Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Yantra Chintamani
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प्रस्तावना। प्रिय महानुभावों! यह वही ग्रंथ है कि, जिसके लिये आप चिरकालसे उत्कंठित हो रहे थे। संसारमें जितने ग्रंथ दिखाई देते हैं उनमें यह मंत्रशास्त्र वडा अलौकिक है, कारण इससे मनुष्यकी आकांक्षा बहुतही शीघ्र पूर्ण होजाती है, फिर यह शास्त्र वेदोंसे निकला है इसलिये इसकी सत्यतापर तो किंचिन्मानभी सन्देह नहीं किया जा सकता वरन इसके वाक्य ब्रह्मवाक्य समझे जाते हैं। मनशास्त्र के अन्तर्गतही यंत्र और तंत्रशास्त्र भी हैं । प्राचीन कालमें हमारे महान् आचार्य ऋषि मुनियोंन इसी मंत्र ( यंत्र- तंत्र) शास्त्रोके द्वारा अपना जीवन सुखमय बनाया था । इन दिनों मंत्र- शास्त्रका प्रचार बहुत कम होने तथा इस विषयपर अच्छे सरल ग्रंथ न रहने एवं जनताकी अश्रद्धा बढने आदिसे यह शास्र प्रायः लुमसा होरहा है, किन्तु अम भी इस विषयका जो कुछ प्रचार शेष रहगया है उसपर यदि पाठक भलीभांति ध्यान देकर अध्ययन तथा मनन करें तो इस मंत्रवाक्यसे अल्प कालमें ही उनकी वह चिर अभिलाषा पूरी हो सकती है कि जो मरणपर्यन्त अन्य शास्त्रोंके पठन पाठनसे नहीं हो सकती। इस कर्मभूमिमें सिद्धि प्राप्त कराने के लिये अनेक अन्यान्य शास्त्र हैं और मन्त्रशास्त्रमी । उसमें जहाँ और और शास्त्र दूध अथवा दहीके सदृश हैं वहाँ मंत्र शास्त्र मक्खनके सदृश होरहा है । मक्खनमें दूध वा दहाँसे अवश्यहाँ पहुत अधिक स्वाद और अधिकशक्ति होती है । यह इससेभी सिद्ध है कि खाद्यपदार्थमें श्रीकृष्ण भगवान माखनको ही श्रेष्ठ समझते थे। अतः शीघही मनुष्यों के अमिलपित फल प्राप्त होने के लिये मंत्रशास्त्रसे बढकर कोई दूसरा उपयोगी शास्त्र नहीं है। मंत्रशास्त्रके अन्तर्गतही यह “यंत्रचिन्तामणि" है कि जिसमें अनेक प्रकारके सिद्धिदायक मंत्र और यंत्र भरेहुये हैं । परमपूज्य महात्मा गंगाधरजाके पुत्र ६४ कलाओंमें चतुर श्रीगणेशजी के परमभक महायशस्वों परेम बुद्धिमान् दामोदरजी उत्पन्न हुये। उन्होंने जम शिवोक्त-सोंक देव्युक्त प्रभृति अनेकों शास्त्रों को विस्तारपूर्वक देखकर RAL मुदफ और प्रकाशफ- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, मालिफ-" लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर " स्टीम्-प्रेस, फल्याण-वंबई, सन् १८६७ के माक्ट २५ के मुजब रजिष्टरी सब हक प्रकाशकने अपने आधीन रक्खा है.
प्रस्तावना। प्रिय महानुभावों ! यह वही अंध है कि, जिसके लिये आप चिरकालसे उत्कंठित हो रहे थे। संसारमें जितने ग्रंथ दिखाई देते हैं उनमें यह मंत्रशाख बडा अलौकिक है, कारण इससे मनुष्यकी आकांक्षा बहुतही शीघ्र पूर्ण होजाती है, फिर यह शास्त्र वेदोसे निकला है इसलिये इसकी सत्यतापर तो किंचिन्मानमी सन्देह नहीं किया जा सकता वरन इसके वाक्य ब्रह्मवाक्य समझे जाते है। मंप्रशासके अन्तर्गतही यंत्र और तंत्रशास्त्र भी है । प्राचीन कालमें हमारे महान् आचार्य ऋषि मुनियोंने इसी मंत्र ( यंत्र- तंत्र ) शास्त्रीके द्वारा अपना जीवन सुखमय बनाया था। इन दिनों मंत्र. शास्त्रका प्रचार बहुत कम होने तथा इस विषयपर अच्छे सरल ग्रंथ न रहने एवं जनवाकी अश्रद्धा बढने आदिसे यह शास्त्र प्रायः लुप्रसा होरहा है, किन्तु अम भी इस विषयका जो कुछ प्रचार शेप रहगया है उसपर यदि पाठक भलीभांति ध्यान देकर अध्ययन तथा मनन करें तो इस मंत्रवाक्यसे अल्प कालमें ही उनकी वह चिर अभिलाषा पूरी हो सकती है कि जो मरणपर्यन्त अन्य शास्त्रोंके पठन पाठनसे नहीं हो सकती। इस कर्मभूमिमें सिद्धि प्राप्त कराने के लिये अनेक अन्यान्य शास्त्र हैं और मन्त्रशालभी । उसमें जहाँ और और शास्त्र दूध अथवा दहीके सटश हैं वहाँ मंत्र शास्त्र मक्खनके सदृश होरहा है 1 मक्खनमें दूध वा दहसेि अवश्यही पहुत अधिक स्वाद और अधिकशक्ति होती है । यह इससेभी सिद्ध है कि खाद्यपदार्थमें श्रीकृष्ण भगवान माखनको ही श्रेष्ठ समझते थे। अत: शीघ्रही मनुष्यों के अमिलपित फल प्राप्त होने के लिये मंत्रशास्त्रसे बढकर कोई दूसरा उपयोगी शान नहीं है । मंत्रशास्त्रके अन्तर्गतही यह "यंत्रचिन्तामणि" है कि जिसमें अनेक प्रकारके सिद्धिदायक मंत्र और यंत्र भरेहुये हैं । परमपूज्य महात्मा गंगाधरजाके पुत्र ६४ कलाओंमें चतुर श्रीगणेशाजाके परमभक्त महायशस्वी परेम बुद्धिमान् दामोदरजी उत्पन्न हुये । उन्होंने जब शियोक्त-सर्वोक देव्युफ प्रभृति अनेकों शाखौंको विस्तारपूर्वक देखकर लोको. A (२) पकारके लिये स्वयम् मन्त्रयुक्त यंत्रोंके संग्रह करनेकी इच्छा की, उसी समय स्वप्नावस्थामें श्रीशंकर महाराजकी प्रेरणा हुई तब उक्त महापंडित दामोदर. जीने इस चिन्तामणिरूपी यंत्रोंका संग्रह किया। फिर तत्रोंके आदि अनुवादक, अनेक ग्रंथों के सुप्रसिद्ध टीकाकार, रचयिता संपादक और महानिर्वाण तंत्र-कामरल तंत्र, आश्चर्य योगमालातंत्र, गुमस धनतंत्र, गौरीकांचलिकातंत्र-गुरुतंत्र, नित्यतन्त्र आदिके भाषान्तरकर्ता गुर दाबाद निवासी परमपूज्य मेरे पितृव्य पंडित बलदेवप्रसादजी मिश्रने इस ग्रंथका सरल हिन्दी भाषा अनुवाद किया, जिसके लिये तांत्रिक समाज उनका चिर कृतज्ञ रहेगा, कितु दुःखकी बात है कि, हमारे पितृयजी इस ग्रंथके प्रकाशनके पूर्वही अपनी जीवनयात्रा समाप्तकर ब्रह्ममें लीन होगये । यद्यपि कलियुगी जीव इस विद्याकी सिद्धि कर सकते हैं कितु जिस प्रकार करना चाहते हैं वैसे यह विद्या सिद्धिप्रदान नहीं फरसकती, पृथ्वी निर्वीर्य नहीं है । आजभी यदि पूर्ण विधिसे अनुष्ठान किया जाय तो अवश्यही सिद्धि प्राप्त हो सकती है। पूर्वकालमें जितने ग्रंथ मंत्र .( यंत्र-तंत्र) विद्याके मिलते थे, आज यह अदृश्य होरहे हैं किंतु बडे आनंदकी बात है कि ऐसे समयमें भी यंत्र- मंत्र तथा तंत्र ग्रंथोके प्रकाश करनेकी रुचि फिर मनुष्योंके पदयों में लह- राने लगी है। मंत्र इत्यादिके प्रयोगों की सिद्धि कहीं नहीं गई है किंतु सिसिकी आम- छापा रन्यनेवाले ही नहीं हैं । जो मनुष्य मंत्र (तंत्र-यंत्र) विद्याको सीखना चीहें वह प्रथम सद्गुरुकी खोजकरें । खोजफरनेपर क्या नहीं मिलता है सधै गुरुके मिल जानेपर उनसे यथाविधि दीक्षा लेवें और उनके पसायेमार्गका अनुसरण फरें तो फिर सिद्धि प्राप्त करना कुछ फठिन नहीं है। शेपमे साधकगास हमारी विनम्र प्रार्थना यही है कि, कदाचित् यथा. विधि प्रयोग करनेपरभी आपको सिद्धि प्राप्त न हो तो यह दोष शास्त्रका न समझकर अपनाही समझिये और पुनर्वार मा पानी के साथ कार्यमें प्रवृत्त हजिये, तो आपकी मनोकामना अवश्यही फलीभूत होगी । ऐसा मेरा हट विश्वास है।
इस प्रथको पूर्ण संशोधनकर अनेक शिष्टश्लोकों वा पदोको सरल तथा स्पष्टफर तांत्रिक प्रेमियों और भी परमोपयोगी धनादिया है। यदि मंत्र-यंत्र-तंत्र प्रेमी प्रिय पाठक, प्राहक, अनुप्राहक इसका आदरकर एक एक प्रति अपने पास रक्खें तो हम अपने विशेष उद्योग तथा अनुवाद- कफे परिश्रमको सफल समझेंगे। यदि इसमें कहीं कोई त्रुटि नरधर्मानुसार रहगयी हो तो पाठक महाशय उसको क्षमा करते हुए सूचना देनेकी कृपा करें। पुनरावृतिमें उसका सुधार फेरदिया जायगा। इसकेलिये उदारता प्रेसाध्यक्ष सर्वगुणसम्पन्न परमोदार रावसाहय श्रीमान् सेठ रंगनाथजी तथा सेठ श्री श्रीनिवासजीको अनेकानेक हार्दिक धन्यपाद है कि, जिन्होंने इस पुस्तक प्रकाशन तथा सर्वाङ्गसुन्दर बनाने में कोई घात उठा नहीं क्खी है । अतः प्रकाशकके इस अद्वितीय उत्साहको हम अत्यंत सराहना करते हैं। चिरपापित- बम्बई. जगदीशप्रसाद मिश्न. मुरादाबाद, श्रीः ॥ ‘यन्त्रचिन्तामणेविषयानुक्रमणिका। पृमाइः । विश्यः .... .... .... ... ३० .... .... .... ७ .... .... . .... .... .... .... .... .... .... .... विषयः मालाचरणम् १ उच्छिष्टपिशाचयन्त्रम् ग्रन्थकर्तुः प्रशस्तिः दुष्टमोहनकर कण्टकयन्त्रम् क्रोधशमने जामदग्न्ययन्त्रम् प्रयोजनादिः २ स्त्रीसौभाग्यकरं ललितायन्त्रम् . पन्त्रलेखनविधिः स्त्रीसौभाग्यकरं यन्त्रम सिमाध्यादिविचार वीवश्यकर कामराजयन्त्रम् महामोहनयन्त्रम् ... ११ स्त्रीवस्यका मदनमर्दनयन्त्रम् योजसम्पुट राजवश्यकरंयन्त्रम्.... १२ कामाक्षं यन्त्रम् यावजीवस्वामिवश्यकर यन्त्रम्.... १३ विजययन्त्रम् दिव्यस्तमनयन्त्रम् कमलाख्ययन्त्रम् .... राजमोहन दुष्टमुखस्तम्भने यन्त्रम् १५ आकर्पणाधिकारः। महामृत्युअययन्त्रम् माणिभद्रयन्त्रम् विवादविजययंत्रम् मित्रदर्शनयन्त्रम् .. मायामययन्त्रम् पुरकास्ययन्त्रम् दुष्टमोहनयन्त्रम् ललनाकृति कामराजपत्रम् ४६ व्यवहारविवादजयदं (देवमातृकं चक्रम् यावजीव वश्यकरं गाणपत्य यन्त्रम् २२ यावजी जनवश्वकरं यन्त्रम् स्तम्भनाधिकारः। जगद्वस्यकरं यन्त्रम् २४ शत्रुमुखगतिमतिस्तम्भनयन्त्रम्.... ४९ पिशाचियन्त्रम् २५/यात्रास्तम्भनयन्त्रम् ५० फरवश्यकर कालानलयन्त्रम् २६ प्रतिवादिमुखस्तम्मनयन्त्रम् १ .... .... .... .... .... .... ....
(२) . पृष्ठाः । विषयः .... विषयः पृष्ठाः शत्रुमुखस्तम्भनयन्त्रम ५३ सर्वजनोच्चाटनयन्त्रम् वहिस्तम्भनयन्त्रम् ५४ शत्रोरुचाटनयन्त्रम् अमिस्तम्भनयन्त्रम् .... १५/स्त्रिया उच्चाटन यन्त्रम् यात्रास्तम्भनयन्त्रम् ५६ त्रैलोक्योचाटनयन्त्रम् शत्रुमुखस्तम्भनयन्त्रम् .... १७/परमोचाटनयन्त्रम् पिशुनमुखस्तम्भनयन्त्रम् शान्त्यधिकारः। विवेपणाधिकारः। शान्तिपौष्टिकयन्त्रम् नरनारीविद्वेषणयन्त्रम् ..... ६१ सर्पादिभयनाशनयन्त्रम् ८३ शत्रुविद्वेषणयन्त्रम् ६३ वन्ध्यागर्भधारणयन्त्रम अन्धुविद्वेषणयन्त्रम् ज्वरनाशनयन्त्रम् ८६ स्वामिभृत्यविद्वेषणयन्त्रम् बालरक्षाकरयन्त्रम् विश्वविद्वेषणयन्त्रम् तृतीयज्वरनाशनयन्त्रम् ८८ मारणाधिकारः। ज्वरशमनयन्त्रम् ८९ शत्रुमारणयन्त्रम् (१ ) ६८ बालानां ज्वरादिस्तम्भन शत्रुमारणपन्त्रम् (२) यन्त्रम् देशान्तरस्थशत्रुमारणयन्त्रम् ७०यालढोषनाशनयन्त्रम् सर्वजनमारणयन्त्रम् सर्पस्तम्मनयन्त्रम नरनारीमारणयन्त्रम् भूतनासनगन्त्रम् .... उच्चाटनाधिकारः। एकान्तज्वरनाशनयन्त्रम् शत्रूचाटनयन्त्रम् .... ७४ / गर्भरक्षाकरयन्त्रम् सबउबाटनयन्त्रम् ७६ मुखप्रसवकरयन्त्रम् ९६ .... .... ... .... .... .... .... ... .... ....
....
विषयः
भूततृतीयज्वरनाशनयन्त्रम्
सर्वतोभद्रयन्त्रम् ....
द्यूतविजयकरयन्त्रम्
वन्धमोक्षणयन्त्रम्
भवमोचनयन्त्रम्
पृष्ठाङ्कः । विषयः
पृष्ठावः
मोक्षाधिकारः।
दुष्टसत्वप्रमोचनयन्त्रम् १०३
वन्धमोचनयन्त्रम्
निगडमोचनयन्त्रम्
१०० बन्धमोक्षकरयन्त्रम्
१०७
१०२ सर्वसाधारणयन्त्रविधिः
१०९
१०४
...
इति अनुक्रणिका समाप्ता।
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॥ श्रीः॥ यन्त्रचिन्तामणिः। भापाटीकोपेतः। मङ्गलाचरणम् । यं ध्यायन्ति सुरासुराश्च निखिला यक्षाः पिशाचोरगा राजानश्च तथा मुनीन्द्रनिवहाः सर्वार्थदं सिद्धये ।भक्तानां वर- दाभयप्रदकरं पाशाङ्कुशालंकृतं चञ्चचामरवीज्यमानमनिशं सोऽहं श्रये शङ्करम् ॥ १ ॥ बभार दुःस्थान्मुनिपुङ्गवान्यो बुद्धयाऽथ मन्त्रैश्च दुरासहोजाः । जाज्वल्यमानो दिशि दृश्यते यः स भार्गवो मामवताच्छरण्यः ॥२॥ यस्य प्रसादादलिनो भवन्ति जानन्ति दैत्या विविधां च मायाम् । यो लब्धवान् मन्त्रवरं षडङ्गं मृत्युञ्जयं देववरागणेशात ॥३॥मन्यकर्तुःप्रशस्ति:- जालन्धरे पीठवरे प्रसिद्ध प्रत्यक्षरूपा भुवि वर्तते या। गोत्रे तस्मिन्वेदविद्याप्रवीणे योन्वाजैषीन्नास्तिकान्वेदबाह्यान्॥४॥ सम्पूर्ण सिद्धियोंके अर्थ जिन शिवजी महाराजका सुर, असुर, यक्ष, पिशाच, उरग (सर्प) राजा मुनिगण आदि ध्यान करते हैं, जो भक्तोंको वर और अभय देते हैं, एवं पाश और अंकुशके धारण करनेसे शोभायमान हैं, जिनपर निरन्तर घुवर दुलता रहता है, उन श्रीशिवजीमहाराजका में वार- म्बार आश्रय लेताहूं ॥ १ ॥ जो प्रतापशील श्रीशुक्राचार्यजी गुप्त भावसे रहनेवाले मुनिश्रेष्ठोंको मंत्रपलसे जानकर धारण करतेहुए वह आकाश मंडलमें प्रकाशमान शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले श्रीभार्गवजी मुझ शरणमें आयेकी रक्षा करें ॥२॥ जिनकी प्रसन्नतासे दैत्यगण वलयान होवें और अनेक प्रकारकी मायाओंको जानते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यजीने देवताओंमें श्रेष्ठ श्रीगणेशजीसे मृत्युको जीतनेवाली श्रेष्ठ पडङ्गमंत्र विद्याको प्राप्त किया ॥३॥ प्रसिद्ध और पवित्रस्थान जालन्धर नाम नगरकी सुन्दर पुण्य भूमिमें उत्पन्न, वेदादि शास्त्रोंसे विमुख नास्तिकोंका पराजय करनेवाले षडङ्ग शास्त्रादिकोंके ज्ञाता जो उक्त भार्गवजीके वंशमें कोई महान पुरुष उत्पन्न होगये हैं ॥४॥ यहाँपर नाम न लेनेका कारण यह है -" आत्मनाम गुरोनाम नामातिकपणस्य प" अपना नाम, गुरुदेवका नाम और बड़े कृपगका नाम नहीं लेना चाहिये । इस शासकी मर्यादा नाम नहीं लिया।
यन्त्राचन्तामाणिः। तदन्वये पण्डितः सन्नृसिंहो ज्वालामुखीं नौमि महाप्रभावाम् । यां योगमायां परमार्थविद्यां विशेषवन्द्यां भृगुवंशजानाम्॥५॥ तस्यात्मजोऽभूद्धषि धर्मशीलो नाना महादेव इति प्रसिद्धः । निसर्गवेरै प्रजहुः सुसत्वा यं प्राप्य दुष्टाहितरक्षसाः ॥ ६ ॥ तस्मादासीत्सुमतिविकसदेवदत्ता कलावामान्यो राज्ञा सदसि विदुषां गद्यगङ्गाप्रवाहा। उत्कल्लोलो दिशि दिशि जनाः कीर्ति- पीयूपसिन्धुं यस्याद्यापि श्रवणपुटकैः कुश्चिताक्षाः पिबन्ति ॥७॥ गङ्गाधरस्तत्तनयो बभूव विवेकगाम्भीर्यगुणेरुदारः । यं प्राप्य लक्ष्मीश्च सरस्वती च तत्पादयुग्मं स्थिरता च ननम् ॥८॥ दामोदरः सर्वकलाप्रवीणस्तस्मादभूच्छीगणनायभक्तः। लब्धप्रतिष्ठो गुरुदेवभक्तो मान्यः सतां धर्मपरा-यणोऽयम्॥९॥ प्रयोजनादिः-दृष्ट्वाऽनेकशिवागांश्च बहुलांश्चालोक्य सोरा- गमान्देवीशास्त्रमहागमांश्च विविधानालोक्य विस्तारतः । उन्हीं महात्मा भृगुवंशीके वंशमें उत्पन्न होकर मैं नृसिह नामक पंडित महा. प्रभावशालिनी श्रीज्वालामुखी देवीको प्रणाम करता हूँ। जो जगजननी योग- माया परम विद्या भृगुवंशियोंको विशेषकर बन्दन करने के योग्य है ॥५॥ उन नृसिंहजीके पुत्र धर्मात्मा महादेव हुए, जिन महात्मा महादेवको प्राप्त करके जीवाने स्वाभाविक वैर छोडदिया और दुष्ट अहितके करनेवाले राक्ष. सादि भी स्वाभाविक वरको त्यागकर प्रीति करनेलगे ॥६॥ महादेवजीके - पुत्र चुद्धिमान ६४ कलाओं में निपुण राजाओं के माननीय पंडितोंकी सभामें गश्पद्यात्मक वाणीके बोलनेवाले देवदत्त हुए । जिन महात्माकी ऊँची कल्लोलवाली कीर्तिरूप नदीके अमृतरूप रसको सम्पूर्ण दिशाओंमें आजतक भी कुञ्चिताक्ष मनु-य प्रवणप्टोस पान कर रहे हैं ॥ ७ ॥ देवदत्त के पुत्र विवेक गंभीरतादि गुणों से उदार गंगाधर हुए, जिन महात्मा गंगाधरजीके दोन चरणकमलोंको पाकरलक्ष्मी और सरस्वतीजी स्थिरभावको प्राप्त हुई ८॥ गाधरजीके पुन ६४ , फलामे चतुर, गंगेशजीक भा दामोदरजी उत्पन्न हुए, यह बडे प्रतिष्ठित गुरुदेवके भक, भक्तपुरषोंके माननीय और अपने धर्ममें वत्पर हुए ॥ ९॥ शिवोक्त, सौरोक्त, देयुक्त प्रभृति अनेकौं दारों को विस्तार पूर्वक देखकर परम घुद्धिमान् दामादरसी लोकोपकारके भाषाटीकोपेतः। कर्तु वाञ्छितसंग्रहं सुमतिमान्दामोदरः स स्वयं लोकानां च हिताय यन्त्रनिकर मन्त्रेण युक्तं स्फुटम् ॥ १०॥ प्रेरितश्चन्द्र- चूडेन स्वप्ने तु द्विजपुङ्गवः । चकार कल्पं यन्त्राणां चिन्ता- मणिरिति स्फुटम् ॥ ११ ॥ पुरा कैलासशिखरे नानाधातुवि- चित्रिते । नानादुमलताकीणे नानापुष्पोपशोभिते ॥१२॥ अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते । शिवभक्तः सुरैर्दैत्यैः पत्रगैश्च विराजिते ॥१३॥ योगध्यानकनिपुणैस्तत्वविद्भिः सुसेविते । आयुधैश्चेतनावद्भिरुदीरितजयस्वनैः ॥ १४ ॥ पकनेद्विनेत्रश्च त्रिनेत्रैरप्यनेककैः । एकपादेर्द्विपादेश्च त्रिपादैश्च सहस्रशः॥१५॥ महाङ्करमहाभीमः करालैश्च विराजिते । कम्बलाश्वतरै गीतध्वनिविराजिते ॥ २६ ॥ इन्द्रायेलौक- पालेश्च बाणाद्यैरसुरैस्तथा । दुर्वासाद्यैश्च मुनिभिःसमन्तात्परि- सेविते ॥ १७ ॥ एवंभूते च कैलासे देवदेवः स्वयंप्रभुः । ज्योतिर्मयोऽमृतमयोयोगचिन्त्यासदाशिवः॥ १८ ॥ अव्यक्तो लिये स्वयं मंत्रयुक्त यंत्रोंके संग्रह करनेकी इच्छा करते हैं, स्वप्नावस्थामें श्रीशिवजी महाराजकी प्रेरणाको स्वीकारकर दामोदर पंडित इस चिन्तामाणिरूपी यंत्रोंका संग्रह करते हुए ॥ १० ॥११॥पूर्वकालमें कैलास पर्वतकी चोटी नानाप्रकर- रकी धातुओंसे विचित्र, अनेक प्रकारके वृक्ष और लताओंसे व्याप्त और अनेक प्रकारके पुष्पोंसे विराजमानधी ।। १२ । अप्सराओंके समूहसे शोभित, सिद्ध धारणादिकोंसे सेवित शिवभक्त, सुर, दैत्य और पन्नगाँसे विराजमान ॥ १३ ॥योगध्यानमें चतुर, तत्वोंके जाननेवालोंसे निपेवित, चेतनावाले आयु धोंसे युक्त जयशब्दसे गुत्रायमान थी ।। १४ । त्रिनेत्रवाले, दो नेत्रवाले, एक नेत्रवाले और अनेक नेत्रवाले, तीन चरणवाले, दो चरणवाले, एक चरणवाले, हजारों महाकूर अतिभयंकर, कराल कम्बल (पशुविशेष), अवतर(खिबर) और हाथियों के शब्दों की ध्वनिसे गर्ज रही थी ॥ १५॥१६ ॥ इन्द्रादि लोक- पालासे, वाणादि असुरोंसे, दुर्वासादि मुनियोंसे सब प्रकारसे सेवित थी ॥ १७ ॥ ऐसे फैलासपर्वतके शिखरपर ज्योतिमय, अमृतमय, योगचिन्त्य सदाशिव अव्यक्त (नहीं प्रकाशस्त्ररूप) व्यक्तकर विगुभगवान्से स्तुतिको ४ यन्त्रचिन्तामणिः। व्यक्तरूपोऽसौ यत्रास्ते तु स्वयं शिवः । विष्णुना स्तूयमा- नस्तु प्रहृष्टस्तु सदाशिवः ॥ १९ ॥ कदाचिदुपविष्टोऽयमे- कान्ते परमेश्वरः । हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सृष्टिसंहारकारका ॥२०॥ चिन्तामणो कल्पवरे सुतन्त्रे श्रीचन्द्रचूडस्य मुखा- द्विनिर्गते । तस्मिन्मयाद्या किल पीठिकेयं कृतात्र दामोदर- पण्डितेन ॥ २१ ॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ महाकल्ले प्रत्यक्षसिद्धिप्रद उमामहेश्वरसंवाद दामोदरपण्डितोड़ते प्रथमपीठिका समाप्ता ॥ प्राप्त प्रफुल्लित सदाशिव, ए, पुष्ट, प्रसन्न आत्मा, सृष्टि और संहार करने वाले देवताओंके देवता स्वयं प्रकाशमान श्रीशङ्करजी महाराज विराजमान थे ॥ १८-२० ॥ श्रीशिवजी महाराजके मुखकमलोसे निकले कल्पों में श्रेष्ठ मुतन्त्र यन्त्रचिंतामाणे कल्पकी यह पूर्वपीठिका दामोदर नाम पंडितने इस ग्रंथमें ३२ प्रकार कल्पना की है ॥ २१ ॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ महाकल्पे प्रत्यक्षासद्धिप्रदे उमामहेश्वर- सम्वाद दामोदरपंडितोद्धृते पण्डित बलदेवप्रसादजी मिश्र• कृतभापाटीकासहिते प्रथमपीठिका समाप्ता।
भाषाटीकोपेतः। स पातु देव्याः कबरीविलासो लास्ये लसन्त्या गिरिराज- पुण्याः। यं पश्यतो बालमृगाङ्कमौले क्षणेन सर्वज्ञपदं बभूव ॥ १॥ एकदा देवदेवेशं दृष्ट्वा देवी शुचिस्मिता । उपगम्य शनैर्वाक्यं प्रोवाच जगदम्बिका ॥२॥ श्रीदेव्युवाच ॥ देव- देव जगन्नाथ करुणाकर शङ्कर । वर्णाश्रमाश्च धर्माश्च संदे- हाश्च महाप्रभो ॥३॥ कौतुकानि स्वकल्पानि पुराणादीनि वै प्रभो । श्रुतं सर्व मया त्वत्तः सर्वज्ञोऽसि यतः स्वयम् ॥ ४॥ मन्त्राणां विनियोगस्तु यन्त्राणां निर्णयस्तथा । आचारभेदा ये लोके योगाभ्यासः सुदुर्लभः ॥५॥ सुदुर्लभतरं ज्ञानं यज्ञ- काण्डः सुदुर्लभः। अनेकमन्त्रयोगो वै वेदोक्तोऽपि हि दृश्यते ॥६॥ तथैवागमभेदेषु उदितो हि न संशयः । एवं द्विजाश्च मन्त्रज्ञा दृश्यन्ते केशभागिनः ॥७॥ पाखण्डिभिः पराभूता नास्तिकैर्वेदनिन्दकः । विना मन्त्रैर्जपोमेरल्पक्लेशेन च प्रभो ॥ ८॥ तत्क्षणाजायते सिद्धिः सुसिद्धा सर्वकामदा । मारणोच्चाटनाकृष्ट विद्वेषे स्तम्भने तथा ॥ ९ ॥ अभिचारेषु जिस नृत्य करती हुई गिरिराजपुत्री श्रीपार्वतीजीके कवरी (चोटी) विलासको देखकर श्रीशंकरजी क्षणमात्रमें सर्वज्ञपदको प्राप्त हुए, यह महा- राणीके कबरी विलास हमारी रक्षा करै ।। १ । एक समय देवताओं के देवता श्रीशिवजी महाराजको देखकर जगजननी श्रीपार्वतीजी निकट आकर कुछ एक हँसती हुई धीरे २ बोली ॥२॥ पार्वतीजी बोली-हे देव जगन्नाथ ! हे करुणासागर ! हे शिव शंकर ! हे प्रभो !. वर्ण, आश्रम, धर्म संदेह इत्यादि मैंने सब आपके मुखारविन्दसे श्रवणकरे, क्योंकि आप सर्वज्ञ है ।।३।।४।। मंत्रोंके विनियोग, यंत्रोंका निर्णय, आचार भेद, कठिनसे प्राम होनेयोग्य योगाभ्यास और जो अनेक वैदिक मन्त्र योग दृष्टि आते हैं ॥ ५ ॥६॥ तथा आगम भेदसे सभीका आपने वर्णन किया है इन सब विषयोंके जानने चाले द्विजाति वेदके निन्दक नास्तिकोंसे पराजित हाकर दुःख भोगते हैं ॥७॥ अतः हे प्रभो ! विनाही मन्त्र, जप, होम इत्यादेिके किये सुखपूर्वक साधकको क्षणकालमें सुसिद्ध सम्पूर्ण कामनाओंकी देनेवली, सिद्धि प्राम होजाय ॥ ८॥ और मारण आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन आदि सप प्रकारके यन्त्रचिन्तामणिः। सर्वेषु काम्यार्थेषु च सर्वदा । विवादे च विषादे च रणे वरि. जये तथा ॥ १० ॥ एतत्सर्व यथा.देव सिध्यते साधकस्य हि । विचार्य देवदेवेश रहस्यं परमं वद ॥ ११॥ श्रीशिव उवाच ॥ वेदाचारो मया प्रोक्त ऋषीणां तु महात्मनाम् । शिवधर्मस्तु मुक्तानां वैष्णवानां तु वैष्णवः ॥ १२॥ सौर साङ्ख्यं मया प्रोक्तं बहूनां सिद्धिमिच्छताम् । शाक्तं च बहुधा प्रोक्तं भैरवं बहुधा प्रिये ॥ १३ ॥ धर्मकामार्थमोक्षाणां ज्ञानं चैव प्रका- शितम् । रहस्यं गोपितं भद्रे सर्वत्रापि न संशयः ॥१४॥ रह- स्यहीनो मन्त्रस्तु ध्यानेनाऽपि विशेषतः । न सिध्याति वरारोहे कल्पकोदिशतैरपि ॥१५॥ श्रीदेव्युवाच ॥ प्रसादं कुरु देवेश सुखोपायं वदस्व मे । सुरहस्यं सुबोधं च सद्यः प्रत्ययकारकम् ॥१६॥विना होमेन जाप्येन पुरश्चरणसेवया । कली तु सिद्धचते देव तथोपायं वदस्व मे ॥ १७ ॥ श्रीशिव उवाच ।। साधु साधु अभिचार तथा काम्य अर्ध विवाद, विपाद, संपाममें पैरोकी जय इत्यादि प्रयोग साधकको शीघही सिद्ध होजाय ॥ ९ ॥ १० ॥ हे देवदेवेश ! विचारकर उस परमरहत्यको प्रकाश करो ॥ ११॥ श्रीशिवजी घोले-महात्मा ऋषियोंका वेदाचार मैंने कहा, मुक पुरुषोंका शिवधर्म कहा और वैष्णवोंका वैष्णवधर्म कहा ॥ १२ ॥ सिद्धिकी इच्छा करनेवालोके निमित्त सौर और सांख्य योग कहा, हे प्रिये ! शाक्त और अनेक प्रकारके भैरव पहे ॥ १३ ॥ धर्म, काम, अर्थ, मोक्षका ज्ञानभी प्रबाश किया। हे भद्रे ! रहस्यको तो सदा निस्सन्देह सब स्थानों में गुप्तहो रखना चाहिये ॥ १४ ।। ह वरारोहे ! विशेष ध्यान करनेपरभी रहस्यहीन मंत्र अनेकों उपाय करनेसे भी सिद्ध नहीं होता है॥ १५ ॥ श्रीपार्वतीजी बोली-हे देवेश! मेरे ऊपर कृपाकर, सुसपूर्वक जानने योग्य शीघ्र विधासके देनेवाझे रहस्यको मुरपूर्वक कहो ॥ १६ ।। हे देव ! विना तप, जप, होम इत्यादि पुरश्चरणों के किये कलियुगमें सिद्ध होनेवाले उपायको पहो ॥ १७ ॥ श्रीशिवजी बोले-हे महा.
भाषाटीकोपेतः। महाप्राज्ञे लोकानां हितकारके । इदमित्थं न केनापि पृष्टोऽह पद्मलोचने ॥ १८ ॥ शृणुप्वैकाप्रचित्ता त्वं रहस्यं क्षणसिद्धि- दम् । कल्पं चिन्तामणि नाम गुह्याद्गुह्यतरं महत् ॥ १९ ॥ सर्वाङ्गमस्य सारं च मन्त्राणां सारमुत्तमम् । अथर्वणस्य वेदस्य सारात्सारतरं परम् ॥२०॥ अस्मिन्कल्पे भविष्यन्ति चिन्ता- मणिमये शुभे। यन्त्राणि बहुधा देवि काम्यकर्मकराणि च ।। २१ ॥ एतत्कल्पं सदा यस्य लिखितं विद्यते गृहे । संपू- ज्यते प्रतिदिनं प्रभावं तस्य वै शृणु ॥ २२॥ अल्पमृत्युभयं नास्ति नास्ति चौरभयं तथा । भूतप्रेतपिशाचानां प्रभावो नैव जायते॥२३॥ अन्यस्य कपट नूनं न सिध्यति कदाचन । अविश्वासो न कर्तव्यः साधकेन वरानने ॥ २४ ।। अभिचारों भवेत्कल्पे ह्यविश्वासान संशयः। संशयेन कृतं यन्वं विष- रीतं प्रजायते ॥२५ ॥ यन्त्रलेखनविधिः-स्नानं कृत्वा शुचिर्भूत्वा पूजयेत्कुलदेवताम् । लेखनीयं प्रयत्नेन एकान्ते यन्त्रमुत्तमम् ॥ २६ ॥ यस्य कस्य प्रयोगस्य विधिरेष प्रकीर्तितः । दिनत्रयं प्राज्ञे ! हे लोकोंका हितकरने वाली ! तुमने बडा उत्तम प्रश्न किया है। हे कमलनयनि ! आजतक मुझसे इस प्रकारसे किसीने नहीं पूछा ॥ १८॥ अब तुम एकाग्रचित्त हो शीय सिद्धिके देनेवाले गुमसे गुप्त अतिश्रेष्ठ चिन्तामणि कल्पको श्रवण करो ॥ १९॥ सम्पूर्ण शाम्रोंके सारभूत और मंत्रोंके उत्तम साररूप अथर्वण वेदके अतिसारयुक्त इस चिन्तामणि नाम कल्पमें काम्यकर्मके करनेवाले अनेकों यंत्र हैं॥२०॥ २१ ॥ यह लिखित कल्प सदा जिसके स्थानमें प्रतिदिन पूजित होता है उसके प्रतापको सुनो ॥ २२ ॥ अल्प मृत्यु- का भय, घोरका भय, भूत प्रेत पिशाच इत्यादिकोंका किया उपद्रव उनके यहाँ नहीं होता ।। २३. ॥ और अन्य किसी नीवका कियाहुआ कपट भी उस स्थानपर नहीं चलता है।। २४ ॥ हे वरानने ! साधकको अविश्वास न करना चाहिये, कल्पमें अविश्वासके करनेसे निस्सन्देह आभिचार होजाता है और संदेह पूर्वक किया हुआ विपरीत (उल्टा ) होजाता है ।। २५ ।। स्नानकर पवित्र हो शुद्ध मनसे कुलदेवताका पूजन करे, फिर एकान्तमें उत्तम यंत्रको लिखे ।। २६ । सम्पूर्ण प्रयोगोंकी यह विधि कहीहै तीन दिन भोग-विधा- यन्त्रचिन्तामाणः। प्रकुर्वीत पूजाभोगविधानतः ॥ २७ ॥ त्रिरात्रं भूमिशायी स्याब्रह्मचर्यरतः शुचिः । त्रिदिनाजायते स्वमं साधकस्य वरानने ॥ २८ ॥ सिद्धादिः-सिद्धं साध्यमारं चैव सुसिद्धमथवा ध्रुवम् । अवश्यं वदति स्वमे मन्त्राधिष्ठानदेवता ॥२९॥ यदा न जायते स्वप्नं तदसाध्यं विनिर्दिशेत । नो चेद्यथाश्रुतं स्वमे तत्तथैव विनिर्दिशेत् ॥३०॥ श्रुत्वा देवमुखात्स्वने फलासाई विधानतः । यदा निवारितः स्वने तदा तद्यन्त्रमुत्तमम्॥३१॥ एवं विलिख्य यः कुर्यात्सिद्धिरेव प्रकीर्तिता। अतएव मयो. क्तानि यन्त्राणि सुबहून्यपि ॥ ३२ ॥ येन मन्त्रेण संसिद्धिर्यषां येषां प्रजायते । तेन तेन हि तद्भाह्यं निषिद्धं तु परित्यजेत ॥ ३३ ॥ विधिरेष प्रसिद्धोऽस्ति यन्त्राणां भूतले कलौ । मन्त्र- कोष्ठे तु पश्यन्ति सिद्धसाध्यादि साधकाः ॥ ३४॥ न तेषां जायते सिद्भिः कलिदोषात्कदाचन । न चैकसाधको लोके नैकप्रकृतिको जनः ॥ ३५॥ न चैकराशिनक्षत्रं न चैका कुल- देवता । यन्त्रं बीजं तथा मन्त्रं चतुर्धा भवति प्रिये ॥ ३६ ॥ नसे पूजा करे । ब्रह्मचर्यका धारणकर शुद्ध अंत:करण हो तान दिनतक भूमिमें शयन कर । हे वरानने ! तीन दिनके भीतरही साधकको स्वप्न होता है ॥ २७ ॥ २८ ॥ सिद्ध, साध्य, आरंभाव तथा सुसिद्ध इत्यादि लक्षणोंको अधिधात देवता स्वयं प्रकाश करदेता है ॥ २९ ॥ यदि स्वप्न न हो तो प्रयोगको असिद्ध समझे, स्वप्नावस्थामें अनिवारित ( नहीं निषेध किया हुआ) साधक जैसा कुछ स्वप्नमे देवताके मुखसे श्रवण कर उस कथनके अनुसार फलसिद्धिको विधानपूर्वक मन्त्रमें लिखकर प्रारंभ फरनेसे निश्चय सिद्धिको होगा इस कारण मैने बहुतसे यंत्र कहे हैं ॥ ३०-३२ ॥ जिन जिन मंत्रोंस जिन २ मंत्राकी सिद्धि कहो है उन उन मंत्रोंको प्रहण करना चाहिये । निषिद्ध विधिको शग देना उचित है, कलियुगमें इस प्रकार यंत्रोंकी विधि प्रसिद्ध है। सिद्ध, साध्य, आदि साधकलेग, मंत्रकोष्ठको देखते हैं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ अत: उनको कलिदापसे किसी प्रकार मिाद्ध नहीं होतो, न तो लोकमै एक साधक है और न एक प्रकृतिके मनुष्य है, न एक राशि है और न एक नक्षत्र है और न एक कुलदेवता है किन्तु अनेकों है ॥ ३५ ॥ है प्रिय ! यंत्रर्चाज तथा मंत्र यह पार प्रकार है-
भाषाटीकोपेतः।
नवैकपञ्चमे सिद्धः साध्यः घट्दशयुग्मके। त्रिसप्तरुद्रे सुसिद्धो
वेदाप्टद्वादशे रिपुः ।। ३७ ।। सिद्धसाध्यावरिश्चति सुसिद्धस्तु
तथा परः। सिद्धः सिध्यात कालेन साध्यः सिद्धयति वा न
वा ॥ ३८ ॥ अििनकृन्तते मूलं मुसिद्धस्तत्क्षणार्थदः ।
तस्मादैववशाद्रार्शि कालं स्वर्ण महोदयम् ॥ ३९ ॥ साधकस्य
मनोभावं सम्यग् ज्ञात्वा समाचरेत् ॥ ४० ॥ एतद्रहस्यं परमं
समीरितं मन्त्रस्य यन्त्रस्य च सिद्धिदायकम् । एतद्विदित्वाऽ
खिलसिद्धिभाजनं भवन्तु सर्वे भुवि साधकाः सदा ॥४१॥
चिन्तामणौ कल्पवरे सुगोप्ये श्रीचन्द्रचूडस्य नियोगतो हि ।
यन्त्रादिसाध्यागमयी हि पीठिकां चकार दामोदरविप्रवर्यः।४२
इति श्रीयन्त्रचिन्तामणो महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिपदे उमामहेश्वर-
संवादे दामोदरपण्डितोद्धृत द्वितीयपीठिका समाप्ता ॥
सिद्ध, साध्य, आरे और सुसिद्ध ।। ३६ ।। नौ एक पाँचवेंमें सिद्ध, छः दश ,
दोमें साध्य, तीन, सात ग्यारहवें सुसिद्ध और चार आठ बारहवेमें रिपुसंज्ञक
होते हैं अर्थात् अपनी राशिसे मंत्रकी वा यंत्रराशि 6)९।१।५
पाँचवी होतो सिद्ध छठी, दशमी दूसरीमें साद्धय, तीसरी, सातवीं ग्यारह-
वीमें सुसिद्ध और चौथी, आठवीं, बारहवीं में शत्रु होता है ॥ ३७॥ सिद्धतो
कुछ फालमें सिद्ध होता है, साध्य सिद्ध होता भी है और नहीं भी होता,
और मूलको काटता है सुसिद्ध तत्काल फलका देता है इस कारण राशि
काल स्वप्न, महोदय और साधकके मनोगत अभिप्रायको भले प्रकार जानकर
क्रिया आरंभ करनी चाहिये ।।३८-४०॥ मन्त्र यंत्रोंकी सिद्धिका देनेवाला
यह परम पवित्र रहस्य कहा गया, इस रहस्यको जानकर सम्पूर्ण मनुष्य
भूमंडलमें सिद्धि भावके पात्र होंगे ॥४१॥ इस प्रकार शिवजीकी आज्ञाको
स्वीकारकर दामोदरजी सुगोप्य चिन्तामणि यन्त्रको यंत्रादिकोंकी सिद्धि
विधान पूर्वक द्वितीय पीठिकाको कहते हुए ॥ ४२ ॥
इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकरले प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसम्वादे
दामोदरपंडितोवृते पं. बलदेव प्रसादजी मिनकृतभाषाटीका-
सहित द्वितीय पीठिका समाप्ता ॥२॥
१० यन्त्रचिन्तामाणिः। अथ वश्याधिकारः। एको देवः स जयति शिवः सर्वदुःखान्तकारी प्रादाञ्चक नयनकमले नार्चितो विष्णुना यः।यः शृङ्गारी गिरिशतनयाद- त्तदेहार्द्धभागो लोकानां यो हवनविधिकृत्कालकूटं दधार ॥१॥ राज्ञां वश्यकराणि दुष्टपुरुषस्त्रीणां जनानां तथा तान्युद्धृत्य महागमाच्च बहुधा यन्त्राणि बीजानि च । अस्मिन्कल्पवरे क्रमेण विविधान् गङ्गाधरस्यात्मजो नित्यं सत्यमतिः प्रवक्ष्य- तितरां दामोदरः साम्प्रतम् ॥२॥ श्रीशिव उवाच ॥ राजवश्यं महायन्त्रं शृणु दोवे सुशोभितम् । कांस्यभाजनमानीय शुद्धं भस्मादिभिः कृतम् ।। ३ ।। जातीकाष्ठेन विलिखेद्रोचनाचन्द- नेन च । साध्यनाम लिखेन्मध्ये वर्तुलं वेष्टयेत्ततः ॥ ४ ॥ तस्योपरि दलान्यष्टो वकारांस्तत्र विन्यसेन । ततस्तद्वेष्टयेत सम्यग्वर्तुलं पूर्ववत् प्रिये ।। ५॥ तस्योपरि प्रकुर्वीत पनं षोडशपत्रकम् । अकरादिस्वरा लेख्या दले प्रत्येकतः क्रमात् ॥ ६॥ ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यग्रेखाभिस्तिसृभिस्ततः । मलिकाजातिकुसुमैः सिताम्भोजेः प्रपूजयेत ॥ ॥ सम्पूर्ण दुःखोंके नाशकरनेवाले कमलनयनसे पूजित विष्णु भगवानको चक्रके देनेवाले, शृङ्गार क्रियामें निपुण, गिरिराजकी पुत्री श्रीपार्वतीजीको अद्धीग में धारण करनेवाले, संसारको हवनकरनेवाले कालकूटके धारण करने वाले श्रीशंकरजी महाराजको जय हो ॥१॥भव नृप, दुष्ट मनुष्य, बी इत्या- दिकोंके वश्यकारक यंत्र तथा पीजीको शास्त्रोसे उद्धारकर विधिवक इस चिन्तामणि फल्पमें गंगाधरजीके पुत्र दामोदरजी वर्णन करेंगे ॥२॥ श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! राजवश्यकारक महायंत्रको सुनो, कांसीके पात्रको लाकर भस्म गोमय इत्यादिसे शुद्धकरै ।। ३ ।। फिर जाती वृक्षकी लकडीकी कलम बना- कर गोरोचन और चन्दनसे लिखे, मध्यमें साध्यके नामको रिखे फिर गोलाकार खींचे उस गोल आकारके ऊपर अष्टदल कमल बनाकर व अक्षर उनके भीतर भरदेव, फिर एक और कमल दलके ऊपर गोलाकार चिदलिखे।४-५॥उसके परभी पूर्ववत् सोलह दल कमल लिख हरेक कमलको क्रमानुसार अकारादि वर्णसे पूर्ण करदे ॥६॥सिर तीन रेसा उस सोलह फमल दलके ऊपरभी ७ १० यन्त्रचिन्तामाणः। अथ वश्याधिकारः। एको देवः स जयति शिवः सर्वदुःखान्तकारी प्रादाबक्र नयनकमले नार्चितो विष्णुना यः।यः शृङ्गारी गिरिशतनयाद- त्तदेहार्द्धभागो लोकानां यो हवनविधिकृत्कालकूटं दधार॥१॥ राज्ञां वश्यकराणि दुष्टपुरुषस्त्रीणां जनानां तथा तान्युद्धृत्य महागमाञ्च बहुधा यन्त्राणि बीजानि च । अस्मिन्कल्पवरे क्रमेण विविधान् गङ्गाधरस्यात्मजो नित्यं सत्यमतिः प्रवक्ष्य- तितरां दामोदरः साम्प्रतम् ॥२॥ श्रीशिव उवाच ॥ राजवश्यं महायन्त्रं शृणु दवि सुशोभितम् । कांस्यभाजनमानीय शुद्धं भस्मादिभिः कृतम् ॥३॥ जातीकाप्टेन विलिखेद्रोचनाचन्द- नेन च । साध्यनाम लिखेन्मध्ये वर्तुलं वेष्टयेत्ततः ॥ ४ ॥ तस्योपरि दलान्यष्टौ वकारांस्तत्र विन्यसेत् । ततस्तद्वेष्टयेत सम्यग्वर्तुलं पूर्ववत प्रिये ॥ ५॥ तस्योपरि प्रकुर्वीत पद्म पोडशपत्रकम् । अकरादिस्वरा लेख्या दले प्रत्येकतः क्रमात् ॥ ६ ॥ ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यग्रेखाभिस्तिसृभिस्ततः । मल्लिकाजातिकुसुमैः सिताम्भोजेः प्रपूजयेत् ॥ सम्पूर्ण दुःखोंके नाशकरनेवाले कमलनयनसे पूजित विष्णु भगवानको चक्रके देनेवाले, शृङ्गार क्रिया में निपुण, गिरिराजकी पुत्री श्रीपार्वतीजीको अद्धीङ्गमें धारण करनेवाले, संसारको हवनकरनेवाले कालकूट धारणकरने. वाले श्रीशंकरजी महाराजको जय हो ॥१॥अब नृप, दुष्ट मनुष्य, स्त्री इत्या- दिकोंके वश्यकारक यंत्र तथा बीजाको शास्त्रोंसे उद्धारकर विधिक इस चिन्तामणि कल्पमें गंगाधरजीके पुत्र दामोदरजी वर्णन करेंगे ॥२॥ श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! राजवश्यकारक महायंत्रको मुनो, फांसीके पात्रको लाकर भस्म गोमय इत्यादिसे शुद्धकरं ॥३॥फिर जाती वृक्षकी लकड़ी की कलम यना- कर गोरोचन और चन्दनसे लिखे, मध्यमें साध्यके नामको लिसे फिरगोलाकार खीचे उस गोलाप्राकारके ऊपर अष्टदल कमल बनाकर व अक्षर उनके भीतर भरदेवै, फिर एक और कमल दलके उपर गोलाकार चिह्नलिव-५॥उसके ऊपरभी पूर्ववन् सोलह दल कमल लिस हरेक कमलको प्रमानुसार अकारादि वासे पूर्ण करदे ॥ ६॥रि दीन रेसा उस सोलह कमल दलके उपरभी ७ ॥
भाषाटीकोपेतः।
अन्यैश्च श्वेतकुसुमैः सुगन्धैः श्वेतकर्पटैः। संपूज्य यन्त्रराजं तं
महामोहनसंज्ञकम् ॥ ८॥ एवं सप्तदिनं कृत्वा त्रिलोहर्वेष्टये-
त्ततः । यो धारयेत्तं शिरसि बाहुमूले गलेऽथवा ॥९॥
योषितां पुरुषो वापि कृतनिश्चयसंयुतः। किंकरा इव ते
सर्वे वशीभूताःसदेव हि ॥ १० ॥
महामोहनयन्त्रम् ।
व
देवदत्त
a
आ
इति श्रीयत्रचिन्तामणिमहाकल्ये प्रत्यक्षसिद्धिप्रद उमामहेश्वरसंवाद
तृतीयपीठिकायां वशीकरणाधिकारे दामोदरपण्डितोद्भुते
महामोहनं नाम प्रथम यन्त्रम् ॥ १ ॥
खींचे, तत्पश्चात् मालती चमेली श्वेत कमल इत्यादि सुगंधित द्रव्योंसे पूजन
करे ॥ ७॥ उन सुगंधित द्रव्योंसे तथा श्वेत पुष्पोंसे पूजन कर इस यंत्रकी
पूजा विधिपूर्वक करै, क्योंकि महामोहन नामक यह यंत्र है ।। ८ । इस
प्रकार सात दिनतक पूजनकर त्रिलोह ( सोना, चांदी, तांबा,) में बंदकर
अर्थात त्रिलोहके तापीजमें बंदकरके शिर, बाहुमूल, (दंड)वा गलेमें धारण
कर ॥९॥ किन्तु विश्वास पूर्वक धारणकर, विश्वास पूर्वक स्त्री वा पुरुषके
धारण करनेसे सब किंकरके समान उसके वशीभूत हो जायंगे ॥ १०॥
इति श्रीयंत्रचिन्तामणौ महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसम्वादे.
दामोदर पंडितोड़ते प्रलदेवप्रसादजीमिश्रकृतभापाटीकासहिते तृतीय
पीठिकायां वशीकरणाधिकारे महामोहनं नाम प्रथमं यंत्रम् ॥१॥
१२ यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच-अतःपरं प्रवक्ष्यामि यन्त्रं वै वीजसंपुटम् राजवश्यकरं श्रेष्ठं जनवश्यकरं तथा ॥१॥ एकपड़तों समालेख्य द्वीकाराणां चतुष्टयम् । ह्रींकारपुटितं पश्चात्साध्य नाम लिखेदधः ॥२॥ अधश्च चतो बीजान हींकारांश्च पुन- स्तथा । रेखाद्वयं चतुष्कोणं भूर्जपत्रे लिखेट्नुधः ॥ ३ ॥रोच- नाकुमेनैव श्रीखण्डेन तथैव च । अनामिकारक्त मिश्र लिखे- धन्वं सुशोभनम् ॥ ४ ॥ एतद्यन्त्रं तदा कुर्याद्यदा ऋद्धो नरा. धिपः । वाञ्छते निगडेवदं सर्वस्वं वाऽपि नाशितम् ॥ ५ ॥ घोजसपुटं यन्त्रम् । तदा तद्यन्त्रराजं तु संपूज्य विधिव. ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं स्वयम् । नानापुष्पैः सुनेवेद्येासेश्च ही देवदत्त ह्रीं | विविधैः शुभैः ॥६॥ यथाशक्त्या तु संभोज्याः कुमार्यो ब्राह्मणास्तथा । ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं योगिन्यश्च सुवासिन्यो नमस्कृत्य सुनिश्चितम् ॥७॥ तद्यन्त्रं मुष्टिमायध्य गच्छेद्वै राजमन्दिरम् । तरकोपं शमयत्याशु वशीकरणमुत्तमम् ॥ प्रसादस्तत्क्षण- देवि जायते नात्र संशयः ॥८॥ इति यन्त्र०म.क.उ.म.सं.तृ.पी.व. कोपशमनं बीजसंपुटं नाम द्वितीय यन्त्रम्॥२ श्री शिवजी घोले-राजव्याक्ति तथा जनव्यक्तिके वश्यकारक बीजसे पुदित परमश्रेष्ठ यंत्रको कहताहूं ॥१॥ गोरोचन, बेशर, लालचंदन अनामिका (कन उंगल के धरेकी उंगली) का रुधिर इन सब द्रव्योफो एक. नितकर भोजपत्रके ऊपर दो रेखायुक्त चतुष्कोणयंत्र लिख उस यंत्रके वीचमें तीन रेखा कलना कर प्रथम पंक्तिमें चार होकार वर्ण लिखे दूसरी पंक्तिमें ही कारसे पुटित साध्यके नामको लिखे तत्पश्चात् तृतीय पंक्ति में फिर पार हीकार लिखे अर्थात् १० होकार वर्ण और एक साध्यका नाम लिखे ॥२॥४॥ इस यंत्रका उस समय लिखे कि जिस समय राजा अतिक्रुद्ध होकर सम्पूर्ण धनादिक लेनेकी इच्छाकर कारागारकी प्राप्तिके निमित्त इच्छाकर ॥५॥ तम अनेक प्रकारके पुष्प नैवेद्य इत्य शुभद्रव्यों से यंत्रराजका पूजन करें। .. ६ ॥ पीछे कुमारी, प्रामण, योगिनी, सुवासिनी इनको निश्चय पूर्वक- , भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि स्वामिवश्यं मनोह रम् । य इच्छेत्स्वामिनं कर्तुं यावज्जीवं हि मानवः ॥१॥ तिर्य- खाद्वयं कुर्यादीर्घ दक्षिणे चोत्तरे । अन्ते तु कर्णिका कुर्याद- क्षिणे चोत्तरे पुनः ॥ २ ॥ प्रणवं च तथा श्री च साध्यनाम तथैव च । तदन्ते श्री च प्रणवं लिखेन्मध्ये तु साधकः ।। ३ ।। उपर्यपि दलांस्त्रींश्च अधोभागे त्रयं, तथा । दक्षिणोत्तरपूर्व च यावजीव स्वामिवश्यकर यन्त्रम् । दलेषु विलिखेत्क्रमात ॥ ४ ॥क्षकाराः सवि- सन्ताः कोणे श्रीङ्कार- क्षः ॐ श्री देवदत्तःश्री ॐ क्षः बीजकाः। एवं लिखित्वा तद्यन्वं रोचनाभूर्जपत्रके ॥५॥शरावसंपुटे क्षिप्त्वा पुटयेदग्निना ततः । उदृत्य स्वाङ्गशीतं च यन्त्रभस्म पिवे- 'वरः ।। ६॥ यावज्जीवं भवेत्तस्य स वश्यो नात्र संशयः । तृतीयं तु समाख्यातं स्वामिवश्यकरं परम् ॥७॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ० उमाम० सं० तृतीयपीटिकायां वशीकरणाधिकारे दामोदरपण्डितोद्धृते यावजीवं स्वामिवश्यकरं नाम तृतीयं यन्त्रम् ॥ ३॥ -नमस्कारकर भोजन करावे ॥७॥फिर यंत्रराजको मुट्ठी में दवाकर राजभवन में जानसे साध्य व्यक्तिका क्रोध तन् क्षण शांत हो प्रसन्नता होगी, यह उत्तम वशीकरण है ॥ ८॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकल्पे उमामहेश्वरसंवादे भापाटीकासहिते तृतीयपीठिकायां वशीकरणाधिकारे कोपशमनं वाजसम्पुटं नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥ २ ॥ • श्री शिवजी बोले-अब स्वामी वश्यकारक मनोहर यंत्रको कहताहूं जिसके हयोगके करनेसे जीवन पर्यन्त स्वामी वश्य होता है ॥१॥ दक्षिण उत्तर वृद्धि । तिरछी दो रेखाकर उनके दक्षिण उत्तर भागमें दो कर्णिका निर्माणकर अर्व साग तथा अधो भागमें साध्य व्यक्तिके नामको लिख फिर श्री और ओंका- को लिखकर फर्णिका तथा वाचके दलमें विसर्गसहित क्षकार अक्षर कल्प- भाकर बाकी स्थानोंमें श्री इस अक्षरको लिखें।॥२-४||इस प्रकार उक्त यंत्रको --- । ही ही यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच ।। यदा कस्यापि केनापि कार्य निर्वाशित भवेत् । तदा महाभियोगेन दिव्यं कोऽपि प्रकारयेत् ॥ १॥ तदा तन्मोहनार्थाय कुर्यादिव्यं विचक्षणः । रोचनाकुलमनैव पट्कोणं भूर्जपत्रके ॥२॥ कोणे कोणे तु हींकारं मध्यदेशे लिखेनरः । कोणान्तराले ह्रींकारान्विलिखेनु षडेव हि ॥३ साध्यनाम लिखेन्मध्ये चतुहींकारसंपुटम् । उपर्यधः पूर्वतोऽन्ते हींकारांश्चतुरो लिखेत ॥ ४॥ शरावसम्पुटे क्षित्वा पूजयेद्भ- दिव्यस्तभनयंत्रम् । क्तिभावतः । द्वितीयेऽद्धि तदाकृष्य यन्त्रराजं सुपूजितम् ।। ५।। दिव्यकाले शिखायां तु वध्वा यन्त्र प्रयत्नतः । मानस्थश्चिन्तयत्कालं फलं वेगेन हो ही देवदत्त होना मानवः ॥ ६॥ न तदास्य मयं किंचि. यन्त्रराजप्रसादतः । दिव्यस्तम्भो भवे नूनं स लोके साध्यतामियात् ॥ ७ ॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ० दिव्यस्तभ्भनं नाम चतुर्थं यत्रम् ॥ ४ ॥ -गोरोचनसे भोज पत्र पर लिखकर सरयोंमें वंदकर अग्निमें पुटितकर जा वह ठंढा होजाय तब उसको खोलर यंत्रराजकी भरमको पान करे, इस प्रयो ग करनेसे साध्यव्यक्ति निस्सन्देहे जीवनपर्यन्त यशीभूत रहताहै यह तीसरा स्वामीको वशमें करनेवाला यंत्र कहा ॥ ६-७॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकल्पे उमामहेश्वरसम्बादे व० कृ० भापाटीका. सहित तृतीयपीठिकायां वशीकरणाधिकारे यावजाप स्वामिवश्यकर नाम तृतीयं यंत्रम् ॥ ३ ॥ शिवजी बोले-सत्र कि किसी पुरुषने किसीके कार्यको विनाशित किया। तब उस पुरुपके मोहनार्थ गोरोचन, कुंकुम इन दो वस्तुओंसे भोजपत्रपर पर कोण दिव्ययंत्र लिखे ॥ १॥ तत्पश्चात् पूर्व और पश्चिम इन दो कोणों दोहीकाराक्षर लिख इनके अन्तरालमें ६ ही काराक्षर और लिखे एवं आ ह्रींकार हुए। पुनः पट्कोण यंत्रके भीवरके भागमे हीकाराक्षर संपुटिन् स भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच ॥ यदा कस्योपरि क्रुद्धो राजा वाञ्छति मारितुम् । तदा तन्मोहनार्थाय दुष्टनिग्रहणाय च ॥१॥रोच- नाकुङ्कुमेनैव लिखेद्यन्नं तु भूर्जके । हींसश्च साध्यनाम च ह्यन्ते ह्रींसस्तथैव च ॥ २॥ पश्चात्तद्वेष्टयेत्सम्यक चतुष्कोणे तु रेखया । उपर्यधो दलास्त्रीस्त्रीकोणे कोणे लिखेदुधः ॥३॥ हींकारं च सकारं च सकारंही तथैव च । एवं दलेषु प्रत्येकं राजमोहनं, दुष्टमुखस्तम्भन यन्त्रम् । लिखेद्वीजचतुष्टयम् ॥४॥ शरावसंपुटे हीसःसही हसिस/सि.स.ह्रीं क्षित्वा संपूज्य च विधानतः। दुष्टानां ही सः देवदत्त ही सः च मुखस्तम्भः स दीसःसाही/हीसःसबी/हीस.साही) वश्यो भवति क्षणात् ।। ५ राजकोपहरं नाम दुष्टमोहनकं परम् । एवं सप्तदिनं कार्य संसिध्यति न संशयः ॥६॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ महाकल्पे राजमोहन दुष्टमुखस्तम्भन नाम पञ्चमपन्त्रम् ॥ -साध्य मनुप्यके नामाक्षर लिख अन्य चार कोणोंको भी ४ ह्रींकाराक्षरसे वेष्टितकर दिय्य यंत्रराजको पूर्ण करै । एवं सब ह्रींकाराक्षर हुए ॥३॥ ॥४॥ इस प्रकार यंत्रराजको निर्माणकर शराव ( सरझ्या ) सम्पुटमें रखकर भक्तिभावसे पूजनकर दूसरे दिन शरावमेंसे निकालकर श्रेष्ठ मुहूर्तमें यत्नपूर्वक शिखामें बाँधे फिर वेगसे मौन हो काल और फलका चिन्तवन करे ॥५॥६॥ तो इस साधक व्यक्तिको किसी समयमें भी किसीसे भय नहोगा किन्तु दिव्यरतंभन होकर लोकमें साध्य भावको प्राप्त होगा ॥७॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसम्वादे पं० चलदेवप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकासहितेतृतीयपीठिकायां वशी- करणाधिकार दिव्यस्तम्भनं नाम चतुर्थे यन्त्रम् ॥४॥ श्री शिवजी योले-जब कि, किसी समय किसीके उपर राजा क्रुद्ध होकर उसको मारनेकी इच्छाकर क्य राजाके मोहन तथा दुष्ट राजानुयायो पुरुषोंके ।
यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच ॥ यदाक्रुद्धः प्रभुनूनं घातं कर्तु हि वाञ्छ ति। तदा स्वजीवरक्षार्थ यन्वं मृत्युञ्जय लिखेत् ॥१॥ आनीय भूर्जपत्राणि लिखेत पत्रद्वयोपरि । मध्ये नाम लिखित्वा तु चतुष्कोणं तु रेखया ॥२॥ एवं सप्तचतुष्कोणं लिखेल्लोहश- महामृत्युञ्जययन्त्रम्। लाकया। तस्योपरि दलांस्त्रीश्च चतुर्दिक्षु विलिख्य च ॥३॥ ८. ईशानादौ लिखेल्ल ला लि ली लु ल च दक्षिणे । ले ले लो लो पश्चिमे च लं लः स्यादर्थ देवदत्तः । चोत्तरे ॥४॥ एवं द्वादशदलेपु प्रत्येकं बीजमेककम् । त्रिशुलं च चतुष्कोणे सबिन्दु विलिखे- नरः॥५॥एवं यन्त्रद्वयं लेख्यं सं. पुटं कारयेत्ततः निक्षिप्य भमो तद्यन्त्रं साधकश्चोत्तरामुखः॥६॥ तस्योपरि क्षिपेतूनं महतीं च -निमहके अर्थ गोरोचन और कुंकुमसे भोजपत्रपर इस प्रकार यंत्रको लिसे ॥१॥कि, चौकोर लम्बी रेखा संच कर्णिका युक्तकर ऊपर नीचेके भागमें तीन दल स्थापितकर ह्रीं सः सही इस प्रकार प्रत्येक दलके भीतर उक चार बीजोंको लिखकर रेसाके मध्यभागमें ही सः इन दो चीजोंसे पुटित, कर साध्यव्यक्तिका नामाक्षर लिखे, शरायमें संपुटितकर पूजन कर तो दुष्का मुखरतंभन होगा और साध्यव्यक्ति वशीभूत होगा ॥२-५ ॥ राजकोपका नाशक दुष्टोंके मुसम्तमानकारक इस यंत्रका सात दिननक पूजन करनेसे निस्सन्देह कार्य मिद्ध होता है ।।६।। इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकल्ले प्रत्यक्षसिद्धिपदे उमामहेश्वर सम्पादे बलदेवप्रसाद मिश्रविरचितमापार्ट कासाहिते तृतीयपछिकायां वशीकरणाधिकारे राजमोहन दुष्टमुरसातम्भनं नाम पंचमं यंत्रम् ॥५॥ श्रीशिवजी बोले-जब कि, स्वामी कोधित होकर घात करनी इच्छा करतय अपने जीवनकी रक्षाके लिये मृत्युस्खयनाम यंत्रको लिसे । भोजपत्रके दो टुक- - .
देवदत्तः ही य की ये N भाषाटीकोपेतः। शिलां दृढाम् । पश्चात्तत्समुसे गच्छेत्कोपस्तस्य प्रशाम्यति ॥७॥ मृत्युञ्जयं महायन्त्रं प्राणरक्षाकरं परम् । यदा कस्यो- परि क्रुद्धः कालोऽपि हि दुरासदः॥८॥नदापि यन्त्रराजोऽयं रक्षत्येव न संशयः॥९॥ इनि श्रीयन्त्रचिन्तामणौ० वशीकरणाधिकारे महामृत्युंजय नाम षष्ट यन्त्रम् ॥६॥ विवादविजययंत्रम् । श्रीशिव उवाच ।। अथातः संप्रवक्ष्यामि विवादे विजयं नृणाम् । यन्त्रं कुर्यात्प्रयत्नेन सर्वलोकमनोहरम् ॥ १॥ मध्ये नाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टये- ततः। चतुर्दलं नतः कुर्या- द्वीजयुक्तं तु मानवः ॥२॥हीं मैं ही य प्रतिदले रोचनाकुगु- मेन च । भूर्जपत्रे समालिख्य पूजयेद्भक्तिमानरः ॥ ३ ॥ धूपै- -गोंके ऊपर पृथक् २ चतुष्कोण (चौकोर) सात रेखावाला चारों भागमें तीन २ कमलदलसे सुशोभित और पारों कोनोंमत्रिशूल लगाकर लोहेकी फलमसे यंत्र. राजको लिस। तत्पभात उक्त यंत्रके भीतर साध्य मनुप्यके नामके अक्षर लिस ईशान दिशातक ल, ला, लि, ली, लु, ल,ले, ले, लो, लो,लं, ल: इन बारह अनमो प्रत्येक कोष्ठमें लिखे, इस प्रकार साधक दो यंत्रोंको लिसफर उत्त- रफी और मुसकर बैठ पृथ्वी में रपी हुई एक भारी शिलासे दामकर यदि माध्यव्याक्तिके सम्मुख जायगा सो वह माध्याफि क्रोधको दूर करके प्रसन्न होगा, कारण कि यह मृत्युनयनामर यंत्र प्राणोंकी रक्षा करनेवाला है, इसका प्रताप एकवार कालके कोषकोभी शांवकर रक्षा करनेको निस्सन्देह समर्थ होगा ॥ १-९ ।। इति दुष्टयश्यकरं महामृत्युस पष्ठं यन्त्रम् ॥ ६ ॥ मीशिवजी बाले-भय विवादमें जपरी देनेगाले सर्व मनोहर इस यंत्रको विधान पूर्वक निर्माण पर ।। ६॥ निर्माणमा विधान-एक गोलाकार हो कंकुमसे भोजपत्रपर पर पार कमलदलोंसे युकार योपने सान्य व्यकिो २ यन्त्रचिन्तामणिः। सकाराः सविर्गान्ताः कोणे कोणे तु विन्यसेत ॥३॥ प्रणव मुख्यदिग्लेख्यं चतुर्दिक्षु क्रमेण च । ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक चतुष्कोणं द्विरेखया॥४॥ खररक्तेन संलेख्य भूर्जपत्रे मनोहरे । एतद्यन्वं सुसंपृत्य प्रक्षिपेटुग्धमध्यतः ॥ ५ ॥ दुष्टाः सर्वे विनश्यन्ति राजा मानं ददानि च । एकविंशहिनं यावत्तावत्त- त्रैव यन्त्रकम ॥६॥ इति यन्त्रचिन्ताम: उ०म० स० तृतीयपीटिकायो पिशुनवश्यकर नाम नवमं यन्त्रम् ॥ ९ ॥ व्यवहारविवादजयद यन्त्रम् । श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि विवादे जयवर्द्ध- मोह नम । व्यवहारे भयहरमिदं यन्त्र प्रशस्यते ॥१॥ पूर्वको ह्रीं” मा ह्रीं समालेख्यं ही माहींच तयेव च । तस्याधः साध्यनाम नच्च- देवदत्त तुष्कोणेन वेष्टयेत ॥ ॥ कोण कोणे दलं कुर्यान्मध्यदेशे म्तम! । तथैव च । दक्षिणे रोधवाजंतु नेते नयैव च ॥ ३॥ पक्षिमे --अष्टदलसे विभूपिककर चतुष्कोणको दो रेाभीसे युकार चक्रके भीतर साम्यव्यक्ति के नामाक्षर लिस प्रतिकोणमें विमर्ग मिलाफर पूर्वादि पारीदिशा. आम प्रणवको लिसे। फिर दुष्ट मोहन संक्षक इन यंत्रका विधानपूर्वक पृजनकरके २१ दिनतक दूधमें न्यापित रसनेसे दुष्टी। मुलमर्दन होगा१-६॥ इनि श्रीयचिन्तामणी महाक्पे प्रत्यक्षसिद्विपद उमामहेश्वरसंवाद तृतीयाठिकायां वर्गीकरणाधिकार पं. बलदेव भा. टी- सहित पिशुनवश्यकरं नाम जयमं यंत्रम ॥ ९ ॥ क्षोभ भाषाटीकोपेतः। स्तम्भवीजं तु वायव्ये क्षं तथैव च । उत्तरे क्षोभवीज तु ईशान्ये क्षं तथैव च ॥ ४ ॥ पूर्वे च मोहबीजं तु आग्नेय्यां क्षं तथैव च । एवं चाष्टदले न्यस्य बीजानि द्वादशैव तु ॥ ५॥ शरावसंपुटे क्षिप्त्वा यन्त्रराज जयावहम् । अभ्यर्च्य गन्धपु- पायेदापश्चाष्टभिरेव च ॥६॥ लोकपालांस्तु संपूज्य भोज- यित्वा कुमारिकाम् । बलिदीपैः प्रपूज्याय अष्टदिक्षु क्रमेण तु ॥७॥ तावत्पूज्यं प्रयत्नेन यावत्कार्य च सिध्यति । व्यवहार- जयं नाम विवादविजयं तयाणा राज्ञां कुले विवादे च जये- त्रास्त्यत्र संशयः । मानोन्नतिभवेत्तस्य यन्त्रराजप्रसादतः ॥२॥ इति श्रीयन्त्र दा०प० ते व्यवहारे ग्विादे च ज पदं नाम दशम यन्त्रम् ॥१०॥ श्रीशिव उवाच ॥ यमिच्छेद्वशगं कर्तु यावजीवं वरानने । तदा यन्त्रं प्रकुर्वन्ति गाणपत्यं सुसिद्धिदम् ॥ १ ॥ भूर्जपत्रं समानीय विस्तृतं छिद्रजितम् । अनामिकारक्तमिश्रं द्विर- -रेखामें ही, मां, ही इन बीजोंको लिख नीचे की पंक्तिमें साध्यव्यक्तिो नामके अक्षर लिसे और रक्तदलोंमें वक्ष्यमाण बीजोंकी पूर्ण करै । विधान यथा-दक्षिणदल में रोपवीजको, नैऋत्यकोणमें भं धीजको, उत्तरदिशा में क्षोभ वीजको, ईशानकोणमें क्षं पीजको, पूर्वदिशामें मोहयोजको, अग्निकोणमें क्षं चीजको लिसे, इस प्रकार जयके देनेवाले यंत्रको निर्माणकर शरावसंघुटमें रखकर अष्ट गंध धूप दीप नैवेद्यादिकोंसे पूजनकर आठों दिशाओंमें यलि. दानादि प्रियाओंको विधिपूर्वक करके इन्द्रादि लोकपालोंका पूजनकर कुमा- रियाको भोजन करावे और जबतक कार्य सिद्ध न हो तश्तक उक्त विधान- पूर्वफ यमराजका पूजन करवा रहे तो विवाइमें यंत्रराजके प्रसादसे जयको प्राप्त हो राजकुलमें प्रतिष्ठा और उन्नतिका भागी होगा।॥ १-१॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकल्पे प्रत्यासिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसंबादे पलदेवप्रसादजीमितभापार्टीकासहिते व्यवहारे विरादे घ जयदं नाम दशमं यंत्रम् ॥ १०॥ श्रीशंकर योले-हे वरानने ! यदि जीवनपर्यन्त किसी शक्तिको वशमें फरनेशी हो तो शीप्रसिद्धि के देनेशले गगपति थंघका प्रयोग करे ॥१॥ विधान यथा-चौद और छिद्ररहित भोजन दुरुडे के ऊपर दो' रेखाओस मिश्रित चतुकोग यंत्रको अनामिका कापर, हायीका मा, लाम्पका २२ यन्त्रचिन्तामणिः। शों ही ली ग देवदत्तः . यावनीववश्यकरं गाणपत्यं यन्त्रम् । दस्य मदं तथा ॥२॥ यावकस्य गँ गगगगगग में गैंग रसंचव रोचनं च तथैव च। ही ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं पतञ्चतुष्कं संयोज्य जातीकान संलिखेत ।। ३ ।हींकाराः सप्त संलेल्याः पूर्वपंक्ती वरानने। लीं ह्रीं में हों ही को ह्रीं अधः पडतो तु संलेख्य को हीं क्ली गँ तथैव च ॥ ४॥ साध्य ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं नाम तथा गं च ततः पंक्तों तृतीयके । क्लीं ह्रीं क्रौंच विवी- गगेंगेंगगगगगें गैंग जानि ह्रीं क्लीं को ही तथैव च ॥५॥ ततः पन्तो चतुर्थ्यो च ह्रींकाराणां चतुष्टयम् । एवं संलेख्य वीजानि विविंशति- सुमहकम् ॥ ६॥ पश्चात्तद्वेष्टयेत्सम्यक् चतुष्कोणं तु रेखया। गँकारा दश संलेख्याः पूर्व पश्चिम उत्तरे ॥ ७॥ प्राङ्मुखास्तु सुसंलेख्यास्त्रिंशत्संख्या गकारकाः । सुक्षेत्रातु समानीय मृत्तिका कृष्णवर्णकाम् ॥ ८ ॥ तया गणपतिं कृत्वा यन्त्र तस्योदरे क्षिपेत् । संपूज्य गन्धपुष्पायरिमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥९॥ देवदेव गणाध्यक्ष सुरासुरनमस्कृत । देवदत्तं महावश्यं रस, गोरोचन, इन सम्पूर्ण वस्तुओंको एकत्रितकर जातीक्षकी लकडोकी कलम बना भोजपत्रके ऊपर दो रेखावाले चतुष्कोण यंत्रको बँधकर उक्त यंत्रके भीतरके भागमेंट तिरछो रेखा बँचे । फिर प्रथम रेखामें सात ही पीज और दूसरी रेखामें क्रों, ही, ही, गं इन चार बीजोको आदिमें लगाय साध्य. व्यक्तिके नामाक्षरको लिख अन्तमें एक गं पीज और लिखे, पुनः तीसरी पंक्तिमें छो ही, की, ही, की, को, ही इन सात बोजोंको स्थापितकर चौधी पंफिमें ही ही, ही, ही, इन पार वाजीको लिख, पूर्व, पश्रिम, उत्तर दिशा में दश दश गंदीज लिखे, अर्थान् यंत्रक पूर्वादि भागाम लिखे दक्षिणमें नहीं। तत्पश्चात् पवित्र स्थानसे काली मिट्टी टाकर गणेशजीकी प्रतिमाको निर्माण कर उक्त यंत्रको गणेशजीके उदरमें स्थापितकर गंध पुष्पादिकासे पूजनकर " देवदेष गणाध्यक्ष सुरासुरनमस्कृत 1 देवदतं ( यहां साध्य व्यक्तिक भाषाटीकोपेतः। यावजीवं कुरु प्रभो ॥ १० ॥ इमं मन्त्रं समुञ्चार्य हस्तमात्र निखन्य च । क्षित्वा तत्र गणाध्यक्षं पूरयित्वा तु मृत्तिकाम् ॥ ११॥ यावज्जीवं भवेदश्यो गणराजप्रसादतः ॥ १२ ॥ इति श्रीप० वशी.यावजीववश्यकां गाणपत्यं नामकादशं यन्त्रम् ॥ ११ ॥ श्रीशिव उवाच॥ अथातःसंप्रवक्ष्यामि जनवश्यकरं परम् । मध्ये नाम लिखित्वा तु ईकारं विलिखेदधः ॥१॥ त्रिरावृत्तं तु संवेष्टयभूर्जपत्रे सुविस्तृते । चतुर्दले लिखेत्पश्चात्पूर्वादी दिकचतुष्टये ।। २ ।। ॐ नमो ॐनमो लेख्यं पश्चिमे पूर्वके दले। यावजी जनवश्यकर यन्त्रम् । ॐ अजिते अजिते चैव लिखे दक्षिण उत्तरे ॥ ३॥ राज- नमो घट्यकरं नाम यन्त्रराजंमनों हरम् । विदिनं पूजयेनित्यं ब्रह्मचर्यरतो नरः ॥ ४ ॥ देवदतः ब्राह्मणं भोजयेञ्चैकं चतुर्ये- ऽहनि सुप्रभे। त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा वाहुमूले च धारयेत् ॥ ५ ॥ हेमं च राजतं चैव तानं चैव विशेषतः॥ यन्त्रस्य -नामोचारण करना योग्य है) महावश्यं यावनीवं कुरु प्रभो।" इस मंत्रका स्चारण करता हुआ दायमर जमीनको खोदकर उसमें गणेशजीकी प्रविमाको पंदकर उपरसे मिट्टी बाल यन्द कर दे, साध्य व्यक्ति गगेशजीके प्रसादसे जीवनपर्यन्त वशमें रहेगा ॥१-१२॥ इति यावजीववश्यकरे यंत्रम् ॥ ११॥ भीशिवजी पोले-हे प्रिये ! जन वश्यफारक यंयको कहवा हूं, उसकी विधिको सुनो। मीन रेसा युक एक गोलाकार पक्रको कपूर, कुंकुम, गोरो- पन, कस्तूरी इन सब यस्तुभोदारा भोजपत्रके अपर लिए पूर्वाहि पारों दिशाभोंको फमल उसे घेष्टिव करे, तत्पश्चात् उक यंत्रक मध्यमें साध्य- व्यक्ति नामाक्षरोंको अन्वमें ईकार लगाफर लिसे और पूर्व पधिमालॉमें भनित इनको स्थापितकर प्रनवर्यपूर्वक तीन दिनतक गन्ध पुन्मादिकांसे पूजन कर चौथे दिन एक प्रामगको मोजन करा प्रात:काटके समय त्रिलोड अजिते अमित । .
यन्त्रचिन्तामणिः। धारणं श्रेष्ठं बाहुमूले गलेऽयवा ॥ ६ ॥ सर्वेषां चैव यन्त्राणां विधिरेष उदाहृतः । सुभगो दर्शनीयश्च स्वजनानां विशेषतः ॥७॥ यन्त्रस्य धारणाद्देवि स भवेन्नात्र संशयः। कर्पूरकुंकुमाभ्यां च रोचनागरुकेसरः॥ ८ ॥ लिखेद्यन्त्रवरं श्रेष्ठं मन्त्रतन्त्रविचक्षणः ॥९॥ इति श्रीयन्त्रवि० म०प्र० उ० त० पी० व. दा. यावज्जी जनवदयकरं नाम द्वादशं यन्त्रम् ॥ १२ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ जगद्वश्यं महायन्त्रं शृणु देवि सुशोभ- नम् । कपरं मृगनाभिश्च चन्दनं रोचनं तथा ॥ १॥जातीका- ठेन संलख्यं भूर्जपत्रे प्रयत्नतः। प्रणवं च वकारं च में ही उंच तथैव च ॥ २॥ पूर्वपक्तौ तु संलेख्यं द्यं बीजप: जगद्वक्ष्यकर यन्त्रम् । श्चकम् । दें डं ह्रींप्रणवं चैव इंकार च तथैव च ।। ३॥ पंक्ती द्वितीये ॐ वं जें ही डं संलेख्यं यत्लतो बीजपञ्चकम । हैं ही 30 ई तृतीयपों संलेख्यं वंकारं तदनंत- रम् ।। ४ । उकारं च जगत्राम व डं जगत् व सं ही वकारं तदनन्तरम् । हींकारश्च ततश्चान्ते एवं वै बीजपश्चकम॥५॥ (सोना, चांदी, तोवा) में वेष्टितकर दण्ड अथवा गलेमें धारण करेगा तो इस मनोहर राज्य वश्यकारक यंत्रधरके प्रतापसे स्वबन्धुगण का दर्शनीय वथा अति माननीय होगा ॥ १-१ ।। इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकल्पे प्रत्यक्षतिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसम्पाद पं. बलदेवपसादमिश्रकृतभापाटीकासहित तृतीयपोठिकायां यावजी जमवश्यकरं नाम द्वादशं यंत्रम् ॥ १२॥ श्रीशंकरजी बोले-हे देवि ! जगन्के वक्ष्यकारक अतिशोभायमान यंत्रको श्रवण करो । उसका विधान यह है-दो रेसायुक्त एक चौकोर यंत्रको भोज- पनके ऊपर चमेलीकी लकडीकी फलम बनाकर, केशर, कस्तूरी, लालबन्दन, गोरोचनसे लिखकर वक्त यंत्रके भीतर तीन तिरछी रेसा वंचकर पहली ग्या ओं, वं, जे, ही, दूसरी रेखामे देई, ही,ओं, ई; तीसरी रेखामे थे, भाषाटीकोपेतः। २५ 'तत्रापि विलिखेचून टंकारं तु चतुर्थकम् । एवं वीजानि संलेख्य चतुःकोणं तु कारयेत ॥ ६ ॥ द्विरेखया महाकार्य जगद्वश्यकर परम् । पूजयेत्रिदिनं देवि सुगन्धः सुमनोहरैः॥७॥ बिलोह- वेष्टितं कृत्वा धारयेद्वाहुमध्यतः । जगद्वश्यं भवेत्तस्य यन्त्र यावत् तिष्ठति ॥ ८ ॥ संपूज्य नित्यमेवादी यन्त्रं देवार्च- नादियु ॥९॥ इति श्रीचि० म०म० उ० तृ० ३०दा० जगदृश्य त्रयोदश यन्त्रम्॥१३॥ श्रीशिव उवाच ॥ यदा स्वभृत्यः क्रुद्धः सन्मर्म सर्व प्रका- शते । न शक्यते निराकर्तु देशकालबलेन च ॥ १ ॥ तदा तन्मोहनार्थाय म्वकीयार्थम्य सिद्धये । यन्त्र पिशाचिकानाम कर्तव्यं सुविचक्षणः ॥ २ ॥ साध्यनाम लिखित्वा तु वर्तुलं पिशाचियन्त्रम् । वेष्टयेत्ततः। चतुर्दलं प्रकर्तव्यं बीजयुक्त मनोहरम् ॥ ३ ॥ ही काराश्चतुरो लेख्या दलमध्ये चतुर्दिशम । रोचना देवदत्तः भूर्जपत्रे तु लेखन्या विलिवेनरः ॥ ४॥ संपूज्य गन्धपुष्पाद्यपानाविधरपि । ड, जगत् थे, उ, ही चीजों को लिसे । सत्पश्चात् तीन दिनतक गन्ध पुप्पादि: फोसे पूजनकर त्रिलोइमें पंदकर दंहमें धारण कर ती जस्तक यह यंत्र इंटमें. धंधा रहेगा तपतक जगत् वक्ष्य रहेगा। परन्तु प्रथम देवता आराधनके समय प्रतिदिन नियमपूर्वक यंत्रराजका पूजन करना योग्य है ।।१-९।। इविधीयंत्रचिन्तामणी महारो प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसम्बादे तृतीय- पीठिकायां यनी फरणाधिकारे ५० यलदेवप्रसादमिश्कृतमापाटीकासहित जगारयं प्रयोदशं यंत्रम् ।। १३ ।। श्रीशिवजी घोले, दे प्रिय ! यदि संवा मुल होकर सम्पूर्ण पनादिको प्रफाराफर नाश करनेफे यत्नमें उचत हो परन्तु देशकालरे वासे स्यामो उससे किसी प्रकार निधो न कर सके, तब उसके पायो लिये एक यार चक्र भोजपत्रके ऊपर गोरोपनसे गंपकर पूर्मादि पारों हिनाभीमें फमलदलमे दी २६ यन्त्रचिन्तामणिः। ततस्तदधिमध्ये तु क्षिपेद्यन्त्रवरं शुभे ॥ ५॥ स वक्ष्यो जायते नूनं यन्त्रराजप्रसादतः ॥ यन्त्रं पिशाचिकं नाम भृत्यवश्यकरं परम् ॥ ६॥ न देयं यस्यकस्यापि स्वयं रुद्रेण भाषितम् ॥७॥ इति यं. चि० भृत्यवश्यकरं पिशाचिसई चतुर्दशं यन्त्रम् ॥ १४ ॥ श्रीशिव उवाच॥ङ्करप्रकृतिका स्वामी यदासंसेव्यते जनः सेव्यमानोऽपि हि सदा भवत्येवे दुराग्रही ॥१॥ खलैः परिवृतो नित्यं दुराचारो महीपतिः। उत्तमो वाउधमो वापि म्लेच्छो वा प्रभुतांगतः॥२॥ यन्वं कालानलं कुर्यात्तदा तदश्यसिद्धये । साध्यनामाक्षरं लेख्य ही कारे गर्भमध्यगम् ॥३॥ यावन्तश्चा- क्षरा नाम्नि तावन्तश्च तथा लिखेत ॥ ईकारमन्ते संलेख्यं रोच- नाभूर्जपत्रके ॥ ४ ॥ विरावर्त चतुष्कोणं दीर्घेण फलवत्कृतम्। फरवश्यकर कालानलयन्त्रम् । ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रींई युक्तकर चक्रके भीतर सेवकके नामके अक्षरोंको लिख पूर्वादि चारों दिशा- ओम होकार बीजों को स्थापितकर पिशाचिका नाम यंत्रको लिखे। फिर गंध पुष्पादिकांसे उक्त यंत्रका पूजनकर दहीके भीतर रसदे तो वह सेवक व्यक्ति - निश्चय वशीभूत होगा। यह पिशाचिका नामक यंत्र सेवक व्यक्तिके वश्यका परम स्थान है इसको श्रीशंकरने स्वयं प्रकाशित किया है, अतः प्रत्येकको न देना चाहिये ।किन्तु अधिकारीकोही देना योग्य है,नहीं तो गुप्त रक्खे१-७ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसम्वादे तृतीयपीठिकायर्या पलदेवप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां भृत्यवश्य- करे पिशाचिसंहं चतुर्दशं यंत्रम् ।। १४ ।। श्रीशिवजी बोले-हे शैलसुते ! यदि दुष्ट पुरुषों से युक्त क्रूरपकृति स्वामी मनुष्योंके यथायोग्य सेवन करनेपाभी अपने दुराग्रह भावको न छोडे, तप उसके मोहनके लिये गोरोचनसे भोजपनके ऊपर तीन रेखासे मिश्रित चतु. कोण कालानल यंत्रको लिसकर ही बोजकी रेसाके भीतर साध्यव्यक्ति के नायके मन्नर लिख अंतमें ईइस वीजको लिसे। परन्तु जितने साध्यक्तिक भाषाटीकोपेतः। २७ राजिकाप्रतिमां कुर्यात्तत्पादस्य च पांसुना ॥५॥ हन्मध्ये प्रक्षिपेत्तस्य यन्त्र कालानलं महत् । संपूज्य प्रतिमां तां तु चुल्लीपा निखन्य च ॥६॥ पूरयेत्ता प्रयत्नेन चतुर्दश्यां महा- निशि ॥ एतत्करणमात्रेण स वश्यो जायते ध्रुवम् ॥७॥ अजा- रक्तेन संमिश्र भक्तं पूर्प तथैव च । बलिदानं प्रदातव्यं दिक्पा- लप्रीतये तदा ॥८॥ महाकालाय स्वाहेति मन्त्रेण जुहुया- ततः । एवं क्रमेण संस्कृत्य तत अष्टोत्तरं शतम् ॥९॥ तदेव भक्तं साज्यं तु रक्तपुप्पेश्च मिश्रितम् । यन्वं कालानलं नाम त्रिदशेरपि पूजितम् ॥ १० ॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणी कालानलं नाम पञ्चदशं यंत्रम् ॥ १५ ॥ श्रीशिव उवाच॥ वाणिज्यार्थ तु वाणिज्य लाभार्थ वाञ्छितं पथि । तेषां मध्ये यदा कोऽपि प्रदुष्टो जायते नरः ॥१॥ मार्गदेशे प्रभुऽपि तदा यन्त्रं प्रकल्पयेत् । हीकारोदरमध्ये तु साध्यनाम लिखेन्नरः ॥२॥ उपरिष्टाचतुर्दिक्षु स्वाहान्ते -नामके अक्षर हो उतनेही ही वर्णके होने चाहिये, अर्थात् ही पीजों की कोई मुख्य गणना इस प्रसंगमें नहीं है, इसका उदाहरण यंत्रमें देसना, पत्पश्चात् पृथके नीपेसेलिलाफर एक राजिका प्रतिमाको निर्माणकर उस प्रतिमाके हृदय भागमें उक्तकालानल यंत्रको स्थापितफर गंपादिकोंसे पूजन करके कृष्णपक्षफी गाभिमें गूल्हे की कर्वट में सोफर उक्त प्रतिमाको मन्त्रसहित गाडदे, फिर पकरेके मपिरसे मिले भातस दिक्पालोंकी प्रसन्नवाफे लिये यलिदानफरके उक्त पदार्थमें घी लाल फूल ओं महाकाठायति मंत्रसे अष्टोत्तरशव जपकरे तो इस देवदामोके पूजित कालानलके प्रयोगसे साध्यमनुष्य निधय वशीभूत होजायगा।।१-१०॥ इति भाषाटीकासादिव यंत्रपिन्सामाणिकी एतीयपीठिफामें कालानट- नामयाला पंद्रहवा पंत्र॥ १५ ॥ भौशिवजी पोर-यदि याणिग्य व्यवहारके फरनेवाले पुरुषको याणिग्य मार्गमें प्रमू अपया अन्य कोई व्यफि दुपदाई हो तो उनके वशके लिये स्वर त गोरोपनसे भोजपत्रके ऊपर दो रेसावाले पतुोग यंत्रको टिसकर भावरके मागमें ही पीजरेसा मध्यमें साध्ययाति नामासको निर्माणकर
૨૮
यन्त्रचिन्तामाणिः।
प्रणवादिकम् । मध्ये आकर्षय लिखेच्चतुर्दिक्षु क्रमेण तु ॥३॥
पवात्तद्वेष्टयेद्यन्त्रं चतुष्कोणं द्विरेखया । कोणे कोणे त्रिशूली
द्वौ चतुर्दिक्षु प्रकल्पयेत ॥ ४॥ एवं कृत्वा प्रयत्नेन पूजयित्वा
उच्छिएपिशाचयन्त्रम् ।
ॐ शाकर्षय शहा
ॐ आर्पय स्वाहा
ॐआकर्षय स्वाहा
देवदतः
ॐआय स्वाहा
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सुगन्धः । स्वरक्तेन तु संमिश्र रोचनाभूर्जपत्रके ॥ ५ ॥
लिखित्वा खण्डवत्कृत्वा रहसि प्रक्षिपेत्ततः। ओमाकर्षय
स्वाहा इमं मन्त्र जपेत्तदा ॥ ६ ॥ तत्क्षणाजायते वश्यो महा-
करोऽपि मानवः ॥ ७॥
इति य० दि० ना० म०प्र० उ० सं०१० पी० व. दामोदरपण्डितो.
इते दुष्टवशीकरणं उछिपिशाचिक नाम षोडशं यन्त्रम् ॥ १६ ॥
-पूर्वादि चारों दिशाओम ओं आकर्षय स्वाहा इसको यंत्रके भीतरही लिसे
कि, जिमसे साधकके नामके अक्षर मध्यगत हो जॉय, परन्तु यंत्र के चारों
कोनों में दो त्रिशूल भी लिखने योग्य है । फिर गंधादिकोंसे पूजन ऑ आक-
पय स्वाहा, इस मंत्रको पढकर यंत्रक टुकड़ेकर उक्त मार्गमें डालंद तो अति
ऋर प्रकृतिवाला मनुष्यभी उसी समय वशीभूत हो जायगा ॥१-७॥
इति भापाटीकासहित यंत्रीचन्वामीणका तृवीयपीठिसमें उच्छिष्ट-
पिशाचिनारक सोलयां यन्त्र ॥ १६ ॥
भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाचाायदा महाबला शत्रोर्घातं कर्तुं हि वाञ्छति। तदा तत्सातुकूल्याथै यन्त्रं कुर्वीत कण्टकम् ।। १॥ साध्य- नाम लिखेन्मध्ये वर्तुलं वेष्टयेत्ततः। ईकारश्च भ्यकारश्च विस- गान्तश्चतुर्दिशम् ॥२॥ एकैकं तु लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टये- दुष्टमोहनकरं कण्टकयंत्रम् । ततः । श्मशानभस्मना लेख्यमर्क- पत्रद्वयोपार ।। ३।। संपुटं मेलयित्वा तु वेधयेत्कण्टकस्ततः । निसन्य पूरये- द्यन्त्रं श्मशाने निशि पूजितम् ॥ ४॥ देवदतः बलिदानं प्रदातव्यं भृतेऽह्नि प्रयतो नरः। तत्क्षणाजायते शत्रुः सानुकूलो न संशयः ॥५॥ कण्टकारख्यं महा- यन्नं दुष्टमोहनकं परम । स्वशक्त्या दक्षिणां दद्यात्कालरात्रिः प्रीयतामिति ॥ ६॥ इति महाशत्रुसानुकूल्यकर कण्टकाव्यं नाम मतदां यन्त्रम् ॥ १७ ॥ Min श्रीशियजी बोले-जब कि, अतिरलवार शत्रु घात करनेकी इच्छा करता हो तो उसको अनुकूल करनेके वास्ते श्मशानकी भस्म लाकर दो आकके पत्तों- पर पृथा २ एक गोलाकार चफ सेंचकर उसके भीतर साध्य व्यक्ति नामक अक्षर लिस"भ्य:"विसर्ग मिश्रित इन दो घीजीको पूर्यादिचारी दिशाओम लिसकर फिर एक गोलाकार चक्र और खेंच कि जिसके बैंचनेस उक्तचक्र मध्यवर्ती होजाय,तत्पमान दोना पत्रोको संपुटगे लेकर काँटासे छेदकर कृ.ग. पशको रात्रि पूजन करके श्मशानभूमिमें सौदंगर गाददे और भूतादि याति- प्रदान करे नो शत्रु उसी समय वशीभूत होजायगा, यह दुष्टमोहनकालकंटक नाम यंत्र है, इसका यथायोग प्रयोगकर " कालरात्रि! प्रसन्न हो" इसको मारण परमाणों को दक्षिणां दे ॥ १-६॥ अतिचिन्ता तीसरी पाठियल मागाकायां कण्टकार- नामवाला दुष्टमोदनयन्त्र ।। १७ ॥
देवदनः
हहिहि
यन्त्रचिन्तामणिः।
कोणकोणे दले न्यस्य दींकारं तु विचक्षणः । रोचना-
कुंकुमेनैव मृगनाभिस्तु चन्दनम् ॥५॥ एकीकृत्य लिखेद्यन्त्र
भूर्जपत्रे सुविस्तृते । त्रयोदश्यां सिते पक्षे साधकश्चोत्तरामुखः
॥६॥ तद्यन्नं पूजयेन्नित्यं रात्रौ रात्री वरानने । भोगेर्नाना
बीसौभाग्यका ललितायंत्रम् । वियः पुप्पैर्वस्त्रालंकारभूषणैः
॥ ७ ॥ एवं सप्तदिनं कृत्वा
तदन्ते तव तुष्टये । स्त्रियः
सौभाग्यसंयुक्ता भोजयेत सप्त-
संख्यया ॥८॥शंकरस्य मिये
देवि ललिते प्रीयतामिति ॥
मपं देहि यशो देहि सौभाग्यं
देहि में श्रियम् ॥९॥ भगवति
वान्छितं देहि प्रियमायुप्यव-
र्धनम् । एवं मन्त्रं समुच्चार्य ततश्चायं विसर्जयेत ॥१०॥
तद्यन्त्र धातुनावेष्टय सदा कण्ठे तु धारयेत् । सुभगा रूपसंपन्ना
पतिप्रियतमा भवेत् । ललिताख्यं महामन्त्रं स्त्रीणां सौभाग्य-
कारक.म्॥११॥इति श्रीप-स्त्रीणां सौभाग्धकरं ललितारगगेकोनविंशं पन्त्रम् १९
ही चीज लिखकर उक्त दलोंग एक एक ही वर्ण लिखकर कृष्णपक्षकी यो-
दीके दिन रात्रिक समयमें उत्तरकी औरको मुखकरके सात रात्रितक
निदम पूर्वक नानाप्रकारके भोग तथा गंधादिकामे तुम्हारी प्रसन्नताके कारण
यन्त्रराज का पूजनकर सौभाग्यवती सान स्त्रियों को भोजन करावे । तत्पञ्चान
वक्ष्यमाण मंत्र को उभारणकर विगर्जन घर । मंत्री यथा-शंकरस्य प्रिये देवि
ललिते गीयतामिति । रूपं देहि यशो देहि सौभाग्यं देहि में श्रियम् । भगवति
वाञ्छितं देहि प्रियमायुप्यवर्धनम् ।। फिर गंत्रको धातु के बने नायाजमें बन्द
करके जो घी केठमैं धारण करेगी तो वह यन्त्रराजक स्थित रहनेतक
सौभाग्य तथा स्पादिस युक्त प्रीतमको अत्यन्त प्यारी होगी। यह ललिता
ख्ययंत्र षियों को अधिक संभाम्पा देनेवाला है ।।१-११ ॥
इति यंत्र. ललितानाम सामान्यदायक उन्नीसवां यन्त्र ॥ १९ ॥
भाषाटीकोपेतः। : श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रसन्नेन यन्त्रं भर्तृप्रसादनम् । संलिख्याथ प्रियं नाम सांकारपुटितं शुभम् ॥ १ ॥ अधोपरि तथा लेख्यं सांकारद्वितयं शुभम् । ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक् वर्तुलं रेखयैकया ॥२॥ तस्योपरि दलान्यष्टो ह्रींकारसहितॉल्लिखेत्। रोचनाकुमेनेव भूर्जपत्रे लिखेन्नरः॥३॥ त्रिदिनं पूजयेन्नित्यं रात्री रात्री तु पूर्ववत् । ततः स्नात्वा चतुर्थेऽति पूजयेत्सुभगा- त्रयम् ॥ ४ ॥ अनङ्गवल्लभे देवि त्वं च मे प्रीयतामिति । स्त्रीसौभाग्यकरं यन्त्रम् । एनं प्रियं महावश्यं कुरु त्वं स्मरवल्लभे ॥५॥ एतन्मन्त्रं समुच्चार्य पूजयित्वा तु ताः स्त्रियः। तद्यन्त्रं धातुनावे- सो देवदत्त सा ट्रय कृत्वा कण्ठे प्रधारयेत ॥६॥ पतिर्दासो भवेत्तस्या यन्त्रराजप्रसा- दतः । सौभाग्यमतुलं तस्या जायते नात्र संशयः ॥ ७ ॥ न सपत्नी गणयति सौभाग्यमददर्पिताम् । एका सुवासिनी भोज्या चतु- दश्यां सितेतरे॥८॥ पक्षे पक्षे रतिप्रीत्ये पूज्यं यन्त्रं तु नित्य- शः । यासां तासां न दातव्यं यन्त्रं सौभाग्यवर्धनम् ।। ९ ।। इति यं० स्त्रीगां सौमाग्यकर विशतितम यन्त्रम् ॥२०॥ स मा K श्रीशिवजी योले-हे देवि ! प्रसन्न मन होकर पतिवश्यकारक यंत्रको सुनो। गोलाकार एक चक्रको गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर सेंचकर अष्टदलसे वेष्टि- तकर उक्त गोलाकार यंत्रके भीतर पूर्वादि चारों भागों में सांधीजको लिखकर अनुस्वार युक्त साध्यव्यक्तिके नामके अक्षरोंको लिसे और उक्त आठ दलों में ही पीजीको लिस. तीन रानितक यंत्रका गंधादिकोंसे पूजनकर चौथे दिन । विधानपूर्वक सौभाग्यवती ३ खियों को पूजितकर वक्ष्यमाग मंत्रका नधारण करे। मंत्र यया-"अनङ्गवलभे देवि त्वं च मे प्रीयतामिति। एनं प्रियं महापश्य कुन त्वं स्वरवल्लभे ॥" इस प्रकार यंत्रका पूजनकर धातुवेष्टित कर कंठमें धारण कर यो पति दासकी समान होजायगा और यंत्रराज प्रतापसे इसका । ३ यन्त्रचिन्तामाणिः। श्रीशिव उवाच ॥ योपिश्यं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशो- भनम् । रोचनाकुटुमेनेव श्रीखण्डमृगनाभिना ॥ १॥ भूर्ज पत्रे तु मलेख्य जातीकाष्ठेन यन्त्रकम् । ऐं ह्रीं क्लीं च ततो नाम ऐं ह्रीं क्लीं च पुनस्तथा ॥ २ ॥ एवं संघटितं कृत्वा चतु- प्कोणं तु वेष्टयेत् । उपर्यधोऽपि विलिखेत्पञ्च बीजानि यत्नतः ॥३॥ ह्रीं क्लीं च तथा क्षी चचान्ते च पुनस्तथा । कोणेषु विन्यसेवीजान ऐं ह्रीं क्लीं च तथैव च ॥ ४ ॥ दला तिस्तु कर्नव्या वीजानामुपरि क्रमात । एवं चतुर्दलं कृत्वा योजयुक्त मनोहरम् ॥ ५ ॥ राजिका प्रतिमा कृत्वा मदनस्प तु काष्ठके । तस्या हदि तु संस्थाप्य तधन्वं पूजयेत्ततः॥६॥' भोगेश्च विविधैर्गन्धे पर्दापः फलैः शुभैः । रात्री रात्रों प्रकर्तव्या दिनान्ते प्रत्यहं शुभे ॥ ७ ॥ एवं कृते च -प्रताप अतुल होगा। इत्यादि उपरोक्त मियामीक करनेपर भी पति सामाग्य- मदसे दर्षित घीको कुछ न समझे तो शुरूपक्षकी प्रति चतुर्दशी रसिकी प्रोविके लिये एक सौभाग्यवती स्त्रीको भाजन फराकर पुनः यंभराजकापूजन थी, यह मौभाग्यवर्द्धकयंत्र विना अधिकारीके और किमीको न देव ॥१-९॥ इति यंत्रचिन्तामणिकी पं० यलदेवप्रमामिप्रकृतभागटीकायुव तीसरी पीठिका श्रीसोमायकारक नामबाला पीसा यंत्र ॥२०॥ श्रीशिवजी बोले-दे देवि ! खावश्याक अनिश्रेष्ठको कहता अब परो । गोरोचन, कुंकुम, लालचंदन, कम्नरी इन सब यग्नु भाको दकट्टापरयो भोजपत्रपर घमेलीकी फलमसे एक अंगुलके अंतरमे कर्णिका युवा राव ओके ऊपर नीचे दो साकार कल्पना परे । फिर कणिका आम में ही पली, इन पीजोंको पूर्णकर इक्त दोनों दलाकारों में, टी,क्ली, भी,एं इन चीजों को लिगका साभीक भीतर ऐं, हो, यती, इन योजोका आदि अनमें लगाकर अनुम्बार साध्यव्यक्ति नामको लिनपा फाटक पराजित)रामे पार देवकी प्रतिमाको निमाणकर उक्त यंत्रकोप भागमें न्यापिनारगंध, पुन धूप, दीप,फल, नवा हमादिशुम यमुनामे मारकालो ममय मिहिप प्रत्येक रात्रिम मात्रको दारणार कामदेयका पूजन करे ।
यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मानिनोमानमर्द- नम् । यन्त्र सुदुर्लभं लोके विख्यातं मानमर्दनम् ॥ १॥ तुर गस्य तु रक्तेन रोचना भूर्जपत्रकोप्रणवं च ततोही च साध्य नामाक्षरं पृथक् ॥ २॥ नामाक्षराणि ह्रींकारपुटितानि विच. क्षणः । आद्यन्ते प्रणवं लेख्यमेकपंक्तो विचक्षणः ॥ ३॥ तत- स्तद्वेष्टयेत्सम्यक् चतुष्कोणं तु रेग्यया । उपर्यधश्च संलेख्य पूर्ववद्वीजसंपुटम् ॥ ४॥ तिर्यग्भागे द्विभागे तु पूर्ववन्नाम- सम्पुटम् । कोणे दलाकृतिं कुर्यान्मदनाकृतिमध्यतः ॥५॥ स्त्रीवश्वकर मदनमर्दनयन्त्रम् । । ॐहादेहोरहादात अहीदेहावहीदहात्तही *ឧត្តរិច ॐहादेहीवादहांतहा हादेहोवहांदा नहीं एवं यन्त्रं सुसंलेख्यं मदनप्रतिमांशुभाम । मदनस्य तु काठन कृत्वा हदि विनिक्षिपेत ॥ ६॥ सरन्धं हदयं कुर्याद्यथा यन्त्र सुतिष्ठति । संवेष्टय प्रक्षिपेचूनं यन्त्रं तस्योपरि स्प्युटम ॥ ७ ॥ श्रीगिपजी पोले- हे देवि! मुदुर्लभ लोकप्रसिद्ध मानिनी ग्रियों के मान मर्दन करनेवाले यन्त्रको कहता हूं.सुनो घोडके मधिरम भोजपत्रके ऊपर मदन- काप्टकी कलमसे एक अंगुलके अंतरमे दो तिरछी रेसा सेंचकर उनके मादि अंवमे कमलदल आमार लगाकर उक्त रेखाओके ऊपर नीचक दोनो भागामें मुछिएक गोलाई युक्त दो रेग्ग चे। फिर आदी देवी वहीं दही नवी ओ", इन ग्यारह योजौको प्रत्येक कोटमे स्थापितकर यन्त्रको पूर्ण करे । तत्पमान मदनकापसे एक कामदेवकी प्रतिमा निर्माण रकि,जिसके हृदय में सा एक छिद्र हो कि, जिप्समें उक्तयन्त्र सुभीषके साथ प्रति होग,फिर लालचंदन मारा ३७ भाषाटीकोपेतः। रक्तचन्दनमाल्याद्यैः पूजयेत्प्रत्यहं तु तत् । एकविंशद्दिनं यावत्सा तस्य वशतामियात् ॥ ८॥ इति यं० चि० स्त्रीवशीकर मदनमर्दन नाम द्वाविंशं यन्त्रम् ॥ २२ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि राजस्खीवश्यका- रकम् । यथा तदृष्टिपातेन कामबाणहता इव ॥ १॥ पतन्ति कामाक्ष यन्त्रम् । सहसा दृष्ट्वा मानिन्यो मद- 'विह्वलाः । रोचनाकुङ्कुमे- नैव भूर्जपत्रे लिखेन्नरः ॥२॥ कपरेण समायुक्तं जातीकाष्ठेन यत्नतः।षद- देवदत्तः कोणस्य तु मध्ये तु सा- ध्यनामप्रतिष्ठितम् ॥ ३॥ क्रोंकारं सर्वतो लेख्य कोणोपरि प्रयत्नतः पूर्व- कोणान्तराले तु हीङ्का- रद्वितयं लिखेत् ॥ ४ ॥ कोणमध्ये लिखेच्चैकं ह्रींकारं पूर्वसं- (over आदिवस्तुओंसे पूजनकर यंत्रेश्वरको उक्तप्रतिमाके हृदयमें स्थापितकर इक्कीस दिनतक पूजन झरै तो साध्यव्यक्ति वशमें होजायगी।॥ १-८॥ इति यंत्रचिन्तामाणिकी तीसरी पीठिकामें स्त्रीवशीकरण मदनमर्दन नामवाला याईसवां यंत्र ॥ २२ ॥ श्रीशिवजी घोले-अव राजस्लीवश्यकारक यंत्रको कहता हूं कि, जिसके दर्शनमात्रसे कामयाणसे हतको समान मानिनी खियें देखकर मइसे व्याकुल हो पतित होगी। विधान यथा-गोरोचन, कुंकुम, कपूर इन वस्तुओंको एकत्रित फरके भोजपत्रके ऊपर चमेलीकी फलमसे एक पट्कोण यंत्रको निर्माणकर उसके पहिर्भागमें एक गोलाकार पक्र खेंचे और दक्षिणभागमें तीन और ईशानभागमें एक दल लिखकर उक्त पदकोणके भीतर साध्यन्यक्तिक नामक यन्त्रचिन्तामणिः। मितम् । तत्सर्व वेष्टयेत्पश्चाद्वर्तुलं रेखया शुभम् ॥ ५॥ दाक्षिणे त्रिदलं कुर्यादीशान्येऽपि दलं तथा । हावार दलमध्ये तु क्रमेण प्रविलेखयेत् ॥६॥ एवं विलिख्य तद्यन्वं पूजयेद्- भक्तिभावतः । गन्धपुप्पः सुनवेद्यैः शुक्लाम्बरधरः स्वयम् ॥ ७ ॥ चिन्तयेत्तां स्त्रियं रात्री यन्त्रस्य पुरतः स्थितः । एवं सप्तदिनं कृत्वा तदन्ते ब्राह्मणाः स्त्रियः ॥ ८॥ संभोज्या विविधभोज्यैः कामाक्षी प्रीयतामिति । शक्त्या च दक्षिणां दद्यद्भोजयेत्साधकः स्त्रियम् ॥ ९॥ त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा बाहु- मूले तु धारयेत् । तं दृष्ट्वा राजपत्न्यश्च कन्दर्पज्वरपीडिताः। स्वयं संमार्थयन्नित्यं का कथेतरयोषिताम् ॥ १०॥ इति य० वि० राजस्त्रीवश्यकर कामाक्षं नाम त्रयोविशं यन्त्रम् ॥२३॥ अक्षर लिख प्रत्येक कोणमें ह्रीबीजको लिखे । तत्पश्चात् पूर्वकोणमें क्रोवीजको लिख दो ह्रीं बीजोंको लिखे और पाँची कोणोंमें सिर्फ एक एक क्रों वीजको लिख उक्तदलों में एक एक ह्रीं बीज लिखे । पुनः भक्तिभावसे गंध पुष्प नैवे. द्यादि पदार्थासे यंत्रका पूजन कर श्वेतवस्त्रको धारण कर उक्त यंत्रको सम्मुख रखकर रात्रिके समय साध्यांका चिन्तवन करे. इस प्रकार सात दिनतक पूजनादि क्रियाओंको करके शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंको विविध प्रकारके भोज्य पदार्थोंसे भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहै कि "कामाक्षी प्रीयताम् "फिर त्रिलोहके तावीजमें बंदकरके भुजामें धारण करने वालं साधकको देखकर कामज्वरसे पीडितहुई राजस्त्रियां स्वयं प्रार्थना करेगी, अन्यस्त्रियोंकी तो पातही क्या है ॥ १-१० ।। इति यन्त्रचिन्तामाणिकी तीसरी पीठिका राजनीवश्यकारक कामाक्षनामक तेईसवां यंत्र ॥ २३ ॥ .
भाषाटीकोपेतः।
श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि बीजमेकं महा-
फलम् सततं धारयेन्नित्यं स्त्रीणां प्रियतरो भवेत् ॥१॥ स्त्री
चद्धारयते नित्यं सा सौभाग्यवती भवेत् । सौभाग्यजननं
बीजं नृणां चैव विशेषतः॥२॥ एतद्वीजाक्षरं गोप्यं न देयं
यस्य कस्यचित् । सकारं च हकारं च ककारं च तथैव चाशा
लकारं च डकारं च ईकारान्तं प्रतिष्ठितम् । एवं विजययन्त्रम् ।
क्रमेण संयोज्य अक्षराणां च षट्ककम् ॥ ४॥
ईकारस्वरसंयुक्तं बिन्दुना परिशोभितम् ।
रोचनानीरयुक्तेन भूर्जपत्रे लिखेन्नरः ॥ ५ ॥
त्रिदिन पूजनं कृत्वा हेना वै वेष्टयेत्ततः। पुरुषो
बाहुमूले वा नारी चेद्गलके पुनः ॥ ६ ॥ धार-
येद्वीजराजं तु स्फुटं दीर्भाग्यनाशनम् । महासौ-
भाग्यजननं श्रीशिवेन प्रतिष्ठितम् ॥ ७॥
ANGA
इति यन्त्रचि ना० म०प्र० उ० तृ०३० दा० सौभाग्य-
जनन विजय नाम चतुर्विश यन्त्रम् ॥ २५ ॥
श्रीशिवजी बोले-हे प्रिये ! अत्यन्त फलदायक एक बीजको कहता हूँ कि,
जिसके नित्य प्रति धारण करनेसे साधक वियोंको अत्यन्त प्यारा होगा।
विधान यथा-जलमिश्रित गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर तीन रेखा युक्त एक ।
अर्द्ध चन्द्राकार लिखकर, सकार, हकार, ककार, लकार, उकार, ईकार इन
छ: अक्षरोंको ईकारमें गर्मितकर उक्त अर्द्ध चन्द्राकारफे धीचमें स्थापित करे।
तत्पश्चात् गन्धं पुष्पादिकोंसे पूजनकर सुवर्णमें लपेटकर पुरुष भुजामें और
स्त्री गलेमें धारण करे । मनुप्योंको यह सौभाग्यका देनेवाला अत्यन्त पवित्र
वोजराज गुप्त मावसे रखना चाहिये किन्तु हरेकको न देना चाहिये, क्योंकि,
उक्त यन्त्रराज शिव प्रतिष्ठित होनेसे शीघ दौभाग्यनाशक और सौभाग्य-
जनक भावको धारण करनेवाला है ॥ १-७॥
इति यन्त्रचिन्तामणिकी तीसरी पीठिकामें सौभाग्यजननविजय
नामवाला चौवीस यन्त्र ॥२४॥
यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि यन्त्रं सौभाग्यदा- यकम् । स्त्रीणामेव समुद्दिष्टं यन्त्रं कमलसंज्ञकम् ॥ १॥ तस्य संधारणादेवि वन्ध्या गर्भवती भवेत । मृतवत्सा तु या नारी सा लभेत्पुत्रमुत्तमम् ॥२॥ धृत्वा तु जायते देवि जीवत्पुत्रा न संशयः। रोचनाकुंकुमेनैव भूर्जपत्रे लिखेनरः ॥ ३॥ प्रणवं तु लिखेत्पूर्व हींकारस्तदनन्तरम् । ततो रमणनामं च ह्रींका- रान्तं प्रतिष्ठितम् ॥ ४॥ उपर्यधोऽपि विलिखेत्त्रोंकारमेकर्क तथा । ततस्तद्वेष्टयेत्सर्व वर्तुलं रेखयैकया ॥५॥ तस्योपरि दलान्यष्टौ बीजाक्षरयुतानि च । जॅकारं च चतुर्दिक्षु दलमध्ये तु विन्यसेत् ॥ ६॥ ॐकारं च तथा हीच गूंकारं च तथैव च । हींकारं च पुनलेख्यमेवं बीजचतुष्टयम् ॥ ७॥ कोणे कोणे दले लेख्यं मध्यदेशे तु साधकः । एवं यन्त्रं सुसंलेख्यं पूजयेत्तु दिनत्रयम् ॥ ८॥ भोजयेन्मिथुन चैकं लोकेशः प्रीयतामिति । पश्चात्तं तन्तुनाऽऽवेष्टय त्रिलोहेन विशेषतः॥ ९॥ वर्तुलं माणि- वत्कृत्वा हारमध्ये तु धारयेत् । धारणाजायते देवि सौभाग्य- मतुलं महत् ॥ १० ॥ पुत्रं च लभते नृनं वन्ध्यात्वं च प्रशा- श्रीशिवजी बोले-अव सौभाग्यके देनेवाले यन्त्रको कहता हूं, कमल संज्ञक यन्त्रका खियोंके लिये प्रयोग करना योग्य है । विधान यथा-गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर एक गोलाकार चक्र बैंचकर वहिर्भाग अष्टदलोंसे सुशोभित कर उक्त गोलाकारके भीतर तीन रेखा कल्पनाकर ऊपर नीचेकी रेखाओम ओं ही इन दो बीजोंको आदिमें मिश्रितकर साध्यव्यक्ति अर्थात् पतिक । नामक अक्षर लिख फिर अन्तमें सिर्फ ही वीजको लगावै । फिर पूर्वादि चारों ज़ेबीजको लिखकर ओ ही, नूं ह्रीं इन चार वाजोको ईशानादि चारी कोनों में स्थापित करै । तत्पश्चात् गन्ध, पुष्प, ताम्बूल, नैवेद्यादि पदार्थोसे तीन दिनतक पूजनकर, हे लोकेश ! प्रीयताम्' इस वाक्यको उच्चारणकर एक स्त्री-पुरुषको भोजन करावे । फिर कच्चेडोरेसे लपेटकर उक्त यंत्रेश्वरको त्रिलोहमें चन्दकर धारण कर तौ हे देवि ! अतुल अतिश्रेष्ठ सौभाग्य प्राप्त होगा । इसका और यह भी प्रताप है कि, इसके धारण करनेसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भवती होकर
: भाषाटीकोपेतः।
म्यति । कमलाख्यं महायन्त्रं सृष्टं नु ब्रह्मणा पुरा । न देयं
यस्य कस्यापि साधकेन वरानने ॥ ११ ॥
कमलाल्ययन्त्रम् ।
ॐ ही देवदत्तः ॐ हीं
हाजही
getta
इति धीपत्र. सीमाग्यजननं कमलाख्य नाम पञ्चविंश यन्त्रम् ॥ २५ ॥
स्वमेन संप्राप्य सदाशिवाय दामोदरोवारचयच्च कल्पम्।।
तस्मिन्महाकल्पपरे सुसत्ये गतः समाप्ति प्रथमोऽधिकारः ||
-उत्तम पुत्रको प्राप्त फर यंध्यामावसे रहितहो मृतवत्सा उत्तम पुरको प्राप्त हो
जीवित पुषवाली होगी, इसमें किंचिन भी संदेह नहीं अधरा हारमें मिलाकर
धारण फर वोभी उफ फल प्राप्त होसफवा. है, इस कमलाख्य महायंत्रको
धाममाजीने फल्पित किया है । अतः सापाको उपित है कि अधिकारी
सिपाय और किसीको न दे।॥ १-११॥
इति श्रीयंत्र चिन्तामणिको वीसरी पीठिका सौभाग्य.
जनन नागपाला पचीसयों यन्त्र ॥ २५ ॥
म्यापस्थामें शिवजीस प्रात पर दामोदर पण्डित पनाये श्रेष्ठाय सत्य
पन्यपिन्वामणिसका प्रथम अधिकार समान टुमा ॥ १ ॥
यन्त्रचिन्तामणिः।
सद्यन्त्रचिन्तामाणिसर्वसिद्धिदे श्रीचन्द्रबृडस्य मुखाद्विनि-
गते । तस्मिस्तृतीयां किल पीठिकामिमां चकार दामोदरप-
ण्डितः सुधीः ॥२॥ वश्याभिधानं प्रथमाधिकारं शृणोति यो
भाक्तियुतो मनुप्यः । तस्याशु देवो भगवान्महेशो ददाति
लक्ष्मी विपुलां सुसिद्धिम ॥ ३॥
इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ महाकल्यै प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरमंवादे
दामोदरपण्डितोद्धृत तृतीयपीटिकायां वक्ष्याविकारः समाप्तः ।।
इति प्रथमोधिकार ||
अथार्पणाधिकारः । २
जयति जगदशेषद्योतयदिव्यभासा विशदकिरणकान्ति:
प्रस्फुरच्चन्द्रमौलि । विषमविषमहाहिप्रोल्लसच्चारुहारः सतत-
मासिततेजा ज्ञानमूतिर्महेशः ॥ १ ॥ चिन्तामणौ कल्पवरे
चतुर्थी प्रारभ्यते संप्रति पीठिकेयम् । आकृष्टियन्त्राणि परि-
स्फुटानि विचारयाम्पत्र तु पीठिकायाम ॥२॥
श्रीचन्द्रचूड शिवजीके भुखसे निकले सत्य त्रचिन्तामणिकल्पकी तीसरी पीठिका
पंडित प्रवर श्रीदामोदरजी इस भाँतिसे करते हुए ।।२।। इस वश्याधिकारनाम
तीसरे अधिकारको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनते हैं उनको श्रीशिवजी महाराज
प्रसन्न होकर अधिक लक्ष्मी और सुसिद्धि देते हैं ॥३॥
इति श्रीयंत्रचिन्तामणी महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरमन्त्रादे
दामोदर पंडितोद्धृते पं० बलदेव प्रमादजी मिश्रकृतभापार्टीका
साहिवतृतीयपीठिकायां वश्याधिकारः समाप्तः ।
समस्त संसारको अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाश करनेवाले, विषम विपको
धारण करनेवाले, सपोंके प्रकाशमान मनोहर हारको धारे,मातको चन्द्रमाको
धारण करनेवाले और निर्मल कान्तिसे शोभायमान होनेवाले तीक्ष्ण तेजको
धारण करनेवाले ज्ञानकी मूर्तिवालं श्री श्रीशिवजी महाराजकी जय हो ॥१॥
'अब चिन्तामणिकल्पकी चौथी पीठिका कही जाती है, इस पीठिकामें आकर
पणके यंत्रोंका म्फुट विचार करताहूं ॥२॥
सः सः सःसः सःइ भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच-संलिख्य नामानि च भूर्जमध्ये गोरोचना- कुकमचन्दनाभिः । सकारबीजास्तु विसर्गयुक्तास्तस्योपरि- टाद्विलिखेत्तु पश्च ।। १ ।। इकारमन्ते विनिवेश्य पश्चाद्विसर्ग- युक्तो विलिखेत्सकारी । क्रौं ह्रीं तथा क्रौं च विलिख्य पंक्ती वर्णस्य पतिमहता क्रमेण ॥ २ ॥ एवं द्विपती तु विलिख्य पश्चान्नाम्नस्तथाऽधो विलिखेत्तु पतिम् । हीं क्रों तथा ह्रीं च तथैव च क्रों विलिख्य नाम्नस्तु अधोविभागे ॥ ३॥ ह्रीं क्रों मणिभद्रयंत्रम् । तथा ह्रीं च विलिस्य पतो तस्याप्यधो वै विलिखेच्च बीजे । दकाररेफी तु विलिख्य पश्चात्संवेष्टयेत्रिः परि- सः सः क्रौं ह्रीं क्रों वर्तनेन ॥४॥ संपूज्य यन्त्रं विधि- देवदत्तः वञ्च पश्चात्सूत्रेण संवेष्टय सुपाण्डु- ह्री को ही को रेण । उद्वर्तनेन स्वशरीरजेन ह्रीं क्रों ह्रीं दर विधाय मूर्ति मनुजस्य ननम् ॥५॥ निधाय तस्या हदि यन्त्रराज पिधाय चोद्वर्तनकेन पश्चात् । संतापयेत्तं खदिरस्य वहिना दिनत्रयं यन्त्रवरं त्रिसन्ध्यम् ।।६।। ॐ देवदत्तं वेगेन आकर्षय २ माणिभद्रस्वाहा ॥ तापनमन्त्रोऽयम् ॥ एवं कृतेः कपति शिवजी योले-हे कान्त ! तीन रेखाओं युक्त एक चतुष्कोण यंत्रको गोरो. पन, कुरुम, लालचंदनसे भोजपत्र पर लिखकर उक्त यमके भीतर पॉप रेग्या कल्पनाकर प्रथम रेखामें पांच विसर्गपुक्क सकार पीजोंको लिखकर अन्त में इकार बीज लिसे । फिर दूसरी रेखामें स: स: को ही की इन पाँच योजोंको लिखे, तीसरी रेपामें साध्य व्यकिके नामके अक्षर लिरी, चौथी रेसामेही, कोंडी को लि और पाँचवी रेखामही क्रोवी दर इन पाँध पीजोंको लिस कर यंत्रकी पूर्ति करै । फिर विधान पूर्वक गंधादिकासे पूजन करके लाल- सूत्रसं घोध और अपने शरीरफै उद्वर्तनस मनुष्याकार मूर्तिको पनाकर उसके हृदयःभागमे यंत्रराजको रसकर उद्वर्तनसे आच्छादितकर निसंध्य में सीन दिनतक सदिरकी अमिमें संतप्तकर इस मंत्रको पढे । मंत्र-भोंदवरा वेगेन भाकर्पय २ माणिभद्र स्वाहा । यह नापन मंत्र है । इस विधान पर
४४
यन्त्रचिन्तामणिः।
माणिभद्रो देशान्तरस्थं मनुजं च नूनम् । अत्यन्तदूरस्थापि
क्रमेण समानयेद्यन्नवरो हि नूनम् ॥७॥ संपूजयस्तापनशो-
पणाच श्रीमाणिभद्रो भगवान हि वीरः ॥८॥
इति यत्रचि चतुर्थ० आकर्षणाविकारे माणिभद्रे नाम प्रथम यंत्रम् ॥ १ ॥
श्रीशिव उवाच।।अतः परं प्रवक्ष्यामि यन्त्रं मित्रस्य दर्शनम्।
रक्तचन्दन मिश्रेण स्वरक्तेन च भूर्जके ॥१॥ मध्ये नाम
लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः । चतुर्दलं ततः कुर्याद्वीजयुक्तं
मित्रदर्शनयंत्रम् । मनोहरम् ॥२॥ हुँकारं दलमध्ये तु
प्रत्येक विलिखेत् क्रमात् । एवं यन्त्रं तु
संलिख्य पूजयेद्गन्धपुष्पकैः ॥ ३ ॥
बलिपुप्पोपहारैश्च सुगन्धद्रव्यसंयुतैः ।
प्रक्षिपेदवृतमध्ये तु आकृष्टिस्त्रिदिनाद्भ-
वेत् ॥ ४ ॥ इदं यन्त्रं महागोप्यं रक्षणीयं
प्रयत्नतः कस्याप्यनेन वक्तव्यं यदीच्छेत्
सिद्धिमात्मनः ॥ ५॥
इति धीयन्त्रचिन्तामणी मित्रदर्शनं नाम द्वितीय यन्त्रम् ॥ २॥
माणिभद्र देशांतर में स्थित पुरुपोंको आकर्षित कर सकताहै। वीर भगवान् श्रीमा.
गिमद्रजीनेमी तापन शोपणादि क्रियाओंसे श्रीयंत्रेश्वरका पूजन कियाहै.१-८।।
इति श्रीयंत्रचिन्तामणिकी चौधा पीठिकाके आकर्षण अधि.
कारमें माणिभद्रनाम प्रथमयंत्र ॥१॥
श्रीशिवजी घोले-भत्र मित्रदर्शननाम यंत्रको कहता हूँ, विधान इस प्रकार
है-लालचंदन, स्वरक्त इनको मिलाकर भोजपत्रके ऊपर एक गोलाकार चक्रको
खेंचकर घार दलोंसे युक्त बीच में साध्यव्यक्ति के सानुस्वार नामके अक्षर लिख
कर उक्त दलोमें हूँ बीजको लिखै । फिर गंध पुष्पवाले इत्यादि पदार्थासे
पूजनकर घृतम स्थापित कर दे तो तीन दिनमेंही आकर्षण होजायगा, इस
यन्त्रको वडे यत्नसे रक्षा कर अशी सिद्धिकी इच्छा करनेवाला इस यंत्रको
किसीको न दे और न किसीसे कहै ॥ १-५।।
इति यंत्रचिन्तामाणिकी चौथीपीठिकाके आकर्षगाधिकारमें
मित्रदर्शन नामबाला दूसरा यंत्र ॥२॥
सौ भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच ।। अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रं त्रैपुरकं महता रोंचनानीरयुक्तेन भूर्जपत्रे लिखेन्नरः ॥२॥ मध्ये नाम लिखित्वा तु हींकारपुटितं शुभम् । पदकोणं तु लिखेत्पश्चान्नामगर्भ मनो- पुराकाख्ययन्त्रम् । हम् ॥२ ॥ सौकारान् विलिखेत कोणे मध्यतो बिन्दुभूषितान्। एत- द्यन्वं सुसम्पूज्य घृतमध्ये विनि- क्षिपेत् ।। ३ ।। प्रत्यहं पूजयेन्नित्यं सौं/ प्रार्थयेत् त्रिपुरान्ततः । आकर्षय ही देवदत्तः हीं) महादेवि देवदत्तं मम प्रियम् ॥४॥ में त्रिपुरे देवदेवेशि तुभ्यं दास्यामि याचितम् । अनेन पार्थयेदेवी त्रिपु- रायन्त्रगां यजेत ॥ ५॥ एवं कृते सप्तमेऽहि आकृष्टिर्जायते शुभे॥६॥ इति यन्त्रचिन्ता. पुरं नाम तृतीय यन्त्रम् ॥ ३॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि मानिन्याकर्षणं शुभम् । रहस्य सर्वयन्त्राणां तत्क्षणात सिद्धिदायकम् ॥ १॥ न वाच्यं यस्य कस्यापि यन्त्रराजं सुदुष्करम् । दक्षिणानामि- श्रीशिवजी बोले-अय पुरक यंत्रको माहता हूँ । जलमिश्रित गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर पट्कोण यंत्रको लिख प्रतिकोणमें सौ यीनको लिपकर मध्य भागमें ही देवदत्त ही इसप्रकार आदि अंतमें ही योजलगाकर साध्यव्यक्तिके नामाक्षर लिए उक्त यंत्रका गंधादिकोंसे विधानपूर्वक पूजनकर घृतके मध्य स्थापित करे, प्रतिदिन त्रिपुरासे प्रार्थना करे । प्रार्थनामंत्र:-आकर्षय महादेवि देवदत्तं मम प्रियम् । में निपुरे देवदेवशि तुभ्यं दास्यामि याचितम् ॥ हे शुभ! इस विधानके फरनेसे सातवें दिन आकर्षण होगा ॥ १-६॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामाणिकी चौथी पीठिकाके आकर्षणाधिकारमें पुरक नामनगला तीसरा यन्त्र ॥३॥ भीशिवजी योले-मानिनी स्वीके आकर्षणको कहता हूँ। यह सम्पूर्ण यन्त्रीका रहस्यभूत यत् क्षगा सिद्धिका देने वाला है। यह यन्त्रराज पडा दुःकर है, विना अधिकारी सरेसे कभी न कहै । दक्षिण अनामिका उंगलीक धिरसे यन्त्रचिन्तामणिः। रक्तेन वामे करतले लिखेत् ॥ २॥ प्रणवं च तथा ह्रीं क्लीं एक- ललनाकृति कामराजयंत्रम् । पंक्ती लिखेन्नरः। तिं हां स्वा- हेति त्रितयं तस्याधो विलिखे क्रमात ॥३॥ तस्याप्यधो लिखे. तिं हां स्वाहा नाम रमण्याश्चैव सुव्रते।त्रिकोणं देवदत्तः वेष्टयेत्पश्चाद्वीजानामुपरि प्रिये ॥४॥ एवं कृत्वा तु संपूज्य तत्रैव कुसुमैः शुभैः । याममा- त्रेण सा नारी समायाति न संशयः ॥५॥ यन्वं श्रीकाम- गजाख्यं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ६ ॥ रति यत्रचि ० ललनाकृति श्रीकामराजाख्यं चतुर्थ यंत्रम् ॥ ४ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रं वै देवमात- कम् । कर्षणं नरनारीणां शृणु देवि महाफलम् ॥ १॥लाक्षा- रसं हरिद्रा च मनिष्ठं भूर्जपत्रके । लेखनीयं प्रयत्नेन एकान्ते यन्त्रमुत्तमम् ॥२॥ मध्ये नाम लिखित्वा तु त्रिकोणं वेष्टये- ततः। तच्चापि वेष्टयेत्पश्चात् घर्तुलं यत्नतः प्रिये ॥३॥ वाम हायकी हथेलीपर एक त्रिकोण यंत्रको लिख और उस यंत्रक भीतर तीन लकीरें सेचे, प्रथम लकीरमें ओं, ही, टी इन तीन चीजोको, दूसरी पंक्ति में तिं हां स्वाहा इन चारवणों को और तीसरी पंक्तिमें साध्यव्यक्तिके नामाक्षरोंको लिस गन्ध पुप्पादियोंसे पूजन फरै शौ साध्यत्री एक पहरमानमें आकर्षित होगी अर्थात् स्वयं प्राप्त होगी इसमें किसी प्रकारफा सन्देह नहीं है। यह श्रीकामराज यन्त्र देवताओंको भी दुर्लभ है ॥ १-६॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणिको चौथी पीठिकाके आकर्षणाधिकारमें कामराज नामवाला पीथा यन्त्र ॥ ४ ॥ श्रीनिवजी घोल-हे देवि ! नर और नारियोंके आकर्षणकारक, महाफर द्वायम् देवमात्रक यन्त्रको कहता हूं सुनो-लाखका रस, हलदी, मंजीठ इन चातुओंको एकत्रित करके भोजपत्रके ऊपर त्रिकोणयुक्त एक गोलाकार पर खेचकर फिर उसके धोरे एक अंगुलक अन्तरसे एक और गोलाकार पर ४७ ओं ब आ अ अ. भापाटीकोपेतः। देवमातृकं चक्रम् । तस्योपरि स्वरा लेख्या अकारा- द्यास्तु षोडश । ततस्तद्वेष्ट- येत्सम्यग्रेखया नेत्रसंख्यया ॥ ४ ॥ तस्यैव पोदधृल्याज्य प्रकुर्याच्छालभक्षिकामातस्या देवदत्तः योनौ तु संक्षिप्य यन्त्रराज सुपूजितम् ॥५॥ एवंकृते तु कृष्टा सा समायाति न सं- शयः। बहुनात्र किमुक्तेन प- तिना सममानयेत्।यन्त्रराजो महागोप्यो देवमातृकसंज्ञकः६ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ मानिन्याकर्षणं देवमातृकं पञ्चमं यन्त्रम् ॥५॥ चिन्तामणो कल्पवरे सुकल्पे श्रीचन्द्रचूडस्य मुखाद्विनि- गते । तस्मिश्चतुर्थी किल पीठिकामिमां चकार दामो- दरविप्रवर्यः॥ १॥ आकर्षणं नाम महाधिकारं पूर्ण द्वितीयं हि महामभावम् । पश्चैव यन्वाणि महाप्रभाव रहस्यभूतानि तु कीर्तितानि ॥२॥ इति यन्त्रचिन्तामणो आकर्षणाधिकारः ।। खेंचकर फिर उसके धारे एक अंगुलके अन्तरसे एक और गोलाकार पक्रको दो रेसाओंसे युक्तकर मैंने फिर त्रिकोण के भीतर साध्यव्यक्तिक नामाक्षरोंको लिखकर अकारादि सोलह स्वरोंफो दोनों गोलाकारोंके भीतर लिखे । पुनः एत साध्याव्यक्ति परणके नीचकी धूल लाकर एक पुत्तलिका पनाकर उसके योनि(भग)में मुरभित यंत्रराजको स्थापित करे ऐसे फरनेपर आकर्षित. हो साध्यध्यफिको प्रात होगी, इसमें किसी प्रकारकासन्देह नहीं विशेष कहनेसे क्या है पतिसहित प्राप्त होगी। इस देवमावर संशयंत्रको अत्यन्त गुम रखना योग्य है ॥१-६॥ इति श्रीयंत्र नरनारीार्ययमातृसंसरु पाँचवां यंत्र ।।५।। श्रीशिवजी महाराजके मुखारविन्दसे निकले फारश्रेष्ठ चिन्तामणिनाम फरकीपीपी पीठिका इस प्रकार दामोदरजीने फरी है।॥ १॥ महाधिकार और महाप्रभाव आकर्षण नाम पौया अधिगर, इस अधिकारमें पाचही रहस्य भूत भाफगयंत्र वर्णित है॥२॥ इति पितामणी भानाधिकारः।। १ पारा जान्नतिका अहेर राशियः ।
यन्त्रचिन्तामणिः। अथ स्तम्भनाधिकारः। नारायणीति निगदन्ति सदैव लोका यां विश्वमातरमिति प्रवदन्ति केचित । गन्धर्षयक्षसुरसिद्धगणः स्तुतां तां विश्वे- श्वरीमभयदां त्रिगुणां नमामि ॥ १॥ संस्तम्भनं नाम महाधि- कारं विचारयामोत्र तु पीठिकायाम् । यन्त्राणि बीजानि शृणुष्व देवि संस्तम्भनानि क्षणसिद्धिदानि ॥२॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि महायन्त्रं स्तम्भनं सर्व- वरिणाम । विवादे व्यवहाराणां मुखस्तम्भो भवेद्धवम् ॥१॥ यदा कालवशाहीव कलहः संप्रजायते । तदा कुर्यान्महायन्त्र जिह्वावेधनकं परम् ॥ २ ॥ रोचना भूर्जपत्रेण संलेख्यं सुविचक्षणः । षट्कोष्ठकं प्रकुर्वीत रेखाद्वितयकेन च ॥३॥ कोष्ठमध्ये लिखेदीजं प्रतिकोप्टमिहेककम् । हकारं च मकार च लकारं तदनन्तरम् ॥ ४ ॥ वकारं च रकारं च यकारं च प्रतिष्ठितम् । ऊकारम्वरसंयुक्तं मस्तके रेफसंयुतम् ॥ ५ ॥ विन्दुमात्रार्द्धसंयुक्तं संयोगे वर्णपटककम् । स्वर- जिसको तीनोलोक नारायणी इस सम्बोधनसे उच्चारण करते हैं, अन्य. जीच जिसको विश्वमाता कहकर पुकारते हैं ऐसी गंधर्व, यक्ष, मुर, सिद्ध गणोंसे स्तुति करी हुई अभयप्रदान करनेवाली रजोगुण, सतोगुण, तमोगुण. रूपा विश्वेश्वरी भगवतीको नमस्कार करता हूं ॥ १ ॥ इस पंचमपीठिकाम स्तम्भन नाम महाधिकारका विचार किया जाता है-हे देवि । क्षणमात्रमे सिद्धिके देनेवाले स्तंभनयंत्र और बीजारो श्रवण करो ।। २ ।। श्रीशिवजी बोल-हे देवि! व्यवहार विवादमें सम्पूर्ण शत्रुओके मुखातम्भन- कारक यंत्रको मुनो ॥१॥ हे देवि । यदि कालवश कलह होजाय तो जिहा. वेषन नाम यंत्रको प्रयोग करें ॥२॥ विधान यथा-गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर दो रेस्मा प्रकोणययको लिखकर प्रतिकोणकी रेसाको त्रिशुल युक्तकरके अन् रालमें कार बाजाको लिख तत्पश्चात् प्रत्येक कोणके भीतर ह, म, ल, व, र, य, इन सब वीको ऊपर नीचे स्थापितकर योजनापूर्वक अन्तम ऊकार स्वरको मिलाकर बिटु तथा रेफको अपरके भागमें लिखकर ईकार स्वरको मिलाय गंध ४९ भाषाटीकोपेतः। द्वितयसंयुक्तं बिन्दुना परिभूषितम् ॥६॥ एवं संजायते बीज- मुखस्तम्भनसंज्ञकम् । काष्ठे कोठे तु संलेख्यमेकैकं बीजमुत्त- मम् ॥ ७ ॥ एवं बीजानि संलेख्यः रेखाद्वितयकेन च । रेखो- परिगताः कृत्वा कोणदेशाश्चतुर्दिशम् ॥८॥ बाह्यरेखोर्ध्वधो लेख्या त्रिशलान्मस्तकोपरि । सर्वतो रेखया चान्ते त्रिशलान् विलिखेत्क्रमात ॥९॥ एवमष्टादशसंख्यात्रिशूलाः संपति- ष्ठिताः । शलान्तराले सर्वत्र तथोपरि लिखेत्क्रमात ॥ १० ॥ ठकारबीजानि षडेव चोर्ध्वमधोऽपि तावन्ति विलिख्य नूनम्। दिग्दक्षिणस्यां च तथा त्रिबीजं तावन्ति संख्यानि तथोत्तरे च ॥ ११॥ एवं हि बीजानि ठकारसंज्ञः श्रीसूर्यसंख्यानि विलिख्य पश्चात् । संपूज्य यन्त्रं विधिवत्प्रयत्नतो जपेत्तु मन्त्र 'मनसा सुनिश्चलः ॥ १२ ॥ *हल्ल्यूँ लललल अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ठ: ५ स्वाहा ॥ अष्टोत्तरं चैव शतं जपित्वा मन्त्रं त्रिसंध्यं त्रिदिनं प्रयत्नात् । संपूजयेद्यन्त्रवरं त्रिसंध्यं पीतैश्च शत्रुमुखगतिस्तंमनयंत्रम् । अ + । tal|Shootow 14-lore . 14 Rai 4444 अ. Shem अ. . - ठं पुमादिकोंसे विधिपूर्वक पूजनकर निभिंत मन हो वक्ष्यमाण मंत्रका जप करे। मन्त्र ओहy लललल अमुकस्य मुखं स्तम्भय २ : ५ स्वाहा । त्रिसंध्याकालाम ४
५०
यन्त्रचिन्तामणिः।
رل
पुष्पैः कनकावदातैः ॥ १३ ॥ एवं कृते शत्रुगात मतिं च
संस्तम्भयेद्यन्त्रवरो हि नूनम् । मूढो महामुक इव प्रजायते
अस्तो ग्रहेणैव रिपुर्नहोनः ॥ १४ ॥
इति य० स्तम्भनाधिकारे शत्रुमुखगतिमनिस्तम्भनं नाम प्रथमं यन्त्रम् ॥ १॥
श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि यात्रास्तम्भन-
मुत्तमम् । शिलासंपुटके लेख्यं पीतद्रव्येण शोभनम् ॥१॥
रोचनाहरितालं च हरिद्रां च मन:शिलाम् । कुटुमेन समायुक्त
पीतद्रव्यं प्रचक्षते ॥२॥ कुम्भे मोहे च बीजानि एकपट्टी
यात्रास्तभनयत्रम् ।
लिखेन्नरः । तस्याप्यधो लिखें-
नाम मोहे चान्ते प्रतिष्ठितम॥३॥
ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक् चतुष्कोणं
कुंभे मोहे
तु रेखया । कोणे कोणे त्रिशूलं
कृत्वैवमष्टी शलानि यन्त्ररेखो-
परि स्थितान् । संपूज्य पीतकु-
सुमेर्यन्त्रराज मनोहरम् ॥५॥
• तान दिनतर इम यंत्रको अप्टोत्तरशत अथग शत ऊपको यत्नपूर्वक करके
त्रिसन्ध्या कालमे सुवर्णगी यांतिके समान पील वर्णवाले फूलोंसे पूजन करे ।
इस विधान से शत्रुी बुद्धि और गतिका स्तम्भन होगा और जैसे
प्रहमे प्रहा- शेता है इसी कारण शत्ररूप महाग्रह मूहकी रामान मूकभा.
वको प्राप्त हो शान्त हागा ॥ १ १४ ॥
इति यंत्र पाँच पो० स्तंभनाधि० शत्रुको मुग्य गतिस्तंभन प्रथम यंत्र ॥१॥
श्रीमहादेवजी बोले-अब यात्रास्तम्भनकारक अतिउत्तम यंत्रको कहता हूँ
शिला संपुटकं ऊपर पलिं द्रव्यमे चतुष्कोण यंत्रको लिखकर चारो योनों तथा
पारो दिशाओम एक ! त्रिशूल लिगकर मध्यमें दो रेखामें कल्पना करें ।
प्रथम रेखामें कुंभ और मोहर दूसरी रेखाम गायव्यक्ति के मानुस्वार
नामके अक्षर लिय आत... ो बगाको युक्त करे अर्थात् देवदत्तं
मोहे इस मा . लग्य।.., माल, हलदा, मांगल. कुंकुम इनको
देवदत्तं मोहै। तु मध्ये मध्ये तथैव च ॥४॥
भाषाटीकोपेतः। धूपैदपेश्च नैवेद्यैर्नानाभक्ष्यसमन्वितैः। एवं संपूज्य तद्यन्त्र भूमिमध्ये क्षिपेत्ततः॥६॥ मृदापर्य समे देशे यन्त्रस्योपरि यत्नतः। गमनं स्तम्भयत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥७॥ यथारोपितभाण्डोऽपि न यात्येव प्रिये सदा ॥ ८ ॥ इति यं० यात्रास्तम्मनं नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥ २ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अयातः संप्रवक्ष्यामि वाचः स्तम्भं च सुन्दरि । प्रतिवादिमुखस्तम्भं यन्त्रं ख्यातं तु भूतले ॥१॥ पीतद्रव्येण संलेख्यं शिलासंपुटमध्यतः। रोचनाहरितालं च हरिद्रां च मनःशिलाम् ॥ २॥ कुंकुमेन समायुक्तं पीतद्रव्यं प्रचक्षते । मध्ये नाम लिखित्वा तु त्रिकोणं वेष्टयेत्ततः॥३॥ ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यग्वर्तुलं रेखयैकया । तस्योपरि दलान्यष्टी प्रकुति ततः परम् ॥ ४॥ दलमध्ये लिखेडीज लकार बिन्दु- भूषितम् । एवं चाटदले लेख्यं पूजयेत्कुसुमैः शुभैः॥५॥ पीतवर्णस्तथा धूपदीपनवेद्यकैः शुभैः । ब्राह्मणं भोजयेचेक -पीले द्रव्य कहते हैं, फिर मनोहर यंत्रराजका पीले फूलोंसे पूजनकर गंधादि प्रदान कर और नानाप्रकारके भक्ष्य नैवेद्यादिकोंको अर्पण करे, पृथ्वीके मध्यमें स्थापितकर यंबके ऊपर मिट्टी डालकर यंदकर दे तो निश्चयही गमन रुक जायगा इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं । हे प्रिये ! मार्गमें भारोपित. भांडभी स्थितही रहेगा अन्यका तो कहना ही क्या है ॥ १-८॥ इति यन्त्रपि० पाँचीं स्तम्भ में यात्रास्तम्भन कारक दूसरा यंत्र ॥२॥ श्रीशिवनी योले-हे मुन्दार ! भत्र वाणीस्तम्मनको कहता हूं और यह यंत्र प्रतिवादिमुखत्तम्भननामसे भूतल में प्रसिद्ध है । विधान इस प्रकारसे है, उक्त पीले द्रव्यो शिलासंपुटके मध्यमें त्रिकोण यन्त्रको सिकार गोलाकार पफमे चेष्टित कर आठ दर से सुशोभितकर उक्त त्रिकोण भीवर साच्या व्यक्ति नाम अक्षर भार दलोमलं योजोको स्यापिठ कर । फिर पीले पपु धिपाले पुष्प, धूप, दीप, नैवेदिकोसे यन्त्रराजका पूजनकर पायम (मेर) सया गुडमिश्रित पदासेि एक प्रामगको भोजनम्रा पर निका परचमां गोताम् । पतरं पातानं नाम च021-
५२
यन्त्रचिन्तामणिः।
R-
प्रतिवादिमुखस्तम्भनयन्त्रम् ।
पायसेन गुडेन च ॥६॥
ततो निखन्य भूमौ तु
स्थापयेत् पूर्ववत्ततः ।
विवादे व्यवहारे च
शास्त्रचर्चासु च प्रिय
प्रतिवादिमुखस्तम्भो
जायते नात्र संशयः।
एतद्यन्त्रं महादेवि सुगो-
प्यं कथितं तव ।। ८
इ० य० प्रतिवादिमुखस्तम्भनं नाम तृतीय यन्त्रम् ॥ ३ ॥
श्रीशिव उवाच॥अतःपरं प्रवक्ष्यामिशत्रोर्वक्रस्य मुद्रणम् !
यदा संजायते वादः शत्रूणां सह सुव्रते ॥ १॥ तदा यन्त्र
प्रकुर्वीत सुगमफलसिद्धिदम् । खटिकया तु संलेख्यं स्वभित्तो
वेगतः प्रिये ॥२ ॥ मध्ये नाम लिखित्वा तु शत्रोस्तु विधि-
-विधानपूर्वक पृथ्वीको खोदकर यंत्रको स्थापित करके ऊपर मिट्टी डालकर
बन्दकर दे तो व्यवहार, विवाद, शाखप आदिकोंमें प्रतिवादीके मुखका
स्तंभन होजायगा । हे देवि ! यह परमगुम यंत्र मैंने तुमसे कहा है ॥१-८॥
इति यंत्र० पाँचवीं० प्रतिवादिमुखम्तम्भन नामवाला तीसरा यंत्र ॥३॥
श्रीशिवजी घोले-हे सुत्रत ! शत्रुके साथ विवाद होने में शत्रुके मुखको
बन्द करनेवाला यंत्रको कहता हूं। हे प्रिये ! जिस समय शत्रुसे विवाद हो
उसी समय शीघ्रसिद्धिके देनेवाले यंत्रका प्रयोग करें। विधि-अपने स्थानकी
दीवारके ऊपर सडियामिट्टीसे गोलाकार चक्र सेंचकर आठों दिशाओंम त्रिशूल
-प्राधाग्येतानि पुष्पाणि यथालार्म वरानने । अन्यानि पीतरीन न प्रायाणि पदाचन ॥२॥
हे वरानने । कुटज, चम्पा, स्वर्गकेतकी, धतूप, नागकेशर, पति कुमुमके धनों इनकेही
यथाशक्ति पीले फूल जितने मिलें उन्हें ग्रहण करना योग्य है अन्य प्रकारके नहा ॥ १॥२॥
दत्तः भापाटीकोपेतः। शनुमुखस्तम्भनयन्त्रम्। वत्प्रिये । तस्योपरि स्थिता रेखा वसुसंख्याष्टदिक्क्रमात ॥ रेखान्ते च त्रिशलानि तल्लिखेच दिगष्टके । तवैव तु सुसंपूज्य श्वेत- देव पुप्पैः फलैः शुभैः ॥ ४॥ अन्यश्च श्वेतगन्धैश्च श्वेतवस्त्रैर्मनोहरैः । ब्राह्मणं भोजयेञ्चकं श्रीशिवः पीय तामिति ॥ ५॥ वादे पिशुनतायां च मुखस्तम्भं करो- त्ययम् ॥ ६॥ इति श्रीयन्त्रवि० ना० म०प्र० उ०प० दा० स्तं० शत्रुमुखस्तम्मन चतुर्थ यन्त्रम् ॥ ४ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संभवक्ष्यामि वहिस्तम्भं मनो- हरम् । दिव्यकाले प्रकुर्वीत यन्त्रराजं सुशोभनम् ॥१॥ पीत- द्रव्येण संलेख्यं भूर्जपचे वरानने । साध्यनाम लिखेन्मध्ये क्रों नामाद्यन्तसंपुटम् ।। २ ।। उपर्यधोऽपि विलिखेलकोंकारं सुमनो- लगाय यंत्रको निर्माणकर सानुस्वार साध्यव्यक्ति के नामाक्षर लिखकर वहीं स्थित यंत्रका श्वेतपुष्प, फल, सुगंध, मनोहर श्वत्तवर इनसे पूजनकर एक ब्राह्मणको भोजन करावे और " श्रीशिवः प्रीयताम्" इसको पढताजाय वो इस यंत्रके प्रतापसे वाद और पिशुनतामें शत्रुका मुखस्तम्भन होगा ॥१-६॥ इवि यंत्रचिन्तामणिको पाँचवीं पोठिकाके स्तम्भनाधिकारमें शत्रु- मुखस्तम्भननामक चोथा यंत्र ॥४॥ श्रीशियजी घोले-अब मनोहर अनिस्तमन यंत्रको कहता हूं-इस यंत्रराजका दिव्यकालमें प्रयोग करना योग्य है ।विधान यथा-पीले द्रव्यसे भोजपत्रके ऊपर दो रेखायुक्त चतुझोणयंत्रको लिखकर पुनः उसके भीतर एक पतुष्कोण यंत्र और लिखकर पहिर्भागके चारों कोनों में दो दो त्रिशूर लगाकर भीत. स्फे चतुष्कोणके उदरमें पूर्वादि चारों दिशाओम को बीजको लिखकर सात ...
यन्त्रचिन्तामणिः।
हरम् । ततस्तद्वेष्टयेदेवि चतुष्कोणं तु रेखया ॥३॥ तस्यो-
पार चतुष्कोणं प्रकुर्वीत द्विरेखया । कोणान्तराले संलेख्य
लकारं विन्दुभूषितम् ॥ ४॥ एवं चतुष्टयं लेख्यं लकाराणांतु
बीजकम् । कोणान्ते तु पृथग्लेख्यो त्रिशूली सर्वथा प्रिय।।५।।
एवमष्टत्रिशलानि विलिख्याथ प्रपूजयेत । संपूज्य ब्राह्मण
वह्निस्तम्भनयत्रम् । भोज्य यन्त्रं भूमौ विनि-
क्षिपेत् ॥ ६ ॥ वहनुदक
मार्ग चमध्ये यन्त्र विधाय
च । यावत्तस्योपरि याति
कों
सलिलं वरवणिनि ॥७॥
को देवदत्तःों
तावदग्नेमहास्तम्भो जा-
यते नात्र संशयः ।
कों
दिव्यस्तम्भकर नाम यन्त्रं
देवः सुपूजितम् । न देयं
-
यस्य कस्यापि यदीच्छे-
सिद्धिमात्मनः ॥ ८॥
इति श्रीयन्त्रचि० ना० म० प्र० उ० प० स्त० दा० वहि-
स्तम्भनं नाम पञ्चमं यन्त्रम् ॥ ५॥
-वार साध्यन्यक्ति के नामाक्षरोंको लिस मध्यकोणके बहिर्भागमें लं बीजोको
लिसे। फिर गंधादिकोंसे उस यंत्रराजका पूजनकर यथाशक्ति ब्राह्मणको पूजित
कर भोजनकरा यंत्रको पृथ्वीमें गाडदे और उस यंत्रके उपर जलका व्यवहार
करै । हे वरवर्णिनि! जबतक उसके ऊपर जल व्यवहार होता रहेगा तबतक
अनिका महारतंभन होगा । इसमे किसी प्रकारका संदेह नहीं है । हे देवि !
दिव्यस्तम्भनवारफ इस यंत्रका देवताओने भी पूजन किया है । अपनी
सिद्धिकी इन्छा करनेवाला साधक अधिकारी विना अन्य किसीकोन दे१-८॥
इति यंत्रचिन्तामणिकी पाँचवी पीठिकाके स्तंभनाधिकारमें
अमिस्तंभनकारक पांचवां यंत्र ॥५॥
भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्त्रं वहिनि वारणम् । यस्मिन्गृहे स्थितं यन्त्र तत्र नानिमयं वचित् ॥ १॥ यस्य हस्ते सदा तिठेद्यन्त्रराजं मनोहरम् । स्व- ऽप्यग्निभयं तस्य कदाचिन्नोपजायते ॥ २ ॥ अलात्कारेण कर्तव्यमग्निनिग्रहकं प्रिये। विद्यागमे तथा मन्त्रैरोषधे वा बला- धिके ।। ३ ।। पादस्पृष्टो यथा सो दशत्येव न मन्यते । तथा स्तम्भोऽपि देवेशि बलात्कारेण वा जनः ॥ ४॥ अपमृत्यु यथा देवि हरे? वैद्यको रसः । तथा यन्त्रोऽपि देवेशि अवा- न्तरभयं हरेत् ।।५।। श्रीखण्डरोचनहिमेन अग्निस्तमनयन्त्रम् । तु लेखनीयं यन्त्रं तु भूर्जे विधिवत विस्तृते । नाम स्वकीयं तु विलिव्य मध्ये सुवेष्टयेद्वर्तुलरेखया तथा ॥ ६ ॥ देवदत्तः तस्योपरि लिखेबूनं वकारं विन्दुभूपि- तम् । पूर्वे च दक्षिणे चैव पश्चिमे चोत्तरे पुनः ॥ ७ ॥ एनत्मर्व तु संवेष्टय चतुष्कोणं तु रेखया । त्रिलोवेष्टितं कृत्वा बाहुमूले गलेऽथवा ॥८॥अथवा गृह- श्रीशंकरजी बोले-हे देवि ! अब अमिनिवारण यंत्रको कहताहूं सुनो। जिस गृहमें यह मंत्र स्थित रहेगा उस गृहमें कदापि अमिका भय नहीं होगा और जिस किसीफे हाथमें यह मनोहर यंत्रराज सदा वर्तमान रहेगा, स्वपमें भी उसको कदापि आनिता भय न होगा । हे मिये ! विद्यागमन, मंत्र, औषध अथवा घलअधिक होनेपर बलात्कारसे अमिका ग्रहण करना योग्य है, हे देवेशि! जैसे कि पादसे स्पर्श कियाहुमा सर्प काटता ही है,ऐसही मनुष्यों करके प्रयोग कियादुआ स्तम्भनयंत्र फलदायक होताही है । हे देवि ! जैसे कि वैद्यका रस अपमृत्युको हरण करता है तैसेही यह यंत्रराज अवान्तरभयको हरण करताहै। विधान यथा-लाल चंदन, गोरोचन और हिमसे सुविस्तृत भोजपत्रपर विधान पूर्वक एक गोलाकार पक्रक मध्यमें साध्यन्यक्ति के नामको लिख यहि गमें अर्थात् पूर्वादि चारों दिशाओमें पं पीजको लिख गंधपुप्पादिकासे पूजनकर त्रिलोहके तापीजमें बंदकर गले अथवा बाहुमूलमें धारणकर, व यन्त्रचिन्तामणिः। मध्ये तु क्षीरमध्ये विनिक्षिपेत् । एवं संपूजयेनित्यं देवष- दोषि यन्त्रकम् ॥९॥ अनेः सकाशादीतिर्या साऽस्मात्कापि न जायते । ब्राह्मणं भोजयेदेकं यन्त्रराजस्य तुष्टये ॥ १९ ॥ पनि प. विना० म०प्र० ३०५०स्त० भाग्निस्तम्भनं नाम षष्ट पन्त्रम्॥९॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रियसंस्तम्भनं परम् । यदा कोऽपि बलाद्याति वारितोऽपि वरानने ॥२॥ तदा संस्तम्भनं कुर्याद्यन्त्रराजं शुचिस्मिते । पीतद्रव्येण संमिश्र फटके फाष्टसंभवे ॥२॥ वटिकया लिखेद्यन्त्रं मूलके काष्ठ- संभवे । जकारगर्भमध्ये तु साध्यनाम प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ पात्रारतम्मनयन्त्रम् । ततस्तद्वेष्टयत्सम्यक् नतुकाणं नु खया । नस्योपरि चतुष्कोण द्वितीयं विलिवेधः ॥ ४॥ कोणे ज दलानि गर्यान्मध्यदेशे पनि- नरः । दलमध्ये लकारं तु मिन्दु- दयानः युक्त लिंगन प्रिये ॥६॥ एवं पिलिटर मंपज्य विधियान्त्र- मुनमम । अधीमुवं निबंधीयान भाषाटीकोपेतः। फलकं गृहमध्यतः ॥६॥ यात्रास्तम्भो भवेद्देवि नात्र कार्या विचारणा ॥ तथापि गच्छते यस्तु गत्वाऽपि च समेत्यसो||७|| १० य० चि० ना०प्र० उ० पं० यात्रास्तम्भनं नाम सप्तमं यन्त्रम् ॥७॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि वैरिवारस्तम्भनं परम् । खट्टिकया तुसंलेख्यं शिलासंपुटमध्यगम् ॥१॥ ह्रींकार- शटमुखस्तम्भतयन्त्रम् । ()() () () () ()() । () (010 (1) । Chr () (1) () () -तो हे देवि ! यात्रामा स्तम्भन होगा, इसमें किसी प्रकार संदेह नहीं है, अथवा पलागया हो तो लौट आवे ॥१-७॥ इति श्रीयंत्रचिन्ता० यात्रा स्तमनकारक सातवाँ यंत्र ॥ ७ ॥ श्रीशिवजी पोले-अप शत्रुको वाणीके स्तम्भनकारक परमयंत्रको कहताहूं- खडियामिट्टीसे शिला संपुटके भीतरचार रेखावाले चतुष्कोण यंत्रको लिखकर यन्त्रचिन्तामणिः । गर्भमध्ये तु साध्यनाम प्रतिष्ठितम् । ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक चतुष्कोणं तु रेखया ॥२॥ एवं चतुश्चतुःकोणं लिखित्वा यन्त्रक परम् । अन्त्यकोणे त्रिशलानि चतुर्दिषु चतुश्चतुः ।। ३ ।। विलिख्य पूजयेद्यन्त्र विधिवत्कुसुमैः शुभैः। संपुट मेलायित्वां तु स्थापयेद्यन्त्रकं शुभम् ॥ ४॥ तत्क्षणाज्जायते शत्रोर्मुख- स्तम्भो न संशयः । ब्राह्मणं भोजयेच्चैकं श्रीविद्या प्रीय- तामिति ॥५॥ इति यन्त्रनि० ना० म०प्र० उ० पंटितदा० स्त० शत्रुमुखस्तम्भनं नामाऽष्टमं यन्त्रम् ॥ ८ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्वं पिशुनमुद्र- णम् । यदा राजकुले देवि पिशुनः कोऽपि वै वदेत ॥ १॥ तदा यन्वं प्रकुर्वीत नाम्ना पिशुनमुद्रणम् । शत्रोः स्तम्भयते वाचं गतिं बुद्धिं वरानने ॥२॥ रोचनाभूर्जपत्रेण लिखेद्यन्त्रं सु- शोभनम् । क्रोंकारपुटितं कार्यमक्षरं नामसंभवम॥३॥ हीङ्कार- प्रत्येक कोणकी प्रतिरेसाको त्रिशूलयुक्तकर उक्त यंत्रके भीतर अर्द्धचंद्राकार और एक बिन्दुको अपरके भागमें लगा एक ही चीज को लिखे और उस हीं घोजकी मात्राके मध्यमें साध्यभ्यक्ति के नामको लिय गंध पुप्पादिफासे पूजन पर संपुटको मिलाकर शुभयंत्रको स्थापितर तो तत्क्षणमें शटके मुखका स्तंभन होगा. इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है, एक ब्राह्मणको भोजन करावे आर पहै कि ' श्रीविद्या प्रीयताम् ॥ १-५॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणिकी पाँचवीं पीठिका क रतभनाधिकार में शत्रुमुखम्तंभनकारक आठवां यंत्र ॥ ८॥ श्रीशिवजी घोले-हे देवि, अय पिशुन मुद्रपनाम यंत्रको कहताई । राज- कुलमें यदि कोई पिशुनता (चुगली ) को करदे तो उसके मुसमुद्रण के लिये पिशुनमुद्रण नाम यंत्रका प्रयोग कर । ६ वरानने ! इसके प्रतापम शत्रुकी याणी गति युद्धि इनका निम्भन होजायगा । गोरोचनमे भोजपत्रके ऊपर चतुष्कोण यंत्रको लिम्कर प्रत्येक कोणमें एक एक दल लगाकर उक्त यात्रक पहिभाग पूर्व पश्रिममें प्रों क्षः इन बीजोको टिम मध्यभागमें को, हीं ६० यन्त्रचिन्तामणिः। भोजयेत्पश्चाद्वित्तशाठयविवर्जितः । तस्माद्यन्त्र निखन्याशु भूमिमध्ये विनिक्षिपेत् ॥ ११ ॥ वृद्धिभ्रंशो गतिभ्रंशो वाग- भ्रंशश्च वरानने । पिशुनस्य क्षणादवि जायते नात्र संशयः१२ इति यन्त्रचि० ना० म०प्र० उ० सं० दा० पण्डितोड़ते स्तं० पिशुनमुखमुद्रण नाम नवमं यन्त्रम् ॥ ९॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणी नाम्नि महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धि- प्रदे उमामहेश्वरसंवादे दामोदरपण्डितोद्धृते पञ्चम- पीठिकायां स्तम्भनाधिकारः समाप्तः ॥ अथ विद्वेषणाधिकारः। त्वरितं जानकी द्रष्टुं निहन्तुं रावणं युधि । पृजितां राम- चन्द्रेण त्वरितां तां नमाम्यहम् ॥ १ ॥ विद्वेषणं नाम महा- धिकारं प्रारभ्यते संप्रति तच्चतुर्थम् । यन्त्राणि बीजानि परि- स्टानि विचारयामोऽत्र सुपीठिकायाम् ॥ ३ ॥ दौर्भाग्य- वैराणि परस्परं तदाविवर्द्धते द्वेषमतीव बन्धुषु । यन्त्रप्रभावा- द्भुवि मानवानां प्रचक्ष्महे तानि परिस्फुटानि ॥ ३ ॥ ब्राह्मणको भोजन करावे, परन्तु वित्तशाम्य विवर्जित होकर करै,फिर भूमिमें गड्ढा करके यंत्रको दाबदे तो हे सुन्दरि ! पिशुन शत्रुकी पुद्धि वाणीकी गति इत्यादिकोंका भ्रंश होगा ॥ १-१२ ॥ इति यंत्र चिन्ता० पिशुनमुखस्तम्भन नामक नववा यंत्र ॥ ९ ॥ इति श्रीयंत्रचिन्तामणौ नाम्नि महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वर सम्बादे दामोदर पंडितोद्धृते पंडित यलदेवप्रसादमिश्रकृत भापाटीकासहितपंचमपीठिकायां स्तंभनाधिकारः समाप्तः ।। शीमही श्रीमहाराणी जानकीजीके अन्वेषणके लिये और संग्राममें रावणके मारनेके लिये श्रीरामचंद्रजीसें पूजितहुई त्वरिता देवीको नमस्कार करताहूं॥१॥ अय विद्वेषण नाम छठा महा अधिकार आरम्भ करा जाताहै ।। इस सुपीठि- कामें यंत्र, पोजीका विचार करते है जिन यंत्रोंके प्रयोग करनेसे दौर्भाग्य, आपसमें पैर, पन्धुनोमे वैर अति वृद्धिको प्राप्त हो अब उन यंत्रोंको स्फुटता- पूर्धक कहताहूँ ।। ३॥
भाषाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्वं दौर्भाग्यवर्ध- नम् । विवादो नरनारीणां येन संजायते सदा ॥ १ ॥रोचना- कुङ्कुमेनैव भूर्जपत्रे वरानने । लिखेद्यन्त्रं महादवि यन्त्र सौभा- ग्यनाशनम् ॥ २॥ कुर्यात्तिर्यग्गता रेखाः पूर्वपश्चिमसस्थिताः । दीर्घकोष्ठाकृतिं कुर्यादष्टसंख्याः शुचिस्मिते॥३॥ तन्मध्योप- रिभागेच एकैकं विलिखेत्क्रमात् ।मध्ये नामाक्षरं देवि द्विवारंतु पुनःपुनः ॥४॥ तस्याधोधाक्रमेणैव तेनैव विलिखेत्पुनः। दुर्भगा चेति स्त्रीलिङ्गे विधिवञ्च पुनःपुनः॥५॥ पुनस्तान्येवाक्षराणि कोष्ठा यावत्समापिताः । कोष्ठबाह्येऽपि विलिखेदधोपरि विशेषतः ॥६॥आजितेत्युपरि संलेख्यं स्वाहान्तं प्रणवादिकम् । नरनारों विषंणयन्त्रम् । ॐ अजितेस्वाहा RIA गा। दुर्भ गाभव दुभव ॐ अपराजितेस्वाहा ! श्रीशिवजी योले-हे देवि ! जिन यंत्रों के प्रयोगकरनेसे विवाद में नर और नारीके दौर्भाग्यकी सदा वृद्धि हो अप उन यंत्रोंको कहता हूं प्रवण करो हे शुचिस्मिते ! गोरोचनसे विस्तारित भोजपत्रके ऊपर चतुकोण यंत्रको संचकर मध्यभागमें पूर्व पश्चिमकी ओर सड़ी ९ रेखा (कि, जिनके अट फोट होते है ) लिखकर प्रतिसाफो मिशिवकर उनके ऊपर भागमें औ अजिते स्वाहा नीचके भागमें “ओं अपराजिते स्वाहा पदोंको लिसर फोटोके भीतर दो वार उपर भागमें साध्यध्यक्ति के नामा. क्षको लिस दुर्भगा भव इन पोंको नीचेके भागमें लिरो । यदि साय. व्यक्तिक नामके अक्षर को संख्यासे अधिक हो पो बहिर्मागर्म लिसने योग्य है। परन्तु नीलिहमें अर्थान् बोके प्रसंगमें दुर्भगाभव इसप्रकार लिखना "
यन्त्रचिन्तामणिः।
अपराजिते अधोभागे स्वाहान्तं प्रणवादिकम् ॥ ७॥ एवं
सीलख्य यन्वं तु गच्छेच्चैव सरित्तटे । उभयोः कूलयोाह्या
मृत्तिका मानिना शुभा ॥ ८ ॥तया गणपतिं कृत्वा यन्त्र
तस्योपरि क्षिपेत् । गोदुग्धस्नपनं कुर्याद्गणनाथस्य सुन्दरि
॥९॥ अर्चयेद्विविधैः पुप्पोदबहुभिस्तु तम् । संपूज्य
बालकान् भक्ष्यगणेशः प्रीयतामिति ॥ १०॥ एवं संपूज्य
देवेशं गणराजं शुचिस्मिते । शरावसंपुटे क्षित्वा संपुटोपरि
विन्यसेत् ॥ ११ ॥ अघोरेति अघोरेति विलिखेत्संपुटोपार ।
भूमिष्ठं सम्पुटं कुर्यान्निखन्यादथ पूजयेत् ॥ १२ ॥ दौर्भाग्य-
मतुलं प्राप्य नारी सीदत्यहर्निशम् । पुरुषो न सहेतां तु सुरू
पामपि सुव्रते ॥ १३ ॥ पुल्लिंगे योजितं यन्त्रं. नारी न सहते
तु तम् । दंपत्योंढेपणं देवि रहस्यं परमं सदा ॥ १४ ॥
नान्यत्र संप्रयोक्तन्यं यन्त्रमेतन्मम प्रियम् न देयं यस्य कस्यापि
विपरीतं प्रजायते ॥ १५॥
दति श्रीपत्रचि. विषणाविकार नरनारीविषण प्रथम यन्त्रम् || १ ॥
-योग्य है ! हे सुन्दरि ! इस प्रकार यंत्रको निर्माण कर नदीके तटपर जाकर
आरपारकी मृत्तिका लाकर मौन हो उक्त मृत्तिकासे गणेशजीकी प्रतिगा
बनाकर यंत्रको उसके ऊपर रखकर गंय पुप्प मोदक आदि द्रव्योंसे स्तुति.
पूर्वक पूजनकर 'गणेशः प्रीयताम्' इ वाक्यको उच्चारणकर भक्ष्यपदाथोंसे
बालकोका पूजन करै । हे शुचिस्मिते | इस प्रकार गणे राजीका पूजनकर
शरावसंपुटमें रख संपुट में स्थापित करै, भूमिमें संपुट से दकर अधोरेति
अघोरेति इस मंत्र को पढता हुआ प्रतिमाको स्थापितकर पूजन करे। हे सुनते !
अति दौर्भाग्यको प्राप्त होकर नारी रातदिन दुःस्त्री होगी, तथापि पुरुष
उसको न सहनेको समर्थ होगा. चाहे वह नारी मुरूपाभी क्यों न हो ?
यदि इस यंत्रका पुंलिंग विषयमें प्रयोग किया जाय तो नारी नरको नहीं
सह सकेगी, हे देवि ! यह रहस्य स्त्रीपुरुषों का विद्रोहकारक है। मेरे प्यारे
इस यंत्र का अन्यविषयमे प्रयोग करना उचित नहीं है, और न किसीको
देना योग्य है, क्योंकि देनेस विपर त फलदायक होगा ॥ १-१५ ॥
इति यंत्रीचन्ता नरनारीवितरणं न म प्रथम यंत्र ॥१॥
हीअह्रीं देवदत्तः HD हीही देवदत्त: होअही। देवदत्तः हाँह देवदत्तः होअही देवदत्तः देवदत्तः भापाटीकोपेतः। श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि शत्रुविद्वेषणं परम् । परस्परं महाद्वेप्यं शत्रूणां जायते परम् ॥ १॥ विद्वपिरक्तयुक्तेन लेखन्या काकपिच्छया । श्मशानकपटे लेख्यं चतुर्दश्यां वरा- शत्रुविद्वेषणयंत्रम् । नने ॥२॥हींकारं च अ- कारं च बिन्दुयुक्तं ततः परमाहींकारं च तृतीयं वे एकपंक्तो लिखेद्बुधः ॥३॥ अध:पंक्ती ततो नाम ही अं ही वर्तुलं वेष्टयेत्ततः । चतु- देवदत्तः दलं ततः कुर्याद्रेखाद्वि- तयभूषितम् ॥४॥दल- हाअही देवदत्तः मध्ये तथा लेख्यं मध्य- देशे तथैव च । अजा- रक्तनसंमिश्र भक्तं नैवेद्यकं भवेत ॥५॥ बलिपुष्पैः प्रपूज्याथ यन्त्रं रात्रौ वरानने । योगिनी भोजयेञ्चेका गुरुं संपूज्य यत्नतः ॥६॥ उद्वासे शिवगेहेतु स्थाप्यं यन्त्रं न संशयः । श्मशानेऽप्यथधा स्थाप्यं गृहे नैव कदाचन ॥शत्रूणां जायते श्रीशिवजी घोले-भव शत्रुविद्वेषण नाम यत्रको कहता हूँ,इस प्रयोग करनेसे .. शत्रुओंका परस्पर परम विद्वप होगा । विधान यथा-दमशान के बखपर अपने (विद्वेष के)रक्तसे कारके पंख की कलमसे एक गोलाकार चक्र खेंचकर दोरखावाले कमलदलोंको पूर्वादि चारों भागों में स्थापित करे । इमापीछे उस गोलाकार चक्रके भीतर तथा चारों दल और प्रतिदल के संधिभाग के समीप ही, अंही, इन तीन पीजीको उपरके भाग और माध्य मनुष्यो नामके अक्षरोंको नीचके भागमें लिखे अर्धान् ऊपर नीचे लिखे । हे परानन ! इस प्रकार यंत्रराजको निर्माण परफे अजारत मिश्रित भात और नैवेद्य इनकी यलि तथा गंध पुष्पा- । दिकोंसे रानिक समय यन्धराज तथा गुरुमालयका पूजन करके एक योगिनीको भोजन पराये और यंग्रको उद्वास शिवमन्दिर अथवा श्मशानमें स्थापित करै घरंग किसी प्रकारमी स्थितकर पूजा गरे । इम प्रयोग ६४ यन्त्रचिन्तामणिः। द्वेषः क्रमेणेव न संशयः । स्वशत्रुद्वेषणं नाम यन्त्रराजं महा- फलम् ॥८॥ एकान्ते स्मरणीयं च लोकान्ते न कदाचन ॥९॥ इति श्रीय० ना० उ० वि० दा० शत्रुविद्वेषणं नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥२॥ श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि बन्धुविद्वेषणं परम्। श्मशानकर्पटे लेव्यं लेखन्या काकपिच्छया ॥१॥ मेषस्य रुधिरेणेव पृष्ट्वाङ्गार श्मशानकम् । साध्यनाम लिखित्वा तु बन्धुविद्वेषणयत्रम् । T र देवदत्तः त्रिकोणं वेष्टयेत्ततः ॥ २ ॥ अधोपरि च रेफो च संलेख्यो भूतरात्रिषु । ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक् चतुष्कोणं तु रेखया ॥३॥ कोणे कोणे त्रिशलानां संलेरख्यं च चतुष्टयम् । चतुसं- --मरनेसे शत्रुओंका विद्वेषण होगा, यह स्वगत्रु विद्वेषण नाम यंत्र महाफलदा- या है इसका प्रयोग एकान्तमे करे, हर किसीके सामने न करे ।।१-९॥ इति यंत्रचि० कि. स्वशत्रु विद्वेपण नाम दूसरा यंत्र ॥ २ ॥ श्री शिवजी घोले-भव बंधुविद्वेषण नाम यंत्रको कहताहूं-मशान वस्त्रक ऊपर काकपत्रकी टेसनीसे एक चतुष्कोण यंत्रको सूचकर उसके भीतर त्रिकोण यंत्रको संच प्रत्येक कोणमें चार २ त्रिशूल लिस पूर्वादि पारों दिशाओकी ग्राओंमें दोहरे रफार ग्यापिन करे तःपधान् भूतरात्रि में श्मशानके अंगारेको यर.ररय - भाषाटीकोपेतः। मुखं लेख्यं चतूरेफोपरि स्थितम् ॥ ४॥ एवं संलिख्य यन्त्रं तु संपूज्यं पूर्ववत्पुनः सप्ताहुलं निखन्यात्तु पूरयेमिमध्यतः॥५॥ यत्रास्ति तेषां मार्गश्च तत्रैव प्रक्षिपेत्ततः । परस्परं महाद्वेष बन्धूनां संप्रजायते ॥६॥ यस्य पादः पतत्यत्र सोऽपि दोर्भा- ग्यभाजनः । जायते नात्र संदेहो.यन्त्रराजप्रसादतः ॥७॥ इति श्री यन्त्रचि० बन्धुविद्वेषणं नाम तृतीयं यन्त्रम् ॥ ३ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि विद्वेषं स्वामि- स्वामिभृत्यविद्वेषणयत्रम् । भृत्ययोः विषेण रक्तमिश्रेण लेखन्या काकपिच्छया ॥१॥ श्मशानकर्पटे लेख्यं चतुर्दा यःमः महानिशि । साध्यनामाश्यगर्भ देवदतः तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः॥२॥ तस्यो- परि अधोभागेरकारवितयं पुनः। यकारं संपुटे लेख्यं तिर्यग्भागे द्विबीजकम् ॥ ३॥ यकारे च -मेप (मेंढा) के राधिरमें घिसकर उससे उक्त त्रिकोणके भीतर साध्यव्यक्तिके नामाक्षरीको लिख त्रिकोणके ऊपर नीचे दो दो रकार वर्ण लिखे। इस प्रकार यन्त्रको लिखकर पूर्ववत् पूजनकर सात अंगुल भूमि खोद यंत्रको दाम तब परस्परमें बन्धुओंका निश्चयही विद्वप होगा, अधवा अन्य किसीका भी भूमिमध्यमें स्थित यंत्रके ऊपर पैर पड़ेगा तो वहभी दौर्भाग्यका भागी होगा, इस यंत्रराजका ऐसा प्रभाव है परन्तु उस स्थानको भूमिमें दापै कि, जहां शत्रुके आनेजानेका मार्ग हो ॥ १-७॥ इति यंत्रचिन्तामणिकी छठी पीठकाके विद्वेषणाधिकारमें बन्धु विद्वपण नामक तीसरा यन्त्र ॥३॥ श्रीशिवजी बोल-अब स्वामी और सेवकके विद्वेपकारक यंत्रको कहता हूं। विधान यथा-सचिर मिले विषसे करपरको लेखनीके द्वारा मान फर्यटके ऊपर एक गोलाकार यंत्रको सैच एक भंगुलके अंतरसे उस यंत्रके बहिर्भागमें एक यंत्र और बैंचकर प्रथम चक्रके भीतर सानुस्वार साध्य. व्यक्ति के नामको लिस पुनः दूसरे यंत्रके मध्य पूर्वपश्चिम भागमें यकारपुटित यरररय ५ भव । यन्त्रचिन्तामणिः। सकारं च विसर्गान्तं प्रतिष्ठितम् । एवं संलिख्य यन्त्रं तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः ॥ ४॥ एवं संलिख्य यन्त्रं तु तेषां मागें निखन्यतु । संजायते महाद्वेषः स्वामिसेवकयोः सदा ॥५॥ यावद्यन्वंतु भूमिष्ठं तावद्वेषः प्रजायते ॥६॥ इति श्रीयन्त्र चिं० स्वामिभृत्ययोविद्वेषणेनाम चनुथं यन्त्रम् ॥ ४ ॥ श्रीशिव उवाच॥शृणु देवि प्रवक्ष्यामि जगद्वेषणकं परम् । यन्त्र भयानकं नाम दौर्भाग्यस्य विवर्धनम् ॥ १॥ काकोलू- कस्य रक्तेन ऋतुरक्तेन वा पुनः। दौर्भाग्यललनायाच लेखन्या काकपिच्छया ॥२॥ विलिखेबूर्जपत्रे तु साध्यनाम निशि विश्वविद्वेषणयन्त्रम् । प्रिये । कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्यां लिखे- दुर्भगो द्यन्त्रं मनोहरम् ॥ ३ ॥ साध्य नाम लिखेन्मध्ये ठकारपरिवेष्टितम् । ठकाराणां न संख्याऽस्ति विपमैवे. देवदत्तः टयेत्सदा ॥ ४ ॥ ततस्तु वर्तुलं 'वेष्टचं दुर्भगो भव वेष्टयेत् । एतद्यन्त्रं तु संस्थाप्पं तद्गृहे तृणमध्यतः ॥५॥ -३ रफार वर्णों को और उत्तर दक्षिण भागोंमें विसर्गान्त यकार सकारोंको लिखे । तत्पश्चान् गन्धपुष्पादिकोसे यंत्रका पूजनकर स्वामी-सेवकके मार्गम भूमि खोदकर दवादे तो स्वामी सेवकका प्रतिदिन विद्वेष रहेगा ॥ १-६॥ इति यन्त्र चिन्तामणिको स्वामीसेवकविद्वेषणनामक चौथा यन्त्र ॥४॥ श्रीमहादेवजी बोले-हे देवि ! अव जात् विद्वपक नाम यन्त्रको कहता हूँ मुनो इस यन्त्रका भयानक नाम है और दौर्भाग्यवृद्धि इसका प्रभाव है । विधान यथा-काक, उलूक इनके रक्तसे तथा दीर्भाग्यललना (खी) के ऋतु रक्तसे भोजपत्रके ऊपर काकपत्रकी लेखनीसे एक गोलाकार चक दूसरा उसके अंगुलमारके अन्तरसे लिखे तथा चक्रकेमध्यमें साध्यव्यक्ति के सानुस्वार नामका लिख उसके पूर्वभागमें चार ठं चीज और पश्चिम भागमें तीन बीज क्या दक्षिण उत्तरभागमें दो दो ट पोज लिख बहिर्मागके पूर्वादि चारों भागों दुर्भगोभव इस पाक्यको लिसे। इसके पीछे गन्ध पुप्पादिकोंसे पूजनकर घर दुर्भगाभव .
भाषाटीकोपेतः। ६७ यावद्गृहस्थं तद्यन्त्रं सोऽपि तद्गृहतः सदा । तावद्विश्वस्य शत्रुः स्यानात्र कार्या विचारणा॥ ६॥ पूजाक्रमस्तु पूर्वोक्तो यन्त्र देवि नृणां सदा ॥७॥ इति श्री यंत्र. विश्वविद्वेषणं पञ्चमं यन्त्रम् ॥ ५ ॥ चिन्तामणौ यन्त्रवरे सुकल्पे श्रीचन्द्रचूडस्य मुखाद्विनि- गते । तस्मिंश्चतुर्थे तु महाधिकारे पूर्णा तु पीठी कथिताऽत्र षष्ठी ॥ १॥ पश्चैव यन्त्राणि महाधिकारे चकार दामोदरविप्र- वर्यः । रहस्यभूतानि विचार्य लोके शृण्वन्ति ये ते सुखिनः सदा नराः॥२॥ इति श्रीयन्त्र चिं० महाकल्पे प्र० सि० उ० सं० दा० पंडितोद्भुते षष्ठपीठिकायां विद्वेषणाऽधिकारः समाप्तः । अथ मारणाधिकारः। ब्रह्माण्डं सर्वमेतत्पचति बहुविधं यः सदा भूतजातं स स्तात्सर्वस्य देवैः करकलितमहाकालदण्डोऽतिरोद्रः। नत्वा -मध्यमें तृणमें स्थापित करदे अर्थात् घास इत्यादिकमें दबाकर रखदे । उक्त यन्त्र जबतक गृहमें स्थित रहेगा तबतक घरमें विद्वेष शांत न होगा किन्तु विश्वमात्रका शत्रुहोगा इस विषयमें किसी प्रकारका संदेह न करना चाहिये। हे देवि ! पूजाका क्रम उक्त यन्त्रके समान है ॥ १-७॥ इति यन्त्र प० पी० में विश्वविद्वेषणनामक पाँचवां यन्त्र ॥ ५॥ श्रीशिवजी, महाराजके मुखकमलसे निकले हुए सुकल्प चिन्तामाणे नाम सुयंत्रकी छठी पीठिका समाप्त हुई। इस महाअधिकारमें विप्रवर्ण्य दामोदरजीने पाँचही यंत्र वर्णन किये हैं । जो मनुष्य रहस्यभूत इन यन्त्रोंका श्रवण करेगे वे मनुष्य चिरकालतक सुखके भागी होंगे ॥१॥२॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणिनाग्नि महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वर- संवादे पष्ठपीठिकायां यलदेवप्रसादमिश्रकृत मापाटी- कासहितविद्वेपणाधिकार समात ॥ जो अनिर्वाच्य शिवस्वरूप परमात्मरौद्ररूपको धारणकर सम्पूर्ण देवताओंके रचेहुए दण्डस नानारूप इस भूनजात प्रमको पका रहेहे उन रौद्रस्वरूप यममार्ग । ६८ यन्त्रचिन्तामणिः । तं कालसंज्ञं विरचयति महापञ्चमं चाधिकार मृत्योः संदर्श- नाख्यं प्रकटयति महो गङ्गदत्तस्य सूनुः॥ १॥ संमारणो नाम महाधिकारःप्रारभ्यते संप्रति सप्तमोमया। सासप्तमी स्यात्किल कल्पवल्ली चिन्तामणी श्रीशिवभाषितेऽस्मिन् ॥२॥ श्रीशिव उवाच॥अतः परंप्रवक्ष्यामि यन्वं शत्रोस्तु मारणम् । एतद्यन्त्रं तु संलेख्यं कपाले तु नरस्य च ॥१॥श्मशानाङ्गारकं शत्रुमारणयत्रम् । वृप्य धत्तूरकरसे न तु । श्मशाने 111 \ um चैव संलेख्यं चतुर्दश्यां महानि- ग्ल म्लि देवदत्तः शि ॥२ ॥ निःशङ्केन विवस्त्रेण एकाकी यन्त्रमुत्तमम् । मध्ये नाम लिखित्वा तु लिखेन्म्ल-म्लि तथोपरि ।।३॥ अधोऽपि म्लम्लि बीजो द्वौ विलिख्या साधकेन तु । त्रिकोणं वेष्टयेत्पश्चादेखाद्वितयशोभितम् ॥ ४॥ ऊर्ध्वरेखास्तु कर्तव्याः सर्वत्रापि वरानने । शरावसम्पुटे क्षिप्त्वा यन्त्रं तत म्ल मिल शर्शी श्रीशिवजी महाराजको प्रणामकर मृत्युम्थान प्रकाम पंचम महाअधिका- रको गंगादत्तजीके पुत्र श्रीदामोदरजी रचनापूर्वक प्रकाश करते हैं ॥ १ ॥ मैं अब पंचम मारण नाम महाअधिकारको वर्णन करताहूँ, इस शिवोक्त चिन्ता- मणि नामक महायंत्रमें सप्तमी पीटिकाको सप्तमी कल्पवल्ली कहते हैं ॥२॥ श्रीशिवजी बोले । अव शत्रुमारण यन्त्रको कहताहूं-प्रयोगकरनेके समय इस यन्त्रको मनुष्यके कपालपर लिखना चाहिये । श्मशानके अंगारेको धतूरेके रसमें घिसकर कृष्णपक्षको चतुर्दशी रात्रिको श्मशानमें ही यन्त्र लिखना योग्य है । निशंक हो वनोंको त्याग इकला उक्त फपालके वीचमें साध्यव्य- क्तिक सानुस्वार नामको लिख उपर नांचे म्ल-म्लि-इन अक्षरोंको लिखे । फिर त्रिकोण दो रेखामोसे वेष्टिनकर ऊपरफी मात्रा लगा शरावसंपुट में रख, भाषादीकोपेतः। सम्प्रपूजयेत॥५॥वलिमांसोपहारस्तु स्वरक्तन विशेषतः। एत- यन्त्रं तु तत्रैव निखन्यादय पूरयेत्॥६॥उपरि ज्वालयेवून रात्री रात्री शुचिस्मिते । एवं कृते तृतीयेऽहि शत्रोः संजायते ज्वरः ॥७॥ क्रमेणेव महाव्याधिस्ततो वे मरणं भवेत् । एकजीवं बलिं दवा उदृते जीवते हि सानो धमपुरं याति नाऽत्र कार्या विचारणा ॥ ९॥ इति श्रीयन्त्र पि० ना० उ०म० दा० सप्तमे मारणाधिकारे शत्रुमारण नाम प्रथमे यन्त्रम् ॥ १ ॥ श्री शिवउवावाअयातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रं शत्रुप्रणाशनम् । मारणं प्रबलस्यापि शत्रोर्मृत्युन चान्यथा ॥ २ ॥ विषेण हरि- शत्रुमारणयंत्रम् । तालेन भूर्जपत्र लिखेन्नरः । - ( साध्यनाम लिखित्वातु लेखन्या काकपिच्छया ॥२॥ लेखने तु विधिः पूर्वमुक्तो यो मारणे हि सः । वारं वारं किमुक्तेन अत्यविस्तारकारणम् ॥ ३ ॥ हींकारगर्भमध्ये तु साध्यनाम प्रतिष्ठितम् । ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक त्रिकोणं पूर्ववत्पुनः ॥ ४॥ कोण कोण त्रिशूलं च विलिख्याध्य प्रपूजयेत् । पूजने विधि अलि, मांस, पूजा सामी स्वरक्त इनसे पूजनकर वहीं गाइदे और हे शुचि- स्मिते ! प्रत्येक रात्रिम उपके ऊपर अमिको प्रज्वलित करता रहे । इस प्रकार करनेसे सीसरे दिन शत्रुको घर भाजायगा और क्रमानुसार रोग प्रबल होकर उसकी मृत्यु हो जायगी । यदि एक जीवको बलि देगा तो प्राणोंसे रशिव होगा, नहीं तो यमपुरीको जायगा ॥ १-९ ॥ इति यंत्रचि०सातवीं पीठिका मारणाधिकारमें शत्रुमारणं नाम पहलायंत्र॥१॥ श्रीशिवजी बोले-अ शत्रुमणाशक यंत्र कहाजाता है, मारणहीसे प्रथल शत्रुको मृत्यु होती है अन्यथा नहीं। विधान यथा-विष, हरताल इनको एस. त्रितकर फाकपनकी लेखनी से भोजपत्रके पर त्रिशूलयुफ एक त्रिकोण यंत्रको ७० ory h Ittee . 674. HE ta th यन्त्रचिन्तामणिः। रायोक्तः सर्वत्राऽपि च मारणे ॥५॥ नराख्रिनलिकामध्ये क्षिपेद्यन्त्र सुपूजितम् । खात्वाइमशानभूमिष्ठा नलिका तुसुयं- त्रिका ॥ ६ ॥ अकस्मान्मरणं तस्य जायते नात्र संशयः । अनुग्रहस्तु पूर्वोक्तः सर्वत्राऽपि च मारणे ॥ ७॥ इति यंत्रचि ० मारणाधिकरे शत्रुमारण नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥ २ ॥ श्री शिव उवाच||अथातः संप्रवक्ष्यामि मारणं दूरदेशजम् । देशान्तरस्थशत्रुमारणयन्त्रम् । श्मशानाङ्गारकं वृष्य अजारक्तं तथैव च॥॥ विषं चैव तु संवृप्य लि- हुंफट खेनरकपालके । सम्पुट चैव संलेख्यं लेखन्या हुंदेवयत्तःहूं। . काकपिच्छया । साध्य- नाम लिखे न्मध्ये हुंका- रपुटितं शुभम् । तत- चाप्टदलं कृत्वा ग्रहसं- स्थापने यथा ॥ ३॥ चतुर्दलं तु संलिख्य हुँ -खेंचकर ही.बीजके मध्य में साध्यव्यक्ति के नामाक्षरोंको लिखे । लेखनका प्रकार मारणयंत्रमें कह चुके हैं,बारम्बार कहने से ग्रंथका विस्तार होगा । परन्तु लेखनी काकपनहीकी होनी चाहिये । इस प्रकार यंत्रको निर्माणकर उक्त विधानपूर्वक ही सब जगह पूजन करना चाहिये। पुन: यंत्रका पूजनकर नरनालिकामें रख- कर श्मशान भूमिमखोदकर गाड़दे तो अचानक शत्रुको मृत्यु हो जायगी १-७ इति यंत्र० सातवी पीठिकाके मा० में शत्रुमारण नामक दूसरा यंत्र ॥२॥ श्रीशिवजी वाले अब दूरदेशी स्थित पुरुषोंका मारण यंत्र कहताहूं श्मशा: नके अंगारेको विप और अजाके रुधिरमें मिलाकर मनुष्यके कपालके मध्यमें काकपत्रकी लेखनीसे दो रेखायुक्त गोलाकार यंत्रको बैंचकर उसके मध्यम एक आठ दल खेचे कि, जैसा महकांडीमें बचा जाताहै । पिर प्रत्येक दलमें 64- 612 Tom (A frhea -hua F भाषाटीकोपेतः। फदतु दलमध्यतः।ततस्तु वेष्टयेत्सम्यग्वर्तुलं तु द्विरेखया॥४॥ हुंकारर्वेष्टयेत्सम्यग्विषमैः सर्वतः प्रिये। ततस्तत्सम्पुटं मेल्य भस्मना पूरयेच्छुभे ॥५॥ अग्नेरुपरि संस्थाप्य पूरयित्वा यथोदितम् । देशांन्तरगतस्यापि शत्रोः संजायते ज्वरः॥६॥ प्रत्यहं ज्वालनीयं तु स्तोकं स्तोकं तु सुन्दरि। दिने एकाधिके विंशे सर्व तज्ज्वलयेनिशि ॥७॥ तस्मिन्नेव क्षणे शत्रोमरणं जायते प्रिये । अतुग्रहे तु पूर्वोक्तं विधानमिति निश्चितम्॥८॥ इति यं० स० पी० देशान्तरस्थशत्रुमारणं नाम तृतीयं यन्त्रम् ॥ ३॥ श्रीशिव उवाच ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि मारणं सर्वदेहिनाम्। सर्वजनमारणयन्त्रम् । रुधिरेण मनुप्यस्य श्मशाना- झारघर्षणैः ॥ १॥ विषेण च तथा लेख्यं कर्पटे वैश्मशा- नके । साध्यनाम लिखित्वा हुँफट् देवदत्त हुँफट् तु हुँ फर संपुटितं तथा ॥२॥ हुँफट् देवदत्त फट एवं त्रिवारं संलिख्य त्रिपंक्तो हुँफट् देवदत्त (फट् तु वरानने । ततस्तद्वष्टयेत्स- म्यग्वर्तुलं तु त्रिरेखया ॥ ३॥ राजिकाप्रतिमां कुर्याच्छनो- चरणपांसुना । हन्मध्ये यन्त्र- कंक्षिप्त्वा शवोस्ताप्या तु -हु पद इस योज मत्राको लिख वीचके भागमें दो हुंकारके बीच साध्यका नाम लिखे। तत्पश्चात् संपुट में लेकर भस्मसे पूरितकर अनिके ऊपर स्थापितकरे । -यदि शत्रु विदेशमें होगा वोभी उसको ज्वर आजोयगा । हे मुन्दरि ! प्रति- दिन थोड़ा थोड़ाही प्रज्वालनीय है । क्योंकि, २१ में दिन रात्रिके समयमें मयही जलैगा हे प्रिये ! उसी समय शत्रुका मरण होजायगा, पूजनके वृत्तान्तको अनुमहकर प्रथम यंत्रमें कह चुके हैं ॥ १-८॥ इति यंत्रं मारमें विदेशस्थशनुमारेण नामक तीसरा यंत्र ॥३॥ श्रीशिवजी घोले-अब सम्पूर्ण मनुष्योंका मारण कहा जाता ह। विधि- मनुप्यके रुधिर श्मशान के अंगारेको घिसकर विष मिलाय फाकपाकी .
७० हुंफट । Phee rhee 67. य he toa •h.co how यन्त्रचिन्तामणिः। रायोक्तः सर्वत्राऽपि च मारणे ॥ ५ ॥ नराख्रिनलिकामध्ये क्षिपेद्यन्त्र सुपूजितम् । खात्वाश्मशानभूमिष्ठा नलिका तुसुयं- त्रिकी ॥ ६ ॥ अकस्मान्मरणं तस्य जायते नात्र संशयः। अनुग्रहस्तु पूर्वोक्तः सर्ववाऽपि च मारणे ॥ ७ ॥ इति यत्रचि० मारणाधिकरे शत्रुमारणं नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥ २ ॥ श्री शिव उवाच||अथातः संप्रवक्ष्यामि मारणं दूरदेशजम् । देशान्तरस्थशत्रुमारणयन्त्रम् । श्मशानागारकं पृष्य अजारक्तं तथैव च॥१॥ विषं चैव तु संवृष्य लि- खेनरकपालके । सम्पुटं चैव संलेख्यं लेखन्या हुंदैवयत्तहुँ । काकपिच्छया । साध्य- नाम लिखेन्मध्ये हुंका- रपुटितं शुभम् । तत- श्चाप्टदलं कृत्वा ग्रहसं- स्थापने यथा ॥ ३॥ चतुर्दलं तु संलिख्य हुँ -सेंचकर ही.वीजके मध्यमें साध्यव्यक्तिकेनामाक्षरोंको लिखे । लेखनका प्रकार मारणयंत्रमें कह चुके हैं,बारम्बार कहने से प्रथका विस्तार होगा। परन्तु लेखनी काकपनहीकी होनी चाहिये । इस प्रकार यंत्रको निर्माणकर उक्त विधानपूर्वक ही सब जगह पूजन करना चाहिये। पुनः यंत्रका पूजनकर नरनालिकामें रखा कर प्रमशान भूमिमें खोदकर गाडदे तो अचानक शत्रुको मृत्यु हो जायगी १-७ इति यंत्र० सातवीं पीठिकाके मा० में शत्रुमारण नामक दूसरा यंत्र ॥२॥ श्रीशिवजी बोले-अब दूरदेशमें स्थित पुरुषोंका मारण यंत्र कहताहूं, श्मशा: नके अंगारेको विप और अजाके रुधिर में मिलाकर मनुप्यके कपालके मध्यम काकपत्रकी लेखनीसे दो रेखायुक्त गोलाकारयंत्रको खेचकर उसके मध्यमें एक आठ दल बँचे कि, जैसा प्रहकांटीमें बैंचा जाता है । पिर प्रत्येक दलमें 61 often Phea HD They भाषाटीकोपेतः। फटतु दलमध्यताततस्तु वेष्टयेत्सम्यग्वर्तुलं तु द्विरेखया।।४।। हुंकारैर्वेष्टयेत्सम्यग्विषमैः, सर्वतः प्रिये । ततस्तत्सम्पुट मेल्य भस्मना पूरयेच्छुभे ॥५॥ अग्नेरुपार संस्थाप्य पूरयित्वा यथोदितम् । देशान्तरगतस्यापि शत्रोः संजायते ज्वरः ॥६॥ प्रत्यह ज्वालनीयं तु स्तोकं स्तोकं तु सुन्दराि दिने एकाधिके विशे सर्व तज्ज्वलयेनिशि ॥ ७ ॥ तस्मिन्नेव क्षणे शत्रोमरणं जायते प्रिये । अनुग्रहे तु पूर्वोक्तं विधानमिति निश्चितम्॥८॥ इति यं० स० पी० देशान्तरस्थशत्रुमारणं नाम तृतीयं यन्त्रम् ॥ ३ ॥ 'श्रीशिव उवाच ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि मारणं सर्वदेहिनाम्। सर्वजनमारणयन्त्रम् । रुधिरेण मनुप्यस्य श्मशाना: झारघर्षणः ॥ १॥ विषेण च तथा लेख्यं कर्पटे वैश्मशा- नके । साध्यनाम लिखित्वा हुँफट् देवदत्त हुँफट तु हुँ फट संपुटितं तथा ॥२॥ फट् देवदत्त फट एवं त्रिवारं संलिख्य विपंक्तो हुँफट् देवदत्त फट तु वरानने । ततस्तद्रष्टयेत्स- म्यग्वर्तुलं तु त्रिरेखया ।। ३॥ राजिकाप्रतिमां कुर्याच्छनो- धरणपासुना । हन्मध्ये यन्त्र- कं क्षिप्त्वा शत्रोस्ताप्या तु - फद इस बीज मंत्राको लिख पीचके भाग दो इंकारके बीच साध्यका नाम लिखे। तत्पश्चात् संपुटमें लेकर भस्मसे पूरितकर अमिक ऊपर स्थापितकरे । -यदि शत्रु विदेशमें होगा वोभी उसको ज्वर आजायगा । हे सुन्दरि ! प्रति- दिन थोड़ा थोडाही प्रज्वालनीय है । क्योंकि, २१ में दिन रात्रिके समयमै सपही जलेगा । हे लिये ! उसी समय शत्रुका मरण होजायगा, पूजनके वृत्तान्तको अनुमहकर प्रथम यंत्रमें कह चुके हैं ॥ १-८॥ इति यंत्र० मारमें विदेशस्थशत्रुमारेण नामक तीसरा यंत्र ॥३॥ श्रीशिवजी योले-अब सम्पूर्ण मनुष्यों का मारण कहा जाता है । विधि- मनुयके रुधिरमें श्मशानके अंगारेको घिसकर विष मिलाय काकपचकी
यन्त्रचिन्तामणिः।
पुत्तली॥४॥शवोःक्रमक्रमेणैव दाहशोषस्तु जायते । शिरोव्य-
था च महती तृतीयेऽहि प्रजायते॥५॥हस्तपादाङ्गदाहः स्यात्म
रणं ततमे दिने । जायते नात्र संदेहो विधावपिन संशयः॥६॥
इति श्रीयन्त्र० सर्वजनमारणं नाम चतुर्थ यन्त्रम् ॥ ४ ॥
१ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्र स्त्रीपुंसमार-
णम् । विभीतकस्य पत्रे तु श्मशानभस्मना लिखेत् ॥ १॥
ऋतुरक्तेन सम्मिश्रं लेखन्या काकपिच्छया। साध्यनाम लिखे-
न्मध्ये स्तम्भस्तम्भति सम्पुटम् ॥ २॥ ततास्त्रकोणं संवेष्टय
पञ्चकोणं तथोपरि । मनुप्यनलिके क्षित्वा नलिकां पूर्य
मृत्नया ॥३॥ तन्मूत्रसिक्तया देवि ततस्तत्पूर्य पूरयेत् ।
भूमध्ये तु खनित्वाऽथ श्मशाने प्रयतो निशि ॥ ४॥ ततः
संजायते रोधो रिपोर्मत्रस्य वै क्षणात् । म्रियते सप्तरात्रेण
मोक्षः पूर्वोक्तमार्गतः॥५॥ इति नरनारीमारणं पञ्चमं यन्त्रम् ॥ ५॥
-लेखनीसे श्मशान वस्रके ऊपर वर्तुल तीन रेखावाले चक्रको बैंचकर उसके
भीतरभी तीन रेखाकी कल्पनाकरै । पुनः प्रत्येक रेखामें हुं फट् इन धीज
मंत्रोंसे पुटित सानुम्वार साध्यव्यक्ति के नामको लिखै । इसके पीछे शत्रुके
चरणके नीचेकी धूलिको राजिका मिश्रितकर एक प्रतिमा बनावै । उसके
हृदयमें शत्रुमारण यंत्रको स्थापितकरै तौ क्रमपूर्वक दाह और व्याधि उत्पन्न
होगी और तीसरे दिन सिरमें बड़ी पीड़ा होगी। फिर हाथ पैर में दाह है।
निस्सन्देह सातवें दिन मृत्यु होजायगी ॥ १-६ ।।
इति यंत्रक सर्वजन मारण नामक चौथा यंत्र ॥ ४ ॥
श्रीशिवजी बोले-अय स्त्री और पुरुषके मारणयंत्रको कहता हूं | विधि-
स्त्रीके मासिक रुधिरमें श्मशानकी भस्मको मिलाकर विभीतको पत्रपर
काकपनकी लेखनीसे त्रिकोण यंत्रको बैंच पंचकोणयंत्रको उसके बहिर्भागमें
बैचे । इसके पीछे त्रिकोणके भीतर स्तम्भ, स्तम्भ इन बीजोंसे पुटिव साध्य ।
व्यक्षिके सानुस्वारनामको लिखयंत्रको नर नलिकामें बंदकर तथा साध्य व्य-
क्तिका मूत्रसे सींची हुयी मिहोसे पूर्ण कर नियमपूर्वक रात्रि के समय श्मशानकी
भूमिको खोदकर दाषदे तो उसी समय शत्रुको मूत्र रोग पैदा होकर सात
रात्रि में मृत्यु होजायगी । मोक्ष पूर्व कथनके अनुसार जानलेनी योग्य है १-५
इनि यंत्रीचन्तामणिकी. नर नारी-मारण नामक पांचवां यंत्र ॥ ५॥
भावाटीकोपेतः। ७३ नरनारीमारणयंत्रम्। तस्भ स्वभ देवदत्तः स्तमस्तभ चिन्तामणो कल्पवरे सुयन्त्रे श्रीचन्द्रचूडस्य मुखाद्विनिर्गते। नाना महामारणसंज्ञके तु संपूर्णतां सप्तमपीठिका गताः॥१॥ पञ्चैव यन्त्राणि महाधिकारे सम्मारणे पञ्चमकतिरौटे। संहार भूतानि सुकीर्तितानि मयेव देवि (बी) पुरतः स्फुटानि॥२॥ इति श्रीयन्त्र चिना० प्र० स० दामोदरपण्डितोद्वते सप्तम पीठिकायां मारणाधिकारः समाप्तः ॥ श्रीचन्द्रचूड शिवजी महाराजके मुखकमलसे निकले चिन्तामणि नाम मारण यन्त्रका पंचयन्त्रसहित ससम पीठिका समाप्त हुई ॥ १॥ हे देवि ! अतिरोद्र संमारण नाम इस पांचवें अधिकारमें संहाररूप पाँच हो यन्त्र मैंने फुटतासे तुम्हारे सम्मुख वर्णन किये हैं॥१॥२॥इति मारणाधिकार समाप्त।
७४ यन्त्रचिन्तामणिः। अथोच्चाटानाधिकारः। देवाधिदेवस्य सदाशिवस्य त्रैलोक्यवन्द्यस्य पदारविन्दम् । कायेन वाचा मनसा च नत्वा दामोदरो भार्गववंशजातः॥१॥ प्रवक्ष्यते संप्रति षष्ठसंज्ञमुच्चाटनं नाम महाधिकारम् । यन्त्राणि बीजानि परिम्फुटानि शिवाजया लोकहिताय विप्रः ॥ २॥ श्री शिव उवाच॥अतः परं प्रवक्ष्यामि शत्रोरुञ्चाटनं परम्। अनामिकाया रक्तेन भूर्जपत्रे वरानने ॥१॥ गं गणपतिवीजानि शत्रुचाटनयंत्रम् । प्रीहतं प्रणवादिकम् । एकपंक्तो समा- लेख्यं हुं गं नाम विलिख्य च ॥२॥ पंक्तौ द्वितीये संलेख्य तृतीये विलि- ॐ गं गणपति प्रहितं । खेत्तताहुं गंधं स्वांगहेति लिखित्वा हुँ गं देवदत्तः क्रमतो नरः ॥ ३ ॥ ततस्तद्वे- हुँ गं धं स्वां ग हा टयेत सम्यक् चतुष्कोणं द्विरेखया । रक्ताम्बरधरो देवि रक्तमाल्यानु- लेपनः ॥ ४॥ चतुर्दश्यां साधकस्तु महारावो लिखेत्क्रमात् । पूजनं रक्तकुसुम रक्तगन्धैः फलः शुभैः॥५||कुमारभोजनं रात्री श्रीशिवजीकी आज्ञासे में दामोदर नाम पंडित देवाधिदेव तीनों लोकोके वन्दन करने योग्य सदाशिवके चरणकमलोंको शरीर, वाणी मनसे नमस्कार कर उचाटन नाम महाधिकारको लोकांके उपकारके लिये वर्णन करता हूँ फि, जिसमें यन्त्र और वीज स्फुटतासे वर्तमान है ॥ १ ॥२॥ श्रीशिवजी योले अब शत्रुका उघाटन कहा जाता है । विधि-अपनी अना- मिका अंगुलिके रुधिरस भोजपत्रके ऊपर दो रेखा मिलाकर एक चतुष्कोण यन्त्रको बैंच उसके भीतर तीन रेखा खेंचे । प्रथम रेखामें 'भांगणपति प्रहितम् दूसरीमहंगं आदिम लगा सानुम्वार साध्यव्यक्तिके नामको, तीसरीमें ई गं धं स्वांग हा इनको लिले । तत्पश्चात् साधक लालघस्त्र धारणकर रक्तमाला और रक्त अनुलेपनसे युक्त हो कृष्णपक्षकी रात्रिमें रक्तपुष्प, रक्तगंध, स्वच्छफल, इनसे यन्त्रका पूजनकर यथाशक्ति दक्षिणा दे कुमारको भोजन कराकर भाषाटीकोपेतः । यथाशक्त्या तु दक्षिणाम् । ध्यानं तु देवदेस्य गणनाथस्य सुन्दरि ॥६॥ नीलाञ्जनाभं गजवक्रवर्य शत्रु गृहीत्वा निज- पुष्करण । उचालयन्तं गगनं गणेशं ध्यात्वा तु नित्यं विधि- वन्मनुष्यः ॥७॥ उच्चाटयेदत्र न संशयोऽस्ति दिनस्तथैका- धिकविशकेन । अयं क्रमो लेखनपूजेन च सर्वत्र उच्चाटकृता- धिकारे ॥८॥ खण्डं कृत्वा तु तद्यन्त्रमुच्छिष्टोदनमिश्रित तम् । दीयते भक्षणार्थ च वायसेभ्योऽन्तिमे दिने ॥९॥ १० श्री० यं. चि. ना० मक० प्र०सि० उ०सं० अष्टमपीठिकाया- मुचाटनाधिकारे शत्रुचाटनं नाम प्रथम यन्त्रम् ।। १ ।। श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि सद्य उच्चाटनं परम् । विषेण तालकेनैव गोन्दतहरितालके ॥ १॥ चित्र- कस्य रसेनैव लिखेत काकं तु कर्पटे। श्मशानजे तु लेखन्या काकपिच्छसमुद्भवा ॥ २ ॥ साध्यनाम लिखेत्पश्चाद्वायसोदर- मध्यतः । पूजने लेखने चैव पूर्वोक्तस्तु विधिः स्मृतः ।। ३ ।। गणी नाथ देव देवधर श्रीगणेशजीका ध्यान करै । ध्यानका क्रम इस प्रकार है-- अंजन पर्वतके समान नीलवर्णवाले, गजमुखके धारण करनेवाले शत्रुको अपने शुंडदंडसे महणकर आकाश मंडल में उछालनेवाले श्रीगणनाथका विधिपूर्वक ध्यानकर उद्घाटन प्रयोग करना योग्य है । इस विधानके करनेसे २१ दिनमें निश्चयहीं शत्रुका उद्घाटन होजायगा।इस प्रकारही सम्पूर्ण उचाटन प्रयोगोंका लेखन पूजन करना चाहिये । इसके पीछे वक्त यन्त्रके टुकडे करके झूठे भातमें मिलाकर अंतके दिन कउऑको खिलादे ॥ १-९॥ इति यंत्रचिन्तामणिकी आठवीं पीठिकाके उशाटनाधिकारमें शत्रु उचाटननाम पहला यंत्र॥ १.!! ओशिवजी घोले-भव शीघ्र उचाटन कारक यंत्रको कहताहूं। विधि-विष, तालक, गोदन्ती हरताल, पीता इन सय यस्तुवोंके रेसको एफनितफर फाफ. पाकी लेखनीसे श्मशान पत्रके ऊपर एक काकको मूर्ति निर्माणकर उसके उदरमें साध्यव्यक्तिक सानुस्वार नामको लिस पहली विधिके अनुसार पूजन फरें। इसके पीछे विभीतक पृक्षके दाक्षिणभागमें रात्रिके समय नियममें तत्पर हो साधकव्यक्ति उस काकी प्रतिमाको अधोमुसकर टांगदे । इस विधि, यः यन्त्रचिन्तामणिः। अधोमुखं तु तत्कालं लम्बमानं तु दक्षिणे । विभीतकस्य वृक्ष सघरचाटनयन्त्रम् । तु बन्धयेत्प्रयतो निशि ॥ ४॥ एवं कृते तुतीयेऽहि स्थानादु- ञ्चाटनं भवेत् । यावद्यन्त्रं तु तत्रस्थमुद्विग्नस्तावदेव हि॥५॥ न रोचते गृहं तस्य सुखं न लभते कचित । विदेशगमनं तस्य संशयेन च जीवितम्६ दति यन्त्रचि०० पी० सघउचाटनकर नाम द्वितीय यन्त्रम् ॥ २ ॥ सर्वजनोचाटनयन्त्रम् । श्रीशिव उवाच ॥ अथातः सप्रवक्ष्यामि उच्चाट सर्वदेहि- नाम् । काकोलकस्य रक्तन भूर्जपत्र लिखेन्नरः॥ १ ॥ मध्ये देवदत्तः नाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टये- ततः। चतुर्दलं ततः कुर्याद्रेखा द्वित यशोभितम् ॥२॥ यकार दलमध्ये तु विसर्गान्तं प्रति. ठितम् । पूजाक्रमस्तु पूर्वोक्तो करनेसे तीसरे दिन स्थानसे उच्चाटन होजायगा और तववक उद्विम रहेगा कि, जयवक वह प्रतिमा टंगी रहेगी न तो घर उसको प्यारा होगा और न कहीं उसको मुखप्राप्त होगा । विदेश जाने परभी उसको सुख न होगा। किन्तु संशय पूर्वक ही जीवित रहेगा ॥ १-६॥ इति यन्त्र चिन्तामणिकी आठवीं पीठिकाके उच्चाटनाधिकारमें शीघ्र उच्चाटनकारक दूसरा यंत्र ॥२॥ श्रीशिव जी बोले-अव सम्पूर्ण मनुष्योंका उच्चाटन विषय कहा जाता है। फाफ और उल्टके मधिरसे भोजपत्रके ऊपर गोलाकर यंत्रको खेंचकर पूर्वादि चारों दिशाओं में दो रेसायुक्त चार कमल दल सेंच प्रत्येक दलमें विसर्गयुक्त यकारवर्णको स्थापितकर मध्यभागमें सानुम्बार साध्यव्याक्तिके नामको लिए- यः । ७७ भाषाटीकोपेतः। ध्यानं देवविसर्जनम् ॥ ३॥ खण्डं कृत्वा तु तद्यन्त्रमुच्छि- दिनमिश्रितम् । दीयते भक्षणार्थ च वायसेभ्योऽन्तिमे दिने ॥४॥ दिशं संत्यज्य यात्येव ग्रामस्यैव तु का कथा ॥५॥ इति यं० चि० दा० सर्वजनोबोटानं नाम तृतीयं यन्त्रम् ॥ ३ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि शत्रोरुच्चाटनं परम् । निम्बपबरसैलेख्य लेखन्या काकापच्छया ॥१॥ भूर्ज- पत्रोपरिक्षितं विधिः पूर्वोक्त एव हि । मध्ये नाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेटयेत्ततमाशाचतुर्दलं ततः कुर्याद्वीजयुक्तं मनोहरम् । शत्रोरुच्चाटनयंत्रम् । रवो ह इति बीजानि दलमध्ये पृथक् पृथक्॥३॥ संपूज्य पूर्ववत्प- चानिखन्यादथ पूरयेत् । अधोमुखं तु तद्यन्नं पूर्वोक्तविधिना ततः॥४॥ देवदत्तः एवं कृते सप्तमेशति उच्चाटयति नान्यथा । भ्रमेदेशे विदेशे च तृण- वत्परिभूयते ॥ ५॥ इति श्रीयन्त्र चि. शत्रोचाटनं नाम चतुर्थयन्त्रम् ॥ ४॥ -उक्त विधिसे पूजनकर ध्यानसे विसर्जनकर यन्त्रक टुकटे २ फरके जूठे भावमें मिलाकर अन्तके दिन क उओको खिलादे तो साध्यव्यक्ति दिशाको छोडकर चला जायगा प्रामकी तो बातही क्या है ॥ १-५ ।। इति श्रीयन्त्र० उ० सर्वजनोचाटननाम तीसरा यन्त्र ॥ ३॥ श्रीशिवजी घोटे रे-अब शत्रुका परम उचाटन कहा जाता है । नीमके पत्तीक रससे भोजपत्रके ऊपर काकपंखको लेखनीसे गोलाकार घना बैंचकर दो रेखायुक्त दल लगा र वो ह इन वर्गाको प्रत्येक दलमें लिख सानुस्वार साध्य- प्यक्तिके नामको लिखे । उपरोफ यन्त्रकी समान इसका विधानभी पहेलेकी समान है। इसके पश्चात् उक्त विधान पूर्वक पूजनकर भूमि सोफर अधोभुस दावदे यदि देश अथवा विदेशमें भ्रमण करता भी होगा तोमी तृणवन् त्याग. कर सात दिन उच्चाटनको प्राप्त होगा इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं ॥ इति यन्त्रचिन्तामणिमें शबाटन नामक चौधा यन्त्र ॥४ ou रचौहूँ यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्त्रमुच्चाटनं स्त्रिया उच्चाटनयन्त्रम् । स्त्रिया गर्दभस्य तु रक्तेन लेखन्या काकपिच्छया ॥१॥ फलके च लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः। तत- श्वष्टादलं कुर्याद्वीजयुक्तं देवदत्तः मनोहरम् ॥ २॥ खकारं सविर्गान्तं ह्रींकारं तदन- न्तरम् । एवं यन्त्रं तु संलि. ख्य पूजयित्वा विधानतः ॥३॥ निसन्य भूमौ संपूर्य पूर्ववच्चाप्यधोमुखम् । कृते ह्येवं तृतीयेऽति शत्रोरुञ्चाटनं भवेत् ॥ ४ ॥ उच्चाटयात स्थानातु चलते वायुपर्णवत् ॥ ५॥ इ. य० वि० ना० म०प्र० उ० सं० अ० पी० स्त्रीणां सद्यउच्चाटनं नामपञ्चमं यन्त्रम् ॥ ५ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि त्रैलोक्योच्चाटनं परम् । कृष्णकुक्कुटरक्तेन भूर्जपत्रे लिखेन्नरः॥१॥ साध्यनाम श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! अब स्नीके उच्चाटनका यन्त्र कहा जाता है। विधि-नाधेके रुधिरसे काठके टुकडेके ऊपर काफपत्रकी लेखनीसे गोलाकार चक्र बैंचकर आठ दलसे सुशोभितकर विसर्गान्त खकार और ह्रीं बीजको प्रत्येक दलमें लिखकर चक्रके मध्यमें सानुस्वार साध्यव्यक्तिके नामको लिखे । इसके पीछे विधिपूर्वक पूजनकर भूमि खोद अधोमुख दावदे तो तीसरे दिन शत्रुका उच्चाटन होगा और उच्चाटनको प्राप्त हो पूर्ण वायुसे उडाया हुआ पत्तलके समान गमन करेगा ॥ १-५॥ इति यन्त्र चिन्तामणिकी आठवीं पीठिकाके उच्चाटनाधिकारमें स्त्रीउच्चाटन नामक पांचवां यन्त्र ।।५॥ श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! अब त्रिलोकीका उच्चाटन कहा जाता है श्रवण करोविधिःकाले मुर्गे के रुधिरसे भोजपत्रके ऊपर एक बडा त्रिकोणयन्त्र ढंचकर हो ही ही ही देवदत्त हो हो ही दो भाषाटीकोपेतः। ७२ लिखित्वा तु त्रिकोणं वेष्टयेत्ततापुनस्त्रिकोणं संलिख्य द्वितीयं त्रैलोक्योचाटनयन्त्रम् । तु वरानने ॥२॥ ततोपारे विभागे च ह्रींकाराणां चतु- ट्रयम् । एतविभागे सैलिख्य बीजानि रविसंख्यया ॥३॥ परितो वर्तुलं कृत्वा पूजयेत् पूर्ववत्पुनः। एवं कृत्वा तु त- धन्वं बधीयाच शुनो गले॥४ यथायया श्वा ब्रजति तथा सोऽपि क्षणेन हि । उन्बाटयन संदेहस्तत्क्षणात्सुरसुन्दरि॥५ प्रति यं० चि० ना० म०प्र० अ० उ० दा० त्रैलो- क्योचाटनं नाम षष्ठ यन्त्रम् ॥ ६ ॥ श्रीशिव उवाच ।। अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रमुचाटनं परम्। निशाचररसैलेख्यं भूर्जपत्रे न संशयः ॥ १॥ साध्यनाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः । उपर्यष्टदलं कृत्वा वीजयुक्तं --उसके भीवर एक दस्व त्रिकोण मार खेपफर गोलाकार पक्रसे गर्भितार हरव त्रिकोणक भीवर साध्यव्यक्ति नाम भार दीर्घत्रिकोणकी प्रतिरेसाफे भीरे पार चारही योनीको लिखे । पुनः उक्त विधानपूर्वक पूजनफर कुचके गलेमें यांध दे तो जहाँरयह कुचाजायगा यही उपादनको प्राप्त हो उसी समय शत्रुभी जायगा । हे सुन्दर ! इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है ॥१५॥ इति मन्य चिन्तामणिकी आठवी पीठिका सचाटनाधिकारमें लोपयोघाटन नामक छठा यन्त्र ॥ ६॥ श्रीशिवजी बोले-प्रय परम सचाटन यन्त्रको फहवाई | निशापर (हवी. । वृक्ष ) के रससे भोजपत्रके पर एक हस्व गोलाकार पक्रो सेंपरर उसके पाहिरी भाग अष्टदल टगाकर एक यदा गोलाकार पक्र सीप किस यसे दलादिक गर्भगत होजाय । पुनः प्रतिइसमें फट् इस योजको लिस.
८० यन्त्रचिन्तामणिः। प देवदत्तः कदा 1b मनोहरम् ॥ २॥ ततश्च लेख्यं फडिति प्रत्येक दलमध्यतः। परमोच्चाटनयन्त्रम् ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यग्वर्तुलं रेखये- कया ॥ ३॥ संपूज्य विधिवत्पश्चा- द्यन्त्रं संचूर्णयेत्ततः । खाने पाने च दातव्यमुच्चाटो जायते ध्रुवम् ॥ ४ ॥ हरिद्रातरुविख्यातो गुप्तनामा निशा चरः॥ ५॥ इति यन्त्रचिं० परमोबाटनं नाम सप्तमं यन्त्रम् ॥ ७ ॥ चिन्तामणी यन्ववरे सुकल्पे श्रीचन्द्रचूडस्य मुखाद्विनिर्गते। उच्चाटनंनाम महाधिकारे प्रकाशिता ह्यष्टमपीठिकेयम् ॥ १॥ सनैव यन्त्राणि महाधिकारे उच्चाटनं श्रीशिवभाषितेऽस्मिन् । रहस्यभूतानि तु कीर्तितानि विप्रेण दामोदरसंजकेन ॥२॥ इति यन्त्र० ना० म०प्र० ३० अ०४८ दा० अष्टम पीठिकायुतो- चाटनाधिकारः समाप्तः ॥ -हस्व गोलाकार चक्रके भीनर साध्यव्यक्ति के नामको लिख उक्त विधान पूर्वक पूजन कर यन्त्रका चूरणकर खाने पीनेमें देनेसे उच्चाटन होजाता है । हलदीके वृक्षको निशाचर कहते हैं ॥ १-५॥ इति यन्त्र चिन्तामणिकी आठवी पीठिकाके उच्चाटन अधिकारमें परमोचाटन नामक सातवाँ यन्त्र ॥ ७ ॥ श्रीचन्द्रचूड शिवजी महाराजके मुसकमलसे निकले यन्त्र श्रेष्ठ चिन्तामणि नाम मुफलका उचाटन नाम महाधिकारमें अष्टम पीठिका समाप्त हुई । इस शिवोक्त महाधिकारमें दामोदरजीने रहस्यभूत सातही उच्चाटन यन्त्रोंका वर्णन किया है ।। १-२॥ इति श्रीयन्त्राचिंतामणौ नाम्नि महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वर संवादे दामोदर पण्डितोद्भुते बलदेव प्रसादकृत भा० टी० युत अष्टमपीठिका उचाटनाधिकार समान ।
है . भाषाटीकोपेतः। अथ शान्त्यधिकारः। यः पूर्व जनकादेशादरण्यं समपद्यत । निस्तीर्य प्राप्तवान् सीतां तं रामं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥१॥ अधिकारं महद्वक्ष्ये सर्वो- पद्रवनाशनम् । नवम्यां पीठिकायां तु शान्तिपुष्टिकरं परम् ॥२॥ शान्तरक्षाकरं नाम ख्यातं सर्वत्र दुर्लभम् । न देयं यस्य कस्यापि यदीच्छेसिद्धिमात्मनःशानारीणां मनुजेषु शान्ति- ककरान्नक्षाकरान्सर्वदा बालानां च तथैव सर्वसुखदान्मंत्राणि यन्त्राणि ते।तांचोवृत्य महागमाञ्च विविधान् गङ्गाधरस्यात्म- जो नित्यं कलप्तमातः प्रवक्ष्यति महादामोदरः साम्मतम्॥४॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि परं गुह्यं यन्त्र रक्षाकरं परम् । बालखीपुरुषाणां च महारक्षाकरं स्मृतम् ॥ १॥ कांस्यपात्रे तु संलेख्यं सुतियो शोभने दिने । रोचनाकुडुमेनैव कर्परेण विशेषतः ॥२॥ मगनाभिसमायुक्तं जातीकाष्ठेन संलिखेत् । ऊर्ध्वमष्टाभोरेखाभिस्तिर्यग्रेखास्तथैव च ॥ ३॥ एवमेकोनप- चाशत कोष्ठाश्च प्रभवन्ति हि । ईशानादिक्रमेणेव स्वरा: कोष्ठेषु संलिखेत् ॥ ४ ॥ तेनैवं क्रमतो लेन्याः शेषकोठेषु जो श्रीरामजी महाराज जनक (पिता) की प्रविशाको पूर्णकर श्रीसीताजीको प्राप्त करते भये, मैं उन श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार करताहूँ॥१॥भय नववीं पीठिका कही जाती है कि जिसमें शांति पुष्टिकारक सम्पूर्ण उपद्रोंका नाशक महाधिकार कहा जायगा॥२॥सिद्धिका इच्छा करनेवाला साधक सर्वत्र दुर्लभ इस शांतरक्षाकरनामयंत्रको विना अधिकारीके दूसरेयोन देशामय स्त्री पुरुष पालक इनकी शांति रक्षा और पल इत्यादिफके देनेवाले मन्त्र व्या यन्दको उद्धारकर प्रतिनिर्मटयुद्धिवाले गंगापरजांके पुत्र दामोदरजी वर्णन करते हैं। शिवजी पोले-हे देवि! पाल, वृद्ध, सी पुरुष इनमें महारभाकारक यन्त्रको कहता हूँ मुनो । विपान-शुभदिन और शुभ विधिमै गोरोचन, कुंकुम, कपूर, फसूरी इन सम यस्लुमोको एसप्रितकर पमेटीमी फलमगे कासारे पापा | पर आठ सम्बी और आठ पोदी रेग्में गैपर?९ फोटो पत्रको निर्माग कर प्रत्येक रेस्गके मुरको निधनसेः युगकारक पूर्व एभिममार्गमें साल २ में वीज लिसार शिनगरसे देर मनिरेगा में मारादि स्वरयुक्त व्यसन मनाको नानुसार भरदे । इसके पीछे देत त्या टाल यमन, मारनी, जो यन्त्रचिन्तामणिः। व्यञ्जनाः । एवं संलिख्य बीजानि त्रिशूलानि लिखेत्ततः ॥५॥ शान्तिपौष्टिकयन्त्रम्। क्रौंकों की माँ कौं| क्रोनी अं भाई ई उं दं ये बं घं पं धं । दं गं अं) औं ओं क्रॉकी की क्रौंकों की की प्रतिरेखोपरि नूनं चतुर्दिक्षु क्रमाल्लिखेत् । क्रोंकाराः सप्त संलेख्याः पूर्वपतो तु पश्चिमे ॥६॥ एवं संलिख्य तद्यन्त्रं पूजयेद्भक्तिभावतः । पुण्डरीके सिताम्भोजे शतपत्रैर्मनोहरे ॥७॥ मालतीयूधिकाभिश्च केतकर्मल्लिकैस्तथा । बकुलेश्च यथालाभं फलैः कालोद्भवैः शुभैः ॥ ८॥निर्गन्धं रक्तवर्ण च पुष्पं यत्नेन वर्जयेत् । सकपुरैश्च ताम्बूलेधूपैर्दीपः सिताम्बर ॥९॥ दिनवयं तु सम्पूज्य नेवेद्योर्विविधैः प्रिये । जपेत्सप्त- शती नित्यं ब्राह्मणांस्तु दिनत्रयम् ॥ १०॥ संभोज्य पायसे- नैव गोप्टेन एतेन दु । त्रिदिनं भूमिशायी स्थादोजनाहन्धः केतकी, चमेली यथालाभ वकुल, ऋतुफल, कर्पयुक्त तांबूल, धूप, दीप, गंध, श्वेतवस्र, नैवेद्य इत्यादिकोंसे यन्त्रेश्वरका पूजनकर ब्राह्मणद्वारा सप्तशतीका जाप कराता हुआ पायस घृत इनसे यथेष्ट ब्राह्मणों को तीन दिनतक भोजनकरा भूमिमें भाषाटीकोपेतः। रोचनाम् ।। ११ ।। उदृत्य गुटिका कुर्यात्रिलोहर्वेष्टयेत्ततः । तच्छेषं चैव पातव्यं पानीयेन वरानने ॥ १२ ॥ परस्प जायते क्षोभो विद्यया चे नियोजितः । गुटिकां धारयेदेखि बाहुमूले. गलेऽथवा ॥ १३॥ धारणात्तस्य यन्त्रस्य उपसर्गः प्रशाम्यति। अलक्ष्मीः कलहश्चैव दोर्भाग्यं चविशेषतः॥१४॥ यत्परेण कृतं किंचित्तत्सर्वच प्रणश्यति । शान्तिकं पौष्टिकं नाम देवाना- मपि दुर्लभम्।प्रथम यन्त्रराजाख्यं सद्यः प्रत्ययकारकम् ।।१५।। इति यंत्र० शान्त्यधिकारे शान्तिक पौष्टिकं नाम प्रथम यन्त्रम् ॥१॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्त्र चारिनिवा- सर्पादिभयनाशनयंत्रम् । रणम्। सर्पव्याघ्रभयं नास्ति यन्त्रे करतले स्थिते ॥ १ ॥ पूर्वोक्तो लेखनविधिद्रव्यं पूर्वोक्तमेव च । सर्वत्र शान्तिके देवि विधि- रन्यो न विद्यते ॥ २ ॥ पूजनं चापि पूर्वोक्त नियमश्चापि तादृशः । भूर्जपत्रे तु संलेख्य द्वितीयं यन्त्रमुत्तमम् ॥३॥ ह्रींकारगर्भमध्ये तु साध्यनाम लिखेन्नरः । तत्तत्पादे तु संयोज्य मकार तदनन्तरम् ॥ ४॥ लकारं शयन पूर्वक पर्ने । फिर भोजन से गंध, रोचनको निकालकर गुटिका धना त्रिलोके तापीजमें पंदकर गले अथवा याहुमूलमें धारण करे। हे वरानने ! शेपभागको पानी में मिलाकर पीवे, इस यन्त्रक धारण करनेसे शत्रुको क्षोभ होगा और उपद्रव, दारिद्र, छेस, दर्भाग्य अथवा अन्यकृत अभियारा- दिका सम्पूर्ण दोप शांत होजायगा । शांतिक पौष्टिक नाग देवताओंको भी दुर्लभ आदिभून यह यन्नराज शीघ्र विधासदायक है ॥ १-१५ ॥ इति यन्त्र शान्तिपोष्टिक नामक पहला यन्त्र ॥१॥ श्रीशिवजी योले-दे देवि ! भय अरिनिवारण यन्त्रको कहा है. प्राण परो। इस यन्त्रको पास रसनेसे सर्व व्याघ्र इत्यादिकोंका भय न होगा। इसके लेखन म्यभी पूर्वोक है। हे देवि ! सम्पूर्ण शान्तिक विग्योंकी एकही विधि है दूसरी नहीं, पूढेरक कयन के अनुसारही पूजन तथा नियमही किया है। भोजपत्रके ऊपर पतुष्कोण यन्त्रको सिकारीबीगी: मात्रा भीवर ल व। व ।
यन्त्रचिन्तामणिः। च वकारं चायकारान्तं प्रतिष्ठितम् । उकारस्वरसंयुक्तं शान्ति- बीजं मनोहरम् ॥ ५ ॥ ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक चतुष्कोणं द्विरे- खया । त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा वाहुमूले गलेऽथवा ॥ ६॥ सर्प- व्याघ्रभयं हन्ति हन्ति चौरभयं तथा । विविधोपद्रवं हन्ति नात्र कार्या विचारणा ।।७।। इति यंत्रचि० ना० म०प्र० उ० न० शा० दा० सर्पव्याघ्र- चौरभयनाशनं नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥ २॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्नं दोर्भाग्य- नाशनम् । नारीणां च विशेषेण नराणां चैव लेबने तु विधिः प्रोक्तो द्रव्यं पूर्वोक्तमेव च । लेखनी पूर्वनि- र्दिष्टा भूर्जपत्रे लिखेनरः ॥२॥ साध्यनाम लिखित्वा तु त्रिकोणं तु द्विरेखया । तस्योपरि चतुष्कोणं रेखाद्वितयशो- भितम् ॥ ३॥ कोणे कोणे त्रिशले तु पूर्वोक्तविधिना ततः । त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा बाहुमले गलेऽथवा ॥ ४ ॥ धारयेद्विधि- --साध्यव्यनिके नामको लिखे और ह्रींचीज के पारमें मकार, टकार, चकार, यफार उकारकोभी मिलाकर त्रिलोह वेष्टितकर पाहुमूल अथवा गले में धारण करे तो सर्प, व्यान, चोर इत्यादिकोंका भय न होगा। अधिक क्या? अनेक प्रकारके उपद्रव शान्त होजायेंगे ॥ १-७ ।। इति यन्त्रचिन्ताम० नवमीं पीठिकाके २० मि० भा० टी० शान्तिअधि- फारमें सर्प-व्याघ्र चौर-भयनिवारण नामक दूसरा यन्त्र ॥२॥ श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! नारी तथा नरों को विशेषतासे दार्भाग्यताके नाश करनेवाले यन्त्रों को कहता है । लेखनविधि पूर्वोक्तही होने योग्य है, यधा-चमटीकी लेसनीमे भोजपत्रके ऊपर दो रसायाले त्रिकोणयन्त्रको संच. कर उसके यहिभागमें दो रेसायुक्त चतुष्कोणयन्त्र मैंचकर प्रतिरेखाको त्रिशूलसे मिश्रित करे,तत्पधान त्रिकोणके भीतर साध्यन्यक्तिके नामको लिस रतनिधिसे पूजनकर त्रिलोदके वायोजमें रखकर उपरोक्त विधिसे नारी भाषाटीकोपेतः। वन्यागर्भधारणयन्त्रम् । देवदत्तः वत्पूर्व नारी वा पुरुपोऽथवा । विविधोपद्रवं हन्ति वध्या गर्भ- वती भवेत् ।।५।। सौभाग्यमतुलं प्राप्य देववन्मोदते सदा॥६॥ इति श्रीयन्त्रवि. ना. म० प्र०३० नवमपी० शान्त्य. सौभाग्यजननं वन्ध्यागर्भधारण नाम तृतीय यन्त्रम् ॥ ३ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अयातः संप्रवक्ष्यामि ज्वरनिर्नाशनं परम्। भूतजं तु ज्वरं हन्ति विद्यते वैद्यकोदितम्॥१॥वालानां -अथवा पुरुष धारण फर तो अनेकप्रकारके उपद्रव शांत होंग, बंध्या खो गर्भवती होगी। अनेक प्रकारके सौमाग्यको प्राप्त होकर सदा देवताको समान सुरसको प्राप्त होंगे ॥ १-६॥ इति यन्त्रचिन्तामणिकी नववीं पीठिकाके १० मि० भा० टी० शान्ति- अधिकारमें सौभाग्यजनन पन्ध्यागर्भधारण नामक तीसरा यन्त्र ॥॥ श्रीशिवजी पोले-मय परके नासकरनेका यन्त्र काहना है, यह वैद्यकशास्त्रमें कहा हुआ यन्त्रराज भूतमा घरको नाराकरताहै। इस यन्त्रराज पाल.
॥१॥ 4 ८४ यन्त्रचिन्तामणिः। च वकारं च यकारान्तं प्रतिष्ठितम् । ऊकारस्वरसंयुक्तं शान्ति- बीजं मनोहरम् ॥ ५ ॥ ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक् चतुष्कोणं द्विरे- खया। त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा वाहुमूले गलेऽथवा ॥ ६ ॥ सर्प- व्याघ्रभयं हन्ति हन्ति चौरभयं तथा । विविधोपद्रवं हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥७॥ इति यंत्रचि० ना० म०प्र० २० न० शा० दा० सर्पव्याघ्र- चौरभयनाशनं नाम द्वितीयं यन्त्रम् ॥ २॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्त्रं दीर्भाग्य- नाशनम् । नारीणां च विशेषेण नराणां चैव लेखने तु विधिः प्रोक्तो द्रव्यं पूर्वोक्तमेव च । लेखनी पूर्वनि- र्दिष्टा भूर्जपत्रे लिखेन्नरः ॥२॥ साध्यनाम लिखित्वा तु त्रिकोणं तु द्विरेखया । तस्योपरि चतुकोणं रेखाद्वितयशो- भितम् ॥ ३॥ कोणे कोणे त्रिशूले तु पूर्वोक्तविधिना ततः । त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा याहुमूले गलेऽथवा ॥ ४ ॥धारयेद्विधि- साध्यव्यक्ति के नामको लिखे और ह्रीबीजके पादमें मकार, लकार, वकार, यकार उकारकोभी मिलाकर त्रिलोह वेष्टितकर बाहुमूल अथवा गलेमें धारण करे तो सर्प, व्याघ, चोर इत्यादिकोंका भय न होगा। अधिक क्या? अनेक प्रकारके उपद्रव शान्त होजायँगे ।। १-७॥ इति यन्त्रचिन्ताम० नवमीं पीठिकाके व० मि० भा० टी० शान्तिअधि- कारमें सर्प-व्याघ्र चौर-भयनिवारण नामक दूसरा यन्त्र ॥२॥ श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! नारी तथा नरों की विशेषतासे दीर्भाग्यताके नाश करनेवाले यन्त्रोंको कहता हूं । लेखनविधि पूक्तिही होने योग्य है, यथा-चमेलीकी लेखनीसे भोजपत्रके उपर दो रेखावाले त्रिकोणयन्त्रको खंच. कर उसके यहि गमें दो रेखायुक्त चतुष्कोणयन्त्र बँचकर प्रतिरेखाको त्रिशूलसे मिश्रित करे,तत्पश्चात् त्रिकोणके भीतर साध्यव्यक्तिक नामको लिख उक्तनिधिसे पूजनकर त्रिलोहके ताबीजमें रखकर उपरोक्त विधिसे नारी भाषाटीकोपेतः। वध्यागर्भधारणयन्त्रम् । देवदत्तः y वत्पूर्व नारी वा पुरुषोऽथवा । विविधोपद्रवं हन्ति वन्ध्या गर्भ- वती भवेत् ॥५॥ सौभाग्यमतुलं प्राप्यदेववन्मोदते सदा॥६॥ इति श्रीयन्त्रचि ० ना० म०प्र० उ० नवमपी० शान्त्य० सौमाग्यजननं वन्ध्यागर्भधारण नाम तृतीय यन्त्रम् ॥ ३ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अयातः संप्रवक्ष्यामि ज्वरनिर्नाशनं परम्। भूतजं तु ज्वरं हन्ति विद्यते वैद्यकोदितम्॥१॥बालानां -अथवा पुरुष धारण करे तो अनेकप्रकारके उपद्रव शांत होंगे, वंध्या स्त्री गर्भवती होगी। अनेक प्रकारके सौभाग्यको प्राप्त होकर सदा देवताकी समान सुखको प्राप्त होंगे ॥ १-६॥ इति यन्त्रचिन्तामणिकी नववीं पीठिकाके २० मि० मा० टी० शान्ति- अधिकारमें सौभाग्यजनन वन्ध्यागर्भधारण नामक तीसरा यन्त्र ॥ ३॥ श्रीशिवजी योले-अय अरके नाशकरनेका यन्त्र कहता हूं, यह वैद्याशाखमें का हुआ यन्त्रराज भूतमात्रके चरको नाश करताहै । इस यन्त्रराजका बाल.
र F र र र र T यन्त्रचिन्तामणिः। ज्वरनाशनयत्रम् । तु सदाकार्य यन्त्रं वैज्वर- शान्तये । उन्मत्तस्य रसे लेख्यं कर्पटे इमशानके ॥२॥ कृष्णाष्टम्यां चतुर्द- देवदत्तः र श्या संपूज्य निखनेत्ततः। श्मशाने तु दिवैवस्यान्नि- राहारेण मानवः॥३॥चतु. कोणोपरि चतुर्भवेदष्टदलं तथामध्ये नाम लिखित्वा तु रकारस्य तु संपुटे॥४॥ दलमध्येऽन्तराले तु रकारं संप्रतिष्ठितम् । एवं विंशतिरेफाः स्युः सर्वं तत्र क्रमेण तु ॥५॥ संपूर्य भूमी संपूज्य बलिपुप्पे- मनोहरैः । तत्क्षणाद्याति भृतं तु ज्वररूपं तु दारुणम् ॥६॥ दति यत्रचिन्तामणी ज्वरनाशनं नाम चतुर्थ यन्त्रम् ॥ ४ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि बालानां शान्ति- कारकम् । यन्त्र रक्षाकरं श्रेष्ठं सर्वोपद्रवनाशनम॥१॥पूर्वोक्त- कोफे ज्वरमांतिके अर्थ अवश्य प्रयोग करना चाहिये । विधान-धतूरेके रससे मशाना बनके ऊपर चतुकोणचा संघकर कोण निकाल दूमरा चतुः कोण उसके ऊपर और लिस भीतर साध्यव्यक्तिक नामको चार रकार वांस वेष्टितकर लिखे और प्रतिकोणके भीतर वधा याहर एक एक रकार वर्ण लिसे इस प्रकार सब २० रकार होने योग्य हैं। फिर मनोहर चलि पुष्प इत्यादिकोंसे पूजनफर उपवासयुक्त हो कृष्णपश्चकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको दिनके समय पूजनकर गाड दो तो उसी समय पालकोंका जर दूर होजायगा१-६॥ दति यंत्रचिन्तामणिकी नववीं पीठिका ५० मि. मा० टी० शान्ति अधिकारमें ज्वरनाशक नामक चोथा यन्त्र ॥४॥ श्रीशिवजी पोले-अय वालफोकी शांति करनेवाले तथा रक्षा करनेवाले अनेक रोगों के शान्त परनेवाले यात्राको बहता ई । उक्त द्रव्योंसे विधामके . भाषाटीकोपेतः। बालरक्षाकरयन्त्रम् । विधिना लेख्य द्रव्यैः पूर्वोदितैःक्रमात् । भूर्जपत्रोपरि देवि पूर्वोक्तविधिनाऽर्चनम् ॥२॥ मध्ये नाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः । ततश्चाष्टदलं कुर्याद्वीज- युक्तं मनोहरम् ॥ ३ ॥ सकारान्सविसर्गा- तान्दले प्रत्येकशो न्यसेत् । सम्पूज्य विधिवत्पश्चाद्वाहुमूले गलेऽथवा ॥४॥ धारयद्यन्त्ररोज तु लोहत्रितयवेष्टितमाशाकिन्यो वाऽथ डाकि- न्यो वालग्रहास्तथापरे ॥ ५॥ गच्छन्ति बालकं मुक्त्वा यन्त्र- राजस्य धारणात् ॥ ६॥ देशदत्तः इति श्रीयन्त्रचि. ना. म. प्र. उ० न० शा० दा. बालरक्षाकरं नाम पश्चर्म यन्त्रम् ॥५॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि तृतीयज्वरनाश- नम् । पूर्वोक्तविधिना लेख्यं भूर्जपत्रे सुशोभने ॥१॥ साध्य- -समान भोजपत्रके ऊपर एक गोलाकार चत्र बैंचकर अष्टदल लगा प्रत्येक. इसमें विसर्गान्त सकारको लिख बीच बालकनामको लिख तत्पश्चात् त्रिलो. एके तापीजमें रखकर विधानपूर्वक पूजनकर भुजा अथवा गलेमें माँघ दे, तो राफिनी, नाकिनी, यालाह इत्यादि घाटकोंको छोड़कर चले जायेंग॥१-६॥ इति यन्त्रचिन्तामणि वलदेवप्रसादमिप्रकृतभाषादीकासाहत बालरक्षाकारक पाँचवां यत्र 411 . श्रीशिवजी पोले-अब यीसरा मरनाशक यन्त्र कहता हूं। विधान-उका शियानपूर्वक भोजपनों पर त्रिकोणमित त्रिकोणयन्त्रको संचकर मध्य- ८८ यन्त्रचिन्तामणिः । यः यः यः यः यः यः यः यः यः यः यः या य: तृतीयज्वरनाशनयन्त्रम् । नाम लिखित्वा तु यकारस्य तु सम्पुटे । त्रिकोणं वेष्टयित्वा तु न्यसेदीजानि चोपरि ॥२॥ य: देवदत्तः यः एवं संलिख्य संपूज्य बनीया- दक्षिणे करे । यकाराः सवि- सर्गान्ताश्चत्वारश्च पृथक पृथक् ॥ ३ ॥ त्रिषु भागेषु संलेख्यात्रिकोणेतु तथोपरि। ज्वरवेलासु तत्कार्य बल्यर्थ दधिभक्तकम् ॥ ४॥ बालो वा अथवा वृद्धो ज्वरान्मु- च्येत तत्क्षणात् ॥ ५॥ इति श्रीयन्त्रचिं० तृतीयज्वरनाशनं नाम पठे यन्त्रम् ॥ ६ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि वेलाज्वरविनाश- नम् । पूर्वोक्तविधिना लेख्यं द्रव्यैः पूर्वोदितैः क्रमात ॥१॥ भूर्जपत्रे तु संलेख्यं पूजयित्वा विधानतःमध्ये नाम लिखित्वा नु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः ॥२ ॥ ऊर्ध्वाधो ह्यग्रतः पृष्ठे वकारस्य तु संपुटम् । ततश्चाष्टदलं कुर्याद्वीजयुक्तं तु सर्वतः ॥३॥ प्रत्येकं दलमध्ये तु नकार बिन्दुभूषितम् । दलान्तरे तु ही- -भाग, यकार पुटित वालकके नामको लिखकर प्रतिरेखाके नीचे चार चार यकार वर्ण लिखकर दही भातकी बलि दे । वालक अथवा वृद्ध अपने दहिने हाथमें घधिंगे तो निश्चय ही उसी समय ज्वरसे छूट जायंगे ।। १-५ ॥ इति यन्त्रचिन्तामणिकी नववी पीठिकाक घ० मि. भापाटीका शान्ति- आधिकारमें तीसरा वरनाशक नामक छठा यन्त्र ॥६॥ श्रीशिवजी बोले-अय • समय याँधकर आनेवाले घरको शांत करनेवाले यन्त्रको कहता हूं । उक्त द्रव्योंसे उक्त विधानपूर्वक भोजपत्रके ऊपर गोलाकार पक खेंच आठ दल लगाकर अनुम्वारयुक्त साध्यव्यक्ति के नामको लिखकर चारों ओर विसर्गान्त चारबकारोंको लिख प्रतिदलके भीतर नं धीजोंको और G भाषाटीकोपेतः। कारानष्टौ सर्वत्र विन्यसेत् ॥ ४॥ एवं संलिख्य संपूज्य शीत- तोये विनिक्षिपेत् । मुच्यते विदिनाद्रोगी ज्वरद्वन्द्वान्न संशयः ज्वरशमनयन्त्रम् । प्र. ह्रीं ही म. नं ही . नं वः देवदत्तः व ह्री व: हीं ह्रीं ॥५॥ उप्णोदके तु संक्षिप्तं ज्वरं शीतं विनाशयेत् । हस्तमूले तु तद्वद्धं ज्वरं वेलासमुद्भवम् ॥ ६॥ नाशयेन्नात्र संदेहो भूतजं सुरसुन्दार ॥७॥ इति यन्त्रधि० वरशमनं नाम सतम यन्त्रम् ॥ ७ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि बालानां रक्षणं सदा । यन्त्र ज्वलनरक्षारख्यमायुर्वृद्धिकरं परम् ॥१॥ पूर्वोक्त- -भाहर हीयोजोंको लिखे, फिर विधानपूर्वक पूजनकर ठंडे पानी में डालदे तो रोगी धन्द्वज ज्वरसे तीन दिनमें मुक्त होजायगा। इसमें किसी प्रकारकामी संदेह नहीं है। हे मुन्दार! यदि हाथमें बाँधलिया जाय तो भूतसे पैदा हुआ ज्वर तत्क्षण दूर होजायगा ॥१-७॥ इति यन्त्रचिन्तामणिककी नवी पीठिकाफे य० मि० भा० शान्ति. अधिकारमें वरशमन नाशक सातवा यन्त्र ॥७॥ श्रीशिवजी बोले-अय सदा पालकोंकी रक्षा वथा आयु वृद्धि करनेगले ज्वलन रक्षा नामयाले यन्त्रको कहता हूं। विधानपूर्वक फहए द्रव्योंसे भोज-
९
०
यन्त्रचिन्तामणिः।
वालानां ज्वरादिस्तम्भनयंत्रम् ।
SU
देवदत्तः
विधिना लेख्यं द्रव्यः, पूर्वोदितैः शुभैः । भूर्जपत्रे तु संलेख्यं
साध्यनाम तु मध्यनः ॥२॥ ततस्तद्वेष्टयेत्सम्यक् चतुष्कोणं
तु रेखया । तस्योपरि चतुष्कोणं त्रिशूलं कोणतो लिखेत् ॥३॥
कोणान्तरे लिखेडीज चकारं बिन्दुभूषितम् । उपर्यधोऽन्तराले
तु ह्रींकारं विलिखेदुधः॥ ४॥ एवं संलिख्य तद्यन्त्रं पूजयित्वा
विधानतः । त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा वधीयात्कण्ठमध्यतः॥५॥
ये चोपसर्गताः केचिद्रोगाः शारीरमानसाः। ईर्ष्या कोपस्तथा
दोपो दन्तानां संभवः पुनः ॥६॥ न बाधते बालकस्य
स्तन्यदोषः कदाचन ॥७॥
इति श्रीयंत्र बालानां ज्वरादिस्तम्भनंदन्तरोगादिकृत्रिमोपद्रवनाशनमष्टम यंत्रम् ।।
-पत्रके ऊपर दो रेखावाले चतुष्कोणयन्त्रको बँचकर प्रत्येक कोणमें त्रिशूल लिस
पूर्वादि चारों दिशाओमें ही चं इन चीजोंको लिसकर वीचमें सानुस्वार साध्य-
व्यक्तिके नामको लिखे, फिर उक्त विधानसे पूजनकर त्रिलोहके तावीजमें
वन्दकर गलेमें यांध दे तो उपसर्गजरोग, शारीरक रोग, मानसिकरोग, ईर्षा,
क्रोध, दांतोंका रोग, स्तनरोग इत्यादि कभी बालकको वाधा न देंगे ॥१-७॥
इति यन्त्रधि० नवमीं पीठिकमि भाण्टीशान्ति अधिःमें ज्वरादि-
स्तंभनदंतरोगादिकृत्रिमोपद्रवनागननामक आठवां यन्त्र ॥८॥
देवदत्तः
भाषाटीकोपेतः।
श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि मृतापस्मारना.
शनम् । शाकिनीभूतवेतालहीतोऽपि सुदारुणः॥१॥ तदा
बालदोषनाशनयंत्रम् । तन्मोहनार्थाय कुर्याद्यन्वं
मनोहरम्। स्वस्थस्य तु प्रा-
वीत स तु दोषैर्न बाध्यते
॥२॥ द्रव्यैः पूर्वोदितैलेंव्यं
पूर्वोक्तविधिना ततः । मध्ये
नाम लिखित्वा तु भूर्जपत्रे
वरानने ॥ ३॥ वर्तुलं वेष्टय
संलेख्यं तस्योपरि दलाष्ट-
कम् । हींकारं दलमध्ये तु प्रत्येक विलिखेत्पुनः ॥ ४ ॥ एवं
संलिख्य संपूज्य लोहत्रितयवेष्टितम् । सुवर्ण रजतं तानं
त्रिलोहं परिचक्षते ॥ ५॥ बालानां गलके धार्य यन्त्रं त्रैपुरभै-
रवम् । मुच्यते बालको रोगादपस्माराद्वरानने ॥६॥
इति श्रीयन्त्रचिन्तामणौ नाम्नि म० प्र० उ० न० शा० बालाना
दोषनाशन नाम नवम यन्त्रम् ॥९॥
S
श्रीशिवजी बोले-अब मूत तथा मृगीरोगके नाश करनेवाले यन्त्रको
कहता हूं, इस यन्त्रका प्रयोग उस समय करना चाहिये कि, जिस समय
बालक शाकिनी भूत वेताल इत्यादिकोंसे पीडित हो। यदि स्वस्थवालकके
ऊपर इस यन्त्रराजका प्रथमही प्रयोग करदिया जाय तो कदापि दोपमसित
न हो । पूर्वोक्त पूजादि विधानसे भोजपत्रके ऊपर एक गोलाकार चक्र बैंप
उसके चाहर आठ दल लगाकर प्रत्येक दलमें ही बीज और मध्यभागमें
साध्यन्यति नामको लिखे । फिर पूजनकर त्रिलोहके ताबीजमें बन्द करके
चालकके गलेमें योधदे तो बालक अपस्मारादिरोगोंसे मुक्त होकर सुख पावे।
सोना, चांदी,तांवा इनको मिलोह कहते हैं, इस यन्त्रका त्रिपुरभैरव नाम है १-६
इति यन्त्रचिन्तामणिको नयी पीठिकाके २० मि० भा० टी० शान्ति
अधिकार में बालदापनाशक त्रिपुरभैरवनामक नीवाँ यन्त्र ॥९॥
९२
यन्त्रचिन्तामाणिः।
हमः
2
श्रीशिव उवाच||अथातः संप्रवक्ष्यामि सत्संरक्षणं परम् ।
सादिभिर्यथा बालः प्रौढो वापि विशेषतः।।१।।न दंश्यते यथा
सर्पस्तंभनयत्रम् । देवि प्रमादाद्वद्विशान्त-
यः। पूर्वोक्तविधिनालेख्यं
पूजयित्वा विधानतः॥२॥
मध्ये नाम लिखित्वा तु
वर्तुलं तु द्विरेखया। संवे-
देवदत्तः ष्ट्य च दलान्यष्टौ हंसपी-
जान् पृथक् पृथक् ॥ ३॥
त्रिलोहवेष्टितंकृत्वाबाहु
मूले तु धारयेत् । नश्यन्ति
दर्शनात्तस्य दन्दशूका-
श्चतुर्दिशम्॥४||प्रमादात्पतिते पादे तिष्ठन्ति स्तम्भिताध्वम् ।
अथ दष्टः प्रमादेन विषं नैवाऽधिरोहति ॥ ५॥ सर्पाणां
स्तम्भनार्थाय यन्त्र गरुडभाषितम् ॥ ६॥
इति श्रीयन्त्र० सर्पस्तम्मन नाम दशमं यन्त्रम् ।। १० ॥
श्रीशिवजी बोल-अभ सर्पसे रक्षा करनेवाले यन्त्रको कहता हूँ, जैसे कि
सपीदि हिंसकजीव शाल अथवा तरुणादिकोंका कुछ विचार नहीं करते हैं,
इसी प्रकार अग्निशांतिमें भी कुछ विचार नहीं है । विधान-पूर्वोक्त विधान-
पूर्वक भोजपत्रके ऊपर दो रेखावाले गोलाकार चक्रको बैंचकर अष्टदल
मिश्रित कर हं सः इन घांजोंको प्रतिदलमें लिख कर मध्यभागमें सानुस्वार
साध्यव्यक्ति के नामको लिख, पूजनादि क्रियाकर त्रिलोहके ताबीज बन्दकर
धारण करें तो दर्शनमात्रहीसे मच्छरादिकोंका चारों दिशाओं में नाश होजा-
यगा,यदि सादिके ऊपर प्रमादसे पर पडभी जाय तौभी स्तम्भित रहेंगे किंतु
देशनादिक्रिया कुछभी न करसकेंगे अथवा काटभी लेंगे तो उनका विय न
चढेगा।इस यन्त्रको सपोक स्तम्भनके लिये श्रीगरुडजीने प्रकाश किया है१-६
इति यन्त्रचिन्तामणिकी नयी पीठिकाके प०मि० भा० टी० शान्ति.
अधिकारमें सर्पस्तंभन नामक दसवां यन्त्र ॥१०॥
भाषाटीकोपेतः।
श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि डाकिनीवासन
परम् । भूतप्रेतपिशाचाद्यै किनीब्रह्मराक्षसैशायदा यस्तो
नरः कोऽपि नारी वा बालकोऽपि वा । तदा यन्त्रं प्रकुर्वीत
बासाथ भूतरक्षसाम् ॥ २॥ खडिकया लिखित्वा तु खरे
भूतत्रासनयन्त्रम् । नूतने शुभे । चतस्रास्तिर्यगारेखा
ऊध्र्वास्ताः पञ्चरेखिकाः॥३॥ एवं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं
भवन्ति कोष्ठानां द्वादशैव वरानने।
ह्रीं
ही होकारं प्रतिकोष्ट तु विलिख्याथ
प्रपूजयेत् ॥ ४ ॥ बलिपुप्पोपहारेश्व
ह्रीं
ततो धूल्या प्रपूरयेत् । संस्थाप्य
चानेरुपरि ज्वालयेत् खदिरानलैः ॥५॥ रुदन्तं च महा-
भूतं वेपमानं पलायते । तत्क्षणाद्वालकं त्यक्त्वा देशत्यागेन
गच्छति ॥६॥
इति श्रीयन्त्रचि ना. म. प्र. उ० न० पी० दा० भूतत्रासने
नामैकादर्श यन्त्रम् ॥ ११॥
हीं
श्रीशिवजी बोले अव डाकिनियोंको त्रास देनेवाले यन्त्रको कहता हूं। इस
यन्त्रका प्रयोग उस समय करे कि जिस समय पालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुप भूत,
प्रेत, पिशाचादिकोंसे प्रसित हों तब उनके त्रासके लिये यन्त्रका प्रयोगकरै ।।
विधान-नये खप्पडके उपर खड़िया मिट्टीस द्वादश कोष्ठक यन्त्रको लिख प्रत्येक
कोछमें ही बीजोंको लिखे, फिर बलि पुष्प इत्यादिकोंसे यन्त्रका पूजनकर
धूलिसे पूर्णकर अमिमें रखकर खैरफी आगसे प्रज्वलित करे तो भूतादिक रोते
और कॉपते हुए बालकादिकोको छोडकर भाग जायंगे और उस देशमेंमी.
घास नहीं करेंगे विशेष तो कहनाही क्या है ॥ १-६॥
इति यन्त्रचिन्तामणिकी नववीं पोठिकाके बलदेवप्रसादकृतभाव्युत
शान्ति अधिकारमें भूतनासन नामक ग्यारहवां यन्त्र ॥ ११ ॥
'ॐ यन्त्रचिन्तामाणिः। श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि ज्वरनाशनं परम् । निशाचररसेनव लिखितं यन्त्रमुत्तमम् ॥१॥ ताम्बूल- एकान्तरज्वरनाशनयन्त्रम् । पत्रे संलेख्यं बर्खरस्य तु ही कण्टकैः। साध्यनाम लिखि- त्वा तु क्रोंकारपुटितं शुभम् ॥२॥ षटकोणमण्डलं मध्ये प, प्रत्येकं प्रणवं लिखेत। कोणो- परि तुह्रींकारं सर्वतो विलि- को देवदत्तः क्रौं खेत्क्रमात् ॥ ३ ॥ ताम्बूलं क्षणार्थ च पूजयित्वा प्रदी- यते । यन्त्रस्य भक्षणादेवि *ज्वरो याति न संशयः॥४॥ एकान्तरं क्षणेनैव नात्र कार्या विचारणा ॥५॥ इति यन्त्रचि० ना० म०प्र० उ० न० पी० शा० दा० एकान्तर- ज्वरनाशनं नाम द्वादशं यन्त्रम् ॥ १२ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि गर्भरक्षाकरं परम् । हस्तिमदेन संलेख्यं भूर्जपत्रे सुशोभने ॥ १ ॥ मध्ये नाम 0 श्रीशिवजी बोले- अब ज्वरनाशक यंत्रको कहता हूं। हलदीके रससे पानके ऊपर ववूलके कॉटेसे षट्कोण यंत्रको लिख प्रत्येक कोणके भीतर भोकारको लिख ऊपरके तीनों कोनोंमें ह्रीं बीजको लिख बीचमे को वीजसे पुटित साध्य. व्यक्तिक नामको लिखे । फिर ताम्बूलका पूजनकर रोगीको खवादे तो हे देवि! एकांतर ज्वर क्षणमात्रमें नाश होजायगा, इसमें कुछ विचार नहीं है ॥१-५।। इति यंत्रचिंतामणिकी नववीं पीठिकाके शांति अधिकारमें एकांतर. ज्वरनाशन नामक वारहवां यंत्र॥ १२ ॥ श्रीशिवजी बोले-अब गर्भरक्षा कारक यंत्रको कहता हूं। हे सुशोभने ! हाधीके मदसे भोजपत्रके ऊपर चतुष्कोणयंत्र बँचकर चारों दिशाओंमें भाषाटीकोपतः। यास यःर: गर्मरक्षाकरयन्त्रम् । लिखित्वा तु चतुष्कोणं द्विरे- खया । संवेष्टय कर्णिका कार्या वर्तुला तु चतुर्दिशम् ॥२॥यकारं चरकारं च विस- देवदत्तः गान्तं पृथक् पृथक् । कर्णि- कामध्यतोलेव्याः पूर्ववत्पू- जयेत् क्रमात ॥३॥ लोहैकेन तुसंवेष्टय गर्भिण्याः कण्ठतो न्यसेत् सुखात्प्रसूतिर्भ- वति छलछिद्रंच नश्यति ॥ ४ ॥ इति श्रीयन्त्रचि ० ना० म०प० उ० ० शा० दा० गर्भरक्षाकरं नाम त्रयोदशं यन्त्रम् ॥१३॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि अन्तर्वत्नीसुरक्ष- णम् । यन्त्रं योनिव्यथा याति दारुणं भूतनाशनम् ॥ १॥ पूर्वोक्तविधिना लेख्यं द्रव्यैः पूर्वोदितः क्रमात् । भूर्जपत्रे विधानेन मध्यदेशे विचक्षणः ॥२॥ प्रणवं च तथा ह्रीं च --कर्णिका लगाकर मुशोभितकर प्रत्येक कणिकामें यःर इन चीजोंको लिस मध्यभागमें साध्यव्यक्ति के नामको लिखे । फिर उक्त विधानपूर्वक पूजनकर चांदीके ताजमें पंदकर गर्भणी बीके कण्ठमें बाँध दे तो सम्पूर्ण छल छिद्र नाश होजायंगे और सुखपूर्वक संतान पैदा होगी ॥ १-४॥ इति यन्त्रचिंतामणिकी नववीं पीठिकाके शान्ति अधिकारमें गर्भरक्षा- कारक नामवाला तेरहवाँ यंत्र ॥१३॥ श्रीशिवजी घोले-भय गर्भिणी वीके रक्षा और सुखपूर्वक प्रसूतिकारक यंत्रको कहता हूं । यह यंत्र गर्भव्यथा तथा भूतादिकोंकी व्यथाको दूर करता है। विधान यथा-उक्त द्रव्योंसे भोजपत्रके ऊपर पटवत् चतुष्कोण यन्त्रको सेंचकर दीघरेखासे युक्तकर प्रतिकोष्ठकमें को ही इन बीजोंको लिख ओं ह्रीं
यन्त्रचिन्तामणिः।
आद्यन्तं नामतो लिखेत । पटवच्च चतुष्कोणं दीर्घ संवेष्टय
रेखया ॥ ३ ॥ उपर्यधोऽपि त्रिदलान्कोणक प्रतिष्ठितम् ।
मुबमसकरपन्न् ।
हो हो ही देवदतःही हो हो
ह्रीं क्षं च तथा हीच कोणे दलगतं लिखेत ॥४॥ कोंकारं च
तण ही च दलशेषेषु वै लिखेत । एवं संलिरन्य संपूज्य लोह-
त्रितयवेष्टितम् ॥५॥ गर्भिण्याः कण्ठदेशे तु धार्य यन्त्रं न
संशयः। योनिशुलं शिराले भृतदोषः प्रणश्यति ॥ ६ ॥
तुखं प्रसूतिर्भवति व्यथानाशं न संशयः । रहस्योऽयं समा-
स्याना यन्त्रराजो महाद्भुतः॥ ७ ॥
इति श्रीमन्त्रचिन्तामगौ नान्नि नहारले प्रत्यक्षति २०० शान्यनि-
कारे दा० गागीरक्षगं मुखप्रतिकानं नाम तुर्दा यन्त्रम् ॥
-दो चीजोंसे पुटिव साधरके नानको वीच लिसे रि पूजनकर त्रिलोहके
ताबीज में वंदर गर्मिनाके गठेमें वांदे वो गर्भमूल और गिरस्यूल
भूतदोप यह सम्पूर्ण उपद्रव दांत हाँ मुखपूर्वक प्रति होगी । हे देवि ! इस
यंत्रराजके रहस्यको मैने कहा है इसका विधानभी पूर्वी समान है ॥१-७॥
इति चंचतामानिकी नववी पीठिका मांति-अधिकारने गर्मिगीरक्षण
सुखातूतिकारक चौदहवां यंत्र॥ १४ ॥
भाषाटीकोपेतः।
थः
यः
यः
यः यः यः
यः
28
यः
यः
यः
श्रीशिव उवाच ।। अथातः संप्रवक्ष्यामि तृतीयज्वरनाश-
नम् । द्रव्यैः पूर्वोदितैलेख्यं भूर्जपत्रे वरानने ॥ १॥ मध्ये नाम
भूततृतीयज्वरनाशनमन्त्रम् । लिखित्वा तु त्रिकोणं वेष्टये-
ततः। तस्याधः स्वस्तिकं
कार्य तत्सर्व वेष्टयेत्ततः॥२॥
देवदत्तः चतुष्कोणं शिलाकारतस्यो-
परि लिखेद्वधः। यकारैः स-
विसर्गान्तर्विषमर्वेष्टयेत्ततः
॥३॥ संपूज्य तस्य वेलायो
| बन्नीयादक्षिणे करे । ज्वरो
याति न संदेहो भूतजस्तु
तृतीयकः ॥ ४॥ रोगज नैव
यात्येषन योज्यंतत्र वैकदार
इति श्रीयन्त्रचि० ना० म०प्र० ३० न० शा० दा० भूत-
तृतीयज्वरनाशन नाम पञ्चददां यन्त्रम् ॥१५॥
श्रीशिवजी बोले-अब तृतीयम्वर नाशक यन्त्रको कहता हूं। हे वरानने !
पूर्वकथित द्रव्योंसे भोजपत्रके ऊपर एक चतुष्कोण यन्त्र खेंचकर उक्त
त्रिकोणके नाचे स्वस्तिक लिख पुनः इन सयको चतुष्कोणयन्त्रसे वेष्टित
करे। फिर त्रिकोणके भीवर साध्यव्यक्तिके नामको और द्वितीय चतुष्कोणके
भीतर विसर्गान्त तीन यकार वर्णीको पूर्वादि चारों दिशाओंमें लिख पूजन-
कर ज्वरके समय दहिने हाथमें बांधे तो तीसरे दिन आनेवाला वर दूर
होगा। यदि भूतादिकोंके उपद्रवसे होगा तो अवश्य दूर होजायगा । अथवा
रोगजन्जर हो तो इसका प्रयोग न करें क्योंकि इस यन्त्रसे रोगज्वर दूर नहीं
होता किन्तु भूतजही दूर होता है ॥ १-५ ॥
इति यन्त्रचिन्तामाणिको नवीं पीठिकाके शान्ति अधिकारमें तृतीयक
भूतमरशमन नामक पन्द्रहवां यंत्र ॥ १५॥
अ
आ
क
भं
अ:
यन्त्रचिन्तामणिः।
श्रीशिव उवाच ।। अथातः संप्रवक्ष्यामि सर्वरक्षाकरं परम्।
छलछिद्हरं नाम सर्वतोभद्रसंज्ञकम् ॥१॥ अर्ध्वरेखाः पञ्च पञ्च
सर्वतोमद्यंत्रम् ।
तिर्यग्रेखास्तु संलिखेत् । एवं कृते
भवन्त्येते कोष्ठाः पोडशसंज्ञकामा२॥
अकारपूर्वाः क्रमशो बिलिख्य सर्वत्र
कोष्ठे निशि भूतजेऽति । भूर्जस्य
गे पो मृगनाभिचन्दने हिमेन संमेल्य
लिखेत्रमेण तु ॥ ३ ॥ संपूज्य पुप्पै-
ओ औ
विविधैश्च गन्धेधूपमनोज्ञविविधोप-
चारैः । संयज्य विप्रान्वसनर्धनैश्च यन्त्रं च तद्भक्तियुतः समर्च-
येत् ॥ ४ ॥ संवेष्टय लोहत्रितयेन पश्चात्संहपुचेता विधिवत्म-
नुप्यः । तं धारयेदक्षिणबाहुमूले नारी गले यन्त्रवरं प्रयत्नात
॥५॥ तद्धारणात् प्राप्तमनःप्रसादः सर्वप्रियो भाग्ययुतः स
तूर्णम् । संजायते सर्वभयेन हीनो लोके यथा प्राप्तमहाष्ट-
सिद्धिः ॥ ६॥
इति श्रीय० चि० ना० म. प्रत्यक्षसि० उ० न० शा० दा0 सर्व-
सौभाग्यवर्धनं सर्वतोमद्राख्यं षोडशं यन्त्रम् ॥ १६ ॥
श्रीशिवजी बोले-अब सब प्रकारके छलछिद्रोंके नाश करनेवाले भार
सब प्रकारकी रक्षा करनेवाले सर्वतोभद्र नामक यन्त्रको कहता हूं । विधान
यथा-भोजपत्रके अपर कातूरी, लाल चन्दन, हिम इन सब वस्तुओंको एक
त्रितकर सोलह कोष्ठवाले यन्त्रको खींचे। फिर प्रतिकोष्ठकमें अकारादि सोलह
स्वरोको लिख गन्ध, धूप, दीप इत्यादिकोंसे यन्त्रराजका पूजनकर धन '
वस्त्रादिकोंसे भाह्मणों को संतुष्टकर भोजन करावै । फिर यत्नपूर्वक त्रिलोह
निर्मित ताबीजमें पन्दकर पुरुप दक्षिणहाथमें और स्त्री गले में बाँधले तो प्रस।
नचित्त और भाग्ययुक्त हो सबके प्रिय होंगे और सा प्रकारके भयोंसे रहित
जैसे कि अष्टसिद्धिक प्राप्त होनेसे सुख होता है उसकी समान सुख पावेंगे१-६.
इति यन्त्रचिन्तामणिको नववी पीठिकाक शान्ति अधिकारमें सौभाग्य
वर्द्धक सर्वतोभद्र नामक सोलहवाँ यन्त्र ॥ १६॥
भाषाटीकोपेतः। तंद य रु पा नं श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रं चूतजया' वहम् । सर्वाते हि परमं जयं स्याद्यन्वधारणात् ॥१॥ वाजिनः द्यूतविजयकरयंत्रम् । क्रममाख्यातं चतुःषष्टिस्तु कोष्टकम् । तद्धारणाजयं मे। खैर का जिज नः देवि यूते सर्वत्र निश्चितः। 'छ दावी य मंत्रं ते प एरण्डपत्र संलेख्य लेखन्या हे प्टिवा मोक्षिण पात्रकाकपिच्छया । कजलस्य पाण निमो वा टि हे मषों कृत्वा लिखेद्रात्री यवी दाछ शुचिस्मिते ॥ ॥ तिर्यगू- नःचनीद जजिक वा॑स्तु संलेख्या नव रेखास्तु विस्तृताः। एवं भवन्ति कोष्ठाश्च चतुःषष्टिर्वरानने ॥ ४॥ मध्ये बीजाः सुसं- लेख्यातुलोमप्रतिलोमतः। ते एव हि पुनर्लेख्या:शेषकोष्ठेषु च क्रमात ॥५|| मेखैरक्तंदयेरुपाकजिजतंदनीचनः ॥छदावी- यमंत्रंतपहेष्टिवामोक्षिणपात्रम् ॥ ६ ॥ एतान्येव तु बीजानि द्वाविंशद्विलिखेत् क्रमात् । दामोदरकवीन्द्रेण चित्रो वाजि- क्रमः कृतः ॥७॥ स्वेच्छया नीयते येन चतुःषष्टिपदं जनः। प ते मं त पा श्रीशिवजी बोले- अब जुएमें जयके देनेवाले यन्त्रको कहताहूं इस श्रेष्ट यन्त्रक धारणकरनेसे सब प्रकारके जुएमें जय होती है इस सोलह कोष्ठकवाले यन्त्रमें वाजिक्रम कहा है, हे देवि ! इस यन्त्र धारण करनेसे सब प्रकारके जुभोंमें जय होती है। हे शुचिस्मिते ! रात्रिके समय एरंडपत्रके ऊपर काक- पत्रकी लेखनीसे काली स्याहीके ६४ कोष्ठक बना प्रविकोष्ठ कमें अनुलोम वा विलोमसे इन३वीजीको लिखे। बीज यथा मे,खे,र, क्ल,द, ये, रु, पा, क,जि, ज, सं, द, नी, प, नः छ, दा, वी, य, मं, , वे, प, हे, टि, वा, मो, क्षि, ण, पा, यह वाजिक्रम चित्र दामोदर पण्डिव ने वर्णन किया है। जो मनुन्या १०० यन्त्रचिन्तामणिः। प्रसन्नं तु मया प्रोक्तं यन्त्रं चित्रं मनोहरम् ॥ ८ ॥ सर्वाते जयं प्रोनं धारणाजायते प्रिये ॥९॥ इति श्रीयन्त्रचि. ना. म. प्र.३. न. शा दा. उतविनयकरं सप्तदर्श यन्त्रम् ॥ १७ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि बन्धमोक्षं मनोह- रम् । बद्धो रुद्धः क्षणेनैव मुच्यते यत्प्रसादतः ॥ १॥ यदा बन्धमोक्षण यंत्रम् । मां मोचय मां मोचय देवदत्तः हल्लेखा मां मोचय मां मोचन -इस ६४ कोष्टक यन्त्रको धारणकर जएम जायंगे वे लोग निश्यही जयको प्रान होकर प्रसन्न होंगे कारण कि इस यन्त्रका नामही प्रसन्नयन्त्रह ॥१-९।। इति श्रीयंत्रचिन्तामणिका नववी पाठिका शान्ति अधिकारम गृतविजयकर नामक सत्रहवां यन्त्र ।। १७ ।। श्रीशिवजर्जा बोले-अब मनोहरवंदामोचननाम यंत्रको कहता है। इस यन्त्रक प्रयोगारनंस बंदो क्षणमात्र बंधनसं हट जायगा । अथवा किसी जीवरे भाषाटीकोपेतः । १०१ केनापि संरुद्धो न विन्देन्मुक्तिमात्मनः । तदा यन्त्रं प्रकुर्वीत तत्क्षणान्मुक्तिदायकम् ॥२॥ कपरं कुंकुमेनैव भूर्जपत्रे सुवि- स्तुते । लेखनीयं प्रयत्नेन एकान्ते यत्रमुत्तमम् ॥३॥ मध्ये नाम लिखित्वा तु हल्लखात्तदनन्तरम् । ततस्तद्वेष्टयेत्सम्य- ग्वर्तुलं तु द्विरेखया ॥ ४ ॥मां मोचयेति सर्वत्र चतुर्दिक्ष प्रवेष्टयेत् । चतुष्कोणं तु संवेष्टय रेखाद्वितयकेन तु ॥५॥ पूजनीयं प्रयत्नेन गन्धपुप्पैः फलैः शुभैः। त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा बाहुमूले गलेऽथवा ॥ ६॥ धारणात्तत्क्षणान्मुक्तः संसार इव निमर्मः । स्वस्थता धारणान्नित्यमवरोधः कदाचन ॥ ७ ॥ जायते नैन संदेहः स्वमेऽपि हि कदाचन ॥ ८ ॥ इति श्रीय, चिं. ना. म. प्र. 3. न. शा. बन्धमोक्षणं नामाऽटादशं यंत्रम् ॥ १८ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि भवबन्धविनाश- नम् । निर्वाणपदयोज्यं हि निर्वेदपदायकम् ॥ २ ॥ पट- -किसीने रोकलिया हो और उसके निकलनेका कोई उपाय न हो तो युक्ति. कारक इस यन्त्रराजका प्रयोगकरै । विधान-कपूर, कुंयुम इनको एकत्रित करके विस्तारित भोजपत्रके ऊपर एक चतुष्कोणको, खेचकर उसके मध्यमें दो रेखा मिश्रित एक गोलाकार चक्र लिखकर उसमें विसर्गान्त साध्य- व्यक्तिक नामको लिखकर अन्त में हलेखा इसको लिख उक्त गोलाकारके बहिर्भाग पूर्वादि चारों दिशाओंमें " मां मोचय" इस वाक्यको लिखे । फिर गन्ध पुष्प इत्यादिकोंसे यंत्रका पूजनकरके त्रिलोहके तायीजमें वंदकर गले अथवा बाहुमूलमें धारणकरे तो बंदी उसी क्षणमें बंधनसे छूट जायगा, जैस कि संसाररूप बंधनसे ममतारहित मुगुक्षुलोग छूट जाते हैं, । हे देवि ! इस यंत्रके धारण करनेसे शरीरफोस्वस्थता रहेगी, बंधन तो स्वप्न में न होगा१-८॥ इति श्रीयंत्रचिंतामणिकी नववीं पीठिकाके शान्ति अधिकारमें बंधमोक्षण नामक अठारहवा यंत्र ॥१८॥ श्रीशिवजी बोले-भय भयन नाशक और मोक्षपदके देनेवाले यंत्रको कहता हूं । विधान-गोरोचन, लाल चंदन इनको मिलाकर भोजपत्रके ऊपर निमार नि:सार १०२ यन्त्रचिन्तामणिः। कोणस्य तु मध्ये तु साध्यनाम प्रतिष्ठितम् । निःसारं सम्पुटं भवमोचनयन्त्रम् । कृत्वा भूर्जपत्रे सुविस्तृते ॥२॥ निःसारंतु लिखेरकोणे रोचना- /निःसार चन्दनेन तु ॥३॥ लोहमध्य. गतं कृत्वा रक्षयेच्छिरसा सदा । तद्धारणात्क्रमेणैव देवदत्तः विरक्तः संप्रजायते ॥ ४ ॥ नि.सार ज्ञानयोगं समासाद्य मुच्यते निम्मा नात्र संशयः । पितृमित्रकल- त्रेषु निर्मोहः संप्रजायते ॥५॥ निर्बन्धम्तु वनारण्यदुर्गपर्यटनं गिरी । जायते नात्र संदेहो योगी सर्वत्र पृजितः ॥ ६ ॥ दनि य. चि. ना.म.प्र.३० नशा० दामोदरपक्टि- तोते भवमोचन नाम एकोनविंश पन्त्रम् ॥ १९ ॥ श्रीशिव उवाच॥अथातःसंप्रवक्ष्यामि दुष्टसत्वात्प्रमोचनम् । यदारण्ये सरिदुर्गे दुष्टसत्त्वेन बाधितः।।॥तदा यन्त्रं प्रकुर्वीत -एक पदकोण यन्त्रको संच प्रत्येक कोणमे निःसार इस पदको लिये और इसही गन्दसे पुटित साध्यव्यक्ति नामको यन्त्रके भीतर लिसे । तत्पश्चात् उक्त विशनपूर्वक यन्त्रराजका पृजनकर बिलोहके तावीजमें बन्दकर शिरम धारण करें तो विरक्त हो मानमार्गको अनुसरण करनादुआ पुत्रादिकोंके मोहसे शून्य होकर पर्वतादि श्रेष्टम्धानी में यन्धरहित पूजनीय योगीभर होगा ॥१-६॥ :ति यन्त्र चिन्तामगिकी नवधी पीठिका मान्ति अधिकारमं भवमा- चन नामक उन्नीसवां यंत्र ॥१९॥ श्रीशिवजी घोले अव दुष्ट व मे मोचन करनेवाले यन्त्रको कहता हूं। इम यंत्रका उस समय प्रयोग करें कि, जिस समय वन नदी शाड़ी इत्यादि निगडबंध पुरुष जिस बंदो देवीकी आज्ञासे विमुक्त हो सिद्धादि गतिको प्राम: भापाटीकोपेतः। दुष्टसध्वप्रमो-वामहस्ततलोपरि । निष्ठीवनेन हींकारं लिखित्वा चनयंत्रम् । पूजयेत्तदा ॥२॥ अनामा वरक्तने चतुर्दिक्षु प्रसे- ह्रीं चयेत् । तत्क्षणान्मुच्यते जन्तुर्यावद्वीपिमहोरगैः ॥३॥ रुद्धो वृकैश्च दरिभिरन्यैर्दुष्टैन संशयः ॥४॥. इति श्रीयंत्रचि० ना दुष्टसत्वात्प्रमोचन नाम विशं यन्त्रम् ॥ २० ॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणो नाम्नि महाकल्पेप्रत्यक्षसिद्धि- प्रदे उमामहेश्वरसंवादे दामोदरपण्डितोदृते नवमी- पीठिकायुतः शान्त्यधिकारः समाप्तः॥ अथ मोक्षाधिकारः॥ आपादमस्तकनिबद्धजनःक्षणेन मोक्ष प्रयाति निगडैश्च सुवेष्टिताङ्गः । यस्याज्ञया जगति देवमनुष्यसिद्धास्तां भक्ति- युक्तमनसा प्रणतोऽस्मि बन्दीम् ॥ १॥ अधिकारं महद्वक्ष्ये बन्दीमोक्षकरं नृणाम् । विश्वासात्तत्क्षणादेवि सर्वकार्यप्रसा- धकम् ॥ २ ॥ देवानां मनुजेशिनां नृपजुषां स्त्रीणां शिशूनां ततो बद्धानां निगश्चिरंतनुजुषां मोक्षाय सिद्धिप्रदम् ॥ ३ ॥ मागास सिंहादि दुष्ट जीवोंसे भययुक्त हो । विधान-अपने थूकसे बायें हाथके ऊपर चतुष्कोणयन्त्र हुँचकर भीतरके भागमें ही बीजको अनामिका अंगुलीके रुधिरको पूर्वादि चारों दिशाओं में सेचन करे तो तत्क्षण साध्य- व्यक्ति उक्त हिंसक जीवोंके भयसे विमुक्त हो सुखका भागी होगा ॥ १-४॥ इति श्रीयंत्रचिंतामणिकी नववीं पीठिकाके बलदेवप्रसादमिश्रजीकृत भापाटोफयुत शांति अधिकारमें दुष्टसत्वात् मोचन नामक बीसा यंत्र ॥२० इति श्रीयंत्रचिंतामणौनाम्नि महाकल्पे प्रत्यक्ष सिद्धिप्रदे उमामहेश्वर सम्बादे दामोदरपण्डितोद्धृते ५० वलदेवप्रसादमिश्रकृत भा० टी० युत नवमी पीठिकालो शानयाधिकारः समासः ॥ श्री बन्दीदेवीको नमस्कार है। मस्तकसे लेकर चरणपर्यंत सम्पूर्ण भा. होते हैं उस बंदीदेवीको भक्तियुक्त मानस नमस्कार करता है ॥ १; 1 हीं १०४ यन्त्रचिन्तामणिः। श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि बन्दीमोक्षप्रसा- धनमायत्प्रसादात्क्षणे व बन्दीमोक्षः प्रजायते ॥ १॥साध्य- अन्धमोचनयंत्रम् । नाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः। अपूपस्योपरि लेख्य वृतेनेव तु यन्त्र- कम॥२॥चतुर्दिक्षुचह्रींकारं लिखित्वा देवदनः वेष्टयेत्ततः । तत्रैव विविधैः पुप्पने- वेद्यः परिपूजयेत् ॥३ ॥ भक्षणार्थ प्रदातव्यमपूपं सुरसुन्दार । त्रिदिना' न्मुच्यते जन्तुर्दुष्टबद्धोऽपि सप्तमे ॥ ४॥ में ही श्री बन्दीदेव्यै अमुकस्य बन्धमोक्षं कुरु कुरु मात- नमः स्वाहा अनेन मन्त्रण नाम गृहीत्वापुनःप्रतिमन्त्रं गुग्गुल- बटिको होमयेत ॥ अष्टोत्तरशतं सप्तविंशतिदिनपर्यन्तं सर्वथा वन्धमोक्षो भवति नान्यथा यन्त्रकल्पविहितसिद्धमन्त्रोऽयम्।। इति श्रीय. चिं. ना. म. प्र. उ. मोक्षाधिकारे दा, बन्धनमोचन नाम प्रथम यत्रम् ॥ १ ॥ श्रीशिवजी बोले-हे सुंदर ! जिसके प्रयोग करनेस बंदी कैदसे छूट जाता है अय उस यंत्रराजको कहता है । विधान-पुयेके ऊपर घृतसे एक गोलाकार चक्र लिखकर उसके यहि गमें एक चक्र और लिखें । फिर प्रथम यंत्रफे भीतर साध्यव्यक्ति के नामाक्षर और दूसरे यंत्रके पूर्वादि चारोंभागमें ही बीज लिखकर गंध पुप्पादिकांसे यंत्रका पूजनकर साध्यव्यक्तिको रबादें तो तीन दिन अधवा सात दिन में बंधनसे छूट जायगा ।। १-४॥ ऐं, ही श्री, पन्दीदेव्य अमुकस्य वन्धमाझं कुरु २ माननमः स्वाहा । इस मन्त्रम नाम मारण करके गुग्गल वटिकासे आहुति देकर हवन करे । सत्ताईस दिनतक १०८ पार वक्त मंत्रका जापफर तो यदीको अवश्य मोक्ष होजायगी भान् कारागारसे टूटजायगा । यह कल्पविहित सिद्ध मंत्र है ।। इति यंत्रपितामगिकी दशवी पीठिका मोक्षाधिकारमे पंधनमोचन नामक पहला यंत्र॥ १ ॥ ।
भाषाटीकोपेतः। २०५ श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रं निगडमोच- नम् । हस्तपादतले बद्धो मुच्यते यत्प्रप्तादतः ॥ २ ॥ कांस्य- पात्रोपरि लेख्यं रोचनाचन्दनेन च । कर्परकुडमाभ्यां च मृग- निगडमोचनयन्त्रम् । bihar व भ भा ही आ a श ग्व कास नाभियुतेन च ॥२॥ हीङ्कारं मध्यदेशे तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः । ततस्तु पोडशदलानकारादिस्वरान्वितान ॥३॥ ततस्तद्वेष्ट- श्रीशिवजी बोले-अब निगडमोचन यन्त्रको कहताई कि जिस यन्त्रराजके प्रतापसे सर्वाङ्गवंदी मुक्त होसकता है। विधान-गोरोचन, लालचंदन, कपूर, कुंकुम,कस्तूरी इन सब वस्तुओंको एकत्रितकर कांसोके पात्रके ऊपर एक गोला- फार चक्र बँचकर मध्यभागमें हीवोजको स्थापितकर उक्त गोलाकारके यहि-
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यन्त्रचिन्तामणिः।
श्रीशिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि वन्दीमोक्षप्रसा-
धनम्।यत्प्रसादात्क्षणेनैव बन्दीमोक्षः प्रजायते ॥१॥साध्य-
बन्धमोचनयंत्रम् ।
नाम लिखित्वा तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः।
अपृपस्योपरि लेख्यं वृतेनेव तु यन्त्र-
हीं
कम्॥२॥चदिक्षु चह्रींकारं लिखित्वा
ह्रीं देवदत्तः
हो
वेष्टयेत्ततः। तत्रैव विविधः पुप्पन-
वेद्यैः परिपूजयेत् ॥ ३ ॥ भक्षणार्थ
प्रदातव्यमपूपं सुरसुन्दार । त्रिदिना
न्मुच्यते जन्तुर्दुष्टबद्धोऽपि सप्तमे ॥
ऐं ह्रीं श्री बन्दीदेव्यै अमुकस्य वन्धमोक्षं कुरु कुरु मान-
नमः स्वाहा अनेन मन्त्रेण नाम गृहीत्वा पुनःप्रतिमन्त्र गुग्गुल-
वटिका होमयेत् ॥ अष्टोत्तरशतं सप्तविंशतिदिनपर्यन्तं सर्वथा
वन्धमोक्षो भवति नान्यथा यन्त्रकल्पविहितसिद्धमन्त्रोऽयम्॥
इति श्रीय. नि. ना. म. प्र. उ. मोक्षाधिकारे दा.
बन्धनमोचन
नाम प्रधम यन्त्रम् ॥ १ ॥
श्रीशिवजी वोलेहे सुंदरि ! जिसके प्रयोग करनेसे बंदी कैदसे टूट
जाता है अप उस यंत्रराजको कहता हूं। विधान-पुयेके ऊपर घृतसे एक
गोलाकार चक्र लिखकर उसके अहिर्भागमें एक चक्र और लिखे । फिर प्रथम
यंत्रके भीतर साध्यव्यक्ति के नामाक्षर और दूसरे यंत्रके पूर्वादि चारोंभागमें
ही बीज लिखकर गंध पुप्पादिकांसे यंत्रका पूजनकर साध्यव्यक्तिको ग्यवादे तो
तीन दिन अधवा मात दिनमें बंधनसे छूट जायगा ।। १-४॥
ऐं, ही श्री, बन्दीदेव्य अमुकस्य यन्धमोक्ष कुर २ मातर्नमः स्वाहा ।। इस
मन्त्रसे नाम उच्चारण करके गुग्गल वटिकासे आहुति देकर हवन करें ।
सत्ताईस दिनतक १०८ बार उक्त मंत्रका जापकरे तो बंदीकी अवश्य मोक्ष
होजायगी अर्थात् कारागारसे छुटजायगा । यह कल्पविदित सिद्ध मंत्र है ।।
इति यंत्रपितामणिकी दशवीं पीठिकाक मोक्षाधिकारमें बंधनमोचन
नामक पहला यंत्र ॥१॥
भाषाटीकोपेतः। १०५ श्रीशिव उवाच ।। अथातः संप्रवक्ष्यामि यन्त्रं निगइमोच- नम् । हस्तपादतले बद्धो मुच्यते यत्मसादतः॥ १॥ कांस्य- पात्रोपरि लेख्यं रोचनाचन्दनेन च । कर्परकुद्दामाभ्यां च मृग- निगडमोचनयन्त्रम् । Bia 2 ४ ५ ऊ स sho N अं आ -- श ग क नाभियुतेन च ॥२॥ हीङ्कारं मध्यदेशे तु वर्तुलं वेष्टयेत्ततः । मतस्तु पोडशदलानकारादिस्वरान्वितान् ॥३॥ ततस्तद्वेष्ट- भौशिवजी पोले-अप निगडमोचन यन्त्रको कहताई कि जिस यन्त्रराजके ममापसे माहबंदी मुफ होसकता है । विधान-गोरोपन, लालचंदन, कपूर, मुरुम, फस्नरोइन सय यन्तुओंको एकत्रितकर कांसोके पात्रके ऊपर एक गोला- फार पत्र रोपकर मध्यभागम द्वीपोजको स्थापितर 3 गोलाकारके यहि - १०६ यन्त्रचिन्तामणिः। येत्सम्यग्वर्तुलं रेखया पुनः । तस्योपरि प्रकर्तव्यं द्वात्रिंश- द्दलसंयुतम् ॥ ४॥ ककारादिसकारान्तं व्यञ्जनांनि लिखेतक- मात् । प्रतिष्ठाप्य महापूजां गन्धपुष्पैः फलैः शुभैः ॥५॥ नैवेद्यर्बलिहोमैश्च दीपदानैर्मनोहरैः। ॐ नमश्चण्डिकायै स्वा- हेति मन्त्रेणाऽष्टोत्तरशतं जुहुयात् । पायसैमधुखाद्यैश्व गुग्गु- लेन विशेषतः॥ ६॥ प्रत्यहं तु प्रकर्तव्यं सप्तमेऽहनि पूर्यते । उद्धृत्य प्रणतः पूर्व भोजनाद्गन्धरोचनम् ॥ ७ ॥ पानार्थमर्ध दातव्यं गुटिकान कल्पयेत् । तद्धारणात्प्रमुच्येत चिरं बद्धो- ऽपि मानवः ॥८॥ इनि यत्रचिन्तामणी ना० म०प्र० उ० द० मो० दा० निगड- बधमोक्षफर नाम द्वितीय यंत्रम् ॥ २॥ श्रीशिव उवाच॥अथातः सम्प्रवक्ष्यामि यन्त्रं वै बन्धमोक्ष- णमाविवरे चारुवद्धोऽपि मुच्यते यत्प्रसादतः ॥ १॥ हींकार- -भीगमें पोडशदल लिसकर अकारादि १६ स्वरोंको क्रमानुसार प्रत्यके कोष्टमें लिखे । फिर और एक दीर्घमा गोलाकारसे उक्त पोडश दलोंकोभी वेष्टितकर ३२ दलोसे युक्तकरके प्रत्येक दलमें क्रमानुसार फकारसे लेकर सकारपर्यन्त वत्तीय व्यंजन वर्णोको प्रत्येक कोष्टकमें लिसे । तत्पश्चात् यन्त्रराजकी प्रतिष्ठा करके गंधफूलोसे महापूजा करै धूप दीप नैवेद्य व मनोहर दीपदानदे। 'ओं नमश्चण्डिकायै स्वाहा इस मन्त्रका १०८ बार जपकरै । सीर, मधु साध और विशेषकर गूगलको प्रतिदिन बलिदे और ढककर रखद । प्रणाम फरनेके पूर्व उसको निकाले और गन्ध धूप देकर भोजन कर ॥ पीनेके लिये इसका आधा भागदे और आधेकी गुटिका यन वे । इस गुटिकाके धारण करनेसे जन्म कैदीभी छूट जायगा ।। १-८॥ इति यंत्राचन्तामाणिको दावी पीठिकाके मोक्षाधिकारमे निगड वंधमोक्षकारक दूसरा यंत्र ॥ २ ॥ श्रीशिवजी बोले :-अब वंधमोक्षण नाम पत्रको कहताहूं-पदि कालकोठरी इत्यादिकमें भले प्रकार बद्धभी होगा तथापि यंत्रराजके प्रतापसे छूटजायगा । विधि-भोजपत्रके ऊपर कुंकुमसे चतुकोण यंत्रको लिखे । तत्पश्चात् ही पीजके भाषाटीकोपतः। १०७ बन्धमोक्षकरयन्त्रम् । मध्यदेशे तु साध्यनाम च यत्नतः । लिखित्वा भूर्जपत्रे तु रोचनाकुङ्कुमेन च ॥२॥ Tी तद्यन्नं पूजयित्वा तु वहमानेऽम्भसि क्षिपेत् । तदम्भ पक्केनानेन भोजनं तस्य कारयेत् ॥३॥ एवं कृते तृतीयेऽद्विमुच्यते नात्र संशयः। विव रस्थोत्र यो बद्धो गूढस्थोऽपि विमुच्यते ॥४॥ इति श्रीयन्त्रचिन्तामणी नाम्नि महाकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसंवाद दशमपीठिकायां मोक्षाधिकारे दामोदरपण्डितोदृते बन्धमोक्षकर नाम तृतीयं यन्त्रम् ॥ ३॥ यन्त्रचिन्तामाणे नाम कल्पं श्रीशिवभाषितम् । धर्मार्थका- मफलदं वैरिनिग्रहकारणम् ॥ १॥ यस्तु पूजयते नित्यं धारये- द्वापि मानवः । अवध्यः सर्वलोकानां जायते नात्र संशयः ॥२॥ शृणोति यस्तु धर्मात्मा वाच्यमानं कदापि च । सोऽपि पूज्यश्च मान्यश्च जायते मत्प्रसादतः॥३॥यन्त्रचिन्तामणिं यस्य श्रुत्वा श्रद्धा न जायते । न वन्द्यः पापकृदेवि दुर्भगो भुवि -मध्यमे साध्यव्यक्तिक नामको लिख यन्त्रराजके भीतर स्थापित करे । पुनः उक्त विधानसे पूजनकर यन्त्रको वहवेहुए जलमें डालदे और उस जलको पक्कान के साथ उक्त व्यक्तिको भोजन करावे । इस विधि करनेसे तीसरे दिन विवरस्थ तथा गुप्तस्थानमें स्थित व्यक्तिभी मुक्त होजायगा ॥ १-४॥ इति यंत्रचिन्तामणिको दशवीं पीठिकाके पं० बलदेवप्रसादमिश्रजी. कृतभापाटीकायुत मोक्षाधिकारमें बंधमोक्षकर नामक तीसरा यंत्र ॥३॥ शत्रुानाहकारक धर्म, अर्थ, काम, फलके देनेवाले शियोक्त इस चिन्ता- माणे नाम फल्पको जो मनुष्य नित्यप्रति पूजन अथवा धारण करता है वह मनुष्य निःसन्देह सम लोकोंका अवध्य होता है॥१॥२॥ जो धर्मात्मा मनुष्य वर्णितकरे हुए इस चिन्तामणि नामक उत्पको श्रवण करता है वह मनुष्य 'मेरे प्रसादसे पूज्य तथा माननीय होता है॥ ३॥हे देवी! इस चिन्तामाण नाम यन्त्रको श्रवण फरकेभी जिस व्यक्तिकी यन्त्रशाखमें श्रद्धा नहीं होती है उस संशयरूप व्यक्तिको किसी प्रकारभी प्रणामादि न करना चाहिये, १०८ यन्त्रचिन्तामणिः। निश्चितम्॥४॥यस्तु श्रद्धाभियुक्तः सन्यन्त्रचिन्तामणि श्रयेत् । तेन सार्द्ध तु कः कुर्याविरुद्धं वै जिजीषुकः॥ ५॥ अतः परं किंबहुनोदितेन कल्पप्रभावं बहुधा तु देवि । यः शुद्धरूपी जगतःप्रशास्ता मत्तेजसा भाति सुशोभमानः॥६॥पुण्यं पवित्रं परमं रहस्यं सुसारसं यत्परिकीर्तितं ते । चिन्तामणि चिन्ति- नकार्यसाधक प्रत्यक्षकामादिफलप्रसाधकमणिविक्ष्याभिधानं प्रथमं द्वितीयमाकर्षणं स्तम्भनक तृतीयम् । विद्वेषणं मारणकं ततश्च उच्चाटनं शान्तिकरं च सप्तमम्॥ ८॥ बन्दीप्रसादजनक तु महाप्रभावमत्यन्तमुच्चाटनकं वदन्ति । अष्टाधिकारं प्रवद- न्ति कल्पं चिन्तामणों देववरैः सुपूजिते ॥९॥ स्वर्गच्युतस्य बहुभाग्ययुतस्य पुंसः पुण्याधिकस्य बहुयोगयुतस्य लोके । प्राप्तिर्भवेत्कल्पघरेण नस्य येनाचिनो देववरो महेशः ॥१०॥ इनि श्रीय महा० दशमपीठिकायुतो मोक्षाधिकार समाप्तः॥ क्योकि वह मनुष्य संसारमें दुर्भागी कहाता है ॥ ४ ॥ जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक यन्त्रचिन्तामाण नाम फल्पका आश्रय लेते हैं उन मनुष्यों के साथ ऐसा कौनसा व्यक्ति है जो जीवनकी इच्छा कर विरोध करेगा अर्थान् कोईभी नहीं ॥५॥ हे देवि । इस चिन्तामाणि नाम फल्पके अत्यन्त प्रताप वर्णन करनसे क्या है? यह समुद्ररूप लोकोंको शिक्षा देनेवाला मेरे तेजसे प्रकाशित है॥६॥ हे देवि ! पुण्यदायक अत्यन्त पवित्र परमरहस्य प्रीतिदायक जो यह कल्प मैंने तुमसे कहा है सो यह चिन्तामणि नाम कल्प चिन्तितकायोंके फलका देनेवाला है ॥७॥इस चिन्तामाण नाम कल्पमें आठ अधिकार है जो कि देवपूजित हैं, संख्या-पहिला वश्याधिकार, दूसरा आकर्पणाविकार, तीसरा स्तम्भना. धिकार, चौथा विद्वेपणाधिकार, पांचवां मारण आधिकार, छठा उच्चाटना- धिकार, सातवां गांति अधिकार, आठवां बंदीमोक्षणाधिकारटा९ ॥ जो मनुष्य स्वर्गसे आये हैं और जो अत्यन्त भाग्यवान हैं और जिनके अतिपुण्य है जो अत्यंत योगों से युक्त है, जिन्होंने देव श्रेष्ठ श्रीशिवजी महाराजका भक्तिसे पूजन किया है उनकोही इस श्रेष्ठ कल्पी प्रानि होती है, दूसरेको नहीं१०॥ इति श्रीयंत्रः ६० पलदेवप्रसादमिजीकृतभापटीकासहित दशमपीटिकायुतो मोक्षाधिकारः समानः ।
१०९ भाषाटीकोपेतः। अथ सर्वसाधारणयन्त्रविधिः । तंत्रान्तरे-सुनातः सुवस्त्रचन्दनादिभिर्भूपितो यथोक्तद्रव्यैः शुद्धदेशे यन्त्रं लिखेत् । तत्रादी षष्ठयन्तं साधकपदं मध्ये बीज तदधो द्वितीयान्तं साध्यनाम तत्पार्श्वयोः कुरु कुरु तदधो वियदयुक्तं सर्गबीजं लिखेत् । तत ईशानादिचतुष्कोणेषु हंसः सोऽहं प्राणवीजं चतुर्दिा दिग्बीजानि प्रतिदिशं यन्त्रगायत्री- वर्णान लिखेत ॥ यन्त्रगायत्री-यन्त्रराजाय विद्महे महायन्त्राय धीमहि । तन्नो यन्त्रः प्रचोदयात् ॥ इति यन्त्रगायत्र्या प्राणप्र- तिष्ठामन्त्रवर्णन च यन्त्रं सर्वतो वेष्टयेत । एवं यन्त्रं लिखित्वा सावधानतया सुवर्णादिना वेष्टितं कृत्वा यन्त्रप्रतिष्ठां कुर्यात॥ सा यथा-सर्वतोभद्रमण्डलेअष्टदले वा कर्णिकायां कलशस्था- पनविधिना कलशं संस्थाप्य तदुपरि यन्त्र स्थापयेत। मण्डल- कोणचतुष्टये चतुकलशान्संस्थाप्य प्रतिकलशं ऑ ह्रीं क्रौं इति त्र्यक्षरीविद्या कूर्चवीजयुतां सहस्र जपेत् ॥ ततस्तद्यन्त्रं चतुष्कलशोदकरभिपेकमन्त्रैरभिषिच्य गन्धादिभिः सम्पूज्य अय सय यंत्रोंके धारण करने की विधि कहते हैं-तंत्रॉम लिया है कि प्रथम स्नानफर चन्दन लगाय सुन्दर वनोंको पहनकर जिस द्रव्यसे जिस यन्त्रके लिखनेको कहा गया हो, उस द्रव्यसे शुद्धस्थानमें (वैठकर ) यंत्रको लिसे। पहले साधक के नामके अन्तमे पष्ठीविभक्ति लगाकर लिसे, घोचमें योजोंको लिस नीचे साध्यके नामके अंतमे द्वितीयाविभक्ति लगाकर लिस, दोनों और नीचे कुछ २ उसके नीचे वियदयुक्त सर्गप्रोजको लिए। फिर ईशानादि चारों कोनों में हंसः सोऽहं और माणवीजके चारों ओर दिगोजोंको प्रत्येक दिशाम यंत्रगायत्री तीन वाँको लिसे । यंत्रगायत्री-"यंत्र. राजाय विद्महे महायंत्राय धीमहि । तन्नो यंत्रः प्रचोदयात्।" इस । यंत्र गायत्री के द्वारा प्राणप्रतिष्ठा के मंना वास यंत्रसो पारों ओरस बेष्टित फरें । इस भौति सायधानीस यंत्रको लिसकर मुवर्गादिसे वेष्टनार यंत्रकी प्रतिष्ठाकर सर्वतोभद्रमंडलमें आठों दलोम कलशको स्थापनकर उसके ऊपर यंत्रको मण्डर पारों कोनों में चार करोंको स्थापित करे और प्रत्येक , ११० यन्त्रचिन्तामणिः। यन्त्र प्राणप्रतिष्ठामन्त्रेण यन्त्रदेवताप्राणान् प्रतिष्ठाप्य यन्न यच्या यंत्रं षोडशोपचारैः सम्पूज्य ब्राह्मणसुवासिनी कुमा, संभोज्य दक्षिणां दत्त्वा तेषामाशिषो गृहीत्वा यथोक्ताङ्गे बधीयात् । अनुक्कलखेनस्थले भूर्जपत्रम् । अतुक्तलेखन केसरगोरोचनकर्पूरकस्तुरीगजमदचन्दनागरुद्रव्याणि ।। क्तलेखनिकायां सुवर्णशलाका अनुक्तवेष्टने सुवर्णम् ।। अब धारणाने दक्षिणबाहुः ॥ इति सर्वसाधारणयन्त्रावधिः ॥ इति श्रीदामोदरपण्डितोद्धृतो यंत्रचिंतामणिः समाप्तः ।। -कलशपर (हाथधर) ऑ ही को इन तीन अक्षरोंवाली विद्यामें कृयी लगाफर हजारवार जपै । फिर उस यंत्रको चारों फलशोंके जलसे अभि मंत्रीद्वारा अभिषिक्तकर गंधपुष्पादिसे पूजनकर यंत्रमें प्राणप्रतिष्ठाके मंत्रो यंत्रदेवताकी प्राणप्रतिष्ठा करके यंत्रगायत्रीके द्वारा यंत्रकी पोडशोपचारसे करसुंदरवस्त्र पहननेवाली ब्राह्मणकी कन्याको भोजनकराय दक्षिणा देकर उस आशीर्वाद ले फिर जिस अंगमें यंत्रधारण करना लिखा हो उस अंगमें यह धारण करें।जहाँ फिसीपर यंत्र लिखनेका विधान न हो वहाँ भोजपत्रपर लि जहां यंत्रके लिखने में द्रन्यका विधान न हो वहाँ केसर, गोरोचन, क' कस्तूरी, गजमद, चंदन और अगर इनमेंसे किसी के द्वारा लिखे । जहाँ कि लेखनीका विधान न हो वहाँ सोनेकी सलाईसे लिखे।जहाँ किसीमें धरकर धारण करनेका लेखन हो वहाँ सुवर्णक तापीजमें धरकर धारण करना चाहि जहाँ किसी अंगमें धारण करनेका लेखन होवहाँ दक्षिणभुजामें धारण करे ।। इति श्रीपंडित-बलदेवप्रसादमिनजीकृतभापाटीकासहित यंत्रचिन्तामाणि समाप्त । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- सङ्गाविष्णु श्रीरुष्णदास, । खेमराज श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, "श्रीवेङ्कटेश्वा" स्टीम्-प्रेस, कल्याण-बम्बई. खेतवाडी-बम्बई.