Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Mahabandho Vol-7
Front matter
ONL हीरालाल जैन एवं डॉ. आ. ने. उपाध्ये
भारतीय ज्ञानपीठ
(स्थापना फाल्गुन कृष्ण ६, वीर नि स २४७०, विक्रम स २०००, १८ फरवरी, १६४४)
स्व० पुण्यश्लोका माता मूर्तिदेवी की पवित्र स्मृति मे
स्व० साहू शान्तिप्रसाद जैन द्वारा संस्थापित
एव
उनकी धर्मपत्नी स्व० श्रीमती रमा जैन द्वारा सपोषित
इस ग्रन्थमाला के अन्तर्गत प्राकृत, सस्कृत, अपभ्रश, हिन्दी, कन्नड, तमिल आदि प्राचीन
भाषाओ मे उपलब्ध आगमिक, दार्शनिक, पौराणिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक आदि
विविध-विषयक जैन-साहित्य का अनुसन्धानपूर्ण सम्पादन तथा उनका मूल और
यथासम्भव अनुवाद आदि के साथ प्रकाशन हो रहा है। जैन-भण्डारो की
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सम्पादक (प्रथम सस्करण)
मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला
प्रकाशक
भारतीय ज्ञानपीठ
१८, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नयी दिल्ली-११०००३
मुद्रक नागरी प्रिटर्स, दिल्ली-११० ०३२
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित
Moortidevi Jain Granthamala : Prākrita Grantha No. 9
MAHĀBANDHO
MAHADHAVALA SIDDHĀNTAŚĀSTRA
of
Bhagavanta Bhūtabalī
[CHATURTHA PRADESA-BANDHADHIKARA)
Vol. VII
Edited and Translated by
Pt. Phoolchandra Siddhantashastri
BHARATIYA JNANPITH
Second Edition : 1999 o Price : Rs. 140.00
BHARATIYA JNANPITH
Founded on Phalguna Krishna 9, Vira N Sam 2470 • Vikrama Sam 2000 • 18th Feb 1944
MOORTIDEVI JAIN GRANTHAMALA
Founded by
Late Sahu Shanti Prasad Jain
In memory of his late Mother Smt Moortidevi
and
promoted by his benevolent wife
late Smt Rama Jain
In this Granthamala Critically edited Jain agamic, philosophical,
puranic, literary, historical and other original texts
available in Prakrit, Sanskrit, Apabhramsha, Hindi,
Kannada, Tamil etc , are being published
in the respective languages with their
translations in modern languages
Also
being published are
catalogues of Jain bhandaras, inscriptions, studies,
art and architecture by competent scholars,
and also popular Jain literature
General Editors (First Edition)
Dr Hiralal Jain & Dr AN Upadhye
Published by
Bharatiya Jnanpith
18, Institutional Area, Lodi Road, New Delhi-110003
Printed at Nagri Printers Delhi-110032
All Rights Rescrved by Bharatiya Jnanpith
महाबन्ध का सारांश महाबन्ध क्या है? 'महाबन्ध' का सीधा-सादा अर्थ है-महान बन्धन। दुनिया में एक-से-एक वडे बन्धन है जिनको शारीरिक, मानसिक और भौतिक शक्तियो के बल से तोडा जा सकता है, लेकिन मोह, राग एक ऐसा बन्धन है जिसे साधु, सन्त, योगी ही अध्यात्मयोग से तोड सकता है। मोह, राग-द्वेष का नाम 'कर्म' है। इनमें अपनेपन की बुद्धि से कर्मबन्ध होता है। कर्म-बन्ध से जन्म-मरण, सुख-दुःख की प्राप्ति होती है जो ससार का मूल कारण है। 'कर्म' किसी भाव का नाम मात्र नहीं है, किन्तु वह एक हकीकत है जो द्रव्य और भाव रूप से अपना अस्तित्व रखती है। इसलिए मूल मे कर्म के दो भेद है-भावकर्म और द्रव्यकर्म। जिसकी कोई शुरुआत नही है, ऐसे काल के अनादिनिधन प्रवाह में अनादि काल से भावकर्म के निमित्त से द्रव्यकर्म और द्रव्यकर्म के निमित्त से भावकर्म प्रत्येक समय में उत्पन्न होता रहता है। जो सदा काल ज्ञान, दर्शन में चेतता है उसे 'चैतन्य' और जो जीवित रहता है उसे 'जीव' कहते है। जीव चेतन है, कर्म जड है। लेकिन अनादि काल से दोनो का निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है। आगम ग्रन्थो में 'कर्म' शब्द का प्रयोग इन तीन अर्थो मे मिलता है-जीव की स्पन्दन क्रिया, जिन भावों (राग-द्वेष, मोह) से स्पन्दन क्रिया होती है और जो कर्म रूप (कार्मण) पुद्गलो मे सस्कार के कारण उत्पन्न होते है। वास्तव मे जन्म-जन्मान्तरो मे बने रहनेवाले वासनात्मक सस्कार 'कर्म' है। 'कर्म' का मुख्य काम जीव को ससार मे रोककर रखना है। राग-द्वेष और मोह के निमित्त से आत्मा के साथ जो कर्म सम्बन्ध को प्राप्त होते है उनके साथ अमुक समय तक बने रहने को स्थिति कहते है। 'महाबन्ध' सात पुस्तकों में है। पहली पुस्तक प्रकृतिबन्धाधिकार है। इसमे कर्म के स्वभाव का स्वरूप बताया गया है। प्रकृति' का अर्थ स्वभाव है। कर्म के असली स्वभाव का नाम मूल प्रकृति है। अलग-अलग भाग के रूप मे जिसे कहा जाए वह उत्तर प्रकृति है। स्वभाव बतलाने का प्रयोजन द्रव्य की स्वतन्त्रता बतलाना है। जीव कभी कर्म रूप नही होता और कर्म कभी जीव रूप नही होता। किन्तु इन दोनो के सम्बन्ध का नाम बन्ध है। कोई भी वस्तु अपना स्वभाव कभी नहीं छोडती। नीम अपनी कडवाहट छोडकर मीठा नही होता और शक्कर कभी मिठास छोडकर अन्य रस-रूप नही होती। आगम छह खण्डो मे निबद्ध है। आगम ग्रन्थो को ही सिद्धान्तशास्त्र कहते है। आचार्य नेमिचन्द्र का कथन है कि जीवस्थान, क्षुद्रकबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड और महाबन्ध के भेद से षट्खण्ड रूप सिद्धान्तशास्त्र है। (कर्मकाण्ड, गा ३६७) कर्म की सामान्य प्रकृतियाँ १४८ है। इनके विशेष भेद अनन्त हो जाते हैं। ओघ से ५ ज्ञानावरण तथा ५ अन्तराय की प्रकृतियो का सर्वबन्ध होता है। आयुकर्म को छोडकर सातो कर्मों की प्रकृतियाँ निरन्तर बँधती रहती है। कर्म की प्रकृतियों के स्वरूप को कहना, वर्णन करना 'प्रकृति-समुत्कीर्तन' कहलाता है जो 'महाबन्ध' के प्रथम भाग का मूल विषय है। यह 'प्रकृतिबन्ध-अधिकार' 'षट्खण्डागम' के वर्गणा खण्ड के अन्तर्गत बन्धनीय अर्थाधिकार में २३ पुद्गल वर्गणाओ की प्ररूपणा मे विवेचित है। २४ अनुयोगद्वारी मे इनका विस्तार से वर्णन किया गया है। 'महाबन्ध' में भी यही शैली अपनाई गयी है। इसमे ज्ञानावरणीय की उत्तर तथा उत्तरोत्तर प्रकृतियो का विवेचन किया गया है। यह कहा गया है कि मिथ्यात्व, असयम, कषाय और योगो के निमित्त से कर्म उत्पन्न होते है और कर्मों के निमित्त से जाति, बुढापा, मरण और वेदना उत्पन्न होती है। कर्म शुभ और अशुभ दोनों तरह के होते हैं। जीवो को एक और अनेक जन्मो मे पुण्य तथा पाप कर्म का फल मिलता है। कर्म के उदय मे जीव के राग-द्वेष और मोह रूप भाव होती है। उन भावो के कारण कर्म बँधते है। कर्मो से चार (मनुष्य, तिर्यच, नरक, देव) गतियो मे जन्म लेना पडता है। उससे शरीर मिलता है। शरीर के मिलने से इन्द्रियाँ होती हैं। उनसे यह जीव विपयो को ग्रहण करता है। विषयो ६ महावन्ध . को ग्रहण करने से राग-द्वेप रूप परिणाम होते हैं। यही ससार-चक्र है। 'महावन्ध' मे सामान्यत वन्ध के चार भेदों (प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेश-बन्ध) का बहुत विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। मूल मे प्रश्न यह है कि जीव अमूर्त है और कर्म मूर्तिक है। अमूर्तिक होने से जीव मे स्पर्श गुण नही है। जब जीव कर्म को छू नहीं सकता है तो फिर बॅधता कैसे है? इसका मुख्य कारण जीव की अपनी कमजोरी है। जीव ज्ञानमय है, लेकिन ज्ञानावरण कर्म के उदय मे अपने को भूला हुआ पर को जानने मे लगा रहता है। परिणमन करने की शक्ति जीव मे है। अत राग-द्वेष, मोह रूप परिणमन से कर्म का वध करता रहता है और अज्ञानी (आत्मज्ञान नही होने से) वना रहता है। मिथ्यात्व, असयम, कपाय और योग के निमित्त से कर्म का वध होता है। मिथ्यात्व, नपुसकवेद, हुण्डक सस्थान, असप्राप्तासृपाटिका सहनन का वध करने वाला मिथ्यादृष्टि होता है। (महावन्ध, भा १, पृ ४७) मिथ्यात्व के उदय मे ही प्रथम गुणस्थान (योग और मोह से उत्पन्न स्थिति) होता है। मिथ्यात्व के भाव से मिध्यादृष्टि मिथ्यात्व का वन्ध करता है। मिथ्यात्व का बन्ध करने वाला ५ ज्ञानावरण, ६ दर्शनावरण, १६ कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजस, कार्मण शरीर, ४ वर्ण, अगुरुलघु, अपघात, निर्माण और ५ अन्तराय का नियम से वन्धक है। (वही, पृ १३५) मिथ्यात्व मे भी रजना शक्ति है, इसलिए मिथ्यात्व का बन्ध करने वाला तीनो लोको का स्पर्शन करता है। मिथ्यात्व के बन्धको का स्पर्शन-क्षेत्र ८/१४, १३/१४ या सर्वलोक है। (वही, पृ २४८) यही नही, 'कर्म की स्थिति' से मतलब केवल 'मोह' या 'मिथ्यात्व' की सत्तर कोडा-कोडी (एक करोड में एक करोड का गुणा करने पर जो सख्या हो) सागर की स्थिति से है जिसमे सब कर्मों की स्थिति का सग्रह है। (महायन्ध, भा १, पृ६३) कर्म की स्थिति दो तरह की होती है-कर्मस्थिति और निषेकस्थिति। द्रव्यकर्म आठ प्रकार के है-ज्ञानावरणीय (जो सम्पूर्ण ज्ञान को प्रकट होने से रोक), दर्शनावरणीय (जो पूर्ण दर्शन को विकसित न होने दे), वेदनीय (जिससे सुख-दुख का वेदन हो), मोहनीय (जिससे मोह रूप अनुभव हो), आयु (जिससे जीव को अमुक समय तक शरीर में रहना पडे), नाम (जिससे गति, जाति, शरीर आदि मिलता है), गोत्र (ऊँच-नीच कुल जिससे मिले) और अन्तराय (विध्न-वाधा उत्पन्न करनेवाला)। ये कर्म की मूल प्रकृति के आठ भेद कहे गये है। इन आठ मूल प्रकृतियों के १४८ भेद होते है। इनमे से कर्मवन्ध योग्य १२० प्रकृतियाँ हैं। यद्यपि उत्तर प्रकृतियाँ १४८ हैं, लेकिन दर्शन मोहनीय की सम्यक्त्व और सम्यमिथ्यात्व ये दो अवन्ध-प्रकृतियाँ है और पॉच वन्धनो तथा पाँच सघातो का पॉच शरीरो मे अन्तर्भाव हो जाता है। इसी प्रकार स्पर्शदिक के वीस भेदो के स्थान पर चार का ग्रहण किया गया है, इसलिए २८ प्रकृतियाँ कम हो कर १२० प्रकृतियाँ कही गयी है। इन कर्म-प्रकृतियो मे से ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय की १६, मिथ्यात्व, १६ कपाय, भयद्विक, तैजसद्विक, अगुरुलयुद्धिक, निर्माण और वर्णचतुष्क ये ४७ ध्रुववन्धिनी प्रकृतियाँ है। द्रव्यकर्म की रचना कर्म-परमाणुओ से होती है। जीव के राग-द्वेप, मोह भाव के निमित्त से आत्मा के प्रदेशो मे जो स्पन्दन क्रिया होती है, उससे समान गुण वाले वर्गों का समूह वर्गणा रूप परिणमन करता हे जो कर्म का आकार ग्रहण करता है। यद्यपि वर्गणाएँ तेईस प्रकार की कही गयी है, किन्तु उनमे से आहार वर्गणा, तैजसवर्गणा, भापावर्गणा, मनोवर्गणा और कार्मणवर्गणा ये ही पाँच ग्रहण योग्य है। कार्मण-वर्गणा से कर्म की रचना होती है। कर्म के परमाणु कहीं बाहर से नहीं आते, वे शरीर मे ही विद्यमान (मौजूद) है। प्रत्येक कर्म-प्रकृति की वर्गणा भिन्न-भिन्न है। कर्म-परमाणु स्कन्धी के रूप में निक्षिप्त होते है जिनको निपेक कहा जाता है। कर्म निपेक रूप मे बँधते है ओर निपेक रूप में झडते है। मिथ्यादर्शन, असयमादि परिणामो से कार्मण वर्गणा के परमाणु कर्म रूप से परिणत होकर जीवप्रदेशो के साथ सम्बद्ध होते है जिसे 'प्रकृतिवन्ध' कहते है। इस प्रकृतिवन्ध की प्ररुपणा २४ अनुयोगद्वारों में की गयी है जो 'महायन्य' की पहली पुस्तक के रूप में है। एक समय में एक ही कर्म-प्रकृति का वध होता है। उत्कृष्टवन्ध, अनुत्कृष्टवन्च, जयन्यवन्ध और अजघन्यवन्य प्रकृतिवन्च में सम्भव नहीं है। - महावन्ध का साराश ७ - महाबन्ध का विषय- 'महाबन्ध' का मूल विषय कर्म-बन्ध है। वन्ध का अर्थ है--बंधना। प्रश्न यह है कि जीव वेधता है, कर्म बॅधता है या दोनो परस्पर बँधते हैं अथवा बाँधते है। आचार्य भूतवली भगवन्तो का अभिप्राय प्रकट करते हुए कहते है-'को बधो को अबधो।' (पु.१, पृ३६) अर्थात् मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली तक सभी बन्धक है। 'बन्ध' का अर्थ बँधना तथा बँधनेवाला है। यदि जीव कर्म से वधता है तो ससारी है और कर्मो से छूट जाता है तो मुक्त है। यह सुनिश्चित है कि जीव अपने आपको भूल जाने के कारण स्वय अज्ञान से बँधा हुआ है, तभी कर्म उसके साथ सयोग मे है। लेकिन महज सयोग मात्र नहीं है, हकीकत भी है। जीव के स्वभाव में किसी कर्म का प्रवेश नहीं है। कहा भी है-"दव्वस्स दवेण दव्व-भावाण वा जो सजोगो समवाओ वा सो बधो णाम।" (षट्खण्डागम, धवला पु १४, पृ.१) अर्थात् द्रव्य का द्रव्य रूप से और द्रव्य का भाव रूप से जो सयोग या समवाय है उसका नाम वन्ध है। व्यवहार से भी जीव भावो के सिवाय कुछ नहीं कर सकता है। अत राग-द्वेष, मोह के अतिरिक्त कर्म की प्रकृति क्या है? उसका सम्बन्ध जीव के प्रदेशो के साथ है। यह भी स्पष्ट है कि एक साथ कुछ समय तक एक ही प्रदेश मे जीव और कर्म के रहे बिना सम्बन्ध स्थापित नहीं होता। इसलिए जीव और कर्म का एक क्षेत्रावगाह सम्बन्ध कहा गया है। जैसे एक ही बर्तन मे दूध और पानी मिले हुए होने पर भी अलग-अलग हैं, इसी प्रकार जीव और कर्म के एक साथ रहने पर भी वे दोनो अलग-अलग है। यही नहीं, दोनो के काम भी अलग-अलग है, लेकिन कर्म का फल जीव को मिलने के कारण, क्योंकि जीव उस रूप वेदन करता है, इसलिए कर्म की प्रकृति को जीव रूप कहा जाता है अर्थात् उस समय जीव का वही भाव होता है। चौदह गुणस्थानों में से प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थान मे तीर्थकर प्रकृति और आहारकद्विक का बन्ध न होने से ११६ प्रकृतियो का बन्ध होता है। द्वितीय गुणस्थान सासादन मे मिथ्यात्वादि १६ प्रकृतियो का बन्ध न होने से १०१ कर्म-प्रकृतियो का बन्ध होता है। मिश्र गुणस्थान मे ६६ प्रकृतियो का बन्ध होता है। चतुर्थ गुणस्थान में अविरत सम्यग्दृष्टि के देवायु और तीर्थकर प्रकृति का बन्ध प्रारम्भ हो जाने से ६१ कर्म-प्रकृतियो का बन्ध होता है। पंचम देशविरत गुणस्थान में अप्रत्याख्यानावरण ४ प्रकृतियों का बन्ध न होने से ६७ प्रकृतियो का बन्ध होता है। प्रमत्तगुण मे ६३ और अप्रमत्तगुणस्थान मे ५६ प्रकृतियो का बन्ध होता है। अपूर्वकरण मे ५८ प्रकृतियो का, अनिवृत्तिकरण में २२ प्रकृतियो का तथा उपशान्तकपाय में १७ कर्म-प्रकृतियों का बन्ध होता है। सूक्ष्म साम्पराय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली गुणस्थानो में केवल १ कर्म-प्रकृति का बन्ध होता है। किन्तु चौदहवें गुणस्थान अयोगकेवली में किसी भी प्रकृति का बन्ध नहीं होता। जैनधर्म भावप्रधान है। जीवो के मिथ्यात्व अवस्था मे मिथ्या भाव होते है और सम्यक्त्व अवस्था मे सम्यक्त्व भाव होते है। वास्तव मे जीव में प्रत्येक भाव रूप परिणमन उसकी अपनी योग्यता से होता है, किन्तु कथन निमित्तसापेक्ष किया जाता है। सिद्धान्तशास्त्र में अन्तरग, बहिरग कारण निमित्त की अपेक्षा कहे गए हैं। परन्तु जीव का स्वभाव परमनिरपेक्ष है। अन्तर इतना ही है कि परमागम मे आत्मा के सहज शुद्ध स्वभाव का वर्णन सर्वप्रथम किया जाता है, किन्तु सिद्धान्त (आगम) ग्रन्थो में उसे सबसे अन्त मे समझाया जाता है। परिणाम दो प्रकार के हैं-सराग और वीतराग। जैनधर्म वीतराग भाव में है। अतः जैनधर्म वीतराग है। पचगुरु वीतराग है। जिनवाणी वीतरागता की प्रतिपादक है और अर्हन्त-प्रतिमा वीतरागता की प्रतीक है। जैनसाधु आदर्श है। परमार्थ से वीतरागता ही साधुता है। अन्य प्रकार से दो प्रकार के परिणाम हैं-उत्कृष्ट और जघन्य। 'अनन्त' नाम ससार का है, क्योकि उसका कभी अन्त नहीं है। जो ससार का कारण है-वह 'अनन्त' है। यहाँ पर 'मिथ्यात्व' परिणाम को 'अनन्त' कहा गया है। राग, द्वेष ससार का कारण है, बन्ध का कारण है, संसार मै टिकानेवाला और उसका फल देने की शक्तिवाला है, किन्तु अनन्त ससार का कारण मिथ्यात्व ही है। जो उस मिथ्यात्व के साथ (अनु) महाबन्ध . बंधती है, उसकी सहचरी है, उस कपाय को अनन्तानुवन्धी कहते है। ("तथाहि-अनन्तससारकारणत्वात् मिथ्यात्वमनन्त तदनुबघ्नन्तीत्यनन्तानुबन्धिनः ।"-गोम्मटसार, कर्मकाण्ड भा १, गा ४५ की जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका) मिथ्यात्व में भी स्निग्धता है। (पचास्तिकाय, गा ६७, समयटीका) 'महावन्ध' मे यह प्रश्न किया गया है कि किस भाव से जीव कर्म-प्रकृति को बॉधता है? उत्तर है कि सभी प्रकृतियो का बन्ध औदयिक भाव से होता है। (ओदइगो भावो। एव याव अणाहरउ त्ति णेदव्व।) अर्थात् जव तक जीव अनाहारक अवस्था प्राप्त नहीं करता है, तव तक औदयिक भाव से कर्म वॉधता है। मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यात्व भाव से चारो गतियो का बन्धक होता है। मिथ्यात्व, हुण्डक सस्थान, नपुसकवेद, असप्राप्तासृपाटिका सहनन, एकेन्द्रिय, स्थावर, आताप, सूक्ष्म, अपर्याप्ति, दोइन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, साधारण, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, नरकायु ये १६ प्रकृतियॉ मिथ्यात्व गुणस्थान में मिथ्यात्व भाव से बंधती है। ये वन्धव्युच्छित्ति वाली प्रकृतियाँ है। (महावन्ध पृ ५, पृ ३७१) विश्व के सभी प्राणी कर्म-फल मे अधिक रुचि रखते है। कोई जीव दुख नही चाहता है, सभी सुखी रहना चाहते है। किन्तु जीव पुद्गल के आलम्बन से, सस्कार (कर्मोदय) के कारण राग-द्वेष, मोह (मिथ्यात्य) भावो को न पहचान कर, उनसे निवृत्त हुए बिना जिन भावो से स्पन्दन किया करता है, उनसे कार्मण पुद्गलो को ग्रहण कर निरन्तर कर्म-वन्ध करता रहता है। वस्तुत. मोहनीय कर्म के उदय से बुद्धि का विपरीत परिणमन होता है। यह अज्ञान तथा अध्यवसान भाव ही बन्ध का मूल कारण है। क्योकि अपने असली भाव को और मौजूदा भाव को वह नही यहचानता है। 'महावन्ध' की द्वितीय, तृतीय पुस्तक मे स्थितिवन्ध का प्रतिपादन है। कर्म का मुख्य कार्य जीव को ससार मे रोककर रखना है। कर्म-सिद्धान्त की दृष्टि से स्थिति और अनुभाग वन्ध सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। क्योकि पूर्व शरीर छूटने पर नवीन जन्म की प्राप्ति के पूर्व ही कहाँ, किस जन्म को धारण करना हे और वहाँ कब तक रहना है, यह सब पहले ही सुनिश्चित हो जाता है। 'स्थितिवन्ध' का सामान्य अर्थ है-शरीर मे जीव का अमुक समय तक रहना । स्थिति बन्ध के मुख्य चार भेद कहे गये है। स्थितिवन्ध तथा अनुभागन्ध का सामान्य कारण कषाय है। आगम मे कपायो के विविध भेदो तथा स्थानो का उल्लेख मिलता है। उनमे से कपाय-अध्यवसान-स्थान दो प्रकार के होते है-सक्लेशस्थान और विशुद्धिस्थान । असाता के बन्ध योग्य परिणामो को सक्लेश और साता के वन्ध योग्य परिणामो को विशुद्ध कहा जाता है। ये दोनो प्रकार के परिणाम कपायरूप होने पर भी विभिन्न जाति के है। फिर जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से दोनो ही तरह के परिणाम अनेक प्रकार के होते है। इनका सामान्य नियम यह है कि तिर्यच-मनुष्य-देवायु के सिवाय सभी प्रकृतियो का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध उत्कृष्ट सक्लेश परिणामी से होता है, किन्तु विशुद्ध परिणामो से जघन्य स्थितिवन्ध होता है। यहाँ पर विशेष रूपसे उल्लेख योग्य यह है कि 'महावन्ध' में इन परिणामो के सन्दर्भ में ससारी जीवो को दो रूपों में विभक्त कर दिया है-साताबन्धक और असातायन्धक ! दोनो तरह के जीव तीन-तीन प्रकार के होते है-चतु स्थान, तृतीय स्थान तथा द्विस्थानयन्धक। साता के चार स्थानो का वन्ध करनेवाले जीव सर्वविशुद्ध होते हैं। त्रिस्थानक वन्ध करनेवाले सक्लिष्टतर और द्विस्थानवन्धक जीव उनसे भी अधिक संक्लिप्टतर होते है। इसी प्रकार साता के उदय में भी जानना चाहिए। इससे यह स्पष्ट है कि 'महावन्ध' मे सक्लेश ओर विशुद्धि परिणामों में भेद होने पर भी वे विशेप अर्थ के वाचक है जो तारतम्य (रूप अश) के सूचक है। मोहनीय (दर्शनमोह, मिध्यात्व) कर्म का उत्कृष्ट स्थितिवन्ध सत्तर कोडाकोडी सागर है। इसलिए इसे ज्ञानावरणादि के द्रव्य से बहुत द्रव्य मिलता है। मोहनीय कर्म को जो सर्वधाति द्रव्य मिलता है, उसमें से एक भाग चार सज्वलन कपायों में और दूसरा एक भाग बारह कपायों में तथा मिव्यात्व में विभक्त हो जाता है। मिथ्यात्व का भाग कपायो और नोकपायों को मिलता है। ("मिच्छत्तस्स भागो कसाय-णोकमाएतु गच्छदि । महायन्ध पु ६, पृ ३०७) महावन्धका साराश ६ 'महाबन्ध' की चौथी और पाँचवीं पुस्तक मे अनुभाग वन्ध का विवेचन है। 'अनुभाग' शब्द का अर्थ है-फल देने की शक्ति। जिस कर्म की जितनी फल देने की शक्ति प्राप्त होती है उसका नाम अनुभागवन्ध है। यह फल निषेको के रूप मे मिलता है। प्रकृतिवन्ध की भाँति पाँचवी पुस्तक में भी स्पष्ट उल्लेख है कि ओघसे सब प्रकृतियो के उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट अनुभाग के वन्धक जीवो का कौन भाव है? औदयिक भाव है। (ओघे सबपगदीण उक्कस्साणुक्कस्स अणुभाग बंधए त्ति को भावो? ओदइगो भावो।-पृ २२१) मिथ्यात्व सबसे तीव्र अनुभाग वाला है। अनन्तानुवन्धी लोभ का अनुभाग अनन्तगुणा हीन है। यही नहीं, अनन्तानुबन्धी लोभ के अनुभाग से मिथ्यात्वका अनुभाग अनन्तगुणा अधिक है। (वही, पृ. २२५) यह भी नियम है कि मिथ्यात्व के उत्कृष्ट अनुभाग का वन्ध करनेवाला जीव सोलह कपाव, नपुसकवेद, अरति, शोक, भय और जुगुप्साका नियम से वन्ध करता है। (वही, पृ२) यह भी कहा गया है कि जो अनुभागवन्धाध्यवसान स्थान है वे ही अनुभागवन्धस्थान है। अन्य जो परिणामस्थान है वे ही कषाय उदयस्थान कहे जाते है। यह अवश्य है कि जवन्य स्थिति में अनुभागबन्धाध्यवसान स्थान मिथ्यात्व और सोलह कपायो के सवसे कम तथा उत्कृष्टस्थिति में विशेष अधिक होते हैं। इस विशेषता का उल्लेख भी यहाँ किया गया है कि अप्रशस्त ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों को मिथ्यादृष्टि मिथ्यात्व के सन्मुख होकर वाँधता है और प्रशस्त ध्रुवबन्ध वाली प्रकृतियो को सम्यग्दृष्टि सम्यक्त्वके सन्मुख होकर वाँधता है। अत. इनके उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट अनुभागवन्ध के अन्तरकाल का निषेध किया गया है। (वही, पृ ३६६) यद्यपि सर्वघाती और देशघाती का भेद घातिकर्मों में किया जाता है, किन्तु अघातिकर्मों को घातिप्रतिबद्ध मानकर चतुर्थ पुस्तक में निपेकप्ररूपणा और स्पर्धकप्ररूपणा रूप मे दो भेद किये गये है। आठों कर्मों के जो देशघातिस्पर्धक कहे गए है, उनकी प्रथम वर्गणा से लेकर निपेको का विचार किया गया है। प्रत्येक कर्म-परमाणु में अनन्तानन्त शक्त्वश उपलब्ध होते है। अनुमाग के शक्ति-अश को अविभाग प्रतिच्छेद कहते है। अनुभाग में ऐसे कर्म-परमाणुओं का कथन किया जाता है जिनमे समान अविभागप्रतिच्छेद पाए जाते हैं। इन कर्म-परमाणुओ के प्रत्येक वर्ग और उनके समुदाय की वर्गणा सज्ञा है। अनुभाग की अपेक्षा एक-एक वर्गणा में अनन्तानन्त वर्ग होते है। इस प्रकार की अनन्तानन्त वर्गणाओ का एक स्पर्धक होता है। पहली वर्गणा से दूसरी, तीसरी आदि वर्गणा के प्रत्येक वर्ग मे एक-एक प्रतिच्छेद अधिक होता है। इस प्रकार अन्तिम वर्गणा तक जानना चाहिए। अघात्तिकर्मो में प्रशस्त और अप्रशस्त रूप से अनुभाग दो प्रकार का है। प्रशस्त अनुभाग अमृत के समान और अप्रशस्त अनुभाग विषके समान माना गया है। क्योंकि घातिकर्मों की सभी प्रकृतियों पापरूप ही होती हैं। सादि-अनादि, प्रव-अध्रुववन्यरूप प्ररूपणा की गयी है। इसमे यही विशेप है कि भव्यजीवो में ध्रुववन्ध नहीं होता है। शेष मार्गणाओ मे सादि तथा अधुववन्ध होता है। स्वामित्वप्ररूपणा के अन्तर्गत प्रत्ययानुगम की अपेक्षा छह कर्म मिथ्यात्वप्रत्यय, असयमप्रत्यय और कपायप्रत्यय होते है। 'महावन्ध' में वार-बार यह कहा गया है कि औदयिक भाव वन्ध के कारण है। वास्तव में मोह जनित औदयिक भाव ही बन्ध के कारण हैं। 'महावन्ध' के छठे और सातवे भाग में प्रदेशवन्ध का विशद वर्णन है। कर्मरूप से परिणत पुद्गल स्कन्यो की संख्याका अवधारण परमाणु रूप से होना कि कितने परमाणु कर्म रूप से परिणत हुए, उसे प्रदेशबन्ध कहते हैं। जीवके समीप योगस्थानों के द्वारा वहुत प्रदेशो का आगमन होता है। अत योगस्थान प्ररूपणा के अन्तर्गत दश अनुयोगद्वारों में प्रतिपादन किया गया है। वस्तुत आठ कर्मों के वन्ध के समय कर्म-परमाणुओं का सक्ते अल्प भाग आयुकर्म को मिलता है। उससे विशेष अधिक नामकर्म को और उससे भी विशेष अधिक गोत्रकर्म को मिलता है। उससे ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय कर्म को विशेप अधिक भाग मिलता है। उससे भी विशेष अधिक वेदनीय कर्म को मिलता है। यह स्वाभाविक ही है कि जिस कर्म की जैसी स्थिति है, उसे वैसा ही भाग उपलब्ध होता है। मोहनीय का ज्ञानावरणादि के द्रव्य से १० महावन्य बहुत द्रव्य मिलता है। उत्तर प्रकृतियों में कर्म परमाणुओ का वितरण कर्मवन्ध के समय ज्ञानावरणीय कर्म को जो एक भाग मिलता है वह चार भागों में विभक्त होकर आभिनिवोधिकज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण और मन पर्ययज्ञानावरण इन चार कर्मो को प्राप्त होता है। इनमें विशेप रूप से यह ध्यान देने योग्य है कि मोहनीय कर्म को उपलब्ध देशपातीय भाग दो भागों में विभक्त हो जाता है-कपाय वेदनीय और नोकपायवेदनीय। कपायवेदनीय का द्रव्य चार भागो मे और नोकपायवेदनीय का पाँच भागों मे विभक्त हो जाता है। और मोहनीय कर्म को जो सर्वघाति द्रव्य प्राप्त होता है उनमे से एक भाग चार सज्वलन कपायो में तथा दूसरा एक भाग बारह कपायो में और मिथ्यात्व में विभक्त हो जाता है। जघन्य और उत्कृष्ट के भेद से प्ररूपणा दो प्रकार की गई है। ओघ से सभी प्रकृतियो का उत्कृष्ट और अनुष्कृष्ट प्रदेशवन्च करने वाले जीवों का भाव औदयिक कहा गया है। भावानुगम की अपेक्षा भी ओघ से सव प्रकृतियों के भुजगार, अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्यपद के वन्धक जीवो का भाव भी औदयिक कहा गया है। जो कुल जीवराशि है उसमे सव प्रकृतियो के सम्भव सभी पदो के वन्धको का विभाग किया जाए, तो कितना भाग किसको मिलेगा, यह विचार भागाभाग में किया गया है। सव पदो के वन्धक जीवो का परिमाण अनन्त कहा गया है। पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वादर पृथिवीकायिक, वादर जलकायिक और वादर अग्निकाविक जीवो में सव प्रकृतियो का उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करने वाले जीवो का क्षेत्र लोक के असख्यातवै भागप्रमाण है। इनमे नरकायु, मनुष्यायु, देवायु का निरन्तर वन्ध सम्भव नही है, क्योंकि इनका वन्ध करने वाले अधिक से अधिक असख्यात जीव होते है। आयुवन्ध का कुल काल अन्तर्मुहूर्त होने से इनका निरन्तर वन्ध सम्भव नहीं है। सभी प्रकृतियो का उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध अपने-अपने स्वामित्व के अनुसार होता है। 'महावन्ध' के सातवे भाग मे विस्तार से क्षेत्रप्ररूपणा, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव तथा अल्पवहुत्व के भगों के रूप में विवेचन किया गया है। स्वामित्व में विशेपता यह कही गयी है कि मिथ्यात्व के अवक्तव्यवन्ध का सासादन सम्यक्त्व से च्युत होकर जो प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि हुआ है वह जीव स्वामी है। (भाग ७, पृ २३०) वन्ध करनेवाले जीवों का सभी लोक क्षेत्र है। तीन वृद्धि, तीन हानि, अवस्थित और अवक्तव्य पद के बन्धक जीवो का जघन्य काल एक समय, उत्कृप्ट काल आवलि के असख्यातवै भागप्रमाण है। सामान्यत जघन्य अन्तर सभी जीवो का एक समय है किन्तु उत्कृष्ट अन्तर मे भिन्नता है। सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्व या सासादन को अधिक-से-अधिक सात दिन-रात प्राप्त नहीं होते। भावानुगम की अपेक्षा सर्वत्र औदयिक भाव है जो अनाहारक मार्गणा तक है। मिथ्यादृष्टि असज्ञी जीवो मे पचेन्द्रिय जीवों के समान अल्पवहुत्व का भग है। मिय्यादृष्टि के जो प्रदेशवन्ध स्थान होते है उतने को परिपाटी कहते है। अवस्थितवन्ध इसलिए कहलाता है कि इस समय जो जीव जिन प्रदेशो को वाँधता हे उनको अनन्तर (वाद में) पिछले समय में घटाकर या वढाकर बॉये गये प्रदेशो के अनुसार उतने ही वॉधता है। अवन्ध के बाद वन्ध होना अवक्तव्यबन्ध कहलाता है। प्राय सभी प्रकृतियों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। कृष्ण, नील, कापोत लेश्या वाले जीव सव लोक मे पाये जाते है। भव्य जीवों में ओष के समान भग है। अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असजी जीवों में मत्यज्ञानी जीवो के समान भग है। महावन्ध का प्रयोजन- 'महायन्य' के लेखन का एक मात्र प्रयोजन जीवों को मौजूदा परिस्थिति का ज्ञान कराना है। जीव किस प्रकार अपनी करतृत से ससार के जेलखाने में पड़ा है। इस पराधीनता को जाने बिना कोई स्वतन्त्रता का पुरुषार्थ कैसे कर सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सयम, तप, त्याग का मार्ग स्वाधीन होने का उपाय है। आध्यालिफ जागृति विना यह सम्भव नहीं है। अत पुरुपार्य करना चाहिए। २६-२-१६६६ -देवेन्द्रकुमार शास्त्री प्राथमिक वक्तव्य (प्रथम सस्करण, १९५८ से) महावन्धकी इस सातवीं जिल्दके साथ एक महान् साहित्यिक निधिका प्रकाशन सम्पूर्ण हो रहा है। इसके लिये उसके विद्वान् सम्पादक पं० फूलचन्द्र शाली तथा भारतीय ज्ञानपीठके अधिकारियोंको जितना धन्यवाद दिया जाय, थोड़ा है। विद्वान् पाठकोंको ज्ञात होगा कि प्रस्तुत महावन्ध आचार्य पुष्पदन्त और भूतबलीकी अद्वितीय सूत्र-रचना षट्खण्डागमका ही छठा खण्ड है। इसके पूर्वके पाँच अर्थात् जीवट्ठाण, खुहावन्ध, बंधसामित्त, वेदणा और वग्गणा खण्डोंका सम्पादन व प्रकाशन कार्य भी विदिशा निवासी श्रीमन्त सेठ सिताबराय लक्ष्मीचन्द्रजी द्वारा स्थापित जैन-साहित्य उद्धारक ग्रन्थमाला द्वारा सम्पूर्ण हो चुका है। इस प्रकार पूरा पटखण्डागम अपनी वीरसेन कृत धवला टीका और आधुनिक हिन्दी अनुवाद सहित १६+७%२३ जिल्दॉमें समाप्त हुआ है जिनकी पृष्ठसंख्या दस हजारसे ऊपर होती है। धवला टीकाकी श्लोक-संख्या परम्परानुसार वहत्तर हजार श्लोक प्रमाण और महावन्धकी चालीस हजार श्लोक प्रमाण मानी गई है। यदि अधिक नहीं तो इतना ही हम अनुवादका प्रमाण मान लें वो इस पूरी प्रकाशित रचनाका प्रमाण लगभग सवा दो लाख श्लोक प्रमाण हो जाता है। धवलाका प्रथम भाग सन् १९३६ में प्रकाशित हुआ था और अय सन् १६५८ मे उसका अन्तिम सोलहवाँ भाग और महाबन्धका अन्तिम सातवाँ भाग प्रकाशित हो रहा है। इस प्रकार गत अठारह-उन्नीस वर्षों में जो यह विपुल साहित्य व्यवस्थित रीतिसे प्रकाशित हो सका इसे इस युगकी विशेष साहित्यिक अभिरुचिका ही प्रभाव कहना चाहिये। जैन तीर्थङ्करो द्वारा उपदिष्ट आचाराङ्ग आदि द्वादशाङ्ग श्रुतके अन्तर्गत जिस चारहवें अङ्ग दिविवादका समस्त जैन परम्परानुसार लोप हो गया है, उसके एक अंशका अर्थोद्धार आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व भगवान् पुष्पदन्त और भूतवलीने “पट्खण्डागम सूत्रोंके रूपमें किया था। इसी महान् घटनाको स्मृतिमे ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमीकी तिथि आज तक श्रुतपञ्चमी या ऋषिपञ्चमीके नामसे मनाई जाती है। वर्तमान वीर निर्वाण संवत् २४८४ को श्रुतपञ्चमी इस दृष्टिसे विशेष महत्त्वपूर्ण मानी जा सकती है कि इस वर्षमें वही पटखण्डागम"शताब्दियों तक शानभण्डारमें निरुद्ध रहने के पश्चात् पुनः प्रकाशमें आया है। प्राचीन साहित्यके प्रकाशनकी यह सफलता बड़ी सन्तोषजनक है। किन्तु यह समझ बैठना हमारो बड़ी भूल होगी कि इस साहित्यके उद्धारका कार्य परिसमाप्त हो गया। इन परमागम ग्रन्थी और उनकी टीकाओंके सम्पादन-प्रकाशन कार्यको प्राचीन साहित्योद्धार कार्यकी प्रधम सीढ़ी कहना उचित होगा । जैसा कि उक्त ग्रन्थ-भागोंकी प्रस्तावनाओमे हम बारम्बार कह चुके हैं, इनका पाठ-संशोधन सीधा मूल ताड़पत्रीय प्रतियों परसे नहीं हुआ, किन्तु उनपरसे की हुई प्रतिलिपियोंके आधारसे ही विशेषतः हुआ है। जो थोड़ा-बहुत मिलान सीधा ताडपत्रीय प्रतियोंसे दूसरोके द्वारा कराया जा सका है, उससे सम्पादकोंको पूरा सन्तोष नहीं हुआ। तथापि उस थोडेसे मिलानके द्वारा ही यह सिद्ध हो चुका है कि समस्त उपलभ्य ताडपत्र प्रतियों से मिलान कितना आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है। जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है, मूडनिद्री पटखण्डागमकी एक सम्पूर्ण और दो खण्डित ताड़पत्रीय प्रतियों हैं। इनके पाठोमें भी परसर कहीं-कहीं भेद है, जैसा धवला भाग तीनमें प्रकाशित पाठान्तरोंसे देखा जा सकता [ १२ ] है। सत्प्ररूणाके सूत्र ६३ के पाठके सम्बन्धमें वह उतना मतभेद और बखेड़ा कभी न उत्पन्न होता, यदि प्रारम्भसे ही हमें ताडपत्रीय प्रतियोंके मिलानको सुविधा प्राप्त हुई होती और वह सब विवाद तभी समाप्त हो सका, जब हमारे द्वारा अनुमानित पाठका ताड़पत्रीय प्रतियोंसे पूर्णतः समर्थन हो गया। तात्पर्य यह कि जब तक एक बार इस सम्पूर्ण प्रकाशित पाठका ताड़- पत्रीय प्रतियों अथवा उनके चित्रोसे विधिवत् मिलान कर मूलपाठ अङ्कित न कर लिये जायेंगे, तबतक हमारा यह सम्पादन-प्रकाशन कार्य अधूरा ही गिना जायगा और उन मूल प्रतियोको आवश्यकता व अपेक्षा वनो ही रहेगी। पाठ-संशोधन पूर्णतः प्रामाणिक रीतिसे सम्पन्न हो जानेके पश्चात् इन ग्रन्थोंके विशेष अध्ययनकी समस्या सम्मुख उपस्थित होती है। इन प्रन्थोंका विषय कर्म-सिद्धान्त है जो जैन धर्म और दर्शनका प्राण कहा जा सकता है। यह विषय जितने विस्तार, जिवनी सूक्ष्मता, और जितनी परिपूर्णताके साथ इन ग्रन्थोमे-उनके सूत्रों और टीकाओमे-वर्णित है, उतना अन्यन्न कहीं नहीं । इसका जो हिन्दी अनुवाद और साथ-साथ थोड़ा बहुत तुलनात्मक अध्ययन व स्पष्टीकरण इस प्रकाशनमें किया जा सका है वह विपय-प्रवेशमात्र ही समझना चाहिये । इस विषयसे हमारा उत्तर कालीन समस्त साहित्य ओत-प्रोत है। दिगम्बर और श्वेताम्बर साहित्यमें समान रूपसे अनेक ग्रन्थोमे कर्मसिद्धान्तकी नाना शाखाओ और नाना तत्त्वाका प्रतिपादन पाया जाता है। इस समस्त कर्म सिद्धान्तसम्बन्धी साहित्यका ऐतिहासिक क्रमसे अध्ययन करना आवश्यक है,जिससे इसके भिन्न तत्त्वो और नाना मतीका विकास स्पष्ट समझमें आ सके और उसका सर्वांग-सम्पूर्ण व्याख्यान आधुनिक रीतिसे किया जा सके। भारतीय साहित्यमें कर्मसिद्धान्तकी चर्चा इतनी व्यवस्थित रूपमे अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलती है। जिन्होंने अपने विपुल दानो द्वारा हार्दिक उत्साहके साथ इन ग्रन्थीका सम्पादन-प्रकाशन कराया है, हम भली भाँति जानते हैं, कि वे साहू शान्ति प्रसादजी और उनकी धर्मपल्ली रमा रानी जी, किसी व्यापारिक बुद्धिसे प्रभावित नहीं हुए, किन्तु शुद्ध धार्मिक और साहित्योद्धारको भावनासे ही प्रेरित थे। अतएव हम आशा ही नहीं, किन्तु विश्वास भी करते हैं कि वे अपने विशुद्ध और उच्च कार्यके उक्त अवशिष्ट अंशोपर अवश्य ध्यान देगे और ऐसी योजना बना देंगे, जिससे वह कार्य निर्विलम्ब प्रारम्भ होकर सन्तोष जनक रीतिसे गतिशील हो जावे । इस सहित्योद्धारकी जो यह एक मंजिल इस ग्रंथके प्रकाशनके साथ समाप्त हो रही है, उसके लिए हम मूडाबिद्री के सिद्धान्त वसदिके भट्टारकजी व अन्य सव अधिकारियो, प्रतिलिपियोंके स्वामियो, सम्पादको, प्रकाशकों एवं अन्य विद्वानोको हार्दिक धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने इस महान कार्यको सफलतामें सहयोग प्रदान किया है - हीरालाल जैन आ० ने० उपाध्ये प्रधान सम्पादक सम्पादकीय प्रदेशबन्धका मूलप्रकृतिप्रदेशबन्ध और उत्तरप्रकृतिप्रदेशबन्धके चौबीस अनुयोग द्वारीमेंसे परिमाण अनुयोगद्वार तकका भाग सम्पादन होकर अनुवादके साथ प्रकाशित हुए लगभग तीन माह हुए हैं। उसके कुछ ही दिन बाद उसका शेष भाग सम्पादन होकर अनुवादके साथ प्रकाशित हो रहा है। पूर्व भागके साथ यह भाग भी मुद्रित होने लगा था, इसलिए इसके प्रकाशित होनेमे अधिक समय नहीं लगा है। पूर्व भागोके समान इस भागके सम्पादनके समय भी हमारे सामने दो प्रतियाँ रही हैं- एक प्रेस कापी और दूसरी ताम्रपत्र प्रति । मूल ताइपत्र प्रति तो अन्त तक नहीं प्राप्त हो सकी है। इस भागके सम्पादनमे उक्त दोनों प्रतियोका समुचित उपयोग हुआ है। दोनो प्रतियोकी सहायतासे जिन पाठोका संशोधन करना सम्भव हुआ उनका संशोधन करनेके बाद भी बहुतसे ऐसे पाठ रहे हैं जो चिन्तन द्वारा स्वतन्त्ररूपसे सुझाए गये हैं। इस प्रकार जितने भी पाठ मूलमं सम्मिलित किये गए हैं उन्हें स्वतन्त्ररूपसे [] ब्रेकेटके अन्दर दिखलाया गया है और जिन पाठोंका संशोधन नहीं हो सका है उन्हें वैसा ही रहने दिया है। अभी तककी जानकारीके अनुसार यही कहना पड़ता है कि मूडचिद्रीमें "महावन्धकी एक ही ताड़पन्न प्रति उपलब्ध है। वह भी अधिक मात्रामे त्रुटित और स्खलित है। उसमें भी प्रदेशबन्ध पर स्खलनका सबसे अधिक प्रभाव दिखलाई देता है। इस भागम ऐसे अनेक प्रकरण हैं जिनका यत्किञ्चित् अंश भी शेष नहीं बचा है। स्वामित्व आदिके आधारसे उनकी पूर्ति करना भी सम्भव नहीं था, इसलिए उन्हें हमने त्रुटित स्थितिमें ही रहने दिया है। महाबन्धकी उपलब्ध हुई ताड़पत्र प्रति कितनी पुरानी है, इसकी जानकारी अभी तक नहीं हो सकी है। स्थितिबन्ध और अनुभागवन्धके अन्तमें अलग-अलग प्रशस्ति उपलब्ध होती है। उन दोनों प्रशस्तियोंसे इतना बोध अवश्य होता है कि सेनकी पत्नी मल्लिकवाने श्री पञ्चमी व्रतके उद्यापनके फलस्वरूप महाबन्धको लिखाकर आचार्य माघनन्दिको भेट किया। इसी आशयकी एक प्रशस्ति प्रदेशबन्धके अन्तमे भी आई है। उसे हम अनुवादके साथ आगे उद्धृत कर रहे हैं । स्थितिबन्ध और प्रदेशबन्धके अन्तमे आई हुई प्रशस्तिम मेघचन्द्र व्रतपतिका विशेषरूपसे उल्लेख किया है और माघनन्दि व्रतपतिको उनके पादकमलोमे आसक्त बतलाया है। मेरा विचार था कि इन प्रशस्तियोंके आधारसे मैं कुछ लिखू। किन्तु वर्तमानम इस प्रकारका प्रयत्न करना असामयिक होगा, क्योकि धवला और सम्भवतः जयघवलाके अन्त में पुस्तक दान करनेवालेकी जो प्रशस्ति उपलब्ध होती है, उसके अनुवाद के साथ प्रकाशमे आनेके बाद ही इस पर सर्वाङ्गरूपसे विचार होना उचित प्रतीत होता है। यह हम पिछले भागोकी प्रस्तावनामें बतला आये हैं कि स्थितिबन्धके मुद्रित होनेके बाद ही हमे ताम्रपत्र प्रति उपलब्ध हो सकी थी। इसलिए अभी तक उस प्रतिसे स्थितिबन्धका मिलान होकर न तो पाठ-भेद लिए जा सके हैं और न शुद्धि-पत्र ही तैयार हो सका है। प्रकृतिवन्धका सम्पादन और अनुवाद तो हमने किया ही नहीं है, इसलिए उसके सम्बन्धमे हम विचार ही करनेके अधिकारी नहीं हैं। इतना अवश्य ही सकेत कर देना अपना कर्तव्य समझते [ १४ ] हैं कि समस्त महाबन्धका योग्य रीतिसे सम्पादन होकर प्रकाशमे आनेमे जो थोड़ी-बहुत न्यूनता रह गई है उस ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। प्रसङ्गसे हम यह आशा करे वो कोई अत्युक्ति न होगी कि समस्त "महाबन्धका ताडपत्र प्रतिसे मिलान होनेको ओर भी भारतीय ज्ञानपीठका ध्यान जायगा। दिगम्बर परम्परामे पटखण्डागम और कषायप्राभृत मूल श्रुत माने गये हैं, इसलिए इनके प्रत्येक पद और वाक्यकी रक्षा करना दिगम्बर संघका कर्तव्य है। इस भागके सम्पादनके समय भी हमे श्रीयुक्त पं० रतनचन्द्र मुख्तार और पं० नेमिचन्द्रजी वकील सहारनपुरवालोंने सहायता प्रदान की है, इसलिए हम उनके आभारी हैं। इस भागको समाप्तिके साथ महाबन्ध समाप्त हो रहा है। अन्य अनेक अड़चनोके रहते हुए भी इस कार्यको सम्पन्न करनेके अनुकूल हमारा मनोबल बना रहा, यह वीतराग मार्गकी उपासना का ही फल है । वस्तुतः बाह्य साधन सामग्री ऐहिक है। अन्तरङ्गका निर्माण हुए विना केवल उसकी साधना पारमार्थिक जीवनके निर्माणमे सहायक नहीं हो सकती, यह बात पद-पद पर अनुभवमे आती है । हमे ऐसे गुरुतर कार्यके निर्वाह करनेका सुअवसर मिला और हम उसका समुचित रीतिसे निर्वाह करनेमे सफल हुए, इसके लिए हम अपने भीतर प्रसन्नताका अनुभव करते है। जिन्होने वीतराग मार्गको जीवनमे उतारकर उसका प्रकाश किया, वे महापुरुष सबके द्वारा तो वन्दनीय हैं ही, किन्तु जो उस मार्ग पर यत्किञ्चित् चलनेका प्रयत्न करते है और जो ऐसे कार्यमे समुचित साहाय्य प्रदान करते हैं वे भी अभिनन्दनीय हैं । किमधिकम् । -फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री अन्तिम प्रशस्ति श्रीमलधारिमुनींद्रपदामलसरसीरुहमँगनमलिनकित्ते । प्रेमं मुनिजनकैरवसोमनेनल्माघनंदियतिपति एसेदं ॥२॥ जितपंचेषु प्रतापानलनमलतरोत्कृष्टचारित्ररारा- जिततेनं भारतिभासुरकुचकलशालीढभाभारनना- यततारोदारहारं समदमनियमालकृतं माधनंदि- अतिनाथं शारदाप्रोज्वलविशदयशोवल्लरीचक्रवालं ।।२।। जिनवक्त्रांभोजविनिर्गतहित्तनुतराद्धान्तकिंजल्कसुस्वा- दन...... ज-पदनुतभूपेंद्रकोटीरसेना......... तिनिकायभ्राजितांघ्रिद्वयनखिलजगद्भव्यनीलोत्पलाहला- दनताराधीशनें केवलमे भुवनदोल् माघनंदिवतीन्द्रम् ॥३॥ .... . श्री भलधारी मुनीन्द्र के निर्मल चरणरूपो कमलमें भौरेके समान सुशोभित होनेवाले, निर्मल प्रेमी और मुनिजनरूपी कुमुदके लिए चन्द्रमाके समान माधनन्दि यतीन्द्र हुए ॥१॥ जिन्होंने मन्मथको जीत लिया है, जिनकी प्रतापरूपी अग्नि व्याप्त हो रही है, जिनका तेज निर्मलतर उत्कृष्ट चारित्रसे शोभायमान हो रहा है, जो सरस्वतीके प्रकाशमान कुचरूपी कलशमें संलग्न हैं, जो प्रकाशमान हैं, नवीन और दीर्घतर उदार हारस्वरूप है, शम, दम और नियमसे अलंकृत हैं तथा जो शरत्कालीन मेधके समान उज्ज्वल और विस्तृत यश समूहसे विभूषित हैं ऐसे माधनन्दि यतीन्द्र हुए ।।२।। जो जिनेन्द्रदेवके मुखरूपी कमलसे निकले हुए हितकारी और मान्य सिद्धान्तरूपी कमल के परागका रसास्वादन करनेमें भौंरके समान हैं, अनेक पृथिवीपति जिनके चरण कमलों में नमस्कार करते हैं, जिनके पदयुगल अनेक सेनापतियोंके मुकुट-समूहसे सुशोभित हो रहे हैं और जो समस्त भव्यरूपी नील कमलोंको आह्लादित करनेके लिए चन्द्रमाके समान हैं, ऐसे एकमात्र माघनन्दि व्रतपति हुए ॥३॥ १ 'नल्कापुनन्धियतिपति नेसेद' महाबन्ध प्रथक पुस्तक प्रस्तावना पृ० ३६ । २. 'जितप्रपचेषु' म०प्र० पु०प्र० पु०३६ । ३ 'यत् सारोदारहार' म०प्र० पु०प्र० पृ० १०॥ ४. 'नीलोत्पलांगा दवतारावीशने' म०प्र० पु० प्र० पृ० १० ।
[ १६ ] वरराद्धान्लामृतांमोनिधितरलतरंगोत्करक्षालितांत':- करणं श्रीमेवचन्द्रव्रतिपतिपदपंकेरुहासक्तपट्- चरणं तीव्रप्रतापोधृतविनतवलोपेतपुष्पेषुभृत्सं- हरणं सैद्धान्तिकाग्रेसरनेने नेगल्दं माधनंदिव्रतीन्द्रम् ।।४।। श्रीपंचमियं नौतुद्यापनमं माडि परेसि राद्धान्तमना । रूपवती सेनवधू जितकोपं 'श्रीमाघनंदियतिगित्तल् ॥५॥ भद्रं भूयात् , वर्धतां जिनशासनम् । जिनका अतःकरण श्रेष्ठ सिद्धान्तरूपी अमृतजलनिधिके तरल तरङ्गकणोंसे प्रक्षालित हुआ है, जो श्री मेघचन्द्र तिपतिके चरणरूपी कमलमें आसक्त भौंरेके समान हैं, जो तीव्र प्रतापी हैं, जिन्होने विशाल बलशाली कामको जीत लिया है और सैद्धान्तिकोंमें अग्रेसर हैं, ऐसे माघनन्दि व्रतीन्द्र हुए ||४|| सिद्धान्तको माननेवाली रूपवती सेनकी पत्नीने श्री पश्चमी व्रतका उद्यापन कर इस ग्रन्थको लिखवा कर जितक्रोध माघनन्दि यतिको समर्पित किया ||५|| मगल हो, जिनशासनकी वृद्धि हो । १. 'स्कटक्षालितांत' म०प्र० पु० प्र० पृ० ४० । २. 'करण श्रीमेघचंव्रतपतिपकेव्हासतपट पद ।। ..... ...... चारणं सैद्धान्तिकाग्रेसरनेने नेगल्दमाधनंदिवतीन्द्रम् ॥४॥ म०प्र० पु० प्र० पृ० ४० । ३ 'नोतुद्यापनेय' म० प्र० पु० प्र० पृ० ४०। १. "जितकोप म० प्र० पु० प्र० पृ० १०॥ ५. 'श्रीमाघनंदिव्रतपतिगितल' म० प्र० पु० प्र० पृ० १० ।
विषयानुक्रमणिका पृष्ठ , १०८-१०६ ११०-१११ २१२-२४३ १५० १५०-१५२ ७.५२ १५३-१८० १००-१८७ १०८-१६१ १६१ १६१-१६७ १६७-२२६ १६७ १६७-१९८ विषय क्षेत्रमरूपणा क्षेत्रात्मणाके दो भेट उत्कृष्ट क्षेत्रप्ररूपणा बघन्य क्षेत्रामा स्पर्शनमल्पणा सर्शनप्राणाके दो भेट उत्कृष्ट वर्शनप्रत्पण जयन्य सर्शनमा कारणरूपणा बालपणाचे दो भेट उत्कृष्ट नलयारा जरन्य कालगनगा अन्तरमत्पणा यन्तरत्नगाने ने भेट उर अन्तरप्रहरणा जघन्य अन्तपत्रणा भावप्ररूपणा भाग्प्ररणाके दो भेट उत्कृटाप्रपा जयन्व भावनपणा अल्पत्रहुन्नमस्पणा अल्पबहुत्वप्ररणाके दो भेद स्वत्यान अल्लन्हुवो टो मेट उत्कृट तत्यान आल्यबहुत जवन्य तत्थान अल्पनहुन पन्त्यान अल्पन्हुलने टो भेट उत्कृट परत्यन अल्पाहुन जवन्य परत्यन अल्बहुत भुजगारबन्ध अर्थपष्ट तेरह अनुयोगद्वारोग निर्देश समुक्तनानुगन पृष्ट विश्य 5-६ तामित्वानुगम कालानुगम १-४ अन्तगनगर्न भागामागानुगम परिमागानुगम क्षेत्रानुगम ७-४५ सर्शनानुगम कालानुगम अन्तगनुगम भायानुगम ५६-६१ अल्मबहुतानुगम ६२-६३ पदनिक्षेप ६३-६४ नीन अनुवांगद्वारोंग निर्देश समुन्कीर्तना ६५ समुत्कीर्तनाके दो मेट उत्कृट सनुत्तीर्तना जयन्य समुत्तीर्तना स्वामित्व स्वामित्वके दो भेट ६५-१०. उत्कृष्ट स्वामिल ६५ जयन्य स्वामित्व ६५ असबहुन्च ६५-७५ अल्पवहुत्व के दो भेट ७५-८१ उत्कृष्ट व्यल्पबहुत ८१ जघन्य अल्पबहुत ८१-१३ अजघन्य वृद्धि प्राटिके विषयमें सूचना ६४-१०५ दिवन्ध ६०५-१७ तेरह अनुयंगहागेकी सूचना १०५ मनुीर्तना १०५ वामित्र १०६-१०७ गल १६७ १९७-१९६८ १६८ १९८-२२५ १६८ ११८-२२३ २२३-२२५ २२५-२२६ २२५ २२५-२२६ २२६ २२६ २२७-३०१ ૨૨૭ २२७-२२६ २३०-२३५ २३५.२६६ 1 अन्तरकालके अन्तका जश, भंगविषय पुरा और भागाभागको अन्तकी एक पंक्तिको छोड कर पूरा भागाभाग त्रुटित है।
[ १८ ] विपय विपय पृष्ठ ३०३-३०६ ३०६-३०८ अन्तर नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय नाना जीवोंकी अपेक्षा भागाभाग नाना जीवाकी अपेक्षा परिमाण नाना जोवोंकी अपेक्षा क्षेत्र नाना जीवोंकी अपेक्षा स्पर्शन नाना जीवोकी अपेक्षा काल नाना जीवोकी अपेक्षा अन्तर नाना जीवोंकी अपेक्षा भाव नाना जीवोंकी अपेक्षा अल्पबहुत्व अध्यवसानसमुदाहार दो अनुयोगद्वारीका नामनिर्देश परिमाणानुगम पृष्ट २३७-२६७ अल्पबहुत्व २६७-२६६ जीवसमुद्राहार २६६-२७० दी अनुयोगद्वारीका नामनिर्देश २७१.२७६ प्रमाणानुगम २७६-२८१ प्रमाणानुगमके दो अनुयोगद्वार २८२-२८४ योगस्थानप्ररूपणा २८५-२६० प्रदेशबन्धस्थानप्ररूपणा २६१-२६४ जीवसमुदाहारमे अल्पबहुत्व २६५ अल्पबहुवो तीन अनुयोगद्वार २६५-३०१ उत्कृष्ट अल्पबहुत्व ३०१-३०६ जघन्य अल्पबहुत्व ३०१ जघन्योत्कृष्ट अल्पबहुत्व अन्तिम मङ्गलाचरण ३०६-३०७ ३०७-३०८ ३०८-३१६ ३०८-३०६ ३०६-३१० ३१०-३१६ ३१६ महाबन्धो चउत्थो पदेशबंधाहियारो
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सिरि-भगवंतभूदवलिमडारयपणीदो महाबंधो चउत्थो पदेसवंधाहियारो खेतपरूवणा १. खेतं दुविहं-जहण्णयं उक्कस्सयं च । उक्कस्सए पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० तिण्णिआउ०-वेउन्वियछ०-आहार०२-तिन्थ० उपक० अणु० पदेयं० केवडि खेत्ते ? लोगस्स असंखेंजदिभागे। सेसाणं कम्माणं उक्क० पदे०५० कंव. ? लोगस्स असंखें । अणु० पदे०व० केव० ? सबलोगे । एवं ओवभंगे तिरिक्खोपो कायजोगि-ओरालि०-ओरालि मि० कम्मइ०-णस०-कोधादि०४-मदि-मुद०-असंज०- अचक्खु०-किण्ण०-णील०-काउ०-भवसि०-अभवसि०-मिच्छा०-असण्णि-आहार०- अणाहारग ति। ------ क्षेत्रप्ररूपणा १. क्षेत्र दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारकां है ओघ और आदेश । ओघसे तीन आयु, वैक्रियिकपटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यात भाग- प्रमाण क्षेत्र है। शेष प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका कितना क्षेत्र है ? लोकके असख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है। अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कितना क्षेत्र है ? सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र है। इसी प्रकार ओपके समान सामान्य तिर्यञ्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्नकावयोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार स्पायवाले. मत्यजानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचक्षुदर्शनी, कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले, कापोतलेश्यावाले, भव्य,अभव्य, मिध्याष्टि, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवामें जानना चाहिए। विशेषार्थ-ओघसे सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध अपने-अपने स्वामित्वके अनुसार संज्ञी जीव और तीन आयु आदि वारह प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध किन्हीका असंज्ञी जीव आदि तथा किन्हींका संज्ञी जीव करते हैं, इसलिए सब प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोंका बन्ध करनेवाले जीवोंका क्षेत्र और तीन आयु आदिके अनुत्कृष्ट प्रदेशीका वन्ध करनेवाले जीवोका नेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। यद्यपि मनुष्यायुका बन्ध एकेन्द्रिय आदि भी करते हैं,पर ऐसे जीव असंख्यातसे अधिक नहीं होते और इनका क्षेत्रलोकके असंख्यातवेभागप्रमाणसे अधिक नहीं होता, इसलिए इस अपेक्षासे भी उतना ही क्षेत्र कहा है। उक्त बारह प्रकृतियोके सिवा शेप प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्वलोक है,यह सष्ट ही है। क्योकि इनका 0- महाबंधे पढ़ेसबंधायिारे २. सव्वोरइएसु सव्वपगदीणं उक्क० अणु० पदे०७० केव० ? लोगस्स असंखें । सेसाणं पि असंखेंजरासीणं एवं चेव कादच्वं । ३. एइंदिएसु पंचणा०-णवदंसणा-मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक०-तिरिक्ख०- एइंदि०-ओरालि-तेजा-क०-डंडसं०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४-थावर-सुहुम०- पज्ज०-अपज्ज०-पत्ते०-साधार०-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग-अणार्दै०-अजस-णिमि०- णीचा-पंचंत० उक्क. अणु० केव० ? सचलोगे। मणुसाउ० ओघ । मणुस मणुसाणु०-उच्चा० उक्क० लोग० असंखें । अणु० केव० ? सव्वलोगे । सेसाणं उक्क० लोग० संखेज्जदि० । अणु० सव्वलो० । एवं बादरएइंदियपज्जत्तापज्जत्तगाणं । णवरि तससंजुत्ताणं उक्क० अणु० लोग० संखेंज । णवरि मणुसगदि०४ उक० अणुः लोग० असंखें । सव्वसुहुमेसु सब्वपगदीणं उक्क० अणु० सव्वलो० । णवरि मणुसाउ० उक्क० अणु० असंखें। एकेन्द्रियादि अनन्त जीव बन्ध करते है और वे वर्तमानमे सर्व लोकमे पाये जाते हैं। यहाँ सामान्य तिर्यञ्च आदि अन्य जितनी मार्गणा गिनाई है, उनमे बन्धको प्राप्त होनेवाली अपनी-अपनी प्रकृतियोके अनुसार यह क्षेत्र प्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमे ओघके समान क्षेत्रके जाननेकी सूचना की है। २. सब नारकियाम सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है। शेप असंख्यात संख्यावाली राशियोमे इसी प्रकार क्षेत्र घटित कर लेना चाहिए। विशेपार्थ-सब नारकी और यहाँ निर्दिष्ट अन्य मार्गणाओंका क्षेत्र ही लोकके असंख्यात भागप्रमाण है, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोके दोनो पदीकी अपेक्षा लोकके असंख्यात भागप्रमाण क्षेत्र कहा है। ३ एकेन्द्रियोमें पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकपाय, तियञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यजगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कितना क्षेत्र है ? सत्र लोक क्षेत्र है। मनुष्यायुका भंग ओघके समान है । मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्च- गोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है। अनुत्कृष्ट प्रदेशवध करनेवाले जीवोका कितना क्षेत्र है। सब लोक क्षेत्र है। शेप प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके संख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका सर्वलोक क्षेत्र है। इमी प्रकार बादर एकेन्द्रिय और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमे त्रस- संयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके संख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है। उसमे भी इतनी और विशेपता है कि मनुष्यगतिचतुष्कका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है। सब सूक्ष्म जीवोमे सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका सब लोकप्रमाण क्षेत्र है। इतनी विशेषता है कि मनुष्यायुका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है।
खेत्तपरूवणा ३ ४. पुढवि०-आउ०-तेउ०-वादरपुढवि०-आउ०-तउ० सव्यपगदीणं उक. लोग. असंखें । अणु० सव्वलो। णवरि वादरेसु सुहुमसंजुत्ताणं उक० लोग० असंखें । अणु० सव्वलो० । तससंजुत्ताणं उक्क० अणु० लोगस्स असंखें । बादरपज्जत्ताणं पंचिंदियअपज्जत्तभंगो। बादरअपज्जत्ताणं एइंदियसंजुत्ताणं उक्क० अणु० सव्वलो० । सेसाणं उक्क० अणु० लोग० असंखें। एवं बाउकाइगस्स वि । णवरि यहि विशेषार्थ-एकेन्द्रियोंमें पॉच ज्ञानावरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय बादर एकेन्द्रिय जीवोंके और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सब एकेन्द्रियोके सम्भव है, इसलिए इनका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका सव लोक क्षेत्र कहा है। मनुष्यायुका भग ओषके समान है,यह सष्ट ही है । विशेष तुलासा ओघप्ररूपणाके समय कर आये हैं। एकेन्द्रियोम मनुष्यगतिद्विक और उबगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध अनन्तजीव करते हुए भी वे लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रमे ही पाये जाते हैं, इसलिए यह क्षेत्र उक्त प्रमाण कहा है,पर इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध स्वस्थानस्थित सब एकेन्द्रियोंके सम्भव है, इसलिए यह क्षेत्र सब लोक कहा है। इनके तिवा जो शेष प्रकृतियाँ बचती हैं उनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध, जो वादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव स्वस्थान स्थित हैं उन्हींके होता है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र कहा है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध स्वस्थानगत सब एकेन्द्रियोके सम्भव है, इसलिए यह क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण कहा है। बादर एकत्रिय तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप जीवोमें यह क्षेत्र प्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, इसलिए इसे एकेन्द्रियोंके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र बादर एकेन्द्रिय और इनके पर्याप्त और अपर्याप्त ऐसे जीव जो मनुष्यगतिद्विक और उचगोत्रका बन्ध करते हैं, उनका स्वस्थान स्थित क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ही पाया जाता है, क्योंकि वायुकायिक जीव इन प्रकृतियोका बन्ध नहीं करते, इसलिए इन तीन मार्गणाओमे उक्त तीन प्रकृतियो और मनुष्यायु इन चार प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है पर ससंयुक्त अन्य प्रकृतियोका बादर वायुकायिक जीव भी बन्ध करते है, इसलिए उनका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके संख्यातवे भागप्रमाण कहा है। सब सूक्ष्म जीव सब लोकमे पाये जाते हैं, इसलिए उनमें मनुष्यायुके सिवा अन्य सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र कहा है । यहां भी मनुप्यायुका दोनो पदोकी अपेक्षा क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है यह स्पष्ट ही है। ४ पृथिवीकायिक, जलकाविक, अग्निकायिक, वादर पृथिवीकायिक, बाढर जलकायिक और वावर अग्निकायिक जीवामें सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है । अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है । इतनी विशेषता है कि बादरोंमे सूक्ष्मसंयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है तथा त्रससंयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाका क्षेत्र लोकके असख्यातवे भागप्रमाण है। इनके बादर पर्याप्तकोंमे पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तकाके समान भङ्ग है। इनके वादर अपर्याप्रकोमें एकेन्द्रियसयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशब्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है और शेष प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुस्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इसी प्रकार बायुकायिक जीवाम भी जानना चाहिए । इतनी विशेपता है कि जहाँ लोकके असंख्यातवे भाग- , महाबंधे पदेसवंधाहियारे लोगस्स असंखें. तम्हि लोगस्स संखेंजः । सबवणप्फदि-णियोद० एइंदियभंगो। णवरि यम्हि लोगस्स संखेज्ज० तम्हि लोगस्स असंखें । चादरपत्ते० पुडविभंगो। प्रमाण क्षेत्र कहा है वहाँ लोकके संख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र कहना चाहिए । सव वनस्पतिकायिक और निगोद जीवोका भङ्ग एकेन्द्रियोके समान है। इतनी विशेषता है कि जहाँ लोकके संख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र कहा है वहाँ लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र कहना चाहिए । वादर प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवोमे चादर पृथिवीकायिक जीवोके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-पृथिवीकायिक आदि तीनमे और बादर पृथिवीकायिक आदि तीनमे सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध वादर पर्याप्तक जीव करते है, इसलिए इनमें सामान्यसे सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र कहा है, क्योकि इनके पर्याप्तकोंका क्षेत्र स्वस्थान और समुद्धात दोनो प्रकारसे लोकके असंख्यातवे भाग- प्रमाण है। इनमे सब प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सबके सम्भव है और पृथिवीकायिक आदि तीनका सर्व लोक क्षेत्र है, इसलिए इन मार्गणाओमे सब प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र कहा है। मूलमे यह क्षेत्र सामान्यसे छहो मार्गणाओमें कहा है, इसलिए तीन वादर मार्गणाओमे अपवाद बतलानेके लिए भागे अलगसे विचार किया है । बात यह है कि वादरोका सर्वलोक क्षेत्र मारणान्तिक और उपपाद पदके समय ही बन सकता है, पर ऐसे समयमे इनके प्रससंयुक्त प्रकृतियोका बन्ध नहीं होता, इसलिए तो बादर पृथिवीकायिक आदि तीनमे त्रससंयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवालोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । तथा जैसा कि स्वामित्व अनुयोगद्वारसे ज्ञात होता है वादरोमे सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध वादर पर्याप्तक जीव ही करते हैं और इन तीन मार्गणाओमें बादर पर्याप्तक जीवोका क्षेत्र किसी भी अवस्थामे लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही होता है, इसलिए इनमे सूक्ष्मसंयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातचे भागप्रमाण और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्वलोक प्रमाण कहा है। पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तकोमे सब प्रकृतियोके दोनों पदोकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाग क्षेत्रका निर्देश-पहले कर आये हैं,वही क्षेत्र यहाँ वादर पृथिवीकायिक पर्याप्त आदि तीनमै प्राप्त होता है, इसलिए यह प्ररूपणा पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तकोके समान जाननेकी सूचना की है। बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त आदि तीन मार्गणाओमें मारणान्तिक समुद्धातके समय भी एकेन्द्रियसंयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध हो सकता है, इसलिए इनमें इन प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र कहा है। पर इनमे ससंयुक्त प्रकृतियोका प्रदेशबन्ध स्वस्थानमे ही सम्भव है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असख्यातवे भाग- प्रमाण कहा है। वायुकायिक जीव और उनके अवान्तर भेदोंमे पृथिवीकायिक और उनके अवान्तर भेदोके समान ही क्षेत्रप्ररूपणा घटित कर लेनी चाहिए । पर बादर वायुकायिक और उनके अवान्तर भेदोका क्षेत्र लोकके सख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होता है, इसलिए वादर पृथिची- कायिक और उनके अवान्तर भेदोमे जहाँ लोकका असंख्यातवा भागप्रमाण क्षेत्र कहा है वहाँ पर इनमे लोकके संख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र जानना चाहिए । सव वनस्पतिकायिक और निगोद जीवोंका क्षेत्र एकेन्द्रियोके समान वन जानेसे उनमे एकेन्द्रियोंके समान क्षेत्र प्ररूपणा जाननेको सूचना की है। बादर प्रत्येक वनस्पतिकायिक और उनके अवान्तर भेदोमें वादर पृथिवीकायिक और उनके अवान्तर भेदोके समान प्ररूपणा बन जानेसे उनमें बादर पृथिवीकायिक और उनके ता.आ०प्रन्यो 'चादरपत्ते बादर ४ पुडविभगो' इति पाठ ।
५ खेत्तपख्वणा ५. जहण्णए पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० तिण्णिआउ०-वेउन्वियछ०- आहार०२-तित्थ. जह० अजह० के० ? लोगस्स लोगस्स असंखें । सेसाणं जह० अजह० के० ? सव्वलो० । एवं ओघभंगो तिरिक्खोघो कायजोगि-ओरालि०-ओरालि. मि०-कम्मइ०-गर्बुस० कोधादि०४-मदि-सुद०-असंज०-अचक्खु०-किण्ण-णील-काउ० भवसि०-अभवसि०-मिच्छा०-असण्णि-आहार०अणाहारग त्ति । ६. सेसाणं सव्वाणं संखेंज-असंखेंजरासीणं सव्वपगदीणं जह० अजह० लोगस्स असंखें। एइंदिएसु सव्यपगदीणं जह० अजह सबलो० । णवरि मणुसाउ० जह० अजह लोगस्स असंखें । एवं सन्यसुहुमाणं । AN अवान्तर भेदोके समान प्ररूपणा जाननेकी सुचना की है। यहाँ पूर्वोक्त सत्र मार्गणाओमें मनुष्यायुके दोनो पढोका वन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र ओघके समान ही प्राप्त होता है, इसलिए उसका अलगसे निर्देश नहीं किया है। ५ जयन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे तीन आयु, वैक्रियिक छह, आहारकद्विक और तीर्थकर प्रकृतिका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करने वाले जीवोका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र है। शेप प्रकृतियोका जघय और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कितना क्षेत्र है ' सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र है। इसी प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यञ्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्र- काययोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदवाले, क्रोधादि चार कपायत्राले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचक्षुदर्शनवाले, कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले, कापोतलेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यावष्टि, असंजी, आहारक और अनाहारक जीवोमे जानना चाहिए । विशेषार्थ-तीन आयु आदिका एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीव वन्ध नहीं करते । असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय आदिमें भी प्रारम्भकी नौ प्रकृतियोका असंज्ञी और संज्ञी जीव कदाचित् वन्ध करते हैं और अन्तको तीन प्रकृतियोंमे आहारकद्विकका अप्रमत्तसंयत आदि दो गुणस्थानवाले तथा तीर्थङ्करप्रकृनिका असंयतसम्यग्दृष्टि आदि पॉच गुणस्थानवाले जीव कदाचित् और कोई- कोई बध करते हैं। यदि उक्त प्रतियोका वध करनेवाले इन सव जीवोके क्षेत्रका विचार करते हैं तो वह लोकके असंख्यातवे भागसे अधिक प्राप्त नहीं होता, इसलिए यहाँ ओघसे उक्त सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवालेजीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । तथा शेप सब प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीच योग्य सामाग्रीक सद्भावमे करते हैं और अजघन्य प्रदेशवन्ध यथायोग्य सब जीवोंके सम्भव है, इसलिए इनके जघन्य और अजघन्य प्रदेशोका बन्ध करनेवाले जीवीका क्षेत्र सर्व लोकत्रमाण कहा है । यहाँ मूलमे कही गई सामान्य तिर्यञ्च आदि मार्गणाओमें यह ओघारूपणा बन जाती है, इसलिए उनमे ओघके समान क्षेत्र प्ररूपणा जाननेकी सूचना की है। मात्र जिन मार्गणाओमे जितनी प्रकृतियोका वन्ध सम्भव है उसे ध्यानमे रखकर ही ओघप्ररूपणाके अनुसार वहाँ क्षेत्रप्ररूपणा घटित करनी चाहिए। ६शेप सब संख्यात और असख्यात राशिवाली मार्गणाओमे सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है । एकेद्रियोमे सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है । इतनी विशेषता है कि इनमे मनुष्यायुका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवो महावंधे पडेसबंधाहियारे ७. पुढवि०-आउ-तेउ०-याउ० ओघभंगो। तेसिं चेव बादराणं [चादरपज्जत्ताणं] एइंदियसंजुत्ताणं जह० लोगस्स असंखें । अब० सम्वलो० । तससंजुत्ताणं जह० अजह. लोगस्स असंखें । एवं वादरपुढविअपज्जत्तादि०४ । सन्चवणफदि-णियोदाणं सच्चे चेव भंगो सव्वलोगे० । बादरपज्जत्तपत्ते वादरपुढविभंगो । एवं एदेण बीजेण णेदव्वं । एवं खेत्तं समनं का क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है । इसी प्रकार अर्थात् एकेन्द्रियोंके समान सब सूक्ष्म जीवोंम क्षेत्रप्ररूपणा जाननी चाहिए। विशेपार्थ-पृथिवीकायिक आदि पाँचको छोडकर अन्य जितना असंख्यात संख्यावाली मार्गणात हैं और संख्यात संख्यावाली मार्गणार हैं उनका क्षेत्र ही लोकके असंख्यातव भागप्रमाण है, इसलिए उनमें सब प्रकृतियोके दोनो पदवाले जीवोका क्षेत्र एक्तप्रमाण जाननेकी सूचना की है । तथा एकेन्द्रियोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है, इसलिए इनमे मनुष्यायुको छोड़कर सब प्रकृतियोके दोनों पटोंका बन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण कहा है । इनमे मनुप्यायुके दोनों पदोंका बन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है। सय सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव भी सब लोकमें पाये जाते हैं, इसलिए इनमें एकेन्द्रियोंके समान प्ररूपणा बन जानेसे उसे उनके समान जानने की सूचना की है। ७. पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायुकायिक जीवाम ओधके समान भन है । उन्हींके वादरी व वादर पर्याप्तकोमे एकेन्द्रियसंयुक्त प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवीका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है । तथा त्रससंयुक्त प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है। इसी प्रकार बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त आदि चागॅमे जानना चाहिए। सब वनस्पतिकायिक और सब निगोद जीवोमे सब प्रकृतियोके दोना पदवाले जीवांका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है। वादर प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवोमे चादर पृथिवीकायिक जीवोंके समान भङ्ग है। इस प्रकार इस वीजपदके अनुसार ले जाना चाहिए। विशेषार्थ-पृथिवीकायिक आदि चारी मार्गणाआका क्षेत्र सब लोकप्रमाण है, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोंके दोनी पटवालोका क्षेत्र आपके समान जाननेकी सूचना की है। इन चारोके वाइरोमे एकेन्द्रियनातिसंयुक्त प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध स्वस्थानमे ही सम्भव है और अजघन्य प्रदेशबन्ध मारणान्तिक और उपपादपटके समय भी सम्भव है, इसलिए इनमे एकेन्द्रियजातिसंयुक्त प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाका क्षेत्र लोकके असंख्यात भागप्रमाण और अजवन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण कहा है। इनमें अससंयुक्त प्रकृतियोका बन्ध स्वस्थानमे ही सम्भव है, इसलिए इनके दोनो पढ़वालोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त आदि चारमें भी इसी प्रकार अर्थात् चादर पृथिवीकायिक आदि चारके समान क्षेत्र घटित कर लेना चाहिए। सब वनस्पति- कायिक और सब निगोद जीवोम सब लोक क्षेत्र कहनेका कारण स्पष्ट हो है। तथा वाटर प्रत्येक बनस्पतिकायिक जीवोका भन वादर पृथिवीकायिक जीवोंके समान है.यह भी स्पष्ट है। यहाँ जिन मार्गणाओका क्षेत्र नहीं कहा है, उसे जाननेके लिए इसी प्रकार इस वीजपदके अनुसार ले जाना चाहिए यह सूचना की है। यहाँ चादर वायुकायिक व उनके अपर्याप्तकोमे लोकके संख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्र क्यो नहीं कहा यह विचारणीय है। बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त आदि चारका क्षेत्र विलकुल नही कहा । शायद इसीके लिए अन्तमे एवं एदेण वौजेण' इत्यादि सूचना की है। पहले कह आये हैं कि जघन्य प्रदेशबन्ध वायुकायिक जीव तद्वस्थके प्रथम समयमै जघन्य योग फोसणपरूवणा फोसणपरूवणा ८. फोसणाणुगमेण दुविहं-जहण्णयं उक्कस्सयं च । उक्कस्सए पगदं । दुवि०- ओवे० आदे०। ओघे० पंचणा०-चदुदंसणा०-सादा०-चदुसंज०-पुरिस०-मणुसग०- चदुजादि-ओरालि अंगो०-असंपत्त०-मणुसाणु-तस-वादर-जस०-उच्चा०-पंचंत० उक्क० पदे धगेहि केवडियं सत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेन्जदिभागो। अणु० सव्वलोगो। थीणगिद्धि०३-असादा०-मिच्छ,०-अणताणु०४-णस०-पर०-उस्सा०-पज्ज०-थिर-गुम- णीचा० उक्क० लोगस्स असंखें. अडचाँस० सबलोगो वा । अणु० सव्वलोगो। णिद्दा-पयला-अपच्यखाण०४-छण्णोक-तिरिक्खाउ०-आदाव० उक० लोगस्स असंखें अट्टचोदस० । अणु० सव्वलो० । पच्चक्खाण०४-समचदु०-दोविहा०-सुभग-दोसर-आदें। उक्क० छ० । अणु० सन्चलो। दोआउ०-आहार०२ उक० अणु० खेतभंगो। मणुसाउ० उक्क० अट्ठचौँ । अणु० सवलो० । दोगदि०-दोआणु० उस्क० अणु० सहितके होता है, किन्तु ऐसे जीव असंख्यात होते हुए भी बहुत कम होते हैं जो लोकके असंख्यानवें भागमें ही पाये जाते हैं, अतः लोकका संख्यातवा भाग नहीं कहा। पृथिवीकायिक आदि बागे स्थावरोंका भङ्ग एकेन्द्रियोंके समान कहा। तथा बादर सामान्य व चादर अपर्याममै जो विपता थी.वह अलगसे खोल दी गयी है। इस प्रकार क्षेत्र समाप्त हुआ। स्पर्शनानुगम ८. स्पर्शनानुगम दो प्रकारका है जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण,चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संचलन, पुरुषवेद, मनुष्यगति, चार जाति, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, असम्यातामुपाटिका- संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, त्रस, बादर यश कीति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यात भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सब लोकका सर्शन किया है । स्त्यानगृद्धित्रिक, असातावेदनीय, मिथ्यात्व अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, परघात, उच्छास, पर्याप्त, स्थिर, शुभ और नीचगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण, वसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्वलोकप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है । निद्रा, प्रचला, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क, छह नोकपाय, तिर्यञ्चायु और आतपका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और बसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करने- वालेजीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। प्रत्याख्यानावरण चतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, दो विहायोगति, सुभग दो स्वर और आदेवका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। दो आयु और आहारकद्विक का उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रामाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो गति और दो आनुपूर्वीका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने , , ८ महावंधे पदेसबंधाहियारे छच्चाँमः।तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरालि०-तेजा०-क०-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०- उप०-थावर-सुहम-अपज्ज०-६ -पत्ते ०-साधा०-अथिर-असुभ-दूभग-अणार्दै०-अजस० -णिमि० उक्क० लोगस्स असंखें सव्वलोगो वा । अणु० सबलोगो। उज्जो० उक्क० अट्ठ- णव० । अणु० सव्वलो० । इत्थि०-चदुसंठा०-पंचसंघ० उक्क० अट्ठ-बारह० । अणु० सव्वलो० । वेउवि०-वेउवि अंगो० उक्क० अणु० वारह. | तित्थ० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० अट्टचों। -- - सनालोके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तियञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपधात, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति और निर्माणका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेद, चार संस्थान और पाँच संहननका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने असनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने बसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तीर्थङ्करप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, यशःकोर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमे होता है। चार संज्वलन और पुरुपवेदका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध नौवे गुणस्थानमें होता है। तथा मनुष्यगति आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध तिर्यञ्च और मनुष्यगतिके मिथ्यादृष्टि संज्ञी पर्याप्त जीवके होता है। यतः इन सब जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, अतः इन प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवध करनेवाले जीवोका स्पर्शन लोकके असख्यातवे भागप्रमाण कहा है। तथा इन सब प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध एकेन्द्रियादि जीवोके भी सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे इसका स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण कहा है। इसी प्रकार नरकायु, देवायु, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक- शरीर, आहारकशरीर वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, आहारकशरीर आङ्गोपाङ्ग और तीर्थङ्करप्रकृतिको छोड़कर अन्य सव प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध भी एकेन्द्रिय आदि जीव करते हैं, इसलिए उनकी अपेक्षा भी सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्यानगुद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धी चतुष्क, नपुसकवेद और नीचगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध चारों गतिके संज्ञी मिथ्यादृष्टि पर्याप्त जीव करते है। असातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध चारो गतिके संज्ञी पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टि जीव करते हैं। तथा परघात आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध तीनगतिके संज्ञी पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव करते हैं । यत इन जीवोके इनप्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध स्वस्थानस्वस्थानमें, विहारवत्स्वस्थानके समय और मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। निद्रा, प्रचला और छह नोकपायका उत्कृष्ट , फोसणपखवणा ६ । है. णिरएसु छदस-बारसक०-सत्तणोक० उक्क० बँत्तमं० । अणु० छच्चोंट्स० । प्रदेशबन्ध चारो गतिक पर्याप्तक सम्यग्दृष्टि जीव करते है। अप्रत्याख्यानावरण चारका चारोगतिके असंयतसम्यग्दृष्टि पर्याप्त जीव उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते है । तिर्यञ्चायुका चारों गतिके संजो पर्याप्तक मिथ्याष्टि जीव उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं। तथा आतपका तीन गतिके संजो पर्याप्तक मिथ्याष्टि जीच उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करते हैं। यतः इन जीवोंके इन प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध स्वस्थान- स्वस्थानके समय और विहारवत्स्वस्थानके समय भी सम्भव है, अत. इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाग स्पर्शन कहा है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका दो गतिके संयतासंयत जीव, समचतुरस्र- संस्थान, प्रशस्तविहायोगति, और सुभग आदि तीनका दो गतिके संज्ञी पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टि जीव तथा अप्रशस्त विहायोगति और दुस्वरका दो गतिके संजो पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करते हैं। यत इन जीवोके स्वस्थानस्वस्थानके समय और मारणान्तिक समुद्भातके समय उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध हो सकता है, अत. इन प्रकृतियाका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करने- वाले जीवोका लोकके असंख्यात भागप्रमाग और त्रसनालीके कुछ कम छह वटेचौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि अप्रशस्तविहायोगवि और दुस्वरका नीचे मारणान्तिक समुद्धात कराते समय तथा शेप प्रकृतियोका अपर मारणान्तिक समुहात कराते समय उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कहना चाहिए। तथा मूलमे स्वस्थानस्वस्थानको अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन नहीं कहा है फिर भी वह सम्भव है, इसलिए विशेपार्थमे हमने उसका निर्देश कर दिया है । नरकायु, देवायु और आहारकद्विकके दोनो पदोका बन्ध करनेवाले जीवोका सर्शन क्षेत्रके समान है, यह स्पष्ट ही है। मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध देवाके विहारवत्स्वस्थानके समय भी सम्भव है, इसलिए इसका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। नरकगतिद्विक और देवगतिद्विकका दोनो प्रकारका प्रदेशबन्ध क्रमसे नारकियोमे और देवोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका दोनो प्रकारका प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण पर्शन कहा है। एन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी तिर्यञ्चगति आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है। स्वस्थानमे तो यह सम्भव है ही, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। देव विहारवत्स्वस्थानके समय और एकेन्द्रियोमे ऊपर मारणान्तिक समुद्बात करते समय भी उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करते हैं, इसलिए इसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोकासनालीके कुछ कमआठ और कुछ कम नौ बटेचौदह भागप्रमाण स्पर्शनकहा है। देवोके बिहारवत्स्वस्थानके समय तथा नारक्रिया और देवोके तिर्यञ्चो और मनुष्योमें मारणान्तिक समुद्भातके समय भी स्त्रीवेद आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटेचौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । नारकियो और देवोमे मारणान्तिक समुहात करते समय भी वैक्रियिकद्विकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनके दोनो पदोका बन्ध करनेवाले जीवोका वसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध मनुष्य करते हैं, इसलिए इसका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण होनेसे इसे क्षेत्रके समान कहा है। तथा देवोके विहारवत्स्वस्थानके समय भी इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होता है, इसलिए इस अपेक्षासे इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। ६. नारकियाम छह दर्शनावरण, बारह कपाय और सात नोकषायोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका सर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने २ " १० महाबंधे पढेसबंधाहियारे दोआउ०-मणुसगदिदुग-तित्थ०-उच्चा० उक० अणु० खेत्तभंगो । सेसाणं सवपगदीणं उक० अणु० छच्चोंइस० । एवं सचणेरड्याणं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । १०. तिरिक्खेसु पंचणा०-थीणगिद्धि०३-सादासाद०-मिच्छ०-अणंताणु०४- णस०-तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरालि०-तेजा०-०-[हुंड-] वण्ण०४-तिरिक्खाणु०- अगु०४-थावर-मुहुम-पजत्तापञ्जत्त-पत्तेय ०-साधार०-थिराथिर-सुभासुभ-भग-अणाद. अजस०-णिमि०-णीचा०-पंचंत० उक. लोगस्स असंखें सबलोगो वा । अणु० सव्वलो० । छदंस०-धारसक०-सत्तणोक०-समचदु०-दोविहा०-सुभग-दोसर-आर्दै०-उच्चा० उक्क० छचौड्स० । अणु० सव्वलो० । इथि० उक्क० दिवड्डचाँदस० । अणु० सब्बलो० । वसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु, मनुष्य- गतिद्विक, तीर्थकरप्रकृति और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। शेष सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार सब नारकियोका अपना-अपना म्पर्शन ले जाना चाहिए। विशेपार्थ-नरकमें छह दर्शनावरण आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध पर्याप्त सम्यग्दृष्टि ही करते हैं, इसलिए इनका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे क्षेत्रके समान कहा है। यद्यपि छठेसे लेकर प्रथम नरक तकके सम्यग्दृष्टि नारकी मरकर मनुष्य होते हैं और इनके मारणान्तिक समुद्भातके समय उक्त प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, पर ऐसे जीवोका म्पशन लोकके असंरयातवे भागसे अधिक नहीं होता, इतना यहाँ स्पष्ट जानना चाहिए । दो आयुका प्रदेशबन्ध मारणान्तिक समुद्भातके समय नहीं होता। मनुष्यगतिद्विक आदिका उत्कृष्ट शबन्ध मारणान्तिक समुद्रातके समय सम्भव होनेपर भी स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भाग- प्रमाण ही रहता है, इसलिए इन प्रकृतियोंके दोनो पढोकी अपेक्षा भी स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । अव रहे प्रथम दण्डकमे कही गई प्रकृतियांका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीव और शेप सब प्रकृतियोके दोनो पदोका बन्ध करनेवाले जीव सो मारणान्तिक समुद्घातके समय शेष प्रकृतियो- का उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध तथा मारणान्तिक समुद्भात और उपपादके समय इन सब प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे यह स्पर्शन सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। प्रथमादि पृथिवियोमे यह स्पर्शन इसी प्रकार घटित होनेसे उसे सामान्य नारकियोके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र सामान्य नारकियोका जहाँ कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है वहाँ अपना-अपना स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए। १०. तिर्यञ्चोमै पाँच ज्ञानावरण, स्यानगृद्धित्रिक, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी,अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अर्याप्त,प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। छह दर्शनावरण, धारह कपाय, सात नोकपाय, समचतुरस्रसंस्थान, दोविहायोगति, सुभग, दो स्वर, आदेय और उचगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेदका १ ता० आ० प्रत्योः 'दूभग दुस्सर अणादे०' इति पाठः।
११ फोसणपरूवणा दोआउ० खेत्तभंगो । तिरिक्खाउ०-मणुस०-चदुजादि-चदुसंठा०-ओरालि०अंगो०- छस्संघ०-मणुसाणु०-आदा० [तस-] यादर० उक० खेत्तभंगो। अणु० सबलो० । दोगादि-दोआणु० उक्क० अणु० छच्चौदस० । वेउन्वि०-वेउन्वि०अंगो० उक० अणु० वारह० । उजो०-जस० उक्क० सत्तचाँड्स० । अणु० सब्बलो० । ११. पंचिंदि०तिरिक्ख०३ पंचणा०-थीणगिद्धि०३-दोवेद-मिच्छ०-अणंतागु०४- उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयुओका भङ्ग क्षेत्रके समान है। तिर्यञ्चायु, मनुष्यगति, चार जाति, चार संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, त्रस और वादरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करने- वाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो गति और दो आनुपूर्वीका उत्कृष्ट और अनुस्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालोके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उद्योत और यश कौतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-एकेन्द्रियादि सबके यथासम्भव बंधनेवाली प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्धकी अपेक्षा स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण कहा है, इसलिए इस स्पर्शनका यहाँ व आगे हम अलग-अलग स्पष्टीकरण नहीं करेगे । जहाँ विशेषता होगी उसका खुलासा अवश्य करेंगे। पॉच ज्ञानावरणादि का उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सन्नी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीवोंके स्वस्थानके समान मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यातवे भाग और- सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। देवोंमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय छह दर्शनावरण आदिका तथा नारकियोमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय अप्रशस्त विहायोगति और दुस्वरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवीका बसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । देवियोमें मारणान्तिक समुद्घात करनेवाले तिर्यञ्चोके स्लीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव होनेसे इसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका बसनालीके कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । नरकायु और देवायुका प्रदेशबन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय नहीं होता, इसलिए इनके दोनों पदोंका बन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन लोकके असख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तिर्यञ्चायुका प्रदेशबन्ध तो मारणान्तिक समुद्धातके समय होता ही नहीं । शेपका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध मारणान्तिक समुद्रातके समय भी होता है। फिर भी यह स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागसे अधिक नहीं होता, इसलिए इसका भंग क्षेत्रके समान कहा है। दो गति और दो आनुपूर्वोकी अपेक्षा स्पर्शन तथा वैक्रियिकद्विककी अपेक्षा स्पर्शन जिस प्रकार ओघ प्ररूपणाके समय घटित करके बतलाया है,उसी प्रकार यहाँपर भी घटित कर लेना चाहिए । जो ऊपर एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्भात करते हैं उनके भी उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध होता है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । ११. पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्चत्रिकर्म पाँच ज्ञानाबरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, , ~~~-~- ------ 2-.-. --~---- १२ महावंधे पदेसर्वधाहियारे णस०-णीचा-पंचंत० उक० अणु० लोग० असंख० सव्वलो० । छदंस०-बारसक०- हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दु० उक्क० छच्चाँड्स० । अणु० लोग० असंखें सब्बलो । इत्थि० उक्क० अणु० दिवड्डचौदस० । पुरिस०-दोगदि-समचदु०-दोआणु०-दोविहा०- सुभग-दोसर-आर्दै-उच्चा० उक्क० अणु० छचोंद्द० । चदुआउ०-मणुसग०-तिण्णिजादि- चदुसंठा०-ओरा अंगो०-छस्संघ०-मणुसाणु०-आदा० उक्क० अणु० लोग० असं० । तिरिक्ख०-एइंदि--ओरालि०-तेजा०-क०-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु-अगु०४-थावर- सुहुम-पजत्तापञ्जत्त-पत्ते-साधार०-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग-अणादें-अजस० -णिमि० उक्क० अणु० लोगस्स असं० सव्वलो० । वेउवि०-बेउन्वि०अंगो० उक्० अणु० वारह० । पंचिंदि०-तस० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० बारहचोदेस० । उज्जो०-जस० उक्क० अणु० सत्तचों । वादर० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० तेरह० । अनन्तानुवन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद,नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका औरसर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। छह दर्शनावरण,धारह कपाय,हास्य, रति, अरति, शोक,भय और जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीके कुछ कम छह वटै चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेदका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । पुरुपवेद, दोगति, समचतुरस्रसंस्थान, दो आनुपूर्वी, दो विहायोगति, सुभग, दो स्वर, आदेय और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। चार आयु, मनुष्यगति, तीन जाति, चार संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और आतपका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिक- शरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति और निर्माणका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपागका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पञ्चेन्द्रियजाति और उसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम धारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। बादरप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुस्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सनालीके कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-उक्त तीन प्रकारके तिर्यश्च स्वस्थान और एकेन्द्रियोमें मारणान्तिक समुद्वात करते समय दोनों अवस्थाओंमें पॉच ज्ञानावरणादिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करते हैं, इसलिए यहाँ इन दोनों पदोंकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण सर्शन कहा है । छह दर्शनावरण आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध ऊपर आनत कल्पतकके देखोमें फोसणपरूवणा १३ १२. पंचिंदि तिरि०अपज० पंचणा०-णवदंस०-दोवेद०-मिच्छ०-सोलसक०- सत्तणोक०-तिरिक्ख०-[एइंदि०-] ओरालि०-तेजा०-क०-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०- अगु०४-थावर सुहुम-पजत्तापञ्जत्त-पत्ते-साधार०-धिराथिर-सुभासुभ-दूभग-अणार्दै अजस०-णिमि०-णीचा०-पंचंत० उक्क० अणु० लोगस्स असंखें सवलो । इथिल-पुरिस०- दोआउ०-मिणुस०-] चदुजा०-पंचसंठा०-ओरालि०अंगो०-छस्संघ०-मणुसाणु०-आदा०- दोविहा०-तस-सुभग-दोसर-आर्दै०-उच्चा० उक० अणु० खेत्तभंगो ! उज्जो-जस० उक्क० अणु० सत्तचौँ । बादर० उक्क० खत्तभंगो । अणु० सत्तचाँदस० । एवं सव्वअपजत्तयाणं मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए यहाँ इस पदको अपेक्षा बसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है। इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जाबोका लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन जैसा पॉच ज्ञानावरणादिकी अपेक्षा घटित करके बतला आये हैं,उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए। तथा आगे तिर्यश्चगति आदि प्रकृतियोकी अपेक्षा भी यह स्पर्शन कहा है सो वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । देवियोम मारणान्तिक समुद्धातके समय स्त्रीवेदके दोनो पद सम्भव हैं, इसलिए यहाँ स्त्रीवेदके दोनो पढोकी अपेक्षा असनालीके कुछ कम डेड़ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। अपर आनत कल्पतक के देवोमें मारणान्तिक समुद्धात करनेवाले जीवोके पुरुषवेद आदिके दोनो पद सम्भव होनेसे इनकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है। चार आयु आदिके दोनों पदवालोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, यह स्पष्ट ही है। क्योकि चार आयुओका वन्ध स्वस्थानमें ही होता है और शेष प्रकृतियोंका कन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय होते हुए भी स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागसे अधिक नहीं होता। वैक्रियिकद्विककी अपेक्षा वसनालोके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन ओघप्ररूपणामे घटित करके बतला आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए । तथा इसी प्रकार यह स्पर्शन पञ्चेन्द्रियजाति और त्रसप्रकृतिके अनुत्कृष्ट पदकी अपेक्षा भी घटित कर लेना चाहिए । तथा इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है, यह स्पष्ट ही है। ऊपर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात करनेवाले जीवोके उद्योत और यश कीर्तिके दोनो पद सम्भव हैं, इसलिए इनके दोनो पदवालोंका सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। बादप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है,यह भी स्पष्ट है । तथा नीचे छह राजू और ऊपर सात राजू क्षेत्रके भीतर मारणान्तिक समुद्रात करनेवाले जीवोके वाटर प्रकृतिका अनुत्कृष्ट प्रदेशकाध सम्भव है, इसलिए यह स्पर्शन बसनालीके कुछ कम तेरह पटे चौदह भागप्रमाण कहा है। १२, पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोंमें पॉच ज्ञानावरण, नौ दुर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकषाय, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलधुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, दो आयु, मनुष्यगति, चार जाति, पॉच संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, दो विहायोगति, बस, सुभग, दो स्वर, आदेय और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने बसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका , .
महावंधे पदेसवंधाहियारे तसाणं सव्वविगलिंदियाणं च बादरपुढवि०-आउल्-तेउ०पजत्तयाणं च । १३. मणुम०३ पंचणा०-छदंस०-सादा०-बारसक०-छण्णोक०-पंचंत० उक० खेत्तभंगो । अणु० लोगस्स असंखें सव्वलो० । थीणगिद्धि०३-असादा०-मिच्छ०-अणं- ताणु०४-णवंस-तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरालि०-तेजा०-क०-हुंड०-यण्ण४-तिरिक्खाणु०- अगु०४-थावर-सुहुम-पञ्जत्तापजत्त-पत्ते-साधार-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग०-अणार्दै०- अजस-णिमि०-णीचा० उक्क० अणु० लोग० असंखे सव्वलो० । उजो० उक० अणु० सत्तचों । बादर०-जस० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० सत्तचों । सेसाणं उक्क० अणु० सत्तभंगो। स्पर्शन किया है । बादर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। इसी प्रकार सबअपर्याप्त, बस अपर्याप्त सब विकलेन्द्रिय तथा वादर पृथिवी- कायिक पर्याप्त, वादर जलकायिक पर्याप्त और बादर अग्निकायिक पर्याप्त जीवोमे जानना चाहिए। विशेषार्थ-ये पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्त जीव स्वस्थान और मारणान्तिक समुद्वात दोनों अवस्थाओमे पॉच ज्ञानावरणादिके दोनो पदोका बन्ध करते हैं, इसलिए यहाँ इनके दोनो पदोका वन्ध करनेवाले जीवांका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्रीवेद आदिका यथासम्भव एकेन्द्रिय आदिम मारणान्तिक समुद्रात करते समय चन्ध नहीं होता । दूसरे दो आयुओका तो मारणान्तिक समुद्धातके समय वध होता ही नहीं, इसलिए यहाँ इन स्त्रीवेद आदिके दोनो पदोका बन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असस्यातवे भागप्रमाण सर्शन कहा है । उद्योत और यश कीर्तिका स्पष्टीकरण पञ्चेन्द्रिय तियंञ्चत्रिकको प्ररूपणाके समय कर आये हैं,उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए। उद्योतके समान ही बादरका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए। वादरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है। यहाँपर अन्य जितनी मार्गणाएँ गिनाई है उनमे यह प्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमे पञ्चन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोके समान स्पर्शन जाननेको सूचना की है। १३. मनुष्यत्रिकी पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, सातावदनीय, वारह कपाय, छह नोकगाय और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्यानगृद्धित्रिक, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण और नीचगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उद्योतका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वाडर और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबीने त्रसनालोके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पशन किया है । शेप प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है।
० AN फोसणपरूवणा १४. देवेसु पंचणा०-थीणगि०३-सादासाद०-मिच्छ० अणंताणु०४-णस०- तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरालि०-तेजा०-०--हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४- उज्जो०-थावर-वादर-पज्जत्त-पत्ते-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग-अणार्दै जस०-अजस०- णिमि०-णीचा०-पंचत० उक्त० अणु० अट्ठ-णव० । छदंस०-यारसक०-छण्णोक० उक० अहचौँ । अणु० अट्ठ-णव० । इत्थि०-पुरिस०-दोआउ०-मणुस-पंचिंदि०-पंचसंठा०- ओरालि०अंगो०-छस्संघ०-मणुसाणु०-आदाव-दोविहा०-तस-सुभग-दोसर-आदें-तित्थ उक्क० अणु० अट्ठचौँ । एवं सव्वदेवाणं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । विशेषार्थ-मनुष्यत्रिकी पॉच ज्ञानावरणादिके उत्कृष्ट प्रदेशवन्धका स्वामित्व यथायोग्य गुणस्थानप्रतिपन्न जीवोके बन जाता है और इन जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है । क्षेत्र भी इतना ही है, अव इन कर्मोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । मनुष्यत्रिकमें एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्भात करनेवाले जीवोंके भी इन कर्मोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध होता है, इसलिए इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका लोकके असंख्यात भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्यानगृद्धित्रिक आदि प्रकृतियोका भी दोनों प्रकारका वन्ध इसी प्रकार एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्घातके समय बन जाता है, इसलिए इनका दोनो प्रकारका वध करनेवाले जीवोका स्पर्शन भी लोकके असंख्यातचे भाग और सर्वलोकप्रमाण कहा है । उद्योतकी अपेक्षा दोनों पदोका बन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन पहले पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चत्रिकमें घटित करके बतला आये है ,उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए । मात्र बहाँ यश-कीर्ति प्रकृतिको उद्योतके साथ गिनाकर स्पर्शन कहा है। पर मनुष्यत्रिकमे इसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध गुणस्थान प्रतिपन्न जीव करते हैं, इसलिए इनमे इसका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान ही प्राप्त होता है। बादर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका भी इतना ही स्पर्शन बनता है, इसलिए यहाँपर यश.कीर्तिको धादर प्रकृतिके साथ सम्मिलित कर इन दोनो प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंको एक साथ स्पर्शन कहा है। तथा इन दोनो प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध ऊपर एकेन्द्रियोमै मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी होता है, इसलिए उनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन सनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । यहाँ गिनाई गई इन प्रकृतियोंके सिवा अन्य जितनी प्रकृतियों बचती है,उनके दोनो पदोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे उसे क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है। १४ देवोमे पॉच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिंक, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलधुचतुष्क, उद्योत, स्थावर, बादर, पर्याम, प्रत्येक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, यश कीर्ति, अयश कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । छह दर्शनावरण, वारह कपाय और छह नोकपायका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवध करनेवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। नोवेद, पुरुषवेद, दो आयु, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रियजाति, पाँच संस्थान, औदारिकशरीर आंगोपांग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, दो विहायोगति, बस, सुभग, दो स्वर, आदेय और तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध .
0- -- १६ महावंधे पसबंधाहियारे १५. एइंदिएसु पंचणा०-णवदंसणा०-दोवेद०-मिच्छ-सोलसक०-सत्तणोक०- तिरिक्व०-एइंदि०-ओरालि तेजा०-क० -हुंड०-चण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४-थावर- सुहुम-पज्जत्तापज्जत्त-पत्ते०-साधार०-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग-अणार्दै० णिमि०-णीचा०-पंचंत० उक्क० अणु० सव्वलो० । इत्थि०-पुरिस०-चदुजादि-पंचसंठा० ओरा०अंगो०-छस्संघड०-दोविहा०-तस-बादर-सुभग-दोसर-आर्दै उक्क० लोगस्स संखेंजदिभागों । अणु० सव्वलोगो । एवं तिरिक्खाउ० । मणुसाउ० उक्क० खेत्त- भंगो । अणु० लोगस्स असंखें सब्बलोगो वा। मणुसगदिदुग-उच्चा० उक्क० खत्तभंगो। अणु० सव्वलो० । उज्जो०-जस० उक्क० सत्तचों । अणु० सव्वलो० । सेसाणं उक्क० खेत्तभंगो । अणु० सव्वलो० । करनेवाले जीवोंने जसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार सब देवोमे अपना-अपना स्पर्शन ले जाना चाहिए । विशेषार्थ-यहाँ जिन प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट या अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध विहारवत्स्वस्थानके समय और एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्भात करते समय वन जाता है, उनका उन पदोकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भाग प्रमाण स्पर्शन कहा है और जिनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्धात करते समय नहीं बनता, उनका उन पदोकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । इन्ही विशेषताओको और अपने स्पर्शनको ध्यानमें रखकर देवोंके सब अवान्तर भेदोंमे स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए। १५. एकेन्द्रियोंमें पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, सात नोकषाय, तिर्यश्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश.कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है । स्त्रीवेद, पुरुपवेद, चार जाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो वियोगति, त्रस, बादर, सुंभग, दो स्वर और आदेयका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार तिर्यञ्चायुकी अपेक्षा स्पर्शन जानना चाहिए । मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मनुष्यगतिद्विक और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालोके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेष प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-एकेन्द्रियोंमें बादर पर्याप्त जीव ही सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते १ ता० आ० प्रत्योः 'असंखेजटिभागो' इनि पाठः। , फोसणपरूवणा १६. वादर-पजत्तापञ्जताणं एइंदियसंजुत्ताणं उक० अणु० सव्वलो० । इत्थि०-पुरिस-तिरिक्खाउ०-चदुजादि-पंचसंठा०-ओगलि०अंगो०-छस्संघ०-आदाव- दोविहा०-तस- [चादर-] सुभग-दोसर-आदें। उक० अणु० लोगस्स संखेंजदिभागो। मणुसाउ०-मणुस०-मणुसाणु०-उच्चा० उक्क० अणु० लोगस्स असंखें । सव्वमुहुमाणं AANA AAMANAR- हैं,पर अन्य एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्भात करते समय भी ये जीव पॉच ज्ञानावरण आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं और इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सब एकेन्द्रियोंके होना है, इसलिए इनके दोनों पढोका बन्ध करनेवाले जीवांका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्रीवेद आदि छच्चीसका, मनुष्यगति आदि तीनका, उद्योत आदि दोका और जिन प्रकृतियाका यहाँ नाम निर्देश नही किया है,उनका भी सव एकेन्द्रिय जीव अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं, इसलिए इनमे इन प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा खीवेद आदि छब्बीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध एकेन्द्रियोंमें बादर एकेन्द्रियपर्याप्त जीव करते हुए भी इनका सब प्रकारका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण होनेसे यह उक्त प्रमाण कहा है। इनमे तिर्यञ्चायुका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शनस्त्रीवेद आदिके समान घटित हो जानेसे यह उनके समान कहा है। मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है। तथा इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध यद्यपि अग्निकायिक और वायुकायिक जीयाको छोड़कर सत्र केन्द्रिय जीव करते हैं, पर ऐसे जीवोका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण वन जानेसे यह उक्त प्रमाण कहा है। एक साथ एकेन्द्रिय जीव यदि मनुष्यायुका बन्ध करे तो असंख्यात जीव करेंगे और उस समय यदि इनका क्षेत्रस्पर्शन देखा जाय तो वह लोकके असंख्यात भागप्रमाण ही प्रात होगा, इसलिए तो यह उक्त प्रमाण कहा है और इस तरह यदि अतीत कालीन सब स्पर्शनका योग किया जाय तो वह सर्व लोकगत हो जानेसे उक्त प्रमाण कहा है,यह उक्त कथनका तात्पर्य है। यो तो सब एकेन्द्रिय बादर पर्याप्त जीव उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कर सकते हैं, पर ऐसे जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागसे अधिक नहीं होता हॉ,जो एकेन्द्रिय उपर एकेन्द्रियों में मारणान्तिक समुद्भात करते हैं, उनके भी इन दो कोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है। इसलिए यहाँ इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका त्रस- नाली के कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है। यहाँ शेष प्रकृतियोंमें आतप प्रकृति वचती है सो उसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंफा स्पर्शन क्षेत्रके समान लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है,यह सष्ट ही है। १६ बादर एकेन्द्रिय और उसके पर्याप्त तथा अपर्याप्त जीवोमे एकेन्द्रिय संयुक्त प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण है । स्त्रीवेद, पुरुषवेद, तिर्यञ्चायु, चार जाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग छह संहनन, आतप, दो विहायो- गति, बस, बादर, सुभग, दो स्वर और आदेयका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मनुष्यायु, मनुष्यगति मनुष्य- गत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सव सूक्ष्म जीवोंमे सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी १ ताप्रती 'वाटरपजत्ताण अपजत्ताण' इति पाठ ।
१८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे सन्चपगदीणं उक० अणु० सव्वलो० । णवरि मणुसाउ० उक० अणु० लो० असंखें. सबलो। १७. पुढवि०-आउ०-उ० एडंदियपगदीणं उक्क० लोगस्स असंखें. मब्ब- लोगो । अणु० सव्वलो० । सेसाणं तसपगदीणं आदावं च उक० लोगस्स असंखें। अणु० सव्वलो० । दोआउ० [एइंदिय ] ओघं । एवं यादग्पुढवि०-आउ० तेउ । नादरपुढवि -आउ०-तेउ०पञ्जत्तयाणं एइंदियसंजुत्ताणं उक्क० अणु० सव्यलो० । नस- संजुत्ताणं आदावं च उक्क० अणु० लोगस्स असंखें । एवं बाउकाइयाणं पि । णचरि यम्हि लोगस्स असंखें तम्हि लोगस्स संखेंजदिभागो कादच्यो । विशेषता है कि मनुष्यायुका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके अमंग्या- तवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पशन किया है। विशेषार्थ-बादर एकेन्द्रिय और उनके पर्याप्त व अपर्याप्त जीवाम एफेन्द्रियजाति संयुक्त प्रकृतियोका दो प्रकारका प्रदेशबन्ध मारणान्तिक समुद्भातके समय भी सम्भव है, दमलिग इनके दोनों पदाको अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। इनमें स्त्रीवेट आदिका उत्कृष्ट व अनु- स्कृष्ट प्रदेशबन्ध एकेन्द्रियामै समुदान करनेवाले जीवांके नहीं होता। आतपका होकर भी वह बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकोम समुद्रात करनवाले जीयाके ही होता है और तिर्यश्चायुका मारणान्तिक समुद्रातके समय बन्ध नहीं होता, इसलिए यहाँ इन कमां के दोनों पढवालांका लोकके मन्यात भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा मनुष्यायु और मनुष्यगति आदि तीनका वायुकायिक जीव बन्ध नही करते, इसलिए यहाँ मनुष्यायु आदि चार कमांक दोनो पढवालोका लोकके असल्यात भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। सव सूक्ष्म जीव सर्व लोकम पाये जाते हैं, इसलिए इनमे मनु- प्यायुके बिना सब प्रकृतियोंके दोनो पदयालोका सर्व लोकप्रमाण म्पर्शन कहा है। तथा इनमें मनुष्यायुका बन्ध करनेवाले जीवोका वर्तमान स्पर्शन तो लोकके असल्यातवे भागप्रमाण है,पर अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण बन जानेसे यह वर्तमानकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और अतीतकी अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण कहा है। १७ पृथिवीकायिक, जलकायिक और अग्निकायिक जीवाम एकेन्द्रिय प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असल्यानत्र भागप्रमाण और मर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबाने सर्वलोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेष त्रसप्रकृतियांका और आनपका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असं- ख्यातः भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व- लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। दो आयुओंकी अपेक्षा स्पर्शन सामान्य एकेन्द्रियोंके समान है। इसी प्रकार बादर पृथिवीकायिक, बादर, जलकायिक और वाटर अग्निकायिक जीवोमे जानना चाहिए | वादर पृथिवीकायिक पर्याम, बादर जलकायिक पर्याप और बाहर अग्निकायिक पर्याप्त जीवोमे एकेद्रिय संयुक्त सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा त्रससंयुक्त प्रकृतियोका और आतपका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोन लोकके असंख्यातये भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार वायुकायिक जीवोमे भी जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि जहॉपर लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन कहा है, वहॉपर लोकके संख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन करना चाहिए। १ आ०प्रतौ लोगस्स असखे । अणुः इति पाठः । २ 'तेउ ओघ पद । बाटरपुटवि०' इति पाठ ।
फोसणपरुवणा १६ १८. वणफदि-णियोदेसु एइंदियभंगो। णवरि यम्हि लोगस्स संखेंजदिभागो तम्हि लोगस्स असंखेंजदिभागो कादव्यो । यादरवणप्फदि-बादरणियोदाणं पजत्तापज- ताणं एइंदियपगढ़ीणं उक्क० अणु० सव्वलो० । तससंजुत्ताणं उक्क० अणु० खेत्तभंगो। उञ्जो०-जस० उक्क० अणु० सत्तचों सव्ववादराणं च । बादर० उक्क० खेत्तभंगा । अणु० जसगितिभंगो । चादरचणप्फदिपत्ते वादरपुढविभंगो । विशेषार्थ-पृथिवीकायिक आदि तीनमे भी बादर पर्याप्त जीव उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं, इसलिए इनमे एकेन्द्रिय प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबोका म्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। साथ ही यह बन्ध मारणान्तिक समुद्धानके समय भी सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे सर्व लोकप्रमाण सर्शन भी कहा है। इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करन- वाले जीवोंका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन है,यह स्पष्ट ही है। इनमें आनपसहित शेप प्रकृतियांका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्रात करते समय नहीं होता. इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण कहा है । यद्यपि मातपका एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्रात करते समय उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है,पर ऐसे जीव बादर पृथिवीकायिक पर्याप्तकामे ही मारणान्तिक समुद्धात करते हैं, इसलिए इस अपेक्षासे भी उक्त स्पर्शनके प्राम होनेमे कोई बाधा नहीं आती। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध पृथिवी- कायिक आदि सब करते हैं, इसलिए इनके इस पदवालोका मर्व लोकप्रमाण पर्शन कहा है। दो आयुओकी अपेक्षा जो प्ररूपणा एकेन्द्रियोंमे कर आये हैं वह यहाँ भी बन जाती है, इसलिए इसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। बादर पृथिवीकायिक आदि तीनमे सब प्ररूपणा पृथिवीकायिक आदि तीनके समान घटित हो जाता है, इसलिए इसे उनके समान जाननेकी सूचना की है । बाहर पृथिवीकायिक पर्याम आदि तीनोमे एकेन्द्रियमंयुक्त प्रकृतियोंके दोनो पद मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है. इसलिए इनके दोनो पढाकी अपेक्षा सर्व लोक- प्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा ससंयुक्त और आतपका बन्ध करनेवाले उक्त जीवोका लोकक असंख्यातवे भागसे अधिक स्पर्शन किसी भी अवस्थामै सम्भव नहीं है, इसलिए यह म्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है। वायुकायिक और उनके पर्याप्त व अपर्याप्त जीवोम सब स्पर्शन पृथिर्ग- कायिक और उनके पर्याप्त व अपर्याम जीवोंके समान बन जानसे इसी प्रकार वायुकायिक जीवीक जानना चाहिए,यह कहा है। मात्र उनसे इनमे जितनी विशेषता है उसका अलगसे उल्लेख किया है। २८ बनस्पतिकायिक और निगोद जीवाम एकेन्द्रियोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि जहाँ पर लोकके संख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहा है, वहाँ पर लोकके असख्यातव भागप्रमाण कहना चाहिए । बादर वनम्पतिकायिक और बाहर निगोद तथा इनके पर्याप्त और अपर्चाम जीवोम एकेन्द्रिय प्रकृतियाका उकृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोक प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है ।त्रससंयुक्त प्रकृतियोंका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीयोने त्रसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सब बाइरोमें उद्योत और यश कौतिका भग इसी प्रकार जानना चाहिए। बाहर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवीका म्पर्शन यश कीर्तिके समान है। बादर वनम्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीवाम वाटर पृथिवीकायिक जीवोंके समान भङ्ग है।
२० महावंधे पदेसवंधाहियारे १६. पंचिंदि०-तस०२-पंचमण०-पंचवचि० पंचणाणा० चदुदंसणा-सादा०- चदुसंज०-[ जस०-] पंचंत० उक० बँत्तभंगो । अणु० अट्ठचौँ सव्वलोगो वा । थीण- गिद्धि०३-असादा-मिच्छ०-अणंताणु०४-णस०-पर०-उस्सा-पन्ज०-थिर-सुभ०- णीचा० उक्क० अणु० अट्ठचौं० सव्वलो० । णिहा-पयला-अपच्चरखाण०४-छण्णोक० उक्क० अट्ठचाँदस० । अणु० अडचाँदस० सव्वलो० । पञ्चखाण०४ उक्क० छचौसक अणु० अडचोद्दस० सव्वलो० । इत्थिवे०-चदुसंठा०-पंचसंघ० उक्क० अणु० अट्ठ-बारह । पुरिस०-पंचिंदि०-ओरालि अंगो०-असंपत्त-तस० उक० खेत्तभंगो। अणु० अट्ट- , विशेपार्थ बनस्पतिकायिक और निगोद जीवोमे एकेन्द्रियोंके समान भङ्ग है,यह स्पष्ट ही है । मात्र एकेन्द्रियोंमे वायुकायिक जीव भी आ जाते है जो कि इनसे अलग कायवाले इसलिए एकेन्द्रियोमे जहाँ लोकके संख्यातः भागप्रमाण स्पर्शन कहा है वहीं इन जीवोमे लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन जाननेकी सूचना की है । बादर वनस्पतिकायिक और बादर निगोद तथा इनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवाम मारणान्तिक समुद्धातके समय भी एकेन्द्रिय प्रकृतियोका बन्ध सम्भव होनेसे इनके दोनो पदाकी अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। ये जीव त्रस प्रकृतियांका बन्ध करते समय एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात नहीं करते, इसलिए इन प्रकृतियो- का उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण म्पर्शन कहा है। अब रहीं उद्योत, यश कीर्ति और बादर ये तीन प्रकृतियाँ सो इनके दोनों प्रकारके स्पर्शनका पहले अनेक बार खुलासा कर आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए । इनमेसे उद्योत और यश कीर्ति इन दो प्रकृतियोका अन्य सत्र बादरोमे यह स्पर्शन घटित हो जाता है, इसलिए उसे अन्तमे इनके समान जाननेकी सूचना को है । वाइर प्रत्येकवनस्पत्तिकायिक जावोका भन बादर पृथिवीकायिक जीवोंके समान है, यह स्पष्ट ही है। १६ पञ्चेन्द्रियद्विक, सद्विक, पाँच मनोयोगी और पॉच वचनयोगी जीवाम पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संज्वलन, यश-कीर्ति और पाँच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने मनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्यानगृद्धित्रिक, असातावेदनीय, मिथ्यात्र, अनन्ता- नुवन्धी चतुष्क, नपुंसकवेद, परघात, उच्छास, पर्याप्त, स्थिर, शुभ और नीचगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीक कुल कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । निद्रा, प्रचला, अप्रत्याख्याना- वरणचतुष्क और छह नाकपायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीयोन सनालोके कुछ कम आठ बंट चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोन असनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। प्रत्यास्यानावरण चतुष्कका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन वसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, चार संस्थान और पॉच संहननका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन सनालोके छ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पुरुषवेद, पञ्चेद्रियजाति, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, असम्प्रामामृपाटिकासंहनन और उसका १ ना० आ० प्रत्या: 'उक अटचाइस सवलो' रति पाठ । , , , फोसणपरुवणा २१ बारह० । दोआउ०-तिण्णिजादि-आहारदुर्ग उक्क० अणु० खैत्तभंगो । दोआउ०-आदाव. उक्क० अणु० अट्ठचौदस० । दोगदि-दोआणु० उक० अणु० छच्चों स० । तिरिक्ख०- एइंदि०-ओरालि०-तेजा०-क० हुँड०-वण्ण४-तिरिक्खाणु०-अगु०-उप०-थावर-पत्ते- अथिर-असुभ-दूभग-अणादें-अजस-णिमि० उक० लोगस्स असंखें सव्वलो० । अणु० अट्ठ० सव्वलो । मणुस०-मणुसाणु०-तिस्थ० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० अडचों । एवं उच्चा० । वेउचि०-वेउवि०अंगो० [ उक० ] अणु० बारह० । समचदु०-दोविहा०- सुभग-दोसर-आदें० उ० छच्चों । अणु० अट्ठ-बारह । उजो०-यादर० उक्क० अट्ठ- णवचौस० । अणु० अट्ठ-तेरह० । णवरि बादर० उक्क० खेत्तभंगो । [ सुहुम०-अपज०- साधार० पंचिंदियतिरिक्खपजत्तभंगो । ] एवं चक्खु०-सण्णि त्ति । कायजोगि० ओघं । उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीर्याने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है । दो आयु, तीन जाति और आहारकद्विकका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कग्नवाले जीबोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। दो आयु और आतपका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करन- वाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो गनि और दो आनुपूर्वीका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तियश्चगति, एकेन्द्रियजाति, आदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, स्थावर, प्रत्येक, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादय, अयश कीर्ति और निर्माणका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनवाले जीवोने लोकके असत्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालोके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इसी प्रकार उच्चगोत्रके दोनो पढोका बन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन जानना चाहिए । वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिक शरीर आङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट और अनुकृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम बारह बंट चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। समचतुरस- सम्यान, दो विहायोगति, सुभग, दो स्वर और आईयके उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने असनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन बसनाली के कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भाग- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उद्योत और बादरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवान असनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ घंटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन बसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चाढ़ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इतनी विशेषता है कि बादर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च पर्याप्तकोके समान है । इसी प्रकार चक्षुदर्शनवाल और संनी जीवाम जानना चाहिए । तथा काययोगी जीवाम ओधके समान भङ्ग है। १ ता० प्रती 'मणुस मणुपु (१) तिथ०' आप्रतो 'मणुस० मणपन. तिस्था' इति पाठ। २ ता० प्रतो आ० उ० (दे) छच्चा०' आता 'आटे बच्चो०' इति पार ।
महाबंधे पटेसवंधाहियारे विशेपार्थ-पञ्चेद्रिय आदि मार्गणाओमे पांच नानावणाटिका उत्कृष्ट प्रशबन्ध करने घालं जीवाने लोकके असंख्यातवं भागप्रमाण क्षेत्रका ही स्पर्शन किया है। इनका क्षेत्र भी इतना ही है. इसलिए यह स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। तथा विहारवत्वम्थान और मारणान्तिकर्क समय भी इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशांका बन्ध करनेवाले जीयोका असनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। त्यानगृद्धि तीन आदि प्रतियोके दोनो पढोका स्पर्शन ज्ञानावरणादिके अनुत्कृष्ट पढके समान घटित हो जानसे वह भी सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोक प्रमाण कहा है । निद्रा आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध देवोंके बिहारवल्यम्थानके समय भी सम्भव है। इस लिए इनका टस पढकी अपेक्षा मनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण म्पर्शन कहा है। निद्रादिकके अनुत्कृष्टके समान प्रत्यारयानावरण चतुष्क और तिर्यञ्चगति आदि इक्कीस प्रकृ. तियोंके अनुत्कृष्ट प्रदेशाका बन्ध करनेवाले जीयोका भी उक्त प्रमाण स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए । कोई विशेषता न होनेसे वहा इस स्पर्शनका हम अलगसे स्पष्टीकरण नहीं करेंगे ।अन्युत कल्प तकके देवोमे मारणान्तिक समुद्रात करनेवाले जीव भी प्रत्यारयानावग्ण चतुष्कका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं, इसलिए यह पर्शन सनालोके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । देवोके बिहारवत्वस्थानके समय और सासादनसम्यग्दष्टियोंके मारणान्तिक समुद्रातके समय भी स्त्रीवेद आदि दस प्रकृतियोके दोनो पढोका बन्ध सम्भव है, इसलिए यह स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। पुरुपवेदका अनिवृत्तिकरणम और पञ्चन्द्रियजाति आदि पच्चीस नाम प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला दो गतिका जीय उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है, इसलिए इनका स्पर्शन लोकके असंख्यातये भागप्रमाण प्राप्त होनेसे क्षेत्रक समान कहा है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन जो सनालीके युद्ध कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाग कहा है सो यह वीवेट आदिका पर्शन घटित करके बतला आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए। दो आयु आदि सात प्रकृतियोंके दोनो पदीका वध करनेवाले जीवांका पर्शन क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है । तिर्य- ब्वायु, मनुष्यायु और आतपके दोनो पढोका बन्ध देवोंमें विहारवत्स्वस्थानके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका स्पर्शन वसनालीके कुछ कम आठ घटे चौदह भागप्रमाण कहा है। नारकिया और देवोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी दो गति और दो आनुपूर्वांके दानो पद सम्भव हैं, इसलिए इनके दोनो पढवालोका स्पर्शन असनालोके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । एकेन्द्रियोमै मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी तिर्यश्चगति आदिका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध सम्भव है, इसलिए इन प्रकृतियोंके उक्त पदवालोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण कहा है । मनुष्यगतिद्विक और तीर्थकरप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका स्पर्शन स्वामित्वको देखते हुए लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रक समान कहा है । तथा देवोके स्वस्थानविहारके समय भी इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है। उच्च- गोत्रके दोनो पढ़वालोका सर्शन मनुष्यगति आदिके समान ही बन जानेसे वह उस प्रकार कहा है । नारकियों और देवोमे मारणान्तिक समुद्धात करनेवाले जीवोके भी वैक्रियिकद्विकके दोनों पद सम्भव हैं, इसलिए इस अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम वारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । समचतुरस्रसंस्थान आदिका देवोमे मारणान्तिक समुद्रात करते समय और अप्रशस्त विहायोगति तथा दुस्वरका नारकियोमे मारणान्तिक समुद्रात करते समय उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण म्पर्शन कहा है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध देवोमै बिहारवत्स्वस्थानके समय और सासादन जीबोके २३ । फोसणपरूवणा २०. ओरालि० पंचणाणावरणदंडओ ओवं । थीणगिद्धि०३-असादा०-मिच्छ०- अणंताणु०४–णस० उक्क० लोगस्स असंखें सव्वलो० । अणु० सव्वलो। णिद्दा- पयला-अपञ्चक्खाण०४-छण्णोक० उक्क० छच्चौँ । अणु० सवलो० । एवं पञ्चक्खाण०४- [ समचदु०-सुभग-दोसर-आर्दै॰] । इथि उक्क० दिवड्डचौस० । अणु० सव्वलो० । पुरिस-तिरिक्खाउ०-मणुस०-चदुजादि-चदुसंठा०-ओरालि अंगो०-छस्संघ०-मणुसाणु०- आदाव०-दोविहा०-तस-बादर० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० सव्वलो । दोगदि-दोआणु० उक० अणु० छच्चों । तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरालि०-तेजा०-क०-हुंड०-यण्ण० ४-तिरि- मारणान्तिक समुद्घातके समय भी सम्भव होनेसे इस अपेक्षासे सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। देवाके विहारवत्स्वस्थानके समय और देवांके केन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे त्रसनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण म्पशन कहा है । तथा देवोंके विहारवत्स्वस्थानके समय और वैक्रियिककाययोगी जीवोके मार- णान्तिक समुद्रातके समय इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। बादर- प्रकृतिका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन उद्योतके अनुत्कृष्टके समान ही घटित कर लेना चाहिए । तथा इसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है, यह म्पष्ट ही है। सूक्ष्म आदिका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोंके समान है, यह भी स्पष्ट है। चक्षुदर्शनवाले और संज्ञी जीवोमे उक्त प्रकारसे स्पर्शन घटित हो जानेसे वह उक्त प्रमाण कहा है। तथा काययोग एकेन्द्रियादि सब जीवोंके सम्भव होनेसे इसमे ओघप्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, अतः ओघके समान जाननेकी सूचना की है। २० औदारिककाययोगी जीवोमें पॉच ज्ञानावरणदण्डकका भङ्ग ओघके समान है । स्त्यान- गृद्धित्रिक, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क और नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । निद्रा, प्रचला, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और छह नोकषायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करने- वाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरण चतुष्क, समचतुरस्त्रसंस्थान, सुभग, दो स्वर और आदेयकी अपेक्षा स्पशन जानना चाहिए। स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने असनालीके कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पुरुपवेद, तिर्यश्चायु, मनुष्य- गति, चार जाति, चार संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्य- गत्यानुपूर्वी, आतप, दो विहायोगति, बस और बादरका उत्कृष्ट प्रदेशचन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो गति और दो आनुपूर्वीका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालोके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तियश्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, वैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुप्क, तिर्यश्च- १ ता०या० प्रत्यो 'पञ्चक्खाण. ४ इत्यिः' इति पाठः।
२४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे क्खाणु०-अगु०४-थावर-सुहुम-पजत्तापञ्जत्त-पत्ते०-साधार०-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग अणार्दै -अजस०-णिमि०-णीचा० उक० लोगरस असंखें० सव्वलो० । अणु० सव्वलो। [ वेउब्धि०-बेउन्यि अंगो० उक्क० अणु० वारहचॉइस 1 ] तिण्णिआउ० तिरिक्खोघं । आहारदुगं तित्थ० खेत्तभंगो । उजो० उक्क० सत्तचौदस० । अणु० सब्बलो० । जस० पुरिसभंगो। गत्यानुपूर्वी, अगुमलघुचतुष्क, स्थावर. सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनाडेय, अयश कीर्ति, निर्माण और नीचगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशगन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । वैक्रियिकशरीर और बैंक्रियिक आङ्गोपाङ्गके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीन आयुओका भङ्ग सामान्य तिर्यश्चोके समान है। आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग क्षेत्रके समान है। उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। यश कीर्तिका भङ्ग पुरुपवेदके समान है। विशेषार्थ-~-पोंच ज्ञानावरणादिके दोनो पढवालोका सर्शन ओघके समान यहाँ घटित हो जानेमे वह ओघके समान कहा है। स्त्यानगृद्धि तीन आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव स्वस्थानके समान मारणान्तिक समुद्रातके समय भी उसका वध करते हैं, इसलिए इस अपेक्षासे लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा औदारिककाययोगका स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण होनेसे इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका उक्त प्रमाण स्पर्शन कहा है। ऊपर आनतकल्प तकके देवोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी निद्रा आदि बारह प्रकृत्तियोंका और चार प्रत्याख्यानावरणका दोनो प्रकारका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके दोनो पदीका सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । देवियोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इसके इस पदवाले जीवोका सनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा एकेन्द्रियादि सब जीव इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध कर सकते हैं, अत. इसके इस पदवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है । आगे भी जिन प्रकृतियांके अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका यह स्पर्शन कहा हो, वह इसी प्रकार जानना चाहिए । यहाँ पुरुषवेद आदिके उत्कृष्ट प्रदेशोका बन्ध करनेवाले जीवोंके स्वामित्वको देखते हुए इस अपेक्षासे स्पर्शन क्षेत्रके समान लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण प्राप्त होता है, इसलिए यह क्षेत्रके समान कहा है। दो गति और दो आनुपूर्वीके दोनो पदवालोका त्रसनालीके छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शनका पहले अनेक चार स्पष्टीकरण कर आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए। और इसे दूना कर देनेपर वैक्रियिकद्विककी अपेक्षा दोनो पढ़वालोंका स्पर्शन हो जाता है। स्वस्थानके समान एकेन्द्रियामें मारणान्तिक समुद्धातके समय भी तिर्यञ्चगति आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव है, अत इनके उत्कृष्ट पदवालाका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है। तीन आयुका भग सामान्य तिर्यञ्चोके समान और आहारकद्विक व तीर्थङ्कर प्रकृतिका भग क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है। ऊपर वादर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इसके इस पदवालोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम सात वटे १ आ०प्रती 'उनी० सत्तचोइस०' इति पाठः ।
फोसणधरूवणा २५ . २१. ओरालियमि० पंचणा०-धीणगिद्धि०३-सादासाद-मिच्छ अर्णताणु०४- णस०-तिरिक्ख०-एइंदि० -तिण्णिसरीर-हुंड० वण्ण०४-तिरिक्खाणु० - अगु०४-- थावर-सुहुम- पञ्जत्तापअत्त-पत्ते-साधार०-विराथिर-मुभासुभ-दभग-अणाटे अगम- णिमि०-णीचा०-पंचंत० उक्क० लोगस्स असंखे० । अणु० सबलो० । सेमा ३० अणु० खेत्तभंगो। २२. वेउत्रियका० पंचणा०-थीणगिद्धि०३-दोवेद०-मिच्छ -अणता गु० ४-णQस०--णीचा०-पंचंत० उ० अणु० अट्ट-तेरह० । छदंस०-चारसक०-छण्णोक० उक्क० अठ्ठचो० । अणु० अट्ट-तेरह० । इन्धि०-पुरिस०-पंचिंदि०-पंचसंटा०-ओगलि. अंगो०-छस्संघ०-दोविहा०-नस-सुभग-दोसर-आदे० उक्क० अणु० अट्ठ-बारह । णवरि पुरिस० उक्क० अट्ठ। दोआउ०-मणुस ०-मणुसाणु०-आढाव-तित्थ०-उच्चा० चौदह भागप्रमाण कहा है। पुरुपवेदकी अपेक्षा जास्पर्शन कहा है उसी प्रकार यश कीर्तिकी अपेक्षा भी पर्शन बन जाता है. इसलिए इसका भङ्ग पुरुपवेदके समान कहा है। २१. औदरिकमिश्रकाययोगी जीवाम पाँच जानावरण, म्त्यानगुद्धित्रिक, मानानंदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, निर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजानि, तीन शरीर, हुण्डमस्थान, वर्णचतुष्क, तियश्चगल्यानुपर्ची, अगुमलधुचनुष्क, स्थावर, सक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, माधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय. अयश कीति, निर्माण, नीचगोत्र और पांच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असख्यात भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवान मर्यलोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेष प्रकृतियाका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेपार्थ-पॉच ज्ञानावग्णादिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध शरीरपर्याप्ति पूर्ण होनेके एक समय पूर्व करते हैं, इसलिए उनके इस पदवालीका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण म्पर्शन कहा है। नथा औदारिकमिश्रकाययोगका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन होनेसे इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशवालोका उक्त प्रमाण म्पर्शन कहा है । शेप प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध तो शरीरपर्याप्ति पूर्ण होनेके एक समय पूर्व संज्ञी पश्चेन्द्रिय जीव ही करते है, इमलिए इनके इस पडवाले जीवोका पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण होनसे वह क्षेत्रके समान कहा है और इनके अनुत्कृष्ट प्रशवाले जीवांका जिसका जो क्षेत्र कह आये हैं वह यहा स्पर्शन घटित हो जानेसे वह भी क्षेत्रके समान - कहा है। २२ वैक्रियिककाययोगी जीवाम पांच ज्ञानावरण, स्त्यानगुद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यान्य, अनन्तानुवन्धीचतुष्क, नपुसकवेद, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवाने असनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह यटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। छह दर्शनावरण, बारह कपाय और छह नोकपायका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करने- वाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोनेत्रमनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नेरह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेद, पुरुपवेद, पञ्चेन्द्रियजाति, पाँच सस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह सहनन, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर और आदेयके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध महावंचे पट्टेसबंधाहियारे उक्क० अणु० अहचाँदस० | तिरिक्व०-तिण्णिसरीर-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०- अगु०४-उजो०-यादर-पजत्त-पत्ते-थिरादितिण्णियु०-दूभग-अणा-णिमि० उक्क० अट्ठ-णव० | अणु० अट्ठ-तेरह० । एइंदि०-थावर० उक्क० अणु० अट्ठ-णव० । २३. वेउन्वियमि-आहार-आहारमि०-अवगदवे०-मणपज०-संजद-सामाइ०- छेदो०-परिहार०-सुहुमसंप० उक्क० अणु० खेत्तमंगो । २४. कम्मइ० पंचणाणा०-धीणगिद्धि०३-दोवेद-मिच्छ०-अणंताणु०४- णबुंस०-णीचा०-पंचंत० उक्क० बारह । णवरि मिच्छ०पगदीणं उक्क० ऍक्कारह० । करनेवाले जीवोंने बसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, तीर्थङ्कर और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने बसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तिर्यञ्चगति, तीन शरीर, हुण्डमंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्च- गत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, उद्योत, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर आदि तीन युगल, दुर्भग, अनादय ओर निर्माणका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांने त्रसनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । एकेन्द्रियजाति और स्थावरके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशोका बन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-क्रियिककाययोगम विहारवत्स्वस्थानको अपेक्षा सनालीके कुछ कम चौदह भागप्रमाण म्पर्शन है । मारणान्तिक समुद्रातकी अपेक्षा त्रसनालोके कुछ कम तेरह वटे चौदह भाग प्रमाण म्पर्शन है। एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्धात करनेपर त्रसनाली के कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण म्पर्शन है । तथा नारकियाका तिर्यञ्ची और मनुष्योमें व देवोका तिर्यश्चों और मनुष्योमे मारणान्तिक समुद्भात करनेपर मिलाकर त्रसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन है, इसलिए यहाँ जिन प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका जो स्पर्शन कहा है, वह पूर्वोक्त म्पर्शनको देखकर अपने-अपने स्वामित्वके अनुसार घटित कर लेना चाहिए । अन्य विशेषता न होनेसे यहाँ हमने उसे अलग-अलग घटित करके नहीं बनलाया है। २३. वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, अपगतवेदवाले, मनःपर्ययज्ञानी, सयत, सामायिकसंयन, छेदोपस्थापनामयत, परिहारविशुद्धिसंयत और सूक्ष्म- माम्परायसंयत जीवामे अपनी-अपनी प्रकृतियांका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबोका म्पशन क्षेत्रके समान है। विशेपार्थ-इन सब मार्गणाआमे अपना-अपना स्पर्शन लोकके असख्यातवे भागप्रमाण ही है, इसलिए यहाँ अपनी-अपनी प्रकृतियोंके दोनो पढवालीका स्पर्शन उक्तप्रमाण प्राप्त होनेसे क्षेत्रके समान कहा है, क्योंकि यहाँ क्षेत्र भी इतना ही है। २४, कार्मणकाययोगी जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, नीचगोत्र और पाँच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करने- वाले जीबीने त्रसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्व प्रकृतियांका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले लीवोंने बसनालीके कुछ कम , - . , फोसणपत्रणा अणु० सव्वलो० । छस०-चारसक० सत्तणोक-उच्चा० उक्क० छचौँ । अणु० सव्वलो० । इत्थि०-चदुसंठा०-पंचसंघ०-अप्पसत्थ०-दुस्सर० उक्क० बारह ! अणु० सब्बलो । दोगदि-पंचजादि-तिण्णिसरीर-हुंड०-औरालि अंगो०-असंप०-यण्ण०४- दोआणु०-अगु०-उप०-] तस-थ्वरादिसत्त-अथिगदिपंच-णिमि० उक्क० बँत्तभंगो । अणु० सबलो० । देवगदिपंचग० उक्क० अणु० खेत्तभंगो । समचदु०-पसत्थ० सुभग- मुस्सर-आदे० उक्क० छचों 1 अणु० सवलो० । पर०-उस्सा०-पज०-थिर-सुभ- जस० उक्क० छचौह० । अणु० सब्बलो० । एवं आदाउजो० । ग्यारह बंद चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका न्यर्शन क्यिा है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करने- वाले जीवोने सर्व लोकप्रमाग क्षेत्रका म्पर्शन किया है। वह दर्शनावग्ण बारह कयाय; सात नोकपाय और उमगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन सनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागमाग क्षेत्रका पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीयोने सर्वलोकनमाण क्षेत्रका पर्शन किया है ।न्त्रीवेद चार मन्थान. पोच मंहनन· अप्रशन्त विहायो- गति और दुत्वरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने मनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण- क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो गति. पॉच जाति. तीन शरीर, हुण्डसंन्धान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग.असन्माप्रानृपाटिका संहनन. वर्गचतुष्क, दो आनुपूर्वी. अगुल्लवु, उपघात, बस और स्थावर आदि सान. अन्थिर आदि पॉच और निर्माणका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीगेका न्यर्शन क्षेत्र के समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोक- प्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। देवगतिपञ्चकका उकृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका म्पर्शन क्षेत्रके समान है। समचनुरखमंन्धान, प्रशन्त विहायोगति. सुभग, सुन्दर और आइयका उत्कृष्ट प्रशवन्ध करनेवाले जीवाने बसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन क्यिा है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदशवन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाग क्षेत्रका सर्शन किया है। परघात. उच्छान. पर्याप्र. धिर. शुभ और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेगले जीवाने बसनालीक कुछ कम नह बडे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार आतप और उद्योनके दोनो पढ़वाले जीवोंका म्पर्शन जानना चाहिए। विशेणर्थ यहाँ जिन प्रकृतियोंके अनुकृष्ट प्रशवन्धवाले जीवीका सर्व लोकप्रमाण सर्शन कहा है वह कार्मग काययोगके उक्त प्रमाण पर्शनको देखकर घटित कर लेना चाहिए। शेप सष्टीकरण इस प्रकार है-चाग गतिक कार्मणकाययोगी मंत्री जीव पाँच ज्ञानावरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कर सकते हैं। यतः इन जीवोका पर्शन नीचे छह और उपर छह इस प्रकार कुल कुछकन बारह गजूप्रमाण प्राम होता है. अत' यहाँ यह न्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम वारह घंटे चौदह भागप्रमाण कहा है। मात्र जो मिथ्यावष्टि जीवन्त्यानगृद्वित्रिक मिथ्यात्व, अनन्तानु- बन्धीचनुष्क नपुंसकवेद और नीचगोत्रका ज्कृष्ट प्रदेशवन्य करते हैं, उनका उपर कुछ कम पाच राजूप्रमाग ही स्पर्शन वन नकता है. क्योंकि न तो ऐसे जीव आनतादिकर्म उत्पन्न होते है और न आनतादिकसे आकर मनुष्वगतिमे ही उत्पन्न होते हैं। अत यहाँ मिथ्यात्व सम्बन्धी प्रकृ. नियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका पर्शन मनालोके कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागतनाग कहा है। यह दर्शनावरण आदिका मन्यन्त्रष्टि कार्मणकायोगी ही उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं और से जीवोका पर्शन सनाली के कुछ कम बह वटे चौदह भागप्रमाण होता है, २८ - महायंधे पदेसबंधाहियारे २५. इत्थिवेदेसु पंचणा०-थीणगिद्धि०३-ढोवेद-मिच्छ०-अणंताणु०४- णस०-णीचा०-पंचंत० उक्क० अणु० अट्ठ० सव्वलो । णिहा-पयला-अपचक्याण०४- छण्णोक० उक्क० अट्ठ० । अणु० अट्ठ० सव्वलो० । चदंसणा-चदुसंन० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० अढचों सञ्चलो० । पच्चक्खाण०४ उक्क छनौ । अणु० अढ० सब्बलो० । इत्थिं ०-दोआउ०-चदुसंठा०-पंचमंघ-आढावुजो० उक्क ० अणु० अट्ठ । पुरिस-मणुस०-ओरालि अंगो०-असंप०-मणुसाणु० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० अट्ठचौं । दोआउ०-तिण्णिजादि-आहारदुग-तित्थ० खेत्तभंगो दोगदि-दोआणु० उक्क० अत. यह स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है। प्रीवेद आदिके उत्कृष्ट प्रदेशवन्धवाले जीवोका जमनालीक कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण म्पर्शन अपने-अपने स्वामित्वको जानकर पाँच नाना- वरणादिके उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवालोके समान ही घटित कर लेना चाहिए। दो गति आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जा क्षेत्र कहा है वहीं यहां पर स्पर्शन प्रात है, इसलिए यह म्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। यहाँ देवगनिपञ्चकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्यग्दृष्टि जीव ही करते हैं, इसलिए उनके दोना पटवाले जीवोका भग क्षेत्रक समान कहा है, क्योंकि इन जीवाका लोकके अमंग्यानयं भागसे अधिक म्पर्शन नही प्रान होता। सुभगादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीत्र ऊपर सनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन करते हैं, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है। इसी प्रकार परयात आदि प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन अपने स्वामित्वके अनुसार सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण घटित कर लेना चाहिए। २५. स्त्रीवेढवाले जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, म्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धीचतुष्क, नपुंसकवेट, नीचगोत्र और पॉच अन्तगयका उत्कृष्ट और अनुस्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रमनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । निद्रा, प्रचला, अप्रत्याख्यानावग्ण चतुष्क और छह नोकपायके उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जीबीने त्रसनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। चार दर्शनावरण और चार संव- लनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करने वाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। प्रत्याख्यानावरण चतुष्कका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जाबीन बसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, दो आयु, चार संस्थान, पाँच संहनन, आतप और उद्योतका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । पुरुपवेद, मनुष्यगति, औदारिकशरीर आङ्गोपाल, असम्प्रामासृपाटिका संहनन, और मनुष्य- गत्यानुपूर्वीका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने असनालीके कुछ कम आठ वटं चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । दो आयु, तीन जाति, आहारकद्विक ओर तीर्थङ्कर प्रकृतिके दोनो पदवालोका पर्शन १ ता० प्रतौ 'मिच्छ० मिच्छ० (१) अणताणु० णषु ' इति पाठ.1 २ आ प्रतो 'अह । इत्यिः' इति पाठः । ३ आ० प्रती 'आदाउजो० उक्क०' इति पाठ. । - फोसणपरूवणा अणु० छच्चों । तिरिक्व०-एइंदि०-ओगलि-तंजा०-क०-९ड ०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु- अगु०-उप०-थावर-पत्ते०-अथिर-अमुभ-दृभग-अणादें-अजस-णिमि० उक्क० लांगस्स असंखें सव्वलो० । अणु० अह. सबलो० । पंचिंदि०-तस० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० अह-बारह 1 [वेउब्धि०-घेउवि०अगो० उ० अणु० बारहचॉट्स०] समचदु०- टोविहा०-सुभग-दोसर-आर्दै उक्क० छ० । अणु० अट्ठचौ । पर०-उस्सा०-पज्ज०- थिर-सुभ० उक० अणु० अट्ठचौ० सव्वलो० । उज्जो० उक्क० अणु० अट्ठ-पत्र पादर. उक्क० खेत्तभंगो । अणु० अट्ठ-तेरह । सुहम-अपज्ज. साधार० उक्क० अणु० लोगग्स असंखें सन्चलो । जस० उक्क० ओघं । अणु० अट्ठ-णवचाँदस० । एवं पुरिसदे वि । णवरि तित्थ० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० जहचों । क्षेत्रके समान है। दो गति और दो आनुपूर्वीका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवान वसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तियश्चगति, एकेन्द्रिय- जाति, औदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसम्धान, वर्णचतुष्क, निर्यञ्चगत्यानुपर्यो, अगुरुलघु, उपघात, स्थावर, प्रत्येक, अग्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादय, अयश कीनि और निर्माणका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जीवाने लोकके असल्यातव भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रमनाली- के कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। पझेन्द्रिय- जाति और उसका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बंटे चौदह भाग- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिक्रशरीर और त्रैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गक उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवच करनेवाले जोवाने त्रसनालीके कुछ कम बारह बंटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । समचतुरबसस्थान, दो विहायोगति, सुभग, दो स्वर और आदेयका उत्कृष्ट प्रदशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह बटेचौदह भागप्रमाण चेत्रका म्पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवान बसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। परघात, उच्छास, पर्यात, स्थिर और शुभका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जीवाने त्रसनालीक कुछ कम आठ बंट चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण सूत्रका म्पशन किया है । उद्योनका उत्कृष्ट और अनुस्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाल जीवाने त्रसनालीक फुल कम आठ और कुछ कम नौ वटै चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । वाटरका उत्कृष्ट प्रदेशवच कग्नवाले जीवोका म्पर्शन क्षत्रके समान है । तथा अनुस्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाल जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह वर्ट चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदशवन्ध करनेवालं जीवान लोकके असंख्यातत्र भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। यश कीतिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीबोका भङ्ग ओषके समान है । नथा इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाल जीवोन सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटं चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार पुरुपबेदी जीवाम भी जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें तीकर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्राण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-लीवैदियोंमे जहाँ सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन १. ता. प्रतो ० ० लेत्तमगा दति पाट ।
३० महाबंधे पडेसंबंधाहियारे २६. णपुंसगे० पंचणा-थीणगिनि०३-दावेद०-मिन्छ०-अणनाणु०४- का है वहां देवोंके स्वस्थान विहारको मुग्यतासे जानना चाहिए | अन्य पर्शन उसीम गर्भिन हो जाता है । जहाँ सर्व लोकप्रमाण म्पर्शन काटा है वहाँ एफेन्द्रियोम मारणान्निक ममुद्रान कगकर यह प्रान किया गया है। कहीं उपपाटपनकी अपना भी यह पर्यन प्रामकता है मा विचार कर लगा लेना चाहिए । जहा पूर्वोक्त दोनों प्रकारका म्पर्शन कला है, वो इन दोनों विवनाको ध्यान रखकर यह ले आना चाहिए । मनाली र रुम छर बंट चांदर भागप्रमाण म्पर्शन देवोंमे और नागकियोम माग्णान्तिक. मगुद्वान कगनगे प्राम होता है मो स्वामित्वको देखकर जहाँ जो सम्भव हो यहाँ वा टित कर लेना चाहिए । गुरुपयेट आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका मौन लोरर अमन्यात भागप्रमाण कहनेका कारण यह है कि पुरपवेदका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध नी अनितिकरणम हावा है नथा मनुवान आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध नामकर्मको पन्चीम प्रनिगांका वध करनवाले मनी मियाट्रि निर्यच और मनुष्य गनिके जीव करते हैं। दो आयु आदि आठ प्रकृनियों दोनों पदयालोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है,यह पहले अनेक बार स्पष्ट कर आये है । निर्यप्रगति आदि काम प्रहतियांका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध नामकर्मकी नेईस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाले दो गतिके मनी गियाष्टि जीव म्यग्थानमं और एकन्द्रियाम माग्णाग्निक समुद्रातके समय इन दाना भयायाम करने है. उमाला उनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीयोका लोक अमन्यातय भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। पञ्चन्द्रियजानि और उसके उत्कृष्ट प्रशियन्धका स्वामी मनुष्यगतिक ती ममान है, लिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कनियाल जीवोका स्पर्शन लोकं अमन्यानयं भागप्रमाण कहा है। तथा इन दोनो प्रकृतियाका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्य देयोंके बिहारवल्यम्थानके समय आर नाकियो व देवाम मारणान्तिक समुद्रात करने समय भी सम्भव है. इसलिए उनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीयाका पर्शन बमनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बंटे चौदा भागप्रमाण कहा है । नारकियो और देवाम मारणान्तिक ममुगान करते गमय नियिकद्धिक होना पद सम्भव है, इसलिाग टनके दोना पदयालोका सनाली कुछ कम बारह बंट चांदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। देयोम मारणान्निक समुद्रात करते समय भी मनुष्य और नियंत्र समचतुरनसंम्वान आदिका और नाकियाम मारणान्तिक समुद्रात करते समय अप्रशस्त विहायोगति और द स्वरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए उनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जीवांका सनालीके कुछ कम छह बटे चीनह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। सूक्ष्म आदि तीन प्रकृतियोका दोनों प्रकारका प्रदेशबन्ध तियञ्च और मनुष्योंके स्वस्थानम व एकेन्द्रियाम माग्णान्तिक समुद्रातके समय सम्भव है, टसलिए इनके दोनो पदयालोका लोक असल्यान भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्रीवेदियोम शेप जिस स्पर्शनका यहाँ स्पष्टीकरण नहीं किया है उसका पहले अनेकवार स्पष्टीकरण कर आये हैं, इसलिए उसे वहाँसे जान लेना चाहिए | यश कीनिके उत्कृष्ट पदवालोका म्पर्शन ओषक समान है यह स्पष्ट ही है । तथा देवियोंक विहारके समय और एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्रातके समय भी इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इसके इस पदवाले जीवोका त्रसनालीफे कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। पुरुपवेदी जीयामे यह स्पर्शन अविकल घटित हो जाता है इसलिए उनमें स्त्रीवेदी जीवोंके समान जाननेकी सूचना की है । मान देवोम तीर्थकर प्रकृनिका भी बन्ध होता है, इसलिए पुरुपवेदियोमे इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवालोका स्पर्शन त्रसनाली कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण वन जानेसे इसकी अलगसे सूचना की है। २६ नपुमकवेदी जीवामे पॉच ज्ञानावरण, म्त्यानगृद्भित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, तिर्यञ्चगति मयुक्त प्रकृतियों, नीचगांत्र और पाँच अन्तरायका उत्कृष्ट , फोसणपरूषणा ३१ तिरिक्खगदिसंजुत्ताणं [णीचा०-पंचंत०] उक० लोगस्स असंखें. सब्बलो० । अणु० सव्वलो। णिद्दा-पयला-अट्ठक०-सत्तणोक०-पंचसंठा०-पंचसंघ०-दोविहा०-सुभग- दोसर-आदें०-उचा० उक० छ । अणु० सव्वलो० । चदुदंस०-चदुसंज०-पुरिस० उक्क० खैत्तभंगो । अणु० सव्वलो० । दोआउ०] वेउन्चियछक्कं आहारदुगं ओधं । [तिरिक्खाउ०-मणुसाउ०-सुहम-अपज्ज०-साधा० तिरिक्खोधं । ] मणुस०-चदुजादि- ओरालि अंगो०-असंपत्त०-मणुसाणु०-आदाव०-जस० उक्क० खेत्तभंगो । अणु० सव्वलो० । [पर०-उस्सा०-पज्ज-थिर-सुभ० उक्क० लोग० असंखें सन्चलो । अणु० सव्वलो०] उज्जो० उक० सत्तचौँ । अणु० सब्बलो० । [तित्थ० खेत्तभंगो।] कोधादि०४ ओघं। , प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। निद्रा, प्रचला, आठ कपाय, सात नोकपाय, पॉच संस्थान, पॉच संहनन, दो विहा- योगति, सुभग, दोस्वर, आदेय और उन्नगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । चार दर्शनावरण. चार संचलन और पुरुष- वेदका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेश- वन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु, वैक्रियिकपटक और आहारकद्विकका भन ओघके समान है । तिर्यश्चायु, मनुष्यायु, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका भग सामान्य तिर्यचौके समान है । मनुष्यगति, चार जाति, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, असम्प्रा- मासपाटिकासंहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप और यशकीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोक- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। परघात, उच्छास, पर्याप्त, स्थिर और शुभका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अनुस्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग क्षेत्रके समान है। क्रोधादि चार कपायवाले जीवाम ओघके समान भङ्ग है। विशेपार्थ-पाँच ज्ञानावरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध संनी जीव स्वस्थानमे तो करते ही हैं,पर एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी उनके वह सम्भव है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सब जीवोंके सम्भव है, अत. यह स्पर्शन सर्व लोक- प्रमाण कहा है। आगे भी जिन प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जीवोका यह स्पर्शन कहा है.वह इसी प्रकार जानना चाहिए। निद्रादिकके उत्कृष्ट प्रदेशचन्धके म्वामी अलग-अलग जीव बतलाये हैं । उनका पर्शन त्रसनालोके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण वन जानसे यहाँ वह उक्त प्रमाण कहा है। चार दर्शनावरण आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध संयत जीवाम अलग- - १. आ० प्रती उक्क अणु० इति पाठ.!
३४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे २८. विभंगे० पंचणा०-णवदंस०-दोवेद०-मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक०- पर०-उस्सा०-पज्जत्त०-थिर-सुभ-णीचा०-पंचंत० उक्क० अणु० अट्ठयाँ सव्वलो० । इस्थि०-पुरिस० चदुसंठा०पंचसंघ० उक्क० अणु० अट्ठ-बारह० । दोआउ०-तिण्णिजादि० उक्क० अणु० खेत्तभंगो । दोआउ०-आदाव०-उच्चा० उक्क० अणु० अट्ठचों । णिरयगदि- दुर्ग ओघं । तिरिक्खगदिदंडओ उक्क० ओघो । अणु० अट्ठचौँ सव्वलो० । मणुसगदि- दुर्ग उक्क० खत्तभंगो । अणु० अट्ठ० । देवगदिदुगं उक्क० अणु० पंचचों । पंचिंदि०- ओगलि अंगो०-असंपत्त-तस० उक्क० खेत्तभंगो । अणु अह-बारह० । नारकियोमे और ऊपर सहस्रार स्वर्गतकके देवोमें मारणान्तिक समुद्धात करनेवाले जीवोके वैकि- यिकद्विकका दोनो प्रकारका प्रदेशबन्ध होता है, इसलिए इनके दोनो पदवालोका स्पर्शन त्रसनाली का कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। परघात आदि प्रकृतियोकी अपेक्षा जो म्पर्शन ओघम कह आये है वह यहाँ बन जाता है, इसलिए यह आपके समान कहा है। देवोमे विहारबस्वस्थानके समय और देवोके ऊपर एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्रात करते समय भी उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनके इस पढवाले जीवोका सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटं चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। दवाम विहारादिके समय भी उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इसके इस पदवालाका म्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। तथा इसका अनुत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवांका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन है यह स्पष्ट ही है। यह प्ररूपणा अभव्य और मिथ्यादृष्टि जीवोमे अविकल घटित हो जाती है, इसलिए इनमे मत्यज्ञानी और श्रुनाजानी जीवोके ममान स्पर्शन जाननेकी सूचना की है। २८ विभङ्गबानी जीवामे पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह- कपाय, सात नोकपाय, परघात, उन्छास, पर्याप, स्थिर, शुभ, नीचगोत्र और पॉच अन्तगयका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भाग- प्रमाण और सर्व लोक प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। नोवेद, पुरुपवेद, चार संस्थान और पाँच मंहनन का उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु और तीन जातिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवीका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। दो आयु, आतप और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। नरकगतिद्विकका भङ्ग ओषके समान है। तिर्यञ्चगति दण्डकका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका भङ्ग ओषके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । मनुष्यगतिद्विकका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाका म्पशन क्षेत्रके समान है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है देवगतिद्विकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेश- वन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । पञ्चेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन और प्रसका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवीका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध ना प्रतो 'आउ [दा] वः' आप्रती 'आउच' इति पाट । आ० प्रतौ तसा वेत्तभगो ।' इति पाठः। , २ फोसणपरूवणा वेडवि०-वेउधि अंगो० उक्क० अणु० एक्कारहचौदसः समचदु०- पसन्थ०-सुभग-सुस्सर-आर्दै उक्क० पंचचौँ । अणु० अट्ठ-बारह । उजो०-जस० उक. अट्ठ-णवौं । अणु० अट्ट-तेरह० । अग्पसत्थ०-दुस्सर० उक्क० छच्चाद्द० । अणु० अ-बारह। बादर० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० अट्ठ-तेरहों। सुहुम- अपज. साधार० उक्क० अणु० लो० असंखें.' सब्बलो। करनेवाले जीवान जसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट और अनुकृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । समचतुरस्रसस्थान, प्रशस्त बिहायोगति, सुभग, सुम्बर और आदयका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेनाले जीवांने त्रसनालीका कुछ कम पांच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने असनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। उद्योत और यश कीतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन बसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। अप्रशस्त विहायो- गति और दुम्बरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन जमनालीका कुल कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनाली- का कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। बादर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह मागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवध करनवाले जीवाने लोकके असल्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। विशेषार्थ---देवोंमें विहारवत्वस्थानके समय और एकेन्द्रियाम मारणान्तिक समुद्भातके समय भी पॉच ज्ञानावरणाढिके दोनों पद सम्भव हैं, इसलिए इनके दोनो पदोकी अपेक्षा त्रस- नालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। देवाम बिहार- वस्वस्थानके समय तथा नीचे छह और ऊपर छह इस प्रकार कुछ कम बारह गजूके भीतर मारणान्तिक समुद्भात करते समय भी स्त्रीवेद आदिके दोनों प्रकारका प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनके दोनों पदाकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । नरकायु, देवायु और तीन जातिका दोनो प्रकारका प्रदेशबन्ध तिर्यञ्च और मनुष्य ही करते हैं । तथा दो आयुका मारणान्तिक समुद्भावके ममय वन्ध नही होता और तीन जातियांका केवल विकलेन्द्रियोमै मारणान्तिक समुद्धातके समय भी बन्ध हो सकता है, इसलिए इनकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असल्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रक समान कहा है। इन प्रकृतियांके विपयम यह अर्थपद आगे व पीछे सर्वत्र लगाकर वहाँ-वहाँका म्पर्शन जान लेना चाहिए । दो आयु आदि चार प्रकृतियोंका दोनो प्रकारका प्रदेशबन्ध देवांक बिहारवल्वस्थानके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका दोनो पढोकी अपेक्षा सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण म्पर्शन कहा है। नरकगतिविकका जो औधर्म म्पर्शन बतलाया . ताप्रता अणु० असा इति पाट ।
ur महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे M RRRR है,वह यहाँ भी बन जाता है, इसलिए यह ओघके समान कहा है। तिर्यश्चगतिदण्डकके उत्कृष्ट प्रदेशोका बन्ध करनवाले जीवोका ओघसे लोकके असंख्यात भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन बतला आये है । वह यहाँ भी बन जाता है, इसलिए इसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है । तथा देवोके विहारवत्स्वस्थान और केन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्रात करते समय भी इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सन्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा बसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है । मनुष्यगतिद्विकका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध मंत्री तियञ्च और मनुष्य करते हैं । तथा इनके मनुष्योमे मारणान्तिक समुद्रातके समय भी यह सम्भव है । पर इस प्रकारके जीवोका स्पर्शन लोकके असंरयातवे भागसे अधिक नही होता, इसलिए यह स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्धमे देवाके विहारवत्स्वस्थानकी मुख्यता है, इसलिए इनके उस पढकी अपेक्षा सनालीका कुछ कम आठ घटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। देव और नारकी मारणान्तिक समुद्रात के समय यद्यपि इन दो प्रकृतियोका बन्ध करते हैं,पर इस प्रकार प्राप्त होनेवाला स्पर्शन लोकके असख्यात भागसे अधिक नहीं होता, अत विहारवत्स्वस्थानसे प्राप्त होनेवाला स्पर्शन ही यहाँ मुख्यरूपसे विवक्षित किया गया है । ऊपर सहस्रार कल्पतकके देवाम मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी देवगतिद्विकके दोनो पद सम्भव हैं, इसलिए इनके दोनो पदीकी अपेना सनालीका कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण पर्शन कहा है । यद्यपि मत्यज्ञान, श्रुतानान और विभगनान नौवे अवेयकतक सम्भव हैं, इसलिए यह प्रश्न हो सकता है कि देवगतिद्रिकका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन कुछ कम पाँच गजूक स्थानम कुछ कम छह राजू होना चाहिए । पर इसका समाधान यह है कि सहस्रार कल्पके ऊपर सम्यग्दृष्टि तिर्यञ्च ही उत्पन्न होते हैं, इसलिए उक्त स्पर्शनमे विशेष अन्तर नही पडता । पञ्चेन्द्रियजाति आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध संज्ञी तिर्यश्च और मनुष्य करते है । तथा द्वीन्द्रियादिकमे यथायोग्य मारणान्तिक समुद्रातके समय भी इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव है,पर ऐसे जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागसे अधिक न होनेके कारण इस प्ररूपणाको क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है । तथा इनका देवाके बिहारवत्स्वन्धानके समय और यथायोग्य नीचे व ऊपर छह-छह राजूके भीतर मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी अनुत्कृष्ट प्रदशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पढकी अपेक्षा वसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण पर्शन कहा है। नारकियाम और ऊपरके सहस्रार कल्प तकक देवामे मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी वैक्रियिकद्विक दोनो पदीका बन्ध सम्भव है, इसलिए इन दोनों पदाकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। देवगतिद्विककी अपेक्षा जो शंका- रामाधान किया गया है, वह यहाँ भी जान लेना चाहिए | सहस्रारकल्पतकके देवामे मारणान्तिक समुद्घात करते समय समचतुरस्त्रसंस्थान आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदको अपेक्षा असनालीका कुछ कम पांच बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाका जो सनालीका कुछ कम आठ और युद्ध वारह बटे चोदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है सो इसका खुलासा पञ्चन्द्रियजातिका स्पर्शन बतलाते समय कर आये उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए । देवांके बिहाग्बल्वस्थानके समय और एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी उद्योत और यश-कीनिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । तथा देवोके विहारवत्स्वस्थान समय और नीचे छह व ऊपर सात इस प्रकार कुछ कम तेरह राजूके भीतर मारणान्तिक समुद्रातके समय भी उक्त दो प्रकृतियोका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा असनालीका कुछ कम आठ व फोसणपस्वणा २६. आभिणि-सुदृ०-ओधि० पंचणा० चदुदंसणा-सादा०-चदुसंज--पुरिस०- जस-वित्थ०-उच्चा--पंचंत० उक्क० संत्तभंगो। अणु० अडचौँ । णिहा-पयला- असादा०-अपञ्चक्खाण०४-छण्णोक-मणुसाउ०-मणुसगदिपंचग० उक० अणु० अट्ठचों । पचक्खाण०४ उक० छचों । अणु० अडचों । देवाउ०-आहारदुर्ग खेत्तमंगो। देवग०४ उक्क०' अणु० छचों । पंचिंदि-तेजा-क०-समचतु०- वण्ण०४-अगु०४-पसत्य-तस०४-थिराथिर-मुभामुभ-सुभग-मुस्सर-आदे०-अजस० णिमि० उक्क० छचौँ । अणु० अडचों । एवं ओघिद० सम्मादि-बड़ग०- कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है । अप्रशस्त विहायोगति और दुम्बरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध नारकियाम मारणान्तिक समुद्रात करते समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदको अपेक्षा सनालाका कुल कम छह बटे चौदह भागप्रमाण म्पर्गन कहा है। तथा देवांक बिहारवत्स्वस्थानके समय और नीचे बह राजू और ऊपर छह राजू इस प्रकार कुछ कम बारह राजूके भीतर यथायोग्य पदके रहते हुए भी इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा असनालीका कुछ क्म आठ और कुछ कम बारह बंट चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है। बादरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका पर्शन क्षत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है । तथा इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन जो सनालीका एक कम आठ बटे चौदह भाग और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है सो इनका स्पष्टीकरण उद्योतके अनुत्कृष्टके समान कर लेना चाहिए । मृक्ष्मादिका स्वस्थानम और एकेन्द्रियाम मारणान्तिक समुद्वात करते समय भी दो प्रकारका प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका दाना पदाको अपेक्षा लोकके असंख्यात भाग और सर्व लोकप्रमाण सर्शन कहा है। २६. आभिनिवोधिकनानी, श्रुतवानी और अवधिज्ञानी जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण. सातवेदनीय, चार संचलन पुरुपवेद, यश-कीति, नीर्थङ्कर. उच्चगान और पांच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका सर्शन क्षेत्र समान है। तथा इनका अनु- स्कृष्ट प्रदेशयन्ध करनेवाले जीने त्रसनालोका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। निद्रा, प्रचला. असातावेदनीय, अप्रत्याख्यानावरणचनुष्क, छह नोकपाय, मनुप्यायु और मनुष्यगनिपञ्चकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवान वस- नालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। प्रत्याख्यानाबरणचनुष्क- का उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने बसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने असनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। देवायु और आहारकद्विकका भङ्ग क्षेत्रके समान है । देवगतिचतुष्कका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भानप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पञ्चन्द्रियजाति, जसशरीर, कार्मगशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचनुष्क, प्रशस्त विहायोगति, सचतुष्का स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग. मुग्बर. आदेय, अवश कीर्ति और निर्माणका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवाने असनालोका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्द्रष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि . १ आ. प्रती खेत्तभंगी। जति पार।
३८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे उवसम० । णवरि खड्ग० देवगदि०४ खेत्तभंगो। ३०. संजदासंजदेसु देवाउ०-तित्थ० खेत्तभंगो। सेसाणं उक० अणु० छचों । ३१. असंजदेसु मदिभंगो । णवरि छदंस० वारसक०-सत्तणोक० उक्क. अट्टचों । अणु० सन्चलो० । वेउब्बियछक-समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आदें। ओषभंगो। अचक्खु० औघं। V . ---- और उपशमसम्यग्दष्टि जीवोमे जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंमें देवगतिचतुष्कका भङ्ग क्षेत्रके समान है। विशेषार्थ-यहॉ प्रथम दण्डकर्म कही गई प्रकृतियांका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध यथायोग्य दसवं, नौवे और असंयतसम्यग्दष्टि मनुष्य करते हैं। यतः ऐसे जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवं भागप्रमाण है, अतः इनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। तथा देवोके विहारवत्स्वस्थानके समय भी इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा रानालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। आगे जिन प्रकृति- योका उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट या टोनी पढोका बन्ध करनेवाले जीवोका बसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है, वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । देवोम मारणन्तिक समुद्रात करते समय संयतासंयत जीवांके प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। आगे पञ्चेन्द्रियजाति आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका यह स्पर्शन इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र यहाँ संयतासंयत ऐसा नहीं करना चाहिए । शेप कथन स्पष्ट ही है। यहाँ अवधिदर्शनी आदिमे इसी प्रकार जाननेकी सूचना कर जो नायिक- सम्यग्दृष्टि जीवोमे विशेषता कही है, उसका कारण यह है कि क्षायिकसम्यग्दर्शन मनुष्य ही उत्पन्न करते हैं, अत. ऐसे मनुष्य और ये यदि भोगभूमिमें उत्पन्न होते हैं तो वहाँ उत्पन्न हुए क्षायिकसम्यग्दृष्टि तियञ्च और मनुष्य देवगतिचतुष्कका वन्ध करते हैं। ऐसे जीवोका यदि देवोमें मारणान्तिक समुद्धातकी अपेक्षा स्पर्शन लिया जाता है तो वह भी लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही प्राप्त होता है, अत. क्षायिकसम्यग्दृष्टियामे देवगतिचतुष्कका दोनो पदोकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। ३०. संयतासंयतोम देवायु और तीर्थकर प्रकृतिका भग क्षेत्रके समान है। शेष प्रक- तियोंका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-सयतासंयतोके देवायुके सिवा सब प्रकृतियोका देवोमे मारणान्तिक समुद्भात करते समय उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ इनका दोनो पदोकी अपेक्षा वसनालीका कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा देवायुका मारणान्तिक समुद्रातके समय बन्ध नहीं होता और तीर्थडर प्रकृतिका मारणान्तिक समुद्धातके समय बन्ध होकर भी मनुष्य ही इसका वन्ध करते है, इसलिए इनका दोनो पदाको अपेक्षा लोकके असंख्या- तवे भागप्रमाण स्पर्शन प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है। ३१. असंयतोमे मत्यनानी जीवोके समान भन है। इतनी विशेषता है कि छह दर्शना- वरण, बारह कपाय और सात नोकपायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ बटे चोदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबीने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। वैक्रियिकपटक, समचतुरस्रसस्थान, ६ फोसणपरूवणा 0- ३२. तिण्णिले० पंचणा०-थीणगिद्धि०३-दोवेद०-मिच्छ,०-अणंताणु०४- -तिरिक्व०-एइंदियसंजुत्ताणं णीचा०-पंचतरा० गीचा०-पंचंतरा० उक. लोग० असंखें० सव्वलो० । अणु० सवलो० । छदंस०-धारसक०-सत्तणोक०-तिरिक्खाउ०- मणुस-चदुजादि०-समचदु०-ओरालि अंगो-असंपत्त०-मणुसाणु०-आदाव-पसत्य०- [ नस० बादर-] सुभग-सुस्सर-आदें०-उच्चा० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० सब्बलो । इत्थि०-चदुसंठा-पंचसंघ-अप्पसत्य०-दुस्सर० उक्क० छच्चत्तारिवेच्चाइस० । अणु० सव्वलो० । दोआउ० खेत्तभंगो। मणुसाउ० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० लोगस्स असंखें सव्वलो० । णिरयगदिदुगं वेउवि०-वेउब्वि०अंगो० उक्क० अणु० छच्चत्तारित्रे - प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयका भङ्ग ओषके समान है। अचक्षुदर्शनवाले जीयर्याम ओवके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-असंयतोंमें एकेन्द्रियोंसे लेकर चतुर्थगुणस्थान तकके जीव गर्भित हो जाते हैं इसलिए जिन प्रकृतियोंका मिथ्याष्टि गुणस्थानमें उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होता है और जिनका एके- न्द्रियादिजीव भी बन्ध करते हैं, उनकी अपेक्षा यहाँ मत्यज्ञानी जीवोके समान भङ्ग बन जाता है। मात्र जिन प्रकृतियोंके म्पर्शनमें विशेषता है उनका अलगसे निर्देश किया है। यथा- असंयतोमै छह दर्शनावरण आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध असंवसन्यग्दृष्टि जीव करते हैं और इनका स्पर्शन सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण है. इसलिए इन प्रकृतियोका उन पदको अपेक्षा उक्त प्रमाण पर्शन कहा। तथा इनका एकेन्द्रिय जीवोके भी बन्ध सम्भव है, इमलिए इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। इसी प्रकार वैक्रियिकपटक आदिका अपनी-अपनी विशेषता जानकर ओपके समान यहाँ पर्शन घटित कर लेना चाहिए। ३२. तीन लेश्याओमें पॉच जानावरण. त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानु- यन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद और तिर्यञ्चगवि आदि एकेन्द्रियसंयुक्त प्रकृतियाँ तथा नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका न्पर्शन किया है । छह दर्शनावरण, बारह कपाय, सात नोकषाय, तिर्यश्चायु, मनुष्यगति, चार जाति, समचतुरस्त्रसंस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, असन्प्रामानुपाटिका संहनन, मनुष्य- गत्यानुपूर्वी, आतप, प्रशस्त विहायोगति, स, बादर, सुभग, सुस्वर, आदेय और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। वीवेद, चार संस्थान, पॉच संहनन, अप्रशस्त विहायोगनि और दुःस्वरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने क्रमसे नसनालीका कुछ कम छह, कुछ कम चार और कुछ कम दो वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयुओका भङ्ग क्षेत्रके समान है। मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। नरकगतिद्विक, वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीराङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम छह कुछ कम चार और कुछ कम दो बटे चौदह मागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया महावे पदेनर्वधाहियारे 0- - चौदस०' । देवगदिदुगं तित्थ० खेतमंगो। पर०-उस्सा०-पज०-थिर-सुभ० ओथं । उजो०-जस० उक० सत्तचों। अणु० सवलो। ३३. तेउए पंचणा०-थीणगि०३-दोवेद०-मिच्छ०-अणंताणु०४-णस- तिरिक्व०-एइंदियसंजुत्ताणं णीचा०-पंचंत० उक. अणु० अट्ठ-णव० । छदंस देवगतिद्विक तीर्थङ्कर प्रकृतिका भग क्षेत्रके समान है। परयात, उन्हाम, पर्याप्त, स्थिर और शुभका भग ओषके समान है। उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने मनालीका कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनु- स्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीयाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-तीन लेश्यावाले मंत्री पञ्चन्दिय जीव स्वस्थानम और केन्द्रियोंम माग्णान्तिक समुद्भात करते समय भी पाँच ज्ञानाचरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कर सकते हैं, अतः इनका इस पढकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध एकेन्द्रियादि सब जीवोंके सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। आगे जिन प्रकृतियाँका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है,वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। यहाँ छह दर्शनावरण आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवीका सर्शन क्षेत्रके समान कहनेका कारण यह है कि इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते समय लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही स्पर्शन देखा जाता है। कारणका विचार अलग-अलग स्वामित्वको देखकर कर लेना चाहिए । कृष्णादि लेश्याओका स्पर्शन क्रमसे सनालीका कुछ कम छह, कुछ कम चार और कुछ कम दो बटे चौदह भागप्रमाण उपलब्ध होता है । मारणान्तिक समुद्रातके समय इतने क्षेत्रका स्पर्शन करते समय इनमे स्त्रीवेद आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोका उक्त पदकी अपेक्षा उक्त- प्रमाण स्पर्शन कहा है। इसी प्रकार नरकगतिद्विक और चैक्रियिकद्विकके दोनों पदोकी अपेक्षा यह स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए। दो आयुओका दोनो पदोकी अपेक्षा और मनुष्यायुका उत्कृष्ट पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान है.यह स्पष्ट ही है। क्योकि इनका स्वस्थानमे ही बन्ध होता है और नरकायु व देवायुका चतुरिन्द्रिय तकके जीव बन्ध नहीं करते। मनुष्यायुका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध एकेन्द्रियादि जीव भी करते है पर ऐसे जीवोका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण प्राप्त होनेसे यह उक्तप्रमाण कहा है। यहाँ देवगतिद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग क्षेत्रके समान कहनेका कारण यह है कि देवगति द्विकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भवनत्रिकमे यदि मारणान्तिक समुद्भातके समय भी कर तो यह स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही प्राप्त होता है। तथा इनमे तीर्थकर प्रकृ- तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध एक तो मनुष्य करते हैं। दूसरे नरकमे यद्यपि इसका बन्ध होता है और मारणान्तिक समुद्भातके समय भी इसका बन्ध सम्भव है, फिर भी ऐसे जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाणसे अधिक नहीं प्राप्त होता। यहाँ परघात आदिके दोनो पदीका बन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन ओषके समान बन जानेसे वह ओघके समान कहा है। यहाँ ऊपर एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्रातके समय भी उद्योत और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध मम्भव है, अतः इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण म्पर्शन कहा है। ३३. पीतलेश्यामें पाँच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानु- बन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यश्चगति, एकेन्द्रियजाति संयुक्त प्रकृतियाँ, नीचगोत्र और पॉच १ ता० प्रतौ वैउ. अगो. छचत्तारि-बेचौ.' इति पाठः।
फोसणपरूवणा ४१ अपञ्चक्खाण०४-छण्णोक० उक्क० [अट्ठ । अणुक्क० ] अट्ठ-णव० । पच्चक्खाण०४ उक्क० दिवड्डचौ० । अणु० अट्ठ-णव० । चदुसंज० उक्क० खैत्तभंगो। अणु० अट्ठ-णव० । इस्थि०-पुरिस०-चदुसंठा०-ओरा०अंगो०-छस्संघ०-अप्पसत्थ०-दुस्सर०-[उच्चा०] उक्क० अणु० अट्टचों । एवं मणुसगदिदुगं । दोआउ० उक्क० अणु० अट्ठचों । देवाउ०- आहारदुर्ग उक्क० अणु० खेत्तभंगो । देवगदि०४ उक्क० अणु० दिवड्डौं । पंचिंदि०- समचदु०-पसत्थ०-तस-सुभगादितिण्णि. उक्क० दिवड्डौं । अणु० अट्ठचौँ । नित्थ० उक्क० खेत्तभंगो। अणु० अट्ठों । एवं पम्माए। णवरि सगफोसणं णादूण णेदव्यं । एवं सुक्काए वि। णवरि पंचणाणावरणादिपढमदंडओ उक० खैत्तमंगो। अणु० छचों० । सेसाणं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । भवसि० ओघो । --- . अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। छह दर्शनावरण, अप्रत्याख्याना- वरणचतुष्क और छह नोकपायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने सनालीका कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। चार संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, चार संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुःस्वर और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार मनुष्यगतिद्विककी अपेक्षा स्पर्शन जानना चाहिए । दो आयुका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने बसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। देवायु और आहारकद्विकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करने- वाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है।। देवगतिचतुष्कका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पञ्चेन्द्रियजाति, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, बस और सुभग आदि तीनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने असनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार पालेश्या में भी जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अपना स्पर्शन जानकर ले जाना चाहिए । तथा इसी प्रकार शुक्ल- लेश्याम भी जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इसमें पॉच ज्ञानावरणादि प्रथमदण्डकका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम छह चटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया ६ ४२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे ३४. सासणे० पंचणा०-णवदंसणा०-दोवेद०-सोलसक०'-अट्ठणोक०- तिरिक्ख०-चदुसंठा०-पंचसंध०-तिरिक्खाणु०-उजो०-अप्पसत्थ०-दूभग-दुस्सर-अणार्दै०- णीचा-पंचंत० उक्क. अणु० अट्ठ-बारह । णवरि दोवेद० संठाणं संघडणं अप्पसत्थ० उक्क० अणु० अट्ठ०-ऍकारह० । दोआउ० मणुसगदिदुगं उच्चा० उक्क० अणु० अट्ठचों। देवाउ० खेत्तभंगो। देवगदि०४ दोपदा पंचचो०। पंचिंदियादिअट्ठावीसं० उ० है। शेष प्रकृतियोका अपना-अपना स्पर्शन जानना चाहिए। तथा भव्य जीवामें ओवके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-यहॉ जिन प्रकृतियोका देवोके विहारवत्स्वस्थानके समय भी उत्कृष्ट या अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, उनका उस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भाग- प्रमाण स्पर्शन कहा है। जिनका देवोके विहारवत्स्वस्थानके समय और देवांके ऊपर एकेन्द्रियोमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी उत्कृष्ट या अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध सम्भव है,उनका उस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा जिनका मनुष्य और तिर्यञ्च या केवल मनुष्य देवोमें मारणान्तिक समुद्भातके समय भी उत्कृष्ट या अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं उनका उस पदकी अपेक्षा कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । यहाँ चार संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव करते है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । देवायुका मारणान्तिक समुद्धातके समय वन्ध नहीं होता और आहारकद्विकका अप्रमत्तादि जीव बन्ध करते है, इसलिए इनका दोनो पदाको अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध मनुष्य करते हैं, इसलिए इसका भी उक्त पदकी अपेक्षा क्षेत्रके समान स्पर्शन कहा है । पीतलेश्यामें यह जो स्पर्शन कहा है वह पद्मलेश्यामे भी वन जाता है। मात्र यहाँ कुछ कम डेढ़ राजूके स्थानमे कुछ कम पॉच राजू स्पर्शन कहना चाहिए। तथा बसनालीका कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन नहीं कहना चाहिए । शुक्ललेश्यामें भी इसी प्रकार अपना स्पर्शन जान कर घटित कर लेना चाहिए। मात्र इसमें पॉच ज्ञानावरणादिके उत्कृष्ट प्रदेशबन्धका स्वामी ओघके समान होनेसे इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पशन क्षेत्रके समान और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाका स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण वन जानेसे वह उक्त प्रमाण कहा है। भव्योमे ओघके समान भङ्ग है,यह स्पष्ट ही है। ३४ सासादनसम्यक्त्वमे पॉच ज्ञानावरण, नो दर्शनावरण, दो वेदनीय, सोलह कपाय, तिर्यञ्चगति, चार संस्थान, पॉच संहनन, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दु.स्वर, अनादेय, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालाका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि दो बेद, संस्थान, संहनन, और अप्रशस्त विहायोगतिका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु, मनुष्यगतिद्विक और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रासनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। देवायुका भग क्षेत्रके समान है । देवगति चतुष्कके दो पदवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम पांच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । पञ्चेन्द्रियजाति आदि अट्ठाईस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने १ आ० प्रतौ 'टोवेद० सादा० अठणोक०' इति पाठः। .
फोसणपरूवणा पंचों । अणु० अट्ठ-बारह० । णवरि पंचिंदि०-[समचदु०-] पसत्थ०-तस-सुभग- सुस्सर-आर्दै [उ०] पंचचों । अणु० अट्ठ-ऍकारह० । ३५. सम्मामि० पंचणाणावरणादिधुवियाणं पढमदंडओ दोवेद०-चउणो- कवाय० उक्क०' अणु० अडचों । देवगदि०४ खेत्तभंगो । पंचिंदियादिअट्ठावीसं उक्क० खेत्तमंगो । अणु० अट्ठचों। वसनालीके कुछ कम पॉच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने मनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि पञ्चेन्द्रियजाति, समचतुरस्त्र- संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, स, मुभग, मुस्वर और आदेयका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनवाल जीवोने त्रसनालोके कुछ कम पाँच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-सासादनसम्यक्त्वका स्वस्थानविहारकी अपेक्षा वमनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन है। मारणान्तिक समुद्रातकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन है। यहाँ प्रथम दण्डककी अपेक्षा दोनो पढोका यह स्पर्शन बन जानेसे वह उक्त प्रमाण कहा है । मात्र दो वेद, चार संस्थान, पाँच महनन और अप्रशस्त विहायोगतिका बन्ध एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्रान करते समय नहीं होता, इसलिए इनका दोनो पदोंकी अपेक्षा स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम आठ ओर कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। देवोंके बिहारवत्स्वस्थानके ममय भी दो आयु आदिके दोना पढ़ सम्भव हैं, इसलिए इन प्रकृतियोके दोनो पदोकी अपेक्षा बसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग- प्रमाण स्पर्शन कहा है । देवायुका भङ्ग क्षेत्रके समान है, यह स्पष्ट ही है । देवगति चतुष्कका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध तिर्यञ्च और मनुष्य करते है जो कि दवाम मारणान्तिक समुद्घातक समय भी सम्भव है, अत इन प्रकृतियोका दोनो पदोकी अपेक्षा असनालीका कुछ पाँच वटं चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। पञ्चेन्द्रियजाति आदि अट्ठाईस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदशवन्ध तिर्यश्च और मनुष्य करते हैं, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम पाँच बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध देवाके स्वस्थानम तथा एकेन्द्रियोमें मारणान्तिक समुद्घातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपना वसनालीका कुछ कम आठ व कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। मात्र पश्चेन्द्रियजाति आदि निर्दिष्ट कुछ प्रकृतियोका बन्ध एकेन्द्रियोमै मारणान्तिक समुद्भातकं समय नहीं होता, इसलिए इनका अनुत्कृष्ट पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। ३५ सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोमे पॉच ज्ञानावरण आदि प्रथम दण्डककी ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका तथा दो वेदनीय और चार नोकपायका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। देवगति- चतुष्कका भङ्ग क्षेत्रके समान है । पञ्चेन्द्रियजाति आदि अट्ठाईस प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन सनालीका कल कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ यहाँ देवोमे विहारवस्वस्थानके समय भी पॉच जानावरणादिके दोनो पद १ ता० आ० प्रत्या 'पदमदडओ एगुणतीसाए उक्क०' इति पाट. ।
महाबंधे पदेसबंधाहियारे ३६. सण्णि० पंचिदियभंगो । असण्णीसुपंचणा०-णवदसणा०-दोवेद-मिच्छ०- सोलसक०-सत्तणोक-तिरिक्खगदि-एइंदि संजुत्ताणं यावणीचा०-पंचंत० उक० लोगस्स असंखें० सव्वलो । [अणु० सव्वलो० । ] सेसाणं उक० अणु० खेत्तभंगो । णवरि उज्जो-जस० उक० सत्तचों । अणु० सन्चलो। ३७. आहार० ओघं | अणाहारगेसु पंचणा०-थीणगिद्धि०३-दोवेद-मिच्छ०- अणंताणु०४-णस०-पर-उस्सा०-पज्जत्त-थिर-सुभ-णीचा०-पंचंत० उ० बारह। और पञ्चेन्द्रियजाति आदिका अनुत्कृष्ट पट सम्भव है, इसलिए इनका उक्त पदोकी अपेक्षा सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। शेप भन्न क्षेत्रके समान है, यह स्पष्ट ही है । यहाँ प्रयम दण्डकी ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों ये हैं-पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, वारह कयाय, पुरुपवेद, भय, जुगुप्सा, मनुष्यगतिपञ्चक, उपगोत्र और पाँच अन्तराय । तथा इनमे दी वेदनीय और चार नोकपाय भी सम्मिलित कर लेनी चाहिए, क्योंकि इन सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध देवोके भी सम्भव है। पञ्चेद्रियजाति आदि प्रकृतियाँ ये हैं-पञ्चेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशगैर, समचतुरस्त्रसंस्थान, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, प्रशस्त विहायोगति, त्रस आदि चार, स्थिरआदि तीन युगल, सुभग, सुस्वर, आदेय और निर्माण | ३६. संत्री जीवा में पञ्चन्द्रियोंके समान भन है। असंनी जीवोंमें पाँच ज्ञानावरण, नी दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, सात नोकपाय, तिर्यश्चगति और एकेन्द्रियजाति संयुक्त प्रकृतियोमे लेकर नीचगोत्र और और पांच अन्तरायतककी प्रकृतियांका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेप प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। इतनी विशेषता है कि उद्योत और यशःकीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने असनालीका कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा उनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-स्पर्शन प्ररूपणामे जो पञ्चेन्द्रियाम स्पर्शन कह आये है वह संज्ञियाम अविकल वन जाता है, इसलिए संन्नियोमै पञ्चेन्द्रिय जीव ही पॉच ज्ञानावरणाटिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते हैं और उनका स्वस्थान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है तथा एकेन्द्रियोमे मार- णान्तिक समुद्धात करते समय भी इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा इनका एकेन्द्रियादि सब जीव वन्ध करते हैं, इसलिए इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवांका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। इनके सिवा शेप जितनी प्रकृतियाँ हैं, इनका दोनो पदोकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान है,ऐसा कहनेका यह तात्पर्य है कि जिस प्रकृतिका दोनो पदीकी अपेक्षा जो क्षेत्र बतलाया है वह यहाँ स्पर्शन जानना चाहिए | मात्र उद्योत व यश-कीर्तिके स्पर्शनमे क्षेत्रसे विशेषता है, इसलिए इसका उल्लेख अलगसे किया है। ३७. आहारक जीवाम ओषके समान भङ्ग है। अनाहारक जीवामे पांच ज्ञानावरण, स्त्यानगुद्धित्रिक दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, परघात, उच्छास, पर्याप्त, स्थिर, शुभ, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने प्रसनालीका १. ता० प्रतौ 'सण्णि [यास'.. "य भगा | अ) सणीसु' इति पाठः । २. आ० प्रती 'पचत० बारहः' इति पाठः । - , ४५ फोसणपरूवणा अणु० सबलोगो । छदंस०-वारसक०-सत्तणोक०-[उच्चा० ] । उक० छचों । अशु० सब्बलो । सेसाणं उ० खेत्तभंगो । अणु० सव्वलो० । णवरि इत्थि०-चदुसंठा- पंचसंघ०-अप्पसत्थ०-दुस्सर० उक्क० ऍकारह० । अणु० सव्वलो० । उज्जो०-जस० उक० छच्चों । अणु० सब्बलो० । देवगदिपंच० उक० अणु० संत्तभंगो। ३८. जह० पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघ० दोआउ०-आहार०२ जह० कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवय करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। यह दर्शनावरण, बारह कपाय, मात नोकपाय और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध कग्नवाले जीओंन सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेप प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने मर्व लोकप्रमाण क्षेत्रकाम्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद, चार संस्थान, पाँच संहनन, अप्रशस्त बिहायोगति और दुम्बरका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। नथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जावाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उद्यात और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन सनालीका बुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सर्वलोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। देवगतिपञ्चकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेषार्थ-यहाँ पॉच जानावरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध चारा गतिके सनी जीव करने हैं, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। इस स्पर्शनमे हमे कार्मणकाययोगी जीवामें कह गये सर्शनमे दो विशेपता दिखलाई रही है-एक तो वहाँ 'णवरि' कहकर मिथ्यात्वसम्बन्धी प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध ऋग्न- वाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है जो यहां नहीं कहा है । दूसरे वहाँ परघात, पर्याप्त, स्थिर और शुभ इन प्रकृतियाका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करन याले जीवोका स्पर्शन सनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भाग प्रमाण कहा है जो यहाँ त्रसनाली का कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । इन दो विशेषताओका क्या कारण हो सकता है,वही यहाँ देखना है। यहाँ ऐसा मालूम पड़ता है कि कार्मणकाययोगमे स्पर्शन कहते समय मिथ्यात्व आदिका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका ऊपर कुछ कम पाँच राजू स्पर्शन विव- क्षित रहता है और यहाँ वह कुछ कम छह राजू विवचित कर लिया गया है। तथा स्वामित्व प्ररूपणामे परघात आदिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध तीन गतिका संज्ञा जीव करता है, इस अभिप्रायको ध्यानमे रखकर कार्मणकाययोगमे इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है यह कहा है और यहॉपर इनके उत्कृष्ट प्रदेश- बन्धका स्वामी चारों गतिका जीव होता है, ऐसा मानकर स्पर्शन कहा है। इन पाँच बानावर- णादिका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण है यह स्पष्ट ही है। शंप स्पर्शनका स्पष्टीकरण जैसे कार्मणकाययोगके समय किया है, उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए । तथा समचतुरस्त्र संस्थान आदिके सम्बन्धमे जो विशेपता कही है,उसे भी जान लेनी चाहिए। ३८. जघन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । आपसे दो १. ता० प्रती 'सत्तणोक० उ० छचोल अणु' आ. प्रतौ 'सत्ताक अणु०' इति पाठः । २. आ. प्रतो ससाणं खेत्तभगो' इति पाठ ।
४६ महाबंधे पदंसबंधाहियारे अनह० केवडियं सत्तं फोसिहं ? खेत्तभंगा। मणुसाउ. जह० लोगस्स असंखें. सब्बलो० । अजह० अठ्ठचौ० सवलो० । दोगदि-दोआणु० जह० खेत्तभंगो । अजह० छचों० । वेउब्बि०-वेउब्बि०अंगो० जह० खेतभंगी । अजह. बारह । तित्थ० जहर खैत्तभंगी। अजह० अट्ठचों । सेसाणं सव्यपगदीणं जह अजह. सव्वलो । एवं ओवभंगो कायजोगि-णस०कोधादि०४-मदि--मुद०- असंज०-अचक्नु०-भवसि०-मिच्छा-आहाग्ग त्ति गदव्यं । णवरि णपुंस० तित्थ. खेंत्तभंगो। मदि-मुद० वेउब्धियल० जह० खेत्तभंगा। अबह० पगदिभंगो। एवं अभवसि-मिच्छा। " आयु और आहारक द्विकका जत्रय और अजघन्य प्रशवन्ध करनेवाले जीयांने कितनं क्षेत्रका पर्शन किया है। इनका भग क्षेत्रके समान है। मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवनि लोकके असंख्यातवें भाग ओर मर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अजय य प्रदेश- उन्ध करनेवाले जीवोन सनालीका कुछ कम आठ बट चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । ढो गति और दो आनुपूर्वीका जघन्य प्रदशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। नथा अजयन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीयोन बसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । वैक्रियियशरीर और वैक्रियिकशगर आङ्गोपाङ्गका जवन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन कंत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन असनालीका कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोन बसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग प्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। शेष सब प्रकृतियोका जान्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार औषके ममान काययोगी, नपुसक बेदी, क्रोवादि चार कपायवाले, मत्यनानी, श्रुताबानी, असयत, अचतुदर्शनी, भव्य, मिथ्याष्टि और आहारक जीवोम ले जाना चाहिए | इतनी विशेषता है कि नपुसकवेदी जीवोम तीर्थकर प्रकृतिका भग क्षेत्रके समान है। तथा मत्यनानी और श्रुतानानी जीवोंमे बैंक्रियिकपटकका जघन्य प्रदेशवध करनेवाले जीवाका भङ्ग क्षेत्रके समान है और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका भग प्रकृतिवन्धके समान है। इसी प्रकार अभव्य और मिथ्याष्टि जीवामे जानना चाहिए। विशेपार्थ-नरकायु और दबायुका बन्ध मारणान्तिक समुद्भातके समय नहीं होना । तथा आहारकद्विकका बन्ध अप्रमत्तसंयत आदि जीव करते है, दमलिए उनका दोनी पढोकी अपेक्षा लोकके असंस्थातवे भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवा- का वर्तमान म्पर्शन लोकके असत्यात भागप्रमाण और अतीत म्पर्शन सर्व लोकप्रमाण वन जानसे यह उक्त प्रमाण कहा है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशवन्ध देवोके विहारवत्स्वस्थानके समय और एकेन्द्रियोके भी सम्भव है, इसलिए इसका इस पद की अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाग सर्शन कहा है। नरकगतिद्विक और देवगतिद्विकका जयन्य प्रदेशबन्ध क्रमसे असंनी जीद और प्रथम समयवर्ती तद्भवस्थ मनुष्य योग्य सामग्रीके सद्भावमे करते हैं । यत इनका स्पर्मन लोकके असख्यात भागप्रमाण प्राप्त होता है, अत क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनका अजघन्य प्रशवध क्रमसे नरक्रमे ओर देनामे मारणान्तिक मसुद्धातके गमय भी सम्भव है, अत इनका इस पढ़की अपेना नमनालीका कुछ कम छह बटे - फोसणपरुवणा ३६. गेरइएसु दोआउ०-मणुस-मणुसाणु०-तित्थ०-उच्चा० जह० अजह. खैत्तभंगो । सेसाणं जह० बैंत्तभंगो । अजह० छच्चों० । एवं सचणेरइगाणं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । ४०. तिरिक्खेसु ओघं । पंचिंदियतिरिक्ख०३ पंचणा०-णवदंसणा०-दोवेद०- मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक०-तिरिक्व०-एइंदि०-तिण्णिसरीर-डंडसं०-वण्ण०४-तिरि- क्खाणु०-अगु०४-थावर-सुहुम-पज्जत्तापज्जत्त-पत्ते-साधार०-थिराथिर-सुभासुभ-दूमग- अणादें-अजस-णिमि०णीचा०-पंचंत० जह० खेत्तभंगो। अजह० लोग० असंखें. - चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । वैक्रियिकद्विकके जघन्य प्रदेशबन्धका स्वामी देवगतिद्विकके ममान है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। तथा इनका अज- घन्य प्रदेशवन्ध नारकियो और देवामे मारणान्तिक समुद्भातके समय भी होता है, इसलिए इनका इस पढकी अपेक्षा सनालीका कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका जघन्य प्रदेशबन्ध प्रथम समयवर्ती तद्भवस्थ देव और नारकी जीव करते हैं,पर से जीव सख्यात ही होते हैं, अत. इसका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तथा इसका अजघन्य प्रदेशबन्ध देवोके विहारवत्स्वस्थानके समय भी सम्भव है, इसलिए इसका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । इस ओघप्ररूपणाके समान काययोगी आदि अन्य मार्गणाओंमें भी स्पर्शन बन जाता है, इसलिए इनमे ओघके समान प्ररूपणा जाननेकी सूचना की है। मात्र देव नपुंसक नहीं होते, इसलिए नपुंसकवेदी जीवोम तीर्थङ्कर प्रकृतिका भन क्षेत्रके समान प्राप्त होनेसे उसकी सूचना अलगसे की है। तथा मत्यज्ञानी और अताज्ञानी जीवोमे वैक्रियिकपटकका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवालोका स्पर्शन भी ओघके समान नहीं बनता, इसलिए उसे प्रकृतिवन्धके समान जाननेकी सूचना की है । तथा अभव्य और मिथ्यादृष्टि जीवोंमे भी मत्यज्ञानीके समान ही स्पर्शन प्राप्त होता है, इसलिए इनमें भी मत्यजानियोके समान म्पर्शन जाननेकी सूचना की है। ३६ नारकियोमे दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तीर्थङ्कर और उच्चगोत्रका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । शेप प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार सव नारकियोमे अपना-अपना स्पर्शन ले जाना चाहिए। विशेषार्थ यहाँ दो आयु आदिके दोनो पदोकी अपेक्षा और शेष प्रकृतियो के जघन्य पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहने का कारण स्पष्ट है । तथा शेष प्रकृतियोका अजघन्य पद मारणान्तिक समुद्भातके समय भी सम्भव है, अत. इनका इस पदको अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। इसी प्रकार प्रथमादि सब नरकोमें अपना- अपना स्पर्शन जानकर वह घटित कर लेना चाहिए। ४० तिर्यम्बोमे ओषके समान भङ्ग है। पञ्चेन्द्रियतिर्यचत्रिकी पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकपाय,तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रितजाति, तीन शरीर, हुंडसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। .
महापंधे पदेमबंधाहियारे सव्वलो । इत्थि० जह० खेन । अजह• दिवड्डचौँ । पुरिस०-दोगदि-सम०-दोआणु०- दोविहा०-सुभग-दोसर-आदें-उच्चा० ज० खेतं । अज० छच्चों । चदुआउ०-मणुस०- तिण्णिजादिणाम-चदुसं०-ओरा०अंगो०-स्संघ०-मणुसाणु०-आदाव० ज० अज० खेत्तभंगो । पंचिं०-उ०-वेड० अंगो-तस० ज० खेत्तभंगो। अज० बारह । उज्जो०- जस० जह० खेत्तभ० । अजह० सत्तचों । चादर जह० खेत्तभंगो । अजह० तेरह । . - तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यात भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र का स्पर्शन किया है । स्त्रीवेदका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका सर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीयोने वसनालीका कुछ कम डेढ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। पुरुपवेद, दो गति, समचतुरनसंस्थान, दो आनुपूर्वी, दो विहायोगति, सुभग, दो स्वर, आदेय और उच्चगोत्रका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवीका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । चार आयु, मनुष्यगति, तीन जाति, चार संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगल्यानुपूर्वा और आतपका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। पञ्चेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, वक्रियिक शरीर आङ्गोपाङ्ग और उसका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने मनालीका कुछ कम बारह घटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उद्योत और यश कीर्तिका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका भग क्षेत्रके समान है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनवाले जोवाने त्रसनालीका कछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है । वाटरका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने बसनालीका कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-तिर्यश्चामें अपनी सब प्रकृतियोका जघन्य स्वामित्व ओवके समान है। तथा इन प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका ओघसे जो स्पर्शन कहा है वह यहां भी बन जाता है, इसलिए इसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र मनुष्यायुका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन जो ओघसे मनालीका कुछ कम आठ बटे चोटह भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है सो यहाँ यह स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण ही जानना चाहिए । पञ्चेन्द्रियतिर्यश्चत्रिकमे सब प्रकृतियोका जघन्य स्वामित्व यथायोग्य असज्ञी पश्चेन्द्रिय जीवके होता है और ऐसे जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण होता है। यत. इन तीन प्रकारके तियञ्चोंमें क्षेत्र भी इतना ही होता है, अत. यहाँ सब प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशरन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है। अब रहा सब प्रकृतियोका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोके स्पर्शनका स्पष्टीकरण सो वह इस प्रकार है- इन तीन प्रकारके तिर्यश्चीका स्वस्थान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है और अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण है। इनके इन दोनो अवस्थाओमै पाँच ज्ञानावरणादिका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले उक्त तिर्यञ्चोका लोकके असंख्यातवे भाग और सर्च लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है । इनके देवियोमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय स्त्रीवेदका बन्ध सम्भव है, इसलिए इसका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीधोका स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। ऊपर कुछ कम छह राजू क्षेत्रके भीतर मारणान्तिक समुद्धात करते समय यथायोग्य पुरुषवेद आदि प्रकृतियोका बन्ध सम्भव है, अतः इनका अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवीका सनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है।
४६ फोसणपरूवणा ४१. पंचिंदि तिरिक्खअपज. पंचणा०-णवदंस०-दोवेद०-मिच्छ०- सोलसक०-सत्तणोक०-तिरिक्ख०-एइंदि०-तिण्णिसरीर-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०- अगु०४-थावर-सुहुम - पजत्तापजत्त-पत्ते० -- साधार०-थिराथिर - सुभासुभ-दूभग- अणार्दै -अजस-णिमि०-णीचा०-पंचंत० जह० खेत्तभंगो । अजह लोगस्स असंखें. सव्वलो० । उज्जो०-बादर-जस० जह० खेत्तभंगो। अज. सत्तचों। सेसाणं सव्वपगदीणं जह. अजह० खेत्तभंगो। एवं सव्वअपजत्तयाणं सव्वविगलिंदियाणं बादरपुढवि०-आउ०-तेउ०चादरवणप्फदिपत्तेय पजत्तयाणं च । -1. --- -~- , चार आयु आदिका बन्ध करनेवाले उक्त तिर्यश्च लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका ही स्पर्शन करते हैं, इसलिए यह स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। पञ्चेन्द्रियजाति आदिका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव मारणान्तिक समुद्भातके समय ऊपर कुछ कम छह और नीचे कुछ कम छह राजूप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन कर सकते हैं, इसलिए यह स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। ऊपर वादर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय उद्योत और यश कीर्तिका बन्ध सम्भव है, अत: इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन सनालीका कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। नीचे कुछ कम छह राजु और ऊपर कुछ कम सात राजू क्षेत्रके भीतर मारणान्तिक समुद्धात करते समय बादर प्रकृतिका वन्ध सम्भव है, अत इसका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन असनालीका कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। ४१. पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोमें पॉच जानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकपाय तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, तीन शरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश-कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पाँच अन्तरायका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथाअजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। उद्योत, बादर और यश कीर्तिका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेप सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। इसी प्रकार सब अपर्याप्तक, सब विकलेन्द्रिय, बादर पृथिवी- कायिक पर्याप्त, बोदर जलकायिक पर्याप्त, बादर अग्निकायिक पर्याप्त और वादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीवोके जानना चाहिए। विशेषार्थ-पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोमें सब प्रकृतियोके जघन्य प्रदेशवन्धका जो स्वामी बतलाया है, उसे देखते हुए इस अपेक्षासे स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है। तथा पाँच ज्ञानावरणादिका बन्ध स्वस्थानके समान मारणान्तिक समुद्धात आदिके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पशन लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है। उद्योत आदि तोन प्रकृतियोका वन्ध ऊपर वादर एकेन्द्रियों में मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन सनालीका कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । तथा पूर्वोक्त सब प्रकृतियोके सिवा जो स्त्रीवेद, पुरुषवेद, दो आयु, मनुष्यगति, चार जाति,पाँच संस्थान, औदारिकशरीरआङ्गोपाङ्ग और छह संहनन आदि प्रकृतियों शेष रहती हैं, इनका , ५० महाबंधे पदेसबंधाहियारे ४२. मणुस०३ पढमदंडओ पंचिंदियतिरिक्खमंगो। सेसाणं पि पंचिंदिय- तिरिक्खभंगो । णवरि केसि चि वि रज्जू णत्थि । णवरि उज्जो०-बादर-जसगि० अजह सत्तचोद। ४३. देवेसु पंचणा०-णवदंसणा०-दोवेद०-मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक०- तिरिक्व०-एइंदि०-तिण्णिसरीर-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४-थावर-बादर- पज्जत्त-पत्ते-थिरादितिण्णियुग०-दूभग-अणादें-णिमि०-णीचा०-पंचत० जह० खेत- भंगो। अजह० अट्ठ-णव० । सेसाणं जह० खेत्तभंगो० । अजह० अदु० । दोआउ० जह० अजह० अट्टचों । एवं सव्वदेवाणं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । - बन्ध यथासम्भव स्वस्थानमें और नारकियो व देवोंके सिवा शेष बसोंमें मारणान्तिक समुद्धात आदि के समय ही सम्भव है। यतः इस प्रकार प्राप्त होनेवाला स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागसे अधिक नहीं होता, अत' इन प्रकृतियोका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन भी क्षेत्रके समान कहा है। ४२. मनुष्यत्रिकमे प्रथम दण्डकका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोके समान है। शेष प्रकृतियोंका भङ्ग भी पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्चोंके समान है। इतनी विशेषता है कि किन्हीं भी प्रकृतियोंका स्पर्शन रज्जुओमे नहीं है। किन्तु इतनी विशेषता है कि उद्योत, बादर और यश कीर्तिका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सनालोका कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-लब्ध्यपर्यापक मनुष्य देवों और नारकियोंमें जाते नहीं और गर्भज 'मनुष्य संख्यात होते हैं, इसलिए मनुष्योंमें स्त्रीवेद, पुरुषवेद, चार आयु, तीन गति, चार जाति, दो शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, तीन आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, तीन आनुपूर्वी, दो विहायोगवि, आतप, सुभग, दो स्वर, त्रस, आदेय, तीर्थङ्कर और उच्चगोत्रका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन राजुओमें प्राम न होनेसे उसका निषेध किया है । मात्र उद्योत, बादर और यश कीर्तिका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले उक्त मनुष्योंका स्पर्शन राजुओमें प्राप्त हो सकता है, इसलिए इसका अलगसे विधान किया है। शेष कथन सुगम है ! ४३. देवोंमे पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकषाय, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, तीन शरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्वगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, बादर, पर्यास, प्रत्येक, स्थिर आदि तीन युगल, दुर्भग, अनादेय, निर्माण, 'नीचगोत्र और पांच अन्तरायका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेष प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । दो आयुओ का जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार सब देवीका अपना-अपना स्पशन ले जाना चाहिए । विशेषार्थ-देवामें दो आयुओको छोड़कर शेष प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशबन्ध भवके प्रथम समयमे अपनी-अपनी योग्य सामग्रीके सद्भाव में होता है, इसलिए इनका उक्त पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। तथा पाँच ज्ञानावरणादिका बन्ध विहारवत्स्वस्थान और एकेन्द्रियों में भारणान्तिक समुद्धात आदिके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य ५१ फोसणपत्वणा ४४. एइंदि०-पुढवि०-आउ० तेउ०-बाउ०-यणप्फदि-णियोद-सन्वयादराणं च सव्वपगदीणं जह० अजह० सव्वलो। णवरि पादरएइंदिय-पजत्तापज० जह० लोगस्स संखेंज० । अजह० सव्वलो० । तससजुत्ताणं जह० अजह लोगस्स संखेन्ज मणुसाउ० सव्वाणं जह० ओथं । अजह• लोगस्स असंखें सन्चलो । मणुसगदि- तिगं च जह० अजह लोगस्स असंखें। एवं चादरवाऊणं बादरवाउ अपज्जत्तयाणं च । णवरि मणुसगदिचदुक्कं वज्ज । एवं चादरपुढविकाइगदीणं एइंदियसंजुत्ताणं जह० लोगस्स असंखें । अजह सबलो। तससंजुत्ताणं जह० अजह० खेतमंगो। सन्चबादराणं उजो०-बादर०-जस० जह० खेत्तभंगो । अजह सत्तचों । सव्वसुहमाणं सव्वपगदीणं जह० अजह. सव्वलो० । णवरि मणुसाउ० जह• अजह. लोगस्स असंखें सन्चलो। । ------ प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका पर्शन सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम नौवटे चौदह भागप्रमाण कहा है । तथा शेष प्रकृतियोंका बन्ध एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात आदिके समय सम्भव नहीं है, इसलिए उनका अजघन्य प्रदेशवध करनेवाले जीवोका तथा दो आयुओका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। शेप देवोमें इसीप्रकार अपना-अपना सर्शन जानकर यह घटित कर लेना चाहिए । विशेषता न होनेसे उसका अलग-अलग निर्देश नहीं किया है। ४४. एकेन्द्रिय, पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, निगोद और सब वादर जीवोमे सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि वादर एकेन्द्रिय और उनके पर्याप्त व अवर्याम जीवोंमे जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने लोकके असंख्यात भाग- प्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है ! ससंयुक्त प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने लोकके संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मनुष्यायुका सब जीवोमे जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका पर्शन ओघके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातचे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मनुष्यगतित्रिकका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार बार वायुकाचिक और बादर वायुकायिक अपर्याप्त जीवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि मनुष्यगतिचतुष्कको छोड़कर कहना हिए । इसीप्रकार वादर पृथिवीकायिक आदि जीवोमे एकेन्द्रिय संयुक्त प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । ससंयुक्त प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका सर्शन क्षेत्रके समान है। सब बाहर जीवोंमे उद्योत, बादर और यश कीर्तिका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीबोका सर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। सब सूक्ष्म जीवोमें सब प्रकृतियोका जघन्य और अजवन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीबॉने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि मनुष्यायुका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंने लोकके असंल्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है।
महावंधे पदेसवंधाहियारे ४५. पंचिंदि० स०२ सन्यपगदीणं जह० खेत्तभंगो। अजह० पगदिफोसणं कादच्वं । ४६. पंचमण-तिण्णिवचि० पंचणा०-णवदंसणा०-दोवेद-मिच्छ०-सोलसक०- सत्तणोक० -तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरा सरीर-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४- थावर-पजत्त-पत्ते-थिराथिर-सुभासुभ-भग-अणादें-अजस०-णिमि०-णीचा०-पंचंत. जह० अट्ठ० । अजह० लोगस्स असंखें. अट्ठचौँ सव्वलोगो वा । इथि०-पुरिस०- [पचिंदि०-] पंचसंठा-ओरालि अंगो०-छस्संघ०-दोविहा०-तस-सुभग-दोसर-आर्दै। जह० अट्ठ० । अजह० अट्ठ-बारह । दोआउ०-तिण्णिजादि-आहार०२ जह० अज० खेत्तभंगो। दोआउ०-मणुस०-मणुसाणु०-आदाव-तित्थ०-उच्चा० जह० अजह० विशेपार्थ-यहाँ एकेद्रियादि उक्त मार्गणाओम सब प्रकृतियोका जघन्य स्वामित्व और अपना-अपना स्पर्शन आदि जानकर सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करने वाले जीवोका स्पर्शन मूलमे कहे अनुसार घटित कर लेना चाहिए। विशेष वक्तव्य न होनेसे यहाँ उसका अलग-अलग स्पष्टीकरण नहीं किया है। ४५. पञ्चेन्द्रियद्विक और सद्विक जीवामे सब प्रकृतियांका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन प्रकृतिवन्धके समान करना चाहिए। विशेषार्थ-चार आयुओका बन्ध मारणान्तिक समुद्धात आदिके समय सम्भव नहीं और शेप प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशवन्ध भवके प्रथम समयमें अपनी-अपनी योग्य सामाग्रीके सद्भावमें होता है, इसलिए इस अपेक्षासे स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तथा सब प्रकृतियोका प्रकृतिवन्धके समय जो स्पर्शन प्राप्त होता है, वह यहाँ उनका अजघन्य प्रदेशवन्धकी अपेक्षा बन जाता है, इसलिए उसे प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान जाननेकी सूचना की है। ४६. पाँची मनोयोगी और तीन बचनयोगी जीवामे पॉच ज्ञानावरण, नी दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, सात नोकपाय, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिक- शरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तियश्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश कीति, निर्माण, नीचगोत्र और पोच अन्तरायका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अजघन्य प्रदेशचन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग, वसनालीका कुछ कम आठ भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेद,पुरुपवेद, पञ्चेद्रियजाति, पाँच संस्थान, औदारिकशरीर अङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर और आदेयका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम वारहवटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। दोआयु, तीनजाति और आहारकद्विकका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, तीर्थकर और उच्चगोत्रका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका १ ता० आ० प्रत्योः एइदि० तिण्णिसरीर इति पाठः ।
फोसणपख्वणा ५३ अट्ठचौँ । दोगदिन्दोआणु० जह० खेत्तभंगो। अजह० छच्चों । वेउब्बि०-वेउन्धिः- अंगो० जह० खेत्तभंगो । अजह. चारह। तेजा-क० जह० खेत्तभंगो। अजह लोगस्स असंखें अट्ठ० सब्बलो | उज्जो बादर-जस० जह० अट्ट। अजह० अट्ठ-तेरह । सुहुम-अपज साधारजह० खेत्तभंगो । अजह० लोगस्स असंखें सवलो। --~- स्पर्शन किया है। दो गति और दो आनुपूर्वीका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर अगोपागका जवन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम वारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। वैजसशरीर और कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भाग, सनालोका कुछ कम आठ भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। उद्योत, बादर और यश कीर्तिका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने असनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह घटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-उक्त योगोम पॉच ज्ञानावरणादिका जघन्य प्रदेशवन्ध देवोंमें विहारवत्स्व- स्थानके समय भी सम्भव है, अतः इस अपेक्षा सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भाग- प्रमाण सर्शन कहा है। तथा स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान और मारणान्तिक समुद्धातके समय इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे इनका लोकके असंख्यातवें भाग, सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण सर्शन कहा है। विहारवत्स्व- स्थानके समय स्त्रीवेद आदिका भी जघन्य प्रदेशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । आगे जिन प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका यह स्पर्शन कहा है, वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। तथा विहारवत्स्वस्थानके समय तो इन त्रीवेद आदिका अजघन्य प्रदेशवन्ध सम्भव है ही । साथ ही नारकियों और देवोंके तिर्यञ्चो और मनुष्योमें मारणान्तिक समुद्घात करते समय भी इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन सनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह मागप्रमाण कहा है। दो आयु आदिका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका सर्शन क्षेत्रके समान है, यह सष्ट ही है । देवोमें विहारवत्स्वस्थानके समय भी तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु आदि प्रकृतियोंके दोनों पद सम्भव है, इसलिए इनके दोनों पदोंकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है। नरकगतिद्विक और देवगविद्विकका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका सर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनका क्रमसे नारकियों और देवोमे मारणान्तिक समुद्धात करनेवाले जीवोंके अजघन्य प्रदेशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदको अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । वैक्रियिकद्विकका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें .
५४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे ४७. वचि०-असच्च०वचि० पंचणाणावरणादिपढमदंडओ मणजोगिभंगो । णवरि तेजा-क० सह तेण जहणं खेत्तभंगो। अजह० अढ० सव्वलो० । विदिय- दंडओ मणजोगिभंगो । जह. बँतभंगो। अजह० अट्ठ-बारह० । तदियदंडओ चउत्थ- दंडओ मणजोगिमंगो। जह० खैत्तभंगो । अजह० अट्टचों । [पंचम-छहदंडओ मणजोगिभंगों] | उज्जो०-बादर-जस० जह० खैत्तभंगो । अजह० अट्ठ-तेरह० । सुहुम- अपज्ज०-साधार० जह० खैत्तमंगो । अजह० लोगस्स असंखें सव्वलो० । तित्थ. -rwA --------- भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध देवोमे और नारकियोंमें मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदको अपेक्षा स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। तैजसशरीर और कार्मण शरीरका जघन्य प्रदेशबन्ध अप्रमत्तसंयत जीव करते है, इसलिए इनके जघन्य पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। तथा स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान और एकेन्द्रियांमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी इनका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भाग, सनालोका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है। देवोंके विहारवत्स्वस्थानके समय उद्योत आदिका जघन्य प्रदेशवन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध देवोमे विहारवत्स्वस्थानके समय और नारकियोंमें व एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । सूक्ष्म आदिका जघन्य प्रदेशबन्ध आयुक्न्धके समय ही सम्भव है, इसलिए ऐसे जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध स्वस्थानके समान एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण कहा है। ४७. वचनयोगी और असत्यमृपावचनयोगी जीवोंमे पॉच ज्ञानावरण आदि प्रथम दण्डकका भङ्ग मनोयोगी जीवोके समान है। इतनी विशेषता है कि प्रथम दण्डकको तैजस- शरीर और कार्मणशरीरके साथ कहना चाहिए, इसलिए इनका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सनाली- का कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। द्वितीय दण्डक भी मनोयोगी जीवोके समान लेना चाहिए। किन्तु इनका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तृतीय दण्डक और चतुर्थदण्डकका भङ्ग मनोयोगी जीवोंके समान है। मात्र जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका भग क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पञ्चम दण्डक और पष्ठ दण्डक मनोयोगी जीवोके समान है। उद्योग, चादर और यश-कीर्तिका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका भङ्ग क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने बसनाली- का कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है।
५५ फोसणपरूवणा जह० अजह० अट्ठचों। ४८. ओरालियका०-ओरालियमि०-कम्मइ०-अणाहारग ति ओघं । वेउ- ब्वियका० सव्वपगदीणं. जहखेत्तभंगो । अजह० अप्पप्पणो पगदिफोसणं णेदव्वं । दोआउ० जह• अजह. अडचा । वेउवि०मि०-आहार०-श्राहारमि०- अवगद०-मणपज०-संजद-सामाई०-छेदो०-परिहार०-सुहुमसं० खेत्तभंगो। इत्थि०-पुरिस० जह० खेत्तभंगो । अजह० अप्पप्पणो पगदिफोसणं कादव्वं । ४६. विभगे पंचणा०-णवदंस०-दोवेद०-मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक०- तिरिक्ख०-एइंदि०-तिण्णिसरीर-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४-थावर-पज्जत्त- पत्ते-थिरादिदोयुग०-दूभग-अणाद-अजस०-णिमि०-णीचा०-पंचंत० जह• अह । अजह• अट्ठ. सव्वलो० । इथि०-पुरिस०-पंचिंदि०-पंचसंठा-ओरालि अंगो०- ---- तया अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका जघन्य और अअघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-इन दोनो योगोंमें पॉच ज्ञानावरणादि जिन प्रकृतियोका जघन्य स्वामित्व द्वीन्द्रिय जीवोके होता है उन सब प्रकृतियोंका जघन्य पदको अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है । शेप स्पर्शन मनोयोगी जीबोके समान ही है। ४८. औदारिककाययोगी, औदारिकमिप्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवामें ओधके समान भङ्ग है। वैक्रियिककाययोगी जीवोमे सब प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन अपने अपने प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान ले जाना चाहिए । दो आयुओका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, अपगतवेदी, मनःपर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धि संयत और सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवोंमे क्षेत्रके समान भङ्ग है। स्त्रीवेदी और पुरुपवेदी जीवोमे जघन्यका भङ्ग क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन अपने- अपने प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान करना चाहिए । विशेषार्थ-इन सब मार्गणाओम जहाँ जिसके समान पशन कहा है उसे देख कर वह घटित कर लेना चाहिए। ४६. विभङ्गज्ञानी जीवोंमें पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकषाय, निर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, तीन शरीर, हुण्ड संस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, स्थावर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर आदि दो युगल, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वथाअजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, पञ्चेन्द्रियजाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर १ आ० प्रती 'सजढ० सजदासजट सामाद' इति पाठः । , .
५६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे छस्संघ०-दोविहा०-तस-सुभग-दोसर-आदें. जह• अट्ठ० । अजह. अट्ठ-बारह । दोआउ०-तिण्णिजादि० जह० अज० खेत्तभंगो । दोआउ०-मणुस०-मणुसाणु०-आदाव- उच्चागोद० जह० अज० अट्ठचौँ । णिरय०-णिरयाणु० जह० खेत्तभंगो। अजह. छच्चोंह० । देवगदि-देवाणु० जह० खेतमंगो। अजह. पंचचो० । बेउन्वि०-वेउन्वि०- अंगो० जह. खेत्तभंगो। अजह० ऍकारह । उज्जो०-बादर-जस० जह० अट्ठ । अजह० अद्व-तेरह० । सुहुम-अपज०-साधार० जह० खत्तभंगो। अजह० लोगस्स असंखें सव्वलो। ५०. आभिणि-सुद०-ओधि. मणुसाउ०' जह० अजह० अढचों । सेसाणं , आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर और आदेयका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु और तीन जातिका जघन्य और अजवन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्य- गत्यानुपूर्वी, आतप और उच्चगोत्रका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने बस- नालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। नरकगति और नरक- गत्यानुपूर्वीका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । देवगति और देवगत्यानुपूर्वीका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम पॉच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शनक्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने सनालीका कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उद्योत, बादर और यश-कीर्तिका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-मनोयोगी जीवोंमे पहले स्पर्शनका स्पष्टीकरण कर आये है । उसीके प्रकाशमें यहाँ भी स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए। मात्र देवगतिद्विक और वैक्रियिकद्विकका बन्ध करनेवाले जीव यहाँ ऊपर पॉच राजूके भीतर स्पर्शन करते हैं, इसलिए यहाँ देवगतिद्विकका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवांका पर्शन त्रसनालीका कुछ कम पॉच बटे चौदह भागप्रमाण कहा है और वैक्रियिकद्विकका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। ५०. आभिनिबोधिकनानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें मनुष्यायुका जघन्य और अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालोका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका १ ता० आ० प्रत्योः 'मणुसाणु' इति पाठः ।
फोसणपरूवणा जह खत्तभंगो । अजह० अप्पप्पणो पगदिफोसणं काढव्यं । एवं ओघिदं०-सम्मा०- खड़ग०-वेदग०। ५१. संजदासंजदेसु असादा०-अरदि-सोग-अथिर-असुभ-अजस० जह० अजह० छच्चों । देवाउ०-तित्थ० ज० अजह० खेत्तभंगो । सेसाणं जह० खेत्तमंगो । अजह० छच्चों। ५२. चक्खुदं० तसपञ्जत्तभंगो। किण्ण-णील०-काउ० तिरिक्खोघं । णवरि वेउब्धियछक्कं तित्थ० जह० खेत्तभंगो । अजह. पगदिफोसणं कादव्वं । तेउ-पम्म- सुक्काए सवपगदीणं आउगवजाणं च खेत्तभंगो। अजह० अप्पप्पणो पगदिफोसणं कादव्वं । दोआउ० जह० अजह० अह. सुकाए छचों । स्पर्शन किया है। शेष प्रकृतियो का जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन अपने-अपने प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान करना चाहिए। इसी प्रकार अवधिदर्शनी. सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और वेदक- सम्यग्रष्टि जीवोंमे जानना चाहिए । विशेषार्थ-देवोंमें विहारवत्स्वस्थानके समय भी मनुप्यायुका दोनों प्रकारका वन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ मनुष्यायुका दोनो पोकी अपेक्षा बसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। ५१. संयतासंयत जीवोमे असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और अयशः- कीर्तिका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवाने त्रसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । देवायु और तीर्थङ्कर प्रकृतिका जघन्य और अजघन्य प्रदेश- वन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। शेप प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने वसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-असातावेदनीय आदिका देवोमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी दोनो प्रकारका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनका दोनों पदोको अपेक्षा असनालीका कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। इसी प्रकार देवायु और तीर्थकर प्रकृतिके सिवा शेप सब प्रकृतियांका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंकी अपेक्षा स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए। मात्र इनका जघन्य प्रदेशबन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय सम्भव नहीं है, इसलिए इनका जघन्य पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। देवायु और तीर्थङ्कर प्रकृतिका दोनो पदोंकी अपेक्षा पनि क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है। ५२ चक्षुदर्शनवाले जीवोंमे त्रसपर्यापकोंके समान भङ्ग है। कृष्णलेश्या, नीललेश्या और कपोतलेश्यामें सामान्य तिर्यञ्चोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि वैक्रियिकपटक और तीर्थङ्करप्रकृतिका जघन्य प्रदेशवस्थ करनेवाले जीवोका पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन अपने अपने प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान करना चाहिए । पीनलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्यामे आयुके सिवा शेष सत्र प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका पर्शन अपने-अपने प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान करना चाहिए। दो आयुओका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने पीत और पद्मलेश्यामें सनालीका कुछ कम १ आ० प्रनौ 'अहचो० । जह० इति पाठः।
8 महावे पढ़ेसबंधाहियारे ५३. उपसम० देवगढिपंचगं आहारदुर्ग जह० अजह० खेत्तभंगो। सेसाणं जह खेत्तभंगो । अजह० अढ० । सासण सव्वपगढीणं जह० खेत्तभंगो । अजह० अप्प- प्पणो पगदिफोसणं काढच्वं । दोआउ० दवभंगो । सम्मामि देवगदि०४ जह• अजह० खैत्तभंगो । सेसाणं जह० अजह० अट्ठों। ५४. सण्णीसु सब्बपगदीणं जह० खेत्तभंगो। अजह० अप्पप्पणो पगदिफोसणं कादव्यं । असण्णीसु सव्वपगदीणं जह० खेतभंगो । अजह पगदिफोसणं पणेदन्छ । एवं फोसणं समत्तं। आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका तथा शुक्ललेश्याम बसनालीका कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-यहाँ सर्वत्र अपने-अपने स्पर्शनको जानकर वह घटित कर लेना चाहिए । जहाँ जो विशेषता कही है, उसे स्वामित्व देखकर जान लेनी चाहिए। ५३. उपशमसम्यक्त्वमे देवगतिपञ्चक और आहारकद्विकका जपन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। शेष प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशवन्ध करने- वाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सासादनसम्यक्त्वमें सब प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन अपने-अपने प्रकृतिवन्धके म्पर्शनके समान करना चाहिए। दो आयुओंका भङ्ग दबोके समान है। सम्यग्मिथ्यावृष्टि जीवोंमे देवगति चतुष्कका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका म्पर्शन क्षेत्रके समान है। शेप प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोने त्रसनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका म्पर्शन किया है। विशेषार्थ-उपशमसम्यक्त्वमे देवगति चतुष्कका प्रदेशबन्ध भी मनुष्य ही करते हैं, इसलिए देवगतिपञ्चक और आहारकद्रिकका जवन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है। सम्यग्मिथ्याइष्टि जीवामें देव- गतिचतुषकके दोनो पढौंका बन्ध करनेवाले जीवोका पर्शन क्षेत्रके समान कहनेका यही कारण है। शेप स्पर्शन स्पष्ट ही है। ५४ संत्री जीवोमें सब प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशवध करनेवाले जीयाका स्पर्शन अपने-अपने प्रकृतिबन्धके स्पर्शनके समान करना चाहिए । अमंजी जीव सब प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन प्रकृति- वन्धके स्पर्शनके समान करना चाहिए। विशेपार्थ-संजी और असंजी इन दोनो मार्गणाओमे सब प्रकृतियोके जघन्य प्रदेशबन्धका जो स्वामित्व बतलाया है उसे देखते हुए इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है। तथा सब प्रकृतियोका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन उनके प्रकृतिवन्धके स्पर्शनके समान होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि प्रकृतिवन्ध जघन्य या अजघन्य प्रदेशवन्धको छोड़कर नहीं हो सकता । उसमे भी जघन्य प्रदेशबन्ध नियत सामग्रीके सद्भावमे ही होता है, अन्यत्र तो अजघन्य प्रदेशवन्ध अधिक सम्भव होनेसे दोनोंका स्पर्शन एक समान जाननेको सूचना की है। इस प्रकार स्पर्शन समाप्त हुआ।
कालपरत्वणा ५४ कालपरूवणा ५५. कालं दुविहं-जह० उक्क० च । उक्कस्सए पगढ़ । दुवि०-ओघे०आदे० । ओघे० पंचणा०-चदुदंस०-सादा०-चदुसंज०-पुरिस०-आहारदुग-जस०-तिस्थ०-उच्चा०. पंचंत० उक्कस्सपदेसवंधकालो केव०१ जह० एग०, उक्क० संखेंजसम० । अणु० पदे० चं. केव० ? सन्नद्धा । सेसाणं सन्वपगदीणं उक्क० पदे० ५० केव० १ जह० एग०, उक० आवलि० असंखें । अणु० सन्बद्धा । तिण्णिआउ० उक्क० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । अणु० पदे० बं० ज० ए०, उक्क० पलि० असंखें । एवं ओधभंगो पंचिंदि०-तस०२-पंचमण-पंचवचि०-कायजोगि-ओरालि०-इत्यि-पुरिस०-णस०- कोधादि ०४-आभिणि-सुद०-ओधि०-चक्षु०-अचक्खु०-ओधिदं०-भवसि०-सम्मा० - खड़ग०-उवसम०-सण्णि-आहारग त्ति । णवरि विसेसो जाणिय वत्तव्वं । तेसिं ओघ- भंगो चेव । णवरि इत्यि०-पुरिस० चदुदंस०-चदुसंज०-पुरिस०-आहारदुग-जस०- तित्थ० उक० जह० एग०, उक्क० संखेंजस० । अणु० सव्वदा । सेसाणं उक्क० जह. एग०, उक्क० आवलि० असंखें । अणु० सव्वदा । एवं णबुंस०-कोधादि०३ । कालप्ररूपणा ५५ काल दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संज्वलन, पुरुषवेद, आहारकद्विक, यश कीर्ति, तीर्थकर, उच्चगोत्र और पाँच अन्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले. जीवोका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट . काल संख्यात समय है। इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कितना काल है ? सर्वदा है। शेष सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवीका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है। तीन आयुओका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है । इस प्रकार ओषके समान पञ्चेन्द्रियद्विक, त्रसद्विक, पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, काययोगी, औदारिककाययोगी, स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार कपायवाले, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिनानी, चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अवधि- दर्शनी, भव्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्रष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, संज्ञी और आहारक जीवोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि जिस मार्गणामे जो विशेषता हो उसे जानकर कहना चाहिए । यद्यपि उनमें ओघके समान ही भङ्ग है, फिर भी स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवॉमें चार दर्शनावरण, चार संचलन, पुरुषवेद, आहारकद्विक, यश कीर्ति और तीर्थङ्करप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है, तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है। शेष प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातव भागप्रमाण है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है। इसी प्रकार नपुंसकवेदी और क्रोधादि तीन कपायवाले जीवोंमें जानना चाहिए ।
६० महावंधे पदेसबंधाहियारे ५६. णिरएसु सव्वाणं उक० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । अणु० सव्वदा । तिरिक्खाउ० उक्क० णाणावरणभंगो। अणु० जह० एग०, उक्क० पलिदो. असंखें । मणुसाउ० उक्क० जह० एग०, उक्क० संखेजसम० | अणु० जह० एग०, उक्क० अंतोमु० । एवं सत्तसु पुढवीसु । विशेषार्थ-ओघसे पॉच ज्ञानावरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध श्रेणिप्रतिपन्न जीव अपनी-अपनी योग्य सामग्रीके सद्भावमे करते हैं और श्रेणि आरोहणका जघय काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है, इसलिए यहाँ इन पाँच ज्ञानावरणादिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है, तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध एकेन्द्रियादि सब जीव करते हैं। यद्यपि आहारकद्विक और तीर्थङ्करका एकेन्द्रियादि जीवोके बन्ध नहीं होता,फिर भी इनका भी बन्ध करनेवाले जीव निरन्तर पाये जाते हैं, अत इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका काल सर्वदा कहा है। तीन आयुआको छोड़कर अब रहीं शेष प्रकृतियाँ सो उनका कम-से-कम एक समय तक और अधिक-से-अधिक असंख्यात समय तक उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए उनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। तीन आयुओका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र तीन आयुओका निरन्तर सर्वदा बन्ध सम्भव नहीं है। हां, इनका एक जीवकी अपेक्षा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्धका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ नाना जीबोकी अपेक्षा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण वन जानेसे वह उक्त प्रमाण कहा है और शेष प्रकृतियोंका अनुस्कृष्ट प्रदेशवन्ध सर्वदा सम्भव होनेसे वह सर्वदा कहा है। यह ओघनरूपणा पञ्चेन्द्रिय आदि मार्गणाओंमे बन जाती है, अतः उनमें ओघके समान जाननेकी सूचना की है । मात्र तीनों वेदवाले और क्रोधादि तीन कपायवाले जीवोमें सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, इसलिए इनमे पाँच ज्ञानावरण और पॉच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशवन्धका स्वामित्व बदल जाता है, इसलिए इनमे इन दस प्रकृतियोंको शेप प्रकृतियोंके साथ गिना है। शेष कथन स्पष्ट ही है। ५६. नारकियोमें सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका काल सर्वदा है। तिर्यश्वायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका काल ज्ञानावरणके समान है । तथा अनुष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यात भागप्रमाण है। मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेश- बन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। इसी प्रकार सब पृथिवियोमे जानना जाहिए। विशेषार्थ-नारकी असंख्यात होते हैं। उनमे यह सम्भव है कि सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध एक समय तक हो और द्वितीयादि समयोंमे उनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाला एक भी जीव न हो । तथा यह भी सम्भव है कि लगातार नाना जीव सब प्रकृतियांका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करते रहें तो असंख्यात समय तक ही कर सकते हैं, इसलिए यहाँ मनुष्यायुके सिवा शेप सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट कालपरवणा ६१ ५७. तिरिक्खेसु सत्तण्णं कम्माणं उक० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । अणु० सन्चद्धा । चदुण्णमाउगाणं ओघं । एवं सवाणं अणंतरासीणं । एसिं असंखेंजरासी तेसिं णिरयभंगो। एसिं संखेंजरासी तेसिं आहारसरीरभंगो। णवरि एइंदिएसु सम्बविगप्पा सत्तण्णं क० उक० अणु० सव्वदा । दोआउ० ओघं । एवं वणप्फदि-णिगोद-सब्बसुहुमाणं वादरपुढवि०-आउ०-तेउ०-चाउ०-चादरवणफदि- पत्ते अपञ्जत्तयाणं च | पुढवि०-आउ०-तेउवाउ० तेसीए वादरा तिरिक्सओयं । तेसिं वादरपञ्जत्तगाणं पंचिंदियतिरिक्स अपजत्तमंगो। काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । तथा इनमे मनुष्यायुका वन्ध ऋग्नेवाले अधिकसे अधिक संख्यात जीव ही हो सकते हैं, इसलिए इनमे मनुष्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवीका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। अब रहा अनुत्कृष्टका विचार सो तिर्यश्वायुका वन्ध एक साथ और लगातार असंख्यात जीव कर सकते हैं और एक जीवको अपेक्षा इसके अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्धका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, अतः यहाँ इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले नाना जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है, क्योकि असंख्यात अन्तर्मुहूर्तांके कालका योग पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण ही होता है। तथा मनुष्यायुका वध करनेवाले संख्यात जीव ही हो सकते हैं, इसलिए इसका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है । इन दो प्रकृतियोंके सिवा शेप प्रकृतियोंका अनुस्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है, यह स्पष्ट ही है। साता पृथिवियोमे इसी प्रकार काल वन जानेसे उनमे सामाय नारकियोके समान जाननेकी सूचना की है। ५७. तिर्यञ्चोमें सात कर्मोंका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है । चार आयुओका भङ्ग ओधके समान है। इसी प्रकार सत्र अनन्त राशियामें जानना चाहिए । जिन मार्गणाओकी असंख्यात राशि है उनमे नारकियोके समान भग है, तथा जिन मार्गणाओकी संख्यात राशि है उनमे आहारकशरीरके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि एकेन्द्रियोंके सत्र भेदोमे सात काँका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका काल सर्वदा है। दो आयुओका भङ्ग ओघके समान है । इसी प्रकार वनस्पति, निगोद और सब सूक्ष्म जीवोमे तथा बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त, बादर जलकायिक अपर्याप्ट, आदर अग्निकायिक अपर्याप्त, बादर वायुकायिक अपर्यात और वादर बनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त जीवोंमे जानना चाहिए । पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और उनके बादरोमें सामान्य तिर्यञ्चोंके समान भङ्ग है । तथा उनके बादर पर्याप्तकोम पञ्चेन्द्रिय तियञ्च अपर्याप्तकोके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-तिर्यञ्चोमें सात कौ के उत्कृष्ट प्रदेशबन्धके जो जीव स्वामी बतलाये हैं वे कमसे कम एक समय तक उनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करे,यह भी सम्भव है और लगातार अनेक जीव क्रमसे यदि उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करे,तो असंख्यात समय तक ही कर सकते हैं। इसके बाद नियमसे अन्तर काल आ जाता है, इसलिए इनका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असख्यातबे भागप्रमाण कहा है। तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवीका काल सर्वदा है,यह स्पष्ट ही है। चार आयुओका उत्कृष्ट १. ता० आ० प्रत्यो. 'घाटरायाघ' इति पाटः। , ६२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे ५८. जहण्णए पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० दोआउ० जह० जह एग०, उक० आवलि० असंखें । अजह जह० एग०, उक० पलिदो० असंखें । मणुसाउ० जह० जह० एग०, उक० आवलि० असंखें । अजह० जह० अंतो०, उक्क० पलिदो० असंखें । णिरयगदि-णिरयाणु० जह० जह० एग०, उक्क० आवलि. असंखें। अजह. सवदा । देवगदि०४-आहार०२-तित्थ० जह० जह० एग०, उक्क० संखेजसः। अजह सव्वदा । सेसाणं सव्वपगदीणं जह० अजह. सव्वदा । एवं ओघमंगो कायजोगि०-ओरालि०-ओरालियमि०-कम्मइ०-णस०-कोषादि०४-मदि- सुद०-असंज०-अचक्खु०-तिण्णिले०-भवसि०-अभवसि०-मिच्छा०-असण्णि-आहार०- अणाहारग ति । णवरि मदि-सुद०-अभवसि०-मिच्छा०-असण्णि. देवगदि०४ णिरयगदिमंगो। और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका जो काल ओघसे घटित करके वतला आये हैं वह तिर्यञ्चोंमे भी बन जाता है, इसलिए यहाँ उसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। आगे अनन्त संख्यावाली अन्य जितनी मार्गणाएं हैं, जिनमे ओघ प्ररूपणा नहीं बनती, उनमें तिर्यञ्चोंके समान प्ररूपणा बन जानेसे उसे इनके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र एकेन्द्रियोंमें और उनके सब भेदोंमे सात कर्मोके दोनो पदवाले जीव सर्वदा पाये जाते हैं, इसलिए उनमें इनका काल सर्वदा कहा है । वनस्पति आदि आगे और जितनी मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमे भी एकेन्द्रियोंके समान काल बन जाता है, इसलिए एकेन्द्रियोंके समान जाननेकी सूचना की है। तथा असंख्यात संख्यावाली मार्गणाओं और वादर पृथिवी कायिक पर्याप्त आदि चारोमै नारकियोके समान प्ररूपणा वन जानेसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। यहाँ यद्यपि पृथिवीकायिक आदिम पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोके समान जाननेकी सूचना की है, पर उसका अभिप्राय पूर्वोक्त ही है। शेप कथन सुगम है। ५८ जघन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे दो आयु- का जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अजयन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। नरकगति और नरकगत्यानुपूर्वीका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है। देवगतिचतुष्क, आहारकद्विक और तीर्थङ्करका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका काल सर्वदा है। शेष सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका काल सर्वदा है। इस प्रकार ओघके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्र- काययोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचतुदर्शनी, तीन लेश्यावाले, भन्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवोमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञी जीवोमे देवगतिचतुष्क का भङ्ग नरकगतिके समान है। , अंतरपरूवणा ५६. सेसाणं उकस्समंगो। णरि परिमाणे यम्हि असंखेज्जा रासी तम्हि आवलि० असंखेजदिभागो । यम्हि संखेजरासी तम्हि संखेजसमयं । यम्हि अणंतरासी तम्हि सव्वदा । बादरपुढवि०-आउ०-तेउ०-याउ०-बादरपत्तेयपजत्तयाणं च उक्कस्स- मंगो। सेसा विगप्पा सव्वदा । एवं कालं समत्तं। अंतरपरूवणा ६०. अंतरं दुविहं-जह• उक्क० च । उक्क० पगदं । दुवि०-ओधे० आदे० । ओघे० सव्वपदीणं उक्कस्सपदेसर्वधतरं केवचिरं०१ जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें। अणु० पगदिअंतरं कादच्वं । एस मंगो यात्र अणाहारग त्ति । णवरि सव्वएइंदियाणं मणुसाउ० ओघं । सेसाणं उक्क० अणु० णत्थि अंतरं । एवं वणप्फदि-णियोदाणं . विशेषार्थ-नरकायु और देवायुका जघन्य प्रदेशवन्ध आयुबन्धके मध्यमें भी हो सकता है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय प्राप्त होनेसे वह एक समय कहा है। पर मनुण्यायुका जघन्य प्रदेशवन्ध त्रिभागके प्रथम समयमे होता है, इसलिए इसका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त कहा है । शेप काल जैसा उत्कृष्टके समय घटित करके वतला आये है, उसी प्रकार अपने-अपने स्वामित्वको देखकर यहाँ पर भी घटित कर लेना चाहिए । मत्यज्ञानी आदि चार मार्गणाओमे देवगतिचतुष्क का भङ्ग नरकगतिके समान कहनेका कारण यह है कि इनमे इनका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले लगातार असंख्यात जीव सम्भव हैं, इसलिए इनमे इनका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण नरकगतिके समान बन जाता है ५६. शेष मार्गणाओमे उत्कृष्टके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि जिनमे परिमाण असंख्यात है, उनमें जघन्य प्रदेशबन्धका उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है और जिनका परिमाण संख्यात है उनमें जघन्य प्रदेशबन्धका उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। तथा जिनका परिमाण अनन्त है,उनमें सर्वदा काल है । वादर पृथिवीकायिक पर्याप्त, चादर जलकायिक पर्याप्त, वादर अग्निकायिक पर्याप्त, वादर वायुकायिक पर्याप्त और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीवोंमे उत्कृष्टके समान भङ्ग है। शेष विकल्पोमे सर्वदा काल है। विशेषार्थ-यहाँ स्वामित्व को देखकर मूलमे कहे अनुसार काल घटित कर लेना चाहिए। इस प्रकार काल समाप्त हुआ। अन्तरप्ररूपणा ६० अन्तर दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे सव प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कितना अन्तर है? जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रेणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्धका अन्तर प्रकृतिबन्धके अन्तरके समान करना चाहिए । यह भङ्ग अनाहारक मार्गणातक जानना चाहिए । इतनी विशेपता है कि सब एकेन्द्रियोमें मनुष्यायुका भग ओघके समान है। शेप प्रकृतियोका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका महावंचे पदेसबंधाहियारे सबसुहुमाणं । पुढवि०-आउ०-तेउ०-बाउ० तेसि वादराणं पचेग० ओषं । तेसिं च यादरअपज०-पत्तेगअपज० एइंदियभंगो । ६१. जहण्णए पगदं । दुवि०-ओधे० आदे० । ओघे० तिण्णिआउ०-वेउ व्विय- छक्क-आहारदुग-तित्थ० जह• अजह• उक्कस्सभंगो। सेसाणं जह० अजह० णत्थि अंतरं । एवं ओघमंगो तिरिक्खोघो कायजोगि-ओरालि०-ओरालि०मि०-कम्मइ०- णस०-कोधादि०४-मदि-सुद०-असंज०-अचम्खु०-तिण्णिले०-भवसि०-अ भवसि०- मिच्छा०-असण्णि-आहार०-अणाहारग त्ति । सेसाणं अप्पप्पणो उकस्संतरं कादव्वं । एवं अंतरं समत्तं । । , , अन्तरकाल नहीं है । इसी प्रकार वनस्पतिकायिक, निगोद और सव सूक्ष्म जीवोमें जानना चाहिए । पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और इन चारोके बादर तथा प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। इनके वाटर अपर्याप्तक और प्रत्येक वनस्पतिकायिक अपर्याप्तक जीवोमें एकेन्द्रियोके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-योगस्थान जगश्रेणिके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध जिस योगसे होता है, वह एक समयके अन्तर से भी हो सकता है और सब योगस्थानोके क्रमसे हो जाने पर भी हो सकता है, इसलिए यहाँ ओघसे सब प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रेणिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । तथा इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करनेवाले जीवोका आतर जिस प्रकृतिवन्ध का जो अन्तर है उतना है यह स्पष्ट ही है । इस प्रकार यह अन्तर कथन अनाहारक मार्गणातक जानना चाहिए। किन्तु एकेन्द्रियादि कुछ मार्गणाओंमें फरक है जो अलगसे कहा है। ६१ जघन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-ओध और आदेश । ओघसे तीन आयु, वैक्रियिकपटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका अन्तर उत्कृष्टके समान है। शेष प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका अन्तर काल नहीं है। इस प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यञ्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचक्षुदर्शनी, तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवामे जानना चाहिए । शेष मार्गणाओमे अपने- अपने उत्कृष्टके समान अन्तर करना चाहिए। विशेषार्थ-तीन आयु आदिका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध यथायोग्य असंख्यात और संख्यात जीव ही करते हैं, इसलिए इनका उत्कृष्टके समान भङ्ग बन जाता है । पर शेष सव प्रकृतियोंका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध अनन्त जीव करते हैं, इसलिए इनके दोनों पदोंका अन्तर काल नही बननेसे उसका निषेध किया है। यहाँ सामान्य तिर्यञ्च आदि अन्य जितनी मार्गणाऐ गिनाई हैं उनमे यह ओधप्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमें ओघके समान जाननेकी सूचना की है। इनके सिवा शेप जितनी मार्गणाएँ हैं उनमें अपने अपने उत्कृष्टके समान प्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उसे उत्कृष्टके समान जाननेकी सूचना की है। , इस प्रकार अन्तर समाप्त हुआ।
अप्पाबहुगपरुवणा ६५ । भावपरूवणा ६२. भावं दुविहं-जहण्णयं उक्कस्सयं च । उक्क० पगदं। दुवि०-ओघे० आदे०। ओघे० सव्वपगदीणं उक्कस्साणुकस्सपदेसर्वधग ति को भावो ? ओदइगो भावो । एवं यावं अणाहारग त्ति णेदव्यं । ६३. जहण्णए पगदं। दुवि०-ओषे० आदे० । ओघे०-सव्वपगदीणं जह० अजह० पदेसवंधग त्ति को भावो ? ओदइगो भावो । एवं याव अणाहारग तिणेदव्वं । एवं भावो समतो। अप्पाबहुगपरूवणा ६४. अप्पाबहुगं दुविहं-सत्थाणप्पाबहुगं चेव परत्थाणप्पावडगं चेव । सस्थाण- प्पाबहुगं दुविहं-जह० उक्क० च । उक्क० पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० सव्वत्थोवा केवलणाणावरणीयस्स यं पदेसग्गं । मणपज्ज. उक्क० पदे० अणंतगुणं । ओधिणाणा० उक्क० पदे. विसे० । सुद० उक्क० पदे० विसे । आभिणि० उक्क० पदे विसे। ६५. सव्वव्योवा पयला० उक० पदे० । णिहाएं उक० पदे० विसे । भावप्ररूपणा ६२. भाव दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघसे सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कौन भाव हैऔदयिक भाव है। इस प्रकार अनाहारक मार्गणातक ले जाना चाहिए। ६३. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है- ओघ और आदेश । ओघसे सब प्रकृतियोका जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोका कौन भाव है ? औदयिक भाव है। इस प्रकार अनाहारक मार्गणातक ले जाना चाहिए । इस प्रकार भाव समाप्त हुआ। अल्पबहुत्वप्ररूपणा ६४ अल्पवहुत्व दो प्रकारका है-वस्थानअल्पबहुत्व और परस्थानअल्पबहुत्व । स्वस्थान अल्पवहुत्व दो प्रकारका है जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे केवलज्ञानावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाप सबसे स्तोक है। उससे मन.पर्ययज्ञानावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे अवधिज्ञानावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे श्रुतज्ञानावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे आभिनिबोधिकज्ञानावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। ६५. प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष १ आ० प्रतौ 'पदे० विसे । णिहाए' इति पाठः।
६६ महापंधे पदेसबंधाहियारे पयलापयला उक्क० पदे० विसे० । णिहाणिदाए' उक्क० पदे विसे । थीणगिद्धि ० उक्क. पदे० विसे । केवलदं० उक्क० पदे० विसे० | ओधिदं० उक० पदे० अणंतगुणं । अचक्खुदं० उक्क० पदे० विसे । चक्खुदं० उक्क० पदे० विसे० । ६६. सन्वत्थोवा असाद० उक० पदे । साद० उक० पदे० विसे० । ६७. सव्वत्थोवा अपञ्चक्खाणमाणे उक्क० पदे । कोधे० उक० पदे० विसे । माया. उक० पदे० विसे । लोमे० उक्क० पदे० विसे । पचखाणमाणे उक्क. पदे० विसे | कोघे० उक० पदे० विसे । माया० उक० पदे० विसे । लोमे० उक्क० पदे० विसे० । अणंताणु०माणे० उक्क० पदे० विसे० । कोधे० उक्क० पदे० विसे । माया० उक्क० पदे० विसे । लोभे० उक्क० पदे० विसे । मिच्छ० उक्क० पदे० विसे० । दुगुं० उक्क० पदे० अणंतगु० । भय० उक० पदे. विसे० । हस्स-सोगे उक० पदे० विसे० । रदि०-अरदि उक० पदे० विसे० । इस्थि०-णस० उक० पदे. विसे० । कोधसंज० उक० पदे० संखेंजगुणं० । माणसंज० उक० पदे० विसे । पुरिस० उक० पदे. विसे० । माया० उक्क० पदे० विसे० । लोभसंज० उक्क० पदे० संखेंज्जगु०। अधिक है। उससे प्रचलाप्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे निद्रानिद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे त्यानगृद्धिका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाप्न विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे अचक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे चक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। ६६. असातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे सातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। ६७. अप्रत्याख्यानावरणमानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अप्रत्याख्याना- वरणक्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अप्रत्याख्यानावरणमायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रत्याख्यानावरणमानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे प्रत्याख्यानावरण क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे प्रत्याख्यानावरणमायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रत्याख्यानावरणलोभका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे अनन्तानुबन्धी मानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अनन्तानुबन्धी क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे अनन्तानुबन्धी मायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अनन्तानुबन्धी लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे हास्य-शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे रति-अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे स्त्रीवेद-नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे मान- संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक १ आ० प्रतौ 'विसे । णिद्दाए' इति पाठः । ।
७ अप्पाबहुगपरूषणा ६८. चदुण्णं आउगाणं उक्कस्सपदेसग्गं सरिसं० । ६६. सन्वत्थोवा णिरयगदि-देवगदि० उक्क० पदे० । मणुस० उक्क० पदे० विसे । तिरिक्ख० उक० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा' चदुण्णं जादिणामाणं उक्क० पदे । एइंदि० उक्क० पदे० विसे । सम्वत्थोवा आहार० उक्क० पदे । वेउवि० उक्क० पदे० विसे० । ओरा० उक० पदे० विसे । तेजा० उक्क० पदे० विसे० । कम्मइ० उक्क० पदे० विसे | आहार-तेजाक० उक्क० पदे० विसे० | आहार०- कम्मइ० उक्क० पदे० विसे० । आहार-तेजा०-क० उक्क० पदे० विसे० । वेउन्धिः- तेजाक० उक्क० पदे० विसे । वेउवि०-कम्मइ० उक्क० पदे० विसे । वेउन्वियक तेजाः ०-क० उक० पदे. विसे । ओरालि०-तेजाक० उक्क० पदे० विसे० । ओरालिय.. कम्मइ० उक्क० पदे० विसे० । ओरालिय-तेजा०-क० उक० पदे० विसे० । तेजा- कम्मइ० उक्क० पदे० विसे०। सव्वत्थोवा चदुसंठा० उक्क० पदे। समचदु० उक्क० पदे० विसे । हुंड० उक्क० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा आहारंगो० उक० पदे वेउ अंगो० उक० पदे० विसे । ओरा०अंगो० उक० पदे० विसे० । सन्बत्थोवा है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। ६८. चार आयुओंका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्परमे समान है। ६६. नरकगति-देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाप्र सवसे स्तोक है। उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तिर्यश्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। चार जातियोंका उत्कृष्ट प्रदेशाम सवसे स्तोक है। उससे एकेन्द्रियं जातिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तैजसंशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे आहारक-तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आहारक-कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आहारक-तैजस-कार्मण शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रियिक-तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिक-कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिक-तैजस-कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिक- तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिक कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे औदारिक-तैजस-कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे-तैजस-कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। चार संस्थानका उत्कृष्ट प्रदेशाम सबसे स्तोक है। उससे समचतुरस्रसंस्थानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे हुण्डसंस्थानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आहारकशरीर आङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्गका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। पाँच संहननका उत्कृष्ट १ ता. प्रतौ 'णिरयग० । देवगदि० उ०प० मणुस० उ०प० मणुस० उ० प० (?) विसे । सन्बत्योवा' इति पाठः।
महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे पंचसंघ० उक्क० पदे । असंप० उक्क० पदे० विसे० । सव्वत्थोवाणील० उक्क०' पदे । किण्ण० उक्क० पदे० विसे० । रुहिर० उक्क० पदे० विसे० । हालिद्द० उक्क० पदे० विसे० । सुकिलणामा० उक्क० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा दुगंधणामाए उक्क० पदे । सुगंधणामाए उक० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा कडुक० उक० पदे । तित्थणामा० उक्क० पदे० विसे० । कसिय० उक्क० पदे० विसे०। अंबिल० उक्क० पदे० विसे । मधुर० उक्क० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा मउग-लहुगणामाए उक्क० पदे । कबड- गरुगणामाए उक्क० पदे० विसे । सीद-लुक्खणा उक्क० पदे० विसे० । गिद्ध-उसुणणा० उक्क० पदे० विसे० । यथा गदी तथा आणुपुवी । सव्वत्थोवा परघादुस्सा० उक्क० पदे० । अगुरुगलहुग-उवघाद० उक्क० पदे० विसे । आदाउज्जो उक्क० पदे. सरिसं । दोविहा० उक्क० पदे० सरिसं। सव्वत्थोवा तस-पजत्त० उक० पदे । थावर०-अपज० उक्क० पदे० विसे० । वादर-सुहुम-पत्ते-साधार० उक्क० पदे० सरिसं । सम्वत्थोवा थिर-सुभ-सुभग-आर्दै० उक्क० पदे । अथिर-असुभ-दूभग-अणार्दै उक्क० पदे० विसे० । सुस्सर-दुस्सर० उक्त० पदे० सरिसं० । सव्वत्थोवा अजस० उक्क० प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है । उससे असम्याप्तामृपाटिका संहननका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। नील नामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे कृष्णनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे रुधिरवर्ण नामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे हारिद्रवर्ण नामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे शुक्लवर्ण नामकमका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। दुर्गन्धनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाप्र सबसे स्तोक है। उससे सुगन्धनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। कुटुकरसनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशान सबसे स्तोक है। उससे तिक्तरस नामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कषायरसनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अम्लरसनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मधुरसनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। मृदु-लघुस्पर्शनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सवसे स्तोक है । उससे कर्कश- गुरुस्पर्शनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे शीत-रूक्षस्पर्शनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे स्निग्धउष्णस्पर्शनामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। जिस प्रकार गतियोका अल्पबहुत्व है, उसी प्रकार आनुपूर्वियोका अल्पबहुत्व है। परघात और उच्छ्रासका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। अगुरुलघु और उपघातका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। आतप और उद्योतका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्पर समान है। दो विहायोगतियोका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्पर समान है। त्रस और पर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशात सबसे स्तोक है । स्थावर और अपर्याप्त का उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। बादर, सूक्ष्म, प्रत्येक और साधारणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्पर समान है । स्थिर, शुभ, सुभग, और आदेयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है । अस्थिर, अशुभ, दुर्भग और अनादेयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। सुस्वर १. ता० आ० प्रत्योः 'सम्बयोवा णिमि० उक्क.' इति पाठः। २. ता. प्रतौ विसे० विसे० (१)। सम्बत्योवा' इति पाठः। ३. ता० प्रतौ 'उक्का [ विसे० ] । कसियः' इति पाठः । 'ककडगुरुग० 10 णामाए उकवी (उक्क विसे)। सीटलुक्खणा' इति पाठः। ५. ता० प्रती 'णिध (ख) उमुणा णा०' आ० प्रतौ णीदउमुणणा.' इति पाठः । ४. ता० प्रतौ દ अप्पाबहुगपरूवणा पदे । जस० उक्क० पदे० संखेज्जगु० । ७०. सव्वत्थोवा णीचा० उक० पदे० | उचा० उक्क० पदे० विसे० । ७१. सव्वत्थोवा दाणंत० उक्क० पदे । लाभंत० उक्क० पदे० विसे० | भोगत० उक्क० पर्दः विसे । परिभोगंत० उक्क० पदे विसे । विरियंत० उक्क० पदे० विसे० । ७२. णिरएसु पंचणा०-णवदंस०-पंचंत० ओघं । सम्वत्थोवा अपचक्खाण- माणे उक्क० पदे । कोधे० उक्क० पदे० विसे । माया० उक० पदे० विसे० । लोमे० उक्क० पदे० विसे० । एवं पञ्चक्खाण०४-अर्णताणु०४ । मिच्छ०' उक्क० पदे० विसे । भय० उक्क० पदे० अणंतगु० । दुगुं० उक० पदे० विसे० । हस्स-सोगे उक्क० पदे० विसे० । रदि-अरदि० • उक० पदे० विसे० । इथि०-णवंस० '. उक० पदे० विसे। पुरिस० उक्क० पदे० विसे० । माणसंज० उक्क० पदे० विसे० । कोधसंज० उ० पदे० विसे० 01 मायाए उक्क० पदे० विसे० । लोभसंज० उक० प० विसे । ७३. दोगदी तुल्ला । सन्वत्थोवा ओरा० उक० प० । तेजाक० उक्क० पदे. -~- और दुःस्वरका उत्कृष्ट प्रदेशाम परस्परम समान है। अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे यशःकीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। ७. नीच गोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे उमगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। ७१. दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशात सबसे स्तोक है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे भोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। ७२. नारकियोमे पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण और पाँच अन्तरायका भग ओधके समान है । अप्रत्याख्यानावरण मानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आगे प्रत्याख्यानावरण चतुष्क और अनन्तानुवन्धी चतुष्कका इसी प्रकार अल्पवहुत्व जानना चहिए । अनन्तानुबन्धी लोभके उत्कृष्ट प्रदेशाग्रसे मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाय अनन्तगुणा है । उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे हास्य-शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे रति-अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे स्त्रीवेदनपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे पुरुष- वेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मान संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभ संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। ७३. दो गतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्परमें तुल्य है। औदारिक शरीरका उत्कृष्ट १. ता० प्रतौ 'एवं पच्चस्खाण०४ अणंताणु०४ मिच्छ०' इति पाठः। २. ता. प्रतौ 'उक० [विसे०] | माणसंज०' इति पाठः ।
७० महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे विसे० । कम्म० उक्क० पदे० विसे० । संठाण-संघडण-घण्ण०४-दोआणु०-दोविहा०- थिरादिछयुग तुल्ला । दोआउ०-दोगोदाणं उक० पदे० विसे० । एवं सत्तसु पुढचीसु । ७४. तिरिक्खेसु सत्तणं कम्माणं णिरयभंगो। णामाणं ओघभंगो। णवरि सम्वत्थोवा जस० उक० । अज० उक्क० विसे० । एवं सधपंचिंदियतिरिक्खाणं । पंचिंदियतिरिक्खअपजत्तगेसु सत्तणं क० णिरयभंगो। णवरि मोहे. अण्णदरवेदे उ० प० विसे० । सव्वत्थोवा मणुसग । तिरि० उ० विसे । एवं णामाणं ओघं । णवरि सब्वत्थोवा जस० । अज० उ० विसे० । एवं सच्चअपजत्तयाणं सव्वएइंदि० पंचकायाणं । मणुसाणं ओघं । ७५. देवेसु सत्तण्णं कम्माणं णिरयभंगो । णामाणं ओघो । णवरि देवगदि- पाऑग्गाओ णादव्याओ। सणक्कुमार याव सहस्सार त्ति णिरयभंगो । आणद याव उबरिमगेवज्जा ति णिरयभंगो । णामाणं वण्ण-गंध-रस-फासाणं ओघं । सरीरंणारग- प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। छह संस्थान, छह संहनन, वर्णचतुष्क, दो आनुपूर्वी, दो विहायोगति और स्थिर आदि छह युगलका अलग-अलग उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्परमे तुल्य है । दो आयु और दो गोत्रोका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार सातो पृथिवियोमे जानना चाहिए । ७४. तिर्यञ्चोमे सात कोका भङ्ग नारकियोके समान है। नामकर्मकी प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। इसी प्रकार सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्वोमे जानना चाहिए | पञ्चेद्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोमे सात कोंका भङ्ग नारकियोके समान है। इतनी विशेषता है कि मोहनीयकर्ममे अन्यतर वेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे तिर्यञ्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। इस प्रकार नामकर्मकी प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि यश-कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। इसी प्रकार सब अपर्याप्तक, सव एकेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोमे जानना चाहिए | मनुष्यामे ओषके समान भङ्ग है। ७५. देवोंमें सात कोका भग सामान्य नारकियोके समान है। नामकर्मकी प्रकृतियोका भन ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि देवगतिमे वन्धको प्राप्त होने योग्य प्रकृतियों जाननी चाहिए । सनत्कुमारसे लेकर सहस्रार कल्पतकके देवांमे नारकियोके समान भन है। आनत कल्पसे लेकर उपरिम अवेयकतकके देवामें नारकियोके समान भन है। नामकर्मकी प्रकृतियोमे वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श इन प्रकृतियोका भन ओघके समान है। शरीरका भड्न १ ता० प्रतौ 'वण्ण० टोआणुः' इति पाठः । २ आ० प्रती एव सत्तमु पुढवीसु | तिरिक्खेसु सत्तण्ण कम्माण णिरयभयो। णामाण ओयो । णवरि देवगदि' इति पाठः । ता. प्रतौ 'उवरिम केवेज्जाति' इति पाट।
आपाबहुगपरूवणा भंगो । सेसाणं तुल्ला | अणुदिस याव सव्व? ति णेरड़गभंगो । णवरि णामाणं वण्ण- गंध-रस-फासाणं ओघं । सेसाणं तुल्ला | ७६. पंचिंदि०-तस०२-पंचमण-पंचाचि०-कायजोगि-ओरालि०-चक्षु०. अचखु०-भवसि०-सण्णि-आहारग ति ओघभंगो। ओरालि०मि. सत्तणं कम्माणं गिरयभंगो। णामाणं ओघं । णवरि सम्वत्थोवा जस० उक्क० पदे । अजस० उक० पदे० विसे० । वेउन्वि०-वेउवि०मि० देवो । ७७. आहार-आहारमि० पंचणा०-छदसणा०-दोवेद-पंचंत० ओघं । सव्व- त्योवा दुगुं० उक्क० पदे । भय० उक्क० पदे० विसे.'। हस्स-सोगे उक्क० पदे. विसे । रदि-अरदि० उक्क० पदे० विसे० । पुरिस० उक्क० पदे० विसे० { माणसंज. उक्क० पदे० विसे । कोषसंज० उक्क० पदे० विसे । मायासंज० उक्क० पदे० विसे। लोभसंज० उ० पदे० विसे | वण्ण-गंध-रस-फासार्ण तुल्ला० । कम्मइग० सत्तणं क० णिरयभंगो । णामाणं ओघमंगो। ७८. इत्थि-पुरिस-णqसगवेदेसु छण्णं कम्माणं णिरयभंगो। मोहो ओघो नारकियोंके समान है। शेष प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र तुल्य है। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि वकके देवोंमें नारकियोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि नामकर्मकी वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श इन प्रकृतियोका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र ओघके समान है। तथा शेष प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र तुल्य है। ७६ पञ्चेन्द्रियद्विक, सद्विक, पॉच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, काययोगी, औदारिक काययोगी, चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य, संजी और आहारक जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवॉम सात कर्मोंका भङ्ग सामान्य नारकियोंके समान है। नामकमकी प्रकृतियोका मग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। वैक्रियिककाययोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें सामान्य देवोंके समान भङ्ग है। ७७. आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोंमें पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, दो वेदनीय और पॉच अन्तरायका भग ओघके समान है। जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे हास्य-शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे रति-अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे माया- संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंस्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्शका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र परस्परमें तुल्य है। कार्मणकाययोगी जीवोंमें सात कर्मो का भङ्ग सामान्य नारकियोंके समान है। नामकर्मको प्रकृतियोंका भग ओघके समान है। ७८. स्त्रीवेदी, पुरुपवेदी और नपुंसकवेदी जीवोंमें छह कमोंका भङ्ग सामान्य नारकियोके १. ता. प्रतौ 'भय० [उ०] विसे०' इति पाठ. ।
७२ महावंधे पदेसवंधाहियारे याव इत्थि० | णस० उक० पदे० विसे० । माणसंज० उक० पदे० विसे । कोध- संज० उक० पदे० विसे० । मायासं०-लोभसंज० उक्क० पदे० विसे० । पुरिस० उक० पदे० संखेज्जगु० । गामाणं ओघं । ७६. अवगदवेदेसु पंचणा-पंचंत० ओघ । सव्वत्थोवा केवलदं० उक्क० पदे । ओधिदं० उक्क० पदे० अणतगु० । अचक्खु० उ० पदे० विसे० । चक्खु० उक्क० पदे० विसे० । सव्यस्थोवा कोधमंज० उक्क० पदे० । माणसंज० उक्क० पदे० विसे । मायासंज० उक्क० पदे० विसे० । लोभसंज०' उक० पदे० संखेंजगु० । ८०. कोधकसाइसु ओघं। णवरि मोहे नाव इथि० । णस० उक० पदे. विसे० । माणसं० उक्क० पदे० संखेंजगु० । कोषसंज० उ० पदे० विसे । मायासंज. उक्क० पदे० विसे० । लोभसंज० उक्क० पदे० विसे० । पुरिस० उक० पदे० विसे० । ८१. माणकसाइसु ओघं । णवरि मोहे याव इत्थि० । णस० उ० पदे. विसे० । कोधसंज० उक्क० पदे० संखेंज्जगु० । माणसंज. उक० पदे० विसे० 01 समान है । मोहनीय कर्मका भङ्ग स्त्रीवेदके अल्पबहुत्वके प्राप्त होने तक ओघके समान है। स्त्रीवेदके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रसे नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलन और लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । नामकर्मको प्रकृतियोका भद्ग ओघके समान है। ७. अपगतवेदी जीवामे पाँच ज्ञानावरण और पॉच अन्तरायका भङ्ग ओधके समान है। केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे अचक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेप अधिक है। उससे चक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशान सबसे स्तोक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। ८०. क्रोधकपायवाले जीवोंमे ओषके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि मोहनीय कर्ममें स्त्रीवेदका अल्पबहुत्व प्राप्त होनेतक ही ओघके समान भङ्ग जानना चाहिये । स्त्रीवेदके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रसे नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। ५१. मानकपायवाले जीचोंमें ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि मोहनीय- कर्ममें स्त्रीवेदके अल्पबहुत्वके प्राप्त होनेतक ही ओघके समान भन जानना चाहिए। आगे स्त्रीवेदके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रसे नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलन का उत्कृष्ट प्रदेशाम संख्यातगुणा है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। १. ता० प्रती 'मायसन० उ० विसे । * मायसज० उ० विसे० [चित्रान्तर्गतपाठः पुनरुक्तः ] लोभसन.' इति पाठः। २. ता० प्रती 'मोहे जोग याव] इस्थि० णपु० उक०' इति पाठः ।
७३ अप्पाबहुगपरूवणा मायासंज० उक० पदे. विसे० । लोभसंज० उक्क० पदे० विसे० । पुरिस० उ० पदे० विसे। । ८२. मायाए ओषो। णवार मोहे याब इत्थिः । णस० उक्क. पदे० विसे । कोषसंज० उक० पदे० संखेज्जगु० ० । माणसंज० उक० पदे० विसे० । पुरिस० उक्क० पदे० विसे । मायाए उक० पदे० विसे० । लोमसंज० उक० पदे० विसे । लोभक० ओघं। ८३. मदि-सुद-विभंग० अब्भव०-मिच्छा०-असण्णि० तिरिक्खोयं । णवरि अण्णदरवेदे० विसे। ८४. आभिणि-सुद-ओधि० सत्तण्णं क० ओघभंगो । सव्वत्थोवा मणुसग० उक्क० पदे । देवग० उक्क० पदे० विसे । एवं आणु० । सव्वत्थोया आहार० उक्क. पदे । ओरा० उक्क० पदे० विसे० । वेउन्चि० उक्क० प. विसे । तेजाक० उक० पदे० विसे० । कम्म० उक्क० प० विसे० । सव्वत्थोवा आहारंगो० उक० पदे । ओरा०अंगो० उक० पदे० विसे । वेउ०अंगो० उक० पदे० विसे । वण्ण-गंध-रस- उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। ८२. मायाकपायवाले जीवोंमें ओधके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि मोहनीय- कर्ममें स्त्रीवेदके अल्पबहुत्वके प्राप्त होनेतक हो ओषके समान भङ्ग जानना चाहिए । आगे स्त्रीवेदके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रसे नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलन का उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेप अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोमसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। लोभकपायवाले जीवोंमें ओषके समान भङ्ग है। १३. मत्यज्ञानी, श्रुताशानी, विमङ्गज्ञानी, अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञो जीवोंमे सामान्य तिर्यचोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमे अन्यतर वेदका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। ८४. आमिनिबोधिकजानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोमे सात कोका भङ्ग ओधके समान है। मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। इसी प्रकार आनुपूर्वियोका अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए। आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाप सबसे स्तोक है । उससे औदारिक शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आहारकशरीर आनोपानका उत्कृष्ट प्रदेशाप सबसे स्तोक है। उससे औदारिकशरीर आनोपानका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीर आझोपाङ्गका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र बिशेप अधिक है। वर्ण, १ आ० प्रती 'विसे । मदि' इति पाठ १२ ता० प्रती 'वेड अगो०-उक्क० विसे । वेउ०अगो० उक्क [१] वण' इति पाठः ।
। ७४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे फासाणं ओधों । सेसाणं सरिसं पदेसग्गं । एवं ओधिदं०-सम्मा०-खड़ग-उवसम० । मणपज्ज. सत्तण्णं क० ओघं। णामाणं आहारकायजोगिभंगो। एवं संजद-सामाइ०- छेदो०-परिहार० । संजदासंजद० आहारकायजोगिभंगो सुहुमसंप० चौदसणं ओघं । ८५. असंजद-तिणिले. सत्तण्णं कम्माणं णिरयभंगो । णामाणं तिरिक्खोपं । तेउ-पम्माणं सत्तण्णं क. देवभंगो । णामाणं ओघं । णवरि तेऊए सव्वत्थोवा अप्पसत्थ- विहायगदि-दुस्सर उक्कस्सं० । पसत्यविहायगदि-सुरसर० उकस्स० पदे० विसेसाहियं । पम्माए सव्वत्थोवा दोगदि० । देवगदि० उक० पदे० विसे । एवं आणु० । सम्वत्थोवा आहार० उक्क० पदे । ओरालि० उक्क० पदे० विसे० । वेउन्चि० उक्क० पढ़े० विसे । तेजाक० उक्क० पदे० विसे० । कम्म० उक्क० पद० विसे० । सव्व- त्योवा पंचसंठा० उक्क० पदे । समचदु० उक० प० विसे । अंगोवं० सरीरभंगो। सम्वत्थोवा अप्पसत्थ०-दूभग-दुस्सर-अणा० उक्क० पदे । तप्पडिपस्खाणं उक्क. पदे० विसे० । सुक्काए ओघं । णवरि सन्वत्थोवामणुसग० उक्क० पदे । देवग० उक्क० पदे० विसे० १ एवं आशु०। गन्ध, रस और स्पर्शका भन ओघके समान है। शेप प्रकृतियोका समान प्रदेशाग्र है । इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवाम जानना चाहिए। मन पर्ययज्ञानी जीवोमे सात कोका भङ्ग ओघके समान है। नामकमकी प्रकृतियोका भन आहारककाययोगी जीवोंके समान है। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत और परिहारविशुद्धिसंयत जीवोंमे जानना चाहिए। संयतासंयत जीवामे आहारककाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवोमे चौदह प्रकृतियोंका भङ्ग ओघके समान है। २५. असंयत और कृष्ण आदि तीन लेश्यावाले जीवोम सात काँका भन्न सामान्य नारकियोंके समान है। नामकर्मकी प्रकृतियोका भग सामान्य तिर्यञ्चोके समान है । पीत और पद्मलेश्यावाले जीवोंमें सात काँका भङ्ग सामान्य देवोंके समान है। नामकमकी प्रकृतियोंका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि पीतलेश्याम अप्रशस्त विहायोगति और दुःस्वरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है । उससे प्रशस्त रिहायोगति और सुस्वरका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। पद्मलेश्यामें दो गतियांका उत्कृष्ट प्रदेशाम सबसे स्तोक है । उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । इसी प्रकार आनुपूर्वियोके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रका अल्पबहुत्व जानना चाहिए । आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे औदारिक शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है । उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। पॉच संस्थानोंका उत्कृष्ट प्रदेशाय सबसे स्तोक है। उससे समचतुरस्रसंस्थानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आङ्गोपाङ्गोका भगशरीरोके समान है । अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुम्बर और अनादेयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है । उससे उनकी प्रतिपक्ष प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। शुक्ललेश्याम ओघके समान भर है। इतनी विशेषता है कि मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाप्र सबसे स्तोक है । उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार आनुपूर्वियोंके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रका अल्पवहुत्व जानना चाहिए । १. ता. प्रतौ० 'ओघ' इति पाठः। २. 'परिहार० सजदासजदः' इति पाठः। ३. ता. प्रती 'अप्पसत्यवि [हा यगटि' इति पाठः ।
अप्पाबहुगपरुवणा ८६. वेदगस० सन्चट्ठभंगो । णवरि सब्वत्थोवा मणुसगदि० उक्कस्सओ पदे- सबंधो । देवगदि० उक० पदे० विसे० । एवं आणु० । ८७. सासणसम्मादिट्ठीसु सत्तण्णं कम्माणं मदिमंगो। णवरि मिच्छ०- णवूस० बज । णामाणं सन्चथोवा तिरिक्खग०-मणुसग० उ० पदे० । देवगदि० उक० पदे० विसे० । वण्ण०४ ओघं। सेसं सरिसं । ८. सम्मामि० सत्तण्णं क० सबढ भंगो। सम्वत्थोवा मणुसग० उक्क० पदः । दिवगदि० उ० विसे०] । एवं आणु० । वण्ण०४ ओघं । अणाहार० कम्मइगभंगो। एवं उक्कस्सं समत्तं। ८६. जहण्णए पगदं । दुवि०-ओपे० आदे० । ओघे० णाणावरणीयाणं [दंस- णावरणीयाण] यथा उक्कस्सं सत्थाणअप्पाबहुगं तथा जहण्णं पि कादव्वं । सादासादाणं दोणं पि जहण्णयं पदेसग्गं तुल्लं । १०. सवत्थोवा अपच्चक्खाणमाणे जह० पदे । कोधे० जह० पदे० विसे । माया • जह० पदे० विसे० । लोभ० जह० पदे० विसे० । एवं पच्च- १६. वेदकसम्यग्रष्टि जीवोमे सर्वार्थसिद्धिके देवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सबसे स्तोक है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेप अधिक है। इसी प्रकार आनुपूर्वियोंके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रका अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए । ८७. सासादनसम्यग्दृष्टि जीवामे सात कोका भग मत्यज्ञानी जीवोंके समान है। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्व और नपुसकवेद इन दो प्रकृतियोको छोड़कर अल्पवहुत्व जानना चाहिए। नामकर्ममे तिर्यञ्चगति और मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। वर्णचतुष्कका भग ओघके समान है। शेष प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रका अल्पबहुत्व समान है। 4. सम्यग्मिध्यादृष्टि जीवोमे सात कर्मोंका भङ्ग सर्वार्थसिद्धिके देवोके समान है । मनुष्य- गतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है । उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार दो आनुपूर्वियोके उत्कृष्ट प्रदेशाप्रका अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए । वर्णचतुष्कका भङ्ग ओषके समान है। अनाहारक जीवाम कार्मणकाययोगी जीवोंके समान भङ्ग है। इस प्रकार उत्कृष्ट अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। ८६ जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे नानावरणीय और दर्शनावरणीयका जिस प्रकार उत्कृष्ट स्वस्थान अल्पवहुत्व कहा है, उसी प्रकार जघन्य भी करना चाहिए। सातावेदनीय और असातावेदनीय दोनोका हो जघन्य प्रदेशाग्र १० अप्रत्याख्यानावरणमानका जघन्य प्रदेशात सबसे स्तोक है। उससे अप्रत्याख्याना- वग्ण क्रोधका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य १ ता प्रती एवं । आणु० बण्ण ०४ ओर' ति पाठ । २ ता. प्रतो माणी न. पदे । [को०] ज०प० विते । माया.' आ. प्रता-माणे न पढे । माया' इति पाठ. ।
महाबंधे पदेसवंधाहियारे क्खाण०४ । एवं चेव अणंताणु०४। मिच्छ जह० पदे० विसे० । दुगुं० जह० पदे. अणंतगु० । भय० जह० प० विसे० । हस्स-सोगे जह० पदे० विसे० । रदि-अरदि० जह० पदे० विसे । अण्णदरवेदे जह० पदे० विसे । माणसंज० जह० पदे० विसे । कोधसंज० जह० पदे० विसे । मायासंज० जह० पदे० विसे० । लोभसंज. जह० पदे० विसे० । ११. सव्वत्थोवा तिरिक्ख-मणुसाऊणं जह० पदे । णिरय-देवाऊणं जह० पदे० असंखेंजगुः। १२. सव्वत्थोवा तिरिक्ख० जह० पदे । मणुस० जह० पदे० विसे । देव- गदि० जह० पदे० असंखेंजगु० । णिरय० जह० पदे० असंगु० । सव्वत्थोवा चदुण्णं जादीणं जह० पदे० । एइंदि० जह० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा ओरा० जह० पदे । तेजा० जह० पदे० विसे० । कम्म० जह० पदे० विसे० । वेउन्चि० जह० पदे० असं०गु० । आहार० जह० पदे० असं०गु० । छण्णं संठाणाणं जह० पदे. तुल्लं । सव्वत्थोवा ओरा०अंगो० जह० पदे । वेउवि अंगो० जह० पदे० असं०गु० । आहार अंगो० जह० पदे० असं०गु० । छण्णं संघडणाणं जह० पदे तुल्लं० । वण्ण- ---- ------------------ A- प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका अल्पबहुत्व जानना चाहिए । तथा इसी प्रकार अनन्तानु- बन्धीचतुष्कका अल्पवहुत्व जानना चाहिए | अनन्तानुवन्धी लोभके जघन्य प्रदेशाप्रसे मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे भयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे हास्य-शोकका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे रति-अरतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है उससे मानसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका जवन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। ६१. तिर्यश्चायु और मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे नरकायु और देवायुका जघन्य प्रदेशाप्र असंख्यातगुणा है। १२. तिर्यञ्चगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदे- शाम विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे नरक- गतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। चार जातियोंका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे एकेन्द्रियजातिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। औदारिक शरीरका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असख्यातगुणा है। उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असख्यातगुणा है। छह संस्थानोका जघन्य प्रदेशान तुल्य है । औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्गका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे क्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गका जघन्य प्रदेशाय असंख्यातगुणा है। उससे आहारकशरीर आङ्गोपाङ्गका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। छह सहननीका जघन्य प्रदेशाय परस्परम तुल्य है। वर्ण, गन्ध, आपाबहुगपरूचणा गंध-रस-फासाणं पंचअंतराइगाणं च उकस्सभंगो। यथा गदी तथा आणुपुवी । सव्व- स्थोवा तस-चादर-पञ्जत्त-पत्तेगाणं जह० पदे० । थावर-सुहुम-अपज्जत्त-साधारण० जह० पदे० विसे० । सेसाणं पगदीणं जहण्णयं पदेसग्गं तुल्लं । णीचुच्चागोद० जह० पदे० तुल्लं। ६३. णिरयेसु सत्तणं क० ओधभंगो । सम्वत्थोवा तिरिक्ख० जह० पदे । मणुस० जह० पदे० विसे । एवं आणु० । बण्ण०४ उक्कस्सभंगो। सेसाणं णामाणं जहण्णयं पदेसग्गं तुल्लं० । एवं सत्तसु पुढवीसु । णवरि सत्तमाए सव्वत्थोत्रा तिरिक्व० । मणुस० जह० पदे० असं०गु० । एवं आणु०-दोगोद० । ६४. तिरिक्खेसु ओघभंगो । एवं पंचिंदियतिरिक्साणं पंचिंदियतिरिक्स- पज्जत्त-पंचिंदियजोणिणीसु । [णवरि जोणिणीसु] सव्वत्थोत्रा तिरिक्ख० जह० पदे । मणुस० जह० पदे० विसे०। णिरय-देवगदि० जह० पदे० असंगु० । सन्वत्थोवा चगुण्णं जादीणं [जह० पदे०] एईदि० जह० पदे० विसे० । सम्बत्थोवा ओरालि. जह पदे। तेजा. जह० पदे विसे०। कम्मजह० पदे० विसेवेउन्वि० जह० पदे० असंगु० । सन्वत्थो० ओरालि अंगो० जह० पदे० । वेउ०अंगो० जह रस, स्पर्श और पाँच अन्तरायोका भङ्ग उत्कृष्टके समान है। जिस प्रकार चार गतियोंके जघन्य प्रदेशापका अल्पबहुत्व कहा है, उसी प्रकार चार आनुपूर्वियोके जघन्य प्रदेशाग्रका अल्पबहुत्व जानना चाहिए। त्रस, बादर, पर्याप्त और प्रत्येकका जघन्य प्रदेशाय सबसे स्तोक है। उससे स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। शेष प्रकृतियोका जघन्य प्रदेशाय तुल्य है। तथा नीचगोत्र और उच्चगोत्रका जघन्य प्रदेशाय परस्परमें तुल्य है। ६३ नारकियोमे सात कोका भङ्ग ओघके समान है। तिर्यञ्चगतिका जघन्य प्रदेशाप सबसे स्तोक है । उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार दोनो आनुपूर्वियोंके जघन्य प्रदेशागका अल्पबहुत्व जानना चाहिए। वर्णचतुष्कका भङ्ग उत्कृष्टके समान है। नामकमकी शेप प्रकृतियोका जयन्य प्रदेशाग्र तुल्य है। इसी प्रकार सातों पृथिवियोंमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि सातवीं पृथिवीमे तिर्यञ्चगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सवसे स्तोक है । उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। इसी प्रकार दो आनुपूर्वी और दोनो गोत्रोंके जघन्य प्रदेशाप्रका अल्पवहुत्व जानना चाहिए । ६४. तिर्यञ्चोंमे ओवके समान भङ्ग है। इसी प्रकार पञ्चेन्द्रिय तियञ्च, पञ्चेन्द्रिय तियञ्च पर्याप्त और पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिनियोंमे जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिनियोंमे तिर्यश्चगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे मनुष्यगतिका जवन्य प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे नरकगति और देवगतिका जघन्य प्रदेशात्र असंख्यातगुणा है। चार जातियोका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे एकेन्द्रियजातिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । औदारिकशरीरकाजघन्यप्रदेशात्र सबसे स्तोक है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे कार्मणशरीरका जयन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे चैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाप असंख्यातगुणा है । औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्गका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक १ आ. प्रती 'सन्त्रता निरिक्त ' इति पाठ। २ आ० प्रती 'पढे। सम्बाया जह' । ति पाठ.1 महापंधे पदेसवंधाहियारे पदे० असं०गु० । सेसाणं ओघभंगो। पंचिदितिरिक्खअपज० सव्यपगदीणं ओघं । एवं सव्वअपज्जत्तगाणं सव्वएईदिय-विगलिंदिय-पंचकायाणं च । ६५. मणुसेसु ओघभंगो । देवाणं णिरयभंगो।एवं भवण-वाणवेतर-जोदिसिय० । सोधम्मीसाण याव सहस्सार त्ति एवं चेव । णवरि दोगदि० सरिसं पदेसग्गं । एवं सव्वदेवाणं । १६. पंचिंदि०-तस०२-काययोगि०-ओरा०-ओरा०मिस्स०-कम्मइ०-णqस०- कोधादि०४-मदि-सुद०-असंन०-चक्खुदं०-अचक्खुदं०-छल्लेस्सा०-भवसि०-अ भवसिः मिच्छा-सण्णि-असण्णि-आहार-अणाहारग ति ओघभंगो। णवरि मदि-सुद०- अब्भव०-मिच्छा-असण्णि० वेउब्वियछक्क पंचिंदियतिरिक्खजोणिणिभंगो। ६७. पंचमण-तिण्णिवचि० सत्तणं क० णिरयभंगो। सव्वत्थोवा तिरिक्स०- मणुस० जह० पदे । देवग० जह० पदे० विसे० । णिरयगे० जह० पदे विसे। सम्वत्थोवा वेउ० जह० पदे । तेजा. जह० पदे० विसे । कम्म० जह० पदे० विसे । आहार० जह० पद० विसे । ओरा० जह० पदे विसे । एवं अंगो । - . है। उससे वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गका जघन्य प्रदेशाम असंख्यातगुणा है। शेष प्रकृतियोका भन ओघके समान है ।पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च अपर्याप्तकोमे सव प्रकृतियोंका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार सब अपर्याप्तक सब एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोमे जानना चाहिए। ६५. मनुष्योमें ओघके समान भङ्ग है। देवोमे नारकियांके समान भङ्ग है । इसी प्रकार भवनवासी,व्यन्तर और ज्योतिषी देवोमे जानना चाहिए । सौधर्म और ऐशान कल्पसे लेकर सहस्रार कल्पतकके देवोमें इसी प्रकार जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि दो गतियोका सहश प्रदेशाग्र करना चाहिए । इसी प्रकार सब देवोमे जानना चाहिए। ६६. पञ्चेन्द्रियद्विक, सद्विक, काययोगी, औदारिककाययोगी औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार कपायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, चक्षु- दर्शनी, अचक्षुदर्शनी, छह लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवामें ओधके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञी जीवोमे वैक्रियिकपटकका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय तिर्थञ्च योनिनियोके समान है। ६७. पॉची मनोयोगी और तीन वचनयोगी जीवोमें सात कर्मोंका भङ्ग नारकियोके समान है। तिर्यश्चगति और मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। बैंक्रियिक- शरीरका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आहारक शरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । इसी . १. ता. प्रतौ 'ज० मिस्से० [विसे०] । णिरयः' इति पाठः ।
७६ । आपाबहुगपरूवणा सेसाणं ओषो । दोवचिजोगीसे एवं चेव | गवरि वीइंदिया सामि० | वेउ-वेउ०मि. देवोघं । १८. आहार-आहार मि० पंचणा-छदंस-पंचंत० ओघं । सव्वत्थोवा साद० जह० पदे । असाद० जह० पदे० विसे० । सव्वत्थोवा दुगुं० जह० पदे । भय० जह० पदे० विसे० । हस्स० जह० पदे० विसे । रदि० जह० पदे० विसे । पुरिस० जह० पदे० विसे० । सौग० जह० पदे. विसे० । अरदि० जह० पदे० विसे० । माणसंज जह० प० विसे० । कोधसंज० जह० पदे० विसे० । मायासंज. जह०प० विसे० । लोभसंज. जह० पदे० विसे० । वण्ण०४ ओघभंगो। सव्वत्थोवा थिर-सुभ-जस० जह० पदे० । अथिर-असुभ अजस० जह० पदे० विसे । एवं मण- पज०-संजद-सामाह०-छेदो०-परिहार०-संजदासंजद० । ६६. इस्थिवे. पंचिंदियतिरिक्खजोणिणिभंगो। पुरिसवेदे पंचिंदियतिरिक्ख- भंगो । अवगदवे. पंचणा०-चदुदंस०-पंचंत० उक्कस्सभंगो । सव्वत्थोवा माणसंज जह. । .. -- - ----...... । प्रकार अगोपाडोके जघन्य प्रदेशाप्रका अल्पबहुत्व जानना चाहिए। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। दो वचनयोगी जीवों में इसी प्रकार जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि द्वीन्द्रिय जीव स्वामी हैं। वैक्रियिककाययोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोमे सामान्य देवोके समान भङ्ग है। ८. आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शना- घरण और पॉच अन्तरायका भङ्ग ओघके समान है । सातावेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे असातावेदनीयका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाप सबसे स्तोक है। उससे भयका जघन्य प्रदेशाप्रविशेप अधिक है। उससे हास्यका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे रतिका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे पुरुपवेदका जघन्य प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे शोकका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे अरतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मानसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोध- संज्वलनका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे लोभसंज्वलनका जपन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । वर्णचतुष्कका भग ओघके समान है । स्थिर, शुभ और यश-कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अस्थिर, अशुभ और अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार मन पर्थयज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत और संयतासंयत जीवोंमें जानना चाहिए। ६६. स्त्रीवेदी जीवोंमें पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिनियोके समान भङ्ग हैं। पुरुषवेदी जीवोमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोके समान भन है। अपगतघेदी जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पॉच अन्तरायका भङ्ग उत्कृष्टके समान है। मानसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाय सबसे स्तोक , १. ता. प्रतौ से [साण ओघो। दोवचिजोगीसु' इति पाठः। २. ता. प्रतौ 'सामि० (१) वे३०' इति पाठः । ३. ता० प्रती 'ज. प० ।..[अथिरअसुभभ] जस०' इति पाठः । - ४ महावंधे पदेसबंधाहियारे पदे० । कोषसंज० जह० पदे० विसे । मायासंज. जह० पदे० विसे । लोभ- संज. जह० पदे० विसे। १०१. विभंगे सत्तण्णं कम्माणं ओघभंगो। सव्वत्थोपा तिरिक्ख० जह० पदे० । मणुस० जह० पदे० विसे० । णिरयगदि-देवगदि० जह० पदे० विसे । सम्वत्थोवा ओरालि. जह० पदे। तेजा. जह० पदे० विसे०। कम्म० जह० पदे० विसे० । वेउ० जह'० पदे० विसे० । एवं [वेउ०] अंगोवंग० ! आणुपु० गदिभंगो । एवं सेसाणं ओघमंगो। १०२. आमिणि-सुद-ओधि० सत्तणं कम्माणं ओघमंगो । सम्वत्योवा मणुसग जह० पदे । देवगदि० जह० पदे० विसे । एवं आणु० । वण्ण०४ ओघभंगो। एवं ओधिदं०-सम्मा०-खइग-वेदग०-उवसम० । सासणे सव्वत्योवा तिरिक्व० जह० पदे० । मणुस० जह० पदे० विसे । देवगदि० जह० असं०गु० । एवं आणु० । सव्वत्थोवा ओरा० जह० पदे । तेजा. जह० पदे० विसे | कम्म० जह० पदे० विसे । वेउ० जह० पदे० असं०गु० । सम्मामि० सत्तणं कम्माणं है। उससे क्रोधसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मायासंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। १०१. विभङ्गजानमे सात कर्माका भन ओघके समान है। तियश्चगतिका जघन्य प्रदेशाम्र सबसे स्तोक है । उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशात विशेप अधिक है। उससे नरकति और देवगतिका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है । औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशात सबसे स्तोक है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका अन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार दो आङ्गोपाङ्गाके जघन्य प्रदेशायका अल्पवहुत्व जानना चाहिए । आनुपूर्वियोका भग चारो गतियोके समान है। इसी प्रकार शेप प्रकृतियोंका भङ्ग ओघके समान है। १०२ आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीचोमें सात कर्मोंका भङ्ग ओधके समान है । मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है । इसी प्रकार दो आनुपूर्वियोंके जघन्य प्रदेशाप्रका अल्पवहुत्व जानना चाहिए। वर्णचतुष्कका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे जानना चाहिए। सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोमे तिर्यश्चगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है । इसी प्रकार तीन आनुपूर्वियोंके जघन्य प्रदेशानका अल्पबहुत्व जानना चाहिए। औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे तोक है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिक शरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है । . १. ता. प्रतौ 'कम्म० [जह० पदे० विसे०] 1 . विउवि०] उ० ज०' आ० प्रतौ कम्म० जह० पदे विसे । उ० जह० इति पाठ० ।
अप्पाबहुगपरूवणा ८१ णिरयभंगो । सव्वत्थोवा मणुस० जह० पदे० । देवग० जह० पदे. विसे । एवं सत्थाणअप्पाबहुगं समत्तं । १०३. परत्थाणप्पावहुगं दुविधं-जह० उक्क० च । उक-पगदं। दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० सव्वत्थोवा अपञ्चक्खाणमाणे उक्क० पदेसम्गं। कोघे० उक्क० पदे० विसे । माया० उक्क० पदे विसे० । लोमे० उक० पदे. विसे । एवं पञ्चक्खाण०४- अणंताणु०४ । मिच्छ०' उक्क० पदे. विसे० । केवलणा० उक्क० पदे. विसे । पयला० उक्त० पदे० विसे । णिदा० उक० पदे विसे० | पयलापयला० उक्क० पदे० विसे । णिहाणिहा० उक्क० पदे विसे० । थीणगिद्धि० उक्क० पदे० विसे० । केवलदं० उ० पदे० विसे । आहार० उक्क० पदे० अर्णतगु० । वेउ० उक० पदे० विसे । ओरा० उक्क० पदे० विसे० । तेजा० उक्क० पदे० विसे० । कम्म० उक्क० पदे० विसे० । णिरयग० उक्क० संखेज्जगु० । [देवग० उक्क० विसे०] । मणुस० उक्क० पदे० विसे । तिरिक्ख० उक्क० पदे० विसे० | अज० उक्क० पदे० विसे० । दुगुं० उक० पदे० सं०गु० । भय० उक्क० पदे० विसे० । हस्स-सोग० उक्क० पदे० विसे । सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवामे सात कोंका भङ्ग नारकियोके समान है। मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे म्तोक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इस प्रकार स्वस्थान अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। १०३. परम्थान अल्पवहुत्व दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे अप्रत्याख्यानावरण मानका उत्कृष्ट प्रदेशाप सबसे स्तोक है। उससे अप्रत्याख्यानाचरण क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्या- न्यानावरण लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरणचतुष्क और अनन्तानुवन्धीचतुष्कके उत्कृष्ट प्रदेशागका अल्पबहुत्व जानना चाहिए। आगे मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे प्रचलाप्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे निद्रानिद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेप अधिक है। उससे त्यानगृद्धिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाय अनन्तगुणा है । उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे नरकगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाप संख्यातगुणा है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तिर्यश्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे हास्य-शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक १ ता-प्रतौ 'पञ्चरवाण०४ | अगताणु०४ मिच्छ० उ०' इति पाटः । २ ता. प्रतौ 'विसे । पयला.' इति पाठ।
महाबंधे पदेसबंधाहियारे रदि-अरदि उक्क० पदे० विसे० । इस्थि०-णस० उक्क० पदे. विसे० । दाणंत. उक्क. पदे० संखेंगु० । लाभंत० उक्क० पदे० विसे । भोगंत० उक्क० पदे० विसे । परिभोगत० उक० पदे० विसे० । विरियंत० उक्क० पदे० विसे । कोधसंज० उक० पदे० विसे | मणपज० उक्क० पदे० विसे० | ओधिणा० उक्क० पदे० विसे । सुदणा० उक० पदे० विसे । आभिणि उक्क० पदे० विसे० माणसंज० उक० पदे० विसे । ओधिदं० उक्क० पदे० विसे० । अचक्खु० उक्क० पदे० विसे । चक्खुदं० उ० विसे० । पुरिस०' उक्क० पदे. विसे । मायासंज० उ० पदे० विसे० । अण्णढरे आउगे उक्क० पदे० विसे० । णीचा० उक्क० पदे० विसे । लोभसंज० उक्क० पदे० विसे० । असादा० उ० पदे० विसे० । जस०-उच्चा० उक्क० पदे. विसे० । सादा० उ० पदे० विसे । १०४. आदरोण पोरइएसु सब्बत्थोवा अपचक्खाणमाणे उक्क० पदे । कोधे० उक्क० पदे० विसे० । माया० उ० प० विसे० । लोभ० उ०प० विसे० । एवं मूलोपं याव केवलदसणावरणीयस्स उक्स्सपदेसगं । ओरा० उक० पदे० अणंतगु० । तेजा. है । उससे गति-अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे स्त्रीवेद-नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे भोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे मन पर्ययनानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम्र विशेष अधिक है। उससे अवधिज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे आभिनिबोधिक ज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अबधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे अचतुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे चक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे पुरुपवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे मायासज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है । उससे अन्यतर आयुका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशप अधिक है। उससे नीचगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभ- मंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे असातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे यश कीर्ति और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे सातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। १०४. आदेशसे नारकियोमे अप्रत्याख्यानावरण मानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उमसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इस प्रकार केवलदर्शनावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है इस स्थानके प्राप्त होने तक मूलोधके समान भङ्ग है। आगे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशान १ आ० प्रलौ 'अचक्खु० चकावु० उक्क० पदे० विसे० । पुरिस' इति पाठः।
२३ ------ ----------- अप्पावहुगपरूवणा उक्क० पदे० विसे० । कम्म० उक्क० पदे० विसे० । तिरिक्खग०-मणुसग० उक्क० पदे० संखेज्जगु० । जस०-अजस० उक्क० पदे० विसे० । दुगुं० उक्क० पदे० संखेंजगु० । भय० उक्क० पदे० विसे । हस्स-सोगे उक्क० पदे० विसे । रदि-अरदि० उक्क० पदे० विसे । इत्थि०-णबुंस० उक्क० पदे० विसे० । पुरिस० उक्क० पदे० विसे० । माण- संज० ० उक० पदे. विसे । कोधसंज० उक्क० पदे. विसे । मायासंज. उक्क० पदे० विसे० । लोभसंज० उक्त० पदे० विसे । दार्णत० उक० पदे० विसे० । लाभंत. उक्क० पदे० विसे । भोगत० उक्क० पदे. विसे० । परिभोगंत० उक्क० पदे० विसे । विरियंत० उक० पदे० विसे । मणपज्जे० उक्क० पदे० विसे० । ओधिणा० उक्क० पदे० विसे । सुद० उक० पदे० विसे० । आभिणि० उक्क० पदे० विसे । ओधिदं० उक० पदे. विसे० । अचक्खु० उक्क० पदे० विसे० । चक्खुद उक्क० पदे० विसे । अण्णदरे आउगे० उक्क० पदे० संखेंज्जगु० । अण्णदरे गोदे० उक्क० पदे० विसे । अण्णदरे वेदणीए० उक्क० पदे० विसे । एवं सत्तसु पुढवीसु । १०५. तिरिक्खेसु मूलोघं याव केवलदसणावरणीयस्स उक्क० पदे० विसे० । अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है । उससे तिर्यश्चगति और मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यात- गुणा है । उससे यश-कीर्ति और अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे हास्य और शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे रति और अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाप्र विशेष अधिक है। उससे स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे माया- संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे भोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मन पर्ययज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अवधिज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आमिनिबोधिक ज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अचनु- दर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे चक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम्र विशेष अधिक है । उससे अन्यतर आयुका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे अन्यतर गोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । इसी प्रकार सातो पृथिवियोमे जानना चाहिए । १०५. तिर्यश्वामें केवलदर्शनावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इस स्थानके १. आ० प्रतौ परिभोगत. उक्क० पदे. विसे० । मणपजा' इति पाठः । २. ता० प्रतौ 'अचस्खु० उ० विसे० । अचम्चु० उ० विसे० (१) चक्खुद०' इति पाठः ।
महावंधे पदेसबंधाहियारे वेउ० उक० पदे० अणंतगु०। ओरा० उक० पदे० पिसे । तेजा० उक्क० पद० विसे० । कम्म० उक्क ० पदे० विसे । णिरयगदि-देवग० उक० पदे० संखेंजगुः । मणुस० उक० पदे० विसे० । जस० उक्क० पदे. विसे० । तिरिक्स० उक्क० पदे० विसे० । अजस० उक० पदे० विसे० । सेसाणं पगदीणं णिरयभंगो । एवं पंचिंदि०- तिरिक्ख०३ । पंचिदितिरिक्सअपज्जत्त० णिरयभंगो याव कम्मइयसरीर ति । मणुस० उक्क० पदे० संखेंजगु० । जस० उक० पदे० विसे। तिरिक्ख० उक. पदे० विसे० । अजस० उक्क० पदे० विसे० । दुगुं० उक्क० संखेंजगु० । भय० उक० विसे । हस्स-सोगे० उक्क० पदे० वि०। रदि-अरदि० उक० पदे० विसे० । अण्णदर- वेदे० उक्क० पदे० विसे० । सेसाणं पगदीणं णिरयभंगो। एवं सब्वअपज्जत्तयाण तसाणं थावराणं च सव्वएइंदिय-विगलिंदिय-पंचकायाणं । णवरि मणुसाउ०-मणुस ०. मणुसाणु०- उच्चा० चत्तारि एदाणि तेउ०-बाऊणं वज्ज । १०६. मणुस०३-पंचिंदि०-तस०२-पंचमण-पंचवचि०-कायजोगि०-ओरालि. मूलोघं । देवेसु णिरयभंगो या कम्मइयसरीर ति। तदो मणुस० उक्० पद० संखेन्जगु० । तिरिक्ख० उक्क० पदे० विसे० । जस-अजस० दो वि तुल्ला उक्क० प्राप्त होने तक मूलोषके समान भन्न है । आगे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे नरकगति और देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा हे । उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तिर्यश्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है । शेप प्रकृतियाका भङ्ग नागकियोके समान है। इसी प्रकार पञ्चेन्द्रिय तिर्यचत्रिकमे जानना चाहिए । पञ्चेन्द्रिय तिर्यन अपर्याप्तकोम कार्मणशरीरके उत्कृष्ट प्रदेशानका अल्पवहुत्व प्राप्त होने तक नारकियोंके समान भङ्ग है । आगे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाय संख्यातगुणा है। उससे यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे तिर्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे अयशःकीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे हास्य और शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे रति और अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। शेष प्रकृतियांका भन नारकियोके समान है। इसी प्रकार त्रस और स्थावर सब अपर्याप्तक, सब एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोमे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अग्निकायिक और वायुकायिक जीवामे मनुष्यायु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्र इन चार प्रकृतियोको छोड़कर अल्पबहुत्व कहना चाहिए। १०६. मनुष्यत्रिक, पञ्चेद्रियद्विक, सद्विक, पाँच मनायोगी, पाच वचनयांगा, काययोगी और औदारिककाययोगी जीवोमे मूलोघके समान भङ्ग है। देवोम कार्मणशरीरके उत्कृष्ट प्रदे- शानका अल्पबहुत्व प्राप्त होनेतक नारकियोके समान भङ्ग है। उसके आगे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे तिर्यञ्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे यश.. कीर्ति और अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र दानाका परस्पर तुल्य होते हुए भी विशप अधिक है।
२५ । अप्पाबहुगपरूवणा पदे० विसे० । दुगुं० उक० पदे० संखेंजगुः । सेसाणं णिरयभंगो। एवं भवण- वाण-जोदिसि० सोधम्मीसाणेसु । सणक्कुमार याव सहस्सार ति णिरयभंगो । एवं चेव आणद याव णवगेवज्जा त्ति । णवरि विसेसो तिरिक्खगदिचदुण्णं का। १०७. अणुदिस याव सव्वट्ठ ति सव्वत्थोवाअपञ्चक्खाणमाणे० उक० पदे । कोघे० उक० पदे० विसे । माया. उक्क० पदे० विसे । लोमे० उक्क० पदे. विसे । एवं पचक्खाण०४ । केवलणा० उक्क०प० विसे० । पयला० उ०प०विसे० । णिद्दा० उ०प० विसे० । केवलदं० उ०प० विसे० | ओरा० उ०प० अर्णतगु० । तेजा० उ०प० विसे । कम्म० उ०प० विसे० । मणुस० उ०प० संखेंजगु० । जस-अजस० उ०प० विसे० । दुगुं० उक्क० पदे० संखेंजगु० । भय० उक्क० पदे विसे । हस्स-सोगे० उक० पदे० विसे० । रदि-अरदि० उ० पदे० विसे० । पुरिस० उक्क० पदे० विसे० । माणसंज० उक० पदे० विसे० । कोधसंज० उक्क० पदे० विसे । मायासं० उक्क० पदे० विसे० । लोभसं० उ. प. विसे । दाणंत. उ. प. विसे। लाभंत. उ. प. विसे० । भोगंत० उ० प० विसे । परिभोगत. उ. प. विसे । विरियंत उ०प० विसे । मणपज्ज० उ० उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । शेष प्रकृतियोका भङ्ग नारकियोके समान है। इसी प्रकार भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी, सौधर्म और ऐशान कल्पतकके देवोमे जानना चाहिए। सनत्कुमारसे लेकर सहस्रार कल्प तकके देवोमे नारकियोके समान भङ्ग है। आनत क्ल्पसे लेकर नौ अवेयकतकके देवोमें इसी प्रकार जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि तिर्यञ्चगति- चतुष्कको छोड़कर अल्पबहुत्व कहना चाहिए । १०७. अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवामे अप्रत्याख्यानावरण मानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । । उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरण चतुष्कका अल्पबहुत्व जानना चाहिए | आगे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मण- शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश-कीर्ति और अयशःकीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे हास्य और शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे रति और अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे लोभसज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे भोगान्तगयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्ररेशान - म६ महापंधे पदेसर्वधाधियारे प० विसे । ओधिणा० उ०प० विसे० । मुद० उ०प० विसे० । आभिणि० उ०प० विसे० । ओधिदं० उ०प० बिसे० 1 अचस्मु० उ०प० विसे० । चम्खुदं० उक० प० विसे । मणुसाउ० उ० पदे० संसज्जगु० । उचा० उपा० पदे० पिसे। सादासाद उपा० पदे० विसे । १०८. ओरालियमि० ओघं याय केवलदसणावरणीय ति उ०प० विसे० । दो आउ० अणंतगु० । वेउब्धि० उ०प० असं०गु० । ओरा० उ० प० विसे । तेजाफ० उ०प० विसे । क० उ० पदे. विसे । देवगदि उ० संखेंजगु० । मणुस० उ. प. विसे । जस० उ. पविसे। तिरिक्ख० उ०प०विसे । अजस० उ० प० विसे० । दुगुं० उ०प० संखेंजगु० । भय० उ० प० विसे । सेसाणं पंरिदियतिरिक्सभंगो। १०६. वेउब्वियका० दबोघं । एवं वेउम्बियमिस्सगे विणवार आउ० णत्यि। आहार०-आहारमि० सव्वत्थोवा केवलणा० उपा० पदे० । पयला० उ०प० विसे० । णिद्दा० उ०प० विसे। केवलदं० उ० ५० विसे । वेउन्धि० उ०प० अणंतगु० । विशेप अधिक है। उससे मनःपर्ययमानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे अवधिज्ञानायरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे आभिनियोधिक ज्ञानापरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अचनुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है । उससे चतुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मनुप्यायुका उत्कृष्ट प्रदेशाप्र संख्यातगुणा है। उससे उपगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे सातावेदनीय और असातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। १०८. औदारिकमिश्रकाययोगी जीवामे केवलदर्शनावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होनेतक ओघके समान भन्न है। आगे दो आयुओका उत्कृष्ट प्रदेशाम्र अनन्तगुणा है । उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाप असंरयातगुणा है। उससे औदारिफशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तेजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है । उससे यशः- कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेप अधिक है। उससे तियञ्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशान संख्यातगुणा है । उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। शेप प्रकृतियोका भग पञ्चे- दिय तिर्यञ्चोके समान है। १०६. वैक्रियिककाययोगी जीवोमे सामान्य देवोके समान भन्न है। इसी प्रकार वैक्रियिक- मिश्रकाययोगी जीवोमें भी जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें आयुकर्मका चन्ध नहीं होता | आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवामे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम सबसे स्तोक है। उससे प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। १. आ० प्रती 'मणुसाणु० उ०' इति पाठः । २.आ० प्रती तेजाक० उ०प० विसे । देवगदि०' इति पाठः।
८७ अप्पाबहुगपरूवणा तेजा० उ०प० विसे० । कम्म० उ० पदे० विसे० । देवग० उ०प० संखेंजगु० । जस०-अजस० उ० प० विसे । दुगुं० उ० प० संखेंजगु० । सेसाणं यथा अणुदिस- देवाणं । णवरि यम्हि मणुसाउ० तम्हि देवाउ० भणिदव्यं ११०. कम्मइयकायजोगीसु याव केवलदसणावरणीयं ताव मूलोघो । वेउ० उ० पदे० अणंतगु० । ओरा० उ०प० विसे । तेजा० उ० प० बिसे० । कम्म० उ० प० विसे० । देवगदि० उ०प० संखेज्जगु० । मणुस उ०प० विसे० | जस० उ० प० विसे । तिरिक्ख० उ० प० विसे० । अजस० उ०प० विसे० । दुगुं० उ०प० संखेंज्जगु० । सेसाणं यथा पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्तएसु तथा णेदव्यं । १११. इत्थि-पुरिस-णqसगेसु मूलोघं याव इत्थि०-णस० उ० प० विसे० । माणसंज० उ०प० विसे० । कोषसंज. उ. प. विसे०। मायासंज. उ. प. विसे । लोभसं० उ०प० विसे० । दाणंत० उ. प. विसे० । लाभंत० उ०प० विसे । भोगत० उ०प० विसे० । परिभोगंत० उ०प० बिसे० । विरियंत० उ०प० विसे । मणपज्ज० उ०प० विसे । ओधिणा० उ०प० विसे० । सुद० उ०प० उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश कीर्ति और अयश.कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग जिस प्रकार अनुदिशके देवीके बतलाया है,उस प्रकार जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि जहॉपर मनुष्यायु कही है,वहॉपर देवायु कहनी चाहिए । ११०, कार्मणकाययोगी जीवोंमे केवलदर्शनावरणीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है- इस स्थानके प्राप्त होने तक मूलोषके समान भङ्ग है। आगे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशा अनन्तगुणा है। उससे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तैजस- शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाय संख्यातगुणा है । उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे तिर्यश्च- गतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। शेष प्रकृतियोंका जिस प्रकार पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च पर्याप्तकोमें अल्पवहुत्व कहा है, उस प्रकार यहाँ जानना चाहिए। १११. स्त्रीवेदवाले, पुरुषवेवाले और नपुंसकवेदयाले जीवोंमें स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होनेतक मूलोघके समान भङ्ग है। आगे मानसंचलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंस्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे भोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेप अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मन पर्ययजानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अवधिज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञानावरणका उत्कृष्ट मा महापंधे पदेन गहियारे विसे । आभिणि० उ. प. विसे । ओधिदं० उ०प० विसे० । अचाबु. उ० प० पिसे० । चक्खुदं०-पुरिस० उ०प० विसे० । अण्णदरे आउगे० उ०प० विसे० | अण्णदग्गोदे जस० उ०प० विसे । अण्णदग्वेदणीप उ०प० विसे० । ११२, अवगदवेदेम सम्बन्धोत्रा केवलणा० उ० पदे । केवलदं० उफ. पदे० विसे । दाणंत० उ० प० अणनगु० । सेसाणं यथासंसं उका० पदे० विसे० । कोधसं० उ०प० विसे० । मणपज्ज० उ०प०विसे । ओधिणा० उ०प० पिसे। सुद० उ०प० विसे । आभिणि उ०प० दिसे० । माणसं० उ० ५० विसे । ओधिदं० उ० प० विसे । अचक्युदं० उ०प० विसे । चरखुदं० उ० प० विसे० । मायासं० उ०प० त्रिसे० । लोभसं० उ०प० संग्वेज्जगु०। जस०-उच्चा० उक० प० विसे० । सादा० उ०प० विसे । ११३. कोधकसाइमु मूलोघं याव इन्थि० उ० ५० विसे० । दाणंन० उ० प० विसे | लाभंत० उ०प० विसे० । भोगत० उ०प० विस० । परिभोगत० उ० प०विसे । विरियंत० उ०प० पिसे । मणपज्ज० उ. प. विसे । ओधिणा० । प्रदेशाप विशेप अधिक है। उसमे आभिनियोधिकमानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उमसे अवधिदर्शनावरणका उराष्ट्र प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अचतुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। उसने चदर्शनावरण और पुरुपवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उमसे अन्यतर आयुका उत्कृष्ट प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे अन्यतर गोत्र और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्न विशंप अधिक है। उससे अन्यतर वेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। ११२. अपगतवेढवाले जीवोम फेवलजानावग्णका उत्कृष्ट प्रदेशाम सबसे स्तोक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाम अनन्तगुणा है। शेष अन्तगयकी प्रकृतियांका क्रमसे उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आगे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे मनःपर्ययज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अवधिज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है । उससे श्रुतनानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आभिनिवोधिकजानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्न विशेप अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उनसे अचनुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे चतुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश-कीर्ति और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे सातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्न विशेष अधिक है। ११३. क्रोधकपायवाले जीवोमें स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है-यस स्थानके प्राप्त होने तक मूलोघके समान भङ्ग है। आगे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्न विशेष अधिक है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे भोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्त- रायका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे मनःपर्ययज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अप्पाबहुगपरूवणा उ०प० वि० । सुद० उ० वि० । आभिणि० उ० वि० माणसं० उ० वि० । कोधसं० उ० वि० मायसं० उ० वि० । लोभसं० उ०वि० । ओघिदं० उ० वि० । अचम्खुदं० उ० वि० । चक्खुदं० उ० वि० । पुरि० उ० वि० । अण्णदरआउ० उ० वि० । अण्णदरे गोदे जस० उ० वि० । अण्णदरे वेदणी० उ० वि० माण- कसाइसु कोधकसाइभंगो याव आभिणि० उ० वि० । कोषसंज० उ० वि० | ओधिदं० उ० वि० । अचक्षु० उ० वि० | चक्षु० उ० वि० | माणसंज० उ० विसे० । माय- संज० उ० विसे० | लोभसंज० उ० वि० । पुरि० उ० वि० । णवरि कोधकसाइभंगो। मायकसाइ० माणकसाइभंगो याव माणसंजल० उ० वि० । पुरि० उ० वि० । मायसंजल० उ० वि० । लोभमं० उ० वि० । अण्णदरे आउगे उ० विसे । णवरि कोधकसाइभंगो । लोभे मूलोयं । ११४. मदि-सुद-विभंग० पंचितिरि०पज्जत्तभंगो याव अण्णदग्वेदणी० उ० । अधिक है। उससे अवधिनानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञाना- वरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे आभिनिवोधिक ज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशान विशेष अधिक है। उससे मान संज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोध- संचलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंघलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लाभसंचलनका उत्कृष्ट प्रदेशान्न विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे अचतुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे चनुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशात्र विशेष अधिक है । उससे अन्यतर आयुका उत्कृष्ट प्रदेशाग्न विशेष अधिक है । उससे अन्यतर गोत्र और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अन्यतर वेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । मानकषायवाले जीवोमें आभिनिवोधिक ज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है इस स्थानके प्राप्त होनेतक क्रोध कपायवाले जीवोंके समान भङ्ग है। आगे क्रोध संचलनका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अचक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे चक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे लोभसंचलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इतनी विशेषता है कि क्रोधकपायवाले जीवोंके समान भङ्ग है। मायाकपायवाले जीवोंमें मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है इस स्थानके प्राप्त होने तक मानकपायवाले जीवोंके समान भङ्ग है। आगे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंचलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंचलनका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे अन्यतर आयुका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इतनी विशेषता है कि आगे क्रोधकपायवाले जीवोंके समान भङ्ग है । लोभकषाय- वाले जावोंमें मूलोघके समान भङ्ग है। ११४. मत्यन्नानी, श्रुताज्ञानी और विभङ्गज्ञानी जीवोंमें अन्यतर वेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है इस स्थान प्राप्त होनेतक पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च पर्याप्तकोंके समान भङ्ग है।
महावंधे पदेसबंधाहियारे वि० । आभिणि-सुद-ओधि० अणुत्तरविमाणवासियदेवभंगो याव केवलदसणावरणीयं० त्ति । तदो आहार० उ. अणंतगु०। ओरा० उ०प० विसे । वेउ० उ०प० विसे 01 तेजा० उ. प. विसे । कम्म० उ०प० विसे०। मणुस० उ० प० संखेंजगु० । देवगदि० उ०प० विसे० । अजस० उ० प० विसे० । दुगुं० उ०प० संखेंजगु० । भय० उ० ५० विसे० । हस्स-सोगे० उ० प० विसे० । रदि-अरदि० उ०प० विसे० । दाणंत० उ० प० संखेंजगु० । लाभंत० उ०प० विसे । भोगत. उ०प०विसे । परिभोगंत० उ. प. विसे । विरियंत उ०प०विसे । उवरि ओघं। णवरि णिरयाउगं तिरिक्खाउगं णीचा० णत्थि । ११५, मणपज्ज. सव्वत्थोवा केवलणा० उ० प० । पयला० उ० ५० विसे । णिद्दा० उ०प० विसे । केवलदं० उ०प० विसे । आहार० उ० प० अणंतगु० । वेउ० उ० प० विसे० । कम्म० उ० प० विसे० । देवगदि० उ०प० संखेंजगु० । अजस० उ० प० विसे० । दुगुं० उ० प० संखेंजगु० । उवरि ओधि- णाणिभंगो । णवरि मणुसाउ० णत्थि । एवं संजदा० । सामाई०-छेदो० मणपज्जव- आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमे केवलदर्शनावरणके अल्पवहुत्वके प्राप्त होनेतक अनुत्तरविमानवासी देवोके समान भङ्ग है। उससे आगे आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे औदारिक शरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशप अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अयश-कोर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशात विशेप अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे भयका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे हास्य और शोकका उत्कृष्ट प्रदेशाप्न विशेप अधिक है। उससे रति और अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाप संख्यातगुणा है। उससे, लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे भोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे आगेका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि यहाँ नरकायु, तिर्यश्चायु और नीचगोत्रका वन्ध नहीं होता। ११५. मनःपर्ययज्ञानी जीवोमे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे क्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे अयश-कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाम्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशान संख्यातगुणा है । उससे आगे अवधिज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि मनुष्यायु नहीं है। इसी प्रकार संयत जीवोंमें जानना चाहिए। सामायिकसंयत और १ ता० प्रती एवं संजदा० सामा०' इति पाठः ।
। ० आपाबहुगपरूवणा हर भंगो याव रदि-अरदि० उ०प० विसे० । दाणंत० उ०प० विसे० | उनि माणकसाइ- भंगो यात्र माणसंज० उ. प. विसे० ! पुरिस० उ०प० विसे० । मायासंज० उ० प० विसे० । देवाउ० उ०प० विसे । उच्चा०-जस० उ०प० विसे । लोभसं० उ०प० विसे। अण्णदरवेदणी० उ०प० विसे । ११६. परिहारे० सन्यत्थोवा केवलणा० उ० पद०। पयला० उ०प० विसे । णिदा० उ० प० विसे । केवलदं उ०प० विसे० । आहार० उ० प० अणंतगु० । वेउ० उ०प० विसे | तेजा० उ. प. विसे । कम्म० उ०प० विसे० । उपरि आहारकायजोगिभंगो। ११७. सुहुमसंप० सम्वत्थोवा केवलणा० उ० पदे० । केवलदं० उ० ५० विसे । दाणंत० उ० प. अणंतगु० । लाभंत० उ०प० विसे० | भोगंत० उ०प० विसे । परिभोगंत० उ०प० विसे० । विरियंत० उ०प० विसे० । मणपज्जव० उ०प० विसे० । ओधिणा० उ०प० विसे । मुद० उ० प. विसे० । आभिणि उ०प० विसे० । ओधिदं उ०प० विसे० । अचक्खु० उ० प० विसे० । चक्लु० उ० छेदोपस्थापनासयत जीवोमे रति और अरतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होनेतक मनःपर्ययजानी जीवोके समान भङ्ग है। आगे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आगे मानसज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है- इस स्थानके प्रान होनेतक मानकपायवाले जीवोंके समान भङ्ग है। आगे पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे देवायुका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे उच्चगोत्र और यश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदशाम विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। ११६. परिहारविशुद्धिसंयत जीवोमे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय सबसे स्ताक है। उससे प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाय अनन्तगुणा है। उससे वैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उसके आगे आहारककाययोगी जीवोके समान भङ्ग है । ११७. सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीर्वोमे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय सबसे म्तोक है उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे दानान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाम अनन्तगुणा है। उससे लाभान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे भोगा- न्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मन.पर्ययज्ञाना- वरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अवधिनानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे अतज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आभिनि- बोधिकज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अचक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे १ ता. प्रतौ 'मणपजबभंगो । याव' इति पाठ । २ ता. प्रतौ 'भगो । याव' इति पाठः।
६२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे प० विसे० । जस० उच्चा० उ०प० संखेंजगु० । सादा० उक्क० प० विसे । ११८, संजदासंजदेसु सव्वत्थोवा पञ्चक्खाणमाणे० उ० पदे० । कोघे० उ० प० विसे० । माया० उ०प० विसे । लोमे० उ०प० विसे । केवलणा० उ०प० विसे । पयला० उ० प० विसे० | णिदा० उ०प० विसे । केवलदं० उ०प० विसे । वेउ० उ०प० अणंतगु० । उवरिं आहारकायजोगिभंगो। ११६, असंजदेसु पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्तभंगो । चक्खुदं०-अचक्खुदं० ओघो । ओधिदं० ओधिणाणिभंगो। किण्ण-णील-काऊणं असंजदभंगो । तेऊए ओघं याव केवलदसणावरणीय' ति। तदो आहार० उ०प० अणंतगु० । वेउ० उ०प० विसे । ओरा० उ०प० विसे । तेजा० उ०प० विसे । कम्म० उ०प० विसे । मणुस० उ०प० संखेंजगु० । देवग० उ०प० विसे । तिरिक्ख० उ०प० विसे। जस०-अजस० उ०प० विसे० उवरिं आहारकायजोगिभंगो। णवरि तिरिक्खाउ मसाउ० अथि। चक्षुदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे यश कीर्ति और उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सख्यातगुणा है। उससे सातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। ११८. संयतासयत जीवोमे प्रत्याख्यानावरण मानका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे प्रत्याख्यानावरण क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रत्याख्यानावरण मायाका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे केवलज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे निद्राका उत्कृष्ट प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे बैंक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे आगे आहारककाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। ११६ असंयत जीवोंमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च पर्याप्तकोके समान भङ्ग है। चक्षुदर्शनवाले और अचक्षुदर्शनवाले जीवोमे ओधके समान भङ्ग है। अवधिदर्शनवाले जीवोंमे अवधिज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है । कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले और कापोतलेश्यावाले जीवोमे असयतोंके समान भङ्ग है । पीतलेश्यावाले जीवोमे केवलदर्शनावरणीयका अल्पबहुत्व प्राप्त होनेतक ओघके समान भङ्ग है । उससे आगे आहारकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे वैक्रियिकशरीरका रस्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशात्र विशेष अधिक है । उससे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे देवतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तिर्यञ्चगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे यशःकीर्ति और अयश-कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आगे आहारक- काययोगी जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि यहॉपर तिर्यश्चायु और मनुष्यायु हैं। अर्थात् आहारक काययोगमे तिर्यञ्चायु और मनुष्यायुका बन्ध नहीं था,किन्तु पीतलेश्यामें इन दोनो आयुओका बन्ध होता है। १ ता०आ प्रत्योः 'केवलणाणावरणीय' इति पाठः । २ ता.आप्रत्योः 'णवरि णिरयाउ तिरिक्खाउ० णत्थि' इति पाठः।
आपाबहुगपरूवणा ६३ १२०. पम्माए तेउभंगो । णवरि आहारसरीरादो ओरा० उ०प० विसे । वेउ० उ०प० विसे । तेजा० उ०प० विसे० । कम्म० उ० प० विसे० । तिरिक्ख- मणुसगदि० दो वि सरिसा संबंजगु० । देवग० उ० प० विसे० । एवं सुक्काए याव कम्मइगसरीर त्ति । तदो मणुसग० उक्क० पदे० संखेंज्जगु० । देवग० उ०प० विसे । अजस० उ०प० विसे | उवरि ओषो। १२१. सासणे ओघ याव केवलदंस० । णवरि मिच्छ० णस्थि । तदो ओरा० उ०प० अणंतगु० । वेउ० उ०प० पिसे । तेजा० उ० प० विसे० । कम्म० उ०प० विसे० । तिरिक्स-मणुसग० उ० प० संखेंजगु० | देवग० उ० प० विसे० । । जस०- अजस० उ० प० विसे० । दुगुं० उ० प० संखेंजगु० । उवरि मदिभंगो । णवरि णस० णत्थि। १२२. सम्मामि० वेदगभंगो। णवरि आउ० आहार० णत्थि । मिच्छा०- असण्णि० मदि भंगो । सण्णि०-आहार० मूलोघं । अणाहार० कम्मइगभंगो। एवं उक्कस्सपरत्थाणअप्पाबहुगं समत्तं । १२०. पद्मलेश्याम पीतलेश्याके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि आहारकशरीरसे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे चैक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे तैजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे तिर्यञ्चगति और मनुष्यगति इन दोनोका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र आपसमे समान होकर संख्यातगुणा है ! उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। शुक्ललेश्याम कार्मणशरीरका अल्पबहुत्व प्राप्त होनेतक इसीप्रकार जानना चाहिए । उससे आगे मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे अयश कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आगे ओघके समान भङ्ग है। १२१ सासादनसम्यक्त्वमे केवलदर्शनावरणका अल्पबहुत्व प्राप्त होने तक ओषके समान भङ्ग है । इतनी विशेपता है कि मिथ्यात्वप्रकृति नहीं है। आगे औदारिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे बैंक्रियिकशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तेजसशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तिर्यञ्चगति और मनुष्यगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे देवगतिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे यश कीर्ति और अयश-कीर्तिका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे आगे मत्यज्ञानी जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि नपुंसकवेद नहीं है । १२२ सम्यग्मिथ्याइष्टि जीवोमे वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि आयु और आहारकशरीर नहीं है। मिथ्यादृष्टि और असंज्ञी जीवोमे मत्यत्रानी जीवोंके समान भङ्ग है। संज्ञी और आहारक जीवोमे मूलोघके समान भङ्ग है। अनाहारक जीवोमे कार्मणकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। इस प्रकार उत्कृष्ट परस्थान अल्पबहुत्व समाप्त हुआ।
४ महानवे पढ़ेसबवाहियारे १२३. जहण्णए पगदं । दुवि०-ओघ० आद०। ओव० सम्वत्थोवा अपच्च- क्याणमाणे जहण्णयं पदसग्गं । कोष० ज०प० विसे । माया ज० प० विस० । लोमे० जह० प. विसे । एवं पञ्चश्वाण०४-अणंताणु०४ । मिच्छ० ज० ५० विस०। केवलणा० ज०प० पिसे । पयला. ज. प. विसे० । णिद्दा० ज०प० विस० । पयलापयला० जह०प० विसे० । णिहाणिद्दा० ज प० विसेका थीणगि० ज० प. विसे० केवलदं० ज० प० बिसे० । ओरा० ज०प० अणंतशु० । तेजा० ज०प० विसे । कम्म० ज०प० विसे० । तिरिक्स० ज० प० मंसजगु० जस-अजस० ज० प० विसे० । मणुस० ज० प० विसे० । दुगुं० ज० प० संखेंजगु० । भय० ज० प० विसे । हस्स-सोग० ज० प० विसे० । रदि-अरदि० ज० प० विसे० । अण्णदरवेद. ज. प. विसे । माणसंज० ज०प० बिसे । कोषसं० ज०प० विसे० मायासं. ज. प. विसे । लोभसं० ज०प० विसे० । दाणंत० ज. प. विसे० । लाभंतजा प० बिसे० । भोगंत० ज०प० विसे० परिभोगंव० ज०प० विस० । विरियंत. ज. ५२३ जघन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-आंघ और आदेश । ओपसे अप्रत्या- त्यानावरण मानका जघन्य प्रदेशाम सवसे ग्ताक है । उससे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधका जघन्य प्रदेशात्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य प्रदेशात विशेप अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरण चतुष्क और अनन्तानुबन्धी चतुककी मुख्यतासे अल्पवहुत्व जानना चाहिए। आगे मिथ्यात्वका जपन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे केवलनानावरणका जघन्य प्रशान विशेप अधिक है। उससे प्रचलाका जवन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे निद्राका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे प्रचलाप्रचलाका जप व प्रदेशाय विशेष अधिक है। उसले निद्रानिद्राका जघन्य प्रदेशात्र विशेष अधिक है। उससे स्त्यानगृद्धिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका जयन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरकका जघन्य प्रदशाग्र विशेप अधिक है। उससे तिर्यच्चगतिका उपन्य प्रदेशाग्र सख्यातगुणा है । उससे यश कीर्ति और अयश-कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है । उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगणा है। उससे भयका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे हाम्य और शोकका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे रति और अतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदका जघन्य प्रदेशात्र विशेष अधिक है। उससे मानर्मज्वलनका जवन्य प्रदेशाग्र विगेप अधिक है। उससे क्रोधसंचलनका जवन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंञ्चलनका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे लोभसंचलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे दानान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे लाभान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे भोगान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष १. ताप्रा 'कोड [ध०] जा' इति पाठः । २ तात्प्रती 'अणताणु०४ मिच्छ० इति पाठ ।
अप्पाबहुगपल्वणा प० विसे० । मणपज्ज० ज० प० विसे० । ओधिणा० ज० प० विसे । सुदणा० ज० प० विसे० 1 आभिणि. ज. प. विसे० । ओधिदं० ज. प. विसे० । अचक्खुदं० ज० प० वि० | चखुदं० ज० प० विसे० । अण्णदरगोदे ज० प० संखेंजगु० । अण्णदरवेढणी० ज०प० विसे० । वेउब्बि० ज० प० असंखेज्जगु० । देवगदि० ज० प० संखेंजगु० । तिरिक्ख-मणुसाऊणं ज० प० असंखेज्जगु० । णिरयगदि० ज० प० असं- खेजगु० । णिरय-देवाऊणं ज०प० संखेंजगु० । आहार० जह० पदे० असंखेंजगुणं । १२४. आदेसेण णिरयगदीए परइएसु मूलोघं याव अण्णदरवेदणी० ज० प० विसे | तदो तिरिक्त-मणुसाऊणं ज०प० असंखेंजगु०। एवं छसु पुढवीसु । सचमाए मृलोयो याव कम्मइ० ज० ५० विसे० । तदो तिरिक्ख० ज० प० संखेंगु ० । जस-अजस० ज० प० विसे । उवरि ओषो । णवरि याव चाखुर्द० ज० प० विसे । णीचा० ज० प० संखेंजगु० । अण्णदरवेदणी० ज०प० बिसे० ! मशुसग० ज० प० असंखेंजगु० । तिरिक्साउ० ज० प० संखेलगु० । उच्चा ज० ५० विसे० । १२५. तिरिक्खेसु मूलोघो । णपरि आहार० णत्थि । एवं पंचिंदियतिरिक्त । अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे मनःपर्ययचातावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अवधिन्नानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञाना- वरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे आमिनिबोधिकनानावरणका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे अवधिदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है उससे अचजुदर्शनावरणका उपन्य प्रदेशात विशेष अधिक है । उससे चनुदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अन्यतर गोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे अन्यतर वेदनीयका जवन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिक शरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुगा है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशात राज्यातगुणा है। उससे तिर्यश्चायु और मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशाप असंख्यातगुणा है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाप असंख्यात- गुणा है। उससे नरकायु और देवायुका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे शरीरका जघन्य प्रदेशात असंख्यातगुणा है। १२४. आदेशसे नरकगतिकी अपेक्षा नारकियोंमें अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है-इस त्यानके प्राप्त होने तक मूलोधके समान भङ्ग है । उससे आगे तिर्यश्वायु और मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशात असंख्यातगुणा है। इसी प्रकार प्रारम्भकी छह पृथिवियामे जानना चाहिए। सातवीमे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होने तक मूलोघके समान भङ्ग है । उससे आगे विर्यञ्चगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश-कीर्ति और अयश कीतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आगे ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि यह अल्पबहुत्व चतुदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशान बिशेप अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होने तक ओघके समान जानना चाहिए | उससे आगे नीच गोत्रका जवन्य प्रदेशात्र संख्यातगुणा है । उससे अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उनसे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे तिर्यश्चायुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे उमगोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। १२५ निर्यञ्चामें मूलोषके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि आहारकशरीर नहीं महाबंधे पदेसबंधाहियारे पंचिंदियतिरिक्खपज० मूलोघं याव देवगदि० ज० ५० संखेंजगु० । णिरयग० ज० प० असंगु० । अण्णदरे आउ० ज० प० संखेंजगुः । पंचिंदियतिरिक्सजोणिणीसु मलोपं याव वेउ० ज० प० असं०गु० । तदो णिरयग-देवग० ज० प० संखेंजगुः । अण्णदरे आउ० ज०प० संखेंजगु० । सव्यअपजत्तयाणं च सन्चएइंदिय-विगलिंदिय- पंचकायाणं णिरयभंगो । णवरि तेउ-वार्ण मणुसगठिचदुकं वज । १२६. मणुसेसु ओघो याव तिरिक्स-मणुसाऊणं ज० प० असं०गु० । तदो आहार० ज० प० असं०गु० | णिरयगदि० ज० प० संखेंजगु० । णिरय-देवाऊणं ज० प० संखेंजगु० । मणुसपजत्तेसु एसेव भंगो याव देवगदि० ज० प० । तदो आहार० ज० प० असं०गु० । णिरय० जह०प० संखेंजगु० । अण्णदरे आउ० ज० पदे० संखेंजगु० । मणुसिणीसु एसेव भंगो याव सादासादादीणं ज० प० विसे० । तदो वेउ० ज० प० असंखेंजगु०। आहार. ज. प. विसे० । देवगदि० ज०प० संखेंजगु० । णिरयगदि० ज०प० विसे० । अण्णदरे आउगे. ज. प. संखेंज्जगुः । । । M है । इसी प्रकार पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोम जानना चाहिए । पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च पर्याप्तकोमे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र गंख्यातगुणा है-इस स्थानके प्राप्त होने तक मूलोषके समान भङ्ग है । उससे आगे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाप असख्यातगुणा है। उससे अन्यतर आयुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिनियोमे वैक्रियकशरीरका जघन्य प्रदेशाप्र असंख्यात- गुणा है-इस स्थानके प्राप्त होने तक मूलोधके ममान भंग है। उससे आगे नरकगति और देव- गतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे अन्यतर आयुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। सत्र अपर्याप्तक, सब एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवोमें नारकियोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि अग्निकायिक और वायुकायिक जीवामे मनुष्यगति चतुष्कको छोड़कर अल्पबहुत्व कहना चाहिए । १२६. मनुष्योमे तिर्यञ्चायु और मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है-इस स्थानके प्राप्त होने तक ओघके समान भङ्ग है। उससे आगे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असख्यातगुणा है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे नरकायु और देवायुका जयन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। मनुष्यपर्याप्तकोमें देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र सम्बन्धी अल्पबहुत्वके प्राप्त होने तक यही भङ्ग है। उससे आगे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे अन्यतर आयुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । मनुष्यिनियोमै सातावेदनीय और असातावेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होने तक यही भन है। उससे आगे वैक्रियकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विरोप अधिक है । उससे अन्यतर आयुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। १. ता० प्रतौ 'एव पचिदिय-तिरिक्ख-पचिं० तिरिक्ख-पज० मूलोष' इति पाठ.। २. ता० प्रतो 'णिरय० ज० सखेज्जगु० । म[गु] सिणीसु' इति पाठः। ३. ता. प्रतौ 'याव स [सा] दास [ सा] दादीण' इति पाठः।
६७ अप्पाबहुगपरूवणा १२७. देवेसु भवण ०-वाण-जोदिसि० पढमपुढविभंगो। सोधम्मीसाणादि याव सहस्सार ति णेरइगभंगो याव कम्मइगसरीर त्ति । तदो तिरिक्स-मणुसगदि. जह०प० संखेंजगु० । जस०-अजस० ज० प० विसे० । सेसाणं णिरयभंगो । आणद याव उपरिमगेवज्जा ति एसेव मंगो । णवरि तिरिक्खाउचदुक्कं णत्थि । १२८. अणुदिस याव सव्वट्ठ त्ति सन्वत्थोपा अपञ्चक्खाणमाणे ज० पदे । कोघे० ज० प० विसे । माया० ज० प० विसे० । लोमे०ज. प. विसे । एवं पञ्चक्खाण०४ । केवलणा० ज० प० वि० । पयला० ज० प० विसे० । णिद्दा० ज० प० विसे । केवलदं० ज०प० विसे० । ओरा० ज० प० अणंतगु० । तेना. ज. प० विसे । कम्म० ज० ५० विसे० । मणुस० ज० प० संखेंजगु० । जस-अजस० ज० प० विसे० । दुगु० ज० प० संखेंजगु० । भय० ज० प० विसे० । हस्स-सोगे० न०प० विसे । रवि-अरदि० ज० प० विसे । पुरिस० ज० प० विसे० । सेसाणं णेरहगभंगो। १२६. पंचिंदिएसु मूलोषो। पंचिंदियपज्जत्तगेसु वि मूलोघो याव सादा- सादा ति । तदो घेउ० ज० प० असं०गु० । देवगदि० ज० प० संखेज्जगु० । णिरय- १२७. सामान्य देव, भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोमे पहली पृथिवीके समान भङ्ग है। सौधर्म और ऐशान कल्पसे लेकर सहस्रार कल्पतकके देवोंमे कार्मणशरीरसम्बन्धी अल्पवहुत्वके प्राप्त होनेतक नारकियोंके समान भड़ है। उससे आगे तिर्यञ्चगति और मनुष्य- गतिका जघन्य प्रदेशाप्र संख्यातगुणा है। उससे यश-कीर्ति और अयश-कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। शेष प्रकृतियोंका भङ्ग नारकियोंके समान है। आनत कल्पसे लेकर उपरिम- प्रैवेयक तकके देवोंमें यही भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि यहाँ तिर्यश्चगतिचतुष्क नहीं है। १२८, अनुदिशिसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोमें अप्रत्याख्यानावरण मानका जघन्य प्रदेशाप सबसे स्तोक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अप्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी अपेक्षा अल्प- बहुत्व जानना चाहिए। उससे आगे केवलज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे प्रचलाका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे निद्राका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाम अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाम संख्यातगुणा है । उससे यश-कीर्ति और अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे भयका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे हास्य और शोकका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे रति और अरतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आगे शेष प्रकृतियोंका भगनारकियोंके समान है। १२६. पवेन्द्रियोंमें मूलोषके समान भङ्ग है । पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोंमें भी सातावेदनीय और असातावेदनीयकी अपेक्षा अल्पबहुत्व प्राप्त होने तक मूलोधके समान भङ्ग है। उससे आगे । महावंधे पदेसबंधाहियारे गदि० ज० प० असंखेंजगु० । अण्णदरे आउ० ज० प० संखेंजगु० । आहार० ज० प० असं०गु०॥ १३०. तस-तसपजत्तयाणं मूलोघो । पंचमण-तिण्णिवचि० मलोषं याव केवल दसणावरणीय ति । तदो वेउ० ज० ५० अणंतगु० | आहार० ज०प० विसे । तेजा. ज०प० विसे । कम्म० ज० पदे० विसे० । ओरालि० ज०प० विसे । तिरिक्ख.. मणुस०] ज० प० संखेंजगु० । जस०-अजस० ज० प० विसे० । देवग० ज०५० विसे । णिरय० ज०प० विसे० । दुगुं० ज० प० संखेंजगु० । भय० ज०प० विसे । हस्स-सोगे० ज०प० विसे० । रदि-अरदि० ज०प० विसे० । अण्णदरवेद० ज०प० विसे० । माणसं० ज०प० विसे । कोधसं० ज० प० विसे । मायासं० ज० प० विसे० । लोभसं० ज. प. विसे० 1 दाणंत० ज०प० विसे० । लाभंत. ज. प. विसे | भोगंत० ज०प० विसे । परिभोगंत० ज०प०विसे । विरियंत ज. प. विसे० । मणपज. ज. प. विसे । ओधिणा० ज० ५० विसे । सुदणा० ज० प० विसे० । आभिणि० ज० १० विसे० । ओधिदं० ज०प० विसे । वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशात असंख्यातगुणा है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशान संख्यातगुणा है । उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे अन्यतर आयुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाम असंख्यातगुणा है। १३०. बस और उस पर्याप्सकोमें मूलोषके समान भङ्ग है । पाँचों मनोयोगी और तीन वचनयोगी जीवामें केवलदर्शनावरणीयकी अपेक्षा अल्पवहुत्वके प्राप्त होने तक मूलोघके समान भङ्ग है। उससे आगे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तेजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे तिर्यश्चगति और मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश- कीर्ति और अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाम्र विशेष अधिक है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे भयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे हास्य और शोकका 'जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे रति और अरतिका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मानसंज्वलनका जघन्य- प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मायासंज्वलनकाजघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे दानान्तरायका जघन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे लाभान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे भोगान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका जघन्य प्रदेशाप विशेप अधिक है । उससे मनापर्ययज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे अवधिन्नानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे श्रुतज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे आभिनिबोधिकजानावरणका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। १. ता०आ०पत्योः 'केवलणाणावरणीय ति' इति पाठः। ।
अप्पाबहुगपरवणा अवसुदं० ज० प० वि०। चक्खुदं० ज० प० विसे० । अण्णदरे आउ० ज० प० संखेंजगु० । अण्णदरगोद० ज० प० विसे० । अण्णदरवेदणी० ज० प० विसे । १३१. वचि० असञ्चमोसवचिजोगीमु ओघो याव चक्खुदं० ज० प० विसे० । तिरिक्स-मणुसाऊणं ज० प० संखजगु० । अण्णदरे गोदे० ज० प० विसे० । अण्णदरे वेदणी० ज०प० विसे० । वेउवि० ज० प० [असंखेंजगु० । देवगादि० ज० प०] असंखेंजगु०। णिरयगदि० ज०प० संखजगुणं । णिरय-देवाऊणं ज० प० संखेज्जगुणं। आहार० ज० प० असंगु० । एवं ओगलि. | कायजोगि० ओघं। १३२. ओरालियमिस्से मूलोयो याव अण्णदरवेदणी० ज० प० विसे० । तदो वेउ० ज० प० असं०गु० । देवगदि ज० प० संखेजगु० । तिरिक्ख-मणुसाऊणं ज० प० असं०गु० । वेठब्वियकायजो० सोधम्मभंगो याव चक्षुदं० ज० प० विसे । तदो तिरिक्त-मणुसाऊणं ज० ए० संखेंजगु० । अण्णदरे गोद० ज० प० विसे० । अण्णदर- वेदणी० ज० प. विसे । वेउनियमिस्स० एवं चेव । आउ० णन्थि । उससे अवधिदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अचतुदर्शनावरणका जवन्य प्रदेशाप्र विशेष अधिक है । उससे चतुदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे अन्यतरआयुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे अन्यतर गोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। १३१. वचनयोगी और असत्यमृपावचनयोगी जीवामे चतुदर्शनावरणका जवन्य प्रदेशान विशेष अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होने तक ओघके समान भङ्ग है। उससे आगे तिर्यञ्चायु और मनुष्यायुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे अन्यतर गोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अन्यतर वेदनीयका जयन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशात असंख्यातगुणा है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे नरकगतिका जघन्य प्रदेशाप संख्यातगुणा है। उससे नरकायु और देवायुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यावगुणा है। उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशात्र असख्यातगुणा है। इसी प्रकार औदारिककाययोगी जीवॉमें जानना चाहिए । काययोगी जीवोमें मूलो के समान भङ्ग है। १३२, औदारिकमिश्रकाययोगी जीवाम अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशात्र विशेष अधिक है-इस स्थान के प्राप्त होनेवक मूलोषके समान भङ्ग है । उससे आगे वैनियिकशरीरका जघन्य प्रदेशात असंख्यातगुणा है। उससे देवगतिका जवन्य प्रदेशाप्र संख्यातगुणा है । उससे तिर्यश्चायु और मनुष्यायुका जपन्य प्रदेशात्र असंख्यातगुणा है। बैंक्रियिककाययोगी जीवोमे चक्षुदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है-इस स्थानके प्राप्त होने तक सौधर्मकल्पके समान भङ्ग है। उससे आगे तिर्वश्चायु और मनुप्यायुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे अन्यतर गोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अन्यत्तर वेदनीयका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। बैंक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमे इसी प्रकार भग है। इतनी विशेषता है कि आयुकर्म नहीं है। १. भाव्यतो 'वउवि० ० ५० एवं चेष | आउ० असंखेजगु०इति पाठः।
महाबंधे पदेसबंधाहियारे १३३. आहार-आहारमि० सन्वत्थोवा केवलणा० ज० प० । पयला० ज० प० विसे । णिद्दा. ज. प० विसे । केवलदं. ज. प. विसे । वेउ० ज०प० अणंतगुः । तेजा० ज० प० विसे० । कम्म० ज० ५० विसे० } देवग० ज० ५० संखेंजगु०। जस० ज०प० विसे० । अजस० ज०प० विसे० । दुगुं० ज०पदे० संखेंजगु० भय० ज० ५० विसे० । हस्स० ज० प० विसे । रदि० ज० प० पिसे०। पुरिस० ज. प. विसे । सोग० ज० प०विसे० । अरदि० ज० प० विसे० माणसं० ज०प० विसे । कोधसंज. ज. प. विसे० । मायासं० ज०प० विसे | लोभसं० ज०प० विसे० । उवरि सम्बट्ठभंगो याव साद ति । तदो असाद० ज० प. विसे० । कम्मइग० ओरा०मिभंगो। णवरि आउ० पत्थि । १३४. इथिवेदे पंचिंदियतिरिक्खजोणिणिभंगो। णवार अवसाणे आहार ज० ५० असंगु० भाणिदव्वं । पुरिसवेदे पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्तभंगो। णवरि अवसाणे आहार० ज० ५० असं०गु० । णqसगे मूलोषो याव अण्णदरवेदणीय० ज० प० विसे० । तिरिक्ख-मणुसाऊणं ज० ५० असं०गु० । वेउ० ज० प० असं०गु० । १३३. आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमें केवलज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। उससे प्रचलाका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे निद्राका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे केवलदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है । उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाप संख्यातगुणा है। उससे यश कीर्विका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाम्र संख्यातगुणा है । उससे भयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे हास्यका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे रतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे पुरुषवेदका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है । उससे शोकका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे अरतिका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है । उससे मानसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मायासंज्वलनका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। आगे सातावेदनीयका अल्पबहुत्व प्राप्त होनेतक सर्वार्थसिद्धिके समान भङ्ग है। उससे असाता- वेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। कार्मणकाययोगी जीवोंमें औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि आयुकर्म नहीं है । १३४. स्त्रीवेदी जीवोंमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिनी जीवोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि अन्तमें आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाय असंस्त्यातगुणा कहना चाहिए । पुरुषवेदी जीवोमें पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च पर्याप्तकोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि अन्त में आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाय असंख्यातगुणा है। नपुंसकवेदी जीवोमें अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशान विशेप अधिक है इस स्थान के प्राप्त होने तक मूलोधके समान भङ्ग है। उससे आगे तिर्यञ्चायु और माध्यायुका जघन्य प्रदेशाप असंख्यातगुणा है। उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाप n०९ आपाबहुगपरूवणा णिरय-देवग० ज० प० संखेंजगु० । णिरय-देवाउ० ज० ५० संखेंजगुआहार० ज० प० असं०गु०। १३५. अवगदवे० सव्वत्थोवा केवलणा० ज० प० । केवलदं० ज० पदे विसेन दाणंत० ज० प० अणंतगु० । लाभंत० ज०प० विसे । भोगंत० ज०प० विसे० । परिभोगत० ज० प०विसे । पिरियंत. ज. प. विसे०। मणपज्ज० ज०प० विसे । ओघिणा० ज०प० विसे । सुदणा० ज० प० विसे । आभिणि० ज० प० विसे० 01 माणसंज० ज० प० विसे० कोधसंज० ज० प० विसे । मायासंज० ज० प० विसे । लोभसंज० ज० प० विसे । ओधिदं० ज० प० विसे० । अचक्खुदं० ज. प. विसे० । चक्खुदं० ज० प० विसे । जस०-उच्चा. ज. प. संखेज्जगु०। सादा० ज० प० विसे। १३६. कोधादि०४ ओघं । मदि-सुद० णqसगभंगो० । णवरि आहारस० णत्थि । विभंगे मूलोघो याव केवलदसणावरणीय ति । तदो ओरा० ज० प० अणंतगु० । तेजा० ० ज०प० विसे० । कम्म० ज० प० विसे । वेउ० ज० प० विसे । तिरिक्ख० -------- ----- असंख्यातगुणा है। उससे नरकगति और देवगतिका जघन्य प्रदेशाप्र संख्यातगुणा है। उससे नरकायु और देवायुका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाम असंख्यातगुणा है। 40983 १३५. अपगतवेदी जीवामें केवलज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाप्र सवसे थोड़ा है। उससे केवलदर्शनावरणका जवन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे दानान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्न अनन्तगुणा है। उससे लाभान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे भोगान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे परिभोगान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वीर्यान्तरायका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मनःपर्ययज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अवधिज्ञानावरणका जयन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे श्रुतज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे आभिनिवोधिकज्ञानावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मानसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रोधसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे मायासंबलनका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है । उससे अवधिदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अचक्षुदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाय विशेप अधिक है। उससे चक्षुदर्शनावरणका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे यश-कीर्ति और उच्चगोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यात- गुणा है । उससे सातावेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। १३६. क्रोधादि चार कपायवाले जीवोंमे ओघके समान भङ्ग है। मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवॉम नपुंसकोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमे आहारकशरीर नहीं है। विभङ्गजानी जीवोंमें केवलदर्शनावरणीयके अल्पबहुत्वके प्राप्त होने तक मूलोघके समान भङ्ग है। उससे आगे औदारिकशरीरका जवन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिक्शरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे तिर्यश्चगतिका जघन्य प्रदेशाप १०२ महावंधे पदेसबंधायिारे ज० प० संखेज्जगु० । जस०-अजस० ज० २० वि० । मणुस० ज०प० वि० । णिश्य- देवग० ज० ५० वि० । दुगु० ज० प० संखेंजगु० । उवरिमणजोगिभंगो । १३७. आभिणि-सुद-ओधि० उक्कस्सभंगो याव केवलदसणावरणीय ति । तदो ओरा० ज०प० अणंतगु० । तेजा ज. प. विसे० । कम्मइ० ज० प० विसे । वेउ० ज०प० विसे । मणुस० ज० प० संखेंजगु० । जस०-अजस० ज०प० विसे । दोगदि० ज. प. विसे० । दुगुं० ज० प० संखेंजगु० । उवरि याव अणुदिस विमाणवासियदेवभंगो याव सादासादा० ति । तदो आहार० ज० प० असं०गु० । दो आउ० ज० प० संखेंज्जगु०। १३८, मणपज्जवणाणीसु उक्कस्सभंगो याव केवलदसणावरणीय ति । तदो वेउ० ज० ५० अणंतगु० । आहार० ज० प. विसे० । तेजा० ज० प० विसे । कम्म० ज० ५० विसे० । देवगदि ज० प० संखेज्जगु० । जस० ज० ५० वि० । अजस० ज० ५० विसे० । दुगुं० ज० प० संखेंजगु० । उवरिं आहारकायजोगिभंगो। एवं संजद- संख्यातगुणा है । उससे यश कीर्ति और अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाम विशेप अधिक है। उससे नरकगति और देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे आगे मनोयोगी जीवोंके समान भङ्ग है। १३७. आभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमे केवलदर्शनावरणीयका अल्पवहुत्व प्राप्त होने तक उत्कृष्टके समान भङ्ग है। उससे आगे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है । उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेप अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यशःकीर्ति और अयशःकीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे दो गतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उमसे आगे सातावेदनीय और असाता- वेदनीयका अल्पवहुत्व प्राप्त होने तक अनुदिशविमानवासी देवोके समान भङ्ग है। उससे आगे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे दो आयुका जघन्य प्रदेशात्र संख्यातगुणा है। १३८. मनःपर्ययज्ञानी जीवोंमे केवलदर्शनावरणीयका अल्पबहुत्व प्राप्त होने तक उत्कृष्टके समान भङ्ग है । उससे आगे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे आहारक- शरीरका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाय विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशान संख्यातगुणा है । उससे यश-कीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे अयशःकीर्तिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे आगे आहारककाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदो- १ ता प्रतौ 'उवरिम जोगिभगो' आ०प्रतो 'उवरिमजोगिभगो' इति पाठः । २ ता आ प्रत्योः केवलणाणावरणीय' इति पाठः।
अप्पाबहुगपत्रणा १.३ सामाइ०-छेदो०-परिहार० मणपजनभंगो । मुहुमसं० उकरसभंगो। १३६. संजदासजदेसु उकस्सभंगो यात्र देवगदि० ज०प० संखेंजगु० । जस० ज०प० वि० । अजस० ज०प० विसे। उवरिं आहारकायजोगिभंगो । असंजदेसु मृलोपं । णवरि आहार० णत्थि । १४०. चतुर्द-अचखुर्द ओघ । ओघिदं० आधिणाणिभंगो। किण्ण-णील- काऊणं असंजदभंगो । तेउ-पम्माणं मूलोघं याव केवलदसणावरण ति । तदो ओरालि. ज० प० अणंतगुः । तेजा० ज०प० विसे० । कम्म० ज० प० विसे । वेउ० ज०प० विसे । तिरिक्स-मणुसगदि० ज० प० संखेंजगु० स०-अजम० ज० प० विसे । देवग दि० ज०प० वि० । दुगुं० ज०प० संखजगु० । उबरिं ओघं याव सादासादा० चि ज० प० वि० । तदो आहार० ज० प० असंगु० । तिरिक्ख-मणुस-देवाऊणं ज० प० संखेंजगु० । सुक्कलेस्सिगेसु एवं चेव । णवरि तिरिक्सग दि०४ वज ! १४१. भवसि० औषं । अभवसि० मदि०भंगो । सम्मा०-सहग०-वेदग० आभिणिभंगो । उत्रसमसम्मा० बोधि भंगो याव केवलइसणावरणीय त्ति । तदो पत्त्यापनासंयत और परिहारविशुद्धिसंयत जीवॉने मनःपर्ययज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है। सूक्ष्मसान्परावसंचत जीवामें उत्कृष्ले समान भङ्ग है। १३६ संयवासंयत जीवाने देवगतिका जयन्य प्रदेशाम सख्यातगुणा है-इस स्थानके प्राम होने तक स्कृष्टके समान भङ्ग है । उसले नागे यशःजातिका जघन्य प्रदेशात्र विशेष अधिक है। उससे अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है । उससे आगे आहारककाययोगी जीवीके समान भङ्ग है। नतंयत जीवाने मूलीयके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि आहारकशरीर । -- १४. चक्षुदर्शनी और भचक्षुदर्शनी जीवोंमें ओधके समान भङ्ग है । अवधिदर्शनी जीवों में भवधिज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है। कृष्गलेश्यावाचे नीललेश्यावाले और कापोवळेश्यावाले जीवाने अतंयत जीवांके समान भङ्ग है। पीनटेश्यावाले और पालेश्यावाले जीवामें केवलदर्शना- वरणमा अल्यबहुत्व प्राम होने तक मूलोधके समान भङ्ग है। उत्तले आगे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाम मनन्तगुणा है । उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे क्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशात्र विश्रेष अधिक है। इससे तिर्यगति और मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशात्र संख्यातगुणा है। उससे यश कौति और अयश-बोर्तिका जघन्य प्रदेशात विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जयन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे जुगुप्ताका जवन्य प्रदेशाप्र संख्यानगुणा है। उससे आगे सातावदनीय और असावावदनीयका जवन्य प्रदेशात विशेष अधिक है-इस स्थान के प्राप होने तक ओषके समान भङ्ग है। उससे भागे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशात्र असंख्यावगणा है। उससे विर्यबाचु, मनुष्यायु और देवायुका जघन्य प्रदेशात संख्यातगुणा है। शुक्ललेश्यावाले जीवॉमें इसी प्रकार भङ्ग है। इतनी विशेषता है शिविर्यञ्चपतिवस्तुकको छोड़कर कहना चाहिए । १४१. भव्य जीवाने भोधके समान भङ्ग है। नभन्य जीवों में मत्यजानी जीवोके समान मङ्ग है। सन्यन्द्रष्टि ज्ञापिकसन्यन्द्रष्टि और वेदकसन्याटष्टि जीवोमें आमिनितोषिकबानी जीवोंके समान भङ्ग है। उपरामसन्यन्दृष्टि जीबाने केबलदर्शनावरणीयका बयबहुत्व प्राप्त होने तक अवधि- १०४ महावं पदेसबंधाहियारे ओरा० ज० प० अणंतगुणं । तेजा० ज० प० विसे० । कम्म० ज०प० विसे । मणुसग० ज० प० संखेज्जगु० । जस०-अजस० ज० प० विसे० । उवरि ओधिभंगो याव सादासादा० ति। तदो वेउ० ज० प० असं०गु० । आहार० ज० प० विसे० । देवग० ज० प० संखेंजगुः । १४२. सासणे उक्करसभंगो याव केवलदं० । तदो ओरा० ज० प० अणतगु० । तेजा० ज० प० विसे० । कम्म० ज० ५० विसे० । तिरिक्ख० ज० ५० संखेंजगुः । जस०-अजस० ज०प० विसे० । मणुस० ज० प० विसे० । दुगु० ज० प० संखेंजगुः । उवरि उक्कस्सभंगो याव चदुदंसणावरणीय त्ति । तदो अण्णदरगोद० ज० प० संखेंजगुः । अण्णदरवेदणी० ज० प० विसे० । वेउ० ज० प० असं०गु० । देवगदि० ज० प० संखेंजगुः । तिण्णिआउ० ज० प० संखेंजगुः । १४३. सम्मामि० ओधिणाणिभंगो याच केवलदसणावरणीय त्ति । तदो ओरा. ज० प० अणंतगुः । तेजा ज० प० विसे० । कम्म० ज० प० विसे० । वेउ० ज० प० विसे० । मणुस० ज० प० संखेंजगुः । जस०-अजस० ज० प० विसे० । देवग० ज० ज्ञानी जीवोंके समान भन है। उससे आगे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाप अनन्तगुणा है। उससे तेजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाम्र विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश कीर्ति और अयशःकीर्तिका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे आगे सातावेदनीय और असाता- वेदनीयका अल्पवहुत्व प्राप्त होने तक अवधिज्ञानी जीवौके समान भह है। उससे आगे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाम असंख्यातगुणा है। उससे आहारकशरीरका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। १४२. सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोमे केवलदर्शनावरणका भङ्ग प्राप्त होनेतक उत्कृष्टके समान भन्न है। उससे आगे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाप्र अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरकाजघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे तिर्यञ्चगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे यश कीर्ति और अयश कीर्तिका जघन्य 'प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका जपन्य प्रदेशाप विशेष अधिक है। उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे आगे चारों दर्शनावरणीयका भग प्राप्त होने तक उत्कृष्टके समान भङ्ग है । उससे आगे अन्यतर गोत्रका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे अन्यतर वेदनीयका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे बैंक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है। उससे तीन आयुका जघन्य प्रदेशाम संख्यातगुणा है । १४३. सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोमे केवलदर्शनावरणीयका भङ्ग प्राप्त होने तक अवधिज्ञानी जीवोके समान मन है। उससे आगे औदारिकशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र अनन्तगुणा है। उससे तैजसशरीरका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है। उससे कार्मणशरीरका जघन्य प्रदेशाम विशेष अधिक है। उससे वैक्रियिकशरीरका जघन्य प्रदेशाम्र विशेष अधिक है। उससे मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेशाप संख्यातगुणा है। उससे यश कीर्ति और अयश कीर्तिका जघन्य प्रदेशाम विशेष ।
। भुजगारबंधे अट्ठपदं १०५ प० विसे० । दुगु० ज० प० संखेंजगु० । उवरि आउगवजा याव मणपजवणाणावरणीय ति । मिच्छादिट्ठी० मदिभंगो । सण्णीसु मणुसभंगो । असण्णीसु मदिअण्णाणिभंगो। आहारय ओघमंगो। अणाहारय कम्मइयभंगो। एवं जहण्णपरत्थाणअप्पाबहुगं समत्तं । एवं चदुवीसमणियोगद्दारं समत्तं । मुजगारवंधो अट्ठपदं १४४. एत्तो भुजगारबंधे ति तत्थ इमं अट्ठपदं-याणि एहि पदेसग्गं बंधदि अणंत- रोसकाविदविदिकंते समए अप्पदरादो बहुदरं बंधदि ति एसो भुजगारवंधो णाम । अप्पदबंधे ति तत्थ इमं अहपदं-याणि एण्हि पदेसग्गं बंधदि अणंतरुस्सकाविद- विदिकते समए बहुदरादो अप्पदरं बंधदि त्ति एसो अप्पदरबंधो णाम | अवढिदवंधे त्ति तत्थ इमं अट्ठपदं-याणि एण्हि पदेसग्गं रंधदि अणंतरोसक्काविद-उस्सकाविदविदिक्कते समए तत्तियं तत्तियं चेवबंधदि ति एसो अवद्विबंधोणाम। अबंधादो बंधो एसो अवत्तव्य- बंधो णाम । एदेण अट्ठपदेण तत्थ इमाणि तेरस अणियोगद्दाराणि-समुक्त्तिणा याव अप्पाबहुगे ति ॥ १३ ॥ अधिक है। उससे देवगतिका जघन्य प्रदेशाग्र विशेष अधिक है । उससे जुगुप्साका जघन्य- प्रदेशाग्र संख्यातगुणा है । इससे आगे आयुकर्मको छोड़कर मन.पर्ययज्ञानी जीवोके समान अल्प- बहुत्व जानना चाहिए। मिथ्यादृष्टि जीवोमे मत्यज्ञानीजीवोके समान भङ्ग है। संज्ञीजीवोमें मनुष्यो के समान भङ्ग है। असंज्ञी जीवोमें मत्यज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है। आहारक जीवोमें ओघके समान भङ्ग है तथा अनाहारक जीवोम कार्मणकाययोगी जीवोंके समान भङ्ग है। M इस प्रकार जघन्य परस्थान अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। इस प्रकार चौबीस अनुयोगद्वार समाप्त हुए। भुजगारवन्ध-अर्थपद १४४. यहाँ से आगे भुजगारवन्धका प्रकरण है। उसके विषयमें यह अर्थपद है इस समयमै जिन प्रदेशोका वन्ध करता है, उन्हे अनन्तर पिछले व्यतीत हुए समयमे घटाकर बॉवे गये अल्पतरसे बहुतर बॉधता है, इसलिए यह भुजगारवन्ध कहलाता है। अल्पतर- वन्धके विपयमे यह अर्थपट है-इस समय जिन प्रदेशोको बॉधता है उन्हे अनन्तर पिछले व्यतीत हुए समयमे बढ़ाकर वॉधे गये बहुतरसे अल्पतर बॉधता है, इसलिए यह अल्पतरवन्ध कहलाता है। अवस्थित वन्ध के विपयमै यह अर्थपद है-इस समय जिन प्रदेशोको बॉधता है उन्हें अनन्तर पिछले समयमें घटाकर या बढ़ाकर बॉधे गये प्रदेशोके अनुसार उतने ही वॉघता है, इसलिए यह अवस्थितबन्ध कहलाता है। तथा अबन्धके वाद् बन्ध होना यह अवक्तव्यबन्ध कहलाता है। इस अर्थपदके अनुसार ये तेरह अनुयोगद्वार हैं-समुत्कीर्तनासे लेकर अल्पबहुत्व तक १३॥ १ ता प्रतौ इमं याणि' इति पाठ । २ ता प्रतौ 'वधदि । अर्णतरूस्सकाविदविनिकते' इति पाठः।
, " महाबंधे पदेसबंधाहियारे समुक्कित्तणाणुगमो १४५. समुकित्तणाए दुवि०-ओघे० आदे०। ओघे० सव्वपगदीणं अस्थि भुजगारवंधगा अप्पदरवंधगा अवद्विदवंधगा अवत्तव्वबंधगा य। एवं ओघमंगो मणुस०३- पंचिंदि०-तस०२-पंचमण-पंचवचि०-कायजोगि०-ओरालियका०-आभिणि-सुद-ओधिः- मणपज०-संज०-चक्खुदं०-अचखुदं०-सुकले०-भवसि०-सम्मादि०-खड़ग०-उवसम०- सण्णि-आहारग ति। १४६. णिरएसु धुवियाणं अस्थि भुज०-अप्पदर०-अवविद० । सेसाणं ओघमंगो। एवं सब्बणेरइएसु । णवरि पढमाए तित्थयरं धुपियाण भंगो। विदियाए तदियाए साद०भंगो। एदण वीजेण याव अणाहारगति णेदव्वं । णवरि उच्चियमि०-आहारमि० धुवियाणं अत्थि भुजः । सेसाणं परियत्तमाणियाणि अत्थि भुजगार०-अवत्तव्य० । विशेषार्थ-जिन तेरह अनुयोगद्वारोका आश्रय लेकर भुजगारवन्धका कथन किया जा रहा है,उनके नाम ये हैं-समुत्कीर्तना, स्वामित्व काल, अन्तर, भगविचय ,भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र, म्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व । समुत्कीर्तनानुगम १४५. समुत्कीर्तनाकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओष और आदेश । ओघसे सब प्रकृतियोके भुजगारबन्धक, अल्पतरबन्धक, अवस्थितवन्धक और अवक्तव्यबन्धक जीव हैं। इसी प्रकार ओघके समान मनुष्यनिक, पञ्चेन्द्रियद्विक, सद्विक, पाँचों मनोयोगी, पॉचो वचन- योगी, काययोगी, औदारिककाययोगी, आभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिजानी, मनः- पर्ययज्ञानी, संयत, चतुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले, शुक्लेश्यावाले, भव्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिक- सम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, संज्ञी और आहारक जीवों में जानना चाहिए | विशेपार्थ-ओघसे सब प्रकृतियोका भुजगार, अल्पतर और अवस्थितबन्ध तो सम्भव है ही, क्योकि योगकी घटा-बढ़ी होनेसे और एक समान योगके रहनेसे ये पद सब प्रकृतियोंके बन जाते हैं। साथ ही जो अध्रुववन्धिनी प्रकृतियाँ हैं,उनका अवक्तव्यबन्ध भी सर्वत्र सम्भव है और जो ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियों है, उनकी यथायोग्य स्थानमे बन्धन्युच्छित्ति होकर पुन. पूर्वस्थान प्राप्त होनेपर उनका बन्ध होने लगता है, इसलिए ओघसे इनका भी अवक्तव्यबन्ध बन जाता है। यहाँ मनुष्यत्रिक आदि जितनी मार्गणाऐं गिनाई हैं,उनमें जहाँ जितनी प्रकृतियोका बन्ध होता है, उनमे ओषके अनुसार भुजगार आदि चारो पद बन जाते हैं, इमलिए उन मार्गणाओमें ओषके समान प्ररूपणा जाननेकी सूचना की है। १४६. नारकियोमै ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगारबन्धक, अल्पतरबन्धक और अव- स्थितबन्धक जीव हैं। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार सब नारकियोमे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि पहली पृथिवीमे तीर्थकर प्रकृतिका भङ्ग ध्रवधन्धवाली प्रकृतियोके समान है। तथा दूसरी और तीसरी पृथिवीमें तीर्थङ्करप्रकृतिका भग साता- वेदनीयके समान है। इस बीजपदके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए । इतनी विशेषता है कि वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमै ध्रुववन्धवाली १ ता०प्रतो 'अभिणि मदिसुट' इदि पाट. ।
भुजगारवंधे समुक्त्तिणा १०७ कम्मइ०-अणहार० धुबियाणं देवगदिपंचगस्स य अस्थि भुज । सेसाणं अन्थि भुज०- अवत्तव्च०। एवं समुकित्तगा समत्ता प्रकृतियोके भुजगारवन्धक जीव है । शेप परावर्तमान प्रकृतियोके भुजगारबन्धक और अवक्तव्य- वन्धक जीव हैं। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके और देवगतिपञ्चकके भुजगारबन्धक जीव हैं। शेप प्रकृतियोके भुजगारबन्धक और अवक्तव्य- बन्धक जीव हैं। विशेषार्थ- यहाँ नारकियामे जो ध्रुवबन्धवालो प्रकृतियों है,उनका निरन्तर बन्ध होता रहता है, इसलिए उनका अवक्तव्यबन्ध सम्भव न होनेसे तीन ही बन्ध कहे । अधुन्वन्धिनी प्रकृतियोका अवक्तव्यवन्ध भी सम्भव है, इसलिए उनका ओघके समान भङ्ग जाननेकी सूचना की है। सब नारकियामे यह व्यवस्था बन जाती है, इसलिए उनका निरूपण सामान्य नारकियोंके समान जाननेको सूचना की है। मात्र पहली पृथिवीमे तीर्थक्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाला ऐसा ही मनुष्य मर कर उत्पन्न होता है जो सम्यग्रष्टि होता है, अतः वहाँ यह प्रकृति भी ध्रुवबन्धिनो होती है, इसलिए वहाँ इसका अवक्तव्यवन्ध सम्भव न होनेसे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके समान भङ्ग जाननेकी सूचना की है। तथा दूसरी और तीसरी पृथिवीमे तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध करनेवाला मनुष्य मिथ्यावष्टि होकर उत्पन्न होता है, इसलिए वहीं इसका मिथ्यात्वके कालमे बन्ध नहीं होता। बाद में जब वह सम्यग्दृष्टि हो जाता है,तब पुनः बन्ध प्रारम्भ होता है, इसलिए वहाँ इसका सातावेदनीयके समान अवक्तव्यबन्ध घटित हो जानेसे साता- वेदनीयके समान भङ्ग जाननेको सूचना की है। यह पूर्वोक्त प्ररूपणा वीजपद है। आगे अनाहारक मार्गणातक इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। अर्थात् जिस मार्गणामे जो ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियॉ हो, उनके तीन पद और अध्रुवबन्धिनी प्रकृतियोंके चार पढ जानने चाहिए । मात्र जिन मार्गणाओमे कुछ विशेपता है उसका अलगसे निर्देश किया है। खुलासा इस प्रकार है-क्रियिकमिश्रकाययोग और आहारकमिश्रकाययोगमे एकान्तानुवृद्धियोग होता है, इसलिए इन दो मार्गणाओंमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका केवल भुजगारवन्ध ही सम्भव है, क्योंकि इनमें प्रति समय उत्तरोत्तर योगकी वृद्धि होनेसे इन प्रकृतियो का उत्तरोत्तर प्रदेशबन्ध भी अधिक-अधिक होता है। तथा जो अध्रुवबन्धवाली प्रकृतियाँ है,उनके भुजगारवन्ध और अवक्तव्यवन्ध ही सम्भव हैं, क्योंकि इन प्रकृतियोका वन्ध प्रारम्भ होनेके प्रथम समयमे अवक्तव्य- वन्ध होता है और द्वितीयादि समयोमे भुजगारवन्ध होता है। कार्मणकाययोग और अनाहारक- मार्गणाम भी इसी प्रकार घटितकर लेना चाहिए। इन दोनो मार्गणाओंमे जिन जीवीके देवगतिपञ्चकका बन्ध होता है, उनके उन प्रकृतियोका नियमसे बन्ध होता रहता है, इसलिए इनमे इन पॉच प्रकृतियोकी परिगणना ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों के साथ की है । इस प्रकार समुत्कीर्तना समाप्त हुई। १ ता०प्रती अस्यि भुन० अवत्तं (त०) इति पाठः । २ ता. प्रतौ 'एव समुक्कित्तणा समत्ता' इति पालो नास्ति ।
१०८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे सामित्ताणुगमो १४७. सामित्ताणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा०-छदंस.. चदुसंज०-भय-दुगु-तेजा०-०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० भुज०-अप्पद०- अवहिबंधगो को होदि ? अण्णदरो । अवत्त० कस्स० ? अण्णद० उवसामयस्स परि- बदमाणगस्स मणुसस्स वा मणुसिए वा पढमसमयदेवस्स वा | थीणगिद्धि०३-मिच्छ०- अणताणु०४ तिण्णि पदा कस्स० ? अण्णद० । अवत्त० कस्स० १ अण्णाद. संजमादो बा संजमासंजमादो वा सम्मत्तादो वा परिवदमाणयस्स पढमसमयमिच्छादिहिस्स वा सासणसम्मादिद्विस्स वा । णपरि मिच्छ० अवत्त० [सम्मामिच्छत्तादो ] सासण- सम्मत्तादो वा परिवदमाणय० मिच्छादिहिस्स । सादादीणं सध्यपगदीणं परियत्तमाणीणं तिण्णि पदा कस्स० १ अण्ण अवत्त० कस्स० ! अण्ण० परियत्तमाणयस्स पढमसमय- बंधयस्स । अपचक्खाण०४ तिणि पदा कस्स०१ अण्ण" | अवत्त० कस्स० ? अण्ण० संजमादो वा० संजमासंजमादो चा परिवदमा पढमसमयमिच्छा० वा सासण. वा [सम्मामि० वा] असंजदसम्मा० वा । एवं पञ्चक्खाण०४ । णवरि संजमादो परिवद- माणयस्स पढमसमयमिच्छादिद्विस्स वा सासण. वा सम्मामि० वा असंजदसम्मादि. स्वामित्वानुगम १४७. स्वामित्वानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, वैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, भगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पांच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित- बन्धका स्वामी कौन है? अन्यतर जीव स्वामी है। इनके अवक्तव्यबन्धका स्वामी कौन है ? उपशमश्रेणीसे गिरनेवाला अन्यतर मनुष्य, मनुयिनी और इनको बन्धव्युच्छित्तिके बाद मर कर उत्पन्न हुआ प्रथम समयवर्ती देव इनके अवक्तव्यवन्धका स्वामी है। त्यानगृद्वित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धीचतुष्कके तीन पदोका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव इनके तीन पदोका स्वामी है। इनके अवक्तव्य पदका स्वामी कौन है? संयमसे, संयमासंयामसे और सम्यक्त्वसे गिरनेवाला अन्यतर प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव इनके अवक्तव्यपदका स्वामी है। इतनी विषेशता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदकास्वामीसम्यग्मिथ्यात्व और सासादनसम्यक्त्वसे भी गिरनेवाला मिथ्यादृष्टि जीव ही होता है। परावर्तमान सातावेदनीय आदि सब प्रकृतियोके तीन पदोका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव इनके तीन पदोंका स्वामी है। इनके अवक्तव्यपदका स्वामी कोन है? परावर्तन करके प्रथम समयमे बन्ध करनेवाला अन्यतर जीव इनके अवक्तव्यपदका स्वामी है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके तीन पदोका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव इनके तीन पदोका स्वामी है। इनके अवक्तव्य पदका स्वामी कौन है ? संयमसे और संयमासंयमसे गिर कर जो मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्य- ग्मिथ्यादृष्टि या असंयतसम्यग्दृष्टि हुआ है, प्रथम समयवर्ती उक्त गुणस्थानोवाला वह जीव उक्त प्रक- तियोके अवक्तव्य पदका स्वामी है। इसी प्रकार अर्थात् अप्रत्याख्यानवरणचतुष्कके समान प्रत्या- ख्यानावरण चतुष्कके चार पदोका स्वामी जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि जो संयमसे गिर कर प्रथम समयवर्ती मिथ्याष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिध्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि या भुजगारवंधे सामित्तं १०६ वा संजदासंजदस्स वा । चदुण्णं आउगाणं तिणि पदा कस्स० ! अण्णद० । अवत्त० कस्स० ! अण्ण० पढमसमयआउगवंधमाणयस्स । एवं ओघभंगो मणुस०३-पंचिंदि०- तस०२-पंचमण०-पंचवचि० कायजोगि-ओरालि०-आभिणि सुद-ओधि० - मणपज० -संजद- चाखुदं०-अचखुदं०-ओधिदं०-सुक्कले०-भवसि०-सम्मा०-खड़ग०-उपसम० -सण्णि आहारग ति । णवरि मणुस०३-पंचमण-पंचवचि०-ओरालि०-संजद० अवत्तव्यं देवोत्ति ण भाणिदव्वं । एवं एदेण बीजेण याव अणाहारग ति दन्छ । एवं सामित्तं समत्त। , संयतासंयत होता है वह प्रत्याख्यानावरणचतुष्कके अवक्तव्यपदका स्वामी है। चार आयुओके तीन पदोंका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव चार आयुओके तीन पदोका स्वामी है । इनके अवक्तव्यपदका स्वामी कौन है ? प्रथम समयमे आयुवन्धका प्रारम्भ करनेवाला अन्यतर जीव इनके अवक्तव्यपदका स्वामी है। इस प्रकार ओघके समान मनुष्यत्रिक, पञ्चेद्रियद्विक, प्रसद्विक, पाँचौ मनोयोगी, पाँचौ वचनयोगी, काययोगी, औदारिककाययोगी, आभिनिवोधिक- ज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञनी, मन.पर्ययज्ञानी, संयत, चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अबधिदर्शनी, शुक्ललेश्यावाले, भन्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, संजी और आहारक जीवोमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि मनुष्यत्रिक, पाँची मनोयोगी, पॉचो वचनयोगी, औदारिककाययोगी और संयत जीवोमै पाँच ज्ञानावरणादिके प्रथम दण्डकमे कही गई प्रकृतियोके अवक्तव्यपदका स्वामी देवको नहीं कहना चाहिए। इस प्रकार इस बीजपदके अनुसार अनाहरक मार्गणा तक लेजाना चाहिए । विशेषार्थ यहाँ किस प्रकृतिके किस पदका कौन जीव स्वामी है इस वातका विचार किया गया है। प्रथम दण्डकमै कही गई पॉच ज्ञानावरणादि प्रकृतियाँ अपनी अपनी अन्ध- व्युच्छित्तिके स्थानके पूर्व ध्रुववन्धवाली हैं, इसलिए इस बीच कोई भी जीव इनके भुजगार आदि तीन पदोंमें से किसी भी पदका स्वामी हो सकता है, अतः इनके तीन पदोका अन्यतर जीव स्वामी कहा है। पर इनका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणीसे गिरनेवाले या तो मनुष्यके होता है या मनुष्यिनीके होता है और यदि ऐसा मनुष्य या मनुष्यिनी इनका पुन' बन्ध होनेके पूर्व मर कर देव हो जाता है तो वह भी प्रथम समयमे इनके अवक्तव्यपदका स्वामी होता है, इसलिए ऐसे जीबोको इनके अवक्तव्यपदका स्वामी कहा है। दूसरे दण्डकमें कही गई स्त्यानगृद्धित्रिक आदि भी अपनी वन्धव्युच्छित्तिके पूर्वतक ध्रुववन्धिनी हैं, इसलिए इस बीच कोई भी जीव यथायोग्य योगके अनुसार इनके तीन पदोका बन्ध कर सकता है, अन' इनके भी तीन पदाका अन्यतर जीव खामी कहा है। पर इनमेंसे मिथ्यात्वके सिवा शेष प्रकृतियो का अवक्तव्यपद संयम, संयमासंयम और सम्यक्त्वसे गिर कर मिथ्यादृष्टि या सासादनसम्यादृष्टि हुए जीवके प्रथम समयमे होता है और मिथ्योत्वका अवक्तव्यपद संयम, संयमासंयम, सम्यक्त्व और सासादन- सम्यक्त्वसे गिर कर मिथ्यादृष्टि जीवके प्रथम समयमे होता है, क्योकि अपनी अपनी व्युच्छित्तिके वाद ऊपरके गुणस्थानोमें इनका बन्ध नहीं होता है। लौट कर पुनः बन्धयोग्य गुणस्थानांके प्राप्त होने पर इनका बन्ध होने लगता है, इसलिए ऐसे जीवको इनके अवक्तव्यपदका स्वामी कहा है। यहाँ सम्यग्मिथ्यात्वसे गिर कर जो प्रथम समयवर्ती मिध्यादृष्टि होता है वह भी १. ता०प्रतौ 'एव समित्त समत्त' इति पाठो नास्ति । , महाबंधे पदेसबंधाहियारे कालाणुगमो १४८, कालाणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे। ओघे० सव्वपगदीणं भुजगार०- अप्पद० जह० एगसमयं, उक्क० अंतोमुहुत्तं । अवढि० जह० एग०, उक० पवाइजतेण उवदेसेण एकारससमयं । अण्णेण पुण उवदेसेण पण्णारससमयं । चढुण्णं आउगाणं भुज०- अप्पद० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवढि० जह० एग०, उक्क० सत्तसम० । अवत्त -~ -- स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके अवक्तव्यपदका स्वामी होता है, इतना विशेष जानना चाहिए । यद्यपि यह बात मूलमे नही कही गई है,फिर भी यह सम्भव है, इसलिए इसका अलगसे निर्देश किया है । सातावेदनीय आदि अध्रुववन्धिनी प्रकृतियों हैं, इसलिए इनका बन्ध प्रारम्भ होने पर प्रथम समयमं अवक्तव्यपद और द्वितीयादि समयों मे शेप तीन पद सम्भव हैं, यह स्पष्ट ही है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क चतुर्थ गुणस्थान तक ध्रुवबन्धिनी है। इस बीच कोई भी जीव इनके नीन पदों का स्वामी हो सकता है। आगेके गुणस्थानों मे इनका बन्ध नहीं होता, इसलिए संयम या सयमासंयमसे गिर कर जो प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि या असंयतसम्यग्दृष्टि होता है, वह इनके अवक्तव्य पदका स्वामी होता है, यह कहा है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका सयमासंयम गुणस्थान तक बन्ध होता है, इसलिए यहाँ तक ये ध्रुवबन्धबाली होनेसे इस वीच किसी भी जीवको इनके तीन पदों का स्वामी कहा है । मात्र इनका अवक्तव्य पद संयमसे गिरकर नीचेके गुणस्थानों को प्राप्त होनेवाले जीवके प्रथम समयमे होता है।यहीदेखकर संयमसे गिर कर मिथ्याष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्याष्टि, असंयत- सम्यग्दृष्टि और संयतासंयत हुए प्रथम समयधर्ती जीवको इनके अवक्तव्यपदका स्वामी कहा है। चार आयुका अपने बन्धके योग्य सामग्रीके मिलने पर ही बन्ध होता है, इसलिए इनका बन्ध प्रारम्भ होने पर प्रथम समयमै उनका अवक्तव्य पद और द्वितीयादि समयों मे शेष तीन पढ कहे हैं । यह ओघ प्ररूपणा है । मूलमे कही गई मनुष्यत्रिक आदि मार्गणाभों मे अपनी-अपनी वन्ध प्रकृतियों के अनुसार यह व्यवस्था बन जाती है, इसलिए उनमे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र मूलमे प्रथम दण्डकमे कही गई प्रकृतियों के अवक्तव्य पदका स्वामी ऐसा जीव भी कहा है जो उपशमश्रेणिमे इन प्रकृतियों की बन्धव्युच्छित्तिके वाद मर कर प्रथम समयवर्ती देव होता है। पर स्वामित्वका यह विकल्प मनुष्यत्रिक आदि कुछ मार्गणाओ मे घटित नहीं होता, अतः उनमे उसका निषेध किया है। इनके सिवा अनाहारक तक अन्य जितनी भागणाएँ ,उनमें उक्त व्यवस्थाको देखकर स्वामित्व साध लेना चाहिए। उक्त प्ररूपणा उन मार्गणाओमे स्वामित्वके लिए साधनेके लिए बीजपद है। इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। " कालानुगम १४८. कालानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे सब प्रकृतियों के भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थित पदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल प्रवर्तमान उपदेशके अनुसार ग्यारह समय है। परन्तु अन्य उपदेश के अनुसार पन्द्रह समय है। चार आयुओं के भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थित पदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल सात समय है। अवक्तव्यपदका जघन्य और --- भुजगारबंधे कालाणुगमो १२१ जह० उक० ग० एवं यात्र अणाहारग ति णढच्वं । णवरि ओरालियमि० देवगदि- पंचगस्स भुज० जह० उक. अंतो० ! दोआउ० ओषं । सेसाणं गदिभंगो। एवं वेद ब्धियमि० । आहारमि० धुवियाणं भुज० ज० उक्क० अंतो० । परियत्नमाणीणं भुज०- अवत्तः ओषं । कम्मइ०-अणाहार. भुज० जह० एग०, उकल्वेसम० । अवत्त० जह० उक्त० एग० [सुहुमसंप०-उवसमसम्मा० अबाहि जहएग०, उक० सनसमयं । एवं कालं समनं । उत्कृष्ट काल सवना एक समय है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणानक ले जाना चाहिए। इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी जीवॉमें देवगनिपञ्चक्के भुजगारं पदका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्नुहर्त है। दो आयुओका भङ्ग भोपके समान है। भेष प्रकृतियोंका भङ्ग गति समान है। इसी प्रकार नियिमित्रकाययोगी जीवों में जानना चाहिए। आहारकमिश्कायोगी जीवों में ध्रुवबन्धवाली प्रववियों के मुजगार पदका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्नमुहूर्त है। परावर्तमान प्रकृतियों के भुजगार और भवक्तव्य पदका नाल ओक्के समान है। कानणकाययोगी और मनाहारक जीगेमें भुजगार पदका जयन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल दो समय है। अवकल्यपका जघन्य और स्कृष्ट काल एक समय है। सूक्ष्मतान्परायसंयत और उपशम- सन्यन्द्रष्टि जीवों में अवस्थित पदका जघन्य काल एक ननय है और उकृष्ट काल सात समय है। विशेषार्थ-योगके अनुसार भुजगार और अत्यतरपद एक समय तक भी हो सकते हैं और अन्तहूर्त काल तक भी हो सस्ते हैं। यही कारण है कि यहाँ पर सब प्रकृतियोंके इन दो पदोंका जघन्य काल एक समय और स्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। अवस्थितड़का जयन्य काल वो एक समय ही है. क्योंकि एक समयकं लिए अत्यिवपद होकर दूसरे समयम अन्य पद हो,यह नन्भव है। पर इसके उत्कृष्ट कालने विपयनें दो उपदेश पाये जाते हैं-प्रथम श्वर्तनान उपशके अनुसार उस्कृष्ट कालका निर्देश और दूसरा अप्रवर्तमान उपदेशके अनुसार उत्कृष्ट कालका निर्देश । प्रथम उपदेशके अनुसार अवस्थितपदका उत्कृष्ट काल ग्यारह समय बतलाया है और दूसरे उपदेश अनुसार अवस्थितपदका उत्कृष्ट काल पन्द्रह समय यतलाग. है. इसलिए यहाँ सब प्रकृतियों के अवस्थितपदका जयन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल चारह या पन्द्रह समय कहा है। चारों आयुजों के तीनों पत्रों का यह काल इसी प्रकार है। मात्र अवन्धितपदका उत्कृष्ट काल ग्यारह समय या पन्नह समय न प्राप्त होकर केवल सात समय ही प्राप्त होता है. इसलिए इनके तीनों पदों के कालका अलगले निर्देश किया है। अब रहा नत्र प्रकृतियों के अवतव्यपदका काल लो यह पद बन्ध प्रारम्भ होनेके प्रथम समयमै होता है, इसलिए इसना जघन्य और स्व काल एक समय कहा है। अनाहारक तक जितनी मार्गणार है, उनमें यह बाल प्ररूपणा घटित हो जाती है, इसलिए उनमें ओषके समान जानने की सूचना की है। मात्र कुछ मार्गणाएँ इसनी अपवाद हैं, इसलिए उनमें अलगसे कालका विचार मिया है। उनसे पहली औदारिकमिश्कायोग मार्गणा है। इसने सन्यग्दृष्टि अपर्याप्त जीवों ने देवगतिचतुक और टीशङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले जीवों के इनका नियमसे मुलगारबन्ध होता रहता है, इसलिए इस नार्गगामें उक्त पाँच प्रकृतियों के भुजगारपदका जवन्य और मशष्ट काल अन्तर्नुहूर्त कहा है। इस मार्गणाने दो आयुओं का भङ्ग औषके समान है,यह सष्ट ही है। क्या इसमें शेष प्रकृतियों के चारों पदों का काल गति मार्गणा के अनुसार बन जाता है. इसलिए वह गतिके अनुसार जानने की सूचना की है। आहारकमित्रकाययोगमें १.अपने देवगदिग्वगन्न बई' इति । २.ताप्रती 'भगाहार० नुज० ए.' इति पाठः।
११२ महाबंधे पदेसवंधाहियारे अंतराणुगमो १४६. अंतराणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा०-छदसणा०-चदुसंज०- भय-दुगुं०-तेजा०क०-चण्ण०४-अगु०-उप-णिमि०-पंचंत० भुज०-अप्पद० बंधंतरं० जह० एग०, उक० अंतो० । अव४ि० जह० एग०, उक्क० सेढीए अमंखे० । अवत्त० जह अंतो०, उक० श्रद्धपोग्गल० । थीणगिद्वि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४ भुज०-अप्पद० जह० एग०, उक्क० वेछावहि० देसू० । अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखेन । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अद्धपोग्गल। सादासाद०-हस्स-रदि-अरदि- सोग-थिराथिर-सुभासुभ-जस०-अजस० भुज०-अप्पद०-अवढि णाणावरणभंगो । अवत्त० एकान्तानुवृद्धि योग होता है, इसलिए इसमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों का एक भुजगारपद होनेसे उसका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। तथा शेप प्रकृतियों परावर्तमान होती हैं। उनका जघन्य बन्धकाल एक समय है और उत्कृष्ट बन्धकाल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए यहां ओघके अनुसार इन प्रकृतियों के भुजगारवन्धका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। मात्र यहां भुजगारका जघन्य काल एक समय प्राप्त करनेके लिए दो समय तक इन प्रकृतियांका बन्ध अवश्य कराना चाहिए, क्योंकि इन दो समयों मे प्रथम समय अवक्तव्यका और दूसरा समय भुजगारका होनेसे भुजगारका जघन्य काल एक समय प्राप्त होगा। यहां सब परावर्तमान प्रकृतियोंके अवक्तव्यपदका ओघके अनुसार जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है यह स्पष्ट ही है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक मार्गणाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय है। पर इनमें प्रथम समय अवक्तव्यका है, इसलिए यहां भुजगारका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल दो समय कहा है। अवक्तव्यका उत्कृष्ट काल एक समय है यह स्पष्ट ही है। सूक्ष्मसाम्पराय आदि दो मार्गणाओं में मात्र अवस्थित- पदके कालमें विशेषता है, इसलिए उसका अलगसे निर्देश किया है। इस प्रकार काल समाप्त हुआ। अन्तर १४६. अन्तरानुमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलधु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायके भुजगार और अल्पतरबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थितिबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवक्तव्य- वन्धका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण है। स्त्यान- गृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्कके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागर प्रमाण है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रेणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अर्धपुदल परिवर्तनप्रमाण है। सातावेदनीय, असातावेदनीय, हास्य, रति, अरति, शोक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, यशः- १ ता०आ प्रत्योः 'असंखेजगु० । अवत्त०' इति पाठः। . ३ भुजगारबंधे अंतरकालाणुगमो ११३ जह० एग०, उक्क० अंतो० । अट्ठक० भुज-अप्पद० जह० एग०, उक्क० पुवकोडी देमू० । अवढि०-अवत्त० णाणावरणभंगो। इत्थि. भुज०-अप्पद०-अबाहि० मिच्छ०- भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वेछावहि. देसू० । पुरिस० भुज०अप्पद०- अववि० णाणावरणभंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वेछावट्टि० सादि०। णस० पंचसंठा-पंचसंघ०-अप्पसत्थ०-दूभग-दुस्सर-अणार्दै० भुज०-अप्पद० जह० एग०, उक्क० वेछावद्विसाग० सादि० तिणिपलि० देसू० । अवट्टि० णाणा भंगो। अवत्त० ज० अंतो०, उक० वेछावटि सादि० तिण्णिपलिदो० देसू०। तिण्णिआउ०-वेउन्वियछक्क० तिण्णिपदा० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अणंतका० । तिरिक्साउ० भुज०-अप्पद० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० सागरोवमसदपुधत्तं । अववि० णाणाभंगो। तिरिक्व०-तिरिक्खाणु०-उज्जो० भुज०-अप्पद० जह० एग०, उक्क० तेवहिसागरोवमसदं० । अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० असंखेंजा लोगा । णवरि उज्जो० अवत्त० [ जह० ] अंतो०, [उक्क०] तेवहिसागरोवमसदं । अवढि० णाणा भंगो। मणुस०-मणुसाणु०-उच्चा० भुज०-अप्पद०-अवढि० जह० एग०, उक्क० असंखेंजा कीर्ति और अयश कीर्तिके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपढ़का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। आठ कषायों के भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। अवस्थित और अवक्तव्यपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। स्त्रीवेदके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है। अवक्तव्यपदका जयन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण है। पुरुपवेदके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरण के समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है । नपुंसकवेद, पाँच संस्थान, पॉच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुस्वर और अनादेयके भुजगार और अल्प- तरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है । अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तन्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। तीन आयु और चैक्रियिकपटकके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर अनन्त कालप्रमाण है। तिर्यश्चायुके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवतव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर सौ सागरपृथक्त्वप्रमाण है। अवस्थितपदका भड्न ज्ञानावरणके समान है। तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी और उद्योतके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ त्रेसठ सागरप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है । इतनी विशेषता है कि उद्योत- के अबक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ बेसठ सागरप्रमाण है। अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रके भुज- गार. अल्पतर औरजवस्थितपदकाजघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोक- प्रमाण है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण ११४ महावंधे पदेसबंधाहियारे लोगा। अवत्त० जह. अंतो०, उक० असंखेज्जा लोगा। चदुलादि-आदाव- थावर-सुहम-अपज्जत्ता साधारण भुज-अप्पद० जह० एग०, उक० पंचासीदि- सागरोवमसदं० । एवं अवत्त । जह• अंतो० । अवढि० णाणा भंगो । पंचिंदि०- पर०-उस्सा०-तस० बादर-पज्ज-पत्ते भुज०-अप्पद०-अवढि० णाणा भंगो। अवत्त० ज० अंतो०, उक्क० पंचासीदिसागरोवमसदं० । ओरा० भुज-अप्पद० जह० एग०, उक० तिणिपलिदो० सादिः । अववि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अणंतकालम० । एवं ओरालि अंगो-वञ्जरि । णवरि अवत्त० नह० अंतो०, उक० तेत्तीसं० सादि० । आहारदुर्ग तिण्णिपदा जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अद्धपोग्गल । समचदु०-पसत्य-सुभग-सुस्सर-आर्दै भुज०-अप्पद० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखे । अवत्त० जह० अंतो०, उक. वेछावद्वि० सादि० तिणिपलि० देसू० । तित्थ० भुज०- अप्पद० जह० एग०, उक्क० अंतो०। अवढि० जह० एग०, अवत' जह० अंतो०, उक० तेत्तीसं० सादि० । णीचा० णसगभंगो। णवरि अवत्त० जह है। चार जाति, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ पचासी सागरप्रमाण है। इसी प्रकार अवक्तव्यपदकी अपेक्षा अन्तरकाल है। मात्र इस पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहुर्त है। अवस्थित- पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। पन्चेन्द्रियजाति, परघात, उच्छ्रास, बस, बादर, पर्याप्त और प्रत्येकके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ पचासी सागर है। औदारिक- शरीरके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तीन पल्य है। अवस्थितपटका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगभोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त कालप्रमाण है। इसी प्रकार औदारिकशरीर आनोपान और वर्पभनाराच संहननका मन जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । आहारकद्विकके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और चारोका उत्कृष्ट अन्तर अर्धपुरल परिवर्तनप्रमाण है। समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक.समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगमणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। तीर्थङ्करप्रकृतिके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहुर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। नीचगोत्रका भड्न नपुंसकवेदके समान १ आप्रतौ 'सुहुमस अपजत्त' इति पाठ । २ आ०प्रतौ 'उक्क०सेदीए अणतकालम०' इति पाठः। ३ ता आ०प्रत्योः 'ओरालि०भगो वजार' इति पाठः। ४ आ प्रतौ 'नह० एग० उ० अतो० अवत्त०' इति पाठः। - भुजगारबंधे अंतरकालाणुगमो ११५ अंतो०, उक्क० असंखेंजो लोगा । एवं ओघभंगो अचक्खुदं भवसि । है। इतनी विशेषता है कि अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है। इस प्रकार भोधके समान अचतुदर्शनी और भव्य जीवामें जानना चाहिये। विशेषार्थ-प्रथम दण्डकमें कही गई पाँच ज्ञानावरणादिका भुजगार और अल्पतरपद कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूतके अन्तरसे सम्भव है, क्योंकि इन प्रकृतियों के इन पदों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त पहले कह आये हैं, अतः इन प्रकृतियों के उक्त दोनों पदों का जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त कहा है ! इन प्रकृतियोके अवस्थित पदके योग्य योग एक समयके अन्तरसे भी हो सकता है और जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण कालके अन्तरसे भी हो सकता है, इसलिए इन प्रकृतियोंके अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगनोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। कुल योगस्थान जगणिके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। उनमें से एक-एक पदके योग्य योगस्थान भी जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण होते हैं। इसलिए यदि अन्य पदोके योग्य उक्त योगस्थान लगातार होते रहें और अवस्थित- पदके योग्य योगस्थान न हो,तव अवस्थित पदका यह उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है । इन प्रकृतियोके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूतके भीतर दो वार उपशमश्रोणि पर चढ़ा- कर दूसरी वारमें उतरते समय मरण कराके देवोमे उत्पन्न कराने पर प्राप्त होता है और अर्ध- पुद्गल परिवर्तनके प्रारम्भमे और अन्तमें उपशमश्रोणि पर चढ़ाकर उतारने पर इनके अवक्तव्य पदका उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्त- मुहूर्तप्रमाण और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण कहा है। स्त्यानागृद्धित्रिक आदि आठ प्रकृतियोके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय तो पॉच ज्ञाना- वरण आदिके समान ही घटित कर लेना चाहिए। तथा इनका बन्ध, जो जीव बीचमे सम्य- ग्मिथ्यात्वके साथ रह कर कुछ कम दो छयासठ सागरकाल तक वेदकसम्यक्त्वके साथ रहा है, उसके नहीं होता। इसके पूर्व और बादमे मिथ्यादृष्टि रहने पर अवश्य ही होता है और वह यथायोग्य भुजगार और अल्पतर दोनो प्रकारका हो सकता है, अत. इन आठ प्रकृतियोके उक्त दो पदों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागर प्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोके अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रोणिके असंख्यातवे भाग- प्रमाण जिस प्रकार पाँच ज्ञानावरण आदिके अवस्थित पदकी अपेक्षा घटित करके बतला आये हैं,उसीप्रकार घटित कर लेना चाहिए। इनके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण उसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । मात्र वहाँ उपशमश्रेणिकी अपेक्षासे यह अन्तरकाल घटित होता है और यहाँ यह अन्तरकाल सम्यक्त्व- की अपेक्षा घटित कर लेना चाहिए। सातावेदनीय आदिके भुजगार आदि तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । तथा ये परावर्तमान प्रकृतियों हैं, इसलिए इनके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त कहा है। अप्रत्याख्याना- वरण चतुष्कका संयतासंयत आदिके और प्रत्याख्यानावरण चतुष्कका संयतके बन्ध नहीं होता और इन दोनों संयमासंयम और संयमका उत्कृष्ट काल कुछ कम एक पूर्वकोटि है, इसलिए यहाँ इन आठ कषायोंके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण कहा है। यहाँ जघन्य अन्तर एक समय पहले घटित करके बतला आये हैं, इसलिए उसका फिरसे खुलासा नहीं किया। आगे भी जो अन्तरकाल पुनरुत होगा, महावंधे पदेसबंधाहियारे -~----~~ 1 , उसका अलगसे खुलासा नहीं करेगे। इनके अवस्थित और अवक्तव्यपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है ,यह स्पष्ट है। मात्र यहाँ पर अवक्तव्य पदका अन्तरकाल क्रमसे संयमासंयम और संयमको प्राप्त करके घटित कर लेना चाहिए। स्त्रीवेदके भुजगार आदि तीन पदोंका भङ्ग मिथ्यात्व- के समान है,यह स्पष्ट ही है । तथा इसके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है, क्योकि यह सप्रतिपक्ष प्रकृति होने से अन्तमुहूर्तके भीतर इसका दो बार बन्ध प्रारम्भ हो सकता है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागर है, क्योकि इतने काल तक जीवके बीच में सम्यग्मिथ्यात्वके साथ सम्यग्दृष्टि रहनेसे इसका वन्ध नही होता, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल क्रमसे उक्त कालप्रमाण कहा है। पुरुषवेदके प्रारम्भके तीन पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । तथा यह सप्रतिपक्ष प्रकृति होनेसे अन्तर्मुहूर्तके भीतर एक तो इसका दो बार वन्ध प्रारम्भ हो सकता है, दूसरे एक बार इसका वन्ध प्रारम्भ करके कोई जीव सबसे उत्कृष्ट काल तक बीचमे सम्यग्मिथ्यात्वके साथ सम्यग्दृष्टि रहा और वहाँ इसका बन्ध करता रहा । पुनः मिथ्यात्वमे आकर और इसका अबन्धक होकर अन्तर्मुहूर्तमें पुनः इसका बन्ध करने लगा। यह काल साधिक दो छयासठ सागर प्रमाण होता है, इसलिए इसके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्तप्रमाण और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण कहा है। नपुंसकवेद आदिके भुजगार और अल्पतरपदका जंघन्य अन्तर एक समय है,यह तो स्पष्ट ही है । तथा भोगभूमिमे पर्याप्त होनेपर इनका बन्ध नहीं होता और वहाँसे निकलनेके पूर्व जो सम्यक्त्वको प्राप्त कर बीचमें सम्यग्मिथ्यात्वके साथ कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण काल तक सम्यक्त्वके साथ यापन करता है, उस जीवके भी इन प्रकृतियोका बन्ध नहीं होता । उसके बाद मिथ्यात्वमे जाने पर उक्त दो पदो के साथ बन्ध होने लगता है, अतः इन प्रकृतियोके उक्त दो पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छथासठ सागरप्रमाण कहा है। इनके अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान घटित कर लेना चाहिए । तथा ये सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर जैसा भुजगार आदि दो पदोका घटित करके बतलाया है, उस प्रकार घटित कर लेना चाहिए । तीन आयु आदि नौ प्रकृनियोके वीन पद तो एक समयके अन्तरसे हो सकते हैं तथा अवक्तव्यपद कमसे कम अन्तमुहूर्तके अन्तरसे ही होगा, क्योंकि प्रथम बार बन्धका प्रारम्भ और अन्त होकर पुनः बन्धका प्रारम्भ होनेमे लगनेवाला काल अन्तर्मुहूर्तसे कम नहीं हो सकता, इसलिए आदिके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय और अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है । तथा लगातार अनन्त काल तक एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय पर्यायमे जीवके रहते हुए इनका बन्ध नहीं होता । तथा बन्धके अभावमे भुजगार आदि पद तो सम्भव ही नही हैं, अतः इन प्रकृतियोके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर अनन्त कालप्रमाण कहा है। तिर्यश्चायुके भुजगार आदि दो पदोका जघन्य अन्तर एक समय और अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त पूर्वमे कहे गये तीन आयु आदिके तीन पदोकी अपेक्षा कहे गये जघन्य अन्तरकालके समान ही घटित कर लेना चाहिए । तथा कोई जीव यदि अधिकसे अधिक काल तक तिर्यश्च न हो तो वह सौ पृथक्त्व सागर काल तक ही नहीं होता, इसलिए तिर्यञ्चायुके उक्त तीन पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है। इसके अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान प्राप्त होता है,यह स्पष्ट ही है । जो सम्यक्त्व और बीचमे सम्यग्मिथ्यात्वके साथ १३२ सागर विताकर अन्तमे नौवे अवेयकमे उत्पन्न होता है, उसके इतने काल तक तिर्यश्चगतित्रिकका बन्ध नहीं होता, इसलिए तिर्यञ्चगतिद्विकके भुजगार और अल्पतर पदका तथा उद्योतके प्रारम्भके भुजगारवंचे अतरकालाणुगमो तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ बेसठ सागर कहा है। मात्र तिर्यञ्चगतिद्विकके और उद्योतके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त होता है, क्योंकि इनका एक बार बन्ध प्रारम्भ होकर और बीचमे कमसे कम अन्तर पड़कर पुनः दूसरी बार इनके बन्धका प्रारम्भ अन्तर्मुहूर्तसे पहले नहीं हो सकता । और तिर्यञ्चगतिद्विकका निरन्तर बन्ध तैजस्कायिक और वायुकायिक जीवोमे असंख्यात लोकप्रमाण काल तक होता रहता है, इसलिए इन दोनोके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इन तीनो प्रकृतियोके अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है, यह स्पष्ट ही है। मनुष्यगति आदि तीनका बन्ध अग्निकायिक और वायुकायिक जीव नहीं करते, इसलिए इनके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण कहा है। तथा इनके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय और अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त अन्य प्रकृतियोका पूर्वमे अनेक वार घटित करके बतला आये है, उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए। चार जाति आदिका बन्ध निरन्तर एक सौ पचासी सागर तक नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके इन तीन पदोके जघन्य अन्तर कालका विचार तथा अव- स्थितपदके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर कालका विचार सुगम है। पञ्चेन्द्रियजाति आदिका एक सौ पचासी सागर काल तक निरन्तर वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इनका शेष विचार सुगम है । जो मनुष्य प्रथम त्रिभागमें मनुष्यायुका बन्ध कर और क्षायिकसम्यग्दृष्टि होकर उत्तम भोगभूमिमे जन्म लेता है, उसके साधिक तीन पल्य तक औदारिकशरीरका बन्ध नहीं होता, इसलिये इसके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । इसके अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रोणिके असंख्यातवे भागका स्पष्टीकरण ज्ञाना- वरणके समान कर लेना चाहिए । तथा इसका कमसे कम अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे बन्ध सम्भव है और एकेन्द्रियों में इसका अनन्त काल तक निरन्तर वन्ध होनेसे इतने कालके अन्तरसे भी इसका उक्त पद सम्भव है, इसलिए इसके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त कालप्रमाण कहा है। औदारिक शरीर अङ्गोपाङ्ग और वर्षभनाराचसंहननके अन्य पदोका अन्तर काल औदारिकशरीरके समान वन जानेसे उस प्रकार जाननेकी सूचना की है। मात्र इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर प्राप्त होनेसे यह उक्त कालप्रमाण कहा है। उत्कृष्ट अन्तरकाल अलग-अलग प्रकृतिका विचार कर घटित कर लेना चाहिए । आहारकद्विकका वन्ध अर्धपुद्गलपरावर्तनके प्रारम्भमे और अन्तमे करानेसे इनके चारों पदोका उक्त काल प्रमाण अन्तर प्राप्त हो जाता है। शेप विचार सुगम है। समचतुरस्रसंस्थान आदिके प्रारम्भके तीन पदोंका जो अन्तरकाल कहा है वह ज्ञानावरणके ही समान है, इसलिए ज्ञानावरणके प्रसंगसे जिस प्रकार घटित करके बतला आये हैं, उसी प्रकार यहाँ पर भी घटित कर लेना चाहिए। तथा इनका कमसे कम अन्तर्मुहूतके अन्तरसे दो वार बन्ध प्रारम्भ हो सकता है और कुछ कम तीन पल्य अधिक दो वार छयासठ सागरके अन्तरसे भी दो बार वन्ध प्रारम्भ हो सकता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण कहा है। यहाँ जो उत्कृष्ट अन्तरकाल कहा है सो इतने काल तक तो इनका निरन्तर वन्ध होता रहता है, किन्तु इसके प्रारम्भमें इनका वन्ध प्रारम्भ करावे और सम्यक्त्वके कालके पूर्ण होनेपर मिथ्यात्वमे ले जाकर तथा अन्य सप्रतिपक्ष प्रकृतियोका बन्ध कराकर पुन इनके बन्धका प्रारम्भ करावे और इस प्रकार यह उत्कृष्ट अन्तर काल ले आवे । अन्यत्र भी जहाँ विशेप खुलासा नहीं किया हो, वहाँ इसी प्रकार खुलासा कर लेना चाहिए।
१२८ महाबंधे पदेसवंधाहियारे १५०. णिरएसु धुवियाणं भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो । अवधि. जह० एग०, उक० तेत्तीसं० देसू०। थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-इथि०-णस. दोगदि-पंचसंठा-पंचसंघ०-दोआणु०-उज्जो०-अप्पसत्थ०- ०-दूभग-दुस्सर-अणार्दै०-दोगोद. भुज०-अप्पद०-अवडिजह• एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक० तेत्तीसं० देसू० । दोवेद०-चदुणोक०-थिरादितिण्णियुग० भुज०-अप्प०-अवढि० णाणाभंगो । अवत्त ० जह• उक्क० अंतो०। पुरिस०-समचदु०-बञ्जरि०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आर्दै भुज०- अप्पद०-अवढि० णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेंतीसं० दे० । दोआउ० भुज०-अप्पद०-अवडि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० छम्मासं० तीर्थङ्कर प्रकृतिका और अन्तरकाल सुगम है। केवल अवस्थित और अवक्तव्यपदके उत्कृष्ट अन्तरकालका विचार करना है। इस प्रकृतिका उत्कृष्ट बन्ध काल साधिक तेतीस सागर है। यह सम्भव है कि वन्धकालके प्रारम्भमे और अन्तमे अवस्थित पढ़ हो और मध्यमे न हो, इसलिए तो इसके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। तथा किसीने तीर्थङ्कर प्रकृतिके बन्धका प्रारम्भमै अवक्तव्यपद किया और साधिक तेतीस सागर काल तक निरन्तर वन्ध करनेके वाद मनुष्य पर्यायमे उपशमश्रोणिपर चढ़कर और इसका अवन्धक होकर उतरते समय पुन वन्ध प्रारम्भ किया। इस प्रकार अवक्तव्यपदका साधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त हो जानेसे यह उक्त कालप्रमाण कहा है। इसके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त इसके बन्धका प्रारम्भ कराके और अन्तमुहूर्तके भीतर उपशमश्रेणि पर चढ़ा कर और मरण कराकर देवोमे उत्पन्न कराकर पुनः बन्धका प्रारम्भ करानेसे प्राप्त हो जाता है। नीचगोत्रका अन्य सब भङ्ग नपुंसकवेदके समान है। मात्र इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण प्राप्त होनेसे वह अलगसे कहा है । अग्निकायिक और वायुकायिक जीवोमे इतने काल तक इसका निरन्तर वन्ध होता रहता है, अत इसके प्रारम्भमे और बादमे नीचगोत्रके बन्धका प्रारम्भ कराकर अवक्तव्यपदका यह अन्तर काल ले आना चाहिए | अचक्षुदर्शनी और भव्य जीवोमे यह ओचप्ररूपणा अविकल घटित हो जानेसे उनमें ओषके समान जाननेकी सूचना की है। १५०. नारकियोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व अनन्तानुवन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, दो गति, पॉच संस्थान, पॉच संहनन, दो आनुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायो- गति, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और दो गोत्रके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। दो वेदनीय, चार नोकपाय और स्थिर आदि तीन युगलके भुजगार अल्पतर और अवस्थितपदका भग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । पुरुषवेद, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रर्षभनाराचसंहनन, प्रशस्त विहायो- गति, सुभग, सुस्वर और आदेयके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। दो आयुओके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और सक्का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम छह महीना . " भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो ११४ देसू० । तित्य. भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवढि० जह'० एग०, उक्क० विणि सागरो० सादि० [ अवत्त० णत्यि अंतरं । एवं सन्चणेरइयाणं अप्पप्पणो अंतरं णेदव्वं । णवरि पढमाए पुढवीए वित्य० अवत्त० णत्यि अंतरं। है। तीर्थक्करप्रकृतिके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थितपदका जघन्य अन्वर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तीन सागर है। अवतन्यपदका अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार सब नारकियोंमें अपना-अपना अन्तरकाल ले आना चाहिए । इतनी विशेषता है कि पहली पृथिवीमें तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्य पदका अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थनारकियोंमें जो ध्रुववन्धवाली प्रकृतियाँ हैं, उनका अवस्थित पद भवके प्रारम्भमें और अन्तमें हो मध्यमें न हो यह भी सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है। यहाँ इन प्रकृवियोंका अवक्तव्यपद नहीं होता, इसलिए उसकी अपेक्षा अन्तरकाल नहीं कहा है। स्त्यानगृद्धि तीन आदिके चारो पदोंका जो उत्कृष्ट अन्तर काल कुछ कम तेतीस सागर कहा है,उसका खुलासा इस प्रकार है-कोई जीव नरफमें जाकर और सम्यक्त्वको प्राप्त कर इनका अवन्धक हुआ । पुनः कुछ कम तेतीस सागर काल तक सम्यक्त्वके साथ रहकर और मिथ्यात्वमै लाकर पुनः इनका वध करने लगा । इसप्रकार तो भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर प्राप्त हो जाता है। तथा नारकी होकर प्रारम्भमें अवस्थित पद किया और अन्तमें अवस्थितपद किया, इसलिए इसका भी उक्त कालप्रमाण उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त हो जाता है। यहाँ जो सप्रविपक्ष प्रकृतियाँ हैं उनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त तो सुगम है,पर ल्यानगृद्धित्रिक आदि आठ प्रकृतियोंके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त दो बार सम्यक्त्व कराकर और मिथ्यात्वमें ले जाकर प्राप्त कर लेना चाहिए। दो वेदनीय आदि परावर्तमान प्रकृतियों हैं, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका भङ्ग ब्रानावरणके समान प्राप्त होने में कोई बाधा नहीं आती,पर अवस्थितपदका जो उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है, वह कैसे बनता है यह विचारणीय है । बात यह है कि यहाँ अवस्थितपद प्रत्येक जीवके होना ही चाहिए-ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योकि अवस्थितपदके कारणभूत जो योगस्थान हैं वे अधिकसे अधिक जगनोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण कालके अन्तरसे भी होते हैं और एक समयके अन्तरसे भी होते हैं।पर नारकी जीवका नरकमें उत्कृष्ट अवस्यानकाल तेनीस सागरसे अधिक नहीं होता और इस कालके भीतर अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर काल दिखाना आवश्यक था, इसलिए जिस जीवने इन प्रकृतियोंका नरकभवके प्रारम्भमें अवस्थित पद किया और नरकभवके अन्तमें अवस्थित पद किया, मध्यमें नहीं किया उसको लक्ष्यमें रखकर अवस्थितपदका यहाँ उत्कृष्ट अन्तरकाल कहा है। अन्यत्र जहाँ भी भवस्थिति और कायस्थितिमें फरक नहीं है या कायस्थितिजगोणिके असंख्यात भागसे न्यून है,वहाँ इसी बीजपदके अनुसार अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल ले आना चाहिए। तथा इन दो वेदनीय आदिके दो बार बन्धके प्रारम्भमें अन्तर्मुहूर्त काल लगता है, इसलिए इनके अवतन्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्त कहा है । पुरुषवेद आदि सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ तो हैं,पर सन्यग्दृष्टिके ये निरन्तरवन्धिनी हैं, इसलिए यहाँ इनके प्रारम्भके तीन पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान बन जाता है। अब रहाअवक्तव्यपदसो इनका मिथ्यादृष्टिके १. ताप्रतौ 'बह० एग, अवहिल नह०' इति पाठः।
. १२० महावंधे पदेसबंधाहियारे १५१. तिरिक्खेसु धुपियाणं भुज०-अप्पद०-अववि० ओघ । थोणगि०३-मिच्छ०- अणताणु०४ भुज० अप्पद० ज० एग०, उक्क० तिण्णिपलिदो० देसू० । अवडि. अवत्त० ओघ । दोवेदणी०-चदुणोक०-थिरादितिण्णियु० चत्तारि पदा ओघं। अपञ्च- क्खाण०४ ओघभंगो] । इत्थि० भुज०-अप्पद० जह० एग०, अवत्त० जह• अंतो०, उक्क तिणि पलिदो० देसू० । अवढि० ओघ । पुरिस० भुज० अप्पद०-अवढि० णाणा भंगो । अवत्त० जह• अंतो०, उकै तिणिपलिदो० देसू० । गqस०-चदुजादि- [ओरा०-] पंचसंठा०-ओरालि अंगो०-छस्संघ०-आदाउज्जो०-अप्पसस्थ०-थावरादि०४- भग-दुस्सर-अणार्दै० भुज०-अप्पद० जह० एग०, उक्क० पुवकोडि० देखणं० । अवद्धि याणा मंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक० पुचकोडी देसू० । तिण्णिआउ० भुजे०- अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे दो बार वन्ध होना सम्भव है और नरकभवके प्रारम्भमे इनका बन्ध प्रारम्भ करे । तथा सम्यक्त्वके साथ रह कर भवके अन्तमे मिथ्यादृष्टि होकर अन्य सप्रतिपक्ष प्रकृतियोसे अन्तरित कर पुनः इनके बन्धका प्रारम्भ करे,यह भी सम्भव है। यही कारण है कि यहाँ इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है । दो आयुओके भुजगार आदि तीन पद एक समयके अन्तरसे हो सकते है, इसलिए दोनों आयुओके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय कहा है,पर दूसरी बार आयुवन्धका प्रारम्भ कमसे कम अन्तमुहूर्त काल गये विना नहीं हो सकता, इसलिए इसका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है । तथा नरकमे प्रथम त्रिभागमे आयु बन्ध हो और उसके बाद कुछ कम छह महीनाका अन्तर देकर आयुबन्ध हो, यह सम्भव है।यही देखकर यहाँ इनके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम छह महीना कहा है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाला जीव यदि नरकमे उत्पन्न होता है तो उसको आयु साधिक तीन सागरसे अधिक नहीं होती, यह देखकर यहाँ इसके अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। सामान्यसे नरकमें और प्रथम नरकमे तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है.यह स्पष्ट ही है । शेप कथन सुगम है। १५१. तिर्यञ्चोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भग ओघके समान है।स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धीचतुष्कके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है । अवस्थित और अवक्तव्यपदका भड्ग ओघके समान है। दो वेदनीय, चार नोकषाय और स्थिर आदि तीन युगलके चार पदोका भङ्ग ओघके समान है। अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कका भङ्ग ओघके समान है। स्त्रीवेदके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपढ़का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनों पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है। तथा अवस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है। पुरुषवेदके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है। नपुंभकवेद, चार जाति, औदारिकशरीर, पाँच संस्थान, औदारिकशरीर आलोपाङ्ग, छह संहनन, आतप, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर आदि चार, दुर्भग, दुःस्वर और अना- देयके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है । अवस्थितपदका भन ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। तीन आयुओके १ ता०प्रतौ 'ओघ । थि (थी) णगि०, इति पाठः।२ आ०प्रतौ 'अवत्त० जहरू उक्क०' इति पाठः ।
भुजगारवंघे अंतरकालाणुगमो १२१ अप्पद०-अवडि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो, उक्क० पुव्वकोडितिभागं देसूर्ण । तिरिक्खाउ० भुज०-अप्पद० जह० एग०, उक्क० पुचकोडी सादि । अवढि० णाणा०- भंगो । अवत्त० ज० अंतो०, उक्क० पुब्बकोडी सादि । वेउब्वियछक्कं मणुसगदितिगं ओघं । तिरिक्खगदितिगं गईंसंगभंगो । णवरि अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० असंखेंजा लोगा। पंचिंदि०-समचदु०-पर-उस्सा०-पसत्थ०-तस०४-सुभग-सुस्सर-आर्दै भुज०- अप्पद०-अवढि० णाणाभंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पुव्वकोडी० देस० । भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिका कुछ कम विभागप्रमाण है। - तियश्चायुके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक एक पूर्वकोटिप्रमाण है । अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कष्ट अन्तर साधिक एक पूर्वकोटिप्रमाण है। वैक्रियिकपटक और मनुष्यगतित्रिकका भङ्ग ओघके समान है। तिर्यञ्चगतित्रिकका भग नपुंसकवेदके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपढ़का जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है। पञ्चेन्द्रियजाति, समचतुरस्रसंस्थान, परघात, उच्छास, प्रशस्त विहायोगति, सचतुष्क, सुभग, सुस्वर और आदेयके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग बानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है । विशेषार्थ—यहाँ व आगे सव प्रकृतियोंके यथासम्भव पदोका जो जघन्य अन्तरकाल कहा है वह सुगम है, क्योंकि उसका ओघप्ररूपणाके समय अलग-अलग स्पष्टीकरण कर आये हैं, अतः उसे वहाँ देखकर सर्वत्र घटित कर लेना चाहिए । जहाँ कुछ वक्तव्य होगा,वहाँ उसका निर्देश करेंगे ही। मात्र सर्वत्र यथासम्भव पदोके उत्कृष्ट अन्तरकालका स्पष्टीकरण करना आव- श्यक समझ कर उसपर अवश्य ही विचार करेंगे । उसमे भी भुजगार और अल्पतरपदके विषयमे जहाँ विशेष वक्तव्य होगा, वहीं उसका निर्देश करेंगे । यहाँ तिर्यञ्चोकी उत्कृष्ट कायस्थिति अनन्तकाल होनेसे ध्रववन्धवाली प्रकृवियोंके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल ओघके समान बन जानेसे वह ओषके समान कहा है । आगे अन्य जिन प्रकृतियोंके अवस्थितपदका अन्तरकाल भोधके समान कहा है वह भी इसी प्रकार जान लेना चाहिए । स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके भुजगार और अल्पतरपद उत्तम भोगभूमिके प्रारम्भमे हों, उसके बाद सम्यग्दृष्टि होकर इनका वन्ध न होनेसे मध्यमें न हों और अन्तमें मिथ्यादृष्टि होनेपर पुन बन्ध होने लगनेसे पुन हो,यह सम्भव है, इसलिए उक्त प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य कहा है। यहाँ आगे अन्य जिन प्रकृतियोंके जिन पदोका यह अन्तरकाल कहा है,वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए | ओघसे इन प्रकृतियोंके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर जगश्रेणिके असंख्यातवें भागप्रमाण और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुदगल परिवर्तनप्रमाण कहा है, वह यहाँ भी बन जाता है, क्योंकि तिर्यञ्चकी कायस्थिति इन दोनों अन्तरकालोसे बहुत अधिक बतलाई है, अतः किसी भी जीवके इतने कालतक तिर्यञ्च पर्यायमे वने रहना सम्भव है। दो वेदनीय आदिके चारो पदोंका भग ओधके समान यहाँ भी घटित हो जाता है, इसलिए उसे १. ताप्रती 'पुबकोडिति० तादि०' आ०प्रतौ 'पुब्बकोडितिमार्ग साटि०' इति पाठः। २. आ०प्रतौ 'पुन्चकोडितिभागं सार्टि' इति पाठ-1 ३. ता प्रती 'लोगा । सम० पर०' इति पाठ ।
૨ महावंधे पदेसबंधाहियारे १५२. पंचिंदि तिरि०पञ्जत्त-जोणिणीसु धुबियाणं भुज०-अप्प० जह० एग०, उक० अंतो० । अवढि० जह• एग०, उक० तिण्णि पलिदो० पुच्चकोडिपुत्तेण- भहियाणि । थीणगि०३-मिच्छ०-अणताणु०४-इत्थि० भुज०-अप्पद० जह० एग०, ओघके समान कहा है। भोगभूमिम नपुंसकवेद आदिका बन्ध अपर्याप्त अवस्थामें होता है, इस- लिए यहाँ इन प्रकृतियों भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल कर्मभूमिको अपेक्षा प्राप्त किया गया है, क्योंकि कर्मभूमिमे एक पूर्वकोटिकी आयुवाले जीवके भवके प्रारम्भमे मिथ्या- दृष्टि होनेसे ये पद हो, पुन. सम्यग्दृष्टि हो जानसे मध्यम पन्ध न होने से ये पद न हो और भवके अन्तमें पुनः मिन्यात्वमे चला जानेके कारण वन्ध होनेसे पुनः ये पद होने लगे,यह सम्भव है, इसलिए उक्त प्रकृतियोंके इन दोनो पदीका उत्कृष्ट अन्तर फुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण कहा है। आगे जिन प्रकृतियोंक जिन पदोका यह अन्तरकाल कहा हो,वह इसीप्रकार घटित कर लेना चाहिए । जो पूर्वकोटिकी आयुवाला तिर्यश्च प्रथम विभागमे तीन आयुआम से किसी एकका बन्ध करके चारी पद करता है और फिर भवके अन्तम इनका बन्ध करके चारों पद करता है, उसके उक्त तीनो आयुआके चागे पदोंका उत्कृष्ट अन्तरफाल पूर्वकोटिका कुल कम विभागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह उक्तकाल प्रमाण कहा है । तियश्चायुके अवस्थित पदके सिवा शेष तीन पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एक पूर्वकोटिप्रमाण जानना चाहिए, क्योंकि तिर्यवायुके तीन पदोका यह अन्तरकाल दो भवाके आश्रयसे प्राप्त करनेपर साधिक एक पूर्वकोटिप्रमाण प्राप्त होता है। मात्र इसके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे उसका भद्ग ज्ञानावरणके समान कहा है । बैंक्रियिकपटक और मनुष्यगतित्रिकका भग ओषम तिर्यचौकी मुख्यतासे ही प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ ओषके समान जाननेकी सूचना की है। तिर्यश्चगतित्रिकका शेप भग तो नपुंसकवेदके समान बन जाता है, क्योंकि इनके दो पढोका उत्कृष्ट अन्तर कर्मभूमिमे पूर्वकोटिकी आयुवाले तिर्यश्चके ही प्राप्त हो सकता है और अवस्थित- पदका उत्कृष्ट अन्तर मानावरणके समान जगणिके असंख्यात मागप्रमाण यहाँ भी बन जाता है। मात्र इनके अवक्तव्यपदके उत्कृष्ट अन्तरकालमै फरक है। बात यह है कि अग्निकायिक और वायुकायिक जीव इन तीन प्रकृतियोका निरन्तर बन्ध करते रहते हैं, इसलिए उनके इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल सम्भव नहीं है और उनकी उत्कृष्ट कायस्थिति असंख्यात लोकप्रमाण होती है, अतः इस कायस्थितिके पूर्वम और बादमें इन प्रकृतियोंका अवक्तव्यपद होनेसे इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण प्राप्त होनेसे यह उक्त कालप्रमाण कहा है । पञ्चेन्द्रियजाति आदिका भोगभूमिमे बन्ध प्रारम्भ होनेपर वह निरन्तर होता है, इसलिए वहाँ इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल सम्भव नहीं है। हॉ,कर्मभूमिमे जो पूर्वकाटिकी आयुवाला जीव प्रारम्भमै नका अवक्तव्य पद करके और सम्यग्दृष्टि होकर इनका निरन्तर वन्ध करे। तथा अन्तमे मिथ्यादृष्टि होकर और अन्य प्रकृतियोके बन्धका अन्तर देकर पुनः इनका बन्ध करे,उसके इनके अबक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। १५२ पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च, पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च पर्याप्त और पश्चेन्द्रिय तिर्यश्च योनिनी जीवोंमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके मुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्य है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धीचतुष्क और स्त्रीवेदके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर , भंगो। भुजगारवघे अंतरकालाणुगमो १२३ अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तिणि पलिदो० देसू० । अवट्टि णाणा० अपचक्खाण०४ भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० पुचकोडी० दे० । अवढि० णाणा भंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पुत्रकोडिपुध० । साददंडओ अवहि० णाणा भंगो। सेसाणि पदाणि तिरिक्खो । पुरिस० तिण्णिपदा० सादभंगो । अवत्त तिरिक्खोपं । णबुंस-तिण्णिगदि-चदुजादि-ओरा०-पंचसंठा-ओरा अंगोव०-छस्संघ०-तिण्णिआणु०- आदाउजो०-अप्पसत्थः-थावरादि०४-दूभग-दुस्सर-अणार्दै०-णीचा० भुज०-अप्प. तिरिक्खोघ-णqसगभंगों । अबढि० जह० एग०, उक्क० पुन्चकोडिपुध० । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पुव्वकोडी देसू० । तिण्णिआउ० तिरिक्खोघं । तिरिक्साउ तिण्णि पदा तिरिक्खोपं । अवाहि० णभंगो। देवगदि-पंचिदि०-वेउवि०-समचदु०-वेउ०अंगो०- देवाणु०-पर०-उस्सा०-पसत्य०-तस०४-सुभग सुस्सर-आर्दै०-उच्चा० भुज०-अप्प०- अवहि० णाणा भंगो। अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० पुन्चकोडी दे । अन्तमुहूर्त है और तीनों पदीका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्यप्रमाण है । तथा इनके भवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके भुजगार और अल्पतर- पढ़का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तथा अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वप्रमाण है। सातावेदनीयदण्डकके अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है तथा शेष पदोंका भग सामान्य तिर्यञ्चोके समान है। पुरुषवेदके तीन पदोंका भङ्ग सातावेदनीयके समान है और अवक्तव्यपदका भन सामान्य तिर्यञ्चोके समान है। नपुंसकवेद, तीन गति, चार जाति, औदारिकशरीर, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, तीन आनुपूर्वी, आतप, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर आदि चार, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और नीचगोत्रके भुजगार और अल्पतरपदका भङ्ग सामान्य तिर्यञ्चोके कहे गये नपुंसकवेदके समान है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्व कोटि पृथक्त्वप्रमाण है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। तीन आयुओका भग सामान्य तिर्यञ्चोके समान है । तिर्यश्चायुके तीन पदोंका भग सामान्य तिर्यञ्चोके समान है। अवस्थितपदका मन नपुंसकवेदके समान है। देवगति, पञ्चेन्द्रियजाति, वैकियिकशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, देव- गत्यानुपूर्वी, परघात, उच्छास, प्रशस्त विहायोगति, त्रसचतुष्क, सुभग, सुस्वर, आदेय और ज्वगोत्रके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जवन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। विशेषार्थ— इन तीन प्रकारके तिर्यञ्चोंको उत्कृष्ट कायस्थिति पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्यप्रमाण होनेसे यहाँ ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके अवस्थितपदका उक्त कालप्रमाण उत्कृष्ट अचरकाल कहा है। कारणका निर्देश पहले कर आये हैं । यहाँ स्त्यानगृद्धित्रिक आदिका उत्कृष्ट धन्धान्तर उत्तम भोगभूमिमें ही सम्भव है, अत इनके भुजगार, अवस्थित और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य कहा है। यहाँ प्रारम्भमे और अन्तम उक्त पद कराकर यह १. ताप्रतौ पटाणि 'तिरिक्खोयं णवू.' इति पाठः। २ ता आ प्रत्यौः 'अप्प० णबुसगमंगो' इति पानः। ३. ता०प्रती दे० । तिरिक्ताउ०, इति पाठः। .
महावंधे पदेसबंधायिारे १५३. पंचिंदि तिरि०अपज. धुवियाणं भुज०-अप्प०-अवहि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । सेसाणं भुज-अप्प०-अघहि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवत्त. अन्तरकाल ले आना चाहिए । इनके अवस्थितपदका भङ्ग जानावरणके समान है, यह स्पष्ट ही है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कका उत्कृष्ट बन्धान्तर पूर्वकोटिकी आयुवाले उक्त निर्यञ्चोमे ही सम्भव है, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि प्रमाण कहा है । तथा पूर्वकोटिपृथक्त्व कालके प्रारम्भमे और अन्तमे संयमासंयम होकर पुनः असंयममें जाना सम्भव है, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके अवस्थित पदका अन्तर ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। सातावेदनीय- दण्डकके अवस्थित पदका भग ज्ञानावरणके समान और शेप तीन पदोका भग सामान्य तिर्यञ्चोंके समान है,यह भी स्पष्ट है। विशेष खुलासाके लिए उक्त स्थानोको देखकर अन्तर- कालकी संगति बिठला लेनी चाहिए। यहाँ सातावेदनीयके तीन पदोका जो अन्तरकाल कहा है वह पुरुपवेदके तीन पदोका भी बन जाता है, अतः इसे सातावेदनीयके समान जाननेकी सूचना की है। तथा सामान्य तिर्यञ्चोमे पुरुपवेदके अवक्तव्यपदका जो अन्तर काल घटित करके बतला आये है,वह यहाँ भी बन जाता है, इसलिए इसे सामान्य तिर्यञ्चोके समान जाननेकी सूचना की है । सामान्य तिर्यम्बोमे नपुंसकवेदके भुजगार ओर अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण पहले घटित करके वतला आये हैं, वह इन तियञ्चोकी मुख्यतासे ही सम्भव है। इसलिए यहाँ नपुंसकवेद आदि प्रकृतियोके उक्त दो पदोका भग सामान्य तिर्यम्बोमे कहे गये नपुंसकवेदके उक्त दो पदोके अन्तरकालके समान कहा है । इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर काल कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । तथा इनके इन प्रकृतियोका अवस्थितपद पूर्वकोटिपृथक्त्वके प्रारम्भमे और अन्तमे हो और मध्यमे न हो यह सम्भव है, इसलिए इनके इस पदका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। सामान्य तिर्यञ्चोमे तीन आयुओके सब पढोका अन्तरकाल उक्त तीन प्रकारके तियञ्चोकी मुख्यतासे ही कहा है, इस लिए यहाँ तीन आयुओके सव पदोके अन्तरकालको सामान्य तिर्यञ्चोके समान जाननेकी सूचना की है। तिर्यञ्चायुके तीन पदोका भङ्ग तो सामान्य तियञ्चोके समान वन ही जाता है, क्योंकि वहाँ इन्हीं तिर्यञ्चोकी मुख्यतासे इन पदोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है। पर इसके अवस्थित पदके उत्कृष्ट अन्तरकालमै फरक है। बात यह है कि इन तियञ्चोकी उत्कृष्ट कायस्थिति पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्यप्रमाण है और यहाँ नपुंसकवेदके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल इतना ही बतला आये है, इसलिए यहाँ तिर्यञ्चायुके अवस्थित पदके अन्तरकालको नपुंसकवेदके समान जाननेकी सूचना की है। देवगति आदिके भुजगार आदि पदोका अन्तर ज्ञानावरणके समान यहाँ भी घटित हो जाता है, इसलिए इसे ज्ञानावरणके समान जाननेकी सूचना की है । तथा इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण प्राप्त होनेसे वह अलगसे कहा है। उक्त तिर्यञ्चोंमेसे कोई एक तियञ्च इन प्रकृतियोके बन्धका प्रारम्भ करके सम्यग्दृष्टि हो जाता है। फिर भक्के अन्तमें मिथ्यादृष्टि होकर और इनका अन्य प्रकृतियो द्वारा बन्धान्तर करके पुनः बन्ध प्रारम्भ करता है, तो उसके इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि प्रमाण प्राप्त होनेसे वह उक्त काल प्रमाण कहा है। १५३ पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपटका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। शेष प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्त- एग०, . भुजगारवंचे अंतरकालाणुगमो १२५ जह० उक्क० अंतो०। एवं सन्चअपजत्तयाणं तसाणं थावराणं सञ्चसुहुमपज्जत्तयाणं च । १५४. मणुस०३ पंचिंदियतिरिक्सभंगो। णवरि धुवियाणं उपसम० परिवद- माणयाणं अवत्त० जह० अंतो०, उक्क. पुव्वकोडिपुधत्तं । पञ्चक्खाण०४ अवत्त. जह० अंतो०, उक्क० पुव्वकोडिपुत्त । आहार-आहार अंगो० तिण्णि पदा जह० अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पुव्वकोडिपुध० । तित्थ० भुज०-अप्प० णाणभंगो। अवडि• जह० एग०, अवत्त० ज० अंतो०, उक्क० पुन्चकोडी देवः । मुहूर्त है। अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । इसी प्रकार त्रस और स्थावर सब अपर्याप्तकामे तथा सव सूक्ष्म पर्याप्तकोमे जानना चाहिए । विशेषार्थ—यहाँ सव प्रकृतियों दो भागोंमे विभक्त हो गई है-ध्रुववन्धवाली और शेप । इन सबके भुजगार आदि तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है, क्योकि अपर्याप्त जोवोकी भवस्थिति और कायस्थिति अन्तर्मुहूर्तसे अधिक नहीं होती । तथा जो शेष प्रकृतियाँ हैं, उनका अवक्तव्यपद भी यहाँ सम्भव है । पर एक बार बन्ध होकर पुन उस प्रकृतिके बन्ध होनेमे अन्तर्मुहूर्त कालका अन्तर पड़ता है, इसलिए इनके इस पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त कहा है । यहाँ अन्य जितनी मार्गणाएँ गिनाई है, उन सबकी कायस्थिति अन्तमुहूर्तप्रमाण होनेसे उनमे यह व्यवस्था बन जाती है, इसलिए उनमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोके समान जाननेकी सूचना की है। १५४ मनुष्यत्रिकमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि ध्रुववन्ध- वाली प्रकृतियोंके उपशमश्रेणिसे गिरनेवाले जीवोमे अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वप्रमाण है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वप्रमाण है। आहारकशरीर और थाहारकाङ्गोपाङ्गके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वप्रमाण है। तीर्थङ्कर प्रकृतिके भुजगार और अल्पतरपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और दोनोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि- प्रमाण है। विशेषार्थ-पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोकी और उक्त तीन प्रकारके मनुष्योकी कायस्थिति पूर्वकोटि- पृथक्त्व अधिक तीन पल्य होनेसे तीन प्रकारके मनुष्योमे अन्य सब प्रकृतियोंके सब पदोका अन्तरकाल पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोके समान वन जाता है। मात्र मनुष्योमे प्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोको प्राप्ति सम्भव है और इनमे आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध भी सम्भव है, इसलिए इस दृष्टिसे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोकी अपेक्षा अन्तरकालमे जो विशेषता आती है,उसका अलगले निर्देश किया है। उदाहरणार्थ- इन तीन प्रकारके मनुष्योमे उपशमश्रोणिकी प्राप्ति सम्भव है, इसलिए इनमे पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, तैजस- शरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तराय इन इकतीस प्रकृतियोंका उपशमणिकी अपेक्षा अवक्तव्यपद भी सम्भव है, इसलिए उसका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अलगसे कहा है। इसी प्रकार यहाँ संयम ग्रहण सम्भव होनेसे प्रत्याख्याना- १ ता प्रतौ 'सव्वहुमअपजत्तयाण' इति पाठ । ३ ता प्रतौ 'परिपदया (मा) ण' इति पाठ । ३ आ प्रती 'नह० अतो०, आहार०' इति पाठ.। , १२६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे १५५. देवेसु धुवियाणं भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अववि० जह० ए०, उक्क० तेत्तीस'० देसू० । एवं तित्थ० । थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४- इत्थि०-णस०-पंचसंठा०-पंचसंघ०-अप्पसत्य०-दूभग-दुस्सर-अणादें-णीचा० भुज०- अप्प अवढि० जह० एग०,अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० ऍक्कत्तीसं० देसू० । दोवेदणी- चदुणोक०-थिरादितिण्णियुग० भुज०-अप्पद०-अवढि णाणाभंगो। अवत्त० जह अंतो०, उक० अंतो० । पुरिस०-समचदु०-वञ्जरि०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आदें- उच्चागो० तिण्णि पदा णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० ऍकत्तीसं० देसू० । दोआउ० णिरयभंगो। तिरिक्खगदि-तिरिक्खाणु०-उजो० तिण्णि पदा० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अट्ठारससाग० सादि० । मणुस०-मणुसाणु० भुज०- अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवढि णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अट्ठारससाग० सादि०। एइंदि०-आदाव०-थावर० भुज-अप्प०-अवढि० जह० एग०, अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० वेसाग० सादि० । पंचिंदि०-ओरा अंगो-तस० वरणचतुष्कका भी अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए उनके इस पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अलगसे कहा है । शेष कथन सुगम है। १५५. देवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। इसीप्रकार तीर्थङ्कर प्रकृतिको अपेक्षासे जानना चाहिएं। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व अनन्तानुबन्धीचतुष्क, खीवेद, नपुंसकवेद, पाँच संस्थान, पॉच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्रके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है। दो वेदनीय, चार नोकषाय और स्थिर आदि तीन युगलके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। पुरुष- वेद, समचतुरस्रसंस्थान, वर्षभनाराचसंहनन, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय और उच्चगोत्रके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है। दो आयुओका भङ्ग नारकियोके समान है। तिर्यश्चगति, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी और उद्योतके तीन पदोंका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर है। मनुष्यगति और मनुष्यगत्यानुपूर्वीके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर है। एकेन्द्रियजाति, आतप और स्थावरके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर है। पछेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर आजोपाग और त्रसके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरण के समान १. आप्रतो 'अप्प. जह० एग०, उक्क० तेत्तीस०' इति पाठः। २ आमतौ 'णीचा. अप्प०' इति पाठः। , भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो १२७ तिण्णिपदा णाणा भंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वेसाग० सादि०। एवं सच्च- देवाणं अप्पप्पणो अंतरं णेदव्वं । है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर है। इसी प्रकार सब देवोंमे अपना-अपना अन्तरकाल ले जाना चाहिए । विशेषार्थ-देवोंकी उत्कृष्ट आयु तेतीस सागर है, इसलिए यहाँ ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों के अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है । देवोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों ये है-पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, अप्रत्याख्यानावरण आदि बारह कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, निर्माण और पॉच अन्तराय । स्त्यानगृद्धि आदिका सम्यग्दृष्टिके बन्ध नहीं होता, इसलिए इनके चारों पदोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागरप्रमाण कहा है। यहाँ भवके प्रारम्भमें चारो पदोंको करावे । वादमें सम्यग्दृष्टि होकर कुछ कम इकतीस सागर हो जाने पर अन्तमें पुनः मिथ्यात्वमें ले जाकर चार पढ़ कराकर यह अन्तरकाल ले आवे । दो वेदनीय आदिके भुजगार आदि तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। ये सप्रतिपक्ष प्रकृतियों हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होनेसे उक्त कालप्रमाण कहा है। पुरुषवेद आदिका सम्यग्दृष्टिके भी बन्ध होता है, इसलिए इनके भुजगार आदि तीन पदोका भग जानावरणके समान वन जानसे वैसा कहा है । पर सम्यग्दृष्टिके ये निरन्तर बन्धिनी प्रकृतियाँ हैं, इसलिए उसके इनका अवक्तव्य- पद सम्भव नहीं है। हाँ,जिस मिथ्याष्टिने इनके बन्धका प्रारम्भ किया और मध्यमे सम्यग्दृष्टि रह कर अन्तमें मिथ्यादृष्टि होकर तथा इन्हें सप्रतिपक्ष प्रकृतियोंके धन्धसे अन्तरित करके पुनः वन्ध प्रारम्भ किया, उसके इनका अवक्तव्य वन्ध और उसका अन्तरकाल दोनो बन जाते हैं । इस तरह अवक्तव्य पदका उत्कृष्ट अन्तर काल कुछ कम इकतीस सागर होनेसे वह उक्त काल प्रमाण कहा है। देवों और नारकियोंमें आयुबन्धके नियम एक समान हैं, इसलिए यहाँ दो आयुओका भङ्ग नारकियोंके समान कहा है। तिर्यश्चगतित्रिकका वन्ध सहस्रार कल्प तक ही होता है, इसलिए इनके चारों पदोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक अठारह सागर कहा है। चारो पदोका अन्तरकाल विचारकर घटित कर लेना चाहिए । मनुष्यगतिद्विकका वन्ध सब देवोके सम्भव है,पर इनकी सप्रतिपक्ष प्रकृतियोंका वन्ध सहस्रार कल्प तक ही होता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर कहा है। यहाँ भी प्रारम्भमें और अन्तमे मिथ्यादृष्टि रखकर इनका अवक्तव्यबन्ध कराकर यह अन्तरकाल ले आवे । आगे इन दोनों प्रकृतियोके प्रारम्भके तीन पद होते हैं, अवक्तव्यपद नहीं होता, इसलिए यहाँ अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान प्राप्त होनेसे उसके समान कहा है। एकेन्द्रियजाति आदि तीन प्रकृतियोका बन्ध ऐशान कल्प तक ही होता है, इसलिए इनके चारों पदोंका उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर प्राप्त होनेसे वह उक्त काल प्रमाण कहा है। यहाँ भी मध्यमें साधिक दो सागर तक सम्यग्दृष्टि रखकर और प्रारम्भमें व अन्तमें मिथ्यात्वमें इनके चारो पद कराकर यह अन्तर काल ले आवे | इतनी विशेषता है कि अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर काल लानेके लिए सम्यग्दृष्टि होनेकी आवश्यकता नहीं है। अन्यत्र भी यह विशेषता जान लेनी चाहिए। पञ्चेन्द्रियजाति आदि सानत्कुमार कल्पसे निरन्तर- वन्धिनी प्रकृतियों हैं। किन्तु वहाँ इनका अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, इसलिए इनके अवक्तव्य- पदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर कहा है। इनके शेष पद ज्ञानावरणके समान सम्भव हैं,यह स्पष्ट ही है। देवोंके अवान्तर भेदोमें अपना-अपना अन्तरकाल जानकर वह घटित कर लेना चाहिए।
१२८ महावंधे पदेसबंधाहियारे १५६, एइंदिएसु धुवियाणं भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखेंजदिभागो, बादरेसु' अंगुल० असंखें, चादरपजत्तगेसु संखेंजाणि वाससहस्साणि । एवं मणुसगदितिगस्स वि ओघं । बादरेसु कम्मदिट्ठी०, पञ्जत्तएसु संखेंजाणि वाससह । तिरिक्खगदितिगं भुज-अप्प०-अववि० णाणाभंगो। अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० असंखेंजा लोगा कम्महिदी संखेंजाणि वाससह० । सेसाणं परियत्तमाणियाणं भुज०-अप्प०-अवढि० णाणाभंगो। अवत्त जह० उक्क० अंतो० । तिरिक्खाउ० दोण्णिपदा जह० एग०, अवत्त० ज० अंतो०, उक्क० बावीसं वाससह० सादि० । अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें. अंगुल. असंखें० संखेंजाणि वाससह । मणुसाउ० तिण्णि पदा जह० एग०, अवत्त ० जह० अंतो० उ० सव्वपदाणं सत्तवाससह ० सादि० । सुहुमेइंदि० एइंदियभंगो । णवरि दो- आउ० पंचिंदि तिरि०अपजत्तभंगो। णवरि तिरिक्खाउ० अवढि० ओघं । एदेण कमेण विगलिंदिय-पंचकायाणं अंतरं णेदव्वं । , १५६. एकेन्द्रियोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रोणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। बादरोमे अङ्गुलके असंख्यातवें भागप्रमाण है और बादर पर्याप्तकोमे सख्यात हजार वर्ष है। इसी प्रकार मनुष्यगतित्रिकका भी भङ्ग ओघके समान है। बादरोमे कर्मस्थितिप्रमाण है और बादर पर्याप्तकोमे संख्यात हजार वर्प है । तियश्चगतित्रिकके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है, बादरोमे कर्मस्थितिप्रमाण है और बादर पर्याप्तकोमे संख्यात हजार वर्ष है। शेष परावर्तमान प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । तिर्यश्चायुके दो पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर साधिक बाईस हजार वर्ष है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर एकेन्द्रियोंमे जगश्रेणिके असंख्यातवे भागप्रमाण, वादरोमें अङ्गुलके असंख्यातवे भागप्रमाण और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकोमे संख्यात हजार वर्ष प्रमाण है। मनुष्यायुके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर साधिक सात हजार वर्ष प्रमाण है । सूक्ष्म एकेन्द्रियोमे एकेन्द्रियोके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि इनमें दो आयुओका भग पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोंके समान है। इतनी और विशेषता है कि इनमे विर्यच्चायुके अवस्थितपदका भन ओघके समान है। इस क्रमसे विकलेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवोंमें अन्तरकाल ले जाना चाहिए। १ ता०-आ०प्रत्योः 'असखेजगु०। बादरेसु' इति पाठः । २ आ०प्रतौ 'सखेजाणि एवं' इति पाठः। ३ ता०प्रप्तौ 'अगो० (तो.)तिरिक्खाउ० तिण्णिपदा०' आप्रतौ 'अतो। तिरिक्खाउ० तिण्णिपदा' इति पाठः । ४ आ०प्रतौ 'जह० एग०, उक्क अगुल० असखे० सेटीए असखे० सखेजाणि' इति पाठः । ५ ता० आ०प्रत्यो. जह० एग० उ० अवत्त०' इति पाठः। ६ आ० प्रतौ 'उ० सत्तवाससहः' इति पाठः।
भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो १२६ विशेपार्थ-एकेन्द्रियोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अतमुहूर्त तथा अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवे भाग प्रमाण जैसा ओघम ज्ञानावरणादिका घटित करके वतला आये है,उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए । वादर एकेन्द्रियोमे और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकोमे इन पदोका और सव अन्तर काल तो इसी प्रकार है, पर इनके अवस्थित पदके उत्कृष्ट अन्तरमे फरक है, क्योकि इन जीचोकी उत्कृष्ट कायस्थिति क्रमसे कमस्थितिप्रमाण और संख्यात हजार वर्पप्रमाण है, अतः इन दो प्रकारके एकेन्द्रिय जीवोमे इन प्रकृतियोके अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। मनुष्यगतित्रिकके एकेन्द्रियोमै चार पद सम्भव हैं और ओघसे इनके चारो पदोका अन्तरकाल एकेन्द्रियोकी मुख्यतासे कहा है, इसलिए यहाँ उसे ओघके समान जाननेको सूचना की है। इन पदोंके अन्तरकालका स्पष्टीकरण ओषप्ररूपणाके समय किया ही है, इसलिए इसे वहाँसे जान लेना चाहिए। मात्र बादर एकेन्द्रियो और वादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकोमे इन प्रकृतियोके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर क्रमश. कर्मस्थिति प्रमाण और संख्यात हजार वर्पप्रमाण ही प्राप्त होगा | कारणका निर्देश पूर्वमे किया ही है। एकेन्द्रिय और उनके अवान्तर भेदोमे जिस प्रकार अग्निकायिक और वायुकायिक जीवोके मनुष्यगतित्रिकका वन्ध नहीं होता, वह स्थिति तिर्यञ्चगतित्रिकके विषयमे नहीं है, इसलिए उक्त तीन प्रकारके एकेन्द्रियोमे तिर्यञ्चगतित्रिकके भुजगार आदि तीन पदोका भन ज्ञानावरणके समान ही बन जाता है, इसलिए वह ज्ञानावरणके समान कहा है। साथ ही उनका यहाँ अवक्तव्यपद भी सम्भव है। उसमे भी एक तो ये सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ हैं और दूसरे अग्निकायिक और वायुकायिक जीवामे इनका निरन्तर वन्ध होता रहता है, अत यहाँ इनके अवक्तव्यपदका उक्त तीन प्रकारके एकेन्द्रियोंमे जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर क्रमसे असंख्यात लोक प्रमाण, कर्मस्थितिप्रमाण और सख्यात हजार वर्षप्रमाण प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष जितनी परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं,उनका भुजगार अदि तीन पदोकी अपेक्षा भङ्ग ज्ञाना- वरणकेसमान कहनेका कारण स्पष्ट है । पर इनका यहाँ अवक्तव्यपद भी सम्भव है। यतः अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तसे कम नहीं होता और ये परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर भी अन्तर्मुहूर्त ही प्राप्त होगा, अतः इन प्रकृतियोके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त कहा है। अब रही तिर्यञ्चायु और मनुष्यायु सो तिर्यश्चायुके भुजगार, अल्पतर और भवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक भवकी अपेक्षा भी प्राप्त हो जाता है,पर उत्कृष्ट अन्तर दो भवकी अपेक्षा प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए इनमेंसे आदिके दो पदोका जघन्य अन्तर एक समय, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और तीनो पदोका उत्कृष्ट अन्तर साधिक वाईस हजार वर्प कहा है। यहाँ वाईस हजार वर्षकी आयुवाले उक्त तीन प्रकारके एकेन्द्रियोके प्रथम त्रिभागमें तीन पद करावे । उसके वाद मरकर इतनी ही आयु प्राप्त कराकर जीवनमे अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहने पर आयुबन्ध कराकर ये तीन पद करावे और इस प्रकार इन तीन पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल ले आवे । तथा इनमें तिर्यञ्च होते रहनेसे एकेन्द्रियोमे जगभोणिके असंख्यातवे भागके अन्तरसे बादर एकेन्द्रियोमे कर्मस्थितिप्रमाण कालके अन्तरसे और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकोंमें संख्यात हजार वर्षके अन्तरसे भी सम्भव है, इसलिए इनमे तिर्यञ्चायुके इस पदका उक्त कालप्रमाण अन्तर कहा है । मात्र इनमे मनुष्यायुके चारो पदोका अन्तर एक भवके आश्रयसे ही सम्भव है, इसलिए इनमे इसके तीन पदोंका जघन्य अन्तर एक समय, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और सब पदोका उत्कृष्ट अन्तर साधिक सात हजार वर्पप्रमाण प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा " १३० महावंधे पदेसबंधाहियारे १५७. पंचिंदि०-तस०२ पंचणा०-छदंस०-चदुसंज०-भय-दु०-तेजा०-०-वण्ण०४- अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवट्टि. जह० एग०, अवत्त' जह० अंतो०,उक्क० कायट्ठिदी थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४- भुज०-अप्प० ओघं । अवहि०-अवत्त० णाणा (भंगो । दोवेदणी०-चदुणोक०- थिरादितिण्णियुग० अवढि० णाणा भंगो। सेसाणं पदाणं ओधं । अट्ठक० दोण्णिपदो ओघं । अव४ि०-अवत्त० णाणा भंगो । इत्थि० भुज०-अप्प०-अवत्त० ओथं । अवट्टिक णाणा भंगो । पुरिस० तिण्णि पदा णाणा भंगो । अवत्त० ओघं । णस०-पंचसंठा०- पंचसंघ०-अप्पसत्थ०-दूभग-दुस्सर-अणादें-णीचा० भुज० अप्प ० जह० एग०, अवत्ता जह० अंतो०, उक्क० वेछावहि० सादि० तिणिपलिदो० देसू० । अबढि० णाणा भंगो। तिण्णिआउगाणं तिण्णि पदा जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्कस्सेण सागरोवम- सदपुधत्तं । णवरि अवडि० सगहिदी० | मणुसाउ० तिण्णि पदा जह० एग०, अवतः है । सूक्ष्म एकेन्द्रियोकी कायस्थिति असंख्यात लोकप्रमाण होनेसे इनमे सब अन्य प्रकृतियोंका भग एकेन्द्रियों के समान बन जाता है,यह तो स्पष्ट ही है, पर इनमे दोनों आयुओका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्तसे अधिक सम्भव नहीं है, इसलिए इनके चारो पदोका अन्तरकाल अपर्याप्तकोके समान जाननेको सूचना की है। यहाँ विकलेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोमें इसी क्रमसे जाननेकी सूचना की है सो अपनी-अपनी कायस्थिति तथा ध्रुवबन्धवाली और परावर्तमान प्रकृतियोको समझकर यह अन्तर काल ले आना चाहिए,यह उक्त कथनका तात्पर्य है। १५७. पञ्चेन्द्रियद्विक और त्रसद्विक जीवोम पाँच बानावरण, छह दर्शनावरण, चार संन्च- लन, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पोच अन्तरायके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और दोनों पदोंका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्ता- नुवन्धी चतुष्कके भुजगार और अल्पतरपदका भग ओघके समान है। अवस्थित और अवक्तव्य- पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। दो वेदनीय, चार नोकपाय और स्थिर आदि तीन युगलके अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। शेष पदोका भड्न ओघके समान है। आठ कषायोंके दो पदीका भङ्ग ओघके समान है। अवस्थित और अवक्तव्यपदका भङ्ग जानावरणके समान है । स्त्रीवेटके भुनगार, अल्पतर और भवक्तव्यपदका भङ्ग ओषके समान है। अवस्थित- पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। पुरुषवेदके तीन पदोंका भङ्ग नानावरणके समान है। तथा अवक्तव्यपदका भङ्ग ओघके समान है। नपुंसकवेद, पाँच सस्थान, पांच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्मग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्रके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनों पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य तथा कुछ अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तीन आयुओके तीन पदाका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर सौ सागर पृथक्त्व , १ ता०-आप्रत्योः 'ज. ए.७० अवत्त० इति पाठः। २ ता०-आप्रत्योः अहक तिष्णिपदा०' इति पाठः । ३ ता०-आप्रस्योः 'णीचा० अप्प०' इति पाठ ।
-- भुजगारवंचे अंतरकालाणुगमो १३१ जह अंतो०, उस० कायहिदी। णिस्यगदि-चदुजादि-णिरयाणु०-आदाव-यावरादि०४ भुज०-अप्प० जह० एग०, अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० पंचासीदिसागरोवमसदं । अबाहि० णाणाभंगो। तिरिक्ख०-तिरिक्खाणु०-उजो० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० तेबहिसागरोवमसइं। अवढि णाणा भंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेवढिसाग० सद० | दोगदि-वेउ०-वेउ०अंगो०-दोआणु० भुज०-अप्प० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेतीसं० सादि०। अवढि णाणा मंगो । पचिंदि०-पर०-उस्सा०-तस०४ तिण्णि पदा णाणा भंगो। अबत्त० जह० अंतो०, उक० पंचासीदिसागरोवमसद० । आहार०२ तिण्णि पदा जह० एग०, अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० कायट्ठिदी । ओरा०-ओरा अंगो०-वञ्जरि० भुज-अप्प० जह० एग०, उक्क० तिणि पलिदो० साहिर । अवढि णाणा भंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । सम- चदु०-पसत्य०-सुभग-सुस्सर-आदे० भुज०-अप्प-अवढि णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वैचावहि० सादि० तिण्णिपलि० देसू० । तित्य० ओघं । उच्चा० प्रमाण है। इतनी विशेषता है कि अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर अपनी कायस्थितिप्रमाण है। मनुष्यायुके तीन पदोंका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर कायत्यितिप्रमाण है। नरकगति, चार जाति, नरकगत्यानुपूर्वी, सात्य और त्यावर मादि चारके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवतन्य पदका जवन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनों पदोंका उत्कृष्ट अन्तर एक सौ पचासी सागर है। क्या इनके अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। विर्यश्चगति, तिर्यञ्च- गत्यानुपूर्वी और ज्योतरे भुजगार और अल्पतर पदका जवन्य अन्तर एक समय है और स्कृष्ट अन्तर एक सौ त्रेसठ सागर है। अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तथा अबक्तव्यपदका जन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एक सौ त्रेसठ सागर है। दो गति वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और दो आनुपूर्वोके भुजगार और अल्पतरपदका जयन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनो पदोका उत्कृष्ट मन्तर साधिक वेतीस सागर है। तथा इनके अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। पञ्चेन्द्रियजाति. परयात, उच्छ्रास और सचतुष्कके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तथा इन अवक्तव्यपदका जयन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एक सौ पचासी सागर है। साहारहिकके तीन पदोका जयन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य पदका जघन्य मन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट भन्तर कायस्थितिप्रमाण है । औदारिकशरीर, औदारिक- शरीर भागोगा और वर्षभनारावसंहननके मुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साविक तीन पल्य है। अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तथा अवतव्य पदका जयन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर सायिक तेतीस सागर है। मनचतुरस्त्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयके भुजगार, अल्पतर और मवस्थितपत्रा भङ्ग बानावरणके समान है। तथा अवक्तव्यपदका जवन्य अन्तर अन्तर्नुहुर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण १ गती-सागरोबमस्टपुष। अहि इति पाठ । २ आ०प्रतो तेवहिसागरोसद धत्त । स्वहिः इति पाल। ३ता आप्रन्यो 'ततः २तिग्गिा इति पाठ ।
१३२ महावंधे पदेसवंधाहियारे भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । अवढि णाणाभंगो । अवतः जह• अंतो०, उक्क० वेछावढि० सादि० तिणि पलि० देसः । है। तीर्थकर प्रकृतिका भग ओघके समान है। उच्चगोत्रके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। अवस्थितपदका भङ्ग बाना- वरणके समान है। तथा अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर प्रमाण है। विशेषार्थ-यहाँ सब प्रकृतियोके यथासम्भव सव पदोका जघन्य अन्तर काल सुगम है । साथ ही भुजगार और अल्पतर पदका जहाँ उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त कहा है वह भी सुगम है, इसलिए इन अन्तरकालोको छोड़कर शेप अन्तरकालका ही विचार करेगे। पञ्चेन्द्रियद्विक और त्रसद्विकको जो कायस्थिति कही है,उसके प्रारम्भमे और अन्तमै पाँच ज्ञानावरण आदिका अवस्थितपद हो यह भी सम्भव है और इस कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमे उपशमणिको प्राप्ति हो यह भी सम्भव है, इसलिए यहाँ पाँच ज्ञानावरणादिके अवस्थित और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है। मिथ्यात्व आदिके भुजगार और अल्पतर पद कुछ कम दो बार छयासठ सागर काल तक न हो,यह सम्भव है, क्योकि जीवका इतने काल तक सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके साथ रहना सम्भव है, इसलिए यहाँ इन पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल ओघके समान उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा इनके अवस्थित और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल पूर्ववत् ज्ञानावरणके समान बन जाता है, इसलिए इन पदोका भन ज्ञानावरणके समान कहा है। आगे भी जिन प्रकृतियोंके उक्त दो पदीका या सब पढ़ोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान कहा है, वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। दो वेदनीय आदिके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर ओघके समान अन्तमुहूर्त प्राप्त होनेसे यह ओधके समान कहा है। स्पष्टीकरण ओघ प्ररूपणाके समय कर ही आये हैं। आठ कपायोके भुजगार और अल्पतर पदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है, क्योंकि इनका इतने काल तक बन्ध न होनेसे इन पदोका उक्त काल तक अन्तर बन जाता है। ओघसे भी इन पदोका इतना ही अन्तरकाल प्राप्त होता है, इसलिए यह ओधके समान कहा है । स्त्रीवेदके भुजगार अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण मोघमें घटित करके वतला आये हैं। यहाँ भी यह अन्तर इतना ही प्राप्त होता है, इसलिये यह अन्तर ओघके समान कहा है। पुरुषवेदके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर ओघ प्ररूपणाके समय साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण घटित करके वतला आये हैं। यहाँ भी यह अन्तर इतना ही प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ पुरुषवेदके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर ओघके समान कहा है। नपुंसकवेद आदिका कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर काल तक बन्ध न हो, यह सम्भव है। इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। नरकायु, तिर्यञ्चायु और देवायुका यहॉ सौ सागर पृथक्त्व काल तक बन्ध न हो,यह सम्भव है, इसलिए यहाँ इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। यहाँ इन तीनों आयुओका किसी एक जीवके एक साथ उक्त काल तक बन्ध नहीं होता,ऐसा ग्रहण नहीं करना चाहिए । किन्तु कभी नरकायुका, कभी मनुष्यायुका और कभी देवायुका उत्कृष्टरूपसे इतने काल तक बन्ध नहीं होता,ऐसा ग्रहण करना चाहिए। इनके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर काल अपनी-अपनी कायस्थितिप्रमाण प्राप्त होता है,यह स्पष्ट ही है, क्योकि किसी भी प्रकृतिका बन्ध होते समय भुजगार और अल्पतरपदके समान अवस्थितपद होना हो चाहिए--ऐसा भुजगारवंबे अंतरकालाणुगमो १५८, पंचमण-पंचवचि० पंचणा०-णवदंस०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दुगु- www-------- M एचान्त नियम नहीं है। सामान्यले एकेन्द्रियामें बंधनेवाली प्रकृतियोंके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल जगणिके असंख्यातवें भागप्रमाण होता है। पर यहा कायस्थिति इस कालसे न्यून है. इसलिए कायस्वितिके भीतर प्रारम्भमें और अन्तम अवस्थित पद कराकर यह अन्तर काल कहा है। सर्वत्र अवस्थितपदके विषयमे यह नियम समझ लेना चाहिए । हाँ, जिन प्रकृतियो का एजेन्द्रियाम या अन्तिकायिक और वायुकायिक जीवाम बन्ध नहीं होता, उनके अवस्थितपदका अन्तर काल जगोगिके असंख्यातवें भागसे अधिक भी बन जाता है । मनुप्यायुका इनकी उकृष्ट कायस्थितिके प्रारम्भमें और अन्तम बन्ध हो तथा मध्यम बन्ध न हो,यह सम्भव है, और वन्ध होते समय भुजगार आदि चारों पद भी सम्भव हैं, इसलिए यहाँ इसके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर नपनी-अपनी काचस्थितिप्रमाग कहा है। नरकगति आदिका अधिकसे अधिक एक सौ पचासी सागर झाल तक बन्ध नहीं होता-ऐसा नियम है । उसके बाद नौवे अवेयकसे आक्र मनुष्य होने पर इनका वन्ध होने लगता है, इसलिए इतने काल तक इनके भुजगार, अल्पतर और अवतन्यपदके न प्राप्त होनेसे वहाँ इनका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। उक्त मार्गणाऑन तिचगति आदिका एकसौ सठ सागर काल तक बन्ध न हो,यह सम्भव है, इसलिए इनके मुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । तथा इनके अवस्थितपदका उकृष्ट अन्तरज्ञानावरणके समान जगमोणिके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होना है.यह सष्ट ही है। आगे भी जिन प्रकृतियोंके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर ज्ञानावरणके समान कहा है,वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । दो गति आदिके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपद साधिक तेतीस सागर काल तक न हों, यह सम्भव है, अतः यहाँ इन प्रकृतियोंके उक्त पदोंका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। यहाँ साधिकसे दो मुहूर्त लेने चाहिए । मात्र मनुष्यगतिविकका सातब नरकम उत्पन्न कराकर यह अन्तरकाल प्राप्त करना चाहिए और शेषका उपशमनोणिसे सर्वार्थसिद्धिम उत्सन्न कराकर यह अन्तरकाल प्राप्त करना चाहिए। पञ्चेन्द्रियजाति आदिके तीन पदोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल जैसा ज्ञानावरणकी अपेक्षा घटित करके ववला आये हैं,उसी प्रकार यहाँ भी घटित कर लेना चाहिए । तथा इन प्रकृतियोंका एक सौ पचासी सागर प्रमाग काल तक निरन्तर वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट भन्तर एक सौ पचासी सागर कहा है । औदारिकशरीर आदिका भोगभूमिमे और उसके पहले सन्यान्डष्टिक बन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तीन पल्य कहा है। तथा सातवें नरकमें औदारिकद्विकका और वहीं पर सन्यन्द्रष्टिक वर्षभनाराचसंहननका निरन्तर बन्य सन्भव है। और वहॉसे निकलने पर भी इनका अवन्यपद प्राप होने में अन्तर्मुहूर्न काल लग सकता है । यतः यह काल साधिक तेतीस सागर होता है, अतः यह अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । समचतुरस्त्रसंस्थान आदिके भुजगार भादि तीन पदोका उत्कृष्ट अन्तर काल ज्ञानावरणके समान घटित कर लेना चाहिए । तथा इनका कुछ कन तीन पल्य अधिक दो च्याळ सागर काल तक निरन्तर बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवतन्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाग कहा है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका भग मोयले समान है,यह सष्ट ही है। छगोत्रका सातबे नरकम मिथ्याष्टिके वन्ध नहीं होता, इसलिए इसके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है । तथा इसका हल क्म तीन पल्य अधिक दो व्यासठ सागर काल तक निरन्तर बन्ध सम्भव है, इसलिए इसके अवाज्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उत्त कालप्रमाण कहा है। १५. पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवामे पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, १३४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे आहारदुग-तेजा०-क०-वण्ण०४--अगु०-उप०-णिमि०-तित्थ-पंचंत-चत्तारिआउ० भुज०-अप्प०-अवढि० ज० एग०,उक्क० अंतो० । अवत्त० [गत्थि अंतरं] । सेसाणं' कम्माणं भुज०-अप्पद-०अवट्टि० जह० एग०, उक० अंतो० । अवत्त० जह० उक्क० अंतो० । १५६. कायजोगीसु धुवियाणं एइंदियभंगों। णवरि अवत्त० णत्थि अंतरं । तिरिक्खगदितिगं भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । णवरि अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखे० । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० असंखेजा लोगा। मणुसगदि- तिगं तिणि पदा जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० ओघं। सेसाणं भुज०-अप्पद०- अबढि णाणा भंगो । अवत्त० जह• उक्क० अंतो० । पवरि दोआउ० विउन्वियछ० आहारदुग-तित्थ० मणजोगिभंगो । मणुसाउ० ओघं। तिरिक्खाउ० एइंदियभंगो। . मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्सा, आहारकद्विक, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण, तीर्थकर, पाँच अन्तराय और चार आयुओके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है । शेप प्रकृतियोंके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । तथा इनके अवक्तव्य पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। विशेषार्थ-इन योगोमे सब प्रकृतियोंके भुजगार आदि तीन पद कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे हो यह सम्भव है इसलिए सब प्रकृतियोंके इन पदोका यह अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इन योगोका उत्कृष्ट काल अन्त- मुहूर्त है, इसलिए सब प्रकृतियोके उक्त पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्तके भीतर प्राप्त किया गया है । मात्र पाँच ज्ञानावरणादि ये ध्रुवन्धिनी प्रकृतियों हैं और जो ध्रुववन्धिनी नहीं हैं उनका इन योगोके कालमे दो वार वन्ध सम्भव नहीं है, इसलिए उनके अवक्तव्यपदके अन्तर कालका निषेध किया है । तथा शेष प्रकृतियां परावर्तमान होनेसे उनका इन योगोके कालमे अन्तमुहूर्तका अन्तर देकर दो बार बन्धका प्रारम्भ होना सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। १५६. काययोगी जीवोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोका भङ्ग एकेन्द्रियोके समान है। इतनी विशेषता है कि इनमे अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। तिर्यञ्चगतित्रिकके भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है। मनुष्यगतित्रिकके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है। अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर ओघके समान है। शेष प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तथा अवक्तव्य पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । इतनी विशेषता है कि दो आयु, वैक्रियिकपटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग मनोयोगी जीवोके समान है। मनुष्यायुका भङ्ग ओषके समान है । तथा तिर्यश्चायुका भङ्ग एकेन्द्रियोके समान है। १ ता प्रतौ 'अवत्त० [एव] 1 सेसाण' आ०प्रतौ 'अवत्त सेसाण' इति पाठः। २ ता००प्रत्योः 'धुवियाण सादभगो' इति पाठः । ३ ता.आ०प्रत्योः 'उक० सखेजा' इति पाठः ।
---- --- , भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो 39. १६०, ओरालिका जोगि० पढमदंडओ मणुजोगिभंगो । णवरि अवढि० जह० एग०, उक्क० बावीसं वाससह०, देसू० । दोआउ० तिण्णि पदा जह० एग०, अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० सत्तवाससह. सादि० । दोआउ०-वेउब्वियछक्क- आहारदुग-तित्थ० मणजोगिभंगो। सेसाणं णाणा भंगो। [णवरि अवत्त० जह० उक्क०] अंतो' । विशेषार्थ—यहाँ ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों ये है-पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण. मिथ्यात्व, सोलह कयाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तराय । एकेन्द्रियोमे इन प्रकृतियोंके तीन पदोका जो अन्तरकाल कहा है वह यहाँ भी बन जाता है, क्योंकि एकेन्द्रियोमे सामान्यरूपसे काययोग ही पाया जाता है, इसलिए काययोगियोमे इन प्रकृतियोंके तीन पदोका भङ्ग एकेन्द्रियोके समान कहा है। मात्र एकेन्द्रियोंमे इन प्रकृतियोंका अवक्तव्य पद नहीं होता और काययोगियोंमे होता है, फिर यहाँ इन प्रकृतियोंके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल सम्भव नहीं है, इसलिए यहॉ इनके अवक्तव्य पदके अन्तरकालका निषेध किया है। काययोगियोम तिर्यश्चगतित्रिकका असंख्यात लोकप्रमाण काल तक निरन्तर वन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्य पदका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोंके शेष पदोका अन्तरकाल सुगम है। मनुष्यगतित्रिकके चारो पदोंका उत्कृष्ट अन्तर ओघमे कहे अनुसार यहाँ बन जाता है, इसलिए वह ओषके समान कहा है। खुलासा ओघप्ररूपणाको देखकर जान लेना चाहिए। पञ्चेन्द्रियोमे काययोगका काल अन्तमुहूर्तसे अधिक नहीं है । इसलिए काययोगियोमे दो आयु, वैक्रियिकपटक आहारकद्विक और तीर्थकर प्रकृतिके सब पदोका अन्तरकाल मनोयोगी जीवोके समान वन जानेसे वह उनके समान कहा है। मनुष्यायुका ओघमे और तिर्यञ्चायुका एकेन्द्रियोके चारों पदोकी अपेक्षा जो अन्तरकाल कहा है वह यहाँ भी वन जाता है, इसलिए मनुष्यायुके चारो पदोके अन्तरकालको ओघके समान और तिर्यञ्चायुके चारो पदोंके अन्तरकालको एकेन्द्रियोके समान जाननेकी सूचना की है। अव रहीं शेष ये प्रकृतियों-सातावेदनीय, असातावेदनीय, सात नोकपाय, पॉच जाति, वह संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, परघात, उच्छ्रास, आतप उद्योत, दो विहायोगति और त्रस-स्थावर ओदि दस युगल । ये सब प्रकृतियाँ परावर्तमान हैं, इसलिए इनके सब पदीका मूलमे कहे अनुसार अन्तरकाल बन जानेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। १६०. औदारिककाययोगी जीवामे प्रथम दण्डकका भङ्ग मनोयोगी जीवोंके समान है। इतनी विशेषता है कि अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम वाईस हजार वर्ष है । दो आयुओके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक सात हजार वर्ष है। दो आयु, वैक्रिविकपटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग मनोयोगी जीवोंके समान है। शेप प्रकृतियोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। विशेषार्थ—औदारिककाययोगका उत्कृष्ट काल कुछ कम वाईस हजार वर्ष होनेसे औदारिककाययोगवाले जीवामे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ . १ता आप्रत्यो 'णाणा भंगो .. "अतो.' इति पाट. ।
------ -APAN AN १३६ महावंधे पदेसबंधाहियारे १६१, ओरा०मि० धुवियाणं भुज अप्पद ०-अवढि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । देवगदिपंचग० भुज० णत्थि अंतरं । सेसाणं भुज०-अप्पद- अवढि० जह० एग०, उक० अंतो० । अवत्त० जह० उक्क० अंतो। णवरि मिच्छ० अवत्त० णत्थि अंतरं । १६२. वेउव्वियका०-आहारका० मणजोगिभंगो । वेउव्वियमि० पंचणा- कम वाईस हजार वर्ष प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके शेष पदोका अन्तर मनोयोगी जीवोके समान है,यह स्पष्ट है । यहाँ प्रथम दण्डकमे वे ही प्रकृतियॉ ली गई हैं जो काययोगीके प्रथम दण्डकमे गिना आये हैं । यहाँ मूलमे 'मणजोगिभंगो' के स्थानमै 'कायजोगि- भंगो' पाठ उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योकि काययोगीके प्रथम दण्डककी प्रकृतियाँ ही यहाँ पर ली गई है। वैसे तीन पदोकी अपेक्षा अन्तरकालका विचार दोनोमे एक समान है, इसलिए कोई भी पाठ वन जाता है। औदारिककाययोगमे प्रथम त्रिभागमे और अन्तमे आयुबन्ध होने पर आयुबन्धमें साधिक सात हजार वर्पका अन्तर काल प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ तियञ्चायु और मनुष्यायुके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। दो आयु आदि प्रकृतियोंके सव पदोका भङ्ग मनोयोगी जीवोंके समान है, यह स्पष्ट ही है। शेष सब प्रकृतियाँ यद्यपि परावर्तमान हैं, फिर भी उनके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान प्राप्त होनेमें कोई बाधा नहीं आती, इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका अन्तरकाल ज्ञानावरणके समान कहा है । मात्र यहाँ इनका अवक्तव्यपद भी सम्भव है, इसलिए इसका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अलगसे कहा है । शेष प्रकृतियाँ ये हैं-साताद्विक, सात नोकपाय, दो गति, पाँच जाति, छह संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परधात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, बस-स्थावर आदि दस युगल और दो गोत्र | १६१. औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। देवगतिपञ्चकके भुजगार पदका अन्तरकाल नही है। शेष प्रकृतियोंके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। अवक्तव्यपढका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। इतनी विशेपता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थ-औदारिकमिश्रकाययोगका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त होनेसे इसमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार आदि तीन पदाका उत्कृष्ट अन्तर काल अन्तमुहूर्त कहा है। ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका निर्देश काययोगी मार्गणाका कथन करते समय किया ही है। औदारिकमिश्रकाय- योगमें देवगतिपञ्चकका एक मात्र भुजगार पद हो सम्भव है, इसलिए इसके अन्तरकालका निषेध किया है। शेष सव प्रकृतियों परावर्तमान हैं और उनके चारो पद सम्भव हैं, इसलिए उनके चारो पदोका अन्तरकाल कहा है। मात्र इस योगमे सासादनसे मिथ्यात्वमें जाना सम्भव है और इसलिए मिथ्यात्व प्रकृतिका अवक्तव्य पद भी सम्भव है, पर इसमे मिथ्यात्वसे सम्यक्त्वकी प्राप्ति और उसके बाद पतन सम्भव नहीं है, इसलिए यहाँ मिथ्यात्व प्रकृतिके अवक्तव्यपदके अन्तरकालका निपेध किया है। १६२. वैक्रियिकफाययोगी और आहारककाययोगी जीवोमें मनोयोगी जीवोंके समान भन है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोमें पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह १ ता०प्रती वेउन्वि० मिच्छस० पचणा' आप्रतौ विउविगि० मिन्छ० पचणा' इतिपाठ. ।
भुजगारबंधे अंतरकालाणुगमो १३७ णवदंस-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दुगुं०-ओरालि०-तेजा०-क०-बण्ण०४--अगु०४-तस०४- णिमि०-तित्थ०-६चंत० भु० णत्थि अंतरं। सेसाणं भुज० णत्थि अंतरं। अवत्त० जह• उक्क० अंतो० । मिच्छत्त० अवतः णत्थि० अंतरं० । आहारमि० वेउब्धियमिस्स०- भंगो। णवरि आउ० भुज० अवत्त० णत्थि अंतरं । १६३. कम्मइग० धुवियाणं देवगदिपंच० भुज० णत्थि अंतरं । सेसाणं भुज०- अवत्त० णत्थि अंतरं। कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचाक, निर्माण, तीर्थङ्कर और पांच अन्तरायके भुजगार पदका अन्तरकाल नहीं है । शेप प्रकृतियोके भुजगारपदका अन्तरकाल नहीं है। अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है। इतनी विशेषता है कि यहा मिथ्यात्वप्रकृतिका अवक्तव्यपद सम्भव है पर उसका अन्तरकाल नहीं है। आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमे वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमे आयुके भुजगार और अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थ-वैक्रियिककाययोग और आहारककाययोगमे बँधनेवाली प्रकृतियोंकी व्यवस्था मनोयोगी जीवोके समान वन जाती है, इसलिए इनमे मनोयोगी जीवोके समान जाननेकी सूचना को है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगमे पांच ज्ञानावरणादिका एक भुजगारपद होता है, इसलिए उसके अन्तरकालका निषेध किया है। मात्र इनमेसे मिथ्यात्व प्रकृतिका यहां अवक्तव्यपद भी सम्भव है, क्योकि जो सासादनसम्यग्दृष्टि मिथ्यात्वमे जाता है उसके मिथ्यात्वप्रकृतिका यह पद होता है। पर दूसरी बार इस प्रकार यहां इसके अवक्तव्यपदकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, इसलिए अन्तमे इस प्रकृतिके अवक्तव्यपदके अन्तरकालका निषेध किया है। शेष जितनी परावर्तमान प्रकृतियों हैं उनका यहाँ पर भुजगारपद तो एक बार ही प्राप्त होता है, इसलिए उसके अन्तरकालका निषेध किया है। हाँ अवक्तव्यपदकी प्राप्ति दो वार अवश्य सम्भव है, इसलिए इसका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है । आहारकमिश्रकाययोगमे अपनी वन्धको प्राप्त होनेवाली अन्य सब प्रकृतियोका भङ्ग तो वैक्रियिकमिश्रकाययोगके समान बन जाता है पर यहॉ आयुकर्मका भी बन्ध सम्भव है और उसके दो पद भी सम्भव हैं, इसलिए इस विशेषताका अलगसे निर्देश किया है। यहाँ देवायुके दोनों पदोका अन्तरकाल नहीं होता, क्योकि इस योगके कालमे दो बार आयु बन्धका प्रारम्भ सम्भव नहीं है, इसलिए आयुके दोनो पदोके अन्तरकालका निषेध किया है। १६३ कार्मणकाययोगी जीवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके और देवगतिपश्चकके भुजगार- पदका अन्तरकाल नहीं है । शेष प्रकृतियोके भुजगार और अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है । विशेषार्थ—कार्मणकाययोगमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोका और देवगतिपञ्चकका बन्ध होता है उनका एक मात्र भुजगार पद होता है, इसलिए इसके अन्तरकालका निषेध किया है। इनके सिवा शेष सब प्रकृतिया परावर्तमान हैं, अतः उनके भुजगार और अवक्तव्य ये दो पद तो सम्भव हैं, पर उनका अन्तरकाल नहीं प्राप्त होता, इसलिए उनके अन्तरकालका निषेध किया है । कारण स्पष्ट है। १ ता० अ०प्रत्यो 'अतो। अवत्त०' इति पाठ ।
0- --- M १३८ महाबंधे पदेसर्वधाहियारे १६४. इत्थित्रेदेसु पंचणा०-चदुदंसणा०-चदुसंज-पंचंत० भुज०-अप्प० जह एग०, उक्क० अंतो० । अवढि० जह० एग०, उक्क० कायहिदी० । थीण गिद्धि०३- मिच्छ०-अणंताणु०४ भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क. पणवणं पलि० देसू० । अवढि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० कायविदी० | णिद्दा-पयला-भय- दुगुं०-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि० भुज०-अप्प०-अवढि० णाणाभंगो। अवत्त० णत्थि० अंतरं । दोवेदणी०-चदुणोक०-थिरादितिण्णियुग० भुज०-अप्प०- अवढि० ० णाणा भंगो। अवत्त० जह० उक० अंतो० । अट्ठकसा० भुज०-अप्प० जह. एग०, उक्क० पुन्चकोडी देसू०। अवहि० णाणाभंगो । अवत्त० जह० अंतो. उक० कायट्टिदी० । इथि० मिच्छत्तभंगो। णवरि अवत्त० जह• अंतो०, उक्क. पणवण्णं पलिदो० देसू०। एवं इत्थिवेदभंगो णवूस-तिरिक्ख०-एइंदि०-पंचसंठा-पंचसंघ०- तिरिक्खाणु०-आदाउलो०-अप्पसत्थ०-थावर-दूभग-दुस्सर-अणा-णीचा० । पु पंचिंदि०-समचदु०-पसत्थ०-तस-सुभग सुस्सर-आदे-उच्चा० तिण्णिपदा० णाणाभंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पणवणं पलिदो० देसू० । णिरयाउ तिण्णिपदा० जह० एग०, १६४. स्त्रीवेदी जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, चार सज्वलन और पाँच अन्तरायके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्त- मुहूर्त है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है । ख्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके भुजगार और अल्पतरपढका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचवन पल्य है । अवस्थितपदका जयन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और दोनोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। निद्रा, प्रचला, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात और निर्माणके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका भन्न ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। दो वेदनीय, चार नोकपाय और स्थिर आदि तीन युगलके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्य- पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। आठ कपायोके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पूर्वकोटिप्रमाण है। अवस्थितपटका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। स्त्रीवेदका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है । इतनी विशेषता है कि अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचवन पल्य है । इसी प्रकार स्त्रीवेदके समान नपुंसकवेद, तिर्यश्चगति, एकेन्द्रियजाति, पाँच संस्थान, पॉच संहनन, तिर्यश्चगत्यानु. पूर्वी, आतप, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और नीचगोत्रका भङ्ग जानना चाहिए । पुरुपवेद, पञ्चेन्द्रियजाति, समचतुरस्त्र संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, बस, सुभग, सुस्वर, आदेय और उच्चगोत्रके तीन पदाका भद्न ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचवन पल्य है। नरकायुके तीन पढोका जघन्य अन्तर एक समय, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहर्त और सबका उगृष्ट - १ ताप्रती 'पचणा० चदुसज०' इति पाठः।
भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो १३६ अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पगदिअंतरं। दो आउ० तिण्णिपदा जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० कायहिदी० । देवाउ० अवढि० जह० ए०, उक्क० पलिदोवमसद। भुज०-अप्प० जह० ए०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अट्ठावणं' पलिदो० पुवकोडि- पुध० । णिरयगदि-देवगदि-तिण्णिजादि-वेउवि०-वेउवि अंगो०-णिरय०-देवाणुपु०- सुहुम०-अपञ्ज०-साधार० भुज०-अप्प० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक० पणवणं पलि० सादि० । अवढि० जह० एग०, उक्क० कायद्विदी। मणुस०-ओरा०- अंगो०-वञ्जरि०-मणुसाणु० भुज-अप्प० जह• एग०, उक्क० तिण्णिपलि० देसू० । अवढि० जह० एग०, उक्क० कायद्विदी० । अवत्त० जह० अंतो०, उक० पणवण्णं पलिदो० देसू० । ओरा० भुज-अप्प० ज० एग०, उक्क० तिण्णि पलिदो० देसू० । अवट्टि० जह० एग०, उक्क० काढिदी० । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क. पणवणं पलिदो सादि। पर०-उस्सा-यादर-पज्जत्त-पत्ते भुज-अप्प ०-अवट्ठि० णाणा०- भंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क. पणवण्णं पलि. सादि० । आहारदुगं तिण्णि पदा जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० कायट्ठिदी । तित्थ० दो पदा जह० एग०, अन्तर प्रकृतिबन्धके अन्तरके समान है। दो आयुओके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और चारोंका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। देवायुके अवस्थित्तपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्य पृथक्त्वप्रमाण है। भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक अट्ठावन पल्य है । नरकगति, देवगति, तीन जाति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, नरकगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अव- क्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचवन पल्य है। अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। मनुष्यगति औदारिकशरीराङ्गोपाङ्ग, वर्षभनाराचसंहनन और मनुष्यगत्यानुपूर्वोके भुजगार और अल्पतर- पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ तीन पल्य है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचवन पल्य है । औदारिकशरीरके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है । अव- स्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचवन पल्य है। परघात, उच्छास, वादर, पर्याप्त और प्रत्येकके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचवन पल्य है। आहारकद्विकके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। तीर्थङ्कर प्रकृतिके दो पदोका जघन्य १ ता०प्रतौ 'दोआउ० तिण्णिपदा० ज० ए० अवत्त० ज० अतो० उ०-कायडिदि० । देवाउ० अवहि० ज० ए० उ० परिदोवमसदपुध० । भुज अप्प० ज० ए० अवत्त० ज० अतो० उ० अशावण्ण' आ प्रतौ दोआउ० तिष्णिपदा जह० एग०, अवत्त० जह० अतो०, उक्क० अट्ठावण्ण, इति पाठ । , , १४० महाबंधे पदेसबंधाहियारे उक्क० अंतो० । अवडि० ज० एग०, उक्क० पुव्वकोडी देसू० । अवत्त० णत्थि अंतरं । अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। तथा अवक्तव्यपदका अन्तर- काल नहीं है। विशेषार्थ-पॉच ज्ञानावरण आदिका अवस्थितपद कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमें हो पर मध्यम न हो यह सम्भव है, इसलिए स्त्रीवेदी जीवोंमें इनके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके अवस्थित और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र स्त्यानगृद्धित्रिकके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल प्राप्त करनेके लिए प्रारम्भमे और अन्तमें सम्यक्त्व प्राप्त कराकर और वादमें मिथ्यात्वमे ले जाकर प्राप्त करना चाहिए । निद्रा आदिके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है यह स्पष्ट ही है । यद्यपि स्त्रीवेदमे निद्रादिककी आठवे गुणस्थानमे बन्धव्युच्छित्ति सम्भव है पर ऐसा जीव नौवे गुणस्थानम जाकर स्त्रीवेदी न रहकर अपगतवेदी हो जाता है, इसलिए स्त्रीवेदमें इन प्रकृतियांके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल सम्भव न होनेसे उसका निषेध किया है। दो वेदनीय आदि परावर्तमान प्रकृतियाँ है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अतर्मुहूर्तप्रमाण प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोंके शेप पदोंका भन ज्ञानावरणके समान है यह स्पष्ट ही है । देशसंयम और संयमका उत्कृष्ट काल कुछ कम एक पूर्वकोटि कालप्रमाण है और इस कालमै क्रमसे अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क और प्रत्याख्याना वरण चतुष्कका वन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि कहा है । इनके अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है यह स्पष्ट ही है। अवक्तव्यपद अन्तमुहूर्तके अन्तरसे तथा कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमें हो यह सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है। स्त्रीवेदका अन्य सब भन्न मिथ्यात्वके समान है। मात्र इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचवन पल्य ही प्राप्त होता है, क्योकि स्त्रीवेदमें सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल कुछ कम पचवन पल्य है। तात्पर्य यह है कि किसी स्त्रीवेदी जीवने स्त्रीवेदका अवक्तव्यवन्ध करके बादमे सम्यक्त्व प्राप्त किया और अपने उत्कृष्ट काल तक उसके साथ रहकर बादमें मिथ्यात्वमें जाकर पुनः स्त्रीवेदका अवक्तव्यबन्ध किया तो इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण प्राप्त हो जाता है । नपुंसक- वेद आदिका भङ्ग स्त्रीवेदके समान घटित होनेसे उसके समान कहा है । स्त्रीवेदमे पुरुपवेद आदि का सम्यक्त्वके कालमे निरन्तर बन्ध होता रहता है, अत. इस कालके आगे पीछे इनका अब- क्तव्यपद प्राप्त होनेसे इसका अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है । तथा इनके शेष पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है यह स्पष्ट ही है। नरकायुका पूर्वकोटिकी आयुवाले जीवके त्रिभागके प्रारम्भमे और अन्तमे बन्ध होकर चार पद हो और मध्यमे बन्ध न होनेसे न हों यह सम्भव है, इसके प्रकृतिवन्धका उत्कृष्ट अन्तर भी इतना ही है, इसलिए यहाँ नरकायुके चारों पदोका उत्कृष्ट अन्तर प्रकृतिबन्धके अन्तरकालके समान कहा है। तियश्चायु और मनुष्यायुमसे किसी एकका कायस्थितिके प्रारम्भमें और अन्तमे वन्ध किया और मध्यमे नहीं किया, इसलिए इनके चारो पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। कोई स्त्रीवेदी जीव देवायुका वन्ध कर पचवन पल्यकी आयुवाली देवी हुआ। पुनः वहाँसे च्युत होकर पूर्वकोटि- पृथक्त्वकाल तक स्त्रीवेदके साथ परिभ्रमण कर तीन पल्यकी आयुके साथ मनुष्यिनी या तियश्चनी ।
। -------- rrrr- भुजगारवंवे अतरकालाणुगमा १४१ १६५. पुरिसेसु पढमदंडओ थीणगिद्धिदंडओ णिहादंडओ सादा०दंडओ अट्ठ- कसायदंडओ इस्थिवेददंडओ पबिंदियपजत्तभंगो। णवरि पंचणा०-चदुदंस०-चदुसंज० पंचंत० अवत्तवं णत्थि । णिहादंडओ अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० कायद्विदी० । पुरिस० तिण्णिपदा० णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० बेछावहि० दे० अंतोमुहुत्त । णऎस०-पंचसंठा-पंचसंघ०-अप्पसत्य०-दूभग-दुस्सर-अणादें- णीचा० भुज०-अप्प० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वेछावहि० हुआ और आयुके अन्तमे पुनः देवायुका वध किया । इसप्रकार देवायुके दो बार वन्धके साथ चार पदोंके प्राप्त होनेमे पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक अट्ठावन पल्यका उत्कृष्ट अन्तर आता है, अत. यह अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। देवीके नरकगति आदिका बन्ध नहीं होता। तथा वहाँसे आनेके बाद भी अन्तर्मुहूर्तकाल तक इनका वन्ध सम्भव नहीं है, इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवतव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर सधिक पचपन पल्य कहा है। देवगतिचतुष्कको छोड़कर अन्य प्रकृतियोका देवी होनेके पूर्व भी अन्तर्नुहृर्तकाल तक वन्ध नहीं होता, यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए । इनके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है, यह स्पष्ट ही है। उत्तम भोग- भूमिमे सम्यग्दृष्टि होनेपर मनुष्यगति आदिका बन्ध नहीं होता और वहाँ सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल कुछ कम तीन पल्य है, इसलिए यहाँ इनके दो पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्यप्रमाण कहा है। अवस्थितपढका उत्कृष्ट अन्तरकाल कायस्थितिप्रमाण है, यह स्पष्ट ही है। तथा देवीके सम्यक्त्वके कालमे कुछ कम पचग्न पल्य तक इनका निरन्तर बन्ध होते रहनेसे अवक्तव्य पद सम्भव नहीं है, इसलिए इनके उक्त पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। औदारिकशरीरके तीन पदोंका अन्तरकाल तो मनुष्यगतिके समान ही है । मात्र इसके अवक्तव्य पदके अन्तरकालमै फरक है। बात यह है कि देवीके निरन्तर औदारिकशरीरका ही वन्ध होता है, इसलिए इसके अवक्तन्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचवन पल्य बन जानेसे वह उक्त काल- प्रमाण कहा है । परवान आनिक अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर औदारिकशरीरके समान ही घटित कर लेना चाहिए। इनके शेष तीन पदोका अन्तरकाल ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। आहारकद्विकका कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तम वन्ध हो यह सन्भव है, इसलिए इनके चारो पदोंका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है। मनुष्विनीके कुछ कम एक पूर्वकोटि काल तक तीर्थकप्रकृतिका बन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ इसके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल- प्रमाण कहा है। यहाँ इसके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल सम्भव नहीं है, क्योकि इसके बन्धका प्रारम्भ होनेपर ही एकमात्र इसका अवक्तव्यपद होता है। अन्यका नहीं। यद्यपि उपशमश्रेणीसे उतरनेपर स्त्रीवेदमें पुन' इसका अवक्तव्यपद सम्भव है, .र उपशमबोणिमे मार्गणा बदल जाती है, अत यहाँ इसके भवक्तव्यपकके अन्तरकालका निपध किया है। शेष कथन सुगम है। १६५ पुरुषवेदी जीवाने प्रथमदण्डक, स्त्यानगृद्धिदण्डक, निद्रादण्डक सातावेदनीयदण्डक, आठ कपायहण्डक और स्त्रीवेदवण्डकका भङ्ग पञ्चेन्द्रियपर्याप्तक जीवोंके समान है। इतनी विगेपता है कि पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पॉच अन्तरायका अवक्तव्यपद नहीं है। निद्राण्डकके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिति- प्रमाग है। पुरुपवेदके तीन पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त अधिक दो छयासठ सागर है । नपुंसकवेद, पाँच संस्थान, पॉच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और नीचगोत्रके भुजगार और अल्पतरपदका जवन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त है . १४२ महावंवे पदेसबंधाहियारे सादि० तिण्णि पलि० देसू० | अवढि जहएग०, उक्क० कायद्विदी० । णिरयाउ० इत्थिभंगो। दोआउ० पंचिंदियभंगो। देवाउ० भुज०-अप्प० जह० एम०, अवत्त० जह० अंतो०, उक० तेत्तीसं० सादि० । अहि. जह० एग० उक्क० कायद्विदी। णिरयग०-चदुजादि-णिरयाणु०-आदाव-थावरादि०४ तिण्णि पदा जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेवहिसागरोवमसदं । अवढि० जह० एग०, उक्क० कायद्विती० | आरणच्चुदि सम्मन्नं गहेण तदो वेछावहिसागरोवमाणि भमिद्रण- सव्वऍकत्तीसं गदो मिच्छत्तं गदी ताओ तं णादण केई पुणोबंधदि। तिरिक्वगदितिगं पंचिंदियपजत्तभंगो । मणुरागदिपंचग० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० तिण्णिपलि. सादि० । अवढि० जह० एग०, उक्क कायद्विदी० । अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । देवगदि०४ भुज०-अप्प० जह• एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेतीसं० सादि० । अवहि० जह० एग०, उक्क० कायद्विदी० । पचिंदि०- पर०-उस्सा०-बादर-पजत्त-पत्ते० तिण्णि पदा णाणा मंगो। अवत्त० जह अंतो०, उक० तेनहिसाग०सदं० । आहारदुर्ग तिण्णिपदा जह० एग०, अवत्त० जह. अंतो० उक्क० कायद्विदी० । समचदु०-पसन्थवि०-सुभग-सुस्सर-आदें-उच्चा० तिण्णि और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन बल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है । अवस्थित- पढका जय य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। नरकायुका भन स्त्रीवेदी जीवोके समान है । दो आयुओका भङ्ग पश्चेन्द्रिय जीवोंके समान है। वायुके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघय अन्तर अन्तमुहूर्त है और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर साविक तेतीस सागर है। अवस्थितानका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। नग्कगति, चार जाति, नरकगत्यानुपूर्वी, आतम और स्थावर आदि चारके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक रामय है, अवक्तव्यपढका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और नीनोका उत्कृष्ट अन्तर एक सौ बेसठ सागर है। अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उस्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। आरण-अच्युत कल्पमे सम्यक्त्वको ग्रहणकर उसके बाद दो छयासठ सागर काल तक भ्रमण करनेके बाद सम्पूर्ण इकतीस सागरको बिताकर मिथ्यात्वको प्राप्त हो उसका अनुभव करता हुआ उक्त प्रकृतियोमसे किन्ही प्रकृतियाका वध करता है। तिर्यञ्चगतित्रिकका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोके समान है। मनुष्य- गतिपञ्चकके भुजगार और अल्पतर पड़का जघन्य अन्तर एक समय है ओर उत्कृष्ट अन्तर साधिक तीन पल्य है। अवस्थितपढका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर काय- स्थितिप्रमाण है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । देवगतिचतुप्कके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य- पटका जघन्य अतर अन्तर्मुहूर्त है और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। अव- स्थितपढ़का जघन्य अन्तर एक समय है और उसष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। पञ्चेन्द्रियजाति, परघात, उच्छास, वादर, पर्याप्त और प्रत्येकके तीन पदोका भन ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यादका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एक सौ बेसठ सागर है। आहारकद्विकके तीन पदोका जघन्य अतर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमु हूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो १४३ पदा णाणा०संगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वेछावट्ठि० सादि० तिण्णि. पलि. देम्० । तित्थ० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक अंतो० । अबहि० ओघं । अवत्त० जह० अंतो०, उक० पुवकोडी देसू० । सुभग. सुस्वर. आदेय और उच्चगोत्रके तीन पनाका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर है। तीर्थङ्कर प्रकृतिके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अत्रस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। विशेषार्थ-यहाँ पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोमे प्रथमादि दण्डकोका जो अन्तरकाल कहा है, वह पुरुपवेदी जीवोंमे भी वन जाता है, इसलिए इसे यहाँ पञ्चेन्द्रियपर्याप्तकोंके समान कहा है। विशेप खुलासा पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोमे इन दण्डकांके अन्तरकालको देखकर कर लेना चाहिए । मात्र पुरुपवेदियोमे पाँच ज्ञानावरणादिके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं प्रात होता, अतः उसका निषेध किया है । किन्तु निद्रादिकके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल बन जाता है, इसलिए उसका अलगसे विधान किया है। तथा अपनी कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमे अपूर्वकरणमे इनका अवन्धक होकर और सवेद भागमे भरकर देव होनेपर इनका वन्धक होनेसे इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल कायस्थिनि प्रमाण प्राप्त होता है। पुन्पवेदके तीन पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । तथा जो दो छयासठ सागर काल तक गुणस्थान प्रतिपन्न रहता है, उसके इतने काल तक पुरुषवेदका ही वन्ध होता है, इसलिए इसके अवक्तञ्चपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है। इसी प्रकार नपुंसकवेद आदिका भी उक्त काल तक बन्ध नहीं हो यह सम्भव है, इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो छयासठ सागर कहा है । तथा इनके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है । नरकायुका स्त्रीवेदी जीवोमे और दो आयुका पञ्चेन्द्रिय जीवोमे जो अन्तरकाल घटित करके बतलाया है,उसी प्रकार यहाँ पर भी घटित कर लेना चाहिए । कोई मनुष्य पूर्व कोटिकी आयुके प्रथम विभागमे देवायुके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्य ये तीन पद करे,उसके बाद देव होकर और च्युत होकर पुन पूर्वकोटि आयुके अन्तमे देवायुके उक्त तीन पद करे तो यहाँ इस आयुके उक्त तीन पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण प्रोप्त होनेसे वह साधिक तेतीस सागर कहा है। इसके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिति प्रमाण है,यह स्पष्ट ही है। नरकगति आदिका पुरुषवेदीके एक सौ बेसठ सागर तक वन्ध न हो, यह सम्भव है, इसलिए यहाँ इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है, यह सुगम है। पञ्चेन्द्रिय पर्याप्रकोमे तिर्यञ्चगतित्रिकके सब पदोका जो अन्तर काल कहा है वह यहाँ अविकल वन जानेसे इसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। साधिक तीन पल्य तक मनुष्य- गविपञ्चकका वन्ध न हो,यह सम्भव है, इसलिए इनके दो पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल- प्रमाग कहा है। इनके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है। किसी जीवने मनुष्यगतिपञ्चकका विजयादिकम अवक्तव्यपद किया । पुन मर कर वह पूर्वकोटिकी आयुवाला मनुष्य हुआ। तथा पुन मरकर वह विजयादिकमे उत्पन्न हुआ और मनुष्य- गतिपञ्चकका वन्ध करने लगा। इस प्रकार इसके इन प्रकृतियोके अवकन्यपदका उत्कृष्ट अन्तर- काल साधिक तेतीस सागर देखा जाता है, इसलिए वह उक्त कालप्रमाण कहा है। उपशमश्रोणिके . १४४ महाचंधे पदेसबंधाहियारे १६६. णqसगे पढमदंडओ इस्थिभंगो। णवरि अवढि० ओघं । थीणगिद्धि- तिगदंडओ दोपदा जह० एग०, उक्क० तेत्तीसं० देसू० । अबढि० ओघं। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अद्धपोग्गल० । णिद्दा-पयलदंडओ ओ | णवरि अवत्त० णत्थि । असाददंडओ अट्ठकसायदंडओ ओघो। इत्थि०-णस०-पंचसंठा-पंचसंघ०-उज्जो०- अप्पसत्थ०-दूभग-दुस्सर-अणार्दै भुज०-अप्प० मिच्छत्तभंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० देसू० । अवहि० ओवं । पुरिस०-समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुम्सर-आर्दै तिष्णिपदा णाणा भंगो । अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० देसू० । तिण्णिआउ० वेउन्नि छक्कं मणुसगदितिगं आहारदुर्ग सव्वपदा ओघं । देवाउ० मणुसिभंगो । अपूर्वकरण गुणस्थानमें देवगतिचतुष्ककी वन्धव्युच्छित्ति कर और इस गुणस्थानको प्राप्त होनेके पूर्व मरकर जो तेतीस सागरकी आयुके साथ देवोमे उत्पन्न होता है,उसके इतने काल तक इन प्रकृतियोका बन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर काल साधिक तेतीस सागर कहा है। मात्र पहले और बादमे इन प्रकृतियोके यथास्थान भुजगार आदि पद प्राप्तकर यह अन्तरकाल लाना चाहिए । इनके अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है यह स्पष्ट ही है । पञ्चेन्द्रियजाति आदिके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है सो उसे देखकर घटित कर लेना चाहिए । तथा पुरुपवेदीके इनका एक सौ त्रेसठ सागर तक निरन्तर बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । आहारकद्विकका कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमे बन्ध हो और मध्यमें न हो यह सम्भव है, इसलिए इनके चारों पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है। समचतुरन- संस्थान आदिके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है, यह स्पष्ट ही है । तथा इनका कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर काल तक निरन्तर बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तीर्थङ्करप्रकृतिके अन्य पढोका अन्तरकाल तो स्पष्ट है । मात्र अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तरकाल जो कुछ कम एक पूर्वकोटि कहा है सो वह जिस भवमे तीर्थकर प्रकृतिके बन्धका प्रारम्भ होता है,उस भवकी अपेक्षासे जानना चाहिए । कारण कि जिस भक्में तीर्थङ्करका उदय होता है, उसमें उसका उपशमश्रेणिपर आरोहण नहीं होता,यह वात इसी अन्तरकालसे ज्ञात होती है। १६६ नपुंसकवेदी जीवामे प्रथम दण्डकका भग स्त्रीवेदवाले जीवोके समान है। इतनी विशेषता है कि अवस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है। स्त्यानगृद्धित्रिक दण्डकके दो पदोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतोस सागर है। अवस्थितपदका भङ्ग ओषके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुदल परिवर्तनप्रमाण है। निद्रा-प्रचलादण्डकका भड्न ओघके समान है। इतनी विशेपता है कि इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है । असातावेदनीयदण्डक और आठ कपायदण्डकका भङ्ग ओधके समान है । स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, पाँच संस्थान, पॉच संहनन, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर और अनादेयके भुजगार और अल्पतरपदका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है | अवस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है। पुरुपवेद, समचतुरस्रसस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयके तीन पदोका भग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। तीन आयु, वैक्रियिकपटक, मनुष्यगतित्रिक और आहारकाद्वकके सब पदोका भङ्ग ओघके समान है। देवायुका भङ्ग मनुष्यिनियोके समान है। ।
भुजगारवंधे अंतरकालाणुगमो तिरिक्खगदितिगं भुज-अप्प० जह० एग०, उक्क० तेत्तीसं० देसू० । सेसपदा ओघं । चदुजादि-आदाव-थावरादि०४ भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० अवडि. ओघं । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेंतीसं० सादि० । पंचिंदि०-पर०-उस्सा०-तस०४ भुज०-अप्प०अवढि० णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक० तेतीसं० सादि० । ओरा० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० पुन्चकोडी० देसू० । अवद्वि०-अवत्त० ओघं । एवं ओरालि० अंगो०-बजरि० । णवरि अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । वजरिसभ० तेत्तीसं० देसू० । तित्थ० भुज०-अप्प० जह० ए०, उक्क० अंतो० । अवहि० जह० एग०, उक्क० तिणि साग० सादि० । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पुचकोडि- तिभागं देसू० । तिर्यञ्चगतित्रिकके भुजगार और अल्पतरपनका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। शेष पदोका भङ्ग ओधके समान है। चार जाति, आतप और स्थावर आदि चारके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । अवस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । पञ्चेन्द्रियजाति, परघात, उच्छास और त्रसचतुष्कके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। औदारिकशरीरके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि है । अवस्थित और अवक्तव्यपदका भङ्ग ओघके समान है । इसी प्रकार औदारिकशरीरआङ्गोपाङ्ग और वज्रर्षभनाराचसहननका भङ्ग जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । तथा वज्रर्पभनाराचसंहननके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है । तीर्थङ्कर प्रकृतिके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तीन सागर है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एक पूर्व कोटिका कुछ कम विभागप्रमाण है। विशेषार्थ-नपुंसकवेदमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, चार संज्वलन और पाँच अन्तराय इस प्रथम दण्डकका भङ्ग स्त्रीवेदी जीवोके समान बन जानेसे वह उनके समान कहा है। मात्र नपुसकवेदी जीवोकी कायस्थिति अनन्तकालप्रमाण होनेसे इनमे इस दण्डकके अवस्थित पटका उत्कृष्ट अन्तर ओघके समान जगश्रेणिके असंख्यातवे भागप्रमाण वन जानेसे वह ओषके समान कहा है। स्त्यानगृद्धित्रिक दण्डकसे स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्क ये आठ प्रकृतियों ली गई है। नपुंसकवेदी जीवोमे इनका कुछ कम तेतीस सागर काल तक वन्ध न हो,यह सम्भव है, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतर पदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है। इनके अवस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है,यह स्पष्ट ही है। तथा नपुंसकवेदी जीवके अर्धपुद्गल परावर्तनकालके प्रारम्भमे और अन्तमे इनका अवक्तव्यपद हो और मध्यमें न हो,यह भी सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। निद्राप्रचलादण्डकसे निद्रा, प्रचला, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात १६ , " महाबंधे पदेसबंधाहियारे और निर्माण ये प्रकृतियाँ ली गई हैं सो इन प्रकृतियाका भद्ग ओघनरूपणा जिसप्रकार कहा है वह यहाँ भी वन जाता है, इसलिए ओघके समान जाननेको सूचना की है । यद्यपि यहाँ इनका अवक्तव्यपद तो सम्भव है पर उसका अन्तरकाल सम्भव नहीं है, क्योंकि इस मार्गणामे इनका अवक्तव्यपन होकर पुनः अवक्तव्यपट होनेके पूर्व नियमसे मार्गणा बदल जाती है, इसलिए इस मार्गणामे इन प्रकृतियांके अवक्तव्यपदके अन्तरकालका निषेध किया है। सातावेदनीयदण्डकम ये प्रकृतियाँ ली गई हैं-सातावेदनीय, असातावेदनीय, हास्य, रति, अरति, शोक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, यश कौति और अयश-कीर्ति । आठ कपायदण्डकी प्रकृतियाँ स्पष्ट ही हैं। इन दाना दण्डकोके चारों पदाका अन्तरकाल ओघके समान यहाँ घटित हो जानेसे वह ओषके समान कहा है। खीवेद आदि सत्रह प्रकृतियोंका बन्ध यहाँ कुछ कम तेतीस सागर तक न हो, यह सम्भव है। मिथ्यात्वप्रकृतिके विपयमे भी यही बात है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके भुज- गार और अल्पतरपदका अन्तरकाल मिथ्यात्वके समान घटित हो जानेसे वह उसके समान कहा है । इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर इसी कारण घटित कर लेना चाहिए । तथा इनके अवस्थित पदका अन्तर ओघके समान है, यह स्पष्ट ही है। पुरुपवेद भादि छह प्रकृतियोंके तीन पद का भगनानावरणके समान प्राप्त होनेसे वह उसके समान कहा है । तथा नपुंसकवेदीके कुछ कम तेतीस सागर तक इनका निरन्तर बन्ध सम्भव है और इनका अवक्तव्य पद इस कालके आगे-पीछे ही सम्भव है, इसलिए इनके अवतन्यपढ़का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है। तीन आयु आदि चौदह प्रकृतियांका भगोषके समान और देवायुका मन मनुयिनीके समान है,यह स्पष्ट ही है। अलग-अलग स्पष्टीकरण देखकर कर लेना चाहिए । यहाँ तिर्यञ्चगतित्रिकका बन्ध कुछ कम तेतीस सागर तक हो,यह सम्भव है, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष दो पदोका भद्ग ओषके समान है.यह ओध प्ररूपणाको देखकर घटित कर लेना चाहिए | चार जाति आदिनी प्रकृतियाका वन्ध नरकमें नहीं होना और वहाँ प्रवेश करनेके पूर्व और वहाँसे निकलनेके बाद अन्तर्मुहूर्त काल तक नहीं होता, इसलिए यहाँ इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। इनके अबस्थितपढ़का भद्ग ओघके समान है,यह स्पष्ट ही है। पञ्चेन्द्रिय- जाति आदि सात प्रकृतियोंका बन्ध नरकम और वहाँ प्रवेश करनेके पूर्व व निकलनेके वाद अन्तर्मुहर्त काल तक नियमसे हाता रहता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। इनके शेप पढोका भङ्ग जानावरणके समान है, यह स्पष्ट ही है। यहाँ सम्यग्दृष्टि मनुष्य और तिर्यम्बके कुछ कम एक पूर्वकोटि काल तक औदारिकशरीरका बन्ध नहीं होता, इसलिए इसके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष पदोका भङ्ग भोधके समान है. इसलिए वहॉसे देखकर घटित कर लेना चाहिए। औदारिक- शरीर आङ्गोपाङ्ग और वज्रर्पभनागचसंहननका अन्य भङ्ग औदारिकशरीरके समान है। केवल इनके अवक्तव्यपदके अन्नरकालम फरक है। बात यह है कि इस मार्गणाम औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग का साधिक तेतीस सागर काल तक और वज्रर्पभनाराचसंहननका कुछ कम तेतीस सागर काल तक निरन्तर बन्ध सम्भव होनसे इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। नपुंसकवेढमें साधिक तीन सागर तक तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ इस प्रकृतिके अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। यहाँ प्रारम्भमें और अन्तम अवस्थित- पढ़ कराकर यह अन्तरकाल ले आना चाहिए। तथा नरकायुके बन्धवाले नपुंसकवेदी मनुष्यमें एक पूर्वकोटि के कुछ कम विभागप्रमाण काल तक ही तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध सम्भव है। ऐसे मनुप्यने तीर्थदर प्रकृतिके बन्धके प्रारम्भमें अवक्तव्यपद किया और द्वितीय व तृतीय नरकम उत्पन्न भुजगारवंधे अतरकालाणुगमो १४७ १६७. अवगदवे० सव्वपगदीणं भुज-अप्प०-अवडि० जह० एग०, उक्क० अंतो० अवत्त० णत्थि अंतरं। १६८. कोधकसाइसु पंचणा०-चदुदंस०-चदुसंज०-पंचत० भुज०-अप्प०५ अवढि० जह० एग०, उक० अंतो० । सेसाणं मणजोगिभंगो। एवं माण-मायाणं । णवरि तिण्णि- संज०-दोसंज० । लोमे० पंचणा०-चदुदंस-पंचंत० भुज-अप्प०-अवढि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । सेसाणं मणजोगिभंगो । १६६, मदि-सुदे धुवियाणं भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अपहि जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखेंजदि० । दोवेद०-छण्णोक०-थिरादितिण्णयु० भुन०- होकर व अन्तर्मुहूर्तमे सम्यग्दृष्टि होकर तीर्थकर प्रकृतिका पुन. वन्धका प्रारम्भ कर अवक्तव्यपद किया। इस प्रकार इस प्रकृतिके अवक्तव्यपदके दो बार बन्ध होनेमे उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त काल प्रमाण प्रान होनेसे वह उतना कहा है। १६७. अपगतवेदी जीवोमे सब प्रकृतियोके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थ-क्षपकनेणिकी अपेक्षा अपगतवेदी नौवे और दसवे गुणस्थानका काल और उपशमश्रोणिकी अपेक्षा अपगतवेदका काल अन्तर्मुहूर्तसे अधिक नहीं है, इसलिए इसमे सब प्रकृतियोके तीन पदोका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। तथा क्षपकनेणिमे तो इन प्रकृतिग्रोका अवक्तव्यपद होता ही नहीं। हॉ उपशमश्रोणिमे इनका अवक्तव्यपद होता है,पर वह उतरते समय एक बार ही होता है, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्य- पदके अन्तरकालका निषेध किया है। १६८. क्रोध कपायवाले जीवोमै पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, चार संज्वलन और पॉच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग मनोयोगी जीवोके समान है। इसी प्रकार मान और माया कपायवाले जीवोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमे क्रमसे तीन संज्वलन और दो सञ्चलन लेने चाहिए। लोभकपायवाले जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । शेप प्रकृतियोका भङ्ग मनोयोगी जीनोके समान है। विशेषार्थ-यहाँ चारी कपायवाले जीवामे सब प्रकृतियोके यथासम्भव पदोका अन्तर- काल मनोयोगी जीवोके समान बन जाता है। मात्र श्रोणिमे क्रोध कषायमै चार संज्वलनोका, मानकपायमे तीन संचलनांका और मायाकपायमे दो संचलनोका वन्ध सम्भव है। तथा लोम कपायम एक भी संज्वलनका वन्ध न हो यह भी सम्भव है, इसलिए इस फरकका बोध करानेके लिए विशेषरूपसे उल्लेख किया है। १६६. मत्वज्ञानी और श्रुताजानी जीवोमै ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार और अल्प- तरपठका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगभोणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। दो वेदनीय, वह नोकपाय और स्थिर आदि तीन युगलके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदका भग ज्ञाना- १४८ महाबंधे पदेसर्वधाहियारे अप्प०-अवाहि० णाणाभंगो। अबत्त० जह० उक्क. अंतो० । णस०-पंचसंठा०- छस्संघ०-अप्पसत्थ-भग-दुस्सर-अणादें. भुज०-अप्प० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तिणि पलि० देसू० । अवहि० णाणाभंगो । चदुआउ० वेउब्वियछक्कं मणुसगदितिगं भुन० अप्प०-अवढि०-अवत्त० ओवं । तिरिक्ख०-तिरिक्खाणु ०-उजो० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० ऍकत्तीसं० सादिः । अवहि-अवत्त० ओघं । णवरि उजो० अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० ऐक्कत्तीसं० सादिः । [चदुजादि-आदाव-थावर४ भुज०-अप्प० जह० ए०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं सादि० । अवढि० ओघं । ] पंचिदि०-पर-उस्सा०-तस०४ भुज-अप्प०-अवढि० णाणा भंगो। अवत्त० जह. अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । ओरालि० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० [तिण्णि पलिदो० देस० । अवढि०-अवत्त० ओघं । समचदु ०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आर्दै तिण्णिप० णाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक० तिण्णिपलिदो० देसू० । ओरालि अंगो० भुज०-अप्प० जह० एग०, उक्क० तिण्णिपलिदो० देसू० । अवढि० ओथं । अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० तेत्तीसं सादि० । णीचा तिण्णिपदा० णवंसग- वरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहर्त है। नपुंसकवेद, पॉच संस्थान, छह संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुस्वर और अनादेयके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है। तथा अवस्थितपटका भगबानावरणके समान है । चार आयु, वैक्रियिकपटक और मनुष्यगतित्रिकके भुजगार, अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्यपढका भङ्ग ओघके समान है। तिर्यश्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी और उद्योतके भुजगार और अल्पतर- पढ़का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक इकतीस सागर है। अवस्थित और अवक्तव्यपदका भग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि उद्योतके अवक्तव्यपढका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक इकतीस सागर है । चार जाति, आतप और स्थावर आदि चाग्के भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर साधक तेतीस सागर है। अवस्थितपदका भङ्ग ओघके समान है । पञ्चेन्द्रियजाति, परघात, उच्छास और बस- चतुष्कके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपढ़का भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। औदारिकशरीरके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है। अवस्थित और अवक्तव्य पदका भङ्ग ओघके समान है । समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयके तीन पदीका भङ्ग कानावरणके समान है । अबक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है। औदारिक- शरीर आङ्गोपाङ्गके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है । अवस्थितपदका भङ्ग ओधके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। नीचगोत्रके तीन पदोका भङ्ग . . १ ता. प्रतो 'उक० तेत्तीस सादिः' इति पाट. ।
१४६ भुजगारवघे अंतरकालाणुगमो भंगो । अवत्त० ओघं । ]....... ..... ...... ........ ........ .... ... ........ ... . ..... .. . . . .. ... . ... ... .. ...... .......... ... .. . ... नपुंसकवेदके समान है। तथा अवक्तव्यपदका भङ्ग ओघके समान है। विशेषार्थ—इन दोनों अज्ञानोमे सैंतालीस ध्रुवन्धिनी प्रकृतियोका निरन्तर बन्ध होता रहता है, इसलिए यहॉइनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त तथा अवस्थित- पदका उत्कृष्ट अन्तर जगश्रोणिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । यहाँ इनका अवक्तव्यपद नहीं है,यह स्पष्ट हो है । दो वेदनीय आदि चौदह प्रकृतियाँ यद्यपि परावर्तमान हैं, पर इनके तीन पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान वन जानेसे वह ज्ञानावरणके समान कहा है । तथा इनका अन्तर्मुहूर्तमे दो बार बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त कहा है । नपुंसकवेद आदि सोलह प्रकृतियांका उत्तम भोगभूमिमें पर्याप्त होनेपर कुछ कम तीन पल्यतक वन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार अल्पतर और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य कहा है । इनके अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। चार आयु आदि तेरह प्रकृतियोके चारो पदोका भङ्ग जो ओधमे कहा है वह यहाँ भी वन जाता है, इसलिए इसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। तिर्यञ्चगति आदि तीन प्रकृतियोका बन्ध इन अज्ञानोंमें साधिक इकतीस सागरतक नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतर- पदका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक इकतीस सागर कहा है । इनके अवस्थित और अवक्तव्य पटका भन्न ओघके समान है,यह स्पष्ट ही है । मात्र उद्योत परावर्तमान प्रकृति है, इसलिए इसका अग्नि- कायिक और गयुकायिक जीवोमे उनकी कायस्थितिप्रमाण कालतक निरन्तर वन्ध सम्भव नहीं है। हॉ,नौवें वेयकमे इसका बन्ध नहीं होता और आगे-पीछे भी अन्तर्मुहूर्त कालतक इसका वन्ध न हो, यह सम्भव है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक इकतीस सागर ही जानना चाहिए | चार जाति आदि नौ प्रकृतियोका बन्ध सातवे नरकमे नहीं होता और आगे-पीछे भी अन्तमुहूर्त कालतक इनका वन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार, अल्पतर और अवक्तन्य पदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। इनके अवस्थितपदका भग ओघके समान है यह स्पष्ट ही है। पञ्चेद्रियजाति आदि सात प्रकृतियोंके तीन पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान वन जानेसे वह उनके समान कहा है। तथा सातवे नरकमें पूरी आयुप्रमाण , १५० महाबंधे पढेसबधाहियारे भागाभागाणुगमो १७०. ""मिस्स० भंगो । एवं एदेण वीजपदेण या अणाहारग ति णेदव्वं । परिमाणाणुगमो १७१. परिमाणं दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा-छदंसणा०-अट्ठक०- भय-दुगुं०-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पचंत० भुज०-अप्पद०-अवढि० त्तिया ? अणंता। अवत्त० कॅत्तिया ? संखेंजा। थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अट्ठक०- ओरालि० तिण्णि पदा कॅत्तिया ? अणंता । अवत्त कत्तिया? असंखेजा । तिण्णिआउ० कालतक और आगे-पीछे अन्तर्मुहूर्त कालतक इनका निरन्तर बन्ध होता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेवीस सागर कहा है। औदारिकशरीरका उत्तम भोग- भूमिमे कुछ कम तीन पल्यतक बन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य कहा है । तथा इनके अवस्थित और अवक्तव्यपरका उत्कृष्ट अन्तर ओघमे जो कहा है वह यहाँ भी बन जाता है, इसलिए इसे ओधके समान जाननेकी सूचना की है । समचतुरस्रसंस्थान आदि पॉच प्रकृतियोके तीन पदोका भद्ग ज्ञानावरणके समान घटित हो जाता है,यह स्पष्ट ही है । तथा उत्तम भोगभूमिमें कुछ कम तीन पल्यतक इनका निरन्तर वन्ध होता रहता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । औदारिकशरीर अझोपानका अन्य सब विकल्प औदारिक शरीरके समान घटित हो जाता है। मात्र अवक्तव्यपदके उत्कृष्ट अन्तरकालमे फरक है। बात यह है कि इसका सातवे नरकमे तो निरन्तर बन्ध होता ही है । तथा वहाँ जानेके पूर्व और निकलनेके बाद भी अन्तर्मुहूर्त कालतक बन्ध होता रहता है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। नीचगोत्रके तीन पदोका भङ्ग नपुंसकवेढके समान वन जानेसे वह उसके समान कहा है और अवक्तव्यपदका भङ्ग ओघके समान बन जानेसे उसे ओघके समान जाननेको सूचना की है। भागाभागानुगम १७०. मिश्रके समान भङ्ग है। इसप्रकार इस वीजपदके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। परिमाणानुगम १७१. परिमाण दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, आठ कपाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदवाले जीव कितने हैं ? अनन्त हैं। अवक्तव्यपदवाले जीव कितने है ? सख्यात हैं। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, आठ कषाय और औदारिकशरीरके तीन पदोके बन्धक जीव कितने हैं।अनन्त हैं। इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात है। तीन आयु और वैक्रियिकषट्कके भुजगार, अल्पतर अव- १ ता०प्रतौ 'ओरालि० भुज०अप्पाज० ए० उ० ति. [अत्र ताडपत्रद्वयं विनष्टम् । एक क्रमाकरहित ताडपत्र विद्यते ] मिस्सभगो । एव एदेण प्रोजेण याव' आ०प्रतौ 'ओरालि० भुज अप्प० जह० मिस्सभगो। एदेण बीजपदेण याव' इति पाठः । अत्र आ०प्रतौ यहाँसे २०८ ताडपत्र नहीं है।' इत्यपि सूचना विद्यते । . एग०, उक्क० " भुजगारबंधे परिमाणाणुगमो वेउन्वियछक्कं भुज-अप्प०-अवढि०-अवत्त० कत्तिया० ? असंखेंजा । आहारदुगं चत्तारि पदा कौत्तया ? संखेज्जा । तित्थ० तिणि पदा कत्तिया ? असंखेंजा। अवत्त कत्तिया ? संखेंजा । सेसाणं सादादीणं चत्वारि पदा कॅत्तिया ? अणंता । एवं ओषभंगो कायजोगि- ओरा०-णस०-कोधादि०४-अचक्खु०-भवसि०-आहारग त्ति । स्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात है। आहारकद्विकके चारी पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। तीर्थङ्करप्रकृतिके तीन पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं । अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात है। शेष सातावेदनीय आदि प्रकृतियोके चार पदोके वन्धक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं ? इसीप्रकार ओघके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, नपुंसकवेवाले, क्रोधादि चार कपायवाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवोमे जानना चाहिए। विशेषार्थ—यहाँ पॉच ब्रानावरणादि पैंतीस प्रकृतियोके भुजगार आदि तीन पद एके- न्द्रियोंके भी बन जाते हैं, इसलिए इनका परिमाण अनन्त कहा है। तथा इनका अवक्तव्य पद या तो सामान्य मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त और मनुष्विनीके सम्भव है या ऐसे यथासम्भव मनुष्योके मरकर देव होनेपर उनके प्रथम समयमे सम्भव है । ये जीव यतः संख्यातसे अधिक नहीं होते, अत इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। स्त्यानगृद्धित्रिक आदि तेरह प्रकृतियोंके तीन पद एकेन्द्रियोके भी बन जाते हैं, इसलिए इनका परिमाण अनन्त कहा है। तथा इनका अवक्तव्यपद संजी पञ्चेन्द्रियोंमे प्राप्त होता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंका परिमाण असंख्यात कहा है । नरकायु, मनुप्यायु और देवायु इन तीन आयुओके और बैंक्रियिकपटकके बन्धक जीव ही असंख्यात है, इसलिए इनके चारो पदोके बन्धक जीवोका परिमाण असंख्यात कहा है। आहारकद्विकके चार पद तो अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणमें ही होते हैं, इसलिए इनके चारो पदाके बन्धक जीबोका परिमाण संख्यात कहा है । तीर्थङ्करप्रकृतिक तीन पद नरक, मनुष्य और देव इन तीनो गतियोमे सम्भव है, इसलिए इसके भुजगार आदि तीन पदोके बन्धक जीवोका परिमाण असख्यात कहा है। यद्यपि इसका अवक्तव्य- पद भी उक्त तीन गतियोंमे होता है,पर वह तीर्थङ्करप्रकृतिका बन्ध करनेवाले सब जीवोके सर्वदा नहीं होता। एक तो तीर्थकर प्रकृतिका वध करनेवाले जो मनुष्य मिथ्यादृष्टि होकर दूसरे और तीसरे नरकमे उत्पन्न होते हैं। उनके पुन. इसका वन्ध प्रारम्भ करने पर होता है। दूसरे मनुष्य- गतिमें जो तीर्थकर प्रकृतिका वन्ध प्रारम्भ करता है उसके होता है या उपशमश्रोणिसे गिरकर आठवे गुणस्थानमे इसका वन्ध प्रारम्भ करने पर होता है। तीसरे तीर्थङ्कर प्रकृतिका वन्ध करनेवाला जो मनुष्य उपशमश्रेणिमें इसकी वन्धव्युच्छिति करनेके बाद मरकर देवोमे उत्पन्न होता है उसके होता है। यत' ऐसे जीयोका जोड़ एक समयमे संख्यातसे अधिक नहीं होता। अत. इसके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका परिमाण सख्यात कहा है। शेष रहीं दो वेदनीय, सात नोकषाय, तिर्यञ्चायु, दो गति, पॉच जाति, छह संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, सादि दस युगल और दो गोत्र सो इन साठ प्रकृतियोंके चारो पद एकेन्द्रियोंके भी सम्भव हैं, अत. इनका परिमाण अनन्त कहा है। यहाँ काययोगी आदि जितनी मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमे ओघ प्ररूपणाकी अपेक्षा यह परिमाण अविकल घटित हो जाता है, अतः उनमे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। " १. ताप्रती 'आहारदु. . सखेना' आप्रती 'आहारदुग केत्तिया ? संखेजाति पाठः।
महावंधे पदेसवंधाहियारे १७२. ओरालिमि० ओघं । कम्मइग०-अणाहार० धुवियाणं भुज० कॅचिया ? अणंता । परियत्तमाणियाणं भुज०-अवत्त० कैंतिया ? अणंता । एदेसिं तिणि पदा देवगदिपंचग० भुज० कॅत्तिया ? संखेंजा । वेउ०मि० धुवियाणं भुजगारं कॅत्तिया ? असंखें । सेसाणं भुज० अवत्त० के० ? असंखेना। णवरि कम्म०-अणाहार० मिच्छ. अवत्त० केत्तिया ? असंखें । एवं एदेण वीजपदेण अणाहारगं तिणेदव्वं । एवं परिमाणं समत्तं। - १७२. औदारिकमिश्नकाययोगी जीवोमे ओघके समान भङ्ग है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार, पदवाले जीव कितने हैं १ अनन्त हैं। परावर्तमान प्रकृतियोके भुजगार और अवक्तव्यपदवाले जीव कितने हैं । अनन्त हैं । मात्र इन तीन मार्गणाओमे देवगतिपञ्चकके भुजगार पदवाले जीव कितने है ? संख्यात हैं । वैक्रियिकमिश्न- काययोगी जीवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार पदवाले जीव कितने हैं ? असख्यात हैं। शेप प्रकृतियोके भुजगार और अवक्तव्य पदवाले जीव कितने हैं ? असंख्यात है। इतनी विशेषता है कि कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवामे मिथ्यात्वके अवक्तव्य पदवाले जीव कितने हैं ? असंख्यात है। इस प्रकार इस वीजपदके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। विरोपार्थ-औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोका परिमाण अनन्त है, इसलिए उनमे बन्धको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियोंके यथासम्भव पदोका भग ओघके समान बन जानेसे वह उसके समान कहा है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोका भी परिमाण अनन्त है, अतः इनमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार पदके बन्धक जीयोका और परावर्तमान प्रकृतियों के भुजगार और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका परिमाण अनन्त कहा है। मात्र पूर्वोक्त तीन मार्गणाओमे देवगतिपञ्चकके बन्धक जीव संख्यात ही होते हैं, क्योकि जो देव और नारकी सम्यक्त्वके साथ मरते हैं वे सख्यात ही होते हैं और जो मनुष्य सम्यक्त्वके साथ मरकर विर्यञ्चो और मनुष्योमे उत्पन्न होते है, वे भी संख्यात ही होते हैं, इसलिए इनमे उक्त पाँच प्रकृतियोंके भुजगार पदवालोका परिमाण संख्यात कहा है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोका परिमाण असंख्यात है, इसलिए इनमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार पदवालोका और परावर्तमान प्रकृतियोके भुजगार और अवक्तव्य पदवालोका परिमाण असंख्यात कहा है। यहाँ कार्मण काययोगी और अनाहारक जीवोमे मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदवाळे असंख्यात होते हैं-यह जो कहा है सो उसका कारण यह है कि जो सासादनसम्यग्दृष्टि इन मार्गणाओमें मिथ्यात्वको प्राप्त होते हैं, वे असख्यातसे अधिक नहीं हो सकते, क्योकि उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोका परिमाण ही असं- ख्यात है। इस प्रकार यहाँ तक जो परिमाण कहा है,उसे बीजपद मानकर उसके अनुसार अन्य सब मार्गणाओमे बन्धको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियोके यथासम्भव भुजगार आदि पवाले जीवोंका परिमाण ले आना चाहिए। इस प्रकार परिमाण समाप्त हुआ। १ आ प्रतौ 'आहार०' इति पाठः | २ ता०प्रती 'वरि कम्म० अणाहार० । मिच्छ०' इति पाठः । ३ ताप्रतौ 'एदेण बीजेण' इति पाठः।
, मुलगारबंधे फोसणाणुगमो १५३ खेताणुगमो १७३. उत्ताणुगमेण दुवि०-ओषे० आई० ओ० तिण्णिआउ० वेउब्बि०छक आहारदुगं तित्य० चत्तारि पढ़ा धुवियाणं ओरालियसरीरस्स य अवत्तव्यगाणं केवडि खेचे ? लोगन्स असंखेजदिभागे। सेसाणं सब्वपदा केवडि खेत्ते ? सव्वलोगे। एवं अणंतहाणेसु णेदव्वं । सेसाणं सोसि सम्वे भंगा ओघ देवगदिभंगो। णवरि एइंदिय- पंचकायाणं ओयादो साघेदन्यो। फोसणाणुगमो १७४. फोसणाणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा०-छदंस०-अट्ठक०- क्षेत्रानुगम १७३ क्षेत्रानुगम की अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघसे तीन आयु, वैक्रियिकादक, आहारकद्रिक और तीर्थङ्कर प्रकृतिके चार पदोके बन्धक जीवोका तथा ध्रुवबन्धबाली प्रकृतियोंके और औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवीका क्षेत्र कितना है ? लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है । शेष सब प्रकृतियोंके सब पढोके बन्धक जीवाका क्षेत्र कितना है? सर्व लोक है। इसी प्रकार सब अनन्त संख्यावाली मार्गगाओमे जानना चाहिए। शेष मार्गगामे सब प्रकृतियोंके सब पदोंका भङ्ग ओघसे देवगतिके समान जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि एकेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोम ओषके अनुसार साध लेना चाहिए। विशेषार्थ-तीन आयु, वैक्रियिकपक और तीर्थङ्कर प्रकृतिके बन्धक जीव असंख्यात हैं तथा आहारकट्टिकके बन्धक जीव संख्यात हैं। तथा ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोमे पाँच जानावरणादिके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यात हैं और त्यानगृद्वित्रिक आदिके और औदारिक्शरीरके अवक्तव्यपदके वन्धक जीव असंख्यात हैं, इसलिए इन प्रकृतियोमसे तीन आयु, बैंक्रियिकादक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिके सब पदवालोका तथा शेप प्रकृतियोके अवतन्यपदवालाका क्षेत्र लोकके असंख्यानवे भागप्रमाग कहा है। इनके सिवा जो शेप प्रकृतियों रहती है अर्थात् ध्रुववन्धवाली प्रकृतियाँ तो अवक्तव्यपदके सिवा शेष पदोकी अपेक्षा यहाँ शेष पदत्ते ली गई है और इनके सिवा परावर्तमान सब प्रकृतियाँ यहाँ ,सब पदोकी अपेक्षा ली गई हैं सो उन सबके सत्र पढ़वालोंका क्षेत्र सर्व लोक है, क्योकि इन प्रकृतियोके ये पद एजेन्द्रियोंमें भी पाये जाते हैं। यह औषप्रहपणा अनन्त संख्यावाली सव मार्गणाओमे अपनी- अपनी बंधनेवाली प्रकृनियोंके अनुसार घटित हो जाती है, इसलिए उनमे ओघके अनुसार साननी सुचना की है। शेष मार्गणाभाका क्षेत्र ही लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, इसलिए उनमेोबसे देवगतिके भङ्गके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र एकेन्द्रियके अवान्तर भेद और पात्र त्यावरकायिज्ञाम विशेषता है, इसलिए उनमें ओषको लक्ष्यकर क्षेत्रके घटित करनेकी सूचना की है। स्पर्शनानुगम १५४. सर्शनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओय और आदेश । ओषसे पाँच ज्ञानावरण छह दर्शनावरण, आठ कषाय. भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, , महाबंधे पडेसबंधाहियारे भय-दुगुं०-तेजा-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० भुज-अप्प ०-अवढि० केवडि० खेतं फोसिदं ? सबलोगो'। अवत्त० केव० फोसिदं ? लोग० असंखें । थीणगि०३-मिच्छ०- अणंताणु०४ तिण्णिपदा सबलो० । अवत्त० अट्ठचों । णवरि मिच्छ० अट्ट-बारह | अपच्चक्खाण०४ तिण्णिपदा सबलो० । अवत्त० छच्चों । सादादीणं चत्तारिपदा सब्बलो० । दोआउ० आहारदुगु सबपदा खेत्तभंगो । मणुसाउ० सव्यपदा अट्टचौँ सव्वलो० । दोगदि-दोआणु० तिण्णिपदा छचों० । अवत्त० खेत्त- भंगो । ओरालि० तिण्णिपदा सन्चलो । अवत्त० चारहचों । वेउब्धि-वेउचि०- अंगो० तिण्णिपदा वारहों। अवत्त० खेतभंगो। तित्थ० तिण्णिपदा अट्ठचों। अवत्त० खेत्तभंगो। अगुगलघुचतुष्क, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सब लोकका स्पर्शन किया है। अवक्तव्यपदवाले जीवोने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्यान- गृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके तीन पदवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है? सब लोकका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदवाले जीवोने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदवाले जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम वारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके तीन पवाले जीवोने सब लोकका स्पर्शन किया है । तथा अवक्तव्यपटवाले जीवोने वसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सातावेदनीय आदिके चार पदोंके बन्धक जीवोने सव लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु और आहारकद्विकके सब पदोके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। मनुष्यायुके सब पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका और सब लोकका स्पर्शन किया है। दो गति और दो आनुपूर्वीके तीन पदोके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्य पदके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। औदारिकशरीरके तीन पदोके वन्धक जीवोने सब लोकका स्पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोंने वसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीरआङ्गोपाङ्गके तीन पदोके बन्धक जीवोने वसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तीर्थङ्कर प्रकृतिके तीन पदोके बन्धक जीवोने सनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इसके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेषार्थ-ओघसे पॉच ज्ञानावरणादि प्रकृतियोंके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपद यथासम्भव एकेन्द्रिय आदि सब जीवोके सम्भव हैं, इसलिए इन प्रकृतियोके उक्त पवाले जीवोका सर्व लोक स्पर्शन कहा है । तथा उनका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिसे गिरनेवाले मनुष्यो और मनुष्यिनियोके तथा इनकी वन्धव्युच्छित्तिवाले ऐसे जीवोके मरकर देव होनेपर प्रथम समयमे १ ता०आ प्रत्योः 'सबलोगे इति पाठः। २ आ० प्रती 'ओरालि० सत्रपटा' इति पाठः।
भुजगारवंधे फोसणाणुगमो होता है. इसलिए इनके अवक्तव्यपदवाले जीवोंका पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है।न्यानगृद्धि तीन आदि आठ प्रकृतियोंके भुजगार आदि तीन पदोका स्वामित्व बानावरणके समान है. इसलिए इनके उक्त तीन पवाले जीवोका सर्शन सर्व लोक कहा है । तथा इनका अवतन्यपद उपरके गुणस्थानासे गिरकर इनके वन्धके प्रथम समयम होता है। ऐसे जीवोका स्पर्शन देवाने विहारवत्स्वस्थानकी मुख्यतासे त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण है. मत' वह उक्त प्रमाण कहा है। मिथ्यात्वके अवतव्य पवाले जीवोका यह स्पर्शन तो है ही पर नीचे कुछ कम पाँच राजू और ऊपर कुछ कम सात राजुप्रमाण क्षेत्रम मारणान्तिक समुद्धातके समय भी इसका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए इसके अवक्तव्य पदबाले जीवोका त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ क्म बारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । अप्रत्याख्यानावरण चतुम्कके भुजगार आदि तीन पद एकेन्द्रिय आदि सब जीवोंके सम्भव है, इसलिए इनके इन तीन पनोंके बन्धक जीवोंको सर्व लोक स्पर्शन कहा है । तथा इनका अवक्तव्यपद ऊपर कुछ कम छह राजु प्रमाग क्षेत्रका सर्शन करनेवाले जीवोंके भी होता है, अतः इनके अवक्तव्यपदका बन्ध करनेवाले जीवोंका पर्शन त्रसनालोके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । सातावेदनीय आदिके सब पढ़ एकेन्द्रियादि सब जीवोंके सम्भव हैं, इसलिए इनके चारी पदोके बन्धक जीवोका सर्शन सब लोक कहा है। यहाँ सातावदनीय आदिसे सातावेदनीय, असातावेदनीय, सात नोकयाय. तिर्वश्चायु, तिर्यञ्चगति, मनुष्यगति, पाँच जाति, यह संन्थान, औदारिकशरीरआङ्गो- पाङ्ग, छह संहनन, तिर्यश्वगत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति. सादि दस युगल और दो गोत्र के प्रकृतियाँ ली गई हैं । नरकायु और देवायुका बन्ध मतंजी जीव करते हैं । पर मारणान्तिक समुद्धात और उपपादपदके समय इनका बन्ध नहीं होना। तथा आहारकद्विकका बन्ध अप्रमत्तसंयत जीव करते हैं, अत. इनके चारों पदोके बन्धन जीवॉका सर्शन क्षेत्रके समान प्राप्त होनेसे तत्प्रमाण कहा है । मनुष्यायुके चारी पद देवाके विहारवल्वत्थानके समय भी सन्भव है और एकेन्द्रिय आदि जीबोके भी सम्भव हैं, अत' इसके सब पढ़ोंके बन्धक जीवोंका म्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोक कहा है । तिर्यञ्चो और मनुष्योके नारकियो और देवाम मारणान्तिक समुद्भात करते समय भी क्रमसे नरकगतिद्विकके और देवगतिद्विकके भुजगार आदि तीन पद सम्भव हैं, अत: इनके उक्त पाने बन्धक जीवोंका पर्शन त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। परन्तु मारणान्तिक समुद्रात के समय इनका अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, अतः इनके इस पदके बन्धक जीगेका पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। औदारिकशरीरके तीन पदोका वन्ध एकेन्द्रिय मादि जीव भी करते हैं, अतः इसके इन तीन पदोंकी अपेक्षा सर्शन सर्व लोक कहा है। तथा नारकी और देव ज्पन्न होनेके प्रथम समयमै औदारिकशरीरका अवक्तव्य बन्ध लियमसे करते हैं. नत. इसके इस पदकी अपेक्षा सनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन क्हा है। तिर्यों और मनुष्योंके नारकियों और देवोमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी वैक्रियिद्विकके तीन पद सम्भव है, अतः इनके तीन पढोके यन्धक जीवोका सर्शन त्रसनालीके छक्म बारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । पर ऐसे तिर्यञ्चों और मनुष्योके इनका अवक्तव्य- पद नहीं होता. इसलिए इनके अबक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। देवोंके बिहारवल्वन्यानले समय भी तीर्थकर प्रकृतिके तीन पद सम्भव है, इसलिए इनके इन पढ़ाके बन्धक जीवोंका स्पर्शन वसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । तथा दीर्थङ्कर प्रकृतिका अवक्तव्चपद ननुप्योंके तो सम्भव है ही और उपशमश्रोणिमे इसकी बन्ध- व्युञ्चित्तिने बाद मरकर जो देव होते हैं उनके भी प्रथम समयमै सम्भव है । तथा इसका वन्ध महाबंधे पदेसबंधाहियारे १७५. णिरयेसु धुवियाणं तिण्णि पदा छच्चों ! सादादीणं तेरहपगदीणं सच्चपदा बच्चों । दोआउ०-मणुस०-मणुसाणु०-तित्थ०-उच्चा० सवपदा हुँचभंगो। सेसाणं तिष्णिपदा छच्चौद्द० । अवत्त ० खेत्तभंगो। णवरि मिच्छ० अवत्त० पंचों । एवं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । करनेवाले जो मनुष्य द्वितीय और तृतीय नरम उत्पन्न होते हैं उनके भी सम्भव है। इन सवका स्पर्शन विचार करनेपर लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण हो प्रान होना है. अत. यहाँ इसके अवक्तव्यपदका बन्ध करनेवाले जीवोंका सर्शन क्षेत्रके समान कहा है १७५. नारकियोमै ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पदोके बन्धक जीवाने असनालीले कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सातावेदनीय आदि तेरह प्रकृतियांके सब पदोके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तीर्थक्षर और ज्वगोत्रके सब पड़ोंके बन्धक जीवोका भङ्ग क्षेत्रके समान है। शेप प्रकृतियोंके तीन पदोके बन्धक जीवाने सनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका सर्शन क्षेत्रके समान है। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवतन्यपढ़के बन्धन जीवोने वसनालोके कुछ काम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। इस प्रकार अपना-अपना स्पर्शन ले जाना चाहिए । विशेषार्थ-नारकियाम ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके तीन पद ही होते है और नारकियाका स्पर्शन सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण है, इसलिए इन प्रकृतियांक उक्त पदाकी अपेक्षा उक्त प्रमाण स्पर्शन कहा है । यहाँ ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियाँ ये हैं-पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, वारह कपाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर वर्णचतुष्क, अगुलधुचतुष्क, असचतुष्क, निर्माण और पॉच अन्तराय | सातावेदनीय आदि तेरह प्रकृतियोंके सब पड़ोके वन्धक जीवोंका भी वही स्पर्शन प्राप्त होता है, क्योंकि इनके चारो पद नारकियोंके मारणान्तिक और उपपादके समय भी सम्भव है। सातावेदनीय आदि तेरह प्रकृतियाँ ये हैं लावावेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकपाय, उद्योत, और स्थिर भादि तीन युगल । मूलमे शेष पद द्वारा आगे कही गई त्यानगृद्धि तीन, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, तीन वेद, विर्यचति छह संस्थान, छह संहनन, तिचञ्चगत्यानुपूर्वी, दो विहायोगति, मध्यके तीन युगल और नीचगोत्रके भुजगार आदि तीन पदोंके बन्धक जीवोका इसी प्रकार स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए । तथा इनका अवक्तन्यपद स्वस्थानमें ही होता है, इसलिए इस अपेक्षासे स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। मात्र मिथ्यात्वका अवतव्यपद छठे नरक तकके नारकियोके मारणान्तिक समुद्धा के समय भी सम्भव है, इसलिए इसके इस पदके बन्धक जीवौंका स्पर्शन अलगसे सनालीके कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। अब रहीं दो आयु आदि प्रकृतिवॉ सो इनमेसे दो आयुका बन्ध तो मारणान्तिक समुद्भात और उपपाइपदके समय होता ही नहीं। शेष चार प्रकृतियोंके तीन पदोका वन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय भी हो सकता है,पर वह मनुष्योमे मारणान्तिक समुद्भातके समय ही सम्भव है । तथा इनके अवक्तव्य पदका बन्ध ऐसे समय भी सम्भव नहीं है, इसलिए इनके सब पदोंके बन्धक जीवोंका पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। प्रथमादि सब नरकोमे अपना- अपना स्पर्शन जानकर वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए।
भुजगारवधे फोसणाणुगमो १७६. तिरिक्खेसु धुविगाणं तिण्णिपदा सबलोगो। थीणगि०३-मिच्छ०- अट्ठक-ओरालि० तिण्णिपदा सव्वलो । अवत्त० खेत्तभंगो। णवरि मिच्छ० अवत्त० सत्तचौह ० । सेसाणं पगदीणं ओघं । १७७. पंचिंदितिरिक्स०३ धुपियाणं भुज०-अप्प०-अवढि० लोगस्स असंखें सब्बलोथीणगि०३-अट्ठक ०-णव॒स०-तिरिक्ख०-एइंदि०-ओरालि०-हुंड-तिरिक्खाणु०- पर०-उस्सा०-थावर-सुहुम-पज्जत्तापजत्त - पत्तेय-साधारण-भग - अणादेज - णीचा० तिण्णिपदा लोग० असंखें सबलो० । अवत्त० खेत्तभंगो। सादामाद०-चदुणोक०- ० १७६ तिर्यञ्चामे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पदोके बन्धक जीवोने सर्व लोकका स्पर्शन किया है । स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, आठ कपाय और औदारिक शरीरके तीन पदोके वन्धक जीवोने सब लोकका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेष प्रकृतियोका भग आपके समान है। विशेषार्थ-तिर्यश्चोमे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, आठ कपाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तराय इन ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पद एकेन्द्रिय आदि जीवोंके भी होते हैं और वे सब लोकमे पाये जाते हैं, इसलिए इनके उक्त पदोंके वन्धक जीवोंका सर्व लोक स्पर्शन कहा है। स्त्यानगृद्वि तीन आदिके तीन पदोंके वन्धक जीवोका सर्व लोकप्रमाण पर्शन इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र इनका अवक्तव्यपद इनके अवन्धक होकर पुन. बन्ध करते समय होता है, ऐसे तिर्यञ्चाका सर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही प्राप्त होता है और क्षेत्र भी इतना ही है, इसलिए वह क्षेत्रके समान कहा है। मात्र मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद ऐसे तिर्यञ्चोंके भी सम्भव है जो ऊपर एकेन्द्रियोंमें भारणान्तिक समुद्धात कर रहे हैं, इसलिए इसके अवक्तव्यपढ़के बन्धक जीवाका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । अब रहीं शेष प्रकृतियों सो उनके सम्भव पदोके बन्धक जीवोंका स्पर्शन ओधमे जिस प्रकार कहा है,उस प्रकार यहाँ पर भी घटित हो जाता है, इसलिए इसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है । वे प्रकृतियाँ ये है- दो वेदनीय, सात नोकपाय, चार आयु, चार गति, पाँच जाति, वैक्रियिकशरीर, छह सस्थान, दो आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, चार आनुपूर्वी, परघात, उच्छ्रास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, बस आदि दस युगल और दो गोत्र । १७७ पञ्चेन्द्रियतिर्यचत्रिकमे प्रववन्धवाली प्रकृतियाके भुजगार, अल्पतर और अव- स्थितपदके बन्धक जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्यानगृद्धित्रिक, आठ कपाय, नपुंसकवेद, तिर्यनगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, हुण्ड- संस्थान, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, परघात, उच्छास, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, दुर्भग, अनान्य और नीचगोत्रके तीन पदोके बन्धक जीवाने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका सर्शन क्षेत्रके समान है। सातावेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकपाय, स्थिर, अस्थिर, शुभ और अशुभ १ ता० आ० प्रत्यो 'थीणगि०३ मि-अटर०' इति पाट ।
महावं पदेसबंधाहियारे धिराथिर-सुभासुभ० सव्यपदा लोगस्स असंखें सव्वलो० 1 मिच्छ० तिण्णिपदा णसंग- भंगो । अवत्त० सत्तचों । इत्थि० तिण्णिपदा दिवटचों । अवत्त० खेत्तमंगो। पुरिस०- दोगदि०-समचद्०-दोआणु०-दोविहा०-मुभग०-दोसर-आउँ०-उच्चा० तिण्णपदा छच्चों । अवत्त० खेत्तभंगो। चदुआउ०-मणुसग०-तिण्णिजादि-चदुसंठा०-ओरालि०अंगो०-छस्संघ०- मणुसाणु०-आदाव० सय्यपदा खेतमंगो। पंचिंदि०-वेउवि०-वेउब्धि अंगो-तस० तिष्णिपदा चारह० । अवन० खेतमंगो। उजो०-जस० सव्वपदा सत्तचों पादर० तिष्णिपदा तेरह० । अवत्त० खेत्तभंगो । अजस० तिण्णिपदा लोग० असंखें. सबलो। अवत्त० सत्तचों। . फे मब पदोंके बन्धक जीवोंने लोक असंख्यातवं भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मिथ्यात्व के तीन पदोके बन्धक जीयांका भन्न नपुंसकवेदके समान है। तथा इसके अग्रफच्यपदके बन्धक जीवांने उसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । लीवेटके तीन पदोके बन्धक जीवाने मनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा उसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीयोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। पुरपयेट. दो गति, समचतुग्ममग्थान, दो आनुपूर्वी, दो विहायोगति, सुभग, दो स्वर, आदेय और उचगानके तीन पदीका बन्धक जीवाने असनालीके युद्ध कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपटक बन्धक जीवांका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। चार आयु, मनुष्यगनि, तीन जाति, चार संस्थान, औदारिकशगैर आद्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और आनपके सब पढोके बन्धक जीयाका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। पञ्चेन्द्रियजाति वैनियिकशरीर, क्रियिकगगैर आगीपाद और उसके तीन पदोके बन्धक जीवोने सनालीके कुल कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवांका स्पर्शन क्षेत्रके ममान है। ज्योत और यश कीर्तिके सब पदोके वन्धक जीवांने त्रसनालीके कुछ कम मात घटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। बादरके तीन पदोके बन्धक जीवाने वसनालीके कुछ कम तेरह बेटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। अयश कीर्तिके तीन पदोंके बन्धक जीवाने लोकके असंख्यातवं भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्य- पटके बन्धक जीवाने बसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेपार्थ-पञ्चेन्द्रियतिर्यश्चत्रिकका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण होनेसे इनमें प्रवन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पटाके बन्धक जीयाका स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है। ध्रुववन्धवाली प्रकृतियाँ ये हैं-पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, अन्तको आठ कपाय, भय, जुगुप्सा, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरु लघु, उपयात, निर्माण और पॉच अन्तराय । त्यानगृद्धित्रिक आदिके तीन पदोंके बन्धक जीवोंका स्पर्शन भी उक्त प्रकारसे लोकके असंख्यात भाग और सर्व लोकप्रमाण घटित कर लेना चाहिए। इनका अवक्तव्यपद मारणान्तिक समुद्धात और उपपाद पदके समय सम्भव न होनेसे इसकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। सातवेदनीय आदिके चारो पद मारणान्तिक समुद्धात और उपपादपदके समय भी सम्भव हैं, इसलिए इनके चारों पदोके बन्धक जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण कहा है। मिथ्यात्वके तीन पदोके बन्धक जीवोंका स्पर्शन इसीप्रकार घटित कर लेना चाहिए। तथा इसका अवकन्यपद उपर कुछ कम सात राजूप्रमाण भुजगारबधे फोसणाणुगमो १७८, पंचिंदि तिरिक्खअप० धुवियाण सव्वपदा लोग० असंखें सव्वलो। साटासाददंडओ पंचिंदि तिरिभंगो । णस० [तिरिक्ख-एइंदि०-हुंड-तिरिक्खाणु०- पर०-उस्सा०-थावर-सुहुम-पजत्तापजत्त-पत्ते-साधा०-दृभग-अणा-णीचा० ] तिण्णिपदा लोगस्स असंखें सवलो० । अवत्त० खेतभंगो। उजो०-जसगि० सव्वपदा सत्तचों । -- --- क्षेत्रका सर्शन करते समय सम्भव होनेसे यह उक्त प्रमाग कहा है। आगे अवश कार्तिके चारी पदोंकी अपेक्षा जो मशन कहा है वह मिथ्यात्वके समान ही है, अत उसे भी इसीप्रकार घटित कर लेना चाहिए। देवियोमे मारणान्तिक समुहातके समय भी स्त्रीवेदके तीन पदीका बन्ध होता है, इसलिए इसके तीन पदोंके बन्धक जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भाग- प्रमाण कहा है। पर ऐसी अवस्थामै इसका अवक्तव्यपद नही होता, इसलिए इसके अवक्तव्य- पदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। नारकियोमे मारणान्तिक समुदानके समय नरकगति. नरकगत्यानुपूर्वी, अप्रशस्त विहायोगति और दु स्वरके तीन पद ओर देवोमे मारणान्तिक समुद्भातके समय पुरुपवेद, देवगति, समचतुरस्रसंस्थान, देवगत्यानुपूर्वी, प्रशस्त विहायोगति, सुभन, सुम्बर, आदेय और उचगोत्रके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके उक्त पदोके वन्धक जीवोका सर्शन सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। पर ऐसी अवस्थामे इनका अवक्तव्यपद नहीं होता, अतः इनके इस पदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। चार आयुआके सब पद और इस दण्डककी शेष प्रकृतियोका अवक्तव्यपद मारणान्तिक समु- द्वातके समय नहीं होते । यद्यपि शेष प्रकृतियोंके तीन पट मारणान्तिक समुद्भातके समय भी होते हैं,पर जिन जीवोसम्बन्धी ये प्रकृतियाँ हैं, उनका स्पर्शन ही लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, इसलिये इन प्रकृतियोके सब पदोके वन्धक जीवीका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। नारकियो और देवोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी पञ्चेन्द्रियजाति आदि चार प्रकृतियोंके तीन पदोका बन्ध होता है, अत इनके उक्त पदोके बन्धक जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। पर इनका अवक्तव्यपद ऐसे समयमै नहीं होता, अत इनके अव- तन्यपदके वन्धक जीवीका स्पशन क्षेत्रके समान कहा है। ऊपरके एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी उद्योत और यश कीर्तिके सब पदोका वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके सब पदोंके वन्धक जीवोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। अपर सात और नीचे छह इसप्रकार कुछ कम तेरह राजुका स्पर्शन करते समय वादर प्रकृतिके तीन पदो का बन्ध सम्भव है, इसलिए इसके तीन पदोके बन्धक जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । पर मारणान्तिक समुद्भातके समय इसका अवक्तव्यपद नही होता. इसलिए इसकी अपेक्षा सर्शन क्षेत्रके समान कहा है। १७८, पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्यामकोमे ध्रुवबन्धवाली सव प्रकृतियोंके सब पदोके बन्धक जीवोने लोकके असह्यात भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। साता- वेदनीय-असातावेदनीयदण्डकका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोके समान है। नपुसकवेद, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, हुण्डसस्थान, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी, परघात, उच्छ्रास, स्थावर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, दुर्भग, अनादेय और नीचगोत्रके तीन पदोके बन्धक जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। ज्योत और यश कीर्तिके सब पढ़ोके वन्धक जीवोने वसनालोके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वाटर प्रकृतिके तीन ..
HAPPA १६० महावंधे पदेसर्वधाहियारे वादर० तिण्णिपदा सत्तचौ० । अवत्त० बँत्तभंगो। [अजस० तिण्णिप० लो० असंखें. सबलो 0 | अवत्त० सत्तचो. 1] सेसाणं सव्वपदा खेत्तभंगो। एवं सन्वअपजत्तगाणं विगलिंदिय-वादरपुढवि०-आउ०-तेउ०-चाउ०- वादरपत्तयपजत्तगाणं च । [णवरि तेउ०- वाऊणं मणुसगदिचदुकं वज । वाऊणं जम्हि लोग० असंखेंज० तम्हि लोग० संखेंज० ] पदोके वन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्यपढ़के बन्धक जीवीका सर्शन क्षेत्रके समान है। अयश कीर्तिके तीन पदोके वन्धक जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। शेप प्रकृतियोंके सब पदोके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। इस प्रकार सब अपर्याप्त, बिकलेन्द्रिय, वादरपृथिवी- कायिक पर्याप्त, बादर जलकायिक पर्याप्त, वादर अग्निकायिक पर्याप्त, वादर वायुकायिक पर्याप्त और वादर प्रत्येक वनस्पतिकायिक पर्याप्त जीवोमे जानना चाहिए। इतनी विशेपता है कि अग्नि- कायिक और वायुकायिक जीवोंमें मनुष्यगतिचतुष्कको छोड़कर कहना चाहिए। तथा पूर्वमें जहाँ लोकके असख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन कहा है वहाँ वायुकायिक जीवोमे लोकके संख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहना चाहिए। विशेषार्थ-पन्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकाका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण वतलाया है । इस सब स्पर्शनके समय इनके ध्रुववन्धिनी प्रकृतियोंके तीन पद और सातावेदनीयदण्डकके चार पढ सम्भव होनेसे इस अपेक्षा यह स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है। ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियाँ ये हैं-पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचनुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तराय । साता-असातावेदनीय दण्डककी प्रकृतियों ये हैं-दो वेदनीय, चार नोकपाय, स्थिर, अस्थिर, शुभ और अशुभ | अन्य जिन प्रकृतियोके जिन पदोके बन्धक जीवोका यह स्पर्शन कहा है,वह इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए, अतः आगे इसे छोड़कर शेषका स्पष्टीकरण करते हैं । नपुंसकवेद आदिका अवक्तव्यबन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय नहीं होता, इसलिए इनके इस पदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। ऊपर एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्धातके समय उद्योत और यश कीर्तिके सव पदोका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके सब पदोंके वन्धक जीवीका पशन सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। बादर प्रकृतिके तीन पदोंके बन्धक जीवीका भी यही स्पर्शन कहा है सो उसका कारण भी इसी प्रकार जानना चाहिए । तथा इसका अवक्तव्यपद मारणान्तिक समुद्रातके समय नहीं होता, इसलिए इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । ऊपर एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय अयश कीतिका अवक्तव्यपट भी सम्भव है, इसलिए इसका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । अब रही शेप स्त्रीवेद, पुरुपवेद, दो आयु, मनुष्यगति, चार जाति, पाँच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर, आडेय और उच्चगोत्र सो एक तो आयुकर्मका मारणान्तिक समुद्धातके समय बन्ध नहीं होता, दूसरे शेष प्रकृतियोंका यद्यपि मारणान्तिक समुद्धातके समय वन्ध होता है, फिर भी जिन जीवो सम्बन्धी ये प्रकृतियाँ हैं उनमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकोके मारणान्तिक समुद्धात करनेपर स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही " १ताप्रती 'सेसाण सम्वपढाण सन्वपदा' इति पाठ. ।
भुजगारवंधे फोसणाणुगमो १६१ १७६. मणुसेसु पंचिंदियतिरिक्खभंगो । णवरि णिरयगदि-देवगदिसंजुत्ताणं रज्जू ण लभदि । .१८०. देवेसु धुरियाणं सव्वपदा अट्ठ-णव० 1 थीणगि०३-अणंताणु०४-णस०- तिरिक्स०-एइंदि०-हुंड०-तिरिक्वाणु०-थावर-दूभग-अणार्दै०-णीचा० तिण्णिपदा अट्ट- णव० । अवत्त ० अट्ठचों । सादादिदस०-उज्जो०-जस०-अजस-मिच्छ० सयपदा अह-णव० । सेसाणं सव्वपदा अट्टचौँ । एवं अप्पप्पणो फोसणं णेदव्वं । - प्राप्त होता है और इनका क्षेत्र भी इतना ही है, इसलिए इनके सब पदोके वन्धक जीवोका पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । यहाँ सब अपर्याप्त आदि अन्य जितनी मार्गणाएँ कही हैं उनमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यच अपर्याप्तकोके समान स्पर्शन वन जाता है, इसलिए उनमे इनके समान स्पर्शनके जाननेकी सूचना की है। मात्र अग्निकायिक और वायुकायिक जीवमि मनुष्यगतिचतुष्कका वन्य नहीं होता, इसलिए इनमे इन चार प्रकृतियोंके वन्धका निपेध किया है । तथा वायुकायिक पर्याप्त जीवामे स्पर्शन लोकके संख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे इनमे लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शनके स्थानमे उक्त प्रमाण स्पर्शन करना चाहिए । १७६. तीन प्रकारके मनुष्योमे पञ्चेन्द्रिय तियञ्चोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमे नरकगति और देवगति संयुक्त प्रकृतियोका स्पर्शन रज्जुओमे नहीं प्राप्त होता । विशेषार्थ-पहले पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोमे स्पर्शन बतला आये है । तीन प्रकारके मनुष्योमें यह स्पर्शन अविकल वटित हो जाता है, इसलिए इनमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोके समान स्पर्शन जाननेको सूचना की है । पर मनुष्यत्रिकमे नरकगति और देवगतिसंयुक्त नामकर्मकी जितनी प्रकृतियों बंधती हैं उनके सब पदोके वन्धक जीवोका पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ही प्राप्त होता है, क्योकि इन तीन प्रकारके मनुष्योके नारकियो और देवोमे मारणान्तिक समुद्धात करनेपर भी उस समय प्राप्त हुआ सब स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ही होता है, इसलिए यहाँ नरकगति और देवगतिसंयुक्त प्रकृतियोका सव पदोकी अपेक्षा स्पर्शन राजुमओमें नहीं प्राप्त होता है ,ऐसा कहा है। १८०. देवाम ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके सत्र पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्यानगृद्धित्रिक, अनन्तानु- बन्धीचतुष्क, नपुसकवेद, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, हुण्डसंस्थान, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, स्थावर, दुर्भग, अनाव और नीचगोत्रके तीन पदोके वन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम ना बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सातावेदनीय आदि दस नथा ज्योत, यश कीर्ति, अयश कीर्ति और मिथ्यात्वके सब पदोंके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेप प्रकृतियोंके सब पदोके वन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार सब देवामे अपना-अपना स्पर्शन जानना चाहिए। विशेषार्थ देवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण है । ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके सब पदोकी अपेक्षा, स्त्यानगृद्धि आदिके तीन पदोकी अपेक्षा और सातावेदनीय आदिके सब पदोकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अत यह उक्त , " महापंधे पडेसबंधाहियारे १८१. एई दिय-पंचकायाणं खेत्तभंगो। १८२. पंचिंदि०-तस०२ पंचणा०-छदसणा-अट्ठकसा०-भय-दुगु-तेजा०-क०- वण्ण०४-अगु०४-पजत्तं-पत्ते-णिमि०-पंचंत० भुज०-अप्प०-अवढि अठ्ठचों सब्बलो० । प्रमाण कहा है । मात्र स्त्यानगृद्धि आदिका अवक्तव्यपद् एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्भातके समय सम्भव न होनेसे इसकी अपेक्षा स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण • कहा है । यहाँ सातावेदनीय आदि दस प्रकृतियों ये हैं-दो वेदनीय, चार नाकपाय, स्थिर, अस्थिर, शुभ और अशुभ । अब शेप रही स्त्रीवेद, पुरुषवेद, दो आयु, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रियजाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीरआनोपान, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, दो बिहायो- गति, त्रस, सुभग, दो स्वर, आदेय, तीर्थदर और उच्चगोत्र सो इनका एकेन्द्रियामै मारणान्तिक समुद्भात करते समय वन्ध नहीं होता,पर देवोंके विहारवल्वस्थानके समय वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके सब पढोकी अपेक्षा सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। अलग-अलग देवार्म अपना-अपना स्पर्शन जानकर इस विधिसे सब प्रकृतियांके यथा- सम्भव पदोका स्पर्शन ले आना चाहिए । १८१. एकेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवोमे क्षेत्रके समान भङ्ग है। विशेपार्थ-यहॉ एकेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिको क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है। विशेष खुलासा इस प्रकार है - एकेन्द्रिय, पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक तथा इनके चादर और बादर अपर्याप्त, वाटर प्रत्येक वनस्पतिकायिक और इनके अपर्याप्त सब वनस्पतिकायिक और निगोद तथा सब सूक्ष्म इनमे सब प्रकृतियोंके सम्भव पदोको अपेक्षा स्पर्शन और क्षेत्रम अन्तर नहीं है, इसलिए उसे क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र कुछ प्रकृतियोके स्पर्शनमें फरक है । उसे यहाँ यद्यपि मूलमे नहीं कहा है, फिर भी विशेष रूपसे जान लेना चाहिए । यथा-मनुष्यायुके सब पढोके बन्धक जीव थोड़े होते हैं, इसलिए इसके सब पदोकी अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण जानना चाहिए। उद्योत और यश कीर्तिके सब पद तथा बादरके भुजगार आदि तीन पद ऊपर वादर एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए यह स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भाग- प्रमाण जानना चाहिए। किन्तु बादरका अवक्तव्यपद ऐसे समयमै सम्भव नहीं है, इसलिए इसके इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण जानना चाहिए। अयश कीर्तिके तीन पद सब अवस्थाओमे सम्भव हैं, इसलिए इसके इन पढोकी अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन जानना चाहिए । पर इसके अवक्तव्यपदका वर्तमान स्पर्शन लोकके असल्यातवे भागप्रमाण है। फिर भी ये जीव जब ऊपर बादर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात करते हैं, तब भी इसका अवक्तव्यपद होता है, इसलिए इस अपेक्षासे इसका भी स्पर्शन सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण जानना चाहिए। १८२, पञ्चेन्द्रियद्विक और त्रसद्विक जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, आठ कपाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुप्क, अगुरुलघुचतुष्क, पर्याप्त, प्रत्येक, निर्माण और पॉच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदके बन्धक जीवाने बसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके १आप्रती 'वण्ण ४ पजत्त' इति पाठः।
. भुजगारवधे फोसणाणुगमो १६३ अवत्त० खेंचभंगो। थीणगि०३-अणंताणु०४-णस-तिरिक्ख०-एइंदि०-हुंड-तिरि- क्खाणु०-थावर-दूभग-अणार्दै०-णीचा० भुज०-अप्प०-अवढि० अट्ठचों. सव्वलो० । अवत्त० अडचौ । सादासाद०-चदुणोक०-थिराथिर-सुभासुभ० सव्वपदा अट्ठों सन्चलो। मिच्छ. तिण्णिपदा अडचों सव्वलो | अवत्त० अट्ठ-बारह० । अपच्च- क्खाण०४ तिण्णिपदा अट्ट० सव्वलो० । अवत्त० छचों । इत्थि०-पुरिस०-पंचिंदि०- पंचसंठा०-ओरालि अंगो०-छस्संव०-दोविहा०-तस-सुभग-सुस्सर-दुस्सर-आर्दै तिण्णि- पदा अहवारह० । अवत्त० अट्ठचौँ । दोआउ०-तिण्णिजादि-आहारदुगं सब्बपदा खेत- भंगो । दोआउ०-मणुस-मणुसाणु ०-आदाव०-उच्चा० सव्वपदा अट्ठों। [णिरयगदि-- देवगदि-दोआणु० तिण्णिपदा छच्चौं अवत्त० खेत्तः । ओरालि० तिण्णिप० अडचों सबलो० । अवत० बारह० । वेउन्वि०-वेउन्वि०अंगो० तिण्णिपदा बारहों। : अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका पर्शन क्षेत्रके समान है। स्त्यानगृद्धित्रिक, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यश्चगति, एकेन्द्रियजाति, हुण्डसंस्थान, तिर्यश्चगत्यातुपूर्वी, स्थावर, दुर्भग, अनादेय और नीचगोत्रके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवाने वसनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। साता- वेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकपाय, स्थिर, अस्थिर, शुभ और अशुभके सब पदोके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मिथ्यात्वके तीन पदोंके वन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग- प्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवाने सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है । अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके तीन पदोके वन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और सर्वलोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके भवक्तव्यपदके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वीवेद, पुरुषवेद, पन्वेन्द्रियजाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो विहायोगति, स. सुभग, सुखर, दुस्वर और आदेयके तीन पदोके बन्धक जीवाने वसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धन जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। दो आयु, तीन जाति और आहारकद्विकके सब पदोके बन्धक जीवाका सर्शन क्षेत्रके समान है। दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप और उच्चगोत्रके सब पदोके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आट वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। नरकगति, देवगति और दो आनुपूर्वीक तीन पदोके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। औद्मारिकशरीरके तीन पदाके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकत्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम वारह बटे चौदह भागप्रमाण , . १ त प्रतौ तिगिपदा० " "चो. सच्चो०' इति पाठ २ आ प्रती 'सुत्सर-आटे०' इति पाठ. | महाबंधे पदेसवंधाहियारे अवत्त० खेत० । वादर-उजो०-जस० सव्वपदा अट्ठ-तेरह । णवरि बादर० अवत्त० खेत्तभंगो। सुहुम-अपजत्त-साधार० तिण्णिपदा लोग० असंखें सव्वलो० । अवत्त० खेंत्तभंगो । [ अजसतिण्णिपदा अट्ठचौँ सवलो० । अवत्त० अह-तेरह० । ] तित्थ. तिण्णिपदा अट्टचों । अवत्त० खेत्तमंगो। एवं पंचिंदियभंगो पंचमण-पंचवचि०- चक्खु०-सण्णि त्ति । कायजोगि-अचखु०-भवसि०-आहार० ओघ । क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गके तीन पदोके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। बादर, उद्योत और यश-कीर्तिके सब पदोके बन्धक जीवोने बसनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भाग- प्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि बादरके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणके तीन पदोके बन्धक जीवोने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। अयश कीर्तिके तीन पदोके बन्धक जीवोने वसनालीके कुछ कम आठ और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीर्थङ्कर प्रकृतिके तीन पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । इस प्रकार पञ्चेन्द्रियोंके समान पॉच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, चक्षुदर्शनवाले और संज्ञी जीवोमे जानना चाहिए । काययोगी, अचक्षुदर्शनी, भव्य और आहारक जीवोमे ओघके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-पञ्चेन्द्रियद्विक जीवोका स्पर्शन स्वस्थानविहार आदिकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह राजु और मारणान्तिक पदको अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण है, इसलिए इनमे पाँच ज्ञानावरणादिके भुजगार आदि तीन पदोकी अपेक्षा उक्त प्रमाण स्पर्शन कहा है,क्योकि इन जीवोमे उक्त प्रकृतियोंके ये तीन पद सब अवस्थाओमे सम्भव है । मात्र इनमे इन प्रकृतियोके अवक्तव्यपदका स्वामित्व ओघके समान होनेसे इस पदवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। स्त्यानगृद्धि आदिके तीन पदोकी अपेक्षा सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण म्पर्शन पॉच ज्ञानावरणके समान ही घटित कर लेना चाहिए। तथा इनका अवक्तव्य पद देवामे स्वस्थान विहार आदिके समय भी सम्भव है, इसलिए इनके इस पदवाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। सातावेदनीय आदिके चारो पद विहारादिके समय और मारणान्तिक समुद्धातके समय सम्भव हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। मिथ्यात्वके तीन पदोकी अपेक्षा उक्त स्पर्शन इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । तथा इसका अवक्तव्यपद देवोमे विहारादिके समय और नीचे कुछ कम पॉच और अपर कुछ कम सात राजूके सर्शनके समय भी सम्भव है, इसलिए इसके इस पदकी अपेक्षा सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके तीन पदोकी अपेक्षा त्रसनालोके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन पॉच ज्ञानावरणके समान ही घटित कर लेना चाहिए । तथा आगे भी जिन प्रकृतियोंके उक्त पदोका यह स्पर्शन कहा है वह भी इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। तथा जो संयतासंयत भुजगारवंवे फोसणाणुगमो १६५ आदि मर कर देवोमें उत्पन्न होते है,उनके भी प्रथम समयमे इनका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए इस अपेक्षासे इनके अवक्तव्य पवालोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । देवोमें विहार आदिके समय और नारकियो व देवोके तिर्यञ्चो व मनुष्यों में मारणान्तिक समुद्रातके समय स्त्रीवेद आदि प्रकृतियोंके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके इन तीन पवाले जीवोंका सर्शन सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाग कहा है । तथा इनका अवक्तव्यरद देवोके विहारादिके समय भी सम्भव है, इसलिए इनके इस पड़वाले जीवोंका पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। दो आयु आदिके सब पढ़वालीका स्पर्शन क्षेत्रके समान है,वह स्पष्ट ही है। शेष दो आयु और मनुष्यगति भादिके सत्र पद देवाम विहारादिके समय भी सम्भव हैं, इसलिए इनके सब पवालोका सर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाग कहा है। तिर्यञ्चो और मनुष्योंके नारकियोंमे मारणान्तिक समुद्धातके समय भी नरकगतिद्विकके तीन पद और देवोमे मारणान्तिक समुद्रात करते समय भी देवगतिद्विकके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके तीन पदवालोंका सर्शन सनालोके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । मात्र ऐसे समयमै इन प्रकृतियोंका अवतन्यपद नहीं होता, इसलिए इनके इस पदद्वाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । देवोमे बिहारादिके समय और एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्घातके समय औदारिकशरीरके तीन पद सम्भव है, इसलिए इसके तीन पवाले जीवाका सर्शन सनालीके कुछ कम आठ वट चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है । तथा इसका अवक्तव्यपद नारकियों और देवोके प्रथम समयमे भी सम्भव है, इसलिए इसके इस पदवाले जीवोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम बारह वटे चौवह भागप्रमाण कहा है । मनुध्या और तिर्यञ्चोके नारकिया और देवास मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी बैंक्रियिकद्विकके तीन सन्भव हैं, इसलिए इनके इन पदाले जीवोका सर्शन त्रसनालीके कुछ कम वारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। पर ऐसे समयमै इनका अवक्तव्यपद सम्भव न होनेसे इस अपेक्षासे स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। बाहर आदिके सब पद्धोका स्पर्शन देवोके विहारादिके समय और नीचे कुछ कम छह राजू व कार कुछ कम सात राजूप्रमाग स्पर्शनके समय भी सम्भव होनेसे इनके सब पढ़वालोका सर्शन सनालीके कुछ कम आठ व कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । मात्र वादर प्रकृतिका प्रवक्तव्यपद एक तो मारणान्तिक समुद्रातके समय नहीं होता । दूसरे इसे करनेवाले जीव अल्प है, इसलिए इनके इस पवाले जीवोका लर्शन क्षेत्रके समान कहा है । सूक्ष्म आदिके तीन पद्वालोका वर्तमान सर्शन लोकक असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत सर्शन सर्व लोकामाग.प्राम होनेसे यह उत्तप्रमाण न्हा है । तथा इनका अवक्तव्यपद मारणान्तिक समुद्रात भादिके समय नहीं होता, इसलिए इनके इस पवालोका पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। अयश:- कौतिक तीन पनवालाका सर्शनजोनसनालीके कुछ कम आठ वटें चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है सो इसे जानावरणके समान घटितकर लेना चाहिए तथा इसके अवक्तव्य पटवाले जीवांका म्पर्शन त्रसनालीछकम आठ और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण यश कीर्तिकेसमान घटित कर लेना चाहिए । तीर्थङ्करप्रकृतिले तीन पद देवांके विहारादिकेसमय भी सम्भव है, इसलिए इसके इन पदवाले जीवों का सर्शन घसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। तथा ऐसे समय इसका अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, इसलिए इसके अवक्तव्यपवाले जीवो का सर्शन क्षेत्रके समान कहा है । यहाँ पाँच मनायोगी आदि अन्य जितनी मार्गणाएं गिनाई है उनमे यह सर्शन भविकल बन जाता है, इसलिए उनमें पञ्चेन्द्रियों के समान इसके जाननेकी सूचना की है। तथा काग्चोगी आदि मार्गणाओं मे ओवप्रहाणा घटित हो जाती है, इसलिए उनमे ओघक समान जानने की सूचना की है।
१६६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे १८३. ओरा०का० ओघं। णवरि थीण०३-अट्ठक०-ओरालि० अवत्त० खैत्तभंगो। मिच्छ० अवत्त० सत्तचों। अपच्चक्खाण०४ अवत्त० मणुसाउ' तित्थगरादीणं रज्जू णस्थि । ---- ---- -211 .... १८३. औदारिककाययोगी जीवों मे ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि स्त्यानगृद्धित्रिक, आठ कपाय और औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवों का स्पर्शन क्षेत्रके समान है। मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवों ने प्रसनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथाअप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवों का तथा मनुष्यायु और तीर्थकर आदिके सब पदों के बन्धक जीवों का स्पशन राजुओं मे नहीं प्राप्त होता । विशेषार्थ—यहाँ समान्यसे औदारिककाययोगी जीवों मे सब प्रकृतियो का भङ्ग ओघके समान जाननेकी सूचना की है और यह सम्भव भी है, क्योंकि यह योग एकेन्द्रिय आदि जीवों के भी यथासम्भव पाया जाता है । मात्र कुछ ऐसी प्रकृतियाँ हैं जिनके विवक्षित पदवाले जीवों का स्पर्शन ओघके अनुसार घटित नही होता, इसलिए उसे अलगसे सूचित किया है । यर्था--ओधमे स्त्यानगृद्धित्रिक और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके अवक्तव्यपदवालों का स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । जो देवों के विहारादिके समय होता है । तथा औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदवालों का स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है जो नारकियों और देवों के उपपादपदके समय होता है। किन्तु इस स्पर्शन कालमे औदारिककाययोग सम्भव नहीं है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियों के अवक्तव्य पदवाले जीवों का स्पर्शन क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है । प्रत्याख्यानावरण चतुष्कके अवक्तव्य- पदवाले जीवोका स्पर्शन ओघसे भी क्षेत्रके समान है, इसलिए उससे इस विपयमे यहाँ कोई विशेपता नहीं है। हॉ यह स्पर्शन यहाँ उपपादपदके समय नहीं प्राप्त करना चाहिए, इतनी विशेपता अवश्य है । यही कारण है कि इसका भी यहाँ विशेपरूपसे उल्लेख किया है । ओघसे मिथ्यात्वके अवक्तव्य पदवाले जीवों का स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। किन्तु उसमेसे यहाँ सनालीके कुछ कम सात वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन ही प्राप्त होता है, क्योंकि औदारिककाययोगी जीव उपर कुछ कम सात राजूप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन करते समय ही मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद कर सकते है, पूर्वोक्त अन्य स्पर्शनके समय नहीं। इसलिए मिथ्यात्वके अवक्तव्य पदवाले जीवो के स्पर्शनमे ओघसे फरक होनेके कारण यह भी अलगसे कहा है । ओघसे अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके अवक्तव्य पदवाले जीवों का स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण घटित करके बतलाया है,पर यह स्पर्शन भी यहाँ सम्भव नहीं है, क्यो कि जो संयतासयत आदि मनुष्य और संयतासंयत तिर्यच असंयत होकर उसी पर्यायमे इनका अवक्तव्यपद करते हैं उनका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाणसे अधिक नहीं प्राप्त होता, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्यपद्का स्पर्शन राजुओं मे नहीं प्राप्त होता यह सूचना की है । ओघसे मनुष्यायुके सब पवाले जीवों का स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ बढ़े चौदह भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण कहा है। सो इसमेसे सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन तो यहाँ भी बन जाता है, क्योंकि एकेन्द्रियों के औदारिककाययोग भी होता है । पर दूसरा स्पर्शन यहाँ सम्भव नहीं है । हो, उसके स्थानमे यहाँ लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन अवश्य सम्भव है, इसलिए उक्त स्पर्शनका निषेध करनेके लिए मनुष्यायुके सव पदवालों का १ ता० प्रतौ 'अवत्त० (१) मणुसाउ०' इति पाठः ।
भुजगारबंधे फोसणाणुगमो १६७ १८४. ओरालि मि०-आहार-आहारमि०-अवगदवे०-मणपज (०-संजद-सामाइ०- छेदो०-परिहार०सुहुमसं० खेत्तभंगो। १८५. वेउब्वियका० पंचणा०-णवदंसणा०-सोलसक-भय-दुगुणवुस-] तिरिक्ख०-ओरालि०-तेजा-क०-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०४-बादर-पजत्त-पत्ते०- दूभग-अणार्दै-णिमि०-णीचा०-पंचंत० तिण्णिपदा अट्ट-तेरहः । अवत्त० अट्ठचों । सादासाद०-चदुणोक० उञ्जो०-थिरादितिण्णियुग सव्वपदा अट्ट-तेरह ० । मिच्छ० तिण्णिपदा अट्ठ-तेरह । अवत्त० अट्ठ-बारह । इत्थि० -पुरिस०-पंचिंदि०-पंचसंठा०-ओरालि०अंगो छस्संघ०-दोविहा०-तस-सुभग-दोसर-आर्दै तिण्णिपदा अट्ठ-बारह० । अवत्त० अट्टचों । दोआउ-मणुस०-मणुसाणु०-आदाव०-उच्चा० सन्चपदा अट्ठचों । एइंदि०-थावर० स्पर्शन राजुओ मे नहीं प्राप्त होता, यह कहा है। इसी प्रकार तीर्थकर प्रकृतिके तीन पदवाले जीवोका स्पर्शन भी यहाँ त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण सम्भव नहीं है, इस वातका ज्ञान करानेके लिए यहाँ इसके सब पदवाले जीवों का स्पर्शन राजुओं में नहीं प्राप्त होता, यह सूचना की है। इसी प्रकार अन्य जो विशेषता सम्भव हो वह घटित कर लेनी चाहिए । १८४. औदारिकमिश्रकाययोगी, आहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, अपगतवेद- वाले, मन पर्ययज्ञानी, सयत, सामायिकसयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत और सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवोंमे क्षेत्रके समान भङ्ग है। विशेपार्थ-इन मार्गणाओंमे जिन प्रकृतियोके जिन पदोकी अपेक्षा जो क्षेत्र कहा है, सामान्यसे वह यहाँ भी बन जाता है, इसलिए इनमे क्षेत्रके समान स्पर्शन जाननेकी सूचना की है। १८५. वैक्रियिककाययोगी जीवामें पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, नपुंसकवेद, तिर्यश्चात, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्ण, चतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, दुर्भग, अनादेय, निर्माण, नीच- गोत्र और पॉचअन्तरायके तीन पदोंके वन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सातावेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकषाय, उद्योत और स्थिर आदि तीन युगलके सब पदोके बन्धक जीवोने जसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मिथ्यात्वके तीन पदोके वन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, पन्चेन्द्रियजाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर और आदेयके तीन पदोके वन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानु- पूर्वी, आतप और उच्चगोत्रके सब पदांके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। एकेन्द्रियजाति और स्थावरके तीन पदोंके बन्धक जीवोने १ ता प्रतौ 'थिगदितिण्णिउ (यु) सन्वपदा' इति पाठ.1 २ ता प्रतौ 'अठतेर० अहबारह०' इति पाठः। , १६. महाबंधे पदेसबंधाहियारे तिण्णिपदा अढ-णव० । अवत्त० अट्ठचौँ । तित्थ० तिण्णिपदा अट्ठचों । अवत्तः खेत्तभंगो। १८६. कम्मइ० धुविगाणं भुज० सब्बलो० । सेसाणं भुज०-अवत्त० सव्वलो। सनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवाने सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीर्थद्वरप्रकृतिके तीन पटाके बन्धक जीवाने सनालोके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है, तथा इसके अवक्तव्यपढके बन्धक जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेपार्थ—यहाँ प्रथम दण्डकमे दो प्रकारको प्रकृतियों ली गई हैं । पाँच नानावरण, छह दर्शनावरण, वारह कपाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्ण- चतुष्क, अगुल्लघुचतुष्क, वादर, पर्याप्त, प्रत्येक, निर्माण और पॉच अन्तराय ये तो ध्रुववन्धिनो प्रकृतियाँ हैं। इनके यहाँ केवल तीन ही पद होते हैं। शेप नपुंसकवेद, तिर्यञ्चगति, हुण्डसंस्थान, तिर्यश्वगत्यानुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय और नीचगोत्र ये पगवर्तमान प्रकृतियाँ हैं। इनके यहाँ चारों पद सम्भव हैं । यहाँ तीन पदों की अपेक्षा तो पूर्वोक्त दोनों प्रकारको प्रकृतियों का स्पर्शन कहा है और अवक्तव्यपदको अपेक्षा दूसरे प्रकारको प्रकृतियों को स्पर्शन कहा है । देवों के विहारादिके समय भी स्त्यानगृद्वित्रिक आदिका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए इनके इस पदवालों का सनालीके कुछ कम आठ चटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। आगे खीवेद आदिके तथा एकेन्द्रियजाति और आतपके अवक्तव्यपदकी अपेक्षा, दो आयु आदिके सब पदों की अपेक्षा और तीर्थकर प्रकृतिके तीन पदों की अपेक्षा स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहनेका यही कारण है। प्रथम दण्डकमे कही गई इन सब प्रकृतियो के तीन पद देवों के विहार आदिके समय तो सम्भव हैं ही। साथ ही नीचे छह और ऊपर सात इस प्रकार कुछ कम तेरह राजूका स्पर्शन करते समय भी सम्भव हैं, इसलिए इन सब प्रकृतियों के तीन पदी की अपेक्षा सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। साता- वेदनीय आदिके सव पदों की अपेक्षा और मिश्यात्वके तीन पदोकी अपेक्षा यह स्पर्शन इसीप्रकार कहनेका यही कारण है। देवों के विहारादिके समय तथा नीचे कुछ कम पॉच और ऊपर कुछ कम सात राजू प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन करते समय भी मिथ्यात्वका अवक्तव्य- पद सन्भव है, इसलिए इसके इस पदवाले जीवों का स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। स्त्रीवेद आदिके तीन पदो की अपेक्षा यह स्पर्शन इसी प्रकार प्राप्त होनेसे उक्त प्रमाण कहा है। मात्र यहाँ कुछ कम बारह राजूसे नीचे कुछ कम छह और उपर कुछ कम छह राजू लेने चाहिए। कारणका विचार कर लेना चाहिए। देवों में विहार आदिके समय एकेन्द्रियजाति और आतपके तीन पद तो सम्भव हैं ही। साथ ही एकेन्द्रियों में इनके मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी ये पद सम्भव हैं, इसलिए इनके तीन पदवाले जीवों का पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। वैक्रियिककाययोगमे दूसरे और तीसरे नरकमें ही तीर्थङ्कर प्रकृतिका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदवाले जीवों का स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है। शेष कथन सुगम है। १८६. कार्मणकाययोगी जीवोंमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके भुजगारपदके बन्धक जीवोने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। शेष प्रकृतियोंके भुजगार और अवक्तव्य पदके वन्धक - भुजगारबंधै फोसणाणुगमो १६६ गवरि मिच्छ० अवत्त० ऍकारस० । देवगदिपंचग० खेत्तमंगो। १८७, इत्थिवेदेसु पंचणा०-चदुदंस०-चदुसंज०-पंचंत० तिण्णिपदा अट्टचों सबलो। थीणगिद्धि०३-अणंताणु४-गवुस०-तिरिक्ख०-एइंदि०-हुंड-तिरक्खाणु०- थावर-दूभग-अणादें-अजस०-णीचा० तिण्णिपदा अट्ठचों सव्वलो० । अवत्त० अट्ठचों। [णवरि अजस० अवत्त० अट्ठ-णवों] णिद्दा-पयला-अट्ठक०-भय-दुगुं०-तेजा०- क०-वण्ण०४-अगु०४-पजत्त-पत्ते-णिमि० तिण्णिपदा अट्टचों सन्चलो० । अवत्त खेंत्तभंगो। सादासाद०-चदुणोक०-थिराथिर सुभासुभ० सव्वपदा अडचौ० सबलो। मिच्छ० तिण्णिपदा सादभंगो। अवत्त० अट्ठ-णव० । इथि०-पुरिस०-दोआउ०-मणुस०- जीवों ने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि इनमे मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवों ने बसनालीके कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा देवगतिपञ्चकके बन्धक जीवों का स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेषार्थ-कार्मणकाययोगी जीवो का स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण है, इसलिए इनमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों के भुजगारपदके वन्धक जीवों का और अन्य प्रकृतियों के भुजगार और अवक्तव्यपदके वन्धक जीवों का सर्शन सर्व लोकप्रमाण कहा है। मात्र इस नियमकी कुछ प्रकृतियाँ अपवाद हैं । यथा इस योगमे ऊपर छह और नीचे पॉच इस प्रकार कुछ कम ग्यारह राजूप्रमाण क्षेत्रके भीतर ही मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद करनेवाले जीव पाये जाते हैं, इसलिए मिथ्यात्वके अवक्तव्य पदवाले जीवोंका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भाग- प्रमाण कहा है । तथा जो सम्यग्दृष्टि मनुष्य उत्तम भोगभूमिके मनुष्यो और तिर्यञ्चोंमे उत्पन्न होते हैं,उनके व जो नारकी और देव सम्यक्त्वके साथ मरकर मनुष्योमें उत्पन्न होते हैं, उनके इस योगमे देवगतिपञ्चकका बन्ध होता है। ऐसे जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही प्राप्त होता है, अतः यह क्षेत्रके समान कहा है। १८७. बीवेदवाले जीवों में पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, चार संज्वलन और पॉच अन्तरायके तीन पदोंके बन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोक- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्यानगृद्वित्रिक, अनन्तानुवन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, हुण्डसंस्थान, तिर्यश्वगत्यानुपूर्वी, स्थावर, दुर्भग, अनादेय, अयश कीर्ति और नीच- गोत्रके तीन पदोके बन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि अयश कीर्तिके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोने सनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। निद्रा, प्रचला,आठ कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु- चतुष्क, पर्याप्त, प्रत्येक और निर्माणके तीन पदोके बन्धक जीवाने प्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। सातावेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकषाय, स्थिर, अस्थिर, शुभ और अशुभके सब पदोके वन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका पर्शन किया है। मिथ्यात्वके तीन पदोके बन्धक जीवोका स्पर्शन सातावेदनीयके समान है। तथा इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे १ ता.आ०प्रत्योः 'भयदुगुं ओरा० ते० क०' इति पाठः।
१७० महाबंधे पदेसबंधाहियारे पंचसंठा-ओरालि अंगो०-छस्संघ० - मणुसाणु०-आदाव०-पसत्य -सुभग-सुस्सर-आदें०- उच्चा० सव्वपदा अट्टचों । दोआउ०-तिण्णिजादि-आहारदुग-तित्थ० सव्वपदा खेत- भंगो । दोगादि-दोओणु तिण्णिपदा छच्चों । अवत्त० खेत्तभंगो। पंचिंदि०-अप्पसत्थ०- तस-दुस्सर० तिण्णिपदा अट्ठ-बारह० । अवत्त० अढचों । ओरालि तिण्णिपदा अट्टचों सव्वलो० । अवत्त० दिवड्डची। वेउ०-वेउ०अंगो० तिण्णिपदा बोरह० | अवत्त० खेतभंगो। उजओ०-जसगि० सव्वपदा अट्ठ-णव०। बादर० तिण्णिपदा अट्ठ-तेरह । अवत्तः खेत्तभंगो। हुम-अपज०-साधार० तिण्णिपदा लोगस्स असंखें सव्वलोगो वा । अवत्त० खेत्तभंगो । पुरिसेसु एसेव भंगो। णवरि तित्थ० ओघं । ओरा०-अपचक्खाण०४ अवत्त० छचोद० । --- AM चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, दो आयु, मनुष्यगति, पॉच संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय और उसगोत्रके सब पदोके बन्धक जीवोंने त्रसनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । दो आयु, तीन जाति, आहारकद्विक और तीर्थकर प्रकृतिके सब पढोके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। दो गति और दो आनुपूर्वीके तीन पदोके वन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनके अवक्तव्यपदका पर्शन क्षेत्रके समान है । पञ्चेन्द्रियजाति, अप्रशस्त विहायोगति, त्रस और दुःस्वरके तीन पदोके बन्धक जीवोने बसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंने बसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। औदारिकशरीरके तीन पदोके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंने बसनालीके कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गके तीन पदोंके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । उद्योत और यश कीर्तिके सब पदोंके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। बादरप्रकृतिके तीन पदोके बन्धक जीवोंने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अवक्तव्यपदका भङ्ग क्षेत्रके समान है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणके तीन पदोके बन्धक जीवोने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा अवक्तव्यपदका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। पुरुषवेदवाले जीवोमे यही भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि इनमें तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। तथा औदारिकशरीर और अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने वसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ-विहारवत्स्वस्थानकी अपेक्षा कुछ कम आठ राजू और मारणान्तिक समुद्धात की अपेक्षा सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्त्रीवेदी जीवोने स्पर्शन किया है। पॉच ज्ञानावरणादि, स्त्यानगृद्धि आदि सातावेदनीय आदि, मिथ्यात्व और औदारिकशरीरके तीन पदोकी अपेक्षा तथा सातावेदनीय आदिके सब पदोकी अपेक्षा इन जीवोने उक्त क्षेत्रका स्पर्शन किया है, अतः यह उक्त भुजगारबंधे फोसणाणुगमो १७१ ----------- प्रमाण कहा है। किन्तु स्त्यानगृद्धि आदिके अवक्तव्य पदकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौवह भागप्रमाण क्षेत्रका ही स्पर्शन सम्भव है, क्योंकि देवियोंके विहारादिके समय इन प्रकृवियो का यह पद सम्मव है। यद्यपि अन्य गतियोमे भी यह पद होता है पर इनका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण होनेसे इसीके अन्तर्गत है, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है। स्त्रीवेद आदिके सब पदोंकी अपेक्षा तथा पञ्चेन्द्रियजाति आदिके अवक्तव्य पदकी अपेक्षा भी यह स्पर्शन सनालीके कुछ कम चौदह भागप्रमोण प्राप्त होनेसे उक्त प्रमाण कहा है। यहाँ निद्रा-प्रचला आदिका अवतन्यपद जिस अवस्थाम होता है, उस अवस्था सहित उन जीवोका स्पर्शन लोकके असख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेसे उसे क्षेत्रके समान कहा है। दो आयु आदिके सब पदीकी अपेक्षा तथा दो गति आदि, वैक्रियिकशरीरद्विक और बादर प्रकृतिके अवक्तव्यपदकी अपेक्षा भी सर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण प्राप्त होनेसे यह भी क्षेत्रके समान कहा है। कारणका विचार सर्वत्र कर लेना चाहिए। देवियांके विहारादिके समय और ऊपर एकेन्द्रियोमें मारणान्तिक समु. दात करते समय भी मिथ्यात्वका अवक्तव्य पद सम्भव है, इसलिए इस पदकी अपेक्षा सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। उद्योत और यश-कीतिके सब पदोकी अपेक्षा भी यह स्पर्शन बन जाता है, इसलिए यह भी उक्तप्रमाण कहा है । नीचे कुछ कम छह राजूप्रमाण क्षेत्रमे मारणान्तिक समुद्रात करते समय नरकगतिद्विक के तीन पद और ऊपर कुछ कम छह राजूप्रमाण क्षेत्रमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय देव- गतिद्विकके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके इन पदोकी अपेक्षा सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका पर्शन कहा है। तथा इन दोनो स्पर्शनोको मिला देनेपर वैक्रियिकद्विकके तीन पदोकी अपेक्षा स्पर्शन प्राप्त होता है, इसलिए इनके उक्त पदोकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है । देवियोंके विहारादिके समय तथा तिर्यश्ची और मनुष्योंके नारकियोंमे मारणान्तिक समुद्घात करते समय भी पञ्चेन्द्रियजाति आदिके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके उक्त पदोकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। देवियोमै मारणान्तिक समुद्घात करते समय औदारिकशरीरका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए इसके इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। देवियोंके बिहारादिके समय तथा ऊपर सात और नीचे छह, इस प्रकार कुछ कम तेरह राजूका स्पर्शन करते समय भी वादर प्रकृतिके तीन पद सम्भव हैं, अत. इसके इन पदोकी अपेक्षा सनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह वटे चौदह भागप्रमाण सर्शन कहा है । सूक्ष्मादि तीन प्रकृतियोका बन्ध तिर्यश्च और मनुष्य ही करते हैं और स्त्रीवेदी इन जीवांका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण है, इसलिए इनके इन तीन पदोकी अपेक्षा उक्तप्रमाण स्पर्शन कहा है। पहले अयश कीर्तिको भी त्यानगृद्धित्रिकदण्डकके साथ गिना आये हैं। किन्तु उसके अवक्तव्यपदके स्पर्शनमै उक्त प्रकृतियोके अवक्तव्यपदके स्पर्शनसे फरक है, क्योंकि ऊपर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी इसका अवक्तव्य पट होता है, देवियोंके विहारादिके समय तो सम्भव है ही, अतः इसके अवक्तव्यपदकी अपेक्षा त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन अलगसे कहा है । कुछ अपवादको छोड़कर पुरुषवेदवाले जीवोंमें यह स्पर्शन बन जाता है, अतः उनमे बीवेदी जीवोके समान जाननेकी सूचना की है। पुरुपवेदियोंमे एक अपवाद तो तीर्थङ्कर प्रकृतिको अपेक्षासे है। वात यह है कि ओधर्म इस प्रकृतिके तीन पदोकी अपेक्षा जो कुछ कम आठ राजूप्रमाण स्पर्शन कहा है वह पुरुपवेदी जीवामे ही सम्भव है, क्योंकि तीर्थङ्कर प्रकृतिका वन्ध करनेवाले जीव देवियोमें नहीं उत्पन्न होते-यह इस स्पर्शनसे सष्ट हो जाता है । दूसरा अपवाद अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदके स्पर्शनकी अपेक्षा है। , १७२ महायंचे पदेसबंधाहियारे १८८. गसगे ओरा०कायजोगिभंगो। णवरि मिच्छ० अवत्त० चारहवाँद । कोधादि०४ ओघं। मदि-मुद० ओघं । णवरि देवगदि-देवाणु० तिण्णिपदा पंचत्रों। अवत्त० खेत्तमंगो। वेउ०-वेउ अंगो० तिष्णिपदा ऍक्कारह० । अवत्त० खेत्तभंगो। ओरालि० अवत्त० ऍकारह । एवं अन्भव०-मिच्छा० । विभंगे० पंचिंदियभंगो । णवार वेउव्यियछक्क मदिभंगो । ओरालि० अवत्त० खेत्तभंगो। बात यह है कि अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और भीटारिकशरीरका अवक्तव्यपद करनेवाले जीव उपर सर्वार्थसिद्धि तक उत्पन्न हो सकते हैं, अत यहाँ इनके इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन सनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह अलगसे कहा है। १८. नपुंसकवेदी जीवोमे औदारिककायोगी जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमे मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवांने त्रसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। क्रोधादि चार कपायवाले जीवाम औधके समान भन है। मत्यज्ञानी और श्रुतानानी जीवामे ओधके समान भग है। इतनी विशेषता है कि इनमें देवगति और देवगत्यानुपूर्वकि तीन पदोंके बन्धक जीवाने बसनालीके कुछ कम पॉच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है ।वक्रियिक शरीर और बैंक्रियिक शरीर आङ्गोपाङ्गके तीन पदोके बन्धक जीवो ने सनालीके कुछ कम न्यारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवों का स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा औदारिकशरीरके अवक्तव्यपढ़के बन्धक जीवोंने त्रसनालोके कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसीप्रकार अर्थात् मत्यज्ञानी जीवोंके समान अभव्य और मिध्यावष्टि जीवोमे जानना चाहिए। विभगज्ञानी जीवाम पञ्चेन्द्रियोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इसमें वैक्रियिकपटकका मन मत्यज्ञानी जीवोके समान है। तथा औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदका भद्ग क्षेत्रके समान है। विशेपार्थ-नपुंसकवेदी जीवोमे मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद नीचे कुछ कम पांच और ऊपर कुछ कम सात इसप्रकार कुछ कम बारह राजूका स्पर्शन करते समय बन जाता है। किन्तु औदारिककाययोगी जीवोमें कुछ कम सात राजूप्रमाण ही स्पर्शन प्राप्त होता है, क्योंकि नारकियोंके औदारिककाययोग सम्भव नहीं है । नपुंसकवेदी जौवामे औदारिककाययोगवालाकी अपेक्षा इतनी मात्र विशेषता है। अन्य सब कथन एक समान होनेसे नपुंसकवेदी नीयोंमें औदारिककाययोगी जीवाके समान जाननेकी सूचना की है। क्रोधादि चार कपायवाले जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है, यह स्पष्ट ही है। मत्यज्ञानी और श्रुताचानी जीवामे कुछ अपवादोंको छोड़कर शेष कथन ओघके समान बन जाता है । जहॉ फरक है,उसका खुलासा इसप्रकार है-साधारणतः ये दोनो अज्ञानवाले मनुष्य अन्तिम वेयक तक उत्पन्न होते हैं पर ऐसे जीव संख्यात ही होते हैं, अतः यहॉ तिर्यवाकी मुख्यता है और ऐसे तिर्यबोका उत्पाद सहस्रार कल्प तक होनेसे वे सहस्रार कल्प तक ही देवोमे मारणान्तिक समुद्रात कर सकते हैं। यही कारण है कि यहाँ देवगतिद्विकके तीन पदवालोका स्पर्शन असनालीके कुछ कम पॉच बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। किन्तु ओघसे यह सनालोके कुछ कम छह घटे चौदह भागप्रमाण प्राप्त होता है, क्योंकि मोरसे देवोंमें मारणान्तिक समुद्धात करनेवाले सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि दोनों प्रकारके जीव लिये गये हैं। इनके अवक्तव्यपदका स्पर्शन क्षेत्रके समान है, यह स्पष्ट ही है। एक फरक तो यह है । दूसरा फरक इसी कारणसे वैक्रियिकद्विकके तीन पदोकी अपेक्षा स्पर्शनमें पड़ता है। बात यह है कि ओघसे वैक्रियिकतिकके तीन पदोंकी अपेक्षा स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भाग- . भुजगारवंधे फोसणाणुगमो १७३ १८६. आभिणि-सुद-ओधिणा. पंचणा०-छदंस०-अट्ठक०-पुरिस०-भय-दु०- मणुस-पंचिंदि०- [ ओरालि०-] तेजा-क०-समचदु० - [ओरालि अंगो०-बञ्जरि०] वण्ण०,४- [मणुसाणु०-] अगु०४-पसत्थवि०-तस०४-सुभग-सुस्सर-आर्दै-णिमि०- तित्थ०-उच्चा०-पंचंत० तिण्णिपदा अट्टचों । अवत्त० खेत्तभंगो । सादासाद०-चदुणोक०- थिरादितिण्णियुग० सन्चपदा अट्ठचौं । अपच्चक्खाण०४ तिण्णि पदा अढचों । अवत्त० छचों । मणुसाउ० सादभंगो। देवाउ० आहारदुगं खेत्तभंगो । मणुसगदि- प्रमाण वतला आये हैं। पर यहाँ उसमेसे ऊपरका एक राजू स्पर्शन कम हो जाता है, अतः यहाँ इनके तीन पदोकी अपेक्षा स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। इनके अवक्तव्यपदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान है, यह स्पष्ट ही है। तीसरा फरक औदारिक- शरीरके अवक्तव्य पदकी अपेक्षा है । ओघसे यह पर्शन त्रसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण बतला आये हैं, क्योंकि वहाँ सम्यग्दृष्टि और मिथ्याष्टिका भेद न होनेसे नीचेके छह और ऊपरके छह इसप्रकार कुछ कम बारह राजू लिए गये है। किन्तु यहाँ नीचेके छह और ऊपर के पॉच इस प्रकार कुछ कम ग्यारह राजू ही लिए जा सकते हैं, क्योकि बारहवे कल्प तकके देवामे ही तिर्यञ्च मरकर उत्पन्न होते हैं। अभव्य और मिथ्याष्टियोमे मत्यजानियोके समान प्ररूपणा वन जानेसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। विभगक्षानी पञ्चेन्द्रिय ही होते हैं, इसलिए इनमे साधारणत पञ्चेन्द्रियोके समान जाननेकी सूचना की है। जो अन्तर है उसका अलगसे निर्देश किया है। बात यह है कि पञ्चेन्द्रियोमे बैंक्रियिकपटकका भङ्ग ओघके समान बन जाता है और विभगङ्गज्ञानी मिथ्यात्रष्टि होते है, अत उनमे वह नहीं बनता। किन्तु मत्यज्ञानियो के जो स्पर्शन कहा है वह वनता है, अत इनमे वैक्रियिकपटकका भङ्ग मत्यज्ञानियोंके समान जाननेको सूचना की है। दूसरे पञ्चेन्द्रियोंमें औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदकी अपेक्षा स्पर्शन वसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है जो नारकियो और देवोके उपपादपदके समय प्राप्त होता है। किन्तु देव और नारकी उपपादपदके समय विभङ्गज्ञानी नहीं होते, क्योकि उनके यह अनान पर्याप्त होनेपर प्राप्त होता है । अत जो विभङ्गज्ञानी तिर्यश्च और मनुष्य औदारिकशरीरका अवक्तव्य पद कर रहे हैं,उन्हींकी अपेक्षा यहॉपर औदारिकशरीरके अवक्तव्य- पदका स्पर्शन घटित किया जा सकता है और वह लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही होता है। यही कारण है कि विभङ्गजानमे औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदवालोका स्पर्शन क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है। १८६, आभिनित्रोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, आठ कपाय, पुरुषवेद, भय, जुगुप्सा, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, वर्षभनाराचसंहनन, वर्णचतुष्क, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, प्रशस्त विहायोगति, त्रसचतुष्क, सुभग, सुस्वर, आडेय, निर्माण, तीर्थकर, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके तीन पदोंके बन्धक जीवांने त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदका भङ्ग क्षेत्रके समान है । सातावेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकषाय और स्थिर आदि तीन युगलके सब पदोके वन्धक जीवोंने सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके तीन पदोके बन्धक जीवोंने सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। मनुष्यायुका भग सातावेदनीयके समान है । देवायु और आहारकद्विकका भङ्ग क्षेत्रके समान है। मनुष्यगतिपञ्चकके अवक्तव्यपदके , , , महावत्र पसवाहियारे पंचयास अवत्त० छबोंदवगदि०४ तिष्णि पड़ा छनॉ। अवतः सत्तभंगो । एवं जोघिई०-सम्मा०-सड्ग-वेदग-उबसम० । णबार सहा-उपसम० देवगदि०४ उत्त- भंगो । उबसम नित्य खेतमंगो। बन्धक जोगेने सनाजीने छ, म ह व चौदह भागनान क्षेत्रका सर्शन मिया है। देवाविवकके तीन पट्टाके बन्धक जीवान मनालीक कुछ कम छह ने चौदह भागन्मान क्षेत्रमा सर्शन लिया है। क्या इनके भवस्यपदके बन्धक जीगचा भङ्ग क्षेत्र समान है। इसी प्रकार अवविदर्शनवाले, मन्यन्त्रष्टि ज्ञायिकमन्यग्नति, वेदकलन्याष्टिऔर उसमरन्यन्त्रष्ट जीवामें जानना चाहिए । इदनी विशेषता है कि ज्ञायिकमन्यन्द्रष्टि और उपशमनन्याष्टिकंगन देवगतिकका भङ्ग क्षेत्रले समान है' क्या उपशनसन्यन्द्रष्टि जीवान नार्या दिना मङ्ग क्षेत्रके समान है। विशेषार्थ-व्हाँ वेगन विहारादिने समय भी गैंच मानावरणादि और कार लाया- स्थानावरण के वीन पट्ट क्या सातादेवनीय आदिव मनुयायुके सब पद बन जाते हैं. इसलिए इनके उक्त पदबालाचा सर्शन मनालीने कुछ कन भाउ बवाह भागमाग ग्रहा है । तथा जो संयत जीव इनकी कन्यत्र्युञ्चिचि होने वाह मरकर देव होते हैं या लौटकर पुन इनका बन्ध करते हैं उनके इन अवतन्यनद होता है। यतः ऐसे जीशंका दर्शन लोक भगायें भागनाग प्राम होता है. अतः इनके अवतव्यपवाले जीगचा सर्शन क्षेत्रके सनगन कहा है। इतनी विशेषता है कि इनसे तायर प्रकृतिका नाचव्याद दूसरे और तीसरे नरन्न भी न जाता है। तय ननुभ्यमविपञ्चकका अवतन्यपदजोमन्यन्द्रष्टि तियश्च नरनदेव होर है, उनकी सन्मय है. इसलिए इनके भवक्तव्य पढ़वाले जीवोंका स्पर्शन मनाली कुछ न कह बंटे बाह भागप्रनाग मान होनेसे उसका अलगले निर्देश दिया है। जो नयष्टि ननु श्रम न करें सन्न होते हैं उनके भी इनका मवतन्य पन होता है,पर इससे जननें कोई अन्तर नहीं पड़ता । संत और संयतानंयत्र जीवाले मसंयतसन्याष्टि होने पर या ऐसे जीग मरकर देव होनेपर अन्याख्यानाचरण चतुष्कका भवतव्य पत्र होता है। यतः ऐसे नाशका वर्शन भी तनाली कुछ कम बौदह भागमाग ग्राम होता है. अतः यह जानागकहा है । ति और मनुष्य देवान मारणान्तिक समुद्रात करते समय भी देवगवितुष्को तीन पद काते हैं। अदः इनले उक्त पवाले जीत्राका सर्शन तनालीके कुछ कम छह बजे बौदह भागनाग कहा है। क्या जो देव मरकर ननुयाने स्सन्न होते हैं, उनके इनचा वच्च्य पद होता है । यतः ऐसजीशन सर्शन लोकले मसंख्यातवें भागप्रमाण प्राप्त होता है,मतः यह क्षेत्रके सनान कहा है। यहाँ अवधिदर्शनी भादि अन्य जितनी मार्गगाएँ गिनाई है मनन यह प्रहलगा न जानी है. अतः उनमें उक्त तीन प्रकारके दानवाले जीवोंके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र झायित्रसम्यग्दृष्टि और उपशमसन्यग्दृष्टि नीबॉमें कुछ विशेषता है। यह है कि जो शामिक सन्यन्द्रष्टि नियंञ्च और मनुष्य देवाम मारणान्तिक समुहात करते हैं वे बहुत ही अल्प होते हैं और उनका सर्शन क्षेत्र भी सीमित है, इसलिए ते ज्ञायिकसन्यन्द्रष्टियाम देवगति सुकने सत्र पवाले जोशका सर्शन क्षेत्रके समान हा है। क्या उपशमसन्यन्द्रष्टि तिर्यञ्च तो देगने मारणान्तिक समुद्रात ही नहीं करते । मनुष्य करते हैं सो जो उपशननंगिया ऐसे नुय है । ही करते हैं. इसलिए इनमें भी देवगविनुष्का के सब पवालोंचा सर्शन को समान न्हा है। उपशमसन्यन्द्रष्टियान नहीं बात तीर्यवर प्रकृतिक विश्यमें भी जानना चाहिए।
छच्चों भुजगारवघे फोसणाणुगमो १६०. संजदासंजदेसु धुविगाणं तिण्णि पदा छच्चो ० । सादादीणं सब्यपदा' । देवाउ०-तित्थ० खेत्तभंगो । असंजद० ओघं । १६१. किण्ण-णील-काउ० धुवियाणं तिण्णि पदा सव्वलो० । णिरयगदि-णिर- याणु०-बेउ०-वेउ०अंगो० तिण्णि पदा छ-चत्वारि । अवत्त० खेत्तभंगो। दोआउ०- देवगदि-देवाणु०-तित्थ० खेत्तभंगो। सेसाणं तिरिक्खोघं । णवरि ओरालि० अवत्त. छच्चत्तारि-वेचौदेस। १६०. संयतासंयतामे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके तीन पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सातावेदनीय आदि प्रकृतियोके सब पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । देवायु और तीर्थङ्कर प्रकृतिके बन्धक जीवोका भङ्ग क्षेत्रके समान है । असंयत जीवोमे ओघके समान भङ्ग है। विशेषार्थ -संयतासंयतोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण है और यह ध्रुववन्धवाली व इतर प्रकृतियोके सब पदवालोके बन जाता है, इसलिए यह उक्तप्रमाण कहा है । मात्र मारणान्तिक समुद्वातके समय आयुकर्मका वन्ध नहीं होता और सयतासंयतोमे तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले मनुष्य ही होते हैं । यत. ऐसे जीवांका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होता है। अत. इन प्रकृतियोके सम्भव सब पदवालोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । असयत जीवांमे ओघके समान भङ्ग है ,यह स्पष्ट ही है। १६१. कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावाले जीवोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पदोके बन्धक जीवाने सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक- शरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गके तीन पदोंके बन्धक जीवोने सनालोके कुछ कम छह, कुछ कम चार और कुछ कम दो बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । दो आयु, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग क्षेत्रके समान है। शेष प्रकृतियोका भग सामान्य तिर्यञ्चोके समान है। इतनी विशेषता है कि औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम छह, कुछ कम चार और कुछ कम दो बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। विशेषार्थ कृष्णादि तीन लेश्यावाले जीव सर्व लोकमें पाये जाते हैं, इसलिए इनमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पवाले जीवोका स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण कहा है। कृष्णलेश्यामें सातवे नरक तकके, नील लेश्यामें पॉचवे नरकतकके और कापोत लेश्यामे तीसरे नरक तकके नारकियोंमें मारणान्तिक समुद्घात करते समय भी नरकगति आदिके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके इन तीन पदवाले जीवाका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम छह, कुछ कम चार और कुछ दो बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। किन्तु ऐसे समयमें इनका अवक्तव्यपद नहीं होता, इसलिए इनके अवक्तव्य पदवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। आयुका बन्ध मारणान्तिक समुद्भातके समय नहीं होता । कृष्ण और नीललेश्याम देवगतिद्विकका बन्ध भी मारणान्तिक समुद्रातके समय सम्भव नहीं है, क्योकि इन दो लेश्यावाले देवोमे मारणान्तिक समुद्धात ही नहीं करते । कापोत लेश्याम मारणान्तिक समुद्धातके समय भी देवगतिद्विकका वन्ध सम्भव है,पर , . १. ताप्रतौ 'सत्त [व] पदा' इति पाठ । २. आ०प्रतौ 'पटा चत्तारि वे' इति पाठः ।
१७६ महारचे पदेसपाहियारे १६२. नेउए पंचणा-छदमणा०-चदुसंज०-भय-दुगुनेजा-क-अण्ण०४-अगु०४- यादर-पञ्जन-पत्तय-णिमि-पंचन. सव्यपदा अट्ठ-णव०। धीणगिदिदंडओ साइक- दंडओ गोधम्मभंगी। अपचरखाण०४-ओगलि. तिणि पढ़ा अट्टणवत्रों। अबतक दिवड्डवों । पचवाण०४ तिष्णिपदा अट्ठ-णव० । अवत्त० खेत्तभंगो । तित्य० ओवं । दंबाउ०-आहारसुगं खेत्तभंगा । देवगदि०४ तिणि पदा दिवड्डचा । अवत्त० खेत्तभंगो। सेसाणं पगड़ीणं साधम्मभंगा। एवं पम्माए दि। गवरि अपञ्चसाण०४-ओरा०- ओरा अंगो० अवत्त देवगदि०४ तिणि पढा पंचचा । सेसाणं सहस्सारभंगो। ऐसे जीव केवल भवनत्रिकने ही मारणान्तिक समुद्रात करने हैं। ऐसी अवस्थामें उनका स्पर्शन लोकके असंन्यानभागमाग ही शाम होता है। इसी प्रकार कृष्ण मौर. नील लेश्याम नारकियामें नारणान्तिक समुद्रात करते समय तीर्थदर प्रकृतिका बन्ध नहीं होता । कापीत लेण्या मारणा- न्तिक ज्ञान करते नमय अवश्य ही इस प्रकृतिका न्य सम्भव है,पर ऐसे जीव या तो प्रथम नर या प्रथम नरकबाल मनुश्याम ही मारणान्तिक समुहात करते हैं। और इनका नर्शन मी लोले मसंख्यानवें भागप्रमाग है. इसलिए इन दो आयु आदि सब प्रकृतियों के सब पवाजे जीवॉश मशन क्षेत्र के समान कहा है। प्रकृनियोंका भङ्ग सामान्य विवस्वाने समान है,यह स्पष्ट ही है । मात्र भादारिकशरीरका अवतव्याद नग्न्में उपसराइ पदके समय भी सम्भव है, इमलिए इन अवश्य पढ़वाले जीवोंका मर्शन मनालीके कुछ कम छह. कुछ क्रम चार और कुछ कम दो बचादह मागरमाग कहा है। १२. पीतवेगवाले जीवॉन गँच मानावरग, वह दर्शनावरण, चार संचलन, भय, जुगु-चा. नैजसशगर, कार्मगशरीर, वर्णचतुष्क, अगुल्लघुचतुष्क, बादर, पर्याम, प्रत्येक, निर्माण और पांच अन्तरायके सब पदॉक बन्धक जीवाने असनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नी वटे चौदह भागप्रमाग क्षेत्रका सर्शन किया है। न्यानगृद्धिदण्डक और सातावदनीयाडकका भङ्गसौधर्मऋल्पने समान है। अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क और औदारिकशरीरके तीन पढ़ाने बन्धक जीवाने मनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह मागप्रमाग क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा उनके मवक्तव्यपदके बन्धक जीवॉन सनालोके उच कम डेढ़ बटे चौदह माग- प्रभाग क्षेत्रका न्यर्शन क्रिग है। प्रत्याख्यानावरणचनुष्क्के तीन पदोंके बन्धक नावाने त्रसनालीके कुछ कम माउ और कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाग क्षेत्रका पर्शन किया है। तथा इनके मरचयपदके उन्धन जीरांचा सर्शन क्षेत्रके समान है। तीर्यवर प्रकृतिका मन ओपने समान है। वायु और जाहारकादिकका मग क्षेत्रके समान है। देवगवितुष्को तीन पट्टाके बन्धक जीवाने वलनालोके कुछ म डेढ़ व चौदह भागनमाण क्षेत्रका सर्शन किया है। तथा इनके अवकलदले बन्धक जीवोंका सर्शन क्षेत्रके समान है। शेष प्रकृतिगंशा भङ्ग सौधर्म कल्पके समान है। इसीप्रचार पञ्चश्यामें भी जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि अप्रत्या- स्यानावरणचनुक, औदारिकशरीर और मादारिकशरीरमाङ्गोपाङ्गके अवक्तव्यपदळे बन्धक जीवोंने तथा देवगदिचतुष्कके तीन पट्टोंके बन्धक जीवोंने सनालोके कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमार क्षेत्रमा पर्शन किया है। शेष प्रतियोंका मङ्ग सहलार कपके समान है। अहणवः' इति पा1३,तप्रोत देवगदि निग १.तामा 'गिनि को दिपाठः।
भुजगारबंधे फोसणाणुगमो १७७ -~ . , - विशेषार्थ—पीतलेश्यामे देवाके विहारके समय त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाग स्पर्शन पाया जाता है और ऊपर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्वात करते समय सनालीके कुछ कम नौ वटोचौदह भागप्रमाग स्पर्शन गया जाना है और ऐसे समयमे पाँच ज्ञानावरणादिके तीन पद सम्भव हैं, अत इनके सब पढ़वाले जीवोका उक्तप्रमाण स्पर्शन कहा है। त्यानगृद्धिदण्डक और सातावेदनीयदण्डकके स्वर्शनको जो सौधर्म कल्पके समान जाननेकी सूचना को है सो उसका यही अभिप्राय है कि रत्यानगृद्धिदण्डकके तीन पदवाले जीवोका और सातावेदनीयदण्डकके चार पढ़वालोंका उक्त प्रकारसे ही स्पर्शन जानना चाहिए। तथा स्त्यानगृद्धि- दण्डकका अवक्तव्यपद ऊपर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्धातके समय नहीं होता, इसलिए इनके इस पद्वाले जीवोका स्पर्शन इसीका सौधर्म कल्पमे कहे गये सर्शनके समान त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। त्यानगृद्धिदण्डककी प्रकृतियाँ ये हैं-स्त्यान- गृद्धित्रिक, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, तिर्यश्चगति, एकेन्द्रियजाति, हुण्डसंस्थान, तिर्यञ्च- गत्यानुपूर्वी, स्थावर, दुर्भग, अनादेय और नीचगोत्र | सातावेदनीयदण्डककी प्रकृतियों ये हैं- सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, चार नोकपाय, उद्योत और स्थिर आदि तीन युगल । अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क, प्रत्याख्यानावरणचतुष्क और औदारिकशरीरके तीन पद भी देवोके विहारके समय और ऊपर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्घातके समय सम्भव हैं, इसलिए इनके इन पदवाले जीवोका स्पर्शन भी उसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम नौ वटे चौदह भाग- प्रमाण कहा है । मात्र अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और औदारिकशरीरका अवक्तव्यपद देवोमें ऐशान कल्प तकके देवोके उपपादपदके समय ही सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोका सर्शन त्रसनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका अवक्तव्यपद भी यद्यपि उक्त देवोमें सम्भव है,पर जो संयत मनुष्य भरकर इनमें उत्पन्न होते हैं उन्हींके यह होता है, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्यपदवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहाहै। तीर्थकर प्रकृतिका भग ओधके समान तथा देवायु और आहारकद्विकका भग क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है । सौधर्म-ऐशान कल्प तकके देवोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी देवगति- चतुष्कके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम डेढ़ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। किन्तु ऐसे समयमे इनका अवक्तव्यपद नहीं होता, इसलिए उसका भङ्ग क्षेत्रके समान कहा है। यहाँ शेप प्रकृतियाँ ये हैं-स्त्रीवेद, पुरुषवेद, दो आयु, मनुष्य गति, पञ्चेन्द्रियजाति, पाँच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, आतप, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर, आदेय और उच्चगोत्र । इनका ऊपर एकेन्द्रियोमे मारणान्तिक समुद्घात करते समय वन्ध नहीं होता, अत. इनके चारो पदवाले जीवोका स्पर्शन सौधर्म कल्पके समान त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। यहाँ मूलमे इसीप्रकार पद्मलेश्याम भी जानना चाहिए, ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार अलग- अलग प्रकृतियोंके सम्भव पढ़वालोंका स्पर्शन पीतलेश्यामे कहा है,उसीप्रकार पालेश्यामें भी घटित कर लेना चाहिए । पर पद्मलेश्याम त्रसनालीके कुछ कम नौ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन सम्भव नहीं है, इसलिए उसे सर्वत्र छोड देना चाहिए। मात्र इनमे अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और औदारिकशरीरका अवक्तव्यपद सहस्रार कल्प तकके देवोमे उपपादपदके समय और देवगति- चतुष्कके तीन पद इन्हीं देवोमें मारणान्तिक समुद्घातके समय भी सम्भव हैं, इसलिए इनके उक्त पदवालोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोंके सिवा शेप प्रकृतियोंका विचार सहनारकल्पके समान कर लेना चाहिए ,यह उक्त कथनका , . तात्पर्य है।
महाबंधे पदेसवंधाहियारे १६३. सुक्काए आणदभंगो' । अपञ्चक्खाण०४-मणुसगदिपंच० सव्यपदा छच्चों। देवगदि०४ तिण्णि पदा छच्चों । अवत्त० खेत्तभंगो० । खविगाणं अवत्त० खेत्तभंगो । १६४. सासणे धुबियाणं तिण्णि पदा अह-बारह । सादादीणं तेरसण्णं सच्चपदा अट्ठ-बारह० । इत्थि०-पुरिस०-पंचसंठा०-ओरालि अंगो०-पंचसंघ०-दोविहा०-सुभग- दोसर-आर्दै तिणि पदा अह-ऍकारह | अवत्त० अट्ठों। णवरि ओरा अंगो. १६३ शुक्ल लेश्याम आनतकल्पके समान भङ्ग है । अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क और मनुष्यगति पश्चकके सब पदोके वन्धक जीवाने वसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। देवगतिचतुष्कके तीन पदोके वन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । क्षपकप्रकृतियोके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवाका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेपार्थ-शुक्ललेश्यावाले जीवोका स्पर्शन बसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण है । आनत कल्पके देवीका भी उक्त प्रमाण स्पर्शन बन जाता है, अतः शुक्ललेश्याम आनत कल्पके समान भङ्ग है,यह वचन कहा है । उसमे भी कुछ स्पष्ट करनेके लिए अलगसे निर्देश किया है। आरण कल्पसे लेकर ऊपरके देवोम उत्पादके समय भी अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके सब पढ़ और मनुष्यगति पश्चकका अवक्तव्यपद तथा इन देवोके विहारादिके समय मनुप्यगतिपञ्चकके शेप तीन पद सम्भव है, इसलिए इन प्रकृतियोंके सत्र पदवाले जीवोका वसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तियश्चो और मनुष्यों के देवोमें मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी देवगतिचतुष्कके तीन पद होते हैं, इसलिए इनके तीन पवाले जीवोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम छह घटे चौदह भागप्रमाण कहा है। किन्तु ऐसे समयमै इनका अवक्तव्य पद नहीं होता, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका भङ्ग क्षेत्रके समान कहा है। अब रहीं पॉच ज्ञानाबरणादि शेप क्षपक प्रकृतियॉ सो इनका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिमे या तो उतरते समय या इनकी बन्धव्युच्छित्तिके बाद मरकर देव होनेके प्रथम समय प्राप्त होता है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदवाले जीवोका भङ्ग भी क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनके शेप तीन पदवाले जीवोका स्पर्शन कितना है, इसका उत्तर 'आनत कल्पके समान है। इसमे ही हो जाता है । यहाँ ऐसी तीन प्रकृतियों और शेष रहती, है, जिनके विषयमे अलगसे कुछ नहीं कहा है । वे हैं-देवायु और आहारकद्विक । सो देवायुका वन्ध तो स्वस्थानमे ही होता है और आहारकद्विकका वन्ध केवल अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणवाले मनुष्य करते है, इसलिए इनके चारो पवाले जीवोका स्पर्शन यहाँ क्षेत्रके समान प्राप्त होता है। १६४. सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोमे ध्रुववन्धवालो प्रकृतियोके तीन पदवाले जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम वारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सातावेदनीय आदि तेरह प्रकृतियोके सब पदोके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेद, पुरुपवेद, पॉच संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, पॉच संहनन, दो विहायोगति, सुभग, दो स्वर और आटेयके तीन पदोके बन्धक जोवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम ग्यारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तथा इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने सनालोके कुछ कम आठ वटे चौदह भाग- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इतनी विशेषता है कि औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्गके अवक्तव्य- १ ता०प्रतौ 'सहस्सारमं [गो आण] दभगो' आप्रतौ 'सहस्सारभगो । • आणढभगो' इति पाठ । २. आप्रती 'देवगटि० ४ छच्चोः' इति पाठः। । , .
१७६ भुजगारवंधे फोसणाणुगमो अवत्त० पंचचों । दोआउ०-मणुसग०-मणुसाणु०-उच्चा० सव्वपदा अट्टचों । देवाउ० खेत्तभंगो । तिरिक्खग-तिरिक्खाणुपु०-दूभग-अणार्दै तिण्णि पदा अट्ठ-बारह० देसू० । अवज्ञ० [अह] एगा०चौँ । देवगदि०४ तिण्णि पदा पंचों देसू० । अवत्तव्व० खैत्तभंगो। १ ------ -------------- " पदके वन्धक जोवोने सनालोके कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो आयु मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रके सब पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । देवायुका भङ्ग क्षेत्रके समान है। तिर्यश्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, दुर्भग और अनादेयके तीन पदोके बन्धक जीवीने त्रसनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । देवगतिचतुष्कके तीन पदोके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम पॉच वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। विशेषार्थ-सासादनसम्यग्दृष्टियोका स्पर्शन कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण बतलाया है । यह दोनों प्रकारका स्पर्शन ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके तीन और सातावेदनीय आदिके चार पदोके बन्धक जीवोके सम्भव होनेसे उक्तप्रमाण कहा है। स्त्रीवेद आदिके तीन पदोका बन्ध देवाके विहार आदिके समय तथा नारकियो और देवोके तिर्यञ्चो और मनुष्योमें मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोंका स्पर्शन त्रसनालोके कुछ कम आठ और कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । मात्र इनका अवक्तव्यपद मारणान्तिक समुद्धातके समय सम्भव नहीं है । तथा तिर्यञ्चो और मनुष्योके देवोमे उत्पन्न होनेपर उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें औदारिकशरीर आङ्गोपागका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए यहाँ स्त्रीवेद आदि सब प्रकृतियोके अवक्तव्य पदवाले जीवोका स्पर्शन वसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और औदारिकशरीर आगोपागके अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम पाँच बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । देवोके विहार आदिके समय भी दो आयु आदिके सब पद सम्भव हैं, अत. इनके चारो पदवाले जीवोका स्पर्शन बसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । देवायुका भङ्ग क्षेत्रके समान है,यह स्पष्ट ही है । देवाके विहारादिके समय तथा नारकियों और देवोके तिर्यञ्चो और मनुष्योंमें मारणान्तिक समुद्बात करते समय भी तिर्यञ्चगति आदिके तीन पद सम्भव हैं, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । तथा इनका अवक्तव्यपद देवोमे विहारादिके समय और देवो व नारकियोके तियञ्चामें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे भी सम्भव है, इसलिए इस पदवाले जीवोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। तिर्यञ्चो और मनुष्योके देवोमे मारणान्तिक समुद्धात करते समय भी देवगति चतुष्कके तीन पदोंका बन्ध सम्भव है, अत इनके उक्त पवाले जीवोंका स्पर्शन सनालीके कुछ कम पाँच वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। तथा इनका अवक्तव्यपद ऐसे समयमें नहीं होता, इसलिए इसका भग क्षेत्रके समान जाननेकी सूचना की है। . . १ ता.आप्रत्यो 'अवत्त ए. अतो. ची० इति पाट ।
. महाबंधे पदेसबंधाहियारे १६५. सम्मामि० देवगदि०४ तिण्णि पदा खेत्तभंगो। सेसाणं पगदीणं सव्व- पदा अडचों । असण्णी० खेत्तभंगो । अणाहार० कम्मइगभंगो। एवं फोसणं समत्त। कालपरूवणा १६६. कालाणु०-दुवि०-ओपे० आदे० । ओघे० पंचणा०-छदसणा०-अट्ठक०-भय- दुगु-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० तिणि पदा केवचिरं० ? सव्वद्धा। अवत्त० जह० एग०, उक्क० संखेजसम० थीणगि०३-मिच्छ०-अट्ठक०. ओरालि० तिण्णि पदा सम्वद्धा । अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें | तिण्णिआउ० भुज-अप्प० जह० एग०, उक्क० पलिदो० असंखें । अवहि-अवत्त. जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । वेउन्चियछ० दोपदा सब्बद्धा । अवढि०-अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । आहारदुर्ग दोपदा सब्बद्धा । अबढि०-अवत्त० १५. सम्यग्मिथ्यावष्टि जीवामे देवगतिचतुष्कके तीन पदोके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। शेप प्रकृतियोंके सब पोंके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। असंजी जीवोमे क्षेत्रके समान भङ्ग है और अनाहारक जीवोमे कार्मणकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। विशपार्थ -यहाँ देवगति चतुकका तिर्यञ्च और मनुष्य बन्ध करते हैं, इसलिए इनके सब पदवाले जीवीका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । तथा शेप प्रकृतियोका बन्ध देवोके विहारादिके समय भी सम्भव है, इसलिए उनके सब पढ़वाले जीवोका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । असंजियोमे क्षेत्रके समान और अनाहारक जीवामे कार्मणकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है,यह स्पष्ट ही है। इस प्रकार स्पर्शन समाप्त हुआ। कालप्ररूपणा १६६. काल दो प्रकारका है-ओष और आदेश | ओघसे पॉच ज्ञानावरण. छह दर्शनावरण, आठ कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायके तीन पढोके बन्धक जीयाका कितना काल है। सर्वदा काल है। अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल सस्यात समय है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, आठ कपाय और औदारिकशरीरके तीन पदोके बन्धक जीवोका सर्वदा काल है। तथा इनके अवक्तव्य पदके वन्धक जीवों का जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असख्यातवे भागप्रमाण है। तीन आयुओके भुजगार और अल्पतरपदके वन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। वैक्रियिकपटकके दो पदोके बन्धक जीवोका काल सर्वदा है। तथा अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। आहारकद्विकके दो पढोके वन्धक जीवोका काल १. ता० प्रतौ 'एव फोसणं समत्त' इति पाठो नास्ति । २. ता०प्रतौ 'आहारदुगु [ग]' इति पाट ।
१८7 भुजगारवंचे फोसणाणुगमो जह० एग०, उक्क० संखेंजसम०। तित्थ० देवगदिभंगा । णवरि अवत्त० जह० एग०, उक० संखेजसम० । सेसाणं चत्तारि पदा सब्बद्धा । । सर्वदा है । तथा अवस्थित और अवक्तन्यपदके वन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है । तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग देवगतिके समान है । इतनी विशेषता है कि अवक्तव्य पदके वन्धक जीवांका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। शेष प्रकृतियोंके चार पदोके बन्धक जीवोका काल सर्वदा है। विशेषार्थ—पॉच ज्ञानावरणादिके तीन पदोका बन्ध एकेन्द्रियादि जीव भी करते है, अत इनके इन पदवाले जीवोका काल सर्वदा कहा है । तथा इनका अवक्तव्यपद या तो उपशमश्रेणिसे रतरते समय होता है या उपशमणिमै इनकी बन्ध-व्युच्छित्तिके बाद मरकर देव होनेपर होता है और उपशमश्रोणिपर निरन्तर चढ़नेका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्य पढवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है । मात्र उक्त प्रकृतियोमे प्रत्याख्यानावरणचतुष्क भी है सो इनके अबक्तव्य- पदका जघन्य और उत्कृष्ट काल संयत जीवोको नीचे लाकर प्राप्त करना चाहिए | आगे जिन प्रकृतियाँके जिन पदोका सर्वदा काल कहा है सो कही तो उसका पूर्वोक्त कारण है और कही उसका किसी-न-किसीके निरन्तर बन्ध होना कारण है । इसलिए यह उस प्रकृतिके बन्ध स्वामीका विचार कर ले आना चाहिए। जिन प्रकृतियोंके जिन पदोका काल उससे भिन्न है, उसका स्पष्टी- करण इस प्रकार है-पहले त्यानगृद्धि आदिके अवक्तव्यपदका काल एक जीवकी अपेक्षा एक समय बतला आये हैं। यदि नाना जीव इन प्रकृतियोंका अवक्तव्य करे तो एक समय तक तो कर ही सकते हैं, क्योंकि सासादनसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानकी राशि पल्यके असं- ख्यातवे भागप्रमाण है। उसमसे कुछ जीव यदि मिथ्यात्व आदि गुणस्थानोमे आते है तो एक समय तक आकर अन्तर भी पड़ सकता है। इसलिए तो इन प्रकृतियोके अवक्तव्यपदका जघन्य काल एक समय कहा है और यदि पूर्वोक्त जीव निरन्तर मिथ्यात्व आदि गुणस्थानाको प्राप्त हावे तो आलिके असंख्यान भागप्रमाण काल तक होगे। इसलिए इन प्रकृतियोंके अवक्तव्यपढ़का उस्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । प्रत्येक आयुका बन्धकाल अन्तर्मुहूर्त है । तथा नरकायु. मनुष्यायु और देवायुका वन्ध एक साथ यदि अधिकसे अधिक जीव कर तो असंख्यात ही कर सकते हैं। तथा भुजगार और अल्पतर पदका एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थितपदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल सात समय है और अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। यह मब देखकर यहाँ उक्त तीन आयुओके भुजगार और अल्पतरपदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यात भागप्रमाण तथा शेप दो पदोका जघन्य काल एक समय और उस्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। वैक्रियिकपटकके अवस्थित और अवक्तव्यपदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। आहारकद्विकका बन्ध सख्यात जीव ही करते हैं, इसलिए इनके अवस्थित और अवक्तव्यपनका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। तीर्थकर प्रकृतिका भग देवगतिके समान है,यह स्पष्ट ही है । किन्तु इसका अवक्तव्यपद करनेवाले जीव संख्यात ही हो सकते हैं. अत इसके उक्तपदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल मंख्यात समय कहा है। यहाँ शेष पदसे ये प्रकृतियाँ ली गई हैं-दो वेदनीय, सात नोकपाय, १. ताप्रती 'ज० ए० सखेजसम०' इति पाठ ।
0 १८२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे १६७. णिरएसु धुवियाणं दोपदा सम्बद्धा० । अवढि० जह० एग०, उक्क० आवलि.' असंखें । एवं तित्थयरं । णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क० संखेंजस पढमाए तित्थ०' अवत्त० णस्थि । सेसाणं पगदीणं भुज०-अप्प० सम्बद्धा । अवढि० अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । तिरिक्खाउ० ओघं णिरयाउभंगो। मणुसाउँ० भुज-अप्प० जह• एग०, उक्क० अंतो० | अवढि०-अवत्त० जह० एग०, उक्क० संखेजसम० । एवं णेरइगाणं णेदव्वं । १६८. तिरिक्खेसु धुवियाणं तिण्णि पदा सवद्धा । सेसाणं ओघं । पंचिंदिय- तिर्यञ्चायु, दो गति, पाँच जाति, छह संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, सादि दस युगल और दो गोत्र । १६७. नारकियोमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके दो पदवाले जीवोंका काल सर्वदा है। अवस्थितपदके वन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । इसी प्रकार तीर्थकरप्रकृतिकी अपेक्षा काल जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। मात्र प्रथम पृथिवीमें तीर्थकर प्रकृतिका अवक्तव्यपद नहीं है। शेष प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतर पदके बन्धक जीवोका काल सर्वदा है। इनके अवस्थित और अवक्तव्य पदके वन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भाग- प्रमाण है। तिर्यञ्चायुका ओघसे नरकायुके समान भङ्ग है। मनुष्यायुके भुजगार और अल्पतर- पदके वन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। इसीप्रकार सब नारकियोमे ले जाना चाहिए। विशेषार्थ—यहाँ मनुष्यायुको छोड़कर शेप सब प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतर पदवाले जीवोका काल सर्वदा है,यह स्पष्ट ही है । तथा नारकी जीव असंख्यात हैं, इसलिए यहाँ जिन प्रकृतियोका अवस्थितपद सम्भव है और जिन प्रकृतियोंके अवस्थित और अवक्तव्य दोनों पद सम्भव हैं, उनके इन पदोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। मात्र तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्यपदवाले जीव और मनुष्यायुके अवस्थित और अवक्तव्यपदवाले जीव संख्यातसे अधिक नहीं हो सकते । यही करण है कि यहॉपर इन दो प्रकृतियोंके उक्त पदवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। तीर्थकर प्रकृतिका अवक्तव्यपद प्रथम नरकमे नहीं होता, यहॉ इतना विशेष जानना चाहिए । एक बात और है और वह तिर्यश्चायुके सम्बन्धमे है। बात यह है कि किसी भी आयुका बन्ध आयुवन्ध के कालमें अन्तर्मुहूर्तसे अधिक काल तक नहीं होता है और नारको जीव असंख्यात हैं, इसलिए यहाँ तिर्यञ्चायुके भुजगार और अल्पतर पदवाले जीवोंका सर्वदा काल नहीं बन सकता। यही कारण है कि यहाँ इसका भङ्ग ओघसे नरकायुके समान जाननेकी सूचना की है। सब नारकियोंमें इसीप्रकार अपनी-अपनी प्रकृतियोका विचारकर काल घटित कर लेना चाहिए | १८. तिर्यञ्चोंमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों के तीन पदवाले जीवों का काल सर्वदा है। शेष प्रकृतियों का भङ्ग ओघके समान है । पञ्चेन्द्रिय तिर्यचत्रिकर्म ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार १ ता०प्रती 'ज० ए० आवलिः' इति पाठः । १. ता प्रतौ 'ओघ । णिरयाउभगो मणुसाउ.' इति पाठः।
जह भुजगारबंधे फोसणाणुगमो तिरिक्ख०३ धुवियाणं भुज०-अप्प० सव्वद्धा । अवढि जह० एग०- उक्क. आवलि. असंखें । चदुणं आउगाणं भुज-अप्प० जह० एग०, उक्क० पलिदो० असंखें । अवढि०-अवत्त० जह० एगद, उक्क० आवलि० असंखें। सेसाणं भुज०-अप्प० सम्बद्धा। अबढि० ०-अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि. असंखें। १६६, पंचिंदि तिरि अपज० धुवियाणं भुज०-अप्प० सव्वद्धा । अवढि० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें। दो आउ० भुज०-अप्प० जह०एग०, उक्क० पलिदो- वम० असंखें | अवहि०-अवत्त० • एग०, उक्क० आवलि. असंखें। सेसाणं भुज०-अप्प० सम्बद्धा । अवढि०-अवत्त--जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । एवं और अल्पतर पदके बन्धक जीवोंका काल सर्वदा है । अवस्थितपदके बन्धक जीवोकाजघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। चार आयुओके भुजगार और अल्पतरपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असख्यातवे भागप्रमाण है। अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । शेप प्रकृतियोके भुजगार और अल्पतरपदके वन्धक जीवोका काल सर्वदा है। अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। विशेषार्थ-तिर्यञ्चोंमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों ये हैं–पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, आठ कपाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तराय । सो इनके भुजगार आदि तीनो पद एकेन्द्रियादि सब जीवोके सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोका काल सर्वदा कहा है। इनके सिवा यहाँ बंधनेवाली शेष जितनी प्रकृतियाँ हैं उनकी ओघप्ररूपणा यहाँ बन जाती है, इसलिए उसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है । पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च त्रिक प्रत्येक असंख्यात होते हैं, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोके भुजगार और अल्पतर पदवालोका सब काल और जिनका अवस्थित पद है या जिनका अवस्थित और अवक्तव्य पद है, उनका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । मात्र चार आयुओ के भुजगार और अल्पतर पदवालोका सर्वदा काल नहीं बन सकता, क्योंकि इनका त्रिभागमे अन्तर्मुहूर्त तक ही आयुबन्ध होता है, इसलिए इनके इन दो पदवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है । १६६. पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तक जीवोंमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार और अल्पतर पदके बन्धक जीवोंका काल सर्वदा है । अवस्थितपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। दो आयुओके भुजगार और अल्पतर पदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है । अवस्थित और अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। शेप प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतर पदके बन्धक जीवोंका काल सर्वदा है । अवस्थित और अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय १. ता प्रतौ 'सम्वद्या [ द्वा] सन्ना। अवधि' इति पाठ । २ आ प्रती 'एग० आवलि.' इति पाठः।३ वा प्रती 'चढुगाण' इति पाठ । ४. आपतो 'अवष्टि नहः' इति पाठ ।
माहागीपगमाहियारे मानिलिदिन पनिंदिय-नग अपनगाणं पंचायाणं पारम्पजनगाणं च । २... मणुयेग धीयाण अवधि जाएग:, 31. आगलि. अमंग 1 संगपदा ओयं । वेनियल भागादगं नित्य मारमभंगो। गेमाण पनिदियतिरिक्स- भंगो। परि दोभाउ णिय-मणगाउमंगी। पजन-मणमिणीगु मध्यपगाणं आहार- गर्गम्भंगी। नदआउ० णिग्य-गणगाउभंगी। मणुगपत्ता धुपियाणं भुज अप जाएग०, उस पलिटी शगंगदिमा० । अहि० ज०० एग०, उग.. आवलि. अग एवं गत्यपगढीणं । णारि मत अहिदांगी। दीपाउ० पंचिंटियतिरिक्स अपअत्तभंगा। -- -------- भी TY TEHIT-आमगाभागामापारमादिग, पञ्चेन्द्रिय- भाग प्रमभागांमार पानामागका पार पाणी जानना चाहिए। विगपा-zinfrinterin IT अमंगा र गाइन दोनो भाभीलोर मेषगरी मायारे जागा माल मयंदा वन जाना नानगर पाना भीर आराम नागपरे गाला मिनार मोर ग गामनाममा यह निमन anipiriram गन्य माल मगय और जाट फाल अगनी, महा जग माग. मगम और गट माल पल्या भाग्यान भागमाग प्राREIt मा in marrinti मा उपन्य काल ममय और करपार माग-आदमय माग समय या मग गा ariam-मालक ममय और ना पाठ भापनि समागान भागमा प्राम होना है। यह मी निरामको ध्यान र ग. पारगा। गााअगसनी गार्गनागिनाई, उनमे गहप्रमपणा अविन पटिनोसानी है, मग उनमें परनिय नियंत्रा अपर्यामको ममान जाननेको मृगना की। २०. गमगीन पायानी नियों के अधिनपर काफः जीवोंका जान्य काल एक समय और नगार गालि भगवान भागमा प पटोके बन्धक जोका मा और ममान है। कियिकादम, आक और नीकर प्रकृतिका भज गोधने आगरकरके समान है। शेष प्रानियोका भग पोन्द्रिय तिर्योक ममान है। इतनी वियना है कि दी आयुका भग नापियांग गनुप्यायुरु मगान है। मनुष्य पर्याप्त और मनुचिनियों में मत्र प्रतियोंका भगाहारफशरीर ममान है। पार आयुभीका भग नागकियोंमें मनुप्यायुके समान है। मनुष्य अपर्यापकोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रतियांके भुजगार और अल्पतर पदके बन्धक जीवोका जघन्य फाल % समय और उत्कृष्ट काल पत्यके असरयातये भाग- प्रमाग है । भलित पदके बन्धक जीयाका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके अमंग्यातवें भागप्रमाण है। इसी प्रकार मर प्रकृतियोंके विषयमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अवक्तव्य पदका भग भवस्थित पदके समान है। दो आयुओका भन्न पञ्चेन्द्रिय तिर्यत्र अपर्याप्तकोंके ममान है। विशेषार्थ-~-मनुष्य असंख्यात्त होते हैं। इनमे अन्य सब प्रकृतियोंके पढोका काल पद्धेन्द्रिय तिर्ययोके समान बन जाता है । मात्र इनमे धुववन्धवाली प्रकृतियोका अवक्तव्यपद भुजगारबंधे कालाणुगमो १८५ २०१. देवेसु णिरयभंगो। एवं सव्वदेवाणं । णवरि सवढे मणुसि भंगो । धुविगाणं अवत्त० णस्थि । २०२. एइंदिय-पंचकायाणं मणुसाउ० ओघभंगो। सेसाणं सम्बद्धा कायजोगि- ओरालि०-णस०-कोधादि०४-अचक्खु०-भवसि०-आहारग ति ओघभंगो। ओरालिय- मि०-मदि-सुद०-असंज-तिण्णिले०-अब्भव-मिच्छा०-असण्णि ति तिरिक्खोघं । णवरि ओरालियमि० देवगदिपंच० भुज० जह० उक० अंतो० | भी सम्भव है, इसलिए इनमे इनके शेष पदवालोका काल ओघके समान कहा है । तथा वैक्रियिक- षटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका वन्ध करनेवाले मनुष्य संख्यात ही होते हैं, इस- लिए इनमे इन प्रकृतियोका भन ओघसे आहारकशरीरके समान जाननेकी सूचना की है। इसी प्रकार यहाँ नरकायु और देवायुका बन्ध करनेवाले मनुष्य भी संख्यात ही होते हैं, इसलिए इनका भङ्ग नारकियोमें मनुष्यायुके समान जाननेकी सूचना की है। मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनी ये तो संख्यात होते ही हैं, इसलिए इनमे सत्र प्रकृतियोका भङ्ग ओघसे आहारकशरीरके समान और चार आयुओका भन्न नारकियोमें मनुष्यायुके समान जाननेको सूचना की है। मनुष्य अपर्याप्त सान्तर मार्गणा है, इसलिए इसमें इस दृष्टिको ध्यानमें रखकर ध्रुववन्धवाली और इतर प्रकृतियोंके भुजगार और अल्पतर पदवाले जीवोका काल कहा है । शेष कथन सुगम है। २०१. देवोंमें नारकियोके समान भङ्ग है। इसी प्रकार सब देवोमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि सर्वार्थसिद्धिमें मनुम्यिनियोके समान भङ्ग है । किन्तु यहाँ ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंका अवक्तव्यपद नहीं है। विशेषार्थ देवो और उनके अवान्तर भेदोंमें नारकियोंके समान भङ्ग है,यह स्पष्ट ही है। मात्र सर्वार्थसिद्धिके देव संख्यात होते हैं, इसलिए उनमें मनुष्यनियोंके समान भङ्ग वन जानेसे उनके समान जाननेको सूचना की है। किन्तु मनुष्यिनियोंमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंका अवक्तव्य पद होता है,पर यहाँ नहीं होता, इसलिए उसका निषेध किया है। २०२. एकेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवामें मनुष्यायुका भङ्ग ओघके समान है। शेष प्रकृतियोंके सब पदोके बन्धक जीवोका काल सर्वदा है। काययोगी, औदारिककाययोगी, नपुंसकवेदवाले, क्रोधादि चार कषायवाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवोमें ओषके समान भङ्ग है । औदारिकमिश्रकाययोगी, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, तीन लेश्यावाले, अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञी जीवोमें सामान्य तिर्यञ्चोके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमें देवगतिपञ्चकके भुजगार पदके बन्धक जीवोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। विशेषार्थ—एकेन्द्रिय राशि तो अनन्त है। पॉच स्थावरकायिक जीवोमें वनस्पति- कायिक भी अनन्त है । शेष चार कायवाले असंख्यात हैं,फिर भी बहुत हैं, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोंके यथासम्भव सब पवाले जीव सर्वदा पाये जाते हैं, इसलिए उनके सब पदवालाका सर्वदा काल कहा है । मात्र मनुष्यायुका बन्ध करनेवाले थोड़े होते हैं, इसलिए इसका भङ्ग ओघके समान जाननेकी सूचना की है। काययोगी आदि मार्गणाओंमें ओघनरूपणा घटित हो जानेसे उनमें उसके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र जहाँ जो थोड़ी-बहुत विशेषता हो उसे जान १. ताप्रती 'सन्वा (खा)' इति पाठः । २ आ०प्रती 'जह. एग०, उक्क. अतो.' इति पाठ.!
१८६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे २०३. वेउ०मि० धुवियाणं भुज० जह• अंतो०, उक्क० पलिदोव० असंखें । सेसाणं भुज. धुवभंगो। णवरि जह० ए० । अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि. असंखें । णवरि तित्थ० ओरामिस्सभंगो। २०४. आहारमि० धुविगाणं भुज० [जह• ] उक्क० अंतो० । एवं सव्वाणं । णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क० संखेंजसमः । लेना चाहिए । औदारिकमिश्रकाययोगी आदि सब अनन्त संख्यावाली मार्गणाएं हैं, इसलिए इनमें सामान्य तिर्यञ्चोंके समान कालप्ररूपणा बन जानेसे उनके समान जाननेको सूचना की है । मात्र औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमें देवयतिपञ्चकके भुजगार पदके बन्धक जीवोका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होनेसे वह उक्त प्रमाण कहा है। २०३. वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार पदके बन्धक जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। शेष प्रकृतियोंके भुजगारपदके बन्धक जीवोका भड्न ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियोके समान है । इतनी विशेषता है कि इनके भुजगार पदके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है। तथा अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इतनी विशेषता है कि तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंके समान है। विशेषार्थ-वैक्रियिकमिश्रकाययोग यह सान्तर मार्गणा है और इसका जघन्य काल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है, इसीसे यहाँ ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके भुजगार पदवाले जीवोंका जघन्य काल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है । शेष प्रकृतियोके भुजगार पदवालोका भङ्ग ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकेसमान है, इसलिए कहा है कि इनके भुजगार पदवाले जीवोंका उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण बन जाता है पर इनका अवक्तव्यपद भी होता है, इसलिए इनके भुजगार पदवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय प्राप्त होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है। इनके अवक्तव्य पवाले जीवोका जघन्य काल एक समय है,यह स्पष्ट ही है । तथा इनका प्रमाण असंख्यात है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदवाले जीवोंका उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। औदारिक- मिश्रकाययोगी जीवोंके समान वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवामे भी तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले जीव अधिकसे अधिक संख्यात ही हो सकते हैं, इसलिए इनमै तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंके समान जाननेकी सूचना की है। २०४. आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके भुजगार पदके बन्धक जीवोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है। इसी प्रकार सब प्रकृतियोका जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। विशेषार्थ-आहारकमिश्रकाययोगका नाना जीवोकी अपेक्षा भी जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है, इसलिए इनमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों के भुजगार पदवाले जीवोका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त कहा है । मात्र अन्य प्रकृतियोंका अवक्तव्य पद भी होता है। किन्तु लगातार भी उसे संख्यात जीव ही कर सकते हैं, इसलिए इस पदवाले जीवों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय प्राप्त होनेसे तत्प्रमाण कहा है।
१८७ भुजगारबंधे कालाणुगमो २०५. कम्मइ० धुवियाणं भुज० सन्नद्धा । मिच्छ० अवत्त० ओघं । सेसाणं भुज-अवत्त० सन्नद्धा । णवरि देवगदिपंचग० भुज० जह० एग०, उक्क० संखेंजसम'। एवं अणाहार। २०६. अवगदवे. भुज-अप्प० जह० एग०, उक्क० अंतो० | अचट्ठि०-अवत्त. जह० एग०, उक्क० संखेंजसम० । एवं सुहुमसं ० । एसिमसंखेंजरासी तेसि णिरयभंगो । एसि संखेंजरासी तेर्सि मणुसि भंगो । सासण-सम्मामि० मणुसअपजत्तभंगो। एवं कालं समत्त २०५. कार्मणकाययोगी जीवों मे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियों के भुजगार पदके बन्धक जीवों का काल सर्वदा है। मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवों का काल ओघके समान है। शेष प्रकृतियों के भुजगार और अवक्तव्यपदका काल सर्वदा है। इतनी विशेषता है कि देवगतिपञ्चकके भुजगार पदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। इसी प्रकार अनाहारक जीवों में जानना चाहिए। विशेषार्थ कार्मणकाययोगी जीव अनन्त होते हैं, इसलिए इनमे सव प्रकृतियों के भुजगार पदका काल सर्वदा वन जाता है। मात्र यहाँ मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद ऐसे हीजीवप्राप्त करते हैं जो कार्मणकाययोगके कालमें ऊपरके गुणस्थानोंसे मिथ्यात्वको प्राप्त होते हैं। यह सम्भव है कि ऐसे जीव एक समय तक हो और द्वितीयादि समयों में नहीं हों और यह भी सम्भव है कि वे लगातार असंख्यात समय तक होते रहें, इसलिए यहाँ इसके अवक्तव्यपदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। तथा यहाँ देवगतिपञ्चकके बन्धक जीव एक समयसे लेकर संख्यात समय तक ही हो सकते हैं, इसलिए इनके भुजगार पदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। अनाहारक जीवों में यह प्ररूपणा बन जाती है, क्योंकि यहाँ संसार दशामे अनाहारक दशा और कार्मणकाययोगका सहभावी सम्बन्ध है, इसलिए उनमें कार्मणकाययोगी जीवोंके समान जाननेकी सूचना की है। शेष कथन सुगम है। २०६. अपगतवेदी जीवोंमे भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। अवस्थित और अवक्तव्य पदका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। इसी प्रकार सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत जीवोंमें जानना चाहिए | तथा जिन मार्गणाओंमे जीवराशि असंख्यात है,उनमें नारकियोके समान भङ्ग है और जिन मार्गणाओंमें जीवराशि संख्यात है, उनमें मनुष्यिनियोके समान भन है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यावष्टि जीवोमें मनुष्यअपर्याप्तकोके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-कर्मबन्ध करनेवाले अपगतवेदी जीवोका काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इनमें भुजगार और अल्पतर पदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। १. ता० प्रवौ 'ए० [उक०] संखेजसः' इति पाठः । २. ता. प्रतौ एवं (सि) असखेजरासी' इति पाठ.। ३. ता. प्रतौ 'एवं (सिं) सखेबरासि' इति पाठः। ४. ता. प्रतौ 'एवं कालं समत्त' इति पाठो नाति ।
१८८ महामंधे पदेसबंधाहियारे अंतरपरूवणा २०७. अंतराणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा०-छदंस०-चदुसंज०- भय-दु०-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-[उप०-णिमि०-पंचंत० तिणि पदा णत्थि अंतरं। अवत्त० जह० एग०, उक्क० वासपुध० । थीणणि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४ तिणि पदा णस्थि अंतरं। अवत्त० जह० एग०', उक्क० सचरादिदियाणि । एवं अपचक्खाण०४ । [णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क० चाँइस रादिदियाणि । पञ्चक्खाण०४ एवं चेव । ] णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क० पण्णारसरादिदियाणि । दोवेदणी-सत्तणोक०- तिरिक्खाउ०-दोगदि-पंचजादि-छस्संठा०-ओरा अंगो०-छस्संघ०-दोआणुक-पर-उस्सा.. आदाउजो०-दोविहा०-तसादिदसयुग०-दोगोदः सव्यपदाणं णत्थि अंतरं । तिष्णि- आउगाणं भुज-अप्प०-अवत्त० जह० एग०, उक० चउवीसं मुहु० । अवढि० जह एग०, उक्क० सेढीए असंखें । वेउन्वियछक्कं आहारदुर्ग दोपदा णस्थि अंतरं । अवट्ठि. " तथा अपगतवेदको लगातार संख्यात समय तक संख्यात मनुष्य ही प्राप्त हो सकते हैं, इसलिए यहाँ अवस्थित और अवक्तव्य पदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। सासादन और सम्यग्मिथ्यात्व ये सान्तर मार्गणाएँ हैं और इनका काल मनुष्य अपर्याप्तकोके समान है, इसलिए इनमे मनुष्य अपर्याप्तकोके समान जाननेकी सूचना की है। इस प्रकार काल समाप्त हुआ। अन्तरप्ररूपणा २०७. अन्तरानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओष और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायके तीन पदोका अन्तरकाल नहीं है । अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके तीन पदोका अन्तरकाल नहीं है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर सात दिन-रात है। इसी प्रकार अप्रत्याख्यानावरणचतुप्फके विपयमें जान लेना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर चौदह दिन-रात है। प्रत्याख्यानावरण चतुष्कका इसी प्रकार भन्न है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पन्द्रह दिन-रात है। दो वेदनीय, सात नोकपाय, तिर्यश्चायु, दो गति, पॉच जाति, छह संस्थान, औदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, सादि दस युगल और दो गोत्रके सब पदोका अन्तरकाल नहीं है। तीन आयुओके भुजगार, अल्पतर और अवतव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर चौबीस मुहूत है । अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यात भागप्रमाण है। वैक्रियिकपट्क और आहारकद्विकके दो पदोंका अन्तरकाल नहीं है। अवस्थित- १. ता प्रती 'अवत्त० न०] ए.' इति पाठः । २. ता प्रतो-दस-(यु.) टोगोट०' इति पाठ.!
१८९ भुजगारवंधे अंतगणुगमो जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें । अवत्त० जह० एग०, उक्क० अंतो० । ओरालि. तिणि पदा णत्यि अंतरं । अवत्त० जह० एग, उक्क० अंतो० । तित्थ भुज० अप्प० णत्यि अंतरं। अबढि० जह० एग०, उक्क० सेडीए असंखें । अवत्त० जह० एग०, उक्क. वासपुध० । एवं ओषभंगो कायजोगि-ओरालि०-लोभ०-अचक्खु०-भवसि०- आहारग ति। पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर नगनोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अवक्तन्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। औदारिकशरीरके तीन पदोंका अन्तरकाल नहीं है । अवक्तव्यपदका जयन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। तीर्थकर प्रकृतिके भुजगार और अल्पतरपदका अन्तरकाल नहीं है। अवस्थित- पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगभोणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवकन्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है। इस प्रकार ओपके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, लोभकपायवाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवोंमें जानना चाहिए । विशेषार्थ-पॉच ज्ञानावरणादि और स्त्यानगृद्वित्रिक आदिके तीन पद एकेन्द्रियादि तीवोंके भी होते हैं, इसलिए इन पदोका अन्तरकाल नहीं कहा है। तथा उपशमश्रेणिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व प्रमाण है, इसलिए पॉच ज्ञानावरणादिके अवस्वन्य पदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण कहा है। तथा उपशमसन्यक्त्वका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर सात दिन-रात है। तदनुसार सन्यक्त्वसे च्युत होकर मिथ्यात्वको प्राप्त होनेवाले जीवोका अन्तरकाल भी उतना ही है, इसलिए स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर सात दिन-रात कहा है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और प्रत्याख्यानावरणचतुष्कके भुजगार आदि तीन पदोका अन्तरकाल न होनेका वही कारण है जो पॉच ज्ञानावरणादिके समय कह आये हैं। तथा उपशमसम्यक्त्वके साथ संवतासंयतगुणस्थानका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर चौदह दिन-रात है । और उपशमसम्यक्त्वके साथ संवतका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पन्द्रह दिन-रात है। तदनुसार कमसे कम एक समयतक और अधिकसे अधिक चौदह और पन्द्रह दिन-रात तक जीव क्रमसे संयतासंयतसे अविरत अवस्थाको और विरतसे विरताविरत अवस्थाको नहीं प्राप्त होते, इसलिए अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्याना- वरणचतुष्कके अवक्तव्य पदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर क्रमसे चौदह व पन्द्रह दिन-रात कहा है। दो वेदनीय आदिके चारो पद एकेन्द्रियादि जीव करते हैं, इसलिए इनके अन्तरकालका निषेध किया है, नरक, मनुष्य और देवगतिमें यदि कोई भी जीव उत्पन्न न हो तो कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक चौबीस मुहूर्ततक नहीं उत्पन्न होता। इसके अनुसार इन आयुओके वन्धमें भी इतना अन्तर पड़ता है, इसलिए इन तीन आयुओके भुजगार, अल्पतर और अवतन्यपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर चौबीस मुहूर्त कहा है। मात्र इनके अवस्थितपदका अन्तर योगस्थानोके अनुसार होता है, इसलिए इस पदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। वैक्रियिकषट्क और आहारकद्विकके अवस्थितपटका अन्तरकाल इसीप्रकार घटित कर लेना चाहिए । तथा इन छह प्रकृतियोंका नाना जीव निरन्तर वन्ध करते रहते हैं, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपद किसी न किसीके होते ही रहते हैं, अतः इनके अन्तरकालका निषेध महाबंधे पदेसबंधाहियारे २०८, तिरिक्खेसु धुवियाणं तिण्णि पदा णत्थि अंतरं । सेसाणं ओघं । एवं णसग०-कोध-माण-माय०-मदि-सुद०-असंज-तिण्णिले०-अभवसि०-मिच्छा० -असण्णि त्तिा PM-A .MP4. ..... PAN २०६. रइएसु तित्थ० ओघं । णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क० पलिदो० असंखें 01 सेसाणं एसिं असंखेंजरासी तेसि ओघं देवगदिभंगो । एसि संखेंजरासी तेसिं ओघं आहारसरीरभंगो । एइंदिय-पंचकायाणं सवाणं णथि अंतरं । ओरालियमि० देव- गदि०४ भुज० जह० एग०, उक्क० मासपुध० विस्थ० भुज० जह० एग०, उक्क० वास- किया है । तथा ये परावर्तमान प्रकृतियों हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपटका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहून कहा है । औदारिकशगैरके तीन पद एकेन्द्रियादिके भी होते हैं, इसलिए इनके अन्तरकालका निषेध किया है । तथा यह पगवर्तमान प्रकृति है, इसलिए इसके अबक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका नाना जीवीके निरन्तर बन्ध होता रहता है, इसलिए इसके भुजगार और अल्पतरपदके अन्तर- कालका निषेध किया है। इसके अवस्थितपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर वैक्रियिकपटकके समान घटित कर लेना चाहिए । कोई भी नया जीव तीर्थदर प्रकृतिका कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक वर्षपृथक्त्व तक बन्धका प्रारम्भ न करे यह सम्भव है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण कहा है। यहाँ काययोगी आदि अन्य जितनी मार्गणारे गिनाई हैं, उनमें यह ओघप्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, इसलिए उनमे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। २०८. तिर्यश्चीम ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके तीन पदोका अन्तरकाल नहीं है । शेप प्रक- तियोंका भग ओघके समान है। इसीप्रकार नपुंसकवेदी, क्रोधकपायवाले, मानकपायवाले, मायाकपायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुतानानी, असंयत, तीन लेश्यावाले, अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंक्षी जोवीमे जानना चाहिए। विशेपार्थ-एकेद्रियादि जीव भी तिर्यश्च हैं, इसलिए इनमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके बन्धक जीव सर्वदा पाये जानेसे उनके अन्तरकालका निषेध किया है। तिर्यश्वोमे अपनी धन्ध- प्रकृतियोको ध्यानमे रखकर शेप प्रकृतियोका भग ओधके समान है,यह स्पष्ट ही है। यहाँ गिनाई गई नपुंसकवेदी आदि अन्य मार्गणाओमे यह प्ररूपणा वन जानेसे उनमे तिर्यञ्चोके समान जाननेकी सूचना की है। २०६, नारकियामे तीर्थकर प्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। शेप मार्गणाओमे जिनकी राशि असंख्यात है, उनमें ओघसे देवगतिके समान भङ्ग है और जिनकी राशि संख्यात है, उनमें ओघसे आहारकशरीरके समान भङ्ग है। एकेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवॉम सब प्रकृतियोका अन्तरकाल नहीं है। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें देवगतिचतुष्कके भुजगारपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्वप्रमाण है। तीर्थङ्करप्रकृतिके भुजगारपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व , , १. ता प्रतो सेसाण सि] असखेजरासी' तेसिं आप्रतो सेसाण असखेजरासीण तेसि इति पाठः। २. ता प्रती एव (सि) सम्वेजगमी तेमि' आप्रतो 'एसि सग्वेजगसिं तेमि' ति पाठः ।
भुजगारवंधे अप्पाबहुआणुगमो पुधत्तं । एवं कम्मइ०-अणाहार० । एवं एदेण वीजेण याव सण्णि ति णेदव्वं । एवं अंतरं समत्त। भावपरूवणा २१०. भावाणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे। ओघे० सव्वपगदीणं भुज०- अप्प०-अववि०-अवत्त बंधगे ति को भावो ? ओदइगो भावो। एवं याव अणाहारग त्ति णेदव्यं । एवं भावो समत्तो। अप्पाबहुअपरूवणां २११. अप्पाबहुगाणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे०। ओघे० पंणा०-णवदंसणा०- मिच्छ०-सोलसक०-भय-दुगुं०-ओरालि०-तेजो०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० सव्वत्थोवा अवत्तव्वबंधगा । अवडिदबंधगा अणंतगुणो। अप्प०० असंखेंगु० । भुज. प्रमाण है। इसी प्रकार कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोंमें जानना चाहिए । इस प्रकार इस वीजपदके अनुसार संज्ञी मार्गणा तक ले जाना चाहिए। विशेषार्थ-यहाँ कुछ स्फुट सूचनाएँ मात्र दी हैं। नरकमें दूसरे व तीसरेमें जो मिथ्याष्टि से सम्यग्दृष्टि होकर पुन. तीर्थकर प्रकृतिके बन्धका प्रारम्भ करे ऐसा जीव कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण कालके अन्तरसे उत्पन्न हो सकता है, इसलिए यहाँ तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। इसीप्रकार अन्य मार्गणाओंमें इस प्रकृतिके अवक्तव्यपद का जो अन्तर कहा है,वह यहाँ उतने अन्तरकालसे होता है,ऐसा जानना चाहिए। शेष प्ररूपणा विचारकर लगा लेना चाहिए । यहाँ बीजरूपसे कही गई सूचनानुसार विस्तार कर लेना चाहिए। इस प्रकार अन्तर समाप्त हुआ। भाव २१०. भावानुगमको अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे सब प्रतियोके भुजगार, अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका कौन-सा भाव है? औदयिक भाव है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। इस प्रकार भाव समाप्त हुआ। अल्पवहुत्व २११. अल्पबहुत्वानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजस- शरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँच अन्तरायके अवक्तव्य- पदके वन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके वन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। उनसे १. ता०प्रतौ 'एवं अंतर समत्त' इति पाठो नास्ति । २. ता०प्रती एव भावो समत्तो' इति पाठो नास्ति । ३. आप्रतौ 'अवत्तवबंधगा य । अवडिदबंधगा' इति पाठः।
१६२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे पं० विसे० । सादासाद-सत्तणोक० चदआउ०-चद्गदि-पंचजादि-वेउन्विय०-छस्संठा- दोअंगो०-वस्संघ०-चदुआणु०-पर०-उस्सा०-आदाउनो०-दोविहा०-तसादिदसयुग०- दोगोद० सम्वत्योवा' अवढि० । अबत्त० असंगु० । अप्प० असंगु० । भुज० विसे० | आहारदुर्ग सम्वत्योवा अपट्टि० । अवत्त० संजगु० । अप्प० संखे०गु० । भुज० विसे । तित्थ० सम्बन्धोवा अवत्त । अवट्टि० अमंगु० । अप्प० असं०गु० । भुज. विसे । एवं ओघभंगो कायजोगि-ओग-लोभक०-अचकायु०-भवसि०-आहाग्ग चि | २१२. णिरएमु धुविगाणं सब्बयोवा अवढि० । अप्पद० असं०गु० । भुज० विसे । थीणगिद्धि०३-मिच्छर-अणंताणु०४-निन्थ० सन्चथोवा अवत्त । अवढि० असंखेंगु० । अप्प० असं०गु० । भुज० विसे० । सेमाणं ओघं साद भंगो । मणुसाउ० ओघ आहारसरीरभंगो । एवं सव्वणिरयाणं । णवरि सत्तमाए दोगदि-दोआणु०- दोगोद० थी णगिद्धिभंगो। २१३. तिरिक्सेसु धुवियाणं णिरयभंगो। सेसाणं ओघभंगो। सव्वपंचिदि०- तिरि० णिरयभंगो। णवरि मणुमाउ० ओघ आहारसरीरभंगो। । " अल्पतरपटके बन्धक जीव असरयानगुणे हैं। उनसे भुजगारपटके बन्धक जीव विशेष अधिक है। मातावेदनीय, असानावेदनीय, सान नोकपाय, चार आयु, चार गति, पाँच जाति, वैक्रियिक- शरीर, छह संस्थान, दो आगोपान, यह संहनन, चार आनुपूर्वी, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, सादि दम युगल और दो गोत्रके अवस्थितपटके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे अवक्तव्यपदके यन्धक जीव अमंल्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं । आहारकद्विको अवस्थित- पदके वन्धक जीव सबसे स्तोफ हैं। उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अल्परपढके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपटके बन्धक जीव विशेष अधिक है। तीर्थसर प्रकृतिके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपढके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीच असख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक है। इस प्रकार ओघके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, लोभ- कपायवाले, अवजुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवों में जानना चाहिए । २१२. नारकियोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अल्पतरपदके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपटके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुसन्धी चतुष्क और तीर्थवरप्रकृतिके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनमें अवस्थितपटके यन्धक असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेष प्रकृतियोंका भङ्ग ओघसे सातावेदनीयके समान है। मनुष्यायुका भङ्ग ओघसे आहारकशरीरके समान है। इसी प्रकार सब नारकियोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि सातवीं पृथिवीमें दो गति, दो आनुपूर्वी और दो गोत्रका भद्ग स्त्यानगृद्धिके समान है। २१३. तिर्यश्चामें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका भग नारकियोंके समान है। शेष प्रकृतियोंका १. आ०प्रतौ 'टोगदि० सव्यत्योवा' इति पाठः ।
. भुजगारवंधे अपाबहुआणुगमो १६३ २१४. मणुसेसु पंचणा-णवदसणा०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दु०-ओरा०- तेजा-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि-पंचंत० सम्वत्थोवा अवत्तः। अवढि० असं०गु० । अप्प० असं०गु० । भुज० विसे० । सेसाणं ओघं । णवार संखेंजरासीणं आहारसरीरभंगो । एवं मणुसपञ्जत्त-मणुसिणीसु । णवार संखेंजगुणं कादव्वं । सन्वअपजत्त- सव्वदेवाणं सन्बएइंदिय-विगलिंदिय-पंचकायाणं च णिरयभंगो । णवरि सबढे संखेंज कादच्वं । २१५. पंचिंदि०-तस०२ पंचणा०-णवदंस०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दु०-तेजा०- क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-तित्थ०-पंचंत० सम्वत्थोवा अवत्त । अवट्टि असंगु० । अप्प० असं०गु० । भुज. विसे० । सेसाणं सव्वत्योषा अवढि० । अवत्त० असं०गु० । अप्प० असं०गु० । भुज० विसे० | आहारदुगं ओघं । २१६. पंचमण-तिण्णिवचि० पंचणा०-णवदंस०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दुगुं०- भङ्ग ओघके समान है । सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यचोमें नारकियोंके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि मनुष्यायुका भङ्ग ओघसे आहारकशरीरके समान है। २१४. मनुष्योंमें पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । उनसे भुजगारपदके वन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि मनुष्योमे जिन प्रकृतियोंका संख्यात जीव वन्ध करते हैं, उनका भङ्ग ओघसे आहारकशरीरके समान है। इसी प्रकार मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनियोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें संख्यातगुणा करना चाहिए । सब अपर्याप्त, सब देव, सब एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवोंमें नारकियोंके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है-सर्वार्थसिद्धिमें संख्यात करना चाहिए। २१५. पञ्चेन्द्रियद्विक और त्रसद्विक जीवोंमें पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्ता, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण, तीर्थकर और पॉच अन्तरायके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं । शेष प्रकृायोके अवस्थितपदके यन्धक जीव सबसे तीक हैं। उनसे अवक्तव्यपदके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतर पदके बन्धक जीब असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। आहारकद्विकका भङ्ग भोपके समान है। २१६. पाँच मनोयोगी और तीन वचनयोगी जीवों में पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्सा, देवगति, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, तेजसशरीर, . १ ताप्रती 'ओ । मगुतेतु पंचणा' आ प्रती 'ओवं आहारतरीरमगो । पंचणा०' इति पाठ. । २. आप्रती 'मयदु. तेजाः' इति पाट। २५ १६४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे देवग०--ओरालि०-वेउन्वि०-तेजा-क०-ओरालि०-वेउन्वि०अंगो०-देवाणु०-अगु०४- वादर-पजत्त-पत्ते-णिमि०-तित्थ०-पंचंत० सव्वत्थोवा अवत्त० । अवढि० असं०गु० । अप्प० असं०गु० । भुज. विसे० सेसाणं ओधभंगो। ओरालियमि० णिरयभंगो । णवरि मिच्छ० सव्वत्थोवा अवत्त । अवढि० अणंतगु० । अप्प० असं०गु०। भुज. विसे । वेउन्वियका० देवभंगो। वेउब्बियमि० धुवियाणं एगपदं० । परियत्तमाणिगाणं सव- त्थोवा अवत्त । भुज० असं०गु० । आहारकायजो० सबढ०भंगो । आहारमिस्से परि- यत्तमाणिगाणं सव्वत्थोवा अवत्त० । भुज० संखेज्जगु० । कम्मइ० सम्वत्थोवा मिच्छ० अवत्त० । भुज० अणंतगु० । सेसाणं सन्वत्थोवा अवत्त० । भुज० असंगु० । २१७, इथिवेदेसु पंचणा०-चदुदंस०-चदुसंज०-पंचंत० सव्वत्थोवा अवढि० । अप्प० असं०गु०। भुज० विसे०। पंचदंस०-मिच्छ०-बारसक०-भय-दु०-ओरालि०-तेजा०- क०-वण्ण०४-णिमि० सव्वत्थोवा अवत्त० । अवढि० असंगु० । अप्प० असं०गु० । भुज. विसे । सेसाणं सव्वत्थोवा अवढि० । अवत्त० असं०गु० । अप्प० असं०गु० । भुज. कार्मणशरीर, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु- चतुष्क, बादर, पर्याप्त प्रत्येक, निर्माण, तीर्थङ्कर और पाँच अन्तरायके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतर पदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगार पदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेप प्रकृतियोका भग ओघके समान है। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें नारकियो के समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपढके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। उनसे अल्पतर पदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक है। वैक्रियिककाययोगी जीवोमें देवोंके समान भङ्ग है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंका एक भुजगारपद है । परावर्तमान प्रकृतियोके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे भुजगारपदके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आहारककाययोगी जीवोंमें सर्वार्थसिद्धिके समान भङ्ग है। आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमे परावर्तमान प्रकृतियोंके अवक्तव्य पदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे भुजगारपदके वन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। कार्मण- काययोगी जीवोमें मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं । शेप प्रकृतियोके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे भुजगार पदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। २१७. स्त्रीवेदी जीवा में पॉच ज्ञानम्मरण, चार दर्शनावरण, चार संज्वलन और पाँच अन्तरायके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अल्पतर पदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेप अधिक हैं । पाँच दर्शनावरण, मिथ्यात्व, बारह कपाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क और निर्माणके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके वन्धक जीव असख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेप प्रकृतियोके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। १. आ. प्रतौ 'तेजाक० वेउन्धि अगो देवाणु० अगु-वादर' इति पाठ.।
। ०- भुजगारबंधे आपावहुआणुगमो १६५ विस 01 आहारदुगं तित्य० मणुसि भंगो। एवं पुरिस० | णवरि तित्थ० ओघभंगो। णqसगेसु धुविगाणं अट्ठारसपगदीगं सन्वत्थोवा अवढि० । अप्पद० असं०गु० | भुज० विसे | सेसाणं ओघं। २१८. एवं कोघे० अट्ठारस० माणे सत्तारस० मायाए सोलस० । अवगदवे० सन्नपगदीणं सम्बत्थोवाअवडि० । अवत्त० संखेज्जगु० अप्प० संखेंजगु० । भुज० विसे । २१६. मदि-सुद० धुबिगाणं सम्बत्योवा अवढि० । अप्प० असंखेंजगुः । भुज विसे० सेसाणं ओघ । एवं असंजद-तिण्णिले०-अभवसि०-मिच्छा०-असण्णि ति । विभंगे धुत्रियाणं मदिभंगो । सेसाणं मणजोगिभंगो २२०. आभिणि-सुद-ओधिणा० पंचणा०-छदस०-वारसक०-पुरिस०-भय-दु०- दोगदि० पंचिंदि ] चदुसरीर-समचदु०-दोअंगो०-बजरि०-वण्ण०४-दोआणु०-अगु०४- पसत्य-तस४-सुभग सुस्सर-आर्दै-णिमि०-तित्थ०-उच्चा०-पंचंत० सम्वत्थोवा अवत्त। उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है । उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यात- गुगे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं । आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिना भङ्ग मनुष्यनियोंके समान है। इसी प्रकार पुरुषवेदी जीवोमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि तीर्थङ्करप्रकृतिका भड्ग ओवके समान है। नपुंसकवेदी जीवाम ध्रुवबन्धवाली भठारह प्रकृतियोंके अवस्थित पदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अल्पतरपदके वन्धक जीव असंख्यातणे हैं । उनले भुजगार पदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं । शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओधके समान है। २१% इसी प्रकार क्रोधकषायमें अठारह प्रकृतियोंके, मानक्रयायमे सत्रह प्रकृतियोके और मायाकरायन सोलह प्रकृतियोंके बन्धक जीवोका भङ्ग नपुंसकवेदी जीवोके समान जानना चाहिए। अपरातवेदी जीवामें सब प्रकृतियोके अवस्थितपदके वन्धक जीव सवसे स्तोक है। उनसे अवक्तव्यदके बन्धक जीव संख्यातगुणे है | उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं । उनले भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। २१६. मत्यन्नानी और श्रुताजानी जीवोमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार असंयत, तीन लेश्यावाले, अभव्य, मिथ्यावृष्टि और असंज्ञी जीवोम जानना चाहिए। विभङ्गनानी जीवामें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियाँका भङ्ग मत्यज्ञानी जीवोंके समान है। शेष प्रकृतियों का भङ्ग ननोयोगी जीवोंने समान है। २२०. आभिनिबोधिकन्नानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवामे पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण; बारह कपाच, पुरपवेद, भय, जुगुप्सा, दो गति, पञ्चेन्द्रियजाति, चार शरीर, सम- चतुरस्त्रसंस्थान, दो आङ्गोपाङ्ग, वर्षभनाराचसंहनन, वर्णचतुष्क, दो आनुपुर्वी, अगुरुलघु. चनुष्क प्रशस्त विहायोगति, सचतुष्क, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण, तीर्थकर, उचगोत्र और पाँच मन्तरायके अवतन्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव १. आप्रती अवच अहिअसंखेजगुरु यति पाठ। २. ता प्रतौ 'ससाण मोहः । एव अन्ना आमजीतनं मोहः । एवं स्वा' इति पाठः । , .
महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे अवढि० असं०गु० । अप्प० असं०गु० । भुज० विसे० । सादासाद०-चदुणोक०- दोआउ०-थिरादितिण्णियुग. आहारदुर्ग ओघभंगो । एवं ओधिदंस०-सम्मा०-खइग०- वेदग०-उवसम०। णवरि मणुसाउ० णिरयभंगो। खइगे दोआउ० मणुसि भंगो। मणपज्जवे आमिणिभंगो। णवरि संखेंज कादव्वं । एवं संजद०-सामाह० -छेदो परिहार० सुहुमसं० । संजदासजदा० ओधिभंगो । चक्खु. तसपजत्तभंगो। २२१. तेउए पंचणा०-छदसणा०-चदुसंज०-भय-दु०-तेजा०-०-वण्ण०४-अगु०४- बादर-पजत्त-पत्ते-णिमि०-चंत० सव्वत्थोवा अवढि० । अप्प० असं०गु० । भुज. विसे । थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-बारसक०-देवगदि०४-ओरालि०-तित्थ० सव्वत्थोवा अवत्त । अवढि० असं०गु० । अप्प० असं०गु । भुज० विसे० । सेसाणं सम्बत्थोवा अवढि० । अवत्त० असं०गु० । अप्प० असंगु । भुज० विसे । एवं पम्माए वि । णवरि देवगदि०४-ओरा०-ओरा अंगो०-तित्थ० अडकल्भंगो। , असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है । उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। सातावेदनीय, असातावेदनीय, चार नोकपाय, दो आयु, स्थिर आदि तीन युगल और आहारकद्विकका भग ओघके समान है। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि वेदगसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोंमे जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि मनुष्यायुका भग नारकियोके समान है। तथा क्षायिक सम्क्त्वमें दो आयुओंका भङ्ग मनुष्यिनियोंके समान है। मनःपर्ययज्ञानी जीवोंमै आभिनिबोधिक ज्ञानी जीवोके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि संख्यात कहना चाहिए। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत और सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवोंमे जानना चाहिए। संयतासंयत जीवोमे अवधिज्ञानी जीवोके समान भङ्ग है। चक्षुदर्शनी जीवोमे असपर्याप्तकोंके समान भङ्ग है। २२१. पीतलेश्यामे पॉच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, तैजस- शरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, वादर, पर्याप्त, प्रत्येक, निर्माण और पॉच अन्तरायकेअवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यात गुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, बारह कषाय, देवगतिचतुष्क, औदारिकशरीर और तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है । उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेष प्रकृतियोंके अवस्थित पदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक है। इसी प्रकार पद्मलेश्याम भी जान लेना चाहिए | इतनी विशेषता है कि देवगतिचतुष्क, औदारिकशरीर, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और तीर्थदर प्रकृतिका आठ कपायोंके समान , , " भङ्ग है। १. आप्रतौ चदुसज. तेजाक०' इति पाठः । २. ताप्रती 'अमत. असगु० भुज० विसे' इति पाठः।
। पदणिस्खेवे समुकित्तणा १६७ २२२. सुक्काए पंचणाणा०-गवदंसणा०-मिच्छ०-सोलसकसा०-भय-दु०-दोगदि- चदुसरीर-दोअंगो०-वण्ण०४-दोआणु०-अगु०४-तस०४-णिमि-तित्थ-पंचंत० सव्वत्थोवा अवत्त० । अवढि० असंगु० । अप्प० असं०गु० । भुज. विसे० । सेसाणं सादादीणं एवं चेव । णवरि सम्वत्थोवा अवढि० । २२३. सासणे धुवियाणं णिरयभंगो । देवगदि०४-दोसरीर० तेउभंगो । सेसाणं ओघं । सम्मामि० धुविगाणं सासणभंगो । सादादीणं ओघ । सण्णी० मणजोगिभंगो। अणाहार० कम्मइगभंगो। एवं अप्पाबहुगं समत्तं । एवं भुजगारखंधो समत्तो। पदणिक्खेवो समुक्कित्तणा २२४. एत्तो पदणिस्खेवे ति तत्थ इमाणि तिण्णि अणियोगद्दाराणि णादव्वाणि भवति । तं जहा-समुक्त्तिणा सामित्तं अप्पाबहुगे ति। समुक्त्तिणाए दुवि०- जह० उक्क० च। उक्क० पगर्द। दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० सव्वपगदीणं अस्थि उक्कस्सिया वड्डी उक्कस्सिया हाणी उक्कस्सयमवट्ठाणं । एवं याव अणा- २२२. शुक्ललेश्यामें पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्सा, दो गति, चार शरीर, दो आङ्गोपाङ्ग, वर्णचतुष्क, दो आनुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचतुष्क, निर्माण, तीर्थकर और पॉच अन्तरायके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सवसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतरपदके बन्धक जीव असंख्यात- गुणे हैं। उनसे भुजगारपदके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। शेष सातावेदनीय आदिका भग इसी प्रकार जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। २२३. सासादनसम्यक्त्वमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका भङ्ग नारकियोंके समान है। देवगतिचतुष्क और दो शरीरोका भङ्ग पीतलेश्याके समान है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है । सम्यग्मिथ्यात्वमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोका भड्न सासादनसम्यक्त्वके समान है। सातावेदनीय आदि प्रकृतियोका भग ओघके समान है। संज्ञी जीवोंमे मनोयोगी जीवोंके समान भङ्ग है । अनाहारक जीवामें कार्मणकाययोगी जीवोंके समान भङ्ग है। इस प्रकार अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। इस प्रकार भुगजारवन्ध समाप्त हुआ। पदनिक्षेप समुत्कीर्तना २२४. आगे पदनिक्षेपका प्रकरण है। वहाँ ये तीन अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं । यथा- समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पबहुत्व । समुत्कीर्तना दो प्रकारको है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है ओघ और आदेश। ओघसे सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट पृद्धि, उत्कृष्ट हानि और उत्कृष्ट अवस्थान है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए । १ ताप्रती 'उ० 1 [उ०] पगट' इति पाठ । २ वा प्रतौ 'उक्कस्सिया (य) मवाण' इति पाठः। ८ १६८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे हारग ति णेदव्यं । णवरि वेउन्वि०मि०-आहारमि०कम्मइ०-अणाहार० सव्वपगदीणं अस्थि उक० बड्डी । ओरालिमि० देवगदिपंचग० अस्थि उक्क० वड्डी । २२५ जह० पगदं। दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० सव्वपगदीणं अस्थि जहण्णिगा बड्डी जहण्णिगा हाणी जह० अवट्ठाणं । एवं याव अणाहारगति णेदव्वं । णवरि वेउब्वियमिस्स०-आहारमि०-कम्मइ०-अणाहार० सव्वपगदीणं अस्थि जह बड्डी । ओरालियमि० देवगदिपंच० अत्थि जह० चड्डी । एवं समुकित्तणा समत्ता। सामित्तं २२६. सामित्तं दुविधं-जह० उक्क० च । उक्क० पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा०-चदुदंस०-सादा जस०-उच्चा०-पंचेत० उक्कस्सिया वड्डी कस्स० ? जो सत्तविधवंधगों तप्पाओग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उकस्सयं जोगहाणं गदो तदो छविधबंधगो जादो तस्स उक. बड्डी । उक्क हाणी कस्स ? जो छविधवंधगो उकस्स- जोगी मदो देवो जादो तप्पाओग्गजहण्णए जोगट्ठाणे पदिदो तस्स उक्क० हाणी । इतनी विशेषता है कि वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, कामणकाययोगी और अनाहारक जीवोंमें सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट वृद्धि है। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमें देवगति- पञ्चकको उत्कृष्ट वृद्धि है। २२५. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे सव प्रकृतियोकी जघन्य वृद्धि, जघन्य हानि और जघन्य अवस्थान है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए । इतनी विशेषता है कि वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोंमे सब प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि है । औदारिकमिश्रकाय- योगी जीवोमें देवगतिपञ्चककी जघन्य वृद्धि है। विशेषार्थ यहाँ क्रियिकमिश्रकाययोगी आदि चार कार्मणाओमे उत्तरोचर योगको वृद्धि होनेसे मात्र वृद्धि सम्भव है। तथा यही बात औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमे देवगति- पञ्चके विपयमै जानना चाहिए । शेप कथन सुगम है। इसप्रकार समुत्कीर्तना समाप्त हुई। स्वामित्व २२६. स्वामित्व दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनाररण, सातावेदनीय, यश कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हो अनन्तर छह प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा वह उक्त प्रकृतियोको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? छह प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेवाला जो उत्कृष्ट योगवाला जीव मरा और देव होकर तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानमे पतित हुआ वह उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। १ ता प्रती एव अणाहारग' इति पाठ । २. ता०प्रती एव समुक्त्तिणा समत्ता । इति पाटो नास्ति । ३. तापतौ 'करस ? सत्तविधवधगो' इति पाठः । ४ ता प्रती -जहण्णय (ए)जोगहाणे' इति पाठः ।
१६६ पदणिक्खेवे सामित्तं उक्क० अवट्ठाणं कस्स ? जो छविधवंधगो उक्कस्सजोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्ग- जहण्णगे पडिदो तदो सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक्क० अवट्ठाणं । उकस्सादो जो जोगट्ठाणादो पडिभग्गो यहि जोगट्ठाणे पडिदो तं जोगहाणं थोत्रं । जहण्णगादो जोग- ट्ठाणादो यम्हि उक्सगं जोगहाणं गच्छदि तं जोगट्ठाणमसंखेंजगुणं । एवं उक्कस्सगस्स अवट्ठाणगस्स साधणं । थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-असाद०-णस०-णीचा० उक्क० वड्डी कस्स० ? जो अट्ठविधवंधगो तप्पाऑग्गजहण्णगो, तष्पाऑग्गजहण्णगादो जोग- ट्ठाणादो उक्कस्सजोगहाणं गदो सत्तविध० जादो तस्स उक० वड्डी। उक्क० हाणी कस्स ! जो सत्तविधबंधगो उकस्सजोगी मदो सुहुमणिगोदजीवअपजत्तगेसु उववण्णो तप्पाऑग्गजहण्णगे पडिदो तस्स उक्क. हाणी । उक्क० अवट्ठाणं कस्स० ? जो सत्तविध- बंधगो उक्कस्सजोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजह० जोगट्ठाणे पडिदो अढविधवंधगो जादो तस्स उक्क० अवठ्ठाणं । णिहा-पयला-पञ्चक्खाण०४-हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुं० उक्क० वड्डी कस्स० १ जो सम्मा० अट्ठविधबंधगो तप्पाओग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उक्कस्सं जोगवाणं गदो सत्तविधधगो जादो तस्स उक० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ जो सम्मा० सत्तविधवंधगो उकस्सजोगी मदो देवो जादो तप्पाऑग्गजहण्णजोगट्ठाणे उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? छह प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला जो उत्कृष्ट योगवाला जीव प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे पतित हुआ और उसके बाद सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा वह उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। उत्कृष्ट योगस्थानसे प्रतिभग्न होकर जिस योगस्थानमे पतित हुआ वह योगस्थान स्तोक है, जघन्य योगस्थानसे जिस उत्कृष्ट योगस्थानमे जाता है वह योगस्थान असंख्यातगुणा है । इस प्रकार यह उत्कृष्ट अवस्थानका साधनपद है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धोचतुष्क, असातावेदनीय, नपुंसकवेद और नीचगोत्रको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेवाला जो जीव तनायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा वह उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है । उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कमोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगवाला जी जीव मग और सूक्ष्म निगौद अपर्याप्तकोमें उत्पन्न होकर तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानमें पतित हुआ वह उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला जो उत्कृष्ट योगवाला जीय प्रतिभग्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे पतित होकर आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध करने लगा वह उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । निद्रा, प्रचला, प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्साकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मोंका वन्ध करनेवाला जो सम्यग्दृष्टि जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हो सात प्रकारके कोका बन्ध करने लगा वह उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो सम्यग्दृष्टि जीव मरा और देव होकर तलायोग्य जघन्य योगस्थानमे पतित हुआ वह उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । उत्कृष्ट , १. वा प्रतौ 'पडिभगो (ग्गो) यहि इति पाठ । २. आप्रतौ 'जोगाणे पडिटो त जोगटाणम- संखेजगुणं' इति पाठ.।
२०० महावंधे पदेसवंधाहियारे पडिदो तस्स उक० हाणी । उक्क० अवट्ठाणं कस्स० १ जो सत्तविधवंधगो उक्कस्सजोगी पडिभग्गो तप्पाऔंग्गजह जोगट्ठाणे पडिदो अट्ठविधधगो जादो तस्स उक्क० अवट्ठाणं । एवं पचक्खाण०४ । णवरि संजदासंजदादो कादव्वं । कोधसंजलणाए उक० वड्डी कस्स० ? जो मोहणीयपंचविधधगो तप्पाङग्गजहण्णजोगट्ठाणादो उकस्सयं जोगट्ठाणं गदो तदो मोहणीयस्स चदुविधधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० होणी कस्स० १ जो मोहणीयस्स' चदुविधवंधगो मदो देवो जादो तप्पाऑग्गजहण्णजोगट्ठाणे पडिदो तस्स उक० हाणी। उक्क० अवट्ठाणं कस्स० ? मोहणीयस्स चदुविधबंधगो उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजह जोगट्ठाणे पडिदो मोहणीयस्स पंचविधबंधगो जादो तस्स उक्कस्सयं अवठ्ठाणं। माणसं०-मायासं०-लोभसं० उक्क० वड्डी कस्स० १ मोहणीयस्स चदुविधवंधगो तिविधयंधगो दुविधवंधगो तप्पाऑग्गजह जोगट्ठाणादो उक्क० जोगट्ठाणं गदो तदो मोहणीयस्स तिविध० दुविधबंधगो जादो तस्स उक० वड्डी । उक्क. हाणी कस्स० १ यो मोहणीयस्स तिविध० दुविध० एयविधबंधगो मदो देवो जादो तप्पा- अँग्गजह०जोगट्ठाणे पडिदो तस्स उक्क. हाणी। उक्क० अवट्ठाणं कस्स ? यो मोहणीय. तिविध० दुविध० एकविधवंधगो उक्क०जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्ग- A-APAN अबस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीय प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगमे पतित हुआ और अनन्तर आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा वह उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । इसी प्रकार प्रत्याख्यानावरण चतुष्ककी उत्कृष्ट वृद्धि आदिका स्वामी कहना चाहिए । इतनी विशेषता है कि संयतासंयतका अवलम्बन लेकर कहना चाहिए | क्रोध संज्वलनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? मोहनीयकी पॉच प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे तत्मायोग्य उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर मोहनीयकी चार प्रकृतियोंका वन्ध करने लगा वह क्रोधसंज्वलनको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है । उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? मोहनीयकी चार प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला जो जीव मरा और देव होकर तत्त्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे पतित हुआ वह संज्वलन क्रोधकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है? मोहनीयकी चार प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरकर मोहनीयकी पॉच प्रकृतियोंका बन्ध करने लगा वह उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। मानसंज्वलन, मायासंज्वलन और लोभसंज्वलनको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? मोहनीयके चार प्रकारके, तीन प्रकारके और दो प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला जो जीव तनायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर अनन्तर मोहनीयके तीन प्रकारके और दो प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? मोहनीयके तीन प्रकारके, दो प्रकारके और एक प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला जो जीव मरा और देव होकर तत्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें पतित हुआ वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है? मोहनीयके तीन प्रकारके, दो प्रकारके और एक प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला तथा उत्कृष्ट योगसे युक्त जो १. ताप्रती 'कल्स १ मोहणीयसत्स' इति पाठः।
. पदणिक्रोवे सामित्तं २०१ जह जोग० पडिदो तदो मोहणी० चदुविध० तिविध० दुविधवंधगों जादो तस्स उक्क० अवठ्ठाणं । पुरिस० उक्क. बड्डी कस्स० ? जो मोहणीयस्स णवविधबंधगो तप्पाऑग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उकस्सगं जोगहाणं गदो तदो मोहणीयस्स पंचविधबंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० ? जो मोहणी० पंचविध- बंध० उक्क०जोगी मदो देवो जादो तप्पाओग्गजह जोग० पडिदो तस्स उक्क. हाणी | उक्क० अवठ्ठाणं कस्स ? जो मोहणी पंचविधवं. उक०जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्ग- जह जोगट्ठाणे पडिदो' मोहणी० णवविधधगो जादो तस्स उक्क० अवठ्ठाणं । इत्यिवे० उक्क० वड्डी कस्स० ? जो अट्ठविधबंधगो तप्पाऑग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उक्क० जोगट्ठाणं गदो सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक्क० चड्डी । उक्क० हाणी कस्स० ? जो सत्तविघबंधगो उक्कस्सजोगी मदो असण्णिपंचिंदिएसु उववण्णो तस्स उक्क० हाणी । उक्क० अवठ्ठाणं कस्स० ? जो सत्तविधवंधगो उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाओग्गजह. पटिदो अवविधबंधगो जादो तस्स उक्क० अबढाणं । २२७. अण्णदरे आउगे बंधमाणो पुरदो अंत्तोमुहुत्तमग्गदो अंतोमुहुत्तं याव जीव प्रतिभन्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे पतित होकर अनन्तर मोहनीयके चार प्रकारके, तीन प्रकारके और दो प्रकारके कर्मोका वध करने लगा वह उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । पुरुषवेदकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? मोहनीयके नौ प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर अनन्तर मोहनीयके पॉच प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है । उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? मोहनीयके पाँच प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और देव होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा वह उसकी स्कृष्ट हानिका स्वामी है। उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? मोहनीयके पॉच प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरकर मोहनीयके नौ प्रकारके कर्मोंका वन्ध करने लगा वह उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगग्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करने लगा वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है? सात प्रकारके कर्माका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरकर असंनी पञ्चेन्द्रियोमें उत्पन्न हुआ वह उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न हुआ और वत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरकर आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा वह उसके उत्कृष्ट अवस्यानका स्वामी है। २२७. अन्यतर आयुका वन्ध करनेवाला जीव आगेका जो अन्तर्मुहूर्त है उस अन्तर्मुहूर्त कालके समाप्त होने तक आयुकर्मका बन्ध करता है । इस प्रकार इस कालम यदि सम्यग्दृष्टि है तो १. तापतौ 'जोगहाणं पडिटो' इति पाठ १२ ता प्रतौ 'अतोमुहुत्त मं (१) गटो' इति पाठ | २०२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे आउगं बंधदि । एवं एदं कालं सम्मादिट्ठी सम्मादिट्ठी चेव, मिच्छदिट्ठी मिच्छादिट्ठी चेव, यदि सासणो सासणो चेव, यदि असंजदो असंजदो चेव, यदि संजदासजदो संजदासंजदो चेव', यदि संजदो संजदो चेव । एदं कारणं अट्ठस्स हेदू कित्तिदं । एदं कारणं दसणावरणस्स च पंचण्ण पगदीणं मिच्छत्त-बारसक० एदेसिं कम्माणं यथोप- दिवाणं उकस्सपदणिक्खेवसामित्तसाधणत्थं यो संसयो तं संसयं हिस्संसयं काहिदि त्ति एदं कारणं हेदू कित्तिदं । चदुण्णं आउगाणं उक्क० वड्डी कस्स० ? यो० अढविधबंधगो तप्पाओग्गजहण्णजोगट्ठाणादो उकस्सयं जोगहाण गदो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ यो अट्ठविधबंधगो उक्त जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजह. जोगट्ठाणे पडिदो तस्स उक्क. हाणी। तस्सेव से काले उक्क० अवट्ठाणं। एवं आउगस्स सव्वत्थ याव अणाहारग ति णेदव्वं । २२८, गिरयगदि-देवगदि-वेउत्रि०-वेउ०अंगो०-दोआणु० उक्क० वड्डी कस्स० ? यो अट्ठविधबंधगो तप्पाओग्गजह जोगट्ठाणादो उक्क० जोगट्ठाणं गदो सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ जो सत्तविधबंधगो उक्कस्सगादो जोगट्ठाणादो तप्पाऑग्गजहण्णजोगट्ठाणे पडिदो अवविधबंधगो तस्स उक्क० हाणी । तस्सेव से काले उक० अवट्ठाणं । सम्यग्दृष्टि ही रहता है, मिथ्यादृष्टि है तो मिथ्यादृष्टि ही रहता है, यदि सासादनसम्यग्दृष्टि है तो सासादनसम्यग्दृष्टि ही रहता है, यदि असंयतसम्यग्दृष्टि है तो असंयतसम्यग्दृष्टि ही रहता है, यदि संयतासंयत है तो संयतासंयत ही रहता है और यदि संयत है तो संयत ही रहता है । इस कारण विवक्षित विषयका हेतु कहा है। तथा इसी कारण यथोपदिष्ट दर्शनावरणकी पॉच प्रकृतियों, मिथ्यात्व और बारह कषाय इन कोंके उत्कृष्ट पदनिक्षेप सम्बन्धी स्वामित्वको सिद्ध करनेके लिए जो संशय है उस संशयको निःसंशय कर देता है। इस कारण हेतु कहा है। चार आयुआकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ, वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है? आठ प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभन्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त हुआ है,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा वह अनन्तर समयमै उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । आयुकर्मका सर्वत्र अनाहारक मार्गणा तक इसी प्रकार स्वामित्व जानना चाहिए । २२८. नरकगति, देवगति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और दोआनुपूर्वीकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो जीव तत्सायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला जो जीव उत्कृष्ट योगस्थानसे प्रतिभग्न होकर तत्रायोग्य जघन्य योग- १. तापतौ मिच्छादिट्टी चेव यदि असंजदो असजदो चेव यदि संनदासजदा सजदासजदा चैव' इति पाठः । २. ता०प्रतौ 'चप (प)चण' इति पाठः। ३. आ०-प्रतौ 'तप्पाओग्गजहण्णजोगहाण' इति पाठः । ४. ता०प्रतौ 'उक्करसगादो पडिदो तपाओग्गजहण्ण [जो ] गहाणे' आप्रतौ 'उक्कस्सगादो जोग- वाणादो पडिदो तापाओग्गजहण्णजोगहाणे' इति पाठः । - पदाणिक्खेचे सामिस २२६. तिरिक्खगदिणामाए उक्क० वड्डी कस्स० १ यो अट्ठविध० तप्पाओग्ग- जहण्णगादो जोगट्ठाणादो उक्कस्सयं जोगट्ठाणं गदो तदो तेवीसदिणामाए सह सत्तविध- बंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० ? जो सत्तविधबंधगो उकस्सजोगी मदो सुहुमणिगोदजीवअपजत्तगेसु उववण्णो तप्पाऑग्गजह० पडिदो तीसदिणामाए बंधगो जादो तस्स उक० हाणी । उक्क० अवठ्ठाणं कस्स० ? जो सत्तविधबंधगो उकस्स- जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजहण्णजोगट्ठाणे पडिदो अट्ठविधबंधगो जादो । ताघे ताओ चेव तेवीसदिणामाए वंधदि णो तीसं। केण कारणेण ? आउगवंधस्स अभासे जाओ चेव णामाओ ताओ चेव बंधदि याव आउगधगद्धा पुण्णो त्ति । अण्णं च पुण पुरदो अंतोमुहृत्वमग्गदो अंतोमुहुत्वं णीचा । एदेण कारणेण तेवीसदिणामाओ वंधमाणगस्स उक्कस्सयं अवहाणं णो तीसा । एवं ओरालि०-तेजा०-का-हुंड०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०- अगु०-उप०-अथिर-असुभ-दूभग-अणादे०-अजस०-णिमि० तिरिक्खगदिभंगो कादब्बो। २३०. मणुसग० उक्क० वड्डी कस्स० ? यो अवविधबंधगो जहण्णगादो जोग- स्थानको प्राप्त हुआ और आठ प्रकारके कर्मोंका वन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा वही अनन्तर समयमे उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। २२६. तिर्यश्चगति नामकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मोका वन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर अनन्तर नामकर्मकी तेईस प्रकृतियोंके साथ सात प्रकारके काँका बन्ध करने लगा वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है । उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करने- वाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और सूक्ष्म निगोद अपर्याप्तक जीवोंमे उत्पन्न होकर तथा तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त कर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोका बन्ध करने लगा,वह उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तनायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा और आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा वह उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। उस समय वह नामकर्मकी उन्हीं तेईस प्रकृतियोका वन्ध करता है तीस प्रकृतियोंका वन्ध नहीं करता क्योंकि आयुकर्मका बन्ध प्रारम्भ होते समय नामकर्मकी जिन प्रकृतियोंका वन्ध करता है, आयु- वन्धके कालके पूर्ण होने तक उन्हीं प्रकृतियोंका वन्ध करता रहता है । और भी अन्तर्मुहूर्त पूर्वसे अन्तर्मुहूर्त आगे तक उन्हीं प्रकृतियोका बन्ध करता है। इस कारणसे नामकर्मकी तेईस प्रक- तियोंका बन्ध करनेवाला जीव तिर्यञ्चगतिके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। तीस प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला नहीं। इसीप्रकार औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश.कोर्ति और निर्माणका भङ्ग तिर्यश्चगतिके समान कहना चाहिए। २२०. मनुष्यगतिकी उत्कृष्ट प्रदेशवृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला जो जीव जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी पच्चीस , १. ताप्रती 'जो ति संकेण' इति पाठ.। २. आप्रतौ 'जाओ चेव वधर्दि' इति पाठः। ३ तातो 'पुणो ति अण्ग इति पाठ ।
२०४ महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे हाणादो उक्कस्सयं जोगहाणं गदो पणवीसदिणामाए सह सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ यो सचविधवं उक०जोगी मदो मणुसअपञ्जत्तएसु उववण्णो तप्पाऑग्गजह० पडिदो एगुणतीसदिणामाए सह सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । उक्क० अवट्ठाणं कस्स० १ यो सत्तविध० उक्क जोगी पडिभम्गो तप्पा- ऑग्गजह० जोगट्ठाणे पडिदो अढविधबंधगो जादो। ताघे ताओ चेव पणवीसदिणामाए पंधदि णो एगुणतीसं । केण कारणेण ? तं चेव कारणं यं तिरिक्खगदिणामाए भणिदं । एदेण कारणेण पणवीसदिणामाए बंधमाणगस्स उक्त अवट्ठाणं णो एगुणवीसं । २३१. एइंदिय-थावर० तिरिक्खगदिभंगो। गवरि हाणी मदो छन्चीसदि- णामाए। बीइंदि०-तीइंदि०-चदुरिदि०-पंचिंदिन तस०] उक्क० चड्डी कस्स० १ मणुस- गदिभंगो । णवरि उक्क० हाणी कस्स० १ वेइंदि० तेई दि०-चदुरिदि०-पंचिंदिएसु उववण्णो तीसदिणामाए बंधगो तस्स उक्त हाणी । उक्त अवट्ठाणं कस्स० १ यो सत्तविधवंधगो उकजोगी पडिभग्गो तप्पाऑग० पडिदो अविधवंधगो जादो। प्रकृतियोंके साथ सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करने लगा, वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और मनुष्य अपर्याप्तकोंमें उत्पन्न होकर तनायोग्य जघन्य योगको प्राप्त हुआ और नामकर्मको उनतीस प्रकृतियों के साथ सात प्रकारके कर्मोंका वन्ध करने लगा,वह उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा और आठ प्रकारके कमोंका वन्ध करने लगा,वह उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। उस समय वह जीव नामकर्मको उन्हीं पच्चीस प्रकृतियोंका बन्ध करता है। उनतीस प्रकृतियोंका बन्ध नहीं करता। कारण क्या है ? वही कारण है जो तिर्यञ्चगतिनामके सम्बन्धमें कह आये हैं। इस कारणसे नामकर्मको पच्चीस प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला जीव मनुष्यगतिके उत्कृष्ट भवस्थानका स्वामी है। उनतीस प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला नहीं। २३१. एकेन्द्रियजाति, और स्थावर प्रकृतिका भङ्ग तिर्यश्चगतिके समान है। इतनी विशेषता है कि जो भरनेके बाद नामकर्मकी छन्बोस प्रकृतियोका बन्ध करता है,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, पञ्चन्दियजाति और वसको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ! इनका मन मनुष्यगतिके समान है। इतनी विशेषता है कि उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पञ्चेन्द्रियोंमें उत्पन्न होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोंका बन्ध करने लगा,वह उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है? सात प्रकारके कर्माका बन्ध करनेवाला और उत्कृष्ट योगसे शुक जो जीव प्रतिभन्न होकर तत्त्रायोग्य जघन्य योगके साथ आठ प्रकारके कोका बन्ध करने लगा,वह इनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। वह उस समय नामकर्मकी पञ्चीस प्रकृतियोंका १. ता प्रतौ 'एइंदि. थावरतिरिक्खगदि णवरि' इति पाठः ।
पदणिक्वे सामित्तं २०५ ताधेव' पणवीसदिणामाओ बंधदि णो तीसं । केण कारणेण १ तं चेव । एदं कारणं पण- वीसदिणामाओं बंधमाणगस्स उक्क० अवट्ठाणं णो तीसं । २३२. आहारदुर्ग उक० वड्डी कस्स० १ यो अट्ठविधबंधगो । तप्पाङग्गजह। जोगट्ठाणादो उक्क० जोगहोणं गदो तीसदिणामाए सह सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स ? यो सत्तविधवं० उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाओग्ग- जह० पडिदो तस्स उक्क० हाणी । तस्सेव से काले उक्क० अवठ्ठाणं । २३३. समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आर्दै उक्क० वड्डी कस्स० ? यो अट्ठ- विधबंधगो तप्पाऑग्ग० उक्क० जोगट्ठाणं गदो अट्ठावीसदिणामाए सह सत्तविध- बंधगो जादो तस्स [ उक्क०] वड्डी । उक्क. हाणी कस्स० १ यो सत्तविधबंध० उक्क० जोगी मदो देवो जादो तप्पा जहपडिदो तीसदिणामाए सह बंधगो जादो तस्स उकै. हाणी । उक्त अवट्ठाणं कस्स० १ यो सत्तविध० उक्क० जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजहण्णगे० पडिदो अट्ठविधबंधगो जादो । ताघे ताओ चेव अट्ठावीसदिणामाए बन्ध करता है। तीस प्रकृतियोका नहीं। कारण क्या है ? कारण वही पूर्वोक्त है। इस कारण नामकर्मको पञ्चीस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला जीव उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। तीस प्रकृतियोंका वन्ध करनेवाला जीव नहीं। २३२. आहारकद्विककी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोके साथ सात प्रकारके कोका बन्ध करने लगा.वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्माका वन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । तथा वही अनन्तर समयमे उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। २३३. समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मोंका वध करनेवाला जो तत्मायोग्य उत्कृष्ट योग स्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी अट्ठाईस प्रकृतियोंके साथ सात प्रकारके काँका बन्ध करने लगा वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका वन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और देव हुआ। तथा तत्यायोग्य जघन्य योगको प्राप्तकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोके साथ सात कर्मोका बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका वन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तत्यायोग्य जघन्य योगको प्राप्त हुआ और आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा, वह उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। उस समय वह नामकर्मकी उन्हीं अट्ठाईस प्रकृतियोका बन्ध करता है। तीसका नहीं। कारण १. ता प्रतौ 'ताधे व' इति पाठ । २. आ०प्रती, 'पणुवीसटिणामाए' इति पाठः । ३. तात्प्रतौ 'अप्पाओ नह' इति पाठः । ४. ता प्रतौ 'हाणी० उ० (१) क्न्स' इति पाठ ! ५ ता प्रतौ 'तीसदि- णामाए बंधगो जादो तस्से० उक्कः' इति पाठः।६. ता०आ प्रत्यो. 'अवहिवधगा' इति पाठ २०६ महाबंधे पदेसवंधाहियारे वंधदि णो तीसं । केण कारणेण ? तं चेव कारणं । एदेण कारणेण अट्ठावीसदिणामाओ बंधमाण उक० अवट्ठा० णो' तीसंबंधदि । २३४. चदुसंठा०-पंचसंघ० उक्क० वड्डी कस्स० १ यो अट्ठविधधगो तप्पा- ऑग्गजह० जोगहाणादो उक० जोगट्ठाणं गदो एगुणतीसदिणामाए सह सत्तविध- वंधगो जादो तस्स उक० बड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ यो सत्तविधबं० उक्क० जोगी मदो असण्णिपंचिंदियपजत्तएसु उववण्णो तप्पाङग्गजह० पडिदो तीसदि- गामाए सह सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक० हाणी । उक्क० अवट्ठाणं कस्स० ? यो सत्तविधवंधगो उक्क. जोगी पडिभग्गो तप्पाओग्गजहण्णगे पडिदो अट्ठविधबंधगो जादो। ताधे ताओ चैव एगुणतीसदिणामाओं वंधदि णो तीसं । केण कारणेण ? तं चेव कारणं। २३५. ओरालियअंगो०-असंपत्तसे० उक्क० वड्डी अवट्ठाणं च पंचिदियभंगो। उक्त हाणी वेइंदियअपजत्तगेसु उववण्णो तप्पा जह० जोगट्ठाणे पडिदो तीसदि- णामाए बंधगो जादो तस्स उक० हाणी। पर०-उस्सा-पजत्त-थिर-सुभ० उक० क्या है ? वहीं पूर्वोक्त कारण है। इस कारण नामकर्मको अट्ठाईस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला जीव उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। तीसका बन्ध करनेवाला नहीं। २३४. चार संस्थान और पॉच संहननकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? आठ प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी उनतीस प्रकृतियोकेसाथसात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेलगावह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव भर कर असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोमे उत्पन्न हुआ और तत्सायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मको तीस प्रकृतियोके साथ सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा, वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभम हुआ और तत्त्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त होकर आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा, वह उनके उस्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । उस समय वह नामकर्मकी उन्हीं उनतीस प्रकृतियोंका बन्ध करता है। तीसका बन्ध नहीं करता । कारण क्या है ? वही पूर्वोक्त कारण है। २३५. औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और असम्प्राप्तास्पाटिका संहननकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थानका भङ्ग पञ्चेन्द्रियोके समान है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो द्वीन्द्रिय अपर्याप्तकोमे उत्पन्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोका बन्ध करने लगा, वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। परघात, उच्छास, पर्याप्त, स्थिर, और शुभकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थानका भङ्ग पञ्चेन्द्रियोके समान है। उत्कृष्ट हानिका १. आप्रती 'उक० असाद० णो' इति पाठः। २. ता०आ प्रत्योः 'जह जोगगदो उक्क०' इति पाठः । ३. ता प्रती 'सत्तविधबंधो (धगो) जादो' इति पाटः । ४. ता०प्रतौणा [मा ] ओ' इति पाठ.। ५. ता०आ प्रत्योः 'जह० जोगी पडिदो' इति पाठः।
पदणिक्खेवे सामित्तं २०७ बड्डी अवट्ठाणं च पंचिंदियभंगो । उक्क० हाणी [ कस्स० ] ? मदो' सुहुमेइंदियपत्तगेसु उववण्णो तप्पा जह० जोगट्ठाणे तीसदिणामाए बधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । २३६. आदाव० उक्क० वड्डी कस्स० ? यो अट्ठविध० तप्पाओग्गजह जोग- द्वाणादों उक्क जोगट्ठाणं गदो छच्चीसदिणामाए सह सत्तविधवंधगो जादो तस्स- उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स ? यो सत्तविध उक्क० जोगी मदो बादरेइंदिय- पजत्तएसु उववण्णो जहण्णजोगहाणे पडिदो छब्बीसदिणामाए बंधगो जादो तस्स उक्क. हाणी । उक० अवट्ठाणं कस्स० ? जो सत्तविधधगो उक्क० जोगी पडिभग्गो अट्ठविध धगो जादो । ताघे चेव छव्वीसदिणामाए बंधदि । उजोव० उक्क० वड्डी आदावभंगो । उक्क० हाणी० [ कस्स ] ? मदो वादरएसु उववण्णो तीसदिणामाए बंधगो जादो तस्स उक्क. हाणी । उक्क० अवट्ठाणं कस्स० ? यो सत्तविध० उक० जोगी पडिभग्गो अढविधवंधगो जादो । ताधे वि नाओ चेव छच्चीसदिणामाओ बंधदि णो तीसं । केण कारणेण ? तं चेव कारणं । एदेण कारणेण छब्बीसदिणामाओ बंधभाणगस्स उक्त अवडाणंणो तीसदि० बंध० । स्वामी कौन है ? जो मरकर सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तकोमे उत्पन्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोका बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका । स्वामी है। २३६. आतपकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी छब्बीस प्रकृतियों के साथ सात प्रकारके कर्मों का वन्ध करने लगा, वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का वध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकोंमे उत्पन्न होकर जघन्य योगस्थानको प्राप्त हुआ तथा नामकर्मकी छब्बीस प्रकृतियोका वन्ध करने लगा,वह उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध करने लगा,वह आतपके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । वह उस समय नामकर्मकी छब्बीस प्रकृतियोका बन्ध करता है। उद्योतकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी आतपके समान है । उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो जीव मरा और चादरोमे उत्पन्न होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोंका बन्ध करने लगा,वह उद्योतकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उसके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभन्न होकर आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उसके उत्कृष्ट अवस्थान- का स्वामी है। वह उस समय भी नामकर्मकी उन्हीं छब्बीस प्रकृतियोका बन्ध करता है। तीसका नहीं । कारण क्या है ? वही पूर्वोक्त कारण है। इस कारणसे नामकर्मकी छब्बीस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला-जीव उद्योतके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। तीस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला जीव नहीं। १. ता.प्रतौ 'हाणी [कस्स ? ] महो' इति पाठ । २. आ०प्रती 'यो अवहिद० तप्पाओग्गनहरू- जोगहाणाटो' इति पाठः।
महाबंधे पदेसबंधाहियारे २३७. अपसत्थ०-दुस्सर० उक० बड्डी देवगदिभंगो । उक्क० हाणी कस्स० १ मदो गेरइएसु उवचण्णो तीसदिणामाए बंधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । उक्क० अवट्ठाणं समचदुभंगो । सुहुम-अपज०-साधार० उक्क० वड्डी तिरिक्खगदिभंगो । हाणी तं चेव पणधीसदिणामाए बंधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । उक्क० अवट्ठाणं कस्स ? यो सत्तविधबंधगो एवं याव अढविध जादो ताधे वि ताओ चेव तेवीसदिणामाएं बंधदि णो पणवीसं तरस उक० अवट्ठाणं । बादरणामाए उक्क० वड्डी अवट्ठाण तिरिक्खगदिभंगो । हाणी० १ मदो चादरएइंदियअपञ्जत्तएसु उववण्णो तीसदिणामाए पंध० जादो तस्स उक० हाणी । पत्तेयसरीरं तिरिक्खगदिभंगो। णवरि णियोद वज पत्तेयसरीरसुहुमेसु उववण्णो । तित्थ० उक० बड्डी अवट्ठाणं णग्गोदभंगो। उक्क० हाणी कस्स ? जो सत्तविध उक्क० जोगी मदो देव-णेरइएसु उववण्णो तप्पाऑग- जह० पडिदो तीसदिणामाए बंधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । एदेण वीजेण गेरहग- देवेसु सव्वपगदीणं उक० चड्डी अवडाणं हाणीओ च ओवं देवगदिभंगो। एवं सम्बणिरय-देवाणं । २३८. तिरिक्खेसु पंचणा०-दोवेदणी-दोगोद०-पंचंत० वड्डि-हाणि-अवट्ठाणाणि २३७. अप्रशस्त विहायोगति और दुःस्वरकी उत्कृष्ट वृद्धिका म्वामी देवगतिके समान है। इनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कीन है जोजीवमराऔरनारकियोमै उत्पन्न होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोका बन्ध करने लगा, वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। इनके उत्कृष्ट अवस्थानका भङ्ग समचतुरस्त्रसंस्थानके समान है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी तिर्यञ्चगतिके समान है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? वही जीव जब नामकर्मकी पच्चीस प्रकृतियोका बन्धक हुआ तब उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है जो सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला इसी प्रकार आठ प्रकारके कर्मों का वध करनेवाला हुआ वह उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। वह तब भी नामकर्मकी उन्हीं तेईस प्रकृतियोका बन्ध करता है। पचीस प्रतियोका बन्ध नहीं करता । बादरनामकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थानका भग तिर्यश्चगतिके समान है। उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो जीव मरा और बादुर एकेन्द्रिय अपर्याप्तकोमे उत्पन्न होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोका बन्ध करने लगा,वह उसकी उत्कृष्ट हानि- का स्वामी है। प्रत्येकशरीरका भन तिर्यञ्चगतिके समान है। इतनी विशेषता है कि निगोदको छोड़कर जो प्रत्येकशरीरसूक्ष्मामें उत्पन्न हुआ, ऐसा कहना चाहिए । तीर्थकर प्रकृतिकी वृद्धि और अवस्थानका स्वामी न्यग्रोधपरिमण्डल संस्थानके समान है। इसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है। सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरकर देव नारकियोंमें उत्पन्न हुआ और तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोंका बन्ध करने लगा, वह उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । इस वीजपदके अनुसार नारकी और देवोंमे सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट वृद्धि, उत्कृष्ट हानि और उत्कृष्ट अवस्थानके स्वामीका भङ्ग ओघसे देवगतिके समान है। इसी प्रकार सब नारकी और देवोंमे जानना चाहिए। २२८. तिर्यश्चामे पाँच ज्ञानावरण, दो वेदनीय, दो गोत्र और पॉच अन्तरायकी उत्कृष्ट १. ता०प्रतौ 'सत्तविधबधः । एवं' इति पाठः । २. ता.आप्रत्योः तेत्तीसदिणामाए' इति पाठः ।
पणिक्खेवे सामि २०६ ओवं थीणगिद्विभंगों । चाउ०-वे ब्वियछक मणुस०-मणुसाणु०- उच्चा० तिणि वि सत्यापी काइव्वं । ओषेण अट्ठावीसाए सह उकासं तेसि कम्माणं सत्याणे काढव्वं । तिगि बि एसि सम्मादिट्ठी सामित्तं तेसिं सत्याणे काददं । सेसाणं ओघं । २३६. पंचिंदियतिरिक्व०३ पंचणाणावरणदंडओ थीणगिद्धि०३-मिच्छ०- अणंताणु०४-असाढ०-गईस-णीचा० उक० वड्डी कस्स० ? यो अवविधबंधगो नप्पाओगाजहण्णगादो जोगहाणादो उकस्सगं जोगहाणं गदो तस्स उक० वड्डी । उक० हाणी कम्स ? जो सत्तविधधगो उक्क जोगी मदो असण्णिपंचिदियअपजत्तगेसु उववष्णो नस्स उक्त० हाणी । उक. अबढाणं कस्स ? यो सत्चविध० उक्कस्सजोगी पडिभगो अविधवंधों जादो तस्त उक्त अवट्ठाणं । छदंस-हस्स-रदि-अरदि-सोग- भय-दुगुं० उक० बड्डी कस्स० ? अट्ठविधव० तुप्पाऑग्गजहण्णजोगहाणादो उकस्स- जोगहाणं गदो सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक० बड्डी । उक्क० हाणी कस्स ? जो सत्तविश्वगो उक्कजोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजहण्णजोगवाणे पडिदो तस्स उक्क० हाणी । तस्लेव से काले उक० अबढाणं । अपञ्चक्वाण०४ असंजदसम्मादिहि, वृद्धि हानि और अवस्थानचा स्वामी ओवले त्यानगृद्धिके समान है। चार आत्रु, वैक्रियिकपटक, ननुयगति. मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रके तीनों पदोंका स्वामित्व न्वस्थानमें कहना चाहिए । गंजबाईल प्रकृतिगक सायजिनका उकृष्ट स्वामित्व है, उनका स्वस्थान करना चाहिए। जिनके तीनों पदाँशा तम्मन्दृष्टि बानी है, उनने बयानमें कहना चाहिए। शेष प्रकृतियोंका भङ्ग ओवके २२६. पझेन्द्रिय विर्यचत्रिनमें पाँच ब्रानावरण दण्डक, स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, जनन्नानुबवाचतुष्क; सातावदनीय. नपुंसकवेद और नीचगोत्रकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? भाकारके कर्मों का अन्य करनेवाला जो तस्रायोन्य जयन्य बोगस्थानसे उत्कृष्ट योग- स्थानो प्राव हुआ वह कृष्ट वृद्धिमा स्वामी है । उन| उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात चारके कनों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और असंजी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तऋन उत्पन्न हुआ,बह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी फैन है ? सात प्रकारके कर्मों का वन्य करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीब प्रतिभग्न होकर प्रचारके कर्मों का बन्द करने लगा,वह उनके उत्कृष्ट अवत्यानका स्वानी है। वह दर्शनावरण, हात्य रनि: अति. शाम मय और जुगुलाकी स्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कौन बन्ध करनेवाला जो जीव तनायोन्य जयन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ और सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा, वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिकान्गनी बौन है ? सात प्रकारके कौन बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रविमग्न होकर बनायोग्य जवन्य योगस्यानको प्राम हुमा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। क्या वही जनन्तर समय उनके उत्कृष्ट अवस्थानना खानी है । अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके १. दाताओ। थानगिदिमंग' इति पास। २. याप्रती 'उफ् माग इति पाठः। ३. हम अप्रती अष्टिधा' इति पर । ४. ताम्प्रती जोगटाणं उकन्न- इंग्छः सन्।ि २१० महाबंधे पदेसर्वधाहियारे पञ्चक्खाण०४ संजदासंजदस्स । एवं संजलणचत्तारि चढ़आउ-चदुगदि-चदुजादि० एदाणि देवगदिभंगो। पंचिंदियनादि-चदुसंठा-ओरा०अंगो०-छस्संघ० उक० पड्डि-हाणि- अवहाणाणि णाणावरणभंगो। णवरि हाणी असणिपंचिंदियअपअत्तगेसु उवषण्णो । चदुसंठा०-चदुसंघ० असण्णिपंचिंटियपज स उववण्णो । २४०. पंनिनियतिरिक्खअपजत्त. पंचणा०-णवदसणा०-दोवेद-मिच्छ०- सोलसक०-णस०-छपाक-पंथिदि०-ओरालि अंगो०-असंप० उ० वड्डी हाणी अवट्ठाणं तिरिक्खगदिभंगो । णवरि हाणी असण्णिपंचिदिएमु उवषण्णो । सेसाणं सत्थाणे वड्डी हाणी अवठ्ठाणं कादव्यं । एवं सब्बअपञ्जत्तगाणं । णवरि अप्पप्पणो अपजत्तगेसु उववण्णो। २४१. मणुस०३ तिरिक्सभंगो। णवरि सम्मादिहि-उवसम - खवगपगढीणं बड्डी अवठ्ठाणं मूलोपं । हाणी अवठ्ठाणम्हि कादव्यं । २४२. एइंदिगम् दोआणि मणुसगदि-चदुजादि-पंचसंठा ओरालि अंगो०- छस्संघ०-मणुसाणु०-दीविहा०-तस-सुभग-दोसर-आदें-उच्चा० चड्डी हाणी अवट्ठाणं च सब पढोका स्वामी असंयतमम्यग्दृष्टि और प्रत्यास्यानारण चतुष्कके मब पढोका स्वामी संयता- संयत जीव है । इसी प्रकार चार संज्वलनके स्वामित्वके विपयम जानना चाहिए | चार आयु, चार गति और चार जाति इनका भग देवोंके समान है। पञ्चेन्द्रियजाति, चार संस्थान, औदारिकशरीर आद्गोपाल और छह संहननकी उत्कृष्ट हानि वृद्धि और अवस्थानका भग जानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि जो असंगी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तकोमें उत्पन्न हुआ, वह इनकी हानिका स्वामी है । तथा असंनी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोम उत्पन्न हुआ जीव चार संस्थान और चार महननकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। २४०. पञ्चेन्द्रिय तिर्वश्च अपर्याप्तकामे पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नपुसकवेद, यह नोकपाय, पञ्चन्द्रियजाति, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और असम्प्राप्तामृपाटिकामंहननकी उत्कृष्ट वृद्धि, हानि और अवस्थानका भग तिर्यञ्चोके समान है। इतनी विशेषता है कि जो असंजी पञ्चेद्रियोमे उत्पन्न होता है, वह उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। शेप प्रकृतियाको उत्कृष्ट बद्धि, हानि और अवस्थान स्वस्थानमे करना चाहिए। इसी प्रकार सब अपर्याप्तकोमं जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अपने-अपने अपर्याप्तकोमे उत्पन्न हुआ जीव स्वामी है। २४१. मनुप्यत्रिकम तिर्यबोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि सम्यग्दृष्टिसम्बन्धी तथा उपशम और क्षपक प्रकृतियोंकी वृद्धि और हानिका भड्ग मूलोघके समान है। हानि अवस्थानमे करनी चाहिए। २४२. एकेन्द्रियोमे दो आयु, मनुष्यगति, चार जाति, पॉच संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, दो विहायोगति, त्रस, सुभग, दो स्वर, आदेय और उच्चगोत्रकी वृद्धि, हानि और अवस्थान स्वस्थानमे करने चाहिए। शेप प्रकृतियोके वृद्धि और १ ता०प्रती 'सजटासजटस्स एव । सजलणचत्तारि' इति पाठः। २. आ प्रती तिरिक्खिगदिभगो' इति पाठः। , . - पदणिक्खेवे सामित्तं २११ । सत्थाणे कादव्वं । सेसाणं वड्डी अवठ्ठाणं बादरस्स कादव्वं । हाणी मदो सुहुमणिगोदसु उववण्णो | आदाव० वादरपुढविपञ्जत्त० सत्थाणे कादव्वं । एवं पंचकायाणं । विगलिं- दियाणं पंचिंदियतिरिक्खअपजत्तभंगो। णवरि पंचणा-णवदसणा० - दोवेदणी०- मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक०-विगलिंदियजादि-ओरालि०अंगो०-असंप०-णीचा०- पंचंत० उक्क० वड्डी अवठ्ठाणं सत्थाणे काव्यं । हाणी मदो अपजत्तगेसु उववण्णोः । सेसाणं सत्थाणे तिणि वि कादब्वं । २४३ पंचिंदिएसु सव्वपगदीणं ओघं। णवरि तिरिक्खगदि-चदुजादीणं ओरालिक- तेजा-क०-हुँडसं०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०-उप०-आदाउजो०-थावर-बादर-सुहुम- पञ्जत्त-अपञ्जत्त-पत्तेय-साधार-थिराथिर-सुभासुभ-दूभग-अणादें-अजस-णिमिणं एदाणं बड्डी अवट्ठाणं ओघं । हाणी अवट्ठाणम्हि कादव्वं । सेसाणं ओषं । एवं तस०२। २४४, पंचमण-पंचवचि० पंचणा०-चदुदंस०-सादा०-जसगि०-उच्चा०-पंचंत० उक्क० बड्डी कस्स. ? यो सत्तविधधगो उक्क० जोगी तप्पाऑग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उकस्सं जोगहाणं गदो छविधबंधगो जादो तस्स उक० वड्डी। उक्क. हाणी कस्स० १ जो छविधबंधगो उक्कस्सजोगी पडिभग्गो तप्पाओग्गजहण्णगे जोग- हाणे पडिदोसत्तविध० तस्स उक्क० हाणी। तस्सेव से काले उक्कस्सयमवट्ठाणं । थीणगि०३- अवस्थान बादर जीवके करने चाहिए । तथा जो मरकर सूक्ष्म निगोद जीवोमे उत्पन्न हुआ उसके हानि करनी चाहिए । आतपकी उत्कृष्ट वृद्धि आदि बादर पृथिवीकायिक पर्याप्तके स्वस्थानमे करनी चाहिए । इसी प्रकार पाँच स्थावरकायिक जीवोंमे जानना चाहिए । विकलेन्द्रियोमे पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकषाय, विकलेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर आङ्गो- पाङ्ग, असम्प्राप्तामृपाटिका संहनन, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थान स्वस्थानमें करने चाहिए। तथा जो मरकर अपर्याप्तकोमे उत्पन्न हुआ, वह इनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। शेष प्रकृतियोके तीनो ही स्वस्थानमै काहने चाहिए। २४३. पञ्चेन्द्रियोमे सब प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि तिर्यश्चगति, चार जाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, आतप, उद्योत, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुभंग, अनादेय, अयश कीर्ति और निर्माण इनकी वृद्धि और अवस्थानका भङ्ग ओघके समान है। हानि अवस्थानके समय करनी चाहिए। शेप प्रकृनियोका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार त्रसद्विकमे जानना चाहिए। २४४. पॉच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, यश कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का वध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर छह प्रकारके कर्मो का बन्ध करने लगा,वह उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? छह प्रकारके कर्मों का वध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा और सात प्रकारके कर्मो का बन्ध करने लगा,वह उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । तथा वही जीव अनन्तर समयमे . . - २१२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे मिच्छ०-अणंताणु०४- [-असाद०-] इत्थि०-णवंस०-णीचा० उक्क० वड्डी कस्स० ? यो अट्ठविध० तप्पाऑग्गजह जोगहाणादो उकस्सजोगहाणं गदो सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक० हाणी कस्स० १ यो सत्तविधवंधगो उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाओग्गजहण्णगे जोगट्ठाणे पडिदो अट्ठविधवंधगो जादो तस्स उक० हाणी । तस्सेव से काले उक्क० अवट्ठाणं । णिद्दा-पयला०-छण्णोक० उक्क० वड्डी कस्स०१ सम्मादि० अढविध तप्पाऑग्गजह जोगट्ठाणादो उक्क. जोगट्ठाणं गदो सत्तविधधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक० हाणी कस्स० ? यो सत्चविधवंधगो उक्क०जोगी पडिभग्गो अढविधबंधगो जादो तस्स उक्क० हाणी। तस्सेव से काले उक्क० अवट्ठाणं । अपञ्च-' क्खाण०४ असंजदसम्मादिहिस्स चदुगदियस्स सत्थाणे वड्डी हाणी अवट्ठाणं च कादव्यं । पञ्चक्खाण०४ संजदासंजदस्स च दुगदियस्स तिणि वि सत्थाणेण । चदु संजलणं पुरिस० वड्डी अवठ्ठाणं ओघभंगो। हाणि-अवट्ठाणेसु पढमसमए हाणी विदिय- समए अवट्ठाणं णादव्वं । चदुण्णं आउगाणं ओघं । णामाणं सव्वाणं वड्डी हाणी अवट्ठाणं ओघभंगो । णवरि हाणी अप्पप्पणो अवट्ठाणेसु पढमसमए उक्कस्सिया हाणी विदियसमए उक्कस्सयमवहाणं । सेसाणं सत्थाणे तिण्णि वि कादव्वाणि । एवं ओरालियकायजोगि०- कायजोगी. ओघ। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, असाता- वेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और नीचगोत्रकी उत्कष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा, वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभन्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा और आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । तथा वही अनन्तर समयमे उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। निद्रा, प्रचला और छह नोकषायोकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो सम्यग्दृष्टि जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ और सात प्रकारके कोका बन्ध करने लगा और वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिमग्न होकर आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा वही अनन्तर समयमें उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। अप्रत्याख्यानाचरण- चतुष्कके चार गतिके असंयतसम्यग्दृष्टिके स्वस्थानमे वृद्धि, हानि और अवस्थान करने चाहिए। प्रत्याख्यानावरण चतुष्कके तीनों ही पद दो गतिके संयतासंयत जीवके स्वस्थानमें कहने चाहिए। चार संज्वलन और पुरुषवेदकी वृद्धि और अवस्थानका भङ्ग ओघके समान है। अपने अवस्थानमे प्रथम समयमें उत्कृष्ट हानि होगी और द्वितीय समयमे अवस्थान होगा। चार आयुओंका भङ्ग ओषके समान है। नामकर्मकी सब प्रकृतियोकी वृद्धि, हानि और अवस्थानका भग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि हानि और अपने-अपने अवस्थान इनमेसे उत्कृष्ट हानि प्रथम " १. आप्रतौ ओरालियकाजोगि ओघ' इति पाठः?
२१३ पदणिक्खेवे सामित्तं २४५. ओरालियमि० पंचणा०-थीणगि०३-दोवेदणी०-मिच्छ०--अणंताणुव०४- गqस०-णीचा०-पंचंत० उक्क० वड्डी कस्स० १ जो सत्तविधब तप्पाऑग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उकस्सजोगहाणं गदो से काले सरीरपजत्ती गाहिदि त्ति तस्स उक्क० बड्डी । उक्क. हाणी कस्स० ? यो सत्तविधवंधगो उक्क० जोगी मदो सुहुमणिगोद- अपजत्तगेसु उववण्णो तप्पाओग्गजह० पडिदो तस्स उक० हाणी | उक्क० अवट्ठाणं कस्स० १ यो सत्तविधवं धगो उक्क जोगी पडिभग्गो अट्ठविधवंधगो जादो तप्पाऑग्ग- जह जोगट्ठाणे पडिदो तस्सेव से काले उक्कस्सयं अवट्ठाणं । छदंस०-बारसक० सत्त- गोक० उक० वड्डी कस्स० १ यो सम्मादिट्ठी तप्पाओग्गजहण्णगादो जोगहाणादो [ उकस्सयं जोगट्ठाणं गदो] तस्स उक्क० वड्डी । उक० हाणी अवट्ठाणं णाणा- भंगो। आयु० दो वि ओघ । णवरि अण्णदरस्स पंचिंदिय० सण्णि त्ति भणिदव्वं । णामाणं घड्डी णाणावभंगो। हाणी अवट्ठाणं च अप्पप्पणो ओघं । णवरि देवगदि०४ उक० वड्डी कस्स० १ अण्णदरस्स सम्मादि० तप्पाऑग्गजहण्णगादो जोगट्ठाणादो उकस्सजोगडाण गदो से काले सरीरपजत्ति जाहिदि ति तस्स० उक० वड्डी । समचदु० समयमे होती है और दूसरे समयमें उत्कृष्ट अवस्थान होता है। शेप प्रकृतियोके स्वस्थानमे तीनो ही कहने चाहिए। इसी प्रकार औदारिककाययोगी जीवोमें जानना चाहिए । काययोगी जीवोमे ओधके समान भङ्ग है। २४५. औदारिकमिश्रकाययोगी जीवामे पॉच ज्ञानावरण, त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर अनन्तर समयमें शरीरपर्याप्तिको प्राप्त करेगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है । सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और सूक्ष्म निगोद अपर्याप्तकामें उत्पन्न होकर तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभन्न होकर आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा और तलायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा,वही अनन्तर समयमे उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। छह दर्शनावरण, बारह कषाय और सात नोकषायोकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो सम्यग्दृष्टि तत्प्रायोग्य जघन्य योग- स्थानसे उत्कृष्ट योगम्थानको प्राप्त हुआ,वह उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। तथा इनकी उत्कृष्ट हानि और अवस्थानका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। दोनो आयुओंका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि अन्यतर पञ्चेन्द्रिय संज्ञीके कहना चाहिए । नामकर्मकी प्रकृतियोंकी वृद्धिका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। तथा हानि और अवस्थानका भङ्ग अपने-अपने ओधके समान है। इतनी विशेषता है कि देवगतिचतुष्ककी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो अन्यतर सम्यग्दृष्टि वत्सायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हो,अनन्तर समयमे शरीरपर्याप्तिको पूर्ण करेगा,वह उनकी वृद्धिका स्वामी है। समचतुरखसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर १. आ प्रतौ 'सम्मादिष्टित्ति० तप्पाओग्गजह ण्णगादो' इति पाठः । २. ता०प्रतौ 'जोगष्ठाणादो जोगहाण. (१) उक. जोगहाण' इति पाठः ।
. २१४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आर्दै० वड्डी हाणी अवट्ठाणं च णिहाए भंगो। गवरि हाणी असण्णीसु उववण्णो । चदुसंठा०-पंचसंघ० वड्डी अवट्ठाणं ओथं । हाणी असण्णीसु उव- वण्णो । तित्थयरं देवगदिभंगो । एवं सेसाणं वड्डि-हाणि-अवट्ठाणाणि णाणा भंगो। २४६. वेउब्वियका० देवभंगो । वेउन्चियमि० पंचणा० उक० वड्डी कस्स० १ अण्णद० मिच्छादि० तप्पाऑग्गजह जोगट्टाणादो उक्क० जोगट्ठाणं गदो से काले सरीर- पञ्जति गाहिदि त्ति तस्स उक्क० वड्डी । एवं थीणगि०३-दोवेदणीं-मिच्छ०-अणंतागु०४ णस०- दोगोद-पंचंत० । णवरि पंचणा०-दोवेदणी०-उच्चा०-पंचंत० सम्मादिद्विस्स वा मिच्छादिहिस्स वा कादव्वं । छदंस०-चारसक० सत्तणोक० बड्डी कस्स० १ यो अण्णद सम्मादि० तप्पाओँजहण्णजोगट्ठाणादो उक्क० जोगट्ठाणं गदो तस्स उक्क० वड्डी । एवं सव्वपगदीणं । आहार-आहारमि० मणजोगिभंगो । णवरि आहारमि० से काले सरीरपजति गाहिदि त्ति। २४७. कम्मइगे पंचणा०-थीणगि०३-दोवेदणी-मिच्छ०-अणंताणु०४-इत्थि णस०-णीचा०-पंचंत० उक० वड्डी कस्स० ? तप्पाओग्गजह० जोगट्ठाणादो उक्क० और आदेयकी वृद्धि, हानि और अवस्थानका भङ्ग निद्राके समान है। इतनी विशेषता है कि हानि असंज्ञियोमे उत्पन्न हुए जीवके कहनी चाहिए। चार संस्थान और पॉच संहननकी वृद्धि और अवस्थानका भङ्ग ओघके समान है। इनकी हानि असंजियोमें उत्पन्न हुए जीवके कहनी चाहिए । तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग देवगतिके समान है। इसी प्रकार शेष प्रकृतियोंकी वृद्धि, हानि और अवस्थानका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। २४३, वैक्रियिककाययोगी जीवोमे देवोके समान भङ्ग है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोमे पॉच ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो अन्यतर मिथ्यादृष्टि जीव तत्मा- योग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर अनन्तर समयमें शरीरपर्याप्तिको पूर्ण करेगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। इसी प्रकार स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, नपुंसकवेद, दो गोत्र और पॉच अन्तरायकी मुख्यतासे जान लेना चाहिए | इतनी विशेषता है कि पाँच ज्ञानावरण, दो वेदनीय, उच्चगोत्र और पाँच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी सम्यग्दृष्टि भी है और मिथ्यादृष्टि भी है। छह दर्शनावरण, बारह कषाय और सात नोकषायोकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है जो अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव तत्सायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है । इसी प्रकार सब प्रकृतियोकी अपेक्षा जानना चाहिए। आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमे मनोयोगी जीवोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि आहारकमिश्रकाययोगी जीवो. में जो अनन्तर समयमें शरीरपर्याप्तिको ग्रहण करेगा,ऐसा और कहना चाहिए । २४७. कामणकाययोगी जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, नीचगोत्र और पॉच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उनकी १. आप्रतौ 'देवगदिभगो' इति पाठः । २. ता०मा०प्रत्योः 'उक्क० वड्डी। ...दोवेदणी० इति पाठः । ३. तापतौ 'अणता । इत्थिः' इति पाठः।
पदणिक्खेवे सामित्त २१५ जोगट्टाणं गदो तस्स उक्क० चड्डी। छदंस०-बारसक०-सत्तणोक० उक्क० वड्डी कस्स. ? अण्णदरस्स सम्मादिहि तप्पाओग्गजह जोगट्ठाणादो उक्क. जोगट्ठाणं गदो तस्स उक्क० बड्डी । तिरिक्खगदिणामाए उक्क० चड्डी कस्स० ? यो तेवीसदिणामाए तप्पाऑग्गजह० जोगट्ठाणादो उक्क. जोगट्ठाणं गदो तस्स उक्क० वड्डी। एवं तिरिक्खगदिभंगो एइंदि० ओरालि०-तेजा-क० - हुंडसं०-वण्ण०४-तिरिक्खाणु०-अगु०-उप०-थावर०-आदर-सुहुम- पत्तेय-साधार०अथिर-असुभ-दूभग-अणार्दै-अजस-णिमिण ति । मणुसगदिणामाए' उक्क० चड्डी कस्स० १ यो पणवीसदिणामाए तप्पाओग्गजह जोगहाणादो उकस्सं जोगट्ठाणं गदो तस्स उक्क० वड्डी। एवं मणुसगदिभंगो चदुजादि-ओरालि०- अंगो०-असंप०-मणुसाणु०-पर०-उस्सा०-तस-पञ्जत्त-थिर-सुभ-जस० | देवगदि० उक्क० वड्डी कस्स० १ यो सम्मादिछी तप्पाओग्गजह जोगट्ठाणादो उक० जोगट्ठाणं गदो तस्स उक्क० वड्डी । एवं देवगदि०४ । एवं चेव तित्थय० । णवरि एगुणतीसदिणामाए वंधगो जादो तस्स० उक्क० वड्डी । चदुसंठा०-पंचसंघ०-अप्पसत्थ०-दुस्सर० उक० वड्डी कस्स० ? एगुणतीसदिणामाए बंधगो तप्पाऑग्गजह जोगट्ठाणादो उक० जोगट्ठाण गदो तस्स उक्क० वड्डी । आदाउजोक ० उक्क० वड्डी कस्स० ? यो छब्बीसदिणामाए बंधगो उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। छह दर्शनावरण, बारह कषाय और सात नोकषायोंकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। तिर्यञ्चगतिकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? नामकर्मकी तेईस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला जो जीव जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है । इस प्रकार तिर्यश्चगतिके समान एकेन्द्रियनाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, प्रत्येक, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयश-कीर्ति और निर्माणकी अपेक्षा उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी जानना चाहिए । मनुष्यगतिकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? नामकर्मकी पच्चीस प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ.वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। इसी प्रकार मनुष्यगतिके समान चार जाति, औदारिकशरीरआङ्गोपाङ्ग, असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन, मनुष्य- गत्यानुपूर्वी, परघात, उच्छास, बस, पर्याप्त, स्थिर, शुभ और यश कीर्तिकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी जानना चाहिए । देवगतिकी उत्कृष्टि वृद्धिका स्वामी कौन है ? सम्यग्दृष्टि जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। इसी प्रकार देवगत्यानुपूर्वी और वैक्रियिकद्विक इन तीन प्रकृतियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी जानना चाहिए । तथा इसी प्रकार तीर्थङ्कर प्रकृतिकी अपेक्षा उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि जो नामकमकी उनतीस प्रकृतियोका बन्धक है, वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। चार संस्थान, पॉच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति और दु.स्वरकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? नामकर्मकी उनतीस प्रकृतियोका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्मा- योग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ, वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। १. ता०प्रतौ "णिमिण स्थि (ति)। मणुसगदिणामाए' इति पाठ. ।
२१६ महाबंधे पदेसवैधाहियारे तप्पाओग्गजहण्णादो जोगट्ठाणादो उकस्सजोगहाणं गदो तस्स उक्क० वड्डी । एवं अणाहारगेसु । २४८. इस्थिवेदेसु पंचणा०-थीणगि०३-दोवेदणी-मिच्छ०-अणंताणु०४- इथिवे०-णीचा०-पंचंत० उक० वड्डी कस्स० १ जो अढविधवंधगो तप्पाऑग्गजह. जोगहाणादो उक्क० जोगडाणं गदो सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक्क० बड्डी । उक हाणी कस्स० ? यो सत्तविधवंधगो उक्क जोगी मदो असण्णीसु उपवण्णो तप्पाऑग्ग- जह० जोगट्ठाणे पडिदो तस्स उक्क० हाणी | उक्क० अवट्ठाणं कस्स ? जो सत्तविधवंध्रगो उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाऔंग्गजहण्णजोगट्ठाणे पडिदो अट्ठविधवंधगो जादो तस्स उक्त अवट्ठाणं । णिद्दा-पयला-छण्णोक० उक्क० चड्डी कस्स० १ अण्णदरस्स सम्मादिद्वि० यो अविघबंधगो तप्पाओग्गजह जोगट्ठाणादो उक०जोगहाणं गदो सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक्कस्सिगा वड्डी। उक० हाणी कस्स० १ जो सत्तविधयंधगो उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाऑग्गजहण्णजोगट्ठाणे पडिदो' अढविधधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । तस्सेव से काले उक्क० अबढाणं । एवं अपञ्चक्खाण०४ असंजद० पञ्चक्खाण०४ संजदा- -- . आतप और उद्योतकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? नामकर्मको छब्बीस प्रकृतियोंका वन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ, वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। इसी प्रकार अनाहारक जीवाम जानना चाहिए। २४८. स्त्रीवेदवाले जीवोमें पॉच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नीचगोत्र और पाँच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? आठ प्रकारके काँका वन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके फोका बन्ध करने लगा,वह उनको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है? सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और असंज्ञियोमे उत्पन्न होकर तलायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तत्त्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा और आठ प्रकारके काँका बन्ध करने लगा,वह उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। निद्रा, प्रचला और छह नोकपायको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो आठ प्रकारके काँका बन्ध करनेवाला अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव तत्मायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का वन्ध करनेवाला और उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रति- भग्न होकर तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा और आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा वही जीव अनन्तर समयमै उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। इस प्रकार अप्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी उत्कृष्ट वृद्धि आदि पदोंका स्वामित्व असंयत- सम्यग्दृष्टिके तथा प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी उत्कृष्ट वृद्धि आदि पदोंका स्वामित्व संयतासंयत १ ताप्रती जोगहाण पडिदो' इति पाठः ।
पदणिक्लेवे सामित्तं २१७ संजद० । णस० तिणि वि मणुसभंगो । चदुदंसणा० उक्क० बड्डी कस्स० ? जो छविध- बंधगो तप्पाऑग्गजह जोग०' उक्क० जोगट्ठाणं गदो चदुविधवंधगो जादो तस्स उक्क. वड्डी । उक्क हाणी कस्स० ? जो चदुविधबंधगो उक्कनोगी पडिभग्गो तप्पाओग्ग- जह जोगट्ठाणे पडिदो छविधबंधगो जादो तस्स उक्क० हाणी । तस्सेव से काले उक्क० अवट्ठाणं । चदुसंजल• उक्क० वड्डी कस्स० ? यो अण्णद० पमत्तसंजदस्स अट्ठविध- बंधगो जादो तप्पाऑग्गजह जोगट्ठाणादो उक्क. जोगहाणं गदो तदो सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ यो सत्तविध पडिभग्गो अवविध- बंधगो जादो तस्स उक्क. हाणी । तस्सेव से काले उक्क. अवहाणं । पुरिस० उक्क० वड्डी अवट्ठाणं ओयं । हाणी अवट्ठाणम्हि कादच्वं । चदुआउ० ओघं । णामाणं सव्वाणं जोणिणिभंगो। णवरि तिरिक्खग० अण्णदर० दुगदि० । एवं सव्वाओ णामाओ। पुरिस० इत्यिवेदभंगो। णबरि सम्मादिहिपगदीणं । हाणी मदो अण्णदरीए गदीए उववण्णो तप्पा०जह० पडिदो तस्स उक्क० हाणी। सेसाणं हाणी अवट्ठाणम्मि कादव्वं । जीवके कहना चाहिए। नपुंसकवेदके तीनों ही पदोका भन मनुष्योके समान है। चार दर्शना- वरणकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? छह प्रकारके दर्शनावरणका वन्ध करनेवाला जो जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर चार प्रकारके दर्शनावरणका बन्ध करने लगा, वह उनको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? चार प्रकारके दर्शनावरणका बन्ध करनेवाला और उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा और छह प्रकारके दर्शनावरणका वध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा वहीं अनन्तर समयमें उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। चार संज्वलनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला अन्यतर प्रमत्तसंयत जीव तनायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करकेवाला जीव प्रतिभग्न होकर आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा,वह उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा अनन्तर समयमें वही जीव उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। पुरुषवेदकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थानका स्वामी ओघके समान है। हानि भवस्थानके समय करनी चाहिए। अर्थात् अवस्थानका स्वामित्व घटित करते समय पूर्व समयमें हानि होती है और अनन्तर समयमे अवस्थान होता है। चार आयुओका भगओघके समान है। नामकर्मकी सब प्रकृतियोंका भग पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च योनिनी जीवोंके समान है। इतनी विशेषता है कि तिर्यजगतिका भग अन्यतर दो गतिके जीवके कहना चाहिए। इसी प्रकार नाम- कर्मकी सब प्रकृतियोंके विषयमें जानना चाहिए । पुरुषवेदी जीवोंमें स्त्रीवेदी जीवोंके समान भग है। इतनी विशेषता है कि सम्यग्दृष्टि सम्बन्धी प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट हानिका स्वामित्व कहते समय जो जीव मरा और अन्यतर गतिमें उत्पन्न होकर तप्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। शेष प्रकृतियोकी उत्कृष्ट हानि अवस्थानमे करनी चाहिए। १. ता प्रतौ ति] प्पाभोग्गजह जोग.' इति पाठः! २. आ प्रतौ 'जो छविधबंधगो' इति पाठः। ३. ता०आ प्रत्योः 'हाणी अवठाणं हि इति पाठः।
। २१८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे २४६. णबुंसगे पंचणा० वड्डी अबढाणं सत्थाणे । हाणी मदो सुहुमणिगोद- जीवेसु उववण्णो । सम्मादिट्ठिपगदीणं वड्डी अवट्ठाणं सत्थाणे । हाणी अण्णदरस्स मदस्स वा सत्याणे । गवरि गिद्दा-पयला-अट्ठक०-छण्णोक० ओघं । सेसाणं सत्थाणे । णामाणं ओधभंगो। अवगदवेदे ओघभंगो। णवार सत्थाणे हाणी। कोधादि०३ सत्तण क. णबुंसगभंगो । णामाणं ओधभंगो । लोमे ओघं । २५०. मदि-सुद० पंचणा० उक्क० वड्डी कस्स० १ यो अवविध धगो तप्पा- ऑग्गजह जोगट्ठाणादो उक० जोगट्ठाणं गदो सत्तविध धगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स०१ जो सत्तविधबंधगो उक० जोगी मदो सुहमणिगोदजीवअपजचएसे उववण्णो तप्पाऑग्गजह जोग० पडि० तस्स० उक० हाणी। अवट्ठाणं सत्थाणे णेदव्यं । णवदंसणा-सादासाद०-मिच्छ०-सोलसक०-णवणोक०-दोगोद०-चदुआउ० सव्वाओ णामपगदीओ ओपो भवदि। एवं मदिभंगो अभवसि०-मिच्छा० असण्णि त्ति विभंगे पंचणाणावरणादीणं विणि वि सत्थाणे कादव्वाणि । २५१. आभिणि-सुद-ओधि० पंचणा०-चदुदंस०-सादा०-जस०-उच्चा०-पंचंत० २४६. नपुंसकवेदी जीवोंमें पाँच ज्ञानावरणको उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थान स्वस्थानमें कहने चाहिए। तथा उत्कृष्ट हानि जो जीव मरकर सूक्ष्म निगोद जीवोमे उत्पन्न हुआ है,उसके कली चाहिए | सम्यग्दृष्टि सम्बन्धी प्रकृतियोकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थान स्वस्थानमें कहने चाहिए। तथा उत्कृष्ट हानि अन्यतर मरे हुए जीवके अथवा स्वस्थानमे करनी चाहिए। इतनी विशेषता है कि निद्रा, प्रचला, आठ कषाय और छह नोकपायका भन भोधके समान है। शेषका स्वामित्व स्वस्थान में कहना चाहिए। नामकर्मकी प्रकृतियाँका भन ओघके समान है। अपगतवेदी जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि हानि स्वस्थानमें कहनी चाहिए। क्रोधादि वीन कषायवाले जीवोमें सात कर्मों का भङ्ग नपुंसकवेदवाले जीवोके समान है। नामकर्मकी प्रकृतियोंका भद ओघके समान है। लोभ कषायवाले जीवोमें ओघके समान भङ्ग है। २५०. मत्यज्ञानी और श्रुवाज्ञानी जीवोंमे पाँच ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? आठ प्रकारके काँका बन्ध करनेवाला जो जीव तत्सायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हो सात प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला और उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और सूक्ष्म निगोद अपर्याप्तकोंमे उत्पन्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। इनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी स्वस्थानमें ले जाना चाहिए । नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, नौ नोकषाय, दो गोत्र, चार आयु और सब नामकर्मकी प्रकृतियो इनका भङ्ग ओधके समान है। इसी प्रकार सत्यज्ञानियोंके समान अभन्य, मिथ्यादृष्टि और असंही जीवामें जानना चाहिए । विभङ्गज्ञानी जीवोंमें पाँच ज्ञानावरणादिके तीनो ही पद स्वस्थानमें कहने चाहिए। २५१. आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, यश-कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायकी उत्कृष्ट वृद्धि, हानि और 1. मा प्रतौ कोधादि०४सत्तण्ण' इति पाटः। २. ता प्रतौ तस्स उछ । हाणी' इति पाठः। ३. ता प्रतौ 'दोगदि० चदुआउ० 'इति पाठः ।
पदणिक्लेवे सामित्त उक० वड्डी हाणी अवट्ठाणं ओघ । णिद्दा-पचला-असादा०-छण्णोक० उक्क० वड्डी कस्स० ? अण्णद० यो अट्ठविध तप्पाऑग्गजह जोगट्ठाणादो उक्कस्सजोगहाणं गदो सत्तविध- बंधगो जादो तस्स उक्क० वटी । उक्क. हाणी कस्स० ? सत्तविधबंधगो मदो तप्पा- ऑगजह० पढिदो तस्स उक्क. हाणी। उक्क० अवठ्ठाणं कस्स० ? यों सत्तविध उक्क जोगी पडिभन्गो तप्पाऑगजह. पडिदो अट्ठविधबंधगो जादो तस्स उक्क० अवट्ठाणं । अपञ्चश्वाण०४ असंजद० पञ्चक्खाण०४ संजदासंजदस्स | चदुसंजल-पुरिस०- दोआउ०, ओघभंगो। मणुसग० उक्क० बड्डी कस्स० १ यो अट्ठविधव० तप्पाओग्ग- जह जोगट्ठाणादो उक० जोगट्ठाणं गदो एगुणतीसदिणामाए सह सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक० चड्डी । उक्क० हाणी कस्स०? यो सत्तविधवंधगो उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाऑनजह पडिदोअट्ठविधबंधगो तस्स उक्क हाणी । तस्सेब से काले उक० अवडाणं। एवं ओरा०-ओरा अंगो०-वञ्जरि०-मणुमाणु० । देवगदि०४ मूलोघं । पंचिदि० उक्क० बड्डी अवट्ठाणं देवगदिमंगो । हाणी मदो देवेसु उववण्णो एगुणतीसदिणामाए सह सत्त- अवस्थानका भङ्ग मोके समान है। निद्रा. प्रचला, असातावेदनीय और छह नोकयायोंकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला जो अन्यतर जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त होकर सात प्रकारके कर्मोंका वन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोंका वन्ध करनेवाला जो जीव मरा और तत्यायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मोंका वन्य करनेवाला और संस्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभन्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा और माठ प्रकारके कोका बन्ध करने लगा, वह उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। अप्रत्याल्यानावरण चतुष्कके तीन पदोका स्वामित्व असंयतसन्यग्दृष्टि जीवके और प्रत्याख्याना- वरणचतुष्कके तीन पदोंका स्वामित्व संवतासंयत जीवके कहना चाहिए । चार संज्वलन, पुरुषवेद और दो आयुका भङ्ग भोषके समान है। मनुष्यगतिकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला जो जीव तलायोन्य जघन्य योगत्यानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्रामकर नामकर्मकी उनतीस प्रकृतियोंके साथ सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा वह उसकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाला और उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव प्रतिभन्न होकर वनायोग्य जघन्य योगस्थानम गिरा और आठ प्रकारके कर्मों का बन्ध करने लगा,वह उसकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है । तथा वही अनन्तर समयमें रत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। इसी प्रकार औदारिकशरीर, औदारिक- शरीर आङ्गोपाङ्ग. वर्षभनाराचसंहनन और मनुष्यगत्यानुपूर्वीको वृद्धि आदि तीन पदोंका स्वामित्व जानना चाहिए ! देवगतिचतुष्कका भङ्ग मूलोषके समान है। पञ्चेन्द्रियजातिको उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्यानका भय देवगतिके समान है। उत्कृष्ट हानि-जो जीव मरा और देवाम उत्पन्न होकर नामकर्मको उनतीस प्रकृतियोंके साथ सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करने लगा,वह १. ताप्रती 'अवटा० [१] यो' इति पाठः । २. ता प्रनी 'अवठ्ठाणः । [क्रमागतताडपत्या- अनुपलधिः । अक्रन्युभमन्यं समुपलभ्यते ।] एवं' इति पाठः । ३. वा प्रतौ 'मणुसाणु० देवगदि मूलोष' इति पास महायंधे पदेसयंधाहियारे विधधगो जादो तम्स उपा० हाणी । एवं सन्याओ णामाओ। णवरि आहारदुर्ग तित्थ० ओघं । अथिर-अमुभ-अजस० तिणि वि पंचिंदियभंगो । णवरि सचविधबंधगस्स कादव्यं । एवं ओधिदंस०-सम्मा०-खइग०-वेदगस०-उवसमसम्मादिट्ठीसु । मणुस- गदिपंचगस्स बट्टी हाणी अवहाणं सत्याणे कादब्वं । २५२. मणपञवे. सत्तणं क. मणुसगदिमंगो । णामाणं देवगदिआदियाण बड्डी हाणी अवट्ठाणं आभिणिभंगो । णवरि सत्याणे हाणी णेदव्वं । एवं सव्वाण णामाणं । अधिर-असुभ-अजस० सत्तविधबंध० कादम् । एवं संजट-सामाइ०-छेदो०- परिहार २५३. मुहुमसं० छण्ण क० उ० वड्डी कस्स० १ यो तप्पाऑग्गजह जोग- हाणादो उक० जोगट्ठाणं गदो तस्स उक० बडी। उक० हाणी कस्स० १ उक्स्सगादो जोगवाणादो पडिभग्गो तप्पाओग्गजह जोगट्ठाणे पडिदो तस्स उक. हाणी । तस्सेव से काले उक्क० अवट्ठाणं । संजदासंजद० परिहारभंगो। २५४. असंजदेसु पंचणा०-धीणगि०३-दोवेद०-मिच्छ०-अणंताणु४-इथि०- . पन्यन्द्रियजातिको उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। इसी प्रकार नामकर्मको सब प्रकृतियोंके विषयम जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि आहारकद्विक और तीर्थदर प्रकृतिका भग ओघके समान है। अस्थिर, अशुभ भीर अयशाकौतिके तीनों ही पदीका भन्न पञ्चेन्द्रियों के समान है। इतनी विशेपता है कि सात प्रकारके कर्मों का बन्ध करनेवाले जीवके कहना चाहिए। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, नायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवामे जानना चाहिए । मनुष्यगतिपत्रककी वृद्धि, हानि और अवस्थानका भद्न स्वस्थानमे कहना चाहिए। २५२. मन-पर्ययमानी जोयोंमें सात कर्मों का भङ्ग मनुष्योंके समान है। नामकर्मको देवगति आदिकी वृद्धि, हानि और अवस्थानका भग आभिनिवाधिकज्ञानी जीवांके समान है। इतनी विशेषता है कि हानि स्वस्थानमें ले जानी चाहिए। इसी प्रकार नामकर्मकी सब प्रकृतियों के विषयमे जानना चाहिए । अस्थिर, अशुभ और अयश कीर्तिकी वृद्धि आदि सात प्रकारके कर्मों बन्ध करनेवाले जीवके कहनी चाहिए। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदेपस्थापनासंयत 'और परिहारविशुद्धिसंयत जीवोंके जानना चाहिए। २५३. सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत जीवोमे छह कर्मोकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? जो तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त हुआ है,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है? जो उत्कृष्ट योगस्थानसे प्रतिभग्न होकर तत्सायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा है.वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। तथा वही अनन्तर समयमै उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है। संयतासंयत जीवोमै परिहारविशुद्धिसंयत जीवोके समान भङ्ग है। २५४. असंयत जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्ता- नुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, दो गोत्र और पाँच अन्तरायका भङ्ग मस्यज्ञानी जीवोके - १. ताप्रती 'उकसि [या ] हाणी।' इति पाठः। २. ता०प्रती एव ओधिदसम्मा' इति पाठः । ३. तापतौ 'परिहार० सुटुमस० छण्ण' इति पाठः पणिक्खवे सामित्त २२१ । णस०-दोगोद०-पंचंत० मदिभंगो । छदंस०-वारसक०-सत्तणोक० उक्क० वड्डी कस्स० ? अण्ण० सम्मादिहिस्स अट्ठविध तप्पाओग्गजह [ उक्क० ] जोगहाणं गदो सत्तविध- पंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी । उक्क० हाणी कस्स० १ जो सम्मादिट्ठी उक्क जोगी मदो अण्णदरीए गदीए उववण्णो तप्पाऑग्गजह० पडिदो तस्स उक० हाणी। उक्क० अबढाणं कस्स०? या सत्तविधवं उक्क जोगी पडिभग्गो तप्पाओग्ग- जहण्णगे जोगट्ठाणे पडिदो अढविधवंधगो जादो तस्स० उक्क० अवट्ठाणं । णामाणं मदिभंगो । णवरि देवगदि०४-समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आर्दै० ओघं । २५५. चक्खुदंसणी. तसपजत्तभंगो । णवरि चदुरिंदियपजत्तेसु उववण्णो० । अचक्षु० ओघं । किण्ण-णील-काउणं असंजदभंगो । तेऊए पंचणा-थीणगि०३- [दोवेद०-] मिच्छ०-अणंताणु०४-इत्थिवेद-दोगोद-पंचंत० उक्क० वड्डी कस्स० ? अण्णदरस्स अट्ठविधवंधगो सत्तविधवंधगो जादो तस्स उक्क० वड्डी। उक्क० हाणी कस्स० ! यो सत्तविधवंधगो उक्क जोगी मदो देवो जादो तस्स उक्क. हाणी । णवरि थीणागिद्धि०३- मिच्छ०-अणंताणु०४-इथिवे. दुगदियस्स । अवट्ठाणं सत्थाणे० । छदंस०-सत्त- समान है। छह दर्शनावरण, बारह कपाय और सात नोकपायोकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है? जो आठ प्रकारके कर्मो का बन्ध करनेवाला अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे उत्कृष्ट योगस्थानको प्राप्त कर सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करने लगा, वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो उत्कृष्ट योगवाला सम्यग्दृष्टि जीव मरा और अन्यतर गतिमे उत्पन्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानको प्राप्त हुआ, वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी कौन है ? जो सात प्रकारके कर्मोका कध करनेवाला उत्कृष्ट योगसे युक्त जीव प्रतिभग्न होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमे गिरा और आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करने लगा,वह उनके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामी है । नामकर्मकी प्रकृतियाका भङ्ग मत्यज्ञानी जीवोंके समान है। इतनी विशेषता है कि देवगतिचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयका भङ्ग ओषके समान है। २५५ चक्षुदर्शनवाले जीवामे त्रस पर्याप्तकोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि चतुरिन्द्रिय पर्याप्तकोमे उत्पन्न हुए जीवके कहना चाहिए। अचक्षुदर्शनवाले जीवोमे ओघके समान भङ्ग है। कृष्ण नील और कापोत लेश्यावाले जीवोमे असयत जीवोके समान भङ्ग है। पीतलेश्यावाले जीवोम पाँच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी- चतुष्क, स्त्रीवेद, दो गोत्र और पॉच अन्तरायको उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाला अन्यतर जीव सात प्रकारके कर्माका वन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? सात प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला और उत्कृष्ट योगसे युक्त जो जीव मरा और देव हो गया, वह उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। इतनी विशेषता है कि स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क और खीवेद इनका भग दो गतिवाले जीवके कहना चाहिए। तथा इनके अवस्थानका स्वामित्व १ ताव्यतो 'तापाओग्गजणं जोगाण पडिटो' इति पाठ.। २. ता०आ प्रत्योः 'इथिवे० सेसाणं दुगदियस्स, इति पाठ।
महावंधे पदेसवंधाहियारे णोक० उक० वड्डी कस्स० १ अण्णद० सम्मादिहि, अट्ठविध० सत्तविधबंधगो जादो तस्स उक० वड्डी । उक० हाणी कस्स० ? यो उक्क०जोगी मदो जहजोगट्ठाणे पडिदो तस्स उक० हाणी । अवठ्ठाणं सत्थाणे कादच्वं । अपचक्याण०४- [पञ्चक्खाण०४] ओघ । संजलणं पमत्तसंजदस्स कादव्वं । तिण्णिआउ० ओघं। तिरिक्खगदिणामाए पणवीसं संजुत्ताणं च । मणुसगदिपंचगं' आदाउञ्जोवं सोधम्मभंगो। देवगदि०४ सत्याणे कादच्वं । आहारदुगं ओघं । पंचिंदियणामाए बड्डी अवट्ठाणं देवगदिभंगो। हाणी मदो देवो जादो तीसदिणामाए बंधगो जादो तप्पाङग्गजह० पडिदो तस्स उक्क. हाणी । एवं समचदु०-पसत्य सुभग-मुस्सर-आदें | णसं० सत्थाणे कादच्वं । चदुसंठा०- पंचसंघ०- अप्पसन्थ०-दुस्सर० सोधम्मसंगो । एवं पम्माए वि । णवरि णामाणं तिरिक्स- गदि-मणुसगदिसंजुत्ताणं सहस्सारभंगो । एवं देवगदिसंजुत्ताणं आभिणिभंगो । एवं मुक्काए बि । णवरि सम्मत्तपगदीणं ओघभंगो। सेसाणं आणदभंगो। अट्ठावीसदि- संजुत्ताणं आभिणि भंगो । भवसिद्धिया० ओभंगो। स्वस्थानमे कहना चाहिए । छह दर्शनावरण और मात नोकपायोकी उत्कृष्ट वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो आठ प्रकारके कोका बन्ध करनेवाला अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव सात प्रकारके कमांका वन्ध करने लगा,वह उनकी उत्कृष्टि वृद्धिका स्वामी है। उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी कौन है ? जो उन्कृष्ट योगवाला जीव मरा और जघन्य योगस्थानमे गिर पड़ा,वह उनको उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। इनका उत्कृष्ट अवस्थान स्वस्थानमें कहना चाहिए। अप्रत्यख्यानवरणचतुष्क और प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका भड्ग ओधके समान है। संज्वलनका भद् प्रमत्तसंयतके कहना चाहिए । तीन आयुओंका भड्ग ओधक समान है। तिर्यञ्चगतिकी उत्कृष्ट वृद्धि आदिका स्वामित्व नामकर्मको पच्चीस प्रकृतियोसे संयुक्त हुए जीवके होता है। मनुष्यगतिपश्चक, आतप और उद्योतका भग सौधर्म फल्पके समान है। देवगनचतुष्कका भङ्ग स्वस्थानमे कहना चाहिए । आहारकद्विकका भन ओचके समान है। पञ्चेन्द्रियजातिकी वृद्धि और अवस्थानका भद्ग देवाके समान है। तथा उत्कृष्ट हानि-जो जीव मरा और देव होकर नामकर्मकी तीस प्रकृतियोके साथ वन्धक होकर तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानमें गिरा, वह उसकी उत्कृष्टि हानिका स्वामी है। इसी प्रकार समचतुरस्त्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयकी अपेक्षा जानना चाहिए । नपुंसकवेदका भङ्ग स्वस्थानमे कहना चाहिए। चार संस्थान, पॉच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति और दुःस्वरका भग सोधर्मकल्पके समान है। इसी प्रकार पालेश्यामें भी जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि तिर्यश्चगति और मनुष्यगतिसंयुक्त नामकर्मकी प्रकृतियोका भग सहस्रार फल्पके समान है। इसी प्रकार देवगतिसंयुक्त प्रकृतियोका भङ्ग आभिनिबोधिक ज्ञानी जीवोंके समान है। इसी प्रकार शुक्ललेश्याम भी जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि सम्यक्त्वप्रकृतियोंका भग ओघके समान है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग आनतकल्पके समान है। देवगति आदि अट्ठाईस संयुक्त प्रकृतियोका भङ्ग आभिनिवोधिक ज्ञानी जीवोंके समान है। भव्य जीवोंमे ओघके समान भङ्ग है। १. ताप्रती-संजुत्ताणं च मणुसगदिपचग' इति पाठः। २. ता०प्रती 'आदेणबुस.' इति पाठः ।
पदाणिक्खेवे सामित । २५६, सासणे तिण्णिआऊणि देवगदि०४ तिण्णि वड्डी हाणी अवट्ठाणं सत्थाणे कादव्वं । सेसाणं वड्डी अवठ्ठाणं सत्थाणे० । हाणी अण्णदरो मदो अण्णदरेसु एइंदिएसु उववण्णो तप्पा०जह० पडिदो तस्स उक्क० हाणी । सम्मामि० सवाणं पगदीणं सत्याणे काइन्वं । देवगदिअट्ठावीससंजुत्ताणं मणुसगदिपंचगस्स एगुणतीसदिणामाए सह सत्तविधवंधगस्स । सपणी० ओथं । णवरि थावर-विगलिंदियसंजुत्ताओ सत्थाणे काद- वाओ । असण्णि तिरिक्खोघं । गवरि सब्बाओ पगदीओ मिच्छादिहिस्स कादवाओ। आहारा० ओघं। एवं उक्कस्ससामित्तं समत् । २५७. जहण्णए पगढ़ । दुवि०-ओघे० आदे। ओघे० णिरयाउ-देवाउ-णिरय- गदि-देवगदि-बेउब्बि०-आहार-दोअंगोन्दोआणु०-तिस्थ० जह० वड्डी कस्स० ? यो वा सो वा यत्तों वा तत्तो वा हेडिमाणंतरजोगट्ठाणादो उपरिमाणंतरजोगहाणं गदो तस्स जह० वड्डी। जद. हाणी कस्स० ? यो वा सो वा यत्तो वा तत्तो वा उवरिमाणंतर- जोगट्ठाणादों हेडिमाणंतरं जोगट्ठाणं गदो तस्स जह• हाणी । एक्कदरत्थमवट्ठाणं । सेसाणं सव्वपगढीणं जह० वड्डी कस्स० ? यो वा सो वा परंपरपजत्तगो वा परंपरअपञ्जत्तगो वा २५३. सासाइनसन्यन्त्रष्टि जीवामें तीन आयु और देवगतिचनुष्की तीनो ही वृद्धि, हानि और भवत्त्यान त्वस्थानमे कहने चाहिए। शेष प्रकृतियोंकी वृद्धि और अवस्थान स्वस्थानमें करने चाहिए । हानि-जो अन्तर जीव मग और अन्यतर एकेन्द्रियोमे च्यन्न होकर तत्प्रायोग्य जवन्य योगस्थानमें गिरा,वह उनकी उत्कृष्ट हानिका स्वामी है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवाम सब प्रकृचियोंके उत्कृष्ट वृद्धि आदि तीनो पद स्वस्थानमें करने चाहिए। देवगति आदि अट्ठाईस संयुक्त प्रकृतियोंका और मनुष्यगतिपञ्चकका भङ्ग नामकर्मकी उनतीस प्रकृतियोंके साथ सात प्रकारले कोका बन्ध करनेवाले जीवके कहना चाहिए। संजी जीवोमै ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि स्थावर और विकलेन्द्रिय संयुक्त प्रकृतियोका भन्न स्वस्थानमें कहना चाहिए। असंज्ञी जीवोंमें सामान्य तिर्यञ्चोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि सब प्रकृतियोंना भङ्ग मिच्याष्टिके करना चाहिए । आहारक जीवामें ओघके समान भङ्ग है। इस प्रकार उकृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ। २५७. जयन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-ओष और आदेश | ओघसे नर- कायु, देवायु. नरकगति, देवगति, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, दो आङ्गोपाङ्ग, दो आनुपूर्वी और तीर्थङ्करप्रकृतिकी जघन्य वृद्धिका स्वामी कौन है? जो कोई जीव जहाँ-कहींसे अघस्तन अनन्तर योगत्यानसे उपरिम अनन्तर योगस्थानको प्राप्त हुआ, वह उनकी जघन्य वृद्धिका स्वामी है। उनकी जघन्य हानिका स्वामी कौन है ? जो कोई जीव जहाँ कहींसे उपरिम अनन्तर योगत्यानले अवस्तन अनन्तर योगस्थानको प्राप्त हुमा, वह उनकी जघन्य हानिका स्वामी है। तया इनमेंसे किसी एक स्थानमें जघन्य अवस्थान होता है। शेष सब प्रकृतियोंकी जवन्य वृद्धिका स्वामी कौन है ? जो कोई परम्परा पर्याप्तक जीव या परम्परा अपर्याप्तक जीव १. वास्तौ [वा ] यतों' इति पाः | २ ता. प्रतो 'उपरिमाणंतरं जोगाणाटो' इति पाठः । , .. महाबंधे पदेसवंधाहियारे यत्तो वा तत्तो वा हेहिमाणंतरजोगहाणादो उवरिमाणंतरजोगहाणं गदो तस्स जह. बड्डी । जह० हाणी कस्स० ? यो वा सो वा परंपरपजत्तगो वा परंपरअपजत्तगो वा यत्तो वा तत्तो वा उवरिमाणंतरादो जो०ढाणादो हेहिमाणंतरजोगट्ठाणं गदो तस्स जह. हाणी। एकदरत्थमवट्ठाणं । एवं ओघभंगो सवतिरिक्ख-सव्वमणुस-सव्वएइंदिय-सव्व- विगलिंदिय-पंचिंदियपजत्तापजत्त-पंचकाय-सब्बतसकाय-कायजोगि०-इथिल-पुरिस० णबुंस०-कोधादि०४-मदि-सुद०-आभिणि-सुद-ओधि०-असंजद०-चखुदं-अचखुर्द ओधिदं०-तिण्णिले०-भवसि०-अभवसि०-सम्मादि०-खइग०-वेदग०-मिच्छा०-सण्णि- असण्णि-आहारग ति। २५८, रइएसु सव्वपगदीणं ओघं णिरयगदिभंगो। एवं सव्वणिरय-सव्वदेव पंचमण-पंचवचि०-ओरालिय०-बेउब्धियका०-आहारका०-अवगद०-विमंग०-मणपज०- संजद-सामाइ०-छेदो०-परिहार०-सुहुमसंप०--संजदासंज०-उवसम०-सासण-सम्मामि । ओरालियमि० देवगदिपंचगस्स जह० वड्डी क० ? अण्णदरस्स दुसमयओरालियकाय- जोगिस्स । सेसाणं ओघो। वेठबियमिस्स० सच्चपगदीणं जह० वड्डी क० ? अण्ण- दरस्स दुसमयवेउब्वियका०मिस्सगस्स । एवं आहारमि० । कम्मइग-अणाहारगेसु सब्ब- जहाँ-कहींसे अधस्तन अनन्तर योगस्थानसे उपरितन अनन्तर योगस्थानको प्राप्त हुआ, वह उनकी जघन्य वृद्धिका स्वामी है। उनकी जघन्य हानिका स्वामी कौन है ? जो कोई परम्परा पर्याप्तक जीव या परम्परा अपर्याप्तक जीव जहाँ-कहींसे उपरिम अनन्तर योगस्थानसे अधस्तन अनन्तर योगस्थानको प्राप्त हुआ,वह उनकी जघन्य हानिका स्वामी है। तथा इनमेंसे किसी एक स्थानमें जघन्य अवस्थान होता है। इस प्रकार ओघके समान सब तिर्यश्च, सब मनुष्य, सब एकेन्द्रिय, सब विकलेन्द्रिय, पञ्चेन्द्रिय व पर्याप्त और अपर्याप्त, पाँच स्थावरकायिक, सब उसकायिक, काययोगी, स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी आमिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी,' अवधिज्ञानी, असंयत, चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अवधि- दर्शनी, तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, मिथ्या- दृष्टि, संज्ञी, असंज्ञी और आहारक जीवोंमें जानना चाहिए। २५८, नारकियों में सब प्रकृतियोका भङ्ग ओघसे नरकगतिके समान है। इसी प्रकार सब नारकी, सब देव, पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, औदारिककाययोगी, वैक्रियिककाययोगी, आहारककाययोगी, अपगतवेदी, विभङ्गज्ञानी, मनापर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोप- स्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसाम्परायसंयत, संयतासंयत, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिध्याहृष्टि जीवोंमे जानना चाहिए । औदारिकमिश्नकाययोगी जीवोमें देवगतिपश्चककी जघन्य वृद्धिका स्वामी कौन है? जिसे औदारिकमिश्रकाययोगको प्राप्त हुए दो समय हुए,ऐसा अन्यतर दो गतिका जीव उक्त प्रकृतियोकी जघन्य वृद्धिका स्वामी है। शेष प्रकृतियोंका मग ओघके समान है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमे सब प्रकृतियोको जघन्य वृद्धिका स्वामी कौन है ? जिसे वैक्रियिकमिशकाययोगको प्राप्त हुए दो समय हुए हैं,ऐसा अन्यतर जीव उनकी जघन्य वृद्धिका स्वामी है। इसी प्रकार आहारकमिश्रकायोगी जीवोमे जानना चाहिए । कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमें सब प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धिका - , - ०- पदणिक्खेवे अपाबहुअं २२५ पगदीणं जह० वड्डी कस्स० ? अण्णदरस्स सुहुम० दुसमय-विग्गहगदिसमावण्णस्स तस्स जह० वड्डी एगमेवपदं । णवरि देवगदिपंचगस्स ओरालियमिस्सभंगो । णवरि ओघो। किंचि विसेसो। एवं जहण्णयं समत्तं । एवं सामित्तं समत्तं । अप्पाबहुअं २५६. अप्पाबहुगं दुविधं-जहण्णयं उक्कस्सयं च । उक्क० पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओषे० चदुआउ० वेउब्वियछकं आहारदुगं सव्वत्थोवा उक्कस्सिया वड्डी । उक्क० हाणी अवट्ठाणं च दो वि तुल्लाणि विसेसाधियाणि | सेसाणं पगदीणं सव्वत्योवा उक्क० वड्डी । उक० अवट्ठाणं विसेसाधियं । उक्क. हाणी विसे० । एवं ओघमंगों पंचिंदिय-तस०२-कायजोगि-कोधादि०४-मदि० मुद०-आमिणि-सुद-ओघि०-असंजद०- चम्सुदं०-अचखुदं०-ओधिदं०-तिण्णिले०-तेउ-पम्म-सुक्कले०-भवसि०-अभवसि० सम्मादि०-खइग-वेदग०-उवसम-सासण-मिच्छा-सण्णि-असण्णि-आहारग त्ति । णवरि एदेसि सव्वेसिं पगढ़ीणं अप्पाबहुगं | यासिं पगदीणं मरणं णत्यि० तेसिं आउग- भंगो कादव्यो। न्वामी कौन है ? जिसे विग्रहगतिको प्राप्त हुए दो समय हुए ऐसा अन्यतर सूक्ष्म जीव सत्र प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धिका स्वामी है। यहाँ एक ही पद है। इतनी विशेषता है कि इनमें देवगतिपश्चकका भङ्ग औदारिकमित्रकाययोगी जीवोंके समान है । इतनी विशेषता है कि ओघसे कुछ विशेषता है। इस प्रकार जघन्य स्वामित्व समाप्त हुआ। इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। अल्पवहुत्व २५६. अल्पबहुत्व दो प्रकारका है जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओष और आदेश ! ओघसे चार आयु, वैक्रियिकपटक और आहारकद्विककी उत्कृष्ट वृद्धि सबसे स्तोक है। उससे उत्कृष्ट हानि और अवन्थान दोनो परस्परमे तुल्य होकर भी विशेष अधिक हैं। शेष प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट वृद्धि सबसे स्तोक है। उससे उत्कृष्ट अवस्थान विशेप अधिक है। उससे उत्कृष्ट हानि विशेष अधिक है । इस प्रकार ओधके समान पञ्चेन्द्रियद्विक, त्रसद्विक, काययोगी, कोषादि चार कयायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुतानानी, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, असंयत, चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अवधिदर्शनी, कृष्णादि तीन लेश्यावाले, पीतलेयावाले, पद्मलेश्यावाले, शुक्ललेश्यावाले, भव्य, अभव्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्नष्टि, वेदकसन्याष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासाइनसन्यन्तुष्टि, मिथ्याष्टि, सन्नी, असंज्ञी और आहारक जीवामें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इन सबमे अल्पवहुत्व है। तथा जिन प्रकृतियोंके बन्धके समय मरण नहीं है,उनका भङ्ग आयुकर्मके समान करना चाहिए ! १. ताप्रती मित्तमंगो णरि आयो' इति पाठः। २. आप्रती वितेताघिय । हाणी' इति पाट ३. ताप्रती विनाधिका आधभंगा' इति पाठ ! ४ आ प्रतो तस० कायजोगि०' इति पाठः । " , २६ . । ૨૨૬ महाबंधे पदेसबंधाहियारे २६०. सव्वणेरइ०-देव०-पंचमण-पंचवचि०-ओरा०-वेउ०-आहार०-अवगदवे- विमंग०-मणपज०-संजद-सामाइ०-छेदो०-परिहार०-सुहुमसंप०-संजदासंजद-सम्मामिच्छा एदेसि वि याओ पगदीओ अत्थि तेसिं मूलोघं यथा आहारसरीरं तथा कादत्वं । ओरालियमि० दोआउ० ओघ । देवगदिपंचगं वज । सेसाणं सव्वपगदीणं सम्वत्थोना उक० अवठ्ठाणं। उकहाणी विसे० । उक्क० वड्डी असंखेंजगु० । वेउनियमि०-आहारमि०- कम्मइ०-अणाहारगेसु हाणी अवठ्ठाणं च णत्थि'। एकमेव वड्डी । एवं उकस्सयं अप्पाबहुगं समचं । २६१. जहण्णए पगदं। दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० सम्वपगदीगंजह० वड्डी जह० हाणी जह० अवट्ठाणं च तिण्णि वि तुल्लाणि । एस कमो याव अणाहारग ति। णवरि वेउन्वियमि०-आहारमि०-कम्मइ०-अणाहार० जह० वड्डी । हाणी अवठ्ठाणं णस्थि । ओरालियमिस्स० देवगदिपंचगस्स एकमेव पदं वड्डी अस्थि । सेसं णत्थि । एवं जहण्णं अप्पाबहुगं समत्त । २६२. एसिं पगदीणं अणंतभागवड्डी अणंतभागहाणी वा तेसिं पगदीणं तम्हि चेव समए अजहण्णिया वड्डी वा हाणी वा अवट्ठणं वा होज, ण पुण एरिसलक्खणं पत्तैगम्हि। २६० सव नारकी, सब देव, पॉच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी औदारिककाययोगी, वैक्रियिककाययोगी, आहारककाययोगी, अपगतवेटवाले, विभङ्गज्ञानी, मन पर्ययज्ञानी, सयत, सामायिक सयत, छेदोपस्थापनासयत, परिहारविशुद्धिसयत, सूक्ष्मसाम्परायसयत, सयतासयत और सम्यग्मिथ्यादृष्टि इन मार्गणाओमे जो प्रकृतियाँ है, उनका अल्पवहुत्व मूलोघसे जिस प्रकार आहारकशरीरका कहा है, उस प्रकार करना चाहिए। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमे दो आयुओका भङ्ग ओघके समान है। तथा देवगतिपञ्चकको छोडकर शेप प्रकृतियोका उत्कृष्ट अवस्थान सबसे स्तोक है। उससे उत्कृष्ट हानि विशेप अधिक है। उससे उत्कृष्ट वृद्धि असख्यातगुणी है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे हानि और अवस्थान नहीं है, एकमात्र वृद्धि है। इस प्रकार उत्कृष्ट अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। २६१. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओष और आदेश । ओघसे सब प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि, जघन्य हानि और जघन्य अवस्थान तीनों ही तुल्य हैं। यह क्रम अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि क्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगो और अनाहारक जीवोंमें जघन्य वृद्धि है। हानि और अवस्थान नहीं हैं । औदारिकमिश्नकाययोगी जीवोमें देवगतिपश्चकका एकमात्र वृद्धिपद है, शेष दो पद नहीं है। इस प्रकार जघन्य अल्पत्रहुत्व समाप्त हुआ। २६२. जिन प्रकृतियोंकी अनन्तभागवृद्धि या अनन्तभागहानि होती है, उन प्रकृतियोंकी उसी समयमै अजघन्य वृद्धि, हानि या अवस्थान होवे,पर इस प्रकारका लक्षण प्रत्येकमें नहीं है। १. ताप्रती हाणि-अवाण णत्यि' इति पाठः। २. तामती 'जह० पट्टिहाणिअवधाण णत्यि' इति पाटा।
वडिबंधे समुक्त्तिणा वडिबंधो समुक्त्तिणा २६३. एचो वडिबंधे ति तस्य इमाणि तेरस अणियोगद्दाराणि । तं जहा- समुकिवणा याव अप्पाबहुगे ति १३ । समुक्त्तिणाए दुविधो णिदेसो-ओघे० आदे०। ओषे० पंचणा-थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-इत्थि०-णबुस० चदुआउ०-पंचंत० अत्यि [असंखेंजमागवडि - हाणी संखेंजभागवडि संखेंजभागवड्डि - हाणी संखेंजगुणववि-हाणी असंखेंगुणवति-हाणी अवडिद० अवत्तव्वबंधगा य। छदंस०-बारसक०-सत्तणोक० अस्थि अणंतभागवड्डि-हाणी असंखेंजभागवड्डि-हाणी संखेंजभागवड्डि-हाणी संखेंजगुणवड्डि- हाणी असंखेंजगुणवडि-हाणी अवविद० अवतन्त्रबंधगा य। दोवेदणीयं सव्याओ गामपगदीओ दोगोदं अस्थि चत्तारिवड्डि-हाणी अवट्टिद० अवतव्वबंधगा य । एवं ओघमंगो मणुस०३-पंचिंदिय-तस०२-पंचमण-पंचवचि०-कायजोगि०-ओरालिय०- चक्सुदं०-अचक्तुदं०-सुकले०-भवसि०-सण्णि-आहारग त्ति । २६४. णिरएसु छदस-बारसक० सत्तणोक० अस्थि पंचवड्डी पंचहाणी अवट्ठा० । सेसाणं धुविगाणं अत्थि चचारिवड्डी चत्तारिहाणी अवढिदवंधगा य । ससाणं परि- पत्तमाणियाणं पगदीणं अत्यि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवट्ठाणं अवतन्वबंधगा य । एवं सन्वणेरइय-सव्वतिरिक्ख-सन्वदेव-वेउन्वि०-असंजद०-पंचलेस्सा० । वृद्धिवन्ध समुत्कीर्तना २१३. आये वृद्धिबन्धका प्रकरण है। उसमें ये तेरह अनुयोगद्वार होते हैं। यथा- समुत्कीर्वनासे लेकर अल्पबहुत्व तक १३ । समुत्कीर्तनाका निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और भादेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चार मायु और पॉच अन्तरायकी असंख्यातमागवृद्धि, असंख्यातमागहानि, संख्यात- भागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यात- गुणहानि, अवस्थित और भवक्तव्यपदके वन्धक जीव हैं । छह दर्शनावरण, वारह कषाय और सात नोकषायकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि, असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव हैं। दो वेदनीय, नामकर्मकी सब प्रकृतियाँ और दो गोत्रकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके वन्धक जीव हैं । इस प्रकार ओघके समान मनुष्यत्रिक, पञ्चेन्द्रियद्विक, सद्विक, पॉच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, काययोगी, औदारिककाययोगी, चनुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, शुक्ललेश्यावाले, भव्य, संझी और आहारक जीवोंमें जानना चाहिए । २६४. नारकियों में छह दर्शनावरण, वारह कषाय और सात नोकषायको पाँच वृद्धि, पाँच हानि और भवस्यान पदके बन्धक जीव हैं। शेष ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीव हैं। शेष परावर्तमान प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि, अव- १. ता प्रतौ 'सम (मु) कित्तणा' इति पाठः । २. ता प्रतौ 'अत्यि सखेजमागवटि सखेबभाग- बढिहाणि' इति पाठ । ३. ता प्रतौ 'अवठा (हिट) अवतन्त्रबंधगा' इति पाठः । ४. ता प्रतौ 'अबष्ठा (हिद०)। सेवाण इति पाठः। , महाबंधे पदेसर्वधाहिवारे २६५. सव्वअपजत्तगाणं तसाणं थावराणं च सव्वएइंदिय-विगलिंदिय-पंच- कायाणं धुविगाणं अत्थि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवट्ठिदवंधगा य । सेसाणं अत्थि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवहि अवतव्वबंधगा य । २६६. ओरालियमि० अपजत्तभंगो। णवरि देवगदिपंचगस्स अस्थि असंखेंज- गुणवडिवंधगा य । सेसाणं णत्थि । वेउब्वियमि०-आहारमि०-कम्मइ०-अणाहारगेसु धुविगाणं एकवड्डी । सेसाणं परियत्तमाणियाणं अस्थि असंखेंजगुणवडि० अवतव्व- वंधगा य । २६७. इत्थि-पुरिस०-णस०-कोधेसु पंचणाणावरणीयाणं चदुदंचदुसंज०- पंचंत० अवत्त० णस्थि । सेसपदा अस्थि । सेसाणं पगदीणं ओघं। एवं माणे । णवरि पंचणा०-चदुदंस-तिण्णिसंज०-पंचंत । एवं मायाए। णवरि पंचणा०-चदुदंस०- दोसंज०-पंचंत० । एवं लोमे । णवरि पंचणा०-चदुदंस०-पंचंत० । अवगदवे. पंचणा- चदुदंस०-सादा०-चदुसंज-जसगि०-उच्चा०-पंचंत० अत्थि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवविद० अवत्तव्वबंधगा य । स्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव हैं। इसी प्रकार सव नारकी, सब तिर्यच, सव देव, वैक्रियिककाययोगी, असंयत और पॉच लेश्यावाले जीवोमे जानना चाहिए। २६५ त्रस और स्थावरके सब अपर्याप्तक, सब एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके वन्धक जीव हैं । शेप प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव है। २६६ औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमे अपर्याप्तक जीवोंके समान भन्न है। इतनी विशेषता है कि देवगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव हैं। शेष पदोके बन्धक जीव नहीं है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी,आहारकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवामें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोकी एक वृद्धि है । शेष परावर्तमान प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धि और अवक्तव्यपदके वन्धक जीव हैं। २६७. स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और क्रोधकपायवाले जीर्वोमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, चार संज्वलन और पाँच अन्तरायका अवक्तव्य पद नहीं है। शेष पद हैं। तथा इनमें शेप प्रकृतियोका भग ओघके समान है। इसी प्रकार मानकषायवाले जीवोम जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, तीन संज्वलन और पाँच अन्तरायका अवक्तव्यपट नहीं है। इसी प्रकार मायाकषायवाले जीवोमें जानना चाहिए। इतनी विशेपता है कि इनमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, दो संज्वलन और पाँच अन्तरायका अवक्तव्यपद नहीं है। इसी प्रकार लोभकपायवाले जीवामे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पॉच अन्तरायका अवक्तव्यपद नहीं है। अप्रगतवेदवाले जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संज्वलन, यश-कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव हैं। १. तान्यता पचलेस्सा सन्चअपजत्तगाण तसाण यावराण च । सम्बएइटिय-' इति पाठः।
२२६ वडिवंधे समुचित्तणा २६८. मदि-सुद० धुविगाणं अत्थि चत्वारिवड्डी चत्तारिहाणी अवविदवंधगा य । सेसाणं परियत्तमाणिगाणं अस्थि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवद्विद० अवत्तव्ववंधगा य । एवं विभंग०-अब्भव०-मिच्छादि०-असणि ति । णवरि मदि-सुद० विभंगभंगो। मिच्छा० सादभंगों। २६६. आभिणि-सुद-ओघि० चदुदंस-अट्ठक० अत्थि पंचवड्डी पंचहाणी अव- द्विद० अवत्तन्वबंधगा य । सेसाणं अस्थि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवविद्० अवत्तव्य- बंधगा य। एवं ओधिदंस-सम्मा०-खइग-वेदग०-उवसम० ति। णवरि वेदगे धुविगाणं अवतव्वं णत्थि । छदसणा० णाणाभंगो । २७०. मणपजवे सवपगदीणं अत्थि चत्तारिवड्डी चत्तारिहाणी अवद्विद० अवत्तव्वबंधगा य । चदुदंसणा० अत्यि पंचवड्डी पंचहाणी अवडिद० अवत्तव्वबंधगा या एवं संजद-सामाह०-छेदो०-परिहार०-सुहुमसंप० संजदासंजद० - सासण। सम्मामि० धुविगाणं अत्थि चत्तारिवड्डि-हाणी अवट्ठाणं । सेसाणं अस्थि चत्तारिवड्डी चत्वारिहाणी अवविद० अवतन्वबंधगा य । एवं समुक्त्तिणा समत्ता -www- २६८. मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवाम ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके वन्धक जीव हैं। शेष परावर्तमान प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव हैं। इस प्रकार विभगनानी, अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञी जीवामें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोमें विभङ्गज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है । वथा मिथ्यात्वका भङ्ग सातावेदनीयके समान है। २६६. आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोमें चार दर्शनावरण और आठ कषायकी पाँच वृद्धि, पॉच हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव हैं। शेष प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव हैं। इसी प्रकार अवघिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, ज्ञायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोंमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका अवक्तव्यपद नहीं है। तथा छह दर्शनावरणका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। २७०. मनःपर्ययज्ञानी जीवोंमें सब प्रकृतियाकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके वन्धक जीव हैं। चार दर्शनावरणकी पाँच वृद्धि, पॉच हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके वन्धक जीव हैं। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसाम्परायसंयत, संयतासंयत और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंमे जानना चाहिए। सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवामें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीव हैं। शेष प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्य- पदके बन्धक जीव हैं। इस प्रकार समुत्कीर्तना समाप्त हुई। , १. आप्रती 'असामंगों' इति पाठ.।
महाबंधे पदेसबंधाहियारे सामित्तं २७१. सामित्वाणुगमेण दुविहो णिदेसो-ओघे० आदे० । ओषे० पंचणा०- तेजाः ०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप० - णिमि० - पंचंत० चत्वारिवाड्ड - हाणि-अवविदबंधगो कस्स० १ अण्णदरस्स । अवत्तव्यपंध० कस्स० १ अग्णद० उवसमग० परिसडमाण. मणुसस्स वा मसिणीए वा पढमसमयदेवस्स वा । थीणगि०३-मिच्छ०-अणताणु०४ चत्तारिवाड्डि-हाणि-अवडिदव० कस्स १ अण्ण० । अवत्त० कस्स० १ अण्ण० संजमादो वा संजमासंजमादो वा सम्मत्तादो या सम्मामिच्छत्तादो वा परिपडमाणगस्स पढम- समयमिच्छादिहिस्स वा सासणसम्मादिद्विस्स वा। णवरि मिच्छा० अवत्त० सासण- सम्मत्तादो वा त्ति भणिदव्वं । णिहा-पयला-भय-दुगं०चचारिवड्डि-हाणि-अवट्टि कस्स० १ अण्ण' । अवत्तव्व० णाणाभंगो। अणंतभागवड्डी कस्स० १ अण्ण. पढम- समयसम्मादिवि० संजदासंजद० संजदस्स वा । अणंतभागहाणी कस्स० ? अण्णद० सम्मत्तादो परिपडमाणगस्स पढमसमयमिच्छा० [सासण.] 1 चदुदंस० णाणा भंगो । णवरि अणंतभागवड्डी' कस्स ? अण्णद० पढमसमयअसंजदसम्मा० संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा पढमसमए वट्टमाणगस्स | अर्णतभागहाणी कस्स० १ अण्णद० अपुव्व- . स्वामित्व २७१. स्वामित्वानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्त- रायको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितबन्धका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। अवक्तव्यवन्धका स्वामी कौन है ? उपशमश्रोणिसे गिरनेवाला अन्यतर मनुष्य और मनुष्यिनी तथा प्रथम समयवर्ती देव उनके अवक्तव्यबन्धके स्वामी है। स्थानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितबन्धका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। उनके अवक्तव्यबन्धका स्वामी कौन है ? संयम, संयमासंयम, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वसे गिरकर जो प्रथम समयमें मिव्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि हुआ है,वह उक्त प्रकृतियोके अवक्तव्यबन्धका स्वामी है। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यबन्धका सासादनसम्यक्त्वसे च्युत होकर जो प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि हुआ है, वह जीव भी स्वामी है- ऐसा कहना चाहिए। निद्रा, प्रचला,भय और जुगुप्साकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है । अवक्तव्यपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। उनकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है ? प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत्त और संयत जीव उनकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी है। उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी कौन है ? अन्यतर जो सम्यक्त्वसे च्युत होकर प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि या सासादनसम्यग्दृष्टि जीव है, वह उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी है। चार दर्शनावरणका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि उनकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है ? प्रथम समयवर्ती अन्यतर असंयत सम्यग्दृष्टि, संयतासयत और संयत जीव उनकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी है। उनकी अनन्त- १. तापतौ 'अणु (पण.) इति पाठः । २. आ०प्रतौ 'गवरि अवत्त० अणंतभागवड्डी' इति पाठः ।
वडिबंधे सामित्तं २३१ करणस्स वा णिद्दा-पयलाणं पढमसमयबंधगस्स पढमसमयमिच्छादिहिस्स [ सासण.] वा । सेसाणं पदाणं णाणा मंगो । दोवेदणी० सव्वाओ णामपगदीओ दोगोद० तारि- वड्डि-हाणि-अवढि० कस्स० १ अण्णद० । अवत्तव्वं कस्स० १ अण्णद० परियत्तमाणगस्स पढमसमयवंधगस्स। अपञ्चक्खाण०४ अणंतभागवड्डी कस्स ? अण्ण० पढमसमय० असंजदस्स । अणंतभागहाणी कस्स० १ अण्णद० सम्मत्तादो परिपडमाणपढमसमय- मिच्छादि० वा सासणसम्मादिहिस्स वा। सेसाणं पदाणं णांणा मंगो। पञ्चक्खाण०४ अणंतभागवड्डी कस्स० १ अण्ण० पढमसमयअसंजदस्स वा संजदासंजदस्स वा। हाणी कस्स० १ अण्ण० संजमादो वा संजमासंजमादो वा परिपउमाणगस्स पढमसमय- मिच्छादिहिस्स वा असंजदसम्मादिहिस्स वा । सेसाणं पदाणं णाणावरणभंगों' । णवरि अट्ठक० अवत्तव्वं भुजगारमंगो। चदुसंजलणाणं अणंतभागवड्डी कस्स० १ अण्ण. पढमसमयअसंबदसम्मा० वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा। हाणी कस्स० ? अण्ण० संजमादो वा संजमासंजमादो वा सम्मत्तादो वा परिपडमाणगस्स पढमसमय- मिच्छादिहिस्स वा सासण० वा सम्मामि० वो असंजदस्स वा संजदासंजदस्स वा। सेसाणं पदाणं णाणा भंगो। चदुण्णं आउगाणं चत्तारिवड्डि-हाणि-अवहि कस्स. ? भागहानिका स्वामी कौन है ? अन्यतर लौटते हुए निद्रा और प्रचलका बन्ध करनेवाला,ऐसा प्रथम समयवर्ती अपूर्वकरण जीव और प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि या सासादनसम्यग्दृष्टि जीव उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी है। शेष पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। दो वेदनीय, नामकर्मकी सब प्रकृतियों और दो गोत्रकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका स्वामी कौन है ? अन्यवर जीव स्वामी है। उनके अवक्तव्यपदकास्वामी कौन है? भन्यवर परावर्तमान प्रथम समयमें बन्ध करनेवाला जीव स्वामी है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कको अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है ? अन्यतर प्रथम समयवर्ती असंयतसम्यग्दृष्टि जीव स्वामी है। उनकी अनन्त- भागहानिका स्वामी कौन है ? अन्यतर सम्यक्त्वसे गिरनेवाला प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि या सासादनसम्यग्दृष्टि जीव स्वामी है। शेष पदोका भङ्ग झानावरणके समान है। प्रत्याख्यानावरण चतुष्ककी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है? अन्यतर प्रथम समयवी असंयतसम्यग्दृष्टि और संयवासयत जीव स्वामी है। उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी कौन है? अन्यतर संयमसे और संयमासंयमसे गिरनेवाला प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीव स्वामी है। शेष पदोंका मग ज्ञानावरणके समान है । इतनी विशेषता है कि आठ कषायोंके अवक्तव्यपदका भङ्ग भुजगारके समान है। चार संज्वलनोकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है ? भन्यतर प्रथम समयवर्ती असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत जीव स्वामी है। उनकी अनन्त- भागहानिका स्वामी कौन है ? अन्यतर संयम, संयमासंयम और सम्यक्त्वसे गिरनेवाला प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्याहृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीव स्वामी है। शेष पदोंका भज्ञानावरणके समान है। चार आयुभोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। अवक्तन्यपदका स्वामी कौन १. तापतौ 'णदा [णं] णाणावरण-भंगो' इति पाठः । २. ता प्रतौ 'चदुसंबलणाणा (ण) इति पाठः।
२३२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे अण्णद० । अवत्त० कस्स० १ अण्णद० पढमसमयआउगवंधमाणगस्स । एवं ओघ- भंगो मणुस०३-पंचिंदि०-तस०२-पंचमण०-पंचवचि० - काययोगि-ओरालि० चखु०- अचाखु०-भवसि०-सण्णि-आहारग ति । णवरि मणुस०३-पंचमण-पंचवचि० ओरा० अवत्त देवो ति ण भाणिदछ । २७२. गिरएसु धुवियाणं चत्तारिवाड्डि-हाणि-अवडि• कस्स० १ अण्णद० । छदंस०-बारसक०-सत्तणोक० अणंतभागवड्डी कस्स०१ अण्णद० पढमसमयसम्मादिद्विस्स । अर्णतभागहाणी कस्स० १ अण्णद० पडिमाण. पढमसमयमिच्छादिवि० वा सासण- सम्मा० वा। सेसाणं भुजगारमंगो। एवं सत्तसु पुढवीसु । सव्यतिरिक्ख-सव्वदेव- वेउब्वियका०-असंजद०-किण्ण-णील-काऊणं गिरयभंगो। गवरि तिरिक्खेसु अणंत- भागवड्डि-हाणी० संजदासंजदादो अत्थि ति णादव्यं । २७३. सव्वअपजत्तगेसु धुविगाणं चत्तारिखड्डि-हाणि-अवट्टिः कस्स० १अण्णदः । सेसाणं परियत्तियाणं ओघमंगो। एवं सम्बअपजतगाणं एइंदिय-विगलिंदिय-पंच- कायाणं च। है ? प्रथम समयमें आयुबन्ध करनेवाला अन्यतर जीच स्वामी है। इस प्रकार ओघके समान मनुष्यत्रिक, पञ्चन्द्रियद्विक, सद्विक, पॉच मनोयोगी पाँच वचनयोगी, काययोगी, औदारिक काययोगी, चतुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, भव्य, संज्ञी और आहारक जीवोमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि मनुष्यत्रिक, पॉच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी और औदारिककाययोगी जीवों में अवक्तव्यपदका स्वामी देव है,ऐसा नहीं कहना चाहिए। विशेषार्थ-यहाँ ओघसे सब प्रकृतियोके यथासम्भव पदोंका स्वामी कहा है। मान तीन वेद और चार नोकषायोके सम्भव पदोका स्वामित्व उपलब्ध नहीं होता सो जान कर घटित कर लेना चाहिए। २७२. नारकियोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकी चार धृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। छह दर्शनावरण, बारह कषाय और सात नोकषायकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है ? अन्यतर प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टि जीव स्वामी है। अनन्तभागहानिका स्वामी कौन है ? अन्यतर गिरनेवाला प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव खामी है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग भुजगार अनुयोगद्वारके समान है। इसी प्रकार सातो पृथिवियोंमें जानना चाहिए । सवतिर्यच, सब देव, वैक्रियिककाययोगी, असंयत, कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले और कापोतलेश्यावाले जीवोंमें नारकियोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि तिर्यञ्चोंमें अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि संयतासंयतके सम्पर्कसे भी होती है। अर्थात् संयतासंयतमे भी अनन्तभागवृद्धि होता है और उससे गिरनेवाले जीवके भी अनन्तभागहानि होती है,ऐसा जानना चाहिए। २७३. सब अपर्याप्तक जीवोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। शेष परावर्तमान प्रकृतियोंका भङ्ग १. आ०प्रतौ 'तस० पचमण पचवचि० ओरा० अवत्तः' इति पाठः । २. ता० प्रतौ 'सव्वा (व) अपजत्तगेसु' इति पाठः।
वडिवंधे सामित्तं २३३ २७४, ओरालियमि० धुविगाणं चत्तारिखड्डि-हाणि-अवढि० कस्स० ? अण्णद० । सेसाणं परियत्तमाणिगाणं चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० कस्स० ? अण्णद० । अवत्त० कस्स० १ अण्णद० परियत्तमाण० पढमसमयबंधगस्स । देवगदिपंचग० संखेंजगुणवडि. कस्स० ? अण्णद० सम्मादि । २७५. वेउब्धियमि० पंचणा०-णवदंसणा०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दु०-ओराल तेजा०-०-वण्ण०४-अगु०४-बादर-पजत्त-पत्ते-णिमि-तित्थ०-पंचंत० असंखेंजगुणवड्डी कस्स० १ अण्णद० । सेसाणं असंखेंजगुणवड्डी कस्स ? अण्णद० । अवत्त० कस्स० ? अण्णद० परियत्तमाणपढमसमयपढमबंधगस्स। एवं आहारमि०-कम्मइ०-अणाहारगेसु । णवरि अप्यप्पणो धुविगाओ णादवाओ। २७६. इत्थिवेदगेसु ओघं । णवरि अवत्त० मणुसि भंगो । एवं णवंसगे। पुरिस० ओषं । अवगदवेदे ओघं । णवरि अवत्त० परिपडमाण. उवसम० पढमसमयबंधगस्स ! एवं सुहुमसं० । णवरि अवत्त० णत्थि । कोधादि०४ ओघं । णवरि अप्पप्पणो धुवि- गाओ णादव्याओ। ओघके समान है । इसी प्रकार सब अपर्याप्तक, एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोंमें जानना चाहिए। २७४ औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। शेष परावर्तमान प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। अवक्तव्यपदका स्वामी कौन है? अन्यतर परावर्तमान प्रकृतियोका प्रथम समयमे चन्ध करने- वाला जीव स्वामी है। देवगतिपञ्चककी संख्यातगुणवृद्धिका स्वामी कौन है ? अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव स्वामी है। २७५. वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमे पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरु- लघुचतुष्क, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, निर्माण, तीर्थङ्कर और पॉच अन्तरायकी असंख्यातगुणवृद्धिका स्वामी कौन है ? अन्यतर जीव स्वामी है। शेष प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धिका स्वामी कौन है । अन्यतर जीव स्वामी है। अवक्तव्यपदका स्वामी कौन है ? परावर्तमान प्रकृतियोका प्रथम समयमें बन्ध करनेवाला अन्यतर जीव स्वामी है। इसी प्रकार आहारकमिश्रकाययोगी, कार्मण- काययोगी और अनाहारक जीवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अपनी-अपनी ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियाँ जाननी चाहिए। २७६. स्त्रीवेदी जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेपता है कि इनमे अवक्तव्य- पदका भङ्ग मनुज्यिनियोंके समान है। इसी प्रकार नपुंसकवेदी जीवों में जानना चाहिए। पुरुष- वेदी जीवोंमे ओपके समान भङ्ग है। अपगतवेदी जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमें जो उपशमश्रोणिसे गिरनेवाला जीव प्रथम समयमे बन्ध करता है, वह उनके अवक्तव्यपदका स्वामी है। इसी प्रकार सूक्ष्मसाम्पराय संयत जीवोमे जानना चाहिए। इतनी १. आ० प्रतौ पदमसयरवगस' इति पाठ.।
। २३४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे २७७. आभिणि' सुद-ओधि० चदुदंस० अणंतभागवड्डी कस्स० १ अण्ण० अपुव्व- करणस्स णिहा-पयलाबंधवोच्छिण्णपढमसमयपंधगस्स। अणंतभागहाणी कस्स . ? अण्ण० अपुवकरणस्स णिहा-पयलापढमसमयबंधगस्स । पञ्चक्खाण०४ अणंतभागवड्डी कस्स० ? अण्णदरस्स संजदासंजदस्स पढमसमयबंधमाणगस्स । हाणी कस्स० १ अण्णद. संजमासंजमादो परिपडमाण पढमसमयबंध असंजदसम्मादिहि । चदुसंज० अर्णत- भागवड्डी कस्स० १ अण्णा पढमसमयसंजदासंजदस्स [ संजदस्स ] वा। अणंतभागहाणी कस्स०१ अण्ण० संजमादो संजमासंजमादोवा परिपडमाणपढमसमयअसंजद० वा संजदा- संजदस्स वा । सेसाणं ओघं । णवरि अणंतभागवडि-हाणी णत्थि। एवं ओघिदंस०- सम्मादि०-खड्ग०-वेदगस०-उत्सम | मणजव ओषं । णवरि चदुदंस० अणंतभाग- वडि-हाणी अत्थि । सेसाणं णत्थि । ताओ वि पगदीओ ओधिमंगो। एवं संजद- सामाइ०-छेदो०-परिहार०-संजदासंजद । गरि एदाणं दोणं अणंतभागवड्डि-हाणी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्यपद नहीं है। क्रोधादि चार कषायवाले जीवोंमें ओपके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि अपनी-अपनी ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों जाननी चाहिए । २७७, आभिनिबोधिकज्ञानी, अतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें चार दर्शनावरणकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है ? निद्रा और प्रचलाकी बन्धव्युच्छित्तिके प्रथम समयमें विद्यमान अन्यतर अपूर्वकरण जीव स्वामी है। उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी कौन है? उतरते समय प्रथम समयमै निद्रा और प्रथलाका बन्ध करनेवाला अन्यतर अपूर्वकरण जीव स्वामी है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है? चढ़ते समय प्रथम समयमें बन्ध करनेवाला अन्यतर संयतासंयत जीव स्वामी है। उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी कौन है ? संयमासंयमसे गिरनेवाला और प्रथम समयमै बन्ध करनेवाला अन्यतर असंयत- सम्यग्दृष्टि जीव स्वामी है। चार संज्वलनकी अनन्तभागवृद्धिका स्वामी कौन है? चढ़ते समय प्रथम समयमें बन्ध करनेवाला अन्यतर संयतासंयत जीव और संयत जीव स्वामी है। उनकी अनन्तभागहानिका स्वामी कौन है? संयमसे और संयमासंयमसे गिरनेवाला अन्यतर प्रथम समयवर्ती असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीव स्वामी है। शेष प्रकृतियोंका भंग ओषके समान है। इतनी विशेषता है कि शेष प्रकृतियोमेसे किसीकी भी अनन्तभागवृद्धि और अनन्त- भागहानि नहीं है। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे जानना जाहिए । मनःपर्ययज्ञानी जीवोंमे ओधके समान भंग है। इतनी विशेषता है कि इनमें चार दर्शनावरणको अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है तथा शेषको अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि नहीं है। फिर भी उन प्रकृतियांका मंग अवधिज्ञानी जीवीके समान है। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत और संयतासंयत जीवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अन्तके इन दोनों संयमोंमें १. ताप्रती धुविगाओ। आमिणि.' इति पाठः। २, ता. प्रतौ -वोच्छिण्णा पदमसमयबंधग' इति पाटः । ३. आ०प्रती 'अणतभागबट्टी कस्स.' इति पाठः । ४. ता०प्रती 'श्वसमा (म०) मणपजव०' दति पाठः।
वडिबंधे कालो - णत्यि । एदेण कमेण सामित्त पणेदव्वं । एवं सामित्वं समत्तं । कालो २७८. कालाणुगमेण-दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० सव्वपगदीणं असंखेंजगुण- वडि-हाणिबं० केवचिरं कालादो होदि ? जह० एग०, उक्क० अंतोमुहुत्तं । असंखेंज- भागवड्डि-हाणि-संखेंजभागवड्डि-हाणि-संखेंजगुणवड्डि-हाणिवंघकालं केवचिरं कालादो होदि ? जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । अवट्टि बंध० जह० एग०, उक्क० पवाइजतेण उवदेसेण ऍकारससमयं । अण्णेण पुण उवदेसेण पण्णारससमयं । एसिं कम्माणं अणंतभागवडि-हाणी अत्यि तेसि सव्वेसिं च अवत्त० सम्वत्थ कालो एयसमयं । दोणं आउगाणं चत्वारिषड्डि-हाणि-अवत्त० गाणा भंगो । अवहिदवंध० केवचिरं कालादो० १ जह० एग०, उक्क० सत्तसमयं । एवं याव अणाहारग त्ति पणेदव्यं । णवरि ओरालियमिस्स० देवगदिपंचग. असंखेंजगुणवड्डी केवचिरं कालादो० १ जह० उक० अंतोमु० । वेउव्वियमि० सव्वपगदीणं. असंखेंजगुणवड्डिबंधकालो केवचिरं० १ जह० मनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि नहीं है। इस प्रकार इस क्रमसे स्वामित्व ले जाना चाहिए। इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। काल २८ कालानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघसे सब प्रकृतियोंकी असंख्यावगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका कितना काल है जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यावगुणवृद्धि और संख्यातगुणहानिका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवस्थितबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल प्रवर्तमान उपदेशके अनुसार न्यारह समय है और अन्य उपदेशके अनुसार पन्द्रह समय है। जिन कर्मोंकी अनन्तभागवृद्धि और मनन्तभागहानि है उनके उन दोनों पदोका तथा सब प्रकृतियोंके अवक्तव्यपदका सर्वत्र एक समय काल है। दो आयुओंशी चार वृद्धि, चार हानि और अवक्तव्यपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवस्थितबन्धका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल सात समय है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए । इतनी विशेषता है कि औदारिकमित्रकाययोगी जीवाम देवगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिका कितना काल है ? जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवामें सब प्रकृतियोकी मसंत्यातगुणवृद्धि बन्धका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल १. वा प्रवौ 'एवं सामित्त ममत्त' इति पाठो नान्ति । २ ता०प्रतौ 'एगमम [यं दोणं ] माजगाने इति पाठ।
२३६ महाबंधे पदेसर्वधाहियारे एग०, उक्क० अंतोमु० । एवं आहारमि० । णवरि एसिं अवत्त० अत्थि तेसिं एयसमयं । कम्मइ०-अणाहारगेसु सव्वपगदीणं असंखेंजगुणवड्डी जह० एग०, उक्क० तिण्णिसमयं । देवगदिपंचग० असंखेंजगुणवड्डी जह० एग०, उक्क० वेसमयं एसि० अवत्त० अत्थि तेर्सि एगसमयं । णवरि अवगद० कोधसंजलणाए अवट्ठिदबंधकालं जह• एग०, उक्क० सत्तसमयं । सेसाणं अवहि० जह० एग०, उक्क० ऍकारससमयं । सुहुमसं० अवडि० जह० एग०, उक० सत्तसमयं । उवसम० णिहा-पयला-अपञ्चक्खाण०४ सचाओ णाम- पगदीओ जसगित्ति वज अवढि जह० उक० सत्तसमयं । सेसाणं अवढि० जह एग०, उक्क० ऍकारससमयं । अथवा पण्णारससमयं । एवं कालं समत्त। अन्तर्मुहूर्त है। इसी प्रकार आहारकमिश्नकाययोगी जीवामे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि जिनका अवक्तव्यपद है उनका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवामे सब प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल तीन समय है। देवगतिपञ्चककी असंख्यतगुणवृद्धिका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल दो समय है । तथा इनमे जिन प्रकृतियोका अवक्तव्यपद है उनका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । इतनी विशेपता है कि अपगतवेदी जीवोमे क्रोधसंज्वलनके अवस्थित वन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल सात समय है । शेप प्रकृतियोंके अवस्थित- वन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल ग्यारह समय है। सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवामे अवस्थितबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल सात समय है। उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे निद्रा, प्रचला, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और यश कीर्तिको छोड़कर नामकर्मकी सब प्रकृतियॉ इनके अवस्थितवन्धका जघन्य और उत्कृष्ट काल सात समय है। शेष प्रकृतियोके अवस्थितबन्धका जवन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल ग्यारह समय अथवा पन्द्रह समय है। विशेपार्थ-यहाँ ओघसे जिस प्रकृतिके जितने पद बतलाये है, उनमेसे प्रत्येक एक समय तक हो और दूसरे समयमें अन्य पद हो,यह सम्भव है, इसलिए सबका जघन्य काल एक समय कहा है । तथा असंख्यात गुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त और असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यावभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि और संख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होनेसे वह उक्त प्रमाण कहा है। जैसा कि स्वामित्वसे विदित होता है कि अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि जिन प्रकृतियोकी होती है,एक समयके लिए ही होती है, इसलिए इसके कालके समान उत्कृष्ट काल भी एक समय कहा है। अवस्थितपदके उत्कृष्ट कालके विषयमे दो उपदेश मिलते है-एक ग्यारह समयका और दूसरा पन्द्रह समयका, इसलिए यहाँ इन दोनो उपदेशोका संकलन कर दिया है। उनमेसे ग्यारह समयवाला उपदेश प्रवर्तमान बतलाया है । और पन्द्रह समयवाले उपदेशको अन्य कहा है । अवक्तव्यपद तो बन्धके प्रथम समयमे ही होचा है, इसलिए उसका उत्कृष्ट काल भी एक समय है, यह स्पष्ट ही है । यह ओघप्ररूपणा अनाहारक मार्गणा तक अपने-अपने पदोके १. ता० प्रतौ 'ए. अतो० (१) उ० अतो०' इति पाठः। २. ता प्रतौ 'ऐ (ए) सिं' इति पाठः । ३. ता०प्रती 'वज । अवहिः' इति पाठः । ४. ता०प्रती एवं काल समत्त । इति पाठो नास्ति । .
वडिवघे अंतरं २३७ अंतरं २७६. अंतराणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा०-तेजा-क०- वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० दोवड्डि-हाणिबंधंतरं केवचिरं कालादो० ? जह. एग०, उक्क० अंतो० । दोवड्डि-हाणि-अवडिदबंधंतरं केवचिरं० १ जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखेंज० । अवत्त० जह. अंतो०, उक्क. अद्धपोग्गल | थीणगिद्धि०३- मिच्छ०-अणंताणु०४ असंखेंजभागवड्डि-हाणि-असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० वेछावट्ठि० देसू० । दोवड्डि-हाणि अवढि०-अवत्त० णाणाभंगो। छदंस०-चदुसंज०- अनुसार सर्वत्र बन जाती है, इसलिए अनाहारक मार्गणातक इसी प्रकार जानना चाहिए-यह कहा है । मात्र जिन मार्गणाओमे कुछ विशेषता है उनमें उसका अलगसे निर्देश किया है। यथा-औदारिकमिश्रकाययोगी मार्गणामें अन्य प्रकृतियोके सम्भव पदोका काल तो ओघके समान बन जाता है,पर देवगतिपश्चककी मात्र असंख्यातगुणवृद्धि ही होती है, और इस मार्गणाका जघन्य व उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इसमे इन पाँच प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें यद्यपि सामान्यसे सब प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है,पर यह काल परावर्तमान प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धिका जानना चाहिए । ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त यहाँ भी है। आहारक- मिश्रकाययोगो जीवामे भी वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है, इसलिए उनमे 'इसी प्रकार आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमें जानना चाहिए' यह कहा है। इन दोनो मार्गणाऑमें जिनका भवक्तव्यपद है,उनके उस पदका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है,यह स्पष्ट ही है। कार्मणकाययोग और अनाहारक मार्गणाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय होनेसे इनमे सब प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय कहा है । मात्र देवगतिपञ्चकका वध करनेवाले जीवोका इन मार्गणाओमे उत्कृष्ट काल दो समय ही प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ इनकी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल दो समय कहा है । तथा यहाँ जिनका अवक्तव्यपद है,उनके इस पदका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है, यह भी स्पष्ट है । इसी प्रकार अन्य मार्गणाओंमे जो विशेषता वतलाई है उसे जानकर घटित कर लेनी चाहिए । इस प्रकार काल समाप्त हुआ। २७६. अन्तरानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । औघसे पाँच ज्ञानावरण, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्त- रायके दो वृद्धिबन्ध और दो हानिबन्धका कितना अन्तरकाल है ? जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थितवन्धका कितना अन्तर है ? जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । अवतन्य पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण है । स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण है। दो वृद्धि, दो हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय और जुगुप्साकी अनन्तभागवृद्धि, १ .
दुस्सर-अणादें २३८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे भय-दु० अर्णतभागवड्डि-हाणि-अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अद्धपोंग्गल० । सेसपदा णाणाभंगो। सादासाद-थिराथिर-सुभासुभ-जस०-अजस०दोषड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । मज्झिनाओ वड्डि-हाणि-अवढि जहएग०, उक्क० सेढीए असंखें । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अंतो' । अट्ठक० अणंतभागवड्डि-हाणि-अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० अद्धपोग्गल । असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० पुचकोडी देसू० । दोण्णिवड्डि-हाणि-अवट्ठि० णाणाभंगो। इत्थि० मिच्छ भंगो । णवरि अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० चेछावट्टि• देसू० । णqस०-पंचसंठा०-पंचसंघ०-अप्पसत्य०-दूभग- दोवड्डि-हाणि० अंतिल्लाओं जह० एग०, उक्क० वेछावद्विसाग० सादि० तिण्णि पलिदो० देसू० । मझिल्लाओ दोवड्डि-हाणि-अवढि णाणाभंगो । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० वेछावढि० सादि० तिण्णि पलिदो० देस० । पुरिस० अणंत- भागवड्डि-हाणि० जह० अंतो०, उक्क० अद्धपोग्गल० । अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० वेछावहि० सादि० । सेसाणं साद भंगो। तिण्णिआउ० वेउन्वियछक्कं चत्तारिखड्डि-चचारि हाणि-अवढि० जह० एग०, अवत्त०' जह० अंतो०, उक्क० सव्वाणं अणंतकालं० । अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण है। इनके शेष पदोंका भन ज्ञानावरणके समान है। सातावेदनीय, असाता- वेदनीय, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, यश कीर्ति और अयश कीर्तिकी दो वृद्धि और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। मध्यकी वृद्धि और हानिका तथा अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रेणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। आठ कपायकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि ओर अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण है । असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थित- पदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। स्त्रीवेदका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है। इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागर है । नपुंसकवेद, पॉच संस्थान, पाँच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर और अनादेयको अन्तकी दो वृद्धि और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक छयासठ सागरप्रमाण है। मध्यकी दो वृद्धि और दो हानिका तथा थतपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर है। पुरुषवेदकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण है। शेष पदोका भङ्ग सातावेदनीयके समान है। तीन आयु और वैक्रियिक षटकको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका १. ता०प्रतौ 'अवत्त० उक. अतो.' इति पाठः। २. ता प्रतौ 'अत्यिल्लाओ' इति पाठः। ३. ता.आ.प्रत्योः न०ए० उ० अवत्त०' इति पाठः।
वड्डिबंधे अंतरं २३६ तिरिक्खाउ० दोवड्डि-हाणि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० सागरोवमसद- पुषत्तं । दोण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें । तिरिक्ख०- तिरिक्खाणु०-उजो० दोवड्वि-हाणी० जह० एग०, उक्क० तेवहिसागरोवमसदं । दोण्णि- वड्डि-हाणि-अवट्टि० साद भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक० असंखेंजा लोगा। णवरि उजो० अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० तेवढिसागरोवमसदं । मणुसग०-मणुसाणु०- उच्चा० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० असंखेंजा लोगा | अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० असंखेंजा लोगा। चदुजादि-आदाव-थावरादि०४ दोवड्डि-हाणि० जह. एग०, अवत्त ० जह• अंतो०, उक्क० पंचासीदिसागरोवमसदं । दोणिवड्डि-हाणि०- अवट्ठाणं णाणाभंगो। पंचिंदि०-पर-उस्सा०-तस०४ चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० गाणा भंगो। अवत्त० जह० अंतो०, उक्क. पंचासीदिसागरोवमसदं। ओरालिक ओरालि०अंगो०-वजरि० दोवड्डि-हाणि० अंतिमाओ जह० एग०, उक्क० तिण्णि- पलिदो० सादि० । दोण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें। 0- जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है । निर्यश्चायुकी दो वृद्धि और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर सौ सागर पृथक्त्वप्रमाण है । तथा इसकी दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थित- पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगश्रोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। तिर्यश्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी और उद्योतको दो वृद्धि और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ त्रेसठ सागर है। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थितपदका भग सातावेदनीयके समान है । तथा अवतव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है। इतनी विशेषता है कि उद्योतके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्वर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एकसौ त्रेसठ सागर है। मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है । तथा अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है। चार जाति, आतप और स्थावर आदि चारको दो वृद्धि और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तन्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर एक सौ पचासी सागर है । तथा दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। पञ्चेन्द्रियजाति, परघात, उच्छास और सचतुष्ककी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर एक सौ पचासी सागर है। औदारिकशरीर, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और वर्षभनाराच संहननकी अन्तिम दो वृद्धि, और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तीन पल्य है। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगनोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । औदारिकशरीरके अवक्तव्य . १ आमतौ 'उजो० जह.' इति पाठः । २. आप्रतौ 'पचसागरोवमसः' इति पाठः । ३. आ प्रती 'वस० ३ तारिखहि इति पाठः।
. - महापंधे पदेसवंधाहियारे अवत्त० जह० अंतो०, उक० अणंतकालमसंखें । ओरालि०अंगो०-वारि० अवत्त० जह० अंतो०, उपा० तेतीसं० सादि० । आहारदुगं चत्तारिवाड़ि-हाणि-अवट्ठि० जह) एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक० अद्धपोग्गल०। समचदु०-पसत्य० सुमग-सुस्सर- आर्दै० चत्तारिवाहि हाणि-[ अवट्ठि• ] णाणाभंगों। अवत्त० ज० अंतो०, उक्क० वेछावहिसादि० तिण्णिपलिदो० देसू० । वित्य० दोवडि-हाणि० जह० एग०, उफ. अंतो.। दोण्णिवहि-हाणि-अवट्टि• जह० एग०, अवत्त० [जह० ] अंतो०, उम० तेत्तीसं० सादि० । णीचा. गqसगभंगो। णवरि अवत्त. जह• अंतो०, उक० असंखेंजा लोगा। पटका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है जो असंख्यात पुद्गल परिवर्तनके बगवर है। औदारिकशरीर आगीपाद और वसर्पभनाराच संहननके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुर्त है और उन्कृष्ट अन्तर माधिक तेतीस सागर है। आहारकद्विककी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जयन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहुर्न है और सबका उत्कृष्ट अन्तर अर्धपुलपरिवर्तनप्रमाण है। समचतुरस्त्र- संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, मुस्वर और आदेयकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका भन्न तानावरणके समान है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। तीर्थकर प्रकृतिको दो वृद्धि और दो हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। नीचगोत्रका भङ्ग नपुंसकवेदी जीवोंके समान है । इतनी विशेषता है कि इसके अवकन्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है। विशेषार्थ-ओघसे पॉच ज्ञानावरणादि ध्रुववन्धिनी प्रकृतियों हैं । इनका अवक्तव्य वन्धका अन्तर दो बार उपशमश्रेणिपर चढ़े हुए जीवके इन प्रकृतियोका अवन्धक होकर और पुनः वन्ध करानपर ही सम्भव है और इस प्रकार दो बार उपशमणिपर चढ़कर दो बार अबन्धक होनेके बाद पुनः बन्धक होनेका जघन्य अन्तर भन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुदल परिवर्तनप्रमाण होता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुदलपरिवर्तनप्रमाण कहा है। तथा इनकी शेप वृद्धि, हानि और अवस्थितपद एक समयके अन्तरसे हो सकते हैं, इसलिए तो उनका जघन्य अन्तर एक समय कहा है। आगे भी सब प्रकृतियोंकी इन वृद्धियो, हानियों और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए | अब रहा इन वृद्धियो, हानियो और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर सो इनमेसे दो घृद्धियों और दो हानियोकी प्राप्ति यदि अधिकसे अधिक कालमें हो तो वह नियमसे अन्तर्मुहूर्तके बाद सम्भव है, इसलिए इनका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है और शेष घृद्धियों, हानियों व अवस्थित पद यदि अधिकसे अधिक कालमें प्राप्त हो,तो उनकी दो वार प्राप्तिके मध्य अधिकसे अधिक जगणिके असंख्यात भागप्रमाण कालका अन्तर पड़ सकता है, क्योंकि सव योगस्थान जगश्रोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही होते हैं, अतः इनका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। स्त्यानगृद्धित्रिक आदि आठ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट बन्धान्तर १. आप्रतो 'हाणि णाणा भगो' इति पाठः । .
वडिवंधे अंतरं २४१ . कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण होनेसे यहाँ असख्यातभागवृद्धि, असख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । यहाँ गेष पदोका भङ्ग जानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । मात्र इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल प्राप्त करनेके लिए इसके स्वामित्वका विचार कर घटित कर लेना चाहिए । छह दर्शनावरण आदि बारह प्रकृतियोंके स्वामित्वके अनुसार अवक्तव्यपदके समान अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव हैं और अवक्तव्यपदके समान इन दोनो पदोका भी जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण बन जाता है, इसलिए वह उक्तप्रमाण कहा है। मात्र इन प्रकृतियोके इन तीनो पदोका यह अन्तर काल अपने-अपने स्वामित्वके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरका विचार करके ही घटित करना चाहिए । इनके शेष पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। सातावेदनीय आदि यद्यपि परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं,फिर भी योगन्थानोके अनुसार इनकी दो वृद्धिया और दो हानियोका उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त तथा मध्यकी दो वृद्धिया, दो हानियो और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातये भागप्रमाण बन जानेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है । तथा इनके बन्धका एक वार प्रारम्भ होकर व्युच्छित्ति हो जाने पर पुन दूसरी बार बन्धका प्रारम्भ होनेमे कमसे कम और अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्त लगता है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर भन्तर्मुहूर्त कहा है । आठ कपायोकी अनन्तभागवृद्धि अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपदका जो स्वामी कहा है,उसका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण प्राप्त होनेसे इन पदाका भी जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा इन आठ कपायांका उत्कृष्ट बन्धान्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण बतलाया है, इसलिए यहाँ असंख्यातभागवृद्धि, असख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि और असख्यात- गुगहानिका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है। इनके शेष पदोका भङ्ग नानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। वीवेदका बन्धान्तर मिथ्यात्वके समान प्राप्त होनेसे इसका भग मिथ्यात्वके समान कहा है। किन्तु यह परावर्तमान प्रकृति है, इसलिए इसके अबक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर मिथ्यात्वके समान नहीं प्राप्त होनेसे उसका निर्देश अलगसे किया है। नपुंसकवेद आदि पन्द्रह प्रकृतियोका उत्कृष्ट बन्धान्तर कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागरप्रमाण प्राप्त होता है, इसलिए इनकी दोनो छोरको दो वृद्धियो और दो हानियोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। ये परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं, इमलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर काल भी उक्तप्रमाण वन जानेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके शेष पदोका भड्न ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । पुरुपवेदकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि का जो स्वामी है, उसका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुद्गल परिवर्तनप्रमाण प्राप्त होनेसे पुरुषवेदके इन दोनो पदीका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल- माण कहा है । तथा पुरुषवेदका वन्ध साधिक दो छयासठ सागर तक निरन्तर होता रहे, यह सम्भव है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा यह परा- वर्तमान प्रकृति है, इसलिए इसके शेप पढोका भग सानावेदनीयके समान बन जानेसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। तीन आयु आदिका बन्ध अनन्त काल तक न हो, यह सम्भव है. इसलिए इनके सब पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है। तिर्यञ्चायुका अधिकसे अधिक सौ सागर पृथक्त्व काल तक वन्ध नहीं होता, इसलिए इसकी दो वृद्धियो, दो हानियाँ और अवक्तव्य पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इसके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है। तिर्यश्चगति आदि तीनका बन्ध एक सौ सठ सागर काल तक न हो,यह सम्भव है, इसलिए इनकी दो वृद्धियों और दो हानियोंका २४२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे २८०. णिरएसु धुविगाणं असंखेंजभागवड्डि-हाणि-असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक० अंतो० । दोण्णिवड्डि-हाणि-अवाहिक जह• एग०, उक्क० तेत्तीसं० देसू० । एसि अणंतभागवडि-हाणि० अस्थि तेसिं जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० देसू० । एवं -~-~- ~ उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तिर्यश्चगतिद्विकका अग्निकायिक और वायुकायिक जीव निरन्तर बन्ध करते रहते हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण कहा है। पर यह बात उद्योतके विषयमे नहीं है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर इसकी दो वृद्धियो और दो हानियोके उत्कृष्ट अन्तरके समान एक सौ त्रेसठ सागर कहा है। इन तीनों प्रकृतियोका शेष भग सातावेदनीयके समान है,यह स्पष्ट ही है। अमिकायिक और वायु- कायिक जीव मनुष्यगति आदि तीन प्रकृतियोका बन्ध नहीं करते, इसलिए इनके सब पदोंका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोक प्रमाण कहा है। चार जाति भादिका एक सौ पचासी सागर प्रमाण काल तक बन्धन हो,यह सम्भव है, इसलिए इनकी दो वृद्धि, दो हानि और अवकव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा इनके शेष पदोंका भन ज्ञानावरणके समान यह स्पष्ट ही है। पञ्चेन्द्रियजाति आदिका निरन्तर बन्ध एक सौ पचासी सागर तक होता रहे, यह सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है । इनके शेप पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । औदारिकशरीर आदि तीन प्रकृतियोका साधिक तीन पल्य तक बन्ध न हो, यह सम्भव है, इसलिए इनकी दो छोर को दो वृद्धियो और दो हानियोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इनकी दो वृद्धियो, दो हानियो और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर जगभोणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है, यह स्पष्ट ही है। तथा औदारिक शरीरका अनन्त काल तक निरन्तर बन्ध होता रहे, यह सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है। और औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग व वर्षभ-नाराचसंहननका साधिक तेतीस सागर काल तक निरन्तर बन्ध सम्भव है, इसलिए इन दोनोके अवतव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। आहारकद्विकका कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण काल तक बन्ध न हो, यह सम्भव है, इसलिए इनके सब पदोंका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। समचतुरखसंस्थान आदिका कुछ कम तीन पल्य अधिक दो छयासठ सागर काल तक निरन्तर वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके शेष पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। तीर्थङ्कर प्रकृतिका उत्कृष्ट बन्धकाल साधिक तेतीस सागर काल सम्भव है, इसलिए इसमें मध्यको दो वृद्धियो, दो हानिया, अवस्थित और अवक्तव्य पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त काल प्रमाण कहा है। शेष पदोंका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है,यह स्पष्ट ही है। नीचगोत्रका अग्नि- कायिक और वायुकायिक जीव निरन्तर वन्ध करते रहते हैं, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोक प्रमाण कहा है। इसके शेष पदोका भङ्ग नपुंसकवेदके समान है, यह स्पष्ट ही है। २९०, नारकियोमे ध्रवबन्धवाली प्रकृतियोकी असंख्यातभागवृद्धि, असख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। जिन प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है,उनके इन पदोंका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर वडिबंधे अंतरं एदेण वीजेण भुजगारमंगो कादव्यो । णवरि असंखेंजभागवड्डि-हाणि असंखेंजगुणवड्डि- हाणि० भुजगार-अप्पदरभंगो कादव्यो। दोण्णिवड्डि-हाणि-अवविदस्स अवडिदंतरं कादव्यं । एसिं अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्थि तेसिं पगदिअंतरं कादव्वं । एवं सब्बणेरडगाणं । २८१. तिरिक्खेसु सव्वपगदी० भुजगारभंगो। णवरि एसिं पगदीणं अणंतभाग- वड्डि-हाणि० अस्थि तेसिं जह• अंतो०, उक्क० अद्धपोग्गल० । असंखेंज [भागवड्डि-हाणि० असंखेंज० ] गुणवड्डि-हाणि भुजगार-अप्पदरं कादव्वं । दोण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० है। इस प्रकार इस वीजपदके अनुसार भुजगारके समान भङ्ग करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका भड्न भुजगारपद और अल्पतरपदके समान करना चाहिए । तथा दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थितपदका अन्तर काल भुजगारके अवस्थित पदके अन्तरके समान करना चाहिए | जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है,उनका प्रकृतिवन्धके समान अन्तर काल करना चाहिए । इसी प्रकार सव नारकियोमे जानना चाहिए । विशेषार्थ-नारकियोकी उत्कृष्ट आयु तेतीस सागर है, इसलिए इनमे ध्रुषवन्धवाली प्रकृतियोकी मध्यकी दो हानि, दो वृद्धि तथा अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है। इन प्रकृतियोका शेष भङ्ग सुगम है। यहाँ छह दर्शनावरण, बारह कषाय और सात नोकषायको अनन्तभागवृद्धि सम्यक्त्व प्राप्तिके प्रथम समयमें होती है। तथा इनकी अनन्त- भागहानि गिरते समय मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थानके प्राप्त होनेके प्रथम समयमें होती है। यतः यह अवस्था दो वार कमसे कम अन्तमुहूर्त कालके अन्तरसे और अधिकसे अधिक कुछ कम तेतीस सागरके अन्तरसे प्राप्त हो सकती है, अत इन प्रकृतियोके उक्त पदोका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है। यहाँ इनके शेष पदोका तथा शेष प्रकृतियोंके सब पदोका भङ्ग भुजगारके समान जाननेकी सूचना करके भी यहॉके किस पदका अन्तर काल भुजगारके किस पदके समान है, इसका स्पष्ट निर्देश मूलमे ही कर दिया है। तात्पर्य यह है कि इन प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुण- वृद्धि और असंख्यातगुणहानिका भङ्ग भुजगारके भुजगार और अल्पतर पदके समान है, इसलिए उसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। तथा संख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यात- गुणवृद्धि और संख्यातगुणहानि तथा अवस्थितपदका अन्तर काल भुजगारके अवस्थित पदके समान होनेसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। सम्यग्दृष्टिके जिन प्रकृतियोका बन्ध नहीं होता,उनके सब पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर प्राप्त हो जाता है, इसलिए विशेष ज्ञान करानेके लिए मूलमे यह कहा है कि जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि नहीं होती उनमें प्रकृतिबन्धके समान अन्तर काल जान लेना चाहिए। इसी प्रकार अपनी-अपनी भवस्थितिको जानकर प्रथमादि सब नरकोमे वहाँ बँधनेवाली प्रकृतियोके सम्भव पदोका अन्तर काल ले आना चाहिए । २८१. तिर्यश्चीमे सब प्रकृतियोका भङ्ग भुजगारके समान है। इतनी विशेषता है कि जिन प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके उक्त पदोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण है। असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहनिका अन्तरकाल भुजगार और अल्पतरके समान करना चाहिए। दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थित पदका अन्तरकाल २४४ महावंचे पदेसबंघाहियारे भुजगारअवहिदंतरं कादब्वं । अवत्त० भुजगारअवत्तव्यं तरं कादब्वं । २८२. सवपंचिदियतिरिक्खेसु सव्यपगदीणं भुजगार भंगो। णवरि एसि अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्यि तेसि जह• अंतो०, उक्क० तिणि पलिदो० पुत्रकोडि- पुत्० । असंखेंजगुणवडि-हाणि भुजगार-अप्पदरं कादच्वं । तिण्णिवडि-हाणि० अवट्टिदस्स अवहिदंतरं कादव्वं । एसि अवत्तव्यं अस्थि तेसिं अवतव्वंतरं कादब्लं । २८३. सन्चअपजत्तगाणं सन्चपगदीणं चत्तारिवड्डि - हाणि-अवट्ठि० जह. एग०, उक० अंतो० । एसिं अवत्त अस्थि तेसिं जह० उक्क० अंतो। २८४. मणुसेसु सव्वपगदीणं भुजगारभंगो कादचो। णवरि विसेसो अणंत- भागवड्डि-हाणि० छदंस०-बारसक०-सत्तणोक० जह० अंतो०, उक्क० तिणि पलि. भुजगारके अवस्थित पदके अन्तरके समान करना चाहिए ) तथा अवक्तव्य पदका अन्तर भुजगारके अवक्तव्य पदके अन्तरकालके समान करना चाहिए। विशेपार्थ-तिर्यञ्चोमें यह दर्शनावरण, वारह कपाय और सात नोकपायकी अनन्त- भागवृद्धि और अनन्तभागहानि सम्भव है। तथा तिर्यञ्चोंकी कायस्थिति अनन्त काल है, इसलिए इनमें इन प्रकृतियोंके उक्त पदोका जघन्य मन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्थ- पुद्गल परिवर्तन प्रमाण प्राप्त हो जानेसे उक्त प्रमाण कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। २८. सब पञ्चन्द्रिय तिर्यब्वॉम सब प्रकृतियोंका भग भुजगारके समान है। इतनी विशेषता है कि जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके उन पदोका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्य है। असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका अन्तरकाल भुजगारके अल्पतरके समान करना चाहिए। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका अन्तरफाल भुजगारके अवस्थित पदके समान करना चाहिए। तथा जिन प्रकृतियोंका अवक्तव्यपद है,उनके उस पदका अन्तरकाल भुजगारके अवक्तव्य के समान करना चाहिए। विशेषार्थ-पझेन्द्रिय तिर्यश्चत्रिककी कायस्थिति पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्य है, इसलिए इनमें अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्य प्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है। २७२. सब अपर्याप्तकॉमें सब प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । तथा जिन प्रकृतियोका अवक्तव्य- पद है उनके इस पदका नघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। विशेपार्थ-अपर्याप्तकोंकी कायस्थिति हो अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त वन जानेसे उक्तप्रमाण कहा है। तथा अवक्तव्य पदका सर्वत्र जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तसे कम नहीं बनता, इसलिए यहाँ जिन प्रकृतियोंका यह पद सम्भव है,उनके इस पदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त २८४. मनुष्याम सब प्रकृतियोंका भङ्ग भुजगारके समान करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि छह दर्शनावरण, बारह कपाय और सात नोकषायकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्त भागहानिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन वडिबंचे अंतरं २४५ . पुन्यकोडिपुध० । सेसाणं असंखेंजगुणवड्डि-हाणि भुज-अप्प०अंतरभंगो। तिण्णिवड्डि- हाणि-अवढि० अवट्ठिदंतरं कादव्वं । अवन० अवत्तन्वं तरं काद' । २८५. देवेसें भुजगारभंगो। णवरि एसिं अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्थि तेसिं पगदीणं अंतरं कादव्वं । असंखेजगुणवड्डि-हाणि० भुजगार-अप्पदरंतरं कादव्वं । सेसाणं अवविदभंगो कादयो । एवं सव्वदेवाणं अप्पप्पणो अंतरं कादच्वं । २८६. सव्वएइंदिय-विगलिंदिय-पंचकायाणं भुजगारभंगो कादव्यो । पंचिंदि०- तस०२ सव्वपगदीणं भुजगारमंगो। णवरि एसि अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्यि तेर्सि अंतरं सगढिदि० कादव्वं | असंखेंजगुणयड्डि-हाणि० भुज० अप्पदरंतरं कादव्यं । तिणि वड्डि-हाणि-अवट्ठिदस्स अवडिदंतरं कादध्वं । सव्वपगदीणं अवत्त० अप्पप्पणो भुजगार-अवत्त भंगो कादन्यो। पल्य है। शेष प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धि और असख्यातगुणहानिका अन्तर भुजगार अल्पतरके समान है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका अन्तर भुजगारके अवस्थित पदके अन्तरके समान है। तथा अवक्तव्यपदका अन्तर भुजगारके अवक्तव्यके समान है। विशेषार्थ-मनुष्योकी कायस्थिति पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्य है, इसलिए इनमे छह दर्शनावरण आदिकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका जघन्य अन्तर अन्त- मुहूर्व और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक तीन पल्य बन जाता है। शेष कथन स्पष्ट ही है। २८५ देवामे भुजगारके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि जिन प्रकृतियोंकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है,उनके इन पदोका अन्तर प्रकृतिवन्धके अन्तरके समान कर लेना चाहिए । असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका अन्तर भुजगारके अल्पतरके समान करना चाहिए। तथा शेष पदोंका भुजगारके अवस्थितके समान अन्तर करना चाहिए। इसी प्रकार सब देवामें अपना-अपना अन्तर करना चाहिए। विशेषार्थ देवोमें उत्कृष्ट भवस्थिति तेतीस सागर है, इसलिए इनमे जिनकी अनन्तभाग- वृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके इन पदोका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर बन जाता है । शेष कथन सुगम है। २८६. सव एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पाँच स्थावरकायिक जीवोमे भुजगारके समान भड्ग करना चाहिए। पञ्चेन्द्रियद्विक और त्रसद्विक जीवोंमे सव प्रकृतियोका भग भुजगारके समान करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि जिन प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्त- भागहानि है,उनका अन्तर अपनी-अपनी स्थितिके अनुसार करना चाहिए। असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका भुजगारके अल्पतरके समान अन्तर कर लेना चाहिए । तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितका अवस्थितके समान अन्तर कर लेना चाहिए। तथा सब प्रकृतियोके अवक्तव्य पदका अपने-अपने भुजगारके अवक्तव्यके समान अन्तर कर लेना चाहिए । विशेषार्थ-पछेन्द्रियोंकी कायस्थिति पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक एक हजार सागर और पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोकी कायस्थिति सौ सागर पृथक्त्व प्रमाण है। तथा त्रसकायिक जीवोकी १. आप्रतौ 'अवच० अवत्तन्वगंतर कादब' इति पाठो नास्ति ।
. महाबंधे पदेसबंधाहियारे २८७, पंचपण०-पंचवचि० पंचणा० चचारिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक० अंतो० । अवत्त० णत्थि अंतरं । एवं थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-इत्थि.. गस०-चदुआउ० सब्याओ णामपगदीओ गोद-पंचंतरं । णवरि दोवेदणीयादिपरियत्त- माणिगाणं भुजगारभंगो कादयो। छदस०-बारसक०-सत्तणोक० एवं चेव । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि णस्थि अंतरं । २८८. कायजोगीसु पंचणा० असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखेंजदिभा० । अवत्त. णत्थि अंतरं । थोणगिद्धि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-ओरालि०-तेजाक०-वण्ण०४-अगु०- उप-णिमि-पंचंत० णाणाभंगो। छदंस० वारसक०-भय-दु० णाणाभंगो। णवरि Arma.MAA. कायस्थिति पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक दो हजार सागर और उसकायिक पर्याप्त जीवोंकी कायस्थिति दो हजार सागर प्रमाण है। यहाँ इस कायस्थितिका विचार कर यथायोग्य अन्तरकाल ले आना चाहिए । शेप कथन सुगम है। २७. पॉच मनोयोगी और पॉच वचनयोगी जीवामे पाँच ज्ञानावरणकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवक्तव्यपदका अन्तर काल नहीं है। इसी प्रकार स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व अनन्तानुवन्धी- चतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चार आयु, नामकर्मकी सब प्रकृतियों, दो गोत्र और पाँच अन्तरायके विषयमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि दो वेदनीय आदि परावर्तमान प्रकृतियोका भन भुजगारके समान करना चाहिए | छह दर्शनावरण, बारह कपाय और सात नोकपायका मन इसी प्रकार है । इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका अन्तर- काल नहीं है। विशेषार्थ-इन योगाका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इनमें पॉच ज्ञानावरणादि सब प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त कहा है। यहाँ मूलमे जो यह कहा है कि वेदनीय आदि परावर्तमान प्रकृ- तियोका भग भुजगारके समान करना चाहिए सो उसका अभिप्राय इतना ही है कि भुजगार- बन्धमे इनके अवक्तव्यबन्धका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर जो अन्तर्मुहूर्त कहा है वह यहाँ इनके अवक्तव्यबन्धका जानना चाहिए | तथा यहाँ छह दर्शनावरण आदिकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके निषेधका यह कारण है कि इन मार्गणाओंका काल भल्प होनेसे इनमें उक्त प्रकृतियाका अन्तर देकर दो बार अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिकी प्राप्ति सम्भव नहीं है। शेष कथन सुगम है । २८. काययोगी जीवोमे पाँच ज्ञानावरणकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवें भाग- प्रमाण है । अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँच अन्तरायका मन ज्ञानावरणके समान है। छह दर्शनावरण, बारह कषाय, भय और जुगुप्साका १. आप्रतौ 'णवरि वेदणीयादि' इति पाठः ।
वडिवंधे अंतरं अणंतभागवडि-हाणि० णत्थि अंतरं। दोवेदणी०-इथि०-णस०-पंचजादि- अस्संठा०-ओरालि अंगो०-छस्संघ०-पर० - उस्सा० - आदाउजो०[ दोविहा०-] स- थावरादिदसयुगल [णीचा०] णाणा मंगो। णवरि अवत्त० जह० उक्क० अंतो० । पुरिस-हस्स-रदि-अरदि-सोग० एवं चेव । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि० णत्थि अंतरं । दोआउ० वेउब्वियछक्कं आहारदुगं० तित्थ० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवाहि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवत्त० णत्थि अंतरं । तिरिक्खाउ० असंखेंजगुणवड्डि-हाणि जह० एग०, अवत्त० जह• अंतो०, उक्क० वावीसं वाससहस्साणि सादि । तिण्णि वड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें । मणुसाउ० चत्तारिवड्डि- हाणि-अबढि० जह० एग०, अवत्त० [जह.] अंतो०, उक्क० अणंतकालं० । तिरिक्ख तिरिक्खाणु०-णीचा० णाणा भंगो। णवरि अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० असंखेंजा लोगा । मणुसग०-मणुसाणु०-उच्चा० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० असंखेंजा लोगा। . - भन ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागधृद्धि और अनन्तभाग- हानिका अन्तर काल नहीं है। दो वेदनीय, श्रीवेद, नपुंसकवेद, पॉच जाति, छह संस्थान, औदारिकशरीर अङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, स- स्थावर आदि दस युगल और नीचगोत्रका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति और शोकका भङ्ग इसी प्रकार है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्त- भागहानिका अन्तर काल नहीं है। दो आयु, वैक्रियिकषटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। तिर्यश्चायुकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और इनका उत्कृष्ट अन्तर साधिक बाईस हजार वर्ष है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अव- स्थिवपद्का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । मनुष्यायुकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है । तिर्यच्च गति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी और नीचगोत्रका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोक- प्रमाण है । मनुष्यगति और मनुष्यगत्यानुपूर्वीकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अबक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर असख्यात लोकप्रमाण है। विशेषार्थ-काययोगका उत्कृष्ट काल अनन्तकाल है, क्योंकि एकेन्द्रियोंमे सामान्यसे काययोग ही पाया जाता है, इसलिए इसमे पाँच ज्ञानावरणके विवक्षित पदोका उत्कृष्ट अन्तर- काल जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होनेमें कोई बाधा नहीं आती, अतः यह उक्त १. आ प्रती 'मणुसाणु० चत्तारि' इति पाठः ।
महाबंधे पदेसबंधाहियारे २८६. ओरालियका० पंचणाणावरणादीणं असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० वावीसं वास- सहस्साणि देसू० । अवत्त० णस्थि अंतरं। एवं थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताशु०४- A.AAAAA . कालप्रमाण कहा है। काययोगमे एक बार इनका अवक्तव्यपद प्राप्त होनेके बाद पुनः उसके प्राप्त करनेमे कमसे कम भी जितना काल लगता है उस कालके भीतर यह योग बदल जाता है, इसलिए इसमें उक्त प्रकृतियोके अवक्तव्यपदके अन्तरकालका निपेध किया है। स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके सब पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान प्राप्त होनेमे कोई वाधा नहीं आती, इसलिए इसे ज्ञानावरणके समान जाननेकी सूचना की है। तथा छह दर्शनावरण आदिका भङ्ग भी ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । मात्र इन प्रकृतियोको अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी होती है। पर इनके उक्त पदोका यहाँ अन्तरकाल सम्भव नहीं है, क्योकि इन प्रकृतियोंके उक्त पदोके अन्तरकालमें जितना समय लगता है उस कालके भीतर काययोग बदल जाता है। दो वेदनीय आदि प्रकृतियोका अन्य भङ्ग तो ज्ञानावरणके ही समान है। मात्र यहॉइनके अवक्तव्यपदका अन्तर काल बन जाता है, इसलिए उसका अलगसे निर्देश किया है। यतः ये सब परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है। पुरुषवेद आदिका सव भङ्ग सातावेटनीयके समान है, इसलिए उसे सातावेदनीयके समान जाननेकी सूचना की है। परन्तु इन पाँच प्रकृतियोंकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी होती है। पर इनका इस योगमें अन्तरकाल सम्भव न होनेसे उसका निषेध किया है। कारणका निर्देश पहले कर आये है । नरकायु, देवायु और वैक्रियिकपटक आदिका बन्ध पञ्चेन्द्रिय जीव ही करते हैं और इनमे काययोगका उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोके अवक्तव्यके सिवा शेष पदोंका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहर्त कहा है। यहाँ यद्यपि इनका भवक्तव्य- पद होता है, पर एक बार इनका वन्ध प्रारम्भ होकर बन्धव्युच्छित्तिके बाद पुनः इनका वन्ध प्रारम्भ होनेमे कमसे-कम जितना काल लगता है उसमे यह योग बदल जाता है, अत. यहाँ इनके अवक्तव्य पदके अन्तरकालका निषेध किया है। काययोग चालू रहते हुए तिर्यश्चायुका दो बार बन्ध होनेमे साधिक बाईस हजार वर्षका उत्कृष्ट अन्तर पड़ता है, इसलिए इसके विवक्षित पदोंका उत्कृष्ट अन्तर उक्तकाल प्रमाण कहा है। तथा इसके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर जगश्रेणिके असंख्यातवें भागप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है। क्योकि लगातार यदि कोई जीव तिर्यश्च होता रहे तो वह विर्यञ्चायुका वन्ध करते समय अधिकसे-अधिक इतने कालतक उक्त पद न करे, यह सम्भव है। मनुष्यायुका तिर्यश्च अनन्त कालतक बन्ध न करे,यह सम्भव है, इसलिए इसके सव पदोंका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । अग्निकायिक और वायु- कायिक जीव तियश्चगतिद्विक और नीचगोत्रका उत्कृष्टसे असंख्यात लोकप्रमाण काल तक निरन्तर बन्ध करते रहते हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्तकाल प्रमाण कहा है। इनके शेप पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। तथा अग्निकायिक और वायुकायिक जीव मनुष्यगतिद्विकका बन्ध नहीं करते, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके सब पदीका उत्कृष्ट अन्तर- काल असंख्यात लोकप्रमाण कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। २८. औदारिककाययोगी जीवोंमे पाँच ज्ञानावरणादिकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यात- गुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम वाईस हजार वर्ष है। अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानु- , वड्डिवंधे अंतरं २४६ - ओरा-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत । छदंसं० वारसक० - भय - दु० एवं चैव । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणीणं णत्थि अंतरं । दोवेदणी-इस्थि०-णस०- दोगदि-पंचजादि-छस्संठा०ओरा अंगो०-छस्संघ०-दोआणु०-पर०-उस्सा०-आदाउजो०- दोविहा०-तस-थावरादिदसयुग०-दोगोद० णाणा भंगो। णवरि अवत्त० जह० उक्क० अंतो० । पंचणोक० एवं चेव। णवरि अणंतभागवड्डि-हागीणं णत्थि अंतरं। दोआउ०- वेउन्वियछ०-आहारदुगं तित्थ० मणजोगिभंगो। दोआउ० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवट्टि जह. एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क. सव्वपदाणं सत्तवाससहस्साणि सादि० । वन्धी चतुष्क, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायका सब पदोंकी अपेक्षा अन्तरकाल जानना चाहिए। छह दर्शनाचरण, बारह कषाय, भय और जुगुप्साका भङ्ग भी इसी प्रकार जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका अन्तरकाल नहीं है। दो वेदनीय, स्त्रीवेद,नपुंसकवेद, दो गति, पॉच जाति, छह संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, स-स्थावरादि दस युगल और दो गोत्रका भङ्ग ज्ञानावरण के समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। पॉच नोकपायका भग इसी प्रकार जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभाग वृद्धि और अनन्तभागहानिका अन्तरकाल नहीं है। दो आयु, वैक्रियिकपटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भन्न मनोयोगी जीवोके समान है । दो आयुको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर साधिक सात हजार वर्ष है। विशेषार्थ—औदारिककाययोगका उत्कृष्ट काल कुछ कम वाईस हजार वर्ष है । यहाँ असंख्यातगुणवृद्धि आदि पदोंका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण और शेषका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम वाईस हजार वर्पप्रमाण वन जाता है, इसलिए वह उक्त प्रमाण कहा है। तथा इनका यहाँ अवक्तव्यपद वो सम्भव है,पर दूसरी बार इस पदके प्राप्त होनेके पहले यह योग बदल जाता है, इसलिए यहाँ उक्त प्रकृतियोंके इस पदके अन्तरकालका निषेध किया है। आगे दूसरे दण्डकमें कही गई स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके सव पदोका भङ्ग इसी प्रकार बन जाता है, इसलिए उसे इसीके समान जाननेकी सूचना की है। तीसरे दण्डकमें कही गई छह दर्शनावरण आदिका और चौथे दण्डकमे कही गई दो वेदनीय आदिका भग भी इसी प्रकार बन जाता है, इसलिए उसे पाँच ज्ञानावरणके समान ही जाननेकी सूचना की है। साथ ही इन दो दण्डकोमें जो विशेषता है, उसका अलगसे निर्देश किया है। बात यह है कि छह दर्शनावरण आदिकी यहाँ अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव है पर उनका अन्तरकाल सम्भव नहीं है, क्योकि पञ्चेन्द्रियों में इनके अन्तरकालकी अपेक्षा इस योगका काल छोटा है, इसलिए इन प्रकृतियोंके उक्त पदोका निर्देश करके उनके अन्तरकालका निषेध किया है । तथा दो वेदनीय आदि परावर्तमान प्रकृतियाँ होनेसे उनके अवक्तव्यपदके साथ उसका अन्तरकाल भी सम्भव है, इसलिए इस विशेषताका अलगसे निर्देश किया है । पाँच नोकषायका अन्य सब भङ्ग तो दो वेदनीय आदिके समान बन जाता है, १. ता प्रतौ 'अणताणु०४ । ओरा०' इति पाठः। २. ता प्रतौ 'पचंत० छदस०' इति पाठः। ३. आप्रतौ 'बारसक० एवं' इति पाठः। ३२ .
२५० ० महाबंधे पदेसवंधाहियारे २६०. ओरालियमि धुविगाणं चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० जह• '[ एग० ], उक्क० अंतो० । सेसाणं चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक० अंतो०'' अवत्त जह० उक० अंतो० । देवगदिपंचग० असंखेंजगुणवड्डी० णत्थि अंतरं । २६१. वेउब्विय०-आहारका० मणजोगिभंगो। उब्वियमि० धुविगाणं असंखेंजगुणवड्डी० पत्थि अंतरं। सेसाणं पि असंखेंजगुणवड्डीणं णत्थि अंतरं । अवत्त० जह• उक्क० अंतो० । णवरि मिच्छ० अवत्त० णत्थि अंतरं । एवं आहारमि०-कम्मइ०-अणाहार । णवरि एदाणं अवत्त० णत्थि अंतरं । क्योकि ये भी परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं, इसलिए उन्हेंदो वेदनीय आदिके समान जाननेकी सूचना की है । पर इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव है,पर अन्तरकाल सम्भव नहीं है, इसलिए इनकी इस विशेषताका अलगसे निर्देश किया है। नरकायु, देवायु और वैक्रियिकपटक आदिका बन्ध पश्चेन्द्रिय जीव ही करते हैं और उनके इस योगका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्तसे अधिक नहीं है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोका भङ्ग मनोयोगी जीवोके समान बन जानेसे उसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। तिर्यश्चायु और मनुष्यायुका बन्ध एकेन्द्रिय जीव भी करते हैं और उनके इस योगका उत्कृष्ट काल कुछ कम बाईस हजार वर्प है, इसलिए उत्कृष्ट विभागका ख्यालकर यहाँ इन दोनों प्रकृतियोंके सव पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक सात हजार वर्ष कहा है। २६०. औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। तथा शेप प्रकृतियोंकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । तथा इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। देवगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिका अन्तरकाल नहीं है। विशेपार्थ-जिन औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोके देवगतिपञ्चकका बन्ध होता है उनके इनकी असंख्यातगुणवृद्धि ही होती है, इसलिए यहाँ इसके अन्तरकालका निपेध किया है। शेप कथन सुगम है। २६१. वैक्रियिककाययोगी और आहारककाययोगी जीवोमें मनोयोगी जीवोंके समान भग है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धिका अन्तरकाल नहीं है। शेप प्रकृतियोकी भी असंख्यातगुणवृद्धिका अन्तरकाल नहीं है। तथा इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार आहारकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोगें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थ -पर्याप्त योगोंको छोड़कर शेप योगोमें उत्तरोत्तर वृद्धिगत योगस्थान होता है, इसलिए इनमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकी एक मात्र असंख्यातगुणवृद्धि होनेसे उसके अन्तरकालका निषेध किया है। पर जो परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं उनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल केवल बैंक्रियिकमिश्रकाययोगमे ही बनता है, इसलिए वहाँ उनका विधान कर अन्यत्र निषेध किया है। शेप कथन सुगम है। . , वडिवंधे अंतरं २६२. इत्थिवेदगेसु पंचणा० असंखेजगुणवड्डि-हाणी० जह० एग०, उक्क० अंतो०। तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० पलिदोवमसदपुधत्तं । एवं पंचंत० । थीणगि०३-मिच्छ० अणंताणु०-४ असंखेंज[ गुण ]वड्डि-हाणि०' जह० एग०, उक्क० पणवणं पलिदो० देसू० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० कायहिदी० । णिद्दा-पयला-भय-दुगुं० णाणा भंगो। णवरि अणंत- भागवड्वि-हाणी० जह० अंतो०, उक्क० कायट्टिदी० । अवत्त० णत्थि अंतरं । चदुदंस०- चदुसंज० एवं चेव । णवरि अवत्त पत्थि । दोवेदणी०-थिराथिर-सुभासुभ-जस०-अजस० णाणाभंगो। णवरि अवत्त० जह० उक्क० अंतो० । अट्ठकसा० असंखेंजगुणवडि- हाणी • जह० एग०, उक्क० पुव्वकोडि० देसूणं । सेसाणं थीणगिद्धिभंगो। णवरि अणंत- भागवड्डिहाणी० जह० अंतो०, उक्क० कायद्विदी० । इत्थि०-णबुंस० असंखेंजगुणवड्डि- हाणि• जह० एग०, उक० पणवणं पलिदो० देसू० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अबढि० जह० एग०, उक्क० कायहिदी० । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क. पणवण्णं पलिदो० देसू०। तिरिक्ख०-एइंदि०-पंचसंठा-पंचसंघ-तिरिक्खाणु०-आदाउजो०-अप्पसत्थ०- २ , २६२. स्त्रीवेदवाले जीवोमे पाँच ज्ञानावरणकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुण- हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्यपृथक्त्वप्रमाण है। इसी प्रकार पॉच अन्तरायके विषयमें जानना चाहिए। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानु- बन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचयन पल्य है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिति प्रमाण है। निद्रा, प्रचला, भय और जुगुप्साका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिकाजघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिति प्रमाण है । अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। चार दर्शनावरण और चार संज्वलनका भड़ इसी प्रकार है। इतनी विशेषता है कि इनका अवक्तव्यपद नहीं है। दो वेदनीय, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, यश कीर्वि और अयश-कीर्तिका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके भवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । आठ कषायोको असंख्यात गुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। शेष पदोंका भङ्ग स्त्यानगृद्धिके समान है इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर काय- स्थितिप्रमाण है। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य है। तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, पॉच संस्थान, पाँच सहनन, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, १. आ प्रती, असंखेज वड़ि हाणि' इति पाठः । २. ता प्रतौ 'अष्टकस (सा०) असखेजगुणवडि हाणि०' आ प्रतौ 'अटकसा० संखेजगुणवट्टि हाणि' इति पाठः । - महापंचे पदेसवंधाहियारे थावर-दूभग-दुस्सर-अणादें-णीचा० इत्थिभंगो। पुरिस० पुरिस० णिहाए मंगो। णवरि अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पणवणं पलिदो० देसू० । एवं हस्स-रदि-अरदि-सोगाणं । णवरि अवत्त० साद भंगो। णिरयाउ० चत्तारिवाड्डि-हाणि-अवढि०-अवत्त० पगदि- अंतरं कादव्यं । दो] आउ० चत्तारिवाडि हाणि-अवढि० जह० एग०, अवत्त० जह अंतो०, उक्क० कायट्टिदी० । देवाउ० असंखेंजगुणवड्डि-हाणी० जह० एग०, अवत्त जह० अंतो०, उक्क० अट्ठावण्णं पलिदो० पुन्चकोडिपुधत्तं । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवट्ठि० जह एग०, उक्क० कायद्विदी० । दोगदि-तिण्णिजादि-वेउन्वि०-वेउनि अंगो०-दोआणु०- सुहुम०-अपजत्त-साधारणं असंखेचगुणवाड्डि-हाणी० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पणवणं पलिदो. सादि। तिण्णिवडि-हाणि-अवहि० जह० एग०, उक्क० सगहिदी.' । मणुसगदि०४ असंखेंजगुणवडि-हाणी० जह० एग०, उक्क० तिण्णिपलि. देसू० । तिण्णिवडि-हाणि-अव४ि० जह० एग०, उक्क० कायट्ठिदी० । अवत्त० जह० अंतो०, उक० पणवण्णं पलिदो० देसू० । एवं ओरालि । णवरि अवत्त० जह. अंतो०, उक० पणवण्णं पलिदो० सादि। पंचिंदि०-समचदु०-पसत्य-तस-सुभग-सुस्सर- - . अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, दुर्भग, दु.स्वर, अनादेव और नीचगोत्रका भन्न स्त्रीवेदके समान है। पुरुपवेदका भद्ग निद्राके समान है। इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य है। इसी प्रकार हास्य, रति, अरवि और शोकका भग जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका भग साता- वेदनीयके समान है । नरकायुकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदका प्रकृति- वन्धके समान अन्तरकाल करना चाहिए । दो आयुकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। देवायुकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है. अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक अट्ठावन पल्य है। तथा इसकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। दो गति, तीन जाति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, दो आनुपूर्वी, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है, अवतन्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचपन पल्य है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अपनी स्थितिप्रमाण है। मनुष्यगतिचतुष्कको असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य है। इसी प्रकार औदारिकशरीरका भङ्ग जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचपन पत्य है । पञ्चेन्द्रियजाति, समचतुरससंस्थान प्रशस्त विहायोगति त्रस, १. ता प्रतो 'ए. सगहिटी' इति पाठ. !
वडिबंधे अंतरं २५३ आर्दै-उच्चा० णाणा भंगो । णवरि अवत्त० मणुसगदिभंगो। आहारदुगं चत्तारिवाड्डि- हाणि-अवढि० जह• एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० कायहिदी० । पर०-उस्सा०- बादर-पज०-पत्तेय. असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि- हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सगहिदी० । अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० पणवणं पलिदो० सादिरे । तित्थ० असंखेज्जगुणवड्डि-हाणि जह० एग०, उक्क० अंतो । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० पुचकोडी देसू० । अवत्त० णत्थि अंतरं। [धुवियाणं सेसाणं भुजगारभंगो।] . , सुभग,सुस्वर,आदेय और उच्चगोत्रका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अव- क्तव्यपदका भङ्ग मनुष्यगतिके समान है। आहारकद्विककी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित- पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है। परघात, उच्छ्रास, वादर, पर्याप्त और प्रत्येककी असंख्यात- गुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अपनी स्थितिप्रमाण है । अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचपन पल्य है । तीर्थङ्कर प्रकृतिकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है। अवक्तव्य- पदका अन्तरकाल नहीं है । ध्रुवबन्धबाली शेप प्रकृतियोका भङ्ग भुजगारके समान है। विशेषार्थ-स्त्रीवेदी जीवोकी उत्कृष्ट कायस्थिति सौ पल्यपृथक्त्व प्रमाण है, इसलिए यहाँ पॉच ज्ञानावरणके विवक्षित पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है । पॉच अन्तरायोका भग पाँच ज्ञानावरणके समान बन जाता है, इसलिए उनका भङ्ग ज्ञानावरणके समान कहा है। स्त्रीवेदी जीवोमे स्त्यानगृद्धित्रिक आदिका कुछ कम पचपन पल्य तक बन्ध न हो,यह सम्भव है, इसलिए इनमे उक्त प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धि आदि दो पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा इनके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है.यह स्पष्ट ही है। निद्रादिक चार प्रकृतियोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह भी स्पष्ट ही है। मात्र इनकी यहाँ अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके साथ उनका अन्तरकाल भी सम्भव है, इसलिए उसका अलगसे उल्लेख किया है । स्त्रीवेदी जीवके अन्तमुहूत कालमे दो बार सम्यक्त्वपूर्वक मिथ्यात्वकी प्राप्ति सम्भव है, इसलिए तो यहाँ उक्त पदोका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त कहा है और यह विधि कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमें हो, यह भी सम्भव है, इसलिए इन पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है। निद्रादिकका अवक्तव्यपद उतरते समय आठवे गुणस्थानमे सम्भव है, पर स्त्रीवेदी जीव उपशमश्रेणिपर चढ़ते समय नौवे गुणस्थानमे अपगतवेदी हो जाता है, इसलिए स्त्रीवेदके रहते हुए उपशमश्रेणिका चढ़ना और उतरना सम्भव न होनेसे यहाँ इनके अवक्तव्यपदके अन्तरकालका निषेध किया है । चार दर्शनावरण और चार संज्वलनका अन्य सब भङ्ग निद्रादिक के समान वन जानेसे इसे उनके समान जाननेको सूचना की है। मात्र इन आठ प्रकृतियोका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिसे उतरते समय दसवे गुणस्थानमे होता है पर ऐसा जीव स्त्रीवेदी नहीं होता, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्यपदका निषेध किया है। दो वेदनीय आदिका अन्य सब भग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। पर परावर्तमान प्रकृतियों होनेसे यहॉ इनका अवक्तव्यपद ૫૪ महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे और उसका अन्तरकाल सम्भव है, इसलिए उसे अलगसे कहा है। आठ कपायोका यहाँ कुछ कम एक पूर्वकोटि कालतक बन्ध न हो,यह सम्भव है, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। इनके शेष पदोका भङ्ग स्त्यान- गृद्धिके समान है, यह स्पष्ट ही है। पर यहाँ इनकी अनन्तभागबृद्धि और अनन्तभागहानि ये दो पद तथा उनका अन्तरकाल सम्भव होनेसे इसका अलगसे उल्लेख किया है। इनके उक्त दोनो पदोके अन्तरकालका खुलासा निद्रादिकके इन्हीं पदोके अन्तरकालके समान कर लेना चाहिए। स्वामित्वको विशेपता अलगसे जान लेनी चाहिए । सम्यग्दृष्टिके स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका वन्ध नहीं होता, इसलिए यहाँ इन असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य कहा है। इनके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिविप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है । सम्यग्दृष्टि जीवके तिर्यञ्चगति आदिका भी पन्ध नहीं होता, इसलिए इनका भङ्ग स्त्रीवेदके समान बन जानेसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। पुरुषवेदका अन्य सब भग निद्राके समान बन जाता है,पर इसके अवक्तव्यपदका यहाँ अन्तरकाल सम्भव होनेसे उसका अलगसे उल्लेख किया है। पुरुपवेदके इस पदके अन्तरकालका खुलासा स्पष्ट ही है, क्योकि सम्यग्दष्टिके एकमात्र पुरुपवेदका ही बन्ध होता है, इसलिए इसके अवक्तव्यपढका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य कहा है। हास्य आदि चार प्रकृतियोका अन्य सब भन तो पुरुषवेदके ही समान है फरक केवल अवक्तव्य पदके अन्तरकालमे है। बात यह है कि एक तो ये सप्रतिपक्ष प्रकृतियों हैं और दूसरे सम्यग्दृष्टिके भी इनका बन्ध होता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका भङ्ग सातावेदनीयके समान बन जानेसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। नरकायुकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदका प्रकृतिवन्धके समान अन्तर करना चाहिए,यह सामान्य कथन है। विशेषरूपसे इसकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर प्रकृतिबन्धके उत्कृष्ट अन्तरके समान है। तिर्यश्चायु और मनुष्यायुके सब पद कायस्थितिके प्रारम्भमे और अन्तमे हो यह सम्भव है, इसलिए इनके सब पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । अट्ठावन पल्य और पूर्वकोटिपृथक्त्वके आदिमे और अन्तमे देवायुका बन्ध हो यह सम्भव है, क्योकि जो जीव पचपन पल्यकी देवायु बाँधकर देवियोमे उत्पन्न होता है। पुन. वहाँसे च्युत होकर और पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्यके अन्तमे पुनः देवायुका बन्ध करता है, उसके दो वार देवायुका बन्ध होनेमे उक्त कालप्रमाण अन्तर प्राप्त होता है, इसलिए इसकी असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त- कालप्रमाण कहा है। तथा शेष पद कायस्थितिके आदिमे और मध्यमे देवायुका बन्ध करते समय हो और मध्यमे न हो यह सम्भव है, इसलिए इसके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिति- प्रमाण कहा है। स्त्रीवेदी जीवोके दो गति आदि प्रकृतियोका अधिकसे अधिक साधिक पचपन पल्यतक बन्ध नहीं होता, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य- पदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचपन पल्य कहा है। तथा इनके शेष पदोंका उत्कृष्ट अन्तर काय- स्थितिप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है । स्त्रीवेदी जीवोके मनुष्यगति आदिका अधिकसे अधिक कुछ कम तीन पल्यतक बन्ध नही होता, इसलिए इनको असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । इनका देवियोमें सम्यक्त्वदशामे कुछ कम पचपन पल्य तक निरन्तर बन्ध होता रहता है, इसलिए इस कालके आगे पीछे अवक्तव्यपट करानेसे अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन पल्य कहा है। तथा इनके शेप पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है,यह स्पष्ट ही है। औदारिकशरीरका भङ्ग इसी प्रकार है । मात्र देवीके , , वडिवंधे अंतरं પૂ. २६३. पुरिसेसु पंचणा० असंखेंजगुणवड्डि-हाणी० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवहि० जह० एग०, उक्क. सागरोवमसदपुध० । एवं पंचंत० । यीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४ एक्कवड्डि-हाणी० जह० एग०, उक्कन्वेछावहि० देसू० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, अवच० जह० अंतो०, उक्क० सगहिदी । णिहा-पयला० अणंतभागवड्डि हाणि-अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० सगढ़िदी० । सेसपदा० आभिणिभंगो । एवं भय-दु० 1 चदुदंस०-चदुसंज० एवं चेव । णवार अवत्त० णस्थि । इस प्रकृतिका निरन्तर वन्ध होता रहता है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचपन पल्य कहा है । पञ्चेन्द्रियजाति आदिका भड्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। पर इनका यहाँ अवक्तव्यपद सम्भव है जो कि मनुष्यगतिके समान प्राप्त होता है, इसलिए उसका मन मनुष्यगतिके समान जाननेकी सूचना की है। आहारकद्विकके सब पद कायस्थितिके प्रारन्ममें और अन्तम हो,यह सम्भव है, इसलिए इनके सब पदोंका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थिति- प्रमाण पहा है। परघात आदि ये परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं और इनका मिथ्यादृष्टि व सम्यग्दृष्टि सबके बन्ध सम्भव है, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। तया सम्यग्दृष्टिके इनका निरन्तर वन्ध होता रहता है और आगे पीछे भी इनका वन्ध सम्भव है,इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक पचपन पल्य कहा है। इनके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण है, यह स्पष्ट ही है। तीर्थङ्कर- प्रकृतिका वन्ध प्रारम्भ होनेपर उसकी अवन्धक दशा इतनी नहीं प्राप्त होती जिससे उसकी असंत्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्तसे अधिक वन सके अतः इसके इन पदोंका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है । तथा स्त्रीवेदी जीवोंमे कुछ कम एक पूर्व- कोटि कालतक ही इसका निरन्तर बन्ध होता है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदके सिवा शेष पदोंका रस्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि कालप्रमाण कहा है। उपशमणिमें नौवेंके आगे जीवके बीवेद नहीं रहता, अतः स्त्रीवेदी जीवके इसका अवक्तव्यपद होकर भी उसका अन्तरकाल सम्भव न होनेसे उसका निषेध किया है। २६३. पुस्पवेदी जीवोंमें पॉच ज्ञानावरणकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और भवन्थिवपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर सौसागरपृथक्त्वप्रमाण है । इसी प्रकार पाँच अन्तरायका भङ्ग जानना चाहिए। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी- चतुष्कको एक वृद्धि और एक हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो व्यासठ सागर है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर अपनी स्थितिप्रमाण है। निद्रा और प्रचलाकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तमागहानि और अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अपनी स्थितिप्रमाण है। शेष पदोंका भन आभिनिवोधिक ज्ञानावरणके समान है। इसी प्रकार भव और जुगुप्साका भङ्ग समझना चाहिए। चार दर्शनावरण १. ता आ प्रत्योः अवत्त० णत्यि अंतरं इत्यतः पश्चात् पुरिसेतु इत. प्राक् 'पुरिसेतु पचणाणा असंन्देजगुन हागि० ब० ए० उक० अंतो० । तिष्णिबड्डिहाणिअवहि० ज० ए० उ० सगहिदी० अवत्तः २० अं० उ० पनवगं पलि. नाटि० । तित्य. असंखेनगुणवडिहाणि ज० ए० उ० अंतो० । तिण्णिबट्टि- हानियवष्टि १० ए० उ० पुलकोडिदे० अवतः णत्यि अंतरं । इत्यधिक पाठ उपलभ्यते ।
. २५६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे दोवेदणी-थिरादितिण्णियुग० णाणा भंगो। णवरि अवत्त० जह• उक्क० अंतो० । अट्ठक० ओघं । णवरि सगढ़िदी० । इस्थि० थीणगिद्धिभंगो। णवरि अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० चेछावढि० देसू० । एदेण कमेण भुजगारभंगो सव्वाणं । णवरि असंखेंज- गुणवड्डि-हाणी० [ भुज०-अप्पदरभंगो। तिण्णिवड्डि-तिण्णिहाणि-अवविद० ] अवहिक दभंगो। अवत्त० अप्पप्पणो अवत्तभंगो। और चार संज्वलनका भङ्ग भी इसी प्रकार है। इतनी विशेपता है कि इनका अवक्तव्यपद नहीं है। दो वेदनीय और स्थिर आदि तीन युगलका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। आठ कपायोका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि अपनी स्थिति कहनी चाहिए। स्त्रीवेदका भङ्ग त्यानगृद्धिके समान है। इतनी विशेषता है कि अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण है। इस क्रमसे सब प्रकृतियोका भङ्ग भुजगारपदके समान करना चाहिए । इतनी विशेषता है कि असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका भङ्ग भुजगारके अल्पतरपदके समान करना चाहिये । तीन वृद्धि, तीन हानि, और अवस्थित्तपदका भन भुजगारके अवस्थितपदके समान करना चाहिए। तथा अवक्तव्यपदका भङ्ग अपने-अपने अवक्तव्यपदके समान करना चाहिए। 'विशेषार्थ-एक तो पॉच ज्ञानावरण ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियाँ हैं। दूसरे पुरुषवेदी जीवकी उत्कृष्ट कायस्थिति सौ सागर पृथक्त्वप्रमाण है, इसलिए यहाँ पाँच ज्ञानावरणकी असंख्यातगुण- वृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त तथा शेष पदोंका उत्कृष्ट अन्तर सौ सागरपृथक्त्वप्रमाण कहा है। पॉच अन्तरायका भङ्ग इसी प्रकार है, इसलिए उसे पॉच ज्ञाना- वरणके समान जाननेकी सूचना की है। पुरुपवेदी जीवके कुछ कम दो छयासठ सागर काल तक स्त्यानगृद्धित्रिक आदिका बन्ध न करे,यह सम्भव है, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा इनके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर अपनी कायस्थिति प्रमाण है,यह स्पष्ट ही है । निद्राद्विककी असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यात- गुणहानि और अवक्तव्यपद अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे हो,यह भी सम्भव है और अपनी कायस्थितिके अन्तरसे हो,यह भी सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदोका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कायस्थितिप्रमाण कहा है । तथा इनके शेप पदोका भग आमिनिबोधिकज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। निद्राद्विकके समान भय और जुगुप्साका भी भङ्ग होता है, इसलिए इसे निद्राद्विकके समान जाननेकी सूचना की है। चार दर्शनावरण और चार संज्वलनका अन्य सब भग तो निद्राद्विकके ही समान है। मात्र इन प्रकृतियोका पुरुषवेदी जीवके अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, क्योंकि निद्राद्विक, भय और जुगुप्साकी बन्धव्युच्छित्ति अपूर्वकरणमें होती है, इसलिए इन जीवोके उक्त प्रकृतियोंका अवक्तव्यपद उपशमश्रोणिसे उतरते समय कराके और पुन: अन्तर्मुहूर्तमे उपशमश्रेणिपर चढ़ाकर अपूर्वकरणमें बन्धव्युच्छित्तिके बाद मरण कराकर देवोमे उत्पन्न होनेपर पुनः अवक्तव्यबन्ध करानेसे यहाँ इन प्रकृतियोका अवक्तव्यपद भी बन जाता है और उसका अन्तर काल भी घटित हो जाता है। यह क्रिया यदि अन्तर्मुहूर्तके भीतर कराते हैं तो अन्तमुहूर्त अन्तर काल आ जाता है और कायस्थितिके प्रारम्भमे एक बार अवक्तव्यपद तथा कायस्थितिके अन्तमे दूसरी बार अवक्तव्यपद करानेसे कायस्थितिप्रमाण अन्तरकाल आ जाता है। पर चार दर्शनावरण और चार संज्वलनकी वन्धव्युच्छित्ति अपगतवेदी होनेपर होती है, इसलिए पुरुषवेदीके उनका अवक्तव्यपद सम्भव न होनेसे उसका निषेध किया है। दो वेदनीय आदि - वडिवंधे अंतरं २५७ ०- . २६४, णसंगवेदेसु सव्वपगदीणं भुजगारभंगो । कोधादि०४- मदि-सुद-विभंग भुजगारभंगो। २६५. आभिणि-सुद-ओधिणा० पंचणाणा० - णिहा-पयला-पुरिस०-भय-दुगु पंचिंदि०-तेजा०-क०-समचदु०-वण्ण०४-अगु०४-पसत्थवि०-तस०४-सुभग-सुस्सर-आदें- णिमि०-उच्चा०-पंचंत० असंखेंजगुणवड्डि-हाणी० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिष्णि- वाड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० छावहिसाग० सादि। सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्त बन जानेसे उक्त प्रमाण कहा है। इनके शेष पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। आठ कपायोका भग ओघके समान यहाँ बन जाता है,पर अपनी कायस्थिति कालतक ही पुरुषवेद रहता है, इसलिए जिन पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल पुरुपवेदकी कायस्थितिसे अधिक कहा है वह पुरुषवेदकी कायस्थितिप्रमाण है, इस वातका ज्ञान करानेके लिए उसकी अलगसे सूचना की है। पुरुषवेदी जीवके स्त्रीवेदका बन्ध कुछ कम दो छयासठ सागर कालतक न हो,यह सम्भव है, क्योंकि इसके बाद यदि जीव मिथ्यात्वमे आता है तो उसका वन्ध नियमसे होने लगता है, इसलिए यहाँ अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण कहा है। वीवेदका शेप भङ्ग स्त्यानगृद्धित्रिकके समान है, यह स्पष्ट ही है । यहाँ तक कुछ प्रकृतियोंके सम्भव पदोका अलग-अलग अन्तरकाल कहा है। इनके सिवा जो प्रकृतियों रह जाती हैं, उनका अन्तरकाल भुजगार अनुयोगद्वारके समान यहाँ भी घटित हो जाता है। मात्र यहाँ सब प्रकृतियोकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका भङ्ग भुजगार और अल्पतरपदके समान प्राप्त होता है, क्योकि किसी भी प्रकृतिका बन्ध होनेपर जैसे उसके भुजगार और अल्पतरका नियम है,उसी प्रकार असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानि- का भी नियम है। तथा जिस प्रकार भुजगारके अवस्थितपदका नियम है, उसी प्रकार यहाँ तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका नियम है। तथा जिस प्रकार भुजगारके अवक्तव्यपदका नियम है, उसी प्रकार यहाँ भी अवक्तव्यपदका नियम है, इसलिए यहाँ अनुयोगद्वारके समान जाननेको सूचना करके इन विशेषताओका अलगसे उल्लेख किया है। २६४. नपुंसकवेदी जीवोमे सब प्रकृतियोका भग भुजगारके समान है। क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभङ्गज्ञानी जीवोंमे भुजगारके समान भङ्ग है । विशेषार्थ-पूर्व पुरुषवेदी जीवोमे असंख्यातगुणवृद्धि आदि किन पदोका भुजगार अनुयोगद्वारके किन पदोंके साथ साम्य है, इस बातको जानकर यहाँ सब प्रकृतियोका इन मार्ग- णाओंमे कहे गये भुजगार अनुयोगद्वारके समान अन्तरकाल घटित हो जाता है, इसलिए उसे भुजगारके समान जाननेकी सूचना की है। २६५. आभिनिवोधिकज्ञानी, अतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवामे पॉच ज्ञानावरण, निद्रा, प्रचला, पुरुषवेद, भय, जुगुप्सा, पञ्चेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्र- सस्थान, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, प्रशस्त विहायोगति, सचतुष्क, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है . १. ता.प्रतौ 'णबुंसके (ग) वेदेसु' इति पाठः । ३३ २५ । महाबंधे पदेसयंधाहियारे चदुदंस०-चदुसंज० णाणा भंगो। णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि-अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० छावहि. सादि० । साद दंडओ णाणाभंगो। णवरि अवत्त० जह० उक्क० अंतो० । अपच्चक्खाण०४ एकवड्डि-हाणी० ओघं । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० णाणा०- भंगो। अवत्त० जह० अंतो, उक० तेंतीसं० सादि० । एवं पच्चक्खाण०४ । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणी० जह० अंतो०, उक्क० छावद्विसाग० सादि० । मणुसाउ० असंखेज्ज- गुणवड्डि-हाणी. जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० छापट्टि सादि० । एवं देवाउ० । णवरि छावद्विसागरो० देसू० । मणुसगदिपंचगस्स असंखेंजगुणवड्डि-हाणी० जह० एग०, उक्क० पुव्यकोडी सादि० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवहि० जह० एग०, उक्क० छावहि० सादि० । अवत्त० जह० अंतो०, उक० तेत्तीसं सादि० । देवगदि०४ असंखेंजगुणवड्डि- हाणी० जह० एग०, अवत्त० जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । तिण्णिवड्डि- हाणि-अवढि० जह० एग०, उक० छावद्विसाग० सादि०। एवं आहारदुर्ग । तित्थ० ओवं। और सबका उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागर है। चार दर्शनावरण और चार संज्वलनका भन ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपढका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागर है। सातावेदनीय दण्डकका भग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इस दण्डकके अवक्तव्य पढका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अप्रत्याख्यानावरण चतुष्ककी एक वृद्धि और एक हानिका भङ्ग ओषके समान है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका भग जानावरणके समान है। अवक्तव्यपढका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। इसी प्रकार प्रत्याख्यानाचरणचतुष्कका भङ्ग जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागर है। मनुष्यायुकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्यपढ़का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और सवका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागर है। इसी प्रकार देवायुका भङ्ग जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इसकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछकम छयासठ सागर कहना चाहिए । मनुष्यगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अतर साधिक एक पूर्वकोटि है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागर है। अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। देव- गतिचतुष्ककी असख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है, अवक्तव्य- पदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और तीनोका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागर है । इसी प्रकार आहारकद्विकका भग जानना चाहिए। तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है।
वडिवंधे अंतरं ૨૫૬ , . विशेषार्थ-आभिनिवोधिकनानी आदि जीवामे पॉच ज्ञानावरणादिका केवल उपशम- श्रेणिम ही बन्धका अन्तर पड़ता है, वैसे अपनी-अपनी बन्धन्युच्छित्ति तक उनका निरन्तर वन्ध होता रहता है । उपशमश्रोणिमे भी अन्तर होकर वह अन्तमुहूर्तसे अधिक नहीं होता, इसलिए वहाँ इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त वन जानेसे वह उक्तप्रमाण कहा है । तथा यहॉ इनका साधिक छयासठ सागर काल तक निरन्तर वन्ध सम्भव है, अत' इतने कालका अन्तर देकर इनकी तीन वृद्धि, तीन हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपद भी सम्भव हैं, इसलिए इनके उक्त पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। यहाँ इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तके भीतर दो बार उपशमश्रोणिपर चढ़ाकर और दो बार अवक्तव्यबन्ध कराकर ले आना चाहिए । चार दर्शनावरण और चार संज्वलनका अन्य सब भङ्ग ज्ञानावरणके समान है, पर यहाँ इनकी अनन्तभागवृद्धि और भनन्तभागहानि भी सम्भव हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदके साथ उक्त पदोका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अलगसे कहा है । सातावेदनीयदण्डकमै सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्त वन जानेसे उक्तप्रमाण कहा है। शेप भग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। यहाँ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कका कुछ कम एक पूर्व कोटि तक बन्ध न हो, यह सम्भव है, इसलिए इनकी असख्यातगुणवृद्धि और असंख्यात गुणहानिका अन्तरकाल ओषके समान बन जानेसे वह ओघके समान कहा है। इनकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है, यह स्पष्ट ही है । तथा इनका भवक्तव्य पद अन्तर्मुहूर्तमे भी दो बार सम्भव है और साधिक तेतीस सागरके अन्तरसे भी दो बार सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। प्रत्याख्यानावरण चतुष्कका अन्य सब भन अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके समान वन जानेसे उसके समान कहा है। मात्र यहाँ इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनत्तभागहानि भी सम्भव है, इसलिए इनके इन पदो का अन्तरकाल अलगसे कहा है। चौथैसे पॉचवमे जानेपर अनन्तभागवृद्धि होती है और पाँचवेसे चौथेमे आनेपर अनन्तभाग- हानि होती है। दो बार यह क्रिया अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे भी सम्भव है और साधिक छयासठ सागरके अन्तरसे भी सम्भव है, इसलिए इनके उक्त दो पदो का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है । यहाँ मनुष्यायुका दो बार बन्ध होनेमे साधिक तेतीस सागरका उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है, इसलिए इसकी असंख्यारागुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य- पदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा आभिनिवोधिकज्ञानी आदि जीवौके साधिक छयासठ सागर कालके भीतर अपने बन्धकालके योग्य समयके प्रान होने पर कई बार मनुष्यायु का बन्ध सम्भव है, इसलिए यहाँ इसके शेष पदोका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। यहाँ आरम्भम और अन्तम आयुबन्धके समय विवक्षित पद कराके उसका अन्तर ले आना चाहिए । सर्वत्र यही विधि जाननी चाहिए। देवायुका भङ्ग इसी प्रकार है। विशेष बात इतनी है कि यहाँ कुछ कम छयासठ सागरके भीतर ही यथासम्भव देवायुका बन्ध सम्भव है, इसलिए इसकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम छयासठ सागर कहा है । यहाँ मनुष्य- गतिपञ्चकका एक पूर्वकोटि कालतक बन्ध नहीं होता, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एक पूर्वकोटिप्रमाण कहा है। इन मार्गगाओका उत्कृष्ट काल साधिक छयासठ सागर है, इसलिए यहाँ उक्त प्रकृतियोंकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक व्यासठ सागर कहा है। तथा तेतीस सागरकी आयुवाले विजयादिकके देवने भवके प्रथम समयमै इनका अवक्तव्यपद किया। पुन. तेतीस ra-PACC-. महाबंधे पदसबवाहियारे २६६. मणपजव०-संजदा० भुजगारभंगो । णवरि अर्णतभागवड्डि-हाणी० जह० अंतो०, उक्क० पुब्धकोडी देसू० । २६७. सामाइ०-छेदो० पंचणा०-चदुदंस०-लोभसंज०-उच्चा०-पंचंत० मणपजव०- भंगो । णवरि अवत्त० णत्थि । सेसाणं मणपजव भंगो । तिण्णिसंज०-देवगदिअट्ठावीस सव्वपदा णाणाभंगो। णवरि अवत्त० णत्थि अंतरं । परिहार० भुजगारभंगो । सुहुमसंप० सव्वपगदीणं चत्तारिवड्डि-हाणि-अवडि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । संजदासंजदः सागर काल तक इनका निरन्तर बन्ध करता रहा । पुन एक पूर्वकोटिको आयुवाला मनुष्य होकर इनका अवन्धक हो गया और दूसरी बार देव होनेपर भवके प्रथम समयमे पुन इनका अवक्तव्य बन्ध किया। इस प्रकार इनके अवक्तव्यबन्धका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा सप्रतिपक्ष प्रकृतियॉ होनेसे इनके अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है, यह स्पष्ट ही है। उपशमश्रेणिमे बन्धव्युच्छित्तिके वाद देवगतिचतुष्कका बन्ध नहीं होता । देवपर्यायमे तो होता ही नहीं, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि मनुष्य पर्यायमे यथासम्भव अधिकसे अधिक काल तक सम्यक्त्व रखनेके पूर्व मिथ्यात्वमे इनका अवक्तव्यपद कराकर यह अन्तर लावे। इन मार्गणाओका उत्कृष्ट काल साधिक छयासठ सागर है, इसलिए इनमे उक्त प्रकृतियोके शेष पदोका,उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है | आहारकद्विकका भङ्ग इसी प्रकार प्राप्त होने से उसे इनके समान जाननेकी सूचना की है। ओघमे तीर्थकर प्रकृतिके सब पदोंका अन्तरकाल इन्हीं मार्गणाओकी मुख्यतासे कहा है, इसलिए यहाँ उसे ओधके समान जाननेकी सूचना की है। २६६. मनःपर्ययज्ञानी और संयत जीवोमे भुजगार अनुयोगद्वारके समान भङ्ग है। इतनी विशेपता है कि अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि है। विशेषार्थ—यहाँ चार दर्शनावरणकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि सम्भव है। तथा इनके ये पद अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे हो, यह भी सम्भव है, क्योकि अन्तर्मुहूर्तके भीतर दो बार उपशमश्रोणि पर आरोहण कराने ओर उतारनेसे अन्तर्मुहूर्तके अन्तरसे ये दोनो पद बन जाते हैं, इस लिए तो इनका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है और प्रारम्भमे व अन्तमे उपशम- श्रोणिपर आरोहण करानेसे और उतारनेसे कुछ कम एक पूर्वकोटिके अन्तरसे भी ये पद वन जाते है, इसलिए इनका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है। २६७. सामायिकसयत और छेदोपस्थापनासयत जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, लोभसंज्वलन, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायका भन मन.पर्ययज्ञानी जीवीके समान है। इतनी विशेषता है कि यहाँ पर इनका अवक्तव्यपद नहीं है। शेष प्रकृतियोका भन मनापर्ययज्ञानी जीवोंके समान है। तीन संज्वलन और देवगति आदि अट्ठाईस प्रकृतियोके सब पदोका भन ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। परिहारविशुद्धिसंयत जीवोमे भुजगार अनुयोगद्वारके समान मङ्ग है । सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवोमे सब प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय १. ता प्रती 'मणपजत्त (व) भगो' इति पाठः ।
वडिवंचे अंतरं २६१ परिहार भंगो । असंजद-चखु०-अचक्तु० ओघं । ओघिदं० ओधिणा मंगो। २६८. किण्णाए पंचणा० - तेजा-क०-वण्ण०४-अगु-उप०-णिमि-पंचंत० असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवट्ठि• जह० एग०, उक्क० तैंतीसं सादिः । एवं सव्वपगदीणं भुजगारभंगो। णवरि दोआउ०-दोगदि- चदुजादि-दोआणु०-आदाव-थावरादि०४-तित्थ० चत्वारिवड्डि-हाणि-अवट्टि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवत्त० णत्थि अंतरं । ओरा०-ओरा०अंगो० एकवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० तैंतीसं० देसू० । अवच० णत्थि अंतरं । पंचिंदि०-पर०-उस्सा०-तस०४ एक्कवडि-हाणि० जह० एग०, है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। संयतासंयत जीवोंमें परिहारविशुद्धिसंयत जीवोंके समान भङ्ग है । असंयत, चक्षुदर्शनी और अचक्षुदर्शनी जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है । अवधिदर्शनी जीवोंमें अवधिज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है। विशेषार्थ—सामायिक और छेदोपस्थापना संयम नौवें गुणस्थान तक होते हैं, इसलिए इनमें पाँच ज्ञानावरणादिके अवक्तव्यपदका निषेध किया है। तथा यहाँ तीन संज्वलन और देवगति आदि भट्ठाईस प्रकृतियोका अवक्तव्यपद तो होता है, क्योकि इन मार्गणाओंके कालके भीतर ही इनकी बन्धव्युच्छित्ति हो जाती है, इसलिए लौटते समय इनका अवक्तव्यपद वन जाता है। पर इन मार्गणाऑके कालके भीतर दो बार इनका अवक्तव्यपद प्राप्त होना सम्भव नहीं है, इसलिए इनके अन्तरकालका निषेध किया है। इन मार्गणाओमे शेष कथन स्पष्ट ही है। परिहारविशुद्धिसंयत छठे और सातवे गुणस्थानमें होता है, इसलिए भुजगार अनुयोगद्वारसे यहाँ कोई विशेषता नहीं आती, अतः यहाँ सब प्रकृतियोका भङ्ग भुजगारके समान जाननेकी सूचना की है । सूक्ष्मसाम्परायसयतका काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इसमे सब प्रकृतियोके यहाँ सम्भव सब पदोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्व प्राप्त होनेसे वह उक्त काल प्रमाण कहा है। यहाँ जिन मार्गणाओंमे जिनके समान जाननेकी सूचना की है वह स्पष्ट ही है, इसलिए उस विषयमें विशेष नहीं लिखा जाता है। २६८. कृष्णलेश्यामें पॉच ज्ञानावरण, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । इसी प्रकार सब प्रकृतियोंका भुजगार अनुयोगद्वारके समान भङ्ग जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि दो आयु, दो गति, चार जाति, दो आनुपूर्वी, आतप, स्थावर आदि चार और तीर्थङ्कर प्रकृतिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है । औदारिकशरीर और औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्गकी एक वृद्धि और एक हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है । पश्चेन्द्रियजाति, परघात, उच्छास, और सचतुष्कको एक वृद्धि और एक हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर १. आ०प्रतौ 'अचक्षु० ओघिदं' इति पाठः।
૨૬૨ महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे उक्क० अंतो० । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि० . जह० एग०, उक० तेत्तीसं० सादि। अवत्त० णस्थि अंतरं । वेउवि०-वेउवि०अंगो० तिण्णिवडि-तिण्णिहाणि-अवढि० जह. एग०, उक्क० अंतो० । असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० वावीसं० सादिः । अवत्त० भुजगारभंगो । एवं णील-काऊणं । णपरि काउए तित्थ० णिरयभंगो। तिण्णि लेस्साणं एसिं अणंतभागवड्डि-हाणी अस्थि तेसिं अंतरं जह० अंतो०, उक्क० तेत्तीस सत्तारस सत्त सागरो० देसू० । सेसाणं भुजगारभंगो। -~~-~- ४. -- ~--~--~ अन्तर्मुहूर्त है। तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। इनके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है । वैक्रियिक- शरीर और वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्गकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुण- हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक बाईस सागर है। इनके अवक्तव्यबन्धका भङ्ग भुजगारके समान है। इसी प्रकार नीललेश्या और कापोतलेश्याम जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि कापोत लेश्याम तीर्थङ्कर प्रकृतिका भग नारकियोके समान है। तीन लेश्याओमे जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है उनके इन पदोका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर, कुछ कम सत्रह सागर और कुछ कम सात सागर है । शेप पदोका भग भुजगारके समान है। विशेषार्थ-पाँच ज्ञानावरण आदि ध्रुववन्धवाली प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनकी असंख्यात- गुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त बन जानेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। तथा इस लेश्याका उत्कृष्ट काल साधिक तेतीस सागर है, इसलिए यहाँ उक्त प्रकृतियोंके सब पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। इस प्रकार यद्यपि भुजगार अनुयोगद्वारके समान यहाँ सब प्रकृतियोके सम्भव पदोका अन्तरकाल प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए अलगसे उसके निर्देश करनेको आवश्यकता नहीं है। फिर भी कुछ प्रकृतियोमे विशेषताका ज्ञान करानेके लिए मूलमे उनके विषयमे अलगसे सूचना की है । यथा- मनुष्यो और तिर्यञ्चामे कृष्णलेश्याका उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है, इसलिए यहाँ नरकायु, देवायु, नरकगति, देवगति, चार जाति, नरकगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, आतप, स्थावर आदि चार और तीर्थकर प्रकृतिके अवक्तव्यपदको छोड़कर सब पढोका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। यहाँ यद्यपि इनका अवक्तव्यपद होता है, पर इनके दूसरी बार अवक्तव्यपदके प्राप्त होने तक लेश्या बदल जाती है, इसलिए इस लेश्यामे उक्त प्रकृतियोके अवक्तव्य- पदके अन्तरकालका निषेध किया है। नरकमे औदारिकशरीरद्विकका निरन्तर बन्ध होता रहता है और तिर्यञ्चो व मनुष्योमे यथासम्भव ये सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त प्राप्त होनेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। नरकमें कृष्णलेश्याका उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है। इसके प्रारम्भमे और अन्तमें उक्त दोनो प्रकृतियोकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपद हो तथा मध्यमे न हो,यह सम्भव है, इसलिए यहाँ इनके उक्त पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर कहा है। नरकमे तो इनका अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, तिर्यञ्चो और मनुष्योके सम्भव है,पर इन जीवोके इस लेश्याके कालमे दो बार अवक्तव्यपद नहीं होता, अतः यहाँ इनके अवक्तव्यपदके , -~-~- Mr. वडिवंधे अंतरं २६३ २६६, तेऊए पंचणा-तेजाक०-वण्ण०४-अगु०४-वादर-पञ्जत्त-पत्ते-णिमि०- पंचंत० एकचड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० | तिण्णिवड्डि-हाणि-अवहि जह. एग०, उक्क० वेसाग० सादिः । एसिं अणंत०वृड्डि-हाणी अत्थि तेर्सि जह० अंतो०, उक्क० बेसाग० सादि० । देवगदि०४ तिण्णिवड्डि-चत्तारिहाणि-अवढि जहएग०, उक्क० अंतो० । असंखेज्जगुणवड्डी० जह० एग०, उक्क० वेसाग० सादि० । ओरालि. अन्तरकालका निषेध किया है। पञ्चेन्द्रियजाति आदि एक तो सप्रतिपक्ष प्रकृतियाँ है । दूसरे इनका निरन्तर बन्ध भी सम्भव है, इसलिए इनको असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्त कहा है । तथा नरकम व वहाँ जानेके पूर्व और बादमे अन्तर्मुहूर्त कालतक इनका नियमसे बन्ध होता रहता है, इसलिए इनकी आदि और अन्तम तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदका प्राप्त होना सम्भव होनेसे इनके उक्त पदोका उत्कष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। इनके भी अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं होता, इसका खुलासा पूर्वके समान जानकर कर लेना चाहिए। तिर्यश्च और मनुष्य वैक्रियिकद्विकका बन्ध करते हैं और इनके कृष्णलेश्याका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए यहाँ तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित- पदका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त कहा है । अव एक ऐसा जीव लो जिसने नरकमै जानेके पूर्व इनकी असंख्यातगुणवृद्धि की । वादमें वह छठे नरकमे उत्पन्न हुआ। सातवेमे तो इसलिए नहीं उत्पन्न कराया है कि वहाँसे निकलनेके बाद भी वह अन्तर्मुहूर्त कालतक औदारिकद्विकका ही वन्ध करता है और उसके बाद लेश्या बदल जाती है। परन्तु छठे नरकके लिए ऐसा नियम इसलिए नहीं है, क्योकि वहाँसे सम्यग्दृष्टि जीव मरकर मनुष्योम उत्पन्न होते है और ऐसे जीवोके यहाँ उत्पन्न होनेपर प्रथम समयसे ही इस लेश्याके रहते हुए वैक्रियिकद्विकका वन्ध होने लगता है। यतः प्रारम्भमें अवक्तव्यपद होकर असंख्यातगुणवृद्धि और अन्तम परिमाणयोगस्थान होनेपर असंख्यातगुणहानि होती है। इसके बाद लेश्या बदल जाती है, इसलिए यहाँ इन दो पदोका उत्कृष्ट अन्तर साधिक वाईस सागर कहा है। इनके भुजगार अनुयोगद्वारमै अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर साधिक सत्रह सागर और उत्कृष्ट अन्तर साधिक वाईस सागर प्राप्त होता है। वह वहाँ भी बन जाता है, इसलिए यहाँ इसके अवक्तव्यपदका भङ्ग भुजगारके समान कहा है । इसी प्रकार नील और कापोतलेश्याम अपने-अपने कालके अनुसार यह प्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमें कृष्णलेश्याके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र कापोतलेश्याम तीर्थङ्कर प्रकृतिका भग नारकियोंके समान वन जानेसे उसमें इसके सम्बन्धमे नारकियोंके समान जाननेकी सूचना की है। इन तीन लेश्याओम जिन प्रकृतिचोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव हैं उन प्रकृतियोंके इन पदोका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अलगसे कहा है। तथा इन प्रकृतियोंके शेष पदोका भङ्ग भुजगार अनुयोगद्वारके समान है,यह स्पष्ट ही है। २६६. पीतलेश्यामें पाँच ज्ञानावरण, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु- चतुष्क, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, निर्माण और पॉच अन्तरायकी एक वृद्धि और एक हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। तीन वृद्वि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर है। जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके उन पदोका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सोगर है। देवगतिचतुष्ककी तीन वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । असख्यातगुण- वृद्धिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर है। ओदारिकशरीरका १ महापंधे पदेसबंधाहियारे णाणाभंगो। णवरि अवत्त० णत्थि अंतरं । एवं एदेण सन्चकम्माणं भुजगारभंगो। एवं पम्माए वि । णवरि एसिं अणंतभागवड्डि-हाणी अस्थि तेसिं जह• अंतो०, उक्क० अट्ठारस सागरो. सादि० । देवगदि०४ असंखेंजगुणवड्डी० जह• एग०, उक्क० अट्ठारस साग० सादि० । ओरालि अंगो० णाणा भंगो। णवरि अवत्त० णस्थि अंतरं। भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। इस प्रकार इस विधिसे सब कर्मोंका भग भुजगारके समान है । इसी प्रकार पालेश्याम भी जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि यहॉ जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके इन पदोका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर है। देवगतिचतुष्ककी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर है । औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग का भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थ-पीत लेश्यामें पॉच ज्ञानावरणादि ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियाँ हैं, इसलिए इनकी एक वृद्धि और एक हानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है । तथा इस लेश्याका उत्कृष्ट काल साधिक दो सागर है, अतः यहाँ इनके शेष पदोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। इस लेश्यामें जिन प्रकृतियोंकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि सम्भव है,उनका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक दो सागर बन जाता है, इसलिए यह उक्त कालप्रमाण कहा है । इन पदोंके अन्तरकालका खुलासा पहले अनेक बार कर आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए। मात्र पीतलेश्याका उत्कृष्ट काल साधिक दो सागर होनेसे इन पदोका उत्कृष्ट अन्तरकाल भी उस कालके भीतर प्राप्त किया जा सकता है, इस बातको ध्यानमे रखकर उक्तप्रमाण कहा है। देवगतिचतुष्कका बन्ध तिर्यश्च और मनुष्य करते हैं और इनके पीतलेश्याका काल अन्तर्मुहूर्त उपलब्ध होता है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंकी तीन वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। तथा किसी जीवने देवोंमे उत्पन्न होनेके पूर्व इनकी असंख्यातगुणवृद्धि की और वहाँसे आकर पुनः मनुष्योंमें इनकी असंख्यातगुणवृद्धि की यह सम्भव है, क्योंकि देवों में से आनेके वाद औदारिकमिश्रकाययोगमें इनकी असंख्यातगुणवृद्धि ही होती है और देवामें उत्पन्न होनेके पूर्व भी यह सम्भव है, इसलिए इन प्रकृतियोके उक्त पदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक ठो सागर कहा है। औदारिकशरीरका बन्ध तिर्यञ्चों और मनुष्योके भी होता है और देवोमें यह ध्रुवबन्धिनी है, इसलिए इसका भङ्ग ज्ञाना- वरण के समान वन जानेसे उसे उनके समान जाननेकी सूचना की है । मात्र इसका अवक्तव्यपद या तो देवोंके प्रथम समयमें सम्भव है या तिर्यञ्चो और मनुष्योके सम्भव है। पर इस लेश्याके रहते हुए यह पद दो बार सम्भव नहीं है, इसलिए इस प्रकृतिके उक्त पदके अन्तरकालका निषेध किया है। इस प्रकार यहाँ जिन प्रकृतियोंके सम्भव पदोका अन्तरकाल कहा है,उसे ध्यानमें रख- कर शेष प्रकृतियोंके सम्भव पदोंका अन्तरकाल भुजगार अनुयोगद्वारके समान यहाँ भी घटित हो जाता है, इसलिए यहाँ शेष प्रकृतियोंका भङ्ग भुजगारके समान घटित कर लेनेकी सूचना की है। पद्मलेश्यामें भी इसी विधिसे अन्तरकाल ले आना चाहिए मात्र इस लेश्याका उत्कृष्ट काल साधिक अठारह सागर है, इसलिए इस कालको ध्यानमें रखकर अन्तरकाल प्राप्त करना चाहिए । यही कारण है कि यहाँ जिन प्रकृतियोकी अनन्तभाग वृद्धि और अनन्तभागहानि सम्भव है,उनके इन पदोका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर कहा है। तथा यहॉ एकेद्रियजातिसम्बन्धी प्रकृतियोका बन्ध न होनेके कारण देवोंमें औदारिकआनी- वडिवघे अंतरं રહ્યું । ३००. सुक्काए पंचणा०-छदंसणा०-चदुसंज-भय-दुः-पंचिंदि०-तेजा०क०-वण्ण०- ४-अगु०४-तस०४-णिमि०-पंचंत० एकवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० अंतो० । तिण्णिवडि-हाणि-अवडि० जह० एग०, उक्क० तेत्तीसं० सादि० । अवत्त० णत्थि अंतरं । एसि अणंतभागवड्डि-हाणी अत्थि तेसिं जह० अंतो०, उक्क० ऍकत्तीसं० देसू० । मणुसगदि०४ धुविगाण भंगो । णवरि तत्तीसं० देसू० । देवगदि०४ असंखेंजगुणवड्ढि० जह० एग०, उक० तेत्तीसं० सादि० । सेसपदाणं जह० एग०, उक्क० अंतो० । अवत्त० जह• अट्ठारससाग० सादि०, उक्क० तेत्तीसं० सादिः । एवं० भुजगारमंगो कादयो । पाङ्ग भी ध्रुवबन्धिनी प्रकृति हो जाती है, अतः इसका भग ज्ञानावरणके समान प्राप्त होनेसे उसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। परन्तु यहाँ औदारिक आङ्गोपाङ्गका अवक्तव्यपद भी सन्भव है. पर उसका अन्तरकाल सन्भव नहीं है, इसलिए इस प्रकृतिके उक्त पदके अन्तर- कालका निषेध किया है । खुलासा पहले औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदके अन्तरकालका निषेध करते समय कर आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए । ३०० शुक्ललेश्याम पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, पद्धेन्द्रियजाति. तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचतुष्क, निर्माण और पांच अन्तरायकी एक वृद्धि और एक हानिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है । अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके इन पदोका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उकृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है। मनुष्यगतिचतुष्कका भग ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी तीन वृद्धि. तीन हानि और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर छ कम तेतीस सागर है। देवगतिचतुष्ककी असंख्यातगुणवृद्धिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। इनके शेष पदोंका जघन्य अन्तर एक समय है और स्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवक्तव्यपदका जवन्य अन्तर साधिक अठारह सागर है और स्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर है। इस प्रकार भुजगार अनुयोगद्वारके समान भग करना चाहिए। विशेषार्थ-शुक्ललेश्याम उपशमश्रेणिमे बन्धव्युच्छित्तिके बादके कालको छोड़कर पाँच नानावरणादिका निरन्तर पन्ध होता रहता है । इसलिए यहाँ इनकी एक वृद्धि और एक हानिका उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त बन जानेसे वह उक्तप्रमाण कहा है । तथा इस लेश्याका नहष्ट काल साधिक तेतीस सागर है। यह सम्भव है कि इसके कालके प्रारम्भमै और अन्तमें उक्त प्रकृतियोंकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपद हों तथा मध्यमे न हों, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके उक्त पदोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक तेतीस सागर कहा है । यहाँ उपशम- गिसे उतरते समय यद्यपि इनका अवक्तव्यपद होता है, पर इस लेश्याके उसी कालमें दूसरी वार उपशमश्रोणिपर चढ़ना और उतरना सम्भव नहीं है. क्योंकि उपशमश्रेणिसे उतरकर सातवें गुणस्थानमें आनेपर लेश्या बदल जाती है। इसलिए यहाँ उक्त प्रकृतियोका अवक्तव्यपद् होकर भी उसका अन्तरकाल सम्भव नहीं है, अतः उसका निषेध किया है । यहॉजिन प्रकृतियाकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि होती है,उनके इन पदोका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त तो पूर्ववन् घटित कर लेना चाहिए । पर उत्कृष्ट अन्तर जो कुछ कम इकनीस सागर बतलाया ०६६ महाबधे पदेसबंधाहियारे ३०१. भवसि०-अभवसि०-सम्मा-खड़ग० -वेदग भुजगारभंगो । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि अंतरं ओधि भंगो । अप्पप्पणो द्विदी कादव्वं । ३०२. उवसम० चदुदंस०-चदुसंज० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढिजह० एग०, उक्क० अंतो० । अणंतभागवड्डि-हाणि-अवत्त० गथि अंतरं । पञ्चक्खाण०४ अणंत- भागवड्डि-हाणि-अवत्त० जह० उक्क० अंतो० । सेसाणं भुजगारभंगो । सासण- है,उसका कारण यह है कि इकतीस सागरसे अधिक स्थितिवाले देव नियमसे सम्यग्दृष्टि होते हैं और ऐसे देवांके उक्त प्रकृतियांके उक्त दोनो पद नहीं बनते । अतः यहाँ इन दोनो पदोका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर कहा है। एक मनुष्यने उपशमश्रेणिपर आरोहण करते समय देवगनिचतुष्ककी असंख्यातगुणवृद्धि की। उसके बाद उतरते समय इनका अवक्तव्यवन्ध किया और मरकर तेतीस सागरकी आयुके साथ देव हो गया । पुनः वहाँसे च्युत होकर प्रथम समयमे अवक्तव्यबन्ध करके द्वितीय समयमे असंख्यातगुणवृद्धि की । इस प्रकार इनके उक्त पदका उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक तेतीस सागर प्राप्त होनेसे वह उक्त प्रमाण कहा है । इनके शेप पद तिर्यश्चो और मनुष्योमे होते हैं और वहाँ इस लेश्याका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, अतः ईनके उक्त पदोका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है । अब रहा एक अवक्तव्यपद सो मनुष्योमे इनका अवक्तव्यपट करावे । बादमे देवोमे उत्पन्न करावे और वहांसे च्युत होकर मनुष्य होनेपर पुन अवक्तव्यपद करावे और अन्तरकाल ले आवे । यतः यहाँ इस प्रकार दो वार अवक्तव्यपद प्राप्त करनेमे कमसे कम साधिक अठारह सागर और अधिकसे अधिक साधिक तेतीस सागर काल लगता है, अत' ईन प्रकृतियोंके उक्त पढका जघन्य अन्तरकाल साधिक अठारह सागर और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक तेतीस सागर कहा है । इस प्रकार यहाँ तक जो अन्तरकाल कहा है, उसके आगे शेष प्रकृतियोका उनके अपने-अपने पढोके अनुसार अन्तरकाल भुजगार अनुयोगद्वार को लक्ष्यमें रखकर प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए उसे भुजगारके समान जाननेकी सूचना की है। ३०१ भव्य, अभव्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि जीवामे भुजगारके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका अन्तर अवधिज्ञानी जीवोके समान है । मात्र सर्वत्र अपनी-अपनी स्थिति कहनी चाहिए । अर्थात् जिस मार्गणाका जो उत्कृष्ट काल है उसे जानकर उत्कृष्ट अन्तरकाल लाना चाहिए | विशेषार्थ-यहाँ अभव्य मार्गणामें किसी भी प्रकृतिको अनन्तभागवृद्धि और अनन्त- भागहानि सम्भव नहीं है। शेपमे सम्भव है सो अवधिज्ञानमार्गणाके अनुसार वह घटित कर लेना चाहिए। पर जिसकी जो कायस्थिति हो उसे जानकर घटित करना चाहिए। यहाँ इतना और विशेप जानना चाहिए कि भव्य मार्गणामे मिथ्यात्वादि सब गुणस्थान सम्भव हैं, इसलिए इसमे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिका भङ्ग ओधके समान बन जाता है। ३०२. उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे चार दर्शनावरण और चार संज्वलनकी चार धृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अनन्त- भागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपदका अन्तरकाल नहीं है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपदका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। . १ ता० प्रती 'कादवो भव अम्भव । सम्मा०' इति पाठः।
२६७ www वडिबंधे णाणाजीवेहि भंगविचओ सम्मामि० - मिच्छादि० - सण्णि-असण्णि - आहारका० - अणाहार चि भुजगारभंगो कादब्यो। एवं अंतरं समत्तं । णाणाजीवेहि भंगविचओ ३०३. णाणाजीवेहि भंगविचयाणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा.. गवदंसणा०-मिच्छ०-सोलसकसा०-भय-दु०-ओरालि०-तेजा००-वण्ण०४-अगु०-उप०- णिमि०-पंचंत० पत्तारिवाड्डि-हाणि अवढि० णियमा अत्थि । अवत्तव्यमा भयणिज्जा'। तिणि भंगो । तिण्णिाउगाणं सव्वपदा भयणिज्जा । वेउव्वियछक्क आहारदुगं तित्थ० असंखेंजगुणवड्डि-हाणी० णियमा अस्थि । सेसपदा भयणिज्जा । सेसाणं पगदीणं सव्वपदा णियमा अस्थि । गवरि छदंस०-बारसक०-सत्तणोक० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढिणियमा अस्थि । अणंतभागवड्डि-हाणिबंधगा भयणिजाणि । ओघभंगो तिरिक्खोघो कायजोगि- ओरालिका० - ओरालिमि० - णqसग०-कोधादि०४-मदि०-सुद०-असंज०-अचखुदं०- शेष प्रकृतियोका भग भुजगारके समान है। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवोमे भुजगारके समान भङ्ग कहना चाहिए। विशेषार्थ -उपशमसम्यक्त्वका काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इसमें चार दर्शनावरण और चार संज्वलनकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त बन जानेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है। यहाँ इनकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्य पद तो सम्भव हैं, पर ये पद यहॉ दो बार नहीं हो सकते, इसलिए उक्त प्रकृतियांके इन पदोंके अन्तरकालका निषेध किया है। मात्र उपशमसम्यक्त्वके कालमे संयमासंयम और सयमकी दो बार प्राप्ति और दो बार च्युति सम्भव है, इसलिए यहाँ प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपद दो बार बन जानेसे उनका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है । शेष कथन स्पष्ट है । इस प्रकार अन्तरकाल समाप्त हुआ। नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गाविचय ३०३. नाना जीवोका अवलम्बन लेकर भङ्गविचयानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपधात, निर्माण और पाँच अन्तरायको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदके बन्धक जीव नियमसे हैं । अवक्तव्यपदके बन्धक जीव भजनीय हैं। भग तीन होते हैं। तीन आयुओके सब पद भजनीय हैं। वैक्रियिकषटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुण- हानि नियमसे है। शेष पद भजनीय हैं । शेष प्रकृतियोके सब पद नियमसे हैं । इतनी विशेषता है कि छह दर्शनावरण, बारह कषाय और सात नोकषायोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपद् नियमसे हैं । अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव भजनीय हैं। इस प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यच, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाय- , . १. आप्रतौ 'अवत्तबगा व भयणिजा' इति पाठः।
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वडिबंधे भागाभागो २६६ ३०४. णिरएसु असंखेंजगुणवड्डि-हाणी णियमा अस्थि । सेसपदा भयणिज्जा । मणुसअपजत्त-वेउन्वि०मि०-आहार-आहारमि०-अवगद०-सुहुमसंप० - उवसम०- सासण-सम्मामि० सम्वपगदीणं सन्नपदा भयणिजा । एदेण कमेण णेदव्यं । एवं णाणाजीवेहि भंगविचयं समत्तं । भागाभागो ३०५. भागाभागाणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे। ओषेण पंचणा०-णवदंसणा०- मिच्छ०-सोलसक०-भय-दु०-ओरालि०-तेजा-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि० -पंचंत०. असंखजगुणवडिबंधगा सव्वजीवाणं केवडियो भागो ? दुभागो सादिरेयो । असंखेंज- गुणहाणिबंधगा सव्वजीवाणं केवडियो भागो ? दुभागो देसूणो । तिण्णिवड्डि-हाणि- अव४ि० सव्वजीवाणं केवडियो भागो १ असंखेंजदिभागो। अवत्त०बंध० सव्वजीवाणं केवडि० ? अणंतभागो । एर्सि' अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्यि तेसिं सव्वजीवाणं केवडियो भागो ? अणंतभागो । सेसाणं पगदीणं एक्वड्डि० के० ? दुभागो सादिरेगो । एक्कहाणि दुभागो देसू० । सेसपदा सन्दजीवाणं केवडियो भागो० १ असंखेंजदिभागो। ३०४. नारकियोंमें असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिवाले जीव नियमसे हैं । शेष पद भजनीय हैं। मनुष्य अपर्याम, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारककाययोगी, आहारक- मिश्रकाययोगी, अपगतवेदवाले, सूक्ष्मसाम्परायसंयत, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सन्यग्मिय्यादृष्टि जीवोंमें सब प्रकृतियोंके सब पद भजनीय हैं। इस क्रमसे ले जाना चाहिए । विशेषार्थ- मनुष्य अपर्याप्त मादि सान्तर मार्गणाएँ हैं, इसलिए इनमें सब प्रकृतियोंके सब पद भजनीय होना स्वाभाविक है शेष कथन स्पष्ट ही है। इस प्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय समाप्त हुआ। भागाभाग ३०५. भागाभागानुगमको अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच झानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँच अन्तरायकी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? साधिक द्वितीय भागप्रमाण हैं । असंख्यातगुण- हानिके बन्धक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? कुछ कम द्वितीय भागप्रमाण हैं ? तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? असंख्यातवे भागप्रमाण हैं। अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? अनन्तवें भाग- प्रमाण हैं । जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके इन पदोंवाले जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? अनन्तवें भागप्रमाण है। शेष प्रकृतियोंकी एक वृद्धिके बन्धक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? साधिक द्वितीय भागप्रमाण हैं। एक हानिके बन्धक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? कुछ कम द्वितीय भागप्रमाण हैं। शेष पदोंके बन्धक १. ताप्रती केवडि १ अणंतमागो। एसिं अणतमागो एसि' आप्रतौ केवडि १ अणंता भागा। एसि भणतमागो एसि' इति पाठः।
-~-~Mr-wwwww महाबंधे पदेसबंधाहियारे एवं आहारदुर्ग। णवरि संखेंज कादव्वं । तित्थय० णाणा भंगो। णवरि अवत्त० साद०- भंगो। एवं ओघभंगो तिरिक्खोघं कायजोगि-ओरालियका०-ओरालियमि०-गवंस.. कोधादि०४-मदि-सुद०-असंजद - अचक्खु०-तिण्णिले०-भवसि०-अभव सि०-मिच्छादि०- असण्णि-आहारग त्ति । णवरि ओरालियमि० देवगदिपंचगस्स ऍकवड्डि० । कम्मइ०- अणाहारग० एसिं अवत्त अत्थि तेसिं असंखेंजगुणवड्डि० असंखेंजा भागा। अवत्त० असंखेजदिभागो। सेसाणं णिरयादीणं एसिं असंखेंज्जजीवा तेसि ओधं साद मंगो। एसिं संखेंजजीविगा तेसिं ओघं आहारसरीरभंगो । एवं णेदव्यं । एवं भागाभागं समत्त । जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? असंख्यातवे भागप्रमाण हैं । इसी प्रकार आहारकद्विकके सब पदोके बन्धक जीवोका भागाभाग करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि संख्यात करना चाहिए | तीर्थङ्कर प्रकृतिके सब पदोके बन्धक जीवोका भागाभाग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका भागाभाग सातावेदनीयके समान है। इस प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यञ्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, नपुंसकवेवाले, क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचक्षुदर्शनी, तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी और आहारक जीवोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमे देवगतिपञ्चककी एक वृद्धि है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमें जिनका अवक्तव्यपद है, उनकी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव असंख्यात बहुभागप्रमाण हैं और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। शेष नरकादि मार्गणाओमे जिनका परिमाण असंख्यात है,उनका ओघसे सातावेदनीयके समान भङ्ग है और जिन मार्गणाओंका परिमाण संख्यात है,उनमे ओघसे आहारकशरीरके समान भङ्ग है । इस प्रकार ले जाना चाहिए। विशेषार्थ-जो कुल जीवराशि है. उसमे सब प्रकृतियोके सम्भव सब पदोके बन्धकोंका यदि बटवारा किया जाय तो कितना हिस्सा किसे मिलेगा, इसका विचार भागाभागमें किया गया है। तदनुसार पाँच ज्ञानावरणादिकी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव आधेसे कुछ अधिक प्राप्त होते हैं। असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीव आधेसे कुछ कम प्राप्त होते हैं। फिर भी इन दोनो पदोके बन्धक जीवोका कुल परिमाण मिलाकर सम्पूर्ण जीव राशि नहीं होता है। जो परिमाण बच रहता है उसमें शेष पदोके बन्धक जीव होते हैं । भागाभागको दृष्टिसे उनका विचार करनेपर तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदके बन्धक जीव सब जीव राशिके असंख्यातवें भागप्रमाण होते है । अर्थात् सब जीवराशिमें असंख्यातका भाग देनेपर जो लब्ध आवे उतने इन पदोंके बन्धक जीव होते हैं और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव अनन्तवें भाग- प्रमाण होते हैं । अर्थात् सब जीवराशिमे अनन्तका भाग देनेपर जो लब्ध आवे, उतने इस पढ़के बन्धक जीव होते है । कारणका विचार पहले कर आये हैं। यहाँ इतना विशेष समझ लेना चाहिए कि आगे परिमाण अनुयोगद्वारमे जो प्रत्येक प्रकृतिके विवक्षित पदके बन्धक जीवोंका परिमाण बतलाया है.उसे प्रतिभाग बनाकर यहाँ सर्वत्र भागहार प्राप्त करना चाहिए। पाँच ज्ञानावरणादिमे पाँच नोकषायोको छोड़कर शेष ऐसी प्रकृतियाँ भी सम्मिलित हैं, जिनकी १. ता० प्रती 'असखेज्जजीविगा वेसि ओघ । आहारसरीरमगो' इति पाठः । २. ता०प्रती एव भागाभाग समत्त । इति पाठो नास्ति ।
। वद्विवंचे परिमाणं २७१ परिमाणं ३०६. परिमाणाणुगमेण दुवि०-ओषे० आदे० । ओघेण पंचणा०-छदसणा०- [पचक्खाण०४]-चदुसंज०-भय-दु०-तेजा०-०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत. चत्तारिखड्डि-हाणि-अवढि० कॅत्तिया १ अणंता । अवत्तन्व० कॅत्तिया ? संखेंजा । थीण- गिद्धि०३-मिच्छ०-अट्ठक०-ओरालि० णाणाभंगो । णवरि अवत्त० कॅत्तिया ? अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव है । पाँच नोकषायांके साथ उनके इन पदवालोंका भागाभाग कितना है,यह बतलानेके लिए उसको अलगसे सूचना की है। ये पॉच ज्ञानावरणादि सब ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियाँ हैं । अपनी-अपनी वन्धव्युच्छित्तिके पूर्व इनका सव जीव नियमसे बन्ध करते हैं। इनमें औदारिकशरीर ऐसा है जो सप्रतिपक्ष प्रकृति कही जा सकती है,परन्तु सब अपर्याप्तक और एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रिय तकके जीव उसका नियमसे वन्ध करते हैं, इसलिए उन जीवोकी अपेक्षा वह भी ध्रुववन्धिनी है । अब शेष जो प्रकृतियों रहती हैं, वे परावर्तमान हैं, इसलिए उनके अवक्तव्य पदकी परिगणना तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित पदके साथ की गई है। अतः पाँच ज्ञानावरणादिके अवक्तव्यपढ़वालोका भागाभाग जो अलगसे कहा गया है, उसे यहाँ अलगसे नहीं दिखलाया गया है। मात्र आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिके विषयमें कुछ विशेषता है। वात यह है कि आहारकद्विकका बन्ध करनेवाले जीव ही संख्यात होते हैं, इसलिए असंख्यातवें भागप्रमाणके स्थानमे यहॉ संख्यातवे भागप्रममाण होते हैं,ऐसा कहनेकी सूचना की गई है। तथा तीर्थङ्कर प्रकृति ध्रुवबन्धिनी ही है,यह दिखलानेके लिए उसका भङ्ग ज्ञानावरणके समान जाननेकी सूचना की है,पर इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंका भागाभाग सातावेदनीयके समान है। क्योंकि तीर्थङ्कर प्रकृतिके बन्धक जीव असंख्यात होते हैं और इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यात होते हैं,इसलिए यहाँ इस पदकी अपेक्षा भागाभाग सातावेदनीयके समान बन जानेसे उसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। यहाँ सामान्य तिर्यश्च आदि कुछ अन्य मार्गणाएँ गिनाई हैं, जिनमें ओघके समान जाननेकी सूचना की है। उसका कारण इतना ही है कि ये सब मार्गणाएँ अनन्त संख्यावाली हैं, इसलिए उनमें ओधप्ररूपणा बन जाती है। मात्र अपनी-अपनी बन्धयोग्य प्रकृतियोंको जानकर भागाभाग कहना चाहिए। किन्तु उनमे औदारिकमिश्रकाययोग एक ऐसी मार्गणा है जिसमें देवगतिपञ्चकको एकमात्र असंख्यातगुणवृद्धि होती है, इसलिए यहाँ इसका भागाभाग सम्भव नहीं है। कामणकाययोगी और अनाहारक ये दो ऐसी मार्गणाएँ हैं, जिनमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धि ही होती है, इसलिए इनका भागाभाग सम्भव नहीं है। शेष प्रकृतियोंकी अवश्य ही असंख्यातगुणवृद्धि और अवक्तव्यपद होते हैं, इसलिए इनका भागाभाग भलगसे कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। इस प्रकार भागाभाग समाप्त हुआ। परिमाण ३०६. परिमाणानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानोवरण, छह दर्शनावरण, प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, चार संज्वलन, भय, जुगुप्सा, तैजस- शरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके वन्धक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं । अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? सख्यात हैं । स्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, कषाय और औदारिकशरीरका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं | २७२ महापंधे पदेसवंधाहियारे असंखेंजा। तिण्णिआउगाणं वेउव्वियछक्कं तित्थ. चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि०-अवत्त० कॅत्तिया ? असंखेजा। णवरि तित्थ० अवत्त० कैंत्तिया ? संखेंजा । आहारदुगस्स सब्बपदा कत्तिया ? संखेंजा। सेसाणं सब्वपगदीणं सव्वपदा केत्तिया ? अणंता । एसिं अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्थि तेसिं असंखेजा। एवं ओवभंगो तिरिक्खोघं कायजोगि-ओरालि०-ओरालियमि०-णस०-कोधादि०४-मदि-सुद०-असंजद-अचक्खुदं०- तिण्णिले०-भवसि०-अभवसि०-मिच्छादि०-असण्णि-आहारग ति। णवरि ओरा- लियमि०-कम्मइ०-अणाहार० देवगदिपंचग० असंखेंजगुणवड्डि० कॅत्तिया ? संखेंजा । कम्मइग०-अणाहार० सव्वपदा कत्तिया ? अणंता। णवरि धुविगाणं एगपदं अणंता । णवरि मिच्छ० अवत्त कत्तिया? असंखेंजा। एदेण वीजेण पणेदव्वं याव अणाहारग त्ति । , ? असंख्यात है । तीन आयु, वैक्रियिकपटक और तीर्थङ्करप्रकृतिकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने है ? असंख्यात है । इतनी विशेपता है कि तीर्थकरप्रकृतिक अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। आहारकद्विकके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात है। शेष सब प्रकृतियोके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं। जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके इन पदोके बन्धक जीव असंख्यात हैं। इस प्रकार ओपके समान सामान्य तिर्यश्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाय- योगी, नपुंसकवेदवाले, क्रोधादि चार कपायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचनुदर्शनी, तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी और आहारक जीवोमे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे देव- गतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे सत्र पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं । इतनी विशेषता है कि ध्रुव- बन्धवाली प्रकृतियोंके एक पदके बन्धक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं । इतनी विशेपता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। इस वीजपढके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। विशेषार्थ-ओघसे पॉच ज्ञानावरणादिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका बन्ध अन्यतर जीव करते हैं और सब जीवराशि अनन्त है, अत. यहाँ उक्त प्रकृतियोके उक्त पद- वाले जीवोका परिमाण अनन्त कहा है। परन्तु इनका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिमें ही सम्भव है, अतः इनके इस पदवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। स्त्यानगृद्धि आदिके विपयमे यही बात है, अतः उनका भङ्ग ज्ञानावरणके समान कहा है। मात्र उनके अवक्तव्यपदके स्वामित्वमे विशेषता है। बात यह है कि इनका अवक्तव्यपद यथायोग्य प्रथम गुणस्थानसे पाँचवे गुणस्थान तक होता है। यथा-गिरते समय स्त्यानगृद्धिका पहले और दूसरे गुणस्थानमे, मिथ्यात्वका पहले गुणस्थानमे, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कका प्रथमादि चारमे प्रत्याख्यानावरण- चतुष्कका प्रथमाद्रि पॉचमें और औदारिकशरीरका असंज्ञी आदि जीवोके अवक्तव्यपद होता है और ऐसे जीवीका परिमाण असंख्यात सम्भव है, अतः यहाँ इन प्रकृतियांक अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका परिमाण असंख्यात कहा है। तीन आयुके उदयवाले जीव असंख्यात हैं। इस न्यायसे इनका वध करनेवाले जीव भी असंख्यात होते हैं। यही कारण है कि यहाँ इनके सब पदवाले जीवोका परिमाण असंख्यात कहा है। वैक्रियिकपटकका असंज्ञी आदि जीव और , वडिवंधे परिमाणं २७३ ३०७. गेररएसु धुविगाणं चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० कॅत्तिया ? असंखेंजा । मणुसाउ० सव्वपदा कैत्तिया ? संखेजा। सेसाणं पगदीणं सव्वपदा असंखेंजा । एसिं अणंतभागवडि-हाणि० अस्थि तेसिं असंखेंजा । णवरि तित्थ० अवत्त० फुत्तिया ? संखेजा । एवं सब्बणेरइय-देव-सव्वपंचिंदियतिरिक्ख-अपन० सम्वविगलिदिय-सव्वपुढ० आउ० - तेउ-बाउ० - वादरपजत्तपत्ते०-वेउव्विय -[ वेउन्वियमि० - इत्थिवे०-पुरिसवे०- विभंग-सासणसम्मादिहि ति। ] णवरि पंचिंदियतिरिक्ख-विभंग-सासणे देवाउ. तीर्थङ्करप्रकृतिका सम्यग्दृष्टि कुछ जीव वन्ध करते हैं । यतः ये जीव भी असंख्यात हैं, अतः इनके सब पढोंके बन्धक जीव भी असंख्यात कहे हैं। मात्र तीर्थङ्करप्रकृतिका अवक्तव्यपद एक तो उपशमणिमें सम्भव है, दूसरे आठवे गुणस्थानमे वन्धन्युच्छित्तिके बाद जो जीव मरकर देव होते है, उनके प्रथम समयमै सम्भव है और तीसरे जो इसका वन्ध करनेवाले जीव दूसरे तीसरे नरकमे उत्पन्न होते हैं, उनके सम्भव है। यत ये मिलकर भी संख्यात ही होते हैं, अतः यहाँ इसके अवक्तव्यपवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है । आहारकद्विकके सब पदोंका वन्ध करनेवाले जीव सख्यात हैं, यह स्पष्ट ही है। अब रहीं शेष परावर्तमान प्रक्रतियों सो उनके सब पद एकेन्द्रियादि सब जीवोंके सम्भव हैं, इसलिए उनके सब पदोके बन्धक जीवोका परिमाण अनन्त कहा है । यहाँ छह दर्शनावरण, वारह कपाय और सात नोकषायोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी होती हैं,पर उनके इन पढ़वालोका परिमाण अभी तक नहीं कहा गया था, इसलिए उसका अलगसे उल्लेख किया है। तात्पर्य यह है कि ये पद भी यथासम्भव गुणस्थान चढ़ते समय और उतरते समय होते हैं। चढ़ते समय अनन्तभागवृद्धि होती है और उतरते समय अनन्तभागहानि | विशेष जानकारी स्वामित्वको देखकर कर लेनी चाहिए। यतः ऐसे जीव असंख्यात हो सकते हैं, अत. उक्त प्रकृतियोके इन पदवाले जीवोका परिमाण असंख्यात कहा है। यहाँ मूलमें गिनाई गई सामान्य तिर्यञ्च आदि अन्य मार्गणाओमें यह ओघप्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमें ओघके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमें तथा इनके साथ कार्मण- काययोगी और अनाहारक जीवोमे देवगतिपञ्चकका बन्ध करनेवाले जीव संख्यात ही होते हैं और यहॉ इनकी एकमात्र असंख्यातगुणवृद्धि ही होती है, इसलिए यहाँ इनके उक्त पदवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोका एक असंख्यातगुणवृद्धि पद और शेषके असंख्यातगुणवृद्धि और अवक्तव्य ये दो पद होते हैं तथा इनका परिमाण अनन्त है,यह स्पष्ट ही है। ३०७ नारकियोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियाँकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके वन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं । मनुष्यायुके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। शेष प्रकृतियोंके सब पदोके बन्धक जीव असंख्यात हैं। जिन प्रकृतियोंकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभानहानि है,उनके इन पदोके बन्धक जीव असंख्यात हैं । इतनी विशेषता है कि तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्यपदके वन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। इसी प्रकार सब नारकी, देव, सब पञ्चेन्द्रिय तियन, सब अपर्याप, सब विकलेन्द्रिय, सब पृथिवीकायिक, सब जलकायिक, सब अग्निकायिक, सब वायुकायिक, वादर पर्याप्त प्रत्येक वनस्पतिकायिक, वैक्रियिककाययोगी, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, बीवेदवाले, पुरुषवेवाले, विभङ्गज्ञानी और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोमै १ ताप्रती 'गदर० पत्ते वेउन्निय' [सासण स] म्मामि० णवरि' आ० प्रतौ वादर पजत्तपत्ते 'सासण. सम्मामि । वरि' इति पाठ । २ ता प्रती विभग | सासणे' इति पाठ.। , .. . वेनि ५ -~- --- २७४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे असंखेजा। केसिं च मणुसाउ० सव्वपदा असंखेजा। सेसाणं संखेन्जा'। वेउनियमि० धुविगाणं एगपदं असंखेंजा । सेसाणं असंखेंजगुणवड्डि-अवत्त० असंखज्जा । नित्थ० एयपदं संखेजा । [इत्थि० तित्थ० सच्चपदा संखेजा।] ३०८, मणुसेसु पंचणा०-णवदसणा०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दुगुं०-ओरालि०- जानना चाहिये । इतनी विशेषता है कि पञ्चेन्द्रिय तिर्यस्त्र, विभङ्गज्ञानी और सासादनसम्यदृष्टि जीवोमे देवायुके सब पीके बन्धक जीव असंख्यात हैं। मनुप्यायुके सब पदोके बन्धक जीच किन्हींमे असंख्यात हैं और शेपमे संख्यात हैं। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोमे ध्रुवबन्ध- वाली प्रकृतियोके एक पदके बन्धक जीव असख्यात है । शेप प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धि और अवक्तव्यपदके वन्धक जीव असंख्यात है। मात्र तीर्थङ्कर प्रकृतिके एक पदके बन्धक जीव संख्यात हैं। तथा स्त्रीवेदी जीवोम तीर्थङ्करप्रकृतिके सब पदोके बन्धक जीव सख्यात हैं। विशेषार्थ----नारकियोका परिमाण असंख्यात है, इसलिए उनमे सब प्रकृतियोके यथा- सम्भव पदवाले जीवोका परिमाण असंख्यात बन जाता है। मात्र इसके दो अपवाद हैं- एक तो मनुष्यायुके सब पदोंका वन्ध करनेवाले जीव और दूसरे तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्य- पदका वन्ध करनेवाले जीव । नारकी जीव गर्भज मनुष्योंकी आयुका ही बन्ध करते है और गर्भज मनुष्य संख्यात होते हैं, इसलिए नारकियोमे मनुष्यायुके सब पदोका बन्ध करनेवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। तथा तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले जो मनुष्य अन्तमे मिथ्यादृष्टि होकर दूसरे और तीसरे नरकमे उत्पन्न होते हैं,उन्हींके वहाँ सम्यग्दर्शन होनेपर तीर्थङ्कर प्रकृतिका अवक्तव्यपद होता है। यतः ऐसे जीव संख्यात ही हो सकते हैं, अत नारकियोमे इसके अवक्तव्यपदका बन्ध करनेवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। यहाँ गिनाई गई सब नारकी आदि मार्गणाओमे यह प्ररूपणा वन जाती है, अतः उनमे सामान्य नारकियोके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र इन मार्गणाओंमेंसे तीन प्रकारके पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च, विभङ्गज्ञानी और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंमें देवायुका भी बन्ध होता है, इसलिए इनमें देवायुके सब पदवाले जीवोका कितना परिमाण होता है,यह अलगसे बतलाया है। तथा इन सब मार्गणाओमे यद्यपि मनुष्यायुका बन्ध होता है, पर उनमेंसे बैंक्रियिककाययोगी और सासादनसम्यग्दृष्टि इन दो मार्गणाओंमें संख्यात जीव ही इस आयुका बन्ध करते हैं,किन्तु अन्य मार्गणाओमे असंख्यात जीव मनुष्यायुका बन्ध करते है, इसलिए उक्त मार्गणाओमे मनुष्यायुसम्बन्धी उक्त विशेषताका उल्लेख करनेके लिए इसकी प्ररूपणा भी अलगसे की है। बैंक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोका परिमाण असंख्यात है, इसलिए इनमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके एक पदवाले जीव और तीर्थङ्कर प्रकृतिको छोड़कर शेष प्रकृतियोके दो पदवाले जीव असंख्यात है,यह स्पष्ट ही है। मात्र तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले जो मनुष्य भर कर देव होते हैं और प्रथम नरकके नारको होते हैं, उन्हींके इस योगमें तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध सम्भव है। ऐसे जीव संख्यातसे अधिक नहीं हो सकते, इसलिए यहाँ इसके सब पदवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है । तथा मनुष्योमे ही स्त्रीवेदी जीव तीर्थङ्करप्रकृतिका वन्ध करते हैं, इसलिए इस मार्गणामे इसके सब पदोके बन्धक जीवोंका परिमाण अलगसे कहा है। ३०८. मनुष्यों में पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच . ३ ता.आ०प्रत्योः 'सेसाण असखेज्जा' इति पाठः ।
२७५ वडिवंधे परिमाणं तेजा-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० असंखेजा। अवत्त० संखेजा । एसिं अणंतभागवड्डि-हाणि० अत्थि तेसिं संखेजा। दोआउ०- वेउब्बियछक्कं ] आहारदुगं तित्थय० सव्वपदा कैंचिया ? संखेंजा । सेसाणं सच- पगदीणं सन्वपदा असंखेंजा। मणुसपजत्त-मणुसिणीसु सव्वपदा कॅत्तिया ? संखेंजा। एवं सब्वट्ठल-आहार-आहारमि०-अवगदवे०-मणपज्ज-संजद-सामाइ०-छेदो०-परिहार०- सुहुमसं०। ३०६. एइंदि० वणप्फदि-णिगोद० सन्वपगदीणं सव्वपदा कॅत्तिया ? अणंता । णवरि मणुसाउ० सन्वपदा कॅत्तिया ? असंखेंज्जा। . . अन्तरायकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपटके वन्धक जीव असंख्यात हैं। तथा अवक्तव्यपढ़के बन्धक जीव संख्यात हैं। यहाँ जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है उनमें इन पटोके वन्धक जीव संख्यात हैं। दो आयु, वैक्रियिकषटक, आहारकद्विक और तीर्थकरप्रकृतिके सव पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं । शेप सब प्रकृतियोके सव पदोके वन्धक जीव असंख्यात हैं। मनुष्य पर्याप्त और मनुप्यिनियोमे सब प्रकृतियोके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। इसी प्रकार अर्थात् मनुष्य पर्याप्त जीवोके समान सर्वार्थसिद्धिके देव, आहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, अपगतवेदवाले, मन पर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसयत और सूक्ष्मसाम्परायसयत जीवामे जानना चाहिए। विशेषार्थ-सामान्य मनुष्योका परिमाण असंख्यात है। लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य भी पॉच ज्ञानावरणदिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका वन्ध करते है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके उक्त पदवाले जीवोंका परिमाण असंख्यात कहा है। परन्तु इनका अवक्तव्यपद लन्थ्यपर्याप्त मनुष्याके सम्भव नहीं है, इसलिए इनके अवक्तव्य पदवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है । यहाँ विवक्षित प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि ये पद भी लब्ध्य- 'पर्याप्तक मनुष्योके नहीं होते, इसलिए इन पदवाले जीर्वोका परिमाण भी संख्यात कहा है। दो आयु, वैक्रियिकषटक, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध गर्भज मनुष्य यथासम्भव करते हैं,यह स्पष्ट ही है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके सब पवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। शेष सब प्रकृतियों और उनके सब पढोका बन्ध मनुष्यामे यथायोग्य सबके सम्भव है, इसलिए उनके सब पदवाले जीवोका परिमाण असंख्यात कहा है। मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनी इनका परिमाण ही संख्यात है, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोंके सम्भव सब पदवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। यहाँ गिनाई गई अन्य सत्र मार्गणाओमे जीवोका परिमाण सख्यात है, इसलिए उनमे अन्तके इन दो प्रकारके मनुष्योंके समान जाननेकी सूचना की है। ३०६ एकेन्द्रिय, वनस्पतिकायिक और निगोद जीवोमे सब प्रकृतियोंके सब पढोके बन्धक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं। इतनी विशेषता है कि मनुष्यायुके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। विशेषार्थ-इन तीन मार्गणाओंमे परिमाण अनन्त है, इसलिए इनमे सब प्रकृतियोके १ ता प्रतौ 'अर्णतभागव [ट्टि "आहारदुग] तित्यय' आ प्रतौ अणतभागवड्डि " आहारदुग तित्यनः' इति पाठ ।
~~ २७६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे ३१०. एदेण कमेण आभिणि-सुद०[ ओधि० पंचणा०-देवग०-पंचिंदि' वेउचिन्तेजा-क०-समचदु०-वेउन्वि० अंगो०-वण्ण०४-देवाणुपु०-अगु०४-पसत्य - तस०४-सुभग-सुस्सर-आर्दै - णिमि०-तित्थ० - उच्चा०-पंचंत० चत्तारिवड्डि-हाणि- अवढि० कॅत्तिया ? असंखेंज्जा । अवत्त० संखेंज्जा । एवं णिहा-पयला-पुरिस०-भय-दु० । एवं चदुदंसणा० । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि० संखेंज्जा। चदुसंज०-पचक्खाण०४ णाणा भंगो। णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि० कैंचिया ? असंखेंजा। [दोवेदणी०- अपच्चक्खाण०४-चदुणो०-देवाउ०-मणुसग०-ओरालि०-ओरालि अंगो०-वञ्जरि०- मणुसाणु०-थिरादितिण्णियुग० सन्वपदा० कॅत्तिया० १] असंखेंज्जा। मणुसाउ०- आहारदुगं सव्वपदा कॅत्तिया ? संदज्जा । एवं ओधिदं०-सम्मादि०-वेदग० । सब पदवाले जीवोका परिमाण अनन्त बन जानेसे वह उक्त प्रमाण कहा है । पर कुल मनुष्य ही असंख्यात होते है, इसलिए मनुष्यायुका बन्ध करनेवाले जीव कहीं असंख्यातसे अधिक नहीं हो सकते । यही कारण है कि यहाँ इसके सव पदवाले जीवोका परिमाण असंख्यात कहा है। ३१० इस क्रमसे आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवों में पॉच ज्ञानावरण, देवगति, पञ्चेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कर्मगशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिक- शरीर आङ्गोपाङ्ग, वर्णचतुष्क, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, प्रशस्त विहायोगति, सचतुष्क, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण, तीर्थकर, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीव कितने है ? असंख्यात हैं। इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यात है। इसी प्रकार निद्रा, प्रचला, पुरुषवेद, भय और जुगुप्साका भङ्ग जानना चाहिए। तथा इसी प्रकार चार दर्शनावरणका भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव संख्यात हैं। चार संज्वलन और प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका भग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात है। दो वेदनीय, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क, चार नोकषाय, देवायु, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, वर्षभनाराच संहनन, मनुष्य- गत्यानुपूर्वी और स्थिर आदि तीन युगलके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। मनुष्यायु और आहारकद्विकके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोमे जानना चाहिए। विशेषार्थ-ये तीन मार्गणावाले जीव असंख्यात हैं, इसलिए इनमे पॉच ज्ञानावरणादिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके वन्धक जीव असंख्यात कहे है। परन्तु इनका अवक्तव्य- पद उपशमश्रेणिमे होता है, इसलिए इनके उक्त पदके बन्धक जीव संख्यात कहे हैं। निद्रादिक पॉचका भग इसी प्रकार है, इसलिए उनके विषयमें पांच ज्ञानावरणादिके समान जाननेकी सूचना की है। चार दर्शनावरणका भङ्ग भी इसीप्रकार बन जाता है। मात्र इनकी अनन्तभाग- वृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव होनेसे इन पदोके बन्धक जीवोंका परिमाण अलगसे कहा -2 १ ता०प्रतौ 'अभिणिसुद".. केवल०] पचि०' आ० प्रतौ 'आमिणि-सुढ० "केवल. पचिंटि० इति पाठः। २ आ०प्रतौ 'वण्ण० देवाणुपु० अगु० पसत्थः' इति पाठः। ३ वा प्रतौ 'केत्तिक १ अस [खेजा। - "असोजा] । मणुसाउ०' आ प्रती 'केत्तिया १ असखेजा।" "असखेजा। मणुसाउ० इति पाठः।
वड्ढिवधे परिमाणं २७७ ३११. संजदासंजद सव्वपगढीणं सव्वपदा कैंचिया ? असंखेंज्जा । णवरि तित्थ० सव्वपदा संखेंज्जा। ३१२. तेउ०-पम्म० [पचक्खाण०४-] देवगदि०४-तिस्थ० अवत्त कॅत्तिया ? संखेजा। सेसपदा असंखेंज्जा। सेसपगदीणं सव्वपदा कत्तिया? असंखेंज्जा । [ मणुसाउ०-आहारदु० सव्वपदा कॅत्तिया ? संखेंजा।] है जो सख्यात प्राप्त होता है, क्यो कि यहाँ इनके ये दो पद उपशमश्रेणिम ही सम्भव हैं। चार संचलन और प्रत्याख्यानावरण चतुष्ककी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि ये दो पद चौथेसे पाँचवेमे जाते समय और ऊपरके गुणस्थानोसे चौथेमे आते समय भी सम्भव हैं, इसलिए इन प्रकृतियोंके उक्त पढ़वालाका परिमाण असख्यात कहा है। इनके शेप पदोका भग पाँच ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है। दो वेदनीय आदि कुछ तो परावर्तमान प्रकृतियाँ हैं, अप्रत्याख्यानावरणका चतुर्थ गुणस्थानमें वन्ध होता है तथा मनुष्यगतिद्विक, औदारिक- शरीरद्विक और वज्रर्पभनाराचसहननका अविरतसम्यग्दृष्टि सव देव और नारकी वन्ध करते हैं, इसलिए यहाँ इनके सव पदोके बन्धक जीवोका परिमाण असख्यात प्राप्त होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है । यहाँ मनुष्यायु और आहारकद्विकके सब पदोके वन्धक जीव सख्यात हैं,यह स्पष्ट ही है। अवधिदर्शनवाले आदि मूलमे कही गई तीन मार्गणाओमे यह प्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, इसलिए उनमे आभिनिवोधिकजानी आदि जीवोंके समान जाननेकी सूचना की है। ३११ सयतासयत जीवोमे सब प्रकृतियोंके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात है । इतनी विशेषता है कि तीर्थङ्कर प्रकृतिके सब पदोके बन्धक जीव संख्यात हैं। विशेषार्थ-संयत्तासंयतोंमे मनुष्य ही तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करते हैं, इसलिए इनमें इस प्रकृतिके सव पवाले जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। शेप कथन स्पष्ट ही है। ३१२ पीत और पद्मलेश्याम प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, देवगतिचतुष्क, और तीर्थकर प्रकृतिके अवक्तव्य पढ़के बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात है। शेष पदोके बन्धक जीव असंख्यात हैं। शेप प्रकृतियोके सब पदोके वन्धक जीव कितने हैं ? असख्यात हैं ? तथा मनुष्यायु और आहारकद्विकके सव पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? सख्यात हैं। विशेषार्थ-जो सयत मनुष्य नीचेके गुणस्थानामे आते हैं या मरकर देव होते है उनके ही प्रत्यास्थानावरणचतुष्कका अवक्तव्यपद होता है, इसलिए तो इन लेश्याओमे अप्रत्याख्याना- वरण चतुष्कके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवाका परिमाण सख्यात कहा है । तथा देव और नारकियोंके तो देवगतिचतुष्कका वन्ध ही नहीं होता, इसलिए वहाँ इनके अवक्तव्यपदकी बात ही नहीं । जो मिथ्यावष्टि देव मरकर अन्य गतियोंमे उत्पन्न होते है उनके भी इनका बन्ध नहीं होता, इसलिए वहाँ भी इनके अवक्तव्य पदकी बात नहीं । हॉ,जो उक्त लेश्यावाले सम्यग्दृष्टि देव मरकर मनुष्योमे उत्पन्न होते है, उनके देवगतिचतुप्कका अवक्तव्यपद मुख्यरूपसे सम्भव है और ऐसे जीव संख्यात होते है, इसलिए यहाँ देवगविचतुप्कके अवक्तव्यपदका बन्ध करनेवाले जीवाका परिमाण संस्थात कहा है। तथा इन लेश्याओमे तीर्थङ्कर प्रकृतिका अवक्तव्यपद मनुष्योम ही सम्भव है, इसलिए यहाँ इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव भी संख्यात कहे हैं। यहाँ इन प्रकृतियोंके शेष पदोके तथा मनुष्यायु और आहारकद्विकको छोड़कर शेप प्रकृतियोके ? १ ताप्रती 'वेटगः सजदासजदा' इति पाट । २ आप्रती देवगटि ४ मिच्छ० अवत्त इति पाट । .
। महाबंधे पदेसबंधाहियारे ३१३. सुक्काए धुविगाणं चत्तारि [ वड्डि-हाणि-अवढि कॅत्तिया० । असंखेंजा । अवत्त० कॅत्तिया० । संखेंजा। दोआउ०-आहार० सव्वपदा कॅत्तिया० ? संखेंजा। सेसाणं सव्वप० के० असंखेंज्जा] । णवरि' मणुसग दिपंच०-देवगदि४-तित्थ० अवत्त० कैंचिया ? संखेज्जा । सेसपदा असंखेजा । [खइय० एवमेव 1] ३१४. उवसम० धुविगाणं मणुसगदिपंचग०-देवगदि०४ अवत्त० कैंतिया ? संखेंजी। सेसपदा असंखेजा। चदुदंस० अणंतभागवड्डि-हाणि० संखेंजा । सेसपदा कॅत्तिया ? असंखजा | आहारदुगं तित्थ० सव्वपदा कॅत्तिया ? संखेल्ला । सेसाणं पगदीणं सन्वपदा कत्तिया ? असंखेजा । - सब पदोके बन्धक जीव असख्यात है,यह स्पष्ट ही है। यहाँ मनुष्यायु और आहारकद्विकके सब पदाके बन्धक जीव संख्यात है,यह भी स्पष्ट है। ३१३ शुक्ललेश्याम ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके वन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। दो आयु और आहाकद्विकके सब पदोके वन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। शेप प्रकृतियोके सब पदोके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। इतनी विशेषता है कि मनुष्यगतिपञ्चक, देवगतिचतुष्क और तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्य पदके बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं । तथा शेप पदोके वन्धक जीव असंख्यात हैं । क्षायिकसम्यग्दृष्टियोमे इसी प्रकार जानना चाहिए । विशेषार्थ-शुक्ललेश्याम ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिसे उतरते समय होता है, इसलिए यहाँ इनके उक्त पदवाले जीव संख्यात कहे हैं। जो शुक्ललेश्यावाले उपशमश्रोणिसे उतरते समय देवगतिचतुष्कका वन्ध करते हैं,उनके इन प्रकृतियोका अवक्तव्य पद होता है और जो मरकर देव होते हैं, उनके वहाँ उत्पन्न होनेके प्रथम समयमै मनुष्यगति पञ्चकका अवक्तव्यपद होता है। यत. ये जीव संख्यात होते हैं, अत. यहाँ इनके अवक्तव्य पदके बन्धक जीवोका परिमाण संख्यात कहा है। शुक्ललेश्यामै तीर्थङ्कर प्रकृतिके बन्धका प्रारम्भ एक तो मनुष्य करते है । दूसरे उपशमश्रोणिमे तीर्थङ्कर प्रकृतिकी वन्धव्युच्छित्तिके बाद जो मर कर देव होते हैं या नीचे उतर आते हैं, वे भी इसके बन्धको पुनः प्रारम्भ करते हैं। अत. ये संख्यात होते हैं, अत. इस लेश्याम तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्य पदके बन्धक जीव भी संख्यात कहे हैं। शेष कथन सुगम है। यहाँ मूलमे कुछ पाठ त्रुटित है और गड़बड़ भी है। सुधारकर पाठ वनानेका प्रयत्न किया है। क्षायिकसम्यक्त्वमे प्रायः शुक्ललेश्याके समान भङ्ग बन जाता है, इसलिए उसमे भी शुक्ललेश्याके समान जाननेकी सूचना कर दी है। जो विशेषता है उसे जान लेना चाहिये। ३१४. उपशमसम्यक्त्वमे ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंके और मनुष्यगति पञ्चक तथा देवगति चतुष्कके अवक्तव्यपदके वन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। शेष पदों के बन्धक जीव असंख्यात हैं। चार दर्शनावरणकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव संख्यात हैं। शेष पदों के बन्धक जीव कितने हैं? असंख्यात हैं। आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिके सव पदों के बन्धक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। शेष प्रकृतियों के सब पदों के बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। १ ता. प्रतो 'चत्तारि [वटि हाणि ] "एवमेव णवार आप्रतौ 'चत्तारि... "एवमेव णवरि' इति पाठः। . ..
२७६ वडिवंधे खेतं ३१५, सासण-सम्मामि० सम्वपगदीणं सबपदा असंखेंजा। णवरि सासणे मणुसाउ० सन्वपदा संखेंजा। एवं परिमाणं समत्तं । खेतं ३१६. सत्ताणुगमेण दुवि०-ओघे० आदे० । ओघेण पंचणा०-णवदसणा०- मिच्छ०-सोलसक० - भय • दु०-ओरालि. तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०- पंचंत० चत्तारिखड्डि-हाणि-अवहिदबंधगा केवडि खेत ? सबलोगे । अवत्त० कंवडि खेत्तै ? लोगस्स असंखेंजदिमागे। एसिं अणंतभागवडि-हाणी अत्थि तेसिं लोगम्स विशेषार्थ-जो मनुष्य उपशमसम्यक्त्वके साथ मर कर देव होते हैं उनके प्रथम समयमें मनुष्यगति पञ्चकका अवक्तव्य पद होता है और उपशमश्रोणिसे उतरते हुए उपशमसम्यग्दृष्टि मनुष्यों के देवगति चतुष्कका अवक्तव्यपट होता है। यत. ये संख्यात ही होते हैं, अत. यहाँ इनका परिमाण उक्तप्रमाग कहा है। इनमें चार दर्शनावरणकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभाग- हानि भी उपशमणिमें होती है, इसलिए इनके बन्धक जीवोका परिमाण भी संख्यात कहा है। इनमें आहारकद्विकके सब पदोंके बन्धक जीव संख्यात होते हैं, यह स्पष्ट ही है। तथा उपशम सम्यग्दर्शनमें तीर्थङ्कर प्रकृतिके बन्धका प्रारम्भ मनुष्य ही करते हैं और ऐसे मनुष्य उपशम- प्रोणिमें यदि मरते हैं,वो देवोंमें भी अन्तर्मुहूर्त कालके भीतर संचित हुए तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले उपशमसम्यग्दृष्टि देव देखे जा सकते हैं। यतः ये सब जीव भी संस्यात ही होते हैं, अत. यहाँ तीर्थङ्कर प्रकृतिके सब पदोंके बन्धक जीवाका परिमाण संख्यात कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। ३१५. सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्याष्टि जीवोम सब प्रकृतियों के सब पदो के बन्धक जीव असंख्यात हैं। इतनी विशेषता है कि सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों में मनुष्यायुके सब पदों के बन्धक जीव संख्यात हैं। विशेषार्थ—यद्यपि सासादन सम्यग्दृष्टि जीवों में परिमाणका निर्देश पहले आ चुका है। उस हिसावसे यह पुनरुक्त हो जाता है,पर हमने यहाँ मूलके अनुसार ही रहने दिया है। पहले सुम्यग्मिध्यावष्टि पदका भी मूलमें निर्देश किया है,पर उसे उसी स्थल पर टिप्पणीमे दिखला दिया है । एक तरहसे यह पूरा प्रकरण त्रुटित और पुनरुक्त है। किसी प्रकार उसे सम्हाला है। इस प्रकार परिमाण समाप्त हुआ। क्षेत्र ३१६. क्षेत्रानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघसे पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्सा, औदारिकशरीर, शरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पॉच अन्तरायकी चार वृद्धि, तेजस- चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवोंका कितना क्षेत्र है ? सर्वलोक क्षेत्र है। अवक्तव्य- पढ़के वन्धक जीवांका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है। जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है,उनके इन पदोके वन्धक जीवोका लोकके असख्यात १ वा प्रती एवं परिमाण समत्त' इति पाठो नास्ति । २. ता प्रतौ 'असखेजदिमागों' इति पाठ.।
२८० 0. ...... महावंधे पटेसबंधाहियारे असंखेंज० । तिण्णिआउ० वेउब्धियछ०'आहारदुगं तित्थ० सव्वपदा केवडि खेत्ते ? लोगस्स असंखें । सेसाणं सव्वाणं पगदीणं सव्वपदा केडि खेते ? सव्वलोगे । एवं ओषभंगो तिरिक्खोघं कायजोगि-ओरालि० - ओरालियमि० - कम्मइ०-णqस०- कोधादि ०४-मदि-सुद०-असंजद -अचखुदं०-तिण्णिले ०-भवसि०-अभवसि०- मिच्छा० असण्णि-आहार०-अणाहारग ति। णवरि ओरालियमि० - कम्मइ०-अणाहारगेसु देवगदिपंचगस्स एगपदं लोगस्स असंखेंजः । भागप्रमाण क्षेत्र है। तीन आयु, वैक्रियिकपटक, आहारकद्विक और तीर्थकर प्रकृतिके सव पदोके वन्धक जीवोका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवं भागप्रमाण क्षेत्र है। शेप सब प्रकृतियोंके सत्र पदोके बन्धक जीवीका कितना क्षेत्र है। सर्वलोक क्षेत्र है। इस प्रकार ओषके समान सामान्य तिर्यश्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदवाले, क्रोधादि चार कपायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचक्षुदर्शनवाले, तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्याष्टि, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवामै जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे देवगतिपश्चकके एक पदके बन्धक जीवाका क्षेत्र लोकके असंख्यात भागप्रमाण है। विशेषार्थ-पाँच ज्ञानावरणादिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका बन्ध एकेन्द्रियादि सब जीवोके सम्भव है, इसलिए इन प्रकृतियांके उक्त पदवाले जीवोका क्षेत्र सर्व लोक कहा है । इनमेसे कुछका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिमे होता है, स्त्यानगृद्धित्रिक और अनन्तानुवन्धी चतुष्कका अवक्तव्यपद गुणस्थान प्रतिपन्न जीवोके उतरकर सासादन और मिथ्या- त्वमे आनेपर होता है, मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद ऊपरके गुणस्थानवालोका मिथ्यात्वमे आनेपर होता है, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कका अवक्तव्यपद ऊपरके गुणस्थानवालोके चौथे गुणस्थानमे आनेपर होता है, प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका अवक्तव्यपद संयत जीवके संयवासंयत होनेपर होता है और औदारिकशरीरका अवक्तव्यपद यथासम्भव असंज्ञो पञ्चेन्द्रिय आदि जीवोके होता है। यत. इन सब जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागसे अधिक नहीं प्राप्त होता, अतः यहाँ उक्त प्रकृतियोके इस पदवाले जीवोका क्षेत्र उक्तप्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोमेसे छह दर्शनावरण, वारह कपाय और सात नोकपायकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि सम्भव है,पर इनका स्वामित्व भी गुणस्थान प्रतिपन्न जीवोके होता है और उनका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अतः यहाँ इन प्रकृतियोंके उक्त पदोके बन्धक जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। नरकायु और देवायुका असंज्ञी आदि जीव बन्ध करते हैं, मनुष्यायुका वन्ध यद्यपि एकेन्द्रियादि जीव भी करते हैं पर ये असंख्यातसे अधिक नहीं होते, क्योकि मनुष्योका परिमाण ही असंख्यात है, वैक्रियिकपटकका वन्ध असंज्ञी आदि जीव, आहा- रकद्विकका वन्ध अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरण गुणस्थानवाले जीव तथा तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध सम्यग्दृष्टि जीव करते हैं। यतः इन सब जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण अतः यहाँ इन प्रकृतियोके सब पदोका बन्ध करनेवाले जीवोका क्षेत्र उक्तप्रमाण कहा है। शेष सब प्रकृतियोका बन्ध एकेन्द्रियादि जीव भी करते हैं, अतः उनके सब पदोके बन्धक जीवो का क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण कहा है। यहाँ गिनाई गई सामान्य तिर्यञ्च आदि मार्गणाओमे अपनी- अपनी बन्धको प्राप्त होनेवाली प्रतियोके सम्भव पदोके अनुसार ओघप्ररूपणा बन जाती है, १. ता०प्रतौ 'वेउब्बियः' इवि पाठ.।
२८१ वडिबंबे खत्वं ३१७. वादरेइंदिय-पजत्तापञ्जत्ता० धुविगाणं चत्तारिवाड्डि-हाणि-अवडि० सव्व- लोगे। तसपगदीणं चत्तारिखड्डि - हाणि-अवहि०-अवत्त० लोगस्स संखेजदिभागे। मणुसाउ० ओथं । तिरिक्साउ० सवपदा लोगस्स संखेंजः । सेसाणं सबपगदीणं सन्वपदा सबलोगे । णवार लिरिक्स०३ अवत्त० लोगस्स असंखेज० । मणुसगदितिगं सन्चपदा लोगस्स असंखें । एदेण वीजेण याव अणाहारग ति णेदव्वं । एवं खेत्तं समत्तं । ------ ------ मतः उनमें ओरके समान जाननेको सूचना की है। मात्र औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मण- काययोगी और अनाहारक जीवोंमें देवगतिपञ्चकका एक ही पद होता है और वह भी सम्य- मुष्टियोंके ही. इसलिए इनके उक्त पवाले जीवोंका क्षेत्र लोकके असंख्यात भागप्रमाण कहा है। ३१७. वाइर एकेन्द्रिय तथा उनके पर्याप्त और पर्याप्त जीवाम ध्रुववन्धवाली प्रकृतियांकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदबन्धक जीवोंका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है। त्रसप्रकृतियोंकी चार वृद्धि. बार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका क्षेत्र लोकके संख्यातवे भाग- प्रमाण है । मनुष्यायुका भङ्गाओवके समान है । तिर्यञ्चायुके सब पदोके बन्धक बोका क्षेत्र लोकके संत्यातवें भागप्रमाण है। शेप सब प्रकृतियोंके सब पकि वन्धक जीवाका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है। इतनी विशेषता है कि तिर्यञ्चगतित्रिकके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका क्षेत्र लोकके मसंख्यातवें भागप्रमाण है। तथा मनुष्यगतित्रिकके सब पदोके बन्धक जीवोका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है। इस वीजपदके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। विशेषार्थवादर एकेन्द्रिय आदि तीनो प्रकारके जीव मारणान्तिक समुद्घातके समय भी ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके सब पद करते हैं, इसलिए इनके सब पढ़वाले जीवाका क्षेत्र सर्व लोक कहा है। परन्तु एकेन्द्रियोने मारणान्तिक समुद्धात करते समय त्रसप्रकृतियोका बन्ध नहीं होता, इसलिए इनके सब पवाले जीर्वोका क्षेत्र लोकके संख्यातवे भागप्रमाण कहा है। मोघसे मनुष्यायुके सब पदोके वन्धक जीवोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण सिद्ध करके बतला आचे हैं, उसी प्रकार यहाँ भी बन जाता है। इसलिए यहाँ ओधके समान जाननेत्री सूचना की है। इन बादर एकेन्द्रिय आदि जीवोका स्वस्थान क्षेत्र लोकके संख्यातवे भागप्रमाग है, इसलिए यहाँ तिर्यञ्चायुके सब पदोके बन्धक जीवीका क्षेत्र उक्तप्रमाण कहा है। इन जीवीके शेष सब प्रकृतियोंके सब पदोका बन्ध मारणान्तिक समुद्धातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनके सब पढ़वालोंका क्षेत्र सर्वलोक कहा है। मात्र तिर्यञ्चगतित्रिकका अबक्तव्य- पद वादर वायुकाचिक जीव नहीं करते और इन जीवांको छोड़कर अन्य बादर जीवोका स्वस्थान क्षेत्र लोकके संख्यातवें भागप्रमाण नहीं है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवाका क्षेत्र लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। तथा अग्निकायिक और वायुकायिक जीव मनुष्यगतिन्त्रिकका बन्ध नहीं करते, इसलिए इनके सब पदोके बन्धक जीबोका क्षेत्र भी लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। अनाहारक मार्गणा तक इस वीज पदको समझकर क्षेत्र प्राप्त करना सम्भव है. इसलिए उसे इस कथनको बीज मानकर जाननेकी सूचना की है। इस प्रकार क्षेत्र समाप्त हुआ। १. वाल्या प्रत्यो. 'लोगल अन्वेजदिमागों' इति पाठ। २. ना प्रतौ 'तिगं सम्बोग अमखे.' दति भार 1. तापतौए से समत्त । इति पो नास्ति।
। , २२ महाबंधे पदेसर्वधाहियारे फोसणं ३१८. फोसणाणुगमेण दुवि०-ओघेण आदेसेण य । ओघेण पंचणा०-तेजा०- क०-वण्ण०४-अगु०-उप-णिमि०-पंचंत० चत्तारिवड्डि-हाणि - अवडिदबंधगेहि केवडि खेतं फोसिदं? सबलोगो । अवत्त० लोगस्स असंखें थीणगि०३-मिच्छ० अणंताणु०४ णाणा भंगो। णवरि अवत्त० अट्ठचों । मिच्छ० अवत्त० अह-बारह । छदंस-अट्ठक०- भय-दु० जाणाभंगो। णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि० अट्ठचों । सादासाद०- सत्तणोक०-तिरिक्खाउ-दोगदि-पंचजादि-छस्संठाण-ओरालि अंगो० - छस्संघ०-दोआणु०- पर०-उस्सा०-आदाउजो०-दोविहा०-तसादिदसयुग०-दोगोद' सव्वपदा केवडि सत्तं फोसिदं ? सन्चलोगों। णवरि पुरिस-हस्स-रदि-अरदि-सोग० अणंतभागवड्डि-हाणिक अट्ठचौँ । अपच्चक्खाण०४ णाणा भंगो । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि केवडि खे सिदं ? अट्ठचौ | अवत्त० केव० खेतं फोसिदं ? छच्चों० । दोआउ०-आहारदुर्ग स्पर्शन ३१८. स्पर्शनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघसे पाँच ज्ञानावरण, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँच अन्तरायकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदके बन्धक जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोंने लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कका भग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्य- पदके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने सनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। छह दर्शनावरण, आठ कषाय, भय और जुगुप्साका भड्ग जानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवोंने बसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सातावेदनीय, असातावेदनीय, सात नोकपाय, तिर्यञ्चायु, दो गति, पाँच जाति, छह संस्थान, औदारिक शरीर आगोपाग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छास, आवप, उद्योत, दो विहायोगति, त्रस आदि दस युगल और दो गोत्रके सब पदोके बन्धक जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इतनी विशेषता है कि पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति और शोककी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके वन्धक जीवोने सनालोके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पशन किया है। अप्रत्याख्याना- वरणचतुष्कका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवोने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन १. ता०प्रतौ 'तसादिदस [ युगल० ] दोगोद' इति पाठः । २. ता प्रतौ 'केवडि खेत्ते फोसिद ? सबलोगे' आ०प्रतो केवडि खेत फोसिदं ? सबलोगे' इति पाठः। , .
२८३ वड्डिवंधे फोसणं सव्वपदा खेत्तभंगो। मणुसाउ० सव्वपदा लोगस्स असंखें. अडचाँद० सव्वलो । दोगदि-दोआणु० चत्तारिखड्डि-हाणि-अवहि० छच्चों । अवत्त० खेत्तभंगो। वेउन्वि०- वेउव्वि अंगो० चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि० वारहचों । अवत्त० खेत्तभंगो । ओरालि. णाणाभंगो। अवत्त० वारहचों । तित्थय० चत्तारिचड्डि-हाणि-अवट्टि० अट्ठचों । अवत्त० खेत्तमंगो। एवं ओघभंगो तिरिक्खोघं कायजोगि०-कोधादि०४-अचखुदं०- भवसि०आहारग ति । एवं एदेण वीजेण भुजगारभंगो कादवो याव अणाहारग त्ति । णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि सव्वणिरय-सव्वतिरिक्ख-मणुस-ओरालि०-णबुंसक- मणपजव० - संजद-खड़ग० - उवसम० खेत्तभंगो । आभिणि-सुद-ओधि० खेत्तभंगो। तेऊए अपञ्चक्खाण०४ अवत्त० दिवड्डचाँद्द० पम्माए पंचचौं० सुकाए छच्चोंस० । अण्णेसि तेसि केसिं च ओघेण साघेदूण णेदव्वं । एवं फोसणं समत्तं। ---------- -Mr.APPA किया है। दो आयु और आहारकद्विकके सब पदोका भङ्ग क्षेत्रके समान है । मनुष्यायुके सब पदोके बन्धक जीवोने लोकके असंख्यातवे भाग, त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। दो गति और दो आनुपूर्वीकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदके वन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्यपदका भङ्ग क्षेत्रके समान है। वैक्रियिकशरीर और बैंक्रियिकशरीर आलोपालकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवाने असनालोके कुछ कम बारह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इनके अवक्तव्य- पदके बन्धक जीवीका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। औदारिकशरीरका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। मात्र इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोने त्रसनालीके कुछ कम बारह वटे चौदह भाग- प्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तीर्थङ्करप्रकृतिको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवाने त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसके अवक्तन्यपदका भग क्षेत्रके समान है । इस प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यञ्च, काय- योगी. क्रोधादि चार कपायवाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवामे जानना चाहिए। इस प्रकार इस वीजके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक भुजगारके समान भङ्ग करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि सत्र नारकी, सब तिर्यश्च, मनुष्य, औदारिककाययोगी, नपुंसकवेवाले, मन पर्ययत्रानवाले, संयत, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। आभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवों में भी क्षेत्रके समान भङ्ग है । अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके अवक्तव्य- पढ़के बन्धक जीवोंने पीत लेश्यामें त्रसनालोके कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका, पद्मलेश्यामे त्रसनालीके कुछ कम पांच बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका और शुक्ललेश्याम त्रस- नालीके कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका सर्शन किया है । अन्य प्रकृतियोका उनमे तथा किन्हींमै ओघके अनुसार साध लेना चाहिए। , १. तापतौ 'एवं फोसणं समत्तं ।' इति पाठो नास्ति ।
महावंचे पटेसबंधाहियारे . विशेपार्थः-पॉच ज्ञानावरणादिको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पदका बन्ध मव जीय करते है. इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोका सर्व लोकप्रमाण स्पर्शन कहा है। मात्र इनका अवक्तव्यपद उपशमणिमे होता है, इसलिए उनके उक्त पढवाले जीवोका लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्यानगृद्धित्रिक आदिके अन्य पदोका भगबानावरणके समान है, यह स्पष्ट ही है, क्योकि इनकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका बन्ध एकेन्द्रियादि जीव भी करते है, इसलिए उक्त स्पर्शन बन जाता है । पर स्त्यानगृद्धित्रिक और अनन्तानुबन्धीचतुप्कका अवक्तव्यपद तृतीयादि उपरके गुणस्थानांसे गिरकर इनके बन्धके प्रथम समयमे होता है। ये जीवाम देवोकी मुल्यता है, क्योंकि इस पदकी अपेक्षा विहार- वस्वस्थान आदिके समय सनालीका कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन उन्हीं के सम्भव है। इस पवाले अन्य सब जीवोका स्पर्शन लोकके असख्यातवे भागप्रमाण होता है जो पूर्वोक्त स्पर्शनम गर्मित है, इसलिए यहाँ उक्त प्रकृतियोंक अवक्तव्य पदवाले जीवोका स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है। तथा मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद बाके विहारवत्स्वस्थानके समय और नीचे कुछ कम पाँच व ऊपर कुछ कम सात गजूप्रमाण क्षेत्रमे मारणान्तिक समुद्भातके समय भी सम्भव है, अतः इसके उक्त पदवाले जीयाका स्पर्शन असनालीके कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। छह दर्शनावरण आदिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित पद एकेन्द्रियादि जीवोंके भी सम्भव है और इनका अवतव्यपद यथायोग्य उपशमणिमे व प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका गिरते समय पॉचयेके प्रथम समयमे होता है, इसलिए इन प्रकृतियांका भन ज्ञानावरणके समान बन जानेसे उनके समान कहा है। मात्र इन प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि भी होती है जो देवांके विहारवत्स्वस्थान आदिके समय भी सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पढवालोका उक्त प्रमाण स्पर्शन अलगसे कहा है। सातावेदनीय आदि प्रकृतियोंके सब पद एकेन्द्रिय आदि जीवोके सम्भव है, इसलिए इनके सब • पढवाल जीवोका स्पर्शन सर्वलोकप्रमाण कहा है। मात्र इनमेसे पुरुपवेद आदिको अनन्तभाग- वृद्धि और अनन्तभागहानि भी सम्भव है, इसलिए इन पॉच प्रकृतियोंके उक्त पदबाले जीबोका स्पर्शन अलगसे कहा है। यह त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्या कहा है। इस वातका स्पष्टीकरण छह दर्शनावरण आदिका स्पर्शन कहते समय कर आये हैं,उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिए। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है,यह स्पष्ट ही है । इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवोका स्पर्शन तो त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है, वह भी स्पष्ट है । तथा देवोमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे इनका अवक्तव्यपद सम्भव है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन वसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। नरकायु और देवायुका असंडी आदि जीव बन्ध करते हैं। उसमे भी मारणान्तिक समुद्धातके समय इनका बन्ध नहीं होता। तथा आहारकद्विकका अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरण जीव बन्ध करते हैं । यत ऐसे जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, अत' यहाँ इनके सब पदोके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। मनुष्यायुके सब पदोके बन्धक जीवाका वर्तमान म्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है। तथा अतीत स्पर्शन देवोके विहारवत्स्वस्थान आदिकी अपेक्षा वसनालीके कुछ कम आठ वटे चौदह भागप्रमाण और एकेन्द्रियोकी अपेक्षा सर्वलोकप्रमाण है । अतः यह उक्त प्रमाण कहा है। नारकियोमे मारणान्तिक समुद्भातके समय नरकगतिद्विककी तथा देवीमे मारणान्तिक समुद्रातके समय देवगतिद्विककी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थित- पदका वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवीका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम छह वडिबधे कालो २८५ कालो ओषेण आदेसेण य । ओघेण पंचणा०-तेजा०क०- ३१६. कालाणुगमेण दुवि० -- वटे चौदह भागप्रमाण कहा है। किन्तु ऐसे समयमै इनका अवक्तव्यपद नहीं होता, इसलिए इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। नीचे कुछ कम छह राजू और ऊपर कुछ कम छह राजूके भीतर मारणान्तिक समुद्धात करते समय वैक्रियिकद्विकको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनके उक्त पदधाले जीवोका स्पर्शन वसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। परन्तु ऐसे समयमे इनका अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। औदारिक- शरीरका वन्ध एकेन्द्रिय आदि जीव भी करते हैं, इसलिए इसका भङ्ग ज्ञानावरणके समान कहा है। मात्र इसके अवक्तव्यपदके स्पर्शनमे अन्तर है। बात यह है कि देव और नारकी उत्पन्न होने के प्रथम समयमे इसका अवक्तव्यबन्ध करते है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदवाले जीवोका स्पर्शन वसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। देवोके विहारवत्स्वस्थान आदिके समय भी तीर्थङ्कर प्रकृतिकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपद सम्भव हैं, इसलिए इसके उक्त पदोके बन्धक जीवोका स्पर्शन सनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण कहा है। इसका अवक्तव्यपद एक तो उपशमश्रेणिमे होता है, दूसरे इसकी बन्धव्युच्छित्तिके बाद जो मर- कर देव होते हैं उनके प्रथम समयमे होता है और तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले जो मनुष्य अन्तमे मिथ्यादृष्टि होकर दूसरे-तीसरे नरकमे उत्पन्न होते हैं, उनके सम्यक्त्वपूर्वक पुनः इसका वन्ध प्रारम्भ करनेके प्रथम समयमें होता है। यतः ऐसे जीवोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, अत. यहाँ इसका बन्ध करनेवाले जीवोका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है, क्योकि इस पढवाले जीवोका क्षेत्र इतना ही है । यहाँ सामान्य तिर्यश्च आदि अन्य जितनी मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमे अपने-अपने बन्धके अनुसार यह ओघप्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। यहाँ इसी प्रकार अनाहारक पर्यन्त भुजगार प्रदेशबन्धके समान जाननेकी सूचना करके कुछ अपवादोका अलगसे निर्देश किया है। यथा- मूलमे गिनाई गई सब नारकी आदि कुछ ऐसी मार्गणाएँ हैं जिनमे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवीका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण ही होता है। कारण स्पष्ट है, इसलिए इनमे उक्त पदवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है। आमिनिबोधिक- ज्ञानी आदि तीन मार्गणाओमे भी इन पदवाले जीवोका स्पर्शन इसी प्रकार जानना चाहिए। पीतादि लेश्याओके रहते हुए देवोके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कका अवक्तव्यबन्ध सम्भव है, क्योकि जो पञ्चम आदि गुणस्थानवाले जीव इन लेश्याओके साथ मरकर देव होते हैं,उनके प्रथम समयमे उक्त प्रकृतियोका अवक्तव्यपद ही होता है, इसलिए इन लेश्याओमें उक्त प्रकृतियोंके अवक्तव्य पदवाले जीवोका स्पर्शन क्रमसे सनालीके कुछ कम डेढ, कुछ कम पॉच और कुछ कम छह वटे चौदह भागप्रमाण कहा है । इस प्रकार ओघके अनुसार साध कर सर्वत्र स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए। इस प्रकार स्पर्शन समाप्त हुआ। , काल ३१६ कालानुगमको अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच २८६ महापंधे पदेसबंधाहियारे वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० चत्तारिखड्डि-हाणि-अवढि० केवचिरं कालादो होदि ? सव्वद्धा'। अवत्त० केवचिरं कालादो० १ जह० एग०, उक्क० संखेजसमयं । थीणगि०३-मिच्छ० अणंताणु०४-ओरालि. णाणा भंगो। णवरि अवत्त० केवचिरं कालादो० १ जह० एग०, उक्क० आवलियाए असंखें । छदंस०-अट्ठक ०-भय-दु० णाणाभंगो। णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । अपच्चक्खाण०४ णाणा भंगो। णवरि अणंतभागवड्डि-हाणि-अवत्त० जह• एग०, उक्क० आवलि० असंखें । पुरिस०-चदुणोक० अणंतभागवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें। सेसपदा० केवचिरं० १ सम्बद्धा। तिण्णिाउ० असंखेंज- गुणवड्डि-हाणिवंधगा केवचिरं० १ जह० एग०, उक्क० पलिदो० असंखें । तिण्णिवड्डि- हाणि-अव४ि०-अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि. असंखें । वेउन्वियक० असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० सव्वद्धवा । तिण्णिवड्डि-हाणि-अवढि०-अवत्त० जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । आहारदु० असंखेंजगुणवड्डि-हाणि सव्वद्धा । तिण्णिवड्डि- - , ज्ञानावरण, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँच अन्तरायकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवोका कितना काल है ? सर्व काल है । इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क और औदारिकशरीरका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । छह दर्शनावरण, आठ कपाय, भय और जुगुप्साका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है । इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । अप्रत्याख्याना- वरणचतुष्कका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। इतनी विशेषता है कि इनकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। पुरुपवेद और चार नोकषायोको अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। शेष पदोके बन्धक जीवोका कितना काल है ? सर्वदा है। तीन आयुओकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीवोका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है । तीन वृद्धि, तीन हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है । वैक्रियिक- पटककी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीवोका काल सर्वदा है । तथा तीन वृद्धि, तीन हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। आहारकद्विककी असंख्यातगुण- वृद्धि और असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीवोका काल सर्वदा है। तथा इनकी तीन वृद्धि और , १. ता प्रतो 'सव्वत्यो (द्धा ).' इति पाठः। २. ता०प्रतौ 'सव्वत्यो (खा)' इति पाठ. ।
वडिबंधे कालो २८७ हाणि [जह एग०, उक्क० आवलि असंखें।] अवहि-अवत्त० जह० एग०, उक्क० संखेंजसमयं । तित्थ० देवगदिभंगो । णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क० संखेंजेसमयं। सेसाणं सादादीणं चत्तारिवाड्डि - हाणि-अव४ि०-अवत्त० सव्वद्धा। एवं ओघभंगो कायजोगि - ओरालि०-णस०-कोधादि०४-अचक्खुदं०-भवसि० - अभवसि०-आहारग ति। ओरालियमि० एवं चेव । णवरि देवगदिपंचग० असंखेंजगुणवडि. जह० उक्क० अंतो। तीन हानिके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। तथा अवस्थित और अवकन्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग देवतिके समान है। इतनी विशेषता है कि इसके अवक्तव्यपदके बन्धक जोवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। शेष सातावेदनीय आदि प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका काल सर्वदा है। इस प्रकार ओघके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, नपुंसकवेवाले, क्रोधादि चार कपायवाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य, अभव्य और आहारक जीवामे जानना चाहिए । औदारिकमिश्नकाययोगी जीवोमे इसी प्रकार भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि देवगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीवोका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। विशेषार्थ-प्रथम दण्डकमे कही गई प्रकृतियोके नौ पदोका बन्ध एकेन्द्रियादि सब जीव भी करते हैं, इसलिए इनके बन्धक जीवोका काल सर्वदा कहा है । मात्र इनका अवक्तव्य- पद उपशमणिमें होता है या ऐसे जीवोके होता है जो उपशमश्रेणिमें इनके अवन्धक होकर मरकर देव हो जाते हैं और उपशमश्रेणिपर प्रथम समयमें चढ़कर दूसरे समयमे अन्य जीव नहीं चढ़ते । तथा लगातार यदि जीव चढ़ते रहें तो सख्यात समय तक ही चढ़ते हैं । उसके बाद व्यवधान पड़ जाता है। इस हिसाबसे अवक्तव्यपद भी कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक संख्यात समय तक होता है, इसलिए यहाँ ईन प्रकृतियोंके उक्त पदके बन्धक जीवाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है । स्त्यानगृद्धि- त्रिक आदिके नौ पद एकेन्द्रियादि यथासम्भव सब जीवोके सम्भव है, अत' इन पदोके बन्धक जीवोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान कहा है। तथा इनका अवक्तव्यपद अपरके गुणस्थानोसे मिथ्यात्व और सासादनमें आनेपर प्रथम समयमे होता है और इन गुणस्थानोको प्राप्त होनेका कमसे कम एक समय है और अधिकसे अधिक आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है, क्योकि अन्य जिन गुण- स्थानोसे इन गुणस्थानोमे जीव आते हैं, उनमेसे कुछका परिमाण असंख्यात समय है,इसलिए अधिकसे अधिक असंख्यात समय तक इन गुणस्थानोको प्राप्त होनेके क्रममे कोई बाधा नहीं आती। यही कारण है कि यहाँ इन प्रकृतियोके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। मात्र औदारिकशरीरका अवक्तव्यपद अन्य प्रकारसे प्राप्त कर यह काल घटित कर लेना चाहिए। छह दर्शनावरण आदिके नौ पदोका बन्ध यथासम्भव एकेन्द्रियादि जीव करते हैं, इसलिए तोइनके उक्त पदोके वन्धक जीवोका काल सर्वदा धन जानेसे वह ज्ञानावरणके समान कहा है। तथा इनमेंसे प्रत्याख्यानावरण चारको छोड़कर शेपका अवक्तव्यपद ज्ञानावरणके समान ही घटित हो जाता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंका काल भी ज्ञानावरणके समान जाननेकी सूचना की है। अव रहीं प्रत्याख्यानावरण १. ताप्रती 'सवटा (द्धा) इति पाठः।
२८८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे चतुष्क सो इनका अवक्तव्यपद ऊपरके गुणस्थानवाले जीवोंके संयतासंयत होनेपर प्रथम समयमे होता है और ऐसे जीव संख्यात होकर भी कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक संख्यात समय तक ही अवक्तव्यपद कर सकते हैं, इसलिए इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवाका काल भी ज्ञानावरणके समान वन जानेसे उसे उनके समान जाननेकी सूचना की है। अब रहीं इन प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि सो इनके उक्त पदोको असंख्यात जीव कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक असंख्यात समय तक कर सकते है, इसलिए इन प्रकृतियोंके उक्त पदवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके नौ पदोका बन्ध भी यथायोग्य एकेन्द्रियादि सब जीवोके सम्भव है, इसलिए इनके इन पदोके वन्धक जीवोका काल ज्ञानावरणके समान कहा है। तथा इनको अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवक्तव्यपद करनेवाले जीव युगपत् और लगातार असंख्यात होते है, इसलिए इनके इन पदोके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । पुरुपवेद और चार नोकषायों की अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके वन्धक जीवों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके इन पदों की अपेक्षा कहे गये कालके समान ही घटित कर लेना चाहिए। तथा ये परावर्तमान प्रकृत्तियों हैं और यथायोग्य एकेन्द्रिय आदि जीवों के भी इनका वन्ध सम्भव है, इसलिए इनके शेप पढोके बन्धक जीवों का काल सर्वदा कहा है। नरकायु, मनुप्यायु और देवायुकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिका एक जीवको अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त पहले बतला आये हैं । यहाँ जघन्य काल तो एक समय ही है, क्योकि नाना जीव एक समयतक इन पदोको करे और दूसरे समयमें अन्य पदोको करे,यह सम्भव है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होता है, क्योकि नाना जीव क्रमसे निरन्तर यदि इन पदोको करे तो उस सब कालका जोड़ उक्तप्रमाण होता है । परन्तु इनके शेष पढोका जघन्य काल एक समय प्राप्त होता है, क्योकि नाना जीव एक समय तक ही इन पदोंको करे और दूसरे समयमे विवक्षित पदके सिवा अन्य पदको करने लगे, यह भी सम्भव है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण प्राप्त होता है, क्योकि यदि अन्तरके विना नाना जीव इन आयुओके बन्धका प्रारम्भ कर इन पदोको करे तो उस कालका जोड़ आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाणसे अधिक नही होता । तात्पर्य यह है कि असंख्यातगुणवृद्धि आदि दो पदोका एक जीवकी अपेक्षा उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । मान लीजिए कुछ जीवोने अन्तर्मुहूर्त कालतक ये दोनो पद किये। उसके बाद व्यवधान न पड़ते हुए अन्य कुछ जीवोने ये दो पद किये । इस प्रकार निन्तर क्रमसे इन पदोके करनेपर वह काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण होता है, इसलिए तो इन पद- वालोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। तथा शेष पदोंमे एक जीवकी अपेक्षा अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट काल एक समय है, अवस्थितपदका उत्कृष्ट काल सात समय है और शेष पदोका उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। यहाँ भी व्यवधानके बिना एकके बाद दूसरे इस क्रमसे यदि इन पदोको करे तो इस प्रकार व्यवधानके बिना प्राप्त हुए उत्कृष्ट कालका जोड़ आवलिके असंख्यातवे भागसे अधिक नहीं होता, क्योंकि असंख्यात समयोका जोड़ भी आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण होगा और असंख्यात आवलियोके असंख्यातवे भागका जोड़ भी आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण होगा, इसलिए यहाँ शेष पदवालोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भाग- प्रमाण कहा है। नाना जीवोके वैक्रियिकपटकका निरन्तर बन्ध होता रहता है, इसलिए यहाँ . .
वड्डिबंधे कालो २८६ । ३२०. कम्मइग०-अणाहारगेसु देवगदिपंचग० असंखेजगुणवड्ढि० जह० एग०, उक्क० संखेजसमयं । मिच्छ० अवत्त० जह० एग०, उक्क० आचलि० असंखें । धुविगाणं असंखेंजगुणवड्डि० सेसाणं परियत्त० असंखेंजगु० अवत्त'. सव्वद्धा । वेउव्वियमि० सव्वपगदीणं असंखेंजगुणवड्डि० जह• अंतो०, परियत्तीणं [जह०] एग०, उक्क० पलिदो० असंखें । एसिं अवत्त० अत्थि तेसि जह० एग०, उक्क० आवलि० असंखें । तित्थ. इनकी असख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीवोका काल सर्वदा कहा है । तथा इनके शेप पदोका क्रमसे असंख्यात जीव बन्ध कर सकते हैं, इसलिए उनके बन्धकोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। आहारकद्विकके बन्धक नाना जीव सर्वदा पाये जाते हैं और उनमेसे किसी-न-किसीके इनकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानि भी होती रहती है, इसलिए इनके उक्त पदवाले जीवांका काल सर्वदा कहा है। इनकी तीन वृद्धि और तीन हानिको क्रमसे संख्यात जीव भी करे तो भी उस सब कालका जोड आवलिके असंख्यातवे भागसे अधिक नही होता, इसलिए यहाँ इनके उक्त पदोके वन्धक जीवीका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है। तथा इनके अवस्थित और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट काल एक जीवकी अपेक्षा क्रमसे संख्यात समय और एक समय है, इसलिए यहाँ इनके उक्त पदोके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल सख्यात समय कहा है। तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग देवगतिके समान होनेसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र इसका अवक्तव्यपद करनेवाले जीव संख्यात ही होते हैं, इसलिए इसके इस पदवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। शेष सातावेदनीय आदि एक तो परावर्तमान प्रकृतियाँ है। दूसरे एकेन्द्रियादि जीव इनका बन्ध करते हैं, इसलिए इनके सब पदोके बन्धक जीवोका काल सर्वदा प्राप्त होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है। यह ओघप्ररूपणा काययोगी आदि कुछ मार्गणाओमे अविकल बन जाती है, इसलिए उनन ओघके समान जाननेको सूचना की है । औदारिकमिश्रकाय- योगी जीवोमे यथासम्भव अन्य सब प्ररूपणा ओघके समान वन जाती है, इसलिए उनमे भी ओघके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र इनमे देवगतिपञ्चकका बन्ध करनेवाले जीव संख्यात ही होते हैं और इनकी यहाँ एक असंख्यातगुणवृद्वि ही होती है, इसलिए इनके उक्त पद- वाले जीवोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। ३२० कामणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे देवगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिक वन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल सख्यात समय है। मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असख्यातवे भागप्रमाण है । ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोंकी असल्यातगुणवृद्धि और शेप परावर्तमान प्रकृतियोकी असख्यातगुणवृद्धि तथा अवक्तव्यपदके वन्धक जीवो का काल सर्वदा है। वैक्रियिकमिश्रकाय- योगी जीवोमे सब प्रकृतियो की असख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीवोका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है, परावर्तमान प्रकृतियो की असख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय है और सबका उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है। तथा जिनका अवक्तव्यपट है उनके वन्धक जीवो का जवन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असल्यातवे भाग- प्रमाण है। तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों के समान है। नरक आदि . १ ता प्रतो 'अस्ग्वेजगु । अक्त्तः' इति पाट. । ३७ महाबंधे पटेसबंधाहियारे ओरालियमिस्सभंगो। णिरयादीणं एसिं अणंनभागवडि-हाणि० अत्थि तेर्सि परियत्त- माणेण ओघेणेव णेदव्वं । णवरि एसिं असंखेन्जरासीणं तेसिं ओथं देवगदिभंगो । एसिं संखेंजरासी तेसिं ओघं आहारसरीरभंगो। एसिं अणंतरासी तेसिं ओघं साद०भंगो। णवरि... 'याउभंगो कादव्यो । एसिं अणंतभागवड्डि-हाणि अस्थि तेसिं परिमाणेण ओषेण च साधेदव्यं । एवं याव अणाहारग त्ति । एवं कालं समत्ता PM . .. गतियों में जिनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है, उनके इन पदों का भङ्ग ओषके अनुसार ही परावर्तमान प्रकृतियों के समान साध लेना चाहिए । इतनी विशेषता है कि जिन प्रकृतियों के बन्धकों की असंन्यात राशि है, उनमे ओघसे दंवगतिके समान भङ्ग है। जिन प्रकृतियों के बन्धकों की सख्यात गशि है, उनमें ओघसे आहारकशरीरके समान भङ्ग है और जिन प्रकृतियों के वन्धकों की अनन्त गशि है, उनमे ओघसे सातावेदनीयके समान मन है। इतनी विशेषता है कि. के समान भन करना चाहिए । तथा जिनकी अनन्त- भागवृद्धि और अनन्तभागहानि है,उनके इन पटवाले जीवों का काल परिमाण या परिवर्तमान प्रकृतियों के समान ओघके अनुसार साध लेना चाहिए। इस प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। विशेषार्थ-कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवामे अधिकसे अधिक संख्यात जीव देवगतिपञ्चकका बन्ध करनेवाले होते हैं और ये जीव यदि निरन्तर उत्पन्न होते रहें तो संख्यात समय तक ही यह सम्भव है, इसलिए इनमे उक्त प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल सख्यात समय कहा है। मात्र मिथ्यात्वका अवक्तव्यपद करनेवाले जीव यहॉ अमख्यात सम्भव हैं और वे लगातार आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण काल तक उत्पन्न होते रहे, यह सम्भव भी है। इसलिए मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका यहाँ जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यात भागप्रमाण कहा है। यहाँ शेप ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी असंरयातगुणवृद्धि और परावर्तमान प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणवृद्धि और अवक्तव्यपदके बन्धक जीव अनन्त होते है, अत यहाँ इनके उक्त पदवाले जीवोका काल सर्वदा कहा है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है, इसलिए इनमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोको असंख्यातगुणवृद्धिवाले जीवों का जघन्य और उत्कृष्ट काल उक्त प्रमाण कहा है । परावर्तमान प्रकृतियोंको असख्यातगुणवृद्धि एक समयके लिए हो, यह भी सम्भव है, इसलिए इनके इस पदवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । मात्र पगवर्तमान प्रकृतियोंके अवक्तव्यपदका एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है, इसलिए यहाँ इनके उक्त पदवाले जीवोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असह्यातवे भागप्रमाण कहा है। यहाँ वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोमे तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोके समान है,यह स्पष्ट ही है । नरक आदि गतियों मे जिन प्रकृतियों की अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि होती है उनका इन पदों के साथ बन्ध करनेवाले जीवों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण १ १ तान्प्रतो 'एत्र कालं समत्तं।' इति पाठो नास्ति।
वड्डिबधे अंतरं - अंतरं ३२१. अंतराणुगमेण दुवि०-ओघेण आदेसेण य । ओषेण पंचणा० चत्तारि- वड्डि-हाणि-अवहिबंधगंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णत्थि अंतरं । अवत्त० जह० एग०, उक्क० वासपुधत्तं । एवं सव्वाणं धुविगाणं । णवरि थीणगि०३-मिच्छ०- अर्णताणु०४ अवत्त० जहएग०, उक्क० सत्त रादिदियाणि । अपचक्खाण०४ जह० एग०, उक्क० चौदस रादिदियाणि | पञ्चक्खाण०४ जह० एग०, उक्क० पण्णारस रादिदियाणि । एसिं पगदीणं अणंतभागवड्डि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें । सादादीणं तिरिक्साउगस्स य चत्तारिवड्डि-हाणि-अवढि०-अवत्त० णत्थि अंतरं। एवं सब्बासि परियत्तमाणियाणं। णिरय-मणुस-देवाऊणं तिण्णिवाड्डि-हाणि- अवडि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें | असंखेंजगुणवड्डि-हाणि-अवत्त० जह० एग०, उक्क० चदुवीसं मुहुत्तं । वेउब्बियछ०-आहारदु० असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० णत्थि अंतरं । तिण्णिवड्डि-हाणि-अबढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंखें । अवत्त. ओषके अनुसार यहाँ भी बन जाता है, इसलिए इस विषयमे ओघके समान जाननेकी सूचना की है। शेष कथन स्पष्ट ही है। इस प्रकार काल समाप्त हुआ। अन्तर ३२१. अन्तरानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पॉच ज्ञानावरणको चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवोका कितना अन्तर है ? अन्तर नहीं है ! अवक्तव्यपदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है । इसी प्रकार सब ब्रुववन्धवाली प्रकृतियोका भङ्ग जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धी चतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जयन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर सात दिन-रात है। अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर चौदह दिन-रात है। प्रत्याख्यानावरण चतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जवन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पन्द्रह दिन-रात है। तथा जिन प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि, अनन्तभागहानि और अवस्थितपद है, उनके इन पदोके बन्धक जीवोका जघन्य अन्नर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। सातावेदनीय आदि और तिर्यञ्चायुकी चार वृद्धि, चार हानि, अवस्थित और अबक्तव्यपदके बन्धक जीवों का अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार परावर्तमान सब प्रकृतियों का भङ्ग जानना चाहिए । नरकायु, मनुष्यायु और देवायुकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थित- पदके बन्धक जीवों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातये भागप्रमाण है । असंख्यातगुणवृद्धि असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदके वन्धक जीवों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर चौबीस मुहूर्त है । वैक्रियिकषटक और आहारक- द्विककी असंख्यातगुणबृद्धि और असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीवों का अन्तरकाल नहीं है। तीन वृद्धि तीन हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवो का जघन्य अन्तर एक समय है और , २६२ महावंधे पटसंबंधाहियारे जह० एग०, उक्क० अंतो० । एवं चेव तिथं० । णवरि अवत्त० जह० एग०, उक्क. वासपुधत्तं । णिरएसु तित्थय० अवत्त० जह० एग०, उक्क० पलिदो० असंखें । एवं ओधभंगो कायजोगि-ओरालि०-ओरालियमि०-लोभ०-अचक्खु०-भवसि०-आहारग त्ति | णवरि ओरालियमि० देवगदिपंच० असंखेजगुणवड्डि. ० जह० एग०, उक० मासपुधत्तं । णवरि तित्थय० वासपुधत्तं । एवं कम्मइ०-अणाहार० । उत्कृष्ट अन्तर जगश्रोणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है। अवक्तव्यपदके बन्धक जीवों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । इसी प्रकार तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग जानना चाहिए । इतनी विशेपता है कि इसके अवक्तव्यपदके वन्धक जीबीका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है । नारकियोम तीर्थङ्करप्रकृतिके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है। इस प्रकार ओघके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, लोभकपाय- वाले, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवामे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोमे देवगतिपञ्चककी असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्वप्रमाण है । इतनी विशेषता है कि तीर्थकर प्रकृतिका वर्षपृथक्त्वप्रमाण है । इसी प्रकार कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवाम जानना चाहिए। विशेषार्थ :-पाँच ज्ञानावरणका एकेन्द्रियादि जीव भी बन्ध करते हैं और वे अनन्त होनेसे उनके इन प्रकृतियोकी चार वृद्धि, चार हानि और अवस्थितपद भी निरन्तर सम्भव है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके उक्त पदोके बन्धक जीवांका अन्तर काल नही कहा है। किन्तु इनका अवक्तव्यपद उपशमश्रेणिमे सम्भव है और उपशमश्रेणिमे इनकी वन्धन्युच्छित्तिके वाद मरकर जो देव होते है उनके सम्भव है और उपशमश्रेणिका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है, इसलिए यहाँ इन प्रकृतियोंके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। जितनी ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियों है, उनका यह भङ्ग बन जाता है, इसलिए उनके सब पदोका भङ्ग ज्ञानावरणके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र जिन ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी बन्धव्युच्छित्ति उपशमश्रेणिमे होती है उनके लिए ही यह अन्तर कथन पूरी तरहसे लागू होता है। जिन ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोकी बन्धव्युच्छित्ति उपशमश्रेणिसे पूर्व अन्य गुणस्थानामे होती है, उनका अन्य भङ्ग तो पॉच ज्ञानावरणके समान बन जाता है पर अवक्तव्यपदके अन्तग्मे फरक है, इसलिए उसका अलगसे उल्लेख किया है। सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्व या सासादनको अधिकसे अधिक सात दिन-रात तक नहीं प्राप्त हों यह सम्भव है, इसलिए यहाँ स्त्यानगृद्धि तीन आदि आठ प्रकृतियोंके अवक्तव्यपढ़के बन्धक जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर सात दिन-रात कहा है। देशविरत जीव अधिकसे अधिक चौदह दिन-रात तक अविरत अवस्थाको नहीं प्राप्त होते, इसलिए अप्रत्याख्याना- वरणचतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका उत्कृष्ट अन्तर चौदह दिन-रात कहा है । तथा संयत जीव अधिकसे अधिक पन्द्रह दिन-रात तक संयतासंयत आदि नहीं होते, इसलिए प्रत्याख्यानावरण चतुष्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर पन्द्रह दिन-रात कहा है। इन सबका जघन्य अन्तर एक समय है,यह स्पष्ट ही है। सातावेदनीय आदि और १. तापतो 'एव तित्था' इति पाठः। २. आप्रतो तित्थय० जहः' इति पाठ. ।
वडिबवे अंत २६३ ३२२. अवगढ़वे० सव्वपगदीणं असंखेंजगुणवड्डि-हाणि० जह० एग०, उक० विर्यञ्चायुका एकेन्द्रिय आदि यथासम्भव सब जीव वन्ध करते हैं और वहाँ उनके सब पद निरन्तर सन्भव हैं, इसलिए इनके सब पवाले जीवोंके अन्तरकालका निषेध किया है। परावर्तमान सब प्रकृतियोंके विषयमें यही बात जाननी चाहिए। नरकायु आदि तीन आयुओका अधिकसे अधिक असंख्यात जीव ही वन्य करते हैं, इसलिए इनका निरन्तर बन्ध तो सम्भव ही नहीं है, क्योंकि एक तो आयुबन्धका कुल काल अन्तमुहूर्त है और वह भी त्रिभागर्म वन्ध होता है, इसलिए इनकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदके बन्धक जीवोका जवन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण बन जानेसे वह उक्तप्रमाण कहा है। परन्तु इन तीनों आधुओंके बन्धमें जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर चौवीस मुहूर्त प्राप्त होता है. इसलिए इनके शेष पवाले जीवोंका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। यद्यपि वैक्रियिकपटकका बन्ध करनेवाळे असंख्यात और आहारकद्विकका बन्ध करनेवाले संख्यात जीव हैं, फिर भी इनका किसी-न-किसीके नियमसे वन्ध होता रहता है, इसलिए इनको असंख्यातगुणवृद्धि और असंख्यातगुणहानि सर्वदा होती रहने से इनके अन्तरकालका निषेध किया है। पर तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपढ़क्रे विषयमे यह बात नहीं है। ये कमसे कम एक समय तक न हों, यह भी सम्भव है और अधिकसे अधिक जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण काल तक न हों, यह भी सन्भव है, इसलिए इन पदवाले जीवोका उत्तप्रमाण अन्तरकाल कहा है। तथा इनका अवक्तव्यपद कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक अन्तमुहूर्तके अन्तरसे होता है, इसलिए इनके इस पदवाले जीवोंका उक्त कालप्रमाण अन्तर कहा है। तीर्थङ्करप्रकृतिके सब पवाले जीवोका यह अन्तरकाल इसी प्रकार बन जाता है, इसलिए इसे वैक्रियिकपटकके समान जाननेकी सूचना की है। पर इसके अवक्तव्यपदके अन्तर काल्में फरक है, इसलिए उसका अलगसे निर्देश किया है। मान दूसरे और तीसरे नरकम तीर्थकरप्रकृतिका बन्ध करनेवाले मनुष्य कमसे कम एक समयके अन्तरसे उत्पन्न हो,यह भी सन्भव है और अधिकसे अधिक पल्बके असंख्यातवे भागप्रमाण कालके अन्तरसे उत्पन्न हो, यह भी सम्भव है, इसलिए नारकियों में इसके अवक्तव्यपदका वन्ध करनेवाले जीवोका जघन्य अन्तर एक समय कहा है और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है । यहाँ मूलमें काययोगी आदि जितनी मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमे यह ओघप्ररूपणा बन जाती है, इस- लिए उनमें ओषके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र औदारिकमिश्रकाययोगमे देवगति- पञ्चकनी जसंख्यातगुणवृद्धि ही होती है। तथा कोई भी सम्यग्दृष्टि इस योगवाला न हो तो कमसे क्म एक समय तक नहीं होता और अधिकसे अधिक मासपृथक्त्व काल तक नहीं होता, इसलिए वहाँ इन प्रकृतियोंके उक्त पवाले जीवोंका जयन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर मासयन्वप्रमाग कहा है । इस योग, तीर्थङ्करप्रकृतिकी भी एक असंख्यातगुणवृद्धि ही होती है। साथ ही यह नियम है कि वीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध करनेवाला यदि मनुष्याम जन्म न ले तो कमसे ज्म एक समय तक नहीं लेता और अधिकसे अधिक वर्षपृथक्त्व काल तक नहीं लेता, इसलिए यहाँ इस प्रकृतिक रक्त पदावाले जीवोका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्ष- पृथक्त्वप्रमाग कहा है। कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे औदारिकमित्रकाययोगमे कही कई अन्तरसरणा बन जाती है, इसलिए इनमें भौतारिकमिश्रकाययोगके समान जाननेकी सूचना की है। ३२२.अपगववेवाले जीवामें सब प्रकृवियोंकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंल्यातगुणहानिके बन्धक जीवाचा जयन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट मन्तर वह महीना है। तीन वृद्धि, तीन महाबंधे पदेसवंधाहियारे छम्मासं० । तिष्णिवडि-हाणि-अवढि० जह० एग०, उक्क० सेढीए असंख० । अवत्त० जह० एग०, उक्क० वासपुधत्तं० । एवं सुहुमसं० । णरि अवत्त० णत्थि। ३२३. वेउब्धियमि० मिच्छ० अवत्त० जह० एग०, उक्क० पलिदो० असंखें । एवं ओरालियमि०-कम्मइ०-अणाहार० । वेउब्बियमि'० सन्चपगदीणं एगवड्डि-अवत्त० जह० एग०, उक० बारसमुहुर्त । णवरि एइंदियतिगस्स चउच्चीसं मुहुत्तं । एवं सेसाणं णिरयादीणं ओघेण आदेसेण य साघेदव्वं । एसिं संखेंजरासी असंखेंजरासी तेसिं अंतरं ओघं देवगदिभंगो । एवं याव अणाहारगति णेदव्यं । एवं अंतरं समत्तं । हानि और अवस्थित पदके बन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक ममय है और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यात भागप्रमाण है । अबक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्पपृथक्त्वप्रमाण है । इसी प्रकार सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवाम जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इसमे अवक्तव्यपद नहीं है। विशेपार्थ-छह और सात कोका बन्ध करनेवाले अपगतवेदी जीवीका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है, इसलिए यहाँ सब प्रकृतियांकी असंख्यातगुणवृद्धि और असंग्ख्यातगुणहानिका बन्ध करनेवाले जीवांका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। पर आपकणिमे इन प्रकृतियांका अवक्तव्यपन नहीं होता और उपशमश्रेणिका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है, इसलिए यहाँ इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवीका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण कहा है। यहाँ इन प्रकृतियोंके शेप पटाके बन्धक जीवाका जयन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर जगणिके असंख्यातवे भागप्रमाण है, यह स्पष्ट ही है । सूक्ष्मसाम्पगयिक जीवोकी स्थिति अपगतवेदी जीवोंके समान ही है, इसलिए उनमे इनके समान जाननेकी सूचना की है । मात्र सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत जीवोंमे किसी भी प्रकृतिका अवक्तव्यपद सम्भव नहीं है, इसलिए उसका निषेध किया है। ३२३. क्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमे मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके वन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है। इसी प्रकार औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीचोंमें जानना चाहिए । वैक्रियिक- मिश्रकाययोगी जीवाम सत्र प्रकृतियोंकी एक वृद्धि और अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर बारह मुहूर्त है। इतनी विशेषता है कि एकेन्द्रियजाति- त्रिकका उत्कृष्ट अन्तर चौबीस मुहूर्त है। इसी प्रकार शेप नरकादि गतियोमे ओघ और आदेश अनुसार अन्तरकाल साध लेना चाहिए। जिनकी संख्यात और असंख्यात राशि है उनका अन्तर ओषसे देवगतिके समान है। इस प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। विशेपार्थ-वैक्रियिकमिश्रकाययोगका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर बारह मुहूर्त है, इसलिए यहाँ सब प्रकृतियोकी जिनकी केवल वृद्धि सम्भव है,उनकी वृद्धिकी अपेक्षा और जिनकी वृद्धि और अवक्तव्यपद दोनो सम्भव हैं, उनके दोनो पदोकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर बारह मुहूर्त कहा है । मात्र यहाँ एकेन्द्रियजातित्रिकका १. ता०प्रतौ अणाहार. वेउन्धियमिः' इति पाठ.} २. ताप्रती एव अतर समत्त । इति पाठो नास्ति।
वड्डिवंधे अपात्र में २६५ भावो ३२४. भावाणुगमेण सव्वत्थ ओढइगो भावो। एवं याव अणाहारग तिणेदव्वं । अप्पाबहुअं ३२५. अप्पाबहुगं दुवि०--ओषेण आदेसेण य । ओघेण पंचणा० सव्वत्थोवा अवत्त । अवडिदबं०' अणंतगु० । संखेजभागवड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा । संखेंजगुणवड्डि-हाणि दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा । असंखेजभागवड्डि-हाणि दो वि तुल्ला असंखेजगुणा । असंखेंजगुणहाणि० असंखेंजगुणा । असंखेंजगुणवड्डि० विसे० । एवं थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-ओरा-तेजा-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत एस भंगो छदंस०-बारसक०-भय-दु० । णरि सव्वत्थोवा अवत्त० । अणंतभागवड्डि- वन्ध करनेवाले अधिकसे अधिक चौबीस मुहूर्तके अन्तरसे हो सकते हैं, इसलिए इन प्रकृतियोके उक्त पढकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर चौबीस मुहूर्त कहा है । तथा सासादन गुणस्थानका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवे भाग- प्रमाण है, इसलिए इनमें मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदवाले जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवों में मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीवोका वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोके समान अन्तर बन जाता है, इसलिए इन तीन मार्गणाओमें मिथ्यात्वके अवक्तव्यपरकी अपेक्षा वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंके समान अन्तरकाल कहा है । शेष कथन सुगम है। इस प्रकार अन्तरकाल समाप्त हुआ। भाव ३२४. भावानुगमको अपेक्षा सर्वत्र और यिक भाव है। इस प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। इस प्रकार भाव समाप्त हुआ । अल्पवहुत्व ३२५ अल्पवहुत्व दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे पॉच ज्ञानावरणके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे म्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। उनसे संख्यातभागवृद्धि और संख्यातभागहानिके वन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं। उनसे संख्यातगुणवृद्धि और संख्यातगुणहानिके बन्धक जीव दोनों ही तुल्य होकर असंख्यात- गुणे हैं। उनसे असंख्यातभागवृद्धि और असंख्यातभागहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं । उनसे असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे असंख्यात- गुणवृद्धिके बन्धक जीव विशेप अधिक हैं। इसी प्रकार स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धी चतुष्क, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कामगशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँचअन्तरायकी अग्नेक्षाजानना चाहिए। तथा छह दर्शनावरण, बारह कपाय,भय और जुगुप्सा- को अपेक्षा यही भङ्ग है। इतनी विशेपता है कि इनके अवक्तव्यपदके वन्धक जीव सवसे स्तोक हैं। उनसे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे १. ता०आ प्रतौ 'सम्बत्योवा । अवत्त० अवविव०' इति पाठ. । २. आ प्रती 'असखेजगुणवड्डि- हाणिः' इति पाट. . , महाबंधे पदेसबंधाहियारे हाणि दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा । अवढि० अणंतगुणा । उवरि णाणा भंगो । सादादीणं सव्वत्थोवा अवढि० । असंखेंजभागवड्डि-हाणि दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा। संखेंज- भागवड्डि हाणि दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा । संखेंजगुणवड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा। [अवत्त० असंखजगुणा ! ] असंखेंजगुणहाणिवं. असंखेंजगु०। असंखेंज- गुणवड्डि. विसे०। इस्थि-णस०-चदुआउ०-चद्गदि-पंचजादि-वेउव्वि०-छस्संठा०- दोअंगो-छस्संघ०-चदुआणु०-पर०-उस्सा०-आदाउञ्जो०-दोविहा०-तसथावरादिदसयुग०. दोगोद० साद भंगो कादव्यो। पुरिस०-चदुणोक० सम्वत्थोवा अणंतभागवड्डि०- हाणि । अवढि० अणंतगु० । उवरि सादभंगो । आहारदुर्ग सव्वत्थोवा अवहिः । असंखेंजभागवड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला संखेंजगु० । संखेजभागवड्डि-हाणि० दो वि संखेंजगुणा। संखेंजगुणवड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला संखेंजगुणा । अवत्त० संखेंजगुणा । असंखेंजगुणहाणि० संखेंजगुणा। असंखेंजगुणवडी विसे० । तित्थ० सव्वत्थोवा अवत्त० । अवढि० असंखेंजगुणा । असंखेंजभागवड्डि-हाणि दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा। संखेंजभागवड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा । संखेंजगुणवड्डि-हाणि० दो वि हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। इससे आगेका अल्पबहुत्व ज्ञानावरणके समान है। सातावेदनीय आदिके अवस्थितपदके वन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे असंख्यात- भागवृद्धि और असंख्यातभागहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं। उनसे संख्यातभागवृद्धि और संख्यातभागहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं। उनसे संख्यातगुणवृद्धि और संख्यातगुणहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे है। उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव विशेप अधिक है। स्त्रीवेद, नपुंसक- वेद, चार आयु, चार गति, पॉच जाति, वैक्रियिकशरीर, छह संस्थान, दो आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, चार आनुपूर्वो, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, स-स्थावर आदि दस युगल और दो गोत्रका भग सातावेदनीयके समान कहना चाहिए । पुरुपवेद और चार नोकपायो- की अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थित- पदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। आगे सातावेदनीयके समान भङ्ग है । आहारकद्विकके अव- स्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे असंख्यातभागवृद्धि और असंख्यातभागहानिके बन्धक जीव दोनों ही तुल्य होकर संख्यातगुणे हैं। उनसे संख्यातभागवृद्धि और संख्यातभाग- हानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर संख्यातगुणे है । उनसे संख्यातगुणवृद्धि और संख्यात- गुणहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर सख्यातगुणे हैं । उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं । उनसे असंख्यातगुणहानिके वन्धक जीव संख्यातगुणे है। उनसे असंख्यातगुण- वृद्धिके बन्धक जीव विशेप अधिक है। तीर्थङ्कर प्रकृतिके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे असंख्यातभागवृद्धि और असं- ख्यातभागहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं। उनसे संख्यातभागवृद्धि और संख्यातमागहानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर भसंख्यातगुणे हैं। उनसे सख्यात. १. ताप्रती 'असखेजभाग (गुण) बढिहाणि०' इति पाठ. २ ता०प्रतौ 'तुल्ला असंखेजगु०' इति पाठः। . . .
वड्डिबंधे अप्पाबहुरं २६७ तुल्ला असंखेंजगुणा । असंखेंजगुणहाणि० असंखेंजगुणा । असंखेंजगुणवड्डि० विसे । एवं ओधभंगो कायजोगि-ओरालि०-अचक्खु०-भवसि०-आहारग त्ति । ३२६. गेरइएसु पंचणाणावरणादिधुविगाणं सव्वत्थोवा अववि० । संखेजभाग- वड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला. असंखजंगुणा । उवरि ओघं । एसिं धुविगाणं अणंत- भागवड्डि-हाणि अस्थि तेसिं ताओ थोवाओ। अवढि० असं०गु० । उवरि णोणा०- भंगो । सेसं ओघ । एवं सव्वणिरय-सम्पपंचिंदियतिरिक्ख०-मणुस०अपज०-[सन्वदेव-] सव्वएइंदि०-विगलिंदि०-पंचकायाणं च। तिरिक्खेसु ओघभंगो। पवरि धुविगाणं एसिं अणंतभागवड्डि-हाणि०] अस्थि तेसिं ताओ थोवाओ। अव४ि० अणंतगु० । उवरि ओघो । मणुसेसु ओघो। णवरि दोआउ० वेउव्वियछक आहारदुगं आहारसरीर- भंगो । सेसाणं ओघ । णवरि किंचि विसेसो। मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसुतं चेव । णवरि संखेंज कादब्वं । ३२७. पंचिंदि०-तस०२ ओघ । णवरि यम्हि अवढि० अणंतगु० तम्हि असंखेंजगुणं कादच्वं । पंचमण-तिण्णिवचि० पंचणा०-थीणगि०३-मिच्छ०-अर्णताणु०४- देवगदि-ओरालिय०-वेउन्विय-तेजा०-क० - वेउवि०अंगो०-वण्ण०४-देवाणु०-अगु०४- गुणवृद्धि और संख्यातगुणहानिके बन्धक जीव दोनों ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं । उनसे असंख्यातगुणहानिके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। इस प्रकार ओघके समान काययोगी, औदारिककाययोगी, अचक्षुदर्शनवाले, भव्य और आहारक जीवोमे जानना चाहिए । ३२६. नारकियोमे पॉच ज्ञानावरणादि ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे संख्यातभागवृद्धि और संख्यातभागहानिके बन्धक जीव दोनों ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं । आगे ओघके समान भङ्ग है । जिन ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि होती है, उनके इन पदोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ज्ञानावरणके समान भङ्ग है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इस प्रकार सब नारकी, सब पश्चेन्द्रिय तिर्यञ्च, मनुष्य अपर्याप्त, सब देव, सव एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवोमे जानना चाहिए । तिर्यश्चोमें ओंघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि जिन ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है उनके इन पदोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। आगे ओधके समान भङ्ग है । मनुष्योंमे ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमें दो आयु, वैक्रियिकषटक और आहारकद्विकका भङ्ग आहारक- शरीरके समान है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओधके समान है। मात्र कुछ विशेषता है। मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियोंमे वही भग है। इतनी विशेषता है कि संख्यातगुणा कहना चाहिए। ३२७. पञ्चेन्द्रियद्विक और सद्विक जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि जहाँ अवस्थितपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे कहे हैं वहाँ असंख्यातगुणे कहने चाहिए। पाँच मनोयोगी और तीन वचनयोगी जीवोमें पॉच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानु- वन्धीचतुष्क, देवगति, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वैक्रियिक- शरीरआगोपाङ्ग, वर्णचतुष्क, देवगत्यानुपूर्वो, अगुरुलघुचतुष्क, वादर, पर्याप्त, प्रत्येक, निर्माण । , . २६८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे वादर-पञ्जत्त-पत्ते-णिमि०-पंचंत० सव्वत्थोवा अवत्त । अवढि० असंखेंजगुणा । सेसाणं पदाणं ओघं तिस्थयरभंगो। सेसपगदीणं ओघभंगो। वचिजो०-असच्चमोसवचि०- चक्खुदं० पंचिंदियभंगो। ओरालियमिस्स० तिरिक्खोघं । णवरि अणंतभागवड्डि- हाणि० णत्थि। ३२८. वेउब्धियका० देवोघं । वेउन्धियमिस्सका० सन्वत्थोवा अवत्त । असंखेंज- गुणवड्डिवं. असंखेंजगुण । एवं कम्मइ०-अणाहार। णवरि मिच्छ० सव्वत्थोवा अवत्त० । असंखेंजगुणवड्डिवं० अणंतगु० । आहारकायजोगी० । सव्वट्ठभंगो० । आहार- मिस्स० वेउन्वियमिस्स भंगो। ३२६. इत्थिवेद० पंचणा०- पंचंत० | सम्वत्थोवा' अवहिः । उपरि ओघं । थीणगि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४ - ओरालि० - तेजा०क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि सव्वत्थोवा अवत्त । अवढि० असंखेंजगुणा । उपरि ओघं । णिदा-पयला०-अट्ठक०- भय-दु. सव्वत्थोवा अवत्त । अणंतभागवड्डि-हाणि० दो वि तुल्ला असंखेंजगुणा। अवद्विद० असंखेंजगु० । उवरि ओघं । णवरि चदुसंज० सव्वत्थोवा अणंतभागवड्डि- और पॉच अन्तरायके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपढके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। शेप पदोका भग ओघसे तीर्थकर प्रकृतिके समान है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है । वचनयोगी, असत्यमृपावचनयोगी और चतुदर्शनवाले जीवोंमें पञ्चेन्द्रियोके समान भङ्ग है । औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें सामान्य तिर्यञ्चोके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि नहीं है। ३२८. वैक्रियिककाययोगी जीवोमें सामान्य देवोंके समान भङ्ग है। वैक्रियिकमिश्रकाय- योगी जीवोमे अवक्तव्यपदके वन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे असंख्यातगुणवृद्धिके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे असंख्यात- गुणवृद्धिके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं । आहारककाययोगी जीवामे सर्वार्थसिद्धिके देवोके समान भङ्ग है । आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमे वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंके समान भङ्ग है। ३२६. स्त्रीवेदी जीवों में पॉच ज्ञानावरण और पॉच अन्तरायके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । आगे ओधके समान भङ्ग है । स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधीचतुष्क, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात और निर्माण अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। निद्रा, प्रचला, आठ कषाय, भय और जुगुप्साके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव दोनों हो तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि चार संज्वलनकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्त- १. ता प्रतौ 'इत्थिवेदभंगो पंचणा. पचत० । सञ्चत्योवा' आप्रतौ इत्थिवेदभंगो पचणा० पचत सम्वत्थोवा' इति वाठः।
वडिबंधे अप्पाव २६६ हाणि । अवढि० असंखेंजगु० । उवरि ओघं। पुरिस० इथिभंगो । णqसग० धुविगाण इथि मंगो । णवरि अवहि० अर्णतगु०। ३३०.कोधकसा० पावूसगभंगो। माणे० पंचणा०-चदुदंसणा-तिण्णिसंज०-पंचंतक सव्वस्थोवा अवहिः । उवरि ओघं । मायाए पंचणा०-चदुदंसणा०-दोसंज०-पंचंत० सव्वत्थोवाअवधिः । उवरि ओघं । लोभकसाए ओधं । ३३१. मदि-सुद० धुविगाणं सव्वत्थोवा अवहि । उवरि ओथं । सेसाणं चि ओघो। विभंगे धुविगाणं सव्वत्थोवा अवट्टि । उवरि ओघ । असंखेंजगुणं कादच्वं । देवगदि-ओरालि०-वेउवि०-वेउवि अंगो०-देवाणु०-पर-उस्सा० - वादर-पजत्त-पत्ते० सव्वत्थोवा अवत्त० । अघटि. असं०गु० । एवं [अ] संखेंजगुणं कादच्वं । सेसाणं ओघं। ३३२. आभिणि-सुद-ओधि० पंचणा०- [ छदंस०- ] अपञ्चक्खाण०४ - पुरिस भय-दु०-दोगदि-पंचिंदि०-ओरालि०-वेउवि तेजा-क०-समचदु० - दोअंगो०-वजरि० वण्या०४-दोआणु०-अगु०४-पसत्थ-तस०४-सुभग-सुस्सर-आर्दै-णिमि०-तित्थ०-उच्चा०- भागहानिके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं। आगे ओधके समान भन है। पुरुषवेदी जीवोमे स्त्रीवेदी जीवोंके समान भङ्ग है। नपुंसकवेदी जीवोमे ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोका भङ्ग स्त्रीवेदी जीवोके समान है। इतनी विशेषता है कि इनमे अवस्थितपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। ३३० क्रोधकषायवाले जीवोमे नपुसकवेदवाले जीवोके समान भङ्ग है। मानकपायवाले जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, तीन संज्वलन और पॉच अन्तरायके अवस्थितपदके वन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। मायाकपायवाले जीवोमे पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, दो संज्वलन और पॉच अन्तरायके अवस्थितपदके बन्धक जीव सवसे स्तोक हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है । लोभकषायवाले जीवोमें ओघके समान भङ्ग है। ३३१ मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोमें ध्रुववन्धवाली प्रकृतियांके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे खोक हैं। आगे औषके समान भन है । शेप प्रकृतियोका भङ्ग भी ओधके समान है। विभङ्गज्ञानी जीवोंमे ध्रुवबन्धचाली प्रकृतियोके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। मात्र असंख्यातगुणा करना चाहिए। देवगति, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, देवगत्यानुपूर्वी, परपात, उच्छास, वादर, पर्याप्त और प्रत्येकके अवक्तव्यपदके वन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे अवस्थितपदके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे असख्यातगुणा कहना चाहिए। शेष प्रकृतियोंका भड्ग ओघके समान है। ३३२. आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिनानी जीवोमें पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, अप्रत्यारयानावरणचतुष्क, पुरुपवेद, भय, जुगुप्सा, दो गति, पञ्चेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, दो आङ्गोपाङ्ग, वनपभनाराचसहनन, वर्णचतुष्क,दो आनुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, प्रशस्त विहायोगति, नसचतुष्क, १. ताप्रतौ 'गपुसक धुवि (१) धुविगाण' इति पाठः । , . - ३०० महाबंधे पदेसवंधाहियारे पंचंत० सव्वत्थोवा अवत्त० । अवडि० असंखेंजगु० । उवरि ओघं। णवरि चदुदंस० सव्वत्थोवा अणंतभागवड्डि-हाणि । अवत्त० संखेंजगु० । अवढि० असंखेंजगुः । उपरि ओघं । पचक्खाणाव०४ सव्वत्थोवा अवत्त । अणंतभागवड्डि-हाणि दो वि तुल्ला असंखेंजगु० । अवढि० असंखेंजगुं० । उवरि ओघं। [एवं चदुसंज०]। दोवेदणी०- थिरादितिण्णियुग०-आहारदुगं ओघं । चदुणोक० साद० भंगो । एवमाउगं । गवरि मणुसाउ० मणुसि भंगो। एवं ओधिदं०-सम्मादि०- खइग०- वेदग०। मणपजे०- संजद०-सामाइ०-छेदो०-परिहार० ओधिभंगो । णवरि संखेंजगुणं कादव्वं । सुहुमसंप० अवगद भंगो । संजदासंजद० परिहार भंगो। ३३३. असंजदेसु धुविगाणं मदिभंगो । एसि धुविगाणं अणंतभागवड्डि-हाणिक अस्थि तेसिं ताओ थोवाओ । अवढि० अणंतगुणा । उवरि ओघ । सेसाणं पगदीणं ओघं । एवं किण्ण-णील-काऊणं । तेऊए धुविगाणं सन्वत्थोवा अवढि० । उवरि ओघं । देवगदिपंचग-ओरालि० सव्वत्थोवा अवत्त । अवढि० असंखेंजगुः । उपरि ओघं । सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण, तीर्थकर, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि चार दर्शनावरणकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। प्रत्याख्यानावरण- चतुप्कके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभाग- हानिके बन्धक जीव दोनो ही तुल्य होकर असंख्यातगुणे हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। इसी प्रकार चार संज्वलनके विषयमे जानना चाहिए । दो वेदनीय, स्थिर आदि तीन युगल और आहारकद्विकका भङ्ग ओघके समान है। चार नोकपायोका भग सातावेदनीयके समान है। इसी प्रकार आयुके विषयमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि मनुष्यायुका भङ्ग मनुष्यिनियोके समान है। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोंमे जानना चाहिए। मनःपर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत और परिहारविशुद्धिसंयत जीवोमै अवधिज्ञानी जीवांके समान भन है। इतनी विशेषता है कि संख्यातगुणा कहना चाहिए । सूक्ष्मसाम्पराय संयत जीवोंमें अपगतवेदी जीवोंके समान भङ्ग है। संयतासंयत जीवोमें परिहारविशुद्धिसंयत जीवोके समान भङ्ग है। ३३३. असंयत जीवोमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोंका भड्न मत्यज्ञानी जीवोंके समान है। जिन ध्रुववन्धवाली प्रकृतियोकी अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानि है उनके इन पदोके बन्धक जीव स्तोक हैं । उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार कृष्णलेश्या, नीललेश्या और कापोतलेश्यामें जानना चाहिए। पीतलेश्याम ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके अवस्थितपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है। देवगतिपञ्चक और औदारिकशरीरके अवक्तव्यपदके १. ताप्रती 'ओधिद' । सम्मादि० खड्ग वेदग० मणपज' इति पाठः। २. ता प्रतौ 'असखेज (असन) देसु' इति पाठः । ३. ता०प्रतौ 'अवत्त । असखेजगु०' इति पाठः । .
अज्झवसाणसमुदाहारे परिमाणाणुगमो ३०१ एवं पम्माए वि । गवरि देवगदिपंचग० - ओरा०-ओरा०अंगो०-समचदु०-उच्चा० थीणगिद्धिभंगो । सुकाए तेउभंगो। ३३४. उवसम० धुविगाणं सव्वत्थोवा अवत्त० । अवढि० असंखेंजगु० । उवरि ओघ । चदुदंस० सव्वत्थोवा अणंतभागवड्डि-हाणि । अवत्त० संखेंजगु० । अवढि० असंखेंजगु० । सेसाणं ओघं । सासण-सम्मामि० मदि०भंगो। एवं मिच्छादिवि०- असण्णि | सणि पंचिंदियभंगो। आहारा० ओघं । एवं अप्पाबहुगं समत्तं एवं वड्डियंघे ति समत्तमणियोगद्दारं । अन्झवसाणसमुदाहारपरूवणा परिमाणाणुगमो ३३५. अज्झवसाणसमुदाहारे त्ति तत्थ इमाणि दुवे अणियोगद्दाराणि णादव्वाणि भवति । तं जहा-परिमाणाणुगमों अप्पाबहुगे ति । परिमाणाणुगमेण दुवि०- ओघेण आदेसेण य । आभिणिवोधियणाणावरणीयस्स असंखेंजाणि पदेसवंधवाणाणि । जोगट्ठाणेहितो संखेंज भागुत्तराणि। कधं संखेंजदिभागुत्तराणि ? अट्ठविधबंधगेण बन्धक जीव सवसे स्तोक हैं । उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । आगे ओधके समान भङ्ग है। इसी प्रकार पद्मलेश्यामे भी जानना चहिए। इतनी विशेषता है कि देवगति- पञ्चक, औदारिकशरीर, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, समचतुरस्रसंस्थान और उच्चगोत्रका भग स्त्यानगृद्धिके समान है । शुक्ललेश्याम पीतलेश्याके समान भङ्ग है। ३३४. उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमें ध्रुवबन्धवाली प्रकृतियोके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आगे ओघके समान भङ्ग है । चार दर्शनावरणको अनन्तभागवृद्धि और अनन्तभागहानिके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवक्तव्यपदके बन्धक जीव संख्यातगुणे है। उनसे अवस्थितपदके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। शेषका भङ्ग ओघके समान है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोमे मत्यजानी जीचोके समान भङ्ग है। इसी प्रकार मिथ्यादृष्टि और असंजी जीवोमे जानना चाहिए। संज्ञी जीवोमे पञ्चेन्द्रिय जीवोके समान भङ्ग है । आहारक जीवोमे ओधके समान भङ्ग है। इस प्रकार अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। इस प्रकार वृद्धिवन्ध अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। अध्यवसानसमुदाहारप्ररूपणा परिमाणानुगम ३३५. अध्यवसानसमुदाहारका प्रकरण है। उसमे ये दो अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं । यथा- परिमाणानुगम और अल्पबहुत्व । परिमाणानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे आभिनिवोधिकज्ञानावरणके असंख्यात प्रदेशबन्धस्थान है। ये योगस्थानोसे संख्यात भाग अधिक है । संख्यातवे भाग अधिक कैसे हैं ? आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेवाले " , १. तान्यतौ 'परिमा [णा] गुगमो' इति पाठ.। २. ता०प्रतौ परिमाणाणुगम दुवि०' इति पाठ.। ३. ता०प्रतौ 'पदेसबध [] णाणि' इति पाठः । ४ ता.आ.प्रत्योः 'असंखेज्जमागुत्तराणि' इति पाठः महाबंधे पढ़ेसबंधाहियारे ताच सव्वाणि जोगहाणाणि लद्धाणि । तदो सत्तविधबंधगस्स उक्कस्सगादो अवविध- पंधगस्सं उक्कस्सगं सुद्धं । सुद्धिसेसो यावदियो भागो अधिद्वित्तो जोगट्ठाणं तदो सत्तविधबंधगेण विसेसो लद्धो । एवं सत्तविधबंधगादो छविधवंधगं उवणीदा । एदेणं कारणेण आभिणिबोधियणाणावरणीयस्स असंखेंजाणि पदेसबंधहाणाणि जोगहाणेहितो संखेंजभागुत्तराणि । एवं सुद०-ओधि०-मणपज-केवलणा-पंचंतराइयाणं च एसेव भंगो। थीणगि०३ असंखेंजाणि पदेसबंधट्ठाणाणि जोगहाणेहितो विसेसाधियाणि । विसेसो पुण संखेंजदिभागो । णिद्दा-पयलाणं असंखेंजाणि पदेसबंधट्ठाणाणि | जोगट्ठाणेहिंतो दुगुणाणि संखेंजदिमागुत्तराणि । चदुदंस० असंखेंजाणि पदेस- वंधट्ठाणाणि जोगहाणेहितो तिगुणाणि संखेजदिभागुत्तराणि । कधं तिगुणाणि संखेंजदि- भागुत्तराणि ? असण्णिघोलमाणगं जहण्णय जोगट्ठाणं आदि कादृण सव्वाणि जोगट्ठाणाणि अढविधबंधगेण लद्धाणि । तदो सत्तविधधगेण विसेसो लदो। एतियाणि चेव पदेसबंधट्ठाणाणि सम्मादिविणा वि लद्धाणि । पुणो वि णिद्दा-पयलाणं बंधगदो च्छेदो एत्तियाणि चेव पदेसबंधट्ठाणाणि लद्धाणि । एदेण कारणेण चदुदंसणावरणीय स्स असंखेंजाणि पदेसबंधट्टाणाणि जोगट्ठाणेहितो तिगुणाणि संखेंजदिभागुत्तराणि । सादामाद०-मिच्छ०-अणंतागु०४-इत्थि०-णस चदुण्णं आउ० सवासिं णामपगदीणं o ... rrrrrrrrr- ----- जीवने सब योगस्थान प्राप्त किये हैं। उनसे सात प्रकारके बन्धक जीवके उत्कृष्टमसे आठ प्रकारके बन्धक जीवका उत्कृष्ट घटा दें। घटानेपर योगस्थानका जितना भाग शेप रहे,उसकी अपेक्षा सात प्रकारके बन्धक नीचने विशेष प्राप्त किया है। इसी प्रकार सात प्रकारके बन्धक जीवसे छह प्रकारके बन्धक जीवने विशेष अधिक प्राप्त किया है। इस कारणसे आभिनिबोधिकनानावरणके असंख्यात प्रदेशवन्धस्थान हैं जो योगस्थानासे संख्यातवे भाग अधिक हैं। इसी प्रकार श्रुतज्ञाना- वरण, अवधिज्ञानावरण, मन-पर्ययज्ञानावरण, केवलज्ञानावरण और पॉच अन्तरायांके विपयमे यही भङ्ग जानना चाहिए। स्त्यानगृद्धित्रिकके असंख्यात प्रदेशबन्धस्थान है जो योगस्थानोसे विशेप अधिक हैं। विशेषका प्रमाण संख्यातवे भागप्रमाण है। निद्रा और प्रचलाके असंख्यात प्रदेश- वन्धस्थान हैं जो योगस्थानोसे संख्यातवाँ भाग अधिक दूने है। चार दर्शनावरणोके असंख्यात प्रदेशबन्धस्थान हैं जो योगस्थानोंसे संख्यातवाँ भाग अधिक तिगुणे हैं। संख्यातवाँ भाग अधिक तिगुणे कैसे हैं ? असंज्ञीके घोलमान जघन्य योगस्थानसे लेकर सब योगस्थान आठ प्रकारके कर्मोका बन्ध करनेवाले जीवने प्राप्त किये हैं। उनसे सात प्रकारके कौके बन्धक जीवने विशेप प्राप्त किये हैं। तथा इतने ही प्रदेशवन्धस्थान सम्यग्दृष्टि जीवने प्राप्त किये हैं। तथा फिर भी निद्रा और प्रचलाका बन्धसे छेद होनेके बाद इतने ही प्रदेशबन्धस्थान प्राप्त किये हैं। इस कारणसे चार दर्शनावरणके असंख्यात प्रदेशबन्धस्थान हैं जो योगस्थानोसे संख्यातवाँ भाग अधिक तिगुणे है। सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चार आयु, नामकर्मकी सब प्रकृतियाँ, नीचगोत्र और उच्चगोत्र इनका स्त्यानगृद्धि- १. आ प्रतो 'अवष्टिग्धगरस' इति पाठ । २ ताप्रती 'उवणिए० एदेण' इति पाठ.। ३. ता प्रतौ 'कथं (ध) तिगुणाणि' इति पाठः । ४. ता प्रतो 'यत्तियाणि' इति पाठ.। ५. ता०प्रतौ 'वघटोच्छेदो यत्तियाणि' इति पाठः।
३ A अन्झवसाणसमुदाहारे अप्पाबहुरं ३०३ णीचुच्चागोदस्स य यथा थीणगिद्धितियस्स भंगो कादव्यो। अपञ्चक्खाणचदुक्कस्स दुवे परिवाडीओ। पञ्चक्खाण०४ तिण्णि परिवाडीओ। कोषसंजलणाए चत्तारि परिवाडीओ। अण्णा च अट्ट परिवाडीओ। माणसंजलणाए चत्तारि परिवाडीओ अण्णा च विभागूणिया परिवाडी। मायसंजलणाए वत्तारि परिवाडीओ अण्णा च चदुभागूणिया परिवाडी। लोमसंजलणाए चत्तारि परिवाडीओ अण्णा च अट्ठम- भागूणिया परिवाडी। पुरिसवेदस्स दुवे परिवाडीओ अण्णा च तदिया पंचभागूणिया परिवाडीओ। छण्णोकसायाणं दुवे परिवाडीओ। परिवाडी णाम सण्णा का ? याणि मिच्छादिहिस्स पदेसबंधट्ठाणाणि एसा परिवाडी सण्णा णाम । एवं परिमाणाणुगमो समत्तों। अप्पाबहुगं ३३६. अप्पाबहुगं दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणाणावरणीयाणं सव्व- स्थोवाणि जोगट्ठाणाणि । पदेसबंधहाणाणि विसेसाधियाणि । सव्वत्थोवाणि णवण्डै दसणावरणीयाणं जोगट्ठाणाणि । थीणगिद्धितियस्स पदेसबंधट्ठाणाणि विसेसा० । णिहा-पयलाणं पदेसवंधट्टाणाणि विसेसा० । चदुण्हं दंसणावर० पदेसर्वधट्ठाणाणि विसेसाधि० | सव्वत्योवाणि सादासादाणं दोण्हं पगदीणं जोगट्ठाणाणि । असादस्स त्रिकके समान भङ्ग कहना चाहिए। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके विषयमे दो परिपारियों हैं। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कके विषयमें तीनपरिपाटियों हैं। क्रोधसंज्वलनके विषयमे चार परिपाटियों हैं और आठ अन्य परिपाटियाँ हैं। मान सज्वलनकी चार परिपाटियाँ हैं और विभाग कम एक अन्य परिपाटी है। मायासज्वलनकी चार परिपाटियों हैं और चतुर्थ भाग कम एक अन्य परिपाटी है। लोभसंज्वलनकी चार परिपाटियाँ हैं और अष्टम भाग कम एक अन्य परिपाटी है। पुरुषवेदकी दो परिपाटियों हैं और तृतीय भाग कम एक तीसरी परिपाटी है तथा छह नोकपार्योंकी दो परिपाटियाँ हैं। शंका–परिपाटी इस संज्ञाका क्या अर्थ है ? समाधान-मिथ्याष्टिके जो प्रदेशवन्धस्थान होते हैं उतनेको परिपाटी संज्ञा है। अल्पबहुत्व ३३६. अल्पबहुत्व दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघसे पॉच ज्ञानावरणके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। उनसे प्रदेशवन्धस्थान विशेष अधिक हैं। नौ दर्शनावरणौके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। उनसे स्त्यानगृद्धित्रिकके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे निद्रा और प्रचलाके प्रदेशवन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे चार दर्शनावरणके प्रदेशवन्धस्थान विशेप अधिक हैं। सावावेदनीय और असातावेदनीय इन दोनों प्रकृतियोंके योगस्थान सबसे १. ता०प्रतौ 'अण्णा व (च) अपरिवाडीए' इति पाठ-। २. ता०प्रतौ 'तिभागू (ऊ)णिया' इति पाठ । ३ ता प्रतौ 'सण्या कायाणि' इति पाठ.! ४. ता०प्रती एवं परिमाणाणुगमो समत्तो' इति पाटो नास्ति । ५. ता०प्रतौ 'सन्बत्योवाण (णि) णवण्ह' इति पाठः ।
३०४ महाबंधे पदेसबंधाहियारे पदेसबंधट्ठाणाणि विसेसाधियाणि । सादस्स पदेसबंध. विसे० | सव्वत्थोवाणि मिच्छ०- सोलसक० जोगट्ठाणाणि । मिच्छ०-अणंताणु०४ पदेसबंध० विसे० । अपचक्खाण०४ पदेसबंध० विसे । पञ्चक्खाण०४ पदेसबंध. विसे० । कोधसंज० पदेसबंध विसे । माणसंज० पदेसबंध. विसे । मायसंज० पदेसबंध० विसेसा० । लोभसंज० पदेस- बंध. विसेसा। सव्वत्थोवाणि णवणोकसायाणं जोगट्ठाणाणि । इस्थि०-णस० पदेसवंध० विसेसा० । छण्णोक० पदेसबंध० विसेसा० । पुरिस० पदेसवंध. विसेसा० । चदुण्हमाउगाणं सन्वासिं णामपगदीणं पंचण्हमंतराइगाणं च णाणावरणभंगो । णीचुचागोदाणं सादासादभंगो। एवं ओधभंगो मणुस०३-पंचिंदि०-तसर-पंचमण०- पंचवचिजो०-कायजोगि-ओरालिय०-इत्थि०- पुरिस०-णस० - अवगद० - कोधादि०४- आभिणि०- सुद०-ओधि०-मणपज०-संजद-सामा० - छेदो०-चक्खु०-अचक्खु०-ओधिदं०- सुक्कले०-भवसि०-सम्मादि०-खड्ग०-उवसम०-सण्णि-आहारग ति । ३३७. णिरयगदीए पंचणा० सव्वत्थोवाणि जोगट्ठाणाणि। पदेसवंध० विसे०। एवं दोवेदणी०-दोआउ० सव्वाणं णामपगदीणं दोगोद पंचंतराइगाणं च । सव्वत्थोवाणि स्तोक हैं। उनसे असातावेदनीयके प्रदेशवन्धस्थान विशेष अधिक हैं । उनसे सातावेदनीयके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं । मिथ्यात्व और सोलह कपायोके योगस्थान सबसे स्तोक है। उनसे मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्कके प्रदेशबन्धस्थान विशेप अधिक हैं। उनसे अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानावरणचतुष्क के प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे क्रोधसंज्वलनके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे मान संज्वलनके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे माया संज्वलनके प्रदेशवन्ध- स्थान विशेष अधिक हैं। उनसे लोभसंज्वलनके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। नौ नोकषायोंके योगस्थान सबसे स्तोक हैं । उनसे स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे छह नोकषायोके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं । उनसे पुरुषवेदके प्रदेश- बन्धस्थान विशेष अधिक हैं। चार आयु, नामकर्मकी सब प्रकृतियों और पॉच अन्तरायका भङ्ग ज्ञानावरणके समान है। नीचगोत्र और उच्चगोत्रका भङ्ग सातावेदनीय और असातावेदनीयके समान है। इस प्रकार ओघके समान मनुष्यत्रिक, पञ्चेन्द्रियद्विक, त्रसद्विक, पॉचों मनोयोगी, पॉचो वचनयोगी, काययोगी, औदारिककाययोगी, स्त्रीवेदवाले, पुरुषवेवाले, नपुंसकवेवाले, अपगतवेदवाळे, क्रोधादि चार कपायवाले, आभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मन'- पर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, चनुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले, अवधिदर्शनवाले, शुक्ललेश्यावाले, भव्य, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, संज्ञी और आहारक जीवोंमें जानना चाहिए। ३३७. नरकगतिमे पॉच ज्ञानावरणके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। तथा योगस्थानोसे प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। इसी प्रकार दो वेदनीय, दो आयु, नामकर्मको सब प्रकृतियों, दो गोत्र और पॉच अन्तरायके विषयमे जानना चाहिए । नौ दर्शनावरणके योगस्थान . , १. आ०प्रतौ 'तस० पचमणः' इति पाठः । २. ता०प्रतौ सम्वत्यो । जोगहाणादो० पदे. विसे. साधियाणि ।' इति पाठः । ३. ता०प्रतौ 'दोगदि०' इति पाठः।
० अज्झवसाणसमुदाहारे अप्पाबहुगं ३०५ णवण्हं दंसणा. जोगहाणाणि । थीणगिद्धि०३ पदेसबंध० विसे० । छदंस० पदेसबंध. विसे । सम्वत्थोवाणि मिच्छ-सोलसकसायाणं जोगट्ठाणाणि । मिच्छ०-अणंतागु०४ पदेसबंध० विसे० | वारसक० पदेसबंध० विसे । सव्वत्थोवाणि णवण्हं णोकसा० जोगहाणाणि । इत्थि०-णस० पदेसबंध. विसे | सत्तणोक० पदेसबंध० विसे । एवं सवणेरइय-तिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्ख०३ देवा याव उपरिमगेवजा त्ति वेउबि०- असंजद-पंचले०-वेदग० । णवरि एदेसु किंचि विसेसो। तिरिक्खेसु सव्वत्थोवाणि मिच्छ०-सोलसक. जोगट्ठाणाणि । मिच्छ,०-अणंताणु०४ पदेसबंध. विसे | अपच्चक्खाण०४ पदेसबंध० विसे० । अट्ठक० पदेसबंध० विसे । एवं तेउ-पम्माणं । णवरि अपञ्चक्खाण०४ पदेसबंध० विसे० । पञ्चक्खाण०४ पदेसबंध० विसे । चदुसंज० पदेसबंध. विसे० । एवं वेदग ३३८. सव्वअपजत्ताणं तसाणं थावराणं च सव्वएइंदिय-विगलिं०-पंचकायाणं च सव्वपगढीणं च सव्वत्योवाणि जोगहाणाणि । पदेसबंध० विसे | एवं ओरालियमिक- मदि-सुद-विभंगे० अब्भव०-मिच्छादि०-असण्णि त्ति । णवरि ओरालियमिस्स० देवगदि- सबसे स्तोक हैं। उनसे स्त्यानगृद्धित्रिकके प्रदेशवन्धस्थान विशेष अधिक है। उनसे छह दर्शनावरणके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। मिथ्यात्व और सोलह कपायांके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। उनसे मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धीचतुप्कके प्रदेशवन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे बारह कपायोंके प्रदेशबन्धस्थान विशेप अधिक हैं। नौ नोकपायोके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। उनसे स्त्रीवेट और नपुंसकवेदके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे सात नोकपायोके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। इसी प्रकार सब नारकी, सामान्य तिर्यच, पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चत्रिक, सामान्य देव, उपरिम अवेयक तकके देव, वैक्रियिककाययोगी, असंयत, पॉच लेश्यावाले और वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इन मार्गणाओम सामान्य नारकियोसे कुछ विशेष है। यथा-सामान्य तिर्यञ्चामे मिथ्यात्व और सोलह कयायोके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। उनसे मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अप्रत्याख्यानावरणचतुप्कके प्रदेशवन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे आठ कपायोके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक है। इसी प्रकार पीत और पद्मलेश्याम जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अप्रत्याख्यानावरण चतुष्कके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानावरणचतुष्कके प्रदेशबन्धस्थान विशेप अधिक हैं। उनसे चार सञ्चलनाके प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। इसी प्रकार वेदक सम्यग्दृष्टि जीवाम जानना चाहिए । ३३८. त्रस और स्थावर सब अपर्याप्तक, सब एकेन्द्रिय, सब विकलेन्द्रिय और पॉच स्थावरकायिक जीवोमे सब प्रकृतियोंके योगस्थान सबसे स्तोक हैं। उनसे प्रदेशबन्धस्थान विशेष अधिक हैं। इसी प्रकार औदारिकमिश्रकाययोगी, मत्यज्ञानी, श्रुताबानी, विभङ्गज्ञानी, अभब्य, मिथ्याष्टि और असंझी जीवामे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी जीवाम देवगतिपञ्चकका अल्पबहुत्व नहीं है। इसी प्रकार वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवामे जानना १ ता प्रती एवं वेटग० सबअपजत्तगाण' इति पाठ। ३६ । - ३०६ महाबंधै पदेसबंधाहियारे पंचग० णत्थि अप्पाबहुगं । एवं बेउव्वियमि० । कम्मई०-अणाहार० सव्वपगदीणं णत्थि अप्पायहुगं । अणुदिस याच सव्व? ति अपजत्तभंगो। एवं आहार-आहारमि परिहार०-संजदासंजद०-सासण-सम्मामिच्छादिहि ति । णवरि सम्मामिच्छादिट्ठीणं गत्थि अप्पाबहुगं। एवं अप्पाबहुगं समत्तं । एवं अज्झवसाणसमुदाहारे त्ति समत्तमणियोगद्दारं । जीवसमुदाहारपरूवणा ३३६. जीवसमुदाहारे ति तत्थ इमाणि दुवे अणियोगद्दाराणि । तं जहा- पमाणाणुगमो अप्पाबहुगे ति । पमाणाणुगमो जोगट्ठाणपरूवणा ३४०. पमाणाणुगमो ति तत्थ इमाणि दुवे अणियोगद्दाराणि-जोगट्ठाण- परूवणा पदेसबंधट्ठाणपरूवणाचेदि । जोगट्ठाणपरूवणदाए सव्वत्थोवो सुहुमअपञ्जत्तयस्स जहण्णगो जोगों। बादरअपजत्तयस्स जहण्णगो जोगो असंखेंजगुणों । एवं बीइंदि०-तीइंदि०-चदुरिंदि०-असण्णिपंचिंदि अपज० जहँ० जोगो असंखेंजगुणो। चाहिए । कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवामे सब प्रकृतियोका अल्पवहुत्व नहीं है। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवामे अपर्याप्तकोके समान भङ्ग है । इसी प्रकार आहारक- काययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, परिहारविशुद्धिसंयत, संयतासंयत, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंमे अल्पबहुत्व नहीं है। इस प्रकार अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। इस प्रकार अध्यवसानसमुदाहार अनुयोगद्वार समाप्त हुआ । जीवसमुदाहार प्ररूपणा ३३६. जीवसमुदाहारका प्रकरण है। उसमे ये दो अनुयोगद्वार हैं । यथा--परिमाणानुगम और अल्पबहुत्व। परिमाणानुगम योगस्थानप्ररूपणा ३४०. परिमाणानुगममें ये दो अनुयोगद्वार होते हैं-योगस्थानप्ररूपणा और प्रदेशबन्ध- स्थानप्ररूपणा । योगस्थानप्ररूपणाकी अपेक्षा सूक्ष्म अपर्याप्त जीवका जघन्य योग सबसे स्तोक है। उससे बादर अपर्याप्तका जघन्य योग असंख्यातगुणा है। इसी प्रकार द्वीन्द्रिय अपर्याप्त, त्रीन्द्रिय अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त और असंज्ञी पश्चेन्द्रिय अपर्याप्त जीवका जघन्य योग उत्तरोत्तर १. ता०प्रतौ 'वेउब्वियमि० कम्मइ०' इति पाठः । २. वा प्रतौ 'सम्मादिहि णत्यि' मा०प्रतौ 'सम्मादिछीण णत्यि' इति पाठः । ३. ता०प्रतौ 'चेदि' इति पाठो नास्ति । ४. ता प्रतौ 'सव्वत्थोवा (वो)' आ०प्रतौ 'सम्वत्योवा' इति पाठः । ५. ता प्रतौ 'जहण्णयं जोगो' इति पाठः। ६. ता०प्रतौ 'असखेजगुण' इति पाठः। ७. ता०प्रती 'अपज । जहः' इति पाठः। - जीवसमुदाहारे जोगट्टाणपरूवणा ३०७ मुहुमस्स पञ्जत्तयस्स जह० जोगो असंखेंजगुणों। बादरेइंदियपजत्तयस्स जह० जोगो असंखेंजगुणो'। सुहुम० अपज्जत्तयस्स उकस्सगो जोगो असंखेंजगुणो । वादर० अपज० उक्क० जोगो असंखेंजगु० । सुहुम० पञ्जत्त० उक० जोगो असंखेंजगु० । वादर० पजत्त० उक्क० जोगो असंखेंजगु० । वेइंदि०पञ्जत्त० जह० जोगो असंखेंजगु० । एवं तेइंदि०-चदुरिंदि०-असण्णिपंचिंदि०-सण्णिपंचिंदि०पञ्जत्त० जह० जोगो असंखज- गुणो । बीइंदि०अपज० उक्क० जोगो असंखेंजगुणो। एवं तेइंदि०-चदुरिंदि०-असण्णि- पंचिंदि०-सण्णिपंचिंदि०अपज० उक्क० जोगो असं०गुणो। वीइंदि०पजत्त० उक० जोगो असं०गुणो । एवं तीइंदि -चदुरिदि०-असण्णिपंचिं०-सण्णिपंचिंदि०पजत्त० उक्क० जोगो असंखेंगुणो। एवमेककस्स जीवस्स जोगगुणगारो पलिदोवमस्स असंखेंजदिभागो। एवं जोगट्ठाणपरूवणा समत्ता । पदेसबंधट्टाणपरूवणा ३४१. पदेसबंधट्ठाणपरूवणदाए सव्वत्थोवा सुहुमस्स अपजत्तयस्स जहण्णयं पदसग्गं । बादर०अपञ्ज० जह० पदेसग्गं असंखेंजगुणं। एवं वेइंदि०-तेइंदि०-चदुरिदि०- असण्णिपंचिंदि०-सणिपंचिंदि अपजत्त० जह० पदेसग्गं असंखेंजगुणं। सुहुमस्स असल्यातगुणा है । असज्ञी पञ्चेन्द्रियके जघन्य योगस्थानसे सूक्ष्म पर्याप्तका जघन्य योग असंख्यात- गुणा है । उससे वादर एकेन्द्रिय पर्याप्तका जघन्य योग असंख्यातगुणा है। उससे सूक्ष्म अपर्याप्तका उत्कृष्ट योग असख्यातगुणा है। उससे वादर अपर्याप्तका उत्कृष्ट योग असंख्यातगुणा है। उससे सूक्ष्म पर्याप्तका उत्कृष्ट योग असख्यातगुणा है। उससे वादर पर्याप्तका उत्कृष्ट योग असख्यातगुणा है । उससे द्वीन्द्रिय पर्यामका जघन्य योग असंख्यातगुणा है। इसी प्रकार क्रमसे त्रीन्द्रिय पर्याप्त, चतुरिन्द्रिय पर्याप्त, असंजी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त और संजी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीवका जघन्य योग उत्तरोत्तर असंख्यातगुणा है। उससे द्वीन्द्रिय अपर्याप्तका उत्कृष्ट योग असख्यातगुणा है। इसी प्रकार क्रमसे त्रीन्द्रिय अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त, असंही पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्त और सज्ञी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्त जीवका उत्कृष्ट योग उत्तरोत्तर असख्यातगुणा है। सनी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तके उत्कृष्ट योगसे द्वीन्द्रिय पर्याप्तका उत्कृष्ट योग असख्यातगुणा है । इसी प्रकार क्रमसे त्रीन्द्रिय पर्याप्त चतुरिन्द्रिय पर्याप्त, असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त और संत्री पञ्चन्द्रिय पर्याप्त जीवका उत्कृष्ट योग उत्तरोत्तर असख्यातगुणा है। इसी प्रकार एक-एक जीवका उत्तरोत्तर योग गुणकार पल्यके असत्यातवे भागप्रमाण है। इस प्रकार योगस्थानप्ररूपणा समाप्त हुई । प्रदेशवन्धस्थानप्ररूपणा ३४१ प्रदेशबन्धस्थानप्ररूपणाकी अपेक्षा सूक्ष्म अपर्याप्तका जघन्य प्रदेशाय सबसे स्तोक है। उससे वादर अपर्याप्तका जघन्य प्रदेशाग्र असख्यातगुणा है। इसी प्रकार क्रमसे द्वीन्द्रिय अपर्याप्त, त्रीन्द्रिय अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त, असज्ञी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्त और संज्ञी पञ्चेन्द्रिय १ ता.प्रतौ 'जाग० असखेजगुण' इति पाट. | २ ता प्रतौ 'पज्जत्त० जोगो० जह० असखेज्जगु०' इति पाठ. । ३ ता०प्रती० 'असण्णिपचिदि० । सणिपचिदि०' इति पाठ'।
३०८ महाबंधे पदेसबंधायिारे पजत्त० जह० पदेसग्गं असंखेंजगुणं । एवं बादर०पजत्त० । सुहुम०अपजत्त० उक्क० पदेसग्गं असंखेंगुणं । बादर अपज. उक० पदे० असं०गुणं । सुहम०पज्ज० उक्क० पदे० असं०गुणं। बादर०पजत्त० उक्क० पदे० असंल्गुणं । वेइंदिपज्जत्त० जह० पदे० असं०गुणं । एवं तीइंदि०-चदुरिंदि०-असण्णिपंचिंदि०-सण्णिपंचिंदिपज्जत्त० जह० पदे. असं०गुणं । वीइंदि०अपज्ज० उक्क० पदे० असं०गुणं । एवं तेइंदि०- चदुरिंदि० - असण्णिपंचिंदि० - सण्णिपंचिंदि०अपज्ज. उक० पदे० असंखेंगुणं । वीइंदि०पज्जत्त० उक्क० पदे० असं गुणं । एवं तेइंदि०-चदुरिंदि०-असण्णिपंचिंदि० सण्णिपंचिंदि०पज्जत उक्क० पदे असं०गु० । एवमेक्ककस्स जीवस्स पदेसगुणगारों पलिदोवमस्स असंखेन्जदिभागो। एवं पदेसबंधट्ठाणपरूवणा समत्ता। अप्पाबहुगं ३४२. अप्पाबहुगं तिविहं-जहण्णयं उक्कस्सयं जहण्णुकस्सयं च । उक्कस्सए पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघेण तिण्णिआउगाणं वेउन्चियछक्क० तित्थयरस्स य सन्वत्थोवा उक्कस्सपदेसबंधगा जीवा । अणुक्कस्सपदेसवंधगा जीवा असं०गुणा । आहारदुगस्स सम्वत्थोवा उक्कस्सपदेसवंधगा जीवा। अणुक्कस्सपदेसवंधगा जीवा अपर्याप्तका जघन्य प्रदेशाम उत्तरोत्तर असंख्यातगुणा है | आगे सूक्ष्म पर्याप्तका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे वादर पर्याप्तका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे सूक्ष्म अपर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशात असंख्यातगुणा है। उससे वादर अपर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे सूक्ष्म पर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है । उससे बादर पर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे द्वीन्द्रिय पर्याप्तका जघन्य प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है । इसी प्रकार क्रमसे त्रीन्द्रिय पर्याप्त, चतुरिन्द्रिय पर्याप्त, असंज्ञी पञ्चन्द्रिय पर्याप्त और संज्ञी पञ्चन्द्रिय पर्याप्तका जघन्य प्रदेशाय उत्तरोत्तर असंख्यातगुणा है। आगे द्वीन्द्रिय अपर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशाय असंख्यातगुणा है। इसी प्रकार आगे त्रीन्द्रिय अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त, असंज्ञी पञ्चन्द्रिय अपर्याप्त और संज्ञी पञ्चन्द्रिय अपर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। आगे द्वीन्द्रिय पर्याप्तका उत्कृष्ट प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। इसी प्रकार आगे क्रमसे त्रीन्द्रिय पर्याप्त, चतुरिन्द्रिय पर्याप्त, असंज्ञी पञ्चन्द्रिय पर्याप्त और संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीवका उत्कृष्ट प्रदेशाय असंख्यात- गुणा है। इसी प्रकार उत्तरोचर एक-एकका प्रदेश गुणकार पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इस प्रकार प्रदेशबन्धस्थान प्ररूपणा समाप्त हुई। अल्पवहुत्व ३४२. अल्पबहुत्व तीन प्रकारका है जघन्य, उत्कृष्ट और जघन्योत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे तीन आयु, वैक्रियिकषट्क और तीर्थकर प्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे अनुकृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आहारकद्विकके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे १. ता०प्रतौ 'बीह उ (अ) प०' इति पाठः । २. ता०प्रतौ 'एवमेक्केकस्स पदेसगुणगारो' इति पाठः । ~-~- -~~-~- N " जीवसमुदाहारे अप्पाबहुरं ३०६ संखेंजगुणा । सेसाणं सवपगदीणं सव्वत्थोवा उक्कस्सपदेसबंधगा जीवा। [ अणुक्कस्स- पदेसवंधगा जीवा ] अणंतगुणा । एवं ओघभंगो तिरिक्खोपं कायजोगि-ओरालियका०- ओरालियमि०-कम्मइ०-णस०-कोधादि०४-मदि-सुद०-असंजद-अचक्खुदं० - तिण्णिले.. भवसि०-अभवसि०-मिच्छा०-असण्णि-आहार-अणाहारग ति। णवरि ओरालियमिक- कम्मइ०-अणाहारगेसु देवगदिपंचग० सम्वत्थोवा उक्क० पदेस०० जीवा । अणुक्क०- पदेसबंध जीवा संखेंजगुणा। सेसाणं णिरयादि याव सणि ति एसिं असंखेंजरासीणं तेसिं एइंदिय-चणफदि-णियोदाणं च ओघं देवगदिभंगो। णवरि णिरएसु मणुसाउगमादी] याव सासण त्ति एसिं परियत्त-अपरियचरासीणं याओ पगदीओ परिमाणे संखेंजाओ तासिं पगदीणं ओघं आहारसरीरभंगो। एवं उक्कस्सगं अप्पाबहुगं समत्त । ३४३. जहण्णए पगदं । दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० आहारदुगं सव्वत्थोवा जह पदे बंधगा जीवा | अजह०पदे०० जीवा संखेंजगुणा । एवं याव अणाहारग त्ति संखजपगीणं सव्वाणं । सेसाणं पगदीणं णाणावरणादीणं सम्वत्थोवा जह०पदे- अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके वन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। शेष सब प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे रतीक हैं। उनसे अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। इस प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यञ्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाय- योगी, नपुंसकवेदवाले, क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असयत, अचक्षुदर्शनवाले तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, असंजी, आहारक और अनाहारक जीवोमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवाम देवगतिपञ्चकके उत्कृष्ट प्रदेशांके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अनुत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। शेष नारिकोसे लेकर संज्ञी मार्गणा तक जो असख्यात संख्यावाली मार्गणाएँ हैं उनमे तथा एकेन्द्रिय, वनस्पतिकायिक और निगोद जीवोमे ओघसे देवगतिके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि नारकियोमे मनुष्यायु आदिका सासादन- सम्बन्ष्टि तक तथा परिवर्तमान और अपरिवर्तमान जिन प्रकृतियोका बन्ध करनेवाले जीव संख्यात हैं उन प्रकृतियोका ओघसे आहारकशरीरके समान भन है। इस प्रकार उत्कृष्ट अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। ३४३. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे आहारकद्विकके जघन्य प्रदेशांके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अजघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। अनाहारक मार्गणा तक जिन प्रकृतियोका बन्ध करनेवाले जो सख्यात जीव हैं,उन सबका भग इसी प्रकार जानना चाहिए। अर्थात् जिन प्रकृतियोका किन्हीं भी मार्गणाओमे संख्यात जीव बन्ध करते हैं उनमे तथा जिन मार्गणाओका परिमाण ही सख्यात है,उनमे ओघसे आहारकशरीरके समान भङ्ग जानना चाहिए। शेष ज्ञानावरणादि प्रकृतियांके जघन्य प्रदेशोका १. तापनी 'ए[मि] असंन्जरातीर्ण इति पाठ. | २. ता प्रतौ 'एव उकत्सग समत्त' इति पाठ ।
. .. - ३१० महावंचे पदेसवंधाहियारे पंधगा जीवा। अजहण्णपदे०० जीवा असं०गुणा । एवं याव अणाहारग चि असंखेंजरासीणं अणंतरासीणं च सव्वेसिं च णेदव्यं । ३४४. जहण्णुक्कस्सए पगदं। दुवि० -ओपे० आदे०। ओघे० पंचणा णवदंस०-दोवेद-मिच्छ०-सोलसक०-णवणोक-तिरिक्साउ०-दोगदि - पंचजादि-तिण्णि- सरीर-छस्संगण-ओरा अंगो छस्संघ०-वण्ण०४ - दोआणु०-अगु०४-आदाउलो. दोविहा०-तस-थावरादिदसयुग०-दोगोद-पंचंतरा० सव्वत्थोवा उक०पदे०५० जीवा । जह०पदेसबं० जीवा अणंतगु० । अजहण्णमणुक्कस्सपदेस० जीवा असंखेंजगुणा । णिरय- मणुस-देवाउ-णिरयगदि-णिरयाणु०. सन्चथोवा उक्क०पदे०० जीवा । जह०पदे०७० जीवा असं०गुणा । अजहण्णमणुकस्सपदेच. जीवा असं०गुणा । देवगदि०४ सव्वत्थोवा जह पदे०७० जीवा । उक०पदे०५० जीवा असं०गु० । अजह०मणु०पदे०७० जीवा असं०गुणा। आहारदु० सम्वत्थोवा जह०पदे०५० जीवा । उक्त पदे०० जीवा संखेंजगुणा | अज०मणु०पदे०० जीवा संगुणा । तित्थ० सम्वत्थोवा जह०पदे०५० जीवा । उक्क०पदेव जीवा संखेंजगु० । अजह०मणु०पदेच जीवा असंखें गुणा । बन्ध करनेवाले जीव सवसे स्तोक हैं । उनसे अजघन्य प्रदेशोका बन्ध करनेवाले जीव असख्यात- गुणे हैं । इस प्रकार अनाहारक मार्गणा तक असंख्यात राशिवाली और अनन्त राशिवाली जितनी मार्गणऍ हैं,उन सबमें जानना चाहिए। इस प्रकार जघन्य अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। ३४४. जघन्योत्कृष्ट अल्पबहुत्वका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । मोघसे पॉच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नौ नोकषाय, तिर्यश्चायु, दो गति, पाँच जाति, तीन शरीर, छह संस्थान, औदारिकशरीरआङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, वर्णचतुष्क, दो आनुपूर्वी, अगुरुलघुचतुष्क, आतप, उद्योत, दो विहायोगति, त्रस- स्थावरादि दस युगल, दो गोत्र और पाँच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके वन्धक जीव अनन्तगुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। नरकायु, मनुष्यायु, देवायु, नरकगति और नरकगत्यानुपूर्वोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यात- गुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। देवगतिचतुष्कके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । आहारकद्विकके जघन्य प्रदेशाके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुस्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। तीर्थङ्कर प्रकृतिके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजधन्य १. ता प्रतौ 'आपंचणा.' इति पाठः। २. आ०प्रतौ पचणा० तिसरीर छसठाण अगो' इति पाठः । ३. ता प्रतौ 'असंखेज्जगुणं (णा)' इति पाठः। ४ तापतौ 'देवाउणिरयाणुः' इति पाठः। ५. ता प्रतौ 'अनह. अ(अ)णुक० पदे००' इति पाठः।
जीवसमुदाहारे अप्पाबहुअं ३११ एवं ओघभंगो तिरिक्खोघं कायजोगि-ओरालियका०-ओरालियमि०-कम्मइका०-णस०- कोधादि०४-मदि-सुद०-असंजद-अचक्खुदं०-तिण्णिले०-भवसि०अभवसि० -मिच्छादि०- असण्णि-आहार०-अणाहारग त्ति । णवरि ओरालियमि०-कम्मइ०- अणाहार० देवगदि- पंचग० ओघ । णवरि संखेंजं कादच्वं । ३४५. णिरएसु छदंस०-बारसक०-सत्तणोक०-तिरिक्खाउ० सम्वत्थोवा उक्क०पदे० ५० जीवा । जह०पदे०० जीवा असंखेंजगु० । अज०मणु०पदे०७० जीवा असं०गु० । मणुसाउ० सम्वत्थोवा उक्क०पदे०व० जीवा । जह०पदे० जी० संखेंजगु। अजह०मणु०पदे०० जीवा संखेंजगु०। सेसाणं पगदीणं तित्थय० सव्वत्थोवा जह पदे०७० जीवा । उक०पदे०वं जीवा असं०गु० । अजह मणु०पदे०व० जीवा असं०गु० । एवं सत्तसु पुढवीसु । सव्वत्थोवा' 'संखेंज कादव्वं । ४४६. तिरिक्खेसु ओघं । पंचिंदियतिरिक्खि० सव्वपगदीणं सम्वत्थोवा उक्क०- पदे०५० जीवा । जह०पदे०व० जीवा असंखेंजगु० । अजह०मणु०पदेव जीवा असं०गु० । देवगदि०४ ओघभंगो। पंचिंदियतिरिक्खपञ्जत्त-जोणिणीसु पंचणा०- थीणगि०३-दोवेदणी० - मिच्छ० - अणंताणु०४ - इथि० - मणुसाउ-देवाउ-देवगदि०४- अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। इस प्रकार ओघके समान सामान्य तिर्यञ्च, काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी, नपुंसकवेदवाले, क्रोधादि चार कषायवाले, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, असंयत, अचक्षुदर्शनवाले, तीन लेश्यावाले, भव्य, अभव्य, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी, आहारक और अनाहारक जीवोमे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोमे देवगति- पञ्चकका भङ्ग ओघके समान है । इतनी विशेषता है कि संख्यातगुणे करना चाहिए। ३४५. नारकियोंमे छह दर्शनावरण, बारह कषाय, सात नोकषाय, और तिर्यञ्चायुके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यात- गुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। मनुष्यायुके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। शेप प्रकृतियोके तथा तीर्थङ्कर प्रकृतिके जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार सातों पृथिवियोंमें जानना चाहिए ।. .. ... संख्यात कहना चाहिए । ३४६. तिर्यञ्चोंमें ओघके समान भङ्ग है। पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्चौमे सब प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। देवगतिचतुष्कका भग ओघके समान है। पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च पर्याप्तक और पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च योनिनियोंमें पॉच ज्ञानावरण, स्त्यान गृद्धित्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी चतुष्क, त्रीवेद, मनुष्यायु, देवायु, १. ता.आप्रत्यो. 'असं०गु०' इति पाठः। २. ता आ प्रत्योः 'असखेजगु०' इति पाठः। ३. ता०प्रती सम्वत्योवा "रे सखेज' इति पाठः। " ३१२ महाबंधे पदेसबंधाहियारे समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुम्सर-आर्दै०-उच्चा० - पंचंतरा० सम्वत्थोवा जह०पदेव जीवा । उक्त पदे०७० जीवा असंखेंजगुणा । अजह०मणु०पदेव जीवा असंखेंज- गुणा । सेसाणं पगदीणं सव्वत्थोवा उक्क० पदे०२० जीवा । जह०पदेव जीवा असं० गु० । अजह०मणु०पदे०२० जीवा असं०गु | पंचिंदियतिरिक्खअपजत्त० सव्यपगदीणं सम्बत्थोवा उक्क० पदेव जीवा । जह०पदे०० जीवा असंखेंजगु० । अज०मणु०पदे०- 4. जीवा असं०गु० । एवं एइंदिय-बादरेइंदिय-विगलिंदियाणं तिण्णिपदा । पंचिंदिय- तसअपज० पंचकायाणं च ओघ पदा। वेसिं बादराणं ओघं पदा । बादरेइंदियपञ्जत्ता सव्वसुहुमपंचकायाणं चादरपञ्जत्तापञ्जत्ताणं तेसिं सव्वसुहुमाणं सव्वत्थोवा जह०पदे०- व जीवा । उक्त पदेव जीवा असंगुणा | अजह०मणुपदे०२० जीवा असं०गु० । किं कारणं जह०पदे० जीवा थोया ? सगरासिस्स असंखेजदिभागो जहण्णयं करेदि त्ति । मणुसाउ० ओघो। ३४७. मणुसेसु दोआउ-वेउब्धियछक्कं आहारदुगं तित्थ० ओघ आहारसरीरभंगो । सेसाणं सव्वत्थोवा उक्क० पदेव जीवा । जह०पदेय जी० असं०गु० | अजह.. मणु०पदेष जीवा असं०गु०। मणुसपजत्त-मणुसिणीसु सव्वपगदीणं सव्वत्थोवा देवगतिचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुगे है। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है । शेप प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव असख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोमे सब प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव अस- ख्यातगुणे हैं । इसी प्रकार एकेन्द्रिय, वाटर एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवोमे तीन पढोका अल्प- वहुत्व जानना चाहिए । पवेन्द्रिय अपर्याप्त, बस अपर्याप्त और पाँच स्थावरकायिकामे ओधके अनुसार पदोका अल्पबहुत्व है । उनके बादरोमै ओधके अनुसार पदोका अल्पबहुत्व है । बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त, सब सूक्ष्म पॉच स्थावरकायिक, बादर पर्याप्त और बादर अपर्याप्त तथा उनके सब सूक्ष्म जीवोमे जयन्य प्रदेशाके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं, इसका क्या कारण है क्योकि अपनी राशिके असंख्यातवे भागप्रमाण जीव जघन्य प्रदेशांका बन्ध करते हैं । मनुष्यायुका भङ्ग ओघके समान है। ३४७. मनुष्योमे दो आयु, वैक्रियिकषट्क, आहारद्विक और तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग ओघसे आहाग्कशरीरके समान है। शेष प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनियोमें सब प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशोके बन्धक - । १. आ प्रती 'जह पदे०० जीवा असखेजगुः । एवं' इति पाठः । २. ता०प्रतौ 'पद (दा) बादर- एइदियपज्जत्ता' इति पाठ.।
अझवसाणसमुदाहारे अप्पाबहुगं ३१३ जह पदे०५० जीवा। उक्त पदे०७० जीवा संखेंजगु० । अजह मणुपदे०७० जीवा संखेंजगु० । णवरि पंचणा०-छदंस०सादा०-बारसक०-सवणोक० जस०-उच्चा०-पंचंत. सव्वत्थोवा उक०प०० जीवा । जह पदे०७० जीवा संखेंजगु० । अजहमणु०- पदे०६० जीवा संखेंजगु० । मणुसअपज० णिरयभंगो। ३४८, पंचिंदिय-तसाणं देवगदि०४ सादाणं ओघं। सेसाणं पंचिंदिय- तिरिक्तभंगो। पंचिंदियपञ्जत्तगेसु थीणगिद्धि०३-असाद-मिच्छ-अर्णताणु०४-इथि०- णस०-देवगदि४-पंचसंठा-पंचसंघ०-पर उस्सा०-आदाउजो० - पसत्थ०-पज्जत्त-थिर- सुभ-सुस्सर-आदे०-णीचा० सव्वत्थोवा जह०पदे०७० जीवा। उक्त पदे०५० जीवा असं०गु० । अजहण्णमणु०पदे०७० जीवा असं०गु०। पंचणा०-छदंस०-सादा०-बारसक०- सत्तणोक०-चदुआउ०-तिण्णिगदि-पंचजादि-ओरालि० - तेजा०-क० - हुंड० - ओरालि०- अंगो०-असंप०-वण्ण०४-तिण्णिआउ०-अगु०-उप० - अप्पसत्थ०-तस-थावर-बादर-सुहुम- अपज्जा-पत्ते-साधार०-अथिरादिछक्क जसगि-णिमि० उच्चागो०-पंचंत० सम्वत्थोवा उक्क० पदे०७० जीवा । जह०पदे०५० जीवा असं०गु० । अजह०मणु०पदेपं० जीवा असं०गु० । आहारदुगं तित्थय० ओघं । एवं तसपञ्जत्तः । , जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। इतनी विशेषता है कि पॉच ज्ञानावरण, छह- दर्शनावरण, सातावेदनीय, बारह कपाय, सात नोकपाय, यश-कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्त- रायके उत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। मनुष्य अपर्याप्तका नारकियोंके समान भङ्ग है । ३४८, पञ्चेन्द्रिय और त्रस जीवोंमें देवगतिचतुष्कका भङ्ग ओधके समान है। शेष प्रकृतियोका भङ्ग पञ्चेन्द्रिय तिर्यचौके समान है। पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकोमें स्त्यानगृद्धित्रिक, असाता- वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, देवगतिचतुष्क, पॉच संस्थान, पाँच संहनन, परघात, उच्छास, आतप, उद्योत, प्रशस्त विहायोगति, पर्याप्त, स्थिर, शुभ, सुस्वर, आइय और नीचगोत्रके जयन्य प्रदेशोका बन्ध करनेवाले जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोका बन्ध करनेवाले जीव असंख्यातगुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंका बन्ध करने- वाले जीव असंख्यातगुणे हैं । पाँच ब्रानावरण, छह दर्शनावरण, सातावेदनीय, बारह कषाय, सात नोकयाय, चार आयु, तीन गति, पॉच जाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन, वर्णचतुष्क, तीन आयु, अगुरलघु, उपघात, अप्रशस्त विहायोगति, त्रस, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, अस्थिर आदि छह, यश कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके वन्धक जीव असंत्यातगुणे हैं। आहारकद्विक और तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग ओषके समान है। इसी प्रकार सपर्याप्तक जीवोमें जानना चाहिए । , महाबधे पटेसबंधाहियारे ३४६. पंचमण-तिण्णिवचि० मणुसग० -देवग०-वेउचि०-तेजा-का-वेउवि०- अंगो०-दोआणु० सम्बन्थोवा जह०पदेव जीवा । उक० पदेष जीवा असं०गु०॥ अजह०मणु०पदेय जीया असं०गु० । आहारदुगं तित्थयरं ओघं । सेसाणं सव्य- त्थोवा उक्क०पदेव जीवा । जह०प०० असं०गु० । अजह०मणु०पदेव जीवा असं०गु०। यचिजोगि०-असचमोसवचि० सव्वपगदीणं सम्वत्थोवा उक्क०पदे०- पं० जीवा। जह०पदे०७० जीवा असं०गु० । अजह०मणु०पदेव जीवा असं गु० । आहारदुर्ग तिथ० ओघं । ३५०, कायजो०-ओरालियका०-ओरालियमि० ओघमंगो। वेउब्धियका० देवोघं। वेउब्बियमि० छदसणा-यारसक०-सत्तणोक० सव्वत्थोबा उक्क०पदेष जीवा । जह०पदेष जीवा असं०गु० । अजह मणु०पदेय जीवा असं०गु० | एवं सब्ब- पगदीणं । णवरि मणुसगदि-मणुसाणु०-उचा० सम्वत्थोवा जह०पदे०५० जीवा । उक्क०पदेष जीवा असंगु । अजह०मा०पदेष जीवा असं०गु० । तित्थ० सव्वत्थोवा उक०पदे०७० जीवा । जह०पदेव जीया संखेंजगु० | अजह०मणुक०- पदेव जीवा संखेंजगुणा । आहारकायजोगीसु सब्बपगदीणं सव्वत्थोवा जह०पदे०- पं जीवा । उक्क०पदे०५० संखेंजगु० । अजह०मणु०पदे०व० जीवा संखेंजगु० । ३४६. पॉच मनोयोगी और तीन वचनयोगी जीवामे मनुष्यगति, देवगति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग और दो आनुपूर्वीके जघन्य प्रदेशाके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशांके बन्धक जीव असख्यातगुणे है । उससे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशांके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भग ओषके समान है । शेय प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेश के बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है। वचनयोगी और असत्यमृपावचनयोगी जीवोमे सब प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक है । उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे है । आहारकद्विक और तीर्थङ्कर- प्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। ३५० काययोगी, औदारिककाययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीवाम ओघके समान भङ्ग है। वैक्रियिककाययोगी जीवामे सामान्य देवोके समान भङ्ग है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवामे छह दर्शनावरण, बारह कपाय और सात नोकयायोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार सब प्रकृतियोंकी अपेक्षाअल्पबहुत्व जानना चाहिए। इतनी विशेपता है कि मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। तीर्थङ्कर प्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीच संख्यातगुणे है । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं । आहारककाययोगी जीवोमे सब प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य , जीवसमुदाहारे अप्पाबहुरं ३१५ आहारमिस्स० वेउनियमिस्स भंगो। णवरि संखेंजगुणं कादव्वं । कम्मइग० सव्वपगदीणं सव्वत्योवा उक्त पदे०० जीवा । जह०पदेब जीवा अर्णतगु० । अजह०मणु०- पदे०वं जीवा असं०गु० । देवगदि०४ ओघ । णवरि संखेंजगुणं कादव्वं । तित्थयरं वेउन्वियमिस्स भंगो। ३५१. इत्थिवेदगे पंचणाणावरणीय-थीणगि०३-सादासाद०-मिच्छ०-अणंताणु०४- इत्थि०-णस०-चदुसंठा-पंचसंघ०-पर-उस्सा०-आदाउजो०-पसत्य-पज० - थिर-सुभ- सुभग-सुस्सर-आर्दै०-दोगोद-पंचंत० सम्बत्थोवा जह०पदे०५० जीवा । उक्त पदे०५० जीवा असं०गु० । अजह मणु०पदे०व० जी० असं०गु०। सेसाणं सव्वत्थोवा उक्क०पदेय जीवा । जह०पदे० जीवा असं०गु० । अजह०मणु०पदे० असं०गु० । आहारदुर्ग ओघं । तित्थ० सन्वत्थोवा जह०पदेव जीवा । उक्क०पदे०- वं जीवा संखेंजगु० । अजह०मणु०पदेव जीवा संखेंजगु० । एवं पुरिसवेदगेसु । णवरि आहारदुगं तित्थ० ओघमंगो। णस० ओघ । णवरि देवगदि-वेउवि वेउबि अंगो०-देवाणु० सव्वत्थोवा उक्त पदेष जीवा । जह०प०० जीवा असं०गु० । अजह०मणु०पदेव जीवा असंखेंगु० । तित्थय० सम्वत्थोवा जह०- - . अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। आहारकमिश्रकाययोगी जीवोमें वैक्रियिक- मिश्रकाययोगी जीवोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि संख्यातगुणा करना चाहिए । कार्मणकाययोगी जीवोमे सब प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सवसे स्तोक हैं । उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव अनन्तगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । देवगतिचतुष्कका भङ्ग ओघके समान है। इतनी विशेषता है कि संख्यातगुणा करना चाहिए । तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोके समान है। ३५१. स्त्रीवेदी जीवोंमें पॉच ज्ञानावरणीय, त्यानगृद्धित्रिक, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चार संस्थान, पॉच संहनन, परघात, उच्छास, आतप, ज्योत, प्रशस्त विहायोगति, पर्याप्त, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, दो गोत्र और पाँच अन्तरायके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सवसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। शेष प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। आहारकद्विकका भग ओघके समान है। तीर्थकर प्रकृतिके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव संख्यातगुणे हैं | उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार पुरुषवेदवाले जीवोंमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि आहारकद्विक और तीर्थङ्करप्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। नपुंसकवेदवाले जीवॉमे ओधके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि देवगति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आलो. पाङ्ग और देवगत्यानुपूर्वाक उत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशांके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। तीर्थकर प्रकृतिके जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे --- महाबंधे पदेसबंधाहियारे पदेवं जीवा । उक्त पदेय जीवा संखेंजगुणा। अजह मणु०पदेब जीवा संखेंजगुणा। ३५२. कोध-माण-माय-लोभकसाईसु ओधभंगो। मदि-सुद० ओषमंगो । णवरि देवगदि०४ णिरयगदिभंगो। विभंग. देवगदि०४ सम्वत्थोवा जह०पदेष जीवा । उक०पदेव जीवा असं०गु० । अजह०मणु०पदे०२० जीवा असं०गु० । सेसाणं सबपगदीणं सव्वत्थोवा उक्त पदे०७०' जीवा | जह०पदे० जीवा असंखेंज- गुणा । अजहमणु० पदेय जीवा असंखेंजगुणा । ३५३. आभिणि-सुद-ओधिणाणीसुपंचणाणावरणीय-चदुदंस०-सादाचदुसंजल०- पुरिस०-देवाउ०-जसगि०-उच्चा०-पंचंत० सम्वत्थोपा उक्क० पदे०व० जीवा । जह.. पदे०५० जीवा असंखेंजगु० । अजह०मणु०पदेच जीवा असंखेंजगु० । मणुसाउगं णिरयभंगो। आहारदुगं तित्थ० ओघभंगो। सेसाणं सव्वपगदीणं सव्वत्थोवा जह०- पदे०५० जीवा । उक्त पदेष जीवा असंखेंजगु० । अजह मणु०पदेव जीवा असंखेंजगुणा । एवं ओधिदंस०-सम्मादि०-खड़ग-उवसम० । णवरि उवसम० तित्थय० सव्वत्थोवा जह०पदे०६० जीवा । उक्क०पदे०६० जीवा संखेंजगुणा । अजह०मणु०पदे०- पंजीवा संखेंजगुणा। उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुण हैं। ३५२. क्रोधकयायवाले, मानकपायवाले, मायाकपायवाले और लाभकपायवाले जीवामे ओघके समान भङ्ग है। मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोमे ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि देवगतिचतुष्कका भङ्ग नरकगतिके समान है। विभङ्गज्ञानी जीवामे देवगतिचतुष्पके जघन्य प्रदेशांके वन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशांके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है। शेप सब प्रकृतियाँके उत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव अमख्यातगुणे है। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। ३५३. आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोमे पॉच ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, चार संज्वलन, पुरुपवेद, देवायु, यश-कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदशोके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं । मनुष्यायुका भङ्ग नारकियोंके समान है। आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। शेष सब प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे है । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोमे तीर्थङ्करप्रकृतिके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव १. ता प्रतौ 'ससाण सन्वपगढीण सम्बत्योवा णं (१) उक्क०पदे०' आ०प्रतौ सेसाण सव्वपगदीण सवस्यावाण उक०पदे०२०' इति पाठः । २ आ. प्रतौ पचणाणावरणीय सन्वयोवा' इति पाठः। , जीवसमुदाहारे अप्पाबहुअं ३१७ ३५४. मणपजव० पंचणा०-चदुदंसणा०-सादावे-चदुसंजल-पुरिस-जसगि'- उच्चा०पंचंतरा० सम्वत्थोवा उक्क०पदेव जीवा । जह०पदेव जीवा संखेंजगुणा । अजहण्णमणु०पदे०० जीवा संखेंजगुणा। सेसाणं सवपगदीणं सव्वत्थोवा जह० पदेष जीवा । उकळपदेव जीवा संखेंजगुणा । अजह०मणु०पदेव जीवा संखेंजगुणा।एवं संजदा०सामाइ०-छेदो०-परिहार० सव्वपगदीणं मणपजव असादभंगो। णपरि सामाइ०-छेदो० चदुदंस-पुरिस-जसगित्ति० मणपजवभंगो । ३५५. सुहुमसंप० सव्वपगदीणं सव्वत्थोवा उक्त पदे०० जीवा। जह- पदे०व० जीवा संखेंजगुणा। अजहण्णमणु०पदेवं जीवा संखेंजगुणा । एवं अवगदवेदाणं पि। संजदासंजदेसु असाद०-अरदि-सोग-देवाउ० सव्वत्थोवा उक्कस्स- पदेसवंधगा जीवा। जहण्णपदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुक्कस्स- पदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । सेसाणं सन्चपगदीणं सव्वत्थोवा जहण्णपदेसबंधगा जीवा । उक्कस्सपदेसबंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुक्कस्सपदसबंधगा जीवा असंखेंजगुणा । असंजदेसु तिरिक्खोघं । णवरि तित्थयरं ओघ । एवं किण्णलेस्सिय- सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे। ३५५. मनःपर्ययज्ञानी जीवोमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संज्वलन, पुरुषवेद, यश कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव सवसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। शेष सब प्रकृतियोके जघन्य प्रदेशाके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सख्यातगुणे है । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार संयत जीवोमे जानना चाहिए । सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत और परिहारविशुद्धिसयत जीवामे सब प्रकृतियांका भनाभन.पर्ययननियोंमे कहे गये असातावेदनीयके समान है। इतनी विशेषता है कि सामायिकसंयत और छेदोपस्थापनासंयत जीवोंमे चार दर्शनावरण, पुरुषवेद, और यश कीर्तिका भङ्ग मन पर्ययज्ञानी जीवोंके समान है। ३५५. सूक्ष्मसाम्परायसंयत जीवोमे सब प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशांके बन्धक जीप संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार अपगतवेदी जीवोंमे जानना चाहिए । संयतासंयत जीवामे असातावेदनीय, अरति, शोक और देवायुके उत्कृष्ट प्रदेशीके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असख्यातगुणे हैं । शेप सब प्रकृतियोके जघन्य प्रदेशोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशाके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशांके बन्धक जीव असंख्यातगुण हैं। असंयत जीवोमे सामान्य १. ता०आ पत्योः 'पुरिस० उवसम० नसगिः' इति पाठः । २. ता प्रतौ 'चदुदंस० पुरिस.' इति पाठ. । ३, ता प्रतौ 'पवेसबधोवा (धगा) जीवा' इति पाठः । ४. ता प्रतौ 'उक्कस्स उक्कस्स (१) पदेस- बंधगा' इति पाठः। , ३१८ महावंधे पदेसबंधाहियारे णीललेस्सिय-काउलेस्मियाणं । णवरि किण्ण-णीलाणं तित्थयरं इत्थिभंगो। चक्खुदंसणी० तसपज्जत्तभंगो । अचक्खुदंसणी० ओघं । ३५६. तेउ-पम्मासु छदसणावरणीयाणं चारहकसायं सत्तणोकसायं सव्वत्थोवा उक्कस्सपदेसबंधगा जीवा । जहण्णपदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुक्कस्स- पदेसबंधगा जीवा असंखेंजगुणा । मणुसाउगं देवभंगो । देवाउगं ओधि भंगो। सेसाणं सव्वत्थोवा जहण्णपदेसवंधगा जीवा । उकस्सपदेसवंधगा जीवा असंखेजगुणा । अजहण्णमणुकस्सपदेसंबंधगा जीवा असंखेंजगुणा । ३५७. मुक्काए पंचणाणावरणीयाणं चदुदंस० सादा० चदुसंजल० पुरिस० जसगित्ति उच्चागोद पंचण्णं अंतराइगाणं च सव्वत्थोवा उक्कस्सपदेसबंधगा जीवा । जहण्णपदेसबंधगा जीवा असंखेंजगुणा। अजहण्णमणुकस्सपदेसबंधगा जीवा असंखेंज- गुणा । दोआउ० देवभंगो । सेसाणं सव्वत्थोवा जहण्णपदेसवंधगा जीवा | उक्स्स- पदेसबंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुकस्सपदेसबंधगा जीवा असंखेंजगुणा । ३५८, भवसिद्धिया० ओघं | अभवसि०-मिच्छादि०-असण्णि० मदिभंगो। वेदगसम्मादिट्ठी० सव्यपगदीणं सुव्वत्थोवा जहण्णपदेसबधगा जीया । उक्कस्सपदेस- तिर्यञ्चोके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। इसी प्रकार अर्थात् असंयत जीवोके समान कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले और कापोत लेश्यावाले जीवांमे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि कृष्ण और नील लेश्यावाले जीवोमे तीर्थङ्कर प्रकृतिका भङ्ग स्त्रीवेदी जीवोके समान है। चतुदर्शनवाले जीवोम त्रस पर्याप्त जीवोके समान भङ्ग है । अचक्षुदर्शनवाले जीवोमे ओघके समान भन है। ३१६ पीत और पद्मलेश्यावाले जीवोमे छह दर्शनावरणीय, बारह कषाय और सात नोकपायोके उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे जघन्य प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे है। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। मनुष्यायुका भङ्ग देवोंके समान है । देवायुका भङ्ग अवधिज्ञानी जीवोके समान है। शेष प्रकृतियोके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुस्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। २५७. शुक्ललेश्यावाले जीवोम पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संचलन, पुरुपवेद, यश-कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव सबसे स्तोक है। उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुस्कृष्ट प्रदशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। दो आयुओका भङ्ग देवोके समान है। शेप प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशांके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुण है। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। ३५८. भव्य जीवोमे ओघके समान भङ्ग है। अभव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञो जीवोमें मत्यज्ञानी जीवोंके समान भङ्ग है। वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोमें सब प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशोके " जीवसमुदाहारे अप्पाबहुअं ३१६ वंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुकस्सपदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । एवं सासण-सम्मामि० । सण्णीसु पंचणा०-चदुदंसणा-सादावे०-चदुसंज०-पुरिस- जसगिचि-उच्चागोद-पंचंतराइगाणं च सव्वत्थोवा उक्कस्सपदेसवंधगा जीवा । जहण्ण- पदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुक्कस्सपदेसबंधगा जीवा असंखेंज- गुणा । एवं चदुण्णमाउगाणं णाणावरणभंगो। आहारदुर्ग तित्थयरं च ओघं। सेस- पगदीणं सव्वत्थोवा जहण्णपदेसबंधगी जीवा । उकस्सपदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । अजहण्णमणुकस्सपदेसवंधगा जीवा असंखेंजगुणा । एवं एदेण वीजेण चिंतेदूण णेदव्वं भवंति । आहार० ओषो । अणाहार० कम्मइगकायजोगिभंगो । एवं अप्पावहुगं समचं । एवं जीवसमुदाहारे त्ति समत्तमणियोगद्दारं । एवं पदेसबंधो समत्तो। एवं बंधविधाणे ति समत्तमणियोगद्दारं । एवं चदुविधो बंधो समत्तो। णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवमायाणं णमो लोए सव्वसाहणं ।। MAP वन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके वन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । उनसे अजघन्य अनुस्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिय्यादृष्टि जीवोमें जानना चाहिए । संज्ञी जीवोंमे पॉच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चार संज्वलन, पुरुषवेद, यश कीर्ति, उच्चगोत्र और पॉच अन्तरायके उत्कृष्ट प्रदेशोंके वन्धक जीव सक्से स्तोक हैं । उनसे जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशीके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । इसी प्रकार चार आयुओका भड्न ज्ञानावरणके समान है। आहारकद्विक और तीर्थकर प्रकृतिका भङ्ग ओघके समान है। शेष प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशोके बन्धक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट प्रदेशोके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । उनसे मजघन्य अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । इस प्रकार इस वीजपदके अनुसार विचार कर ले जाना चाहिए । आहारक जीवोंमें ओघके समान भङ्ग है। अनाहारक जीवोंमें कार्मणकाययोगी जीवोके समान भङ्ग है। इस प्रकार अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। इस प्रकार जीवसमुदाहार अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। इस प्रकार प्रदेशवन्ध समाप्त हुआ। इस प्रकार वन्धन अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। इस प्रकार चार प्रकारका वन्ध समाप्त हुमा। अरिहन्तोको नमस्कार हो, सिद्धाको नमस्कार हो, आचार्योंको नमस्कार हो, उपाध्यायोंको नमस्कार हो और लोकमें सव साधुओंको नमस्कार हो । १. आ प्रती 'साटावे. पुरिस०' इति पाठः। २ ता. प्रतौ 'पदेसबंधं समत्त' इति पाठः।