Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Ahmiksar Sankshep
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"શ્રીમતી રિવાબાઈ તકે ल नमः २-२१२ गाई उपोद्घातः ELLAB -- धर्मएर हताहन्ति धोरक्षतिरक्षितः॥ आपणा चालू व्यवहारमाथी जरा निवृत्त थईने जनसमूहना वर्तनकम तरफ तटस्थ तरीके नजर फेरवीशुं तो जणाशे के:- प्रत्येक जण शक्य तेटली महेनत करीने पोताना जिंदगीने सुख- रूप करवा तत्पर थई रखो छे. “ थोडा अपवाद छोडी देतां" अत्यंत अल्प प्रमाणमां पण यशस्वी थयेला भाग्येन जणाई आवशे." व्यवहारनुं आ स्वरूपज होवाथी (पोताना) प्रयलो व्यर्थ थाय तेमा मोटुं आश्चर्य नथी; अने धारेला कामनी सिद्धि माटे एक उपाय लागु न थयो होय, तो बीजो उपाय स्वीकारवो तेमां पण कोई प्रकारनी हरकत नथी. मात्र उपायनो अंगीकार करती वखतेज अपायनो पण विचार करवो जरूर छ, जो तेवो विचार न करता-साहसथी-मुखमधु उपायोनो अंगीकार को होय; ने पछी आपती प्राप्त थाय; त्यारे उपाय ए अपायनो जनक थया वापत दोप कोने आपचो ! आसरे दोढसो परस उपर भारतवासिओनी दैवगती विचित्र रीते फरी; जेथी पोताना परंपरा प्राप्त आचार, विचार व्यवहार, तथा सुख प्राप्तीना साधनो-पाश्चिमात्य लोकोना सह- वासने लोधे-अपुरा अने दोषपूर्ण लागवा लाग्या; अने तेथी हळवे हळवे पोतानी जन्मसिद्ध हकथी प्राप्त थती सहज संस्कृतीने सदोषी अतएव निःसार ठरावतानी साथेज पाश्चिमात्य संस्कृतीने अत्यंत निदोप, अर्थपूर्ण तथा सुखदायि एवी ठरावीने मोटा प्रेम तथा उत्साही वधावी लेवा लाग्या, एक एक करता आज घणा मागे आखं राष्ट्र ते संस्कृतीथी संस्कृत थयु एम कहेवा हरकत नथी. बहुजनसमाज केवळ गतानुगतिक होवाने लीधे " आ अंगीकृत कराती संस्कृती सदोष छे, के निदोप छे; मुखपर्यवसायी छे, के दुखपर्यवसायी; इहलोक तथा परलोक साघवा अनुकूल छे, के प्रतिकूल छे विगेरे विचारो तेनां मन- मांज आव्या नथी. ने कोई माग्यशाली पुरुषो ब्रीभूत श्री प. प. श्रीशंकराचार्य राजराजेश्वर शंकराश्रम स्वामी मठ द्वारफा-2० विष्णुशास्त्री चिपळुणकर विगेरे जेया आ पाश्चिमात्य संस्कृती संबंधी विचार करया तत्पर धया, तेमने तो तेनुं पोग तथा आपातरमणीयत्व चौसी रते जणाई आव्यु जे पूर्ण राने तेमना अंथमा जाहेर छे. पण ते तरफ ध्यान आपे कोण? अस्तु--- आजकाल देपनी अनुपूल गति या रागवायी पेटलाएक बुद्धिमान् पुरषो स्वदेशना तथा परदेगना इतिहार:-सागरनु बुदिप मापन-इण्टरटे मन्थन करने उत्पात परेला सिद्धान्त -- रत्ननु पोताना हृदय विशे स्थापन करी देशबन्धुओना हृदयमा पण उपदेशामृतद्वारा तेनुं स्थापन करी रह्या छे; जेथी सदसद्विवेक शक्ती सचेतन तथा सबल थवा लागी. आजकाल विवेचक शक्तीना जागृती- काम पण घणे भागे लोकादरने पात्र थयु अने सिद्ध थयु छ के धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । आ प्रमाणे दैवगति अनुकूल थतांज " दोढसो वरसथी पाश्चिमात्य संस्कृतिरूप राजयक्ष्मानो रोग लागेलो छतां पण, " कालोह्ययं निरवधिविपुला च पृथ्वी । काल निरवधि छ; अने पृथ्वी विपुल छे. तो कोईपण मारो पक्षपाती उत्पन्न थशे." एवा आशावादना आधीन बनी केवळ प्राण धारण करी रहेली; अनेक नाथ छतां अनाथ; तथा अनेक पुत्रो छता निपुत्रिक एवी प्राचीन आर्यसंस्कृति लोकमान्य-महात्मा- ओना उपदेशामृतने लीधे हळवे हळवे पुनरुज्जीवन मेळववा पात्र थई. तो आवी वखते " प्राचीन संस्कृतीने सारी शक्ती आपनार पण बोजारूप थई न पडे, एवो आचार विचार प्रति- पादन करी व्यवहार तथा धर्मशास्त्र आ बेउ विषयनो मुकावलो करनार लघु पुस्तक" कोमल अंतःकरणना नवयुवकोना हाथमा अवश्य आपq जोइए; के जेथी तेमना अंतःकरणमा "नवनीवन "नो संचार थई, छेवटे श्रीमन्महाभारतमां कहा मुजव-" न जातु कामान भयान्न लोभाद्धर्म त्यजेन्जीवित- ६ W पण भ्यापि हेतोः॥" कोईपण वखने, कामवश बनीने, भयथी गभराई जईने, लोभना आधीन बनीने, अथवा प्राणसरक्षण मारे धर्मनो ( सहज धर्मनो) त्याग करवो नहीं." एवा सिद्धात उपर तेओ आवशे आ प्रमाणे न करता केवल शिरोभाग उपर लखेला वाक्यतु तात्पर्यज ' नवयुवकोना" हृदयमा ठसाववा प्रयत्न करीशु, तो तेओ तेनो स्वीकार तो करशे, पण “जे पळायो होय तो पाळे छे अने हणायो होय तो हणे छे" तेवा धर्मने हालना समयमा ओळरसवा असमर्थ वनी अते नाइलाजे यथेष्टाचारी बनशे. माटे इतर सर्व धर्मो करता उत्तम, अवश्य स्वीकारवा लायक, अने सहज अतएव जीग्नभूत, एवा सनातन धर्मनु महत्त्व पण तेमना नजर आगळ मुक्वु जोइए ते टुकामा नीचे प्रमाणे जे प्राणी ज्या उत्पन्न थाय छे त्याना हवा पाणी तथा जन्मसिद्ध अन्न (खोराफ ) अने कर्म एज ते प्राणीना पोपफ होय छे, ते शिवाय बीजी हवा वीजा गुणवाळु पाणी, जुदोज खोराक तथा पर्मने रीधे प्राप्त थती स्थिती एमा जो तेने राग्विये तो घणा मागे ते जीवयानोज नथी, सदाच जीव्यो होय तो मृततुल्य वनशे. बेम विपमा अथवा नरकमा जन्म पामेला प्राणीयोने जोई, कोई सहृदय सज्जन तेमना उपर उपकार करवाना सद्धेतूथी प्रेरित बनीने, हेमने अमृता अथवा म्वच्छ पदार्थमा जो मुके, तो तेओ पैकी एक पण जीय जीवतो रहेवानो सभव नथी. पदाच रेहेशे तो -
,
ते निवि-अशक्त थईने पडशे, अने सहज-जन्मसिद्ध-कर्मने
पण असमर्थ बनशे. तेवीज रीते आ भरतखण्डमां "वर्णाश्रम
व्यवस्थानुगृहीत " कुलोमां जन्म लीधा छता, कोई मोहक
महात्मा (१) ना उपदेशी, संगतीथी, अथवा संस्कृतीथी दूषित
बनी, पोताना वर्णाश्रमव्यवस्थानो त्याग करिये, अथवा तो-कोई
पोताना मोहक याग्जालबडे आपणने मोहित करी आपणी
उहज-समाज-व्यवस्थानो" त्याग करावे, तो आपणे जीवता
रही\ज नहीं; अने कदाच रहीशुं तो आपणां "
सहज समाज
व्यवस्थाने " जाळयवा समर्थ थईशुंज नहीं. आ पावत एक
दृष्टांत एको छ के:--
सुप्रसिद्ध मानस सरोवरना प्रदेशमा निरंतर निवास
करनारा हंसो वर्षाकालमां सरोवरनुं पाणी कलुपित ( मलीन)
थई जतुं होवाथी, ते प्रदेशने छोडी समुद्रना काठे वास
(निवास) करवा जाय छे. ज्यारे तेओ मानस सरोवरना
प्रदेशमा होय छे, त्यारे कमलनां फंद, बीज, तथा मृणाल
( कमलनां दांडा ) विगेरेनो आहार करी पोतानुं गुजराण
चलावे छे; अने ज्यारे समुद्रना काठान सेवन करया जाय छे
त्यारे समुद्ना खळमळाटने लीघे कांठा उपर आवी पडेला
मोतीनो आहार करे छे; जेथी घणी लांबी (गरुडविना ) सर्व
पक्षीओ करतां क्यारे पल्लानी मुशाफरी करनारा भने मजबूत,
निरोगी एवा तेभो थाय छे.
८
एक वखते तेमना कमनशीवे "दीर्घायु " नामनो कागडो
द्वीपातरमा भ्रमण करतो करतो त्या-मानस सरोवरना पवित्र
प्रदेशमा-आल्यो, तो तत्काल तेनो काळो रग पलटाई जई ते
पण हस जेको शुभ्र वर्णनो वनी गयो पण अत फरणनो स्वभाव
तो तेनो तेज धूर्ततापूर्ण-हतो, तेथी ते मनमा विचार करवा
लाग्यो के
" वर्णथी साम्य तो प्राप्त थयु, पण आवु वर्ण साम्य
मच्या पछी पण आहार विहारमा जो हसनी साथे मारु ऐज्य
न बने, तो पछी आ केवळ वर्णसाम्यनो उपयोग शो "
आ प्रमाणे विचार करता तेणे "पोतानो आहार छोडी
हसनो आहार स्वीकारीशु, तो ते आपणने पचशे नहीं तेम
आरोग्यदायी अने सुखदायी पण यशे नहीं." एवो विचार
करीने " अतर्गश निर्मल एवा हसोने फसावी, पोताना आहारना
चाहता बनाववा, एटले तेओ मने कोई वखते आहार विहारनो
भेद जोई तरछोडशे नहीं." एवु ठरावी ते श्वेतकाफ हसो पासे
भावाने मोटी आजीनीनी साये बोल्या राम्यो
हे मानस सरोवर निवासि हस गधुओ, तमो अने
ममो एकत्र कुटुयना, एकज जातना, अने महपि कश्यपना
पाश्यप छोए. जेना तेना प्रारख्य प्रमाणे
पीना वीजा देशमा आपणो जन्म थयो, तथा आहार विहारमा
पण भेद थयो छे, पण तेटराथी तमो अमारा तथा अमो त.
"
वंशज अतएव
.
आ "जीवन- मारा कोई प्रकारना सबंधी नथी एवु मात्र समजवु योग्य नथी. मारा सुदैवने लीधे हु देशभ्रमण करवा लाग्यो, अनेक बाधवोनी मुलाकात लीधी, आज आपणा पण दर्शननो लाम थयो. सर्व प्रकारना आनददायक मगल प्रसगमा तमारु साधन " जोई, अने वेनी दुर्मिळता जोई अत करण क्लेश पूर्ण थयु, तेथी विनवु छु के –मारा हितना चार शब्द सामळो, तो मारा उपर घणो उपकार थशे. आ प्रमाणे ते धूर्तकारुनी विनती सामळी ते हीनभाग्य हसो मोटा उत्साह तथा आनदनी साथे तेनु भाषण सामळवा तत्पर थया. तेनु तात्पर्य टुकामा आगळ लख्या प्रमाणे श्वेत काक कहे छे अमो तथा अमारा कुटुबी विगेरे देशबांधवो ज्या रहिये छिये, ते प्रदेशने जगत्मा गाम, नगर, शहर, के राजधानी, एवा नामथी ओळखे छे. त्या ज्यारे जोइए त्यारे " धनविहार" करवा माटे पण अडचण पडती नथी. नाना प्रकारना उत्सव महोत्सव विगेरे हमेशा थयाज करे छे. एवी रीते मनोरजननु साधन मुलक छता, त्या विशेष ए छ के.-उपजीविका माटे बिलकुल प्रयल न करता उत्तम उत्तम प्रकारनु भोजन तयार मळे छे, जेथी तमारा करता अमारी आ शरीर यष्टि केवी पुष्ट अने निरोगी रहे छे, ते तमोने विचारवा लायक छे. हवे तमारी बाबतमा जुओ.
, केवळ सरोवरमाज पैदा थनारा, पाणीना परपोटा जेवा नि सार एवा कमळबीज, कमळकद तथा मृणाल विगेरेनो आ- हार तमोने शो स्वाद आपतो हशे ? तेनाथी तमारो सतोष केवो थतो हशे ? अने तमारी शक्ती पण केवी वधशे ? अस्तु- वर्षाकालमा अथवा इतर वखते पण समुद्रना काठे जईने, रेतीना भाटामा मैदानमा आवी पडेला मोती वीणी वाणीने खावा, आ पण आहार एवोज लायक छे एक तो एमा परावरवीपणु, तथा दारिद्यनी परमावधी, एटल वेठी, पण सतोप-तृप्ती नहीं जुओ प्रथम स्वाती नक्षत्र उपर समुद्रमा वृष्टी धवी जोइए, ते वखते उघाडेरी छीपो समुद्र उपरना वा-वाइटना तडाकामाथी बचीने तरती रेहेवी जोइए, पछी तेमा स्वाती नक्षत्र उपर थती वृष्टीना जर विंदू पटवा जोइए, एटले मोती तयार थाय, पछा तयार भयेरा ते मोती समुद्ना खळभळाट साथे उपर आधी भरतीना समये पाठा उपरना मेदानमा आवी पडवा जे इए, पटनु ज्यारे थाय त्यारे तमो मोती चूटीने (वीणी) सामी मुदेवन शरीधे एटल क्यु ययु तो पण एक एक मोतीनो दाणो, ते धूळमा सोळी सोम ने खायो ए शु खावु । ए तो दागिनी परम सीमा, अने तेथीज सतोपनी आशा तमारा उपजीविकाना पकारमा पिरपुर नधी, त्यारे शरीरपुष्टीनी तो वातज पया। मांट मार देहेषु मानता हो तो, तमो तमारी प्राचीन आहार-विहार-परंपरा छोडी घो; अने मारी साये अमारा वसति-स्थान उपर प्रेम राखी, तथा त्यां जवा आववानुं राखी; पडूस पूर्ण एवो तयार मळतो आहार खावा माटे भाग्य- वान् बनो, तो मारी तमारा साथे थयेली मुलाकात सफल थई एबुं हुं समजीश." एवो ते श्वेत काकनो धूर्तता मरेलो उपदेश सांभळी वि- चारा सरल हृदय हंसो सेना भाषणने मोही पड्या; अने हळवे हळवे श्वेत काकना उपदेश प्रमाणे तेना वप्ततिस्थाननो परिचय करवा तथा आहार विहारनो पण स्वीकार करया लाग्या; अने कागडा प्रमाणेज बलीना तथा उच्छिष्ट अन्ननाज लाभथी आनं- दमा रहेवा लाग्या. आ प्रमाणे व्यवहार चालू थये घणो काल व्यतीत थया बाद दैवचक्र फरी जवा लाग्यं अने वली उपर तथा गामना उकेडा उपर नांखी दिधेला उच्छिष्ट अने अमेध्य अन्न उपर जीवन करनारा हंसोने पोतानुं निर्मल मानस सरोवर, तथा जन्मसिद्ध आहार विहार एकदम स्मरणमां आव्या; त्यारे ते पैको आतुर थएला केटलाएक हंसोए एकदम उडी जवाना हेतुथी पोताना शक्तीना बहार प्रयत्न कन्या; पण तेमां तेओ यशस्वी थया नहीं. ते जोईने बीजा विवेकशील हंसोए विचार को त्यारे जगाई आव्यू के, आ वखने कोईपण प्रकार अमलमा लावीशु, तो पण मानस सरोवरना सुखनी प्राप्ती थशे नहीं, कदाच मानस सरोवरनो प्रदेश प्राप्त थशे पण " जिव्हालौल्यना आधीन बनी स्वीकारेला पारकाना वगर प्रयत्ने मळनारा आहारना तथा यथेष्टाचगणने अनुकूल एवा विहारना भोगनारा अमो पूर्वे श्वेत काकना कहेवा प्रमाणे क्षुद्र अने दरिद्रता सूचक आहार विहारनो स्वीकार आन केवी रीते करी शकीशु । अने कदाच जोर जुलमी स्वीकारीशु तो ते परिणाममा मुखदायी केवी रीते निवडशे ? माटे जेवी रीते पोताना जन्मसिद्ध आहारविहारनो धीमे धीमे त्याग करी, पारकाना आहारविहारना चाहानारा थया, तेवीज रीते तेना परता अनेक गुण वेगथी " प्रतिलोम मार्गे" जाने मानससरोवर- नामक म्वदेशमा निवास करया तथा स्वातत्र्य सुखनी परमानदता भोगवा भ ग्यवान् थईशु, आ प्रमाणे पोतानो विवेकपूर्ण विचार नयी वर्ग, ते प्रमाणे पोते आचरण परवा, तथा अनुयायिओने पोताना मत प्रमाणे वर्तवानो विवरपूर्ण उपदेश पण परवा गन्या. जधी सर्वनु एफ्मत यनी उद्योग परताज सपूर्ण रीते मनोरयने पूर्ण करी भाग्यगारी पनी गया आन भारतवासिओनी स्थिती पण आये हुव हसो जेधीन भयेगवे, विमारी एपा' गेफमा-ग-महात्माभोना " उपदेशन र नया देवनी मनुारताने से हाल तेओ प्रत्य गरी यनया सग्या त्यारे पेटाएक अधिकार मपर विज्ञान ने पारपाई आयु भरे पयर मुग्गदिन्नने भर पनन सपा माना, पण ते सापत्र " एपदमो रनि"भा अष्टादारी पन मारण मरी. " .
आजकाल उपर लख्या प्रमाणे दृष्टि तो बराबर प्रत्यम्
वनवा लागी छे, अने तेथीज जे जे मार्गे अधःपात थयो एवं
विचारी लोकोना अंतःकरणमां निश्चित थाय छे, तेना तेना
प्रतिलोममार्गनो स्वीकार करवामां आवे छे. अने तेवो स्वीकार
करयो एन योग्य छे.
ज्यारे धर्मप्रधान अंतःकरणवाळा प्राचीन विद्याभूषित विद्वानो
शिरोभाग उपर आपेला श्लोका पैकी प्रथमनी अष्टाक्षरी
अधःपातने कारण छे एवं माने छे त्यारे उन्नतीनुं साधन पण
प्रतिलोममार्गसूचक एवी बीजी अष्टाक्षरी छे एवं जो तेओ
माने तो तेमां कोई हरकत जेवू नथी.
अधःपातना प्रसंगे “ अमुक एक उपाय करीए तो उन्नती
थाय " ए, प्रतिपादन करनारा घणा मळे छे; पण ते उपायने
अमलमा लाववाचें काम तो श्रीकृष्ण भगवान्ना हिसावेज
थाय छे; एटले:-
मनुष्याणां सहस्रपु कश्चिद्यतति सिद्धये ॥” इति.
आ वखते पोतानुं साध्य साधवा माटे परधर्मीओए तथा
तेमना संसर्गथी दूषित थयेला लोकोए करेलो धूलिप्रक्षेप दूर करी
अधिकारी माटे सनातन धर्मनू शास्त्रसंमतव्यवहार्यस्वरूप प्रकट
करवु आवश्यक छे.
हाल जगतमा धर्म शद्वथी ओळखाता पंथो हजारो हो,
पण सर्व धर्मोमां मूर्धन्य धर्म सनातन-वैदिक-धर्म ( हिंदु
धर्म) एज छ; एषु परमहंस विवेकानंद तथा रामतीर्थ विरे विद्वानोए पण द्वीपांतरमा सिद्ध फन्युं छे. अर्थात् पारत विशेप लसपानी जरूर नयी. तो पण सामान्य जन माटे माधारण हटात आपी एनी सर्वोचमता सिद्ध करिये छीये. भागे के.--एक उपम राजधानी- दहर छे, अने तेमा रोषोनी आवक जायफ पणी छे तो लोकोना भोजननी व्यय- स्था माटे अनेक उपोगी रोशोप फेटीएक विशाओ उपाठी, रोशनी सारयार सारी रया माटे मरगरे पण पायदो परी पिपासा पर फरज पाही के-पच्छता, पदार्थना भाव, जमया मारे तयार करा पदार्थनु परक, मानो रेवाना नेनी पारनी चिंगरे, अने यमाई रे। पटलं व्यवस्थित गते दोगुनाई.
. आज दुकानोमां अत्यत संपत्तिमान एवा लक्ष्मीपतीए पण काढेली एक दुकान हती, जेमो कायदानी सर्व वावतो साच ने, दुकानमा योग्य किंमत आपी आवतां सर्व लोकोने जेना तेना अधिकार तथा रुचीने अनुसरी सर्व प्रकारना पदार्थ पुरा पाडवामां आवतां हता; तेथी मालीफना चाहोशीधी चालती ते दुकान सर्व दुकानोमां श्रेष्ठ जेया रीते मानवी योग्य छे; तेवीज रीते " सर्व प्रकारना मनुप्योनी जेनां तेना अधिकारसंमत रुची प्रमाणे धर्माचरणनी सगवड करी आपनार सनातन वैदिक धर्म शिवाय वीजो धर्म नहीं होवाथी " जगतमा सर्वधर्ममूर्धन्य एनेज मान्या वगर गती नथी. सनातन वैदिक धर्म पद्धतीथी करवामां आवता कोमा भणात: वेदादि मंत्रनो अर्थ घराबर समजीनेज कर्मों करवामां आवे तो ते सफल थाय; पण तेवू तो कर्म करनार के करायनार पैकी एकने पण ज्ञान होतुं नथी; त्यारे एया "वंध्या गोदोहन" जेवां कर्म करवानां परिश्रम शा कामना ?-एवा विचारो फेलावीने केटलाएक पाश्चिमात्य संस्कृति मूपित विद्वानो, सनातन धर्मानु- यायिओना ज्ञानचक्षु उपर धूलिपक्षेप करी, तद्वारा बुद्धिभ्रंश अने धमभ्रंश करी रह्या छे. माटे तेमना कहेवामां" सत्यांश" केटलो छ ते जुओ. "वेदमंत्रोनो अर्थ जाण्या वगर अथवा कर्मकाण्डना प्रयो गोनो अर्थ जाण्या वगर करवामा आवतां अध्ययनो तथा संस्कारादि कर्मों व्यर्थ छे, एटटुंज नही तो तेवा विद्वानो तथा कर्म कराव- नारा पुरोहितो केवळ स्थाणु-भारवाकस्तंभ-छे." एवं पूर्वोक्त पंडितम्मन्य जे वाक्यना आधारे कहे छे ते वाक्य आ प्रमाणे है.-स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजा. नाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति शानविधूतपाप्मा ॥ १ ॥ श्रुतिः आ वाक्यना पूर्वार्धमाज उपर लखेलो सिद्धांत भासमान थाय छे, उत्तरार्ध फलश्रतिरूप छे. पूर्वार्धमा क्रियाओ ये बतावी मनो कर्ता एकज वतापी, वाक्यभेद कन्या यगर अर्थ बोध थवा माटे व्याकरण शास्त्रना नियम प्रमाणे एक क्रिया ल्यवंत राखी छे आया स्थळ उपर एटले क्त्वा प्रत्ययांत अथवा ल्यप् प्रत्ययांत क्रियापद वापरलं होय त्यां"ते किया करीने मुख्य क्रिया करनारो"कर्ता होय छे, एवं सर्व व्युत्पन्न लोकोनां जाण- यामा छे. परंतु जेवी रीते " एकाद दे रोगीने दवा आपीने ५. होय के, " तूं आ दवा स.ईने घहीय वारे पेोतानो खोराफ साईने दुई जा." पछी रोगीए वेदना ये हेया मुजय दवा खाईने थोडो सत वित्या बाद पोवानो सोराफ साती रखते एक पास राईने मुथु, फरी उटीने चीजो मास साने गुई ज; एको (पेट भरता सुर्धाना आहार माटे) कम राखेलो जणाय, " अथवा एपो मम समयो ये.ग्य है; एवं नारो गडे तो तेने विचारशील मेहेया परता मंशिरोमणी पेहेयं यधारे योग्य
१७
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थशे; ( दीपशे) एवं सामान्य अशिक्षित पण कबूल करशे;
तेवीज रीते उपर लखेला श्रुति वाक्यमा यः अधीत्य न विजानाति-
अध्ययन करवू अने अर्थने न जाणवो, आ ये क्रियाओनो यः ए
कर्ता छे. अने वाक्य भेद कन्या विना अर्थ थवा माटे अधि+ह
कियानू " अधीत्य " एवु ल्यप् प्रत्ययांत उच्चारण करी
विजानाति ए कर्तरि क्रियापद राख्युं छे. तेथी आ वाक्यनो
अर्थ-उपर संख्या प्रमाणेज करवो होय तो तेमां विशेष तफावत
एटलोज करवो जोईए के:-
"जे वेदतुं अध्ययन (संपूर्ण) करीने तेना०इत्यादि"
आ प्रमाणे करेलो अर्थज योग्य छे एवं कहिये तो एवी
आपत्ती आवे छे के:-
अनन्ता वै वेदाः " वेद अनन्त छ. आ श्रुति वाक्य
उपरथी वेदनुं अनंतत्व सिद्ध होवाथी सम्पूर्ण वेदनुं अध्ययन थकुंज
मुश्केल छे; त्यारे अर्थज्ञाननी तो वातज क्या? उपर लखेला
श्रुतिमांनो
" आ वेद शह जातिवाचक
होवाथी एकवचनान्त छे. वेदनुं अनन्तत्व "भरद्वाजना" अध्ययन
संबंधी इतिहास उपरथी स्पष्ट रीते सिद्ध थाय छे.
वेदना अर्थचें ज्ञान भणनारने थy जोइए, एवं प्रतिपादन
करनाराओए " मणावनारनी केटली तयारी जो ए "ते ध्यानमा
लई, तेवी तयारी थवी हाल शक्य छे के अशक्य छे एनो विचार
" अघीत्य वेदम्
१८ तो निदान प्रथम करवो जोइतो हतो. पण दुर्महदूषित अंतःकर- गोमा तेटलुं सामर्थ्य होय क्याथी ? वेदना मंत्रोनो अर्थ करवा माटे मुख्यतःआगळ जणावेला साधनोनी जरूर छे. १ वेद भणवानी पद्धति जेमा बतावेली छे एवा दरेक शाखाना शिक्षा ग्रंथो. २ मंत्रना अध्ययन वखते भणाता स्वरवर्ण-उदात्तादि प्रकार बराबर छ के नथी ते समजवा माटे व्याक- रण शास्त्रनुं स्वर वैदिकी साथे उत्तम ज्ञान होवा उपरांत सर्व शाखाओनां सर्व जातना प्रातिशाख्य नामक व्याकरण ग्रंथोनुं ज्ञान. ३ मंत्रोनो यज्ञकर्ममां केवी रीते उपयोग कराय विगेरे बावतो यतावनारा सर्व ब्राह्मण ग्रंथोनुं ज्ञान. ४ उपर रखेला साधनोना आधारे एकाद मंत्रनो अर्थ क्यो होय अने तेना विरुद्ध अर्थ बतावनार बीजो मंत्र होय तो प्रथमनो करेलो अर्थ केटला प्रमाणमा संकुचित करवो अथवा फेरववो ते समजवा माटे हाल उपलव्य तथा आजसुधी लोप स्येला सर्व वेद भागनुं पण ( अध्ययन ) ज्ञान जोइए. ५शिवाय वैदिक कोश, छंदःशाम्ब, पूर्वोचरमीमांसा- संकर्षणकांड-सहित, अने वेदना व्याख्याननी .
पद्धति बतावनार महर्षि यास्काचायकृत निरुक्त अंथर्नु पण पूर्ण ज्ञान होवू जोइए. एटली तयारी होवा उपरांत आधिमैतिक आधिदैविक अने आध्यात्मिक शाम्रोमां पण पूर्ण पारंगतता होय तो वेदनो अर्थ ( योग्य शद्वार्थ) करया मारे कदाच अध्यापक अधिकारी गणाशे. पण आ प्रकारनी साधननी तयारी न छतां वेदनो अर्थ करवा तत्पर थई पोते करेलो अर्थ खरो अने इतर विद्वानोए (ऋपीओए ) करेलो खोटो एवं प्रतिपादन करवू ए केवळ प्रतारणा मात्र ज छे. हाल एटली तयारी थवी स्वममां पण अशक्य छे; माटे " अनेक जन्म तपश्चर्यामां गाळी सिद्ध बनेला महर्षिओए तपोबलथी सर्वज्ञता मेळवी जगत् उपर उपकार करखाना भावनाथी प्रेरित थई मंत्रोर्नु तात्पर्य जाणी जे जे मंत्रनो जे जे कर्ममा विनियोग को छे ते ते मंत्र ते ते कर्ममा विनियोगपूर्वक उच्चारवो. एटलोज आपणो ( कर्माधिकारिओनो) अधिकार छे. कलियुगमांनां महषी ( माधवाचार्य) पण पंचदशीना नवमां प्रकरणमा लखे के के:- फर्मोपास्ती विचार्यते अनुष्ठेयाविनिर्णयाद । बहुशाखाविभकीर्ण निर्णतुं कः प्रभुनरः ॥ २६ ।। निर्णीतोर्यः कल्पसूत्रैथितस्तावताऽस्तिकः । विचारमन्तरेणापि शक्तोऽनुष्ठानुपञ्जसा ॥ २७ ॥ - २० उपास्तानामनुष्ठानमार्पग्रन्थेषु वर्णितम् । विचाराक्षममाश्वतच्छ त्वोपासते गुरोः ॥२८॥ वेदवाक्यानि निर्णेतुमिच्छन् मीमांसतां जनः । आप्तोपदेशमात्रैण ह्यानुष्ठानं हि सम्भवेत् ।। २८ ।। " वेदमा कर्म तथा उपासना ठेकठेकाणे कहेली छे तेमा त्याज्य शुं ? अने स्वीकार्य शुं ? ते जाणवा माटे विचार करतो जोइए" एवं समजी विचार करनारा ( शास्त्रो । विचार करे छे. पण अनंत वेदनी सहस्रावर शाखाओमा व्याप्त थई रहेला उप- रोक विषयनो निणय करवा कोण मनुष्य समर्थ छे १ ॥२६॥ परंतु जे खरो आस्तिक छे, ते तो " पूर्वना ऋषीओए तपोव- लथी (उपवृंहण साथे) सर्व वेदनं जाणी निश्चित करेलो सिद्धांत -कल्पसूत्र विगेरे ग्रंथरूपे जे आज प्रसिद्ध छे तेनाज आधारे" म्वतंत्र विचार कन्या वगरज कर्म तथा उपासना करवा समर्थ याने तत्पर होय छे. ॥ २७ ॥ उपासना केवी करवी ते ऋषि- प्रणीत ग्रंथोमा प्रतिपादित करेलं छे. माटे विचार फरवा असमर्थ अथवा अयोग्य गनुप्यो गुरु पासेची उपासना प्रकार जाणी लई ते प्रमाणे उपासना करे . ।। २८ ॥ वेद वाक्यनो अर्थनिर्णय परपानी इच्छा राखनारे सुपीधी विचार करयो पण उपासना करयानो प्रकार आयोपदेगी (परंपराधी ) जे प्राप्त थतो होय तेनेज मधीकारी ते भगानेज अनुप्टान फखं ॥ २९ ॥ सेमा पोताना निर्णयने तया तनुसारी पद्धतीने उमेरपी नदी.
महर्षि पतंजली पण महाभाष्यमां
अप्रयुक्त पण
शब्दो छ" एवं प्रतिपादन करनारा पूर्वपक्षीयूँ खंडन करती
वखते " शब्दजालनी महत्ता तथा विस्तार जाण्या वगर अप्रयुक्त
शब्दो छे. एवं केहेवू नहीं," एवं प्रतिपादन करी " योग्य
शब्दार्थ करवा तथा करेला शब्दार्थनो वीजा तेवाज शब्दना
अर्थनी साथै संवाद ( मुकाबलो ) करवा केटछं ज्ञान जोइए वे
कहे छे; के:-
सप्तद्वीपा वसुमती त्रयो लोकाः चत्वारो वेदाः सांगाः
सरहस्याः बहुधाभिन्नाः एकशतमध्वर्युशाखाः सहस्रवर्मा
सामवेदः एकविंशतिधा याव्हच्यं नवधावणो वेदः
चाकोवाक्यमितिहासः पुराणं चैधकामित्येतावाच्छब्दस्य
प्रयोग विषयः । १ अ. १ पा १ आन्हिक.
सात द्वीप युक्त संपूर्ण पृथ्वी, प्रणे लोक, अंगोपांग तथा
रहस्य सहित चारे वेद, अनेक शाखाओथी युक्त; ते शाखाओ
पैकी एकसो यजुर्वेदनी शास्त्रा, एक हजार शाखारूप सामवेद,
एकवीश शाखात्मक ऋग्वेद, अने नय शाखात्मक अथर्ववेद,
प्रश्नोत्तररूप वेदभाग, इतिहास, वैद्यक आ प्रमाणे
शब्द शास्त्रनो विषय छे."
आ भाप्य उपरथी एबुं सिद्ध थाय छे के:
शब्दनो के मंत्रनो अर्थ करेलो होय तो ते आटला ग्रंथोना ता-
पर्यना साथे सरखारतां सर्व रीते व्यवस्थित विषय हो जोइए.
"
.
पुराण,
तथा
:-एकाद
२२ आ प्रमाणे विचार करता सिद्ध थाय छे के -कर्म के उपासना करवा माटे वेदना अर्थ-ज्ञाननी बिलकुल आवश्यकता नथी, तेमज उपर लख्या मुजब अव्यभिचारी अर्थनु ज्ञान तपो- बल विना थवु पण शक्य नी." आ प्रमाणे शास्त्र सिद्धात स्पष्ट छता जेओ " अर्थ-ज्ञान विनानुं अध्ययन तथा कर्मोपासनादि व्यर्थ छ " एवु कहे छे, त्यारे तेओ "केवळ धूर्तपणाना, तथा धर्म विषयक अज्ञानताना, अने अज्ञानतान लीधेन निरंतर जागृत रहे. नारा नास्तिकपणाना, आधीन बनी सामान्य जनसमाज उपर धूलिप्रक्षेपज करी रह्या छ " गती नथी ए कहा वगर उपर रखेला स्थाणुरयं० आ श्रौत वाक्यनु ता रार्य एवु छ के --- 'कर्ममा वपराता मत्रोनो अर्थ-उपयोग वाण्या वगर कर्म न करणे. " जेम के एकज गायत्री मन्त्र छ, पण तेनो उपनयन सस्कार वसते उपदेश करवामा, सध्या वखते प्राणायाम फरव'मा, अर्ध्य समर्पण करवामा, तथा जपमा, अपवित्रता दूर करी पवित्रता प्राप्त करवी होय त्यार प्रोक्षण करयामा, पचगव्य करती यखते गोमूत्र रेवामा, जे उपयोग परवामो आवे छे तेन तेनो अर्थ समजो आ हेतुीज कात्याय- नादि मंहपीओ पण मपिच्छदो विनियोगवित् मलनु पटन क्खु एषु पहे हे जेथी इष्ट प्राप्ती थाय छ " २३ . . मंत्र ए शार्दूल (चित्तो ) छे. माटे " जेम शार्दूलने धारेली शिकार पकडवा माटे छोडवो होय तो तेने ते शिकार आंगळी वडे बताचवी; अथवा तेवी तेनी समजुत करी पछी तेने छोडवो- विनियोग करयो-के तत्काल झडप साथे दोडी पारेखें काम करी योजनारने कृतार्थ करे छे." तेवीज रीते मंत्रनो उपयोग करता पेहेला-गायच्या विश्वामित्रः सविता गायत्री उपनयनोपदेशे विनियोगः । प्राणायामेवि० अर्घ्यदाने वि० अपेविनिः । इत्यादि रीते मंत्रनो धारेला कर्मोमा विनियोग करवो. एटले ते योजेलो मंत्र पण शादलविक्रीडित " करीने योजनारने कृतार्थ करशे, विनियोगर्नु तथा ऋपिच्छंदादिक उचारणज करतुं जोईए एq नथी तो तेमनुं ज्ञान हो, जोईए अने ते ज्ञान कर्ममा मंत्रनो उपयोग कराय ते वखते मनोवृत्तीमा जागृत थाय तो सारुंअर्थात् " अर्थ ज्ञान वगरनुं कर्म निष्फल छे. एटले शब्दार्थ ज्ञान नहीं पण ऋपिच्छंदो विनियोगनर ज्ञान वगर करेलं फर्म निष्फल जाणवू एवं कहेवाय. अहीं सुधीना एकंदर लेख उपरथी सनातन धर्म ए सर्व धर्ममा श्रेष्ठ होवाथी तेने तथा तदनुसार प्राचीन परंपराने अनु- सरी धर्माचरण करवू; अने ते बाबतमा विरुद्धसंस्कृतिदूषित वनेला लोकोए करेला धूलिपक्षपने लीधे अंघ बनवू नहीं तेमज धर्मथी विमुख पण थर्बु नहीं, एटल सिद्ध थाय छे. आज सनातन धर्मने अनुसरी आचार विचार व्यवहार अने नित्य कर्मोन प्रतिपादन करनारा प्राचीन अंको प्रणा छै. पण
२४
सेओ विस्तृत अने शास्त्रार्थ पूर्ण तथा केवळ सस्कृतमान होवाथी
हालना व्यवहार-प्रधान कालमा व्यवहारी लोकोने
उपयुक्त
थई
शके तेम नथी, तेमज पोताना तर्क तथा बुद्धि प्रमाणे मत्रोनो
अर्थ लखवानु आडवर करी आहिकना पुस्तको बहार पाडवानु
साहस पण केटलाएक अधुनिक विद्वानोए करेल पण तेथी
आस्तिकताना वदले नास्तिकताज फेलाय छ, अने
विनायक प्रकुर्वाणो रचयापास वानरम् ।।
आ कहेवतने मात्र तेओ सार्थ करे छे.
आहिर-मूत्रावली मरखा अथो अत्यत माहिती आप
नारा होवाथी दरेक धर्मचुम्तने सघरवा रायफ छ, पण व्यवहार
प्रधान रोकोने तो निरपयोगी अने योजारूप छे, तेमज भुबई,
भान, सूरत, अमदाव द विगेरे ठेकाणे प्रसिद्ध थयेल आसरे
१०-१२ आहिना पुस्तको जोवामा आव्या, परतु प्रस्ताव
नामा रखरो हेतु पूरी पाडयामा एक पण समर्थ थशे एए
रागतु नी
एवी रते आजसुधी प्रसिद्ध थयेा नवा तथा जुना
आहिस-विषयक पुस्तयोनी हारनां समयमा निरपयोगिता जोई,
तथा पूर्व रम्या प्रमाणे धाण बनेरी प्राचीन सम्मृतीने शक्ती
आपनार पण पोवारूप न यई पटे एवो आगर विचार प्रति
पादन करी व्याहार तया धर्म-भाष आ येउ विपयनो मुकामलगे
परनार लघु पुरता पोमल अत करणना नरगुवकोना
२५ हाथमा आपवानी आवश्यकता जणाचा लागवायी तेम करवा आतुर थयेला श्रीक्षेत्र डाकोर निवासी श्रीयुत उमयाशंकर मंच्छाराम पाठक एमणे-तेमना हेतु मुजब एक लघु पुस्तक तयार नहीं होवाथी-पोताना हेतु मुजब एक लघु पुस्तक तयार करवा माटे मोटा प्रेम साथे मने विनंती करी; जेथी तेमना प्रेमपूर्वक विनंतीना आधीन बनी आ लघु प्रयास करवा हुं तत्पर थयो. आ पुस्तकना बे माग करी, प्रथम मागमा उत्थानविषिथी आरंभीने शयन विधी सुधी आवश्यक नित्य-कर्म-प्रयोग तथा, गुर्जर भाषामा पद्धति आपी अते यज्ञोपवीत संस्कार तथा धारण विधि अने अशीचमां संध्या करवानो प्रकार कही प्रथम भाग पूर्ण कन्यो. बीजा भागमा प्रथम भागमां कहेला कर्मोनी सप्रमाणता, आवश्यकता, तथा शास्त्र सिद्ध संकोच बंतावी गायत्री जपमां प्रणव बाबत तथा जप साधन बाबत अर्धदग्ध लोकोमा चालतां झगडान अप्रामाण्य तथा ग्राह्य विपयनो निर्णय आपी अंते खास व्यवहा. रोपयोगी थोडाक प्रमाण वाक्योनो पण संग्रह आपेलो छे. व्यवहार साधीने पण धर्म साधयो होय तो केवी रीते कुटुंबा रेहेवं अने तेथी केटला नित्य कर्मों विशे माफी मळे छे ते पण नित्य होमनो विचार करतां जणाव्युं छे. आ प्रमाणे अनेक अंथोना आधारे लखेलं पुस्तक वाचवा अथवा सांमळवा माटे अनेना प्रसिद्ध विद्वान् वे. रा. हरि गदाघर चैव घनपाठी, वे. रा. भिकंभट गोडशे काशीकर २६ धनपाठी तथा वे. रा. विष्णुभट चंद्रात्रे धनपाठी एमने विनंती करतांज तेओए पोतानो अमूल्य वखत रोकी पुस्तक सारी रीते सांमळी स्थळ विशेषे योग्य ते सुचनाओ करी आ पुस्तक व्यवहार प्रधान लोकोने तथा नवी पीढीने सारी रीते उप- योगी यवा लायक होवायी अवश्य संग्राह्य एवं ययुं छे" एवो हस्ताक्षर साथे पोतानो अभिप्राय दर्शाव्यो छे तेमज अमारा विद्या- गुरु ये. शा. सं. रा. व्यंकटाचार्य नरहराचार्य उपाध्ये, शास्त्री वडोदा कॉलेज एमना तथा अमारा ज्येष्ठ वंधु ती. वे. शा. सं. रा. रामशास्त्री प्रकाशकर एमना संमतीथी निति करेला आ पुस्तकमाना शास्त्रार्थना विषयो जोईने पण घणो संतोप थयार्नु तेओए जणान्युं छे. सदर अभिप्रायपत्र आ ठेकाणे आपी पुस्तकनुं गौरव करवानी जरूर न लागवाथी ते अत्रे छाप्यु नथी. आ प्रमाणे सर्वान्तर्यामी श्री सद्गुरूनी प्रेरणाथी तयार ययेला पुस्तकनो सप्रेम अंगिकार करी, अधिकारी नवयुवको पोकाना आचार विचारने सुसंस्कृत करी पुस्तकना अते लखेला श्रीकृष्ण भगवानना हेवा प्रमाणे मनुष्य जन्मनुं साफल्य करवा भाग्यवान् यो एवी आशा राखी आ प्रास्ताविक लेस पूर्ण करु छ. वडोदरा, मिती आश्विन चाळकृष्ण गणेश प्रकाशकर ता. ६-१०-२१. सुचना-भा पुस्तक वाचता पर्ग आप पुद्धिपत्र प्रमाणे शुरु परी पी बायु बुद्धोपशम मिती अधिना श्री. ARL LABH प्रकाशकनावे शब्द. . लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म दुर्लभम् । तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम् ।। यस्त्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधीः । स छात्मा स्वं विनिहन्त्यमद्ग्रहात् ॥ श्री शंकराचार्य. प्रिय धर्मबंधु महाशयो ! आप जाणो छोज के आपडे देशकाल परिस्थितिने लीधे संकट रूप बनेला जीवन कलहमां अत्यंत व्यग्र थयेला छीये; अने व्यवहारना संकटोने महान् प्रयलो करीने पण दूर करवा तत्पर थया छीये; तो पण मारे कहेवू पडे छे के परम कृपालु श्रीमन्महेश्वरावतार श्रीमच्छंकराचार्य महाराजे वियेकचूडामणिमां कहेला सिद्धांत तरफ दुर्लक्ष करी शकाय तेम नथी. आचार्य श्री कहे छ:-- " अत्यंत दुर्लभ एवं मनुष्य जन्म, तेमां पुरुषत्व, तेमा पण वेदवेदांगना अध्ययन अध्यापन विगेरेनो अधिकार- संपन्न एवा ब्राह्मणनो अवतार प्राप्त थयो छत्तां; जे मूर्ख ( व्यवहारमस्त-मूढधीः ) जन्म मरण परंपरामांथी मुक्त थवा २८ प्रयत्न करतो नथी तेज " आत्महत्या " करनारो छे, अने तेज केवल व्यवहारग्रस्त थवाने लीधे पोतानो नाश करी ले छे. आ आचार्य श्रीनो सिद्धात ध्यानमा राखी व्यवहारमम रहे होय तो " यथाशक्ति स्वकर्माचरण कन्या वगर गति नथी" एवो सिद्धात अनेक विद्वानोना परिचयने लीधे मारा ध्यानमा आववाथी, तेम देशोद्धार करवा उत्कट इच्छा धरावनारा नवयु वको धर्माचरण तरफ पोतानु लक्ष दोरी शुद्ध चित्त बनशे तोज़ इच्छित कर्ममा फत्ते मेळवशे, एवु निश्चित रीते जणाई आव्याथी, “ व्यवहार प्रधान लोकोने उपयोगी थई शके तेवु पुस्तक बनाववा माटे अमारा प्रेमाक्ति वे शा. सं बाळ कृष्ण गणेश प्रकाश कर* के ने श्री शारदापीठ चातुर्वर्ण्य विद्यालयना मुख्य अध्यापक इता, तेमने विनती करी जे विनतीनो तेमणे प्रेमपूर्वक स्वीकार करी, अनेक अथोना आधारे तथा विद्वानोना समत्तीथी " आ " आतिक्सार-संक्षेप" नामनु पुस्तक मने तयार करी आप्यु. आ पुस्तक श्रीक्षेत्र डाफोर के ज्या" परम कृपालु परमात्मा श्री रणछोडरायजी महाराज विराजमान छे, अने ज्या तेमना कृपाछपनी नीचे घणा यजु शाखीय वाडी मेवाडा विगेरे ब्राह्मणो निवास करे छे" त्याना तथा इतर गामना रहेवासी विप्र वर्गने पोतानु नित्यकर्म सुरम रीते करयानी समजुत आपी शके एवा हेतूथी छापी प्रसिद्ध कन्यु छे. -
२९
आ पुस्तक डाकोर क्षेत्रना यजुर्वेदीय ब्राह्मणोने तथा
डाकोरनी पाठशाळाओमां अभ्यास करनार विद्यार्थिओने विना
मूल्ये आपवामां आवशे.
आशा छे के अमारा व्यवहार प्रधान धर्मबंधुओ तथा
नवयुवको आ पुस्तकनो संग्रह करी तेमा लख्या मुजब पोतानी
शक्ती प्रमाणे स्वधर्माचरण करी ग्रंथकर्ताने तथा मने अंशत:-
पण कृतार्थ करशे.
प्रसिद्ध कर्ता.
डाकोर
मंवत् १९७७
आश्विन शुद्ध ५
गुम्बार
उमाशंकर मंछाराम पाठक.
" " ८ - शुद्धिपत्र. आ प्रमाणे पुस्तक शुद्ध करीने वाचवू. पत्रांक. पंक्ति. অযুত্ত शुद्ध. २ १ आचमन आचमैन आपनी आपणी ६ वर्चः मज्ञा प्रज्ञा वरुणाया वरुणाया १२ पाशा पाशं यो। यो । यस्य नुछसन्दा स्विन ब्रजेत् व्रजेत् पाशा पाश- जलऽस्मिन् जलेऽस्मिन् ३ सर्वशये सर्व० भवेद ११ व्यायपज्जम० घ्यायपध्जम १४ भापम् भाध्यम महिमा महिमा पक्राम प्पप्राम " यस्य नुसन्वा स्पिन्न १ " 1 ३४ १२ ... ... १४ १५ १६ .... १८ .... १८ २४ .... २८ ... .... .... १३ घेर नित्य स्नान कर होय त्यारे विधि १४ प्र० ६ ढुं गौणस्नान क्यारे कर १५ प्र० ७ मुं; भस्मरुद्राक्ष धारण प्रकार १६ भस्मरुद्राक्ष धारण पद्धति भापामां १७ प्र०८ मुं पुरुषसूक्तम् १८ पुरुषसूचनो उपयोग तथा विनियोग १९ प्र०९ मुं प्रातः सन्ध्या प्रयोग २० अथ प्रातः सन्ध्या (भाषामां) २१ प्र० १० मुं; देवपूजानो विधि २२ देवपूजानो माहिती साथे प्रयोग २३ १० ११ मुं; पूजाप्रतिनिधिरूपा शिवप्रतिपत्तिः २४ शिवप्रतिपत्ती क्यारे भणवी २५ शिवप्रतिपत्ती- प्रामाण्य तथा अत्रे संग्रह २६ प्र० १२ मुं; हंसकल्पोक्त सूर्य नमस्कार २७ हंसकल्पोक्त सूर्य नमस्कारनी पद्धति (भा०) २८ प्र० १३ मुं: मध्यान्ह संध्या प्रयोग २९ मध्यान्ह संध्या करवामा विशेष ३० प्र० १४ मुं; ब्रह्मयज्ञ प्रयोग ३१ ब्रह्मयज्ञनो माहिती साथे प्रयोग ३२ प्र० १५ मुं। तर्पण प्रयोग ५० ५२ ५२ .... .... .... ५७ ६. .... .... ....
.... .... .... ૭૨ ७६ ७६ .... .... ८० ८३ .... ३३ ब्रह्मयज्ञ तथा तर्पण अव्यवहित रीते करवा होय तो ३४ तर्पणनी माहिती तथा प्रयोग ३५ तंत्र प्रयोग करवो होय तो विशेष... ३६ प्र० १६ मुं; वैश्वदेव प्रयोग ३७ वैश्वदेवनो समजुती साथे प्रयोग ३८ प्र० १७ मुं; भोजनविधि संक्षेपमा.... ३९ भोजन करवानी पद्धती ४० प्र० १८ मुं; सायं संध्या प्रयोग ४१ सायं संध्यामा विशेष ४२ प्र० १९ मुं; निद्रालेतां पहेला शुं करवं ४३ शयन प्रकार ४४ प्र०२० मुं; यज्ञोपवीत धारण विधि २५ जनोई निकळी गयु होय अथवा तुटयु होय तो न धारण करवानी पद्धति ४६ प्र० २१ मुं; आशौचमां संध्या केटली अने ८७ .... ... ८८ .... .. ८८ .... .... .... १० .... .... केवी करवी .... .... .... ९१ ९२ 2७ आशौचमां संध्या करवानी पद्धति ... .000 भाग २ जो. ८ ब्राझ गुहूर्त कोने केहेयो ९ ग्राम मुहूर्तमा जागृत थईने यूं करवू ...
३६ .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... ५० मांगलिक पदार्थों ५१ आचमनना प्रकार ९५ ५२ पुराणाचमननी पद्धति.... ९५ ५३ स्मार्ताचमननी पद्धति ९७ ५. श्रौताचमननी पद्धति ९८ ५५ श्रोत्रा चमननी पद्धति.... ५६ आचमनना प्रकारोनो विनियोग ५७ तूप्णी आचमननो प्रकार ५८ आचमन एटले झुं १०० ५९ आचमन माटे पाणी केटल लेवु १०० ६० शौचकृपनी आवश्यक्ता १०१ ६१ शास्त्रसंमत धर्मसंकोच करवानी पद्धति ६२ अनाचारी अने अत्याचारीनी निंदा १०२ ६३ देहशुद्धी केवी करवी १०२ ६४ मृतिका केटला वखत लगाडवी १०३ ६५ मृतिका तथा पाणीथी द्रव्य शुद्धी करवानी मर्यादा १०३ ६६ भावदुष्टनी शुद्धी थायज नहीं ६७ शुद्धि माटे आळस करवो नहीं १०४ ६८ सप्त स्नान विधि १०५. ६० स्नान विधिनो संकोच शा माटे? ७० प्रातःम्नाननी आवश्यकता ... .... .... .... .... ... .... १०५ ....
.... 4. .... .... .... .... .... .... ७१ स्नानना गुण ७२ स्नान न करे तो? १०६ ७३ स्नान करवानी अशक्यता होय त्यारे शुं करवू ? १०७ ७४ वस्त्र धारण केवी रीते करतुं ? .... १०८ ७५ प्राणायाम करती चखते नासिकाधारण. ७६ पूरण कुंमन अने रेचन वावत मतभेद १०९ ७७ समंत्रक प्राणायाम ७८ माना लक्षण ७९ तूष्णीं प्राणायाम ८० भस्म धारणनी आवश्यकता ८१ तिलकसमुच्चय ११२, ८२ उपासनांगतिलक तथा तेनी आयता ८३ जलना अंदर जलनोज तिलक करवो ८३ पुरुषसूक्त पापनाशक छे ८५ संध्या करवी ८६ संध्या न करनारनी निंदा ११५ ८७ संध्याकाल ८८ कालतिक्रम थाय तो प्रायश्चित ८९ मध्यान्हसंध्यानो बखत .... .... .... .... .... .... .... ११४, .... .... .... .... .... .... ... ११६. 4.. .... ९० छेपट गौणकाल .... ... ९.१ आळसमां वखत गुमावे तो ...
.... .... .... .... .... ... .... .... ... .... .... ... .... ९२ आशोचमां पण संध्या करवी ११७ ९३ आशौचमा संध्या केवी रीते करवी ? ११७ ९४ संकल्पोपयोगी माहिती ११८ ९५ उपस्थान एकज १२१ ९६ जप प्रकार १२१ ९७ ग्राह्यपक्ष निर्णय ९८ संख्या गणवाना साधननो विचार.... १२२ ९९ रुद्राक्षमाला सर्वोत्तम छे १२३ १०० जप वखते हाथ क्या राखवो १२३ १०१ जप वखते हाथने आच्छादित करवो १२४ १०२ अथ गायत्री मंत्रस्वरूपविचारः १२४ १०३ श्री प. प. शंकराचार्यनी निर्णय १०४ श्रुतिस्मृति तथा युक्तीसिद्ध उपबृंहण १२९ १०५ संशयित बाबतमा ऋग्वेदानुकूल निर्णय सर्व मान्य छ.१३१ १०६ जपनी आवश्यकता १०७ पटफर्मों १०८ एकत्र अथवा पृथक् रेहेवू १३३ १०९ एकत्र रहेनारने धर्म संकोच ११० षोडशोपचार १३६ १११ पंचोपचार .... १३६ १३७ . १२५ १३२ .... .... .... .... .... .... .... ११२ पुरुषसूकन्यास ... ....
.... १३८ १३८ .00 .... .. .... १३९ .... .... ... .... .... .... .... .... .... .... .... ११३ पंचायतन स्थापन प्रकार ११४ सूर्यनमस्कारने श्रौत प्रमाण ११५ ब्रायन-सूत्र ११६ गायत्रीना संबंधमा निर्णय ११७ प्राजापत्यादि तीर्थो ११८ पंचसूना ११९ वैश्वदेवाग्निनिर्णय १२० वैश्वदेवनी आवश्यकता १२१ अन्न वाक्य १२२ अन्ननु आच्छादन तथा अमृतीकरण १२३ प्राणाग्निहोत्रनी आवश्यकता १२४ सायंकालीन कृत्यो करी संव १२५ केवी रोते मुंq ? १२६ उपवीती तथा पद्धशिख रहे, १२७ मज्ञोपवीत धारण निर्णय १२८ उपयोत्यादि लक्षण १२९ यज्ञोपवीत ( नर्बु ) क्यारे धारण कखं ? १३० दोपने लीधे विशिख होय तो? १३१ प्रण पवित्र पावतो १३२ स्पर्शास्सर्स बाबत विचार १३३ समाजमा स्पर्श विचार .. १४२ .... .... -.. .... .... २४२ १४३ १४३ .... .... .... .000 .... .... १४३ १४१ १४५ १४५ .... .... 04.
४०
....
....
....
....
....
,
१३४ वखत उपर कर्म न थाय तो....
१४५
१३५ नास्तिकसंग परित्याग
१३६ घातक बाबतो
१३७ यथाशक्ति स्वकर्म करवं
१४६
१३८ धर्म संग्रह करवो
....
१३९ धर्मएज विशेष-भेदक छे.
१४० व्यवहारमा केवु वर्तवू ?
१४७
१४१ शास्त्रमर्यादा छोडनार कृतार्थ थाय नहीं १४७
१४२ श्रीकृष्ण भगवानन, शास्त्रोक्त कर्म करवा माटे आज्ञा.१४८
१४३ ईश्वरसेवा करी जन्मनुं साफल्य कराय छे १४८
....
....
....
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१ इति विषयानुक्रमणिका.
श्री. श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं साधनपञ्चकम् ॥ वेदो नित्यपघीयतां तदुदितं कर्म वनुष्ठीयताम् । तेनेशस्य विधीयतामपचितिः काम्ये मतिस्त्यज्यताम् ।। 'पापौघ' परिध्यतां भवसुख दोपोऽनुसंघीयताम् । आत्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात्तूर्ण विनिर्गम्यनाम् ॥१॥ निरंतर अध्ययनधर्मने अनुसरी वेदपठण करो, अने वेदे प्रति- पादित करेलु कर्म सारी रीते करो. आ प्रमाणे पोतानुं विहित कर्म करी तेना वडेज जगन्नियंता परमेश्वरनी पूजा ( आज्ञापालनरूप सत्कार एज पूजा ) करो, पण काम्य कर्म करवा दिये बुद्धि न राखो. (छोडी द्यो.) “नित्यनैमित्तिक कर्मो वडेज " पापसमूह नष्ट करो, अने “फरी पापसंचय न थवा माटे" संसारना सुखने विषे दोषदृष्टीज राखो. आत्मप्राप्तीनी इच्छा राखी सर्व व्यवहार करो, अने जेम बने तेम (जलदी ) उतावळ करी " वैराग्य यतांज" पोताना गृहमाथी-गृहस्थाश्रममांथी-बहार निकळी पडो ॥ १॥ संगः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्ति हा धीयताम् । शान्त्यादिः परिचीयतो दृढतरं कौशु संत्यज्यताम् ।। सद्विद्वानुपसर्पता प्रतिदिनं तत्पादुके सेव्यताम् । ब्रमकाक्षरमयनां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्।।२॥ सत्पुरुषोनो संग करो; परमात्मानी दृढ एटले अव्यभिचा- रिणी भक्ति हृदयमा राखो, वैराग्यद्वारा ईशकृपापात्र बनावनारा १२ शान्ति तितिक्षा इत्यादि सद्गुणो प्राप्त थवा माटे योग्य अभ्यास करो; अने जे आपणने प्रतिबंधक थई पडशे एवं कोई पण प्रकार- अहंकारपूर्वक करवामां आवतुं कर्म हशे ते झट् छोडी चो. सच्छास्त्रनो अभ्यास करी तेनो अनुभव लेनारो विद्वान् मळे तो तेनी पासे जवानुं राखो, तथा दररोज तेनी चरण सेवा पण करो. ज्यारे ते कृपा करवा तयार थाय त्यारे तेनी पासे . एक अद्वितीय अक्षर अविनाशी एवा ब्रह्म-आत्मतत्व-नीज याचना करो अने उपदेश तरीके तेमना मुखमाथी निकळतुं वेदान्त-उपनिषद् वाक्य सांभळो ॥ २ ॥ वाक्यार्थश्च विचार्यतां श्रुतिशिरःपक्षः समाश्रीयताम्। दुस्तकात्सुबिरम्यतां श्रुतिमतस्तर्कोऽनुमन्धीयताम् । ब्रह्मवास्मि विभाध्यतामहरहर्गवः परित्यज्यताम् । देहेऽहम्मतिरुपता बुधजनैर्वादः परित्यज्यताम्॥३॥ उपदेश तरीके सांभळेला उपनिषद् वाक्योनो अर्थ विचा- रमा ल्यो, तेम करतां मनमा विकल्प उत्पन्न थाय तो वेदांतशा- सना सिद्धांतनेज ग्राह्य मानी तेनी शान्ति करो. गुरु वाक्य उपर विश्वास राखीनेज शास्त्र विचार करवो. तर्क बिलकुल करवो नहीं; अने कदाच करवानोज होय तो वेदने-बेदसिद्धांतने अनुकूल एवोज तर्क करवो पण दुस्तर्कथी तो पूर्ण दूर रहे. उपनिषद्वाक्यसिद्धांतरूप-हुं ब्रह्मज छु.-एq नितर मनमा मानी ले, तेम सर्व प्रकारनो गर्व-कर्तृत्वाभिमान दिवसे दिवसे छोडी देवो. देहना विशे अहं भावना छोडी द्यो अने विद्वान् लोकोनी साथे वादविवाद करवानु पण छोडो. ॥ ३ ॥ क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यताम्। खाद्वन्नं न तु याच्यतां विधिवशात्माप्तेन संतुष्यताम्॥ शीतोष्णादि विषह्यतां न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यताम् । औदासीन्यमभीप्स्यतां जनकृपानठुर्यमुत्सृज्यताम् ॥४॥ " जितं सर्व जिते रसे " रस-सनेंद्रियनें जित्यु एटले सर्व जित्यु छ एवं समजवु एवो सिद्धांत होवाथी दरेक मुमुक्षए अथवा मनुष्यमात्रे " जिव्हालोल्य " ना आधीन न थq; ए तेनी फरज छे. जिव्हालल्य बंधक होवाथी तेनार्थी अलग रहेवा माटे आचार्य श्री कहे छ के- क्षुधारूप व्याधीने दूरकरो, अने तेटला माटे दररोज औषध सरखी मिशा इष्ट अथवा अनिष्ट स्वादनो विचार न करतां खाओ; स्वादु अन्न मागशो नही, दैववशात् जे प्राप्त थशे तेना वडेज संतुष्ट रहो. शीत उष्ण वात वर्षा विगेरेनी पीडा सहन करो, निरुपयोगी वाक्य उच्चारशोज नही. कोईनी माथे मित्रता अथवा शत्रुत्व न मेळवता केवळ उदासीनताने मेळजवानी इच्छा करो; अने तेवी उदासीनता प्राप्त थवा माटे लोकोए करेला उपकार तथा अपकार भुली जाओ।॥ ४ ॥ एकान्ते सुखमास्यता परतरे चेतः समाधीयताम् । पूर्णात्मा मुसमीक्ष्यतां जगदिदं तदयितं दृश्यता ॥.
k . आ माफर्म प्रविलाप्यतां चितिवलान्नाप्युत्तरैः श्लिष्पताम् । प्रारब्धंत्विह मुज्यतामय परब्रह्मात्मना स्थीयताम् ॥५॥ एकान्त स्थलने विशे सुखे बेसो परतरतत्वने-आत्माने विशे अन्तः करणने स्थापित करो. आत्मा ए कोई प्रमाणवडे मापेलो नथी अतएव सर्वतः पूर्ण छे एवं विचारो अने ( सत्य नो विचार करतां सत्य तरीके भासमान थतुं) आ जगत् आत्मावडे बाधित छे एवं जाणो; ज्ञानबलवडे संचित कर्मनो नाश करो अने क्रियमाण कर्मोथी न जोडाओ, जन्ममा मात्र प्रारब्ध भोगो अने पछी ( कर्म नाश थया पछी) परब्रह्मरूपे रहो ॥ ५॥ यः श्लोकपंचकमिदं पठते मनुष्यः । सश्चिन्तयत्यनुदिन स्थिरतामुपेत्य । तस्याशु संसतिदवानलतीवघोर-। तापः प्रशान्तिमुपयाति वितिप्रसादात् ॥ ६ ॥ ने मनुप्य स्थिर बनीने दररोज आ पांच श्लोकनु पठन करशे तथा तेना अर्थनो विचार करशे, तेनो संसाररूपदावामीनो प्रखर अने भयंकर ताप परमात्माना प्रसादवडे जलदी शांतीने पामशे ॥ ६॥ • ॥ इति श्री. प. प. श्रीमच्छंकराचार्य विरचितं साधन पञ्चकस्तोत्रम् ।।
॥ श्री दत्तः प्रसन्नोऽस्तु ॥ श्री शुक्लयजुर्वेदीय आह्निकसार-संक्षेप. PALLALLY भाग १ लो. वासुदेवो यतिश्रेष्ठः सदा विजयतेतराम् । स कृपाविटपी छायामासुरः पातु मां सदा ॥१॥ हृत्सरोरुहपीठस्थ सद्स्प्रेरिना मम । सूनृता वाग् दिशवर्थानखिलान् श्रुतिसम्मतान् ॥२॥ प्रकरण १ टुं. रोगरहित माणसे ब्राह्म मुहूर्तमा जागृत थईने पोताना इष्टदेवर्नु स्मरण करी, आदर्शादि मांगे- लिक पदार्थोर्नु यथासंभव अवलोकन करी; "समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनपण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे ॥" आ श्लोकवडे "पृथ्वीनी प्रार्थना" करी; शयननो ( पथारीनो) त्याग करवो. मुखशुद्धि माटे त्रण उत्थान प्रकार.
२
N
कोगळा करी; तथा तूष्णी आचमन करी; देव, द्विज, गुरु,
गाय, माता, तथा पितानुं सगवड प्रमाणे दर्शन लई; दिवसमा
करवा धारेला धार्मिक तथा आर्थिक कृत्योनु चिंतन करवु.
मागलिक पदार्थोमा जमणा हाथनो पण मागलिक तरीके समावेश
करेलो छे; तेथी इतर मागलिक पदार्थोना अभावे, तथा मागलिक
पदार्थनु दर्शन लेता पेहेलाज अमागलिक पदार्थनुं दर्शन थवानो
सभव होय त्यारे, जमणा हाथना होळीनु दर्शन जरूर लेनु.
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प्रकरण २ जं.
( गामना के नगरना) बहार खुल्ली जगामा
पूत्रनो उत्सर्ग करवा माटे" जवानी
मलमूनोत्सर्ग करवा
जवा माटे सामान्यन इच्छा होय तो, वनता सुधी नैर्ऋत्य
गाखीय पद्धति
दिशामा एक बाणना प्रक्षेप जेटलु
(कमीमा कमी सो हाथ ) दूर जई, सुका पानडा के घास
अथवा सुकी खरी पडेली न्हानी डाखडिओ विगेरे जमीन उपर
पाथरी, " रात्रे दक्षिण दिशा तरफ अने दिवसे उत्तर दिशा
तरफ मुख राखी" बेसवु. सध्या कालमा ( न रात के दिवस
गणाय एवी समये ) उत्तर दिशा तरफ मुख राखी बेसवु. मल
अने मूत्रनो उत्सर्ग करती वखते जनोईने प्रथम कठे करी,
आपनी नजरे न आवे एवी रीते काने वींटवु. तेमज मुग्व मस्तल
अने नाक ए वत्रयो ढाकवा तथा मौन राखवु.
३
"
खुल्ली जगामा उत्सर्ग माटे बेसवु होय त्यारे " रीलो
घास, कीडिओना दर, जवा आववानो रम्तो, जल, जलाशयना
नजीकनो प्रदेश, राफडो, अग्नी, भम्म, (रासोडो) गोशाळा,
गोमय, पर्वत के टेकरीनु उचु शिखर, म्ममान, पडयानु ज्या
भय होय तेवु रोई पण स्थल, धर्मशाळा, प्रवासिओने उपयोगी
थनारा वृक्षोना (मूळ ) नजीरनो प्रदेश, अने खेडेल सेतर"
एटा स्थानो छोडीने बेसवु तेमज चालता चारता के उभा
उमा मलमूवोत्मर्ग" न करवो अग्नी, वायु, सूर्य, चद्र,
तीर्थ स्त्री, गुरु, के जामण एमना सन्मुस पण (मल० माटे)
बेसवु नहीं आ वारत जाळववा जता प्रथम ल्लो दिशानो
नियम न सचवाय तो, अथवा "गोविंदार्णव" नामना ग्रथमा
कह्या मुजब शोपमाज मलमूत्रोत्सर्ग माटे जवु होय त्यारे
दिशाना नियमनो भग थाय तो हरकत नथी आ मल० नी)
वखते शुद्धि करवा माटे साथे रारावानु उदकपात · मुननो
छाटो न उडे " एटले छेटे राखवु
मलमूनोत्सर्ग करी रह्या पछी साथे आणेला जलवडे तथा
सारी मृत्तिरावडे वेड अपरेंद्रियोने " गध
शुद्धि करवाना रीत
लेपरहित थई शके तेवा"
शुद्ध परी
योग्य स्थळे आवी वीजा पानमा प्रथमयीज मुफेरा जन्मडे तथा
सारी मृचिकावडे येउ पगने तथा बेउ हाथने गन्ध तथा रेप नष्ट
थाय त्या सुधी शुद्ध करवा, अने पोतानी डागी बाजूए बार
है
कोगळा नाखवा. साथे रासेल जलपान इतर उपयोगमा लेवानु
होय तो तेनी पण आ प्राणेज ( मृत्तिका अने जलथी) शुद्धी
करवी. शुद्धि करवानी गावतमा कदापि आळस करवी नही,
कारण ब्राह्मणत्व ए शुद्धि मूलकज छ
इद्रियोनी शुद्धि करवा माटे, तथा हाथ पग धोवा माटे
पासे जलाशय होय तो पण स्वतत्र जल
शुध्यर्थ उल अने पात्रोमा जल लई तेनोज उपयोग करवो
कारण आ शुद्धी " उद्धृत जलवडे "
एटले “ जलाशयमाथी वीजा पात्रमा राधेला जलवडेज करवी"
एवी शास्त्रनी आज्ञा छे आ प्रमाणे करवाथी स्नानादि विधि
माटे जलाशयनु जल शुद्ध रही सासगिक रोगोनो फेलाव
थाय नहीं
मत्तिा क्वा लवी?
शुद्धि माटे ‘राफडानी, उदरना दरनी, जलना अदरनी.
बीजाए वापरीने वाकी रहेली, भीतनी, रस्तामानी, तथा कोई पण
प्रकारनो अपवित्रतानो सभर होय तेवा स्थाननी मृत्तिका न देता
शुद्ध मृत्तिानोन उपयोग करवो (मृत्तिकाना अभावमा राखोडानो
उपयोग करवामा आवतो देखाय छे, तेवु करवाने प्रमाण
" शुद्धि प्रकरणमा शोधक द्रव्योमा तेनो स्वीकार करेलो छे")
आ प्रमाणे शौचविधि थया पछी दतधावन करवु
प्रकरण ३ जं.
दतधावन
परवाना
दतधावन ए काठ, मृत्तिका, आगोविगेरे शुद्ध वनम्पतीना
पानडा, अथवा शुद्धि प्रकरणमा वतावेला
मानो
भम्मादि योग्य पदार्थ, पैकी अनुकूल पदार्थ
वडे फरवु. काष्ठ रेवु होय तो ते सामान्यत
काटावाळा वृक्षोनु, क्षीर वृक्षोनु, (पीपळो वट विगेरेनु ) अघेडा
विगेरे विहित वनम्पति पैफीनु, अने आपणा मुखने तथा दातने
नुकसानकारक न थाय तेबु लेवु. दतधावन काष्ठ ब्राह्मणोए
(नियोए पण ) टचली आगळी जेटलु जाइ अने धार आगळ
राबु लेवु. (प्रमाण पोत पोताना आगळीओनु समजवु.)
उतनापन
काठनो अभाव होय त्यारे. अने अमावास्या, श्राद्धतिथि
विगेरे पितृतिथीना तथा एकादगी विगेरे
माननी
अपवाद अन प्रतिनिधि, व्रत के उपासना दिवसे, अथवा इतर
कारणने लिधे काठनो स्वीकार न करवानो
होय त्यारे, उपर लसेला काष्ठ गिवायना पदार्थवडे दंतधावन
करवु. दतधावन करती वेळाए दातन तर्जनी एटले अगुष्ठना
नजीकनी आगळी अडवा देवी नहीं. दन्त धावन करता विशेषत
प्रत उपवासना दिवसे दातमाथी रोही न निकळयु जोइए, कारण
तेवु थवाथी व्रत उपवासनो भग थाय. जेमना दातमाथी लोही
निरळ्या वगर रेहेज नहीं एवु होय तेवाओए प्रत उपवासना
दतधावन पद्धति " दिवसे केवल बार कोगळा करवा; एटले तेटलाीज मुखशुद्धि तथा दंतधावन थाय छे. काष्ठथी दतधावन करवू होय त्यारे " आयुर्वलं यशो वर्षः प्रजाः पशु वसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञा च मेधां च तन्नो धेहि वनस्पते ।। आ मंत्र बोली काष्ठम्थवनस्पतिदेवतानी प्रार्थना करी मुखदुर्गन्धिनाशाय दन्तानाञ्च विशुद्धये । टीवनाय च गात्राणां कुर्वेऽह दन्तधावनम् ॥ आ मंत्र बोली दत- घावन कर्मनो आरंभ करवो. दन्तमल तथा जिव्हामल काढी रह्या पछी जलवडे अतर्वाह्य मुखशुद्धि करी पोतानी डाबी बाजू तरफ बार कोगळा करवा. ज्यारे दन्तधावन माटे काष्ठ लेवु न होय त्यारे प्रथमनो बनस्पतिप्रार्थनानो श्लोक न बोलता बाकीनो विधि करवो. आ प्रमाणे दतधावन थया पछी वखतने अनुसरीने योडी पण ईश स्तुनी अथवा इष्ट स्तुती करवी. उदाहरण तरीके प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशम् । गद्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ॥ खट्वाइशूलवरदाभयहस्तमीशम् । संसाररोगहरमौपधपद्वितीयम् ॥ १ ॥ प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजादेहम् । सर्ग-स्थिति-प्रलय-कारणमादिदेवम् ।।
. विश्वश्वरं विजितविश्वमनोभिरामम् । संसार-रोग-हरमौषधमद्वितीयम् ॥ २ ॥ मातर्भजामि शिवमेकमनंतमाद्यम् । वेदान्तवेद्यमखिलं पुरुपं महान्तम् ।। नामादि-भेद-रहितं पडभावशून्यम् । संसाररोगहरमौषयमद्वितीयम् ॥ ३ ॥ मातः समुत्थाय शिवं विचिन्य । श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति । ते दुःखजालं बहु-जन्म-सश्चितम् । हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भोः ॥ ४ ॥ इति शंकरस्तुतिः प्रकरण ४ थु. ॥ अथ नद्यादौ प्रातःस्नान विधिः । तत्रादौ भस्म, धोतं कार्पासं कौशेयमौर्ण वा करवानी मंक्षिप्त विधि वस्त्रयुगमौर्णान्तरितं, जलपात्रादि- चादाय तीर्थतटं गत्वा शुचौ देशे संस्थाप्य, प्रक्षालित-पाणि-पादः कृतमलापकर्पणलानो बद्धशिख उपवीत्याचम्घ सङ्कल्पं कुर्यात् । तद्यथा ॥ ॐ केशवायनमः स्वाहा । ॐ नारायणाय नमः स्वाहा । ॐ माधवाय नमः स्वाहा इत्याचम्य । ॐ गोविंदाय नमः इति हस्तं प्रक्षाल्य हस्ते जलमादाय "विष्णु विष्णु विष्णुः ८ .... आत्मनः अद्य महामांगत्यमदे मासोत्तमे....... मासे........पक्षे चासरान्वितायां ..""शुभपुण्यतिथौ मम श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलमाप्त्यर्थ कायिक-वाचिक मानसिक सांसर्गिकादि दोप-परिहार-द्वारा नित्य-नैमित्तिकादि कर्माई-शुचिता-सिध्यर्थं श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थ.. तीर्थ मातःस्नान गहं करिष्ये । इति पूर्वाभिमुखास्तिछन् सङ्कल्पयेत् । ततः प्रवाहाभिमुखः प्राङ्मुस उदङ्मुखो वा न्युजाखलिना तीर्थमभिमत्रयेत् ।। ॐ उरु: हि राजा धरुण श्चकार सूर्याय पधा मन् तबाउं । अपदे पादा पर्तिधातवे फरुतापयुक्ता हृदयाविधश्चित् । नमो वरुणायामिष्तिो धरुणस्य पाशा’ ॥ इति मत्रेण तीर्थमभिमन्य त्रिनिमज्योन्मज्य दुर्वाभिर्दभरगुल्योर्चा ( देवतीर्थेन ) आत्मानं मार्जयेत् ॐ आपोरिष्ठा मयो भव स्तानऽऊजें दधातन । महेरणाय चक्षसे ॥ १ ॥ यो 4- शिवतमी रमतस्य भाजयते इन । जशती रिच मातरं + ॥२॥ तस्मा ऽअरंग मामयो यस्य क्षयाय जिन्वय । आप जनयथा चन ॥३॥ तनों 5 तर्नले निमोऽ नुच्छसन्या ऽ घमर्पणं फुर्याद
वेलाए मम्म,
ॐ
दुपदा दिव मुमुचान स्विन्न स्नातो मलादिव।
पूतम्प्रविण वाज्ज्य मा शुन्धन्तु मैनंस ॥ *
इति मन्त्रान्ते उन्मज्य जलादहिनिर्गच्छन् जलाञ्जलिमेकं
तटे निक्षिपेत् । तत्र मन्त्रः। यन्मया दृपितं तोयं
शारीरमलसम्भवात् । तस्य पापस्य शुध्यर्थ
यक्षम'णं तर्पयाम्यहम् ॥इति । ततो जलादहिरागत्य
धौते वाससी परिधाय भस्मधारणमाचमनं माणायामञ्च
कृत्वा मृदं ब्रजेत् । इति नयादौ प्रातःस्नानविधिः॥
वे नद्यादि तीर्थमा मातःस्नाननो विधि-अरुणोदयनी
धोईने सुकवेला कपासना
सार्थमा निन्य प्रात.
के रेशमना वस्रो, अथवा कामळी,
ऊर्णा-
वस्त्रना अंदर वीटी मुकेला; तथा लोटो
विगेरे पात्र संध्यादि कर्मोपयोगी जल लाववा माटे, दर्भ दूर्वा
विगरे उपयुक्त वस्तुओ अनुकूलता प्रमाणे लई तीर्थना काठे जवू.
अने पवित्र स्थळ उपर सर्व वस्तुओ मुकी प्रथम हाथ पग धोह
जळामयमा उतरी मलापकर्षण स्नान करी गरीर स्वच्छ कर.
पछी शिखा बांधी यज्ञोपवीत सुन्य राखी आचमन करी संकल्प
कग्यो. ते आ प्रमाणे:-ॐ केशवा० इत्यादि त्रण मंत्र वडे त्रण
वसत जमणा हथेलीमा हृदय मुधी जई शके एटलं पाणी लई
पीवु अने ॐ गोविंदायनमः आ मंत्र बोली हाथ धोइ नाखी,
फरी जमणा हाथमा पाणी लईने “ विष्णु णु विष्णुः
स्नाननी प्रकार
१०
अहींथी
करिष्ये " सुधी बोलीने सकल्प मुकवो. पछी प्रवाह
तरफ, पूर्व दिशा तरफ, अथवा उत्तर दिशा तरफ मुख राखी
अधोमुख अञ्जलि वडे तीर्थनु अभिमन्त्रण कर ॐ उरु हि-
राजा. पाशा - ॥ १ ॥ आ मत्र बोली तीर्थनु अभिमन्त्रण
कन्या पछी त्रण वसत निमज्जन करी (डबकीयोमरी ) दूर्वा
दर्भ अथवा आगळीओना अग्र वडे पाणी लई मस्तक उपर
मार्जन करवु. माजन करती वेळाए बोलवाना मत्रो
आपो हिप्ठा यंथाचन 5 ॥ ३ ॥ * पछी पाणीमा डुबी
रहीने अथवा श्वासोच्छास न थाय तेवी रीते ( नासिकान्त )
डुबीने अधमर्षण करवु तेनो मत्र -ॐ द्रुपदार्दिव० नस ॥
आ मन्त्र मनमा बोली डुबेला होईए तो उन्मज्जन करी, जला
शयना बहार आवता एक अजली पाणी काठे नाखवु
तेनो
मन्त्र -य-मयाद० म्यहम् ॥ पछी पाणीमाथी बहार आवी,
शरीर कोरु करी, धीत वस्त्र धारण करी भस्मधारण, आचमन,
अने प्राणायाम करी घेर जवु (सध्योपासना जलाशय उपर
करवी होय, अने प्रथमथीज तेवी तैयारी राखी होय तो ते करवा
हरकत नथी ) आ प्रमाणे नद्यादि जलाशय के तीर्थ उपर
प्रात स्नान करवानो विधि समजवो.
,
प्रकरण ५ मुं. ॥ अथ गृहे नित्यस्नानविधिः ॥ शुद्धपात्रे शीतोदकमादाय तत्रोष्णोदकं यथे- घर नित्य प्रात.स्नान- नो विधि. च्छं निक्षिप्य प्राङ्मुख उदङ्मुखो वा काष्ठफलकाद्यासन उपविश्य हस्त- पादं प्रक्षाल्प गण्डूपत्रयं कृत्वा पादत आरभ्यामस्तकान्तं मलापकर्षणस्नानं विधाय पूर्ववत् संकल्पं कुर्यात् “ अत्र संकल्पे " तीर्थे " इत्यस्य स्थाने "गृहे " इति वक्त- व्यम् । तथा च गृहेस्नाने कर्तव्ये तीर्थानिमन्त्रणमानना- घमर्पणयक्ष्यतर्पणानां लोपः ॥ संकल्पान्ते स्नानीयोदके र्थिभावनां तीर्थस्मरणञ्च कुर्यात् । तद्यथा । वं राना सर्वतीर्थानां त्वमेव जगतः पिता । शचितं देहि मे तार्थ तीर्थराज नमोस्तुते ॥ नमामि गङ्गै तत्र पादपङ्कन--सुरासुरै न्दित दिव्यरूपम्। भुक्तिश्च मुक्तिश्च ददासि नित्यं भावानुमारेण सदा नराणाम् ।। पुष्करायानि तीर्थानि गङ्गायाः सरितस्तथा । आगच्छन्तु पवित्राणि स्नानकाले सदा मम ।। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलऽस्मिन् सन्निधि कुरु ।।
१२
नन्दिनी नलिनी सीता मालती च मलापहा ।
विष्णुपादान्जसम्भूता गङ्गा त्रिपथगामिनी ।
भागीरथी भोगवती जान्हवी त्रिदशेश्वरी ।।
द्वादशैतानि नामानि या यत्र जलाशये ।
स्नानोद्यत पठेत्तत्र गङ्गास्नानफलं भवेत् ।।
इति मत्रान् पठन् स्नात्वा शरीरं प्रमृज्य वासो
धारणादि कुर्यात् । इति गृहे नित्यस्नानविधि ॥
हवे घरमाज नित्यनो मातःस्नान विधि । स्वच्छ अने पवित्र
घेर नित्यस्नान करयु एवा ताबाना, पितळना, के बीजा एवाज
हाय त्यारे विधि
पानमा प्रथम थड्ड पाणी लई, तेमा पोताना
मर्जी प्रमाणे उष्णोदक उमेखु, अने पूर्व अथवा उत्तर दिशा
तरफ मुख राखी पाटला विगेरे आसन उपर बेसीने हाथ पग
धोई, पोतानी डावी बाजू तरफ त्रण कोगळा नाखी, पगथी
आरभी मस्तक सुधी प्रथम पाणी लई 'मलापकर्षण"
(एटरे शरीरनोमर दूर करवा माटे विहित एवु) स्नान परी, कर्म
परवानो अधिकार प्राप्त थवा माटे तथा जोइती पवित्रता प्राप्त
थवा माटे पूर्व रख्या प्रमाणे "विष्णु विष्णु विष्णुः" अहींथी
आरभी "रिये" सुधी बोरीने सकल्प मुकवो सरल्पमा
तीर्थे प्रातःस्नानं एना बदले गहे प्रात स्नानं एवु
योल्वु तेमज घेर खान करती वखते " तीर्थ, अभिमत्रण,
मार्जन, अधमर्पण अने यक्ष्मतर्पण" एटली बाबतोनो लोपकरवो
,
संकल्प थया पछी सान करवा माटे लीधेला जलने विशे तीर्थ
भावना करवी तथा तीर्थोनुं स्मरण पण कर. ते आ प्रमाणे:-
त्वं राना म० शये ॥ ६ ॥ आ मंत्र बोलता बोलतां
स्नान करी शरीर लुछी नांखी वस्त्रधारणादि कृत्यो करवा.
आ प्रमाणे घेर नित्य प्रातःस्नान करवानो विधि सम्जवो.॥
प्रकरण ६ हुँ.
गरीरना अस्वस्थताने लीधे जलस्नान करवा अशक्यता
होय तो प्रातःस्नान कन्या पछी काई
गोणम्नान क्यारे
करवं.
कारणसर जोइती पवित्रता नही रही
होय त्यारे; तेमज विवाहादिकना प्रसंगे,
जनसमूहमा जई आन्या पछी; अने अस्पृश्य माणसनो के
पदार्थनो परंपरा संबंध थयो होय त्यारे; योग्य पवित्रता साचववा
माटे गोर्णस्नान करवं.
आ गौणसान करवाथी संध्या जप वेदाभ्यास तथा
एवाज वीजा ( असहाय साधन वगरना ) कर्मो करवा पुरती
शुद्धी प्राप्त थाय छे; परंतु श्राद्ध करवाने के श्राद्धमा क्षण लई
श्राद्धान्न भोजन करवाने, पूजा, होम वैश्वदेव, तथा एवाज बीजा
को करवाने शुद्धि, मळती नथी. आ कर्मों करवा होय तो
जलमान कर.
१४
भस्म रुद्राक्ष धारण
'ग्रकार.
,
प्रकरण ७ मुं.
अध संध्यादिकर्माधिकारप्राप्त्यर्थमाचमनं
भस्मादिधारणञ्च कथ्यते ॥
उक्तवद्यथाविधि स्नात्वा
धौते
वाससी परिधाय कृमिकीटकादि
वर्जिने निरुपद्रचे स्थाने दर्भाद्यासनमास्तीर्य प्राङ्मुख
उदङ्मुखो चोपविश्याफेनाभिः शीताभिः पूताभिचाद्भिः
पूर्णकलशमुपपात्रादिसहित, भस्म, रुद्राक्षमालादि च
संपाद्य कर्म समारभेत् ।
तत्रादौ तूष्णीमाचमनं प्राणायामञ्च कृत्वा विश्वधरं
ध्यायनन्तःकरणमन्तर्मुखं विधाय वामपाणौ
संस्थाप्योदकेनाकृत्य करद्वयेन संपर्य व्यायुपमिति
मंत्रस्य नारायण ऋपिः आशी देवता उष्णिक्छन्दः
भस्मत्रिपुण्ड्धारण विनियोगः
ध्यायुप जमदग्नेऽ कश्यास्य व्यायुपम् । यहे.
येपुं व्यायुपतन्नोऽअस्तु व्यायुपम् ॥ इति मंत्रण ललाटे
अंसे हृदये नाभौ पृष्ठे प्रीवायां च त्रिपुण्ड्रान् धारयेत् ।।
अथ रुद्राक्षमालां " व्यंक मित्यस्य वशिष्ठ ऋषिः
पंचकोरुद्रो देवता अनुष्टुप्छन्दः रुद्राक्षपालाधारण
विनियोगः
भस्म
ॐ इयम्बकंव्यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् । कुकमिव बन्धना मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ " इति मवेणाभिमन्य धारयेत् । ततः शुध्यर्थं पुरुषसूक्तं पठेत् ॥ भम्म रुद्राक्ष धारण पद्धति. "जमणो हाथ हवे संध्यादि कर्म करवा प्रारंभ करवानो अधिकार प्राप्त थवा माटे आचमन भस्म धारण विगेरे कहुं छु. उपर लखी गया मुजब यथाविधि खान परवारी, धोयेलं शुद्ध अने पवित्र एवं वन पद्धतिसर पहेरी, बीजं तेवुज वस्त्र वहार उघाडो रहे तेवी रीते " ओढी कृमि कीटादि वर्जित अने निरुपद्रव एवा स्थान उपर दर्भ- आसन, मृगाजिन अने कामळी आ त्रणे, अथवा आ त्रण पैकी जे शक्य होय ते; किंचा काष्ठादि निर्मित पण आसन लई, उचर के पूर्व तरफ मुख करी तेना उपर बेसवु. स्वच्छ फीण के परपोटा वगरनुं ठंड पाणी लई तेनाथी भरेलो एक कलश, पवालं, आचमनी, तरमाणी, भस्म, रुद्राक्षमाळा, अर्घ्यपात्र, चंदनाक्षतादि, यथाशक्ति सामग्री संपादन करी पछी कर्मनो आरंभ करवो. एटले फर्म समाप्त थतां पहेला बच्चे उठवानी अगर व्यवहारिक भाषा बोल- वानी पण जरूर न पडे. , प्रथम तूष्णों आचमन तथा प्राणायाम करी विश्वेश्वरनु ध्यान करना अन्तःकरणने अन्तर्मुख पटले विषय परामुख
राखी जमणा हाथवडे भस्म ला डावा हाथमां मुकी जलवडे
पल्हाळी येउ हाथे चोळीने "च्यायुषमिति छन्दः भस्मै त्रिपुण्डू
धोरणे ।" व्यायुपज्जम० पम् * आ मंत्र बोली कपाळ,
देउ स्कन्ध, हृदय, नाभिस्थान पृष्ठस्थान, गळू, आ प्रत्येक स्थळे
त्रिपुण्डू करवा; पछी रुद्राक्ष माळाने " त्र्यंबकमित्यस्य० छन्दः
रुद्राक्ष माला धारणे० ॥ ॐ त्र्यम्बकम्प० तात्
आ मन्त्रथी अभिमन्त्रण करी घारण करवी. अने शुद्धी माटे
पुरुषसूक्तर्नु पठन कर.
प्रकरण ८ मुं.
सहसशीर्षेतिपोडशर्चस्यसूक्तस्य नारायणऋषिः अनुष्टुप्
छन्दः अन्त्यात्रिष्टुप् । शरीर
ॐ सहस्रशी पुरुप ई सहस्राक्ष सहस्रपाद ।
स भूमि ६ मतस्प्पृक्त्वा त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥ पुरुष
एवेद : सर्च य्यद्भूतं य्यर्च भाव्यम् । उतामृतत्त्वस्येशांनो
यदन्नैनातिरोहति ॥२॥ एतावानस्य महिमा तोज्ज्याथि
पूरुपईपादौस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥३॥
विपादूर्ध्व 5 उदॆत्पुरंप 5 पादौस्येहाभवत्पुन ।
ततो विप्पर व्यंक्रामत्साशनानाने 5 अभि ॥४॥
सो बिराई जायत विराजो 5 अधि पूरुष ! स जातो अत्यापित 'पश्चाभूमिमयों पुरः ॥ ५ ॥ तस्माद्यज्ञास हुन 5 सम्भृतम्पृषदाज्यम् । प्रस्ताँश्चके वायव्यानारण्याग्ग्राम्याव ये ॥६॥ तस्माद्यज्ञास त । नाच सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्मादय. जुस्तम्मादजायत ।। ७॥ तस्मादन्या 5 अजायन्तु ये के चौभयादत । गायौं ह जज्ञिरे तस्मा तस्माज्जाता ऽ अजा. वयं ॥८॥ ययज्ञम्यर्हिषि पौलम्पुरुषजातमन्ना तेनं देवा अयनन्त साध्याऽ ऋषयश्च ये ॥९॥ यत्पुरुष व्यदधु कतिधा व्यफलयन् । मुखदिमस्यासी किम्याहू किमूरू पादी 5 उच्च्यते ॥ १०॥ ब्राह्मणोऽ स्प मुखं मासीद्धाइ राजन्न्यः कृतः । अरू तदस्य यद्देश्य : पझ्या शूद्रो ऽ अजायत ॥ ११ ॥ चन्द्रमा मनसो जात थक्षो के सूर्योs अजायत । भोत्राद्वायुर्थ पाणश्च मुखाग्नि रंजायत ॥ १२ ॥ नाभ्यो ऽ आप्तीढनरिक्ष ६ शीनों चौ समवर्वत । पद्भ्याम्भूपिर्दिश श्रीवात्तथा लोका अंकल्पयन् ॥ १३ ॥ यत्पुरुपेण हविषा देवा यज्ञमतन्यत । यसन्तोस्यासीदाज्यवीष्म 5 इक्ष्म शरद्धवि ॥१॥ सम्मास्यासम्परिधयनि सप्तप्तरिय कृता । देवा ययान्तवानाऽ अबदनपुरपम्पशम् ॥ १५ ॥ योन २ यज्ञमयजन्त देवास्तानि धम्माणि पथमाध्यासन । ते हुना-महिमान : सचन्त यत्र पूर्व साध्या ई सन्ति देवा ॥१६॥ ॥ इति पुरुषसूक्तम् ।। आ प्रमाणे पोडश मंत्रात्मक पुरुपसूक्त मत्येक वेदमां छे. तेनो पवित्रता प्राप्त करवा माटे, पोडशागन्यास करवा, पोडशो- पचार पूजा करवी होय त्यारे उपचार समर्पण करती वखते, तथा अभिषेक वखते उपयोग कराय छे. पुरुषसूक्तना ऋपिछंद विनियोग आ प्रमाणे बोलवा. सहस्रशीतिपोडशर्चस्य सूक्तस्य नारायणऋषिः अनुप्छन्दः शरीरशुध्धर्य जपे विनियोगः" प्रकरण नवमुं. (१) अथ प्रात:सन्ध्यामयोगः।। भूस्वाहा ॐ भुवस्वाहा ॐ स्वःस्वाहा इति त्रिपामाश्य हस्तं मक्षाल्य ॐ प्रातः संध्या प्रयोग, विष्णुर्विष्णुः ॐ मनामनः वायाफ् ॐ प्राणाप्राणः ॐ घनःशुः ॐ श्रोत्रं
श्रोत्रं ॐ नाभिः ॐ हृदयं ॐ कण्ठः ॐ मुखं
शिरः ॐ शिखा ॐ बाहुभ्यां यशोयलम् " इति
अर उपस्पृश्य प्राणायाम कुर्यात् । प्रणवस्य परब्रह्मऋषिः
परमात्मा देवता देवी गायत्री छन्दः व्याहृतीनां विश्वा-
मित्रजमदग्निभरद्वानगोतमात्रिवसिष्ठकश्यपा ऋषयः आग्नि-
बायबादित्यवृहस्पतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवनाः गायत्र्पुष्णि-
गनुएव्हतीपडिविएन्जगत्यश्छन्दांसि गार्यच्या विश्वा-
मित्रः सविता गायत्री गायत्रीशिरसः प्रजापतिपिः न.
मानियावादित्या देवताः यजुश्छन्दः एतेपां प्राणायामे
विनियोगः ॥ ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ
जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितु. यांत् ।
ॐ आपोज्योतीरसोमृतंप्रमभूभुवः स्वरोम् । इति
विचारं मनसाऽऽवर्तयन्मयमेनावर्तनेन पूरकं द्वितीयेन
कुंभकं तृतीयेन रेचकं कुर्यात् । इत्यमेकं त्रीन् वा प्राणाया-
मान् कृत्वा पाणी जलमादाय सङ्कल्पं कुर्याद ।।
अथ सइँल्पः । अत्राध महामाङ्गल्पप्रदे मासोत्तमे
...मासे.... ...पो.........पुण्यतिथौ.........वासरे....
..मक्षत्रे..
स्थिते चंद्रे.. स्थिते सूर्य........स्थिते
श्रीदेवगुरौ शेपेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु
शुभकरण एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथी
ममोपात्तदुरितक्षयद्वारा श्री परमेश्वरमीत्यर्थ
......
....
२० * मातःसन्ध्योपासनमहं करिष्ये । इति सङ्कल्प्य' हस्ते पुन जलं गृहीत्वा सूर्यश्चमत्यस्य नारायणऋपिः सूर्यो देवता अनुष्टुपछन्दः अम्युमाशने विनियोगः । ॐ सूर्यच मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यद्राच्या पापमकार्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तव लुम्पतु यत्किश्चिद् दुरितं माय इदमहं माममृत- योनी रसूर्य ज्योतिपि जुहोमि स्वाहा ॥ इति मन्त्रेण तन्नलं प्राश्य द्विराचामेत् । पुनः पात्रान्तरे वामहस्ते वा जलं गृहीत्वा दर्भः देवतीर्यन (अङ्गुल्पग्रैर्वा ) आत्मानं मार्जयेत्। तत्र मन्त्राः । आपोहिष्ठतिमन्त्रत्रयस्य सिन्धुद्वीपऋपिः आपोदेवता गायत्रीछन्दः मार्जने विनि- योगः ॐ आपोहि० । ३ * इति मार्जनम् । सुमित्रियेत्यस्य प्रजापतिपिः आपोदेवता यजुदा द्रुपदादित्यस्य प्रजापतिपिः आपोदेवता अनुष्टुप्छन्दः जभवनाणे ( अम्भुप्रक्षेपणेदा) विनियोगः। * समित्रियान आप ऽ ओपघय सन्तु 1 दुमि प्रियास्तस्मै सन्तु योस्मान् द्वेष्टि यञ्च व्वयं हिष्म ॥ * ॐ दुपदादिर मुमुचान दक्षिणहस्तरथं जलमवप्राय वामभागे भूमौ क्षिपेत् । * इति मन्त्राभ्यां २१ ( एवं त्रिः सकता, ) ऋतश्चेतिमन्त्रमयस्य अवार्य गपिः भाववृत्तो देवता अनुष्टुप्छन्द : अधर्मागे विनियोगः । ॐ ऋतं च सत्यं चामोदात्तपसोधनीयते । ततो रापजायत ततः समुद्रो ऽ अर्णवः॥ समुद्रौदर्ण वादर्षि संवत्सरोऽ अजायत । अहोरात्राणि विदधादिश्वस्य मिपुतो चशी ।। सूर्याचन्द्रगसौं धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्ष मथो स्वः॥३॥ इति गन्त्रान्ते दक्षिणपा- णिस्थे जलेऽ घमर्पणं कृत्वा ऽऽनवलोकितमेव तन्जलं वा- मागे क्षिपेत् ॥ तत आचम्य, प्रणवस्य परब्रह्मऋषिः परमात्मादेवता देवीगायत्रीछन्दः, व्याहृतीनां परमेष्ठी अनापतिः प्रजापतिर्वृहती, गायच्या निश्वामित्रः सविता गायत्री, अर्घ्यदाने विनियोगः । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्स- वि० यात् । श्री सपिठसूर्यनारायणाय इदमध्ये दत्तं न मम ॐ आपो ज्योती० रोम् । इत्यर्घ्यदानान्ते दक्षिणं कर्ण स्पृशेत् ।। एवं पुन दिः ॥ अध्यत्रयान्ते ॐ असावादि- दित्योब्रह्म ।। इति मन्त्रेण प्रदक्षिणं परिभ्रमन् आत्मनः समन्तात् जलं सिञ्चेत् । तत अविश्प, आपम्पमागांना. यम्य तिष्ठन् सूर्योपस्थानं कुर्यात् ।। उद्यमित्यस्य प्रकमः सवितानुष्टुप् उदुत्यमित्यस्य प्रायः सविता गायत्री, चित्रं देवानामित्यस्य कुत्तः सरिता त्रिष्टुप् ,तचनुरित्यस्प परमेष्ठी प्रजापतिः सूर्यत्रिष्टुप् सूर्योपस्थाने विनियोगः ॥
- शुत शृणुयाम २२ ॐ उन्हयन्तमसस्परि स्थुई पश्यन्त उत्तरम् । देवन्दैवत्रा सूर्यमगंलमज्योतिरुत्तमम् ।। * ॐ उत्पन्ना तवैदसन्दे॒वं वहन्ति केत । दृशे निधाय सूक्षयम् । * चित्रन्देवाना मुगादनीकञ्चक्षुमित्रस्य वरुणस्या- ग्मे ! आप्माद्दयावां पृथिवी 5 अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपंश्च । * ॐ तचक्षुर्देवहितम्पुरस्तान्हुकमुञ्चरत्। पश्येम शरद शुत जीप शरद शरद - शतम्प्रवाम शरद- शत मदीनाऽ स्याम शरद- शतम्भूयश्च शरद - शतात् ॥ ४ ॥ * इति तिष्ठन्नुपस्थायोपविशेत् । ततो गायत्रीमावा- इयेत् । तेजोसीत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिपि आज्य देवता यजुश्छन्दः गायच्याचाहने विनियोगः। ॐ तेजेोसि शुक्रर्मस्यमृतपास धामनामांसि प्पियन्देवा नामनाधृष्टन्देवयनमप्ति ॥ * आपातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्मसम्मितम् । गायत्री छन्दतां मातेदं ब्रह्म जुषस्व में || * यदन्हात्कुरुते पाप तदन्हाप्रतिमुच्यते । यद्राव्यात्कुरुते पापं तद्राव्यात्प्रतिमुच्यते ॥ * सर्व चणे महादेवि सन्ध्या विये सरस्वति । ओजोसि २३ सहोसि पलमसिभ्राजोसि देवानां धामनामासि विश्वमासि विश्वायुः सर्वमसि सायुरभिभूरों गायत्रीमावाहयामि सावित्रीमावाहयामि सर- स्वतीमावाहयामि छन्दनावाहयामिश्रियमा- हयामि । * इति गायत्रीमावाह्य प्रणवस्यपरब्रह्म ऋषिः परमात्मादेवता देवी गायत्री छन्द : व्याहृतीनां परमेष्ठी प्रजापतिः प्रजापतिवृहती गायत्र्या गायवीन्दो विश्वा- मित्र ऋपिः सविता देवता अग्निर्मुखं ब्रह्मा शिरो विष्णु- हृदय ५ रुद्रः शिखा पृधिषी योनिः प्राणापानव्यानोदा- नसपाना सप्राणा श्वेतपर्णा साङ्ख्यायनसगोत्रा गायत्री चतुर्विशत्यक्षरा त्रिपदा पद कुक्षिः। गायत्री जपे विनि- योगः ॥ ॐभूर्भुवः स्वः तत्सवितु. दयात् ॥ १ ॥ इत्यष्टोत्तरशतमष्टाविंशतिवारं वा यथाशक्ति गायत्री ज- पित्त्या " अनेन गायत्रीजपाख्येन कर्मणा श्रीसवितासूर्य नारायणः मीयताम् ॥ इति जरं निवेदयेत् उत्तमे शिखरे जाते भूम्यां पर्वतमूर्द्धनि । ब्रामणेभ्यो । भ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्* स्तुतो मया परदा दमाता प्रचोदयन्ती पवने द्विजाता। आयुः पृथिव्यां द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्वा प्रजातुं ब्रह्मलोकम् ।। * इति गायत्री विसर्जयेत् ॥ आसत्पलोकापातालादालोका- २४ ....00 लोकपर्वतात् । येसन्ति ब्राह्मणा देवास्तेभ्यो नित्यं नमोनमः ॥ इति ब्राह्मणादीनमस्कृत्य गोत्रोत्पन्न भवरान्वित श्रीशुक्लयजुर्वेदान्तर्गत- माध्यन्दिनवाजसनेयशाखाध्यायी शर्माऽहं भो गुरो अभिवादयाभि ॥ एवं वदन् गुरुमातृपितृज्येष्ठबन्ध्वादीन यथासंभवं प्रणमेत । यस्यस्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो चन्दे तमच्युतम् । * अनेन प्रातस्सन्ध्योपासनाख्यन कर्मणा श्री सवितृस्वरूपी साम्ब सदाशिवः प्रीयताम् न मम । ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥ इति कर्म सगये कर्मान्ते द्विराचम्य प्राणायाम कुर्यात् ॥ ॥ इति प्रात:सन्ध्याप्रयोग ॥ अथ प्रात सन्ध्या । गोकर्णाकृति जमणा हाथमा हृदय मुधी जई शके एटल दर वखते पाणी लेवु अने अनुक्रमे " ॐ भू स्वाहा ॐ भुव स्वाहा ॐ स स्वाहा" आ मत्र बोली वण वखत पीवु, अने हाथ धोई नाखी “ ॐ विष्णुर्विष्णु० यशोवलम् " आ मन्त्रो बोली दरेक मन्त्रनो उच्चार करती वेळाए ते ते इद्रियोने जमणा हाथना अगुप्ठवडे स्पर्श करी शफाय तेवी रीते स्पर्श करी हाथ धोई प्राणायाम करवो प्रथम 'प्रणवस्य योग " सुधी बोली " अंगुष्ठ अनामिका अने २५ कनिष्ठिका " आ त्रण आंगळीओ बडे नासा पुट दाबवा. प्रथम एक पुट वडे वायूनुं पूरण करयु पछी वन्ने पुट बंध राखवा अने पछी दाबी राखेलं पुट सुलं कर्तुं अने बन्ने पुट बंध करी रोकी राखेला वायूने हळवे हळवे छोडवो. आ क्रिया- ओने अनुक्रमे पूरक कुंमक अने रेचक कहे छे. दरेक क्रिया करती वेळाए " ॐ भूः" थी ते " रोम् " ॥ सुधीनो मंत्र मनमा जपयो एटलुं करवाथी एक प्राणायाम थाय; एवो एक अथवा त्रण प्राणायाम करवा; अने हाथमां जल लई सङ्कल्प करवो:- " अनाद्यमहा० कारिप्ये " एवं बोली सङ्कल्प करी; फरी हाथमां जल लई “ सूर्यश्चमेत्यस्य० ॐ सूर्यश्च० स्वाहा" आ मंत्र बोली ते पाणी पी. अने ॐ भूः स्वाहा विगेरे प्रथम संध्याना आरंभमां लख्या प्रमाणे ये वार आचमन कर. पछी आचमनीमां, बीजा पात्रमां, अथवा डावा हाथमा उदक लई दर्भ वडे अथवा दक्षिण हस्तना आंगळीओना अग्र- वडे ते पाणी अनुक्रमे मस्तक उपर पग उपर तथा हृदय उपर छांट. एने मार्जन कहे छे. ते वसते बोल्वाना मंत्रोः- आपोहि० योगः। ॐ आपो० व १ ॐ नान० तन । ॐ महे० से। ॐ योष० सः। ॐ तस्य इनः ॐ उशती० । ॐ तस्मा० वः। ॐ यस्य य । ॐ आपो० नः ।। पछी जमणा हाथमा पाणी लई “ सुमिनियेत्यस्यममा * सुमित्रिया० द्रुपदा० नसः ॥" आ ये मंत्रो बोली, - " हाथमा लधेिला पाणीने सुंधी पोतानी डाबी वाजू तरफ फेंकतुं. आ प्रमाणे त्रण वखत के एक वखत कर, फरी जमणा हाथमा पाणी लई आगळ लखेलो मंत्र भणी डाबा नासा पुट वेडे वायूने उपर खेंची, ते वाय् दक्षिण नासा पुट पडे हाथमा लीधेला पाणी उपर छोडवो; अने " प्राणायाम, मार्जन, तथा जलावधाण, आ क्रियाओ बडे शरीरथी छुटो पडेलो पाप पुरुष पाण वायूना मार्गे हाथमा लीधेला पाणीमा पध्यो छे, " एवी भावना करी पाणी तरफ न जोता ते डावी बाजू तरफ जमीन पर नाखतुं. "अनञ्चेति योग ! ॐ नश्चम० वः ॥३॥ पछी पूर्ववत् आचमन करी उभा रहीने अजलीमा शक्य होय तो गन्धाक्षतपुष्पमिश्र उदक लई अथवा शुद्ध पवित्र उदक लई " प्रणवस्य ० अर्यदाने । ॐ भूर्भुवःस्वः तत्संचित यात् । श्रीमवितृ० दत्तं न मम" आ प्रमाणे बोलतानी साथेन ले उदक उंचेथी सारा पाणीधी भरी मुक्केला तरमाणि विगेरे पात्रमा नाखवु. ते नाखती वखते (अंजलीमाना उदक) अगुष्ठ तथा तर्जनी अडया देवी नहीं. आ प्रमाणे अण अर्य आपका [ सन्ध्या काल थई गयो होय तो “प्रणव० सविता गायत्री कालातिपत्ति जनित प्रत्यवाय परिहारार्थ अर्य दाने वि०" एवो विनियोग बोली एक अर्य वधारे आपचो.] प्रत्येक अर्ध्य आप्या पछी " * आयोज्यो० रोम् " आ शिरोमंत्र बोली जमणा हाथना अंगुष्ठनो दक्षिण कर्णने तथा
"
वेउ नेत्रने स्पर्श करवो. आ प्रमाणे त्रण अर्घ्य अथवा चार
अर्घ्य आपी रया पछी " ॐ असा० म ।
आ मंत्र बोली-
जमणा हाथे थोडु थोडु पाणी जमीन उपर नाखतां पोतानेज
प्रदक्षिणा करवी. पछी आसन उपर बेसी, आचमन प्राणायाम
करी; उभा थर्बु अने हाथ जोडी नम्रतापूर्वक सूर्यन उपस्थान करतूं.
उद्वयमित्यस्य० उदुत्यं० चित्रं० तचक्षु० योगः। ॐ
उद्वयं० मम् । ॐ उदुत्यं० यम् । ॐ चित्र• पश्च। ॐ
तचक्षुर्दे० शुतात् ।४।" आ प्रमाणे उपस्थान करी आसन उपर
वेसी गायत्रीनें आवाहन करवू. “ तेजोसीत्यस्य० योगः
ॐ तेजोसि० मसि । आयातु० स्वमे ॥ यदन्हा० ते ।
यद्राच्या० च्यते ॥ सर्ववर्णे स्वति । ओजोसि यामि ।"
आ प्रमाणे गायत्री- आवाहन करी, जपनो विनियोग बोलवो.
प्रणवस्य० गायपागायत्रीछन्दो योगः। ॐ भूर्भुवः
स्वः तत्सवितु० यात् ॥ १०८ ॥" आ प्रमाणे विनियोग
बोली एकसो आठ, के अष्टाविंशति वार जप करी, (अथवा
दश ) " अनेनगाय० प्रीयताम् । आ प्रमाणे बोली जप
समर्पण करयो. पछी " उत्तमे शिखरे स्तुतो मयावरदा०"।
आ बे मंत्रवडे गायत्री- विसर्जन करी; आसत्यलो
मंत्रवडे ब्राह्मणादिवंधोने नमस्कार करी;
गोत्रोत्पन्नः .प्रतरान्वितः श्री."
प्रमाणे गोत्र प्रवरोचारपूर्वक " आचार्य गुरु पिता माता ज्येष्ठ
"
"
आ
......"
............
या
२८
तम् ॥
आ प्रमाणे कर्म
बंधू विगेरे" ने नमस्कार करवो. पछी " यस्यस्मृत्या
अनेन प्रातःसंध्यो० नमम । ॐ तत्सत्०
समर्पण करवं. अने कर्म समाप्ती थया पछी द्विराचमन तथा
प्राणायाम करवो.
आ प्रमाणे प्रातःसंध्यापद्धति समजवी.।।
प्रकरण १० मुं.
अथ देवपूजा प्रयोगः ॥
प्रातः कृतसन्ध्यः कृतनित्यहोमः यथासम्भवं सम्पादि-
तोपचारः प्राङ्मुख उदङ्मुखो देव.
देवपूजानो विधि.
ताभिमुखो वा दर्भाधामन उपविश्य
चद्धशिख उपवीत्याचम्य प्राणानायम्य शान्ति पठेत् ।।
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा ई स्वस्ति नं - पूषा
विश्ववदा ई । स्वस्ति न स्ताक्ष्यों 5 औरष्टनेमि ई स्वस्ति
नो बृहस्प्पनिर्दधातु । * ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। ॐ इष्टदेवताभ्यो
नमः । ॐ कुलदेवताभ्यो नमः । ॐ ग्रामदेवताभ्यो नमः ।
ॐ स्थानदेवताभ्यो नमः । ॐ वास्तुदेवताभ्यो नमः ।
२९ - ॐ वाणीहिरण्यगर्भाम्यां नमः। ॐ श्री लक्ष्मीनाराय- णाभ्यां नमः । ॐ श्री उमामहेश्वराभ्यां नमः शचीपुरन्दराभ्यां नमः ॐ मातापितृचरण कमलाभ्यां नमः । ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणोभ्यो नमोनमः । निर्विघ्नमस्तु ।। सुमु- खश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः । * धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि * विद्यारम्भे विचाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । समामे सटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते * शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्ण चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये * सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्शसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते * सर्वदासर्वकार्येषु नास्ति तेपाममालम् । येषां हृदिस्थो भगवान् मगलायतनं हरिः * विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् । सरस्वती मणौम्यादी सर्वकार्यसिद्धये * अभीप्सितासिध्यर्थ पूजितो यः सुरासुरैः। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः। सर्वेवारख्यकार्यपु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मशानमनार्दनाः । = विष्णुर्विष्णुर्विष्णु श्रीमद्- भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराजपा पार्तमानस्य अद्य ब्रह्मण. द्वितीये परार्दै विष्णुपदे श्री श्वेतवाराहकल्पे
.......
"वा.
...........
......"
वैवस्वतमन्वन्तरे कलियुगे कलिमयमचरणे भरतवर्षे-
भरतखण्डे--जम्बुद्वीपे आर्यानन्तरगतब्रह्माच कहे
कन्याकुमारिकाक्षेत्रे रेवाया उत्तरे तीरे विक्रमशके
मालीवाहनशके "नाम्नि संवत्सरे 'अयने
ऋतो. "मासे पक्षे......."तियों
सरे....... नक्षने...."स्थिते वर्तमाने चन्द्रे...."स्थिते
श्रीसूर्य "स्थिते श्रीदेवगुरौ शेपेषु ग्रहेषु यथाय
राशिस्थानस्थितेषु सत्सु शुभकरण एवं गुणविशेषणविशि-
शायां शुभपुण्यतिथौ मम आत्मनः श्रुतिस्मृतिपुरा
पोक्तफलप्राप्त्यर्थ श्री.
"मनुखपञ्चायतन
देवता इष्टदेवताकुलदेवता प्रीत्यर्थं यथामिलितो.
पचारद्रव्यैः पुरुषसूक्तेन ध्यानावाहनादि पोडशोपचारैः
पूजनं करिष्ये ।। तत्रादौ निर्विघ्नतासिध्यर्थं गणपतिस्परणं
(शरीरशुध्द्यर्थ पुरुषसूक्तभ्यासान् कलशशङ्खघण्टापूजनश्च
करिष्ये । इति सङ्कल्पः॥
ॐ गणानान्या गणपति हिवामहे मियान्ता
प्रियपति ६ हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति हवामहे
चसो मम । आममानि गर्भधमाश्चर्मनासि गर्भधम् ।
ॐ भूर्भुवःस्वः श्रीमन्महागणपतये नमो नमः" इति
गणपतिस्मृला:-
*
पृथ्चि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना
धृता । त्वञ्च धारय मां देविपवित्रं कुरु चासनम् ।।
* अपसर्पन्तु ते भूताये भूता भूमिसंस्थिताः।
ये
भूता
विघ्नकर्तारस्ते मश्यन्तु शिवाज्ञया । *
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशन् ।
सर्वेपामविरोधेन पूजाकर्म समारभे ।। इति दिनसणं
विधाप चामपादपाणिना भूमि त्रिस्ताढयेत् ।।
[ न्यासचिकीयां पुरुपसूक्तमन्त्ररित्थं न्यासान
न्यसेत् । ॐ महसंशा०। इति वाप करे १ ॐ पुरुष एवं० ।
इनि दक्षिण करे २ ॐ एतावानस्य ० । इति वामपादे ३
ॐ त्रिपादूर्ध्व० इति दक्षिणपादे ४ ॐ ततोनिरा० । इति
चामजानों ५ ॐ तस्माद्यज्ञासं० । इति दक्षिणजानौ ६
ॐ तस्मा. तमचर्डसा० । इति वामकटयाम् ७
तहम्मादश्चा० । इति दक्षिणकटयाम् ८ ॐ तंवयव ।
इति नाभौ९ ॐ यत्पुरुषव्य० । इवि हृदये १० ॐ ब्राह्मणो।
इति वामकुक्षौ ११ ॐ चन्दमा० । इति दक्षिणकृती १२
ॐ नाभ्याआ० । इति फण्डै १३ ॐ यत्पुरपेण० इति
मुखे १५ ॐ सप्तास्पांसन् । इति नेत्रयोः १५ ॐ
यझेमय० । इति शिरसि १६ इति ]
अथ शुद्धनलहितं फल स्वचाममागे निघाय
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३२ - तदुपरि दक्षिणं हस्तं न्यड्मुखं संस्थाप्य वरुणमावाहयेत् । तद्यथाः- ॐ तयायामिब्रह्मणा चन्दमानस्तदाशस्ति यजमानो इविभि - । अडमानो वरुणेहबोध्युरशः समान आयुई प्रमोपीः ।। * अस्मिन् कलरो वरुणं सांगं सपरिवारं सायु- धं सशक्तिक आवाहयामि ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणायनमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पं समर्पयामि नमस्करोमि । इति नत्वादेवपुरतः स्वदक्षिणभागे राह निधाय । ॐ अग्निपि परमान उं पाञ्चजन्य उं पुरोहित । तमीमहे महागयम् ॥ * ॐ भूर्भुवः स्वः शसस्थदेवताभ्यो नमः आवाहयामि । सर्वोपचारार्थे गन्धपुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि । इनि नत्वा देवपुरतः स्ववामभागे घण्टो निधायः- ॐ मुपोसि गरुत्मा निवृत्ते शिरों गायत्रश्चक्षुद- द्रयन्तरे पक्षौ । स्तोम ऽ आत्मा छन्दा ७ स्यानि य— v पि ना मा। ते तनूचीमदेव्यं स्यैज्ञायझियम्पच्छन्धि- पण्या शफा ॥सुपाणैसि गरुत्मान्दिवंगच्छस्व-रता* ॐ भूभुवःस. घण्टास्थगरुडाय नमः आवाहयामि । सर्वोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमीति नत्वा शहादकन पूजाद्रव्याणि आत्मानं च मोक्षपेत् । तत्र मन्त्रः। अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरं शुचिः ॥ * ततो घण्टा वादयेत् । तत्र मन्त्रः । आगमार्यन्तु देवानां गमनान्तु रक्षसाम् । कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताव्हानलक्षणम् ।। * इति ततः पञ्चायतन-देवताः ध्यायेत् स्वेष्टदेवताञ्च । पूर्व वि ग वि श|| वि 3 du نادر R4 यू सू पश्चिम एतदन्यतमप्रकारेण पञ्चायतनदेवताः स्थोपनीयाः ।। अथ ध्यानम् । श्वेताझं वेतवस्त्रं सितकुसुमगणैः पूजित श्वेतगन्धैः; क्षीराभौ रत्नदीपे सुरवरुत्रिमळे रत्न- ३४ सिंहासनस्यम् ।। दोभिः पाशाङ्कुशेष्टाभयधृतिरुचिरं चन्द्र- मौलि त्रिनेत्रं ध्यायेच्छान्त्यर्थमीशं गणपतिममलं श्रीसमेत मसन्नम् ॥ १॥ इति गणपतेः ॥ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः॥ नमः प्रकृत्य भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ २ ॥ इति देव्याः ।। शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभागम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्देविष्णुं भवभयहरं सर्वलोक नाथम् ॥ इति विष्णोः ॥ ३ ॥ ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंस, रत्नाकल्पोज्ज्वला परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसनम् । पमा सीनं समन्तात्स्तुतममरगणेाघकातिं वसान; विश्वाचं विश्ववन्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्रं त्रिनेत्रम् ॥ इति शहरस्य ॥४॥ ध्येयः सदा सवित्रमण्डलमध्यवर्ती, नारायणः सरसि. जामनसग्निविष्टः ॥ केयूयान्मारकुण्डलपान किरीटी हारी हिरण्मपवर्धननवयकः ॥ इति सूर्यस्य ।। ५ ।। भूर्भुस्य.......... प्रमुख पचायानदेयतापो नमः [ इष्टदेवनारदेवतानां प पान व "re.
पश्चा- देवताकुलदेवताभ्यो नमः" इत्पूर्वम् ] ध्यायापि । इत्यु- स्वा पुष्पं तुलसीपत्रादि वा हस्ते गृत्तिा तत्र ध्यात- देवतां नेत्रद्वारा ऽवतीर्णा प्रकल्प्य तत्पुष्पादि पूजनीय- पञ्चायतनादिदेवतोपरि निधाय देवताविर्भाव विभावयेत् । ततः ॐ सहस्रशीप० । १ । ॐ भूर्भुवःस्वः यतनदेवताभ्यः " इष्टदेवनाकुलदेवनाभ्यो नमः आवा- हयामि इति वदन् तुलसीपत्रपुष्पाक्षताधन्यतम समर्प- येत् । यदा च नोपचारसमर्पणशक्यता तदा ऽसतातुलसी- पत्रादि समर्पयेत् नमस्कुर्याद्वा ।। ॐ पुरुषएवे० ॥२॥ ॐ भूर्भुवःस्वः "पञ्चाय. इष्टकुल आसनं समर्पयामि । इति वदन् भासनं तदभाये तुलसीपत्रादि समर्पयेत् । ॐ पुतावानस्य० । ३ । ॐ भूर्भुवःस्वः ...... पञ्चा० पायं० ॥ ॐ त्रिपादूर्घ । ४ । ॐ भूर्भुवःस्वः पश्चाय. अयं समर्प० । ॐ ततौविरा०१५॥ ॐ भूर्भुवस्वः पञ्चायतन आचमनीयं । तस्माज्ञा० । ६ । ॐ भूर्भुवः 'पञ्चायः स्ना- नीयं समर्प० । " स्नानायवस्त्रयज्ञोपतिनैवेद्यांत आव. मनीयं समर्पयेत् " " अय पञ्चामृतस्नानम् ॥ * पर्य’ पृधिव्यामयमोपंधोपु पो दिव्यन्त- रिक्षे पयोधा ई ॥ पर्यसनी ई दिन सन्तु मद्यम्॥ १।। "
पञ्चायत० पय स्नान
ॐ भूर्भुवः स्वः अमुक
सम० पय स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि, शुद्धोदक-
स्नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ।।
ॐ दधिकारणोऽअकारिपजिष्णोऽरस्य व्याजिन-
सरभिनी मुखावरपण आयुपि तारिपत् ॥२॥
ॐ भूर्भुव स्वः". .. पञ्चायतन दघिस्नानं समः
दाधिस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं० शुद्धोदकस्नानान्ते आच.
मनीयं ॥२॥
ॐ घुत्तम्मिमिले धुतमभ्य योनिर्धते श्रितो घुतम्म्यस्य
धाम । अनुप्प्यध मावह मादयस्व स्वाहांकृत कृपभव्यक्षि
हव्यम् ॥ ३ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः..........पञ्चायनिदे०
घृतस्नानं० घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं० शुद्धो० आच.
गनीयं ममर्पयामि ।
ॐ गधवाताऽनातायते मधुक्षरन्ति सिन्धवऊ । मा-
धान्न सन्मोपीऽ ॥१॥ मधुमयमुतोपमो मधुमृत्पार्थिव
रज - | मधुचौरस्तु न पिता ॥२॥ मधुमानो
वनस्पतिम्र्मधुमारं अस्तु सूर्य - | माध्वीयों भवन्तु
नई ॥३॥ ॐ मूवि स ....... पञ्चाय
मधुस्नानं०
मघुस्नानान्ते शुद्धोदयस्नानं० शुद्धोद आचम० ॥ ४ ॥
ॐ अपारसमुदयम मय सन्ततिपादितम्। अपार रसस्य यो रसस्तं ब्नो गृहामयुत्तमपयाम हीवो सीन्द्रीय त्या जुष्टं झुङ्गा म्म्येषते योनिरिन्द्रीय त्वा जुष्ट्रतमम् ॥ ५ ॥ ॐ भूर्भुवःस्वः ..........."पञ्चायतन शर्करास्नानं० शरास्नानान्ते शुद्धो० शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीय० ॥ ॐ गन्धद्वारी दुराधर्षी नित्यपष्ट करीपिणीम् । ईश्वरी सर्व भूतानां तामिहोपव्हये श्रियम् ॥६॥ भूर्भुवःस्वः "पञ्चायतन० पठं गन्धोदकस्नान. गन्धोदकस्नानान्ते शुद्धो शुद्धोदकस्नानान्ने भाचमनीयं स०॥ .......... ॐ भई शुनति अशुच्यताम्परुपा पर + । गन्धस्त सोममवतु मदाप रसो 5 अच्युत ॥ १ ॥ ॐ भूच : स्व: "पञ्चायतन० उद्वर्तनपूर्वकमुष्णोदक- स्नानं सर्प उष्णोदकस्नानान्ते आचमनीयं । ॐ भूवःस्वः पञ्चायतन० नमः विलेपनार्थे चन्दनं सम, अलङ्कारार्थे अक्षतान् स., पूनार्थे पुष्पाणि सम धूपं दीपं स० (दर्शयामि वा ) नैवेद्यं स नैवेद्यान्ने आच० करोद्वर्तनायें चन्दर्भ पुखवासायें पूगीफलताम्बूलं सप. दक्षिणां० मन्त्रपुष्पं समः ॥ " सम्मिश्रपञ्चामृतेन स्नापने तु ३८ ॐ पञ्चनाउंसरस्वतीमपियन्ति सस्रोतसाई । सर- स्वती तु पञ्चधा सोदेशे भवत्सरित् ॥ १ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः 'पञ्चायतन दे० पञ्चामृत- स्नानान्ते० शुद्धोदकस्नानं० शुद्धोदकस्नानान्ते आच० | इति विशेष । एवं पञ्चामृतस्नानादिविशिष्टो- पचारयुतं पूजनं काम्यम् , तत्र समर्पितं पुष्पादि स्वस्योत्तरतो निक्षिप्यदेवमभिपिश्चेत् । देवोपर्यखण्डा नलधारां पातयन् पुरुपसूक्तश्रीसूक्तरुद्राध्यायादीनां यथाशक्ति यथावकाश ञ्च पाठं कुर्यात् । तत्रावश्यक पुरुषसूक्तम् ॥ ॐ सहस्रशीर्षा पुरु० देवा ॥ १६ ॥ इत्याद्यन्ते शहपूरितोदकेन ॐ इदं निष्णुविचक्रमे प्रेधा निर्दधे पदम् । समूढमस्यपासुरे स्वाहा ॥ इति मत्रेण देवान् स्नापयेत् । केवलस्य शिवस्य सूर्यस्य वा पूजने तु न शवोदकेन स्नापनम् । तंतोऽभिपेकपात्रस्थोदकशेपेण देवान् स्नापयन् शा. न्तिपठेत् ।। सा च यथाः- ॐ द्योऽशान्तिगन्तरिक्ष शान्ति पृथिवी शान्तिराप शान्तिरोपंधय शान्ति । व्यनस्पतयशान्तिविश्वेदेवा ।
शान्तिब्रह्मशान्ति सर्च शान्ति शान्ति रेवशान्ति सा. माशान्तिरेधि ॥ यतोपतई मपीईसे ततो नोऽअभयकुरु । शन : कुरुप्पुजाभ्यो भयन्नऽपशुभ्य: ।। सर्वेषां वाऽएप वेदाना रसो यत्साम सर्वेषापेवेनमेतद्वेदाना रसेनाभि- पिञ्चति । *ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। सुशान्तिर्भवतु । सर्वारिष्यान्तिर्भवतु । ॐ अमृताभिपेकोस्तु ॥ ॐ भूवः खा..."पञ्चायतनदे. अभिषेकस्तानं स० स्नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ॥ देवतीर्थ पात्रान्तरे निधाय दे. चेभ्यो वस्त्रायुपचारान् समर्पयेत् ॥ तस्मज्ञानज्ञा. • ऋचुइंसा० ॥ ७॥ ॐ भूर्मुवःस्वः ....... पञ्चावत्रं सॐ तस्मादश्वा अ०८ॐ भूर्भुवःस्वः ":"पञ्चाय• यज्ञोपवीत . । ॐ तं मयुझं बु०।९। ॐ भूर्भुवःस्सः ....."पञ्चा० विलेपनार्थे चन्दनं० सौभाग्यव्यं नानापरिमलद्रव्याणि स० । अलंकारार्थे अक्षतात् समर्प- यामि ॥ॐ यत्पुरु० ॥१०॥ॐ भूर्भुवःस्वः" ऋतुकालोद्भरपुष्पाणि स । तुलसीपत्राणि स० बिल्व- पत्राणि स० दुर्दा दुरान् स.1 ॐ ब्राह्मणोस्य० । ११ । ॐ भूर्भुवः स्वः ...."पञ्चाय० धूपं आधापयामि । (समर्प- यामिवा)। ॐ चन्द्रमामन । १२ । ॐ भूर्भुवःस्वः ......"प- चाय० दीपं दर्शयामि (समर्पयापि वा) ॐ नाभ्यो आ. ।१३। ॐ भूर्भुवस्वः ..."पञ्चाय नैवेद्यं स०। "...""पञ्चाय.
४० । ॐ ॐ उदाना० प्रथमं देवाग्रे चतुरस्र मण्डलं कृत्वा तदुपरि यथासम्भव मक्ष्य भाज्यादिपूर्ण पात्रं संस्थाप्य तुलसीदलायन्तरितोदकेन सम्मोक्ष्य, परिपिच्यानमनयं कृत्वा ग्रासमुद्रया नैवेद्यं स मर्पयेत् । ॐ प्राणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा ॐ व्या. नाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा ॐ समानाय स्वाहा ( ब्रह्मणे स्वाहा इति केचित् नैवेद्य मध्येपानीयं समः । पुनः ॐ प्राणा० ॐ अपाना० ॐ व्याना० समानाय० ( ॐ ब्रह्मणे० ) उत्तगपोशनं सम० हस्तमक्षा लनं० मुग्यप्रक्षालनं स० करोद्वर्तनार्थे चन्दनं स० । आव. मनीयं समर्पयामि ।। ॐ यत्पुरपेण । १४ । ॐ भूर्भुव स्वः ......."पञ्चाय. मुखवासार्थे पूगीफलताम्बूलं पूजासाहू ण्याथै यथाशक्ति दक्षिणां कालोद्भवानि फलानि च समर्प- यामि ॥ ॐ इदवि मजननम्मेऽअस्तु दर्शवीर सवंगण) स्वस्तये। आरमसनि पजासनि पशुसनि लोकसयभसनि। अमिपुजाम्ब हुलाम्मे कोत्वसम्पयो रेतोऽस्म्मासुंधत्त ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः . पञ्चायतन० उत्तरनीराजनं कपूरात्र्तिक्यं वा स०॥ ॐ सुप्तास्याः ॥१५॥ ॐ भूर्भुवः स्वः"पञ्चाय. प्रदक्षिणां स० ॐ ने गुजः ॥१६॥ ॐ भूर्भुवः स्वः पञ्चायत मन्त्रपुष्पाञ्जलिं नमस्कार च समर्पयामि ॥ अथ देवान्मार्थयेत् ।। आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यता परमेश्वर ॥१॥ मन्त्रहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर । यत्पूनितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे ॥ २ ॥ अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम । तस्मात्कारुण्यभान रक्षस्य परमेश्वर ॥ ३ ॥ गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्यमेव च । आगता सुखसम्पत्तिः पुण्यो तब दर्शनात् ॥ ४ ॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपो-यज्ञ-क्रियादिपु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्द तमच्युतम् ।। ५ ।। अनेन यथाशक्ति यथाज्ञानेन कृतपोडशोपचार पूजनेन" पन्चायतन देवताः ( इष्ट देवताः कुल देवताः) भीयन्नाम् नमम ॐ तत्मद् ब्रह्मार्पणमस्तु ।। इति कर्म सपर्पण करवा देवतीर्थ पिवेत् । तत्रादौ शङ्ख जलेनापूर्ण शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि। । अङ्गालग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।। * इति मत्रेण भ्रामित शवादुदकं दक्षिणहस्ते गृहीत्वा तेना स्मानं मोक्षयित्वा दस्ते तीर्थमादाय अकालमृत्युदरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । (विष्णु) देवपादोदकं तीर्य जठरे धारयाम्यहम् इति पियेत्।। इति देवपूजा मयोगः ।। अथ देवपूजा:-प्रातः सन्ध्या तथा नित्यहोम (कर- चानो होय तो ते) करी शक्यनुसार उपचार देव पूजानो माहिती मेळवी, पूर्वाभिमुख, उत्तराभिमुख अथवा देवताभिमुख थवाय तेवी रीते दर्मादि देवपरितो भ्रामयेत् ॥ " । साथ प्रयोग.
"
नमः
अथवा
जल लई;
निर्मित आसन उपर बेसी शिखा वांधी, तथा यज्ञोपवीत सव्य
राखी आचमन अने प्राणायाम करी शान्तिपाठ भणवो.
“ॐ स्वस्तिन० शान्तिः 1" पछी ॥ ॐश्रीमन्महागणा-
धिस्तये नमः" अहीथी "सर्वेभ्यो । ब्राह्मणे० नमः" सुधी
दरेक सद्वान्त वाक्यना उच्चार साथे नमस्कार करी
सुमुख० महेश्वरा." अहीं सुधीना मङ्गल श्लोक बोली
हाथमा अक्षतायुक्त " केवल "
" विष्णु विष्णु विष्णुः श्रीमद् भगवतो. करिष्ये " सुधी
बोली सङ्कल्प करवो; पछी फरी हाथमा जल लई “ तत्रादौं०
थी “ करिष्ये " सुधी बोली सङ्कल्प करवो; बजिो सकस
करती वेळाए " शरीर शुद्धी माटे पुरुषमूक्त न्यास" करवा
होय तो ते शब्द बोलया; अने न करवा होय तो तेटला शहो
छोडीने सङ्कल्प फरवो. पछी “ ॐ गणानान्तवा गणपतये
नमोनमः " एवी रीते गणपतिनुं स्मरण करी;" पृथ्विवया
अपसर्पन्तु अपनाम रभे ॥ ३ ॥" आ त्रण मंत्रवड
भूमिप्रार्थना भूतापसारण अने दिप्रक्षण करी; डावा पगवडे
भूमीने त्रण वखत ताडण क. [ न्यास करवा होय तो दरेक
मन्त्र बोली कया अंगने स्पर्श करवो ते आ प्रमाणे:-
"ॐ सह ०। १ डावा हाथने; ॐ पुरु ०) २ जमणा
हाथने ॐ एता ०। ३ डावा पगने ॐ त्रिपा० ४। जमणा
पगने; ॐ ततोवि० ।५ । डावा घुटणने; ॐ तस्मा० । ६
जमणा घुटणनेॐ तस्माद्य०७। डाबी केडने ॐ तस्माद टा
-
४३
-
" ॐ भूर्भुवःस्वः वरु
जमणी केडने; (कटि भागने ) ॐ तय्यहं० ९ । नाभिस्थानने
ॐ यत्पुरुप १० । हृदयने; ॐ ब्राह्मणो० ११ 1 डाबी
कुखने; ॐ चन्द्रमा० १२ । जमणी कुखने; ॐ नाभ्यां ०.
१३ । कण्ठनें; ॐ यत्पुरुपेण १४ । मुखने; ॐ सप्तास्या
१५। नेत्रोने; ॐ यज्ञेन यज्ञ० १६। मस्तकने" स्पर्श करवो अने
ते ते स्थान मन्त्रमय थयु एवं समजवू. आ प्रमाणे करवाथी
शुद्धी थाय छे. ] पछी शुद्धजलपूर्ण कलश पोताना डावी बाजू
तरफ मुकी लेना उपर जमणो हाथ अधोमुख आच्छादन करी
"ॐ तत्वोयामि० " आ मन्त्रवडे वरुण, आवाहन करी
आ प्रमाणे बोली ते कलशने गन्ध
अक्षता पुप्प समर्पण करी नमस्कार करवो. पछी देवना अग्र
भागे पोताना जमणा हाथ तरफ शंख मुकी, ॐ अमित्रपिः०
ॐ भूर्भुवःस्वः शङ्ख०" आ प्रमाणे बोली शसस्थ देवतार्नु
आवाहन करी, तेमने गन्धादि उपचार समर्पण करी नमस्कार करयो.
देवना अग्र भागे पण पोताना डाची बाजू तरफ घण्टाने मुकी,
"ॐ सुप! ॐ भूर्भुवःस्वः घण्टास्थ० " आ प्रमाणे
बोली गरुड नामक देवतार्नु आवाहन करी तेने गन्धाक्षतादि .
उपचार समर्पण करी नमस्कार करतो. पछी शङ्खमा
पाणी भरी, ते पाणी जमणा हाथमां लई लेनाथी पोताना
शरीरनु, पूजाना स्थाननु, तथा पूजा साहित्य एकवार अथवा
त्रण चार प्रोक्षण कर. ते वखते " अपवित्रापचित्रोवा."
४४ . . मत्र बोललो. तेज प्रमाणे राक्षसादिपुण्यापहारकोना प्रयाण माटे तथा देवोने आव्हान करवा माटे घण्टानाद करयो. ते वखते आगमार्थ." आ श्लोक बोलयो. पछी पोताना इष्टदेव कुर- देव तथा पञ्चायतन पैकी जेमनुं पूजन करवानुं छे तेमनु ध्यान एटले एकाग्र अंतःकरणवडे आपादतलमस्तक स्वरूप, चिंतन क्खु. पूजा करवा माटे आगळ लीधेला पञ्चायतननो स्थापन प्रकार पाच प्रकारनो छे. जे देवताने प्रधान मानवानी छे तेने मध्यमा मुकी वाकीनी देवताओ ईशान्य दिशाची आरंभी प्रदक्षिणक्रमे स्थापी. अनुक्रम तथा देवताओ कोठामा बतावी छे. आ प्रमाणे स्थापन फरी, हाथमा पुष्प तुलसीपत्र के अक्षता रई, श्यता आ श्लोक प्रमाणे गणपतीनु; "नमोदेव्य०" आ लोक्थी देवीनु, "शान्नाकारं०" आ लोक प्रमाणे विष्णून; "ध्यायेन्निन्य०" आ श्लोक प्रमाणे शकरनु, अने ध्येयासदा० आ लोक प्रमाणे सूर्यनु ध्यान करी; तथा पोताना इष्टदेवनु अने कुलदेवनु पण परंपरा प्राप्त पद्धती प्रमाणे ध्यान करी, हाथमा रधेिरा पुष्प तुलसीपत्र के अक्षता तरफ जोई; "हृदयमा पकान पिताटे चिंतित एपी नेनोमय देवा नेत्रदागदायमा लीधे- लापुपादि पदार्थ उपर भग" एवी भावना परी ते पुप्पा. दि, पूजनीय ण्यायननादिपने ममर्पण करयु; अने पधायननादिषमा पतनीय देवनानी आधिभार थयो एप समनीने आपादनादि उप- घार गमर्पण परया."*मा.नमः आगाहयामि"।१।आ ४५ पुप्प समर्पण प्रमाणे बोली तुलसीपत्र अक्षता अथवा पुष्प समर्पण करवू. ज्यारे प्रत्यक्ष उपचार समर्पण करवाना न होय, त्यारे अक्षता तुलसीपत्र के कखु, अथवा नमस्कार करखो. "ॐ पुरुष० ना आसनं० ।२।" आ प्रमाणे बोली देवने आसन अथवा तुलसीपत्रादि समर्पण करवु. "ॐ पूतावा. नम पायं ।३।" " ॐ त्रिपा० नमः अध्य० ।४।" जा प्रमाणे बोली गन्धाक्षत-पुष्प-मिश्र उदक समर्पण करवू."ॐ तनीधि० नम आचमनीयं० ।५।" "ॐ तम्मा द्यज्ञा० नमः स्नानीय० स्नान अयं वस्त्र यज्ञोपवीत अने नैवेद्य समर्पण कथा पछी आचमनी- योदक समर्पण करg " एकादशी विगरे पर्वणीना दिवसे देवने पञ्चामृत स्नान कराववु, तेम विजया-दशमी विगेरे तेहेवारना दिवसे पञ्चामृत उद्वर्तन- पूर्वक उप्णोदक स्नान पण करावयु तेनी पद्धती तथा मन्त्रो:- ॐ पर्य-पृ० नम पयःस्नान० पयःस्नानान्न शु आन । १।" आ प्रमाणे प्रथम दूधथी देवने न्हवाडी पछी शुद्धोदकरडे स्नान करावी आचमनीयोदक समर्पण करी, दधिस्नान करावयु. आ प्रमाणे प्रत्येक द्रव्यना स्नान पछी कखु. दपिका० नम. दधिस्नानं० दघिस्नानान्ते० शु. आचमनीय० ।।ॐधुतम्मिानम घृतस्नानं० घृतस्नानान्ते० गु० जाचमनीयं । ३। ॐ मधुव्वाता०३।नमः मधुन्तानं स्नान उपरान्त
४६
स्नान
मधुस्नानान्तेशु० शु० न्ते आच ४ॐ अपारस • नम
शर्करास्नान शर्करास्नानान्ते० शुन्ते आच० ।५। ॐ
गन्धद्वारां० नम पष्ठ गन्धोदक गन्धो० शुद्धोन्ते आप
मनीयं०१६। ॐ अशुना० नम उद्वर्तनपूर्वकमुष्णोदक
उष्णोदकस्नानान्ते आचमनीय समर्पयामि "
गन्धोदक स्नान कराव्या पछी चन्दन अक्षता पुष्प धूप दीप नैवेद्य
पूगीफल ताम्यूर दक्षिणा अने मन्त्रपुष्प,आ उपचारवडे देवनु स्नानाग
पूजन करी-" अनेन पञ्चोपचार पूजनेन श्री आराध्यदेवता
श्रीयन्ताम् " एव वोली पूजा समर्पणनो सकल्प करवो
केटलाएक विद्वानो गन्धोदक स्नान थया बराबर
नपूर्वक उष्णोदरस्नान करावी उपर लख्या प्रमाणे पञ्चो
पचारपूजन परे छे, अने केटाएक महाभिषेक स्नान थया पछी
उद्वर्तन अने उप्णोदक समर्पण करे छे तेम करवा माटे "उष्णोदक
स्नान क्या पछी शीतोदक स्नान करना इतर ठकाणे
पहेला निपेधने" प्रमाण माने छे माटे पोताना सप्रदाय प्रमाणे
पक्ष स्वीकारवो उचित छ
केटलाएक पञ्चामृतना पदार्थो जुदा जुदा राखी समर्पण
करव ना बदले मिश्र परीनेज समर्पण करे छे एटले मिश्र द्रव्याज
देवने सान करावे छे, ते वखते उपर रख्या प्रमाणे प्रत्येक
पदार्था मन्त्रो न भणता आ एक्ज मन्त्र भणी पञ्चामृतस्त्रान
परावीये तो हरकत नथी ते मन्त्र एवो-
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४७ " आ प्रमाणे ॐ पञ्चनाउंसर० नमः पञ्चामृतस्ना० पञ्चामृत. स्नानान्ते शुद्धो० शुद्धोदक स्नानान्ते आ०" विगेरे सर्व पूर्व प्रमाणेज समजवं. आ प्रमाणे विशिष्ट सानविधि थया पछी देवने समर्पण करेला पुष्पो पोताना डावी बाजू तरफ नाखी; संतत जलधारा पडे ए, अभिषेक पान जलपूर्ण करी तेनाथी देवने अभिषेक करवो. अथवा देवने थोडा थोडा पाणी बड़े स्नान करावता रही पुरुषसूक्त श्रीसूक्त रुद्राध्याय विगेरेनो यथाशक्ति अवकाशने अनुसरीने पाठ करयो, पैकी पुरुषसूक्तनो पाठ थनोज जोइये. " ॐ सहस्र देवा ॥ १६ ॥ सोळ मनो तथा उपर लख्या पैकी जेटलो पाठ करयो शक्य होय तेटलो पद्धतिसर करी रह्या पछी; शंसमा पाणी भरी ते पाणीवटे देवताओने सान करायवू ते वखते "ॐ इदं विष्णु० स्वाह आ मन्त्र बोलयो. केवल शंकर- के सूर्य, पूजन करघु होय त्यारे शंखोदक खान वर्ण्य छे. त्यार पछी अभिपेकपानमांना देवने अभिपेफकरी वाकी रहेलापाणी बड़े देवने मान करावतां शान्तिमन्त्रनो पाठ करवो. ते मन्त्रः- ॐ द्यौः शांतिः अमृताभिषकोऽस्तु ॐ भूर्भुवः स्वः......"पञ्चा० स्नानान्ते आच० पछी देवोने स्वच्छ वस्त्रधी कोरा करी पोताना स्थान उपर स्थापित करवा; अने देवतीर्थ एक पानमा भो? काठी द वाकी तुलमी मूल ४९ 1 तेनाथी अथवा अंगुल्यप्रथी पाणी लई गायत्री मंत्रनो उचार करतानी साथे नैवेद्यतुं प्रोक्षण कवू पछी “यथादेहे तथा देवे" आ न्यायने अनुसरि नैवेद्यपानना चौतरफ प्रदक्षिण रीते पाणी फेरवी, अपोशनमाटे एक आचमनी पाणी समर्पण करी; नेत्र मीलित करी अने डावो हाथ हृदय पासे राखी; जमणा हाथनी पांचे आंगळीओ एकत्र राखी, देवने जमाडिये छीये एवी भावना राखो “अन्ननो परिमल देव तरफ पोहोचाडवो." ते वसते " ॐ प्राणाय० ॥ मंत्रो वोलवा. नैवेद्य मध्ये प्राशन करवा माटे थोडं पाणी समर्पण करी फरी नैवेद्य "ॐ प्राणाय." आ मंत्रोथी समर्पण करवो. नैवेद्य समर्पणान्ते " उत्तरापोशन हस्तमक्षालन तथा मुखप्रक्षालन" ने उद्देशीने त्रण वखत थोड़ें पाणी तरमाणीमां मुकवू. अने करोद्वर्तन माटे चंदन समर्पण करवू. त्यार पछी भोजनांग आचमन आपq. आ प्रमाणे नैवेद्य समर्पणनी पद्धती समजवी. नैवेद्य पछीः- "ॐ यत्पुरुपेण नमः मुखवासार्थे पूगीफल । १४ । आ मन्त्र वडे पानबिड सोपारी यथाशक्ति दक्षिणा भने फर एटली अथवा शक्य होय ते वस्तुओ समर्पण करयी. “ॐ इदवि० नमः उचरनीरामनं० " । आ मन्त्र- वडे देवनी भारती उतारवी. फर्पूरार्तिक पण आज वखते समर्पण कघू. आ उपचार पोडशोपचारना बहारनो छे; तोपण लोको रूद तथा मङ्गलदायक छे, माटे समर्पण करतो. -- 5 ~
५०
.
"ॐ सप्तास्या० नमः प्रदक्षिणां"। १५ । आ
मंत्र वडे त्रण अथवा एक प्रदक्षिणा करवी. “ ॐ यज्ञेनयन्त्र
नमः मन्त्रपुष्पां." । १६ । आ मंत्रवडे देवने मंत्रपुष्पां-
जली समर्पण करी, त्रण अथवा एक साष्टांग नमस्कार करी;
आसन उपर येसी हाथ जोडी नम्रता पूर्वक प्रार्थना करवी. तेना
श्लोको:-"आवाहनं० मन्त्रहीनं० अन्यथा० गतंपापं०"
पछी “यस्प स्मृत्या ०"एवं विष्णु स्मरण करी “ अनेन यथा०"
विगेरे बोली कर्म समाप्ती कन्यार्नु तथा ते समर्पण कन्यानुं जल
मुकवू. पछी शंखमां शुद्धोदक भरी " शंखमध्ये " आ मन्त्र
बोली ते शंखन देव उपर प्रदक्षिण रीते फेरवी पोताने ते उदक
वडे प्रोक्षित करी लई; त्रण वखत अथवा. एक वखत देवतीर्थर्नु
प्राशन क. ते वखते ॥
अकाल मृत्युहरणं"
वोलवो. आ प्रमाणे देवपूजा करवानी पद्धति समजवी. ।।
आ
श्लोक
प्रकरण ११ मुं.
अथ श्रीमदुमारमणप्रतिपत्तिः।
ॐ शिवेन व्यचसा वा गिरिशाच्छा वदामास।
यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्म ५ सुमना
पूजाप्रनिनिधेिक्षा
रोवप्रातिपत्ति. असन् । * ॐ निश्नपतये नमः ।
ॐ निधनपतान्ति काय नमः ।
काय नमः । ॐ अलिङ्गाय नमः। ॐ हिरण्याय नमः । ॐ हिरण्यलिङ्गाय नमः। ॐ सुवर्णाय नमः । ॐ सुवर्णलिङ्गाय नमः । ॐ दिव्याय नमः । ॐ दिव्यालाय नमः । ॐ भवाय नमः । ॐ भवालेङ्गाय नमः । ॐ शर्वाय नमः । ॐ शवलिङ्गाय नमः । ॐ शिवाय नमः । ॐ शि- लिशाय नमः। ॐ ज्वलाय नमः । ॐ अललिङ्गाय नमः। ॐ आत्माय नमः । ॐ आत्मलिङ्गाय नमः । ॐ परसाय नमः। ॐ परमलिङ्गाय नमः। २२ । एतत्सोमस्य स्प सर्वलिङ्ग ५ स्थापयति पानिमन्वं पवित्रम् । * ॐ सद्यो- जातं मपदयामि सदयोजाताय वै नमोनमः। भरे भवे नातिगये भवस्त्र मां भवोद्भवाय नमः । * चापदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कामाय नमः फलविकरणाय नमो पलविकरणाय नमो वाय नमो बलममधनाय नमः सर्वभूतदपनाय नपो मनोन्ननाय नमः । * अघोरे पोथ घोरेभ्यो पौरपोरतरेभ्यः। सोमः सर्वगर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः । * तत्क्षाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्ने न्द्रः मयोपा । * ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूताना ब्रह्माधिपति प्रम- पोधिपतिमा शिवो मे अनदाशिरोम् ॥ * नपा हिरपवावे हिरवय हिरण्यरूपाय हिरा येऽम्बिकापतये उमापतये पशुपये नमोनमः । * र
५२
सत्यं पर, हरपं वृष्णार्पङ्गलम् । ऊर्ध्वरेतं विरु
पाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः सों 4 स्ट्रस्तस्मै
रद्राय नमो अस्तु । पुरपो वै रद्रस्तन्महो नमो नमः | *
विश्व भृतं भुवनं चिनं बहुधा जातं जायमान च यत् ।
सर्वो ह्येष रद्रस्तरमै रद्राय नमो अस्तु ॥ * वद्रुद्राय प्रचे.
तसे मीढुष्टमाय तव्यसे । वोचेम शंतम र हृदे । * सर्वो ोप
रुद्रस्नस्मै रद्राय नमो अस्तु । * ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
॥ इति शिवमतिपत्तिः ॥
प्रथम लख्या प्रमाणे देवपूजा कोईपण कारणने लीधे
कराती न होय, ( अने आपणा हाये
नियप्रतिपत्ति क्यारे देवपूजा थवी जोइये एवी मननी भावना
होय ) त्यारे आ शिवप्रतिपनीनो पाठ
भणयो. मणवानी पद्धती एवीः-प्रथम प्रात.सन्ध्यादि नित्य कर्म
करी रह्या पछी आसन उपर वेसीने शान्त अने एकामा चितवहे
ईश्वर ध्यान करी, हाथ जोटीन संपूर्ण पाठ भणी जयो एटले
पूजा न्यानुं फल मळी शके छे.
भणची.
था शिव प्रतिपचीनो पाठ परमकृपालु तथा धर्मोद्धार परनार
पिसार्नु प्रा.
बनीभूत श्री. प. प. नगहरु श्री
माय सपा मंत्र मह शारदापीठाधीश्वर श्रीपामाधार्थ
सामीमहारान एमणे "कृष्ण यजुर्वेदना
सपा मी.
नारायण उपनिपायी " उध्दृत करी हालना न्यवहार प्रधान
लोकोना कल्याण माटे छपाची प्रसिद्ध करेला त्रिकाल सन्ध्याना
पुस्तकमां आपेशे छे; तेनी उपयुक्तता तथा सप्रमाणता जोई,
आ पुस्तकमां पण तेनो सङ्घह करेलो छे.
नमस्कार.
प्रकरण १२ मुं.
अथ इंसकल्पोक्तसूर्यनमारविचिः ।।
भाचम्य प्राणानायम्य अयेत्यादेिशकाठी सकीर्य
भम आसनः श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-
हंसकल्पोक्त सूर्य
फल प्राप्त्यर्थ श्रीमपितृपूनारायग
देवतामीत्यर्थ हंसकल्पोपोन विधिना
एकावृत्या नमस्काराख्यं कर्म करिष्य। इति सदस्य
ध्ययः
सदा सवितृपण्डलमध्याती नारायणः सरसिना-
सनसन्निविष्टः ॥ केगुरवान् मकर डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्धनराजनकः ॥ इति ध्यायेत् ॥ ततो
पवान्ते उरसा शिरसा पभ्यां पाणिभ्यां जानुपाच
युगपद् यया भूमिस्पर्शी भवेत्तथा नात् ।।
ॐ हां हप्तः शुचिषद ॐ नित्राय नमः ॥१॥
ॐ ही सुरन्तरिक्षस ही ॐ रवये नमः ॥ २ ॥
५४ ॥ ८॥ भास्कराय नमः ॐ हूं होता वैदिपत् हूं ॐ सूर्याय नमः ॥ ३ ॥ हैं अवियित्रीणसद हैं ॐ भानवे नमः ॐ हौं नृपत् हौ ॐ खगाय नमः ॐ हः वरसत् . ॐ पूष्णे नमः ॐ अनसत् द ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ॥ ७ ॥ ॐ ही व्योमसत् ही ॐ परीचये नमः ॐ ई अब्जा गोना • हूं ॐ आदित्याय नमः ॥ ९ ॥ ॐई कजाऽअदिना है ॐ सवित्रे नमः ।।१०।। ॐ हौं ऋतम् । ॐ अर्काय नमः ॥१॥ द वृहत् हा * यहां ही सुचिष मुरन्तारक्षम हां ही मितरविभ्या नम ॥ १३ ॥ * ई में होता वर्दिपदातयिदुरागस हूं - ॐ सूर्यभानुभ्यां नमः । ९४ ॥ ॐ नृपदरसत् ही *सगप्पभ्यां नमः ॥ १५ ॥ ॐ हां हीन सम्योपसत् हिरण्यगर्भमरीचिम्पा नमः ॥ १६ ॥ ॐ अजागोमा ऋननाउ अदिनाः आदित्यमपितृभ्यां नम ॥१७॥ ॐ चोदा ऋरात् यो अर्थ भास्कराभ्यां नमः ॥१८॥ छपी नई सः शुषिपदारतरिकासमीना दिपदमिपिरोणमन् पापी में पिरति हा सूर्यभानुभ्यो नमः॥ १९ ॥ ॐ हौं हा हा ही नृप- दरसदृतसन्योमसत् हौं हः हां ही ॐ खगपूप हिरण्यगर्भमरीचिभ्यो नमः ॥२० ॥ ॐ हूं हैं हाँ हः अन्ना गोगा ऋतजा अद्विना ऋतंबृहत् हूं हैं हौं इः ॐ आदित्यसावित्रर्कभास्करेभ्यो नमः ॥ २१ ॥ *हां ही पई ही हो ही दूंहीहः Eस चिपद वर्मुरन्तरिक्षसद्धौनाच्योदपदतिथिर्दुरोणसत् । नुपरसस्तसम्योपसदृब्जागोजागाऽअद्विमा अनव हत् हांदी पीडः यहाद दादः ॐ पियविमू- पभानुखगपूपहिरण्यगर्भगरीच्यादित्यसविप्रर्कभास्करेभ्यो नमः ॥२२॥ पुनरेवं द्विः १२४॥ एवं चतुर्विशनि नमस्का- रान् कृता " अनेन एकात्या हंसकरपोकाविधिना श्रीस निमस्काराख्येन कर्मणा श्रीरावितृसूर्य पारायणः मी. यतां न मम । ॐ तत्सब्रह्मार्पणमस्तु । इवि सूर्यनमस्कार विधिः ॥ हंस कल्पोक्त सूर्य नमस्कारनी पद्धतीः- प्रथम आचमन अने प्राणायाम करी " अद्यपूर्वोचरित करिष्ये " एy बोली सकल्प फरवो. नमस्कारनी माहिती, पछी " ध्येयः सदा लोकवडे ध्यान करी; प्रत्येक मन्त्र विभागना नमः शब्दद् उच्चारण करी --
साष्टांग नमस्कार करवो ते वखते वे पग, (पादान ) बे घुटण,
वे हाथ, हृदय, (छाती) तथा मस्तक, शरीरना आ आठ स्थानो
जमीननो स्पर्श एक्दम करे तेची रीते नमस्कार करवा, अथवा
दण्डवत् नमस्कार करवा प्रथमनी पद्धतीप्रमाणे नमस्कार करवाथी
शरीर कसवाल बने छे, बावीसमो नमस्कार फरी बे वखत तेवोने
तेवोज भणवाथी चोवीस सख्यापूर्ण थाय छे आ प्रमाणे ( पोताना
शक्तीने अनुसरी एकथी बार आवृत्तीओ पूर्ण थता सुधी ) नम
स्कार करी रह्या पछी " अनेन० " इत्यादि बोली कर्म सम
र्पण पर आ प्रमाणे सूर्य नमस्कारना विधि समजवो
प्रकरण १३ म.
अथ मध्यान्हसन्ध्याप्रयोग ॥
आचम्य प्राणानायम्प अगाध महा० त्यर्थ मध्या
न्दसन्ध्योपासनं करिष्ये । इति सङ्क
मध्याह सध्या
सयेत् । अत्राम्युमाशन विशेष । आपः
पुनन्त्वित्यस्य कश्यपऋपि आपोदेवता अनुपछन्द
अम्बुप्राश ने विनियोग | ॐ आप पुनन्तु पृथिवीं पृथिवी
पूता पुनातु माम् । पुन तु ब्रह्मणस्पति ब्रह्मपूना पुनातु माम् ।।
यदुरिष्टमभोज्यच्च यद्वा दुवरितं मग । सर्व पुनन्तु मा-
।
मापोऽसताश्च मतिप्रह र स्वाहा ।। इति ॥ मध्यान्ह सन्ध्या- यामयः सकदेव देयः । त्रय इति केचित् । शेष प्रातः सन्ध्यावत् । अन्ते " अनेन मध्यान्हसंध्योपासनाख्येन कर्मणा ० न मम " इति समर्पयेत् ॥ ॥ इति मध्यान्हसन्ध्याप्रयोगः॥ हवे मध्यान्हसन्ध्यानी पद्धतिः---प्रथम आचमन प्राणा- याम करी" अनाय. मध्यान्हसन्ध्यो- वामा विशेष पासन करिष्य"एको सकस करको. अबुमाशन वखते आपः पुनन्वि० आ मन्त्र बोल्वो. अर्ध्य एक आपवो कोई त्रण अर्ध्य आपवा एवं पण कहे छे. वाकीनु सर्व प्रातः सन्ध्या प्रमाणेज समजवु. अन्ते ( कर्म सम- पण वखते )" अनेन मध्यान्ह० " एवो विशेष (फेरफारी) करी कर्म समर्पण कर. मध्यान्हसध्या कर " मा प्रमाणे मध्यान्हसन्ध्यानो विधि समजवो. R E. टीप-" ब्रह्मयज्ञ तथा तपण या पठी मध्यान्ह सध्या करवी" एवु पण केटला एक स्मृतिकारोन मत छ ( आ. स.)
बाह्मयज्ञ प्रयोग * ॥ तस्य ते प्रकरण १४ मुं. अथ ब्रह्मयज्ञप्रयोग.॥ माड्मुख उदङ्मुखो वा दर्भादिनिर्मित आसन उपरिश्याचम्य प्राणानायम्य दक्षिण- हस्तस्यानापिकायां कुशपवित्रं धारयेत्। ॐ पवित्र स्थो पैष्णव्यौ सवितुर्व - प्रमाऽ उत्पु. नाम्म्यच्छिद्रेण पषित्रैग सूर्यस्य रश्मिभि पवित्रपते परिपूनस्य यत्काम पुने नच्डकेयम् ॥ इति पवित्रं धृत्वा अध पूर्वोचरित एव गुणविशे. पणविशिष्टाया शुभपुण्पतिथौ मम आत्मनः श्रुतिस्मृति राणाक्तफलमात्य ॐ तत्सत्यरमेधस्मीत्यर्थ ( यथाशक्ति) ग्रह्मयज्ञेन वो" इति सङ्कलां कुर्यात् । 'ब्रह्मयज्ञारम्भे यथाविधि स्नाता छन्दः पुरुप शरीरं न्यपेन् । निर्य बिरयगमऊ वन उन्द पुरुषस्य च ॥ न्यासा || ॐ गौतमरदानाभ्या नमः नेत्रयोः ॥ ॐ विश्वामित्रजमदमिभ्या नम योरोः। ॐवशिष्ठकश्प. पाभ्यां नम -नासिक्यो । ॐ अपये नम -पाचि । ॐ गापयप्रिभ्यो नमः शिरसि । ॐ उष्णिमपितृभ्यो नमः श्रीरायाम् । ॐ यतीवृहस्पतिभ्यां नम -इनौ । * पृादपतरपाराधितीभ्यां नम -पागोः । ॐ विष्टु- अध बिन्द्राभ्यां नमः-नाभौ । ॐ जगत्यादित्याभ्यां नमः- श्रोण्योः । ॐ अतिच्छन्दामजापतिभ्यां नमः-लिङ्गे । ॐ यज्ञायज्ञियवैश्वानराभ्यां नम'-गुदे। ॐ अनुष्टुविधेभ्योदे- वेभ्यो नमः-ऊोंः। ॐ पलिमरुद्भ्यो नमः म:-जान्योः। ॐ द्विपदाविष्णुभ्यां नमः-पादयोः। विच्छन्दावायुभ्यां नमः-नासापुटस्थमाणेषु । ॐ न्यूनाक्षरछन्दोभ्यो नमः -- सर्वाङ्गेषु । " एवमेवाङ्गानि गोजयित्वा सदभप. सम्मयते । " एवं न्यासान् कृत्वा मध्यादिस्मरगर्यक विनियोग पठेत् ।। प्रणवस्य पानामपि. परमात्मादेवता देवीगायत्री छन्दः व्याहनीनां परमेष्ठीमजापतिः पनापनिर्ध- हती गायया विश्वामित्रः मरिता गायत्री इस सादिए संजमान्नेषु दशाणसहितेपु याः क्रियामा विवस्वानृषिः मनापतिता नगि च्छन्दाको मर्मागि यापे गर्वाणि सामानि प्रतिलिङ्गोक्ता देवता ब्रह्मयनारम्भे विनि- योगः । इति पिनियोग पठित्वा वामगंयोपरि दासंग पर निधाय तस्मिन् करे नादेशमात्र कुशाग्ररूरे पवित्र संस्थाप तन किञ्चित् जलं क्षिप्सा तदुरि दक्षिगं इस समाच्छाद्य निमीलिताक्षो द्यावापृथिव्योः मधिनीशमा. णो वा आदौ प्रण व्याहृनीस्तित्र. सकन सावित्री च विचारपभ्पस्प वेदादीन् पठेत् । तद्यथा:- ६० ॐ भूर्भच स्व + तसवितु० यात् । १। तत्सवितु० यांत् । २ । तत्सवि० यात् । ३ ॥ ॐ इपेत्वो में त्वा वायवस्त्थ देवो वं - सविता पापयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणऽ आप्यायध्वमघ्न्याऽ इन्द्राय भागम् जायती रनमीवा अयक्ष्म्मा मा बस्तेन 5 ईशत माघश सो दुवाऽ अस्म्पिन्गोप॑तौ स्यात चव्हार्यजमानस्य पशून्याहि ॥ १॥ यसो पवित्रंम् । हिरण्मयन पात्रेण सत्यस्या पिहित मुखम् । यो सावादित्ये पुरुष सोसा यहम् । ॐ म् खम्ब्रह्म ॥ ॐ व्रतमुपैख्य नन्तरेणाहवनी यञ्च गाईपत्यञ्च माशिष्ठन्नप 5 उपस्पृशति । तदपs उपस्पृशत्यमेध्यो चै पुरुषो यदनृतम्बदति तेन पूतिरन्त- रितो मेध्या पाs आपो मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानीति पवित्रं वाऽ आपई पवित्रपूतो व्रतमुपायानीति तस्माद्वाऽ अपऽ उपस्पृशति ।१ । सोम्निमेवा भीक्षमाणो व्रत मुपैति ।[ॐ पूर्णमदई पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदुच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ खंब्रह्म । ॐ खंपुरा- णम् । ॐ वायुरेव खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदयं ग्राह्मणा विदुइँदैन न यद्वेदितव्यम्।] ॐ मानीपुत्रादासुरि यासिन प्राश्नीपुत्र आसुरायणादासुरायण ऽ आसुरेरासु- रियर्याक्षवल्ल्यायाज्ञवल्क्य ऽउद्दालकादुद्दालकोऽरुणादरुण उपवेशेरुावेशिः कुशे ६ कुश्रिाजश्रवसोवाजवा जि- व्हावतोबाध्योगाजिव्हावान् वाध्योगोऽ सितादार्पगणाद- सितोवार्पगणोहरितात कश्यपारित ई कश्यपशिल्पात्कश्य. पाहिल्प डे कश्यप ७ कश्यपानववे कश्यपोनैध्रुविचाची- बागम्भिण्या 5 अम्भिण्यादित्यादादित्यानीमानिशुक्लानि- यज पि वाजसनेयेन याशवस्येनाख्यायन्ते ।। ॐ अग्निाळे पुरोहितयज्ञस्यदेवमुत्विगम् । होताररत्न- धातमम् ॥ ॐ अग्म भायर्यादिचीतगृणानोहम्पदातये । निहोतासास्सियहि पि ॥ ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपोभवन्तु. पीतये । शंयोगमिस्रवन्तु नः ॥ अधानुवाकान् वक्ष्यामि । मण्डलं दक्षिणमक्षिह- दयम् । अथ शिक्षा प्ररक्ष्यामि । अयातोऽधिकारः फर- यक्तानि फर्माणि । अथातो गृह्यस्थाटीपाकानां कर्म । वृद्धिरादैच् । समानायः समानातः। मयरसतजभनलगसं- मितम् । पञ्चसंवत्सरमयं युगाध्यक्षम् । गौः ग्मा । अथातो धर्मजिज्ञासा । अथातो ब्रह्मजिज्ञासा । योगी- श्वर याज्ञवल्क्यम् । नारायणं नमस्कृत्य । इति विद्यातपो- योनिरयोनिविष्णुरीडितः । वान्यज्ञेनाचितो देवः पीयतां भेजनार्दनः । इति ब्रह्मयज्ञ रिचाय दर्भविमानामुष. रस्या त्यागं कृत्वा कर्मसमर्पणं कुर्यात् । यस्यस्मृत्या०
६२
तमन्युतम् ॥ अनेन ब्रह्मयज्ञाख्येन कर्मणा भगवान् श्री
वेदपुरुष पीयताम् न मम । ॐ तत्सदनलार्पणमस्तु ।।
इति ब्रह्मयज्ञ प्रयोग.॥
ब्रह्मयज्ञनो विधि --पूर्व अथवा उत्तर दिशा तरफ मुख
ब्रह्मयज्ञनो माहिती करी दर्भ विगरेना आसन उपर वेसी,
साथ प्रयोग
आचमन तथा प्राणायाम करी, वे दर्भनु
प्रथियुक्त पवित्र, “ ॐ पवित्रस्थो केयम् " आ मन्त्र कोली,
जमणा हाथनी अनामिकाना वीजा पर्वमा धारण करी, हाथमा
पाणी लई, " अयपूर्वो० करिष्ये " आ प्रमाणे वाली सङ्कल्स
करयो “ सर्वानुमभूत्रमा कर्जा छे के, ब्रह्मयज्ञना आर
ममा यथाविधि (मुख्य अथवा गौणपद्धतीथी ) स्नान
परीने वेद पुरुपने पोताना शरीरमा स्थापित करवो.
ते वेदपुरपनने शिरोभाग चमसनामकपान अरामुख
कन्यु होय तो जेवु देवी माफिये तेवो " आ प्रमाणे
वेद पुरपना मधान गनु वर्णन आपी पछी न्यास कसा छे.
भापणा पानमोतिक देहना अगे रटेली अपवित्रता दूर थईने
वेद पुरपन आरापन करवा रायक पवित्रता प्राप्त करवा माटे
तथा वेदमय शरीर थाना माटे ब्रायनना आरममा न्याम
करवा' ॐ गोनय." अशीधी दरेक मानो उच्चर परतान
ते ते म्थानने परी परयो मनोना अनुक्रमने अनुसरी स्थानोनो
अनुभम आ प्रमाणे--त्र, कान, मासिफा, मु, मस्तक,
६३
ग्रीवा, (डोक ) हनु, ( दादी) हाय नाभि, कटि, लिङ्ग,
गुदा, ऊरु, घुटण, पग, नासिकास्थपवन, सर्वशरीर
उपर, ॥ १७॥ आ प्रमाणे न्यास करवाथी सर्व वेदमय बने
छे. न्यास करी रखा पछी ऋपि छन्द देवता विनियोग जाणवा
अथवा बोलवा. "
प्रणवस्य० ब्रह्मयज्ञा०
आ विनियोग
बोली रह्या पछी डावा धुंटण उपर जमणो पग राखी पलांठी
(प्रौढासन करी ) वाळी; पूर्व तरफ आगळीओनां अग्र थाय
तेवी रीते छत्तो डायो हाथ जमणा घुटण पर राखी; तेमां दश
आगळ लांगा एवा वे दर्भाग्र ( शक्य होय तो) पूर्व तरफ
अन रहे तेवी रीते राखी, तथा थोडुं पाणी पण नांखी; तेना
उपर जमणो हाथ अधोमुख ढांकी, नेत्रनुं मीलन करी, अथवा
तो उघाडा नेत्र छता कोई पण पदार्थ उपर दृष्टी न जाय तेवी
रीते आकाश तथा पृथ्वीना वचला सन्धि भागनेज जोता रही;
स्वाध्यायनो आरंभ करवो. प्रथम "प्रणव तथा प्रणव्याहृति एक
वखत अने वणवार गायत्रीमंत्र " एटलं भणीने पछी
इपेत्वो० " थी ते " जनार्दनः " मुधी भणी ज. पछी
हाथमाना दी तथा दर्भपवित्र पोतानी डावी बाजू तरफ
नासी देवा; अने " यस्यस्मृत्या०" आ लोक तथा " अनेन
नहायता आ प्रमाणे वोली कर्म समर्पण कर.
आ प्रमाणे ब्रह्मयज्ञनो विधि समजवो.
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अद्य- प्रकरण १५ मुं. अथ तर्पणप्रयोगः॥ पूर्ववदासन उपविश्याचम्य प्राणानायम्य ( सति सम्भवे ) कुशपवित्रं धृत्वा तर्पण प्रयोग पूर्वो० ॐ तत्सत्परमेश्वरमीत्यर्थं देव- ऋषिमनुष्य पितृतर्पणं करिष्ये " इति सङ्कल्प्य ताम्रपाने रौप्यपात्रे तदभाव यस्मिन् कस्मिन्बापि शुद्ध पात्रे श्वेतगन्धं तण्डुलान् सुगन्धिपुष्पाणि तुलसीदलानि च निक्षिप्य तत्पात्रं मादेशप्रमाणः पागतिमिर्दभराच्छाद्य शुद्धोदकेनापर्य तत्र- त्यान् दर्भान् आदाय साञ्जलिवन्धो देवानाबाहयेत् । ॐ विश्वदेवासऽआर्गतशृणताहमवम् । एदम्बाई निंपादत ॥ विश्वेदेवाः शृणुतेमइयम्मयअन्तरिक्षेयउपद्य- विष्ट । येग्मिजिव्हाऽजताय त्राऽआसयास्मिन्यर्हिषिमा- दयट्रम् ॥ आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेना महाबलाः॥ये सर्पोऽत्र विहिताः सावधाना भान्तु ते ॥ इत्यावाह्य देतीर्थेन प्रतिवाक्यकै काजलिना देवास्तर्पयेत् । अनलो दर्भाः मागया धासः ।
" ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् । ॐ विष्णुस्तृप्यताम् । रुद्रस्तृप्यताम् । ॐ प्रजापविस्तृप्यताम् । ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दासि तृप्यन्ताम् । ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् । ॐ ऋष- यस्तृप्यन्ताम् । ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ गन्धर्वा- स्तृप्यन्ताम् । ॐ इतराचार्यास्तृप्पन्ताम् । ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम् । ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् । ॐभप्सरसस्तृप्य- ताम् । ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् । ॐ नागास्तृप्यन्ताम् । ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् । ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् । ॐ सरित- स्तृप्यन्ताम् । ॐ मनुष्यास्वप्यन्ताम् । यशास्तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षाऽसितृप्यन्ताम् । ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् । ॐ सुप- र्णास्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतानितृप्यन्ताम् । ॐ पशवस्तृप्य. न्ताम् । वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् । ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् । इति देवतर्पणं कृत्वा निप्रीती भूता पूर्ववृतान् कुशानुदगग्रान् दक्षिणहस्तस्य कनिष्ठिकामूलमदेशे धृत्योदङ्मुखः कायतीयन प्रतिवाक्य- मञ्जलिद्वयं दद्यात् । सनकस्तृश्यतु सनकस्तृप्यतु । ॐ सनन्दन- स्तृप्यतु- सनन्दः । ॐ सनातनस्तृप्यतु-ॐ सना० । ॐ कपिलस्तृप्यतु-ॐ कपिः । ॐ आसुरिस्तृप्यतु-ॐ आरि० । ॐ वौदुस्तृप्यतु-ॐ वोडु० । ॐ पञ्चशि. सस्तृप्यतु-ॐ पञ्चशि ॥ इति मनुष्यदेवतर्पणं कृत्वा पाचीनापीती भूला पूर्वधृवान् कुशान् द्विभुनान्दक्षिणाय- मुलान् दक्षिणहस्तस्याङ्गुष्ठतर्जनीमध्यप्रदेशे धृत्वा दक्षि- णाभिमुखः पितृतीन प्रतिवाक्यं त्रीस्तीनजलीन्यात् । कन्यवाडनलस्तृप्यताम् । ॐ कन्यवाउनलस्तृ. प्यताम् । ॐ कव्यवाइनलस्तृप्यताम् । ॐ सोमस्तृप्यताम् ३॥ यमस्तृप्यताम् ३। ॐ अर्यमा तृप्यताम् । ॐ अगि- प्वात्ताः पितरस्तृप्यन्नाम् ३ ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् । ॐ वर्हिपदः पितरस्तृप्यन्ताम् ३ ॥ अथ यमतर्पणम् ॥ तत्र प्रय एको वाजलिर्दयः । ॐ यमाय नमः यमं तर्पयामि। इति एकवारं त्रिवारं वा । एवमग्रेऽपि । ॐ धर्मराजाय नमः धर्मराज तर्पयामि । ॐ मृत्यवे नमः मृत्युं तर्प० । ॐ अन्तकाय नमः अन्तर्क त० ॐ वैवस्वताय नमः वैवस्वतं २० । ॐ कालाय नमः कालं तः । ॐ सर्वभूतक्षपाप नमः सर्वभूतक्षयं त । ॐ औदुम्बराय नमः औदुसरं त० । दध्नाय नमः दनं । ॐ नीटाय नमः नीलं न परमेष्टिने नमः परमेष्ठिनं त०। ॐ सोदगय नमः वृकोदरः । ॐ चिधायनमः चित्रं त० । ॐ चित्रगु. नाय नमः चित्रगुप्वं तर्पयामि । इनि यमतर्पणम । । अध मृतपित्केण फर्नव्यं पितृतर्पगम्। तर पितनागदपेन् * उनन्तस्यानिधीपप्रमन्त समिधागदि । उम. हात भारपिलून हस्पेिऽम।। इत्याचाप तर्पयेत्। तथया:- अमुक गोत्रः अस्मन् पिता अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् । इदं जलं तस्मै स्वधा नमः । इदं० । इदं० । अमुकगोत्रः अस्मपितामहः अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् । इदं जलं तस्मै स्वधा नमः इदं० । इदं० । अमुकगोत्रः अस्मत्पपि. तामहः अमुकशर्मा आदित्यरूपः तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा नमः । इदं० । इदं । अ० मा अस्मन्माता अमुकदा वसुरूपा तृष्यतामिदं जलं तस्यै स्वधा नमः । इदं। इदं० । अ० वा अस्मपितामही अपुरुदा रुद्ररूपा तृ० इदं। इदं० । इदं नमः । अश्वा अस्मत्पपितामही अदा आ- दित्यरूपा तृप्यताम् । इदं । इदं । इदं० । अन्ना अस्म- सापत्नमाता अमुकदा वसुरूपा तृप्यतामिदं जलं तस्यै स्वधा नमः । इ० । इदं० नमः । तत एतान् मवान् पठेत् ॥ ॐ उदारतामवर ऽ उत्परांस ऽ उन्मध्यमा पितर' मोम्पास - अमुंयय ऽ ईयुवमा 5 तज्ञास्तेनौवन्तु पि- तरोहवेषु ॥ अङ्गिरसो न पितरोनवम्बा ऽ अथवाणी भृगद ई सोम्यासं ' । तेपाय ६ सुमतौ यज्ञियाना मपिभट्टे सौमनसे स्पाम ॥ आर्यन्तु न पितर सो- मम्यासोग्निप्वाता - पथिभियान ई । अस्मिन्यझे स्यपयामदन्तोपिलुवन्नु ते बन्लस्मान् ॥ उज्जैनहन्ती रमततम्भय फीलालम्परिघुनंम् । स्वघास्यं तर्पयत में ६८ . पितन ॥ पितृभ्य - स्वधायिभ्य - स्वधा नम - पिताम- हेभ्यं – स्वधायिभ्यं - स्वधा नम पपितामहेभ्य 5 म्वधायिभ्य - स्वधा नम - 1 अक्षपितरो मीमदन्त पित. रोतीतपन्त पितर : पितरः शुन्छध्वम् ॥ ये चेह पितरो ये च नेहयाँश्च विद्या २ उंच न विद्म । त्वं वैत्य यति ते जातवेदस्वधानि य॑ज्ञ सुकृतजुषस्व ॥ मधुव्वाता भवन्तु न 5 ॥ ॥ ॐ मधु मध मधु । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् । ॐ नमोव : पितरो रसाय नमो व पितर 5 शोपाय नो व 5 पितरो जीवाय नमो व पितर ऽ स्वधायै नमो व पितरो घोराय नमों व पितरो मन्यवे नमों व 5 पितर ऽ पितरो नमोवो गुहान- पितरो दत्त मतो 4- पितरो देग्मत पितरोव्वास आधुत्त ॥ आधुत्तपितरोग कुमारम्पुष्करस्रजम् । यथेह परपो सत् ।। " द्वितीय गोत्रम् " | - ६९ ...." ............ ........... ........... तस्मै०३ शर्मा वसुरूप- ..........."भ्राता .... ............. ........... ....... ... ............ """दा वसुरूपा तृ० तस्यै०३ । गोत्रा" दृद्धममातामही “दा आदित्यरूपा तृ० तस्पै०३। "गोत्रा "पत्नी "दा वसुरूपात तस्यै० ३1........... 'गोत्र "सुतः 'शर्मा वसुरूपस्तृप्य० तस्मै ०३ ।........ 'गोत्रा ""कन्या “दा वसुरूपा तृ० तस्यै० ३ .........."गोत्रः "पितृव्यः "शर्मा वमुरूपस्तु "गोत्रः 'मातुलः स्तृ• तस्मै० ३।........... गोत्रः .""शर्मा वसुरूपस्तु' तस्मै० ३। 'गोत्रा "पितृभगिनी" "दा वसुरूपा तृप्य० तस्यै० ३ । ..."भातृभगिनी......"दा वमुरूपा तृप्यता. तस्यै ०३|.......... "गोत्रा आत्मभगिनी ""दा वसुरूपा तृप्यता० ३ |... "गोत्रः श्वशुरः "शर्मा वमुरूपस्तृप्य० तस्मै० ३........... गोत्र: "गुरु ........"शर्मा वसुरूस्तृ० तस्मै० "गोत्र 'आप्तः शमी वसुरूास्तु तस्मै "गोत्र "शिप्यः शर्मा वसुरूपस्तृ• तस्मै० ३। ॐ आब्रह्मस्तम्बार्यन देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥ अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् । आब्रह्मभुवनालो. कादिदमस्तु तिलोदकम् ॥ ये वान्यता बान्धवा ये येज्य. .... ....... ........ ...... .... ...... ........ .
ते जन्मनि वान्धवाः । ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्चेन वारिणा । इत्यञ्जलित्रयं दद्यात् ॥ एतावत्पर्यन्तं मृत- पितृकेणैव कर्तव्यम् ॥ अथ वस्त्रनिष्पीडनम् । ये के चास्मत्कले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः । गृहन्तु मया दत्तं वस्त्रनिप्पीडनोदकम् ॥ इति मत्रेण सदशं चतु गुणीकृत वस्वं स्ववामभाग भूमौ निप्पीडयेत् । ततो इस्तस्थान् दर्भान् स्ववामभागे त्यक्त्वा सव्येनाचम्प प्राणानायम्प पाने शुद्धोदकं पूरयित्वा तन्मध्ये ऽ नामिकया पदलं कृत्वा तत्र यथासंभवं गन्धाक्षतपुष्पतुलसीपत्राणि क्षिप्वाऽ यान दद्यात् । तन मन्त्रा। ॐ ब्रह्मनमानम्धमपुरस्ताद्वितीपत मुश्चोयेन 5 आंबई। मघुन्याऽपमाऽस्यविष्ठा मतश्योनिमसनव- विवं -- ॥ ॐग्रहाणे नमः ॥ ॐ इदं विष्ण• साहा ॥ ॐ विष्णने नमः ॥ ॐ नमस्ते रुद्रप्रयजनोतऽभवेनमें + । बाहुभ्यामुततेन ॥ॐहदाय नमः। ॐ तत्सन्चितु याच । ॐ सनिमः। ॐ मिनत्यचर्पणीधृतोपोटेवस्य मानुमि ।
द्युम्नचित्रश्रवस्तमम् ॥ॐ मित्राय नमः ॐ इमम्मैवरुण- श्रुधीहमद्याचमृदय । वामवस्युराचके । ॐ वरुणाय नमः।। एवं पडन्दित्वा सूर्यमुपतिष्ठदेतैर्मन्नैः ॥ ॐ अश्रिमस्यके वो चिरश्मयोजना अनु। भ्राजन्तोऽअग्नौयथा॥ उपयाम गृहीनोसि सूबीय चा भ्राजायैप ते योनि सूर्वीच त्वा- भ्राजाय । सूर्य भ्रानिष्ठ भ्रार्जिन स्स्थन्वे- हप्वमि भ्राजिष्ठोहर्मनुष्येषु भूयासम् ॥ राई शुचिपद- मुरन्तरिक्षसद्धांतविदिषदतिषिर्दुरोणसत् । नृप स- हत सोमसजागाजातजाअटिजाऋतम्बृहत् ।। इति तिष्ठन्नुपस्थाय दिग्भ्योदिग्देवताभ्यश्च नमस्कुर्यात् । ॐ माच्य दिशे इन्द्राय च नमः । ॐ आग्नेय्यै दिशे अग्नये च नमः । ॐ दक्षिणायै दिशे यमाय च नमः । ॐ नैऋत्यै दिशे निनये च नमः । ॐ पथिमायै दिशे वरुणाय च नमः। ॐ वायव्य दिशे वायवे च नमः। ॐ उदीच्य दिशे सोमाय च नमः। ॐ ईशान्य दिशे ईश्वराय च नमः । ॐ ऊर्याय दिशे ब्रह्मणे च नमः। ॐ अपराय दिशे विष्णवे चनमः। ॐ अवाच्यै दिशे अनन्ताय च नमः ॥ एवं नमस्कारान् कृत्वोपविश्य ॐ ब्रह्मणे नमः। ॐ अग्नये । ॐ पृथिव्यैः । ॐ औपधिभ्यो । ॐ चाचे० । ॐ वाच- स्पतये। ॐ महदभ्यो । ॐ विष्णवे० ॐ अदभ्यो। ॐ अपाम्पतये । ॐ वरुणाय नमः । इति नवा शुद्धोदकेन मुखं विमृजेत् । तत्र मन्त्रः । । ।
७२ ॐ संवर्चसापर्यमासन्तभिरगन्महिमनसासशिव- ने। वो सुदबोनिदधानगयो पापुतन्यायट्विरिष्यम् ॥ सतस्तर्पणे आवाहितदेवता विसर्जयेत् । ॐ देवांगातुविदोगा- तुविवागातुमित । मनसस्पतऽइमन्दैवज्ञ स्वाहाव्यात था ॥ यस्य स्मृत्या. अनेन देवपिमनुष्यपितृतर्प णाख्येन कर्मणा भगवान् श्रीवेदपुरुषः प्रीयताम् । न मम तत्स० विष्णवे नमः ॥ ब्रह्मयज्ञतर्पणयोस्तन्त्रायोगे " ब्रह्मयज्ञपूर्वक देव ब्रह्मयज्ञ तथा तर्पण ऋषिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये " इति अव्यवहित रीते करया संकल्पे, “ अनेन ब्रायनपूर्वक देव० पणाख्येनः" इति समर्पणे च विशेष।। इति तर्पणप्रयोगः ॥ अक्षयज्ञ पछी तर्पण करवानी पद्धती:- :-प्रथम कह्या प्रमाणे आसन उपर चेसी आचमन तथा पाणा- थाम करी, होय तो दर्मनुं पविन धारण करी अब पूर्यो• रिष्ये " एवो सहस्प क्री; तापमय अथवा रौप्यना पानमा अभाये कोईपण प्रकारना शुद्ध पात्रमा श्वेतचन्दन चौखा (अक्षता ) सुगन्धि फुलो तथा तुलसी पयो नासी ते पारने आसरे दश आंगळ जेटस प्रमाणना साम एया प्रग दी पडे आच्छादित फरी, शुद्धोदक्थी ते पार पूर्ण करीतना उपरना दर्मो लई: दनि तर्पणनी माहिती तथा प्रयोग ॥
७३ गर्भमा राखी हाथ जोडी देवोठे आवाहन करवं. तेना मंत्र:- "ॐ विश्वेदेवास ० वन्तुते॥" आ प्रमाणे आवाहन करी देव- तीर्थ वडे एक एक अञ्जली उदक प्रत्येक वाक्यना अन्ते आपी देवोनु तर्पण करवू. ते वखते दर्भ पूर्वाग्र थई शके तेवी रीते अंजलीमा राखवा. "ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् । २९ ।" आ प्रमाणे देव तर्पण करी; निचीती ( यज्ञोपवीतने माळाप्रमाणे धारण करी;) थईने, पूर्वेना द ने उत्तर दिशा तरफ अन थाय तेवी रीते जमणा हाथनी कनिष्ठिकाना तथा अनामिकाना मूळमां घरी; उत्तर तरफ मुख करी, प्राजापत्य तीर्थ वडे प्रत्येक वाक्यने अनुसरी वे वे वखत जलाञ्जली आपवी. " केटलाएक विद्वानो दरेक जलान्जली आपती चखते तर्पण वाक्यनो उच्चार करवा तरफ अनुकूलता बतावे छे. अने बीजा तो वाक्यनो उच्चार एक वखत करी जलाञ्जली मान चे वखत आपया माटे अनुकूलता धरावे छे. माटे शिष्टाचार संमत पद्धतीनो स्वीकार करवो ते युक्त छे." "ॐ सनकस्तृप्यतु-ॐ सनकस्तृप्यतु ।७। आ प्रमाणे मनुष्य देवतर्पण करी, " प्राचीनावीती" एटले " यज्ञोपवीत दक्षिण स्कंध उपर राखी डायो हाथ बहार राखनार" थईने हाथमाना दोंने वेवडा करी दक्षिण तरफज मूळ तथा अन थाय तेवी रीते जमणा हाथना तर्जनी तथा अङ्गुष्ठ आ बेना वचे धारण करी; दक्षिणाभिमुख थई, पितृ-तीर्थ वडे त्रण त्रण अजली आपवी. तर्पण वास्यना उच्चारनो स्वीकार्य पक्ष उपर लख्या प्रमाणेज समजवो. "ॐ कन्य० ॐ कच्य०ॐ कव्य०।७।
७४
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आ प्रमाणे पितरोनुं तर्पण करी रह्या पछी यमतर्पण क.
तेमां तर्पण वाक्य उच्चारी एक एक अञ्जली आपदो. त्रण
त्रण अञ्जली आपवा एवो पण पक्ष छे. " ॐ यमाय
नमः यमं तर्पयामि । १४ । " अहीं सुधी जीवत्-पितृके
तथा मृतपितृके सरखीज रीते तर्पण करवु. प्राचीनावीत
करती वखते यज्ञोपवीतमाथी डाबो हाथ संपूर्ण बहार न काढता
एकलो अंगूठो न काढवो. एवो जीवत् पितृके प्राचीनावीती
थवा विशे निबंध छे. “जेनो पिता जीवतो होय ते जीवत्यि-
तृक. " मृतपितृके पितृतर्पणना आरंभमां पितरोनुं आवाहन
कर. " ॐ उशन्तस्त्वा० तवे । " आ मन्त्र बोली पितरोनुं
भावाहन करी, ". “गोत्रः........पिता ......"शर्मा वसु.
रूपः तृप्यतामिदजलं तस्मै स्वधानमः । ३।" एवी रीते
दरेक पितर गोत्र, संबंध, नाम, अने रूपर्नु उच्चारण करी
इदं जलं तस्मै " पुरुपने उद्देशीने जल आपती वखते--अने
" इदं जलं तस्यै" सीने उदेशीने जल आपती वखते बोली,
ऋण त्रण वखत जल आपq. प्रथम पिता, पितामह, प्रपितामहः
माता, पितामही, प्रपितामही एटला छ जणर्नु प्रयोगमा लख्या
प्रमाणे तर्पण करी पितृदेवताक मन्त्री भगवा. “ ॐ उर्दीरता०
पुरुपोसद ॥ " मन्त्र भणी रझा पछी अनुक्रमे
प्रमातामह, दममातामह, मातामही, ममानामही, वृद्ध प्रमा
तापही, स्त्री, (पोतानी) पुत्र, कन्या, पितृव्य, मातु , भ्राता,
पितृपगिनी, पातृभागेनी, भात्मभागनी, घर, गुम,
"
मातामह,
७५ आत, शिष्य," एमना गोत्र, संबंध, नाम, तथा रूप, उचारी तर्पण कर. उपर लखेला तर्पण करवा लायक पितरोमां आवेला स्त्रीवर्ग पैकी कोईनो पति पण मृत थयो होय तो तेना नाम साथे “ सभर्तृका " एवं पुत्र (उपनयन थयेलो) मरेलो होय, अथवा कन्या परग्या पछी मृत थयेली होय; तो "समुता" एवं वधारे बोलवू. तेमज पुरुपनी पत्नी मृत थयेली होय तो सपत्नीक " अने पुत्र अने कन्या मृत थई होय तो ससुत" एवं वधारे बोलवू. शिप्य सुधी बतावेला संघांधओ पैकी जेओ मृत हशे तेटलाने उद्देशीने जलाञ्जली आप्या पछी; आब्रह्म आ त्रण श्लोक वडे जलाञ्जली आपवा; अहीं सुधी मृतपितृकेन करवानुं छे. पछी दशायुक्त वस्रने चोग' करीने ५ ये के चा." आ श्लोक बोली ते पोतानी डाबी बाजूए भूमी उपरज निचोव. पण धेरज तर्पण करवं होय तो वस्त्र नीचोवq नहीं. तर्पण मारे हाथमा लीधेला दो पण डावी बाजू तरफ नाखी, सव्य करी, आचमन तथा प्राणायाम करी, पात्रमा शुद्धोदक लई, तेमा दक्षिण हाथनी अनामिका वडे पड्दल लखी यथासंभव गंधाक्षतपुष्प तुलसीपत्रनांखी अर्घ्य आपवा. "ॐ ब्रह्म वरुणायनमः ६।" एवी रीते छ अर्घ्य आपी उमा रही ऊर्ध्व वाहू थईने, अथवा हाथ जोडीने सूर्य, उप- स्थान क. " ॐ अश्रम० बुहत् ।" उपस्थान थया पछी अनुक्रमे प्रदक्षिण फरतां दिशा तथा दिक्पालोने नमस्कार करी , नमस्कार करी आसन उपर वेसी ॥ ब्रह्मादिकने पण शुद्ध जल वडे मुख स्वच्छ करवं ते वसते . ॐ संवर्च." आ मन्त्र भणयो; पछी तर्पण स्वीकारका माटे जेमर्नु आवाहन करेलुं, तेमन विसर्जन करवू. ते वखते ॐ " देवांगा." आ मंत्र भणयो पछी यस्यस्मृत्या. आ श्लोक बोली "अनेन." आ रीते कर्म समर्पण कर. कर्म पूर्ण थया पछी हाथमार्नु पवित्र काढी नांखी बे वखत आचमन करवू. आ प्रमाणे तर्पणनी पद्धती समजवी. ब्रह्मयज्ञ तथा तर्पण एक तंत्री करवा होय तो सकल्पमा "ब्रह्मयज्ञपूर्वकं देवऋषिमनुष्यपितृ तंत्र प्रयोग करयो होय तर्पण करिष्ये" एवो, अने समर्पण वखते अनेन ब्रह्मयज्ञपूर्वक देव०पणा." एवो विशेष तफावत करवो. तो विशेष " वित्रं धृत्वा प्रकरण १६ मुं. ॥ अथ वैश्वदेवप्रयोगः ॥ आचम्य प्राणानायम्य सति मम्भवे पूर्ववत्कुशप- अद्य पूर्वो० तिथौ मम गृहे पश्चमूनाजनि. लोपपरिहारपूर्वक नित्यकर्मानुष्ठानसिद्धिद्वारा श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थ [ पञ्चमहायज्ञैर्यध्ये ] पञ्चमहायज्ञरूपं वैश्वदेवाख्यं क करिष्ये । इति मट्कल्प्य स्थाण्डिले वैश्व- तसकला ७७ देवः कर्तव्यश्चेत्पच भूसंस्कारान् कृत्वा, ताम्रादिकुण्डे त्व- कृत्वा महानसात्वाकानिमाहृत्य ॐ भूर्भुवःस्वः पाव कनामा- नमानिं प्रतिष्ठापयामि इत्यक्षतैः अग्निं प्रतिष्ठाप्य धमन्या प्रबोध्य ध्यायेत् । ॐ चचारिशृङ्गात्रयो ऽ अस्यपादादेशीर्षसप्तहस्तांसो. अस्य । प्रियांबद्धोपभोरोरवीतिमहोदेवोमा आवि- वेश*। ॐ एपोहदेव मुदिशोनुसा पूर्वी हज़ात ६ सऽ उगर्भ ऽ अन्तः । स एवजात सननिष्यमांग ई मृत्यङ् जनास्तिष्ठतिमर्वतोमुख ६॥ इति ध्यात्वा " मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुकव्यभुक् तथा । पितृणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने ॥ ॐ पायकनाम्ने वैश्वानराय नमः। अग्नये अत्रं नमः । अग्नये गन्धं नमः । अग्नये अक्षतापुप्पं च नमः । अग्नये नमोनमः । अमे शाण्डिल्यसगोत्र मेपध्वज पामुख मम सम्मुखो वरदो भव । ततो हस्ते जलं गृहीत्वाऽग्नि निः प्रदक्षिणं परिसमुद्य विश्व पर्युक्ष्य धृताभि- धारितौदनस्य बदरीफलप्रमाणा आहुतार्जुहुयात् । ॐ भूः साहा इदमग्नये न मम । ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे न मम । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय न मम | ॐ भूर्भुवःस्वः स्वाहा इदं मजापतये न मम । ॐ देवकृत- स्येन सोवयजनपसि स्वाहा इदमग्नये न मम । ॐ मनुष्य कृतस्यैनसोदयजनमसि साहा इदं० । ॐ पितृकृतस्यै- ७८ नसोक्यजनमसि स्वाहा इद० । ॐ आत्मकृतस्यैनसो- वयजनमसि स्वाहा इद। ॐ एनस 5 एनसोवयजन- मसि स्वाहा इद० । ॐ यच्चाहमेनो विद्वांश्चकार यच्चाविद्वाँ स्तस्य सर्वस्यैनसोवयजनमसि स्वाहा इद० । ॐ मना- पतये स्वाहा इदं प्रजापतये न मम । ॐ अग्नये सिष्टकृते स्वाहा इदं अग्नये स्विष्टकृते न मम । इति हुत्ला अग्नेः पश्चिमत उत्तरतो वा वितस्तिमात्रं जलेन भूमी मण्डलं कृत्वा तत्रैतान चलीन् दद्यात् । स्थापनप्रकारश्चैत्यम् । पूर्व ॐ विधाने. २ ॐ भृताना नपतये ॐ धाने. १ ॐ हंतते. ॐ सर्वेभ्यो ८ ॐ यक्ष्मतत्ते. ॐ विश्वेभ्यो. ॐ पितृम्य ६ पश्चिम अथाहुतयः । ॐ घाने नमः इदं धात्रे न मम ।। ॐ विधात्रे नमः इदं विधाने न मम । २॥ ॐ विश्वभ्यो देवेभ्यो नमः इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम । ३ । ॐ सर्वेभ्यो भूतेभ्यो नमः इदं सर्वेभ्यो भूतेभ्यो न मम । ४ । ॐ भूतानां च पतये नमः इदं भूतानां च पतये न मम | ५। एवं वलिदानानन्तरं पूर्वोक्तपकारेण सिद्धानपूरितपात्रस्य देवेभ्यो नैवेद्यं सपर्य पातितवामनानुदक्षिगामुखोऽ पस- व्येन, "ॐ पितृभ्यः स्वधा इदं पितृभ्यो न मम ।६।" इत्येक पलि दत्ता प उपस्पृश्य सम्पन बल्यन्नपात्रं प्रक्षाल्य तजलं ब्रह्मादिवलीनां वायव्य भागे " ॐ यौतत्ते निर्गजनं नमः इदं यक्ष्मणे न मम । ७ । इत्युत्सृज्य ब्रमयज्ञः पूर्वमकृतश्चेदत्रायसरे विधाय" सिद्धान्नादनमादाय निवीती भूत्वा मण्डलोत्तरतः "ॐ हन्त ते सनकादि मनुष्येभ्यो नमः इदं हन्त ते सनकादिमनुष्येभ्यो न मम । ८।" इति बालि दत्ता सव्येन यथाशक्ति गोग्रासं "मुराभि वैष्णवी माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता । गोग्रास तु मया दत्तं सुरभिः प्रतिगृह्य - ताम् । इदं गोभ्यो न मम । ९ । इति गोग्रासं समय यथाशक्ति अन्नमादाय गृहादहिभूमौ निधाय; " द्वौ पानौ श्यामशवली वैवस्वतकुलोद्भवौ । ताभ्यामनं पदा- स्यामि रक्षतां पथि मां सदा ॥ इदं वभ्यां न मम । यमोऽसि यमदूतो 5 सि वायसो ऽसि महामते । अहोरात्र कृतं पापं यलिं भक्षतु वायसः॥ इदं चायसेभ्यो न मम ॥ पिपीलिकाः कीटपतङ्गकायाः पुभुक्षिताः कर्मणि योगबद्धाः। प्रयान्नु ते तृप्तिमिदं मयानं तेभ्योऽविसृष्टं मुखिनो भवन्तु ॥ इदं .
८०
पिपीलिकाकीटपतङ्गेभ्यो न मम इति श्ववायसपिपीलि.
कादिभ्य एकं पृथग्या वलिं दत्वा इस्तौ पादौ प्रक्षाल्य
गृहमागत्याचम्य पूर्वधृतं भस्म निःसार्य चन्दनादिना
तिलकं कुर्यात् । तत्र मन्त्रः । ॐ सुचक्षा ऽ अहमक्षिभ्यां
भूयास : सुवर्चा मुखेन । सुश्रुत्कर्णाभ्याम्भूयासम्। इति
मन्त्रेण तिलकधारणानन्तरं वैश्वदेविकादग्नेः किश्चिद्भस्मा.
दाय व्यायपज्जम " इति मन्त्रेण ललाटाद्यङ्गेपु
धृत्वा गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर । पत्र
ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ हुताशन ॥
ॐ यज्ञ यागच्छयज्ञपतिहटस्वाय्योनिरस्वाहा ।
एपदैवज्ञोयज्ञपतेतहक्तवाक ई सधीरस्त पस्वस्वाहा।
" कुशपवित्रत्यागः " यस्यस्मृत्या. अनेन वैश्वदेवाख्येन
कर्मणा श्रीयज्ञनारायस्वरुपी परमेश्वरः प्रीयताम् न मम ॐ
तासत्ब्रह्मार्पणमस्तु । ॐ विष्णवे नम इति त्रिः पठेत् ।
इति पञ्चमहायज्ञरूपवैश्वदेवमयोगः
वैश्वदेव पद्धतिः-आचमन तथा प्राणायाम करी शक्य
होय तो दर्भनु पवित्र पण धारण करी
वैश्वदेवनो समजुती " अद्यर्वो. करिप्पे " एवी रीते
गेली सङ्कल्प करी अग्निस्थापना करवी.
स्थंडिल उपर के मृतिकाना गर्तरूप कुण्डमा वैश्वदेव करयो होय
साथ प्रयोग
तो; दर्भवडे त्रण वखत परिसमूहन, गोमय तथा जलवडे त्रण वखत लेपन, दर्भना मूळ वडे त्रण वखत उल्लेखन, अङ्गुष्ठ अने अनामिका वडे मृत्तिका पैकी अपवित्र पदार्थर्नु त्रण वखत, उद्धरण अने उदक वडे त्रण वखत प्रोक्षण; एवी रीते प्रत्येक संस्कार त्रण त्रण वखत फरवो. तांबानो के पितळनो अगिनिवास (कुण्ड ) होय तो आ संस्कार करवानी जरूर नथी. पछी जे अग्नी उपर रसोई सिद्ध करेली होय ते पैकी थोडो अमी वैश्वदेव स्थल पासे आणी " ॐ भूर्भुवः स्वः पावकनामान- मनि पति. " एबुं बोली कुण्डमां के स्थण्डिलना उपर अमि स्थापन करी, किश्चित् अक्षताओ अग्नी उपर नांखी; वांस विगेरेनां भुंगळी वडे अग्नीने प्रदीप्त करी "ॐ चत्वारि एपोह।" आ मन्त्रो बोली अग्नीनुं ध्यान करी " मुखं यः सर्व" आ श्लोकथी नमस्कार करी, गन्धाक्षत पुष्प वडे " अमीना वायव्य खुणा उपर अनीना बहार " अग्नी- पूजन करी • अग्ने शाण्डिल्य भव" एवी प्रार्थना करवी. पछी हाथमा पाणी लई अनीने त्रण वखत परिसमूहन तथा पर्युक्षण ( एटले अग्नीना ईशान्य खुगाथी आरंभी चारे तरफ प्रद- क्षिण रोते अधोमुखहस्ते जल फेरव ते परिसमूहन अने ऊर्ध्व मुख हस्ते जल फेरव ते पर्युक्षण ) करी; घृत पडे पवित्र बनावेला चरूनी बोरना फल जेवडी आहुतियो होमवी. "ॐ भूः स्वाहा ।१२।" आहुतीओनो होम थई रद्यापछी अग्नीना पश्चिम अथवा उत्तर दिशा तरफा मुमारे वार आंगळ प्रमा-
"
पाच
“
णनु मण्डल ( जलवडे) करी तेना उपर आगळ लखेली नाम मन्त्रा-
हुती मुकची. आहुती मुकवानो अनुक्रम बलिहरणना पट्टमा
बताच्यो छे ते ध्यानमा रेवो. "ॐधाने १५॥
आहुतीओ थया पछी सारा भोजन पात्रमा सर्व सिद्धान्नादिकर्नु
परिवेपण करी (राधेलु अन्न पिरसी) देवोना अग्रभागमा जल्वडे
चोखण्टु मण्डल करी, तेना उपर ते अन्नपूर्णपात्र स्थापित करी
पूजा प्रकरणमा लख्या मुजन ॥ नैवेद्य समर्पण करी, फरी
वैश्वदेवस्थान उपर आयी, डाबु पुटण अधोमुख थाय एवी रीते,
दक्षिण दिशा तरफ मुख राखी बेसी अपसव्य करीने " ॐ
पितृभ्य. स्व०६" एवु बोली एक आहुती मुकी हाथ धोईने
सव्य करवु अने यली आपवा माटे लोधेरो चर जे पानमा हतो
ते पार विछळी ते पाणी ब्रह्मादि चलीना यायव्य गुणा उपर
"ॐ यक्ष्मतत्ते.
" .. आ मन्त्र बोली रेटवु, अने ब्रह्मयत
पूर्व न थयो होय तो आ वसते " निदान तण वसत गायत्री
मत्र जपरुपे" पण फरवो. यज्ञोपवीत कण्ठे करीने सिद्धान
(चर) रईने मण्डरनी उपर वान् तरफ "ॐन्तने"
ा मन्त्र वोरी परी आपी, सव्य करी यथाशक्ति गोग्रास एक
पारमा पिरसी" मुरभि० आ मन्न वडे समर्पण करी, परी
ययाति चर घरना बहार जमीन उपर
पिपीलिपादिपना कुत्रा पागहा ने लियो विगेरेना"
मारे एफ टेकाणे मुती अनुरमे दीवानी । यमोहि ।
विलि.मा मन्यो योगते मनोना भन्ने प्रयोगमा यतान्या
"
पापा
,
प्रमाणे त्याग करवो. हाथ पग धोईने अंदर (घरमां) आवी
आचमन करी, प्रथम धारण करेठं भस्म काढी नांखी "
सुचक्षा० " मन्त्रनुं पठन करी चन्दन विगेरे माङ्गलिक द्रव्यनो
तिलक करी वैश्वदेवाग्नीमाथी थोडु भस्म लई ते "ॐ न्यायुप०"
आ मन्त्रवडे पूर्ववत् सर्व स्थानोने किश्चित् किश्चित् लगाडवू,
अने ॥ गच्छ गच्छ० ॐ यज्ञ यज्ञ०" आ मन्त्रो भणी अग्नी
उपर अक्षता नांखो तेनुं विसर्जन करी प्रयोगमा लख्या मुजब
पवित्र त्याग पूर्वक कर्म समर्पण करी त्रण वखत विष्णुस्मरण
तथा कर्मपूर्ति थया बाबत ये वखत आचमन करी भोजन करवं.
आ प्रमाणे पंचमहायज्ञरूप वैश्वदेवनी पद्धती समजवी.
पारस्कर सूत्रमा सामिक माटे वैश्वदेवनी पांच आहुतीओ तथा
पृष्टोदिविविधानानुसार अनी तयार करी तेना उपर
पाक करी वैश्वदेव करवो होय तो सात आहुतिओ कही
छे. लौकिकाग्नि उपर पाक अने वैश्वदेव फरनारने माटे
* शाकल परिशिष्टमां कहेलो वैश्वदेव अहीं आप्यो छे.
प्रकरण १७ मुं.
अथ भोजनविधिः।
भोजनस्थानमागत्य यथोक्तचतुष्कोण मण्डलोपरि
पात्रं निधाय परिविष्य घृतेन पयसा
भोजन विधि मंक्षेपमा.
वाऽऽभिधार्य गायच्या ॐ नमो भग.
चते वासुदेवायेति मन्त्रेण च संप्रोक्ष्यः-
सम- ॐ पितु स्तोपम्हो धर्माणन्तविपीम् । यस्यनितो. व्य्योजसानं विमर्दयत् । इति मंग्रेण अन्नं स्तुत्या दि- वसे ॐ सत्यं त्वःन परिपिञ्चामीति मन्त्रेण, रात्रौ ॐ ऋतंत्वा सत्येन परिषिञ्चामि-इति मन्त्रेणानं " ताज्जलेन प्रदक्षिणं " परिपिच्य ॐ तेजोसिशुक्रम स्यमृतममियामनामासिप्पियन्देवानामनाधृष्टदेवयजनमसि । इति मन्त्रमन्नमभिपृश्य जपेत् । ततः सिद्धानात चरूं तदभावेऽन्यद्वायज्ञियमनमादाय पानदक्षिणतः किन्चिदनार विहाय प्रासंस्थमुदक्संस्थं वा भूमौ वलित्रयं दद्यात् । ॐ भूपतये स्वाहा नमः । ॐ भुवनपतये स्वाहा नमः भूताना पतये स्वाहा नमः इति । ततोऽन्येन पली. नुद्वासयेत स्वयं पर्णादिना वाच्छादयेत् । अथ दक्षिणहस्ते जलं गृहीत्वा ॐ अन्नपते० इति मन्त्र जप्त्या अमृतोपस्तर णमामि स्वाहा इति मन्त्रेण जलंपिवेत् । जप्यमन्त्रश्चेत्थम् । ॐ अपत्तेऽस्य नोदेवनभीवस्यपिणं -1 प्रय दातारैतारिपननोधेहिद्विपढेचतुष्पदे । ॐ अमृतोप- "ॐ माणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा । ५ । इति पञ्चभिराहुतिमि माणौनिहोत्रं दुस्खा यामहस्तेन नेपोख्दक इला विष्णुस्मरणपूर्व शिसापोचनं च यत्सा यवागलं स्तरण । ततः .
भुञ्जीत । आचमनं प्राणाहुतिग्रहणं च वामइस्तेन भोज- नपात्रमालभ्यैव मौनेन कार्यम् । तदुर्घ मौनं पात्रस्प शश्व ऐच्छिकः । तृप्तौ जातायां " ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ” इति मन्त्रेण आपोशनीयादुदकादर्थं पीत्वा शेष-" उत्तरापोशनग्रहणात्पूर्वमेय पात्रादुच्छिष्टं चामभागे प्रक्षिप्य " तदुपरि पितृतीर्यन निक्षिपेत् । तूष्णीं शिखां बध्या चित्राहुति चलाश्च काभ्यः समय इस्ती मुखं घ सम्यक् क्षालयेत् । ततस्तूष्णीमाचम्य माणानायम्य शतं पदानि गच्छेत् । इति भोगनविधिः। भोजननी पद्धतिः-भोजन करवाना स्थाने आवी चोख- ण्डा मण्डल उपर भोजन पात्र मुकी भोजन करवानी पद्धति सर्व प्रकारचें अन्न तेमां पिरश्या पछी घृत थी के दूधथी तेने अभिधारी-गायत्री मंत्र तथा विष्णु द्वादशा- क्षरी मंत्र बोली अन्ननुं प्रोक्षण करी; " ॐ पितुन्नु० " आ मन्त्र बडे अन्ननी स्तुति करी; हाथमां पाणी लई, दिवसे "ॐ सत्यं त्य" अने राते "ॐ ऋतं त्वा. चोली भोजन पात्रना चोतरफ प्रदाक्षण रीते पाणीनी धारा करी, अधोमुख हाथ बडे अन्नने स्पर्श करयो ते वखते "तेजौसि." आ मन्त्र भणयो. पछी मात विगरे यज्ञिय भक्ष्यान्न लई पात्रना दक्षिण भागे थोडे छैटे पूर्व तरफ़ अथवा उचर तरफ समाप्ती थाय आ मंत्र
८६
॥ ॐ प्राणाय०
एवी रीते जमीन उपर त्रण बली मुकवा. ॐ भूपतये० ३ ।" आ
बली मुक्या पछी ते वीजा पासेथी काढी नखावयाः अथवा पोते
तेमना उपर पत्र विगेरेनु. आच्छादन करवं. पछी जमणा हाथमा
जल लेई . ॐ अन्नपते० ॐ अमृतोप० " आ मन्त्रो बोली
ते पाणी पीई जq. पछी पांच आंगळीओ बडे थोडे थोड़े अन्न
५। पांच आहुतिओ लई डाये हाथे
नेत्रोने उदक स्पर्श करी, विष्णु स्मरण पूर्वक शिखा मुक्ति करी,
भोजन करवू. आपोशन तथा प्राणाहुतिओ लेती वखते डावा
हाथे भोजन पात्रने स्पर्श करी राखवो, तथा मौन पण राखवू.
प्राणाहुति लई रह्या पछी इच्छा होय तो मौन तथा पात्र धारण
छोडी देवू अथवा राखq. भोजन थया पछी पात्रमानुं सर्व
उच्छिष्ट अन्न निदान ग्रास मान पण लई ते पात्रना बहार डाबी
बाजू तरफ मुकी; जमणा हाथमां जल लई " ॐ अमृतापि०
आ मंत्र बोली अडधुं पाणी पीवू; अने अडधं पितृतीर्थवडे
प्रथम मुकेला उच्छिष्ट अन्न उपर " आपq. शिखा बांधी
प्रथमना बली न कढाया होय तो ते तथा उच्छिष्टान्न रूप
चित्राहुति लई ने घरना बहार आवी ते कागडाने माटे नाखी
दर्दने मुख तथा वेड हाथ स्वच्छ सारी रीते धोवा. पछी
तूष्णी आचमन तथा प्राणायाम करी आसरे सो पगला सुधी
चाली पछी नित्यव्यवहारमा आसक्त थq.
मा प्रमाणे भोजन पद्धाते समजवी.
प्रकरण १८ मुं.
अथ सायंसन्ध्याप्रयोगः ।
आचमनप्राणायामादि प्रातःसन्ध्यावत् । सङ्कल्ये
" सायंसन्ध्योपासनं करिष्ये " इति
सायंसच्या प्रयोग.
विशेषः । अम्बुमाशने “ अनिश्वमे-
त्यस्य नारायणऋपिः अनिर्देवता अनुष्टुप्छन्दः। अम्घु-
प्राशने वि० । ॐ अग्निश्च मामन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युक.
तेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यदन्हा पापम कार्प मनसा वाचा
इस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अइस्तवलम्पतु यकिञ्चि-
दुरितं मयि इदम मा ममृतयोनी सत्ये ज्योतिपि जुहोमि
स्वाहा।" इति विशेषः। उपस्थान प्रातःसन्ध्यावत् । अथवा
इममेइत्यस्य शुनाशेपऋपिः वरुणो देवता गायत्रीछन्दः
तत्वापामीत्यस्य शुनाशेपमपिः वरुणो देवता त्रिष्टुप छन्दः
वनोअमइति द्वगोर्यामदेवऋषिः अग्नीवरुणो देवते त्रिष्टुप्-
छन्दः । उपस्थाने वि०।
ॐ इमम्म० चंके । ॐ तायामि। ॐ वंनोऽअन्ने-
वरुणस्यनिद्वान् देवस्यहेहो ऽ अवयासिसीष्ठाउं । यनिष्ठो
चन्हितम ई शोशुचानोविश्वाटेपा सिपमुग्ध्यस्मत् ।३।
ॐ सत्वोअवमोभवोतीनेदिष्ठो । अस्याउपमोव्युष्टौ।
अवयवनोवरण राणोचीहिमुडीक सुहबौन 5 एघि।
८८
"
इत्युपस्थानम् । समर्पणे " सायंसन्ध्योपास" इति
विशेषः । अन्यत्सर्वं प्रातःसन्ध्यावत् ।
इति सायंसन्ध्याप्रयोगः।
सायंसन्ध्या पद्धतिः-आपन प्राणायामादि प्रातःसन्ध्या
प्रनाणेज करवा. संकल्पमां "सायं सं०"
रायमंन्ध्यामा विशेष
एटलो फेरफार करवो. " अग्निश्च
आ मंत्र बोली अ.प्राशन कर. तेम उपस्थान
प्रात.कालना उपस्थान मन्त्रो बोली करवं अथवा " इमम्मे "
विगेरे वरुण देवताना चार मन्त्रो वडे करवू. समर्पण यसते
" अनेन सायंसन्ध्योपा० " एवं बोलवं सायंकाले अर्घ्य
पश्चिम तरफ आपवा. ते वखते " श्रीसूर्याय इदं " ना बदले
श्रीवरुणाय इदमयं. " एवं बोलवू. वाकीनुं सर्व प्रातःसन्ध्या
सरखंज समजवू.
आ प्रमाणे सायंसन्ध्याविधि समजवो.
स्वाह।
प्रकरण १९ मुं.
अथ शयनपद्धतिः।
कृतसायंसन्ध्याभोजनादिः गहरादर्भ रात्रौ निहत.
ताम्लो हस्ती पादौ मुखश मसाल्य
निद्रा रेनो पहेलो [
दरपुं.
अपनस्थानमागत्य;
८९ केवी रातें सु. • आरोत्रिपार्थिव रज’ पितुरप्पायघाभि । दिवई सदासि बृहतीबितिष्ठम 5 आन्लेववर्तते तम ॥ उपुस्तश्चित्रमा राम्मभ्यवाजिनीवति । येन तोकञ्चतनयञ्चधामहे ॥ आस्तिधिवश्वैव मुचुकुन्दो महामुनिः । कपिलो युनिरास्तीका पश्चैते सुखशायिनः । इति मन्त्रान् पठन् विष्णुस्मरणपूर्वकमुत्तरदिग्वदिम- स्तकः स्त्रपेत् । इति शयनपद्धतिः। शयन प्रकारः-सायंकालना संध्या, भोजन विगेरे कामो परवाया पछी एटले आसरे एक प्रहर रात्र थया बाद मुखमां ताम्बूल होय तो थुकी; हाथ पग तथा मुख धोई, तूप्णीं आचमन करी मुवानी जग्या उपर आवी " शयनारूढ थतां पहेला " " ॐ आरात्रि० शापिनः" आ मन्त्रो भणी विष्णूनुं स्मरण करी उत्तर दिशा तरफ मस्तक न थाय तेची रीते सु. आ प्रमाणे शयनमकार समजवो. प्रकरण २० मुं. अथ यज्ञोपवीतधारणविधिः । इस्ती पादौ प्रक्षाल्य कृतभस्मादिगौणस्नानः आपम्प अद्य पूर्वो० मम श्री. यज्ञोपवात धारण विधि. तस्मातकर्मानुष्ठानाधिकारमिष ( अ- माणानायम्य "
।
मुककर्मागत्वेन वा) यज्ञोपवीतधारणं करिष्ये ।" इति
सङ्कल्प्य क्षालितं यज्ञोपवीतयुगं वामहस्ते निधाय दक्षिणेन
पाणिनाऽच्छाध दशवारं गायच्याऽ भिमन्वयेत् । तत
आपोहिष्ठति मन्त्रैः सम्प्रोक्ष्य " उदुत्यं० चित्रं० तचक्षु'
इति मन्त्रत्रयेण सूर्याय दर्शयित्वा · यज्ञोपवीतमित्यस्य
परब्रह्म परमान्मा त्रिष्टुप् । यज्ञोपवीतधारणे वि० ॐ यज्ञो.
पवीतं परमं पवित्रं मजापतेर्यत्सहज पुरस्तात् । आयुष्यमय
प्रतिमुच शुभ्रं यज्ञोपवीतं वलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीत
मसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥ इति मन्त्रो-
चारणान्ते दक्षिणं वाहुमुद्धार्य एक यज्ञोपवीतं धृत्वा
आचम्य पुनरेवं द्वितीयं च धृत्या आचम्य ॐ समुद्र
गच्छ स्वाहा इति मन्त्रेण जणं विसृजेत् । यज्ञो
पवीतधारणांगं यथाशक्ति गायत्री जपं कुर्यात् । ततः "अनेन
यज्ञोपवीतधारणाख्येन कर्मणा तदंगजपाख्येन कर्मणा
च श्रीसवितृसूर्यनारायण प्रीयताम् न मम । ॐ तत्सद्
ब्रह्मार्पणमस्तु ।
इनि यज्ञोपवीतयारणविधिः ।
(नूतन ) यज्ञोपवीतधारणप्रकारः-हाथ
धोई भस्मस्नानादि गौणस्नान फरी,
जनोई निळी गर्यु
होय अथवा तुटयु होय आचमन तथा प्राणायाम करी " अद्य.
ता नबुं धारण करवानी
पूर्वो० आ प्रमाणे साकल्प करवो.
पछी धोयेली यज्ञोपवीतनी जोडी डामा
तथा
पग
पद्धति,
हाथमा राखी जमणा हाथे आच्छादन करी दश गायत्री-मत्र वडे अभिमत्रण करी, आपोहिष्ठा० विगैरे त्रण मत्र उच्चारी तेनु प्रोक्षण कखु. पछी वे हाथना अगुठामा ते यज्ञोपतियुग धारण करी सूर्यने बताववु. ते वखते उदुत्यं० चित्रं तचक्षु. आ मनो भणवा पछी ते पैको एक यज्ञोपवीत लइने " ॐ यज्ञो- पवीत." आ मन्त्र भणी दक्षिण हाथ प्रथम यज्ञोपवीतना वहार काढी पछी ते यज्ञोपवीत फण्ठमा नाखवू पुन आचमन करी पूर्व प्रमाणेज मत्रपठनपूर्वक बीजु यज्ञोपवीत धारण करी आचमन करवु, अने " ॐ समुद्रं गच्छस्वाहा मनु उच्चारण करी जुनु यज्ञोपवीत युग काढी तेनु विसर्जन करवु यज्ञोपवीतधारणमा अगे यथाशक्ति गायत्री जप करीने " अनेन । एवी रीते बोली कर्म समर्पण करवु. ब्रह्मचारीए एक अने गृहस्थे वे यज्ञोपवीत धारण करवा, आ प्रमणे ( नूतन ) यज्ञोपरीत धारणविधी समजवो. आ प्रकरण २१ मुं. अथ आशौचे सन्ध्यापद्धतिः। तूष्णीमाचम्य माणानायम्य मनसा मन्त्रान्स्मरन्मा- जनं कुर्यात् । गायत्रीं सम्यगुचार्या- आशीचमा सध्या के- ध्यप्रदानं कुर्यात् । तर उपविश्य टर्स ने केवी करवी पुनस्तूष्णीमाचमनं कृत्वा सूर्याय नम- ।
९२ स्कारं कुर्यात् । अनेन मातः सं० इति पूर्ववत्कर्मसमर्पण कुर्यादिति आशौचे संध्यापद्धतिः । आशौचमां सन्ध्या करवानी पद्धतिः-तूष्णीं आचमन तथा आशेचा संध्या कर प्राणायाम करी, मनमा मन्त्र भणी मार्जन वानी पद्धति. करवं. गायत्रीनो स्पष्ट उच्चार करी अर्घ्य आपवा. पछी बेसीने पुनः तूष्णीं आच- मन करी, सूर्यने नमस्कार करतो. " अनेन० " इत्यादि बोली पूर्वेनी संध्या मुजब समर्पण- उदक छोडवू. आ प्रमाणे आशौचमां संध्या करवानी पद्धती समजवी. प्रथम भाग संपूर्ण. R.E. TALLABH
॥ श्रीदत्तः प्रसनोऽस्तु॥
श्री गुप्यतुर्वेदीय
आह्निकसार-संक्षेप.
जो.
भाग २
प्रथम भागमा जे जे शदूना शिरोभाग उपर अक मुकवामा आव्या छे
ते ते शदनो निरोप गुलासो तथा तेनी सप्रमाणता आ
भागमा अनुश्मे यतावेली छे.
१ रात्रे पश्चिमयामस्य मुहूर्तो यस्तृतीयकः ।
गाय मुहूर्त कोने स माम इति विज्ञेयो विहितः स प्रबोधने ॥
यहयो।
विष्णुपुराणमां-रात्रीना ठेला त्रण प्रहरनो जीजो मुहूर्त
बामपज्ञक जाणवो, जागृत थवा माटे ते मुहूर्त विहित छे,
माम मुहूर्तमा ब्राझे मुहूर्ते युध्येत धर्मार्थावनुचितपेत् ।
पर
मनस्मृतीमां-बाह्म मुहूर्तमा जागृत थवु, अने धार्मिक
तथा आर्थिक कृत्योनो योग्य विचार करतो.
९४
।
प्रदोपपश्चिमी यामौ विद्याभ्यासेन योजयेत् ।
यामद्वयं शयानस्तु ब्रह्मभूयाय
कल्पते
स्मृति सङ्घमा-प्रदोषकालनो प्रहर तथा रात्रीनो अंतिम
प्रहर विद्याभ्यासमां योजयो; वचला महानिशाना ये प्रहर सुधी
निद्रा लेनार ब्रह्मभावने प्राप्त थाय छे.
२-- रोचनां चन्दनं गन्धात् मृदङ्ग दर्पणं मणिम् ।
मागलिकपदार्थों गुरुमग्निं रवि पश्येन्नमस्येत्प्रातरेवहि ।।
कात्यायन-गोरोचन, चन्दन, सुगन्धी पदार्थो, मृदंग,
आदर्श, रत्न, गुरु, अग्नि, सूर्य, अथवा इतर एवाज मांगलिक
तथा पूज्य पदार्थो जोवा तथा तेमने नमस्कार करवो.
श्रोत्रियं सुभगं गां च अग्निमग्निचिति तथा।
प्रातरुत्थाय यः पश्येदापद्भ्यः स प्रमुच्यते ।।
कात्यायन-वेदाध्यनशील विप्रने, भाग्यवान् मनुष्यने,
गायने, अमीने, तथा अमिहोत्रीने, प्रातःकालमा उठीने जे
( अवलोकन करे ) देखे छे ते सामान्यतः आपत्तीथी मुक्त थाय
छे. एमना प्रमाणेज दक्षिणकरदर्शन पण शुभसूचक छे.
९५ आचमनना प्रकार. ३-पुराणाचमन, स्मार्ताचमन, श्रोताचमन, अने श्रोत्राचमन, आ प्रमाणे आचमननां चार भेद छे. तूष्णीं आचमननो पुराणाचमनमा समावेश थतो होवाथी तेनुं स्वतंत्र रीते गारेगणन करेलु नथी. पुराणाचमननी परति. पुराणाचमन- केशवास्त्रिभिः पीत्वा चतुर्थेन मृजेत्करम् । पञ्चमेन च पष्ठेन द्विरोष्ठान्मृजेत्क्रमात् ।। तौ सप्तपेन च मृजेदेकवारन्तु मन्त्रवित् । अष्टमेन तु मन्त्रेण अभिमन्य जलं शुचि ।। चामं संपक्षियेत्पाणिं मनुना नवमेन तु । दक्षिणं दशमेनानि वाममेकादशेन वै ॥ मुर्धानं द्वादशेनाप स्पृशेर्बोष्ठपृष्ठकम् । सङ्कर्षणाय नम इति स्पृशेदङ्गुलिपूर्धभिः ॥ अङ्गुष्ठत न्यग्राभ्यां संश्लिष्टाभ्यां जलैः सह । नासारंधे वासुदेवप्रद्युम्नाभ्यां स्पृशेच्छुभे ।। अङ्गुष्ठानामिकाभ्याञ्च संश्लिष्टाभ्यां जलैः सह । अनिरुद्धाय नम इति संस्पृशेदति दक्षिणम् ।। कुरुलेरमाण अश्या अमा शेशम् ।
तथाष्टकनिष्ठाभ्यां संश्लिष्टाभ्यां जलैः सह ।। अधोक्षजनृसिंहाभ्यां श्रोने दे संस्पृशेत्क्रमात् । नाभिमच्युतमन्त्रेण ताभ्यामेव स्पृशेषः । श्रीजनार्दनयन्त्रण तलेन हृदयं स्पृशेत् । उपेन्द्रायेति मूख्नं स्पृशेत् सजलपाणिना ।। सर्वागल्यग्रभागैस्तु समाश्लिष्टर्जलैः सह । भुजौ तु हरिकृयाभ्यां संम्पृशेदक्षिणोत्तरी।। आचांदप एवन्तु भगवन्नामभिः क्रमात् । सद्यः पुतः स विहितपूत्तरेवधिकारवान् ।। प्रयोग पारिजातमांव्याघ्रपाद-केशव, नारायण, माधव, आ त्रण नामो उच्चारी त्रण आचमन करी, गोविंद नामे जमणो हाथ धोवो. विष्णु नामे ऊ;ष्ठ, अने मधुसूदन नामे अधरोष्ठ शुद्ध करवा. त्रिविक्रम नामे वेउ ओष्ठने जलस्पर्श करवो. वामन नामवडे जलाभिमंत्रण करी ते जल जमणा हाथे किंचित राई, श्रीधर नामे डावा हाथने प्रोक्षित-शुद्ध-करवो. हुपीकेश नामे दक्षिण पादनुं अने पमनाभ नामे वामपादनुं प्रोक्षण करवं. दामोदर नामे मस्तकने म्पर्ण करयो. सर्व अडलीओना अग्र- वडे " सहर्पणायनमः " आ मंत्र बोली ऊोष्ठ-पृष्ठने स्पर्श फरयो. जलयुक्त अंगुष्ट तर्जनीओवडे " वासुदेव तथा प्रद्युम्न" नामे अनुक्रमे दक्षिण तथा वाम नामिका पुटने स्पर्श फरयो. अंगुष्ट तथा अनामिकापडे " अनिरुद्ध तथा पुरुपोच" नामे .
दक्षिण तथा वाम नेत्रने स्पर्श करवो. अंगुष्ट तथा कनिष्ठिकावडे " अधोक्षज तथा नृसिंह" नामे दक्षिण तथा वाम कर्णने स्पर्श करवो. तेवीज रीते " अच्युत" नामे नाभीने स्पर्श करवो. " जनार्दन" नामथी हस्तना तळवडे हृदयने तेमज " उपेन्द्र" नाने मूर्दाने ( मस्तकने स्पर्श करवो. सर्व अंगळीओना अग्रवडे "हरि तथा श्रीकृष्ण" नामे दक्षिण तथा वामस्कन्धने स्पर्श करवो. आ प्रमाणे भावनामोचारपूर्वक आचमन कर एटले सर्व विहितकर्मों करवा माटे अधिकारी बनी शकाय. अनिरङ्गुष्ठस्तस्मातेनैव सर्वस्थानानि संस्पृशेत् । आन्हिक संक्षेप ग्रंथमा पैगनसि-अंगुष्ठ ए अभी छे; तेथी आचमन प्रकरणमां कहेला स्थानोना स्पर्शने माटे विहित एवो अंगुलीनी यावतमा जे निबंध छ; तेवू न करता केवळ अंगुष्ट बडेज सर्व स्थानोने स्पर्श करयो. स्मार्ताचमनः-ॐ पूर्वाभिः सर्वाभिहितिमिराचा- मैन् । यसथममाचामति तेन अदं स्मातीचमननी पद्धति. मीणाति । पद्वितीयं तेन यजुर्वेदम । यत्तृतीयं तेन सामवेदम् । यत्मय संमार्टि तेनायर्वणवेदम् । गद्वितीयं तेनैनिहासादीन् । यत्सम्यं प्रोक्षति पाणि शिरो हृदयं चक्षुः कर्णों नासां नाभि चौपस्पृशाते तेनौपाधे वन- सतिमभृतीन सान्देवान् प्रीणाति । ७ ९८ बौधायन:-ॐ भूः स्वाहा, भुवःस्वाहा, स्वाहा, आ रीते मंत्र वोली आचमन करवू, प्रथमना आचमन वडे ऋग्वेदने संतुष्ट करे छे; वीजा आचमन वडे यजुर्वेदने अने त्रीजा वडे सामवेदने सन्तुष्ट करे छे, हाथ धोईने सजल हस्त वडे ऊर्बोप्ठ- जे शुद्धीकरण करे तेथी अथर्वण वेदने, अधरोप्ठना शुद्धीकरणथी इतिहासादिकने संतुष्ट करे छ; अने डावा हाथर्नु, तथा मस्तक, हृदय, नेत्र, कर्ण, नासिका, अने नाभीनु. जे प्रोक्षण तथा स्पर्श करे छे तेथी औषधि वनस्पतिस्थ सर्व देवोने तुष्ट करे छे. श्रीताचमननी " श्रोताचमनः- पद्धति. देव्याः पादैखिभिः पीत्वा अग्लि नवभिः स्पृशेत् । पुनातिगायच्या शिरो मन्त्रै विधा स्पृशेत ।। यः करोति प्रयत्नेन श्रौतमाचमनं द्विजः। अशुद्धात्मापि पापिष्ठः स पूतो नाच संशयः ।। सन्ध्यादौ,ब्रह्मयज्ञे च होमे देवार्चने तथा । श्रौतमेव दिनैः कार्यमिति चौधायनोऽब्रवीत् ।। चौपायनः--गायत्रीना एक एक चरणे एक एक आच- मन करी हाथ धोई " आशहिप्ठा " आ त्रण मंत्रोना नव चरण बडे तथा व्याहृति सहित तथा शिरोमंत्र सहिन गायत्री मंत्र बडे सर्व शरीरने अथवा स्माताचमनमां कहेला स्थानाने श्रोताचमननी ९९ पर्श करवो. जे द्विज एवं श्रोताचमन करे छे, ते अशुद्ध, पापी एवो होय तो पण ते पवित्र थयो एज समजवू. सन्ध्या अझयज्ञ होम देवपूजा विगेरे सर्व कर्मों करती वखते द्विजोए श्रीताचमन ज करवु एवं चौधायने कयु छे. " श्रोत्राचमन- 'पद्धति. पञ्चाङ्गुलीमालयित्वा दक्षिणं श्रवणंस्पृशेत् । गौणमाचमनं ह्येतदभाचे सलिलस्य च ॥ देवल:--पांचे अंगुलीयो एकत्र करी दक्षिण कर्णने स्पर्श करयो. उदकना अभाव प्रसंगे अथवा तो अतिक्षुद्र कारणने लोधे आचमन कवु जरूर होय त्यारे आ गौण आचमन क. पौराणमथवा स्मात श्रौतमाचमनं तथा । रौना विनियोग. तत्तत्कणि कुर्वीत यथेष्टं वा विरीयते ॥ संस्कार गणपतिमाः-पुराणा चमन स्मार्ताचमन अने श्रोताचमन अनुक्रमे पुराणोक्त स्मृत्युक्त तथा श्रुत्युक्त कर्म करती वखते ग्राह्य समजी ते प्रमाणे क; अथवा स्मृति अने पुराणो श्रुति मूलक ज होवाथी आचमन विधिनो गमे ते पक्ष स्वीकाच्यो होय तो पण हरकत नथी. निद्रा लई उठ्या पछी, भोजन पछी, निद्रा लेता पेहेला, विगेरे वखते तूष्णी एटले को पण प्रका- रनो मंत्र बोल्या वगर आचमन करवान कडं छे. तेने तूणी आचमन कहे छे. आचमननाघरा- तूष्णी आचमननो प्रकार.
आ आचमनमा त्रण वखत पाणी पीवु अने हाथ धोवो, एटलु ज कृत्य करवान छे. कारण:- आचमन एटले झु उपस्पर्शनं कृत्वा खानि च संस्पृशेत् इतिपृथ मभिधानात् विरभक्षणमात्रमाचमनं- खस्पर्शनादिकमितिकर्तव्यता इति दर्शितम् । मनुस्मृतीनी कामां कुल्लूकभट्ट- --आचमन करी इन्द्रियोने स्पर्श करवो; एवी पृथक् पृथक् (विधिवाक्य तथा ) क्रियाओ कहेली होवाथी "त्रण वखत पाणी पीg" एनुज नाम आचमन छे. इंद्रियोने स्पर्श करवो आ विधि केवळ उप- कारक एटले पुष्टिदायक (आचमन विधिने ) समजवो एवं स्मृतिकारेज दर्शाव्यु छे. आ उपरथी द्विराचमन एटले बे वखत पाणी पीवं एवं केटलाएक विद्वानो कह छे ते असत्य छे; माटे द्विराचमन एटले वण वखत पाणी पीथु अन हाथ घोवो, अने फरीथी त्रण वखत जल प्राशन अने हस्त प्रक्षालन करवू प्राशनने पण केटलाएक आचमन कहे छे ते पण गौण छे. माचमन माटे हृद्गाभिः पूयते चित्रः कण्ठ गाभिस्तु भविपः। पाणी केट: २१ वैश्योद्भिःमाशिताभिस्तु शूद्रःस्पृष्टामिरन्ततः।। मनुस्मृतिमां-हृदयमुधी जई शके एटला पाणी वडे आच- मन कन्यु होय तो ब्राह्मण; गळाना अंदर मात्र उतरी शके एटला " "अंबु-
१०१.
पाणीथी क्षत्रिय, प्रागन करी शकाय एटला पाणीथा वश्य; अन
मुखना अंदर स्पर्श मात्र करी शके एटला पाणीथी शूद्र पवित्र
थाय छे.
.
,
आ वाक्य उपरथी " आचमन माटे जल केटलं लेबु, "
ते जाणी शकाशे.
४-- जनपद, जनालय, पल्ली, ग्राम, खेट, खर्वट,
पुर, अने नगर अथवा राजधानी आ संज्ञाओ
शौचापनी आ.
काई विशिष्ट प्रमाणने अनुसरी" वसति-
वश्यकता.
स्थान माटे वैष्णवकृत कौस्तुभमां तथा काशी-
म्वण्डनी टीकामां प्रतिपादन करेली छे. शौचविधि माटे कहेलो
प्रदेश सर्वने अनुकूल आवशे नहीं एवं जाणीने " धर्मनी
मर्यादा शक्य होय त्या सुधी संभाळनी अने मारासार
विचार पूर्वक करवाना कोमा पण बलावल जोईने धर्मा-
चारनो संकोच करवो" एवा सद्धेतूथी प्रेरित बनीने शौच
माटे:--
पट्टणग्रामस्थानां स्वगृहे शौच कृत्मा गौचं कुर्यात् "
गोविंदार्णव अन्यपां-ग्राममा अने नगरमा रेहेनाराओए
पोताना गृह समीप शौचकूप करी त्यां मलमूत्रोत्सर्ग करयो एवं
लम्ब्युं छे.
आ प्रमाण धर्माचार संकोच करवा माटे महर्षि
शाधममत धर्म
संकोच करवानी नारद पंचरानमां-
पद्धति.
स्वगृहे सर्वकर्माणि तदर्घ परवेश्मनि
तदर्थे नगरे कुर्यात्पथि शूद्रवदावरेत् ।।
१०२ पोताना गृहमा सर्व कर्मों करवा, पारकाना घरमा अर्थ भागे, नगरमा चोथे भागे अने प्रवासमा शूद्र सरखंज आचरण करवु. एq तथा. स्वग्रामे पूर्णमाचार अन्य ग्रामे तदर्घकम् । पत्तने पादमाचारं पथि शूद्रवदाचरेत् ॥ स्मृतिसंग्रइयां-पोताना ग्राममा पूर्ण, वीजा ग्रामोमा तेनाथी अर्घ, नगरमा चोथे भागे, अने प्रवासमा शूद्रवत् आचार पाळवो. एतु कहेल होवाथी विवेकपूर्वक तथा शास्त्रसंमत सकोच स्वीका- रवाथी धर्मबाह्य वर्तन थयु केहेवाय नहीं. एवु छता जे दुराग्रही आचार संकोच नज करे; अथवा "संकोच फरवो तया त्याग करवी" एमा काई तफावत नथी एवं मानी; त्यागज कबूल राम्ये; तेवा" अन्याचारी तथा अनाचारी"लोकोने-भीम- पितामह श्री महाभारतमा अनाचारस्तु मालिन्यमत्याचारस्तु मूर्खता ।" आचार त्याग ए मलिनता, अने अति आचार ए मूर्तता के. एवु यही " मूर्ख तथा मलिन " कहे छे. व्यवहार प्रधान लोगोए व्यवहार सिद्धि माटे सशास्त्र रीते आचार संकोच म्वीकारवा हरफ्न नयी. ....मृद्धिरभ्युष्टतैनसः। गन्धलेपहपकरं गौचं कुर्यादतन्द्रितः ।। देवशुदिपेगी . .......
१०३ याज्ञवल्क्य स्मृतीमां-मृत्तिका तथा उध्दत जलवडे गन्ध तथा लेप नष्ट करनारी शुद्धी आळस छोडीने करतो. मृत्तिका फेटला यावत्तु शुद्धिं मन्येत तावच्छौवं विधीयते । वसंत लगाडवी प्रमाणं शौच संख्यायां न विप्रैरुपदिश्यते ॥ देवलस्मृतीमां-" शुद्धी थई" एवं जेटला शुद्धी करणी मनाय; त्यां सुघ शुद्धि करवी. शुद्धि करती वेळाए मृत्तिका लेपन तथा जलक्षालननी संख्यानो निबंध वेदज्ञ स्मृतिकारो बतावता नथी. आ वाक्यना आधारे प्रयन भागमां शुद्धि करण चखते मृत्तिकानी-मृतिकार्नु लेपन करा वावत-संख्या आ- पली नया यावनापैत्यमेध्याक्तो गन्धो लेपथ तत्कृतः। ६- तावन्मृद्वारि देयं स्यात्सर्वासु द्रव्यशुद्धिषु ॥ मतिकाया तथा पाणी द्रव्य शु- द्धा करवानी म- यांदा मनुस्मृतीमां-ज्या सुधी अमेध्य पदार्थ तथा तेनो लेप अने गन्ध नष्ट थयो नी; त्यां सुधी मृतिका लेपन तथा जलक्षालन क; आ नियम सर्व प्रकारना द्रव्यनी शुद्धि विपे समजवो.
१०४ आ वाक्यना आधारे धातुपात्रनी शुद्धी करवी. अने मृत्तिकापात्र मात्र निरुपयोगी ज समजवू. शौच विधिमा करेलो संकोच न कबूल राखनार अत्या- चारी" माटे:- गङ्गानोयेन कृत्स्नेन मृद्भारैश्च नगोपमैः । भाव दुष्टनी शु- द्धाथाय ज नहीं आमृत्योराचरन शौचं भावदुष्टो न शुध्यति। स्मृति संग्रहमां:- गगा नदीनुं सर्व पाणी अने पर्वत- प्राय मृत्तिकाना राशी एवं शुद्धिसाधन लई मरता सुधी शुद्धि- करण करवाथी पण भाव दुष्ट " एटले स्वभावतः दुष्ट पदार्थ अथवा हुं अपवित्र छु एवं धारी निरंतर साशंक रहेनार अत्याचारी शुद्ध थाय नहीं एवु कयुं छे. आ वाक्य पण आचार संकोच “ शास्त्रीय भावनाने अनुसरीने ज करयो " एवं सुचवे छे. मृदा जलेन शुद्धिः स्यात् न क्लेशो न धनव्यय ।. यस्य शौचेऽपि शैथिल्यं चित्तं तस्य परीक्षितम्॥ शुद्धिमाटेआळस न करवो. दक्षस्मृतिमां-मृत्तिका अने जल आ बेज द्रव्यवडे शुद्धि थाय; एमा क्लेश के खर्च नधी. जेनु एपो शुद्धि करवा माटे पण शैथिल्य-आलस्य-अनादर-होय तेनुं अत• करण केवी रीते धर्म विवेक करशे ते जाण्यु.
१०५ खा सशक्तिमान आ वाक्य शुद्धि विशे अनादर-आळस अथवा कार्य कारण भाव मूलक दुस्तर्क करनारनो पिकार करे छे. योऽसौ विस्तरशःप्रोक्तः स्नानस्य विधिरुतमः। विस्तारपूर्वक असामान चेत्कुर्यात्तत्रायं विषिरुच्यते ॥ स्नान विधि क- स्नानमन्तजले चैव मार्जनाचमने तथा । गारे सक्षिप्तनिधि जलाभिमन्त्रगं चैत्र तीर्थस्य परिकल्पनम् ।। अघमर्पणमूक्तेन त्रिरावृत्चेन नित्यशः । स्नानाचरणमित्येतत्ममुद्दिष्टं महात्मभिः ।। योगी याज्ञवल्ल्य-जे आ विस्तारथी स्नाननो विधि को छे, ते प्रमाणे असामर्थने लिये स्नान न कराय तो, आ-वक्ष्य- माण-विधि प्रमाणे स्नान करवू. नदी तलाव विगेरे जलाशयना जलमा अवगाहन, मार्जन तथा आचमन, जलनुं अभिमन्त्रण, तीर्थ कल्पना (तीर्यन अभिमंत्रण रूप आवाहन ) अघमर्पण मुक्त वण वखत आवृत्त करी अपमर्पण, आ प्रमाणे महपओिए स्नानविधि"संक्षेपमा" कह्यो छे. स्नान विधिनो संकोच करवानुं कारण कात्यायन कहे छे के:- अल्पत्वाद्धोमकालस्य वह्यत्वात्स्नान कर्मण। मच शामाटे. प्रातर्न तनुयात्नानं होमलोपो विगहितः॥ . निान विधिगो
१०६
प्रात स्नाननी
आवश्यक्ता.
होमकाल अल्प होवाने लीधे, अने स्नानविधी बहुत
विस्तारवाळो होवाथी प्रातःकालमा विस्तृत स्नानीवधानो स्वीकार
करवो नहीं. कारण तेनु स्नान करवा जता-होमनो लोप थवो
निंद्य छे. होम शब्द सन्ध्यानो पण उपलक्षक छे.
अत्यन्तमलिनः कायो नवच्छिद्रसमन्धित ।
स्रवत्येप दिवारात्रौ प्रातः स्नानं विशोधनम्।।
सर्वमहति शुद्धात्मा मात स्नायी जपादिकम् ।।
दक्षस्मृति-नवच्छिद्रयुक्त अने अत्यन्तमलिन एवो आ
देह आखो दिवस ने रात्र झन्याज करे छे माटे प्रात स्नान ए तेनु
विगोधन करनार छे. प्रात स्नान करनारो शुद्धात्मा-शातचित.
वाळो-जपादि सर्व कृत्यो फरवा लायक होय छे. तेमज
मनः प्रसादजननं रूपसौभाग्यवर्द्धनम् ।
दुःखशोफापर स्नानं मानदं ज्ञानदं तया ॥
अत करणनी प्रसन्नताने उत्पन्न करनारु, रूप अने साभा-
म्यनी वृद्धि करनारु, दु.म तथा शोकने दूर करनारु, अने
अन्त रणने उथ भावना तथा ज्ञान आपनारु, पशु प्रात म्नान
होय है. एवो फगभिसंधि यतावाने प्रात म्नाननी आवश्यकता
गिद् धग छे.
अस्नाताशी मलं भुरे भपानी पूर्णशोणितम्।
भाताची कापि सर प्रदाता विषमभुने ।
गनम.tal
१०७ . शातातप स्मृतीमां-जे मनुष्य स्नान कन्या वगर भोजन करे छे, ते मल मक्षण करे छे, एवं समजवु. वैश्वदेव कन्या वगर भोजन करे ते परु तथा रुधिरनुं भक्षण करे छे, होम कया वगर भोजन करे ते कृमिनु तथा अन्नदान कन्या वगर भोजन करेः तो विपर्नु भक्षण करे छ एबुं समजवू. आ वाक्यमां आ प्रमाणे निन्दा प्रतिपादन करी छे ते उपरथी एq सिद्ध थाय छे के:-मुख्यस्नान ज्वरादि सबळ कारणने लीधे न थाय तो गौणस्नान करीने पछीज भोजन कखं. आतुरने माटे स्वतंत्र विचार करवो. स्नान फळ शरीरनी केवळ स्वच्छता एवं मानी यथेष्टाचरण, करनारा तथा नास्तिको आ वाक्यना विषय छे; एयुं समजवू. ९-योगियाज्ञवल्क्यना मत प्रमाणे मांत्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, थारुण, अने मानस, एवा क्यता होय, त्या | गौणस्नानना सात प्रकार छे. " आचार कर? प्रकाश" नामक ग्रंथमां-कापिल, गायत्र, अने सारस्वत, आ त्रण प्रकार अधिक छे. "आपोहि०" इत्यादि त्रण मन्त्रोनो उच्चार करतानी साथे सर्व शरीर उपर पाणी छांटq- मार्जन कर. १ : शुद्धमृत्तिका लई शरीरने चोळवी. २ । मानस्तोके० " "पायुषं " मन्त्रो उचारी भस्मोद्धूलन क. ३ । गायोना चालवाथी उडती धूळ आपणा शरीर उपर स्नान करवानी अश- १०८ पडवा देवी. ४ । तडको पडेलो छता वरसाद पडतो होय ते वखते वरसादमा पल्हळवु ५। जलमा अवगाहन कर. ६/ अने आत्मचिंतन करवु. ७ । * भीणा वस्त्रवडे शरीर लुछवु. १ । दशवार गायत्री मत्र जपी तेनाथी अभिमन्त्रित करेला जलवडे आपादतलमस्तक प्रोक्षण करवु. २ । प्रत्यक्ष वारुण स्नान करवा अशक्त होय तेणे. वारुण मन्त्र जाणनारा सारा आचार सम्पन्न विद्वान् पासे जईने “ मारे नीर्थ स्नान करg छे हुँ पारुण स्नान करवा असमर्थ छु" एवी प्रार्थना करवी. पछी ते विद्वाने एक कलशमा शुद्ध उदक भरी " इममेगंगे० " आ अथवा एवाज तीर्थकल्पना करवा लायक मन्त्र भणी ते पाणीनु अभिमन्त्रण करी, प्रार्थना करनार ( द्विज होय तो) तेना शरीर उपर छाटवु, अने “ मीभिपेकस्ते भूयात् " एवु बोलवु. ३। आ प्रमाणे दस प्रकारनु गौणस्नान छे. वस्त्रस्य धारणं यच्च पञ्चकच्छ च तद्विदुः। वस्त्र धारण केवी कुक्षिद्वये तथा पृष्ठ नाभौ द्वौ परिकीर्तितौ ॥ स्मृतिसंग्रहमा वस्त्रनु धारण पञ्चकच्छ होय एवु विद्वानो माने छे बेउ कुक्षी तरफ वे कच्छ, पृष्ठ भागमा एक अने नाभि- स्थानमा बे, एवी रीते पञ्च कच्छ युक्त वस्त्र धारण कखु. वगर धोयेनु, शुद्रे धोयेलु, अथवा केवल पल्हाळी नीचो- बेलु, वस्त्र सन्ध्यादि कर्मने लायक न समजवु. तेमज शोवेलु रीत करघु सांधेलं अन मलिन वस्त्र विभव होय तो धारण न कर. वस्त्र. पोताना हाथ प्रमाणे आठ हाथर्नु होय तो सारं. ११- नासिकामङ्गली भिस्तु तर्जनीमध्यपाते । पीटयदिति शेषः। शौनक स्मृतिमां-तर्जनी अने मध्यमा शिवायना आंग- ळीयो वडे नासिकापीडन करयु. पञ्चागुलीभिनासा पीढयेत्पणवेन वै। मुद्रेयं सर्वपापघ्नी वानप्रस्थगृहस्थयोः ।। कनिष्ठानासिकाङ्गुष्ठयेतेश्च ब्रह्मचारिणः । प्रयोगपारिजातमां-प्रणवनो उच्चार करी पांचे आंगळीयो बड़े नासिकागर्नु पीडन कर. आ मुद्रा वानप्रस्थ अने गृहस्थना सर्व पापने दूर करनारी छे. कनिष्ठिका, अनामिका, तथा अंगुष्ठ आ त्रण आंगळीयो बडे नासिकापीडन करवानुं यती अने ब्रह्म- चारीने विहित छे. सव्येन तु समाकृष्य दक्षिणेन विसर्जयेत् । शौनक स्मृतिमां-अंगुष्ठ वडे दक्षिण नासापुट दाबी राखी वामनासापुट वडे वायूनुं आकर्पण करवं अने कुंभक करी रह्या पछी दक्षिण नासापुट वडे वायूनुं विसर्जन करवं. प्रणं दक्षया नाड्या कुम्भनं हृदयस्थया । चन चाममा फर्यात्माणायामस्य लक्षणम् ॥
योगीयाज्ञवल्क्य-दक्षिण नाडीथी पूरण, हृदयस्थ
(सुषुम्ना ) नाडीथी कुम्मन, अने वाम नाडीथी रेचन पर
एवं प्राणायामर्नु लक्षण छे.
सव्याहृति सप्रणवां गायत्री शिरसा सह ।
विर्जपेदायतपाणः प्राणायामः स उच्यते ।।
-प्रणव व्याहती अने शिरोमंत्र सहित
गायत्रीनो पूरण कुंभन अने रेचन करती वखते अनुक्रमे त्रण
वार जप करवो; ते प्राणायाम कहेवाय छे.
गौतम स्मृतिमां-
मणवं व्याहृतीः सप्त गायत्री शिरसा सह ।
त्रिः पठेदायतमाणः प्राणायामः स उच्यते
शौनक स्मृतिमां-तूप्णीं वायुपूरण करी तेनो कुंभक करती
सात व्याहृति, गायत्री, अने शिरोमंत्र"
एटलानो त्रण बखत मानसिक पाठ करयो; ते माणायाम
कहेवाय छे.
वेळाए।
प्रणव,
.
आ प्रमाणे शास्त्रमा " नासिकापाटन, वायर्नु पूर्ण,
तथा रेचन, अने ते चाखते मंत्रतंयोग " आ नणे यावतोमा
उपर लन्च्या प्रमाणे मतभेद होबाथी "सर्व उपर कहेली
चायतो वैकल्पिक छे" एवं समजीने पोताने योग्य जणाय
तेवु फरवू. तेमा शासनो बाघ नथी.
१११
यावत्कालं त्रिरावेष्टय जानुं इस्तेन दक्षिणम् ।
छोटिकाकरणं यत्सा मानेति परिपठ्यते ।।
शिवार्चनचन्द्रिकामा तया सिद्धान्तशेखरमां. -जमणा
धुंटणने हाथ बडे ण वखत प्रदक्षिणा करी चपी वगा-
डवी; एटलुं करवा जेटलो वखत थाय, तेने मात्रा काल
( कहेवू ) समजयो.
तूष्णीं प्राणायाम करती वेळाए पूरण कुंभन तथा रेचन
आ त्रणे कृत्यो पंदर पंदर मात्राना प्रमाणमां करवा. अथवा त्रण
मात्रा प्रमाण-पूरण, नव मात्रा प्रमाण कुंभन, अने त्रण मात्रा
रेचना एवं प्रमाण राख. ( बालकने योग्य छे.)
१२- स्नानाङ्गतर्पणं कृत्वा देवपिपितृवोपकम् ।
शुद्धे वस्त्र परीधाय जलाहिरुपागतः ।।
विभूतिधारणं कार्य रुद्राक्षाणां च धारणम् ।
मयोगेन कर्तव्यं सर्वदा जपसा ।।
श्रीमद्भागवत एकादशस्कन्धमां-देव ऋपि अने पितरोनी
तृप्ती करनारुं स्नानांग तर्पण करी, पाणीना बहार आवी, शुद्ध
वस्त्रयुग धारण करी, भस्म तथा रुद्राक्षनुं धारण करयुं. आ प्रमाणे
जपयज्ञ करनारा साधकोए नित्यशः कटुं.
सितन भस्म ना कुर्यात् त्रिसन्ध्यं च त्रिपुण्ड कम् ।
११२
"
वण
सन्ध्या शौचं जपो होमस्तीर्यदेवादिपूजनम् ।
तस्य व्यर्थमिदं सर्वं यस्त्रिपुण्डूं न धारयेत् ।।
भविष्य पुराणपां-जे मनुष्य त्रणे सन्ध्या यखते श्वेत
भस्म वडे त्रिपुण्डू करे छे ते सर्व पापथी मुक्त थई शिवनी साथे
आनंद करे छे. अने जे त्रिपुण्डू धारण करतो नी; तेनी
सन्ध्या पवित्रता जप होम तीर्थस्नान अने देवपूजादि सर्व
व्यर्थ समजवू.
भस्म त्रिपुण्ड्र धारण करनारे त्रिपुण्ड्रना स्वरूपमा
गुण, त्रण लोक, त्रण वेद, त्रण अग्नी, अने ब्रह्मा विष्णु महेश्वर
आ देवोर्नु समष्टि चिन्ह धारण कन्युछे एवं समजवु." एवो रोते
पुराण ग्रंथमा तथा स्मृतिओमां भस्म धारण करनारनी स्तुती करेली
छे. अंथ विस्तार थवाना भीतीने लीधे ते वचनो अही आया नथी.
स्नान कन्या बराबर भस्म धारण करवानुं उपर लखेलं छे;
ते शुद्ध वैदिक संप्रदाय प्रमाणे जोता सर्वने सरखीज रीते
मान्य होवू जोइए. कारण आ विधि श्रुतिमूलक छे. परंतु
महाभारतनी नीलकंठ चतुर्धरकृत टीकामां लखेला:-
स्नात्वा पुण्ड्रं मृदा कुर्यादुत्वा चैव तु भस्मना ।
देवान् पितृन् समभ्यर्य चन्दनेनैव कारयेत् ।।
स्नान करीने मृत्तिका बडे ऊर्ध्व पुण्डू करवो; नित्य होम
कन्या पछी भस्म वडे त्रिपुण्डू धारण करवो अने देव तथा
पितरोन अर्चन थया पछी चन्दन वडे तिलक करवो.
आ स्मृति वाक्यर्थी उपासनाने लीधे प्राप्त थयेला मृत्ति- काना ऊर्ध्व पुण्ड्रनो पण वैदिक क्रियामां समुच्चय करेलो जणाय छे. माटे आ वाक्यथी प्राप्त थयेला ऊर्ध्व पुण्डूनी व्यवस्था एवी समजवी जोईए के:-जेने उपासनाना अंगे ऊर्ध्व पुण्डू धारण विहित छ तेवाओए स्नान कन्या बरावर ऊर्ध्व पुण्डू धारण करवो; अने होम कन्या पछी मस्म धारण कर. पण जेमने ऊर्ध्व पुण्डू धारण उपासनांग तरीके प्राप्त थतुं नथी; तेओए स्नान कन्या पछी भस्म त्रिपुण्ड्ज धारण करवो. उपासनांग तिलक व्यवस्था श्रुतिमां एवी जणाय छे. ---थ्रोणामेक उढ़क गामा जति मांसमे पिंशतिसून- या भृतम्। आनिमुः शकुदेकोऽअपभगत् किंस्वित्पुत्रेभ्यः पितरउपावतुः। ऋग्वेदः-कोई एक मृद्वी मृत्तिकाने उदक मिश्र करी धारण करे छे; कोई हिंसायी प्राप्त यतुं मांस (गोरोचन) पसीने ज धारण को छ; अने कोई स्वागशीत थयेला अग्नीनु भन्म धारण करे छे; त्यारे पुत्रोए शुं स्वीकार. " एवो प्रश्न उठावी तेना जवावमा कयुं छे के;" वेमना पितृ पितामह परंपराए जे स्वी- कायुं होय ते स्वीकार. उपर लखेला श्रुतीमां तथा स्मृतीमां अनुक्रमे गोरोचन तथा चंदन एवा ये शब्दो छे; ते उपलक्षण मात्र छे. पोतपोताना उपासनाने अनुकूल तिलक धारण करवाने तेथी हरकत नथी.
जलेन तिलकं कुर्याज्जलान्तः कर्मसिद्ध पे । आन्हिक संक्षेपमां-जलमां उमा रहीने ज कर्म करवानो प्रसंग आवे त्यारे कर्माधिकार प्राप्त्यर्थ जल बडेज तिलक करवो. त्रिपुण्डू करती वेळाए अंगुष्ठ तथा कनिष्ठि का वर्ण्य करवी, झुकुटी समान दीर्घ त्रिपुण्डू करवो; अने भस्म जलयुक्त के कोरं लेबु ते बावतमां बेउ प्रकारका वाक्योने लीधे विकल्प प्रतीत थाय छे, माटे शिष्टाचार संमत पद्धति स्वीकारवी. . १३- प्रतिवेदं महाभाग यत्सूक्तं पौरुपं स्मृतम् । सर्वकर्मकरं पुण्यं पवित्रं पापसूदनम् ॥ आन्हिक सूत्रारलीमां-पुष्कर वाक्य-पुष्कर ऋषी श्री रामचंद्रने कहे छे; हे भाग्य शालिन् दरेक वेदमा जे विराट् पुरु- पना वर्णननुं पौरुपसूक्त छे; ते सर्व कर्मोपयोगी, पवित्र, अने पापनाशक छे. चतुर्वर्ग चिंतामणीना-हेमाद्रीना-प्रायश्चित्त कांडमां पुरुप सूक्तना स्तुतीनो घणो विस्तारपूर्वक संग्रह करेलो छे. १४-- सन्ध्यात्रयं तु कर्तव्यं द्विजेनात्मविदा सदा ॥ अविस्मृतीमां-हुं द्विज छ; एवु जाणानारा द्विजे निरंतर त्रिकाल सन्ध्या करवी.
११५ नोपतिष्ठति यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शृद्ववद्वहिष्कार्यः सर्वस्पाविनकर्मणः ।। मनुस्मृतीमां-जे द्विज प्रातःसन्ध्यानी उपासना करतो नथी; तेमज जे सायं सन्ध्यानी उपासना करतो नी; ते सर्व प्रकारना द्विजाधिकृत कर्ममाथी शूद्र प्रमाणे बहिष्कृत करवो. सन्ध्याहीनोऽशुचिनित्यं अनईः सर्वकर्मसु । पदन्यत्पुरते फर्म न तस्य फलभाग्मवेत् ।। दक्षस्मृतीमां-सन्ध्यारहित द्विज निरंतर अपवित्र तथा सर्व प्रकारना कर्मो करवा विशे अनर्ह अनधिकारी होय छे. कदाच आग्रहपूर्वक कोई पण प्रकार- पार्मिक-शान्तिक पौष्टिक नित्य नैमितिक अथवा काम्य-कर्म करे तो तेनुं फल मेळवी शकतो नधी. सन्ध्याकालः प्रागुदयाद्विमस्य द्विवर्तकः तथैवास्तमिते तेषां वैश्यादीनां यथाक्रमम् ॥ अविस्मृतीमा सूर्योदयना पूर्व एक घडीथी आरंभी चतु- घटिकात्मक प्रातःसन्ध्या काल समजयो. तेमन सायंकाले सूर्य अम्बनापूर्वे एक घडीथी चतुर्घटिकात्मक सायं सन्ध्या काल सम- जयो. फलाभिसन्धाने अनुसरनेि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य एमणे अनुक्रमे चार घटिका ये पटिका यने एक घरिका, रूप सन्ध्या- काल समजवो.
उदयास्तमयादू यावत्स्यात् घटिकात्रयम् ।
तायसन्ध्यामुपासीत प्रायश्चिचं ततः परम् ।।
प्रयोग पारिजातमा सूर्योदय तथा सूर्यास्त पछी त्रण
घटिका पूर्ण थता सुधी सन्ध्योपासना करवी; अने ए वखत वीती
जाय तो पछी प्रायश्चित्त कर.
कालातिक्रमणे चैव चतुर्थार्थ्य प्रदापयेत् ।
आचारार्कमां काल बिती गयो होय तो चतुर्थ ( चोथी
वखते ) अर्घ्य समर्पण करवो.
अध्यर्थयामादासायं सन्ध्यामाध्यान्हिकीस्मृता।
तन्त्रराजमां-दोढ प्रहर दिवसथी सायंकाल सुधी मध्यान्ह
सन्ध्या करवी. " तेथी सूर्य अस्त पछी ब्रह्मयज्ञ तर्पण अने मा-
ध्यान्ह सन्ध्यानो लोप करवानुं प्रतीत थाय छे."
रात्रौ प्रहरपर्यंत दिवा कर्माणि कारयेत् ।
नैशं निशीथपर्यन्तमिति शास्त्र विनिश्चयः ।।
संग्रह:-
:--ब्रह्मयज्ञ तर्पण अने मध्यान्ह सन्ध्या विनाना
दिवसे करवाना नित्यकर्मो रातना एक प्रहर पर्यंत करी शकाय;
तेम सायंकाले करवाना नित्य कर्मो मध्यरात्र सुधी करी शकाय;
एवो " अति जरूरना प्रसंगे वखत विती जाय त्यारे कर्म करवा
माटे" शास्त्र सिद्धान्त समजवो.
या सन्ध्यां कालता प्राप्तामालस्पादतिवर्तते ।
सूपहत्यामवापोति उलूकत्वमवामुयात् ।।
आन्हिकसंक्षेप ग्रंथमा व्यास जे द्विज कालतः प्राप्त
सन्ध्या समयने, आळसने आधीन बनी गुमावे छे, ते सूर्यहत्याने
मेळवे छे; अने जन्मान्तरमा घुवड योनीमा जन्म ले छे.
सूतके मृतके चैव सन्ध्याकर्म न सन्त्यजेत् ।
पुलस्त्य-जननाशीचमा तथा मृतकाशौचमा सन्ध्याकर्म
न छोड.
मूतके पृतके कुर्यात्साणायायममन्त्रकम् ।
नया मानमन्त्रास्तु मनसोचार्य मानयेत् ।।
गायत्रीं सम्यगुच्चार्य सूर्यायायै निवेदयेत् ।
मार्जनन्तु न वा कार्यमुपस्थान न चैव हि ।।
मयोगपारिजातनां भरद्वाज- जननाशौचर्मा
मुखाशीचमा मन्त्ररहित-तूष्णी-प्राणायाम करयो तेमज मार्जनना
सन्नी मनोज भणी मार्जन कर, गायत्रीनो सप्ट उच्चार करी
पूर्यने अर्ध्व आपवा. अथवा मार्जन न ज करवं तेम उपस्थान
वेगरे करवान नथी.
तथा
११८ १५-- सङ्कल्पोपयोगी माहिती. उदगयने वमन्त ऋती चैने मासे शुक्ल---कृष्ण वैशाखे मास " " ग्राम ऋती ज्येष्ट मासे. " " " आपाढे मामे " " दक्षिणायन वर्षा ऋता श्रावण मासे भाद्रपदे मासे शरटतो जाशिने मास " कार्तिक मासे " " " " हेमन्त ऋती मार्गशा मामे. " पाप मासे " " " " उदगरने शिशिर ऋता माघे मागे. " " फाल्गुन माग " " " प्रतिपत् तिथी. भानुवासरे, १. मघा नक्षने द्विनीयायाम . चंद्र वासरे, ११ पूर्वा फाल्गुनी, तुन यायाम् माम १२ उत्तरा फाल्गुना, " चतुर्याम् सौम्य १३ हस्त नक्षत्र " पञ्चम्याम् १४ चिना " " पठ्याम् शुक १५ स्वाती " " " मतम्याम् मंद १६ विशाखा " " " अदम्याम् १ अश्विनी नक्षने. १७ अनुराधा नरभ्याम् २ भरणा नक्षने १८ ज्येष्टा " दगभ्याम् ३ कृत्तिका १९ मूळ एकादश्याम् ४ रोहिणी २० पूर्वापाढा " " ५ मृगशाप २१ उत्तराषाढा द्वारश्याम् " " २२ श्रवण ६ आदी " " प्रयोदश्याम् चतुर्दश्याम् पाणिमायाम् पुनर्वसू २३ धनिष्टा " " ८ पुष्य २४ शततारका " अमावास्यायाम् ॥ ९ आया " २५ पूर्वा भाद्रपदा, २६ उत्तराभाद्रपदा २७ रेवती इति नक्षत्राणि. " १२० अथ राशयः १ मेप. चद्रे. श्री सूर्ये. गुरौ. " २ वृषभ ३. मिथुन ४ कर्क " " " " " " ५ सिंह " " " ६ कन्या " " ७ तूल ८ वृश्चिक " " " ९धन " " १० मकर " ११ कुंभ " " " १२ मीन इति राशयः सङ्कल्पमा छुटी राखेली जग्या उपर जेना तेना वखते योग्य तेथी गोठवण करी सङ्कल्प करवो. अज्ञात स्थितीमां " विष्णु" शब्द उमेरखो.
१२१
१६-- सन्ध्यात्रये 5 प्येकमेव उपस्थानं प्रचक्षते ।
उद्वयमदुत्पं चित्रं त-चक्षुस्तिष्ठेदिवाकरम् ।।
व्यास स्मृति-उद्वयम् , उदुत्त्यम्,
चित्रम् अने तच्चक्षुर्
आ चार मन्त्रोथी सूर्य- उपस्थान कर. त्रणे सन्च्या बखते आ
एफज प्रकारर्नु उपस्थान करवं.
प्रयोग पारिजातमा-प्रातः संन्ध्यामां मित्रपद घटित
मन्त्रोधी उपस्थान कर. एवं प्रतिपादन करेउं छे.
१७-- निजकर्णागोचरो यो मानमः स जपः स्मृतः।
उपाशुर्निजकर्णस्य गोचरः स जपः स्मृतः ।।
निगदस्तु जनैवेद्यस्त्रिविधी अप ईरितः ॥
आहिकमदीपपां-जे पोताना काने पण न सांभळी
भाकाय ते मानस संज्ञक; पोताना कानेज संभळाय ते उपांशु
संगका अने इतर मनुष्य पण सांभळे तेवी रीतनो जप निगद
संझक कहेलो छे. आ रीते जपत्रण प्रकारको छे.
वाचिकः सर्वकार्येषु उपांशुः सर्वसिद्धिषु ।
मानसो मोक्षकायेंषु ग्राह्यः पक्षश्च सर्वदा ।।
सप ग्रंथमा सर्व प्रकारना काम्य फर्मो सिद्ध थवा मोटे
जप करवी होय तो वाचिक जप फरखानो पक्ष स्वीकारवो गुरु
१२२
पासेथी उपदेश रूपे मळेला मन्त्रोनी सिद्धी थवा माटे जप
करवो होय त्यारे उपांशु जप करवानो पक्ष लेवो; अने निष्काम
बुद्धीथी करवानो गायत्रीनो सन्ध्यान जप, तथा उपास्य देवताना
मन्त्रनो जप, अथवा एवोज केवल मोक्ष माटे करवामां आवतो
जप करवो होय त्यारे मानस जप करवानो पक्ष स्वीकारवो.
नित्यं जप करेणैव कुर्यात्काम्यं कदाचन ।
काम्यं चैव तथा कुर्यान्मालाभावे तु सुंदर।।
मुंडमालातंत्रमा शंकर पार्वतीने कहे छे-हे सुंदरि;
नित्यनो जप-जप संख्या गणन-हाथवडेज करवो; काम्य जप
मात्र कोई वखते हाथवडे करवो नहीं. पण मालाना अभावे
काम्य जप पण हाथवडे करवा.
अनामामध्यमारभ्य कनिष्ठानुक्रमेण तु ।
मध्यमामूलपर्यन्तं करमाला प्रकीर्तिता ॥
कालिका तन्त्रमां-अनामिकाना मध्यम पर्वथी आरंभ
करी कनिष्ठिकाना मूल तरफथी प्रदक्षिण रीते मध्यमाना मूल
मुधी गणवु एने करमाला कहे छे. एकंदर पर्व १०
तस्मादेतेप कर्मस्वष्टावष्टावनूच्यन्त इंद्रियाणां वीयाणा
मरुध्यैः इति श्रुतः।
ऐतरेय ब्राह्मणमां-इंद्रियोना सामर्थ्याना अवरोधने माटे
जपादि साध्य कर्मोमां शवादि संख्या उपरांत आठ आठनी संख्या
गणाय छे. जेम अष्टोत्तर सहस्रः अप्टशत, इत्यादि.
१२३
अङ्गुलीगणनादेकं पण्यष्टगुणं भवेत् ।
पुत्रजीवेर्दशगुणं शतं शङ्खः सहस्रकम् ॥
प्रपालमणिरत्नेश्व दशसाहस्रक मतम् ।
तदेव स्फाटिकैः प्रोक्तं मौक्तिकैलेसमुत्पते ।
पद्माक्षेर्दशलसं स्यात्सौवर्णेः कोटिरुच्यते ।
कुशग्रन्थया कोटिशतं रुद्राक्षैः स्यादनन्तकम् ॥
कालिका पुराणमा-
-जप करती वेळाए संख्या गणवानी,
ते आंगळीयो वडे गणी होय तो जपर्नु उक्त फल प्राप्त थाय
छे. करमाला वडे गणवाथी अष्टगुण, पुत्रजीवनी माळा बढे
दशगुण, (पुत्रजीवने गुजराती भाषामा "जीपापोतो"
आ शही ओळखे छे एवं के० आयुर्वेद महोपाध्याय शंकर
दाजी पदे शास्त्री कृत वनौपधिगुणादर्शना चोथा भागमा लस्यु
छे.) शंखनी मालावडे शतगुण, प्रवालनी मालायडे सहस गुण;
मणि अथवा रलनी मालावडे दशसहम गुण; स्फरिफनी माला-
बडे पण दशसहन गुण; मोतीनी माळावडे लक्ष गुण पाक्षमा
नालाबडे दशलक्ष गुण; सोनाना अक्ष-मणका-गानी शेती माला.
वडे कोटि गुण; दर्भनी ग्रंथीमय माळा सगावी रोजागी जागर.
वामां आवे तो शतकोटि गुण; अने रद्राक्षनी गला रस
फल प्राप्त थाय छे.
मापन भी करौ धृत्वा मध्यान्हे दि सस्थिती।
सा नपस्तु नासाग्रे त्रिसन्ध्यं जपलक्षणम् ॥
१२४ , प्रयोग पारिजातमां-प्रातःकाले नाभिस्थान पासे, मध्याह काले हृदय पासे; अने सायंकाले नासिका पासे हाथ राखी जप करवो एवं त्रिकाल सन्ध्याना जपर्नु लक्षण समजवु. आ वाक्य केवळ आंगळीओ बडेज गणना करवी होय त्यारे ध्यानमा राखी ते प्रमाणे करवू. वस्त्रेणाच्छाध तु कर दक्षिण यः सदा भोत् । तस्य स्यात्सफलं जप्यं तद्धीनमफलं स्मृतम् ।। दृद्ध मनु-जे द्विज दक्षिण हाथने जप करती वेळाए वम्बवडे आच्छादित करे छे; तेनो जप सफल यार छे, आच्छर- दन वगरनो जप निष्फल समजवो. १८- अथ गायत्रीमन्त्रस्वरूपविचारः । जप्य गायत्री मन्त्रनुं स्वरूप-केटलाएक आमही तथा अनमिन लोको तरफयी प्रतिपादन कराय छ; अने तेनाथी अम उत्पन्न भई साधारण आस्तिकोने ते दिङ्मूढ बनाये छे; माटे ते स्वरपनी " विशेष विचार " आ ठेकाणे करीए छोए. " गायत्री मन्त्रनी जप करया एटले आगळ नसेली मापना जागवानी डर छे. न्यास, गुदा, शापोद्धार, उत्कीलन, अंने रगर गदम्पा; पर जाण्या यगर वालो जप निरर्थक है. का प्रमाणे-गामान्यतः मयं मान्यता प्रतीत पाय एवीत-मति- - १२५ पादन करनारा घणा छे. अने तेमनु प्रतिपादन केवळ निरुपयोगी छ ए, पण नथी. सोपण-"वैदिका तान्त्रिका मिश्रा आयां वैकां चरेत् क्रियाम् " । वेदोक्त, तन्त्रोक्त, अथवा मिश्न आ त्रण प्रकारनी क्रियाओ पैकी जेमने मिश्र अथवा तन्त्रोक्त क्रियानो स्वीकार न करवो होय तेमणे केवल वैदिक क्रिया स्वीकारवी पूर्बु कहेलं होपाथी; केवल वैदिक जप पद्धतीमा उपर " जाणका योग्य " लखेली बाबतोनो बिलकुल उपयोग न होवाथी; अने ते वाचतोना त्याग माटे प्रत्यक्ष परिशिष्ट प्रमाण होवाथी संक्षिप्त- रूपमा सन्ध्या करनार व्यवहारी द्विज ते वायतोनो त्याग करवा अधिकारी छे. आश्वलायन परिशिष्टमां न्यास विधीने उद्देशीनें- "एनके नेछिन्ति स हि विधिरवैदिक इत्तमनु सन्द धान:।" आन्यास विधि अवैदिक छे; एवं वेदनं तात्पर्य जाणनारा आचार्यों आ न्यास विधीने कर्तव्य तरीके इच्छता नथी. एy. चोकस रीते मतिपादन करी साहचर्य नियमने अनुसरी सर्व प्रका- रना तान्त्रिक विधीनी गायत्री जपमा अनाधता सिद्ध करी छे. अर्थात् प्रणवनी संख्या आवतनी तकार पण आ न्यायवडेज दूर थाय छे. तथापि विशेष माहिती आपी अंतःकरणनी खात्री करवा मादे प्रणवनी संख्याना ग्रासता बाबत " श्रीमच्छंकराचार्य शारदापीठाधीश्वर तरफयी" संवत् १९६९ मा अपायले निर्णय छापी प्रसिद्ध थय छे ते आ प्रमाणे:- विभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमद्दत् । तादित्यूचीयाः सावियाः परमेष्ठी प्रजापतिः ।।
" मनु. २ । ७७ आवृत्ति रहित उत्तम स्थानमा रहेनारा प्रजापतिए ॥ नन् ए प्रतीकी आरंभ थती गायत्रीनी ऋचाना प्रण चरणने व्रण वेदमाथी दोही काट्या छे. एतदक्षरमैनां च जान्पाहनिपूर्षिकाम् । सध्ययोदविधिमा चेदपुण्येन युज्यते ।। मनु. २ । ७८ वेदवचा ब्रामण प्रभातमा तथा सायंकाले "ॐ" अन " भर् भुवः स्वः " आ व्याहत पूर्वक गाय- ग्रीनो जप करे तो तेने वेदाध्ययन- फल ( पुण्य ) मळे छे.
१२७ अमिहोत्रादि क्रिया करता नथी ते सत्पुरुषोमां निंदाने मात्र भाय छे. ॐकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहतयोव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ।। मनुः २ । ८१ अविनाशी ॐकारपूर्वक त्रण महाव्याह- तिओने तथा त्रण चरणवाळी गायत्रीने वेदनु मुख जाणवू. माटे आत्रण भण्या पछी वेद भणवानो आरंभ करवो. योऽधीते ऽ हन्यदन्येताँस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः ख मूर्तिमान् ।। मनुः २। ८२ जे पुरुष आळसनो त्याग करीने त्रण वर्ष सुधी गायत्रीनो जप करे छे, ते मरण पछी वायुरूप थईने पर- ब्रह्मने पामे छे. उपर लखेला सर्व वाक्यो तात्पर्य गायत्री जपमा एक प्रणव स्वीकारयो; एg छे. कारण उपर दावेला वाक्योमा " एतद- सरम् " इत्यादि रीते एक वचननुज उच्चारण छे. तेमज मनुस्मृति सर्व सामान्य होपाथी सर्य शाखाबाळा- ओए पण एकज प्रणव जपकाळमा लेवो एवं तार्य निकले छे. विशेष करीने मनुस्मृतीमा जे जे मन्त्रप्रतीको आवेला छे, ते ऋग्वेदनाज होचाधी ते स्मृती ऋग्वेदीओने प्रधान मानवान, के तेथी ऋग्वेदीओने जपकाळमा एकज प्रणव लेवानो छे.
१२८ स्मृत्यन्तरमा वधारे प्रणव लेवानो निषेध अनिष्ट फल बतावी सिद्ध करेलो छे; ते आ प्रमाणे:- तत्रैकमणवा ग्राह्या गृहम्यैर्ब्रह्मचारिभिः । गृहस्थो ब्रह्मचारी च प्रणवाद्यामिमा जपेत् । अन्ते यः प्रणवं कुर्यात्रासौ वृद्धिमवाप्नुयात् ।। गायत्री जप त्रण प्रकारनो छे. ते पैकी एक प्रणवयुक्त गायत्री मन्त्रनो जप गृहस्थ तथा ब्रह्मचारी एओए करवो. जे अन्ते प्रणव ले छे, ते उत्कर्पने पामे नहीं. एवी रीते निषेध करेलो छे. ऋग्वेदीय स्मृतिकार आश्वलायन ऋपि पण पोतानी स्मृतीना आचार प्रकरणना श्लोक ४५ मा कहे छे के:- जपेत्य गवपूर्वाभिातीभिः सहैव तु । तिमभिर्भूप्रभृतिभिर्गायत्री ब्रह्मरूपिणीम् ॥ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च........ .......॥ ॐकार पूर्वक त्रण महा व्याहृतिओ साथे ब्रह्मरूपिणी गायत्रीनो जप ब्रह्मचारी तथा गृहस्थोए करवो. महर्षि चौपायन पण पोतानी स्मृतीमा द्वितीय प्रश्न पैकी पाचमा अध्यायमा वावीसमे सूने रखे छे के मणको व्याहृतयः मावित्रीत्येते पच ब्रह्म- यता अहरहामणं किल्लिपात्यायन्ति ॥२२॥ -- ALLABH R. E. एक प्रणवत्रण व्याहति एक गायत्री आ प्रमाणे पांच ब्रह्मयज्ञो (असमन्त्रो) जप करनार ब्रामणने दररोज पवित्र करे छे. एवी रीते सर्व साधारण वाक्योनो विचार करतां सिद्ध थाय छे के जप बखते " ॐ भूभुवःस्वः तत्सनितु०" एवी रीते एक मणवयुक्त गायत्रीनोज स्वीकार फरवो एवो अमारो शास्त्र- सिद्ध निर्णय छे ते जाणवु एज आशीर्वाद ता. ११-१०-१२ स्वारी मुकाम डाकोर श्री प, श्री आज्ञाथी बालकृष्ण गणेश प्रकाशकर. श्री शारदापीठ चातुर्वर्ण्य विद्यालय मुख्य अध्यापक. आ प्रमाणे श्रीमज्जगद्गुरु तरफभी गयेलो निर्णय प्रसिद्ध छ; छता विशेप माहिती माटे श्रुति स्मृति तथा युकीथी आज सिद्धान्तनुं उपबृंहण नीचे प्रमाणे छे; ते जरूर जाणवू. श्री कृष्ण परमात्माए:---गीताना पंदरमा अध्यायमां:- ऊर्ध्वमूलमंत्राचाखमवत्यं पारव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदपिद ।।
" उर्ध्व भागमा जेनु मूळ छे, अने नीचला भागमा आवेला जेना थड छे, गायत्र्यादि छन्दो जेना पानडां छे तेवा अव्यय-अविनाशी वृक्षने जे जाणे ते वेदवित् केहेवाय " सामान्यत एवा अर्थनो श्लोक आपेलो छे तेनो योग्य विचार करता तेने लगतोज मनु स्मृतीनो श्लोक पण उपबृहण तरीके मनमा उभो रहे छे ते श्लोक एवो अकारं चाप्पुकारं च मकार च प्रजापतिः। वेदत्रयान्निरदुइद भूर्भुवस्वरितीति च ॥ ७५ ॥ ज्यारे " वृक्ष मुकाय तो हरकत नथी " एवी वृक्षना मालीक अथवा रक्षकनी भावना थाय छे, त्यारे ते प्रथम ते वृक्षना बीजनो सग्रह करी पछी ते वृक्ष तरफ उदासीनता धारण करे छे कारण तेने खात्री होय छे के " ज्यारे जोइये त्यारे था बीजमाथी वृक्ष उत्पन्न थई शकशे " ते मुजब कल्पान्तनी वखते परमात्माए वेद वृक्षना रक्षण माटे वेद बीज ग्रहण कयु ते बीज एटले ॐ कार, ते पैकी ऋग्वेदमाथी अकार, यजुर्व- दमाथी उकार अने सामवेदर्माथी मकार काढ्यो आ त्रण अशो बडे बनेल बीज प्रणव सज्ञक तथा ऋण व्याहृतिओ तेना अकुररूप समजवी. कल्पारभनी वखते आज बीजने पोताना बुद्धिक्षेत्रमा वावी ने तपश्चर्या रूप जल छाटी (तस्मानेपानावयोवेदा अना यन्त ) पकारमाथी भू उकारमाथी भुवर अने मकारमार्थी सर आ प्रमाणे प्रण अंकुर उत्पन्न थई ते अंकुरना तत्सवितुः भर्गो थियो आ ऋण थड थया. पवो आ ब्रश वृक्षको उत्तचिकम छे. जुवो मनु अ. २ श्लो. ८१ सर्व वाक्योनो समुच्चय रूप अर्थ करी स्वरूप निर्देश कखो होय तो आ प्रमाणे थई शकशे. आ प्रमाणेज वेदोत्पत्ति होवाथी गायत्री जपमा एवीज रीते बोलवु जोइए. खं मनुस्मृतीना मुह सुपर स्वर टीकाकार कुल्लक भह मनु. अ. २ तत्सवि० भो थियो। लो. ७८ नी रीफामा लखे छे. तेम अंगिरक्ष दक्ष विगैरे स्मृतिमा पण आज प्रकार आप्यो छे. धर्मसिंधु पण आ मतनेज मळतो छे. आ सर्व स्मृतिओ " ऐतरेय ब्राह्मण पश्चम पचिका खण्ड ३२" ना आधारे छे. ज्यारे ग्राह्यामावतादि संबंधमा याद होय त्यारे निर्णय मानयानी श्रीत पद्धीत एवी छे; के:- " एतद्वै यनस्य समृदं यमुपसमृदं-पत्कर्म निय- मागमृगभिवदति । " ऐतरेय ब्राह्मण. आज यज्ञर्नु समृद्ध-निर्दोष-रूप समजवू के जे यज्ञना . यौन सम्वेदनु प्रमाण मळे छे. गायत्रीजप ए जायज्ञ होवाथी ऋग्वेदानुकूल रोते है यज्ञ थाय तो सफल गणाय. तेमजः--
क्रियते तदृढम् ।
१३२
यद्यजुषा साम्ना वा क्रियते तच्छियिलं यहचव
" कृष्णयजुर्वेद-आर्यविद्यासुधाकर
नामना ग्रंथमाः-आ यज्ञ कर्मो पैकी एकाद बाबत थोडा तफावत
साथे यजुर्वेदमा, सामवेदमां, तथा ऋग्वेदमां पण आवेली
होय तो स्वीकार करवामां संशय उत्पन्न न थवा माटे “ कृष्ण
यजुर्वेदमा जणाव्युं छे के:-यजुर्वेद अने सामवेदमां कह्या मुजन
जे कर्म कराय ते शिथिल एंटले फल आपवा असमर्थ समजवू;
अने जे ऋग्वेदमां कह्या मुजब कराय ते दृढ एटले फलदान
समर्थ समजवु. माटे विरोधरहित समुच्चय करवो.
आ प्रमाणे श्रुति स्मृति अने युक्ति सिद्ध निर्णय छे; ते
जाणीने निर्मल अने निःशंक अंतःकरणवडे जप करखो.
कारण:-
जप्येनैवहि संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यात्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥
मनु० मां गायत्री जपवडेज ब्राह्मण सर्व कामामा सफलता
मेळवनार वनी जन्मनु पण साफल्य मेळवे छे. जन्मना साफल्य
माटे वीजा कर्मो करे अथवा न करे तोपण चाले; कारण ब्राह्मण
ए मैत्र-मित्र देवतानो उपासक अथवा सर्व प्राणीओनी साधे
मित्रता धरावनार केहेवाय छे. माटे शक्त्यनुसार तथा समयानु-
• सार १००८, १०८, २८, १० पैकी कोई संख्या जेटलो
दरेक संध्या वखते जप करवो.
F
१३३ सिद्ध थयेलं गायत्रीनुं जप्य स्वरूप. ॐ भूर्भुवःस्वः तत्सवितु० यात् ॥ १-१००८. इति जप्यमत्रस्वरूपविचारः । १९- स्नानं सन्ध्याजपो होमः साध्यायो देवतार्चनम् । वैश्वदेवातियेयश्च पद् कर्माणि दिने दिने । पराशर स्मृतीमा-स्नान, सन्ध्याकालीन जप, औपास- नहोम, ब्रह्मयज्ञ, देवतार्चन, अने वैश्वदेवसहित अतिथिसत्कार मा छ कर्मो गृहस्थाश्रमीए प्रतिदिन करवा. एवं कहेलं छे. ब्रह्मचारीओए अग्निकार्य उपनयनाग्नी उपर अथवा यथा- विधि लौकिकाग्नीनी स्थापन करी तेना उपर करखं. विवाह थया दिवसथी ( विवाह-पाणिग्रहण ) आवसथ्यतुं (गृह्याग्नीनु) आधान करवानो तथा औपासन होम करवानो अधिकार प्राध थाय छे. परंतु ज्यां सुधी एकज पाक उपर अनेक विवाहित बंधु विगेरेने भोजन करी एकत्र हळी मळी रेहेवानुं छे त्या सुधी एक करतां वधारेने अग्नि सेवक थवानो अधिकार नथी. अने जो आधानपूर्वक अग्नि सेवा करवानी श्रद्धा होय तो जुदो पाक करी भोजन करवा-जुदु रेहेवा-तैयार थर्बु जोइए. ते विना गत्यं- तर नथी. एवं सह वसेयुर्वा पृथवा धर्मकाम्यया । पृथग्विवर्धते धर्मस्तस्मादो पृषक्रिया ॥
" G मनुस्मृतीमां-आ प्रमाणे कुटुंबिओए (पिता पुत्र-बंधुओ विगेरे ) भेगा रेहे, अथवा धर्मर्नु यथावत् आचरण आपणाथी थवानी जरूर छे. एवी इच्छा होय तो पृथक् रेहे. पृथक् रेहेवाथी धर्म वधे छ माटे पृथक् क्रिया ए धर्म प्रधान छे. आ उपरथी धर्म प्रधान लोकोए पाणि ग्रहण थया पछी जुदु रही पराशरना केहेवा प्रमाणे पट् कर्मो करवा. एवं सिद्ध थाय छे. व्यवहार प्रधान लोकोने नो एक ठेकाणे रेहेवाथी संघ- शक्ती वधे छे माटे, आर्थिक नुकसान कमी प्रमाणमा थाय छे तेथी, अने धर्म सकोचनी परवानगी मळे छे तेथी पण पृथक क्रिया इष्ट नयी. एकपाकेन बसता पितृदेवद्विजार्चनम् । एकं भवेत् विभक्तानां तदेव स्याद् गृहे गृहे ॥ बृहस्पति स्मृतिमां-एक पाकमा भोजन करी रेहेनारा नधुओने श्राद्धकर्म, देवपूजा, वैश्वदेव, अतिथि सत्कार, नित्यदान, अने औपासन, एटला कृत्यो पृथक् पृथक् रीते करवानी जरूर नथी. तो घरना मुख्य मालिके अथवा तेनी आज्ञाथी तेना प्रति- निधीए कन्या होय तो सर्वजणोए कन्या छे एवं समजबु. एवं एक ठेकाणे रहेनार बध्वादिकना माटे अनुप्राहक वाक्य छे. तेमज पितृपाकोपजीवी या भावपाकोपनीवकः । झानाध्ययननिष्ठो वा न दुष्येदामिना विना ।
निर्णयसिंधुमां गार्य कहै छ-पितृपाकोपजीवी अथवा
भ्रातृपाकोपजीवी थ; किंवा ज्ञाननिष्ठ अथवा अध्ययननिष्ठ
रहेवु; एटले औपासनाग्नि वगर रह्यानो दोष प्राप्त थाय नही
आ वाक्य पण व्यवहारमधान लोको माटे अनुप्राहक छे.
हाल वटुकने ब्रह्मचारी राखी तेना पासेथी ब्रह्मचर्य पळावq
अशक्य होवाथी तथा तेवो शास्त्र निषेध पण होवाथी ( जुबो
कलिवर्ण्य प्रक० ) ब्रह्मचारीए करवानो नित्य होम आ पुस्तकमा
आप्यो नथी. आहिताग्नी गृहस्थने परपाक भोजननो निषेध
होवाधी, तथा गृहस्थाश्रम पण आहिताग्नीपणाने लीधे संकटरूप
थतो होवाथी, ( संकटाह्याहितानीनां प्रत्यवायहस्थता।
आहिताग्नि लोकोनुं गृहस्थपणुं प्रत्यवाय-धार्मिक-अडचणोने लीधे
घणुं संकटरूप होय छे. " उत्तर रामचरिते भवभूतिः )
आवसध्याधानना व्यवहार प्रधान लोकोए त्याग करेलो छे.
अतएव सायंप्रातहोमनी पद्धती पण आ ठेकाणे आपी नथी.
पृष्टोदिविविधान परपाक भोजन निषेध पूर्ण रीते पाळवावाला
धर्मप्रधान लोकोना माटे होपाथी व्यवहारमा तेनो प्रचार रहेलो
नथी; तेथी तेना प्रयोग पण अत्रे आपेलो नथी.
व्यवहार सिद्धी माटे संकोच कहो तोपण तेनाथी थता
धर्मातिक्रमण माटे योग्य अने अल्प प्रायश्चिच - करवानू जे जे
ठेकाणे सयुं हशे हे ते ठेकाणे योग्य रीते क्.
N
१३६
२०- आवाहनासने पाधमय॑माचमनीयकम् ।
स्नान वस्रोपवीते च गन्धं माल्यानि वैक्रमात् ।।
धूपं दीपं च नैवेद्यं नमस्कारप्रदक्षिणे।
ततः पुष्पाजालश्चैव प्रत्यूचं पौरुपेण तु ॥
प्रयोग पारिजातमां-आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य,
आचमनीय, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्य, नमस्कार, प्रदक्षिणा, अने पुष्पांजलि, आ पोडश
उपचार पुरुपसूक्तना सोळ मंत्रो बोली अर्पण करवा.
गन्धपुष्पे धूपदीपा नैवेद्यः पञ्च ते क्रमान् ।
स्मृति संग्रहमां-पंचोपचार पूजन कलुं होय त्यारे "गन्ध,
पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य;" आ पांच उपचार समर्पण करवा.
नासतैरर्चयेद्विष्णुं न तुळस्या गजाननम् ।
न यायेदुर्गा न केतक्या महेश्वरम् ।।
विधानमालामां-अक्षताओवडे विष्णुर्नु; तुलसीपत्रवडे
गजानन ; दूर्वावडे दुर्गान; अने केतकीवडे महादेवन
फरवू नहीं.
आ वाक्यमां बतावेला निपेघनो प्रतिप्रसव करेलो हे ते
था प्रमाणे:-अक्षता अर्घ्यमा निषिद्ध नथी; तुलसीपत्र चतुर्थीव्रतना
दिवसे निषिद्ध नथी; ललितानी पूजामा दूर्वा विहित होयायी; तथा
१३७ दुर्वया " एवं एक वचन प्रथमा होवाथी; कांडनयात्मक दूर्वा समर्पण करवा हरकत नथी; तेम केतकीवडे दिवसे पूजन न करवं; राने दोष नथी. कारण-"केतकानि कदम्बानि रात्रौ देयानि शंकरें। आचार प्रकाश ग्रंथमां-केतक अने कदंब शंकरने राने समर्पण करवा एवं कथु छे. पुप्पोनी पायता विशे घणो विचार छे; पण ते साचवया जतां सवातो नथी, जेथी ते अत्रे आपवानी जरूर नथी. २१-प्रथमा विन्यसेवामे द्वितीयां दक्षिणे करे । तृतीयां वामपादे च चतुर्थी दक्षिणे न्यसेत् ॥ पञ्चमी वामजानौ तु पष्ठी वे दक्षिणे न्यसेत् ।। सप्तमी वामकटों तु दक्षिणस्यां तथाष्टमीम् । नवी नाभिमध्ये तु दशमी हृदये तथा । एकादशी वामकुक्षौ द्वादशी दक्षिणे न्यसेत् ।। कण्ठे त्रयोदशी न्यस्य तथा बके चतुर्दशीम् । अक्ष्णोः पंचदशी चैप विन्यसेन्मूर्टिन पोडशीम् ।। एवं न्यासविपि कसा ततः पूनां समारभेत् ।। वृहत्पाराशर संहितामां-१ वामकर, २ दक्षिणकर, ३ वामपाद, ४ दक्षिणपाद, ५ वामजानु, ६ दक्षिणजानु,७ वा- मकटि, ८ दक्षिणकटि, ९ नाभिस्थान, १० हृदय, ११ वाम- कुति, १२, दक्षिणकुक्षि, १३ कण्ठस्थान, १४ मुस, १५ नेत्रो,
१३८
१६ मस्तक, आ प्रत्येक मंत्रना उच्चारना अंते ते ते स्थानने
न्यास संज्ञक स्पर्श करीने पूजानो आरंभ करवो.
२२ शंभौ मध्यगते हरीनहरभूदेव्यो हरौ शङ्करे ।
भास्येनागसुतारवौ हरगणेशाजाम्बिका स्थापिताः।।
देव्यांविष्णुहरैकदन्तरवयो लम्बोदरेऽजेश्वरे- ।
नार्याः शंकरभागतोऽतिसुखदा व्यस्तास्तु से हानिदाः।।
वोपदेवः-शंकर वच्चे होय तो विष्णु, सूर्य, गणपति अने
देवी; विष्णु वच्चे होय तो शंकर गणपति सूर्य अने देवी; रवि
वच्चे होय तो शंकर गणपति विष्णु अने देवी; देवी वच्चे होय
तो विष्णु शंकर सूर्य अने देवी; आ प्रमाणे ईशान्य खुणाथी
आरंभ करी प्रदक्षिण रीते चारे खुणे स्थापना करवा एटले ते देवो
सुखदायी थाय छ; अने आ क्रम तोडी नांखवामां आव्यो होय
तो हानि कर्ता थाय छे.
२३ अयं मित्रो मस्यःमुगेवो रानामुक्षत्रो अजनिष्ट वेदाः ।
तस्य वयंमुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रेममिनुने स्याम ॥
उत्तम रूपवान; खतम्नेजस्वी; सेवक जननुं रक्षण करनारा;
जेना पासेधी वेदनी उत्पत्ती (प्राकट्य ) थई छे एवो आ मित्र
देव नमस्य नमस्कार उपचार समर्पण करवा निरंतर योग्य छे.
जो के ते यशिय एटले यज्ञ कर्मोथी संतुष्ट करवा लायक छ;
तोपण आ " नमस्कार करवाथी सर्व फस्याण मापनार एका तेना सौमनस्यमां-आत्मीय भावनामां-अमो प्रविष्ट थईशं.(ऋग्वेद) मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । मनुः ग्रामण मित्रोपासक होय छे. सूर्य नमस्कारने लीधे आरोग्यता पण प्राप्त थाय छे. २४" उपविशेदर्भेषु दर्भपाणिः स्वाध्यायञ्च यथाश- इत्यादावारभ्य वेदस्।" कात्यायन परिशिष्ट सूत्रम् । प्रागम दर्भोना आसन उपर बेसी दर्भ पाणी थईने, वेदा- दिनो आरंभ करी यथाशक्ति खाध्याय भणवो. एवं कात्यायन परिशिष्टमां कयुं छे. स्वाध्यायर्नु अध्ययन करवानी मुख्य पद्धति मूळ सूत्रमा उपाकर्मना प्रसंगे आपी छे ते एवी के:- " ॐकारमुक्त्वा त्रिश्च सावित्रीम (पारस्कर गृह्यसूत्रे) प्रथम ॐ कार बोली त्रण वखत गायत्री मंत्र बोली वेदनो आरंभ करवो. आ पारस्कर सूत्रनी पद्धतीमा व्याइतिओने छोडी देवामां आव्युं छे; पण जप प्रकरणमा कदा मुजब प्रणव व्याहृति बने गायत्री आ चणे मळीने वेदनुं मुख होवाथी व्याहृतिनो सर्व प्रयोग ग्रंथमां आ स्थान उपर स्वीकार करेलो छ तेथी इतर स्मृतिओ; ऋग्वेद तथा आ पारस्कर सूत्र त्रणेनो समुचित अर्भ करिये ते ब्रह्मयज्ञनो आरंभ आ प्रमाणे करवो जोइए:-
१४०
ॐ भूर्भुवःस्वः तत्सपि तत्सं० तत्सवि० यात् ।।
स्वाध्यायाध्ययनरूप ब्रह्मयज्ञवडे तृप्त थयेला पितरो ब्रमयज्ञ
करनारने सर्व शुभइच्छापूर्ण करी तृप्त करे छे. एवं याज्ञवल्क्य
स्मृतीमां कडं छे.
२५- कनिष्ठदेशिन्याष्ठमूलान्यग्रं करस्य च ।
प्रजापतिपितृवालदेवतीर्यान्यनुक्रमात् ।।
याज्ञवल्क्य स्मृतीमा-कनिष्ठिका. तर्जनी, अंगुष्ठनु मूळ,
अने करनुं अग्र आ ठेकाणे अनुक्रमे प्रजापतितीर्थ पितृतीर्थ
आमतीर्थ अने देवतीर्थ समजवू.
२६-
पच्चसूना गृहस्थस्य चुल्ली पेपण्युपस्करी ।
कण्डणी चोदकुम्भी च तासां पापस्प शान्तये ।।
पञ्च स्कृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ।
मनुस्मृतिः- गृहस्थना घरमा चुलो, घंटी, सावरणी,
सांडणी, अने पाणीआरं आ पांच हिंसा स्थानो छे. त्या थनारी
हिंसानु पाप दूर थवा माटे दररोज गृहस्थाश्रमीना उद्देशथी पंच
महायज्ञ रूप वैश्वदेवतुं विधान करेलु छे.
२७- शालानौ वा पचेदन लौकिके वापि नित्यशः ।
यस्मिनग्नौ पचैदन्नं तस्मिन् होमो विधीयते ॥
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१४१
आंगिरसस्मृतीमां-औपासनाग्नी उपर अथवा लौकिकाग्नी
उपर निरन्तर पाक करवो. मात्र जे अग्नी उपर पाक थाय तेज
अग्नी उपर वैश्वदेव फरवो.
आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ-
चित्तशुद्धिश्चित्तशुद्धौ ज्ञानम्।
श्रीमन्महाभारत शान्तिपर्व मोक्षधर्मनी टीकामां-
भोजनना पदार्थो शुद्ध होय तो सत्व गुगनी शुद्धी थाय
छे, सत्वशुद्धि थये चित्तशुद्धि थाय अने चिपशुद्धि थई होय तो
ज्ञान थाय छे. एवी श्रुति छे. तेथी आहार शुद्धी भवा माटे
जेटलं पवित्र भोजन मळे वेटलं सारं, वैश्वदेवपण तेटला माटेज
करवानो छे.
हुताग्रिहोत्रः कृतवैश्वदेवः-
पूज्यातिथीन्भृत्य जनावशिष्टम् ।
तुष्टः शुचिः श्रद्दधदत्ति यो मां-
तस्यामृतं स्यां स च मां भुनक्ति ॥
बौधायन० अग्निहोत्रनो होम वैश्वदेव तथा अतिथिसत्कार
करी, भृत्य-पोय-वर्गनुं भोजन थया पछी बाकी रहेला मने
( अन्नने ) ने तुष्ट शुद्ध अने श्रद्धापूर्वक अंत.करणवडे खाय के
तेने हुं अमृत छु. अने तेज मने खाय छे. (आ अझर्नु वाक्य छे.)
२८- आपोशनेनोपरिष्टादधस्तादनता तथा ।
अनमममृतञ्चैव कार्यमन द्विनन्मना ।।
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१४२ याज्ञवल्क्य स्मृति- भोजन करनार द्विजाती ए भोजनना 'पूर्वे तथा पछी " आपोशन" लई अन्नने आच्छादित अने अमृतरूपी बनावq. २९- यथेह क्षुधिता वाला मातरं पर्युपासते । एव १ सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ॥ छांदोग्य उपनिपद्मा-जेवी रीते क्षुधित थयेला बालको मा-नी प्रतीक्षा करी तेनी आशाए बेसी रहे छे, तेवी रीते सर्व प्राणी मात्र द्विजोए करवाना प्राणाग्निहोत्रनी प्रतीक्षा करे छे. माटे जननाशौचमा अथवा मृताशाचमा पण आ प्राणाग्निहोत्रने लोपवा देवू नहीं. ३०-उपास्य पश्चिमा सन्ध्यां हुत्वानीन् तानुपास्य च । भृत्यैः परिवृतो भुक्त्वा नातितृप्याथ संविशेत् ॥ याज्ञवल्क्या-सायंसन्ध्योपासन करी, औपासनाग्नी- होम- पूर्वक आराधन करी, अने पोप्यवर्ग साथे अतितृप्त थवाय नहीं तेवी रीते भोजन करी निद्रा लेवी. माच्यां दिशि शिरः शस्तं याम्पायामधवा नृप । सदैव स्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम् ।। विष्णुपुराणमा:-निद्रा लेनार मनुप्यतुं निरंतर पूर्व के दक्षिण तरफ मस्तक रेहे, योग्य छे. एथी विपरीत होय तो रोगी बनावे छे.
१४३
स्फुट संग्रह.
सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च ।
विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम् ॥२॥
निरंतर जमणो हाथ बहार रहे एवी रीते उपवीत करीने
तथा शिखाबंधन करीनेज वर्तवु. उपवीत कन्या वगर अने
शिखा बाध्या वगर जे कराय ते न कया बराबर समजवू.
यज्ञोपवीते द्वे धार्य श्रौते स्मार्ते च कर्मणि।
तृतीयमुत्तरीयाथै वस्त्राभावे चतुर्थकम् ॥ २ ॥
श्रौत अने स्मात कर्मना अधिकारार्थ वे यज्ञोपवीत धारण
करया. त्रीजु उत्तरीय वस्त्र तरीके अने पेहेरवा योग्य वस्त्र न होय
तो ते खामीनी पूर्ती करवा माटे चोधुं धारण कर,
अमसूत्रे सव्येसे स्थित्ते यज्ञोपवीतिता ।
प्राचीनावीतिताऽसव्ये कण्ठस्थे तु निचीतता॥३॥
डाबा स्कंधना उपर ब्रह्मसूत्र होय-ने ते तिर्यम् धारण कन्यु
होय तो ते यज्ञोपवीत-उपवीत केहेवाय; अने दक्षिण स्कन्ध
उपर राखी बांसु कन्युं होय तो माचीनावीत केहेवाय; कण्ठमा
माळा जेवु राज्यं होय तो निवीत केहेवाय.
सूतके मृतके चैव गने पासवतुष्टथे ।
नत्यशोपीतानि पुरवा जाणानि सन्त्यजेत् ॥४॥
१४४ जननाशौच तथा मृताशौच उतरी गया पछी, अने यशो- पवीत धारण कन्याने चार मास थाय त्यारे, नवं यज्ञोपवीत धारण करी जुनानो त्याग करवो. तेज प्रमाणे शरीरमाथी निकळी जाय अथवा तुटी जाय तो पण नूतन यज्ञोपवीत धारण करवू. खल्वाटादिकदोपेण विशिखश्चन्नरो भवेत् । कौशी तदा धारयीत ब्रह्मग्रंथियुतां शिखाम् ।।५।। खल्वाटादि दोपने लीधे मनुष्य शिखा वगरनो होय, तेणे दर्भनी ब्रह्मग्रंथि युक्त शिखा धारण करवी. जपादि कर्मो करवाथी थतुं ब्राझ तेज नष्ट न थता सवतः तेनो कब्जो रेहेवा माटे जेवी रीते अंतःकरणने विषयलोलुप न भवा देवू, अने ते द्वारा ज्ञानेंद्रिय तथा कर्मेन्द्रियोनुं आकलन करवु आवश्यक छ तेम नव द्वारो रोकवानी पण जरूर छे तेज प्रमाणे दशम द्वार जे ब्रह्मरंध्र तेनुं आच्छादन कर, आवश्यक छे. माटेज " मुण्डस्यैवापिधानं तत् । यच्छिखा " । मस्त- कर्नु ते ढाकणुं छे, जेने शिखा कहिये छिये. एवं श्रुति कहे छे. जेमने दशम द्वार खुल्लु राखी वखतने तथा अभ्यासने अनुसरी तेनो भेद करवानो छे; तेवा लोकोए अर्थात् सन्यासीओए शि- खानो त्याग करवो उचित छे. प्रायश्चित्तना अंगे शिखासहित वपन केटला एक प्रसंगे कहेलं छे ते शिवाय शिखानो त्याग परनार गृहस्थादिक प्रत्यवायी छे.
आश्वलायन-नित्य कर्म जे जे वखते करवा कहेलं छे ते ते वखते कोईपण प्रकारना अडचणने लीधे न कराय तो अवि- हितकाले एटले मुख्य कालना पहेलांज अथवा काल व्यतीत १४५ त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् । अष्टमद्भिनिर्णिकं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ ६॥ चौधायन-देवोए ब्राह्मणो माटे त्रण बावतो पवित्र कहेली छे. न जोयेलं; पाणीवडे शुद्ध करेलु तथा जे शास्त्रीय वाणीए गृहीत कन्युं हशे ते. अशुींच स्पृशते यस्तु एक एव स दुष्यति । तं स्पृष्ठाऽन्यो न दुष्येत सर्वद्रव्येष्वयं विधिः॥७॥ बहूनामेफलमानां योकोप्यशुचिर्भवेत् । अशौचं तम्य तन्मात्रं नेतरपां कदाचन ॥ ८ ॥ लघुशातातप-एकाद समाजमां पणा लोको एक ठेकाणे मळेला होय तेमा जो एकाद पण अपवित्र ( अस्पृश्य ) होय, तो अपवित्रता ते जेने प्रत्यक्ष स्पर्श करे तेना पुरतीज समजवी; इतरोने अपवित्रता नथी. एवं लधुशातातप स्मृतीमा कयुं छे. उक्तं कर्म यथाकाले यदि कर्तुं न शक्यते । अकाले चापि तन्कुर्यादुलंध्य वापप्य च ॥ ९ ॥ थया पछी पण क. १.
१४६ पाखण्डिनोविकर्मस्थान् बैडालवतिकान् शठान्। हैतुक न् वकवृत्तींश्व वाइमात्रेणापि नायेत्॥१०॥ मनु-वेदनिंदक, वेदनिषिद्ध कर्म करनारा, दाभिक, शठ हेतुवाद करनारा, अने बफ वृत्तीना लोकोने सभाषण करीने पर पूजवा नहीं सकारवा नहीं. अप्रमाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चाभिलंघनम् । अव्यवस्था च सर्वत्र (वणानां) एतन्नाशनमात्मन ॥११॥ महाभारत अनुशासनमा-वेदोनु अप्रामाण्य, शास्त्राज्ञा ओनु उल्लघन, अने सर्व बाबतमा अव्यवस्था अनियमितपणु अ आपणु विनाशक एवं त्रितय छे. वेदोदित स्त्रकं कर्म नित्य कुर्यादतन्द्रितः । तद्धि कुर्वन्यथाशक्ति पामोति परमां गतिम् ॥१२ मनु-आळस छोडीन वेदे व्हेलं पोतानु नित्य कर्म निरंतर कखु. पोतानी शक्ती प्रमाणे नित्य कर्म करनार उत्तन गतीने पामे छे. धर्म संचिनुयान्नित्यं वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोफसहायार्थ सर्वभूतान्यपीडयन् ।। १३ ।। मनु-ममरीओ जे प्रमाणे मृचिकानो एक एक परमाणु लईने पोतानु वसतिस्थान (वल्मीक) बनावे छे, तेवी रीते - आ गीता-जे मनुष्य शास्त्रीय पद्धतीने छोडीने यथेष्टाचरण १४७ आईपण प्राणीने त्रास न आपतां परलोकमां मददगार थवा माटे घोडो थोडो पण धर्मसंचय निरंतर करवो. आहार-निद्रा-भय-पैथुनश्च- सामान्यमेतत्स्शुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेपामधिको विशेषो- धर्मेण हीना पशुभिः समागाः ॥ १४ ॥ मनुप्योनी " आहार निद्रा भय तथा स्त्रीसंभोगः " वार बाबतो ने पशूनी पण आ बाबतो समानन छे; केवल धर्म कर्तव्याकर्तव्यविनार-प्रतिपादन करनार शास्त्र एज ते पशूना करतां विशेष-भेदक-छ जेओ कर्तव्याकर्तव्यविचारशून्य के तेओ पशुतुल्यज समजवा. वयमः कर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च । वेषवाग्युद्धिसारूप्यमाचरन्विचरेदिह ॥ १५ ॥ मनु-उमर, धंदो, द्रव्यसमृद्धि, विद्याभ्यास, अने कुल परंपरा; एटलाने शोभे एवी रीते " वेप, भाषण पद्धति, अने बुद्धी राखी " व्यवहार करवो. यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्वते कामकारतः। नस सिद्धिमवामोति न सुखं न परां गनिम् ॥१६॥ . करे छे ते सिद्धीने कृतार्थताने प्राप्त थतो नी; तेम सुख तथा उत्तम गतीने पण प्राप्त करी शकतो नथी.
१४८ . तस्माच्छात्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहाहसि ॥ १७ ॥ गीता-यथेष्टाचरण करवाथी कृतार्थता प्राप्त थती नथी माटे कर्तव्याकर्तव्यनो निर्णय करवामां प्रमाणभूत एवा शास्त्रने जाणी, शास्त्रानुसारि कर्म करवा माटे तूं योग्य छे. यतः प्रवृत्तिभूतानां येन सर्व मिदंततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानवः॥१८॥ गीता-जेना पासेथी सर्व प्राणी मात्रनी उत्पत्ती छे; अने जेणे आ संपूर्ण जगत् व्याप्त करेलुं छे; ते सर्वानार्यामी अनिद्देश्य परमात्माने पोताना विहित कर्मोवडे सेवीने-संतुष्ट करीने-मनुप्य सिद्धीनें एटले जन्मना साफल्यने प्राप्त करे छे. द्वितीय भाग समाप्त श्रीदत्त. R.E