Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur
Devagam Aparnam Aaptmensa
Front matter
प्रकाशक
डॉ० दरबारीलाल कोठिया,
मत्री, वीरसेवामन्दिर-ट्रस्ट,
चमेली-कुटीर,
१/१२८, डुमराव कालोनी, अस्सी,
वाराणसी-५ ( उ० प्र०)
प्रथम मस्करण ' एक हजार प्रतियां
जन १९६७
द्वितीय सस्करण
११०० प्रतियाँ
आषाटी अष्टाह्निका, वीर निर्वाण मंवत् २५०४
जुलाई १९७८
मूल्य : ५०
मनक
बाबूलाल जैन फागुल्ल
महावीर प्रेन, भेलूपुर, वाराणनो
ग्रन्थानुक्रम
८
९
१ समर्पण
२ प्रकाशकीय
३ धन्यवाद
४ अनुवादकीय वक्तव्य
५ प्रस्तावना
६ विषय-सूनी
७ मूलगन्य अनुवाद महित
८ कारिफानुक्रमणिका
९ प्रमुखशब्द-मूची
१-४७
४९
१०८
म्मामिनचरित नम्य कम्य नो विम्मयावहम् ।
दवागमेन मवनो येनाध्यापि प्रदश्यते ।।
-वादिराजमूरि
ममन्नभद्रा
भद्राज्यों भातु भाग्नभूपण ।
देवागमन येनान व्यस्तो देवाज्ज्गम त ॥
-शामचन्दाचाय,
पानायचरित
समर्पण त्वदोय वस्तु भो स्वामिन् । तुभ्यमेव समर्पितम्। हे आराध्य गुरुदेव स्वामी-समन्तभद्र | आपकी यह अपूर्व अनुपम कृति देवागम (आप्तमीमासा) मुझे आजसे कोई ७० वर्ष पहले प्राप्त हुई थो । उस वक्तसे बराबर यह मेरी पाट्य वस्तु बनी हुई है और मैं इसके अध्ययन-मनन तथा मर्मको समझनेके प्रयत्न द्वारा इसका समुचित परिचय प्राप्त करनेमें लगा रहा हूँ । वह परिचय मुझे कहाँ तक प्राप्त हो सका है और मैं कितने अशोमें इस ग्रन्थके गूढ तथा गम्भीर पद-चाक्योंकी गहराई- में स्थित अर्थको मालूम करनेमें समर्थ हो सका हूँ, यह सब सक्षेपमें अन्यके अनुवादसे, जो आपके अनन्यभक्त आचार्य श्रीविद्यानन्दजीकी अष्ट- सहस्रो-टीकाका बहुत कुछ आभारी बहुत कुछ आभारी है, जाना जा सकता है, और उसे पूरे तौरपर तो आप ही जान सकते हैं। मैं तो इतना ही समझता हूँ कि आपकी आराधना करते हुए, जिनका मैं बहुत ऋणो हूँ, मुझे जो दृष्टि- शक्ति प्राप्त हुई है और उस दृष्टि-शक्तिके द्वारा मैंने किसीका भी निमित्त पाकर जो कुछ अर्थका अवलोकन किया है, यह कृति उसीका प्रतिफल है । इसमें आपके ही विचारोंका प्रतिविम्ब होनेसे वास्तवमें यह आपकी ही वस्तु है और इसलिये आपको ही सादर समर्पित है । आप लोकहित- की मूर्ति है, आपके प्रसादसे इस कृति-द्वारा यदि कुछ भी लोकहितका साधन हो सका तो मैं अपनेको आपके ऋणसे कुछ उऋण हुआ समझूगा । विनम्र जुगलकिशोर
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प्रकाशकीय मन् १९६४ में वीरसेवामन्दिर-ट्रस्ट द्वारा 'समाधिमरणोत्साहदीपक' का प्रकाशन हुआ था और अब प्रस्तुत स्वामी समन्तभद्रकृत देवागम ( आतमीमामा) का उसके हिन्दी-भाग्यके साथ मुद्रण हो रहा है । यह हिन्दो-भाष्य प्रसिद्ध साहित्य और इतिहासवेत्ता तथा स्वामी समन्तभद्रके अनन्य भक्त एव उनकी कृतियोंक मर्मज्ञ श्रदय पण्डित जुगलकिशोरजी मुन्तार अधिष्ठाता वीग्मेवामन्दिर-ट्रस्टद्वारा रचा गया है । विज्ञ पाठकोसे यह अविदित नहीं है कि स्वामी ममन्तभद्रकी प्राय. सभी उपलब्ध कृतियां अत्यन्त गम्भीर, दुरुह और दुग्वगाह हैं। एक 'रत्नकरण्डफश्रावकाचार' ही ऐसी कृति है जो अन्य कृतियोंसे अपेक्षाकृत सरल है। पर वह सैद्धा- न्तिक रचना है और इसलिए उसका सरल होना स्वाभाविक है। धर्मका उपदेश सरल भाषामें होना ही चाहिए। समन्तभद्रकी शेप कृतियोमें 'स्तुति-विद्या' काव्य-शास्त्रको उच्च कोटिकी रचना है जो समन्तभद्रके तत्सम्बन्धी वैदुष्यको प्रकट करती है । देवागम, युक्त्यनुशासन और स्वयम्भूस्तोत्र ये तीनो दार्शनिक रचनाएं हैं, जो जैन दर्शनकी अप्रतिनिधि कृतियां है और जिनमे समन जैन वाट मय प्रदीप्त है । प्रसन्नताकी बात है कि स्तुति-विद्याको छोडकर शेप चारो कृतियोका व्याख्याता होनेका सौभाग्य मुस्तारसाहवको प्राप्त है। उन्होंने इन कृतियो- का वीं तक स्वय अध्ययन, मनन और अनुशीलन किया और तव उनपर व्याख्यान लिखे हैं । यद्यपि उन्होने इन कृतियोको गुरुमुखसे पढा नही, फिर भी उन्होंने इनके मर्मको जितनी अच्छी तरह समझा तथा अपने भाष्योमें उसे प्रस्तुत किया उतनी अच्छी तरह गुरु-मुखसे उन्हे पढ़नेवाला भी सम्भवत नही कर मकता। टीकाओ, कोपी और ग्रन्थान्तरोके आधारसे उन्होंने इन भाज्योको लिखा है और इसमें उन्हे कठोर परिश्रम करना पड़ा है । फलत वे इन ग्रन्थोके तलदृष्टा एव सफल व्याख्याता सिद्ध हुए हैं।
८ पकागकोय प्रस्तुत देवागम-भाष्य उसी क्रममें सन्निविष्ट है। स्वयम्भूस्तोत्र, युक्त्यनुशासन आदिकी तरह इमके भी प्रत्येक पद-वाक्यादिका उन्होंने अच्छा अर्थ-स्फोट किया है और अन्यकारके हार्दको प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं। इस महत्त्वपूर्ण रचनाको उपस्थित करनेके लिए वे समाजके विशेषतया विद्वानोके धन्यवादाह हैं । इसकी प्रस्तावना लिखनेका वायदा हमने किया था। परन्तु हमें अत्यन्त खेद है कि हम उसे शीघ्र न लिख सके और जिसके कारण डेढ वर्ष जितना विलम्ब इसके प्रकाशनमें हो गया। इसके लिए हम पाठकोने क्षमा-प्रार्थी हैं । मुत्तार साहबका धैर्य और स्नेह ही प्रस्तावनाके लिखानेमें निमित्त हुए, अत हम उनके भी कृतन है । यहां इतना और हम प्रकट कर देना चाहते है कि यह अन्य कुछ कारणोंने दो प्रेसोमें छपाना पडा। मूल ग्रन्थ (पृ० १-११२ ) तो मनोहर प्रेसमें छपा और शेप सब महावीर प्रेसमें । महावीर प्रेसकी तत्परताके लिए हम उसे धन्यवाद देना नही भूल सक्ते । आशा है पाठक इन महत्त्वपूर्ण कृतिको प्राप्तकर प्रसन्न होगे और विलम्वजन्य कष्टको भूल जावेगे। ११ अप्रैल १९६७, --दरखारीलाल जैन कोठिया चैत्र शुक्ला २, वि० स० २०२४ । मन्त्री, वीरसेवामन्दिर-ट्रस्ट अनुवादकीय वक्तव्य मूलके अनुकूल वाद-कयनको अनुवाद कहते है । जो मनुवाद मूल- का ठीक-ठीक अनुमरण न करे, मूलकी मीमासे बाहर निकल जाय अथवा बीच-बीचमें इधर-उधरकी कुछ ऐसी दूसरी वातोको अपने समाविष्ट करे, जिनका प्रकृत विपयके साथ कोई सम्बन्ध न हो वह अनुवाद कहला- नेके योग्य नहीं । अनुवाद्य-ग्रन्थ यहां 'देवागम' है, जो स्वामी जैसे उन अद्वितीय महान् आचार्यकी अपूर्व कृति है जिनके वचनोको उत्तम पुरुपोके कण्ठोंका आभूपण बननेवाली बडे चहे गोल-सुडौल मोतियोको मालाओकी प्राप्तिसे अधिक दुर्लभ वतलाया है । भव-भ्रमण करते हुए ससारी प्राणियो- को मनुष्य-भवके समान दुर्लभ दर्शाया है और भगवान् महावीर-वाणीके समकक्ष दैदीप्यमान घोपित किया है। देवागम यह नाम ग्रन्यके 'देवागम' गन्दसे प्रारम्भ होनेसे सम्बन्ध रखता है, जैसे भक्तामर, कल्याणमन्दिर, स्वयम्भूस्तोत्रादि ग्रन्य प्रारम्भिक शब्दके अनुरूप अपने-अपने नामोको लिए हुए हैं उसी प्रकार यह ग्रन्थ भी, जो वस्तुत एक असाधारण कोटिका स्तोत्र-ग्रन्थ है, अपने प्रारम्भिक शब्दानुसार 'देवागम' कहा गया इसका दूमरा नाम 'आप्तमीमासा' है, जो आप्तों-सर्वज्ञ कहे जानेवाली- के वचनोको परीक्षाद्वारा उनके मतोके सत्यासत्यनिर्णयकी दृष्टिको लिए हुए हैं। समन्तभद्रके सभी ग्रन्य दो-दो नामोंको लिए हुए है, जैसे 'जिन- शतक' का दूसरा नाम 'स्तुतिविद्या' और युक्त्यनुशासनका दूसरा नाम 'वीरजिनस्तोत्र' है, जो देवागमके वाद-सब आप्तों-सर्वज्ञोकी परीक्षा कर लेनेके अनन्तर-श्रीवीरजिनकी स्तुतिमें लिखा गया है । समन्तभद्रके किसी भी ग्रन्थका नाम केवल प्रारम्भिक शब्दके आधारपर ही नही है किन्तु साथमें गुणप्रत्यय भी है, देवागम भी ऐसा ही नाम है वह मूलका- रिकानुसार देवोके आगमनका वाचक ही नहीं बल्कि जिनेन्द्र देवका आगमन जिसके द्वारा व्यक्त होता है उस अर्थका भी वाचक है । देवागमको मूल कारिकाएँ कुल १९४ है, देखनेमें प्राय सरल जान १० देवागम पडती है-सामान्य अर्यको दृष्टिसे कोई खान कठिनाई मालूम नही पडती, परन्तु विणेपार्थ और फलितार्थकी दृष्टिने जव विचार किया जाता है तो बहुत कुछ गहन-गम्भीर तथा अर्थगौरवको लिए हुए जान पडती है । सभी कारिकाएँ प्राय सूत्रस्पमें है । अनेक कारिकाओमें तो कितने ही स्त्र एकसाथ निबद्ध हो रहे हैं। सूत्रगली प्राय अनिमक्षिप्तरूपमे कथनको गैली है और इनलिए सूत्रो अथवा सूत्रत्प कारिकाओका अर्थ स्पष्ट करनेके लिए कितनी ही वातोका ऊपरले लेना-लगाना होता है, जिनमे यह मालूम हो सके कि स्त्रकारके सामने क्या परिस्थिति थी, कोई मत-विनेप अथवा प्रग्न-विशेष उपस्थित था, जिसे लेकर इसका अवतार हुआ है । श्री अकल कदेवने अपने अष्टगती (आठतौ श्लोकोके परिमाण जितने )-भाष्यमें देवागमकी अर्थदृष्टिको मूत्रस्पमें ही खोला है । परन्तु विषयकी दृष्टिने वे स्त्र इतने कठिन और दुर्गम हो गये हैं कि माधारण विद्वान्की तो वात ही क्या, अच्छे विद्वान् भी उने सह्नमें नही लगा सकते है । उक्त अष्टशतो-भाष्यको अपनाकर श्रीविद्यानन्दा- चार्यने देवागमपर जो अष्टनहनी ( आठ-हजार श्लोक परिमाण) नामकी अलकृति लिखी है उससे अष्टशतीका स्त्रार्थ स्पष्ट अवभासित होता है और उसकी गम्भीरता एव जटिलताका पता चल जाता है । यह नष्ट- सहत्री-टीका भी विषयकी दृष्टिमे कठिन शब्दोकी भरमारको लिए हुए और इसलिए एक विद्वान् यशोविजय ( श्वेताम्बराचार्य ) को इसपर टिप्पण लिखना पड़ा है, जिसका परिमाण भी आठ हजार श्लोक जितना हो गया है । इससे मूलगन्य कितना अधिक गहन, गम्भोर तथा अर्थ- गौरवको लिए हुए है, यह और भी स्पष्ट हो जाता है । अष्टमहत्रीको स्वय विद्यानन्दाचायने 'कष्टसहवी' लिखा है अर्थात् उसका निर्माणकार्य सहत्रो कष्ट झेलकर हुआ है और यह बात उन विन पाठकोसे छिपी नही, जो एमे खोजपूर्ण महत्त्वके ग्रन्याका निर्माणकार्य करते है-उन्हें पद-पदपर उस कष्टका अवभासन होता है-साधारण विज्ञ पाठकोके वशकी वह वात नही । ठीक है, प्रनवमें जो भारी वेदना होती है उसे वांझ क्या जाने ? भाचार्य महोदयने एक बात इस अष्ट- अनुवादकीय ११ सहस्रोके विषषमें और भी लिखी है और वह यह कि 'हजार शास्त्रोके सुननेसे क्या, एक अष्टसहस्रीको सुनना चाहिए, जिस अकेलीसे ही स्वसमय और परसमय दोनोका यथार्थ वोध होता है। यह मात्र अपने अन्यकी प्रशसामें लिखा हुआ वाक्य नहीं है, बल्कि सच्ची वस्तुस्थितिका द्योतक है । एक वार खुर्जाके सेठ ५० मेवारामजीने बतलाया था कि जर्मनी- के एक विद्वान्ने उनसे कहा है कि 'जिसने अण्टसहस्री नही पढी वह जैनी नही और जो अष्टसहस्रीको पढकर जैनी नही हुआ उसने अण्टसहनीको समझा नही ।' कितने महत्त्वका यह वाक्य है और एक अनुभवी विद्वान्के मुखमे निकला हुआ अष्टसहस्रोके गौरव को कितना अधिक स्यापित करता है । मचमुच अष्टसहस्री ऐसी ही एक अपूर्व कृति है और वह देवागमके मर्मका उद्घाटन करती है । खेद है कि आज तक ऐसी महत्त्वकी कृतिका कोई हिन्दी अनुवाद ग्रन्य-गौरवके अनुरूप होकर प्रकाशित नही हो सका। जिन्होने स्तुति-विद्याका अध्ययन किया है वे जानते हैं कि समन्त- भद्रको शब्दोके ऊपर कितना अधिक एकाधिपत्य प्राप्त या। श्लोकके एक चरणको उलटकर दूसरा चरण, पूर्वाधको उलटकर उत्तरार्ध और सारे श्लोकको उलटकर दूसरा श्लोक बना देना तो उनके बाएं हाथका खेल था । वे एक ही श्लोकके अक्षरोको ज्यो-का-त्यो स्थिर रखते हुए उन्हें कुछ मिलाकर या अलगसे रखकर दो अर्थोके वाचक दो श्लोक प्रस्तुत करते थे। श्रीवीर भगवान्की स्तुतिमें एक पद्यका उत्तरार्ध है . 'श्रीमते वदमानाय नमो नमितविद्विपे।' यही उत्तरावं अगले दो पद्योका भी उत्तरार्ध है । परन्तु अर्थ तीनो पद्योंके उत्तरार्धोका एक- दूसरेसे प्राय भिन्न है । ये सब वार्ते रचनाके महत्त्व और उनकी कला- पूर्णताको व्यक्त करती है। प्रस्तुत देवागम भी ऐसे कलापूर्ण महत्त्वसे अछूता नही, उसमें एक कारिकाको एक जगह रखनेपर एक अर्थ, दूसरी जगह कुछ कारिकाओके मध्य रखनेपर दूसरा अर्थ और तीसरी जगह १ श्रोतव्याष्टसहस्री श्रुतं किमन्यै सहस्रसख्यान । विज्ञायेत ययंव स्वसमय-परसमयसद्भाव ।।
१२ देवागम ऐमे महान् रखनेपर तीसरा अर्थ हो जाता है । वह कारिका है 'विरोधान्नोभयंकात्म्य' नामको, जिमे ग्रन्यमें ९ म्यानोपर रखा गया है और ग्रन्य-सन्दर्भको दृष्टिमे अपने-अपने स्थानपर उसका अलग-अलग अर्थ होता है-एक स्थानपर जो अर्थ घटित होता है वह दूमरे स्थान पर घटित नही होता । आचार्यके इतने गहन, गभीर तथा अर्थगौरवको लिए हुए कलापूर्ण ग्रन्थका अनुवाद मेरे जैसा व्यक्ति करे, जिमने न किमी विद्यालय-कालेजमें व्यवस्थित शिक्षा ग्रहण कर डिग्री प्राप्त की है और न माक्षात् गुरुमुखसे ही ग्रन्थका अध्ययन किया है, यह आश्चर्यकी ही वात है। फिर भी स्वामी समन्तभद्र और उनके वचनोके प्रति मेरी जो भक्ति है वही यह सब कुछ अद्भुत कार्य मुझमे करा रही है- 'त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते वलान्माम्' मानतुगाचार्यका यह वाक्य यहां ठोक घटित होता है । इसी भक्तिसे प्रेरित होकर मैंने इससे पहले स्वा- मीजीके तीन ग्रन्यो-स्वयम्भूम्तोत्र, युक्त्यनुगासन और समीचीन धर्म- शास्त्रके अनुवादादि प्रस्तुत किये है जो विद्वानोको रुचिकर जान पडे है । इसके किए स्व० न्यायाचार्य प० महेन्द्रकुमारजीका एक वाक्य यहाँ उद्धृत कर देना अनुचित न होगा, जो उन्होने तत्वानुशासनके 'प्राक्क- थन' में ग्रन्यके अनुवाद-विषयमें लिखा है- 'युक्त्यनुशासन जैसे जटिल और सारगर्भ महान् गन्यका सुन्दर- तम अनुवाद समन्तभद्र स्वामीके अनन्यनिष्ठभक्त साहित्य-तपस्वी ५० जुगलकिशोरजी मुस्वारने जिस अकल्पनीय सरलतासे प्रस्तुत किया है वह न्यायविद्याके अधिकारियोके लिए आलोक देगा।" इस प्रकारके विद्वद्वाक्योसे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहा और में बरावर अपने कार्यमें अग्रसर होता रहा हूँ। देवागमकी प्राप्ति मुझे आजसे कोई ७० वर्ष पहले जयपुरके ८० जयचन्दजीकी जयपुरी भाषामें लिखी टीका-सहित हुई थी, जिसकी मेंने स्वाध्यायके अनन्तर निज पठनार्थ प्रेमपूर्वक प्रतिलिपि भी अच्छे पुष्ट कागजके शास्त्राकार खुले पत्रोपर की थी, जिसको पत्रसख्या ९० है और जो मगसिर वदी सप्तमी सवत् १९५५ को लिखकर समाप्त हुई थी। - अनुवादकीय १३ यह हस्तलिखित प्रति आज भी मेरे सगहमें सुरक्षित है। इस टोकासे मुझे ग्रन्थको अधिकाधिक जानकारीके लिए और जो गुत्थियां इस टोकासे नही सुलझ सकी उन्हें सुलझानेके लिए दूसरी टीकाओको देखने की प्रेरणा मिली और मै बरावर उनकी तलाशमें रहा । सन् १९.५ में सनातन जैन ग्रन्यमालाका प्रथम गुच्छक वम्बईसे प्रकाशित हुआ, जिसमें वसुनन्दि आचार्यको एक वृत्ति (सस्कृत-टीका) देवनेको मिली। यह वृत्ति शब्दा- र्थको दृष्टिसे अच्छी उपयोगी जान पडी। इसके अन्तमें आचार्यने स्वामी ममन्तभद्रको त्रिभुवनलब्धजयपताक', 'प्रमाणनयचक्षु' और 'स्याद्वाद- शरीर' जैसे विशेषणोके माथ उल्लेसित किया है और अपनेको 'श्रुत- विस्मरणशील' तथा 'जडमति' लिखा है और 'आत्मोपकार' के लिए इस टीकाका लिखा जाना सूचित किया है । इससे कोई १० वर्ष वाद सन् १९१५ में अष्टसहस्रीका प्रकाशन भी बम्बईसे हुआ । वह अष्टशतोको भी हृदयगम किये हुए है और अनेक टिप्पणाको भी साथमे लिए हुए है। तभीमे वे मेरे अध्ययनका विषय बनी रही है और उनमे प्रत्येक उलझने सुलझी है। मेरा प्रस्तुत अनुवाद मुख्यत अण्टसहस्रीके आधारपर अवलम्वित है, जिसके लिए मैं श्रीविद्यानन्दाचार्यका बहुत आभारी हूँ। मेरे अनु- वादमें जो कुछ खूबी है उसका प्रमुख श्रेय स्वामी समन्तभद्र और उनके अनन्यभक्त उक्त आचार्य महोदयको प्राप्त है, जहां कही कोई त्रुटि है वहाँ मेरी अपनी ही है। मैंने सब टीका-टिप्पणोके साथ अष्टसहस्रीका दोहन कर जो मोटा नवनीत (मक्वन) निकाला है और जिसे मैंने अपने पाठकोके लिए परम उपयोगी तथा हितकर समझा है उसीको अनुवादादिके रूपमें निवद्ध किया गया है, जो पाठक विशेष सूक्ष्म वातो- को जाननेके इच्छुक हो वे अण्टसहस्रोमे अपना सीधा सम्बन्ध स्थापित करें । मूल कारिकाओपरसे जो अर्य सहज फलित तथा अनुभत होता है उसे म्लानृगामो अनुवादके रूपमें ब्लैक-टाइपमें रखा गया है, उस अर्यकां यथाशक्य स्पष्टीकरण डैश (-) के अनन्तर अथवा दो डैशोके भीतर दिया गया है और जो बातें कथनका सम्बन्ध विठलानेके लिए परसे लेनी पडी है गोल कटके भीतर रखा गया है-कही-कही १ १८ देवागम मिनी अर्थका दूसरा पर्याय शन्द भी बैकटके नीनर रखा गया है । नाथ ही मिनी-किनो क्रान्किार अर्थको और विगट करनेके लिए व्यान्याको भी अपनाया गया है । जैन माग्धिा ८ की च्याम्या । ऐनी ब्यान्याएँ और अधिक लिन्त्री गातो नो अच्छा होना । पग्न्नु नमन और शक्तिने यथावना इजाजत नहीं । इग्न नूनान्थ और अनुबानको नागे यिनि- को मल प्रकार मनमा जानता है । यहाँ एक वान प्रकट कर देनेनी है और वह यह कि प्रवृत देवागनमें जिन आप्नकी नोमाना की गई है वह आप्न वह है जो तत्वा- धिगनमूत्रको आदिमें मगन्नावणन्नने चिन नुनिका पियन्न है, जैना कि अप्टननोना प्रारम्भ करते हुए विद्यानन्तगोरे निम्न मगल- लोकवायन प्रन्ट है 'गान्त्रावतारविननुगौचगप्तमीमानित कृतिग्लनियने नयाग्य ।' अर्थात् तत्वार्थगा अवतार नव ग्त्री गई नो नुनि (नोन- नार्गन्ध नेतान्' इत्यादि) उनका विषयनून जो आप्त है उन आप्नली मोनानाको लिए हुए नमन्तनन्को कृति (आप्ननीनाना) को मैं अलंकृत काना है । उनो वातको विद्यानन्तने अपनी आमपरीक्षा अन्तमें निम्न पद्य द्वारा मोर नी न्पष्ट कर दिया है :- श्रीनत्तवार्थगात्रातनलिलनिवेग्रिन्नोद्भवय, प्रोत्थानारम्भकाले नल्लमलभिडे शाळारै कृत्तं यन् । तोत्र तीथॉपमान प्रथितपृथुपथ चामिनीमानिन तत्, विद्यानन्द शक्तया कथमपि कथित नत्यवाञ्यार्थनिय ।। इननें जो कुछ वर्गाया है उनका नार इतना ही है कि तत्त्वार्थगान्त्र नानका जो अद्भुत ननुद्र है उनके निर्माणके प्रारम्भकालमें नगलाचरणके लिए जो तीर्थोपमान न्तोत्र त्रकाद्वारा रचा गया है उनकी स्वामी जनन्तमदने मोमामा की है और मैंने यह परोमा नत्यवाच्यार्थको निद्धिक लिए लिखी है। ऊपर जिन नगल-स्तोत्रको चर्चा है वह पद्य इस प्रकार है मनुवादकीय १५ गुण आप्तमें मोक्षमार्गस्थ नेतार भेत्तार कर्मभूभृताम् । ज्ञातार विश्वतत्त्वाना वन्दे तद्गुणलब्धये ।। इममें आप्तके तीन गुणोका उल्लेख है और उन गुणोकी प्राप्तिके लिए ही आप्तकी वन्दना की गई है । वे तीन गुण है मोक्षमार्गका नेतृत्व, मोहादिकर्मभूभृतोका भेतृत्व और विश्वतत्त्वोका ज्ञातृत्व । ये जिस क्रममे विकासको प्राप्त होते है वह है पहले मोहादिकर्मभूभृतो (पर्वतो) का भेदन होकर राग-द्वेषादि दोपोका अभाव होना, दूसरे ज्ञानावरणादिका अभाव होकर विश्वतत्त्वोंका ज्ञाता होना और तीसरे आगमेशके रूपमें मोक्षमार्गका प्रणेता होना, जैसा कि स्वामीजीके समी- चीनधर्मशास्त्र (रत्नकरण्ड) के निम्न वाक्यसे प्रकट है आप्तेनोत्सन्नदोपेण सर्वज्ञेनागमेशिना। भवितव्य नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ।। तव उक्त मगल-स्तोत्रमें आप्तके विशेषणोको क्रममग करके क्यो रखा गया है-तृतीय विशेषणको प्रथम स्थान क्यो दिया गया है? यह एक प्रश्न पैदा होता है । इसके उत्तरमें इतना ही निवेदन है कि तत्त्वार्थसूत्रको 'मोक्षशास्त्र' भी कहते है, जगह-जगह 'मोक्षशास्त्र' नामसे उसका उल्लेख है। मोक्षशास्त्रका मगलाचरण होने से ही इसमें 'मोक्ष- मार्गस्य नेतारम्' पदको प्रधानता दी गई है और यही वात विशेषणपदोको क्रमभग करके रखनेका कारण जान पड़ती है। तथा इस वातको स्पप्ट सूचित करती है कि यह मोक्षशास्त्रका मगल-पद्य है।' अस्तु इस अनुवादको न्यायाचार्य पण्डित दरवारीलालाजी जैन कोठियाने पूर्ण मनोयोगके साथ पढ जानेकी कृपा की है और कितना ही प्रूफरीडिंग आदि भी किया है । दो-एक जगह समुचित परामर्श भी दिया है । इस मय कृपाके लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ। साथ ही उन्होंने प्रस्तावना १ इम मगलाचरण-विपयका विशेष ऊहापोह न्यायाचार्य पण्डित दरवारीलालजीकी प्रस्तावना तथा उन लेखोमें किया गया है जो अनेकान्त वर्ष ५ कि० ६-७ व कि० ११-१२ में प्रकाशित हुए हैं।
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प्रस्तावना देवागम और समन्तभद्र १. देवागम: (क) नाम प्रस्तुत कृतिका नाम 'देवागम' है। प्राचीन ग्रन्थकारोने प्राय इसी नाममे इसका उल्लेख किया है । अकलङ्कदेवने इसपर अपना विवरण (अष्ट- शती-भाष्य) लिखनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसके आरम्भमें इसका यही नाम दिया है और उसे 'भगवत्स्तव' (भगवान्का स्तोत्र) कहा है। विद्यानन्द ने भी 'अष्टसहस्री' (पृ० २९४) में अकलङ्कदेवके अष्टशतीगत 'स्वोक्त- परिच्छेदे' पदकी व्याख्या 'देवागमाख्ये • शास्त्रे' करके इसका 'देवागम' नाम स्वीकार किया है । वादिराज, हस्तिमल आदि ग्रन्थकारोने भी अपने ग्रन्योमें ममन्तभद्रकी उल्लेखनीय कृतिके रूपमें इसका इसी नामसे निर्देश किया है। आश्चर्य नही कि जिस प्रकार 'कल्याणमन्दिर', १ कृत्वा विवियते स्तवो भगवता देवागमस्तस्कृति।' -अष्टग प्रारम्भिक पद्य २। २ 'इति देवागमाख्ये स्वोक्तपरिच्छेदे शास्त्रे....।' -अण्टस० पृ० २९४ । ३ 'स्वामिनश्चरित तस्य कस्य नो विस्मयावहम् । देवागमेन सर्वज्ञो येनाद्यापि प्रदर्श्यते ॥ पार्श्व० च० । ४ देवागमनसूत्रस्य श्रुत्या सद्दर्शनान्वित ।' -विक्रान्त कौ० प्र०।
२ देवागम-आप्नमीमामा 'भक्तामर', 'एकोभाव' आदि स्तोत्र 'कल्याणन्दिर', 'भक्तामर', 'एकी- भाव', जैने आद्य पदोन आरम्भ होने कारण वे उन नामो से ख्यात है उनी प्रकार यह नव भी 'देवागम पदने आरम्न होनेसे वागम नाम अधिक प्रनिद्ध रहा हो और इनीर ग्रन्यकारों द्वारा वह इर्ग नान्ने विप उल्लिखित हुआ हो । न्तकारने' इमका 'आतमीमासा' नाम दिया है, जिने अनलकंदवन' 'मवंतविशेषपरीक्षा' कहा है। विद्यानन्दन अपने उन्लीमें 'देवागम' नाम अतिरिक्त इन 'आप्तमीमामा' नाम भी उपयोग न्यिा है। इसमें माल्म पड़ता है कि यह कृति जहां देवागम' नामसे जन माहित्यमें विश्रुत है वहां वह 'आप्तमीमासा' नामसे भी । और इन तन्ह यह हन्टर्ण रचना दोनों नामोन प्रव्यात है। (ख) पग्चिय यह दश परिच्छेनों में विभक्त है और ये परिन्छेन विपय-विनजनकी दृष्टिने स्वय प्रन्यकारोक्त हैं। प्रन्यकारकी यह दग-नत्यक परिन्दोन कल्पना हमें आचार्य गृपिच्छचे तत्त्वार्थत्रने दश अध्यायो मौन हपि ग्णादक वैगेपिनत्र म अध्यायोका स्मरण दिलाती है। उन्नर इतन ही है कि वे मृत्र-चन्य गद्यात्मक तथा सिद्धान्नगलीमें त्रित है और देवागम पद्यान्मक एवजनिक भैलीमें रचा गया है। उस नन्य बार्गनिक रचनाएँ प्राय गमित्र तया इप्टदेवी न्तुतिल्प, रत्री नाती थो। नागार्जुन, वसुबन्धु आदि दार्शनिकोकी रचनाएं उनी प्रार- ही उपलब्ध होती हैं। नमन्तभन्ने नी नमयकी नांगके अनुरूप अपने तीन (वचन्भू, युज्यनुनापन औ देवागमा स्तोत्र वानिक एक कान्ति मैलीमें न्चे है। १ 'इनीरमाममीगना विहिता हितमिच्छनाम् ।' -देवागम का० ११४ । अष्टम० देवागन का० ११४ । अप्टम० पृ० १, आप्तपरीक्षा पृ० २३३, २६२ वीसेवामन्दिर, दरियागज, दिल्ली। ४ 'स्वोक्तपरिच्छेदे.'-अप्टा०, देवागम का० ११४ । 3 प्रस्तावना ३ प्रथम परिच्छेद इसके दस परिच्छेदोमें कुल ११४ कारिकाएँ हैं। प्रथम परिच्छेदमें १-२३ कारिकाएं हैं। १-३ तक उन विशेषताओंका उल्लेख करके मीमासा की गई है जिनसे आप्त माननेकी बात कही जाती है। ४थीमें ऐसे व्यक्ति-विशेषकी सम्भावना की है जो निर्दोष हो सकता है । ५वीमें ऐमे हेतुमे सामान्य आप्त (सर्वज्ञ) का सस्थापन (अनुमान) किया है जो साध्यका अविनाभावी तथा निर्दोष है । ६ठीमें वह सामान्य आप्तत्व युक्ति- पूर्वक अर्हत्में पर्यवसित किया गया है और कहा गया है कि चूंकि उनका शामन ( तत्त्वप्ररूपण ) प्रमाणाविरुद्ध है, अत वही आप्त प्रमाणित होते है। वीमें वर्णित है कि जो एकान्त तत्त्वके प्ररूपक है उनका वह एकान्त प्ररूपण प्रत्यक्ष-विरुद्ध है। ८वीमें यह बताया गया है कि एकान्तवादियोंका वह तत्त्व-प्ररूपण प्रत्यक्ष-विरुद्ध कसे है। यत एकान्तवादी स्वपरवरी है, अत उनका पुण्य-पापादि प्ररूपण उनके यहां सम्भव नही है । ९-११ तक तीन कारिकाओ द्वारा वस्तुको सर्वथा भाव ( विधि ) रूप स्वीकार करनेपर प्रागभाव आदि चारो अभावोंके अपह्नवका दोप दिया गया है । बताया गया है कि प्रागभावका अपलाप करने पर किसीका उत्पाद नही हो मकेगा-अर्थात् कार्य अनादि हो जायेगा, प्रध्वसाभावके न रहनेपर किसीका नाश नहीं होगा-अर्यात कार्यद्रव्य अनन्त हो जायेगा, अन्यो- न्याभावके निषेध करनेपर 'यह अमुक है, अमुक नहीं' ऐसा निर्धारण नही हो सकेगा-अर्थात् सब सवरूप हो जायेगा। और अत्यन्ताभावके लोप हो जानेपर वस्तुका अपना प्रतिनियत स्वरूप न रहेगा। इस तरह सारी वस्तुव्यवस्था चौपट ( ममाप्त ) हो जायगी। - कारिका १२ द्वारा उन्हें दोष दिया गया है जो वस्तुको सर्वथा अभाव ( शन्य ) रूप मानते हैं। कहा गया है कि अभावरूप वस्तु स्वीकार करने- पर उमे स्वय जाननेके लिए वोध ( ज्ञान ।) और दूसरोको जनाने- ग्तानके लिए वचनरूप माधन-प्रमाणो तथा अनभिमत भावरूप वस्तुको स्वय दोषपूर्ण जानने और दूसरोको दोषपूर्ण बतानेके लिए उक्त दोनो देवागम-आप्तमीमामा ( बोध और वचनस्प ) दूषण-प्रमाणोको स्वीकार करना आवश्यक है, जो मर्वथा अभाववादमें सम्भव नहो, क्योकि वे दोनों भावरूप है १३ में सर्वथा भाव और सर्वथा अभाव दोनोस्प वस्तुको माननेपर विगेघ तथा उसे सर्वथा अवाच्य (अनिर्वचनीय) स्वीकार करनेपर उसका 'अवाच्य' शब्दमे भी कथन न कर सकनेका दोप दिखाया गया है। १४-२२ तक ९ कारिकाओ द्वारा स्याद्वादमय (अपेक्षावाद) मे वस्तु- को अनेकान्तात्मक अर्थात् भाव ( विवि ) और अभाव ( निषे) रूप विरोधी युगलको लेकर उमे सप्तभङ्गात्मक ( मप्तधर्मरूप) सिद्ध किया है । २३वी कारिका द्वारा एक-अनेक, नित्य-अनित्य आदि विरोधी युगलो- को लेकर भी वस्तुमें सप्तभगी ( सप्तभङ्गात्मकता) की योजना करने- की मूचना की गई है। इस तरह इस प्रथम परिच्छेदमें भाव और अभावके सम्बन्धमें उन एनन्त मान्यतामोकी मीमासा की गई है जो ग्रन्थकारके समयमें चर्चित एव बद्धमूल थी। साथ ही उनका नय-विवक्षाले समन्वय करके उनमें नप्नभङ्गी-अनेकान्तकी स्थापना की है। द्वितीय परिच्छेद द्वितीय परिच्छेदमें २४-३६ तक १३ कारिकाएँ हैं। २४-२७ तक चार कारिकामओ द्वारा अद्वतकान्त ( सर्वथा एकवाद ) की समीक्षा की गई है और कहा गया है कि वस्तुको सर्वथा एक माननेपर क्रिया-भेद, कारक-भेद, पुण्य-पापरुप कर्मद्वैत, सुख-दुखरूप फलद्वत, इहलोक-परलोक- त्प लोकद्वंत, विद्या-अविद्यारूप ज्ञानद्वैत और वन्ध-मोक्षरूप जीवकी शुद्धाशुद्ध दो अवस्थाएं ये सब अद्वैतमें सम्भव नही है। इसके सिवाय हेतुने अद्वेतकी सिद्धि करनेपर साधन और साध्यका द्वैत स्वीकार करना आवश्यक ही नही, अनिवार्य है। यदि विना हेतुके ही अद्वैत माना जाय, तो द्वैतको भी बिना हेतुके मान लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त अद्वैतवादमें यह भी विचारणीय है कि 'अद्वत' पदमें जो 'त' शब्द पड़ा हुआ है उसका वाच्य द्वैत है या नहीं? क्योकि नामवाली वस्तुका प्रस्तावना ५ निध उसफे अस्तित्वको स्वीकार किये बिना नहीं हो सकता और द्वतको स्वीकार करनेपर सर्वया मदतकी मान्यता समाप्त हो जाती है। यथार्थ में अद्वैत द्वैतका निषेध है और द्वेत वस्तुभूत अतकान्तमें स्वीकृत न होनेने उनका निपेषरूप सर्वथा मद्धत फैसे माना जा सकता है ? कारिका २८ के द्वारा सर्वघा द्वत (अनेक) वादी वैशेपिकोंके अनेक- वादकी मालोचना करते हुए प्रतिपादन किया गया है कि जिस पृथक्न्व गुणसे द्रव्यादि पदाथोंको पृथक् ( अनेक ) कहा जाता है वह उनसे अपृथक् है या पृथक् ? उसे उनसे अपृथक् तो कहा नहीं जा सकता, क्योकि वैमा उनका नितान्त नही है। यदि उसे उनसे पृथा कहा जाय तो वह पृथक्त्व गुण अपनी मत्ता कायम नही रख सकता, क्योकि वह अनेकांमें रहकर ही अपने मस्तित्वको स्थिर रखता है। इस प्रकार वैशेपिकोक अनेकवादको मान्यताका आधार-स्तम्भ ( पृथक्त्वगुण ) जव ढह जाता है तो उसपर आधारित अनेकवादका प्रसाद भी घरापायी हो जाता है। वौद्ध भी अनेपावादी है। पर उनका अनेकवाद वैशेषिकोंफे अनेकवाद- से भिन्न हैं। वे अन्वयरूप एकत्व न मानकर सर्वथा पृथक्-पृथक् अनेक विमदृश क्षणोको ही वस्तु स्वीकार करते हैं। उनकी इस मान्यताकी भी २९-३१ तक तीन कारिकाओं द्वारा समीक्षा की गई है। कहा गया है कि मालाके दानोमें सूतकी तरह क्षणोमें अन्वयरूप एकत्व न माननेपर उनमें सन्तान, मादृश्य, समुदाय भौर प्रेत्यभाव आदि नही बन सकते, पयोकि क्षणोंका एक-दूसरेसे एकत्वरूप सम्बन्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त ज्ञान और ज्ञेय इन दोनोको 'सत्' की अपेक्षासे भी भिन्न माननेपर दोनो ही असत् हो जावेंगे। और उस हालतमें न ज्ञानकी स्थिति रहेगी और न वाह्य तथा अन्तस्तत्त्वरूप आभ्यन्तर जेय ही बन सकेगा। वचनोमे भी उनकी स्थिति नही रोपी जा सकती है, क्योंकि वचन सामान्य (अन्यापोह) मात्रको कहते हैं, जो अवस्तु है, विशेष (स्वलक्षात्मक वस्तु) को नही और ऐसी दशामें ममस्त वचन यथार्थत वस्तुके वाचक न होनेसे मिथ्या ( असत्य) ही है। कारिका ३२ के द्वारा वस्तुको सर्वथा एक और मर्वथा अनेक दोनों (उभय ) रूप अङ्गीकार करनेपर विरोध तथा अवाच्य (अनुभय) देवागम-आप्तमीमाना न्वीकार करनेपर 'अवाच्य' गन्द दाग भी उमा निर्वचन न हो नपनेग ोप प्रदगित किया गया है। ३३-३६ तक ४ कारिकानो द्वारा न्याठादनय ( पञ्चवाट ) में कि और अनेकके विरोधी युगलकी अपेक्षाने सप्ननगीकी योजना जे वन्नु त्यचिन् एक और क्याचिन अनेक अनेकान्तनी न्यापना की गई है। इन प्रकार मरे परिच्छेदमें एक (अंत ) और अनेक (वेत ) गारेमें भ्ट एलान्न धारणाजोको समालोचना करे इन युगकी अपंग उनुको सप्तभडात्मक ( अनेकान्तन्प ) सिद्ध क्यिा गया है । ननीय परिच्छेद तृतीय परिच्छेदमें ३५-६० तक २४ कारिकाएं है। ३-४० नक नार कारिओ द्वारा मापदर्गन एकान्त नित्यवादको आलोचनाने रहा गया है कि प्रधान एव पुरुषको नर्वथा निन्य स्वीकार करने पर उनमें किसी भी प्रकारके विगकी नम्भावना नहीं है क्योति उत्पत्तिते पूर्व न किमीको कारक कहा जा सकता है और न जानने पूर्व किनीको प्रमाण यह नन्ते हैं । अकारफवभाव छोडक काल- प्रभाव प्रण करने म्प उत्पत्ति होनेके बाद कारक औ अनापन्वभाव डकर ज्ञापकस्वभाव ग्रहण करनेन्द ज्ञप्ति होनेने अनन्तर ज्ञापन ( प्रमाण ) व्यवहार होता है । एकल्प रहनेके कारण एकान्त नित्य ( प्रधान व पुरुष ) ने किनीकी उत्पनि अथवा ज्ञप्ति आदिल्प कोई भी क्रिया सम्भव नही है और इसलिए उसे न कारक कहा जा सकता है और र प्रमाण । इन्द्रियोमे जैने घटादि अर्यकी अभिव्यक्ति होती है वैने ही प्रधानम्प कारक या प्रमाणने महदादिकी अभिव्यक्ति होती है, इन प्रकारको मान्यता भी युक्त नहीं है, क्योनि प्रमाण तथा कारक दोनोल्प प्रधान सर्वघा नित्य होनेने उनका अभिव्यक्तिके लिए भी व्यापार सम्भव नहीं है। अन्यथा अभिव्यक्तिने पूर्व रहनेवाले अनभिव्यञ्जन स्वभावको छोडने तथा व्यञ्जक स्वभावको ग्रहण करनेरूप अवस्थान्तरको प्राप्त करनेने उसे अनित्य मानना पड़ेगा। अत महदादि प्रधानने अनियग्य (विनाय) प्रस्तावना ७ भी नही हो सकते । इसी तरह एकान्त नित्य पक्षमें पुरुषको तरह मत्कार्यको न उत्पत्ति सम्भव है और न अभिव्यक्ति, क्योकि सदा विद्यमान रहनेने उनमें किसी भी तरहका परिणमन (परिवर्तन), चाहे वह उत्पत्ति- रूप हो और चाहे अभिव्यक्तिरूप, नहीं बन सकता है। पुण्य, पाप, प्रेत्यभाव (पर्यायान्नर ), वन्ध और मोक्ष ये सर परिणाम भी एकान्त नित्य (अपरिणामी पुरुषवाद ) में असम्भव है। नित्य जब सदा एकर ( कूटम्य) रहेगा तो उसमें कोई विकृति नही हो मकती। तथा विना विकृतिके पुण्यपापादि, जो भिन्न कालोमें होनेवाली अवस्थाविशेष है, कैन नम्भव है, यह विचारणीय है। ४१-५४ तक चउदह कारिकाओ द्वाग एकान्त अनित्यपक्ष (क्षणिकवाद) में दोप दिये गये है। यहा गया है कि वस्तुको सर्वथा भनिन्य (क्षणिक) म्वीकार करनेपर भो उक्त प्रेत्यभावादि नही वन मकते, क्योंकि पूर्वापर क्षणोंमें परस्पर अन्वय (ध्रौव्यात्मक बन्धन-कडी )न होने कारण प्रत्यभिज्ञा, स्मरण, अनुभव, अभिलापा आदि ज्ञानधारा प्रवाहित नही हो सकती। ऐमी दशामें न पूर्व क्षणको कारण और न उत्तर भणको कार्य कहा जा सकता है । सर्वथा क्षणिववादमें न असत्कार्यकी उत्पत्ति, न कार्यकारणभाव, न हिस्याहनकभाव, न गुरुशिष्यभाव, न पति- पत्नीभाव, न मातृपुत्रभाव, न बद्धमुक्तभाव और न स्कन्धसन्ततियां ही बन सकती हैं। ५५ के द्वारा मर्वथा नित्य और मर्वथा अनित्य दोनो (उभयकान्त) के स्वीकान्में विगंध और न सर्वथा नित्य तथा ननर्वथा अनित्य दोनांके निपेधम्प (अनुभयकान्त) में 'अवाच्य' शब्दसे उसका कथन न कर सकने- का दीप प्रदर्शित किया गया है। ५६-६० तक ५ कारिकाओं द्वारा रयाद्वादनयसे वस्तुको कश्चित् नित्य, कथश्चित् अनित्य, कथञ्चित् उभय, क्थश्चित् अनुभय आदि सप्तभङ्गात्मक अनेकान्त सिद्ध किया है। इस प्रकार इस परिच्छेदमें नित्यानित्यके विरोधी युगलकी अपेक्षा पूर्ववत् सप्तभङ्गी दिखायी गई है। उल्लेखनीय है कि दो महत्त्वपूर्ण दृष्टान्तो (लौकिक एव लोकोत्तर) - , दयाम्यानमीनना सानो न्नु निन्दता (नोन्य) निन्ना (उन्नयल) बने। प्रतीनिनित नगण गण है। चतुर्थ परिच्छेद मे -- 0 ग्गिा है, जिन् वानन्द दन विचार न्निनग।.-::-गरिनगणनेनंद (रुन्ना ) चादी पिगी गन्न नंद-मान्यताने नांग की गई है। हागन डि न नगणने गुण और गाने न्या और नानन्दगाने (गृण) में नपाइन्न्न (द) नाना जप जोक (यं-पच्चो गाल) नन्नेगे (गन्ना-स्व गदि) में रहना (कृति) मन्मन न्हो है न्यानि प्रान ना है कि वह एक नेचमें गन्ने रहता है या न्यूण प्रपन तो टोल नहीं मानविन गोगे नहीं बना है- मि दोगा निपा न है। हितीय पक्ष भी ठीक नहीं है, ज्योति न्निने काण (द) हो चने ही (स्वपी) गाना पहो। दि उन एक (जन्य)-पना , जे पयार्य वकीय निशान्त- चिरहै तो निर उसे एक ने नहा मनवा है-उने नाम (न्नक) हो प्रतिपादन करना चाहिए। इन हदण भेदन ग्ह वृनि दोष निवार्य है-जिन दूर नहीं मिया मनाता है। इसी प्रकार इस भेद- बाद सामान्य व नवापबन्दी, जिन्हें भिन्न पदार्यन्वीना न्या है, अपने गम्पोने वृति न्ही वन्ती। मरण यह है कि जिन नानगोल एव उलादमील व्यन्यिों (घर-पट-नो आदि)में उन दोनोगे चिति दीकार की गई है उनने नाग या उत्पाद होनेपर उन दोनोका न नाग होता है और न उत्पाद । ऐनो कितिने बाघपले विना मात्रयो (नानान्य तथा समवाय) नहीं और नचे रहो' जब कि उन्हें प्रत्येक व्यन्ति। नम्पूर्ण स्ने रहनेवाला तया नित्य जोर निष्क्रिय नाना गण निक्रिय होनेने वे नारशील व्यन्तिके नाश और उत्पागोल व्यत्तिके उत्पादके नमय अन्यत्र (दूसरे व्यनियोने) जा नही सकते तथा नित्य होनेने वे व्यक्तिक माय न नष्ट हो सकते है और न उत्पन्न । अत' - प्रस्तावना ९ . उनका विधान 'दुविधामें दोनों गये माया मिली न राम' कहावतको चरितार्य करता है । अर्थात् मामान्य और समवाय दोनोकी स्थिति भेदवाद- में हवाडोल है। इसके अतिरिक्त मामान्य और ममयायमें परम्पर सम्बन्ध सम्भव न होनेसे उनसे द्रव्य, गुण और कर्म का भी सम्बन्ध सम्भव नहीं है। सामान्य और समवायमें परस्पर सम्बन्ध क्यो सम्भव नहीं है ? इसका कारण यह है कि वे द्रव्य न होनेसे उनमें मयोगसम्बन्ध तो स्वय वैदो- पिकोको भी इप्ट नहीं है । समयाय भी उनमें सम्भव नहीं है, क्योंकि उन्हें अवयव-अवयवी, गुण-गुणी आदि रूपमें स्वीकृत नही किया गया । 'सामान्य समवायि'-सामान्य समवायवाला है, इस प्रकारमे उनमें विशेषण-विगेष्य सम्बन्धकी भी सम्भावना नहीं है, क्योंकि एक समयायके सिवाय अन्य समवायान्तर वैशेषिोंने नहीं माना। अन्यथा अनयस्था दोपसे वह मुक्त नही हो सकता है। हां, उनमें एकार्यसमवायकी कल्पना की जा सकती थी, पर वह भी नही की जा सकती, क्योंकि घटत्वादि मामान्य घटादिम समवायसे रह जानेपर भी समवाय उनमे समवेत नहीं है । स्पष्ट है कि वैशेषिकोंने समवायके गहनेके लिए अन्य समवाय नही स्वीकार दिया- एक ही समवाय उन्होंने माना है। इस तरह जव मामान्य और ममवाय दोनोमें परस्पर सम्बन्ध सम्भव नहीं है तो ये अनम्बद्ध रहकर द्रव्यादिमे सम्बन्धित नही हो सकते । फलत तीनों (मामान्य, ममयाय और द्रव्यादि) विना मम्वन्धके ग्वपुष्प तुल्य व्हरते हैं । वैशेपिको कोई परमाणुओमें पाक ( अग्निमयोग ) होकर घणुकादि अवयवीमें क्रमश पाक मानते हैं और कोई परमाणुमाम किसी भी प्रकारकी विकृति न होनेमे उनमें पाक (अग्निसयोग) न मानकर केवल घणुकादि (अवयवी ) में पाक स्वीकार करते हैं । जो परमाणुओमें पाक नहीं मानते उनका कहना है कि परमाणु नित्य (अप्रच्युत-अनुत्पन्न-स्थिरैकरूप ) है और इसलिये वे यणुकादि मभी अवस्थामओमें एकरूप बने रहते हैं- उनमें किसी भी प्रकारकी अन्यता ( भिन्नरूपतारूप परिणति ) नही होती उनमें सर्वदा अनन्यता ( एकस्पता) विद्यमान रहती है। इसी (किन्ही वैशेपिकोंकी ) मान्यताको आ० ममन्तभद्रने 'अणुओंका अनन्यतैकान्त' -
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प्रस्तावना ११ ७१-७२ द्वारा उन अवयव-अवयवो, गुण-गुणी मादिमें कश्चित् भेद, कञ्चित् अभेद आदि समभङ्गी-प्रक्रियाको योजना करके उनमें भनेकान्त सिद्ध किया है और यह दिखाया है कि किस तरह उनमें अभेद ( एकत्व) है और किस तरह उनमें भेद ( नानात्व ) आदि है । इस प्रकार इस परिच्छेदमें भेद और मभेदको लेकर विभिन्न वादियो द्वारा मान्य भेदैकान्त, अभेदैकान्त आदि एकान्तोंकी आलोचना और स्याहादनयसे उनमें अनेकान्तकी व्यवस्था की गई है। पञ्चम परिच्छेद इम परिच्छेद में ७३-७५ तक तीन कारिकामओ द्वारा उन वादियो की मीमासा करते हुए जैन दृष्टि प्रस्तुत की गई है जो सर्वथा अपेक्षासे या नर्वथा अनपेक्षा आदिमे वस्तुस्वरूपको मिद्ध मानते हैं। कारिका ७: में कहा गया है कि यदि धर्म और धर्मीकी, विशेषण और विशेष्यकी, कार्य और कारणकी तथा प्रमाण और प्रमेय आदिको मिद्धि सर्वथा अपेक्षासे मानी जाय तो उनकी कभी भी व्यवस्था नही हो सकती, क्योकि वे उसी प्रकार अन्योन्याश्रित रहेगे जिस प्रकार किसी नदीमें डूबते हुए दो तैराक एप दूसरेके आश्रय होते हैं और फलत दोनों ही डूब जाते है । यदि उनकी मिद्धि मर्वथा अनपेक्षासे ( स्वत ) ही स्वीकार की जाय तो अमुक कार्य- का ण है, अमुक धर्म-धर्मी है, अमुक विशेषण-विशेष्य है, अमुक प्रमाण- प्रमेय हैं और अमुक सामान्य-विशेप है, इस प्रकारका व्यवहार नही वन सकेगा, क्योकि ये सब व्यवहार परस्परको अपेक्षासे होते हैं। कारिका ७४ में सर्वथा उभयवादियोके उभयकान्तमें विरोध और सर्वथा अनुभयवादियोंके अनुभयकान्तमें 'अनुभय' शब्द द्वारा भी कथन न हो नकनेका दोप दिया गया है। ७५ द्वारा स्याद्वादनयसे वस्तुस्वरूपकी सिद्धि प्रदर्शित की गई है। कहा गया है कि धर्मर्मिभाव, कार्यकारणभाव, विशेपणविशेष्यभाव और प्रमाणप्रमेयभावका व्यवहार तो अपेक्षासे सिद्ध होता है। परन्तु उनका स्वरूप स्वत सिद्ध है। यथार्थमें कार्य में कार्यता, कारणमें कारणता, प्रमाणमें प्रमाणता, प्रमेयमें प्रमेयता आदि स्वय सिद्ध है वह परापेक्ष नही १२ देवागम-आप्तमीमासा है। अन्यथा किमी भी वस्तुका अपना स्वतत्र स्वरूप नही बन सकेगा। जैसे कर्ताका स्वरूप कर्मापेक्ष और कर्मका स्वरुप कत्रपेक्ष नही है तथा वोधकका स्वरुप वोघ्यापेक्ष और वोध्यका स्वरूप वोधकापेक्ष नहीं है। पर उनका व्यवहार अवश्य परस्पर-सापेक्ष है। उसी प्रकार धर्मधर्मी आदिका स्वरूप तो स्वय सिद्ध है किन्तु उनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष होता है। इस तरह इम परिच्छेदमें अपेक्षा और अनपेक्षाके विरोधी युगलमें भी सप्तभङ्गीकी योजना करके अनेकान्तकी व्यवस्था की गई है। षष्ठ परिच्छेद पष्ठ परिच्छेदमें ७६-७८ तक तीन कारिकाओं द्वारा हेतुवाद नौर अहेतुवादकी एकान्त मान्यताओमें दोषोद्घाटन करते हुए उनमें सप्तभङ्गी- योजनापूर्वक समन्वय (अनेकान्तस्थापन) किया गया है । कारिका ७६ में सर्वथा हेतुवादसे वस्तुमिद्धि मानने पर प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे वस्तुज्ञानके अभावका प्रसङ्ग तथा आगमसे सर्वसिद्धि स्वीकार करनेपर परस्पर विरुद्ध सिद्धान्तोंके प्रतिपादक वचनोंसे भी विरोधी तत्त्वाकी सिद्धिका प्रसङ्ग दिया गया है। कारिका ७७ में पूर्ववत् उभयकान्तमें विरोध और आवाच्यतकान्तमें 'अवाच्य' शब्दद्वारा भी उसका निर्वचन न कर सकनेका दोष प्रदर्शित इस परिच्छेदको अन्तिम ७८ वी कारिकामें हेतुवाद और अहेतुवाद दोनोसे वस्तुसिद्धि होनेका निर्देश करते हुए सप्तभङ्गात्मक अनेकान्त प्रदर्शित किया गया है । कहा गया है कि जहाँ आस वक्ता न हो वहाँ हेतुसे साव्यको सिद्धि की जाती है और उस सिद्धिको हेतु-साधित कहा जाता है तथा जहाँ आप्त वक्ता हो वहां उसके वचनसे वस्तुकी सिद्धि होती है और वह सिद्धि आगम-साधित कही जाती है। इस प्रकार वस्तु-सिद्धिका अङ्ग उपायतत्त्व ( हेतुवाद और अहेतुवाद ) भी अनेकान्तात्मक है । सप्तम परिच्छेद इस परिच्छेदमें ७९-८७ तक ९ कारिकाएं हैं, जिनके द्वारा ज्ञानकान्त और वाह्याकान्त आदि एक-एक एकान्तोंके स्वीकार करने में आनेवाले दोषोको दिखलाते हुए निर्दोष अनेकान्तकी स्थापना की गई है।
प्रस्तावना १३ कारिका ७९ के द्वारा बतलाया गया है कि यदि सर्वथा ज्ञानतत्व ही हो, वाह्य अर्थ न हो तो सभी वुद्धियां और सभी वचन मिथ्या हो जायेंगे, क्योकि दोनोका प्रामाण्य वाह्य अर्थपर निर्भर है। जिनका ज्ञात वाह्यार्थ सत्य निकलता है उन्हें प्रमाण और जिनका सत्य नही निकलता उन्हें प्रमाणाभास कहा जाता है। परन्तु ज्ञानकान्तवादमें वाह्यार्थको स्वीकार न करनेके कारण किसी भी बुद्धि और किसी भी वचनको प्रमाणताका निश्चय नहीं हो सकता और इसलिये उन्हें मिथ्या ही कहा जावेगा और जब वे मिथ्या है तो वै प्रमाणाभामकी कोटिमें प्रविष्ट हैं। किन्तु विना प्रमाणके उन्हें प्रमाणाभास भी कैसे कहा जा सकता है। तात्पर्य यह कि सर्वथा ज्ञानतत्वके ही स्वीकार करनेपर प्रमाण और प्रमाणाभास दोनो ही नही वनते और उनके न बननेपर किस तरह ज्ञानमात्रको वास्तविक और वाह्यार्थको अवास्तविक सिद्ध किया जा सकता है । ८० के द्वारा साध्य और साधनकी विजलिसे विज्ञप्तिमात्रतत्त्वकी मिद्धिके प्रयानको भी निरर्थक बतलाया गया है, क्योंकि उक्त प्रकारसे मिद्धि करने पर प्रतिज्ञादीप और हेतुदोप आते हैं। स्पष्ट है कि विज्ञप्ति- मायनत्त्वको मानने वालोके यहां न साध्य है और न हेतु । अन्यथा द्वैत- का प्रसङ्ग आयेगा। ८१ के द्वारा उन्हें दोप दिया गया है जो केवल बाह्यार्थ स्वीकार करते हैं, अन्तरगार्थ ( ज्ञान ) को नहीं मानते। कहा गया है कि यदि सर्वथा वाधार्थ ही हो, ज्ञान न हो, तो न मंगय होगा, न विपर्यय और न अनध्यवमाय । इतना ही नहीं, सत्यासत्यका निर्णय भी नही किया जा सकेगा। फलत जो विरोधी अर्थका प्रतिपादन करते हैं उनके भी मोक्षादि कार्योंकी मिद्धि हो जायगी। इसके अतिरिक्त स्वप्नवुद्धियोका स्वार्थक माथ सम्बन्ध न होनेसे उन्हें असवादी नहीं कहा जा सकेगा। कारिका ८२ के द्वारा सर्वथा उभयवादमें विरोध और सर्वथा अनुभय- वादमें 'अनुभय' शब्दसे भी उसका कथन न हो सकनेका दोष पूर्ववत् दिखाया गया है। कारिका ८३ द्वारा स्याहादसे वस्तुव्यवस्था करनेपर कोई दोप नही आता, यह दिखलाते हुए कहा गया है कि स्वरूपसवेदनकी अपेक्षा कोई १४ देवागम-आप्तमीमामा ज्ञान प्रमाणाभाम नहीं है । पर वाह्य प्रमेयकी अपेक्षा प्रमाण जोर प्रमाणा- भाम दोनो है । जिम ज्ञानका वाह्य प्रमेय ज्ञात होनेके बाद वही उपलब्ध होता है वह प्रमाण है तथा जिसका वाह्य प्रमेय जात होनेके बाद वही उपलन्ध नही होता अपितु अन्य मिलता है वह प्रमाणामाम है। इस तरह स्वन्पमवेदनकी अपेक्षा मभी ज्ञान प्रमाण है, कोई प्रमाणाभान नहीं है। किन्तु गह्य प्रमेयकी सत्यताने प्रमाण और असत्यताने प्रमाणाभान है। अन प्रमाण और प्रमाणाभाग्की व्यवस्था अन्तरगाथ (ज्ञान) और वाह्यार्थ दोनोको स्वीकार नेमे हाती है, किसी एग्मे नही । यही अने- कान्तम्प वस्तुतत्त्व है जिनगी स्याद्रादमे उक्त प्रकार व्यवस्था होती है । ther - काका ८४ के द्वारा उन (बौद्धो ) का समाधान किया गया है जो बाह्यार्य नही मानते, फेदर उसकी गान्दिन (काल्पनिक) प्रतीति स्वीकार करते हैं। उनके लिए कहा गया है कि कोई भी गन्द क्यो न हो, उनका वाच्च बाहार्थ अवश्य हाता है। उदाहरणार्थ जीवशब्दको ही लीजिए, उमका वाच्य वाह्यार्थ अवश्य है क्योकि वह एक नना है । जो सजा होती उमका वाच्य वाद्यार्थ अवश्य होता है, जैसे हेतुशब्द अपने वाच्य हेतु- रूप वाह्याय को लिए हुए है। यह भी उल्लेखनीय है कि जीवशन्दका प्रयोग शरीरमें या इन्द्रियो आदिके समूहमें नहीं होता, क्योकि ऐसी लोक- रूढि नही है । 'जीव गया, जीव मौजूद हैं' इस प्रकारका जिसमें व्यवहार होता है उमोमें यह लोकरूढि नियत है । कोई भी व्यक्ति यह व्यवहार न गरीरमें करता है, क्योंकि वह अचेतन है, न इन्द्रियों में करता है, क्योकि वे मात्र उपभागको सावन है और न शब्दादि विषयोमे करता है क्योकि वे भोग्य रूपमे व्यहृत होते है । वह तो भोक्ता आत्माने 'जीव' यह व्यव- हार करता है। अत 'जीव' शब्द जीत रूप बाह्यार्थ सहित है। माया, अविद्या, अप्रमा आदि जो भ्रान्तिस्चम सज्ञाये हैं वे भी माया, अविद्या, अप्रमा आदि अपने नावात्मक अर्थोने महित है। जैसे प्रमामा अपने प्रमारूप असे सहित है। इन सज्ञाओंको मात्र वक्ताके अभिप्रायको चि- का भी नहीं कहा जा सकता, क्योकि श्रोताओको जो उन तज्ञामो (नामो) को सुनकर उस-उस अर्थक्रिया प्रवृत्तिका नियम देखा जाता है वह अभिप्रया- प्रस्तावना १५ ने सम्भव नही है । अत सज्ञानों (गन्दो) को अभिप्रायका सूचक नही मानना चाहिए, किन्तु उन्हें मत्यार्थ ( वाहार्य ) का सूचक स्वीका- करना चाहिए। मगली ८५-८७ तक तीन कारिकाओके द्वारा ग्रन्थ कार अपने उक्त कथनका सवल समर्थन करते हुए प्रतिपादन फरते है कि प्रत्येक वस्तुवी तीन सज्ञाएँ होती है। बुद्धिमज्ञा, शब्दमज्ञा और अर्थमज्ञा । तया ये तोनों समायें बुद्धि, शब्द और अर्थ इन तीनको क्रमश वाचिका है और तोनोमे श्रोताको उनके प्रतिविम्बात्मक बुद्धि, शब्द और अर्थम्प तीन बोध होते हैं। अत 'जीव' यह शब्द य वल जीवबुद्धि या जीवशब्दमा वाचक न होकर जीवमर्थ, जीवशन्द और जीवबुद्धि इन तीनोका वाचक है । वास्तवमें उनके प्रतिविम्बात्मा तीन योघ होनेसे उन तीनो मनाओके वाच्यार्थ तीन है, यह ध्यान देनेपर स्पष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह कि प्रत्येक पदार्थ तीन प्रकारका है-वृदयात्मक, शन्दात्मक और अर्थात्मक । और तीनोंकी वाचिका तीन सज्ञान है, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है और इस तरह समस्त गजायें (शब्द) अपने अर्थ सहित है। यद्यपि विज्ञानवादोके लिए ऊपर कहा गया हेतु (गज्ञा होनेसे) असिद्ध है, क्योंकि उमके यहा वि + अलावा मजा (शब्द) नहीं है । उमके लिए ग्रन्थकार कहते है कि जब हम कुछ कहते या सुनते या जानते हैं तो हम वक्ता, श्रोता या प्रमाता कहे जाते हैं और ये तीनो भिन्न-भिन्न हैं, एक नही है । तथा इन नीनोके तीन कार्य भी अलग-अलग होते हैं। वक्ता अभिधेयका ज्ञान कर वाक्य बोलता है, श्रोता उसको श्रवण कर उसका वोध करता है और प्रमाता शब्द और अथरूप प्रमेयकी परिच्छित्ति (प्रमा) करता है। ये तीनो ही उन नीनोके विलकुल जुदे- जुदे कार्य हैं। विज्ञानवादी इन अनुभवसिद्ध पदार्थोका अपह्नव करनेका साहस कैमे कर सकता है। ऐसी दशामें वह हेतुको असिद्धादि दोपोगे युक्त नहीं कह सकता। यदि वह इन अनुभवसिद्ध पदार्थों ( अभिधेय, अभिधेयके ग्राहक वक्ता और श्रोता ) को विभ्रम कहे तो उसका विज्ञान- वाद और साधक प्रमाण भी विभ्रम कोटिमें आनेसे कैसे बच सकते है।
१६ देवागम-आप्तमीमासा और प्रमाणके विभ्रम होनेपर उसे जो इण्ट अन्तर्जेय ( ज्ञान ) है वह और जो उसे इष्ट नही है ऐसा बहिर्नेय दोनो ही, जिन्हे तादृश (प्रमाणरूप ) और इतर-अन्यादृश ( अप्रमाणरूप ) माना जाता है, विभ्रम ही सिद्ध होगे। ऐसी हालतमें सर्वथा विज्ञानवादमें हेयोपादेयका तत्त्वज्ञान कैसे हो सकता है ? यदि प्रमाणको अभ्रान्त कहें तो उसके लिए बाहार्यका स्वीकार आवश्यक है। उसके विना प्रमाण और प्रमाणाभासको व्यवस्था सम्भव नही है, क्योकि उन्ही ज्ञानो तथा शब्दोमें प्रमाणता होती है जिनका वाह्यार्थ होता है और जिनका वाह्यार्थ नही होता उन्हें प्रमाणाभास माना जाता । यथार्थमें जिस वुद्धिका ज्ञात अर्थ प्राप्त होता है उसे सत्य और जिसका जात अर्थ प्राप्त नहीं होता उसे असत्य कहा जाता है। इसी प्रकार जित शब्दका अभिहित अर्थ मिलता है वह सत्य और जिसका अभिहित अर्थ नहीं मिलता उसे असत्य माना जाता है । इस प्रकार बाह्याथके सद्भाव और असद्भावमें ही बुद्धि और शब्द प्रमाण एव प्रमाणाभास कहे जाते हैं। सर्वथा ज्ञानेकान्तमें यह प्रमाण और प्रमाणाभासकी व्यवस्था सम्भव नही है। अत उक्त प्रकारसे वाह्यार्थ अवश्य सिद्ध होता है और उसके सिद्ध हो जानेपर वक्ता नादि तीन और उनके बोधादि तीन भी सिद्ध हो जाते है । अतएव उक्त 'सज्ञात्व' हेतु असिद्धादि दोष युक्त नही है । इस प्रकार इस परिच्छेदमें ज्ञापकोपायतत्त्वमें भी सप्तभङ्गीकी योजना करके उसे स्याद्वादनयसे अनेकान्तात्मक सिद्ध किया गया है । अष्टम परिच्छेद इस परिच्छेदमें ८८-९१ तक चार कारिकायें है । ८८वीं कारिकाके द्वारा सर्वथा दैववादकी मान्यतामें दोष दिखलाते हुए कहा है कि यदि एकान्तत देवसे ही इष्टानिष्ट वस्तुओको निष्पनि स्वीकार की जाय तो उनका निष्पादक देव किसते निष्पन्न होता है, यह प्रश्न उपस्थित होता है ? उसकी निष्पत्ति पौरुषसे तो मानी नही जा सकती, क्योकि 'सब पदार्थोकी सिद्धि देवसे ही होती है इस मान्यताको समाप्ति हो जाती है ।
प्रस्तावना १७ यदि उसकी निष्पत्ति अन्य देवसे कही जाय तो मोक्ष कभी किसीको हो ही नही सकेगा, क्योंकि वह अन्य दैव पूर्व देवसे उत्पन्न होगा और वह पूर्व दैव भी और पूर्ववर्ती दैवसे होगा और इस तरह पूर्व-पूर्व देवोका जहाँ ताता बना रहेगा वहां पौरुष निष्फल सिद्ध होगा। ८९ वी कारिकाके द्वारा सर्वथा पौरुषवादको भी दोषपूर्ण बतलाते हुए कहा गया है कि यदि सर्वथा पौरुषसे ही सभी इष्टानिष्ट वस्तुओंकी निष्पत्ति हो तो पौरुप किससे उत्पन्न होता है, यह बताया जाय ? देवसे तो उसकी उत्पत्ति कही नही जा सकती, क्योकि 'पौरुषसे ही सव पदार्थों- की सिद्धि होती है। यह प्रतिज्ञा टूट जाती है । अगर अन्य पौरुषसे उसकी निष्पत्ति कही जाय तो किसी भी प्राणीका पौरुष (प्रयत्न ) निष्फल नही होना चाहिए- सभीका पौरुष सफल होना चाहिए । पर ऐसा दृष्टिगोचर नही होता । अत देवकान्तकी तरह पौरुषकान्त भी सदोष है और इसलिए वह भी ग्राह्य नही है। कारिका ९० के द्वारा उभयकान्तमें विरोध और अनुभयैकान्तमें 'अनुभय' शब्दसे भी उसका प्रतिपादन न हो सकनेका दोष पूर्ववत् वताया गया है। कारिका ९१ के द्वारा स्याद्वादसे पदार्थोंकी सिद्धि की गई है। जहां इष्टानिष्ट वस्तुओंका समागम बुद्धिव्यापारके बिना मिलता है वहां उनकी प्राप्ति देवसे है और जहां उनका गमागम वुद्धिव्यापारपूर्वक होता है वहां पौरुपकृत है। इस प्रकार इस परिच्छेदमें देवकान्त, पौरुषकान्त आदि एकान्तोंको त्रुटिपूर्ण बतलाते हुए उनमें स्याद्वादसे वस्तुसिद्धिकी व्यवस्था की गई है और यहाँ भी पूर्ववत् सप्तभङ्गीकी योजना दिखलाई है। नवम परिच्छेद इम परिच्छेदमें पिछले परिच्छेदमें वर्णित देवकारकोपायतत्त्वके पुण्य और पाप ये दो भेद करके उनकी स्थितिपर विचार किया गया है। पुण्य २ १८८ देवागम-आप्तमीमासा किन कारणोसे होता है और पाप किन बातोसे, यही इस परिच्छेदका विषय है, क्योकि पुण्य और पापके सम्बन्धमें भी ऐकान्तिक मान्यताएँ हैं । इसमें चार कारिकाएँ हैं। ९२ वी कारिकाके द्वारा उस मान्यताको समीक्षा की है जिसमें दूसरेमें दु ख उत्पन्न करनेसे पाप वन्ध और सुख उत्पन्न करनेसे पुण्य वन्ध स्वीकृत है। पर यह मान्यता युक्त नहीं है, क्योकि ऐसा माननेपर दूध आदि दूसरेमें सुख तथा कण्टकादि दु ख उत्पन्न करनेके कारण उनके भी पुण्यवन्ध और पापवन्ध मानना पडेगा। यदि कहा जाय कि चेतन ही वन्धयोग्य है, अचेतन दुग्धादि एव कण्टकादि नही, तो वीतराग ( कषाय रहित ) भी पुण्य और पापसे बंधेगे, क्योकि वे अपने भक्तोमें सुख और अभक्तोमें दु ख उत्पन्न करनेमें निमित्त पडते है। यदि कहा जाय कि उनका उन्हे सुख-दु ख उत्पन्न करनेका अभिप्राय न होनेसे उन्हें पुण्य-पापबन्ध नही होता तो 'परमें सुख उत्पन्न करनेसे पुण्य और दु ख उत्पन्न करनेसे पाप बन्ध होता है' यह एकान्त मान्यता नही रहती। ९३वी कारिकाके द्वारा उन वादियोकी भी मीमासा की है जो कहते है कि अपनेमें दु ख उत्पन्न करनेसे तो पुण्य और सुख उत्पन्न करनेसे पापका वन्ध होता है। कहा गया है कि ऐसा सिद्धान्त माननेपर वीतराग मुनि और विद्वान् मुनि भी क्रमश कायक्लेशादि दु ख तथा तत्त्वज्ञानादि सुख अपनेमें उत्पन्न करनेके कारण पुण्य-पापसे बंधेगे। फलत वे कभी भी ससार-बन्धनसे छुटकारा न पा सकेंगे। अत यह एकान्त भी सगत प्रतीत नही होता। ९४ के द्वारा उभयकान्तमें विरोध और अनुभयकान्तमें 'अनुभय' शब्दसे भी उसका निर्वचन न हो सकनेका दोष पूर्ववत् प्रदर्शित किया गया है। कारिका ९५ के द्वारा स्याद्वादसे पुण्य और पापकी व्यवस्था की गई है। युक्तिपूर्वक कहा गया है कि सुख-दुख, चाहे अपनेमें उत्पन्न किये जायें और चाहे परमें । यदि वे विशुद्धि ( शुभ परिणामो) अथवा सक्लेश ( अशुभ परिणामो ) से पैदा होते है या उन परिणामोंके जनक हैं तो प्रस्तावना १९ क्रमश उनसे पुण्यास्रव और पापास्रव होता है। यदि ऐसा नही है तो जो दोष ऊपर दिया गया है उसका होना दुनिवार है। यथार्थमें पुण्य और पाप अपनेको या परको सुख-दुख पहुंचाने मात्रसे नही होते हैं, अपितु अपने शुभाशुभ परिणामोंपर उनका होना निर्भर है। जो सुख-दुख शुभ परिणामोंसे जन्य हैं या उनके जनक हैं उनसे तो पुण्यका आस्रव होता है और जो अशुभपरिणामोसे जन्य या उनके जनक हैं वे नियमसे पापास्रवके और कारण या कार्य हैं । यह वस्तुव्यवस्था है। इस प्रकार स्याद्वादमें ही पुण्य पापकी व्यवस्था बनती है, एकान्तवादमें नही । दशम परिच्छेद इस अन्तिम परिच्छेदमें ९६-११४ तक बीस कारिकायें हैं । कारिका ९६ के द्वारा माख्यदर्शनके उस सिद्धान्तकी समीक्षा की गई है जिसमें कहा गया है कि 'अज्ञानसे बन्ध होता है और ज्ञानसे मोक्ष' । परन्तु यह सिद्धान्त युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञेय अनन्त है और इसलिए किसी-न-किसी ज्ञेयका अज्ञान वना रहेगा । ऐसी स्थितिमें कभी भी कोई पुरुष केवली नही हो सकता। इसी प्रकार अल्पज्ञान (प्रकृति-पुरुषका विवेक मात्र ) से मोक्ष मानना भी युक्त नहीं है, क्योकि अल्पज्ञानके साथ बहुत-सा अज्ञान भी रहेगा । ऐसी दशामें वन्ध ही होगा, मोक्ष कभी न हो सकेगा। इस प्रकार विचार करनेपर ये दोनो ही एकान्त दोषपूर्ण है और इसलिए वे ग्राह्य नही है। ९७ के द्वारा उभयकान्तमें विरोध और आवाच्यतैकान्तमें 'अवाच्य' शब्दके द्वारा भी उसका निर्देश न हो सकनेका दोष दिया गया है। ९८ के द्वारा स्याद्वादमे वन्ध और मोक्षको व्यवस्था बतलाते हुए कहा है कि मोहसहित अज्ञानसे बन्ध होता है, मोहरहित अज्ञानसे नही । इसी तरह मोहरहित अल्पज्ञानसे मोक्ष सम्भव है और मोहसहित अल्पज्ञान- से नही । अत बन्धका कारण केवल अज्ञान नहीं है और न मोक्षका कारण केवल अल्पज्ञान है । यथार्थमें मोहके सद्भावमें बन्ध और मोहके अभावमें मोक्ष अन्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध होते है । अज्ञानका बन्धके साथ और ज्ञानका २० देवागम-आप्तमीमासा मोलके साथ अन्वयव्यभिचार तथा व्यतिरेकव्यभिचार होनेसे उनका उनके साथ न अन्वय हैं और न व्यरिरेक । और जव उनका उनके साथ अन्वय- व्यतिरेक नही है तो उनमें कार्यकारणभाव भी नही बन सकता। अत मोहसहित अज्ञानसे बन्ध और मोहरहित थोडेसे भी ज्ञानसे मोक्षकी व्यवस्था मानी जानी चाहिए। कारिका ९९ में उनकी समीक्षा अन्तनिहित है जो प्राणियोकी अनेक प्रकारको इच्छादि सृष्टिको ईश्वरकृत मानते है-~-उसे उनके शुभाशुभ- कर्मजन्य स्वीकार नहीं करते । ग्रन्थकार कहते है कि प्राणियोको इच्छादि विचित्र सृष्टि उनके स्वकर्मानुसार होती है, ईश्वर उसका कर्ता नही है । और उनका वह कर्म उनके शुभाशुभ परिणामोसे अर्जित होता है, क्योकि समस्त ससारी जीव शुद्धि (शुभ परिणाम) और अशुद्धि (अशुभ परिणाम) की अपेक्षासे दो भागोमें विभक्त हैं। उल्लिखित शुद्धि और अशुद्धि ये दोनो जीवोकी एक प्रकारकी शक्तियाँ है जो उनमें पाक्य और अपाक्य शक्तियोकी तरह नैसर्गिक होती हैं, यह कारिका १०० में प्रतिपादन है। कारिका १०१ में जैन प्रमाणका स्वरूप और उसके अक्रमभावि तथा क्रमभावि ये दो भेद निर्दिष्ट हैं। कारिका १०२ में प्रमाणफलका निर्देश करते हुए उसे दो प्रकारका बतलाया है-एक साक्षात्फल और दूसरा परम्पराफल । अक्रमभावि (केवल) प्रमाणका साक्षात्फल अज्ञाननिवृत्ति और परम्पराफल उपेक्षा (वस्तुओमें रागद्वेषका अभाव) है । क्रममावि प्रमाणका भी साक्षात्फल अज्ञाननाश है और परम्पराफल हानबुद्धि, उपादानबुद्धि तथा उपेक्षा- बुद्धि है। कारिका १०३ में सूचित किया है कि वक्ताके प्रत्येक वाक्यमें उसके आशयका बोधक 'स्यात्' निपातपद प्रकट या अप्रकट रूपमें अवश्य विद्यमान रहता है जो एक धर्म (बोध्य) का बोधक (वाचक) होता हुआ अन्य अनेक धर्मों (अनेकान्त) का द्योतक होता है । यह बात सामान्य वक्ताके प्रस्तावना २१ ~ वाक्योंके विषयमें ही नहीं है, केवलियोंके भी वाक्योंमें 'स्यात्' निपातपद निहित रहता है और वह एक ( विवक्षित ) धर्मका प्ररूपक होता हुआ अन्य सभी ( अविवक्षित ) धर्मोंका अस्तित्वप्रकाशक होता है । कारिका १०४ में उसी 'स्यात्' के वाद (मान्यता) अर्थात् स्याद्वाद को स्पष्ट किया गया है। कहा गया है कि किश्चित्, कयश्चित् शब्दोसे जिसका विधान होता है और जिसमें एकान्तको गन्ध नहीं है तथा जो सप्तभङ्गीनयसे विवक्षित ( उपादेय ) का विधायक एव अविवक्षितो (हेयो -शेष धर्मों) का निपेधक ( सन्मात्रसूचक ) है वह स्याद्वाद है । कथश्चि- द्वाद, किञ्चिद्वाद इसीके पर्याय हैं। कारिका १०५ में स्याद्वादका महत्त्व घोषित करते हुए कहा गया कि तत्त्वप्रकाशनमें स्याद्वादका वही महत्त्व है जो केवलज्ञानका है। दोनो ही समस्त तत्त्वोके प्रकाशक हैं। उनमें यदि अन्तर है तो इतना ही कि केवलजान साक्षात् समस्त तत्त्वोंका प्रकाशक है और स्यावाद असाक्षात् (परोक्ष ) उनका प्रकाशक है । कारिका १०६ में प्रतिपादन है कि उल्लिखित तत्त्वप्रकाशन स्यावाद (श्रुत-अहेतुवाद-आगम ) के अतिरिक्त नयसे भी होता है और नयसे वहाँ हेतु विवक्षित है। जो स्याद्वादके द्वारा जाने गये अर्थके विशेष (धर्म ) का गमक है तथा मपक्षके साधर्म्य एव विपक्षके वैधर्म्य (अन्यथा- नुपपन्नत्व) को लिए हुए है अर्थात् साध्यका अविनाभावी होता हुआ साध्य- का साधक है वह हेतु है । व्याख्याकारोंने इस कारिकामें ग्रन्थकार द्वारा नयलक्षणके भी कहे जानेका व्याख्यान किया है । उनके व्याख्यानके अनुसार नय तत्त्वज्ञानका वह महत्त्वपूर्ण उपाय है जो स्याद्वादद्वारा प्रमित अनेकान्त- के एक-एक धर्मका वोध कराता है। समग्रका गाहक ज्ञान तो प्रमाण है और असमनका ग्राहक नय है । यही इन दोनोंमें भेद है। कारिका १०७ में जैन सम्मत वस्तु (प्रमेय) का भी स्वरूप निरूपित है। ऊपर नयका निर्देश किया जा चुका है । उसके तथा उसके भेदो- उपभेदो ( उपनयो ) के विषयभूत त्रिकालवर्ती धर्मो (गुण-पर्यायों) के समुच्चय ( समष्टि ) का नाम द्रव्य ( वस्तु-प्रमेय ) है । यह ममुच्चय २२ देवागम-आप्तमीमासा सयोगादि सम्वन्धरूप न होकर कथञ्चित् अविभ्राड्भावसम्बन्ध (तादात्म्य) रूप है। वस्तुका कोई भी धर्म उसके शेष धर्मो से न सर्वथा भिन्न है और न सर्वथा अभिन्न । सभी धर्म परस्पर मैत्रीभावके साथ वस्तुमें वर्तमान है और वे सभी वस्तुको आत्मा ( स्वरूप ) हैं। इस प्रकारके सह अस्तित्वात्मक सम्बन्धको अविष्वग्भावसम्वन्ध कहते हैं । वस्तु सत्सामान्य- की अपेक्षासे एक होती हुई भी धर्म-धर्मीके भेदसे अनेकरूप भी है । अथवा यो कहे कि वह न सर्वथा एक है और न सर्वथा अनेक है, अपितु एकाने- कात्मक जात्यन्तररूप है। कारिका १०८ में उस शङ्काका समाधान प्रस्तुत है जिसमें कहा गया है कि जैनदर्शनमें एकान्तोंके समूहका नाम अनेकान्त है और एकान्तको मिथ्या (असत्य) माना गया है । अत उनका समूह (अनेकान्त) भी मिथ्या कहा जायेगा। अनेक असत्य मिलकर एक सत्य नही बन सकता। इस लिए उक्त एकान्तसमुच्चयरूप अनेकान्तको जो ऊपर वस्तु कहा गया है वह सम्यक् नही है ? इस शड्काका समाधान करते हुए ग्रन्थकार कहते है कि निरपेक्ष एकान्तोके समूहको यदि मिथ्या कहा जाता है तो वह हमें इष्ट है, क्योकि स्याद्वादियोके यहां वस्तुमें निरपेक्ष एकान्तता नही है । स्याद्वादी सापेक्ष एकान्तको स्वीकार करते तथा उनके ही समूहको अनेकान्त मानते है, निरपेक्ष एकान्तोके समूहको नही। उन्होने स्पष्टतया निरपेक्ष नयो ( एकान्तो ) को मिथ्या ( असत्य ) और सापेक्षोको वस्तु ( सम्यक् -सत्य ) कहा है, क्योकि वे ही अर्थक्रियाकारी है। कारिका १०९ में वाचकके स्वरूपकी भी स्याद्वाददृष्टिसे व्यवस्था की गई है। जो विधिवाक्यको केवल विधिका और निषेधवाक्यको केवल निषेधका नियामक मानते है उनकी समीक्षा करते हुए कहा गया है कि चाहे विधिवाक्य हो, चाहे निषेधवाक्य, दोनो ही विधि और निषेधरूप अनेकान्तात्मक वस्तुका बोध कराते हैं। जब विधिवाक्य बोला जाता है तो उसके द्वारा अपने विवक्षित विधि धर्मका प्रतिपादन होनेके साथ प्रतिषेध धर्मका भी मौन अस्तित्व स्वीकार किया जाता है उसका निराकरण या लोप करके वह मात्र विधिका ही बोध नही कराता। इसी प्रस्तावना २ प्रकार प्रतिषेधवाक्य भी अपने विवक्षित प्रतिषेध धर्मका कथन करनेके साथ अविनाभावी विधि धर्मका भी मौन जापन करता है उसका निराम या उपेक्षा करके केवल निषेधको ही सूचित नहीं करता। इसका कारण यह है कि प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मा है-तद् और अतद् इन विरोधो धर्मोको अपने में समाये हुए है। अत कोई भी वाक्य उसके इस स्वरूपका लोप करके मनमानी नहीं कर सकता। हां, वह अपने विवक्षित वाच्यका मुख्यतया और शेषका गौणरूपसे अवगम कराता है। इसी तथ्यको प्रस्तुत करनेके लिए स्याद्वाददर्शनमें वक्ता द्वारा बोले गये प्रत्येक वाक्यमें 'स्यात् निपात-पद कही प्रकट और कही अप्रकट रूप- से अवश्य रहता है। यदि विधिवाक्य या निषेधवाक्य केवल विधि या केवल निषेधके ही नियामक हो तो अन्य विरोधी धर्मका लोप होनेसे उसका अविनाभावी अभिधेय धर्मका भी अभाव हो जायेगा और तब वस्तुमें कोई भी धर्म (विशेषण) न रहने पर वह अविशेष्य (शून्य) हो जायगी। ११०-११३ तक चार कारिकाओंके द्वारा वाच्यके स्वरूपमें अङ्गीकृत एकान्तवादियोके अभिनिवेशोकी समीक्षा करते हुए स्याद्वादसे वाच्यके भी स्वरूपको स्थापना की है । ग्रन्थकार कहते हैं कि प्रत्येक वचन (वाक्य) तद् और अतद् रूप वस्तुको कहता है, यह हम ऊपर देख चुके हैं, तो 'तद्प ही वस्तु है' ऐसा कथन करने वाला वचन सत्य नहीं है और जव वह सत्य नही तव असत्य वाक्योके द्वारा तत्त्वार्थ ( यथार्थ वस्तु) का उपदेश कैसे हो सकता है ? विधिवादियोको इसपर गम्भीरतासे विचार करना चाहिए। 'अन्य नहीं' इतना ही प्रत्येक वचन सूचन करते हैं, यह एकान्त मान्यता भी युक्त नहीं है, क्योकि वाणीका स्वभाव है कि वह अन्य वचन द्वारा प्रतिपाद्य अर्थका निषेध करती हुई अपने अर्थ सामान्यका भी प्रतिपादन करती है। जो वाणी ऐसी नही है वह खपुष्पके समान मिथ्या है।
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-- प्रस्तावना २५ - के परहितसम्पादनप्रवण हृदयका और उनको दर्शनविगुति, प्रचनवात्मल्य तथा मार्गप्रभावना जैमी उच्च भावनाओका परिचय मिलता है। (ग) देवागमकी व्याल्याएं ऊपर देवागम और उसके प्रतिपाद्य विषयका कुछ परिनय दिया गया है। अब उसकी व्यास्यामोका भी परिचय देनेका प्रयान दिया जाता है। देवागमपर तीन व्याख्याएं उपलब्ध है'-१ देवागम-विवृति (अप्ट- राती-भाष्य), २ देवागमालद्वार (आप्तमीमामालझार-अप्टमहनी) मोर ३ देवागमवृत्ति । १ देवागम-विवृत्ति इसके रचयिता आ० अकलङ्गदेव है। यह देवागमकी उपलब्ध व्याख्याओमें सबसे प्राचीन और अन्यन्त दुरुह व्याप्या है। परिच्छेदोके अन्तम जो समाप्ति-पुष्पिकावाक्य पाये जाते हैं उनमें उसका भाप्तमीमासा- १ आ० विद्यानन्दने अप्टमहसीके अन्तमें आ० अकलादेवकै नमाप्ति- मङ्गलसे पूर्व 'केचित्' शब्दोके माथ देवागमयो किमी व्याख्याकारका 'जयति जगति' आदि समाप्ति-मगल पद्य दिया है। उमने प्रतीत होता है कि अकलवदेवसे पूर्व भी देवागमपर किमी आचार्यको व्याख्या रही है, जो विद्यानन्दको प्राप्त थी या उमकी उन्हें जानकारी थी और उनपरसे ही उन्होंने उल्लिखित समाप्ति-मङ्गलपद्य दिया है। लघुममन्तमद्र (वि० स० १३वीं शती) ने वादीसिंहद्वारा देवागम (माप्तमीमामा) के उपलालन-व्याख्यान करनेका उल्लेख भष्टसहनी-टिप्पण ( १०१) में किया है। पर वह भी आज अनुपलब्ध है । देवागमके महत्त्व और विश्रुतिको देखते हुए आश्चर्य नही कि उसपर विभिन्न कालोमें विविध टीका-टिप्पणादि लिखे गये हो। अकलङ्कदेवने अण्टशती ( का० ३३ की विवृति ) में एक स्थानपर 'पाठान्तरमिद बहु स गृहीत भवति' शब्दोका प्रयोग करके देवागमके पाठभेदो और उसकी अनेक व्याख्याओकी ओर स्पष्ट सकेत किया है।
२० देवागम-आप्तमीमामा भाष्य (देवागम-नाप्य) के नामने उल्लेख हुआ है। आ० विद्यानन्दने अष्टहनीने तृतीय परिच्छेदके आरम्नमें जो अन्य-प्रगतामें पद्य दिया है उनमें उन्होंने इनका 'अष्टाती' नान भी निदिष्ट किया है। सम्भवत आन्नो श्लोप्रमाण रचना होनेने इसे उन्होंने 'अष्टगतो' कहा है। लाता है कि उन अष्टगतीको ध्यानमें रखकर ही अपनी दिवागमालकृति' व्याख्याको उन्होने आठ हजार ग्लोन्प्रमित बनाया और 'नष्टलहनी' नान ग्वा । जो हो, इन तरह यह अकलदेवकी व्यात्या देवागम-विवृति, आप्तनीनाना-नाप्य ( देवागम-भाज्य ) और अप्टगती इन तीनो नामोंने जन वाइमयमें विश्रृत है । इनका प्राय प्रत्येक स्थल इवना जटिल एव दुरवाह है कि माघाण विद्वानोंका उसमें प्रवेश सम्भव नहीं है । उनके गर्न एव रहन्चको अष्टमहीने नहारे ही जात किया जा सकता है । नातीय दन-नाहित्यमें इनको जोडनी रचना मिलना दुर्लभ है । अष्ट- हनीके मध्ययनमें जिन प्रकार कष्टनहरीका अनुभव होता है उसी प्रकार इन अप्ठगतीके अन्यानमें भी कष्टशतीका अनुभव उनके अन्यासीको पद- पदपर होता है। २ देवागमालकृति यह ना० विद्यानन्दकी अपूर्व एन महत्त्वपूर्ण रचना है। इने आप्न- नीमामालकृति, साप्तमीमानालद्वार और देवागमालबार इन नामोते नी नाहित्यमें उल्लिखित किया गया है । आ० हजार श्लोक प्रमाण होनेने इने लेखकने न्वय 'मटनहलो' भी कहा है। देवागमकी जितनी व्याल्याएं उपलब्ध है उनमें यह विस्तृत और प्रमेयबहुल व्याख्या है। इनमें देवा- १ 'इत्याप्तमीमानाभाष्ये दाम परिच्छेद ॥ ॥' २ अष्टगती प्रथितार्था नाष्टमहनी कृतापि तक्षेपात् । विलसदकलङ्कषिषण प्रपञ्चनिचितावबोद्धव्या ।। -अष्टस पृ १७८। ३ श्रोतव्याष्टसहत्री श्रुतं किमन्य सहनसल्यान । विनायेत ययव स्वसमय-परसमयसद्भावः ।। अष्टस० पृ० १५७ ।
प्रस्तावना २७ गमको कारिकामो और उनके प्रत्येक पद-वाक्यादिका विस्तारपूर्वक अर्थोद्- घाटन किया है। साथ ही उपर्युक्त अष्टशतीके प्रत्येक पदवाफ्यादिका भी विशद अर्थ एव मर्म प्रस्तुत किया है । अष्टशातीको अष्टसहनीमें इस तरह नात्ममात् कर लिया गया है कि यदि दोनोको भेद-सूचक पृथक्-पृथक टाइपोमें न रखा जाय तो पाठकको यह जानना कठिन है कि यह अष्टशती- का अग है और यह अप्टसहस्रीका । विद्यानन्दने अष्टशतीफे मागे, पीछे और मध्यको आवश्यक एव अर्थोपयोगी मान्दभिक वाक्यरचना करके अप्टगतीको अष्टसहनीमें मणि-प्रवाल न्यायमे मनुस्यूत किया है और अपनी तलस्पशिनी अद्भुत प्रतिभाका चमत्कार दिखाया है । वस्तुत यदि विद्या- नन्द यह देवागमालकृति न रचते तो अष्टशतीका गूढ रहस्य अष्टपतीमें ही छिपा रहता और मेधावियोंके लिए वह रहस्यपूर्ण बनी रहती। देवागम मौर महशतीके व्याख्यानाके अतिरिक्त इसमें विद्यानन्दने कितना ही नया विचारपूर्ण प्रमेय और अपूर्व चर्चाएं भी प्रस्तुत की हैं। व्याख्याकारने अपनी इस व्याख्याके महत्त्वको उद्घोषणा करते हुए लिया है- 'हजार शास्त्रोका पढना-सुनना एक तरफ है और एफमान इस कृतिका अध्ययन एक मोर है, क्योंकि इस एफके अभ्याससे ही स्वसमय और परसमय दोनोंका ज्ञान हो जाता है।' व्याख्याकारको यह घोपणा न मदौरित है और न अतिशयोक्ति । अष्टसहस्री स्वय इसकी निर्णायिका है । देवागममें यत दश परिच्छेद है अत' उसके व्याख्यानस्वरूप अष्टसहस्रीमें भी दग परिच्छेद है । प्रत्येक परिच्छेदका मारम्भ और समाप्ति दोनो एक- एक गम्भीर पद्य द्वारा किये गये है। इमपर लघुसमन्तभद्र (१३वी शती) ने 'अष्टसहस्री-विषमपदतात्पर्यटीका' और श्वेताम्बर विद्वान् यशोविजय (१७वी गती) ने 'अष्टसहस्रोतात्पर्यविवरण' नामकी व्याख्याएँ लिखी हैं, जो अप्टसहस्रोके विषमपदो, वाक्यो और स्थलोका स्पष्टीकरण करती है। यह देवागमालकृति कोई ५२ वर्ष पूर्व सन् १९१५ में सेठ नाथारङ्गजी गाधी द्वारा एक वार प्रकाशित हो चुकी है। पर वह अव अप्राप्य है । अव आधुनिक सम्पादनके साथ इसका दूसरा शुद्ध सस्करण प्रकट होना चहिये।
२८ देवागम-आप्तमीमामा . ३ देवागम-वृत्ति—यह देवागमकी लघुपरिमाणको व्यान्या है । यह न अष्टशतोकी तरह दुरूह है और न अष्टमहत्रोके नमान विस्तृत एव गम्भीर है। कारिकाओका व्याल्यान भी लम्बा नहीं है और न दार्शनिक विस्तृत जहापोह है। माय कारिकाओं और उनके पद-वाक्योका गन्नार्य और कही-कही फलितार्य अतिमक्षेपमें प्रस्तुत किया गया है पहां, कारिकाओका ये समझनेके लिये यह वृत्ति पर्याप्त उपयोगी है। इसके ग्चयिता बा० वमुनन्दि है, जिन्होंने वृत्तिके बन्तमें स्वयं लिखा है कि 'मैं मन्दबुद्धि और विम्मरणगील व्यक्ति हूँ। मैंने अपने उपकाके लिए ही इन देवागमका मक्षिप्त विवरण किया है।' वृत्तिकारके इन स्पष्ट आत्म- निवेदनमे इन वृत्तिकी लगुरूपता और उनका प्रयोजन अवगत हो जाता है। उल्लेखनीय है कि वनुनन्दिके नमन देवागमको ११४ कारि- काओपर ही अप्टगती और अष्टमहत्री उपलब्ध होते हुए तथा 'जयति जगति' आदि कारिकाको विद्यानन्दके उल्लेवानुमार किमी पूर्ववर्ती आचार्यकी देवागम-च्यात्याका समाप्ति-मङ्गल-पद्य जानते भी उन्होंने उसे देवागमको ११५वी कारिका दिन आधारप, माना और उसका विवरण किया? यह चिन्तनीय है। हमारा विचार है कि प्राचीन काल्में साधुओमें देवागमका पाठ करने और उने कण्ठस्य रखनेको परम्परा रही है। वसुनन्दिने देवागमको ऐमी प्रतिपरने कण्ठम्य किया होगा, जिनमें मूलमात्र देवागमको ११४ कारिकाओंके साय उक्त अज्ञान देवागम- व्याया- का नमाप्तिमङ्गल-पद्य भी अङ्कित कर दिया गया होगा और उसपर ११५ का अङ्क डाल दिया होगा । वसुनन्दिने अष्टशती और अष्टमहतो टीकाओपरने जानकारी एव अनुसन्धान किये बिना देवागनका अर्थ हृदयङ्गम रखनेके लिये यह देवागम-वृत्ति लिखी होगी नौर उसमें कण्ठस्थ सभी (११५) कारिकाओका विवरण लिन्वा होगा। यही कारण १ 'श्रीमत्समन्तभद्राचार्यस्य देवागमात्या कृते सोपभूत विवरण कृत श्रुतविस्मरणशीलेन वसुनन्दिना जडमतिनात्मोपकाराय ।' -वसुनन्दि, देवागमवृत्ति पृ० ५०, सनातन, जैन ग्रन्थमा० प्रस्तावना २९ है कि प्रस्तुत वृत्तिमें न कही अष्टशतीके पदवाक्यादिका निर्देश मिलता है और न कही अष्टसहस्रीके । अस्तु । यह देवागमवृत्ति कलकत्ताकी सनातन जैन ग्रन्थमाला द्वारा सन् १९१४ में एक बार प्रकाशित हो चुकी है । यह अब अच्छे सस्करणके रूपमें पुन मुद्रित होना चाहिए । (घ ) देवागम-रचनाका मूलाधार ऊपर देवागम और उसकी व्याख्याओंका परिचय देनेके बाद उसकी रचनाके मूलाधारपर भी यहां विचार किया जाता है आ विद्यानन्दका जैन वाड्मयमें सम्मानपूर्ण स्थान है और उनकी कृतियोंको आप्त-वचन जैसा माना जाता है। इन विद्यानन्दके उल्लेखा- नुमार स्वामी समन्तभद्रने देवागमकी रचना तत्त्वार्थसूत्रके आरम्भमें स्तुत आप्तकी मीमासाके लिये की थी। उनके वे उल्लेख निम्न प्रकार हैं (१) 'शास्त्रावताररचितस्तुतिगोचराप्तमीमांसित कृति अष्टस आदिमङ्गलश्लो १, पृ. १ । (२) 'शास्त्रारम्भेऽभिष्टुतस्याप्तस्य मोक्षमार्गप्रणेतृतया कर्मभूभृद्भ- तृतया विश्वतत्त्वाना ज्ञातृतया च भगवदहत्सर्वज्ञस्यैवान्ययोग- व्यवच्छेदेन व्यवस्थापनपरा परीक्षेय विहिता।' अष्टस पृ० २९४ । (३) श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्राद्भुतसलिलनिधेरिद्धरलोद्भवस्य, प्रोत्थानारम्भकाले सकलमलभिदे शास्त्रकार कृत यत् स्तोत्र तीर्थोपमान प्रथित-पृथु-पथ स्वामि-मीमांसित तत् विद्यानन्द स्वशक्त्या ॥ आप्तप० का १२३, पृ० २६५ । (४) ' "इति सक्षेपत शास्त्रादौ परमेष्ठिगुणस्तोत्रस्य मुनिपुङ्गवै- विधीयमानस्यान्वय सम्प्रदायाव्यवच्छेदलक्षण पदार्थघटना- लक्षणो वा लक्षणीय , प्रपञ्चतस्तदन्वयस्याक्षेपसमाधान- श्रीमत्समन्तभद्रस्वामिभिर्देवागमाख्याप्तमीमांसायां प्रकाशनात् ।' -आप्तप० का० १२०, पृ० २६१-२६२ । लक्षणस्य ३० देवागम-आप्तमीमासा इन उल्लेखोमे स्पष्ट है कि तत्त्वार्यशास्त्र ( तत्त्वार्थ, तत्त्वार्थसूत्र, नि श्रेयशास्त्र या मोक्षशास्त्र ) के आरम्भमें जिन 'मोक्षमार्गस्य नेतारम्' आदि तीन अमाधारण विशेषणोमे आप्तकी वन्दना शास्त्रकार आ० उमाम्वामीने की है उन्ही विशेषणोकी मीमामा ( सोपपत्ति विचारणा) स्वामी ममन्तभद्रने आप्तमीमामा की है । तात्पर्य यह कि तत्त्वार्थमूत्रका 'मोक्षमार्गम्य नेतारम्' आदि मङ्गलस्तोत्र अप्तमीमामाकी रचनाका मूलाधार है। विद्यानन्दके उक्त उल्लेखोंमें आये हुए 'शास्त्रावतार- रचितस्तुतिगोचराप्तमीमासित', 'शास्त्रकार कृत यत् स्तोत्र स्वामि- मीमासित तत्', शास्त्रादौ परमेष्ठिगुणस्तोत्रस्य मुनिपुङ्गवैविधीयमानस्य तदन्वयस्पाक्षेप-समाधानलक्षणस्य श्रीमत्समन्तभद्रस्वामिभिर्देवा- गमाख्याप्तमीमामाया प्रकाशनात्' जैसे स्पष्ट और अर्थगर्भ गन्द विगेप ध्यान देने योग्य हैं जो आप्तमीमासाको तत्त्वार्थसूत्रके मङ्गलस्तोत्रका व्याख्यान अमन्दिग्ध घोपित कर रहे हैं। विद्यानन्दने अपने इस कथनको माधार और परम्परागत वतलानेके लिए उसे अकलङ्कदेवके अष्टशतीगत उम प्रतिपादनसे भी प्रमाणित किया है जिसमें अकलङ्कदेवने आप्तकी मीमासा (परीक्षा) करनेके कारण समन्तभद्रपर किये जाने वाले अश्रद्धालुता और अगुणज्ञताके आक्षेपोका उत्तर देते हुए कहा है कि अन्यकारने देवागमादि मङ्गलपूर्वक की गई 'मोक्षमार्गस्य नेतारम्' आदि स्तवके विषयभूत परमात्माके गुणविशेषोकी परीक्षाको स्वीकार किया है, इमसे उनमें श्रद्धा और गुणज्ञता दोनो वातें स्वय आपन्न हो जाती है, क्योकि उनमें एककी भी कमी रहने पर परीक्षा सम्भव नही है। निश्चय ही ग्रन्थकारने शास्त्रन्याय ( तत्त्वार्थशास्त्रकी पद्धतिमङ्गल- विधानपूर्वक शास्त्रकरण ) का अनुसरण करके ही आप्तमीमासाकी रचना- का उपक्रम किया है और इसमे महज ही जाना जा सकता है कि ग्रन्य- कारमें श्रद्धा और गुणज्ञता दोनो है। अकलङ्कका वह प्रतिपादन इस प्रकार है 'देवागमत्यादिमगलपुरस्सरस्तवविषयपरमात्मगुणातिशयपरीक्षामुपक्षि- पतव स्वय श्रद्धागुणज्ञतालक्षण प्रयोजनमाक्षिप्त लक्ष्यते । तदन्यतरापायेऽर्थ- प्रस्तावना ३१ स्यानुपपत्ते । गास्वन्यायानुसारितया तधयोपन्यामात् ।' अप्टग० अष्टग० पृ० २। विद्यानन्दने मफलरदेवके इस प्रतिपादन और अपने उपत गायनका इनी अप्टसहली (पृ० ३) में समन्यय भी किया है और इस तरह अपने निरूपणको उन्होंने परम्परागत सिद्ध करके नममें प्रामाण्य म्यापित किया है। (ड) 'मोक्षमार्गस्य नेतारम्' स्तोत्र तत्त्वार्थसूत्रका मङ्गलाचरण जहाँ विद्यानन्द और अमालदेवके उपर्युनत उल्लेखोसे मिद्ध है कि म्यामी समन्तभद्रको मानमोगाना 'मोसमर्गस्य नेतारम्' आदि स्तोत्रको व्याख्यानमें लिपी गई है यहां विद्यानन्दो ही उपत उल्लेगोपग्गे यह भी स्पष्ट है कि वे उक्त स्तोगको तत्त्वाप भयया तत्त्वार्यशाला मगला- चरण मानते हैं। तथा तत्त्वाचं अयवा तन्यापास्त्रगे उन्हें आचार्य गृदपिन्टरचित दशाध्यायी तत्त्वार्थसूत्र ही विवक्षित है ।' म सम्बन्ध पर्याप्त व्हापोह एवं विस्तारपूर्वक विचार अन्यत्र किया जा चुका है। परन्तु कुछ विद्वान विद्यानन्दके उपत उल्लेगोका साभिप्राय अर्थविपर्यास करके उमे मधिमिद्धिकार पूज्यपाद-देयनन्दिगी रचना पतलाते हैं। १ (क) कय पुनम्तत्यार्य शास्त्र येन तदारम्भे परमेष्ठिनामाध्यान विधीयत इति चेत् तल्लक्षणयोगत्वात् । ' तच्च तत्त्वार्यस्प वशा- ध्यापोस्पस्यास्तौति शास्य तत्त्वार्थ ।' -~-त० श्लो० पृ० २। (ख) 'इति तत्त्वार्थशास्त्रादौ मुनीन्द्रस्तोत्रगोचरा।'-आप्त० १२४ । (ग) दगाध्याये परिच्छिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति । फल स्यादुपवामम्य भापित मुनिपुङ्गवै ॥ २ 'तत्त्वार्थसूत्रका मङ्गलाचरण' शीर्षक लेखकके दो लेख, अनेकान्त वर्ष ५, किरण ६-७, १०-११ । ३ 'मोक्षमार्गम्य नेतारम्, के कर्ता पूज्यपाद देवनन्दि', शीर्पक लेख, मुनि हजारीमल स्मृतिग्रन्य पृ० ५६३ ।
देवागन-आप्तमीमांज्ञा उनका प्रयान है कि प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता पं० जुगलकिशोरजी नुन्तार वाग बोगपूर्ण अनेकविध प्रमाणाने निर्णीत वानी सनन्तभद्रके विन्न ० दून-तीनरो गतान्दो ननयको वि० सं० सातवी-आठवीं शताब्दी मित किग जाय। व्हां उनकी न्धापनाओंको देकर उनपर सूक्ष्म और गहराईने विकार किया जाता है. (१) आप्नपरोनागत प्रयोगोंने सिद्ध है कि 'मूत्रकार' शन्द केवल आ. उनाबानोले लिए ही प्रयन्त नहीं होता था, दूसरे आत्राति लिए भी उनका प्रयोग किया जाता था। (२) तत्वार्थलोकवाकिगत तत्त्वार्यसूत्रके प्रथम सूत्रकी अनुपपत्ति- उपन्यापन और उनके परिहारको चान स्पष्ट फलित होता है कि विद्यानन्द्र के सामने तत्वार्थमूत्रने प्रारम्नमें 'नोक्षमार्गच नेतारन्' ग्लोक न्हों था। (e) अप्टननी तथा आप्तपरीक्षाके कुछ विशेष उल्लेखोत सिद्ध होता है कि इनी उलोको विषयभूत माप्तको नोनाता नन्तनद्रने अपनी माप्तनीनानाने की। समीनाः इन तीनों स्थापनालोको यहां समीक्षा को जाती है । प्रथम स्थापनाने ननर्थनने विद्यानन्दके अन्योने कोई ऐसा उल्लेख-अनाण प्रस्तुत नहीं किया, जिननें उन्होंने उनावानीके अतिरिक्त अन्य किसी आचार्यको मूत्रकार या शास्त्रकार महा हो। तथ्य तो यह है कि विद्यानन्दने अपने किनी भी त्यनें उमास्वानीके निवाय अन्य किनी ग्रन्थकर्ताको मूत्रकार या शान्त्र- कार नही ल्सिा । जहाँ कही अन्य प्रन्थकर्ताओंके उन्होंने अवतरण दिये है उन्हें उन्होंने उनके सामने या प्रन्थ नानसे या केवल 'तक्त्तन' कहकर उल्लसित किया है, मूत्रकार या शास्त्रकारले नानसे नही। सूत्रकार या मात्रनार शब्दका प्रयोग केवल उनावामीके लिए किया है। इस सम्बन्ध- में हनने विद्यानन्दक ग्रन्थॉपरसे खोजकर ३३ अवतरण उदाहरणार्थ
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देवागन-माप्तीनामा 07 इस स्थापनाके ननर्थन एक बात यह भी कही गई है कि विद्यानन्द- को यदि उक नङ्गलस्तोत्र उमाधानी प्रणत अभिप्रेत होता नो वे नुहाशेषनवार्य आदि मोत्थानिका बाल्य द्वारा अनुपपत्तिस्थापन और उनका पनिहारन कर उनीका यहाँ निर्देश करते । इन नबन्ने हन इतना ही पूछना चाहते हैं कि स्थापनाकारले उस उत्यानिकानाक्ष्य माहित पद्यान उन अर्थ कैने निकाला? क्योकि विद्यानन्दने यहाँ केवल उन वनोपात्त अनुपपत्तिको प्रस्तुत करके उनका परिहार किया है जिनमें अनुपपत्तिमारने कहा है कि जब न कोई नोलनार्गका प्रवक्ताविशेष है और न कोई प्रतिपाद्यविगेप, तव प्रथन सूत्रको रचना अनगत है ? इन अनुपपत्तिका न्हार करते हुए वे कहते हैं कि नुनीन्द्र (सूत्रकार ) ने मोक्षजाय नमान् आदि नङ्गल-तोत्र द्वारा नी, बोतराग और नोमनारके नेताको न्तुति कम निद्ध कर दिया है कि नौजमार्गका प्रनारिष है और प्रतिपाद्यपि भो। और इसलिए भावी प्रेयने युन्न होनेवाले जानवर्शनम्वरूप आमाको नोक्षमार्गको जाननेकी अभि- लापा होनेपर नूत्रकारद्वारा प्रथम सूत्रका रचा जाना नंगत है। विद्यानन्द- का मा पूगल इन प्रकार है : :- ननु तवायंगात्रादिर नावन्यन्त विशेष मागावे- जप गतिविशेषच ३ कजरुतिपित्तायाः प्रवृत्तवाहित्यनुपपत्ति- बोनागनुतरह- प्रवृद्धाशेषतत्वार्थे मात्रकोणकाल्न । निढे तीन्द्रनत्ये गेकमार्ग नेतरि ।। नत्या तनिपिलायनुप्योगालकाचन । वना गेष्यनाण-य प्रवृत्तं नादिन्न् । लोग्रजन्नर ताम।' त० लोक० पृ. ४ । ग्द्यिानन्दने यहाँ 'शाशेषतत्या, मामाकोणाल्न' और मोक्षमार्गच नैसरि' पोंके द्वारा आतके जिन गुणोंका उल्लेख किया प्रस्तावना ३५ वे वही है जो 'मोक्षमार्गस्य नेतारम् भादि स्तोत्रमें अभिहित है-उमीका यहां उन्होंने अनुवाद ( दोहराना) किया है। "सिद्धे मुनीन्द्रसस्तुत्यै' पदके द्वारा तो उन्होंने सम्ट कर दिया है कि मुनीन्द्र ( मूषकार ) ने उक्त विगेपणोते आसकी स्तुति करनेके बाद ही मादिना रचा। हमें आश्चर्य है कि विद्यानन्दके जो उल्लेग स्थापनाकारके रचमात्र भी साधक न होकर उनके लिए 'म्ववधाय कृत्योत्यापन' म्प है उन्हें प्रस्तुत करनेका नाहस क्यो किया जाता है। तीसरी स्थापनामें जो उक्त स्तोत्रके व्यान्च्यानस्वरूप आप्तमीमासाके रिखे जानेकी बात कही गई है उसमें कोई विवाद नहीं है। पर जब उस स्तोपको विद्यानन्दके उल्लेग्वों द्वारा, जो स्थापनाकारके अभिप्रायके लेग- मात्र भी माधक नहीं है, पूज्यपाद-देवनन्दिका निद्ध करनेगी असफल चेप्टा की जाती है तब भागे आश्चर्य होता है । 'प्रोत्यानारम्भकाले' इन आप्नपरीक्षागत पदका मीषा और प्रकरणसगत अर्थ है-प्रयलारम्भसमयमें अथवा अवतरणारम्भममयमें। परन्तु इस सीधे अथको अङ्गीकार न कर उनका अर्थ किया गया है कि 'उत्थान शब्दका अथ है पुस्तक, अतएव प्रोत्थान शब्दका अर्थ हुआ प्रकृष्ट उत्यान अर्थात् वृत्ति या व्याम्यान, अतएव 'प्रोत्यानारम्भकाले' का अर्थ हुआ व्याख्यानारम्भकाले' । प्रश्न है कि प्रकृष्टनानमे वृत्ति या व्याख्यानका ग्रहण कैसे कर लिया गया ? क्योकि उमका समर्थन न किसी कोपसे होता है और न परम्परागत किसी स्रोत- मे । यदि विद्यानन्दको उक्त न्तोष पूज्यपाद-देवनन्दिको वृत्ति (सर्वार्थसिदि) का बताना इष्ट होता तो वे इतना बुद्धिव्यायाम न कर पाठकोंको उलझन- में न डालते और 'प्रोत्यानारम्भकाले' न लिखकर 'व्याख्यानारम्भकाले' लिख सकते थे। इसी तरह 'शास्त्रकार कृत' के स्थानपर 'वृत्तिकार कृत' दे मकते थे। इसमे श्लोककी रचनामें कोई क्षति भी नहीं होती। किन्तु विद्यानन्दको यह सव इण्ट ही नहीं था। वे असन्दिग्ध रूपमें उक्त म्योत्रको तत्त्वाथशास्त्रका मानते थे और उसे शास्त्रकार-न कि वृत्तिकार रचित स्वीकार करते थे और शास्त्रकार या सूत्रकारसे उन्हें आ० गृद्धपिच्छ ( उमास्वामी ) ही अभिप्रेत थे।
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प्रस्तावना देवागम और उसकी व्याख्यामओके प्रसङ्गसे इतनी चर्चा करनेके उप- रान्त अब उसके कर्ता सम्बन्धमें भी विचार किया जाता है। २ समन्तभद्र : इस मूल्यवान् और महत्त्वपूर्ण कृतिके उपस्थापक आचार्य समन्तभद्र है, जो साहित्य और शिलालेखोमें विशिष्ट सम्मानके प्रदर्शक 'स्वामी' पदसे विभूषित मिलते हैं । आ० कुन्दकुन्द और गृद्धपिच्छके पश्चात् जैन वाड्मयको जिस मनीषीने सर्वाधिक प्रभावित किया और यशोभाजन हुआ वह यही स्वामी समन्तभद्र हैं । इनका यशोगान शिलालेखों तथा वाड्मय- के मूर्धन्य ग्रन्थकारोंके ग्रन्थों में बहुलतया उपलब्ध है। अकलङ्कदेवने स्याद्वादतीर्थका प्रभावक और स्याद्वादमार्गका परिपालक, विद्यानन्दने स्याद्वादमार्गाग्रणी, वादिराजने सर्वज्ञका प्रदर्शक, मलयगिरिने आद्यस्तुतिकार तथा शिलालेखकोने वीरशासनकी सहस्रगुणी वृद्धि करनेवाला, श्रुतकेवलि- सन्तानोन्नायक, समस्तविद्यानिधि, शास्त्रकर्ता एवं कलिकालगणधर कह- कर उनका कीर्तिगान किया है । यथार्थमें जब तत्त्वनिर्णय ऐकान्तिक होने लगा और उसे उतना ही माना जाने लगा तथा आर्हत-परम्परा ऋषभादि तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित तत्त्व-व्यवस्थापक स्याद्वादन्यायको भूलने लगी, तो इसी महान् आचार्यने उसे उज्जीवित एव प्रभावित किया । अत ऐसे शासन-प्रभावक और तत्त्वज्ञानप्रसारक मूर्धन्य मनीषीका विद्वानो द्वारा गुणगान हो तो कोई आश्चर्य नही । इनका विस्तृत परिचय और समयादिका निर्णय श्रद्धेय प० जुगल- किशोरजी मुख्तारने अपने 'स्वामी समन्तभद्र' नामक इतिहास-ग्रन्थ में दिया है । वह इतना प्रमाणपूर्ण, अविकल और शोधात्मक है कि ४२ वर्ष वाद भी उसमें सशोधन, परिवर्तन या परिवर्धनकी गुनाइश प्रतीत नहीं होती। वह आज भी विल्कुल नया और चिन्तनपूर्ण है। उसमें इतनी सामग्री है कि उसपर शोधार्थी अनेक शोध-प्रबन्ध लिख सकते हैं । अतएव यहाँ समन्तभद्रके परिचयादिकी पुनरावृत्ति न करके केवल उनकी उप- लब्धियों पर प्रकाश डालनेका प्रयास करेंगे। ।
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प्रस्तावना पट्खण्डागममें यद्यपि स्याद्वादकी स्वतत्र चर्चा नही मिलती, फिर भी सिद्धान्त-प्रतिपादन 'स्यात्' (सिया) शब्दको लिये हुए अवश्य मिलता है। उदाहरणार्थ मनुष्योको पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक दोनो बतलाते हुए कहा गया है कि "सिया पज्जत्ता, सिया अपज्जता' अर्थात् मनुष्य स्यात् पर्याप्तक हैं, स्यात् अपर्याप्तक है। इसी प्रकारसे आगमके कुछ दूसरे विषयोका भी प्रतिपादन उपलब्ध होता है। आ० कुन्दकुन्दने उक्त दो ( विधि और निषेध ) वचन-प्रकारोमें पांच वचन-प्रकार और मिलाकर सात वचन- प्रकारोसे वस्तु ( द्रव्य ) निरूपणका स्पष्ट उल्लेख किया है । यथा- सिय अत्यि गत्यि उहय अन्वत्तग्वं पुणो य तत्तिवय । ववव खु सत्तभग आदेसवसेण सभववि ।। पचास्तिकाय गा० १४ । 'स्यादस्ति द्रव्य स्यान्नास्ति द्रव्य स्यादुमय स्याववक्तव्यं स्याद- स्त्यवक्तव्य स्यान्नास्त्यवक्तव्य स्थावस्तिनास्त्यवक्तव्यं । इन सात भङ्गोका यहां उल्लेख हुआ है और उनको लेकर आदेशवशात् ( नय- विवक्षानुसार ) द्रव्य-निरूपण करनेको सूचना की है । कुन्दकुन्दने यह भी प्रतिपादन किया है कि यदि मद्रूप ही द्रव्य हो तो उसका विनाश नहीं हो सकता और यदि असद्रूप ही हो तो उसका उत्पाद सम्भव नही है और चूंकि यह देखा जाता है कि जीव मनुष्यपर्यायसे नष्ट, देवपर्यायसे उत्पन्न और जीवसामान्यसे ध्रुव रहनेमे वह उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वरूप है। ( ख ) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामोघलाछनम् । जीयात् त्रैलोक्यनाथस्य शासन जिनशासनम् ॥ प्रमाणस०१-१ । (ग) वन्दित्वा परमाहता समुदय गा सप्तभङ्गोविधि स्याद्वादामृतभिणी प्रतिहतकान्तान्धकारोदयाम् ॥ अष्टश० मङ्गलश्लो० १। १ पचास्तिकाय गा० १५, १७ ।
४० देवागम-आप्तमीमामा इममे प्रतीत होता है कि कुन्दकुन्दके समयमें जैनवाड्मयमें दर्शनका त्प तो आने लगा था, पर उसका अभी विकाम नहीं हो सका था । आ० गृद्ध- पिच्छके तत्त्वार्थमूत्रमें कुन्दकुन्दहाग प्रदर्शित दर्शनके रूपमें कुछ वृद्धि मिलती है। एक तो उन्होंने प्राकृतमें सिद्धान्त-प्रतिपादनकी पद्धतिको मस्कृत-गद्य सूत्रोमें बदल दिया । दूसरे उपपत्तिपूर्वक सिद्धान्तोका निरूपण आरम्भ क्यिा। तीसरे, आगम-प्रतिपादित ज्ञानमार्गणागत मत्यादि ज्ञानो- को प्रमाण-मना देना, उसके प्रत्यक्ष और परोक्ष दो भेद करना, दर्शनान्तरी- में पृथक् प्रमाणरूपमें स्वीकृत स्मृति, प्रत्यभिज्ञान और अनुमानको मतिज्ञान कहकर उनका 'आचे परोक्षम्' (त० मू० १-११) मूत्रद्वारा परोक्षप्रमाण- में ही अन्तर्भाव करना और नैगमादि नयोको अर्थाधिगमका उपाय बताना आदि नया चिन्तन प्रारम्भ किया। इतना होनेपर भी दर्शनमें उन एकान्तवादो, मघों और अनिश्चयोका तार्किक समाधान नही आ पाया था, जो उस समयकी चर्चा विषय थे। (ख) तत्कालीन स्थिति विक्रमकी दूसरी-तीसरी शताब्दीका समय भारतवपके इतिहासमें दार्शनिक क्रान्तिका समय रहा है। इस ममय विभिन्न दर्शनोमें अनेक क्रान्तिकारी विद्वान् हुए हैं । श्रमण और वैदिक दोनो परम्पराओमें अश्व- घोष, मातृचेट, नागार्जुन, कणाद गौतम, जैमिनि जमे प्रतिद्वन्द्वी विद्वानो- का आविर्भाव हुआ और ये सभी अपने मडन और दूसरेके खडनमें लग गये। शास्त्रार्थोंकी वाढ-सी आ गई। सहाद-असहाद, शाश्वतवाद-उन्छेदवाद, अद्वैतवाद-द्वैतवाद और अवक्तव्यवाद-वक्तव्यवाद इन चार विरोधी युगलोको लेकर तत्त्वकी मुख्यतया चर्चा होती थी और उनका चार कोटियोने विचार किया जाता था । तथा वादियोका अपनी इण्ट एक-एक कोटि (पक्ष) को ही माननेका आग्रह रहता था। इस खीचतानके कारण अनिश्चय ( अनान ) १ 'सदेकनित्यवक्तव्यास्तद्विपक्षाश्च ये नया. । सर्वथेति प्रदज्यन्ति पुष्यन्ति स्यादितीह ते ॥ स्वयम्भू० श्लो० १०१।
प्रस्तावना
४१
वादी सजयके अनुयायी तत्त्वको अनिश्चित ही बतलाते थे।' उपर्युक्त
युगलोंमें लगनेवाली चार कोटियां इस प्रकार होती थी-
-
१ सदसद्वाद
(१) तत्त्व सत् है।
(२) तत्त्व असत् है ।
(३) तत्त्व उभय है।
(४) तत्त्व अनुभय है।
२ शाश्वत-अशाश्वतवाद
(१) तत्त्व शाश्वत है।
२) तत्त्व अशाश्वत है।
(३) तत्त्व उभय है।
(४) तत्त्व अनुभय है।
३ द्वैत-अद्वैतवाद
(१) तत्त्व द्वैत है।
(२) तत्त्व अद्वैत है।
( ३ ) तत्त्व उभय है।
( ४ ) तत्त्व अनुभय है।
४ वक्तव्यावक्तव्यवाद
(१) तत्त्व वक्तव्य है।
(२) तत्त्व अवक्तव्य है।
(३) तत्त्व उभय है।
४) तत्त्व अनुभय है।
१ दीघनिकाय सामन्यफलसुत्तमें सजयका मत 'अमराविक्षेपवाद' के
रूपमें मिलता है। अमरा एक प्रकारको मछलीका नाम है। उसके समान
विक्षेप (चचलता-अस्थिरता) का होना-मानना अमराविक्षेपवाद है।
४२ देवागम-आप्तमीमासा (ग) समन्तभद्रकी देन ममन्तभद्रने प्रतिपादन किया कि तत्त्व उक्त चार ही कोटियोमें समाप्त नहीं है, अपितु सात कोटियोमें वह पूर्ण होता है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्त्व तो अनेकान्तरूप है।-एकान्तरूप नही और अनेकान्त विरोधी दो धर्मों ( सत्-असत् शाश्वत-अशाश्वत, एक-अनेक आदि ) के युगलके आश्रयसै प्रकाशमें आनेवाले वस्तुगत मात धौंका समुच्चय है। और ऐसे-ऐसे अनन्त सप्तधर्म-समुच्चय विराट् अनेकान्तात्मक तत्त्व-सागरमें अनन्त लहरोंकी तरह लहरा रहे हैं और इसीसे उसमें अनन्त सप्तकोटियाँ ( सप्तङ्गियाँ) भरी पड़ी है। हाँ, द्रष्टाको सजग और समदृष्टि होना चाहिए। उसे यह ध्यान रहे कि वक्ता या ज्ञाता तत्वको जव अमुक एक कोटिसे कहता या जानता है तो तत्त्वमें वह धर्म अमुक अपेक्षा से रहता हुआ भी अन्य धर्मोका निषेधक नही है। केवल वह विवक्षावश १ न्यावाद मर्वथैकान्तत्यागात् किंवृत्तचिद्विधि । सप्तभङ्गनयापेक्षो हेयादेयविशेषक' ॥ आप्तमी० का० १०४ । २ (अ) 'तत्त्व त्वनेकान्तमशेषरूपम्'–युक्त्यनु० ४६ । (मा) एकान्तदृष्टिप्रतिधि तत्त्व प्रमाणसिद्ध तदतत्स्वभावम् स्वयम्भू० ४१ । (इ) न सच्च नातच्च न दृष्टमेकमात्मान्तर सर्वनिषेधगम्यम् । दृष्ट विमिश्र तदुपाधिभेदात् स्वप्नेऽपि नैतत्त्वदृषे परेषाम् ॥ युक्त्य० ३२ ३ (क) विधिनिषेधोऽनभिलाप्यता व त्रिरेकशस्त्रिद्विश एक एव । त्रयो विकल्पास्तव सप्तधामी स्याच्छन्दनेया सकलेऽर्थभेदे ॥ -युक्त्य० ४५ । (ख) विधेय वार्य चानुभयमुभय मिश्रमपि तत् विशेने प्रत्येक नियमविषयश्चापरिमित । सदन्योन्यापेक्ष सकलभुवनज्येष्ठगुरुणा त्वया गीत तत्त्व बहुनयविवक्षेतरवशात् ।। स्वयम्भू० ११८॥
प्रस्तावना ४३ मुख्य और अन्य धर्म गौण है।' इसे समझनेके लिये उन्होने प्रत्येक कोटि (भङ्ग-वचनप्रकार) के साथ 'स्यात्' निपात-पद लगानेकी सिफारिश की और 'स्यात्' का अर्थ 'कथञ्चित्'-किसी एक दृष्टि-किसी एक अपेक्षा बतलाया। साथ ही उन्होने प्रत्येक कोटिको निर्णयात्मकताको प्रकट करनेके लिए प्रत्येक वाक्यके साथ एवकार पदका प्रयोग भी निर्दिष्ट किया, जिससे उस कोटिकी वास्तविकता प्रमाणित हो, काल्पनिकता या सावृतिकता नही । तत्त्वप्रतिपादनकी इन सात कोटियोको उन्होने एक नया नाम भी दिया । वह नाम है भङ्गिनी प्रक्रिया-सप्तभङ्गी अथवा सप्त- भङ्गनय । समन्तभद्रकी वह परिष्कृत सप्तभङ्गो इस प्रकार प्रस्तुत हुई- १ (क) विधिनिषेधश्च कथञ्चिदिष्टी विवक्षया मुख्यगुणव्यवस्था । स्वयम्भू० २५ । (ख) विवक्षितो मुख्य इतीष्यतेऽन्यो गुणोऽविवक्षो न निरात्मकस्ते । स्वयम्भू० ५३ । २ (अ) वाक्येष्यनेकान्तद्योती गम्य प्रति विशेषणम् । स्थान्निपातोऽर्थयोगित्वात्तव केवलिनामपि ।। आप्तमी० का० १०३ । (मा) तद्द्योतन स्याद् गुणतो निपात युक्त्य० ४३। ३ स्याद्वाद सर्वथकान्तत्यागात् किंवृत्तचिद्विधि । आप्तमी० १०४। ४ (क) यदेवकारोपहित पद तदस्वार्थत स्वार्थमवच्छिनत्ति । युक्त्य०४१। (ख) अनुक्ततुल्य यदनेवकार व्यावृत्त्यभावान्नियमद्वयेऽपि । युक्त्य० ४२ । ५ प्रक्रिया भङ्गिनीमेना नयनयविशारद । आप्तमी० २३ । ६ 'सप्तभङ्गनयापेक्ष आप्तमी०१०४। .
४४ देवागम-नाप्नमीमाना सदसद्वाद 7 (१) न्यात् नद्रूप ही तत्व है। (२) स्यात् अनद्रूप ही तत्त्व है। (३) न्यात् उभयत्प ही तत्त्व है। (४) स्यात् अनुभय (अवत्तव्य) रूप ही तत्त्व है। (५) न्यान् मद् और लवक्त्तव्यत्प ही तत्त्व है। (8) स्यात् जमद् और अवक्तव्यरूप ही तत्त्व है। (७) स्यात् यद् और अन्नद् तथा अवक्तव्य रूप ही तत्त्व है। इन सप्तनडोम प्रथम नड़ स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी अपेक्षाने, द्वितीय परद्रव्य-क्षेत्र काल-भावको अपेक्षाने, तृतीय दोनोंकी नम्निलित अपेक्षामोने, चतुर्थ दोनो (सत्त्व-अनत्त्व) को एक नाथ कह न सकनेने, पत्रम प्रथम-चतुर्यके नयोगले षष्ठ द्वितीय-चतुर्थक मेलले और स्प्तम तोय-चतुर्थ- मित्ररूपने विवक्षित हैं और प्रत्येक पृथक- ५ थक् है । जैना कि नमन्तभद्रके निम्न प्रतिपादनने प्रकट है मदेष सर्व को नेच्छेत्स्वल्पादिचतुष्टयात् । अनदेव विपर्यासान्त चेन्न व्यवतिष्ठते ।। क्रमापितळ्यात् तं सहावाच्यमशक्तित। अवक्तव्योत्तरा शेषास्त्रयो नङ्गा स्वहेतुत ॥ धर्मे धर्मेऽन्य एवार्थों धर्मिणोऽनन्तमिण । मङ्गित्वेऽन्यतमान्तस्य शेषान्तानां तदङ्गता । माप्तमी० का० १५, १६, २१ । भङ्गका प्रयोजन तत् १ न्यचित्त नदेवेष्ट कथञ्चिदमदेव तयोभयमवाच्य च नययोगान्न नर्वथा ।। लाप्तमी०१४ । २ अवक्तव्योत्तरा नेपास्त्रयो भङ्गा म्वहेतुत ॥ आप्तमी०१६।
प्रस्तावना ४५ समन्तभद्रने सदसद्वादकी तरह अद्वैत-द्वैतवाद, शाश्वत-अशाश्वतवाद, वक्तव्य-अवक्तव्यवाद, अन्यता अनन्यतावाद, अपेक्षा-अनपेक्षावाद, हेतु- अहेतुवाद, विज्ञान-बहिरर्थवाद, देव-पुरुषार्थवाद, पाप-पुण्यवाद और बन्ध- मोक्षकारणवाद इन एकान्त वादोपर भी विचार प्रकट किया तथा उक्त प्रकारमे उनमें भी सप्तभड़ी ( सप्तकोटियो) की योजना करके स्याद्वाद- की स्थापना की। इस तरह विचारकोको उन्होने स्याद्वाद-दृष्टि (तत्त्व- विचारकी पद्धति ) देकर तत्कालीन विचार-सघर्षको मिटानेमें महत्त्वपूर्ण योगदान किया। साथ ही दर्शनके लिए जिन उपादानोकी आवश्यकता होती है उनका भी उन्होने सृजन किया तथा आर्हत दर्शनको अन्य दर्शनो- के समकक्ष ही नही, उसे गौरवपूर्ण भी बनाया। जिन उपादानोकी उन्होने सृष्टि करके उन्हें जैन दर्शनको प्रदान किया वे इस प्रकार हैं १ प्रमाणका स्वपरावभासि लक्षण। २ प्रमाणके अक्रमभावि और क्रमभावि भेदोकी परिकल्पना। ३ प्रमाणके साक्षात् और परम्परा फलोका निरूपण । ४ प्रमाणका विषय ५ नयका स्वरूप ६ हेतुका स्वरूप ७ स्याद्वादका स्वरूप ८ वाच्यका स्वरूप ९ वाचकका स्वरूप आप्तमी० का० २३, ११३ । २ स्वयम्भूस्तोत्र का० ६३ । ३ आप्तमीमासा का १०१। ४ उपेक्षा फलमाद्यस्य शेषस्यादान-हान-धो । पूर्वाऽवाऽज्ञाननाशो वा सर्वस्यास्य स्वगोचरे ।। -आप्तमी० १०२ । आप्तमी० १०७ । ६,७ आप्तमो० १०६ । ८ आप्तमी० १०४ । ९ आप्तमी० १११, ११२ । १० आप्तमी० १०९। ५ देवागम-आप्तमीमासा १० अभावका वस्तुधर्म-निरूपण एव भावान्तर-कथन ११ तत्त्वका अनेकान्तरूप प्रतिपादन १२ अनेकान्तका स्वरूप १३ अनेकान्तमें भी अनेकान्तकी योजना १४ जैनदर्शनमें अवस्तुका स्वरूप १५ स्यात् निपातका स्वरूप १६ अनुमानसे सर्वज्ञकी सिद्धि १७ युक्तियोसे स्याद्वादकी व्यवस्था १८ आप्तका ताकिक स्वरूप १९ वस्तु ( द्रव्य-प्रमेय ) का स्वरूप । जैन न्यायक इन उपादानोका उपस्थापन अथवा विकास करने के कारण ही समन्तभद्रको जैन न्यायका आध-प्रवर्तक कहा गया है।" (घ) कृतियां समन्तभद्रकी ५ कृतियाँ उपलब्ध है १ देवागम-प्रस्तुत कृति है । २ स्वयम्भूस्तोत्र-इसमें चौबीस तीर्थकरोका दाशनिकशलीमें गुण- स्तवन है । इसमें १४३ पद्य है। ३ युक्त्यनुशासन-इसमें भी वीरकी स्तुतिके बहाने दार्शनिक निरूपण है । यह ६४ पद्योमें समास है। १ 'भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्म , भावान्तर भाववदर्हतस्ते । -युक्त्यनु० ५९ । २ युक्त्यनु० २३ । ३ आप्तमी० १०७, १०८ । ४ स्वयम्भूस्तो० १०३ । ५ आप्तमी० ४८, १०५ । ६ स्वयम्भू० १०२ । ७ आप्तमी० ५। । आप्तमी० ११३ । ९ जैन दर्शन, स्याद्वादाङ्क, वर्ष २, अङ्क ४-५, पृ० १७० । १० आप्तमी० का० ४, ५, ६ । ११ आप्तमी० १०७ । - प्रस्तावना ४७ ४ जिन-शतक ( स्तुति-विद्या )-यह ११६ पद्योंकी आलकारिक अपूर्व काव्य-रचना है। चौवीस तीर्थकरोकी इसमें स्तुति की गई है। ५ रत्नकरण्डकश्रावकाचार-यह उपासकाचार विपयक १५० पद्यो- की अत्यन्त प्राचीन और महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक कृति है । इनमें आदिको तीन दार्शनिक, चौथी काव्य और पांचवी धार्मिक कृतियां हैं। इनके अतिरिक्त भी इनकी जीवसिद्धि जैसी कुछ कृतियोके उल्लेख मिलते है पर वे अनुपलब्ध है। उपसंहार प्रस्तुत प्रस्तावनामें देवागम और स्वामी समन्तभद्रके सम्बन्धमें प्रकाश डाला गया है। इसी सन्दर्भमें देवागमकी व्याख्याओ और उसकी रचनाके प्रेरणास्रोतपर भी अनुचिन्तन प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तावना यद्यपि अधिक लम्बी हो गई है तथापि उसमें किया गया विचार पाठकोको लाभप्रद होगा। अन्तमें प्रस्तुत ग्रन्थके अनुवादक एव सम्पादक तथा जैन साहित्य व इतिहासके वेत्ता श्रद्धेय ५० जुगलकिशोरजी मुख्तारके इस देवागम- अनुवादको सराहना करूंगा। देवागम जैसे दुरवगाह दर्शन-ग्रन्थका बडे परिश्रमके साथ ग्रन्थानुरूप हिन्दी रूपान्तर प्रस्तुत करके समन्तभद्रभारती- के उपासकोंको उन्होंने बडा लाभ पहुँचाया है। परम प्रमोदका विषय है कि वे ९० वर्षकी वयमें भी शासन-सेवामें सलग्न हैं। हम उनके शतवर्षी होनेकी हृदयसे कामना करते है। दरबारीलाल कोठिया काशी हिन्दू विश्वविद्यालय २९ मार्च, १९६७ १ खेद है कि इस महान् साहित्यकारका २२ दिसम्बर १९६८ को निधन हो गया। -प्रकाशक, द्वितीय सस्करण ।
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विषय-सूची विषय पृष्ठ विषय ४ w w ७ पृष्ठ अनुवादकीय-मगल-प्रतिज्ञा २ उक्त एकान्तोकी निर्दोष-विधि- देवागमादि विभूतियाँ आप्त- व्यवस्था १८ गुरुत्वकी हेतु नहीं ३ सत्-असत्-मान्यताकी निर्दोष विधि १९ वहिरन्तविग्रहादिमहोदय उभय तथा अवक्तव्यकी निर्दोष- आप्त-गुरुत्वका हेतु नही २० तीर्थकरत्व भी आप्त-गुरुत्वका मान्यतामे हेतु अस्तित्वधर्म नास्तित्वके साथ हेतु नही, तब गुरु कौन? ५ अविनाभावी २० दोषो तथा आवरणोकी पूर्णत नास्तित्वधर्म अस्तित्वके साथ हानि सभव अविनाभावी २१ सर्वज्ञ-सस्थिति शब्दगोचर-विशेष्य विधि निर्दोष सर्वज्ञ कौन और किस निषेधात्मक २१ मर्वथैकान्तवादो आप्तोका शेष भग भी नय-योगसे स्वेष्ट प्रमाण-बाधित अविरोधरूप २२ ९ सर्वथैकान्त-रक्तोके शुभाऽशुभ वस्तुका अर्थक्रियाकारित्व कव बनता है २२ कर्मादिक नही बनते धर्म-धर्ममे अर्थभिन्नता और भावैकान्तकी सदोषता १५ धर्मोकी मुख्य-गौणता २३ प्रागभाव-प्रध्वसाभावके विलोप- उक्त भगवती प्रक्रियाकी एका- मे दोष १६ ऽनेकादि विकल्पोमे भी अन्योऽन्याभाव-अत्यन्ताभावके योजना २३ विलोपमे दोष १६ अद्वत-एकान्तकी सदोषता २४ अभावकान्तकी सदोषता १७ कर्मफलादिका कोई भी द्वत उक्त उभय और अवक्तव्य नही बनता २५ एकान्तोकी सदोषता १७ हेतु आदिसे अद्वैत-सिद्धिमे हेतुसे ? ८ ९ ५० देवागम की वौद्ध-मान्यता ४० ३० विषय पृष्ठ विषय द्वैतापत्ति पृष्ठ २५ क्षणिकैकान्तमे हेतु-फलभावादि द्वेतके बिना अद्वैत नही होता २६ नही बनते ३७ पृथक्त्व-एकान्तकी सदोषता २७ सवृति और मुख्यार्थकी एकत्वके लोपमे सन्तानादिक स्थिति ३८ नही बनते २७ चतुष्कोटि-विकल्पके अवक्तव्य ज्ञानको ज्ञेयसे सर्वथा भिन्न ३८ माननेमे दोष २८ अवक्तव्यको उक्त मान्यतामे वचनोको सामान्यार्थक दोष ३९ माननेमे दोष २८ निषेध सत्का होता है असत्का उक्त उभय तथा अवक्तव्य नही एकान्तोकी सदोषता २९ अवस्तुको अवक्तव्यता और पृथक्त्व-एकत्व एकान्तोका वस्तुकी अवस्तुता अवस्तुत्व-वस्तुत्व सर्वधर्मोके अवक्तव्य होनेपर एकत्व-पृथक्त्व एकान्तोकी उनका कथन नही वनता ४२ निर्दोष व्यवस्था अवाच्यका हेतु अशक्ति, अभाव विवक्षा तथा अविवक्षा सत्की ४३ ही होती है क्षणिकैकान्तमे हिंसा हिंसकादि एक वस्तुमे भेद और अभेदकी अविरोध विधि ३१ की विडम्बना नित्यत्व-एकान्तकी सदोषता ३३ नागको निर्हेतुक माननेपर प्रमाण और कारकोंके नित्य दोषापत्ति ४५ होनेपर विक्रिया कैसी? ३४ विरूपकार्यारम्भके लिए हेतुकी कार्यके सर्वथा सत् होने पर मान्यतामे दोष उत्पत्ति आदि नही बनती ३४ स्कन्वादिके स्थित्युत्पत्तिव्यय नित्यत्वैकान्तमे पुण्य-पापादि नही बनता नही वनते उक्त उभय तथा अवक्तव्य क्षणिक-एकान्तकी सदोषता ३६ एकान्तोको सदोपता कार्यके सर्वथा असत् होनेपर नित्य-क्षणिक-एकान्तोकी दोषापत्ति निर्दोष व्यवस्थाविधि ३० या अबोध? ४४ ४६ ४७ ३७ विषय-सूची ५१ पृष्ठ विषय ७६ विषय पृष्ठ उत्पाद-व्यय सामान्यका नही, हेतु तथा आगमसे निर्दोष विशेषका होता है ५० सिद्धिकी दृष्टि ७१ उत्पादादिकी भिन्नता और अन्तरगार्थता-एकान्तकी बौद्ध- निरपेक्ष होनेपर अवस्तुता ५१ मान्यता सदोष ७२ एक द्रव्यकी नागोत्पादस्थिति विज्ञप्ति-मात्रताके एकान्तमे मे भिन्न भावोकी उत्पत्ति ५२ साध्य-साधनादि नही वनते ७३ वस्तुतत्त्वको त्रयात्मकता ५३ वरिरगार्थता-एकान्तकी कार्य-कारणोकी सर्वथा सदोषता ७४ भिन्नताका एकान्त उक्त उभय तथा अवक्तव्य उक्त भिन्नतैकान्तमे दोष ५६ एकान्तोकी सदोषता ७५ अनन्यता-एकातकी सदोषता ६० उक्त दोनो एकान्तोमे अपेक्षा- कार्यकी भ्रान्तिसे कारणकी भेदसे सामजस्य ७५ भ्राति तथा उभयाभावादिक ६१ जीवशब्द सज्ञा होनेसे कार्य कारणादिका एकत्व सवाह्यार्थ है माननेपर दोष ६१ सज्ञात्व-हेतुमे व्यभिचार-दोषका उवत उभय तथा अवक्तव्य निराकरण ७७ एकान्तोकी सदोषता ६३ सज्ञात्व-हेतुमे विज्ञानादैतवादी एकता और अनेकताकी की शकाका निरसन ७८ ३३ बुद्धि तथा गब्दकी प्रमाणता और सिद्धिके आपेक्षिक-अनापेक्षिक सत्याऽनृतकी व्यवस्था वाह्यार्थके एकान्तोकी सदोषता ६६ होने न होने पर निर्भर ८० उवत उभय तथा अवक्तव्य देवसे सिद्धिके एकान्तकी एकान्तीकी सदोषता ६८ सदोपता ८१ उक्त आपेक्षिकादि एकान्तोकी पौरुषसे सिद्धिके एकान्तको ८२ सर्वथा हेतुसिद्ध तथा आगम- उक्त उभय तथा अवक्तव्य- सिद्ध एकान्तोकी सदोषता ६९ एकान्तोकी सदोषता ८४ उक्त उभय तथा अवक्तव्य दंव-पुरुषार्थ-एकान्तोकी एकान्तोकी सदोषता निर्दोष-विधि ८५ निर्दोष व्यवस्था निर्दोप-व्यवस्था ६८ सदोषता ७० ५२ देवागम पृष्ठ विषय ९९ विषय परमे दुख-सुखसे पाप-पुण्यके पृष्ठ स्यानिपातकी अर्थ-व्यवस्था ९७ एकान्तकी सदोषता ८५ स्याद्वादका स्वरूप ९८ स्वमे दुख-सुखसे पुण्य-पापके स्याद्वाद और केवलज्ञानमे एकान्तकी सदोषता ८८ भेद-निर्देश उक्त उभय तथा अवक्तव्य नय-हेतुका लक्षण एकान्तोकी सदोषता ९० द्रव्यका स्वरूप और भेदोकी पुण्य-पापकी निर्दोष व्यवस्था ९० सूचना १०० अज्ञानसे बन्धका और अल्प निरपेक्ष और सापेक्ष नयोकी ज्ञानसे मोक्षका एकान्त ९३ स्थिति १०० उक्त उभय और अवक्तव्य वस्तुको विधि-वाक्यादि-द्वारा एकान्तोकी सदोषता ९४ नियमित किया जाता है १०१ अज्ञान-अल्पज्ञानसे वन्ध-मोक्ष- तदतद्रूप वस्तुको तद्रूप ही कहने- की निर्दोष-विधि ९४ वाली वाणी सत्य नही कर्मबन्धानुसार ससार विविधरूप वाक्-स्वभाव-निर्देश, और बद्ध जीव शुद्धि-अशुद्धिके तद्भिन्न-वाक्य अवस्तु १०३ भेदसे दो भेदरूप अभिप्रेत-विशेषको प्राप्तिका शुद्धि-अशुद्धि दो शक्तियोकी सादि-अनादि व्यक्ति १०४ ९५ सच्चा साधन १०५ प्रमाणका लक्षण और उसके भेद ९६ आप्त-मोमासाका उद्देश्य १०६ प्रमाणोका फल ९६ अनुवादकीय-अन्त्य-मगल १०२ स्याद्वाद-सस्थिति
श्रीमत्स्वामि-समन्तभद्राचार्य-विरचित
देवागस
[जिनदेवागम-ज्ञापक-स्तोत्र ]
अपरनाम
आप्त-मीमांसा
[सम्यग्मिथ्योपदेशाऽर्थविशेष-प्रतिपत्तिरूपा]
स्पष्टार्थादियुक्त-मूलानुगामी अनुवादसे भूषित
श्री-ममन्नमन महर्षये ननः । अनुवाकोय-मंगल प्रतिमा श्रापमानममिनम्य नमन्तमा नन्द्रोध-जगत्वरिता नारूपस । देवागमं तन्तुएस र-बोध-गात्रं व्याख्यामि लोक-हित-गान्नि-चित्रक-पृद्धथै ।। जो मन्यग्नानमय हैं, सच्चारित्रल्प हैं और जिनके वचन निर्दोष हैं उन समन्तभद्र (सब ओन्ने भद्ररूप-मंगलमय ) श्रोवर्द्धनान ( भगवान महावीर ) को नया श्री मान ( विद्या- विभूति, कीति आदि लक्ष्मीले वृद्धिको प्राप्त हुए ) ननन्तनद्र- (वामी समन्नमनाचार्य) को (अलग-अलग तथा एक नाथ ) नमस्कार करके, मैं (उनका विनत्र सेवा जुगलक्रिगोर ) लौकिक- नोको हित-वृद्धि, गान्ति-वृद्धि और विवेक-वृद्धि के लिये उन 'देवागम' को (न्यष्टार्थ आन्मि युक्त हिन्दी अनुवादप ) व्याख्या करता हूँ, जो कि उत्तम जानकी गान्ति-गिमाको लिये हुए सम्यक् तथा मिथ्या उपगने अर्थविशेषकी प्रतिपनि- जानकारी करानेवाला-अनुपम शान्त्र है और चामो समन्ननको एक अद्वितीय कृति है।'
प्रथम परिच्छेद देयागमा विभूतिया आम-गान्यगी रेनु नारी दवागम-नभोयान-चामरादि-विभृतयः । मायाविप्वपि दृश्यन्ते नातम्त्वममि नो महान् ॥१॥ (हे वोर्गजन) देवोके नागमनके कारण स्वर्गादिन के देव माप जन्मादिक कन्याणकोन अवमगर आपन, पाम आते है इनलिए-आकाशमे गमनके कारण-गगनमे विना लिमी विमानादिको महायनावे मापा गहज-म्वभावने विवरण होता है इन हेतु-और चामगदि-विभूतियोके कारण-वर, छप, मिहामन, देवदुन्दुभि. पुष्पवृष्टि, अगोकवृक्ष, भामण्डल और दिव्य- ध्वनि-जने अष्ट प्रातिहार्योका तथा ममवसरणगी दूमरी विभूतियोका आपके अथवा आपके निमित्त प्रादुर्भाव होता है इसकी वजहसे- आप हमारे-मुझ-जैसे परीक्षा-प्रधानियोके-गुरु-पूज्य अथया आप्तपुरुष नहीं हैं भले ही समाजके दूगरे लोग या अन्य लौकिक जन इन देवागमनादि अतिगियोंके कारण आपको गुरु, पूज्य अथवा आप्त मानते हो। क्योकि ये अतिशय मायावियोमे-मस्करि. पूग्णादि इन्द्रजालियोमे भी देखे जाते हैं। इनके कारण ही यदि आप गुम, पूज्य अथवा आप्त हो तो वे मायावी इन्द्रजालिये भी गुरु, पूज्य तथा आप्त ठहरते हैं; जब कि वे वैसे नहीं है । अत उक्त कारण-कलाप व्यभिचार-दोपमे दूपित होनेके कारण अनेकान्तिक हेतु है, उससे आपकी गुरुता एव विशिष्टताको पृयक्
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? कारिका ३] देवागम द्वष-काम-क्रोध-मान-माया-लोभादि कषायोसे अभिभूत-स्वर्गके देवोंमे भी पाया जाता है-वही यदि महानता एव आप्तताका हेतु हो तो स्वर्गाके रागी, द्वेषी, कामी तथा क्रोधादि-कषाय-दोषोसे दूषित देव भी महान् पूज्य एव आप्त ठहरें; परन्तु वे वैसे नहीं है, अत इस 'अन्तर्बाह्य-विग्रहादि-महोदय' विशेषणके मायावियोमे न पाये जानेपर भी रागादिमान् देवोमे उसका सत्त्व होनेके कारण वह व्यावृत्ति-हेतुक नही रहता और इसलिए उससे भी आप-जैसे आप्त-पुरुषोका कोई पृथक् बोध नही हो सकता।' ( यदि यह कहा जाय कि घातिया कर्मोंका अभाव होनेपर जिस प्रकारका विग्रहादि-महोदय आपके प्रकट होता है उस प्रकारका विग्रहादि महोदय रागादियुक्त देवोमे नही होता तो इसका क्या प्रमाण ? दोनोका विग्रहादि-महोदय अपने प्रत्यक्ष नही है, जिससे तुलना की जा सके। यदि अपने ही आगमको इस विषयमे प्रमाण माना जाय तो यह हेतु भी आगमाश्रित ठहरता है और एक मात्र इसीसे दूसरोको यथार्थ वस्तु-स्थितिका प्रत्यय एव विश्वास नहीं कराया जा सकता । अत यह विग्रहादि-महोदय हेतु भी आपकी महानता व्यक्त करनेमे असमर्थ होनेसे मेरे जैसोंके लिए उपेक्षणीय है।) तीर्थकरत्व भी आप्त-गुरुत्वका हेतु नही, तव गुरु कौन ? तीर्थकृत्समयानां च परस्पर-विरोधतः । सर्वेषामाप्तता नास्ति, कश्चिदेव भवेद्गुरुः ।।३।। '( यदि यह कहा जाय कि आप -तीर्थंकर हैं-ससारसे पार उतरनेके उपायस्वरूप आगम-तीर्थके प्रवर्तक हैं और इसलिए आप्त-सर्वज्ञ होनेसे महान हैं, तो यह कहना भी समुचित प्रतीत नही होता, क्योकि तीर्थकर तो दूसरे सुगतादिक भी कहलाते हैं और वे भी ससारसे पार उतरने अथवा निर्वनि प्राप्त करनेके
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देवागमा कारिका ५] मलका पूर्णत क्षय हो जाता है-अर्थात् जिस प्रकार किट्ट- कालिमादि मलसे बद्ध हुआ सुवर्ण अग्निप्रयोगादिरूप योग्य सावनोको पाकर उस सारे बाहरी तथा भीतरी मलसे विहीन हुआ अपने शुद्ध सुवर्णरूपमे परिणत हो जाता है उसी प्रकार द्रव्य तथा भावरूप कर्ममलसे बद्ध हुआ भव्य जीव सम्यग्दर्शनादि योग्य साधनोके बलपर उस कर्ममलको पूर्णरूपसे दूर करके अपने शुद्धात्मरूपमे परिणत हो जाता है । अत किसी पुरुष-विशेषमे दोषो तथा उनके कारणोकी पूर्णत हानि होना असम्भव नही है । जिस पुरुषमे दोषो तथा आवरणोकी यह नि शेष हानि होती है वही पुरुष आप्त अथवा निर्दोष सर्वज्ञ एव लोकगुरु होता है।' सर्वज्ञ-सस्थिति सूक्ष्मान्तरित-दूरार्थाः प्रत्यक्षा कस्यचिद्यथा । अनुमेयत्वतोज्न्यादिरिति सर्वज्ञ-सस्थिति ॥६॥ '( यदि यह कहा जाय कि दोषो तथा आवरणोकी पूर्णत- हानि होनेपर भी कोई मनुष्य अतीत-अनागतकाल-सम्बन्धी सब पदार्थोको, अतिदूरवर्ती सारे वर्तमान पदार्थोंको और सम्पूर्ण सूक्ष्म- पदार्थोंको साक्षात् रूपसे नही जान सकता है तो वह ठीक नही है, क्योकि,) सूक्ष्मपदार्थ-स्वभावविप्रकर्षि परमाणु आदिक- अन्तरित पदार्थ-कालसे अन्तरको लिये हुए कालविप्रकर्षि राम- रावणादिक-, और दूरवर्ती पदार्थ क्षेत्रसे अन्तरको लिये हुए क्षेत्रविप्रकर्षि मेरु-हिमवानादिक-, अनुमेय ( अनुमानका अथवा प्रमाणका विषय' ) होनेसे किसी-न-किसीके प्रत्यक्ष जरूर हैं, १ प्रमाणका विषय 'प्रमेय' कहलाता है। अनुमेयका अर्थ 'अनुगत मेय मान येपा ते अनुमेया प्रमेया इत्यर्थ' इस वसुनद्याचार्यके वाक्यानुसार 'प्रमेय' भी होता है और इस तरह अनुमेयत्व हेतुमें प्रमेयत्व हेतु भी गर्भित है ।
८ ममन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १ जैसे अग्नि आदिक पदार्थ जो अनुमान या प्रमाणका विषय हैं वे किसीके प्रत्यक्ष जरूर हैं। जिसके सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थ प्रत्यक्ष है वह सर्वज्ञ है । इस प्रकार सर्वज्ञको सम्यक् स्थिति, व्यवस्था अथवा सिद्धि भले प्रकार सुघटित है।' निर्दोष सर्वज कौन और किम हेतुसे स त्वमेवाऽसि निर्दोषो युक्ति-शास्त्राऽविरोधिवाक् अविरोघो यदिष्टं ते प्रसिद्धेन न वाध्यते ।।६।। '(हे वीर जिन ! ) वह निर्दोष-अज्ञान तथा रागादि- दोषोंसे रहित वीतराग और सर्वज्ञ-आप ही हैं, क्योकि आप युक्ति-शास्त्राऽविरोधिवाक् हैं-आपका वचन ( किसी भी तत्त्व- विषयमे ) युक्ति और शास्त्रके विरोधको लिये हुए नहीं है । और यह अविरोध इस तरहसे लक्षित होता है कि आपका जो इष्ट है-मोक्षादितत्त्वरूप अभिमत–अनेकान्तगासन है-वह प्रसिद्धसे-प्रमाणसे अथवा पर-प्रसिद्ध एकान्तसे~-बाधित नहीं है, जब कि दूसरोका (कपिल-सुगतादिकका) जो सर्वथा नित्यवाद- अनित्यवादादिरूप एकान्त अभिमत ( इष्ट ) है वह प्रत्यक्षप्रमाणसे ही नहीं किन्तु पर-प्रसिद्ध अनेकान्तसे भी बाधित है और इसलिए उन सर्वथा एकान्तमतोके नायकोमेसे कोई भी युक्ति-गात्रा- विरोधिवाक् न होनेसे निर्दोष एव सर्वज्ञ नहीं हैं।' सर्वथकान्तवादी आप्तोका स्वेष्ट प्रमाण-वाधित त्वन्मताऽमृत-बाह्यानां सर्वथैकान्त-वादिनाम् । आप्ताऽभिमान-दग्धानां स्वष्टं दृष्टेन बाध्यते ।।७।। 'जो लोग आपके मतरूपी अमृतसे- अनेकान्तात्म-वस्तु- तत्त्वके प्रतिपादक आगम ( शामन ) से, जो कि दुखनिवृत्ति-लक्षण परमानन्दमय मुक्ति-सुखका निमित्त होनेसे अमृतरूप है वाह्य
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ममन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १ ( जन्म ) भी नहीं बनता, शुभ-अशुभ कर्मोका फल भी नही वता और न बन्ध तथा मोक्ष ही बनते है-किसी भी तत्त्व अथवा पदार्थकी सम्यक् व्यवस्था नही बैठती। और इस तरह उनका मत प्रत्यक्षसे ही बाधित नही, बल्कि अपने इण्टसे अपने इण्टका भी वाधक है।' व्याख्या-वास्तवमे प्रत्येक वस्तु अनेकान्तात्मक है-उसमे अनेक अन्त-धर्म, गुण-स्वभाव, अग अथवा अंश हैं। जो मनुष्य किसी भी वस्तुको एक तरफसे देखता है-उसके एक ही अन्त- धर्म अथवा गुण-स्वभावपर दृष्टि डालता है--वह उसका सम्यग्द्रष्टा ( उसे ठीक तौरसे देखने-पहचाननेवाला ) नही कहला सकता । सम्यग्द्रष्टा होनेके लिये उसे उस वस्तुको सव ओरसे देखना चाहिये और उसके सब अन्तो, अगो, धर्मों अथवा स्वभावो- पर नजर डालनी चाहिये । सिक्केके एक ही मुखको देखकर सिक्के- का निर्णय करनेवाला उस सिक्केको दूसरे मुखसे पडा देखकर वह सिक्का नही समझता और इसलिये धोखा खाता है। इसीसे अनेकान्तदृष्टिको सम्यग्दृष्टि और एकान्तदृष्टिको मिथ्यादृष्टि कहा है। जो मनुष्य किसी वस्तुके एक ही अन्त, अग, धर्म अथवा गुण-स्वभावको देखकर उसे उस हो स्वरूप मानता है-दूसरे रूप स्वीकार नहीं करता और इस तरह अपनी एकान्त-धारणा वना लेता है और उसे ही जैसे तैसे पृष्ट किया करता है, उसको 'एकान्त-ग्रहरक्त', एकान्तपक्षपाती अथवा सर्वथा एकान्तवादी कहते है । ऐसे मनुष्य हाथीके स्वरूपका विधान करनेवाले जन्मान्ध पुरुषोकी तरह आपसमे लडते-झगडते है और एक दूसरेसे शत्रुता धारण करके जहाँ परके बैरी बनते है वहाँ अपनेको हाथीके १ अनेकान्तात्मदृष्टिस्ते सती शून्यो विपर्यय । तत सर्व मृपोक्त स्यात्तदयुक्त स्वघातत ।। -स्वयम्भूस्तोत्र
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१२ नमन्तभद्र भारती [परिन्छेन १ अधिक मात्रामे भी दे देता है। नतीजा यह होता है कि वे रोगी मर जाते है या अधिक कष्ट तथा वेदना उठाते हैं और वह मनुष्य कुचलेका ठीक प्रयोग न जानकर उसका मिथ्या प्रयोग करनेके कारण दण्ड पाता है, तथा कभी स्वय कुचला खाकर अपनी प्राणहानि भी कर डालता है। इस तरह कुचलेके विषयमे एकान्त आग्रह रखनेवाला जिस प्रकार स्व-पर-वैरी होता है उमो प्रकार दूसरी वस्तुओंके विषयमे भी एकान्त हठ पकडनेवालोको स्व-पर-वैरी समझना चाहिये। सच पूछिये तो जो अनेकान्तके द्वषो है वे अपने एकान्तके भी द्वषी हैं, क्योकि अनेकान्तके बिना वे एकान्तको प्रतिष्ठित नही कर सकते-अनेकान्तके बिना एकान्तका अस्तित्व उनी तरह नहीं बन सकता जिस तरह कि सामान्यके विना विशेषका या द्रव्यके विना पर्यायका अस्तित्व नही बनता। सामान्य और विशेष मस्तित्व और नास्तित्व तथा नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म जिस प्रकार परस्परमे अविनाभाव-सम्बन्धको लिये हुए है- एकके बिना दूसरेका सद्भाव नही बनता-उसी प्रकार एकान्त और अनेकान्तमे भी परम्पर अविनाभाव-सम्बन्ध है। ये सब सप्रतिपक्षधर्म एक ही वस्तुमे परस्पर अपेक्षाको लिए हुए होते है। उदाहरणके तौरपर अनामिका अगुली छोटी भी है और उडी भी कनिष्ठासे वह बडी है और मध्यमाने छोटी है। इस तरह अनामिकामे छोटापन और वडापन दोनो धर्म सापेक्ष हैं, अथवा छोटी है और छोटी नही है ऐसे छोटेपनके अस्तित्व और नास्ति- त्वरूप दो अविनाभावी धर्म भी उसमे सापेक्षरूपसे पाये जाते हैं-अपेक्षाको छोड देनेपर दोनोमेने कोई भी धर्म नही बनता। इसी प्रकार नदोके प्रत्येक तटसे इस पारपन और उस पारपनके दोनो धर्म होते हैं और वे सापेक्ष होनेसे ही अविरोधल्प रहते हैं। जो धर्म एक ही वस्तुमे परस्पर अपेक्षाको लिये हुए होते हैं वे अपने और दूसरेको उपकारी ( मित्र ) होते हैं और अपनी तथा कारिका ८] देवागम १३ दूसरेकी सत्ताको बनाये रखते हैं । और जो धर्म परस्पर अपेक्षाको लिये हुए नही होते वे अपने और दूसरेके अपकारी ( शत्रु ) होते है-स्व-पर-प्रणाशक होते हैं, और इसलिये न अपनी सत्ताको कायम रख सकते है और न दूसरेकी। इसीसे स्वामी समन्तभद्रने अपने स्वयभूस्तोत्रमे भी- 'मिथोऽनपेक्षा स्व-पर-प्रणाशिन "परस्परेक्षा स्व-परोपकारिण" इन वाक्योके द्वारा इसी सिद्धान्तकी स्पष्ट घोपणा की है। आप निरपेक्ष नयोको मिथ्या और सापेक्ष नयोको सम्यक् बतलाते है । आपके विचारसे निरपेक्ष नयोका विषय अर्थक्रियाकारी न होने- से अवस्तु है और सापेक्ष नयोका विषय अर्यकृन् (प्रयोजनसाधक ) होनेसे वस्तुतत्त्व है', निरपेक्ष नयोका विषय 'मिथ्या एकान्त' और सापेक्ष नयोका विषय 'सम्यक् एकान्त' है। और यह मम्यक् एकान्त ही प्रस्तुत अनेकान्तके साथ अविनाभावसम्वन्धको लिये हुए है। जो मिथ्या एकान्तके उपासक होते हैं उन्हे ही 'एकान्त- ग्रहरवत' कहा गया है, वे ही 'सर्वथा एकान्तवादी' कहलाते हैं और उन्हे ही यहां स्वपरवरी' समझना चाहिये। जो सम्यक् एकान्तके उपासक होते है उन्हें 'एकान्तग्रहरक्त' नही कहते, उनका नेता 'स्यात्' पद होता है, वे उस एकान्तको कथचित् रूपसे स्वीकार करते है, इसलिये उसमे सर्वथा आसक्त नहीं होते और न प्रतिपक्ष-धर्मका विरोध अथवा निराकरण ही करते है- सापेक्षावस्थामे विचारके समय प्रतिपक्ष-धर्मकी अपेक्षा न होनेसे उसके प्रति एक प्रकारकी उपेक्षा तो होतो है किन्तु उसका विरोध अथवा निराकरण नही होता। और इसीसे वे 'स्व-पर-वेरी' नही कहे जा सकते । अत स्वामी समन्तभद्रका यह कहना विल्कुल ठीक है कि 'जो एकान्तग्रहरक्त होते हैं वे स्वपरवैरी होते हैं।' १ निरपेक्षा नया मिथ्या सापेक्षा वस्तु तेऽर्थकृत् ।। -देवागम १०८ परिच्छे अब देखना यह है कि ऐनेस्व-मन्री एवान्नादिगन्न गुन-ग्गुन-वर्न नल-मुख-दुरु, जन्म-जन्गन्ना (लेक- ग्लोर ) और बन्य-नोक्षादिक्री व्यवस्यक नहीं बन । गत बिल्कुल गप्ट है नत्र अगएँ कि नेगन्नावित है अनजान्ने गत्रय गिना इन परस्पर बिन्दु नगल्न नउने- वाला नागा स्वयगेको बोर्ड बन्न नता व्या शत्र नहीं बन स्तो-इनलिये जो अनेनगन्न बरी है-अनेकान्न- निद्धान्तले उप रखते हैं उनके यहां ये गन्स्याएं कुटित नहीं हो सकती । स्नेगन्त प्रतिपेव न-जन्ना प्रतिपत्र हो जाता है, योनि तन-मनन स्नेकान्त नाय व्यानि है। इन स्नेगन्त ही नहीं तक न-अनमनी अवस्था में बन जाती है यान् द्रव्य मान्ने जिन प्रकार गुण-यांग और वृमने भावमे गोगम, जामन नीन, नानादिनी काई व्यवस्य नहीं बननननी उनी कार बनेकान्तके ब्भावन मननी वस्या नही बन मन्नी। नम-अम्ती व्यस्य न बननेने बर्यान्यान्न निषेध हो जाता है क्योति यनिगगे न-जनने नाय बगलि है। और लगनगरे उभान्मे मादिक नहीं बन नकते-जमानिनकी यनियाके साथ ग्यप्ति है। ज नुन- अनुभ-कर्न ही नहीं बन सकते तब उनका फ्ल नुख-दुख, जल भोगका क्षेत्र जन्म-जन्मातर । लोक-परलोक) और मनोने बने तया छूटनेकी बात तो ने बन सकती है ? साराम यह कि बनेकान्तके नात्रय बिना रे ननुभाशुभ-वदिन निराश्रित हो जाते हैं और इसलिए नव्या नियत्वादि एकान्नवादियोन नन्ने इनको कोई ठीक व्यवस्था नहीं बनती। वे यदि इन्हें नानते है और तपन्त्ररगादिक अनुष्ठानद्वारा सलोंग अर्जन करके उनका मफल लेना चाहते हैं अयन जोने नन्त होना चाहते हैं तो बसने इन इष्टको ल्नेकान्तका विरोध करके वाधा पहुंचाने हैं, और इस तरह भी अपनको स्वररी सिद्ध से हैं।
कारिका ९] देवागम १५ वस्तुत अनेकान्त, भाव-अभाव, नित्य-अनित्य, भेद-अभेद आदि एकान्तनयोंके विरोधको मिटाकर, वस्तुतत्त्वकी सम्यक्-व्यवस्था करनेवाला है। इसीसे लोक-व्यवहारका सम्यक् प्रवर्तक है--विना अनेकान्तका आश्रय लिये लोकका व्यवहार ठीक वनता ही नहीं, और न परस्परका वैर-विरोध ही मिट सकता है। इसीलिये अनेकान्तको परमागमका बीज और लोकका अद्वितीय गुरु कहा गया है-वह सवोके लिये सन्मार्ग-प्रदर्शक है। जैनी नीतिका भी वही मूलाधार है। जो लोग अनेकान्तका सचमुच आश्रय लेते है वे कभी स्व-पर-वैरी नही होते, उनसे पाप नही बनते, उन्हे आपदाएं नही सताती, और वे लोकमे सदा ही उन्नत उदार तथा जयशील बने रहते हैं। भावकान्तकी सदोपता भाबकान्ते पदार्थानामभावानामपहवात् । सर्वात्कमनाद्यन्तमस्वरूपमतावकम् ॥९॥ '(हे वीर भगवन् । ) यदि पदार्थोके भाव ( अस्तित्त्व ) का एकान्त माना जाय--यह कहा जाय कि सब पदार्थ सर्वथा सत् रूप ही हैं, असत् ( नास्तित्व ) रूप कभी कोई पदार्थ नही है- तो इससे अभाव पदार्थोंका--प्रागभाव, प्रध्वसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभावरूप वस्तु-धर्मोंका-लोप ठहरता है, और इन वस्तु-धर्मोका लोप करनेसे वस्तृतत्त्व ( मर्वथा ) अनादि, अनन्त, सर्वात्मक और अस्वरूप हो जाता है, जो कि आपका इष्ट नही है-प्रत्यक्षादिके विरुद्ध होनेसे आपका मत नही है।' (किस अभावका लोप करनेसे क्या हो जाता अथवा क्या दोष आता है, उसका स्पष्टीकरण आगे किया गया है ) १ नीति-विरोध-ध्वसी लोकव्यवहारवर्तक सम्यक् । परमागमम्य बीज भुवनेगुरुर्जयत्यनेकान्त ॥
१६ नमन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १ प्रागभाव-प्रव्वसाभावके विलोपमें दोष कार्य-द्रव्यमनादि स्यात्प्रागभावस्य निरे । प्रध्वंयम्य च धर्मस्य प्रच्यऽनन्ततां व्रजेत् ॥१०॥ 'प्रागभावका यदि लोप किया जाय-कार्यरूप द्रव्यका अपने उत्पादसे पहले उस कार्यरूपमे अभाव था, इस वातको न माना जाय -तो वह कार्यरूप द्रव्य-घटादिक अथवा गन्दादिक- अनादि व्हरता है और अनादि वह है नही, एक समय उत्पन्न हुआ, यह बात प्रत्यक्ष है । यदि प्रध्वस धर्मका लोप किया जाय- कार्यद्रव्यमे अपने उस कार्यरूपमे विनागको शक्ति है और इसलिए वह नगदको किसी समय प्रध्वसाभावरूप भी होता है, इस वातको यदि न माना जाय तो वह कार्यरूप द्रव्य-घटादिक अथवा गन्नादिक-अनन्तता-अविनाशिताको प्राप्त होता है और अवि- नागी वह है नहीं, यह प्रत्यन सिद्ध होता है, प्रत्यनमे घटादिक तथा शब्दादिक कार्योका विनाश होते देखा जाता है। अत प्राग- भाव और प्रध्यसाभावका लोप करके कार्यद्रव्यको उत्पत्ति और विनाग-विहीन सदासे एक ही रूपमे स्थिर (सर्वथा नित्य ) मानना प्रत्यक्ष-विरोधके दोषसे दूषित है और इसलिए प्रागभाव तथा प्रध्वताभावका लोप किसी तरह भी समुचित नहीं कहा जा सकता । इन अभावोको मानना ही होगा।' अन्योन्याभाव-अत्यन्ताभाव विलोपमे दोप सर्वात्मकं तदेक स्यादन्याऽपोह-व्यतिक्रमे । अन्यत्र समवाये न व्यपदिश्येत सर्वथा ॥११॥ 'यदि अन्याऽपोहका-अन्योन्याभावरूप पदार्थका व्यतिक्रम किया जाय-वस्तुके एक रूपका दूसरे रूपमे अथवा एक वस्तुका दूसरी वस्तुमे अभाव है, इस बातको न माना जाय तो वह कारिका ११] देवागम प्रवादियोका विवक्षित अपना-अपना इष्ट एक तत्त्व ( अनिष्टतत्त्वो का भी उसमे सद्भाव होनेसे ) अभेदरूप सर्वात्मक ठहरता है- और इसलिए उसकी अलगसे कोई व्यवस्था नही बन सकती। यदि अत्यन्ताभावका लोप किया जाय-एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यमे सर्वथा अभाव है, इसको न माना जाय-तो एक द्रव्यका दूसरेमें समवाय-सम्बन्ध ( तादात्म्य ) स्वीकृत होता है और ऐसा होनेपर यह चेतन है, यह अचेतन है इत्यादि रूपसे उस एक तत्त्वका सर्वथा भेदरूपसे कोई व्यपदेश ( कथन ) नहीं बन सकता।' . अभावकान्तकी सदोषता अभावैकान्त-पक्षेऽपि भावाऽपन्हव-वादिनाम् । बोध-वाक्य प्रमाण न केन साधन-दूषणम् ।।१२।। 'यदि अभावकान्तपक्षको स्वीकार किया जाय-यह माना जाय कि सभी पदार्थ सर्वथा असत्-रूप हैं तो इस प्रकार भावोका सर्वथा अभाव कहनेवालोके यहाँ ( मतमे ) बोध (ज्ञान) और वाक्य (आगम ) दोनोका ही अस्तित्व नहीं बनता और दोनोका अस्तित्व न बननेसे ( स्वार्थानुमान, परार्थानुमान आदिके रूपमे ) कोई प्रमाण भी नहीं बनता; तब किसके द्वारा अपने अभावैकान्त पक्षका साधन किया जा सकता और दूसरे भाव- वादियोके पक्षमें दूषण दिया जा सकता है ?–स्वपक्ष-साधन और परपक्ष-दूषण दोनो ही घटित न होनेसे अभावैकान्तपक्ष- वादियोके पक्षकी कोई सिद्धि अथवा प्रतिष्ठा नही बनती और वह सदोप ठहरता है, फलत अभावैकान्तपक्षके प्रतिपादक सर्वज्ञ एव महान् नही हो सकते।' उभय और अवक्तव्य एकान्तोकी सदोषता विरोधान्नोभयेकात्म्य स्याद्वाद-न्याय-विद्विषाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ॥१३॥ २ - १८ ममन्तभद्र-भारती [परिच्छद १ '( भावेकान्त और अभावकान्त दोनोकी अलग-अलग मान्यतामे दोप देखकर ) यदि भाव और अभाव दोनोका एकात्म्य (उभयेकान्त) माना जाय, तो स्याहाद-न्यायके विद्वेषियोंके यहाँ- उन लोगोके मतमे जो अस्तित्व-नास्तित्वादि सप्रतिपक्ष धर्मोमे पारस्परिक अपेक्षाको न मानकर उन्हे स्वतन्त्र धर्मोके रूपमे स्वीकार करते है और इस तरह स्याद्वाद-नीतिके गत्रु वने हुए -वह एकात्म्य नही बनता, क्योकि उससे विरोध दोष आता है-भावकान्त अभावकान्तका और अभावैकान्त भार्वकान्तका सर्वथा विरोधी होनेसे दोनोमे एकात्मता घटित नही हो सकती।' '( भाव, अभाव और उभय तीनो एकान्तोकी मान्यतामे दोप देखकर ) यदि अवाच्यता ( अवक्तव्य) एकान्तको माना जाय-यह कहा जाय कि वस्तुतत्त्व सर्वथा अवाच्य (अनिर्वचनीय या अवक्तव्य ) है तो वस्तुतत्त्व 'अवाच्य' है ऐसा कहना भी नही बनता-इस कहनेसे ही वह 'वाच्य' हो जाता है, 'अवाच्य' नही रहता; क्योकि सर्वथा अवाच्यकी मान्यतामे कोई वचन- व्यवहार घटित ही नही हो सकता।' उक्त एकान्तोकी निर्दोप विधि-व्यवस्था कथञ्चित्ते सदेवेष्ट कथञ्चिदसदेव तत् । तथोभयमवाच्य च नय-योगान्न सर्वथा ॥१४॥ '( स्याद्वाद-न्यायके नायक हे वीर भगवन् ! ) आपके शासनमें वह वस्तुतत्त्व कथञ्चित् ( किसी प्रकारसे ) सत्-रूप ही है, कथञ्चित् असत्-रूप ही है, कथञ्चित् उभयरूप ही है, कथञ्चित् अवक्तव्यरूप ही है (चकारसे ) कथञ्चित् सत् और अवक्तव्य, रूप ही है; कथञ्चित् असत् और अवक्तव्यरूप ही है, कथञ्चित सदसत् और अवक्तव्यरूप ही है; और यह सब नयोके योगसे है-वक्ताके अभिप्राय-विशेषको लिए हुए जो सप्तभगात्मक नय- कारिका १३, १४] देवागम १९ विकल्प है उनकी विवक्षासे अथवा दृष्टि से है-सर्वथारूपसे नहीं- नयदृष्टिको छोडकर सर्वथारूपमे अथवा सर्वप्रकारसे एकरूपमे कोई भी वस्तुतत्त्व व्यवस्थित नही होता।' सत्-असत्-मान्यताकी निर्दोप विधि सदेव सर्वं को नेच्छेत्स्वरूपादि-चतुष्टयात् । असदेव विपर्यासान्न चेन्न व्यवतिष्ठते ।।१५।। (हे वीर जिन ! ) ऐसा कौन है जो सबको-चेतन- अचेतनको, द्रव्य-पर्यायादिको, भ्रान्त-अभ्रान्तको अथवा स्वयके लिए इष्ट-अनिष्टको-स्वरूपादिचतुष्टयको दृष्टिसे–स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावकी अपेक्षासे-सत् रूप ही, और पररूपादिचतुष्टयको दृष्टिसे-परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावकी अपेक्षासे-असत् रूप ही अगीकार न करे ?--कोई भी लौकिकजन, परीक्षक, स्याद्वादी, सर्वथा एकान्तवादी अथवा सचेतन प्राणी ऐसा नहीं है, जो प्रतीतिका लोप करनेमे समर्थन होनेके कारण इस बातको न मानता हो। यदि ( स्वय प्रतीत करता हुमा भी कुनयके वश विपरीतबुद्धि अथवा दुराग्रहको प्राप्त हुआ) कोई ऐसा नहीं मानता है तो वह ( अपने किसी भी इष्ट-तत्त्वमे ) अवस्थित अथवा व्यवस्थित नहीं होता है- उसकी कोई भी तत्त्वव्यवस्था नही बनती। क्योकि स्वरूपके ग्रहण और पररूपके त्यागको व्यवस्थासे ही वस्तुमे वस्तुत्वकी व्यवस्था सुघटित होती है, अन्यथा नही। स्वरूपकी तरह यदि पररूपसे भी किसीको सत् माना जाय तो चेतनादिके अचेतन- त्वादिका प्रसग आता है। और पररूपकी तरह यदि स्वरूपसे भी असत् माना जाय, तो सर्वथा शून्यताकी आपत्ति खडी होती है । अथवा जिस रूपसे सत्त्व है उसी रूपसे असत्त्वको और जिस रूपसे असत्त्व है उसी रूपसे सत्त्वको माना जाय, तो कुछ भी
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कारिका १६, १७] देवागम २१ ( अन्वय-हेतु ) भेद-विवक्षा ( वैधयं अथवा व्यतिरेक हेतु ) के साथ अविनाभाव-सम्बन्धको लिए रहता है-व्यतिरेक (वैधर्म्य ) के बिना अन्वय ( साधर्म्य ) और अन्वयके विना व्यतिरेक घटित नही होता।' नास्तित्वधर्म अस्तित्वके साथ अविनाभावी नास्तित्व प्रतिपेध्येनाऽविनामाव्येकधर्मिणि । विशेषणत्वाद्वैधयं यथाऽभेद-विवक्षया ॥१८॥ ( इसी तरह ) एक धर्मीमें नास्तित्वधर्म अपने प्रतिषेध्य- ( अस्तित्व ) धर्मके साथ अविनाभावी है-अस्तित्वधर्मके विना वह नही बनता–क्योकि वह विशेषण है जो विशेषण होता है वह अपने प्रतिषेध्य ( प्रतिपक्ष ) धर्मके साथ अविनाभावी होता है-जैसे कि ( हेतु-प्रयोगमे ) वैधर्म्य (व्यतिरेक-हेतु ) अभेद- विवक्षा ( साधर्म्य या अन्वय-हेतु ) के साथ अविनाभाव सम्बन्धको लिए रहता है-अन्वय ( साधर्म्य ) के विना व्यतिरेक (वैधर्म्य ) और व्यतिरेकके बिना अन्वय घटित ही नही होता।' शब्दगोचर-विशेष्य विधि-निपेधात्मक विधेयप्रतिपेध्यात्मा विशेष्यः शब्दगोचरम् । साध्यधर्मों यथा हेतुरहेतुश्चाप्यपेक्षया ।।१९।। 'जो विशेष्य ( धर्मी या पक्ष ) होता है वह विधेय तथा प्रतिषेध्य-स्वरूप होता है-विधिरूप अस्तित्वधर्म और निषेधरूप नास्तित्वधर्म दोनोको अपना विपय किये रहता है, क्योकि वह शब्द- का विषय होता है-जो-जो शब्दका विषय होता है वह सब विशेष्य विधेय-प्रतिषेध्यात्मक हुआ करता है। जैसे कि साध्यका जो धर्म एक विवक्षासे हेतु ( साधन ) रूप होता है वह दूसरी विवक्षासे अहेतु ( असावन ) रूप भी होता है। उदाहरणके लिए साध्य
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कारिका २०, २१] देवागम एव परिगृहीत नहीं है-वह अर्थ-क्रियाको करनेवाली होती है। यदि ऐसा नहीं माना जाय तो बाह्य और अन्तरंग कारणोसे कार्यका निष्पन्न होना जो माना गया है वह नही बनता-सर्वथा सत्-रूप या सर्वथा अमत्-रूप वस्तु अर्थ-क्रिया करनेमे असमर्थ है, चाहे कितने भी कारण क्यो न मिले, और अर्थ-क्रियाके अभावमे वस्तुत वस्तुत्व बनता ही नहीं।' धर्म-धर्ममें अर्थभिन्नता और धर्मोकी मुख्य-गौणता धर्मे धर्मऽन्य एवार्थों धर्मिणोऽनन्त-धर्मिणः । अङ्गित्वेऽन्यतमान्तस्य शेषान्तानां तद(दा)ङ्गता ॥२२॥ 'अनन्तधर्मा धर्मीके धर्म-धर्ममे अन्य ही अर्थ सनिहित है- धर्मीका प्रत्येक धर्म एक जुदे ही प्रयोजनको लिए हुए है। उन धर्मोमेसे किसी एक धर्मके अङ्गी (प्रधान) होनेपर शेष धर्मोकी उसके अथवा उस समय अङ्गता ( अप्रधानता ) हो जाती है- परिशेष सब धर्म उसके अङ्ग अथवा उस समय अप्रधान रूपसे विवक्षित होते हैं। उक्त भगवती प्रक्रियाकी एकाऽनेकादिविकल्पोमें भी योजना एकाऽनेक-विकल्पादावुत्तरत्राऽपि योजयेत् । प्रक्रिया भगिनीमेनां नयनय-विशारदः ।।२३।। 'जो नय-निपुण है वह ( विधि निपेषमे प्रयुक्त ) इस भंगवती (सप्तभगवती) प्रक्रियाको आगे भी एक-अनेक जैसे विकल्पादिकमें नयोके साथ योजित करे-जैसे सम्पूर्ण वस्तुतत्त्व कथचित् एकरूप है, कथचित् अनेकरूप है, कथचित् एकाऽनेकरूप है, कथचित् अवक्तव्यरूप है, कचित् एकावक्तव्यरूप है, कथचिदनेकावक्तव्य- रूप है और कथचिदेकाऽनेकाऽवक्तव्यरूप है। एकत्वका अनेकत्वके साथ और अनेकत्वका एकत्वके साथ अविनाभावसम्बन्ध है, और
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कारिका २४ ] मेवागम २५ रूप कोई विकल्प ही बनता है, फलत मारा लोफ-व्यवहार विगड जाता है। ( यदि यह कहा जाय कि जो एक है वही विभिन्न कारको तथा क्रियानोंके रूपमे परिणत होता है तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) जो कोई एक है--सर्वथा अकेला एव असहाय है-वह अपनेसे ही उत्पन्न नहीं होता।---उसका उस रूपमे जनक और जन्मका कारणादिक दूसरा ही होता है, दूसरेके अस्तित्व एवं निमित्तके विना वह स्वय विभिन्न कागको तथा क्रियामोके रूपमे परिणत नहीं हो सकता। कर्म-फलादिका कोई भी द्वैत नही बनता कर्म-द्वैनं फल-द्वैत लोक-द्वैत च नो भवेत् । विद्याऽविद्या-द्वयं न स्याद्वन्ध-मोक्ष-द्वय तथा ।।२५।। '( सर्वथा अद्वत सिद्धान्तके माननेपर ) कर्म-वैत-शुभ- अशुभ कर्मका जोडा, फल-त-पुण्य-पापस्प अच्छे बुरे फलका जोडा और लोक-द्वैत-फल भोगनेके स्थानस्प इहलोक परलोकका जोडा-नहीं बनता। ( इसी तरह ) विद्या-अविद्याका द्वैत (जोडा ) तथा बन्ध-मोक्षका द्वैत ( जोडा ) भी नहीं बनता। इन तो ( जोडो) मे से किसी भी दंतके माननेपर सर्वथा अद्वत का एकान्त वाधित होता है । और यदि प्रत्येक जोडेकी किसी एक वस्तुका लोपकर दूसरो वस्तुका ही ग्रहण किया जाय तो उस दूसरी वस्तुके भी लोपका प्रमग आता है; क्योकि एकके विना दूसरीका अस्तित्व नही वनता, और इस तरह भी सारे व्यवहारका लोप ठहरता है। हेतु आदिमे अद्वैत-सिदिमे देतापत्ति हेतोरद्वैत-सिद्धिश्चेद्वैतं स्यातु-साध्ययोः। हेतुना चेद्विना सिद्धिद्वैत वाङ्मावतो न किम् ।।२६।। - २६ समन्तभद्र-भारती [ परिच्छेद २ '( इसके सिवाय यह प्रश्न पैदा होता है कि अद्वतकी सिद्धि किसी हेतुसे की जाती है या बिना किसी हेतुके वचनमात्रसे हो ?-- उत्तरमे ) यदि यह कहा जाय कि अद्वैतको सिद्धि हेतुसे की जाती है तो हेतु ( साधन ) और साध्य दोको मान्यता होनेसे वैतापत्ति खडी होती है-सर्वथा अद्वतका एकान्त नही रहता-और यदि बिना किसी हेतुके ही सिद्धि कही जाती है तो क्या वचनमात्रसे तापत्ति नहीं होती ?-साध्य अद्वैत और वचन, जिसके द्वारा साध्यकी सिद्धिको घोषित किया जाता है, दोनोके अस्तित्वसे अद्वतता नही रहती। और यह बात तो बनती ही नही कि जिसका स्वय अस्तित्व न हो उसके द्वारा किसी दूसरेके अस्तित्वको सिद्ध किया जाय अथवा उसकी सिद्धिकी घोषणा की जाय। अत अद्वैत एकान्तकी किसी तरह भी सिद्धि नही बनती, वह कल्पना- मात्र ही रह जाता है।' द्वैतके बिना अद्वैत नही होता अद्वैत न बिना द्वैतादहेतुरिव हेतुना । साज्ञनः प्रतिषेधो न प्रतिषेध्यादृते क्वचित् ॥२७॥ ( एक बात और भी बतला देनेकी है और वह यह कि ) द्वतके बिना अद्वैत उसी प्रकार नही होता जिस प्रकार कि हेतुके बिना अहेतु नही होता, क्योकि कहीं भी सज्ञीका-नामवालेका- प्रतिषेध प्रतिषेध्यके बिना-जिसका निषेध किया जाय उसके अस्तित्व-बिना-नही बनता-द्वत शब्द एक सज्ञी है और इसलिये उसके निषेधरूप जो अद्वरत शब्द है वह द्वतके अस्तित्वको मान्यता-बिना नही बनता।) [इस प्रकार अद्वैत एकान्तका पक्ष लेनेवाले ब्रह्माद्वैत,सवेदना- द्वरत और शब्दाद्वैत जैसे मत सदोष एव बाधित ठहरते हैं। ] २७ कारिका २६, २७] देवागम पृथक्त्व-एकान्तको मदोषता पृथक्त्वैकान्त-पक्षेऽपि पृथक्त्वादपृथक्तु तौ । पृथक्त्वे न पृथक्त्व स्यादनेकस्थो ह्यसौ गुणः ।।२८।। '( अद्वैत एकान्तमे दोप देखकर) यदि पृथक्पनका एकान्त- पक्ष लिया जाय-यह माना जाय कि वस्तुतत्त्व एक दूसरेसे सर्वथा भिन्न है तो इसमें भी दोष आता है और यह प्रश्न पैदा होता है कि पृथक्त्व-गुणसे द्रव्य और गुण पृथक् है या अपृथक् ? यदि अपृथक् हँ तव तो पृथक्त्वका एकान्त ही न रहा-वह बाधित हो गया। और यदि पृथक् हैं तो पृथक्त्व नामका कोई गुण ही नहीं बनता (जिसे वैशेपिकोने गुणोकी २४ सख्यामे अलगसे गिनाया है ) क्योकि वह एक होते हुए भी अनेकोमें स्थित माना गया है और इसकी कोई पृथकग्गति नहीं है-पृथक् रूपमे उसकी स्थिति न तो दृष्ट है और न स्वीकृत है, अत पृथक् कहने- पर उसका अभाव ही कहना होगा। [ यह कारिका वैशेषिको तथा नैयायिकोके पृथक्त्वैकान्त पक्षको लक्ष्य करके कही गयी है, जो क्रमश ६ तथा १६ पदार्थ मानते हैं और उन्हे सर्वथा एक दूसरेसे पृथक् बतलाते हैं । अगली कारिकामे क्षणिकैकान्तवादी वौद्धोंके पृथक्त्वैकान्तपक्षको सदोष वतलाया जाता है। एकत्वके लोपमें सन्तानादिक नही बनते सतानः समुदायश्च साधर्म्यञ्च निरकुशः । प्रेत्य-भावश्च तत् सर्वं न स्यादेकत्व-निह्नवे ।।२९॥ 'यदि-एकत्वका सर्वथा लोप किया जाय-सामान्य, सादृश्य, तादात्म्य अथवा सभी पर्यायोमे रहनेवाले द्रव्यत्वको न माना जाय-तो जो संतान, समुदाय और साधर्म्य तथा प्रेत्यभाव ( मरकर परलोकगमन ) निरकुश है-निर्वाध रूपसे माना
२८
समन्तभद्र-भारती
[परिच्छेद २
जाता है-वह सब नहीं बनता-अर्थात् क्रमभावी पर्यायोमे जो
उत्तरोत्तर परिणाम-प्रवाहरूप अन्वय है वह घटित नही होता,
रूप-रसादि जैसे सहभावी धर्मोमे जो युगपत् उत्पाद-व्ययको लिये
हुए एकत्र अवस्थानरूप समुदाय है वह भी नही वनता, सह-
धर्मियोमे समान परिणामकी जो एकता है वह भी नही वनती
और न मरकर परलोकमे जाना अथवा एक ही जीवका दूसरा
भव या गरीर धारण करना ही बनता है। इसी तरह बाल-
युवा-वृद्धादि अवस्थाओमे एक ही जोवका रहना नही बनता और
(चकारसे ) प्रत्यभिज्ञान-जैसे सादृश्य तथा एकत्वके जोडरूप ज्ञान
भी नही बनते।'
जानको जयते सर्वथा भिन्न मानने में दोष
मदात्मना च भिन्न चेज्ज्ञान ज्ञेयाद् द्विधाऽप्यसत् ।
जानाऽभावे कथ ज्ञेय पहिरन्तश्च ते द्विपाम ॥३०॥
( इसी तरह ) ज्ञानको ( जो कि अपने चैतन्यरूपसे जय-
प्रमेयमे पृथक् है ) यदि सत्स्वरूपसे भी ज्ञेयसे पृथक् माना जाय-
अस्तित्वहीन स्वीकार किया जाय तो ज्ञान और ज्ञेय दोनोका
ही अभाव ठहरता है -ज्ञानका अभाव तो उसके अस्तित्व-विहीन
होनेसे हो गया और ज्ञेयका अभाव ज्ञानाभावके कारण वन गया,
क्योकि ज्ञानका जो विषय हो उसे ही ज्ञेय कहते हैं-ज्ञानके अभाव-
मे वाह्य तथा अतरग किसी भी ज्ञेयका अस्तित्व ( हे वीर जिन । )
आपसे द्वेष रखनेवालोके यहाँ-सर्वथा पृथक्त्वैकान्तवादी वैगेषि-
कादिकोके मतमे-कैसे बन सकता है ?-उनके मतसे उसकी
कोई भी समीचीन व्यवस्था नही बन सकती।
वचनोको सामान्यार्थक मानने में दोष
सामान्याऽर्था गिरोऽन्येषां विशेषो नाभिलष्यते ।
सामान्याऽभावतस्तेषां मृषैव सकला गिर ॥३१॥
२९ कारिका २९, ३०] देवागम 'दूसरोके यहाँ-बौद्धोके मतमे-वचन सामान्यार्थक हैं। क्योकि उनके द्वारा ( उनकी मान्यतानुसार ) विशेषका- याथात्म्यरूप स्वलक्षणका-फथन नहीं बनता है। (वचनोके मात्र सामान्यार्थक होनेसे वे कोई वस्तु नही रहते-बौद्धोके यहाँ उन्टे वस्तु माना भी नहीं गया और विशेषके अभावमे सामान्यका भी कही कोई अस्तित्व नही बनता, ऐसी हालतमे सामान्यके भी अभावका प्रसग उपस्थित होता है ) सामान्यका अवस्तुरूप अभाव होनेसे उन ( वौद्धो ) के सम्पूर्ण वचन मिथ्या ही ठहरते हैं-वे वचन भी सत्य नही रहते जिन्हे वे सत्यरूपसे प्रतिपादन करते है।' उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोकी सदोपता विगंधान्नोभयकात्म्य स्याहाद-न्याय-विद्विपाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ॥३२॥ '(अद्वत और पृथक्त्व दोनो एकान्तोकी अलग-अलग मान्यता- मे दोप देखकर ) यदि अद्वैत ( एकत्व ) और पृथक्त्व दोनोका एकात्म्य ( एकान्त) माना जाय तो स्याद्वाद-न्यायके विद्वेषियोके यहाँ -उन लोगोके मतमे जो अद्वैत पृथक्त्वादि सप्रतिपक्ष धर्मो मे पारस्परिक अपेक्षाको न मानकर उन्हे स्वतत्र धर्मों के रूपमे स्वीकार करते हैं और इस तरह स्याद्वाद-न्यायके शत्रु बने हुए है-वह एकात्म्य नहीं बनता ( उसी प्रकार जिस प्रकार कि अस्तित्व-नास्तित्वका एकात्म्य नही बनता), क्योकि उससे (वन्ध्या-पुत्रकी तरह ) विरोध दोष आता है-अद्वतकात पृथक्त्वैकातका और पृथक्त्वैकात अद्वतकातका सर्वथा विरोधी होनेसे दोनोमे एकात्मता घटित नही हो सकती।' '( अति, पृथक्त्व और उभय तीनो एकान्तोकी मान्यतामे दोष देखकर ) यदि अवाच्यता ( अवक्तव्यता) एकान्तको माना जाय-यह कहा जाय कि वस्तुतत्त्व एकत्व या पृथक्त्वके रूपमे सवथा अवाच्य ( अनिर्वचनीय या अवक्तव्य ) है तो वस्तुतत्त्व मन्नमा-नानी [ पग्निंट 'श्वाच्च है' ऐमा कहना भी नहीं बनता-उस कनेने ही वह 'वाच्य' हो जाना है, अवाय नही हिना, गंनि गया भगव्य' की मान्यनामे कोई वचन-वहार घटित ही नहीं हो सकता।' पृयन्त्र- मन्त्र गमाग स्वप्नुवन्तुन अनपध्ये पृथक्वन्ये द्यवस्तु हृय-हेतुतः। तस्य पृथक्न्त्र च बभेदैः माधन यथा ॥३३॥ 'एक दूमरेको अपेक्षा न रखनेवाले पृथक्त्व और एकत्र कि हेनुग्ने श्रवन्नु है-एकच-निरपज होनेने पृथक्वा भर पृषत्र-नि पेन होनेने एक वा कही कोई अस्तित्व नहीं बनता- स्त एकत्व और पृथक्त्व नापेनरूपमें विरोधको प्राप्त न होने उसी प्रकार वस्तुत्वको प्राप्त है जिन प्रकार विनाधन (हेतु साधन अपने पक्षधर्मन्त्र, नपलमे नत्व और विनमे व्यावृत्तिल्प नेदो तया अन्वय-व्यतिरेकल्प भेदोंके नाय सापेलनाके कारण विरोधको न रखने हुए वस्तुत्वको प्राप्त है।' 1- एकन्व-पृषन्त्र नान्नोंगे निर्दोषव्यवल्या मत्सामान्यात्त सर्वेक्य पृथग्दच्याढि-मेदतः। । मेदाऽभेट-विवक्षायामसाधारण-हेतुवत ॥३४॥ '( यदि यह कहा जाय कि एकत्वके प्रत्यन-वाधित होनेके कारण और पथन्त्वके मदाद्यात्मकतामे गधित होनेके कारण प्रतीतिका निविषयपना है तब सब पदार्थों मे एकत्ल और पृथक्त्वको कैने अनुभूत किया जा सकता है ? तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) सत्ता-अस्तित्वमे-समानता होनेकी दृष्टिसे तो तब (जीवादि पदार्थ) एक है-इसलिये एकत्वकी प्रतीतिका विषय सलामान्य होनेने वह निविषय नही है और द्रव्यादिके भेदकी दृष्टिसे-द्रव्य, गुण और कर्मकी अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल और कारिका ३३] देवागम ३१ भावकी जुदी-जुदी अपेक्षाको लेकर-सब ( जीवादि पदार्थ) पृथक् है-इसलिये पृथक्त्वकी प्रतीतिका विपय द्रव्यादि-भेद होनेसे वह निविषय नही है । जिस प्रकार असाधारण हेतु अभेदको दृष्टिसे एकरूप और भेदको दृष्टिसे अनेकरूप है उसी प्रकार सब पदार्थों में भेदको विवक्षासे पृथक्त्व और अभेदको विवक्षासे एकत्व सुघटित है। विवक्षा तथा अविवक्षा सत्की ही होती है विवक्षा चाऽविवक्षा च विशेष्येऽनन्त-धर्मिणि । सतो विशेषणस्याऽत्र नाऽसतस्तैस्तदर्थिभि ॥३५॥ ( यदि यह कहा जाय कि विवक्षा और अविवक्षाका विपय तो असत्रूप है तव उनके आधारपर तत्त्वकी व्यवस्था कैसे युक्त हो सकती है तो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) अनन्तधर्मा विशेष्यमें विवक्षा तथा अविवक्षा जो की जाती है वह सत् विशेषण- की ही की जाती है असत्को नहीं और यह उनके द्वारा की जाती है जो उस विशेषणके अर्थी या अनर्थी हैं-अर्थी विवक्षा करता है और अनर्थी अविवक्षा । जो सर्वथा असत् है उसके विषयमे किसी- का अर्थीपना या अनर्थीपना बनता ही नही-वह तो सकल-अर्थ- क्रियासे शून्य होनेके कारण गधेके सीगके समान अवस्तु होता है।' एक वस्तुमें भेद और अभेदको अविरोध-विधि प्रमाण-गोचरौ सन्तौ भेदाभेदौ न सवृती। तावेकत्राविरुद्धौ ते गुण-मुख्य-विवक्षया ॥३६॥ (हे वीर जिन 1 ) भेद (पृथक्त्व) और अभेद (एकत्व-अद्वैत) दोनो (धर्म) सतरूप हैं-परमार्थभूत हैं-सवृतिके विषय नहीं-कल्पनारोपित अथवा उपचारमात्र नही हैं। क्योकि दोनो प्रमाणके विषय हैं-( इसीसे ) आपके मतमे वे दोनो एक वस्तुमे ३२ समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद २ गौण और मुख्यकी विवक्षाको लिये हुए एकमात्र अविरोधरूपसे रहते हैं-फलत जिनके मतमे भेद और अभेदको परस्पर निरपेक्ष माना है उनके यहाँ वे विरोधको प्राप्त होते है और बनते ही नही।' ( ऐसी स्थितिमे (१) सर्वथा भेदवादी बौद्ध, जो पदार्थो के भेदको ही परमार्थ सत्के रूपमे स्वीकार करते है-अभेदको नही, अभेदको सवृति ( कल्पनारोपित ) सत् बतलाते हैं और अन्यथा विरोधकी कल्पना करते है; (२) सर्वथा अभेदवादी ब्रह्मावती आदि, जो पदार्थो के अभेदको ही तात्त्विक मानते है-भेदको नही, भेदको कल्पनारोपित बतलाते है और अन्यथा दोनोमे परस्पर विरोधकी कल्पना करते है, (३) सर्वथा शून्यवादी बौद्ध, जो भेद और अभेद दोनोमेसे किसीको भी परमार्थ सत्के रूपमे स्वीकार नहीं करते किन्तु उन्हे सवृति-कल्पनाका विषय बतलाते है, और (४) उभयवादी नैयायिक जो भेद और अभेद दोनोको सतरूपमे मानते तो है, परन्तु दोनोको परस्पर निरपेक्ष बतलाते हैं। ये चारो ही यथार्थ वस्तु-तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले सत्यवादी नही है । इन सबकी दृष्टिसे इस कारिकाके अर्थका स्पष्टीकरण निम्न प्रकार है 'अभेद सत् स्वरूप ही है-सवृति ( कल्पना ) के विषयरूप नही, क्योकि वह भेदकी तरह प्रमाण-गोचर है । भेद सत्रूप ही है-सवृतिरूप नही, प्रमाण-गोचर होनेसे, अभेदकी तरह । भेद और अभेद दोनो सत् रूप है-सवृतिके विपयरूप नही, प्रमाण- गोचर होनेसे, अपने इष्ट तत्त्वकी तरह, और इस प्रकार एक अन्य पक्ष भी सग्रहीत होता है, क्योकि उन दोनोको सवृतिरूप बतलाने- वालो एव वस्तुको समस्त धर्मोसे शून्य माननेवालो (शून्यवादियो) - १ यह स्पष्टीकरण श्रीविद्यानन्दाचार्यने अपनी अष्टसहस्री-टीकामें "इति कारिकायामर्थसग्रह" इस वाक्यके साथ दिया है।
कारिका ३७] देवागम ३३ का भी सद्भाव पाया जाता है। ( यहां इन पक्षोके अनुमानोमे जो-जो उदाहरण हैं साध्य-साधन-धर्मसे विकल ( रहित ) नही है, क्योकि भेद, अभेद, उभय और अनुभय एकान्तोके माननेवालोमे उसकी प्रसिद्धि स्याद्वादियोको तरह पाई जाती है।) इस तरह हे वीर भगवन् । आपके यहाँ एक वस्तुमे भेद और अभेद दोनो धर्म परमार्थसत्के रूपमे विरुद्ध नहीं हैं, मुख्य-गौणको विवक्षाके कारण प्रमाण-गोचर होनेसे, अपने इष्टतत्त्वकी तरह। और इसलिये सामर्थ्यने यह अनुमान भी फलित होता है कि जो भेद और अभेद परस्पर निरपेक्ष हैं वे विरुद्ध ही हैं, प्रमाण-गोचर न होनेसे, भेदैकान्ता- दिकी तरह। इति देदागमाप्तमीमासाया द्वितीय परिच्छेद । तृतीय परिच्छेद नित्यत्व-एकान्तकी सदोपता नित्यत्वेकान्त-पक्षेऽपि विक्रिया नोपपद्यते । प्रागेव कारकाऽभाव क्व प्रमाण क्व तत्फलम् ॥३७॥ 'यदि नित्यत्व एकान्तका पक्ष लिया जाय-यह माना जाय कि पदार्थ सर्वथा नित्य है, सदा अपने एक ही रूपमे स्थिर रहता है-तो विक्रियाकी उपपत्ति नहीं हो सकतो-अवस्थासे अवस्था- न्तररूप परिणाम, हलन-चलनरूप परिस्पन्द अथवा विकारात्मक कोई भी क्रिया पदार्थमे नही बन सकती; कारकोका-कर्ता, कर्म, करणादिका-अभाव पहले ही (कार्योत्पत्तिके पूर्व ही) होता है- जहाँ कोई अवस्था न बदले वहाँ उनका सद्भाव बनता ही नहीं- ३ ३४ ममन्तभद्र-भारती [परिन्छेन ३ और जव कारकोका अभाव है तव ( प्रमाताका भी अभाव होनेमे) प्रमाण और प्रमाणका फल जो प्रमिति (सम्यग्ज्ञप्ति यथार्थ जान- कारी ) है, ये दोनो कहाँ बन सकते हैं ?-नही बन सकते। इनके तथा प्रमाताके अभावमे 'नित्यत्व एकान्तका पक्ष लेनेवाले साश्योंक यहाँ जीवतत्त्वकी सिद्धि नही बनती और न दूसरे ही किसी तत्त्वकी व्यवस्था ठीक बैठनी है। प्रमाण और कारको नित्य होनेपर विक्रिया कैसी? प्रमाण-कारकैर्व्यक्त व्यक्त चेदिन्द्रियार्थवत् । ते च नित्ये विकार्य कि साधोस्ते गासनाबहिः ।।३८|| '( यदि साख्यमत-वादियोकी ओरसे यह कहा जाय कि कारण- रूप जो अव्यक्त पदार्थ है वह सर्वथा नित्य है, कार्यल्प जो व्यक्त पदार्थ है वह नित्य नहीं, उसे तो हम अनित्य मानते हैं और इस- लिए हमारे यहाँ विक्रिया वनती है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) इन्द्रियोंके-द्वारा उनके विषयकी अभिव्यक्तिके समान जित प्रमाणो तण कारकोके द्वारा अव्यक्तको व्यक्त हुआ बतलाया जाता है वे प्रमाण और कारक दोनो ही जब सर्वथा नित्य माने गये हैं तव उनके द्वारा विक्रिया बनती कौन-सी है ?- सर्वथा नित्यके द्वारा कोई भी विकाररूप क्रिया नही बन सकती और न कोई अनित्य कार्य ही घटित हो सकता है। हे साधो-वीर भगवन् !-आपके शासनके बाह्य-आपके द्वारा अभिमत अनेकान्तवादकी सीमाके वाहर~~जो नित्यत्वका सर्वथा एकान्त- वाद है उसमे विक्रियाके लिये कोई स्थान नहीं है.-सर्वथा नित्य कारणोसे अनित्य कार्योकी उत्पत्ति या अभिव्यक्ति बन ही नहीं सकती और इसलिये उक्त कल्पना भ्रममूलक है।' कार्यक सर्वथा सत् होनेप- उत्पत्ति आदि नही बनती यदि सत्सर्वथा कार्य पुंवन्नोत्पत्तुमर्हति । परिणाम-प्रक्तृप्तिश्च नित्यत्वेकान्त-वाधिनी ||३९|| कारिका ३८, ३९] देवागम ३५ (यदि माख्योको बोरसे यह कहा जाय कि हम तो कार्य- कारण-भावको मानते है मदादि कार्य है और प्रधान उनका कारण है-इमलिए हमारे यहाँ विक्रियाके बननेमे कोई बाधा नही माती, तो यह कहना अनालोचित सिद्धान्तके रूपमे अविचारित है, क्योकि कार्यको सत् और अगत् इन दो विकल्पोंके अतिरिक्त तीनरी कोई गति नही। ) कार्यको यदि सर्वथा सत् माना जाय तो वह चैतन्य पुरुषको तरह उत्पत्तिके योग्य नहीं ठहरता- कूटस्थ होनेसे उसमे उत्पत्ति जैसी कोई बात नही वनती, जिम प्रकार कि पुरुपमे नही बनती। दूसरे शब्दोमे यो कहिये कि जो सर्वथा सत् है उसके चैतन्यको तरह कार्यत्व नहीं बनता, नैनन्य कार्य नहीं है, अन्यथा चैतन्यरूप जो पुग्प माना गया है उसके भी कायत्वका प्रसग आएगा । अत. जिन प्रकार मवंथा सन्म्प होनेसे चैतन्य कार्य नही है उसी प्रकार महदादिकके भी कार्यत्व नही बनता। जब नई कार्योत्पत्ति ही नहीं तव विक्रिया कमी ? और कार्यको यदि सर्वथा असन् माना जाय तो उसमे सिद्धान्त-विगेष घटित होता है; क्योकि कार्यकारणभावको कल्पना करनेवाले माख्योंके यहाँ कार्य को सत्रूपमे ही माना है-गन-कुसुमके समान असत्रूपमे नहीं।' '( यदि यह कहा जाय कि वस्तुमे अवस्थासे अवस्थान्तर होने रूप जो विवर्त है-परिणाम है-वही कार्य है तो इससे वस्तु परिणामी ठहरी ) और वस्तुमे परिणामको फल्पना ही नित्यत्वके एकान्तको बाधा पहुंचानेवाली ह-सवथा नित्यत्वके एकान्तमे कोई प्रकारका परिणाम, परिवर्तन अथवा अवस्यान्तर वनता ही नहीं।' १ 'अमदकरणादुपादानग्रहणात्मर्वमभवाभावात् । सातम्य (कार्यम्य) शक्यकरणान् कारणभावाच्च सत्कार्यम्" || इति हि गारयाना सिद्धान्त ।' -अष्टसहस्री पृ० १८१
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न हेतु-फल-मावादिग्न्यमावादनन्ययान । मन्तानान्तग्यन्नकः मन्नानम्गदतः पृथक ॥४३॥ 'मोगियाग ) क्षगि फातिमे निरणोपे तुभाष और फलनाव आदि पाभो नी यनते, गयोफि मया अन्यय न होने कारण उन पूतर क्षणोम मातानानारको तरह रायंया भन्यभाव होता है। (गदि यह कहा जाय गिः पूवानर-क्षणांगा मन्नान एक है ना रह टोर नही है; योकि जो एकमन्तान होता उन्नमा-भारती [परिन्छे है वह मनानीले पृथक नहीं होता-नया पृथ्ऋत्पनै उना अस्तित बनना ही नही । 1 नवृति और त्यागे चिति अन्येष्वनन्यगब्दोऽयं मंतिर्न नृपा क्यम् । मुल्यार्थः नवनिर्न भ्गद् विना मुख्यान्न मवृतिः ।।४४|| 'यदि (लोको लोर) यह कहा जाय कि श्त्याने जन्ल्य मानका यह नो व्यवहार है-सया भिन्न वित्त-अगोको वो न्तानने रुपने अनन्य, अनिन्न अथवा एक आत्ना न्हा जाना है-वह संवृति है-काल्पनिक अथवा आग्वारिक है, गत्तनिर नही तो चंग संवृतित्प होनेसे वह मिथ्या क्यों नहीं है? अन्य ही निथ्ण है, और इसलिये उनके आधारभर सन्तान अन्ना जैनी कोई व्न्तु व्ययिन नहीं बननी । यदि संतानको मुल्य यक रूपने माना जाय तो मुख्यार्थ होता है वह सर्वथा संवृतिल्प नहीं होता और यदि संवृतिरूपमे उसे नाना नाय तो संवृत्ति चिना मुख्याने दनती नहीं-मुल्याने विना उपचारकी प्रवृत्ति होतो हो नही जैसे निहा नभाव-विना निहला नि नहीं बनता। ऋतुजोडि-विनय श्वनव्यनी बौज- माना चतुष्कोटेंश्किल्पस्य मन्निपूल्ययोगत । तत्त्वाऽत्यत्मवाच्य चेत्तयो सन्तानतहतो ॥४५॥ 'यहि (बद्धोनो ओरसे ) यह कहा नाय कि कि तब माँ- में चतुष्कोटिविरल्पने कयनका योग है-सत्व-एन्त्यति शिनी भी धनी विषग्ने यह कहना नहीं बन सकता कि वह सत्-रूप है ग सनत्-रूप हैं अथ्वा सत् अनत् दोनो (उभय ) रूप है या दोनोल्प नहीं (अनुस्यरूप ) है, क्योकि सया नत् करने पर कारिता ४६] देवागम उनकी उत्पत्तिके साथ विरोध जाता है, सर्वथा असत् कहनेपर शून्य पक्षमे जो दोप दिया जाता है वह घटित हाता है, सर्वश्रा उभयन्म कहनेपर दोनो दोषोवा प्रमग आता हे और सर्वथा अनु. भय पत्रके लेनेपर वस्तु निविषय, नोरुप, नि स्वभाव अथवा निसान्य ठहरती है और तब उसमें किनी भी विकासको उतात्ति नही बनती-अत उन सन्तान सन्तानीका भी तत्त्व ( एकत्व- अभेद , धर्म तथा अन्यत्व ( नानात्व-भेद ) धर्म (धर्म होनेसे ) अवान्य ठहरता है । तदनुसार उभयत्व-जनुभयत्त्व धर्म भी (अवाच्य ठहरे हैं), क्योकि वस्तुको धर्मको वस्तुने मर्वथा सनन्य (अभिन्न) कहनेपर, वन्तुमायका प्रमग आता है, वस्तुमे गबंधा अन्य (भिग्न) कहनेगर व्यपदेगकी सिद्धि नहीं होती अर्थान् यह कहना नहीं बनता कि अमुक वस्तुका यह धर्म है, सर्वथा नभय ( भिन्नाभिन्न ) कहने पर दोनो दोप आते हैं और मथा अनुभग ( न भिन्न और न अभिन्न ) कनपर वस्तु निशान्य एव नि स्वभाव ठहरती है- इनमे सन्तान-सन्नतिके धर्म-विषयमे कुल भी पाहना नहीं बनता; (तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योकि ) बनायी उपन मानानाम दोग अवक्तव्यचतुष्कोटिविकल्पोऽपि न कथ्यताम् । असन्तिमवस्तु स्याटविशेप्य-विशंपणम् ।।४६॥ 'तब तो (वौद्धोको ) 'चतुष्कोटिविकल्प अयक्तव्य हैं यह भी नहीं कहना चाहिये, -- क्योकि सब धोंगे उक्तिका अयोग बताने अर्थात् गर्वथा अवक्तव्य ( अनभिलाप्य ) का पक्ष लेनेपर 'चतुष्कोटिविकल्प अवफव्य है' यह कहना भो नही बनता, कहनेसे कचिन् वक्तव्यत्वका प्रसग उपस्थित होता है और न कहनेमे दूमगेको उसका बोध नहीं कराया जा सकता। ऐमी स्थितिमे उमके मर्वविकल्पातीत्व फलित होता है। जो सवं विकल्पातीत है वह असर्वान्त ( सब धर्मोंसे रहित ) है और जो असर्वान्त है वह (आकाश-कुसुमके समान ) अवस्तु है, क्योकि उसके विशेष्य- ४० नमन्तभद्र-भारती [परिन्। ३ विशेषणभाव नहीं बनता-न वह विशेष्य है और न विशेषण ।' (और यदि यह कहा जाय कि स्वसवेदनसे विशेषणविशेष्य- रहित ही तत्त्व प्रतिभासित होता है तो वह ठीक नही, क्योकि स्वसवेदनके भी सत्त्व (अस्तित्व) विशेषणकी विशिष्टतासे विशेष्य का हो अवभासन होता है। स्वसवेदनके उत्तरकालमे होनेगले विकल्पबुद्धिमे 'स्वका सवेदन' इस प्रकार विशेषण-विशेष्यनाव अवभानित होता है-स्वमवेदनके स्वरूपमे नहीं। यदि यह कहा जब कि स्वत्तवेदन अविष्य-विशेषणल्प है और वह स्वत प्रति- भासित होता है तो इसने ( भी । स्वतवेदनमे विशेषण-विशेष्यभाव सिद्ध होता है; क्योकि वैसा कहनेपर अविशेषणविशेष्यत्व ही विशेषण हो जाता है।) निषेध नतका होता है अमका नही द्रव्याद्यन्तरभावेन निषेधः सशिनः सतः । असझेदो न भावस्तु स्थान विधि-निषेधयोः ॥४७॥ 'यदि विशेषण-विशेष्यभावको सर्वथा असत् माना जाय तो उसका निषेत्र नहीं बनता, न्योकि ) जो सज्ञी (स्वय-क्षेत्र- काल-भावकी अपेक्षा ) सत् होता है उमीका परद्रव्य-क्षेत्र काल- भावकी अपेक्षा निषेध किया जाता है, न कि असत्का । सर्वथा असत् पदार्थ तो विधि-निषेधका विषय ही नहीं होता जो पदार्थ परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी अपेक्षाके समान स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव- की अपेक्षासे भी असत् है वह सर्वथा असत् है, उसकी विधि कसो ? जितकी विधि नहीं उसका निषेध नही बनता, क्योकि निषेध विधि-पूर्वक होता है। और इसलिये जो सत् होकर अपने द्रव्यादि- की अपेक्षा कयचित् पचव्य है उसीके (परद्रव्यादिकी अपेक्षा निषेध होनेसे ) अवक्तव्ययना युक्त ठहरता है। और जो मन्- पदार्थ स्वदव्यादिकी अपेक्षा कथचित् विशेषण-विशेष्यरूप है उनोके (परद्रव्यादिकी अपेक्षा ) अविष्य-विशेषणपना ठोक घटित होता यारिका ४८] देवागम ४१ बत एकान्तसे कोई वस्तु अवक्तव्य या अविशेष्य-विशेपणस्प नहीं है. ऐमा बौद्धोको जानना चाहिये। अवन्तुको यवक्तव्यता और वस्तुको भवन्तुसा अवस्त्वनभिलाप्य म्यात्सवान्तः परिवर्जितम् । वस्त्वेवाऽवस्तुतां याति प्रक्रियाया विपर्ययात ||४|| 'जो सर्वधर्मोसे रहित हैं वह अवस्त हैं-किसी भी प्रमाणका विषय न होनेसे-और जो अवस्तु है वह (ही सर्वधा) अनभिलाप्य ( अवाच्य ) है न कि वस्तु, क्योकि जो वस्तु है यह प्रमाणके द्वाग परिनिष्ठित (प्रतिष्ठिन ) होनी है और इसलिये मवया अनभि- लाप्य नही होती। '( यदि यह कहा जाय कि सकल-धर्मोसे रहित निरूपान्य वस्तु स्याद्वादियोके द्वारा स्वीकृत नहीं है तब उनका यह वचन कि 'अवस्तु अनभिलाप्य है' युक्त नहीं जान पडता, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि मर्वधर्मोमे रहित अवस्तुका अनभिलाप्यम्पमे कथन पर-परिकल्पनामाप्रसे सम्बन्ध रखता है. न कि प्रमाणवलमे), प्रमाणवलसे तो वस्तु ही अवस्तुताको प्राप्त होती है, प्रक्रियाके विपरीत हो जाने अथवा बदल जानेसे अर्थात् जब किसी वस्तुको म्वद्रव्यादिचतुष्टयलक्षण-प्रक्रिया, जो कि कचिद्रूपको लिये हुए होती है, बदल जाती है-परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी अपेक्षाको धारण करती है-तब वह वस्तु ही अवस्तु बन जाती है। जैसे स्वस्पसिद्ध घटके पटादि-पररूपोकी अपेक्षा-पटादिके किमी भी सपको घट माननेकी दृष्टिसे-अघटपना है ( यदि यह कहा जाय कि वस्तुको ही अवस्तु वतलाना परस्पर विरुद्ध है, क्योकि वस्तु और अवस्तुकी स्थिति एक-दूसरेके परि- हाररूप है-वस्तु अवस्तु नही होती और न अवस्तु कभी वस्तु बनती है तो यह कहना ठीक नही है; क्योकि अभाव-वाचक गन्दोके वचन-द्वारा भी भावका अभिधान ( कथन ) होता है, जैसे
४२
समन्तभद्र-भारती
[परिच्छेद ३
'अब्राह्मणको लाओ' इस वाक्यमे 'अब्राह्मण' शब्द ब्राह्मण-वस्तुके
अभाव ( निषेध ) का वाचक होते हुए भी ब्राह्मणसे भिन्न अन्य,
क्षत्रियादिवस्तुके अभावका वाचक नही किन्तु उनके भावका ही
वाचक है और इसलिये उक्त वाक्यके द्वारा यह समझा जाता
है कि 'ब्राह्मणको नही किन्तु क्षत्रियादिकको बुलाया जा
रहा है,' तदनुसार ही क्षत्रियादिकको लाकर उपस्थित
किया जाता है। इस तरह ब्राह्मण कोई वस्तु है उसोको
'अब्राह्मण' शब्दके द्वारा कचित् अवस्तु कहा गया है, सर्वथा
अभावरूप अवस्तु नही, और इसलिये अवस्तुका आशय यहाँ
अविवक्षित वस्तु समझना चाहिये। अविवक्षित ( गौण ) वस्तु
विवक्षित ( मुख्य ) वस्तुके अस्तित्व ( भाव ) के बिना नहीं बनती
( मुख्याहते गौण-विधिर्न दृष्ट ) और न स्वय अस्तित्व-विहीन
होती है। इसीसे अर्हन्मतानुयायी स्याद्वादियोके यहाँ वस्तुको ही
अवस्तु कहनेमे कोई विरोध नही आता-मुख्य-गौणको व्यवस्था-
विधिसे द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप प्रक्रियाके स्वसे पर और परसे
स्व-रूपमे बदल जानेसे यह सब सुघटित होता है। इसीसे कोई
वस्तु सर्वथा भावरूप नही है, स्वरूपकी तरह पररूपसे भी भावका
प्रसग आनेसे, और न सर्वथा अभावरूप ही है, पररूपकी तरह
स्वरूपसे भी अभावका प्रसग उपस्थित होनेसे । वस्तुको सर्वथा
भाव या सर्वथा अभावरूप माननेसे वस्तुकी कोई व्यवस्था ही
नही वनती। प्रत्येक वस्तु भावकी तरह अभाव-धर्मको भी साथमे
लिये हुए है और वह भी वस्तुकी व्यवस्थाका अग है। उसे छोड
देनेपर वस्तु-व्यवस्था बन ही नही सकती। इसीलिये स्याद्वादियोके
यहाँ अपेक्षावश कथचित् भावाऽभावरूपसे वस्तुका प्रतिपादन
किया जाता है।)
सर्व धर्मोंके अवतव्य होनेपर उनका कथन नहीं बनता
सर्वान्ताश्वेदवक्तव्यास्तेषां किं वचन पुनः ।
संवृतिश्चेन्मृवैषा परमार्थ-विपर्ययात् ॥४९॥
कारिका ५०] देवागम ४३ 'यदि (क्षणिक एकान्तवादी वौद्धोंके द्वारा ) यह कहा जाय कि 'सर्व धर्म अवक्तव्य हैं'-सर्वथा वचनके अगोचर हैं-तो फिर उनका धर्म-देशना-रूप तथा स्वपक्षके साधन और पर-पक्षके दूषणरूप वचन कैसा ?-वह किसी तरह भी नहीं बन सकेगा और एकमात्र मौनका ही शरण लेना होगा, क्योकि 'सर्व धर्म अवक्तव्य हैं। इस कथनमे स्ववचन-विरोधका दोप उसी तरह सुघटित होता है जिस तरह कि कोई अपने मुखसे दूसरोको यह प्रतिपादन करे कि 'मैं सदाके लिये मौनव्रती हूँ, क्योकि उस समय वह बोल रहा है इसलिये उसका सदाके लिये मौनव्रती होना स्वय उसके उस वचनसे ही बाधित हो जाता है। सर्व धर्मोके सर्वथा अवक्तव्य होनेपर उनकी कोई चर्चा वार्ता नही बन सकती, उन्हें अवक्तव्य कहना भी नहीं बनता, अवक्तव्य कहना भी उन्हे वक्तव्य ठहराता है। 'यदि यह कहा जाय कि उक्त वचन सवृतिरूप है-व्यवहारके प्रवर्तनार्थ उपचाररूपको लिये हुए है तो इस सवृतिरूप वचनसे सत्यका प्रतिपादन कैसे हो सकता है ? नही हो सकता, क्योकि मवृति परमार्थके विपरीत-यथार्थताके विरूद्ध-होनेसे स्वय वौद्धोके यहां मिथ्या मानी गई है। सर्वधर्म जव सर्वथा अवक्तव्य है तब वे 'अवक्तव्य है। इस वचनके द्वारा भी वक्तव्य नही वन सकते और न दूमरोको उनका तथा उनकी अववतव्यताका प्रत्यय (वोच ) कराया जा सकता है।' अवाच्यका हेतु अशक्ति, अभाव या अवोध ? अशक्यत्वादवाच्य किमभावात्किमयोधतः । आद्यन्तोक्ति-द्वय न स्याकि व्याजेनोच्यतां स्फुटम् ॥५०॥ 'यहाँ क्षणिक एकान्तवादी बौद्धोंसे पूछा जाता है कि तुम्हारा यह सर्वथा अवक्तव्य कथन किस हेतुपर अवलम्बित है। क्या अशक्तिके कारण?-कथन करनेकी सामर्थ्य न होनेसे गमन्नभद्र-भान्ती पग्न्डेिद:] अवक्तव्य है ?-या अभावके कारण -वस्तु-धर्मका अस्तित्व न होनेने अवस्तव्य है ? जयवा अज्ञानके कारण ?-वस्तुवर्मो. को मनभिनता-अजानकागेमे अवक्तव्य है ? (इन तीन कारणोने भिन्न अन्य कोई कारण नहीं हो सकता, क्योकि मौनव्रत, प्रयो- जनाभाव, भय और लज्जादिक जैसे कारणोका, जो कि इन्द्रिय- ताल्वादिकग्णव्यापारकी अगक्तिमे निमित्तकारण होते है, अगापितमे ही अन्तर्भाव है।) इन तीनोमे आदि और अन्तरे दो कारणोका (अगन्ति तथा बनान) का कथन तो बनता नहीं, क्योंकि बौद्धोने महात्मा बुद्धको प्रज्ञापारमिताके रूपमे सर्वन नाना है और उनमे क्षमा, मंत्री, ध्यान, दान, वीर्य, गील, प्रज्ञा, करुणा, उपाय और प्रमोद नामके दम बल अगीकार किये हैं। ऐमी स्थितिमे उक्त दो कारणोका कथन कैने वन नकता है नहीं बन सकता। तब तीमग कारण ही शेप रह जाता है । अत अवक्तव्यका बहाना बनानेते क्या स्पष्ट कहिये कि वस्तुतत्वका सवथा अभाव ह-किनी भो वन्नुवा कही कोई अस्तित्व नहीं है। ऐमा स्पष्ट कहनेने मायाचारका दोप नही रहेगा, जो कि बुद्धके आप्तत्वमे बाधक पडता है, और तब इस अवक्तव्यवाद बौर सर्वथा अभावत्प शून्यवादमे कोई जन्तर नहीं रहेगा।' भणिकशान्त मे हिना-अहिनादिकी विडम्बना हिनस्त्यनभिमधात न हिनस्त्यभिधमत् । वध्यते तद्वयापेत चित्त बद्ध न मुच्यते ॥५१॥ '(बौदोके क्षण-क्षणमे निरन्वय-विनागरूप मिद्धान्तके अनुनार ) जो चित्त हिताके अभिप्रायसे रहित है वह तो हिंसा करता है, जो हिंसा करनेके अभिप्रायसे युक्त है वह हिंसा नहीं करता, जिसने हिंसाका कोई अभिप्राय अथवा सकल्प नहीं किया और न हिंसा ही की वह चित्त बन्धनको प्राप्त होता है और जो चित्त बन्धनको प्राप्त होता है उसकी मुक्ति नहीं होती--मुक्ति अन्य ? पारित ५२] देवागम अवद्ध-चित्तको होती है, क्योकि हिंसाका अभिप्राय करनेवाला चित्त वसा अभिप्राय करनेके क्षणमे ही नष्ट हो जाता है और उत्तरक्षणने दूसरा चित्त, जिसने हिमाका को इगदा, विचार अयत्रा मकल्प नही किया, उस हिमा-कार्यको करता है, उम हिनक चित्तके तत्क्षण नष्ट हो जानेपर तीनरे क्षणमे तीसरा ही चित्त, जिमने न तो हिमाका कोई नकल्प किया और न हिंगाकार्य ही किया, उम द्वितीय चित्तके हिमाकर्मसे बन्धनको प्राप्त होता है और वन्धको प्राप्त हुए उम तृतीय चित्तके भी तत्क्षण नष्ट हो जानेपर उसे उन पापकर्म बन्धनमे मुक्तिको प्राप्ति नहीं होतो-तव मुक्ति किनको होती है। क्या अवद्ध-चित्तको भी मुनि वनती है ? नहीं बनती। मुक्तिके वन्धपूर्वक होनेमे जब वन्धन ही नहीं तव बन्धनमे छुटकारा पानेरूप मुक्ति केमो ? इस तरह बौद्धोंके यहां ऋतकर्मके फलका नाश और अकृतकर्मक फल-भोगका ऽमग उपस्थित होता है-अर्थात् जिमने कर्म किया वह उनके फलका भोक्ता नहीं होता और जिसने कर्म नहीं किया उने उस कर्मका फल भोगना होता है, जो कि एक उपहासका विपय है। इसके मिवाय जव बद्ध-चित्तको मुक्ति नहीं होती तव मुक्तिके लिये यम-नियमादिका अनुष्ठान व्यर्थ ठहरता है।' नागको निहतुक माननेपर दोपापति अहेतुकत्वान्नाशस्य हिंसाहेतुर्न हिंसकः । चित्त-सन्तति-नाशश्च मोक्षो नाष्टाङ्ग-हेतुकः ॥५२॥ (क्षणिक एकान्तवादी बौद्धमतके अनुसार नाग स्वय होता है, उसका कोई कारण नहीं होता, जव नाशका कोई कारण नहीं होता तव हिंसक हिंसाका हेतु नहीं ठहरता-किसीको हिंसक कहना नहीं बनता। इसी तरह चित्त-सन्ततिके नाशरूप जो मोक्ष माना गया है वह भी अष्टाङ्गहेतुक नहीं बनता। बौद्धोके यहाँ मोक्ष (निर्वाण) को जो सम्यक्त्व, सज्ञा, सज्ञी, वाक्काय-
-
विल्प-कायारम्भाय यहि हेतु-समागमः ।
आश्रयिभ्यामनन्याऽमावविचंपादयुक्तका ५३
' नांदनने मन्त्र अन या निन्न्नाना
चांगनेने कन्याग गई होना नही, द्र) र
बोद्धा हाग विमहमायने आरम्भ लिये तुका मागन
इष्ट किया जाना है- तुर दिन काग .
मानने हेतुन मन्यन्नादि स्ट-गका यागा नना नाना
हैनो वह तुसमागम नाग नग उत्गा बोनोका कारण
होनेने उनका नाप्रयन्त है और इसलि अपने नवी नग
और उन्पाइप दोनो कार्योक नाय ब्लन्यत्प हैको नगर
हार अनाम वायंग हेतु है वही सालो (ने)
ज्या-जाना भी है दोनो कार्गेना हेतु निन्नतिन
होने दोनों लिये न्युनगे नानि-नादायको प्रजनीगनन्ना
गर भरनारे काग-चलानी नरह-एज हो जा ज्यगर
को दिन होता है और इसने चंडोका गार्य भी हे
हनना है जिसे वे नितु नलाने हैं, यह एक तुगप इस
हेतु-नागमको नान्यन में उचित होता है। यदि विना निचे
हेतुन समागम नही, तो उन्पादने लिये भी हेतुना ननागन -7
नगनो, क्रोनि कार्यको इप्टिम-नाग र उत्गद दोनोने गई
नेद न होनेन-एकको निर और नरेने नहेतृक तनाना
क्ति-गन नहीं कहा जा नाना।'
व्याख्या-द्धोंने प्रश्न है कि यदि विनाय निर्हेतुक है,
कारिका ५४] देवागम ४७ - उसका कोई कारण नहीं है, वह स्वरसत होता है, तो कारणो- ( हिंसाजनक हिंसक और मोक्षहेतु सम्यक्त्वादि अष्टाङ्ग ) का व्यापार किसके लिए होता है ? इस प्रश्नका वे यह समाधान करते हैं कि विसदृश-कार्यके उत्पादके लिए कारणोका व्यापार होता है । परन्तु उनका यह समाधान ठीक नही है, क्योंकि कारणोका व्यापार नाश तथा उत्पाद दोनोका जनक होनेसे आश्रय है और आश्रय अपने आश्रयीसे-उत्पाद-नागसे- अनन्य-अभिन्न होता है, भिन्न नही। कारण कि उन दोनोमे परस्पर कोई अन्तर नही है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि अपृथक्-सिद्ध पदार्थोंके कारण-व्यापारमे भेद नही होता। शिंशपा और वृक्ष तथा चित्रज्ञान और नीलादि-निर्भास इन अपृथक्-सिद्ध पदार्थोंसे उनका कारण-व्यापार भिन्न नही है । एक कारण-समूहसे ही उनका आत्मलाभ होता है। वास्तवमे जो पूर्वाकारका विनाश है वही उत्तराकारका उत्पाद है। अत दोनोका कारण एक ही सामग्री है, भिन्न नही। अन्यथा, वैशेषिक मतका प्रसग आवेगा। कैसा आश्चर्य है कि विसदृश- कार्यके उत्पादक कारणोसे विनाशके कारण भिन्न न होनेसे उसे तो निर्हेतुक स्वीकार किया जाता है, और विनाशके कारणोसे उत्पादके कारण भिन्न न होनेसे उसे निर्हेतुक नही माना जाता । अत नाश और उत्पादमे कोई अन्तर न होनेसे दोनोको सहेतुक या अहेतुक मानना चाहिए। एकको अहेतुक और दूसरेको सहेतुक मानना युक्तियुक्त नहीं है। स्कन्धादिक स्थित्युत्पत्तिव्यय नहीं बनता स्कन्ध-सन्ततयश्चैव संवृतित्वादसस्कृताः । स्थित्युत्पत्तिव्ययास्तेषां न स्युः खर-विपाणबत् ॥५४॥ '(जब क्षणिक एकान्तवादी बौद्धोके द्वारा विरूप-कार्या- रम्भके लिये हेतुका समागम माना जाता है तब यह प्रश्न पैदा ४८ समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद ३ होता है कि उस हेतुसे परमाणु-क्षण उत्पन होते है या स्कन्ध-सन्त- तियाँ ? प्रथम पक्ष परमाणु-क्षणोका उत्पन्न होना माननेसे स्थाप्य- स्थापक और विनाश्य-विनाशकभावकी तरह हेतु-फलभावका भी विरोध उपस्थित होता है । तब सहेतुका उत्पत्ति कैसे बन सकती है ? कार्य-कारणके अभाव होनेपर ये स्थिति, उत्पत्ति और व्यय धर्म विरोधको प्राप्त होते है; क्योकि परमाणु निरश होते है। "न हेतु-फलभावादिरन्यभावादनन्वयात्' इस वाक्य-द्वारा ४३वी कारिकाके अन्तर्गत क्षणिक-एकान्तमे पहले ही कार्यकारण-भावका निषेध किया जा चुका है। स्थिति और विनाशकी तरह अहेतुका उत्पत्ति भी नही बनती, क्योकि स्थाप्य-स्थापकके अभावमे जिस प्रकार स्थितिका और विनाश्य-विनाशकके अभावसे जिस प्रकार विनाशका अभाव होता है उसी प्रकार हेतु-फलभावके अभावमे उत्पत्तिका भी अभाव होता है, तब सहेतुका उत्पत्तिको कल्पना कैसी ? यदि दूसरा पक्ष-स्कन्ध-सन्ततियोका उत्पन्न होना-माना जाय तो) स्कन्ध-सन्ततियां बौद्धोके यहाँ परमार्थसत् न होनेसे असस्कृत हैं-अकार्यरूप है तब उनके लिये हेतुका समागम कैसा? साध्यके अभावमे साधनका भी अभाव होता है। अत (रूप, वेदना, विज्ञान, सज्ञा और सस्कार रूपमे माने गये) बौद्धोके जो पाँच स्कन्ध है वे कोई पारमार्थिक सत् न होकर सवृतिरूप- कल्पना-मात्र हैं उनके स्थिति, उत्पत्ति और विनाशका विधान गधेके सोंगकी तरह नहीं बनता।-गधेके सीगका सद्भाव न होने- से जैसे उसमे स्थिति, उत्पत्ति और विनाश ये तीनो घटित नही होते वैसे ही परस्पर असबद्ध रूप-रस-गन्ध-स्पर्शके परमाणुरूप 'रूपस्कन्ध', सुख-दु खादिरूप, 'वेदनास्कन्ध' सविकल्पक और निर्विकल्पक ज्ञानके भेदरूप विज्ञानस्कन्ध, वृक्षादि वस्तुओंके नाम (शब्द) रूप सज्ञास्कन्ध और ज्ञान-पुण्य-पापकी वासनारूप सस्कार- स्कन्ध जब वास्तविक न होकर काल्पनिक हैं तो उनके स्थिति- उत्पत्ति और विनाश ये तीनो घटित नहीं होते और इनके घटित कागि ५५ ५६] यागम न होनेसे वे कोई कार्य नहीं रहते तब उनके लिये हेतु-समागमको कल्पना ही व्यधं ठहरती है।' उभर तारा अवनतीनो ममोपता विगेधान्नोभयंकात्म्यं स्याद्वाद-न्याय-विद्विपाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्यक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥५५॥ 'यदि नित्यत्व और अनित्यत्व दोनो एकान्तपनोको एक स्पमे माना जाय तो यह बात स्यानादन्यायके यिपियोफे-मवंधा एकान्तवादियोंकि-यहा बनतो नहीं, क्योकि इस मान्यतामे विरोध दोष माता है-जैमा कि एका माथ जीने-मरनेमे विरोर है वैसा ही विगेष यहाँ भी घटित होता है।' । यदि दोनो एकान्तोका तादात्म्य माना जाय तो नित्यत्व और ननित्यत्व दोनों या तो नित्यत्वमा परिणत हो जायेंगे या अनित्यत्वम्पर्म, क्योनि तादात्म्यावस्थामे विरोधी स्थिति न रहकर एव ही स्थिति हो जाती है। जब नित्यत्व-अनित्यत्वरूप दोनो एकान्तोमैंने किसी एक ही एकान्तकी स्थिति रही तब युगपत् उभय एकान्नीकी मान्यता विरुद्ध ठहरती है।) 'यदि (नित्यत्व व भनित्यत्व दोनो एकान्तोकी मान्यताम विरोधको उपस्थितिके भयसे) अवाच्यता (अनभिलाप्यता) का एकान्त माना जाय तो वह भी नहीं बनता, क्योकि मर्वथा सवाच्यका सिद्धान्त माननेपर 'तत्त्व सर्वथा अनभिलाप्य है' ऐसा अभिलाप (वचन-व्यवहार करनेवाले बोरॉफे स्वयचनविरोध उपस्थित होता है उसी प्रकार जिस प्रकार कि उस पुरुपके उपस्थित होता है जो यह कहे कि 'मै सदा मौनव्रती हूँ', क्योकि उमका वैमा कहना उसके सदा मोन-तका विरोधी है।' नित्य-क्षणिक-एकान्तोकी निर्दोप व्यवस्थाविधि नित्य तत्प्रत्यभिज्ञानान्नाकस्मात्तदविच्छिदा। क्षणिक कालमेदाते युद्धथसचरदोपतः ।।५६।।
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समागम मारिका ५८] अवस्थामो अथवा पूर्वोत्तर पर्यायोमे साधारण स्वभावरूपगे रहने- वाले द्रव्यको दृष्टि से न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है और न विनाशको प्राप्त होती है, क्योकि प्रकट अन्वयरूप है-वस्तुपा नामान्य स्वस्र जो द्रव्यस्वभाव है यह उसको नव अवस्थानाम मदा स्थिर रहता है।" ( यदि यह कहा जाय कि काटे हुए नया फिरसे उपजते है, उनमे अन्वयके दर्शन-दाग व्यभिचार-दोष आता है, क्योकि उनमे उत्पत्ति और विनाश दोनो दिखाई पड़ते है जब कि अन्वय के कारण वे दोनो न होने चाहिये थे, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है. कारण कि अन्वयकै माय 'व्यक्त' विगेषण लगा हुआ है, जो इम वातका सूचक है कि एकत्वान्वय प्रमाणसे बाधित नहीं होना चाहिये । यहां ये नखादिक वे ही हैं ऐमा एकत्वान्वय प्रकट-प्रमाण- मे बाधित है, क्याकि उत्पन्न नखादिकवे ही न होकर उनको सहम है जो कट चुके हैं।) विशेषरपसे-पर्याय अथवा व्यनिकको दृष्टिमे-वस्तु विनशती तया उपजती है। एक वस्तुमे युगपत् उत्पाद, व्यय और प्रीव्यका हाना 'सत्' कहलाता है-जैसाकि मूषकारके उत्पाद-व्यय-नोव्ययुक्त मन्' इम वननगे भी जाना जाता है।' उपादादिशी भिन्नता और निरपेक्ष होगपर अयस्तता कार्योत्पादः क्षयो हेतोनियमाल्लक्षणात्पृथक् । न तो जात्याद्यवस्थानादनपेक्षाः सपुष्पवत् ॥५८|| 'हेतुका-उपादानकारणका-जो क्षय है-पूर्वाकारने विनाग है वह उत्तराकाररूप कार्यका उत्पाद है; क्योकि धोनोके एक हेतुका नियम है-जो हेतु उत्पादम्प कार्यके उत्पादका है वही उपा- दानके विनायका हेतु है। इससे बौद्धोका उत्पादको महेतुक और विनाशको निर्हेतुक बतलाना वाधित ठहरता है। (इस पर यदि ५२ समन्तभद्र-मारती [परिच्छेद ३ यह कहा जाय कि उत्पाद और विनाग दोनोका एक ही हेतु होनेपर दोनो अभिन्न व्हरते हैं, तो यह ठीक नहीं, क्योकि उत्पाद और विनाश दोनो लक्षणभेदने कारण एक दूसरेते रूपंचित् भिन्न हैं कार्योत्पादका लक्षण स्वरूपलाभ है और हेनुनयका लक्षण स्वभावप्रच्युति है। इस तरह भिन्न लक्षणसे लक्षित होनेके कारण दोनो कथचित् भिन्न है-सर्वथा भिन्न नही। जाति आदिके अवत्थानके कारण नाश और उत्पाद दोनो भिन्न ही नहीं, कथचित् अभिल्ल भी हैं, क्योकि मिट्टी आदि द्रव्यके बिना घटका नाग और कपालका उत्पाद नही बनता-जाग और उत्पाद दोनो पर्यायकी अपेक्षाले हैं, जात्यादिके अवस्थानरूप सद्- द्रव्यको अपेक्षासे नही। सद्रव्य मिट्टो आदि है, वही घटाकार रूपसे नष्ट हुई और कपालके रूपते उत्पन्न हुई, ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर अपेक्षा न रखें, तो तीनो ही आकारके पुष्पके समान अवस्तु व्हरें स्थिति और ग्निागके बिना केवल उत्पाद नही बनता, नाग और उत्पादके बिना स्थिति नही बनती और स्थिति तथा उत्पादके बिना विनाश नही बनता। इससे यह स्पष्ट फलित होता है कि जो सत् है वह उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसे युक्त है, अन्यथा उसका तत्व ही नही बनता, वह नाकाराकुसुमके सहा अवस्तु ठहरता है।' एक न्यकी नागोत्पादस्थितिमे भिन्न भावोनी उत्पत्ति घट-मौलि-सुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् । गोक-प्रमोद-माध्यस्थ्य जनो याति सहेतुकम् ।।५९।। '(सुवर्ण घटको तोडकर मुकुटके बनाये जानेपर ) नाश उत्पाद और स्थितिको जो अवस्थाएं होती हैं, उनमे यह घटका अर्थी जन शोक (विषाद) को, मुकुटका अथो हर्षको और सुवर्णका कों शोक तथा हर्षसे रहित मध्यस्थ-भावको प्राप्त होता है और कारिका ५८] देवागम ५३ यह सब सहेतुक होता है-घटा के शोकका कारण घटका नाश है, मुकुटा के हर्षका कारण मुकुटका उत्पाद है और सुवणार्थीके मध्यस्थ-भावका कारण सुवर्णकी स्थिति है-जो सुवर्ण घटके रूपमे था वही मुकुटके रूपमे विद्यमान है, इससे उसके लिये शोक तथा हर्षका कोई कारण नहीं रहता। बिना हेतुके उन घट-मुकुट- सुवर्णाथियोंके शोकादिकी उत्पत्ति नही वनती।' (बौद्धोका जो यह कहना है कि विषादादिके कोई हेतु नही होते, किन्तु पूर्वविषादादिके वासनामात्र-निमित्तसे विषादादिक उत्पन्न होते हैं, वह ठीक नही, क्योकि पूर्वविषादादिके वासनामात्र निमित्तके होते हुए भी उन विषादादिके नियमका सभव नही।) इस तरह लौकिक जनोकी उत्पादादि-विषयक-प्रतीतिके भेदसे यह सिद्ध है कि वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ऐसे तीन रूपमे व्यवस्थित है। अब एक दूसरे दृष्टान्त-द्वारा इस विषयको और स्पष्ट किया जाता है। वस्तुतत्त्वकी त्रयात्मकता पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोति दधिव्रतः । अगोरसवतो नोभे तस्मात्तत्त्व त्रयात्मकम् ।। ६०॥ 'जिसके दुग्ध लेनेका व्रत है-आज में दूध ही लूंगा ऐसी प्रतिज्ञा है-वह दही नहीं खाता, जिसके दही लेनेका व्रत है वह दुग्ध नहीं पीता और जिसका गोरस न लेनेका व्रत है वह दूध-दही दोनों ही नहीं खाता। इससे मालूम होता है कि वस्तुतत्त्व त्रयात्मक है-युगपत् उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप है।' व्याख्या-एक ही वस्तुमे प्रतीतिका नानापन उस वस्तुके विनाश, उत्पाद और स्थिति (ध्रौव्य ) का साधक जान पडता है-जो दूधरूपसे नाशको प्राप्त हो रहा है वही दधिरूपसे उत्पद्य- मान और गोरसरूपमे विद्यमान (ध्रौव्य ) है, क्योकि दूध और ..
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कारिया ६.] देवागम ५५ कर्मत्पत्रिक है उसका एक-दूसरेसे अन्यत्व इष्ट किया जाता है (तो उसमे जो वाधा आती है उमे आगे बतलाया जाता है।) व्याया-यहां वैशेषिकमतानुसार 'कार्य' शब्दसे चलनादि क्रियाल्प कर्मका, तन्तु आदि अवयवरूप कारणके अवयवीका, सयोगादिन्प अनित्य गुणका और प्रध्वसाभावका ग्रहण है, 'कारण शब्द नमवायीका. समवायिवान्का ( कर्मवान्का, अनित्यगुणवान्- का, पटादि अवयवोका ) और प्रध्वमके प्रति कारणका वानक है, 'गुण' मन्द नित्य-गुणका, 'गुणो' गन्द गुणके आध्यभृत द्रव्यका, 'मामान्य' शब्द पर-अपर-जातिका और 'सामान्यवान्' शब्द द्रव्य- गुण-कर्मरूप अर्थका वोधक है। वैशेपिकमतका कथन है कि त्रिया-क्रियावान्का, ममवाय-ममवायोका, अवयव-अवयवीका, गुण-गणीका, विशेषण-तद्विशेष्यका, सामान्य-नसामान्यवान्का और अभाव तद्विशेष्यका एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्नपना ही है; क्योकि उनका भिन्न प्रतिभाम होता है, सद्याचल-विन्ध्याचलकी तन्ह । अपने इम 'भिन्नप्रतिभासत्व' हेतुको असिद्ध-विरुद्धादि दोषोसे रहित सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है और उस प्रयत्नमे एक वान यह भी कही गई है कि कार्य-करणादिका लक्षण एक दूसरेसे भिन्न है और वह भिन्न-लक्षण भिन्न प्रतिभासका हेतु है, वस्तु यदि एक है तो उसका भिन्न-लक्षणमे प्रतिभास नही होता। इससे भिन्न-प्रनिमाम हेतु विरुद्ध नही है, क्योकि भिन्नलक्षणलक्षित विपक्षम उसको वृत्तिका अभाव है। दूसरी बात यह भी कही गई है कि जिनका ऐसा अनुमान है कि कार्य-कारणका, गुण-गुणीका तथा मामान्य-सामान्यवान्का एक-दूसरेके साथ तादात्म्य है- अभेद है, क्योकि उनका देश (क्षेत्र) अभिन्न है। जिनका तादात्म्य नही होता उनका देश अभिन्न नही होता, जैसे कि सह्याचल और विन्ध्याचलका । प्रकृत कार्य-कारणादिका देश अभिन्न है । अत उनका तादात्म्य है, और इस अनुमानसे वे कार्य-कारणादिको - ५६ ममन्तभद्र-भारती परिच्छेद ४ भिन्नताके एकान्तको वाधित ठहराते हैं, वह ठीक नही है, क्योकि देशाऽभेद दो प्रकारका है-एक शास्त्रीय और दूसरा लौकिक ! कार्य-कारणादिका शास्त्रीय देशाऽभेद असिद्ध है-गास्त्रकी अपेक्षा- से पटादिरूप कार्यका स्वकीय कारण तन्तुसमूह और तन्तुओका कारण कपासादि इस तरह सबका स्व-अन्य-कारणदेशकी दृष्टिसे देशभेद ही है। लौकिक देशाऽभेदका आकाग-आत्मादिके साथ व्यभि- चारदोष घटित होता है, क्योकि लौकिक देशकी अपेक्षा आकाश और आत्मादिके भिन्त-देशका अभाव होने पर भी उनका तादात्म्य नहीं है। उक्त मिन्नतकान्तमें दोष एकस्याऽनेक-वृत्तिर्न भागाऽभावाद्वहूनि वा । भागित्वाद्वाऽस्य नैकत्व दोपो वृत्तेरनाईते ॥६॥ (यदि वैशेषिकमतानुसार कार्य-कारण, गुण-गुणी और सामा- न्य-सामान्यवान्को सर्वथा एक दूसरेसे भिन्न माना जाय तो ) एक- की-पटादि अवयवीरूप कार्य-द्रव्यादिकी-(अपने आरम्भक तन्तु आदि) अनेकोमे-कारणादिकमे-वृत्ति-प्रवृत्ति नहीं बनती, क्योकि उस एकके विभागके अभावसे निरशपना माना गया है-जवकि वृत्ति होनी चाहिये, अन्यथा कार्य-कारणभावादिका विरोध उसी तरह घटित होगा जिस तरह अकार्य-कारणरूप तन्तु-घटका और मृत्पिण्ड-पटका कार्य-कारणभाव विरुद्ध होता है। यदि ( अवयवो आदि ) एकको भागिस्वरूप आश्रित करके वृत्ति मानी जाय तो इससे एकका एकत्व स्थिर नही रहता-वह विभक्त होकर बहुरूपमे परिणत हो जाता है । इसके सिवाय यह प्रश्न पैदा होता है कि एककी अनेकमे वह वृत्ति तन्तु आदिके लक्षण आधारके प्रति एकदेशरूपसे होती हैं या सर्वात्मक रूपसे ? एक देशरूपी वह नही वनती, क्योकि एक पटादि कार्यद्रव्यके निष्प्रदेश होनेसे तन्तु ५७ कारिफा ६३] देयागम मादि अनेक अपिकरणोमे उसका वर्तना नहीं बनता और प्रत्येकमे सर्वात्मकरूपसे वृत्तिके होने पर एक अवयवी आदिके यहत्वका प्रसग उपस्थित होता है-जितने अवयव उतने ही अवयवी ठहरते है, जितने सयोगी आदि गुणी उतने ही अनेक अवयवामं स्थित नंयोगादि गुण ठहरते हैं और जितने सामान्यवान अर्थ उतने ही सामान्य होने चाहिये । परन्तु ऐसा नहीं है। अत एफको अनेकमे सर्वात्मक अथवा सर्वदेश वृत्ति माननेसे, आहतमतसे भिन्न जो सर्वथा एकान्तमत है उसमे दोष आता है। इस तरह एककी अनेकमे वृत्तिका मानना और न मानना दोनो ही सदोष ठहन्ते है। एकदेशप और मर्वात्मक वृत्तिसे भिन्न वृत्तिका अन्य कोई प्रकार नहीं है।' ( यदि वैगेपिकमतकी मान्यतानुसार नमवाय-सम्बन्धको प्रकागन्तर माना जाय-यह कहा जाय कि समवाय-सम्बन्धक कारण अवयवी आदि अवयवादिकमे वर्तता है, बिना नमवाय- सम्बन्धके वर्तनके अर्थका अभाव है तो यह कहना भी ठीक नही है, क्योंकि यहाँ भी वही प्रश्न पैदा होता है कि अवयवी आदिकी अवयवादिकमे वह ममवायवृत्ति एकदेग है अथवा मत्मिक ? और दोनोमे से किसी भी प्रकारकी समवायवृत्तिको मानन पर वही दोप घटित होता है, जिसे ऊपर बतलाया गया है।) देश-काल-विशेपेऽपि स्यावृत्तियुत-सिद्धवत् । समान-देशता न स्यान्मूर्तकारण-कार्ययोः ॥६३।। ( यदि अवयवादि और अवयवी आदिमे सर्वथा भेद स्वीकार किया जाय तो) देश और कालकी अपेक्षास भी उनमे-अवयवादि और अवयवी आदिमे-भेद मानना पड़ेगा और तव युत-सिद्धके समान-पृथक्-पृथक् आश्रयमे रहने वाले घट-वृक्षकी तरह- उनमे भी वृत्ति (समवाय-सम्बन्धको वर्तना) माननी होगी। - "
मनमा-मारली
परिच्छेद ४
( मन.) तिन कारण और कानें नो मन्नान (अन्ति)
केगता-एकनागतातो जाती है वह नहीं मनोगी।'
व्याय-अन्यत्रादि और अन्यत्री आन्नेि नानानने
पर उनन गनेन और काल्मेट भी मानना पड़ेगा और उनका
नबन्ध युत-निद्रों ना होगा; तब उनमें अनिनन्गना कनेकन
पक्रनी है ? यह गत वैगेषिकोंजो नोच्नेको है।
ग्धति आत्मा और आज्ञागने अत्यन्त न होने पर नो उनने
नगमे । आन नामे है और इसलिये यह अत्यनने
कार्यकारणले ग और कान मेनका नियानर नहीं है, तथापि
नता नास्त्र आदि सपने मात्मा और आनागने मो ग्लन्तने
अनिद्ध है। अत एक उनने अनिनन्ग और अनिकालने होने
मोई बाधा नहीं है।
नागरि-मागन्त मानव्यं नमारिनाम् ।
न्ययुक्तः च नम्बन्धो न युक्तः नमवारिमिः ॥६४||
'यदि ऐना नहा जाय कि नन्दादिशेने-अवयन-अवयन
(नन्द्र-पट) आदिने-(नमवाने वाग) अमराजयोनार
होन्म कारण स्वतन्त्रता नहीं है, जिनने मे कालको अपेक्षा
होनेपर गै वृत्ति ( नमवाय-नबन्ध-उतना ) नतो, तो यह
हना कीन नहीं है। (योनि तक यह प्रश्न उठता है कि वह
नमगव मनगरिओने चत बनता-मन्बन्वित होता है या अन्य
नन्त्राग्ने तिन-मन्त्रित होता है। गद चत सम्बन्धित
होना नो प्ति अवश्त्री ने अपने अवयवोंने स्वन मन्त्र हो
नायगा, उनके लिये एक अलग नमवायको व्यर्थ कल्पना ज्या
ननीजा? यदि अन्य नमवायने यह सम्बन्धिन होता है तो वह
अन्य समनगर को अन्य तृतीयचे और तृतीय भी अन्य चतुर्थ
सुन्वयित नानना पड़ेगा और इस तरह अनेक समगणेची कल्पना
कारिका ६५ ] देवागम ५९ करनेपर एक समवायकी मान्यता वाधित ठहरेगी और अनवस्था- दोषका प्रसग भी उपस्थित होगा।) ( यदि यह कहा जाय कि समवाय अनाधित होनेसे सम्बन्धा- न्तरकी अपेक्षा नहीं रखता, किन्तु असम्बद्ध ही रहता है, तो यह कहना उचित नहीं; क्योकि ) जो स्वय असम्बद्ध ( सम्बन्ध रहित) है वह एक ( अवयवो ) का दूसरे ( अवयवो ) के साथ सम्बन्ध कैसे करा सकता है ? सम्बन्धरहित होनेकी हालतमे वह दूसरे (द्रव्यादि ) के साथ कैसे रह सकता है ? नही रह सकता।' सामान्यं समवायश्चाऽप्येकैकत्र समाप्तितः । अन्तरेणाऽऽश्रय न स्यान्नाशोत्पादिपु को विधिः॥६५॥ "जिस प्रकार सामान्य आश्रयके विना नहीं रहता, उसी प्रकार समवाय भी आश्रयके बिना नहीं रहता । जब सामान्य और समवाय दोनोको प्रत्येक द्रव्यादि नित्य व्यक्तियोमे समाप्ति-पूर्णता होती है तब नाश हुए तथा उत्पन्न हुए अनित्य कार्योंमे उनके सद्भावको विधि-व्यवस्था कैसे बन सकती है ?-नही वन सकती। व्याख्या-जहां एक व्यक्तिका उत्पाद हुआ वहाँ पहलेसे न सामान्य है और न समवाय, क्योकि उनका वहाँ कोई आश्रय नही है और ये दोनो विना आश्रयके नही रहते । अन्यथा अनाश्रित होनेका प्रसग आयेगा। यह भी सम्भव नही कि वे अन्य व्यक्तिसे पूर्णरूपमे या अशरूपमे आते है, क्योकि पूर्वाधार- का अभाव तथा सामान्य एव समवायमे साशपनेका प्रसग आवेगा। स्वय पीछे उनका उत्पाद भी सम्भव नही है, अन्यथा वे अनित्य माने जायेंगे। आश्रयके नाश होनेपर भी उनका नाश नही होता; क्योकि वे नित्य है और आश्चर्य यह कि प्रत्येकमे पूर्ण रूपसे रहते है। साराश यह कि सामान्य और समवाय इन दोनो नन्न्तन्द्र-भारती [रिनं ४ पक्षायोंका नित्य व्यक्तियोमे सल निद होने पर भी निच रक्तियोंने उनका सद्भाव सिद्ध नहीं होता, जबकि वैगेषिक इन दोनोको नित्य, व्यापन और एक एवं प्रत्येक्ने पूर्णपने ध्यान नानते है, जो स्पष्टन गुक्ति और प्रतीति विद्ध है। सर्वथाश्नभिसम्बन्धः सामान्य-समवाययोः। तास्यामोंन सम्बद्धन्तानि त्रीणि ख-पुष्पवत् ॥६६|| ( वैषिक मतानुसार ) जर सामान्य और समवाय दोनों सर्वया अनभितम्बन्ध है-परस्परमे एकका दूसरे साथ नगेगादि- रूप कोई प्रकासा भी सम्बन्ध नहीं है तव उन दोनों साय द्रव्य गुण और कर्मरूप को अर्थ है उनका भी सम्बन्ध नहीं हना। ( बार इलिये सामान्य, समवाय तथाW चे नीती हो आकाश-पृष्पके समान स्वस्तु कहते हैं ज्योनि सता और सन्तुना नून-रोमादिनी नन्ह कोई भीलन नहीं बन सन्ता।' अन्ता- जननी जनता अनन्यतैकान्तेऽणूनां सघातऽपि विभागवन् । अमहतत्व न्याभूतचतुष्ज-भ्रान्निग्ध या ॥३७॥ 'यदि । गैद्ध-मनानुमान ) परमाणुओकी इतन्यताका अक्त्याने स्वणन्नन्परिगननल्प अन्यन अन्ना- एकान्त माना जाय तो लवल्रमे उन मिलनेर भी न मिल्ने- को भ्रान्तिमे परस्पर तबद्धता रहेगी और ऐना होने पर बोटाने द्वारा प्रनिपादित जो मनचनुक हैनन्ना ने ल, ग्नि औरगर ऐ- गर इसने जो कार्य है- वह ( वास्तन्कि न होरर । श्रानरूप ही होगा। । यदि मन- ऋतुष्टयसो त्रान्तिल नगना जाग्गा तो गणुगेग माना- वस्य नन्तर नगनना होगा और मा मानने पर ग अनत्यत्ताका एकान्त नहीं बन पगा।) . , पति:८,६९] देशागम मासान्तिम कामति भयागामात काय-भान्तरणु-भ्रान्तिः कार्य-लिङ्गं हि कारणम् । उमयाऽभावतम्नत्य गुण-जातीतरच न ॥६॥ भूतचतुष्फरप-कार्य भ्रानिप होनसे तमारण परमाणु भी भान्तिस्प व्हरेंगे-नय वस्तुत उनको गस्तित्व-निद्धि भी नहीं बननांगी पयोफि कारण कार्य-निङ्गक शोना है-पागंगे ही उसे जाना गता अपना अनुमान किया गना। कार्य-कारण दोनों भ्रान्तिरूप अभाग्ने उनमे रहनेयाले गुण-जानि शियादिफ भी नहीं बन ममग-जमे गगनगुगुमा अभावगे उनकी कोई गन्ध भी नही वनस्पती। माना HTTERT.. एकन्वेऽन्यतगभाव पाऽमायोऽविनाभुवः । हिन्व-मस्या-विरोधश्च संवृतिश्चन्मृपेव सा ||६|| यदि नाग्यमनानुनार । कार्य-पारणदफा मया एफस्य माना जाप-कार्य जी महन् आदि और कारण जो प्रधान दोनोग तादात्म्य अगीकार लिया जाय तो एपको मान्यतापर दूसरेका अनाव व्हरेगा-प्रधानप गणगी मान्यनापर महत् आदिन्ग कायंकी पृथक् को मान्यता नहीं बन मोगी, दोनोंकि मवथा एव होने । माय ही कार्य अभावपर गेप जो कारण उनका भी अभाव ठहरेगा, क्योंकि कार्यका कारण माघ अविनाभाव-सम्बन्ध है, कारण कार्यकी अपेक्षा रखता है, सर्वथा कार्यका अभाव होनेपर कारणत्व बन नहीं सकता और इस तरह सबके अभावका प्रमग उपस्थित होता है। इसके मिवाय, (यदि यह कहा जाय कि महत् आदि कार्यका प्रधानरूप-कारणमे अनुप्रवेग हो जानेमें उत्तर-सृष्टिक्रमकी अपेक्षा पृथक्सत्तारूप - नन्द्रमान्ती [परिच्छेद ४ भेदका लभान होनेपर भी कारण तो एक रहता हो है-नित्य होनेने उनका अभाव नहीं होता, तो) दोको सल्याका विरोध उपन्चित होता है-कार्य और कारण सर्वथा एक होनेपर यह पाप है और यह कारण है ऐसे दोको सख्याना निदेन नहीं बन सन्ता, जैने कि वस्तुके सर्वथा एक होनेपर उनमे कार्य-भाग- भाव नहीं बनता। यदि द्वित्व-सख्याको सवृतिल्प बस्ति ज्यबा औपचारिक हो माना जाय तो यह सवृति ( परमायके विपरीत हानेते ) जब मृपा ही है तब द्वित्व-संख्या भी वृश ही हरतो है-ऐसी यितिम प्रधानकी जानकारीत होतो? प्रत्यमले वह हो नहीं सकती, क्योकि प्रधान जना निर नहीं। अनुमानने भी नही हो सकती, क्योकि कान्त निङ्गका अभाव है। आगमले भी नहीं बन सकती, ज्योकि गजेनी शान्त नाना गण है, और भ्रान्तलिङ्गले अभ्रान्त नानो मिहि होती नहो, निहि मानने पर अतिप्रतग-दोष उपस्थित होता है।' ( इसी प्रकार पुरुष लार चैतन्य जो आश्य-आश्रयोल्प हैं उनकी एकता माननेपर एक दूसरेका जभान हरता है, पुरुषमे चैतन्यके अनुप्रवेशपर पुरुषनाका बार चैतन्यने पुरुषके अनुप्रवेश- पर चैतन्यमात्रका प्रसग उपस्थित होता है और इससे सांल्यमता नुयायिओके यहां सर्वथा एकत्वको मान्यतापर पुरुष और चैतन्य इन दोमेसे किसी एकका अभाव सिद्ध होता है । दो से एकका अभाव होनेपर शेषका भी जमाव व्हरता है, क्योकि दोनोमे परस्पर अविनाभाव-सम्बन्ध है। पुरुष आश्रय है और चैतन्य रूभाव उसका आत्रयो है-आप्रयके बिना आप्रयोका और जाचीके बिना आश्रयना कोई अस्तित्व नहीं बनता। दोनोंके ग एक होनेपर द्वित्वसंख्य भी नहीं बनती और द्वित्वसंख्यामे माको कल्पना करनेपर भून्यताका प्रसग आता है, क्योकि कारिका ७०] देयागम ६३ परमार्थत द्वित्वसत्याके अभावपर सख्येय जो पुरुष और चैतन्य उनको भी कोई व्यवस्था नही बनती-ऐसी कोई वस्तु ही सम्भव नही जो सकलधर्मोसे शून्य हो। मत सान्योका यह कार्य-कार- णादिकी अनन्यताका एकान्त भी वैशेपिकोके अन्यता एकान्तमी तरहसे नहीं बन सकता। उक्त उमय तया अवक्तव्य कान्तोकी मदोपता है विरोधान्नोभयेकात्म्य स्याद्वाद-न्याय-विद्विपाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यने ।।७०॥ 'यदि कार्य-कारणादिको अन्यता और अनन्यताके दोनो एकान्त एक साय माने जाय तो वे स्याद्वाद न्यायफे विद्वेषियोंके-सर्वथा एकान्तवादियोंके यहां युगपत् नहीं बन सकते, क्योकि उनमे परस्पर विरोध होनेसे उनका एकात्म्य अथवा तादात्म्य असभव । यदि अवाच्यता ( अनभिलाप्यता ) फा एकान्त माना जाय- कार्य-कारणादिका भेद-अभेद सर्वथा अवाच्य है ऐसा कहा जाय- तो यह कहना भी नहीं बन सकता; क्योकि इस कहनेसे वह वाच्य ( अभिलाप्य ) हो जाता है। और जब यह कहना भी नहीं बन सकता तव नवाच्यतैकान्त-सिद्धान्तका परको प्रतिपादन कैसे बन सकता है ? नहीं बन सकता। ( यदि वौद्धोके द्वारा यह कहा जाय कि परमार्थसे तो वचन- द्वारा किसी भी पदार्थ अथवा मिद्धान्तका प्रतिपादन नही बनता- मवृतिके द्वारा हो वनता है, तो सवृतिके स्वय मिथ्या होनेमे उसके द्वारा सत्यसिद्धान्तादिका प्रतिपादन कैसे बन सकता है ? नही बन सकता। अतः मवृतिरूप-वचनके द्वाग प्रतिपादन करनेपर भी अवाच्यताका एकान्त स्थिर नहीं रह सकता।) एकता और अनेकताकी निर्दोप व्यवस्था ६४ समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद ४ द्रव्य-पर्याययोरैक्य तयोरव्यतिरेकत । परिणास-विशेषाच्च शक्तिमच्छक्ति-भावतः ॥७१।। सज्ञा-सख्या-विशेषाच्च स्वक्षण-विशेषतः । प्रयोजनादिभेदाच्च तन्नानात्व न सर्वथा ॥७२।। 'द्रव्य और पर्याय दोनो ( कथचित् ) एक है, क्योकि इनके (प्रतिभासका भेद होनेपर भी ) अव्यतिरेकपना है—अशक्य- विवेचन होनेसे सर्वथा भिन्नताका अभाव है। तथा द्रव्य और पर्याय (कथचित्) नानारूप हैं-एक दूसरेसे भिन्न है, क्योकि दोनोमे परिणाम-परिणामीका भेद है, शक्तिमान-शक्तिभावका भेद है, संज्ञा ( नाम ) का भेद है, सख्याका भेद है, स्वलक्षणका भेद है और प्रयोजनका तथा आदि शब्दसे काल एव प्रतिभासका भेद है । इससे द्रव्य और पर्याय दोनो सर्वथा एकरूप नहीं और न सर्वथा नानारूप ही है-दोनोमे कथचित् भेदाऽभेदरूप अनेकान्तत्व प्रतिष्ठित है।' व्याख्या-यहाँ 'द्रव्य' शब्दसे गुणो, सामान्य तथा उपादान- कारणका और 'पर्याय' शब्दसे गुण, व्यक्ति-विशेष तथा कार्य- द्रव्यका ग्रहण है। 'अव्यतिरेक' गब्द अशक्य-विवेचनका वाचक है, जिसका अभिप्राय यह है कि एक द्रव्यको अन्य द्रव्यरूप तथा एक द्रव्यकी पर्यायको अन्य-द्रव्यकी पर्यायरूप नही किया जा सकता अथवा विवक्षित द्रव्यको उसकी पर्यायसे और विवक्षित पर्यायको उसके द्रव्यसे सर्वथा अलग नही किया जा सकता। इस तरह द्रव्य और पर्याय दोनो एक वस्तु हैं; जैसे वेद्य और वेदकका ज्ञान, जिसे प्रतिभासका भेद होनेपर भी सर्वथा भेदरूप नही किया जा सकता। यदि ब्रह्माद्वैतवादियोकी मान्यतानुसार पर्यायको अवास्तव और द्रव्यको वास्तव बतलाकर पर्यायका तथा बौद्धोकी मान्यता- कारिका ७१, ७२] देवागम ६५ . नुसार द्रव्यको अवास्तव और पर्यायको वास्तव बतलाकर द्रव्यका अभाव माना जाय तो द्रव्य-पर्याय दोनोमेसे किसीका भी सद्भाव नही बन सकेगा-अर्थक्रिया-लक्षण-वस्तुमे पदार्थको तब कोई उपपत्ति अथवा व्यवस्था ही नही बन सकेगी, क्योकि पर्याय- निरपेक्ष केवल द्रव्य और द्रव्यनिरपेक्ष केवल पर्याय अर्थ-क्रियाका निमित्त नहीं होता, निमित्त माननेपर क्रम-योगपद्यका विरोध उपस्थित होगा- सर्वथा एकस्वभावरूप , द्रव्य या पर्यायके क्रम- योगपद्य घटित नही होता, क्रम-योगपद्यके घटित न होनेपर अर्थ- क्रिया नही बनती और अर्थ-क्रियाके न बननेपर वस्तुका अस्तित्व न रहकर अभाव ठहरता है। अत द्रव्य और पर्याय दोनोमेसे किसीका भी लोप करनेपर दूसरेका भी लोप उपस्थित होता है और वस्तुतत्त्वकी कोई व्यवस्था नही बन सकेगी। द्रव्यका लक्षण गुण-पर्यायवान् है, जैसा कि 'गुण-पर्ययवद् द्रव्यम्' इस तत्त्वार्थसूत्रसे जाना जाता है, जिसमे गुण सहभावी ( युगपत् ) और पर्याय क्रमभावी होते हैं। पर्यायका लक्षण 'तद्भाव परिणाम' सूत्रके अनुसार तद्भाव-उस उस प्रति- विशिष्टरूपसे होना-है, जो कि क्रमाऽक्रमरूपमे होता है । क्रमश परिणमनको 'पर्याय' और अक्रम ( युगपत् ) परिणमनको 'गुण' कहते है। द्रव्य और पर्याय दोनोकी यह लक्षण-भिन्नता दोनोके कथञ्चित् नानापनको सिद्ध करती है । इस तरह द्रव्य और पर्यायमे कथचित् नानापना ही है, स्व- लक्षणके भेदसे, कथचित् एकपना ही है, अशक्य-विवेचनके कारण, कचित् उभयपना ही है, दोनोकी क्रमार्पित-विवक्षासे, कथचित् अवक्तव्यपना है, दोनोंके सहार्पणकी दृष्टिसे। शेष तीन भगोको भी इसी प्रकारसे घटित कर लेना चाहिये। इति देवागमाप्त-भीमासाया चतुर्थ परिच्छेद । ५
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कारिका ७३] देवागम है-वस्तुत इनमें कोई भी व्यवस्थित नहीं होता। इस तरहको बापेक्षिकी सिद्धि माननेपर नील-स्वलाण और नीलशान ये दोनो भी व्यवस्थित नहीं होते, क्योकि दोनो विशेषण-विष्यकी तरह आपेक्षिा है। जिनकी नर्वथा आपेक्षिक-मिद्धि होती है उनकी सोई कवस्था नहीं है, जैसे परस्पर एक दूसरेको पकडे हुए नदीमे डूबनेवाले दो मनुष्योकी कोई व्यवस्था नही बनती-( दोनो ही दूबते हैं। ) वैने ही नील और नील-जानमै मर्वथा अपेक्षाकृत- मितिकी बात है नोलनानफे विना नील सिद्ध नहीं होता, अजेयत्वका प्रमग आनेसे नौर तथा मवेदन-निष्ठ होनेम और नीलकी अपेक्षाकविना नीलज्ञान सिद्ध नहीं होता; रोकि नील- जानां नीलमे भाललाभ बनता, अन्यथा नीलगानके निविप- यत्वका प्रमग आता है और बौद्धोने ज्ञानको निविषय माना नही । इस तरह एनके अभावमे दूमरेका भी अभाव होनगे नील और नीलज्ञान दोनोका ही अभाव ठरता है। जब ज्ञान और जंग दोनो ही न रहे तब नर्व-शून्यनाका प्रगग उपस्थित होता है । आपेक्षिक-निद्धिके एकान्तमे दोप देवार यदि योग-मतवादी यह कहे कि 'धर्म-धर्मीको सवया आपेक्षिक-गिद्धि नहीं किन्तु अनापेक्षिक-मिद्धि है, क्योकि धर्म-धकि प्रतिनियन-बुटिका विपय- पना है, नोलादिके स्वल्पकी तरह । सर्वथा अनापेक्षिकत्वका अभाव होनेपर प्रतिनियत-बुद्धिका विपयागना नहीं बनना, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि मवथा अनपेक्षा-पक्षमे भी अन्वय- व्यतिरेक घटित नहीं होते। अन्वय सामान्यगी और व्यतिरेक विपको कहते है, दानो परस्पर अपेक्षाके म्पम ही तिष्ठते हैं, दोनोकी सवया मनापेक्षिा-सिद्धि माननेपर न सामान्य स्थिर रहता है और न विगेप । प्रतिनियतबुद्धि-विपयोमे भी प्रतिनियत- पदार्थता मापेक्षम्पमे होती है, नील-पीतकी तरह । नील और पीतको अनापेक्षिक-सिद्धि माननेपर यह नील है, यह पीत है ऐमा निश्चय नही बनता।
६८ समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद ५ उक्त उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोकी मदोषता विरोधान्नोभयैकात्म्य स्याद्वाद-न्याय-विद्विपाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ।।७४।। 'यदि आपेक्षिक-सिद्धि और अनापेक्षिक-सिद्धि दोनोका एकान्त माना जाय तो वह स्याद्वादन्यायसे द्वेष रखनेवालोके-उस न्याय- का आश्रय न लेनेवाले सर्वथा एकान्तवादियोके-यहाँ नहीं बनता, क्योकि दोनो एकान्तोमे परस्पर विरोध है-उनकी युगपत् विवक्षा सदसत् ( भावाऽभाव ) एकान्तकी तरह नही बनती। यदि (विरोधके भयादिसे ) अवाच्यताका एकान्त माना जाय- सिद्धिको सर्वथा अवाच्य कहा जाय तो यह अवाच्य कहना भी नहीं बनता, क्योकि इस कथनमे ही वह कथचित् वाच्य हो जाती है, और उससे सर्वथा अवाच्यताका सिद्धान्त बाधित ठहरता है।' उक्त आपेक्षिकादि एकान्तोकी निर्दोप-व्यवस्था धर्म-धर्म्यविनाभाव सिद्धयत्यन्योऽन्य-वीक्षया । न स्वरूप स्वतो ह्येतत् कारक-ज्ञापकाऽङ्गवत् ॥७५।। 'धर्म और धर्मीका अविनाभाव-सम्बन्ध ही एक दूसरेकी अपेक्षासे सिद्ध होता है न कि स्वरूप-स्वरूप तो अपने कारण- कलापसे धर्म-धर्मीकी विवक्षासे पूर्व ही सिद्धत्वको प्राप्त है, क्योकि वह स्वत सिद्ध है, कारक और ज्ञापकके अङ्गोको तरह-जैसे कारकके दो अग ( अवयव ) कर्ता-कर्म और ज्ञापकके दो अग वोध्य-बोधक ( वेद्य-वेदक अथवा प्रमेय-प्रमाण ) ये अपने अपने स्वरूप-विपयमे दूसरे अगकी ( कर्ता कर्मकी और कर्म कर्ताको वोध्य-बोधककी, वोधक वोध्यकी ) अपेक्षा नही रखते-अन्यथा -~-अपेक्षा-द्वारा एकके स्वरूपको दूसरेके आश्रित माननेपर दोनोके ही अभावका प्रसग उपस्थित होता है। परन्तु कर्ता-कर्मका और ज्ञाप्य-ज्ञापकका व्यवहार परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षाके बिना कारिका ७६] देवागम ६१ नही बनता-व्यवहारके लिये पारस्परिक अपेक्षा आवश्यक है- स्वरूपके लिये नही।' इस तरह धर्म-धर्मिभूत सकल पदार्थोंको कचित् आपेक्षिको सिद्धि है-अविनाभावरूप व्यवहारको दृष्टिमे, कचित् अना- पेक्षिको सिद्धि है-पूर्व प्रसिद्ध स्वरूपकी दृष्टिसे, कचित् उभयो सिद्धि है-अपेक्षा-अनपेक्षास्प दोनो धर्मोके क्रमापितको दृष्टिम, कचित् अवक्तव्या सिद्धि है-उक्त दोनो धर्मोक महापित ( युग- पत्कयन ) को दृष्टिमे । गेष 'आपेक्षिकी' और अवत्ताव्या' आदि भगोको भी इसी प्रकार घटित करके यहां भी सप्तभगो प्रक्रियाको योजना कर लेनी चाहिये, जो कि नयविदोषको दृष्टिसे पूर्ववत् अविरुद्ध है। इनि दवागमाप्त-मीमाया पचम परिच्छेद । पष्ठ परिच्छेद नवथा हेतुमिद तथा आगममिद्ध एकान्तोकी गदोपता मिद्धं चेतुतः मर्च न प्रत्यक्षादितो गतिः । सिद्ध चेदागमात्मा विरुद्धार्थ-मतान्यपि ॥७६॥ 'यदि (केवल अनुमानवादी बौद्धोके मतानुसार ) सव कुछ (एकान्तत ) हेतुसे ही सिद्ध माना जाय-हेतुके बिना किसी भी कार्य-कारणादिस्प तत्त्वकी सिद्धि-निश्चितिको अगीकार न किया जाय-तो प्रत्यक्षादिसे फिर कोई गति-सिद्धि, व्यवस्थिति अथवा ज्ञानकी प्राप्ति-नहीं बन सकेगी ( और ऐसा होनेपर हेतुमूलक अनुमानज्ञान भी नहीं बन सकेगा; क्योकि अनुमानके लिये धर्मीका,
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कारिका ७८ ] देवागम देखकर ) मवाच्यताका एकान्त माना जाय तो तत्त्वसिद्धि निश्चय- से 'भवाच्य' है ऐसा कहना भी नहीं बन सकेगा-ऐसा कहनेसे हो वह वाच्य हो जानेके कारण स्ववचन-विरोधका प्रसग उपस्थित होता है। हेतु तथा आगमगे निदोंगमिहिको दृष्टि वक्तर्यनाप्ते यद्धेतो साध्यं तद्धतु-माधितम् । आप्ते वक्तरितद्वाक्यात्साध्यमागम-माधितम् ।।७८|| 'वक्ताके आप्त न होनेपर जो (तत्त्व ) हेतसे साध्य होता है वह हेत-साधित ( युक्तिमिद्ध ) कहा जाता है और वक्ताफे मान होनेपर जो तत्त्व उस आप्तके वापयमे साध्य होता है उसे आगम- साधित ( शास्त्रमिद्ध ) समझना चाहिये।' व्याख्या-यहाँ आप्त और अनाप्तके स्वस्पको मुस्यतामे ध्यानमे लेनेकी जम्पत है। आप्तका स्वरूप इस ग्रन्यके प्रारम्भको कुछ कारिकामोमे विस्तारके माथ बतलाया जा चुका है, जिसका फलित-रूप इनना ही है कि जो वीतराग तथा सर्वज्ञ होनेमे युक्ति- शान्त्रके अविगेषरूप यथार्थ वस्तुनत्त्वका प्रतिपादक एव अवि- सवादक है वह आप्त है और जो आप्तके इम स्वरूपसे भिन्न अथवा विपरीतम्पको लिये हुए विसवादक है वह आप्त नही- अनाप्त है । तत्त्वके प्रतिपादनका नाम अविमवाद है जो सम्यग्ज्ञान से बनता है। जो तत्त्वका यथार्थ वस्तुतत्त्वका-प्रतिपादन करता है वह अविमवादक है और इमलिये उसका ज्ञान मम्यज्ञान होना चाहिए, जो कि अबाधित-व्यवसायरूप हाता है और जिसके प्रत्यक्ष ( साक्षात् ) तथा परोक्ष ( असाक्षात् ) ऐसे दो भेद है। सगय, विपर्यय और अनध्यवसाय इन तोनो अज्ञानोका नाश इस सम्यग्ज्ञानका फल है। ऐसी स्थितिम उक्त-लक्षण-आप्तका वचन ७२ समन्तभद्र-भारती परिच्छेद ७ सिद्ध होनेपर आगमसिद्ध उसीप्रकारसे प्रमाण होता है जिस प्रकार कि हेतुसिद्ध। इति देवागमाप्त-मीमामाया पष्ठ परिच्छेद । सप्तम परिच्छेद अन्तरगार्थता-एकान्तकी बौद्ध-मान्यता सदोप अन्तरङ्गार्थतैकान्ते बुद्धि-वाक्य मृषाखिलम् । प्रमाणाभासमेवातस्तत् प्रमाणादृते कथम् ॥७९॥ 'यदि (विज्ञानाद्वैतवादी बौद्धोके मतानुसार ) अन्तरगार्थता- का एकान्त माना जाय-अन्तरग जो स्वसविदित ज्ञान उसीके वस्तुता स्वीकार की जाय और बहिरग जो प्रतिभासके अयोग्य जड है उसके वस्तुता न मानी जाय तो बुद्धिरूप अनुमान और वाक्यरूप आगम सब मिथ्या ठहरते हैं। जब मिथ्या ठहरते हैं तब वे प्रमाणाभास ही हुए, क्योकि प्रमाण सत्यसे और प्रमाणा- भास मिथ्या( मृषा )से व्याप्त होता है। और प्रमाणाभासका व्यवहार बिना प्रमाणका अस्तित्व अङ्गीकार किये कैसे बन सकता है ?-नही बन सकता । अत अन्तरगार्थताके एकान्तकी मान्यता दूषित है। उसे अनुमानादि किसी भी प्रमाणसे सिद्ध नही किया जा सकता, और जब सिद्ध नही किया जा सकता तो दूसरोको उसकी प्रतीति भी नही कराई जा सकती।' (जो ग्राह्य-ग्राहकाररूप है वह सब भ्रान्त है, ऐसी सवेदना- द्वतकी मान्यतासे सवेदनाद्वस्त भी भ्रान्त ठहरता है, क्योकि स्वरूपका ज्ञान भी वेद्य-वेदक-लक्षणका अभाव होनेपर घटित कारिका ८०] देवागम ७३ नहीं होता। सबके भ्रान्त होनेपर साध्य-साधनका ज्ञान भी सम्भव नही हो सकता। उसके सत्यरूपमे सम्भव होनेपर सर्वविभ्रमकी सिद्धि नही बनती।) विज्ञप्ति-मात्रताके एकान्तमें साध्य-साधनादि नही बनते साध्य-साधन-विज्ञप्तेर्यदि विज्ञप्ति-मात्रता । न साध्यं न च हेतुश्च प्रतिज्ञा-हेतु-दोपत ॥८॥ 'यदि साध्य और साधन ( हेतु ) को विज्ञप्ति (ज्ञान) के विज्ञप्तिमात्रता मानी जाय-ज्ञानके अतिरिक्त अन्य कुछ नही ऐसा कहा जाय तो साध्य, हेतु और द्वितीय चकारसे दृष्टान्त ये तीनो नहीं बनते, क्योकि ऐसा कहनमे प्रतिज्ञादोष और हेतुदोष उपस्थित होता है-प्रतिज्ञासे स्ववचन-विरोध आता है और हेतु- प्रयोग असिद्धादि दोपोसे दूषित ठहरता है।' व्याख्या-साध्य-युक्त पक्षके वचनको 'प्रतिज्ञा' और साधनके वचनको 'हेतु' कहते हैं। सवेदातवादी (बौद्ध) अपने सवेदनाद्वैत- तत्त्वको सिद्ध करनेके लिये कहते हैं कि नीला पदार्थ और नीले- का ज्ञान ये अभेद रूप हैं, क्योकि इनकी एक साथ उपलब्धिका नियम है ( सहोपलम्भ-नियमात् ) । जैसे नेत्रविकारीके दो चन्द्रमा- का दर्शन होते हुए भी चन्द्रमा वास्तवमे एक ही है वैसे ही नीला पदार्थ और नीलज्ञान दो न होकर ज्ञानाद्वैतरूप एक ही वस्तु है । इस कथनमे प्रतिज्ञा-दोष जो घटित होता है वह स्ववचन-विरोध है, क्योकि अपने द्वारा कहे हुए नीला-पदार्थरूप धर्म-धमकि भेदका और हेतु तथा दृष्टान्त दोनोके भेदका अद्वतके साथ विरोध है। सर्वथा अद्वत-एकान्तकी मान्यतामे इनका कहना नहीं बनता और इसलिये साध्य-साधनादिके भेदरूप ज्ञानके अभेदरूप विज्ञाना- द्वतताका कथन करनेवालेके स्ववचन-विरोधरूप प्रतिज्ञा-दोष सुघटित होता है।
७४ समन्तभद्र-भारती [परिच्छद ७ हेतु-दोष यह घटित होता है कि उक्त हेतु नील और नील- ज्ञानकी पृथक् उपलब्धिके अभावसे नील और नीलज्ञान-भेदके अभावको सिद्ध करता है, जो कि असिद्ध है, क्योकि दोनो अभावो- मे परस्पर सम्बन्ध सिद्ध नही है-सम्बन्धका अभाव उसी प्रकार है जिस प्रकार कि गधे और सीगमे सम्बन्धका अभाव है। जो हेतु साध्यके माथ अविनाभाव-सम्बन्ध न रखता हो वह साध्यको सिद्ध करनेमे समर्थ नही होता और इसलिये असिद्धहेतु कहलाता है। यदि यह कहा जाय कि 'जिस प्रकार अग्निके अभावसे धूम- का अभाव और व्यापक ( वृक्ष ) के अभावसे व्याप्य ( शीशम )- का अभाव सिद्ध किया जाता है, उसी प्रकार नील और नील- ज्ञानको पृथक् उपलब्धिके अभावसे दोनोके भेदका अभाव सिद्ध किया जाता है, इसलिये हमारा हेतु असिद्ध नही है' तो यह कहना ठीक नहीं हैं, क्योकि धूम और अग्निका कार्य-कारणभाव- सम्वन्ध सिद्ध होनेपर ही कारणके अभावमे कार्यका अभाव सिद्ध होता है तथा शीशम और वृक्षके व्याप्य-व्यापक-सम्बन्ध होनेपर हो व्यापकके अभावमे व्याप्यका अभाव सिद्ध होता है, अन्यथा नही-अर्थात् कार्य-कारणका और व्याप्य-व्यापकका यदि पहलेसे अस्तित्व सिद्ध नहीं है तो कारणके अभावमे कार्यका और व्यापकके अभावमे व्याप्यका अभाव सिद्ध नहीं होता। इस प्रकार भेद और पृथक् उपलब्धिका सम्बन्ध चूंकि विज्ञानाद्वतवादियोके विरोधदोषके कारण सिद्ध नही बनता, जिससे पृथक् उपलब्धिका अभाव (सहोपलम्भ-नियमरूप ) हेतु भेदाऽभावको सिद्ध करे इसलिये उनका उक्त पृथक् उपलब्धिका अभावरूप हेतु निश्चित नही-असिद्ध है। वहिरगार्थता-एकान्तको सदोपता बहिरङ्गार्थतैकान्ते प्रमाणामास-निवात् । सर्वेषां कार्यसिद्धिः स्याविरुद्धार्थाऽभिधायिनाम् ।।८।।
कारिका ८२, ८३ ] देवागम ७५ 'यदि वहिरगार्थताका एकान्त माना जाय-ज्ञानको कोई परमार्थ वस्तु न मानकर वाह्य पदार्थको ही वस्तु माना जाय- तो इससे प्रमाणाभासका-सगयादिरूप मिथ्याज्ञानका-लोप होता है, और प्रमाणाभासके लोपसे सभी विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवालोंके कार्य-सिद्धि ठहरेगो-संवेदनाऽद्वैतवादी, ब्रह्माऽद्धत- वादी आदि किसी भी एकान्तवादी अथवा प्रत्यक्षादिके सर्वथा विरुद्ध कथन करनेवालोको तव मिथ्यादृष्टि या अमत्यवादी नही कहा जा सकेगा, यह दोप आएगा।' उक्त उभय तथा अवक्तव्य एकानोकी मदीपता विरोधान्नोभयेकात्म्य स्याद्वाद-न्याय-विद्विपाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्ति ज्वाच्यमिति युज्यते ॥८२॥ 'अन्तरंग और वहिरग जेयरूप दोनो एकान्तोका एकात्म्य ( सहाऽभ्युपगम ) स्याद्वाद-न्यायके विद्वेषियोके विरुद्ध है और इसलिये उनके उभय-एकान्तका सिद्धान्त नहीं बनता। अन्तरगार्थ और बहिरगार्थ दोनो एकान्तोकी अवाच्यताका एकान्त माननेपर 'मवाच्य है' यह उक्ति भी नही वनती-अवाच्यतैकान्तके विरुद्ध पडती है।' उक्त दोनो एकान्तोंमें अपक्षा-भेदम मामजस्य भाव-प्रमेयाऽपेक्षायां प्रमाणाभास-निवः । बहिःप्रेमायाऽपेक्षायां प्रमाण नन्निभ च ते ॥८३।। ( हे अर्हन् भगवन् ! ) आपके मतमे भावप्रमेयकी अपेक्षा- स्वमवेदन-प्रमाणके द्वारा सव कुछ प्रत्यक्ष होनेपर-और वाह्य- प्रमेयकी अपेक्षा-इन्द्रियज्ञानके द्वारा प्रत्यक्ष होनेपर-प्रमाण तथा प्रमाणाभास दोनो बनते हैं-जहाँ विसवाद होता है अथवा बाधा आती है वहां प्रमाणाभाम वनता है और जहाँ विसवाद न होकर ७६ ममन्तभद्र-भारती [ परिच्छेद ७ निर्वाधता होती है वहाँ प्रमाण वनता है। इस तरह प्रमाण- अप्रमाणकी व्यवस्थारूपसे कोई विरोध नही आता, क्योकि एक ही जीवके आवरणके अभावविशेषके कारण सत्य-असत्य-प्रतिभासरूप सवेदन-परिणामकी सिद्धि उसी प्रकार वनती है जिस प्रकार कि किट्ट-कालिमाके अभावविशेषके कारण मुवर्णका उत्कृष्ट-जघन्य परिणाम वनता है। यदि कोई कहे कि जीव कोई वस्तु ही नही है तो यह कहना नही बन सकता, क्योकि जीवके ग्राहक ( अस्तित्व-सूचक ) प्रमाण- का सद्भाव है, उसीको अगली कारिकामे बतलाया जाता है । जीव शब्द मज्ञा होनेमे मवाद्यार्थ है जीव-शब्दः सबाह्यार्थः सज्ञात्वाद्धेतु-गब्दवत् । मायादि-भ्रान्ति-सज्ञाश्च मायाद्यः स्यै प्रमोक्तिवत् ।।८४|| जीव-शब्द वाह्यार्थ-सहित है-बाह्यमे जीवशब्दका वाच्य अर्थ स्वरूप-लक्षण-विशिष्ट जीव-वस्तु है क्योकि यह शब्द सज्ञा (नाम ) है, जो शब्द सज्ञा या नामरूप होता है वह बाह्य अर्थके बिना नहीं होता, जैसे हेतु-शब्द-अग्निमान् आदिके अनुमानमे प्रयुक्त हुआ धूम ( धुआँ ) आदि सज्ञात्मक हेतु-शब्द धुओं आदि नामधारी वाह्य-पदार्थके अस्तित्वके विना नहीं होता, सब ही हेतु- वादी हेतु-शब्दको बाह्यार्थ-सहित मानते हैं, अन्यथा हेतु और हेत्वाभासमे कोई भेद नही बन सकता। ( यदि यहाँ कोई कहे कि माया ( इन्द्रजाल ) आदि भ्रान्तिकी सज्ञाएँ हैं, जिनका कोई बाह्यार्थ नहीं है अत सज्ञापना हेतु अने- कान्तिक है-व्यभिचारी है-उससे जीव-गन्दका वाह्यार्थ होना अनिवार्य (लाज़िमी) नही ठहरेगा, तो यह कहना ठोक नही है क्यो- कि ) मायादि जो भ्रातिको सज्ञाएँ हैं वे भी प्रमाणोक्तिके समान अपने अर्थको साथमे लिये हुए हैं। जिस प्रकार प्रमाण-वचनका ज्ञान-लक्षण बाह्यार्थ है उसी प्रकार मायादि भ्रान्ति-सज्ञाओका भी कारिका ८५ ] देवागम ७७ बाह्यार्थ भ्रान्ति-विषयक विशिष्ट-प्रतिपत्ति है-भ्रान्ति-सज्ञाओका भ्रान्तिरूप अर्थका अभाव माननेपर भ्रान्ति-सज्ञासे भ्रान्ति-प्रति- पत्तिका योग नही बन सकेगा और उस योगके न बननेसे प्रमाणत्व- प्रतिपत्तिका प्रसग उपस्थित होगा। अर्थात् भ्रान्तिको भी सम्यक्- ज्ञान मानना पडेगा जो इण्ट तथा अवाधित नही । इससे खरविषाण ( गधेके सीग ), खपुष्प ( गगनकुसुम ) आदि शब्दोका भी स्वार्थ- रहित होना बाधित हो जाता है। उनका स्वार्थ अभाव है, उसको न माननेपर खर-विषाणादिके भावका प्रसग उपस्थित होगा। अत इन खरविषाणादिके साथ भी उक्त सज्ञात्व-हेतुका व्यभिचार नही है।' सज्ञात्व-हेतुमें व्यभिचार-दोषका निराकरण बुद्धि-शब्दार्थ-सज्ञास्तास्तिस्रो वुद्धयादिवाचिकाः । तुल्या बुद्धयादिवोधाश्च त्रयस्तत्प्रतिविम्बिकाः ||५|| '( यदि कोई मोमासक-मतानुसारी यह कहे कि अर्थ, शब्द और ज्ञान ये तीनो वरावरको सज्ञाएं हैं, जीव-अर्थ जीव-शब्द और जीव-बुद्धि तीनोकी 'जीव' सज्ञा होनेपर अर्थ-पदार्थक जीव- गब्द ही सवाह्यार्थ प्रसिद्ध है-बुद्धि-पदार्थक तथा शब्द-पदार्थक नही, ऐसी स्थितिमे सज्ञापना हेतुके विपक्षमे भी व्यापनेसे व्यभि- चार दोप आता है, क्योकि सज्ञात्व-हेतुको बुद्धि, शब्द और अर्थादिक विशेषणसे रहित सामान्य-रूपसे हेतु कहा गया है, तो ऐसा कहनेवाले भी यथार्थवादी नहीं हैं, क्योकि ) बुद्धि, शब्द और अर्थ तीनोको सज्ञाएँ और बुद्धि-आदिसज्ञा-जनित बुद्धि-आदि- विषयक तीनो बोध भी सर्वत्र स्वव्यतिरिक्त बुद्धयादि विषयके प्रतिविम्वक होते हैं-उच्चारित-शब्दसे जो ( अव्यभिचरित) निश्चित-बोध होता है वही उसका स्वार्थ है, अन्यथा शब्दके १ अर्थाऽभिधान-प्रत्ययास्तुल्यनामान इति ।
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कारिका ८६ ] देवागम ७९ लिये सुननेको मिलता है ) और प्रमाताका प्रमाण ( जो सुने हुए वाक्यके अर्थावबोधको लेकर वक्ताके अभिधेय-विपयमे योग्य- अयोग्य अथवा सत्य-असत्यका निर्णय करता हैं ) ये तीनो एक दूसरेसे पृथक् जाने जाते हैं-भिन्न-भिन्न प्रतिभामित होते है- ऐसी स्थितिमे विज्ञानाद्वैतता बाधित ठहरती है, 'सज्ञात्वात्' हेतुके असिद्धताका दोष नहीं आता और न हेतु-गब्दवत्' इस दृष्टान्तके साध्य-विकलताका प्रसग ही उपस्थित होता है। ( इसपर यदि यह कहा जाय कि वाह्य अर्थका अभाव होनेसे वक्ता, श्रोता और प्रमाता ये तीनो बुद्धि ( ज्ञान ) से पृथक्- भूत नही है, वक्तादिके आभास-आकारस्प परिणत हुई वुद्धिके ही वक्ता आदिका व्यवहार होता है, वाक्यके अवतारका भी बोध ( बुद्धि ) के बिना कही कोई अस्तित्व नही बनता और प्रमाण स्वय वोधरूप है ही । अत ( ववतादित्रयके वुद्धिसे पृथग्भूत न होनेके कारण ) उक्त हेतुके असिद्धतादि दोप बरावर घटित होता है, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) रूपादिग्राहक श्रोताके, व्यतिरिक्त-विज्ञानसन्तान-कलापके और स्वाश ( ज्ञान )-मात्रावलम्बी प्रमाणके विभ्रमकी कल्पना किये जानेपर रूपादिको पूर्णत असिद्धि होती है और उस असिद्धिसे अन्तर्जेय जो ज्ञानाद्वैत ह उसकी मान्यता विरुद्ध पडती है-रूपादिककी, अभिधेयकी, ग्राहक वक्ता तथा श्रोताकी विभ्रम- रूप कल्पना किये जानेपर व्यतिरिक्त-विज्ञानका जो सन्तानकलाप है वह स्वाशमात्रग्राही सिद्ध नही होता, क्योकि स्वागमावावलम्बी ज्ञानोंके परस्पर अमचार है-स्वरूपका गमकत्व नही बनता- जिससे अभिधान-ज्ञान और अभिधेय-ज्ञानका भेद होवे । स्वाश- मात्रावलम्बी ज्ञानको भी यदि विभ्रम रूप माना जावे तो प्रमाणकी सिद्धि नहो वनती, क्योकि, बौद्धोके यहाँ अभ्रान्त ज्ञानको प्रमाण माना गया है | प्रमाणकी भी विभ्रम-रूपसे कल्पना किये १ प्रत्यक्ष कल्पनापोढमनान्तमिति वचनान् वक्ता तथा . .
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काका ८८] देवागम ८१ बोव-वाश्य-प्रमा पृथक्' इस कारिकामे कहे गये वक्ता, श्रोता, प्रमाता तीनो और इनके बोध-वाक्य-प्रमाण ये तीनो भी सिद्ध होते हैं, और इसलिये जोव-शब्दके वाद्यार्थ-साधनमे दिये गये सज्ञात्व- हेतुके असिद्धता तथा अनैकान्तिकताका दोष घटित नही होता और न 'हेतुगब्दवत्' इस दृष्टान्तके साधनधर्मवैकल्य ही घटित होता है, जिमसे जीवकी सिद्धि न होवे-जीवको सिद्धि उक्त हेतु और दृष्टान्त दोनोन होती है। जीवके अर्थको जानकर प्रवृत्ति करने- वालेके सवाद-विसवादको सिद्धि सिद्ध होती ही है।) इति देवागमाप्त-मीमानाया मप्तम परिच्छेद ! अष्टम परिच्छेद देवसे सिद्धिके एकान्तकी मदोपता देवदेवार्थसिद्धिश्चेव पौरुषतः कथम् । दैवतश्चेदनिर्मोक्षः पौरुप निष्फल भवेत् ।।८८।। 'यदि ( मीमासकमतानुसार ) देवसे हो अर्थफी-सपूर्णप्रयोजन रूप कार्यकी-सिद्धि मानी जाय तो फिर देवरूप कार्यको सिद्धि पौरुषसे-कुशलाऽकुशल-समाचरण लक्षण-पुरुषव्यापारसे-कैसे कही जा सकती है ?--नही कही जा सकती, क्योकि वैसा कहनेसे प्रतिज्ञाको हानि पहुंचती है अर्थात् यह कहना बाधित होता है कि 'मर्व-अर्थकी मिद्धि देवसे होती है। यदि पौरुषसे दैवको सिद्धि न मानकर देवान्तरसे देवकी सिद्धि मानी जाय तो फिर मोक्षका अभाव ठहरता है- क्योकि पूर्व पूर्व देवसे उत्तरोत्तर देवकी प्रवृत्ति तव समाप्त नही हो सकेगी और मोक्षके अभावसे तत्कारणभूत पौरुष निष्फल हो जाता अथवा व्यर्थ ठहरता है।' ६ मुन्न्तममारती परिन्न ८ (दि यह वा गाय कि पुत्लासे का भय होनेपर मेज- की सिद्धि होती है अत. पुत्पार्यको निन्न नहीं रहा ना जता, तो फिर वही प्रतिमा-हानि उपस्थित होती है-पुत्पाचे नोज- शप्तिने स्वीगार कर लेनेपर सब कुछ देवन उरल (निल) होता है इस प्रकारची जो प्रतिमा है वह स्थिर नहीं रहतो- बावित व्हती है। इस्पर यदि गमांननोने द्वारा यह कहा जा नि नोन-कारण-पौरपके भी देवन्त होनेसे परंपराले नगेज नगे देवत सिद्ध होता है, इसमे प्रनिना हानिकी कोई बात नहीं तो यह कला तक नहीं; क्योकि तत्र पौरपते ही से देवकान्द्धि होना व्हरता है. इनलिये देवका एकान्त स्थिर नहीं रहता। दूसरे धर्मसे ही अभ्युन्य तया निश्रेयस-सिद्धिकी जो एमन्त- मान्यता है वह बाधित व्हरती है । और तीसरे, उनके द्वारा नान्य महाबरकी निनृमा ( सृष्टि रचनेकी उन्ना ) के व्यर्थ होनेगा प्रसग उपस्थित होता है-अान् सृष्टिनी उत्पत्तिके देवात्रीन होनेने इन प्रकारले वचनोना कहना नहीं बनता कि यज्ञ प्राणी अपनेको सुखदुख प्राप्त करनेमे असमर्थ है, ईडवरको इच्छाने प्रेरित हुआ ही स्वर्ग या नरको जाता है।) पारने चिनिने एकान्तनीयोपत्ता पौरुषादेव मिद्धिश्चेत् पौरुप दैवतः कथम् । पौरुषाच्चेदमोघं स्यात् सर्व-प्राणिषु पौरुषम् ।।८।। यदि पौरपसे ही सब कुछ सिद्धिका एकान्त माना नाय तो यह प्रश्न पैदा होता है कि पौरुषल्प कार्यको सिद्धि कैसे उसे यदि देवसे कहा जाय-पुण्य-पापल्प देवी सम्मत्तिके गत्रित बतलाया जाय तो यह कहना उक्त एकान्तको माननेपर ने बन सकता है ? नहीं बन सक्ता, क्योंकि इससे प्रतिज्ञा हानिना- स्वोकृत एकान्तसिद्धान्तको वाधा पहुँचनेका-प्रसग उपस्थित होता है तथा उक्त एकान्त स्थिर नहीं रहता। यदि बुद्धि-व्यव- कारिका ८९] देवागम ८३ सायात्मक पौरुष (पुरुषार्थ) की सिद्धिको पौरुषसे ही माना जाय तो सब प्राणियोंमे पौरुष अमोघ ठहरेगा-किसीका भी पौरुष तव (वाधक कारणान्तरके न होनेसे ) निष्फल नही जायगा-परन्तु यह प्रत्यक्षके विरुद्ध है; क्योकि समान-पुरुपार्थ करनेवालोंके भी एकका पुरुषार्थ सफल और दूसरेका निष्फल होता देखा जाता है, ऐसे इस मान्यतामे व्यभिचार-दोष आता है।' ( यदि यह कहा जाय कि पुरुषार्थ दो प्रकारका है-एक सम्यग्ज्ञानपूर्वक और दूसरा मिथ्याज्ञानपूर्वक । मिथ्याज्ञानपूर्वक पुरुषार्थमे व्यभिचार आने अथवा उसके सफल न होनेपर भी सम्य- ग्ज्ञानपूर्वक जो पुरुषार्थ है वह सफल होता है अत सच्चा ( सम्य- रज्ञानपूर्वक ) पुरुषार्थ सफल ही होता है, तो यह कहना भी ठीक नही है, क्योकि ऐसा कहनेवाले चार्वाकमतवालोके दृष्टकारण- सामग्रीके सम्यग्ज्ञानपूर्वक पुरुषार्थमे भी व्यभिचार-दोष दिखलाई पडता है-खेती आदिकी सफलताके हष्ट-कारणोका सम्यग्ज्ञान होते हुए भी किसीको तत्पूर्वक खेती आदि करनेपर सफलता नही मिलती। और अहष्टताको प्राप्त ( अदृश्य ) कारण-कलाप प्रत्यक्ष- रूपसे सम्यग्ज्ञान अल्पज्ञोके असम्भव है अत तत्पूर्वक पुरुषार्थ उनके वनता नही । यदि अनुमानादि-प्रमाणान्तरसे उस ज्ञानका मम्भव माना जाय तो इसमे दो विकल्प उत्पन्न होते हैं-एक तो यह कि वह अदृश्य-कारणकलाप कारण-शक्तिका विशेष है अथवा पुण्य-पापका विशेप है। यदि उसे कारण-शक्तिका विशेष कहा जाय तो उस शक्ति-विशेषका सम्यग्ज्ञान होने पर भी तत्पूर्वक पुरुपार्थके व्यभिचार दोष दिखलाई पडता है; जैसे क्षीणायुष्क- मनुष्यमे औषधशक्ति-विशेषके सम्यग्ज्ञानपूर्वक भी उस औषधिको पिलाने आदिका जो पुरुषार्थ किया जाता है वह उपयोगी नही होता-निष्फल जाता है। इससे सर्व-प्राणियोमे पुरुपार्थके अमोघत्वकी सिद्धि नही बनती। और यदि उस अदृश्य-कारण- कलापको पुण्य-पापादिका विशेष माना जाय तो दैवकी सहायतासे समन्तभद्र-भाती [परिच्छेद ८ हा पीरुपमे ही फलकी सिद्धि ठहगे। इधर देवके सम्यग्ज्ञान- पूर्वक उपायमे उपेयकी व्यवस्थिति और उधर देवके अपग्निान- पूर्वक भी कदाचित फरकी उपलब्धि देखनेमे आती है इसमे नम्यग्ज्ञानपूर्वक पुरुपायका एकान्त भी ठीक नहीं है।) जना तथा जनतव्य-सन्तानी नपिता विगंधान्नोभयंकात्म्य स्यावाट-न्याय-विद्विषाम् । अवाच्यतेकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ।।१०।। 'स्यानादन्यायके विद्वेषियोके दैव और पौरप दोनो एकान्तो- का एकात्म्य नहीं बनता, क्योकि इनमे परस्पर विरोध है ( इन दोनो एकान्तोकी ) अवाच्यताका एकान्त माननेपर उन्हे अवाच्य कहना भी नहीं बनता है-कहनेमे स्ववचन-विरोध घटित होता है। देव-गपार्य-मान्तोकी निर्दोष विधि अबुद्विपूर्वाऽपेक्षायामिप्टाऽनिष्ट स्वदेवतः । बुद्धिपूर्वव्यपेक्षामिटाऽनिष्ट स्वपौरुपात ।।११।। 'जो इप्ट या अनिष्ट- अनुकूल वा प्रतिकूल-कार्य अपने बुद्धि-व्यापारको अपेक्षा रखे विना ही घटित अथवा उपस्थित होता है उसे स्वदैवकृत समझना चाहिये- क्योकि उसमे पौरुष गौण और देव प्रधान है । और जो इप्ट या अनिष्ट कार्य अपने बुद्विव्यापारको अपेक्षा रखकर घटित अथवा उपस्थित होता है उने रवोरुषकृत समझना चाहिये, क्योकि उसमे देव गौण और पौरुप प्रधान है। व्यारया-देव और पुरुषार्थ दोनोको व्यवस्था एक दूसरेकी अपेक्षाको साथमे लिये हुए है, एकके अभावमे दूसरेकी व्यवस्था नहीं बनती। वस्तुत दोनोके सयोगसे ही कार्यसिद्धि होती है, कारिका ९२] देवागम 24 अन्यथा वह नही बनती। अत दोनोमेसे किसीका भी एकान्त ठीक न होकर स्याद्वाद-नीतिको लिये हुए अनेकान्त-दृष्टि ही श्रेयस्कर है-देव-पौरुष-विषयक सारे विवादको गान्त करने- वाली है । और इसलिये सब कुछ कथंचित् दैवकृत है, अबुद्धिपूर्वको अपेक्षासे, कथचित् पौरुषकृत है, वुद्धिपूर्वको अपेक्षासे, कथचित् उभयकृत है, क्रमार्पित देव-पौरुप दोनोकी अपेक्षासे, कथचित् देवकृत और अवक्तव्यरूप है, अबुद्धिपूर्वकी अपेक्षा तथा सहार्पित देव-पौरुपकी अपेक्षासे; कथचित् पौरुषकृत और अवक्तव्यरूप है, वुद्धिपूर्वको अपेक्षा तथा सहार्पित-देव-पौरुपकी अपेक्षासे; कथचित् उभय और अवक्तव्यरूप है, क्रमापित-दैव-पौरुष और सहार्पित- देव-पौरुपकी अपेक्षासे। इस तरह सप्तभगी प्रक्रिया यहाँ भी पूर्ववत् जाननी। इति देवागमाऽप्तमीमामायामष्टम परिच्छेद । - नवम परिच्छेद परमें दु ख-सुग्वमे पाप-पुण्यके एकान्तकी सदोपता ( इण्ट-अनिष्टके साधनरूप जो दैव है वह दो प्रकारका है- एक पुण्य और दूसरा पाप। यह दोनो प्रकारका देव कैमे उत्पन्न होता है, इस विषयके विवादका प्रदर्शन और निराकरण करते हुए आचार्यमहोदय लिखते हैं ..-) पाप ध्रुव परे दुःखात् पुण्य च सुखतो यदि । अचेतनाकपायौ च वध्येयातां निमित्ततः ॥१२॥ 'यदि परमे दुखोत्पादनसे निश्चित (एकान्तत ) पापबन्धका होना और सुखोत्पादनसे ( एकान्तत ) पुण्यबन्धका होना माना
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कारिका १२ ] देवागम ८७ ០១ कभी-कभी दृष्टिपथसे बाहरका कोई जीव अचानक कूदकर पैर-तले आ जाता है और उनके उस पैरसे दवकर मर जाता है। कायो- त्सर्गपूर्वक ध्यानावस्थामे स्थित होनेपर भी यदि कोई जीव तेजीसे उडा-चला आकर उनके शरीरसे टकरा जाता है और मर जाता है तो इस तरह भी उस जीवके मार्गमे वाधक होनेसे वे उसके खके कारण बनते हैं। अनेक निर्जितकपाय ऋद्धिधारी वीतरागी साधुओके शरीरके स्पर्शमात्रसे अथवा उनके शरीरको स्पर्श की हुई वायुके लगनेसे ही रोगीजन निरोग हो जाते है और यथेष्ट सुखका अनुभव करते हैं। ऐसे और भी बहुतसे प्रकार हैं जिनमे वे दूमगेके सुख-दुखके कारण वनते हैं । यदि दूसरोंके सुख-दुखका निमित्त कारण बननेसे ही आत्मामे पुण्य-पापका आसव-वन्ध होता है तो फिर ऐसी हालतमे वे कपाय-रहित साधु कैसे पुण्य- पापके बन्धसे बच सकते हैं ? यदि वे भी पुण्य पापके बन्धनमे पड़ते हैं तो फिर निर्वन्व अथवा मोक्षको कोई व्यवस्था नही बन सकती, क्योकि वन्धका मूलकारण कषाय है। कहा भी है- "कषायमूल सकल हि बन्धनम्" "सकषायत्वाज्जीव. कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्ध ।" और इसलिये अकषायभाव मोक्षका कारण है । जब अकपायभाव भी बन्धका कारण हो गया तव मोक्षके लिए कोई कारण नही रहता । कारणके अभावमे कार्यका अभाव हो जानेसे मोक्षका अभाव ठहरता है । और मोक्ष- के अभावमे वन्धकी भी कोई व्यवस्था नही बन सकती, क्योकि वन्ध और मोक्ष जैसे सप्रतिपक्ष धर्म परस्परमे अविनाभाव- सम्बन्धको लिये होते हैं-एकके विना दूसरेका अस्तित्व बन नही मकना, यह वात इससे पूर्व कारिकाको व्याख्यामे भली प्रकार स्पष्ट की जा चुकी है । जव वन्धकी कोई व्यवस्था नही बन सकती तव पुण्य-पापके बन्धकी कथा ही प्रलापमात्र हो जाती है। अत. चेतन-प्राणियोको दृष्टिसे भो पुण्य-पापको उक्त एकान्त-व्यवस्था सदोष है।
८८ ममन्तभद-भान्ती [परिच्छेद १ यहाँ पर यदि यह न्हा जाय कि उन बकपाय-जीवोंके सगे- को नुव दुख पहुंचानेका कोई नकल्प या अभिप्राय नहीं होता, उन प्रकारकी कोई इच्छा नहीं होनी और न उस विपयमे उनको कोई आमक्ति ही होती है, इनलिये दूसरोंके मुन्व-दृ खकी उत्त- मे निमित्तकारण होनेने वे वन्त्रको प्राप्त नही होते, तो फिर 'दूसगेमे दुखोलादन पापका और सुखोत्पादन पुण्यका हेतु है' यह एकान्त सिद्धान्त कने बन सकता है ?-अभिप्रायाभावके कारण अन्यत्र भी दुवोत्पादनमे पापका और मुखोत्पादनसे पुण्यका उन्त्र नहीं हो सकेगा, प्रन्युत इसके विरोधी अभिप्रायके कारण दुबो- त्पत्तिमे पुण्यका और मुत्रोत्पत्तिमे पापका बन्द भी हो सकेगा। जमे एक डाक्टर मुख पहुंचानेके अभिप्रायमे पूर्ण सावधानी नाथ फोडेका ऑपरेशन करता है परन्तु फोडेको चीरते समय रोगीको कुछ अनिवार्य दुख भी पहुंचाता है, इस दुखके पहुंचनेये डाक्टर- को पापका बन्द नही होगा इतना ही नहीं, बल्कि उसकी दुख- विरोधिनी भावनाके कारण यह दुख भो पुण्य-बन्धका कारण होगा । इसी तरह एक मनुष्य कपायभावके वावर्ती होकर दुख पहुँचानेके अभिप्रायमे किनी कुबडेको लात मारता है, लातके लगते ही अचानक उसका कुबडापन मिट जाता है और वह मुख- का अनुभव करने लगता है, कहावत भी है- 'कुवडे गुण लात लग गई"-तो कुवडेके इस सुखानुभवसे लात मारनेवालेको पुण्य- फलको प्राप्ति नहीं हो सकती उमे तो अपनी सुखविरोधिनी भावनाके कारण पाप ही लगेगा। अत यह एकान्त निद्धान्त कि 'पग्मे सुख-दुखका उत्पादन पुण्य-पापका हेतु है' पूर्णतया नदोष है, और इसलिये उसे किसी तरह भी वस्तुतत्त्व नहीं कह नकते। स्वमें दु व-नुत्रमे पुण्य-पापचे एकान्तबो मदोषता पुण्य ध्रुव स्वतो दुःखात्पाप च सुखतो यदि । वीतरागो मुनिर्विद्वांस्ताभ्यां युज्यान्निमित्ततः ॥९३।।
८९ कारिका ९३ ] देवागम 'यदि अपनेमे दुखोत्पादनसे पुण्यका और सुखोत्पादनसे पापका बन्ध ध्रुव है-निश्चितरूपसे होता है-ऐमा एकान्त माना जाय, तो फिर वीतराग (कषायरहित ) और विद्वान् मुनिजन भी पुण्य-पापसे बँधने चाहिये; क्योकि ये भी अपने सुग्व- दुःखकी उत्पत्तिके निमित्तकारण होते हैं।' व्याख्या-वीतराग और विद्वान् मुनिके त्रिकाल-योगादिके अनुष्ठान-द्वारा कायक्लेशादिरूप दुःखकी और तत्त्वज्ञानजन्य सन्तोषलक्षणरूप सुखकी उत्पत्ति होती है। जव अपनेमे दुख- सुखके उत्पादनसे ही पुण्य-पाप बंधता है तो फिर ये अकषाय- जीव पुण्य-पापके वन्धनसे कैसे मुक्त रह सकते हैं ? यदि इनके भी पुण्य-पापका ध्रुव बन्ध होता है तो फिर पुण्य-पापके अभावको कभी अवसर नही मिल सकता और न कोई मुक्त होनेके योग्य हो सकता है-पुण्य-पापरूप दोनो वन्धोके अभावके बिना मुक्ति होती ही नहीं। और मुक्ति के बिना वन्धनादिककी भी कोई व्यवस्था स्थिर नही रह सकतो; जैसा कि ऊपर बतलाया जा चुका है। यदि पुण्य-पापके अभाव बिना भी मुक्ति मानी जायगो तो ससृतिके-ससार अथवा सासारिक जीवनके अभावका प्रसग आएगा, जो पुण्य-पापकी व्यवस्था माननेवालोमेसे किसीको भी इष्ट नहीं है। ऐसी हालसमे आत्म-सुख-दुःखके द्वारा पाप-पुण्यके वन्धनका यह एकान्त सिद्धान्त भी सदोष है। यहाँ पर यदि यह कहा जाय कि अपनेमे दुख-सुखकी उत्पत्ति होने पर भी तत्त्वज्ञानी वीतरागियोके पुण्य-पापका बन्ध इसलिये नही होता कि उनके दुख-सुखके उत्पादनका अभिप्राय नही होता, वैसी कोई इच्छा नही होती और न उस विषयमे आसक्ति ही होती है; तो फिर इससे तो अनेकान्त सिद्धान्तकी ही सिद्धि होती है-उक्त एकान्तकी नही। अर्थात् यह नतीजा निकलता है कि अभिप्रायको लिये हुए दुख-सुखका उत्पादन पुण्य-पापका , ९० समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद ९ हेतु है, अभिप्रायविहीन दुख-सुखका उत्पादन पुण्य-पापका हेतु नही है। अत उक्त दोनो एकान्त सिद्धान्त प्रमाणसे बाधित है, इष्टके भी विरुद्ध पड़ते हैं और इसलिये ठीक नही कहे जा सकते। उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोकी सदोषता विरोधान्नोभयकात्म्य स्याद्वाद-न्याय-विद्विषाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ॥१४॥ '( पाप-पुण्यके बन्ध-सम्बन्धी प्रस्तुत दोनो एकान्तोको अलग मान्यतामे दोष देखकर । यदि दोनो सिद्धान्तोके एकात्मरूप उभय एकान्तको माना जाय तो वह स्यावाद-न्यायसे द्वेष रखनेवालोके विरोध-दोषके कारण नहीं बनता। अवाच्यताका एकान्त माननेमे भी अवाच्य' है यह कहना युक्त नहीं ठहरता है, क्योकि 'अवाच्य' शब्दके द्वारा वह 'वाच्य' हो जायगा और तब सर्वथा अवाच्यता- का एकान्त नहीं रहेगा। पुण्य-पापकी निर्दोष व्यवस्था विशुद्धि-सक्लेगाङ्ग चेत् स्वपरस्थ सुखाऽसुखम् । पुण्य-पापासबौ युक्तो न चेद्वथर्थस्तवार्डत ॥९॥ 'यदि स्व-परस्थ-अपना अथवा परका-सुख-दुख विशुद्धि तथा सक्लेशका अङ्ग है-तत्कारण-कार्य वा स्वभावरूप है-तो वह सुख-दुःख यथाक्रम पुण्य-पाप आत्रव-बन्धका हेतु है और यदि विशुद्धि तथा सक्लेश दोनोमेसे किसीका भी अङ्ग-कारण-कार्य- स्वभावरूप-नही होता है तो ( हे अर्हन् भगवन् ! ) आपके मतमे वह व्यर्थ कहा है-उसका कोई फल नही । अन्यथा, पूर्वकारिका (९३ ) मे कहे हुए 'अकेननाऽकपार्यो' और 'वीतरागो मुनिविद्वान्' पदोमे जिनका उल्लेख है उनके भी वन्धका प्रसग उपस्थित होगा।' व्याल्या-यहाँ 'सक्लेग' का अभिप्राय बार्त-रौद्रध्यानके ९१ सारिका ९ ] देवागम परिणामसे है-"मातं-रौद्र-ध्यानपरिणाम संपलेश." ऐसा अकलकदेवन 'अष्टगती' टीकामे स्पष्ट लिखा है और श्रीविद्या- नन्दने उसे 'अष्टसहली' में अपनाया है। 'सफ्लेग' शब्दके साथ प्रतिपक्षरूपसे प्रयुक्त होनेके कारण 'विगुद्धि' शब्दका अभिप्राय 'संक्लंगाऽभाव' है ( "तदभाव. विशुद्धि" इत्यकलक )-उस क्षायिकलक्षणा तथा अविनम्वरी परमशुद्धिका अभिप्राय नहीं है जो निरवगैप-रागादिके अभावरूप होती है, उग विशुद्धिमे तो पुण्य-पाप-बन्धके लिये कोई स्थान नही है। और इसलिए विशुद्धि- का आशय यहाँ आतंरीद्रध्यानमै रहित शुभपरिणतिका है। वह परिणति धर्म्यध्यान तथा शुक्लध्यानके स्वभावको लिये हुए होती है। ऐसी परिणतिके होनेपर ही आत्मा स्वात्मामे-स्वस्वस्पमे- चिनिको प्राप्त होता है, चाहे वह कितने ही अगोमे क्यों न हो। इनीने अकलकदेवने अपनी व्यारयामे, इम सक्लेशाभावरूप विशुद्धि- को "मात्मन स्वात्मन्यवस्थानम्" रूपमे उल्लिसित किया है और इनमें यह नतीजा निकलता है कि उक्त पुण्य-प्रमाधिका विशुद्धि मात्माके विकासमे सहायक होती है जब कि मक्लेगपरिणतिमे आत्माका विकास नहीं बन सकता-वह पाप-प्रसाधिका होनेसे आत्माके अब पतनका कारण बनती है । इमीलिए पुण्यको प्रगस्त और पापको अप्रगस्त कर्म कहा गया है। विशुद्धिक कारण, विशुद्धिके कार्य और विशुद्धिके स्वभावको 'विगुद्धिअग' कहते है । इसी तरह सक्लंगके कारण, मक्लेशके कार्य तथा मक्लेगके स्वभावको 'सक्लेगाङ्ग' कहते हैं। स्व-परस्थ सुख- दुग्व यदि विशुद्धिअगको लिये हुए होता है तो वह पुण्य-रूप शुभ- वन्धका और सक्लेगावको लिए हुए होता है तो पाप-रूप अगुभवन्धका कारण होता है. अन्यथा नहीं। तत्त्वार्थसूत्रमे, "मिथ्यादर्शनाऽविरतप्रमादकषाययोगा बन्धहेतव" इस सूत्रके द्वाग मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगरूपसे वन्धके जिन कारणोका निर्देश किया है वे मव सक्लेशपरिणाम ही है, २२ - मनन्नयन-मान्तो [ परिच्छेद २ ज्योकि आर्त-रौनव्यानरूप परिणामोके कारण होनेने 'नालेगाज- मे गामिल हैं; जने कि हिंसान्-िज्यिा गल्लेशकार्य होनेसे नाले- गाङ्गने गणित है। अत्त. बामो समन्तभद्रके इस कथनने उन मूत्रका कोई विरोध नहीं है । इसी तरह 'नायगाइन-ग', ' आलः', 'शुभ पुण्याग' इन तीन सूत्रोले हाग शुभकाचानि-याणरको पुण्यानवका और अनुभ-कायादि-व्यापार- को पानान्त्रवका जो हेतु प्रतिपान्ति किया है वह कथन भो उनके बिद्ध नही पडना, क्योकि कायानियोगके भी विशुद्धि और मलेगकै कारण-कार्य-बनावके द्वारा सल्लेगन्त्र-विशुद्धिनको ज्यबस्थिति है । सल्लेगके कारण-कार्य-भाव पर वतला जा चुके हैं। निगुद्धिके कारण सम्बर नानिक हैं, बर्म्यध्यान नथा गुरुलध्यान उनके स्वभाव हैं और विगुद्धिपरिणाम उनका कार्य है । ऐनी हालतने उ-पर-दुखको हेतुभूत कायादि-क्रियाएँ यदि नंग-कारण-कार्य-स्वभावको लिए हुए होती है तो वे नश्ले- गाङ्गत्वके कारण, विषभक्षणादिरूप कायानिक्रियाओको तह, प्राणिगेको अशुभफलनायक पुद्गलोके नम्बन्धका कारण बनती हैं और यदि विशुद्धि-कारण-कार्य-बभावको लिए हुए होती हैं तो विशुद्ध्यनत्व कारण, पथ्य आहागन्रूिप कायानिक्रियाओको तह, प्राणियोंके शुभफलनायक पुद्गलोके नम्बन्धका कारण होती हैं। जो गुमफलनायक पुद्गल हैं वे पुण्यकर्म है, जो अगुभ- फलदायक पूगल हैं वे पापकर्म है, और इन पुण्य-पाप-क्रमांक अनेक भेद हैं। इन प्रकार संक्षेपने उन कारिताम नम्पूर्ण शुभार भरून पुण्यपाप-कर्मोने आत्रव-बन्धका कारण भूचित किया है। उसने पुण्य-पापकी व्यवस्था बत्तलाके लिये यह कारिका कितनी सन्यपूर्ण है, इसे विनपाल स्वयं समझ सकते हैं। पारांग इन नव कथनका इतना ही है कि-मुख और दुख दोनो हो, त्राहे स्वस्थ हो या परस्थ-अपनेको हो या दूसरोको- कथत्रित् पुण्यरूप आत्रव-बन्धके कारण है, विशुद्धिके अङ्ग होनेन, पाणि १०] देवागम कचित् पापम्प मानव-वन्धके कारण है, गवलेगके अन्न होनेने, कचित् पुण्य-गाप उभयरूप आवव-वन्धके कारण है, क्रमापित विगुहि-नक्लेग मज होनेमे, काथचित् अवस्तम्प है. महार्पित- विगुहि-सक्लेशक अङ्ग होनेमे । और विद्धि-गफ्लेगका अङ्ग न होनेपर दोनो ही उन्धके कारण नहीं है। इस प्रकार नय-विवक्षा- को लिए हुए अनेकान्तमार्गसे ही पुण्य-पापको व्यवस्था ठीक बैठनी है-नवथा एकान्तपक्षका आश्रय लेनेसे नहीं। एकान्त पक्ष मदाप है, जैसा कि कार बतलाया जा चुका है और इसलिये वह पुण्य-पका सम्यक् व्यवस्थापक नही हो सकता। इति देशागमा:प्तमीमागाया नयम पगि । दशम परिच्छेद अशानमे :न्धना और अल्पभानग म.क्षमा पन्त अज्ञानाच्चेब्रुवो बन्धो ज्ञेयाऽनन्यान्न केवली । ज्ञानस्तोकाद्विमोक्षश्चेदज्ञानाबहुतोऽन्यथा ॥९६|| 'यदि ( सारख्यमतानुसार ) अज्ञानसे बन्धका होना अवश्य- भावी माना जाय तो ज्ञेयोकी अनन्तताके कारण कोई भी केवली- सकलविपर्यय-रहित तथा ज्ञानान्तरकी सहायता-रहित तत्त्वज्ञान- स्प केवलने युवत-न हो सकेगा। यदि अल्पज्ञानसे मोक्षका होना माना जाय तो अज्ञानके बहुत होनेके कारण बन्धका प्रसग वरावर उपस्थित रहेगा और उसका निरोध न हो सकसे मोक्षफा होना नहीं बन सकेगा।'
९४ ममन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १० उभय और अवक्तव्य एकान्तोकी नदोषता विरोधान्नोभयेकात्म्य स्याद्बाद-न्याय-विद्विपाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्ति ज्वामिति युज्यते ।।१७।। ( सर्वात्मरूपसे एक व्यक्तिके एक कालमे) अल्पज्ञानसे मोक्ष और बहुत अज्ञानसे बन्ध इन दो एकान्तोमे स्याहाद-न्यायके विद्वेषियोंके अविरोध सिद्ध नहीं होता, अत परस्पर विरोधके कारण उभय एकान्त नहीं बनता। अवाच्यताका एकान्त माननेमे भी 'अवाच्य' है यह कहना ही नहीं बनता-इससे पूर्ववत् स्ववचन- विरोध घटित होता है। अनान-अल्पज्ञानसे वन्ध-नोक्षकी निर्दोष-विधि अज्ञानान्मोहिनो बन्धो नाऽज्ञानाद्वीत-मोहतः । ज्ञानस्तोकाच्च मोक्षः स्यादमोहान्मोहिनोऽन्यथा।।९८॥ 'मोह-सहित अज्ञानसे बन्ध होता है-जो अज्ञान मोहनीय- कर्मप्रकृति-लक्षणसे युक्त है वह स्थिति-अनुभागरूप स्वफलदान- समर्थ कर्म-बन्धका कर्ता है। जो अज्ञान मोहसे रहित है वह ( उक्त फलदान-समर्थ ) कर्म-बन्धका कर्ता नहीं है। और जो अल्पज्ञान मोहसे रहित है उससे मोक्ष होता है, परन्तु मोहसहित अल्पज्ञानसे कर्मबन्ध ही होता है। कर्मवन्धानुसार समार विविधरूप और बद्ध जीव भुद्धि- अशुद्धिके भेदमे दो भेदरूप कामादि-प्रभवश्चित्रः कर्मवन्धाऽनुरूपतः । तच्च कर्म स्वहेतुभ्यो जीवास्ते शुद्धथशुद्धितः ॥१९॥ 'कामादिकके उत्पादरूप जो भावसंसार कार्य है वह विचित्र है और कर्मबन्धकी अनुरूपतासे होता है--द्रव्य-कर्मोका बन्धन कारिका १०० देवागम ९५ जिस प्रकार प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभागकी विशेषता एव नाना-रूपताके कारण विचित्रताको लिए हुए ज्ञानावरण, दर्श- नावरण, मोहनीयादि अनेक प्रकारका होता है उसी प्रकार उदय- कालमे उसका कार्य भी अज्ञान, अदर्शन, मोह, राग, द्वेष, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, सुख, दुख और शारीरिक रचनादिवी विचित्रताको लिये हुए नानारूप होता है । और इससे यह फलित होता है कि जो एक स्वभावरूप नित्य ईश्वर माना जाता है वह तथा उसकी इच्छा या ज्ञान इस नाना-स्वभावरूप जगतका कोई कर्ता नही हो सकता और न निमित्तकारण ही बन सकता है । इस विषयकी विशेष चर्चाको अष्टसहस्रीमे बहुत ऊहापोहके साथ स्थान दिया गया है। और वह कर्मबन्धन अपने कारणोके-रागादिक भावोके- अनुरूप होता है । जिन्हे कर्मबन्ध होता है वे जीव शुद्धि और अशुद्धिके भेदसे दो प्रकारके है-भव्य और अभव्य । सम्यग्दर्शनादि शुद्धस्वभावरूप परिणत होनेको योग्यताकी व्यक्ति रखनेवाले जीव 'भव्य' कहलाते हैं और जिनमे वह योग्यताकी व्यक्ति न होकर सदा मिथ्यादर्शनादिरूप अशुद्धपरिणति बनी रहती है वे 'अभव्य' कहे जाते हैं। जो शुद्धि-शक्तिसे युक्त हैं उन्हीकी काल पाकर मुक्ति हो सकती है, शेषकी नहीं।' शुद्धि-अशुद्धि दो शक्तियोंकी सादि-अनादि व्यक्ति शुद्धधशुद्धी पुनः शक्ती ते पाक्याऽपाक्य-शक्तिवत् । साधनादी तयोर्व्यक्ती स्वभावोऽतर्कगोचरः ॥१०॥ 'और वे शुद्धि-अशुद्धि दोनो ( मूग, उडद आदिके ) पचने अपचनेकी योग्यताके समान-भव्य-अभव्य-स्वभावके रूपमे- दो शक्तियां है, जिनकी व्यक्ति-प्रादुर्भूति क्रमश. सादि-अनादि है-शुद्धिकी प्रादुर्भूति सादि और अशुद्धिकी प्रादुर्भूति अनादि है, क्योकि शुद्धिके अभिव्यजक सम्यग्दर्शनादिक सादि होते हैं और
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मान्तन्द्र भारती
[परिच्छेद -
गुद्धिने यजा निय्या नानिको सन्तत्ति जनादिले ग्लो
जाती है। और यह वस्तुमार है जो ना विषय नहीं
हना-अपेत् भावने यह हेमाद नही चलता कि ऐसा न्णे
हता है।
जमाना ल्शन और उसके
तत्वज्ञानं प्रमाणं ते युगपत्सवभासनम् ।
जसमा च यज्ञान न्याहाद-नय-मस्कृतम् ।।१०।।
(हे नहर भावन् ! ) लापके महमे तत्त्वज्ञानको प्रमाण
रहा है। वह ( तलरूपले जाननेरूप ) प्रमाणज्ञान एक तो युगपत
सभालतल्प ( केवलजान ) प्रत्यज्ञान है गैर दूसरा ऊमस
भालनल्प (नति आदि ) पत्तेक्षतान है। जो जमश मातनरूप
नान है वह त्याबाद तथा नयाँले संस्कृत है-गडादरूप प्रनाण
तथा नगनादिनने वा नजारको प्राप्त है-नट होता है।'
पाल्या-तल ( यथार्थ ) रूपने जाननगला ज्ञान प्रमाण
कहलाता है। यह दोनारका होता है-एक जन्मनारि जोर
दूसरा नादि। जो युगद स्नस्त पदाणेना नागन करता
है हमननदि है बार वह पूर्णतग नाणरूप होता है । किन्तु
जोका पदाणेजा जागत करता है न नादि है तण
हत्यबाद ( नाण) गरन (स्माल गमादि । दोनों
रू होता है।
-
उन्नान
उपेक्षा-फलम्गाजयन्य गंपन्यादान-हान-घोः ।
पूर्वा गजाननागोग मन्यस्य गोरे !!१०२।।
युगपवनातनरूप नो व नगर देवलज्ञान है उमा
। सहित ) - उपेक्षा है। शेष ममता भासन प्रगत
कारिका १०३ ] देवागम मत्यादि ज्ञान-समूह है उसका ( व्यवहित-परपरा ) फल ग्रहण और त्यागकी बुद्धि है तथा पूर्वमे कही हुई उपेक्षा भी उसका ( व्यवहित ) फल है और अपने विषयमे अज्ञानका नाश होना इस सारे ही प्रमाणरूप ज्ञानसमूहका (अव्यवहित अथवा साक्षात्) म्यात निपातकी अर्थव्यवस्था वाक्क्येष्वनेकान्तयोती गम्यं प्रति विशेषणम् । स्यान्निपातोऽर्थ-योगित्वात्तव केवलिनामपि ॥१०३।। ('हे अहंतु 1 ) आपके तथा श्रुतकेवलियोके भी वायोमे प्रयुक्त होनेवाला 'स्यात् निपात (अव्यय ) शन्द अर्थके साथ सम्बद्ध होनेसे अनेकान्तका द्योतक' और गम्य-बोध्य (विवक्षित ) का बोधक-सूचफ ( वाचक ) माना गया है अन्यथा अनेकान्त अर्थकी प्रतिपत्ति नहीं बनती।' व्याख्या-सत्-असत्-नित्य-अनित्यादि सकल सर्वथैकान्तोके प्रतिक्षेप लक्षणको 'अनेकान्त' कहते हैं। और अपने वाक्यके परस्पर सापेक्ष पदोके तथा वाक्यान्तरके पदोसे निरपेक्ष' समुदायका नाम 'वाक्य' है। वाक्यके इस लक्षणसे भिन्न जो परवादियोके द्वारा प्रकल्पित अन्यथा वाक्य है वे निर्दोष न होकर वाचासहित है। वाक्यपदी (२, १-२) मे वाक्यके प्रति न्याय-विदोकी वाधा-भिन्न- मतिकी सूचना करते हुए दस प्रकारके वाक्योका उल्लेख है, जिनके नाम है-(१) आख्यातशब्द, (२) सघात, (३) जाति सघातवतिनी, १ 'द्योतकाश्च भवन्ति निपाता' इति वचनात् ( अष्टमहस्री) अर्थात्-निपात गन्द केवल वाचक ही नहीं किन्तु (प्रकृत अर्थसे भिन्न अर्थक ) द्योतक भी होते हैं । २ वाक्यान्तरगतपदनिरपेक्ष (अण्टसहस्री, पृष्ठ २८५ टिप्पण)।
९८ समन्तभद्र-भारती [ परिच्छेद १० (४) एकोनवयवशब्द, (५) क्रम, (६) बुद्धि, (७) अनुसहृति, (८) आद्यपद, (९) अन्त्यपद, (१०) सापेक्षपद । इन वाक्यप्रकारोमे वाक्यके ( अकलकदेवकृत) उक्त लक्षण- की दृष्टिसे कौन वाक्य-भेद सदोष और कौन निर्दोष कहा जा सकता है, इसका अष्टसहस्रीमे श्रीविद्यानन्दाचार्यने सहेतुक विस्तृत विचार किया है। स्याद्वादका स्वरूप स्याद्वादः सर्वथैकान्त-त्यागात् किंवृत्तचिद्विधिः । सप्तभग-नयापेक्षो हेयाऽऽदेय-विशेषकः ॥१०४॥ 'स्यात-शब्द सर्वथा एकान्तका त्यागी होनेसे "कि' शब्द- निष्पन्न चित-प्रकारके रूपमे कथचित् कथचन आदिका वाचक है और इसलिये कथचित् आदि शब्द स्याद्वादके पर्याय-नाम हैं। यह स्यावाद सप्तभगो और नयोकी अपेक्षाको लिये रहता तथा हेय-उपादेयका विशेषक ( भेदक ) होता है -स्याद्वाटके बिना हेय और उपादेयकी विशेषरूपसे व्यवस्था नहीं बनती।' व्याख्या-जिन सप्तभगोका यहाँ उल्लेख है उन अस्ति-नास्ति- अवक्तव्यादि-रूप सात भगोका निर्देश ग्रन्थमे इससे पहले आ चुका है। रही नयोकी बात, सो नयोके मूलोत्तर-भेदादिके रूपमे बहुत विकल्प हैं। जैसे द्रव्य-पर्यायकी दृष्टिसे द्रव्यार्थिक पर्यायाथिक ये दो मूल नय हैं, अध्यात्मदृष्टिसे निश्चय और व्यवहार ये दो भी मूल नय, है । गुद्धि-अशुद्धिकी दृष्टिसे भी नयोके दो-दो भेद किये जाते हैं, जैसे शुद्धद्रव्यार्थिक, अशुद्धद्रव्यार्थिक, शुद्धपर्यायार्थिक, अशुद्धपर्यायार्थिक, शुद्धनिश्चय, अशुद्धनिश्चय, सद्भूतव्यवहार, असद्भूतव्यवहार इत्यादि । द्रव्याथिकके उत्तरभेद तीन-नैगम, सग्रह और व्यवहार, पर्यायार्थिकके उत्तरभेद चार-ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवभूत । इन सप्तनयोमे प्रथम चार भेद ९९ कारिका १०५-१०६ ] देवागम 'अर्थनय' और शेष तीन भेद 'शब्दनय' कहे जाते है। इन सबके उत्तरोत्तर भेद असख्य है । सक्षेपमे कहा जाय तो जितने वचनमार्ग है-गब्दभेद हैं तथा अपने-अपने ज्ञानके विकल्प है उतने-उतने नयोके भेद हैं । नयोका यह विषय बडा ही गहन-गभीर है। इनके लक्षणादिका विशेष कथन नयचक्रादि ग्रन्थोसे जानने योग्य है। स्याद्वाद और केवलज्ञानमें भेद-निर्देश स्याहाद-केवलज्ञाने सर्वतत्त्व-प्रकाशने । भेदः साक्षादसाक्षाच्च हवस्त्वन्यतम भवेत् ॥१०५।। स्याद्वाद और केवलज्ञान दोनो ( जीवादि) सब तत्त्वोंके प्रकाशक हैं। दोनोंके प्रकाशनमे साक्षात् और असाक्षात् (परोक्ष). का भेद ( अन्तर ) है-केवलज्ञान जीव, अजीव, आस्रव, वन्ध, सवर, निर्जरा, मोक्ष इन सात तत्त्वोका प्रत्यक्षत एव युगपत् प्रकाशक है और स्याद्वादरूप श्रुतज्ञान इन पदार्थोंका अप्रत्यक्षत ( परोक्षरूपसे ) क्रमश प्रकाशक है। इन दोनो ज्ञानोमेसे जो किनी भी ज्ञानके द्वारा प्रकाशित अथवा उसका वाच्य नहीं वह अवस्तु होती है।' नय-हेतुका लक्षण मधर्मणेव साध्यस्य साधादविरोधतः । स्याद्वाद-प्रविभक्तार्थ-विशेप-व्यञ्जको नयः ॥१०६॥ 'स्याद्वादरूप परगमागमसे विभक्त हुए अथविशेषका-शक्य- अभिप्रेत-अप्रसिद्धरूप विवादगोचर साध्यका-जो सधर्मा-दृष्टान्त- के द्वारा, साध्यके साधयंसे और (विपक्षके) अविरोधरूपसे व्यञ्जक है-गमक अथवा बोवक है-उसको नय-नयविशेषरूप हेतु- कहते हैं-'नीयते गम्यते साध्योऽर्थोऽनेन इति नय' इस निरुक्तिसे 'नय' शब्द यहाँ हेतुका वाचक है और अनेक धर्मोमेसे एक-धर्म- प्रतिपादक सामान्य नयकी दृष्टिमे भी वह स्थित है।'
१०० समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १० द्रव्यका स्वरूप और भेदोकी सूचना नयोपनयैकान्तानां त्रिकालानां समुच्चयः । अविभ्राड्भावसम्बन्धो द्रव्यमेकमनेकधा ॥१०७॥ ॥ 'त्रिकालति नयो-उपनयोके एकान्त-विषयोका-पर्याय- विशेषोका-जो अपृथकस्वभाव ( तादात्म्य ) सम्बन्धको लिये हुए समुच्चय-समूह है वह द्रव्य-वस्तु है और वह एक अनेक भेदरूप है।' निरपेक्ष और मापेक्ष नयोकी स्थिति मिथ्या-समूहो मिथ्या चेन्न मिथ्यकान्ततास्ति नः । निरपेक्षा नया मिथ्या सापेक्षा वस्तु तेऽर्थकृत् ॥१०८|| 'यदि यह कहा जाय कि ( एकान्तोको तो आप मिथ्या वतलाते है तब नयो और उपनयो-रूप एकान्तोका जो समूह द्रव्य है वह मिथ्या-समूह ठहरा ) मिथ्याओका जो समूह वह तो मिथ्या ही होता है ( अत द्रव्य कोई वस्तु न रहा ) तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि (हे जिनदेव ! ) आपके मतमे और इसलिये हपारेमे ( सापेक्ष नयोका ग्रहण होनेसे ) मिथ्या एकान्तता नहीं है, जो नय ( प्रतिपक्षी धर्मके सर्वथा निराकरणरूप ) निरपेक्ष होते हैं वे ही मिथ्यानय (दुर्नय ) होते है सापेक्ष नय ( जो कि प्रतिपक्षी धर्मकी उपेक्षा अथवा उसे गौण किये होते है) मिथ्या न होकर सम्बकनय होते है, उनके विषय अर्थ-क्रियाकारी होते है और इसलिये उनके समूहके वस्तुपना सुघटित है। व्याख्या-यहाँ अनेकान्तके प्रतिपक्षी-द्वारा यह आपत्ति की गई है कि जब एकान्तोको मिथ्या बतलाया जाता है तव नयो और उपनयो-रूप एकान्तोका समूह जो अनेकान्त और तदात्मक वस्तुतत्त्व है वह भी मिथ्या ठहरता है, क्योकि मिथ्याओका समूह मिथ्या ही होता है। इसपर ग्रन्थकारमहोदय कहते है कि यह कारिका १०९] देवागम १०१ आपत्ति ठीक नही है; क्योकि हमारे यहां कोई भी वस्तु मिथ्या एकान्तके रूपमे नही है। जब वस्तुका एक धर्म दूसरे धर्मकी अपेक्षा नहीं रखता-उसका तिरस्कार कर देता है तो वह मिथ्या कहा जाता है और जब वह उसकी अपेक्षा रखता है- उसका तिरस्कार नही करता-तो वह सम्यक् माना जाता है। वास्तवमे वस्तु निरपेक्ष एकान्त नही है, जिसे सर्वथा एकान्तवादी मानते है, किन्तु सापेक्ष एकान्त है और सापेक्ष एकान्तोंके समूह- का नाम ही अनेकान्त है, तब उसे और तदात्मक वस्तुको मिथ्या कैसे कहा जा सकता है ? नही कहा जा सकता। वस्तुको विधि-वाक्यादि-द्वारा नियमित किया जाता है नियम्यतेऽर्थो वाक्येन विधिना वारणेन वा । तथाऽन्यथा च सोऽवश्यमविशेष्यत्वमन्यथा ॥१०॥ ( यदि कोई यह गका करे कि वस्तुतत्त्व जब अनेकान्तात्मक है तव वाक्यके द्वारा उसे कैसे नियमित किया जाय, जिससे प्रति- नियत विपयमे लोककी प्रवृत्ति बन सके, तो उसका समाधान यह है कि ) अनेकान्तात्मक वस्तुतत्त्व विधिवाक्य अथवा निषेध-चाक्यके द्वारा नियमित किया जाता है। विधि या निषेधरूप जित वाक्यके द्वारा वह नियमित किया जाय उसरूप तथा उससे अन्यथा-- विपक्षरूप वह अवश्य होता है, क्योकि विधि-निषेधका परस्पर अविनाभाव-सम्बन्ध है और इसमे जिस विधि या निषेध-वाक्यके द्वारा वह नियमित किया जाता है वह उस समय मुख्य होता है और प्रतिपक्षी वाक्यका विषय गौण। यदि ऐसा न माना जाय- विधि-निषेधरूपसे उसका अवश्यभावीपना स्वीकार न किया जाय- तो उस केवल विधि या केवल निषेध-वाक्यसे जो विशेष्य (वस्तु- तत्त्व ) है वह नहीं बन सकेगा; क्योकि प्रतिषेधरहित विधिके और विधिरहित प्रतिषेधके विशेषणपना नही बनता और विधि- प्रतिषेध दोनोंसे रहितके गगन-कुसुमके समान विशेष्यपना नही - १०. नमन्ना-भान्ती [परिन्टेट १० बनता है । और उस तरह मन् अमत् आदि वाक्योमे विधि-निपेवकी गीण तथा प्रधानत्पमे वृत्तिका होना लक्षित होता है।' नन्नद्रप बनतो नप ही रहनेवाली ब्राणी मात्र नदी नदनद्वस्तु बागेपा तदेवेन्यनुशामती । न सत्या म्यान्मृपा-वाक्यः कथ तत्वार्थ-देशना ||११|| ( यदि यह कहा जाय कि वाक्य विधिके हाग ही वस्तुतत्त्व- का नियमन करता है तो यह नर्वथा एकान्त ठीक नहीं है, क्योकि) वस्तु तत्-अतस्प है-दृष्टि-भेदके नाथ अविनाभावसम्बन्धको लिये हए सत्-अमत्, नित्य-अनित्यादि अनेकान्तत्प है जो वाक्य ( वाणी ) उसे सस्था तत्न्प-मत्-नित्यादिस्प-ही प्रतिपादन करता ह-उगके प्रतिपक्षी अविनाभावी धर्मको गौण किये हुए न होकर उसका विरोधक है-वह सत्र नहीं होता तव ( ऐसे ) मिच्या-वाक्योंसे तत्वार्थकी-यथाथ वन्नुवत्तकी-देशना ( कथनी ) कैसे बन सकती है ?-नही बन सकती।' व्यारया~यद्यपि सभी (विधि और प्रतिपेव) वाक्य विवि और प्रतिपेध दोनोस्प वस्तुका प्रतिपादन करते हैं फिर भी यदि कहा जाय कि वे केवल विधिका ही अनुशासन ( उपदेश ) करते हैं तो यह कथन सत्य (यथार्थ) नही-मिथ्या है और मिथ्या-वाक्योके वाग वस्तुस्वरुपका यथार्थ कथन नही बन सकता । अत वाक्य चाहे विविरुप हो और चाहे निषेधरूप सभी विधि तथा प्रतिषेध दोनो- रुप वस्तुका प्रतिपादन करते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि विधि-वाक्यके द्वारा विधिका कथन मुख्यरूपसे और प्रतिषेधका कथन गौणरूपसे तथा प्रतिषेध-वाक्यके द्वारा प्रतिषेधका कथन मुख्यरूपसे और विधिका कथन गौणरूपसे किया जाता है । यही यथार्थ तत्त्व-देशना है।
कारिका १११] देवागम १०३ वाक्-स्वभाव-निर्देश, तद्भिन्न वाक्य अवस्तु वाक्स्वभावोऽन्यवागर्थ-प्रतिपेध-निरङ्कुशः। आह च स्वार्थ-सामान्य तादृग्वाक्य ख-पुष्पवत् ॥१११॥ '( यदि बौद्धोकी मान्यतानुसार यह कहा जाय कि वाक्य प्रतिषेधके द्वारा ही वस्तुतत्त्वका नियमन करता है तो यह एकान्त भी ठीक नहीं है, क्योकि ) वाक्यका यह स्वभाव है कि वह अपने अर्थ-सामान्यका प्रतिपादन करता हुआ अन्य-वाक्योके अर्थ-प्रतिषेध- मे निरकुश होता है-बिना किसी रोक-टोकके दूसरे सब वाक्योके विषयका निषेध करता है। जैसे 'धट लाओ' यह वाक्य पट लामो, लोटा लामो, घडी लाओ, मेज (कुर्सी ) लाओ इत्यादि पर-वाक्यो- के अर्थका स्वभावसे निषेधकरूप है। इस वाक्-स्वभावसे भिन्न बौद्धोका जो उस प्रकारका अन्यापोहात्मक वाक्य है वह आकाशके पुष्प-समान अवस्तु है---कहा-न-कहाके वरावर अथवा अनुक्त- तुल्य है, क्योकि विशेप-रहित सामान्य और सामान्य-शून्य विशेष कहीं भी ( बाहर-भीतर ) उपलब्ध नहीं होता। जब उपलब्ध नही होता तब विशेष-रहित सामान्य ही अथवा सामान्य-शून्य विशेप ही वस्तुका स्वरूप है, इस प्रकारके आग्रह-द्वारा स्व-परको कैसे ठगा जाय ? नही ठगा जाना चाहिये । व्याख्या-बौद्धोंकी मान्यता है कि कोई भी वाक्य हो वे सब अन्यापोह-रूप प्रतिषेधका ही प्रतिपादन करते हैं, विधिका नही। इस पर आचार्य कहते है -वाक्य (वाणी) का यह स्वभाव है कि वह अन्य वाक्यो-द्वारा प्रतिपादित अर्थका निर्वाधरूपसे प्रतिषेध करता है और अपने विधिरूप अर्थ-सामान्यका भी कथन करता है। यदि केवल अन्यापोहरूप प्रतिषेध ही वाच्य हो तो उक्त प्रकारका वाच्य आकाश-पुष्पकी तरह असत् है। हमे विशेषको छोडकर केवल सामान्य और सामान्यको छोडकर केवल विशेष कही उपलब्ध नहीं होता। जब उक्त प्रकारका वाच्य उपलब्ध १०४ समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १० नही होता तो हम ऐसा अभिनिवेश करके कि वाक्यके द्वारा स्व (विधि) अथवा पर (प्रतिषेध-अन्यापोह ) ही कहा जाता है, क्यो भ्रामक प्रवृत्ति करे या दूसरोको ठगे । अत जिस प्रकार वाक्य- के द्वारा केवल विधिका ही नियमन नही होता उसी तरह केवल प्रतिपेध ( अन्यापोह ) का भी नियमन नही होता । किन्तु उभय- का नियमन होता है और यह वाक्य ( वाणी ) का स्वभाव है । अभिप्रेत-विशेपकी प्राप्तिका सच्चा साधन सामान्यवाग्विशेपे चेन्न शब्दार्थो मृषा हि सा । अभिप्रेत-विशेषाप्तेः स्यात्कारः सत्य-लाञ्छनः ।।११२।। 'यदि यह कहा जाय कि ( 'अस्ति' जैसा) सामान्य वाक्य परके अभावरूप ( अन्यापोह ) विशेषमे वर्तता है-उसे प्रति- पादित करता है तो यह ठीक नहीं है, क्योकि सामान्यवाक्य विशेषमे शब्दार्थरूप नही है-अभिप्रायमे स्थित विशेषको नही जनाता अथवा प्रतिपादित नही करता-और इसलिये सत्यरूप न होकर मिथ्या-वाक्य है। अभिप्रायमे स्थित जो विशेष उसकी प्राप्तिका सच्चा लक्षण अथवा चिन्ह स्याद्वाद' ( स्यात् शब्दपूर्वक वाद-कथन ) है-सामान्य-विशेषात्मक वस्तुका जब मुख्यत सामान्यरूपसे कथन किया जाता है तब उसका विशेषरूप गौण होकर वक्ताके अभिप्रायमे स्थित होता है, जिसे साथमे प्रयुक्त 'स्यात्' शब्द व्यक्त अथवा सूचित करता है। और इसलिये 'स्यात्कार' अभिप्रेत-विशेषके जाननेका सच्चा साधन एव मार्ग है । अभिप्रेत वही होता है जो स्वरूपादि ( स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव ) के द्वारा सत् होता है-पररूपादिके द्वारा सत् नही ।' व्याख्या-बौद्धोका कथन है कि विधिरूप सामान्यको कहने- वाला वाक्य भी विशेष ( अन्यापोह ) का ही प्रतिपादन करता है-उसीमे उसकी प्रवृत्ति होती है। पर उनका यह कथन सगत कारिका ११३] देवागम १०५ नहीं है, क्योकि इससे अन्यापोह-शब्दका अर्थ सिद्ध नही होता। शब्दका वही अर्थ माना जाता है जिसमे उस शब्दकी प्रवृत्ति हो । अन्यापोहमे किसी भी शब्दकी प्रवृत्ति नहीं होती। ऐसी स्थितिमे विधिरूप सामान्यको कहनेवाला वाक्य भी आपके मतानुसार मिथ्या ठहरता है । वास्तवमे वही वाक्य सत्य है जिसके द्वारा अपने अभिप्रेत अर्थ-विशेषकी प्राप्ति होती है और ऐसा वाक्य 'स्यात्' शब्दसे युक्त ही सभव है और उसीसे सत्य ( यथार्थ अर्थ ) की पहचान होती है। क्योकि वह लोगोको अभिप्रेत अर्थ-विशेष- की प्राप्ति कराता है। अन्य (स्यात्कारसे रहित ) वाक्योसे अर्थ- विशेषकी प्राप्ति नही होती। यही स्याद्वाद और अन्यवादोमे विशेष अन्तर है। स्याद्वाद-सस्थिति विधेयमीप्सितार्थाङ्ग प्रतिषेध्याऽविरोधि यत् । तथैवाऽऽदेय-हेयत्वमिति स्याद्वाद-सस्थितिः ॥११३॥ '( अस्ति इत्यादिरूप ) जो विधेय है-मनके अभिप्रायपूर्वक जिसका विधान किया जाता है, किसीके भयादिवश नही-और ईप्सित-अर्थनियाका कारण है वह प्रतिषेध्यक-नास्तित्वादिके -साथ अविरोधरूप है-जो नास्तित्वादिके साथ अविरोधरूप नही वह ईप्सित-अर्थक्रियाका कारण भी नही हो सकता; क्योकि विधि-प्रतिषेधके परस्पर अविनाभाव-सम्बन्ध है, विधिके बिना प्रतिषेधका और प्रतिषेधके विना विधिका अस्तित्व नहीं बनता। और जिस प्रकार विधेय प्रतिषेध्यका अविरोधी ईप्सित अर्थ- क्रियाका अंग-कारण सिद्ध है उसी प्रकार वस्तुका आदेय हेयपना अन्यथा नहीं, क्योकि विधेयका एकान्त होनेपर किसीके हेयत्वका विरोध होता है, प्रतिषेध्यका एकान्त होनेपर किसीके आदेयत्वका विरोध होता है, स्याद्वादीके अभिप्रायानुसार सर्वथा विधेय ही प्रतिषेध्य नही होता, कथचित् विधि-प्रतिषेध्यके तादाम्य .
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कारिका ११४] देवागम १०७ दयासे युक्त है, इन्दिय-दमन, परिग्रह-त्यजन और ध्यान-समाधिकी तत्परताको लिए तथा उनकी शिक्षामोंमे परिपूर्ण है, नयो तथा प्रमाणोंसे भले प्रकार पुष्ट है, सर्ववाधामोंसे विवर्जित है, सबके हितरूप है और अन्य समस्त एकान्त-गासनोके वाग अजेय है- कोई भी उमे जीत नही सकता-उन श्रीवीर भगवान्को मैं नत- मस्तक होता है। यद्भक्तिभाव-निरता मुनयोऽकलक- विद्यादिनन्द-जिनसेन-सुवादिराजाः । गायन्ति दिव्य-वचनैः सुयशांसि यस्य भृयाच्छ्यैि स युगवीर-समन्तभद्रः ।।३।। [जिनकी भक्तिमे लीन हुए अकलकदेव, विद्यानन्दस्वामी, भगवज्जिनसेन और वादिराज प्रमुख जैसे महामुनि अपने दिव्य- वचनो-द्वारा जिनके सुयशोका गान करते हैं वे युगवीर-इस युगके प्रधान पुरुष-श्रीसमन्तभद्रस्वामी हमारी श्री'वृद्धिके लिए निमित्त- भृत होवे-उनके प्रसादसे अथवा प्रसन्नतापूर्वक आराधनसे हमे निजश्रीकी-आत्मीय लक्ष्मी-ज्योति, शोभा-प्रभा सम्पत्ति-विभूति, शक्ति-सरस्वती और सिद्धि-समृद्धिकी-अधिकाधिक प्राप्ति होवे । ] इति श्रीनिग्वद्यस्याहादविद्याधिपति - सकलताकिकचक्रचूडामणि-श्रदा- गुणज्ञतादिमातिगयगुणगणविभूपित-मिद्धमारस्वत-स्वामिसमन्तभद्राचार्यप्रणीत सम्यग्मिथ्योपदेशार्थविशेषप्रतिपत्तिरूप देवागमाऽपरनामाऽऽप्तमीमासाशास्त्र युगवीर-जुगलकिशोर मुस्तारविरचित-स्पष्टार्थादियुक्ताऽनुवादसमन्वित समाप्तम् । १ 'श्री' शब्द उन सभी अर्थोमें प्रयुक्त होता है जिन्हें 'निजी' की व्याख्यामें व्यक्त किया गया है और जो यहां विवक्षित हैं ।
देवागम-कारिकाऽनुक्रमणिका कारिकाऽद्यचरण क्रमाङ्कमहित का० पृष्ठाक २ ९ का० पृष्ठाक अनानाञ्चेब्रुवो वन्धो ०६ ९३ एव विधिनिषेधाभ्या . २२ अनानान्मोहिनो बन्यो २८ ९४ कथचित्ते मदेवेष्ट अर्द्रत न विना द्वैताद् २. २६ कर्म-दृत फल-त २५ २५ बहकान्तपक्षेपि ८ २४ कामादिप्रभवञ्चित्र ९० अध्यात्म वहिरप्प ४ कार्य-कारण-नानात्व ६१ ५४ अनन्यतकान्तेऽणूना ६७ ६० कार्य-भ्रान्तेरण-भ्रान्ति ६८ ६१ अनपक्षे पृथक्त्वाचे ३० काय-द्रव्यमनादि स्यात् १० १३ लन्तरगार्थतकान्ते ७१ ७२ कार्योत्लाद क्षयो हेतो- ५८ ५१ अन्येवनन्यगन्नोग्य ४ ३८ फुगलाकुगल कम अबुद्धिपर्वाऽपलाया ९१ ८४ क्रमापितयाद हैत १९ २० अभावकान्तरक्षेपि १२ ०७ अणिकैकान्त-पक्षेऽपि ४१ ३६ लवन्तव्यचतुष्काटि- ४. ३९ घट-मौलि-मुवर्णार्थी ५९ ५२ अवन्त्वनभिलाप्य न्यान् ४८ ४१ चतुष्कोटेविकल्पस्य ४५ ३८ अशक्यत्वादवाच्च किम् ५० ४३ जीवनान्द नवाह्यार्थ ८४ ७६ अस्तित्व प्रतिषेध्येना १७ २० तत्त्वज्ञान प्रमाण ते १०१ ९६ अहेतुकत्वान्नागत्य ५२ ८५ तदनद्वस्तु वागेषा ११० १०२ आत्रयाऽअयिभावान्न ६४ ५८ तीर्थकृत्समयाना च इतीयमाप्तमोमासा ११४ ११४ त्वन्मतामृत-वाह्याना ७ उपेक्षा फलमाद्यस्य १०२ ९६ देवागम-नभोयान- एकत्वेऽन्यतराभाव ६९ ६१ देश-काल-विगेषेऽपि ६३ ५७ एकस्याऽनेकवृत्तिर्न ६२ ५६ दैवादेवार्थ-सिद्धिश्चेद् ८८ ८१ एकाऽनेक-विकल्पादा- २३ २३ दोषाऽवरणयोर्हानि- ३ ८ १ ३ ४ ۶ ७८७१ ४० कारिकानुकमाणिका १०९ द्रव्य-पर्याययोरंक्य ७१ ६४ ६४ वचर्यनाप्ते यद्वेतो द्रव्याद्यन्तरभावेन ४७ वक्तृ-श्रोतृ-प्रमातृणा ८६७८ धर्म-धविनाभाव ७५ ६८ चाक्येप्वनेकान्त-धोती १०३ ९७ धर्मे धर्मेऽन्य एवार्थो २२ ३३ वाक्स्वभावोऽन्यवागर्थ-१११ १०३ नयोपनयकान्ताना १०७ १०० विधेय-प्रतिपेध्यात्मा १९२२ न मामान्यात्मनोदेति ५७ ५० विधेयमीप्सितार्थाङ्ग ११३ १०५ न हेतु-फल-भावादि- ४३ ३७ विरूप-कार्यारम्भाय ५३ ४६ नास्तित्व प्रतिषेध्येना-१८ २१ विरोधान्नोभयेकात्म्य १३ १७ नित्यत्वेकान्त-पक्षेऽपि ३७ ३३ विरोधान्तोभयंकात्म्य ३२ २९ नित्य तत्प्रत्याभिज्ञानात् ५६ ४९ विरोधान्नोभयंकात्म्य ५५ ४९ नियम्यतेऽर्थो वाक्येन १०९ १०१ विरोधानोभयकात्म्य ७० ६३ पयोव्रतो न दध्यत्ति ६०५३ विरोधानोभयेकात्म्य ७४ ६८ पाप ध्रुव परे दुखात् ९२८५ विरोधान्नोभयकात्म्य ७७७० पुण्य ध्रुव स्वतो दु खात् ९३ ८८ विरोधान्नोभयंकात्म्य ८२ ७५ पुण्य-पाप-क्रिया न स्यात् ४० ३६ विरोधान्नोभयंकात्म्य ९० ८४ पृथक्त्वैकान्त-पक्षेऽपि २८ २७ विरोधान्नोभयेकात्म्य ९४ ९० पौरुपादेव सिद्धिश्वेत्- ८९ ८२ विरोधान्नोभयंकात्म्य ९७ ९४ प्रमाण-कारकैर्व्यक्त ३८ ३४ विवक्षा चाऽविवक्षा च ३५ ३१ प्रमाण-गोचरी मन्ती ३६ ३१ विशुद्धि-सक्लेशाङ्ग चेत् ९५ ९० वहिरगार्थतकान्ते ८१७४ शुद्धयशुद्धी पुन शक्ती १०० ९५ वुद्धि-गब्द-प्रमाणत्व शेपभगाश्च नेतव्या २०२२ वुद्धि-गब्दार्थ-सज्ञास्ता- ८५ ७७ भावप्रमेयापेक्षाया सज्ञा-सख्या-विशेषाच्च ७२ ६४ ८३ ७५ भावकान्ते पदार्थानाम् ९१५ स त्वमेवाऽसि निर्दोषो मिथ्यासमूहो मिथ्या सत्सामान्यात्तु सर्वैक्य ३१ २८ चेन् १०८१०० सदात्मना च भिन्न चेत् ३० २८ यदि सत्सर्वथा कार्य ३९ ३४ सदेव सर्व को नेच्छेत् १५ १९ यद्यसत्सर्वथा कार्य ४२३७ सधर्मणैव साध्यस्य १०६ ९९ यद्यापेक्षिक-सिद्धि स्यात् ७३ ६६ सन्तान समुदायश्च २९ २७ ८७८० ११० ममन्तमद्र-भारती मर्वथाऽनभिसम्बन्ध ६६ ६० मिद्ध चेद्धेतुत गर्व ७६ ६९ मर्वात्मक तदेक स्यात् ११ १६ सक्ष्मान्तरित-दूरार्था ५ ७ सर्वान्ताश्चेदवक्तव्या- ८९ ४२ स्कन्वमन्ततयश्चैव ५४८७ माध्य-साधन-विज्ञप्ते- ८० ७३ स्याद्वाद-केवलज्ञाने १०५ ९९ सामान्यवाग्विगेपे चेत् ११० १ १ स्याहाद सर्वथैकान्त-१०४ ९८ सामान्य समवायश्च ५५ ५९ हिनस्त्यनभिसधातृ सामान्याऽर्था गिगेऽन्येपा३१ २८ हेतोरईत-मिद्धिग्नेद- २६ २५ देवागमकी प्रमुख-शब्द-सूची कारिका-सख्याङ्क-महित ५६ अनादि ९,१०,१०० अकपाय ९२ अनाद्यन्त ९ अकस्मात् अनापैक्षिकसिद्धि ७३ अकुगलकर्म अनाप्त ७८ अगोरस-वत अनाहत ६२ अचेतन अनिर्मोक्ष ८८ अज्ञान, नाग १२,९६,९८,१०२ अनिष्ट ९१ अणुभ्रान्ति अनुमेय अतर्कगोचर १०० अनुशागत् ११० अतावक अनेकान्तद्योती अतिगायन ४ अन्त ७,८-१०,१२,१३,२२ अहत १६,२८,२७ ०,४५,४८,५०,५५,७०, अतिसिद्धि २६ ७४,७७,८२,९०,९४,९७ अद्वतकान्तपक्ष १०३ अध्यात्म २ अन्तर ४३,४७ अनन्तता १० अन्तरगार्थतकान्त ७९ अनन्तधर्मा-धर्मी २२,३५ अन्तरितार्थ ५ अनन्य, तैकान्त ४४,५३,६७ अन्यथा ९६,९८,१०९ अनन्वय ४३ अन्यापोह-व्यतिक्रम ११ अनपेक्षे,-क्ष्य ३३,५८ अन्वय ५६ अनभिलाप्य ४८ अपह्नव ९,१२ अनभिसधिमत् ५१ अपाक्य-शक्ति १०० अनवस्थित अपृथक २८ ११२ समन्तभद्र-भारती ९१ - अपेक्षा १९ अवक्तव्यचतुष्कोटिविकल्प ४६ अपोह ११ अवस्तु ३३,४६,४८,१०५ अबोध ५० अवाच्य, अवाच्यतैकान्त १३,१४, अबुद्धिपूर्वापेक्षा ३२,५०,५५,७०,७४,८२, अभाव ९,१०,१२,३०,३१,३७ ९०,९४,०७ ४१,५०,६२ अविच्छिद् ५६ अभावपदार्थ ९ अविनाभाव ७५ अभावैकान्तपक्ष १२ अविनाभावि,-भू १७,१८,६९ अभेद १७,३४,३६ अविभ्राड्भावसम्बन्ध १०७ अभिसन्धिमत् ५१ अविरुद्ध ३६ अमोघ ८९ अविरोध,-धि ६,१०६,११३ अमोह ९८ अविवक्षा ३५ अयुक्त ५३ अविशेष, अविशेष्यत्व ५३,१०९ अयोग ४५ अविशेष्य-विशेषण ४६ अर्थ,-सज्ञा ५,९,२१,२२,३१, अव्यतिरेक ७१ ४४,६६, ७६, ७९ अशक्ति, अशक्यत्व १६,५० ८१,८४,८८,१०२ अशुद्धि ९९,१०० १०३,१०८-११४ असत् १४,१५,३०,३५,४२, २१,१०८ ४७,८७ अर्थयोगित्व अर्थ-विशेष-प्रतिपत्ति ११४ अष्टाङ्गहेतुक ५२ अर्थ-विशेष-व्यञ्जक अर्थसिद्धि ८८ असन्ति ४६ अर्थी ३५,६० असस्कृत अर्पित १६ असहतत्व अर्हन् ९५ असाक्षात् १०५ अवक्तव्य १६,४६,४९ असाधारणहेतु अवक्तव्योत्तरभग १६ असुख ९५ अर्थकृत् ९ १०३ अस्वरूप १०६ असचरदोष ६७ ३४ शब्द-सूची ११३ अहेतु, कत्व १९,२७,५२ उपादान-नियाम ४२ आ उपाधि २१ आगम १,७६,७८ उपेक्षा १०२ आगमसाधित ७८ उभयकात्म्य १३,३२,५५,७०, आत्मन्-त्मा १९,३०,५७ ७४,७७,८२,९०, आदान-हानधी, आद्य १०२ ९४,९७ आनन्त्य ए, ऐ आदेय-त्व १०४,११३ एकसन्तान ४३ आपेक्षिकसिद्धि ७३ एकान्त ७,९,१२,१३,२४,२८ आप्त,-ता ३,७,७८,११४ ३३,३७,३९,४१,५५ आप्तमीमासा ११४ ६१,६७,७०,७४,७७ आप्तभिमानदग्ध ७८,८१,८२,९०,९४, आभास ७९,८१,८३ ९७,१०४,१०७,१०८ आवरण एकान्तनहरक्त आश्रय ६४,६५ एकान्तपक्ष १२,२४,२८,३७,४१ आश्रयाश्रयिभाव ६४ ऐक्य ३३,३४,७१ आश्रयी ५३ क आस्रव ७ ४ ८ ९५ कथचित् कर्म ८,२५,९६ इन्दियार्थ ३८ कर्मत २५ इष्ट ६,७,१४,९१ कर्मबन्धानुरूप ईप्सितार्थान ११३ कामादिप्रभव उक्ति १३,३२,४५,५०,५५, कारक २४,३७,३८,७५ ७०,७५,७७,८२,८४, कारण ६१,६४,६८ ९०,९४,९७ कारक-ज्ञापकाङ्ग ७५ उत्पाद ५८,५९ कार्य १०,२१,३९,४१,४२, उदय २,५७ ५३,५८,६१,६३,६८, उपनयैकान्त १०७
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६ ४७ घ ४९ शब्द-सूची ११५ दृष्ट-दृष्टभेद ७, २४ निरकुश २९, १११ देव-देवागम निरपेक्ष-नय १०८ देश-काल-विशेष निर्दोष देव ८८,८९,९१ निषेध २१, ४७ दोष ४, ६, ५६, ६२, ८० निन्हव १०, २९, ८१, ८३ द्रव्य १०, ३४, ४७, ७१, १०७ न्याय १३, ३२, ५५, ७०,७४ द्रव्याद्यन्तरभाव ७७,८२, ९०,९४, ९७ द्विट् (प) ३० प द्वित्वसख्याविरोध ६९ पक्ष १२, २४, २८, ३७ द्वत २४, २६, २७ पयोव्रत ६० परमार्थविपर्यय धर्म १०,१९, २२, ७५ परलोक धर्मधर्म्यविनाभाव ७५ परस्थ ९५ धर्मी १७, १८, २०, ७५ परिणाम,-विशेष ३९, ७१ ध्रुव ९२,९३,९६ परिणामप्रक्लृप्ति ३९ पर्याय ७१ नभोयान पाक्यशक्ति नय १४, २३, १०१, १०६, १०८ पाप,-पापास्रव ४०, ९२, ९३, नययोग नयविशारद २३ नयापेक्ष पुण्य-पुण्यात्रव ९,९३,९५ १०४ नये पनयकान्त पृथक्त्व (पृथक्) २८, ३३, ३४, १०७ नाशोत्पाद,-दि ४३, ५८ ५९, ६५ पृथक्त्वैकान्तपक्ष २८ नानात्व नित्यत्वकान्त-पक्ष ८८,८९, ९१ ३७, ३९ प्रक्रिया निपात २३, ४८ १०३ प्रतिज्ञाहेतुदोष निमित्त ९२, ९३ प्रतिषेध २७, ५२, १११ नियम, नियाम ५८, १००, ४२ प्रतिषेध्य १७, १९, २७, ११३ १४, २० पुण्य-पाप-क्रिया ४० ६१, ७२ पौरुष ८० मन्नमह-मान्ती ८७ १२ ८६ नाकान्त ५९ तिच्याविरोधि ४४: वृद्धिप्रमाणत्व प्रतिविम्बन ५ बुद्धरामचन्दोष ५६ प्रचन-गानि १७. बोर २,८,८ प्रनिना, न बनन-प्रच्चन भग, भगिनी १९,२०,२२,०४ ना-प्रनानि ८४८ भागाभाव भागिन जनगण- २,३,८०,८ भाव ०,१०,१२,२४,२९,८०,४१, ८.८७.०० ४३,४७,६४,४१८३ प्रनाणगोचर ६ भावप्रमेयापेक्षा ८३ प्रमाणाभार-निन्हव २,८३,८३ भावापन्हववादी प्रमाता प्रनाभ्रान्ति प्रमेय ८३ भूतचतुष्क प्रमोद भेद १७,१८,२४,३३,३४,६४३, प्रयोजनादिभेद ५६,७२१०५ प्रसिद्ध भेदाभेदविवक्षा भ्रान्ति-सज्ञा प्रागभाव ३७,६८,८४८ प्रेत्यभाव मत, मतामृत ७,७६,१०० २९,४०४१ महान् फ, व माध्यस्थ्य फल देत १४४,८४ वन्ध २५,४०,९६,९८,९९ मायादिभ्रान्तिसज्ञा वन्व-मोक्षद्वय (द्वत) २५ मायावी वहिरन्तर्मलक्षय ४ मिथ्या-समूह १०८११४ वहिरङ्गार्थतैकान्त ८१ मिथ्र्यकान्तता १०८ वहि प्रमेयापेक्षा ८४,८६ मिथ्योपदेश ११४ बहिरन्तरुपाधि- ३ वाह्यार्थ ८६,८७ मूर्त-कारण-कार्य वुद्धि, सज्ञा ५६,७९ ८५,८७,९१ मृषा ३१,४४,४९,६९,७९,११०, ११२ बुद्धिपूर्वव्यपेक्षा १० १ २५ माया १ ४० मुख्य, मुख्यार्थ ९५ १ ६३ विमोक्ष - शब्द-सूची ११७ मृपावाक्य २५ ११० विद्याविद्याद्वय (द्वत) मोक्ष २५,४०,५२,९८ विद्वान् ९,१५ मोह, मोही ९८ विद्विट् १३,३२,५५,७०,७२,७७, य,र,ल ८२,९०,९४,९७ युक्त विधि २१,४७,६५,१०९ युक्ति ६ विधेय-प्रतिषेध्यात्मा युक्तिगास्त्राविरोधिवाक् ६ विपर्यय, विपर्यास ४८,४९,१५ युगपत्मर्वभासन १०१ विभूति युतसिद्धि योग, योगित्व १४,२०,१०३ विरुद्वार्थमत ७६ राग २,९३ विरुद्वार्थाभिधायी ८१ रूप विरूपकार्यारम्भ लक्षण-विशेष ५८,७२ लोकद्वत विरोध ३,६,१३,२०,३२,५५,६९ २५ ७०,७४,७७,८२,९०,९४,९७ विवक्षा १७,१८,३४,३६ वक्ता ८६ विशुद्धयन ९५ वस्तु ४८,१०८,११० विशेष-ता ३१,५७,६३,७१,७३, वाक् (वाच्) ६,२६,११०,११२ १०६,१११,११२,११४ वाक्य १२,७८,७९,८६,१०३, विशेपक १०४ १०९,११० विगेपण १७,१८,३५,४६,१०३ वाक्स्वभाव १११ विशेपव्यजक १०६ वादिन, वादी ७,१२ विशेष्य १९,३५,४६ वारण १०९ विहित ११४ विकल्प २३,४५,४६ वीतमोह ९८ विकार्य ३८ वीतराग विकिया ३७ वृत्ति-दोष ६२,६३ विग्रहादिमहोदय २ वैधर्म्य १८ विज्ञप्ति-मात्रता ८० व्यक्त, व्यक्ति ३८,५७,१०० व ममन्नन्दमोही अनिम्न व्यपना नानृतव्यवन्या दात्मा २५ वर्मा .० सन्तान व्याज १०४ ५ ६१४ ५९ सर्व म सन्तान-वान २२,४३,४५ नाग्नि ६,-',०० मन्तानान्तर नश्निनन्छन्तिमान सप्तभगनयापन गन्न- मना ..,८८,८८,८५,८८, मबाह्याय ८. ननय मळगोचर १९ समवाय,यो १,२, गन्दप्रमाणत्व ८. समागम दाहार्य 1. मनानगता ति ००,०० मनुदाय मोप ४,१६ २०,२२,६० .०२ सन्यगुपदेश गोक ३,५,७,९,११,१४,३४, घाना ३९,४०,४५,४७,४९, ६,२,३,८१,८९, सक्लेन-मालेगाङ्ग १०१,१०४,१०५ २५ नव्या, विशेष ६२ . सर्वज्ञ-पस्थिति ५ मत्रान ६७ सर्वतत्त्वप्रकाशन मजा-विशेष ७०,८४,८५ सर्वया ७,११,१४,३९,४२,६,७२ मन्नात्व ८४ नवयकान्त-त्याग ७६०४ सजी २७,४७ सर्वात्मक सत् १४,१५,३०,३४,३६, सर्वक्य ३९,४२,४७,५७,८७ सहाऽवाच्य सत्मामान्य ४ सहेतुक मत्य २,११० सवृति-,सवृतित्व ३६, ४४, ४९, मत्यलाञ्छन भारतीय भूति-दर्शन देत अचएर ५४, ६९ मिमी मस्थिति ५. पालादनयनस्यत्त माक्षान् १०५ म्यानादनमाय विन्दि १३,३२ मादि नाथन १२.१३,८० नाधनदूपण ২ শালানি শনবিবি न्यगोनर माघन्य १७.१० म्यगायरी नाधारणहेतु योगस्यपीत नाय १९,२६,२८,८०, न्यभाव गराधम 10 माध्यमापनविशन्नि ८० म्याग्निनुष्टय २०८ बलक्षण-विशेष नामान्य (न्यान्मा) मा १३६ स्वारस्य ५७,६५,५५,६५७३.११, स्बा . २१२ स्वाता ह मामान्यत्तद्दन्यत्य न्याशगामान्ग च्याट मामान्यवान गामान्याध, मामान्यामाव ३६ हिमारतु मिद, मिदि रंतु ४,१६,११,१९,२५,३३ मुन १२,९३,०५ ३४.२,५३, ५८,७६ मूक्ष्मा 1८,८०,८४,९९ म्कन्ध, कन्यमन्तति ५१ हेतुमद स्थिति ५४.५तक्षय स्थित्युत्पत्तिव्यय ५८ हेतुममागम स्यात्, म्यादाद १३,३१,५५,४०, हेतुमाधित ७४,७७,८२,९०,९४,९७, हेतुमाध्य २६,७८ १०१,१०३,१०६ हेय-हेयत्व १०८,११. म्यात्कार ११२ हयादेय विशेपक १०४ 134