University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
जिनचरितं
Front matter
ეჭდიოდიდიოდური
OGY
* मो३म् *
पालि ग्रन्थमाला
प्रशम माग
जिनचरितं
Essam
उपाध्याय चन्द्रमणि
विद्यालङ्कार
गुरुकुल काङ्गड़ी
YOOORom
www
থাকুলি
५०० प्रनि ।
51
caroo
R069-imalaciatan
स. १६७२ मूल्य ।-
joerdoses
OYOOO
•मोषम् . जिनचरितं उपाध्याय चन्द्रमणि विद्यालङ्कार गुरुकुल कांगडी गुरुकुल यन्त्रालय काङ्गड़ी में नन्दलाल सहायक मख्याधिष्ठाता के प्रबन्ध से मुद्रित तथा प्रकाशित । प्रथमावृत्ति ५०० • } संघत् १६७२ पि मूल्य-
*प्रोम
प्रस्तावना।
गुरुकुल के महाविद्यालय विभाग में पाली भाषः के पढ़ाने
का प्रबन्ध होगया है। पहले लंका के कु नम्बो नग स्थ पर ...नन्द
महाविद्यालय के वर्तमान आचार्य श्री कल्याणनिष्य जी
महारा। यहां पाली पढ़ाने के उद्देश्य से आये थे . पर तु
इस स्थान का शीन उन के प्रति कून पड़ा और वह नामा
होकर लौट गए । तब स्नानक चन्द्रमणि प्रतिष्ठित द्या-
लंकार को गुरुकुत की ओर से लंका भे.. गया जहां पं आ
चार्य का प्रशंसा पत्र लेकर वह गत आपाढ़ मास में लौट आए
थे । आश्विन १६७२ में आर्य सिद्धान्त के कुछ छात्रों को
इन्होंने पाली भाषा पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। बौद्ध धर्म
सम्बन्धी पुस्तके अधिकतर पाना में हैं और पाला भाप के
ग्रन्थ प्रायः सिहाही दि में है : भारत वर्ष के छात्रों के
माग में यह बड़ी भारी मात्र है। इस रुकावट को
दूर करने के लिए उपाध्याय लन्द्रपणि जी ने गुरुकुल विश्ववि-
द्यालय के लिए पाठी के ग्रथों को देनागरात में छपाना
अ.रम्भ किया है। उपाध्याय चन्द्रगिजा का यह पुरुषार्थ
सफल होगा और बहुत से विद्याथि गों को घौद्धध विषयक
मौलिक आन्दोलन में प्रथा काएगा-यह आशा पाती है ।
पाली ग्रन्थ- 11 ना को यह पहला मणि युदेश जीवन चरित्र
से ही प्रारम्भ होनी चाहिए थी। ग्रन्थ का सारांश आर्यभाषा
में देकर पाठकों के लिए और भी मार्ग साफ कर दिया गया
है। ऐसा करने से साधरण अभिाषः जानने वालों को भी
पाली का जिनचरित सहज में हः समक अनाया।
मुशाराम
मुख्याधिटाना गुरुकुल विश्वविद्यालय
शुद्धि पत्र झोक मशुद्ध ७ पुटा সংখ্যা भसंक्खेयात भवे ६८ पण. ७२ महापात्रा महापजनो पल्ला अजिनल्सवेषि पल्लक अजिनप्पणि १२ m १२२ १२५ २११ मजार सुपक्ष्यतो उपेय्य पदिचं ৰিাজন सुपअत्ते उपेम्यं पाटिल विराजमानं ॥ोरम॥ गौतमबुद्ध का के जीवन चरित्र ( पुस्तक का सारांश ) चार असंख्य य एक लाख कल्पों में भी पूर्व अमरपुर नगर एक ब्राह्मण घराने में समेत्र उत्पन्न हुआ वह अभी कुमार ही था कि उसके माता पिता का देहान्त होगया। उनके मरने पर एक दिन को- पाध्यक्ष ने सैकड़ों काठियों में सुरक्षित धन इसे दिग्वाया । उसे देख कर यह विचारने लगा हा ! इस अनन्त धन को एक मास के लिये भी माता पिना साथ नहीं लगये ! मैं अवश्य ले जाऊ गा । .रन्तु जब एकान्त में बैठ कर विचारने लगा तो मनुष्य शरीर में अनेक दोष देखकर बड़ा उद्विग्न तथा उदासीन हुश्रा । उसने सोचा कि मनुष्य का जन्म तथा मरण दोनों दुःखदाया है, यह शरीर जन्म, जरा, व्याधि धर्म वाला है। तब उसने राजा की सूचना देकर शभर में डौण्डी पिटवाकर एक सप्ताह तक माचकों को दान देना शुरू परन्तु तो उस का धन समाप्त नहीं दुश्ा। दा समेध बन्धुयों को रोने पीट छोड़ कर घर बाहर निकल गया और हिमालय प्रदेश में रहकर तपस्या करने लगा और रन दिन में ही वहुन युछ साधन सम्पन्न हो गया। निया एक दिन वह प्रकाश में कहा थाकि साफ करने हुए मनु को दसकार नीचे उतर भाया पार पूछने लगा कि तुम माग को साफ करके हो । उत्तरगिला !-- २५. नगर के सुदर्शन नि में रहना । उमश्राम ४ लास्य ..सरों समेत भोजनार्थ निर्म ग है उसीदोभिएस मार्ग साफ कर रहे हैं युद्ध का नाम सुनते ही फूला साया और ना साफ करने की इच्छा प्रकट की, जिम १२ उसे एनीचर स्थान साफ करने को मिला । वह अभी साफीर art Me प्रार हुंचा । यह स्वयं कीचड़ पर ले : नना । नर से गुजर ।
(२) जावे । ऐसी श्रद्धा तथा भक्ति को देख कर दीपकर ने भविष्यवाणी की कि श्रागे तुम गौतम बुद्ध होंगे, अमुक तुम्हारे मुख्य शिष्य ( अग्रश्रावक ) होंगे और अमुक २ नगदिक में पैदा होंगे। इस प्रकार कल्याण वचन कह कर प्रदक्षिणा करके और पाठ मुट्ठी पुष्पों से पूजा करके दीपकर बुद्ध आगे चला गया। अब रामेधने बड़ा घोरतप करना शुरु किया और बुद्धत्व प्राप्तिके लिए समाधि आदि सब साधन सम्पन्न किये दश प्रकारकी पारमिये संपूर्ण की । दान पारमी पूर्ण करते समय याचकों को अपनी आंखे मांस लोहित, शिर, स्त्री, पुत्र और शरीर तक सब कुछ दान किया। इस प्रकार अनेक जन्म जन्मान्तरों में तप करते हुए (विश्व-तर) घे. सन्तर ) राजा के समय तुपित नामक देवलोक में जन्म लिया । वहां बहुत समय तक रहा। इसके पश्चात कपिलवस्तु में पैदा होता है। इसके पिता का नाम शुद्धोदन था जो कि शाक्य वंशज तथा क- पिलवस्तु का राजा था। इसकी माता मायादेवी देवदह के राजा की पुत्री थी । जिस दिन मायादेवी ने गर्भ धारण किया उस दिन उसने एक श्वेत हाथी को अपनी श्वत सूडमें श्वेत कमल लिये हुए स्वप्न में देखा। दश मास के पश्चात् जब पुत्रोत्पत्ति का समय आया तब माया ने पति से अपने पितृ गृह में जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मि- लने पर बड़े भारी समारोह के साथ देवदह की ओर जाते २ रास्ते के सुन्दर लुम्बिनी वन में एक शाल वृक्ष की शाखा को पकड़े हुए वन की शोभा निहारने लगी। उस समय सन्तानोत्पत्ति की वायु चली और अनुचरों ने आकर चारों तरफ पर्दा डाल दिया । वहां ऐसी अवस्था में ईसा से ६२३ वर्ष पूर्व माया के खड़े २ पुत्रो- त्पत्ति हुई जिम का नाम सिद्धाय रक्खा गया। उस दिन वैशास्त्र की पूणिमा थी।
( ३) राजा को इस शुभ बात की सूचना मिलने पा रागी का पुनः कपिलवन्त में लोटा लिया। देश में अनेक प्रकार की खुशिये मनाई गइ । सामुद्रिक गस्ते से विदेश गरे हुए मनुष्य लोट पाए कदि- यो को छोड़ दिया गया, वस्त्र उछाले गये । राजा का कुलक्रमाग कालदेवल पुरोहित बाहर भमणार्थ गया हुआ था । वह पुनोत्पनि की वार्ता सुनकर राजा के घर आया भोर पुत्र देखने को इच्छा प्रकट की। शृद्धोदन पुत्र को उठाकर तप वो के अभिवादन के लिए उसके पैग की तरफ लारहा था कि पुत्र के पैर तापम के शिा की ओर हो गये । तपस्वी ने म्पर हाथ जाड का सिदार्थ को प्रणाम किया। इसे देख कर राजा वरा चभित हुआ और श्राप भी पुत्र के पैरों पर गिर कर अभिवादन किया। निल दिन गजा का प्रजा सहित क्षेत्र में हल चलाने का वपोत्सव दिवम था, उस दिन कपिलपुर खूब मजाया गया। प्रजा भी मज धज कर गजा के घर पर पहुंच गई। वहां इकट्ठे होकर सब जन गजा के पोले २ वडे समारोह के साथ क्षत्र की ओर चले । गजा सिद्धार्थ को भी साथ ले गया। क्षेत्र में पहुंचने पर दाईये बच्चे को जवनिका मे धिरे छुप जम्बू वृक्ष के नोचे सुलाकर स्वय वहा उत्मा दम्वने चनो गई । बनवा उठ कर श्रासन जमाये बैठ गया। इस विचित्र तथा प्राश्चर्यक घटना का सब हाल दाईयां ने गजा से कहा ओर उल ने फिा परी वार पुत्र को महारमा समझ कर उस के पैरों पर सिर रख कर प्रगाम किया। इस प्रकार सिद्धार्थ कपिलवस्तु में ही पला हा प्रोर यावना- वस्था में पहुंचने पर उसका देवदहब शीय गज पुत्री गमावग मे विवाह होगया। एक दिन वह उद्यान में क्रीडार्थ जा रहा था कि मार्ग में एक अत्यन्त वृद्ध मनुष्य दीग्व पड़ा। उसे देख कर उस का हृदय बडा उद्विग्न एमा। और वही से घर लोट पाया । इसी प्रकार दृमरे दिन गंगी तथा तीसरे दिन मृत मनुष्य को ले जाते देख कर उस के मन में नाना प्रकार के प्रश्न उठने लगे और इस अनित्य शरीर की चिन्ता भे पड़ा दुका दुःसी हदय फिर उद्यान तक न पहुंच कर गस्ते से ही घर लौट पड़ा। चौथे दिन मार्ग में एक प्रल धदन सन्यासी को जाते देख कर उस का हर बड़ा प्रसन टुआ और प्र.अजित बनने की बड़ी प्रवल इच्छा उत्पन्न हुई। उस दिन यर श्राने उद्यान में चला गया। वहां पहुंचन पर सिद्धार्थ स्त्रियों के मृत्य गीतादि सुनने में खूब मस्त था कि "पित ! ने सन्देगा भेजा कि पुत्र तुम्ह लड़का उत्पन्न हुया है। इसको सुनकर सिद्धार्थ के मुख से क दम गह शब्द निकल की प्राज मेरा वधा होगया और राजमहल की ओर चल पड़ा। रास्ते में बैठी हुई गुबोदन राजा को भागजो किनागोतमो ने सिद्धार्थ को देराकर कहा कि इस महा गुणी के जो माता पिता है श्रारजाइन को माहे वह सामिष को प्रात हो गये ! यह मुर कर गजकुमार बड़ा बुरा हुआ ओर प्र ने गले से अति सुन्दर मा उतार कर उस के पान मेज दो। घर पहुंच कर रात्रि को अपने प्रासाद में लग पर लेट गया और स्त्रिो नृत्यमान करने लगीं। पर उमगज कुमार को अयथा श्री बदल चुकी थी। उस के मन पर फिमी अय उच्च बात ने प्र गुरव जमाया हुआ थों। उस को यह सब नाच गान ग्युशो के स्थान पर दुःस्व देते थे। अतः उस ने उनको तरफ ध्यान नक नहीं दिया और सो गया । त्रियों ने जब देखा कि हम जिस के मनो विनादार्थ नाव गान कर रही हैं वह तो ध्यान भी नहीं देता तो वह भी उसी जगह सो गई। सिद्धार्थ थोड़ी देर पश्चात् विश्राम करके जब उठा तो उन स्त्रियों के अनेक प्रकार के विकार देख कर बड़ा खिन्न हुआ। पहले जमे हए भावों ने भी अपना प्रभाव किया और उसी समय उस ने घर से निकलने की सोची । तब द्वार पर बैठे हुए छन सारथी को बुलाकर कहा कि शीघ्र कन्थक अश्व तय्यार करा ( ) लोट कर पुत्र आते समय हृदय के टुकड़ और नयमों के तारे राह पुत्र को देखने के लिए पनागृह में गया और दलीज़ पर पैर रख कर और गर्दन आगे झुका कर झांकी मार्ग और सोचने लगा कि यदि मैं यशोधरा को वा हटा कर पुत्र को उठाना हूं तो वह जाग पड़ेगी और प्रेमवश होकर मेरे जाने में बड़ी भारी बाधा डालेगी, अतः घुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् पुनः को देगा। छन्न ने आकर कहा स्वामिन् ! अश्व लेआया हूं, चलिये । सिद्धार्थ प्रासाद मे उन और अव को थापो देकर कहो कन्थर ! तू आज इसी रात में मुझे तार दे में फिर बुद्ध होकर सर्व लोकों को दुःखमय संसार सागर से पार उतारूंगा। ऐसा कह कर वह घोड़े पर सवार होगया, और छन्न को पूछ पकड़या उस को साथ लेकर २६ वर्ष की आयु में राज्य वैभव को लात मार मुक्ति को तलाश में घर से निकल पड़ा। अब नगर के महाद्वार से निकल जाने पर सि- द्धार्थ के मन में देवासुर संग्राम होता है। मन में विचार उठता | "सिद्धार्थ ! सालवे दिन तुम्हें राज्य मिलेगा, तुम मत जावो मत जावो” परन्तु उस के उच्च विचारों ने उत्तर दिया "हां ! मैं जानता हूं मुझे सातवें दिन राज्य मिलेगा, हे श्रासुरोभाव ! तुम यहाँ से चले जाबो मुझे राज्य से कुछ प्रयोजन नहीं'' इस प्रकार श्रासुरी विचारो को दबा कर रात्रि को समाप्ति से कुछ काल पहले ही ३० योजन चलने के पश्चात् वह अनोमा नदी के तीर पर पहुंच गया। यहां पहुंच कर छन्न को सब आभूषण तथा घोड़ा देकर लौटा दिया । तीदण तलवार से अपने सुन्दर केश काट दिये और दोनों दुशाले फैक कर तपस्वियों का वेष धारण करने के लिए पाठों परिष्कार ग्रहण किये। पुनः अनुप्रिय नामी आम्रवन में जाकर ७ दिन निवास किया। आठवे दिन ३० योजन चल कर भिक्षा के लिए गजगृह पहुंचा।
(६) भिक्षा लेकर पाण्डव पर्वत की छाया में बैठकर भोजन किया । यह भोजन मिश्रित होने से अच्छा न था, जिस मे खाने पर वमन होना चाहता था परन्त यथाकथञ्चित् रोक लिया । विम्बिसार राजा सिद्धार्थ का श्रागमन सुनकर उस के पास पाया और राजगृह का राज्य लेने को कहा परन्तु उसने तो राज्य को पहले ही तुच्छ समझ कर छोड़ दिया था। तब राजा ने कहा अच्छो ! बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् आप मुझे धर्मोपदेश दें। सिद्धार्थ ने इस की पूर्ति का बचन दिया और राजा लौट गया। तत्पश्चात् ६ वर्ष तक सिद्धार्थ ने अनेक कठिन तप तथा दुष्कर कम फिए परन्तु उन से कुछ लाभ न देख कर वह अनपाल नामी घट वृक्ष की ओर गया । वहां पूर्वाभिमुख आसन जमाय समाधि में बैठ गया। इतने में सुजाता नामी एक स्त्री आई जिस की प्रार्थना पूर्ण होचुकी थी और अब वटवृक्ष के देवता को सुवर्ण पात्र में खीर लाकर देने श्राई थी। उसने समाधिस्थ सिद्धार्थ को ही देवता समझकर उस के आगेखीर का पात्र धर दिया और यह कह कर चली गई कि स्वामिन् जैसे मेरी प्रार्थना पूर्ण हुई है वैसे तुम्हारी भी पूर्ण हो तब सि- द्धार्थ नेरंजरा-नदी पर गया और खीर खाकर सुवर्णपात्र नदी में फैक दिया। और पुनः सालवनों में भोजनानन्तर भमण (दिवाविहार) कर के सायंकाल बुद्धगया के बोधि वृक्ष की ओर जा रहा था कि मार्ग में एक श्रोत्रिय ने उसे तृण दिए । उन्हें लेकर वह बोधि वृक्ष पर पहुंचा और वृक्ष की प्रदक्षिणा कर के पूर्व की ओर वह तृण बिछा दिए जिस से १४ हाथ का श्रासन बनगया। तत्पश्चात् सिद्धार्थ ने प्रतिज्ञा की कि चाहे मेरा मांस, रक्त, अस्थि , धमनी, त्वचो सब सूख जावें परन्तु में वीर्य को नहीं छोडूगा, और पूर्वाभिमुख समाधि लगाएं बैठ गया। मन में देवासुर संग्राम होने खगा जिस में देवी विचारों ने आसुरी भावों पर पूर्णतया विजय प्राप्त की और रात्रि के प्रथम याम में पूर्वनिवास, मध्यम याम में दिव्यलोचन, और अ- ।
( ७ ) न्तिम याम में प्रतीत्यसमुत्पाद तीनों शान उपलब्ध करके दूसरे दिन सूर्योदय के समय बुद्धत्व प्राप्त किया । बस अब से सिद्धार्थ बुद्ध के रूप में परिवतित होता है। तीन सप्ताह बोधि वृक्षके नीचे, एक स. प्ताह रत्नालय में, तथा एक एक सप्ताह क्रमशः अजपाल मुचलिन्द राजायतुन वृक्षों के नीचे समाधि लगाई । इस प्रकार बुद्धगया के आस पास ७ सप्ताह को समाधि लगाने के पश्चात बुद्ध ने नाग लता की दातुन करके स्नान किया और हरड़ औषध खाया । और पुनः वैश्यों से लाए हुए मन्थ, मधु विग्डिक नामी भोज्य पदार्थों से सुधा को तृप्त करके अजपाल वृक्ष के नीचे गया ) और वहां कुच्छ देर तक अधिगत धर्म की गम्भीरता पर विचार किया । उसने जब मनुष्यों की वर्तमान अवस्था पर दृष्टिपात किया तो एक- दम निराशना ही निराशता के घनघोर बादल दिखाई पड़ने लगे। उसने देखा "यह लोक क्लेश,राग,दोष,मोह से भरपूर है,अविद्या की खान है, वह उस धर्म को क्या समझेगा, उस के प्रचार करने से क्या लाभ होगा,, ऐसी निरुत्साह तथा निराशता की अवस्था में प्रात्मा से आवाज़ उठी “गौतम ! लोकनष्ट हो जायगा, लोक विनष्ट हो जावेगा।" (२) धर्म प्रचार श्रय यह धर्म प्रचार के लिये कमर कसता है, और प्रचार करता करता १८ योजन का मार्ग तैकरके मृगदाय में पहुंचा । वहां पंचवर्गियों (५ जन थे जो पहले बुद्ध के साथ ही निर्धाण की तलाश में फिरते थे, परन्तु वह बुद्धत्व प्राप्ति का मार्ग भिन्न मानते थे अतः बुद्ध उन से पृथक हो गया था ) ने इसे से आते देख कर विचारा कि हम इसे नमस्कार नहीं करेंगे परन्तु राजा का पुत्र होने से बैठने के लिये आसन मात्र देदेंगे। बद्ध ने उन का भाव योगवल से जानकर मैत्री भावना से उसे दूर किया और जब वह वहां पहुंचा तो उन्हों ने नमस्कार द्वारा मान्य दृष्टि दर्शाई । उन को अभी यह पता नहीं लगा था कि सिद्धार्थ ने बुद्धत्व (1) प्राप्त कर लिया है, इस लिये वह उसे 'भावुसो' संबोधन से पुका. रने लगे । तब बुद्ध ने कहा 'भावुसो' संवोधन से मत पुकारो 'शास्ता' शब्द का व्यवहार करो। भिक्षुयो ! अब मैं बुद्ध पदवी के योग्य हूं, इस प्रकार अपना बुद्धभाव प्रकाशित करके उनको उपदेश द्वारा अपने धर्म में प्रविष्ट किया। . २. पुनः उरुवेल की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में भद्रवर्गीय ३० राजकुमारों को भिक्ष बनाकर प्रचारार्थ भेज दिया । उरुवेल में पहुंच कर जटिलों को उपदेश द्वारा स्वधर्म में लाकर और अटाये कटवा कर भिक्षु बनाया। ३. पुनः महाराजा बिम्वीसार की प्रतिज्ञा स्मरण करके उन्हीं भिक्षुयों को साथ लेकर राजगृह की ओर चला और यहां लट्ठीवन उभ्यानमें डेरा जमाया । बुद्ध का शुभागमन सुनकर महाराजा बिम्बो- सार प्रधान मंत्री के साथ वहां आया और वुद्ध के पैरों में प्रणाम किया और धर्मोपदेश श्रवण के पश्चात् बौद्धधर्म में प्रविष्ट हुश्रा । राजा के अनुरोध करने पर वुद्ध उसके घर गया और भोजनानन्तर पुनः राजगृह के बेनुवन उद्यान में ठहरा। ४. महाराजा शुद्धोदन ने वेलुवन में स्वपुत्र का श्रागमन सुनकर देखने की अभिलापा से उसे कपिलयुग में लाने के लिये वार है मंत्री एक एक सहसा सेना समेत भेजे । परन्तु वह सब उपदेश सु. नकर भिक्षु के वेप में वहीं र हजाते रहे और राजा को उत्तर तक नहीं भेजा। तब राजा ने महामात्य कालूलायी को बुलाकर कहा कि तुम किसी तरह मेरे नयनों के तारे पुत्र को यहां लेावो । और उसे भी एक सहस्र सेना साथ देकर भेजा । वह भी वहां पहुंच कर प्र. बजिन् होगये। फिर महामात्य ने कपिलवस्तु के मार्ग की खूब प्र. शंसा करते हुए कहा प्रभो ! यह वसन्त का समय वहां जाने का । तब बुद्ध ने पूछा उदायि ! तुम गमन मार्ग का इतना व. गगन क्यों करते हो। जिसपर उदाथि ने उत्तर दिया म्वामिन ! श्रा.
(8) . पके पिता आपके दर्शन करनाचाहते हैं, आप शातियों का संग्रह करें, पुद ने कहा अच्छा ! मैं हाति संग्रह करूंगा। तब २० सहसू भिक्षुयों को साथ लेकर गौतम ने कपिल घस्तु की ओर प्रस्थान किया। यह रास्ता ६० योजन का था । प्रतिदिन एक एक योजन पर ठहरते हुए दो मास के पश्चात् वह राजधानी में पहुंचा। राजधानी राजकीय ठाठ से सजाई हुई थी और गाजे बाजे के साथ बुद्ध का स्वागत किया गया और उसे भिक्षु यो समेत न्यग्रोधागम में ठहराया गया। वहां "यह सिद्धार्थ हमारा पुत्र है, हमारा पौत्र है" इत्यादि वार्तालाप करते हुए बड़ो ने नमस्कार नहीं किया प्रत्युत छोटे २ राजकुमारों को कहा कि तुम सिद्धार्थ का अभिवादन करो हम नहीं करते, और उन्हें पकड़ २ कर उस के आगे करने लगे। बुद्ध ने जब देखा कि जाति मुझे नमस्कार नहीं करना चाहते वह गण्डम्बवृक्ष के नीचे गया और अपने आप को आकाश में उठाया । इस अद्भुत कार्य को देखकर महाराज ने और फिर अन्य सब शाक्य वृद्धों ने बुद्ध को प्रणाम किया। तत्पश्चात् उस ने उपस्थित जनता को उपदेश दिया। दूसरे दिन बुद्ध यथाक्रम गृहस्थियों के गृहों में जाकर भिक्षा माँग रहा था कि यशोधरा ने खिड़की से पति को देखा और राहुल पुत्रको लाकर कहा कि देख यह तेरा पिता जारहा है। और पुनः अति शीघ्र शुद्धोदन के पास जाकर कहा कि देख तेरापुत्र घर २ में भीख मांगता फिर रहा है। यह कह कर वह अपने प्रासाद में चली तब पिता कांपता हुआ बडे वेग से वहां प. हुंचा और कहा "पुत्र ! यह भिक्षा याचन फर्म रे वंश का कर्म नहीं, अतः भिक्षाचरण मत करो मत करो। हे पुत्र ! हमारे वश में पहले किसी ने कभी भिक्षा चरण नहीं किया" परन्तु बुद्ध उत्तर देता है “महाराज !यह वंश प्रापका वंश है, मेरा वंश नो बुद्ध वंश है ऐसा कह कर बद्ध वंश सुनाया और "उत्तिठे नप्पमजेय्य धम्म सुचरितं चरे धम्मचारी सुख सेति अस्मिलोके परम्हि च''इस गाथा कोउपदेश दिया। राजा की प्रार्थना पर बुद्ध २० सहस भिक्षुयों समेत उसके घर भोजनार्थ गया ।भोजनानन्तर उपदेश देचुकने के बाद उसने सोचा कि यदि मैं यशोधरा के घर न गया तो उसे प्रता आई ।
(१०) दुःख होगा। अतः दोनों मुहर श्रावक और सुद्धोदन के साथ वुद्ध उसके घर गया वहां पहुंचने पर राजा ने यशोधरा की तपस्या और पातिव्रत धर्म का सब हाल सुनाया । तब बुद्ध ने भी उस की बड़ी प्रशंसा की। उसी दिन मायादेवी के भगिनी पुत्र नन्दकुमार के विवाह, अभिषेक और गृह प्रवेश यह तीनों मङ्गल कार्य थे प न्तु उस के पहले ही बुद्ध "नन्द" को अपने साथ न्यग्रोधाराम में लेगया और उसे भिक्षु बना दिया। उसो दिन भोजनान्तर माता ने राहुन को कहा "जा बचा पिता से दायभाग मांग' वह भी तोतलो आवाज में पिता तुम्हारी छाया मेरे लिए बड़ी सुखकारी है इत्यादि प्रिय वाणी बोलता हुश्रा और दायभाग दो दायभाग दो के शब्द कहता हुआ विहार तक सीके पोछे २ चला गया वहां पहुंचने पर गौतम ने सोचा कि संसारिक तुछ दाम्भाग का बना है अली दायभाग दो, भोर धन दावाद्य देकर उसे भी प्रबजित् कर लिया। ५. बुद्ध कपिल वस्तु से चल कर मार्ग में सर्वत्र धर्मोपदेश करता हुश्रा पुनः राजगृह में लोट आया और वहां शोतवन उपवन में ठहरा। उन्हीं दिनों मुदत्त नामक महा श्रेष्ठिजिसका दूसरा न म अनाथ पिण्डिक भी था बहुतसे शकटों कर बाणिज्यव्यापार की वस्तुये लादकर श्रावस्ती से राजगृह में पाया और वहां एक मित्र के घर ठहरा । मित्र से बुद्ध का श्रागमन सुनकर वह उसके पास गया और संघ स. मेत श्रावस्ती पधारने की प्रार्थना करके लौट आया तब उसने उनके विश्राम के लिये श्रावस्ती के मार्ग में प्रत्येक योजन पर बहुत सा धन व्यय करके विहार बनवाये और श्रावस्ती पहुंचने पर बुद्ध के योग्य निवास स्थान की तलाश में लगा । जेत राजकुमार को उद्यान देखकर उसे पसन्द किया और जितने स्थानमें एक करोड़ हिरण्य विछगया, (११) उसे उतने दामों में खरीद कर वहां जेतवन विहार बनवाया और दुख के पास वहां पधारने के लिए दूत भेजे । तष गौतम ने संघ स. हित राजगृह से श्रावस्ती की ओर प्रस्थान किया थावस्तो में प्रवेश करते हुए का सुदत्त ने पूर्ण रीति से स्वागत किया। उस स्वागत में सबसे आगे चित्रविचित्र अनेक ध्वजों को लिए बालक जारहे थे। उनके पीछे लिये पुण्यघट उठाये जारही थीं। पुनः श्रेष्ठी की पत्नी अन्य अनेक कुलवती स्त्रियों के साथ पुण्य पात्र उठाये जाती थीं। और सब से पीछे सदत्त अन्य अनेक धेष्ठियों के साथ ससङ्घ बुद्ध के साथ २ जारहा था। इस प्र- कार वह पन में प्रविष्ट हुए । वहां पहुंचकर अनाथ पिण्डिक ने सं- कल्प पढ़ा कि मैं यह जेतवन विहार बुद्ध प्रमुख संघ को दान करता हूं और युद्ध के हाथ पर कमण्डलु से जल छोड़ा। इस प्रकार विहार दान लेने के पश्चात् गौतम ने सब उपस्थित नर नाररियों को धर्मो- पदेश दिया। बुद्ध का यह नियम था कि प्रति वर्ष वर्षा ऋतु के तीन मास किसी एक स्थान में स्थिर रहकर विशेष नियम पालन करते हुए व्यतीत किया करता था। उन दिनों अन्यत्र कहीं भ्रमणार्थ नहीं जाता था। यही व्रत अन्य सब भिनुयों के लिये भी आवश्यक था। जिस का नाम वर्षांवास है। निम्नलिखित स्थानों में क्रमशः प्रति वर्ष बुद्ध ने वर्षावास किया, शेष मास देश देशान्तरों में घूमते हुए धर्म प्रचार करता रहा। श्म वर्ष वाराणसि के मृगदाय बन में जिसका दूसरा नाम ऋषिपत्तन था। २,३,४वर्ष राजगृहके वेलुबन में। ५म वर्ष वेशालिके महावन में । ६-मकल पर्वत । ७-शिलासन ।-सिंश मार पर्वत के भेस कलावन में। 8-कौशाम्बी का सिम्बलीबन । १०-पारलेय्यवन । ११-नाल नामो ब्राह्मण ग्राम । १२-बेग्ज नामी ब्राह्मण ग्राम । १३-चालिय पर्वत। १४---जेतवन । १५---कपिल वस्तु । १६-पालवकपुर।
(१२) १७-राज्यह।१८, १६-चालिय पर्वत । २० राजगृह । इस प्रकार २० वर्ष अस्थिर वर्षावास करके पुनः शेष २५ वर्ष श्रावस्ती के जेतवन में व्यतीत किये । और काशी पर्वत से उदय हुआ २ बुद्ध दिवाकर ४५ वर्ष संसार रूपी आकाश मण्डल को अपनी धर्म प्रभा से देदीप्यमान करता हुआ ० वर्ष की आयु में कुशिनाग समीप मस्त दुमा
*आ३म्
जिनचरितं
नमो तस्स भगवतो सरहतो
सम्मासम्बुद्धस्स
१. कवि की १. उत्तमं उत्तमङ्गेन नमस्सित्वा महेसिनो
प्रार्थना
निबाणमधुदं पादपङ्कजं सजनालिनं
२. महामोहतमं लोके धंसेन्त धम्मभाकर
पातुभूतं महातेज धम्मराजोदयाचले
३. जन्तुचित्तसरे जातं पसादकुमुदं सदा
बोधेन्तं सङ्घचन्दं च सीलोरुकिरगुज्जलं
४. तहिं तहिं सुवित्थिरणं जिनस्स चरितं हित
पवस्वामि समासेन सदानुस्सरणस्थिको
५. पणीतं त सरन्तानं दुल्लभम्पि सिवं पदं
अदुल्लभं भवे भोगपटिलाभम्हि का कथा
६. तस्मा तं भजमानं मे चित्तवुलपदक्कम
सुन्दरं मधुरं सुद्ध सोतुसोतरसायनं
७, सोतहत्थपुठा सम्मा गहेत्वान निरन्तरं
अजगमगमिच्छन्ता साधवो ! परिभुञ्जथ
(२)
कथा
२. सुमेव की ८. कप्पसतसहस्सस्स चतुन चापि मत्थके
असंक्खय्यातमावासं सबदा पुकामिनं
६. नानारतनसम्पन्न नानाजनसमाकुलं
विचित्तापणसंकिरणं तोरणग्घिकभूसितं
१०. युत्त दसभि सोभि देविन्दपुरसभिभं
पुरं अमरसंक्वातं अहोसि रुचिरं वरं
११. तहिं ब्रह्मन्वये जातो सबलोकाभिपूजितो
महादयो महापञो अभिरूपो मनोरमो
१२. सुमेधो नाम नामेन वेदसागरपारग्
कुमारोसि गुरूनं सो अवसाने जिनकुरो
१३. रासिवडकमञ्च न दस्सितं अमितं धनं
अनेकसतगम्भेसु निहितं तं उदिक्खिय
१४. धनसनिचयं कवा अहो मयहं पितादयो
गता मासकमेकम्पि नेवादाय दिवं इति
१५. संवेगमुपयातो व चिन्तेसीति गुणाकरो
धनसारं इमं गयह गन्तुयुत्तन्ति मे पण
१६. रहोगतो निसीदित्वा सुन्दरे निजमन्दिरे
देहे दोसे उदिक्वन्तो ओवदन्तोपि अत्तनो
१७. भेदनं तनुनो दुवं दुक्खो तस्सोदयोपि च
जातिधम्मो जराधम्मो व्याधिधम्मो अहं इति
१८. एवमादीभि देहस्मिं दिस्वा दोसे अनेकधा
पुरे भेरी चरापन्या आरोचेत्वान राजिनो
१६, गेरीनादसुगन्धेन याचकालिगमागते
( ३ )
दान कञ्जमवाघन सत्ता पीयीनता
२०. दानग्गहिमविदूनं निपातेनापि धंसनं
अयानं तं विलोकेरवा रतनम्बुजकाननं
२१. रुदतो जातिमंघस्म जलितानलकानना
गजिन्दो विय गेहम्हा निस्वमित्वा मनोरमा
३. हिमालय २२. महन्त सो महावीरो उपगन्छि हिमालयं
का वर्णन
हरिचन्दनकप्पूगगरुगन्धेहि वासिन'
२३. मुफुल्लचम्पकासोकपाटलितिलकेहि च
पूगपुन्नागनागादि पादपेहि च मण्डिनं
२४. सीहव्यग्घतरच्छेहि इभदीपिकपीभि च
तुरङ्गमादि नेकेहि मिगेहि च समाकुलं
२५. सालिका रविहंसेहि हंस कौश्च सुवेहिच
कपोत करवीकादि सकुन्नेहि च कूजितम्
२६. यक्व रक्वस गन्धव देव दानवकेहि च
सिद्ध विजाधरादीहि भूतेहि च निसेविनं
२७. मनोसीलिन्दनीलोरुचारुपब्बत पन्तिभि
सञ्झुढेमादिने केहि भूधरेहि च भासुर
२८. सुवगण मणि सोपान नेक तित्थसरेहि च
सोभिनं तत्थ कीरन्त नेक देवनाहि च
२६. सीत सीकर सञ्छन्नमालकेहि च मण्डितं
किएणरोरग रङ्गोहि रम्मेहि च विराजितं
३०. सिखण्डिसएड नचोहि लतानं मसडपेहि व
भेत वालुकसञ्छन्नमालकेहि च मण्डितं
( ४ )
३१. सुवएणमणिमुत्तादि अनेकरतनाकर
इच्छन्तानं जनालीनं पुअकिञ्जक्खमालयं
३२. तमझोगह सो धीरो सहस्सक्खन मापिले
दिखा इसिपरिक्वारे पाणसालवरे तहिं
३३. इषिवेसं गहेत्वान विहरन्तो समाहितो
सत्ताहब्भन्तरे पश्चअभिल हविधापि च
३४. उप्पादेवा समापत्ति सुखेनेव तपोधनो
नभसा दिवसेकस्मिं गच्छन्तो जनतं इसि
३५. सोधेन्त मञ्जसं दिखा श्रोतरित्वा नभातहिं
इति तं जनतं पुच्छि"कस्मा सोधेथ अञ्जसंग?
३६. "सुमेध! त्वं न जानासि? दीपङ्करतथागतो
सम्बोधि मुत्तमं पत्वा धम्मचकमनुत्तरं
३७. पवत्तेवान लोकस्स करोन्तो धम्मसङ्गहं
रम्मरम्मपुरंपत्वा वसतीह सुदस्सने
३८. भिक्खुसतसहस्सेहि चतूहि विमलेहि तं
निमन्तयिम्ह दानेन मयं लोकेकनायकं
३६. तस्स आगमनत्थाय मग्गं सोधेम चक्खु म !"
इति सोतस्स सोतस्स सुखं दन्तो जनोऽब्रवी
४०. बुद्धोतिवचनं सुत्वा पीतियोदग्गमानसो
सकभावेन सण्ठातुं नेव सक्खि गुणाकरो
४१. तेनारद्धञ्जसा धीरो याचित्वान पदेसकं
लभित्वा विसमं ठानं समंकातं समारभि
( ५ )
४२. नालङ्कतयेव तहिं पदेम
लोकनाथा सनरामरहि
सम्पूजितो लोकहितो महसि
वसीहि सद्धिं पटिपति मग्गं
४३. छब्बएणरंसिजालेहि पजलन्तं तथागतं
आगच्छन्तं तहिं दिखा मोदमानो विचि तमि
४४. यन्नूनिमस्स धीरस्म मेतुं कत्वान कद्दमे
सकत्तानं निपजेय्यं ससङ्घस्स महेसिनो
४५. दीघात मलं तं मे हिताय च मुखाय च
इच्चेवं चिन्तयित्वान निपन्नो सो जिनकुरो
४६. पबोधेवान दिस्यान चारुलोचनपङ्कजे
पुन पेवं विचिन्तेसि निपन्नो धितिमा तहिं
४७. इच्छेय्यं चेहमज्जव हन्त्वा नन्तरण भवा
सङ्घस्स नवको भूत्वा पविसेय्यं पुरं वरं
४८. किमञातक वेसेन क्लेसनिब्बापणेन मे
अयं बुद्धीवहं बुद्धो भूत्वा लोके अनुत्तरो
जनतं धम्मनावाय तारेत्वान भवएणवा
निब्बाणपुर मानेत्वा सेग्यं मे परिनिबुतं
५०. इच्वं चिन्तयित्वाम निपन्नो कद्दमे तहिं
सुवरण कदलीक्वन्धसन्निभो सो तिसोभति
५१. छब्बएणरासीहि विराजमानं
दिखो मनुज सुगतत्तभावं
सञ्जातपीतिहि उदग्गचितो
सम्बोधिया छन्द मकासीधीरो
४६.
( ६ )
आगन्त्वान तहिं ठानं इसिं पङ्क निपन्न
लोकस्स सेतुभूतोपि सेतुभूतं तमत्तमो
५३. दिस्वा उस्सीसके तस्स ठत्वा लोकेकसेतुनो
लोककलोचनो धीरो दीपङ्कर तथागतो
५४. गोतमो नाम नामेन सम्बुद्धोयं अनागते
भविस्सतीति व्याकासी सावके च पुरादिके
५५. इदं वखान कत्वान ससङ्घो तं पदविणं
पूजेसि अहमुहीहि कुसुमेहि गुणप्पियो
५६. इति कातून पायासि ससङ्खो लोकनायको
रम्मकं नाम नगरं रम्मारामालयालयं
५७. जिनस्स वचनं मुत्वा उढहित्वान पङ्कतो
मुदितो देवसङ्केहि कुसुमादी हि पूजिजो
४. सुमेधका ५८, पल्लङ्क माभुजित्वान निसीदि कुसुमासने
बुद्धत्वके महातपो महापञ्त्रो सुमेधो दमितिन्दियो
लिए यत्न ५६. देवा दससहस्सेसु चकबासु मोदिता
अभित्थविसु तं धीरं निसिन कुसुमासने
६०. निसनो उपधारेसि धम्मे बुद्धकरे तदा
किमुद्धं वा अधोवापि दिसासु विदिसासुच
६१. इच्चेवं विचिन तो सो सकलं धम्मधातुकं
अद्दक्खि सकसन्ताने पठमं दानपारमी
६२. एवमेवं गवेसन्तो उत्तरि पारमी विदु
सब्बा पारमियो दिखा अत्तनो आनचमवुना
(७)
६३. संसारे संसान्तो सोबहुं दुक्वं तितिक्खिय
गवेसन्तो ममं सतो पूरेत्वा दानपारमी
६४. सत्तानं कप्परूपवोव चिन्तामणिव कामदो
इच्छितिच्छित मन्त्रादि ददन्तो ददतं वरो
६५. तारकाहि बहुं कत्वा नभे चालविलोचने
उप्पाटेत्वा दर्द धीरो याचकानं पमोदितो
६६. पहिया पंसुतो चापि समुद्दोदकतोधिक
ददं सरीरमंसं च लोहितम्पि च अक्तनो
६७. मोलिना लङ्कते सीसे धिकं करवा सिनेरुतो
कम्पयित्वा महिं देन्तो मुते चापि सकङ्गना
१८. सीलनेश्वम्मपआदी पूरेत्वा सबपारमी
वसन्तरत्तभावे वम्पत्वा तम्हा चुतोपण
६६. उप्पज्जित्वा मुरावासे सुन्दरे तुसिते पुरे
वसन्तो सुचिरं कालं भूत्वाना नन्तसम्पदं
५. सिद्भाय ७०. कतञ्जलीहि देवेहि याचितो दिपदुत्तमो
का माता 'सम्बोधाय महावीर! कालो तुम्हन्ति आदिना
में आना ७१. विलोकेवान कालादं अत्वाकालन्ति बोधिया
पटिनं देवसङ्घस्स दत्वा नन्दनकाननं
७२. गन्त्वान देवसझेहि सुगति गच्छि तो चुतो
अभित्थुतो महापञा चवित्वान ततो इध
१३. सुसज्जितगोरु तुरङ्गमाकुन्ने
निचित्तनानापागायसम्पदे
(८)
मनोरमुत्तु जगजिन्दराजित
विभूसिते तोरणकेतुरासिहि
७४. अलङ्कतट्टाल विसालमालये
मुगोपुरे सुन्दर सुन्दरालये
मुदस्सनीये कपिलव्हयेपुरे
पुरिन्ददस्सापि पुरस्स हासके
७५. भूपालमोलिरतनालि निसेवितद्धि
पङ्करुहं विमलनेक गुणाधिवासं
अोकाकरांजकुलकेतुम नाथनाथं
सद्धोदनं नरपनि पवरं पटिच्च
मो
सज्झदाम धवलामल दस्सनीय
सोएडाय संगहित सेतवरारविन्द
चन्दावदात वरवारणराजवरणं
सन्दस्सयित्व सुपिनेन विसालपओ
विम्बाधराय विकचूजललोचनाय
देविन्द चाप रतिबड्डनभूलताय
सम्पुगण सोम्मविमलिन्दु वराननाय
सोवएणहंसयुगचारु पयोधराय
पादारविन्दकर पल्लवसुन्दराय
सोवरण वरण तनुवराण विराजिताय
मीलादिनेक गुणभूसित भूसिताय
मायाय राजवनितायुपगन्छि कुच्छि
७६. पटिसन्धिक्वणे तस्स जातानेक विधभुता
अथायं गहितारमवो नरोहि अमरेहि च
का जन्म
(8)
८०. मनुअरत्तम्बुजकरिणकाय
मासीनसिङ्गी पटिमा व रम्मो
सुवरणवण्णो दिपदानमिन्दो
पल्लङ्गमा भुञ्जिय मातुगम्भे
८१. मणिम्हि विप्पसन्नम्हि रत्तमुत्तमिवावुतं
मातुनित्तम्बुजं धीरो बोधयन्तो पदिस्सति
१. सिद्धार्थ ८२. दसमासावसानम्हि देवी रञो कथेसिदं
मय्हं आतिघरं देव ! गन्तुमिच्छामहं"इति
८३. रमाथ समनुजाता गच्छन्ती कुलमत्तनो
महता परिहारेन दिबञ्जस समञ्जसे
८४. सुरभिकुसुम सण्डालङ्कतस्सालसण्ड
समद भमरमाला गीयमानग्गनाद
नयन विहगसङ्घ अव्हयन्तं व दिस्वा
विपुलरतिनिवासं लुम्बिनी काननने
८५. विपुलतररतिं सा तम्हि कानून रम्मे
अमर युवतीलीला चारुलीलाभिरामा
विकसितवरसालस्सो पगन्त्वान मूलं
सय मतिनमितेक सालसाखं अगणिह
८६. तस्मि खणे कम्मजमालुत स्सा
चलिंसु सानीहि परिक्तिपित्वा
देवीं जनो त अभिपालयन्तो
तम्हा पटिक्कम्म सुसण्ठिता थ
सा चारुहेमवलयादि विभूसितेन
अञ्चन्त तम्ब नखरंसि ममुजलेन
८७.
८८.
८६.
(१०)
तूलातिकोमल सुरत्त करेन साखं
पोलम्ब तत्थ मजनेसि ठिता व धी'
सोवरण वगण तनुवरण विराजमानं
नेत्ताभिराम मतुलं अतुलाय गम्भा
सम्मा पसारितकरति युगाभिरामं
पङ्करुहा कणक हंस मिवोत्तरन्तं
ब्रह्मा मनग्घरति वडन हेमजाल
मादाय तेन उपगम्म पटिग्गहेत्वा
सम्मोद देवि ! अय मग्गतरो सुतो ते
जातोति ताय पुरतो कथयिंसु ठत्वा
जायन्ति सेसमनुजा मल मक्खितङ्गा
जातो पनेस पवरो दिपदानमिन्दो
प्रच्चन्त सएह मलकासिक वत्थकम्हि
निक्खि त नग्यतरचारु मणीव सुद्धो
११. एवम्पि सन्ते नभतो पगन्त्वा
द्वे वारिधारा सुभगस्स देहे
जनेन्ती देहेपि उतुं मनुञ्ज
गाहापयुं मङ्गल किच्चताय
१२. तेसं कग रतिकरा अजिनस्स वेणो
मादाय तेन उपगम्म पटिग्गहेसुं
देवा दुकूलमय चुम्बटकेन वीरं
तेसं करा नरवरा नरसीहराज
६३. तेसंकरा रतिकरो विमलो व चन्दो
चक्कड़ितोरु चरणेहि महीतलस्मि
--
(११)
सम्मा पतिहिय पुरथिमकं दिसं सो
अोलोकयित्व कमलायतलोचनेहि
६४. एकङ्गना नेकसतानि चक्क
वालान हेसु सनरामराव
धीरं सुगन्ध प्पभुतीहि तेसु
सम्पूजयन्ता इदमब्रवींसु
१५. नत्थे त्थ तुम्हे हि समो सुधीस!
एको पुमा पग्गतरो कुतो ति
एवं दिसा लोकिय लोकनाथो
न पेक्वमानो मदिसम्पि एक
६६. उत्तराभिमुखो सत्तपदं गन्त्वा कथेसिदं
अग्गोहमस्मि लोकस्स जेहो सेहोति आदिक
६७. अनन्यसाधारणनाद मुत्तमं
सुरा सुर ब्रह्म नरिन्द पूजितं
नरिन्द मादाय गतो महाजनो
सुसज्जितं तं कपिलव्हयं पुरं
७.जन्मकाल ९८. भारातिभार नगपादप मेरुराज
अद्भुत सबम्पि सागरजलं वहितं समत्थं
घटनायें
जातक्खणेपि गुणभारम सद्यमाना
सङ्कम्पयीव पठवी पवरस्स तस्स
६६. रमिंसु सोणा हरिणेहि सद्धिं
काका उलूकेहि मुदग्गदग्गा
सुवरणराजूहि महोरगा च
मञ्जारसङ्घापि च उन्दुरेहि
में
( १२ ) १००. मिगा मिगिन्देहि समागमिसु पुत्तेहि मातापितरो यथेव नावा विदेसम्पि गता सदेसं गताव कण्डं सरभङ्गसत्थु १०१. नानाविरागुप्पलपङ्कजेहि विभूसितो सन्त तरङ्गमालो महरणको आसि तर्हि जलम्पि अञ्चन्त सातत्त मुपगमासि ०२. मुफुल्ल ओलम्बक पङ्कजेहि समाकुलचं गानं अगञ्छि जहिंमु पक्रखी गमनं नभम्हि ठिता व सिन्धूपि असन्दमाना १०३. अकाल मेघ प्पियसङ्गमेन महीवधू सोम्मतमा अहोसि मरूहि वस्सापित नेकपुप्फ- विभूसितेना तिविभूसिता व १०४, सुफुल्लमाला भरणाभिरामा लतङ्गना लिङ्गित पादपिन्दा सुगन्ध किञ्जक्ख वरम्बरेहि दिसङ्गनायो अतिसोभबिसु १०५. सुगन्धधूपेहि नभं असेसं पवासितं रम्मतरं अहोसि सुगसुरिन्दा छन वेसधारी सङ्गीतियुत्ता विचरिंसु सत्र
(१३)
१०६ पियंवदा सबजना अहेसुं
दिसा असेसा पिच विपसना
गजा तिगजिसु नदिसु सीहा
हेसारवो चासि तुरङ्गमानं
१०७. मनुअगन्धो मुदुसीतलानिलो
सुखप्पदं वायि असेसजन्तुनो
अनेकरोगा दुपपीटितगिनी
ततो पमुत्ता सुखिनो सियु जना
१०८, विजम्भमानामित वालवीजनि
प्पभाभिरामं भुवनं अहोसि
महीं हि भेत्वा चुदकानि सन्दयु
गर्मिसु खुज्जा उजुगत्ततं जना
१०६.
अन्धा पङ्गु लनचानि लीलोपेनानि पेक्वयु
सुणंसु वधिरा मूगगीतियो पि मनोरमा
११०. सीतलत्त मुपा गछि अवीचरिंग पि तावदे
मोदिमु जलजातस्मि जन्तवो पहसिसु च
१११. खुप्पिपासाभिभूतानं पेतानं आसि भोजनं
लोकन्तरे पि आलोको अन्धकारनिरन्तरे
११२. अतिरेकतरा तारावळिचन्ददिवाकरा
विरोचिंसु नभे भूमिगतानि रतनानि च
११३. महीतलादयो भेत्वा निक्खम्म उपरूपरि
विचित्तपञ्चवण्णा सुसुफुल्लविपुलम्बुजा
११४. दुन्दुभादी चलङ्कारा अवादित अघट्टिता
अञ्चन्तमधुरं नादं पमुग्निंसु महीनले
(१४ )
११५. बद्धा सङ्खलिकादीभि मुश्चिम मनुजा ततो
भुवने भवन द्वार कवाटो विवटा सयं
११६ चेलुक्ख पादयो चापि पवशे ता पमोदिता
कीसुि देवसका ते तावर्तिसालये तदा
११७. पुरे कपिलवस्थुम्हि जातो सुद्धोदनत्रनो
निसज वोधिमण्डे ति श्रयं बुद्धो भविस्सति
११८. इद्धिमन्तो महापञो कालदेवलतापसो
सुद्धोदन नरिन्दस्स धीमतो सो कुलूपगो
११६. भोजनस्सावसानम्हि तावतिसालयं गतो
गन्ता दिवाविहाराय निसनो भुवने तहिं
१२०. छनवेसं गहेत्वान कीटन्ते ते उदिक्खिय
सन्तोस कारणं पुच्छि तेसं तेपि तमब्रवु
१२१. सुत्वा तं तत्ततो तम्हा पीतियोदग्गमानसो
तावदेवोप गत्वान सुद्धोदननिवेसनं
१२२. पविसित्वा सुपअत्तो निसिनो आसने इसि
जातो किर महाराज पुत्तो ते नुत्तरो मुधि
१२३. दह मिच्छामहं तं ति आह राजा अलङ्कतं
आनापेत्वा कुमारं तं वन्दापेतु मुपागमी
१२४. कुमारभूतस्सपि तावदेव
गुणानुभावेन मनोरयानि
पादारविन्दा परिवत्तिय ग्गा
पतिहिता मुद्धनि तापसस्स
१२५. तेनराभावेन नरुतमस्स
न वन्दितब्बो तिभवे पि कोचि
(१५)
तिलोकनाथस्स सचे हि सीसं
तपरिसनो पादतले ठपेय्य
१२६. फालेय्य मुद्धा खलु तापसस्स
पगयह सो अञ्जलि मुरामस्स
अहासि धीरस्स गुणएणवस्स
नासेतु मत्तान मयुक्तक न्ति
१२७. दिस्वान तं अच्छरियं नरिन्दा
देवातिदेवस्स सकत्रजस्स
पादारविन्दा नभिवन्दि तुहो
विचित्तचकङ्कितकोमलानि
१२८ यदा सि रओ पुथुवप्पमङ्गलं
तदा पुरं देवपुरं व सज्जितं
विभूसिता ता जनता मनारमा
समागता तस्स निकेत मुत्तमं
१२६. विभूसितङ्गो जनताहि ताहि सा
पुरक्खतो भूसनभूसितत्रज
तमा दयित्वा तुलवपमङ्गलं
मुरिन्दलीलाय गतो नरिस्सरो
१३०. नानाविरागुज्जल चारु सानि
परिक्खिते कम्हि च जम्बुमूले
सयापयित्वा बहि मङ्गलं तं
उदिक्खितु धातिगणा गर्मिसु
१३१. सुवएणतारादि विराजमान
वितान जोतुज्जल जम्बुमूले
(१६)
निसज धीरो सयने मनुन्थे
झानं समापज्जि कतारकासो
१३२. सुवरणविम्बं विय तं निसिन्न
छायं च तस्सा ठितमेव दिस्वा
तमब्ररी धातिजनो पगन्त्वा
पुस्तस्स ते अब्भुत मीदिसन्ति
१३३. विसुद्धचन्दानन भासुरस्स
मुत्वान तं पङ्कजलोचनस्स
सवन्दनं मे दुतियन्ति वत्व
पुत्तस्सपादे सिरसा भिवन्दि
१३४. तदानि पिलोकम्हि जाता नेकविधभुता
दस्सिता मे समासेन गन्थवित्थारभीरुना
(-कपिल १३५. यस्मिं विचित्तमणि मण्डित मन्दिरानं
वस्तु का
नानावितान सयनासन मण्डितानं
वर्णन
निस्तेणि सेणि पुथुभूमिक भूसितान
तिम उतून मनुरूप मलङ्कतान
१३६. सिनेसु रंसिनिकरा मुरमन्दिरानं
सिंङ्गसु रंसि मपहासकरा व निचं
आदिचरसि विय पङ्कजकाननानि
लोकाननम्बुजवनानि विकासयन्ति
१३७. नानामणि विचित्ताहि भित्तिहि वनिता सदा
विनापि दप्पणच्छायं पसाधेन्ति सकं तनु
१३८. केलास नग सङ्कासं विलोचन रसायनं
सुधालङ्कत पाकार वलयं यत्थ दिस्सते
( १७ )
१३६. इन्द नीलोरु वलयं नानारतनभूसितं
दिस्सते व सदा यस्मि परिखा नेकपमा
९-गौतम १४०. पत्वान बुद्धि विपुले मनुध्ये
का घर से
भुत्वान कामे च तहिं वसतो
निकलना गच्छं तिलो केक विलोचनो सो
उय्यान कीयाय महापथम्हि
१४१. कमेन जिएणं व्यधितं मतं च
दिस्वान रूपं तिभवे विरत्तो
मनोरमं पञ्बुजितं च रूपं
कत्वा रतिं तम्हि चतुत्थवारे
१४२. मुफुल्लनानातरुसण्डमण्डितं
सिखण्डिसण्डादि दिपकूजितं
सुदस्सनीयं विय नादनं वनं
मनोरमुय्यान मगा महायसो
१४३. सुरगना सुन्दरसुन्दरीनं
मनोरमे वादितनञ्चगीते
सुरिन्दलीलाय तहिं नरिन्दो
रमित्व कालं दिपदानमिन्दो
१४४. श्राभूजित्वान पल्लङ्क निसिन्नो रुचिरासने
कारापेतु मचिन्तेसि देहभूसन मत्तनो
१४५. तस्स चित्तं विदित्वान विस्सकम्मस्सि दं ब्रवि
अलरोहि सिद्धस्य मिति देवानमिस्सगे
१४६. तेनानत्तो पगन्त्वान विस्सकम्मो यसस्सिनो
( १८)
दसदुस्स सहस्सेहि सीस वेठसि सोभन
१४७. तनु मनुअम्पि अकासि सोभनं
अनम्ब साधारणलक्खणुजलं
विचित्त नानुत्तम भूसनेहि सो
मुगन्धिगन्धु प्पलचन्दनादिना
१४८. विभूसितो तेन विभूसितङ्गिना
तहिं निसिनो विमले सिलातले
सुरङ्गना सनिभ मुन्दरीहि सो
पुरक्वनो देवपती व सोभति
१४६. सुद्धोदन नरिन्देन पेसितं सासनुत्तम
पुत्तो ते पुत्त !जातो ति सुस्वान दिपदुत्तमो
१५०, मम ज बन्धनं जातं इति वत्वान तावदे
समिद्ध सबकामेहि अगमा सुन्दरं पुरं
१५१. ठिता उपरिपासादे किसागोतमि तं तदा
राजेन्तं सतरंसिं व राज दिस्वा कथेसि दं
१५२. येसं सूनु अयं धीरो या च जाया इमस्स तु
ते सव्वे निघुता नून सदा नूनगुणस्स
२५३. इती दिसं गिरं सुत्वा मनुवं ताय भासितं
सञ्जातपीतिया पीनो गच्छमानो सकालयं
१५४. सीतलं विमलं हारिं हारं तं रतिबड्डनं
पेसेत्वा सन्तिकं तरसा प्रोमुश्चित्वान कराठतो
१५५. पासाद मभिरूहित्वा वेजयन्तं व सुन्दरं
निजि देवराजा व सयने सो महारहे
वे
( १६ )
१५६. मुन्दरी तं पुरक्खत्वा सुरसुन्दरिसत्रिभा
पयोजयिंसु नञ्चानि हितानि विविधानि च
१५७. पबन्जाभिरतो धीरो पञ्चकामे निरालयो
तोदिसे नचगीतेपिन रमित्वा मनोरमे
५८. निपनो विस्समित्वान ईसक सयने तहिं
पल्लङ्क माभुजित्वान महावीरो महीपनि
१५६. निसिनो व नेकप्पकारं विकारं
पदिखान निदूपगानं वधूनं
गमिस्सामि दानी ति उबिग्गचिचो
भवे द्वारमूलं पगन्तान रम्म
१६०. ठपेवान सीसं सुभुम्मारकस्मिं
सुरिणस्सामि धीरस्स सद्दति नस्मि
निपनं सुदन्तं पसादा वहन्तं
सहायं अमचं महापुनमन्तं
१६१. अच्छन्नसक्ने छन्नं आमन्तेत्वा कथेसि दं
आनहि इति कप्पेत्वा कन्थकं नाम सिन्धवं
१६२. सो छनो पतिगएिहत्वातं गिरं तेन भासितं
ततोगत्वान कप्पत्वा सीघ मानेसि सिन्धवं
१६३. अभिनिक्खमणं तस्स अन्वा वस्तुरङ्गमो
तेन सज्जियमानो सो हेसारव मुदीरयि
१६४. पत्थरिखान गच्छन्त स तं सकलं पुरं
सव्व सुरगणा तस्मिं सोतुं नादंसु कस्सचि
१६५. अथ सो सज्जनानन्दो उत्तम पुन मननो
(२०)
पस्सित्वा पठमं गन्त्वा पच्छा बुद्धो भवाम है
१६६. चिन्तयित्वान एवम्पिगन्त्वा जायानिवेमनं
उपेत्या पाद दुम्मार गीवं अन्तो पवेसिय
१६७. कुसुमेहि समाकिरण देविन्दसयनूपमे
निपन्नं मातुया सद्धि सयने सक मत्रज
१६८. बिलोकस्वान चि.तेसि इति लोकेकनायको
सचाहं देविया बाहु मपनत्वा मम जं
१६६. गणिहस्साम न्तरायम्पि करेग्य गमनस्स में
पवुझि वा मह तेन पमने सा यसोधरा
१७०. बुद्धो भुत्वा पुनागम्म पस्सिस्सामी ति अत्रनं
नराधिपो तदा तम्हा पासादतलतो रि
१७१. पेसलानन करविपङ्कजा
हामफेन अमुवाचिभासुरा
नेतनीलकमला यसोधरा
कोमुदी व नयनालिपस्थिता
१७२. समत्थो अस्स को तस्याजहितु देसम्पदं
वि. दमानो विना धीरं ठित पारमिमुद्धनि
१७३. अस्सासामि मया नीतो कालं जान रथेसम
इति अववि इन्नोसो भूपालस्स यसस्सिनो
१७४. महीपति तदा सुत्वा छन्न नो दीरितं गिरं
पासादा प्रोतरित्वान गन्त्वाकाथकसस्तिकं
१५५. तस्मिदं वचन भासि सब सत्तहिते रतो
कन्थक ज्जेकरति म तारेहि सनरामरं
१७६. लोक मुकारयिरसामि बुद्धो भुत्वा अनुरो
( २ )
भवसागरतो घोरजरादि मकग करा
१७७. इति वा वा तमार यह सिन्धवं सङ्घ सन्निभं
गाहापेत्वान छन्नन सुदाहं तस्स वालधि
१७८. पत्वान सो महद्वार समीपं समचिन्तयि
भवेय्य विवटं द्वारं येन केनचि नो सचे
१७६. बालधि गहिकने व सद्धि छन्नं न कन्थक
निप्पीळयित्वा सत्थीहि इम मच्च ग्गतं सुभं
उल्लखित्वान पाकारं गच्छामी नि महब्बलो
१८०. तथा थामवलूपेतो छनोपि तुरगुतमा
विसुविसु विचिन्त सुं पाकारं समतिकम
१८१. तस्स चितं विदित्वान मांदिता गमने सुभे
विम्सुि नदा द्वारं द्वारे धिग्गहितासुग
१० -मार १८२. तं सिद्धत्थ मसिद्धत्थं करिस्सामी ति चिन्तिय
का पलोभन
आगन्त्वा तस्सि दंभासि अन्तरिखे ठितन्तको
१८३. मा निसवम महावीर ! इती ने सक्तमे दिने
दिवतु चक्करतनं श्रद्धा पातुभविस्सनि
१८५. इच्च वं वुच्चमानो सो अन्तकंन महायमो
कोसि त्वमी तितं भासि मारो च तान मादिसि
१८५. मार : जानामहं मय्हं दिलचक्कस्स सम्भव
गच्छ त्वमिध मा तिह नहिरजन मस्थिको
१८६. सदससहस्सम्पि लोकधातु महं पन
उन्नादेत्वा भविस्सामि बुद्धो लोकेकनायको
१८७. एवं वुत्ते महासत्त अत्तनो गिर मुररि
( २२ )
गाहापेतु मसक्कोन्तो नत्थेव न्तरधायि सो
१८८. पापिमस्स इदं वत्वा चकवत्ति सिरिम्पि च
पहाय खेलपिण्डं व पञ्च ससमये वसि
१८६. गच्छन्त मभिपूजेतुं समागन्त्वान तावदे
रतनुक्का सहस्सानि धारयन्ता मरू तहिं
१६०. पच्छतो पुरतो तस्स उभो पस्सेसु गच्छरे
तथेव अभिपूजेन्ता सुपएणा च महोरगा
१६१. सुविपुल सुरसेना चारुलीला भिरामा
कुसुमसलिलधारा वस्सयाता नभम्हा
इह हि दससहस्सी चकनाळा गना ना
मुखुमतनुतमे तो दग्गुदग्गा चरन्ति
१६२. यस्मि सुगन्ध वरपप्फ सुधूपचुगण
हेमद्धज प्पभुति भासुर चारुमग्गे
गच्छ महाजन वरङ्ग तुरङ्गराजा
गन्तुन सक्वि जबतो कुसुमादिलग्गा
१६३. इत्थं तम्हि पथे रम्मे वत्तमाने महामहे
गच्छन्तो रत्तिसेसेन तिसयोजन मञ्जसे
१६४. पत्वा नोमा नदीतीरं पिहितो तुरगस्स सो
प्रोतरित्वान विमले सीतले सिकतातले
१६५. विस्समित्वा इदं वत्वा गच्छाही तिसकं पुरं
आभरणानि पादाय उन्न म तुरगम्पि च
११-भिक्षुवेप १६६. ठितो तस्मि महावीरो अञ्चन्त निसितासिना
सुगन्धवासितं मोळि छेत्वानु विखपि अम्बरे
१६७. चारुहेम सुसुग्गेन केसधातु नभुगतं
धारण
( २३)
पूजनत्यं सहस्सक्खो सिरसा सम्पटिच्छिय
१६८, विलोचनानन्दकरिन्द नील
मवेहि चूरामणिचेतियं सो
पतिद्वपेसा मल तावतिसे
उधतो योजनमत्त मग्ग
१६६. उत्तमट्ट परिक्वारे धारेत्वा ब्रह्मणा भतं
अम्बरे व पविज्झित्थ वरं दुस्स युगम्पि च
२००. तमादाय महाब्रह्मा ब्रह्मलोके मनोरम
द्वादस योजनबधं दुस्सथूपं अकारयि
१२-राज २०१. नामेनानुपियं नाम गन्त्वा अम्बवनं ताहें
सत्ताहं वीतिनामेत्वा पञ्चज्जासुखतो ततो
२०२. गन्त्वाने कदिनेने व तिसयोजन मञ्जसं
पत्वा राजगह धीरो पिण्डाय चरि सुब्बतो
२०३. इन्दनीलसिलाया पिकता पाकारगोपुरा
हेमाचला व दिस्सन्ति तस्सा भाहि तहिं तदा
२०४. कोयं सक्को नु खो ब्रह्मा मारो नागो तिश्रादिना
भीय्यो कोतूहल प्पत्तो पदिखातं महाजनो
२०५. पविसित्वा गहेतून भत्तं यापन मत्तकं
युगम व पेक्वन्तो गच्छन्तो राजवीथियं
२०६. मथितं मेरुमन्थेन समुद्दव महाजनं
तम्हा सोपाकुतीकलाग वो पण्डवपब्बत
गृह जाना
( २४ )
तप करना
२०७. ततो तस्सेव छायाय भूमिभागे मनोरमे
निसिनो मिस्सक भत्त' परिभुञ्जितु मारभि
२०८, पञ्चवेक्षण मन्तेन अन्तसप्पं निवारिय
देहवम्मिकतो धीगे निक्वमन्तं महबलो
२०६. भुलान विम्बिसारेन नरिन्दन नरासभो
निमन्तितो पिरजन उपगवान नेकपा
२१०. पटिक्विपिय तं रज अथ तेना भियाचितो
धम्म देसेहि पयह न्ति बुद्धो भुत्वा अनुचरो
१३ -काठन २११. दत्वा पटिश्च मनुजाधिपस्स
धीरो पगत्वान पधानभूमि
अनज साधारणदुक्करानि
कत्वा ततो किञ्चि अपस्समानो
२१२. ओळारिक नपानानि भुजिया देहसम्पदं
पत्वा जपाल निग्रोध मूल पत्तो मुरो विय
२१३. पुरहाभिमुखो भुत्वा निसिन्नो सिजुति धरो
देहवरण हि निग्रोधो हेमवरणोसि तस्स सो
२१४. समिद्ध पत्थना एका सुजाता नाम सुन्दरी
हेमपाति सपायासं सीसेना दाय प्रोनता
२१५. तस्मि अधिग्गहीतस्स रुक्खदेवस्स तावदे
बलिं दम्मी ति गन्त्वान दिखातं दिपदुत्तमं
२१६. देवो ति सआय उदग्गचिना
पायास पाति पवर त्स दत्वा
आसिंसना इज्झि यथा हि मयह
( २५ )
तुम्हम्पि सा सामि समिज्झतू ति
२१७. इच्च वे वचनं वत्वा गता तम्हा वरङ्गना
अथ पायासपातिं तं गहेत्वा मुनिपुङ्गवो
२१८. गन्त्वा नेरज्जरा तीरं भुत्वा तं वरभोजनं
पटिसोतं पविस्सज्जी तस्सा पाति मनोरम
१४. बोधि २१६. जन्तालि पालि मन नेत्त विलुम्पमानं
वृक्ष को जाना
सम्फुल्ल सालवन राजि विराजमानं
देविन्दनन्दनवनं व भिनन्दनीय
मुय्यान मुत्तमतरं पवरो पगन्त्वा
२२० कत्वा दिवाविहारं सो सायएहसमये तहिं
गच्छं केसरीलाय बोधिपादपसन्तिकं
२२१. ब्रह्मा सुरासुर महोरग पक्विराज
संसजितोरु वटुमे दिपदानमिन्दो
पायासि सोत्थियद्विजो तिणहारको सं
दिस्वान तस्स अददा तिणमुहियो सो
२२२. इन्दीवरारविन्दादि कुसुमान म्बरा तहिं
पतन्ति वुहिधारा व गच्छन्ते दिपदुत्तमे
२२३ चारु चन्दनचुराणादि धूपगन्धेहि नेकधा
अनोकासो सि आकासो गच्छन्ते दिपदुत्तमे
२२४. रतनुज्जलछत्तेहि चारुहेमद्धजेहि च
अनोकासो सि आकासो गच्छन्ते दिपदुत्तमे
२२५. चेलुक्वेप सहस्सेहि कीटन्तेहि मरूहि पि
अनोकासो सि आकासो गच्छन्ते दिपदुत्तमे
( २६ )
२२६. सुरदुन्दुभि वज्जानि करोन्तहि मरूहि पि
अनोकासो सि आकासो गच्छन्ते दिपदुत्तमे
२२७. सुरङ्गनाहि सङ्गीति गायन्तीहि पि नेकपा
अनोकासो सि आकासो गच्छन्ते दिपदुत्तमे
२२८, मनोरमा किरणर किएणरङ्गना
मनोरमगा उरगोरगङ्गना
मनोरम तम्हि च नचगीतियो
मनोरमा नेकविधा पबत्तयु
२२६. तदा महोघे व महामहे हि
पवत्तमाने इति सो महायसा
तिणे गहेत्वा तिभवेकनायको
उपागतो बोधिदुमिन्दसन्तिकं
१५. ममाथि २३०, विद मा सितसेलग्ग रजताचलसन्निभ
से पर्व घटनाय कत्वा पदक्खि ग बोधिपादपं दिपदुत्तमो
२३१. पुरथिम दिसाभागे अचले रणधसके
महीतले ठितो धीरो चालेसि तिणमुहियो
२३२. चुद्दसहत्थमत्तो सो पल्लो आसि तावदे
अथ तं अब्भुतं दिखा महापओ विचिन्तयि
२३३. मंसलोहित महि च नहारु च तचो च मे
काम सुस्सतु नेवाहं जहामि विरियं इति
२३४. ग्राभुजित्वा महावीरो पल्लङ्क मपराजितं
पाचीनाभिमुखो तस्मि निसीदि दिपदुत्तमो
२३५. देवदेवस्स देविन्दो सङ्ख मादाय तावदे
( २७ )
वीसुनरसतुब्बंध धमयन्तो तहिं टितो
२३६. दुतियं पुण्णचन्दं व सेतच्छ त तियोजनं
धारयातो ठिनो सम्मा महानाहा सहम्पति
२३७. चारुचामर मादाय सयामो पि सुराधिपो
वीजयन्तो ठितो तत्थ मन्दं मन्दं तिगायुतं
२३८. बेलुवं वीण मादाय सुरो पञ्चसिखव्हयो
नानाविध लयोपेतं वादय तो तथा ठितो
२३६. थुति गीतानि गायन्तो नाटकीहि पुरकवतो
तथेव हासि सो नागराना कालव्हयोपि व
२४०. महेत्वा हेममञ्जूसा सुरपुप्फेहि पूरिता
पूजयाता व अहसु बत्तिसा पि कुमारिका
१६. मार २४१. सइन्ददेवसङ्केहि नेहि इत्थं महामहे
वतमाने तदा मारो पापिमा इति चिन्तयि
२४२. अतिकमितु कामो यं कुमागे विसयं मम
सिद्धत्योअथ सिद्धत्यं करिस्सामीति नावदे
२४३. मापेत्व भिंसनतरो रुसहस्सबाहुँ
संगय्ह तेहि जलिता विविधायुधानि
आरुरह चारुदिरदं गिरिमेखलालगं
चण्ड दियड्ड सतयोजन मायतं तं
२४४. नानाननाय नलवरुण सिरोरुहाय
रत्तोरुव वहि निग्गत लोचनाय
दहोह भिंसन मुखायु रूग ब्भुनाय
सेनाय सो परियुनो विविधायुधाय
से युद्ध
( २८ )
२४५. तत्थो पगम्म अतिभीमरवं रवन्तो
सिद्धत्थ मेथ इति गएहथ वन्धथे मं
आणापयं सुरगणं सह दरसनेन
चण्डानिलु रगत पिघुव पलापयिस्थ
२४६. गम्भीर मेघरव सन्निभ चण्डनादं
वातञ्च मापिय ततो सुभगस्स तस्य
करणम्पि चीवरवरस्स मनोरमस्स
मो आसि येव चलितु पभु अन्तको य
२४७. संवट्ट वुहि जवसन्निभ भीरघोर
वरसं परिसय ततो दकविन्दुकम्पि
ना सक्खि नेतु मतुलस्स समीपकम्पि
दिस्वा तमब्भुतमथोपि सुदुम्मुखो सो
२४८. अञ्चन्त भीम नळ अच्चिसमुज्जलोरु
पासान भस्म कललायुध वस्सधारा
अङ्गार पज्जलित वालुकवस्सधारा
वस्सापयित्थ सकलानि इमानि तानि
२४६. मारानुभाव बलतो नभतो पगन्त्वा
पत्वान पुअसिखरुग्गत सन्तिकं तु
मालागुळप्पभुति भावगतानि थापि
लोकन्तरे व तिमिरं तिमिरं सुघोरं
२५०. मापेत्व मोहतिमिरम्पि हतस्स तस्स
देहप्पभाहि सतरंसि सतोदितं व
जातं मनोरमतरं अतिदस्सनीय
( २६ )
मालोक पुञ्ज मवलोकिय पापधम्मो
२५१. कोपोपरत्त वदनो भुकुटिप्पचारा
अञ्च त भिंसन विरूपक वेसधारि
अच्चन्त तिएहतरधार मसङ्ग मेव
चक्कायुधं वरतरं अपि मेरुराज
२५२. सङ्खण्डयन्तमिव थूलकलीरखण्ड
विस्सज्जि तेनपि न किश्चि गुणाकरस्स
कातुपभुत मुपगछि ततो तमेतं
गन्वा नभा कुसुमछतत माग सीसं
२५३. विस्सजितापि सेनाय सेलकूटा नलाकुला
पगन्त्वा नभसा मालागुलत्तं समुपागतो
२५४. तम्पि दिवाससोको सोगन्त्वाधीरस्य सन्तिक
"पापुणाति ममेवायं पल्लङ्को अपराजितो
२५५ इतो उहह पल्लङ्का" इति भासिस्थ धीमतो
कतकल्याण कम्मस्स “पल्लङ्कत्थाय मार !
२५६. को सक्वी"ति पवुत्तो सो इमे सब्बे ति सक्खिनो
सेनायाभिमुखं हत्थं पसारेवान पापिमा
२५७. घोरनादेन हं सक्खि अहं सक्खीति तायपि
सक्खिभावं वदापेत्वा तस्सेवं समुदीरयि
२५८. को ते सिद्धत्थ ! सक्खी ति अथ तेना नुलेन पि
ममेत्थ सक्विनो मार !न सन्ती ति सचेतना
२५६. रत्तमेघोपनिक्वन्त हेमविज्जु व भासुरा
नीहरित्वा सुरत्तम्हा चीवरा दक्खिणं कर
२६०. भूमियाभिमुखं कत्वा "कस्मा पारमिभूमियं
(३०)
उन्नादेत्वा निदाने व निस्सदा सी।तिभूमिया
२६१. मुञ्चापिते रखे नेकसते मेघरवे यथा
बुद्धनागवला नागं जानहि सुप्पतिहितं
१६२. दिस्वानि दानि गएहाति दानि गणहाति चिन्तिय
सम्भिन्न दाठसप्पो व हतदप्पो सुदुम्मुखो
२६३. पहाया युधवत्थानि लङ्कारानि अनेकधा
चकवाळाचला याव ससेनाय पलायि सो
२६४. तं मारसेनं सभयं ससोक
पालयमानं इति देवसङ्घा
दिम्बान मारस्स पराजयो यं
जयोति सिद्धत्थकुमारकस्स
२६५. सम्मोदमाना अभिपूजय ता
धीरं सुगन्धप्पभुनीहि तरिम
पुनागता नेकथुतीहि सम्मा
उग्घोसमाना छनवेसधारी
१७.बुद्ध २६६. एवं मारबलं धीरो विद्धंसेत्वा महब्बलो
आदिच्चे धरमाने व निसिन्नो अचलासने
२६७. यामस्मिं पठमे पुब्बेनिवासं बानमुत्तमो
विसोधेवान यामस्मिं मज्झिमे दिब्बलोचनं
२६८. सो पटिच्चसमुप्पाद अथ पच्छिमयामके
ओतारेत्वान बानंसं सम्मसन्तो अनेकधा
२६६. लोकधातुसतं सम्मा उन्नादेत्वा रुणोदये
बुद्धो भुत्वान सम्बुद्धो सम्बुद्ध म्बुजलोचनो
२७०. अनेकजाति संसारा सन्धाविस्सन्ति आदिना
बनना
२७५.
( ३१ )
उदानेदं उदानेसि लीतिवेगेन सादिसो
२७१. सल्लक्खेवा गुणे तस्स पल्लङ्कस्स अनेकधा
न ताव उहहिस्सामि इतो पल्लङ्कतो इति
२७२. समापत्ती समापज्जि अनेकसतकोटियो
सत्था तत्थेव सत्ताहं निसिनी अचलासने
२७३. अज्जापि नून धीरस्स सिद्धत्थस्स यसस्सिनो
अस्थि कत्तबुकिचं हि तस्मा आसनमालयं
२७४. न जहासी ति एकच देवताना सि संसयं
अत्वा तासं वितक तं समेतुं सन्तमानसो
उहाय हेमहंसो व हेमवएणो पभङ्करो
अब्भुग्गरत्वा नभं नाथो अकासि पाटिहारियं
२७६. वितकमेवं इमिना मरूनं
सम्मू पसम्मा निमिसेहि बोधि
सम्पूजयन्तो नयनम्बुजेहि
सत्ताहमहासि जयासनं च
२७७. सुभासुरस्मि रतनेहि तस्मि
संचङ्कमन्तो वरचङमस्मि
मनोरममि रतनाल येपि
विसुद्धधम्म विचिन विसुद्धो
२७८. मूले जपालतरुराजवरस्स तस्स
मारङ्गनान ममलाननपङ जानि
सम्मा मिलापिय ततो मुचलिन्द मूले
भोगिन्द चित्तकुमुदानि पबोधयन्तो
२७६. मूलेपि राजायतनस्स तस्स
( ३२ )
महत्व
तमि समापत्ति सुखम्पि विन्द
संवीतिनामेसि मनुब्बवण्णो
एकूनपास दिनानि धीमा
१८.समाधि २८०. अनीतत्तोदकं दन्तकहनागलतामयं
से उठना हरीटकागदं भुत्वा देविन्देना भतु तमं
२८१. वानिजेहि समानीतं समन्थमधुपिण्डिक
महाराजूपनीतम्हि पत्तम्हि पतिगणिहय
१९.धर्मका २८२. भोजनस्सा वसानम्हि जपालतरुमूलक
गन्त्वा धिगत धम्मस्स गम्भीरत्त मनुस्सरि
चिन्तन २८३. महीसन्धारको वारिम्वन्ध सन्निभको अयं
गम्भीरोधिगतोधम्मो मया सन्तो ति आदिना
२८४. धम्मगम्भीरतं धम्मराजस्स सरतो सतो
आसेवं तकणं धम्म इमं मे पटिविज्झितु
२८५. वायमन्तेन सम्पत्त याचकानं मनोरम
कन्तेत्वा उत्तमङ्गच मोलिभूसण भूसितं
२८६. सुवजितानि अक्वीनि उप्पाटेत्वान लोहितं
गलतो नीहरित्वान भरियं लावण्णभासुरं
२८७. अत्रजं च ददन्तेन कुलवंसप्पदीपक
दानं नाम न दिनं च नत्थि सीलं अरक्खितं
२८८. तथा हि सङ्खपालादि अत्तभावेसु जीवित
मया परिचजन्तेन सीलभेदभयेन च
२८६. खन्तिवादादिके नेकअत्तभावे अपूरिता
छेजादि पापुनन्तेन पारमी नत्थि काचि
२६०.
( ३३ )
तस्स मे विधमन्तस्स मारसेनं वसुन्धरा
न कम्पिरथ अयं पुत्वनिवासं सरतो पिच
२६१. विसोधेन्तस्स मे यामे मज्झिमे दिवानोचनं
न कम्पित्थ पकम्पित्थ पच्छिमे पन यामके
२६२. पच्चयाकारबानं मे तावदे पटि विज्झनो
साधुकारं ददन्ती व मुश्चमाना महारवं
२०. प्रचारस्रो २६३. सम्पुरणलापू विय कञ्जिकाहि
निराशता तकं हि पुण्णं विय चाटिका व
सम्मश्वितो व अनकेहि हत्थो
वसाहि सम्पीत पिलोतिका व
२६४. किलेस पुञ्जन्मरितो किलिहो
रागेन रत्तो अपि दोसदुढो
मोहेन मूळ हो ति महावलेन
लोको अविज्जा निकराकरो यं
२६५. किनाप धम्म पटिविज्झते तं
अत्था हि को तस्सि ति देसनाय
एवं निरुस्साह मगच्छि नाथो
पजाय धम्मामत पानदाने
२१. आदि २६६. निच्छारेत्वा महानादं ततो ब्रम्हा सहम्पति
नस्सति वत भो लोको इति लोको विनस्सति
२६७. ब्रह्मसङ्घ समादाय देवसङ्घ च तावदे
लोकगतुसते सत्थु समीपं समुपागतो
गन्त्वा महीतले जानुनिहच सिरसमलिं
पग्गम्ह भगवा धम्म देसेतु इति आदिना
प्रचार
( ३४)
दाय जाना
२६६. याचितो तेन सम्बुदारविन्दपदनो जिनो
लोकधातुसतं बुद्धचक्खुना लोकयं तदा
३००. तस्मिंश्रप्परजक्खादि मचा दिखा ति एतका
विभजित्वा च ते सत्ते भब्बा भबबसेन सो
३०१. अभब्बे परिवजेखा भब्बे वादाय बुद्धिया
उपनेतु जनो दानि सद्धाभाजन मत्तनो
३०२. पूरेस्सामी ति तं तस्स सद्धम्मामत दानतो
विस्सज्जि ब्रह्मसहस्स वचनामत रंसियो
२२. मृग-३०३. ततो जपालोदयपब्बतोदितो
महप्पभो बुददिवाकरो नभे
मणिप्पभासभिभभासुरप्पभो
पमोचयं भासुरबुद्धरंसियो
३.४. पमोदयन्तो उपकादयो तदा
कमेन अहारसयोजनञ्जसं
अतिक्कमित्वान सुफुल्ल पादपे
विजम्भमानालिगणाभिकूजितं
३०५. निरन्तरं नेक दिपकूजितं
सुफुल्लपक रुह गन्धवासितं
गतो यसस्सी मिगदाव मुत्तमं
तहिं तपस्सी अथ पञ्चवग्गिया
३०६. देवातिदेव तिभवेकनाथं
लोकन्तदस्सि सुगतं सुगतं
दिस्वान धीरं मुनिसीहराज
कुमन्तणं ते इति मन्तयिंसु
(३५)
३०७. भुवान प्रोयरिक अनपानं
सुवरणवएणो परिपुरणकायो
एता वुसोय समणो इमस्स
करोम ना म्हे अभिवादनादि
३०८.
अयं विसालन्वयतो पमूतो
सम्भावनीयो भुवि केतुभूतो
पठिग्गहेतु रहतासनं तु
तस्मा सनं येवि ति पअपेम
३०६. ज्ञत्वा थ भगवा तेस वितकं तिक्खबुद्धिया
मेलानिलकदम्बेहि मानकेतु पधंसयी
३१० समत्था नहि सण्ठातु सकाय कतिकाय ते
असु लोकनाथस्स वन्दनादीनि धीमतो
३११. बुद्धभाव अजानन्ता मुनयो मुनिराजिनो
भावुसो वादतो तस्स केवलं समुदीरयु
३१२. अथ लोकचिदू लोकनाथो तेसमुदीरथ
आवुसो वादतो नेव सत्थुनो समुदीरयी
३१३. भिक्खये! अरहं सम्मासम्बुद्धा ति तथागतो
बुद्धभाव पकासेत्वा अत्तनो तेस मुत्तमो
३१४. निसिनो तेहि पञ्अत्त दस्सनेय्युत्तमासने
ब्रह्मनादेन ते थेरे सीलभूसन भूसिते
३१५. प्रामन्तेन्वान ब्रह्मानं नेककोटि पुरवतो
धम्मचकं पवत्तेन्तो देसनारंसिना तदा
३१६. मोहन्धकार गसिम्पि हत्वा लोके मनोरम
धम्मालोकं पदस्सेत्वा वेनेग्यम्बुजबुद्धिया
(३६)
३१७. मिगकानन संक्खाते रणभूमितले इति
राजा महानुभावो व धम्मराजा विसारदो
३१८. देसनासिं समादाय धीभुजेन मनोरम
वेनेय्य जनन्धूनं महानत्थकरं सदा
३१६. किलेसारी पदायत्वा सद्धम्म जयतुन्दुभिं
पहरित्वान सद्धम्म जयकेतु सुदुज्जयं
३२०. उस्सापेत्वान सद्धम्म जयत्थूनुत्तमं सुभं
पतिहापिय लोके कगजा हुत्वा सिवङकरो
३२१. पमोचेवान जनतं ब्रहा संसारबन्धना
निवाण नगरं नेतुकामो लोकहिते रतो
२३.उरु ३२२. सुवरणाचलकूट व जङ्गमं चारुदस्सनं
बेल जाना परवो वेलगामि वं असं व सुरञ्जसं
३२३. भद्दग्गियभूपाल कुमार तिंस मत्तके
मग्गत्तयामतरसं पायत्वा रस मुत्तम
३२४. पबन्ज मुत्तमं दत्या लोकरसत्वाय भिक्खको
उय्योजत्वान सम्बुद्धो चारिक चरथा ति ते
३२५. गन्त्वोरुवेलं जटिलान मन्तो-
जटा च छेत्वान जटा वहिद्धा
पापेत्व अग्गञ्जस मुत्तमो ते
पुरक्वतो इ.दु व तारकाहि
३२६. पुरक्खतो तेहि अनासहि
छब्बएणरंसाभरणुर मेहि
दिसङ्गनायो अतिसोभयातो
पक्वोन मक्खीनि पि पीनयन्तो
२४.लट्ठि-३२७. दिन पटिनं समनुस्सरन्तो
तं बिम्बिसारस्स महायसस्स
बन जाना
(३७)
मोचेतुकामो वरराजवंसं
धजूपमानरस गुणालयास
३२८. सिखण्डि मण्डलारद्ध नच्च लहिवनव्हयं
उय्यान मगमा नेकतरु सङ्घाभिमण्डित
२५. राज ३२६. बिम्बिसार नरिन्दो सो गतभावं महेसिनो
गृह जाना
सुजिता पीलिपामोज्ज भूसनेन विभूसितो
३३०. त मुय्यानूपगत्वान महामञ्च पुरक्खती
सत्थु पादारविन्देहि सोभय तो सिरोरुहे
३३१.
निसन्नो बिम्बिसारं तं सद्धम्मअमतम्बुना
देविन्दगीयमानग्गवरणो वएखाभिराजितो
३३२. देव दानव भोगिन्द पूजितो सो महायसो
रम्मं राजगहं गन्त्वा देविन्द पुरसन्निभं
३३३. नरिन्दगेहं आनीतो नरि-देन नरासभो
भोजनस्सा सानम्हि चालयन्तो महामहिं
३३४. पतिगरिहय सम्फुल्लतरुराजविराजितं
रम्मं वेल्लुवनारामं विलोचन रसायनं
३३५.
सित पुलिन समूहच्छन्नमालङ्कप्तस्मि
सुरभि कुसुम गन्धाकिरण मन्दानिलस्मिं
विविध कमलमाला लतम्बासयस्मि
विपुल विमलतस्मि वल्लिया मण्डपस्मि
३३६. सुरनरमहनीयो चारुपादारविन्दो
विमल कमल नेत्तो कुन्ददन्ताभिरामा
गुणरतनसमुहो नाथनाथो मुनिन्दो
कणक किरणसोभो सोम सोम्माननो सो
३३७. विमल पवर सीलक्खन्धवारंच कत्वा
(३८)
रुधिरवर समाधि कुन्त मुस्सापयित्वा
तिखिणतर सुभग्गं बुद्धझानोरुफण्डं
विहरति भमयन्तो काम मग्गाविहारा
२६ कपि-३३८. तदा सुद्धोदनो राजा पुत्तो सम्बोधि मुत्तम
लवस्तु जाना पत्वा पवत्तसद्धम्मचक्को लोकहिताय मे
३३६. राजगह व निस्साय रम्मे वेलुवने धुना
वसतीति सुणित्वान बुद्धभूतं सकत्रज
३४०.
दह कामो नवक्वत्तुं नवामच्चे महेसिनो
नवयोध सहस्सेहि सद्धिं पेसेसि सन्तिकं
३४१. गन्त्वा ते धम्मराजस्स मुत्वा नोपमदेसनं
उत्तमत्थं लभिवान सासनम्पि न पेसयु
३४२. तेस्ले कम्पि अपस्सन्तो कालुदायिं सुभारातें
आमन्तेत्वा महामञ्च पब्बज्जाभिरतं सदा
३४३. सुतग्गरतनं नेत्वा ममनेचरसायन
येन केनचुपायेन करोहीति तमब्रवी
३४४. अथ योधसहस्सन तम्पि पेसेसि सोपि च
गन्त्वा सपरिसो सत्थु सुत्वा सुन्दर देसन
३४५. अरहत्तञ्जसं पत्वा पब्बजित्वा नरासभं
नमस्सन्तो स सम्बुद्ध पग्गयह सिरसञ्जलि
३४६. वसन्तकालजनिता तिरत्त
‘वएपाभिरामकुर पल्लवानि
सनीलवएणुज्जल पत्त युत्ता
साखासहस्सानि मनोरमानि
३४७. रिसिह गंधाकुल फालिफुल्ल
(३६) नानाविचित्तानि महोरुहानि सुचित्रा नानामिगपक्षिसङ्घ सङ्गीयमानुत्तम काननानि ३४८. सुनीलसातोदकपूरितानि सुनादि कादम्ब कदम्बकानि सुगध इन्दोवर कल्लहारा- रविन्द रत्नम्बुज भूसितानि ३४६. तीरन्तरे जानदुमेसु पुप्फ- किञ्जकखराजीहि विराजितानि मुत्ताति सेतामल सेकतानि रम्मानि नेकानि जलासयानि ३५०. मनुज वेलूग्यि कञ्चुकानि वगुण्ठितानी व सुसहलेहि सुनीलभूतानि महीतलानि नभानि मन्दानिल सङ्कुलानि ३५१. अनातभोमेहि जनेहि फीतं सुराजधानि कपिलाभिधानि गन्तुं भदन्त समयो ति आदि संवरिण वएणं गमनसस्स ३५२. सुवएणनं तं सुगतो सुणित्वा वरणेसि वण्ण गमनस्सु दायि ! किन्नूति भासित्थ ततो उदायि कथेसि दं तस्स सिवङ्करम्स ३५३. भन्ते पिता दस्सनमिच्छते ते (४०) सुद्धोदनो राजवरो यसस्सी तथागतो लोकहितेकनाथो करोतु सातक सङ्गह न्ति ३५४. सुणित्वा मधुरं तस्स गिरं लोकहिते रतो साधु दायि! करिस्सामिातकानन्ति सङ्गह ३५५. जगमो हेममेरू व रत्त कम्बललङ्कतो विमलो पुण्णचन्दो व तारकापरिवारितो ३५६. सद्धिं वीससहस्सेहि सतचित्तेहि तादिहिं गच्छन्तो सिरिसम्पन्नो अञ्जसे सहियोजने ३५७. दिने दिने वसित्वान योजने योजने जिनो द्वीहि मासेहि सम्पन्नो बुद्धो जातपुरं वरं ३५८. बुद्धं विसुद्ध कमलानन सोभमान बालसुमालिसत भानुसमान भानु चक्कङ्कितोरुचरणं चरणाधिवास लोकत्तयेकसरण अरणग्गकायं ३५६. सम्पुरण हेम घटतोरण धूमगन्ध- मालेहि वेणुपणवादिहि दुन्दुभीहि चित्तहि छत्तधज चामरवीजनीहि सुद्धोदनादि वनिपा अभिपूजयिंसु ३६०. सुसज्जितं पुरं पत्वा मुनिन्दो तं मनोरम सुगन्धिपुप्फ किञ्जक्खा लङ्कतोरुतलाकुलं ३६१. मुफुल्ल जलजा किरण अच्छोदकजलालयं मयूरमण्डलारद्ध रङ्गहि च विराजितं ३६२. चारुचङ्कमपासाद लतामएउपमण्डितं
(४१)
पावेरिख पवरो रम्म निग्रोधागम मुत्तम
अन्हाक मेस सिद्धत्यो पुत्लो नत्तोति आदिना
चिन्तयित्वान सञ्जात मानसत्थद्धसाकिया
३६४. दहरे दहरे रान कुमारे इदम
तुम्हे चन्दव सिद्धत्थं न वन्दाम मयन्ति तं
३६५. इदं वत्वा निसीदिसु कत्वा ते पुरतो ततो
अदन्तदमको दन्तो निलोककविलोचनो
३६६. तेसं अज्झासयं अत्वा न मं वदन्ति बातयो
हन्द वन्दापयिस्सामि दानि नेसन्ति तावदे
३६७. अभिजापादकज्झानं समापज्जित्व मानतो
वुहाय हेमहंसो व हेमवएणो पभरो
३६८. अभुग्गन्त्वा नभं सबसचनेत्तरसायन
गएडम्बरुस्खमूल स्मि पाटिहारियसमिभं
३६६. असाधारण मधेसं पाटिहारिय मुत्तमं
रमनीयतरे तस्मि अकासि मुनिपुङ्गवो
३७०. दिखा तमन्भुतं राजा सुद्धोदन नरासभो
सञ्जातपीतिपामोजो सक्यवंसेकनायको
३७१ सत्थु पादारविन्देहि सके चारुसिरोरुहे
भूसिते कासि ते सब्बे साकिया अकरूं तदा
३७२. धीरो पोक्खरवस्सस्स अवसाने मनोरम
धम्मवस्सं पवस्सेत्वा सत्तचित्तावनुग्गतं
३७३. महामोहरजं हन्खा ससङ्घो दुतिये दिने
पावेक्खि सपदानेन पिण्डाय पुर मुत्सम
३७४. तस्स पादारविन्दानि रविन्दानि अनेकदा
उग्गन्खा पबिगएिहंसु अक्कन्तकन्तठानतो
( ४२ )
३७५.
देहजोतिकदम्बेहि गोपुरट्टालमन्दिरा
पिञ्जर गती तसिं पाकारप्पभुती तदा
३७६. चरन्तं पविसित्वान पिण्डाय पुरवीथियं
लोकालोककर वीर सन्तं दन्तं पभङ्कर
३७७. पसादजनके रम्मे पासादे सा यसोधरा
सीहपञ्जरतो दिस्वा ठिता पमपरायणा
३७८, भूसने मणिरंसीहि भासुरं राहुल वर
आमन्तेत्वा पदस्सेखा तुरह मेसो पिता ति तं
३७६. निकेत मुपसङ्कम्म सुद्धोदनयसस्सिनो
वन्दिखा तम नेकाहि इत्थीहि परिवारिता
३८०. देव ! देविन्दलीलाय पत्तो ते ध पुरे पुरे
चरित्वा चरते दानि पिण्डाया ति घरे घरे
३८१. पवेदेसि पवेदेवा गमा मन्दिर मत्तनो
प्रानन्दजलसन्दोह पूरितोरुविलोचना
३८२. ततो सेसनरिन्दानं इन्दो इन्दो व लङ्कतो
कम्पमानो पगन्त्वा न वेगेन जिनसन्तिकं
३८३. सक्यपुङ्गव ! ते ने स वंसो माचर माचर
वंसे पुतेकराजापि न पिएडाय चरी पुरे
३८४. इति वुते नरिन्देन मुनिन्दो गुणसेखरो
तुयह मेसो महाराज वंसो महपन न्वयो
३८५, बुद्धवंसो ति सम्बुद्धवंसं तस्स पकासयि
अथो तस्मि ठितो येव देसेन्तो धम्म मुतरि
३८६. उत्तिह न प्पमज्जेय्य धम्म मिच्चादि मुत्तम
गाथं मनोरमं वत्वा सोतूनं सिवमावह
( ४३ ) ३८७. ३०८. २८६. ३६०. ३६१. ३६२. दस्सनग्गरसं दत्वा सन्तप्पेत्वा तमु समो तेना पियाचितो तस्स निकेतं समुपागतो सद्धिं वीससहस्सेहि तादिहि दिपदुक्त मधुरोदनपानेन सन्तप्पेत्वा महीपति चूळामणिमरीचीहि पिञ्जरञ्जलिकेहि तं राजूभि सह वन्दित्वा निसीदि जिनसन्तिके तापि नेकसता गात्वा सुन्दरा राजसुन्दरी नरिन्देन अनुज्ञाता निसीदिसु तहिं तदा देसेत्वा मधुरं धम्म तिलोकतिलको जिनो अह म्पज्ज न गच्छय्य सचे बिम्बाय मन्दिरं दयाय हदयं तस्सा फालेय्या ति दयालयो सावकग्मयुगं गयह मन्दिरं पितरा गतो निसीदि पनिसित्वान बुद्धो बुद्धासने तहिं छब्बरणरंसिजालेहि भासुरन्तो व भानुमा मनोसिला चुएणसमान देह मरीचिजालेहि विराजमाना पकम्पिता हेमलता व बिम्बा बिम्बाधरा सत्थु समीप माग सत्थु पादेसु सम्फस्स सीतलुत्तमवारिना निब्बापेसि महासोकपावकं हृदयिन्धने राजा सत्थु पवेदेसि बिम्बाया ति बहुं गुणं मुनिन्दो पि पकासेसि चन्द किएणर जातकं तदा नन्दकुमारस्स सम्पत्ते मङ्गलचये विवाहा अभिसेको च इति गेहप्पवेसनं ३६३. ३६४. ३६५. ३६६. ३६७.
(४४)
३६८. मलानं पुरे येव पवाजेसि पभरो
अनिच्छन्तं व नेत्वा तं पारामं रम्म मुत्तम
३६६. अचान मनुगच्छन्तं दायज्जत्थं सकत्रज
कुमारं राहुलं चापि कुमाराभरणुज्जलं
४००.
सुरू व छाया ते मे ति उग्गिरन्त गिरं पियं
दायज मे ददाही ति दायज्जं मे ददाहिच
४०१. भाराम मेव नेत्वान पवाजेसि निरुत्तरं
सद्धम्मरतनं दत्वा दायजं तस्स धीमतो
२७. राज-४०२. निक्खम्म तम्हा सुगतंसुमाली
गृह जाना तहिं तहिं जन्तु सरोरुहानि
सद्धम्मरंसीहि विकासयन्तो
उपागता राजगहं पुना पि
४०३. कुसुमाकुल मुन्दरतरु पवने
पदुमुज्जल भासुर सरनिकरे
पुथुचङ्कममण्डित सित सिकते
सुभसीतवने विहरति सुगतो
४०४.
तदा मुदत्त व्हय सेहि सेहो
बड़हि भण्डं सकटेहि गयह
सावत्थितो राजगहे मनुञ्जे
सहाय सेहिस्स घरू पगन्त्वा
तेनेव वुत्तो सुभगेन बुद्धो
जातो ति लोके दिपदानमिन्दो
सञ्जातपीतीहि उदग्गचितो
रति पभातं इति मञ्जमाना
(४५ )
४०६. निक्खम्म तम्हो विगतम्धकारे
देवानुभावेन महापथम्हि
गन्वान तं सीतवनं सुरम्म
सम्पुरणच दं व विराजमनं
४०७. तं दीपरुक्खं विय पज्जलन्तं
विलोचनानन्दकरं महेसिं
दिस्वान तरसु त्तमपादरागं
पटिग्गहेत्वा सिरसा सुधीमा
४०८. गम्भीरं निपुणं धम्मं सुणित्वा विमलं वरं
सोतापत्ति फलम्पत्वा सहस्सनयमण्डितं
४०६. निमन्तत्वान सम्बुद्ध ससङ्घ लोकनायक
वरणगन्धरमपेतं दत्वा दानं मुखावहं
२८.श्रावास्ति ४१०. सत्थु प्रागमनत्थाय सावस्थिनगरं वरं
पटिञ्चं सो नहेत्वान गच्छा तो अन्तरापथे
४११. योजने योजने चारू चिनकम्मसमुज्जले
विहारे पवर दत्वा कारापेत्वा बहुं धनं
४१२. सावत्थिं पुनरागन्त्वा पासादसत मरिडतं
तोरणग्धिक पाकार गोपुरादि विराजितं
४१३. पुरं अपहसन्तं व देविन्दस्सापि सब्बदा
सब्बसम्पत्तिसम्पन्न नच गीतादिसोभित
४१४. कस्मि सो विहरेय्या ति भगवा लोकनायको
समन्ता नुविलोकेन्तो विहारारहभूमिक
४१५. जेत राजकुमाररस्स उय्यानं नन्दनोपमं
छायुदकादिसम्पम भूमिभागं उदिक्खिय
जाना
(४६ )
४१६. हिरञ्अकोटिसन्धारवसेने व महायसो
किणित्वा परे तम्हि नरामरमनोहरे
४१७. निच्चं किङ्किणीजालनादरुचिरं सिगी व सिङ्गाकुलं
रम्म नेकमणीहि छमछदनं आमुत्तमुचावलि
नानारागवितानभासुरतरं पुप्फादिना लन्तं
चित्रं गन्धकुटिं वरं सुविपुलं कारेसि भूसेखरं
४१८. जिनजान म्पि विसाल मालयं
वितान नाना सयनासनुज्जलं
सुमण्डितं मण्डपचङ्कमादिना
विलुम्पमानं मनलोचनं सदा
४१६. अथापि सराहामलसेतवालुकं
सवेदिकाचारु विसालमालक
जलासयं साततिसीतलोदक
सुगन्धिसोगन्धिक पङ्कजाकुलं
४२०. सुफुल्ल सालासन सोकनाग
पुन्नाग पूगादि विराजमान
मनोरमं जेतवनाभिधानं
कारापयि सेहि विहारसेटे
४२१. विसाल केलात धराधरुतमा-
भिरामपाकार फनिन्द गोपितो
अनस्स सब्बाभिमनत्थ साधको
विहार चिन्तामणि सो विराजते
४२२. ततो आगमनत्थाय मुनिन्दं नाथपिण्डिको
दूतं पाहेसि सो सत्था सुत्वा दूतस्स सासनं
(४७)
४२८.
४२३. महता भिक्खुसङ्घन तदा तम्हा पुरक्खतो
निक्वमित्वा नुपुब्बन पचो सावत्थि मुत्तम
४२४. समुज्जलानि नेकानि धजाना दाय सुन्दरा
कुमारा पुरतो सत्थु निक्वमिंसु मुरा यथा
४२५. निक्वमिंसु ततो तेसं पच्छतो तरुणगना
चारुपुराणघटा दाय देवका यथा तथा
४२६. पुरणपातिं गहेत्वान सेहिनो भरिया तथा
सद्धिं ने सतित्थीहि नेकालङ्कार लङ्कता
४२७. महासेहि महासेहिसतेहि सह नायक
अब्भुग्गञ्छि महावीरं पूजितो तेहि नेकपा
गणरंसीहि मनोरमेहि
पुरं वरं पिञ्जरवरणभावं
नेन्तो मुनिन्दो सुगतो सुगतो
उपाविसी जेतवनं विहारं
४२६. चातुदि सस्स सङ्घस्स सम्बुद्ध प्यमुखस्स है
इमं दम्मि विहार न्ति सत्थु चारुकरम्बुजे
४३०. गन्धवासितं वारिं हेमभिङ्कारतो वरं
आकिरित्वा अदा रम्म विहारं चारुदस्सनं
४३१. सुरम्म विहारं पटिग्गयह सेह
अनग्घे विचित्चासनमि निसिनो
जितिन्दानमिन्दो तिलोकेकनेचो
तिलोकप्पसादावहं तं मनुषं
४३२. उदारा निसंसं विहार पदाने
अनाथप्पदानेन नाथस्स तस्स
(४८)
मुदत्ताभिधानस्स सेहिस्स सत्था
यसस्सी हितेसी महेसी अदेसी
४३३. उदारा निससं विहारप्पदाने
कथेतु समत्थो विना भूरिप
तिलोकेकनाथं नरो कोसि युत्तो
मुखानं सहस्सेहि नेकेहि चापि
४३४. इति विपुलयसो सो तस्स धम्म कथेत्वा
अपि सकलजनानं मानसे तोसयन्तो
परम मधुरनाद धम्नभेरि महन्तं
विहरति पहरन्तो तत्य त्यूपगन्त्वा
२६.नुद्ध ४३५. एवं तिलोकहितदेन महादयेन
का निवास
लोकुत्तमेन परिभुतपदेसपन्तिं
निच्चं सुरासुर महोरग रक्खसादि-
सम्पूजितं अह मिदानि निदस्सयिस्स
४३६. सद्धम्म रंसि निकरेहि जिनंसुमाली
नेय्यपङ्कजवनानि विकासयन्तो
वासं अकासि पवरो पठमम्हि वस्से
वाराणसिम्हि नगरे मिगकाननम्हि
४३७. नानप्पकार रतनापण पन्ति वीथि-
रम्मे पुरे पवर राजगहा भिधाने
वासं अकासि दुतिये ततिये चतुत्थे
वस्से पि कन्ततर वेलुवने व नाथो
४३८. भूपाल मोलि मणि रसि विराजमानं
सालिनामविदितं नगरं सु·म्म
-
(४६ )
४३६.
४४०.
४४१.
निस्साय सक्यमुनि केसरि पश्चमम्हि
वस्सम्हि वास मकरित्थ महावनस्मि
फुल्लातिनील विमलुप्पल चारुनेत्तो
सिङ्गोसमान तनु जोतिहि जोतमानो
बुद्धो अनन्तगुणसन्निधि छहवस्से
वासं प्रका विपुलामङ्कुलपब्बतस्मि
गम्भीर दुइसतरं मधुरं मरून
देसेत्व धम्म मतुलो सिरिसनिवासो
दविन्दसीतल विसाल सिलासनस्मि
वस्सम्हि वास मकरि मुनि सत्तमम्हि
फुल्लारविन्दचरणो चरणाधिवासो
सो सुसुमारगिरिनाम धराधरम्हि
वासं अफा परममारजि अहमस्मिं
वस्सम्हि कन्ततरभेसकलावनम्हि
नानामतातिवहुतित्थिय सप्पदप्प
हनत्वा तिलोकतिलको नवम्हि वस्से
वासं अकासि रुचिरे अतिदस्सनीये
कोसम्बि सिम्बलिवने जिनपक्विराजा
तसं महन्तकर हं समितु यतीनं
निस्साय वारणवरं दसमम्हि वस्से
पुप्फाभिकिएण विभुलामलकाननस्मिं
वासं अका मुनिवरो वरपारलेय्ये
४४२.
४४३.
४४४.
४४५.
४४६.
( ५० )
धम्मामतेन जनतं अजरामरत्त
नेन्तो विलोचन मनोहर सुद्धदन्तो
नालाभिधान दिजगामवरे मुनिन्दो
वासं अका अमितबुद्धि दसेक वस्से
वेरज्ज चारु दिजगाम समीपभूते
आरामके सुरभिपुप्फफलाभिरामे
सब सक्यमुनि वारसमम्हि वस्से
वासं अकासि पुचिमन्द दुमिन्द मूले
फुल्लारविन्दवदनो रविचारुसोभो
लोकस्स अत्थचरियाय दयाधिवासो
वासं अका रुचिर चालिय पबतस्मि
वीरो तिलोकगरु तेरसमम्हि वस्से
बन्धूक पुप्फसम पादकरा भिरामो
धम्मिस्सरो पवरजेतवने सुरम्मे
धीरो महिद्धि मुनि चुद्दसमम्हि वस्से
वासं अका सकलसत्तहितेमु युगो
वेनेय्यबन्धुवन रागगजे विहन्त्वा
वस्सम्हि पश्चदसमे मुनिसीहराजा
वासं अका कपिलवत्थु धराधरोरु-
निग्रोधराम रमणीय मणिग्गुहार्य
यक्वम्पि कक्खलतरं सुविनीतभावं
नेत्वा पुरे वरतमालवका भिधाने
बस्सम्हि वास मकरि दसछहमम्हि
४४७.
४४८.
४४६.
५१ )
नेन्तो जनं बहुतरम्पि च सन्तिमग्गं
४५०. पाकार गोपुर निकेतन तोरणादि
नेत्ताभिराम वर राजगहे महेसि
वासं अका नधिवरो दससत्तमम्हि
वस्सम्हि पत्थटयसो भुवनत्तर्यात्म
४५१. धम्मोसधेन मधुरेन सुखावहेन
लोकस्म घोरतर रागरज विहन्त्वा
वस्सम्हि वास मकरि दसअहमस्मि
अङ्गीरसो पवरचालियपब्बतस्मि
४५२. वेनेय्य बाधुजन मोहरिपुं उळारं
हन्त्वान धम्मप्रसिना वरधम्मराजा
एकूनवीसतिमके पुन तत्थ वस्से
वासं अका मधुरभारति लोकनायो
४५३. मुद्धासयो पवरराजगहे विचित्त
वासं अकासि समवीसतिमम्हि वस्से
लोकस्स अत्थचरणे सुभकप्परुक्खो
चिन्तामणि पवरभघटो मुनिन्दो
४५४. एवं तिलोकमाहितो अनिबद्धवासं
फत्वा चरम्पठमबोधियु दारपओ
छब्बएणरंसिसमुपेतविचिचदेहो
लोकेकबन्धु भगवा अवसेसकाले
४५५.
सावत्थियं पवरजेतवने च रम्मे
दिब्बालये व समलङ्कत पुबरामे
वासं अकासि मुनि वीसतिपश्चवस्से
( ५२)
लोकाभिवुद्धिनिरतो सुखसनिवासो
४५६. इति अमितदयो सो पश्चतालीसवस्से
मनुजमनवनस्मि जातरागम्गिरासिं
परममधुरधम्मम्बूहि निब्बापयन्तो
अवसि स मुनिमेघो लोकसन्ति करोतु
३० कवि ४५७. पञा वरङ्गना मह सञ्जाना मनमन्दिरे
के अन्तिम वचन तोसयन्ती सबजनं वुद्धिं गच्छतु सब्बदा
४५८.
चितं यं रचयातेन जिनस्स चरितं मया
पुजं तस्सानुभावन सम्प हो तुसितालयं
४५६. मेतेय्य लोकनाथस्स सुणन्तो धम्मदेसनं
तेन सद्धिं चिरं कालं विदन्तो महति सिरि
४६०. बुद्ध जाते महासत्ते रम्मे केतुमतीपुरे
राजवंसे जनित्वान तिहेतूपटिसंधिको
४६१. चीवरं पिण्डपातं च अनग्धं विपुलं वरं
सेनासनं च भेसज्ज दत्वा तस्स महेसिनो
४६२. सासने पवजित्वान जोतन्तो तम नुक्तरं
इद्धिमा सतिमा सम्मा धारेन्तो पिटकरयं
४६३. व्याकतो तेन बुद्धो यं हेस्सती ति अनागते
उप्पन्नुप्पन्न बुद्धानं दानं दत्वा सुखावहं
४६४. संसारे संसरन्तो हि कप्परुक्खो व पाशिनं
इच्छितिच्छित मनाहिं दद तो मधुर वरं
४६५.. मंसलोहितनेत्तादि ददं चिचसमाहितो
सीलनेक्वमपआदि पूरे तो सबपारमी
( ५३ )
४६६. पारमीसिखरं पत्वा बुद्धो सुद्धो अनुतरो
देसेत्वा मधुरं धम्म जन्तूनं सिवमावह
४६७. सवं सदेवकं लोकं ब्रहा संसाग्वाधना
मोचयित्वा वरं खेमं पापुणेय्यं सिवं पु
४६८. लङ्कालङ्कारभूतेन भूपालन्वयकेतुना
विजयावहुना आ सकनामेन कारिते
४६६. सतोयासयपाकारगोपुरादिविराजिते
परिवेणवरे गम्मं वसता सन्ततिना
४७०. मेधडराभिधानेन दयावासेन धीमता
थेरेन रचितं एतं सब्भि संसेवितं सदा
४७१. भवे भवे ध गाथानं तेसचतिचतुस्सतं
गन्थतो पञ्चपञासाधिकं पञ्चसतं इति
१०५ के आगे किसी २ पुस्तक में यह श्लोक भी पाया जाता है।
सवेणुवीणा सुरदुन्दुभी नभे सकं सकं चारुसर म्पमोच्यु
सपबतिन्दप थुलोकधातुया उ रोभासचयो मनोरमो
( ५४ ) बुद्ध की दिनचर्या (अतरनिकाय? कथा से उद्धत) १निपात ६ वर्ग पञ्च हि बुद्धकिशानि-पुरेभत्त किञ्चं, पच्छाभतकिञ्चं, पुरिमयाम किचं, मज्झिमयाम किश्चन्ति १. तत्रिदं पुग्भत्तकिच्चं- भगवा हि पातो व उदीय उपट्ठाका नुग्गहत्थं सरीरफासुकत्थ- च मुखधोवनादि सरीरपरिकम्म कत्वा याव भिक्खाचारवेला ताव विवित्तासने वीतिनामेत्वा भिक्खाचारवेलायं निवासेत्वा, कायबन्धनं बन्धित्वा, चीवरं पारपित्वा, पत्त मादाय कदाचि भिक्ख सङ्घपरि- बुतो गाम वा निगम वा पिण्डाय पविसति, कदाचि पकतिया, दादा- चि अनेकेहि पाटिहारियेहि वत्तमानेहि । सेय्यथीदं पिण्डाय पविसतो लोकनाथस्स पुरतो पुरतो गन्त्वा मुद्गतयो वाता पठवीं सोधेन्ति, वलाहका मुदुफुसितानि मुश्चन्तो मग्गे रेणुवूपसमेत्वा उपरि वि. तानं हुत्वा तिट्ठन्ति, अपरे वाता पुष्फानि उपाहरित्वा मग्गे श्रोकिरन्ति। उरणता भूमिप्पदेसा भोणमन्ति, श्रोणता उन्नमन्ति, पादनिक्स पस- मये समा भूमि होति, सुखसम्फस्सानि पदुमपुप्फानि वा पादे स. म्पटिच्छन्ति, इन्दखीलस्स अन्तो ठपितमत्त दक्विणपादे सरीरो छ- ब्बणरसियो निक्खामित्वा सुवरणरसपिजरानि विय, चित्रपट्टपरि- विवसानि विय च पासादकूटागारादीनि करोन्तियो इतोचितो च विधापन्ति । हत्थी अस्स विहगादयो सकसकटानेसु ठिता येव मधुरेना कारेन सई करोन्ति , तथा भेरी वीणादीनि तुरियानि मनुस्सानश्च कायूपगानि आभरणानि । तेन सजानेन मनुस्सा जानन्ति मज भगवा इध पिण्डाय पविट्ठो ति। ते सुनिवत्था सुपारुता गन्धपुष्फादीनि आदाय घरानिक्ममित्वा अन्तरवीथि पटिपजित्वा भगवन्तं गन्धपुप्फादी- हि सकच्चं पूजेत्वा वन्दित्वा मम्हाकं भन्ते इस भिक्ल , भम्हाकं वीसति,अम्हाकं भिक्षुसतं देथा ति याचित्वा भगवतोपि पत्तगहेन्या . , . (५५) श्रासनं पापेत्वा सकच्चपिएडपातेन पतिमानेन्ति ।भगवा कतभत्त- किलो तेसं सन्तानानि श्रोलोकत्था तथा धम्म देसेति यथा केचि सर- णगमने पतिद्वहन्ति, केचि पञ्चसु सीलेसु, केचि सोतापत्ति सकदा- गामि मानागामि फलानं अतरस्मि, केचि पबजित्वा अग्गफले अरहत्तेति । एवं महाजन अनुग्गहेत्वा उडाया सना विहारं गच्छति । तत्थ गन्धमण्डलमाले पञ्अत्तवर बुद्धासने निसीदति, भिक्ख नं भ- तकिश्वपरियोसानानं श्रागमयमनो । ततो भिक्खूनं भत्तकिच्चपरियो साने उपट्टाको भगवतो निवेदेति । अथ भगवा गन्धकुटिं पविसति । इदं ताव पुरेभत्तकिच्चं. २. अथ भगवा एवं कतपुरेभत्तकिच्चो गन्धकुटिया उपटाने निसीदित्वा पादे पक्खालेत्वा पादपीठे ठत्वा भिक्खून भोवदति. "भिक्खवे ! अप्पमादेन सम्पादेथ. दुल्लभो बुद्ध प्पादो लोकस्मिं, दुल्लभो मनुस्सत्त पाटिलाभो, दुल्लभा खणसम्पत्ति, दुल्लभा पसज्जा, दुल्लभं सद्धम्मसघन न्ति" तत्थ केचि भगवन्तं कम्मटानं पुच्छन्ति भगवा तेसं चरियानुरूपं कम्मद्वान देति. ततो सबपि भगवन्तं घन्दित्वा भत्तनो अत्तनो रत्तिद्वान दिवाहानानि गच्छन्तिः केचि अरनं, केचि रुक्खमूलं, केचि पछतादीनं अतर, केचि चातु- म्महागजिक भवन, केचि वसवत्तिभवन न्ति. ततो भगवा गन्धकुटिं पविसित्वा सचे प्राकखति दक्खिणेन पस्सेन सतो सम्पजानो मुहुत सीहसेय्य कप्पति. अथ समस्सासितकायो उदाहित्वा द्वितीयभागे लोकं प्रोलोकेति.ततिय भागे यं गाम वा निगम या उपनिस्साय विहरति तत्थ जनो पुरेभत्त' दानं दत्वा पच्छा- भत्तो सुनिवत्यो सुपारुतो गन्ध पुप्फादीनि आदाय विहारे सनिपत- ति. ततो भगवा सम्पत्त परिसाय अनुरूपेन पाटिहारियेन गन्त्वा ध- म्म सभायं पात्तवर बुद्धासने निसज धम्म देसेति,कालयुक्त समय युत्त । अथ कालं विदित्वा परिसं उय्योजेति. मनुस्सा भगवन्तं वन्दि - त्वा पक्कमन्ति. इदं पच्छाभत किच्च ( ५६) ३. सो एवं निद्वितपच्छाभत्तकिञ्चो सचे गत्तानि ओसिश्चितुकामो होति वद्धासना उट्ठाय नहानकोटकं पविसिन्वा उपटाकेन पटियादित उदकेन गत्तानि उतु गाहापेति. उपट्ठाकोपि बुद्धासनं आनेत्वा गन्ध कुटिपरिवेणे पआपेति. भगवा रत्तदुपट्टे निवासेत्वा कायबन्धनं बन्धित्वा उत्तरासङ्ग एकंसं कत्वा तत्थ भागन्त्वा निसीदति एकको व मुहुत्तं पटिसल्लीनो. अथ भिक्खू ततो ततो पागम्म भगवतो उपट्टानं गच्छन्ति. तन्थ एकचे पन्हं पुच्छन्ति, एकच्चे कम्मटानं, एकच धम्मसवनं याचन्ति. भगवा तेसं अधिप्यायं सम्पादेन्तो पुरिमयामं वीतिनामेति. इदं पुरिमयाम किश्चं. ४. पुरिमयाकिच्च परियोसाने पन भिक्खुसु भगवन्त वन्दित्वा पक्कन्तेसु सकलदससहस्सी लोकधातु देवतायो श्रोकासं लभमाना भगवन्त उपसमित्वा पम्हं पुच्छन्ति यथाभिसंखातं अन्तमसो चतुर क्खरम्पि भगवा तासं देवतानं पञ्हं विस्मज्जेन्तो मज्झिमयामं वीतिनामेति. इदं मज्झिमयाम फिश्चं. ५. पच्छिमयामं पन तयो कोटासे करवा पुरंभत्ततो पट्ठाय निस- जापीटितस्स सरीरस्स किलासुभावमोचनत्थं एक कोटासं चङ्कमेन वीतिनामेति. ii दुतिय कोट्ठासे गन्धकुर्टि पविसित्वा दक्षिणेन पस्सेन सतो सम्पजानो सीहसेय्यं उ.प्पेति. iii तृतिय कोटासे पञ्चद्वार निसीदित्वा पुरिमबुद्धान सन्तिके दानसी नादिवसेन कताधिकारपुग्गल दस्सनत्थं बुद्धचक्खुना लोक श्रीलोकेति इदं पच्छिमयाम किश्चं. ---
No text on this page.