Evangeline Adams, man Cheiro': "When were you born ?" २. अंगालो ज्योतिष के अनुसार २४ अक्तूबर से २१ नवम्बर तक ग्रंक-विद्या (ज्योतिष) में पड़ने से ऐसे लोग झिझकते नहीं हैं। एक बार मोघ आने पर ऐसे लोग क्षमा करना नही जानते । मन में क्रोधाग्नि भीतर ही भीतर धधकती रहती है और यद्यपि बाहर से यह मालूम होता है कि यह शान्त हो गये परन्तु प्रतिहिंसा की भावना उनके अन्दर और भी भयानक रूप धारण कर लेती है और बिना परिणाम का विचार किये शीघ्रता-पूर्वक बदला लेने की भावना से ऐसे व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी को निर्दयता से हानि पहुंचाने की चेष्टा करते हैं । जिनके शरीर में कफ प्रकृति प्रधान होती है वह केवल अपने व्यक्तित्व से अपने विरोधी को दवा लेते हैं । यदि शिक्षा से ऐसे व्यक्ति सुसंस्कृत न हों तो प्राय: झगड़ालू स्वभाव के होते है और अकारण ही संघर्ष में आ जाते हैं । ऐसे जातक निपुण तथा धैर्यवान् होते हैं और ग्राम- जीवन तथा खेती के कारोवार को पसन्द करते हैं। अपने विचारों में वह इतने जिद्दी होते हैं कि दूसरों के समझाने से नहीं मानते । जीवन के पूर्वाद्ध में ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय नहीं होता परन्तु उत्तरधि में काफी सफलता मिलती है। पं. जवाहरलाल नेहरू, डा. राजेन्द्र प्रसाद, श्री राजगोपाला- चार्य, और श्री मावलंकर मादि बहुत से लोगों के ऐसे उदाहरण हैं जिनका विशेष अभ्युदय जीवन के उत्तरार्द्ध में हुप्रा । वृश्चिक का अर्थ है विच्छू । इसका प्रागे का प्राधा हिस्सा मृदु तथा एक प्रकार से अप्रभावशाली है। विष की तीक्ष्णता उत्तराद्ध में है । इस राशि में जब सूर्य होता है, सब जो मनुष्य पैदा होते हैं उनके जीवन के पश्चिम काल में विरोप अभ्युदय का यही हेतु है। ऐसे आदमियों को विरासत में सम्पत्ति मिलने का भी योग होता है । भाई थोड़े होंगे और उनमे से एक को ऊँचे से गिरने या जन्म-मास के अनुसार फलादेश डूबने का अन्देशा होता है। यदि ऐसा जातक मध्य रात्रि के बाद और मध्याह्न के पूर्व पैदा हुआ हो तो इसके पिता का पद और भाग्य नष्ट हो जाता है। सन्तान बहुत होती हैं। ज्वर, सिर दर्द तथा स्नायु सम्बन्धी दर्द की शिकायत होती हैं । इनका हेतु अत्यन्त परिश्रम या अत्यन्त भोग होता है। एक कड़ी बीमारी होगी परन्तु उससे जातक मुक्त हो जायगा । ऐसा मनुष्य अवश्य विवाह करेगा और सम्भावना यह है कि प्रथम पत्नी का सुख अधिक न हो और दूसरा विवाह करे। पत्नी को किसी चौपाए से या दुर्घटना से चोट लगने का भी अन्देशा होता है। यह भी सम्भावना है कि ३० वर्ष की अवस्था के पहिले किसी प्रेमी या मित्र की मृत्यु हो, जिससे हृदय को आघात लगे। काफी यात्राएँ करनी होंगी पर उन से कोई विशेष लाभ नहीं होगा। क्योकि ऐसे जातकों को प्रौढ़ावस्था के बाद सफलता प्राप्त होगी, जीवन का पूर्व भाग भाग्योदय के लिए संघर्ष में ही बीतेगा। मित्र ,बहुत होंगे और उच्च पदस्थ व्यक्तियों की कृपा भी प्राप्त होगी, किन्तु किसी एक मित्र अथवा संरक्षक के कारण सफलता में या प्रेम- सम्बन्ध मे वाधा होगी। शत्रुताएं भी बहुत होगी और प्रायः स्थायी रहेंगी। ऐसा मनुष्य समुद्रयात्रा करेगा तो विदेश में शारीरिक प्राघात का भय होगा। ऐसे व्यक्ति कफ-पित्त प्रधान होते है। ऐसे व्यक्तियों में क्रोध और ईर्ष्या की मात्रा विशेप होती है। ऐसे जातकों को कमर से नीचे भाग में रोग होने की विशेष सम्भावना रहती है, इस कारण सब प्रकार के संक्रामक रोगों से बचना चाहिए। ठंढे पानी का एनीमा लेना विशेष लाभदायक है। राजनीतिज्ञ, पालोचक, डाक्टर, इन्जीनियर, मशीन के कार्य १३० भक-विद्या (ज्योतिष) आदि में यह लोग विशेष सफल हो जाते हैं। मंगलवार और ह की संख्या इनके लिए महत्त्वपूर्ण होगी। कुछ श्यामता लिए हुए • लाल रंग भी लाभप्रद होगा। ऐसे लोग दूसरों के हृदय की बात भांप लेते हैं परन्तु इनके पेट की थाह पाना कठिन होता है। वराहमिहिर के मतानुसार ऐसे व्यक्ति साहसी, शास्त्र में पंडित तथा औपधि एवम् विप-चिकित्सा से विशेष धन उपार्जन कर सकते है। 'सारावली' के मतानुसार ऐसे व्यक्ति क्रोधी, सत्य से विमुख, स्त्री-सुख से हीन, तथा कलह-प्रिय होते हैं। यदि आपका जन्म १५ दिसम्बर से १३ जनवरी के बीच में हुआ हो। जिन मनुष्यों का जन्म इस समय होता है उन पर बृहस्पति का शुभ-प्रभाव रहता है क्योंकि इस समय सूर्य बृहस्पति के घर में होता है। ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान, ईमानदार तथा उदारहृदय के होते हैं और बिना प्रत्युपकार की भावना के दूसरों के साथ भलाई करते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों को क्रोध शीघ्र आ जाता है परन्तु शीघ्र ही शान्त भी हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर ऐसे व्यक्ति चिन्ता करते रहते है और भविष्य में प्राशंकित विपत्ति से परेशान रहते हैं । यह लोग स्वतन्त्रता के प्रेमी होते हैं। ये व्यक्ति वाग्मी होते १. इस सम्बन्ध में एक अच्छी पुस्तक :- "Character Reading Made Easy" by Frederic K. Mejer. २. प्रहों के प्रभाय के विशेष मध्ययन के लिये देखिये "The Principles of Astrology" By C.E.O. Carter. ३. प्रगती ज्योतिष के अनुसार२२ नवंबर से २२ दिसम्बर तक।
। जन्म-भास के अनुसार फलादेश हैं, और अध्ययन-प्रिय भी। विचारों में परिवर्तन होते रहते हैं। ये कारीगरी के कामों में भी निपुण होते हैं । - बचपन में इनकी आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं होती और पिता को आर्थिक क्षति की भी सम्भावना है; परन्तु अपने उद्यम से उन्नति करेगे। भाई-बहन कम होंगे और उनमें से एक के जीवन को कम उमर में अन्देशा होगा। माता-पिता या सास-ससुर में से एक से मतभेद हो और अपनी सबसे बड़ी सन्तान के कारण काफ़ी चिन्ता होगी। अपनी सन्तान से भी कुछ अनबन रहे । सम्भवतः विवाह दो हों, उनमें से एक के कारण काफ़ी क्षति उठानी पड़े। दो प्रकार के कार्य जातक एक साथ करता रहेगा, उनके कारण कार्य में बाधा भी रहेगी। ३० वर्ष की अवस्था तक ऊपर से गिरने का या ऊंचे पद पर पहुंचकर फिर नीचे आने का काफी अन्देशा है। यात्राएँ काफी करनी पड़ेंगी और किसी एक यात्रा के मध्य में किसी सम्बन्धी की मृत्यु का समाचार मिलेगा। मित्र बहुत होंगे परन्तु एक मित्र के विश्वासघात के कारण जातक की स्थिति को काफी धक्का पहुँचेगा । व्यवसाय तथा प्रेम दोनों क्षेत्रों में शत्रुओं से संघर्ष होगा । ऐसे व्यक्तियों को बृहस्पतिवार और ३ की संख्या शुभ होती है। गहरा नीला रंग भी इनके अनुकूल होगा। जो व्यक्ति इस महीने में पैदा होते है वे खेल-कूद तथा घोड़े को सवारी के बहुत शौकीन होते हैं। यदि सेना में प्रविष्ट हों तो तोरन्दाजी अथवा, गोली चलाने में बहुत निपुण होगे। इनके शरीर में या तो स्नायु-मंडल की कमजोरी के कारण रोग की आशंका होगी या वायु-जनित पीड़ा। वराह मिहिर' के मतानुसार जो व्यक्ति इस समय पैदा होते है . t १३२ अंक-विद्या (ज्योतिष) वे सत्पूज्य, धनवान्, वैदिक कार्य में कुशल तथा शिल्पकला में कुराल होते हैं : किन्तु उनकी प्रकृति में तीक्ष्णता रहती है। 'सारावली' के मतानुसार भी ऐसे व्यक्ति धनी, सरकार से सम्मानित, बन्धुओं के हितकारी और अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण होते हैं। यदि आपका जन्म १४ जनवरी से १३ फ़रवरी के बीच हुमा हो। मकर का सूर्य प्रायः १३-१४ जनवरी से १३ फ़रवरी तक रहता है । मकर राशि का स्वामी शनि है इसलिए जातक में बहुत से गुण शनि के पाये जाते हैं । इस समय जो पैदा होते है वह स्वयं अपने उद्यम से अपने भाग्य का निर्माण करते हैं और जो सम्पत्ति उपाजित करते हैं उसको नष्ट नहीं करते । शनि परिश्रमशील ग्रह है, इस कारण ऐसे जातक भी फुर्तीले और परिश्रमशील होते हैं। मध्यरात्रि के बाद और मध्याह्न के पहले यदि जातक का जन्म हो तो उसमें यह गुण विशेप मात्रा में पाये जायेगे। परन्तु यदि इसके अतिरिक्त १२ घण्टे में जन्म हुआ तो शरीर का कोई अंग दोप-युक्त हो या आकस्मिक घटना द्वारा ऐसा दोप वाद में उत्पन्न हो जाए। स्वभाव में उत्साह के साथ-साथ झगड़ालू प्रकृति भी होती है। भीतर से मन कभी-कभी बहुत उदास हो जाता है । ऐसे व्यक्ति द्रव्य कम खर्च करना चाहते हैं और जोड़ कर रखना चाहते है । व्यापारी बुद्धि इन लोगों की अच्छी होती है और एक से अधिक बातों में समान रूप से दक्ष होते हैं । इच्छा १. देखिये "How to Judge Nativity" तथा "Key to Your Nativity" By Alan Leo | अंग्रेजी ज्योतिष की यह अच्छी पुस्तक है। २. अंगरेजी ज्योतिष के अनुसार २३ दिसम्बर से २० जनवरी तक । ।
जन्म-मास के अनुसार फलादेश शक्ति प्रवल होती है और इस कारण अपने ध्येय में सफल होते हैं । इनके व्यवहार में उतना इखलाक नहीं रहता, जितना कि रहना चाहिए; इसलिए कुछ उद्दण्डता का प्रभाव पड़ता है । क्रोध देर में होता है और शान्त भी देर से । बिना सोचे-विचारे, ऐसे व्यक्ति कोई काम नहीं करते । इनके कामों में फुर्ती होती है और जन्म कुण्डली के २, १२, ६, ८ मे यदि क्रूर ग्रह न बैठे हों तो दृष्टि शक्ति अच्छी होती है। अपने उद्यम से धन प्राप्त होगा। भाई-बहन कई होंगे परन्तु सहायता की अपेक्षा हानि की सम्भावना अधिक है। छोटी-छोटी यात्रायें भी बहुत सी होंगी। पिता के किन्हीं २ व्यवहारों से खिन्नता होगी और कौटुम्विक परिस्थितियां भी असन्तोप का कारण होंगी। इनके वैवाहिक सुख में भी कुटुम्बियों द्वारा अड़चन डाली जायेंगी। जीवन में पूर्वार्द्ध में चोट लगने का या अधिक बीमार होने का हर है । बहुत बच्चे नहीं होंगे और इनके अपने व्यवहार के कारण बच्चों का जीवन उतना सक्रिय न हो सकेगा या उनके कारण इनके स्वयं के जीवन में, सफलता में बाधा होगी । यात्रा में काफी अड़चनें रहेंगी और सम्बन्धियों के कारण परेशानियां उठानी पड़ेंगी। शनि की राशि होने के कारण वात-व्याधि से ऐसे जातक पीड़ित होंगे। हाथ-पैर या जोड़ों में गठिया हो या वायु के कारण पाचन-शक्ति में गड़बड़ हो । ऊँचे से गिरकर चोट लगने का भी अन्देशा है । बिना किसी विशेष बीमारी के भी ऐसे आदमियों को कभी कभी बीमारी का वहम रहता है । विवाहित जीवन में पूर्णसुख प्राप्त नहीं हो और एक से अंक-विद्या(ज्योतिष) अधिक विवाह भी हो सकते हैं । शत्रु बहुत होंगे और ऊंची स्थिति के तथा नीची श्रेणी के दोनों ही प्रकार के लोग शत्रुता करेगे । भाई-बहन-कम से कम उनमें से एक-इसका मित्र सावित नहीं होगा परन्तु अन्त में विजय जातक की होगी। ऐसे व्यक्ति बहुत महत्वाकांक्षी होते हैं किन्तु परिथम-पूर्वक ऐसे कार्य द्वारा धन उपार्जन करते हैं जिनमें कोई घाटे की आशंका न हो। शनिवार और ८ की संख्या इनके लिए विशेष महत्वपूर्ण है । हरा अथवा काला खाकी रंग इनके लिए शुभ है। इन लोगों को रोग पाचन-शक्ति की खराबी के कारण होते है और वृद्धावस्था मे हृदय-रोग के होने की भी सम्भावना है अथवा वायु-विकार के कारण रोगों से पीड़ा हो। 'वराह मिहिर' के मतानुसार यदि मकर में सूर्य हो तो मनुष्य अनुदार, अज्ञ, कुत्सित वाणिज्य करने वाला, अल्प धनवान होता है। 'सारावली' के मतानुसार ऐसे आदमी के बन्धु उसका साथ नहीं देते। वह भीर, तृप्रणासहित बहु कार्यरत तथा लोभी होता है।' बहुत बार नक्षत्र विशेष से सूर्य युति होने पर उपर्युक्त सामान्य फलादेश में अन्तर भी पड़ जाता है, जो केवल जन्म कुण्डली द्वारा जाना जा सकता है। १. विशेष विवरण के लिये देतिये "You and Your Star" by Cheiro (पृष्ठ १.४०) २. देखिये "The Fixed Stars and Your Horoscope by Dr. V. J. Tacker, जन्म-मास के अनुसार फलादेश यदि आपका जन्म १४ फरवरी ओर १३ मार्च के बीच में हुप्रा हो।' कुंभ का सूर्य १४ फरवरी से १३ मार्च तक रहता है। जो लोग इस समय पैदा होते हैं उनकी ललित कलाओं की ओर विशेष रुचि होती है और सफलता भी प्राप्त करते है । ऐसे व्यक्ति प्रायः दीर्घजीवी होते हैं और वक्तृत्व तथा लेखन शक्ति अच्छी पाई जाती है । इनकी प्रकृति में सादगी, मधुरता तथा ईमानदारी होती है और क्रोध आने पर भी अधिक दिनों तक ईर्ष्या का भाव मन में नहीं रखते। इनकी कार्य-प्रणाली में तर्क की अपेक्षा इच्छा शक्ति ही अधिक रहती है । यह लोग एकान्त-प्रिय, धैर्य-शील तथा परिश्रमी होते हैं। एक बार जो राय कायम कर लेते है उस पर स्थिर रहते हैं। जो जायदाद ये लोग उपार्जित करेंगे वह स्थायी रूप से इनके अधिकार में नही रहेगी और शत्रुता का भाव रखने वाले व्यक्तियों के पड्यन्त्र के कारण जायदाद से वंचित होना पड़ेगा। ऐसे शत्रुओं में वह भी होंगे जो बाहर से मित्र मालूम होंगे। ऐसे जातक काफी यात्राएं करेगे । परन्तु उनसे कोई विशेष लाभ नहीं होगा प्रत्युत् धन तथा स्वास्थ्य में हानि की सम्भावना है। भाई-बहन थोड़े होंगे परन्तु उनसे कोई प्रेमपूर्ण व्यवहार नही प्राप्त होगा । किसी यात्रा में जल, शस्त्र या चौपाए से चोट लगने का अन्देशा है । पिता की आकस्मिक मृत्यु हो या सहसा धन का नाश हो। ऐसे व्यक्तियों के.कभी कभी जुड़ले बच्चे होते हैं और स्त्रियों . १. अंपरेची ज्योतिष के अनुसार २१जनपरोसे १६ फरवरी तक ।
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अंक-विद्या (ज्योतिष)
को प्रसव के समय भारी कष्ट को सम्भावना रहती है । जो बच्चे
होंगे उनका स्वास्थ्य बहुत दृढ़ नहीं होगा और उनके पालन-पोषण
में परिश्रम उठाना होगा।
पेट और फेफड़ों की बीमारियों तथा सिर दर्दसम्बन्धी
बीमारी होने का भय है। जिसका जन्म सूर्योदय के करीब होता
है उनको प्राय: हृदय रोग की बीमारी होती है । इसके लिए
सूर्य को अाराधना करनी चाहिए। इसी कारण कुंभ राशि के
अनेक नामों में से एक नाम "हृदय रोग" भी है
इनके भाग्योदय में उतार-चढ़ाव काफी होगा और उच्च श्रेणी
के व्यक्ति सहायता में तत्पर होंगे। इसी प्रकार शत्रु काफी होगे
परन्तु अन्त मे सब कठिनाइयों को पार करके ऐसे व्यक्ति समाज में
प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करते हैं।
जिन व्यक्तियों का इस समय जन्म होता है उनको कंठरोग
(टांसिल आदि) की शिकायत को भी सम्भावना होती है और
वात-जनित पीड़ा न हो इसके लिए रक्त को शुद्ध रखना चाहिए ।
यदि स्वास्थ्य का ध्यान ठीक न रखा जाय तो अधिक अवस्था मे
रक्त-चाप (ब्लड प्रेशर) का भय रहता है ।
हल्का नीला या बैंगनी रंग इनके लिए शुभ होगा। कुछ
पाश्चात्य ज्योतिषियों के अनुसार ४ की संख्या तथा शनिवार इनके
लिए शुभ है।
'वराह मिहिर' के अनुसार यदि जन्म के समय कुंभ का सूर्य
हो तो मनुष्य निम्न-वृत्ति का, धन-रहित, भाग्यच्युत होता है और
उसे सन्तान-कष्ट सहन करना पड़ता है अर्थात् कोई सन्तान नष्ट
हो या सन्तान आज्ञाकारी न हो।
भन्न-मास के अनुसार फलादेश 'सारावली' के मतानुसार जो पुरुप इस समय पैदा होते है वे चुगली करने वाले, व्यर्थ दात करने वाले, शठ होते हैं। उन्हें दुःख उठाना पड़ता है, किसी से स्थायी मित्रता नहीं होती और धन- संग्रह करने में सफल नहीं होते । यह सूर्य का राशिगत सामान्य फल है। प्राचीन अंगरेज ज्योतिपियों द्वारा जो विशेष फलादेश किया गया है उसके लिये निम्न-लिखित पुस्तक देखनी चाहिए।' यदि आपका जन्म १४ मार्च और १२ अप्रेल के बीच में हुमा हो ।' मीन का सूर्य १४ मार्च से १२ अप्रैल तक रहता है । मीन जल- राशि है, इसका स्वामी बृहस्पति है। इस कारण जो जातक इस समय में पैदा होते हैं उनमें जल-राशि तथा बृहस्पति से प्रभावित सूर्य के गुण आ जाते हैं। ऐसे व्यक्ति कला-विज्ञान तथा साहित्य में विशेप निपुण होते है और अपने गुणों द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं । बिना चेष्टा किये यह लाकप्रिय हो जाते हैं। इनकी प्रकृति में बेचैनी होती है, और अपने कार्य को स्वय आलोचना किया करते हैं। इनके विचारो में परिवर्तन होता रहता है और चाहते है कि शीघ्र से शीघ्र अपने उद्देश्य पर पहुँचे । इनकी प्रकृति में ईमानदारी होती है, परन्तु कल्पनाशील अधिक होते हैं। विलास प्रिय होने पर भी स्वाभिमान के कारण नीचे गिरने की , १. देखिये Lilly's Astrology By Zadkiel, Published by G. Bell And Sons Ltd. 4 Ptolemy's Tetrabiblos (English Translation by Ashmond) २. अंग्रेजो ज्योतिष के अनुसार २० फरवरी से २० मार्च तक १३८ अंक-विद्या (ज्योतिष) प्रवृत्ति को रोकते है। इनमें अधिकारी होने की भावना विशेष होती है। लोगों से मिलनसारी और मित्रता का भाव रखते हुए भी अपने हृदय की बात नही बताते। ऐसे व्यक्ति परिश्रमी होते है और दूसरों का बहुत प्रातिथ्य करते है तथा वार्तालाप में बहुत निपुण; लिखने पड़ने में भी बहुत प्रवीणता होती है। स्वयं अच्छा भोजन करने के शौकीन होते हैं तथा दूसरों को दावत देने का भी शौक होता है । स्वयं अपने गुणों के कारण काफ़ी धन उपार्जन करेंगे परन्तु फजूल खर्ची, सट्टा या सम्बन्धियों द्वारा धन का अपव्यय होगा । ऐसे व्यक्ति एक से अधिक काम में समान रूप से निपुण होते हैं और दोनों काम एक साथ करते रहते हैं । भाइयों की अपेक्षा बहनें अधिक होंगी और एक की मृत्यु कम अवस्था में हो ऐसी आशंका है । बचपन में इनके पिता के भाग्य का अपकर्ष हो । ऐसे लोग यात्रा भी अधिक करते हैं और साथ-साथ धन उपार्जन भी। सम्भवतः जायदाद सम्बन्धी मुकदमा भी करना पड़े। थोड़ी अवस्था में घर छोड़ कर जाना पड़े। विवाह भी एक से अधिक हों। इन में से एक विवाह से काफी परेशानी पड़े। स्थान-परिवर्तन कई वार हो । कुटुम्ब मे आकस्मिक दुर्घटनाएँ भी हों। इस समय में पैदा होने वाली स्त्रियों को गर्भाशय सम्बन्धी रोग होने की सम्भावना है। पुरुषों को भी गुप्त अंगों में रोगों की सम्भावना रहती है । हृदय तथा नेत्र सम्बन्धी बीमारियों से बचते रहना चाहिए । दु.स्वप्न पावें । असली गिर बहुत थोडे हों । किसी एक मित्र के कारण, जो शत्रु हो जाए, बड़ा भारी प्राघात हो। ऐसे व्यक्ति प्रायः समाज में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं। इस समय जो मनुप्य पैदा होते है उन्हें गहरा नीला रंग और .
जन्म-मास के अनुसार फलादेश बृहस्पतिवार शुभ होता है । ३ और ७ की संख्या भी शुभ होती है। 'वराह मिहिर' के मतानुसार जिनके जन्म के समय मूर्य मीन राशि में हो वे यदि जल से निकली हुई वस्तु या समुद्रपार देशों से माल मंगाने का या भेजने का (Import and Export) काम करें तो विशेष धन-लाभ हो सकता है। 'सारावली' के मतानुसार ऐसे मनुष्य मीठी वाणी बोलते हैं परन्तु उनमें असत्य की मात्रा भी होती है। स्त्रियों के सम्पर्क से इन व्यक्तियों का भाग्योदय होता है । ये लोग शत्रु पर विजय पाते है और इनके बहुत से पुत्र तथा भृत्य होते है ।' प्रायः सूर्य के विविध राशियों में होने से प्रत्येक राशि के फला- नुसार जातकों के स्वभाव, प्रभाव और भाग्योदय आदि में भी परि- वर्तन होता है । इसलिए पिछले पृष्ठों में सामान्य फल दिया गया है। किन्तु अन्य ग्रह बदलते रहते हैं। और किसी एक दिन में भी बारह लग्न हो जाते हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य की जन्म कुण्डली भिन्न होतो है और सामाजिक स्थिति, वातावरण- देश, काल, पान-के भेद से भिन्न-भिन्न फल दिखाई देते है, किन्तु हम अपने अनुभव के आधार पर यह अवश्य कह सकते है कि जो सूर्य का भिन्न २ राशि के अनुसार फल दिया गया है उसकी मुख्य-मुख्य बातें अवश्य मिलती हैं। अंग्रेज़ी ज्योतिष के आधार पर भिन्न-भिन्न सौर (सूर्य के) मासों मे पैदा होने वाले व्यक्तियों के शुभ और अशुभ अंक भी लिख दिये हैं परन्तु हमारा अपना अनुभव यह है कि अंग्रेजी की जन्म तारीख १. विशेष विवरण के लिये वेखिए 'Your Fate by Stella Coeli तया "The Zodiac and the Soul by C. E. O. Carter १४० अंक-विद्या (ज्योतिष) का जो अंक होता है उसके अनुसार शुभ अक अधिक मिलता है । उदाहरण के लिए ऊपर यह बताया गया है कि १४ फरवरी से १३ मार्च तक जो व्यक्ति पैदा हुए हों उनके लिए ४ का अंक शुभ है, ऐसा अनेक अग्रेज ज्योतिपियों ने लिखा है, इस कारण इस विचार को थोड़ी सी मान्यता हमने भी अपनी पुस्तक में दे दो है परन्तु यदि कोई मनुष्य २३ फरवरी को उत्पन्न हुआ हो तो २३ का मूल अंक २+३=५ होने के कारण हमारे विचार से उसे ५ का अंक ही विशेष शुभ होगा। मेलापक-विचार जिस प्रकार अक-विद्या से शुभाशुभ वर्ष, मास या दिन का विचार किया जाता है, अथवा 'प्रश्न' में अक-ज्योतिप की उपयो- गिता होती है, उसी प्रकार अमुक पुरुप का विवाह अमुक स्त्री से उपयुक्त होगा या नहीं, इस विषय मे पाश्चात्य ज्योतिषियों ने बहुत विचार किया है। एक अंग्रेज़ ज्योतिपी ने तो कई सौ पृष्ठ की- केवल इस विषय की पुस्तक लिखी है कि अमुक मास में पैदा होने वाला पुरुप अमुक मास में पैदा होने वाली स्त्री से विवाह करे तो किस प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक सुख-दुःख की उपलब्धि होगी। परन्तु इस पाश्चात्य दैवज्ञ ने केवल जन्मस्थ सूर्य को ही समस्त विचार का आधार रखा है। हमारे विचार से यद्यपि सूर्य ग्रहराज है तथापि केवल सूर्य-स्थिति को प्राधार मान कर वर-वधू मेलापक विचार करना समीचीन नही। भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्म के समय जिस नक्षत्र में चन्द्रमा था उसी के आधार पर वर-वधू के 1. Successful Blarriage by Pharos : Published by Richard Arling Ltd. 210-11 Piccadilly, London.
नाम धीर भंक-विद्या का सम्बन्ध १४१ गुण (नाड़ी, गण, वश्य, वर्ण आदि) मिलाये जाते हैं । अंक-विद्या के पोषक अंग्रेजी की जन्म तारीख को महत्व देते हैं और यदि वर तथा वधू की जन्म की तारीखों में सहानुभूति है तो उनके विचार से वर-वधू में प्रेम रहेगा । किन-किन तारीखों के मूल अंक में सहानु- भूति है यह तृतीय प्रकरण में बताया जा चुका है। नीचे सब तारीखो को ५ वर्गों में विभाजित किया गया है । (क) १,१०, १६, २८ (ख) २,११, २०, २६ ४, १३, २२, ३१ ७, १६, २५, (ग) ३, १२, २१, ३० (घ) ५, १४, २३ ६, १५, २४ ६, १८, २७ (ङ) ८, १७, २६ इस वर्गीकरण के अनुसार पुरुष की जन्म तारीख (क) के अन्तर्गत हो तो कन्या की जन्म तारीख (क) या (ख) के अन्तर्गत होना उत्तम है । यदि पुरुष की जन्म तारीख (ख) के अन्तर्गत हो तो, कन्या की जन्म तारीख (क) या (ख) के अन्तर्गत होना उत्तम है । यदि पुरुष की जन्म तारीख (ग) के अन्तर्गत हो तो कन्या की जन्म तारीख भी (ग) में होनी चाहिये। यदि पुरुष को जन्म तारीख (घ) के अन्तर्गत हो तो कन्या की जन्म तारीख का (घ) के अन्तर्गत होना उत्तम है। किन्तु यदि पुरुप की जन्म तारीख ८, १७ या २६ हो तो, "ऐसी कन्या से विवाह करे जिमको जन्म तारीखका मूल अंक न हो क्योंकि स्त्री तथा पुरुष दोनों का मूल अंक ८ हो यह अभिप्रेत नहीं है।
वां प्रकरण हस्त-रेखा और यंक-ज्योतिप का सामञ्जस्य अंक-ज्योतिष के विषय में पिछले प्रकरणों में यह बताया जा चुका है कि जन्म की तारीख से यह कैसे पता लगाया जाय कि कौन-कौन से वर्ष महत्वपूर्ण होंगे । अव इस प्रकरण में यह बताया जाता है कि भविष्य के निर्णय मे हस्त-रेखा विज्ञान तथा अंक- विद्या ज्योतिष एक दूसरे को कहाँ तक सहायता दे सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति हमको आकर अपना हाथ दिखाव और उसकी अंगरेज़ी को जन्म तारीख भी हमें ज्ञात हो तो दोनों की सहायता से क्या हम किसी विशेष नतीजे पर पहुँच सकते हैं । ' अंगरेजी हस्त-रेखा विशारद 'कीरो' ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि हस्त-रेखा के चिह्नों से "किस वर्ष में यह घटना "होगी", यह निश्चय करने के लिये वह मायु को सात-सात वर्ष के भागों में बाँटते थे ? प्रति सातवें वर्ष में, जीवन में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है, ऐसा उनका विनार था। 'कोरो' लिखते है कि डॉक्टरी या वैज्ञानिक दृष्टिकोण मे विचार करने से भी ज्ञात होता है कि मात-सात वर्ष का समय विशेष परिवर्तन उत्पन्न करने वाला होता है। बालक के उत्पन्न होने के पहिले भी गर्भ-पिएर, एक के पश्चात् दूसरी, इस क्रम से सात अवस्थानों में परिवर्तित होता है । मस्तिष्क के विकास में भी सात स्थिति होती है। मनुष्य के शरीर में प्रत्येक मात वर्ष के पश्चात् १. देखिये Cheiros Language of the Hand पृष्ठ १४ या १८८ । .
१४३ हस्त रेखा और अंक ज्योतिष का सामञ्जस्य नयी त्वचा, पुरानी त्वचा का स्थान ले लेती है। कीरो के मता- नुसार अनादिकाल से पृथ्वी के समस्त देशों में सात की संख्या का वहुत महत्व रहा है । पृथ्वी में सात नस्ल या जाति के लोग रहते है । सात ग्रह सप्ताह के सात वारों के अधिष्ठाता है । सात के महत्व के अन्य दृष्टान्त भी कीरो ने दिये हैं परन्तु स्थानाभाव के कारण उन्हें यहाँ स्थान नहीं दिया जा रहा है । कीरो के मतानुसार एक सात वर्ष के जीवन के भाग के बाद, दूसरा सात वर्ष का भाग छोड़कर जो तीसरा, पांचवा, सातवां, नवा भाग पाता है, उसमे समानता होती है। इसी प्रकार जीवन का जो दूसरा, ७ वर्ष का भाग है, उसी के समान जीवन का चौथा, छठा, आठवाँ, दसवां व बारहवाँ भाग होगा। उदाहरण के लिये यदि कोई वालक अपने जीवन के सातवें वर्ष मे बीमार और कमजोर रहा है तो वह अपने जीवन के २१ वे वर्ष में भी बीमार और कमजोर रहेगा। इसके विपरीत यदि कोई वालक बचपन में कमजोर और बीमार था लेकिन सातवें वर्ष से उसका स्वास्थ्य अच्छा रहने लगा और यदि वह आपके पास आकर वीस वर्ष की आयु में अपना हाथ दिखाता है कि स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, कव से उसकी तन्दुरुस्ती अच्छी रहेगी तो पाप उपर्युक्त सिद्धान्त के आधार पर कह सकते हैं कि २१ वे वर्ष से उसका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। शरीर मे जो अन्दरूनी मांस-पेशियाँ, रुधिर या ग्रंथियां हैं-~-जिनसे सदा रक्त-स्राव रहता है--वे प्रत्येक चौदह वर्ष में अपनी पूर्व स्थिति पर उमी प्रकार आ जाती हैं जैसे बारह घंटे वाद घड़ी भी छोटो सूई अपने स्थान पर पा जाती है । जहाँ तक शारीरिक स्वास्थ्य का सम्बन्ध है चौदह वर्ष को प्रणाली का प्रयोग बहुत अधिक मिलता है एसा कोरो का मत है
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टिप्पणी -यह पित्र "हम्तीमा विज्ञान' से दिया गया है। गि
विवरण लिये उपयुक पुम्मा का प्रयझोरन करें।
...म्पगी, दीया, दिल्ली-एन मंख्या १. मूल्य)
हस्त रेखा और अंक ज्योतिष का सामञ्जस्य अंक ज्योतिषविद्या का हस्त-रेखा विज्ञान से सामजस्य करने से हम बहुत कुछ ठीक-ठीक पता लगा सकते हैं। साथ के चित्र में यह दिखाया गया है कि जीवन-रेखा को हम सात-सात वर्षों के खण्डो में किस प्रकार विभाजित कर सकते हैं। साथ ही भाग्यरेखा को भी सात-सात वर्ष के खण्ड में बांटा गया है। यह चित्र कोरो के मतानुसार यह प्रदर्शित करता है कि युवावस्था के जीवन को यदि हम दो प्रधान भागों में बांटना चाहें तो पहला खण्ड २१ वर्ष की अवस्था से ३५ वर्ष की अवस्था तक होगा। जहाँ भाग्य-रेखा शीर्ष- रेखा को काटती है वहाँ से दूसरा खण्ड प्रारम्भ होकर ५६ वें वर्ष पर समाप्त होता है। जिस द्रा-उपार्जन मे मनुष्य का बाहुबल और बुद्धि विशेष प्राधार होते हैं उसका समय इक्कीसवें वर्ष से प्रारम्भ होता है। भाग्य-रेखा को सात-सात वर्ष के खण्डों में बाँट कर यह बताया गया है कि कब भाग्य की स्थिति कैसी रहेगी। इसी प्रकार जीवन रेखा को भी सात-सात वर्ष के खण्डों में बांटा गया है। हमारी "हस्त-रेखा विज्ञान" नामक पुस्तक में हमने यह अच्छी तरह समभाया है कि हाथ की रेखानों से वर्ष कैसे निकालना घाहिये । जिनके हाथ विशेष लम्बोतरे या अधिक चौरस हों, जिनकी हृदय-रेखा या शीर्ष-रेखा अपने स्वाभाविक स्थान पर न होकर अधिक ऊंची या नीची हो तो कीरो का यह पैमाना बिल्कुल ठीक नहीं बैठेगा, परन्तु हाथ की रेखानों में कौनसी रेखा से कौनसा पर्प समझना चाहिये, इसका अंक-ज्योतिप-विद्या से कैसे सांमजस्य करना चाहिये, यह नीचे बताया जा रहा है । उदाहरण के लिये एक मनुष्य प्रापके पास आता है। आप उसका हाय देखकर इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि ३६ से ४१वें वर्ष के अंक-विद्या(ज्योतिष) करीव जीवन-रेखा पर अशुभ चिह्न है और भाग्य रेखा पर भी करीब-करीब इसी अवस्था पर कमजोरी आ गयी है। आप उस मनुष्य से पूछते है कि इस समय उसकी अवस्था क्या है और क्या वह २५-२६ वर्ष की उम्र में वीमार हुअा था? वह आपको जवाब देता है कि इस समय उसकी उम्र ३७ साल की है, वह २६ वे वर्प में अधिक वीमार रहा था और वर्ष भर उसका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहा किन्तु २८ वें वर्ष से उसका स्वास्थ्य अच्छा रहने लगा। आप तुरन्त मन में विचार करते है जिस समय को प्राप ३६-४०-४१ वर्प समझ रहे थे-उसमें से कौनसा वर्ष है यह हस्त-रेखा से निश्चय नहीं कर सके थे-वह वास्तव में ४० वां वर्ष होना चाहिये, क्योकि कीरो के उपर्युक्त मतानुसार चौदहवां वर्ष, स्वास्थ्य के दृष्टि- कोण से एक-सा जाना चाहिये । श्राप ताईद के लिये (अपने निर्णय की पुष्टि के लिये) उसकी हस्त-रेखा देखते हैं कि करीव ग्यारह- बारह वर्ष की उम्र में जीवन-रेखा पर कुछ गढ्ढा, है । २६ वें वर्ष में वह कुछ बीमार हुअा था, यह ज्ञात होने के कारण आप उसमें से चौदह घटाकर पूछते है कि "बारहवें वर्ष में तो आप बीमार नही हुए ?" वह बारहवें वर्ष में वीमार होना स्वीकार करता है । उसके जीवन में बीमारी का चौदहवें वर्ष का क्रम ठीक बैठता है, इस नतीजे पर पहुंचते ही ग्राप निश्चयात्मक स्वर से कहते हैं "चालीसवे वर्ष में प्राप वीमार होगे किन्तु ४२ वे वर्ष से पूर्ण स्वस्थ हो जावेगे" श्राप से वह पुन: प्रश्न करता है कि वाद में तो कोई बीमारी नहीं है ? तो आप कह सकते है कि ५४ वें वर्ष में पुनः बीमारी का योग है । स्मरण रहे कि भविष्य कथन इतना सरल नही है जितना कि बहुत से लोग समझते हैं। केवल १४ जोड़ने में बीमार होना हस्त-रेखा और अंक ज्योतिष का सामञ्जस्य १४७ अवश्यम्भावी हो तो भविष्य-कथन बहुत सरल हो जावे । जब हस्त- रेखा से हम किसी निर्णय पर पहुँचे और हमे किस वर्ष में यह घटना होगी यह निश्चय करने में कठिनाई हो तो अक ज्योतिष-विद्या का आश्रय लेना चाहिये । इस प्रकार हस्त-रेखा-विज्ञान तथा अंक- ज्योतिष का सामंजस्य विशेष सहायक हो सकता है। दूसरा दृष्टान्त लीजिये। प्रथम महायुद्ध के समय लार्ड किचनर भारत के प्रधान सेनापति थे। इनके हाथ को देखकर कीरो ने यह बता दिया था कि ६६ वर्ष की अवस्था में वह समुद्र में डूब कर मरेगें। हाथ को देखकर यह पता चलता था कि ६६ वर्ष की अवस्था में यात्रा-रेखा द्वारा भाग्यरेखा और अभ्युदय-रेखा पण्डित होती थी। लार्ड किचनर के गत जीवन की घटनाओं में निम्नलिखित वर्ष विशेष महत्व के थे ।' १९६६%3+++६-२४-२+४%६ १८९७=१+++% २५=२+५=७ १८६५=१+++८२६%२+६=८ १६१४ =१+६+१+४%१५-१+५६ १६१५%D१+६+१+५-१६-१+६७ १६१६ = १+६+१+६-१७-१+७=5 इनसे कीरो ने यह निष्कर्ष निकाला कि जिन वर्णो का जोड़ ६, ७, ८ होता है वह लार्ड किचनर के जीवन में विशेष महत्व के थे। इस कारण ६६ वर्ष की अवस्था जव वह पूरी करेगे तब दो वार ६ के अंक -माने से उनके जीवन में विशेष घटना घटित होनी १. How I foretold the Lives of Great Men पृष्ठ २७-३० , 1 १४८ । , प्रक-विद्या (ज्योतिष) चाहिए। यह सन् १६१६ में होता था और सन् १९१६ का योग १+१+१+६=१७% १+७=८ होता था। यह पाठ को संख्या भी उनके जीवन में महत्वपूर्ण थी। कीरो ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ज्योतिष (जन्मकुण्डली) से वह इस निर्णय पर पहुँचे कि जल में डूबकर लार्ड किचनर की मृत्यु होगी और ६६ वर्ष पूर्ण करने पर यह घटना घटित होगी । इस भविष्यवाणी का आधार अंक-ज्योतिष-विद्या थी। (६६ तथा १६१६ का महत्व ऊपर बताया जा चुका है।) इसी प्रकार बेलजियम के वादशाह लियोपोल्ड II के विषय में कीरो ने बहुत पहले ही बता दिया था कि बादशाह की मृत्यु सन् १६०६ में होगी। हस्तरेखा तथा जन्म-दिन की ग्रह-स्थिति से की रो जिम निश्चय पर पहुँचे थे उसकी पुष्टि अंक ज्योतिष से होती थी। कीरो ने किस मनुष्य की जीवन घटनामों के भविष्य कथन में, किस प्रकार अंक ज्योतिष की सहायता ली, इसका विस्तृत परिचय उनकी पुस्तकों को देखने से ही मिल सकता है । यहाँ केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि कौनसी घटना किस वर्ष में होगी इसका मोटा अदाज हाथ की रेखाओं से लगता है। किन्तु विल्कुल ठीक वर्ष निश्चय करने में अंक ज्योतिष सहायक होता है। उदाहरण के लिए एक स्त्री का जन्म २० अगस्त सन् १६१६ को हुमा । २० तारीख का अंक २+0%२ हुआ। जन्म तारीख की संयुक्त संख्या २+++++१+९-३०=३+०=३ हुई । जैसा कि हमने पिछले प्रकरणों में बताया है, बहुत से व्यक्तियों के जीवन में संयुक्त अंक की यजाय केवल जन्म की तारीस के अंक का विशेष महत्व होता है। इस स्त्री का हाथ देखते ममय प्रश्न किया कि इसका विवाह किस अवस्था में हुआ हस्त-रेखा और ग्रंप-ज्योतिष का सामञ्जस्य तो उसने उत्तर दिया कि १३वें वर्ष में। इस उत्तर से पुष्टि हुई कि १. ३-४ तथा २ की संख्यानों में सहानुभूति है। इस कारण इसके जीवन में दो की संख्या विशेष महत्व की है । फलतः २० वर्ष मे इसके पुत्र होगा। यह भविष्य कथन किया जो अक्षरश: सत्य निकला और जव इसका ३८वां वर्ष था ३+4%११=१+१ = २ तब इसके पुत्र का विशेष अभ्युदय हुा । इसका थोड़ा थोड़ा इंगित हस्तरेखा में भी था । परन्तु जिस चिह्न को बीसवें वर्ष का द्योतक मानते हैं उसको २१वां भी मान सकते हैं ! जिसको ३८वां माना जाता है उसको ३७वां या ३६वा भी कह सकते हैं ! क्योंकि जीवन-रेखा या भाग्य रेखा पर वर्ष स्थिर करना केवल दृष्टि के अन्दाज पर निर्भर रहता है। परन्तु अक-विद्या के प्रभाव से जिसका जन्म २० अगस्त को हुआ है उसके लिए महत्वपूर्ण २० वा और ३८वां ही वर्ष होगा, २१वां या ३६वां नहीं। इस प्रकार अंक-ज्योतिष का सामञ्जस्य हस्तरेखा विज्ञान के करने से फलादेश का वर्ष निश्चित करना सुलभ हो जाता है । सुप्रसिद्ध हस्तरेखा-विशारद सेंट जर्मेन की पुस्तक में एक चित्र दिया गया है जिससे हाथ की विविध रेखायों से, किस वर्ष मे अमुक घटना घटित होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। देखिए अग्रिम चित्र"इसमें सुगमता के लिए आयु के ६-६ वर्ष के खण्ड किए है । यदि कोई चिह्न २४ और ३० वर्ष की अवस्था के बीच में हो तो अन्दाज से यह निश्चय करना चाहिए कि बीच का यह काल २७, २८ या २६ है ? बहुत बार ठीक वर्ष निश्चित करने में बहुत कठि- नाई होती है। उस समय अंक ज्योतिष से यह निश्चय करना चाहिए कि ६(२+७=६), १ (१८८२+८= १०=१+०=१) या
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में हस्तरेला सम्बन्धी ३ ग्रंगरेजी पुस्तकों सया ४० मंस्कृत पुस्तकों का सार दिया
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Study of Palmistry For Professional Parposcs Appendix.
१५१ हस्त रेखा और भंक-ज्योतिष का सामञ्जस्म २ (२६-२+६=११-१+१=२) कौनसा अंक जातक के जीवन में विशेष महत्व का है ? उसी के अनुसार २७, २८ या, २६वां वर्ष महत्व का होगा। यह निश्चय कर फलादेश किया जाये तो विशेष ठीक होगा। इसी प्राधार पर हमने एक सज्जन के हाथ की रेखायों से उनका फलादेश किया। उनका जन्म अंगरेजी ८ तारीख को हुआ था। ऐसे वर्ष जिनका योग ८ होता है सदैव उनके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हुए। पाठवें वर्ष में यह बहुत रोगी रहे; यहाँ तक कि प्रारण बचने की आशा नहीं थी। १७ (१+७-८) वर्ष में उन्होंने मिडिल परीक्षा पास की । उस समय सन् १६०० में मिडिल परीक्षा का भी बहुत महत्व था और अपने निवासस्थान से करीब २०० मील दूर जा कर मिडिल की परीक्षा देनी पड़ती थी। अपने जीवन के २६ (२+६=८) वर्ष में उन्होने बो० ए० पास किया और अपने कालेज के समस्त छात्रों में प्रथम रहे । ३५ वे वर्ष में (३+५=८) परम प्रिय पुत्रोत्पत्ति का हर्ष हुग्रा । ४४३ (४+४-८) वर्ष में उन्हे करीब साढ़े चार हजार वार्षिक की आय का ग्राम पारितोपिक रूप में प्राप्त हुना। इसी प्रकार ५३वाँ ६२वां, तथा ७१वां वर्ष भी उनके जीवन मे विशेष महत्व का हुअा है। उनके हाथ की रेखाओं को देखने से इन वर्षों का बिल्कुल टीक अन्दाज नहीं हो सकता था । अंक-ज्योतिष के प्रभाव से ही यह निश्चित किया कि उपर्युक्त वर्ष विशेष महत्व के थे और वास्तव में दोनों विद्याओं के सामञ्जस्य से ही अनेक व्यक्तियों के जीवन की घटनाएं बताने में बहुत सफलता मिली।
१५२ ग्रंश-विद्या (ज्योतिष) जन्म-कुण्डली तथा अंक-ज्योतिष का समन्वय यह पुस्तक प्रक-ज्योतिप से सम्वन्ध रखती है इस कारण जन्म कुण्डली सम्बन्धी उन बारीकियों का हवाला नहीं दिया जायगा जिनका ज्ञान केवल ज्योतिष के पंडितों को होता है । ऐसी कुछ स्थूल वाते नीचे बतायी जायेंगी जिनको जानने से मनुष्य ठीक ठीक फलादेश करने में सफल होता है। हिन्दी मे एक कहावत है कि "बारह वर्ष में पूरे के भी भाग्य फिरते है ।" इसका अर्थ क्या है ? "पूरा" कूड़े को कहते हैं । अर्थात् जो निकम्मी से निकम्मी वस्तु है उसका भी वारह वर्ष मे भाग्योदय का समय आता है। इस बारह वर्ष की अवधि का क्या तात्पर्य है ? सूर्य एक वर्ष में अपना भ्रमण पूर्ण कर लेता है, वास्तव में भ्रमण तो पृथ्वी सूर्य के चारों ओर करती है किन्तु लोकव्यवहार में सूर्य का भ्रमण कहलाता है । चन्द्रमा करीब २८ दिन में पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर पूरा कर लेता है । मंगल को पृथ्वी की एक परिक्रमा करने में औसत समय डेढ़ वर्ष का लगता है । बृहस्पति वारह वर्ग में पृथ्वी के चारों ओर घूमकर अपने पूर्व स्थान पर पा जाता है। शुक्र और बुध प्रत्येक को पृथ्वी की परिक्रमा करने में वर्ष का समय लगता है। बुध और शुक्र सूर्य के आगे पीछे ही रहते हैं। कभी कोई ग्रागे कभी कोई पीछे, कभी दोनों आगे, कभी दोनों पीछे । बुध सूर्य से २८ अंश से अधिक दूर कभी नही रहता । शुक्र सूर्य से ४८ अंश से अधिक दूर नहीं रह सकता । शनि को प्रत्येक राशि में करीब २३ वर्ष का समय लगता है और कुल बारह राशियां होती हैं। इस कारण १२४२५-३० वर्ष में वह पृथ्वी के चारों ओर अपनी परिक्रमा पूरी कर लेता है। हारत और नेपच्यून यह दो हस्त रेखा और अंक-ज्पोतिय का सामञ्जस्य नवीन ग्रह है। इनका वर्णन हमारे प्राचीन ज्योतिपशास्त्र में नहीं मिलता । पाश्चात्य वैज्ञानिकों के अनुसार हर्शल को पृथ्वी के चारों और एक परिक्रमा पूर्ण करने में ५४ वर्ष का समय लगता है। नेपच्यून को १६८ वर्ष का समय लगता है । राहु और केतु दो उपग्रह है। राहु कोई दिखाई देने वाला ग्रह नहीं है। इसीलिए इसे छाया- ग्रह कहते हैं । पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर भ्रमण का एक मार्ग है । चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर भ्रमण का एक अन्य मार्ग है । जहाँ यह दोनों मार्ग एक दूसरे को काटते है उस विन्दु का नाम राहु है। राहु का स्वरूप सर्प की भाँति माना गया है। राहु को सर्प का सिर और केतु को पूंछ कहते है। यह जो पृथ्वी के मार्ग और चन्द्रमा के मार्ग का-एक दूसरे को काटने वाला "चौराहा" या "बिन्दु" है वह स्थिर नही है। वह सरकता रहता है और १८ वर्ष में मण्डलाकार घूमकर फिर अपने पूर्व स्थान पर आ जाता है। इसलिए लोक व्यवहार में कहते है कि राहु को पृथ्वी की परिक्रमा करने में १८ वर्ष का समय लगता है। जन्म-कुण्डली से फलादेश में मुख्य रूप से तीन सिद्धांत काम में लाये जाते हैं (क) विंशोत्तरी दशा तथा अंतर्दशा के अनुसार फल-कथन । (ख) गोचर फल कथन-कब कौन सा ग्रह किस राशि में जा रहा है, इस प्रभाव के कारण फलादेश (ग) वर्ष-कुण्डली अर्थात् जन्म के समय सूर्य जहाँ पर था, प्रतिवर्ष सूर्य जब वहां आवे उस समय की कुण्डली के अनुसार फलादेश।
अंक-विद्या (ज्योतिष) उपर्युक्त तीनों प्रकारों के फलादेशों से अंक-ज्योनिप का सम्बन्ध है। महादशा, अन्तदशा तथा अंफ-ज्योतिष का सम्बन्ध जन्म-कालीन चन्द्रमा की स्थिति से ही विंशोत्तरी महादशा तथा अन्तर्दशा का क्रम प्रारम्भ किया जाता है। उदाहरण के लिए आप किसी की जन्म-कुण्डली में यह देखते हैं कि उसका बृहस्पति तथा सूर्य दोनों शुभ हैं और बृहस्पति की महादशा में सूर्य का अंतर ६ महीने १८ दिन का चल रहा है। उस मनुष्य को प्रायु इस समय २४३ वर्ष की है और २५ वर्ष ६ महीने १८ दिन की अवस्था तक सूर्य का अंतर रहेगा । अंक-ज्योतिप से अाप इस नतीजे पर पहुंचे कि २५वां वर्ष उसको शुभ होना चाहिए तो प्रत्यन्तर दशा आदि लगाने की आवश्यकता नहीं, न विशेप गोचर का विचार मावश्यक है, वर्ष-कुण्डली बनाने की आवश्यकता भी नहीं, आप तुरन्त कह सकते हैं कि २५वें वर्ष में कार्य हो जावेगा। मान लीजिए कि वह किसी नौकरी के लिए उत्सुक है तो आप कह सकते हैं कि २५वें वर्ष में नौकरी लग जावेगी। यहां जो ६ महीने १८ दिन की सूर्य की अन्तर्दशा है उसके विचार में अंक-ज्योतिप से महायता लेने से इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि प्रथम तीन मास में ही- २५वें वर्ष में ही-कार्य हो जावेगा। गोचर-फल तथा अंकज्योतिष का सम्बन्ध ज्योतिष शास्त्र में इस वात का विस्तृत विवेचन किया गया है कि जन्म के समय जिस राशि में चन्द्रमा है (संक्षेप में इसे जन्म- राशि या राशि कहते हैं) उस राशि में जब कोई ग्रह प्रावे तो क्या फल ? उससे दूसरी राशि में प्रावे तो क्या ? तीसरी हस्त रेखा और मंक-ज्योतिष का सामञ्जस्य राशि में क्या. फल ? इस प्रकार जन्म-राशि से बारहों राशि में जब गोचरवश घूमते हुए सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु आवें तो पृथक् पृथक् क्या क्या फल देते हैं ? सूर्य, बुध, शुक्र प्रायः एक वर्ष में परिक्रमा पूर्ण कर लेते हैं। इस कारण जिस राशि में शुभ फल देते हैं उम महीने को स्मरण रखना चाहिए और अपने जीवन में अनुभव करना चाहिए कि प्रतिवर्ष वह महीना कैसा बीतता है । उदाहरण के लिए सूर्य जव कर्क राशि पर आवे (यह समय प्राय. १५ जुलाई मे १६ अगस्त तक प्रतिवर्ष होता है) तव यदि किसी मनुष्य को चिन्ता, व्ययाधिक्य आदि अनिष्ट फल देता है तो उसे अपने गत जीवन के प्रत्येक वर्ष में जुलाई- अगस्त का समय कैसा गया है, इसका विचार करना चाहिए । किसी वर्ष कोई घटना किसी विशेष प्रभाव के कारण हो सकती है किन्तु यदि मनुष्य अपने जीवन का बीता हुशा काल अध्ययन करके देखें कि प्रतिवर्ष जुलाई-अगस्त का समय उसे अनिष्ट और अशुभ होता है तो भविष्य के लिए भी नतीजा निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए एक मनुष्य अपने गत २५ वर्ष के जीवन की डायरी (जीवन का हाल या हिसाव) का अवलोकन कर इस गतीजे पर पहुँचता है कि १५ जुलाई से १६ अगस्त के समय में जो भी उसने व्यापार या सौदा किया उसमें घाटा हुआ तो उसे अवश्य सावधान हो जाना चाहिए कि यह समय उसके लिए प्रतिकूल होता है और भविष्य में कोई बड़ा काम इस समय न करे । वराह मिहिर ने लिखा है कि 'सविता दशानां पाचयिता" । इस सिद्धान्त के अनुसार जव सूर्य किसी राशि विशेप में आता है तब अन्य ग्रहों का फल भी सहसा अनुभूत होता है । वराह मिहिर .
अंक-विद्या (ज्योतिष) के पुत्र पृथुयशस ने भी लिखा है कि जब सूर्य किसी राशिविशेष में आता है तो उस राशि के स्वामी का रुका हुग्रा फल सहसा प्राप्त होता है। बहुत से लोग अपने गत जीवन का अध्ययन नहीं करते; इस कारण भविष्य के लिये भी परिणाम नहीं निकाल सकते; परन्तु जो अपने जीवन का वैज्ञानिक रीति से अध्ययन करते हैं वे भविष्य के लिये भी किसी नतीजे पर सफलता पूर्वक पहुँच सकते हैं । अनेक विद्वानों से इस विषय में विचार विनिमय करने से हम इसी निश्चय पर पहुंचे हैं कि जिनकी जन्म-कुण्डली में कोई राशि अष्टकवर्ग में बली होती है तथा शुभ-ग्रह से युत दृष्ट होती है उनको वह महीना (जब सूर्य उस राशि में प्राता है) शुभ जाता है और जिनकी जन्म- कुण्डली में कोई राशि सूर्याप्टकवर्ग में निर्वल तथा पापग्रह से दृष्ट- युत या अशुभ सम्बन्ध करने वाली होती है, उस राशि में जव सूर्य आता है तब वह महीना उन्हें अशुभ जाता है । इस सम्बन्ध में हम भारतीय पालिमेन्ट "लोक-सभा" के अध्यक्ष स्वर्गीय श्री मावलंकर जी के एक पत्र का उल्लेख किये विना नहीं रह सकते। इस पत्र में उन्होने हमको लिखा था कि उन्होने अपने गत जीवन की घटनाओं से यह अनुभव किया है कि फ़रवरी-मार्च तथा नवंबर के मास उन्हें विशेष महत्वपूर्ण होते थे।' यह तो हुग्रा सूर्य, बुध और शुक्र के गोचर का अंकज्योतिष से सामज्जस्य । यदि किसी मनुष्य के जीवन में २ संरया शुभ-प्रद है तो उसको फरवरी (वर्ष का २रा महीना) और गवम्बर (वर्ष , १. इस पत्र के एक भाग का चित्र १८७ पृष्ठ पर दिया गया है ।
इल रेजारसमञ्चन्द का ११वां नहींना १:१) का महीना हुन बसा. निवप कले नाप पनि मनुब ने जोवन रोपनों का विवरण पूछ रह निश्चय कर निया बावे कि कौन-सा महेना कसा वाता है दो ग्रंक-पोति ने जनादेश करने समर रिष को नतीजे पर पहुँच करे। चन्द्रना नोगों में चन्द्रमा २३ दिन में एक राशि का भ्रमण कर लेता है। रचना का प्रप्टक वर्ग बनाने के निचे ज्योतिष के अधिक ज्ञान को भारतरता है। जिन राशि में चन्द्रमा अधिक गुन रेसायुरू हो उत्त राशि के मनृप्य को नाम होता है और गोचरवा व नन्द्रमा कमरा करता हुप्रा उस राशि में आ वो गुन फल देता है। परि रिसी कार्य की जून १९५७ में होने की सम्भावना है और जिस मनुष्य के लिये गुभ फल देखना है उनको 3 का अंक शुभ जाता है तो पाप कह सकते हैं कि ७ ताल, १६ ता०, (१+६-५) तपा २५ (२+५=७) तारीत गुन हैं या शुभ जावेंगी। किन्तु पनि उत्त मनुष्य की जन्म-कुण्डली में चन्द्राष्टकवर्ग में फन्याराशि में या ८ शुभ रेसायें हैं तो पाप पंचाग में यह देखकर कि ता०६ मा ता० ७ जून १९५७ को कन्याराशि में चन्द्रमा रहेगा-यह निरुपम पूर्वक कह सकते हैं कि 3 ता० का आपका कार्य हो जायेगा। इस प्रकार ग्रह-ज्योतिप का अंक-ज्योतिप से समन्वय करने से सारी सक निश्चित की जा सकती है। चन्द्रमा दया का पोषपिता होता है। इमके सम्बन्ध में देखिये, वृहज्जातक सारापती, पारागरी शादि। बृहस्पति पहिले वताया जा चुका है कि बृहस्पति १२ वर्ष
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अंक-विद्या (ज्योतिष)
परिक्रमा पूरी कर लेता है । जन्म-राशि से जव दूसरे, पाच, सातवें,
नवें, ग्यारहवें बृहस्पति भ्रमणवश आता है तव शुभ फल देता है ।
इसलिये यदि किसी की जन्मराशि हमें न भी मालूम हो, किन्तु यह
मालूम हो कि अमुक वर्ष अच्छा गया है तो हम इस नतीजे पर
पहुँच सकते है कि १२ वर्ष बाद जब बृहस्पति भ्रमण करता हुआ
उसी स्थान पर आवेगा तब अवश्य शुभ फल देगा । एफ दृष्टान्त
द्वारा इसे स्पष्ट किया जा रहा है।
एक व्यक्ति की जन्म-राशि 'मीन' है और उसके ७वें वर्ष में
बृहस्पति राशि से प्रथम स्थान पर पाया, ११वें वर्ष में पंचम स्थान
पर आया १३वें वर्ष में सप्तम स्थान पर पाया और १५वें वर्ष में नवम
स्थान पर पाया तथा १७वें वर्ष में एकादश स्थान पर आया तो
उसके जीवन में निम्नलिखित वर्षों में फिर बृहस्पति गोचरवश उन्ही
स्थानों पर प्रादेगा।
प्रथम स्थान :-७, १६वें, ३१वे ४३वें,
५५वें, ६७वे, ७९वें, वर्ष में।
पंचम स्थान :-
-११, २३वें, ३५वें, ४७वें
५६३, ७१वें, ८३वें, वर्ष में ।
सप्तम स्थान :--१३, २५वें, ३७३, ४६वें
६१वें, ७३३, ८५वे, वर्ष में।
नवम स्थान :-१५ौं, २७, ३६, ५१वें, ६३वें
७५, ८७वें वर्ष में।
एकादश स्थान :-१७वें, २६वें, ४१वें, ५३वें
६५वें, ७७वें, ८६वें, वर्प में।
यदि जन्म की राशि मालूम न हो तो भी १२ वर्ष की परिक्रमा
हस्त रेखा और अंक ज्योतिष का सामञ्जस्य के आधार पर प्रत्येक जीवन में ऐसा समय निकाला जा सकता है जब कोई शुभ घटना घटित हुई हो । यदि किसी के जीवन में जो अच्छे वर्ष गये हैं एक ओर लिखकर उनके आधार पर १२ वर्ष के परिभ्रमण काल के अनुसार शुभ वर्ष निकालने की चेष्टा करें तो सम्भवतः हम इन नतीजे पर पहुँच सकें कि किस समय को आधार मानने से उसमे बाद का प्रत्येक १२वाँ वर्ष शुभ जाता है । यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित है कि बृहस्पति घूमकर करीव १२ वर्ष में उसी राशि पर प्राता है-विल्कुल ठीक १२ वर्ष में नहीं। वक्री होने से कभी-कभी एक वर्ष में तीन राशियों में आगे पीछे घूमता रहता है । जैसे १६५७ में मार्च तक बृहस्पति कन्या में रहा फिर वक्री होकर सिंह राशि में चला गया, २० जून १९५७ को फिर वापिस कन्या में चला पावेगा और नवम्बर में तुला में चला जावेगा। इसलिये जव ७वां, १६वॉ, ३१ वॉ आदि प्रत्येक १२ वर्ष के काल का निर्देश करते हैं तब इस वर्ष को न तो अपनी जन्म-तिथि से आगामी जन्म तिथि तक लेना चाहिये और न १ जनवरी से ३१ दिसम्बर तक । प्रत्येक १२वे वर्ष का एक मोटा अन्दाज़ है। अब मान लीजिये आप किसी यादमी के गत जीवन काल की घटनाओं से इस अनुमान पर पहुँचे कि उसके जीवन का १३वाँ, २५वां,३ ७वां, ४६वां वर्ष विशेष भाग्योदय का था और अंक ज्योतिष से उसकी अंग्रेजी की जन्म-तारीख के अंकों का योग २ होता है तो ऊपर के वृहस्पति भ्रमण के विचार से ४६ में १२ जोड़े तो ६१ वा वर्ष शुभ आया और अंक-ज्योतिप के अनुसार २ अंक वाले व्यक्ति को ७ का अंक भी शुभ जाता है । यह जानने से आपके पास आये हुए व्यक्ति की आयु का यदि ६१वाँ वर्ष चल रहा है और वह कहता है कि ६१वें वर्ष में , अंक-विद्या (ज्योतिष) अब तक कोई भाग्योदय का कार्य नहीं हुआ तो आप गुरु के भ्रमण के आधार पर -ग्रह-ज्योतिप का सामञ्जस्य कर निश्चयपूर्वक, जोर देकर कह सकते है कि "६१ वा वयं कथमपि कथमपि खाली नही जा सकता"। ऊपर बृहस्पति के भ्रमण का एक आधार है। दूसरा एक कारण और है जिसके कारण प्रत्येक १२वां वर्ष एक-सा जाता है । सुदर्शन चक्र बनाकर उसको घुमाने से प्रत्येक वर्ष का फलादेश करने का ज्योतिष शास्त्र में विधान है । सुदर्शन चक्र के अनुसार प्रत्येक १२वें वर्ष का विचार उसी स्थान से किया जाता है । इसके विशेष विवरण के लिये ज्योतिप के ग्रन्थ देखने चाहिये । इसके अतिरिक्त प्रत्येक १२वां वर्ष किसी अंश में भाग्योदयादि के विचार से एक सा जाता है, यह सर्वाष्टक वर्ग से भी फलादेश का एक प्रकार है । जन्म पत्रिका विधान में लिखा है कि यदि सर्वाष्टक वर्ग में किसी भाव में १४ या १५ रेखा हों और उस भाव में ग्रह भी हों तो उस वर्ष मरण होता है । कुल १६ रेखा हो तो अंग पीड़ा और शरीर में महाव्याधि होती है। कुल रेखा १७ हों तो नाश । १८ हों तो धन-क्षय, १६ रेखा हों तो बान्धव पीड़ा और कुमति । २० रेखा हों तो व्यय और कलह । २१ रेखा हो तो हृदय में घोर दुःख । २२ रेखा हों तो दैन्य और पराभव-इस प्रकार २८ रेखा तक अशुभ फल लिखा है और २८ के वाद शुभ फल । २६ रेखा हों तो लोक में सम्मान वृद्धि । ३० रेसा हों तो नवीन पद-प्राप्ति और मान; ३१ रेखा हों तो द्रव्यागमन और विशेष । १. रेसिए जन्म-पत्रिका विधान पृष्ठ ३६ ।
हस्त-रेखा और अंक ज्योतिष का सामजस्य । आय इत्यादि । इसके लेखक लिखते है कि मान लीजिए प्रथम-भाव में सर्वाप्टकवर्ग में ३१ रेखा पड़ी तो १ ले, १३, २५वें, ३७वे ४६, ६१वें, ७३वें वर्ष में सौख्य और द्रव्यागमन होगा। जन्म- कुण्डली के १२ भावों से इस प्रकार आगामी सब वर्षों का विचार किया जाता है और प्रत्येक १२वा वर्ष एकसा जाना चाहिए । एक अन्य कारण और भी है जिससे प्रत्येक १२वें वर्ष में कुछ समानता होती है। "संकेत निधि" के निर्माता श्री रामदयालु जी ने तथा यवन ज्योतिष शास्त्र के आधार पर निर्मित "मनुष्य- जातक" २ में लिखा है कि जन्म-कुण्डली के जिस भाव में कर ग्रह हो उस वर्ष में पीड़ा होगी। उदाहरण के लिए किसी के नवम स्थान में शनि और राहु है तो इसको ६, २१, ३३, ४५ और ५७ वें वर्ष में पीड़ा होगी। पूर्व भारतीय प्रणाली यह थी कि प्रत्येक भाव को एक एक वर्ष मानकर भविष्य फल कथन किया जाता था। कुछ अंगरेज ज्योतिषियों ३ ने भी इस क्रम को अपनाया है। अतः अंक ज्योतिष का और १२ वर्ष के भ्रमण काल का ममन्वय करने से फलादेश बहुत कुछ ठीक बैठता है । शनि शनि को एक राशि में २३ वर्ष का समय लगता है और पृथ्वी की पूरी परिक्रमा करने में ३० वर्प । वास्तव में यह समय २६ वर्ष और कुछ महीने होता है । जन्म-कुण्डली में जिस स्थान पर शनि १० देखिए सप्तम संकेत, श्लोक ७ २. मनुष्यजातक, दशमाधिकार, श्लोक ५। ?, How To Use And Understand Astrological Predictive Systema by Dal Lee.
अंक-विद्या (ज्योतिष) अशुभ फल देता है उससे जब ६०-६० अंश पर ग्रावेगा तव भी अशुभ फल ही देगा। इस ६० अंश को चलने में उसे करीब ७१ वर्ष का समय लगता है। इसलिए गत-जीवन में जो अनिष्ट समय था, प्राय, उससे साढे सात वर्ष बाद, १५ वर्ष बाद, २२३ वर्ष वाद और ३० वर्ष बाद शनि कप्ट देता है । २९वें या ३०३ वर्ष वाद तो शनि फिर धूमकर उसी विन्दु पर आ जाता है। इस कारण अनिष्ट फल कहते समय या पीड़ा का काल-निर्देश करते समय अक ज्योतिष का, दानिश्चर की परिक्रमा काल से सामञ्जस्य कर लेना उचित है। एक कारण और है जिसके कारण प्रति ७वा वर्ष एक-सा जाता है । इस सम्बन्ध में चन्द्रमा के परिभ्रमण को 'संकेत निधि' के निर्माता श्री रामदयालु जी ने महत्व दिया है और अंगरेजी ज्योतिष में तो चन्द्रमा के भ्रमण को अत्यधिक महत्व दिया गया है । जन्म-स्थानीय चन्द्रमा २८ दिन में १२ राशियों का घेरा पार कर अपने स्थान पर आ जाता है। मार्ग में जब वह अशुभ ग्रहों से सम्बन्ध करता है तो अशुभ फल देता है । शुभ ग्रहों से सम्बन्च करता है तो शुभ फल देता है । अब मान लीजिए किसी स्थान पर उसने अशुभ फल किया तो ६० अंश चलने पर उस स्थान से चतुर्थ श्रा जावेगा । जिस प्रकार ताजिक में चतुर्थ, सप्तम, दशम अशुभ दृष्टि समझी जाती है उसी प्रकार अंगरेजी ज्योतिष में नियम है। इस पद्धति में चन्द्रमा के प्रथम दिन के परिभ्रमण का प्रभाव जीवन के पहिले वर्ष में होता है। दूसरे दिन के भ्रमरण का प्रभाव जीवन १. देखिए संकेत निधि-संकेत ७ इसोरु १०.११ ।
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हस्तरेखा और अंक-ज्योतिष का सामञ्जस्य
के दूसरे वर्ष पर। यह बहुत लम्या और गहन विषय है, जिनको
इसमें विशेष दिलचस्पी हो उन्हें अंगरेजी ज्योतिप की पुस्तकें पढ़नी
चाहिए । यहाँ केवल यह निष्कर्ष दिया जाता है कि:-
१. जो वर्ष अशुभ गया है उसके ७-७ वर्ष के बाद का काल
अशुभ जायगा । उदाहरण के लिए तीसरा वर्ष पीड़ा-कारक है तो
३रा, १०वाँ, १७वां, २४वां, ३१वां, ३८वां, ४५वां, ५२वां, ५६वां
आदि वर्ष अशुभ जावेंगे।
२. जो वर्ष शुभ गया है उससे नवां शुभ जावेगा। यदि पहला
वर्ष शुभ है तो १०वां, १६वां, २८वाँ, ३७वाँ, ४६वा-इस प्रकार
प्रत्येक नवाँ वर्ष शुभ जावेगा।
राहु और केतु
राहु और केतु १८ वर्ष में पूरा परिभ्रमण कर लेते है । इसलिए
जहाँ पर इन्होंने गोचर द्वारा शुभ फल दिया हो उससे १८वें वर्ष में
यदि उसी प्रकार के फल का अनुभव तो उस आधार पर निश्चय
किया जा सकता है कि भविष्य के १८वें वर्ष मे भी उसी प्रकार का
अनुभव होगा।
३६ वर्ष का परिभ्रमण-ऊपर कई मतों से बताया जा चुका
है कि प्रत्येक १२वा तथा प्रत्येक वां वर्ष एक-सा जाता है । १२
और १ का लघुतम ३६ होता है इस कारण प्रत्येक ३६ वर्ष के
बाद के वर्षों में समानता होनी चाहिए।
१ ला, ३७वा ७३वाँ एक सा-
२ रा, ३८वा, ७४वाँ
३ रा, ३६वा, ७५वा.
.४ था, ४०वां, ७६वाँ
"
", इत्यादि
प्रक-विधा (ज्योतिष) यदि किसी व्यक्ति की हम कुण्डली, केतु-कुण्डली तथा बृहस्पति कुण्डली बनावें तो उस वर्ष का शुभाशुभ निकल सकता है। पाप- संयोग होने से उस वर्ष बहुत कप्ट होता है । लिखा है:- "पताकी कुण्डली केतो : कुण्डली च वृहस्पतेः । सर्वत्र पापसंयोगे संशयो जायते महान् ।' इसके अनुसार ३६ वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्ति का भविष्य निश्चित करना हो तो ३६ वर्ष पहले कैसा समय बीता था इसका अन्वेपण करना चाहिए। उदाहरण के लिए एक मनुष्य की जन्म- नारीख, जन्म-महीना आदि कुछ भी मालूम नहीं है । उसके जीवन का ४८वाँ वर्ष जा रहा है, वह बड़े कष्ट में है, भविष्य जानना चाहता है । आप उससे पूछते है कि ४६-३६=१२, उसके जीवन का १२वा वर्ष कसा गया है ? वह कहता है कि १२वां वर्ष तो बड़े कप्ट का वीता किन्तु १३वे वर्ष में सब कष्ट दूर हो गए और भाग्योदय हो गया, तो आप विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि ४६वाँ वर्ष अच्छा जावेगा। ताजिक द्वारा वर्षफल तथा अंक-ज्योतिष का सामञ्जस्य यदि किसी का वर्ष प्रवेश जून या जुलाई में होता है तो 'वर्ष प्रवेश कुएडली' का फल आगामी जुन या जुलाई तक रहेगा। किन्तु अंक-विद्या के सामञ्जस्य से यह निश्चय किया जा सकता है कि १६५७ अच्छा होगा या १६५८? ऊपर जो अनेक प्रकार से ग्रह-ज्योतिप और अंक ज्योतिष का सामञ्जस्य बताया गया है इससे ज्योतिप के विद्वान् तो विशेष लाभ उठावेंगे ही किन्तु साधारण पाठक भी अपने गत जीवन की घटनाप्नों के आधार पर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। १. जन्म पत्रिका विधान-पृष्ठ १८८।
हवां प्रकरण 'अंकों से प्रश्न विचार भारतीय मत - प्रश्न के विषय में यद्यपि ज्योतिष शास्त्र के अनेक ग्रंथ हैं। तथापि 'कों' या 'संख्या' से प्रश्न विचार, केरल देश में अधिक प्रचलित होने के कारण, इस शास्त्र को 'केरलीय' भी कहते हैं । केरल प्रश्न संग्रह में लिखा है कि प्रश्न सम्बन्धी जिस वाक्य का प्रश्नकर्ता उच्चारण करे--उस वाक्य में जो-जो अक्षर पावें उनकी संख्या को जोड़ले । किन्तु यदि वाक्य बहुत लम्बा हो अथवा अस्पष्ट हो तो, प्रश्नकर्ता यदि ब्राह्मण हो तो उससे किसी पुष्प का नाग, क्षत्रिय हो तो किसी नदी का नाम, वैश्य हो तो किसी देवता का नाम और यदि शूद्र हो तो उससे किसी 'फल' का नाम लेने को कहे । किन्तु 'प्रश्न चूड़ामणि' में लिखा है कि कोई भी प्रातः काल प्रश्न करे तो किसी बालक से कहे कि किसी 'वृक्ष' का नाम लो। यदि मध्याह्न काल हो तो किसी युवा पुरुप से किसी 'पुष्प' का नाग ग्रहण करने को कहे । यदि तीसरे पहर कोई प्रश्न करे तो किसी वृद्ध से किसी 'फल' का नाम लेने को कहे । अस्तु । हमारे विचार से प्रश्नकर्ता से ही कहना चाह्येि कि अपना प्रश्न हिन्दी में थोड़े अक्षरों में लिख दीजिये या किसी पुष्प या फल का नाम लिस १. केरल प्रश्न संग्रह, केरलीय प्रश्नान, प्रश्न चूहा माण। प्रादि।
अ यौ १६ अं २५ अंक-विद्या (ज्योतिष) दीजिये। जिन अक्षरों को प्रश्नकर्ता लिखे उनकी संख्या निम्नलि- खित नियमानुसार बनाना चाहिये : १२ ए १८ आ २१ ऐ ३२ प्रो २५ १८ उ ऊ २२ यह तो स्वरों की संख्या हुई । यदि 'ऋ' का प्रयोग करे तो उसे 'रि' की भांति (+इ) माने । लु लु तथा अः का प्रयोग भाषा में नहीं होना इस कारण उन अक्षरों की संख्या नहीं लिखी गई है। अव व्यंजनों को संख्या लिखी जाती है। क् १३ ट् १० प् ३५ ख् ११ स् ३५ ग् २१ द २६ ध् ३० भ २७ म् ८६ च् १५ य् १६ छ् २१ थ् १८ ज् २३ व ३५ ज २६ मान लीजिये किसी ने लिखा 'गुलाव', तो पहिले इस शब्द के स्वर और व्यञ्जन अलग-अलग कर लिखें टिप्पणी : एक मतानुसार 'प' को संख्या २८ है। ए ४५ श् २६ .
अंकों से प्रश्न विचार
१६७
ग्+उ++++
२१+१+१३+२१+२६+१२%१०८
इन प्रत्येक स्वर तथा व्यञ्जन के नीचे उस स्वर या व्यञ्जन
की जो संख्या दी गई है वह लिखनी चाहिये और सब संख्याओं को
जोड़कर उस शब्द (यथा 'गुलाय') का पिंड बनाना चाहिये । ऊपर
सब संख्याओं का योग १०८ आया । अव इस संख्या पिंड से प्रश्न
का उत्तर कैसे देना यह बताया जाता है ।
शास्त्रकारों ने प्रश्नों को अनेक भागों में विभाजित किया है।
यहाँ केवल मुख्य-मुख्य विषय के प्रश्नों के सम्बन्ध में कुछ नियम
बताये जाते हैं।
(१) लाभ-अलाभ प्रदन (द्रव्य का लाभ या हानि)
(२) जय-पराजय प्रश्न (हार या जीत)
(३) सुख दुःख प्रश्न
(४) गमन प्रश्न (जाने के विषय मे प्रश्न)
(५) जीवन मरण प्रश्न
(६) गर्भ विचार (गर्भ है या नहीं)
(७) तेज़ी-मन्दी प्रश्न
(८) विवाह प्रश्न
(६) पुत्र कन्या जन्म प्रश्न
अब क्रमशः इनका उत्तर देने की विधि बतलाई जाती है । हम
नीचे उदाहरणों में 'गुलाब' का उदाहरण दे रहे हैं।'
१. वास्तव में जब प्रश्न कर्ता प्रश्न करे तय प्रश्न के प्रक्षारों का जो संख्या
पिंड माय या जिस फल या पुरुष का नाम ले उसका धो संख्या-पिड भावे-
उसके माधार पर उत्तर कहना चाहिये ।
१६५ पंक-विद्या (ज्योतिष) (१) मान लीजिये किसी ने लाभ या हानि सम्बन्धी प्रश्न किया और 'गुलाब' का नाम लिखा । तो, १०८ प्रश्न का संख्या-पिंड हुआ। इसमें ४२ जोड़ कर ३ से भाग देना चाहिये । यदि १ बचे तो लाभ, २ बचे तो थोड़ा लाभ । यदि शून्य बचे तो हानि । उपर्युक्त 'गुलाव' के उदाहरण में १०८ में ४२ जोड़े तो हुए १५० । तीन भाग देने से शेष ० बचा । इसलिये उत्तर देना चाहिये कि इस कार्य में लाभ नहीं होगा बल्कि हानि होगी। (२) यदि कोई हार-जीत सम्बन्धी प्रश्न करे तो प्रश्न का जो संख्यापिंड हो उसमें ३४ जोड़ कर ३ का भाग देना चाहिये । यदि १ शेष बचे तो 'जय' । यदि २ शेष बचे तो संधि । यदि ० शेष बचे तो पराजय। उदाहरण के लिये प्रश्नपिंड १०८ है। इसमे ३४ जोड़ने से १४२ हुए। इसमे ३ का भाग दिया तो १ शेष बचा । इसलिये उत्तर हुआ 'जीत' होगी। (३) यदि सुख-दुःख-विषयक प्रश्न हो तो प्रश्न का जो संख्या- पिंड हो उसमें ३८ जोड़कर २ से भाग देना चाहिये । यदि शेष १ बचे तो सुख । यदि ० बचे तो दुःस । उदाहरण-प्रश्नकर्ता यह जानना चाहता है कि उसके जीवन के आगे के २ वर्ष दुःखमय जावेगे या सुसमय । उससे किसी पुष्प का नाम लेने को कहिये । उसने कहा 'चमेली' 1 अब 'चमेली' का संख्या-पिंड बनाया- च्++म+ए++ई १५+१+८६.१+१३+१८% १६२ इस '१६२' के संख्या-पिड में ८ जोड़ने मे २०० हुए। इस ।
'अंकों से प्रश्न विचार १६६ '२०० में २ का भाग दिया तो शेष ० बचा । इस कारण उत्तर देना 'चाहिये कि अग्रिम २ वर्ष दुःखमय वीतेंगे । (४) यदि गमन (जाऊंगा या नहीं ?) प्रश्न हो तो प्रश्न-पिंड में '३३ जोड़कर ३ से भाग देना चाहिये । १ शेष बचे तो 'जाना होगा। २ शेप हो तो 'जाना' नहीं होगा। ० शेप हो तो यात्रा तो होगी परन्तुं वीच से ही लौट ग्राना होगा। उदाहरण : किसी का प्रश्न है कि कलकत्ता जावेगा या नहीं? उससे किसी पुष्प का नाम लेने को कहिये । उसने कहा 'चमेली' । 'ऊपर बताया जा चुका है कि 'चमेली के अक्षरों का संख्या-पिंड १६२ होता है। इसमें ३३ जोड़े तो १६५ हुए । इसमें ३ का भाग दिया तो ० शेप वचा। इस कारण उत्तर देना चाहिये कि असफलयात्राहोगी (५) यदि कोई व्यक्ति बीमार हो या मृत्यु की सम्भावना हो 'और प्रश्न किया जावे कि जीवन रहेगा या नहीं तो प्रश्न पिंड में ४० जोड़कर उसे भाग देना चाहिये । शेष १ बंचे तो जोवन रहेगा। २ शेप रहे तो कप्टसाध्य जीवन रहेगा-अर्थात् बहुत कष्ट होगा किंतु जीवन बच जावेगा। यदि ० शेष रहे तो मृत्यु हो जावेगी। 'उदाहरण के लिये यदि. जीवन-मरण सम्बन्धी प्रश्न हो और किसी पुष्प का नाम लेने के लिये कहा तो उसने कहा ,'चम्पा' । 'चम्पा' के अक्षरों का संख्या-पिंड निम्नलिखित प्रकार से बनाया तो संख्या पिंड १६१ हुआ।.. च+अ+म्++प्रा -१५+ १२२८६+२७+२१=१६१ इसमें ४० जोड़ने से २०१ की संख्या हुई।.३ से भाग ,दने से शेष रहा । इस कारण उत्तर देना चाहिए कि जीवित रहने की .
अंक-विद्या (ज्योतिष) बहुत कम आशा है। वास्तव में । शेष रहने से उत्तर तो मृत्यु हुआ । परन्तु ज्योतिषी को उचित है कि अशुभ वाणी न निकाले । प्रकारान्तर से उत्तर दे। (६) गर्भसम्बन्धी प्रश्न हो कि गर्भ है या नहीं तो किसी फल या पुप्प का नाम लेने को कहे। उसका जो संख्यापिंड हो उसमें २६ जोडकर ३ से भाग दे । १ शेष रहे तो गर्भ है। २ शेप रहे तो सन्देह है-ऐसा कहे। तीन शेष रहे तो गर्भ नहीं है यह.कहना चाहिए। उदाहरण के लिए किसी ने कहा 'चम्पा' । चम्पा का संख्यापिंड १६१ है । इसमें २६ जोड़ने से १८५ हुए ! ३ का भाग देने से १ शेष रहा । इस कारण उत्तर हुअा कि गर्भ है । यहाँ पर शंका हो सकती है कि चम्पा की संख्यापिंड बनाते समय यदि, च+अ+++मा इस प्रकार लिखते है तो संख्या पिंड १६१ होता है किन्तु यदि, च् +अं++ग्रा १५+२५+२७+२१%3E इस प्रकार लिसा जावे तो संख्यापिंड ८८ ही हुआ। तब किस प्रकार संख्यापिंड बनाना उचित है। इसका समाधान यही है कि प्रश्नकर्ता से कहे कि कागज पर वह लिख दे । 'चंपा' या 'चम्पा' जैसा वह लिखे उसी के आधार पर प्रश्नपिंड बनाना उचित है। (७) यदि तेजी-मन्दो सम्बन्धी प्रश्न हो तो किसी फल या पुष्प का नाम लेने को कहे। उसके बाद उपर्युक नियमानुसार प्रश्नकर्ता के कहे हुए पुष्प या फलका संस्थापिंड बनाये । उस संस्यापिड में ३ का भाग दे । १ वचे तो मन्दी (माल सस्ता होगा । .
. कहें । उस पुष्प अंको से प्रश्न विचार १७१ दाम गिरेंगे) ! २ शेष बचे तो भाव करीब-करीब उतने ही रहेंगे। यदि ० शेष बचे तो तेजी अर्थात बाजार ऊँचा जावेगा-दाम बढ़ेंगे। उदाहरण के लिए प्रश्नकर्ता ने कहा 'गुल'व' । 'गुलाब' का संख्या- पिंड,१०८ होता है, यह ऊपर बताया जा चुका है। इस १०८ में ३ का भाग देने से ० शेष रहा । इस कारण उत्तर देना चाहिए कि तेजी होगी- बाजार ऊंचा जावेगा । (5) यदि विवाह का प्रश्न हो तो किसी पुष्प का नाम लेने को की संख्यापिण्ड में ८ का भाग दें। यदि १ शेप वचे तो विना यत्ल के विवाहः २ शेष बचे तो अधिक यत्न से विवाह कहना ३ शेप रहे तो विवाह इस समय नहीं होगाः ४ शेष रहे तो कन्या का मरणः ५ शेष रहे तो चाचा आदि का मरण या देशान्तर गमनः ६ शेप रहे तो राजभयः ७ शेष रहे तो सांघातिक रोगभय या श्वशुर को कष्टः ० या ६ शेष रहे तो विवाह से संतान का मरण कहना। (E) अक्षरों से संख्यापिंड बनाना एक प्रकार है। दूसरा प्रकार हैं कि किसी कागज़ पर संख्या ही लिखवा लीजावे और उसी संख्या-पिंड से विचार किया जावे। विशेष जिज्ञासु पाठकों को इस विषय के विस्तृत ग्रंथ केरलीय प्रश्न रत्न आदि देखने चाहिए। पाश्चात्य मत वैसे तो पाश्चात्य ‘मत बहुत प्रकार के हैं और मूक प्रश्न यादि के नियम आगे पृथक् दिये गये हैं। किन्तु साधारण नियम यह है कि प्रश्न-कर्ता से कहे कि वह कोई एक शब्द कागज पर लिख दे । उस शब्द मे जो अंगरेज़ी वर्णमाला के अक्षर पावें उनका १. फेरलीय प्रश्नरत्नम पृष्ठ ४५:१३ प्रक-विद्या (ज्योतिष) 'संयुक्तांक' बनालें । जैसे नाम का संयुक्तांक बनाने की पद्धति ५वें प्रकरण में दी गई है उसी प्रकार जो शब्द प्रश्नकर्ता लिखे उस शब्द का संयुक्तांक बनालें और जो शब्दपिंड (संख्या). आवे उसके शुभाशुभ फलानुसार (देखिए ५वा प्रकरण जहाँ १० से लेकर ७० तक के संख्यापिंड का विवरण दिया गया है) उत्तर दें। अंकों से मूक प्रदन ज्ञान "सेफेरियल" नामक प्रसिद्ध अंगरेज ज्योतिषी ने अपनी अंक ज्योतिष की पुस्तक' में अंकों से मूक पंदन बनाने का जिक्र किया है और जिस दसवें प्रकरण में इसका विवेचन किया है, उस प्रकरण का नाम रक्सा है "अंक विद्या से मूक प्रश्न , बताना-हिन्दू शास्त्रानुसार ।" स्वभावतः . हमे जिज्ञासा हुई कि 'सेफ़ेरियल ने हिन्दू-ज्योतिप के किस ग्रंथ मे से उपयुक्त विषय लिया है। किन्तु बहुत अनुसंधान करने पर भी हमें अपने संस्कृत साहित्य में उस ग्रन्य रत्न का पता न लग सका । -विदेशियों के निरन्तर प्राक्रमरणों से हमारी संस्कृति जर्जरित हो गई और हमारे कितने ही अमूल्य ग्रंथ सर्वदा को काल कवलित हो गये । अब भी जर्मन और इंगलैण्ड के संग्रहालयों मे तथा नेपाल और तिब्बत में प्राचीन भारतीय संस्कृति 'और विद्या समृद्धि के परिचायक कितने ही ऐसे ग्रंथ मिलते हैं जो भारत में उपलब्ध नही । अतः पाठकों के लाभार्थ ग्रंक-ज्योतिप द्वारा भूक प्रश्न बताने की विधि दी जाती है ।। परन्तु "मूक प्रश्न" के सम्बन्ध में एक विशेष बात ध्यान मे . । १. Tho Kabala of Kumbers by Sepharial Published by Rider & Co. London.
'डों से प्रश्न विचार रखनी चाहिए । मूक प्रश्न एक प्रकार से दूसरे के विचार को जान लेना है। इसके लिए स्वयं अपनी मानसिक शक्ति और सात्मिक शक्ति बहुत प्रवल होना आवश्यक है। सूई से कपड़ा सिलता है। परन्तु सोना भी तो आना चाहिए। अग्नि से भोजन बनता है। किन्तु जो भोजन बनाने की कला से अनभिज्ञ है वह क्या करेगा ? प्रश्न में मानसिक शक्ति की तीव्रता और चित्त को सात्विकता- यह दो गुण परमावश्यक हैं। जिस प्रकार प्रत्येक मनुष्य अच्छा गायक नहीं हो सकता- -वारगी का सौष्ठव और गले . की मिठास ईश्वरीय देन होते हैं उसी प्रकार मूक-प्रश्न आदि विद्या मे सब सफल नहीं हो सकते । जिनमें 'अतीन्द्रिय ज्ञान' विशेष मात्रा में होता है वे.ही मूक प्रश्न बताने में सफल हो सकते हैं । प्रदन करने वाले से कहिये कि नौ अंक लिख दे। इनको जोड़िये मोर योग में सदैव ई जोड़ दीजिये । उदाहरण के लिए प्रश्नकर्ता ने लिखा- ९८५६२७१४२-४४ सदैवं जोडिए ३ योग-१७ इस '४७' संख्या के अनुसार नीचे जो उत्तर आवेगा-कमू प्रश्न का उत्तर होगा । यदि कोई ६ बार केवल • लिखे.तो ०००००००००० सदव जोडिए. ३. .- . योग- । योग ३ - होगा। सबसे बड़ी संख्या- तब बनेगी जब कोई ६ बार ६ लिखदे 1 : ...
--
३
१७४
अंक-विद्या (ज्योतिष)
EEEEEEEEEEE१
सदैवं जोडिएं
योग
इसलिए सबसे बड़ी संख्या ८४ होगी। इसलिए ३ से लेकर
८४ तक को संख्यानों का फल नीचे दिया जाता है ।
(३) पाप किसी बीमारी, बुखार, रोग या कोन की व्यक्तिगत बात
८४
सोच रहे हैं।
(४) किसी कौटुम्बिक विषय में-प्रेम या यानन्ददायक विषय
में जिससे हृदय का बहुत सम्बन्ध है -या जिसकी तीव्र इच्छा
आपके मन में है।
(५) विवाह के विषय में या किसी इकरारनामे या साझेदारी
के विषय में यां किन्ही दो वस्तुओं या व्यक्तियों के मिलने के
विषय में।
(६) किसी समाचार यो खबर के विषय में, यात्रा भाई या किसी
सवारी या डाक से आने वाली वस्तु के विषय में ।
(७) मकान या जमीन के विषय में या भूमि के नीचे की वस्तु के
विपय में, समुंद्र, जलराशि, परिवर्तन यो स्थानपरिवर्तन आदि
के विषय में।
(८) विदेशी या प्राचीन वस्तुं के विषय में
(6) मृत्यु से सम्बन्धितं या घाटे के विषय में । कोई गलत इकरार
नामा हो गया है और वह कैसे ठीक हो ?
(१०) कोई कष्टदायक सम्बन्ध हो गया है या कोई ऐसा इकरार
नामा जिससे हानि की संभावना है या झगड़े के विषय में ।
(११) किसी खान, जायदाद या उसके मूल्य के विषय में ।
१७५ अंकों से प्रश्न विचार १२) खुशनुमा वातावरण, कोई जलसा या उत्सव, आराम की चीजें बढ़ियां कपड़े। १३) द्रव्यं के सम्बन्ध में, सट्टे या लाभ के विषय में । (१४) किसी स्त्री-सम्बन्धी के विषय में (लड़की, बहिन आदि) नदी या समुद्र के उस पार से जाने वाले किसी संवाद के विषय 'में या किसी यात्रा के विपय में । (१५) किसी मृत्यु या दुःखदायी समाचार के सम्बन्ध में या किसी अन्य कष्ट के समाचार या घाटे के विषय में । (१६) किसी अच्छे या शुभ समाचार के विषय में, किसी लाभदायक सम्पर्क, पत्नी या किसी अच्छे इकरारनामे या बातचीत के विषय में । (१७) किसी रोग, तकलीफ या नौकर या अपने समीप की किसी वस्तुं के विषय में। (१८) किसी हर्षदायक यात्रा के विषय में, प्रेम, हपं, भाई या इच्छित सन्देश प्राप्ति किंवा सुवर्ण या कौटुम्बिक बांत के विषय में । (१९) किसी चीज की रुकावट, जेल, एकान्तवास, अस्पताल रहना अथवा बच्चे के विषय में। (२०) किसी यात्रा या पत्र के विषय में, किसी से पत्र-व्यवहार या 'वस्तु के लाने-ले जाने के विपय में-रास्ते से सम्बन्धित प्रश्न । (२१) लाभ के विषय में कुछ आर्थिक लाभ, जो वस्तु कब्जे में हो सफ़ेद या चांदी की चीज। (२२) किसी ऐसे विवाह के विषय में जो इच्छा के प्रतिकूल या दुष्परिणामयुक्त हो-किसी बीमार साझीदार या पति या
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-
"
१७६
अंक-विद्या (ज्योतिष)
पली के विषय में किसी शत्रु या प्रतियोगी की बाबत अथवा
कठिनाइयों या प्रतिकूल इकरारनामे के सम्बन्ध में ।
(२३) सुसम्पन्न स्थिति में रहने के विषय में, अच्छे कपड़े, उत्तम
भोजन, स्वामिभक्त नौकरों के विषय में, अच्छे पद, ..स्वास्थ्य,
तथा पाराम के सम्बन्ध में ।
(२४) किसी स्थिति की डांवाडोल हालत के विषय में किसी
कौटुम्बिक कलह की वावत-किसी ऐसे नवीन, कार्य की
आयोजना के विषय में जिसमे बहुत कठिनाइयो तथा विषमता
उपस्थित हो रही हों बच्चों के विषय में या गुप्त प्रेम के
सम्बन्ध में।
(२५) बहुत लाभ के विषय में, बहुत धन, सोना, सूर्य या किसी
चमकीली वस्तु की वावत ।
(२६) शान्तिपूर्ण अधिकार के विषय में, अच्छी जायदाद, मकान,
बुनियाद या समतल भूमि की बाबत.।
(२७) किसी बन्द कमरे या जगह की वावत--नाव -द्वारा छोटी
यात्रा । भाई या किसी सम्बन्धी के विषय में, किसी पन्न,या
सन्देशा लाने वाले की बाबत ।
(२८) अपनी कल्पना के विषय में सफ़ेद कपड़ा, प्याला.या चौदी
की चीज़नवीन (शुक्लपक्ष की प्रारम्भिक तिथियों के)
चन्द्रमा के विषय में।
(२६) अस्वास्थ्य के विषय में गरीबी और कठिनाइयों की परि-
स्थिति के विषय में, खून फसाद या बीमारी को बाबत ।
(३०) प्रसन्न बच्चों के विषय में, आनन्ददायक अनुभव, संयोग, किसी
विरासत या दहेज द्वारा प्राप्त धन के विषय में।
"
'अंकों से प्रश्न विचार
.
(३१) जमीन के नीचे (भूगर्भ में स्थिति) वस्तु के विषय में, मकान
में स्थित सर्प, बिच्छू या अन्य जानवर या विदेश की बाबत ।
(३२) किसी बादशाह या सरकार या सुवर्ण सम्बन्धित या अपने
स्वयं के व्यक्तित्व या कार्य के वारे में।
(३३) एक प्रसन्न दायक समाचार के विषय में, अच्छा पद या स्थिति
..' भाई,या किसी अन्य विशिष्ट उपलब्धि की बाबत ।
(३४) आर्थिक लाभ से सम्बन्धित, भोजन या अन्य आवश्यक पदार्थ,
अन्न या अन्य लाभ ।
(३५) किसी स्त्री के विषय में, जन्म की बावत -किमी गुप्तयोजना
या कार्यवाही से सम्बन्धित-अपनी किसी गुप्त बात की या
(३६) सट्टे या रोजगार में हानि, बीमार बच्चा, दुःखदायक
कौटुम्बिक स्थिति दुःख और कष्ट की बाबत ।
(३७) किसी ऐसे इकरारनामे के विषय में जिसका परिणाम अच्छा
न हुआ हो-किसी विवाह के विषय में जिससे खुशी हासिल
न हुई हो - मकान, जायदाद या अस्तवल की बावत ।..
(३८) बुखार-मलेरिया या मोतीझरा से सम्बन्धित शारीरिक कष्ट
या मृत्यु यात्रा अथवा संवाद-किमी समीप के तालाब या
जलाशय की वावत; वहिन के विषय में !
(३६) किसी बन्द जगह. या मन्दिर के . विषय,मे-राजभवन या
चमकीले मकान (सिनेमा) आदि से सम्बन्धित किंवा बाहर
जाने-निष्कासन आदि के विषय में ।
(४०) अन्न के मूल्य,बहुमूल्य वस्तु, जवाहरात, जेवर, पहिनने के वस्त्र
या द्रव्य विषयक ।.
।
.
१७८ अंक-विद्या (ज्योतिष) (४१) अपने स्वयं के या अपनी पोशाक, भौजनं, स्थिति, नेकनामी, बदनामी, साख या प्रतिष्ठा के बारे में। (४२) किसी मित्र या उच्च पद की स्त्री के विषय में, किसी उच्च पदाधिकारिणी की कृपा के सम्बन्ध में किसी जन समूह की बावत। (४३) मौरूसी जायदाद के विषय में, पुरानी इमारत, मशीन, खान की वस्तुओं की वावत या किसी वृद्ध के विषय में । (४४) भाई के विषय में, स्वास्थ्य, पाराम की वस्तु, शोकीनी, धार्मिक ग्रंथ, शास्त्र सम्बन्धी या समुद्र पार अथवा दूर से आने वाले पत्र के विषय में। (४५) विवाह के विषय मैं-लाभ या हानि सम्बन्धी प्रश्न । धोखा, पक्षपात, असमानता या किसी छोटे मूल्य की वस्तु के विषय में। (४६) किसी मित्र या उच्च पदाधिकारी के विषय में सोने की वस्तु, अंगूठी, जवाहरात या बहुमूल्य वस्तु के विषय में । (४७) स्वयं के विषय में न्याय-इन्साफ़-मुकदमें के बारे में, नाप तोल, संतोप, पाराम, शांति, मृत्यु के विषय में । (४८) पोशाकं-गृह, मकान की. किसी अन्दरूनी जगह की बावत । किसी छिपे हुए नौकर के विपयं में-किसी स्त्री के स्वास्थ्य के विषय में यां दूर से आने वाले संवाद के विपयं में ! (४६) पंद-परिवर्तन के विषय में, अपनी माता या किसी विगिष्ट वस्तु को बावतं-किसी रानी या उच्च पदाधिकारिणी महिला के विषय में। -(५०) किसी कष्टदायक यात्रा के विषय में-कप्ट में पड़ी हुई किसी
।
से प्रश्न विचार
१७६
वहिन के विषय में किसी बुलाहट यां दुःखद समाचार के
विषय में।
(५१) लाभ या आर्थिक प्रचुरता के विषय में। किसी शर्त, सट्टा,
लॉटरों, किसी रोजगार, बच्चों, या दूर से आने वाले द्रव्य के
विषय में।
(५२) शारीरिक रोंग या मृत्यु के विषय में खोई हुई, छिपी हुई
वस्तु की बायत, नोकर, लाल कपड़ा, गरम भोजन, डाक्टर
वंद्य यमराज' यो सर्प विषयक प्रश्न ।
(५३) किसी उच्च पद के विषय में राजा या तत्सदृश पदाधिकारी,
मृत सिंह यो खोये हुए सोने के विषय में।
(५४) सांघातिक भयानक रोग के विपय में, कप्ट की परिस्थिति में,
किसी स्त्री के विषय में-पत्नी, कन्या, किसी वादे या इकरार
नामे की वावत-चहारदीवारी सम्बन्धी प्रश्न ।
(५५) मृत्यु के विपय में, किसी खोये हुए कागज या गलत जगह
पहुँचे हुए सन्देश के विषय में किसी नयी उम्र की लड़की,
जन समूह या मित्र के विषय में ।
(५६) समुद्र पार विदेश सम्बन्धी-समुद्र यात्रा के विषय मे, धार्मिक
सम्मेलन, प्रकाशन, जहाज़ या भूत के विषय में ।
(५७) किसी खजाने, भंडार या प्राप्त धन-राशि के विषय में किसी
विरासत, पेंशन या पुरुष-सम्बन्धी की बाबत !
(५८) वकील, जज, गुरु, पुरोहित, शास्त्र, वेद, ब्राह्मण, व्यक्तिगत
जायदाद, व्यक्तिगत प्रभाव या प्राप्ति के विपय में।
(५९) मृत्यु-गृह, अस्पताल, रोगी को कर्मरा, बच्चा, घर में जलती
हुई अग्नि-किसी साहस या उद्योग सम्बन्धी प्रश्न ।
..
1
१८० अंक-विद्या (ज्योतिष) (६०) किसो पारसी के विषय में, धार्मिक संस्कार-विदेशी नृप, ऋषि, समाधि, ब्रह्म, प्राकाशस्थित सूर्य, ईश्वर तथा काल विषयक . प्रश्न। 7 - ((६१) भोजन या खाद्य विषयक प्रश्न; व्यापार, उत्तम वस्त्र, पुरुष- मित्र, व्यापार स्थान या बाजार नौकर या वैष्णय ब्राह्मण विपयक प्रश्न । (६२) किमी लेख या इकरारनामे के सम्बन्ध में-किसी वादे कार्य भार या माहिदे की वावत-कानूनी कार्यवाही; पद, मिल्कियत या पिता विषयक प्रश्न । (६३) मृत स्त्री से सम्बन्धित-खोई हुई जायदाद या वन्तु के बारे में । कफन का वस्त्र-क्षीणचन्द्र-स्त्री का दहेज (स्त्रीधन), स्नान सम्बन्धी प्रश्न । (६४) अपनी पद-स्थिति सम्बन्धी प्रश्न । प्राप्त जायदाद के विषय में, विरासत, वृद्ध मनुष्य, सौदा या वस्तु-परिवर्तन, समय की अवधि सम्बन्धी प्रश्न । (६५) छोटी यात्रा और उससे लौट आने के विषय का प्रश्न-जाना और पाना-पैदल यात्रा -चन्दकमरा-सुखद कमरे में रहना वहिन, अथवा मंत्र के विषय में। (६६) श्मशान-पर्वतीय स्थल या स्थान खनिज पदार्थ, वैद्य, मृत मित्र, जलता हुअा घर, सूखी भूमि या रेतं विषयक प्रश्न । 'टिप्पणी : 'सेफ़ेरियल' ने मंत्र, ईश्यर, ऋषि, ब्रह्म, वणव बाह्मण, समाधि, गुरु, पुरोहित, यम, घेद, शास्त्र मादि शादी का प्रयोग किया है-जिस यह निस्सन्देह प्रमाणित होता है कि इस प्रकरण का विषय गद्ध संरकत शास्त्रों से संकलित है। . . . से . प्रकों से प्रश्न विचार (६७) मृत राजा, सोया हुआ सोना, स्त्री का दहेज, करधनी, बीमार । बच्चे से सम्बन्धित प्रश्न'। (६८) छोटी (कम उम्र की) कन्या के सम्बन्ध में कुटुम्ब सम्बन्धी, विश्वास योग्य पद या जमानत सम्बन्धी प्रश्न । (६६) वस्त्र, नौका, जहाज़ सौदागरी का सामान, भोजन की वस्तुएँ, व्यापार, वेदांग या व्यापार सम्बन्धी । (७०) पत्नी सम्बन्धी प्रश्न, इकरारनामा, जनता के एकत्रित होने का स्थान, पूर्णचन्द्र सम्बन्धी प्रश्न । (७१) जलपात्र या 'कुम्भ' विषयक प्रश्न । किसी पुराने परिचित जन या स्थान, या मित्र के सम्बन्ध में । अन्य लोगों से अपने सम्पर्क के विषय में। (७२) धन के विषय में-किसी रईस मित्र, ब्राह्मण, धार्मिक सम्मेलन खड़ाऊँ या अन्य जोड़े (दो वस्तु मिलाकर पूर्ण होने) वाले पदार्थ के विषय में। (७३) भाई, पंद, किसी शासक की मृत्यु, शोघ्रयात्रा, क्रोधयुक्त सन्देश सम्मान-प्रतिष्ठा; उत्तराधिकार अथवा लिखने के विषय में । (७४) चमकते हुए सूर्य के विषय मे; गर्विता पत्नी, शक्ति सम्पन्न शत्रु, आखेट, नेत्र ज्योति, या किसी चमकीले पदार्थ के विपय । " . में। 7 (७५) खुशनुमा स्थान, सम्पन्न जमीदारी, मोक्ष, दफ़ोना पृथ्वी के अन्दर द्रव्य राशि), गाय-भैस प्रादि जानवरों के विषय में । (७६) पुत्र विद्यास्थान, पाठशाला' स्कूल; नव परिणीता वधू या , सेफ़ेरिमल ने वेदांग 'कुम, मोक्ष, ब्रह्मवारी, धोती प्रादि शब्दों का प्रयोग किया है।
, १०२ अंक-विद्या (ज्योतिष) ब्रह्मचारी विपयक प्रश्न। (७७) सफ़ेद पगड़ी या साफ़ा, नौकरानी, औषधि, जल या पीने के सम्बन्ध मे। (७८) किसी वृद्ध मित्र, संस्था, प्रचीन सम्बन्ध, अस्पताल या कारा- गार स्थित मनुष्य के विषय में । (७९) अपने विषय में वृद्धि और समृद्धि विषयक प्रश्न-पद, शक्ति पैर, खड़ाऊँ । किसी वस्तु को अति सीमा विषयक या जज, वकील या समझ के विषय मे। (८०) लाभ, हानि की आशंका, अग्नि से हानि, विदेश की भूमि--- दूर स्थान से मृत्यु, प्रलय,' यात्रा सम्बन्धी प्रश्न :-- (८१) किसी धनिक सम्बन्धी के विषय में, उत्तम वस्त्र, सुनहरी ग्राभूपण, व्यक्तिगत स्वास्थ्य, पके फल के सम्बन्ध में ।' (८२) शांतिमय मृत्यु, बहुमूल्य दहेज़, हर्प समाचार, हाथी की सवारी, लाभ के लिये यात्रा या.बहिन के विषय में। -(८३) व्यापार सम्वन्धी । सन्धि या इकरारनामा सम्बन्धी प्रश्न, जायदाद का ठेका या किराये पर देना-रास्ता या फ़ाटक, नव विवाहित वधू या सगाई के सम्बन्ध मे । (८४) कन्या के विषय में.। तालाव या स्नान, स्यान, जनमहोत्सव, दुर्गा, छुट्टी, साफ़ वस्त्र, प्रिय पात्र के विषय में। नाम के अक्षरों से जय-पराजय जान, प्रत्येक नाम को संख्या बनाकर यह निश्चित करना कि दो व्यक्तियों में से किसको हार और किसकी जीत होगी-स विषय १. सेफ़ैरियत ने प्रलय' 'दुर्गा' पादि संरहत शगों का प्रयोग किया है The Kabala of Numbers प० १४५ . .
भ 'को' से प्रश्न विचार में कई प्राचीन विद्वानों ने नाम के अक्षरों से जय-पराजय चक्र बनाने का प्रकार बताया है। "समरसार" नामक संस्कृत ग्रंथ के आधार पर कुछ चक्र नीचे दिये जाते है। १. जय पराजय चक्र ५/५/३/३/३६६/८ प्रमाइजए। ऐसो कासगापचछजझट ढाणात थ दानापफ मयारलावदापासाह! जिन दो व्यक्तियों के विषय में विचार करना है-उनके नामा- क्षरों की संख्या बनानी चाहिए। (क) उदाहरण के लिए- राम-++म् +अ-३+५+५+५:१८ रावण-+या+++ए+%३+५+३+५+५ +५:२६ इस प्रकार दोनों नामों की संख्या बना लेने पर २ से भाग देना । यदि दो का भाग देने पर दोनों में ० शेष आवे-अर्थात् कुछ नहीं बचे तो या दोनों में '१' एक शेप आवे तो समझना कि दोनों पक्ष प्रायः समान वली है । अन्तिम विजय किसकी होगी यह विचार करने के लिए अन्य प्रकार बताए जावेगे । यदि २ का भाग देने से एक नाम के अक्षर की संख्या मे १ बचे और दूसरे नाम की संख्या में बचे तो 'जिसके नामाक्षर-संख्या.में 'वचे उसकी विजय (जीत) होगी। उपयुक्त उदाहरण में संख्या १८ तथा. २६ प्राई है.। २ से भाग १ - हो उसी की विजय होती है। उपर्युक्त उदाहरण में राम की संख्या - बारह घटावे और दोष मे पाठ का भाग दे । जिसका शेप अधिक १९४ क-विद्या (ज्योतिष) देने से दोनों में ही ० बचा । इस कारण दोनों पक्ष वली हैं । काफी ठन कर लड़ाई होगी, यह निष्कर्ष निकालना चाहिए। (ख) जब इस प्रकार से कोई निर्णय न हो सके तो दोनों संख्यानों में 5 का भाग दे । जिस संख्या में अथिक शेप वचे उस संख्या वाले व्यक्ति की विजय होगी। उदाहरण के लिए १८ तथा २६ इन दोनों में ८ का भाग दिया दोनों में '२' शेप वचा। इस प्रकार से भी यही निर्णय आया कि दोनों पक्ष समान बली है । अन्तिम विजय के निर्णय के लिए आगे के चक्रों से सहायता लेनी चाहिए। सर्व प्रथम नं. १ के चक्र से जय-पराजय का विचार करना चाहिए । उससे कोई निर्णय स्पष्ट न ग्रावे तब इस द्वितीय चक्र की सहायता लेना उचित है। राम=+++4=२+३+६+६=१७. रावण+आ++ अ + +२+३+६+६+ ३+६%२८ यदि दोनो संख्या १२ से अधिक हों तो दोनों में से बारह २. जय पराजय चक्र ३ २ ४।६६६४३ . प्राई। । ऐ भो नौ क ख ग घ च छ जाभ ढाण.त ध पफवभ . रसाव वा, पासाह . ।
'मंगे' में प्रश्न विचार
बनो १७ और रावण को २८ । दोनों में १२ घटाये तो संख्या रही
५ तया १६ । इनमें पृथक् पृथक् ८ का भाग दिया तो रोप रहा ५
तया । राम की संख्या में गेप '५' रावण की संख्या में शेप .
से अधिक है, इस कारण राम को विजय हुई।
३. जय पराजय चक्र
४।६।५ ७१।३२
प्रप्राइईक,घ ट त प
मा.
.
प्रो मी मंपिझ
माणन
पदि उपयुक्त प्रथम तथा द्वितीय चक्रों में वरिणत प्रकारों से
कोई निर्णयात्मक उत्तर न पावे तो इस तृतीय चक्र से विचार करना
चाहिए।
दोनों नामों में अक्षरों की संख्या बनाकर पृथक पृथक ७ का
भांग देना चाहिए । जिसके नाम की संख्या में शेष अधिक रहे उसी
की विजय होगी।
उदाहरण के लिए राम=+आ+म्+य
=३++१+=२०
}" रावण%3D+आ++अण्+अ
%D३+"+३++४+८-३४..."
दोनों में ७ का भाग दिया। शेष दोनों में ही ६ बचा । इसका.
अर्थ है कि दोनों में युद्ध-बल बरावर है ।
इस प्रकरण में राम और रावण दो प्रसिद्ध योद्धाओं के नाम ;
उदाहरण के लिए ले लिये गए हैं। प्राचीन ऐतिहासिक पुरुषों पर
अंक-विद्या (ज्योतिष) इन्हें नहीं आजमाना चाहिए । जब कोई समस्या सामने हो तव शुद्ध और निर्मल चित्त से निर्णय के लिए इन चक्रों का प्रयोग उचित है। यदि प्रश्न करने वाला शुद्ध चित्त से ज्योतिषी के पास जाकर आदर पूर्वक प्रश्न करे कि "अमुक स्त्री के पुत्र होगा या कन्या होगी" तब तो प्रश्न का फल मिलेगा। यदि किसी ६० वर्ष की वृद्धा स्त्री का नाम लिखकर पूछे 'इसे' कन्या होगी या पुत्र तो फलादेश नहीं मिलेगा। किसी भी प्रश्न के लिए जब नाम, राशि या कुण्डली का विचार हो या संख्या या अंक-ज्योतिष से विचार करना हो, तो मनमें आस्तिक बुद्धि प्रावश्यक है । भूतकाल के, उपहास (हँसी मजाक) या परीक्षा के लिए किए हुए प्रश्न ठीक नही बैठते। केवल भविष्य- विषयक प्रश्नों के लिए ही उपर्युक्त चक्र काम में लाने चाहिए। टिप्पणी-सेफेरियल नामक मंग्रेत ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक, (The Kabala of Numbers) के पृष्ठ १४४-१५३ में खोयो हुई वस्तुभों का पता लगाने के लिये १ से २४ तक के मंकों का फलादेश दिया है। प्रश्नविषयक विशेष ज्ञान के लिए निम्नलिखित ग्रंप देखने चाहिए : १. प्रश्न वैष्णव २. प्रश्न भैरव ३. केरल प्रश्न संग्रह ४. केरलीय प्रश्न रत्नम् ५. प्रश्न पयोनिषि ६. प्रश्न भूषण ७. प्रश्न कौगदी ८. ताजिक नीलकंठी (प्रश्न तंत्र) ६. प्रश्न पूड़ामणि । १०. केवल ज्ञान प्रश्न चूडामणि। ११. प्रदन मार्ग, १२. प्रश्न चंडेश्वर, १३. पद पंचाशिका, १४. भुवनदीपक, १५. उत्तर कालामृत प्रादि। ये पुस्तकें गोयल एण्ड कम्पनी दरीयां, दिल्ली से प्राप्त को जा सकती हैं। मंक ज्योतिष विज्ञान का सार बहुत से प्रन्यों से लेकर ऊपर दिया गया है । जो सुट ज्योतिष का विषय है वह इन ग्रंथों के प्रवलोकन से ज्योतिषियों को विशेष उपयोगी होगा। . - .
No.D-2635/50 20 Akbar Road, New Delhi, the 1st August, 1950 Dear Mr. Ojba. * * I Aave jotted such inportant events us bay belp you to your astrological research. You will note that the most important. Brents of.2tute have occurred in the monthsofadusrror Warch, and 130 in the month of Novembes. haring yiri, Thurs.sincerely. تمامی To/... (C.V.Mavalankar). Sxs.coRish Kumar,JtaM.A.,LL.B.. उपर्युक्त पत्र में ४३ से अधिक पक्रिया है। केवल अंतिम ४ पक्ति ब्लोक में दी गई हैं। (देखिये पृष्ठ १५६) स्वर्गीय पण्मुखम चेटी (फाइनेम मिनिस्टर गवर्नमेण्ट ऑफ इडिया) के पत्र का एक अंश नीचे दिया जाता है। 5 QUEEN VICTORIA ROAD NEW DELHI 7th October 1947 - * * Imust thank you for the interest that you have taken in my career. Yours sincerely, . IR.K. Shanrushan Chetty) Mr. Gopesh KUTTAT Ojha. उपयुक्त पत्र लम्बा है। केवल अंतिम अंश दिया गया है । इसके अतिरिक्त अन्य अनेक विशिष्ट पुरुषों की जीवनी का उल्लेख किया जा सकता है । परन्तु बहुत मे सज्जन नहीं चाहते कि उनके जीवन की घटनाओं पर, मुद्रित पुस्तक में प्रकाश डाला जावे।
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