Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Nagdaman

Mulchandr · 2010/12

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भारतीय विद्या मन्दिर ग्रन्थमाला
६
नागदमण

भारतीय विद्या मदिर ग्रंथमाला
६
मन्दिर
विद्या
शोध
बीकानर
परामश मण्डल
यौनरोत्तमदास जी स्वामी, एम ए
श्री गभूदयाल जी सक्सेना, साहित्यरत्न
यो अक्षयघद्र जी शर्मा एम ए
श्री नापूराम जी खहगायत, एमए
यो रामेश्वरप्रसाद भी पाडिया, एम ए
श्री चद्रदान जो पारण एम ए

नागदमण
[डिंगळ कृष्ण-भक्ति-साहित्य का सुमधुर काव्य ]
सम्पादक
मूलचाद 'प्राणेश', साहित्यरत्न
सोपसहायक, मा० वि०म० गोय प्रतिष्ठान,
बीकानेर
are
ROM
भारतीय विद्या मन्दिर शोध प्रतिष्ठान
बीकानेर बापान ]

भारतीय विद्या मविर प्रन्यमाला-६
सम्पादक
भी मूलघाव 'माणे, साहित्यरत्न
आवरण शिल्पी
थीमाशाराम गोस्वामी
प्रथम सस्करण भा० स० १८८८, १९६६ ई०
मूल्य ५००
प्रकाशक
भारतीय विद्या मदिरोष प्रतिष्ठान,
बीकानेर [राजस्थान
मुद्रक
एनाल प्रेस, बीकानेर

विषय-सूची
आभार
प्राक्कथन
सम्पादकीय
भूमिका
२
१५
૧-૧૨
खर १
प्रथम अध्याय
मूला सांयाजो ग्यक्तित्व और कृतिरव
द्वितीय अध्याय
मागवमण का कपाश्रोत तया कविको मौलिक उद्भावना
तृतीय अध्याय
नागवमणकी माषा और व्याकरण
चतुप अध्याय
भागबमण का साहित्य सौष्ठव
२१
३६
सर २
मागरमण : मूल पाठ, महत्वपूण पाठमेर, माप एवं मावाप
परिशिष्ट
रामापानी साहिरप में नागामण प्रता

आभार भारतीय विद्या मन्दिर प्रय माला का छठा पुष्प पाठकों की सेवा में सहप प्रस्तुत है । इस प्रकाशन मे राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग एव परम वणव साहित्यानुरागी श्रीमान गिरपरवास जी मूपड़ा द्वारा उदारता पूर्ण प्रदात भाषिक सहयोग के लिए हम उनके बडे मामारी है। वष्णव भक्ति साहित्य पर सस्था का यह पहला प्रप है । आशा है इसी प्रकार भविष्य में भी सस्था अपने शुभचिंतकों व सहायकों के सहयोग एव सहायता से उपयोगी प्रयों का प्रकाशन करती रहेगी। मूलचन्द पारीक रजिस्ट्रार भारतीय विद्या मदिर, मौकानेर प्राक्कथन कालिय और क्त को दुरभिसधि के कारण आये दिन अनमण्डल में नये-नये उत्पात हो रहे थे । जन धन को अपार क्षति हा रही थी। सारे भूमाग में क्षोम को लहर दौर रही थी । जनता हार्थों में तलवार लिए दुष्टों का बलन करने के लिए सनद पौ । भगवान कृष्ण ने उनका नेतृत्व किया । अनमण्डल की कृषि और गोधन को समृद्धि के लिए यह मावश्यक हो गया कि विषधर कालिय का त काल मान किया जाय । एक दिन कदुक-कोटा के निमित कृष्ण ने लिय को उसके घर मे जा ववाया । पुरान सारे वर चुका दिय । इस पौराणिक माश्यान को कवि सांपासूला ने मापा और भाव दोनों दृष्टियों से मोनिक रूप में माध्यामि व्यक्ति दी है। काम्य सोदय और शीगत गेयताओं पर भूमिकाकार मोर सपादक महोदय ने विशद प्रकाश डाल दिया है, मेरे लिए कुछ कहने को शेष नहीं रहा है । रचनामार ने समसामयिक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों भोर मावश्यकता के परिप्रेज्य मे इस कृति का सजन किया है और वह इसमे पूर्ण सफल हुआ है। साधना के एक एक शार से ममि- मत्रित यह काव्यकृति पुरातन काल से कवि की कोति का कसा रही है, मोर मान की बदली हुई परिस्थितियों में भी यह हमे दुष्टों का बलन करने की बराबर प्रेरणा दे रही है । अत्याचारियों , गर्व को घूर कर बन खोदन को निरापद करने की यह शौर्य पूर्ण गाया लौकिक साहित्य की ममर-निधि है और इसीलिए इसे पूरी मेहनत के साथ सम्पादित कर साहित्य जगत के हाथों में सौंपा गया है । प्रिय यो मूलघाणे' ने डिगल भाषा और साहित्य को मार प्रवणता और उसके प्यारण के मम को समझकर आधुमिक साहित्य के विद्वानों के लिए कृति को अधिक से अधिक उपयोगी बनाने को घेष्टाहो है। वह हम सबके सादाद के पात्र हैं। हमें इस बात का गर्व और हप है कि इस महत्वपूर्ण काव्य प्रप को मयेर में प्रसारित करने का श्रेय गोध प्रतिष्ठान को प्राप्त हुआ है। माग है, विज पाठक इसका पूरा पानद उठा पायो । स्थ्यनारायण पारीक अध्यक्ष मा दिम गोष प्रतिष्ठान, बोकानेर आभार । भारतीय विद्या मन्दिर प्रप माला का छठा पुष्प पाठकों को सेवा में सहप प्रस्तुत है । इसके प्रकाशन राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग एव परम व साहित्यानुरागी श्रीमान गिरधरवास भी भूपड़ा वारा उदारता पूर्ण प्रदत्त मार्थिक सहयोग के लिए हम उनके बड़े मामारी हैं। घष्णव भक्ति साहित्य पर सस्था का यह पला प्रप है। आशा है इसी प्रकार भविष्य में भी सस्था अपने शुचितकों व सहायकों के सहयोग एव सहायता से उपयोगी प्रपों का प्रकाशन करती रहेगी। मूलचन्द पारीक रजिस्ट्रार भारतीय विद्या मंदिर, मौकानेर प्राक्कथन कालिय और कस को दुरभिसधि के कारण आये दिन प्रजमण्डल में नये नये उत्पात हो रहे थे। जन धन की अपार क्षति हो रही यो। सारे भूभाग भै क्षोम की लहर दौड रहो यो । जनता हाथों में तलवार लिए दुष्टों का बलन करने के लिए सन्नद्ध यो। मगवान कृष्ण ने उनका नेतृत्व किया । अनमण्डल को कृषि और गोधन को समृद्धि के लिए यह पावश्यक हो गया कि विषघर कालिय का तत्काल वमन किया जाम । एक दिन कदुक क्रीडा के निमित्त कृष्ण ने कालिय को उसके घर मे जा दवाया । पुराने सारे बर का दिये । इस पौराणिक माहयान को कवि साया मूसा ने भाषा और भाव दोनों दृष्टियों से मौलिक रूप में काण्यामि- व्यक्ति दी है। बाध्य सौंदय और शलोगत विशेषताओं पर भूमिकाकार और सपादक महोदय ने विद प्रकाश डाल दिया है, मेरे लिए कुछ कहने को दोष नहीं रहा है। रचनाकार ने समसामयिक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों और आवश्यकता के परिप्रेष्य में इस कृति का सर्जन किया है और वह इसमे पूर्ण सफल हुआ है । साधना के एक एक शब से मि- मश्रित यह बास्यति पुरातन काल से कवि की कीर्ति का कलश रही है, मोर माज की बदली हुई परिस्थितियों मे मो यह हमें दुष्टों का दलन करने को वरावर प्रेरणा दे रही है । अत्याचारियों के गर्व को सूर कर बन जीवन को निरापद करने की यह शोध पूरा गाया लौकिक साहित्य को अमर-निधि हैं और इसीलिए इसे पूरी मेहनत के साथ सम्पादित कर साहित्य सात के हायों में सौंपा गया है । प्रिम भी मूलचर प्राणेश' ने डिगल भाषा और साहित्य को माय प्रवणता और उसके व्याकरण के मम को समाप्तकर आधुमिल साहित्य में विद्वानों के लिए कृति को अधिक से अधिक उपयोगी बनाने की चेष्टाको है। वह हम सबके साधुवाद के पात्र हैं। हमें इस हाताव और हर्ष है कि इस महत्वपून काय प्रय को भये रूप में प्रकाशित करने का श्रेय पोय प्रतिष्ठान को प्राप्त हुआ है। पागा है, विश पाठक इसका पूरा मानव उठा पायगे । सत्यनारायण पारीक अध्यक्ष मा दिमशोष प्रतिक्षाम, कामेर आभार भारतीय विद्या मंदिर प्राय माला का छठा पुष्प पाठकों की सेवा में सहप प्रस्तुत है । इसके प्रकाशन मे राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग एव परम वणव साहित्यानुरागी श्रीमान पिरपरवास मी मूषगवारा उदारता पूण प्रवत्त मार्षिक सहयोग के लिए हम उनके पडे आमारी हैं। वणव भक्ति साहित्य पर सस्था का यह पहला प्रय है। माता है इसी प्रकार भविष्य में भी सस्पा अपने गुपितकों व सहायकों के सहयोग एव सहायता से उपयोगी ग्रन्थों का प्रकाशन करती रहेगी। मूलचन्द पारीक रजिस्ट्रार भारतीय विद्या मदिर, मोकानेर प्राक्कथन कालिय और कस की दुरभिसवि के कारण आये दिन प्रजमाल में नये नये उत्पात हो रहे थे । जन धन को अपार क्षति हो रही थी। सारे मूमाग में सोम की लहर दौड रहो यो । जनता हापों मे तलवार लिए दुष्टों का बलन करने के लिए सनद पो । भगवान कृष्ण ने उनका नेतृत्व किया । अजमण्डल को कृषि और गोधन को समृद्धि के लिए यह पापक हा गया कि विषधर कालिय का तत्काल नमन किया जाय । एक दिन कटुक-क्रीडा के निमित्त कृष्ण ने कालिय को उसके घर मे जा वाया । पुराने सारे वर चुका दिये । इस पौराणिक मापान को कवि सायाला ने मापा और भाव दोनों दृष्टियों से मौलिक रूप में काव्यामि- व्यक्ति की है। काव्य सौंदर्य और शलोगत विशेषतामों पर भूमिकाकार और सपादक महोदय ने विशव प्रकाश डाल दिया है, मेरे लिए कुछ कहने को शेष नहीं रहा है । रचनाकार ने समसामयिक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों मोर आवश्यकता के परिप्रेक्ष्य में इस कृति का सजन किया हैं और वह इसमें पूर्ण सफल हुआ है । साधना के एक एक शब से पमि- मत्रित यह पापकृति पुरातन काल से रवि को कीति का कला रही है, मोर माज को बदलो हुई परिस्थितियों में मो यह में दुष्टों का दलन करने को र प्रेरणा दे रही है । अत्याचारियों के गव को घूर कर बन जीवन को निरापद करने की यह पोय पूण गाथा लौकिक साहित्य की अमर-निधि है और इसीलिए इस पूरी मेहनत के साथ सम्पावित कर साहित्य जगत के हार्यों में सौंपा गया है । प्रिप थो मूलपादप्राणे' ने गिल भाषा और साहित्य को भाव. प्रवणता और उसके व्याकरण के मन को समसकर माधुनिक साहित्य के विद्वानों के लिए कृति को अधिक से अधिक उपयोगी बनाने की चेष्टा की है। यह हम सबके साधुवाद के पात्र है । हर्षे इस बात का गव और हप है कि इस महत्वपूर्ण काश्य प्रन्य को भये आप में प्रकाशित करने का श्रेय गोष प्रतिष्ठान को प्राप्त हुआ है। आ है, विज्ञ पाठक इसका पूरा मानव उठा पायेंगे। सत्यनारायण पारीक अध्यक्ष मा दिम शोष प्रतिष्ठान, मोहानेर सम्पादकीय शोध प्रतिष्ठान द्वारा सचालित साताहिक साहित्य गोष्ठी मे एक दिम गिल भाषा और साहित्य विषय की पर्चा चल रही पी । प्रतिष्ठान के तत्कालीन सघाला श्रीमान अक्षयच द्रजी शर्मा एम ए ने गिल काव्य पर कर्ण कटुता एव बुरुहता का आरोप लगाने वाले व्यक्तियों को अल्पमता पर तरस खाते हुए प्रस्तुत 'मागदमण को भोर उनका ध्यान आकृष्ट पिया तथा साप ही इस कृति का सुपर ग से सम्पादन करके प्रकाशित करवाने को मारता मी प्रकट की और इसके सम्पादन का काम मुझे सौंपा। 'मागदमण' गिल भक्ति साहित्य को एक उत्कृष्ट कृति होने के कारण भक्त एक कवि को अपने सक्लनपों (गुदरों ) में इसका सकलन करते हो ये पर साय ही समान में इस काम का उपयोग सदिय निवारणार्य झार मात्र) के रूप में होने के कारण जन सामाप भी इस कृति को अपने पास सुरक्षित रखने का प्रयास करता था। राजस्थान प्रात में मागदमण को गताधिक प्रतियों का उपलम्प होना इस बात का प्रबल प्रमाण है। प्रस्तुत सम्पादन का काय प्रारम्भ परने पर पुणे मागवण' की सामग तीस प्रतियों के अवलोकन रासोमाग्य प्राप्त हुमा ! पाप प्रतियो स. १७१०वि० से लगा कर स १९९० वि० सक को मलब अवधि में विभिन्न पक्तियों द्वारा लिखित एक सुरक्षित थी, फिर भी उन प्रतियों में पर्याप्त रप से पाठ साम्म दृष्टिगोचर हमा। यदि उनमें कोई मस्तर था वह या तो प्रतिलिपिकार द्वारा अपने मानव द्वारा विनिर्मित शैली के कारण प्रतीत हुमाया पिर दोष ननों के स्थान पर सरलीकरण की प्रवृत्ति के कारण ! मत उक्त समो उपला प्रतियों ने पाठान्तर देकर पृष्ठमार एव समय के दुरुपयोग से बचने के लिए उनमें से केवल छह मतियों को मूत-पाठ एव पाठ-मेको हष्टि से चुना गया। छहों प्रतिया उपयुक्त समी प्रतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं । इनका सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- 'क' प्रति हस्तलिखित प्राति स्थान-~ी बद्धमान ज्ञान भण्डार, बीकानेर । अनुलिपिकार-वोहरा रामचन्द्र। अनु लिपि पाल-स० १७१७ यि० माद्रपद कृष्णा ८ शनि । अनुलिपि स्थान-जतारण 'ख' प्रति हस्तलिखित मासिस्थानी मारतीय विद्या मन्दिर शोष प्रतिष्ठान, बीकानेर । अनलिपिकार--मयेन कुगळा अनुलिपिकाल-स० १७५२ वि० द्वितीय भाषाढ़ शुक्ला १२ अनुलिपिस्पान-बीकानेर ( अनु० ) .' प्रति हस्तलिखित प्राति स्थान~यी खजाची फ्ला भवन पुस्तकालय, बीकानेर । मनुलिपिकार--सज्ञात अनलिपिकाल-स० १८०९ वि० रोप फुटणा ७ गुण अनुलिपि स्यान- अज्ञात 9 प्रति हलिखित प्राति स्थान-श्री अमय जन प्रमालय, बीरानेर । अनुलिपिकार-५० गुणमेन गपि तमिप्य ५० यशोलाम मुनि मलिपिकाल-~-० १७१० मि० मागशीष शुक्ला ५ मोम अनुलिपिस्यान -धो पेशलमेरु (जसलमेर ) ४' प्रति मुद्रित मासिस्थान-राज्य करि लखपीरात्मज हम्मीरदान, पालणपुर । सम्पादक~मोतोमर फुलोसन श्री हमीरदान मुद्रणकात-16 वीं शताब्दी की तीन प्रतियों के आधार पर स० १९८९ वि० में मुद्रित 'प्रति हस्तलिखित माति स्थान-धी अभय जन प्रयालय, बीकानेर । अनुलिपिकार-~-मात पलिपिकाल-१९ यो गतामी का पूर्वाद (मन) अनुलिपि स्यान-मजात २ मूल पाठ को प्रति सम्पादनाय निर्वाचित छहों प्रतियों मक' प्रति प्राचीन एव सपन की दृष्टि से शुद्ध होने के कारण इस प्रति का मूलपाठ मे उपयोग किया गया है। यद्यपि प्रतिलिपि के कालझम से प्रति सभी प्रतियों से प्राचीन है , पातु मादि माग र चौथोम पद त्रुटित होने के कारण इसको मूत पाठ का आधार नहीं बनाया जा सका। पाठ भेद की प्रतिया पाठ गेद लिए निर्वाचित प्रतियों को प्रतिलिपि के कानमा नुसार न रखकर पाठ दोनिस्टतम स्थिति के अनुसार रखा गया है। पाटभेद अकन पाठ भेद कप मे प्रतिलिपिशारों के शलीगत विभेद को भक्ति नहीं किया गया है । वल उही पाठों को पाठ भेद के रूप में स्वीकार किया गया है जिसके द्वारा या तो मूल शाम के स्वरूप को पुष्टि होती हो या मिनये द्वारा अयगत विशेषता प्रगट होती हो। उत्त छहों प्रतियों में से जिन प्रतियों में एम या अधिक छद उपलब्ध होते हैं उन्हें पथास्थान 'नहीं है' 4 टा. पा०' ये सक्त द्वारा दिखाया गया है। शैलीगत विषमताओ का परिहार (B) रास्यानक प्रतिलिपिकारों के द्वारा संयुक्त या स्वतत्र एप प्रयुक्त इमार' या ईकार' सवत्र दोघं लिखने की परम्परा रही है इसी प्रकार रायुरा मा स्वतन हप से प्रयुक्त 'उफार' या उकार को हस्व लिखा गया है। परतु मूलपाठ में उक्त दोनों स्वरों का छद अपवा ध्यारण अनुसार जिस स्थान पर जसा रूप होना चाहिए, कर दिया है। (आ) राजस्थान के कई प्रतिलिपिकारों ने ' के स्थान पर '' लिसा है पर तु मूलपाठ में उसे ही स्वीकार किया है। पथा-'मो के स्थान पर चुनो' न लिगकर उसे ऊमो' ही लिखा गया है। (5) रास्यान के प्राय प्रतिलिपिकारों ने 'ड' या' के स्थान पर सबन हो लिया है इसी प्रकार 'ल' या ळे के स्थान पर सवा 'ल हो लिया है। परतु मूत्रपाठ में उमे ध्वनि के अनुसार '' एवं'ळ' कर गिया गया है। (इ) राजस्थान र समो प्रतिलिपिकारों ने सानुनासिक पनि एप अनुस्वार को प्रकट करने के लिए सर्वत्र शिरोविदु (मस्ते) का प्रयोग किया है । अत मूलपाठ मे मो उसे ग्यों कर क्यों स्वीकार कर लिया गया है। (३) राजस्थान के कई प्रतिलिपिकारों द्वारा अनुनासिक वर्षों से पूर्वके पण पर शिरोबिदु (मस्ते का प्रयोग दृप्लिीघर होता है। परतु मूल- पाठ में उसे स्वीकार नहीं किया गया है । यथा---'मुण या राणी' को 'म' बाराको' न लिखार 'मुज' या राणो' हो लिखा गया है। (अ) नागदमण को कई प्रतियों में 'औ स्थान पर 'अ' एप 'ऐ' के स्थान पर अह' का प्रयोग भी दागने मे आया है, जो छ- विधान के मनुसार उपयुक्त नहीं है । अा मलपाट में उक्त दोनों स्थानों को यदि वे शब्द के मत में प्रयुक्त हुए हैं । वेदान सोधन या तिरस रवाची बों को छोका तो उनको सयत्र 'ओ' या 'ऐ' लिखा गया है और यदि ये पस के मध्य में प्रयुक्त हुए हैं तो उन्हें यया स्थिति 'ओ' या 'ओ' एवं 'ए' या 'ऐ' लिखा गया है। आलोचनात्मक अध्ययन आलोचनात्मक अध्ययन मे जिन जिन सदभ प्रथों ए३ जिन जिन महानुभावों के अमिमत का उपयोग किया गया है, उन सब का पास्थान पाठ टिप्पणियों में उल्लेख कर दिया गया है। हिदी भावाय हिदी मायाप लिखते समय मूल गादों में निकटतम ध्वनित अप पर ही अधिक बल दिया गया है तथा धनी ओर से कल्पित शम्दा पालो का कम से कम प्रयोग किया गया है। यदि किसी स्थल पर शन्दाय ठीक होने पर भी कोई माव अस्पष्ट रह गया है तो वही उसे 'अर्थात् करके मुस्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है। आवरण पृष्ठ का चित्र आवरण पृष्ठ पर अफित विनों में से मध्य भाग का चित्र महोवर से प्राप्त एव जोधपुर के सरदार म्यूजियम में सुरक्षित गुप्तकालोन स्तूप, हसरे दाहिने मागवाला चित्र मद्रास में प्राप्त प्राठवी तादी को कांस्य भूति एवं दा मागवाला चित्र माधुनिक लोला प्रकन को, सरल रेलानुकृतियां हैं। इस प्रकार प्रस्तुत कृति को अधिr से अधिक उपादेय एव बोध- गम्प पनाने का प्रयत्न किया गया है। इस पफल मनाने में नोष प्रति- प्ठान के समान सपाला श्रीमान सत्यनारायणजी पारीफ एम ए के मूल-पाठ की प्रति सम्पादनाय निर्वाचित छहा प्रतियों में क' प्रति प्राचीन एवं लेपन की दृष्टि से युद्ध होने के कारण इस प्रति का मूलपाठ मे उपयोग किया गया है । यद्यरि प्रतिलिपि के कालका से घ' प्रति सभी प्रतियों से प्राचीन है , परतु जादि माग चौबीस एद त्रुटित होने के कारण इसको मूल पाठ का आधार नहीं बनाया जा सका। पाठ भेद की पतिया पाठ गेद लिए निर्वाचित प्रतियों को प्रतिलिपि के कालनमा नुसार न रसकर पाठ दो निकटतम स्थिति के अनुसार रखा गया है। पाठ भेद अकन पाठ भेद के रूप में प्रतिलिपियारो के शैलीगत विमद को प्रकित नहीं किया गया है । पवल उही पाठों को पाठ भेद के रूप मे स्वीकार किया गया है जिनके द्वारा या तो मूल शन के स्वरूप को पुष्टि होती हो या जिनफ द्वारा अयगत विशेषता प्रगट होती हो। उक्त छहो प्रतियों में से जिन प्रतियों में यम या अधिक छद उपलब्ध होते हैं उहें यथास्थान 'नहीं है' 4 '० पा०' पे सकत द्वारा दिखाया गया है । शैलीगत विपमता का परिहार (ग) राजस्थान के प्रतिलिपिकारों के द्वारा संयुक्त या स्वतत्र रूप से प्रयुक्त 'इकार' या "कार को सवत्र दोघं लिखने की परम्परा रही है इसी प्रकार सयुक्त या स्वतन रप से प्रयुक्त 'उफार' या कार' को हस्व लिखा गया है। पर तु मूलपाठ में उक्त दोनों स्वरों का छद अपया प्यार तुसार जिस स्थान पर जसा रूप होना चाहिए, कर दिया है। (आ) राजस्थान के कई प्रतिलिपिकारों ने ' के स्थान पर '' लिखा है पर मूलपाट में उसे ही स्वीकार किया है । यथा-'मो के स्थान पर युनो' न लिखकर उसे ऊमों' ही लिखा गया है । (E) राजस्थान के प्राय प्रतिलिपिकारों ने 'ड' या 'र' के स्थान पर सय ''ही लिखा है, इसी प्रकार 'ल' या ळ के स्थान पर सवय 'ल' ही स्सिा है। पर तु मूलपाठ में उसे पनि के अनुसार '' एवळ कर दिया गया है। (ई) राजस्थान के सभी प्रतिलिपिकारों ने सानुनासिक ध्वनि एप अनुस्वार को प्रकट करने के लिए सवत्र शिरोविदु (मस्ते) का प्रयोग किया है । मत मूलपाठ मे मो मे ग्यों का यो स्वीकार कर लिया (3) राजस्थान के कई प्रतिलिपिकारों द्वारा अनुनासिक यों से पूरे पए पर शिरोपितु (मस्ते का प्रयोग दृष्णिोघर होता है। परतु मूल- पाठ मे उसे स्वीकार नहीं किया गया है । यथा ~~'मुण'पा राणो' को 'मणे' वाणी' न लिपर 'मुण' या राणी' हो रिखा गया है। (2) नागदमए वो कई प्रतियों में 'औ' में स्थान पर 'अ' एप '' के स्थान पर अह' पर प्रयोग भी देखने में माया है, जो छ- विधान के अनुसार उपयुक्त नहीं है । अत मुला म उक्त दानों स्वरों को यदि ये गान के त म प्रयुक्त हुए हैं (यत सबोधन या तिरसारवासी गनों को छोटकर ) तो उनको सपत्र 'ओ' य?'' लिखा गया है और यदि व ना के मध्य में प्रयुक्त हुए हैं तो उन्हें यथा स्पिति 'भा या 'ओ' एय 'ए' या हे लिखा गया है मालोचनात्मक अध्ययन आलाचनात्मक अध्ययन मशित जित सभ-प्रचों एक जिन जिन महानुभावों के अमिमत का उपयोग किया गया है, उन सब का यथास्पान पाद टिप्पणियों में उल्लेख पर दिया गया है। हिदी भावार्य हिंदी मायाय लिखले समय मूल पदों निकटतम ध्वनित अप पर हो अधिक बल दिया गया है तथा अपनी ओर से कल्पित गाठा वाली का कम से कम प्रयोग किया गया है। यदि किसी स्थल पर पदार्थ ठीक होने पर भी कोई भाव आपट रह गया है तो यही उसे 'अर्थात् करके सुस्पष्ट करने का प्रयल किया गया है। आवरण पृष्ठ का चित्र मावरण पृष्ठ पर अस्ति चित्रों में से मध्य भाग का चित्र मडोवर से प्राप्त एष जोपपुर के सरदार म्यूजियम में सुरक्षित गुप्तकालोन स्तूप, इस बाहिने मागवाला चित्र मद्रास में प्राप्त प्राठवी तादी की कांस्य भूति एष या भागाला चिन्न माधुनिक लोसा प्रकन की, सरल रेखानुकृतियां हैं। इस प्रकार प्रस्तुत कृति को अधिक से अधिक उपादेप एव चोप- पम्प पनाने का प्रयत्न पिया गया है। इसे सफल बनाने में गीय प्रति- प्यान के समान सघाला धीमान सत्यनारायणी पारीफ एम ए के निगेन, श्री रोत्तमदास जी स्वामी एम ए, श्री उदयरामी उज्यल, भी घर दानजी चार एमए थी बद्रीप्रसादजी सापरिया श्री सूयशफरजी पारीक और धो पुरुषोत्तमजा मनारिया के सुझावों एव श्री अमय जन प्रथालय, बोपानर के सचालक श्री अगरच दजी नाहटा, यो खजाची फ्लामवन पुस्तकालय सानेर के सवालक श्री मोतीचदजी सनांची, थी अनुप सस्कृत पुस्तकालय, बीकानेर में श्री बाबूरामजी सक्सेना और प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के उपसचालक श्री गोपालनारायणजी बहुरा के सहयोग का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । एतदथ में उन समी महानुभावों का आभारी है। अत मे मैं राजम्यान वालमारतो के प्रिंसिपल श्री रामेश्वरप्रसाद जी पांडिया एम ए का विशेष रूप से कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने समयामाव की स्थिति में भी समय निकालकर प्रस्तुत ग्रप को विद्वत्तापूर्ण भूमिका लिखने का पष्ट किया है। -मूलचन्द प्रारणेश भूमिका सामा मूला इत नाग दमण १७वीं गता में लिपो डिगल साहित्य को उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है । साया र धारण दधि थे। आपको ईडर राज्य में राज्याश्रय प्राप्त था । बाल्यकार मे हो आपकी रचि भगवद्भक्ति में जागृत हो चुकी थी। मयस्था के साथ साथ इसका विकास होता गया । आपको अपनी प्रत्युत्पतमति तथा मति मारना के कारण तरफालान धारण तथा राजसमाज बडे सम्मान को दृष्टि से देखता था। चारण कवि श्री साया जो के लिखे दो अय उपल पहुए हैं'मणी हरण और दूसरा 'नाग दमण' नाग दमण की रचना रमणी हरण के पश्चात् हुई है । कवि ने इसको अपने जीवन के उत्तराद्ध में लिखा है। अत इसमें भाषा प्रांजल्य एप माप त्रौढ़ता का होना स्वाभाविश ही है। भारतीय साहित्य एष जन जीवन म राम और 7 इन दो प्रतित अवतारों का बड़ा महत्व है। निरा मोर मानाश हिदू जनता के जीवन में आशा एव उत्साह का सचार करने हेतु मनोयो मगमगात कवियों ने इन दोनों अवतारों के बोयन को रजत एव लो मगल कारी विविध लीलाओं का चित्रण अपने काव्य में किया है । कृष्ण की लीलाओं में नाग दमण, नाग लोला, सालोय दह नाला अथवा कमल लीला का विशेष महत्व है। इसका यणन भागवत पुराण, विष्णु पुराण, पम पुराण, हरिया पुराण एव ब्रह्मवयन पुराण म मो प्राप्त होता है। विकी दृष्टि विलक्षण होती है। इन विमिन स्थलो स प्रा मासामग्री को प्रहण कर वह अपने युग के मालोक मे उसमे अमिध्यन करता है। हिरी मेंप्रपर कालिय दमन लीला को अयनारणा कृपण नौला के अमर गायक महावि सूरदास क गीतों में हुई । नाग दमण तारा से हिदी तथा गुजराती के अनेक पथि प्रभावित हुए और इहान मुस्तार से इस कया प्रसो लेकर भनेक गीत गाए । नरसी मेना सरदार ५ समकालीन पविथे । उहोंने मो इस लोला का हृदयस्पनी चिनग किया है। शताब्दियो अतीत के माधार मपिता हो गई, रितु परमो मृत नाग- रमण के गीत आज भी लोगों को मान पर सुने जाते हैं। साया जी यगय भक्ति धारा से सरक्षित गुनराक ही सपूत थे । उनको नाम रचना मान भी यहा के लोक कठों मे समायी हुई है । माग दमण की गणना सडकाव्य के अतगत आती है । प्रयष काध्य अथवा खड काव्य के प्रारम्भ में मगलाचरण एक काप परम्परा रती है । मगला चरण तीन प्रकार के होते हैं । (१) नमस्कारात्मक (२) आशीर्वादात्मक एय (३) यस्तुनिर्देगात्मक । इस काव्य का प्रारम्म भी निम्नलिसित पक्तियों से होता है- वळ वो सादर वरणवू ,सारद करी पसाय । पवाडी पनगा सिर, जदुपति कीघो जाय ।। कवि मगलाधरण को प्रथम पक्ति में बुद्धि की अधिष्ठात्री मातेश्वरी गारवा से पारूप आशीर्वाद को याचना करता है ताकि वह कालिय नाग के सिर पर चढ़कर कृष्ण द्वारा किए गए युद्ध चरित्र का गान कर सके। दूसरी पक्ति कया वस्तु की ओर निदंग परती है। इसमें आशीर्वादात्मकता के साथ वस्तु निर्देशन भी है । अत इस पगलाचरण को माशीवारमा धातु निर्देशक मगलाचरण कहना ही उचित होगा । 'नाग दम' का कथानक पौराणिक है । इस पौराणिक कथा के माध्यम से कवि अपनी युगानुकूल मायनाओं को अभिव्यक्ति करता है । सांया मूला मुगल बादशाह अपवर के समकालीन थे । इतिहासकारों ने अकबर के शासनकाल को उत्तम बताने में कोई सकोच नहीं किया है। कार की दृष्टि से अकबर का पासा चाहे भव्य एव शानदार रहा हो, परतु सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से उत्तम नहीं कहा जा सकता । समाज गरीबी एय दय का शिकार था । तुलसीदास जी को पश्तियां भी यही पताती हैं- 'भिखारी को न भीख, न धाकर को चाकरी ।' दीन- इलाहो धम को स्थापना के साथ साय हिंदू संस्कृति का लोप होना प्रारम्भ हो गया था । मुगल बादशाहों द्वारा हिदू सस्कृति एव समाज पर गर्न न होने वाले इस पदाघात की ओर मपत कवियों का ध्यान गया और उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से सस्कृति उदार एव समाज कल्याण के गीत सुनाो प्रारम्म किए। भारतीय प्रामीण समाज मे पशु धन का यहा महत्व है। पशु धन मे मी गोधन का विशिष्ट स्थान है। समाज को सपनता तथा विपन्नता का मापदण्ड पशुमा पो सख्या हो है । मुगल शासनकाल में गौ हत्या का प्रचसन पा । उदार मुगल यादशाहों के गौ हत्या निषेधाज्ञाओं को अपहेलता मुगल सामतों द्वारा होती रहती थी । साया-मूला ने नाग दमण मे गौ महत्ता के प्रसग को काल्पनिक सृष्टि पर इरा पशु धन की रक्षा का स्पष्ट समेत क्यिा है । मागरानी को स्पम घोकृष्ण कहते हैं शि- .

. चव मात, भ्राता विहै घेन चारी, वहै आज ते नागणी मूझ वारी । सुरभी तणी नागणी ऊच मेवा, गळ मध्य याचा सुगे वह ग्रेवा ।। अध दिनागिनी मोक्ष दाधिनी गौ मा कृतिक स्वप को बताने के पाद करि कृष्ण से इस पशु के मापिय महत्व पर मोबाइलयाता है। गौ रस से क्या नहीं बनना ? अमेर तरह साध पगप तयार किये माते हैं । मज पेडे निधी मावा तो आज भी प्रशिद्ध है । दही दूध रावा ची मा सुखदाई, मठा घोदिया साइ सोहा मळाई । औद्योगिक विकास पा को आग पर भारत पर मुग में स्वांस ले रहा है, परतु कवि के समय का मारत गोबर युग में था। तत्कालीन सारे आधिक समाज का दावा कृषि पर ही निभर पा। हलक्षण का मुख्य साधन बल ही थे। इन सारी भारत गरी पृथ्वी का मार बल के पमों पर ही था। कवि गो के माधिक मह यकी चर्चा करते हए बलों की उपयोगिता पर प्रकाश डालता है। सवनी तणो भारि ले कघ प्रायो, जुयो नागणो ने हुनो गन्यु जायो। खळा हळा नागळा पाण खेती, अम नागणी हार में आय एती ॥ इस महत्वपूण गौधन को घराने की बारी घोरण को है और इसकी रक्षा करना वे अपना परमपम समझते हैं । कालिय नाग ने यमुना सारे जल को विधान र निशा है । इस पल 7 पान करने से गो बछडे सब मर जाते हैं । गौ हत्यारे इम लिय को मार कर गौओं को मधाना हो कृष्प अपना परम कर्त्तय ममरते हैं । इस काम के माध्यम से कवि परोक्ष रूपेण यही कहना चाहता है कि मत्राचारियों द्वारा मारी जाने वाली गौ या पशु धन का सरक्षण करना हर भारतीय कृष्ण का प्रथम कतथ्य है। इसके अतिरिक्त विष्णव भक्त है । इस क्या के माध्यम से पह अपनी मक्ति भावना का काम करता है । कृष्ण जीवन दी इस माधुर्य भरो मोजावी लीला का गान करना हो पवियालय है। प्राचीन साधाया पाश्रीपट से पाय के बना भेद लिए हैं । मुरप मे प्रवध और मुस्ता हैं । फयाबरको दृष्टि से प्राप काव्य को मो दो भागों में बाटा गया है। महा और सड काम्य । नागमण की रचना कृष्ण जीवन को एक विशिष्ट कारिप दमन की घटना को लेकर हुई है। मन इसको गणना पड य में ही करना समीचीन है। बोरगाथा काल मे रस प्रधान पा वाप्य को 'रामो' नाम से अभिहित किया जाता था 1 मराठी और डिंगर शाहित में एर 'दयाहा' माम काय प्रकार मी पाया जाता है। पाटा उस काय से पहते हे जिसम युद्ध चरित्र का गान हो । नाग दमण' रचना को मी पाहा की सजा दी जाती है । कवि ने मो प्रयारन मे इस चरित्र को पयारा सजा से अभिहित किया है- पवाडौ पनगा सिर, जदुपति कीघो जाय । पवाडा योर रस प्रधान काट्य होता है । वोर रस का स्थायी भाव उत्साह है । दवि की भक्ति मावायें इस काव्य में स्थान स्थान पर प्रस्ट हुई हैं । काव्य म भक्ति भावना के प्राचुर्य एव प्राबल्य को देखने से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि पवाडा' गायर अपने भक्त कवि को नहीं ववा सका है । भक्ति में गात रस रहता है । इस काव्य कथा को समाप्ति पालिय को बज योपिकाओं में घुमाकर, नद के मांगन में फिराने के साथ होती है ताकि यहां की रजस्पा से उसको देह विता दूर हो जाये- अर्थात् उसको मुक्ति मिले । इस प्रकार इस लघ कथा काश्य का पपयसान शात भाव के साथ होता है । प्राचीन आचार्यों ने काध्य की परिभाषा करते हुए रस को ही काव्य की आत्मा बताया है । नाग दमण भक्ति भायना से पूरित होते हए मी धीर रस प्रधान काव्य है ।आप के प्रारम्भ मे मगलाचरण करने के पश्चात् कवि दूसरे ही छद मे कृष्ण के साहसपूर्ण कार्यों को यार - प्रभू घणा चा पाडिया, दरय वडा चा दत । के पालण पोढिया, वे पय पान करत ॥ मत इस काथ्य को भक्ति भावना से प्ररित पवाडा बाध्य कहें तो कोई अनुचित नहीं होगा। काव्य की कथा का प्रारम्म माता यगोवा द्वारा सोये कृष्ण का गो धारण के लिए लगाने से होता है । कृष्ण और बाल- बाल हर्षित होपर जगल मे जाते हैं । यमुना के किनारे गौए घास पर रही हैं । सारा गोप समाज खेल खेलने को आतुर है । कृष्ण इस टोली के नायर है। चारों तरफ उत्साह और उमग का यातावरण है। देखते ही देखते दही गेडिये का खेल प्रारम्न हो जाता है । उत्साह में माकर खिलाने ने और सटोरा ( hit) लगाया और गेंद यमुना में जा पडी। यमुना महा पराक्रमो कालिय नाग का निवास है । गेंद उसके आवास में पहुष गई । यहाँ से गेंद लेकर आना साधारण पाम नहीं । सारा याल समाम स्तम्य एव येचन है । कृष्ण रे हृदय म बौराय जागृत हुमा । गोहत्यारे मालिप रो मारने का उपयुक्त अवसर जानार ये यमुना के नागपुर में कूद पडे । यहाँ से दही-गहिये पी समाधि तथा दूसरा खेल कृष्ण कालिप- पुत्र प्रारम्म होता है। कृष्ण के माग पुरा मे कूवते हा वातावरण में परिवतन पाता है । बाल सुलभ क्रीधा से उत्पन्न हर्षोल्लास का वातावरण विपाद और भम में बदल जाता है । इस घटना से बाल-बाल तथा नगर निवासिमों में जो खलबली मधो उसका प्रमापूर्ण धणन निम्नांकित पक्तियों में देखिए। जदूनाथ काळी समो वाय जोई, घणी भोम चाली चढी वात घोडे । ऊमा गाय गोवाळ मूरत आरं, हा हा कार हक्कार ससार सारै ।। यह दुखद समाचार माता यशोदा के कानों में मो पा । इसे मुनते ही मौके ममता भरे हृदय पर माघात पहुँचा । उसका दिल टूट गया, शारीरिक गति नष्ट हो गई। वह घाम से गिर पड़ी। चतुर सखियो घटनास्थल पर माता यशोदा को ले गई । यशोदा मे अधिक घलने की शक्ति अब कहाँ यो ? वह सो रास्ते में ही पक गई । कवि ने पुत्र-शोक से विह्वल माता यशोदा के विलाप का बड़ा ही मार्मिक वणस सुण्यो वात आघात माता सनेही, जसोदा ढळी रद्दळो खभ जेही । सवाहै सखी लार हाली सयाणी, रहावी विचाल यकी नद राणी !! x x x बिह लोचन नीर धारा बहती, कनयो कनयो यशोदा कहती। कालिंदी तणी आई लोटत काठ, गयो जाणि चितामणि रक गाठ ।। विप्रलभ या वियोग का काम्य मे बड़ा महत्व है । कवियों की मारमा वियोग वणन में खूब रमी है । भक्त कवियों मे सूर घोर लायसो तो अपना सानी नहीं रयते । आधुनिक कवि सुमित्रानदन पत मोवियोगी होगा पहिला कवि' कह पर शियोग का महत्व बताते हैं । दिपोग पणन एक ऐसा शवाल नाल है जिसमें अल्शन के बाद उससे निकलना मुश्किल होता है । साया एला सिद्धहस्त कवि हैं । हहोंने नागमण रचना मे पियोग थपन में हो तोन पर ही लिसे हैं । वियोग-वरएन इस काध्य में चाहे योग हो, परतु बो है वह बहुत ही प्रमायो पादक है । कवि की पुलता इसी में है कि मह वियोग के जजाल में अधिक न फस र कया को बडे स्थामा- विकह से भागे प्रदाता है । वह यमुना के कछार में खडे मर सलस मासा मोदा एवं गोप समाज से पाठक का ध्यान तुरत हटाकर यमुना में नाय पुलको मोर बाते धोकृष्ण की ओर खींच लेता है । कृष्ण यमुना मपन करते हुए नारा महस को मोर जाने विषाई देते हैं। यह देखकर सारा गोप समाज घबरा जाता है । कृष्ण के माता पिता सपा समी सखा लौट बामे को प्रायना करते हैं, परतु अत्याचारी कालिय को मारने की उत्कट इच्छा रखने वाल कृष्ण एक भी नहीं सुनते । वे गहरे पानी में पंठ कर नागराज के महल में पहुंच जाते हैं । महल मे नागराज सोपा हमा है। नागरानियां अपने कक्ष में बठी हैं । कृष्ण को यहाँ देख उसके अमलस्वरूप पर मुग्य हो जाती हैं । कृष्ण के लोकरजनकारो रुप चित्रण का इस काध्य में विगिष्ट स्थान है । नाग पस्नियां कृष्ण प वणन करती हई कहती हैं कि सु वर सलोने श्यामल रूपधारी कृष्ण के कान मुक्ता जटित कर्णामूषण से मुशोमित हैं । शरीर पर नगाचित पीताम्बर मोढ़े हैं। गले म मुक्ताहार, गुजमाल तथा केहरि नस बहुत ही सुदर लगते हैं । बाहुओं में बघ मणि युक्त याजूवध तया सुदर कीमती रत्नों से जटित मणिषध नागरानियों की दृष्टि घोर लते हैं । हाय को प्रगुली में पहिनी मरिफा उनके पिताषण का विशेष पेद्र है । नागरानियों के मुह से मामूषण यणन तत्कालीन सामाजिक वम एव नारी सुलम मामूपण प्रम का परिचायक है । आभूषण सौ दय वृद्धि का साधन है । वास्तविक सौ दय तो मनुष्य की आकृति एव मानसिक गुणों पर निभर करता है । कृष्ण धीरोदात्त एव दिरोचित गुणों से तो युक्त हैं ही उनके शारीरिक सौंदय का चित्रण निम्नांकित पक्तियों में देखिए । इस नासिका सिघ्य दीपक ऐरी, क्ली चप जाण लळी लप केरी। नवा नेह दीरध्य पक्कज नेत्र सोभा मीन सजन मृगा सहेन । कृष्ण ५ "याम सलोने रूम पर मुग्ध नागरानियां कृष्ण से उपस्थिति से विस्मिन हैं । कृष्ण के प्रति उनके हृदय मे सहानुभूति जागृत होती है। वे पूछती है ---अरे तू यहां कहां से भा गया, यहाँ क्या काम है? या दू रास्ता भूलकर सप क घर मा गया है ? हाय हाय माज यह बकरी बाध की गुफा मे वहां से चलो माई ? इस प्रकार नागरानियां बहुत समझाती है, राती हैं परतु कृष्ण बिल्कुल ही पथ विचलित नहीं होते । बडे आत्मविश्वास के साथ यह कहते हैं- में पयसे प्रतीक्षा में सराहू ।' हे नागिन | तुम जाओ और जल्दी ही नागराज को जगायो । मान हम यही मन्नास रचगे। युद्ध में हार-जीत तो भगवान के हाप हैं। युटयणन हिरीरे मादि-साहित्य की एक बहुत बड़ी विशेषता है। युद्धों का सजीव एष सांगोपांग चित्रण पोरगापा काल 27 अयत्र मिलना दुलम है । भक्त गवि साया जी ने प्रस्तुत रचना में युद्ध वर्णन को स्थान दिया है। युद्ध में विजय के महत्त्व का अनुभव कराने हेतु विशित केशीय और पराक्रम का दिवशन कराना नितान्त आवश्यक है । नाग दमण मे पद कृष्ण एव नागराज के बीच हुआ है। कवि ने नाराज के शोप का वपन नागरानियों के मुह से ही करवाया है- इसो आज ते कोण भूलोक आछ,काळी नागसू जुध्ध सम्राम काछ । चढेकूण काळी तणी सीम चाप,काळी नाग हू आज ही कस काप ॥ अपने पुग के महापराक्रमी योद्धा रसको कपा देने वाले कालिप माग को मीषणता का वणन तो अरपत वशनीय है। जाळ निस्स नीला बहै विरुख झाला,बदल सहस्स वधं व्योम व्याळा। वहा शृग सीतग हेमग वाळा, जिरी फूक आगे भर दूक फाळा !! इस दुदप भयानक नागराज को कौन जगाये ? कसे जगावे ? यह गमोर प्रश्न समी के सामने हो गया । आतिर नागरानी के अनुरोध पर स्वय कृष्ण ने मुरसीवादन शुरू किया | मुरली का स्वर स पाताल भेदो पर, उसका स्थर स्वग देवताओं को भी सुनाई पा! इस महानाद को सुनकर दुष्टों का हृदय कपायमान हो उठा। बज निवासी इस स्वर से अमृत मान करने सा । इस महा-मपानक सिधु राम को सुनकर मत्यात क्रोधित समस्त कणों को ऊधा उठाए, पुकार करते हुए मागरान सपने दरमार में माया और उसने कृष्ण को अपनी पूछ के पर कोटे में घेर लिया। इक टक करते कालिय में कृष्ण पर प्रहार रिले प्रारम्भ किये । कृष्ण के हाथ कालिय नाग को गदन के पास थे। वह एक गारी को तरह दिखाई देते थे। इस युद्ध को देखन सारा नाश समान एकत्रित हो गया । नागरानियो भी यहाँ उपस्थित थीं। कोई भी भारतीय नारी अपने सामने किसो अप पुरुष धारा पतिको अपमानित होते सपा पोटे नाते ए नहीं देख सकता । किसी पुरुष को उसको पत्नी के मामने अपमानित करना उस नारी निरादर करना है। इसी कारण पप्प पालिय को उसके दरवार से बाहर निकालकर यमुना के गहरे पानी में ले गए । वहाँ घोरण ने अपने प्रहारों से नाग को बुरी तरह घायल रिया--- मर्च मूठ मारा क्षरं श्रोण झारा, फणारा घणारा कर फूलकारा ॥ इस भवरवात मार को सहने की गति कालिय में न रहो । वह माननाद कर उठा । धोकृष्ण के प्रहारों से वह बेहोश हो गया मोर छोटो नाय की तरह पानी में तैरने लगा । कालिप एक अस्पापा काग पा। भयाबारी के मरने पर सुर, नर आदि समी को खुशी होती है ।

धीर काथ्य में धोकृष्ण के हाथ में कालिय नाग का सिर देखकर देवगण भी अपने रयों को रोक कर खडे हो गए। युद्ध-सामग्री का भो यहा महत्त्व है। कवि ने कृष्ण, रानी सवाद मे समरोधित सामग्री का भी वणन किया है। सालीन हय-दल पदल, एस्तीदल आदि का होना आवश्यक पा। इसके अतिरिक्त शरीर रक्षाय याजू बाद सपा बस्तर का भी महत्त्व पा। अनेकानेक स्त्रों का प्रयोग उस समय किया जाता था । नीचे की पक्तियों में कवि ने युट सामग्री मे अनेक शात्रास्त्र एव पायों के नाम बताये हैं । फिर डबरी सैय नाही फरस्सी कड चौल कट्टार क्स्सो न कस्सी। टकारी न भारी न अढारटाकी, पापण न बाण न कमाण बाकी। नफेरी न भेरी न निस्साण-नद्दा, रिणतूर बाज न गाज रवद्दा । अत उपयुक्त वणन के आधार पर यह तो निस्सकोच कहा जा सकता है कि कवि को युद्ध एव युद्धोधित सामग्री का ज्ञान पा । इसके साप साप यह कहने में भी सकोच अनुभव नहीं करना चाहिए कि कवि को मारमा कृष्ण कालिय द्वद्व युद्ध चित्रण मे अधिक नहीं रमी है । इसका मूल कारण समवत कवि का भरत होना है । मात कवि इस पर क्षण के लिए भी अपने पाराध्यदय को पष्ट में देखना नहीं चाहता । इसीलिए कालिय के प्रहार कृष्ण को पूल छडी की तरह मालूम हो रहे हैं। साया झूला प्रधानत भक्त कवि हैं । पद्यपि होंने प्रपारम से हो उत्साहपूर्ण वातावरण मे बालकृष्ण के चोय एष पराक्रमपूण कार्यों का चित्रण दिया है फिर भी समप्र प्रप का सम्यक अयलोकन करने के याद इसी निषय पर पहुंचते हैं कि शौर्य गान गायक कवि भक्त हृदय पर विजय नही पा सका । भरत कवि ने इस प्रय मे स्थान स्थान पर बाल प्रण पर देवत्व का मारोप किया है । प्राय के प्रारम्म में हो कण को प्रभु कहकर सबोषित किया गया है वह दूसरों को जीवन मरण के मुक्त कराने वाला है । अवनी भार उतारवा जाग्यो एण जगत्ति' कहकर कवि ने प्रप के प्रारम्भ में ही कृष्ण को अवतार मान लिया है। विसामा पत याला कृष्ण का वणन करते हुए पाठक को एक उत्साही पराक्रमी सपा वाक् धतुर पालक का परिचय देता है । यह परिचय देते देते कवि के अतमन में सोयो भक्ति भावना जागृत होती है और अनेक प्रागों को सप्टि कर बाल-कृष्ण के विरत्व की ओर समेत करता है। कष्ण रे बाल आप पर मुग्ध होकर नागरानियों ने सहानुभूतिया कालिय से पचाने के लिए अव कृष्ण को अपने महलों में छिपने के लिए कहा तो - स्वयं श्रीकृष्ण ने निम्नाक्ति पस्तियों में अपने आपको विराट् बताया है । रहा तो घरै दाव दूज रहावू , मोरो घाट वैराट एथे न मावू । कृष्ण पायिव रूप में तो मथुरा में रहते हैं परन्तु वास्तव में उनका नियास तो मतों के हृदय में है.~~'अमा भगता तगा एह मोरा' पत्तियों द्वारा गीता के इस प्रसिद्ध कपन की याद दिलाई है. 'नाह वसायिक मत हदये यसाम्यहम् ।' इसी प्रकार नागरानो सवाल, नागरानियों द्वारा कृष्ण पूजा, नारद द्वारा स्तुति गान आदि अनेक ऐसे प्रसङ्ग कृष्ण से देवरव की ओर सकेत करते हैं । सारा का सारा प्रय कवि की भक्ति-भावना से भरा पग है । प्रकृति चित्रण का काव्य में यहा महत्त्वपूर्ण स्थान है । कविगण हमेशा से ही प्रकृति की गोद में बैठार उससे प्रेरणा प्राप्त करते रहे हैं । प्रात , सध्या, सम, भद्र, नदी, जगत, पवत आदि मनेक प्राकृतिक उपकरणों के साथ अपना रागात्मक सम्बध स्थापित कर उनके विभिन्न स्वरूपों की अवतारगा कायारमाता के बदन मे सहायक होती है । प्रस्तुत रचना नाग-मण में कवि के सामने अनेक ऐसे अवसर मापे हैं जहां वह प्रकृति चित्रण कर सरता था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। प्रान गोवारण को माते समय या काल एव उगते सूप का बाल बाल के खेरते समय नगल का तथा यमुना नदी का थोडा बहुत चित्रण हो जाता तो मन्या पा । ऐसा प्रतीत होता है कि कवि के दृश्य मे प्राकृतिक सुषमा के प्रति कोई नाक यण नहीं है । कवि युद्ध सामग्री को परिगणना का अवसर तो नागरानी कृष्ण सवाद की रचनार प्राध पर लेता है, परन्तु प्रति वित्रणा सहज स्वाभाविक दर से अवसर प्राप्त होते हुए भी काटप रेस पक्ष को मोर ध्यान नहीं देता। भाषा प्रौढ़ता का निश्प उराशा सदिलष्ट स्वरूप है। पोहे से पारों में भावों को शोधकर रपना मादा पर पूर्ण अधिकार रापने वाले कवियों का हो जाम है । नागदमणET का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इसी कारण इस कार सवाद सौष्ठव एव न चित्रों को योगना को सफलता के साप बन पसे है । 'सादादला करती पम बेहो' में माना मोटा को कृषता एय गिरने का बहा सफल चित्रण है ! लिपो सो कम कमा हलास' को महावभी पढ़ो म माों के सामने गलने को आतुर बिसारियों का चित्र तो सिचता ही है, परतुहुल गाद का प्रयोग उनको मन रिपति रामो परिघायर है । सन्म कोस्यूल रूप हना आधुनिक युग के छापावारी कवियों की एक रिना रही है, परतु 1ो तानी में मार ने इसका कितनी बुशलता के साथ प्रयोग किया है, यह अष्टम है-'धणो मोम चालो चढ़ी बात घोड' में बात को प्रसरण गति मा चित्र सा पडा हो जाता है । इसी प्रकार 'पडो दोतजी भाग हो साथ पान ' में कृष्ण को सुकुमारता तथा कालिप नाम को मयानकता का चित्रण है । 'नारी गाठियो सूदुनो न खायों मे मा ध्यायात्मक मावों यो नदी दुशलता व साय यांधा गया है । हरी हो हो हो हरी धेन हाक' म गोमाको हारने का दृश्य उपस्थित करने में तो कवि ने कमाल दिखाया है। इसके अतिरिक्त सवा रचना में मी कवि को बढी सपलता मिली है। नीचे को पक्तियों में नारानी और कृष्ण के योष प्रश्नोत्तरकोषिए-- कठा हूँत बायो अठ काज केहा, ग्रहा भूलियौ वापरी साप गेहा । कृष्ण उत्तर देते हैं- भली नागणी नावियो राह रलो, देवो आपरी लाज लोधौ दडूलो ।। मागे फिर कृष्ण कहते हैं- खट्टर मु है नागणी बार खारी, प्रभू जागसी मूझ पाछा पधारो । नागिन फिर कृष्ण को समझाती हैं- माळी नाग स लीजिए बेगि कानोपड्यो तात सोझै चढे मात पानी। इस प्रकार घर स०३० से लेकर छद. ९३तक में सवालों की छटा भरी पड़ी है। एक ही पद में प्रश्न उत्तर, प्रत्युत्तर का सा-सा पथ जाता है । यह सब भाषा पर अमित अधिकार होने से हो सम्भव हो चित्रोपमता भी इस काव्य को अपनी विशेषता है । इस काग्य या प्रारम्म मी मगलाचरण चात शदधि से ही होता है। नीचे की पत्तियों म माता यशोदा द्वारा कृष्ण को उगाने, दधिमपन करने, सया मासा मांगने जैसी अनेक क्रियाओं का चित्रण देखने योग्य है । विहागू वाय जागो वला, यो दोदिवा घेनु गोवाळ हेला! जगार जसोदा यदुनाथ जागे, मही माट धूम, नवनीन मागे। अपने घर से प्रात पाल गौओं को निकालकर घोपान में सामा और परोलिए पालेको सपना पास्य ओवन को पनि प्ररिया है । बघि ने इसका बहुत ही सरोव एव मनोरम चित्र साँचा है। हरी हो हरी हो ही धेन हार, झस्सा चढी नदकुमार झारे । अहिराणिया मनला भूल आवै, भगवान न घेन गाया भळावै ।।

इको वेवटी चोवटै माय भी, सभाली लियो श्याम मोरी मुरभी। हुई नद री धेन मू धेन हेग, भिळ वाळवा जाणि भो गग भेळा ।। नाग दमण डिाल भाषा को रचना है। इटली के सुप्रसिद्ध भाषा वजानिक राजस्थानी मापा के अनय प्रेमी डॉतत्सितोरी ने इस भाषा को अनियमित, गवार तथा साहित्यशास्त्र का नुसरण करने यात्री नापा कहा था। नाग दमन में हिल इस स्वरूप को ?ने से उपयुक्त समी प्रतियों का निवारण होता है । पिद्वान सम्पारक ने इस पुस्तक के प्रथम में इस मापा का व्याकरण भी लिया है। प्रस्तुन रचना मे दियल भाषा का पहप बहुत ही प्रौद, नियमित, शिष्ट एवं व्याकरण स्त्र. सम्मत है। भुजग प्रयात छदा प्रयोग सस्त शव्य में बड़ी प्रचुरता के साप मिलता है । हिंगे कविता ने इस छ को यहीं से प्रान लिया है । डिल माया के कवियों ने सस्कृत के समावण धृतो रे सपनाया है फिर मी उनका सर्वाधिक झुकाव मुजगप्रयास को मोर हो रहा है। इसका कारण इस छद का गति गिदप्य है । साया जो ने इस छद का प्रयोग मायने इस पप में प्रारम्म से लेकर मत तक यही कुशलता के साथ दिया है। विगल के प्रसिद्ध अलकार धयणसगाई का निर्वाह परना कोई सरल काम नहीं है । यह तो सिद्धहस्त कवियों से ही सम्भव हो सकता है। पयोंकि इसमें भापा, छद, अलार तीनों पर समान सर से अधिकार होना पाहिए । नागदमण में इसका सुपर निर्वाह हुआ है । उदाहरणार्थ निम्नक्ति पद को देखिए- मध्यो दूपरो खेल खेलत माय हिव ऊतरी वात गोवाळ हाय । कर ग्रीन सडो नमतेय काना, जो धन पद्धीर काठ जमूना । उपयुक्त पद के प्रत्येर धरण मे प्रथम पद तथा अतिम का प्रारम्न एक हो यण से होता है । इस मण-मत्रो को हो डिगर कवि पण सगाई कहते हैं । देखने से पह अनुप्राम का हो एक भेद मालम रोता है । इसके अतिरिक्त उपमा उत्प्रेता, अनुप्राप्त मादि मलकारों का प्रयोग भी बरे सुदर ढग से किया है। साराशत नागदमण गौ-सरक्षण र सगवाहर, भाषा सारस्य, सगिलष्ट मापागलो, चित्रोपमता मयुर सगीतारमर घटा एय नाद- सौंदय से विभूषित हिल मापा । मदिन भावा से पूरित एक सरस पवास काय है। हिदी भाषा में साहित्य सजन का प्रारम्मत ७०० से शुरु हो गया था। इस १३०० वष की लम्बी अवधि में भाषा स्वरूप में मनेक परिवतन हुए हैं। डिंगल और पिंगल ये दोनों हिदी भाषा के आदि स्वरूप ही हैं । इस दौघकाल में नाय दमण जसे अनेक प्रौढ़ काय लिखे गए होंगे । उनमें से उचित ध्यान न दिए जाने के कारण अनेक रचना मतीत के गम में दबी पडी हैं । इन प्रयों को खोजकर साहित्य ससार के सामने लाना साहित्यदेवता तपा मां सरस्वती को सर्वोत्तम पूजा है । लग भग साढे तीन सौ साल पुरानी साया को कृत 'माग वमण' सो प्रौढ़ एव सरस रचना को सटीक सम्पादन के साथ साहित्यानुरागियों के समक्ष प्रस्तुत परने का प्रयास स्तुत्य एष अनुकरणीय है । इस प्रयास के लिए विद्वान सम्पादक श्री मूलचर जो 'प्राणेश' एव मा० वि० म सोप प्रतिष्ठान बधाई के पात्र हैं । प्रिंसिपल राजस्थान बाल भारती, रामेश्वर प्रसाद पाडिया बीकानेर एम० ए०, बी. ए.

खड १
झूला सांयाजी
कृत
नागदमण
आलोचनात्मक अध्ययन

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प्रथम प्रध्याय
झुला सांयाजी:
व्यक्तित्व एवं कृतित्व
राजम्यानो कृष्ण भक्ति साहित्य मे ला सायाजी का विशिष्ट स्थान है।
ये साल कवि होने के साथ साय भगवान कृष्ण के जय भक्त भी थे। इसी
wং মশা নির্যা ম মাল সকা সাবনা ব গ সময় বাম পাঠ
है । अत साक्ष्य के आधार पर पेवर स्वप के नाम तया स्वप के गुरुवय धी
गोविददासजी में नाम के अतिरिक्त जीधन सबधी पुज भी सामग्री नहीं
मिलती। यहि साभ्यस्वरूप सम्बधित ऐतिहासिक प्रया से अबरा प्रचलित
अनुतिया मे चुछ सामग्री उपलब्ध होती है, उसी के नापार पर निम्नास्ति
पक्तियों में भक्त कवि को जीवन हामी प्रस्तुत एरने का प्रयास किया जा
जन्म और वश-परिचय
भक्तपर झूला सायाजी पर जाम धारण कुल को झूला नामफाला के
अतगत वि० स० १६३२ भाद्रपद कृष्णा ९मी के दिन लोलछा नामर ग्राम में
हा । इनके पिता का नाम झूला स्वामीदासजी या । स्वामीदासजी लहर
नामक ग्राम के जागीरदार थे। यह प्राम गुजरेश्वर सोलको राजा सिद्धराज
जयसिंहजी की ओर से इनके पूर्वजों को मिला था।'
ग) समवाद कालोणा एह मारो
चवै दामासानु मायो चितारो{न दमए १०१२१
(मा) रण लोधो जिही निमोद सो दर की,
सादर राखियो त्याग न सुन्दरी --हक्मिणी हर छ० २१
गोविन्ददामी बासौ म गायो। ~मागतम १० १२१
लोलका मामा ग्राम गुगत प्रात प्रसिद्ध नगर डर से १२ मील पूर्व की
और इन्द्रासी नामर नदी के तट पर स्थित है।
"श्री हमोग्दान -नागमण (सायानी की जीवनी) o"

वात्यपाल एव भक्ति मसार पानी पापरात राहोर प्रतीत हो ।मा पिता दार सोपारण से ये भी निप प्रति भुवने पर मारेलमा जाते थे मोर भगवान भोलेनापशेपूना भया रिपाले थे। भनुमnिtir-मपनाप माप मेरी प्रदा एक मतिर पोगो में गोपालीको नदिया था। विद्याध्ययन-प्रभिरचि तया गुर पिताशपुर उपन सौपानी नारर विचारपनररो साप रियाय दिन जय पर की ओर जाहेपेतर शौमाग्य से इमरी भेंट गुलेमान मामर मुगर मान जमादार गे हो गई। पर यात्री रे प्पषिरय रोवता प्रभावित मा तपा मपने आप रहें रमे गया और बाह्मण पर इनर ाो पीने एक गनेशप्रमपररिया। मामा रिमनी रे freप गारमा गोपियानो हम दिनों in मनिवास परते थे।रपानि प्रभावितोपर यात्री मे गोविराराती बागियरप पर रोrिrup frया। पर नि अबसर रेगहोंने म. गोविन्दराजी राम राना विषार अगर रियाहोंने पानीको उपअमितापागार विपि मेरीक्षा प्रानीव नियमित रूप से नारत्रीय पापों साथ-साप पो महागपारि पुराणोंपा मम्माम परवाने सगे। राज्याश्रय एव राज्यसम्मान न सिर पर राठौर राप दोरमयनी (१६३५ १६५३ वि०) का शासन था।' राय पोरमदेवतो प्ररपेर पूर्णिमा रात्रि में स्वप से सम्बंधित पनि साम्य गुनाने वाले को पपसाय रियासरते थे। एर समय आतोमो नामा पारण र आये हुए थे । राव भोरमदेग्मी ने सहारा भांति लासपसापपीतयारीगर आलोजीको पुलवाया। मालोजी तथा सप पीरमदेवजी ये परस्पर सररार रो जाने से शरण आलोगो सारा र रापना इतिहाग पृ. १६८ म्यान में शाम को पार मे वी नया पाचरों गो लासपसार, करो पसाव और परवरमा ६ प में मश टी सम्पत्ति भेंट करने का प्रचला था, पर बाद में हा पमाओं का एक पधी बधाई परिपाटी, शनुगार मरणा (मुनि) पर दिया आता गा।

- मृत्य का पसाव नहीं दिया जा सका। राव योरमदेवजी ने सवाल क्सिी अस कवि को खाने का आदेश दिया जमादार गुलेमान उचित अवगर र मायाजी को खुला लाया ! सोमाजी की विलक्षण प्रतिमा देसवर राव बोरमदेवजो आश्चर्यान्वित हुए तथा उक्त लावपसाव के साथ साय रेहडा नामर ग्राम देकर विशेष सम्मानित किया। साथ ही ईडर मे इनका तम्बू बधया कर राज्याश्य भो प्रदान पिया। राव वोरमा इहें समय समय पर और मो अनेर प्रकार के दान देकर सम्मारते सम्मानित रहते थे जिनमें चवालीरा हजार सालाहर नामक घोडा तया रायपुर से लौटते समय एक हाथो और लालपसाव का दिया जाना अधिक प्रसिद्ध है। राब वीरमदेवजी की मृत्यु के उपरार इनके लधु भ्राता राव ल्याण- मलजी ईडर के शासक बने । य भी राव वीरमदेवजो की तरह भक्तवर सामाजी को अपार क्षा की दृष्टि से देखते थे। चार राव कल्याणमलजी स्वप छोटो सवारी से लोलशा पधारे मे।होंने भी राव वीरमदेवजी को तरह वि० स० १६६१ मे झूला सांगाजी को सातपसाव तथा पुरावा नामक प्राम शासन में देकर विशेष सम्मानित किया था। मतवर झूला सायरानी का भी रार कल्याणमलजी के प्रति अपार स्नह था। उनके द्रजवास के समम रावजी को लिखे गये गीतारमक पत्र के द्वारा ऐसा स्पष्ट ध्वनित होता है । यथा -- गीत सायाजी झूला रो कयोडो ॥ प्रथम दूहो।। मन धारै मळवाह, एच आवाय नही। भाडा ईडरियाह, काकड घणा किल्याणमल ||१|| ॥ गीत ॥ आस सर हो सदेश अमीणो, प्रज भाया किम बळिय । माम तिया सेहर सामरिया, मथुरा मळिये ॥ फारम त रासमाला का गुजराती अनुवार पृ०६६४ जम्यान शाता जब किसी यति का विसर प स गम्मानित करके दरार में बुलात थे तब वे स्वयं सम्मानित यहि से छोटी सवारी (वाहन) पर २ कर उसके पीछे पीर प्रसले भरिमेछोटी सवारी कहा जातामा !

भान ही अठमाई अगग, पर ही पाई दरिया। मोन रख मा राय मान, इंग्यिो ॥२॥ रमा गमागम (एररा अट रय) प्रथयी T घर भेटया तपी गावरमार, पहना पर frल्याणा ॥६॥ गोप प्रतिष्या-शुट पारिप सप पृ० १५३ इस गोगर पत्र प्रा शेत हा राय पस्यामामो भपिगम्य करमपुरारी मार प्ररपान पर रिया था, परन्तु मपुरा पापो से पूरी समानो गोलोगगन को दुगर या हें मिग मोराण माग गजार रिट राय।' पर पगा वि. स. १७०३ धावण मुरा२२ प्रात रात म पटिराई मानी जाता है। समास्य म उक्त पाना स स प पड़ाय की दूरी पर परित होगा मताया गया है जिसका मापार सम्मण गोतारमर पत्ररे हितोय वाले का मार पाठ रारा है। निराम- 'गग-नान परम गारंगुर, माय नो रिपा' पाट से गगा पापागो में होना सम्भावित मानार I पटना । मागी निकट होगा मान लिया गया है। परन्तु मा० मि. म. शोध प्रतिष्ठान द्वारा सपमित हस्तलिरित सामग्री रे भानगत गो गौतारमक पत्र प्राप्त हुआ है उसमग पाठ नहीं है सपा होना भी नहीं पाहिए । योकि डिगल के टोटे सागोर गीत बी यह एर पिता ही है रि-प्रथम डाले मे गित भाष पो हो भप्रिम दातों में गाद भेव से परिपुष्ट पिया जाता है । प्रतिष्टाारे सप लन द्वारा प्राप्त गीत में यह विशेषता उपसाप प्रत इसका पाठ अधिक विन्यास, परो योग्य है। इस पीतात्मर पत्र मे कवि सोयामी ने राय बोरमस्वगो को मधुरा हो पुलवाया है ।योनि बजवारा परो फ उपरात किस प्रसार अय स्थान को जाया जाय ? इसलिए गोवधनधारी को घर पर भेंटन + लिए ही मारू राय से प्रापना की गई है। 1 श्री हमीरदान - नादमण (सोयाजी की औग्नी) पु. ४ श्री मोतीलाल मनारिया राजम्यानी भाषा और साहित्य पृ० १७१-१७६ भावरी कृन रासमाला (गुजराती अनुवाद) पृ०६७० - मत कापी के पास उक्त घटना के घटित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जनमानस पर सायाजी का प्रभाव मक्त कवि मूला सांयाजी सदगृहस्य होते भो अपने जीवन काल में धमत्कारी सत माने जाते थे । इनके द्वारा गाय पर झपटते हुए पाय को श्रापित करक गधा बना देना, ईडर के सरोवर पर स्नान करते समय एक मगर को अजुलिदान द्वारा यक्ष का स्वरूप प्रदान कर देना, द्वारिका स्थित रणछोर जी के वस्त्रों में लगी हुई अग्नि को ईडर के परमार में बठे बठे बुमा देना इत्यादि चमत्कारपूर्ण अनुभूतिया उनकी लोकप्रियता के प्रवल प्रमाण इतना ही नहीं एक डिंगल कवि तो मूला सापांनी को भगवान से भी बढ कर मानता है तथा उनकी पूजा-अर्घा मे हो अपना कल्याण मानता है। यथा गीत साया झूलारो पावन मन तिसो भगता पण, अहडो सकव थय उदार । साइयो एकण वार साभळ , हर साभळं पार हजार | मामा मोह न लागो जे मन, गढवी तूझ लगी हर ग्यान । लीवा भायावत चै लाध, सहस नाम फळ एक समान ॥२॥ झूला राव इसो नित झील, किसन गगजळ समोकरि । वर दोघो एडवो लिखमीवर, भगत सहवं सास भरि ॥३॥ तू गोकळ घर रहे निरन्तर, रिदै तूझ चरण है रीत । गायस तू गढवी अभुवण गुण, गायस हूँ थारा गुण गीत ||४|| गोध प्रतिष्ठान- स्फुट साहित्य संग्रह पृ. १५२ झूला सायाजी की रचनाए भूसा सायानो की दो धार स्फुट पप रचनाओं के अतिरिक्त केवल दो काग्य प्राय उपलाप है- नागरपण और रुक्मिणीहरण । उक्त दोनों काय्य भगवान कृष्ण को पावन लीला स सबंधित है। माय माषा और गली- गत समो विशेषतामा + रहते हुए मो रचनाकाल के उल्लेख का अमान खटकता है । पालगर निवासी राप कवि लखपोरारमन हमारदानजी ने स्वसम्पारित नागरमण में हरिमणीहरण और नागदमण का रचनाकारत राव वीरमरेव जो देहायसान के उपरात राय कल्याणमल नो के द्वारा प्रदत्त रासपसाव से पूर्व माना है।' राब वीरमदेव जी का देहावसान विक्रमी सवत १६.३ में हुमा पा और राव पत्याणमल जी द्वारा सायाजी को वि०स० १६६1 मसात पसाव दिए जाने को मा यता है। इस मा यता के आधार पर [१६५३ स १६६१ वि० तक] पाठ वप का कवनकाल दहरता है। रश्मिणीहरण की भाषा गलो को देखते हुए तो उक्त काल को ठोर कहा जा सकता है, पर नागदमण को गालीगत प्रोता देखत हए, उचित प्रतीत नहीं होना। कारण कि उक्त क्वनकाल + समय मूला सापानी की माय [जम १६३२ वि.] पेवल १ वप वी पीतनी अला बय में नागदमण जसी प्रौढ रचना का रचा जाना सदेहास्पद है तथा आगे के जीवनकाल [मत्यु १७०३ वि.] मे हाय पर हाय परे बठे रहना कम माश्चयजनक नहीं है । नागमण का सजनल रिमगोहरण क साय मानने क पीछे उसको अकबर के दरबार में प्रस्तुत करने को प्रादि रही हो तो भी कोई अत्युक्ति न होगी। प्राचीन नास्त्रकार परीक्षा के अनुप मध्य युग के कवियों मे यह भावना पाई जाती है कि-वे भी अपनी रचनाओं को सत्तालोन गासक के सम्मुख प्रस्तुत कर उस पर सम्मति प्राप्त करें। साहित्य गत मे प्रवलित यह प्रवाद-यह [रश्मिणी हरण] मोर वेति दोनों प्राय एक साय वादगाह अरबर को मिरीपणाप मेजे गये। यादगाह ने पहले वलि को सुन कर हरण को सुना। पत में हरण की रचना की येष्ठतर निर्मात करके लेप और ध्याय मे पृथ्वीराज से कहा-"पृथ्वीराज तुम्हारी देलि को धारण यावा को हरिगिया चर गई।" मी परीक्षनीय है। 19ी हमीरदान-भागदमण [सायात्री की जीवनीपु० २५ श्री माहेश्वरी- राजम्पानी मापा और साहित्य पृ० १७७ भूयते च पारलि पुन शास्त्रकार परीक्षा । अापद वषाविह पाणिनि गिना- विह याडि दररधि पतंजली यह परीदिनाख्यातिमु नामु । राजरासर-कान्य मीमामा हा मानन्दप्रकाश दौदितवलि निसन इक्मिणारी भूमिका पु०३५ हरण को यादगाह प्रश्बर वा जीवनकाल १६.२ वि० तक माना गया है। लि रचयिता राठौर पम्वीराज जी १६५७ वि० मै बकुण्ठवासी हुए। उक्त प्रवाद में यादगाह अक्बर वेलिकार को उपस्थिति में अपना निणय देते है। इस से सिद्ध होता है कि उक्त घटना १६५७ वि० से पूर्व की ह । झूला साबाजी [जम १६३२] को आयु २१ २५ वप और राठौर पथ्वीराज [ज म १६०६] को आयु ५१ वष ठहरती है । यामाह अक्चर जैसा साहित्यममज्ञ एव व्यवहारकाल गासर एक प्रतिष्ठित प्रौड़ साहित्यकार एव प्रतरग मित्र की तुलना में एक नबोदित युवा रवि को बावा सम्बोधित परे, यह कुछ अटपटा सा लगता है, जबकि झूला सायाजी कोई साधु सयासी न हो पर एक सदगृहस्य युवक थे। मूला सायाजी कृत रश्मिणीहरण का काव्यसौष्ठव भी एक विवादात्मक प्रश्न है। राजस्थानी साहित्य ६ ममज १० थी मोतीलाल नो मेनारिया तया श्री सीताराम जी लालस नागदमण को तुलना में रश्मिणी एक साधारण अंगो का वर्णनात्मक प्रय मानते हैं, जिसम काव्यत्व का कहीं पता भी नहीं है। इधर श्री पुरुषोत्तमजी मेनारिया स्वसपादित हरिमणीहरण की प्रस्तावना म-प्रय भण्डारो म सापाजी वृत रुक्मिणी हरण की प्रतिपा बहुत कम मिलती हैं अत मालोचों को धारणाए स्पर न हो सकी-कारण बताते हुए 'यवि को दोना कृतियों में समान रूप से सफलता प्राप्त हुई है" मानते है। वस्तुत स्थिति एसी नहा है। रविमणी हरण कवि क युवाकाल धो रावप्रथम रचना है तया नागरमण प्रौढकाल को । अतएव यदि रुक्मिणीहरण मे नागदमण को सो सजीव र परिपुष्ट गली का अमाव पाया जाता है तो यह उपक्षणीय नहीं, उचित हो। मागरमण को सजीव-चिताक्षर गली ने परयः पर्याप्त मात्रा में प्रभावित किया है। अनेर चारण तया चार- पविषों ने अपने बाध्यायों मे नागवमण छ, को पोडे साय अपना लिया है । सब से बडी रोकप्रियता का उद। तो। पस्याणदास का नागदमन है। इस पर मै कवि, मूला साया जो कृत [अ] श्री मोती लाल मनारिया रा० मा० श्रार साहित्य पृ० १३३ [आ] श्री सीताराम लालम-राजधानी सरदलार माग १ भूमिका प्रकाशक-प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर श्रीमानदान नारट, ग्रामनगरी द्वार हरिरस के साथ प्रकाशित पृ० १४४ नागरमण के विशिष्ट कलात्मक द वि यासो को स्वीकार करते हुए उसी छद और उसी परिमाण का काम्य अपने नाम से प्रचारित करने का लोम सघरण नहीं कर सका है । उदाहरणाय पतिपय छदों का अवलोकन कीजिए सझ चद्रिका चदिवा सीस ता, जरी को दुपट्टो झल्का झगा । जडी लालर मू दडी रूप पुजा, गलं दूल्लडो तिल्लडी हार गुजा ॥४॥ मिलाइये छ० स० २६ हका किलक्का ग्वाल हल्ले बहला, हुव मात गादावरी गग हला ।। x x भले नदर धेनवा बाग टोळा, हले सिंधु ज्या नोर लेती हिलाळा ||१०-११॥ मिलाइये छ० रा०६७ उतसी छटा स्प वसी अधारो, प्रभू फूटरा स्याम पाछा पधारो। अडै अतरी पत हू ता अरोडो, जदूनाथ थारे किसो नाग जोडो ॥३२॥ मिलाइये छ० स० ३४-४० इत्यादि x द्वितीय अध्याय नागदमण का कथा-स्रोत तथा कवि की मौलिक उद्भावना नागदमण भगवान श्रीकृष्ण की बाललीला से सम्बधित एक चरित्र काव्य है । कालिय दमन का पत्तात-महामारत (समा ३८), हरिया (२ १२), ब्रह्म पुराण (१८५), श्री मदभागवत (१०१६) इत्यादि पौराणिक प्रया मे उपलब्ध है। इन सब मे 'श्री मदभागवतमहापुराणोक्त कालिय दमन लीला मुविस्तृत रूप से गणित है। यही प्रस्तुत नागदमण का क्या स्रोत है। इसी बहु प्रचलित कथा को मूला सायाजी ने अपनी काव्य प्रतिमा का मपुर द कर मौलिक स्वरूप प्रगन दिया है। मगवान श्रीकृष्ण तया कालिय नाग इस आएयान के विशिष्ट पात्र हैं। अपेक्षित विवेचन से पूर्व इन दोनो पर सक्षिप्त प्रकाश डालना अप्रासगिक न होगा। भगवान श्रीकृष्ण भारतीय साहित्य में कृष्ण का स्थान महत्त्वपूर्ण है । वृष्ण थे धरित का विस्तारक्षेत्र व्यापर है।' यद्यपि वेदों मे वासुदेव कृष्ण की चर्चा नहीं है, पर अवतारों मे सब से पहले उही की पूजा होने लगी थी। ईसा से कम से कम चार सौ थप पहले घासुदेव की पूजा चल पडी थी। धीरे धीरे वासुदेव और नारायण को एक ही समझा जाने लगा था। सनातन नारायण के चार अव तारों में एक अवतार कृष्ण भी प्रमुस है । विद्वान लोग कृष्ण के स्वरूप की प्राचीनता और ध्यापश्ता म सदेह प्रकट करते हैं। विटरनित्स पाडशे के सलाहकार कृष्ण पौराणिक कृष्ण, गीता उपदेशक कृष्ण को विभिन्न व्यक्ति मानते हैं। भारतीय विचारधारा श्रीमती पाठ- हरिवंश पुराण का सास्कृतिर विवचन पु०८ श्री चारण-अलविया सम्प्रदाय १० 3 द्विवेदी- साहित्य पृ० १ 'महामारत-१२ ३२१,८१० ।

पाश्चात्य विद्वानो के इस स देह को महत्व नहीं देती। इस विचारधारा के अनुसार कृष्ण के अनेक पापो का समावेश एक कृष्ण में हुआ है । प्रारम्भिक पुराणों में कृष्ण का अशावतार, उत्तर कालीन पुराणों में सोलह कला से युक्त पूर्णावतार हो गया है । कृष्ण चरित्र विमिन स्वरूपों का राम वय हो उत्तर काल मे उनके पूर्णावतार को जन्म देता है।' नागदमण का सम्य घ बालकृष्ण या गोपालकृष्ण से है। गोपालाण सबधी कपाओं का वणन हरिवंश और वायुपुराण में उपलव्य होता है। मागवत पुराण मे कस वध, पूनना तथा जय राक्षसो का यप आदि कथाओं का विन्तत वणन है । इनमें कसारि कृष्ण और गोपालकृष्ण को अमित समझा गया है। इन प्रपो के बनने के समय निश्चय हो गोपासण को कथा खूश प्रचारित हो गई होगी ! महाभारत के ही समापय (अ०४१) मे शिशुपाल के मुह से ऐसी बातें पहलाई गई हैं जिनमे कष्ण को गोकुल घालो कपा का मामास पाया जाता है ।' डा. मण्डारकर का अभिमत इससे मिन है। उनके अनुसार कृष्ण आमीर नामक ए घुमार जाति के माल देवता हैं। ये (आमीर) ही सम्भवत बाल दवता को जमस्या और पूजा तथा उनके प्रख्यात पिता का उनके विषय मे यह अशान कि वह उनके पिता है, और निरपराधो के वध की कया अपने साथ ले आये। यह वालकृष्ण की क्या ईसामसीह की पथा का (ही) भारतीय रूप है । केनेडी, प्रियसन, घेवर मावि विद्वान भी भण्डारकर के अभिमत से सहमत हैं । डा० भण्डारकर, फेनेडो तथा वेबर पामत समीचीन नहीं प्रतीत होता। बालकृष्ण की भक्ति भारत के लिए विदशी वस्तु नहीं है। रे चौधरी सुदूर पेदों के अतगत विष्णु के नरावट स्वरूप में बालकृष्ण के बीज को उपस्थिति बतलाते हैं। कोय ने भो बार कृष्ण की कथा को ईस्थी सन से पूर्व का होना सम्मय यताया है। मामौर इसी देश की पुरानी जाति हो सकती है उसके अपने बाल देवता भी हो सकते हैं। भी कुमारस्वामी ने कहा है कि--मामोर शम्द द्रविड भाषा का है जिसका भय होता है गो पाल ! यह कहा जा सकता है और कहा 1श्रीमती पाट-हरिवंश पुराण का सास्कृतिक विवेचन पृ० १२ १३ श्री दिवा-सूर साहित्य पृ० ४ वैति म शैदिन एण्ड माइनर रेलिजम मिस्टास ५० ३६ ३७ वही पृ० ३८५६ श्रीमती पाइ-हरिवंश पुराण मा सास्कृतिक विवेचन पृ० १३ जि० स०ए० सो० सन् १९०७ मी गया है कि-आमीरों (अहीर, जाट, और गूजरों) को मुखाकृति, शरीर गठन आदि, द्रविड नहीं बल्कि सोथियन है। केनेडी इहें सीथियन मानते मो हैं। पर इमसे उक्त अनुमान में कोई बाधा नहीं पड़ती। हो सकता है कि आमोर नाम की कोई द्रविड जाति जिसका म भक्ति प्रधान हो और देवता बालकृष्ण हों, पहले से ही इस देश में रहती हो, वाद को ये सोथिम्न जातिया आरमका धम पहण करके अपने को आमीर कहने लगी हों । आमीर शब्द का द्रविड होना और देवता कृष्ण (काला) होना इस अनुमान का सहायक होना बताया जा सकता है। यह बात ऐतिहासिकों के ऊहापोह का विषय बनी हुई है कि धाहर मे भाई हुई कितनी ही जातिया ब्राह्मण घम मगरण न पा सकी थी। नारद पवरात्र में बालको महिमा का उल्लेख मिलता है । शाना मत सार सहिता के अनुसार नारद कृष्ण माहात्म्य सुनने के लिए कलाग पर शिव के पास जाते हैं, वहां उनके महल के सात पाटकों पर-यमुना, पदव पर श्रीकृष्ण बस्त्र हरण, नान गोपिकाए आदि लीलाए चिचित थी। इस कथा के अनुसार विजिन एक स्तम्म जोधपुर के निकट मण्डोवर ग्राम में पाया गया है।" मण्डारकर के कथनानुसार इस का काल ईस्वी सन को चोयो ताल के पहले नहीं हो सकता। फिर भी पह तो मानना ही पडगा कि चौथो ताबी तक कृष्ण की लीलाए भारत मे सूब प्रख्यात हो गई थीं। कालिय नाग भगवान श्रीकृष्ण के प्रतिद्वदी कालिय र चित्रण एक मकर सप प में हुआ है । कालिय कहार अपन सहस्न फों द्वारा भगवान पर माक्रमण करता है तथा पूछ को लपेट से उहें घेर लेता है । भगवान श्रीकृष्ण अपने पराकम से नागपात से मुक्त होकर प्रत्यारण स्वय उसके फनों पर धद कर उ हैं कुचल देते हैं । वह हमार पनों द्वारा रक्त यमन करने लगता है। नागपनि उसकी मुक्ति के लिए भगवान की स्तुति परती हैं । कालिय के लिए महाकाल, पन्नग, भुजग, सप, महि, पहिराय, भूणिया इत्यादिना एक विशेषण का व्यवहार हुआ है। ० विद्वान उपयुक्त घटना का प्रतीकाम अब करते हैं। नाग श्री द्विवेदी-मूर मा य पृ०६ शालानिएल सर्वे ऑफ रिया, शर्षित विवरण १६०५ जिम, गैविम एण्ड माइनर लिजम मिम्मि ८०१४४२ .

पोकाल का प्रतीक माना गया है। गति और स्थिति, मानेच्छा क्रियारमक विभु की नियाशक्ति के दो प्रधान रूप हैं । गत्यारमक शक्ति का नाम काल है । यह स्वय गतिगोल रहता है और सष्टि मे किसी को स्थिर नहीं रहने देता। सर को विकास द्वारा, परिणित या परिपक्यावस्था में पहुंचा पर उहें समेट सेता है । इस विया पायही स्वमाय है। इसलिए सारी सप्टि विवा हो कर इस पर में पड़ी हुई है और इसकी निरपेक्ष प्रियाशीलता से प्रस्त रहती है। क्योंकि अपनी जयाधगति मे यह छोटे बडे और अच्छे-युरे विचार नहीं करता । इसके चार में या लपेट में भारी सप्टि परी हुई है।" समस्त पत्तियों का उदगम और आथय परमारमा है । भगवान कृष्ण उसी परमात्मा के पूण अवतार माने जाते हैं। अतएव काल सामाय जीवात्माओं की तरह ही भगयान कृष्ण को येष्टित करता है, परतु बेह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता पराजित हो जाता है । कालिय के प्रतीकात्मक पक्ष के अतिरिक्त व्यावहारिक पक्ष मी उल्लेखनीय है । इस पक्ष के अनुसार कालिप, नागराग है । उसरे पत्नियो, दास, नासिया तथा प्रजा है । वह एक महल में निवास परता है । इन सम पर ध्यान देने से नाग सस्कृति को ओर दृष्टि जाती है । आपों के आगमन से पूर्व भारत मे नाग यौर सुपण इत्यादि आर्येतर जातियों की प्रबलता रही है । नाग जाति मे अनेक ने वदिय काल में ग्राह्मण और ऋषि का पद प्राप्त दिया था। नाग काश्यप हैं । नागों को माता का नाम विनता पा । कटु सो को जानी है । सप और नाग भाई माई हैं । काश्यप गरड से इनकी गवृता रही है । यक्ष और नागों को अमृत--सोम का रक्षक कहा गया है। पवत म कुबेर के स्वण तथा धन की रक्षा परने मे नाग मी नियत था । गल, जटी नागों को रावण ने जीता था। नाग स दरिया को बंदी बना लिया था। नागाहप नगर में धम चक्र का प्रयतन हुआ था। परवर्तीकाल मे नागाहप निंग पुरुष इत्युक्तो योगस्नु प्रकृति स्मृता । नाग काल समाख्यात सम्बधस्तु तयो दयो । -आधानिक रहस्य सीमा में भुवनेश्वी सहिता से उद्धत भारतीय प्रती विद्या पृ० १७ यक्ष पृ. ३१ पिक मायथालाजी पु० २७ १४ हस्तिनापुर को करते थे। भोगवती नागों को राजधानी थी। वहां का राजा मेष था।' फुओं का प्रारम्म क्या नाग जाति से जोडा जा सकता है ? क्रिवि-निमि, और यह नाग का नाम है । पचाल सम्मवत पाच नाग जातियां हैं । धतराष्ट्र, ऐरावत, धनजय, वदिक नाग हैं। नाग विवाद करता है । वासुकि उत्तर देता है । मुख्य नाग ये हैं-कर्कोटक [सप], वासुकि [भुजग], कच्छप, कुद, तक्षक [महोरग] । एक भोगवती सर्पो का देवी प्रासुरी सम्बध है।' नाग लोग प्रधानत गिव के उपासक थे और सुपण लोग विष्णु के । गाड विष्णु के वाहन हैं और नाग शिव के भूषण। कहीं कहीं नागों को वरुणोपासक बताया है । आय भी इहें नीच नहीं समझते थे। राजतरगिणी के अनुसार नागक या चद्रलेखा का विवाह एक ब्राह्मण से हुआ था । ऐसे विवाह उन दिनों समी तरह से वध समझे जाते थे। पांडव अजुन का विवाह नाग या उलूपी से हुआ था। सोमश्रवा नागपा गभसम्मूत महातपस्वी हुए हैं, इहोंने जनमेजय के यज्ञ मे पौरहित्य किया था । जरत्कारु महातपा, उध्वरेता तपस्वी थे। नि सतान होने के कारण इनके पूर्वज अधोगति मे जा रहे थे। जरत्कार को प्राथना पर नागराज वासुकि ने अपनी बहिन का सम्बप इनके साथ कर दिया । इससे उत्पन्न सतान ने जरत्कार के पित पितामहों का अधोगति से उद्धार किया था । जनमेजय को नाग यज्ञ विरत कराने वाल तपस्वी आस्ती का मातकुल नाग था। इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट रूप से सिद्ध है कि-नाग यहा ज तुवाचक शम्द नहीं है। कालिय नाग गरुड के भय से रमणीक द्वीप छोड कर (काली) दह म आकर बसा या गाडनागों प्रवल गय थे, यह पहले बताया जा चुका है । खूब समव है इन दोनों (नाग और सुपण) जातियों के लांछन वही पृ० १ वही पृ० ३२ श्री रागय राय-प्राचीन भारतीय परम्परा और इनिरास ५० ८८ प्रीतेन-सस्कृति संगम पृ० २६ महामारत -समापर्व श्रादिपक पौप्य ७० आदि० ४६ अ. आदि० ५६ १० श्रीमामागवत-१० अ० १६ लो०६. 6 1 8 " (टोटेम) ये दोनों (सप भोर पक्षी) जसु थे। मडोयर से प्राप्त गुसरालीन सूप के मकान से भी यही प्रमाणित होता है। नागदमरण कथा का प्रयोजन नागदमण के रचयिता तथा श्रीमदमागवतार का मुख्य उद्देश्य, माया श्रीकृष्ण को अलोरिक लीलाओं का परिचय देना होते हुए भी, दोनों को वणन शैली मिन मिन है । नागवमण पाषा सगटन बाध्यात्मक दृष्टिको प्यान में रखते हुए रिया गया प्रतीत होता है और थोपव मागवत रा इतिवतारमा दृष्टि से। यया नागदमण की कथा सक्षिप्ति माता यशोदाजी के प्रबोधन से सवेत होकर भगवान श्रीकृष्ण प्रात फालीन भोजन से निवत होकर गो चारणाय घर से प्रस्थान करते हैं । सपरों गोप बालर तथा बछने उनके साथ हैं । गोपिशए अपने अपने घरों पर चहा m हष्ण को याट ६५ रही हैं।बई गोपिकाए भगवान पोषण की यी हैं। वे समस्त गो धन को एकत्रित परखे बा को ओर प्रस्थान {रा तट पर पापने ये उपरांत गोप नाका ये प्रस्ताव मे एक भीमा हो जाती है। दोनों पक्षा मे अपार गोप वाला है । मगवान थी पण TRE मध्य खेल रहे हैं। दोनों पाये परस्पर सघष से गॅद उघल पर यमुक गमोर जल मे जा गिरती है । भगवान श्रीकृष्ण गेंद लाने एव पालिय के दुष्प्रमाय को सदा के लिए समाप्त पाने के निमित्त-तार कदम्ब की टहनी पका कर यमुना में कूद जाते हैं। यह वृत्तांत तीन वेग से समस्त विश्व में व्याप्त हो जाता है। माता यशोदजीता इस बात स्पो आघात से बदली स्तम्म की तरह गिर पडती हैं । समस्त अजमल निवासो गरेकाकुल होकर यमुना तट पर पहपते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को यहा न देषकर सबक सय भातनाद करते हुए विलाप करते हैं । गाय, बल, यहडे सभी स्तब्ध बडे हैं । पर भगवान श्रीकृष्ण कालिय के दरबार में पहुंचते है । कारिय मो रहा है। नागपत्निया भगवान के बाल सुलम सौदय को देखकर मुग्ध हो जाती हैं । समस्त नागलोकवासी उहें देखने के लिए कालिय के दरबार में एकत्रित हो गए है। नागपस्निया भगवान श्रीकृष्ण से परिचय पूछतो हुई आश्वय करतो हैं---लाला, पही माग तो नहीं भूल गए हो, यह सांप का घर है ? माप वालिय सोते सोते वापस लौट जाइए । भगवान श्रीकृष्ण प्रत्युत्तर मे अपनी गेंद जो नाग भी सैन --सरकृति सगम पृ० २६ देखि १० सख्या १३ पादपण तया चित्र पनियों ने छुपा रखी है देने की माग करते हैं। नागपस्निया पुन कालिय को भयारता का वणन करती हैं। भगवान श्रीक्ष्ण को पालिय के दुरप स्म रण हो पाते हैं । वे कालिय के साथ युद्ध लिए मर जाते हैं । नागपलिया बालक के भोलेपन पर आश्रय प्रक्ट करती हैं । कालिय से बड बडे राजा तक कापत हैं, जिनके पास अपार सेना है । तुम्हारे पास तो गस्त्रास्त्र नाम पर केवल एक मुरली है। भगवान पीकृष्ण कालिय को भी अपने समान निरस्त बताते हैं । हम दोना गविहीन हैं । नाग और हमारा याहु युद्ध होगा। हार जीत भगवान के हाय है । लास समझाने पर मो जब भगवान धोका अपने हठ को नहीं छोडत है तब नागपत्निया यग्य प्रयोग करती हैं । यमुनाजों भगवान के महत्व का यणन करती हुई कहती हैं - यह बालर और कोई नहीं, स्वयं भगवान हैं। नागपलिया भगवान से हार जाती हैं । भगवान श्रीकण मधुर तथा उच्च स्वर से वेणुवादन करते हैं । मधुर स्वर समस्त प्रहलाद मे म्याप्त हो जाता है। प्रत निवासियों को लत चेतना पुन जाग्रत हो जाती है। उच्च स्वर से कालिप को तदा भग होती है और वह अपने दरबार में भगवान कृष्ण को देखार फुफ्कारता हुआ उन पर आक्रमण करता है । मगवान पर इस का कोई प्रभाव नहीं होता । दोनों याडा मल्ल युद्ध में प्रयुक्त होकर दह में मा जाते हैं । यमुना का जल उन सघप से मया जा रहा है । भगवान के सबल हाथ कालिय को ग्रीवा पर पड़ते हैं। जिस प्रकार गारुडी साप के साथ खेल करता है उसी प्रकार भगवान धोकृष्ण कालिय से खेल रहे हैं। कालिप जोर जोर से फुफकार रहा है। भगवान श्रीकृष्ण हायों और पैरों से निस्तर प्रहार कर रहे हैं । समस्त लोक कायमान हैं। इस दृश्य को देखने के लिए देयता अपने-अपने विमानों में घट कर आ गए मावान श्रीकृष्ण के प्रहारों से गालिय का गार भग हो जाता है। वे उसे एक हाय उठा लेते है तथा दूसरे हाथ से उसकी दष्ट्राए तोडते हैं । वह अपने सहस्त्र पनों से रक्त धमन कर रहा है । मह से फन गिर रहे हैं। श्वास नासा सपुट मे उलझ गया है। इस प्रकार कालिय विधा होकर गिर पडता है। भगवान श्रीकृष्ण तत्काल पूद पर उसके सिर पर चढ़ जाते हैं तथा नत्य करने लगते हैं । नागपनियां अपने पति को दुदगा देखकर मगवान श्रीकृष्ण से उसे जोर देने के लिए विनय करता है । भावान श्रीकृष्ण उसे ययागीप्र छोड देने का वचन देते हैं। नागलिया भगवान को पूना प्रवा करती हैं । भगवान धोरण कमलो नार से कालिय के नकेल डालते हैं तया उसकी पीठ पर सवार होर उसे प्रज की गलियों एष नदरे आगर मे घुमाते हैं। इस प्रकार कालिय का मानमरन पर तथा उसे दह से निकाल कर भगवान श्रीकृष्ण अपने दोनों हाप हुए माता यशोदर ओकी ओर सारे हैं।

भागवत कथा सक्षिप्ति भगवान श्रीकृष्ण यर सम पर विवालिय नाग ने यमुना का जल पिन पर दिया है, उसके गुद यय यमुना मे पूद पडे और अतुल पल वाले मत्तगजराज के समापालिय दहया जल उडालने लगे। कालिप नाग को अपन नियामस्थान का इस प्रकार से तिरस्कार सहा न हुआ। वह चिक पर भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख आया । भगवान श्रीपण को विपात जल मे निभय और निदर हो पर बोस परते देख कर वह और भी प्रोधित हा गया । उसने भगवान श्रीकृष्ण के ममस्थानों पर प्राघात करके अपने गरीर वपन से जकड लिया । भगवान श्रीकृष्ण नागपाल में आपद्ध होकर निम्नेष्ट हो गए। उनको पह दगा दस पर उनके प्रिय सखा, गाय, बल, बधिया समो वातर स्वर से विलाप पग्ने लगे। इधर ब्रज में भी १वी, जायात और गरीरों में भयपर उत्पात होने लगे । नद बाबा मादि गोपों ने पहले तो इन जपापुों को दखा फिर यह जाना fr-माज श्रीकृष्ण बिना बलराम गौए घराने गये हैं तो वे बहुत प्याकुल हुए तया अपने प्रिय को दृढते ते यमुना तट पर पहुचे । उ होने दूर से ही भगवान श्रीकृष्ण को पालिय व यधन में बंध हुए तया कुण्ड के रिनारे ग्यास बालों फो महिनावस्था मे देखा । गौए, बल यछलात्त स्वर से राम रहे थे। इस प्रकार का दृश्य देख कर वे गोप भी मूधित हो गए । माता यशोदाजी त्या नद बाया तो दह में पूदन तर को उद्यत हो गए, पर भगवान के पराकम को जानो वाले घर रामजी के प्रयत्नों से उनके जीवन की रक्षा हुई। मुहूत तक मप के बधाम रहने के उपरात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर को वृद्धि करना प्रारम्भ किया। परिणामस्वरूप माप का शरीर टूटने लगा और उसने अपना पास छोड दिया तया भगवान के सम्मुस बोषित हो पर फुफकारने लगा । भगवान बोकृष्ण पतरे वात बदल कर उसके प्रत्येक आरमण पो विकार रहे थे। ऐसा करते परते फालिम का बल क्षीण हो गया तब भगवान श्रीकृष्ण उघल्पर उसो शिर पर सगर हो गये तथा बलापूण नत्य परने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के मक्त गधव, देयता, धारण एव देवाग बडे प्रेम से वाद्य यत्र बजार लगे। कारियाग के सौ सिर थे। मिरा सिर को वह नहीं पाता था उसे भगवान अपने पर तल प्रहार से कुचल दते । इस प्रकार कालिप को जीवनशक्ति गान गन क्षीण होने लगी। वह नयुनों तथा म ह स खूा उगल रहा था । कालिय, मन ही मन भगवान श्रीकरण की गरण मे गया। अपने पति की दुपा दबकर नागपत्नियां भी भगवान की गरण मे आइ और स्तुति करने लगी। भगवान ने क्या करके उस .

हिन निन गरीर वाले काल्यि को छोड दिया!गन शन लिय मे चेतना शक्ति का संचार हुआ । उसने बडो दोनता से भगवान श्रीकृष्ण को स्तुति को। भगवान ने उसे गडों से अभय करते हुए तत्काल यमुना को छोड कर समुद्र मे जाने का आदश दिया। उनका मादेश प्राप्त करके पश्चात-बाल्यि नाग एच उसकी पत्नियों ने दियवान, पुष्प माला, मणि, आभूषण, दिध गध, चदन और उत्तम कमलो को माला से भगवान श्रीरपण का पूजन भवन किया। तत्पश्चात सपरिवार भगवान की वदना परिक्रमा पर रमणक द्वीर की और प्रम्यान दिया। नागदमण स्था मे झूला सायाजी को मौलिकता उपयुक्त दोनों क्या मगठनों का तुलनात्मक अययन करने पर नागदमण पा क्या सगठन अधिन विज्ञानसम्मत एवं मौलिक प्रतीत होता है। भागवत में भगवान श्रीकृष्ण एक बालक होते हुए भी एक सरगतिमान परमेश्वर के स्वरप मे चिमित हुए हैं। नागदमण म उन बालस्वस्र का निर्वाह कवि को विशेषता है। यमुना तट पर गोप धानको को रोजा सामाजी को मौलिक उदभावना है और सगत मौ । वतमान में की माने यह खेल खेलते देखे जाते हैं तथा गेंद को दुगम से दुगम म्यान पर से लाने का पान करते हैं। भागवत के श्रीकृष्ण यमुना में कूदते ही जल का दिलाउन पर कालिय को क्रोधित होने का अवसर देते है । नागदमण यावालिय समाव से हो रहे वह बालक वर भेद का नहीं समझता है सा जाता है । कान्यि दरबार तथा नागपलियों पायाप स्वस्प मौलिक प्रसग जोड फर कपि ने क्या वाह को अक्षुण्ण रखा है । भगवान श्रीकृष्ण के बार सुलभ माधुय तथा वाणी के द्वारा उत्पन्न एक मनोमुग्धशारीय पर कवि स्वय मुग्प है "सुप्पोटर येत सुपरयो सब हो, बडा भागरी नागरी नारी वेही" कह कर भागलियो क भाग्य की सराहना करता है । मगान श्रीकृष्ण कालिय पे माय पुद्ध करने का हर मो बालसुलम वत्ति का परिवार वालर का निमीक है। मो महता या प्रसग नागमणकार को अपनी पना है। भगवान श्रीरण को जान बारी है । अत सति सम्पत्ति का - परना उनका धन है । मति नेति प्रक्रिया से नागलियों द्वारा सर र स्तर कवि की पोर भावना या परिचायक है। क लिए साय 77 धारण का सघप किमी मी वीर बाब मपय वपन मे वमन है। नागदमार रवि होने र साथ साम भक्त गी हैं। राह अपने इष्टदेव पे प्रमाय पर रयमान मोच ना पसद नहीं है । मागार यो महरा भर नागपाल मे जबडे हुए निवे" पण को चिंता नहीं है पर नाणरमणकार इस प्रसग को अय ढग से प्रस्तुत परते हैं । पालिय क्रुद्ध होरर आरमण परता है, प्रहार परता है, पर भगवान पर ये पुष्प पखुड़ियों के प्रहार के समार असर करते हैं । पुष्प सत्काराय हमेगा चढ़ाते ही हैं। भागवतार कालिय पे परामय के पश्चात उसे सीधे यमुना से हो समुद्र में चले जाने का आदेश भगवान श्रीक्ष्ण से दिलया देते हैं । नागदमणकार इसे पर्याप्त नहीं समझते हैं। वे इसके उपरांत भी भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा ममलनाल से कालिय के नरेल डलवाते हैं । नरेल के द्वारा भयकर से भयपर मसाली जतु स्वया हो जाते हैं यह सत्य है। दुष्ट मानवों के भी नकेल डाल पर घुमाना प्रसिद्ध है । स्यया परके पत्र तत्र घुमाना प्रतिद्वदो को हीनताका भी घोतक है। भयकर फालिय को परास्त करने के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण विनय सहित अपने दोनों हाप जोडे हा माता यगोदाजो सम्मुख उपस्थित होते हैं। इस प्रकार नागमण को फ्था में भगवान श्रीकृष्ण के बालस्वरूप का आदि से थत ता निर्वाह हुआ है । अनुप्रम से उत्यापन मगला, बझार, राजभोग आदि शानियों का वर्णन विदा बल्लमकुल सम्प्रदायानुयायी होना प्रमाणित करता है।

तृतीय अध्याय नागदमण की भाषा और व्याकरण भापा नागदमण को माया राजस्थान के अतगत मत्रहवीं शताब्दी पी प्रचलित साहित्यिक मापा-हिंगल है। गिल गरल को ध्युत्पत्ति को तरह भाषा के सम्बप मे (मो) विद्वानों मे मद्यावपि पर्याप्त भ्रम फत्ला हुआ है। अधिकार विद्वान साधारणतया हिंगल को राजस्थानी का एक रूप मानते हैं । अतएव इस प्रसग में, राजस्थानी की वास्तविक स्थिति क्या है इस ओर मो समेत कर देना अनुपयुक्त न होगा। "राजम्याना मापा" "हिदी भाषा" के समान हो भ्रमात्मा है। जिस प्रकार पस्तुत हिदी-अनेक विमापार्यों का एक सामूहिक नाम है, ठोर वही परिस्थिति राजस्थानी माया साय है, जो कि हिंदी को एक विमापा के रूप मे मा य है। राजस्थाना-राजस्थान प्रात को भाषा है। राजस्थान केयर आधुनिक राजपूताना-प्रात तक हो परिमित नहीं है, किन्तु मालवा और हिसार का मो बहुत-सा भाग राजस्थान के हो अतर्गत समझा जाना चाहिए । राजस्मानो इम समस्त भू-ख को भाषा है, जिसमें मारवाडी (जिगरे अतगत मेवादी भो), दुढाडी (जिसके अतगत हारोती मौ), मालवी और वागढी उपमापार (बोलियां) प्रमुख हैं। राजस्थानी की समस्त बोलियों में मारवाडो प्रमुख है। मुख्यतया सिषित पम पतमान साहित्य, जो कि एक प्रकार से इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि-मारवाडी राजस्थानी की प्रतिमित अयवा परिनिटित (Standard) माषा है। यह प्रतिमित मारवाही ही वस्तुत डिगत है जिसे मद भाषा राजपूतानो, श्री मेनारिया- राजस्थानी भाषा और साहित्य पृ० १७६ 10 जगदीशप्रसाद-~-लि साहित्य पु० २६१ श्री स्वामी-दोला मारू रा दूहा ० १०० (प्रस्तावना) पश्चिमी राजस्यानी आदि नामों से जामिहित दिया गया है। इससे एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी सिद्ध होती है कि-प्रारम्म मे डिंगल घोल चाल की भाषा थी। बाद में मोत चाल की भाषा और साहित्यिर मापा में अंतर हो गया और डिगल का प्रयोग साहित्य की भाषा के लिए होने लगा और डिगल साहित्य राजपूताना र चारणा तथा माटों द्वारा विशेष गमृद्ध हो उठा।' श्री मेनारिया जी ने नागमण को चर्चा करते हुए इसकी भाषा पर विचित गुजराती का प्रभाव स्वीकार किया है तया पवि का काठियावाडी होना इसका कारण माना है, परतु यह तो निविवाद सिद्ध हो चुका है कि- गुजरात तया मारवाड जया पश्चिमी राजस्थान को भाषा सोलहों सताब्दी ईस्वी तक एक थी तब इसो अवधि फ नासपास की रचना पर गुजराती के प्रमाव का प्रश्न ही नहीं उठना है ।हा, प्रकागिन प्रत्य मे भाषा के गुजरातीकरण को प्रयति ति होती है, यह दूसरी बात है। शब्द-समूह नागमण को मापा मे तत्सम, तद्भव, देशज और विदेगी धार प्रकार के गत उपलब्ध होते हैं नि म तद्भव और देशज पदों का बाहुल्य है। व्याकरण क्सिी भाषा के ज्ञान अथवा दूसरे शब्दो में शुद्ध लिखने, पढने और योरने के लिए उसके व्याकरण की जानकारी निता त आवश्यक होती है।' अतएव डिगल भाषा के शरण को ध्यान में रखते हुए नागरमण का सरित ध्यावरण दिया जा रहा है। 1(अ) डा० जादीशप्रसाद-~~-डिंगल साहित्य पृ० २६२ (श्रा) गिल उपनाम हुँ मम्बाना विषय । अपम श जामे अधिक, सटा वीर रस ॥ -~-महावि सूर्यमल-वशमाम्बर प्र मा पृ० १४७ हा० माहेश्वरी-राजस्थानी मापा और माहित्य पृ० ६ ३डा० चटनी-मारत की भाषाएँ और भाषा राम्चधी समस्या पु. ५॥ श्री मनारिया-राम्थानी भाषा और साहित्य ५० १७६ 5ढा० चटर्जी-राजस्थानी भाषा ६०३६ दा० माहेश्वरी रावस्थानी भाषा और साहित्य पृ० १७८ रहा. जगदौराप्रमाद-गिल साहित्य पृ० २६२ २२ ध्वनि समूह -- स्वर-नागदमण मे प्रयुक्त अ, ज, ओ, औ के ह्रस्वरूपों को छोड कर बाको स्वर हिंदी के समान ही हैं। यथा--- अ -मध्य, अध विवृत, ह्रस्व । आ-अग्र, विवृत, दीघ। जा-यह 'आ' का ह्रस्य एप है । दमण में प्रयुक्त इस ध्वनि का उच्चारण लगभग 'अ' के समान ही होता है- माहो माह आणद दाख मुरक्को । छद ३२ २ आया औद्रक सूरमा ऐणि आर । ३ जाळे निस्व नोला वहै विश्व शाळा । १ -मन, सवत, ह्रस्व । ई-अग्र, सवत, दीप। उ-पश्च अध सवत, ह्रस्व । क-पश्च, अध सवत, दीघ । , कहीं-कहीं छद की सुविधानुसार इसका भी हस्व उच्चारण पाया जाता है- १ दूजै नदर घेन गोलरूप दूणो । २ ऊभी मूरळी आप लोध अधूर । मे --अन, अघ वियत, दीघ । अ -अग्र, अघ सवृत, ह्रस्व । इस ध्वनि के लिए कोई स्वतत्र लिपि चिह्न नहीं है । दमण में प्रयुक्त इस ध्वनि का उच्चारण लगमग 'ई' के समान होता है- १ देवो आपरी लाज लोधो दडू लो। २ सेलीजे रमीज पिता मातु पोळा । ३ घेर्यो नद रो पोट महिकोट अहो । अ --अग्र-मध्य, अर्घ विवत, दोघ । अ -यह ध्वनि 'अ' का हस्व स्प है। इसका उच्चारण लगमग य+इ की तरह पाया जाता है। 1 और कूप लाज पखो आव ओरी। २ पैसारा उसारा परा पाइकारा। , . ९९ "१०२ भोपन, अघ-सवृत, दोघं। ओ-पश्च, अघ सयत हस्य । इस ध्वनि के लिए भी स्वतत्र लिपि चिह्न नहीं है । दमण में प्रयुक्त इस ध्वनि का उच्चारण लगभग हस्य 'उ' की तरह होता है- १ वोलाव भळ नाय नाखो भुरक्की । छद ३५ २ मोरे नद वारो जसोमतो माई। जोवो नवर प्रेस सत्रवट्ट जागी । गोपीनाथ रा हाय आया गडद । १०० इत्यादि मो --पश्च मध्य, मध सप्त, दोघ । मो-यह औ' का हस्य रूप है । इस ध्यान के लिए भी स्वतत्र लिपि चिह्न नहीं है । दमण में प्रयुक्त इस ध्वनि का लगभग '+' उच्चारण होता है- १ भाया औद्रकै सूरमा ऐणि आर । २ नोळी बांटते सामठी झाट नाखी । अ-अनुस्वार । ध्यजन-जागदमण में प्रयुक्त व्यजाळ, ६, 4, 5, 6, 4 को छोड कर गेप हिदी की तरह ही होते हैं । यथा- स्पा (स्पृष्ट प्रयत्न) प-कण्ठ्य, अल्पप्राण, अघोष ख-पठ्य, महाप्राण, अयोष ग-कठ्य, अल्पप्राण, सघोष घ-काव्य, महाप्राण, सघोष इ-पठ्य, अल्पप्राण, सपोप, सानुनासिक घ-पत्रय, अल्पप्राण, अघोष ए-यस्य, महाप्राण, अघोप ज-वरस्य, अल्पप्राण, सघोष R-वत्स्य, महाप्राण, सघोष म-परस्म, अल्पप्राण, सघोष, सानुनासिक द-मघाय, अल्पप्राण, अघोप 8-मूधय, महामाण, अघोष २ २४ 3-मूष य, अल्पप्राण, सघोप 8-मूध य, महाप्राण, सघोष ण-मूध य, अल्पप्राण, सघोष, सानुनासिक त-दत्य, अल्पप्राण, जघोष थ-दन्त्य महाप्राण, अघोष द-द त्य, अल्पप्राण, सघोप घ-द त्य, महाप्राण, सघोष न-द त्य, अल्पप्राण, सघोष सानुनासिक प-ओष्ठ्य, अस्पप्राण, अघोष फ-ओष्ठ्य, महाप्राण, अघोष ब-ओष्ठ्य, अल्पप्राण, सघोप म-ओष्ठ्य, महाप्राण, सघोष -ओष्ठ्य, अल्पप्राण, सघोष अत स्थ य-वत्स्य, अल्पप्राण, ईपद्विवत र-मूधय, अल्पप्राण, ईपद्वियत धषित ल-दत्य, अल्पप्राण, ईपद्विवत, पाश्विक ६-द तोप्ठय, अल्पप्राण, ईपद्विवत ऊपम स-दत्य, ताल्थ्य, महाप्राण, अघोष ह-कण्ठ्य, महाप्राण, सघोष अय - ४-मूध य, अल्पप्राण, सघाप, उत्तिाप्त २-दन्त्य, महाप्राण, सघोप, उरिसप्त 4-राजस्थानी व। इसका उच्चारण सात पे '' से भिन्न होता है। -मूध य, सघोष, [जरिक्षत] कारक मागरमण को भाषा म-सना, सवनाम और प्रिया सूचक श.गे का प्रयोग हिवी भाषा के समान ही दो लिंग तया दो वचन में हुआ है। नपु सोलग के रप मो उपसम्ध हैं परतु नपु सलिंग एव पुल्लिा मे विशेष भतर नहीं है । कारकों के लिए विभक्ति प्रत्ययो का प्रयोग हुआ है तया कहीं-कहीं x २ . " में . विविध mitr पून पा विरो में ART गया.पा- पारस प्राय 17 पता पग जमा सिम RIL असा पीर माना। माम पम मायाम । तो पाग योग प्रगना २ x पो मामा। x free APR नि। पातामा fr पोरा गोरा तो गापुर बाग। भगवान पागमः। महिरापन गर कोई गायो। ११९ 3 माप मोपी गरोगह पेया। पामेश्य नर मंगरो। १. से निहाली। १८ का होमपी समोगा। प RO नेते गोपी बिहार । हनधागू न ऐगा। सासागर मान हो । बाजागगो मागलो जनन । सम्प्रदाx सो रातो दया पूरा भाष । न पानीकाग जातेको । पपा देस दोन विप्र रोल। अपादा भै हिप ऊतरी मात गोवउ हाथ । गयो मानि तिमिसग। वठाहुन पायो भह राज । सो सोने से मातगू पात भायो। अहितारिमू पारी माग भनेरो। सम्बप x रात्री महरायग रयस तासी। हो पागदाणव राणी। पप नागणी पद्धिता मारचो हो। २८ दही वृष रायाची मा गुलराई। . . . . ५२ - . . " . . . . २८ चो ५८ १३ , तणा " तणी २२ " " उतारेवा ए भामचो भार आयो। भलो हक बलभद्रचे नाम माई । काळी नागरा कान समाळ देवा । र पहूच प्रभुर लटक प्रहूची। अमा नागणीपत्यरो जूझ आछ । घर कसर तातरी टाट घुट्टी। महामद जाति तणा कान मोती । हुई दुहू मल्ला तणी हल हाय । १२ तण जमुना तण नाखियो नार जाड। १२ तणो तणा सरी क्सतूरी तिलव । अवनी तणा मारि लेप आयो। दोहू भ्रकुटो कोरह देखि है । ओ पडीछा नहीं छो प्रिया राज पायो। अधिकरणx इसो आज ते कोण भूलोक माछ । मडाया मथुरा धरा वास मोरा । मुण्यो रप वेद सु पेत्यो सबेहो। पहूचे प्रभर टक्क प्राची । हिंडोळ घाट घर हूतरायो। माहे पियूस दुवावहि माहैपरेवा । मणि नग हीरातणी ज्यात माहै मा जणणोतणी जूण मा एन आयो । सवोधन x प्रभू आपरा जाणि अप्रत पायो। कहै कीजिप कान्ह भोह विभाग । सामान्य टिप्परिणया - स्वर से आरम्न हान वाल प्रत्यय का प्रयोग करने पर पूर्व पर प्रतिम स्वर का प्राय रोप कर दिया गया है । २ तणो, माहे आदि प्रत्ययों का प्रयोग गम्द से पूर्व भी २७ ६५ २७ "1१६ " " " " भ " . " २९ , ९ ३ सम्रध कारक के प्रत्ययों म परस्य ना लिए लिंग वचन के अनुसार लिंग वचन का परिवतन हुमा है । करण व सम्बध कारक का 'आ' प्रत्यय देवल यहषचन यापी गन्द ये आगे प्रयुक्त हुआ है। बावधन मे अकारात चार फ प्रत्यय लगने से पूर्व अतिम अ ५ रामाय Int मोntin mindin गरे । हिर मामा, गोरापानी में मोगा। irrinanit मा पापा में मापा' और मोरपिा गया है। minut oil परधन माने तमप माग मा cret और है। १. हिसी और RTNEri Re परोपानति परसोnिा गरा। पपा-पम-भ्रम, m-मान मित्रों में रेप मामा मागम कर लिया गया है। सर्वनाम मागामण ५ मा । F17नि प्रयोगमा है। नरा पिपासा Ent पमा (हमारा ) समागीपार माग । अमा मा पारोमा। आम्हा सागरी गिगा पाप । ८. समामेरामा मत पोरी। अमारा रो (ग) असाग मगाहलाएर योरा। ५८ मोपलो राम गुटो अमारो। अमांगू (हमारे ) पा से माम अमाम् । धम (हमारे) महाप म गागनी एप एती। मा (पह उमलिगा है) दोधात ना गुलदा। परीप पिक नोगा भा जपायो । माप (स्वयं) गेयागयो पाप माग्यो । ९२ रियो आपगू आप माज पाहे । सयार घगा शापाप अरच! प्रमू दापय atगि मएन पायो। यो आपरी लाम लोपो दासी। गूि आपरो मोस भाप राव । गुणो सागो पापणी हद्द माहीं। . . . 112 " . ७८ " 101 "114 # " ८. २८ इसा (ऐसे) इसो (ऐसा) उर्व (उसने) (यह) ३५ " अण (इस प्रकार की) अने (इसको) मेह (यह) १०३ ९. ९१ " " ८८ ७१ ७३ ८१ , १२१ । अहरी (इसकी) अरी (इसकी) औ (ये) औरै (इसके) असी (ऐसी) ओ (पह) असयार हुवी आप अपनाणी। छ 114 रटीज इसा मात आग रढाळा। इसो याल देसी दया मू आव । इसो छोट ल मातस बात आडो। अधोराजमारा उवै कोष मारा। जणणी तणो जूगमा एन आयो। उतारेवा ए भोमचा मार आयो। जाग्यो अण जुगत्ति । ससी बाळ अन त्रिभुवन सूझ । लरातू नहीं एह कूदत लूणी लम एह मूश्या पछ छाट लाग । अहीराव न डावडो एह माडा। विढ निजरो एह उच्छाह थाळी । अठ एहरी सम्म एही अदेसा अरी जोगीन देसी चखन हेरी। चवीज नहा बोल अवाळ चाळा। और कूपराज पखो आव औरो। असो भागणी पूण जे पड लातरी धन औ नीर नीर पोध । त्रिलोकी न प्रासइ वोहा औ न वूम। ८७ जितो डाबडो औ वळी देस जाण्यो। ९२ मारया हो राप पाय सू औ न मार। पही सू सडो पपडो तीर काही। लड सो विस मूळ पूछा रडाई। विही छोर चपी रहो मा बकाव । असी मागणी कूण जे चूप आयो। घढवूण पाळी तणी सीम चाप । ५२ वळ दूसरो ताहर कूण पोरो। अर फूण लाज पसो आव ओरी। सूतो साप जगाीज देण कोड । इसो आ7 ते कोण भूलोक आर्छ । जिमाय जि मारता मोग जाणी। जिरी फूक 1ग मर टूर फाला। ८६ पूस आयो। २९ वाही (कोई) किस (कौन से) किही (किसी ) भूण (कोन) १०८ , ५० " " केण (कौन से) कोण (कोन) जिक (जो) जिरी (निसकी) " " " २ " " १५ ॥ १२ ७४ . " ६४ १२ " ५ " ४० " ७२ ६६ जे (fat) असी मागणी पूस भापो। जेही (जेस) सोदा दळी वढी समजेही । जेही (जेशों को) सामी सेस महेग जेहो न सूक्ष । तमा (तुम आप) तमा देय मोटा अमा मत पोली। तुकारा रेकारा गिशारा तमासू । ता (यह) घई पोसळो सिगळी तादवा ता। ताहरी (तुम्हारी) सद ताही बेच सत्रयट्ट यूटो। तिर (ये) राम तिय नागणी बोल यू तिसो (घा) तिसो नागणो गापुरोचन टोको। तुना (तुम्हें) भज ना तोई तुना पुत्र माय । तुन देखापू प्राग यमा तमामा । तू (त) जुडेया ज तू माग काळी जगाव । पछा पोदरा मागणी तू पिछाण । लला तू ही एह कूदत पूणो । पहिनारो तू एह नेठाह आण । पहू मागणो सुण तू रोप पान । मजाण पाळ तू पचान मापो । तूप (तुम्हारे) कटपणे अटnt नहीं तूझ के । दियो वाल दूरतर तिको तू दादै । तूही (दही) परो हेर तूही पिया सह लोटा । ते (पह) रम्पो स्याम ते ठाम जोयत रामा । जयो गणो ते हतो गम्य जायो । ते पण सुणण अहिराय सगो। आया माज ते माफ कीम अमान । तेण (उस) काळोनागत जागवू तेण कीध । तेह (उसे) नया नेहसू तेह गोपी निहाळ । सोनू (सुम्हें) पले तेतला आज तोनू परााप । तोन (तुम्हें-आपको) हर तान प्रगायत जेहा । तोसू (सम्हारे से मापसे) हिव जोडि तोमू वार्ता याद हारी । थारा (तुम्हारा भापके) सम जान थारा भुग रोष मारा । थारी (तुम्हारी-आपकी) जुन यस पारी परस्से सने हो । थारै (तुम्हारे) काळोनू । मापू तो थार यमायू । दिस मोरलो हेर थार दुगुज्मा । " "१२० १९ १२२ . ८२ " ११४ ८1 "१०५ " " , ॥ ७७ मूह (मुझे मूब (मेरा) मूझ (मुन्न) मूय (गरे) " " ५७ P , . ६८ चत लोहवी लोह रिछया न थारं। द ४९ वधारया न थारं अज बाळ बाळा । ३९ थारी (तुम्हारा) नहीं नागणी नाग थारो निवार । प्रिया तातन गोत्र थारो पिछाण्या। , खटका मुहै नागणी बोल सारो। ३४ प्रमू जागसी मूझ पाछा पधारो । इसो चाळ देवी दया मूझ आय । मण्या नागपली जिता मूय मीर । मोरे कस मामो रहै मूझ मूळ । वह आज ते नाणो मूझ वारो। वृथा वण जाण रख मूय वाळा । ७२ मो (मेरे) जप मो दिसी जेम काळी जगाडी।। मोरा (मेरा) मडाया मयुरा घरा वास मोरा ।। ५८ मोर (मरे) मोर नद बानो जसुमति माई । मोर कस मामो रहै मूझ मूळ । मोर देव आहोर च गाम महि । ७३ मारी (मेरा) मोरो घाट पराट एय न मावू मोरो एह ककालियो द्रोहमाणौ । मोरो जागसी स्याम वाय मधुर । राज (आपके) पटीछा नहीं छो प्रिया राज पायो । ११६ राजनू (प्रापको) जसोदा सोई गजनू पुत्र जाण । ११५ रावळो (आपका) वळ रावळो वणिम्रो देखि बाई । ९३ वा (उसने) रद दाद माह क्यिों वान रोसा । १०७ वा (वह) पळ वा सादर चरणवू । बेही (2) वडा मागरी नागरी नारी वेही । सोई (वे) प्रभू अग लागो सोही फूल पाती। इता दोहचौ हू हुतो उप्पवासी । , ६० विशेषण नागदमण मे विगेषणों का प्रयोग हिगे की तरह ही हुआ है तथा उनके लिंग और वचन विशेष्यानुवर्ती होते हैं। गुणवाचक विशेषणों मे कुछ डिगल भाषा मौलिक विशेषणों का प्रयोग भी हुआ है। सरयावाचक विशेषणों मे पौगिर सम्माओं के द्वारा बने प्रयोग पिपिष्ट कहे जा सकते हैं। " " " ९४ " " 1 " " १२ ४८ १२ ८ 1110 " " " . 11 " " " २० २१ " घण घण उपाय म्याहियं प्रेह ग्रेया। घणो अरटो घणो सांग मूठो अमारो। घणी घातियों सक्रि स्याम घेरी। जाडै जमूनां तण नासियो नीर जाई। थड थर्ड बेहड हूह माती पट्टा । सबी मिल पोट सामी सबी दोट माय । सबै सब मामला सामला प्रत्यसद्दा। रगवा सर्व साय सू हेक राग । सामट्ठी भाग नागणी भेट सामट्ठी माण । सारे हाहाकार हार ससार सार। ससेप प्रगावार नारद सखेप गाई। सरयावाचक रमवा सय साय स हे राग। शिल पायता ऊलट हैक झेर । सड आपड हक हेका सपोळा । भी पूर हेयो करी जात मारा। मिळी नागणी हेर हेवो मिला। दिस मोरली हेर थार इभुमा। मुह जोड होसी घडी हेक माहै। भलो हेक पलमद प नाम माई। जणणी पिणी हेक तु ही ज जायो । खरो हेक तू ही दिया सब खोटा। इसी वेवटी इकी वेवटी चौयट आय ऊमो। एकणी पुणू एवणी वार इसकोस पाळां । एको नहीं सेन समाधि एको सजाई । उभे पचास उभे खट्ट दो पट्टराणी। इख्याती उभ सौ दस वापि आठ । उभे न ग यो फिर भोर अडे । दु दिस मौरली हेक थार दुभुना। दुहू भुज पर काळी दमण । दूजी नारी गाडियो सूट दूजी न पायो । दूसरी वळ दूसरी ताहर फूण वोगे। दो पचासा उभ सट्ट दो पट्टराणी । दोहूँ पसपार पिडार पा दोहू पास । ५६ ५८ ८३ " ७२ " ९० . "१०१ ४९ "१२२ ५० " १० बिहू वि है वर ७८ " ૧૮ ११३ निहू . श्रीन " ३७ ८८ " ८१ , " " ९० सोळ " घडीए बिऊ नीमड सा जमायो। विहू लोवन नीर धारा बहती। चव मात, भ्राता वि है धन चारो। बिया सरो हेक तू ही विया सब सोटा। वेहू क्यिा सारखा लोक वेहू किनारी। अठ मांडसा आज वेहू असाडो। नि सखी बाळ ऐन निभुवन मम । पख बिहू पोढी मानो सौख मोरी। पर ग्रीन पडो ममतेय काहा । जीज तर आविजो जागसी जाम पीजै। पचा पचा अम्रत देवच्छ पखाळा। खट पचासा उभ खट्ट दो पट्ट राणी। आठ इव्यासी उभ सौ दस वाघि आठ । दूज नदर धन नौ लख दूणो दमै इय्यासी उभ सौ दस वाघि आठ । जळाबोळ माह फळा सोळ नहो। सहसा लिसो सोळ भर सयाणी । वीसा यदन्न यह भोण पचास वीसा। इक्कीस पुण एरणी वार इक्कीस पाळा । ग्रह्मांड इकोसा देखावो विहाण । पचासा पचासा उभ खट्ट दो पट्टराणी। पचास घदन्न घहै प्रोण पचास बीसा । साठ सखो देस बेटा लिया लख साठ । इठ्यासी शव्यसी उभ सौ दस याधि आठ । सौ इख्यासी उभ सो दस वाघि आठ । सहस्सा सहस्सा लिसी सोळ अर सयाणी । सहस्स पदन्न सहस्स बघ ध्योम प्याळा । हजारा हजारा मुषा जागसी नाग हेवा । हजार हिव एक ही गांठ पेर हजार। सखो देस बेटा रिरपारस्व साठ। कोड प्रणी बात साफा बधीकोड बाजा। गिणांपाद जोताई कोड गाडा । सावनामिक पुरपवावर तथा निजवाचा सवनामों को छोड़ कर मय सवनामों " "१०७ ७२ " " " ७७ " " ९८ ८४ . ४ . ५२ का प्रयोग विशेषण की मांति मा है। उदाहरण के लिए देखिए सर्वनाम ! निया माषा मे किया का प्रत्यात महत्त्वपूर्ण स्थान है। नागदमण में सस्कृत मूलक तथा गिज धातुओं से विनिर्मित ग्यिाए प्रयुक्त हुई हैं । काय का सयादात्मक शलो में होने कारण यतमानकालिक निपा स्पों को प्रचुरता है। जिनका यह प्रयुक्त प्रत्यय '' है। ' य है' यहुत कम प्रयुक्त हए हैं। भूतकालिक क्रियाए बहुधा ओफारात है । भविष्यकाल मे ज, सो, सा, मो, ऊ प्रत्ययों का प्रयोग हुआ है। पतिपय उदाहरण दृष्टथ्य है- वतमानकालिय प्रयोग रमै सग गोवालियो रग रातो। छद ११ धहै सामळो ब्रज सेरी विचाळ । नया नेहन तेह गोपो निहाळे । आया औद्रक सरमा एणि आर । इसो आज त कोण भूलो आछ । रमा सारती है सखी घपण रेखा। ९० कर मूरळी नाद ठाडोक हाई। ९५ विढे सांपन सामळो यूर यादी। पाळी नागन लीजिए यगि पानी। पिहरी कोर चपो रही मा बकाय । जमाता जप्पई नापणी छोडि जोरा। परवाळ न मुह मा चाढि बाई । देवो आपरी लाज लोधी दलो। परका अटको नही दावेड । बळ वो सादर वरणबू। भूतकालिक प्रयोग पुटी न'र मोसार आवो प्रहट्ट । वई वासळी सिगढी नादया ता। घणी मोम चाली चरी वात घोड । १५ जसोदा दळो कद्दळी सम जेही । पड़ीछा नहीं छी प्रिया राज पायो। माम मोकळी सोजना करण मासी। तद ताहरो पेय खरयट्ट यूटी। अमूना वही पूर सिंदूर मन ब्रह्मांड इकोसा देखावी विहाण "१०१ . . ७९ ३४ १ " ७ ८ ' "१०८ छद ३ " ४ , ૧૨ १९ ८० ९० 1110 " २ १० फिणन दौठो का वो सुण्यो न लीला सप अवनी भार ऊतारवा जाग्यो एण जुगत्ति जमूना तण नाखियो नीर जाड दडी लार काहो चढ्यो व्रछ डाली पळदव बूझ्यौ दिखाळ यो सुदामा न दीठो कदीये न नत्र निहाळी वळ मोकळो माळिय लाडवायो ठगवा गयो आप आप ठगाण्यो बळी राव जेहो छळी एण बायौ पयो मार पाण भयो गाय भग पळे फेरियो पागण नद वाळ प्रभू घणा चा पाडिया तवै नदर नेस बलमद्र न हुता पखं पार पिंडार था दोहू पास जगाडया जसोदा जदूनाथ जाग भविष्यत्कालिक प्रयोग अमा नागणीपत्यरी जूस आई हुसी ठाकरा आक्रू आज मारो तुन देखावू आज वेगा तमासा फ्णीनाय न झालवू एण पाणी मुह जोड होसी घडी हैक माह फणीफण न खावसी देखि कोरा तर आविजो जागसी जाम पोज चवीजे नहीं बोत काळचाळा काळो न न नापू तो पार कमावू मोरो जागसी साम वायं मपूर वडा जीपसी जुद माह बडाई असे माडसा आज बेहू असाडी हमारा मुषा जागसो नाग हेवा युलाटी नगाडो जुवौ जुद्ध याय अव्यय नागदमण मे प्रियाविशेषण नामयोगी, सयोजर और केवळ प्रयोगी भेद से चार प्रकार अध्यया का प्रयोग हुमा है निनका छद सरया सहित अकारादिक्रम इस प्रकार है- " - " ५४ ५५ " " ५६ ५६ " " ९४ ३७ " भयाणक (२१), अन (३९,४०,४४), अठ (३३,३७), आ (६३७८) माह से (५४ ११), आग (७५) आगो (८३), आन (३,३७,५४,५५,८२, ८३), इसो (१०९), ऊची (६४) श्रेण (४,४९,५५), अह (५५,७२,७३,८४,१ २१), मेहरी (८७), मेहा (३५), अहा (८७), जोडो (९५), ओरो (८१), भी (९२), फठ (५७) कटा (३३), पदि(३७), पिणी (८३९५), फिस (४१,८०, ८९), पो (११५), फूण (५२, ८१), पे (२), ई (८४), कण (६८), पेपि (११४), फेहा (११४), को (८२९०), गुड (१९), घणा (२), चमको धमकी (३१), धो (९१), ज (५९,८३), गांण (६,१०,१३,४८,१००), जाणि (१८, ९७), 'हाण (२७,११७), जिङ्क के (५४ ११७), जु (४०), जे (२९,६९७०), जेता (८२) नेम (१०५) जेहा (1१४) जेही (११५), जेहो (९२) तणी सण तणो (५९,९१ १२०,१२१), तब (७४,७५), तर (६६) तिक को (६४,१२०), ते (१९,५२,५६,६१), तोई (11६), तान (८२)तोर (५०) थोडी (११२), तो दिसी (६८ १२०), पुरतर (१२०) पारआग (७३), न (यहप्रयुक्त), नको (४२), नयी (३८), नमो (८१), नहीं (४१ ४३, ५० ७७, ७८, ७९, ११६), नाही (४४,४५) नो (८२, १०.), नित (४),, न (८४,101,१०६,१०८), नो (५९), पछ (७३), पहेला (७८), पाछा मागो (८३), पाख (७०), पास (११६) पासा (५५), पास (१०), पुणि (२२), पूर (१०८), विचे (२३), विचाळ (४), वगा (५५), वारवारा (१०३), मल (३२), म (२०,३५ ३९,७९,९२) मा (३९,७९), मानहू (३०) माह (२४,६५,९९), माहोमाह (३२), मूळ (५०), मूळ (५९), मोकळी (८), हरी (९), रसाळी (२६), रोतो (७०), लार (४१३) वळे (२५,३१,५७, 111 11९) यिहाँण (१,४,६९), विहायो (६७), दिघाळ (१६,118), अंगो (३७,११७) या (७२), सण, समी (१५), फिड (९८) सामहो (८०), सौमी (१२), सार (३), सारा (१०२), सिर (१,११२), हिय (१४, ७६,७७,८१), हो (५२), हयपक (४८), है (८०), हेवा (३६)।

चतुर्थ अध्याय नागदमण का काव्य-सौष्ठव । स्वरूपात भेद को दृष्टि में रखते हुए प्राचीन संस्कृत आचार्यों ने घय कास्य को गध, पध, मिश्र नामा तीन यों में विभाजित किया है एय पद्य काव्य को मो महाकाव्य, खडकाव्य, मुक्तार पाय नामक तीन उपवों में मांटा है। इन सम में प्रमुखता महाकाव्य को मिली । महाकाव्य के स्वरूप गठन वा सब प्रयम विवेचन आचार्य भामह ने अपने काव्याल कार नाम लक्षण प्रप में प्रस्तुत किया है । तत्पश्चात् दडो, हट, हेमच द्वाचाय इत्यादि विद्वाना ने इससे सक्षिप्त विवंचना की। महाकाव्य का सबसे सुदर एव विस्तृत विवेचन आघाम विश्वनाथ के साहित्यदपण में उपलब्ध है। खड काव्य पर विचार करते हुए साहियपणकार ने लिखा है-- काध्य भयरमहाकाव्यस्यकदेशानुसारि च। -~-साहित्यरपण, षष्ठ परिच्छेद श्लो० ३२९ अर्थात्-महाकाव्य के एक अग का अनुसरण करने वाला पडकाव्य होता है। इस लक्षण के उपरांत मी सडकाय को स्वरूप गत बिपता जानने लिए महाकाव्य की विशेषताए जानना गेय रह जाता है। इसके स्वर को जाने बिना खरकाव्य और महाकाव्य की सीमाए निर्धारित करना असमय है। साहित्यदपणगार ने महाकाव्य में स्वरुप का विवेचन निम्न प मे किया है १ महापाष्य का कथानक सों में विभाजित रहता है। २ महाकाव्य मानायक कोई देवता या धीरोदात्त गुणा से समन्वित कोई उच्चकुलोत्पन्न सप्रिय होना चाहिए। एक हो वश में उत्पन्न अनेक मरेशमी उसके माप हो सकते हैं। ३ अङ्गार, बोर तथा गांत में से कोई एक रस प्रधान होना चाहिए। ४ उसमें नाटक को समन सपियों (मुख, प्रतिमुख, गर, विमा, उपसहति) को स्थान प्राप्ठ हो। ५ महापाष्य का पान या तो ऐतिहासिक होना चाहिए या । सनाधित। ६ उसमे घार वर्ग (धम मय काम मो1) म से कोई एक फल स्वरुप मे होना चाहिए। प्रारम्भ में नमस्कार, आशीवचन अयवा मुख्य पथा की ओर सकेत कप मे मगलाचरण धनमान रहता है। ८ उसमे यहीं वहीं दुष्टा को लिदा सार समना की प्रासा होती है । ९ महाकाव्य के राजा को सत्या साठ से अधिर होनी चाहिए और इन सग का नाकार बहुत बड़ा या महत छोटा भी नहीं होना चाहिए । प्राय प्रत्येर सम मे एक हो छद का प्रयोग होता है और सर्गात म छद परियतन अपक्षित है। यही नहीं सग मे विविध छदा का प्रयोग भी हो सकता है। प्रत्येक सग अत मे आगत क्था की सूचना होनी चाहिए। १० उसमें सध्या मूय, चन्द्र, रानि, प्रवशेष, अधवार, दिन, प्रात काल, मध्याह, मृगया, पयत, तु, धन, समुद्र, सयोग, वियोग मुनि, स्यग, नगर, पश, पुद्ध, यात्रा, वियाह, मप्रणा, पुत्रोत्पत्ति आदि का ययानुकूल सांगोपाग वणन होना चाहिए । १. महाकाव्य का नामकरण यि, पथावस्तु नायक अथवा किसी अय पक्ति ये नाम य आधार पर होना चाहिए और सर्गों के नाम सागत कथा र प्राधार पर होने चाहिए । उपयुक्त लक्षणों को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाय तो नागवमण मे महाकाव्य क गधियां गुण उपलध हैं। नागमण को पचा एक प्रत्यात पौराणिक कथा है । इस यानायक योकृष्ण पूर्णब्रह्म परमेश्यर एव नायकोधित गुणों रो राम्पत हैं। गारम्म मे मुख्य पया की ओर सस्तावित मगलाधरण विद्यमान है । समस्त याव्य म वीर रस अगोमूत है, वात्सल्य, शात रस सहायक रुप में प्रयुक्त हुए हैं। या यवस्तु-पाचों नाटकीय सधियों मे विमक्त है । सज्जा स्तुति एय पल नि दादा प्रराग यम तत्र आया है। प्रात काल, गो दोहन, गो चारण, कदुक क्रीडा सयोग, वियोग, सत्यवणन, युद्ध इत्यादि प्रसगों का ययानुकूल वणन मा है । समग्न बाध्य म मगलाचरण तया पएस को छोडकर एक ही छद का प्रयोग हुआ है। इस नाम क्यायस्तु के आधार पर है । पुरषाय धतुप्ठ्य फल के रूप मे प्राप्त है जिसे स्वय नागदमण कार ने यत्र तत्र स्वीकार किया है। इतना सब कुछ होते हुए भी यदि कोई वृष्टि है तो यह है-काव्य की सग होनता और यस्तुसक्षेप । नागवमण को क्या का सबध मात्र एक दिन को घटना से है । इसमे समन जीवन को घ्याल्या समुपस्थित परना कवि के लिए कठिन हो नहीं बल्कि असमव भी था। फिर भी भूला साया ने अपनी काश्य प्रतिमा ५ पल से भगवान श्रीकृष्ण क लोकोप ४० धारक स्वरूप को चित्रमय झाको उपस्थित करते हुए गोरक्षा का सदेश प्रस्तुत किया है वह किसी भी महाक्च्य से कम नहीं है। परन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से यह पडाय को ही परिधि में आता है। नागदमण का रस-निरूपण रसयुक्त वाय ही काय है! ---कह कर रसपादियों ने रस की महत्ता प्रस्थापित को है । नागदमण वीर रस प्रधान काव्य है । झूला सयाजी का भगवान श्रीकृष्ण क मन य मत हाते हुए भी वीर रसावित भगवचरित्र का घाटधान करना उनकी पगगत विशेषता है। चारण कुल सदा से ही वीर माव का विस्तार रहा है । नागदमण मा नेति नेनि प्रक्रिया द्वारा चतुर्विध से छ तथा स्मास्त्र वन उक्त परम्परा का सुदर निर्वाह है। विमान अनुभाव तथा सचारी मावों पे सयोग से परिपुष्ट स्थायी माव हो रसमा स्वरूप ग्रहण करता है। वीर रस का स्थायt माय उत्साह माना गया है। इसरे दान, घम, युद्ध और धया यह चार भेद अरकारिया ने बताये हैं। नागदमण जगिरस स्वरुप युद्धवीरका परान हुआ है । रसके आश्रय भगवान धीरप्पा हैं और आलम्बन है पसलिय नाग । नाग का विय-प्रमाव से यमुना के जल को दूषित करके गौ तथा गोगल समाज को हानि परवाना और नागपत्नियों द्वारा भगवार को क्वल साधारण बालक एव कालिय को एक बहुत बडा चोर समझना, उदीपन है । कालिप के भफार आक्रमण में समय भगवान का निश्चल रह पर उस प्रहारों को विफल करने की चेष्टाए भनुमाव के रूप में अपित हैं । गव, तक, स्मृति इत्यादि सचारी माया का यया स्थान निegमा है तथा वात्सल्य, करुण और रौद्र रसों का सहायक रसा के रूप मे वणन है। यद्यपि यषय विषय वस्तु के मापार पर नागदमण एक घार रसाईक्त सण्डकाप्प ही निर्णीत होता है। पर कविता तिम लक्ष्य भगवान श्रीक्षण की माला गायन द्वारा सासारिश दुषों न होरर मोक्ष प्रालि है। इसी कारण पह कृति भक्ति रसाई वतनी मानी जाएगी। नागदमण में भक्तिरस प्राचीन आचार्यों में भक्ति को पत्र रूप से रस को सशा नहीं दी है।गत रस मतगत मावस्य A वन । देवता आदि विषयक रतिको भाव कहा गया है। रस रहा पर तु यह बात की तकचित है ? वाय रसात्म मायम-विश्वनाय विमानरचानुमाये चा यह समारणा तथा । रमतामति सादि स्यायो माद नमाम् |~ सा. ६० परि० ३ मा स्थायी भार पर सच दार्म पुरै दमा या रामावाश्चतु गत वेदी परि० ३ रतिशत विषया व्यभिचारी यानि मायक |-कामप्रकाए भगवद्भा मागयत जादि के श्रवण से जो भक्ति रस का अनुभव परते हैं यह उपेक्षणीय नहीं। उस रसमा आरावन मगवान, पुराणादि धयण उद्दीपन, रोगांच मादि अनुमाय तथा हर आदि सचारी हैं । स्थापी है-जगदिषया प्रेमरप भत्ति । इसमा गांत रस म हमारेग नहीं हो सकता। धारण यह कि-प्रेम, नियंद या राज्य के विरुद्ध है और पराग्य होगांत रस का स्थायी माप है।' ईश्वर म परम अनुरक्ति को मात कहते हैं। यह दो प्रकार को मानी गई:-रागानुगा और यो । वधी से रागानुगा भक्तिरो श्रष्ठ माना गया है। इसमें भी दो भेद हैं- पामरपा और सम्ब घरपा । विषय सम्मोग तप्णा को काम कहते हैं । इद्रियाय हो बद्ध जीव का विषय है। इसीलिए पडित लोग इसे पाम पहा परते हैं। जिस जगह परमत वरुप भगवान, विषय रप में यरण रिय जाते हैं, उस जगह विषय सम्मोग तणा को प्रेम कहा जाता है। बाम और मम मे स्यस्पगत भेद नहीं है, एवर विषयमान का भेद है।' प्रेमामक्ति को दो अवस्याए होती है-माय और प्रेम । अलकारिक वैयादि विषयक रति को भाय पहते हैं रस नहीं यह पहले प्रकट किया जा धुश है । पर वैष्णव भक्तों का भाव उससे मिन्न है। जहा अलकारिक कृष्ण सबधी रति को फेवल माय बहगे रस नहीं, यहाँ मक्ति शास्त्री उसे रस मी कह सकते हैं । भाव शुद्ध रति है। अलकारिकों को रति से यह रति मिल प्रकार की है । स्त्री पुत्रादिर के प्रति जो रति है यह पद्ध जोय की जउ विपया रमि है । पर धोकृष्ण के प्रति भक्त को रति चिद्विषया होती है। पर्यात अलमारियों के रस जडो मुए हैं और मक्ता के रस ईश्वरो मुख" यही दोनो में - भक्तिरस मास्त्रियों के मतानुसार मतिरस व्यापार मे निम्मारित पाच माव हाते हैं-१ स्थायो भाव, २ यिमाव, ३ अनुभाव, ४ सात्विक भाव मोर ५ सधारी भाव । इनको परिभाषाए अलकारियों जसी ही होती हैं। स्थायीमाव नाम प्राप्त रति, विभाव अनुमाव, सात्विक तथा ध्यमिचारी मावा से परिपुष्ट होकर पाच स्वमार्यो को ग्रहण करती है तथा उसी के अनुसार रति पे पाच भेद हात हैं जसा कि निम्नास्ति तालिका से स्पष्ट है- 1श्री रामदहिन मिश्रा य दणु प००१२ अमापरा अनुरक्ति ईश्वर । -- श्रा-सा तु अम्मिन् परम प्रेम म्पा । -नारद मदिसून श्री हजारीरसाद द्विवेदी-सुर सात्यि पृ० ३२ * श्री श्रीधेय शिक्षामा पृ० २१०-२१ डा. रामरतन भटनागर-हिदी मलि साहित्य प० ८८ शाटिल्य सूत्र गार सचारी मधुरा ति मनहरणत्व स्वभाव शात दास्य वात्सल्य स्यायो गातरति दास्य रति वात्सल्य रति सख्य रति आलम्बन सवश्वरत्व सुकुमारत्व सुजानत्व उद्दीपन एकांतध्यान नमस्कार वदन बाल सुलम चेष्टाए क्रीडा वसत यातु, वस्त्राभूषण सात्विक अनुमच्छ के अतिरिक्त स्तम्मादि आठो स्तम्मादि आठो स्तम्मादि आठो स्तम्नादि आठो स्तम्मादि आठो मति, पति, हर्ष, गव, चिता, दास्य की तरह वास्य की तरह दास्य की तरह निवेद, स्मृति मति, घति, निर्वेद, तक, का, दीनता तथा विप्रलम के अम सचारी नागदमण में धणना आरम्म तथा जत की नागपत्नियों द्वारा गोप पत्नियों के स्वरूपा गोचारण के समय नागपत्नियों द्वारा स्तुति एप यमुना द्वारा पूजा अर्चा का वर्णन दर्शन एव कयोप यमुना तट पर कदुक स्वरूप दशन तथा स्तुति का वर्णन कथन का वणन क्रीडा का वणन कयोपकथन का वर्णन रागानुगा भक्ति को प्रेम भक्ति की पुष्टिकारिणी समझकर इसे पुष्टिमाग को सज्ञा दी गई है । आचाय वल्लम इसके प्रवल प्रचारफ रहे हैं । इहोंने विजयनगर के राजा कृष्णदेव को समामे शवों को पराजित करने के उपरात दक्षिण से वृदावन आकर गोवद्धन पर धोनायजी के मदिर की स्थापना को तया अपने उपास्य बालकृष्ण (श्रीनाथजी) के नित्य तथा नमितिक आचारों द्वारा सेवा का प्रकप क्यिा। यल्लमकुल संप्रदाय मे वही प्रणाली वतमान तक गहीत है। भूला सापाजी भी बालकृष्ण (श्रीनाथजी) के अन प भक्त थे। प्राचाय वल्लम द्वारा प्रतिष्ठापित नित्याचार हरिसेवा का यमन इहोंने नागदमण मे बडे ही सुदर ढग से प्रस्तुत किया है-- नम १ ૨ ४ आचाय वल्लभ दाग प्रतिष्ठापित आठो प्रहर की सेवा तथा नागदमणकार की वणनमूचर तालिया- सेवा सा समय माव नागदमणकार नावान नाम मगल प्रात ५ से ७ जनुराग पद, जगाने के पद, और दधि विहाणू नयोनाय जागो यहेला रियादि बजे तक मथन के पद छदम०१ शुगर ७ से ८ बजे बाल रुप सौदय, धेग भूषा, बाल क्रीडा लिया सार सिगार गोचार चौला तक के पद इत्यादि दस०३ ग्बाल ८ से १० बजे सरयनाय चौगान, गोचरण आदि के पर मरया माम सिंदूर मारग माउ इत्यादि तक द सहपा ४ मे ७ तक राजभोग १० से १२ बजे छाक के पद गिमाव जिफ नायता मोगजाणी इत्यादि छ० स०२ उत्थापन साय ३ से ४ लीला के पद वई वासळी सोंगळी नादवा ता इत्यादि बजे तक छदस०८१२ तक मोग साय ५ वजे कृपण स्प, गोपादगा, मुरली, एप मापुरी, अचाणक ऊमो रआन- गाय गोप आदि के पद छद स० २१ से ११९ तब सनी नावों या पणन है। सध्या गो ग्वाल सहित वन से आगमन, गोदोहन घया, वात्सल्यमाव से यगोदा का मुलाना महापाळ पाळो तणौ माण मोडी, जसोदा आदि के पद दिसो जावियो पाप जोडी । छ०स०१२० शयन ७ से ८ बजे अनुराग के पद तथा सयोग शृगार के रम्पो नरपराधारमण व स० १२२ म तक पद देवल सत किया है। ६३० बजे ७ ८ पएल विशप यहाणपणामी असार १५ का प्रभाव हाचते- मानम भी गोप समान वानियापराप नागमणकार वणनानुसार ही सपा दिन होता है। यया (1) प्रात वात ना, (२) बलवा, (३) गोचारण सामग्री हा परिधान, (४) स्वरों साय वन गमन, (५) ग्रीडा, (६) मा भोजन, (७) सायकाल म गायों सहित धन से मागमन, (८) भोजन गयन । अलकार रस या व्यग्य के पश्चात् यदि पाप मे पिसी और का महत्व है तो मनकारों का। अरम' या अय है भूषण । जो गलत पर वह अचार जिसरे द्वारा पलहत किया जाय इस कारण व्युत्पत्ति से उपमा आदि का प्रहण हो जाता है। मलकारों का उपयोग सादप-वृद्धि के लिए किया जाता है। यह मोदय भावों का हो या उनको अभिव्यक्ति का मावों को सजाना, उरें रमणीयता प्रदान १र२ असारों का काम है और दूसरा काम है मावा की अभिव्यक्तिको प्रामल करना व उम प्रमानगाली बनाना। Tम निद्ध कवियों का अपनी रचनाओं में अलगा + ए प्रया नहीं करना पता है। यारेक में सतानमार-farप्यमान निाइयों को भेटने पर भी प्रतिमाशाली कवियों के समय अलकार प्रथम स्थान प्राण पने को अपन आपको हम पहले हम पहले कहते हुए टूटे से पड़ते हैं।' परिजनोचित सस्कार मूरत वतमान होने के कारण नागमणार शे मलारों लिए प्रयास नहीं करना पड़ा है। नाम म डिगर में বগো লই গিয়ে বস্ত্র প্রতিস্থায় স দা ৫ ৪ দিবg हमा है । ययगमगाई है सपस प्रयोग से अय समस्त पायगत दोषों का परिहार ( जाता है । अघ उपमा मारि प्रयालारों का प्रयोग भी यया- स्पान हुमा है तथा पूरा सापानी की उप्रेक्षाए तो अलमारों में अपना एक 1ner ranार दाग युपया पुरा लार रन्दोमामाkिa -वामन ति श्री गमन मिशवाय दपरा पृ० ३२५ प्रकाराला दिनमा दुरटायपि रा समाहित धरमप्रति सवलत पवे सहाकिया परापतन्ति -प लोर * माल, क्यामगाई कम दस ए ३६ दुरा, म स्वनम-विमद-रघुनाथ से - H- भावश्यक समर सर्वप्रथम निस्पको भारत हरपार ययणसगाई का उत्तम, मध्यम और अपम प्रकार भेद से ययणरागाईको तीन गो में रखा गया है। उत्तम २ मी आरिमेल, मध्यमेस और भतमेल नामक तीन उपमेव माने गए हैं। इन अपित यावरोट, सम भरारोट और पून अखरोट भी करते हैं। प्ररथ परोट एक घोपा भेद भी नहीं फहीं मिलता है। नागदमण में अयणरागाई के समी भेदोपमेदों का पयहार हुमा है। सपा- आरिमेल-चरण में प्रथम याश्य के माविवण को याति उसो घरण के अतिम याक्य के आदि मे होती है। उदाहरण- विहाणू, नवो नाप जागो पहेला, हुयो योहिया धेनु गोपाळ हेला। जगाड जसोदा जदुनाय जाग, महो माट घूम नवनीत मांग ॥ ७० ॥ विशेष-उक्त उदाहरण में वव, हह, ज ज तपा म म को मावृत्ति दशनीय " ७० " मध्यमेल-चरण के प्रथम वाक्य के मादिवण को मापति उसो घरण के तिम याक्य रे मध्य में होती है । उदाहरण- १ सारद करो पसाय । १ २ लिया लपकडी कप ऊमा हुलास । 10 ३ रीतो पाहा ये अजीत्यौ घरांन । ४ घडीय बिहू नीमर मा जघायौं । ५ होहि गोपद मणरारि। १२२ अवमेल-परण में प्रथम बाप के आदि यण की भात्ति उसो घरण के अतिम वाक्य के अत मे होती है। उदाहरण- तव नदर नस बलभद्र न हता। भरपमेल-घरण मे प्रथम वारय के आदिवर्ण को आवृत्ति उसी धरण वयणमगाई तीन विध, याद मध्य तुर श्रत । मध्यमल हरि महमहण, तारण दास श्रनत ।। श्राढा किरानाजी-रघुवरजस प्रकाश प० १२ वरण मित्त क्षुधाण विध, कवियण तीन कहत । श्राद अधिक सम मघ अवर, यून अंक सो अत ॥ कवि मछ-रघुनाथ म्पक पृ० ३४ मरध मेल असरोट छ, चल तुम पि यदि चाल विमछ-वही पृ० ३५ १५ २५ ४९ " ४ " १५ ऐरी। " ७ २६ मध्य वाश्यों में होती है। उदाहरण- वलद्द व त्यो दिखाळ यो सुदामा। २ हाहाकार हक्कार ससार सार । ३ सब सु दरी मु दरी देखि मोहो । ४ ढळतडी ढाल नेजा न धज्जा। ५ मिलोकी न त्रासई वीहा औ न वूम। ८८ ६ प्रणी बात सारावधी कोड काना। ८९ मध्यम कोटि को वयणसगाई मे असमान स्वरों, तथा स्वरों के साथ य, घ, अथवाह का मेल होता है। यथा- उदाहरण-1 आप बधाणो ऊपल । २ इको बेवटी घोवट आप ऊमी। ६ ३ ऊमा गाय गोवाळ झूरत आर । इख बाळ गोपाल पामी अचमा। ५ इस नासिका सिध्य दीपर ६ अमारा भगत्ता तणां एह मोरा । उड डॉगळा पींगळा रागारा। ८ ऐरी जोवोन देखो चखे न हेरी। ८६ अचमकोटि को क्यणसगाई मे विमिन वो जसे 'ट' वग और 'त' या अथवा अल्पप्राण और महाप्राण वर्गों का मेल होता है। यया- उदाहरण-1 डी लार काहो चढ्यो वृच्छ डाली। २ तब नदरी लार आहीर टोळा। ३ दरम्यार काळी तणो मेल्हि डायो। ४ दळातडी दाल नेजा न घाना। ५ जाल प्रम्ख नीला यह विस्ख माळा । ६ फणिनाय न झालवू ऐण पाणौ। ७ तमां देव मोटा अमा मत थोडी । नागदमण मे उक्त वयणसगाई के अतिरिक्त छैकानुप्रास, वत्यनुप्रास, अत्यनुप्रास, लाटानुप्रास अत्यानुप्राप्ठ, पुनरुक्ति, वक्रोक्ति इत्यादि गन्गलकारा २ उराहरण यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते हैं तया उपमादि मर्यालकारो का व्यव. हार भी पयास्पान हुआ है। पतिपय उदाहरण प्टव्य है- उपमा- मुग्यौ यात माघात माता सनेही, जसोदा ढळी कदाटी सम जेही २ नहीं नागणी योर एहा निकास यस रस्सण उस्सण विश्वास । . "१०३ १७ " ५० . 1 .

एव १६ 18 २ लम "१०३ " १२२ ६ ७ १६ " २७ १९ . १ मुण्पो यात आयात सन नाना पासपूदा । ३ उड गळां पींगळारा मारा। ४ समठो पार संसार होहि गोप अणहारो। उत्प्रेक्षा- हुई दरी घेन न घेन हेला, मिल वाळया जाणि श्रीगग भेळा। २ पुळी नर नीसार आयो प्रहट्ट । निवेणी उत्सट्टीय रामद्र तट्ट । ३ पालि तण आई तोटत काठ, गयोगाणि चितामणि रय गांठ । ४ इख नासिका सिध्य दीपसरी, पळी घप जाण एगलप करी। ५ अली सकुली जाणि विधी आलश्च । ६ घेर्यो नदरो घोट अहियोट एहो, जळायोळ माह पळा सोळ जेहो । ७ गोपीनायरा हाय जाया गडद्द अही गारही जाणि छाट उडद्द । ८ अही मूठ माज जिहा नां उपाय मही गारडू जाणि पाळी रमाउ । ९ काळी नागरा पाह समाळ केया, लधी जाण यूटयो दधी मच्छ लेवा । असम महा सम्मिया निधि जाम मोटा, परो हेव तू ही बिया सब सोटा । अतिशयोक्ति- जाळ विहाय नीला घहै विरुप शाळा वदन सहस्सौ वध ध्योम व्याळा । यहा शृङ्ग सीतग हेमग वाळा, जिरी फूक आग मरहक फाला ॥ रूपातिगयोक्ति-1 महाकाळ काळो नको वाळ मान, पडी दोतडी गाज हो बाघ पान । २ गुड रूप तोन प्रणाव्रत जेहा, कुहाडा प्रणा ऊपर मार केहा । व्याजस्तुति- 1 मनासू न मू कइ घडी हेव मामी, पर पुर गां तणो पित्य सामा। १०० " ".. " 1१४ . .

उद " - २ प्रिया तात न गोत्र पारा पिठाण्या, वहा गोपरो पुन आयो विहाण्या । ३ जोयो नदर ग्रह सयवट जागी, हिव लापया सक यो लोक लागी । नागदमण म प्रयुक्त छद नागदमण काव्य मे प्रारम्न के चार दोहों तया अन के एक पला के अतिरिक्त सवत्र भुजगप्रयात द का व्यवहार हुआ है । भुजगप्रयात सुप्रसिद्ध समणिक छद है जिसका लपण राजस्थानी छदगास्त्र में इस प्रकार दिया गया है- ध्यार यगण पद प्रत चया, ८ भुजगप्रयात । आटा किरानाजी रघुवर जम प्रकाग प० १३६ नागदमण के मवाद और उक्ति वचिय नागदमण का विशेष महत्व उस वणन और सवागें कारण है। xxxxविशयतया नागरगो और कृष्ण के सवागे म माधुय, वात्सल्य, मा चय, भय उत्माह जाति मानों का एक साय सुटर सामजस्य मिरता है। वे बड़े पबते हुए और उपयुक्त हैं। यदि यो प्रकृति चित्रण परते हुए काव्य के अनुकूल वातावरण प्रस्तुत करने में विशप सफलता मिली है। सफर सवारों का विवरण इस प्रकार है- 1 नागणी और वृष्ण सवाद-द २ नागपो और यमुना सवाद- ३ नागणी और कृष्ण सवाद-" ४ नागणी और अयस्त्री सवाद ८.९३ उक्त सवादों में तथा वणनों मे लोकोक्तियां और मुहावरे मणिकांचन योग स्वरूप प्रयुक्त हुए हैं जो भाषा को सजीवता तथा सौदय वृद्धि के मूल उपादान समझ जाने है । कतिपय सफल प्रयोग दृष्टव्य है- 1 वईकुठ र नाय तो विचारी । २ रम मग गावाळिया रगरातो। ३ मन्यो दूसरो मेल सेटन माय, हिव जरा वात गोवाळ हाय । पणा मोमचारी चढी वात घोट । ५ लिया जीह दत नहीं लौर लोरी गुड गाय गायाळ नरत्य गोत्री श्री मोतीलालजी मेनारिया--राजस्थानी मापा और मारित्य पृ १३ 'श्री पुरुषोत्तमत्री मनारिया-क्मिणीहरण प्रमावना १ १४ १५ ४ " " " . " " ६ बुलाय मळ साप नासी भुरपरी। ७ काठीनागमू जोगिए पनि पानी परयो सात गोश परमात पानो। ८ सीन इसा मान सप रहाळा, धोज नहीं योन पायाठा। ३७ ९ दर बार पाळी तणो मेल्हि डायो। ३८ १० मरीज नहीं आम न पाय भोळा । ११ बधारया न यार मन वाटयाटा। १२ आज मुग्प प पान री सोनि भाव । ४० १३ हारियां जोरिया परतार हाय । १४ सूतौ साप जगाडीज घेणको । ६८ १५ पिता मातरी औषणी पायानो मोस्यारी हुई धूघरो साच मानो। १६ लला तू नहीं मेह पूरत लूणी । १७ अमा पय सांडा तणी धार आग । ७३ १८ मिळ कसरा दूत पाणी न माग । १९ मिळ दादुरा मेह तो सांच मान । २० डीजे नहीं जगळा जाट राणी । २१ दिसू आपरो मोल आप पराव । २२ नरी नारी को नागणी नां वियाणी, रही वाशाला देव दाणध्व राणी। ८२ २३ नारी गाठियो सूट दूनी न पायो जणणो किणी हेव तू ही जनायो । ८३ २४ गिणों बाद जोता केई कोड गाडी। ८४ २५ सपो बाळ एन ग्रिभुयन सूझ । ८८ २६ प्रमू मग सागो सोई पूल पायो । २७ करोफाही विचाळ प्रमू लोक लाग, हेदा सुण्या साप रा यि चाग । ११४ नागदमणकार का काव्यगत सदेश मूला सापानी ने प्रस्तुत काव्य मे भगवान श्रीकृष्ण के सर्वेश्वर मस्तिवाव के साथ साथ गो सरक्षण के महत्त्व का भी प्रतिपादित किया है। मारतवप में प्राचीनकाल से लकर यतमान तक गो तरक्षण को एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में माना गया है। अनेकानेक भारतीय पोरों ने समय समय पर अपने प्राणों " ८० " " को बाजी लगार गो रमा के महत्व को अगुण रखा है। वजानिकदृष्टि से भी गो रक्षा का महत्त्व कम नहीं है। भारत एक कृषिप्रधान देश है। गाय इस देश को सर्वोपरि राष्टीय निधि है। गायों के द्वारा दूध, दही, घृत इत्यादि अमृतो पम पुष्टिपर साहार तो उपलब्ध होता ही है साथ ही साय कृषि काय ये सम्पानाय बर भी गापों द्वारा ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार को राष्ट्रीय- निषि का दुबर होना, नष्ट होना देशका दुर्भाग्यचक लक्षण है। जिस प्रकार मगवान धोकृष्ण गो रक्षा निमित महाकालस्वरूप कालिम नाग से लोहा लेने मे नहीं हिचकिचाये उसी प्रकार भारत के प्रत्येक नागरिक का परीष्य है कि गो सरक्षण के लिए यदि काल से भो ४ार लेनी पर जाए तो उसमे मानाकानी न र, इसी में राष्ट का कल्याण है।

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झूला सायाजी
कृत
नागदमण
मूलपाठ
महत्त्वपूर्ण पाठभेद
शब्दार्थ एव भावार्थ

अथ श्री नागदमण लिग्यते दूहा यळ' या सादर' वरणवू', सारद' करी पसाय । पवाडौ पनगा सिर, जदुपति कोधौ' जाय ॥ १॥ प्रभू धणा' चा पाडिया, दत वडा चा दत के पालन पोढिया, के पय पान करत ॥ २ ॥ किण न दीठो कानवो', सुण्यो न लीला सघ' । आप बधाणौ ऊबळे, वीजा छोडण वध ।। ३ ।। अवनी भार उतारवा, जाग्यो' एण जुगत्ति । माथि विहाण नित' नव नव विहाण नत्ति ॥४॥ छद भुजगप्रयात 6 विहाणू 1 नवो नाथ जागो वहेला हुयो दोहिवा' धेनु, गोवाळ हला। जगाड जसोदा जदूनाथ जागे, मही माट धूम, नवनीत' माग ॥1॥ १ चळतो [ग], वाणी पाज परणवा [प], विधि [1] सारद [ग, ड) यीनवु [स ग घ ], * सादर [ग, पवाड [स] पुषामा [ग], सरस्य [ख], सरस [ग], ' कीनी चि] । २ प्रणाय पाडिया [ख] पणाई [ग], " पालाण [] ३ 1कामा [स],' सुघ [ग] धाव [स] । ४ बायो [ग] नाप [गह च], नवेनिस [ख] । विहारणे [], बहिला [ख], ३ दीयो ख च], हवा [प], दोडिया [४], हिला [ख], जागो [ख घ ड], नवनिदि [], ३ मांगो [] 1 १ 7 अथश्री नागदमण दोहे हे गारदा ! आप मेरे पर अनुग्रह कीजिय जिससे मैं यदुपति श्रीकृष्ण ने कालिय नाग सिर पर चढकर जो पराक्रमपूवक युद्ध चरित्र किया, उसका सादर वणन कर सकू । प्रभु श्रीकृष्ण ने अनेक बड बडे दत्यों क-कइया के पलने मे सोते हुए और पइया क स्तनपान करते हुए, दाँत उसाड डाले (नष्ट कर दिये) ॥२॥ भगवान घोकृष्ण क लोलायुक्त चरित्र ऐसे हैं जो न तो देखे गये हैं और न सुन गये हैं। दूसरों को वधनमुक्त करने वाले स्वय ओखली से यध हैं ।३॥ भगवान श्रीकृष्ण भूमि का भार उतारने के लिए इस रूप में प्रकट हुए हैं कि-नित्य प्रात काल मे नवीन नवीन उच्छ खल व्यक्तियों को अपने वश मे कर लते हैं ।४। भुजगप्रयात छद हे नाय ! प्रात काल मे गायों को दुहने के लिए ग्वालों की पुकार हो रही है अत शीघ्र जागिए । इस प्रकार जसोदा के जगाने पर पदुपति धोकृष्ण जागे और मटके मे दही मयते देख कर नवनीत मापने लगे।। पळ=पराक्रमायो-वह । सारद सारदा। साय-मनुग्रह। पवाडौ= युट परित्र । पनगा-सप के । सिर ऊपर । कीपोक्यिा । २ घणा चा=पने के । पाड़िया-साडे । वडा-मोटे । के= पइयों के । पोढियो घोते हुए । पय-दूध । करत करते हुए । ३ किर्ण न=क्सिी ने भी नहीं। दीठो-देखा । लीला- सलीला- युक्त । बीजो दूसरों के । वघ=पाल । ४ पवनी-पृथ्वो । भारमोझ । जाग्यो-प्रकट हुमा । एण-इस मसार । जुति युक्ति, रूप । नापि विहाण =निरकुरा, तय खल । नवनवीत, नमस्कार करते हैं । विहाण प्रात पाल नप्ति-वध में कर लते हैं। १ रिहाणू प्रात काल । नवो-नवीन । वहेनापोन्र । दोहिवा= दुहने के लिये । हेना=पुकार जगा जगाये । नवनीत-मनन । ५५ जिमाव जिव भावता भोग जाणि परम जसादा जिम' चक्रपाणी । अराम अधार्य दियो आचमन, मपूरी ग्रह पान बोडा' मसान॥२॥ लिया सार' सिंगार गोचारले, घर जाज का गम्मुना तट्ट बोला। सुण्या साम आगम्म भी महली, हरवा हवा हवी हवेरी ॥३॥ भरचा माग सिंदूर मारग भाळं, वह सामलो ब्रज सेरी विचाळ। वहे गर पवार पिडार बाळ, वा नेह सू तेह' गोपी निहाळ ॥ ४ ॥ होहो होहो ही, धेन हाक, क्षस्खा बढी नदनुम्मार याक । अहोराणिया अन्बला झूल आवं, भगवान न धेन गोप्या भळाव॥५॥ इको वेवटी चोवट: आय ऊभी मभालो लियो स्याम मोरो सुरम्भी। हुई नदरी धेन मू धेन हा भिळे वाळया जाणि थीगग भेका ॥६॥ २ ३ ४ जिमा [ग] त्रिमा [४], ३ बौ[], किये [a ग ], कपूरे ख ग प], 'यो व ! लार {e}, प्राजरो [r}, ३ भाग मा n} | 1 भार], भरे [], लेवार [] लवार [], देह [सगी । हरीहे सौहे [ख ग], देहरी [प], 3 बार [ग],' माख [ख], 'पावलो [] प्रामला [ग], " भुनाव [ग]। हा [], एके [ग], " चुप ख], 3 समाले [ग]. नाय खu], Sोपी [ग], सम्मो गा, 'इव [ग], गोपाळ ला ! " भेला [a] बाहला । 10 धोकृष्ण को जा जो प्यजन रुचिकर हैं उ ह ही परोस पर यशोदाजी भोजन करवा रही हैं। सप्त होकर भोजन कर लने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने आचमन किया और पूरी पान का बौडा यह विया।२। भगवान श्रीकृष्ण ने गोचारण ६ शृङ्गार प्रसाधन कर लिये क्योकि आज वे यमुना-तट पर कोई खेल करेंगे। उनका आगमन सुन कर गोकुल बालाए प्रत्यक्ष मन पर उह देखने को खडी हो श्यामल पात्र श्रीकृष्ण बज की गली मे चल रहे हैं और उनके पीछे दुधमुहे बछडे तया वाल ग्यास चल रहे हैं जिहे माग में सिंदूर मरे गोपिया नूतन स्नेह सिक्त होकर माग मे देख रही हैं ।४१ भगवान श्रीकृष्ण हो हो । हरी हो । रहते हुए गायों को हाफ रहे हैं । इमर अहोरनिया रोखां पर चढ़ी नदकुमार को देख रही हैं। उपर अहारनियो का सुपर समूह तया गोपिकाए आकर अपनी अपनी गायें श्रीकृष्ण को सम्हला रही हैं ।५। इको दुको गोप बाला चौराहे पर आकर सढी हो गई और मगवान से कहने लगी पियाम ! मेरो गाय को सम्हाल तना। नद के गो- समूह में साथ मय गायें इस प्रकार आ-आ कर मिल रही है मानों नाल आ आ पर श्रीगगा मे मिल रहे हो । ६॥ २ भावताचिकर । भोग भोजन सामग्री, व्यजन । जिमैं सावे है । बकायोशुराधारी श्रीकृष्ण । प्ररोग भोजन किया | अपाय-तृप्त हुए । पाचमन हाय धोना, पाना । पहेलिये । ३ लिपा सारर लिया, सम्मानपर लिया । सिंगार पृङ्गार । गोचार लीला-गोवारण लीला क । का=कोई । सट्टरिनारे । कोनासेल । प्रागम माना। हरवा हरेवा देखने के लिए। हवेली हयेनो महान मवान पर। ४ भरमा-भरे हुए । मार-माग ! माळ =ग रही है । बज सरीज का गला घra सभ्य मे । मारपीदवार दुधमु हे पछ 1 विहार-गोप । तेह-२), सित | नितळ : निहार रही है। ५ ही भगवान कृष्ण । धेन-पाय | mataातायनों मां देव रही हैं । मग मग सुमर समूह । मावसम्हला सी हैं। . इसी वर्ग-की-दुक्की । धौवटे-चौराह पर भी बड़ी रह गई, व्हरी । मगरपामा सुम्मी-गाय । हेलापतित । भिळ -मिलते हैं। बाळा-माल ! माणिमानो । भेला साप । - ५७ पुळी नर: नोसार आवी प्रहटदै, त्रिवेणी उट्टीय ममद्र' तट्ट महवक्त सौधा' तणी सौढ माथ, हरी मजरी तिल्लर वेण' हाथै ॥ ७ ॥ वई वासळी सिंग्गळी नादवा ता। गळे माळ गुजा ग्रज वाळ गाना । सब आमा सामरा प्रत्य सद्दा, जमूना तण तीर आहीर जद्दा ॥ ८ ॥ रमेवा राव गाय सू हे राग , यह कीजिय पाह भोर विभाग । वर्दकुट रे नाथ स्डी' विचारी क्यिा मारमा रोक' वह विनारो॥९॥ पस पार1 पिडार था दोहू पास, लिया लक्कडी कप ऊभा हुलाम । घड. गेडिय गेंद मदान घेरी', घणो घूमर डपर घेर घेरी ॥ १० ॥ झिलै आवता ऊलट फिरी राम चोटा कहो' दोट फेर । मझी आक्रो माझिया सेल मातो रमै सग गोवाळ्यिा रगराता ॥ ११ ॥ हक झेर 8 ७ ८ पुरे [ग], पुरा [१], परे [३] • नयर [स] नगरे]ग] ३ कीघा [ख ग], पोधो [4] 4 फिर उनरा [ख], फिर उलस [ग], " सिंधु [ख ग] "सुपा [व], नुधा [ग], ' सोड [], मुदही [ग च],' वीण [ख] बाह [व ग] " सगना [प], सगली [ग] 3 हेाता [ल ग], व्रज बाल गोवा गाता [ख] • मायुना [ख], नीर [s] | [], २ रगा [स] . यही [स], “विमगा [स] ( सारी [ख ग], "विस्तारी [ख], ' जाय [स], दुहुँ [ख] बोनू [ग] वे [] बाल [क], दोय [s], किया लाकही वध भी कला से [ख ग ८] * गज [स], घेर [ग] फेरी [ड] । उलटा [रा ग] ' दोट [ख ग], ३ करे [गह], तपो (प), पाकुडे [ग], माको [5], सेलते [ग] । 1 सम ६ 4 1 १० ५८ सारी गाय चल पड़ों और नगर से निकल कर समतल भूमि मे आ गई जसे सागरतट पर त्रिवेणी उलट भाई हो । श्रीकृष्ण तिलकयुक्त मस्तक पर हो तुलसी और सौपा को सुवासित सुगयि धारण किये तथा हायों मे बासुरी लिये पा रहे हैं :७४ बांसुरी एव सोंगो के बजने की ध्वनि हुई। न बालको के शरीर पर गुनाओं को मालाए शोभित हो रही थी। इधर उधर वाले सारे गोप-बालक यमुना तट पर परस्पर शब्द करने लगे ८॥ खेलन के लिए सब बालको ने एक स्वर से कहा कि-हे कृष्ण ! आप हमारे सामी (माह) बाट दीजिए । यकुण्ठपति श्रीकृष्ण ने अच्छी तरह विचार करके बराबर के लोग दोनो ओर बाट दिये १९४ गोनों ओर अपार गोप बालक कों पर लाठिया लिये उल्हसित हो रह थे। इतने में हो गढे हुए गेडिये से गेंद को मैदान के अदर घुमाने का प्रदान करते हुए घेर लिया १०॥ मुख्य खिलाडियों में प्रमुख खिलाी श्रीकृष्ण खेल मे मस्त तथा ग्वालों के साथ खेल रहे हैं । वे अधर माग से आती हुई गेंद को एक ही चोट से उसट देते है एव राम घोट' कहते हुए उस गेंद की चाल को पलट देते हैं।११॥ लीन होकर इत्र, माथे ७ पळीपलकर । नर-नगर । नीसार=निकलकर । प्रहम- तल भूमि पर, पौद में । तट्ट किनारे पर । सोधा में डालने का सुधित मसाला । सोहि सगधि । माय-मस्तक पर । मजरी-तुलसी । येणारी। हार्य महाप में। ८ पायी। बामठी बांसुरी की । सिगळी सोगी को । मावा- पनि । तो वहाँ पर । गातो परीर पर मामला समना- इधर उपर वाले । प्रत्य सहा-परस्पर शम रो बाल । माहीर. जहा-महीर पाला। ६ रमेवा खेलने के लिए | है- सगाव से। विभ : हिम्मों में बांटना । रूडीपच्ची ! सारखा समान । बहूँ दोनों। किनारीपनारे, तरफ में । १. पक्षेपारपार । पर। हलास-उल्लमित हो रहे है। मैगन-घेलने का घोलान । घणा-बहुन । घर-घरे में । ११ कप-योर देते हैं । मेर-प्रहार से । फिरि-घूमकर, पुन । दोट-चलती हुई गेंद । मझोपुर । पाकरोगेज । मातो- मस्त । मसैल रहा है। रातो-लोन होकर ।

. - मिल चाट सामो सधी' दाट माय हुई दुई, मला तणो हल हाथ । चढार' घण मावड तीर ना जमूना तग नागिया नीर जाट ॥१२॥ दडी' लार काही चट्यो ग्रन्छ- डाळी भरी थप काळी दहै नाग वाळी' । काळीनाग राई का ह सभाळ वेवा लवी जाण यो दधीमच्छ लेवा॥१॥ मड्यो' दूसगै खेल मेठत मागे, हिवः ऊतरी वात गोवाळ हाये । कर श्रीन पदा नमतेय' काहा, जोव धेन धद्धीक पाठ जम ना ॥१४॥ जदुनाथ काळी समो' पाथ जोड घणी भोम चाठी चढा वान घाड । ऊभा गाय गावाळ यूरत जार, हाहाकार हमार समार सार ।।१५।। मुण्यो वात आघात माता साही, जसोदा टळी क्दळी सभ जेही । साह समी लार हाली सयाणी रहावी पिचाळे थकी नदराणी ॥१६॥ . 3 1 4 बहाव [-], १२ प्रामा [ग], सामा [-] सभी [ट च] दूध [ग], दुद [] • दोट [ख ग], फेर [s] " पाडे [] । 1 [ग] दडू [], वाज [ग] 3 झांफ [], भोप [ग] भाली [ग 2 ] स [ प र 6 दहे [स] ft [द] 3 करत्रिए [ख], नम देव [ख], नमदेय [ड ], वादक [स] घेधीक [ग], पुकार ६ १५ 1 सरोसी वय [ग], " ऊभी [ग], गोधार। कदळी [ग], 'समाहे [ग], अन राणा। 1 १० दोनों ओर के खिलाडियों के सम्मिलित हाथों से गेंद को समो घालों पर आमने सामने प्रहार होने लगे तया यमुना तट पर अत्यात निकट ले जाने हुए गेंद को यमुना के गहरे पानी में डाल दिया !१२ गेंद के पीछे श्रीकृष्ण वृक्ष की डाल पर चढ़े और जहा पर कालिय माग का कुण्ड या उसमें एलाग लगाई। श्रीकृष्ण, कालिय नाग का पर स्मरण करफ इस प्रकार कूवे मानो लापा (किलशिला पक्षो) मच्छी प्राम करने के लिए समुद्र में कूदा हो । १३६ तेल जा रहे खेर के ऊपर अ य खेल रच गया । अब ग्यालों के हाथ स बात चली गई। श्रीकृष्ण को तीनों खड नमस्कार करने लगे और यमुना + सट पर खडी हुई गायें तम्घ होपर देखने लगी 111 'यदुपति श्रीकृष्ण मालिप से बाहु युद्ध परेंगे" यह बात घोडे भाकर (अत्यात तीव्र गति से दूर दूर तक पढेच गई । गायें एक बाल खए आतनाद पूषक विलाप कर रहे थे। सारे विश्व में हाहाकार मच गया1१५७ यह मुनपर स्नेहमयी माता यशोगाजी इस बात के आधात में बदली सम की तरह गिर गई । ममहादार सखिया ने उई सम्हाला और फिर वे उनके पाछे पीछे चलने लगी कितु चलने वन वे माग में ही था १२ मोट प्रहार । सामो-सामने । सवी-सारी माला-खिला हियों । तपो-को सls frक्ट ) नोखिमोहाल लिया । नौर जाई-गहरे पानी में। १३ मारपीछ । बच्च- । हाली । मप सांगली दह-कालिय नाम में । ममात्रमाणु करके । देवा- बरालयी-मुम्बक पक्षी ( राजस्थान में हमे रिलकिस भी पहने है )}म-माय । घोसलवा लेने के लिए। १४ खेलत-सेने जात हर घर ! हिप । श्रीन-तीन जुर्व =सतो है । घड़ी-tary isनारे पर १५ समी-मामने, से । वाथ जोर याहु युद्ध करेंगे । भोम-कृष्वी । अमरबहे हुए। मूरता कर रहे ५ प्रार-भात ! सार%D समस्त। १६ माघात-प्रहार । हो-गिर पो । पतम्भ । मवाद-सम्हान परमे। हरणी --चनो प्रयाशी-चतुर हाराहक विचाले पाच । यो-विपिन हो गई। । %2 तवै नदरी लार आहोर टोळा सह आपड हे हेवा योगा । जुव' जोपिता जूथ भेळी जसूदा, वपयो' हुई, वानहो मेघ पूदा ॥१७॥ बिहा लोचन नीर धारा बहती, बनयो कन यो जसूदा वती' पदी तण आइ लोटत पाठ, गयो जाणिगितामणि रव गाठ ॥१८॥ बलद्देव वूझ्यो दिपाळ्यौ मुदामा, रम्यो सामते ठाम जोवत रामा । लिया जीह दते नही लीक लोपी, गुडै गाय गोपाळ शूरत्य गोपी ।।१९।। ऊभी घूट 1 हेको करी जात आरा, थभेरी म हूका लहैका मथारा । जसोदान के झप साधी जमना, पहे लाभियो मान हू जात पना ॥२०॥ अचाणक कभी दरवार आव, मिळी नागणी हेक हेका मिळावै । इस बाल गोपाल पामो अचभा, रही दोवळी नागणी देव रभा ॥२१॥ 1 नारि [ग पड] * हाली [स],' हलोले [स],सलोले [ग], * जाई जोवती [म ग], बाबोयो [ग] । 1 बहै [स ग] का हो याहुने [ग], ३ करती [ख] काली दी [स] कुलोद्री [ग], 'प्रावि [ख ग], भूरति [ख], ' नग [ख ग] बम [ ] दिखावो [ख] रिसाले [ग] निज [ख ग] सजा [], * गयो [ख में नहीं ग] । 1 घोट [ख ग], घोट [s] : करिजास [ख च] फरेनास [ग], पर पास [s],' पभ राम अभी [ख च], यभे ऐम [] यह पाग नहीं है [ख ग घ ], पेहलो मरे मात हू तात प ना [४] । पाम [ख ग] देवळो [ग]। २० २१ तभी नद के पीछे अहीर समूह एक दूसरे के कयो को पार पकड कर चलने लगा तया स्त्री समूह में यशोदाजी घातर के समान बनी हुई फ हैपा रूपो मेघ यू दो को देख रही थी १७ यगोदाजी कहैया ! प हैया । पहती हुई, दोनों आखों से अश्रुधारा बहाती हुई, यमुना के तट पर लोट रही पी माना विसी दीन होन के पास से चितामणि रत्न सो गया हो ।१८१ बलदव के पूछने पर सुवामा ने जिस स्थान पर श्रीकृष्ण खेले ये वह स्थान बताया। उसे यशोदाजी देख रही थी। पास ही गायें,ग्वाल याल और गोपिकाए, दांतों तल जीम दवाये हुए विलाप कर रहे थे ।१९॥ समस्त गायें, गोप एव ग्वालिनिया मानसिक पीडा न रुकने के कारण उच्च स्वर से आर्तनाद करती हुई यूथ बनाए खडी थी । इधर भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना के जर छलांग लगाई । उनको पानी के बदर माग मिल गया। वे जल में एसे विचरण कर रहे थे मानों सप पानी क अदर विचर रहा हो ।२०। धोकृष्ण को अकस्मात् दरवार म जापा देव समस्त नागिनियां परस्पर एक दूसरे से मिलीं। बाद गोपाल को देखकर विस्मय को प्राप्त हुई तथा उनके आसपास अप्सराओं की तरह एकत्र हो गई । २।। १७ तबतभी । माहोर टोळे अहीरों के समूह में। पर चले। मापह-पडे हुए। हेक हेका एक दूसरे के सघोल को। जुव== देखती है । जोपित जूथ स्त्री समूह । गली-साप । वपयो-चातक १८ बिहू = दोनों । लोचन नेत्रों से । दहती-वहानी हुई । बहती कहती हुई । क्लदी-यमुना । तरण=के । काठविनारे । बारिण:- मानोरकीन गांठे-पल्ले से । १६ वूश्यो-पूछा । रम्यो बेला । ते=वह । ठम=स्थान । जोवत- देख रही थी। जीजीभ । लोक-लकीर । गुड =समीप । झूरस्य विलाप कर रहे थे। २० पूर-यूष जत्या ।हेको 12एक। मारा-मातनाद । थभेरीम- की नहीं पी। एक-मानसिप पदनाए , सके। लहैका- मपारा । पहे-माग । लाभियो-मिला पना-सप । २१ भवाणप्रवस्मात् सत्मा । इप-देवकर । पामी-पाई । पचमा-प्रा वय । दावळोद गिट, पासपास । देवरमा अप्सरा । पक्षी। - %A जप नागपत्नी' सनी म्प जोती, महाभद्र जाती तणा वान' मोती। पुणी' सामळो गात्र पोळा पिछोरा, पणा ऊपरा नग ओप कदोरा ॥२२॥ पगा घरी रोळ आणद पुजा, गळ हार मोती रळ माळ गुजा । विच दूलडी हे चौको विराज, जिसी राजधी बेहरी नम्यगम ॥२३॥ बिहू व बाज् तणा" नग वाहै, मणी नग हीरा तणी ज्योत माहै । महीनारि जप लई मोल ऊची, पहचे प्रभूर लटका प्रहूची ॥२४॥ सब सुदरी मुरी देय मोही। दत नौती विमोही । अमृत न जायै अघाई, झिगे कु डळा लोळ पोरयाई ॥२५।। इस नामिका सिध्ध दोपक्र ऐरी, कळी चप जाण की परी । नवा नेह दीरघ्घ पकज नेत्र सोभा मीन यजन मृगा महेन' ।।२६।। वळ दादिमें जधुरै 4 - २२ 1 अपि [ख] जीव [च] - पूत्री [१] नाक्य [५ घ], पुण [ ] पण [ड]. 1 पये [ग] पाए [स], · इमो [स] २४ 1 याहाँ [ख] यही [ग], वाजूरणा [ 1 ] ', मणि जीत होरी तो मग मा [ख] 4 लीया [ ] मही पती रोक मुपक ची [ग] । २५ सोही [ग घड], गधरे [७] ३ वान [व] । २६ संघ [], जारिस [] २ जुनी [च] ' तत्र [ग] सवे) [ड) देशभिय वाला पौण क स्वरुप को देखती हुई करने लगी हि-अरे बनके कानों में तो महामद जाति मोती है तथा श्याम पात्र पर पीताम्बर सुशोभित है एव उत निारे पर नगीने और करपनी सोमासमान हो रहे हैं ॥२२॥ परों में मानद समूह, Hओं का शब्द हो रहा है तथा गले में मोतियों का हार एव गुना को माला झूल रही है । साथ हो दो स्याली लोकल के मोच में एक छोको शोमा द रहा है। जिस प्रकार का यह राजकुमार है उसके ही अनुरूप यह सिंह नस शोमित हो रहा है ॥२३॥ दानों बाहों पर बाबद बाघ हुए हैं जिनक भवर मणि, होरे आदि नगीनों को ज्याति प्रभागमान हो रही है । एक तरी नागिन बोली-अरे देखो भगवान के पहुचे में जो यह पहुची लटक रही है, यह तो बहुत हो ऊची कीमत में खरा गई है ॥२॥ समी सुदरिया मुद्रिका का सत्त ही मोहित हो गई । फिर सम्मोहित करने वाली दाडिम के बीजों के समान दातों को पक्ति को जो अपरामृत पान से नूस ही नहीं हो रही थी, साथ ही पोल बधल कुलों को मामा से प्रभागमान हो रहे थे ।२५॥ इसको नातिका कोषक की लौ के समान (तोसी) दिखाई दे रही है वह मानों अम्पे कोरी एप लप को नोक है । नयोन स्नेह के समान सनशील बडे नेत्र, कमल क समान शोभायमान हो रहे हैं । इसकार मानों मोन, मजन एव भृगों की समी छटा यहाँ एकत्र हा गह है ॥२६॥ २२ अपहन लगो । खत्रीविष । जोतोदेखती हई, ज्योति । सामळोयामपए का । गरीर । पाला पिशोप-पील र वस्त्र । कणो करे-किनारे पर। -नगीने । भोपशोभित हा रहे हैं। २५ रोळशाद । ळ भूम रहे हैं । विष-मध्य में । केही नख- शेरमानापून । राज-फरता है । २४ रिहू-दानों । बाहे-मुरायों में । मोती-पोति । मई-भदा Rठी है । मोलकोमत । पत्यो पहुँचे का भाभूषण । २५ मुदसद्रिण प्रभूरी मोदी मोहित हो गई ।वळ पिर डिमाहिम के बीजों के ममापूरमपणे के मचाई वृति। झिगान मोळचपन, पानि ई-पतिविम्य । २९ सिो । एरी-इनको । पप-चम्पा लकीनो। पएलोप नामक धार । ढोरपडे । पहजामल । घोसारकोमा 3 घोह भ्राटी पोर हु पिद है। श्रम भ ग मूता बली' जाण है। अरी सबुरी जाणि कोपी बलक, तणों केगरी रस्सरी तिरका ॥२७॥ यघी चोळमा रग रगी विरगी, सुहै ऊपरा पाप लागी सुचगी । च' नागणी चद्रका मोर ची हो, ओपे चोप पापा घटटा अछेही ॥२८॥ मराहै सराह करें। आपलरोक, ज्या नाग सारा तणी राज सा! ऐमी भागणी पण जे अप' आयो हिंटोग पठाइ घर दुरायो 11 २९ ॥ हुई म्पमयी देव देख हैरान जप जागमी नाग रापो जनन । दायव याळ होसी अवारो, पगल्ले पगल्ल महल पधारौ ।। ३०॥ रहा सा घर दावर दूज रहा। मारी घाट पराट एथ न मावू । चमी चमकी सर्व चित्त: चेती, तुळ पाय लागी वळ लूण लेती ॥३॥ यह २० पोर बग], कर [e], स्यामची देय दे चि], 'द्रोहै [८] भमे [स], सखि लग] २८ चोळ [a], रगई रग रगे [] {e} मूरतोही [ख], मोर तेही घड], धाप पारप [ख], चोप पापर [ग], सप साख पारिख {u. २६ 1 फहूँ [M] पीयों [] प[इ माविलोके [1] प्रग्या , ' एही {a], *पज [५] 'वारे [5], घवारे [] 1 देखी [ हरने [a], हराने [ हिरये [[महो [व], भरो, [ग], भोग [], 'बार [] | 1 देव [ग], पाव च], ' वैन [4], ३ लागू [ग] ।

है ससौ ! दोनों मृकुटियों के किनारों को देखकर ऐसा भ्रम होता है मानों दोनों मोहों के ऊपर मोरे मो रहे हों और अलके मानों भ्रमरों हो शृखला हो । इसी प्रकार के गर तथा कस्तूरो का तिलक भी गोमायमान हो रहा है १२७१ विविध रगों में गो हुई घोळमा बांधी हुई है और मस्तक पर टेली पारी मली गोमित हो रही है । इसके अतिरिक्त मयूर परिका भी लगाई हुई है । नागिन करती है कि इनको प्रमा तो वर्षा ऋतु को अतहीन पटा के समान प्रतीत हो रही है १२८१ इयर घर से श्रीकृष्ण से देख कर नागलोक का दरवार साधारण लोगों मे पचाणच मर गया और वे लोग कहने लगे कि-ऐप्ती यौन भाग्यवान है जिमशे कोख से इस (पालक) ने जन्म लिया और जिसने अपने घर पर हिडोला डालकर हुलराया ॥२६॥ स्वरपपप भगवान पोण को देख कर सभी आश्वसस्ति हो गए और करने लगे---नागराज जग जायेगा,इम वाला को पत्नपूबर रखो। ऐसा मुनशर नागिर्ने भगवान कृष्ण से बहने लगी-दस ! तुम्हें घर तो होगी फिर भी माप धोरे घोरे हमारे महल में घरी घलो १३०॥ यह सुनकर भगवान कृष्ण ने प्रत्युत्तर दिया दिदि तुम्हारे घर रहगा तो किसी अप अवसर पर रहूगा, मेरा स्वरूप निराद है मत अभी यहाँ नहीं समा सकता । भगवान क मुस से इस प्रकार का क्यन सुनकर हम नागिने चौंक घोल र अपने मन में सावधान होती हुई भगवान के परों में अक्कर पहने सगी और बलया लेन सगी १३१॥ २७ कोर-किनारा । भ्रम-म ह । अली= सम्बी भौरा है भौंहों में । साली खना । कीधी-नाई। २५ घोळम-वतमान पाल के स्थान पर पहना माने वाला वस्त्र । रगोविरगी-विविध गोशाली सीटेदी। चोली । उपशामायमान घोपकाति। पासवर्षा ऋतु । मलेही- मतहीन । २९ भाविना मार्ग कर मारनो-देख पर । स्योगादू हो गया, मर गया। लोक साधारण लोगों से जिसकी कूप-गि । हिंडोळी पनना । नायौ-दुपार दिया ३० हैराग्न पस्ति। पहने लग । जतन यल पूराळ पालक पधारोपनो। दाव-प्रवराट स्वरूपावराट-पना एपी-पान पर इस8 | माडूसमा भरता है। सामान हुई । तुदी मारण्यलयां।

सुण्यो रप वेदं सु परयो गयेही,' पड़ा भागरी नागरी नारित वेही । माहो पाह' आणद दाम मुरकी, बोलाव भळे नाथ नापी भरक्की ॥३२॥ पठाहूत आयो मठ काज' नेहा ग्रहा भूलियो वापरी, साप गेहा । भली. नागणी नावियो राह भूलो, देवो आप रो लाज लोधौ दडगे॥३३॥ पटक्क मुहै' नागणी बोर सारी, प्रभू जागसी मूझ पाछा पधारो। काळो नाग सू गेजिप वगि कानी । पड्यो तात मोम चढ मान पानों ॥३४॥ नहीं' नागणी बोल हानिकाम बम रस्सण स्मण विरसवा से। किही कोर चपो, रही' मा बकाव इसौ वाळ देखी दया मूक्ष' आव ||३५|| हजारा मुसा जागसी नाग हेवा, अडीलोन छाड निराधार ऐवा' । महावाळ काळो न का* बाळ माने, पडी दोतडी' आज ही वाघ पान ॥३६॥ 1 ३४ 1 सुवेई [प], सवायो ग] ' नागो भूनौन मायो [ग],' महामोह [ग] महामोद ]प} + ६५ मुरको सड] मुलाई मे खड] "पळी [स] काम [१] 'मोळो खप], भूलो [ग], लिय [ग] दियो ], +लाधौ [], दीर्घ [ग] भापे [], राख च] । मुन [ग], म ही [८] 2 जागिस्य सघ] ३ धुळो [ग], कान [], + पार [स] परा ध], परो । हा [ग] ऐसा [], ३ अपवाहे [स], • कहे [ख] रही [ग], कहो , रहै [ख], " पाय पाव [4], हे प्रापि [ग] भाव काय []" मोय [] | । मुहे [ग] - लहोलो [ख], न इलो [प], लेवा ], नेवा पह), ' म क्यू ख], दो पणी [], बोरडी [] महो [] 2 १८ भमान के जिस स्वप का वणन देदा मे सुना या वही स्वरूप माज सबने प्रत्यक्ष देखा मत वे नाग नारियो बडो भाग्यशालिनी है। नागिन परस्पर हासती हुई अपार आन द का कथन करने लगों । इसने में हो भगवान के गोलों ने उन पर फिर पुरको रालदी ।३। एक नागिन कहने लगी कि-~लाला! तुम रहा से आए हो और यहां पर तुम्हारा क्या काम है ? कहीं तुम अपना घर तो नहीं भूल गए हो ? यह सप का घर है। ऐसा सुन कर भगवान श्रीकृष्ण बोले-है मलो नागिन ! मैं माग मूल कर यहा नहीं खाया हू वर तुम्हें तुम्हारो प्रतिष्ठा रखनी है तो मेरो गेंद जो तुभने लेली है उसे लौटादो ॥३३॥ है नागिन ! तरा यह कटु वचन--"मेरा स्थामी जाग जाएगा तुम पापस चले जाओ" मेरे हृदय म खटक रहा है । मागिन बालो-मैं आपसे फिर बह रही हूँ आप कालिय नाग से पीघ्र किनारा करलो अयया तुम्हारा पिता इयर पर मोजता रेिगा और माता (स्तनों मे ) स्तर बढ़ जाएगा ॥३४॥ भगवान श्रीकृष्ण बहने लो-नागिन ! तुम्हारी रसना के अवर पर सपके विष के समान निवास करनेवाले बचन मत निकालो। किसी अन्य नागिन ने उत्तका पल्ला दबात हए कहा~~ री ठहर, बों पकवास कर रही है। ऐसा बालक देखकर मुझे क्या मा रहोर १३५॥ श्योंकि हमार मुसोयाला कालिय नाग अमी जाग उठेगा और यह ठोसा इस प्रकार के आयमहोन को नहीं छोड़ेगा । महाकाल स्वरूप कालिय कोई वाला नहीं जानेगा । (बालक समा कर नहीं छोड़ेगा। या यह स्वरूप अकरी,बाघ स्वम कालिप के पाल पर गई है ।३६६ १२ पैश्यो-देखा। मांहो माह-परस्पर पहने लगी। मुखको =मित हास्प से। युलावैदयों ने खोली। बुरी वीरण प्रौषधि, भुरको । ११ पटाईतरह से यहाँ हा कसा ! महो-नावियो नहीं पाया हमाग । सीधो-लिया हुमा । ३४ मुहैमेरे को।सारोकटु । मूम-मेरे । पाह-वापिस गि =ोन कानो-किनारा सोझदू दता फिरेगा। पानग्य हाइस प्रकार के रसोरसना मे। स्म-सने वाल। विरमया सेविषपर के समान । मिही-विमो ने। कोर-किनारा पोचाया। रहो-ठहर । मम-मुझे । ३९ हेवामी । मोनोकाठोनिराधारमाश्रयहीन । वा ऐसा, इस प्रकारका मान-सममेगातड़ी-करी पान-पाते । 1 जायो नागणी नाग वैगो जगाडी, अठ माडसा आज यह अवाहो। रढीजे इसा' मात आगं रडाळा, चवीज नहीं बोल,ए काळ चाळा ॥३७॥ नदीठौ रुदौय न नेत्र निहाली, कान ही नगी सामळ्यौ नाग-पाळी । दरवार काळी ती मेल्हि लावा, सड जम राणामको लाभ सायो॥३८॥ चाळा मा कर सामुहा जुद्ध चाळा, बनारयान थार अज बाळ बाळा। पेलीज रमीज पिता'. मातु खोळा, भरीज नहीं आभ सू वाथ भोळा ॥३९॥ गुडेवा' जुतू - ग पाळी जगाव, अज मुस्ख प-पान री मोडि' आव । जुन बस थारी परस्स मनही, काळी नाग मू जुद रोलाग केही ॥४०॥ च्छया वाल देखे दिसू " काळ छेड क्टक्या अटमा नहीं तुझ रेडे । दुरगा दुवाहा दुहल्ला दुझरला. भडा रा नहीं चला झूल भरला ॥४॥ जा हे [M] जगावो [ख] बबे [प] पोनू {८], इसू मात प ध प्रयोगात ड] चविचोली मितव्य मकाल बाला [v], भव बारा एह पया बाळ चाळा [ग] पई बोल ऐ०६ धवई घरचाळी जदुष्य नष, जरियाण, [ग], कदैईन [] जोपण [] -बी [स], काही नहीं {४], 3 म क्यो [] निक्यों {1], विचे [] करती [स], समा [प], " बधे रोम पारे [ग], मधेरान पारे [], 'यह पद्योग नहीं है [ग], पणू {] । 1 जडेवा [प], न तु [ग], २ रा [ग], नही है [-], * मोर [ख], " जुन धम पारी पसस स बेहो च, " सग्राम [] 1 यावा [v], छा [ग] वा [s], छपि [५], " कसू [] भटका [ग], हटवा ], तू हामी [], तू हाट बघ, मोध [भ], कुत [], "माला [] ७० ऐसा सुनकर मगवान यौहरण कहने लगे-हे मागिन ! तुम मौन बार कालिय को लगा दो हम दोनों यहां पर प्रसादा रचो । नागिन बोली-लाल ! इस प्रकार का रोना मा के सामन रोना (इस प्रकार मा के सामने मचलना) यहाँ ये काल को प्रेरित करन वाले बचन मत कहो १३॥ तुमने भी हातिय नाग को आखों से मिहार कर नहीं देखा है और न कानों से सुना है । कालिमा दरबार को ममराज मी चापा रस कर चलते हैं और तुम भी कोई ETम नहीं उठाओग ३८ तुम पुड को प्रेरित ररने वापा घरलें मत चलो (अपनी गति और उम्र से बढ़ करके स्वांग मत रो)। ममी तक तुम्हारे बचपन के केगों का मुण्डन मो नहीं हुआ है । तुम अपन माता पिता को गोद म खेलना, कूदना । मोले ! मा को बाहपाल में नहीं भरा जा सकता ॥३९॥ तुभ कालिय नाग को पुर के निमित्त जगाते हैं। अभी तर तो तुम्हारे मुह से दुग्ध-पान को ग आ रही है । हृदय स लगाकर ENT करने असो तुम्हारी अवस्था देखत हए शालिय नाग से युद्ध का लगाव कंसा ॥४॥ मैं बालक देखकर बहतार कि-यो मौत को बुला रहा है । तेरे पाप्त सेना आरि भी कुछ नहीं है और दुरत्यय, दुवह, दुलम, दुरप एवं प्ठ योद्धाओं सच्छा समूह भी नहीं है १४॥ - ३७ गोशाम पहा ममा-दगल ! रवीरोना (लि.) Relat=रोना । पोज नहीं नहीं रहना । का पाला- दाल के उपद्रव , काम को प्रेरित करने वाले। १८ दौठोमा । निहाटो निहार कर । नमो-नहीं। समिळपो नाहावी-बाप सहचलते हैं। ३६ शाळापाल, शरारत । मानहीं । मामुरमुरा । जुद. पाळा-युद्ध हे पदव, युद्ध को प्रेरणा देने वार । धारपा काटे। मममी तर बाद । सोटागोर में । मामपारा बापवाहपाश । ४० जुदेवा मुदने को पानीदुग्धपान की । सोहि जुन देवकर परस प्यार लाग= सा कर ४१ हवा है। रिपों पण धोन माय । कर-पास ! हासो के ! माना।

न को हैदळे पदळे मेघ नद्दा, जुड वा न वो उम्मरा' नाम जद्दा । सचाळा भुजाळा लशळा न साथी, हठाला पटाळा दताळा न हाथों ॥४२॥ घाटा ग भटा रा नहीं धारट्टा, नहीं धूधरै पासर रोळ यहा। माहे बाह' बाजू हजारा न मखी," हो अगि अग, नही जोवररूप ॥४३॥ ठवं हाथळा राग राग न ठाई, प्रहूच" प्रहूची लोह मौजा न पाई । जडी छक्कडी टोप नाही जरा गुफ्ती न छत्ती क्त्ती न गद्दा ॥४४॥ फिर डवरी संय' नाही फरस्सी, कई चौळ कट्टार कस्सी न कस्सी । टकारी न भारी न अढार टाकी, पपाणन वाण न कमाण बाकी ।।४।। नफेरी न भेरी न निस्साण-गद्दा, रिणतूर वाज न को बाजद पाय पायाळ' बज्जई छिण ऊफण रेण रणा न छज्जई॥४६॥ पपद्दा । 3 2 1 नहीं [], " रण दाह जहा [४] । बाहू वाहू [], महको [],' नही जीण मंगासया जीव रखी स, जूड) अंगमगे )। हाथ रगीन ठाई (खग], 'हूंच प्रभूर [प], 'जसी कड़ी 1 1 सेल स ग कचौली [८], ' स [], 'वधारण {स ग], 1 जनों पाय [स], वामनो वाय [}, परमाळ [प], पेयाल [], 'याई [], 'छाई [] ।

महीं कोई हादत एवं पैदलों का मेघ गजन हो रहा है । लडने के लिए चुने हुए प्रसिद्ध उमराव भी नहीं है । चचल भुजाओंकाले सिह के समान साधी भी नहीं हैं और हटोल घोडे एक बडे बड दातों वाले हापो भी नहीं हैं ।४। घोडों का और सुभट्टों का समूह भो नहीं है और पाखरों में को हुए धरुओं को नकार भी नहीं सुनाई दे रही है । बाहुओं के अबर हजार कोसरों वाला बाजूबद तथा शरीर पर बस्तर एव जीवरसी मी महीं है १४३॥ वीरों के हाथों में तथा रातों में यथास्थान राग के कवच भो नहीं दीख रहे हैं और पहुंचो पर पहुचिया तथा परों पर लोहे के मोजे मी नहीं हैं इसी प्रकार उपडियों द्वारा जरत निरमाण युक्त पत्र भी नहीं हैं । तुम्हारे पास गुप्ति, शक्ति, कर्तरी एव गदा नामक स्त्र मी नहीं दिखाई देते हैं ॥४४॥ विस्तृत सेना में फरसिया भी नहीं फिर रही हैं और कटियस्त्र से कटारी भी कसकर पी हुई नहीं है । भीषण टकार करने घाले धनुष भी नहीं दिखाई देते हैं। और तो और मामूली यांकी क्याण एवं माण तक भी पास में नहीं है ।४५६ नपोरी, मे, नगारे एव रणतुर भी नहीं बज रहे हैं और उनसे होने वाला बाद भी नहीं हो रहा है । घोों के पद प्रहार से पाताल भी नहीं मान रहा है (या घोड़ों क पावों में डाली हुई पायसें मी नहीं बन रही हैं) सपा कम पर रग से सप भी ढका हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।४६॥ ४२ जुड़वा- मुद्ध करने के लिये । उम्मरा-मराध नामजद हा सपाला-चचळ । सकाळासिंह । पटाळा-धोडे । १ पापरस्टा समूह । पासरतरों की। रोल-मनकार । यहासमूह। ठव-यपास्यान 1 हाई-जवाहर, युक्तिपूर । पाई-परामें। जरहाव । ती शक्ति। ४५ सर-मूह , विस्तार । चौकरिवात्र । पहार सोम्पनुप । पसाए पास में तीर (२) बारीमदभुन देतो ४५ मेरी मेर। निमांगना राणतूर-युट के गज । पौर- पद का, बहुत समयोों है। रे-धूलि रैि-सूय, पाकासा न का नकोऐ साप सापा न राज व रागरी धुनि फोज न बाज । गुड नाळ गोळा न दार न गाज, वहे होक होकान का साफ वाज ॥४७॥ न को' हुयर जर छूट हवाई, प्रिवाळ बढाळ न वाजै विधाई । थर्ड बहड' हूह माती न थट्टा घुर जाण आसाढ री मेघ' घट्टा ॥४८॥ ढळसत्तडी ढाल नेजा न धज्जा, दिस मोरळी हर थारै दुभुज्जा । आया औद्रक• सूरमा ऐणि आर, चत लोहवो लोह रिछया न थार ।।४९।। नहीं सैन सैनाधि एको सजाई लड सो किस मूळ पूछा, लडाई । भण नागपत्नी जिता मूझ भीर, तिता माही ऐको नही तूझ तीरै ॥५०॥ कटक्का खगा बाहरौ नाग कार्छ, अमा नागणी-पत्य- रौ जूझ आर्छ । लाडौ जगाडी जुवौ जुध्ध वाथ । हारिया जीपिया ' करतार हाथै ॥५॥ इसो आज ते कोण भूलोक आछ, काळीनाग सू जुध्ध सग्राम काछ । कूण काळी तणी सीम चाप, काळीनाग हू आज ही क्स काप ॥२॥ न कू नाखिये खाप सग्गा न राज सिगा], १ बड़ारागरी [स गड], गडोनाल्य [ख]. गुढे [ग], गडे [४], कोका [स,ग] । क्या है [स]. १ पट्ट बेह बेहूह [ख], घुडो बेहूँ बेहूँ [प च], जेम [ख ग] मेह [ग] । 1 ढलकतडे [4], रो [ग] नको [], मापे उमगे [८], " ऐह [४], 4 लहड [ख घ] मूत्र [व], सूप [ग], भांति [], पूत्र [], " सुर्ण [ग], 'पुर्वी [ख ग], माहोलो एको [], नाग [s] | 1 नाम [] मुझरो पति मालू [ग], वात [ख गङ] । 1 [],' जोध [ड], ३ चढ विश्वाला सग] । चढ ४७ YE 1 ५२ सेना मे गाला प्रशाखा के नीव भी नहीं घोभित हो रहे हैं और मारु राग को धुन भी नहीं बज रही है । तोपों के गोलों से तपा बारव के छूटने से गजना भी नहीं हो रही है । युद्ध के गम्द से होने वाला कोलाहल मी नहीं सुनाई दे रहा है ।४७। 'हवा' ऐसी आवाज करते हुए आग्नेयास्त्र भी नहीं छूट रहे हैं । भडे नगारों का लयपूर्ण घोप भी नहीं हो रहा है । दोनों सय समूह में मापाढ़ की मेघ घटा के समान रव (हुकार) मी नहीं हो रहा है ॥४८॥ लटकती हुई ढालें एव मालों की नोक पर फहराती हुई ध्वनाए मी नहीं दिखाई देती हैं । हम तो तुम्हारे हाय मे केवलमात्र एक मुरली दिखाई दती है । इस कालिय के द्वार पर आते हुए अनेक शूरवीर मो मय खाते हैं । परतु तम्हारे गरीर पर तो लोहे का कवच तक भी तो नहीं तुम्हारे पास न तो सेना है और न एष भी सेनापति है । मैं पूछती हूँ तुम किस आधार पर युद्ध करोगे ? भगवान कृष्ण इस प्रकार के वचन सुनकर बोले-नागिन ! तुमने मेरे लिए जितने सहायक गिनाए हैं उनमें से तुम्हारे पास तो एक भी नहीं है । ॥५०॥ नापिन ! सम एव वीरों से रहित नाग लडेगा उसका और हमारा पुट होगा । तुम नाग पो जगा परके बुलामो और फिर हमारा याह पुट देग्यो। हार-जीत की बात तो ईश्वर के हाय है ॥५॥ नागिन बोली-ऐसा आज पृग्वी पर कौन है जो कालिय नाग से पुट लडे और उस पर चढ़ाई परके उसकी हद्द दवावे ? जालिय माग से आग कस तर कांपता है ।५२॥ ४७ नकोएनकोव (शाखा के सुया गायक)। पिशाया । वही राग-मारराग | गुठनाळ-तोप, वदुर । बारम्बार । गाज= गरता है । होटहीका-युटरव । ४८ शिळे नागारों के वळ =बहों के । त्रिधाई=लयपूण अनि । परसमूह में । हूह हार । माती न=मची नहीं। ४६ नेवाभाले । घजा - वजाए । दुमुज्जा दोनों हापों में । मौद्रा भयभीत होते हैं । ऐणि-इम । पार-तुम्हारे । ५. सेनापिसेनापति । भूळ=प्रापार । लडाई-युद्ध । मणे-कहै । मूममेरे । भीरू =महायर । तितामाही-उनमें से । तीरे-पास । टा-सेना । खगों-बीरों, सलवारोंछा, बषिगा। पाच होगा। जुवोमो तार-ईश्वर । ५२ पसौऐसा । वह। दू-कौन । सोमहद्द (सीमा): पाप वापसे । काप करता है। - जाळ दिग्स नौा बहै विस्य माळा, वदनं सहस्सं वधं घ्याम व्याना । वडा मीतग मग वाळा, जिरी फू आग ' भर टूक काळा ॥५३॥ मरठी घणी साम टी' अमागे हुसी ठापरा आकर आज जारी । निज नारि वखाणिया पद्र' ह । वद जस्म वरो जिय हत्य वाह॥५॥ पनगा नरा दाणवा देवि पासा तुन देसाबू' आज वगा तमामा' । पणी नाय न झाल्वू ऐणपाणी । मोरी' एह' कालियो द्रोहमाणो ११५५।। मुहै' जोड होमो घडी हा माहे । निद्यो नाग ते बोल घोटा निबाहै । जमना जप्पई नागणी छोडि नारा। फणी पेण न खावसी देसि फोरा ॥५६॥ जमाना तणे नागणी वण' जागी, लियो बाल त खाज लण लागी। कठ वाम मूसाळ धोटो रिणी रो, वळ दूसरी ताहर दूण वोरा ॥५७।। 1 विषयाला [ग] ' सेनग ग], पल [ग],' सुठो [v]. रूठो [४] जूठऊ [प], भूम मारी [ग], इसके भागेच प्रति में प्रषिक पाठ है वह सीह मोनी हमार रवीज, करतार न भावती बात कोई। धवा मनमा कमला जीव वाली ममजलीयौ रज तज्जा सभाली। धुर कौन बठी हा महिो ढूक, चिह खाण पालो परि याव एकै । वहा बोलिय बोर तेता विचारी, पराई मा मद गध उतारी।। 4 कद ब ग प ड], नुहे [1], " वढे [], 'दथ्य [s], ५५ 1 वेग [ग], खि [] तुना दाखदा [], हमे एकरणी गांड केरा हजारी, नही नागरणी लाग पारोलगारीमा } पुषि परिण [व] जाण्यो [ग], मुणे [ग], ऐस], एक [] मुर [, 'नटयो मन [ग] निज [फणा फीण [] जप [], वेण [s], ३ लिप [ग], ' बोलको स], 5 सोमना [s], " दोटो [] 1 जर कालिय नाग के सहरू मुषों से विष ज्यालाए निपलकर थ्योग में साकार होवार वदती हैं तर हरे वृक्षों को जला देती हैं तथा जो हिमालय की बड़ी बडी शीतल चोटिया है ये तो उसको पूकार के सामने मां मरने लगती हैं ॥५३॥ मेरा पति कालिय प्रोधित हो जाने पर पागल हो जाता है ठाकुर । आज बहुत ही घोर लडाई होगी । भगवान ने कहा-नागिन । अपनी नारी बखान करन पर पति को इज्जत नहीं यदा करती, प्रत्युन निसके थाह प्रहारो का बखान गण फरें तब हो उसको सधे माने में इज्जत बढ़ती है ॥५४॥ पागों, मनुष्यों, रामसों और देवताओं के समक्ष आज तुम्ह शोन्न हो खेल दिखामगा और इही हाथों से कालिय को वश मे करके पकड गा। यह कालिय मेरा परम मा है ।५५। नागिन बोली-अभी घडी भर के अदर आमना सामना हो जाएगा। तुमने नाग को निंदा की है इन वचनो को नागपुर निभाएगे । जमुना कहने लगी.नागिन । तुम जोर छोड दो। इसको छोरा समश कर फालिम माप नहीं खायेगा ५६ पमुना के पचन सुनकर नागिन सजग हुई और वचन के द्वारा हो धोकृष्ण की परीक्षा सेन लगो । नागिन बोली- तुम्हारा नियास एक मनिहाल कहा पर है ? हम किसके पुत्र हो और तुम्हारा दूसरा भाई कौन है ? १५७ ५३ दिसम विस्य-विप माळालपटे व्याळासप। शुग चोटी । सातम-शीतल । हेमग-अफ वाले पहाच । पहाट पहारी चोटिया पाळाला। ५४ प्रमठोट होन पर | साम-पति । मठो -पागल समारो- हमारा । पाकरू तेज । भारो-पुट भातनायुक्त बोलाहल । वाणियांसा परने पर | द्रजत । ३६-कहें । इत्यवाह-प्रहारों को। ५५ पासमोप, से । गा=गोघ । तपासाला फाग । नायन-कावूकरके। ऐण पint हो हायों से द्रोहमारा ! ५६ पुहोर ग्रामना-सामना ! जाप कहने लगा जोरा और। ५७ वएपनों से 1 बागी-सचेत हार सोजना-जांच, परीक्षा। हो 3 वासनिवाम ! पूसा ननिहाल ! घाटी--पुत्र । -कौन । बोरो-भाई।

अमारा' मगता तणा' एह ओरा, मडापा' मथुरा धरा चाम मोरा । मोर नद याबो जसोमत्ति माई, भलो हेर यळभद्र नाम भाई ॥५८॥ मोर पस मामी रहै' मूथ मूळे, कियो यास' नेडी जमू ना जवळे । मनांसू न मूबई घडी हेक मामी । फर' सूर ऊगां तणी नित्य सामी ।।५।। माम मोकळी पोजना करण मासी । इता दीह चौह हुतो उप्पवासी । घणा दोहरो मकियो नेम पाते । हद जीम मू जुन्झ विभ्रात जात ॥६ol भ' मात, भ्राता विहे धन चारो, वहे आज ते नागणी मूक्ष वारी, सुरभी तणी गणी कच सेवा, गळे अध्य ओया' पुरी पेह ग्रेवा ॥६॥ नरामेह लाग रहै देह नीको, तिसो नागणी गवराचन टीको । बधा देस दीजै विप्र वेद बोल, नही वागणी तोइ' गौदान तोल ।।२।। 3 ५६ ५६ 1 4 मोग], 'रिद पास ड] महामामध्यराबास मोरा [ख] महया पाम घरे घरा ] महे रिदि चा विपि चा च], * जसोदासु [],ळ [प], 'छ। पहू [ग] यहे [५], नास [स ग] ' कोल [ग) झकूल मजद],' ऊग खग] ममेजुद ड] । 1 मारवा ] सोझना च], [] अपवासी [स] चवि ], बन []प्राज तो भ० पा० [], पाप पाग हग] प्रा उधा [4], गया गच], प प्रति में अद्ध पद्य नहीं है। नवयो [ग], नको [], लागो रही [४] जिम रघससू [] रोचान [ग], गद६ पाद्र [1] गायरो चन्द्र [] "विatri [ग] गो वेद [५], द्विजावेद [] कोय [ग], गायरस [५], तेह [५], ख प्रक्ति में यह पद 17 है। ५८ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरे मतों थे हृदयों मे एवं पृथ्वी पर मथुरा मे मेरा निवाम है। मेरे बारा नदनी और माता यशोदानी है और मुझे से यहा बलभद्र नाम का एक माइ मो है ।५८॥ मेरे कस नामक मामा हैं जो मेरे समोप ही यमुना तट पर निवास करते हैं । वे मुझे एक बहो मो मन से नहीं उतारते हैं, निरय सर्योदय होते हो सामना करने के लिए तयार रहत हैं १५९ मामा ने मुझे खोजने लिए मौसी को मो मेगा था। मैं इसने दिन से उपयास हो कर रहा हू । यहुत दिमो का नियम डाल रखा है, अम युद्ध को भ्रांति मिट जाने पर ही भोग्न परगा।६० हैं नागिन ! माता ने रहा है कि तुम दोनों माई गायें चराओ। बाम मेरो वही (पायें घराने को) बारी है । गायों को सेवा पहुच श्रेष्ठ है। इनकी पद रज से पाप समूह नष्ट हो जाते हैं ॥६॥ जिस प्रकार गो पद रज से मनुष्यों का शरीर अUBा रहता है, उसी प्रकार गोरोचन का निलकबरी पर भी शोभित होता है । वेदों और ब्राह्मणों का कहना है कि समस्त देश का दान देन पर मो गोदान कतुल्य नहीं हो सकता १६२१ - ५८ प हमारे । मोराय (वर), कोठा । मोरारी । माई । मली-प्रच्छा । नामनाम वाला। भूम-मेरे । मूळे समीप । नहोनिकट । कूल =ट पर। सोमो युद्ध, मगवानी। ६. मोकळीनी । सोजना जाच । मामोमोसो। दोहोदिनों का । सपनाती-भूखा , बहुत । नेम= नियम , प्रत । पाते हालकर पब । जुझ=युद्ध । विनावि विदना । बारे-दीतने पर। ११ कहती है। विदोनों । धारोमो । पहूँ । भूकमेरी । दारोवारी । मुरम्मी गाय । अपग्रेड । गळे नष्ट होते हैं । यपाए । प्रो समूह । सुरी मेह- पुणे की धूलि । मेगा=गायों की। १२ नोकोमा, सुश्र । तिमोसो प्रसार । रोविला स्था । मोन-पत हैं । तोर--नब भी । वो तुम। प घोळे । पचाअम्रते देव इच्छ, पवाळा । सबै तीथ वामौ वरागसाका । दही दूध गवा' ची आ सुपदाई । मठा पाळीया साड खोहा मळाई ॥६३११ वळे हाय मू मात आफै विरोळे । घृत पीजिये आण निवात लियो मागि लणी दियो मात लूदी । न वम तिवं नागणी बोल यू दो ॥६४॥ पण उच्छचे व्याहिया प्रेह ग्रेवा, पियस दुवाचहि माहे परेवा अवनी तणी भारि ले क्य आयौ , जुवो नागणी ते हुतो गवुजायौ ॥६५।। कही सू वडी कपड़ी तोर काही, महम्मा घणी प्रागण धेन माही । खळा हळ नागळा पाण' खेतो, अमै नागणी हाथ मे* आय ऐती ॥६६॥ पड लातरी धेन ओ नीर पोधे, काळीनागनू जग्गवू तेग कीर्घ । प्रिया, तात नै गोल थारो पिछाण्या, वडा गोप से पुन 'आयो विहाण्या ॥६॥ 1 कोज पा], भाषा रखाळ [-], [-],' घेनु [४], पप्रति में यह पाश नही हैं । सवामन दे दूध उगे सवारो, एरी नागणी तोल मोटो प्रभारो भ० पा. [], जे नवनिय [ग],गे पासना ] नवनीत जे [], मोठा पोलको ग] पोलिस [४], मिलाही [s], मिठाई [प], यह पद्य ए प्रति में नहीं है । नौनीत [], निघोण [व], यह पद स प्रति में नहीं है । 1 बरा उबक महि ग्रासी गरमी, पचासा व घेन माहे परको [ग], घरह मुखवइ ध्याहन खेह प्रोण पचू सापय माहै परेवा प], गरा उसका यह ग्रेही गरेबी, पोसाइते धेन माही परवी [ड जोने घेत । यह पदार यति में नहीं है । 1ोर [] धौर []पाहुणो [ग],प्राहण {4], प्रामणे [४], कोजेन [गड], प्राथमी रात [५], प्रति में यह पद्याश नहीं है। इणे {], प्रा {घ} [] न जाणका [ग], जगासे में, जगाये जे [प], केस [2], पूत [] | 1 . दूध, मृत, शहद एष पौनो (पघामृत) के द्वारा प्रक्षालन की देवता को रखते हैं। समस्त तीयों का निवास गोशाला में होता है । दही, दूध एव मट्ठा मिलाई हुई राब, चीनी मिलाया मा खोया सपा मलाई, मिषो मिलाया हुआ पृत पौने मे यों हो सुन्ध बेने वाले हैं हिर लय माता उन्हे अपने हाप से मथकर देती है तो उसमें स्वाद और भी बढ़ जाता है । मासे मसन मागने पर वह उसासा सोका देती है । है नागिन ! इस प्रकार खान पान वाला समुच्य वचन रूपी में (डॉटाकशी) महन नहीं कर सकता ।६३-६४१ घर अदर गाय के प्रसूत होने पर यहाही उत्सव मनाया जाता है तपा उसका पीयूष मिट्टी के वतन (पारी) मे दुहा जाता है । हे मागिन । तो पृथ्वी का मार अपने गधों पर धारण कर के आया वह गाय को सतान हो था १६५६ हे मागिन सिो भो किनार (छोर) पर चलकर देख लो।रिसरे प्रांगण में गाय है उसका बहुत महत्त्व है और खलिहान मे तथा हल घराने में बलों के आपार (पति)से ही रोती का कार्य होता है । इस प्रकार फा गो-रस स्वरूपी धन हमार हाय मे है।६६॥ सह का पानी पीने से गायें दुर्वल होती जा रही हैं । इसी कारण से हालिय नाग यो जगाना है । नागिन ने महा-~-प्रिय तुम्हारे पिता एवं गाय को हमने पहचान लिया है। सुबह सुबह बहुत बड़े गोषक पुत्र यहां आए रो। जिस प्रकार मेरे सामने कालिया नाग को जगाने की ६. इच्छा करते हैं । पसाळा-प्रक्षालन । वसं रहते है। गम्वुसाला- गोदार में |शा में माला डाल पर बनाया पा १४ बळ-पुन । माफ-वय । विरोळ =मपार । बाण-मानो। निपात मिश्री । लू पोमक्खन । न दोनोंदा । न सम- मही सहन कर सरते हैं । ति। बोल बूटो छोटी । ६५ उच्दर उत्सव : ग्रेह पर मे } प्रेवा-गाय पिम्म खोस, पियूष । परेवापारा में मना-पृष्पी । भारतकोभ । १५-कोपर । गनुमामी-गो प्रसूत । ६६ पला । पपरो । तोर छोर (किनारा) काही कोई भी । ममबहाई । प्राण प्रागन। माहिर | aatलिहानों । कोन में। पाण: भाधार पर गोलों थे । भम-हमार, परे । झाप-- वावर्ती । प्राय-धन सम्पत्ति । पनौतनो । ६० तातरी-दुक्ल । भौगह । पोधपीने से (पर) | बाग गाना hिet-पहचाने । बिहाया I 1 - ३ ८१ . जप मो दिमी जेम' माळी जगाडो, इमा' हाड, ले मात सू वात' आडौ । हेका मिर वापसू पूछि होड, सुतो साप जगाडीज' केण पोह ॥६८॥ कहै पाप से सापरी आळ वीज, तर- आविजो जागसी नाम भोज । पछा पीव रा नागणी तू पिछाण' वडै ठाकुर वात वाच विहाणे ॥६९॥ रीतो बाहडू जे अजीत्यो घरान निसाणी मणा फेण पास न मान । पिता मात रो औधणो' पक्वानो मोत्या री हुई घुघरी साच मानी ।।७०॥ र धेन नौलख्ख दूणी, लला तू ही एह बूदत लूणी । जिहा' बोलता उपड बोल जेता, लला लहै लेसो फणा फेण लेता ॥७१। अही' नारि” तू एह नेठाह आणे , जिव बोलिया बोल गैदत जाण । वृथा वण जाणे रस म्झ वाळा, पुणू एकणी, वार इक्कीस पाळा ॥७२।। नद मेम [ग], " बोली जगायो [व], प्रसो [] + भात [स] भ्रात [४] 5 जगाहिय [६] 1 तो [ग] जो [४] " तुमे [ग], यो [४], पचा पाव [], पापरा [४] * पमाणो [ख] । 1 रोतु पाहड्ड को जीतु नरामि [ख] रीतो बाहहु तो जीती कुणगन [ग ५], जातु बाहिरो को मजे तू न जाण [८], तो जाऊ तो कोइ जीती घरान [च], रे उधण्य [ग], गटु [स], पोसियन [प], उलट्यो [४] 3 साघ्र [व इध] । 1 जेहो [७], बोलिज [ग इ] 'लहेस [व], लेश [], ' फुणा मीण [ग ४] । सो [७], 2 नागणि [s] : नोकल्या [ग], नीसरपा [s], ' मी [], पण [४] । ७२ ८२ बात कह रहे हो इसको छोडकर माता से बातों में ही हर लेना। यदि तुम्हारो मा हां भर ले तो फिर पिता से गत वदर पूछ लेना कि- सोते हुए सांप को किस उत्साह के लिए जगाया जाय ? १६७-६८॥ यदि तुम्हारा पिता कह दे कि-तुम जाकर भले हो साप से ऐड- मानी करो, तो तुम तभी आजाना । साप तीसरे पहर में लगेगा । मगयान हा-नागिन तुम अपने पति के पक्ष को अच्छी तरह पहचानसी हो तमो तो सुबह से हो उस बडे हाकुर (मप) की बातें पाच रही हो १६९॥ यपि मैं सांप को दिना जोते खाली घर लौट जाऊ तो घर वाले साप के चिह बिना यहां पाने की बात को ही नहीं मानी । नागिन होली-लाला ! तुम यह स य समभो कि तुम्हारे माता पिता के पकवान उलट गए हैं एवं घरो मुक्ताओं में परिवर्तित हो गई ज्ञात होनी रे ७० नद के घर नौलास दूध दने वाली गाये हैं अत यह नाघ-कूर सम्हारी नहीं है, उस मक्खन का ही प्रताप है । तुम्हारी जिता से मिलने घोल [धन निकले हैं उनका हिसाब दो कालिय ही लेता पर वह सभी सो रहा है ७॥ श्रीकृष्ण ने कहा-नागिन ! तू यह निश्चयामा रूप से समझ से कि मेरे बधन जो निक्ल गए है वे ह धो के दांतों पे समान हैं जो निकलने रे पश्चात कमी नहीं मुरते । सेने मेरे वचनों को ध्यय समझ रखा है, वास्तव में ऐसी मात नहीं है में जो एक बार कह दता र उसका इरोध बार तक पालन करता है ७२॥ SC १८ मोदिसो मेरी तरफ जेम-जिस तरह घोह-term | मारी: हरु हे होड प्रतिना रकाकोडमना के लिए।' माळ- ऐश्मानी मूठ । तरतव । जाम त्रीजेतोमरे प्रहर । पापा । बाप-बोचती है । ७० साली । बालोटु । यति । निसारणीहि । मसापेमालियनाग । पाम बिना । मौषरपोरसटना । पूपरी सावुत पल उशन पर बनाया gमा पायान । माघ-सरप । ७१ दूणो दूध देने वाली । बोल वचन । मेोहिसाब। फणायाम सप । ७२ शाह-निश्वयात्मक | गै-दत-हापी rata 1 जाणे-मानो। पृषा-फ्जूिल । भूममेरे । पुणूकहता है । यारा। पाळt=पालन ता . निभाता है।

खत्री अमा पथ साटा तणी धार आग, स एह मूक्या पर्छ छाट लाग । मोरे देव आहोर च गाम माहै, खत्री उमट पदका मग्ग वाहै ॥७३॥ वहशा' क्स रैयत्त- सासी, है वट माथ वहै ग्रज यासी । घर वसरै तातरी टाट घुट्टी, तद ताहरी केथ पत्रयट' युट्टी ॥७४|| रळी वसर राज प्रवेस रमता तद' नदर स बलमद्र न हुता । ह्यि नागणा मो बलभद्र आगे, मिळ स्मरा दूत पाणी न माग ।।७।। जोवो नद र ग्रेह' सनवट्ट' जागी. वि लागवा सक त्रालाक लागी । यहू नागणी सुण* सू रोप कान, मिळ दादुरा मेह तो साच मान ॥७६।। काळोनू न नाय तो थार' कमावू , जसोदा माई नद बाव न जावू । नही नागणी नाग* थागे निवार, खि एक ही गाठि पेरू हजार ।।७।। 6 तदा [] * सेन [ख] मट [ग], मांट [8], २ वाजात [ख ३] 'सत्री ऊम ही खाण को सग्ग बाई [४] । काहे को [२] . रेहेत [८] ३ विचेवार [ड] 'घर सरेतुपसी तात [ख] टाटि [ग] घाठी [घ ४] घर कसरे तातरी टाट पाती [च] पित्रवट्ट [५] । पहले [] पहना [ख], पोता [४], नेह [२] 5 नोता [४] बहै [ग] पावै [.] | जुए [ग] जोया [s] : नेस [ख ग] ३ खत्रोट [.] ' बोल रोपकाने [ख ग] रुपयु मोल [४] । 1 काळी नाग नायून जो एक मायो [} तुम्हारो कमायो [ष च] प्रसू [४] * लाग [ग घ ड] ' हेकणी [] । 1 ७ 3 हमारा पथ ( माग ) सांडे को धार पर है अर्थात दुगम है। इस दुगम माग का त्याग रने पर हो कोई कला लग सकता है । हमारे गोव के महीर-क्षत्रिय हाथों में सन धारण किए कमी F उमड रहे हैं। (कि-बालिप नाग को उह से निकाल कर छोडेंगे ) ॥७३॥ नागिन गेली-जयासी क्व से क्षत्रिय बन गए है ? ऐसे तो इसको बहुन रयन है जो अपने अपने हिम्सा पर चल रही है। वनवासी मो हिस्सो पर चल रह हैं अर्थात् कस के अधीन रह रहे हैं । जन्न क्स के घर तुम्हारे पिता का सिर मूडा गया था,तब तुम्हारी क्षत्रियता महा घली गई यो? ७॥ भगवान श्रीकृष्ण महा-नागिन ! अव कस के राग्य में बहुत से लोगों ने मि र उपयुक्त नाटक खेला था, तब नदरे घर बलभद्र र समान पुत्र उपम नहीं हैए थे। अब मेर और यलमद के सम्मुख मदि कसा दूत मा जाम होघे पानी भी नहीं मांगते है अर्थात हमारे द्वारा मार दिए जाते हैं ७५॥ नागिन ने अय सखियों को और सकेत करके कहा-खो,देखो। भर घर मे क्षत्रिय जाग उठा है जिसमे अब तीनों लोगों को मय होने लगा है ! भावान श्रीकृष्ण ने कहा-नागिन तू क्या ताने द रही है ? ध्यान सगाकर सुन, मेंटर तो पर्वा होने पर ही वर्षा को सत्य मानते हैं, वर्षा की बात को नहीं ७६॥ में यदि कालिय को अपने काबू में न कर सका तो 'आजोवन तुम्हारे यहां हो पारी करता रहूगा'अरने माता-पिता के घर नहीं माऊगा। परातु नागिन । मेर पार निराकरण तुम्हारा कालिय नहीं कर- पोगा। में अमी उस सरस-फ्णपारी कास्य को इस एक गांठ को सरसो से घमास गा १७७ २३ समो-हमारा । पयःमाग । खोटा-सलवार । धार-मोक । पर्छ मे} छोट-दाग । माह में मदर । कमटमा रहे हैं। कदका कमीक । पाहे हाथों में । ७४ रयतता ! सगीत । पहिले । सिर । तर रेय-कहाँ । डायोड गई यो, दुट गई थी। ७५. रो-मिलकर, प्रसनता । सम्पर । हिप-अब मोरे । पासो न मग (म.) =मृत्यु को प्रासाते है। १६ वो देखो । ग्रह पर । सत्रयविश्व । सय । शेप-कौन स्थिर करके, यन पूवा । दादुरा-मेडों को। मेह-वर्ण । साप सरम । ७७ नक्कमही । नायू वा में कर या भाकरीमा रहा । पारो-तुम्हारा । निवार-निवारण रामकेगा । एक हो गह एम यो वाली मोगे। फेर मगा। हमारसहान फन वाम, नाग को।

पवाडा अम्माडा पहेला' पुमायौ घडीए विऊ नीमड आ जघावो । ससी बाद पूजा नही साम तोल बाल वाढतोकार पाघोर बोट ॥७८।। सुण्यो। न औपाणी पुराणी मयाणी रूडीज नही जगळा जाट', राणी । पाळी नागरी काण राणी न पाई, वकंवाळ न मुह मा चाढि बाई ॥७९॥ धुरा पोसियो' थान न धान धायौ, वळ मोकळो माळीय लाडवायो। अम्हा सामहो है मग्नी विज्झ' आव, क्सूि आपरो माल आप कराव ॥८०॥ पख बीहू पोढी, मानौ सीप मोरी, अर तण राज परवी', आव ओरी । नमो धीठ धोठा, चव नाग नारी, हिव जोडि तोमू वाता वाद हारी ।।८।। अढगा' कहो' बोल जेता अघाएं, पल' तेतला आज तोनू पसाऐ । नरा नारी को नागणी ना चियाणी, रही बाझडी देव दाण व राणी ॥८॥ ७८ 1 पहेली [0, ' पवाये [४], घही रध्यियु निमडी प्राजघाए [ग], पणा राम्बीयत नीवडा पा जु पाए [५], पणों रूपियो नीघडे नेट घाए [], * इथे [],कोइ [च] सुणोजे [1] - उदाणु [ख प], ऊखाणी [७] 3 जट्ट [], नोमु हो म चाढाव्य बाई [स प], मो चढवेत बोज। पोनियो [], प्रायो [6],' पूद्र [ख], वाद [6] परसा देखि [] पस्यु [ख], पो [५], पखो [],' पोट [ग], ढीठ [५] उपा [ग], जपो [प], हवे [] भने [ग] हवं [0] 1 1 पटका [ग],' कहा [४], ३ पतु तेतरा [४] । 1 ८२ - तुम मखाउ के अदर माने से पहले ही अपने पति के युद्ध-धरित्र पर प्रसन्न हो रही हो । अभी इसो स्थान पर दो घड़ी में निणम हो आएगा । एक अन्य नागिन ने पहली नागिन से कहा-सलो ! याम के बराबर विवाद में हम नहीं पहुंच सकती हैं क्योंकि यह तो सोषा किनारा करता हमाही बोलता है १७८० नागरानी ! तुमने एक पुरानो लोकोक्ति नहीं गुनी है क्या- "मगत में जाट को रोकना नहीं चाहिए। हमने अपनी वश्वास में कालिय मा को कोई प्रतिष्ठा नहीं रखी । इसस में रहती हू-बहिन ! इस मूख को अपने मुह मत लगा ॥७९॥ प्रारम से ही हम लोगों ने इमे अनादि से पोषित करने और फिर महल पावर दुलारन का प्रयत्न श्यिा । इतना करन पर भी यह हमार सम्मुख प्रोधित हो हो पर आता है तो हम भी अपना मोल अपने आप क्यों कराए ।' अर्यात इससे दूर रहना ही अच्छा है ८०॥ तुम तीनों हा पक्षों (पोहर, ससुराल, ननिहाल) में चतुर हो मत मेरा पहना मान र इपर आ जायो । इस कृष्ण के फिस पक्षवाले लग्मित होंगे ? अर्थात् इसरे काई पक्ष है ही नहीं । मागिन ने कृष्ण को मोर समेत पर कहा है पृष्ट बालक, तुम्हें नमस्कार है ! अब मैं तुम से वाद विवाद में परास्त हुई, तू विजयो हमा १८१६ तेरे पास जितन बेतुके बचन हैं उन्हें मृत होकर बहते, मात्र दुझे सब माफ है ! गोंकि-मानव, नाग, वेय, दानव जाति की कोई भी स्त्री आज तर प्रसूता नहीं हुई है, सारोवम्पाए हैं 1८२॥ ० पुमावी Exन्न होवा । निम-निपटेगा । जयायो स्थान पर । पूजा-पहुँचना । तोल-यरामरी में । मानो- काटता हमा। पापोर मोघा स्पष्ट । ७६ श्रीमानोबोरोक्ति । ही नहीं रोकना नहीं । कारा प्रतिष्ठा ईपिसी भी तरह की मां-पत। .. पुरा पहले । पान-पाणु, मूष । धानपन्न । धायो- ततलिया । मोपळोबत । पिझकोधित होकर कि- क्यों, कसे । मोनीमठ । पाप = वय हो । ८१ चतुर, निपुण । पर इसके । पयोम्पस चाला । माय- पोरी-इपर पाना } पीठप्रष्ठ । जाहिलोडकर । ठोस - सेरे से हारी-राति हुई। २२ मा=पय । प्रधाए-तृत होकर । पल-समीप में । ठसा- जितने । पसाए-क्षमा रिए दिया प्रसूता हुई । वामी सध्या पी-रानियो । - सुणो' नागणी नारी गाठियो म्ठ दूजी' न सायो, जगणी किणी हेव तू हो जायो । आयो नाग सू झूय लवा अतागो, अडीलो हुवो आज पाछो न आगौ ॥८॥ वडा भीच' भूपाळ उकाण वाळा , सिवै नागरी' याण केवाण वाळा । अहीराव न डावडो एह आडा, गिणा, वाद जोता 'ई' काड गाडा1८४॥ भुजगा तणी यात पार भुजारी, दोहा' अतरा रात छोटा दुजारी । मदा आणियो' नागणी तेण मारो थयो वेदपागा नक्यु पण यारो॥८५॥ अहीनारि सू नारि मासै अनरी अरी : जोवो न देसी चसे न हरी । आपणी हद्द माही, नरा अस्मुरा अम्मरा गम्म नाही ॥८६।। पवना न चदा न दुडदौर प्रवेसा अठ एहरी गम्म एहाअ देसा नाम पार विच्चार मूनी, घोटा' रूप, मोरारि निवाण धूनी ॥८॥ बीजी [] जनू नी तू ही हेर हेपी जायो [८], ३ यताग [प], 'माग [2 ] । 1. [6] ' बुला [ख १] गोल्या [ग] ३ विस [ग], खि [1] सुकेण [ग] दावडा [v] 'पणा [ख], गिण [ग], गुणा [ रही [rjI 1 भात्य [स], भाति [ग] भेट [], २ भुजारा [५] दिसी [७], पतम् [स) राति [], राता [५], छैटी [स] ' दुजारी [५] 8 तेश्य [ख], बोल [४], सा [ख],सार [प],"यक (म्ब], 11 देव [], 12 पासा (ख, ग] एण [ग]। 1 मालाई [१] . हियारी न बोये पसे पाई हेरी [४], अहीराण पठ देव [५] ३ बाइ लख [1] मण [], ममा [५] । दियो [], दुइदो [ग घ] दणदो []मनेश [0], मयेश [५], सुम्य पारस नाहि म्यचार सूनी [ख] मुण रूप विषार एतेह सूनी [६] सप्पो उर विचार को नहिं [ग] + ढोटो [४], नावीप [] निमाण [] नेवाण [प ग] । सुण' ५५ 13 ८८ । . किसी भी अयम्मी ने सोंठ की गाठ नहीं पाई है । अर्थात प्रसव नहीं किया है , म ससार भर में किसी एक माता ने तुझे ही नाम दिया है । जो कातिम मा से युद्ध करने का हपूर्वक निश्चय करके भागे पड़ रहा है 1८३॥ तुम यह नहीं जानते हो कि--मेघ घटा सहा से य वाले बडे- भडे लक्ष धारी राजा कालिप नाप को मश को मानते हैं। हे शासी ! महिराम कारिय एवं इस बालर की, परस्पर विषादी दृष्टि से तुलना करें तो यह बाला कालिय से कई करोड गुमा अघिद है १८४४ नागिन ने कहाालिय नाग यार तुम्हारे याहों की तुलना को नाय जो दिन और रात तथा शूध और दिनों समान मतर दिराई देता है । भगवान कृष्ण बोले-ह नागिन । जो सदा से जा रहा है वही मटा है । तुम्हारा प्रण क्या येद से विपरीत महीं हुआ है । अर्थात तुमन मेरे सनातन स्वर को नहीं पहचाना १८५३ नागिन से एक अन्य स्त्री ने पहारी नागिन ! सुनो-~-या सुम अपनी बातों से निहार पर नहीं दे रहा हो ? ये अपनी सोमा के अदर हैं। इनको जानकारी मनुष्य, देव तथा दानव किसी को भी नहीं है ।८६॥ हे विचारपूग्य ! शहा सूप, चन्द्र एप पवा का भी प्रवेश नहीं है। उन देशों में भी इनको पहुँच है । इनरे नाम स्मरण मात्र से (मनसागर) पार हो जाता है । मे बालस्वरूप में निर्माण प्रदाता पृथए ५३ जायोप न किया । अझ युद्ध । प्रतागोइतना पागे । पहोलाठी । पानीस्थिर । पर भोंच- पूरवीर,बाबा सिय अश्व । लिव-सहत है,मामत है। कवाए-कृपा । राडाला। एह यह । माst= तुलना करें। वेई कोह गा (मु.) अघिय मिला: मान हैं। बोतादेखते हुए । ८५ मुगांतरणी-मुजगों को । भुजारी भुजांनी श्री दहा-दिन । पतरातर । रात-रात्रि । छोरो-दो । द्विजारी वर्ग की। सागरम्परागत वहाँ । सारो-प्रच्छर है। पोहुमा । पण्णण ८६ भनेरी-प्रय ! मेरी ! (स) चसम्पासों से । ही निहार का । हद-मीमा । मार्ग-दानवों को। अम्म देवतामों को । गम्म जानकारी, पहुँच । ५७ पवनो-पवन । पदो बदमा एहरी इसको विचार मनौ-विचार 2 | पचरूप में। मौरिस्पीकृष्ण निवाण नौनिरिण प्रदाता ।

न सहै। बोलीया बाल जेता मभाळी, वान वचन्न दोए दोढनाळी । मिलाकी न पासई पीहा औन बूझ सखी बाळ एन त्रिभुवन सूझ ।।८।। दियाळे विसू नागवाळा दिवाजा, व्रणो वात माका-बधी कोड काजा । मानत नारी मुरारी निरस्यो, पढी सामगा परग परखो ॥८९॥ रामा' सारसी है सनी धण्ण रेखा, ब्रह्माड वाळी वळी को विसेखा । सहस्सा लिसी सोळ अरै सयाणी पचामा उभ खट दा पट्टराणी ॥१०॥ इठ्यामी' उभ सौ दश बाधि आठ, सखी देस बेटा लिथ्या रख साठ । जणणी तणी जूण मा ए न जायो, उतारेवा ए भाम चो भार आयौ ॥११॥ मजाण वाळ तू , चकच्चाल माधौ वळीराव जेहो छळी एण वाधौ । जिती डावडी औ, वळो देखी जाण्यो। ठगेवा- गयो आप, आप ठगाण्यौ ॥१२॥ 1 ८९ J 2 सब [स ग] जेता बोलिया [४] " दृढ [४] ता मोटे [ख ग], न लोटे [], विड्यो न [च], विवू] । 1 दिसाव [] " काय {ग 4] कोय [],' पोढ़ [ख] पड [८], 4 शाप दूजो [७], फास्ता [४] 1 रना [4], थप [], दू यू [च], हीमह वाला है कोण लेखा [0] अभिसिंत्र [स], प्रभे पत्र [७] । 1 मिसो [ख], मम्यामी [४] दरबार [] लख जनूनी तपो नाण मा एण जायो [], हवा [0] मा [0], तणो [१] । ६२ यिया म०प० []"खापा [ड] बाधा [1], जाति दाऊ के है गक्षी देव रण [स] जिक्या दावक सखो देव जाणू [ग] जसो तो नद ए देव जाणो [], एलेवा [ड), 'छलासो [ड] । 3 6 - हे सखों । इहोने जिनने वचन कहे उनको सुना ? प्रत्येक वचन में कितना घातय था । इन मय से मिलोक जासित है ये (कालिम नाग से) क्या भयभीत होंगे इस बालक को तो तीनों भुवन प्रत्यक्ष रिसाई रते हैं ।८८ इनको तुम कालिय नाग का क्या गौय दिखा रही हो । इनके युट बस रोरों कार्यों का पात्रों में वर्णन है । यदि तुम नहीं मानती हो तो इनका हाय पकहार सामुद्र शास्त्र के अनुसार हाय को रेवाए पदकर परीक्षा पर लो १८९॥ हे सखो इनके हाथ में हमी जसी स्त्री होने की स्त्री रेखा है और ललाट पर जो बलि है वह एक विशेष प्रकार की है। इनके सोलह हमार स्त्रियों का उल्लेख है जिनम १०८ पटरानिया होगी ।९॥ हे सखी । देखो, इनफ बहुत स पुओं का उल्लेख है और यह अपलोगों की तरह माता , उदर से नहीं उत्पन्न हुए हैं। ये तो पृष्त्री का भार उतारने के लिए ही आम हैं ।। इनको तुम वालक मत समझ लना, य चक्रधारी माधव हैं। पति से राजा बाहोंने छल से वाप लिया था । जितना मह पालक frसाई देता है या हो स्यहा बलि ने देखार इनको पहचान लिया पा । ये माप वास्तव में ता बलि को ठगने गये थे, पर आप मे गये ।१२। सहसाब । बोल वचन ! भाळी-सुना। दोडचातुप । हाम्भय । मौन यह नहीं । दूर-दर, भरमीत होता है । बाळ-बालक । त्रिभुवन-तीनों लोक । सूझ-दिखाई देते है। se किया ! विनाशोघ । सामा=युद्ध । । कायों की । न मानत नहीं मानती हो। निरस्ता देयो। करग-हाप पका कर परतीच परलो। १० रामा-ममौ । पारसी-तुल्य | Urmeो । पळो रेखा। विसेखा-विशेष प्राका सयाणोचतुर त्रियां । ११ अण्णीमाता! तपोपी। यानि । मौ=में । बायो- वरपनमा । ए-यह । माम घो-पृथ्वी मा। १२ नहीं । बारम्बालक । पाळ- पलाने वाला , मापी-पी हीजे का निकर । एy== इसने । माधोष निशा । राय-TRE | मो-यह । =বে ।

मयूर। राजा, चळी रावळी वणिओ देपि वाई, प्रतिहार मा सिद्ध कर्तार पाई। सर्वही क्यो' ग्यान राणी सुणायो, सम्ठी अतूठो भल बाज पायौ ॥९॥ ऊभौ मूरळी आप लीव अधूर, मोरो जागगी साम वाय विक्स्मी हम्सी वण' ऊची सपत्तै पताळ मरग्गै सुणाई ॥९४।। वधाई वधाइ जसोदा वधाई, कर मूरळी नाद ठाढी व हाई मथ नीर ओछो- जिही मच्छ माही जमोदा किणी वाह जोत्यौ न जाहो ।०५।। वडा जोए सी जुध वाहै बडाई, ग्रागाचार नारद सखेप रही मूरळी धुरा वाजी रसाळी, वळी चेतना वजना' साय वाळी ।।०६।। लट्यो1 साय जाण अमीधार लीधौ करी' वण नाद सजीवत्त कीधी । विजोगै सजोगे वण ऊची बजायो, प्रभू आपरा जाणि अम्रत पायो ॥९७॥ गाई। 1 वळी रिष्यणटुनमय दाखवाई [७], वळी राज सू-तृठत [], बलि र विणद्धातिरे देववाई [च], फारि में रिद [ ड], प्रतिहार मार मर्या- पाई [च], ३ सवारणी व ग] सवाई [५], समारणी [*], 'गा [म घ घ], जमू [s] माग [ग घ ड घ] । 1 घेण न चो वजायो [7 स इ] ' सुणायो [ख ग ह] । 'काहा ढगाइ [व], तो छातणु णां, यो [सग ह] । 1 रा [s] । लटु [4], सटी [ध च], लुटे [४], पिणो [], ३ सजीवन्न [], 4 वर्गवण वायो [ष ग] बजे वैण वायो [], [७] । 1 सो बहिन ! बलि इगहा अपना बना और द्वारपास स्थान पर भगवान को नियुक्त परफे सिद्धि प्राप्त की। इस प्रकार समस्त झा (पूर्ण बतार चरित्र सम्म पो जानकारी) नागिन को सुनाया और वर बालो-~~~ प्रमान तथा अप्रसन्न,किसी भी तरह से ये हमारे मल के लिए हो गये हैं।१३॥ भगवान मुरली अधरों पर रखे हुए घर मग स्वामी कातिय, इमोमपुर थादन से जग जाएगा। माशन ने प्रसार होकर हसते वए इनमा उच्च बासुरो वारन दिया कि उसे सार्हो पातान एप स्यग दर सुना दिया। मुरली को सरस ध्वनि को सुनकर वासियों में चेतना का सयार हुआ गर्गाचाय तथा नारद मोया स कहने लगे-बधाई भाई ! भगवान रण मुरली माद कर रहे हैं । जिस प्रकार पोडे पानी को मार ममता है उसी प्रकार वे यमना रे पानी को मय रहे हैं। पेण किसी से की जाने वाले नहीं, इनका भुजाओं में सुयश है यत कोई बसा युद्ध जोतगे। इस प्रकार सप बणन किया ।९५-९६१ व्याकुल होते हुए समूह को मानो अमृतधारा आप घेण- भाव करके जोषित कर दिया हो ! जो वियोगी म्बरों या सयोगी स्वरों धारा नए वेण मान लिया है यह प्रभु ने हमें अपना ममझ कर ही यह अमृत पान सपाहै १९७२ ५ - रावळtना । प्रतिहार वारसा सिख-सिद्धि । यो महका मल्ठो-प्रमात । अनूठोप्रप्रम न । भलमले । १४ ऊभी । गोषनिक हुए । धू-प्रवरों पर । वाय वादन से । मधूरै-मधुर विस्मो-पुस्लित होकर हस्सी हमत हए । कपोतेज स्वर से । सपसे एमालेमा पताल में। रा-वर्ग में । ६५ ठाढीसा । प्राकम ! जिही-जमे । मःमगर मय। E६ नामो- बीतेगा । दाह-सुबामो में पापारगागचाय । समेप-यो । धुन रमाळो-मधुर । मोटी पतना-स्मृति । सरपी-पापुर, भरा हा । आमाको । ममीधार अमृत से भारी । चो-तीमार ! आपरामा । १७ आयो । हाथ गडूद्दे, जिसी सिंघवी गग काळो जगायो उपाह फणाकार द्रब्बार फणाकार झाटक्त: फेरी, घणी घातियो साकड साम घेरी ॥९८।। घेयों नदरी धोट अहिकोट अहो जळावोळ- माहे कळा सोळ जेहो । नौळी वाटत सामटी झाट नाग्खी, प्रभू अग लागी सोई पूर पाखी ॥९९।। गोपीनाथ रा आया अहि गारडी जाण छाटा उडद्द । अहीमूठ वाज जिहा' ना रमै गारड जाणि काळी रमाड ॥१००।। जुडो जाति टोळा मिळी नागजादी, वि- साप नै सामळो सूरवादी। उभ जूग जेथी फिर नीर ऊड काळी नाग नू आणियो' काह कूडै ।।१०१॥ पसारा उसारा खरा पाइकारा, सहै। नाग सारा नरा नाइकारा । मच मूठ मारा झरै श्रोण झारा फणारा घणारा करै फूत्रकारा ||१०२॥ उपाड, १८ जिसे सिधव [s] ' को नाटक [४] । ६६ 1 ढोट [८] ' जळागोळ [प], भळाबोळ [s] ३ बाण [], * सामठी स ग] सामही [-], " पमू [ड] । घाटयो [इ] ' न जेही [s] ३ गारही जेम [] * काळी [] जोई गात्र टोली [ड], जात्र टोळा [ख] जुड़े नाग टोळे' [ग] वढ [ड], अभी जग्ग जेठो फिर नीर डडी [ख च] [], सु [s], * प्राविया [८] । १०२ 1 प्रोमारा [s], लहि [ख] लहै [ड च] ' लाग [ख ग च] पारा [५], लारो [ड च], मर [ग इ]। 2 नसी पिपु राग मे शानिय को लगाया दमी गति बनाए, पों रे समूह को चा उठाए वह दरबार में आया। मने पहा करते अपती पूछा चारों ओर घेरा देकर कृrm को मुष्ट में ल दिया । कालिय नै परकोटममान अपने शरीर का रा देकर नगुमार से घेर लिया। इसमें घिरे हुए प्रो बालों के जर पदमा को तह विधाई देते थे। कालिय न ड डागद उरते हर और राहार हिरा प्रभु के अग पर वह पुष्प पाउडो की तरह सा ।९९१ गोपीनाय में दोनों हाय हालियोगदन रे पोर पाए मानों गारो सांप को बाम करने के लिए उडद हाट रहा हो । कारिय को मेवर कट' प्पनि हो यज रही थी यह बिहा नहीं उठा रहा या मानों कोई गारी सेर करता हुमा सांप को पिला रहा । जहां पर कालिय नाग त भोरण दोनों लड रहे ये वहां समान माति की नागिनिया समूह बनाकर एकत्र हुई । पश्चात् उस स्थान में कालिय को भावान श्रीक दह गहरे पानी में ले माये ॥१०॥ नरनायक धीकरण द्वारा किये गय तीण पदापात को रात्रि सहने लगा सपा मुधिरका प्रहार में पालिय के म ह द्वारा प्राष्टि पटवारे चलने सगे और वह अपने सारे पणों से पूतार करने Ee सिंधी-सिधु (मा) राग । फणाकारों को irrzzer प्रहार करते हुए । फेरोमाई। पातियो-डाल Pिre धेरकर। - सकट में । बेरी र रोंगळा पीगळा ग अगारा, अधीराज मारा उव की आरा। माहारा परारा गर्म हाथ मारा, वोछो' गाव धारावहै वारवारा' ।।१०३॥ तिधारा चौधारा जुडं । भव्यतारा, पादरा प्रहारा घा' ढीचणारा । घमू रा घसारा सहै साप सारा, पडे पाव, पाणा मय मिणिधारा॥१०४॥ ग्रह्यो। गूदळी जेम काळी लगारा, खमा आज थारा भुज: सेम भाग । ध्रुजती धरा रा श्रा थभ निहस्म' नगारा सुराग मवारा ॥१०५।। पाळी नाग न वान झूव करारा, काळी- नागरी कापरी हरि' हथ्ये, रह्या ठाठरी देखिवा देव रथ ॥१०॥ जुडी' नाग बाला परी पाव जाचा, चार सापरी, साकळी सूम काचा । रद दाढ काट दियो वा न रीमा बदन वह श्रोण पचास वीमा १०७।। १०३ युद्धि [७] वहा [.] हिंगला [ख], गळ [५], डेगळ [] फिगढा [ष प] गळा [-] प्रधारा झिगारा [ग] । कहानिरा [v], कनारा [s], पारा {] 'उधी {], [+] ' वारि[प] । अधारा [क] 'बडे ], ठिका{r] *AR [a] पार ] गहुदा गमारा गडी गुटणा ग स ग ? म पा] १०५ 1 ग्रहै [s], " गुहद [ग], गुडि [य], गुळ [], यम [स] • पोखर, मेलो . ], सहा झूझ [८], नाषी [], 3 TIम [], या है [१], भर चुछ चाहो है जाउ भाड, वह हापसी माथ नाप बीड [] 1 . प्र.पा. 1 1 जर ], बडे {ब] हाय [ग] 'माय [s], गम खग] पहो [] बड़े नाग रोसे [], ' सोळ [] । 4 ६ घोकृष्ण को मार द्वारा उसने मातनाव किया तथा पगारों के सश गसमय एव पिंगलमम वचन बहने लगा। श्रीकष्ण के प्रहारों को सहना हुमा काहिम जल धारा के सदर छोटी नाव के समान तर रहा था 1१0३॥ नव तारक श्रीकृष्ण कालिय के साथ तिरछे एव सामने से भिडे तथा पैरों में पडे हुए साप को हायों से मयने लगे। साप, श्रीकरण के द्वारा लिए गये एरिमों के, घुटनों के तमा भुकों के प्रहार सहन कर रहा पा।१०॥ योष्ण को भुनाए माज शेष के समान कालिय पे मार को सहन कर रही है। उन्होंने कालिय को गु दळी (हरे प्याज के पत्ते के समान उठा लिया । उस समय भार से पृथ्वी पायमान होने लगी । बडे-बडे स्तम्भ भी मिरफने लगे और देवताओं को विजय दुमि बनने लगो १०५॥ कालिय ना मोर पोष्ण मिट रहे थे। मालिप का सिर भगवान श्रीक्षण के हाथों में था। इसे देखने के लिए देवताओं रय ठहर गए ।१०६ समस्त नागिनियो एकत्र होकर भगवान के पात्रों में पों एवं साप को याचना करने लगी। उनके हापों में पचे सूत को सलाए थीं। मावान कालिय नाग के दांत उसाड रहे ये अत यह विलाप तो परता था, परन्तु कोप नहीं कर रहा था । उसके हमार फणों से श्रोणित यह रहा - - १०३ पारा जलता हुमा कोयला =उसने मारा-प्राचनाद | करारातील हाप-प्रहार | सम-सहता है। वोधी-पोशी, छोटी । पारादी, तरण । १.४ विधारा-टेदे, पाश्व से । चौधारा-सामने से । मातारा- भव तारक कृष्ण । पाटूरा-पदतलो के शवणारा घटनों है। धमू राघमारा-मुकों के प्रहार । पाहायों से । मिणि पाराम्सपशे। १.२ ग्रहो-पहरिया । गूदही-हरे न्यार की कॉपल ! म जती- कम्पाय मान हुई । परा-पृथ्वी । अगमगे ! निदा- पज । सुराग-देवताभों के । १०६ व मिहना मारना । कोपरी-सिर । ठारीस्पिर । देव म्य-देवतामों क रप । १०७ मायाचना । दादा कार्ड-निकालने पर । रोसा कोष । बदाम-मुस से । पचास वीमाहगर।

वाहाल' पाळी नाग नै जुद्ध मातो किसन जमूना वही पर सिंदूर वन । क्यिो आप सू आप आळोच कान, माराध ही सप घावसू औ न मान ॥१०८॥ वडाळ गोपाळ वडम्ब, जो ये नागणी झाग नान जडदै । अहीराव न डाय कोई न सूझ्यो, इमो भीडियो सास' नासा अळूथ्यो ।। १०९॥ पयो मार पाण- भयो' गात्र भग, प्रभू माडियो रास माथ पनग । तिसी तत वसी वजी ताल ताळी माड पाय आणी दियो वनमाळी ॥११॥ पाळी नाचियो ऊपरै नाग काळी वळ रभ नाटारभी अक्वाळी । डर नाग काळी झर श्रोण डाच्या नमी नाच त नाथ नारद्द नाच्या ।।१११॥ भलो नदकिसोर नारद पनगा सिर नाचियो नदि पाख। जप नाथ सू नागणी हाथ जोडी तमा देव' मोटा अमा मत्त थोडी ||१२|| १०८ 1 नी [], 2 मरम्या पखि पाऊ सद्ध न मन [ख च], मरम्या साप घाव सूधो न मान [ग],रम साप सेघाउ [] । 1 विहाल हथाको [], 2 काहू न सूझ [6] एकोन सूझ [च], 3 रहेस नासे प्रबूझे [१] . 1 पर्यो [] फ्यु [ख], प्राण [s] 3 कियो [] 4 भागे [], पनगे [],तिसी तत तातो बजी ताल ताळी, मख्यो पांव भारमियो वनमाळो । तताथ तताथ ततार्थ सतान, तर प्रतय मजय सुखमान । गिड्डयो गिड्डयो गिडयो क गाज, वाइ वासळी नाद बोकासु वाज | [] म पा । 1 काळी [ड ग] त्ति [ग च ], डाच [गह घ] * नमो नाप नो नाच नार- नाच [] । ११२ नाप पाख [s] यह पाश [] प्रति में नहीं है । थियो दोस [४]. भारा, 1 जिस समय कृष्ण और कालिप युद्ध कर रहे थे उस समय यमुना लाल रग से परिपूर्ण होकर यह रही थी। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आप मरणा की कि-यह कालिय प्रहारों से तो यश मे होने वाला नहीं है, इसे तो मारने पर ही सफाया होगा ।1०८1 देखो नागिन, उस बडे भारी सपराज को भगवान कृष्ण ने अपने हापों में उठा लिया है तथा उसे ऐसा पीडित कर रहे हैं कि-कालिप को कोई दाव पेच स्मरण नहीं हो रहा है और उसका श्वास नासा पुट में उला गया है एव यह मह से फेन गिरा रहा है ।1०९। पैरों की मार के कारण कालिप का शरीर टूट कर गिर पा तब भगवान ने उसके सिर पर नत्य करना प्रारम कर दिया। भगवान ने जब कालिय के सिर पर पाय रखा, उसी समय यांसुरी पाने लगोसायही चारों ओर से लय पूण तालियां बजने लगी।111 श्रीकृष्ण, वालिय नाग के सिर पर नाटप की अप्सरा के समान अपनी रटि को मोड पर मुद्रा बनाते हुए नृत्य करने लगे। जिसके पारण कालियनाग भयभीत हो रहा है तथा उसके मुह से रत्तस्राव हो रहा है। इसी समय नत्य करते हुए नारद ने आकर कहा- भगवान ! मापके मुत्य को नमस्कार है धोकष्ण बहुत हो भले हैं,पोकुष्ण यहुत ही मले हैं ऐसा कहते हुए मारदमो मो भगवान के पास नस्य करने लगे । भगवान श्रीकृष्ण से मागनिया हाप जोडकर रहने लगी है देव ! जाप बडे हो और हम अल्प बुद्धि है 1111 १०८ म=ौर । जुद्ध माती=युटमचा । पूरबहाव सम्पूण । सिन्दूर वन लाल रंग की । पाळोधमत्रणा । खप नष्ट होगा । घाव सू =प्रहारो से । मो-यह । मान-समझेगा, वा में होगा। 1.6 Ranळ = बडे । भाग=फेन । जहाव-मुह से । नको गाव-दीव, भवसर । सूक्ष्यो-रिसाई दिया। मोडियो-पीड़ित रिया, असा । प्रयो= उलझ गया है । ११० पयो-परीकी । पणेि-रो, हापों को । गात्र पारीर । रास- नृत्य । तिसी तत-उसी समय । मोह-मुहपर । रम-पासरा । नटारभी-नाटकी । परवाळो-कटि मोरकराच्या से । त-प्राप।। ११२ मतो थे । पास = समीप में । तमा-तुम । मा-हम । मा-बुटि।

तुकारा वारा जिवारा तमासू , माया याज ते माफ कोज अमासू । महा सम्मिया निधि' जादम मोटा, सरो हे तू ही बिया सर खोटा।।११३॥ जुडे' रूप तोने प्रणाव्रत्त जेहा, कुहाडा विणा ऊपरा मार केहा । लोका ही विचाळ प्रभू लीक लाग अहडा सुण्या मापरा' केथि आगे ॥११४॥ सामी' सेस महेस जे- ही न सूझ, बुधी हीण की रावळी गत्त बूझ । इकोसा देसावी विहाणे जसोदा सोई राजन् पुर जाण ॥११५।। पयोर वनरा पास हूँ पध्धरावं, भज नद तोई तुना पुन भाव । पडीछा नहीं छी प्रिया राज पायो 4 प्रभू वेदना हुव साप' दिरावी ।।११६।। कत वगो हसै वैण दीधी, काळी नागरी नार उछाह कीधौ । मागे नागणी भेट सामठी आण, जदूनाथ लीजै जिकू राज जाण ॥११७॥ ब्रह्माड देऊन 5 1 तुपारे रेकारे [3] * मुभाया [ग] ३ नन सुबद [] । 'जडि [ख] जडो [४],तुना [] 'माट [स] मात [गच ,मात्र [s] * लुकाई वचाळ [ड] ' लक [], सासरा [४] । सम्ही [] ' जाइ [ड] ३ बुद्धय [स], बुगा [s] + गात्र [१] दास [ख], दावी [१] देखी []. ६ मजौं [] | पिता [3] ' हो [ग 3] 3 तो [] 4 पडोछापि निषाप्पक राज पाय [ख] पडी मापरी छापयो राज प य [0] वदना [ख ग], होयसी ख ग ] ' साप सरायो [व] साख खरायो [ग घ], राज पायो [] , 1 दिया [ग] दीयर [घ ], दियो [s],' हवे [], ३ सामेटय [ग], सम्मेट [],जको [७] ।

हे स्वामी । ह मारव कुल श्रेष्ठ देव । आप तो क्षमा के अथाह सागर हो। ससार मे एक पाप हो सत्य हो, अम तो सभी मिया है । अत हमारे द्वारा मापके लिए जो छोटे बडे द प्रयोग म आगए हों, उनकोधमाकरना ।।१३। आपका स्वरूप तो तृणावत जस राक्षसों से मिहने का है । हमारे मसे तुच्छ तृपों पर कुल्हाडे का प्रहार कैसा ? तीनों लोकों में यह लकीर (Eveन) लगाएगी। भगवान ! कहीं आगे (पहले) मी साप की शिकार सुनो है ? ११४१ प्रापको वास्तविक स्वरूप तो शेष नाग तथा भगवान शिव के लिए मो मगम्य है फिर हम जब-युद्धि आपकी गति को क्या समझ सपती हैं । प्रात काल में जब आपने इकोस ब्रह्माण्डों को दिखलाया था, फिर भी पशोदा जो तो आपको पुत्र हो समानता हैं ।११५१ इदावन के पास हो बाप अपने धरणों को पघराते है फिर भी मद सो आपको पुत्र माव से ही देखते हैं । हे प्रभु ! आपके पाद-पों को जानकारी हस कालियनाग को नहीं थी, तब यह पाप से मिहा । अब हमें कष्ट हो रहा है । माप कृपा करके इस साप को हमें दे दोमिमे ११६॥ भगवान श्रीकृष्ण ने नानियों को वचन दिया कि-"तुम्हारे पत्ति को गीत हो तुम्हें दे दू।" यह मुनबर कालियनाग की स्त्रियों ने हर्ष प्रगट किया और भगवान श्रीकृष्ण के सामने यहत सो भेंट लाकर रखों सया प्रापना करने लगी दिइनमे से जो हा भी आपको पसद हो वह ले लोमिए १५ + ११३ तुसरा-रकाnिetकार मम धन्द जिकारा सम्मानमय बाद । माफ-क्षमा । सम्मिया निvिsक्षमा के समुद्र । जापन पाय | खरो सत्य । सन्च-समस्त | खोटामसत्य, नकली। ११४ जुम्लाने का । हाहाकार । केहा-सा । महेना शिकार । कपिकही भो । मागपहले भी। ११५ सामो-प्रमु । सूझ-दिखाई देता है। को-क्या | रावळो - मापको। मान सकते हैं । रानु -पाएको । ११६ पोचरण । मर्ज-मरण करते हैं । भाव-भाव से। पडोसा-परीक्षा प्रमाप्रिय को राज-पापके । वेदना कन्ट । दरावो-मो। ११० गोन । वणवचन ! उधा-या । भेटमेंट । सामोज । त्रिो भो ।

सवार घणा आप आपै अरच्च, चोव चदण चीय नारी चरच्च । अही नाथियौ पोयणी नाळ आणी, असवार हूवो आप अप्पलाणी ॥११८॥ वागा झालिया बज्ज सेरी विचाळे, वळ फेरियो आगण नद वाळे । शडी देह चिता पडी, क्स जप, काळी मारिय' टार वेकाण कप ॥११९।। काळी नाग पाळीद्रहा हूत वाढ, दियो वास दूरतर' तिको तूझ' दाढ । महाकाळ काळी तण माण मोडी, जसोदा दिसी आवियो पाण' जोडी ।।१२०॥ विढ विज्जरी एह उच्छाह वाळी, कहता अळूझ ब्रह्मा क्पाळी । गोविंददासरे आसर गुण* गायो, वाचता न पौंचे बहू' सेस वायो । समवाद पाळी तणो मत्त चव दास दासानु सायौ चितार ॥१२॥ सार, 4 , ११८ पारि [स], उचार [ग च] उवारे [८] । पोल नारी [ख], चीर गप],चा[प],कांसमोर [5] काळी भाग्यिो कमळो भार कन, पज्यो माय पाताळ न पाय पान प्रसवार काळी तणो, कान मायो, विविधि विधी प्रज्जनारी वधायो । भगवान सू गोप गोपाळ भेला, बड़ा वीच फोटो दुजो तेरण वेला ॥ [ ग घ घम, पा । 1 वागे [८],' कडे [ग] झरी [0], द्रोह [], कूटियां, यो [ग] । १२० महत्त [२] 'रेनको [ख], दूरे जिता [ग], दूरातका [e], ३ त [ग] * मोहे [], दसु [स], मणी [E) हाय [च) । १२१ विठा व ग], मोठा [], वाई [], वाता, [५], मबूझ [], कमाळी [ख] 4 जस [], पूज [] सस [६], काळी नाग वाळो सवाद कान, पया पेट नाव पडे तास पाम । भाणे वो न जायो जमदून जोड, पुराण मढोरे कियो वूम पाई। रासमै समय कह्यौ सा मसे,ममयाव गातां ग्रहे पार सरोकामपा भगवान 6 गोराळ भेळा, वद वात पूज दुग तेण वेळा । [व] म पा समवाक्ष [ग] एह सारो [], साइयु [स], साइयो [ग], साइयर [५], 10 चितारो [s] । 7 नागनियों ने अपने आपको सुमरिमत करके भगवान को अपना को और घोवा तथा च दन के चित्र बना कर रहें चित्रित किया। तत्पश्चात् भगवान ने कमल नाल मगवाकर कालिनाग नाक में नकेल डालकर उसे अपने वश में विमा ! फिर विना काठीक हो उसकी पीठ पर सवार हो गए 11t भगवान ने कालिय की लगाम को पकडे पकडे उसे बज की गलियों में शुमामा । उसके बाद नद के आंगन में लाफर फिराया जिससे उसकी वह चिता पड गई । फस ने कहा-पालिप जस को मारने से कौनसे केकाण कापते हैं अर्पाद उस क्षुद्र जीव को मार पर कोनसा बा कर दिया १९॥ जिस तरह कालियनाग को कालो-बह से निकालार उसको बहुत हो र स्थान दिया । उसी तरह तेरे कालिय की दाढ़ वाला (विष) पा उसे भी भगवान ने दूर किया । महाशाल म्यरूप कालिय का मान मदन करके भगवान श्रीकृष्ण अपने दोनों हाथों को जोडे हुए माता यशोदाजी के सम्मुख माये ॥२०॥ इस उ साह पक बज की लड़ाई का वर्णन करते हुए ब्रह्मा तया शिव भी लस जाते हैं । पिर भी मैंने धो गोविदासमी के सहारे से भगवान के गुण (धरिय प्रय) का दमन किया है । जो कोई भी इसे पढेगा उसे सांप को हवा (पवन) तक नहीं लगेगी । यह भगवान श्रीकृष्ण तथा कालिय का सम्मान (वन प्रय) अपनी बुद्धि के अनुमार वासानुदाम कषि सांया ने कहा है 1१२१॥ मध्य । ११८ पाप तो है, देकर । चौवाएर सुगभित द्रश्य । पोत्र चित्र । पोयणी नाळ-कमलनाल । प्रपलाणी-रिना काठी के । 6 पाग-नगा । मेरी गली, मुहल्ला । विचाळ रारम्ह । केकाण (मु०-पोहे कोपते है । १२. हुत-से निकाल कर । वासस्थान । दूरवर महत र । हिको यह ! मरे । कारबाहों में, बहर । माण मोमे-मान मदन करके । दिप्ती-सम्मुस पाण-हाय । १२१ विमाई । एह-यह । उच्याह-वाळी-सरसाह पद ! पळू उपमा ! साठी-गिव । मामराय में। नाव नहीं पहुँचेगा । मत मारपस्यनुपार । पर्वकहता है। चितारं- कवि विन करता है।

। कलस रो कवित।। सुणं पर्णममवाद, नद नंदन अहिनारी। समद्रा पार ससार, होहि गोपद अणुहारी । अनत अनत आनद, सब वपु तास समाव। भुगति जुगति भडार, किसन मुगत्ताज कहाव । रम्यो' नृत्य राधा-रमण, दुहुभुज करि काळीदमण । ते चवण-मुणण अहि रावतणा, मटण' काज आवागमण ॥१॥ कळत . खणे सण : गोरिद [v] द्रोपद [प],' मनुहारी , मुगति त ख ग इपिचियो परित्र [] | गहराना गमा काविस, गमण कान्हि ३) । 7 १०४ फलस का कवित्त नद नवन धोकृष्ण और नागनियों का यह सम्वाद (घणनप) खो सुनेगा,पहेगा यह भय रूपो समुद्र को गोपद के समान तर पर पार हो जाएगा सपा उसके गरीर में जनता का समावेश होगा। मुक्ति, जक्ति एष मुक्तिो भगर श्रीकृष्ण अज कहलाते है उ ही राधारमण ने अपनी कोनों भुजाओं द्वारा कालिय रमण-नृत्य किया | उसी नत्य को आवागमन मिटाने लिए कहना तपा मुनना चाहिए। [vie] पहेगा । मणुकाममान । वारी । सास- एसके । मुगतिमोग । जुगति-युक्ति । मारोप । भुग साज-ममा एव मुत। यो एला मचाए। वह उसे । पवरण सुराणाहना सपा मुना मरण काम-मिटाने के लिए । प्राधागमणमाना जाना, 7 मृत्यु ।

परिशिष्ट
राजस्थानी साहित्य में
नागदमण प्रसग
गीत नागदमण रो चारठ मुरारिदास री कहियो
लोहे वाधियां जडलो हलो करग्गा किया
उघडलो नागरो जहलो माग दाज ।
अडलो भागणे ऊमो रड जो सोरोस लिया,
कौनसे कह लो बोले दहला के काज ॥१॥
घी मिल नागणी हुमागणी मुहागणी हो,
मूणो यू पूछो मायो जायो कुणी मात ।
मेसो फूणी सुणी बारा पुणी सू जगाणी आप
तत्र मात्र हणी जकी अने तो घात ॥२॥
बोलियो मापद बदमद रोहू कहाऊ बेटो,
चराऊ
मुकद धन जसोदारो
मोरी देवो गेंद काये जगायो नागेंद्र मोटी,
छोड़ो फद रवगारी नारिपारा फी ॥३॥
हस सारी नाग
उचारी विहारी हूत,
सवारों पधारी ले लेतो आजे सूक।
पठ यारो वेम असो जुस्कारी बातो कर,
पूांधारी दीठो 70 आगारी फूक ॥४॥
मांटी रोसबाटोजसो आंटी माटो वाता मेळो,
मडासू उसाटी तेग पाटी नछ मोह।
पेम वग घाटी जघा पारसो कुरो पाटो,
पौडीर वाटी घाटी पाटी तणी पोह ॥५॥

वाव
नागणो रहायो नाद वादियो प्रधाये बाद,
ताजे वातां मूलायो लखायो ताग ।
पायो ममी आपरी बजायो असो राग प्रभु
फा हूडे जगायो काळी मोळी आयो नाग ॥६॥
राळतो कराळ झाळ फूणा बाळां फूकारडा,
चाळा लागो ठाला पर बावं असी घोट ।
सळवळा जोहां घणो गलापा गुजाफा लाळा,
परनाळा पड जठो हळाहळा पोट ॥७॥
कर पू रपट्टी रट्टा नपट्टा कपट्टा कोपा,
छूटा पट्टी पहुबट्टा
फिरतो छछाळ ।
ले उलट्टां दळतो दपट्टा द्रढा,
कट्टो बट्टा टावर काळी बिकराळ ॥८॥
करा दी मूकियो नोक फरियो क्यागे कूड,
नादीनामजादी गायो वासळी रो नाद ।
मादी नागनावी जोयो महाजोगी मप्रवादी,
अनादी जुगादी आदी बादी सेरे बाद ॥९॥
साग नहीं फूक शाळ स्पेडा पेडा लाग,
नेहा नेश पुणा घणा ऊपरे नत्रोठ ।
रामवी आहे जण यहां डाढा रोस रत्तो,
रमतो उरेडा दिय केटा प्रायो रोठ॥१०॥
सरतोलाप र ताप लोप हुयो लोहां,
माप नाग पाको फुणा वाहतो अमाप ।
स्याम पाप बाहे जमा ऊघडे जो धाप नसी
सापरो ऊतर लिहू तापरो सताप utu
नापियो पोअणनाळि वनमाळ घद नांच,
साळी ताळो नत याली होचतो प्रवक ।
उपारी वालो पाप दम्मा पहना पाठी,
असामाळीपाळो कोराळो म मा ॥१२॥
बरस मनत पूल हररय नारद ब्रह्मा
निरस्त रोता nit प्रवाटी मार।
माना जसोदा मद पनौ घनो जीत मल्य,
न साल अलस मापा मोहिमा निहार ॥१३॥

रोमियो नागणी तो नादा दिपा रोम
नमो नंदन! नम नागदारी मार।
छयाला दुग्दा चदा तोगदान ना छग,
मतार हो। सपा भएदा 'मुरार"१४॥
-श्री सामाग्य सावन सोमय से
अय गीत पाडगती सुपपरा
डी पडता घट गरियोपवव डाळ,
मोर पाघे अयाप पाता याद मार ।
रोल्हाळ दर परसा मगायो पेटी,
काळी नाग अगाडियो कवर कवार ।।
फ7 लोय घसमा कराळा मग भाळा फुषा,
ताळा ६ गुमाळा तू
गुपाळा तोरवान।
विशाळा सिधाळा असाळा मोष बाळावय,
जूटा बिहू काळान मि पाळर जोरयान ।
वमा करणां धाय दाय हे अभूतकारा,
उ भूतकारा पिता फुणारा अमाघ ।
नद हरी बघ काळी सघणा जोडिया जक,
सप विछोडिया नदर सुजाय ॥
महा भुजगेस नाथ समाय खरिपो माण,
खम ठौर
मराय सडियो जतसम।
दडियो जब नौर उचाटा मिटाय है
रज मित्र पुणाटां मडिपो माटारम॥
धू धू कटा भ्रष्टा प्राटापू पू कटा धार,
साधिना ताधिना घिनाता पिता सुताळ ।
ता येई ता थेई येई येई घेई ताता,
गता से अहेस माया नदरी गबाळ ॥

रमानमा रमा ममा रमा शमा शमा रमा,
हमका
सका रमका
पाडगती गोत राधा रजण पयपं प्रयो,
नाग ५ सजणा निमो सगीत निराक ॥
~ग्राटा मिशनाजी
'रघुवर जस प्रकार" से सामार
नागनाथन लीला
सायन को रे बाळा गेंद बणी रे, काय स देऊ घटाय ।
मोहन थारी गेंद वणी रे ॥
रुप्या की रे बाळा गेंद दणी रे, सोन्ना म. देऊ मढाय ।
मोहन पागे गेंद वणो रे ॥
पयलीज जो ढोट्ट बाळा ढोट्टियो रे, गई ते दरदाना माय ।
मोहन पारी गेंद बणी रे ॥
दूसरी जो ढो? बाळा ढोट्टियो रे, गई ते सेरी माय ।
मोहन पारी मेद परगी रे ॥
तीसरी भो ढोट्ट बाळा ढोट्टियो रे, गई ते बनार माय ।
मोहन पारी गेंद मणी रे ॥
घोषो ढोट्ट वाळा ढोट्टियो रे, गई ते गोया माय ।
मोहन पारी गेंद बरगी रे ॥
पाचवी टोट्ट माळा ढोट्टियो रे गई ते जमुनारी पाळ ।
मोहन पारी गेंद पो रे ॥
पेलत जो सेलत गेंद गिरा पटोरे गिरी ते जमना रामाय ।
मोहन पारो गेंद यणी रे ॥
गेंदा एमचा वाळो पूदयो रे, म्हारोकाहो धूरपो जमना पपरे।
मोहन पारी गेंद वो रे ॥
बाळा गुवाटा औरया आया रे मापा ते नमोटा रा पास।
मोहन पारी गैर मणी रे॥
मिळ नसोदा माता मायर यो धारोकान्होपो नमन-माय।
मोहन पारी गेंर बगी रे॥

रहतो ग कुढतो माता नीसरी रे आई ते जमना री पाळ । मोहन पारी गेंद धणी रे ॥ x X x मग सोवननांगेण जाग, जाण मागेण थारा राग मा पो दुई खेला वाव । मोहन पारी गेंद मणी रे ।। की रे बाळा तू, मारण मूल्यो, कोरे याळा पारी माता न दुरघो , वो घर खोटी मा ? मोहन पारी गेंद पणो रे॥ सांगठी जो मोडि नोग जगावियो रे, मांग अवपूत जाग्यो, मची पमघोळ घरमो अनि का लोळ जे का मुख मा जवाळ, मळ जमना री पाळ, खेले नदा नु बाळ, नदा-नु माळ माई-फसा-नु गाळ । मोहन पारी गेंद वणी रे ।। x x मांग नापीन माळो हुयो मसयार रे बोली ते नांगण तय- म्हारा हाथ चूड़ा को लाज रासो, मख जुग जुग दीगो अहात । मोहन पारी गेंद वणी रे॥ मांग नायीन वाळो हुमो प्रसवार रे, पायो ते नमनारी पाळ। मोहन पारी गेंद वणी रे॥ घाळ-गुवाळया बड्या मापा रे, आया ते जप्तोदारा पास । मोहन पारी गेंद बणी रे॥ निकळ जसोदा माता मायेर भो, मांग नापीन माळी यायो पारा द्वार । मोहन पारो गेंद वणी रे॥

मोतियन सौर पारो वाळो बचाओ, दूध पिलाव काळ नाग । मोहन यारी गेंद बगी रे ।। -डॉ. वृष्णलाल हम "निमाडी और उसका साहित्य" से साभार नाग अभिमान मदन सुण जो साजन अचरज नो क्या।। ए पाकगी। एक दिन जमुना हो जळ में परिसरे हरि रम मुविचार । १० । गिदुक उछळो न तव पडयो, काविह मझार ॥१॥ धतुर नर हरि रम रस रग, जी हो सुदर ६प मुहामणा, लाला चरतो ताण अनग । सुण जो साजन अचरज नी कथा।। से लेषा न हरी द्रहानर गया, सोपी लियो गयद । च० । पिछ पिरतो तव पेखियो, आवास तेजनो कद ॥२॥ च० सु० ॥ मितरे दौठो एक गवाक्षिका, पौतुक अघिको पाम । १० । देई फलांग माहि गया निरोपण पर काम ॥३॥ १० सु० ॥ भाग जातां पलग पे झोलता, दव काळो नाग । च० । सहस्त्र फलो सूतो निदमें महीपर विसनो जाग ॥४॥ च० स०॥ कर तिहाँ नागणी पताटनी नव नव भात विनोद । १०। पामी अचरज ताम हरिमणी, बोन वचन सरोद ॥५॥ च० सु० ॥ नागणी पाच- कई बाट वीसरियो रे बाला, काई तू मारग भुलियो । नई ते तारोपाळ घटियो जे इण मारग आवियो ॥६॥ जळ रमळ छडि जाय रे वाला स्याम मोरो जाग से प्रांणी। मान बाघ- नहि ते वाट बोसरियो रे नागग नहि ते मारण भुलियो । नहि ते मारोपाळ घटियो हुएम मारग प्राधियो नळ ॥ नागणी वाच- व्हिा तुमारी वेसगो रे बाळा कुन तुमारो गाम रे। कुण राय ना घलग घाल, सुछ तुमारो नाम रे ॥८०॥ मपुरा हमारो येसणो रे नागण गोकुळ हमाणे पामरे । कस रायना घलग पाल, पोवोटो माह नाम रे ॥९॥ना मागण अगाडो तोराना, ने वो म ने विधासीयो।

राम पो जवट रमतो, ह तुमारो हारोयो utarma मागणी माग प्रबोधन पाच- चरण पोळी मग मोशे, नागणी ए नाही लगायो । ठो न पल्यत वा पामो यालमेहम पर दावोपो रे॥११॥8011 उठ्यो हो मरियर विष भर लोचने, कोष करो सतास ।। मापो हो सनमुक्त हरिन ऊपर रोस भरपो विकराळ ॥१२॥८००n नायो हो झाली घरी परे, पाम्यो अघि मास 111 पर येसो हो परे पारिपो, जोर दिसणे पास ॥१०॥ पापो हो माग तो घमीमान ने मणमें प्रभुना पाय in तुम पायर लायर साहीप, मेहेर करोमदाराम ||१४|० स०॥ हिव हु सेवफ पासपो साहरी, 7 मणु अवर भूपाळ ५० सेई सतार आयोहरी निज घरं,मिलोपा याळ गोपाळ ॥१५॥१० सु०॥ -~-40ो गुणसागर पि "धो हरिष परिध दाळ सागर" से साभार नागनाथण लीला छोटो सो पयो काळोवह पर खेलण आयो रे । मोळो तो कईयो काळीतह पर खेल्ण आयो रे । राहे को पट गेंद यणाई, काहे को अडियो लायो रे । पुष्पन को बाळ गेंद बणाई, हरि पण को डडियो लायो रे। खेलत गेंद परी जमुना में, हरि काळोदह में पायो रे। कोई पारो नायकिण घर भायो, कोण नाम परायो रे । मात जसोवा पिता अदजी, कृष्ण नाम परायो रे । कोण गाय प्र मापोरेवाळा, काई रे कारण प्रापोरे। गोकळ नगरी समायो मे नागण, नागको नेतो लेवण आयो रे। नाग माय प्रभु बाहर आया, नगर तपास पायो रे। पुरषोतम प्रभु को मछि जाऊ, नागनाथ पर आयो रे । -श्रीमती सुमादेवी टपनाम 'पपली' सेतामार

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Nagdaman

Author
Mulchandr
Title
Nagdaman
File name
Nagdaman
Text
OCR done
Citation
1888
Published
2010/12
Publisher
Bikaner,bharatiy Vidhya Mandir Shoudh Partishthan
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514967
Barcode
4990010022632.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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