Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Niyamsaar

Sitalparsad · 2011/07

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- है कि चावतार कथा मिन मकुण्ठपुरनिकासी पानंदिश देख है और जिन्होंने कि घरल जपवलय प्रति कुछ अंग लिखा है, वे ही कुन्दन्दा है। पर यह बात भी हमारी समझमें नहीं आती है। यदि उन्होंने ऐसी कई धति लिसी होती तो उनके समयसार, प्रवचनसार, पंचस्विनय भादि प्रति प्रन्या में कही न कही टमध टदेख या नाम मिलता; पर ऐसा नहीं है। उमास्वामीसे श्रीकुंकुंदाचार्य अधिक प्राचीनयन दूसरा कारण यह है कि भारदा समस्त शाब्रममाओके प्रारममें मंगटावरपके स्में कहा जाता है- मंगष्ठं ममवान् वीरो, भंगलं मौतमो मणी । मंगई कुंददायाँ, जैनपाँच मंगर्छ । परि मास्तानी प्राचीन हो तो पहले टनम ही दम लिया जाता पर ऐसा न पर पीउनास्लामिस्त दावार्पसूत्रो पहने हुए भी यह मेपलावरम पा जाता है। मतः हमारे विपासके भनुमार स्वामी दर्शदाचार्यश्च समय विम्म ..है। ये भाचार्य बड़े प्रावान, सामाभिक, माध्यामिक, बात- समीर जैनधर्मरे ममी हो गये है। अभीतक पारावार्द पंचाम्निश्चय, प्राचनमार और समयसार ये तीन नागिन । मेरी बात समान लिई में नमै भीमपर जो नियममार-रल है, उसी प्रसिदि यहाँ तक मक को उगा नाम भी नहीं जानते। समग भार हुए मैंने परमात चार महीने जयपुरमें शिकाये । पाँ गोर दिगम्बानमन्दिर रोड निवरचन्दने अभिप्रालिये। मरे हालसमें उन्हेंने मी प्रत्य मे देना पाया।मने इस मंदिर हर हम नियममार या दर्शन और गधमप्पयन से दम माया पाएष मैंने उन सभी रोगा भर जाने मदिरा बरपुर निदाउ परी भाप्यामिा परे सेमेसी नमे व मगर इनके हिन्दी अनुसार पहिये मन पर मिल (म प्र पर रेस्टोरल प्रेयर भूमिमा माल्दिी । भाषा-मापियोंको करानेके हेतु इसकी संस्कृतटोराके आधारसे हिन्दीमें टीका लिखनेका संकल्प किया और यह कार्य मिती माघ वदी ८वीर सं.२४३७ से प्रारंभ करके वीर सं. २१८ दीपमालिकाके दिन समाप्त किया। इस प्रपके संस्कृतटीकाधार निर्धन्य मुनि श्रीपध्रप्रभ मलधार देव हैं। इनका समय निषित नहीं है। अनुमानसे ये उमयसारके टीकाकार तथा श्रीपुरषामिद्धा- पायके रचयिता धीअमृतचन्द्रारिके पीछे हुए है। क्योंकि इन्होंने जगह जगहपर समयसारके कलशोका उरेख किया है। ये धकार माध्यात्मिक रसके बड़े प्रेमी थे। इन्होंने अपनी प्रतिमें कई नवीन प्रन्योंके श्लोक 'उच' में दिये है। में अन्य अभीतक प्रगशित नहीं हुए हैं। उनके नाम ये है-मार्गप्रकाश, अमृतीति, एकत्वसप्तति, सत्वानुशासन और पुतरंधु भादि । इस पुस्तकमें पहले मूल प्राक्त गापाका सामान्य अर्थ, और फिर संस्कृत- काके अनुसार विशेष अर्थ लिखा गया है। जिस जगह विषयको अधिक स्पर करने के लिये अपनी भोरसे कुछ लिखा गया है वहीं 'भावार्थ 'पाद लिख दिया है। संस्कृतटीकाकारने प्रत्येक गाथाके अंतमें बहुत धन्दर भोक लिखे है, उन कोंका भयं भी 'काकार कहते हैं। ऐसा लिखकर दिया गया है। में संस्कृत व्याकरण, न्याय, काम्यादिसे मनभिज्ञ है, धर्मशास्त्रों की भी मुझे पूर्ण जानकारी नहीं है, ऐसी दशमें मेरा यह (अनुवाद करनेवा) साहस वाल. पमें हास्यास्पद है । परन्तु इस प्रयके विषयमें मेरे मनमें को भगाय भक्ति उत्पन्न हुई है उसकी प्रेरणासे मुझे इस कार्यों बलात् हाथ गलना पड़ा। संभव है कि मेरी बहानता यामसावधानीसे नहीं कही भूलें रह गई हो, अतः मैं विद्वचनोंसे क्षमा प्रार्थना करता हुआ आता करता हूँ कि वे दयापूर्वक मुझे भलें मूचित करेगे मिससे दूसरे संस्करणमें वे भूलें या त्रुटियों न रहने पाई। शीतलपसाद ब्रह्मचारी। पूसवदी १५ बार ०१४४२ कई .. १४४.

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विषय-सूची। पृष्ट. ४७ ... .. ...१८ मंगलाचरण. विषय- विषय- जीवारिकार १. अस्तिकायका वचन मंगलाचरण और यवनानेकी प्रतिकार द्रव्योंकी प्रदेशसंख्या मोक्षमार्ग और उसकेपलकाकथन ४ अजीवदम्यका संक्षेप नियम शब्दकार्थ मोक्षमार्ग है . शुद्धभायाधिकार ॥३॥ ज्यवहार सम्यग्दर्शनका स्वस्प त्यागनेयोग्य और महणकरने योग्य तत्वों- अठारह दोषोंकि नाम ४९ परमात्माका स्वरूप संसारी और मुजजीवोंमें समानपना" परमागमका स्वरूप दोनों नयों की सफलता छहरव्यों के नाम खत्रयका स्वरूप जीवका लक्षण व्यवहारचरित्राधिकार ।। उपयोगके भेदोका कथन अहिंसावतका स्वरूप स्वभाव विभाव पर्यायोंका कपन २६ सत्यमनका स्वरूप चारगतियोंका कपन अचार्यप्रतका खरूप कर्ता भोकापनेका कपन ब्रह्मचर्येवतका स्वरूप दोनों नयोकी सफलता परिप्रहत्यागमता कथन अजीवाधिकार।। ईयोममितिका क्षण पुलाव्य के भेदोंका कथन भाषासमितिका स्वरूप परमाणुका लक्षण एपणासमिति स्वरुप स्वभाव विभावपयायका सरूप १९ भादाननिक्षेपणसमितिका स्वरूप .. पुल व्यका संक्षेपाप प्रतिष्ठापनासमितिका लक्षण धर्मादियों का स्वरूप मनोगप्तिादिवा सप स्यपदार कालके भेद भरहन आदि पांच परमेटियोध मुरयाका कपन ... ... ... ... . ... . ... ... ... स्वरूप वर्णन

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पूर. विश्य.
केवलकानका स्वरूप
.....कारण परमात्माका स्वरूप
गुण गुणीमें मभेद है
२०५ मोक्षके होनेके हेतु
देवली के न होनेसे धका
मिस्भगवानके स्वभावगुणोंका कथन
अभाष
सिद्धक्षेत्रके आगे जीव पुलके न जा.
जानीक पका अभाव
नेका तु
पंधके न होने हेतु
अंधकारको प्रार्थना
शुरजीवको स्वाभाविक पति होनेका | भव्यत्रीदको शिक्षा
कपन
...२.१/पालक रचनेका प्रयोजन
२२.
...२१९
...
...
२१८
...
...
इति विषयसूची।
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T. निम्म. निभावनिमगणाषिता।" ... प्रीकमागमन नमामिको मोगग १५१ म्यानदारनामोमाई....." पारमारिकार?" पाहार प्रतिरमण होनेका ग.. परममगिरे. निभपयाममारिका मिदमणि निवपप्रत्यारमानात ... 11निरमाम-मनिकाय अपने गुचमाचमान पर. निशय मोगभन्हिकासल ...18 मेघ उपदेश मिपावश्याकार" सरि मारेस्पागनेही निभय आपल्या लक्षण ...माराका ७. भारमाके दोर हुने स उगय २. पराधीनमुनिका र निधय प्रत्याग्यानके योग्य नियमास्याही मालिका उपाय 16 जीवन सस ...११७ मावस्यको रहितको गहिरामा ने निश्चपालोचनाधिकार। कपन निश्चम भालोचनाका स्वरूप ..१२७ बाम अभ्यंतर पचन स्यागका आलोचनाके भेद उपदेश उन मैदोश स्वस्प ... १२९) शुमध्यानको उपादेयपना १८. निश्चयप्रायश्चित्ताधिकारी मौनत्रतको उत्तमताच कथन...१८r निश्चय प्रायश्चित्तका स्वरूप ... वनविवादके त्यागका उपदेश... १८५ क्रोधादि कपायोंके जीतनेका आवश्यककर्मका अतिमफल उपाय १३९ शुद्धोपयागोपिकार ।१२। मत तपको प्रायश्चित्तस्वरूप होनेका कपन ९४२) ज्ञानीजीवके स्वपर प्रकाशकपना निधयकायोत्सर्गका स्वरूप ...4 केवलोके शान दर्शनदोनों एकसाथ होते परमसमाप-अधिकार।९। है उसका ध्यंत सहित कयन... १९१ निश्चय परमसमाधिका स्वरूप,.. ४०' स्वपरप्राथपने में विशेष परिहार ११२ ...tv १२७

-
...
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विरय.
पृष्ठ
दिश्य.
पृष्ट..
केवलझानका स्वरूप
२..कारण परमात्माका स्वरूप
गुण गुणी में अमेर है २.५ मोक्षके होनेके ।
केवलोकेरके न होनेसे बंधका
मिसभगवानके स्वभावगुणोंका कथन
अभाव
सिक्षेत्रके भागे जीव पुलके न जा.
शानी संघका अभाव
बंधक न होने हेतु २.८ ग्रंथकारको प्रार्थना
शुरुजीवको स्वाभाविक गति होनेका भव्यजीवको शिक्षा
कथन
२.१ शाके रचनेका प्रयोजन
२२.
२.६ का हेतु
...
...
इति विषयसूची।

- BA गाथा-सूची। (अकारादिकमसे) यापा पृ.सं.गा.. पृ. से.गा-सं. ... २५/११ ... ... भत्तारामार्ण साभावेण पुणे ...१९1104 भायूल पूलभूत हावं वर्ण ...१.४१७४ अणुसंधावियपेण दु २४॥२. उ भणणियवेक्खोजो ... २०२८ | उभिने गेहो मतादिभत्तमजी उत्तमबई भारा ....१.११ अंतरपहिरजपे १७५1१५.| अम्मग्ग परिचत्ता अमहदारण ... mins उसद्दादिमिणपरिंदा १९५/१४. अपसम्म पेषादि ...१९॥ प मापा परप्पयामो 800 एको मे सासदो अप्पा 11.2 अपार्ण वितुणार्ण ...२.५1१0एगो यमरदि जीवो ११41101 बरसमस्यमा एदे एव्याणिय भष्वापाहमाणिदिय ...११.] एदे सम्ये भावा बसरोगविणारा Art एयरसस्था आ हरिसय भाषणाए १६ আয় पारस्य एण पुणो एरिसभेदाभसे .... मादा मम गाणे भारणार ... १४ बालोयणमाउण १९८1. भोभारा ..."000 पाउस १७. बदमदाणमोदण भावासएक एपो. ...mivoम्ममहरिहरन मागास एक शुतो valsम्मादोबार ... ...111..एवं भेदम्मा ... ।

(२) ... ... .....1100 ... २०५॥१२ ... (ars ... पापा पृ० सं० मा.सं. पृ. संगा-सं. कापकिरियाणियत्ती जाद महदि काले १८३१५ कायाइपरले १४२१/ बस्स यगो दुदोसो दु... १५५१२८ कालस्समोहसण्णा ८२६६ अस्स समिहिदो अपा... १५॥१२७ कि काहदि वणवा १५.११२४ जाइजरमरणरहिट किं बहुणा मणिएण दु... १४0110) जागदि परमदि सर्व कुलजोणिजीवमग्गण जाणतो पस्तो केवलमिदियहिर्य १९११ जा रामादिमियती केवलणाणसहावो ...११२९६ जारिसया सिद्धप्पा कोहादिसगम्भाव १३८111४ जिशकहियपरममुत्ते १८४१५ कोहं खमया मा १३९११५ जीचा पोग्गलकाया जीवो उपभोग्ममओ १८11.. गमणाणिमित्तं धम्म m२ जीवादु पुग्गलाशे ४१३. गामे वा जयरेवा जीवादीदवाणं v५३२ ७२०५८ जावादि बहित 51३८ बावाण घुग्गलाणं ...२११०४ पणपाइकम्नाहिया ८५/७१ जुगर्व वदणाणं ...१९११. जो पस्सदिअपाणं १२९1१.१ बडगाभवममणे ५५४२ श्री समो सवभूदेमु चाउदभेदा मणि २८110 धोदु च च ... १५५१२९ चमा परम भोही २॥१४ ओ३ पुणे च पाव च... १५६५. यतापगतिमा १-२४८८ चलमलिगमगात ओदुग सोग १५111 (५२ को दुर्गा मयं दे १५४१३१ छायातपमादीया २५.२३ बोदुधम्म व मुहंच... १५८११२३. परदहमारयेसो बोगदि मनमो ...felm जो परदि संजदो सल... Mumme मिति मे दुचरित ११.५ जो पम्ममुग्माण ...10011५1 ... ... ... ...१५२१२१ ... ... " ... ... २.11७५ गोकम्मरम्मरहिये ५९४१ ... 41. ... ... ... पापा पृ.सं. गा.सं. जियम जियमस्स फर्स ...141८५ माणितीणो साहू ..... णियमावणानिमित्त २९०11८. शिव्याणमेव सिया २११८३ पिस्सेसदोसरहिको उपणियाविहारा . म गोसायभावठाणा माकम्भधा ८७/७१ को पल सहावाणा ताणेतमवेणस ...१४३11ो ठिदिवधाय ममिऊण जिर्ण वीर परम्परयतिरियमुरा गवसो अवमो अवस १६९/१४२ तस्म मुहम्मदयणं पवित्र गवि सुक्ख २१३१४१ तहदसणउपभोगो दिदिय उपसम्गा २१४॥२८. गदिम्म भोकम्म गाणा जीवा गाणा गाणं परप्पयास माणे प, महदि १९४198|मगुणपत्रयाण १५ गाण प, अप्पा पर ...11वथिएण जीवा गाणे अप्पापयास .... गाणं बीपसर्व .....100/भाउपटास पुणो गाईपरयभावो १२. ५ माई मग्गणटाणो ११८ पंचाचारसमग्गा भाई बाल्ये हो परिकमणणामधेये .1.111४ पाईरगो दोसो (पदिकमणपदि किरिय... 1411५१ गई हो माणो |पडिमिदि अणुभाग 1941 पिसायस्य दातस्स १२../परिवत्ता परभाव १ve णिग्गयोणारागो ... Sam | परिणामपुलपरणे पिई णिदो पासुकभूमिपदेखे पियमेष यकर्ष ५३ पामुगभगेश दिया गिमर्म मोक्सउपायो ... vn पियादि मुंगा ...... पुण्यनगदमाग २१५/१८ बराचौरमत्तक ...ग इनिडर ... ... ... ... ... ... ... १५ पुग्गलद मोत (४) ... ... यालोयं जागइ ... 14. ... १८1५1 ...11१२१ ... ...१५९४१२५ गाभा पृ.सं.मा.सं. पृ.स.ना.म. पुचुतसपलदब्ये ...२.11150ोयायामे ताव ४५६ উনুশষ্ট पोग्गलदर्य उच्च ४०1३९ पोपदकमंडलाई RIY बंधणदणमारण वादि जो सो समो वगरमगंधकामा भूपव्वदमादीया वरममिदिमोलसंजम वयशमयं पडिकम मग्गो मापदंतिय वयशोचारणकरिव ૪૨ ववहारणयचरित्ते ६८1५५ मदमाणमायलोहति १३५११ वाचारविममुडा ममति परिवद्यामि ...१५९९ विवदि केवलप माणुस्सा दुबियप्पा २८1१६ विरदी सयमावचे मिच्छत्तरहुदिभावा ........ विवरीयाभिाणसे मिच्छादसणणाम विवया, जो जुजदि... 6411 मुत्तममुत्तं दर्द ......11६७ संखवासखेवा ७३५ मोसंगयपुरिसाणं १६१३५/ संजमणियमतवेभ दु १४९1१२३ मोस्वपहे अप्पाणं १६२३९ सम्णाणं चउभेमें १९१२ मोराण मारई ...१.२८९ समयावलिभेदेशदु ४२१३२ मोतण भणायार सम्मत्तणाणचरणे १५९४१२४ मोग वयणरयणं सम्मत्तस्य शिमित्तं मातण सयलअप्प सम्मत्त सम्पयनं (८1५४ मोश सदमा सम्म में सबभूदेस १२२४१.४ रयगतयरंजना सदविअप्पामाचे १६४१३८ 11 गपेग दोसव सब्बे पुरागपुरिसा ययादीपरिहारे १६०१५ सम्वेति गंधा महअमुहायपरय mint. गर्ने निह एणे १८॥१५-1 मुहुमा कति पंपा इति गायाधी। १ ... ... ... ...1000 ... ... ... " शुद्धिपत्र । [भापाटीकाका दी गापा चाहिये ..... ५वी गापा ४पी पाली ५ पंकि .....१५ भामारे मोदी १९...१५ जिनेन्द्र निमोहीभात्मा २७.... भाद से भार याजपन्य परमाणु सम या विरम किणीसे बंधको प्राप्त म होगी यह निषेध है। असश्यात ४७...11 सेग्प्यात है भष्य १२...भव्य रियोंसे १५...1. उस मिभ्याधष्ट यह मिभ्याधि सम्माष्टि यद्यपि प्रथम अवस्था में पलने १७... घरमें ७६...१४ मुख्य मुख ७.... भाव होनेगर कर्मका उदय होनेपर भी 41.... करानेवाले ऐरो. होते हुए संसारके त्यागके निमित्त सारके निमित्त देहादियो तथा ११....सहित "..... आगो १५...२१ सयय १२९...विमान ११९...१५ योगी भागे समय विहानके योगी निषयसे १५५...११ (1) अयोर उनके रागदेर हो ही नहीं गहने (१२वी गागा नाहिये) १५..... मस्र्य भव्य १६९...१८ पमध्य अर्थात् अर्यात परदश्य युणि १७४... परमभाव परमात्र १७९... स्थान स्थानमे से "में गुणस्थान तक १८....११ समस्या समता 14....१५ मंद भेद १९१... ८ अनुभवमे अनुभव [संस्कृतटीकाका ।] १९...२२ दभय दमृत १९...२३ नवि नयवि २२...२३ कंघ स्निग्ध २५.... त्वाद् शुद्धः लादशुभः २५...२३ विफल्पे विकल्पे ३२..." परमदव्य पदव्य ३७... दींद्रिय द्वौद्रियादिय २७...१२ चिरडीके विच्छक्ति ५..... पण्डं गजुणा मझं, गच्छेन ५....५ देव सहजन्माण णादेव भई जम्हा ५१...४ युक्त ५१.... चाशुभ च शुभ ५३...१२ केश लेश ५५...१५ वहा वहार प्रह ४ गै ७५.... गर्म ७५...५ सुर पर ७९...1५ विष ५... भुक्त्य विध मुरत्ये बाहि 44...११ प्राप्त १५.... मुदयक ९....८ माव १९...११ प्रणामा १४...२ भाषा १५...२. भोदय 1.....१८ मस्ताव १५...१२ प्रदि १२५.... पमरा १२५...१८ गुणे १२५...२. पान्ति १२९... कारेनि ११....५ क्षणाम ११... स्वन ११५.....ता १४१....९धी m... का १५१...५ कम प्रास्त मुदयक माम्मनाक प्रणमा भाव भादेय मस्ता बोदि परा गुरो याति क्षणम कर्म तान्तर्मुख मुर्ति तिगत १५१...१. भक्ति १५४.... लिये पेत .

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मार्म भरदान माया
ॐ
बीकादर, (गातार
नमःशुद्धस्वरूपाय ।
श्रीमत्वन्दकुन्दाचार्यविरचितः
नियमसार
श्रीपामभमलधारिदयविरचित-तात्पर्यवृत्तिसहित ।
.
त्वपि सति परमात्मन्मादृशान्मोहमुग्धान्
क्थमननुवंशत्वान्युकेशान्यजेऽहम ?
भुगतमगंध या वागीशं शिवं वा
जितभवमभिवन्दे मामुरं श्रीजिन वा ॥
वाचं वाचंयमीन्द्राणां वक्रबारिजवाहनाम ।
पन्दे नययायनबाच्यसर्वस्वपद्धतिम् ।।
सिद्धान्तोदयश्री सिद्धर्मनं
ताजा भट्टपूर्वाकरकम् ।
भन्दाधीन्दु पूज्यपादं च वन्ने
तद्विद्याश्यं वीरनन्दिं मतीन्द्रम।
अपवर्गाय भव्यानां गुदये स्वात्मनः पुनः ।
वक्ष्ये नियमसारस्य वृनि तात्पर्यसंशकाम् ॥
बत कामस्य पशलम एपा तान् । नवनि-
विष्णुमय यो देवा तान् इनिमित्यर्थः । ४ महो।

२ नियममार- *AAMA-- गुणधरमणधग्रचित श्रुतधरमन्ताननस्तु मुन्यनम् । परमागमार्थसाथै वकुममुं के वयं मन्दाः॥ अपिघ- अस्मा मानसान्युच्चैः प्रेरितानि पुनः पुनः । परमागमसारस्य रुच्या मांसलयाऽधुना ।। पंचास्तिकायपदन्यसप्ततत्वनवार्यकाः । प्रोताः सूत्रकृता पूर्व प्रत्याख्यानादिसत्कियाः । अलमलमतिविस्तरेण स्वस्ति साक्षादरमै विवरणाय । अन सूत्रावतार- अथात्र जिनं नत्वेत्यनेन शास्त्रस्यादावसाधारण मङ्गलमभिहित। णमिऊण जिणं वीरं अणंतवरणाणदंसणसहावं । वोच्छामि णियमसारं केवलिमुद्केवलीमणिदं ॥ १ ॥ नत्वा निनं वीर अनन्तवरज्ञानदर्शनस्वभावम् । वक्ष्यामि नियमसारं केवलिश्रुतकेवलिभणितम् ॥ १ ॥ नत्वेत्यादि-अनेकजन्माटवीं प्रापणहेतून समस्तमोहरागद्वेषादीन जयतीति जिनः । वीरो विकान्तः, वीरयते शूरयते विक्रामति फारातीन विजयत इति वीर:--श्रीवर्द्धमान-सन्मतिनाथ-महतिमहावीराभिधानः सनायः-परमेश्वरी महादेवाधिदेवः पश्चिमतीर्थनायः त्रिभुवनसचराचर- द्रव्यगतिपायोक्तसमयपरिच्छित्तिसमर्थः सकलविमलकेवलज्ञानदर्श- नाभ्यां युक्तो यस्तं प्रणम्य वक्ष्यामि कथयामीत्यर्थः । के, नियमसारं, नियमशब्दस्तावत् सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेषु धर्तते, नियमस्य सार इत्यनेन शुद्धरत्नत्रयस्वरूपमुक्तम् । किंविशिष्टं, केवलिश्रुतकेयलिमणितं केवलिनः नापतिः। ३ ----- सकरप्रत्यक्षशानघराः, श्रुतकेवलिनः सकलद्रव्यश्रुतधरास्ते. केवलिमि श्रुतकेवलिभिश्च मणितं सकलभव्यनिकुरम्बहितकर नियमसाराभिधानं परमागर्म वक्ष्यामीति शिष्टेष्टदेवतास्तवनानंतर सूत्रता पूर्वरिणा श्रीकु. न्दकुन्दाचार्यदेवगुरुणा प्रतिज्ञातम्, इति सर्वपदानां तात्पर्य्यमुक्तम् । जयति जगति धीरः शुद्धभावास्तमारः त्रिभुइनजनपूज्यः पूर्णवोधेकराग्यः । नतदिविजसमाजः प्रास्तजन्मदुधीजः समवसतिनिवासः केवलप्रीनिवासः ॥ मोक्षमार्यतत्कलस्वरूपनिरूपणोपन्यासोऽयम्,- मग्गो मग्गफलंति य दुविहं जिणसासणे समक्खादं । मग्गो मोक्सउपायो तम्स फलं होइ णिव्याणं ॥२॥ मार्गा मार्गफलमिति द्विविध निनशासने समारख्यातम् । मार्गो मोक्षोपायः तस्य फल भवति निर्वाणम ॥ २ ॥ 'मम्यग्दर्शनशानचारित्राणि मोक्षमार्ग' इति वचनात् । मार्गस्ताव- इधरत्नत्रयं, मार्गफलमपुनर्भयपुरन्धिकास्थलभालस्थललीलालेकाति- लपता । दिविधं क्लिदं परमवीतरागसर्वज्ञशासन चतुर्थशानधागि पूर्वमूरिभिः रामाव्यात परमनिरपेक्षतया निजपरमात्मतत्व राम्यश्रद्धान- ररिजानानुपानशुद्धानप्रयात्मकमार्गो मोक्षोपायः । तस्य शुद्धग्लश्यम्य फलं स्वास्मोपलब्धिरिति- सचिनति कामिनीरतिसमुत्रनसौख्यं जनः चरिदविणरक्षणे मतिमिमा च चले पुनः । फर्विजिनवरस्य मार्गमुपलभ्य प: परितो निमारमनि रती भजति मुनिमंत. हि सः । अन नियमसान्दप सारस्वप्रतिपादनवारण भावानवपस्याभुनर- .

नियमसार- जियमेण र कर्ज तणियमं गाणसणचरित। विवरीयपरिहरत्थं भणिदं रालु सारमिदि ययणं ॥३॥ निगमेन न गकार्ग म नियमो शानदर्शननारियम् । तिमिसगरी भगिन गनु मागमति यननम् ॥ ३ ॥ यमानरमपरिणामिप्रभावित भागनन्नतुपामग्रमः शानानारिणाम म निगमः । नियमन गनिधन पत्र जन गानाशनमानि याता, नागर संगु जि पदार Farat निशातगयोगमक मा निगमलार र रेप मा।। दर्शनमषि-भगापरमात्ममुगाभिनय गुमानमारियागमभामियाने निजगुदीमानिाप- भदानमे सति । नारित्रमणि-निवपशाना- AuTIArमन विरथिनि । आयतु नियमान (Primarरिहागन समिति माणितं माता Affaमन जिमनुनम पापानम । मानिनो ममुद्रामनगर गामि । Aarum Hurt गिपर्म मौसमस्यायो नागफट हरति परमणियाणे। गर्मि निफपिय पर्मयाच्यणा होई॥५॥ Fani rimaturi in a प्र मान॥॥ Infirmaantar Tirte karmiref ritin armanागा

मारपर्यवृत्तिः।
५
AN
दर्शन,-मिदं पारिनमित्यनेन विकल्येन । दर्शनज्ञानचारित्राणां लक्षणं
वक्ष्यमाणभूत्रेषु ज्ञातव्यं भवति ।
मोक्षोपयो भवति यमिना शुद्धरत्नत्रयात्मा
स्वात्मज्ञानं न पुनग्परं दृष्टिरन्यापि नैव ।
शीलं तावन्न भवति परं मोनुभिः प्रोनमेत-
बुद्धा जन्तुर्न पुनरुदरं याति मातुः म भन्यः ।।
व्यवहारसम्यक्त्वम्वरूपाग्यानमेतत-
क अत्तागमतशाणं सराहणादो हवेइ सम्मत्तं ।
वयगयअसेसदोसो सयलगुणप्पा हवे अत्तो ।।५।।
आसागमतत्तानां श्रद्धानाद्भवति सम्यक्त्वम् ।
व्यपगताशेपदोपः सकलगुणात्मा भवेदामः ॥ ५ ॥
आप्तः शंकारहितः । शंका हि सकलमोहरागपादयः । आगमः
न्मुखारविन्दविनिर्गतसमस्तवस्तुविस्तारसमर्थनदक्षः चतुरवचनसंदर्भः ।
बानि बहिस्तत्वान्तस्तवपरमात्मतत्वभेदभिन्नानि अथवा जीवाजी
शास्त्रमंबरनिर्जराबन्धमोक्षाणां भेात्सप्तधा भवन्ति । तेषां सम्यकद्धान
यवहारसम्यक्त्वमिति ।
मवभयभेदिनि भगवति भवतः कि भनिग्न न शमम्ति
तहि भवाम्बुधिमध्याहमुसान्तर्गतो भवति ।।
अष्टादशदोपस्वरूपाण्यानमेतत्ः-
हतण्हमीररोसो रागोमोहोचिंताजरारुजामिच्चू ।
स्वेदं खेद मदो रइ विहिणिद्दा जणुध्वेमा ॥६॥
क्षुधा तृष्णा भयं गेपो रागो मोहश्चिन्ता
जरा रुमा मृत्युः । स्वदः खेदो मदो रतिः
विस्मयनिद्रे जन्मोद्वेगी ॥६॥

६ नियममार- । असातावेदनीयतीमंदोदारी शुधा । अमानदिनीपतीवीरता- मंदमंदतरपीडया ममुनाना पा । इहलोकालोकामानिन वेदनाकस्मिकमेदान समया माति मयम् । कोधनम्य गर्न अपरिणामो रोपः । रागः प्रशनोप्रशम्नान, दानशीटोनामगु- हजनवैयावृत्यादिसमुद्भवः प्रगनगगः, मीराजगोगमकाविरुयादा- पाकर्णनकौतूहलपरिणामो यशम्नरागः । चातुवर्यमगरवामन्यगनो मोहः प्रशस्त इतरीऽप्रशस्त एव । चिन्तनं धर्म-शुमा प्रशस्तमितरद- प्रशस्तमेव । तिर्यडमानवानां क्यःकृतदेहविकार एव जग । वानपिनाले प्मणां वैषम्यसंजातकलेवरविडिव मना । मादिनिधनमूर्नन्द्रियविजानीय- भरनारकादिविमानन्यभनपायविनाश एवं मृत्युरित्युकः । अशुमर्म- विपाकननितशरीरायासममुपजातपूतिगंधमम्वन्धवामनावासितवाहिन्दु संदोहः स्वेदः । अनिष्टलामः खेदः । सहचतुगकवित्वनिषित- जनताकर्णामृतम्यंदिसहनशरीरकुलवलेश्वगत्माहंकारजन्मा मदः । मनोज्ञेषु वस्तुपु परमा प्रीतिरेव रतिः । परमममरसीमावनापरित्य- क्तानां कचिदपूर्वदर्शनादिग्मयः । केवलेन शुभकर्मणा, केवटेनाशुभ• कर्मणा,मायया शुभाशुभमिश्रेण, देवनारकतिर्यमनुष्यपर्यायपूत्पत्तिर्जन्म। दर्शनावरणीयकर्मोइयेन प्रत्यस्तमितज्ञानज्योतिरेव निद्रा । इष्टवियो- गेषु विक्लवभाव एवोदेगः । एभिर्महादशेषाप्तात्रयो टोकाः । एतेविनिर्मुनो वीतरागसर्वज्ञ इति । यथा चोक्तम्- "सो धम्मो जत्य दया सोधि तवी विसयणिागहो जन्य। दसअददोसरहिओ सो देवो णास्थि संदेहो " ॥ तथा चोक्तं श्रीविद्यानंदिस्वामिभिः- अभिमतफलसिद्धेरभ्युपायः सुबोधः सच भवति सुशास्त्रातस्य चोत्पनिराप्तात् । ऋषिमुनियस्यनगारभेदात् ।

-msnavinnn मायामः। -~-~ इति भाति म पूज्यतत्यसादामपुरः नहितमुपकार माधवो विस्मरति ।" तथा धोनम- शतमरदातपूश्या भाग्यसदोधराज्य: स्मरतिरमुरनायः मास्तदुधाष्टयूध । पदननग्नमाली भन्यपशुमारी दिशतु शमनि मो नेमिरानन्दभूमिः ॥" तीर्थकरपरमदेवस्वापारयानमेतत:--- णिम्सेसदोसरहिओ केयलणाणाइपरमविभवजुदो। सो परमप्पा उबइ तविवरीओ ण परमप्पा ।। ७॥ निषदोषरहित केवरज्ञानादि-परमविभनयुन । स परमात्मोच्यने नद्विपरीतो न परमात्मा ॥ ७॥ आत्मगुणपातकानि पानिकर्माणि शानदर्शनावरणान्तगयमोहनीय- कर्माणि तेषां निरवशेषेण मधंगानिःशेषदोपहितः, अथवा पूर्वसूत्रोपात्ता. यादशमहादापनिर्मूलनानि शेषदोपनिर्मुन इत्युक्तः । सकलविमलकेवल. बोधवलाष्टिपरमवीतगगात्मानन्दापनेकविभवसमृद्धः । यस्त्वेवविध त्रिकालनिगवरणनित्यानंदेवस्वरूपनिजकारणपरमात्मभावनोत्पन्न कार्यपर- मात्मा म एव भगवान् अर्हन् परमेश्वरः । अस्य भगवतः परमेश्वरस्य विपरीतगुणा मकाः सर्वदेवाभिमानदग्या अपि संसारिण इत्यर्थः । तथा चोनं श्रीकुंदपुंदाचार्यदेवैः- "तेजोदिहीणाण ही सोकसं तहेव सिरिय । तिटुषणपहाणदाय माहणं जम्स सो अरिहो” । नया घोनः श्रीमदमृतचदमूरिभिः- "कान्त्येव स्नपयन्ति ये दश दिशो धाम्ना निधन्ति ये - ६ नियमसार- Hinux. असातावेदनीयतीवमंदक्लेशकरी शुधा । असातावेदनीयतीवतीनता- मंदमंदतरपीच्या समुपजाता तृपा । इहलोकपरलोकात्राणारगुप्तिमाग- वेदनाकस्मिकभेदात् सप्तधा मवति मयम् । क्रोधनस्य सस्ती वपरिणामो रोषः । रागः प्रशस्तोऽप्रशस्तश्च, दानशीलोपवासगु- रुजनवैयावृत्यादिसमुद्व. प्रशस्तरागः, स्त्रीराजचोरभक्तबिकथाला- पाकर्णनकौतूहलपरिणामो ह्यप्रशस्तगगः । चातुवर्ण्यभ्रमणसंघवात्सन्यगतो मोहः प्रशस्त इतरोऽप्रशस्त एव । चिन्तनं धर्म-शुक्ररूपं प्रशस्तमितरद- प्रशस्तमेव । तिर्यडमानवानां वयकृतदेहविकार एवं जरा । वातपित्त-ले- धमणां वैषम्यसंजातकलेवरविपीडेव मना । सादिनिधनमूर्तन्द्रियविजातीय- नग्नारकादिविभावव्यअनपायविनाश एव मृत्युरित्युक्तः । अशुभकर्म- विपाक ननितशरीरायाससमुपजातपूर्तिगंधसम्बन्धवासनावासितवार्विन्तु संदोहः स्वेदः । अनिष्टलाभः सेदः । सहाचतुरकवित्वनिखिल जनताकर्णामृतस्य दिसहजशरीरकुलवलेश्वरात्माहकारजन्मा मदः । मनोज्ञेषु वस्तुषु परमा प्रीतिरेव रतिः । परमसमरसीभावनापरित्य- मानो कचिदपूर्वदर्शनाद्विस्मयः 1 फेवलेन शुभकर्मणा, केवलेनाम- कर्मणा,मायया शुभाशुभमिश्रेण, देवनारकतिर्थडमनुष्यपर्यायेपूत्पत्तिर्जन्म। दर्शनावरणीयकर्मादयेन प्रत्यस्तमितज्ञानज्योतिरेव निद्रा । इष्टवियो- गेषु विश्वभाव एवोदेगः । एभिर्महादोपैया॑प्तात्रयो लोकाः । एतेविनिर्मुक्तो वीतरागसर्वश इति । यथा चोक्तम्- "सी धम्मी जत्न दया सोवि तो विसयणिामही जत्य। दमभहदोसरहिओ सा देवो णयि सदेहो"। तथा चौक श्रीवियादिम्वामिनि:- " अभिमतमलसिन्युपायः सुबोधः सच भरति मुशामानम्प चोत्पनिरापात् । १ ऋषिमुनिययनगारमेवार। - t भारनिः। नि भवति स पूरयन भगादामधुनः नहि समुपारं गायो विमति । मया धोन- शतमररशतपूज्य माम्पसदोधराज्य: मरतिरमुरनाथ प्रास्तष्टाष्टयूए । पदननगनमाली भन्यपशुमाली दिशतु शमनिशं नो नेमिगनन्दभूमिः नीपिकरपरमदेषम्यम्पारल्यानमेततः-- जिम्मेसदामरहिओ केयलणाणाइपरमविभवजुदो । मी परमप्पा उस तविवरीओ ण परमप्पा ॥७॥ निरोपदीररहित कारमानादि-परमविभयुन । म परमात्माच्यने नद्रिपरीतो न परमात्मा ॥ ७॥ आत्मगुगपातकानि पानिकर्माणि शानदर्शनावरणान्तगयमोहनीय- चर्माणि तां निररोगेण मनसाभिशेपदोपहित', अयश पूर्वसूत्रोपात्ता. टादशमहादापनिर्मुलनाभि शेपदापनिर्मुक इत्युनः । सकलविमलकेवल- धाधवलाष्टिपरमवीतरागात्मकानन्दायनकविभवसमृदः । यस्त्वेवविध विकासनिरापरणनिन्यानदेवस्वरूपनिजकारणपरमात्मभाश्नोत्पनमार्यपर- मात्मा ग एवं भगशन अर्हन् परमेश्वरः । अस्य भगवतः परमेश्वरस्य विपरीतगणामका सर्वदेवाभिमानदग्धा अपि संसारिण इत्यर्थः । तथा धोनं श्रीदुरवंदाचार्यदेवे । " तेगोदिहीणाण बडी सोकसं तदेव ईसरिय । तिहुधणपहाणाय माहणं जस्म सो अरिहो" ॥ तथा चेनि श्रीमदतचद्रमूरिभिः- " हान्त्येव स्नपयन्ति ये दश दिशो धाना निरुंधन्ति ये ' नियममार- 44 Marma Ans-rn -un--- - . धामोदाममहरिना जनमनी मुध्यति ये। दिव्यन वनिना सुरां श्रवणयो. माझामनोमनं वंधारतेयमारक्षगगनश्चिराः मुग्यः" तथाहि- जगदिदमजगच्च जाननारेबहान्न- भ्रमरवदधाति प्रमुलं यम्य निन्यं । नेमविकलयदेह नेमितीयकरण जलनिधिमपि दोऱ्यांमुत्तराम्युदर्वाचिम् । परमागमस्वरूपाम्यानमेततः-- तस्स मुहग्गदवयणं पुवावरदीसविरहियं मुद्धं । आगममिंदि परिकहिय तेण दुकहिया हवंति तच्चत्था ॥८॥ तम्य मुखोद्गतवचनं पूर्वापरदोषविरहित शुद्धम् । आगममिति परिकथितं तेन तु कथिता भवन्ति तत्तायाः॥ ८॥ तस्य स्खलु परमेश्वरस्य वदनवनजविनिर्गतचतुरबचनरचनाप्रपचपूर्खा- परदोषरहितः, तस्य भगवतो रागाभावात् पापसूत्रवद्धिमादिपापक्रया- मावाच्छुद्धः परमागम इति कथितः । तेन परमागमामृतेन भव्यैः श्रव- णाझलिपुटपेयेन मुक्तिसुन्दरीमुखदर्पणन संसरणागिनिधिमहावर्तनिमग्न- समस्तभव्यजनतादत्तहस्तावलम्बनेन सहजवेगग्यमामादशिखरशिखा- मणिना अक्षुण्णमोक्षप्रासाइप्रथमसोपानन स्मरभोगसमुद्भूताप्रशम्तरागांगागः पच्यमानसमस्तहीनजनतामहल्लेशनिर्नाशनसमर्थसजलजलइन कथिताः खल सप्त तत्वानि नव पदार्थाश्चति । तथा चोकं श्रीसमन्तभद्रस्वामिभिः- 1 तमपि फिल यजेहमिति पाटालरं । Pra मापतिः। १ " -- अन्यूनमनतिरिनं. पापातथ्य दिना व विपरीतात । निःसन्देहं वेद पदारम्तमानमामिनः ॥ रतिनलानित पुन निर्माणकारणकारण निरिग्रमविनामेनस्वर्णाकृतं जिनमदर । भापरिभरपन्यासिन्विषो म जाँ प्रतिदिन बन्दे बन्द सदा जिनपोमिभिः । अब दण्या पृथया नामधेयमुन:- जीवा पोग्गलकाया धमाधम्मा काल आया । तथा इदि मणिदाणाणागुणपजएहिं संजुत्ता॥९॥ भाषा पुढल्काया. धर्माधर्मों न कान्द आकाशं । तत्त्वार्थी इति भगिताः नानागुणपरयायैः संयुक्ता ॥ ९ ॥ स्पर्शनासनप्राण श्रोत्रमनोशारापापुरुच्याप्तनिवासाभिधानई- माभिः माण. जीवति नीविष्यति जीपति (म) पूर्वी या जीव. समहनयां- पमनः । निश्चयेन भावणधारणाली । म्यवहारण द्रव्यमागधारणा- जीवः । शुद्धसतम्याहारेज केवलसानादिशद्धगुणानामाधारभूतत्वात कार्यनीयः । अनुदसतव्यवहारण मतिज्ञानादिविभावगुणानामाधार- भनवाद कारणदीव अदं वेतनः । अस्य चेतनगुणाः अपसमून. । यापूनगुणाः । अयं मुद्रः । अभ्य शुदगुणाः । अयमभुदः । अस्या- गुणाः । पर्यायच । तथा गठनपूरणबभारसनाथ पुगतः । श्वेतादि- शर्माधारो मृतः । अन्य हि मूर्तगणा । अयमननः । अस्यांचेतनगुणाः । विभावविभावगतिक्रियापरिणतानां जीवपुदलानां गतिहेतुः स्वभावरिभाषस्थितिपरिणतानां ने स्थितिहेतुरधर्मः । पंचानामविकास- रानलक्षणमाकार । पंचाना पर्तनाहतुः कालः । चतुर्णामभूतानां शुदगुणाः पप्यायाधता तथाविधान। । धर्मः ।

नियममार-
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इति जिनपतिमार्गामौधिमध्यस्थाने
द्युतिपटलनटालं तद्वि पद्यनातन ।
ददि मुनिशितबुद्विर्भूषणाय विधने
स भवति परमश्रीकामिनीकामरूपः॥
अवोपयोगलक्षणमुक्तमः-
जीवो उवओगमओ उवओगो णाणदसणो होई।
णाणुवओगोदुविही सहावणाणं बिमावणाणं ति॥१०॥
जीव उपयोगमय उपयोगी जानदर्शनं भवति ।
ज्ञानोपयोगो द्विविध स्वभावज्ञानं विभावज्ञानमिति ॥१०॥
आत्मनश्चैतन्यानुवती परिणामः स उपयोग।अयं धर्मः । जीवो धर्मी।
अनयोः सम्बन्धः प्रदीपप्रकाशवत् । ज्ञानदर्शनविकल्पनामा द्विविधः । उत्र
ज्ञानोपयोगोपि स्वभावविभावभेदात् विविधो भवति । इह हि स्वभावज्ञानम्
अमूर्तम् अव्यावाधम अतीन्द्रियम् अविनम्वरम् तच्च कार्यकारणरूपेण
विविध भवति । कार्य तावत् सकलविमर केवलज्ञानम् । तस्य कारण
परमपाग्णामिकमारस्थित त्रिकालानिरूपाधिरूपं सहजज्ञानं स्यात् । केवलं
विभावरूपाणि ज्ञानानि त्रीणि कुमतिकुअनविभंगमानि भवति । एतेषान
उपयोगभेदानां मैदो वस्यमाणमूयोर्द्धयो!द्धव्यः इति ।
अथ सकलजिनौक्तज्ञानभेदं प्रबुद्धा
परिहतपरमावः स्वम्वरूपे स्थितो यः ।
मपदि विशति यत्तच्चिश्मल्यारमात्रं .
स भवति परमश्रीकामिनीकामरूपः।
अत्र च ज्ञानभेदमुन:-
71 केवलमिंदियरहियं असहायं ते सहायणाणं ति।
सण्णाणिदरवियप्पे विहावणाणं हवे दुविहं ॥११॥

मालवृतिः। ५१ सण्णाणं पउमेयं मदिसुदओही तहेव मणपज । अण्णाणं तिविपप्पं मदियाई भेददो पेव॥१२॥जुम्भ । कालमिन्द्रियरहितं असहायं तस्वभावज्ञानमिति । मनानेतरविकल्प विभावज्ञान भवद्विविधम् ॥११॥ संतानं चतुर्भेदं मनिश्रुतावधयम्न मन पर्ययम् । अज्ञानं त्रिविकल्पं मत्यादेभेदनानंत ॥ १२॥ युग्मं । निरणधिम्वरूपत्वात देवलम् । निगवरणस्वरूपत्वात् नमकरणन्य. वधानापादम् । अप्रतिबग्नव्यापकत्वात अमहायम् । तत्कार्यम्वभावज्ञानं भवनि । कारणशानमपि तादर्श भवति । कुतः, निजपामात्मास्थितसहजद- निमहजचरित्रमा नसुखमहजपरमपिच्चनिनिजकारणममयमारस्वम्पाणि र युगपत् परिन्नुं समर्थत्वान तथाविधमेव । इति शुधज्ञानस्वरूपमुनम् । म्दानी शुद्धादशानन्यरूपभेदम्त्वयमुच्यते । अनेकविकल्पसनार्थ मनिज्ञान उपलब्धिभावनोपयोगाच अवग्रहादिभेदाच यहुवहुविधादि- भेदादा । लधिभावनाभेदालालशानं दिविधम् । विविध । देश- मगरमभेदादाभिशानं विविध । मजुत्रिपुलमतिविकल्पान्मनापर्य- यज्ञानं च शिविधम् । परमभावस्थितस्य सम्मादृष्टोतसंज्ञान- चतष्प भवति । मतिश्रुतापधिशानानि मिथ्यादृष्टि परिमाप्य कुमतिभ्र- निविभंगज्ञानानीति नामान्तराणि प्रपेदिरे । अब सहनशानं शुद्धान्तस्तन्व- परमतत्वव्यापकत्वात् म्वरूपपत्यक्षं केवलसकरप्रत्यक्षम् ।'रूपिव- बधे-रिति वचनादवधिज्ञानं विकलप्रत्यक्षम् । तदनन्तभागवस्त्वंशग्राह- क्त्वान्मनःपयज्ञानं च विकलप्रत्यक्षम् । मतिश्रुतिज्ञानदितयमपि परमार्थतः परोक्ष व्यवहारतः प्रत्यक्षम् भाति । किच उत्तेषु ज्ञानेषु साक्षान्मोशमलमेकं निजपरमतत्त्वनिष्ठसहनशानमेव अपि च पारणामिकभाव. मभावेन भव्यस्य परमस्वभावत्वात् सहजज्ञानादपरमुपादेयं न शमस्ति । --

१२.
नियमसार-
अनेन सहजचिदिलासरूपेण सदा सहजपरमवीतरागशामृतेन अप्रतिहत-
निरावरणपरमविच्छक्तिरूपेण सदान्तर्मुसे स्वस्वरूपाविचलस्थितिरूप-
सहजपरमचारित्रेण त्रिकालेष्वव्युच्छिन्नतया सदा संन्निहितपरमचिद्रूपश्रद्धा
नेन अनेन स्वभावानंतचतुष्टयेन सनाथम् अनायमुक्तिमुन्दरीनाथम् आत्मानं
भावयेत् । इत्यनेनोपन्यासेन संसारव्रततिमूलटवित्रेण ब्रह्मोपदेशः
कृत इति।
इति निगदितभेदज्ञानमासाय भव्यः
परिहरतु समस्तं घोरसंसारमूलम् ।
मुकृतमसुकृतं वा दुःसमुच्चैः सुख वा
तत उपरि सम शाश्वतं शं प्रयाति ।
परियहाग्रहं मुक्त्वा कृत्वापेक्षा च विग्रहे ।
नियंग्रप्रायचिन्मार-विग्रहं भावयेद् बुधः ॥
शस्ताशस्तसमस्तरागविलयान्मोहस्य निर्मूलनाद्र
देषाम्भःपरिपूर्णमानसघटप्रर्वमनान्यावनम् ।
ज्ञानज्योतिरनुनमं निरुपाधि प्रव्यनि नित्यादित
भेदज्ञानमहीनसत्फलमिदं वन्यं जगन्मंगलम् ॥
मोक्ष मोक्षे जयति सहजज्ञानमानन्दतानं
निर्व्याचा स्फुटितमहनावस्थमन्तर्मुखं च ।
लीन स्वम्मिन्महानपिलमच्चिञ्चमत्कारमाने
स्वम्य ज्योति प्रतिहततमोवृत्ति निन्याभिरामम् ।।
महाजमानमाम्राज्य मर्वम्वं शुद्धचिन्मयम् ।
ममात्मानमयं ज्ञात्वा निर्विकल्पी भवाम्यहम् ॥
दर्भनागयोगवम्पाख्यानमततः-
तह दसणउयोगी ससहायेदरवियप्पदो दुपिहो।
करटमिंदियरहियं असहायं सहायमिदिमणिदं ॥१॥

PITER १५ । aise मानवियता निति । पनि असहाय गतानि भणित || प पिसिना दानापोरन तथा । REET मारना । विभाग Nि. Arr. भारनि । राष्टि गदा साना पाय iral frमामाचरम्य मानपरमपारि- NEHAITHTTAmपाय निगरमारय मान- প্রকাশ आदिमपरमग्यपाविचलficerय निगालनिरंजनमाधाय निमितपुरदय- FAणम्य सम्पाट परपदानमात्रमेव भन्दा दर्शनशानावरीयारापातिर्मयय मानेर । APER जीप गलपिमलवगांधदुभुनवयम्य रश- मागमुमुभागमुदाय यथाभिधानामुपरिनन्य মাসােসবা বনামক মাম जननायवदनायोग्यम्य तारामनग्य घटज्ञानादियमपि युगा- कागाच्यारिनानि । कार्यकारणरूपेण स्वभावदर्शनोपयोगः पोनः । বিমানযুলসিলাস সর্ম স্বনি। सामाभिधामवमम्मेव चैतन्यगामान्पनिजामतत्व। मुनिपाणामयनं तदुच्चैग्तेन मार्गेण विना न मोक्षः ।। आदष्टिवादपर्यायमूर्यनेयम्:- चश्गु अचमा ओही तिण्णिवि मणिदं विमावदिच्छिनि। पजाओ दुवियप्पो सपरावरखो य मिरयेक्सी ॥१४॥ ॥

विपमस- नक्षुरनारतपयस्नियोपि मणिता निमाटिरिनि । पायो द्वितिफलतः साक्षस निरसः ॥ १४ ॥ मतिज्ञानावरणीयर्मयोपशमन यथा मून वस्नु नानानि तथा गभर्द- भनावरणीयर्मक्षयोपगमेन मूर्त वस्नु पश्यति च । यया शुनजानावाणी- यकर्मक्षयोपशमन श्रुतदारेण इण्यभुतनिगदितमामर्तममग्न बन्तुनानं परोक्षवृत्या जानाति तथैवाचक्षुर्दर्शनावरणीयक्षयोपशमन पर्शनग्मनत्राग- श्रावदारण तत्तयोग्यविषयान पश्यति थ । यथा अनधिज्ञानावरणीयकर्म- योपशमन समस्तमूर्तपदार्थ ! पश्यति । अनोपयोगव्यास्यानन्तरं पर्या- यस्वरूपमुच्यते । परि समन्तात् मेदमति गच्छाति पायः । अब स्वमा वपाया पडद्व्यमाधारणः । अर्थपर्यायः अवाइमनमगोचरः अनिमूना आगमप्रामाण्यादम्युपगम्यापि च पवानिवृद्धिविकल्पयुतः । अनंनभागवृद्धि, असरूयातमागवृद्धिः संख्यातभागन्दिः संन्यातगुणद्धिः असंख्यातगुण- वृद्धिः अनंतगुणवृद्धिः, तथा हानिइच नीयते । अशुद्धपव्या नरनारका- दिव्यानपाय इति । अथ सति परभावे सुद्धमात्मानमेकं सहजगुणमणीनामाकरं पूर्णवोघम् । भजति निशितबुद्धियः पुमान् शुष्टिः स भवति परमश्रीकामिनीकामरूपः । इति परगुणपर्यायेषु सत्सूत्तमानां हृदयसरसि जाते राजते कारणात्मा । सपदि समयसारं तं परं ब्रह्मरूपं भज मजसि निजोत्यं भव्यशार्दूल स त्वम् । जानाति तया अवधिदर्शनावरण्यकर्मक्षयोपशमेन समस्त मूर्तपदार्थ पश्यति " चेति पाठ त्रुटितः प्रदीयते । १ हामि । पनि सदगुणे परिमाण तस्मिानपय इपिएलपर्यायकैः । मनापमपि जीवाचमनाथं समस्नाग्दि ममामि परभावयामि साटापसिद्ध मदा, स्यभाददिभावपर्यायपानिरियमः- परणारपतिरियमुरा पजापाते विमावमिदि भणिदा। कम्मोपाधिषिपन्जियपरजापाले सहावमिदिमणिदा१५ नरनारफनियंकमुराः पयायाम्त विभावा इति भणिता. यमांपाधिविधर्मितपर्यायास्त स्वभावा इति भणिताः ॥ १५॥ मात्र स्वभादविभावपर्यायाणा मध्ये स्वभावपर्यायस्तावत दिप्रकारेणी- ध्यते । पारणगुटपायः कार्यशुदपव्यश्चेति । इह हि सहजसुद्ध- निध्ययन अनादनिधनामूनिन्द्रियस्वभावमुद्रसहनशानसहनदर्शनसहज- चारियसा जपरमीनरागमुसामाशुद्धान्तस्तत्वस्वरूपम्दभावानंतचतुष्टयस्व- रूपेण मागभितपंचमभावपरणतिरय कारण पर्याय इत्यर्थः । सायनिध- नामनातन्द्रियम्वभावशुद्धमतव्यवहारण केवलशान केवलदर्शनकेवलमुरा- केवलभनियुन फलम्पानंतचतुष्टयन मार्द्ध परमोत्कृष्टक्षायिकभावस्य शुद्धपर- णतिरेव कार्यशुद्धपायश्च । अया पूर्वमनीपातमममजुमूतनयाभिप्रायेण पादच्यमाधारणाः एमास्ने हि अर्थपायाः शुदा इति धोद्रव्याः । उक्तः समासतः पदपायविकल्पः । इदानी प्यानपाय उच्यते । व्यन्यने प्रकटीवियते अनेनेति व्यत्र- नपर्यायः । पुतः । लोचनगोचरत्वात् पट्यादिवत् । अथवा सादिसनि- धनमर्नविना याविमावस्वभाबन्चात, हश्यमानविनाशस्वरूपत्वान् । 'पादिवदिति भाति ।

६ नियमसार- व्यवनपर्यायश्च-पर्यापिनमात्मयोधमन्तगण पर्यायम्बमावायुमाशुभ- परिणामेनान्मा व्यवहारेण नगे जातः तस्य नराकारो नरपर्यायः । किंति- छुभमिश्रमायापरिणामेन तिर्यककायनी व्यवहारेणान्मा, तस्याकारनिर्य पर्यायः । केवलन शुभकर्मणा व्यवहारेण आत्मा देवम्तम्याकारो देवर ायश्चेति' । अम्य पर्यायम्य प्रपना द्यागमान्तरे पन्य इति । अपि च बहुविभावे सत्ययं शुष्टिः। सहजपरमतत्त्वाभ्यासनिष्णातबुद्धिः ॥ सपदि समयसारान्नान्यदस्तीति मन्त्रा। स भवति परमश्रीकामिनीकामरूपः ॥ चतुर्गतिस्वरूपनिरूपणाख्यानमेततः- माणुस्सा दुवियप्पा कम्ममहीमोगमृमिसंजादा । सत्तविहा गरइया णाव्या पुढविमेएण ॥ १६ ॥ चउदभेदा मणिदा तैरिच्छा सुरगणा चउन्मेदा। एदेसि वित्थारं लोयविभागेरणादव्यम् ॥१७॥जुम्म मानुपा द्विविकल्पाः कर्ममहीमोगभूमिमंनाताः । सप्तविघा नारका ज्ञातव्याः पृदिन ॥ १६ ॥ चतुर्दशभेदा भणितास्तिर्यश्चः मुरगणाश्चतुर्भेदाः । एतेषां विस्तारो लोकविभागेषु ज्ञातव्यः ॥ १७ ॥ मनोरपत्यानि मनुष्याः । ते द्विविधाः । कर्मभूमिजा, भोगभूमिजाश्चेति । तत्र कर्मभूमिनाश्च द्विविधाः-~आर्या म्लेच्छाश्चेति । आर्याः पुण्यक्षेत्रव- तिनः । म्लेच्छा. पापक्षेत्रवर्तिनः । भौगभूमिजाश्चार्यनामधेयधरा जघन्य- मध्यमोत्तमक्षेत्रवर्तिनः । रत्लशर्करावालुकापंकधूमतमोमहातम प्रभाभिधसत- १ भन" केवलनाशुमकर्मणा नरका आत्मा व्यवहारेण, तस्याकारो नारक- पाय इति." पाठः स्खण्डित भाति ।।

मारनिः। प्रधानमंदाजरानी माया भवन्ति । प्रथमनरस्य नारका साग- मयुषः । दिसायनरकस्य नारकाः बिगागरोपमायुष ३ । मृतीय- नरम्य मम ७ । धनुर्पग्यदा १० । पंचमस्य सादरा १७ । पष्ठम्य विशतिः २२ । सप्तमस्य व्यभिशत ३३अप रिम्तम्भयात् मापणोग्यते। निर्यय:-रमेन्द्रियपातकापावचादरेकेन्द्रियपर्याप्तापर्याप्तर- दीन्दियामिकापर्याप्तवजीन्द्रिय-पर्याप्तकापातम्यनुरिन्द्रियपर्याप्त- कार्यातकामझिप चन्द्रियपातकापातक --शिपमेन्द्रियपातकाप- ध्यमाभेदाभदभदा भनि । भावनव्याज्योति कल्पवाकिभेदा- बार मणिकायाः । एतेषा चतुर्गतिनीभदाना भेदो लोगविभागाभिधा. नपरमागम दृष्टय्यः । बामस्वरूपधरपणान्तरातुरिति पूर्वसरिभिः सूत्रक- द्विग्नन इति । म्बर्गे याग्मिन्मनुनभुयने रोचरेन्द्राय देश. जज्योनिलाके फणपनिपुरे भारवाणां निवामे । अन्यस्मिन् वा जिनपतिभवने कर्मणां मोऽस्तु मतिः भयो भयो भवतु भवतः पादपजभनि: । नानानूननगधिनायविभवानाकार्य चालीस्य च व शिस्नागि मुधात्र कि जहमने पुण्याजितास्ते ननु । तच्छनिर्जिननाथपादकमलाददार्चनायामिय भान स्ते यदि वियत बहरिधा भोगाः स्युरेते त्वयि ॥ कर्तृत्वभातृत्वप्रकारकथनमिदम:- फत्ता भोत्ता आदा पोग्गलकम्मरस होदि ववहारो। कम्मजमावणादा कत्ता भोत्ता दुणिच्छयदो॥१८॥ कर्ता भात्ता आत्मा पुलकर्मणो भवति व्यवहारान् । कर्मनभावे नात्मा का भोगा तु निश्चयतः॥ १८ ॥ - नियमसार- आसन्नगतानुपरिचितासद्भूतव्यवहारनयाद् द्रव्यकर्मणां को तत्फल- रूपाणां सुखदुःखानां भोक्ता च, आत्मा हि अशुद्धनिश्चयेन सकटमो- हरागद्वेषादिभावकर्मणां कर्ता भोक्ता च । अनुपचरितासद्भूतव्यवहारेण नोकर्मणां कर्ता । उपचरितासद्भूतव्यवहारेण पटपटशकटादीनां कर्ता । इत्यशुद्धजीवम्वरूपमुक्तम् । अपि च सकलरागद्वेषमाहात्मको यः परमगुरुपदान्जद्वन्दसेवाप्रसादात् । सहजसमयसारं निर्विकल्पं हि बुद्धा स भवति परमश्रीकामिनीकान्तकान्तः। मावकर्मनिरोधेन द्रव्यकर्मनिरोधनम् । द्रव्यकर्मनिरोधेन संसारस्य.निरोधनम् ॥ संज्ञानभावपरिमुनविमुग्धजीवः कुर्वन् शुभाशुभमनेकविधं स कर्म । निर्मुनमार्गमणुभप्यभिवाञ्छितुं नो जानाति तम्य शरणं न समस्ति टोके। यः कर्मशमनिकरं परिहत्य सर्वम् निःकर्मधर्मनिकरामृतवारिपूरे । मजन्तमत्यधिकचिन्मयमेवरूपं स्वं भावमयममुं समुपैति भव्यः । असति सति विभावे तस्य चितास्ति नो नः मततमनुभवामः शुदमान्मानमेकम् । उदयकमलसम्यं सर्वकर्मप्रमुकम् न एलु न सनु मुनि न्यथास्त्यस्ति तस्मात् ॥ मानिभरगुणाः स्युः सिद्धीवेपि नित्यम् । निजपरमगुणाः स्युः सिद्धिसिद्धा. समस्ताः ।।

नारामिता -- --- पदानियोयं निश्चयावामिद्धि- र भाति भनी का निर्णयोऽयं बुधानाम् । नयदयम्प गपदमुनम दवस्थिएण जीया बदिरिता पुवमणिदपज्जाया। पजयणयेण जीया मंजुत्ता हाँति दुबिहेहिं ॥ १९ ॥ दन्याफिन भावा न्यनिरिका पूर्वभणितपर्यायात् । पर्यायनयेन नीता संयुत्ता भवनि द्वाभ्याम् ॥ १९ ॥ दाहिनयो भगवादपरमेश्वरेण प्रोको म्याधिक पार्यिकति । द्रव्यमदार्थ प्रयोजनमस्येति द्रव्याथिकः । पर्याय एवार्यः प्रयोजनमस्येति पर्यायाधिकः । न रातु एकनयायनोपदेशी ग्राह्य । किं तदुभयाय- गोपदेशः ? मनामा शुद्धद्रव्यापिकवलेन पूर्वोनच्यअनपर्यायेभ्यः सकाशान्मुनामुनगमम्नजीगराराय: सर्वथा व्यतिरिना एव । कुतः "सवे मुदा हु मुदणया "ति वचनात् । विभावत्र्यंजनपर्यायार्थिकञ्चलेन ने सर्वजीवाम्मयुना भवन्ति । चि-मिद्धानामर्थपर्याय: मह परिणतिः, न पुनर्व्यजनपाय. मह परिणतिरिति । कुतः, मदा निरअनत्वात् मिद्धानां सदा निरंजनवे मानि बहिण्यार्थिकपर्यायाधिकनयाभ्याम दाभ्याम संयुक्ताः सर्वे जीवा इति मत्रार्थों ध्यर्थः । निगमो विकल्पः तय भयो नैगमः । स च नेगमनयम्तावत् त्रिविधः, भूतनगमः । वर्तमाननगमः । भाविनैगमश्चति। अत्र भूतनगमनयापेक्षया भगवता सिद्धानामपि व्यवनपव्यत्वमशुद्धं च मभवति । पूर्वकाले ते तावन्त. संसारिण इति व्यवहारात् । किबहुना सर्व मीश नयदयवटेन शुढासुद्धा इत्यर्थः । तथा चोक्तं श्रीमदभयचन्द्रमूरिभिः-- उभयनविरोधध्वसिनि स्यात्पदाक निनवचसि रमते ये स्वयं वांनमोहा।।

नियममा- - मादि ममयमा से पा ज्यानिकी ग्नेग्मनगरक्षामुमक्षित तथाहि- अब नययुगयुनिः लंघनो न मंतः परममिनपदान्नदन्दमनदिकाः । सपदि ममयमार ते पुर्व प्रामुन्नि शितिः परमताने किं फलं सजनानाम् । इति सुकविगनपयोनमित्र-पंचेंद्रियग्रमायजितगात्रमात्रपरिग्रह-श्रीपन- मममलधारिदयविरचिनाया नियमगाग्थ्याग्यायो तात्पर्यना जीवा- धिकारः प्रथमश्रुतस्कन्धः ॥ १ ॥ अदानीमनीवाधिकार उच्यते । पुहलद्रव्यविम्ल्पन्यागोऽयमः- अणुसंधवियप्पेण दु पोग्गलबं हवेइ दुवियप्पं । खंधा हु छप्पयारा परमाणू चेव दुवियप्पो ॥२०॥ अणुस्कन्धविकल्पेन तु पुद्गलद्रव्यं भवति द्विविकल्पम् । म्कन्धाः खलु षट्प्रकारा परमाणुदव द्विविकल्पः ॥ २० ॥ पुदलद्रव्यं तावद विकल्पवयसनाथम् । स्वभावपुगलो विभावपुद्गलश्चेति । तत्र स्वभावपुद्गलः परमाणः, विभादपुद्गलः स्कन्धः । कार्यपरमाणुः कारण- परमाणुरिति स्वभावपुद्गलो द्विधा भवति । म्कधाः पदप्रकाराः स्या, पृथ्वी- जलच्छायाचतुरक्षविषयकर्मप्रायोग्याप्रायोग्यभेदाः । तपा भेदा वक्ष्यमाणसूत्रे- पूच्यते विस्तरेणति । गलनादणुरित्युक्तः पूरणात्स्कन्धनामभाक् । विनानेन पदार्थण लोकयात्रा न वर्तते । , अवं आवरण तेन रहितम् अनवम् । वान नवम् मनवम् चिरंतनम् इत्यर्थः । २ अनयपक्षा एकान्तवादिनस्तरक्षुण्ण अनुभितम् अध्वस्तमित्यर्थः ।

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२० नियमसार- सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्च- रनवमनयपक्षाशुण्यमीशंत एव । तथाहि- अथ नययुगयुक्ति लंघयंतो न संतः परमजिनपदाजबन्दमत्तदिग्फाः । सपदि समयसारं ते ध्रुवं प्रामुवन्ति क्षितिषु परमताते किं फलं सजनानाम् ॥ इति सुकविजनपयोजमित्र-पंचेंद्रियासरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रह-श्रीपद्म- प्रभमलधारिदेवविरचितायां नियमसाग्व्याख्यायां तात्पर्य्यवृत्ती जीया- धिकारः प्रथमश्रुतस्कन्धः ॥ १॥ अदानीमजीवाधिकार उच्यते । युगलद्रव्यविकल्पन्यासोऽयम:- अणुसंधवियप्पेण दु पोग्गलव्वं हवेइ दुवियप्पं । खंधा हु छप्पयारा परमाण चेव दुवियप्पो ॥ २०॥ अणुम्कन्धविकरुपेन तु पुद्गलद्रव्यं भवति द्विविकल्पम् । म्कन्धाः खलु षट्प्रकारा परमाणुश्चैव द्विविकल्पः ॥ २०॥ पुद्गलद्रव्यं ताबद्र विकल्पदयसनाथम् । स्वभावपुद्गलो विभावपुद्गलश्चेति । तत्र स्वभावपुद्गलः परमाणुः, विभावपुगलः स्कन्धः । कार्यपरमाणुः कारण- परमाणुरिति स्वभावपुदलो द्विधा भवति । स्कथाः पदप्रकाराः स्या, पृथ्वी जलरछायाचतुरक्षाविषयकर्मप्रायोग्याप्रायोग्यभेदाः । नेपा भेदो वक्ष्यमाणसूत्र- पूच्यते विम्तरेणति । गलनादरित्युक्तः पूरणाम्कन्धनाममा । दिनानेन पदार्थण तांब्यावा न वर्तते । १भ भावरण तेन रहितम अननम् । वान नाम् भनम् तिनम् इत्यर्थः। २ अनथपशा एकान्नवादिनानुभितम् अदानमित्यर्थः । ।

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नियमसार- -- मपदि ममयमार ते पर ज्योनिम्ने. ग्वमनयपक्षाशुष्णमीक्षेत एर। तथाहि- अथ नययुगयुर्ति लंघनो न मंतः पग्मजिनपदाजदन्दमतादिकाः । सपदि ममयमारं ते भुवं प्रामुवन्ति क्षितिषु परमताने किं फलं सजनानाम् ॥ इति सुकविजनपयोनमित्र-पंचेंद्रियप्रमग्वनितगात्रमात्रपरिग्रह-श्रीपन- प्रभमलधारिदेवविरचितायां नियममाग्व्याख्यायां तात्पर्यवृत्ती जीवा- धिकारः प्रथमश्रुतस्कन्धः ॥ १॥ अथेदानीमनीवाधिकार उच्यते । पुद्गलद्रव्यविम्ल्यन्यामोऽयम्:-- अणुखंधवियप्पेण दु पोग्गलबं हवेइ दुवियप्पं । खंधा हु छप्पयारा परमाणू चेव दुवियप्पो ॥ २० ॥ अणुम्कन्धविकल्पेन तु पुद्गलद्रव्यं भवति द्विविकल्पम् । म्कन्धाः खलु षट्प्रकारा परमाणुश्चैव द्विविकल्पः ॥ २०॥ पुद्गलद्रव्यं तावद् विकल्पदयसनाथम् । स्वभावपुद्गलो विभावपुद्गलश्चेति । तत्र स्वभावपुद्गलः परमाणः, विभाइपुद्गलः स्कन्धः । कार्यपरमाणुः कारण- परमाणुरिति स्वभावपुद्गलो द्विधा भवति । स्कंधाः पटप्रकाराः स्युः, पृर्था- जलच्छायाचतुरक्षविषयकर्मप्रायोग्याप्रायोग्यभेदाः । तेषां मेदो वक्ष्यमाणमूत्र- पूच्यते विस्तरेणति । गलनादणरित्युक्तः पूरणात्स्कन्धनामभाक् । बिनानेन पदार्थण लोकयात्रा न वर्तते । १ भवं भावरण तेन रहितम अनवम् । वान नवम् भनवम् चिरंतनम् इत्यर्थः। २ अनयपक्षा एकान्तबादिनस्तरक्षी अभुभितम् अध्वस्तमित्यर्थः ।

मात्पर्य वानः। रिभावपुलस्वरूपास्यानमेतत्ः- अइथूलथूल थूलं धूलंसुहुमं च मुहुमथलं च । सहुमं अइसुहुमं इदि धरादियं होदि छम्भेयं ॥ २१ ॥ अपव्यदमादीया भाणदा अइथूलथूल मिदि संधा। धूला इदि विण्णेया सप्पीजलतेलमादीया ॥ २२ ॥ छायातवमादीया थूलेदरखंधमिदि बियाणाहि । राहुमथूलेदि मणिया संधा चउरक्खपिसया य॥२३॥ सुटुमा हवंति संधा पावोग्गा कम्भवग्गणस्म पुणो । तन्निवरीया संधा अइमुहुमाइदि परुदि।२४ायउ। अतिस्थूलम्यूलाः, स्थला, स्थूलसूक्ष्माश्य, सूक्ष्मस्थलाध । सूक्ष्मा, अतिसूक्ष्मा, इति धरादयो भवन्नि पझेदा ॥ २१ ॥ भूपर्वताया भणिता अतिम्धूलस्थूला. इति स्कंधा । स्था रनि विज्ञेयाः सप्पिमलतलाधा ॥ २२ ॥ छायानाथाः भूलेतरस्कन्धा इनि विनानीहि । मक्ष्मस्थला इति भणिना सन्धाश्चतुरक्षविपयाच ॥ २३ ॥ सूक्ष्मा भवन्ति सन्धप्रायोग्याः कर्मवर्गणम्य पुन. । नद्विपरीनाः स्कन्धा: अतिसूक्ष्मा इनि प्ररूपगन्ति ॥ २४ ॥ मनुष्कं । अनिस्थलथिला हि ते सलु पदला. सुमेरकुम्मिनभाय: । एतो. सतपसीजलप्रभनिगमतदप्याणि हि स्थलदाश्च। पातरतमभनय: स्परामपुरलाः । पनगरानमाणानिन्दियाणा विपया माधरपुहला: ' ਬਣਿਆ ਉਮਾਸਹੁ ਵਾਹੂ मार ra.TTA अब मागविणेगा arefrier | गमगा art AgarTENT-TEATRE पनि महीननायो गमिर-Tantre-श्री- प्रममलभारियन निगम जीया. भिकारः प्रमभुवम् ॥ १॥ अपदानीमारि मते । परम्परागोन- अणुगंधयियप्र्पण दुपांग्गलयग्य हयद दुधियप्पं । खंधा हु छप्पयारा परमाण व दुधियप्पो ॥ २० ॥ अशुम्कन्धारापन तु पुलद्रग माति द्विषिरुपम् । म्बन्धाः रा १दमाग परमाणुशत द्विशिकल्पः ॥ २०॥ पुद्गलद्रव्यं नावद विपदयमनाथम् । स्वभारगुद्गलो विभागपुगलचति । तत्र स्वभावपुगलः परमाणुः, प्रिभारपुद्गल. गन्धः । कार्पपरमाणुः कारण- परमाणुरिति म्वभावपुद्गली द्विधा भवति । स्थाः पदमागः म्युः, पृथ्वी जलच्छायाचतुरक्षत्रिय प्रायोग्याभायोग्यभेदाः । तेषां भी वश्यमाणभत्र- पूच्यते विस्तरेणेति । गलनादणुरित्युक्तः पूरणात्स्कन्धनामभाक् । दिनानेन पदार्थण लोक्यात्रा न वर्तते । १ अवं आवरण तेन रहितम अनवम् । वान नाम् मनाम् चितिनम् इत्यर्भ.. २ अनयपक्षा एकान्तवादिनम्तैरवणं अनुमितम् अध्वस्तमित्यर्थः ।

मात्पर्य पानः। गिमावलम्बम्पारयानमतत अदृधलथूल थलं धलंमुहुमं च मुहुमथूलं च । मृहुमं अहमुहुमं इदि धरादियं होदि छन्भेयं ॥ २१ ॥ भूपबदमादीया भणिदा अइथूलथूलमिदि संधा। थूटा इदि विष्णेया सप्पीजलतेलमादीया ॥२२॥ छायातवमादीया थूलेदरसंधमिदि वियाणाहि । मुगुमधुलेदि मणिया संधा चउरक्सविसया य॥२३॥ मुटुमा हवंति संधा पावोग्गा कम्भवग्गणस्स पुणो । तबिवरीया संघा अइमुहुमा इदि परवदि।२४।चउक्कं । अतिम्धूलम्धन्दाः, स्थूलाः, म्धन्दमूक्ष्माश्थ, सूक्ष्यस्यूलाश्च । मूक्ष्मा, अनिमक्ष्मा, इति धरादयो भवन्ति षड्भेदा ॥ २१ ।। भूपर्वताद्या भगिता अतिम्थलम्लाः इति स्कधाः । स्थन्दा इति विक्षया सपिनलतेलाद्याः ॥ २२ ॥ डायातपाद्या स्थलेतरस्कन्धा इति विनानीहि । मुश्मस्थूला इति भणिता स्कन्धाश्चतुरक्षविषयाश्च ॥ २३ ॥ मूक्ष्मा भवन्ति मन्धप्रायोग्याः कर्मवर्गणस्य पुनः । तद्विपरीताः स्कन्धा. अनिममा इति प्ररूपयन्ति ॥ २४ ॥ मतुष्कं । अतिस्थूलस्थूला हि ते सलु युगाः मुमेरुकुम्भिनीप्रभृतयः । घृतते- लतपक्षीरजलप्रभृतिसमस्तद्रव्याणि हि स्थूलपुदलाचा छायातपतमःप्रमृतयः स्थूलसूक्ष्मपुद्गटाः । स्पसनरसनघ्राणोजेन्द्रियाणां सिया सूक्ष्मस्थूलपुद्गलाः शब्दस्पर्शग्सगन्धाः । शुभाशुभपरिणामदारणागच्छतां शुभाशुभकर्मा नियमसारpeA AVA - - योग्याः सूक्ष्भपुद्गलाः । एतेषां विपरीताः सूक्ष्मसूक्ष्मपुद्गलाः कर्मणामयोग्या इत्यर्थः । अयं विभावपुद्गलक्रमः । तथाचोक्तं पंचास्तिकायसमयमध्ये- "पुवी जलं च छाया चारिदियविसयकम्मपाओग्गा । कम्मातीदा एवं छन्भेया पोग्गला होत" उक्तं च मार्गप्रकाशे- स्थूलस्थूलास्ततः स्थूला स्थूलसूक्ष्मास्ततः परे । सूक्ष्मस्थलास्ततः सूक्ष्माः सूक्ष्मसूक्ष्मास्तत पर" ॥ तथा चोक्तं श्रीमदमृतचन्द्रमूगिभिः- " अस्मिन्ननादिनि महत्यविवेकानाट्ये वादिमान् नटति पुगल एव नान्यः । रामादिपुद्गलविकारविरुदशुद्ध- चैतन्यधातुमयमूर्तिरयं च जीव ॥ इति विविधविकल्प पुद्रले दृश्यमाने न च कुरु रतिभाव भव्यशार्दूल तस्मिन् । कुरु रतिमतुळांव विचमत्कारमात्र मवमि हि पामश्रीकामिनी कामापः॥ कारणकार्य परमाणुव्यस्वरूपाख्यानमततः-- धाउचउकस्स पुणी जं हेऊ कारणंति तं णेयो। संधाणां अवसाणो णादयो कजपरमाणू ॥२५॥ धातुरनुष्कम्य पुन यो हेतु कारणमिनि म तेयः । म्फयानामतमानी ज्ञातव्य कार्गपरमाणुः ॥ २५ ॥ सुपिश्योनोवायो धानाचत्वारः तेषां यो हेतुः स कारणपरमाण, म एर मपन्याग्माणुसन्धाभगुणानामानन्याभावात, रामविषमभयोग्योग्य पः । नियमक्षगुणानामननगम्योपरि दाभ्याम् चतुभिः गमबन्धः ।

मागिः। १३ - " 1 अपमान र पुनरागाम Trantire frienामा । भगवाचनुर्भदा गर्य- Pri, हाय परमाणुमायापन्धि बिभाग- मामामा सायन प्रबरनमार- "fer का नगा या समा ६ विममा वा । मोगागि जमिन भारिपरिणा". " विधागण गणो पगणणिःण बधमणुदादि। आपण मा निगुणिदो अणु बमादि पगगुणनुत्ती सपा- AVM मभिनिर्मम । अमानमक्ष पुर्व भागामि मर्म परमपोषोनिग्यिम अनादि अपमन्स अचंतं व इंदिए गेज्म । अयिभागी दप्यं परमाणु तं पिआणाहि ॥२६॥ आत्माघाममा यमा मान्नम्नन्द्रियतम । अविभागि यहां परमाणु मद् विनानीहि ॥ २६ ॥ यथा जीना नित्यानित्यनिगादादिसिद्धक्षेत्रपर्यन्तग्थितानां सहन- परमपरिणामिकभावविरक्षासमाश्रयण साजनिश्चयनयन म्वस्वम्पाय- मच्यवनत्वमुनम, तथा परमाणुदल्याणां पंचमभावेन परमस्वभावत्वा- दामपरिणाम तम्पेशादि, मध्यो हि आत्मपरिणतेगमैत्र । तोधि स्वम्यामेव परमाणुग्तः न चेन्द्रियज्ञानगोचरवाद अनिलाना- दिभिरविनश्मालाविभागी हे शिष्य स परमाणुरिति स तं जानीहि । अप्यात्मनि स्थिति बुद्दा पुद्गलस्य जटात्मनः । सिद्धास्ते किन तिष्ठति स्वम्वरूप चिदात्मनि ।

२२ नियमसार- - r । परे। योग्या: सूक्ष्मपुद्गलाः । एतेषां विपरीताः सूक्ष्मसूक्ष्मपुद्गला. कर्मणामअयोग्या इत्यर्थः । अयं विभावपुद्गलक्रमः । तथाचोक्तं पंचास्तिकायसमयमध्ये- "पुढवी जलं च छाया चारिदियविसयकम्मपाओग्गा। कम्मा दा एवं उन्भया पोग्गला होति" उक्त च मार्गप्रकाशे- स्थूलस्थूलास्ततः स्थूला स्थूलसूक्ष्मास्ततः सूक्ष्मस्थूलास्ततः सूक्ष्मा. सूक्ष्मसूक्ष्मान्ततः परं" । तथा चोक्तं श्रीमदमृतचन्दमूर्णिमे.- " अस्मिन्ननादिनि महत्यविवेकानाट्ये वादिमान नटति पुगल एव नान्यः । गगादिपुद्गलविकारविरुद्धशुद्र- चेतन्यथातुमयमूर्तिरयं च जीवः ॥ इनि विविधविकल्प पुदल दृश्यमाने न च कुरु रतिभावं भव्यशार्दूल तस्मिन् । दुरु रतिमनुलां व चिच्चमत्कारमात्र भवसि हि परमश्रीकामिनीकामापः ॥ कारणकार्यपग्माणुद्रव्यावरूपाम्यानमतत.- धाउचउछारस पुणोज हेऊ कारणति तं यो संधाणां अवसाणो णादयो कजपरमाणू ॥२ धानुचतुष्कम्य पुन यो हेनु कारणमिति म क्षेय. । मन्धानामवमानी ज्ञानन्य कार्यपरमाणुः ॥ २५ ॥ पृथिव्योनोवायदो धातववार तेषां या हेतु स कारणपरमाणः, जपामा मलक्षगुणानामानन्याभाग, समविषमभयायी इत्यर्थः । मिग्वाभगुणागमनलालम्पपरि दाभ्याम् चतुर्भिः समवन्धः For, RANIrene | ATM Inter ri grammar forture just 4 Pre.. prnerrierm for NITINAImम प्राय - "Ramfirm TRLfarmi rregneraternatm ". "femmer गणपण। writy for tण पाण' - गाने पर AATuमम । TWARE wwgrimsraffar- अपादिअपम अन व दिए गंगर । अदिमागी दर परमाण में विआणादि ॥२६॥ মামলমানবে। अविभानि या परमाणु रिमानहि ॥२६॥ पहा माना निन्यानिशानाशादिमित्रपनधिताना सहज. पनिमारविशनाममाश्रयण सत्मनिश्चयनयेन पावापाप- ध्यान नमुनम, मथा परमाणुदण्याणा पंचमभावेन परमभाववा- दामपरिणाम हादि, मयो हि आमपरिणतेगमैत्र । अनापि स्वयमेर परमाणुगतः म धेन्द्रियशानगोचरवार अनिलानला. दिभिरदिनकालाविभाग शिष्य म परमाणनिति तं तं जानीहि । अन्यामनि स्थिति बुदा पुलाम्य जरामनः । सिद्धान मिनिनि स्वम्पमपं चिदात्मनि M निपमसार- स्वभावपुद्गलस्वरूपाख्यानमेततः-- एयरसरुवगंधं दोफासं तं हये सहावपूर्ण । विहावगुणमिदिमणिदं जिणसमये सवपपडतं २७॥ एकरसरूपगंधः द्विम्पर्शः स भवेत्स्वभावगुणः । विभावगुणा इति भणितो जिनसमये सर्वप्रकटत्वम् ॥ २७ }} तिककटुकम्पायाम्लमधुराभिधानेषु पंचसु रसेप्वेकरसः । श्वेतपी. तहरितारणकृष्णवर्णेष्वेकवर्णः सुगन्धदुर्गन्धयोरेकगंयः । कशमृदुगुल- धुशीतोष्णस्निग्धरूक्षाभिधानामष्टानामन्त्यचतुःस्पशाविरोधस्पर्शनद्वयम् एने परमाणीः स्वभावगुणाः निनाना मते । विभावगुणात्मको विभावपुलः। अस्य दाणुकादिस्कंधरूपस्य विभावगुणाः सकलकरणग्राममाया इत्यर्थः । तथा चोन पंचास्तिकायसमये- "एयरसवण्णगंध दोफासं सइकारणमसई । संधतरिदं दवं परमाणं तं पियाणाहि" ॥ उन च मार्गप्रकाशे-- वसुधान्त्यचतुम्पर्श-५ चिन्त्यं स्पर्शनद्यम् । वर्णो गन्धी रमश्चकः परमाणो न चतरे ॥" तया रि-- अय मति परमाणोरेकवर्णादिमास्व- निगगुणानियास्मिन नाम्नि में कार्यमिदिः । पनि निनादि मन्वा शुदमामानमेकम परममुसरदार्थी भावयेद्न्यलोकः । পানাৰণ:- अप्पणियविश्खो जो परिणामी मी सहायपनायो। संघसरायण पुणों परिणामो सो विदायपजायो॥२८॥ - हाला Arrn. RATE Rumerica a timrविभागांय ५८ ॥ Prary tire Hamirarmfort Trtratore marriage witterminerani भपता Priyam मदान Annn. Irfaniyanपायी। errerit मममम । Aaryाया ARE रयानinist-- पोग्गटदरच उपर परमाण णिपएण दिरंण । पोग्गटदप्योति पुणो पपदेसो दौदि धम्स ॥२९॥ पुद्रव्यमुप्यने परमाणनिःगयेन इसरेण । पुदगदम्पमिति पुन. गपशो भाति गन्यम्य ॥ २९॥ भारलपर्यायामकम्प परमाणोय पुदप्पय्यादेशोपपते: एद- निन । लोण प्यारनपन विभागपप्पामना कन्धपुगना पुरदमुपचारत: मिदं भवति । विनिनानि मार्गार पुदतवाजातः त्पजतु परमशेष चेतनानने च । भमतु परमनन चिशमवारमा परहितमन्तनिधिक समाधी, पुष्टोऽचेतनो जीतनति कल्पना । -- २६ नियमसार- सापि प्राथमिकानां स्यान स्थानिध्पन्नयोगिनाम् । अचेनने पुगलकायकेऽस्मिन् सचेतने वा परमात्मतत्वे। न गेषभावो न च रागभावो भोदियं शुदशा यतीनाम् ॥ धर्माधर्माकाशानां संक्षेपोक्तिरियमः- गमणणिमित्तं धम्ममधर्म ठिदि जीवपुग्गलाणं च । अवगहणं आयासं जीवादीसम्बदवाणं ॥३०॥ गमननिमित्ता धोऽधर्मः मिथतेः जीवपुद्गलानां च। अवगाहनस्याफाशं जीवादिमद्रव्याणाम् ॥ ३० ॥ अयं धर्मास्तिकायः स्वयं गतिक्रियारहितः दीर्षिकोदकवत् । स्वभावंग- तिक्रियापरिणतस्य योगिनः पञ्चहम्वाक्षगेमारणमात्रस्थितस्य भगवतः सिद्ध- नामधेययोग्यस्य पदकायकमधिमुनस्य मुनियामलोचनालोचनगोचरस्य विटोकशिगनभेरारम्प अपहस्तितसमम्नक्लेशावामपंचविधसंसारस्य परम- गनियान्तस्य स्वभावगतिक्रियाहतुः धर्मः । अपि च । पट्कायक्रमपुताना रांगारिणां विभागनिक्रियाहेतुम्न । यथोदकः पार्टीनानो कारण तथा ने जीवपुरलाना गमनवारण, म धर्म: मोऽयममूर्त: अष्टस्पर्शनविनिर्मुक्तः वर्ण- रमपंचासंदिनयनिर्मुकश्च अनुमकलपुत्वादिगुणाशा: होमात्रामा अमापदार्थः। मावो गुणाः कमवर्तिन पर्यायाचति, पचनाइस गतिहतोधर्मद्रव्याप अदाणाः शुद्धपाया भवन्ति । अधर्मदत्यस्य स्थितिहतुविशेषगुणः । अम्मा तम्याधमानिकायम्प गुपयांया गर्दै भनि । आकाशम्या सादातरक्षागत शिषगुणः इतर धर्माधर्मगोगा माम्यापि गदशा इस्यर्थः । ঠাকাশমালী দালালিনতাময় গণশি RAEमः। मनममिनधरे वार्णया परमालाना ग्यानदानपर्णि। मदगिरमाांवय न्याग माया शिव निगा गदा भव्यताकः । বিষখাকামধ্যিখাসানামস समयापलिभेदेण दुयियप्पं अहप होइ तिषियप्पं । मीदो संग्जायटिहदसंठाणप्पमाणं तु ॥ ३१ ॥ समयावरिमेन तु द्विविशल्पोऽया भवति शिविकल्प । अतीतोऽमग्न्यानामग्निमंशानं प्रमाण तु ॥२१॥ स्वाभिमभाप्रदेश पः परमाणुम्निष्पति तमन्य. परमाणुर्मदचलनापयति गमयोध्यावान माहौर स्यातममयः निमिषः, अथवा नपनपुटपट- नायनी निमेषः । निर्मपाटमाटा, पोटशाभिवाठाभि कला, दात्रिंशत्वला- मिटिका, पष्टिनानिकमागतम् । विशदोरात्रैर्मामः । दाभ्याम मामाभ्याम् तु मनुभिमिभिग्यनम् । अयनयन संस्तारः।त्यालिन्यवहारकालकमः। त्य समयावविभेदेन दिया भवति। अतीतानागतवर्तमानभेदात् त्रिधा । अनी- मकानप्रपंचोयमुग्यते-अतिमिद्धाना सिद्धपव्यप्रादुर्भावममयात् पुरागतो हावल्यादिव्यवसायाल' म कालम्यैषा मंगागवस्थाया यानि संस्थानानि गतानि तैः महशवादनन्तः अनागतकालाप्यनागतमिद्धानामनागमशगंग- गि यानि ते मदृशत्या. मुक्त साशादित्यर्थः । तथा घोन पंचाम्तिकायसमये-- " ममी गिमिसो कहा कला य णाली सदो दिवा रती। मामाडुभयणर्मवस्मगेनि कालो पगपत्तो " - मालिका परिवति ।

नियमसार- तथा हि समयनिमिपकाष्ठा सकलानाडिकाया-- दिवसरजनिभेदाज्जायते काल एपः। न च भवति फल मे तेन कालेन किंचि- निजनिम्पमतत्त्व शुद्ध विहाय ॥ मुख्यकालस्वरूपास्यानमेततः- जीवादु पुग्गलादोऽणतगुणा चाथि संपदा समया। लोयायासे संति य परमही सो हवे कालो॥ ३२॥ जीवात् पुद्गलतोऽनतगुणाश्चापि संप्रति समयाः । टोकाकाशे सति च परमार्थः स भवेत्कालः ॥ ३२ ॥ जीरगशेः पुगलगशेः सकाशादनन्तगुणाः । के ते । समयाः कालाणतः गोकाकासपदेशेषु पृथक् पृथक तिष्ठन्ति स काल: परमार्थः इति । तथा योनाचनमारे- " ममओ दु, अपडेमो पदेममेनस्ग दमियनादस्म । वविददी मी वदि पगमागामविसम्म अस्यापि ममयशाइन मुख्यकालाणस्वरूपमुतं । समभा समपार्या यम्योपादानापणयात् रामयः । पुनः । अपदमी, दितीयादिप्रदेश- रहितो मानि । मो पददि, म पूर्वानकालाणः गतिपरिणतः सहकारितीन वर्तते । पदमनाम दरियनादम्म प्रदेशमा पुलनानिपपरमाणुयाय कृतः । दिदाता, तिपरत मंदगत्या गरातः कम । पदभ का टायरमेय माधनः । आगामदग्यिम्ग, आकाशदम्पायी। --- " लोयायामपद के पिापा rel गलत पण अमेगाणि

मायापतिः।
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-
उन माया--"भागाभा ने भावानां परिणामस्ननगर ।
मदर्य नापि पार्याय., सर्वाभाव अमज्यते ।
नया रि-
'यनारतोष म्यान, भामामेव तत् ।
मानामनियापान मान्यता वर्तना भवेत् ॥
प्रतानिगांगरा गई जीवपुलराशय ॥
धर्माधर्मनभाना सिद्धा सिद्धान्तपद्धतेः ।
कालादिशुदामादेवनद्रव्याणां स्वाभारगुणापायाम्यानमेतन ।
जीवादीदवाणं परियणकारणं हवे कालो।
धम्मादिरओसेणं सहाउगुणपज्जया हॉति ॥३॥
जीवादिन्द्रयाणां परिवर्तनकारणं भोकाला ।
धादिननुणी म्वभावगुणपाया भांति ॥ ३३ ॥
हि मुग्यवालद्रव्ये जीवपुलधर्माधर्मावाशानो पर्यायग्णतिहेतुत्वात्
परिवर्नननिवमिन्युः । अथ धर्माधर्माकाशकालानां स्वजानीयबंधसम्ब-
न्धाभावात् निभावगुणपर्यायाः न भवंति, अपि तु स्वभावगुणपाया भव-
नीत्यर्थः । ते गुणपर्याया पूर्व प्रतिपादिताः अतएवान मंक्षेपनः मुचिता इति ।
इनिविदितमुच्चे व्यपटुम्य माम्बद-
विवरणमनिरम्यं भव्यकर्णामृत यत् ।
तदिह निजमुनीना दत्तचिनप्रमोद
भवतु भवविमुकदै मर्वदा भव्यजन्तोः ।
अर कालदव्यमन्तग्ण पूनिद्रव्याण्यत्र पंचाग्लिशया भवतीत्युगमा
एदे उद्दव्याणि य कालं मोतूण अस्थिकायत्ति ।
णिदिवा जिणसमये काया हु बहुप्पदेसत्तं ॥ ३४ ॥

नियमसार- लानि पदन्याणि नकार मुक्ताभिसया इति । निश निनसमये कागा मन बहुप्रदेशाम ॥ ३४ ॥ रिनिशिश कालः । मममी अपदम, ना, ATTA. नाना कागतमम्यामांशपया Tam. TATANT । असिन नाम सना माfree आसामना महामनोती । तर नर ममाीि RATrयापिनी शान्तामना Arm. प्रपनापालमपच्यापिनी गरमग । भवान TH BIRAT परिणामयापिनी यजामामा । - ना: भरि भग, न नि मनाया. पाEिT: IN. mer in MH दाया बापरेशाभागनि। KATTITHIN Tा पूनिया | मानमरणाग भगानाम। HTorr arry Mनमिया Hinाजातपंगा यति मुगाग। भERINEET Tणा नीषण अगंगोगा ॥३॥ हामाया मा माग अनय हरे देदो। IT यो हो ना३॥ य । intaram मान । 1. Ta auret mein 4 तापवृत्तिः। - लोकाकाशे तदितरस्यानंता भवन्ति देशाः । फालस्य न फायत्वं एक्पदेशो भवेद्यम्मात् ॥ २९ ॥ युग्मं । शुद्धपदलपरमाणुना गृहीतं नभन्थलमेव प्रदेशा। एवंविधा पुदलद्रव्यस्य प्रदेशः संख्याता असंख्याता अनन्ताश्च । लोकावाशधर्माधर्मकीवानाम- संख्यातप्रदेशाभवन्तिा इतरस्यालोकाकाशस्यानन्ताः प्रदेशा भवन्ति कालम्यक- देशो भवति अतःकारणादस्य कायन न भवति अपि तु दय्यत्वमस्त्येवोत । पदार्थलाभग्ण मुमुक्षो. कृतं मया कंठविभूषणार्थम् । अनेन धीमान व्यवहारमार्ग खुदा पुनोंधति शुद्धमार्गम् ॥ अनीवद्रव्यच्यारण्यानोपहारोयम:- पुग्गलव्वं मोतं मुत्तिविरहिया हवंति ससाणि। पदणमावो जीओ पेदणगुणपजिया सेसा ॥३७॥ पुद्गलद्रव्य मून मर्तिनिहितानि भवन्ति शेषाणि । नन्यभावो जीवः नेतन्यगुणवमितानि शेपाणि ॥ २७ ॥ मेषु मूलपार्थेषु पुलम्य मन्तिम् । तपागमत चम् । जविाय थे. नत्तम इतरपामायतनत्वम् । रहमानीयविमायबन्धनापेक्षया जीवन- नयोगशुद्धत्वम, धर्मादीनां चतुर्णा विशेषगुणापेक्षया राक्षल्यमेवेति । যনি গণহনামানি নবম पानरारसि जाने पस्य भन्योलमस्य । सपदि समयगार तस्य पुती ममति दिदि पुनाविप ।"

निपमसार- की मुविजनमोजामियनेन्दिपगरयनिगानपरिषद-भीपमप्रभ. मरधारिदेगिता निगममारण्यास्यायो ताहायानो अजीमाधि- कारो दिमाग ॥ २ ॥ अयानी रामभाविकार उन्यो। हे गोगामागतारयानमार। जीगतिहिंगणे हेयमुपादेयमप्पणी अप्पा। कम्मोपाधिसमुध्मयगुणपजापहि परित्तो ॥३८॥ गरिदिगा यमुपायमा मनो आमा । Kगमन गुणापांग अतिरिकः ॥ ३८ ॥ STAIM पदमा पारंगा । मनः मातो. HTTARomumपामगागम्य पन्धियागा Trenागीयपमरगनिशिाम मांगी मामा, Muftmi artणामानामा मानोगागिपर AMI सागर, जनामिनि नामानिनियमmarrfrrentHITERATurm अगागनमी. Anita for writer-trim finमाति। पर पानि मा (?) 1","SAEE ifafar pur || योग मागणी माणमामाया ! naram Inana,॥

. ------- AAN मग मभानपानानि न मानापमानभाषानानि वा। नारमानानि न भीरमग म्यानानि वा ॥ १९॥ पिारनिगाभिनयम्य दुरीमतिकापाय न सलु विभाग. समानपानानि । दशनामस्तसमम्नमोहगगाभादान र मानापमान- नुभवकोदयामानानि । नपा परिणतेरभावागणुभकर्माभाग भसंमार- महा समारणसम्माभास पंधानानि । नयाशुभरणतेरभागदशुभकर्म । अभवभागम दुष, साभावान शाहर्षस्थानानि चेति । प्रायतिविमुनाम्वतपदे निःशेषतोन्न्तर्मुरा- निभदोदितशर्मनिर्मितविपदिशाहतात्मनि । पैतन्यामृतपूरपूर्णवपुपे प्रेक्षावना गोचरे पुदि दिन गोषि वासि सुर व संमतेर्युक्तेः ॥ णो ठिदिवंधहाणा पपडिहाणा पदेसठाणा था। णोअणुभागहाणा जीवस्स ण उदयठाणा पा॥४०॥ न स्थितिबंधम्यानानि प्रकृतिस्थानानि प्रदेशाधानानि वा । नानुभागस्थानानि नीवस्य नोदयस्थानानि वा ॥ ४०॥ • अत्र प्रतिस्थित्यनुभागप्रदेशबन्धोदयस्थानानि, ज्ञानावरणापष्टकर्मणां तत्तयोग्यपुद्गलद्रव्यम्वाकारः प्रवृतिवन्धः, तस्य स्यानानि न भवान्त । अशु- दान्तम्नारकर्मपुगलयोः परम्परप्रदेशानुप्रवेशः प्रदेशबन्धः, अस्य पंधरय स्थानानि वा न भवन्ति । शुमाशुभकर्मणां निर्जराममये. मुसदुःसफलम- दानशनियुनो गनुभागन्धा, अम्य स्थानानो या न चावकाशः । न च द्रव्यभावोदयस्थानानामन्यवकाशोधनि इति । 1 अकारस्य पार्य।

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नियमसार- शुदनिश्पन्नगेन शुद्धनीस्य समसासंसाराकारममये न सामागुन चउगदमयसममणं जाइजरामरणरोपसोका य। कुलनोणिनीयमग्गण-ठाणा जीयरस णो सति ॥४२॥ कर्गनिभामंामणं गालिगरामग्णगेगशोकास। पुगोनिनीमार्गणमानानि गीतम्ग नो सनि ॥ ४२ ॥ भागमागमणी नाकातिदमनुष्योग पानी f-tणे न भगाती । नियशवपिराननरूपस्य - नाममा प्रयापरणे योग्यरिमाणिोमा जारी Time | Triniti कुलयोनिशिय ना rr HTHI- Terift दशातिरामी। HTarfirmat माकुलानि, सेनामाथिकान विकी नागिनी पानी मालानि, पनामा PHe rate माटा । दिन मातो. iformfrnat PERIEnान, गनिमीन नार trafन नागा, राणा मार्ग its। Trirat RMIfनि, गाणगान Ty ११, ममगलानी नाशिलान, Hri vitri 4 META । म मानिन Fifier | ififtaram. Afternी - piratra #freer aufnairat kx.marathi LATMantra २. Fat hifagar tantarairat wint, नापभिः। . -- - . - रगानि, चतुर्गनिनिगोदिनीवानां सालक्षयोनि, मुररानि वनम्पतिकायिकीवाना दालक्षयोनिमुग्दानि, दीन्दियविनां दिलक्षयोनिमुसानि, बीन्द्रियीवाना दिलक्ष्योनिमम्मानि, चतुगिन्द्रियजीवानां दिलक्षयोनिमुखानि, देवाना । चतुर्लक्षयोनिमुरगानि, नागकाणां चतुर्लक्षयोनिमुरानि, तिनीगना चतुर्ल- भयोनिमानि, मनुष्याणां चतुर्दशलक्षयोनिमुरगानि । स्थलसूक्ष्मेकेन्द्रियमंश्यमंशिपश्चन्द्रियदीन्द्रियचतुगिन्द्रयपातापाप्त- कभेदमनायचतुर्दशीवस्थानानि । गतीन्द्रियकाययोगवेदकपायज्ञानसंय- मदर्शनलेझ्याभल्याभल्यांश्याहारविकल्पलक्षणानि मार्गणास्थानानि । एतानि मर्वाणि च तम्य भगवतः परमात्मनः शुद्धनिश्चयनयबलेन न सन्तीति मगवतां मत्रतामभिप्रायः । तथाचोन श्रीमदमृतचद्रगिभि.- " सकैटपि विहायाद्वायचिच्छनिरिक्तम् स्फुटतग्मवगाय स्वं च चिछीनमात्रम् । इममुपरि चरन्तं चार विश्वस्य साक्षात् कलयंतु परमात्मात्मानमात्मन्यनन्तम् ॥" "पिच्छनिच्यातसर्वम्य, मारो जीव इवानयः । अतोऽतिरित्तास्ते से भाश: पोनालिका इमे ॥ तथाहि। अनवग्तमसण्डजानसद्भावनात्मा नजति सच विकल्प संमृत|ररूपं । अतुलमनधमात्मा निर्विकल्पः समाधिः परपरणति दूर याति सन्मात्र एषः।। इत्थं दुद्दोपदेशं जननमृतिहरं यं जरानाशहेतुं भक्विामरेन्द्रप्रकटमुकुटसदनमाटाचिताः । १पाद्रव्य स्यक्ला । मनोहर या . riftarnatil होममायामी" मान. मग TIHITTH:- गिदंगे णिवंडो गिम्ममो णिकालो निगलंची। णीरागो णिहोमो णिम्टो णिमयो मा।। ४३ ॥ मिनि निमः नि.: निगः । नीगगो नि निको निर्भगः मामा ॥ ४ ॥ मनो TRIVE AT योगमITHA भागरि निगा नाम- माधि । ATTRAITARTमाणाभिम। नि. নাবিয়ামাচাননমাস तः। निदेन परमात्मनः पानिपारम्पार निगमः। निगम देगावागायनिशोभना गाकोधमानमायालोभाभिधानाभ्यन्ता चतुर्दगपरिमाभावान्नीगगः । निअपन लिमिदस्तिमा निर्षि- क्रममयमा गपग्मीलगगगुमणमुद्रमध्यनिर्ममातिगहनासम्या मान शानगात्रपरिवत्वान्निदोषः । महजनिभायनयन महजगनमाज- दर्शनसहजयाग्विसहमपग्मीतरागगुमायने करमामाधारनि नपामतन- परिच्छेदनसमर्थवानिदः । अया मापानिधनामूनातीन्द्रियम्बभाव- शुद्धसद्भूतव्यवहारनयरलेन त्रिकालविलोम्मातिस्थावरजंगमात्मानिधि लद्रव्यगुणपप्यायकसमयपरिच्छिनिसमर्थमफलविमलकेवरमानावस्थत्वान निर्मदश्च निसिलदुरितवीरवेरिवाहिनी दुःप्रवेशनिजशुद्धान्तम्नावमहा- दुर्गनिलयत्वानिर्भयः अयमात्मा ह्युपादेयः इति । तया चोक्तममृतीतो- स्वरनिकरविसर्गव्यंजनार्यद्रहितमहितहानं शाश्वतं मुक्तसंख्यं । अरसतिमिररूपस्पर्शगंधाम्बुवायुक्षितिपवनसरगणुस्थलदिकचकवालम।"

-- - नारामिः। - दुरपश्नकुगर प्रामदुपारः पापानि नामाभिः । हरदिविधविरा: मन्यदिनी रूपादिम्मरमार पातु मामानमार। जयति परमजा तन्दनिष्णानगर- प्रनिदपान्ने दिन निकाम। भन्दमुहद सामान इंद। अनिल सहनाकार। निगरिन मन्तु मारिए। भावनगर पदमिदं मदद मन भजामनिममपूर- ना किमधुवनम्नुनि तिर समयगाग्मनाकुलमायुतम जननमापा जातिविनाशनम्। महजनिर्मदा धाम सारन मा गरिपूजये। इत्य निमशन निजामत- मुन. पुरा सुनिदर। दुदैव पन्मुनि मुनि मन नियमसार- कमेकत्वसप्ततो- आत्मा भिमस्तदनुमतबत् कर्ममिन्नं तयोर्या प्रत्यामतेर्भवति विकृतिः सापि भिन्ना तथर । कालक्षेत्रप्रमुखमपि यत् तन्न भिन्न मतं ये भिन्न भिन्नं निजगुणकलालंकृतं सर्वमेतत् ॥" तथाहि- असति च सति बन्धे शुद्धजीवस्य रूपाद रहितमसिलमूर्तदव्यनालं विचित्रम् । इति जिनपतिवाक्यं वनि शुद्धं बुधानां भुवनविदितमेतद भव्य जानीहि नित्यम् । शुद्धद्रव्यार्थिकनयाभिप्रायेण संसारिजीवाना मुकजीवानां विशेष्ये- भावोपन्यासोयम्:-- जारिसिया सिद्धप्पा भवमल्लिय जीव तारिसा होति । जरमरणजम्ममुक्का अहगुणालंकिया जेण ॥४७॥ यादृशाः सिद्धात्मानो भवमालीना जीवाम्ताहशा भवन्ति । जरामरणनन्ममुक्ता अष्टगुणालंकृता येन ॥ ४७ ॥ ये केचिद् अत्यासन्नभव्यजीवा ते पूर्व संसागवस्थाया संसारक्शाया- सचिताः संतः सहनवैराग्यपरायणाः द्रव्यभावलिंगधराः परमगुरुप्रसादित. परमागमाभ्यासेन सिद्धक्षेत्रं परिप्राप्य निर्व्याबाधकसकलविमलकेवलज्ञान- केवलदर्शनकेबलसुसकेवलशक्तियुक्ताः सिद्धात्मानः कार्यसमयसाररूपाः कार्यशुद्धास्ते यादृशास्तादृशा एव भविनः शुद्वनिश्चयेन येन कारणेन ताट- शेन जरामरणजन्ममुक्ताः सम्यक्त्वायष्टगुणपुष्टितुष्टाश्चेति । विशेषाभायः प्रतीयतेऽत्र।

मानिः। । मागेव शुद्धता पाम् भुपियाँ कुधियामपि । नयेन निधिलेषां भिदा कामपि वेष्ट्यहम् । अयं च पार्दवारणसमयसारयोर्विशेषाभाशेपन्यास.- असरीरा अविणासा अणिंदिया णिम्मला विसुद्धप्पा । जह लोयग्गे सिद्धा तह जीवा संसिदी णेया ॥४८॥ अगरीग अविनाशा अनीन्द्रिया निर्मला विशुद्धात्मानः । यया लोकाग्रे सिद्धाम्नथा भीवाः समृती हया ॥ १८ ॥ निश्चयेन पंचशरीरमपंचाभावादारीराः। निश्चयेन नरनारकादिपर्याय- परित्यागीकाराभावादविनाशा । युगपत्परमतत्त्वस्थितसहनदर्शनादि- ग्णशुद्धम्वरूपपारीचिनिसमर्थमहजज्ञानज्योतिरपहस्तितसमस्तसंशयस्व- रूपन्दादीन्द्रिया मलजनकक्षायोपशामिकादिविभावम्वभावा- नामभावनिर्मलाः । द्रव्यभावकर्माभावाद् विशुद्धामानः यत्र लोकामे भगवन्त: मिद्धपरमेटिनस्तिष्ठन्ति तथैव समृतावपि अमी केचिन्मयबलेन संसारिजीवाः शुद्धा इति । शुद्धामुद्धविकल्पना भवति सा मिथ्याशि प्रत्यहम् शुद्धं कारणकार्यतत्वयुगलं सम्यादृशि प्रत्यहम् । इत्थं य. परमागमार्थमतुलं जानाति सहक स्वयम् सारासारविचारचारुधिपो बन्दामहे तं वयम् ।। निश्चयन्यवहाग्नययोरुपादेयत्वप्रथोतनमेततः:- एदे सब्वे भावा पवहारणयं पहुच्च मणिदा हु सवे सिद्धसहावा सुद्धणया संसिदी जीवा ॥४९॥ एते मर्ने भावा. व्यवहारनयं प्रतीत्य भणिता खलु । मर्वे सिद्धस्वभावाः शुद्धनयान् संमृती जीवाः ॥ ४९ ॥ प्रथमान्ते “ विते, इतिते सदृशो विशेषर्ण भवन। - नियमसार- 44 से पूर्व न विपने इति प्रनिविताम्ने सरे भिमर्यापाः सः महानयादेशेन यिन्ने । संतागपि ये विभागमारेधनुभिः मन्नम्भिानित, अपि च । ते सो मना सिद्रानान गुमण- सहा शुद्धनगदशादिति । तथागोम्म भीमदतगन्दगरिभिः- प्याराणनय स्पार ययाति प्रापदण्या- सिंह निहितपदान तनारम्बः। मणिपाप्रम निमारमा परिगतिमन्तः पश्यतो मेरिदिन" पाहि- गुवनियमन पिमुनो, मेमूनानि च नामिशितः । पार गगनगारे, शुद्धनम्मानिस प्रालि पोर-पागावानरसणानमिदम - एसमदमाश पादप्यं परराहायमितिदेयं । गगसमयाइयं अनावश्यं ६ अप्पा ॥५॥ iTREET पादाग भाषा पनि । मागाईक अन्नम्ना मागरमा ॥१०॥ Aaft मागायोगा Ti प्यादानाचा ५.saina , THERE AR 1. T-PEnानाAIRATHASE TRE #He rate Aft. FunMuTERast ramaina ANTA7Cxmarthairaft- .

तात्पर्यवृत्तिः।
NA
।
"सिद्धान्तोऽयमुदात्तचित्तचरितमोक्षार्थिभिः सेव्यताम्
शुद्ध चिन्मयमेकमेव परमज्योतिस्सदैवास्यहम् ।
एते ये तु समुहसंति विविधा भावा. पृथग्लक्षणाः
तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं सममा अपि ॥"
तथा हि-
नद्यस्माकं शुद्धीवास्तिकायादन्ये सर्वे पुद्गलदय्यभावा' ।
इत्य व्यक्तं यम्ति यस्तत्त्ववेदी, सिद्ध सोयं यानि तामत्यपूर्व ॥
रन्नत्रयम्वरूपाण्यानमेतत्:-
विवरीयामिणिवेस-विवजियसदहणमेव सम्मत्तं । ध
संसयविमोहविष्ममविवजियं होदि सण्णाणं ॥ ५१ ॥
चलमलिणमगाढत्तविवजियसदहणमेव सम्मत्तं ।
अधिगममावे गाणं हेयोपादेयतच्चाणं ॥५२॥"
सम्मत्तस्स णिमित्तं जिणसुत्तं तस्स जाणया पुरिसा ।
अंतरहयो मणिदा दंसणमोहस्स खयपहुदी ॥ ५३॥४
सम्मत्तं सण्णाणं विजदि मोक्खस्म होदि मुण चरणं।
वबहारिणिच्छएणदु तह्मा परणं पवक्खामि ॥ ५४॥
यवहारणयचरिते घवहारणयस्स होदि तवचरणं ।
णिच्छयणयचारितेतवयरणं होदिणिच्छयदो५४ पंचय।"
विपरीनाभिनिवेशविवनितश्रद्धानमेव सम्यक्त्वम् ।
संशयविमोहनिभ्रमविवर्जित मानि संज्ञानम् ॥ ११ ॥
चलमलिनम गादत्तविवर्जिनश्रद्धानमेव सम्यक्त्वम् ।
अधिगमभावो ज्ञान हयोपादेयतत्वानाम ॥ १२ ॥

४६ नियमसार- सम्यक्त्वस्य निमित्तं निनमूत्रं तम्य ज्ञायकाः पुरुषाः । अन्तहेतवे मणिताः दर्शनमोहस्य क्षयप्रभृतेः ॥ ५३॥ सम्यक्त्वं संज्ञानं विद्यते मोक्षम्य मवति शृणु चरणम् ! व्यवहारनिश्चयेन तु तस्माचरणं प्रवक्ष्यामि ॥ १४ ॥ व्यवहारनयचरित्र व्यवहारनयस्य मवति तपश्चरणं । निश्चयनयचारित्रे तपश्चरणं भवति निश्चयतः ॥ १५॥ पंचकं । भेदोपचाररत्नत्रयमपि तावद विपरीताभिनिवेशविवर्जितश्रद्धानरूपं भग- वतां सिद्धिपरंपराहेतुभूतानां पंचपरमेष्टिना चटमटिनागाइविवर्जितसमुप- जनितनिश्चलभक्तियुक्तत्वमेव । विपरीते हिरण्यगर्भादिपणी पदार्थसार्थे ह्यभिनिवेशामाव इत्यर्थः । संज्ञानमपि च संशयविमोहविनमविवन्जिनमेवातत्र संशयः तावत् जिनो वा शिवो वा देव इति । विमोहः शाक्यादिप्रोने वस्तुनि निश्चयस्वरूपं । चलमलिनादिविवजितश्रद्धानमेव अभेदोपचाररनत्रय- परिणतिः तत्र जिनप्रणीतहेयोपादेयतत्त्वपरिच्छित्तिरेव सम्यग्ज्ञानम्' अम्य परिणामस्य बाद्यसहकारिकारणं वीतरागसर्वज्ञमुखकमलादिनिर्गतसम- स्तवस्तुप्रतिपादनसमर्थद्रव्यश्रुतमेव तत्त्वज्ञानमिति । ये मुमुक्षवः तेप्युपचारतः पदार्थनिर्णयहेतुत्वात् अंतरंगहेतब इत्युक्ताः । दर्शनमोहनी- यकर्मक्षयप्रभृतेः सकाशादिति अभेदानुपचाररत्नत्रयपरिणतनीजम्य टकोत्कीर्णशायकैकस्वभावनिजपरमतत्वश्रद्धानेन, तत्परिच्छित्तिमा अंतर्मुसपरेमबोधेन, तद्रूपाविचलस्थितिरूपसहजचारित्रेण, अभूतपूर्वः निद्ध पर्यायो भवति । य. परमजिनयोगीश्वरः प्रयम पापक्रियानिवृत्तिम्पत्य वहाग्नयचारि तिष्ठति, तस्य सलु व्यवहारनयगोचरतपश्चरणं भवति । सहजनिश्चयनयात्मकपरमस्वभावात्मपरमात्मनि प्रतपनं तपः, स्वस्वरूपा- विचरस्थितिरूपं सहजानिश्चयचारित्रम् अनेन तपसा मवतीति । तथा पोनर्मकत्वसततो- तात्पर्यवृप्तिः। ४७ " दर्शनं निश्चयः पुंसि बोधस्तद्रोध इप्यते । स्थितिरत्रेव चारित्रमिति योगः शिवश्रयः । तथा च- जयति सहजयोधस्तादृशी दृष्टिरेषा चरणमपि विशुद्धं तद्धिं चैव नित्यम् । अथ कुलमलपंकानीकनिर्मुक्तमतिः सहनपरमतन्वे संस्थिता चेतना च ॥ इति सुकविजनपयोगमित्रपंचेन्द्रियप्रसरवर्जिनगात्रमात्रपरिमहीपन मममलधारिदेवविरचितायां नियमसाग्व्याख्याया तात्पर्यवृत्ती सुद्धभावाधिकारस्तृतीय श्रुतस्कन्धः ॥ ३ ॥ -- अथेदानी व्यवहारचारित्राधिकार उच्यते । अहिंसावतम्बापाग्यानमेनत्:-- ., कुलजोणिजीवमग्गण-ठाणासु जाणऊण जीवाणं । तस्सारंभणियत्तण-परिणामो होइ पढमवदं ॥ ५६ ॥ कुलयोनिमीवमार्गणास्थानादिपु नात्या जीवानाम । तस्यारम्भनिवृत्तिपरिणामो भवति प्रथमयतम् ॥ ५६॥ फुटविकल्पो योनिविकल्पच जीवमार्गणास्थानविकल्पाच मागेव पति- पादिता । तव तेषां भेदान् बुद्धा तदक्षापरणतिरेव भवत्यहिंसा । तेषां मृतिर्भवतु पा न घा, प्रयत्नपरिणाममन्तरेण सावयपरिहारो न भवति । अतएव प्रयत्नपरेऽहिंसावतं भवतीति ।। तथाचारतं श्रीसमन्तभद्रस्वामिभिः- “ अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परम न सा तत्रारम्भोऽरत्यणुरपि च याश्रमवियो। तनम्तत्सियर्थ परमकरणो प्रन्यमुभय भवानेवात्याक्षीन हि विकृतिवेगेपधिरतः ।।

माना form #it ANTEY. Pari Tamimiririrm बमारे MARATEmraat fireitter Taramin मा mr fromf ARTIYAmकोमानि। fase from a sittet fra Tint - Himनिन । प्यामिनिमम:-- पासुगमगेण दिया अपलोगतो गप्पमार्ण हि । गरह पुरदी ममणी पिया ममिदी ये तम्मा ६१॥ प्रामुम्मागणदिश भागमा युगप्रमाणे गर । गन्नति पान, श्रमणः इंग्या समिनिमानम् ॥ ११॥ पाममयी गादेवपागादिवशम्नप्रयोजनमरियायाम मार्गम् अवलोकयन प्यासनंगमप्राणिपरिक्षार्थ यदेव गाउनि तम्प सम् परमभ्रमणम्याममितिभवनि । स्याहारसमितिमापमुकम् । इदानी निश्चयममितिम्वरूपमुच्यो- अभेदानुपचाररनत्रयमाण पामधMण स्वात्मनि सम्यग इता परणानि समितिः । अया निनपरमतत्त्वनितिमहजपामदोधादिपरमयमांगो महतिः समितिः । इति निभयन्यवहारममिनिमेदं बुदा तव यामनिभयसमिति मुपायानुमव्य इति।

सात्पर्यवृत्तिः। - इथं बुद्धा परमसमिति मुक्तिकान्ताससी यो मुक्त्वा संगं भवभयकर हेमरामात्मक च। स्थित्त्वा पूर्व सहज विलसच्चिदमत्कारमात्रे भेदाभावे समयति च यः सर्वदा युक्त एवं ॥ जपति समितिरेषा शीरमूलं मुनीनाम त्रसहतिपरिदूरा स्यावराणों हतेा । भवदवपरितापक्केशजीमूतमाला सकलसमितिमुख्यानेकसन्तोषदायी ॥ नियतमिह जनानां जन्म जन्मार्णवेशस्मिन् समितिविरनिकानां कामरोगातुराणाम् । मुनिप फुरु ततस्त्वं स्वन्मनोगेहमध्ये स्वपवरकममुख्याश्चारुयोपिन्मुमुक्तेः ।। शममयरूपा समिति सूते गदि मुनिभाग्भवेन्मोक्षः । सहि न च लभतेऽपापात मंसारमहार्णवे भ्रमति। अत्र भाषासमितिस्वरूपमुनमः- ट पेसुण्णहासकक्कसपरणिंदप्पप्पसंसियं घयणं । परिचित्ता सपरहिदं मासासमिदी बदतस्स ॥ १२ ॥ पैशून्यहास्यकर्कशपरनिन्दात्मप्रशसित वननम् ॥ परित्यक्त्वा म्वपरहितं भाषासमितिर्वदतः ॥ १२ ॥ कर्णेनपमुसविनिर्गतं नृपतिकर्णाभ्यर्णमतिं पैफपुरुषस्य एकदुष्टुवस्य एक मामय वा महिपत्कारणं वचः पेशून्यम् । पचित कदाचित् किचित् परजनविकाररूपमवलोक्य त्वाकर्यपहास्याभिधाननीषायसमुपजनितम् परशुभमिश्रितमप्पाभर्मकारणं पुरुषमुरविकारजनित रापकर्म । कर्णशष्युटिविश्राम्यर्णगोपरमात्रेण परेषामग्रीतिनननम् हि कर्कश ।

५२ नियमसार- ARA aon--- -- M- “ परेषां मूताभूतदूषणपुरस्सरवाश्यं परनिन्ना । स्वस्य मूनाभूतगुशम्नुनिगम प्रशंसा । एतत्सर्वमप्रशस्तवनः परित्यज्य स्वम्य च परस्य चाशुभ शुद्धपरिण तिकारणं वचो माराममितिरिति । तथाचोक श्रीगुणमदस्वामिभिः-- समधिगतममम्ता. सर्वमाश्यदूराः स्वहितनिहितचित्ताः शांतसर्वप्रचागः । स्वपरसफलजल्पाः सर्वसंकल्पमुक्ताः कथमिव न विमुक्तेभीजनं ते विमुक्ताः तथा च- परब्रह्मण्यनुष्माननिरतानां मनीषिणाम् । अन्तरैरप्यरं जल्पः बहिर्जल्पैश्च किं पुन: ॥ अत्रेपणासमितिम्वरूपमुकमः- ठ कदकारिदाणुमोदणरहिदं तह पासुगं पसत्त्वं च दिण्णं परेण मत्तं सममुत्ती एसणासमिदी ॥ ६३ ।। कृतकारितानुमोदनरहितं तां प्राशुकं प्रशस्तं च । दत्तं परेण भक्तं संभुक्तिः एषणासमितिः ॥ ६३ ।। तद्यथा-मनोवाकायानां प्रत्येकं कृतकारितानुमोदनः कृत्वा नव विक- ल्पा भवन्ति, न तेः संयुक्तमन्नं नवकोटिविशुदमित्युक्तं । आतिप्रशन मनोहरं हरितकायात्मक सूक्ष्मप्राणिसंचारागोचरं प्रामुकामित्याभिहितम् । प्रतिमहोच्चस्थानपादक्षालनार्चनप्रणामयोगाद्धिभिक्षाशुद्धिनामधेयर्नवविधि- पुण्यैः प्रतिपत्तिं कृत्वा श्रद्धाशक्तिअलुम्धतामक्तिज्ञानदयाक्षमाभिधान- सप्तगुणसमाहितेन शुद्धेन योग्याचारेणोपासकेन दत्तं भक्तं भुंजन . षट्चत्वारिंशदोषरहित पट्टादिविशुद्धं मममथवादके विशुद्धिं च ॥ इनि प्रेथे लिसित।

fri1. ARMINE तापणामभिनित terralifal । सच foren fR मा एमवाय, I am शानितिन PHrit- HOMETRitaramमा। मायाममो भयो। रणमाया पितरोपहियामा ममा आज भिरमणेगण सिमणा orm rrer श्रीगुगमायाभिम पमनियमनिशान शानामानामा ममममम पासवानी। दितिलमिलामामा, सम. दारिनितिनियोनिभिनाध्यात्ममार RE- भवना मन भगानामदन, व्यायामाने पूर्णविरका । हवास सनदी, प्रामोनीदा मुनिकारागनी सः ॥ अगदाननिक्षेपणमामनिम्यापमुनः-- पायापमंटटाई गहणपिसग्गेरा पयतपरिणामी । आदावणणिकसेवण समिदी होदिति णिविदा ॥६४॥ पुम्नककमण्डम्यादि प्रहणविमर्गयोः प्रयत्नपरिणाम. । आदाननिक्षेपणा समिनिर्भवतीति निर्दिष्टा ॥१॥ भारतसंयमिना मंथमज्ञानापुपकरणमहणविसर्गसमयसमुद्भवसमिति- महानिरियम् । उपेक्षासंयमिना न पुस्तककमण्डलुपतयः, अतस्ते परमजिनमुनयः पदान्ततो निशा, अत एव बायोपकरणनिर्मुनाः।

५४ नियमसार- अभ्यन्तरोपकरणनिजपरमतत्त्वयकामादर्श निरुपाधिस्वरूपसहजज्ञानमन्न- रेण किमप्युपादेयमस्ति । अपहृतसंयमधराणां परमागमार्थस्य पुनः पुन प्रत्यभिज्ञानकारणं पुस्तकं ज्ञानोपकरणमिति यावत् । गौचोपकरणं च कार्यविशुद्धिहेतुः कमण्डलुः । संयमोपकरणहेतुः पिच्छः । एतेयो महाधि- सर्गयोः समयसमुद्भवप्रयत्नपरिणामविशुद्धिरेव हि आदाननिक्षेपणा- समितिरित निर्दिश्यति । समितिषु समितीय राजते सोत्तमानां परमजिनमुनीनां संहतो शांतिमैत्री। त्वमपि कुरु मन:पंकेम्हे भव्य नित्यम् मवासि हि परमश्रीकामिनीकांतकांतः ॥ मुनीनां कायमलादित्यागस्थानशुद्धिकथनमिदन:- टपासुगमूमिपदेसे गूढे रहिए परोपरोहेण । उच्चारादिचागो पइहा समिदी हवे तस्स ॥६५॥ प्रासुकभूमिप्रदेशे गहे रहिते परोपरोधेन । उच्चारादित्यागः प्रतिष्ठा ममितिर्भवेत्तम्य ॥ ६ ॥ शुद्धनिश्चयतो जीवस्य देहाभावान्न चान्नग्रहणपरिणतिः, व्यवहारतो देहः वियते तस्यैव हि देहे सति ह्याहारग्रहणं भवति आहारग्रहणान्म- लमूत्रादयः संभवन्त्येव अत एव संयमिनां मलमूत्रविसर्गस्थानं निर्जन्तुकं परेपामुपरोधेन विरहितं, तत्र स्थाने शरीरधर्म कृत्वा पश्चात्तम्मात्स्यानादुनरेण कतिचिन पदानि गत्वा युदङ्मुसः स्थित्वा चोत्सृज्य कायकर्माणि संसा- रकारणं परिश्रम घटमानश्च संसृतेनिमित्तं स्वात्मानमत्र्यम्रो भन्दा ध्याय- ति यः परमसंयमी मुहुर्मुहुः कलेवरस्याप्यशुचित्वं वा परिभावयति, तस्य सलु प्रतिष्ठापनसमितिरिति नान्येषां स्वैरवृत्तीनां यतिनामधारिणां काचित समितिरिना Print -- mmsferreran Manife Relete wa Anime-travre । Flementary rhit rine पE EARTनि पापाः । नाभाrrearrai wधाममा wraneeri:- - कामगागागदोगाअगुदमापार्ण । पगिता मागती पहाणपण परिकहि ॥ ६६ ॥ हापापभभापानाम् । सम्रा मनाभि स्याहानगेन परिवपिता ॥ १९॥ धानमापालामानिने पनि मानविल बाष्यम् । FI नियाभिदधा । संशा भाभपमेनारिम्हाणा भा. पर्दा । गग MEHTAदेन विविध । अगदाननेषु पापि पाराय- पदार्थमा दाग परिणामाप । पापभपरिणामयत्ययानी Fire नपानिपंग मनागभिरिनि । गामिभविष्यति गदा पामागमार्थ- चितामनाथमनमो नितेन्द्रियाय । पागदपरिषट्राणिनितम्य श्रीमनिनन्दनाणरमरणान्वितस्य ॥ .

नियमसारmummmmmmarne । - इह वाग्गुप्तिस्वरूपमुक्तम्:-- त थीराजचोरमत्तकहादिवयणस्स पावहेउस्स । परिहारो वचगुत्ती अलीयादिणियत्तिवयणं वा॥६७॥ स्त्रीरानचौरमक्तकयादिवचनम्य पापहेतोः । परिहारो वामुप्तिरीकादिनिवृत्तिवचन वा ॥ १७ ॥ अतिवृद्धकालैः कामुकजनैः स्त्रीणां संयोगविप्रलंमजनितविविधवचनरचना कर्तव्या श्रोतव्या सेव बोकया । राज्ञां युद्धहेतूपन्यासो राजक्याप्रपंचः । चोराणां चौरप्रयोगकथनं चौरकथाविधानम् । अतिप्रवृद्धभोजनप्रीत्या विचि. त्रमंडकावलीसंडदधिसंडाशताशनपानप्रशंसा भक्तकथा।आसामपि कथाना परिहारो वाग्गुप्तिः । अलीकनिवृत्तिश्च वाग्गुप्तिः । अन्येषां अप्रशस्तवचमा निवृत्तिरेव वा वाग्गुप्तिः। तथाचोक्तं पूज्यपादस्वामिमिः- "एवं त्यात्वा बहिर्वाचं त्यजेदन्तविशेषतः एष योगः समासेन प्रदीपः परमात्मनः।" तयाहि त्यस्त्वा वाचं मरमयकारी मन्यजीवः समस्ताम ध्यात्वा शुद्ध सहगविलसञ्चिञ्चमत्कारम। पश्चान्मुक्ति सहगमाहिमानंदसौख्याकरी ताम प्रामोत्युधैः प्रहतत्वरित बातमघातप । अर कायगुप्तिस्वरूपमुक्रमः- पंधर पोदणमारणभाकुंपण तह पसारणादीया। कापकिस याणियत्ती णिहिता कापगुत्तित्ति ॥ ६८ ॥ पतिः निर्दिष्टा कायगुमिरिनि ॥ १८॥ काफियानि संचनदनग्नसारणाकुंचनानि तथा प्रमारणादीनि ।

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७
merammar, sitting
एनाmthane माप, सात
remergentry-
Har, trn.
- tº sch माईनात.
Prerter Imate निति बागी।
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-
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Kam जन्म मनो।
नियम पनेर-
मारामादिणियसी मणाम जाणादि तम्मणोगुप्ती ।
अतिपाणिपति पा मोणे पाहोर पदिगुप्ती ॥६॥
सानिरिमना मातार हा मनोगुप्तिम् ।
अनामिनिाति मान का भानि पागतिः ॥ १९॥
मोरागाभाषापामापं सम्यगास्थितिरेव नि-
मनोभि । शिष्य व तारन परिक्षा मनोतिमिति जानीहि ।।
--TATreभाषापरिनिर्वा मौनबत पविच मूर्तम्प पेतनाभाग
अमानंदम्पमिदियशानागोचरत्वाभाय चाप्रानि भवति, इति निभय-
पागमा पमुनम ।।
दारतासम्तमनोपचासमुदय स्पररवारमनिष्टापर:
गुलादानपानिरिनमन चिन्मानचिन्तामणिम् ।
मायाननयुटयामकतया साद स्थितो सईदा
जीवन्मानि मुति पोमिनिटकः पापाटवीवकः ।
निश्चयशरीरगुमिरवरूपारयानमेतत-
कापकारियाणियत्ती फाउस्सग्गो सरीरगे गुत्ती।
हिंसाइणियप्ती वा सरीरगुत्तित्ति णिविदा ॥ ७० ॥

नियममार- कायक्रियानिवृत्तिः कायोत्सर्गः शरीरके गुप्तिः । हिमादिनिवृत्तिर्वा शरीरगुप्तिरिति निर्दिष्टा ॥.७०. ॥ सर्वेषां जनानां कायेषु वदनः क्रिया विद्यन्ते तासां निवृत्तिः कायो- त्सर्गः स एवं गुप्तिर्भवति । पंचम्यावगणां त्रसाणां च हिंसानिवृत्तिः कायगुप्तिर्वा परमसंयमधरः परमनिनयोगीश्वरः यः स्वकीयं वपुः स्वम्य वपुषा विवकेने तस्याप्यपरमूर्तिव निश्चयकायगुप्तिरिति । तथाचोक्तम् तत्त्वानुशासने "उत्सकायकर्माणि भावे च भवकारणम् । स्वात्मावस्थानमव्ययं कायोत्सर्गः स उच्यते ॥" तथाहि- अपरिस्पन्दम्पस्य परिस्पन्दामिका तनुः । व्यवहाराद्भवेन्मेऽतस्त्यनामि विकृति तनोः ॥ भगवतोऽईत्परमेश्वरस्य स्वरूपाख्यानमेतत्:- घणघाइकम्मरहिया केवलणाणाइपरमगुणसहिया। चोत्तिसअदिसअजुत्ता अरिहंता एरिसा होति ।। ७१ ।। घनघातिकर्मरहिताः केवलज्ञानादिपरमगुणसहिताः । चतुस्त्रिंशदतिशययुक्ता अर्हन्त ईदृशा भवन्ति ॥ ७१ ॥ आत्मगुणघातकानि घातिकर्माणि, घनरूपाणि सान्दीभूतात्मकानि ज्ञान- दर्शनावरणान्तरायमोहनीयानि तेविरहितास्तथोक्ताः । प्रागुक्तपातिचतुष्क- प्रवसनासादितत्रैलोक्यप्रक्षोभहेतुभूतसकलाविमलकेवलज्ञानकेवलदर्शनकेव- लशक्तिकेवलमुखसहिताश्च। निःस्वेदनिर्मलादिचतुस्त्रिंशदतिशयगुणनिलया। ईदृशा भवन्ति भगवन्तोऽहन्त इति । -- १कयाचित् क्रियया भवितव्यम् ।

तात्पर्य दानः। जयति विदितगात्रः मेग्नीरेजनेत्रः मुस्तनिलयगोत्रः पंडिताम्भोजामित्रः । मुनिजनवनचैत्रः कर्मवाहिन्यमित्रः सकलहितचरित्रः श्रीमुसीमासुपुत्रः ॥ स्मरकरिमृगराजः पुण्यकंजाधिराजः सकलगुणसमाजः सर्वकल्पावनीजः। स जयति जितराजः प्रास्तदुधर्मबीज' पदनुतमुरराजस्त्यनसंसारभूजः॥ जितरतिपतिचापः सर्वप्रियाप्रदीपः परिणतिसुसरूपः पापनाशरूपः । हतभवपरितापः श्रीपदानप्रभूपः स जयति निनकोपः प्रावदित्यलापः॥ जयति विदितमोक्षः पनपनायताक्षः पारितदुरितक्षा पास्तकंदर्पपक्षः पदयुगनतयक्षः तत्त्वविज्ञानदक्षः कृतबुधगनशिक्षः प्रोन निर्वाणदीक्षः ।। मदननगमुरेशः कान्तकायप्रदेशः पदविनतयमीशः प्रास्तानाशपक्षः । दुरघवन हुताशः कीर्तिसपूरिताशः जयति जगदीशः चारपत्रमशः ॥ भगवां सिद्धिपरंपराहेतुभूतानां सम्पमनोनमः- णहडकम्मपंधा अढमहागुणसमणिया परमा । लोयग्गटिदा णिचा सिद्धाजे एरिसा होति ॥७२॥ नपाष्टकर्मरन्धा अष्टमहागुणसमन्विनाः परमाः मोकामस्थिता नित्याः सिद्धास्ने ईरशा भवन्ति ॥ २ ॥ - .. Errfrrrrmire HTT wrimart 1101 trjinarramm ort 2111 . front or Antty POINinnarror writtentirman win पंगाणा निहितानामिणा। पारामीरा भापरिया मा हानि ..॥ पानामा नदिEmaavat पगमा भानामा ॥ भाववादिलायोनियन निःगमा ,r.rr. बदामच श्रीगभियान: वन्दियमा सरर्मनाउन नि मगरिनपोशालिगः । aa ar- पन्ना सामाग्यो नि । नया चार शादिगदो- ११ णिग्गंथा णिम्मोहा साहू एदेरिसा होति ।।७५॥ तापणनिः। "पंचाचारपगभचिनपतीनटरपायाश्रमान् चंचजशानबरामचिनमहो गंचास्तिकायस्थितान् । फागनचलयोगचंचुराधियः सूरीनुदंचद्गुणान् अंचामो भवदुःससंचयभिदे भक्तिकियाचंचवः ।। नयाहि- सकर करणयामादंबादिमुक्तमनाकुल स्वहितनिरतं शुद्धं निर्वाणकारणकारण । शमदममावास मैत्रीदयादममंदिरम निस्पमामिद वंय श्रीचन्द्रकीर्तिमुनेर्मनः ॥ अध्यापकाभिधानपरमगुरुम्वापारयानमेतद्ः- रपणत्तयसंजुत्ता जिणकहियपयत्थदेसया सूरा । णिकरामावसहिया उवझाया एरिसा होति ॥७४ ॥ रनत्रयसंयुक्ता. निनकयिनपदार्थदेशका सूरा' । निःकांक्षभावसहिताः उपाध्याया ईदृशा भवति ।। ७४ ॥ अविचलताऽग्पटादेतपरमचिद्रूपश्रद्धानपरिज्ञानानुष्ठान शुद्धनिश्चयम्वभा- वरमयनिनेन्द्रवदनारविंदविनिर्गत वादिसमस्तपदार्थसार्योपदेशशग , निसिलपरिग्रहपरित्यागलक्षणा निरंजननिजपरमात्मतत्वभावनोत्पन्नपरभ- वीनरागमुखामृतपानेनोन्मुखाम्त एव निष्कांक्षामावनासनाथाः एवभाव- लक्षणलक्षितास्ते जनानामुपाध्याया इति । रत्नत्रयमयान शुद्धान् मव्यांभोजदिदाकरान् । उपदेशनुपाध्यायान् नित्यं वंदे पुनः पुनः ।। निग्न्तगरांडितपरमतपश्चरणनिरतसर्वसाधुस्वरूपाख्यानमेतत् - धावारविप्पमुका चरविहाराहणासयारत्ता।

नियममार- व्यापारविप्रमुक्ताः चतुर्विधाराधनामदारताः । निर्ग्रन्या निर्माहाः साधवः एतादृशा मवति ।। ७५ ॥ ये महान्तः परमसंयमिनः त्रिकालनिरावरणनिरंजनपरमपंचमभाव- भावनापरिणताः, अत एव समस्तबाहव्यापारविप्रमुताः, ज्ञानदर्शन- चारित्रपरमतपश्चरणाभिधानचतुर्विधारायनासंपदानुरक्ताः । बाह्याभ्यन्तर- समस्तपरिग्रहविनिर्मुक्तत्वान्निम्न्याः । सदा निरंजननिजकारणसमयसार- स्वरूपसभ्यअद्धानपरिज्ञानाचरणप्रतिपक्षमिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रामावानि- र्मोहाः । इत्थंभूतपरमनिर्वाणसीमंतिनीचाम्सीमंतसीमाशोमानाममृणरजः पुनर्पिजरितवर्णालंकारावलंबनकौतूहलबुद्धियोपि ते सर्वेपि साधवः इति । भावनां भवसुसचिमुर्स त्यनं सर्वाभिषंगसम्बंधात् । मंक्षु विमक्ष्व निजात्मनि वंद्यं नम्नन्मनः साधो । व्यवहारचारित्राधिकारच्याम्यानोपसंहारनिश्चयचारित्रसूचनापन्यासोयन्ः- एरिसयमावणाए ववहारणयस्स होदि चारितं । णिच्छयणयस्स चरणं एत्तो उद पवक्सामि ॥ ७६ ॥ ईदग्भावनायां व्यवहारनयस्य भवति चारित्रम् । निश्चयनयस्य चरणं एतदूर्व प्रवक्ष्यामि ॥ ७६ ॥ इत्यंभूतायां प्रागुतपंचमहावतपंचसमितिनिश्चयव्यवहार्गवगुमिपंचपर- मध्यिानसंयुक्तायां अतिप्रशस्तशुभभावनायां व्यवहाग्नयाभिप्रायेण परम- चारित्रं भवति, वक्ष्यमाणपंचमाधिकारे परमपरममावनिरतंपचमग- तिहेनुभूतशुद्धनिश्चयात्मपंचमचारित्रं द्रष्टव्यं भवतीति । तथानानं. मार्गकाशे- " कुशीनगर्भस्थितिबीजसोदा मोहिना येन महटियोधनम् ।

नात्पर्यवृत्तिः।
---
॥
-
तदेव देवासुरमानवस्तुतम
नमामि जेनं चरण पुनः पुन
तथाहि-
शीलमपवर्गयोषिदनंगसुखस्यापि मूलमाचार्याः ।
प्राहुर्व्यवहारात्मकवृत्तमपि तस्य परी हेतुः ।।
इतिसुकविजनपयोगमित्रपंचेन्दियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहीपद्म-
प्रभमलधारिदेवविरचितायां नियमसारच्याव्यायाम नात्पर्य्यडको
व्यवहारचारित्राधिकार चतुर्थः श्रुतस्कन्धः ॥ ४ ॥
नमोऽस्तु ते संयमबोधमूर्तये
स्मरेभकुंभस्थलभेदनाय थे।
विनयपंकेरुहविकाशभानवे
विराजते माधवसेनसूरये।
अथ सकलव्यावहारिकचारित्रतत्फलमाप्तिप्रतिपक्षशुद्धनिश्चयनयात्म-
कपरमचारित्रप्रतिपादनपरायणपरमार्थपतिक्रमणाधिकारः कथ्यते । तपथा ।
पचरत्नावतारः । अत्र शुद्धात्मनः सकलकर्तृत्वामा दर्शयतिः-
णाहं मग्गणठाणो णाहं गुणठाण जीवठाणो ण ।
फत्ता ण हि कारइदा अणुमंता प.फत्तीणं ॥ ७ ॥
णाहं णारयमावो तिरियत्त्थो मणुवदेवपजाओ।
कत्ता ण हि फारइदा अणुमंता व फत्तीणं ॥ ७८ ॥
णाहं पालो पुड्डो ण चेव तरुणो ण कारणं तेसि ।
फत्ता ण हि कारइदा अणुमंता णेप कत्तीणं ॥ ७९ ॥
णाहं रागो दोसो ण पेव मोहो ण कारणं तेसिं।
कत्ता ण हि कारदा अणुमंता व कधीणं ॥८॥

६४ नियमसार- --- --- .www.x --MukAIMAN . णाहं कोहो माणो ण चेव माया ण होमि लोहो हिं। कचा ण हि कारइदा अणुमंता व कत्तीणं ॥१॥ पंचयं नाहं मार्गणास्थानानि नाहं गुणस्थानानि जीवस्थानानि वा । कर्ता न हि कारयिता अनुमंता नैव कर्तृणाम् ॥ ७७ ॥ नाहं नारकभावस्तियमानुपदेवपर्यायः । कर्ता न हि कारयिता अनुमंता नैव कर्तृणाम् ।। ७८ ॥ नाहं बालो वृद्धो न चैव तरुणो न कारणं तेषाम् । कर्ता न हि कारयिता अनुमंता नैव कर्तृणाम् ॥ ७९ ॥ नाहं रागो द्वेषो न चैव मोहो न कारणं तेषाम् । कर्ता न हि कारयितां अनुमंता नैव कर्तृणाम् ॥ ८ ॥ नाहं कोधो मानो न चैत्र माया न भवामि लोगोऽहम् । का न हि कारयिता अनुमंता नैव कर्तृणाम ।। ८१ ॥ पंन बहारमपरिग्रहाभावादहं तावन्नारकपायो न भवाभि संसारिणो जी- वस्य बद्धारंभपरिमहत्वं व्यवहारतो भवति अत एव तस्य नारका. युनहेतुभूलनिसिलमोहरागदेश वियन्ते, न मम शुदानिश्चय वलेन शुद्धनीवास्तिकायस्य तिर्यक पर्याय: शुद्धनिश्चयतो न सम• स्तीति । देवनामधेयाधारदेवपर्याययोग्यमुरससुगंधस्वमावा मक- पुदलदन्यसम्बन्धाभावाम्न मे देवपर्यायः' इति । चतुर्दशमेवभिन्नानि मागास्थानानि तयाविधभेइविभिमानि जीवस्यानानि गुणस्थानानि वा निश्चयीन में मनु पपर्याय:, सिम्युरिलो भाति ।

तात्पर्यवृत्तिः। शुद्धनिश्चयनयतः परममावस्वभावस्य न विद्यन्ते । मनुष्यतिर्यप-य- कायनिकायवयःकृतविकारसमुपजनितबालयौवनस्थविरवृद्धावस्थायनेक्स्यू- लकृशविविधभेदाः शुद्धनिश्चयनयाभिप्रायेण न मे सन्ति । सत्ता- घबोधपरमचैतन्यमुखानुभूतिनिरतविशिष्टात्मतत्त्वमाहकशुद्धद्रव्याकिनय- बलेन में सकलमोहरागषा न विद्यन्ते । सहजनिश्चयनयतः सदा निरावरणात्मकस्य शुद्धावबोधरूपस्य सहजचिच्छक्तिमयस्य सहजस्फ- तिपरिपूर्णमूर्तेः स्वरूपाविचटस्थितिरूपसहजयथाख्यातचारित्रस्य न मे नि- सिलसमतिक्लेशहेतवः क्रोधमानमायालोमाः स्युः।अथामीषां विविधविकल्पा- कुलानां विभावपर्यायाणां निश्चयतो नाहं कर्ता, न कारयिता वा भवामि, न चानुमंता वा कर्तृणाम पुदलकर्मणामिति । नाहं नारकपर्यायं कुर्वे, सहजचिदिलासात्मकमात्मानमेव संचिंतये नाई तिर्यकपर्यायं कुर्षे,सहज. चिदिलासात्मकभात्मानमेव सचिंतये । नाहं मनुष्यपर्यायं कुर्खे, सहनचिद्धि- लासात्मकमात्मानमेव संचिंतये । नाहं देवपर्यायं कुर्खे, सहजचिदिला- सात्मकमात्मानमेव संचितये । नाहं मिथ्यादृष्ट्यादिगुणस्थानभेदं कुर्वे, सहमचिदिलासात्मकमात्मानमेव संचिंतये । नाहमेकेन्द्रियादिजीवस्थान- भेदं कुवें सहजचिदिलासात्मकमात्मानमेव संचितये । माहं शरीरगत- वाटायवस्थानभेदं कुर्वे, सहजचिदिलासात्मकमात्मानमेव संचिंतये । नाहं रागादिभेदभावकर्मभेदं कुर्ये, सहजचिदिलासात्मकमात्मानमेव संचिंतये । नाहं भावकात्मकपापचतुष्कं कुर्वे, सहजचिदिलासात्म- कमात्मानमेव संचिंतये । इति पंचरत्नांचितोपन्यासमपंचनसकलविभा- पपर्यायसंन्यासविधानमुनं भवतीति । भत्र्यः समस्तविषयामहमुक्तचिन्तः स्वद्रव्यपर्य्ययगुणात्मनि दत्तचित्तः । मुनवा विभावमरिसलं निजभावभिन्नम् प्राप्नोति मुनिमचिरादिति पंचरत्नात् । 1 नियममार- अत्र मेदविज्ञानात् कमेण व निमयचारित्रं मवीन्युन:- एरिसमेदम्मासे मज्झत्यो होदि तेण चारित्तं । तं दिढकरणणिमित्तं पडिलमणादी पयसामि ॥२॥ इंग्मेदाम्यासे मध्यस्तो मवति तेन नारित्रं । तहढीकरणनिमित्तं प्रतिक्रमणादि प्रवक्ष्यामि ॥ ८२॥ पूर्वोतपंचरत्नांचितार्थपरिमानेन पंचमगतिमानिहेतुमूते मपुद्गटयोर्मेदाभ्यामे सति, तम्मिन्नेव च ये मुमुक्षक सर्वदा संस्थितास्ते हयत एवं मध्यम्या. तेन कारणेन तेषां परम- संयमिना वा स्तवनं चारित्रं भवति। तस्य चारित्राविचलम्थितिहेतोः प्रति- क्रमणादिति निश्चिक्रिया निगद्यते । अतीतदोपपरिहारार्थ यायश्चित्तं क्रियते तत्प्रतिकमणम । आदिशब्देन प्रत्याख्यानादीनां संभवश्चोच्यते इति । तथाचोक्तं श्रीमदमृतचन्द्रसूरिभिः- मेइविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल वेदन। अस्येव मारतो बद्धा पड़ा ये किल केचन। तथाहि- इति सति मुनिनायस्योच्च दमावे स्वयमयमुपयोगादाजते मुक्तमोहः । शमजलनिधिपूरक्षाटितांहाकलंक: स सलु समयसारस्यास्य भेदः क एषः । देनं दैनं मुमुक्षुजनसंस्तूयमानवाङ्मयप्रतिकमणनामधेयसमस्तपापक्षय- हेतुभूतसूत्रसमुदयनिरासोयनः- - पापा Tim4 " मगण पपणापणं गादीमायपारणं किया। अपाणं जो शापदि सम्म दु होदित्ति परिकमणे ॥८॥ हमा वमनाचना रागादिभावगारणं प्रत्या। आरमान यो ध्यायनि सम्म सुभानानि प्रनिर मणं ।। ८३॥ पनि माग्यमानिन्धुनाथाय मानि- यिनी अमापनपरिमनोपि प्रतिरामणगाविषमायनापना सामान दाना निग्लिमोहरागदेवभावान निराशरण प्रत्या दानंदमय निवारणपरमामान प्यापति, तरय खनु परमताय- বাঘাবামিয়ােসিবিশনযামল भवति। समाधान श्रीमदस्मद निमः- अलमलमनिमम्मे विकल्परनप- एपमिर परमापिनो नित्यमेकर। स्वासविसरपूर्णज्ञानविस्फूर्तिमाम- पए समयमागनरं विचिदनि । सपाहि- अतितीवमारसंभवपूर्णार्जितनत्यतिरम्प । आत्मनि सदोधात्मनि नित्यं धर्नेहमात्मना तस्मिन् ॥ अमात्माराधनायो धर्तमानस्य जन्तोरेव प्रतिजमणस्वरूपमुन:- आराहणाइ पद मोतूण विराहणं विसेसेण । सो पटिकमणं उसद पदिकमणमओये जम्हा ॥४॥ आगपनाया पर्नत मुक्त्वा विराधन विशेषण। सत् प्रतिक्रमणमुच्यते प्रनिक्रमणमयो भवेद्यस्मात् ।

नियममारnude - यस्तु ममतमानी भी. नितिगभिभुमाया गाम- संतत्या माशात भापस्थिनागभागवनायर्या बनते अयं निरपराध. गितामाराधनः माप: अपर निमोण विगधनं मुम्वा, विगतागयो यस्य परिणामस्य सरािधनः यम्मान्निभयानिकमगमय: स नीवस्तत एर प्रतिकमणम्यरूपमुच्यते । तथा चोक समयमार- " संसिद्धिगयमिदीसान्तिमाराधणं च पाई। अपगयराधय नो रालु वा सो सलु होदि अविराहो" उन हि समयसारख्यास्यायाम च- अनवरतमनग्यते सापगधः संशति निरपराधो बंधनं नैव जातु । नियतमयमशुद्ध स्वं मजन् सापराधो भवति निरपराधस्साघु शुदात्मसेवी " तयाहि- अपगतपरमात्मध्यानसमावनात्मा नियतमिह मवासा (?) सापराध स्मृतः सन्। अनवरतमसंडादेतचिद्भावयुक्तो भवति निरपराधः कर्मसंन्यासदक्षः ॥ अत्र निश्चयचरणात्मकस्य परमोपेक्षासंयमधरस्य निश्चयप्रतिक्रमण- स्वरूपं च भवतीत्युक्तमः- मोतूण अणायारं आयारे जो दु कुणदि थिरमा । सोपडिकमणं उच्चइ पडिकमणमओ हवे जम्हा॥८॥ मुक्त्वानाचारं आचारे यस्तु करोति स्थिरभावम् । स प्रतिक्रमणं उच्यते प्रतिक्रमणमयो भवेद्यस्मात् ।। ८५॥ - ..1 fort triamilia: सामागनामिरिन: पोप्पनापार, माद नाना पाया का मानचिनिगमलमगरिने বানা । सागपभागनापरिणः रिया- wit मन किमगार पुपते । पार EMPIEमारनारिणा मनिपानिशमनाममा भरतीति। अनिमामासान्द- पुलिस मोशमानमाभानमामा। निगममभिनिर्मगनभरपा प्रपया पाभिरिलोलापमाटे। सुपरवानाधारमननस्तरसपशेषगरी चियामन्यामनामा निरपमराहनानगरप्तिसनी। जापान मसनिधिमाहितः पुण्यः पुराणः क्षतिमलति रोकोपसाक्षी भर उन्मापरियागः सर्वशतिगगमार्गावराधोतः। उम्मग्गं परिपत्ता जिणमग्गे जो दु फुणदि घिरमार्य । सो पटिकमणं उप पटिफमणमओ हपे जम्हा॥८६॥ उन्मार्ग परित्याय मिनमार्ग पम्नु करोति स्थिरभाव। म पनिश्मणमुच्यते प्रनित्रमणमयो भोयरमात् ॥ ९ ॥ पम्नु काकाक्षाविचिकिमान्यष्टिप्रशंसापतवमलकपकनिर्मुकः धनिभायमाटिः गुदादिपणीतमिध्यादर्शनशानचारित्रात्मक मार्गा- भासमन्मार्ग परित्यज्य प्यवहारेण महादेवाधिदेवपरमेश्वरसरवीत- रागमार्गे पंचमहावतपंचसमितित्रिगुप्रिपंचेन्द्रियनिरोधपटावश्यकापटा- विंशतिमूटगुणात्मके स्थिरपरिणाम करोति, मुनिश्चयनयेन सहनबो- पादिधरगुणप्रतक्ते सहमपरमचित्सामान्यविशेषभासिनि nि ... hter Hit froinee optionaristinatrina fruirt Trinetir) orery writium Frittirit FROraimittire Hinduisinfank LADNA -attatrina Arrrrirmati marriHITTA TRITIENTIFram- मोरग मतमान गिग गोमा परिणमादि । सो परिकमणे उगा पदिकमणमोदये गन्दा ॥८॥ माला राम्गभा निराणे गम्नु मातु परिणामी। गतिरमणमुख्यने प्रतिरमणमा दम्मान । निभको निःशल्यपराग पाममनम्मर यानयबरेन कर्म- कपुनलात निदानमापानिध्याशयप विदन त्याचारतः, अना सम्पत्र परित्यज्य पामनिरामयम्बकनिष्पाविषयोपग्मयोगी निभय- मतिकमगताप इत्युच्यने यम्मान म्वरूपगनशनवनिकमणमान्योन। सत्ययं परित्यज्य निःशय दामात्मनि । स्थित्वा विद्वान सदा मुदमामानं मात्रदेवमुटन।

माहानी। Hi मिनिसय मिनर्भगम् भासमा मरदागादिदग्ध मर। मादनियत गरिदिवसादनागादिनम भन मरिन पर्ने प्रचलनीतितः । भिनिरोधनाय निश्पयाग्भिाग्यानमेता- पपा गुत्तिमा तिगुत्तिगुत्तो हवेह जो साहू । सो पटिफामर्ण उमर पटिकमणमओ एवे जम्हा ॥८॥ स्याला प्रगप्तिमा त्रिगुप्तिगुतो भोपः साधुः । म प्रतियमणमुन्यने प्रतिवमणमयो भोपग्मात् ॥ ८ ॥ पः परमनपझरणमरमरटरश्मिरत्यासमभन्यो मुनीश्वरः पारूपम अभिभावं त्याला विभिगुणनिर्विकल्पपरमसमापिटक्षण- हक्षितम् अयपूर्वमात्मानं ध्यापति, पम्मात् प्रतिषमणमयः परमसंयमी अन एवथ निभयपतिवमणावरूपो भवतीति । अप तनुमनोशा स्यात्वा सदा शिति मुनिः सा जपरमा गुर्ति संज्ञानपुंगमपीमिमाम् । भजतु परमा भव्यः गुदात्मभावनया सर्म भवनि विशद शीतं तस्य निगप्तिमयस्य तत् ॥ ध्यानविकल्पस्वरूपाख्यानमेतद:- मोतॄण अहरदं झार्ण जो झादि धम्मसुक था। सो पटिकमणं उच्चा जिणवरणिधिवमुत्तेसु ॥८॥ मुकवातरीदें ध्यानं यो ध्यायनि धर्मगुहं वा स प्रतिक्रमणम् उच्यते मिनवरनिर्दिष्टसूत्रेषु ।। ८९ ॥

७२
नियममार-
स्वदेशत्यागात द्रव्यनागात् मित्रनन विदेशगमनात् कमनीयकामिनी-
वियोगान् अनिटसंयोगादा समुपजातमातव्यानम् । चौरजाशात्रवनन-
वधवंधननिबद्धमहदेपननितगैद्रव्यानं च एतद्वितयम् अपरिमितम्वर्गा-
पवर्गसुख प्रतिपक्षं संसारदुःसमूलत्वं निरवशेषेण त्याचा स्वर्गापवर्गनिः-
सीममुखमूलस्वात्मश्रितनिश्चयपरमधर्मध्यानम्, ध्यानध्येयविविविकल्प-
विरहितान्तर्मुसाकारसकलकरणयामातीतनिर्मदपरमकलामनाथनिश्चयशुम-
ध्यानं च, ध्यात्वा यः परममावभावनापरिणतः मत्र्यवरपुंडरीकः
निश्चयप्रतिक्रमणम्वरूपं भवति । परमजिनेन्द्रबदनारविन्दविनिर्गत-
द्रव्यश्रुतेषु विदितमिति, घ्यानेषु च चतुर्यु हेयमायं ध्यानदितयं, त्रिनयं
तावदुपादेयं, सर्पदोपादेयं च चतुर्थमिति ।
तथा चोनं-
"निष्क्रिय करणातीतं ध्यानध्ययविवर्जितं ।
अन्तर्मुसं तु यद्ध्यानं तच्छुक योगिनो विदुः ॥
ध्यानावलामपि च शुद्धनयो न वक्ति
व्यक्तं सदाशिवमये परमात्मतत्त्वे ।
सास्तीत्युवाच सततं व्यवहारमार्ग-
स्तत्त्वं जिनेन्द्र तदहो महदिन्दजालम् ॥
सदोघमंडनामिदं परमात्मतत्त्वं
मुक्तं विकल्पनिकरैरसिलैः समन्तात् ।
नास्त्येष सर्वनयजातगतप्रपंचा
ध्यानावली कथय सा कथमत्र जाता ॥
आसन्नासन्नभव्यजीवे पूर्वापरपरिणामस्वरूपोपन्यासोऽयम्:-
मिच्छत्तपहुदिमावा पुग्वं जीवेण माविया सुइरं ।
सम्मचपहुदिमावा अमाविया होंते जीवेण ॥ ९० ॥

तात्पर्यवृत्तिः। मिथ्यात्वप्रतिभावाः पूर्व जीवेन भाविताः सुचिरं । सम्यक्त्वप्रभृतिभावाः अभाविता भवन्ति जीवेन ॥ ९ ॥ मिथ्यात्वावतकपापयोगपरिणामास्सामान्यप्रत्ययाः, तेषा तेपी विकल्पा- स्त्रयोदश भवन्ति 'मिच्छादिहिगुणहाणादिसयोगिस्स चरिमंत्त, पति वचनात मिध्याष्टिगुणस्थानादिसयोगिगुणस्थानचरमसमयस्थित इत्यर्थः । अत्यासन्नभव्यजीवन निरंजननिजपरमात्मतत्त्वश्रद्धानविकलेन पूर्व मुचिरं भाविताः खलु सामान्यप्रत्ययाः, तेन स्वरूपविकलेन बहिरात्मनीवे. नानासादितपरमनप्कयंचरित्रेण सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि न भावितानि मवन्तीति अस्य मिथ्याटेविपरीतगुणनिचयसंपन्नोऽत्यासन्नभव्यजीवः । अस्य सम्पाशानभावनाकयमिति चेत्- तथा चोक्तं श्रीगुणभद्रस्वामिभिः- "भावयामि भवावर्ते भावनाः प्रागभाविताः । भावयेद्भावितानेति भवाभावाय भावना:"। अथ भवजलराशो ममजीवेन पूर्व किमपि बचनमा निईतेः कारणं यत् । तदपि भवभरेषु श्रूयते पायते वा न च न च दत कष्टं सर्वदा शानमेकम् ॥ अत्र सम्यग्दर्शनशानचारित्राणां निरवशेषस्वीकारेण मिध्यादर्शन- शानचारित्राणों निरवशेपत्यागेन च परममुमुक्षोनिश्चयप्रतिक्रमणं च भवति इत्युक्तमः-- मिच्छादसणणाणचरित्तं चइऊण गिरवसेसेण । सम्मत्तणाणचरणं जो भावइ सो पडिक्कमणं ॥११॥ मिथ्यादर्शनज्ञानचरित्रं त्यक्त्वा निवशेषेण । सम्यक्त्वज्ञानचरणं यो माश्यति स प्रतिक्रमणे ॥११॥ -

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तात्पर्यवृत्तिः। तस्मै नमः सकलसंयमभूषणाय श्रीवीरनन्दिमुनिनामधराप नित्यं । इति सुकविमनपयोजभित्रपंचेन्द्रियपसरवर्नितगात्रमात्रपरिग्रहश्रीपद्म- अममलभारिदेवविरचितायो नियममारल्याख्यायां तात्पर्यवृत्ती नियमतिक्रमणाधिकार पंचमः श्रुतस्कंधः॥ ५॥ - अदानीं सकलभवन्यासाम्राज्यवैजयन्तीप्युलदंडमंडनायमानसकल- कर्मनिरीहेतुभूतनिःश्रेयसश्रेणीभूतमुनि भामिनीप्रथमदर्शनोपायनीभूत नि- भयप्रत्यास्थानाधिकारः कथ्यते । तपथा- अत्र सूत्रावतारः। निभयनयपत्याख्यानमेततः- मोत्तण सयलजप्प-मणागयमुहमसुहवारणं किया। अप्पाणं जो झायदि परसाणं हये तस्स ।। ९५॥ मुक्त्वा सम्लगल्पमनागतशुभाशुमनिवारणं कृत्वा । आत्मानं यो ध्यायति प्रत्याल्यानं भवेत्तस्य ॥ ९५ ॥ अत्र व्यवहारनयादेशात मुनयो भुक्त्वा दैनं देन पुनर्योग्यकाल- पर्यन्तं प्रत्यादिष्टानपानसांग्रलेखरचयः, एतद् व्यवहारप्रत्याख्यान- स्वरूप, निश्चयनयतः-प्रशस्ताप्रशस्तसमस्तवचनरचनाप्रपंचपरिहारेण शुद्धशानभावनामेवाप्रसादादमिनदशुभाशुभद्रव्यमावर्कमणा संवरः प्रत्या- ख्यानम् । य सदान्तर्मुखे परिणत्या परमकलाधारमपूर्वमात्मानं ध्यायति तम्य नित्यं प्रत्याख्यानं भवतीति । नयायोक्तं समयसारे- निराफनान- ७८ नियमसार- - गाणं सच्छे भावे पचक्रगदीपरति णादूर्ण । तम्हा पचक्साणं गाणं णियमा मुणेदव्वा ॥" तथा समयमारव्यास्यायो च प्रत्याख्याय भविष्यत्कर्मसमस्तं निरस्तसंमोहः । आत्मनि चैतन्यात्मनि निःकमणि नित्यमात्मना वर्ते"। तथाहि- सम्यग्दृष्टिस्यजति सकलं कर्मनोकर्मजात प्रत्याख्यान भरति नियतं तस्य संशानमः। सम्मारित्राण्यकुलहरिणाण्यस्य तानि स्गुरुः ते वोह भापरिभरलेशनाशाय नित्यम् ॥ अनन्तगतुष्ट पारमानिनामध्यानोपदेशोपन्यासोपमः- फेयलणाणसहायो केयलदसणसदार राहमहो। कवलसतिराहायो सोह ददि चिंतए णाणी ॥ ९६ । काक्षानभातः कारनामा: गुगमगः । मातिभा माहमिनि निगरानी ॥९॥ ममानवासामनायिनि नम्प निलशेषणान्ना माग ग Pानिनी नागnि प्रोताका अनागानिस्तान सामनाहाणा, प्रवwriterनामाTHITTE सामाणसालारमामा यः निभाना या सनी, विमानETRE हर Miri, Rafaeम, farfarm तमाला बार- तात्पर्यवृत्तिः। - तथाचोनमेकत्वसततो- "केवलज्ञानदृसौख्यस्वभावं तत्परं महः । तत्र ज्ञानेन कि ज्ञाते दृष्टे दृष्टं श्रुते श्रुतं " तथाहि- जयति स परमात्मा केवलज्ञानमूर्तिः सकलविमलदृष्टिः शाश्वतानंदरूपः । सहनपरमचिच्छक्त्यात्मकः शाश्वतोयं निरिलमुनिजनानां चित्तपंके नहंसः । अत्र परमभावनाभिमुख्यस्य शानिन शिक्षणमुक्त:- णियमावं णवि मुशह परमावं व गेहए केई । जाणदि पस्सदि सव्वं सोहं इदि चिंतए णाणी ॥९॥ निनभायं नापि मुंचति परमावं नैव गृह्णाति किमपि । जानाति पश्यति सर्व सोहमिति चिंतयेद् ज्ञानी ।। ९७ ॥ यस्तु कारणपरमात्मा सकलदुरितवीरवैरिसनाविजयवैजयन्तीलुंटार्क निकालनिरावरणनिरंजननिजपरमभावं वचिदपि नापि मुंचति, पंचविघ- संसारप्रवृद्धिकारण विमावपुद्रलद्रव्यमयोगजातं रागादिपरभाव मेव गृह्णाति, निश्चयेन निननिरावरणपरमबोधेन निरंजनसहजशानसहज- दृष्टिसहनशीलादिस्वभावधर्माणामाधाराधेयविकल्पनिमुनमपि सदामुक्त सहनमुक्तिभामिनीसंयोगमभवपरतानिलयं कारणपरमात्मानं जानाति, तथा- विधसहजावलोकेन पश्यति च, सच कारणसमयसारोह मिति भावना सदा कर्तन्या सम्यग्ज्ञानिभिरिति । तथा चोक श्रीपूज्यपादस्वामिभि:- यमाय न गृहाति गृहीत नापि मुंचति । जानाति सर्वथा सर्व तत्स्वसंदेयमरम्यहम् । " " नियममार- आत्मानमात्मनि निमात्ममुगारमात्मा जानाति पश्यनियमभाामे। तत्याजनेत म दाभाामन्य मासिने सर पोनलिका ॥ मानो मयि सम्मेदनिश गिन्मागितामणा- नानासोमाभिम मुमाना। तधिनराभिर्णमह माना मना शो নামগুহানারা বাবা গান । निन्द पनि निनामा मागायभायनो अगशामा निर्म। नीता प.मानाम गानादिनापाना माifrrent fruriftaar को नाम मा मागमे गाल । बनाया जानन मामामा माम" ** WMT-14T writt! tomon F1671FT पाणुिमागरपोहि पनि मला मालिनी धष याrिurtaman Farmint सामा! tri TRITE 14.41 PradTREk - artrition, ari *apri, Har nuterfinet .

AN... मायामिः। भावनि सहगपरमानंदरिद्वपमे संग्रा तेनियममिदं मुनिमामाग्यमूल । सम्मादुरी स्वयमपि प ससे मदरसरमस्मिन् भ्रराशी पुरु तव मनि पिचमत्कारमा अब सस्टविभावसन्यासविधिः प्रोनः । ममति परिव जामि णिम्ममचिमुपटिदो। आटवणं प मे आदा अवसेस प पोसरे ॥ ९९ ॥ ममत्वं परिवजयामि निर्ममत्वेप्युपस्थितः । आलम्पनं च मे आत्मा आरोप विनामि ॥ ९९ ॥ कमनीयकामिनीकांचनप्रभृतिगमस्तपादम्पगुणपर्यायेषु भमकार संप. जामि । परमापेक्षालक्षणलक्षित निर्ममकारात्मनि आमनि स्थित्या धात्मानमवलम्च्य र संगतिपुगंधिकासंभोगसंभवसुखदुःसापनेकविमाव- परिणति परिहामि । तथाचोक्त भीमदतचन्द्रगिभिः-- "निषिदे सस्मिन् मतदुरित समाज दिल मस्ते नेष्याय न सलु मुनयः सन्त्यशरणम् । सदा शाने शानं चरितमिदमे हि शरणम् पये चिन्दन्त्यने परमभमृत तत्त्वनिरताः ।" तथाहि- अथ नियतमनोशायनेन्द्रियोन्यो भवदनधिसमुन्य मोहयादेशमूह। कनक्युदतिबाच्छामप्य सर्वशवरया प्रवरतरविराई ध्यानमय्या स्यजामि ॥ . जन्तुविशेषः।

८० नियमसार- - तथाहि- आत्मानमात्मनि निजात्मगुणाध्यमात्मा जानाति पश्यति च पंचमभावमेकं । तत्याज नैव सहजं परमावमन्यं गृह्णाति नैव सलु पौगलिकं विकारं ॥ मत्स्वान्तं मयि लग्नमेतदानशं चिन्मात्रचिंतामणा- वन्यद्रव्यकृताग्रहोद्भवमिमं मुक्त्वाधुना विग्रह । तचित्रं न विशुद्धिपूर्णसहजज्ञानात्मनो शर्मणे देवानाममृताशनोद्भवाचं ज्ञात्वा किमन्याशने म निर्दन्दं निरुपद्रवं निरुपमं नित्यं निजात्मोद्भवं नान्यद् द्रव्यविभावनोदवमिदं शर्मामृतं निर्मदं । पीत्वा यः सुकृतात्मकः सुकृतमप्येतदिहायाधुना प्रामोति स्फुटमद्वितीयमतुलं चिन्मात्राचिंतामणिम् ॥ को नाम पनि विद्वान मम च परद्रव्यमेव स्यात् । निजमहिमानं जानन गुरुचरणसमर्थना समुद्भूतम् ।। अत्र बन्धनिर्मुकमात्मानं मानयेदिनि भत्र्यस्य शिक्षणमुकमा:- पपटिहिदिअणुमागप्पदेसरंधेहिं यजिदी अप्पा । सोहं इदि चिंतिग्जो तत्थेव य कुणदि थिरमाये ॥१८॥ प्रनिम्थित्यनुभागप्रदेशवाचित आत्मा । मोहमिनि चितयन् तंत्रताय करोनि पिरभाव ॥ ९ ॥ शुभाशुममनोकामकार्मभिः शनिदेशबंधौ स्याता, धतुभिः कपाः स्पियनुभागबन्धी ला, दमिश्चतुर्विधानिमुना मदानिमाधि मा मामिनि मुम्पमानिना निगला मावना दर्तयति।

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नियमसार- अब मांगत्मनोपदेय इत्युकः। आदा सु मज्झ गाणे आदा मे दंसणे चरिश य । आदा परसाणे आदा मे संबरे जोगे॥१०॥ आन्मा मनु मम ज्ञाने आत्मा में दर्शने भरिने । आत्मा प्रत्यायाने आत्मा मे संपरे गोगे ॥१०॥ अनानिधनामुर्मातीन्धियरपभाराममहमसोम्यामा मामा, म सय मा मशुनगानगरनापरिणतम्य मा राम्याशाने प, सय प्रति বমীলমণি মুখমমাসনাগা মম ক্ষমাশান- लिये गातानिणारयुपायम्पारस्पारिवास्थितिकपमहात. THAशिरिणत माजगारिवापिस पभामा मा समिति, भ'मा महामनस्य: शुभाशुभपुरासानो पणो सार. गानि गागान र मग शिानिनः पापगहाण HTTERTAITHIबिहाय मम सानगरपणासायशिमर. Frm: AKHT ITEM शुभाशुभ अशुभी- Haryमाग भुषायामीनपात मागानि এমনকি গান শ +THANAIRAT मायामिनि नाना पानी- " माने ना गाना। माMAT AAtm. मम Matters T**** Aparati! HDalit asliami " मात्पर्य हानिः। ८५ निरवधिनिदिन्यज्ञानाभ्यो समृदः किमिह पविकल्ये में फलं बाह्यभावः। आत्मगतदोषनिर्मुनयुपायकथनमिदमः- जैकिंचि मे दुचरितं सव्वं तिविहेण योसरे । सामाईर्य तु तिविहं करेमि सव्वं णिरायारं ॥ १०३ ॥ यत्किनिन्मे दुश्चरित्रं सर्व त्रिविधेन विसनामि । सामयिक त त्रिविधं करोमि सर्व निराकारम् ॥ १०॥ भेदविशानिनोपि मम परमतपोधनस्य पूर्वसंचितकर्मोदयवलासा- रिखमोहोदये सति यलिंचिदपि दुश्चरित्रं भवति चेत् सर्व मनोवाका- पसुदधा सत्यनामि, सामायिकशब्देन ताञ्चारित्रमुक्ने सामायिकछेदो- पस्थापनपरिहारविशुदाभिधानभेदाभिधं । अथवा जपन्यरत्नत्र यमुत्कृष्ट करोमि नवपदार्थपरद्रय्यश्रद्धानपरिज्ञानाचरणस्वरूपं रत्नवयं साकार सत् स्वस्वरूपश्रद्धानपरिज्ञानानुष्ठानरूपस्वभावरत्नत्रयस्वीकारेण निराकार शुदं करोमि इत्यर्थः । किंच । भेदोपचारचारित्रं अभेदोपचारं करोमि, अभेद्रोपचारम् अभेदानुपचारं करोमि इति विविध सामायिकमुत्तरोत्तर- स्वीकारेण सहजपरमतत्त्वविमलस्थितिरूपसहजनिश्चयचारित्र,निराकारतत्व- निरतवाभिराकारचारित्रमिति । तपाचोक प्रवचनसाग्व्याख्यायाम- द्रव्यानुसारि चरणं चरणानुमारि द्रय्य मियो इयमिदं, ननु सत्यपेक्षं। तस्मान्ममधुरधिरोहतु मोक्षमार्ग द्रयं प्रतीत्य यदिवा घरण प्रतीत्य ।" तथाहि- चित्तावभावनाशनमतयो यतयो यमम्। " नियमसार- एकस्त्वमाविशसि जन्मनि संक्षये च भोक्तुं स्वयं स्वकृतकर्मफलानुबन्धं । अन्यो न जातु सुखदुःसविधी सहायः स्वाजीवनाय मिलितं नटपटेकंते॥ तथाहि- एको याति प्रबलदुरपाजन्म मृत्यु च जीवः कर्मइन्दोद्भवफलमयं चारुसोख्यं च दुःसं । भूयो मुक्त स्वसुसविमुसः सन सदा तीवमाहा--- देके तत्वं किमपि गुरुतः प्राप्य तिष्ठत्यमुमिन । एकत्वमावनापरिणतस्य सम्यग्ज्ञानिनो लक्षणकयनमिई:- एको मे सासदो अप्पा णाणदसणलक्सणी । सेसा मे बहिरा मावा सध्ये संजोगलसणा ॥१०२॥ एको मे शास्वत आत्मा ज्ञानदर्शनाक्षणः । शेषा मे बाधा भावाः सर्वे सैयोगलक्षणाः ॥ १०२॥ अपिलरांधतिनन्दनतरुमूलालयालामापूरपरिपूर्णप्रणालिकायत संस्थित ताटेवरसमयहेतुभूतद्रव्यभावकार्माभागदेकः, रा पर निसिलकियाको- हावारिविधविकल्पकोलाहल निर्मुकरानगशुधगानचेतनामतीन्द्रिय जानः सन् शाश्वती भूत्वा ममोपादेयास्तिपति । पमिकालनिरूपाधि- समावत्वात् निरायणशानदर्शनलक्षणाशितः कारणपरमात्मा, ये शुभानुमधर्ममयोगभिवाः शेषा मागाभ्यन्तापरिमहा स्वस्वरूपा, थापाले सा, ति मम निश्चयः। अय मम परमात्मा शास्वतः कश्चिदर নাবিলিগিঘিয়।

नापर्यवानः। ८५ निरवधिनिनदिव्यज्ञानदृग्भ्यां समृदः किमिह बहुविकल्पे में फलं बाह्यभावः। आत्मगतदोपनि नयुपायकथनमिदमः- जंकिंचि मे दुशरितं सव्वं तिविहेण योसरे । सामाईयं तु तिविहं फरेमि सव्वं णिरायारं ॥ १०३ ।। यत्किचिन्मे दुश्चरित्रं सर्व त्रिविधेन विसनामि । सामयिकं तु त्रिविधं करोमि सर्व निराकारम् ॥ १०॥ भेदविज्ञानिनोपि मम परमतपोधनस्य पूर्वसंचितकर्मोदयवलाचा- रित्रमोहोदये सति पत्किंचिदपि दुश्चरित्रं भवति चेत् सर्व मनोवाका- पराइघा सत्यनामि, सामायिकशन्देन सावचारित्रमुक्त सामायिकछेदो- पस्थापनपरिहारविशुद्धपभिधानभेदाभि । अथरा जपन्यरत्नव यमुनष्ट करोमि नयपदार्थपरद्रय्यश्रद्धानपरिशानाचरणस्वरूप रत्नत्रय सापार सत् स्वस्वरूपश्रद्धानपरिज्ञानानुष्ठानरूपस्वभावरत्नत्रयस्वीकारेण निराकार शुद्ध करोमित्यर्थः । विच । भेदोपचारचारित्रं अभेवोपचार गमि, अभेदोपचारम् अभेदानुपचार करोमि इति विविध सामायिकमुनरोनर- स्वीकारेण सहनपरमतत्वविमलस्थितिरूपसहजनिश्चपचारिन,निराकारतस्व. निरतावाभिराकारचारिबामिति । तपाचोनः प्रश्चनसारख्याख्यायाम- “व्यानुसारि चरण परणानुमारि ध्ये मियो स्पमिदं, ननु सप्यपेक्षे । तस्मान्ममधिरोरतु मोक्षमार्ग' दय प्रतीत्य यदिषा चरण प्रतीत्य" सपाहि- चिमभावनासतमतयो पतयो एमए । । - नियमसार- ये ते ते पातनाशीलयमनाशनकारणम् ॥ इहान्तर्मुखस्य परमतपोधनस्य भावशुद्धिमताः- सम्मं मे सव्वदेसु वैरं मझं ण केणवि । आसाए वोसरित्ता णं समाहि पडिवज्जए ॥ १०४ ॥ साम्यं मे सर्वभूतेषु वैरं मह्यं न केनचित् । आशां उत्सृज्य नूनं समाधिः प्रतिपद्यते ॥ १०४ ॥ विमुक्तसकलेन्द्रियव्यापारस्य मम भेदविज्ञानिज्ञानिषु च समता, मित्रामित्रपरिणतेरभान में केनचिजनेन सह वैरं, सहनवैराग्यपरिणतर्ण में काप्याशा वियते, परमसमरसीमावसनायपरमसमाधि प्रपयेऽहमिति । तथा चोतं श्रीयोगीन्द्रदेवैः । 'तयाहि- "मुक्त्यङ्गनालिमपुनर्भवसौख्यमूलं दुर्भावनातिमिरसंहतिचन्द्रकीर्तिम् । संमायामि समतामहमुन्नकस्तान या संमता मति संयमिनामनयम्"। तथाहि- जयति समता नित्यं या योगिनामपि दुर्लभा निजमुससुसवापिस्कारपूर्णशशिषभा। परमपमिना प्रवन्यात्रीमन:प्रियमत्रिका मुनिवरगणस्योः सालंक्रिया जगतामपि निश्चयपत्याख्यानयोग्यनीवस्वरूपाख्यानमेततः- णिकसायरस दतिस्त सूरस्स ययसायिणो । संसारमपमीदस्स पचक्साणं मुहं हये । १०५॥ - .

हारपतिः। ------- निवपापम्प दांतम्य परम्प त्यत्रमायिनः । मंमारभयभीतस्य प्रत्याख्यानं मुख भवेत् ॥ १० ॥ मालपायकलेत रिमनाय निखिनेन्द्रियव्यापारविजयोपार्जित- परमन्तिरूपाय असिनपरीषहमहाभटविजयोपार्जितनिजशूरगुणम्य निचयपरमतपाचरणनिरनशुदभावाय संमारदुरभीतम्य व्यवहारेण चतुगहारविवर्जिनमत्यान्यानम् ।चि । पुनः ध्यवहारप्रन्यास्यान कुटेरपि पुरुषम्य पारिश्रमोहोदयहेतुभूतदन्यभावधर्मक्षयोपशमेन कचित् कदाचि- संभवति । अतएर निश्चयनपप्रत्याख्यान हितम् अत्यासमभव्यनी. वानाम, यतः स्वर्णनामधेयधरस्य पाषाणम्योपादेयत्वं न तांधपापाण- स्येति । ततः संसारदारीरभोगनिगता निश्चयपत्याख्यानस्य कारणे, पुन विकाले समाविनां निखिलमोहगगपादिविविधविभावानां परिहारः परमार्थप्रत्याल्यानं । अथवानागतकालोद्भवविविधान्तर्जल्पपरित्यागः शुद्ध नित्ययपत्याख्यानम् इति । जयति सततं प्रत्याख्याने जिनेन्द्रमतोद्भवम् परमयामिनामेनान्निाणसांख्यक पर। सहजसमतादेवी सत्कर्णभूषणमुञ्चक मुनिप शृणु ते दीक्षाकान्तातीवयौवनकारण ॥ निश्चयपत्याख्यानाध्यायोपसंहारोपन्यासोयम्:- एवं मेट्मासं जो कुव्यद जीवकम्मणो णिचं । पचक्साणं सक्कादि धरिदै सो सिजदो णियमा ॥१०६ ॥ एवं पेदाम्यासं यः करोति मौवकर्मणोः नित्यम् । प्रत्यारज्यानं शवो धर्नु स संयतो नियमात् ।। १०१ ॥ यः श्रीमदर्हन्मुसारविन्दविनिर्गतपरमागमार्थविचारक्षमः अशुद्धांतस्तव. - ८८ नियमसार- कर्मगलयोरनादिवन्धनसंबन्धनयो दं भेदाभ्यासबटेन करोति, स परम- संपनी निश्वपत्र्यवहार प्रत्यास्यान स्वीकरोतीति । माविकालभवमारनिवृत्तः सोहमित्यनुदिन मुनिनायः । भारपेदसिलसोस्पानिधान सममले मलमुफ्त्ये। पोरममातिमहार्णवभास्पानपातमिदमाह मिनेन्दः । सम्वतः परमतत्त्वमन माश्याम्यहमतो जितमोह। प्रत्याग्न्यान माति सतत शुदगारिनमूर्तेः भान्निध्वंसात्महगपरमानंदचिप्रमुः। नाम्यन्येलामपरममये यामिनामास्पदाने भूयो भूयो माति भगिना संमृतिपरिरूपा। महानवानदो जगति गिदितः शाश्वतमपः स सिदात्मन्युश्चेनिपातिनिर्मरगुणे । गमी दिन्मोपि स्मरतिनिशिताभिहिताः कप कक्षित्येने बन कटिहताम्ने गरपियः। प्रपारपाना माति यानि प्रगट भुपश्य माचादि पतरमादागीरदियो । तय कुल तव मतो भयाल निग्यम पनि महानमुपद शीलमल मुनीनाम् ।। जपनि गहनता तनिष्णानपद इममि जानाभान्तापन यन। नामाता मनामना सामागिमानमा मनिममाला at RTE METमम । भर प्रमा :- मापतिः। v- नमामिगतं पुनः सहममेव तन्य मुदा ॥ मिनरभुमसाररिन्दविदितं स्यरूपस्थित मुनीश्वरमनोरहान्तरमुरत्नदीपमभम् । नमायमिह पोगिभिर्वजितहरिमोहादिभि. नमामि मुखमन्दिरं सहजतायमुरदः । मनष्टदुरितोलर महतपुष्पकमवने प्रभूतमदनादि प्रपलबोधसाधालय ।। प्रणामकृतनाचवित् प्रकरमणाशात्मकम प्रवृद्धगुणमदिरं प्रकृतमोहरावि नुमः ।। पति सुकदिजनपयोगमित्रपंचेन्द्रियप्रसग्वर्जितगात्रमात्रपरिमहभीपन- मममलधावियाविरचितापां नियमसारख्याख्यायाम तात्पर्य्यवृत्ती निश्चयपत्याख्यानाधिकारः पठः श्रुतस्कन्धः ॥६॥ आटोचनाधिकार उच्यते-- निश्रयालोचनास्वरूपाल्यानमतत्'- पोकम्मकम्मरहियं विहावगुणपज्जएहिं वदिरित्तं । अप्पाणं जो झायदि समणस्सालोयणं होदि ॥१०॥ नोकर्मकर्मरहितं विभावगुणपर्यायतिरिक्तम् । आत्मानं यो ध्यायति श्रमणस्यालोचना भवति ॥१०७ ॥ औदारिकवैक्रियिकाहारतेजसानि शरीराणि हि नोकर्माणि, शानदर्शनावरणांतरायमोहनीयवेदनीयायुर्नामगोत्राभिधानानि हि द्रव्यक- माणि, कोपाधिनिरपेक्षसत्तामाहकनिश्चयद्रव्यार्थिकनयापेक्षया हि एभि- नोकर्मभिर्दव्यकर्मभिश्च निर्मुक्तं । मतिज्ञानादयो विभावगुणाः ८८ नियमसार- कर्मपुगलयोरनादिबन्धनसंबन्धनयों दं भेदाभ्यासत्रटेन करोति, स परम- संयमी निश्रयव्यवहारमत्याख्यान स्वीकरोतीति । माविकालमवभावनिहत्तः सोहमित्यनुदिनं मुनिनायः । मावयेदखिलसोस्यनिधानं स्वस्वरूपममलं मलमुक्त्यै । घोरसंसृतिमहार्णवमास्वयानपात्रमिदमाह जिनेन्द्रः । तत्वतः परमतत्वमजनं मावयाम्यहमतो जितमोहः ।। प्रत्याख्यानं भवति सततं शुद्धचारित्रमूर्तेः भ्रान्तिध्वंसात्सहजपरमानंदचिन्नबुद्धः । नास्त्यन्येषामपरसमये योगिनामास्यदानं मूयो मयो भवति माविनां संमृतिर्पोररूपा ॥ महानंदानंदो जगति विदितः शाश्वतमयः स सिद्धात्मन्युच्चनियतवसतिनिर्मलगुणे। अमी विद्वान्सोपि स्मरंति निशितारभिहिताः कथं कांक्षत्येनं बत कलिहतास्ते जडधियः। प्रत्याख्यानाद् भवति यमिषु प्रस्फुटं शुद्धशुद्ध सच्चारित्रं दुरघतरुसांदाटबीबहिरूपं । तत्वं शीघ्रं कुरु तव मतो मत्र्यशार्दूल नित्यम् यत्किंभूतं सहजसुखदं शीलमूलं मुनानाम् ॥ जयति सहजतत्त्वं तत्त्वनिष्णातबुद्धेः हृदयसरसि जाताभ्यन्तरे संस्थितं यत् । तदपि सहजतेजः प्राप्तमोहान्धकार स्वरसविसरभास्वदोषविस्फूर्तिमात्रं ॥. असंडितमनारतं सकलदोषदूरं परं भांबुनिधिमग्नं जीवततियानपात्रोपमम् । अय प्रबठदुर्गवर्गदववगिकीटालकम -- - जापा निनाचतुदर्भगभगवान्नादिममातशासामार्थमाग्गभूतशुद नियमाटोपनारामत्यारोमिता भवन्ति । ते बापमाणगूनचतुष्टयेन मिन्नति आटोपनाभेदम दिया, मुगनारंगमभूतो।। कामग्थिति यानि हि भन्यनीयः, तस्मै नमः यमनि निष्टिनाय॥ हालोचनारदीवारमात्रेण परमगमनाभावनोना- जो पम्मदि अप्पाणं समभाये संठवित्त परिणाम । आलोयणमिदि जाणह परमजिणंदुस्स उपएसं॥१०९॥ यः पश्यन्यात्मानं समभावे सम्पाप्य परिणामम् । आलोचनमिनि नानाहि पामनिनेन्द्रस्योपदेशम् ॥ १०९ ॥ या सरनवेगग्यमुधासिन्धुनाटिंटीपिटपरिपाटुरमंडनमंटलीप्रद्धिहेतु. भूतगानिशीथिनीनाथः सदान्तर्मुसाकारमत्य निरंजननिजबोधनिलयं कारणपरमात्मानं निरपोपेणान्तर्मुस स्वस्वभावनिरतसहनावलोचनेन निर- न्तरं पश्यति । किं कृत्वा पूर्व निजपरिणामं समतावलंबनं कृत्वा परमसंयमी- भूत्वा तिष्ठति तदेवालोचनास्वरूपमिति हे शिष्य स्वं जानीहि परमजिन- नाथस्योपदेशादित्यालोचनादिकल्पेषु प्रयमविकल्पोऽयमिति । आत्मा यात्मानमात्मन्यविचलानिलयान्यात्मना पश्यती यो मुक्तिश्रीविलासानतनुसुस्तमयान् स्तोक्कालेन याति। सोय वंयः मुशर्यमधरततिभि. संचरभूचरर्वा चिद्रूपं सर्ववयं सकटगुणनिधि तद्गुणापेक्षयाहम् ॥ आत्मा स्पष्टः परमयमिनो चित्तपंकेजमध्ये ज्ञानज्योतिःमहतदुरितध्वान्तपुंजः पुराणः । सोतिकान्तो भवति भविनां बाइमनोमार्गमस्मिन् नारातीये परमपुरुषे को विधिः को निषेधः ॥

नियमसार- ~ - नरनारकादिव्यंजनपायाश्चैव विभावपर्यायाः ! सहभुदो गुणाः क्रममाविनः पायाश्च, एभिः समस्तैः व्यतिरिक्त स्वभावगुणपर्यायः संयुक्तं त्रिकालनिरावरणनिरंजनपरमात्मानं, त्रिगुप्तिगुप्तपरमसमाधिना यः परमश्रमणो नित्यमनुष्ठानसमये वचनरचनापराङ्मुसः सन् ध्यायति तस्य मावश्रमणस्य सततं निश्चयालोचना भवतीति । तथा चोक्तं श्रीमदमृतचन्द्रसूरिभिः- " मोहविलासविभितमिदमुदयकर्मसकलमालोच्य । आत्मनि चैतन्यात्मनि निःकर्माणि नित्यमावर्ते। उक्त चोपासकाध्ययने- "आलोच्य सर्वमेनः कृतकारितमनुमतं च निर्व्याजम् । आरोपयेन्महावतमामरणस्थायि निःशेषम्" ॥ तथाहि । आलोच्यालोच्य नित्यं सुकृतमसुकृतं घोरसंसारमूलं शुद्धात्मानं निरुपधिगुणं चात्मनेवावलम्बे । पश्चादुच्चेः प्रकृतिमाखलां दव्यकर्मस्वरूपां नीत्वा नाशं सहजविलसद्रोधलक्ष्मी व्रजामि । आलोचनालक्षणभेदकथनमेततः- आलोयणमालुंछण वियडीकरणं च मावसुद्धी य । चउविहमिह परिकहियं आलोयणलक्खणं समए॥१८॥ आलोचनमालुंछनमविकृतिकरणं च मावशुद्धिश्च । चतुर्विधमिह परिकथितं आलोचनलक्षणं समये ॥ १०८ ॥ भगवई मुसारविन्दविनिर्गतसालजनताश्रुतिमुभगसुन्दरानंदीनध्य- अच्यध्वनिपरिज्ञानकुशलचतुर्थशानघरगौतममहर्षिमुसकमल- . न्दनानक्षरात्मक तापमाना। विनिर्गचितुरसंदर्भगीतगदानादिरामातशासार्थसार्थसारमर्वभूतशुद्ध- निभयपरमादोरनायाभत्वारो विकल्या भवन्ति । ते वक्ष्यमाणसूबचतुष्टयेन निगपन्न पनि। - आलोचनाभेदम गिदित्वा, मुस्त्यगनासगमभूतहेतुं । म्वात्मस्थिति याति हि भव्यनीयः, तम्मै नमः स्वात्मनि निधिताय॥ इहालोचनास्वीकारमात्रेण परमममताभावनोना:-- जो पस्सदि अपाणं समभाव संवितु परिणामं । आलोपणमिदि जाणह परमजिणंदस्स उवएसं ॥१०९॥ यः पश्यत्यात्मानं समभावे संस्थाप्य परिणामम् । आलोचनमिति नानाहि परममिनेन्द्रस्योपदेशम् ॥ १०९ ॥ या सहनगग्यमुधामिन्धुनाडिंडीरपिंढपरिपांडुरमंडनमंडलीप्रद्धिहेतु- भूतराकानिशीथिनीनायः सदान्तर्मुसाकारमत्य निरंजननिजबोधनिलय कारणपरमात्मानं निरवशेषणान्तर्मुसे स्वस्त्रमापनिरतसहनाक्लोचनेन निर- न्तरं पश्यति । कि कृत्वा पूर्व निजपरिणाम समतावलंबनं कृत्वा परमसंयमी- भूत्वा तिष्ठति तदेवालोचनास्वरूपमिति हे शिष्य त्वं जानीहि परमजिन- नाथम्योपदेशादित्यालोचनाविकल्पेषु प्रथमविकल्पोऽयमिति । आत्मा ह्यात्मानमात्मन्यविचटनिलयान्यात्मना पश्यतीर्थ यो मुनिश्रीविलासानतनुसुखमपान स्तोत्रकालेन याति। सोपं धंध मुझर्यमधरततिभिः रोचौ चरी चिर्प सर्वयं सकलगुणनिधि तद्गुणापेक्षयाहम् ॥ आत्मा स्पष्ट परमयमिनो चित्तपंकेजमध्ये शानज्योति महतदुरितध्वान्तपुनः पुराणः । सोतिकान्तो भवति भविना थाइमनोमार्गमस्मिन् नारातीये परमपुरुषे को विधिः को निषेध ।

९२
नियमसार-
सामनेन पधेन न्यामागगेगनासमुन्नमत लि पमनिन-
-
नानाचिन्मय महगाममुगि
रिमुकसानेन्द्रियामानानर ।
नपान पनिभायाग्मरि योमिनो गोचर
माभिमय पर पगमयुगमशानिनाम् ।
शयामाने निगमुसमुपागादिमजनमेन
दुयः भव्यः परमगुग्नः शानाप्रपानि।
तामाभाग गया भापत्यपूर्णम
ATIf महने निदिभूगोम्पशनम
faysगनिमारमा
नितिगमन परावर्णः।
भावामा प्रामानिनिसर्ग
निर्माणमाइनन्द्रामवाण ।
ATI भितिजभाषा
fHHATHAftभागमा
RAPHAAT-TOMनिज
fartमादिभुगम ।
RHITATATHदा
कम्ममहीन मन्दरगमन्धी महामो।
माया मममा श्रावण म.
write Er warrar ॥ ११॥

मगरपट भैदान पेटिया
तात्पर्यवृत्तिः।
-
मव्यवपारिणामिकभावस्वभावेन परमस्वभावः औदयिकादिचतुर्णा
विभावस्वभावानामगोचरः स पंचमभाव' अतएवोदयोदीरणक्षयक्षयो-
पसमविविधविकारविवर्जित.
अतः कारणादस्यकस्य परमत्वम्
इतरेषां चतुर्णा विमादानामपरत्वम् । निखिलकर्मविपवृक्षमूलनिर्मूल-
नसमर्थः, त्रिकालनिरावरणनिजकारणपरमात्मस्वरूपश्रद्धानप्रतिपक्षती-
बमिथ्यात्वकम्दियचलेन कुदृष्टेरर्य परममावः सदा निश्चयतो विद्यमानो-
प्यविद्यमान एव, नित्यनिगोदक्षेत्रज्ञानामपि शुद्धनिभयनयेन परमभावः
अभव्यपारिणामिक" इत्यनेनाभिधानेन न संभवति । यथा मेरोरधोभाग-
स्थितमुवीशेरपि सुवर्णत्वं, अभव्यानामपि तथा परममावस्वभावत्वं,
वस्तुनिष्ठं न व्यवहारयोग्यं । मुशामत्यासन्नभन्यजीवानां सफलीभूनोऽयं
परमभावः सदा निरंजनत्वात् यतः सकलकर्मविषमविपद्गुमधुमूलनिर्मूलन-
समर्थत्वात् निश्चयपरमालोचनाविकल्पसंभवाः, टुंछनाभिधानम् अनेन परम•
पंचमभावेन अत्यासम्मभव्यजीवस्य सिद्धयति ।
एको भावः स जयति सदा पंचमः शुद्धशुद्धा
कर्मारातिम्फुटितसहजावस्थया संस्थितो यः ।
मूलं मुनेनिसिलयामिनामात्मनिष्ठापराणाम्
एकाकारः स्वरसविसरापूर्णपुण्यः पुराणः ।
असंसारादसिलजनता तीबमोरोदयात्सा
मना नित्य स्मरवशगता स्वात्मकार्यप्रमुग्धा ।
ज्ञानज्योतिर्भवलित कुम्मटलं शुदभावं
मोहाभागस्पुटितसहनावम्थमेषा प्रयाति ।
इह हि शुद्धोपयोगिनो जीवस्य परणतिविशेषः प्रोकः ।
कम्मादो अप्पाणं भिण्णं भाषेद पिमलगुणणिलय।
ureमायण गिटीकरणं ति पिण्णेयं ॥११॥

--- - ... rin 4 दिने भाग freferia fTED THthrit EI Kara Tarrer RTHI भRTriPrint- ME MATATrek । ATTTTTER विATTERTISTAma wrmirf RITYTHो- AAMITRA भुवमा याममा Train fTAITant मगार मामिल है. गामि दिन परिमाने । मोशमामुनमामिटा निमांनी पापादन मुनिपति, गमताप्रमादान। मुक कहापि न यानि विभारकार्य सदतुभूतमुतामुक्त गाना। तस्मादहं मुल नामंजाले मुस्त्वा मुमभुपयमेडमिह मामि प्रपये सदाभुदमात्मानं बोधविति । भवभूतिमिमा त्यस्ता पुदलस्कन्धवन्धुराम् ।। अनादिमनसमाररोगस्यादानमुनमम् । शुभाशुभविनिर्मुक्त शुद्धचैतन्यमावना । अप विविधविकल्पं चारसंसारमूलं मि: --- ETRIAN दिला । Hum पनि मिनमा भापयामि रिनामा ঘিমিললো । rift: गुभाष्टि. भावामभामिनीराममयः । সব সেশসলমা मनभिनिधार परपुरः। pिermताना दुर्लभ सर्वहार्य पामगरगमनः एरपोपोतनि। শিখামাখনাগমনিথাম্বনাইগা হয়নিৗ- নাধিকাথাব্যাথম- मदमाणमापलोहविपजिपमावा मापसद्धित्ति। परिकहिप मध्याण टोपाटोयप्पदरिसीहिं ॥११२॥ मदमानमायगेमविवर्जिनभाग्नु भाषानिरिति । परिवथिती भगानांसोकागेकप्रदर्शिभिः ॥ ११२ ।। ताविचारित्रमोहोदयबलेन देदाभिधाननोपायविलासो मदः, अत्र मदान्देन मदनः कामपरिणाम इत्यर्थः । चतुरसंदर्भगीकृतदर्भक. बिस्तन औदयनामकर्मोदये सति सकलजनपूज्यतया मापितसम्बन्ध- मुटभानिविशुदया दा दानसाहयकोटिभटाभिधानयागापर्यवतोपातिनि- रुपमयटेन च दानादिशुभसम्र्मोपार्मितसंपादिविलासेन, अथा युदिनपो- योषधरसबलाक्षाणधिभिः सप्तभिर्श, कमनीयकामिनीठाचनानन्दन वपुटविण्यररादिसरण वा आत्माहंकारीमानः । गुप्तयतो माया,स्थले धनव्यया- ९६ नियमसार- मावो लोमः,निश्चयेन निखिलपरिग्रहपरित्यागलक्षणनिरंजननिजपरमात्मत- वारिग्रहात् अन्यत् परमाणुमात्रदन्यस्वीकारो टोमः । एभिश्चतुर्मिळ मात्रैः परिमुक्तः शुद्धमाव एव मावशुद्धिरिति मव्यप्राणिनां लोकाटोक प्रदर्शिभिः परमवीतरागसुसामृतपानपरितृप्तर्भगवद्भिरहद्भिरामहित इति । अय जिनपतिमार्गालोचनामेदजालम् परिइतपरभावो मत्र्यलोकः समन्तात् । तदखिलमवलोक्य स्वस्वरूपं च बुद्धा स भवति परमश्रीकामिनीकामरूपः॥ आलोचना सततशुद्धनयात्मिका या निर्मुक्तमार्गफलदा यमिनामजनं । शद्धात्मतत्त्वनियताचरणानुरूपा स्यात्संयतस्य मम सा किल कामधेनुः । शुद्धं तत्वं बुदलोकत्रयं यद् मुद्धा बुझा निर्विकल्यं मुमुक्षुः । तत्सिद्धच शुदशीलं चरित्या सिद्धिं यायात मिद्धिसीमन्तिनीशः। सानन्दं तत्त्वमनजिनमुनिददयाम्मोजाजिल्कमध्ये निर्यावा) विशुद्ध स्मरशरगहना दावानिक । शुद्धशानप्रदीपप्रहतयमिमनोगेहपोरान्धमा तदन्द साधुग्न्य जननजलानिधो लंपने यानपात्रं ॥ अभिनमिदं पार्य यायाः समग्रधियोपि ये विदधाति पा मः किं ते तपस्विन एव हि। हदि विटासिन शुदं शार्न प हिमनुचमम् पदमिदमहो शात्वा भूयोपि यान्ति सगगतो ॥ जयति सहज तने तस्येषु नित्यमनाकुट तात्पर्य दत्तिः। सततमुलभ भास्वत्सम्यादृशो समतालयम् । परभकलया साई पदं प्रवृद्धगुणेनिनः स्फुटितसहनावस्थं लीनं महिनि निजेनिशं ॥ सहनपरम तत्वे तत्त्वेषु सप्तसु निर्मलं सकलविमलज्ञानावासं निरावरणं शिवम् । विशदविशद नित्य बाह्यप्रपंचपराङ्मुसं किमपि मनसा वाचा दूरं मुनेरपि तनुमः ।। जयति शांतरसामृतवारिधि-प्रतिदिनोदयचारुहिमयुतिः । अतुलबोधदिवाकरदीधिति-प्रहतमोहतमस्समितिर्जिनः ॥ विजितजन्मजरामृतिसंचयः प्रहतदारुणरागकदम्बकः । अपमहातिमिरवनभानुमान जयति यः परमात्मपदस्थितः ॥ इति सुकविजनपयोगमित्रपंचेन्द्रियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहश्रीप- अमममलभारिदयविरचितायो नियमसारव्याग्यायो तात्पर्यवृत्ती पर- मालोचनाधिकार सप्तमः श्रुतस्कन्धः ॥७॥ - अथाखिलद्रव्यभावनोकर्मसंन्यासहेतुभूतशुदानिश्चयप्रायश्चित्ताधिकारः कध्यते- निअयप्रायश्चित्तस्यरूपारम्यानमेतत्:- घदसमिदिसीलसंजमपरिणामो फरणणिग्गही भायो। सो हयदि पायचित्तं अणयरयं पेव कायवो ॥११३॥ प्रतसमितिशीलमंयमपरिणामः करणनिग्रहो भावः । स भवति प्रायश्चित्तम् अनवरतं चैव कर्तव्यः ॥११॥ पंचमहावतपंचसमितिशीलसक्लेन्दियाहमनःकायसंपमपरिणाम.. रेलियनिरोधान गनु परिणाम:, १८ नियमसार- परणतिविशेषः । प्रायः प्राचुर्येण निर्विकारं चिनं प्रायभिनं, अनवरत चान्तर्मुसाकारपग्मसमाधियुनेन परमनिनयोगीश्वरेण पापाटीपावकेन पंचेन्द्रियासरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहेण सहजवेगग्यप्रासादशिसरशिस्ताम- णिना परमागममकरंदनिष्यन्दिमुमपद्मप्रमेण कर्तव्य इति । प्रायश्चिनं भवति सतर्त स्वात्मचिंता मुनीनां मुक्तिं यांति स्वमुमरतयस्तेन नि तपापाः । अन्या चिंता यदि च यमिनां ते विमूढाः स्मरानाः पापाः पापं विदधति मुहः किं पुनश्चित्रमेतत् ॥ इह हि सकलकर्मनिर्मूलनसमर्थनिश्चयप्रायश्चित्तमुक्तम्:-- कोहादिसगमावसयपहुदीभावणाए णिग्गहणं। पायच्छित्तं भणिदं णियगुणचिंता यणिच्छयदो।।११४॥ क्रोधादिस्वकीयभावक्षयप्रभृतिभावनायां निर्ग्रहणम् । प्रायश्चित्तं भणितं निनगुणचिंता च निश्चयतः ॥ ११४ ॥ क्रोधादिनिखिलमोहरागद्वेषबिमावस्वभावक्षयकारणनिजकारणपरमात्मस्व- भावभावनायां सत्यां निसर्गगहनवृत्त्या प्रायश्चित्तमभिहितम, अथवा परमात्मगुणात्मकशुद्धान्तस्तत्वस्वरूपसहजज्ञानादिसहजगुणचिंता श्चित्तं भवतीति। प्रायश्चित्तमुक्तमुर्मुनीनां कामक्रोधायन्यभावक्षये च । स्वस्य ज्ञान संभावना वा सन्तो जानन्त्येतदामप्रवादे ॥ चतुष्कषायविजयोपायस्वरूपाख्यानमेततः- कोहं खमया माणं समद्दवेण ज्जवेण मायं च । संतोसेण य लोहं जयदि खुए चहुविहकसाए ॥११५॥ पाय- - नात्यर्यवृत्तिः। “ मोध क्षमया मानं स्वमार्दवेन आनवेन मायां च । मनोपेण च लोभं जयति खलु चतुर्विधरुपायाणां ॥ ११५॥ जपन्यमभ्यमोत्तमभेदाक्षमास्तिम्रो भवन्ति । अकारणायप्रियवादिनो भिध्यादृष्टरकारणेन मां वासयितुमुद्योगो वियते अयमपगतो मत्पुण्येनेति प्रथमा क्षमा । अकारणेन संत्रासं करस्य ताहनवाधादि- परिणामोऽस्ति, अयं दापगतो मत्सुकृतेनेति द्वितीया क्षमा । तथा सत्यमूर्तस्य परमब्रह्मरूपिणो ममापहानिरिति परमसमरसीभवस्थितिरुचमा क्षमा । आभिः क्षमाभिः फोधकषायं जिच्चा, मानकषायं माईवेन च, माया- कपायं चार्जवेण, परमतत्वलाभ सन्तोषेण लोभक्षायं चेति । तयाचोक्तं श्री गुणभद्रमरिभिः- विवस्थमप्यनवबुद्धय हरेण जाड्यात् कुद्धा बहिः किमपि दग्धमनङ्गबुदया। घोरामबाप स हितेन कृतामवस्था क्रोधोदयाद्भवति कस्य न कार्यहानिः"। चकं विहाय निजदक्षिणबाहुसंस्थं यत्प्राइजन्ननु तदैव स तेन मुच्येत् । वेशं तमाप दिल बाहुबली चिराय माना मनागपि हति महतीं करोति । भेय मायामहागर्नन्मिध्यापनतमोमयात् । यस्मिन टीना न टक्ष्यन्ते क्रोधादिविषमाहयः । वनचरभयाद्धावन देवाहताकुलवालधिः किल जहनया लोलो वारजनेअविचलं स्थितः । दत स चमरस्तेन प्राणेपि प्रतियोजितः परिणतषां प्रायेणवविधा हि विपत्तयः -+H ... रि-- माकपा मारिने । मायामानानाभोभा शोग ना: भर पानीमा मायभिगमिनम.--- उकिदो जो घोहोणार्ण तम्मे अपणो चितं । जो घर मुणी णि पापन्धित्तं हये तम्म ॥१६॥ उस्यो गो गोलो गान तगारमनसि । यो पति मुनिनिंग प्राधितं भरेगम्य ॥ १११॥ उनी पो शिशिधर्मःम र परमपाल इत्यर्थः, बोयो ज्ञान दिन- मित्यनान्नग्म, मत पातम्या परमम्मियो जीपम्य प्रायः प्राग चितं पामर्गयमी नित्यं तादर्श दिने धने, तम्य गनु निश्चयायशिननं भवतीति। प. शुद्धामज्ञानमभावनामा प्रायश्चित्तमा चास्येव तस्य । निताह:संहति से मुनीन्दं वन्दे निन्यं तद्गुणमाप्तयेयम् ॥ यह हि परमतपश्चरणनिरतपरमनिनयोगीश्वराणां निश्चयायश्चितं, एवं समस्तावरणानां परमाचरणमित्युकम्:- किं पहुणा मणिएण दु यरतवचरणा महेसिणं सम्बं । पायच्छितं जाणह अणेयकम्माण सयहेउ ।। ११७ ।। किं बहुना मणितेन तु वरतपश्चरणा महर्षीणां सन । प्रायश्चित्तं जानीह्यनेककर्मणां क्षयहेतुः ॥ ११७ ॥ बहुभिरसत्यलापरलमलं पुनः सनिश्चयव्यवहारात्मकपग्मतपश्वर-

तात्पर्य दृत्तिः।
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णात्मकं परमजिनयोगिनामासंसारप्रतिबद्रव्यभावकर्मणां निरवशेषेण वि.
नाशकारणं, शुद्धनिश्चयमायश्चित्तमिति हे शिष्य वं जानीहि ।
अनशनादितपश्चरणात्मक
सहजशुद्धचिदात्मविदामिदम् ।
सहजबोधकलापरिगोचर
सहजतत्त्वमक्षयकारणम् ॥
प्रायश्चित्रं धुत्तमानामिदं स्यात्
स्वद्रव्येस्मिन् चिन्तनं धर्मशुक्लं ।
कर्मप्रान्तवान्तसदोधतेनो-
तीनं स्वस्मिन् निर्विकारे महिमा
आत्मज्ञानाद् मवति यामिनामात्मसन्धिः क्रमण
ज्ञानज्योतिनिहतकरणग्रामघोरान्धकारः।
कर्मारण्योद्भवददशिसानालकानामजनम्
मध्वसेऽस्मिन् शमजलमयीमाशु धारो पमन्ती ॥
अध्यात्मशास्त्रामृतवारिराशे-
र्मयोद्धृता संयमरनमाला।
बभूव या तत्त्वविदों मुकण्ठे
सालंकृतिर्मुक्तिवधूधवानाम् ॥
नमामि नित्यं परमात्मतत्त्वं
मुनीन्द्रचित्ताम्बुनगर्भवासं ।
विमुनियाताम्बरसौख्यमूल
विनष्टसंसारगुमूलमेतत् ॥
अत्र प्रसिद्धशुदकारणपरमात्मतले सदान्तर्मुसतया प्रतपनं यत्तत्तपः
पाराधिन भवतीत्यतमः
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नियमसार- Anan- णंताणंतमयेण समजिअसुहअसुहकम्मसंदोहो। तवचरणेण विणस्सदि प्रायच्छितं तवं तम्हा ॥११८॥ अनन्तानन्तभवेन ममर्जितशुभाशुभाम्ममंदोहः । तपश्चरणेन विनश्यति प्रायश्चित्तं नपस्तस्मात् ।। ११८ ।। आ संसारत एव ममुपार्जितशुभाशुभकर्ममंदोहो द्रव्यभावात्मक पंचसंसारसंवर्द्धनसमर्थः परमलपश्चरणेन मावशुद्धिलक्षणेन विलयं याति, ततः स्वात्मानुशननिष्ठं परमतपश्चरणमेव मुद्धनिश्चयप्रायश्चित्तनित्य- भिहितं । प्रायश्चित्तं न पुनरपरं कम्म कर्मक्षयार्थ पाहुः सन्तम्तप इति चिदानंदपींपूफ्पूर्णम् । आ संसारादुपचितमहत्कर्मकान्तारवद्वि- ज्वालाजालं शमसुसमयं प्राभूतं मोक्षलक्ष्याः॥ अत्र सकलभावानामभावं कर्तुः स्वात्माअयनिश्चयधर्मध्यानमेव समर्थ- मित्युक्त:- अप्पसरूवालंवणमावेण दु सबभावपरिहाणं । सकादि कटुं जीवो तम्हा झाण हवे सब्वं ॥ ११९॥ आत्मस्वरूपालम्बनभावेन तु सर्वमावपरिहाणं । शक्नोतिः कर्तुं जीवस्तस्माद् ध्यानं भवेत् सर्वम् ॥ ११९ ॥ अविचलपरद्रव्यपरित्यागलक्षणलक्षिताणनित्यनिरावरणसहजपरमपारि- गामिकभावभावनया भावान्तराणी चतुर्णामोदायिकोपशमिकक्षायिक- क्षायोपशामिकानां परिहारं कर्तुमत्यासनभव्यनीवः समर्थो यस्मात् तदत रव पापाटीपावक इत्युक्तम् । अतः पंचमहावतपंचसमितित्रिगुप्ति- पत्याख्यानप्रायश्चित्तालोचनादिक सर्व ध्यानमेवेति । - तात्पर्यवृतिः। १०३ यः शुद्धात्मन्यविचलमनाः शुद्धमात्मानमेकं नित्यज्योति प्रतिहततमःपुंजमाद्यन्तशून्यम् । ध्यास्वाजनं परमकलया सार्द्धमानन्दमूर्ति जीवन्मुक्तो भवति तरसा सोयमाचारराशिः ॥ शुदनिश्चयस्वरूपाख्यानमेततः- मुहअसुहवयणरयणं रायादीभाववारणं किच्चा । अप्पाणं जो झायदि तस्स दुणियमं हवे णियम॥१२०॥ शुभाशुभवचनरचनानां रागादिभाववारण कृत्वा । आत्मानं यो ध्यायनि तस्य तु नियमो भवेन्नियमान् ॥ १२० ॥ यः पग्मतत्त्वज्ञानी महातपोधना देतदेतदनं (') संचितसूक्ष्मकर्म- निर्मूलनममर्थनिश्वयप्रायश्चित्सपरायणस्यापि संयमिनो मनोवाकायन्ना- द्भववाहीमूलकंदान्मकशुभाशुभस्वरूपप्रशस्तसमस्तवचनरचनाना निवारण करोति, न केवलमासां तिरस्कारं करोति किन्तु निखिलमोहरागदपाई- परमावाना निवारणं च करोति । पुनरनवरतमसंडातमुन्दरानन्द- निष्यन्दानुपमनिरंजननिजकारणपरमात्मतन्त्र नित्यं शुद्धोपयोगवलेन संभवति, तस्य यतेः मनुष्यस्य सुनिश्चयनियमो भवतीत्यभिप्रायो भगवता सूत्रतामिति । घचनरचा त्यक्त्वा भव्यः शुभाशुभलक्षणी सहजपरमात्मानं नित्यं सुमावयति स्फुटम् । परमयमिनस्तस्य ज्ञानात्मनो नियमादयं भवति नियमः शुद्धो मुक्त्यंगनासुखकारणम् ॥ अनवरतमरांडातचिनिर्विकारे निसिलनयविलासो न स्फुरत्येव किंचित् । मन्थेत निरावरणमिति लिखितम् । +N निपमसार- अपगत इह यस्मिन् भेदवादस्समस्तः तमहमभिनमामि स्तोमि समावयामि ॥ इदं ध्यानमिदं ध्येयमयं ध्याता फलंच तत् । एभिर्विल्पजालेभिर्मुक्तं तन्नमाम्यहम् ॥ भेदवादाः कदाचित्युर्यस्मिन् योगपरायणे। तस्य मुक्तिर्मनो वा को जानात्याहते मते । निश्चपकायोत्सर्गस्वरूपाख्यानमेततः- कायाईपरदव्वे थिरमावं परिहरनु अप्पाणं । तस्स हवे तणुसग्गं जो झायइ णिविअप्पेण ॥१२१॥ कायादिपरद्रत्ये स्थिरभावं परिहरित्वात्मानं । तस्य भवेत्तनत्सर्गो यो ध्यायति निर्विकल्सेन ।। १२१॥ सादिसनिधनमूर्तिविजातीयविभावव्यंजनात्मकः कायः, आदिशब्देन क्षेत्रवास्तु । कनकरमणीप्रभृतयः एतेषु सर्वेषु स्थिर मात्र सनातनभावं परिहत्य नित्यरमणीयनिरंजननिजकारणपरमात्मानं व्यवहार क्रियाकांडाडम्बरविविधविकल्पकोलाहलविनिर्मुक्तसहजपरमयोगवले- न नित्यं ध्यायति । यः सहजतपश्चरणक्षीरवाराराशिनिशीथिनीपद- याधीश्वरः । तपस्विनः सलु सहनवैराग्यमासादशिखरशिखामणेनि- अपकायोत्सर्गों भवतीति । कायोत्सर्गो भवति सततं निश्चयासंयतानां कायोद्तवलतरलसकर्ममुक्तः सकाशात् । वार्चा जल्परविरतेर्मानसानां नितेः स्वात्मध्यानादपि च नियते स्वात्मनिष्ठापराणाम् । जपति सहजतेनःपुननिर्मप्रभास्वत्- सहजपरमतत्वं मुक्तमोहान्धकारम् । स्वस्याकार - तात्पर्यवृतिः। सहजपरमदृष्टया निष्ठितन्मोपनातम् भवभवपरितापः कल्पनाभिश्च मुनम् ॥ भवभवसुखमल्पं कल्पनामात्ररम्यं तदखिलमपि नित्यं संत्यजाम्यात्मशक्त्या । सहजपरमसौख्यं चिञ्चमत्कारमात्रम् स्फुटितनिजविलास सर्वदा चेतयेहम् ॥ निजामगुणसंपदं मम हदि स्फुरन्तीमिमा समाधिविषयामहो क्षणमहं न जाने पुरा । जगद्रितयदेमवालयहेतुदुःकर्मणाम् प्रभुत्त्वगुणशक्तितः सलु हतोस्मि हा संस्तौ ॥ भवसंभवविषभूरहफलमसिलं दुःखकारणं बुद्धा आत्मनि चैतन्यात्मनि संजातविशुद्धसौख्यमनुभुक्ते ।। इति मुकविजनपयोनमित्रपंचेन्द्रियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिमहश्री पद्ध- मममलधारिदेवविरचितायां नियमसारव्याख्यायां तात्पर्य्यवृत्नो शुद्धनिश्चयप्रायश्चित्ताधिकारोष्टमः श्रुतस्कन्धः ।। ८ ॥ - अखिलमोहरागदेषादिपग्मभादविध्वंसहेतुभूतपरमसमाध्याधिकार उच्यते । शुद्धनिश्चयपरमसमाधिस्वरूपाख्यानमेतत्:- वयणोशारणकिरियं परिचत्ता वीयरायमावेण । जो झायदि अप्पाणं परमसमाही हवे तस्स ॥१२२॥ वचनोधारणकियां परित्यक्त्वा वीतरागभावेन । यो ध्यायत्यात्मानं परमसमाधिर्भवेत्तस्य ॥ १२२ ॥ पचिदशुभवंचनार्थ वचनरचनामात्रप्रपंचितपरमवीतरागसर्वशस्तवना. दिक कर्तव्यम् । परमजिनयोगीश्वरेणापि परमार्थतः प्रशस्ताप्रशस्तदाम्बि. .

For mentart.ort.mrat Netry Twitter frTTrtt + gram amari. rist purTrth. Itntain N'Titltd RATATE.it *Email Amit मेरमणियमा पाममाणे पाण। जोपा अमाणे पगमाही ॥१२॥ मेगानि नामा ብሓ ። मानेन मी मान पामममारिमा...।। मंगम, मदिfre: MEन नाग अमानना r rat krtarami. स्यारामान कियापिकामा माने निगरानिम्माधिभरा हो माना तपnिfir. मामापनिजामध्यन पानाध्या- तुकलादिभिर्विकल्यान , तरन्न नामानिनिगमागचा- निरननिमारमधारिनर स्थिनिकष निश्चयशुमान साममिरे मार्दनमहादेतामचिन्मयम् आमान 4. पाममयमी निर्व मापति, नम्प मनु पामममाधिर्भवति । निकममायो यो नित्यं तिउति चिन्मयम् । देशदेनावि स्मात्मानं तं नमाम्यहम् ।।

तात्पर्यवृतिः। १०७ ture- -- ----- अत्र समतामन्तरेण द्रव्यालिङ्गधारिणः श्रमणाभासिन. किमपि पग्लोक- कारणं नास्तीत्युनमः- दाकि काहदि वणवासो कायकलेसो विचित्तउपवासो । अज्झयणमीणपहुदी समदारहियस्स समणस्स ॥१२४॥ किं क्रियते वनवासः कायझेशो विनित्रोपनामः । अध्ययनमौनप्रभृतयः समतारहितस्य श्रमणम्य ॥ १२४ ॥ मकलकर्मकलंककविनिर्मुनमहानंदहेतुभूतपरमसमताभावेन विना कान्तारवासप्रवासेन प्रापि क्षमूले स्थिन्वा, च, ग्रीष्मेऽतितीववरकरसंतप्त- पर्वतामपावनिषण्णतया वा, हमन्ते च गत्रिमध्ये ह्यागांवरदशाफलेन च, त्वगस्थिभूतसङ्गिक्लेशदायिना महोपवासेन वा, सदाध्ययनपटुतया च धाग्विषयव्यापानिवृनिलक्षणेन संततमोनवतेन वा, किमयुपादेयं फल- मस्ति केवलं व्यलिंगधारिण श्रमणाभासस्येति । तथाचोनम अमृताशीती- गिरिगरणगहारण्यान्यशून्यप्रदेश- स्थितिकरणनिरोधध्यानतीर्थोपसेवा पउनजपहोममणो नास्ति सिद्धिः मृगय तदपर त्वं भोः प्रकार स्वमार" तथाहि- अनशनादितपश्चरणे. फलम् समतया रहितस्य यतेन हि । स्त इदं निजतत्वमनाकुट भन मुने समताकुटमंदिरम् ॥ - - १वासप्रवास.२अवस्था।

१०८ नियमसार- ~~ . - '. इह हि सकलसावग्रव्यापाररहितस्य त्रिगुप्तिगुप्तस्य सकलेन्दियव्यापार- विमुखस्य तस्य च मुनेः सामायिकं व्रतं स्थायीत्युक्त:- विरदी सब्बसावज्जे तिगुत्तीपिहिदिदिओ। तस्स सामाइगं ठाइ इदि केवलिसासणे ॥ १२५॥ विरतिः सर्वमावद्ये त्रिगुप्तिपिहितेन्द्रियः । तस्य सामायिकं स्थायि इति केवलिशासन ॥ १२५ ।। अयान केन्द्रियादिप्राणिनिकुम्वक्लेशहेतुभूतसमस्तसावद्यव्यासंगविनिर्मुक्तः, प्रशस्ताप्रशस्तसमस्तकायबाड़मनसां व्यापाराभावात् त्रिगुप्तः । स्पर्शन- रसनप्राणचक्षुःश्रोत्राभिधानपंचेन्द्रियाणां मुसैस्तत्तयोग्यविषयमहणामात् पिहितेन्द्रियः । तस्य खलु महामुमुक्षोः परमवीतरागसंयमिनः -सामायिकं व्रतं शश्वत स्थायि भवतीति। इत्थं मुक्त्वा भवभयकर सर्वसावधराशि नीत्वा नाश विकृतिमानिशं कायवाइमानसानां अन्तःशुदया परमकलया साकमात्मानमेकं बुद्धा जन्तुः स्थिरशममयं शुदशीलं प्रयाति । परममाध्यस्थ्यभावाचारूढस्थितस्य परममुमुक्षो. स्वरूपमत्रोक्तमः जो समो सवभूदेसु थावरेसु तसेसु वा । तस्स सामाइगं ठाई इदि केवलिसासणे ॥ १२६ ॥ यः समः सर्वमनेषु स्थावरेषु त्रसेपु वा। तम्य सामायिक स्थायि इति केलिशासने ॥ १२ ॥ यः सहनवेगग्यप्रासादशिरसरशिसामणिः विकारकारणनिसिलमोह- मोदिता मेदकल्पनापोटपरमगमरसीभावमनाथत्वात्रसस्थावरजीवनि- स्य च परमननयोगीश्वरस्य सामायिकाभिधानाने सनातन- समः,ता समार्गे सिद्धमिति। १वीतगमई आभार तात्पर्यवृत्तिः। 11 । सहतिपरिमुन स्थावराणां वधैर्चा परममिनमुनीना चित्तमुचै'जयम् । अपि चरमगतं यनिर्मले कर्म मुक्त्यै-- तदहमभिनमामि स्तोमि संभावयामि केचिददैतमार्गस्था केचितपणे स्थिताः देताहेतविनिर्मुक्तमार्गे वर्तामहे वयम् ॥ कासन्यदैतमन्यपि देतं काक्षन्ति चापरे । देतातविनिर्मुक्तमात्मानमभिनीम्यहम् ।। अहमात्मा मुस्ताकांक्षी स्वात्मानमजमच्युतम् । आत्मनेवात्मनि स्थित्वा भावयामि मुहमहुः ।। विकल्पोपन्यासैरलमलममर्माभिर्भवकर असंडानन्दात्मा निखिलनयराशंगविषयः । अयं देतादेतो न भवति तत' कश्रिदचिरात् तमेकं पन्देहं मवभयविनाशाय सततम् ।। मुस दुःरों योनी सुकृतदुरितवातजनितं शुभाभाशे भूयोऽशुभपरिणतिर्वा नर नच । यदेवम्याप्युचर्भवपरिचयो बादमिह नो य एवं मन्यस्तो भवगुणगणेः स्तौमि तमहम् ॥ इदमिदमघसेनावजयन्ती रत्ताम स्फुरितसहजतेजःपुंजदूरीकृताहः । प्रबलतरतमस्तोमं सदा शुद्धशुद्ध- जयति जगति नित्यं चिस्चमत्कारमावम् ॥ जयत्यनधमात्मतत्वमिदमस्तसंगारकम महामुनिगणाधिनायवदयारविन्दस्थितम् । -

नियममार-
विमुनभवकारणं म्फुटितभुमेकान्ततः
मदा निजमाहिग्नि लीनमपि मां गोचरम् ।
अत्राप्यान्मेवोपादेय इत्युकः ।
११ जस्ससण्णिहिदो अप्पा संजमे णियमे तवे ।
तस्स सामाइगं ठाइ इदि केवलिसासणे ॥ १२७ ।।
यस्य सन्निहिते आत्मा मंयमे नियमे तपसि ।
तस्य मामायिकं स्थायि इति केवलिशासने ॥ १२ ॥
तस्य सलु बाधापचपराइमुसस्य निर्जितासिलेन्द्रियव्यापारस्य मा-
विजिनस्य पापक्रियानिवृत्तिरूपे बाघसमय कायवाड्मनोगुतिरूपसकले-
न्द्रियव्यापारबर्जितेऽभ्यन्तरात्मनि परिमितिकालाचरणमात्रे नियमेन पर-
ब्रह्मचिन्मयनियतनिश्चयान्तर्गताचारे स्वस्य स्वरूपेऽविचलस्थितिरूपे व्यव-
हारप्रपचांचितपंचाचारे पचमगतिहेतुमूते किंचन मात्रप्रपंचपरिहाणे
सकलदुराचारनिवृत्तिकारणे परमतपश्चरणे च परमगुरुप्रसादोदितनिरंजन-
निजकारणपरमात्मा सदा सन्निहित इति कवलिनां शासने तस्य पदव्य-
पराङ्मुखस्य परमवीतरागसम्यग्दृष्टीतरागचारित्रमाजः सामायिश्वतं-
स्थायि भवतीति ।
आत्मा नित्यं तपसि नियमे संयमे सच्चरित्रे
तिष्ठत्युच्चैः परमयमिनां शुद्धदृष्टर्मनश्चेत् ।
तस्मिन् वादं भवभयहरे भावितीर्थाधिनाये
साक्षादेषा सहजसमता प्रास्तरागाधिरामे ॥
इह हि रागद्वेषाभावादपरिस्पंदरूपत्वं भवतीत्युक्तम्:-
" जस्स रागो दु दोसो दु विग िण जणेति दु ।
तस्स सामाइगं ठाई इदि केवलिसासणे ॥ १२८॥

मारपर्पमिः। पस्य रागम्तु द्वपस्तु विकृतिं न मनयनि त । सभ्य मामायिक स्थायि इति केवलिशासने ॥ १२८ ॥ पस्य परमीतगगर्मयमितः पापाट्वीपास्य गगो वा देषो था विकृति नावनाति तस्य मानन्दाभिनापिणः जीवस्य पवेन्द्रियप्रसरव- तिगाममात्रग्मिहस्य सामायिकनामवते शास्वतं भवतीति केवलिना शासने भवतीति । गगदेषो विकृतभिह तो नैव तु समयाँ ज्ञानज्योतिःमतदुग्तिानी पोगन्धकारे । आगीय सहनपरमानन्दपीयूषपूरे सम्मिनित्ये समग्समये को विधिः को निषेधः॥ आर्तगद्रध्यानपरित्यागात् सनातनसामायिनतम्वरूपास्यानमेततः- " जो दु अहं च रुदं च झाणं पसदि णिशसो। तस्स सामइगं ठाई इदि केवलिसासणे ॥ १२९ ।। यम्त्वात च रोद्रन ध्यानं वर्नयति नित्यशः। तभ्य सामायिक स्थायि इति फेवलिशासने ।। १२९ ।। यम्नु निन्यनिरंजननिजकारणसमयमारस्वरूपनियतशुद्धनिश्चयपरमीत- रागमुखामृतपानरगयणो जीवः तिर्यग्योनिप्रेतावासनारकादिगतिप्रायो- ग्यतानिमिन आर्तगैदध्यानदयं नित्यशः संत्यनति तस्य सलु केवलं- दर्शनसिद्ध शाश्वत सामायिकवतं भवतीति । पनि जिनशासनसिद्धं. सामायिकवतमणुत्रतं भवति । यस्त्यजतिमुनिनित्यं, ध्यानदयमार्तगेद्राख्यम् । शुभाशुभपरिणामसमुपजनितमुक्तदुरितकर्मसंन्यामविधानाख्यानमेतत्.- 11 जो दु पुण्णं च पावं च मावं वज्जेदि णिचसा । तस्स सामाइगं ठाई, इदि केवलिसासणे ॥१३०॥ १

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मनाभि- HiArtiformera
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पशप मियामी ।
नियन after निरम
समयाना नामिनिदान भी
नपनापापविनपन ममामादिरमामालियानमा
जो हरसं रई सोगं अरति पजेदि णिशमा ।
तस्स सामाइगं ठाई इदि केवलिसासणे ॥ १३१ ।
बरणकमल।

सापपट्टत्तिः। जो दुगंछा मयं घेदं सर्व पजेदि णिचसा । तस्स सामाइगं ठाई इदि केवलिसासणे॥१३२शा जुम्म यस्त हास्य रति शोक अरति वर्जयति नित्यश. । तम्य सामायिक स्थायि इति केवलिशामने ॥ १३१ ।। या अगुप्मां मयं वेदं सर्व वर्मयति नित्यशः । तस्य सामायिकं स्थायि इति फेवलिशासने ॥१३२ ॥ युग्मं । मोहनीयकर्मसमुपजनितस्त्रीपुनपुंमकवेदहास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्साभि- धाननवनोपायलितकटंकपकात्मकरामस्तविकारजालक परमममाञ्चि- लेन यस्तु निश्चयरत्नत्रयात्मकपरमतपोधनः संत्यजति, तम्य खलु केबलि- महारकशासनसिद्धपरमसामायिकाभिधानवतं शाश्वतरूपमनेन सूत्रदयेन कथितं भवतीति। त्पजाम्येतत्मई ननु नवकषायात्मकमहम् मुदा संसारर्खाजनितमुखदुःस्रावलिकरं । महामोहान्यानां सततसुलभं दुर्लमकरम् समाधी निष्टानामनदरतमानन्दमनसा परमसमाध्यधिकारोपसंहारोपन्यामोयम्:- ।। जो दु धम्मं च सुमं च झाणं झाएदि णिञ्चसा । तस्स सामाइगं ठाई इदि केयलिसासणे ॥१३३ ॥ यस्तु धर्म प शुलं च ध्यानं ध्यायति नित्यशः। तम्य सामायिक स्थायि इति केलिशासने ॥१३॥ यस्तु सकटदिमलकेवलशानदर्शनलोलुपः परमजिनयोगीश्वरः स्वात्मा- प्रयनिश्चयधर्मध्यानेन निस्सिटविकल्पनालनिर्मुन:, निश्चयशल्लध्यानेन च अनवग्तमसंडादैतसहनदिविटासलक्षणमक्षयानन्दाम्भोधिमजन - .

नियममार- पाक्रियापराङ्मुस सचदंतःक्रियाधिकरण स्वात्मनियनिर्वियामममा. घिसंपत्तिकारणाभ्यां ताभ्यो धर्मशमध्यानाभ्यो सदाशिवात्मकमात्मानं प्या- यात हि तस्य सनु निश्वाशामन नियन्नं नित्यं शुदं मिगुतिमुगपर- मसमाधिलक्षणं शाश्वतं मामायिनतं भवतीति । शुक्लन्याने परिणतिमतिः शुद्धरत्नत्रयात्मा धर्मध्यानेण्यनधपरमानन्दतत्याश्रितेऽस्मिन् । प्रामोत्युच्चेरपगतमहदुःसनालं विशाल भेदाभावात् किमपि मविनां वाइमनोमार्गदूरम् । पति मुकविजनपयोगमित्र-पंचेन्द्रियप्रसरवर्जित-गात्रमात्रपरिग्रहपद्ममम. मलधारिदेवविरचितार्या नियमसारख्याख्यायां तात्पर्यवृत्ती परमसमाध्यधिकारो नवमः श्रुतस्कन्धः।९। अंचं संप्रति हि मक्त्यधिकार उच्यते। रत्नत्रयस्वरूपाख्यानमेततः- सम्मत्तणाणचरणे जो मत्तिं कुणइ सावगो समणो । तस्स दुणिब्बुदिमत्ती होदित्ति जिणेहि पण्णत्त॥१३४॥ सम्यक्त्वज्ञानप्रेरणेषु यो भक्ति करोति श्रावकः श्रमणः तस्य तु निर्वृत्तिभक्तिर्भवतीति निनः प्रज्ञप्तम् ॥ १३४ ॥ चतुर्गतिसंसारपरिग्रहणभ्रमणकारणीवमिथ्यात्वकर्मप्रकृतिप्रतिपक्षनिज- परमात्मतत्त्वसम्यमद्धानावबोधाचरणात्मकेषु शुद्धरत्नत्रयपरिणामेषु मजनं भक्तिराराधनेत्यर्थः । एकादशपदेषु श्रावकेषु जपन्या पद, मध्यमाश्रयः, उत्तमो दो च, एने सर्वे शुद्धरत्नत्रयमाति कुर्वन्ति । अप भवभयभीरवः परमनेष्कर्म्यवृत्तयः परमतपोधनाश्च रत्नत्रयमनि कुर्व- तापप्प पनि। - न्ति, गो मागकाणा परमतपोधनाना च मिनोत्तमः प्रशमा नितिभक्ति- पुनर्भवधिकासेदा भवतीनि । सम्परन्वेऽस्मिन् भवभयहरे शुदवोधे चरित्र भानिः कुर्यादनिशमतुनो यो भवेदन दक्षा। कामोधापग्लिदुरपयातनिर्मुन घेताः भनो मतो भवति सततं श्रावक संयमी वा । प्यारारनयप्रधान सिदभनिम्यरूपाल्यानमेत:- मोक्संगयपुरिसाणं गुणभेदं जाणिऊण सिपि । जो कुणदि परममत्तिं यवहारणयेण परिकहिय ॥१३५॥ मांसगतपुरुषाणां गुणभेद ज्ञात्वा तेपामपि । य करोति परमभक्ति व्यवहारनयेन परिकषितम् ॥ १३५॥ ये पुराणपुग्पाः समम्नकर्मक्षयोपायहेतुभूतं कारणपरमात्मानमभेदानु- पचारक्षत्रपरिणत्या सम्यगाराध्य सिद्धा जाताम्तेषां केवलज्ञानादि- शुदगुणभेदं शात्वा निर्वाणपरंपराहेतुभूतां परममनिमासन्नमव्यः करोति सग्य मुमुक्षीय॑यहारनयेन निवृत्तिभनिर्भवतीति । उतकर्मसंदौहान सिद्धान सिद्धबधूधवान् । संप्राप्ताष्टगुणेश्वर्यानं नित्यं वन्दे शिवालयान || व्यवहारनयस्येत्त्य निनिभनिर्जिनोनमें प्रोना । निश्चयनिवृत्तिभक्ती रत्नत्रयभानि रित्युना । निःशेपदोपदूर केवरबोधादिशुद्धगुणनिलयं । शुद्धोपयोगफलामिति सिदत्वं प्राहुराचार्याः । ये लोकामनिवासिनो भवभवलेशार्णवान्तं गता ये निर्वाणवधूटिकास्तनभरालपोत्यसोख्याकरः । - नियमसारmunwar.. ये शुद्रामविभाफ्नोद्भयमहाकेचन्यपणाः तान् सिद्धानभिनौम्यहं प्रतिदिनं पापादयीपावकार ।। त्रैलोक्याग्रनिकेतान गुणगुरुन ज्ञेयाधिपारंगतान मुनिश्रीवनितामुपाम्बुजबीन स्वाधीनमोम्यार्णवान् । सिद्धान् सिद्धगुणाटकान मवहान् नयाष्टकम्मोकरान नित्यान तान् शरणं वनामि मतनं पाराट्वीपावकान् ।। ये मयंदेवनिकुरम्बपरोक्षमतिः- योग्याः सदा शिवमयाः प्रवगः प्रसिद्धाः। सिद्धाः मुसिद्धरमणीसुमनोशवा--- पंकेरुहोरुमकरंदमधुव्रताः स्युः ॥ निजपरमात्मभक्तिस्वरूपात्यानमेततः- मोक्सपहे अप्पाणं ठविऊण य कुणदि णिचुदी मत्ती। तेणदु जीवो पावइ असहायगुणं णियप्पाणं ॥१३६ मोक्षपये आत्मानं संस्थाप्य च करोति निवृत्तभक्ति । तेन तु भीवः प्रामोत्यसहायगुणं निनात्मानम् ॥ १३६ ।। भेदकल्पनानिरपेक्षनिरुपचाररनत्रयात्मक निरुपरागमोक्षमार्गे निरंजनानि जपरमात्मानंदपीयूषपानाभिमुखो जीवः स्यात्मानं संस्थाप्यापि च करोति निवृत्तमुक्त्यगनायाः चरणनलिने परमा मनि,तेन कारणेन स मव्यो भक्तिः गुणेन निरावरणसहजशानगुणत्वादसहायगुणामक निजात्मानं प्रामोति । आत्मा ह्यात्मानमात्मन्यविचलितमहाशुद्धरत्नत्रयेऽस्मिन् नित्ये भीमुक्तिहेतो निरुपमसहजशानदृक्शीलरूपे। संस्थाप्यानंदमास्वनिरतिशयगृहं चिचमत्कारमपत्या प्रामोत्युरियं यं विगलितपदं सिद्विसीमन्तिनीशः॥

मात्पर्य मिः। निभाययोगभनिरवमपारपानमेतत:- रायादीपरिहारे अप्पाणां जो जंजदे साहू ।। सो जोगमत्तिजत्तो इदरस्स प कहं हये लोगो ॥१३॥ रागादिपरिहोरे आत्मानं यम्नु युनक्ति साधुः । म योगभक्तियुक्त इनरस्य न का भोयोगः ॥ १३७॥ निरवशेषणान्तमुसाकारपरमममाधिना निखिलमोहरागपादिपरमा- थाना परिहारे सति यस्तु साधुगसनभव्यः निनेनारोटादेतपरमानंदस्व- रूपेग निजकारणपरमात्मान युननिः स परमतपोधन एव शुदनिश्च- योपयोगभनियुक्तः । इतरस्य बाह्यप्रपंचमुरसस्य कथं योगभक्तिर्भवति । नथाचोकम- आत्मप्रयत्नसापेक्षा दिशिया या मनोगतिः। तम्या प्रमाणि संयोगो योग इत्यभिधीयते । सथाहि- आत्मानमात्मनात्मा युनक्त्येव निरन्तरम् । स योगमत्तियुक्तः स्यानिश्चयेन मुनीश्वर. ।। अत्रापि पूर्वसूत्रवनिश्चययोगभक्तिस्वरूपमुक्तम् - सम्ववियप्पामाये अप्पाणं जो दु मुंजदे साहू। सो जोगमत्तिजुचो इदरस्स य कहं हये जोगो॥१३८॥ सर्वविकल्पाभावे आत्मानं यस्तु युनक्ति साधुः । स योगभचियुक्तः इतरस्य च कथं भवेद्योगः ॥ १८॥ अत्यपूर्व विरूपरागग्नत्रयात्मनिनचिदिलासलक्षणनिर्विकल्पपरमसमा- दिना निसिटमोहरागदेवादिविविधविकल्पाभावे परमसमरसीभावेन निःशेष- तोऽन्तर्मुसनिजकारणसमयसारस्वरूपमत्यासम्ममव्यगीवः सदा युक्त एष, सस्य सलु निश्चययोगमक्तिमान्येषाम् इति ।

११८
नियमसार-
७
भेदामावे सतीयं स्यायोगमतिरनुत्तमा ।
तयात्मलधिरूपा सा मुक्तिर्भवति योगिनाम् ।
इह हि निखिलगुणधरगणधरदेवप्रभृतिजिनमुनिनायकथिततत्त्वेषु विपरी-
ताभिनिवेशविवर्जितात्मभाव एव निश्चयपरमयोग इत्युक्तः ।
विवरीयामिणिवेसं परिचत्ता जेण्हकहियतचेसु ।
जो जुजदि अप्पाणं णियमावे सो हवे जोगो ।। १३९॥
विपरीताभिनिवेशं परित्यक्त्वा जैनकथिततत्वेषु ।
यो युनक्कि आत्मानं निनभावः स मवेद्योगः ॥ १३९ ॥
अपरसमयतीर्थनाथाभिहिते विपरीते पदार्थे ह्यमिनिवेशो दुराग्रह एव
विपरीताभिनिवेशः। अमुं परित्यज्य जैनकथिततत्त्वानि निश्चयव्यवहार-
नयाभ्याम् बोद्धव्यानि, सकलजिनस्य भगवतस्तीर्थाधिनाथस्य पादप-
मोपजीविनो जैनाः, परमार्थतो गणधरदेवादय इत्यर्थः । तैरभिहि-
तानि निखिलजीवादितत्त्वानि तेषु यः परमजिनयोगश्विरः स्वात्मानं युनक्ति
तस्य च निजभाव एव परमयोग इति ।
तत्त्वेषु जैनमुनिनाथमुसारविद-
व्यक्तेषु मव्यजनताभवघातकेषु ।
त्यक्त्वा दुराग्रहममुं निनयोगिनायः
साक्षायुनक्ति निजभावमयं स योगः॥
भक्त्याधिकारोपसंहारोपन्यासोयमः-
उसहादिजिणवरिन्दा एवं काऊण जोगवरभत्तिं ।
णि बुदिसुहमावण्णा तम्हा धरु जोगयरमत्ति॥१४०॥
वृषभादिनिनवरेन्द्रा एवं कृत्वा योगवरभक्ति।
निवृतिसुखमापनाम्नस्माद्धारय योगवरभक्तिं ॥ १४० ॥

सासवृतिः। अस्मिन् किल भारतवर्षे पुग किल श्रीनाभेयादिश्रीवर्धमानचरमाः धनुर्विशनितीर्थकरपरमदेवाः सर्वशवीतरागा' त्रिभुवनवतिकीर्तयो महा- देवाधिदेवाः परमेश्वराः सर्वे एवमुक्तपकारस्वात्मसंबन्धिनी मुद्धनिश्चय- योगवरभक्ति कृत्वा परमनिर्वाणवधूटिकापीवरस्तनभरगाढोपगुदानिर्मगनंद- परममुरसपूरपरितृप्तसर्वात्मप्रदेशा जाताः, ततो सूर्य महाजनाः सुटित. भव्यत्वगुणास्ता स्वात्मार्थपरमवीतरागमुखपदी योगमानिः सुरुति । नाभेयादिजिनेश्वरान् गुणगुरुन् बेलोरयपुण्योलरान् श्रीदेवेन्द्रकिरीटकोटिबिलगनमाणिस्यमालावितान् । पोलोमीप्रभूतिप्रसिद्धदिविनाधीशागनाहितेः शक्रेणोद्भवभोगहास विमलान् श्रीकीनिनापान स्तुरे। पृषभादिवीरपश्चिमजिनपतयोयंवमुक्तमार्गेण । कृत्वा तु योगभानः निर्वाणग्धूटिकामुरा पान्ति ॥ अपुनर्भवमुसासिद्धी कुहे रामयोगररभनिम् । संसारपोरभीत्या सर्वे पुर्खन्तु गन्तवो नित्यम् । रागदेपपरंपरापरिणतं घेतो विहायाधुना । शुमध्यानसमाहितेन मनसानदात्मतत्त्वास्थितः । धर्म निर्मलशर्मकारिणमहं सन्ध्या गुगेः सनिधी शानापासासमस्तमोरमारमा लीये परमाणि नितेन्द्रियलोल्याना तरलोलुपचेतसा । सुन्दगनन्दनिप्यन्द मायने तत्वमुनमम् ॥ अत्यपूर्वनिगारमोत्यभावनामातशर्मणे । पतन्ते पतयो घेते विन्मुना हि नापरे । अनन्दनिष्टमन परमात्मत भापयामि तह पुनरेकमेपर। -

नियम-
miगदिनमा
तमनलिका मा भगोनिार
ललिलिमिनिमनिनmarrfom.
सानिमभामा निधारमोगायकः ।
पियरीयामिणिसं परिगगा कहियतनु ।
जो जुनदि अप्पाणं णिपमाये सो व जोगा ॥१३॥
शिरीनामिनिाश परित्यागाना।
गो गुनगि आत्मानं निनमार: म मोयोग ॥ ११९ ॥
आरममयीनामाभिहिने तिने पापभिनिरोगी दुराहर
विनाभिनिी । म परित्यय जैनकथिततन्यानि निधावा
नपाम्याम पोदम्यानि, गाजिनम्य भगवतम्नागिनायम्य पादर-
पारदिनो ननाः, परमार्थदी माग्देवाय यी । मिति-
तानि निसिलनीवादितत्वानि ते यः परमनिनयोगीश्वरः सामान युनानि
तस्प च निजभाष पर परमयोग इति।
तत्व जैनमुनिनायमुत्ताविद-
व्यनेषु भन्यजनतामपातके।
त्याला दुराग्रहम, निनयोगिनायः
साक्षायुनक्ति निजभावमयं स योगा।
भक्त्याधिकारोपसंहारोपन्यासोयम:-
उसहादिजिणवरिन्दा एवं काऊण जोगवरमत्ति ।
णिबुदिसुहमावण्णा तम्हा धरु जोगबरमत्ति॥१४०॥
वृषभादिनिनवरेन्द्रा एवं कृत्वा योगवरमादि ।
निवृतिसुबमापन्नास्तस्माद्धारय योगवरभक्तिं ॥ १४ ॥

सासर्यवृत्तिः। अस्मिन् किल मारतेवर्षे पुरा फिल श्रीनाभेयादिश्रीवर्द्धमानचरमाः चतुर्विंशतितीर्थकरपरमदेवाः सर्वज्ञवीतरागाः त्रिभुवनवर्तिकीर्तयो महा- देवाधिदेवाः परमेश्वराः सर्वे एवमुक्तकारस्वात्मसंबन्धिनी शुद्धनिश्चय- योगवरमतिः कृत्वा परमनिर्वाणवधुटिकापावरस्तनमरगाढोपमूदानिर्भरानंद. परममुरसपूरपरिवृहसर्वात्मप्रदेशा जाताः, ततो यूयं महाननाः स्तुटित- भन्यन्वगुणास्तां स्वात्मार्थपरमवीतरागमुमप्रदा योगमक्तिं कुरुतेति । नाभेयादिजिनेश्वरान् गुणगुमन् लोग्यपुण्योत्करान श्रीदेवेन्द्रकिरीटकोटिविलसनमाणिस्यमालार्चितान् । पोटोमीप्रभृतिप्रसिद्धदिविनाधीशांगनामंहतेः शक्रेणोद्भवमोगहासविमलान् श्रीकीर्तिनायान स्तुवे ॥ वृषभादिवीरपश्चिमनिनपतयांप्येवमुकमार्गेण । कृत्वा तु योगभानि निर्वाणवधूटिकामुर्ग यान्ति ॥ अपुनर्भवसुरासिद्धय कुइँह शुद्धयोगवरभक्तिम् । संसारपोरभीत्या सर्वे कुर्वन्तु जन्तदो नित्यम् ।। रागदपपरंपरापरिणतं घेतो विहायाधुना । शुदध्यानममाहितेन मनसानदात्मतत्त्वास्थितः । धर्म निर्मटशर्मकारिणमहं टम्या गुरोः सन्निधौ । शानापास्तसमस्तमोहमाहिमा लीये परदादाणि । निनेन्द्रियटोल्याना तत्त्वलोलुपचेतसा । मुन्दरानन्दनिष्यन्द जायने सावमुनमम् ।। अत्यपूर्वनिनात्मोत्यभावनानातशर्मणे । यतन्ते यतयो ये ते जीवन्मुना हि नापरे । अहन्दनिष्टमन परमात्मताई संभावयामि सदह पुनरेकमेकम् ।

१८
नियमसार-
भेदामाचे सतीर्य स्याद्योगभक्तिरनुनमा ।
तयात्मलब्धिरूपा सा मुक्तिर्मवति योगिनाम् ॥
इह हि निखिलगुणधरगणघरदेवप्रमृतिजिनमुनिनाथकथिततत्त्वेषु विपरी-
ताभिनिवेशाविवर्जितात्ममाव एव निश्चयपरमयोग इत्युक्तः ।
विवरीयामिणिवेसं परिचचा जेण्हकहियतचेसु ।
जो जंजदि अप्पाणं णियमावे सो हवे जोगी ।। १३९॥
विपरीताभिनिवेशं परित्यक्त्वा जैनकथिततत्त्वेषु ।
यो युनकि आत्मानं निनावः स मवेयोगः ॥ १३९ ॥
अपरसमयतीर्थनायाभिहिते विपरीते पदार्थे समिनिवेशो दुराग्रह एव
विपरीतामिनिवेशः। अमुं परित्यज्य जैनकथिततत्त्वानि निश्चयव्यवहार
नयाभ्याम् बोद्धव्यानि, सकलजिनस्य मगवतस्तीर्थाधिनाथस्य पादप-
ग्रोपजीविनो जैनाः, परमार्यतो गणघरदेवादय इत्यर्थः । तैरभिहि-
लानि निखिलजीवादितत्त्वानि तेषु यः परमजिनयोगश्विरः स्वात्मानं युनन्ति
तस्य च निजमाव एव परमयोग इति ।
तत्त्वेषु जैनमुनिनायमुखारविंद-
व्यक्तेषु मव्यजनतामवघातकेषु।
त्यक्त्वा दुराग्रहम, निनयोगिनाय:
साक्षायुननि निजभावमयं स योगः।।
भक्त्याधिकारोपसंहारोपन्यासोयम् -
उसहादिजिणवरिन्दा एवं काऊण जोगवरमत्तिं ।
णिबुदिमुहमावण्णा तम्हा धरु जोगबरमत्ति॥१४०॥
वृषमादिनिनवरेन्द्रा एवं कृत्वा योगवरभक्तिं ।
नितिसुखमापन्नाम्तस्माद्धारय योगवरमक्तिं ॥ १४ ॥

मात्सर्पवृत्तिः। अस्मिन् किल भारतेवर्षे पुरा फिल श्रीनाभेयादिश्रीवर्द्धमानचरमाः पतुर्विशतितीर्थकरपरमदेवाः सर्वशवीतरागाः त्रिभुवनवर्तिकीर्तयो महा- देवाधिदेवाः परमेश्वराः सर्वे एवमुक्तप्रकारस्वात्मसंबन्धिी शुद्धनिश्चय. योगवरमतिं कृत्वा परमनिर्वाणवधूटिकापीवरस्तनभरगाढोपगूढानरानंद परमसुरसपूरपरितृप्तसर्वात्मप्रदेशा जाताः, ततो यूयं महाजनाः स्फुटित- मव्यत्वगुणास्तां स्वात्मार्थपरमवीतरागमुखप्रदा योगभक्ति कुरुतेति । नाभेयादिजिनेश्वरान् गुणगुम्न बेलोक्यपुण्योत्करान श्रीदेवेन्द्रकिरीटकोटिविटसनमाणिस्यमालाचिंताम् । पौलोमीप्रभृतिप्रसिद्धदिविजाधीशांगनासंहते: शक्रेणोद्भवभोगहास विमलान् श्रीकीर्तिनाथान स्तु। वृषभादिवरिपश्चिमजिनपतयोप्येवमुक्तमार्गेण । कृत्वा तु योगभाक्त निर्वाणवधूटिकासुग्वं यान्ति ॥ अपुनर्भवमुरासिद्धये कुर्खेहं शुद्धयोगवरभक्तिम् । संसारपोरभीत्या सर्वे कुर्वन्तु जन्तवो नित्यम् ॥ रागद्वेषपरंपरापरिणतं देतो विहायाधुना। सुद्धध्यानसमाहितेन मनसानंदात्मतत्त्वस्थितः । धर्म निर्मटशर्मकारिणमहं लम्वा गुरोः सनिधी। शानापास्तसमस्तमोहमाहिमा लीये परब्रह्मणि ॥ निर्वृतेन्द्रियलौल्यानो तत्त्वलोलुपचेतसा । सुन्दरानन्दनिष्यन्द जायने तत्त्वमुत्तमम् ॥ अत्यपूर्वनिजात्मोत्थभावनाजातशर्मणे । यतन्ते यतयो ये से जीवन्मुक्ता हि नापरे । अदन्दनिष्टमनघं परमात्मतत्त्वं संभावयामि तदहं पुनरेकमेकम् ।

१८
नियममार-
भेशमा सय गायोगमारिनुनमा ।
तपामलिया मा मुनिमानि गोगितार ।
हहि लिमिटगुगमागणपतिमिनमुनिनामप्तिापि
ताभिनिवेशानिाममा निभयरमयोग इयुनः ।
विवरीयामिणियसं परिचना जेहकाहियतम् ।
जो इंजदि अप्पाणं णियमाये मोहये जोगी ।।१३
विपरीताभिनिाशं परित्याला नापिततत्तेः ।
यो युनक्ति आत्मानं निनभार: स मोयोगः ।। १३२ ॥
अपरसमयतीर्थनाथाभिहिते मिर्गते पदार्थे पभिनिोशो दुराग्रह ए
विपरीताभिनिोगः । अमुं परित्यज्य जैनकयितनवानि नियत्र्यवहार
नयाभ्याम् योन्यानि, सकलजिनस्य भगवतस्ताधिनायस्य पादप
गोपनीविनो जेनाः, पामार्थतो गणथरदेवादय इत्यर्थः । तेरनिति
तानि निसिलजीरादितत्त्वानि तेषु यः परमनिनयोगीश्वरःम्बात्मानं युनान
तस्य च निजमाव एव परमयोग इति ।
तत्त्वेषु जैनमुनिनाथमुखारविंद-
व्यक्तेषु मव्यजनतामवघातकेषु।
त्यक्त्वा दुराग्रहममुं जिनयोगिनाथ:
साक्षाधुनक्ति निजभावमयं स योगः।।
भक्त्याधिकारोपसंहारोपन्यासोयम्
उसहादिजिणवरिन्दा एवं काऊण जोगवरमत्तिं ।
णिज्बुदिसुहमावण्णा तम्हा धरु जोगबरमत्ति॥१४०॥
वृषमादिनिनवरेन्द्रा एवं कृत्वा योगवरभक्ति ।
निवृतिसुखमापन्नास्तस्माद्धारय योगवरपक्तिं ॥ १४० ॥

तात्पर्यवृत्तिः। अस्मिन् किल भारतवर्षे पुरा क्लि श्रीनाभेयादिश्रीवर्द्धमानचरमाः चतुर्विशतितीर्थकरपरमदेवाः सर्वज्ञवीतरागाः त्रिभुवनवर्तिकीर्तयो महा. देवाधिदेवाः परमेश्वराः सर्वे एवमुक्तपकारस्वात्मसंबन्धिी सुद्धनिश्चय- योगवरमनिः कृत्वा परमनिर्वाणवधूटिकापीवरस्तनमरगाढोपनहानिर्भरानंद- परममुरसपूरपरितृप्तसर्वात्मप्रदेशा जाताः, ततो यूयं महाजनाः स्फुटित- मव्यत्वगुणास्तां स्वात्मार्थपरमवीतरागमुखपदी योगभक्तिं कुरुतेति । नाभेयादिजिनेश्वरान गुणगुरुन् लोक्यपुण्योत्करान श्रीदेवेन्द्रकिरीटकोटिविलसन्माणिस्यमालार्चितान । पोलोमीप्रभृतिपसिद्धदिविजाधीशांगनासंहते: शक्रेणोद्वभोगहासविमलान् श्रीकीर्तिनाथान स्तुत्रे॥ वृषभादिवीरपश्चिमनिनपतयाप्येवमुक्तमार्गेण । कृत्वा तु योगभानि निर्वाणवधूटिकासुर्स यान्ति ।। अपुनर्मवसुरासिये कुवेह शुद्धयोगवरभक्तिम् । संसारपोरभीत्या सर्वे कुर्वन्तु जन्तवो नित्यम् ॥ रागदेषपरंपरापरिणतं चेतो बिहायाधुना। शुदध्यानसमाहितेन मनसानंदात्मतत्त्वस्थितः। धर्म निर्मटसर्मकारिणमहं रब्दा गुरोः सन्निधौ । शानापास्तसमस्तमोहमाहमा लीये परब्रह्माणि । निर्दृतेन्द्रियलोल्यानां तत्त्वलोलुपचेतमा । मुन्दरानन्दनिष्यन्दं जायते तत्त्वमुत्तमम् ।। अत्यपूर्खनिजात्मोत्थभावनाजातशर्मणे । यतन्ते यनयो ये से जीवन्मुना हि नापरे । अदन्दनिटमन परमात्मताद संभावयामि तदहं पुनरेकमेकम् ।

१२० नियमसार- किं तैश्च मे फलमिहान्यपदार्थसाथैः मुक्तिस्पृहस्य भवशमणि नि:स्पृहस्य । इति सुकविजनपयोजमित्र-पंचेंद्रियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहश्री पद्मप्रभः मलधारिदेवविरचितायां नियमसारव्याख्यायां तात्पर्य्यवृनो परमभक्त्यधिकारोदशमः श्रुतस्कन्धः ॥१०॥ - अथ सांप्रतं व्यवहारपहावश्यकपतिपक्षशुद्धनिश्चयाधिकार उच्यते । अत्रानवरतस्ववशस्य निश्चयावश्यककर्म भवतीत्युक्तम्:- जो ण हवदि अण्णवसो तस्स दु कम्मं मणंति आवासं॥ कम्मविणासणजोगो णिव्वहिमग्गोत्ति पिज्जुत्तो॥१४१॥ यो न भवत्यन्यवशः तस्य तु कर्म मणन्त्यावश्यकम् । कर्मविनाशनयोगो निवृत्तिमार्ग इति प्ररूपितः ।। १४१ ॥ यः सलु यथाविधि परमजिनमार्गाचरणकुशलः सर्वदेवान्तर्मुखत्वादन न्यवशो मरति किन्तु साक्षात्स्ववश इत्यर्थः । तस्य किल व्यवहारिकक्रिया- प्रपंचपराङ्मुसस्य स्वात्माश्रयनिश्चयधर्मध्यानप्रधानपरमावश्यककास्ती. त्यनवरतं परमतपश्चरणनिरतपरमनिनयोगीश्वरा वदन्तिादि य यनिगुप्ति- गुप्तपरमसमाधिलक्षणपरमयोगः सकलकर्मविनाशहेतुः स एव साक्षान्मोक्ष- कारणात्वान्नितिमार्ग इति निरुक्तियुत्पत्तिरित । तथाचोनममृतचन्दसूरिभिः। आत्मा धर्मः स्वयमितिमवत्प्राप्य शुद्धोपयोग नित्यानन्दप्रसरसरसम्मानतचे निलीने । प्रामोत्युद्धग्चलिततया निमकम्पकाशात पूजन्योतिः सहनविलसनदीपस्य सक्ष्मी । "

तात्पर्यवृतिः।
१२१
तथाहि--
आत्मन्युचर्भवति नियतं सच्चिदानन्दमूनों
धर्म. साक्षात् स्वराजनितावश्यात्मकोयम् ।
सोय कर्मक्षयरपटुर्निवृतरेकमार्गः
तेनैवाहं किमपि तरसा यामि शं निर्विकल्पम् ॥
अवशस्य परमनिनयोगीश्वरस्य परमावश्यकर्मावश्यं भवतीत्यत्रोक्तमः-
ण यसो अवसो अवसस्स कम्म धावस्सयंति पोषध्वा ।
जुत्तित्ति उवाअंति य णिरवयवो होदि णिज्जती ॥१४२॥
न वो अवश. अवशस्य कर्म वाऽवश्यकमिति मोद्धव्यम् ।
युक्तिरिति उपाय इति च निरवयवो भवति निरक्ति ॥१४२॥
यो हि योगी स्वात्मपरिमहादन्येपो पदार्थानां वशं न गतः, अत एवं
अवशइत्युक्तः,अवशस्य तस्य परमजिनयोगीश्वरस्य निश्चयधर्मध्यानात्मकपर-
मावश्यककमावश्यं भवतीति योद्धध्यम् । निरवयवस्योपायो युक्ति अप-
यवी कायः अस्याभावात अवयवाभावः । अवशः परद्रयाणां निरवययो
भपीति निरुक्तिः व्युत्पत्तिश्चेति ।
योगी कश्चिच हितनिरतः शुद्धजीवास्तिकाया
अन्येषां यो न पश इति या संस्थितिः सा निरुनिः।
तस्मादस्य महतदुरितधान्तपुंजस्य नित्य
स्फूर्नज्योतिः स्फुटितसहनावस्थया मूर्तता स्यात् ।।
हहि भेदोपचाररत्नत्रयपरिणतेर्जीवस्याषशत्वं न समस्नात्युनम:-
वहदि जो सो समणो अण्णवसों होदि अमुहमावेण ।
सम्हा तस्सदु कम्म आवस्सयटरसणं ण हवे ॥१४३॥

नियमसार- कि तेश्च मे फटमिहान्यपदार्थमाय: मुनिरहस्य भवशमणि निःस्पृहस्य । इति सुकविननपयोजमित्र-गंचेंद्रियप्रसरवर्जितगात्रमापरिग्रही पनगम- मलयारिदयविरचितायां नियमसारल्याग्यायो तात्पर्यवृत्ती परममक्त्यधिकारोदशमः श्रुतस्कन्धः ॥१०॥ अथ सांप्रतं व्यवहारपडावश्यकमातिपक्षशुद्धनिश्चयाधिकार उच्यते । अत्रानवरतस्ववशस्य निश्चयावश्यककर्म मवतीत्युक्तम्:-- जो ण हवदि अण्णवसो तस्स दुकम्मं मणति आवासं॥ कम्मविणासणजोगो णिव्वहिमग्गोत्ति पिज्जुत्तो॥१४१॥ यो न भवत्यन्यवशः तस्य तु कर्म भणन्त्यावश्यकम् । कर्मविनाशनयोगो निवृत्तिमार्ग इति प्ररूपितः ।। १४१ ।। यः सलु यथाविधि परमजिनमार्गाचरणकुशलः सर्वदेवान्तर्मुखत्वादन- न्यवशो भवति किन्तु साक्षात्स्ववश इत्यर्थः । तस्य किल व्यवहारिककिया- प्रपंचपरामुखस्य स्वात्माश्रयनिश्चयधर्मध्यानप्रधानपरमावश्यककास्ती. त्यनवरतं परमतपश्चरणनिरतपरमजिनयोगीश्वरा वदन्तिा किं च यनिगुप्ति- गुप्तपरमसमाधिलक्षणपरमयोगः सकलकर्मविनाशहेतुः स एव साक्षान्माक्ष- कारणात्वानिवृतिमार्ग इति निरुक्तिव्युत्पचिरिति । तथाचोक्तममृतचन्द्रसूरिभिः । आत्मा धर्मः स्वयमितिभवत्प्राप्य शुद्धोपयोगं नित्यानन्दप्रसरसरसज्ज्ञानतत्वे निलीनं । मामोत्युञ्चरचलिततया निःप्रकम्पप्रकाशात् स्फूर्ज़ज्योतिः सहजविलसद्रनदीपस्य लक्ष्मी ॥"

१२२ नियमसार- वर्तते यः स श्रमणोध्याशी मवत्यशुममावेन । तस्मात्तस्य तु कावश्यकलक्षणं न मवेत् ॥ १४३ ॥ अप्रशस्तरागायशुभभावेन यः अमणामामो द्रव्यलिट्टी वर्तते स्वस्वर- पादन्येषां परद्रव्याणां वशो भूता, ततस्तस्य जघन्यरत्नत्रयपरिणते - वस्य स्वात्माश्रयधर्मध्यानलक्षणपरमावश्यककर्म न भवेदिति अशनार्थ द्वन्य- लिङ्गं गृहीत्वा स्वात्मकार्यविमुसः सन् परमतपश्चग्णादिकमप्युदास्य जिनेन्द्रमंदिरं वा तक्षेत्रबास्तुधनधान्यादिकं वा सर्वमस्मदीयमिति मनश्चकारेति। अभिनवामिदमुच्चोहनीयं मुनीनां त्रिभुवनभुवनान्तवातपुंजायमानम् । तृणग्रहमपि मुक्त्वा तीववैराग्यमावाद् वसतिमनुपमा तामस्मदीयां स्मरन्ति । कोपि कापि मुनिर्वभूव सुकृती काले कलादप्यटन मिथ्यात्वादिकलंककरहितः सद्धर्मरक्षामणिः । सोयं संप्रति भूतले दिवि पुनर्देवश्च संपूज्यते मुक्तानेकपरिग्रहव्यतिकरः पापाटबी पावकः ।। तपस्या टोकेस्मिन् निखिलसुधिया प्राणदयिता नमस्या सा योग्या शतमस्वशतस्यापि सततम् । परिप्राप्यैतां यः स्मरतिभिरसंसारजनितं सुसं रेमे कश्चिदत कटिहतोऽसो जहमति । अन्यवशः संसारी मुनिवेषधरोपि दुःखभाहित्यम् । स्ववशो जीवन्मुक्तः किचिन्न्यूनो जिनेश्वरादेषः ।। अत एव माति नित्यं स्ववशो जिननायमार्गमुनिवर्ग । अन्यवशो भात्येवं भृत्यप्रकोपु राजवच्छभवत् ॥

तापहाति। १२३ - अत्राप्यन्यरशस्याभुशान्तरात्मजीवस्य लक्षणमभिहित:- जो चरदि संजदो खलु सुहभावे सो हवेइ अण्णवसो। तम्हा तस्स दु कम्मं आवासपलक्षणं ण हवे ॥१४४॥ यवरनि मंयतः सलु शुभभावे म भोग्न्यवशः । तस्मात्तस्य तु कमविश्यकलक्षण न भवेत् ।। १४४ ॥ यः स्लु जिनेन्द्रवदनारबिन्दविनिर्गतपरमाचारमासमेण सदा सयतः सन् शुसोपयोगे चरति व्यावहारिकधर्मध्यानपरिणतः अत एव चरणकरणप्रधानः स्वाध्यायमालमवलोक्यन् स्वाध्यायकिया करोति, दैनं दैनं भुक्त्वा भुक्त्वा चतुर्विधाहारप्रत्याख्यानं च करोति, तिमषु संध्यामु भगवर्हत्परमेश्वरस्तुतिशतमुसर मुखारविन्दो भवति । त्रिका- टेषु च नियमपरायणः इत्यहोगन्येकादशक्यिातत्परपाक्षकमासिक- चतुर्मासिकसांवत्सरिणा (१) कर्णनममुपजनितपरितोपरोमाचकंचुक्ति- धर्मशरीरः, अनशनावोदयेरसपरित्यागवृतिपरिसम्यानविविनशयना- सनकायक्लेशाभिधानेपु षटमु बासतपरमु च संततोत्साहपरायणः स्वाध्याय- पानशंभाचरणमच्युतप्रेत्यवस्थापनात्मकप्रायाचित्ताविनययावृत्त्यव्यत्सर्गना- मधयेषु चाभ्यन्तरतपोनुष्ठानेषु च कुशलबुद्धिः, किन्तु स निरपक्षतपो. धनः साक्षान्मोक्षकारणं स्वात्माश्रयावश्यकर्म निश्चयतः परमात्मतत्व- विश्रान्तिरूपं निश्चयधर्मध्यानं शुक्लध्यानं च न जानीते अतः परद्रव्यगत- स्वादन्यवश इत्युक्तः । अस्य हि तपश्चरणनिरतचित्तस्यान्यवशस्य नाकलो- कादिलेशपरंपरया शुभोपयोगफटात्माभिः प्रशस्तरागागारः पच्यमानः सभासम्मभव्यतागुणोदये सति परमगुरुप्रसादसादितपरमतत्वश्रद्धानपरि- शानानुष्ठानात्मकशुद्धनिक्षयरनत्रयपरिणत्या निर्माणमुपयातीति । त्यजतु मुरलोकादिल्लेशे रति मुनिपुंगवो भजतु परमानन्दं निर्वाणकारणकारणं ।

१२४ नियमसार- साठविमलमानाराम निराश्रणात्मक सहजपरमात्मानं दूरं नयानयसंहते। अवाप्यन्याशस्य स्वरूपमुम्नः-- दवगुणपज्जयाणं चितं जो कुणइ सोवि अण्णरसो। मोहांधयारयवगयसमणा कहयंति एरिसयम् ॥ १४५ ॥ दत्यगुणाायणां नितं यः करोति सोप्यन्यासः । मोहान्यारत्यरगतश्रमणाः कपयन्तीरशम् ॥ १५ ॥ य. चित व्यलिङ्गधारी भगवदहन्मुसारिन्दगिनिम्तमलोतरत- दार्थमायतिगानसमर्थः कचित् पप्पणो दव्याणा मध्ये चित धने । करि नपा मूर्नामूतनाचेतनगुणाना मध्ये मनचमार, पुनस्थापन पर्यायाणा मध्ये बुद्धि करोति। अपि तु विकालनिरायणनिपानाम- निकारणसमयमारसम्पनिरतसहजज्ञानादिगुरगुणाम्यांगामाराधना- निनात्मता नि कहानिदपि न पोनयति अतएर तपरिमोग-य. मयु aमदर्शनकारिदमाहनीयम्ममसंपालाः तमाम पानी मुस्याः प्रागानि महाश्रमणाः परमभुत ययन्तीद अन्याय समिति परमात्माबमारनी जमार्य पन्यिाय किया। बना निशान निश". Hiriki irat नाम । मनमनाया।

तापपतिः। १२५ ww - अत्र हि साक्षात् स्ववशस्य परमजिनयोगीश्वरस्य स्वरूपमुक्तम्.- परिचत्ता परिमावं अप्पाणं झादि णिम्मलसहावम् । अप्पवसो सो होदि हु तस्स दु कम्मं भणन्ति आवासं १४६ परित्यक्त्वा परभावं आत्मानं ध्यायति निर्मलस्वभावम् । आत्मवशः स भवति खलु तम्य तु कर्म भणन्त्यावश्यम ॥१४॥ यस्तु निरुपमरागनिरंजनस्वभावत्वादोदयिकादिपरभावानां समुदर्य परित्यज्य कायकरणाचामगोचरं सदा निरावरणत्वान्निर्मलस्वभावं निखिलदुरपवीरवरिवाहिनीपताकाटुटाकं निजकारणपरमात्मानं ध्यायति स एवात्मवश इत्युक्तः । तस्याभेदानुपचाररत्नत्रयात्मकस्य निखिलबाह्यक्रिया- काढाडबरविविधविकल्पमहाकोलाहलप्रतिपक्षमहानंशनंदप्रद निश्चयधर्मशुझ- ध्यानात्मपरमावश्यकर्म भवतीति । जयत्ययमुदारधी स्वशयोगिवृन्दारकः प्रनष्टभवकारणः हतपूर्वकाबलिः । स्फुटोत्कटविवकतः स्फुटितशुद्धबोधात्मिकाम् सदाशिवमयां मुदा जति सर्वथा निचिम् ॥ मध्वस्तपचबाणस्य पंचाचारांचिताकृतेः । अवंचकगुणैवाक्य कारणं मुनिसंपदः । हाथ बुद्धा जिनेन्द्रस्य मार्ग निर्वाणकारणम् । निर्वाणसंपदं यान्ति यस्तं वंदे पुनः पुनः ॥ स्ववशयोगिनिकायविशेषक- प्रहतचारुवधूकनकरशहा। त्वमसि नशिरर्ण भवकानने स्मरकिरातरक्षतचेतसाम् ।।

१२६ नियमसार- अनशनादितपश्चरणः फलं तनुविशोपणमेव न चापरन् । तव पदाबुरहदयचिंतया स्ववशजन्म सदा सफलं मम । जयति सहजतेजोराशिनिर्मनलोकः स्वरसविसरपूरक्षालिताहः समंतात् । सहजसमरसेनापूर्णपुण्यः पुराणः स्ववशमनसि नित्यं संस्थितः शुद्धसिद्धः। सर्वज्ञातरागस्य स्वशस्यास्य योगिनः। न कामापे भिदां कापि तां चिन्मोहा जडा वयन । एक एव सदा धन्यो जन्मन्यस्मिन् महामुनेः । स्वबशः सर्वकर्मभ्यो वहिस्तिष्पत्यनन्यधीः शुद्धनिश्चयावश्यकप्राप्त्युपायस्वरूपाख्यानमेततः- आवासं जइ इच्छसि अम्पसहावेसु कुणदि थिरभावमा तेण दु सामण्णगुणं संपुण्ण होदिजीवस्य ॥ १४७।। आवश्यकं यदीच्छसि आत्मस्वभावेषु करोपि स्थिरभावं । तेन नु सामायिकगुणं सम्पूर्ण भवति जीवस्य ॥ १४७ ॥ इह हि वाहपदावश्यकअपंचकहोलेन कलकलवानपराङ्मुख हे शिष्य शुद्धनिश्चयधर्मशुक्लध्यानात्मकस्वात्माश्रयावश्यक संसारवततिमूसलावित यद् इच्छसि, समस्तबिकल्पनाटविनिम्मुक्तनिरंजननिजपरमात्मभामु सहमज्ञानसहनदर्शनसहजचारित्रसहजमुसपमुसेषु सततनिश्चलस्थिरभार करोपि, तेन हेतुना निश्चयसामायिम्गुणे जाते मुमुक्षोनीवस्य बार- पडावश्यकक्रियाभिः f जातम अप्यनुपादेयं फटामित्यर्थः । अतः तात्पर्यवृतिः। - परमावश्यकेन निष्कियेण अपुनर्भवपुरन्धिकासंभोगहासप्रवीणेन जीवस्य सामायिकचारित्रं सम्पूर्ण भवतीति । तथा चोकं श्रीयोगेन्द्रदेवैः- यदि चलति कथंचिन्मानसं स्वस्वरूपाद भ्रमति बहिरतस्ते सर्वदोपप्रसंगः । तदनवरतमंतर्मनसंलमचिनो भव भवसि भवान्तःस्थायिधामापि यस्त्वम् । तयाहि- ययेवं चरण निजात्मनियतं समारदुःखापह मुक्तिश्रीलटनासमुद्भवमुरसस्योश्चेरिदं कारणम् । वुद्देत्त्य समयस्य सारमनघं जानाति यः सर्वदा सोय त्यनाहि.कियो मुनितिः पापाटदीपावकः ।। अत्र शुद्धोपयोगाभिमुखस्य शिक्षणमुक्तम्:- आपासएण हीणो पचमढो होदि चरणदो समणी । पुन्युचकमेण पुणो तम्हा आवासयं कुज्जा ॥ १४८।। आवश्यकेन हीनः प्रनष्टो भवति चरणतः भ्रमण । पूलाचक्रमेण पुनः तस्मादावश्यकं कुर्यात् ॥ १८ ॥ अत्र व्यबहारनयेनापि समतास्तुतिवंदनाप्रत्याख्यानाविषदायकपरि- होगः श्रमणश्चारित्रपरिभ्रष्ट इति यावत्, मुनिश्चयेन परमाध्यात्मभाष- योतनिर्विकल्पसमाधिस्वरूपपरमावश्यकक्रियापरिहीणभ्रमणो निधयचारि- अभष्ट इत्यर्थः । पूर्वानस्ववशस्य परमजिनयोगीश्वरस्य निण्या- वश्यकक्रमेण स्वात्माश्रयनिश्चयधर्मशुलभ्यानस्वरूपेण सदावापा करोतु परममुनिरिति । आत्मावश्ये सहजपरमावश्य चस्मेकर कुादुरकुटहर निर्मातेर्मूलभूतम् ।

१२८ नियमसार- सोयं नित्यं स्वरसविसरापूर्णपुग्यः पुराण: वाचां दूरं किमपि सहज शास्वतं शं प्रयाति । स्ववशस्य मुनीन्द्रस्य स्वात्मचिन्तनमुत्तमम् । इदं चावश्यकं कर्म स्यान्मूलं मुक्तिशर्मणः ।। अनावश्यककर्माभावे तपोधनो बहिरात्मा मवतीत्युक्तः । आवासएण जुत्तो समणो सो होदि अंतरंगप्पा । आवासयपरिहीणो समणो सोहोदि बहिरप्पा ।।१४९॥ आवश्यकेन युक्तः श्रमणः स भवत्यंतरंगात्मा । आवश्यकपरिहीणः श्रमणः स भवति बहिरात्मा ॥ १४९।। अभेदानुपचाररत्नत्रयात्मकस्वात्मानुष्ठाननियतपरमावश्यकर्मगानवर:- संयुक्तः स्ववशाभिधानपरमश्रमणः सर्वोत्कृष्टोऽन्तरात्मा, पोउसापापानान- मावादयं क्षीणमोहपदवी परिप्राप्य स्थितो महात्मा । असंयतसम्पन्दी- जंपन्यांतरात्मा । अनयोर्मध्यमाः सर्व मध्यमान्तरात्मानः । निश्चयन्य:- हारनययप्रणीतपरमावश्यककियाविहीनो बहिरात्मेति । उक्त च मार्गप्रकाशे- "बहिगत्मान्तगत्मेति स्यादन्यसमयो विधा। बहिरात्मानयोर्दहकरणायुतितात्मधीः "() जघन्यमभ्यमोत्कृष्टभेदादागिरतः मुहक् । प्रथमः क्षीणमोहोन्यो मध्यमा मध्यमस्तयो" तथाहि- योगी नित्यं महजपरमावश्यकर्मप्रयुक्तः मसारोस्य प्रबद्रमुमतुसाद यादवी। तम्मानसोयं ममति नितगमन्तगमात्मनिष्टः सामाटो भति दिगत्मा बहिस्नस्थानिधः। - .

तापर्य्यवृत्तिः। in-HAmer- - बाह्याभ्यन्तरजल्पनिरासोयम्- अंतरवाहिरजप्पे जो वहइ सो हवेइ बहिरप्पा । जप्पेस जो ण वट्टइ सो उच्चइ अंतरंगप्पा ॥१५० ।। अन्तरवाह्यनसे वर्तते स भवति चहिरात्मा । जल्पेषु यो न वर्तते स उच्यतेऽतरगात्मा ॥ १५ ॥ यस्तु जिनलिंगधारी तपोधनाभासः पुण्यकर्मकांक्षया स्वाध्यायप्रत्या- ख्यानस्तवनादिवहिर्जल्पं करोति, अनशनंशयनपानस्थानादिषु सत्कारा- दिलाभलोभस्सनन्तर्जसे मनश्चकारेति म बहिरात्मा जीव इति । स्वात्म- ध्यानपरायणस्सन् निरवशेषेणान्तर्मुसः प्रशस्ताप्रशस्तसमस्तविकल्पजाल- केषु कदाचिदपि न वर्तते अत एव परमतपोधनः साक्षादंतरात्मेति । तथा चोक्तं श्रीमदमृतचंद्रमूरिभिः- स्वच्छासमुच्छलदनल्पविकल्पनाला- मेवं व्यतीत्य महतीं नयपक्षकक्षाम् । अन्तहिः समरसेकरसस्वभावम् स्व भावमेवमुपयात्युनुभूतिमात्रम् ॥ तथाहि- मुक्त्वा जल्प भवभयकर बाह्यमाभ्यन्तरं च स्मृत्वा नित्यं समरसमयं चिचमत्कारमेकम् । सानज्योतिःप्रकटितनिजाभ्यन्तरांगातरारमा क्षीणे मोहे किमपि परमं तत्त्वमन्तर्ददर्श ॥ अत्र स्वात्माश्रयनिचयधर्मरामध्यानदितयमेवोपादेयमित्युक्तमः- जो धम्मसुकझाणम्हि परिणदो सोवि अंतरंगप्पा। झाणविहीणो समणो बहिरप्पाइदिविजाणीहि ।।१५१॥ . - नियमसार- यो धर्मशुक्लध्यानयोः परिणतः सोप्यन्तरंगात्मा । ध्यानविहीनः श्रमणो बहिरात्मति विनानीहि ॥ १५ ॥ इह हि साक्षादन्तरात्मा भगवान क्षीणकपाया, तस्य सलु भगवतः क्षी गकपायस्य पोडशकपायाणाममावात् दर्शनचारित्रमोहनीयक राजन विलयं गत अतएव सहजचिदिलासटक्षणामत्यपूर्वमात्मानं शुद्धनि श्वयधर्मशुक्लध्यानदयेन नित्यं ध्यायति आभ्यां ध्यानाभ्यान विहींनो द्रव्य- लिंगधारी द्रव्यश्रमणो वहिरात्मेति हे शिष्य त्वं जानीहि । कश्चिन्मुनिः सततनिर्मलधर्मशुक्लथ्यानामृते समरसे सलु वर्ततेऽसी । ताभ्यां विहीनमुनिको बहिरात्मकोयं पूर्वोक्तयोगिनमह शरणं प्रपद्ये ॥ किच । केवलं शुद्धनिश्चयनयस्वरूपमुच्यते । " बहिरात्मान्तरात्मेति विकल्पः कुधियामयम् । सुधियां न समस्त्येप संसाररमणीप्रियः" परमवीतरागचारित्रस्थितस्य परमतपोधनस्य स्वरूपमुक्त:--- पडिकमणपहुदिकिरियं कुम्वतो णिच्छयस्स चारितम् । तेण दु विरागररिए समणो अम्मुहिदो होदि ॥ १५२॥ प्रतिनमणप्रभृतिक्रियां कुर्वन् निश्चयस्य चारित्रं नेन तु विरागचरिते श्रमणोम्युत्थितो भवति ॥ ११॥ यो हि विमुक्तहिकच्यापारः साक्षादपुनर्भवकांक्षी महामुमुचः परित्यक- सकन्दियव्यापारवान्निश्चयप्रतिक्रमणादिसत्कियां कुर्वशास्त, तेन कापणन स्वस्वरूपविश्रान्निलक्षण परमवीतरामचरिते स पामतपोधनस्तिति पनि आत्मा तिष्ठत्यनुटमहिमा नष्टशीलमाशे यः ससारांवमुसकरः कर्ममुको विमुक्तः।

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मुले शीले मलविरहिते सोयमाचारराशिः
तं वंदेहं समरस सुधासिन्धुराकाशशांकम् ॥
सफलवाग्विषयव्यापारनिरासोयम्-~-
वयणमयं पडिकमणं वयणमयं पचक्वाण णियमं च ।
आलोयण धयणमयं तं सवं जाण सज्झाउं ॥१५३॥
वचनमय प्रतिक्रमणं वचनमयं प्रत्याख्यानं नियमच ।
आलोचनं वचनमयं तत्सर्वं जानाहि स्वाध्यायम् ॥ १५३ ॥
पाक्षिकादिप्रतिक्रमणक्रियापारणं निर्यापकाचार्यमुखोद्गतं समस्त-
पापक्षपहेतुभूतं द्रव्यश्रुतमसिलं वाग्वर्गणायोग्यं पुद्गलगण्यात्मकत्वान
माझं भवति प्रत्याख्याननियमालोचनाच पौलिकवचनमयत्वात्तत्सर्व
स्वाध्यायमितिरे शिष्य ले जानाहि इति ।
मुस्त्वा भन्यो वचनरचना सर्वदातः समस्ता
निर्वाणश्रीस्वनभरयुगाइलेपसौख्याहादरः ।
नित्यानंदायतुलमहिमाधारके स्वस्वरूपे
स्थित्वा सर्व पूणमिव जगज्जालमेको ददर्श म
तथा चोनम-
" परियट्टणं च वायण पुच्छण अणुपेखणा य धम्मकहा।
युधिमंगलसंजुत्तो पंचविहो होदि सज्झाउ" ॥
अत्र शुदनिश्वयधर्मध्यानात्मकपतिक्रमणादिकमेव कर्तव्यमित्युक्तर-
जदि सक्कदि काई जे पडिकमणादि करेज झाणमयम् ।
सत्तिविहीणो जो जर सद्दहणं चैव कापवम् ॥१५४॥

१३२ नियममार- यदि शस्यने कर्तम अहो प्रतिक्रमणादिक कंगषि ध्याननयन् । गतिविहीना यावाद प्रदान नैव कर्तव्यम् ॥ १५४ ।। मुनिमुदर्गप्रथमदर्शनप्र भनात्मकनिश्चयप्रतिक मणप्रायश्चिनप्रत्याख्या- नप्रमग्वशुद्वानभयक्यिाश्चर कन्या महननशक्तिप्रादुर्भाव सति हहाँ मनिशार्दन, परमागममकग्दनिष्यन्तिमम्मपद्मप्रभमहजरे- राग्यप्रामादशिवभिन्बामणे परव्य-गहमागम्बद्रव्यनिष्णातबुद्धेप. न्द्रियप्रसवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहशानिहाना याद दम्पकाले काले केवलं त्वया निजपरमात्मतन्वश्रद्वानमंत्र कतन्यमिति । अमारे मंमा कविलामिन पागवहले न मनिसर्ग ,स्मिन्ननजिननायम्य भवान अतोन्यात्म यान क्यमिह भवनिमयग्न निजात्मभद्रान भवभयहर पीनामदार वह हि साक्षादन्तर्मयम्य परमजिनयामीन बिगामदमकम जिनकथितपरममत्र प्रामणादा पग 7 । स्फुटमानवतेन योगा . श्रीमदर्हन्मुखारविन्दविनाम , ' . . शुद्धनिश्चयनयात्मपरमात्म-याना मा ।। कचल कार्यपर परममिनयागमा परित्यज्य निसिलसगल्यामग मावा ममम्नपशुजन नियमानोऽप्यभिन्न मन नित मभोगसौम्यमूलमनवरत साधणेदिति । हित्वा भीति पशुजनातो लोभिभात्मक रास्तासम्ता वचनरचनो पोरसंसारम्नो। अयगाधया भनितम्या . - 1. .. नानन - HI1न तात्रवृत्तिः। मुस्त्वा मोह कनकरमागोचरं चात्मनात्मा स्वात्मन्येव स्थितिमविचसा याति मुक्त्यै मुमुक्षुः । भीति विहाय पशुभिर्मनुजः कृतो तं मुक्त्वा मुनिः सकललोक्किजल्पजालम् । आत्मपवादकुशलः परमात्मवेदी प्राप्नोति नित्यमुसदं निजतत्त्वमेकम् ॥ वाग्विषयव्यापारनिनिहेतूपन्यासोऽयम.- णाणाजीवा णाणाकम्मं जाणाविहं हवेलद्धी। तम्हा वयणविवादं सगपरसमएहिं वजिज्जो ॥ १५५ ॥ नानानीवा नानाकर्म नानाविधा भवन्धिः । तस्माद्वचनविवादः स्वपरसमयैर्वननीयः ॥ १५५ ॥ जीवा हि नानाविधाः मुना अमुकाः भन्या अभल्याभ, संसारिणः बसाः स्थावरा दीन्द्रियन्द्रिपचतुरिन्द्रियसंश्यसज्ञिभेदात पंच बसा., प्रध्य- तेजोवायुपनस्पतयः स्थावराः भाविकाले स्वभावानन्तचतुष्टयात्मसहन ज्ञानादिगुणेः भवनयोग्या भव्याः एतेषां विपरीता प्रभच्या, कर्म नाना- विधम् द्रव्यभावनीकर्मभदात, अथवा मूलोचरप्रतिभेदाघ, अय तीबतरतीब- मैदमंदतरोदयभेदादा, जीवानो सुखादिप्राप्तब्धिः कालकरणोपदो- पराममायोग्यताभेदात् पबधा । ततः परमार्थवदिभिः स्वपरसमयेषु वादो नकर्तन्य ति। विकल्यो जीवानां भवति पहुधा संमतिकरः तथा कर्मानकविधमपि सश जन्मजनम्र । योपमः इति भवितम्पम्.

१३२ नियमसार- HP-ALI । यदि शक्यते कर्तुम् अहो प्रतिक्रमणादिकं करोषि ध्यानमयन शक्तिविहीनो यावद्यदि श्रद्धानं चैव कर्तव्यम् ॥ ११४ ॥ मुक्तिसुंदरीप्रथमदर्शनप्राभृतात्मकनिश्चयप्रतिक्रमणप्रायश्चित्तप्रत्यारूपा नप्रमुखशुद्धनिश्चयक्रियाश्चैव कर्तव्याः संहननशकिपाको सति हंहो मुनिशार्दूल परमागममकरंदनिष्यन्दिमुरुपमपभसहन- राग्यप्रासादशिखरशिसामणेः परद्रव्य-पराङ्मुसस्वदव्यनिष्णातबुके पो न्द्रियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहशक्तिहीनो यदि वग्धकाले काले का वया निजपरमात्मतत्त्वद्वानमेव कर्तव्यमिति । असारे संसारे कलिविलासते पापबहुले न मुनिर्मार्गअस्मिन्ननधनिननाथस्य भवति । अतोऽध्यात्म ध्यान कधमिह भवन्निर्मलधियाम् निजात्मश्रद्धानं भवभयहरं स्वीकृतमिदम् । रह हि साक्षावन्तर्मुसस्य परमनिनयोगिनः शिक्षणभिवमुकमः-- मिनकथितपरमसूत्रे प्रतिक्रमणाविक परीक्षायित्वा । स्फुटमानवतेन योगी निजकार्य साधयनित्यम् ॥ श्रीमदहन्मुसार विनविनिर्गतसमस्नपदार्थगी लचतुःसन व शनिमयनयात्म परमात्मध्यानात्मम्मतिक्रमणमभूतिसकियो । पहायपर परमाननयोगाभरः प्रशस्ताप्रशस्तममस्तायनरचना पाय निलिममन्यामंग मृत्वा धामीभूय मौनमान मार ममम्मा भुनने. नियमाना:भिन्न मन् निजकार्य मामलोचनः । सभागमोम्यमलमनतात मा पनि । दिला भी नीनाता लोमिमी शनास वरपना योगमाया। , बरमान, मागमतिः। मुरा माई बनारमणीयांची पात्मनात्मा सामन्या स्थितिमविपला याति मुरत्ये मुमः । भोलि विहाय निर्मनुने पता है मुक्त्वा मुनि समन्लोजिनमनालम् । आमतः परमामयदी मामीति नित्यमुरई निमतमम्म। ঘিানিবি সূমীযে- पाणाजीवा णाणाकम्मं णाणापिहं हये उद्धी । तम्हायणविवाद सगपरसमएहिं पजिजी ॥१५५ ।। नानानीया नानाकम्म नानाविधा भीडन्धिः । तस्मादचनविवादः परसमयैवर्ननीयः ॥ १५५ ॥ जीवा हि नानाविधाः मुक्ता अमुनाः भव्या अभन्याभ, मंसारिणः रसाः स्थावरा दन्दियनीन्द्रियचतुरिन्द्रियसश्यसजिभेदात् पंच ब्रसाः, प्य- तेजोवायुषनस्पतयः स्थावरा. भाविकाटे स्वभावानन्त चतुष्टयामसहज- सानादिगुणे: भवन योग्या भव्याः एतेषां विपरीता स्वभव्याः, कर्म नाना- विपन व्यभावनीकर्मभेडात, अथवा मूटोचरप्रतिभेदाच, अप तीव्रतरतीब- मंदमंदतरोदयभेदादा, जीवानो मुस्खादिप्राप्त:न्धिः कालकरणोपदेशो- पंशम्पायोग्यताभेदात् पबधा । ततः परमार्थवेदिभिः स्वपरसमयेषु पदो न कर्तव्य इति । विकल्पो जीवानां भवति बहुधा संमृतिका तथा कर्मानेकविधमपि सदा जन्मजनम् । पोपमा विभक्तिभ्यम्, १३४ नियमसार- असो ठन्धिर्नाना विमलजिनमार्गे हि विदिता ततः कर्तव्यं नो स्वपरसमयेर्वादवचनम् ।। अत्र दृष्टान्तमुखेन सहजतत्याराधनाधिधिरुतः। लक्ष्णं णिहि एक्को तस्स फलं अणुहवेइ मुजणते तह णाणी णाणणिहिं मुंजेइ चइत्तु परत्तत्तिम् ॥१५॥ लब्ध्वा तु निधिमेकस्तस्य फलमनुभवति सुननत्वेन । तथा ज्ञानी ज्ञाननिधि भुंक्त त्यक्त्वा परततिम् ॥ १५९॥ कश्चिदेको दरिद्रः कचित् कदाचित् सुकृतोदयेन निधि लम्यान निधेः फलं हि सौजन्यम् जन्मभूमिरिति रहस्ये स्थाने स्थित्वा अतिगृहात नुभवति इति दृष्टान्तपक्षा; दार्टान्तपक्षेऽपि सहजपरमतत्त्वज्ञानी . कचिदासमभव्योदयस्य गुणोदये सति सहजगग्यसम्पत्तो सत्यान परन गुरुचलननलिनयुगलनिरतिशयभक्त्या मुनि सहनशानानिधि परिप्राप्य परेपां जनानां स्वरूपविकलानो ततिं ध्यानप्रत्यूहकारणमिति त्यजति ।। गहों भूला अस्मिन् लोके लौकिकः कश्चिदेकः लन्ध्या पुण्यात कंचनानो समूहम् । वर्तते त्यक्तसंगो ज्ञानी तहत ज्ञानरक्षा करोति ।। त्यनवा संग नननमरणातकहतुं समस्त हला युदधा हदपकमले पूर्णविराग्यभावम् । भिल्ला शम्या सहनपरमाननियंगरूप शीग माह पूणमिव सदा टोकमालोकयामः।

मानातिः। मापिन्यासोपर- सचे पुराणपुरिसा एवं आपास पकाउण। मपमतपदिठाणे पविजय संपली जादा ।। १५७ ।। मई पुराणपुरुषा माग र कृया। भमान निपप दिनो माता. ॥ १५॥ गामापनियमनपर सामारिरियारतिष- কাৰখানাৰম ধানবালাদেৱৰ ৰা त पुराणपुरपारपरमदेगया सब दुमा रिट बोरितामा मलादिममाणिभारमयानानिमायाराः नमत्यवान समयसमारानामसारा माताति। Fमापनयापुराणम्पा. SAAMANE पेरिगोजि साहित्य प्रगमनयनन्यमनसा मुनिराहो निराहा ৪ শ মুনামি বাবােক। मुस्त्वा माई नरमीग्रेचर परम नित्यानन्द किपमामाटात दिस्यमोहर । अंतासी भरिश परमात्मानमव्यय धर्म परमगुरुतः शर्मपणे निर्मटाय। पतिमुरिजनपसोनमिपंचदिपरसावतिगामापरिमहीपप्रमभ- मलभारिपरिचितामा निएमभारम्बार तापपानों निभयपरमाश्यकारिकार एकादशमः भुतक पुरा पोगिन १३४ नियमसार-- असो लब्धि ना विमलानिनमार्गे हि विदिता ततः कर्तव्यं नो स्वपरसमयादवचनम् ॥ अत्र दृष्टान्तमुसेन सहजतत्त्वाराधनाविधिठक्तः । भ्रूणं णिहि एक्को तस्स फलं अणुहवेइ सुजणः । तह णाणी णाणणिहि मुंजेइ चइत्तु परत्तत्तिम् ॥१५६॥ लब्ध्वा तु निधिमेकस्तस्य फलमनुभवति मुननत्वेन । तथा ज्ञानी ज्ञाननिधि भुक्ते त्यक्त्वा परततिन् ॥ १५ ॥ कश्चिदेको दरिदः कचित् कदाचित मुक्तोदयेन निधि लब्या तस्य निधेः फलं हि सौजन्यम् जन्मभूमिरिति रहस्ये स्थाने स्थित्वा अतिगूवृत्या- नुभवति इति दृष्टान्तपक्षः; दान्तिपक्षेऽपि सहनपरमतत्त्वज्ञानी जीवा कचिदासनभन्योदयस्य गुणोदये सति सहजवगम्यसम्पत्तो सत्ययम् परम गुरुचलननलिनयुगलनिरतिशयमक्त्या मुनिमुन्दरीमुसमकरन्दायमाने सहनशाननिधि परिमाप्य परेषां जनानां स्वरूपविकलानो तति समूह ध्यानमत्यहकारणमिति त्यजति । अस्मिन् लोके टोकिका कश्चिदेक: लम्या पुण्यात् कंचनाना समूहम् । गहो भूला वर्तते त्यामगों ज्ञानी तदत ज्ञानरक्षा करोति। त्यनया संग जननमरणात म्हंतुं समन त्या दृश्या हदयामले पूर्णगग्यभाश्म । मिला शमत्या महनारमाननियम श्रीण माग गमिः सदा सोमाटोच्यामः ।

तात्पर्यवृतिः। - परमावश्यकाधिकारोपसंहारोपन्यासोयम्.- सब्बे पुराणपुरिसा एवं आवासयं य काऊण । अपमत्तपहुदिठाणं पढिवज य केवली जादा॥१५७ ॥ सर्व पुराणपुरुषा एवमावश्यकं च कृत्वा । अप्रमत्तप्रभृतिस्थान प्रतिपय न केवलिनो नाताः ।। १५७ ॥ स्वात्माश्रयनिश्चयधर्मगुरुभ्यानस्वरूपम् बाह्यावश्यकादिक्रियापतिप- क्षकादिशुदनिश्चयपरमावश्यकम् साक्षादपुनर्भववागनाइमुखकारणं कृत्वा सर्वे पुराणपुरुषास्तीर्थकरपरमदेवादयः वयं वुद्धाः केचिद् बोधितबुद्धा- भाप्रमनादिमयोगिमट्टारकगुणस्थानपंक्तिमध्याम्दाः केवलिनः सकलमत्पक्षशानधराः परामावश्यात्माराधनाप्रसादात ज्ञाताश्चेति । स्वात्माराधनया पुराणपुरषाः सर्वे योगिनः प्रज्वस्ताखिलकर्मराक्षसगणा ये विष्णवो जिष्णवः । तानित्यं प्रणमन्यनन्यमनसा मुक्तिसहो निस्पृहा. स स्यात् सर्वजनार्चितांत्रिकमटः पापाटीपावक ॥ मुक्त्वा मोहं कनकरमणीगोचरं हेयरूपम् नित्यानन्द निरूपमगुणालंकृत दिन्यमोहम् । चेतः शीघ्रं प्रविश परमात्मानमव्यमरूप टमा धर्म परमगुरुतः शर्मणे निर्मटाय ॥ इतिमुकविननपयोजमिअपंचेद्रियप्रसरबर्जितगारमावपरिमहश्रीपनयम- मलधारिदयविरचितायां नियमसारख्याख्यायो तात्पर्यवृत्ती निभयपरमावश्यमाधिभर एकादशमः श्रुतस्कन्धः।११॥

नियमसार- ----- - अथ सकलकर्मप्रलयहेतुभूतशुद्धोपयोगाधिकार उच्यते । अत्र ज्ञानिनः स्वपरस्वरूपप्रकाशकवं कपंचिदुक्तंः- जाणदि पस्सदि सन्दं ववहारणएण केवली मगवं । केवळणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं ॥१५॥ जानाति पश्यति सर्व व्यवहारनयन केवली भगवान् । केवलज्ञानी जानाति पश्यति नियमेन आत्मानम् ॥१८॥ आत्मगुणपातिर्मयध्वंसनेनासास्तिसम्टाविमठाचलमानचलवर्शना- भ्यान प्यपहारनयेन जगायकालायवर्तिसचराचरदन्यगुणरायान एसस्मिन् समये नानाति पश्यति च, म भगवान परमेश्वरः परमा- रका, पराश्रितो व्याहारः, इति वचनात, मुनिश्चयतः परमेश्वरस्म महादेवाधिदेवस्य सर्वशरीतरागस्य परदन्यमाहालदर्शकल्यमापकत्वारे गिरिपरिकल्पयाहिनीसमुद्तमूलध्यानापादः, स भगगन विमान रपाधिनिरवधिनित्यगुदसहनज्ञानमहनदर्शनाभ्यो निनारणपग्मामाने स्वयं कार्यपरमात्मापि जानाति पश्यति चाग । शानथोर तान स्वपरमासद पदीपात् । पदादिमितेः प्रकाशी दीपस्तादिति सर्व प्रशस्वरूपत्वात् परं च साशयति । आरमारि व्यवहारेण जगण्य कालस्यं च परंन्याति:लकलात् स्वयमाशात्मकमात्मान. भाशयति । तापनियोपातिविशारीतिमिहामन पमि.-" ययादातुनिनीति: सम्पासान मा har-41. मायामा पनि शमितः पूषा अथ निवपक्षीस अवनति मानिनामनिरजनसभानिस्तान in the पासनान। मारमान तामान माशान मेशापारनेर बिभिमाननगमायानिsr1 " तापतिः। --- एतदात्मगतदर्शनमुसचारित्रादिक नानाति स्वात्मानं कारणपरमात्मस्वरू- पमपि जानातीति । तथानिम श्रीमदमनन्दसूरिभिः- पन्धच्छेदाललपदतुलं मोक्षमक्षय्यमेतत् नित्योयोत स्फुटितसहजावस्थमेकान्तशुद्ध। एकाकार स्वसभरतीत्यन्तर्गभीरधार पूर्णज्ञान ज्वलितमचले स्वस्य सीन महिनि । तयाहि- आत्मा जानाति विश्वं पनवरतमयं केवलज्ञानमूर्तिः मुनिश्रीकामिनीकोमटमुसकमले कामपाडां तनोति । शोभा सौभाग्यचिन्हां व्यवहरणनयादेवदेवो जिनस्ते तेनोच्चानिर्धयन प्रहतमल काटि. स्वस्वरूपं स वेत्ति । वह हि केवलज्ञानकेबलदर्शनयोर्युगदर्तन दृष्टान्तमुखेनोक्त:- जुगवं वइ गाणं केवलणाणिस्स दसणं च तहा। दिणयरपपासतापं जह बट्टा तह मुणेयव्वम् ॥१५९ ॥ युगपद वर्तते ज्ञानं केवलज्ञानिनो दर्शनं च तथा दिनकरप्रकाशतापी यथा वर्तते तथा ज्ञातव्यम् ॥ १५९ ॥ अन दृष्टान्तपक्षे क्वचिकाले बलाहकमेक्षाभाभाव विद्यमाने नमस्स्थटस्य मध्यगतस्य सहस्रकिरणस्य प्रकाशतापी यया युगपद् वर्तते तथैव च मग- पतः परमेश्वरस्य तीर्थनाथस्य जगध्यवर्तिषु स्थावरजंगमगन्यगुणपर्या- त्मकेषु शेयेषु सकलविमल केवलज्ञानकेवलदर्शने च युगपद् वर्तते। किंच संसारिणां दर्शनपूर्वमेव ज्ञानं भवति इति । तथाचोक्तं प्रवचनसार- - - १३८ नियमसार- - . "णाणं अत्यंतगयं लोयालोयमु वित्यडा दिट्टी। णहमणिडं सलं इदं पुण जे तु तं सदन । अन्यच्च दसणपुव्वं गाणं उदमत्याणं पि दोष्णि उवओग्गा । जुगवं जम्हा केवटिगाह जुग तु ते दोवी " तथाहि वर्तेत ज्ञानदृष्टी भगवति सततं धर्मतीर्थाधिनाये सर्वज्ञेऽस्मिन् समंतात् युगपदसदृशे विश्वलोकनाये। एतावुष्णप्राशो पुनरपि जगतां लोचनं जायतेजस्मिन् तेजोराशी दिनेश हतनिसिठतमस्स्तोन ते तश्च । सदोधपोतमधिय भवाम्बुराशि- मुद्घघ्य शाश्वतपुरी सहसा वयाता । तामेव तेन जिननायपयाधुनाह याम्यन्यदस्ति शरणं किमिहोत्तमान एको देवः स जयति जिनः केवटज्ञानभानुः काम कान्ति बदनामले संतनोत्येव कांचित् । मुक्तस्तस्याः समरसमयानंगसोल्पपदायाः कोनाळं संदिशतुमनिशं प्रेमभूमेः पियायाः ।। जिनेन्दो मुनिकामिन्या. मुसपो जगाम सः । अलिलीलां पुनः काममनमुसमदयन् ।। आत्मनः स्वपरप्रकाशकत्वविरोधोपन्यासोयमः- जाणं परप्पयासं दिहि अप्पप्पयासया चेव । अप्पा सपरपयासो होदिचि हि मण्णसे दिहि ॥१६० तापयत्तिः। ज्ञानं परप्रकाशं दृष्टिरात्ममकाशिका वैव । आत्मा स्वपरप्रसो भवतीति हि मन्यसे यदि सलु ॥ १६० ॥ दह हि तावदात्मनः स्वपरमाशकत्वं कथमिति चेत् । ज्ञानदर्शनादि- विशेषगुणसमृद्धो यात्मा, तस्य शानं शुद्धात्मप्रकाशसमर्थत्वात् परप्रका- शमेव, ययेवं दृष्टिनिरंकुशा केवलमभ्यन्तरे यात्मानं प्रकाशयति चेत् अनेन विधिना स्वपरप्रकाशको यात्मति हहो जहमते प्राथमिकशिप्य, दर्शनशुद्धरभावात् एवं मन्यसे, न खलु जरस्त्वत्तस्सकाशादपरः कश्चित्र- नः । अथ पविरुद्धा स्यादादरियादेवता समभ्यर्चनीया सद्भिरनवरतं तत्रैकान्ततो ज्ञानस्य परप्रकाशकलं न समस्ति, न केवलं, स्यान्मतं दर्शनमपि शुद्धात्मानं पश्यति दर्शनज्ञानप्रभृत्यनकधर्माणामाधारो यात्मा न्यवहारपक्षेपि केवलं परप्रकाशकस्य ज्ञानस्य न जात्यसंबन्ध (1) सदा वहिरदस्थितत्वात् आत्मप्रतिपत्तेरभावात् स सर्वगतत्वं (?) अत:- कारणादिदे शानं न भवति मृगतृष्णाजलबत्, पतिभासमावमेव दर्शनपक्षेपि * तथा न केवटमभ्यन्तरप्रतिपत्तिकारणं दर्शनं भवति । सदैव सर्व पश्यति हि . स्वस्याभ्यन्तरस्थता कनीनिको न पश्यत्येव अतः स्वपरप्रकाश- कत्व शानदर्शनयोरविरुद्धमेव, ततः स्वपरप्रकाशको यात्मा शानदर्शन- टक्षण इति। तथानोक्न श्रीमदमृतचन्द्रसूरिभिः- जानभव्येष विश्व युगपदापि भवद्भाविभूत समस्त मोहाभावापामा परणमति पर नव निस्नका । तेनास्ते मुक्त एवं प्रसभविकसितज्ञप्तिविस्तारनीता शेयाकारी त्रिलोकी गाथामितियोतयन शानमूर्तिः ॥ -- नियमसार- तथाहि- ज्ञानं तावत् सहजपरमात्मानमेकं विदित्वा लोकालोको प्रकटयति वा तदतं ज्ञेयजालम् । दृष्टिः साक्षात् स्वपरविपया क्षायिकी नित्यशुद्धा ताभ्यां देवः स्वपरविषयं बांधति शेयराशिम् ।। पूर्वसूत्रोपात्तपूर्वपक्षस्य सिद्धान्तोक्तिरिय:- णाणं परप्पयासं तइया णाणेण दंसणं मिण्णम् । ण हवदि परव्वगयं दसणमिदि पण्णिदं तम्हा॥१६१॥ ज्ञानं परप्रकाश तदा ज्ञानेन दर्शनं भिन्नम् । न च भवति परद्रव्यगतं दर्शनमिति वर्णितं तस्मात् ।।१६१॥ केवलं परप्रकाशकं यदि चेत् ज्ञानं तदा परप्रकाशकप्रधानेनानेन ज्ञानेन दर्शनं भिन्नमेव । परप्रकाशकस्य ज्ञानस्य दर्शनस्य च कथं सम्बन्ध इति चेत् सह्यविध्ययोरिव अथवा भागीरथीश्रीपर्वतवत्, आत्मानिष्ठं यत् तद् दर्शनमस्त्येव निराधारत्वात् तस्य ज्ञानस्य शून्यतापत्तिरेव, अथवा यत्र तत्र गतं ज्ञानं तत्तद्र्व्यं सर्व चेतनत्वमापद्यते अतत्रिभुवने न काश्चदचेतनः पदार्थः इति महतो दूषणस्यावतारः । तदेव ज्ञानं केवल न परप्रकाराकम् इत्युच्यसे हे शिष्य तार्ह दर्शनमपि न केवलमात्मगत- मित्यभिहितम्, ततः खल्विदमेव समाधानम् सिद्धान्तहृदयं ज्ञानदर्शनयोः कथंचित् स्वपरप्रकारात्वमस्त्येवेति । तथाचोक्तम् श्रीमहासेनपंडितदेवैः- ज्ञानादिन्नो न नाभिन्ना भिन्नाभिन्नः कथचन । शातं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मेति कीर्तितः ।

तात्पर्य वृत्तिः। whennak------ - तथाहि- आत्मा ज्ञानं भवति न हि वा दर्शन क्षेत्र तद्वत ताभ्यां युक्तः स्वपरविषयं वेति पश्यत्यवश्यम् । संशाभेदादपकुलहरे चात्मनि ज्ञानदृष्ट्योः भेदो जातो न खलु परमार्थेन वायुष्णवत्स ॥ एकान्तेनात्मनः परप्रकाशकत्वनिरासोयम:- अप्पा परप्पयासो तइया अप्पेण दंसणं भिण्णं । ण हवदि परद्रव्यगओदसणमिदिबपिणदं तम्हा॥१६२॥ आत्मा परप्रकाशस्तदात्मना दर्शनं भिन्नम । न भवति परद्रव्यगतं दर्शन मिति वर्णित तम्मात् ।। १६२॥ पधैकान्तन ज्ञानस्य परप्रकाशकलं पुरा निराकृत, इदानीमात्मा केवल परप्रकाशश्चेत् तत्तदेव प्रत्यादिष्ट भावाभावदेतयोरेकास्तित्वनि नत्वात् : पुरा किल ज्ञानस्य परप्रकाशकत्वे सति तदर्शनस्य रिम शात । अन्यत्मना परप्रकाशत्वे सति तेनैव दर्शनं भिन्नमित्यवसेयम् । अपि चात्मनः पर- द्रव्यगत इति चेत् तदर्शनमप्यभिन्नमित्यवसेयम् । ततः खल्वात्मा स्वपा- प्रकाशक इति यावत, यथाकथंचिस्वपरप्रकाशकत्वं ज्ञानस्य साधितम् । अम्यापि तथा, धर्मधर्मिणोरकरवरूपत्वात् पावकोष्णवदिति । आत्मा धर्मी भवति मुतरा शानदग्धर्मयुक्त तस्मिक स्थितिमविचला तो परिमाप्य नित्यं । सम्यग्दृष्टिनिखिलकरणग्रामनीहारभाश्यन मुनि याति स्फुटितसहनायस्थया सस्थितानो । ध्यवहारनयस्य सफलत्वायोतनम्थनम्.- णाणं परप्पयासं पवहारणयण दसणं तम्हा । अप्पा परप्पपासो पबहारणपेण दंसर्ण तम्हा ॥१६॥ - १५० निपमसार- तथाहि ज्ञान तापत् महनपरमात्मानमे विदित्वा लोकाठोको प्रकटयति वा तदतं ज्ञेयजालम् । दृष्टिः साक्षात् स्वपरविषया क्षायिक नित्यशुद्धा ताभ्यां देवः स्वपरविषय बोधति शेयगशिन ।। पूर्वमूर्वापानपूर्णपक्षस्य सिद्धान्तोक्तिरिय----- गाणं परप्पयासं तझ्या णाणण देसणं मिण्णम् । ण हवदि परदव्यगयं दसणमिदिवण्णिदं तम्हा॥१६१॥ ज्ञान परप्रकाश तदा ज्ञानेन दर्शनं भिन्नम् । न च भवति परद्रव्यगतं दर्शनमिति वर्णितं तस्मात् ॥११॥ केवल परप्रकाशकं यदि चेत् ज्ञानं तदा परप्रकाशवप्रधाननानेन ज्ञानेन दर्शनं भिन्नमेव । परप्रकाशकस्य ज्ञानस्य दर्शनस्य च कथं सम्बन्ध इति चेत् साविंध्ययोरिव अथवा भागीरथीश्रीपर्वतवत्, आत्मनिष्ठं या तद् दर्शनमस्त्येव निराधारत्वात् तस्य ज्ञानस्य शून्यतापात्तरेव, अथवा यत्र तत्र गतं ज्ञानं तत्तद्र्व्यं सर्व चेतनत्वमापद्यते अतविभुक्ने न काश्चदचेतनः पदार्थः इति महतो दूषणस्यावतारः । तदेव ज्ञानं केवलं न परप्रकाशकम् इत्युच्यसे हे शिष्य तार्ह दर्शनमपि न केवलमालगत- मित्यभिहितम, ततः सल्विदमेव समाधानम सिद्धान्तहदयं ज्ञानदर्शनयोः कथंचित् स्वपरप्रकाशत्वमस्त्येवेति । तथाचोक्तम् श्रीमहासेनपंडितदेवैः- ज्ञानादिन्नो न नाभिन्नो भिन्नाभिन्नः कथंचन । ज्ञातं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मति कीर्तितः ।

तात्पर्यपृत्तिः। ज्ञानमात्मप्रकाशं निश्चयनयेन दर्शनं तस्मात् । आत्मा आत्मप्रकाशो निश्चयनयेन दर्शनं तस्मात् ॥ १६४॥ निश्चयनयन स्वप्रकाशकत्वरक्षणं मुद्धज्ञानमिदमभिहितं तथा सकला- वरणममुक्तशुद्धदर्शनमपि स्वप्रकाशकपरमेव । आत्मा हि विमुक्तसकलेन्द्रि- यन्यापारत्वात्, स्वप्रकाशकत्वलक्षणलक्षित इति यावत् । दर्शनमपि विमुक्त- बहिर्विपयत्वात्स्वप्रकाशकलप्रधानमेवइत्थं स्वरूपप्रत्यक्षलक्षणलक्षिताक्षुण्ण- सहनशानशुद्धदर्शनमयत्वात् निश्चयेन जगत्रयकालत्रयवर्तिस्थावरजंगमा- स्मकसमस्तद्रव्यगुणपर्यायविषयेषु आकाशाप्रकाशकादिविकन्यविदरस्सन् स्वस्वरूपे संज्ञालक्षण प्रकाश्य प्रकाशते, या निरवशेषणान्तर्मुखत्वाइनवरतम् असंडादेतचिञ्चमत्कारमूर्तिरात्मा तिष्ठतीति । आत्मा ज्ञानं भवति नियत स्वप्रकाशात्मकं या दृष्टिः साक्षात् प्रहतबहिरालंबना सापि चेषः । एकाकारस्वरसविसरापूर्णपुण्यः पुराणः स्वस्मिन्नित्य नियतवसतिनिदिकल्पे महिनि। शुद्धनिश्चयनयविवक्षया परदर्शनवनिरासोऽयम्:- अप्पसरुवं पेच्छदि लोयाटोयं ण केवली भगवं । जइ कोइ मणइ एवं तस्स य किं दूसणं होई ॥१६५॥ आत्मस्वरूपं पश्यति लोकालोको न केवली भगान् । यदि कोपि भणत्वैवं तस्य च किं दूपण भवति ॥ १६५ ॥ व्यवहारेण पुद्गलादित्रिगलपियव्यगुणपर्यायेरसमयपरस्थितिसमर्थन- सकलविमटवलाबांधमयत्वादिविविधमहिमाक्षारोऽपि स भगवान केवल दर्शनीयलोचनोभपि परमनिरपेक्षतया निःशेषतोऽन्तर्मुखलात केवलस्वरूप- +- ततो दर्शनमापि तादृशमेव । त्रैलोक्यमोनहेतुभूततीर्थकरपरमईकम्य १४२ नियमसार- ज्ञानं परप्रकाशं व्यवहारनयेन दर्शनं तस्मात् । आत्मा पर प्रकाशो व्यवहारनयन दर्शनं तस्मात् ॥ ११३ ॥ इह सकलकर्मक्षयप्रादुर्भावासादितसकटविमलकेवलज्ञानस्य पुन- दिमूर्तामूर्तचेतनाचेतनपरद्रव्यगुणपर्य्यायप्रकरप्रकाशकवं कथमिति के " पराश्रितत्वे व्यवहारः " इति वचनात् व्यवहारनवरेनेति । शतमखशतप्रत्यक्षवंदनायोग्यस्य कार्यपरमात्मनश्च तहदेव पा. शकत्वं । तेन व्यवहारनयबलेन च तस्य खलु भगवतः केवटदर्शने तादृशमेवेति ॥ तथाचोक्तं श्रुतजन्यो- " जयति विजयदोपोऽमयमत्येन्द्रमौलि- प्रविलसदुरुमाठा-पर्चिताभिर्जिनेन्द्रः । विजगदजगती यस्येदशी व्यसनुगते सममिव विपमेष्वन्यान्यवृत्ति निपेद्धन् । तथाहि- व्यवहाणन येन ज्ञानपुनोऽयमात्मा प्रस्टतरमुदृष्टिः सटोरमदशी। विदितसस्टमूर्तामन्तवार्थसार्थः स भवनि परमश्रीकामिनीकामयः। निधयतरपाम्यानंततः-- गाणं भप्पपपास पिच्छयणपण देसणे तम्हा। अप्पा अपपयासो णिच्छयणपएण सणं तम्हा १६४ लालमिः MARA '---- नमामा निश्चयनयन दर्शनं तस्मात् । आरमा आत्मप्रकासो निश्यनयेन दर्शनं नम्मात् ।। १९४॥ निश्पनयन स्वप्रकाशवरक्षण मुदज्ञानमिदभिहित तथा सकता- परणामुन शुलदर्शनमार बारमेव । आत्मा हि विमुनसरटेन्द्रि- पम्पापरत्वात् दाशलक्षणरहित इति पात् । दर्शनमपि विमुक- बहिविषयत्वात स्वासमत्वाधान मेवात्य स्वरूपप्रत्यक्षलक्षणलक्षिताभुग्ण- सहनशानभुदर्शनमयत्वात् निभयेन नगायमालयप्रतिस्थावरनगमा- मासमन्तदन्पगुपपायविषयेषु आमाशाकासकादिभिकल्पविद्गस्मन् स्वस्वरूपे मंशाटक्षण प्रकाश्य प्रकाशते, या निरवशेषणान्तर्मुसवादनवरतन असंबादेत निश्चमत्कारमतिरामा तिष्यतीति । आत्मा ज्ञान भवति नियत स्वप्रकाशात्मकं या दृष्टिः साक्षात महतबहिरालंदना सापि चैपः । एमकारस्वरसविसरापूर्णपुण्यः पुराणः स्वस्मिनित्य नियतवसतिर्निविकल्पे माहिग्नि गुदनिश्वयनपत्रिवश्या परदर्शनवनिरासोऽयमः- अप्पसरुवं पेच्छदि लोयाटोयं ण केवली भगवं । जइ कोद मणइ एवं तस्स य किं दूसणं होई ॥१६५॥ आत्मम्वरूपं पश्यति लोकान्यको न केवली भगवान् ।। यदि कोपि भगत्वेने तस्य च किं दूषण भवति ॥ १६५ ॥ व्यवहारेण पुदटादित्रिकारविषयदव्यगुणपर्यायेकसमयपरस्थितिसमर्थन- स्कटविमलकेबलावरोधमयत्वादिविविधमहिमाधागेऽपि स भगवान् केवल दर्शनीपटोचनो परमनिरपेक्षतया निःशेषतोऽन्तर्मुसत्वात् केवलस्वरूप- १४४ नियमसार- - प्रत्यक्षमात्रव्यापारनिग्तनिरंजननिजसहनदर्शनेन सचिदानंदमयमात्मा निश्चयतः पश्यतीति शुद्धनिश्चयनयविवक्षया यः कोपि शुद्धान्तस्तत्त्ववेः परमजिनयोगीश्वरो वक्ति तस्य च न सलु दूषणं भवतीति । पश्यत्यात्मा सहजपरमात्मानमेकं विशुद्धं स्वान्तःशुद्ध्यावसथमहिमाधारमत्यन्तीरें । स्वात्मन्युच्चैरविचलतया सर्वदान्तर्निमग्न तस्मिन्नेव प्रकृतिमहति व्यावहारप्रपंचः। केवलबोधस्वरूपाख्यानमेतत्:- मुत्तममुत्तं दबं चेयणमियरं सगं च सन्वं च । पच्छंतस्स दुणाणं पञ्चक्खमणिंदियं होइ ॥ १६६ ॥ मूर्तममूर्त द्रव्यं चेतनमितरत् स्वकं च सर्व च । पश्यतस्तु ज्ञान प्रत्यक्षमतीन्द्रियं भवति ॥ १६६ ॥ पणां द्रव्याणां मध्ये मूर्तत्वं पुद्गलस्य, पंचानाम अमूर्तत्वम् चेतनत्वं भी वस्यैव पंचानामचेतनत्यम् , मूर्तामूर्तचेतनाचेतनस्वद्रव्यादिकमशेषम् त्रिकाळ विषयम् अनवरतम् पश्यतो भगवतः श्रीमदर्हत्परमेश्वरस्य कमकरणव्यवधाना- पोर्ट चातीन्द्रियं च सकलविमलकेवलं ज्ञानं सकलप्रत्यक्षं भवतीति । तथा चोतं प्रवचनसारे- जपच्छदो अमुत्तं मुत्तेसु अइदियं च पच्छण्णम । सयल सर्ग च इवर तण्णाणं हा पचकसम तथाहि- सम्याक्ती निभुवनगुरुः शाश्वतानन्तधामा लोकालोकी सपरमसिल चेतनाचेतनं च। “ .

मात्सप्पतिः।
-
तातार्य यमपनमपर केवलज्ञानसंगम
लेनवार्य शिस्तिमहिमा तीर्थनार्या मिनेन्द्र
भन चटदरभावात सम्टशत न समस्तीत्युत्तमः-
प्रप्युत्तसपलव्य पाणागुणपज्जएण संजुत्तम् ।
जो ण य पेच्छद सम्म परोसदिदी हये तस्स ॥ १६७॥
पूर्वतिसकलद्रव्यं नानागुणपर्यायेण मयुक्तम् ।
यो न न पश्यति सम्यक् परोक्षदृष्टिभवेत्तस्य ॥ १६ ॥
पूर्वमनापासमूाविदय समस्तगुणपर्यायात्मकं, मूर्तस्य मूर्तगुणाः
अचेतनस्याचेतनगुणाः अमूर्तस्यामूर्तगुणाः पेतनस्य चेतनगुणाः पहानि-
पुलिरूपाः हमा, परमागमप्रामाण्यादम्युपगम्याः अर्थपर्यायाः पपणा
दयाणा साधारणा. नरनारकादिव्यंजनपव्या जीवाना पचससारप्रपंचा-
नो, पालाना शूलस्थूलादिस्कन्धपायाभ, चतुर्णी धर्मादीनां शुद्धपर्या-
याभेति, एभिः संयुक्तं तान्यनालं यः खलु न पश्यति तस्य संसारिणामित्र
परोक्षपिरिति ।
यो नैव पश्यति जगध्यमकदैव, कालत्रयं च तरसा सकलशमानी ।
प्रत्यक्षदृष्टिरतुलान हि तस्य नित्य, सर्वज्ञता क्यमिहास्य जहात्मनः स्यात् ।
व्यवहारनयप्रादुर्भारकथनमिदम्:-
लोयालोयं जाणइ अप्पाणं णेव केवली भगवं।
जइ कोइ भणइ एवं तस्स य किल दूसणं होदि।१६८॥
लोकालाकौ नानात्यात्मानं नव केवली भगवान् ।
यदि कोऽपि भणति एवं तस्य च किल दूषणं भवति ॥१९॥

नियममार- - गानामिलोलगाननियोगनो भगान अनामनाकामिनी जीरितेशः परपसंचालो जाममात्राटो र जानाति, "पराधितो गाहार" इतिमानात व्याहारण स्याहारप्रधानमन परागणवात्मसमर ने जानाति गदि थाहारनपरिक्षया गरि गिन नापनापविनारयः ( वक्षः) महाविद पति चेत् तस्य मनु में पणमिति ॥ तथा श्रीममन्तभदम्यामिभिः- "स्थितिनननविरोषलक्षणे, नामनरं च जगप्रतिक्षणम् । पति ननमालनलोउन, वचनमिदं वदावरस्य ते ॥" तथाहि- जानातिलोम्मासिलं खलु तीर्थनायः स्वात्मानमेकमनघं निजसोस्यनिष्ठम् । नो वेत्ति सोयमिति तं व्यवहारमार्गात वतीति कोपि मुनिपो न च तम्य दोषः । अब ज्ञानस्वरूपो जीव इति वितर्कणोक्तः । णाणं जीवसरूपं तम्हा जाणइ अप्पगं अप्पा । अप्पाणं णवि जाणदि अप्पादो होदि विदिरितम् १६९ ज्ञानं जीवस्वरूपं तस्माजानात्यात्मक आत्मा । आत्मानं नापि नानात्यात्मनो भवति व्यतिरिकम् ॥१६॥ इह हि ज्ञानं तावीवस्वरूपं भवति ततो हतोरखंडाइतस्वभावनिरतं निरतिशयमावनासनाथम् मुक्तिसुंदरीनाथम् बहिावृत्तकोतूहलम निज- परमात्मानं जानाति कश्चिदात्मा भव्यजीव इति अयं खलु स्वभावादः अस्य विपरीतो वितर्कः स सलु विभाववादः प्राथमिकशिष्याभिप्रायः ।

तापर्यवृत्तिः। १४७ . क्यामिति चेत् । पूर्वोक्तस्वरूपमात्मानं सलु न आनात्यात्मा स्वरूपावस्थितः संतिष्ठति यथोष्णस्वरूपस्यामे: स्वरूपममिः किं जानाति, तथैव शानज्ञेय. विकल्पाभावात् सोयमात्मात्मान तिष्ठति । हहो प्राथमिकशिम्य अग्निवदय- मात्मा किमचेतनः, किंबहुना तमात्मानं ज्ञानं न जानाति चेद् देववचरहित- परशुवत् । इदं हि नार्थक्रियाकारि अतएव आत्मनः सकाशाद् व्यतिरिक भवति तन्न खलु सम्मतं स्वभाववादिनामिति । तथाचोक्तं श्रीगुणभ- द्रस्वामिभिः। ज्ञानं तावद्भवति सुतरां शुद्धजीवस्वरूप स्वात्मात्मानं नियतमधुना तेन जानाति चैकम् । तच ज्ञानं स्फुटितसहजावस्थयात्मानमारात नो जानाति स्फुटमविचलाद्भिन्नमात्मस्वरूपात् ॥" तथाचोक्तम्- णाण अन्विदिरितं जीवादो तेण अप्पग मुणइ । जदि अप्पर्ग य जाणइ भिण्ण तं होदि जीवादो"" गुणगुणिनो भेदाभावस्वरूपाख्यानमेतत्ः- अप्पाणं विणु णाणं णाणं विण अप्पगो ण सन्देहो । तम्हा सपरपयासं गाणं तह दसणं होदि ॥ १७॥ आत्मानं विद्धि ज्ञानं ज्ञानं विद्ध्यात्मको न मदेहः । तस्मात्स्वपरप्रकाशं ज्ञान तथा दर्शनं भवति ॥ १७ ॥ सकळपरदव्यपराइमुखमात्मान स्वस्वरूपपरिच्छित्तिसमर्थसहजज्ञान- स्वरूपमिति हे शिष्य व विद्धि मानीहि तथा विज्ञानमात्मेति जानीहि तत्व स्वपरप्रकाशज्ञानदर्शनहितयमित्यव संदेहो नास्ति । - “ १४८ नियमसार- KARAN आत्मानं ज्ञानदारूपं विद्धि हि ज्ञानमात्मकं । स्वं परं चेति यत्तत्त्वमात्मा द्योतयति स्फुटम् ॥ सर्वज्ञवीतरागस्य वांछाभावत्वमत्रोक्तम्:---- जाणंतो पस्संतो ईहापुन्वं ण होइ केवलिणो। केवलिणाणी तम्हा तेण दुं सोऽबंधगो भणिदो॥११॥ जानन् पश्यन्नीहापूर्वं न भवति केवलिनः । केवलज्ञानी तस्मात् तेन तु सोअन्धको भणितः ॥ ११ ॥ भगवानर्हत्-परमेष्ठी सायनिधनामूर्तातीन्द्रियस्वभावशुद्धसद्भूतव्यवहारेण केवलज्ञानादिशुद्धगुणानामाधारभूतत्वात् विश्वमश्रान्तं जाननपि पश्यन्नपि वा मनःप्रवृत्तेरभावादीहापूर्वकं वर्तनं न भवति तस्य केवलिनः परमभद्वार- काय, तस्मात् स भगवान केवलज्ञानीति प्रसिद्धः, पुनस्तेन कारणेन । • भगवान् अबंधक इति। तथा चोक्तम् श्रीप्रवचनसारे- "णवि परिणमइ ण गिण्हइ उप्पनइ णेव तेसु अस्थेसु । जाणण्णवि ते आदा अबंधगो तेण पच्छतो॥" तथाहि- जानन सर्व भुवनभवनाभ्यन्तरस्थ पदार्थ पश्यन् तदत सहजमहिमा देवदेवो जिनेश । मोहाभावाइपरमखिलं नव गृहाति नित्यं ज्ञानज्योतिर्हतमलकलिः सर्वलोकैकसाक्षी ।। यह हि शानिनो बंधाभावस्वरूपमुनमः- परिणामपुववयणं जीवरस य बंधकारणं होई । परिणामरहियषपणं तम्हाणाणिस्स ण हि पंधो॥१७२ - नापतिः। 1. इंदापुष्पं पपणं जीयरस य पंधकारणं होई। ईहारहियं पयर्ण तम्हाणाणिसण हि पंधो १७३ जुम्म। परिणामपूर्वमनं नीपस्य पबंधकारणं भवति । परिणामरोहतरचनं तस्मान् ज्ञानिनो न हि बंधः ।। १७२ ॥ सपून बननं भीवस्य न धारणं भवति । ईहारहित वचन तम्माज्ञानिनो न हि बंध ॥१७॥ युमं । एम्पज्ञानी जीवः सचित दारिदापि स्वबुद्धिपूर्वक वचनं ने वातः स्वमनःपरिणामपूर्वसमितियावत् । चुत.-" अमनस्का केवलिनः" इतिवचनात् । अत' कारणाजीवस्य मनापरणतिपूर्वक वचनं बंधकारण- मित्यर्थः, मनःपरिणामपूर्वक वयनं केवलिनो न भवति, ईहापूर्व वसनमेव साभिलापात्मक जीवस्य बंधारण केवटिमुरखारविन्दावनिर्गतो दिव्यध्वनि- रनोहात्मकः समस्तजनादयामाइकारणं, ना सम्यग्ज्ञानिनो बंधाभाव पति। ईसापूर्व वचनरचनासपमरास्ति नैव तस्मादेष प्रकटमहिमा विश्वलॉकभर्ता । अस्मिन् बंधः कथमिव भवरल्यभावात्मकोऽयं मोहाभावान खलु निसिल रागद्देषादिजाल । एका देवखिभुवनगुरनष्टकर्माष्टकाई: सदोवस्थं भुवनमखिलं तदत वस्तुजालम् । आराये भगवति निने नैव बंधो न मोक्षः तस्मिन् काचिन्न भवति पुनर्मूच्छना चेतना च। नचितस्मिन् भगवति निने कर्म कर्मप्रपची रायाभावातुलमहिमा राजते वीतरागः । एपः श्रीमान् स्वमुसनिरतः सिद्धिसामन्तिनींशो शानन्योतिझुरितभुवनाभोगभागः समन्तात् ।

-AAALon
आउस्स खयेण पुणो णिण्णासो होइ सेसपयडीण।
नियममार-
कानिमाम्यानमत्तायोतनततः--
गणणिसे नविहारा हापुन्यं ण होई कवठिणों।
तह्मा ण होइ बंधो साकई नोहणीयम्स ॥ १७ ॥
माननियपिहारा ईहापूल न मान्नि कालिनः ।
तम्मान भाति बंधः साक्षाय मोहन यम्य ॥ १७ ॥
भगतः परमाहन्त्यठामीगिजमानस्य कालिनः परम्वांतगगड-
शस्य ईहापूर्व न किमाप वर्तने अतः स भगवान् न चेहते मनन-
भावात् अमनस्सा केवलिन: इनि वचनादान तिपति नोपविशति न -
पूर्व श्रीविहारादिकं करोति । ततस्तस्य तीर्थकरपरमदेवम्य द्रव्यमावल
चतुर्विधबंधो न भवति । स च बंधः पुनः किमर्थं जातः कस्य संबंध
मोहनीयकर्मविटासविभितः अक्षामिन्द्रियार्थ तेन सह यः वर्चत इति
साक्षा) मोहनीयस्य यशगताना साक्षाप्रयोजनानां संतारिमानेवबंध इति ।
तथाचोक्तं श्रीप्रवचनसारे-
"ठाणमिसेज्जविहारा धम्मुवदेसं च णियदओ नेति ।
अरहंताण काले मायाचारव्व इयाणं"।
देवेन्द्रासनकंपकारणमहकैवल्यदोधोदये
मुक्तिश्रीललनामुखाम्बुजरवेः सद्धर्मरक्षामणे.
सर्व वर्तनमस्ति चेन च मनः सर्व पुराणस्य तत्
सोऽयं नन्वपरिप्रमेयमहिमा पापाटीपावकः ।
शुद्धजीवस्य सभाक्गतिप्राप्त्युपायोपन्यासोऽयं.-
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पच्छा पावइ सिग्धं लोयग्गं समयमैत्तेण ॥१७॥

नासम्वृमिः। आयुषः सयेण पुनः निगारो भवति शेषप्रतीनां । पश्चात्मामानिशीम लोफामं ममयमाण ॥ १७५ ॥ स्वभावमतिक्रियापरिणतस्य परमापकमविहीनस्य भगवत सिरक्षेत्रा- भिमुसम्म पानध्येयध्यात्तत्फटमामिप्रयोजनविकल्पान्येन पाविचलस्थितिरूपेण परमसुम्यानन आयु.कमक्षये जाते वेदनीयनाम- गोत्राभिधानशेपतीनां निर्माता भवति । शनिभयनयेन स्वस्वरूप सहजमहिम्नि तीनोऽपि न्यवहारण स भगगन क्षणार्धन लोकामं प्रामातीति पदकापफमयुकाना भक्निो टक्षणात् पृपा सिमानो लक्षण यस्मादूर्व- गास्ते सदा शिवाः। बन्धपदानुलमहिमा देवविद्याधराणा प्रत्यक्षोऽप स्तवनविषयो नेव सिदः प्रसिद्धः। लोकस्या न्यबहरणतः संस्थितो देवदेवः स्वात्मन्युभरविचटतया निश्चयेनेबमास्ते । पंचसंसारनिमुक्तान पंचसंसार मुनये । पचसिद्धानई वद पंचमोक्षफलमदात् ।। कारणतस्वस्वरूपाख्यानमेततः- जाइजरमरणरहियं परमं कम्मवज्जियं सुद्धं । णाणाइचउसहावं अक्खयमधिणासमच्छेयं ॥ १७६॥ नातिनरामरणरहित परमं कर्माप्टवनितं शुद्ध । ज्ञानादिचनु स्वभाव अक्षयमविनाशपच्छेचं.॥ १७९॥ निसर्गतः संघतेरभावाज्जातिजरामरणरहितं परम पारिणामिकभावेन परमस्वभावत्वात् परम विकासनिरुपाधिस्वरूपत्वात काटकवर्जितं द्रव्य- नियममार- , भाषामगहिनतान्द महनतानमहननमहन पारिवारिक निमगत ज्ञानापिनुमा मादिनिश्ननन्दियामादिनार भारुगननपायीतत्वाइस प्रस्ताप्रशस्तगतिहनुभूतपुष्पकान्दन्दा भागइपिनाशं वचछेदयोग्यमूनिमुनत्यारोपनिति । भगिनलिनममडनानमदन्दमिट निसिलदुरितगंवातदानादिरूप। भज मनसि जिनोत्यं दिव्यशामत न्य सकलानिमारबोधत भात्ये तस्मात अवापि निरुपाधिस्वरूपलक्षगपरमात्मतन्यमुक्त:--- अन्यावाहमणिदियमणीवमं पुण्णपावणिम्मुक्कं । पुणरागमणविरहियं णिचं अचलं अणालंवं ॥ १७७ । अव्यावाधमतीन्द्रियमनुपमं पुण्यपापनिर्मुकम् । पुनरागमनविरहितं नित्यमविचलमनालंबन ॥ १७७ ॥ अखिलदुरपरिवरिवरूथिनीसंभ्रमागोचरसहनज्ञानस्वर्गनिलयत्वादन्य दाधं सर्वात्मप्रदेशभरितचिदानन्दमयत्वादतीन्द्रियं त्रिषु तत्वेषु विशिष्टत्य दनौपम्य संमृतिपुरंधिकासंभोगसमवसुखदुःसाभावात पुण्यपापनिमुर पुनर गमनहेतुभूतप्रशस्ताप्रशस्तमोहरागदेषाभागत्पुनरागमनविरहितं नित्यमरगड भवमरणकारणकलेवरसंबन्धाभावान्नित्यं निजगुणपर्यायाच्यवनामाबादचा परद्रव्यावलम्बनाभावादनालम्बामति । तथाचोक्तम् श्रीसदमृतचन्द्रसूरिभिः- आ संसारात्पतिपदममी रागिणो नित्यमत्ताः । सुप्ता यस्मिन्नयपदमपदं तदिबुध्यध्वमंधा। - मालनिः। - ले संतः पदामिदमिर पर चलन्यातुः । पर गुदा स्वरसभान्तिः स्थादिभावावमति। तपाहि- भाग: च भवन्ति येषु सततं भाव: १० पंचमः । स्थायी संसतिनासारणमयं सम्यगरा गोचर, त मुक्त्वारिरलागरोपनि पुजा पुननिमान । एको भाति कटी युगे मुनिपतिः पापाटीपायक। इह हि सांसारितविकारनिकायाभाराभिर्वाण भवतीत्युन:- •णवि सं णवि मुम्सं णवि पीदा णेयीपजदे वाहा। णपि मरणं णविजणणं तस्येव य होइणियाण॥१७८॥ न च दुःख न म सौम्यं न च पीड़ा नैव विद्यते बाधा । नच मरणं न प जनन तंत्रव प भवति निर्वाण ॥१७८॥ निरूपरागरलत्रयात्मकपरमात्मनः सततान्तमुरसाकारपरमाध्यात्मस्वरूपनि रतस्य तस्य वाशुभपरिणतरभावाम धाशुभकर्म अशुभकर्माभागमा दुःखं शुभ 'परिणतेरभावाम शुभकर्म शुभकर्माभावान सनु संसारमुर पीडायोग्ययातना. शरीराभावान पीड़ा असातावदनीयकर्माभावानेव वियते बाधा पंचविधनो- फर्माभावान मरणं पचविधनोधर्महतुभूतकर्मपुद्गलस्वीकाराभावान जनन एवं रक्षणटक्षिताणविक्षेपणविनिर्मुकपरमतत्वस्य सदा निर्वाणं भवतीति । मवभवमुख दियते नैव बाथा जननमरणपीदा नास्ति यस्येह नित्यम्। •तमहमाभिनमामि स्तोमि संभावयामिस्मरमुखविमुस्सस्सन भक्सिौख्याय नित्यं । आत्माराधनया हीनः सापराध ति स्मृतः। अहमात्मानमानन्दमदिर नौमि नित्यशः। .

णवि धम्मरम्हाणे तत्थेवय होइणिव्याणं ॥१८ नियमसार- परमनिर्वाणयोग्यपरमतत्त्वस्वरूपाख्यानमततः- णवि इंदिय उवसग्गा णिव मोहो विम्हियोण णिहाय। ण य तिण्हाणेव छुहा तत्थेव हवदि णिबाणं ॥१९॥ नापि इन्द्रियाः उपप्ताः नापि मोहो विस्मयो न निद्रा । न च तृष्णा नैव क्षुधा तत्रैव भवति निर्वाणं ॥ १७९ ॥ असंटेकप्रदेशज्ञानस्वरूपत्वात् स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःोत्राभिधान- न्द्रियव्यापाराः । देवमानवतिर्यक्चेतनापसर्गाश्च न भवन्ति क्षायिकशान यथाख्यातचारित्रमयत्वान दर्शनचारित्रभेदविभिन्नमोहनीयक्तियमपि बार- प्रपंचविमुखत्वान्न विस्मयः नित्योन्मीलितशुद्धज्ञानस्वरूपत्वान्न निदा असता वेदनीयकर्मनिर्मूटनान्न क्षुधा तृपा च तत्र परमब्रह्मणि नित्यं ब्रह्म भवतीति। तथा चोक्तममृतशीतो- ज्वरजननजराणां वेदना यत्र नास्ति परिभवति न मृत्यु गतिनों गति; । तदतिविशदचित्ते लभ्यते नोऽपि तत्त्वं गुणगुरुगुरुपादाम्भोनसेशप्रसादात् ॥ तथाहि- यस्मिन ब्रह्मण्यनुपमगुणालंपते निर्विकल्पेड भानामुपैसिंविधविपमं वर्तनं चैव किचित् । नेवान्यैर्वा मविगुणगुणाः संमृतेर्मूठभूता- स्तस्मिन्नित्यं निजसुखमयं माति निर्माण। सकलर्मविनिर्मुन्शुभाशुभमुदध्यानध्येयरिकल्पविनिर्मुद्रपरमतत्व कपाख्यानमतन्:-- णयि कम्मं णोकम्मं गवि चिंता णेय अगुरुदाणि । ।

तात्पर्यवृत्तिः। १५५ CAR- नापि कर्म नोकर्म नापि चिन्ता नैवार्तरौद्रे । नापि धर्मशक्तध्याने तत्रैव च भाति निर्वाणं ॥१८॥ सदा निरंजनत्वान्न द्रव्यकर्माप्टकं त्रिकालनिरुपाधिस्वरूपत्वान्न नोकर्मपचकं च अमनस्कत्वान चिंता औदयिकादिविभावभावानामभागदातरौद्र्ध्याने न स्तः धर्मशुक्लध्यानयोग्यचरमशरीराभावात्तद्वितयमपि न भवति तत्रैव च महानद इति । निर्वाणस्थे प्रहतदुरितध्वान्तसंघे विशुद्धे कमशिष न च न च पुनानकं तच्चतुष्कं । तस्मिन्सिद्धे भवति हि परं ब्रह्माणि शानपुंजे काचिन्मुनिर्भवति वचसा मानसानां च दूरम् ॥ भगवतः सिद्धस्य स्वभावगुणस्वरूपाख्यानमेततः- विजदि केवलणाणं केवलसोक्खं च केवलं विरियं । केवलदिहि अमुचं अस्थि सप्पदेसचं ॥ १८१॥ विद्यते केवलज्ञानं केवलसारूयं च केवलं वीर्य । केवलदृष्टिरमूर्तत्वमस्तित्वं सप्रदेशत्वं ॥ १८१ ।। निरवशेषेणान्तमुसाकारस्वात्माश्रयनिक्षयपरमशुमध्यानबलेन ज्ञानावर- णापराविधकर्माविलये जाते ततो भगवतः सिद्धपरमधिनः केवलज्ञानकेव- लदर्शनकेबलवीर्य केवलसौख्यामूर्तत्वास्तित्वसम्रदेशत्वादिस्वभावगुणा भवति इति । पन्धच्छेदागवति पुननित्यशुद्ध प्रसिद्ध तस्मिानिस भवति नित केवटखनमेतत् ।

नियमसार- दृष्टिः साक्षादसिलविषया सौख्यमात्यंतिक च शक्त्यायन्यद्गुणमणिगणं शुन्द्वशुद्धश्च नित्यं । सिद्धासिद्धयोरेकत्वप्रतिपादनपरायणमेतत्:- णिव्वाणमेव सिद्धा सिद्धा णिव्वाणमिदि समुदिता । कम्पविमुक्को अप्पा गच्छइ लोयग्गपज्जंतं ॥ १८२॥ निर्वाणमव सिद्धा सिद्धा निर्वाणमिति समुद्दिष्टाः । कर्मविमुक्त आत्मा गच्छति लोकानपर्यन्तम् ॥ १८२ ॥ निर्वाणशब्दोऽव दिठो भवति । कथमिति चेत् । निर्वाणमेव सिद्धा इतिवच• नात् । सिद्वा सिद्वक्षेत्रे तिष्ठतीति व्यवहारः । निश्चयतो भगवंतः स्वस्वरूणे तिष्ठति ततो तोर्निर्वाणमेव सिद्धाः सिद्धा निर्वाणम् इत्यनेन क्रमेण निर्वाण शब्दसिद्धशब्दयोरेकत्व सफलं जातं । अपि च यः कश्चिदासन्नभन्यजीव परमगुरुप्रसादासादितपरमभावभावनया सकलकर्मकठेकपकविमुक्तः स परमात्मा भूत्वा लोकामपर्यंत गच्छतीति । अथ जिनमतमुक्ते मुक्तीवस्य भेदं चिदपि न च विनो युक्तितश्चागमाच । यदि पुनरिह भव्यः कर्मनिर्मूल्य सर्वं स भवति परमश्रीकामिनीकामरूपः॥ अब सिद्धनादुपरि जीवपुद्गलानां गमनं निपिदं:- जीवाण पुग्गलाणं गमणं जाणेहि जाय धम्मत्थी। धम्मस्थिकायभावे तत्तो परदो ण गच्छंति ॥ १८३॥ नीवाना पुद्गलानां गमनं नानीहि यावास्तिकः । धम्मानिायाभार तम्मापरतो न गच्छति ॥ १८॥ - HD तात्पर्य दृतिः। जीवानां स्वभावक्रियासिदिगमनं विभावक्रियापट्कापक्रमयुक्तत्वं पुद्ग- लाना स्वभावक्रियापरमाणुगतिः विभावक्रियामणुकादिस्कन्धगतिः अतोऽ मीषां त्रिलोकशिखरादुपरिगतिकिया नास्ति परतो गतिहेतोर्धमास्तिका- याभावात् । यथा जलाभावे मत्स्यानां गतिक्रिया नास्ति अत एव यावद्धर्मा- स्तिकायस्तिष्ठति तक्षेत्रपर्यन्तं स्वभावविभावगतिक्रियापरिणतानां जीव- पुरलाना मतिरिति। त्रिलोकशिखिरादूर्ध्व जीवपुरलयोर्दयोः । नैवास्ति गमनं नित्यं गतिहेतोरभावतः । शाखादी गृहीतस्य नियमशब्दस्य तत्फलस्य चोपसंहारोयः- णियमं णियमस्स फलं णिदि पवयणस्स भत्तीए । पुटवावरविरोधोजदि अवणीय पूरयंतु समयग्गा ॥१८॥ नियमो नियमस्य फलं निर्दिष्टं प्रवचनस्य भक्त्या । पूर्वापरविरोधो यद्यपनीय प्रत्यंतु समयज्ञाः ॥ १८४ ॥ नियमस्तावशुद्धरत्नत्रयच्याख्यानस्वरूपेण प्रतिपादितः । तत्फल परमनिर्वाणमिति प्रतिपादित न कवित्वदर्यात प्रवचनभक्त्या प्रतिपादित- मेतत् सर्वमिति यावत् । ययपि पूर्वापरदोषो विद्यते चेत्तदोषात्मकं लुप्त्वा परमकवीश्वरास्समयविदश्चोत्तमं पदं कुर्वन्विति । जयति नियमसारस्तत्फलं चोत्तमान दयसरसि जाते निते. कारणत्वात् । प्रवचनकृतभरत्या सूत्राद्भिः कृतो यः स खलु निसिलभन्यश्रेणिनिर्वाणमार्गः।

मियमशाt- ON इह दि भागम्य शिष्याण:- ईसामावेण पुणो कई जिंदति सुंदरं मागं । तेर्सि वयर्ण सोचा अमत्तिमा कुणह जिणमग्गे॥१८५॥ गीमान पुनः निन् निन्दन्ति सुन्दरं मार्ग। ने चननं श्रुला अक्ति मा कुरुघ्नं निनमानें ॥ १८ ॥ माजुद्रयः त्रिकालनिरापरणनित्यानिकिटाणनिर्विकल्ला- निनकारणपरमात्मतन्यसम्याश्रमानपरिज्ञानानुठानरूपशुधनवयानिक मिथ्यावरदियसामर्थ्यन मिथ्यादर्शनशानचरित्रपरायणः निावेन समत्सम्परिणामेन मुन्दरं मार्ग सर्वज्ञवीतरागस्य मार्ग पापक्रियानिजिट- क्षणं भेदोपचाररत्नत्रयात्मकमभेदोपचाररवत्रयात्मक केचिनिन्दन्ति तेशं स्वरूपविकलानां कुहेतु दृष्टान्तसमन्धित कुतर्कवचनं श्रुत्वा मतिं जिनेश्वर 'प्रणीतयुद्धरत्नत्रयमार्गे हे भव्य मा कुरुष्व पुनर्भक्ति कर्तब्यति । देहव्यूहमहीजरानिमयदे दुःसावली श्वापदे विश्वासंति करालकालदहने शुप्यन्महीपावने । नानादुर्णयमार्गदुर्गमतमे दृङ्मोहिना देहिनों जैन दर्शनमेकमेव शरणं जन्माटवीसंकटे । तथाहि- लोकालोकनिकेतनं वपुरदो ज्ञानं च यस्य प्रभो- स्त शंखध्वनिकं पिताखिलभुवं श्रीनेमिाथेश्वरं । स्तोतुं के भुवनत्रयेऽपि मनुजाः शताः मुरा वा पुनः जने तत्स्तवनैककारणमहं भक्तिर्जगत्युत्सुका ।। शास्त्रनामधेयकथनद्वारेण शास्त्रोपसहारोपन्यासोय:- णियमावणाणिमित्तं मए कई णियमसारणामसुदं। बुद्धा जिणोवदेसं पुव्वावरदोसणिम्मुक्कं ॥ १८६ ॥ + तात्पर्य्यदृत्तिः। १५९ Aan. । निजभावनानिमित्तं मया कृतं नियमसारनामश्रुतं । बुद्धा निनोपदेश पूर्वापरदोषनिर्मुकम् ॥ १८६ ॥ अत्राचार्याः प्रारब्धस्यान्तगमत्वात् नितरां कृतार्थतां परिमाप्य निज- भावनानिमित्तमराभवंचनार्थ नियमसाराभिधानं श्रुतं परमाध्यात्मशास्त्र- शतकुशटेन मया कृतं । कि कृत्वा पूर्व । ज्ञात्वा अवचकपरमगुरुप्रसादेन उदेति । क । निनोपदेशं वीतरागसर्वज्ञमुखारविन्दविनिर्गतपरमोपदेश पुनः किं विशिष्टं । पूर्वापरदोषनिर्मुक्त पूर्वापरदोषहेतुभूतसकलमोहराग देपभावादाप्तमुसविनिर्गत्वानिदोपमिति । किच अस्य खलु निखिलागमार्थसार्थयतिपादनसमर्थस्य नियमशब्द- संसूचितविशुद्धमोक्षमार्गस्य अचितपश्चास्तिकायपरिसनाथस्य सचित- पंचाचारप्रपञ्चस्य पद्व्यविचित्रस्य सप्ततत्त्वनवपदार्थगर्भीकृतस्य पंचभावप्रपंचप्रतिपादनपरायणस्य निभयप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानप्रायश्चित्त- परमालोचना- मियमध्युत्सर्गप्रतिसकलपरमार्थक्रियाकोडाटंबरसमृद्धस्य उपयोगत्रयविशालस्य परमेश्वरस्य शाखाय विविध किल तात्पर्य सूत्रतात्पर्य शास्त्रतात्पर्य चेति । सूत्रतात्पर्य पयोपन्यासेन पतिसूत्रमेव प्रतिपादित शास- तात्पर्य विदमुपदर्शनेन भागवतं शास्त्रमिदं निर्वाणसुंदरीसमुद्भवपरमवी- तरागात्मकनिर्व्याजाधनिरन्तरानगपरमानन्दमदं निरतिशयनित्यशुद्धनिर- जननिजकारणपरमात्मभावनाकारणं समस्तनयनिचयाचित पंचमगतिहेतु. भूतं पंचेन्द्रियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रहेण निर्मितमिदं ये खलु निश्चयव्यव- हारनययोरविरोधेन जानन्ति ते खलु महातः समस्ताध्यात्मशास्त्रदयवेदिनः परमानंदवीतरागसुसाभिटापिणापरित्यकबाह्याभ्यन्तश्चतुर्विशतिविमहमपंचाः त्रिकाटनिपाधिस्वरूपनिरतनिजकारणपरमात्मस्वरूपश्रदानपरिज्ञानाचरणा- त्मकभेदोपचारकल्पनानिरपेक्षस्वस्थरत्नत्रयपरायणाः सन्तः उस्य शाश्वतमुखस्य भोकारो भवन्तीति।

नियमसार- सुकविननपयोनानन्दिमिण शस्त ललितपदनिकायनिर्मितं शानमेतत् । निजमनसि विधत्ते यो विशुद्धामकांक्षी स भवति परमश्रीकामिनीझामरूपः ॥ १॥ प्रमप्रभाभिधाधनीसिन्धुनायसमुद्भवाः । उपन्यासोर्मिमालेय स्थेयाच्चेतसि सा सतां ॥२॥ आस्मिन् लक्षणशास्त्रस्य विरुद्ध पदमस्ति चेत् । लुप्त्वा तत्कवयो भद्राः कुर्वन्तु पदमुत्तमं ॥३॥ यावत्सदागतिपथे रुचिरे विरजे तारागणैः परिवृतं सकलेन्दुवि । तात्पर्यवृत्तिरपइस्तितहेयवृत्तिः स्थेयात्सतां विपुलचेतसि तावदेव ॥ ४ ॥ इतिसुकविज़नपयोजमित्र गश्चेन्द्रियप्रसरवर्जितगात्रमात्रपरिग्रह-श्रीपरम मलधारिदेवविरचितायां नियमसारव्याख्यायां तात्पर्यवृत्ती शुद्धोपयोगाधिकारो द्वादशः श्रुतस्कन्धः ॥ १२॥ RARARRERA समाप्ता घेर्य तात्पर्यवृत्तिः। WERSERENSEvee .

98 भीपरमात्मने नमः। श्रीकुंदकुंदाचार्यविरचित नियमसार। वालबोधिनी भापाटीका सहित । मंगलाचरण भापाकारकी ओरसे । वोहा। समयसार सतगुण मणमि, दव्य भाव हरपाय। गौतम ' गणधर गाय गुण, जिनयाणी उर ध्याय ॥ ६ ॥ * कुंवकुंद' मुनि धरण नमि, अनुभवके दातार । सानभानु-सम्यककिरण, मिथ्यातमहरतार ॥२॥ नियमसार गुप्परलको, प्रगटायो सुखदाय। प्राकृतभापामय मधुर, निजरसअनुभयदाय ॥३॥ 'पप्रमभ मलपारि'जे, मुनि निर्भन्यस्वरूप । घर संस्कृत टीका रची, पद अरुप अनूप॥४॥ ताकी छाया लयकर, तु बुद्धि अनुसार । मारुतकी भाषा कर, बालवोध हितकार॥५॥ निन अनुभव कारणे, पर अनुभवके कान। पाद दाद जग छोएकर, भनि मन पप जिनराज २ भारियांकी परिपाटी दाग प्रगट किया गया है, ऐसे परमारमा कहनेको मैं माबुद्धि में समर्थ हो सकता हूँ। तथापि पुट चिनो में उत्पनाह उसीने मेरे मन बार नियमसार- संस्कृत टीकाकारके मंगलाचरणका भावार्थ हे परमात्मन्, आपको होते मैं किस प्रकारसे मेरे ही ऐसे अभी संसारी जीवोंके सदृश जो मोहमें मुग्ध और कामदेवके आधीन है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश और बुद्ध देवोंको भज सकता है, इसलिये में मि न्द्रसूर्यको नमस्कार करता । कैसे हैं प्रभु-जिन्होंने संसारको और लिया है, जो मोक्षमार्गके नेता हैं, वार्णाके स्वामी है तथा आनना । तथा मैं जिनवाणीको नमस्कार करता हूं, जो वाणी श्रीमुनाइश इन्द्र ऐसे श्रीजिनेन्द्र के मुखकमलसे प्रगट हुई है, तथा निभय और व्यवहार नयके द्वारा जिसमें वाच्य जो पदार्थ तिनके पूर्ण HE कथन किया गया है। तथा मैं सिद्धान्त समुद्रक पारगामी परित्र मिशन रूपी श्रेय लक्ष्मीके पति श्रीसिद्धसेनको, तर्करूपी कमलो र करनेको सूर्य समान श्रीमहाकलकदेवको, शब ममुद्री वार्षिक लिये चन्द्रमाके समान श्रीपूज्यपादस्वामीको, तथा वियाके पास महानतियों में इन्द्र के समान ऐसे श्रीपीरननि आचार्यको नमामार काम हूं। मैं भव्य जीवोंको मोक्षमार्गमें उगाने लिये तथा अपनी माय शुद्धि के लिये इस नियमसार प्रन्यकी 'तात्पर्यावृत्ति' नामकी युति का यह परमागम गुण पारी श्रीगणवरदेवास रचा गया है सोही । । सारी प्रणाली म भूपकमान पचानकाय, पर दस्य, पान तल, ANT तथा प्रत्यासानामित किया वर्णन wir दिनार नमूल पा लिाग ।

जीवारिकार ३ Anima- मूल ग्रन्धक का मंगलाचरण । णमिऊण जिणं वीरं अगंतवरणाणदंसणसहावं । वोच्छामि णियमसारं केवनिमुदकेवलीमणिदं ॥१॥ शास्त्रकी आदिमें फर्चाने असाधारण मंगल किया है। मंगल उसको ऋहते हैं जो पापको गलावे और सुसकी देवे । असाधारण मगलरे यह प्रयोजन है कि यह मंगल साधारण नहीं है, किन्तु विशेष है। इम मग- लमें ही यह शक्ति है जो जीगत्माके अनादि कर्ममल पापको धोकर इस जीवको निज स्वरूपानंदी मुख प्राप्त करा सकता है, इसीलिये यह असाधारण मंगल है। सामान्य अर्थ-मैं कुंदकुंदाचार्य अनंत केवल ज्ञान दर्शन स्वभावके धारी ऐसे श्रीवीर जिनेन्द्रको नमस्कार करके केवली और श्रुतकेलियोस कहे हुए ऐसे नियमसार परमागनको कहूंग्य-यह प्रतिज्ञा करता है। विशेष अर्थ-अनेक मंसारके जन्मरूपी बनमें भ्रमण कगने के कारण ऐसे जो समस्त राग, द्वेष, माद आदिक विभाव भाव तिनको जो जीतता है उसका नाम 'मिन ' है। वरियते' अर्थात कर्मरूपी शत्रुओंको जी परास्त करता है वह 'वीर' है । चौरीसवें तीर्थकरके पांच नाम प्रासद है- श्रीवर्द्धमान, सन्मतिनाथ, अतिवीर, महावीर और वीर । ऐसे श्रीवर्दमान जिन ही परमेश्वर महा देवाधिदेव है । जो अपने निर्मल कंवलज्ञान और केवल दर्शनस पूर्ण होकर तीन लोकके घर अचर पदार्थोकी समस्त पर्यायाँके जानने की समर्थ है। यही आचार्यने यह प्रगद किया है कि जो सर्वदली सर्वज्ञ और वीतराग है वही आगमका स्वामी सत्यता आत हो सकता है । उसीको ही आगमकी प्याल्यारूप कार्य प्रारम्भमें नमस्कार करना युक्त है। योंकिजो अल्पज्ञ और किसी प्रकारके भी राग और देपको परनेवाला होगा वह कदापि सत्यार्पकल्याणकारी उपदेश नहीं दे -- ४ नियमसार- . सकता । परम हितोपदेशीपना उस परमोदारिक शरीरके धारी अरहन- देवमें ही हो सकता है, जो जीवन्मुक्त अवस्थामें भाव मुक्तिको प्राप्त कर सर्वज्ञ और वीतराग गुणसे विभूपित है, जिसके क्षुधा, वृषा, जरा, जन्म, मरण, भय, विस्मय, राग, द्वेष, मोह, स्वेद, खेद, मद, चिन्ता, रति, अरति, और निद्रा ऐसे अठारह दोष नहीं है। ऐसे आतके नमस्कार करनेसे आचार्य्यने यह दर्शाया है कि उपासकोंको योग्य है कि वे अरहंतको ही आप्त, देव, पूज्य, माननीय, सकल परमात्मा, परम सुखी और दर्शन बंदन योग्य समझें। नियमसारसे प्रयोजन यह है कि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप जो नियम उसका सार जो शुद्ध रत्नत्रय- स्वरूप आत्मा तिसका व्याख्यान करूंगा। यह आचार्यको प्रतिज्ञा है। कैसा है नियमसार जिसको सकल प्रत्यक्ष केवलज्ञानके धारी और समस्त द्वादशांगरूप द्रव्यश्रुतके पारगामी ऐसे श्रुतकेवली कह चुो । इस वाक्यके कहनसे आचार्य्यने यह दर्शाया है कि मैं जिस पर मागमको कहूँगा, वह अपनी मनोक्तिसे नहीं कहूंगा, किन्तु जैसा मेरे गुरुने प्ररूपण किया है उसी अनुसार कहंगा । यह नियमसार परमागन समस्त भव्यजीवों के समूहीका हितकारी है। इस तरह श्रीकुंकुंदाचार्य- देवने अपने इष्ट देवताकी स्तुति करके प्रतिज्ञा की है । टीगर कहते हैं कि इस जगमें श्रीमहावीरस्वामी जयवन्त होहु । केसे हैं स्मनी जिन्होंने अपने शुद भादोंके दाग कामदेवका नाश किया है, जो तीन लोकके मनुष्योंमें पूज्य है, जिनके पास पूर्ण ज्ञानका एक गन्य है। जिनको देवों के समान नमन करते है, जिन्होंने ममार वृक्ष वीजा देषको नष्ट कर दिया है, जो केवलज्ञान दर्शन आदि लक्ष्मीनियम है, तथा जो समवशरणमें विरानमान है। आगे मोक्षमार्ग और उमा वर्णन करते है. -- मग्गी मग्गफलंति य दुविहं जिणसासणे समसाई मगो मोम्मउवायो नम्म फलं होइ णियाण ॥२॥ , जीवाधिकार। । सामान्य अर्थ-जिनशासनम मार्ग और मार्गका फल ऐसे दो भेद हैं, जिनमें मोक्ष प्राप्तिका उपाय सो तो मार्ग है, और निर्वाणकी प्राप्ति उस मार्गके सेवनका फल है। यिशंप अर्थ-यहां पर मार्गस प्रयोजन शुद्ध रलायसे है, जिसका फल मोक्षरूपी के स्थूल भालपर टीलासहित अलंगाररूप तिलकपने- की प्राप्ति है, अर्थात् मोक्षका घरना है । जिनशामनसे प्रयोजन उम उपदेशसे है जिसको परम वीतराग सर्वज्ञ भगानने तथा चार ज्ञानके पारी मणधरादि पूर्वाचाप्योंने कहा है । सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रकी एकता मोक्षमार्ग है । केसा है मोक्षमार्ग; जो परम निरपेक्ष निश्चयनय द्वारा निज शुध परमात्म-तत्वका यथार्थ श्रद्धान शान और अनुभव स्वरूप शुद्ध रत्नत्रयमय है । इस मार्ग मनन और सेवनमे जो निर्वाण फल प्राप्त होता है वह अपने आत्मस्वरूपकी सम्पूर्णतया प्राप्तिरूप है भावार्थ-निर्वाणको आत्माकी नास्ति तथा अन्य अवस्था बहने- पालोंके निगकरणके अर्थ यह विवेचन है कि निर्वाण प्राप्त जानस म आत्माको अपने संघ स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है। जब का पद दर हो जाते हैं, तब वह आत्मा स्वयं ही परमात्मा हो जाता है, और अपनी सनाम कायम रहकरके अपने अतीन्द्रिय परम स्वादमय स्वभावको अनंतकाल भीगता रहता है । यहाँ टीकाकार कहते है कि यह साम- जन कहीं तो श्रीकी रतिसे उत्पन्न जो मुस उसकी तरफ चला जाता है, कहीं द्रश्यकी रक्षा में अपनी युनिको कर लेता है, परन्तु गो धुदि. मान पुरुष है सो जिनेन्द्र के धर्मका लाभ कर अपने आत्मस्यरूपमें न रोता है । ऐसा ही शानी इस मुक्ति अवस्थाको प्राप्त होता है। आगे नियम साथ सारका संबध क्यों किया है, सा प्रयोजन कहते णिपमेण पकजं तष्णियमै णाणसणपरिस। विपरीयपरिहर भणिद खलु मारमिदिपरणे ॥३ ५ निपमसार- शुद्ध चेतना . सामान्य अर्थ-नियम करके जो करने योग्य हो सो नियम है। सम्यग्दर्शनशानचारित्र ही नियम है, इससे विन्द कोई नियम नहर है। इसी लिये निश्चय करके सार ऐमा वचन कहा गया है । विशेष अर्थ-दम माया नियम शब्दके मारपना दिल्याने लिये स्वभाव रत्नत्रया स्वरूप कहा है। जो सहन सामाविक अपने उकुट पारिणामिक भावमें ठहरा है, जो स्वमावसे अनंत-दर्शन-ज्ञान- मुख-वीर्यरूप ऐसे अनंत चतुष्टयस्वरूप है, तथा जो परिणाम है, सो नियम है ।नियन अर्थात् निश्चय करके जो प्रयोजन भूत करने योग्य कार्य है वह दर्शनज्ञानचरित्र है । इसका निश्चय स्वरूप ऐसा है कि भगवान परमात्माक अतीन्द्रिय मुखको सचि काने- वाले जीवमें शुद्ध अंतरंग आत्मीक तत्त्वके आनन्दके उपजनेका स्थान अपने शुद्ध जीवास्तिकायका जो परम श्रद्धान-दृढ़ प्रतीति, सम्पद निश्चय, सो ही दर्शन है । परद्रव्यका आलम्बन न करके अंतरंगने अपना उपयोग रखकरके योग शक्तिकी निकटतासे अपने ही अनेक परम तत्त्वका ऐसा ज्ञान कि यही उपादेय-ग्रहण करने योग्य है सोही ज्ञान है । तथा निश्चय दर्शनज्ञानमय कारण परमात्मा म्वरूपमें अधि- चल अर्थात् दृढ़ताकै साथमें लवलीन या तन्मय हो जाना सो ही चारित्र है । ऐसे निजात्मीक तत्वकी सम्यक् रुचि उसीका यथार्थ ज्ञान तथा उसीमें एक रूपसे ठहर जाना सो ही नियम है। यही नियन निवांग- पदका कारण है। कारण सदृश ही कार्य होता है । स्वरूपर्ने स्थिरता करनेका अभ्यास ही वास्तबमें अनंतकाल तक स्वरूपमें स्थिर रह जानेका उपाय है। यही सार उत्तम उत्कृष्ट करने योग्य उपाय है । इसके सिवाय सर्व असार है, विपरीत है, हेय (त्यागने योग्य है । इसने उल्टा स्वरूप असार है, इस बात के बताने के लिये सार पदको नियमके साथ रखनेका प्रयोजन है। इस प्रकार नियममार शब्दकी सार्थकता वर्णन की। यहां टीकाकार कहते हैं कि मैं विपरीत स्वरूपसे रहित - ।

अनन्स गझत ननय मार के मुनिरूपी सीसे उत्पन्न जो मान्दिप भानन्ध-बिनाम लिमको प्राप्त करता हूँ । आग ने किया भेदकरके रक्षण करना युक्त णिपर्म मोरा उपापा, तस्सफलं हपति परमणियाणं। एदेमि तिण्ड पिय, पतंय परूषणा होइ ।। ४ ।। पामान्य अर्थ-मांक्षा जो उपाय है सो नियम है और इस नियम धानेका फल परम निर्माण अर्थात् मोक्ष है। नियम सम्पग्दर्शन मान चापि है, इस लिये इन तीनोंका भी प्रगट अलग अटग वर्णन आग पत्रों में किया जायग्य। . विशेपार्ध-अनादितथा मादि काटसे संसारी आरमा नगदए समान मोक हट जानेमे जो महा निरुपम, अविनाशी, अतीन्द्रिय आनन्दकी प्राप्ति होती है वही सदा आनन्दस्वरूप परम निर्वाण अर्थात् मोक्ष । नपा आत्माकी अभेद लत्रयरूप जो परिणति है सो हस महानन्दंक प्राप्तिका उपाय है । परन्तु इस अभेद रत्नत्रयका स्वरूप भेद- रत्लबयके जाने बिना अपने अनुभवमें नहीं आसकता, इसी लिये आचार्य दर्शन शान चरित्रको भिन्न भिन्न प्रतिपादन करने की प्रतिशा करते है। आगे व्यवहारसम्यादर्शनको कहते हैं:- अत्तागमतवाणं, सद्दहणादी हवेह सम्मत्तं । ववगयअसेसदोसो, सयलगुणप्पा हवे अत्तो॥५॥ सामान्य अर्थ-आत अर्थात् आगमके ईश देव, आगम अर्थात् जिन- वाणी, तथा आगममें वर्णन किये हुए तत्ल इन तीनोंके श्रद्धान करनेमे व्यवहार सम्यग्दर्शन होता है। तथा आत वही है सो सम्पूर्ण दोपसि रहित और सम्पूर्ण गुणमय है - ८ नियमसारamavurrr. -~- यहां टीकाकार कहते हैं कि मुनियोंके लिये शुद्ध प्लायवर अपने ही आत्माका होना मोक्षका उपाय है, अन्य न तो कोई दर्शन। न ज्ञान है और न चारित्र है । ऐसा ही संसारसे मुक्त श्रीअरहंत ममा नने कहा है । ऐसा जानकर भव्यजीव फिर कभी किसी माताके उसमें नहीं जाता है, अर्थात् गर्म जन्मके संकटोंसे छूट जाता है। विशेष अर्थ-आत अर्थात् पूनने योग्य देव अथवा आगमकाका सम्पूर्ण मोह राग देषादिक दोषोंसे निर्मक है और सर्वज्ञ वीतराग झारे आमाक गुणोंसे विभूषित है । ऐसा गुणवान वक्ता ही परके हितरूप उर. देशको यथार्थ दे सकता सकता है। इसके अतिरिक्त जो राग और देवता स्नेह, भय, काम, निद्रा, जगत्कर्तृत्व, जगतके जीवोंको दंड देनेका इत्यादि दोषोंमे लित है उनके वचन यथार्थ बीतगगरूप नहीं हो मकते। वीतरागीहाक वचन वीतरागरूप हो सकते है। इस लिये सत्य आप्त श्री अरहंत भगवान हैं; जिनकी शांत प्रतिमाको देस कर तथा पूजन कर परम वीतरागरूप निमिनका सम्बन्ध मिलनेमे भव्यजीव अपने भागको उज्ज्वल विशुद्ध और वैराग्यमय करते है। ऐसे सत्यार्थ आप्त मुस मलसे प्रगट होनेवाली जो हितोपदेगमय दिव्य पनि, सो ही समान पदार्थोक विस्तारके समर्थनमें प्राण सना आगम है। अतरंग तार परमात्मा तथा वाय तत्व परमात्मस्वरूपसे भिन्न पदार्थ, मे दो १६ है; भया नीर, भनीव, आम्रव, बंध, सबर, निग और मोक्ष ये मार नन्त हैं। इन तापों प्रदर्शन करानेगले आगम है। भागमा नसका जानना यात कार्यकारी है। इसी लिये सत्यार्थ भान और तन्नों यथा प्रदान करनी सम्पादन होता है। ममि पर यही मईय है कि निगम मशको मले प्रकार अपना हित माने। नाने अपने भात निक्षय दो नायमा त सहन हो मात्र मरन निधय जम जायमा । मीयिनि मापने * सारिकार नारायण का FB उपाशा News AIR मिना भगवनी नाम कम eft state यह संकार समदर जो रूपी माह है इसमें पाया जाता है। in भात भारित होता है। मरिर १८ वोपार नाम- प्रदताहभीररांसो, रागी माहोर्षिता जरा रुजा मिप्य। पदं पेद मदी , पिडिपणिहा जणुप्पेगो ॥६॥ सामान्य अपं-उपर गाथा वर्णन किया हुमा आत १८ दोषोंस राहत होता है. उस आमषा, पा, भय, मोर, ग, मोह, रिता, भरा, गंग, मृत्य. पसीना, मेद, मद, रति.आचार्य, निदा, जन्म आई. टना से १८मारोप नही होते हैं। विशेष अध-असाता बेनी रे नीव तथा मन उइयम विममें शाना सो क्षुधा अर्थात भूसकी पीना है । केरली आहत मोहनी कम अभाव होनेसे बनी धर्म सुधा उपनाने का समय नहीं है। देवनी धर्म मोहकर्मी पति रात तथा अरतिके साधी परदप्यसम्बन्ध- अनित मुख तथा तुख येदन करानेको समर्थ है। मोहके ना जब बलरानी प्रभु अपने आनन्दमय स्वरूप में राष्टीन हो गये और अतीन्द्रिय अनंत मुसका स्वाद लेने लग गये तब उस अनुभववादके उपयोगको हटाकर पानी वेदना कराना और फिर क्षुधाका तुम मिटकर साताका होना यह पात संभव नहीं है। अंतराप नाशसे अनन बल के धनीको अधासम्बधी निर्मलता नहीं पैदा हो सकती है। इसी कारण साधारण मनुष्यों के समान आहार अर्थात् पार प्रकारक भोजनमें से किसीका भी महण देवटी आपके नहीं है। उनकी देह परमादारिफ हो जाती है, जिसकी स्थिति खुद नोकर्मवर्गणाओंके । घर, जमीन, चाँदी, सुपर्ण आदिसे किसी प्रकारकी मर्ज नही। तथा शुन, मरा अपशात अर्धान अशुभ । रान, ", नियमसार- ग्रहणसे ही हो जाती है। अनन्त चतुष्टय के स्वार्माको TET कहना उनके अनंत चतुष्टयमें बाधाका देना है । इसलिये सभी स्वामृत भोजन ही है, जो उनकी अनादि कालकी गंभीर सभाको ER समय मेट रहा है। असाता येदनी कमी तीव, तीनतर, मंद और मन उदयके वशसे पीडामा पैदा होना सो वषा अर्थात प्यास है, सो भी भो सम्भर नहीं है। आत्मीक रसके पीनेवालेको शणिक प्यास में ने वाले जलकी इच्छा कैसे हो सकती है ? इस लोक, परलोक, मक अगुप्ति, मरण, वेदना, आकस्मिक ऐसे सात प्रकार भयका नाम है, सो प्रभु शरीर, भोग, इन्द्रियजनित मुरस तथा धन, धान्य, र क्योंकि प्रभुने चारित्रमोहनी और दर्शनमोहनी हर बाला है, इसमे श्रीणिनन्द सा भयो रहित भत्यन्न नि हैं। कांध पाय रायसे तीन परिणाम का होना सो रोष अर्थात #t है। यह भी माशील शांत प्रमुझे नहीं हो सम्ता । nिyat को मागी सना ETी नाश अपनी पूर्व माया अनि सा Altra गुणस्थान दिया है। गगको प्रकार दोनोमन गाय, गुमना की प्यास मा मारिशुभ कायi it नयोग मोपशान राम और भी, गर्म, पार, भासन मोटा या भूनने का पांग्णाम मयां infi frini fani ल का मान-11 मानना मो. tantanaना है। Month मा ?y Niti Ir Hit it, नि, Hit in its काम HAI THAH मामा tiriti जीवाधिकार।. -w-as- 1 । ऋष्यानरूप है। अशुभ विचार करना सो अशुभ चिन्ता है, यह पायान और रोद्रध्यानरूप है । सो प्रभुके सरूपनिश्चलताके होने के इस चिन्तामा प्रवेश नहीं है । यपपि शुलायान कहा जाता है, परन्तु रह करन मात्र उपचारसे है। श्रीरीतरागी अनंत मुसीके चिन्ता होनेसे उसमें विक्षेप पड सकता है । सो प्रभुके चिंता नहीं है, इसी लिये मुखमें विन नहीं है । तिर्यंच और मनुष्योंके औदारिक शरीरोंका आयुधर्मके गरनेके निमित्तसे जर्जरा हो जाना अर्थात बूढ़ा हो जाना सो जरा है। प्रनतबलके धारी कोटिसूर्यसे अधिक प्रभाधारीके शरीरमें जराका स्वममें की प्रवेश नहीं हो सकता । प्रभुके नस केश ही रदते नहीं है । वायु, विच कफकी विषमतासे पैदा हुई शरीरमें पीड़ा उसका नाम रोग है। सो परमादशारिक महामुन्दर निश्चल शात ध्यानाकार शरीरमें किसी तरह भी नहीं उत्पन्न हो सकता। आई और अंतसाहित, मूर्तीक. इन्दि- पोकरके चिक्ति, आमाक जातिसे विलक्षण विजातीय नर, नारफ. तिर्यंच, देवगतिसम्बन्धी विभाव पेजनपयाय अर्थात् औदारिक और प्रक्रिया शरीरका ही नाश अर्थात आत्माके सूक्ष्म कार्माण शरीरसे अलग हो जाना सो मरण है। सो प्रभु के परमोशरिक देहका छूटना कार्माण देहके साथ साथ होता है, इससे उनके संसारी जीकि समान मरण नहीं है। संसारि- योकी पायका घटना एक नवीन विभाव व्यंजनपर्यायके जन्म लेने के लिये होता है । मरण जन्म करके सहित है। तथा स्वाधीन आत्माका अब किसी भी देहमें उपजना नहीं है, इसी कारण प्रभुझे मरण अथा मरण- सम्बन्धी वेदना व्यापती नहीं। शुभ कर्मके उदयसे शरीर परिश्रम के होनेसे दुर्गंधरूप जलदिनुओंका प्रगट होना सो स्वेद अर्थात् पसीना है। सो स्वरूपानन्दी परम शुद्ध शरीरधारकि सम्भव नहीं है। जो वस्तु अपनेको अप्रिय है उसके लाभमें जो रज करना सो सेव है, सो परिमा तथा मूरहित स्वरूपानन्दी स्वामीके प्रकाश भी सम्भव नहीं है। सहज कविताकी धनु, सम्पूर्ण मनुष्यों को सुननेसे आनन्द ।

- साधारण मादेव न साधारण सम्यक्त्व है, इसी लिये प्रभु जन्म अथव अलोकी भूत, वर्तमान, और भविष्य सर्व द्रव्योंकी सर्व अवस्याओंको कर दिया है। न प्रभुके देवआयुके बंधके कारण सराग संयम, असंयर अकामनिर्जरा, बालतप आदिके भाव है, न जिनेन्द्रक नी स्थिति है, जहां ही देवायुका बंध होता है, न स्वााके मोह कर्म १२ नियमतार- हो मी जननी दना, मनोज शरीर, उनम कुल, अनुड बल, अनि पश्चर्य आणिक होने में आत्मा मा अहकार होना मी मर है। ऐसा मा भागमगारामारी, शरीरादिपरद्रव्यारिग्रहत्यागी तथा निय भात्मा उत्कृष्ट माश्यगुणआशा मी भी प्रकार से नहीं हो सम्ता । मनसे प्यारी वस्तुओंमें गार प्रीतिमा होना मो रात है । नि नारामं रति करनेगलं, परम वीतरागी, संकल्पविकसन्यागारमा मन अभाको रसनेगले प्रभु अपनी निन अनुभूतिसे तो सने । परन्तु उसके सिवाय अन्य किसी भी परदन्य, परमुग व परपर्याय प्रीति नहीं है । परम समरसी भावनासे दूरवती पुश्यों को कभी किन अपूर्ण वस्तुको निमको पहले नही देखा है देखनसे विस्मय अद अचम्भेका हो जाना सो विस्मय अर्थात आश्चर्य है। तीन लोक तथा अपने केवल दर्शन और ज्ञानसे एकही कालमें देखने जाननेवाले के ऐसा कोई पदार्थ व उसकी कोई ऐसी पर्याय ही नहीं है जिसको कि अपूर्व कहा जाय । जब प्रभुके लिये कोई अपूर्व वस्तु ही नहीं है तब प्रमुडे विस्मय दोष नहीं हो सकता । केवल शुभ कमाके वशसे देवगतिमें, केवड़ अशुभ कमोंके निमित्तसे नरकगतिमें, मायाचार करके तिर्यचगतिमें, शुभ अशुभ मिश्रकर्मके वशसे मनुष्यगतिमें जाकर जीवका शरीरको प्र करना सो जन्म है । प्रभुने चागेंगतिमें जाने के कारणरूप भावोंका ही ना । कारण बहु आरम्भ और बहुपरिग्रह स अत्यन्ताभावसे नरकायुबधके म्बन्धी भाव हैं, न वीतरागीके तिर्यंचायु बंधका कारण माया है और अटल सुस भोक्ताके अल्प आरम्भ, अल्प परिग्रहके भाव हैं और जीवाधिकार AN । अवतारसम्बन्धी क्लेशसे मुक्त है । दर्शनावरणीय कर्मके उदयसे ज्ञान- ज्योतिका अचत हो जाना ही निद्रा है। श्रीअहंत परमेष्ठीने पहले ही दर्शनावरणीय कर्मका नाश कर डाला है, इस लिये निरन्तर निन स्वरूपावलोकनमें जागृत हैं, एक समय भी अचेतताको भजते नहीं। इष्ट चेतन तथा अचंतन अथवा मिश्र पदार्थोंसे वियोग प्राप्त करनेपर चित्तौ घबड़ाहटके भावका होना सो उद्वेग अर्थात आकुलता है, सो प्रभुने समस्त पदार्थोमें समरसी भावका आलम्बन किया है, इससे यह आकुलता संभव नहीं है । इत्यादि १८ महादोष हैं, जिन दोषों करके समस्त तीन लोक व्याप्त हो रहा है, अर्थात् तीन लोकके सर्व ही जीव इन दोपोंसे ग्रसित हैं । इन्द्र, धरणेन्द्र, नवग्रह, भवनवासी, व्यन्तर यक्ष, यक्षिणी, चांडका, अम्बिका, कालिका, चक्रवर्ती, महलेश्वर, महाराजा, गना, सेठ, धनी, पहित, मूर्ख, दरिद्री, रोगी, कामी, सिंह, व्याघ्र हार्थी, मोर, भूपक तथा समस्त नारकी इत्यादि समस्त संसारी जीव १८ दोपोंसे पीटित हैं । इन महादापसे सर्वथा रहित श्रीधीतगग सर्वज्ञदेव ही है; इसी लिये वही सच्चे आप्त, देव, पूजनीय माननीय और भजने योग्य हैं। ऐसा ही आप्तका शरण हमको मोक्षमार्गका देनेवाला है। जैसा एक आचार्य्यने कहा है-“धर्म वही है जहा दया है, नप वही है जहां विपर्योका निग्रह है, तथा देव वही है जो १८ दांप करके रहित है। इस विषय में शका नहीं करनी।एमा ही श्रीविधानदि स्वामीन भी कहा है कि " अभीष्ट फल जो मुनि तिसकी सिद्धिका उपाय आत्मज्ञान है। आत्मबोध मुशाम्रसे होता है और मुशाम्रकी उत्पनि आप्तर होती है, इसी कारण बुद्धिमानोंके दाग वही पूजने योग्य होता है। क्योंकि मनन पुरुष अपने ऊपर किये हुए किसी के उपकारको भूलते नहीं है।" अभि- जीवा -पान करने ..... in the ............ १-निरन्तर - . . . . .

अर्थात् तीन काटमें सम्पूर्ण आवरलं करके रहित, नित्य, आनन्दमय,एकस्वरूप, निजकारण परमात्माकी भावना भगवान् परमेश्वरसे विपरीत गुणके धारी सर्व ही देवाभास जो देवाने 'चार्य दूसरे ग्रन्थकी एक गाथामें कहते हैं:-"जिस देवका नेज अन्न निधमगार- मग काह। मे है मामी जी मी इवनिकरित्य है, अनार सम्परताना पाया गया जिन्होंने नामनियादा न होगनिक बनाव में दुष्ट अभी सही निन्होंने शिवम किया है. मिन माणको नागयज बलमा नमार करते हैं, जो मदन कमी प्रति काने लिये मर्प ममान है, तथा जो अन्न न म्यान है॥३॥ आग तयार परम सम स्वरुप और भी कहते हैं:- हिस्संसदोसरहिआ, केयलणाणाइपरमविमवजुदो । सो परमप्पा उच्चइ, तबियरीओ ण परमप्पा ॥ ७ ॥ सामान्य अर्थ-जो सम्पूर्ण दोषोंमे रहित है और जो कर शान आदि परम ऐश्वयंसे संयुक्त है वही परमात्मा कहा जाता है। इससे जो विपरीत अर्थात् विन्द हे वह परमात्मा नहीं है। मिशेपार्थ:-आमाके गुणको घात करनेवाले ज्ञानारणी दर्शन वरणी अंतराय मोहनी एसे चार भातिया कम हैं। इनका सर्वथा नार कर देनेसे वह परमात्मा सर्वदापरहित है, अथवा पूर्वगाथापित १८ महादोपोंके निर्मूलन कर देनसे वह परमात्मा निर्दोष है । सम्पूर्ण प्रकारसे निर्मल ऐसे केवल ज्ञान, केवल दर्शन, परम वीतरागता परमानन्द आदि अनेक अतरंग विभव और अष्टपातिहायर्यादि बहिरंग विभूतिसे वह ‘परमात्मा आतिशयकरके सुशोभित है । तथा जो निर्दोष और विभवयुत उत्पन्न हुआ ऐसा कार्य्यपरमात्मा वही भगवान् अर्हत परमेश्वर है । अभिमानसे दग्ध है; परन्तु देव नहीं वे सब ही संसारी है । श्रीकुंकुंदा .

जीवाधिकार। दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख, ईश्वरपना तथा तीन लोकमें प्रधानपना है ऐसी माहिमाका धारी ही अरहंत होता है।" श्रीअमृतचंद्रमूरि कहते "जो अपनी कांतिसे दशों दिशाओंको उजला करते हैं, जो अपने तेजसे बड़े बड़े तेजधारियोंके तेजको रोकते हैं, जो अपने रूपसे मनु- प्योंके मनको हरते है, जिनकी दिव्यध्वनिसे कानोंमें मानो साक्षात अमृत वर्षता है ऐसा मुख होता है, वे ही १००८ लक्षणके धार्ग तीर्थ- कर भगवान बन्दना करने योग्य हैं । भावार्थ यह कि भी अरहत परमात्माको अपना परोपकारी समझके उनको ही भात- मानके पूजना बन्दना योग्य है ।" यहां टीकाकार कहते है कि निस अरहंतके ज्ञानरूपी कमटमें भ्रमरके समान यह लोक और अलोक नित्य स्पष्टपने प्रतिभासमान है ऐसे श्रीनेमिनाथ भगवानको मैं निश्चय करके यजन करता हूँ। उसी प्रभुके प्रसादसे में तीन तरंगवाल ससार समुद्रको अपनी दोनों भुजाओंसे तर सकूँगा । आगे परमागमका स्वरूप कहते हैं.. तस्स मुहग्गहवयणं, पुव्वावरदोसविरहियं मुद्धं । आगममिदि परिकहियं, तेण दुकहिया हवंति तथा।। सामान्य अर्थ:- ऊपर गाथामें कथित श्री अरहंत परमात्माके मुख- स निकले हुए वचन पूर्वापर दोप करके रहित है, और गुम है, उसीको आगम कहते हैं । इसी आगमर्म तत्वार्थो का वर्णन किया गया है। विशेप अर्थ:-निश्रय करके उसी परमेश्वरक दारा परमागमका उयोत हुआ है । कैसा है परमागम, जो श्रीअरहंत के मुखकमलसे निकले चतुर वचनरचनाका समरूप पूर्वापरदोपसे रहित है। श्रीमहंत आत सर्वज्ञ वीतराग हैं, इसी रिये उनके वचनोंके कथन में ऐसा दोष नहीं है कि पूर्वका कपन आगे कथनसे पदोषी हो जाय । जो अल्पज्ञ शाखके पता होने हैं उनके शारों में यह दोष दीख पड़ता है कि एक स्थानमें १ नियमसार- - जिसको पुष्ट किया है, उसीको दूसरे स्थान में बिना किसी शिर क्षाके शिथिल कर दिया है अथवा निराकरण कर दिया है, पन्न सर्वज्ञ वीतरागकथित परमागममें यह दोष नहीं हैं। तपा जो परमासन हिंसादि पापकियाकी पुष्टि के अभावसे शुद्ध है, क्योंकि निर्मल बीमार भगवानके द्वारा प्रगट है । वे भगान् कदापि भी हिंसाका समर्थन नई कर सकते । इमी परमागममें जीगदि सात तम्ब और ना पाय कथन है । केसा है परमागम, अमृतरूप है, जिसके रसको भन्म और कर्णरूपी अंजलीस पीते है, फिर कैसा है, मुनिरूप मुंपरी पुल का दर्पण हे अर्थात् जिसको देगनेसे मुक्तिमा सरूप प्रगट होता है। यही परमागम संसाररूपी महासमुदमे दर रहे जो सममा भन्यनन हस्नालपन देने की समर्थ है। यही सहन गग्यापी मह मिर शियामणि है, अर्थात् वैराग्यकी शोभा परमागम के ज्ञानस ही है। निक मानसपी महलमें चढ़ने लिये यह प्रथम सीडी है, अर्थात मा शान बिना नी. मीथपर गमन नहीं कर सताना मार तम्याम दाम अशुभ रागो भंगार्गस जलते हुए समा हुने Bानाशनको समय नाम भी मंधा समान । भावा-इम मंगारक म पनि अन्याय परम शाह-गमागमगनी traff सन अनादि अमन arry मा मन मान र हानी inst fHEE माifetiran" antitate पनपाइनन tatt Sinामाता -" ..* .

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कार है। ज्ञानोपयोग दो प्रकारका है, एक स्वभाव ज्ञान, दूस्य 16 --- -- ये चार द्रव्य अमूर्तीक हैं। इन शुद्ध हा गुग तया मुदही पाय है। यहां टीकाकार कहते कियह पदव्य रूपी स्न, ज्योति नन्दन प्रकाशमान श्री जिनेन्द्र मार्गरूपी समुद्र के मध्य स्थित है। और प्रगट हर है। जो कोई निर्मल बुद्धि अपनी शोभाकरिये इन रनको सामान्यार्थ--जीव उपयोगमय है, उपयोग ज्ञान दमनके भेदने तथा व्यास-आत्माके चैतन्य गुणक साथ वतनवाडा जो परिमान प्रवर्तना योग्यं हि धर्म है। आत्मा उसका धमी है।दीप और प्रशासके निरममार माग को भी piri- 1 , नो नो र मार होमको मारने और मामा - है. भाग है, कही गुन । पर्श, म., गंगर, भनन सनी अंबान है। मन्ने दिमाय मिना, मरठ। सभा र निमारमे न मिलने परिजमन ने जोर और टॉमन्य अपग भिाग्ने गमन गर्नमा सामान परमनंदन्य है। मा अयमा भिाम्मे स्थिति हिने गिनन नंगडे जर उदामीनरुपम यति गान अधर्म दन्य है। अन्य सचों को भरमा देनी लक्षणको बग्नेगटा आसन्य है। त्यसले दयोंने वर्तना गर्नका हेतु माल दत्य है । धन, अग्नं, आम हृदयके भीतर धारण करना है वह मुनि रूपी मीर का पति होता है । आगे जीवके उपयोगका टक्षग कहते हैं:- जीवो उवओग्गमओ, उवओगो गाणदंसणो होई । गाणुवओगोदुविही, सहावणाणं विहावणाणंति ॥१०॥ । ठिय 'दाना जीवाधिकार समान इन दोनोंका सम्बन्ध है। यह उपयोग दो प्रकार है। एक सानोप- योग, दूसरा दर्शनोपयोग, ज्ञानोपयोग स्वभाव शान और विभाव ज्ञान ऐसे दो भेद रूप है। अमूर्तीक, अन्यायाध, अतीन्द्रिय और आविनश्वर ऐसा स्वभाव शान है सो आत्मा निज ज्ञान है। यह ज्ञानोपयोग स्वभाव अपेक्षा भी दो प्रकार है। एक कार्य स्वभाव ज्ञान, दूसरा कारण स्वभाव शान। ममस्त प्रभारसे निर्मल केवलज्ञान सोतो कार्य स्वभाव शान है । इसी केवलज्ञानका कारणरूप परम पारिणामिकभार स्थित नीन काल सम्बन्धी सर्व उपाधि अर्थात् विभावरहित ऐसा जो आत्माका सहन ज्ञान अर्थात् स्वरूपरूप ज्ञान सो कारण स्वभाव ज्ञान है । कारण स्वभाव शानके द्वारा ही कार्य स्वभाव ज्ञान प्राप्त होता है। विभाव शान तीन प्रकार है-कुमति कुश्रुत और विभंग अवधि । यहाँ टीकाकार कहते है कि जो कोई जिनेन्द्रकथित सम्पूर्ण ज्ञानके भेदोंको जानकर परमादाको त्यागता है और अपने आत्मीक स्वरूप में स्थिर होता है तथा चैतन्यो समत्कारमात्र स्वभाव में प्रवेश करता है वही जीव मुनिरूपी सीका पति होता है। आगेसी शानोपयोगक भेदोंको आगेकी दो गाथाओं में रहते हैं:- केवलमिदियरहिये, असहायं तं सहायणाणं ति। सण्णाणिद्रवियप्पे, विहायणाणं हये दुविहं ॥११॥ सण्णाणं उभेयं, मदिरादही तहेय मणपज्जं । अण्णाणं तिपियप्पं, मदियाई भेददो पेय ॥ १२ ॥ सामान्या-जातीन्द्रिय असाय जो कचरशान है सो व मान है। संज्ञान और विभाव शान ऐसे दो भेद और शान भैर-मति, श्रुत, अपरि तथा मन पर्यशान । रिभरमार : अशान के तीन भैर है, मतिभुग मोर अधि। - २२ नियमसार। ऐसे आत्माकी मावना करनी योग्य है। कैसा है आत्मा, जिसका क्षेत्र कोई नाथ नहीं है, तथा जो मुक्तिरूप सुंदरीका पति है। इस संसारखी- लताके मूलको काटनेवाले संक्षेप कथनसे यह ब्रममय उपदेश किया गया। भावार्थ:-श्रीगुस्ने ज्ञानके भेद कहकर यह प्रतिपादन किया है कि इस भव्यजीवो अपने आत्माका निश्चय परमात्मस्वरूप अपने उपयोग जमाकर ध्यान करना चाहिये। स्वरूप ज्ञानको ही आत्मज्ञान कहते हैं। यही निराकुल आनन्दका साक्षात् देनेवाला है। जब यह अंतरात्मा पुज्य पार, सुस्त दुःस परिग्रह आदि मावोंसे दूरवर्ती निजमावका मनन करता है तब इस भेदज्ञानका सुन्दर फल जगतको मंगलदायक आनन्दस्वरूप पग्न पवित्र ज्ञान ज्योतिको प्रगट कर दिखाता है । मैं सर्वथा प्रकार मुर चैतन्यमय हूं, यह जानकर निर्विकल्प होता हूं । यही दशा मेरे सह ज्ञानका साम्राज्य है और मैं इसका धनी स्वामी हूं । यही भावना इस जीवके गुप्त शुद्ध स्वभावको प्रगट करती जाती है। इस कारण सर्व कार्य त्याग इस स्वरूपभावनारूपी रमणीक वनमें ग्मनेका उपाय करना - योग्य है। यहां टीकाकार कहते हैं कि जो भव्य जीव अपर लिसित भेदज्ञानको प्राप्त करके भयानक संसारका मूल समस्त पुण्य पाप सुरस दुःखको अति सयकरके त्यागता है सो भव्यनीव सर्व मुस्खोंमें श्रेष्ठ से अविनारी आनन्दको प्राप्त करता है। जो बुद्धिमान प्राणी है सो परिमहके आदर अर्थात् हठको त्यागकरके तया देहमें उपेक्षा अर्थात् देह नह छोड़कर निगल चैतन्यमान शरीरही भावना करता है । शुभ तथा असुन राग दूर होनेसे मोरया विध्वंम रोता है। मोहके जड मुलसे चले तथा देवरूपी नटसे भरे मनासी घटके फूट जानेमे परित्र और योति सर्व उपाधिरहित और नित्य उइयर प्रगट होती जीवाधिकार। २३ । - है। कैसी है ज्ञानज्योति, जो भेदज्ञानरूप वृक्षका सच्चा फल है-जगतमें मंगलरूप इस ज्ञानज्योतिको मैं बन्दना करता हूं। यह आत्माका स्वाभा- विक सहज ज्ञान जो आनन्दके विस्तारसे पूर्ण है सो मोक्ष अवस्थामें प्रगट रहता है । ऐसे सहज ज्ञानकी सदा जय हो। कैसा है यह सहज ज्ञान, जो सर्व बाधाओंसे रहित है, प्रगट आत्माकी सहज अवस्था है, आत्माके अंतरंगमें प्रगट है, अपने स्वाभाविक विलासरूप चैतन्यके चमत्कारमात्र स्वरूपमें लीन है। तथा जिसने अपनी आत्म ज्योतिसे अज्ञान अधकारको दूर कर दिया है। तथा अपने चारित्रकरके नित्य ही अभिराम अर्थात् सुन्दर है। मेरा आत्मा स्वाभाविक सहज ज्ञानका राज्य है सर्व प्रकार शुद्ध चैतन्य रूप है, ऐसा जानकर मैं विकल रहित होता हूं। अब दर्शनोपयोगके भेदोंका प्रतिपादन करते है:- तह दसणउवओगो, ससहावेदवियप्पदो दुविहो केवलमिदियरहियं,असहायतं सहावमिदिमणिदं॥१३॥ सामान्य अर्थ-तैसे ही दर्शनोपयोग दो प्रकारका हे एक स्वभाव दर्शनोपयोग, दूसरा विभाव दर्शनोपयोग । जो केवल दर्शन इन्द्रियोंके व्यापाररहित असहाय है वह स्वभाव दर्शनोपयोग है। विशेपार्थ-इस गाथामें दर्शनोपयोगका स्वरूप कथन है । जैसे शानोपयोग अनेक विकल्पोंका धनी है ऐसे ही दर्शनोपयोग भी है । स्वभाव और विभाव इस तरह दो भेदरूप है । स्वभाव दर्शनोपयोग भी दो प्रकारका है, एक कारण स्वभाव दूसरा कार्य स्वभाव । अब कारण स्वभावको करते है. कारण स्वभाव दृष्टि अपने स्वरूपकी श्रद्धा मात्र ही है, निज- रूप है, सदा पवित्ररूप है, औदयिक, औपशामिक, क्षायोपशमिक और क्षायक ऐसे चार विभाव स्वभावरूप भावोंसे अगोचर है, सहज परम पारि- जामिक भाव स्वभावरूप है, कारण समयसार अर्थात् कारण शुद्धाम- स्वरूप है, आवरणरहित स्वभाव है निज स्वभावका सत्तामात्र भार है;

होनसे मोहका विध्वंस होता है। मोहके जड मूलते चले नियमसार। मे भारमाही भावना करनी योग्य है।मा है आरमा, निलका र कोई नाय नहीं है, तथा नो मुनिरूप मुंदरी पति है। इस संसारम:- हप्ता मुटको काटनेगळे संझेर स्थनसे यह प्रामय उपदेश किया गया भावार्य:-श्रीगुम्ने ज्ञान भेद कहार यह पतिपादन किया है कि एक भन्यनीयको अपने आत्मामा निभय परमात्मस्वरूप अपने अयोग्ने जमाकर ध्यान करना चाहिये। मर ज्ञानको ही आममान कहते हैं। निराकुल आनन्दका माक्षात देनेगला है। जब यह अंगमा पुग्यकार उस दुःस परिग्रह भादि मासे दूरवी निजमावका मनन करता है तर इस भेदशानका सुन्दर फल जगतको मंगलदायक आनन्दम्दरूप पान पवित्र ज्ञान ज्योतिको प्रगट कर दिखाता है। मैं या पकार शुद्ध चैतन्यमय हं, यह जानकर निर्विकल्प होता है । यही दशा मेरे सहन ज्ञानका साम्राज्य है और मैं इसका धनी स्वामी हूं । यही भावना जविक गुप्त मुद्ध स्वभावको प्रगट करती जाती है। इस कारण सर्व कार्य त्याग इस स्वरूपभावनारुपी रमणीक वनमें रमनेका उपाय करना यहां टीकाकार कहते है कि जो भव्य जीव ऊपर लिसित भेदशानने प्रातकरके भयानक संसारका मूल समस्त पुण्य पाप मुख दुःखको अति शयकरके त्यागता है सो भव्यजीव सर्व मुस्तोंमें श्रेष्ठ से अस्निान आनन्दको प्राप्त करता है । जो बुद्धिमान प्राणी है सो परिमहके आवह अर्थात् हठको त्यागकरके तथा देहमें उपेक्षा अर्थात् देह नेह छोड़कर निराकुल चैतन्यमात्र शरीरहीकी भावना करता है । शुभ तथा अशुभ जानेसे तया देषरूपी जलसे भरे मनरूपी घटके फूट जानेसे पवित्र और श्रेष्ठ शानरूपी ज्योति सर्व उपाधिरहित और नित्य उदयरूप प्रगट होती योग्य है। , जीवाधिकार। - । है। केसी है ज्ञानज्योति, जो भेदज्ञानरूप वृक्षका सच्चा फल है-जगतमें मंगलरूप इस ज्ञानज्योतिको मैं बन्दना करता हूं। यह आत्माका स्वाभा- विक सहज ज्ञान जो आनन्दके विस्तारसे पूर्ण है सो मोक्ष अवस्थामें प्रगट रहता है। ऐसे सहज ज्ञानकी सदा जय हो। कैसा है यह सहज ज्ञान, जो सर्व बाधाओंसे रहित है, प्रगट आत्माकी सहज अवस्था है, आत्माके अंतरगमे प्रगट है, अपने स्वाभाविक विलासरूप चैतन्यके चमत्कारमात्र स्वरूपमें लीन है। तथा जिसने अपनी आत्म ज्योतिसे अज्ञान अधकारको दूर करदिया है। तथा अपने चारित्रकरके नित्य ही अभिराम अर्थात् सुन्दर है। मेरा आत्मा स्वाभाविक सहज ज्ञानका राज्य है सर्व प्रकार शुद्ध चैतन्य रूप है, ऐसा जानकर मैं विकल्प रहित होता हूं। अब दर्शनोपयोगके भेदोंका प्रतिपादन करते हैं:- तह दंसणउवओगो, ससहावेदरवियप्पदो दुपिहो । केवलमिदियरहियं,असहायं तं सहायमिदिमणिदं॥१३॥ सामान्य अर्थ-तैसे ही दर्शनोपयोग दो प्रकारका हे एक स्वभाव दर्शनोपयोग, दूसरा विभाव दर्शनोपयोग । जो केवल दर्शन इन्द्रियाँके म्यापाररहित असहाय है वह स्वभाव दर्शनोपयोग है। विशंपार्थ-इस गाथामें दर्शनोपयोगका स्वरूप कथन है । जैसे शानोपयोग अनेक विकल्पोंका धनी है ऐसे ही दर्शनोपयोग भी है । स्वभाव और विभाव इस तरह दो भेदरूप है । स्वभाव दर्शनोपयोग भी दो प्रकारका है, एक कारण स्वभाव दूसरा कार्य स्वभाव । अब कारण स्वभावको कहते है:- कारण स्वभाव दृष्टि अपने स्वरूपकी श्रद्धा मात्र ही है, निज- रूप है, सदा पवित्ररूप है, औदयिक, औपशामिक, क्षायोपशामिक और क्षायक ऐसे चार विभाव स्वभावरूप भावोंसे अगोचर है, महज परम पारि- णामिक भाव स्वभावरूप है, कारण समयसार अर्थात् कारण गुदाम- स्वरूप है, आवरणरहित भाव है निज स्वभावरा सत्तामात्र भार

अतीन्दिय स्वभावकी प्रगटतासे शुद्ध समूतव्यवहारनयात्मक हैं, जयंद
नियमसार।
परम चैतन्य स्वरूप है, अकृत्रिम परम स्वरूप, निश्चठ स्थितिमा मुद
चारित्ररूप है, नित्य शुद्ध कर्माजनरहित ज्ञानरूप है तथा अका
वेरी राग देपादि सेनाकी धनाको विध्वंस का है ऐसे आRANI
निश्चयकरके स्वरूपश्रदान मात्र ही कारण स्वमार दर्शन है। दूसरी
कार्य स्वभाव दृष्टि है जो दर्शनावरणीय ज्ञानावराय आदि धातिया
कर्मोके नाश होनेसे उत्पन्न हो जाती है। यह दृष्टि मी श्री तीर्थकर
परमदेवके केवल ज्ञान के समान एक ही समयमें लोक और अटोकन
सामान्य अवलोकन करनेवाली है। कैसे हैं श्री तीर्थकर परमदेव, में
पातिया कौके क्षय होनेसे शायकलम्विधारी हैं, सम्पूर्ण रूपसे निर्मल
केवलज्ञानके द्वारा तीन लोकके ज्ञाता है, अपने आत्मस्वरूपसे ऊपर
परम वीतरागरूप जो सुस अमृत उसके समुद्र हैं, यथाख्यात नाम
कार्यरूप शुद्ध चारित्रके धारी हैं, आदिरूप परन्तु अनन्त ऐसा अनूः
शुद्ध सद्भूतन्यवहारनयसे अमूर्तीक अतीन्द्रिय स्वभावकी प्रगटता
ऐसा कहनेमें आता है, तीन लोक मन्य जीवोंक द्वारा प्रत्यक्ष बदना
योग्य हैं । इस तरह कारण और कार्य्यरूप दर्शनोपयोगका स्वरूप कहा।
भावार्थ-शुद्ध परमात्म तत्वी सामान्य निश्चल श्रद्धा ही आकार
स्वाभाविक
गुण केवल दर्शनी व्यक्तताका साधन है, इसलिये कारन
स्वभाव दृष्टिको उपादेय जान प्रीति करना योग्य है। यहां टीमकार हो
है कि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप ही एक चैतन्य सामान्य माना
आत्मीकतत्त्व है । यह तत्व अतिशयसे मुक्तिकी इच्छा करनेवाटी गलिय
दर्पण के समान है। इस मार्गके धागेविना मोक्षकी प्राति नहीं हो सकती।
आग विभाव दर्शनोपयोगको कहते हैं:-
चम्सुअचकलू आही, तिष्णिवि मणिदं विभावदिच्छति।
दुवियप्पो, सपरावेसोय णिरवेक्सी ॥१५॥

जीवाधिकार । सामान्यअर्थ-चच, अचक्षु, और अवधि ये तीनही विभाव दर्शन कहे गये हैं। पर्याय दो प्रकारकी होती है, एक स्वपरापेक्ष और दूसरी निरपेक्ष । विशप अर्थ-इस माथामें अशुद्ध दर्शन और शुद्ध अशुद्ध पर्या- यकी सूचना है। जैसे मतिज्ञानावरणी कर्मके क्षयोपशमसे मतिशान मूर्तीक पदार्थको जानता है वैसे चक्षुदर्शनावरणी कर्मके क्षयोपशममे चक्षुदर्शन मूर्तीक पदायोंको देखता है। जैसे श्रुतज्ञान श्रुतशानावरणी कर्मक क्षयोपशमसे श्रुतदारा द्रव्यश्रुत अर्थात् द्वादशांगरूप जिनवचनमें कहे दुप मूर्तीक और अमूर्तीक समस्त वस्तुओंको परोक्षरूपसे जानता है ऐसे ही अचभुदर्शनावरणी कर्मके क्षयोपशमसे अचवर्थन स्पर्शन, रसना, प्राण और श्रोग्के द्वारा अपनी अपनी इन्द्रियके विषयको सामान्य रूपसे देना है, अर्थात् मालूम करता है । जैसे अवधिशन अवधिशानावणी कर्मक क्षयोपशमसे समस्त मूर्तीक पदाथाको जानता है ऐसे ही अवधिदर्शन अवधि दर्शनावरणी कर्मके श्योपशमसे मूक पदार्थो को देखता है। इसप्रकार उपयोगका व्याख्यान दिया। अब पर्यायका स्यरूप कहते हैं। "परि समंतात् भवम् पति गति रति पप्यांय " जो गई तरफसे भेदको प्राप्त हो अर्थात् जो परिणमन को सो पर्याय है। प्रथम स्वभाव पर्याय है, यह छहों दयोंमें साधारण है, अर्थव्यरूप है, वचन और भनके अगोचर है, अत्यन्त सुक्ष्म है । आगम प्रमाणसे अनुभव करने योग्य है, तथा छ. प्रकारकी धधि और प्रकारकी शानि सहित है। अतभागइपि, असल्यात भाग कृषि, पर यात भागानिस्यान गुणधि, असख्यात गुणादि, अनंत गुणादि, इसीतरहसे रूप हानि है। यह पनि हानि अगुरुरपुमुणमें होती है। सारान्त ऐसा है कि जैसे समुघमें जल उतना ही है उसमें जो तरंगे उउती है विरामी उनसे समजलभ हानि नहीं होती। जैसे निडरावी २६ पाय कही गई हैं। जो पर्याय कर्मोकी उपाधिसे रहित हैं वे सभा नियमसार। प्रभामें चमककी चंचलता है, कभी हीन कभी तीब है उसीपकार इ आगमोक्त वृद्धि और हानिको समझना । दूसरी अगुद्ध पर्याय है जो ना नारक तिर्यंच और देवरूप है। इसको व्यञ्जनपाय भी कहते हैं। यहां टीकाकार कहते हैं कि जो मनुष्य उत्कृष्ट भावके होनेपर निर्मबुद्धि होता हुआ स्वाभाविक गुणरत्रोंकी खान पूर्ण ज्ञानमय एक अपने शुद्ध आत्माका भजन करता है, वह शुद्ध सम्यग्दृष्टी जीव मोक्षरूपी क्रीका बर होता है। इस प्रकार उत्कृष्ट गुण और पर्यायके होनेपर उत्तम पुरुषों के इश्य- रूपी सरोवरमें जो कारणरूप आत्मा शोभायमान होता है, हे मव्यरूपी सिंह, तू उसी परब्रह्मरूप समयसार आत्माको मजन कर, जो अपने ही स्वभावमें उदयमान है। यही आत्मा कहीं अपने सत्यगुणोंसे शोभता है, कहीं अशुद्ध गुणोंसे विराजता है, कहीं अपनी स्वाभाविक पर्यायोंसे, तथा कहीं अशुद्ध पर्यायोंसे शोभता है। ऐसा होनेपर भी यह जीव तत्व समस्त विभाव गुण पर्यायोंसे रहित है, मैं सदा ही अपने सर्व प्रयोज- मोंकी सिद्विकेलिये उसी तत्वको नमन करता हूं और उसीकी बार बार भावना करता हूँ। आगे स्वभाव विभाव पर्यायका विस्तार कहते हैं.- णरणारयतिरियसुरा, पजाया ते विभावमिदि मणिदा। कम्मोपाधिविवजिय,पजाया ते सहावमिदिमाणदा १५ सामान्य अर्थ-नर, नारक, पशु ओर देव ये चार मुख्य विभाव पर्याय हैं। विशेष अर्थ-इस गाथामें स्वभाव और विभाव पर्यायका संदेर कथन है। स्वभाव पर्यायांक मध्यमें स्वभाव पर्याय दो भेदन की जाती है । पहली कारण शुद्ध पर्याय दूसरी कार्य शुद्ध जीवाधिकार पर्याय । इस लोकमें शुद्ध निभय नयकी अपेक्षासे आदि और अंत दोनोंसे रहित अमूर्तीक अतीन्द्रिय स्वभावसे शुद्ध स्वाभाविक ज्ञान, स्वाभाविक दर्शन और स्वाभाविक चारित्र तथा स्वाभाविक परम वीत- राग मुखमय शुद्ध अंतरग तत्त्वरूप स्वभावमय अनंत चतुष्टय जो निज- स्वरूप हे उसके साथ विराजमान जो पंचम पारिणामिक भावकी परि- णति है वही कारण सुद्ध पर्याय है। कारण शुद्ध पर्यायका मनन कार्य शुद्ध पर्यायकी उत्पतिका साधन है । आदिसहित और अंत- रहित जो अमूर्तीक अर्तीन्द्रिय स्वभावसे शुद्ध ऐसे सद्भूत व्यवहार- नयके द्वारा केवल ज्ञान केवल दर्शन केवल सुख और केवल वीर्य- करके सहित फलरूप अनंत चतुष्टयके साथमें परम उत्कृष्ट क्षायिक भावकी जो शुद्ध परिणति है यही कार्य शुद्ध पर्याय है । भावार्थ- शुद्ध आत्माकं शुद्ध निश्चय स्वरूपके साधनेसे ४ धातियाकर्मोंका नाश होता है, जब क्षायिक भावकी प्राप्ति होकर अरहंत अवस्था प्राप्त होती है । अथवा पूर्व सूत्रमें कह हुए मूक्ष्म ऋजुगूत्र नयके अभिप्रायसे छह द्रव्यों साधारण मूक्ष्म जो अर्थ पर्याय है, वे भी शुद्ध पर्याय है, ऐसा जानना योग्य है। इस तरह संक्षेपसे शुद्ध पर्यायके भेद कहे । अब व्यसन पायको कहते है । जिसकरके पदार्थ प्रगट हो सो च्यानपव्य है । असे रसाट आदिकी पाय अपने नेत्र गोचर है, अथवा आदि और अंत सहित मूर्तीक निज जाति सिवाय विजातीय विभाव स्वभावको जो धारे तथा जो दिखलाई पड़े और नाश होजाय सो प्यजन पर्याय है। संसारी जीबोके आत्मज्ञानके विना अपनी पाई हुई जो पर्याय उसी रूप अपना स्वभाव करलेनेसे जो अपने शुभ अशुभसे मिले मिश्र- परिणाम होते हैं उनके निमिचसे यह जीव व्यवहार नय करके नर होता है, अर्थात मनुष्यके आकार नर पाय भोगता है। यही ससारी जीच कुछ शुभ कुछ मिश्र और मायाचारूप परिणामकरके लियचड़ी - निरममा N । गाय नाता है, याहार नगर पवियादिक भामर होर दिन पर्याय भोगता है। यही नीर मानवउ शुभ परिणाम दारा यावे इन म्भोके विभिनसे व्याहार नयमे आर और अगर पहन र बंगयांग भोगता है। ( अशुभ परिगाममे बांधे गए कमाने का हार नयारो नरमपर्यायको भोगता है)। यह चागं गतिस्प जी सरगको प्रगटता सो भिार व्यंजन पयांग है।दन पय्यांपाका विशेष सम्म जन्य भागमसे जानना योग्य हाटीमामार कहते है किजीव विभाव होने पर भी जो कोई सम्यग्दृष्टी तन्याभ्यासमें अपनी बुद्धिको जमाकरके मानता है कि शुद्ध आत्मा स्वभार सिगाय और कोई मेरा कल्यार कारी नहीं है वह जीव मुनिम्पी लक्ष्मीका पति होता है। भावार्थ- अपनी इस पायको कमंत मान इसको त्यान्य समझ इससे जा सीन बुधिरके निज स्वभाव, रमनेकी उत्कंठा करनी योग्य है । अब चार गतिका विशेष स्वरूप कहते हैं। माणुरसा दुवियप्पा, कम्ममहीमोगभूमिसंजादा। सत्तविहा गैरइया, णादव्या पुढविभेएण ।। १६ ॥ चउदहभेदा मणिदा, तेरिच्छा सुरगणा चउम्मेदा। एदेसि वित्थारं, लोयविमागेसु णादग्वं ॥ १७ ॥ सामान्य अर्थ-मनुष्य दो प्रकार के होते हैं,कर्मभूमिज और भोगभूमि नारकी ७ प्रकारके जानने। पृथ्वी आदि भेद करके १५ प्रकार तिर्यच तथा चार प्रकारके देव होते हैं। इनका विस्तार 'लोक विभाग' न आगममें जानना योग्य है। विशेप अर्थ-इन माथाओम ५ मतिका निरूपण अर्थात् कुलकर उनके अपत्य अर्थात् सन्तानोंको मनुष्य कहते हैं कर्मभूमिकी आदि और भागभूमिके अंतमें १४ कुलकर न अपभदेव और श्रीभरत चक्रवर्तीको ले १६ कुलकर हुए -ही मनुष्योंको आजीविकाके साधन व अन्यआवश्यक कर्म बताये। यह लकर पितासमान रक्षक होते हैं । इसीकारण उनके द्वारा लालित मलित होनेवाठे सर्व मनुष्य कहलाये। अब यह शब्द रूदिरूप वर्तनमें ाता है। मनुष्य दो प्रकारके, हे एक कर्मभूमिज दूसरे भागभामज । कर्मभू. मनुष्य भी दो प्रकार हैं, आर्य और म्लेच्छ । जो पुण्यक्षेत्र निवासी वे आर्य हैं और जो पापक्षेत्रवर्ती हैं वे म्लेच्छ है । भोगभूमिजोंको भी आर्य कहते हैं। ये जपन्य, मध्यम और उत्तम क्षेत्रमें निवास करनेसे न भेदरूप हैं तथा रन, शर्करा, वालुका, पंक, धूम, तम और महातम सी सात प्रकारकी प्रभाओंको धारण करनेगटी सात पृथिवियाँ हैं, जिनके नेवासी नारकी जीव सात प्रकार के होते है । पहले नरकके नारकी एक गरोपम आयुधारी, दूसरेके तीन सागरोपम, तीसरेके सात, चोर्थके श, पांचवेंके सत्रह, व्हेके बाईस और सातवेंके तेतीस सागरोपम आयु. परी है । यहाँ विस्तारके भयसे संक्षेप कहा है। तियचोंमें १४ भेद -१ सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त, २ सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त, वावर केन्द्रिय पर्याप्त, ४ वाइर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, ५ दीन्द्रिय पर्याप्त, दीन्द्रिय अर्पयाप्त, ७ तेन्द्रिय पर्याप्त, प्लेन्द्रिय अपर्याप्त, ९चौन्द्रिय योप्त, १० चौन्द्रिय अपर्याप्त, ११ पचेन्द्री असेसी पर्याप्त, १२ पंचेन्द्री भसंज्ञी अपर्याप्त, १३ संशी पंचेन्द्री पर्याप्त, १४ संज्ञी पंचेन्द्री पर्याप्त। भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी, कल्पवासी ऐसे देवोंमें पार जातिके समूह हैं । इन चारों गति सम्बन्धी जीका वर्णन टोकविभाग नाम परमागमसे जानना योग्य है। यहां आत्मस्वरूपका कथन है, अतः लोकका विशेष कथन सूचकार पूर्वाचार्यने यहां नहीं कया है। यहां टीकाकार प्रार्थना करते हैं कि जिनेन्द्र स्वर्ग हो, स मनुष्यभवमें व विद्याधरोंके लोकमें हो, व देवटोक, ज्योतिलों । भवनवासीके भवनमें, व नारकियोंके निवासमें हो, १ जिनेन्द्र नवनमें हो व अन्य किसी स्थानमें हो हमें फोकी उत्पचि न हो; परन्तु ।

नयसे नोकम जो औदारिक शरीरादि तिनका कर्चा है, तथा उपमान
नियमसार1
पुनः पुन: आपके चरण मलोकी मन ही हमको शा हो। हे और
तू राना महागनाओमी विभूतिको मुनकर व देकर यो संद करत
है ? में गड़बुद्धि, मत्र पुण्यमे पैदा होती हैं। यदि श्रमिनन्द्र
चग्गामलों में तेरी मति हैं और उन चरणोंकी पूजामें टवर्जन है,
तो यह नानाप्रकार के मोग आपसे आप हो जायगे।
आगे का भोलापनेको कहते हैं:-
कत्ता मोत्ता आदा, पोग्गलकम्मस्स होदि ववहारो।
कम्मजमावणादा, कत्ता मोत्ता दुणिच्छयदो॥ १८
सामान्य अर्थ-यह आत्मा पुदल कर्मका की और भोना है।
है सो व्यवहार नयसे है। कर्ममे उत्पन्न हुऐ जो भाव तिनका कर्ग में
भोक्ता है सो अशुद्ध निश्चयनयसे है।
विशेपार्थ-इस गाथा का और भोक्तापनेका कयन है। नि.
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आदि भाव कोका को और भोक्ता है। अनुपचरित असदभूत व्यवहार
.
-
अतद्भुत व्यवहार नयसे यह आत्मा पट पट रथ गाड़ी आदि पदार्थ
कर्ता है । इस प्रकार अशुद्ध जीवका स्वरूप कहा । भावार्थ- आना
यह बतलाते हैं कि कोई एक अनादि शुद्धबुद्ध ईश्वर की नहीं है, कि
यह संसारी अशुद्ध आत्मा ही नाना प्रकारको अवस्थाओंका वनानेवात
और अपने ही कर्तव्य के अनुसार सुस दुःत फलोंको भोगने वाला है।
निश्चयनय जो वस्तुके यथार्थ शुद्ध स्वभावको बतलाने वाला है उस
अपेक्षा यह आत्मा निज शुद्ध पारिणामिक भावका ही कर्ता और मान्दा

जीवाधिकार है । परन्तु अशुद्ध निश्चयनय जो वस्तु के अशुद्ध भावको बतटानेवाला है उसकी अपेक्षासे यह आत्मा पूर्व वाधे कमाके परिणमनके निमित्तसे पैदा होनेवाले जो राग देषादि औपाधिक भाव तिनका कर्ता और भोना है। अत्यन्त निकट अर्थात् एक क्षेत्रावगाहरूप सम्बन्धको बतलानेवाला ऐसा भी अनुपचरित अर्थात् जिसको मात्र कल्पना ही नहीं किया है किन्तु नो वास्तवमें सम्बन्धित है तथा जो असद्भूत अर्थात् आत्माकी सन्नामें नहीं है, ऐसा जो व्यवहारनय उसके दारा देखा जाय तो यही आत्मा दव्य काँका कर्ना और तिनके बाह्य प्रगट होनेवाले सुखदुःखका भाका है । तथा दूरक्ती अनुपचरित असद्भुत ध्यवहार नरकर के यह आत्मा स्थूल शरीरका कर्ना है । तथा कल्पना मात्र ऐसे उपचरित और अम- भूत भ्यवहारनयसे यह आत्मा पर पदार्थ जिनका अपनसे अर्थात अपने प्रदेशोंसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं है ऐसे पट पटादिका कर्ता है। art टीकाकारने आत्मानुभवकरके कहा है कि जो आत्मा रागद्वेष मोहमें लिप्त हो रहा है यदि परम गुरके चरणकमलकी सेवा करे तो उसके प्रसादमे स्वाभाविक शुद्धात्मरूपको जो विकल्प अर्थात् भेदरहित है उसको पह- चान करके मोक्षरूप स्वीका बर हो जाता है। क्योंकि भावधर्म जी रागादि इनको रोकनेसे द्रव्यकर्म कहते है और द्रव्यकोंके संघरसे संसारका निराध है । यह मूद जीव सम्यग्ज्ञानरूपी भावसे एटा हुआ शुभ तथा अशुभ अनेक प्रकारके कोको करता है। यदि यही जीव कर्मरहित मोक्षमा- की घोड़ी भी करके उसको जाने तो इस लोकमें उसकी रक्षाका उपाय दूसरा नहीं है। जो जीव फर्मजमित सम्पूर्ण राधाप मुसको त्यागता है वह सम्यग्दृष्टि भन्य आत्मा समरहित निराकुल आनन्द समूह- रूप अमृत के समुद्र में दूबेहुए अत्यन्त ही भर चैतन्यमय एकरूप अदितीय अपने आत्मीक भावको प्राप्त करता है। मरमें यास्तबमें कोई विभाग नहीं है, हमालिये मुझे उसकी छ चिन्ता नहीं है। मैं निरन्तर अपने दियकमटमें विराजमान सर्व कर्मसे रहित एसब भात्माका ही .

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जीवाधिकार जीवोंका परिणमन अर्थ पर्यायोंके दारा होता है व्यंजनपायोंक दारा नहीं होता क्योंकि श्रीसिद्ध महाराज सदा निरंजन है, अर्थात् कर्मरूपी अंजनोंसे रहित हैं। प्रगटरूपसे अवस्थाका बदलना सो व्यंजनपर्याय है, जैसे देवसे मनुष्य होना । प्रगटरूपसे एक पर्याय रहते हुए अंतरंग गुणों में परिणमन होना सा अर्थपर्याय है । जैसे श्रीसिद्ध महाराजका एक गुण अनंत ज्ञान है । शेय (जानने योग्य) पदार्थोको जाने सो ज्ञान । ज्ञेय पदार्थ समय समय उत्पत्ति विनाश और भौच्य गुणसे संयुक्त है । ऐसा ही अनत ज्ञानमें भी परिणमन होता है। यहां कोई शंका को जब सिद्ध सदा निरंजन हैं तब गाथामें यह कहना व्यर्थ होगा कि सर्व भाव दव्यार्थिक पार्थिक नयोंके द्वारा दोनों पर्यायोंकरके संयुक्त है रस- का समाधान इस भौति है कि नैगमनय तीन प्रकार है:-निगम नाम विकल्पका है विकल्पमें होवे सो नगम है । भूत नैगम, वर्तमान नेगम, भोर भावि नैगम। गत अवस्थाका विकल्प पदार्थमें कहना सो भूत नेगम, वर्तमान अवस्थाका विकल्प सो वर्तमान नैगम-सम्पूर्ण कार्य न होते हुए कार्य हाना कहना, भावी अवस्थाको पदार्थमें कहना सो भावी नैगम । यहाँ पर भूत नेगम नयी अपेक्षासे सिद्धोंके भी मंजनपराग्रकी संभावना है। सिद अवस्था होनेके पूर्व सर्व जीव संसारी अशुभ होते हैं। अधिक या कहे सर्व ही जीव दोनों नयोके दारा शुद्ध और अमुल हैं। ऐसा ही श्री अमृतचंद पूरिने कहा :-जो जीव स्यात् पइसे सित और दोनों नय अर्थात् निधय न्यबहार नयके विरोधको दूर करनेगल ऐसे जिनेन्द्र के वचनोंमें रमते है वे मोहको दमन कर देते हैं और सीध ही अतिशय से परम ज्यातिरूप समयसार अर्थात सुदामा तिसको देखते ही हैं। कैसा है समयसार, जो नवीन नहीं है तथा रिकी बटी नयकी पक्षसे सरने योग्य नहीं है। यह टीकाकार कहते है " संतपुरुष दोनों नयों की युनियों को नहीं अपन करते हुए परम मिने. न्द्रचरण महोंक म मर हो जाते है, अर्यात भोर समान म नियमसार- वत् भक्ति में लीन हो जाते हैं । संत शीघ्र ही सदा -नित्यरूप समय- सारको प्राप्त करते हैं। सननीको इस जगतमें अन्य कथनसे क्या फल की सिद्धि होगी। भावार्थ-बोनी नयाँसे जीरका स्वरूप समझकर हमको उचित है कि हम परमात्माकी भक्ति में अपने उपयोगको टीन करें। इमप्रकार सकाविरुप कमलकिटिये मूर्यके समान, पंचेन्द्रियों के फैला- वसे रहित, शरीरमात्र परिग्रहके धारी ‘धीपनाममलधारीदेव' रचिन नियमसारकी तात्पर्यत्तित्रं जीवाधिकार नामक प्रथमश्रुत स्कंध पूर्ण हुआ। - अजीवाधिकार। अणुसंधवियप्पेण दु, पोग्गलव्वं हवेइ दुवियप्पं । खंधा हु छप्पयारा, परमाणू चेच दुवियप्पो ॥२०॥ सामान्यार्थ-पुद्गल द्रव्यके दो भेद हैं, एक अणु दूसरा स्कंध । स्कंध निश्चयकरके छः प्रकार है और परमाणु दो प्रकार है । विशेपअर्थ-इस गाथामें पुलल व्यके भेदोका कथन है । प्रथम ही पुद्गल द्रव्यके दो भेद हैं एक स्वभावपुगल दूसरा विभावपुल । पर माणु स्वभाव पुद्गल है और स्कंध विभाव पुद्गल है । स्वभावपुलके दो भेद हैं एक कार्य्यपरमाणु, दूसरा कारणपरमाणु । स्कंध : प्रकार होते हैं-पृथ्वी, जल, छाया, चार इन्द्रियके विषयरूप पदार्थ जैसे शन्द सुगंध आदि, कार्माण योग्य पुदल वर्गणा और कर्म अयोग्य पुल छ. भेद है। इनका स्वरूप आगेकी गाथाओमें विस्तारसे कहेंगे। " स्कंधोंके गलनेसे अणु होता है और अणुओंके मिलनेसे स्कंध होता है। इस पुद्गलपदार्थके विना लोकयात्रा नहीं हो सकती अर्थात् जीवको इस लोकमें भ्रमण और पर्यायाने निवास पुद्गलद्रव्यके द्वारा ही होता है । ऐसे अजीवाधिकार। ૨૧ Man- --- आगे कंधक भेदोंने कहते है:- अइथूलथूल धूलं, थूलंमुहुमं च सुहुमथूलं च । महुमं अइसुहुमं इदि, धरादियं होदि उडमेयं ॥ २१ ॥ भूपबदमादीया, भणिदा अइथूलथूलमिदि संधा। थूला इदि विष्णेया, सप्पीजलतेलमादीया ॥ २२ ॥ छायातवमादीया, धूलेदरसंधमिदि वियाणाहि। मुहुमथलेदि मणिया, संधा चउरक्सविसयाय ॥२३॥ मुगुमा हवंति संधा, पावोग्गा कम्मवग्गणस्स पुणो। तबिवरीया संधा, अइसहुमा इदि परुवेदि ॥ २४ ॥ सामान्य अर्थ-इन ४ गाथाओंमें विभाउ पुलके स्वरूपकाम्पारन्यान है । अत्यंत स्थूल वे पुद्गल हैं जो पर्वत पुम्नी आदिके समान है । धी तेल मठा दूध जल आदि बहनेवाले द्रव्य स्यूल जाति के पुल हैं। छाया, आतप, अंधकार आदि स्थूलसूक्ष्म पुद्गल हैं । स्पर्श रसन प्राण और श्रोत्रान्द्रियके विषय भूत पदार्थ सक्ष्मस्थून जातिके पहल हैं अर्थात शन, स्पर्श, रस, गंध ये समस्यूल हैं । शुभ और अशुभ आत्माके परिणामोंक दाग आनेवाले शुभ और अशुभ कमौके योग्य होनेवाले कार्माग स्कंध सूक्ष्मपुल हैं। इन सबसे विरुद नो कर्मवर्गणासे भी सूक्ष्म हैं वे अत्यंत सूक्ष्माध हैं । इस प्रकार विभाव पुलके छ भेद हैं। ऐसाही पचास्तिकाय और मार्गप्रकाश मन्यमें कहा है आर उनके क्य- नका अभिमाय उपर कहा जा चुका है। इसी प्रकार भीअमृतचन्द- सूरिने कहा है कि “इस महा भारी अनादि घटसे होनेश अमन- रूपी नृत्य के असाम वर्ण स्पर्स रस गध गुणम भारी पुलही नृत्य कररहा है। इसके सिवाय दूसरा कोई नृत्य करनेशल्य नहीं है ।मह जीव तो रागदेष आदि विकारोंसे विरुद्ध शनचैतन्य भानुकी एक नियमसार- -APAN - मूर्ति है " । भावार्थ-पुद्गलकर्मके ही निमित्तसे जीव प्रमता है, निश्चय करके आत्मा शुद्ध निर्विकार है । गतिसे गत्यन्तर होना इसका स्वमात्र नहीं है इसीकारण आचार्यने नाट्य करनेवाला पुद्गलहीको कहा है । क्योंकि श्रीगुरुकी इच्छा इस भवपिंजरेंमें फंसे हुए जीवको अपने शुद्धस्वरूपके स्मरण करानेकी है । जब तक यह आत्मा अपनी शुद्ध- ताका निश्चय नहीं करता तबतक रागद्वेपको हटा नहीं सकता। राग देषोंको विना दूरकिये कर्मबंधकी संततिका अभाव नहीं होता । इस कारण कल्याणार्थी आत्माको अपना शुद्धस्वरूप अनुभवना योग्य है। यही शिक्षा उपादेय है । टीकाकार कहते हैं हे भव्यसिंह अर्थात् सिंहके समान भव्यात्मा तू नानाप्रकारके पुद्गलोंका भेद जगनमें देखकर उनमें अपनी प्रीतिभावको न कर-तू अपनी रति अपनी लोलीनता उस अतुल चैतन्यके चमत्कारमें कर, जिसके प्रभावसे तू मोक्षरूप सीका बर हो जावेगा । भावार्थ-मोक्ष पानेका यही उपाय है जो अपनी चैतन्य सत्ता भूमिमें कलोल करे और पर वस्तुमें क्रीडा करनेका त्याग करे। आगे कारणपरमाणु और कार्यपरमाणूका हेतु कहते हैं:- धाउचउकस्स पुणो, ज हेऊ कारणंति तं णेयो । संधाणं अवसाणं, णादव्यो कजपरमाणू ॥२५॥ सामान्य अर्थ-चार धातुका जो हेतु है वह कारण परमाणु है तथा स्कंधोंका अंतिमभाग कायं परमाणु है, ऐसा जानना योग्य है। विशेष अयं-इस गाथामें कारणपरमाणु द्रव्य और कार्यपरमाण अव्यका स्वरूप वर्णित है। गथ्वी, जल, तेन और वायु ये चार पात्र हैं। इन चार धातुओका जो कारण है वह कारण परमाणु है । अर्थात निन परमाणुओंके सम्बन्धसे ये चार धातुएँ परिणत होती संध रूप दीसती हैं, वे परमाणु कारण परमाणु कहलाते हैं । कारण परमाण ही नपन्य परमाण है। इनमें ना और कक्ष गुणों - अचीवाधिकार --------- सवसे जपन्य अनन्तवा भाग रहता है। यह सम अपवा विषमरूपसे दोनों प्रकार भी बंध योग्य नहीं है, अर्माद न दो गुण स्निग्ध व रुक्षवाला परमाणु अन्य दो गुण स्निग्ध व सक्षमे बंधता है और न तीन गुण क्ष व स्निग्धदाला परमाणु तीन गुपवालोंसे बधता है किन्तु स्निग्ध रूक्ष गुणोंकी अनतताके ऊपरके परमाणु जिनमें दो गुण होंगे के चार गुणवाले परमाणुओंसे यथेंगे । जो तीन गुणवाले परमाणु होंगे वे पाच गुणवाले परमाणुओंसे बंगे । दो गुण अधिक से ही बंध होता है। यही (अध योग्य) उत्कृष्ट परमाणु है। पुदल द्रव्य स्कंधोंके गठते एए अंतिम अवस्यामें रहा हुआ जो परमाणु सो कार्य्यपरमाणु है। इस प्रकार अणु चार प्रकार है-कार्यरूप, भारणरूप, अघन्यरूप, उत्कृष्टरूप । यह परमाणुध्य अपने स्वरूपमें स्थितरूप होनेसे विभाव- भावसे रहित है इसलिये परमस्वभाव है । ऐसाही श्री प्रवचनसारमें 'पिद्धा वा · आदि गापामें कहा है जिसका अर्थ ऊपर आगया है। विशेष यह है कि स्निग्ध रूक्षसे, रूक्ष रूक्षसे. स्निग्ध स्निग्धसे सम हो व विषम दो गुण अधिक होनेसे बंध प्राप्त होता है । टीकाकार श्रीपन- अभुमलधारिदेव कहते हैं कि मैं छः प्रकार स्कंध और चार प्रकार परमाणुओं से अपने आत्माको भिन्न शुद्ध अक्षयरूप बारम्बार भावता ई" भावार्थ-पद्दल चाहे स्कंध हो वा अणु हो शुद्ध आत्माके ज्ञाना- नंदमय टंकीकीर्ण परम स्वभावसे सर्वथा भिन्न है । उसकी भावना कार्यकारी नहीं है । इसलिये शुद्ध आत्मत्वभावकी वारम्बार भावना ही उपादेय, कार्यकारी और कर्तव्य है । जो भावना भावक पुरुषको उपशम भाव प्रदानकर सुधारस गर्भित परमाहादको प्रदान करती है। अब परमाणु विशेषको कहते है:- अचादि अचमझं, अत्तं व इंदिए गेझं। अविमागी जं दुवं, परमाणू तं विआणाहि ॥२६॥ - - ३ नियमसार- ------- 1 सामान्यअर्थ-जिसका स्वयं स्वरूपही आदि मध्य और अंतरूप है, जो इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण योग्य नहीं है ऐसा अविभागी जिसका दूसरा माग नहीं होसके सो द्रव्य परमाणु जानने योग्य है । विशेपार्थ-जैसे नित्य आनित्य निगोदसे ले सिद्धक्षेत्रपर्यंत स्थित रही जीव अपने स्वाभाविक परम पारिणामिक भावरूप सहज निश्चयनयके द्वारा अपने असली स्वरूपसे कभी च्युत-पतित नहीं होते, तेसे ही परमाणु द्रव्य पारिणामिकमाची अपेक्षासे परमस्वभावका धारी है । उस परमार णुकी आत्मा ही आदि है अर्थात् वह स्वयं आदिरूप है वही मध्यरूप है वहीं अंतरूप है। जैसे आत्मा अपने स्वरूपका आप ही आदि मध्य अंतरूप वैसे ही परमाणुको भी जानना अर्थात् आत्मा जैसे आदि मध्य अंतरहित है, वैसे परमाणुको मी अनुभव करना।आदि मध्य अंतरूप वही स्वयं है। इसलिये वह परमाणु अपने आत्माके समान पंचेन्दिय ज्ञानगोचर नहीं है, वह परमाणु निर्मल है। अग्नि आदिसे अविनाशी है, विभागरहित अविभागी है । हे शिष्य परमाणुका स्वरूप तुम ऐसा जानो । टीकाकार कहते । जड़ स्वरूप पुगलकी स्थिति पुगलमें ही जानकर वे सिद्धजीव अपने चैतन्यस्वरूप चिदात्मामें क्यों नहीं तिष्ठे, अपि तु तिष्ठ ही ति।। आगे स्वभावपुगलका स्वरूप कहते हैं:- एयरसरूवगंध, दो फासं ते हवे सहावगुणं । पिहावगुणमिदि मणिदं, जिणसमये सव्वपयउत्तं ॥२॥ सामान्य अर्थ-एक रस एक मप एक गंभ और दो स्पर्श इतने गुणमि सहित स्वभावगुण पालका जिनआगममें प्रगट रूपसे कहा है। विझोर अर्थ-इस गाथा स्वभावपुलके स्थपका कथन है। तीसा, फा, कपापला, आमल, और मधुर इन पांच प्रमाके सोर एक रस होता है। इत, पीला, हरा, सल, कालान पाच वो ६ मैया मुर्गध और दुर्मदमे से एक गंध होती है । कांगड, भजोशााकार। ३९ MA-A- भारी, हटका, शीत, उष्ण, चिकना, कहा इन भाउ स्पोंसे अंतमें कहे जो चार स्पर्श उनसेसे अविरोधी दो स्पर्श होते हैं अर्थात शीत अथवा उष्ण व चिकना अथवा रूसा । इसप्रकार पांच ही गुण पुल परमाणुके स्वाभाविकगुण हैं ऐसा मिनेन्दभगवानके आगमका मत है । विभावगुण- रूप विभावपुरल हैं । यह दोभणु आदिसे ले संल्यात असंख्यात अनंत अणुओंके स्कंधरूप है, विभावगुणधारी हैं। सम्पूर्ण इन्द्रिय मामों के दारा महण योग्य हैं । इन्द्रियोंसे स्कंधोंका महण हो सकता है ऐसा भावार्थ है । ऐसा ही श्रीपंचास्तिकाय में कहा है । उसका आभिप्राय ऊपर आगया । विशेष इतना नो परमाणु स्वयं अशुद्ध है परन्तु वह शन्दका कारण है । तथा मार्गप्रकाशमें भी ऐसा ही कहा है। टीकाकार कहते है कि एक परमाणु अपने वर्णादि गुणों से अपनेमें प्रकाशमान है परन्तु उससे मेरे कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती ऐसा निश्चयकरके जो भव्य जीव परम सुसमई मोक्षपदका इच्छक है उसको अपने हदयमें एक शुद्ध आत्माकी ही भावना करनी उचित है । भावार्थ-सर्व पर वस्तुओंको हेय जान भव्यजीवोंको एक शुद्ध निज आत्मा ही उपादय, ध्येय और सम्यक् मनन योग्य है । अब स्वभाव विभाव पायको कहते है:- अण्णणिरावेक्खो जो, परिणामो सो सहावपज्जायो। संघसरूवेण पुणो, परिणामो सो विहावपज्जायो॥२८॥ सामान्य अर्थ-जो परिणमन अन्यकी अपेक्षाकरके रहित होता है वह स्वभाव पर्याय है । और जो परिणमन रूधरूपसे होता है वह विभावपर्याय है। विशेप अर्थ--इस गाथामें पुलकी पर्यायका कथन है । पुलकी परमाणुरूपपाय पुहटकी शुद्ध पर्याय है, जिसका लक्षण परम पारि- णामिक भाव है । वस्तुमें पट्मकार हानि वृद्धिरूप जो अत्यन्त सूक्ष्म । -. ।

नियमसार- -- अर्थपर्याय होती हैं उस परिणमनरूप है । सादि और सान्त होने भी परद्रव्यकी अपेक्षा रहित होनेसे शुद्ध सत-व्यवहारनयरूप है, अथवा निश्चयकरके एक ही समयमें उत्पाद उत्पति, व्यय विनाश, तथा धौन्यता नित्यता इन तीन स्वरूप है। इस अपेक्षासे सूक्ष्म मनमा नयका विषय रूप है म स्कधरूप पर्याय अपने सनातीय परमाणुझसे बंधरूप है । इस लक्षणसे अशुद्ध है । इसलिये विभाव पायरूप है। टीकाकार कहते हैं पर परिणमनसे दूर शुद्ध पायरूप परमाने स्वभावपर्याय है स्कंधपर्याय नहीं है, तथा यह परमाणु नित्य है। जैसे चैतन्यनाथ श्रीभगवान में पंचबाणरूप कामदेवकी वार्चा नहीं है और जैसे श्रीसिद्ध महाराज नित्य हैं इसी प्रकार यह परमाणु विभाग व्य रहित नित्य है। आगे पुलद्रव्यको व्याख्यानको संकोचते है:- पोग्गलट्वं उच्चइ, परमाणू णिच्छएण इदरेण । पोग्गलदव्योत्ति पुणो, वदेसी होदि संधस्स ॥ २९॥ सामान्यअर्थ-निचयनयकर परमाणुको पुलद्रव्य कहने। तथा व्यवहारनयकाक स्कंधको भी पुद्वलय्य कहा जाता है। विशेषभ-इस गाया पुलद्रव्य व्याख्यानको माया है। स्वभावसे शुद्ध पर्यायरूप परमाणुहीक शुद्ध निभयकरके पुत्र इव्य मंज्ञा है। तया व्यवहार नया निभायपप्याय की भी एट द्रव्य ९मा नाम कहा जाता है। टीकाकार करने । " व्यनार, निर भगवान आगममे ताका मानकर ममान पतन अवतन पदार्था त्याग और int तर ममायिन टीना पायो हित पतन्य NRCHES परमतता भवन ।। भावार्थ- साEिntert । माना पतया परमनिममें सामु अजीवाधिकार पीको सुख प्राप्त करना चाहिये । पुल दम्य अपेतन है, जीव द्रव्य चंतन है, यह कल्पना प्रथम अवस्थामें सामियोंके होती है। जो पांगी निप्पन है अर्थात् मानाभ्यास पूर्ण हैं उनको यह मलना नहीं होती। यती मुनियोंही एसी एम दशा होती है जिससे वे यह अनुभव करते हैं जैसे अर्थतन पुल कादमें न देषभाव है न रागभाव है, उसी तरह वेतन परमामतत्वमें रागदप भाव नहीं हैं॥२९॥ भागे धर्मावि दल्पका स्वरूप कहते हैं:- गमणणिमित्तं धम्म, मधम्म हिदि जीवपुग्गलाणं च । अवगहणं आयास, जीवादीसवय्याणं ॥ ३० ॥ सामान्य अर्थ-जीव पुदलोंके ग्मनमें निमिच धर्मद्रव्य है और स्थितिम निमित्त अधद्रव्य है, तथा जीवादि सर्व द्रव्योंको अवगाहन अर्थात स्थन देनेवाटा आकाशदव्य है। विशेषार्थ--इस गाथामें धर्म,अधर्म और आकाशका संक्षेप कथन है यह धर्मास्तिकाय स्वयं गमनाकियासे रहित है, जैसे वापिकामे जल। अब उ मल, पंच लघुअक्षरमार कारमें स्थित १४ वे गुणस्थानवर्ती अयोगजिन जब अंतके समयमें पंचमतिको अपनी स्वभाव गमनक्रि- याकी परिणतिसे गमन करते हैं, उससमय यह धर्मदग्य उनको स्वभाव गति क्रियाहतुरूप होता है। कैसी है पंचमगति मोक्ष, जहां सम्पूर्ण लेश और दुखोंका घर द्रभ्य, क्षेत्र, काल, भव, भावरूप पंचप्रकार संसा- रका समस्तपने स्थान नहीं है । फिर कैसी है वह पंचमगति, कि जिसमें रहनेवाले जीव सिद कहलाते है। जहाँ छ. कायरूप जीर्वाका नाम जो चारों गतियोंके अन्दर होता है छूट जाता है। तथा वह मोक्षस्थानरूप सिद्धशिला तीन लोकके अमभाग विराजमान है। जिस सिद्ध अवस्था स्थित जीव मोक्षरूप नीके नेत्रोको देखकर वृप्त रहते हैं। तथा षट्कायमें परिश्रमण करनेवाले संसारीजीवोंके यही धर्मद्रव्य विभावगति कियाका शुद्ध ही पर्याय है । अधदन समपायलिभेदेण दु, दुषियर्प अहय छोड तिथिय। मामान्य भय-ममय ओर आय. व्यवहारकालोको नियमसार- हेतु होता है। जेसे मछलियोंकेलिये जल कारण होता है वैसे ही जीत पुदलोंके गमनका कारण यह धर्मदव्य है। यह अमूर्तीक है। आ3 स्पर्श, पांच वर्ण, पांच रस, और वो गंध ऐसे पुगलों के २० गुणसे रहित है । अगुठलघुत्व आदि गुणोंका आधार है । लोकाकाशमात्र आगरा धारी है, अरांड एक पदार्थ है। आगमका यह वचन है कि " सह- भुवो गुणाः कमवर्तिनः पर्यायाः" अर्थात् साथमें रहनेगळे गुण होते हैं और कमसे वर्तनेवाली पर्यायें होती है। इस कारण इस पति- हेतु बाचक धर्मद्रय्यके शुद्ध गुण और जीव पुनलोंकी स्थिति में कारण है, यही इसका विशेष गुण है । धर्मा स्तिकायके समान इसके भी सर्व शुदगुण और शुद्धपाय होते हैं। आकाशद्रव्यमा जीवादि न्यौंको स्थान देना ही विशेष गुण है, अन्य सर्व गुण और पर्याय धर्म अधर्म द्रव्य के सदृश है। लोकाकाश, - वन्य, और अधर्मद्रव्य इन तीनोंका प्रमाण समान है, अलोकाश निश्चयकरके सबसे बड़ा है । टीकाकार कहते हैं कि इस लोकमें जीव पुद्रलोको गमन वा स्थितिका कारण तथा सा द्रव्योंको स्थानरान देने का कारण जो जो व्य हैं उन सबको द्रव्य अपेक्षा यथार्थ अवलोकन कर, तु सर्वदा नि आमी तन्यों ही प्रमेश कर। भावार्थ-धर्माधर्मागरको शेयपदार्थमात्र ही जान इनको उपाय मान, एक अपने शव आत्मीतवही भावना का यही भाना रे. लिये सदा कल्याणकारी है ॥ ३०॥ आगे स्याहार कारक भवन कहते हैं:- नीदो संसेनापलि. हदसंठाणप्पमाणं नु ॥ ३१॥ १, मा तीन । अतीत अापलाती है अगम्यान भात मित माण है भव्य टीम - अगीवाधिकार विशेष भर्थ-१स माया स्याहार बालके विविध मेदोका कथन है एक आकार में जो परमाणु तिष्टा है उसको अन्य परमाणु मैद चलनरूप मनि टप जाता है। उसमें जितना समय लगता है उसको समय नामका व्यवहार काल करते है। इस प्रकार के असण्यात समयका एक निमंप होता है। औसकी पटक मारनेमें जितना समय टगे उसको निमेय कहते हैं। आठ नियों की एक काठा होती है। १६ काठाओंकी एक कला होती है । ३२ कलाओंकी एक घटिका होती ।१० पटिका अर्थात नालियाका एक दिनरात होता है। ३० दिन- राविका एकमास होता है। दो मासकी एक मत होती है। तीन तुका एक अयन होता है । दो अपनका एक संवत्सर अर्थात् वर्ष होता है। इस प्रकार व्यवहार काल जानना । यही व्यवहार काल समय और आवीके भेदसे दो प्रकार है। असंख्यात समयों की एक आवली होती है। यही काल अहीत, अनागत और वर्तमानके भेदसे तीन प्रकार है अब अतीत कालका प्रपच कहते हैं । सिद्ध पर्यायको प्रगट करनेवाले अतीत काटमें अनंत सिद्ध हो गए है । ससार अवस्पाको त्याग कर उ: सस्थान अति आकार विशेष जिनके नहीं रहे वे सिद्ध हैं, वे अनंत है, तिनके सदृश व्यवहार काल भी अनंत बीता है अनागत काल भी भविष्य सिद्धोके समान अनत है। यह गाथा जो असंख्यात आवलि शब्द है उसका यहां प्रकरणके वशसे अनंत आवति अर्थ है ऐसा विदित होता है । व्यवहार काटके भेद श्री पंचास्तिकायमें भी ऐसे ही कहे हैं। टीकाकार कहते हैं कि यह व्यवहार काल जो समय, निमेष, काटा, कला, नाटी, आदि दिवस वर्ष आदि भेदसे प्रगट होता है, उस व्यव- हार काटसे मुझे कोई फलमी प्राप्ति नहीं होती है । मुझे तो निज उपमा--- रहित परम एक आत्मीक तत्त्वको छोड़कर और कोई नहीं है जिससे वास्त- विक फलका लाभ हो । भावार्थ-कालका विकल्प मात्र शेयरूप है।

- "अर्थात्-टोकाकाशके एक एक प्रदेशमें रलोकी राशि समाव ओ काठाणु एक एक करके व्याक्ष हे सो कालाणु आकाशक असंन्यात नियमसार- उपादेय नहीं है । उपादेयरूप तो एक अपना शुद आमीक तत्त्व ही है। और कोई नहीं अब मुम्न्यकालको कहते है:- जीवादु पुग्गलादो, ऽणंतगुणाचावि संपदा समया। लोयायासे संति य, परमडो सो हवे कालो ॥३२॥ सामान्य अर्थ-जीवांस पुदल अनंत गुगे हैं वैसेही पुटसे अनंत गुणे कालके समय भी हैं । जो कालाणु टोकाकाशमें तिछे हैं वे कालागु परमार्थ यानी निश्चय काल है। विशेष अर्थ-इस माथामें मुख्य काठका वर्णन है । जोराने अनंत गुणे पुल हैं, मुगलोंसे अनंत मुगे काठके समय हैं। यह समय व्यवहार काल । परन्तु कालके अणु जो टोकासके एक एक प्रदेशमें अलग अलग तिटे हुए हैं वे परमार्थ यान्न निश्चयकाल हैं। ऐसा ही श्रीप्रवचनसारमें कहा है उस गायाने समय शब्दसे मुख्य काठ जो काटाणु उसका ही सरूप कथन किया है । समय नाम व्यवहार काटरूप समय उसका पादान कारण जो समय अर्थात् कालाणु सो अव्यपदेश अर्थात् दिन्नी- यादि प्रदेश रहित है । अर्थात् कालाणु एक प्रदेशी है । दूसरे काम ओंसे जुड़ा हुआ नहीं है । सो कालाणु परिणमनका सहकारी है, छ हेतुसे वर्तन करता है । एक प्रदेश मात्र पुदल जातिधारी जो पत्र व्य मंदगतिसे आकाश द्रव्यके अन्य दूसरे प्रदेशको जाता है जिस प्रदेशमें कालाणु व्याप्त है। इस परमाणुके इस वर्तनरूप कार्यनं काला सहकारी है । द्रव्योंका वर्ताना उदासीन रूपये प्रवर्तनमें सहाई होन्य काटाणुरूप निश्चयकालका कार्य है । अन्य अन्यमें कहा है:- भजीराधिकार दो मान म rk. । माही मार्गका है असलम भारसे पापोरा परिमन नहीं हो सकता। Forना सहर समता है. न उसी पाप हो सकती साहिबा भाव हो । टीकार करते है कि में मनाने पर धरण है, THEIR नो मोरे य. तह सम है। इस दम्परिन्ग पर अस्ति- म बन अन्य सासनहीं हो सकता । सिसानासी पलिये भाग, पुल, प, धर्म. भाग, सहोदन्य सिर है, इसलिये सपरिमारनेवाय है 1 भाषा-सीतराग रति सि- जान्न भन्दापना नहीं सकता। इसलिये उनसे आगम्मे पणित पदार्थ सत्य है। यही विषय मात्महिताना योग्य है। फिरभीर विषय जाता है:- जीवादीदपाण, परिपाणकारण हो कालो। धम्मादिर सणं, महाउगुणपज्जया होति ॥ ३३ ॥ सामान्य-जीवादिदरमा परिवर्तनका जो कारण सो काल दन्य है। तथा धर्म, अधर्म, आश, काल इन पार दयों के स्गभा- विकगण और पर्याय होते हैं। विशेष--इस गापामें सलादिमुख अमूर्ती अचेतन द्रन्योर स्वभावगुण और पर्यायोंका पन है। विधयकालदव्य जीव पहल धर्म अधर्म और आकास इन पांचों दम्योंकी पायोंके परणमन करने अर्थात् बदल में पारण भूत है । इसीलिये इसको परिवर्तन लिंग कहते हैं। धर्म, अधर्म, आक्ष और पाठ अपने में स्वजातीय किसी प्राक व सम्बन्धका अभाव है, इस कारण इनमें विभावगुण पर्याय नहीं होती हैं, परन्तु मात्र स्वभाव गुणपर्याय ही होती हैं। स्वभाव गुण पर्यायोंका पन पहले कहा जा भुत है इसलिये पहा संक्षेपमें कहा का है। उसका भाव अस्तित्व । आस्तित्वके साथ कायत्वको रसनेवाड़े थे नियममार- है। माग- न्यायो स्वाभाविक गुण तास पन कि नानन नाग्में परागी हानि भार पर्याय ही होती हैं। इनका मन मोला जान आगन प्रमाणमे निथप करना योग्य है। टीम ने इस प्रकार पद ल्यों का पट व्याख्यान गो अतिगम के महा गया है सो मन ही रमणीक है, भव्यनीय कानीको अमृत समान है तथा निज सह मनन करनेवा मुनि यांरेलिये यह आनन्दका दाता है। इन पदहन्योका स्वा सदा भन्यजीवोको संगारसे गुभाने लिये कारणरूप है। आगे अस्तिकायको कहते है:- एदे उहव्याणि य, कालं मोतूण अस्थिकायचि । णिदिवा जिणसमये, काया हु बहुप्पदेसत्तं ॥ ३४ ॥ सामान्यअर्थदन रहो द्रव्योंमें कालको छोड़ अन्य पांच इय आस्तिकाय कहलाते हैं, क्योंकि निश्चयकरके इन वा प्रदेशीपना है, इससे कायमंशा है । ऐसा जिनआगममें कहा है। विशेषअर्थ-इस गाथा काठ द्रव्य सिवाय अन्य द्रव्योंके अन्ति कायका वर्णन है। कारद्रव्य दो तीन आदि प्रदेशसि रहित है जो एक ही प्रदेश है । कालके द्रव्यपना ही है । अन्यपांचोंके कायना है ही, क्योंकि ये पाचों कायके समान कायरूप प्रदेशों के समूहको धरने- वाले हैं। अस्तिनाम सत्ताका है। यह सत्ता दो प्रकारकी है एक चातर सत्ता, दूसरी महासत्ता । समस्त वस्तुओंमें विस्तार काके के हुई महासत्ता है। प्रति नियत एक वस्तुमें व्यापनेवाली अवांतर है । महासत्ता सर्व स्वरूपोंमें व्यापिनी है, नियत एकरूपव्यापिनी है । अनंतपर्यायों में रहनेवाली महामना है। प्रतिनियत एक ही पायमें रहनेवाली अवान्तर सचा है।आस्ति नाम रहने - । किन्तु अवांतर सत्ता प्राप्ति अजीवाधिकार पचास्तिम। बालके भस्तिल है परन्तु कायव नहीं है क्योंकि काटदम्प कायके समान बान प्रदेश नहीं है । टीकाकार कहते है कि "यह पट मध्यरूप रत्नमाला जिनमार्गरूपी समरसे पूर्व आचा- म्योने भव्य जीवों का आभग्ण बनाने के लिये श्रीनिपूर्वक उद्धृत की है।" भाचार्य-दन पर दयों का स्वरूप भध्यजीवोंको अपने भ्या- न भठे प्रकार रसना पाहिये । अब ट्रम्पो प्रदेशस्याको कहते है सज्जासंखेज्जा; पंतपदेसा हवंति मुत्तस्स । धम्माधम्मस्स पुणो, जीपस्म असंखदेसा ॥ ३५ ॥ लोयापासे ताय, इदग्स्स अणंतयं हवे देहो। कालस्स ण काय, एयपदेसो हवे जम्हा ॥ ३६ ॥ सामान्य अर्थ-भूतीकदव्य पुद्दटके संख्यात, असंम्यात और अनंत मदेश होते है। धर्म, अधर्म, तथा एक जीव संरय प्रदेश होते हैं। लोगकाशक भी इतने ही है । अटोकाकाशके अनं. प्रदेश है । कालपके कायपना नहीं है, इससे एक प्रदेश ही रोता है। विशेष अर्थ-इन दो गाथाओंमें उहों द्रव्यों के प्रदेशोंका कथन है। शद पहलके परमाणुदास महण किया गया जो आकाश स्थल सो प्रदेश कहटाता है । इस प्रकार पुदल व्यके प्रदेश संख्यात, असं- व्यात और अनत होते हैं। भावार्थ-कोई पुनलका स्कंध दासे आदि ले संख्यात परमाणुओंका, कोई असख्यातका तथा कोई अनतका होता है। लोकामाश, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य तथा एक जीव द्रव्यक असल्यात प्रदेश होते है। अलोकामासके अनंत प्रदेश होते हैं। कालके एक ही प्रदश है, इसी कारण इसके कायपना नहीं है परन्तु द्रव्यपना अवश्य है ही। टीकाकार कहते हैं कि यह पदार्थरूपी रत्नोंका आभरण मैने मुमकि कंठकी शोभाकेलिये रचा है। जो बुद्धिमान है वह इसके - . ।

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घरभावाधिकार गुइभावाधिकार । chute जीवादिरहित्तर्ग, हेपमुपादेयमप्पणो अप्पा । कम्मोपाधिसमुन्मय, गुणपग्लाएहि पदिरत्तो ॥३८॥ मामान्य अर्थ-नीवावि पास तब हय ,स आत्माको निभय- फरक प्रात्मा ही उपादेय है। यह आत्मा की उपाधिसे पैदा होनेवाले गुगपर्यायखि भिम है। विशेष अर्थ-इस गापामें हेय उपादयतादों के स्वरूपका कथन । जीव, अजीत, आम्रव, बंध, संवर, निरा और मोक्ष यह सात तत्व परदग्य स्वरूप हैं इसलिये ग्रहण योग्य नहीं है । जो आरमा स्वाभाविक वैराग्यरूपी महलके शिसरका शिरामणि है, परद्रव्योंसे उदासीन पराङ्मुस है, पंचन्द्रियके विषयों के विस्तारसे रहित शरीर- मात्र परिमहका धारी है, परम जिन अर्थात् पाप विजयी योगीश्वर हे सथा जिसने अपने ही द्रव्यमें अपनी पुद्धिको जोड़ दिया है पेसे वीतराग आत्माकलिये वही आत्मा उपादेय अर्थात् महणयोग्य है। जो ओयिक, औपशामिक, क्षपापशमिक और क्षायक चारों भावोंके अगोचर होनेसे दव्यकर्म ज्ञानावरणादि भावकर्म रागदेपावि नोकर्म बास शरीरादि इन रूप जो उपाधि उससे उत्पन्न हुए जो विभावगुण और विभावपर्याय उनसे रहित है । जो आदि अंतरहित अमूर्तीक अतीन्द्रिय स्वभावसे ही गुद महज पारिणामिक भाव स्वरूप कारण परमात्मा है । ऐसा ही आत्मा उपादेय है । अत्यन्त निकट भन्य जीयोकेलिये ऊपर कहे प्रमाण निन परमात्माको छोड़कर और कोई वस्तु आदेय नहीं है, अर्थात् उनके एक लिन मुद् म्वरूपका ही महण है । टीकाकार .कहते हैं " सर्वतत्त्वोंमें एक सारभूत जो समयसार, अर्थात शुद्ध आत्मा है नि. सा.

नियमसार- द्वारा न्याहार मार्गको जाना कि परको नामो sit: अर अनी के धनसमोर पुग्गठयम मोन,, मुनिपिरहिया इति सेसामि । पणभागो भीओ गाणगुणनिया मेसा ।। मामान्य अर्थ-पल पन्य मनोर, भय | भी मान्यभाष गण feeli Frir HAIR मीरा व्यापार पो) HARI Httituttititle 1. • Anti- - 11 नार withpast aim attititadi titani. " ar .. -- शुद्धभावाधिकार। गुइभावाधिकार । जीवादिवहितचं, हेयमुवादेयमप्पणो अप्पा। कम्मोपाधिसमुन्मव, गुणपज्जाएहिं वदिरत्तो ॥३८॥ सामान्य अर्थ-जीवादि बाह्य तत्व हेय हैं, इस आत्माको निश्चय- करके आत्मा ही उपादेय है। यह आत्मा कर्मकी उपाधिसे पैदा होनेवाले गुणपार्योसे भिन्न है। विशेष अर्थ-इस गाथामें हेय उपोदयतत्वोंके स्वरूपका कथन । जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष यह सात तत्व परद्रव्य स्वरूप हैं इसलिये महण योग्य नहीं है । जो आत्मा स्वाभाविक वैगम्यरूपी महलके शिखरका शिखामणि है, परद्रव्योंसे उदासीन पराङ्मुख है, पचेन्द्रियके विषयोंके विस्तारसे रहित शरीर- मात्र परिमहका धारी है, परम जिन अर्थात् कपाय विनयी योगीश्वर है तथा जिसने अपने ही द्रव्यमें अपनी बुद्धिको जोड़ दिया है ऐसे वीतराग आत्माकलिये वही आत्मा उपादेय अर्थात ग्रहणयोग्य है। जो औदायिक, औपशमिक, क्षयोपशमिक और क्षायक चारों भावोंके अगोचर होनेसे अन्यकर्म ज्ञानावरणादि भावकर्भ रागद्वेषादि नोकर्म बाह्य शरीरादि इन रूप जो उपाधि उससे उत्पन्न हुए जो विभावगुण और विभावपर्याय उनसे रहित है। जो आदि अंतरहित अभूतीक अतीन्द्रिय स्वभावसे ही शुद महज पारिणामिक भाव स्वरूप कारण परमात्मा है। ऐसा ही आत्मा उपादेय है । अत्यन्त निकट भन्य जीवों के लिये ऊपर कहे प्रमाण निज परमात्माको छोड़कर और कोई वस्तु आदेय नहीं है, अर्थात उनके पर निन शुद्ध स्वरूपका ही ग्रहण है । टीपासर कहते हैं " सर्वतत्वोंमें एक सारभूत जो समयसार, अति शुर आमा है .

.. और निजातीय बंधनकी अपेक्षासे जीपलाही अशाना । दीकाकार रहत.6 जिस भयोलम मुरासपी Hina नियमसार- द्वारा व्यवहार मार्गको जानकर फिर शुब मार्गको जानो अर्थात भव करो। अब अजीव दन्यके कथनको सोचते हैं:- पुग्गलब मोतं,, मुत्तिविरहिया इयंति सेसाणि । चेदणभावो जीओ चेदणगुणवजिया सेसा ॥ २५॥ सामान्य अर्थ-पुबल द्रव्य मूर्ती है, अन्य शेष मुगिहा है। जीर चैतन्यभावधान है। शेष चैतन्यगुणसे रहित है। विशेष अर्थ~स गापा भनी या सही है। बव्यभि पङ्गल अध्यको ही मूर्तिभतपना है। शेष नी धर्म xvi आश तथा काल मूर्तिपनेसे रहिन अनीता नपनाम:१६ नीमय ही है । अन्य पांचोयना पति it है। परन्तु धर्माकिनार बन्यों विशेषगुण ही गोमासे 47 सीमावली उत्पन्न प्रकाशमान हो, निर्मल मुनि पारीमा यी मालमvi 441 44 भयान मारमा प्राधमान तामको माnel नही । भाग -4 पोमra को दी MAI #in 4 आत्मा iii. MPIREHRA समान, 64 {Mitrina Aur AirATHd Minilaiamriticipat Maai ke merit। + शुदभावाधिकार । . शुभावाधिकार । AM जीवादिवाहित्तचं, हेयमुवादेयमप्पणो अप्पा । कम्मोपाधिसमुभव, गुणपज्जाएहि वदिरत्तो ॥३८॥ सामान्य अर्थ-जीवादि बाह्य तत्त्व हेय हैं, इस आत्माको निश्चय- करके आत्मा ही उपादेय है। यह आत्मा कर्मकी उपाधिसे पैदा होनेवाले गुणपायोंसे भिन्न है। विशेप अर्थ-इस गाथामें हेय उपोदयतत्त्वोंके स्वरूपका कथन है । जीव, अगिब, आम्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष यह सात तव परद्रव्य स्वरूप हैं इसलिये ग्रहण योग्य नहीं है । जो आत्मा स्वाभाविक वैराग्यरूपी महलके शिखरका शिखामणि है, परद्रव्योंसे उदासीन पराइमुख है, पचेन्द्रियके विषयोंके विस्तारसे रहित शरीर- मात्र परिग्रहका धारी है, परम जिन अर्थात् कपाय विजयी योगीश्वर हे तथा निसने अपने ही दन्यमें अपनी बुद्धिको जोड़ दिया है ऐसे वीतराग आत्माकलिये वही आत्मा उपादेय अर्थात् ग्रहणयोग्य है। जो औदायिक, औपशमिक, क्षयोपशमिक और क्षायक चारों भावोंके अगोचर होनेसे द्रव्यकर्म शानावरणादि भावकर्म रागदेपादि नोकर्म बाह्य शरीरादि इन रूप जो उपाधि उससे उत्पन्न हुए जो विभावगुण और विभावपर्याय उनसे रहित है। जो आदि अंतरहित अमूर्तीक अतीन्द्रिय स्वभाव से ही शुद सहज पारिणामिक भाव स्वरूप कारण परमात्मा है । ऐसा ही आत्मा उपादेय है । अत्यन्त निकट भव्य जीवोकेलिये ऊपर कहे प्रमाण निज परमात्माको छोड़कर और कोई वस्तु आदेय नहीं है, अर्थात् उनके एक निन शुद्ध स्वरूपका ही ग्रहण है । टीकापर कहते हैं " सर्वतत्त्वों में एक सारभूत जो समयसार, अर्थात् शुद आत्मा है कि. मा- विषमसार- धमकी नगन। मा गमगार, सम्पूर्ण ठिय अर काम गरे। निताने निणे योग्य नामदेवको निनने अम्न र । पापमपी TAB मानेको टार मान ३, शुर गाना मानो मातार है, आननी समुद्रमे परिपूर्ण है. नपा शक्ष्मी सारसमुद्रमे पार हो तुम है। भावार्थ-हितकोंकी पसानी सा परमात्मा को ध्यान लेर अनुमा करना योग्य है । हि भीत:-- जो सलु सहायठाणा, णो माणवमाणमावठाणा वा। जो हरिसमायठाणा,णो जीवस्स हारिस ठाणा या॥३९॥ सामान्य अर्थ-म समयसार निश्यक न तो कोई समाव स्थान है न मान अपमानरूपी भारम्यान न हर्षभावस्य स्थान है और न अर्पभाररूप स्थान हैं। विशेषार्थ-इस गापा निर्विकल्प तत्य स्वरूपमा वर्णन है । भविष्य वर्तमान तीन कालमें जो निरुपाधि स्वभाव है अर्थात् जिसके कोई पर न्यसम्बन्धी उपाधि नहीं है, ऐसा जो शुद्ध जीवास्तिकाय है उसके निश्चयकरके कोई विभावरूप स्वभावस्थान नहीं है। शुभ अशुभ सर्व ही मोह, राग और देषके अभावसे उस शुद्ध भीवके मानअपमानके कारण- भूत कोई कर्मके उदयस्थान नहीं है । न निश्चय करके उसके शुभो- पयोगरूप परिणति होती है । इसलिये शुभकर्मका बंध नहीं होता। शुभ कर्मक न होनेसे संसारीक असारसुस नहीं होता, सासारिक सुसके अभाव होनेसे उस शुद्ध जीवके कोई हर्षके स्थान नहीं है । इसीप्रकार उस शुद्धजीवके अशुभोपयोगकी परिणति नहीं होती इस कारण अशुभ कर्मका ध नहीं होता ! अशुभकर्मके अभावसे दुःस नहीं होता । दुःख न होने से उस शुद्ध आत्माके कोई अहर्ष अर्थात् निरानन्द (दुस- स्थान नहीं होते । टीकाकार कहते हैं कि "हे भव्यजीव; यदि तू - शुद्धभावाधिकार। । इस दुःखरूप संसारसे हटकर सुखकी इच्छा करता है तो तू क्यों नहीं अपनी बुद्धि उस आत्मामें करता, जो प्रीति अप्रीतिसे रहित अविनाशी पदमें विराजमान है । जो सर्वथा अंतर्मुख होकर भेदरहित उदयमान सुसमई निराकार प्रकाशमान है। जिसका निर्मल शरीर चैतन्यअमृतसे परिपूर्ण मरा हुआ है । तथा जो आत्मस्वरूप सोनियोंके ही ध्यानके गोचर हे"। भावार्थ-~-भन्यजीवको उचित है कि निरन्तर ऐसे ही उत्कृष्ट स्वभा- ववाले आत्माका मननकर अद्भुत और अनुपम सुखकी प्राप्ति करे। फिर भी कहते हैं- णो ठिदिवंधहाणा, पयदिवाणा पदेसठाणा था। णो अणुभागहाणा, जीवरस ॥ उदयठाणा वा ॥४०॥ सामान्य अर्थ---उस शुद्ध जीवास्तिकायके न तो कोई स्थिति- बंध स्थान है, न प्रकृतिवध के स्थान है न प्रदेश बंधके और न अनुभाग- बधके स्थान है तथा उसके को उदयस्थान भी नहीं हैं। वि-पार्थ-दस गाधामें बंध व उदयके अभाव स्वरूपका कथन है। उस शुद्ध जीवात्माके कपायरूप स्थितिबंधका कारण ऐसे कोई स्थितिबंध स्थान नहीं है अर्थात् जब आत्मा कोका बध होता है तब उसमें आत्माके साथ उन कमौके संबंध रहनेकी मिशदका नाम स्थितिबंध है। उस आत्माके स्थितिको लिये हुए कोई स्थिति बंधरुप कर्म नहीं है । और न स्थितिबंधका कारण कोई कपायस्थान है। न उस आत्मा शानावरण आदि अष्टममरूप होने योग्य पुद्गल द्रव्यों का स्वीकाररूप प्रकृतिबंध है। और न उसके कारण योगस्थान है। अशुद्धआत्माकी सचामें कर्मवर्ग- णारूप पुदलोंका परस्पर प्रदेशोंमें प्रवेश होजाना सो प्रदेश है। उस सुदआत्माके न ता यह बंध है और न इस बंधक योग्य योगस्थान ही है। शुभभभ कम्मोकी जर निर्जरा होनेगा समय आता है तब वे - सामान्य अर्थ-उस शुद्ध जीवास्तिकायके न तो क्षायिभावक नियममार- सुरानुसका फल पान जाते हैं उसममय निम शकिसे कदमदान होता है उस भनिता नाम अनुभाग बंध है, उस शुद्धआत्माने इस अनुभाग पंका और इमारण कायम्मानका जगभी आमा नही है। और न म निर्मर आकाश सहश आत्मामें द्रव्यर्म और माम उपयरूप स्थानीयही रहने की जगह है। ऐसा ही श्री अमृत- चन्दरिने कहा है:-"जिस आत्मामें बद्ध और पशेमावको लिये हुए कर्म प्रगटापसे ऊपर ही ऊपर रहते हैं उसमें धान करनेकप प्रति- छाको नहीं प्राप्त करते, तया जो सर्व तरफसे प्रकाशमान है ऐसे आत्माको जगतका सम्पूर्ण मोह छोड़कर हे भन्यजीव तू अनुमा कर । कैसा आत्मा, जो सम्यम्यभावरूप है । "साही टीकाकार भी कहते हैं। "मैं उस चैतन्य पदका अतिशय करके अनुभव करता है जो नित्य शुद चिदानंदमयी संपदाकी सानि है उत्कृष्ट है । और विपदाओं स्थान नहीं है । अर्थात् जिसमें किसी प्रकारकी आपत्ति नहीं है । जो भव्यजीव सर्व कर्मरूपी विषवृक्षमे पैदा होनेवाले अपने आत्माके रूपने विलक्षण सांसारिक फलांको त्याग स्वाभाविक चतन्यस्वरूप अपने आत्मतत्त्वको इससमय भोगता है वह भव्यजीव शीघ्र ही मुक्तिको प्राप्त करता है । इसमें कौन जीव संशय कर सकता है ।। भावार्थ- जो कोई इन्द्रियजनित विषयसूसोंको विषके समान जानकर त्यागता है और अपने आत्मीकतत्त्वका अनुभव करता है वहीं जीव कोकी निर्जरा करता हुआ कुछेक भवोंमें मुक्तिको प्राप्त कर सकता संदेह नहीं करना चाहिये। फिर भी कहते है:- णो खइयभावठाणा, णो सयउवसमसहावठाणा वा। ओदइयमावठाणा,णो उवसमणो सहावठाणावा॥४१॥ । । इसमें 14 . पदभावाधिकार ५३ murg स्थान हैं, न क्षयोपशमभाव स्थान है, न औदायिक भावके स्थान है और न उपशमभावके स्थान हैं। विशंप अर्थ-इस माथामें चार विभाव स्वभावोंके कथनके द्वारा पंचम भावका व्याख्यान है । कमो के क्षयसे जो भाव उत्पन्न हो सोक्षायिक भाष है, जैसे सात प्रतियाँके क्षयसे क्षायिक सम्यक्त होता है व चारित्र मोह- नीके नाशसे क्षायिक चारित्र होता है। कोके क्षयोपशमसे जो पैदा हो वह क्षयोपशमिक भाव है अर्थात् सर्व पातीके उदयाभावरूप क्षयसे तथा सर्व पातीके उपशमसे तथा देश पातीके उदयसे जो भाव हो सो क्षयोपशम भाव है, जैसे उ प्रकृतियोंके उपशम तथा सम्यक्त मोहनीके देशपाती म्पर्धकोंके उदयसे क्षयोपशम सम्यक्त होता है । जो भाव कोके उदयसे होता है सो औदयिक भाव है, जैसे नर्कगतिके उदयसे नारकी । कोक उपशमसे जो भाव हो सो औपशमिक भाव है, जैसे सात प्रतियोंके उपशममे उपशम सम्यक्त होता है । सर्व कर्मरूपी उपा- घिसे रहित जो भाव आत्माके स्वाभाविक परिणाममें हो सो पारिणामिक भाव है । इन पांच भावोंमें औपशमिक भाव दो प्रकार, क्षायिक भाव नो प्रकार, क्षयोपशम भाव १८ प्रकार, औदयिक भाव २१ प्रकार तथा पारिणामिक भाव तीन प्रकारका है। औपशमिक भावोंके दो भेद है, एक उपशम सम्यक दूसरा उपशम चारित्र । क्षायिक भाव नौ प्रकार है, क्षायिक सम्यक क्षायिक चारित अर्थात् यथास्यात चारित्र, केवलशान, और केवल दर्शन तथा अतराय कर्मके नाश होनेसे पैदा होनेवाले अनंतदान अनतलाभ, अनत भोग, अनंत उपभोग और अनतवीर्य है । क्षायोपशमिक भावके १८ भेद यह है:-मति, श्रुत, अवधि, मन पर्याय ऐसे ज्ञान ४ कुमति, कुभुत और विभा अवधि ऐसे अज्ञान तीनाचा,अचक्षु,अवधि एसे तीन दर्शन । काल, करण, उपदेश, उपशम और प्रायोग्यता ऐसी पाच लधियो अर्थात् काल सन्धि जिसको क्षयोपशम सन्धि भी कहते

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सामान्य अर्थ-उस शुद्ध जीवास्तिकायके न तो क्षायिकभावने।
नियमसार-
सुससका फल पान जाते हैं उसममय जिस शक्तिम दमदान
होता है उस मनिका नाम अनुभाग है, उस गुदमामाने इस
अनुभाग सका और मर गायम्यानॉग जग भी आकारा
नहीं हैं। और न इस निर्म: आम महश आत्मा द्रव्यम और
भात उदयरूप स्थानांके ही रहने की जगह है। ऐसा ही श्री अमृत-
पन्द्रमरिने कहा है:-" जिस आत्मामें बद्ध और स्पर्शनावको दिये
हुए कर्म प्रगटरूपमे ऊपर ही मार रहते हैं उसमें स्थान करना पति-
धाको नहीं प्राप्त करते, तथा जो सर्व तरफसे प्रकाशमान है ऐसे आत्माको
जगतका सम्पूर्ण मोह छोड़कर हे भव्यनीव तु अनुभव कर । ईसा
आत्मा, जो सम्यकम्यभावरूप है।" ऐसाही टीकाकार भी कहते हैं।
"मैं उस चैतन्य पदका अतिशय करके अनुभव करता हूं जो नित्य
शुद्ध चिदानंदमयी संपदाकी सानि है उत्कृष्ट है । और विपदाओंका
स्थान नहीं है। अर्थात् जिसमें किसी प्रकारकी आपत्ति नहीं है। जो
भन्यजीव सर्व कर्मरूपी विषयक्षमे पैदा होनेवाले अपने आत्माके रूपसे
विलक्षण सासारिक फलोंको त्यागका स्वाभाविक चैतन्यस्वरूप अपने
आत्मतत्त्वको इससमय भोगता है वह भव्यजीव शीघ्र ही मुछिको
प्राप्त करता है । इसमें कौन जीव संशय कर सकता है " भावार्थ-
जो कोई इन्द्रियजनित विषयसुखोंको विषके समान जानकर त्यागता
है और अपने आत्मीकतत्त्वका अनुभव करता है वही जीव कोकी
निर्जरा करता हुआ कुछेक भर्मि मुक्तिको प्राप्त कर सकता है । इसमें
संदेह नहीं करना चाहिये।
फिर भी कहते हैं:-
णो खइयभावठाणा, णो खयउवसमसहावठाणा वा।
ओदइयमावठाणा,णोउवसमणोसहावठाणा वा ॥४१॥

शुरभावाधिकार स्थान है, न पायामभाषक दान है, न औदायिक भाव स्थान है और उपदामभाष यान हैं। । वि अर्थ-मामे या विभाव स्वभा पन के द्वारा पचम भारा प्यार-मान है । को क्षयम नो भाव उत्पन्न हो सोक्षायिक भाव मा प्रतिमौके क्षयंसे शापिक सम्यक होता है य शारिन मोह- मी नापामे सायिक पारित होता है। मौके क्षयोपशमस नो पेदा हो यह क्षयापामिक भाव है अर्थात सर्व पातीक उमयाभावरूप क्षयसे नया सई पातक उपशमसे तथा देश पातीके उद्यमे जो भाव हो सो क्षयोपशम भाव है, जमे उ मातियो उपशम तथा सम्यक मोहनीक देशपाती म्पर्धकार उदयसे क्षयोपशम सम्पत होता है। जो भाव कमों के उदय होता है सो आदयिक भाव है, जैसे नर्कगतिक उदयसे नारकी । सो उपभमसे जो भाव हो सो औपशमिक भाव है, जैसे सात मानियाक उपशमसे उपशम सम्यक होता है। सर्व कर्मरूपी उपा- धिमे रहित जो भाव भात्मा म्वाभाविक परिणाम हो सो पारिणामिक भाव है। इन पनि भाशे ऑपशमिक भाव दो प्रकार, क्षायिक भाव नो प्रकार, क्षयोपशम भाव १८ प्रकार, औदायिक भाव २१ प्रकार तथा पारिणामिक भाव तीन प्रकारका है। औपशामिक भावोंके दो भेद है, एक उपशम सम्यन मग उपशम चारित । क्षायिक भाव नौ प्रकार है, क्षायिक सम्यक्त क्षायिक पारित अर्थात् यथारयात चारित्र, केवलज्ञान, और कंवट दर्शन तथा अतगय कर्मके नाश होनसे पैदा होनेवाले अनंतदान अनतलाभ, अनत भोग, अनंत उपभोग और अनंतवीर्य है । क्षायोपशमिक भावके १८ भेद यह है:-मति, श्रुत, अवधि, मन पर्याय ऐसे शान ४ कुमति, कुभुत और विभग अवधि ऐसे अज्ञान तीन। चच,अचक्षु,अवधि एसे तीन दर्शन । काल, करण, उपदेश, उपशम और प्रायोग्यता ऐसी पांच लधिया अर्थात् काल ठन्धि निसको क्षयोपशम लब्धि भी कहते सामान्य अर्थ-उस शुद्ध जीशस्तिकायके न तो क्षाविका नियमसार- सुखदुखरूप फल प्रदान करते हैं उससमय जिस शक्तिले फरमदान , होता है उस शक्तिका नाम अनुभाग बंध है, उस शुदआत्मामें इस अनुभाग बंधका और इसके कारण कषायस्थानोंका जरा भी अवकाश नहीं है । और न इस निर्मल आकाश सदृश आत्मा द्रध्यकर्म और भावकर्मके उदयरूप स्थानोंके ही रहनेकी जगह है । ऐसा ही श्री अमृत- चन्द्रसूरिने कहा है:-"जिस आत्मामें बद्ध और स्पर्शभावको लिये हुए कर्म प्रगटरूपसे ऊपर ही ऊपर रहते हैं उसमें स्थान करनेरूप प्रति- टाको नहीं प्राप्त करते, तथा जो सर्व तरफसे प्रकाशमान है. ऐसे आत्माके जगत्का सम्पूर्ण मोह छोड़कर हे भव्य व तू अनुभव कर । केसाई आत्मा, जो सम्यकस्वभावरूप है।" ऐसाही टीकाकार भी कहते हैं। " मैं उस चैतन्यके पदका अतिशय करके अनुभव करता हूं जो नित्य शुद्ध चिदानंदमयी संपदाकी खानि है उत्कृष्ट है । और विपदाओं का स्थान नहीं है । अर्थात् जिसमें किसी प्रकारकी आपत्ति नहीं है । जो भव्यजीव सर्व कर्मरूपी विपवृक्षमे पैदा होनेवाले अपने आत्माके सरसे विलक्षण सांसारिक फलोंको त्यागकर स्वाभाविक चैतन्यस्वरूप अपने आत्मतत्त्वको इससमय भोगता है वह भव्यनीव शीघ्र ही मुक्रिम प्राप्त करता है । इसमें कौन जीव संशय कर सकता है। भावार्थ-- जो कोई इन्द्रियजनित विषयमुसोको विपके समान जानकर त्यागना है और अपने आत्मीकतत्त्वका अनुभव करता है वही जीर कोकी निश करता हुआ कुछेक भवोंमें मुक्तिको प्राप्त कर सकता है। इसमें संदेह नहीं करना चाहिये। किर भी कहते है:-- यो सइयमावठाणा, गोरापउवसमसहावठाणाया। औदइयमावठाणा,णो उपसमणो सहायठाणा या॥४१॥ - ।

परमाvिe ५३ १५० 2, याममा धान, न THEIमभादान। ओयिक भार पान? Pain अ-मामे पार विमान समापन भाग पंचम भाषामा पान है। मौसम जो भार पहाधिक भाव गान गरिय वायिक सम्पकता पारिख मोह- HINRNA होता है। मापसम नोहा बह भारत मा पा उपाभाररूप क्षयम या उपशमसे तथा देश पातीक उपसे जो भाव हो सो याराम भार है, जब उ मानियो म नया सम्यक मोहनी समानी उदयसे पराम उम्पक होता है। जो भार मो. उदयमे को औरपिक मार है, जैसे नईगतिक उमयस नारसमा उपास जो भाव । सो औपभामिक भाव है, जैसे कात मातियाँ उपमम उपसम सम्पन होता है । सर्व धर्मरूपी उपा- महिला भार भामा स्वाभाविक परिणममें हो सो पारिणामिक भी है। इन पांच भायो ऑपशामिभाव दो प्रकार, शायिक भाव नो प्रकार, क्षयोपशम भाव १८ मार, ऑयिक भाग २१ प्रकार तथा पारिणामिक भाव तीन प्रकारका है। औपशमिक भावके दो भेद है, एक उपम सम्पन दूसग उपशम चारिता क्षायिक भाव नौ प्रकार है, क्षायिक सम्पत क्षायिक पारित अर्थात् पचास्यात पारित, केवलशान, और संचल दर्शन तथा अराप दम नाश होने से पैदा रोनेगले अनतदान अनतराभ. अनेत भोग, अनंत उपभोग और अनंतीय है ।क्षायोपशमिक भाव १८ भेद यह है:-मति, भुत, अधि, मन पर्याय देसे शान ४ कुति, भन और विर्भग अवधि ऐसे अज्ञान तीना पच,अचक्षु अवधि ऐसे तीन दर्शन । पाट, करण, उपदेश, उपशम और प्रायोग्यता ऐसी पाच लब्धियो अर्थात् काल सन्धि जिसको क्षयोपशम सन्धि भी कहने . ।

सामान्य अर्थ-उस शुद्ध जीवास्तिकायके न तो क्षायिकभाक्के नियममार- मुसगरूर कल पान जाते हैं उसममय निस किसे फटरदान होता है उस शकिा नाम अनुभाग वध है, उस गुदमारमाने इड अनुभाग का और इमो कारण उपायस्यानोका जग भी अत्रकार नती है। और न इस निर्मल आकाश सहस आमा दव्यकर्म और माम्म उदयरूप स्थानों के ही रहने की जगह है। ऐसा ही श्री अमन- चन्द्रमरिने कहा है:-"निस आत्मामें बद्ध और स्पर्शनावको निचे हुए कर्म प्रगटरूपमें ऊपर ही ऊपर रहते हैं उसमें स्थान कग्नेकर प्रति धाको नहीं मान करते, तया जो मईतरफसे प्रकाशमान है. ऐसे मामा जगतमा सम्पूर्ण मोह छोड़कर है भन्यजीव तू अनुभव करमा है आत्मा, जो सम्यगम्वभावरूप है।" ऐसाही टीकाकार भी कहते हैं। "मैं उस चैतन्यके पदका अतिशय का अनुभव करता हूं जो नित्य शुद्ध चिदानंदमयी संपदाकी सानि है उत्कृष्ट है । और विपदाओंभ स्थान नहीं है । अर्थात् जिसमें किसी प्रकारकी आपत्ति नहीं है । जो भव्य जीव सर्व कर्मस्पी विपक्षने पैदा होनेशले अपने आमाके रूपले विलक्षण सांसारिक फलोको त्यागकर स्वाभाविक चैतन्यस्वरूप अपने आत्मतत्त्वको इससमय भोगता है वह भव्यजीव शीघ्र ही निको प्राप्त करता है । इसमें कौन जीव संशय कर सकता है " । भावार्थ- जो कोई इन्द्रियजनित विषयमुखोंको विपके समान जानकर त्यागता है और अपने आत्मीकतन्त्रका अनुभव करता है वही जीव कोको निर्जरा करता हुआ कुछेक भोंमें मुक्तिको प्राप्त कर सकता है । इसमें संदेह नहीं करना चाहिये। फिर भी कहते हैं:- णो खइयभावठाणा, णोखयउवसमसहावठाणावा। ओदइयमावठाणा,णो उवसमणो सहावठाणा वा ॥४१॥ - परभाnirm " at the ete भाषा सिम सपो याम का एक मात्र HTTERm fult माruti TAgerwistian Hit HD REEST HIATTEmeritafat RECr any Aamir Ma Hanfrauahine ANum hath मादाLin 1. मो. सामानामें ka it? री भाग HIR Ru Swam ka irrermins मारना परमामयमंममर्ण, जाजरामाणगंयमीका प कुटमणिनीपमागण, ठाणाजीवामनामन्ति ॥१२॥ मामान्यपुर Nita नाम: • AI, AmirtictINपनि सम्मान मी माणाभी tate-बाधा पनि मापन httyRiR SAR tatt | पह परमा ANTRA भार वर्मा नहीं करता इस सण नारब, मनुष्य मोरवसा चार मतियो भन न राता। पर नियर विहानंदापी कारण परमात्मस्वरूप है अर्थात दान पर परमामाता है। जीव दस्यक माग पोग्य बिमारिणति होती है मरियम जन्म उग, मरण, गग और कफ नहीं है। इस भार पनि संघ नामोयल और पानिः बिल है। कुल और पानिक ५४ नियमसार- हैं, दूसरी उपशम अर्थात् विशुद्धि लन्धि, तीसरी उपदेश अर्थात् देशना लब्धि, चौथी प्रायोग्य लन्धि, पचमी करण उन्धि, श्योपशन सम्पत और क्षयोपशम चारित्र तथा संयमासंयम परिणति ये १८ भेद भयो- पशम भावके हैं । औदयिक भाव २१ प्रकार इस मांति है:-नारक तिर्यञ्च, मनुष्य, देव ऐसे चार गति, ओघ मान माया टोम ऐसे ४ कपाय। स्री, पुलिंग, नपुंसक ऐसे तीन लिंग, सामान्य संग्रहनयकी अपेक्षासे निच्या दर्शन एक, अज्ञान एक, असंयम एक, असिद्धत्त्व एक, शुक्ल, पा, पीत, कापोत, नील, कृष्ण ऐसे छः टेश्या । पारिणामिक भाव १ प्रकार हैं जीवत्व परिणामिक, भव्यत्व परिणामिक और अभव्यत्व परिम- मिक । इनमें जीवत्व परिणामिकभाव भव्य अभव्य दोनोंक होता है । भव्यत्वभाव भन्योहीके और अभव्यत्व अभन्यहींके होता है । इसका पांचपकार भावोंके ५३ भाव है। इन पांच भावोंके कमें क्षायिकभाव तो कार्यसमयसार म्वरूप है । यह कार्यरूप मार तीर्थकर उपलक्षणसे सामान्य केवटी अथवा सिद्ध होता है । जे ? तीर्थकर, तीन लोकके प्रक्षोभके कारण भूत तीर्थकरपनके प्रकार निर्मल केवलज्ञान जिनको प्राप्त हुआ है । औदयिक, ऑपशनिक, और क्षयोपशामिक, ये भाव संसारियोंहाके होते है । मुक जीवोंके ये भाव नहीं होते । परन्तु वे चारों ही भार बोके आर. रणकी अपेक्षासे होते हैं । इसलिये ये चारों ही मुनि के कारण नहीं हैं। तीनों कालमें जिसको किसी प्रकारकी उपाधि नहीं है ऐमा निर• पारि निरंजनरूप जो अपना ही शुद्ध पारिणामिक परम भार है - होकी भावना करने में मुमुधुनीव मोक्षरूप पंचम गतिमं जाने है, जाने दारा सन ॥ . .. . त Intensitiatirits RI.. होनेकी अवस्था निट आता तकाकार कहते है नि. शान, efaऔर वीरसेपर आधागे आपणेाले विकास गरी पा र एक चमभारदको मोक्ष म नियम हैं । और फिी माया पनन नहीं Frusis भोगी भाररिये भागकर भून समार परमवापानी मनि देते है और परम समयमाररूप सारभूत अपने मन की संग मुनि मान लिये भरते हैं इसमें भनमा दाप है । अर्थात वही निदोष कार्य?"भायाध-मुनीश १५ पुण्यको भी हय राम और पुर र मारभाभारनामें एनसीन रहते । ही भावना पर समावर प्रगट होनेरोठिये VIE REAण है इसलिये मोक्षपदाको स्वापभावना पउगइभवसंममणं. जाइजरामरणरोपसोका य । फुटजाणिजीपमग्गण, ठाणा जीयरस णो सन्ति ॥४२॥ मामान्यभनम शुर नीदक भार मतिमें भ्रमण नहीं है, न इसके जन्म, जग, मरण और शोक है । तथा इसके बुट, पोनि, जीवसमास और मा स्थान भी नहीं है। विशेष अर्ध-म गाथा शुर विपनपकी अपेक्षा यह कथन है सिद्ध जीव समस्त संसारके शिकार नहीं है। यह मुद जीवा- निकाय द्रव्य कर्म और भाव कर्मको स्वीकार नहीं करता इस कारण नारू, तिबंध, मनुष्य और देव ऐसी चार गतियों में भ्रमण नहीं करता। यह आत्मा नित्य युद्ध विद्वानंदरूप है कारण परमात्मस्वरूप है अर्थात् साकेही प्यान करनेसे परमात्मा होता है। न इस जीवक द्रव्यकर्म भाषकर्मकहाण योग्य विभावपरिणति होती है इसलिये इसके जन्म, नग, मरण, रोग और शोक नहीं है । न इसके चार मति संबन्धी जी योग्य कुल और पानिके विकल्प हैं । कुल और योनिके भेद नियमसार- हैं, दूसरी उपशम अर्यात विशुद्धि लब्धि, तीसरी उपदेश अर्थात् देशना लाधि, चौथी प्रायोग्य सन्धि, पंचमी करण लन्धि, क्षयोपशम सम्यक और क्षयोपशम चारित्र तया संयमासंयम परिणति ये १८ भेद भयो- पशम भावके हैं । औदयिक भार २१ प्रकार इस भांति है:-नारक तिर्यध, मनुष्य, देव ऐसे चार गति, कोधमान माया टोम ऐसे ४ कशाय! भी, पुलिंग, नपुंमक ऐसे तीन लिंग, सामान्य संग्रहनयकी अपेक्षासे मिथ्या दर्शन एक, अज्ञान एक, असंयम एक, असिद्धत्त्व एक, शुल, पा, पीत, कापोत, नील, कृष्ण ऐसे छः लेश्या । पारिणामिक भाव ३ प्रकार है जीवत्व परिणामिक, भव्यत्व परिणामिक और अभव्यत्व परिणा- मिक । इनमें जीवत्व परिणामिकमाव भव्य अभव्य दोनोंके होता है । भन्यत्वभाव मव्योंहीके और अभन्यत्व अभव्यहीके होता है । इस प्रकार पांचप्रकार भावोंके ५३ भाव है। इन पांच भावोंके बीच में क्षायिकभाव तो कार्यसमयसार स्वरूप है । यह कार्यरूप मात्र तीर्थकर उपलक्षणसे सामान्य केवली अथवा सिद्ध होता है । कैसे हैं तीर्थकर, तीन लोकके प्रक्षोभके कारण भूत तीर्थकरपनेके द्वारा सम्पूर्ण प्रकार निर्मल केवलज्ञान जिनको प्राप्त हुआ है । औदयिक, औपशमिक, और क्षयोपशमिक, ये भाव संसारियोंहीके होते हैं । मुक्त जीवोंके ये भाव नहीं होते । परन्तु वे चारों ही भाव कर्मोके आव- रणकी अपेक्षासे होते हैं । इसलिये ये चारों ही मुक्ति के कारण नहीं हैं। तीनों कालमें जिसको किसी प्रकारकी उपाधि नहीं है ऐसा निह. पाधि निरंजनरूप जो अपना ही शुद्ध पारिणामिक पंचम भाव है उस- हीकी भावना करनेसे मुमुक्षुजीव मोक्षरूप पंचम गतिमें जाते हैं, जायो और गए है । भावार्थ-यहा शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षासे कथन है । जब मुमुक्षु अपने निर्विकल्प शुद्ध स्वभावका अनुभव करता है तब ही कर्मवध शिथिल होते हैं तथा उनकी निर्जरा होती है। और आत्माकी मोक्ष होनेकी अवस्था निकट आती जाती है । टीकाकार कहते हैं कि । .

शुद्धभावाधिकार। 1 "दर्शन, शान, चरित्र, तप और वीर्य ऐसे पांच आचारीको आचरणेवाले विद्वान् लोग सर्व प्रपंचको त्याग कर एक पंचमभावहीको मोक्ष प्राप्त करनेकेलिये स्मरण करते है । और किसी भावका मनन नहीं करते । सर्व पुण्यकर्मको भी भोगी जीवोंकेलिये भोगोंका मूल समझकर परमतत्वाभ्यासी मुनि छोड़ देते हैं और परम समयसाररूप सारभूत अपने तत्त्व स्वरूपको संसारसे मुक्ति प्राप्त करनेकेलिये भजते है इसमें कानसा दोष है । अर्थात् वही निर्दोष कार्य है " । भावार्थ-मुनीश शुभ पुण्यको भी हेय समझते हैं और शुद्ध स्वरूपकी मारभूतभावनामें लवटीन रहते है । यही भावना शुद्ध स्वभावके प्रगट होनेकेलिये परम साक्षात् कारण है । इसलिये मोक्षपद इच्छुकोंको स्वस्वरूपभावना ही कर्तव्य है। चउगदमवसंममणं, नाइजरामरणरोयसोका य । कुलजोणिजीवमग्गण, ठाणा जीवस्स णो सन्ति ॥४२॥ सामान्यअर्थ-इस शुद्ध जीवके चार गतिमें भ्रमण नहीं है, न इसके जन्म, जरा, मरण और शोक है । तथा इसके कुल, योनि, जीवममास और मार्गका स्थान भी नहीं हैं। विशेष अर्थ-इस गाथामें शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा यह कथन है कि इस शुद्ध जीवके समस्त संसारके विकार नहीं हैं । यह शुद्ध जीवा- स्तिकाय द्रव्य कर्म और भाव कर्मको स्वीकार नहीं करता इस कारण नरक, तिर्यय, मनुष्य और देव एसी चार गतियोंमें भमण नहीं करता। यह आत्मा नित्य शुद्ध चिदानंदरूप हे कारण परमात्मस्वरूप है अर्थात् इमाके ही ध्यान करनेसे परमात्मा होता है । न इस जीवक द्रव्यकर्म भारकर्म के ग्रहण योग्य विभावपरिणति होती है इसलिये इसके जन्म, जरा, मरण, रोग और शोक नहीं है । न इसके चार गति सबन्धी जीवोंके योग्य कुल और योनिके विकल्प हैं। फुल और योनिकै भेद - नियमसार- Awr-umar '. .कहते हैं-पृथ्वीकायिक जीवोंके बाईसलास कोड़ कुल हैं। जलकारिक जीवा सात लाख कोड़ कुल है। तेजकायिक जीवाके तीनलास कोई कुल है । वायुकायिक जावोंके सात लाख कोड़ कुल हैं वनस्पतिकारिक जीवोंके अहाईस लास कोड़ कुल है । दीन्द्रिय जीवोंके सातटात कोर कुल है, तेन्द्रिय जीवोंके आठलास कोई कुल हैं | चौन्द्रिय जीवों के नौलास कोड़ कुल हैं, पंचेन्द्रियोंमें जलचर जीवोंके साढ़े बारह लात कोड़ कुल हैं, आकाशचारी पक्षियों के बारह लाख कोड़ कुल है । चार पैर वाले पशुओंके दश लाख कोड़ कुल हैं, सरीसपोंके नौ लास कोइल हैं, नारकियोंके पच्चीस लाख कोढ़ कुल हैं । मनुष्योंके बारह टास को कुल है, देवोंके छब्बीस लाभ को कल है, मई मिलके एकसौ साडे मत्तानवे लास कोड़ कुल योनियोंके भेद कहते है-......... जलकायिक जीवोंके सात लाख योनिमुस्स हैं । तेनकायिक जीरों के सात लाख योनिमुख है। वायुकायिक जीवोंके सात लाख योनि मुख हैं। नित्य निगोद जीबकि सात लास योनिमुस है । चतुर्गति निगोद जाबों सात लाख योनिमुख है । वनस्पति कायिक जीयोंके दश लास योनिमुन हैं । देन्द्रिय जीवोंके दो टास योनिमुस है । तेन्द्रिय नागके वो ठास योनिमुस है । चौन्द्रिय नीयोंके दो लास योनिमुस है, देवों के कार लारस योनिमुक्त हैं। नारकियोंके चार लास्त योनिमुस है । पिच पंचेन्द्रियों के चार लास योनिमुस है। मनुष्यों के चौदह ठार योनिमुन है। स्थून एकेन्द्री, मम एकेन्दी, संज्ञी पंचेन्दी, असंही मन्दी, सीन्दिय, नन्दिय, चौद्रिय, यह सात प्रकार जीव पर्या और अप- सके भइसे चौदह प्रकार होते है नहींको १४ नीर समास कहते हैं। गति, इन्दिय, काय, यांग, वेद, पाय, शान, संयम, दर्शन, हेमा, मध्य. सम्यक, सज्ञा, आहारक एमएमर मानापान । न समास मार्गनाम्यान आदिमा वा श्रीगोमासार, भावना योग्य शुरभाषाधिकार श्रीभगवान् मार श्रीवादापाप्मनीका यह अभिमाय है कि पर निभय नयकाके उस भगवान् परमामा अर्थात शुच जोगस्ति- पर यह कुल पानि, समास, मार्गना आदिको स्थान नहीं है । ऐसा ही भीभराचंद सरिन रहा है । " सर्व ही चैतन्य शाक्मेि गटी जो पदार्थ है उनकी इस समय त्यागकर तथा प्रगटरूप अपनी चैतन्य मात्र शानिमें मशरक जगत साक्षात् ऊपर ऊपर रहनेवाले ति - हित आमाको अपने आत्मावि यह परमात्मा अर्थात महान आत्मा अनुभव परे । चैतन्य राति से ज्यात सर्वका सारभूत यह आत्मा है, यह इतना ही है इसके सिवाय अन्य सर्व ही भाव पुगल सम्बन्धी है । भावार्थ-पैतन्य शनिका पुन यह आत्मा ही है जगतमें रहते भी जगत पदोंसे भिन्न है। इसलिये इस शुर आत्माका अनुभव कार्यकारी है। टीकाकार कहते है कि" यह आत्मा जो निरतर ऐसी भावना करे कि मैं असंट सानप हूँ तो भयानक संसारसम्बन्धी विक- ल्पको दूर करता है। और निर्विकल्प समाधिको प्राप्त करके सत्ता मात्र रहकर पर परणमनसे दूर तुटना रहित और पापवर्जित अवस्थाको प्राप्त करता है। सरकार श्रीनाथ सकिरसे पपरम्पर अधाका पात करनेको प्रवीण तथा जन्म जरा मरणका नाशक ऐसा उपदेश समझकर सत्य और शीलके जहाज़ जो सन्तपुरुष सो ससार समुदक अगले तटको पहुँच जाते है । कैसे है वीरनाथस्वामी,जिनके चरणारविन्द भनि से भरे इन्दोंके मुकुटोंकी सन रत्नमालाओंसे पूजनीक है भावार्थ-श्रीवर्द्धमानस्वामीका यही उपदेश है जो संसारके विकल्प दूरकर आत्मानुभव कगे-दस उपदेश मानकर चलनेशले जीव अवश्य मुक्ति के भोगी होते हैं। फिर भी कहते हैं:- मिइंटो णिद्वंद्वो, जिम्ममो णिकलो णिरालंयो। पीरागो णियोसो, णिम्मूदो णिन्मयो अप्पा ॥ ४३ ॥ " - 1.4 जानी । परमात्माके परद्रव्यका कोई आलम्ब अर्थात् सहारा नहीं है. इसलिये विक ज्ञानरूप शरीक धारनेसे पवित्र है इसलिये वह आत्मा निदान है । स्वाभाविक निश्चयनयके वलसे स्वाभाविक ज्ञान, स्वाभाविक अनेक परमधर्माको धारन करनेवाला ऐसा जो निज उत्कृष्ट तत्व उसके निपममार- सामान्यप्रयं- यह शय आमा र रहिन है, दन्द रहित है, ममकार रहित है, शरीर हित है, आलम्प रहित है, राग रहित है कर रहित है, मुना रहित तमा भय रहित है, निभयर सा विशेषअयं-दम माया कहते है कि मुद्ध आमाके समस्त विना- नभावों का अभाव है । मनइड, वचनदंड, और कायदंड अर्यात मन वचन गायकी क्रिया और इनके योग्य व्यर्म और भार्म होनेके भावसे या शुभआत्मा निर्दड है। निभयकरके यह मुद्ध आत्मा ही परमपदार्थ है सर्व अन्य पदायोंमे रहित है, इसकारण कि ईन्द है। न इस आत्मा शुभ तथा अशुभ समन मोह राग देष हैं, इनके अभाव होनेसे यह आत्मा ममकार रहित निम्न है । निश्चयकरके औदारिक, वैकियिक, आहारक, तेजस, कामांग इन पाँच शरीगेड रहित होनेसे यह आत्मा नि.कल अर्थात् अशरीर है । निश्चयकरके उस वह निरालम्ब है । मिथ्यात्व, वेद, राग, देव, हास्य, रति, अनि, शोक, भय, जुगुप्सा, कोध, मान, माया, लोभ इसप्रकार चौदह प्रकारका अभ्यंतरपरिग्रह उस प्रभुके नहीं है । इसलिये दह शुद्ध आत्मा नीराग है । निश्चयकरके सम्पूर्ण पाप मलालंकापी कावडे रहित सामर्थवान् स्वाभाविक परमवीतरागरूप सुख समुद्रके मन्य दूर्वी हुई प्रगट सहन आत्माकी अवस्था होने के कारण वह शुद्ध आत्मा स्वान् दर्शन, स्वाभाविक चरित्र तथा स्वाभाविक परमवीतराग नुज्ञ आदि जाननेको शक्तिमान है इस कारण वह शुद्ध आत्मा निर्मूढ अर्थात् मना . शुलमायाचिका हिन है। अधया निदरे स्थानमें निर्गट शन भी इसलिये कहने लिभादि सहित परन्तु अंतरहित अभूती अतीन्द्रिय स्वभावरूप होनेसे पद सबूत व्यवहार नयके पलसे यह आत्मा भूतभरिभ्य वर्त. मान RTC सम्बन्धी तीनटोमवर्ती समम्न म प्यावर जीवोंको, व भर अचर पदापोंको तथा उनके मम्पूर्ण गुण और पर्यायों को एक ही समय जानने की शक्तिमान जो सम्पूर्णतया निर्मल केवल ज्ञानरूप अवरपा उसको धारण करनेवाला है, इसकारण यह शुर आत्मा निर्मुद अर्थात को यात निमसे छिपी नहीं है ऐसा है । तथा जो आत्मा मर्व पापरूप धरियोंकी सनासे किसीप्रकार भी प्रवेश योग्य नहीं है, ऐसे पुर निन आत्म नम्वरुप महान दुर्ग अर्यात रिलमें बसने कारण निर्भय अति भयरहित है । भावार्थ-जी दुःप्रवेश दुर्गम बसे जहाँ कोई गनु धुरा नहीं सके उसको किस घातका भय । ऊपर को हुए विशे. पर्णा सहित जो गुद आत्मा है सोही उपादेय है-अनुभव करने के योग्य हैं। ऐसाही श्रीअमृतीति नाम ग्रन्थमें कहा है:--"वह शुद्ध आत्मा अ आ आदि स्वर समूह व विसर्ग व क व आदि व्यजन ऐसे अक्षरोंसे रहित है, स्वहितहानिसे रहित अविनाशी मुक्तरूप है, उसके पच रस, अंधकार, रूप, स्पर्श, गध, जल, वायु, पृथ्वी अग्नि आदिके अणु और स्थूल रूप तथा दिशाओं चक्र नहीं हैं।"टीकाकार कहते है वह समयसार, अर्थात् शुद्ध आत्मा शीघ्र ही हमारी रक्षा करे। कैसा है वह समयसार, जो पापरूपी धन के काटने के लिये कुठारके समान है। जो दुष्ट फोकी विनयको प्राप्त कर चुका है, पररूप परिणमन करनेमे दूर है। रागरूपी समुद्रको जिसने सोस लिया है । नानाप्रकारके वि- कार अर्थात् विभावभाव उनका जिसने नाश कर टाल है, जो सत्य आ- नन्दरूपी समुद्र है तथा जिसने कामदेवको अस्त कर दिया है। वह परमतत्त्व जयवन्त हो । जो आत्मतत्त्वमे तासीन पद्मप्रभमुनिके उदय कमलमें विराजित है। जो विकार रहित है, नानाप्रकार विकल्पोंका - - नियमसार- । 1 . नाश करनेगला है तथा जो कल्पनामात्र अर्थात देखनेमात्र सुन्दर से भवभवके मुख दुःसांसे रहित है, बुद्धिमान आचार्याने जिस परमतत्तका ऐसाही स्वरूप कहा है। हे भव्यनीय यदि मध्यतारूपीभावने तुझको प्रेरित किया है तो तू संसारसे मुक्ति प्राप्त करनेकेलिये ऐसे ही आमाका भनन कर, नी रानिदिन अपने अनंत ज्ञान के आधीन है। जो स्वाभा- विक गुणरूपी रबॉकी खानि है, जो सर्वतत्त्वमि सार है तथा आनीक परिणतिसे उत्पन्न सुसरूपी समुद्रमें मग्न है । हे यती जो तू संसार और भोगांसे उदास है तथा निज आत्मामें अपनी बुद्धि धारनेवाला है तो तू संसारके कारण कर्मबधको नाश करनेवाला जो यह आत्मीक पद है उसीका भजन कर । विनाश होनेवाली वस्तुकी चिंता करनेसे तुझको क्या लाभ होगा ? में उस समयसार अर्थात् शुद्ध आत्माको समतारसरूपी जलसे सदा पूजता है, जो समयसार पर मात्मा आकुलतारहित है, अपने गुणोंसे अच्युत अर्थात् दृढ़ है, जन्म मरण रोगादिसे रहित है तथा स्वाभाविक निर्मल आनन्दरूपी , अमृतका घर है। पूर्व सूत्रकार आचार्योने जैसा आत्मतत्वका वर्णन किया है ऐसा ही निज आत्म तत्वको अपने स्वसवेदनशानके द्वारा विशुद्धरूप जानकरक तथा अनुभवकरके जो कोई भव्यजीव मुक्तिको प्राप्त करता है उस शुद्ध आत्माको मैं उनम मुखकी प्राप्तिकेलिये निर. न्तर भाता हूं, अर्थात् मनन करता हूँ । जो भन्यजीव इस लोकमें परमात्मा तत्वकी भावनामें अपने आत्माको परिणमन करता है वह भव भव के दुःसांसे दूर होकर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त करता है। केसा है वह पर- मात्मतत्त्व ,जो आदि अंतरहित, पापमुक्त, निर्दव अक्षय अत्यंत विशाल और पचान है। भावार्थ-सर्व भावोंको मेटकर एक शुद्धस्वभावकी भावनही शक्तिकारी है।

शुद्धभावास्किार। फिर भी उसीका स्वरूप कहते हैं:- णिग्गंथो णीरागो, णिसालो सपलदोसणिम्मुको । णिकामो णिकोहो, णिम्माणो णिम्मदो अप्पा ॥४४॥ सामान्य अर्थ-वह शुद्ध जीवास्तिकाय निर्धन्य है वीतराग है निःशल्य है, सर्व दोपरहित है, कामरहित, शोधाहत तथा मान और मदरहित है। विशेष अर्थ- इस गाधाम भी शुद्ध जीवका स्वरूप कहा है। वह आत्मा बाह्य और अभ्यंतर २४ प्रकारके परिमहरहित है इससे निर्मन्य है, सम्पूर्ण मोह रागदेषमयी चेतनकर्मक अभावसे नीगग है, निदान, माया, और मिथ्यात्व ऐसे तीन शल्यरहित निःशल्य है, शुद्ध निश्चयकरके शुद्ध जीवास्तिकायके दव्यकर्म और नोर्म नहीं है इससे सर्व दोपोंसे रहित है। शुद्ध निश्चयकरके अपने परम तन्वमें भी दांठाके न होनेसे नि:काम है। निभपकरके शुभ अशुभ सर्व परद्रय्यकी परिणतिक न होनेसे निकांध है, क्योंकि परद्रव्यका सम्बन्ध ही कोधका कारण है। निश्चयकरके सदा परम समतारसमयी है इससे मानका अभावरूप निर्मान है । निश्चयकरके अपने आत्मभावमें पूर्णपने लीन होने के कारण मदरहित निर्मद है । इस प्रकार विशेषकरके घर सहजासिद अविनाशी निज कारणसमयसारका स्वरूप कहा है अर्थात् मिस स्वरूपके मनन करनेसे समयसारता प्राप्त होती है इसकारण वही स्वरूप उपादेय अर्थात् महणयोग्य है। ऐसाही धीभगतचरसूरिन कहा है:-मुचितासे पर परिणति के ऐसे तथा पा कर्म आदि भेदकी प्रांतिके नाश होनेसे जिसने रासात्मतावको पास किया है सपा जो पेतन सत्य चिन्मात्र प्रत्यक्ष ज्योति में मति है उसी स्वाभाविक उदयरूपमहिमा पदा मेरेको मुक्त करने लिये स्थित रहे अर्थात् कायम रहे। रहते हैं कि जिसने शान ज्योतिकारा पाय- गाथाओं में कहा है कि परम प्रभावकारी नियमसार- अंधकारके समूहको नाश कर डाला है, जो नित्य आनंद आदि अतुल महिमाका धारी है, जो सदा ही मर्तिकरके रहित है, जो अपने स्वभाव निश्चल रहने के कारण अपने शुद्ध स्वभावका मूल है, जो भवभयको हरनेवाला मोक्षरूप लक्ष्मीका स्वामी है उसको मैं वन्दना करता हूं। आगे कहते है कि कारण परमात्माके पुद्रठदव्य सम्बन्धी को विकार नहीं है:- वण्णरसगंधफासा, थीपुंसणओसयादिपजाया। संठाणा संहणणा, सव्वे जीवस्स णो संति ॥ ४५ ॥ अरसमरूवमगंध, अव्वत्तं चेदणागुणमसई । जाण अलिंगग्गहणं, जीवमणिदिवसंठाणं ।। ४६ ॥ सामान्य अर्थ-उस शुद्ध जीवास्तिकायके वर्ण, रस, गंध, स्पर्श, •सी, पुरुष, नपुंसक पर्याय, छः संस्थान, छः संहनन नहीं है। आत्मा रसरहित, रूपरहित, गंधरहित है । इन्द्रियों दाग प्रगट नहीं । चेतना गुगवान है, शब्दरहित है, किसी चिन्ह व आकारसे पहन र निश करने योग्य नहीं है। कारण परमात्माके पुदलद्रव्य सम्बन्धी कोई भी विचार नहीं है । विप नयारके उस शुदआत्माके पांच वर्ण, पांच रस, दो गंध, भर स्पर्श, श्री, पुरुष, नपुसक विभावरूप विनातीय व्यंजनपय्यांप, मा आदि । संस्थान, वषम नागव आदिः संहनन नहीं हैं। सा पोकही होते जो नही , ममा आत्या संसारी भी स्थावर नामा नाम उदयमे न्दियों में फठ चेतना हेती, बम नाम नाम उइयो म जीवा कायंसहित का र पाममा तयार परमात्मा गाना दमी है. सारण काय ममयमार वा कारण समयमा काम ।

भावारिका + है चेतना होती है वह स्वभावरूप तथा स्वाभाविक फलरूप है। अतएव शिष्य, तुम सहज सुद्ध ज्ञान चेतनारूप आत्माको अर्थात् निज कारमा परमात्माको ससार अवस्था वा मुक्तरूप अवस्थामें सर्वदा एकरुप उपादेय है, ऐसा जानो । भावार्थ-कर्मफळ चेतना, और कर्म चेतनाके भावोंको त्यागकर शुद्ध शान चेतनाके ही भाव सदा कर्तव्य है। ऐसाही एकत्यस- मतिमें कहा है:-" आत्मा भिन्न है वैसे ही उसकेसाथ रही हुई नोकर्म २६ भिन है तथा द्रव्यकर्म भिन्न है, कर्म और आत्माको निकटतास जो विकार होता है वह विकार भी शुद्ध आत्मासे भिन्न है । काल, क्षेत्र आदि जो कुछ परद्रव्य हैं सो सर्व मेरे आत्मस्वरूपसे भिन्न हैं । सर्वही द्रव्य अपने अपने गुण कटासे शोभित रहकरके भिन्न भिन्न ही रहने है "काकार कहते है कि "आत्माके साथ बंध होवे व न होवे शुद्ध जीवक स्वरूपम समस्त ही मूर्तीक द्रव्योंका विचित्र जाल भिन्न हे पथक है । यह श्रीनिनेन्द- का शुद्ध धरन है। आचार्योने भी ऐसाही कहा है। यही इस मुवन प्रगट भी है । हेतू भन्य नित्य ऐसा ही समस ।। भावार्थ-सर्व एरव्य जनित विकारों को अपने शुद्ध स्वरूपसे अलग अनुभव का, परमात्मस्वभावक भनन करने का अभ्यास करना योग्य है। आगे संसारी और मुकजीवों की समानता बताते है जारिसिया सिद्धप्पा, भवमलिय जीव तारिसा होति। जरमरणजम्ममुमा, अदगुणालफिया जेण ॥१७॥ सामान्य अर्थ-जैसे सिद्ध आत्मा है सही ससारमै लान जार है। से हैं पर, जरा मरण और जन्मसे रहित हैं तथा अटगुणसे . शोभायमान है। विशेष अर्थ:-साद न्यार्षिक मय: अभिप्रायस रोगी और मुनजीको कोई रनरी है यह बात इस गापा कहते है । का कामपन्त निकर भन्यजीव ४ प्रक्ष्य #ER KARNA HERC - । - चिप अर्थ-इन दो गाथाओंमें कहा है कि परम सारण होती है। कार्यकर परमात्मा तथा कारण परमात्मा जानवर ६२ निपमसार- अंधकारके समूहको नाश कर डाला है, जो नित्य आनंद आदि अनुरू महिमाका धारी है, जो सदा ही मूर्तिकरके रहित है, जो अपने स्वभाव निश्चल रहने के कारण अपने शुद्ध स्वभावका मूल है, जो भवभयको हरनेवाला मोक्षरूप लक्ष्मीका स्वामी है उसको मैं वन्दना करता हूं। आगे कहते हैं कि कारण परमात्माक पुलद्रव्य सम्बन्धी कार्ड विकार नहीं है:- वण्णरसगंधफासा, थीपुंसणओसयादिपनाया। संठाणा संहणणा, सम्बे जीवस्स णो संति ॥४५॥ अरसमरूवमगंध, अव्व चेदणागुणमसदं । जाण अलिंगग्गहणं, जीवमणिद्दिसंठाणं ॥ ४६ ॥ सामान्य अर्थ-उस शुद्ध जीवास्तिकायके वर्ण, रस, गंध, सर्स, स्री, पुरुप, नपुंसक पर्याय, छः संस्थान, 3: संहनन नहीं हैं। यह आत्मा रसरहित, रूपरहित, गंधरहित है । इन्द्रियों दाग प्रगट नहीं । चेतना गुणवान है, शन्दरहित है, किसी चिन्ह व आकारसे महमर निवेश करनेयोग्य नहीं है। कारण परमात्मा पुदलद्रव्य सम्बन्धी कोई भी विकार नहीं है । निधन नयकरके उस शुद्धआत्माके पांच वर्ण, च रस, वो गंध, आ स्पर्श, मी, पुरुष, नपुंसक विभावरूप विजातीय व्यंजनपाय, मा आदि छः संस्थान, वनवृषभ नाराच आदि छः संहनन नहीं । सर्व पदलों के ही होते हैं जीवोंके नहीं , समारी अवस्थामे संसारी और स्थावर नामा नाममो उदयसे एकेन्द्रियों का फल चेतना होती है, अस नामा नामकर्मके उदयसे बम जीवों के कार्यसहित कर्म मना होती है। इस कारण कार्य समयमार का कारण समयसा जो सुसमा शुदभावाधिकार। .. विशेष अर्थ-दस गाथामें कार्य समयसार और कारण समयसारके भेदके अभावको दिखलाया है। निश्चयकरके जैसे सिद्ध भगवान औदारिक आदि पांच शरीरोंसे रहित अशरीर है, नरनारक आदि पायके त्याग और ग्रहणके अभावसे अविनाशी है, एक समयमें भी परम-आत्मीकतत्त्वके स्थिरभूत ऐसे स्वाभाविक दर्शन आदि तथा कारण- शुद्ध स्वरूपके जाननेमें समर्थ ऐसी स्वाभाविक ज्ञान ज्योतिकरके सर्व संशयोंको हटा देनेसे अतीन्द्रिय हैं अर्थात् इन्द्रियोंसे अवलम्बन रहित हैं । मल अर्थात् अतीचार उनको उत्पन्न करनेवाले क्षयोपशम आदि विभावस्वभावोंके अभावसे निर्मल हैं, तथा द्रव्यकर्म ज्ञानवरणादिक और भावकर्म रागदेपादिक इनके अभावसे विशुद्वात्मा है, ऐमे सिद्ध भगवान परमेष्टी टोकके अग्रभाग तनुवातवलयमें विराजमान है। वेमे ही इस संसारमें शुद्ध निश्चयसे समस्त संसारी जीव शुद्धरूप अवस्थामें शो. भायमान है । भावार्थ-जबतक यह जीव वस्तुके यथार्थ स्वरुपको नहीं पहचानता तबतक वस्तुकी प्राप्ति नहीं करसकता । इसलिये स्वहित बाउक जीवको शुद्ध निश्चयसे सदा ही अपने शुद्धरूपका मनन करना चाहिये । टीकाकार कहते "कि जो जीव नित्य शुद्ध अशद्ध विक- पमि लवलीन है उस मिथ्यादृष्टिके नित्य यह श्रद्धा है कि कारण और कार्य दोनों ही तत्त्व शुद्ध है। अर्थात् जिसके ध्यान कानसे स्वरूपशुद्धीरूप साध्यकी सिद्धि करना है वह साधन भी शुद्ध परमात्माका भाव है तथा उसका साध्य भी शुद्ध परमात्मा है क्योंकि उपादान कारणके सहारा ही कार्य होता है तथा जो कोई सार और असारके विचार करने में सुन्दर ऐसी अपनी बुद्धिकरके इस अतुल अनुग्म परमागमके अर्थको समझता है वही सम्यग्बादी है। हम उसको बन्दना करते हैं। आगे दोनों नयों की सफलता कहते है:- एदे सब्वे भावा, वयहारणयं पदुच्च भणिदा हु। सय्चे सिद्धसहाया, मुदणया संसिदी जीवा ॥४९॥ नि.सा. ५ निपमसार- -- माम मत हर और तिर ममारने ही वैगम्यमें टीन हुए नया इम- लिंग पार मायनिंगी मुनि हो जिन्होंने परमगुरु के प्रसादने परमागमा अभ्याम किया ध्यान चलमे कमोनो नाशर निक्षेत्रको मात्र किया और बाधारहित सम्पूर्ण प्रकार निर्मल केवटज्ञान, केवल वसंत काल मुम, चउ वीर्य्यमे युन होकर मिदात्मा अर्थात् कासमयकार- रूप होगए अर्यात कार्य शुद्ध भए। शुद्ध परमात्मा ध्यान अवस्थाने कारन समयसार है वही ध्यान में फलमें कार्यरूप समयमार होता है। भावार्य---ज्ञानी जोर उमीयान बलसे उस सदृश हो जाता है। या सिद्ध जमे शुद्ध है येसे ही शुदनिश्चयनयकरके मन्यनीवनी शुद्ध हें । जैसे मिद जन्म जग मरणकरके गहित हैं और सम्यग्दर्शन, अनत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनत वीर्य, मूक्ष्मत्त्व, अवगाहना, अगुरुलघु, अन्याय ऐसे आठ गुणसे सहित हैं ऐसे ही शुद्ध निश्चय करके वे भव्यजीव को हैं, शुद्ध निभयनय पदार्थोके यथार्थ स्वरूप प्रतिपादन करनेवाली है। इसलिये इसकी अपेक्षासे मोक्ष प्राप्त और मुझ होने योग्य बकारी भय्यात्माओंके मध्यमें कोई अतर नहीं है । भावार्थ-ज्ञान को निज व पहीको शुद्ध सिद्ध सदश ध्यान करना योग्य है। टीकाकार हते हैं कि "जिन सिद्ध और संसारी भन्यजीव पूर्वहाँसे शुद्धता विद्यमान है तब हम किस नयसे उनके भेदको जाने " भावार्थ-मुनिश्य- नयसे दोनों का स्वरूप एक है, यद्यपि व्यवहारनयसे मेद है। फिर भी अभेदभावको दिखाते हैं:- असरीरा अविणासा,अणिदिया णिम्मला विसुद्धप्या! जह लोयग्गे सिद्धा, तह जीवा संसिदी णेया ॥ ८॥ सामान्य अर्थ-जैसे श्रीमिद्ध महारान शरीरहित अविनाश निर्मल, विशुद्ध स्वरूपवान होकर इस लो भागमें विराजमान हैं से ही इस संसारमें सर्व जीवीको निश्चयकरके जानना चाहिये ।

एरभावाधिकार
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निमय न पटग हेय अपात रागने योग्य है । स्याकि
मात्र है, मास र च्य है आत्मा बदल्य नहीं है। तथा
सच विभाष गुग और पयांपो हित जोर अतरंग को
अपना आरमदस्य करने योग्य है । क्योकि यह आत्मा
निकम माविक नान सारिकान सभाविक चारित्र और
स्मादिक परमे बातगाम सुसमई एम अंतरय नत रचनाका आधार
है। यही समाधि परम पारिभावित भार है लक्षण जिसका
दरारमा समयसारहे।
मा ही श्री अमृतप्रसूरिन कहा -निर्मल भावमें चलनेवाले
मोक्ष पाहनेवाले पुरुषांसी सिमान्नकी सेवा भक्ति करनी चाहिये
में सदा पर तन्यरूप एक परमज्योति स्वरूप है। तथा जो ये
भाना मकर भाव मिटा पड़ते है व मुमसे भिन्न लक्षणके धारी है ।
नमें उन रूप हूं और न वे मेरे स्वरूप है क्योकि वे सर्व ही पा द्रव्य
टीकाकार कहते है कि "जो तत्वदी प्रगटरूपस ऐसा कहता
शुद जीवास्तिकाय है तथा अन्य सर्व भाव पुल द्रव्य के भाव
है वही अपूर्व सिर मायाको प्रात करता है"
आगे रसायका स्वरूप कहते हैं-
विपिरीयाभिणियसवि, यजिपसहहणमेव सम्मत्तं ।
संसयविमाहविन्नमवि, यनियं होदि सपणाणं ५१
चलमलिणमगादत्त,-विवजियमदहणमेव सम्म ।
अधिगममा गाणं, योपादयतचाणं ।। ५२ ॥
सम्मत्तस्स णिमित्तं, जिणमुत्तं तस्य नाणया पुरिसा।
अंतरहयो भणिदासणमोहस्स रायपगुदी ॥५३॥

गुण और विभाव पर्याय पहले कहीं हैं सो व्यवहारसे उपादेय है परन्तु J-- +-+May - पर स्वभाव है, इस कारण त्यागने योग्य है तथा अंतरंग तत्व जो अपना विशेषार्थ-इस गाथामें हेय उपादेयका कथन है। जो कोई विभाव विषमता मामा मनोमा मार बगर । HिTTममा माही भी सिर म भमान शुभ। fi-म मानिभाना और भार नयी उसके मिमimi Tणन गिर मात्र शुद्ध मग ममार्ग नही ifiमार भार और विभाव Kriin Hinm Am भायमान है। शुद्ध नग मा मनायो मोरपि आदि पार माय संमार आस्थाने tic HD 3+ मार्ग जामेनी सारी नार भी भगमन मिशिबा और पप्यायों मनान शुद मुगा और पयाय- पारी में गादी धामनरागायने कहा है: चरनेवाले जीराके लिये यह गााग्नग हस्तावसम्यन प अधीत हायसे सहारा दिये गाने के समान है तथा मम्पूर्ण पर पदायोंमे हित लन्यो चमत्कार मात्र अपने प्य पदार्थो अपने अंतागमे देसनेवालोंकेटिये यह व्यहार नय कोई चीन नही है । टीकाकार कहते हैं “ निश्चयकरके सुद्ध तत्वो रमिक लोग तत्व विचारके भीतर ऐसा कहते हैं कि शुद्ध निश्य नयकरके मुक्त और संसारी जीवों में कोई भी विशेष अर्थात् भेद नहीं है। पुवुत्तसगदमावा, परदवं परसहावीमदि हेयं । सगदव्यमुवादेयं, अंतरतच्चं हवे अप्पा ॥५०॥ सामान्य अर्थ-पहल कहे गए सम्पूर्ण ही भाव परद्रव्य हैं और द्रव्य आत्मा सो उपादय है। ।

- है। व्यवहार सम्याज्ञान भी संशय, दिमोह विभ्रमसे रहित है । देव जिनेन्द्र होने चाहिये या शिव होने चाहिये ऐसा जो शंकारूप ज्ञान सो सशय है । शाक्य आदिके कहेहुए पदाथोंमें श्रद्धा होनी सो विमोह है। कुछ भी निश्चय करनेकी आकाक्षाका न होना सो विभ्रम है । इन दोषोंसे रहित सम्यग्ज्ञान आदरणीय है । तहां जिनेन्द्र प्रणीत जो हेय और उपादेयतत्व हैं उनका यथार्थ ज्ञान सो ही सम्यग्ज्ञान है। इस सम्यक्त परिणामका बाह्य सहकारी कारण वीतराग सर्वशके मुखकमलसे उदयरूप सर्व पदार्थोके बतलानेको समर्थ द्रव्यश्रुतरूप ही तत्वज्ञान है। क्योंकि उपचारसे पदार्थोके निर्णयका कारण है। सम्यग्दर्शनके होने में अंतरंग कारण दर्शन मोहनीकर्मका क्षय, उपशम अथवा क्षयो- पशम है । तथा भेदरहित और उपचाररहित निश्चय रत्नत्रयमें जो जीव पारणमन कर रहा है उस जीवके टंकोत्कीर्ण झायक एक स्वभावमें अपने आत्मीकतत्वकी जो श्रद्धा सो निश्चय सम्यक है। उसी आत्मीक सत्व ज्ञानरूप अतरंगमें जो परम बोध है सो ही निश्चय सम्यग्ज्ञान है उसही अपने आत्मस्वरूपमें जो निश्चय स्थितिरूप हे सो निश्चय स्वाभा- विक चारित्र है-इन तीन अभेद रत्नत्रयके द्वारा ही जो अबतक प्राप्त नहीं हुई ऐसी अभूतपूर्व सिद्ध पर्याय उत्पन्न होती है। जो परम जिन जितेन्द्री योगीश्वर मुनि प्रथम ही पापक्रियासि हटानेवाले व्यवहारनयसे जानने योग्य ऐसे व्यवहार चारित्रमें टहरते है अर्थात् स्यवहारचारित्रका आचरण करते है । ऐसे ही योगीके व्यवहारनयसे जानने योग्य व्यवहार रूप तपश्चरण भी होता है पश्चात् निश्चय रत्नत्रयकी प्राप्तिके अवसरमें मिश्चयतप होता है । सहज निश्चयनयके आश्रित परमस्वभावमई पर मात्मामें प्रतपन अर्थात् तपना अर्थात् दृढ़तासे तन्मय होना सो निश्चय सप है। इस तपके द्वारा ही अपने आत्मा स्वरूपमें निश्चल स्थितिरूप स्वाभाविक निश्चय चारित्र भी होता है ऐसा ही एकत्वसमतिमें कहा है "कि अपने आत्मस्वरूपी निश्चय सोही सम्यग्दर्शन है, अपने आत्म- . किये पदार्थाम श्रद्वाका अभाव हे अयोत् अन्य एकान्त धमाके तत्वको नियमसार। सम्मतं सपणाणं, विजदिमोक्खस्स होदि मुण चरण। ववहारिणिच्छएण दु, तमाचरणं पवक्खामि ॥५४॥ ववहारणयचरित्ते, ववहारणयस्स होदि तवचरणं । णिच्छयणयचारित्ते,तवयरणं होदि णिच्छयदो॥५५॥ सामान्यअर्थ-उलटे अभिप्रायसे रहित जो श्रद्धान है वही सम्यक है। जो संशय, विमाह, विभ्रमसे रहित है वही सम्यग्ज्ञान है । चल, मलिन, अगाढ़ दोषोंसे रहित जो श्रद्धान है वही सम्यक्त है । हेय त्यागने योग्य तथा उपादेय ग्रहण करने योग्य तत्त्वोंका जानना सो ज्ञान है । सम्यक्तका निमित्त जिन सूत्र है अर्थात् जैन शाम्राके द्वारा जो भाव ज्ञान होता है वहीं सम्यक्त होनेका निमित्त है। जिन सूत्रके ज्ञायक पुरुपको सम्यक्त होनेमें अंतरंग कारण दर्शन मोहनीका क्षय, क्षयोपशम तथा उपशम है। सम्यक्त और सम्यग्ज्ञानके साथ सम्यक्चा- रित्र भी मोक्षका कारण है इसलिये व्यवहार निश्चयरूप चारित्रको आगे कहूँगा । व्यवहारनयसे व्यवहार चारित्र और तप होता है। निश्चयन- यसे निश्चय चारित्र और तप होता है। विशेषार्थ-इन गाथाओंमें रत्नत्रयके स्वरूपका वर्णन है। भदो- पचाररूप व्यवहार रत्नत्रयमे प्रथम व्यवहार सम्यग्दर्शन विपरीत अभिप्राय रहित जीवादि सात तत्वोंका श्रद्धान रूप है । केसा है यह श्रद्धान, जो श्रद्धान मोक्षके परम्परा कारण भगवत श्री अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु इन पांच परमेष्ठीकी निश्चल दृढ़ भाकि साहित है । केसी है हदभाक्त, जिसमें चल, मल, अगाद ये तीन दशेर नहीं हैं-इस श्रद्वानमें पंचपरमेठीसे विपरीत हरिहरादिक द्वारा प्रापश -- . । एकान्त रूप अर्थात अनेहान्त भूतार्थ पदायोंमे उल्टा जो श्रद्धान करना तथा मोक्ष कारणभूत पदार्थोको सच्चा यथार्थ श्रद्धान करना सो सम्यतन पायाका । हैं। यान भी पक्षप, मोह जिसे रहिन । निरन्न होने काहि ने भारिय माप जान सो साप है। साय आदिए शामें प्रदानी रिहै। १० वि माक्षिा होना को मिहे । इन दासि रहित समान भादाणीप है। तह निन्द मी नाहय और उपाय है उनम पाई जान ही सम्पान हे रस सम्पा Hि माम मार्ग कारण पीतराग शो मुसम्मम उदयरूप पदाकि बतलाने सम इन्पतरूप ही सत्यमान है । यो उपासे पाक रिसरण है । सम्पन्दनक ही न wr दर्शन मोहनीका क्षय, उपसम अपय भयो- पक्षमा । तथा भदहन और उपसरहित निभय रलायो गोजीम पामिन है उस नीव रंजन हायर पर समायमें अपन आत्माकमावकी नो श्रद्धा सो विजय सम्यक है। उसी आत्मा सत्य सानप अंतरगमें ओ परम N है सोही निभय सम्पशान उसही अपन जात्मस्वरूपने जो विभय स्पितिरूप हे सो निधय स्वाभा- विक पारिवह-इन तीन अभेद रत्नत्रयों द्वारा ही जो अरत प्राम नही मी अभूतपूर्व सिद्ध पर्याय उत्पन्न होती है। जो परम मिन मिनन्द्री योगीश्वर मुनि प्रथम ही पापकियामि हटानेवाले म्परहारनपसे जामन योग्य से व्यवहार चारित्रमें टहरते है अर्थात् म्यवहारचारित्रका आचरण करते है । एसे ही योगी के व्यवहारनपस जानने योग्य ध्यवहार रूप तपश्चरण भी होता है पक्षात निश्चय रलायकी प्राप्तिके अवसरमें निश्चयतप हाता है । सहन निश्चयनयके आश्रित परमस्वभावर्मा पर मारमा प्रतपन अर्थात तपना अर्थात् दृढ़तासे तन्मय होना सो निश्चय तप है । इस तपके द्वारा ही अपने आत्मा स्वरूपमै निधल स्थितिरूप स्वाभाविक निधय चारित्र भी रोता है ऐसा ही एकत्यसततिमें कहा है कि अपने भारमस्वरूपमै निक्षप सोही सम्मग्दर्शन है, अपने आत्म- नियममा suNWNLOra- + - - SIT जान मोही मनान समिति भयो महाना ही माग गरीनन Ky Him माशाजन है" RTE A. जोग मान अमजानकी । - मीमी गजानकार चान्ति भी नित्य डमी भारमा मानरगिलान्य मामाकी धनना मनम्न म मलममहगे ति मतिनी मोर भाति भार नपर्ने franti मायार्य-गु बनना पादश्या, पर भोर पर नाम निभटता सभी गुख तनापि, अमान, मान और शातिनिश्रय नीनालाय कर मोक्ष मीन है। मोक्षायां भगानीको उचित है कि अपने भात्माजी परम शुद ज्ञाता इष्टा भिनन निर्विकार अट अधिनाही सम्पूर्ण पर औपाधि भागमि रहित अनुभाग। पर शुद्धनावका अधिकार आत्माकी शुद्धिका पाम अनुन निमिन कारण है। इसमकार मुकरियांकर कमलोहलिये मुर्दा पवेन्द्रिय व्यापारम रहित शरीरमा परिमहक धारी श्री पद्ममममलधारिदेव आग कथित श्री नियमसारकी तात्पर्यवृनि नाम य्याख्याने शुद्धमावअधिकार नानकी द्वतीय श्रुतस्कर समाप्त हुआ ॥ ३॥ व्यवहारचारित्राधिकार । फुलजोणिजीवमग्गण, ठाणाइमु जाणऊण जीवाणं । तस्सारंमणियत्तण, परिणामी होइ पढमवदं ।। ५६॥ सामान्य अर्थ-कुलस्थान, योनिस्थान, जीवसमासस्थान, मार्गणा- स्थान इत्यादि जीवोंके ठिकानोंको जानकरके उनमें आरंम करनेसे हटनेका जो परिणाम है वहीं प्रथम अहिसा व्रत है।

ग्यारसरिताधिकार पिसोप -इम गाया रिसा इतके स्वरूपमा कथन है॥ कुन पनि मारियानाही कह परे है। भेटेको भले प्रकार जानका भीगा कानेका जो भाउ सो अहिसा है । मावशी मल देती है स नहीं होती है मे विचारकी कोमिममें रंगपुर णामके पिरिना पारूप मा किया त्याग नहीं हो सकता । अतरव इस नमें रानाही अहिसा वर है। ऐसा ही समन्तभद- रपाीनीने का है अभा श्रीसमन्तभदम्मामी अपने स्वयंभूस्तो- में श्रीमुनिमुबानाय स्वामीकी स्तुति करते हुए कहते हैं कि जगतमें यह पान को प्रगट है कि यह अहिसा ही परमरम बाप है अर्थात आत्माकी वीतरामता ही हिना है नहीं एमी तिगगता है वहीं अमा- का बर वरूप है । जिस आभमके चारित्रमें अणुमात्र अर्थात् किंचित भी आरंभ नहीं है वहीं यह अहिता प्राप्त होती है । भावार्थ-मुनियोंका २८ मूलगुगरूप व १२ प्रकार चारिकरूप जो आचरण है वही अहिसा है । इसलिये पामदयावान आपने हे प्रभु इसी अहिमाकी सि- दिलिये अंतरंग और वाय २४ प्रकार के परिमहको बिलकुल त्याग दिया । आप शिकारी भेष और परिग्रह में रत नहीं हो। भावार्थ-नाम दिगम्बररूप ही सश अहिंसा मार्गमा देय है । इसके सिवाय अन्वेष विकारवान दोती है । जहाँ पग्निहमें सर्वया मूर्णा अभाव है वहीं अहिंसा धर्म है। टीकाकार कहते हैं-इस जिनधर्मकी जय हो जिसमें ऐमी अहिंसाका पाटन है, जो अहिना अस जीव इन्द्रियादिकको पात करनेवाले परिणामोंको जड़ भूटसे हटानेका कारण है तथा जो पंच- कायरूप एकेन्द्री स्थावर जीशे नानामकार होनेशले वधसे बिलकुल दूर है-जो अहिंसा सम्पूर्ण लोकके जीव समूहको सुख देनेवाडी है तथा जो मुन्दर मुससे भरपूर समुदके समान अगाध है। 1 1 नियमसार । स्वरूपका ज्ञान सो ही सम्यग्ज्ञान है अपने स्वरूपमें स्थिति अर्थात् टहाना ही सम्यक चारित्र है । यही तीनोंकी योगरूप अवस्था मोक्षपदको कारण "दीकाकार कहते हैं:-जय हो उस सहज आत्मज्ञानकी । सम्य- म्हष्टि भी इसी आत्मज्ञानरूप ही है तथा निर्मल चारित्र भी नित्य इसी आत्माके ज्ञान क्रियारूप है । वह चैतन्य आत्माकी चेतना समस्त- प्रकारके मलसमूहसे रहित मूर्तिवती और स्वाभाविक आमांक तत्वमें स्थितिरूप है ॥ भावार्थ-शुद्धस्वरूपकी शुद्ध चेतना परद्रव्य, परगुण और पर पUोंसे रहित है तथा निजरूपमें निश्चलता स्वरूप है । उसी शुद्ध चेतनाका निश्चय, श्रद्धान, ज्ञान और चारित्र निश्चय तीन रत्नत्रय स्वरूप मोक्षका परमीज है । मोक्षार्थी भव्यजीवको उचित है कि अपने आत्माको परम शुद्ध ज्ञाता द्रष्टा निरंजन निर्विकार अट्ट . । अविनाशी M .. अ. शरीरमात्र परिग्रहके धारी श्री पद्मप्रभमलधारिदेव द्वारा कथित श्री नियमसारकी तात्पर्यवृत्ति नाम व्याख्या शुद्धभावअधिकार नामका तृतीय श्रुतस्कंध समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ व्यवहारचारित्राधिकार । फुलजोणिजीवमग्गण, ठाणाइसु जाणऊण जीवाणं । तस्सारंमणियत्तण, परिणामो होइ पदमवदं ।। ५६ ।। सामान्य अर्थ- -कुलस्थान, योनिस्थान, जीवसमासस्थान, स्थान इत्यादि नीवोंके ठिकानोको जानकरके उनमें आरंम करनेमे हटनेका जो परिणाम है यहीं प्रथम अहिसा व्रत है। मार्गमा पारिवाnिा। - hwar TV NIA GURaman is सकता। दिपाया अपना एर्णन है। इस मा. NarmanaraPa सिमोसार पग भी समान हो उसका माम नगर । महा मनुष्यांका IHARITRA FIRE THER पूर्ण हो उसपनाम मा. ध्यान दा नगा या नमें सकारासी पाई पदयोगमा को भारको मोरयामाहा पा सागरा भगवतता।नो यमुने fixin KAFAST सामसार मिठे व दूसरा सम्मान पाहा यह है- निराहारीमा धानको भी लेना भागुनमान स्थान मिली पस्तुपर उसहोस अधि. पास यह भनिटीकाकारात है कि यह अचौर्य व्रत आई पलया दाता। पालनरताको पुग्यो उदयसे अतिशय- पनीका दस प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग मुररका मूलभूत यह धन और पाम बम बमुनिरूपी संगम कराने बाटा गाय मतकोपर- पण दधिरुपं, यांछामा णियचदे तागु । गुणसण्णविपजिय,-परिणामो अहय तुरीयवदं ।।५९॥ सामान्यार्थ-नो रूपको देखकर ही उसके भीतर अपनी इच्छा निरूप भारको हटाता है तथा मैथुन गंज्ञास रहित अपने परिणामोंको करता है उसकि ही यह चौथा यत मैथुन सज्ञात्याग अर्थात् समचर्य बत होता है। विशेषार्थ-स गापा समचर्य प्रतका स्वरूप है । इन्दर नियोंके मनोहर अंगांकी देसने कारण जो उनसे कीड़ा करनेकी चित्तम इच्छा. है ETRATE + ittin -- रागंण मेण ये, मोहण मोसमासपरिणानं । जो पहाहि मान गया, पिवियर धोद ता सामान्य अयं - मी मार सन ' रामे, में करने नामको योजना हो मरा मायब होना है। गि अयं- म मा गत्य TT शिंन है- मुषा vitiगारने हामी परिणाम अयान भाव है सेयर HOT HIM Triहै। पर अगत्य भार गामारसे, देशमा SHOT मा भामिनिन नीदा होता है-अयान यह मनुष्य ३४ पापा 4 nिi गगन उनी प्राप्ति रक्षासहिये अन्य कमला आनट पायो । शिशिर उनके दूर होनारिक 4Tना मन्यन्ध न पानीलिये असत्य म्हना है अयश निम्मामुद्धिने सैमाग्में मोह झारण उम मिथ्या भारी रक्षा के अर्थ अन्त्य घोटना है। जो कोई निकट मन्य जीव साधु पुरुष इसप्रकारके सत्य बोलनेरूप परिणामको त्यागता है उसके ही यह सत्पात होता है । टीकाकार कहते हैं-जो काई अतिशयारके सत्य भावको अतरगमें जपता हुआ प्रगटपने मत्य ही बोलता है वह मनुष्य परलोक में स्वर्गको त्रियोंके धने भोगोंको भागनेवाला होता है और इस लोकनें सदा सजनोंके द्वारा पूजनीय अर्थात आदरणीय होता है । इसलिये इस सत्यमे बढकर दूसरा कोई व्रत नहीं है यह वात सर्वथा सत्य है ।। आगे तीसरे व्रतको कहते है:- गामे वा जयरे वा, रणं वा पेछिऊण परमच्छं । जो मुचदि गहणभावं, तिदियवदं होदि तस्सेव ॥५८॥ सामान्यार्थ-जो कोई माममें, नगर, वा जंगलमें दूसरेकी वस्तुको सकारा पदी देकर उसके उठा लेने परिणामको त्याग देता है उसी सजनके ती पहनासग अचार्यबत होता है। विपार्थ-दम माया नीमरे अौर्य बतमा वर्णन है। दक्ष आ- दिशी पारकरके जादा तो उसको गांव कहते हैं । चार दिशाओंके चार दग्याजोसे जो शोभायमान हो उसका नाम नगर है। जहाँ मनुष्योंका गमनागमन नहीं हो तथा क्षठ गुजेकरके परिपूर्ण हो उसका नाम अर- प्प अभीत धन है । ऐसे गांव वा नगर वा बनमें दूसरे के द्वारा रक्सी दुई पसी हुई, वा भूलीई परदन्यको देखकर उसको स्वीकार करने के भावको जो त्यागता है उसके ही यह तीसरा अार्यवत होता है । जो यस्तु अपने परिश्रमसे विसीका कुछ कामकरके मिले व दूसरा सन्मान वै दयाकरके देखें यह वस्तु पास है-इसके सिवाय कहींकी कोई चीजको भी टेना पोरी है । सूनसान स्थान में मिली हुई वस्तुओपर उसहाका अधि- कार है जिसकी वह भूमि है। दीकाफार कहते हैं कि यह अदौर्य मत अपूर्व परका दाता है। इसके पालनकर्ताको पुण्यके उदयसे अतिशय- रूप रत्नोंका देश प्राप्त हो जाता है। स्वर्गरूप सीके सुसका मूलभूत यह व्रत है और कम कम करके मुक्तिरूपी ग्रीका संगम कराने वाला है ।। आगे चौथ बतको कहते है:- दहण इच्छिरूपं, वांडामापं णियचदे तासु । महुणसण्णविवजिय,-परिणामो अहव तुरीयवदं ।।५९॥ सामान्यार्थ-जो खाके रूपको देगाकर ही उसके भीतर अपनी इच्छा होनेरूप भावको हटाता है तथा मैथुन संज्ञासे रहित अपने परिणामको करता है उसके ही यह चौथा मत मैथुन संज्ञात्याग अर्थात् ब्रह्मचर्य व्रत होता है। विशेपार्थ-इस गाथा में ब्रह्मचर्य व्रतका स्वरूप है । सुन्दर नियोंके मनोहर अर्गाको देखने के कारण जो उनसे क्रीड़ा करनेकी चित्तमें इच्छा. - नियमसार। । . का होना उसको त्याग करनेसे अथवा वेद नाम नोक्पायके तीव्र उदयसे मैथुन सेवनकी इच्छाका होना उसको छोड़नेसे यह ब्रह्मचर्य व्रत होता है। टीकाकार कहते हैं कि हे कामी पुरुष तू क्यों सहज परम तत्वरूप जो अपना स्वरूप है उसको छोड़कर सुन्दर स्त्रियोंकी शरीर आदि विभूतिको मनमें याद करता है और किस कारणसे तू उनमें अत्यन्त मोहक्ने प्राप्त होता है। ऐसा करनेसे मेरा वचन अर्थात् उपदेश तरेलिये किस कामका होगा!॥ आगे पंचम व्रतको कहते हैं:- सव्वेसि गंथाणं, तागो निरवेखभावणापुव्वं । पंचमवदमिदि भणिदं, चारित्तभरं वहंतस्स ॥ ६॥ सामान्यार्थ-जो वांडा रहित भावनाके साथ सर्वही परिग्रहोंको त्यागना हे सो चारियके भारको सदा वहनेवाले साधुओंका पंचन बत है। विशेषार्थ-इस गाथामें परिग्रहत्याग व्रतका स्वरूप है-जो सम्पूर्ण अंतरग और बाह्य परिग्रहसे रहित है लक्षण जिसका ऐसे कारणरूप परमात्माके शुद्ध स्वभावमें स्थित हैं ऐसे परम संजमी परम जिन योग्य- श्वर जो हैं तथा जो सदा ही निश्चय व्यवहाररूप उत्तम चारित्रके भारको वहनेवाले हैं उनके अंतरंग और वाह्य २५ प्रकारके परिग्रहका त्याग करना ही पंचम बत है। कैसा है यह परिग्रह त्याग व्रत, यही परंपरा- करके पंचम गति जो मोक्ष तिसका कारण है ।। ऐसा ही श्री समयसारजीमें कहा है। किसानी ऐसा जानते हैं जो मेरे परद्रव्य परिग्रह होय तो मैं भी अजीवपनेको प्राप्त हो जाऊँ क्योंकि मो अदि गहण इससे मेरे परिग्रह नहीं है | ने हैं। भव्य जीवको उचित है कि संसारसे मप रह जो आपत्ति उसको त्यागे और उपमारहित ही है जो प्पहारपारिवारिका । पदी देसार उसके उठा लेने के परिणामको याग देता है उसी पनड ही यह नीसग अचार्य बत होता है विशेषार्ध-इस माथामें नीसो अन बना वर्णन है। इस मा. दिकी बाइकारोवटा उसको गाय करता है। चार दिशा पार दरवाजास जोभायमान दो उसरा नाम नगर है। नहा मनुष्योरा गमनागमन नहीं लदा क्षयेट गुऔपके परिपूर्ण हो उसका नाम र. प्य अर्थात यन है। इसे गांव वा नगर वा वनमें दूसरेक दारा रसी पटी हुई, या भूटी परदन्गको देखकर उसको स्वीकार मानेरे भावको जो त्यागता है उसके ही यह तीसरा अचारत होता है । जो यस्तु अपने परिश्रमसे किसी का बुर कामकरके मिले दूसरा सन्मान दयाकरके देखें वह वस्तु मारा है- सिशय बहसकी कोचीनको भी लेना चोरी है । पुनसान स्थानमें मिली हुई वस्तुपर उराहाका अपि. कार है जिसकी यह भूमि है टीकाफारकहते है कि यह अचौर्य पत अपूर्व बलका दाता है। इसके पाटनकर्ताको पुण्यक उपयस अतिशय- रूप लोंका देर प्राप्त हो जाता है। स्वर्गरूप क मुसका मूलभूत पह बत है और कम कम करके मुक्तिरूपी सीया संगम कराने वाला है। आग चौथ वतको कहते है:- दहण इच्छिरूपं, वांछामापं णियदे ताम्। मेहुणसण्णविवन्जिय,-परिणामो अहव तुरीयपदं ।।५९॥ सामान्यार्थ-जो ग्राम रूप देगकर ही उसके भीतर अपनी इच्छा होनेम्प भावको हटाता है तथा मैथुन संशास रहित अपने परिणामोंको करता है उसके ही यह चौथा वत मैथुन संशात्याग अर्थात् माघN व्रत होता है। विशेपार्थ-दस गाथामें प्रमचर्य प्रतका रूप मानकर उस परम मनोहर अंगको देखने के कारण जो उनसे कीरा र नियमसार। लाप करते हैं वही कार्यकारी है अन्य स्वपर हितकारी वचन भी निश्चय नयकरके उपादेय नहीं हैं। आगे तीसरी समितिको कहते हैं:- कदकारिदाणुमोदण,-रहिदं तह पासुगं पसच्छं च । दिणं परेण भत्तं, समभुत्ती एसणा समिदी ॥ ६३ ॥ सामान्य अर्थ-जो कृत, कारित, अनुमोदना इनको त्यागकर प्राशुक, शुभ और श्रावक द्वारा भक्तिसे दिये हुए आहारको समभावसे भोजन कर ऐसे मुनिके एपणा समिति होती है। विशेपार्थ-मन वचन काय द्वारा करना, मन वचन काय द्वारा कराना, मन वचन काय द्वारा सराहना करनी ऐसे नो विकल्पोंकरके रहित जो अन्न हे सो नौकोटि शुद्ध कहा जाता अर्थात् जिसमें मुनि कुछ भी अपना सकल्प न करें । अलि प्रशस्त भोजनसे प्रयोजन यह है कि जो मनको हरनेवाला गेगादि व्यया. निद्रा आलस्यको पैदा न करे ! हरित कायमई साचिनरूप योंके संचारसे अगोचर सो प्रासुक है अर्थात जिसमें सचितपना । सचित्तका सम्बन्ध न हो । मुनिको प्रतिग्रह करना “आहार पानी मुज अत्र तिष्ठ तिष्ठ तिष्ठ " ऐसा कहकर पड़ गाहना, ऊंचेस्थानपर स्थित करना, चरण धोने, पूजन करना, प्रणाम करना, मन वचन और कायको शुद्ध रसना तथा भिक्षा अर्थात् आहारकी शुद्धता ऐसे नऊ प्रकार भनि- करके सहित जो श्रावक है तथा जिस आवक्रम श्रद्धा, शक्ति, लोमा अभाव, भाक्ति, ज्ञान, दया, क्षमा ऐसे सात वातारके गुण विराजमान हो ऐसे योग्य आचरणधारी उपासक श्रारकसे प्रदान किया मागन उसको जो परम तपोधन अर्थात् मुनि महण करते हैं उनके एक समिति होती है। यह व्यवहार एषणा समितिको कहा । निभयका उप विके इस समितिका प्रवेश नहीं है क्योंकि संसारी जीकि . प्राय Stषारिवारिकार। का मानना नयाईहासा हिश्रीसमय- सारनाni- * आकारमार्मादार जैसे रेचली,कर्म आहार गायक र आहार जमे एन्धि बल आहार जैसे Par मा, मामाहार बटाके, मानसिक आहार मेयोंके । श्री गुणभावानीन सा-मो मुनि सम भार नियममें लीन जिनका आमा मत और मारत है, जो समाधि परिणमन परई है. सर्व प्राणामार दया करनेवाले है, जिन्होंने अपना दिल लिया है गो मदार आहार करनेवाले है जो निदाको (टाने वाले हैं. मा नो अध्यात्मीनावरे निक्षय करनेवालाई से मुनि जद मुलंसरसों के समाको जला देते हैं। टीकाकार करते है-मो भन श्रावसदारा सबके अप्रभाग प्रदान कियेर आहारको महण करके पूर्ण ज्ञान प्रकाशमान ऐसे नात्माका ध्यान करते है तथा जो सत्वंस ही सम्यग तपकी तपनेवाले है वही तपस्वी है तथा वही गुन्दर मुनिरूपी श्रीको प्राप्त करते है ।। आगे सार्थी समितिको कहते हैं:- पोधइकमंढलाई, गहणविसग्गसु पयत्तपरिणामो। आदावणणिरोपण,-समिदी होदित्ति णिविदा ॥६४॥ सामान्यार्थ-पुस्तक कमंडल पीजी आदिके उठाने धरने में जो यत्न करनेरूप परिणाम सो आदाननिक्षेपणा समिति है ऐसा कहा है। विशपार्थनम गाथा अपद्धत संयमियोंके द्वारा संयमका उपकरण पीठी कमल तथा ज्ञानका उपकरण शान आदिकोंके उठाते धरते समय जो समिति करी जाती है उस समितिका वर्णन है । उपेक्षा संयमधारी मुनियोंके पुस्तक कमंटल आदि नहीं होते है वे उपेक्षा संयमधारी मुनि परम जि- तेन्द्री एकांतवासी बिलकुल बेचाह होते हैं निरन्तर आत्मध्यानमें लीन - ८० नियमसार। । रहते हैं इसलिये उनको बाहरके शास्त्रादि उपकरणोंकी जरूरत नहीं होती । ऐसे संयमी साधु अभ्यंतर उपकरण जा आपका निज परम तत्व उसके ही प्रकाश करनेमें चतुर होते हैं उनके सर्व उपाधिरहित सर स्वाभाविक आत्मज्ञानके सिवाय और कोई भी वस्तु ग्रहण योग्य नहीं होती । परन्तु अपहत संयमी मुनियोकेलिये परमागम जो शाख उसके अर्थको वार वार ज्ञान करानका कारण ऐसी जो पुस्तक तथा शौच करनेका कारण तथा शरीरको विशुद्धताका कारण जो कमीठ तया संयम अर्थात् प्राणी रक्षाका कारण जो पीडी सो होती हैं। इनके उठाने धरनेमें उसी समय जीवरक्षाके निमित्तसे पैदा होनेवाटा जो प्रयत्न निस्ने लवलीन जो आत्माके परिणामोंकी विशुद्धता सो ही आदाननिक्षेपन समिति कही गई है। टीकाकार कहते हैं कि उत्तम परम जिन मुनि- योंके सर्व समितियोंके अन्दर यही बड़ी समिति शोभायमान है जिससे उनको सर्व प्राणिमात्र पर क्षमा और मंत्री भाव होता है । हे भव्य जीत तू भी अपने मनरूपी कमलमें इस समितिको धारण कर जिससे त् पान लक्ष्मीरूप मुक्ति खीका स्वामी हो जावे ॥ भावार्थ-सा जाबोंपर कमा और सईका हित चिंतन यही इस समिति के पालनेका आभप्राय है। आगे पांचमी समितिको कहते हैं:- पामुकभूमिपदेसे, गूढे रहिए परोपराहेण । उच्चारादिद्यागो, पइच्छा समिदी हवे तस्स ॥६५॥ सामान्य अर्थ---जो मुनि जोरजंतु रहित प्रामुक जमीनमें से गह हो अन्यद्वारा रोकने योग्य न हो ऐसे स्थानमें मलम्बादिका त्या करते हैं उनहींके यह पाचमी प्रतिष्ठापना समिति होती है। विसपार्थ-दस गाथामें मुनीश्वरा लिये शरीरका मनाहि त्या कानेडिये जो स्थानकी मुद्धता चाहिये उसका वर्णन है यजीवके यह ही नही है, वह अभागे अन्नादिका टेना - नही पहा मामा दह है इस शहामते माहाण रोता है। आप उनसे सामान्य मनिषि मरममाव होते ही हैंग- लिये पाभियोंयिमरमा क्षेपनका स्थान भीबारित नपा इसरो हागनाने योग्य होना पारद स्थानमें हारा पर्म का उस स्थानो पुरपर र नासा उत्तरमुर पापोत्तम संहार मान कार्य कियामोश रयागर संसारका कारण माओfit fami गमेकाले ऐसे कार निमिच देहादिको तपा भपने आत्माको रहर पाते हैं तपा को परमसंयमी इस airan अपविपना भी वारदार विचार रते हैं उन मुनियों निध- पर यह प्रतिष्ठापना समिति होती है, अन्य पतीनामधारी स्वैरहनी सिपिलापानिको भी समिति नहीं होती है। टीकाकार कहते हैं यह समिति सटीक भुनीचरोलिये मोक्षरूपी राज्यका मूल कारण है। से है मुनि, जो जनमतमें चतुर हैं और अपने आत्माकी चिन्ताम लपलान है । परन्तु जिनमुनियोका चिन सहत पेटी तल- धारकी धारमै आसक हो चल रहा है भावार्थ-जो पिय मुर उस सहलके समान है जो तलगार की पारमें लिपटा हो, उस मुराके लोलुपी जो मुनि है उनके यह समिति नहीं होती है। जो अति. न्द्रियमुखके अभिलापी है उनही समिति होती है। हे मुनिप्रधान ! भले प्रकार इस समितिको जाने। कैसी है समिति, जो मुक्ति रूपी सीको प्यारी है, भवभवका भयरूपी अंधकार उसको नारा करनेकेलिये चंद्रमाही प्रभाके समान है, नया तरी सम्यक जो मुनिपदकी दीक्षा उसके लिये मुन्दर ससी है । प्रसन चित्त हो अब इसका ऐसा अभ्यास करो जो तुमको जिन धर्मके तपसे सिद्ध होनेवाला अविनाशी ही कोई ऐरो फलकी प्राप्ति हो। निश्चयकरके मुनि इस समितिकी संगतिसे शीघ्र ही किसी उत्तम फरको प्राप्त करते हैं जो फल मनसे चिन्तयने योग्य तपा वचनसे नि. सा..

नियमसार- ... --- - कहने योग्य नहीं है नया जो कपाल मुसाई अमृत रूप है। मानार्थ: समिति के पालते हुए ही मुनि शिव मुसको पासकते हैं। आगे मन गुतिको कहे हैं:- कालुस्समोहसण्णा, रागद्दोसाइअमुहमावाणं ! परिहारी मणुगुत्ती, ववहारणयेण परिकहियं ।। ६६ ॥ सामान्यार्थ-कलुपपना, मोह, अभिटापा, राग, देष आदि अन भावोंका जो त्याग करना उसे ही व्यवहारनयसे मनो गति कहते हैं । विशेपार्थ-इस गाथामें व्यवहार मनोगप्तिके स्वभावका वर्णन है । कोध, मान, माया लोम इन चार कपार्योंसे झोमित आकुलित मया से चित्त उसको कालुप्य कहते हैं । मोह दो भेदरूप है एक दर्शन मोहनी दूसरे चारित्र मोहनी ॥ संज्ञाके चार भेद हैं-आहार, भय, मैथुन और परिग्रह हैं । राम दो प्रकारका है एक असुन दूसरा शुभ ॥ जिन मनुष्योंका सम्बन्ध अपनेको न मुहावे असा जो वस्तुएं अपने मनको नहीं रुचें उन सबसे वरमई परिगान सो देष है । इत्यादि सर्व अशुभ परिणामोंके कारणोंको त्यागना ही न्य हारनयकरके मनगुष्ठि है ॥ टीकाकार कहते हैं जो अपने ननको सक्ष परमागमके अर्थकी चिंता लवटीन रखते हैं. जो जितेन्द्रिय हैं, जो वाह्य और अभ्यंतर परिग्रहकरके रहित हैं तथा जो श्रीमान जिनेन्द्रके चरणोंके स्मरणमें दत्तचिच हैं उनहींके यह मनगुप्ति होती है ।। ६६ ॥ आगे वचन गुतिको कहते हैं:- थीराजचोरमत्तक,-हादीवयणस्स पावहेउस्स। परिहारो वचगुत्ती, अलियादिगियतिवयणं वा ॥६॥ सामान्यार्थ-पाप बंधकी कारण नोकथा, राजक्या, चोरक्या, तथा भोजनकथा इन ४ विक्यारूप वचनोंका जो त्याग करना खें वचनगुप्ति है इसीको अटीअनिवृचिवचन भी कहते हैं । . - पारिवारिका MIT - चाय अपना सार है । अति र पुष्यो. का पुरुष समागमा खियोंके संयोग तथा वियोगमे पैदा मा सपनापना र पानिना किया जाना तया ना ना नाना सोपिया है || राजाओं पर कारणोंग जो उपन्यास सो नामाप्रपंच है चोरोंकी चोरी करने की प्रतियोग भोपनमा परिभारिपन है । अत्यन्त नदी भोजनको प्राति. नानासार भोजन समूह सार यही दूध भादि भोजन पानकी प्रोमा करनी सोमनाया है। इन चारोही समरकी कथाओं का जो स्था है सा बन गुलि है। सीको अटीक पचनसे निवृति भी कहते १और भी अन्य सम्पर्ग अशुभ बचनो स्यागना सो वचन गुप्ति है। सी भात श्री पूज्यपाद स्वामीने भी कहा है भावार्थ इस प्रकार याहरमें वरनकी प्रवृनिको त्याग कर अंतरंगमें विशेषरूपसे अंतनल्प अर्थात भीतर २ही वचन कहना उसको भी दूरफरनेसे योग अर्थात् भ्यान होता है यही प्यान परमात्माको प्रदीप्त अर्थत प्रमश करनेवाला है।टीकाकार कहते है:-जो भन्यजीव संसारके भयको करनेवाली सर्व ही वचनकी रचनाको त्यागकर महज विलासरूप चतन्यका चम- काररूप एक शुद्ध आत्माको पाता है वह जीव शीघ्र ही कर्म अंध. कारक समूहको अतिशयकरके विश्वस कर स्वभावकी महिमाका आनंद से मुसकी सान मुक्तिको प्राप्त करता है ।। अब कायगुप्तिको कहते है:- पंधणदणमारण, आकुंचण तह पसारणादीया। फायकिरियाणियत्ती, णिमिहा कायगुत्तिचि॥६८॥ सामान्यार्थ-बंधन, उदन, मारन, संकोचन, विस्तारन आदि शरीरकी क्रियाओं को न करना सो कायगुप्ती कही गई है।

नियमसार- - विशेषार्थ-किमीका बंधन होना इसमें अंतरंग निमित्त का उश्य तया बाद्य कारण किसीके कायका व्यापार है । छेदनमें भी अंग कारण कर्मका उदय और वाद्य कारण प्रमादी कषाय सहित जीरफ शरीरकी किया है। मारनका मी अंतरंग कारण कर्मका उदय बाह्य कारण क्षयकरनेवाले वाद्य मिसके काय आदिकी नेष्टा है । संकोच विस्तार एक ही पायमें समुद्यातकी अपेक्षा होता है जिसमें आत्मा प्रदेश आत्माको न त्यागकर कुछ देर केलिये फैलनाते हैं और फिर सकुट जाते हैं इत्यादि बंधनादिरूप जो कायकी क्रिया उनसे अलग रहना सो कायगुप्ति है । टीकाकार कहते हैं जो मुनि कायके विकारोंको त्यागकर वारवार शुद्धात्माकी भावना करता है उसीका ही में इस संसारमें सफल समझता हूं " अब निश्चय नयसे मनोगुप्तिका स्वरूप कहते हैं:- जा रायादिणियत्ती, मणस्स जाणीहि तम्मणोगुत्ती । अलियादिणियत्तिं वा, मोणं वा होइ वदिगुत्ती ॥६९॥ सामान्यार्थ-जो मनसे रागादि भावोंका दूरकरना सो मनगुप्ति तथा असत्य आदि वचन का न कहना मौन रखना सो वाग्गुप्ति है । विशेषार्थ:-जो मुनि सब मोह रागद्वेषको दूर करके संडरहित अदेत परमचैतन्यरूपमें मले प्रकार स्थित होता है उसकि ही निश्चय मनोगुमि होती है।हे शिष्य! तुम जबतक इस स्थिरतासे चलायमान न हो तबतक मनो गुप्ति जानो । सम्पूर्ण असत्त्य भापाका त्यागना अथवा मौनवतका रखना ऐसा कि चेतना जिसमें नहीं ऐसे मूर्तिक द्रव्यमें व इंदियज्ञान अगोचर ऐसे अमूर्तिक द्रव्यमें व दोनोंमें वचनकी प्रवृत्ति न करना सो निश्चय वचन गुप्ति कही जाती है । टीकाकार कहते हैं जो ।

पाश्मिर ८५ मा किसाण को मार पाता जाति पानी पीरिये म मान रोकिमि पणि हातामा अनत पतुष्टयम HEART TMA finate सदा नाति मापाप भोगी होता है। अनियमिको कहते है। फायफिरिपाणिपती, फाउरसम्गो सरीरंगे गुती । हिंसाहणियपी पा, सरीरधिषि णिहिता ॥७॥ मामान्या-चाप उम्पूर्ण बियाओगे याना भायंस ममत्त भारना सोसर गुम अधरा सर्व रियाये दूर रहना सो काप मुभि एसा कहा गया है। विपार्थ- ही मनुष्यों में यातही कियाएं हुआ करती है। उन सर्व क्रियाओं को बोरसर कायोत्सर्ग करना सो काय गुमि । तथा पंच प्रकार पावर नीर और सर्व राजीवोंकी हिसा न पानी सा काय गति है । तथा परम यमके धारी परम निन योगीश्वर नर अपने आमार बैतन्यम शरीरसे इस शरीरका भेदशान करते तब उन अंतरगर्म अपने आत्माकी उवष्ट मूर्तिका निधपका होना सो काय गुप्ति है । ऐसा ही श्रीतत्यानुशासनमें कहा है कि शरीरकी सम्पूर्ण घटाओको तथा संमारक परण राग देपादि भावोंको जड़कर स्थिर ही अपने आत्मस्वरूपमें लीन हो जाना सो कायोत्सर्ग कहा जाता है काकार कहत है-आत्मा अपरिस्पन्दरूप अर्थात् हलन चलन कियासे रहित है, परन्तु शरीर परिस्पन्दरूप हलन चलन क्रिया सहित है। पहारसे यह लन चटन मेरे आत्मामें होता है इसलिये में पारिकी विकाररूप क्रियाओं का त्याग करता हूँ ॥ अब श्री आहत परमेष्ठीका स्वरूप कहते हैं:- पणपाइकम्मरहिया, फेवलणाणाइपरमगुणसहिया! चात्तिसअदिसयजुत्ता, अरिहंता एरिसा हॉति ॥७१५ नियमसारrwwww -ARIA-- . सामान्यार्थ-जो सम्पूर्ण पातिया कोसे रहित हैं केवल ज्ञाना- दि परम गुणके धारी हैं चौतीश अतिशय विराजमान हैं सो ही अरहंत ' कहलाते हैं। विशेपार्थ- आत्माके गुणोंको घातने वाले कर्मोको घातिया कहते हैं। घनरूप अर्थात् आत्मासे जो एकमें एक होरहे हैं ऐसे जोज्ञानावरणी, दर्शना- वरणी अंतराय और मोहनी इनसे जो अहंत परमेष्ठी रहित हैं। इन घातिया कोके नाशसे समस्त लोककोआनन्दका कारण सर्वथा निर्मठ ऐसा केवल ज्ञान, केवल दर्शन, केवल वीर्य और केवल सुख इन चार चतुष्टय करके जो अर्हत भगवान युक्त हैं तथा आगममें प्रसिद्ध ३४ अतिशय के जो धारी हैं वे ही भगवान अर्हत होते हैं । टीकाकार कहते हैं- वे सुसीमाजीके पुत्र श्रीपद्मप्रभु जयवन्त हो निनका शरीर परमोवा- रिक है जिसमें पद्मरंग प्रसिद्ध है, जिनके नेत्र प्रफुल्लित कमलके समान हैं, जो पुण्यसमूहरूप तीर्थंकर गोत्रके धारी हैं, जो पंडित ननकी कमलाको प्रसन्न करनेकालये सूर्यके समान है, जो मुनिजनामी वनीकी शोभाको बढ़ानेकोलये चैत्रमास अर्थात् वसतकाल हैं, जो कर्म रूपी मेनाके नाश करनेको शत्रु हैं, तथा जिनका चारित्र सर्व प्राणियों- का हित करनेवाला है। जो कामदेवरूपी हाथ के नाशकेलिये गिइके समान हैं, जो पुण्यरूपी कमलके सिलानेको मयं हैं, जो सम्पूर्ण गुणों के समान हैं, जो सर्वको इच्छित मुम्ममाता कल्पा । जोर कर्मोके बीजको जलानेगलं हैं, जो संसारके पदार्थों को छोड़ चुके हैं, निनके चरणोंको इंद्र नमस्कार करते हैं ऐसे श्रीनिनेन्न व नवन्न होतु ॥ जिन्होंने कामदेवके धनुषको जीत लिया है, जो मई लियाक प्रगटा, निनो परिणति मुमहजो पाप मनकेलिये यमरान के समान है जिन्होंने ममा सापको wोतकर दिया है, जिनके परमभीमपन्त पोको माग पदाधिकार नम्न काने है, जिन्होंने कोशको जीत लिया है तथा विद्वानों के समूह मिनो नमस्कार करते है से श्रमिनेन्द्र जयान्त हो । यहापर टीमरने पy अरहन भगरानकी एक स्तुति मनोहर श्लोकों में रिसी है ॥ ए प्रथम श्लोक पर्व ममास शनोंके अन्तौ ।' अक्षर भाया है, वमो झोकमें "" अक्षर, तीसरमें 'प' अक्षर आया है। अब चौकीका अर्थ कहते है जिससे समास पकि अन्तमें '' अक्षर आया है अर्थात जिन्होंने मोक्षको प्रगट किया है, निन नेत्र पर कमलके समान विस्तार युन है, जिन्होंने पापकी सनाको जीत लिया है, कामदेवकी पक्षको सहित किया है, जिनके युगल पापों को पक्ष नमन करते हैं, जो तत्वविज्ञानमें दक्ष अर्थात् चतुर है, जिन्होंने पुरिमान भन्य जीवोंको शिक्षा प्रदान की है, तथा जिन्होंने निर्शणका कारण मुनि दीक्षाका स्वरूप पहा है ऐसे श्री मिनेन्द्र प्रभू- भयवन हा ॥ आगे स्टोर के पदोंके अंतमें 'श' अक्षर है:-जो कामदेव धरणन्द्र और दवा शि है, जिनका शरीरका प्रदेश कांतमान शोभायमान है, जिनके चरणों को यमीश अर्थात् मुनियों के ईश नमस्कार करते हैं, जिन्होंने यमरानकी पक्षको नष्ट कर दिया है, जो पापरूपी वनके जलाने कलिय अनिके समान है, जिनका मुयश एर्व दिशाओमें फैला हुभा जो जगलकश है, ऐसे मनोहर श्रीपमप्रभु स्वामी जयवन्त होह ।। आगे श्री सिद्धभगवानका स्वरूप कहते हैं:- महकम्मबंधा, अहमहागुणसमण्णिया परमा । लोयग्गठिदा णिशा, सिद्धा जे एरिसा होति ॥ ७२ ॥ सामान्यार्थ-जिन्होंने अष्टकमोके बंधनाको नाश करदिया है, जो आठ महागुणकरके सहित परम अर्थात् बढ़े हैं, जो लोकके अग्रभागमें स्थित जो नित्य अर्थात् अविनाशी है वे सिद्ध होते है।

८८ नियममार- विशेपार्थ-इस गाया मोक्ष प्राप्त करनेके परम्परा कारणभूत ऐसे जो भगवान सिद्ध परमेष्ठी हैं उनके स्वरूपको कहते हैं। सम्पूर्ण पने अंतरंगके सन्मुस होकर ध्यान और ध्येयके विकल्पोंसे दूरवर्ती ऐसा जो परम शुद्ध शुक्ल ध्यान उसके बलसे जिन्होंने ज्ञानावरणी आदि आउ प्रकार कर्मबंधोंको नष्ट कर दिया है तथा जो शायक सम्यक्त आदि आठ गुणोंसे पुष्ट और तुष्ट अर्थात् संतोपित हैं तथा जोसम्यग्दर्शन, सन्यज्ञान और सम्यक् चारित्र ऐसे तीनों तत्वोंके विशेष गुणाधाररूप होनेसे परम हैं, अर्थात् तीनों तत्वोंकी जहां पूर्णता है, तथा जो व्यवहारसे तीन लोकके शिसरके आगे गमनका कारण धर्मद्रव्य न होनेसे लोरके अम- भागमें ही तनुदालवलयमें विराजमान हैं तथा जो आनी इस अभूत पूर्वपर्यायसे कभी अन्य पर्यायरूप न होंगे अर्थात् सिद्धपाय न त्याग्ने इस कारण नित्य हैं ऐसे श्री सिद्धपरमेष्ठी होते हैं। टीकाकार कहते हैं कि ज्ञानके पुन ऐसे जो श्री सिद्धभगवान हैं सो म्यर हारनयकरके तीन भवनके शिसरके अग्रभागके चूडामणि हैं पग्नु निश्चयकरके श्री सिद्धदेव स्वाभाविक परम चैतन्य चितामाग र अपने अविनाशी शुद्ध निजरूपमें ही विराजते हैं जिन्होंने सर्व वोपोग अस्त कर दिया है, जो देहसे मुक्त होकर तोन भवन के शिलरपर गिणात है, जो सिद्ध अवस्थामें उपमा रहित प्रत्यक्ष ज्ञान दर्शन शक्तिसे युन ।, जिन्होंने अकर्म प्रतिके समुदायों को नष्ट कर दिया है और न महागुणों को सिद्ध किया है, जो अंत रहित, अन्यागध हैं, जो न भवन शिरोमणि और सिद्विरुपी मी स्वामी है ऐसे नित्य शुद्ध सिंदोंको में नमस्कार करता है। जो अपने आत्म में स्थित टबीन है, जिन्होंने आउ गुणकी सदा पात पिया है और मार कर्मक समुहको ना किया ऐसे विद महायजाडो में वारपार नमका करना। 2 पारपारिवारिकार। मांगी आचार्य स्वरूपको कहते है.- पंपापारसमग्गा, पंसिंदिग्दतिदप्पणिठणा। धीरा गुणगभीरा, आपरिया एरिसा होति ॥७३॥ सामान्याथ--जो दर्शन, शान, चारित्र, नप और वीर्य ऐसे पाचा आधारोंसे परिपूर्ण है, नो पवेन्द्रियरूपी हाधियों के मन को दटन रमेशले है, जो धार, भोर गुणो गंभीर है वे ही आचार्य होते है। विशेषार्थ-जी ज्ञानादि पापों आचरम परिपूर्ण हैं जो स्पर्शन, रसन, भाग, पशु और श्रीबदन पाचों इन्द्रियोंरूप मदांध हस्तियोंका मद दटनमें दक्ष हैं, तथा जो सम्पूर्ण प्रकारसे पोर उपसर्गोको विजयकरके धीरता गुणके कारण गंभीर है । ऐसे टक्षणोंहासे जानने योग्य श्री भगवान आचार्यनी है। ऐसा ही श्रीयादिराजदेवने कहा है:-कि जो पंच आचारमें लीन है, अकिचन अर्थात् निम्रन्थताके जो स्वामी है, कपाय चोरों स्थानोंको जिन्होंने नष्ट दिया है, प्रगट शान के बलसे परमतेनको जिन्ने पार किया है। जो पंचास्तिकायके स्वरूप रानमें लवटीन हैं, जो प्रगट स्थिर योगाभ्यासमें प्राण पुदिशाली है, जो गुणोंकरके उदय रूप है ऐस श्री आचार्य महाराजोंकी हम भक्तिरूपी झियाके अभिलाषी अपने संसारसम्बन्धी दुखसमूहको काटनेकेलिये पूजन करते हैं । . . हजार 174 प्राप्तिका कारण है, जो समता और इन्द्रियदमनताका मंदिर है, जो मैत्री, दया और दम अर्थात् जितेन्द्रियताका घर है, जो उपमारहित है ऐसा श्रीगुरुका मन मेरे द्वारा बदनीक है ।। आगे श्रीउपाध्याय महाराजका स्वरूप कहते हैं:- रयणत्तयसंजुत्ता, जिणकहियपयच्छदेसया सुरा। णिकसभावसहिया, उवझाया एरिसा होन्ति ॥७४|| जाते हैं। तथा ज्ञान दर्शन चारित परम तपश्चरण ऐसी धार परकी भावना नियमसार- सामान्यार्थ-जो रत्नत्रयसे युक्त हैं, जिनेंद्र भगवान प्रणीत पदा- थोंके उपदेशक हैं जो इच्छारहित ऐसे भाव सहित हैं ऐसे उपाध्याय कहे विशेपार्थ-इस गाथामें अध्यापकसरूप परम गुरुओंके स्वरूपका वर्णन है:-जो निश्चल संड रहित अद्वैत परम चेतन्य रूपके श्रद्धान, ज्ञान और आचरणसे शुद्धनिश्चय स्वभाव रत्नत्रयके धारी हैं, जो मिने- न्द्र के मुखारविन्दसे प्रगट हुए जीवादि समस्त पदार्थोको अर्थ सहित व्याख्यान करनेवाले हैं, जो सम्पूर्ण परिग्रहका त्याग है लक्षण जिसका तथा कर्माजन रहित ऐसा जो निज परमात्मतत्त्व उसकी भारनाने पैदा होनेवाले परम वीतराग सुसरूपी अमृतके पीनेमें अनुरागी हैं इस- लिये इच्छा रहित परम भावनाके स्वामी हैं । ऐसे लक्षणांकरके पहचा. नने योग्य जैनियोंके उपाध्याय महाराज होते हैं ॥ टीकाकार कहते हैं-मैं रनत्रयमई, शुद्ध, भव्यकमलों के लिये मूर्य ऐसे उपदेश दाता उपा- ध्यायोको नित्य धारदार वंदना करता हूँ ॥ आगे निरंतर अरहित परमतपश्चरणमें लीन ऐसे सर्वसाधुके स्व. रूपको कहते हैं:- यावारविष्पमुक्का, चविहाराहणासयारना । णिग्गंथा णिम्मोहा, साढू दे एरिसा होति ॥७५ ।। सामान्या-जो सर्व व्यापारसे रहित है, चार प्रकार आगनाने सदा लवलीन हैं, जो निमन्य और मोह रहित है वे साधु होते हैं। विशेषार्थ-जो महान पुरुष परम संयम धारी हैं तथा जो पंचम भाव जो पारणाभिक भार उसकी मारनामें परिणमन करते हैं-गा। पचमभाव, जो तीन काठमें आवरणरहित तथा समाजनमे रहित ने गुर है। ये मुनि सीधारण सा पान प्यापारी ।

व्यवहारचारित्राधिकार। 4- रूपी संपदा उनमें जो अनुरक्त हैं अर्थात् तन्मय है । बाह्य अभ्यंतर सर्व परिग्रहके हठसे रहित हैं इसलिये निबंध है । सवा कर्मरूपी अंजनसे रहित निज परमात्मस्वरूप जो कारण समयसारस्वरूप उसका यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान और आचरण उनके विरोधी मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, और मिथ्याचारित्र इनके अभावसे जो मुनि निर्मोह अर्थात् मोह रहित है । तथा जो मुनि परम निर्वाणरूप सी उसका सुन्दर केशोंका जूड़ा उसकी शोभा तथा उसके सचिकण केसरका रज पुंज उसमे शोभा- यमान नानाप्रकार वर्णोका अलंकार उसके आलम्बनमें कौतूहल बुद्धि हैं अर्थात् मुक्ति स्त्रीके प्रेमी है ऐसे सर्व साधु होते हैं । किाकार ऋहते हैं कि साधुका मन संसारी जीवोंके ऐसे मुखोसे रहित है सर्व परिग्रहके सबंधसे दूरवर्ती है हम लोगोंसे नमस्कार करने योग्य है । हे साधु ऐसे मनको अपने आत्माहीमें शीघ्र दुबाओ। आगे इस अधिकारको संकोचते हैं:- एरिसयमावणाए, वयहारणयस्स होदि चारित्तं । मिच्छयणयस्स चरणं, एची उडू पवक्खामि ॥ ७६ ॥ सामान्यार्थ-न ऊपर लिसित भावनामि व्यवहार नयी अपेक्षासे चारित्रका कथन किया है । निश्चय नय अपेक्षा चारित्रको आगे कहेंगे। विशेषार्थ:--इस प्रकार पहले कहे पाचमहावत, पांचसमिति, निश्य व्यवहार तीन गुप्ति तथा पाच परंमष्ठीका स्वरूप-इनके द्वारा अत्यन्त शुभ भाश्नाकी प्रामि होती है यह सर्व व्यवहार नयके अभिप्रायसे परम शरिब होता है। आगे कहने योग्य पांच अधिकारमें परम पंचम भाव जो परि- शामिक भाव उसमें लीन तथा जो पंचमगति अर्थात मोक्ष उमका कारण- रूप ऐसा शुद्ध निधय नयके आधीन जो परम पारित है उसका स्वरूप दिखलाएगे। ऐसा ही श्री मार्गमकामं करा है कि जिस शारिक - १२ नियमसार- विना सम्यग्दर्शन और ज्ञान ऊखल के भीतर पड़े हुए बीजके समान दिल. केसे तथा मेलसे अलग नहीं है उस जैनके चारित्रको मैं नमन करता है। इस चारित्रकी स्तुति देव असुर, तथा मनुष्य सर्व करते हैं । दफाकार कहते हैं कि मोक्षरूपी वीके अनंग अर्थात् अतीन्द्रिय सुखका मूल यह परम निश्चय चारित्र है ऐसा आचायोंने कहा है तथा इस चारित्रका उत्कृष्ट साधन व्यवहार चारित्र भी है एसा वर्णन किया है। इस प्रकार सुकविकमलोंकेलिये सूर्य पंचेंदियके विस्तारसे रहित शरीर मात्रपरिमह धारी श्रीपद्मप्रभमलधारिदेव रचित नियमसारकी नात्पर्य्यवृत्ति नामटीका व्यवहारचारित्रका अधिकार पूर्ण हुआ । । . निश्चयप्रतिक्रमणाधिकार । आगे आचार्य टीकाकार श्रीमाधयसनाचार्यको नमस्कार करते -जो संयम और ज्ञानकी मूर्ति हैं तथा विनयवान् जो शिष्यरूपी कमल उनके विकाश करने के लिए सूर्य हैं तथा कामदेवरूपी हा के कुंभस्थल विदारनेको सिंह के समान हैं ऐसे जो श्रीमाधवचंद्र आचार्य मो शोभाको विस्तारते हैं । आगे सर्व व्यवहार चारित्र और उसके फल । लाभ उससे प्रतिपक्षी जो शुद्ध निभय नयस्वरूप परम चारित्र उसको प्रतिपादन करनके अभिप्रायसे निभय प्रतिकमण आधिकारको आगे तिसमें प्रथम ही पंचरत्नका स्वरूप कहते है:- गाई णारयमावो, विरियच्छो मश्वदेवपज्जाशी। कत्ता पहि कारबदा, अणमंता ग्रेप कत्तीर्ण ॥ ७ ॥ --- निश्वयमतिकमणाधिकार णाहं मग्गणठाणो, णाऽहं गुणठाण जीवठाणो ण । कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता णेव कतीणं ॥७८॥ गाई पालो बुडो, ण चेव तरुणो ण कारणं तेसिं । कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता व कचीणं ॥ ७९ ॥ पाहं रागो दोसो, ण चेव मोहो ण कारणं तोसें। कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता व कत्तीणं॥८॥ णाहं कोहो माणो, ण चेव माया ण होमि लोहो हिं। कचा ण हि कारइदा, अणुमंता व कचीणं ॥१॥ सामान्यअर्थन में नारकभाव धारी हूं, न मै तिर्यंच । मनुष्य तथा देवपर्यायवाला नहीं हूं, न मैं इनका कर्ता हूं न, करानेवाला हूँ और करनेकी अनुमोदना करनेवाला हूं। न तो मैं मार्गना स्थान हूं न गुणस्थानरूप हूंन जीवसमास स्थानरूप हूँ न में इन भावोंका कर्ता हूं न करानेवाला हूँ न मैं कर्ताओंकी अनुमोदना करनेवाला हूं।न में बालक हूं न मे बहर ईन मैं जुबान हूं और न इन अवस्थाओं के होने का हूं।न मैं इनका कती हूं न करानेवाटा हूं और न मैं इनके करनेवालोंकी अनुमोदना करनेवाला हूं॥न में रागरूप हूँ न देष रूप हूँ न मोहरूप हू और न इन भावोंका कारण हूं, न मैं इनका कर्ता हूं, न कराने वाला हूं और न अनुमोदना करनेवाला हूं ॥ न में क्रोधरूप हून मानरूप हूँ न माया रूप हूं और न कभी लोभ रूप होता हूँ। न मैं इनका कर्ता हूं न करानेवाला हूं और न करनेकी अनुमोदना करनेवाला हूं। विशेषार्थ-इन गाथाओंमें कहा है विशुद्ध आत्माके सर्व कर्तृत्व भावका अभाव है। बहु आरंभ और बहु पस्मिहके अभावसे मैं कभी नारक पव्यरूप नहीं होता है क्योंकि संसारी जीवके ही व्यवहारसे नियमसार- ------- । मेरे नरक । बहु आरंभ और बहु परिग्रह होते हैं और इसीकारण उस संसारीके नारकादि दुर्गतिका कारण ऐसा पूर्ण मोह, राग, तथा द्वेष होता है। मैं शुद्ध निश्चयके बलसे शुद्ध जीवास्तिकाय हूं। पर्याय समान तिर्यच पर्याय भी नहीं है और न मनुष्यपर्याय है और न मेरे देवपाय है क्योंकि देव पर्यायके योग्य सुन्दर रस गंध तथा शुम रूप ऐसे पुल दन्य उनका सम्बन्ध मेरे साथ नहीं है। इसीप्रकार १४ प्रकार मार्गनाके स्थान १५ जीव समासके स्थान व १४ गुणस्यान ये कोई भी सुद निश्चयकरके मेरे नहीं है । कैसा हूं मैं, परम भाव जो शुद्ध परिणामिक भाव उसको धारण करन पाला हूं । मनुष्य तिर्यचकी कायकी जातिमें अवस्था निमिनसे जो विकार पैदा होता है वही विकार शरीरका वालक, धूप, अगन शिथिलआदि अवस्थारूप हानेसे अनेक प्रकार है-सो इनमेंस को भी विकार शुद्ध निश्चय नयके अभिप्रायसे मेरे नहीं है । सत्ता, गान, परमचैतन्य सुसका अनुभर इनमें लीन जो उकृष्ट आत्मी ताब है उस तन्त्रको ग्रहण करनेवाली जो शुद्ध द्रव्याधिक नय उसके परमे मेरे मोह, राग, व देप बिलकुल नहीं है। मैं स्वभाविक निश्चय कप सदा निरावरण हूँ कर्मो के आवरणसे अलग हूं। सुब ज्ञान RT सहज चैतन्यमई शक्तिका धारी हूँ। सहन दर्शन गुणरो प्रभासमान और परिपूर्ण मेरी मूर्ति है, अपने स्वरूप निश्चलतासे हरा 100 कारण स्वभावसे ही यथाल्यात चारिशका धारी है। इसलिये मेरे सापूर्व संसारसम्बन्धी दुःसांके कारण ऐसे कोप, मान, माया, सोमना!' तथा न मैं इन नानाप्रकार आरितामा मात्र पर्याय निवर फर्ता, न करानेगला और न उ कमों का मोदक । न मैं नार पर्यायको करता हूं, मैं तो स्वाभाविक पद आरिटामा आमाको ही अनुभा I मैं पशु करता । मैं तो सहन रित (IRST HIमाह arel m निश्श्यपतिक्रमणाधिकार । AN । हूं । न मे मनुष्य पर्यायको करता हूं, मैं स्वाभाविक चैतन्यका बिलास- रूप जो आत्मा उसहीका अनुभव करता हूं। न मै देव पर्यायको करता हूं, मैं सहज चैतन्यके प्रकाशरूप आत्माका ही मनन करता हूं । न मै मिध्यादर्शन आदि गुणस्थानोंके भेदोंको करता हूं । मैं स्वाभाविक चैतन्यका विलासरूप आत्माका ही सचेतन करता हू।न मै एकेन्द्रिय आदिक जीव समामके भेदोंको करता हूं। मैं सहन चैतन्यका प्रकाशरूप आत्माहीका अनुभव करता हूँ। न मै शरीर सम्बन्धी बाल वृद्ध आदि भेदको करता हूं । मैं स्वाभाविक चैतन्यका विलासरूप आत्माका ही स्वाद लेता हू । न मै राग देप आदि भावकके भेदोंको करता हूं। मैं सहन चेतन्यके प्रकाशरूप आत्माहीका मनन करता हूं। न मैं भावकर्म- रूप कोधाद चार कषायोंको करता हूं। मैं स्वभाविक चैतन्यका विलास रूप आत्माकाही अनुभव करता हूं। इस प्रकार पंचरत्न मई ५ गाथाओंमें गर्भित संक्षेपमें यह कथन किया है कि सर्व विभावपर्यायोंको त्याग कर- नेकी भावना करना ही कार्यकारी है। टीकाकार कहते है-जो भव्य जीव इन पांचरत्नमई पांच गाथाओंके द्वारा अपने चित्तको सर्व इन्द्रिय विषयोंके हठसे छुड़ाता है तथा अपने आत्मीक द्रव्यके शुद्धगुण पर्या- योंमें अपने उपयोगको लीन करता है वह आत्मा अपने आत्मीक भाषसे भिन्न सर्व विभायोंको त्यागकर शीघ्रही मुक्तिका लाभ करता है। आगे कहते है कि भेद विज्ञानसे ही क्रम २ से निश्चय चारित होता है:- एरिसभेदमासे, मज्झच्छो होहि तेण चारि। तं दिढकरणणिमिचं, पडिकमणादी पवक्सामि ॥२॥ सामान्यार्थ-ऊपर कहे प्रमाण भेद विज्ञानके भीतर जो अभ्यास करते हैं वे मध्यस्थ होते है-इसी भावके द्वारा चारित्रका लाभ होता है। सी चारित्र हट करनेकेलिये प्रतिक्रमण आदिको कहेंगे ऐसी श्रीन- बुंदाचार्य प्रतिज्ञा करते है ।।

नियमसारrumawra विशेषार्थ--पहले कही हुई पंचरत्नमई पांच गोंके द्वारा अर्थका भाव जाननेसे मोक्षका साधक ऐसा जीव और पुगलोंका भेद विज्ञान होता है इस भेद विज्ञानका अभ्यास करते करते जो मुमुक्षु मोक्षके इच्छुक इस भेद विज्ञानके मावमें सदा स्थिर रहते हैं वे ही मध्यस्थ अर्थात् वीतराग हो जाते हैं। इस कारणसे ही उन परम संयमी मुनियोंके ही वास्तव में चारित्र होता है--इसी चारित्रमें निश्चलरूपसे स्थिति करनेका उपाय प्रति- क्रमण आदि नियमरूप क्रियाएं कही गई है । अतीत अर्थात् गतकालमें किये हुए दोपोंको छुड़ानेकेलिये जो प्रायश्चित किया जाता है उसको प्रतिक्रमण कहते हैं। आदि शब्दसे प्रत्याख्यान आदिभी ग्रहण करने। आगे इनहीका स्वरूप कहेंगे। ऐसा ही श्रीअमृतचंद्रसूरी ने कहा है कि निश्चय करके जोर सिद्ध हुए हैं वे सर्व ही भेद विज्ञानकी महिमामे हुए हैं और जो जो संसारमें बंधे हुए हैं वे सर्व ही भेद विज्ञान के अभावसे ही बंधे हुए हैं। टीकाकार कहते हैं कि श्रीमुनिनाथके चित्तमें अतिशयकरके मेद ज्ञानका भाव होनेपर स्वयं ही यह उपयोग मोहको छोड़ देता है तया शान्तभावरूप ऐसा शमरूप समुद्र उससे समस्त पापरूपी कठको धो डालता है-यह कोई निश्चयकरके समयसारका ही एक भेव है। आगे प्रतिक्रमणका स्वरूप कहते हैं:- मोत्तण वयणरपणं, रागादीभाववारणं किच्चा। अप्पाणं जो झायदि, तस्स दु होदित्तिपडिकमण॥८॥ सामान्यार्थ:-वचनकी स्चनाको छोड़कर तथा राग द्वेषारि भावको निवारणकरके जो कोई आत्माको ध्याता है उसके प्रतिक्रमण होता है। विशेषार्थ-जो मोक्षायों जीव प्रतिदिन सर्व पाकेि समूहों को अप करनेकेलिये वचनई प्रतिक्रमणकी स्तुति का है उसका इस माथामें -- निश्चयपतिक्रमणाधिकार ! । निराकरण है। जो कोई परम तपश्चरणका कारण स्वाभाविक वैराग्यरूपी अमृतका जो समुद्र उसके बढ़ाने के लिये पूर्ण चंद्रमाके समान है उसके अशुभ वचनोंको कहनेका त्याग तो होता ही है तोभी वह प्रतिक्रमण सूत्रमें गठन कीहुई कठिन वचनोंकी रचनाको छोड़ता है और संसार रूपी बेटके मूलकद जो सर्व मोह राग द्वेष भाव इनको दूर करता है तथा सडरहित आनंदमई निजकारण परमात्माका ध्यान करता है उसी मुमच जीवके निभयकरके निश्चय प्रतिक्रमण होता है । कैसा है यह निश्चय प्रतिक्रमण, जहाँ परमात्मीक तत्वका सम्यक् श्रद्धान, शान और आचरण विद्यमान है । तथा जहां सम्पूर्णवाग्विलास अर्थात् वचन रचना- रूप च्यापारका त्याग है । ऐसा ही श्रीमान् अमृतचंद्र सूरी ने कहा है:- कि बहुतसे खोटे विकल्परूप वचनकी रचना करनेसे कोई कार्यकी सिद्धि नहीं है। परमार्थबात यही है कि नित्य एक स्वरूप- हीका अनुभवकरना ठीक है । क्योंकि अपने आत्मीक रससे भरपूर ऐसे पूर्णज्ञानका जहाँ प्रगटपना है ऐसे समयसारके सिवाय और कोई कुछ अनुभवने योग्य नहीं है । दीकाकार कहते है-अत्यन्त तीन मोहसे पैदा किये पूर्वमें जो कर्म उनका प्रति- क्रमण करके मैं नित्य सम्यग्ज्ञानरूपी आत्मामें अपने आत्मस्वरूपके द्वारा वर्तन करता हूं। आगे कहते है जो आत्माकी आराधनामें ठहरा हुआ है उसी जीवके ही प्रतिक्रमण कहा जाता है:--- आराहणाइ वट्टइ, मोतूण विराहणं विसेसेण । सो पडिकमणं उचाइ, पडिकमणमओ हवे जम्हा॥४॥ सामान्यार्थ-जो कोई मोक्षार्थी विशेषकरके सर्व विराधना अर्थात् अपराध उसको छोड़कर स्वरूपकी आराधनामें वर्तन करता है वह जीव प्रतिकमणमई होता है तथा वही जीव प्रतिक्मणस्वरूप कहा गया है। नि. सा.. ।

निपमसार- . विदशेपार्थ-जो कोई परमतत्व ज्ञानी जीव निरंतर आत्मसन्मुत्त हो विना टूटे हुए अर्थात् लगातार परिणामोंकी परिपार्टीसे साक्षात् स्वमावमें ठहरकर आत्माकी आराधनामें वर्तन करता है वही जीव निरपराध स्वभाव है। आत्माकी आराधनाका विगत होना अर्थात् विराधना होना सो अपराध हे उसकरके जो रहित है वही मव्य निरपराध है । ऐसा मन्य जीव सम्पूर्ण प्रकारसे विराधनाको छोड़ देता है। जिसके परिणामसे आराधना चली गई है उस परिणामको विराधना कहते हैं। ऐसा निरपराधी जीव ही निश्चय प्रतिक्रमण स्वरूप है ऐसा कहा गया है । सो ही श्रीसमय- सार में कहा है । उसहीका समयसारकी व्याल्यामें श्लोक है-जो अपराधीजीव है वह निरन्तर अनंत कम्मोसे वंधता है परन्तु जो निरप- राधी है वह कमी भी बंधनको स्पर्श नहीं करता है। क्योंकि सार- राधी अपने आत्माको नियतरूपसे अशुद्ध ही मनता है परन्तु निरपराधी मलेप्रकार अपने शुद्ध आत्माका सेवक होता है। टीकाकार कहते है:-जो परमात्मस्वरूपके ध्यानसे रहित है ऐसा आत्मा निश्चयकरके संसारी और अपराधी ही है क्योंकि अपनेको अपराध सहित ही स्मरण करता मारके मननसे अशुद्ध ही रहता है। किन्तु जो निर• न्तर संड रहित एक अद्वैत चैतन्यके भावमें तल्लीन रहता है वही निर. परावी होता है तथा वही कम्मोंके नाश करने में प्रवीण होता है। आगे कहते हैं कि जो निश्चयचारित्रके धारी परम उपेशा संपके पालनेवाले हैं उन्हीके ही निश्चय प्रतिक्रमणका स्वरूप होता है.- मोतूण अणायारं, आयारे जो दु कुणदि थिरमा । सोपडिकमणं उबइ, पडिकमणमओ हवे जम्हारा सामान्य अर्थ-जो भव्य अनाचारको त्यागकर स्वागारमें स्थिर भावको करता है वही प्रतिक्रमण होता है तथा वही ति. क्रमण रूप॥ है अर्थात् अशुद्ध निश्रयपातिकमणाधिकार। विशेषार्थ-नियतरूपसे परमोपेक्षा संयमी मुनिके शदात्माकी आराधना अर्थात् भकि उस सिवाय सर्व ही अनाचार है इसलिये सर्व ही अनाचारको त्यागकर जो स्वाभाविक चैतन्यका बिलासरूप ऐसा निरंजन अपना परमात्म तत्वकी भावनास्वरूप जो आचार उसमें जो को सहन वैराग्यकी भावनामें परिणमन करता हुआ अपने स्थिरभावको करता है वहीं परम तपोधन मुनि प्रतिकमणस्वरूप कहा गया है क्योंकि वही भव्य परम समता रसमई भावनामें परिणमन करता हुआ निश्चय प्रतिकमणाम होता है । भावार्थ-वैराग्यमई भाव करता हुआ जो मुनि परमात्माकी भावना करता है उसीहीके निश्चय प्रति- क्रमण होता है । टीकाकार कहते हैं कि इस आत्माको उचित है कि यह आत्मा निजपरम आनंदरूपी अमृतसे भरे हुए तथा स्वाभाविक ज्ञानको प्रकट करनेवाले अपने आत्माको आत्मीक शांतरसमई जलसे पूर्ण आनंदमई भक्तिपूर्वक यान करावे संसारीक अनेक बचोंके समूहरूप जालोंसे कोई कार्यसिद्ध न होगा । जो भव्यआत्मा अतिशय- करके जन्ममरणकारी तथा सर्व दोषों के प्रसंगको करानेवाले अनाचारको स्थामकर तथा अपने आत्माके द्वारा उपमारहित स्वाभाविक दर्शन, स्वाभाविक ज्ञान तथा स्वाभाविक वीर्यके धारी आत्मामें स्थित होकर बाह्य आचारको छोड़ करके शांत समुद्रक शमरसमई जलबिन्नु- ओंके समूहोंसे पवित्र होता है वहीं आत्मा पुण्यशन है तथा यही समीचीन आत्मा मठसमूहको नाश करके साक्षातरूप होता हुआ प्रकाशमान होता है। आगे कहते हैं कि उन्मार्गको त्यागकर सर्वशवीतरागके मार्गको स्वीकार करना चाहिये:-- उम्मग्गं परिचचा, जिणमग्गे जो फुदि थिरमावं। सो पडिकमणं उचहपडिकमणमओहवे जमा ८६ १०. नियमभार- AAMAnnn सामान्यार्थ--उन्मार्गको रणगकर जो जीव जिनमार्गम अपना स्थिग्भार करता है वही प्रतिक्रमणरूप कहा गया है क्योंकि वही जीव प्रतिक्रमणमई होता है। विशेषार्थ-जो कोई शुद्ध निश्चय सम्यग्दृष्टी शंका, कांक्षा, विधि- कित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा, तथा अन्यदृष्टिसंस्तव ऐसे पांच मलरूपी कलं. की कारसे मुक्त होकर बुद्ध आदि एकान्त वादियोंके कहे हुए मिध्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान और मिथ्या चारित्ररूपी मार्ग सारखे दीसें परन्तु धर्ममार्ग नहीं ऐसे उन्मार्गीको छोड़ता है और व्यवहार नयकरके महादे- वाधिदेव परमेश्वर सर्वज्ञ वीतरागके द्वारा कहा गया जो व्यवहार चारित्र.. रूपी मार्ग अर्थात् पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति, पांच इन्द्रियों- का निरोध, प्रतिकमण आदि छः आवश्यक आदि २८ मूल गुणों के आचरणमें अपने परिणामको स्थिर करता है तथा शुद्ध निश्चय नय- करके स्वाभाविक ज्ञान आदि शुद्ध गुणोंसे शोभायमान तथा स्वाभाविक परम चैतन्यके सामान्य विशेषरूप प्रतिभासमान ऐसे अपने परमात्म दव्यमें अपना स्थिर भाव करता है अर्थात् शुद्ध चारित्रमें लीन होता है वही मुनि निश्चय प्रतिकमण स्वरूप कहा गया है। क्योंकि निश्चय पति- कमण परम आत्मकि तत्त्वमें ही प्राप्त है इस कारणसे ही वह तपोधन सदा ही शुद्ध है ॥ ऐसाही श्री प्रवचनसारमें कहा है-विशेष आदरके धारी पुराण पुरुषोंके द्वारा यह चारित्र उत्सर्ग और अपवाद एसे दो भेदे- रूप सेवित किया जाता है उस चारित्रकी स्पष्टपने अनके भूमिकाओंको आचरणकरके मुनि सबसे अपनी अतुल निवृत्ति करके चतन्यके सामान्य विशेषरूप अपने आत्मद्रव्यम तिष्टता है। ऐसा ही टीकाकार कहते हैं कि जो मुनि इन्द्रिय विषयोंके सुरससे विरक्त है, शुद्ध आत्मीक तत्त्व लीन हैं. तपमें अपने चित्तको अनुरागी किये हुए हैं, शास्त्र समूहकी संगतिमें उन्मत्त है, गुणरूप मणियोंकी मालासे युक्त हैं, तथा सर्व संसा- विनयपतिकममारिकार । - कि मैकल्पोंसे रहित हैं, ऐसे मुनि क्यों नहीं अमृता मोक्ष वधूके बालभ होकर स्फुरापमान होंगे अर्थात् अवश्य मुक्त प्राप्त करके प्रकाशमान होंगे । आगे कहते हैं कि शल्य रहित भावों में परिणमन करनेवाला महातपोधन अर्थात् मुनि ही निश्चयातिकमणरूप होता है:- मोनूण सलमावं, णिस्सले जो दु साहु परिणमदि। सो पडिकमणं उच्चर, पडिकमणमओ हवे जम्हा८७ सामान्यार्थ:-जो मुनि उस शल्य भावको त्यागकर शल्य रहित भाव परिणमन करता है यह प्रतिक्रमणरूप कहा जाता है क्योंकि यह मुनि प्रतिक्रमण हो जाता है । विशेपार्थ:-निश्चयकरके यह आत्मा सर्व शल्यसे रहित स्वरूप परमात्मा है परन्तु व्यवहार नयके बलसे कर्मरूपी कीचड़से सहित हे इस कारणसे उपचार करके यह संसारी जीव माया, मिथ्या, निदान ऐसे तीन शल्यों के साथ है । इसकारण इन तीनों शल्योंको छोड़कर जो कोई विपर्योसे विमुख परमयोगी परम निःशल्य स्वरूप परमात्मस्वभावमें टीन होता है वही मुनि निश्चय प्रतिक्रमण स्वरूप कहा गया है । क्योंकि अपने आत्मस्वरूप प्राप्त होना ही वास्त- विक प्रतिक्रमण है । टीकाकार कहते हैं कि विद्वान् यती तीन शल्योंको स्यागकर शल्यरहित परमात्मामें 'टहरकर प्रगटपने सदा शुद्ध आत्माही- की भावना करता है। हे मुनि ! तू काय कालिमासे रंजायमान होता हुआ बार २ कामदेवके वाणसे निकली जो अनि उसकरके दग्ध हो चुका हे सो अब तू भवभवमें भ्रमणका कारण ऐसा जो मलीन चित्त उसको छोड़ और प्रबल संसारसे भयको प्राप्त करके जिस निर्मल तथा स्वभावमें ही रहे हुए आनन्दको अनादि कर्म बंधके वशसे नहीं प्राप्त किया उसही आनन्दको भज ॥

नियमसार- - आगे कहते हैं जो मुनि तपोधन मन वचन कायकी गुप्तियाम गुप्त होता है उसीके ही निश्चय चारित्र होता है:- चचा ह्यगुत्ति मावं, तिगुत्तिगुत्तो हवेइ जो साहू । सो पढिकमणं उच्चइ,पडिकमणमओ हये जम्हा।।८८ सामान्यार्थ:-जो साधु अगुप्ति मावको त्याग निश्चयकरके तीन गुप्तियोंमें गुप्त होता है वही प्रतिक्रमण स्वरूप कहा गया है क्योंकि वह मुनि प्रतिक्रमणमई हो जाता है। विशेषार्थ:-जो कोई परम तपश्चरणरूप सरोवरके कमलोंके लिये अत्यन्त तेजवान सूर्यके समान है ऐसा अत्यन्त निकट भव्य मुनीश्वर है सो बाह्य प्रपचरूप जो अगुप्तिभाव उसको त्यागकर त्रिगुतिमें गुप्त अर्थात् लवलीन ऐसी विकल्प रहित परम समाधि सोही हे लक्षण जिसका ऐसे अति अपूर्व आत्माको ध्याता है वही निश्चय प्रतिक्रमणमई परम संयमी हे इसलिये उसीको ही निश्चय प्रतिक्रमण स्वरूप होता है:- टीकाकार कहते हैं जो मुनि भव्यात्मां वचन कायके विकारोंको सा त्यागकर सम्यग्ज्ञानमई स्वाभाविक परम गुप्तिको शुद्धात्माकी भावनाके साथमें भजन करता है वह मुनि त्रिगुप्तिमई होकर अपने प्रत्यक्ष स्वभा- यको प्राप्त होता है। आगे ध्यानके भेदोंको कहते है:- मोत्तूण अट्ट रुई, झाणं जो झादि धम्म सुकं वा । सो पडिकमणं उच्चइ, जिणवरणिदिसुत्तेसु ॥ ८९॥ सामान्यार्थ:-जो कोई आर्न तथा रोद्रध्यानको छोड़कर धर्म- ध्यान और शुक्लध्यानको ध्याता है उसीके ही जिनेन्द्र कथित सूत्रोंमें प्रतिक्रमण कहा गया है। विशेपार्थः-अपने देशके त्यागसे, द्रव्यके नाश होनेसे, मित्र बंधु' मनोंके विदेश जानेसे, तथा सुन्दर वीके वियोगसे इष्ट वियोग जनि निश्चयतिकमणारिकार PAN आर्चम्यान होता है। जो चेतन अचेतन पदार्थ अपनेको इष्ट नहीं है उनका संयोग होते उनके वियोगकी इच्छासे पैदा हुआ अनिष्ट संयोग आर्तध्यान होता है। शरीरमें वेदना होते उसके दूर न होनेतक बार बार उस पीडाको विचारकर दुख मानना सो पीड़ा चिन्तवन आर्तध्यान है। आगामी भवन कालमें भोगोंकी इच्छासे बार र उनका चिन्तवन सो निदान आध्यान है। चोर, जार, शत्रु आदिको वध, बंधन आदि चाहते हुए महादेपरूप भावके चिन्तवनसे उत्पन्न हुआ हिसानंद रौद्रयान है। चोरी करने कराने आदिमें आनन्दकाध्यान सो चौर्यानंद रौद्रध्यान है। मुषावादमें आनंद मृपानन्दरौदध्यान है। परिग्रहकी बुद्धिमें आनन्द मानना सो परिग्रहा- नंद रोदध्यान है । ये दोनों ही आत रीध्यान स्वर्ग और मोक्ष मुरुके विरोधी है तथा संसार दुःखके मूल हैं। इन दोनोंको सर्वथा त्यागकर जो कोई भन्य श्रेष्ठोंमें मुख्य परम भाव जो अपने आत्माका शुद्ध भार . : .. रूपमें निश्चित है। तथा कैसा हे निश्चय शुलध्यान, जहां ध्यान और ध्येयका भेद नहीं है। जिसका ध्यान करनेवाला अपने अंतरगमें अपनी परिणति काके धई ही इन्द्रिय ग्रामों बाहर रह भेदरहित परम कलाका नाथ होता है । यह कथन परम जिनेन्द्र श्रीतीर्थकर देवके मुस कमलसे प्रगट हुआ जो द्रव्यश्रुत उसमें प्रगट है । इस प्रकार ४ भेद स्वरूप ध्यानों में आदिके दो ध्यान आर्त और गदहे अर्थात त्यागने योग्य हैं। प्रथम अवस्थाम धर्मध्यान ग्रहण करने योग्य है। परन्तु चतुर्थ शुमध्यान सर्वदा ही उपादेय है-यही ध्यान मोक्षका निकट कारण है। ऐसा ही अन्य ग्रन्थमें कहा है-जो ध्यान क्रियारहित, इन्द्रियबाद, ध्यान के ध्येयक विकल्पसे रहित, अतरंग टीनरूप है उसीको योगिशेने शुरू ध्यान कहा है । टीकाकार कहते है:-शुद्ध नय ध्यानके भेदसमूह

मियमसार-
को ही नहीं कयन करता है-शुद्ध नयसे यह आत्मा सदा शिवनई
मोक्षक आनन्द स्वरूप अपने परमात्म तत्त्वमें व्यक्त अर्थात प्रगट है।
ध्यान और ध्यानके भेद हैं इस कथनको व्यवहार नय ही सदा कयन
करता है । हे जिनेन्द्र आएका तत्व परम आश्चर्यकारी है मानों इन्द्र
जाल ही है क्या ॥ भावार्थ-शुद्ध नय वस्तुके शुद्ध अमल स्वरूप-
को ही कहनेवाला है ! व्यवहार नय अशुद्ध तथा भेद रूप कयनको
कहनेवाला है । परम शुद्ध अवस्थामें ध्यान और ध्येयका विकल्प ही
नहीं है । यह आत्मा स्वय ही साध्यरूप कार्यको सिद्ध किये हुए शुद्ध
हो जाता है, वही सिद्ध अवस्था इस आत्माका असल स्वरूप है । उसको
कहनेवाला जो शुद्ध नय सो अन्य अवस्थाको नहीं कह सकता । इस-
कारण सिद्ध अवस्थाके कारणरूप जो ध्यान वह सर्व व्यवहार और
भेदरूप धर्म है इसीसे व्यवहार नयहीका विषय है । इन्द्रजालका
दृधान्त कहनेका प्रयोजन यह है कि जैसे इन्द्रजालके सेलको समझना कठिन
है ऐसे ही जिनवाणीके भेदोंका जानना दुर्गम है । फिर मी कहते हैं-
जो यह परमात्मतत्व सम्यग्ज्ञानका मंडन अर्थात् आभूषण है तथा
चहूं ओरसे समस्त विकल्पोंके समूहोंसे मुक्त है उस तत्त्वमें सर्वे नय
सम्बन्धी कोई भी विकल्परूप प्रपंच नहीं है तो फिर कहिये उस ललके
स्वरूपमें ध्यानावली कैसे उदय हो सकती है । अर्थात् ध्यानादि सर्व
साधक अवस्थामै हैं अत एव व्यवहार मार्ग हैं । शुद्ध निश्चय नयसे ये
सर्व विकल्प नहीं हैं।
आगे कहते हैं कि अत्यन्त निकट भव्य जीवके पूर्व अवस्थामें कौनसे
परिणाम होते हैं तथा पश्चात् कौनसे परिणाम होते हैं:-
मिच्छत्तपहुदिभावा, पुवं जीवेण माविया सुइरं।
सम्मत्तपहुदिभावो, अमाविया हॉति जायण ॥ ९० ॥

निश्चयप्रतिक्रमणाधिकार। "धीकानेर, (राम ताना सामान्यार्थः-पूर्व में जीवने अनादिकालसे मिथ्यात्व आदि भावोंको गया है । तथा सम्यक्त आदि भावोंको अनादि कालसे कभी नहीं नाया है। विशेपार्थ:-मिथ्यान, अवत, पाय, योगपरिणाम ऐसे चार सामान्यरूपसे बंधके कारण भाव तथा इनके तेरह भेद (१३) गुणस्थान रूप है। जैसा कहा है-मिच्छादिहिगुणहाणादि सयोगिस्स चरिमंतं ॥ अर्थात मेण्यादृष्टि गुणस्थानमें चारोंको, अवतनाम चतुर्थ गुणस्थानमें अवत मादि तीनोंको, सासदन नाम द्वितीय गुणस्थानमें भी अवत आदि तीनोंको, मिश्रगुणस्थानमें सम्यग्मिथ्यात्व, तथा अन्तादि तीनोंको, देश- वरतसे ले दसवें सूक्ष्म सापराय गुणस्थानतक कषाय और योग दोको रथा ११ वें उपशांतमोहसे १३ वे समोगिकवलीत मात्र योग हीको धका कारण कहा गया है । अत्यन्त निकट भव्य जीवने पूर्व अवस्थामें नरंजन स्वरूप अपने परमात्म तत्वके श्रद्धानको न पाकर मिध्यात्व आदि पंधके कारण भावोंको अनादि कालसे भाया है अर्थात् निजस्वरूपके तानसे रहित बहिरात्मा मिध्यादृष्टी जीवने परम नैष्कर्म्य चारित्र अर्थात् निश्चल स्वरूपमें स्थितिम्प स्वरूपाचरणको न पाकर सम्यग्दर्शन शान दारित्ररूपी मोक्षके कारण भावोंकी भावना नहीं की है। मिथ्यादर्शनसे विपरीत होकर सम्यग्दृष्टी अत्यन्त निकट भभ्यनीव गुणसम्र से पूर्ण हि सम्यग्ज्ञानकी ही भावना करता है। सो केसे करता है इसलिये श्री गुणभद्रस्वामीने कहा है कि इस संसारके पाने में उन भाषना- ओंकी भावना करता हूँ निनको मैंने पहले नहीं भाया है। जो इन भावनाओं को भाते हैं उनकेलिये ये भावनाएं संसारको अभाव करने- गटी हैं। टीकाकार करते हैं:नस संसाररूपी समुद्र में रेहए जीवने जो कोई भी निति अर्थात् मोक्षमा भरण भार है उसको कभी भी नहीं भाया है यह बड़े कारकी बात है चाहे इसने भवभवमें उस तत्तको निपमसार- PA--- -~ बनन मात्र सुना साहका कारणरूप मार सदा एक आत्मज्ञान ही है। आगे कहते है कि परम नीको सम्यग्दर्शन मान चारित्रक सपा सीधा करने और मिथ्यादर्शन ज्ञान गरिसके बिलकुठ त्याग करनेही निधय प्रतिक्रमणमा टाम होता है:- मिन्छादसणणाण, चरितं चइऊण गिरवसेसेण । सम्मत्तणाणचरणं, जो भावइ सो पउिमणं ॥११॥ सामान्या-जो कोई मिच्यादर्शन शान चारित्रको सर्वया त्याग कर सम्यग्दर्शन शान चारित्रकी भावना करता है वहीं प्रतिकमगर होता है। विशेषार्थ--भगवान अईत्परमेश्वर कथित जो धर्मका मार्ग उससे उल्टे मार्गाभासका श्रद्धान करना सो मिथ्यादर्शन है। उसी ही धर्मकी वस्तुओंमें अर्थात पदार्थोंमें सात पदार्योंकी श्रुदि करना सो निभ्याज्ञान है, उसही मार्गाभासमें धर्मका आचरण करना सो मिथ्या चारित्र है। इन तीनोंको बिलकुल त्याग देवे अथवा अपने आत्मतत्वका श्रद्धान ज्ञान और आचरणरूप जो निश्चय रखत्रय उसके विरोधी जो मिथ्याद. र्शन ज्ञान चारित्र इनको भी त्याग कर देवे । तीनों काठोंमें आवरण रहित नित्य आनंदमई एकरूप हे लक्षण जिसका ऐसा निरंजन निज Musion७i 14t की भावना करते हैं वे परमतपोधन मुनि ही निश्चय प्रतिक्रमणस्वरूप होते हैं ऐसा आगममें कथन है ॥ टीकाकार कहते हैं:-जो बुद्धिमान मुनि आत्मीक तत्त्वके शाता है वे सर्व विभावको तथा व्यवहार रलायके निश्पमतिक्रमणाधिकार। - मार्गको त्यागकर शुद्धात्मतत्त्वमें स्थिर अपने एक शान स्वरूपहीका अद्धान ज्ञान और आचरण करते हैं। आगे निश्चय उत्तमार्थ प्रतिक्रमणका स्वरूप कहते है:- उत्तमअहं आदा, तमि विदा हणदि मुणिवरा कम्मं । तहमादु झापामेव हि, उत्तमअहस्स पडिकमणं ॥ १२ ॥ सामान्यार्थ-आत्मा ही उत्तमार्थ है। उसमें स्थित रहकर मुनि महाराज कम्मोको नाश करते हैं इसलिये ध्यान ही उत्तमार्थ प्रतिफमण है। विशेषार्थ-जिनेश्वरका यह मार्ग है कि मुनियोंको सलेखना अर्थात् समाधि मरणके समय ४२ वियालीस आचाय्यांसे दिया हुआ जो उत्तमार्थ प्रतिक्रमण तिसरूप होकरके देहका त्याग करना सो व्यवहार करके सदेखना धर्म है । निश्चयकरके सोसनाको कहते है कि, नव पश- थोंमें उत्तम पदार्थ निश्चयकरके आत्मा ही है इस आत्माके सचिदानंदमई कारण समयसार स्वरूपमें जो तपोधन तिष्ठते हैं वे निश्चय साहसनाके धारी हैं वे मुनि नित्य मरणसे भयभीत होते हैं इसलिये जीवको जन्म मरण न प्राप्त हो ऐसा विचार कर वे मुनि कम्मोका नाश करते हैं । इसकारण अध्यात्मीक भाषाकी अपेक्षा जो निश्चय परम शुक्लध्यान ध्यानध्येय विकल्पसे रहित सर्वथा प्रकार आत्माके सन्मुखरूप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अगोचर है वही ध्यान उत्तमार्थ प्रतिक्रमण है ऐसा जानना चाहिये । प्रयो- जन यह है कि निश्चय उत्तमार्थ प्रतिक्रमण अपने आत्माहीके आश्रय है। सो निशय धर्मध्यान तथा निश्चय शुलभ्यानमई है। इसटिये अमृतका कुंभ है अर्थात अमृत रससे भरा सुन्दर कटश है । तथा व्यवहार उत्तमार्थ प्रतिक्रमण व्यवहार धर्मध्यानई है इसलिये विपकुंभस्वरूप है अर्थात् जहरसे भरे कलसके समान है। ऐसाही श्री समयसारजीमें कहा है। कि प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार, धारना, निवृत्ति, निंदा, गो, शुद्धि थे आठ प्रकार विषकुंभ हैं। क्योंकि इन फियाओंमें कापनेकी बुद्धि न नियममार- समय समयमा धके कारण हैं । तया पमाही श्री समयकार नाकी गाम्या हा है-यहाँ उम नीगने जो निशय प्रतिकमगन कर सन्नों कारग याहार प्रतिकमणको विषम जानकर उसे भी छोड़ देता है उसको आचार्य महते हैं किनिम आत्मानिर्मठ भाउमें प्रति क्रमण अर्थात म्याहार प्रतिक्रमणकोही विषय है ऐसा कहा है वहां प्रनिम्मणको बिलकुल ही न करना अर्थात् व्याहार निभय दोनोंका न करना अमाप मे हो मम्ता है। आचार्य आभयंकरके कहते हैं कि यह जीव नीचे २ गिरता हुआ क्यों प्रमादी हो रहा है क्यों नहीं यह प्रमादको त्यागकर ऊपर ऊपर चढ़ता है। भागय यह है कि जो व्यवहार प्रतिकमणमें प्रमारी या उसको उपदेश किया है कि व्यवहार प्रतिकमग तो करो परन्तु इसको करते करते निश्चय प्रतिकमणकी प्राप्ति करे क्योंकि निश्चय अमृतरूप हे और व्यवहार विपरूप है तथापि प्रतिक्रमण न करनेकी अपेक्षा उपादेय है इसलिये ऊपर २ चढ़नेकेलिये ऐसा उप- देश है जो व्यवहार प्रतिकमण कर रहा है उसको उड़ानेकेलिये नहीं । टीकाकार कहते हैं:-आत्माध्यानके सिवाय अन्य समस्त ध्यान भयानक संसारका कारण हैं। ध्यान ध्येय आदिका विकल्परूप जो तप है सो कहने मात्र ही सुन्दर है ऐसा समझकर बुद्धिमान पुरुष स्वाभाविक परमानंदी अमृतसे भरे समुद्र में दूबे हुए स्वाभाविक एक परमात्माहीका अनुभव आगे कहे हैं कि सर्व पदार्थोके भीतर एक ध्यान ही उपादेय है अन्य सर्व त्याज्य हैं:- झाणणिलीणो साहू, परिचागं कुणइ सम्बदोसाणं। तम्हादु झाणमेव हि, सब्यादिचारस्स पडिक्कमणं ॥९॥ सामान्यार्थ:- जो ध्यानमें लवलीन साधु है वह सर्व दोषोंका त्याग कर देता है इसलिये ध्यान ही सर्व अतीचारोंका प्रतिक्रमण करनेवाला है।

निश्चयप्रतिक्रमणाधिकार। विशेपार्थ:-कोई परम जितेन्दी योगीश्वर साधु अत्यन्त निकट भव्यजाद है सो अध्यात्मीक भाषाकी अपेक्षा अपने आत्माहीके आश्रयमें स्थिरीभूत ऐसा जो निश्चय धर्माध्यान उसमें ऐसा लीन है कि भेद रहित- पनेसे टहरा हुआ है अथका सर्व क्रियाकांडके आढम्बग्से टूटा हुआ व व्यवहार नयके आधीन ध्यान ध्येयका भेदरूप विकल्प उनसे रहित, सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अगोचर, परमतत्व जो शुद्धात्म तत्व उसके विषयभेदकी कल्पनाकी अपेक्षा न करके लवान होनेरूप जो निश्चय सुमभ्यान उसमें जो साधु ठहरता है वह सम्पूर्णपने अंतरंग लीन होता हुआ शुभ तश अशुभ समस्त मोह राग देपोंको त्याग कर देता है। इसलिये अपने आत्मस्वरूपके आश्रित जो निश्चय धर्मध्यान और निश्चय शुमध्यान ये दोही ध्यान सर्व अतीचारोंकोलिये प्रतिक्मणरूप है। टीकाकार कहते हैं-यह शुक्लध्यानरूपी दीपक जिसके चित्तरूपी घरमें प्रकाशता है वहीं योगी है उसीको ही अपने आप शुद्धात्माका प्रत्यक्ष हो जाता है। आगे व्यवहार प्रतिक्रमणका फल कहते है। पडिकमणणामधेये, सुचे जह वण्णिदं पडिक्रमणं । तह णादा जो भावइ, तरस तदा होदि पडिकम॥१४॥ सामान्यार्थः-प्रतिकमण नाम सूत्र में जैसा प्रतिक्मणका स्वरूप कहा है उसको वैसा ही जानकर जो उसकी भावना करता है तब ही उसके प्रतिक्रमण होता है। विशेषार्थ:-सर्व आगमके ज्ञाता, सार और असारके विचार करने में परम चतुराई आदि गुण के धारी निर्यापक आचार्योंने प्रतिक्रमणमूत्र नाम द्रव्यश्रुतमें विस्तार पूर्वक जैमा प्रतिक्रमणका स्वरूप कहा है उसको वैसा ही जानकर जिनेन्द्रकी नीतिरूप आज्ञाको नहीं उलुपन करता हुआ सुन्दर चारित्रकी मूर्तिस्वरूप जो मुनि सो सकल संयमकी - - नियममार- -- भावना करता है उसी महामुनिके व्याहार प्रतिक्रमण होता है। कमा है मुनि, बाह्य प्रपंच जालसे उदास है, पंचन्द्रियके विषयों के विस्तारसे रहित शरीरमात्र परिग्रहका धारी है तथा अपने परम गुरुके चरणकि स्मरणमें आसन्नचित अर्थात् लवलीन है । टीकाकार कहते हैं कि निर्यापकावार्यके द्वारा युक्तिरुप आगमके अनुसार वचनोंको सुनकर जिस मुनिका गित सर्व चारित्रको धारण करता है उस संयमधारी मुनिको मेरा नमस्कार होहु ॥ जिस मुमुक्षु मुनिक सा व्यवहार और निश्चय प्रतिष्मण विद्यमान है तथा जिसके अतिशय पूर्वक रंचमात्र भी अप्रतिक्रमण नहीं है ऐसे सर्व संयनरूपी आभूषणके धारी श्री चीरनदि नाम मुनिको मैं नित्य नमस्कार करता हूं। इस प्रकार मुकविरूपी कमलोंकेलिये सूर्यके समान पंचन्द्रिय विषय- के विस्तार सहित शरीरमात्र परिग्रहके धारी श्रीपद्मप्रभुमलधारी देवसे रचित श्री नियमसार व्याख्याकी तात्पर्य वृत्ति नाम टीकामें निश्चय प्रतिकमण नामका पंचम श्रुतस्कंध पूर्ण भया । निश्चयमत्याख्यानाधिकार। --+9ve+d. आगो सकल त्यागरूपी जो मुनि दीक्षामई शोभनीक पताका उसके लिये भारी दहके समान तथा सर्व कर्मकी निर्जराका कारण, मोक्ष महल की सीढ़ीरूप मुक्तिरूपी वीके मुराको प्रथम दिखलानेवाली ऐसी जो सखी उस समान इत्यादि विशेषणों सहित जो निश्चय प्रत्याख्यान उसके अधिकारको कहते हैं ।

विमाधार Kutstatest Marit.- माण भएप्प,-मणागपमुहममुहयारण किया। अपाणी प्रापदि पवाण नाम ॥१५॥ माया भास नालकर आगामी AM भाlisairat raifiyat str है सक HINGANA II. ARARI मा भनिण EAa मीनन र IAS अनुम भागामरिक पर Ana, SH. Mait भर भोगनगि से १r mART आगर नाम Aura- TEACHINMAnd many यातनामा काit one wNA भो भरमानी पगना झोर हा एम नपा अधुमपा , सानाNIR मी भाषानिहारना भीत नाही पायाma ने मामा र म परम NR अपने भा.मारा ध्यान करता है सीमिय त्या-या है। ऐसा ही समपसारनी करा Aarti पावर (अन्य)हंसा मानहायरसस अर्थात यात है, इस कारण ऐसा जो प्रत्यास्थान का ETARA यास्मान तथा श्रीसमयसारजीएसnic भागी समस्यागर तया मार दिय 4 सप और निकम्म एसे आम max साप दारा वर्तन करता है टीमो-4t सार ऐसा सम्यग्दृष्टी जीव सम्पूर्ण दस - , - ११२ नियमसार- न्धी परिणामको त्याग देता है इसलिये उसीके नित्य प्रत्याख्यान होता है तथा उसीके ही अतिशयकरके कम्मोको हरनेवाला सम्या चारित्र होता है । इसलिये मैं अपने भव भवके क्लेशोंको नाश करने- केलिये नित्य उस भव्यात्माको वन्दना करता हूं। आगे अनंत चतुष्टयमई अपने ही आत्माके ध्यान करनेका उपदेश संक्षेपमें कहे है:- केवलणाणसहावो, केवलदसणसहाव सुहमईओ। केवलसत्तिसहावो, सोऽहं इदि चिंतए णाणी ॥ १६ ॥ सामान्यार्थ जो कोई केवल ज्ञान स्वभाव है, केवल दर्शन स्वभाव है, परम सुरमई है तथा केवलशक्ति स्वभाव है वही में ऐसा ज्ञानीको विचार करना चाहिये। विशेपार्थ:-यहां आचार्य उस परम तत्वज्ञानी जीवको शिक्षा प्रदान करते है जो समस्त बाह्य प्रपंचकी वासनासे रहित सर्वथा प्रकार अपने अंतरंग; लबटीन है । आदि अत रहित अमूर्तीक अतीन्द्रिय स्वभाव रूप ऐसे शुद्ध सदभूत व्यवहारनयर शुद्ध स्पर्श रस ग यो धारी आन्दपुदल परमाणु के समान कंवल ज्ञान केवल दर्शन केवल सुरा और केवल शक्ति सहित जो परमात्मा है सो ही में हैं ऐसी भावना अपने सम्यक्षा- नके दाग करनी योग्य है । अर्थात निश्चयसे मैं सहन ज्ञान साप। सहज दर्शन स्वरूप हूं, में सहग चारित्र साप हूँ में सदन चैतन्य साति स्वरूप हूं इस प्रकार भारना करनी चाहिये ॥ ऐसा ही श्री पकार. समतिमें कहा है कि यह परमज्योति काल शान दर्शन मुसबभा मई है। उस ज्योति के देसते हुए ज्ञानसे क्या नहीं जाना गया, हबले क्या नहीं दया गया, श्रुतिसे क्या नहीं सुना गया । अर्थात व पर आत्माकी स्वय ज्ञान.दि स्वप है उस जानते हुए सई जान दिन जाता है। टीकाकार कहते हैं वह परमात्मा नयान्त हो नि निश्चयपस्यास्थानाधिकार। ११३ मूर्ति केवल ज्ञानरूप है जो संपूर्णरूपसे निर्मल दर्शनको धारनेवाला है जो अविनाशी आनंदरूप है तथा जो स्वाभाविक परम चैतन्य शक्तिस्वरूप है, अविनाशी है और मुनीश्वरोंके चित्तरूपी कमल सरो- वरके लिये राजहंस है। आमे परमभावनाके सन्मुख जो ज्ञानी उसको फिर शिक्षा कहते हैं:- णियमावं णवि मुंबइ, परमावं पणेव गेहए केई। जाणदि पस्सदि सव्वं, सोऽहं इदि चिंतयेणाणी॥१७॥ सामान्यार्थ-जो अपने भावको कभी नहीं छोड़ता है, तथा किसी भी परभावको कभी ग्रहण नहीं करता है परन्तु सईको जानता है और देखता है सोही मैं हूँ ऐसा ज्ञानी चिंतबन करें ॥ विशेपार्थ-जो कोई कारणपरमात्मा सम्पूर्ण पापरूपी वीर वैरियोंकी सेनाकी धुनाको टूटनेवाला है तथा तीन कालमें आवरणर- हित, निरंजन, अपने आत्माके परमभावको कहीं भी कभी नहीं छोड़ता है तथा पंच परावर्तनरूप संसारको बढ़ानेवाले विभाषी पुद्गल दृष्य के संयोगसे उत्पन्न जो राग देषादि भाव उनको कभी भी ग्रहण नहीं करता है तथा जो निश्चयकरके कारण परमात्माको जानता है। कैसा है कारण परमात्मा, जो अपने निरावरण निर्मल परम ज्ञानके द्वारा सहनशान सहजदर्शन सहज चारित्र आदि स्वभाविक धर्मोका आधार आधेय भावरूपी जो विकल्प उससे रहित होने पर भी सरा मुनरूप है तथा जो परमात्मा स्वाभाविक मोक्ष वधूके संयोगसे उत्पन्न जो प्रेम उसमें तीन है । इसीप्रकार निभयकरके उस कारण परमात्माको जो कोई अपनी स्वाभाविक दृष्टि से देखता है वही कारण सययसाररूप में हूं मुरुमें और कारण परमात्मामें कोई अन्तर नहीं हैं इस प्रकार सम्पज्ञानियोंको नित्य भावना करनी चाहिये । ऐसा ही धीपूज्यपादस्वामीने सहारे कि जो कोई नहीं महणे योग्य वस्तुको हम नहीं करता है, तथा जो .

११४ नियमसार- ग्रहण किये हुए है उसको कभी नहीं छोड़ता है। परन्तु सर्व पदायाँको सर्व प्रकारस जानता है वही स्वसंवेद्यरूप में हूं अर्थात् अपने ही द्वारा अपना अनुभव करनेको में समर्थ हूं। टीकाकार कहते हैं---आमा अपने आत्मामें अपने आत्मीक गुणोंसे भरपूर आत्माको जानता और देसता है वहीं एक उसका परिणामिक पंचम भाव है । इस आनाने अपने सहज स्वभावको कभी नहीं छोड़ा और न यह आत्मा अन्य किन परभावको ग्रहण करता है और न किसी पुद्गलसम्बन्धी विकार भावको धारण करता है । तथा चैतन्य मात्र चिंतामणि जो मेरा स्वरूप उसीमें मेरा अंतःकरण रात्रिदिन लीन है । मेरे मनने परव्यको ग्रहण करनेसे जो विग्रह (विकार ) पैदा होता है उसको त्याग दिया है। मुझे विशुद्ध पूर्ण स्वाभाविक ज्ञान स्वरूप सुखकी ही प्राप्तिका प्रयोजन है । मुझे अन्य पदार्थक भोगनेकी आवश्यकता नहीं है। चार प्रकारके देवाकी तृप्ति जत्र उनके कंठमें झरनेवाले अमृतसे ही हो जाती है तव अन्य प्रातरूप आहार करनेकी उन्हें कोई जरूरत नहीं है । इसका कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये । तथा जो कोई पुण्यात्मा जीव इस पुण्यमई कर्म तथा भावको भी त्याग कर निन्द, उपद्रव रहित, उपमारहित, नित्य, अपने आत्मासे ही उत्पन्न तथा जिसकी उत्पत्तिमें अन्य किसी द्रव्य व विभावकी गम्य नहीं है ऐसा जो आनन्द अमृतमई निर्मल जल उसको पाता है वही प्रगटपने उसीसमय अद्वितीय, अतुल चैतन्यमात्र चिन्तामणि रज- को प्राप्त करता है ॥ कौन ऐसा विज्ञान है जो कोमा । पर द्रव्य मेरा ही है ? । फैसा हे विज्ञान, जो अपने आत्मामी महिमाको जानता है कैसी है महिमा, जो श्री गुरुके चरणोंकी भक्ति और सेनासे प्रगट हुई। है। अर्थात शाता कभी परको अपना नहीं कह सकता। आगे भव्य जीरको शिक्षा करते हैं किबंध रहित आत्माकीही भावना करनी चाहिये:- .

विभपायापामारिकार। पपटिरिदिभणुभाग,-प्पदंसरहिं पजिदो अपा। सोहं ददि चिंतिजी, तत्धेय य कुणदि थिरमायं ॥९८॥ सामान्यार्थ ---यह आत्मा निश्चयसे प्रति, स्थिति, अनुभाग और देशका ऐसे चार प्रकार बंधास रहित है जो ऐसा है यही में इस तरह भिन्नवन काता गुमाशानी सीमें ही अपने स्थिर भावको करता है ।। पिसा-हाभ तथा अशुभ मन, वचन और कायकी क्रिया. आस प्रति और प्रदेश बंध होते हैं। चारों शोधारिकपायोंसे स्थिति और अनुभाग बंध राते है । इन चारों ही प्रकारके बधोंसे रहित सदा उपाधि हित स्वरुप ही निश्चयकरके यह आत्मा हे सोही हूँ मम्यशानीको निरंतर एसी ही भावना करनी चाहिये । दीकाकार बहन माकाजुक पुरुष सहज परमानंदरूप पैतन्यमा उपमा- रहित मुनिगन्य मूलभूत ऐसे एक अपने स्वभावको ही ग्रहण करते है, इसलिये है मित्र मेरे धरनों का सार गुनकर तू अतिशयकरके स्वयं इस अपने तन्यके चमत्कामात्र स्वभाव में शीघ्र अपनी बुद्धिकर । आगे समस्त विभाव भावोंको त्याग करने की विधि कहते हैं:- ममतिं परिवजामि, णिम्ममतिमुवद्विदी। आलंयण च मे आदा, अवसंसं घ वोसरे ॥ ९९ ॥ सामान्यार्थ–मै ममताभावको त्यागता हूं तथा आत्मा निर्म- मत्व भावमें ही हरता हू । निश्चयकरके मुझको आत्माका ही आटम्बन है। शेष सर्वको मे स्यागता हूं। विशेपार्थ.--मुन्दर स्त्री मुवर्ण आदि समस्त परद्रव्योंके गुण और पर्यायों में से में अपने ममता भावको हटाता हूं, परमापक्षा लक्षणसे चि. हिन जी मेरे आत्माका ममत्व रहित परिणाम उसी में ही ठहरकर तथा अपने आत्माका ही आलम्बन लेकर सांसारिक सभोगाँसे उत्पन्न जो नियममार- मुसाम आदि अनेक प्रिभाव परिणाम उनमें त्यानता हूं। श्रीभमतन्त्र पुरीने कहा है-मो समय गयोको हार निधगमे निकम्मरुप आत्मामें आनग्ग करते हुए मुनिगम अशा र नहीं हो जाते हैं अयान सहाय रहित नहीं होने उस समय अपने ज्ञानस्सा मारनामें अपने आत्मनानका आचाना यही उनको परमार है। मुनि स्वयं ही अपने आत्मीक ननमें लीन रहकर पान अका अनुमा करते हैं। ऐसा ही दीकाकार कहते हैं में नियमसे सम्पूर्ण मन वचन काय और इन्दियों की इच्छाको तथा संमार समुद्रसे उत्पन्न मोह- रूप जलजंतुओंके समूहोंको तथा सुवर्ण और ब्रीकी गांठगको इत्यादि सर्वको अपनी अत्यन्त तीव विशुद्ध ध्यानमई सर्व शानिये लाग देता हूं ॥ भार्थ-आत्मध्यानमें लीन होते ही मर्व विभावभावोंका प्रलय हो आगे रहते हैं कि सब स्थानोंमें एक आत्मा ही उपादेय है:-- आदा खु मज्झ गाणे, आदा मे देसणे चरिते य। आदा पञ्चक्खाणे, आदा मे संवरे जोगे ॥१०॥ सामान्यार्थ-निश्चयकरके मेरे ज्ञानमें आत्मा है। मेरे दभनमें आत्मा है, मेरे चारित्र आत्मा है, प्रत्याख्यान अर्थात् त्यागमें आत्मा है तथा मेरे संवर और उपयोगमें आत्मा है। विशंपार्थ -यह आत्मा निश्चयकरके आदि अंत रहित अभूतींक अतीन्दिय स्वभावरूप शुद्ध स्वाभाविक सुखमई है। यही आत्मा स्वमा- वसे शुद्ध ऐसी जो शुद्ध ज्ञान चेतना उसमें परिणमन करनेशला जो मैं सो मेरे सम्यग्ज्ञानमें शोभायमान है। यही आत्मा परम पूजनीक पंचम गति जो मोक्ष उसके लाभ करनेा जो साधनरूप पांचमां पारिणा- मिक भाव उसकी भावनामें रमण करनेवाला जो मैं सो मेरे स्वाभाविक निश्पमस्याश्यानाधिकार। सम्यग्दर्शन में भी प्रकारामान है। साक्षात् निर्वाण प्राप्ति करने का उपाय जो निज आत्मावरूपमें अविचल शेकर स्थिति होना है उसरूप जो स्वाभाविक परम चरित्र है उसमें परिणमन करनेवाला जो मे सो मेरे सहज चारित्रमें भी वही आत्मा है। वह परमात्मा जो सदा निकट ही है जो सदा अपने पास ही विराजमान है वही आत्मा निश्चय प्रत्यारल्यान- में भी हैं। कैसा है निधय प्रत्याख्यान, जहाँ शुभ अशुभ, पुण्य पाप, मुख दुसइन उहाँका सम्पूर्णपने त्याग है। मैं भेद विज्ञान में लीन हूँ, परद्रयोंसे पराडमुख हूं, पंचेन्द्रियोंका जो फैलाव उससे रहित शरीर- मात्र परिमहका धारीह, में स्वाभाविक वैराग्यरूपी महलके शिखरका शिखामाप हूँ, स्वरूपमें गुप्त हूं, पापरूपी वनीके जलानेकेलिये अमि समान , मेरे शुभ तथा अशुभके संवरकी अवस्था में वही आत्मा है, मै अशुभोपयोगसे पराङ्मुख हूं, मैं शुभोपयोगसे भी उदासीनतारूप हूं साक्षात भुदोपयोगके सन्मुस हूं। परमागमकी मकरंद (सुगंध ) उसमें टीन ऐसा में जो परम्भ सो मेरे शुद्धोपयोगमें भी वही परमात्मा अपने सनातन सदाके प्राचीन स्वभावरूपसे विराजमान है। ऐसा ही एकत्त्व समतिमें कहा ह-वह आत्मा ही एक परम ज्ञान है वही एक पवित्र सम्यक् दर्शन है वही एक सम्यक् चारित्ररूप होता है वही एक निर्मल तप है। वहीं एक नमस्कार करने योग्य है। वही एक मंगल (सुख- दाता ) है, वही एक सर्वमें उचम पदार्थ है, सन्त साधु जनोंकेलिये वह आत्मा ही एक शरणरूप है वह आत्मा ही एक आचाररूप है, वही आवश्यक क्रियारूप है, स्वाध्यायरूप भी वही एक आत्मा है ऐसे ही आत्मस्वरूपमें योगीजन स्थिति करते है। ऐसा ही टीकाकार कहते हैं। मेरे स्वाभाविक सम्यग्दर्शन में, मेरे शुद्ध सम्यग्ज्ञान और चारित्रमें तथा मेरे शुभ अशुभ कर्मोके त्यागके अवसरमें वही परमात्मा है । वही शुद्ध आत्मा मेरी सबर अवस्था तथा मेरे शुद्ध उपयोगमें है। इस जगतमें मोक्ष प्राप्ति के लिये अन्य कोई पदार्थ ऐसा नहीं है। यही आत्मा कहीं वो निर्मपम शामना है। कहीं मुदामुन्ध मित्र मार दीवता है विलाल अगुबीलमता है, अनानीलिय यही असा पनि कठिनतामे प्रगनियोग्य है। वही आत्मा निज मानी जानकरी कसे पानको नाम करनेगारा, कही आया है। वहीं माला इदम मपी कमलो महलने निभदायमे गिनमान है। आगे कहे हैं कि संमार आन्याने अश्या मुक अपस्याने यह र सहाय रहित एगो य मरदि जीवो, एगो व जीवदि सयं । एगस्स जादि मरणं, एगो सिज्झदि गीरयां ॥१०१५ सामान्यार्थ:-यह जीव अंटा ही मागजाता है स्वयं काही जन्मता है, एकलाही मरता है तथा एकलाही कमोसे इटार सिद्ध होता है। विशेपार्थ:-नित्य मरणावस्था अर्थात् नित्य आयुनिकों पर मरणमें तथा उस पायके छूटनेल्प मरणमें किसी अन्य वहाय बिना व्यवहारकरक एकला ही नीच मारा जाता है अर्थात् व्यवहार श्वानाच्यासादि प्राणोंसे रहित होता है-आदि और अंतसहित, मूर्ती तथाआलाकी गाति विलक्षण पेसी जो विभाव व्यंजनपव्यरूप मनुष्यदेहकी व नरकादि देहकी प्राप्तिमें अति निकट अनुपचरित असमत व्यवहार नयकरके स्वय यह जीव अकेला ही जन्मता है। सर्व बंधुओंसे रक्षा किये जाने पर भी तथा महापराकम धारी होने परभी दिना इच्छा व याचनाके स्वयं ही अकेले एक जीवका मरण हो जाता है । तथा परमगुरुके प्रसादने जिसको अपने ही आत्माके आश्रयमें रहनेवाला निश्चय शुक्लध्यान प्राप्त हो जाता है वह जीव उसके वटसे अपने आत्मस्वरूपको व्यापार कर्मरूपी रजसे छूटकर शीघ्र ही स्वयं अकेला निर्माणको प्राप्त हो जाता है । ऐसा ही अन्य प्रथमें कहा है कि यह आत्मा स्वयं ही कोको करता है, स्वयं ही उन कर्मोके फटको भोगता है। स्वयं ही संसारमें निश्वयमस्यास्यानाधिकार। ----- 1 - धूमता है तथा स्वयं ही संसारसे मुक्त होता है । ऐसा ही श्री सोमदेव पंडितदेव ने कहा है-यह जीव अकेला ही जन्म और मरणमें प्रवेश करता है तथा अकेला ही अपने किये कर्मोंके फलको भोगता है दूसरा कोई भी सुस दुसकी विर्धा, सहाय नहीं करता । अपनी आजीवकाके- लिये ही नटको अपनी पेटी मिली है । भावार्थ-नट स्वयं खेल करता है और स्वयं उसके फलको भोगता है । ऐसा ही टीकाकार कहते है-यह जीव अकला ही प्रबल कर्मके उदयसे जन्म और मरणको मात होता है तथा अकेला ही तीव मोहके उदयसे, सदा आत्मीक मुम्बसे विमुख होता हुआ शुभ अशुभ कर्मके फलरूप सुन्दर मुस तथा दुखको बार- म्वार भोगता है । तथापि किसी भी उपायसे किसी गुरुके निमित्तसे अपने एक आत्मीक तत्वको पायकर यह जीव स्वय उमीमें ही ठहरता है। आगे एकत्वभावनामें लीन सम्यग्ज्ञानीका लक्षण कहते हैं:- एको मे सासदो अप्पा, णाणदसणलक्षणो। सेसा मे बाहिरा भावा, सवे संजोगलक्खणा ॥१०२॥ सामान्यअर्थ:-निश्चयकरके मेरा आत्मा एक अविनाशी है, ज्ञान दर्शन लक्षणका धारी है। मेरे आत्मीक भावके सिवाय अन्य सर्व भाव मुझसे बाहर है तथा सर्व ही भाव संयोगलक्षण है अर्थात् पर द्रव्यक संयोगस उत्पन्न हुए है। विशेपार्थ --यह आत्मा द्रव्य वर्म और भाव कमोके अभावसे एक अकेला है। वैसे हैं ये पर्म, जो समस्त संसाररूपी नंदनबनके शोंकी क्यारी में जल भरने के लिये प्रणालिका (मोरी) उसके समान है तथा इस संसारिक कलेवर जो नोकर्म उसके कारणभूत हैं । अर्यात इन्हीं सम्मौके निमित्तसे नये कम्मौका आरव और बंध होता है। यही भात्मा सर्व कियाकांडका आटेवर और उसकेटिये नानाप्रकारके कोडाइल उनसे नियमसार- ---- दूरवर्ती ऐसी जो ज्ञान चेतना उसमा अतीन्द्रिय मुस उसके मांगनवाया हे तथा अग्निाशी है। यही मेरेलिये उपादेय है। यही तीनों काटने उपाधि रहित स्वभावको धारनंवाला है और आवरण रहित निर्मटज्ञान और दर्शन लक्षणसे पहचानने योग्य कारण परमात्मा है । तथा शुभ तथा अशुभ कम्मों के संयोगसे उत्पन्न भए मेरे आत्मा निज स्वरूपसे भिन्न समस्त बाह्य और अभ्यंतर परिग्रह हैं ऐसा मेरा निश्चय है। भावार्थ ॥ में शुद्ध आत्मा ही हूं। मुझसे भिन्न सर्व पद हैं। टीकाकार-कहते हैं कि मेग परन आत्म स्वभाव अविनाशी है यही एक स्वाभाविक परम चैतन्य चिन्तामणिरूप है नित्य शुद्ध है मर्यादा- विना अपने दिव्य ज्ञान दर्शनकरके पूर्ण है अन्य बहुत विकल्पोंसे तया बाह्य पदार्थोसे मुझको किस फलकी प्राप्ति होगी ? अर्थात् अन्य मासे मुझे कोई उपाय फल नहीं प्राप्त होगा। आगे आत्मा से दोपोंको छुटानेका उपाय कहते हैं:- जं किंचि मे दुचरिचं, सव्वं तिविहेण वासरे। सामाइयं तु तिविह, फरेमि सव्वं णिरायारं ॥१०॥ सामान्यार्थ:-जो कुछ मेरा दुष्टरूप चारित्र है उस सर्दको मैं मनवचन कायसे त्यागता हूं। तण तीन प्रकारसे सर्व तरहसे निराकार जो सामयिक सो करता हूं। विशेपार्थः--यद्यपि में भेद विज्ञानी हूं परम तपोधन (तपस्वी ) हूं तथापि पूर्व संचित कर्मोके उदयके वटसे चारित्र मोहके उदय होते जो कुछ भी दोषरूप आचरण मुझसे बन गया होय उस सबको मन वचन कायकी शुद्धिकरके त्यागता हूं। सामयिक शब्दसे चारित्र ग्रहण करना । सो में सामायिक, छेदोपस्थापना और परिहार विशुद्धि ऐसे तीन प्रकार चारित्रको करता हूं अथवा जपन्यरूपसे वर्तता जो रलाय निश्चयमत्यास्पानाधिकार । उसको उत्कृष्टरूप करता हूं । नवपदार्थ उ: द्रव्यके श्रद्धान ज्ञान और आचरण स्वरूप जो रत्नत्रय सो साकार है विकल्प सहित है । उस सवि- कल्स रत्नत्रयको मैं आत्मस्वरूपके श्रदान ज्ञान और आचरण स्वरूप जो स्वभाव रत्नत्रय उसमई जो निराकार अर्थात् निर्विकल्प और शुद्ध अवस्था उसरूप करता हूं । अर्थात् व्यवहार रत्नत्रयके दाग निश्चय रत्नत्रयको प्राप्त करता हूं अथवा भेदोपचाररूप चारित्रको अभेदो- पचाररूप करता हूं । और अभेद उपचाररूप चारित्रगे अभेद अनुप- चाररूप करता हूं । भावार्थ-भेदोपचाररूप चारित्र व्यवहार महावतादि पालन है, अभेदोपचाररूप चारित्र शुद्धात्माकी भावना वरूप है, और अभेद अनुपचाररूप चारित्र स्वभाव, निश्चल अवस्थारूप स्थितिमई है। इस प्रकार क्रमसे तीन प्रकार सामायिकको स्वीकार करनेसे निग- कार चारित्र प्राप्त होता है। कैसा है निराकार चारित्र, जहाँ स्वाभाविक परमतत्त्वमें अविचल स्थिति है तथा वहीं स्वाभाविक निश्चय चारित्र है क्योंकि वहीं निराकार तत्व जो आत्मीक तत्त्व उसी तडीनपना है । ऐसा ही श्री प्रवचनसारजीकी व्याख्यामें कहा है कि द्रव्यको अनु. सरन करनेवाला चारित्र होता है । अर्थात् आत्मव्यको सिद्ध करने- वाटा चारित्र होता है तथा चारित्रके अनुसार प्राप्त होनेवाला आत्मद्रव्य होता है । अपेक्षासे दोनॉकाही यहां उदय है । जहाँ आत्मद्रव्य है वहीं चारित्र है इसलिये चाहे द्रव्यकी प्रतीतिकरके चाहे आचरणकी प्रतीतिकरके मोक्षका चाहनेवाला मोक्षमार्गमें आरोहन करता है अर्थात् मोक्षके उपायमें उन्नति करता है। दीकाकार कहते है-जो मुनि पती आरमा चैतन्यपनेकी भावनामें आसक्त बुधि यती संसारमें गिराने के स्वभावको धारनेवाला जो यम (काल) उसको नाश करने के कारण होते है अर्थात् भवमें भ्रमणका कारण जो कर्म उसको दाधम देते हैं।

नियमसार- आगे कहते हैं जो अंतरंगने लीन होकर मुनिष्ण आचरम करते हैं उन्हीके भावोंकी शुद्धता होती है:- सम्मं मे सबभूदेनु, वेरं मज्झं ण केणवि । आसाए वोसरिता गं, समाहि पडिवजए ॥१०॥ सामान्यार्थ:-सर्व प्राणियोंसे मेरे समता भाव है तथा किसके भी साथ मेरा वैरभाव नहीं है । निश्करके आशाको त्याग करके समाधि भावको प्राप्त होता हूं। विशेषार्थ:-समस्त इन्द्रियोंके व्यापारले छुट्टाहुजा न जो नै सो मेरे भेद विज्ञान ज्ञानी अज्ञानी सर्व ही मानियोंने समता भाव है। निनेही अथवा देश्पनेकी परिणति के अन्दर होने मेग बिजी भी मनुष्य के साथ वैर मात्र नहीं है, तथा स्वाविक वैरान्पर्ने परिपन्न करनेशला ऐसा जो मैं सो मेरे कमी आशा नहीं शिपमान है, इसडिये परम समता रसमें दूग हुआ जो भार उस भावकी स्थनिनी जो परन समाधि ( उत्कृष्ट समता) उसके भावको ही मैं प्राप्त है। ऐसा ही श्रीयोगद देने कहा है:-"नुकतालसत्वधियोपः सत्ता परां च समता कुलदेवतो वा संज्ञानचनिइन्य महान तुज्ञानबिन मोहरिपून्यमई "मागर्म हे सारी जीव त उनमें बसता हुन आदस्यको त्यागकर और अपनी कुन्देको मो उच्च समता मम स्मरण करके शोध ही सम्माज्ञानरूपी पहन कर और अज्ञानी करके सहित मोहरूपी समा मदनकर टीनार करते हैं कि इस समता अतिशयमरके मना करता है। केसी है का से मुक्तिरूपी सोमें भरके समान दिन है। मनभर जो की उसके मुरकी जह है । सोटी भावना पारमा सहने नाश करने .. सच हो रह" "है। - ।

निश्चपम्पास्यानाधिकार। ------ लिये चंद्रमाकी कीर्ति अर्थात निर्मल चांदनीके समान है तथा संयमी मुनियोंको तत्काल ही सम्मत अर्थात माननीय है । इस समताकी जय हो। जो समता नित्य योगियोंको भी दुर्लभ है तथा आत्मीक मुसको बढ़ाने के लिये प्रफुटित पूर्ण चद्रमाकी प्रभाक समान है। परम यमी जो महावती मुनि उनकी दीक्षारूप स्त्री उसके मनको प्यारी यह समता मसीके समान है । तथा मुनिवरों के मणकेलिये यह समता एक अतिशयमई अलंकार है. यही समता जगतके प्राणियों के लिये भी परम आभूषण है। आगे निश्चय प्रत्याख्यानके योग्य जो जीव तिसका स्वरूप कहते है:- णिमसायस्स दांतस्स, सरस्स पयसायिणो । संसारभयभीदस्स, परसाणं सुहं हये ॥ १०५॥ सामान्यार्थ:--जो पाय रहित है, इन्द्रिय दमन करनेवाला, योदा है, उद्यमी है, तथा संसारसे भयभीत है उसीके ही मुसमई यह प्रत्याख्यान होता है। विपार्थ:-जो मुनि सर्व पायम्पी कलंककी कीचसे विभुनः ( रहित ) है, जिसने सर्व इन्द्रियाँ च्यापारीको विनय करनेमे परम दमपना माप्त किया है , तथा जिसने सम्पूर्ण परीसहरूपी महान् योमा. ऑको बिजयकरके अपने योद्धापनके गुणोंको उपजाया है । और जो मुनि निश्चयाप जो परम तपश्चरण उसमें लीन हो गुलभायका धारी है तथा जो संसारसे भयवान है उसीके ही व्यवहारनयसे चार प्रकार आ. रका त्यागरूप प्रत्याख्यान होता है। यह व्यवहार प्रत्याग्यान मिथ्या- दृष्टि पुरपके भी कहीं किसक चारित्र मोहके उदयरूप जो द्रव्यधर्म और मात्रकर्म उनके श्योपशमसे ले जाता है। अतएव जो निश्चयनयकाके प्रत्यारण्यान है वही वास्तविक प्रत्याख्यान है। यह प्रत्यारयान अत्यन्त निकट भन्य जीशंकरी रोता है। जैसे मुबर्गको स्नेवाले पत्थरका नियमसार- उपादेयपना है अर्थात् मानपना है ऐसा अंघपापाणका नहीं है क्योंकि उससे सुवर्ण प्राप्त नहीं हो सकता । इसलिये संसार शरीर और भोगोंसे जो वैराग्य है वही निश्चय प्रत्याख्यानका कारण है-आगामी कालमें जिनका होना संभव है ऐसे सर्व मोह राग द्वेषादि नानाप्रकारके विभावों- का त्यागना ही परमार्थ प्रत्याख्यान है । अथवा आगामी कालमें होने वाले विविध जो अंतरंग वचनरूपी विकल्प उनका त्याग करना सो शुद्ध निश्चय प्रत्याख्यान है । टीकाकार कहते हैं कि हे मुनिप्रधान! यह प्रत्याख्यान जिनेन्द्रमतसे प्रगट मया है, यही परम मुनियोंको उत्कृष्ट निर्वाण सुखका करनेवाला है, यही स्वाभाविक समतादेवीके सत्य कर्णीका आभूपण कर्णफूल है तथा अतिशयकरके यही दीक्षारूपी स्त्री उसको अत्यन्त यौवनवान करनेका कारण है। ऐसे प्रत्याख्यानकी निरंतर जय होहु ॥ आगे निश्चय प्रत्याख्यान नामा अध्याय उसको संकोचते हुए संक्षेपमें एवं भेदभासं, जो कुब्बइ जीवकम्मणो णिचं । पञ्चरवाणं सक्कदि,धरिदे,सो संजदोणियमा॥१०६॥ सामान्यार्थ:--ऊपर कहे प्रमाण जो कोई जीव और कर्मों के भेवके अभ्यासको नित्य करता है वही संयमी नियमकरके प्रत्याख्यानको धारण कर सकता ster ॥ विशेषार्थ:--जो कोई श्रीमान अर्हत भगवानके मुसकमलसे प्रगट जो परमागम उसके अर्थको विचार करनेमें समर्थ हे तथा अपने भेदा- भ्यासके चेल्से अशुद्ध आत्माके साथ जो फर्म पुनलोंका अनादि बंधनका सम्बन्ध है इनके अर्थात् आत्मा और कर्मक भेदको कर देता है अर्थात् योनीको भिन्न २ अनुभव करता है वही परम संयमी निश्रय और - निश्चयमत्याख्यानाधिकार । १२५ - -- व्यवहार प्रत्याख्यानको स्वीकार करता है। टीकाकार कहते हैं-आगा. मी कालमें होनेवाला जो संसार उसके भाशेंको दूर करनेवाला मुनियोंका स्वामी रात्रि दिन सम्पूर्ण सुखका निधान, निर्मल, आत्मीक स्वरूपमई जो सोहं तत्त्व उसकी भावना अपने कर्म मल छुड़ानेकेलिये करा करता है। भावार्थ-जैसे सिद्ध भगवान हैं वैसा ही मैं हू यह भावना परम सुखदाई और स्वरूप समाधिको कारण है । जिनेन्द्र भगवानने इस तत्वको भया- नक संसाररूपी समुद्रसे पार करनेकेलिये एक शोभनीक जहाज़के समान कहा है । निश्चयसे यही परम तत्त्व है इसलिये मोहको जीतकरके मै तत्काल इसीकी ही भावना करता हूँयह प्रत्याख्यान निरंतर उसीके ही होता है जो शुद्ध चारित्रकी मूर्ति है तथा जिसने पर द्रव्यके भरमको नाश करदेनेसे स्वाभाविक परमानंदई चैतन्य शक्तिके द्वारा विकल्प- रूप बुद्धिको नष्ट कर दिया है। अन्य आगममें लीन अन्य योगियोंका मुरु दान ( उपयोग ) इस ओर नही हो सकता । इसके विना पुनः पुनः जीवोंको इस भयानक संसारमें भ्रमण होता है । वह सिद्धात्मा महान आनन्दोंमें परमानन्दरूप है, जगतमें प्रसिद्ध है, अविनाशी स्वरूप है, अतिशयकरके अपने निज गुणमें ही जिसकी निश्चित वस्ती है। ऐसे आनन्दरूपको छोड़कर यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि ये विद्वान लोग भी तीन कामके शत्रोंसे पीटित हो किस प्रकार पापसे हते हुए जड़ बुद्धि होकर पाप कार्यकी इच्छा करते हैं । प्रत्याख्यान करनेसे ही मुनियोंको प्रगटरूपसे अत्यन्त शुद्ध सम्यग्दारित्र होता है । कैसा है सम्याचारिब रूप आत्म तत्व, जो पापरूपी दृक्षांसे भरी जो संसाररूपी बनी उसके जलाने के लिये अग्निके समान है । हे मत्योंमें सिंह ! तू अपनी बुद्धिमें इसी तत्त्वको धारण कर, यही तत्व स्वाभाविक मुसका देनेवाला और मुनिओके स्वभावका मूल है। उस सहज आमीक तत्वक जय हो। जो स्वाभाविक तत्व आत्मीक तत्वमें धारी है दुद्धि जिन्होंने उनके हृदयरूपी । .

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१३० निमपसार- भूमिगोचरियोंके द्वारा बन्दनाक है | उनहीं गुणोंकी अपेक्षासे मैं उस चेतन्यरूपको नमन करता है जो सबसे वन्दनीक और सौ मुणोंकी सान है || यह आत्मा परम यमी मुनियोंके चित्तरूपी कमलके मापर्ने प्रगट रहता है । कैसा है आत्मा, जो ज्ञान ज्योतिमा है, जिसने पारपी अधकारके पुनका नाश कर दिया है, जो समीचीन है तथा जो आका जीवोंके बनन और मनसे अगोचर रहता है । आचाप्यं कही है जो अत्यन्त प्राचीन परम पुरुष परमात्मा है उसमें विधि और fire it होगा ? ॥ ऐसा कहने से परमयोगीश्वरने न्याहार आलोचना प्रकारे हैसी की है। टीकाकार कहते है उस पाप रहित चैतन्य रूपकी र हो। मा है वह सहनाय, जो अतिशय समन निक समूहगे उत्पन्न मी कोलाहल (पप ग ) इनमे है। उस महान तातो नयोंग तथा अनयों समझकर प्रशनी ? अप विश्व व्याहार नग आदि से दो र है, पंसा या मी वहन योगियाही गोचर है । वा भामी त मान- और परन्तु आत्मज्ञानंग रहित मनानी जीठिया तमाम है। मायनी पाम गुरू मागम शुबमा आमी मुममा अमुतो मन A HAAL मानाशी मार कान में प्रशियां finst माना in मान, श्री मा सम्पूर्ण भनागा After Hit पाम HHamta ममम .at RELI, rinोर नामा 16 mitti ma M निभ्रयाछोपनारिकार। - करता हूं तथा अत्यन्त ही भेदोंसे रहित जो मोक्षका मार्ग है उसको भी नमन करता हूं। आगे आटुंछनका स्वरूप कहते हुए परमभावस्वम्पका ग्यारन्यान करते हैं.. कम्ममहीरहमूल,-छेदसमथो सकीयपरिणामो। साहीणो समभावो, आलुछणमिदि समुदिहें ॥ ११०॥ सामान्यार्थ -अष्ट कर्मरूपी पक्षके मूलको छेद करनेमे समर्थ जो अपने ही आत्माका स्वाधीन और समता भावरूप परिणाम उसीको आलंउन इस नामसे कहा है। विशेपार्थ:--यहां पंचम जो पारिणामिक भाव उसका स्वरूप कहते हैं । भन्यन्त्र नाम जो पारिणामिक भाव उस स्वभावका धारी जो भव्य- जीव उसके निजआत्म सम्बन्धी जो पारणामिक भाव सोरी परम भाव है। यह पंचम भाव औइयिक, औपशामक, क्षयोपशमिक और क्षायिक इन चार विभाव स्वभावोंके गोचर नहीं है। अतएव उश्य अर्थात समय पाकर कर्मोका उदय, उदारणा अर्थात् आगामी उपय योग्य कमोका पहले एक साथ बहुतसोका उदय हो जाना । क्षय अर्थात् कोका सर्वथा नाश । क्षयोपशम अर्थात् कर्मोके सर्व पाती स्पर्दयोंका उदया- भावी क्षय तथा उपराम, देशपाती पदकोंका उदय ऐसे घर अवस्था द्वारा उत्पन्न हुए नाना प्रकार के विकार भाव उनकरके राहत है इस कारण इस एक आत्माके गुद परिणामको ही परमस्व अर्थात् उत्पष्टपना है इसकी अपेक्षा अन्य चार विभाव भाबीको अपर (हीनपना) है यह परम भाव सम्पूर्ण फर्मरूपी शिक्षकी जद्दको उहाइनेको समय तीनो कालोंमें भी जिसके आवरण नहीं होता ऐसा निराकरण निज कारण परमात्मा उसके स्वरूपका जो श्रदान वह सम्यक्त है। उसका विरोधी जो तीव मिथ्यात्वकर्म उसके उदयके वससे जो शुर परम +9 विषममार- A पर निभानमोगमा भीमuft गापि नही भार भयमान समान होHIRism पान मा भान भी नही . नियमिrit यस भारनियर नाप Hit मा) मा THAR भाममा नाम - Hir Gri Hanfi Kavita 1 in its it in TRESHI PIt is a भाIREM शोभायमान है Air famirmaton kilm है HAIR ant it In HIT मा ।। नीर, HEMix+1+ नाग- 4जी Sterile + at in Hindi) in Hindi . AN .

मिभपाठोपनाविधार। . जिसने दिशा मस्टो पोराटा है अर्थात सर्वत्र व्याप्त है तथा जिसने आत्माकी स्वाभाविक अवस्थाको प्रगट कर दिया है। आगे अवितिकरणमा स्वरूप कहते है:- कम्मादो अप्पाणं, भिण्णं मावेद विमलगुणणिलयं । मझत्थ भावणाए, वियदीकरणति विष्णेये ॥१११ ।। सामान्यार्थ:-निश्रयकरके सम्मोसे भिन्न निर्मठ गुणकास्थान जो आत्मा उसको जो कोई मध्यस्य अर्थात् वीतराम भावना उसमें लीन होकर भावता है उसके ही अधिकृतिकरण जानना चाहिये ।। विशेपार्थ:-यहाँ शुदोपयोगी जीवकी परिणतिविशेषको कहते । जो कोई भव्य पापरूपी बनको दग्ध करने के लिये अनिके समान होकर द्रव्य, भाव और नोकम्मोंसे भिन्न तथा स्वाभाविक गुणके निधान आत्माको ध्याता है उसीके ही सहन गुणरूप जो परम आलोचना उसका स्वरूप माल होता है टीकाकार कहते हैं यह आत्मा सम्पूर्ण दव्यकर्म ज्ञानावरणादि और नोकर्म औशरिक शरीरादि उनकी राशि- योंसे सदा ही भिन्न रहता है, अंतरंगमें शुद्ध है, शम कहिये शांतभाव और दम कहिये इन्द्रियवराता ऐसे शमदमरूपी कमटोंकेलिये राजहं- सके समान है-जैसे रानरंस कमटमें केलि करता है ऐसे ही आत्मा शाम दममें रमता है । मोहके अभाव होनेसे यह आत्मा अपनेसे भिन्न सर्व अन्यवस्तुओंको कभी नहीं महण करता है । ऐसा यह आत्मा नित्य आनंद आदि अनुपम गुणमई तथा चैतन्य चमत्कारकी मूर्ति है । यह शुद्धात्मा अविनाशी अंतरग गुणरूपी रत्नोंका समूह है, शुद्ध भावरूप अमृतके अत्यन्त निर्मल समुदमें जिसने अपने पाररूपी कलकोंको धोटाला है, जिसने इन्द्रियरूपी ग्रामोंके कोटाहटको हटा दिया है तथा अपनी ज्ञानज्योतिकरके म्ह अंधकारके फैलावको नाश कर दिया है ऐसा शुद्धामा प्रकाशमान होता है । यह टोक संसारके जन्ममरण .

विमसार- भीकर भगाना और अपने सभा मे पnिt Arr. मान हो ? II THIRT RE 2 मे भारणी I म अनि भनी अमृता भी मो (1) RT INTERE ARE CENTERti मामा को AIATin ki irat THE THAMEmit मा गरम HAN Tu ar II ।। गरम simansistil पाबो sattam I am atit in TER Eris / पनी mmstats main Mathritam Varanauntilm.ni, At Intu RAHMAN Ananta, Milam tigent # 11.11th Him antit . । . .

। निभपालोचमापिका -~- -1 आगे चौधा भेद भावशुद्धिनामकी जो परम आलोचना उसका स्वरूप कहते हुए पुननिश्चय आलोचनाके अधिकारको सोचते है:- मदमाणमापलोहपि,-पजियभावो दुमाव मुद्धित्ति । परिकहियं मध्वाणं, लोयालोयप्पदरिसीहिं ॥ ११२ ॥ सामान्यार्थ:-मद, मान, माया और लोभ इन चारों कषायोंसे रहित जो भाव है उसको भावभुद्धि कहते हैं। लोक और अलोकको देखनेवाले श्री जिनेन्द्र भगवानने भन्य जीवों केलिये ऐसा कहा है। विशेपार्थः-तीव चारित्र मोहनी नामा कर्म उदयके बलसे पुरुष वेद नाम नोकपायका जो विटास है उसको मद कहते हैं । यहाँ मद शब्दसे मदन अर्थात् काम सेवनेका परिणाम ऐसा अर्थ लेना चाहिए । चतुर पचनों की रचना सहित प्रवीण और श्रेष्ठ कवितापनेके द्वारा आद्य नाम नामकर्मके उदयसे सर्व जनोंमें पूज्यपना पाने के कारणसे अथवा माता सम्बन्धी और पितासम्बन्धी कुलजातिकी उज्वलतासे अथवा ब्रह्मचर्य बतके पालनेसे उत्पन्न जी पुण्य तिससे प्राप्त जो १ लासकोटिभटके समान उपमा रहित बल होनेसे, अथवा दान पूजा आदि शुभकर्मों के द्वारा उत्पन्न जो पुण्य उस पुण्यके उदयसे प्राप्त जो संपदा धनादिकी वृद्धि उसके विटास से अथवा बुद्धि, तप, विकिया, औषध, रस, चल, तथा अक्षीण ऐसी सात ऋद्धियों के होनेसे अथवा सुन्दर सियोंके लोचनोंको आनंदकारी ऐसी शरीरकी सुन्दरताके रसके विस्तारसे आत्माके अहंकारका पैदा होना सो मान है ।। गुप्त रीतिसे पाप कर टेना सो माया है। योग्य स्थलमै धनका व्यय नहीं करना सो लोभ है । निश्चयकरके सम्पूर्ण परिमहका त्याग है टक्षण जिसका ऐसा कर्मरूपी अंजनसे रहित अपने परमात्म तत्वको ग्रहण करनेके विरुद्ध अपनसे अन्य परमाणु मात्र द्रव्यका स्वीकार करना सो लोभ है । इन चारों भाशेसे रहित जो शुद्ध भाव है वही भावशुद्धि है । इस प्रकार भव्य प्राणियोंकलिये लोकाठोक दी,

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निभयमापभिनाशिकार। विकतन्य सात तत्वों से सर्वोत्लष्ट तल है, परम निर्मल है, सर्व प्रकारसे निर्मल शानका पर है, आवरणोंसे रहित है, मोक्ष रूप है, अत्यन्त विशव (रुष्ट ) है, नित्य है, राम प्रपंच नालोंसे विरुद्ध है, मुनिको भी मन और वचनों से दूर है ऐसे तत्वको हम नमस्कार करते हैं । उस जिनेन्द्रकी जय हो जो शांतरसमई अमतके समुद्रको बढ़ाने के लिये मति दिन उपयरूप सुन्दर चन्द्रमा उमान है तथा तुटना रहित ज्ञान- रूपी सूर्पकी किरणोंसे जिसने मोहरूपी अंधकारके समूहको नाश कर दिया है । जिसने जन्म जरा मरणके समूहको जीत लिया है, अत्यन्त भयानक गगके समूहका पात कर दिया है, पापरूपी महा अंधकारके समूहके नाशकेटिये जो सूर्यके समान है तथा जो परमात्माके पदमें स्थित है उस महात्मा जीवकी सदा जय होहु ॥ इस प्रकार मुकविरूपी कमलोकटिये सूर्यके समान पंचेन्द्रियोंके विस्तारसे रहित शरीर मात्र परिमहक धारो श्रीपद्मप्रभुमलधारी देव विर- चित श्री नियमसार पन्थकी तात्पर्यति नामकी व्याख्या परमालो. पना नामका सातवां श्रुतस्कंध पूर्ण हुआ। जो शुद्ध निश्चयपायश्चित्ताधिकार। >4A आगे सर्व द्रव्यभाव और नोर्मके त्यागका कारणभूत निश्चय प्रायधिच नामका अधिकार उसको कहते हैं:- वदसमिदिसीटसंजम,-परिणामो करणणिग्गहो मावो। सोहनदि पायपि, अणवरयं व काययो॥ ११ ॥ सामान्यार्थ-वत, समिति, शाल और संयमका जो परिणाम तथा निपमसार- इन्दियोंके रोकनेका जो भाव उसका नाम प्रायश्चित्त है। सोही निरंतर करना योग्य है। विशेषार्थ:--अहिंसादि पांच महारत, पांच समिति, शीत और सौ इन्द्रियोंको तथा मनवचनकायको संयम करनेका परिणाम और पार इन्द्रियांका निरोधरूप जो भावकी परिणतिविशेष सोही प्रायधिन है प्रायःका अर्थ प्रचुरपने विकार रहित चिन अर्थात मन सो प्रायाधित है। सो प्रायश्चिन मुम पद्मप्रभकरके करना योग्य है । कैसा होकरी करना योग्य है, निरंतर अंतरंग लीन हो पाम समापि युक्त होकर, जितेन्द्री योगीश्वरकी दशाम रहार तथा पापानी बग्ध करने में अनि समान भार रसकर । तया केमा है में, पंचेद्रियो फेलासे कि शरीर- मान परिग्रहका धारी है, स्वाभाविक राम्यापी महलो शिस शिखामणि ह तथा परमागमकी मुगद लेने सन्मुग पहा बीका. कार कहत-हे मुनियाँके निरन्तर अपने आत्माको चिन्ता बोना सो प्राधिन होता है। इसका पागेको धोका तया भपने मात्मा स्वमा रत होकर मुनि मोक्षको मा त गो मनियम मिवाय अन्य चिन्ता करते हैं। बुधी पापी IRRFam होकर भी पापको यह एक पान है। भागे गो कम्मो को मान समयमा निशा पापभिन । na कोहादिसगामा, सयपदहीभाषणाप णिग्गवणं । पागरिछन मणि, भियगुणन्तिापjि११॥ मामान्या-गाने HE Its ret -साना ना भान मीnिia Heak विपापभिसाकार। Ammmmmm . -- विशेषाधी-कोषादि सई मोह राग देश विभाव भायोंको क्षय कर- नमें रणभूत जो अपने पारण परमात्मा स्वभावकी भावना उसके होते हुए निज स्वभाव ग्रहणकी अपेक्षासे मायापित्त कहा गया है। अथवा परमात्मा गुणस्वरूपपुर अतरंग तपाप जो अपना स्वभाव उसमें सहज सानाकि जो सहन गुण है उनकी चिन्ता करनी सो प्राय- पित होता है । टीकाकार कहते हैं-अतिशय करके मुनियोंका प्राय- पिस काम कोपादिक जो आत्मासे अन्य भाव हैं उनके नाशके अर्थ अपने आत्मस्वभावमा जानना अपग उसकी भावना करनी सो ही है। भामभयाय में संतों ने ऐशाही माना है । आगे धारों सायों जीतनेका उपाय बतलाते है:- कोई समया माण, समद्दयेणऽजवेण मायं च । संतोसेण य लोहं, जयदि सुए उपिहफसाए ॥११॥ सामान्या:-कोपको क्षमासे, मानो आत्मीक माईव भावसे, मायाको आर्जव धर्मसे तथा टोभको संतोषसे इस तरह ४ प्रकार कषा- योंको योगी जीतता है। विशेषार्थ-जपन्य मध्यम और उत्तम भेदसे क्षमा तीन प्रकार है। विना कारण के ही अभियवादी भिस्याटी मेरी निदा फरता है व बास देनेका उद्योग करता है परन्तु मेरे पुण्यके उदयसे यह कुछ न कर सका ऐसा जानकर क्षमा करना सो प्रथम जपन्य क्षमा हे।बिना कारण ही यह जीव मुझे बास करना और ताड़ना व बाधा देना चाहता है परन्तु मेरे पुण्यके उदयसे यह मेरा कुछ विगार न करसका ऐसा जानकर झोप न करके क्षमा करनी सो दूसरी मध्यम क्षमा है । और यदि अपने को बाधा व कास प्राप्त हो तो ऐसा विचारना कि मैं अमूर्तीक परम ब्रह्म स्वरूप हूँ मेरे शुद्ध स्वरूपकी कुछ हानि नहीं होती है ऐसा En नियममार- स्थानमें लेकर परम समा सो भा र माता सीaure मा । सरकार नो क्षमामा को पासमा भाप कोमल परिणामांसे मानणायको मोर Htta भाामे माया सभा मालामा गीत hit को जीतना योग है। यानी भी गुण- भाषा - (मन) ने दिए HTrail Nagaाना मोर roll yा listeininet.i को ही सबसे पा Nitilat art पानमा शतोगमा-Intent atta HELHI EK HERE : HTML ना in Tata Hi irat Timitenital intu Lipit sit insahit .

निभरमाश्रिताधिकार। १४१ and दिखलाई पड़ते हैं अर्थात मायाघारीके कोधादि पाय भीतर बैठे होते हैं। चमरी गाय भीलोंके मयसे भागती२ जाती है अकस्मात् उसकी पूरा वृक्षकी वेलमें फंस जाती है-इसको अपनेवालोंका बड़ा मोह होता है सो वाटोंके समूहमें टोलुपी रहकर इस भयसे कि कहीं कोई वाल टूट न जाय अपनी जड़ बुद्धिसे निश्चल सही रह जाती है अपनी पूंछको पुटाकर भागती नहीं है । आचार्य सेव करते हैं कि सलोभके कारण वह विचारी भीलके द्वारा हतीगयी। जो लोभकी परिणति रखते हैं उनको मायः इसी मकारकी विपत्तियां नानाप्रकारकी आ जाती हैं । टीकाकार कहते हैं । क्रोधकपायको क्षमासे, मानकपायको मार्दवसे, आर्जवसे मायाको तया लोभापायको संतोषसे जीवना चाहिये। आगे शुद्ध ज्ञानका स्वीकार करना ही प्रायश्चित्त है ऐसा कहते हैं:- उकिदो जो वोहो, णाणं तस्सेव अप्पणो चित्तं । जो धरइ मुणी णिचं, पायच्छित्वं हवे तस्स ॥ ११६ ॥ सामान्यार्थ:-अपने ही आत्माका जो उत्कृष्ट बाध, ज्ञान तथा चित्त है उसको जो कोई मुनि नित्य धारण करता है उसके ही प्राय- बित होता है। विकोपार्थ:--उत्तृष्ट जो विशिष्ट धर्म है वही परम बोध है-बोध शान और चित्त तीनोंका एक ही अर्थ है । अतएव उसी परम धर्मक भारी आत्माका प्रायः अर्थात् प्रकर्षपने जो चित्त अर्थात ज्ञान सो माय- चिन है । जो कोई परमसंयमी नित्य इस प्रकारके चित्तको धारण करता है उसी ही निश्चय प्रायश्चित्त होता है टीकाकार कहते हैं जो कोई शुद्धात्मशानकी भावनाको रखनेवाटा आत्मा है सो ही प्रायश्चित्त- मात्रका धारी है । जिसने पाप समूहको दूर कर दिया है ऐसे मुनीन्द- कोमेंनिस्य उनके गोकी मासिकेलिये बन्दना करता है।

१४२ नियमसार- । आगे कहते हैं कि इस लोकमें परम तपश्चरणमें टीन जो परम योगीश्वर हैं उनहीके निश्चय प्रायश्चिच होता है यही समस्त आचरण श्रेष्ठ आचरण है:- किं बहुणा मणिएण दु, वरतवचरणं महेसिणं सव्वं । पायच्छित्तं जाणह, अणेयकम्माण खयहेऊ ॥ ११७ ॥ सामान्यार्थः---बहुत क्या कहें । महर्षियोंका सर्व उत्कृष्ट तपश्चरण एक प्रायश्चिनको ही जानो जो अनेक कमोके नाशका कारण है। विशेषार्थः-आचार्य कहते हैं बहुत असत् प्रलाप कहनेसे बस होहु । निश्चय व्यवहाररूप सर्व उत्कृष्ट तपश्चरण एक निश्चय प्रायश्चित- को ही हे शिष्य तुम जानो । यहा परम जितेन्दी योगियोंकोलये अनादि संसारमें बांधे हुए द्रव्यकर्म और भावकम उनको सर्व प्रकार से विनाश करनेका कारण है । टीकाकार कहते हैं कि अनशनादि बारह तरूप आचरण यही आत्माका सहज स्वाभाविक तत्त्व है । यही शुद्ध चैतन्य स्वरूपको जाननेवाला है। यही स्वाभाविक ज्ञानकी कलाके गोचर है तथा यही पापोंको क्षय करनेका कारण है । यह प्रायश्चिच निश्चयसे उनम साधु पुरुषोकों ही होता है । कैसा है यह प्रायश्चिच, जो अपने आमीक द्रव्यमें चिन्तवन स्वरूप है तथा धर्मध्यान और शुमध्यानरूप है। कमांक अंधकारको विनाश करनेकठिये सम्यग्ज्ञानरूपी तेज है तथा जो अपनी विकाररहित महिमामें लीन है । यमी साधुओंको आत्मज्ञानमे ही क्रमकमसे आत्माकी प्राप्ति होती है और ज्ञान ज्योति प्रगट होती है। कैसी हे ज्ञान ज्योति, जिसने इन्द्रियोंके विषयरूप मामके घोर अंधारको हतन कर दिया है तथा कर्मरूपी जंगलसे उत्पन जो दावानली शिसा उसको बुझानेकेलिये शांत नठमई अमृतकी धारामेशीय २ वरपा रही है। अध्यात्म शास्त्ररूपी समुद्र से मैने इस संयम रूपीरलमालामो निमाला है यही निश्रय संयमरूपी रत्नमाला मादि वधूके पर ऐसे जो तार शाता , निश्चयमायभिचाधिकार । - उनके सुकंठको मुशोभित करनेवाली हो गई है, मैं नित्य इस परमात्म तत्वको नमस्कार करता हूँ। जो मुनीन्द्रोंके चित्तरूपी कमलका गर्भवास है, मोक्षके अतीन्द्रिय मुसका मूल है तथा जिसने संसाररूपी सके मलको नष्ट कर दिया है। आगे कहते हैं कि प्रसिद्ध ऐसा शुद्ध जो कारण समयसार परमात्म- तत्त्व उसमें सदा अंतरगसे लीन होकर जो तप तपना है वही तप प्रायाश्चत्त है:- पंताणंतमवेण स,-मजिअमुहअसुहकम्मसंदोहो। तवचरणेण विणस्सदि, पायच्छिचं तवं तह्मा ॥ ११॥ सामान्यार्थ.---अनंतानंत भवोंके द्वारा जो इस जीवने शुभ तथा अशुभ कमोके समूहको उत्पन्न किया है सो सर्व कर्मजाल तपश्चरण- करके नाशको प्राप्त होता है। इसलिये ऐसा तप ही प्रायश्चित्त है। विशेषार्थ:-अनादिकालसे संसारमें भ्रमते हुए जो शुभ तथा अशुभ कर्मोका समूह इस जीवने पैदा किया है सो द्रव्यरूप पुद्गलार्म तथा रागद्वेषादि भावकर्म जो द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भावरूप पांच प्रकार संसारका बढ़ानेवाला है सो सर्व भावशद्धि लक्षणके धारी परम तपश्चरणके दाग विलयको प्राप्त हो जाता है। इसलिये अपने आत्मीक तदमें रमनरूप जो परम तपश्चरण सो ही शुद्ध निश्चय प्रायश्चित्त है ऐसा प्रयोजन है टीकाकार कहते हैं-अष्ट कम्मोके जालको नष्ट करने के लिये संत पुरुषोंने ऐसे तपके सिवाय और किसीको प्रायश्चित्त नहीं कहा है । कि जो तप चैतन्यके आनदरूपी अमृतसे पूर्ण है तथा जो अनादि संसारमें संमह किया ऐसा महान कर्मरूपी बन उसके दग्ध करनेकेलिये आमिकी ज्वालाका समूह है और जो समसुसई तथा मोक्षरूपी लक्ष्मीना दहेन है। .

नियमसार- आगे कहते हैं कि सम्पूर्ण विभावभावको अभाव करने लिये आने आत्माही आपसे प्रपन्न जो निश्रय धर्मध्यान वही समय है:- अप्पसरूवालंवण,-मावेण दुसन्धमावपरिहारं । सकदि कई जीयो, तम्हा झाणं हवे सम्बं ॥११९॥ सामान्यार्थ:-यह जीर अपने आत्मीक स्वरूपके आलइनमें तन्मय जो भार उसीसे सर्व अन्यभारको त्यागनेको समर्थ हो जाता है। इसलिये सर्व प्रायश्चित्तादि ध्यान ही होता है। विशेषार्थ:-निचलरूपसे परदव्यका त्याग हे लक्षण जिसका ऐसे लक्षणसे लक्षित जो असंड नित्य आवरण रहित ऐसा जो स्वामाविक परम पारिणार्मिक भाव उसकी ही भावना मानेसे यह अत्यन्त निकटमव्य जीत औदार्यक औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक, ऐसे अपने शुद्ध स्वरूपसे अन्य चारोंभावोंको तजनेकलिये समर्थ हो सकता है। इसी कारणसे उसी जीवके ऐसे भावको पापरूपी वनीके जलाने के लिये अग्रिसमान कहा गया है । अतएव पांच महावत, पांच समिति, तीन गुप्ति, ऐसे ११ प्रकार चारित्र तथा प्रत्याख्यान, प्रायश्चिन, और आलोचना आदि सर्व ध्यानमें ही गर्भित हैं । टीकाकार कहते है-जो कोई भन्यजीव शुद्धात्मामें अपना मन निश्चल करके एक शुद्ध आत्माको ही ध्याता है . किस प्रकार ध्याता है, कि यह आत्मा एक है नित्य अपनी ज्योति- करके मोह अंधकारके समूहको नाश करनेवाला है, आदि और अतसे शून्य है, परमकलासे विराजमान है तथा आनदकी मूर्ति है वह जीव शीघ्र ही जीवन्मुक्त अर्थात् अरहंत हो जाता है। और वही जीव समस्त आचारका प्रतिपालक है। आगे शुद्ध निश्चयस्वरूपमा व्याख्यान करते है:- सुहअसुहवयणरयणं, रायादीभाववारणं किच्चा। अप्पाणं जो झायदि, तस्स दुणियम हवेणियमा॥१२० .

निर्भयप्रायश्चित्ताधिकार १४१ --- सामान्यार्थ:--जो कोई शुभ और अशुभ बचनोंकी रचनाको दूरकर तथा रागदेषादि भावोंको हटाकर आत्माको ध्याता है उसके ही नियमसे नियम होता है। विशेपार्थ-जो कोई परम तत्त्वज्ञानी महा तपोधन प्रतिदिन सचय किये गए जो सूक्ष्मकर्म उनके नष्ट करने में समर्थ जो निधय प्रायाचित्त उसमें लीन रहता है तथा जो मुनि मन वचन कायको रोककरके संसाररूपावेलके मूलकंद जो शुभ तथा अशुभरूप प्रशस्त और अप्रशस्त समस्त वचनकी रचनाको दूर करता है, केवल इन वचनोंहीका तिरस्कार नहीं करता किन्तु समस्त मोह रागदेष आदि पर भागेको भी दूर करता है फिर निरन्तर असंट, अद्वैत, सुंदर, आनंदसे भरपूर अनुपम तथा कर्माजन रहित अपने कारण परमात्मतत्वको नित्य अपने शुद्धो. पयोगके बलसे वारंवार भावता है उसी ही यमी मनुष्य के शुद्ध निर्भयनय. करके नियम होता है। यह अभिप्राय भगवान सूत्रकारका है। टीकाकार कहते है-जो कोई भय्यजीव शुभ तथा अशुभरूप वच- नकी रचनाको त्यागकरके नित्य प्रगटपने स्वभावमई परमात्माको भले प्रकार भारता है उसी ही परम जितेन्द्री और ज्ञानी मुनिक निय- मसे यह शुद्ध नियम होता है तथा वही नियम मुनिरूपी के मुसका कारण है । निरन्तर असंड अद्वैत चैतन्य के विकार रहित स्वरूपमें सम्पूर्ण नयों का विलास कुछ भी प्रगट नहीं होता है। जिसमें सर्व भेदवादोंका विलय हो गया है ऐसे तत्वको मैं यहां नमस्कार करता है, उसीकी स्तुति करता है तथा उसीकी वारम्बार भावना करता हंस्यह ध्यान है, यह ध्येय है, यह ध्याता है, यह ध्यानका फल हे इन विकल्प जालोंसे रहित जो ताव है उसीको मैं नमन करता हूँ। जिस रिसी योगमें लीन योमके कभी र भेदवार उठाकरते है अर्थात जो किस भावोंमें मात करता है उसको अरहंतके मतमें मुनि होगी नहीं कौन जानता है। नि.सा...

१४६ नियमसार- AAMA करके भावार्थ-मुक्तिका कारण तो एक निर्विकल्प ध्यान ही है जहां विकल्प हैं वहां बंध है। आगे निश्चय कायोत्सर्गका स्वरूप कहते हैं:- कायाइपरद्दम्बे, थिरमावं परिहरन्तु अप्पाणं । तस्स हवे तणुसग्गं,जो झायइणिविअप्पेण ॥१२१॥ सामान्यार्थ:-काय आदि पर द्रव्योंमें स्थिर भावको जो कोई विकल्परहित होकर अपने आत्माको ध्याता है उसके ही कायोत्सर्ग होता है। विशेपार्थः-आदि और अंत सहित मूर्तीक अपनी आत्मजातिसे भिन्न विभाव व्यंजन पर्यायरूप अपने शरीरका जो आकार है सो काय है । आदि शब्दसे क्षेत्र, महल, सुवर्ण, खी आदि लेना। इन सर्व विनाशीक पदार्थोंमें स्थिर भावको अर्थात् ये सदा रहेंगे ऐसे भावको त्यागकरके नित्य ही मनोहर कर्मरूपी मैलसे रहित अपने स्वभावमई कारण परमात्माको जो नित्य व्यवहार कियाकांडके आडंबर सम्बन्धी नानाप्रकार विकल्प उनसे पूर्ण कोलाहल ( शोर-गुल ) उससे रहित ऐसा जो स्वाभाविक परम योग उसके बठसे ध्याता है उसी ही तपस्वीके निश्चय कायोत्सर्ग होता है। कैसा है तपस्वी, जो स्वाभाविक तपश्चरण- रूपी क्षीरसमुद्रको बढ़ानेकेलिये चंद्रमाके समान हृदयका ईश्वर है तथा निश्चयकरके स्वाभाविक वैराग्यरूपी महलके शिरसरका शिखामणि है ॥ टीकाकार कहते हैं-यह निश्चय कायोत्सर्ग निश्चयसे अपने आत्मामें लीन संयमी मुनियों के ही निरंतर अपने आत्मध्यानके द्वारा ही होता है। कैसा हे आत्मध्यान, जहां शरीरसे उत्पन्न जो प्रबलरूपसे प्रगट होते हुए कर्म उनसे मुक्तरूप है अर्थात् कोयकी कियारहित है, वच- ।

निश्चयमायधिसाधिकार। नोंके जालोंके समूहसे रिक्त है तथा मन सम्बन्धी भावोंसे भी अलग है। उस स्वाभाविक परमतत्त्वकी जय होहु । जो अपने सहज तेजके पुनमें मम होकर प्रकाशमान है, जिसने मोह अंधकारको हटा दिया है, जो स्वाभाविक परमदर्शनसे परिपूर्ण है तथा वृथा ही उत्पन जो संसार तथा जो भव भवके दु ख और कल्पना तिनसे मुक्त है । संसारके जो सुरस हैं वे एक तो अल्प अर्थात् थोड़े हैं। दूसरे फल्पना मात्र ही अर्थात अपनी मानी हुई बुद्धिसे ही रमणीक ( अच्छे) मालूम होते हैं ऐसे सर्व सुखको मैं अपनी आत्मीक शक्तिसे त्यागता हूं तथा स्वाभाविक परम सुस्वरूप चैतन्यके चमत्कार मात्र प्रगट अपने विलासमई आत्मतत्त्वको सदा अनुभव करता हूं। आचार्य्य कहते हैं कि मेरे हवयमें स्फुरायमान जो समाधिमई निज आत्मीक गुणोंकी संपदा उसको मैंने इस कालसे पूर्व क्षणमान भी मैंने नहीं जाना। बड़े सेदकी बात है मै तीन जगतकी अद- भुत विभूतिको प्रलय करनेवाले दुष्ट कम्मौकी प्रभुताईके बलसे इस महा संसारमें अत्यन्त हता गया हूँ अर्थात् सेद उठा चुका हूं ॥ भवभवके वि- पमई वृक्षक सम्पूर्ण दुसके कारण फलोंको त्यागने योग्य जानके में चैतन्यस्वरूप आत्मामें उत्पन जो विशुद्ध सुरस उसीको अनुभव करता हूं। इसप्रकार मुकविरूपी कमलॉकेलिये सूर्यके समान पंचेन्द्रिय प्रसारसे रहित मात्रमात्र परिमहधारी श्री पद्मपभमलधारी देवसे विर- चित निमयसार मन्यकी तात्पर्यवृत्ति नाम टीका तिसमें शुद्ध निधय प्रायचित्त-अधिकार आठवां श्रुतस्कंध पूर्ण हुआ ।

१४८ नियमसार- परमसमाधि-अधिकार। - . . आगे सम्पूर्ण मोह रागद्वेष आदि परमार्बोको नाश करनेका कारण भूत जो परमसमाधि नाम अधिकार उसको कहते हैं । तहां प्रथम ही शुद्धनिश्चय परमसमाधिका व्याख्यान करते हैं:- वयणोच्चारणकिरियं, परिचत्ता वीयरायभावेण । जो झायइ अप्पाणं, परमसमाही हवे तस्स ।। १२२ ॥ सामान्यार्थ:-जो कोई अपने वीतराग भावसे वचनोंस बोलने की क्रियाको त्याग करके अपने आत्माको ध्याता है उसीके ही परम समाधि होती है। विशेपार्थः-परम जिन योगीश्वर भी कभी अपनी अगुम प्रतिको हटानेकेलिये वचनरचनासे मनोज्ञ ऐसी परम वीतराग सर्वज्ञ देवकी स्तुति करते हैं । तो भी निश्चयसे योगीश्वरको शुभअशुम वपनोंका व्यापार नहीं करना योग्य हैअतएव समस्त वचनकी रचनाको स्वाग करके सर्व कर्मरूपी कलककी कीचड़से रहित हो अपने रागदेष भागेको हटानेवाले ऐसे परम वीतराग भावके दारा तीनो कालोम आवरणरहित नित्य ही शुद कारण परमात्माको अपने ही आत्माका है आश्रय निसको ऐसे निश्चय धर्मभ्यानके बलसे अथवा टंफोकीर्ण झाया एक स्वभारम लग्लीन ऐसा जो परम शुक्ल ध्यान उसके यलमें जो कोई पाम वीतराग- स्वरूप ताभरणमें लीन, रागरहित संयमी ध्याता है उसी या निश्चयमे परम समाधि होती है । कैसा है साप, जो दय्यकर्म और मारकर्मकी सेनाको लूटनेगला है | टीकाकार कहते हैं-सी र्मा धमाकेदारा उगम भात्माक लयमें प्रगट होनेगरी म.

परमसमाधि-अधिकार। ---- -- ताके साथ २ रहनेवाली जो स्वाभाविक आत्मीक सम्पदा उसको जबतक हम लोग नहीं जानते तबतक यह समाधेि हमारा विषय नहीं है ऐसा हम मानते हैं । अर्थात् समाधिका लाभ कठिन है । आगे समाधिका लक्षण कहते हैं- संजमणियमतवेण दु, धम्मज्झाणेण मुमझाणण । जो झायइ अप्पाणं, परमसमाही हवे तस्स ॥ १२३ ।। सामान्यार्थ:-संयम, नियम और तपके द्वारा धर्मध्यान अथवा शुक्लध्यानसे जो आत्माको ध्याता है उसीके ही परम समाधि होती है। विशेपार्थ:-सर्व इन्द्रियों के व्यापारका त्यागना सी सयम है। अपने आत्माकी आराधनामें नियमसे ताहीन रहना सो नियम है। आ- माको आत्मा द्वारा धरा जाय सोही अध्यात्मीम्ता है। सर्व किया- काटके आढबरका हे त्याग जहाँ ऐसे अंतरग क्रियाकं आधाररूप आत्माको जो मर्यादारहित तथा तीनों फालोंमें कम्मोकी उपाधि अर्थात् आपानसे रहित स्वरूप जानता है उस ज्ञानकी जो परिणति विशेष है वही अपने आत्माके आश्रयमें तिष्ठनेवाला निधय धर्मध्यान है । अर्थात् आत्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान होकर स्वरूपके ज्ञान में निचलता सोही निधय धर्मध्यान है। जहां ध्यान, ध्येय, ध्याता और ध्यान फलको आदि ले नाना प्रकार के विकल्प नहीं है तथा जो सम्पूर्ण विकल्प सकल्पोंसे आदि ले सन्द्रियमाम विषयोंसे अगोधर आमीक परम तस्वकी निभलास्थितिरूप है वही निथप गु ज्यान है। यदि विशेष सामग्रियों के साथ जो कोई परम संयमी अरेट भी परम तन्यर्थ आत्माको नित्य ध्याता है उसी निपसे यह परम समाधि होती है। टीकाकार कहते है-जो तन्यमा निर्विकल्प समामि IA नियमसार- नित्य ठहरता है उसी आमाको मैं नमस्कार करता हूं। कैसा है आत्मा, जो देत और अद्वैतके विकल्पोंसे रहित है ॥ आगे कहते हैं कि जो काई समताभावके विना केवळ द्रव्यरूप बाह्यलिंग अर्थात् चिन्हको धारणेवाला व्यलिंगी श्रमणामास है अर्थात् यथार्थमें मुनि नहीं परन्तु मुनि सदृश मालूम होता है उसके मोक्षका कुछ मी उपाय नहीं है:- कि काहदि वणवासो, कायकलेसो विचित्तउववासो। अज्झयणमोणपहुदी, समदारहियस्स समणस्स ॥१२४॥ सामान्यार्थ:-जो श्रमण (दिगम्बर मुनि ) ममतासे रहित है उसको बनवास, अथवा कायक्लेश व नानाप्रकारके उपचाका करना व शास्त्रपठन तथा मानवत यह सर्व ही क्या कर सकते है ।। अर्थात् मोक्षके साधनको करनेमें असमर्थ है। विशेपार्थ:-सर्व कर्मक्लंकरूपी कीचमे हित महानदका कारण यह परम समता भाव है । यदि यह भाव न हो और केवल इयटिंगधारी श्रमणाभास वनमें वास करे, ३ वर्षाचालमें वृक्षके नीचे टहरे, गमि अत्यन्त तीव किरणोंसे संतप्त पतिके शिवरपर बैठकर आसन लगाये, अथवा शीतऋतुमें रात्रि मध्यमें दिशाओंके ही यखा लिहाफ मोडे अर्थात् चोडे मेनमें चेठ नमावस्थामें रह ध्यान लगारे, त्वचा और हीको दिसटानेवाला व सर्व अंगको पा देनेवाला उपवास महोपा- ७ करे व सदा शास्त्र पढ़ने में ही चतुर हो अथा वचनों व्यापारको त्याग. कर सदा मौनवत ही धारण को तभी उसे कुछ भी मोक्ष कारगमत मटकी प्राप्ति नहीं है । मायाथ-समताभारो माय तो येस आदय है परन्तु समताभावरहित नीक इनमे को भी महा योग्य परमसमाधि-अधिकार। १५१ फलका लाभ नहीं है । ऐसाही श्री अमृतशीति प्रथमें कहा है कि पर्वतकी भयानक गुफामें, बनमें, व दूसरे किसी शून्य प्रदेशमें बैठने से, इद्रियों को रोकनेसे, ध्यानसे, व तीयोंकी यात्रासे, पदनेसे, अथवा जए- होम करनेसे ब्रह्मकी सिद्धि नहीं है। इसलिये हे प्राणी तू उत्कृष्ट रूप, इन सर्वसे अन्य, अपने आत्माके सारको ही टूट । टीकाकार कहते है:-जो यती समता भावसे रहित हो अनशनादि द्वादश तपोको पाटता है उसके कार्यकी सिद्धि नहीं है । इसलिये हे मुनि ' तू आकुल- तासे रहित समतादेवीका जो कुलमंदिर ऐसा जो अपना आत्मीक तत्व उसीका ही भजन कर। आगे कहते हैं जो मुनि सर्व पापरूप व्यापारसे रहित हो मनवचन कायकी गुप्तिमें गुप्त हो सर्व इन्द्रियों के व्यापारोंको छोडकर अपने आत्मा सन्मुख होता है उसीके ही सामायिकवत स्थायी (तिष्ठनेवाला) होता है:- विरदी सव्वसावज्जे, तिगुतीपिहिदिदिओ। तस्स सामाइगं ठाइ, इदिकेवलिसासणे ॥ १२५ ॥ सामान्यार्थ:-जो सर्व शासन अर्थात साश्य कियाओंसे विरक्त हो तीन गुप्तियों को धारके अपनी इन्द्रियोंको संकोचता है उसी के ही सामा- यिक स्थायी होता है ऐसा केवली भगवानके आगममें कहा है। विशेषार्थ:-जो कोई महा मुमधु मुनि एकेन्द्रिय आदि प्राणियों के समूहोंको दुःसदेनेका कारण जो सम्पूर्ण पार सहित व्यापार उससे अलग होकर, शुभ अशुभ सर्व काय, पचन और मनके म्यापारोको स्यागार तीन गुप्तरूप होता है तथा स्पर्शन, रसन, माण, पक्ष और इन पांच इन्द्रियोंके सन्मुस हो उनके योग्य जो सिय करनेशले पदार्थ उनको महण न करके जितेन्दी रहता है उसी ही परम पतिराग संयनीके यह सामायिक पत शाश्वता सदा ठहरनेशला रोता है। टीकाकार कहते हैं- नियमसार- --- नित्य ठहरता है उसी आत्माको मैं नमस्कार करता हूं। कैसा हे आत्मा, जो देत और अद्वेतके विकल्पोंसे रहित है। आगे कहते हैं कि जो कोई समताभावके बिना केवल द्रव्यरूप बाद्यलिंग अर्थात् चिन्हको धारणेवाला व्यलिंगी श्रमणाभास है अर्थात यथार्थमें मुनि नहीं परन्तु मुनि सदृश मालूम होता है उसके मोक्षका कुछ भी उपाय नहीं है:- कि काहदि वणवासो, कायकलेसो विचित्तउपवासो। अज्झयणमीणपहुदी, समदारहियस्स समणस्स ॥१२४॥ सामान्यार्थ:-जो श्रमण (दिगम्बा मनि ) ममतामे रहित है उसको बनवास, अथवा कायश च नानापर उपगमौका करना व शाखपठन तथा मौनवत यह सर्व ही क्या कर सकते है ? । अर्थात मोक्षके साधनको करने में असमर्थ है। विशेषार्थ-सर मलकापी कायम राहिन महानदका कारण यह परम समता भार । यदि 4 मारना 1 सप्पलिंगधारी श्रमणाभाम वनमें वाम का, व वाकालमें THE नाच ठहरे, गाम अत्यन्त नीव किंग्णाग मनात पत: शिपापा बेठकर आरान लगारे, अथवा तिमतुम गा मध्यम दिशाही या Eिमोरे अर्थात चौ? मैदानमा नमातम्याम m, या भोर हीका दिन दानामा 'इनाराम महा- सकर तमाशापनमnan बनना थापाम. कर सहा मौनवत ही था तभी ममम रणभूत पली प्राति नहीं। भाग मताभAL मापन ना पगा उपादेश पन्त ममनाभान न NIL Rm om परमसमाधि-अश्किार। फलका लाभ नहीं है । ऐसाही श्री अमृतीति संथमें कहा है कि पर्वतकी भयानक गुफा, पनौ, ह दूसरे किसी शून्य प्रदेशमें बैठने से, दियों को रोकनेसे, भ्यानसे, व तायोड़ी यात्रासे, पढ़नेसे, अथवा जप- होम करनेसे बाकी सिदि नहीं है। इसलिये हे पाणी तू उत्कृत रूप, इन सबसे अन्य, अपने आत्मा के सारको ही दूर । टीकाकार कहते हैं--जो पती समता भावसे रहित हो अनशनादि दादश तोको पारता है उसके कार्यकी सिद्धि नहीं है। इसरिये हे मुनि! तू आकुल- तासे रहित समतादेवीका जो कुलमंदिर ऐसा जो अपना आत्मीक तस्य उसीकाही भजन कर। आगे कहते हैं जो मुनि सर्व पायरूप व्यापारसे रहित हो मनवचन कायसी गुभि गुप्त हो सर्व इन्द्रियों के व्यापागेको जोडकर अपने आमाके सन्मुस होता है उसीके ही सामायिकवत स्थायी (तिष्ठनेवाला) होता है.- विरदी सध्यसायजे, तिगुतीपिहिदिदिओ। तस्स सामागं ठाइ, इदिकेयलिसासणे ॥ १२५ ॥ सामान्या:--नो सर्व शासन अर्थात् सारय कियाओंसे विरक हो तीन गुहियोंको धारके अपनी इन्द्रियों को संकोचता है उसके ही प्रामा. विक स्थायी होता है ऐसा देवी भगदानके आगममें कहा है। विशेषार्थ-जो की महा मुमा मुनि एकेन्द्रिय आदि प्राणियों के समूहों को दुसदेनेका कारण जो सम्पूर्ण पाप सहित व्यापार उससे अटग होर, शुभ अशुभ सर्व काय, वचन और मनो म्यापारोंसे त्यागर तीन गुसरूप होता है तथा स्पर्शन, रसन, प्राण, Y और भोर इन पांच इन्द्रियों के सन्मुस हो उनके योग्य जो विषय बानेशठे पदार्प उनसे महणन र जितेन्द्री रहता है उसी ही परम पतिराग संपनी यह सामायिक मत सावता सा ठहरनेगटा होता है। टीकाकारहते है-

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परमभमा-अश्किार। तथा स्तिो चाहते है परन्तु मे देत, अदेतसे रहित आत्माको ही नमन करता हूँ ॥ मे आत्मा हूँ स्वमुसका चाहनेगला है इससे में अपने आलाहीमें ठहाकर आत्माही दारा जन्म और नामासे मुक्त ऐसे अपने आत्माको ही दारंवार भावता हूं संसारक रसानेगले इन विकलांके वचनोंसे पूरी पड़ो अर्थात् इनसे र कार्यकरी मिदिन होगी-यह आत्मा संदरहित आनन्दई, सर्व नयों के समूहोंका विषय नहीं है, न यह देत तथा अदेतरूप है इसलिये में उसी एकको विना विलम्ब सदा ही अपने संसारके भयको नाश कानेसलिये बन्दना करता हू॥ इस जन्ममें पापपुण्यके समूहसे उत्पन्न और दुख होता है । जिस आत्मामें न तो शुभभाव न अशुभ परिणति है, जो भवके परिचयमे अत्यन्तरहित तथा भवके करनेवाले आगुणों के समूहोंसे विमुक्त है उसी आत्माको मे नमस्कार करता हूं। इस जगतम नित्य ही यह चैतन्यका चमत्कार मात्र स्वरूप जयवन्त होहु । कैसा है स्वरूप, जो पापी सेनाकी भजाको हरनेवाला है, जिसने अपने स्पष्ट स्वाभाविक तेजसे पापोंके ममूहोको दूरकर दिया है तथा अत्यन्त प्रबल मोह अंधकार अस्त किया है और जो अत्यन्त शुद है। यह पापरहित आमाक तत्व जपको प्राप्त होहु । जिसने समस्त संसारको अस्त कर दिया है जो महामुनिगयों के नाथ जो परम योगी- श्वर उनके दयमें कमलके समान स्थित है, भवके कारणोंको जिसने विश्वंस करडाटा है, जो प्रगटपने शुद है । एकम्पसे सदा अपनी महिमामें टीन है तो भी सम्यग्दृष्टियोंके अनुभव गोचर हे ।। आगे कहते है कि आत्मा ही उपादेय है:- जस्स सण्णिहिदो अप्पा, संजमे णियमे तवे। तम्स सामाइगं ठाई, इदि केवठिसासणे ॥ १२७ ॥ 1 .

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परमसमाधि-अधिकार। १५३ । तथा कोई दैतको चाहते हैं परन्तु में वैत, अद्वैतसे रहित आत्माको ही नमन करता हूं ॥ मैं आत्मा है स्वसुसका चाहनेवाला है इससे मैं अपने आत्माहीमें ठहरकर आत्माहींक द्वारा जन्म और नारासे मुक्त ऐसे अपने आत्माको ही वारंवार भावता हूं। संसारके बढानेवाले इन विकल्पोंके वचनोंसे पूरी पढ़ो अर्थात् इनसे कुछ कार्यकी सिद्धि न होगी-यह आत्मा संदरहित आनन्दर्मा, सर्व नयों के समूहोंका विषय नहीं है, न यह तथा अदेतरूप है इसलिये मैं उसी एकको विना विलम्बके सदा ही अपने संसारके भयको नारा करने के लिये वन्दना करता हूँ॥ इस जन्ममें पापपुण्य के समूहमे उत्पन्न सुख और दुःख होता है । जिस आत्मामें न तो शुभभाव न अशुभ परिणति है, जो भवक परिचयसे अत्यन्तरीहत तथा भवके करनेवाले औगुणों के समूहोसे विमुक्त है उसी आत्माको में नमस्कार करता हूँ । इस जगतम नित्य ही यह चैतन्यका चमत्कार मात्र स्वरूप जयवन्न होहु । कैसा है स्वरूप, जो पापकी सेनाकी धमाको हरनेवाला है, जिसने अपने स्पष्ट स्वाभाविक तेजसे पापोंके समूहीको सूरकर दिया है तथा अत्यन्त प्रबल मोह अंधकार अस्त किया है और जो अत्यन्त घर है। यह पापरहित आत्मीक तत्व जयको प्राप्त होहु । जिसने समस्त मंसारको अस्त कर दिया है जो महामुनिगणोंके नाप जो परम योगी- श्वर उनके बदयमें फमलके समान स्थित है, भक कारणोंको जिसने विवस काढाला है, जो प्रगटपने शुद्ध है । एकरूपसे सदा अपनी माहिमाम लीन है तो भी सम्पादष्टियों के अनुभव गोचा है ।। आगे कहते है कि आत्मा ही उपाइस है:- जस्स सणिहिदो अप्पा, संजमे णिपमे नये । तम्स सामार्ग ठाई, इदि केवटिसासणे ॥ १२ ॥ - १५४ नियमसार- सामान्य अर्थ-जिसके संयम पालते नियम करते व तप धरते ए आत्मा ही निकटवर्ती है उसके सामायिक स्थायी होती है ऐसा केवड़ी आगममें कहा है। विशेपार्थ-जो निश्चय करके वाह्य प्रपंचजालोंसे अलग है, जिस सर्व इन्द्रियोंके व्यापारोंको जीत लिया है,जो मावी जिन है ऐसा मुनिज पापक्रियाओंके त्यागरूप बाह्य संयममें तथा मनवचन कायकी गुठि सहि सर्व इन्द्रियोंके व्यापारसे वर्जित हो अभ्यंतर आत्मरूप संयममें तिष्ठता । तथा किसा मर्यादा रूप बांधे हुए कालतक किसी आचरणको करना है स्वरूप जिसका ऐसे नियममें रहता है तथा परब्रह्म चैतन्यमई नियत निश्चय अतरंग लीन और स्वस्वरूपमें अविचल स्थितिरूप चारित्रने व व्यवहारनयके आधीन दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और वीर्य्य ऐ. पांच आचाररूप पंचमगति जो मोक्ष उसके कारणभूत चारित्रमें प्रवर्तता है और समस्त भावोंके प्रपंचोंसे रहित तथा सम्ल दुराचारकी निवृषिका जो कारण ऐसे तपश्चरणमें तन्मय होता है; उसी ही मुनिके परमगुरुके प्रसादसे प्राप्त जो निरंजन निज कारण परमात्मा सो सदा निम्ट ही रहता है । अर्थात् वह मुनि हरएक संयम, नियम और तपम परमात्माकी शुद्धताको भावता है। ऐसे ही परद्रव्योंसे पराङ्मुस अर्थात् पिच, परमवीतराग सम्यग्दृष्टी तथा वीतराग चारित्रवान मुनिके सामायिक बत सदा निष्ठनेवाला होता है ऐसा कथन केवली महाराजके आगममें कहा हे। टीकाकार कहते हैं-यदि मनमें शुद्ध सम्यग्दर्शन होता है तो यह आत्मा नित्य ही परम यमके धारी मुनियों के तपमें, नियम, संप- ममे तथा सम्यकचारित्रमें आतिसरायसे शिनता है। ऐसे ही गमरत रागकी मनोज्ञताको अस्त करनेवाले तथा संसारके भयको हरनेवाल आगामी तीर्थकरपद प्राप्त करनेगले आत्मामें यह स्वाभाविक ममता साक्षात शाभती है। ।

परमसमाधि-अधिगर। -- आगे कहते है कि गगषेके अभावसे अपरिस्पदरूपपना अर्थात हलन चठन रहितपना पाप्त होता है - जस्स रागो दु दोसो दु, विगडि ण जणेति दु। तस्स सामाइगं ठाई, इदि केवलिसासणे ॥ १२८॥ सामान्यार्थ-जिसके राग देष विचार नहीं पैदा होते है उसके सामायिक स्थायी होता है ऐसा केवीके आगममें कहा है। विशेषार्थ-जो परमवीतराग संयमी पापरूपी इनके जलानेको अभिके समान हैं उनके न तो गग और न देषका विकार पैदा होता है ऐसे ही महा आनन्दके चाहनेवाले जीवके तथा पंचेद्रियोंके फैलाव रहित शरीरमात्र परिमहके धारी मुनि के सामायिक बत शाश्वता अवि- नाशी होता है ऐसा केवटी भगदानके शासनमें प्रसिद्ध है। टीकाकार कहते हैं कि रागदेव विकारोको करनेफेलिये महामुनि समर्थ नहीं है (१)। जिसने अपनी शानन्योतिसे पापरूपी सेनाका पोर अंधकार दूर कर दिया है, जो शभाविक परमानदरूपी अमृतसे पूर्ण है तथा नित्यही समताके रससे भरपूर है ऐसे मुनिकेलिये विधि और निषेधकी कौनसी गति है ? अर्थात् रागदेप है व नहीं यह विकल्प ही नहीं 33 सकता । आगे कहे हैं कि आ रोद्रध्यानके त्यागसे ही सनातन सामायिक बत होता है:- जो दुअह च रुदं च, झाणं वजेदि णिचसो । तस्स सामायिगं ठाई, इदि केवटिसासणे ॥१२९॥ सामान्यार्थ.--जो नित्य आर्त और रोद पानाको हटाता है उसीके सामायिक वत स्थायी होता है ऐसा देवटी महाराजके आगममें - १५३ नियमसार- विशेपार्थ:-जो कोई जीव नित्य निरंजन निज कारण समय स्वरूपमें स्थिर रह निश्चय परम वीतराग सुखरूपी अमृत पान कर लवलीन है वह जीव तियच योनि तथा नरक आदि गतिको प्राप्त कराने निमित्त जो आर्त और रोने दोनों ध्यान उनको नित्य ही त्यान्ता उसीके निश्चयकरके केवल दर्शनधारी द्वारा सिद्ध किया हुआ शाम श्रावकके यह सामायिक अणुव्रतरूप होता है, ऐसा जिन शासनमें सिव आगे शुम तथा अशुम परिणामोंसे उत्पन्न जो पुण्य और पाप कर उनके त्याग करनेका विधान वतठाते हैं:- जो दु पुण्णं च पावं च, मावं वजेदि णिञ्चसा। तस्स सामाइगं ठाई, इदि केवलिसासणे ॥ १३०॥ सामान्यार्थ:-जो को निय पुण्य और पाप भावोंको पागला है उसकि सामायिकवत स्थायी होता है ऐसा चटी महाराज के आम ममें कहा है। विशेषार्थ:-जो बाय और अभ्यंतर परिग्रहको त्याग करना। रक्षण जिसका पैसे टक्षणसे जो उक्षित (चिन्हित) है ऐसे पाम Nि कि योगीश्वरोंके चरण कमलों धोना, संवारना आदि प्याय अर्थात सेवा करना उससे पैदा दुई जो आमाकी भ परिणति उससे उत्पन हुआ नो पुण्यकर्म तथा हिंसा, असाय, चोरी, अगर नया परिम्ह इन पांचों पापोंके परिणामांसे पेश अशुभ इन दानों पुण्य और पाभित्रो को स्वामाशिक थेराग्यो शिसास शिसाममि सो स्याम देता है। सेदोदो, से संसारमी पीके सिके तिमी जन्मभूमि अपना कोई .

परमसमाधि-अधिकार। Ku.. निमिनमे संसारमें जीव भ्रमण करता है। इन्हीं कम्मोकेरागका त्यागी नीव निन्य रेचली भगवानारा सिद्ध किया हुआ सामायिक मतको प्राप्त होता है ।। टीकाकार कहते है कि सम्पादरी जीव संसारके मुलभूत सर्व पुण्य और पापोको त्यागकरके अपने नित्य आनन्दरूप सहन शुद्ध चैतन्य स्वरूपको प्राप्त होता है तथा उसी अपने शुद्ध जीवास्तिकायमें ही विहार करता है पथात् वही जीव अतिशयकरके तीन लोकके जनोंसे पूजनीक मिनेन्द्र चटीरो जाता है। मैं नित्य ही उस आत्मज्ञानकी पूजा करता हूं । जो स्वय सिद्ध है पापपुण्यरूपी बनके जलानेकेलिये अग्नि समान है, महा मोहरूपी अधकारके दूर करनेको अत्यन्त तेनरूप है, मुनिका मूल है, उपाधिरहित महा आनंदका देनेवाला है तथा भव भवके प्रमणको नाश करनेमें निपुण है । यह जीव कामदेवसे उत्पन्न जो मुख उसकोठिये अपनी बुदिको क्षोभित किये हुए संसार रूपी वधूके वरपनेको प्राप्त होकर पापरूपी कुलके सम्बन्धसे ससारमें अपने प्राण धारण करता है। कदाचित् अपनी गतिको बदलकर जब यह शीम मोहके मुगको प्राप्त करता है तब उस एक सुखको तन का फिर वह सिद्ध जीव अपनी अवस्थाको नहीं चटायमान करता है । अर्थात् सदा एकाकार स्वभावमें तहीन रहता है। आगे नव नोकपार्योंके जीतनेसे सामायिक चारित्र प्राप्त होता है उसका स्वरूप कहते हैं- जो दु हस्सं रई सोगं, अरर्ति वजेदि णिचसा। तस्स सामाइगं ठाई, इदि केवलिसासणे ॥१३१॥ सामान्यार्थ-जो हास्य, रति, शोक, अरति, जगप्सा, भय, तीनप्रकार वेद ऐसे सर्व नोकपार्योको नित्य दूर रखता है उसीके ही यह सामायिक स्थायी होती है, ऐसा श्रीवलीके शासनमें कहा है।

१५८ नियमसार- -- । कपाय, जो महा मोहमें विशेपार्थ-मोहनीय कर्म द्वारा उत्पन्न जो सी, पुरुष, नपुंसकोत्र, हास्य, रनि, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा अर्थात् पृणा, ऐसे ना प्रा नोकपाय अर्थात् ईषत् ( किंचित् ) कपाय हैं इनसे संयुक्त जो करंसारी कीचड़ उसमई सर्व ही विकारों के समूहको परमसमाधिक घटसे जो करें निश्चयरत्नत्रयका धारी परम तपोधन मुनि त्याग देता है उसीके ही निय. यसे यह परम सामायिक नामका व्रत शाश्वत रूपसे रहता है।यह बात केवली भट्टारकके आगममें सिद्ध है। टीकाकार-कहते है कि मैं संसार. रूपी सीसे पेदा जो मुखदुःसोंके समूह उनको करनेशले सही नोक. पार्योको हर्षपूर्वक त्यागता हुं। कैसा है यह नो अन्धे पा है उनक दृश्यम मदाही मुगमतासे उपना करता है, पान्न जो आत्माकी समाधिम लालान निरन्तर आनंद मनरूप हैं उन दिन इनका उपनना अत्यन्त दुर्लभ है ॥ आगे परमममाधि अधिकारको संकोच करते हुए कहते हैं:- जो दु धम्मं च सुकं च, झाणं झाएदि णिसा। नम्स मामाइगं ठाई. इदि केयलिसासणे ॥ १३ ॥ सामान्या ना का Arयही धर्मध्यान और भ्यानको ध्याता है उसी के ही यह सामायिक स्थायी होता है देणाही भाग मन कहा। विज्ञापाय मा माया मा निर्म18सान और नया समयनाम * ५. annent at प्रपन मारमाहीमाश्रय निभय कमान 14 मय अभ्यान निरन्तर दंत, भामग्रमणमामा माम न siatvitamiमां Em .

परममपरिकार
अतरंगका आधारभूत ऐसे आत्मारा मनन करता है अपश आत्मामें
तन्मयरूप विकल्परहित परमसमाधिक ऐश्वर्यको कारण ऐसे धर्म
और
राम
प्यानोंसे सा मोक्षस्वरूप आत्माका ध्यान करता है उसीके
ही निश्रयसे जिनेश्वरके आगममें प्रतिपादित नित्य शुद मनवचन
पायकी गुप्तिरूप परमगुप्त समाधि है लक्षण जिसका ऐसा अविनाशी
सामायिक बत होता है। टीकाकार कहते है--जो कोई शुद्ध रत्न-
नयका भारी आत्मा शुमध्यान अपनी बुद्धिको परिणमाता हे अथवा
अपरहित परमानंद तावका आश्रय जिसको ऐसे धर्मध्यानमें लीन
होता है वही तत्वज्ञानी अतिशयसे सम्पूर्ण भेदों के अभावमे ऐसे किसी
विशाल तम्पको माप्त करता है जिसमें बड़े २ दुःखजालोका अन्त हो
गया है तथा जो भव्यनीयों के वचन और मनके मार्गासे दूर है। अर्थात्
जो अतीन्दियभाव गम्य है। भावार्थ-आत्माकी परमसमाधिसे उत्पन्न
परमामृतका पान करनेकेलिये आत्मस्वभावमें लवलीन ऐसे धर्मध्यान
और भ्यानकी ही आवश्यकता है ॥ १३३ ।।
इसप्रकार मुन्दर कविरूपी कमलों के लिये सूर्य्यसमान पचेन्द्रियके
फैलावसे रहित शरीरमात्र परिमहके धारी भीपद्मप्रभमलधारि देव
द्वारा कथित श्रीनियमसारकी तात्पर्यवृत्ति नाम व्याख्या परमस-
माधि नामका ९ मा श्रुतस्कंध पूर्ण हुआ ।
परमभक्त्यधिकार ।
आगे परम भकि अधिकारको कहते हैं । प्रथम ही रत्नत्रयका स्वरूप
वर्णन करते है:-
सम्मत्तणाणचरण, जो मत्त्रिं कुणइ सावगो समणो।
नस्स दुणिबुदिमत्ती,होदित्ति जिणेहिं पण्ण॥१३४॥

नियमसार- सामान्यार्थ-जो कोई श्रावक व श्रमण अर्थात् परमादिगम्बर मुनि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यचारित्रमें भक्ति करता है उसीक ही निवृत्तिरूप अर्थात् संमारसे छुड़ानेवाली भक्ति होती है। देसा जिनेन्दभगवान केवलियोंने कहा विशेपार्थ- चारों गतिरूप संसार उसको ग्रहण और उसमें भ्रमणका कारण तीन मिथ्याच कर्मरूपी प्रकृति है इसका विधीनो अपना परमात्मतन्त्र है उसका भले प्रकार श्रदान करना, उसीमे यथार्थ जानना तथा उसमें ही सम्यरूपसे आचरण करना सो सम्पयन ज्ञान चारित्र है । इन शुद्ध रत्नत्रय के परिणामको मनन करना, बमकी भान करनी, तथा इन्हीं की आगधना करनी योग्य है, यह प्रपोजन है। श्रावक ग्यारह पहन ११ पदम शनयत, सामापियोi. वाम, माचिन त्याग और गरि भोजनत्याग ऐसे ३ पकधारी श्रा गधन्यावा है । बह्मचर्य, आरंभ त्याग और परिमल राग इन तीन Tamमयम अE inा अनुमा) त्याग और पावर in 46 40 गाने माहासम्परा जाना हान हरियाली नामा मम मममीन, TRA (नानि धरने पमा मनाइमा नियमसिनो परम " for IAमान जिनन्द मान दागही निभा PRASNA Hrt. माना है। m. a... Int rime I J निल Pram..' 14 am in In न्याRHA - HEARTHATEHiTittyान !

परमभक्ष्परिकार आगे व्यवहारनयको प्रधान करके सिद्ध भक्ति के स्वरूपको कहते हैं.- मोक्संगयपुरिसाणं, गुणभेदं जाणिऊण तेसिपि । जो कुणदि परमभत्ति,व्यवहारणपेण परिकहियं ।।१३५॥ सामान्यार्थ:-उन मोक्ष प्राप्त पुरपीके गुणों के भेदोंको जानकर जो आत्मा उन गुणा परम भक्ति करता है उसीके ध्ययहार नयमे यह सिद्ध भक्ति कही गई है। विशेषार्थ-जो समीचीन महात्मा सर्व कम्मों के क्षय होनेम उपाय- भूत ऐसा जो कारण परमात्मा उसको अपनी भेदरहित और उपचार रहित रत्नत्रयमई परिणति के द्वारा भले प्रकार आराधन करके सिद्ध अब- स्थाको प्राप्त हो चुके है उन सिद्धोक सुदगुणों के भेनाको जानकरके जो कोई निम्ट भव्यजीव निर्वाणकी परपरासे कारणभूत ऐसी परम उत्कृष्ट भक्तिको करते है उन ही मुमुध नीकि म्यवहारनपसे निति भनि अर्थात् सिद्ध भनि होती है । टीकाकार कहते है जिन्होंने मौका समूहोंको धो डालाहै, जो सिद्धरूपी वधूके घर है तथा जिन्होंने सम्यन आदि आठ मुख्यगुणरूपी ऐश्वर्यको प्राप्त कर लिया है ऐसे मोक्ष स्थानमें निधासी सिद्ध भगवानांसो में निस्य वंदना करता हूं । मिनेन्द्र भगवामने इस प्रकारकी बंच वकभावरूप भलि.को व्यवहारनयसे कहा है । तथा बालग्यस्वरूप जो भनि है सो निभय निनि भक्ति है एमा वर्णन किया है। आचाप्योने सिद्ध अवस्था विपयमें वर्णन किया है कि वह सिरभाव पर्व दोषोंसे दूर है, केवल शानाविध गुणोंकास्थान है तथा दोपयोगका फलरूप है अर्थात् पुलोपयोग धारनहीसे सिर आस्थाकी प्राप्ति होती है। जो भी सिर महाराज तीन लोक आभा- गमें निवास करने वाले है, भव भव तरूपी समद अंत भाम भए है सपा निर्वाणरूपी निश्वक स्पर्शसे पैदा होनेवाले मुसी सान है मि.सा."

रिसममा मिवार जो जी चाय संसारो पार नामुमो सिमरसे यह योगकियोमानी। मधमती म है। ऐमा ही कहा है कि भामाश शुक्षि सोको असा मोर मनीम में संयोग होना सोनीns मग टीकाकार हरे-जा भा.मा अपने भाभा भामाशा अपने मामा हो निाना पोग 12amgi निया पागम में होता है। PREभी सोनिया गोगमा- मरिभणामार, अप्पाणे जागांसा। मोनोगनिनुता SILR को नोगा ॥१३॥ ना An मा मापान 41.मा. . HIGH +met won ka at Ruitm. . . AAP A 4 4.4.

परमभापधिकार। विवरीयाभिणिवेसं, परिचता जोण्हकहियतचेसु । जो जुजदि अप्पाणं, णियभावो सो हवे जोगो ॥१३९॥ सामान्यार्थ---जो विपरीत अभिप्रायको छोड़ करके जैन शास- नमें कहे हुए तत्त्वामें अपने आत्माको योग करता है वही आत्माका निज भाव, योग कहलाता है। विशेपार्थ:-जेन सिवाय अन्य धर्मोके कर्त्ताओंदारा कहे हुए विप- रीत पदार्थोंमें राग भावका होना वहीं दुराग्रह है अर्थात् एक भारी हठ है तथा इसीका नाम विपरीत आभिप्राय है। क्योंकि पदार्थ अनेकातरूप है सो स्यादाद के द्वारा ही यथार्थ प्रतिपादित हो सकता है । इसलिये उस दुराग्रहको त्यागकर जैन आगममें कहे हुए तत्त्वोंको निश्चय और व्यवहार नयों के द्वारा जानना योग्य है ।। सकल जिन जो अरहंत भगवान तीर्थ- नाथ उनके चरण कमलों की सेवा करनेवाले जैन है, सो निश्चयसे श्री गणधर देवादि मुनीश्वर है । इन आचार्योंके द्वारा वर्णन किये गए जो सम्पूर्ण जीवादितत्त्व उनके अनुभवमें जो कोई परम जितेन्द्री योगीश्वर अपने आत्माको जोड़ देता है उस योगीका जो अपना आत्मीक भाव है वही परम योग है । टीकाकार कहते है कि जैन मुनियों के नाथ श्री तीर्थकर अथश गणधररादिकोंके द्वारा प्रगट किये हुए तथा भव्यजनोंके संसारको घात करनेवाले तत्त्वोंके अंदर जो कोई जिन वीतरागी योगि- नाथ अपने अनादि परसमयमें होनेवाले विपरीत बुद्धिरूप दुराग्रहको त्यागकर साक्षात् अपने.आत्माक अंदर भावको तन्मय करता है उसीक ही भावयोग कहलाता है। आगे भाक्त अधिकारको संकोचते है:- उसहादिजिणवरिंदा, एवं काऊण जोगवरमति। णिबुदिमुहमायण्णा, तमा धरु जोगवरभत्रि ॥१४॥ .

नियमसार- -- Maivary 4u सामान्यार्थ:-श्री वृषभर्यिकरसे आदिलेय श्री महागर जिने पर्यंत २४ तीर्थकरांने इसी प्रकारसे योगकी उत्कृष्ट भात करो मोई मुखको प्राप्त किया है इसलिये तुम भी इसी योगी श्रेड मारक धारण करो। विशेषार्थ:-इस भरतक्षेत्र में इस अवसर्पिणी कालम श्री नारे ( नाभिगनाके ) पुत्र श्री माभसे लेकर श्री वर्षमान पर्यत पोरीस ताप- कर परमदेव सर्पश तिगग तीन लोकमें अपनी कीर्तिमतिराहे महागाधिरे परमेश्वर हो गए हैं, इन मयांने ऊपरकी गाथामा कर अनुमार अपने ही सम्बन्ध रसनेपाली निश्चय योग ट भान का थी, इमीमे परम निणिरूपी अगर मुस्लिम बाग पन्ना परम गदर रमपी अम् । उमस अपने सो म', आत्मर देशों को तृप्त कोष इमलिय र पा भगानी गुणों को पार नेपाल महापम्पो तुम भी सीही योग भनिनोमाने मामा पयानमा म मानती है ॥ दीशाार HAI (Hift ना। ATM inाले की Tak AHILE | मन मुनी सामस्वरूप 7 4. न.: "attits it. की है नपान 11 faninal rgo मन ' Tanka THIS HIN02140 म

रस्मसमरिकार
-
भनय यह भकिनी पाहिये।भपने मिसे राग और देवकी
भरपगारीओ परिणति उदा अब पर ध्यानसे
भपने मनको संयुक भानदमा भा.मताल रिपत होता हुभा तथा
भलिस्ट रिकोरनेशले पमं टाभर अपने सम्पानसे
गमन दी महिमा हटाता दुमा परम माप परमात्मा
मोनार ॥ो मान्दिय मुके सोलुपी है तथा जिन्होंने
अपना लिन आम लोममें पसा दिया है उनको दा आनंद
भरपूर यह उनम हम पास रोता है। जो यती भयन्त अपूर्व अरने
आ.मा भावना मान जो परम पुरर उसकरिये पल करते हैं ये
ही पनी निस्पकर जीवन्मना हो है दूमी नहीं। मैं मात्र एक ही
परमात्म ननकी पुनः पुनः भावना करता है। जो दरहित है, भदेत हे
हैं, परम हितकारी है तथा सर्व पापोंस दूर है। कैसा में मुनि
नियाका अभिन्नापी मारक मुरगे। लिमिलापी मुसको परमात्म
मसिवाय अन्य पशयोंक संबंध करनेसे कौनसे पाटकी प्रालि होगी?
अर्थात पुउन हांगी । भावार्थ-जो जिसको चाहे उसीको भने । जो
पामामा होना चाहता है संकलिंय उसी तानकी भावना कार्यकारी है।
इति श्रीकविमनापी मटोलिये सूर्य परन्द्रियके विस्तारसे रहित
शरीरमार परिमहके धारी भीपप्रम-मलधारी देय द्वारा रचित
श्रीनियमसार की तात्पर्यसि मामकी संस्तव्याख्या तिसमें
परमभकिनामा दावा श्रुतस्कंध पूर्ण हुआ । १४०॥
17

निश्चयावश्यकाधिकार ।
At
आगे सामायिक प्रतिकमण, प्रत्यास्यान, स्तुति, वंदना, कायोत्सर्ग दमे
छः आवश्यक व्यवहार उनसे प्रतिपक्षी जो शुद्धनिश्चय उसका अति
कार कहते हैं।
प्रथम ही कहते हैं कि जो निरन्तर अपने वश है उसीके निश्य
आवश्यक कर्म होता है:-
जोण हयदि अण्णवसो, तस्स दु कम्मं मणंतिआवासं।
कम्मविणासणजांगो, णिश्यहिमग्गोत्ति पिग्नुत्ती॥१४१
सामान्यार्थ:-जो दूसरे वश नहीं रहता है उसके आप
कर्म होता है। यही कम्मों के नाश करने में समर्थ मोक्षमा
ऐमा कहा गया है।
विशेषार्थ:--मोकामवयसे श्रीनिन्द्र माने गया ग
अनुमार आचरण करना कुशल अति चतुर है, जो सही तर
टीन होकर किसी भी अन्य भाधीन नही होतान्तु गाने
आत्माही आधीन रहता है वही ध्याहार किया आगो बाप
यानीन हा माता में नया मी अपने भामा
इनवाटा एमा निमय समयानका
हाता है। मा
है। मा निगला माण इसी
ताना या मनन 44 .
सीरियाना नाम Awtafai
MATHEMATIME
vt Rid firstमा मा retrinali
-
प्रधान
-

विभपाएकातिर भी अभूतप-सून हा भामा सम्योगो मारा अपने रूप nangमा तथा निरय आनंदसे मार सन् मानतात. मा गाभा, अनियरक भने निधारापनेसे माहित होतामा नो FIR TER अपनी योनिको रापमान करता हमा सभापति शोभायमान ना समपर्मा निर्माप उसमें निवास जानकारी मुनि लक्ष्मी प्राप्त पाता है । टीकाकार करते है कि साक्षात अपने आत्मा मान रहनेगा जो भावमयर कर्मरूपी धर्म को अनिदायक समिशन मूनिभरी आरमाहीवि नियत. रूपसे शाम होता है । पर्म को क्षप करनेमें कुशल है और मोक्ष मार दही मार्ग है । इसहाके दारा निस ताह होसके ही विकल्परहित सुरसको मान होता है । आगे कह है जो स्थान परम वीतरागी योगीश्वर है उन्होंने यह परम आवायरर्म अवश्य होता है.. ण यसो अपसो अयस,-रस कम्ममावासपंति बोधवा। जुधिचि उयाति य, पिरययवो हादि णिजेती॥१४२॥ सामान्यार्ध-जो किसीके आधीन नहीं है वह अपरा है। स्वाधीन केही आवश्यक कर्म सा है ऐसा जानना चाहिये । यही युक्ति है, यही उपाय है तथा यही अवयव पग्दन्य अर्थात् उससे रहित निरक्ति होती है। विशेषार्थ-निश्वयसे योगी अपने आत्मस्वरूपके महण कर. नं कारण अन्य पदायों के बस नहीं होता है अतएव अवश अर्थात् स्वाधीन रहता है। जो अवश परम वीतराग्य योगीश्वर रोता है उसके निभय धर्मभ्यान स्वरूप जो परम आवश्यक कर्म सो अवश्य ही होता है ऐसा जानना चाहिये। निरवयव (कायसे रहित) होनेरा उपाय उक्ति है। अवयवी अर्थात् काय उसका अभाव सो निरयव है। जो परद्रयोंके - नियमसार- MAA--- निश्चयावश्यकाधिकार । आगे सामायिक प्रतिक्रमण, प्रत्यास्यान, स्तुति, वंदना, कायोत्सर्ग एसे छः आवश्यक व्यवहार उनसे प्रतिपक्षी जो शुद्धनिश्चय उसका अधि- कार कहते हैं। प्रथम ही कहते है कि जो निरन्तर अपने वश है उसीके निश्चय आवश्यक कर्म होता है:- जोण हवदि अण्णवसो, तस्स दु कम्मं भणति आवासं। कम्मविणासणजोगो, णिव्वहिमग्गोत्ति पिज्जुत्तो॥१४१ सामान्यार्थः-जो दूसरेके वश नहीं रहता है उसीके आवश्यक कर्म होता है । यही कम्मोके नाश करनेमें समर्थ मोक्षका मार्ग है, ऐसा कहा गया है। विशेषार्थः-जो कोई निश्चयसे श्रीजिनेन्द्रक मार्गमें यथार्थ विधिक अनुसार आचरण करनेमें कुशल अर्थात् चतुर है, जो सदा ही अंतरंग लीन होकर किसी भी अन्यके आधीन नहीं होता किन्तु साक्षात् अपने आत्माहीके आधीन रहता है वही व्यवहार क्रियाके आडंबरोंके प्रपंचसे उदासीन हो जाता है तथा उसीके अपने आत्माहीके आश्रयमें रहनेवाला ऐसा निश्चय धर्मध्यानरूपी प्रधान परम आवश्यक कर्म होता है। ऐसा निरन्तर परमतपश्चरणमें लवलीन परम वीतरागी योगश्विर कहते है । प्रयोजन यह है कि मन वचन काय- की गुप्तियोंमें गुप्त ऐसी जो परम समाधि वही है लक्षण जिसका पेरा जो परमयोग वही सर्व कमों के विनाश करनेका कारण है तथा यही साक्षात् मोक्षका कारण होनेसे नितिकामार्ग है, ऐसी व्युत्पति है। ऐसा ही । MAN निश्चयावश्यकारिकार। - । भी अमृतचंद्र-सूरीन कहा है-यह आत्मा शुद्धोपयोगको प्राप्तकर स्वयं अपने धर्मरूप होता हुआ तथा नित्य आनंदसे व्याप्त सत् ज्ञानतत्त्व- रूपी सरोवरमें डूबाहुआ, अतिशयकरके अपने निश्चलपनसे कम्परहित होता हुआ जो प्रकाश उससे अपनी ज्योतिको स्फुरायमान करता हुआ स्वभावहाँसे शोभायमान जो रनत्रयमई रब्दीप उसमें निवास करनेवाटी मुक्ति लक्ष्मीको प्राप्त करता है ॥ टीकाकार कहते हैं कि साक्षात् अपने आत्माके आधीन रहनेवाला जो आवश्यक कर्मरूपी धर्म सो अतिशयकरके सच्चिदानद मूर्तिधारी आत्माहीकेविर्षे नियत- रूपसे प्राप्त होता है । यही धर्म कर्मोके क्षय करनेमें कुशल है और मोक्षका एक मात्र यही मार्ग है । इसहीके द्वारा में जिस तरह होसके दीघ्र ही विकल्परहित सुखको प्राप्त होता हूं। आगे कहे हैं जो स्वाधीन परम वीतरागी योगीश्वर है उन्हीके यह परम आवश्यक कर्म अवश्य होता है:- ण वसो अवसोअपस,-रस कम्ममावासयंति बोधवा। जुचिचिउपाअंति य, गिरवयवो होदिणिनेती॥१४२॥ सामान्यार्थ-जो किसीके आधीन नहीं है वह अवरा है। स्वाधीन केही आवश्यक कर्म होता है ऐसा जानना चाहिये । यही युक्ति है, यही उपाय है तथा यही अवयव परदन्य अर्थात् उससे रहित निरस्त होती है। विशेषार्थ-निश्वयसे योगी अपने आत्मस्वरूपके पहण कर. नेके कारण अन्य पदायों के वश नहीं होता है अतएव अवश अर्थात् स्वाधीन रहता है। जो अदरा परम वीतरागी योगीश्वर होता है उसके निधय धर्मभ्यान स्वरूप जो परम आवश्यक कर्म सो अवश्य ही होता है ऐसा जानना चाहिये । निरवयव (कायसे रहित) होनेम उपाय उति है। अवयवी अर्थात काय उसप अभाव सो निरया है। जो परदन्यारे ।

नियम Hamar वश नहीं होता रही निस्यया अर्थात असमय हो जाता है ऐसी निति अर्थात् न्युनपत्ति है । टीकाकार कहते हैं जो कोई योगी अाने आम- हित में लीन रहता है वह शुद्धनीगास्तिकायको छोड़कर अन्य पदार्थोक यश नहीं होता हैसप्रकार अवस्थाका होना सो निरुक्ति है । इसी कारणसे इस योगीके अमूर्तीकपना प्राप्त होता है । कैसा है अमूर्तीकपना, जो इस जोगीके पापम्पी अंधकारक नाशसे नित्य स्फुरायमान होती हुई जो ज्योति उससे प्रगट जो स्वाभाविक अवस्था उससे युक्त है। आगे कहते हैं कि जो भेदरूप उपचार अर्थात् व्यवहार रत्नत्रयी परिणतिमें रहता है उस जीवके अवशपना नहीं होता है:-- वदि जो सो समणो, अण्णवसो होदि असुहमावेण । तम्हा तस्स दु कम्मं, आवस्सयलक्खणं ण हवे ॥१४३॥ सामान्यार्थ:-जो कोई श्रमण अर्थात् मुनि अपने अशुभ मावके- द्वारा आत्माके सिवाय अन्य पदार्थके वश हो जाता है इसी कारणसे उसके आवश्यक कर्म नहीं होता है। विशेषार्थ:-अप्रशस्त राग आदि अशुभ भावाके द्वारा जो कोई श्रमणाभास अर्थात् द्रव्यालिंगी मुनि वर्तन करता है और अपने स्वरूपसे भिन्न जो अन्य परद्रव्य उनके वशमें हो जाता है उस जघन्य रलत्रयमें परिणमन करनेवाले जीवके अपना आत्मा ही है आश्रय जिसका ऐसा धर्मध्यान लक्षण जो परम आवश्यक कर्म सो नही होता है । भोजनके अर्थ द्रव्यालिगको धारके अपने आत्मीक कार्यसे विमुख रह परम तप- श्चरणसे उदासीन होकर जिनेंद्र मदिर व उसका क्षेत्र व मकान व धन धान्यादि मेरा है ऐसा मनमें किया करता है ।। भावार्थ । ऐसे द्रव्यलिगीके धर्मध्यान नहीं हो सकता । टीकाकार कहते हैं-तीन भवनरूपी मका- नमें भरे हुए अंधकारके समूहसे व्याप्त ऐसे तृणके घरको भी जो मुनि

विभाvिat
K मा दही भूमि infi मनाम
बमाको पाताम मनियाका पामीनबीन मी.
बाय॥
भरिका में भी की पुण्यामा भी मनिहार
पिया अलग हो भने माय मादक
रक्षा नि, जो Air For aftein
४ा है तथा सो भनि सो nिein
और पाली में सि पृमा नाता है लोग यह नया सम्पूर्ण
मान र पुरको भाया प्यारी नानिम्तर
सोनम-
नयाको पाना शाम अपारस याप्त
समय गमता है माम सरवरि । हे उगने
ना बन बिगार यो निको भानंबाला भी है परन्न
TRICय अन्य पर पानबह संसारी और निय
दु.को भोगनाला है तथा ओ अपने आरमारे वश है पर भीवन्मुक ही
जिनेवर से ही सम । अतएव साधार भगवान माग
मुनिसमामि जो मुनि स्वरा है, अपने आत्माही आधीन है
मामाको पाते है। परन्तु जो भात्मा सिवाय पर पाक वश होते
से ही प्रतिभागते है जैसे चारकि समूहमें यह धाकर निसको
राजा अपनी शाम में हाँ मिटा देने कारणसे प्यार करता है
अर्थात जो मुशामदी राजथाभ पाकर होगा वह सदा पराधीन होगा।
सा ही वह आत्मस्वरूपमै बास मनि है॥
आगे फिर भी अन्य आधीन जो अशुब अंतरात्मा जीद उसीका
रक्षण कहते है:-
जो परदि संजदो सलु, मुहमाये सो हवेह अण्णवसो।
तमा तस्स टु फम्म, आवासपटक्खणं ण हवे ॥१४॥

सामान्यार्थ:-जो संयमी मुनि शुभ भावमें प्रवर्दन करता है
भी अन्यके आधीन हो जाता है इसलिये उसके आमा टन
निसका ऐसा कर्म नहीं होता है।
विशेपार्थ:-जो कोई सामु जिनेन्द्र के मुखकमलद्वारा प्रष्ट जो पर
आचार शास्त्र उसके क्रमसे सदा संयमको पालते हुए सुभोपयोग, एक
हैं अर्थात् व्यवहारिक धमन्यानमें परिणमन करते हैं। अतएर कार
आवरणके पालने में प्रधान रहते हैं। साध्याय गाठो
स्वाध्याय करते हैं, प्रतिदिन एमार भोजन करके चार प्रकार आर.
का त्याग करते हैं, तीनों सध्याओंमें अर्थात प्रातः वापर और सोको
१०० दौमे बनी: अरहन भगवान परमेश्वरकी ति पहो
नीनी कालांके नियमांमें लीन रहते है हम पार गविनिमें काम
कियामि तत्पर रहते है। तथा पाक्षिक, मानिस, चातुमानित
मा प्रतिकमण पाउथे मुनम उत्पन्न हुमा नो मतोष मम रोमा
चित । मानेर मनगन मौर्य सल्पिाय
निमियान, Inायन'मान
मे 14
तप सा माहम लीना मायाय यान, नया •
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निसाम बिताना पमा मा मायबिनायाfits
ग्यातुन मारमा एम.1 मारमा
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Ramerican Om Amiri for mi mixt rint 1 HR THE witmeera **14 mitt isto x sz fegu 1420 7. Pot;f4 internation REATE. Fritera at kirt wwantar amr' भाई HARI 4 आHARE ६] 1488 REATE NE है । सगुणपत्रदान, fai कुणा सीमि। intvan,-समणा कहपनि ॥१५॥ मामा. - inाई term sir writte Marathi ५ - variantarita॥ it later Wine 47414 naturaTHE SITE 4. निमान है inhiare, TER, MINI, TAS. KNatuntीन tric sti nisa गुगल की मनमा मार है. सगुन पनि 4 3GRAH takci fan मार दुरिता Tigital. मारणार निस्य भान सागा सा नापण समपार मतामा उसपर उनकी - १७४ नियमसार- H सहन ज्ञान आदि शुद्ध गुग और शुद्ध पर्यायांकी सेदनेवाय अन्ना उसके तत्वमें कभी भी अपने उपयोगको नहीं संपोग करता है, PM कारणसे ऐसा तपोधन अर्थात् मुनि भी अन्याय है-पराधीन है रेस कहागया है । दर्शन मोहनी और चारित्र मोहनी कम्मोके त श्य करनेवाले तथा परमात्मतत्वकी भाग्नासे उत्पत्र जो मन मुसरूपी अमृत उसके पीनेमें दनचित्त ऐसे जो महामुनि परमजी आदिक वे निश्चयसे अन्यवश अर्यात पराधीन मुनि देखा हो मन कहते है । ऐसा ही अन्यत्र भी कहा है। जो परसपने शासन यती है उनको आत्मकाय सिगाय अन्य प्रत्यक्ष और पामे fit चिताभास म्या लाभ है ! । टीकाकार कहते हैं-जा के चिन्ता है ना ही ससार है. जैसे गवतापन हेता नानाथ (मि) का बना है। आगे साक्षात पाधीन पाम निनयोगीश्चERप हो- पग्नित्ता परमायं, अप्पाणं झादि णिम्मठसहार। अप्परमो सोहोदिह, तरस तुझम्म भणति आया १४१ मामान्याना ना मा पामारको त्याग र निSHARMA समाको पानाही नि आमास यांनाanil तथा उ आयामा ऐना । विरा - मनि 14 imran finai Ww amatefa. it is kiss Mant बन नाम tam | Hit raat miliarhi . 1 F विभावापारिकार । समाही का किया आमसर जमी नानामा स्लिमहा कोलार उनसे किसी ऐसा जो महा आनारा देने पानिपर पर्मपान और समानरूप परममा कर्म सो हता है। टीकाकार कहते है-यह उदार मुदिरा पारी मान रोगियों हमें मुल्य मुनि नपचन्त हुमा मुनि, निसने सरकारण आम नष्ट र सिता पूर्वमें गरेर कम्मोक सम्होको विसरिया है। यही माधु अपने पापं प्रगट और हर विक अनि भानसे हसरत सा ससारसे नितिरूप मोक्षको ता। कैसी है यह निनि, जहाँ पदार्थ र ज्ञान प्रसारमान है तथा जो सदा ही आनन्दम है। जिन्होंने कामदेवरे पांच वाणोंको सारसा है, जो दर्शन शान परिव तर वीर्य से पांच आचारोंसे शोभन आतिशन है तथा मारागरसे रहित हैं ऐसे गुरुके बरन ही मुनिरूपी संपदा कारण है ॥जो को निर्माण के कारण जिनेन्द्र मार्ग समसार जानार निवाणी संपदाको प्राप्त करता है उसको में पुनः पुनः नमम्कार करता हूं। हे पोश्चर अपने आत्म- भार परवर्ती यांगके होनेसे मुन्दरसी और मुवर्गकी को दूर करनेवाले तुम हो। जो समदेवी च्या वाणास पीडित चित है उनमें इस संसारधनमें कोई दरानगला नहीं हैं। अनशन आदि तप- भरणांसे तो मान शरीरका मखना ही फल है और कुछ नहीं है परन्तु मैं आपके चरणकमलोंकी चितामें सवीन हू तपास्वाधीन इससे मेरा जन्म सदा सफल है ।। स्वाभाविक तनक समूहमें मर पुरुपकी जय होहु । सा है यह बन्धनानी नर, जो अपने आाक रसके प्रगहमें पापोंको सर्व तरफ धोका है। स्वाभाविक समताके रससे पूर्ण है, पुन्यात्मा है, समीचीन है, अपने आधीन अपने मनको दिये हुए नित्य विरान. मान है तथा अत्यन्त पद सिर समान है। श्री सर्वज्ञ वीतराग भगवान- के और स्वाधीन आत्मवश योगीके कहीं भी कोई भेद नहीं है। पान हम लोग मूर्स जडचुद्धि हैं, चैतन्य स्वभावको न जानार मोही है। इस संसार में एक वही महामुनी सदा धन्य है जो अपने आरमारे ३१ है तथा अन्य पदार्थ में चुदिको नहीं रसनेशदा है और गो मर्म कोरोंसे बाहर रहनेवाला है। आगे शुद्ध निधय आरश्यासम्मकी प्रालिके उपाय सापको कहते आवासं जइ इच्छसि, अप्पसहायेसु कुणहि थिरमा। तेण तु सामण्णगुणं, संपुण्णं होदि जीयरस ॥ १४ ॥ मामान्यार्थ-यदि आरश्या कर्मको पाता तो भाय सभा में स्थिरभाकरइसी जी सामायिक गुण संपूर्ण विषा:---ग संसार, सामाणिक, प्रतिप्रमाण आदि भार भाप कर्म के प्राच गान कल भोगने १r सुनना उजाम : शिष्य ! यदि मारा मन में भी का RTI समान न निगमगान तथा शा भान EL मा मात्र नेपाल भारया को बाहता है तो मम्माम मुनिजन मगन हा परमामा: Enim Tiff at नया Hift: मम It itik Hafterfine मा ummitutirisi नानी मntures, Entertainfantite - Tamatar Sainti nita aani Torti m निपावरपाधिकार -- हाभ रोम ऐसाही भी पायपने साहै-विसी निमि- मग मन अपने स्वरूपसे बाहर जाता है तो मुझे गर्व दोपोंगा मग भाता है और परिह भव्य ! नमिता अंतरंगो मा हो अपने बिनको आपमें लपीन सता हुआ दि स्वभावरूप हो जाता है तो रे समारका अंग हो आता है टीकाकार कहते ह-सका जो अपने मामा नियत से रहनेशला आवरण है सो संसारक दुमका निधारणवाटा है तथा मुनिकपी गुन्दर लसनासे उत्पन्न होने. वाला ओमुस उसका अतिसपसे कारण है। ऐसा भले प्रकार समझकर शो कोई अपरहित सम्य अर्थात् आत्मा उसके सारको अर्यात शुलामस्वरूपको सर्वदा जानता है वही मुनियों का पति सर्व बाध्य निमार हटा हुआ पाप बनके दध करनेको अनि समान होता है। आगे एलोपयोगके सन्मुस जो शिष्य उसको शिक्षा करते हैं - आवामएणहीणो, पम्मदो होदि चरणदो समणो। पुप्त्तकर्मण पुणी, तहा आवासर्य फुज्जा ॥१४८ ।। सामान्यार्थ:- श्रमण अर्थात साधु आवश्यक कर्म नहीं करता हबह अग्ने चारित्रसे प्रष्ट है । इसठिये पहले कहे हुए शमसे ही आपश्या कर्म करने चाहिये। विसपार्थ:-व्यवहार नयसे भी जो मुनि समता, स्तुति, अंदना, मस्याम्यान, मतिकमण, दायोत्सर्ग आदि छ:आवश्यक क्रियाओंको नहीं करता है वह साधु पारित भ्रष्ट होता है। तो फिर जो गुद निश्चय नयक परम अध्यात्मीक भाषासे कही हुई जो निर्विकल्प समाधि स्वरूप पाम आवश्यक किया उससे रहित है सो मुनि तो निश्चय चारित्रसे प्रष्ट ही हैं । इसलिये पहली गाथाओम स्वाधीन परम वीतराग योगीश्वरकेलिये जो निक्षय आवश्यक क्रियाका क्रम बताया है उसके अनुसार अपने नि.पा.१२ 2.

नियमसार- Hirwainmrakarmiram । आत्माहीमें है आश्रय जिनका ऐसे निश्चय धर्मध्यान तया शुलध्यानके दारा परम मुनिको सदा आवश्यक कर्म करना योग्य है। भावार्य- प्रथमावस्थामें मुनिको व्यवहार छःआवश्यक करने ही चाहिये परन्तु दृष्टि परमसमाधिरूप निश्चय आवश्यक कर्ममें रखनी चाहिये तया निश्य हीको उपादेय समझना चाहिये । इस अभ्याससे जव सातवें गुणस्थानक अंतमें पूर्ण निश्चय धर्मध्यानका लाम करता है तथा आठ गुणस्थानमें जब शुक्लप्यानको पाता है तब बाह्य आवश्यक अपने आप छूट जाने हैं। क्योंकि वह अवस्था विकल्परहित निश्चल समाधिहाँकी है। टीकाकार कहते हैं कि आत्माको अवश्य स्वाभाविक एक परम आध- श्यक कर्म करना चाहिये । कैसा है यह कर्म, पार सम्हों हरनेवाला तथा मोक्षका मुख्य कारण-मूठ भूत है । जो इस करता है वह नित्य अपने आत्मीक रसके विस्तारसे पूर्ण, पवित्र और समीचीन कहलाता तथा अविनाशी अपने किसी अपूर्व मुखको प्राप्त करता है । जो मुनीन्द्र स्ववश अर्थात् स्वाधीन आत्मस्वरूपमें ठवटीन हैं उन्हींको अपने आत्मामा अनुमरूप पह अवश्यक कर्म प्रगट होता है । कैसा है यह कर्म, मुनि शांत मुसा एक अद्वितीय कारण (मूल)म्प है। आगे कहते हैं जो तपोषन आवश्यक कर्मसे रहिन । २० बहिरात्मा है:- आवासएण जुत्ता, समणी सो होदि अंतरंगप्पा । आवासयपरिहाणी, समणो सोहोदि पहिरप्पा ॥१४॥ सामान्यायं- मुनि आवश्यक कर्म सहित है अंतरंग आत्मा अर्थात अंतगमा है और नी भागदपा शिपाओसर दे दा मुनि बहिगमा मिप्यारी है। अपने " - wirriver - fratert- मोर पा fra ma tir अध्या मा Tukar (आप) Anat AIEEEE7 wr fate stu tin ना आने मा.मामा-या mar , गो र पाय माना नाम In't wrt 1 RIHymnt anा है। Him AN अर्धा Autta are it ivani sate ne manna मा un vayri in 4 गुजापान पनि आगम Visit in five Annangi 440 daalenाहीमागंशा. matar Marn for free ANA eigyan time wiपल मुस सकती बनी HTTAR FAIRर अपने भाकाम लीन या सपाना TAHITमामे बताया हरिरात्मा भांग बाय मी अल्पमत पर उसके पास उमेश अंतरवाहिरजप्प, जो पहा सो हपंह पहिरप्पा । जप्पंगु जी ण घर, सो उपद अंतरंगप्पा ॥ १५० ॥ सामान्यार्थी अतरंग और पार जल अर्थात् पचन रचनामें बनाता है परन्तु स्वरूप चिान नही करता या रहिमा है किन्न भोइन नपामें नहीं रहना सीकी अंतरात्मा कहते हैं।

नियमसार- विशेपार्थ-जो कोई जिनलिंगधारी तपोधनाभास अर्थान मुनि नहीं किन्तु मुनिसा दीखनेवाला पुण्यधर्मकी इच्छा करके स्वाध्याय, प्रत्याख्यान,स्तवन आदि वाद्य कायोंमें जल्प करता है अर्थात् शब्दोंको कहना हे तथा भोजनपान शयनादि स्थानों में अपने आदर सत्कारके पानका लालची होकर अंतरंग भाववचनरूपी जल्प मनमें कहता हे सो बहिरात्मा जीव है । परन्तु जो अपने आत्माके ध्यानमें लीन होकर तथा सम्पूर्णतया अंतरंगमें सन्मुख रहकर शुभ तथा अशुभ समस्त विकल्प जालोंमें कभी नहीं वर्तन करता है सो ही परम तपोधन साधु साक्षात अंतरात्मा है । ऐसा ही श्रीअमृतवंद्रसूरीने कहा है कि अपनी इच्छापूर्वक उछलते हुए समस्त विकल्प जालोंको तथा महा भारी नयोंकी पक्षरूपी श्रेणीको इस प्रकार उलंघन करके जो वर्तता वही अंतरंग और बहिरंग दोनों अवस्थाओंमें एक समस्ता रसमई मात्र जो अपना ही अनुभवमात्र भाव है उसको प्राप्त करता है। टीकाकार कहते हैं-संसारके भयको पैदा करनेवाले सर्व अंतरंग और बहिरंग जालोको त्यागकर तथा नित्य समता रसमई एक चैतन्यके चमत्कार- मात्र स्वरूपको स्मरण करके ज्ञान ज्योतिके द्वारा प्राशमान है अपना अभ्यंतर जिसका ऐसा अंतरात्मा मोहके क्षय होनेपर किसी परम तत्वको अंतरंगमें साक्षात देसने लगा। आगे कहते हैं कि अपने आत्माके आश्रय जो शुमायान सोही उपादेय है:-- जो धम्ममुफझाण,-म्हि परिणदासोऽवि अंतरंगप्पा। झाणविहीणो समणो, बहिरप्पाइदि विजाणीहि ॥१५॥ सामान्यार्थ:-जो साधु पुष धर्म ध्यान और शुम पानी परिणमन करता है वही अंतरात्मा है। तया जो मुनि ध्यान दिन सो बहिरामा हे ऐसा नानो।

निधयावश्यकाधिकार १८१ -- - विशेपार्थ:-जो साक्षात् उत्कृष्ट अंतरात्मा भगवान क्षीणकपाय है उस क्षीण मोह भगवान के निश्चयसे १६ पाय और ९ नोकपायके अभावसे दर्शन मोहनी और चारित्रमोहनीरूपी अंधकार विलयगए हैं इसलिये वह महात्मा स्वाभाविक चैतन्यका विलास है लक्षण जिसका ऐसे अत्यन्त अपूर्व आत्माको शुद्ध निक्षय धर्म शुक्लध्यानोंसे नित्य ध्याता है । परन्तु जो इन दोनों ध्यानोंसे रहित ट्रम्पलिगी द्रव्यश्रमण है यह वहिरात्या है ऐसा है, शिम्य ! तुम जानो । टीकाकार कहते है- चहीं असल मुनि है जो कि सदा निर्मल धर्म और शुक प्यानामृतमई समता रसमें वर्तन करता है, जो इन ध्यानोंसे रहित है वह बहिरात्मा है। में पूर्वमें कहे हुए अंतरात्मा योगीकी शरणमें प्राप्त होता हूँ तथा केवल शुद निश्चय नयका स्वरूप यह है कि वह बहिरात्मा हे अथवा वह अंतरात्मा है ऐसा जो विकल्प सो संसाररूपी रमणी (खी) उसीको प्यार करनेवाला है। सो यह विकल्प कुधी जी मंद विज्ञानरहित मिथ्यादृष्टी उन्हींको होता है परन्तु सुधी जो सम्यग्दृष्टी है उनके बिलकुल नहीं होता। आगे परम वीतराग चारित्रमें लीन जो परम तपोधन मुनि उनका स्वरूप कहते है:- पडिकमणपदिकिरियं, कुव्वंतो णिच्छयस्य चारित्रं । तेण दु विरागचरिए, समणो अन्भुडिदोहोदि ॥१५२॥ सामान्यार्थः-प्रतिक्रमण आदिकी निश्रय चारित्ररूप कियाको करता हुआ जो रहता है । वही श्रमण इसी निश्चय पारिखके द्वारा वीतराग चारित्रमें स्थिा होता है। विशेषार्थ:-जो इस लोकसम्बन्धी समस्त व्यापारको त्याग करके साक्षात् मोक्षकी अभिलास रखनेवाला महा मुमुक्ष साधु सर्व पंच इन्त्रि- -- 4 H यो व्यापारीको त्यागने निभप प्रतिक्रमण आरित हिंगाम करता रहता है वही पाम तोधन मी मारके अपने आपक स्वरूप स्त्रिांति लेना है नमण जिसका पान तगम पारने तिएता है । टीकाकार कहते हैं- होगया है दर्शन और चारित्र मोह जिसका ऐसा अतुल महिमाका धारी आत्मा सामाफि मुसो प्ररने वाडे कम्मोसे मुक्त होता हुआ मलरहित मांझो मूल चाग्निमें विधता है वही मुनि आवारकी राशि अर्थात् नियिरूप है । में समता रसरूप अमृतई समुद्र बढ़ानेगले चंद्रमाके समान देमे तपोनिधिको बन्दना करता हूं। आगे सर्व बचन सम्बन्धी व्यापारके त्यागका उपदेश है:- वयणमयं पडिकमणं, वयणमयं पञ्चक्साण णियमं च । आलोयण वयणमयं, तं सन्यं जाण सज्झाओ॥१५३ ॥ सामान्यार्थ:-वचनमई प्रतिक्रमण, वचनमई प्रत्याख्यान तथा नियम, और वचनमई आलोचना ये सर्व स्वाध्यायमें गर्भित है ऐसा जानो। विशेषार्थ:-पाक्षिक मासिक आदि प्रतिक्रमणकी क्रिया पड़ना तथा निर्यापक आचार्यके मुखसे प्रगट समस्त पापोंके क्षयका कारण जो द्रव्यश्रुत उसका पाठ इत्यादि सर्व वचन वर्गणाके योग्य क्रिया सो पुदल द्रव्यके आश्रय जड़मई है। इसलिये ग्रहण योग्य नहीं है । प्रत्या- ख्यान, नियम, आलोचना ये सर्व पुद्दल वचनमई हैं इसलिये स्वाध्याय ही है, ऐसा हे शिष्य तुम जानो । टीकाकार कहते हैं- इसलिये वह भव्यजीव जो निर्वाणरूपी स्त्रीके स्तनयुगलके स्पर्शके सुखकी इच्छा करता है सो सर्वदा समस्त वचनकी रचनाको छोड़कर नित्य आनंदआदि अतुल महिमाके धारक अपने आत्मस्वरूपमें स्थित निश्चयावश्यकारिकार। 4- पता है। वही एक इस जगतके जालको तृणके समान देखता हुआ रहता । ऐसा ही कहा है कि वाचना, पंउना, अनुप्रेक्षा, धर्मोपदेश और गनाय ये सर्व स्तुति मंगल सहित किये जानेसे पांच प्रकार के स्वाध्याय - आगे कहते है कि शुद्ध निश्चय धर्मध्यान स्वरूप ही प्रतिकमण आदि करने योग्य हैं:- नदि समदि कादं जे, पडिकमणादिं करेज्ज झाणमयं । उत्तिविहीणो जो जद, सद्दहणं व कायब्वं ॥१५४ ॥ सामान्यार्थ-हे भाई । यदि तू करनेकी शक्ति रखता है तो न्यानमई प्रतिक्रमणादिकोंको कर और जो तेरी शक्ति न हो तो तब- नक ऐसा श्रद्धान तो करना ही चाहिये। विशेपार्थ:-मुक्तिरूपी मुन्दरीके प्रथम दर्शन स्वरूप ऐसी जो निश्चय पतिक्रमण प्रायश्चित्त प्रत्याख्यान आदि शुद्ध निश्चय किया उनहीको पदि है मुनिशार्दूल अर्थात् मुनिसिह तेरेमें संहननकी शक्ति प्रका- शमान है अर्थात् यदि तू उत्तम संहननका धारी है तो तुझे करना योग्य है । कैसा है मुनिसिह, परमागमकी मुगंधमे लीन है मुख जिसका तथा कमलके समान प्रभावान है । पद्मप्रभ है नाम जिसका तथा जो स्वाभाविक वैराग्यके महलके शिखरका शिसामणि है। और जो परदन्यांसे उदास हो अपने आत्मद्रव्यमें बुद्धिको धरनेवाला है तथा पंचेन्दियोंके फैलावसे रहित शरीरमात्र परिमहका धारी है । और यदि तू शनिकरके हीन है तो इस दग्धशाल अकाल पंचमकाटमें तुझे इस केवल उस स्वरूपका श्रमान ही करना योग्य है । टीकाकार कहते हैं-इम असार संसारमै पार्योंसे भरे हुए इस क्षेत्रमें इस कलिकाल पंचमकालमें इस अभ रहित तर्धिकर मिनेन्द्र के धर्म के अनुसार मुक्ति नहीं होसकती है (स. ।

१८४ नियमसार- लिये किसप्रकारसे उस आध्यात्मीक ध्यानका होना संभव है ! नि बुद्धिमानकिलिये इसकारण भवभयको हरनेवाला अपने आत्मा श्रद्धान ही करना स्वीकार योग्य है । आगे साक्षात अंतरंगमुखी जो परमवीतरागी योगी है उसको शिः कहते है:- जिणंकहियपरमसुत्ते,पडिकमणादिय परीक्सऊण फुडं मोणव्यएण जोई, णियकजं साहये णिचं ॥ १५५ ॥ सामान्यार्थ:--जिनेन्द्र कथित परमसूत्रोंसे प्रतिक्रमण आदि स्वरूप भले प्रकार परीक्षाकरके जो योगी प्रगटपने मौन व्रत साय धारण करता है वही साधु नित्य अपने कार्यको साधता है। विशेपार्थ:-~श्रीमत् अहंतके मुखकमल से प्रगट सर्व पदार्थों अपने गर्भमें रसनेको चतुर ऐसे द्रव्यश्रुतसे शुदानिश्चय स्वरूप परमात्मा ध्यानमई प्रतिकमण आदि सतक्रियाओं को समझकर केवल अपने आत्मीक कार्यम तत्पर ऐसा परम मिन वीतरागी योगीश्वर शुभ तथा अशुभ सर्व वचनम रचनाको त्यागकरके तथा समस्त परिग्रह और अन्यक संगको छोड़ करके अफेला रह मौन व्रतके साथ तिष्ठ मा अज्ञानी जनोंस निरता नाता हुआ भी अशोभित रह मुनि संभोग सुनके मूल अपने आत्मीक काप्यो निरन्तर साधता है। दीकाकार करते हैं-अज्ञानी मनुष्यों की लोक निन्दा भयको हार औई आत्मज्ञानी मोक्षमा आमा सो भयानक संसारको करने बाडी शुभ तथा अमन समस्त वचनी रचनाको हार नया सुराग और कि मोहको दकर अपने आत्मा क्षारा अपने भामा . निद्रिय निकल स्थिति करता आनी मनुष्यों Mi 1.माया समक।

विभपादायकाधिकार -- निन्दा भयको त्यागकर तथा सम्पूर्ण लोकीक पचनके नाटोको दूरकर आत्ममयाद आगममें चतुर ऐसा परमात्मवेदी मुनि निस्य मुसको देने- वाले अपने एक आत्मीक तचकोही प्राम होता है। आगे बचन सम्बन्धी सर्व व्यापारोंसे निवृत्ति होनेक कारणका संक्षेप कपन करते है:- णाणा जीवा णाणा, फम्मं गाणाविहं हये लद्धी। नमा धयणविवाद, सगपरसमएहिं पजिज्जो ॥१५६ ॥ सामान्यार्थ:-नाना प्रकारके जीव है, नाना प्रकारके कर्म है, नाना प्रकारकी जीवोंके सब्धियां होती है इसलिये अपने और परके समयों अर्थात धर्मोसे वचनोंका विवाद मिटाना योग्य है। विज्ञपार्थ:-जीद अनेक प्रकारके जैसे मुक्त और संसारी भव्य और अभव्य । तथा संसारी के दो भेद हैं-स और स्थावर रादीन्द्रिय, तेन्द्री, चौदी, पंचद्री असेनी और सैनी ऐसे पाच प्रकार अस है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, वनस्पति ये पाच स्थावर है । आगामी कालमै स्वभावसे अनंत चतुष्टयमई स्वाभाविक ज्ञान आदि गुणोंकरके होनेयोग्य अर्थात जिनके ये गुण आगामी प्रगट हो सकें सो भव्य है । इनसे विपरीत जो है अर्थात जिनके अनंत ज्ञान आदि प्रगट न हो सकें वे अभव्य है ॥ कर्म नाना प्रकार है-न्यकर्म भावकम्र्म और नोकर्म भेदसे तीन प्रका. रके कर्म है, अथवा मूल प्रकृतिके भेदसे द्रव्यकर्म ८ प्रकार हैं तथा उत्तर प्रकृति १४८ हैं। तीब, तीव्रतर, मद, मंदतर कर्मोके उदयसे जीवों के मुख आदिकी प्राप्ति सो टन्धि है । तथा काठ, उपशम, उपदेश, प्रायोग्य और करण लब्धिके भेदसे पांच प्रकार लन्धि है। इसलिये जो परमार्थ निभयके शाता है उनको अपने तथा परके मतोंसे वाद विवाद नहीं करना योग्य है । भावार्थ यह है कि जबतक जीवोंके शुभ कर्मके १८८ नियमसार-- महान पुरुष कोई स्वयंबुद्ध कोई दूसरोंके द्वारा उपदेश लाभकर अप्रमत्तसे ले सयोगिभट्टारक गुणस्थानतक पंक्तिरूप आरूढ़ होतेहुए सम्पूर्ण प्रत्यक्ष ज्ञानके धारी केवली हो गए। यह सर्व महिमा परम आवश्यक कर्मकी सेवासे प्राप्त होती है । टीका- कार कहते हैं कि प्राचीन कालमें सर्व महानपुरुषोंने अपने आत्माकी आराधना ही करके योगी होकर समस्त कर्मरूपी राक्षसोंके समूहोंको नष्ट कर दिया है-ऐसे जो ज्ञानापेक्षा व्यापक और जिष्णु अर्थात् जयमाप्त उनको जो कोई संसारका वैरागी मोक्षका इच्छुक एकाम मन होकर नित्य प्रणाम करता है वह जीव पापरूपी वीके दग्ध करनेलिये आनिके समान है तथा उसके चरणकमलोंको सर्व मनुष्य पूजन करते ॥ सुवर्ण और स्त्रीके गोचर सर्व मोहको जो त्यागने योग्य है उसको छोड़कर हे मन ! तू परम गुरुके प्रसादसे धर्मका लाभ कर तथा निर्मल आनन्दकेलिये परमात्मामें प्रवेश कर । कैसा है परमात्मा, जो नित्य आनंदरूप है, अनुपम गुणोंसे शोभायमान है, अलौकिक मोहवाला अर्थात् मुक्तिस्नेही है । तथा जो निराकुल रूप इस प्रकार सुकविरूपी कमलोंकेलिये सूर्यके समान, पचेन्द्रियोंके विस्तारसे रहित, शरीर मात्र परिग्रहके धारी श्रीपद्मप्रभमलधारी देव विचित श्रीनियमसार प्राकृत ग्रंथकी तात्पर्य्य वृत्ति नाम संस्कृत टीकामें निश्चय परमावश्यक नामका ग्यारहवां श्रुतस्कंध पूर्ण हुआ ॥ . ॥

शुद्धोपयोमारिकार। शुद्धोपयोगाधिकार। आगे सर्व कर्माको नष्ट करनेवाले शुद्धोपयोग नामके अधिकारको . प्रथम कहते हैं कि ज्ञानी जीव के ही किसी अपेक्षासे म्बपर स्वरूपका प्रकाशरूपना :- जाणदि पस्सदि सव्वं, ववहारणएण केवली मयवं । केवलणाणी जाणदि, पस्सदि णियमेण अप्पाणं ॥१५९॥ सामान्यार्थ---केवली भगवान् सर्व पदार्थोको जानते देखते हैं यह कथन व्यवहार नयकरके है परन्तु नियम करके अर्थात् निश्चयकरके केवल ज्ञानी अपने आत्मस्वरूपको ही जानते और देखते हैं । विशेपार्थ:-आत्माके गुणों को पात कानेवाले कर्मोको नाश कर देनेसे सर्व प्रकारसे निर्मल केवल ज्ञान और केवल दर्शन प्रगट होते है इनके द्वारा व्यवहार नयसे श्रीअरहंत भगवान परमेश्वर परमभट्टारक तीन काठ सम्बन्धी और तीन जगतके सर्व चर और अचर अर्थात् प्रस और स्थावर जीव तथा पुद्गलादि द्रव्योंके गुण और पर्यायोंको एक ही समयमें जानते और देखते है । व्यवहार नय पराश्रित है ऐसा सिद्धा- न्तका वचन है, अर्थात् अपनेसे अन्य जो पदार्थ उनके आश्रयसे जो कथन अपने में किया जाय सो व्यवहार नय है । परन्तु शुद्ध निश्चयसे परमेश्वर महादेवाधिदेव सर्वज्ञ वीतराग देवके परद्रव्योंको ग्रहण करने वाला ऐसा जो दर्शकपना तथा शायकपना आदि नानाप्रकारके विकल्प उनको रसनेवाली नदीसे उत्पन्न जो अवस्था सो भूलप्यानसे अन्य कथन है अर्थात अपवाद है । भावार्थ-यह उपचार नरसे कथन है कि

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शोपयोमाधिकार। १९१ । - रहा है, नित्य उयोतरूप है, अपनी स्वाभाविक अवस्थाको स्पष्ट करनेवाला है, अत्यन्त शुद्ध है, एक निज आकाररूप है, अपने रससे भरपूर है, अत्यन्त गभीर है तथा धीर है ॥ ऐसा ही दीकाकार कहते हैं-यह केवलशान मूर्तिका पारी आत्मा इस सम्पूर्ण जगतको निरंतर देखता है तथा मोक्षरूपी मुन्दा सीके कोमल मुखरूपी कमलमें अपनी किसी अपूर्व सृष्णाको तथा सौभाग्यमई शोभाको विस्तारता है । वह कथन व्यवहारनय है । परन्तु निश्चयनयसे वह देवोंका देव जिनेन्द्र, मल समूहसे हटा हुआ अपने ही शुद्ध स्वरूपका अनुभवसे का है। आगे कहते हैं कि केवलज्ञान और केवल दर्शन एक साथ ही आत्माम वर्तते हैं इसी यातको स्टान्त द्वारा प्रगट करते हैं:- जुगवं पट्टा गाणं, केवलणाणिस्स देसणं च तहा। दिणयरपयासतापं, जह पट्टइ तह मुणेयव्वं ॥ १६० ॥ सामान्यार्थ:-जैसे मूर्यका प्रकार और आताप एक ही साथ वर्तन करता है वसे ही केवली भगवानके एक साथ ही केवलज्ञान और केवल दर्शन होते हैं, ऐसा जानना योग्य है ।। विशेपार्थ:-जैसे किसी समय मेपोंके आडंबरके दूर होते ही आकाशके मध्यमं विराजित सूर्यका आताप और प्रकाश एक साथ ही होता है वैसे ही तार्यकर परमेश्वर भगरानके तीन लोक सम्बन्धी समस्त स्थावर और ब्रस जीवोंक तथा अन्य द्रव्योंके गुण और पर्यायोंके जान- नमें अर्यात ज्ञेय पदार्थों में एक साथ ही सम्पूर्ण प्रकारसे निर्मल केवल शान और केवल दर्शन प्रगट होते है । परन्तु संसारी जीवोंके दर्शन पूर्वक ही ज्ञान होता है अर्थात् प्रथम पदार्थ निराकार अवटोकन होता है पभात् उसका ज्ञान होता है। ऐसा ही श्री प्रवचनसारमें कहा है। भावार्थ उग्रस्यों के दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है दोनों उपयोग .

नियमसार- ----1 । - " पर के ज्ञाता द्रष्टा है । निश्चय अपेक्षा यह एक अपगई है। ये भगवान कार्य परमात्मा होनेपर भी तीनो कालों में उपाधिरहित तथा मा रहित नित्य शुच स्वाभाविक शानं स्वाभाविक दर्शनसे अपने कारण परमात्माको स्वयं जानते और देखते हैं। करो जानते हैं। यह शानका धर्म है । यह मेरा धर्म प्रदीप के समान पर प्रकाशक है। जैसे पटपट आदि पदार्थो का प्रमश करनेगला दीपक है मोकाश होने योग्य पदार्थोसे भिन्न होनेपर भी अपने सामाशि पर AFN. पन सभा से आपको भी प्रकाशता है तथा दूसरों को भी प्रकाशित करा या मा.माही व्यवहार नयसे तीन जगत और तीन काही प्रमा रेम ही यह आत्मा परम ज्योतिस्प होने के कारण अपने मामा को भी प्रता। पेमा ही ९५ प्रसपासमविनय करत मनान ift पारनपाल श्री महासन पति यने कहा है या जानुपा निर्णय सही सम्पाज्ञान है। यह ज्ञान प्रशीप समान र और पाया नियय करने तथा प्रमिलो माग .. TH foभी पास Tथ गुय । म 16 मा. नयी पायर्यात पर जान निTRA मिस ननमा लीन हाHIT मनिमयनयाना- मानी मानना नमानामा प्रयोजनकी मित्र titani rani माना की 8 ना. मान प्रामा पात या attail ARina THEATRE1। मतमा MR4t Me actingat पूर्णमान Hit indin ! दानAsin lain agitatif wint " शुद्धोपयोगाधिकार । १९१ रहा है, नित्य उद्योतरूप है, अपनी स्वाभाविक अवस्थाको स्पष्ट करनेवाला अत्यन्त शुद्ध है, एक निज आकाररूप है, अपने रससे भरपूर है, अत्यन्त गंभीर है तथा धीर है ॥ ऐसा ही टीकाकार कहते है-यह केवलज्ञान मूर्तिका धारी आत्मा इस सम्पूर्ण जगतको निरंतर देखता है तथा मोक्षरूपी मुन्दर सीके कोमल मुखरूपी कमलमें अपनी किसी अपूर्व तृष्णाको तथा सौभाग्यमई शोभाको विस्तारता है । वह कथन व्यवहारनयसे है। परन्तु निश्चयनयसे वह देवोंका देव जिनेन्द्र, मल समूहसे हटा हुआ अपने ही शुद्ध स्वरूपका अनुभवसे कर्ता है। आगे कहते हैं कि केवटज्ञान और केवल दर्शन एक साथ ही आत्मा वर्तते हैं इसी बातको दृष्टान्त द्वारा प्रगट करते है.- जुगवं वट्टइ णाणं, केवलणाणिस्स देसणं च तहा। दिणयरपयासतापं, जह पट्टइ तह मुणेयव्वं ॥ १६० ।। सामान्यार्थ:---जैसे मूर्य्यका प्रकाश और आताप एक ही साथ वर्तन करता है वैसे ही केबली भगवानके एक साथ ही केवलज्ञान और केवल दर्शन होते हैं, ऐसा जानना योग्य है ।। विशेपार्थ:-जैसे किसी समय मेपोंके आडंबरके दूर होते ही आकाशके मध्यमें विराजित मूर्य्यका आताप और प्रकाश एक साथ ही होता है वैसे ही तापकर परमेश्वर भगवानके तीन लोक सम्बन्धी समस्त स्थावर और बस जीवोंके तथा अन्य द्रव्योंके गुण और पर्यायोके जान- नमें अर्थात शेय पदार्थो में एक साथ ही सम्पूर्ण प्रकारसे निर्मल केवल शान और केवल दर्शन प्रगट होते हैं । परम्न संसारी जीवों दर्शन पूर्वक ही ज्ञान होता है अर्थात् प्रथम पदार्थका निराकार अवलोकन होता है पश्चात् उसका ज्ञान होता है। ऐसा ही श्री प्रवचनसारमें कहा है । भावार्थ-उग्रस्थोके दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है दोनों उपयोग १९२ नियमसार- साथ नहीं होते हैं जबकि केवली भगवानके दोनों उपयोग एक साथ होते हैं। ऐसा ही टीकाकार कहते हैं जैसे समस्त अंधकारके समूहको दूर करनेवाले तेनकी राशिरूप सूर्यके उदय होते आताप और प्रकाश दोनों प्रकट होते हैं तथा जगतके जीवोंके नेत्र खुलते हैं अर्थात् जगत विनादीपकादिके सर्व कार्योको देखता है और करता है, तसे हा श्रीमग- वान सर्वज्ञ तीर्थकर देवके सदा ही ज्ञान और दर्शन एक साथ ही होते हैं। कैसे हैं प्रभु, जो असदृश है अर्थात् जिनके समान तीनों लोकोंमें और कोई कपिलादि देव नहीं है तथा जो सर्व लोकके एक अपूर्व ईश्वर हैं । हे जिननाय ! आप सम्यग्ज्ञानरूपी जहाजपर चढ़कर शीघ्र ही संसार समुद्रको उल्लंघकर मोक्षकी अविनाशी नगरी में पधारते भए । उसी ही मार्गकरके मैं भी उसी मोक्षपुरीमें जाऊंगा। क्योंकि उत्तन पुरुपोंको इस मार्गके सिवाय अन्य कोई शरण अर्थात् रक्षक नहीं है एकमात्र श्रीजिनेन्द्र केवलज्ञानसूयं ही जयवन्त होहु । कैसे हैं ज्ञान सूर्य प्रभु, जो भव्यजीवोंके मुखकमलमें किसी अपूर्व चमकको विस्तारते हैं । जो मुक्तिरूपी वी समरसमई अतीन्द्रिय सुखको देनेवाली है तथा प्रेमकी भुमि और परमाप्रिय है उसके सुखको रात्रिदिन देनेकेलिये कौन समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं है। एक श्री जिनेन्द्र ही समर्थ हैं। श्रीजिनेन्द्र भगवान ही मुक्तिरूपी वीके मुखकमलमें भ्रमरके समान क्रीडा करते हुए रमते भए और फिर अदितीय किसी अतीन्द्रिय सुखका लाभ करते भए। आगे आत्मा स्वपरप्रकाशक है इसके विरोधका निराकरण करते हैं:- णाणं परप्पयासं, दिवी अप्पपयासया चेव । अप्पा सपरपयासो, होदित्ति हि मण्णसेजदि हि॥१६॥ सामान्यार्थ-यदि कोई आत्माको निश्चयसे स्वपरप्रकाशी है ऐसा नानता है तथा कहता है कि ज्ञान परप्रकाशक ही है तथा दर्शन आत्मप्रकाशक ही है।

शुद्धोपयोमारिकार। MARA - - विशेषार्थ-अब यहां कहते हैं कि आत्मा स्वपरप्रकाशक किस प्रकारसे है-ज्ञानदर्शनादि विशेष गुणोंकरके सहित ही आत्मा है । यदि आत्माका ज्ञान शुद्धात्माको प्रकाश करनेमें असमर्थ होनेसे पर. को ही प्रकाश करनेवाला है तथा इसी प्रकारसे आत्माका दर्शन अंकुश- रहित केवल अभ्यंतरमें ही आत्माको प्रकाश करता इस कारसे स्वपर प्रकाशक आत्मा है । आचार्य कहते हैं हे जड़मती या तू ऐसा मानता है तो तू मिथ्यादृष्टी है। प्राथमिक शिष्य अर्थात् प्रथम अवस्थामें होनेवाला जो सम्यग्दृष्टी उसको नो सम्यग्दर्शनकी शुद्धता होती है सो भी तुझको प्राप्त नहीं है । तो समान अन्य कोई जड़मति नहीं है तथा विरोध रहित स्यादाद विद्यारूपी देवीके पूजनेवाले सज्जन सम्यग्दृष्टी निरंतर ऐसा ही मानते है कि न तो ज्ञान एकान्तकरके परप्रकाशक ही है और न केवल एकान्तसे दर्शन शुद्धात्माहीको देखता है। यह आत्मा निधयकरके दर्शन ज्ञान आदि अनेक धर्मोका आधार है। पापि व्यवहार नयझरके भी केवल मात्र यह शान परप्रकाशक ही ऐसा नहीं है। यदि ऐसा माना जायगा तो आत्मारो सम्बन्ध न रहेगा, क्योंकि वह ज्ञान सा ही आत्मासे बाहर रहेगा । उस ज्ञानरो आत्माकी मतीति नहीं होगी। यह शान सर्वगत हो जायगा । इसलिये वह यास्तवमें ज्ञान ही न रहेगा किन्तु अगष्णा के जलके समान ज्ञानका प्रतिभास मात्र ही होगा । जैसे धारेतमें सूर्यकी मासे जल समक्ष मृग आकुटित होता है एसे ही बाहर पदाथोंमें ज्ञान कल्पकर शान नहीं मिटता किन्न शानसा दीसता है। इसीतरह दर्शन भी यल अभ्यतर आत्माके ही प्रतीतिका कारण नहीं है, किन्तु सा ही को देखता है। जैसे यह पक्ष अपने अभ्यंतरमें टीई कनीनिका अर्थात् पुती उसको तो नहीं देती है बाहर सर्वका रूती है । इससे दर्शन परपका भी हुआ। इस कारण यह शानदान दोनों ही व और नि.स.११ M नियमसार- H । परको प्रकाश करनेवाले हैं इसमें कोई भी विरोध नहीं है । इस कारण यह आत्मा भी स्व पर प्रकाशक ही है क्योंकिज्ञान दर्शन लक्षण धरनेवाला है । लक्षणसे लक्ष्य प्रदेशअपेक्षा भिन्न नहीं है। ऐसा ही श्री अमृतचंद्र सूरीने कहा है कि यह आत्मा एक ही समयमें समस्त भूत, भविभ्य और वर्तमान जगतको जानता हुआ भी मोहके अभावसे परस्वरूप कभी नहीं परिणमन करता है । परन्तु वह आत्मा सर्वकर्माको नाश करके मुक्तमें प्रतिभासमान होता है । कैसा होता हुआ प्रतिभासमान होता है, तीन लोक सम्बन्धी सर्व ज्ञेय पदार्थोको प्रगटपने स्पष्ट २ अलग २ जानता हुआ अर्थात ज्ञानकी मूर्तिमई उदयरूप रहता है । टीकाकार कहते हैं- आत्माका ज्ञान एक अपने स्वाभाविक परमात्मस्वरूपको जानता हुआ भी लोक और अलोक दोनोंको शेयके जालके समान प्रकट करता है। इसी तरह दर्शन समस्त आवणों से रहित होकर नित्य गुरताको रसता हुआ साक्षात स्त्र और परको देखनेवाला है इन दोनों शानदर्श- नौस सहित आत्मा अपने तथा परको ऐसे समस्त शेय राशिको जानता है। फिर भी पूर्वपक्षीको कहते है.- णाणं परप्पयासं, तइया णाणेण दसणं भिण्णं । ण हवदि परश्यगपं, दसणमिदि यण्णिदं तमा॥१६२॥ मामान्या:--जो ज्ञान र पदायाँको ही वास करता है तर शानमें दर्शन मिच हुआ। इस कारण यही वर्णन दुमा दिन पर• दस्यको दमनेगला नहीं है। विशंपाय:-परिवार लि परको काश दागालात पर शुकशानने दर्शन मित्र ही टहरा, if कान पESNEE शुदोपयोमाधिकार। है ओर दर्शन आत्मप्रकाशक है । ऐसा माननेसे ज्ञान और दर्शन दोनों भिन्न हो जायगे। जैसे सहाचल और विन्ध्याचल भिन्न २ हैं, अथवा गंगाजी और श्रीपर्वत भिनर हैं । इसी तरह ज्ञान और दर्शन भिन्न २ हैं, ऐसा हो जायगा । यदि दर्शन ही आत्मामें रहनेवाला माना जायगा तो ज्ञान आधाररहित होनेसे शून्य हो जायगा अथवा यदि ज्ञान शून्य नगा तो जहाँ २ शान जायगा वहाँ २ की सर्व वस्तुए घेतनरूप हो जायगी। तब तीन लोकमें कोई भी अचेतन पदार्थ न रहेगा यह पड़ा भारी पण आ जायगा। क्योंकि ज्ञान जव सर्व पदार्थोंमें रहेगा आत्मा न रहेगा तर सर्व पदार्थ चेतन हो जायगे, अचेतन कोई न रहेगा। इस लिये हे शिष्य ! ऐसा मत कहो कि ज्ञान केवल परको ही प्र- काश करनेवाला है। तथा दर्शन केवल आत्माको ही जानता है। इसलिये निधय यही समाधान सिद्धान्तका है कि शान और दर्शन दोनों ही कपंचित स्वपर प्रकाशक ही है । ऐसा नहीं कि ज्ञान केवल पर- प्रकाशक है और दर्शन स्वरकाशक है । ऐसा ही श्री महासेन परित देवने कहा है कि शान आत्मासे न तो सर्वथा मिब है, न अभिम है किन्तु कथाचित मिन और कथंचित् अभिन्न है । पूर्व और प्रगामी सर्व पदार्थों को जाननेवाला जो ज्ञान हे सोही आत्मा है ऐसा कहा गया है। टीकाकार रहते हैं किन तो आत्मा ज्ञान ही है न दर्शन ही है परन्तु शान और दर्शन सहित आत्मा है । इन दोनोकरके सहित आत्मा आए और पर दोनों को अवश्य ही जानता है। संज्ञा संस्या रक्षण प्रपोजनी अपेक्षा शान और दर्शनसे तथा आत्मासे स्थापित भै परन्तु नियम- नयसे पापसमूहको नाश करनेवाले आत्मा और ज्ञानदर्शनमें की भर नहीं है, जैसा अग्नि और उसकी उष्णतामें भेद नहीं है। आगे एमेत नपसे आमा पाक नहीं हैं ऐसी हैं:- नियमसार- VA अप्पा परप्पयासो, तइया अप्पेण इंसणं मिण्णं । ण हवदि परदव्यगयं, दसणमिदिवणिदं तम्हा ॥१६३॥ सामान्यार्थ:-यदि आत्मा केवल परको ही प्रकाश करनेवाला है तो आत्मासे स्वप्रकाशक दर्शन भिन्न ही रहेगा। कारण कि दर्शन पर- द्रव्यगत नहीं है ऐसा कहा गया है। विशेपार्थः-जैसे एकान्तसे ज्ञानका परप्रकाशकपना पहले निषेध्या है तेसे ही यहां आत्माके केवल परप्रकाशकपने होनेका निराकरण करते हैं। क्योंकि अपने स्वमावके अभावसे स्वभाव और स्वभाववान वस्तुका एक अस्तित्त्व न रहेगा । आत्मा स्वपरप्रकाशक है। पहले कह चुके हैं कि जो ज्ञानको परप्रकाशक माना जायगा तो दर्शनसे उसकी भिन्नता हो जायगी । अब जो आत्माको भी परप्रकाशक मानोगे तो आत्माकी भी दर्शनसे भिन्नता हो जायगी। क्योंकि ज्ञान परप्रकाशक है इसी- कारण दर्शनसे भिन्न हुआ है, यह बात प्रतिपादन की जाचुकी है । इस- लिये आत्मा भी दर्शनसे जुदा हुआ । और जो कहोगे कि आत्मा पर द्रव्योंको जानता है परन्तु दर्शन गुणसे भिन्न नहीं है तो फिर यही सिद्ध हो जायगा कि आत्मा स्वपरका प्रकाश करनेवाला है । जैसे पहले किसी अपेक्षासे ज्ञानमें स्वपरप्रकाशकपना सिद्ध कर चुके हैं तैसे ही आत्मामें भी स्वपर प्रकाशकपना निश्चय करना चाहिये क्योंकि धर्म और धर्मी एक स्वरूपमई होते हैं। जैसे अग्नि और उष्णताका एक स्वरूप है अर्थात प्रदेश भेद नहीं है ॥ टीकाकार कहते हैं कि आत्मा तो धर्मी है और ज्ञान दर्शन उसके धर्म अर्थात् स्वभाव हैं । सम्यग्दृष्टी जीव इस आत्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान करके उस आत्मामें ही निश्चलपने अपनी स्थिति करता है तथा नित्य अभ्यासके बलसे उसका लाभ कर संपूर्ण इंद्रियों के ग्रामरूपी हिम अर्थात् पाला उसके से बाहर निकले हुए सूर्यके समान प्रकाश । । - शुद्धोपयोगारिमार। करता हुआ मुक्तिको प्राप्त करता है । कसी है मुकि, जहां स्पष्ट अपनी स्वाभाविक अवस्थासे प्रकाशमान श्री सिद्ध भगवान विराजमान हो रहे हैं। आगे व्यवहार नयकी सफलताको दिखलाते हैं:- णाणं परप्पयासं, धवहारणयेण दसणं तम्हा । अप्पा परप्पयासो, ववहारणयेण दंसणं तम्हा ॥१६४॥ सामान्यार्थ.-व्यवहार नयसे ज्ञान परको प्रकाशनेवाला है इसलिये दर्शन भी परप्रकाशक है तथा व्यवहारनपसे जैसे आत्मा परप्रकाशक हे तसे दर्शन भी पर प्रकाशक है ॥ विशेपार्थ--सर्व शानावरणी कर्मके क्षय होजानेसे प्रगट हुआ जो बिलकुल निर्मल केवल शान सो किस प्रकारसे तथा किम अपेक्षासे पुल आदि मूर्तीक तथा धर्मादि अमूर्तीक तथा अन्य चेतन अचेतन परद्रव्य तथा उनके गुण और पर्यायाँक समूहको प्रकास करनेमें समर्थ होसकता है। इसका समाधान यह है कि ध्यवहारनयकरके प्रकाशता है क्योंकि परके आश्रितभावपनेहीमें घ्यवहारका प्रयोजन है । जैसा करा है “पराश्रितो व्यवहार" इसलिये इसीप्रकार दर्शन गुण भी परका प्रकाशक है । तथा तीन टोकको आनंदके कारण सो इन्दसि प्रत्यक्ष वन्दना योग्य श्रीतीर्थकर परमदेव कार्य परमात्माके भी इसी ही प्रकार परपदार्थों का प्रकाशकपना सिद्ध होता है जैसे ज्ञान के सिद्ध होता है । सो व्यवहार नयके बलकरके जानना । तैसे ही उस केवटी भगानक केवल दर्शनको भी परप्रकाशक समासना। ऐसा ही भुतपंधुमें कहा है कि सर्व दोषोंको विनय करनेवाले श्रीजिनेन्द्र भगवान जयवन्त होहु । कैसे है प्रभु, जिनके परणारविदको मनुष्य और मनुष्यों के इंद्र कदती अपने मुक्टभि शोभायमान तक्षा १९८ नियमसार- हृदयमें पड़ी हुई मालाओंकरके सहित पूजन करते हैं तथा जिनको तीन लोक और अलोक इसप्रकार एक ही समयमें प्रतिभास होरहा है कि विपरीत पदार्थोंमें एक दूसरेके रहनेका अभाव है, अर्थात् छः द्रव्यों को पृथक् २ देखनेवाले हैं । टीकाकार कहते हैं-जब यह आत्मा केवल ज्ञानका पुंज होता है और अत्यन्त प्रगटरूप केवल दर्शनका धनी होता है तब व्यवहारनयकरके सर्व लोकको देसनेवाला ऐसा हो जाता है कि एक ही काल सर्व मूर्तीक और अमूर्तीक पदार्थ अपने यथार्थ स्वरू- पको लिये उसमें प्रगट होते हैं । तब ही यह आत्मा परममोक्षरूपी जो स्त्री उसके रूपका मोहनेवाला होता है। आगे निश्चयनयसे स्वरूप कहते हैं:- णाणं अप्पपयासं, णिच्छयणयएण दंसणं तम्हा। अप्पा अप्पपयासो, णिच्छयणपएण दसणं तम्हा॥१६५॥ सामान्यार्थ-निश्चयनयसे ज्ञान आत्माका प्रकाशक है इसलिये दर्शन भी आत्मप्रकाशक है। निश्चयसे आत्मा अपने आत्माका प्रकाश- कर्ता है इसलिये दर्शन भी आत्माका प्रकाश करनेवाला है। विशेपार्थ-निश्चयनयमे स्व अर्थात् आपको प्रकाश करना लक्षण निसका ऐसा ज्ञानको कहा गया है, तेसे ही सर्व दर्शनावरणीसे रहित होकर शुद्ध दर्शन भी आत्मस्वरूपका ही दिसलानेवाला है। तथा सा इन्द्रियों के व्यापारोंसे रहित होने के कारण निश्चयसे आत्मा अपने आपको प्रकाश करनेवाले लक्षणसे लक्षित होता है । तथा दर्शन भी यान पड़ा- घोंसे रहित होकर अपने आपको ही प्रकाश करता है, यह निचयन पकी प्रधानता है। इस प्रकार अपने सपके प्रत्यक्ष लक्षणसे लक्षित यह आत्मा असंहित अपने स्वाभाविक ज्ञान तया भर दर्शनसे परिपूर्ण रहता है। निचयनयसे यह आत्मा प्रकार और प्रकाश स्यादि शुद्धोपयोगारिकार। विकल्पोंसे दूर है । अर्थात् मै प्रकाशक हूं और तीन जगत सीन कालके स्थावर और जंगमरूप सई द्रव्य तथा उनके गुण और पर्याय प्रकाश्य है, ऐसा विकल्प नहीं करता है । तथा यह आत्मा अपने आत्मस्वरूपहीमें अपने आत्माक ही लक्षणम्प प्रकाश्यको प्रकाशता है। सम्पूर्णपने अंतरंग लीन होकर निरन्तर संढरहित तथा देततारहित चैतन्यके चमत्कारकी मूर्तिके समान यह आत्मा निश्चयसे विराजता हे। टीकाकार कहते हैं-निश्चयसे आत्मा ही अपने आत्म- स्वरूपको प्रकाश करनेवाला ज्ञानरूप है तथा बाह्य अलबनसे रहित साक्षात् जो दर्शन उसरूप ही आत्मा है । अपने एक आकारको लिये हुए अपने आत्मीक रससे पूर्ण पवित्र समीचीन ऐसा जो आत्मा सो अपनी विकल्परहित महिमामें नित्य दास करता है । आग शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे आत्मा परका देग्नेवाला है इस वातका निराकरण करते है:- अप्पसरूवं पेच्छदि, लोयालोयं ण केपली मययं । जइ कोई भणद एवं, तस्स य किं दूसणं होई ॥१६॥ सामान्यार्थ-केवटी भगवान आत्मस्वरूपको देखते है लोक और अटोकको नहीं देखते हैं, जो कोई इस प्रकार कहे उसको स्या दूषण दिया जा सकता है। विशेपार्थ-व्यवहारनयकरके पल आदि म्यों तीनहाल सम्बन्धी गुण पर्यायांचे एक समयमें जाननेको समर्थ ऐसा जो सम्पूर्णपने निर्मल केवल शान उसको आरिले नाना प्रकारकी महिमाको धारण करनेवासा होनेपर भी वह भगशन पल दर्शनरूप तीसरे बसे पारने- वाला है तथापि यह भयशन अत्यन्त निरपेक्ष होकर पूर्णपने अरमें सीन होता है तथा अपने फेरल सरूप प्रत्यक्ष मात्र पापारमें रवीन - नियमसार- - निरंजन ऐसे अपने आत्मस्वभावको स्वाभाविक रीतिसे देखने के कारण वह प्रभु निश्चयनयसे सच्चिदानंदमई आत्माको ही देखता है । भावार्थ- व्यवहारनयसे ऐसा कहनेमें आता है कि केवली भगवान लोकालोका. को देखते हैं परन्तु निश्चयसे वे अपने शुद्ध स्वरूपको ही देखते हैं। शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षासे जो कोई शुद्ध अंतरगतत्त्वके ज्ञाता परम जितेन्द्री योगीश्वर हैं वे ऐसा ही कहते हैं । उनको निश्चयसे कोई दूषण नहीं होता है। टीकाकार कहते हैं कि यह आत्मा अपने अंतरंगकी शुद्धि करके एक विशुद्ध स्वाभाविक परमात्माको देखता है। केसा है परमात्मा, जो अपूर्व महिमाको धारनेवाला है तथा अत्यन्त धीर है तथा अतिशय निश्चलरूप रहकर अपने आत्मामें सदा निमम है। तथा उसी परमात्माके स्वभाव, यह जगतका बड़ा प्रपंच प्रगट है अर्थात् वह लोका. लोकको देखता है यह कहना सर्व व्यवहारका कथन है ॥ भावार्थ-पही है कि शुद्ध निश्चयनयकरके यह आत्मा अपने आपको ही दसता परको नहीं । परको देखता है ऐसा कहना सो व्यवहार नयका विषय आगे केवलज्ञानका स्वरूप कहते हैं:- मुत्तममुत्तं व्यं, चेयणमियरं सगं च सव्यं च । पेच्छंतस्स दु णाणं पचासमणिंदियं होई ॥१६॥ सामान्यार्थः-जो ज्ञान मूर्तीक अमूर्तीक द्रव्य ऐसे चेतन तया अचेतन पदार्थोंको तया अपनेको और सबको देसता हे वही ज्ञान प्रत्यक्ष और इन्द्रिय रहित होता है। विशेषार्थ:-छः द्रव्योम पुदल द्रव्य मूनीक है तथा अन्य पाँच द्रव्य अमूर्ती है। नीर चेतन ही हे पाच द्रव्य सई अचेतन है। इस प्रकार मूर्त अमन चेतन अचेतन सर्व अपनेको और पर दयाको तीन ॥

शुद्धोपयोयाधिकार। २.१ AAS कालसम्बन्धी सर्वको एक ही समयमें निरन्तर देसनेवाले श्री अरहंत भगवान परमेश्वरके ही केवलज्ञान होता है । केसा है केवल ज्ञान, जो क्रमपूर्वक ज्ञानसे रहित है, अतीन्द्रिय है, तथा सर्व प्रकारसे निर्मल और प्रत्यक्ष श्री प्रवचन सारमें ऐसा ही कहा है। उसका आभप्राय ऊपर आय गया । दीकाकार कहते है-वे तीर्थंकर श्री जिनेन्द्र भगशन अपने स्वरूपमें भले प्रकार वर्तन कर रहे हैं । केसे हैं प्रभु, जो तीन टोकके गुरु हैं, शाश्वत और अनंत ज्योतिके धारी है, तथा अपने केवल ज्ञानरूपी वीयनेत्रकरि जिनकी महिमा प्रगट है । कैसा हे केवल ज्ञान, जो लोक और अलोकको तथा आप और पर समस्त चेतन अचेतन द्रव्यों को देखनेवाला है। आगे कहते हैं कि केवल दर्शनके अभावसे देवली के सर्वज्ञपना नहीं हो सकता:- पुटवत्तसयलध्वं, णाणा गुणपजएण संजुत्तं । जो ण य पेच्छह सम्मं, परोक्सदिही हवे तस्स ॥१६॥ सामान्यार्थ:--पूर्वमें कहे गए सम्पूर्ण दोको नाना गुण और पीयोंकरके सहित जो कोई भले प्रकार नहीं देखता है उसके परोक्ष दृष्टि होती है। विशेपार्थ:-पूर्व सूत्रों कहे हुए जो मूर्तादि द्रव्य तथा उनके गुण और पर्याय हैं उनमें भूर्तीक द्रव्य के मूतीक गुण हैं, अचेतन पदार्थक अचे. तन गुण हैं, अमूर्तीकके अमूर्तीक गुण हैं तथा चेतनके चेतनमई गुण हैं । पर्याय दो प्रकार की है एक अर्थपर्याय दूसरी व्यंजन पर्याय । पद गुणी वृद्धि हानिरूप अत्यन्त सूक्ष्म परमागमके दारा जानने योग्य जो दयों के गुणमें स्वाभाविक परिणमन सो अर्थपर्याय है । यह अर्थपर्याय सर्व द्वन्या साधारण है। पांच प्रकार द्रश्य क्षेत्र काल भव भावरूप संसारमें - - 1 २०२ नियमसार- । परिभ्रमण करनेवाले जीवोंके नर नारक देव पशु वदनके भेदरूप जो पर्याय सो जीवकी व्यंजन पर्याय हैं । पुलकी अति-स्थूल, स्थूल, स्थूल सूक्ष्म आदि छः प्रकार व्यंजन पर्याय हैं। धर्म अधर्म, आकाश और काल इन चार द्रव्योंकी शुद्ध स्वभावमई पर्याय ही होती हैं क्योंकि इनमें विकार भाव नहीं होते । इत्यादिक गुण पर्यायांकरके सहित सर्व द्रव्यों के समूहको जो कोई एक कालमें नहीं देख सकता है उस संसारी जीवके परोक्ष दर्शन है प्रत्यक्ष दर्शन नहीं है । जब प्रत्यक्ष दर्शन नहीं है तब सर्वज्ञपना कैसे संभव है । ऐसा ही टीकाकार कहते हैं जो कोई सकलको जाननेवाला ज्ञानी जीव होकर शीघ्र ही एक ही कालमें सर्व तीन लोक और तीन कालकी वस्तुओंको नहीं देख सकता है उसके उपमा रहित ऐसी प्रत्यक्ष दृष्टि अर्थात् केवल दर्शन कैसे हो सकता है ? और जब केवल दर्शन नहीं है तब उस जड़ बुद्धी आमाके नित्य सर्वज्ञ- पना कैसे हो सकता है । अर्थात् नहीं हो सकता ।। आगे व्यवहारनयको प्रगटपने कहते हैं:- लोयालोयं जाणइ, अप्पाणं व केवली भयवं । जइ कोइ भणइ एवं, तरस य किं दूसणं होई ॥१६९॥ सामान्यार्थः-देवली भगवान लोकालोकको जानते है परन्तु अपने को नहीं जानते हैं यदि कोई व्यवहारसे ऐसा भी कहे तो भी उसको शेप नहीं हो सकता है। विशेषार्थ:-सर्व प्रकार निर्मल जो केवलज्ञान उसकप तीसरे नेको धारनेवाले तथा मोक्षरूपी मनोज पीके जीन स्वामी श्री जिनेन्द्र भगान छः म्योंसे भरे हुए लोगामायको तथा पर आकाश है जहां ऐसे अटोकाकाशको इस प्रकार सर्व लोक और अडी. कको मानते है तथा पारित जो पयहार उस व्यवहारकी प्रमानतास - .

शुद्धोपयोगाधिकार। २०३ रागादिरहित शुद्धात्म-स्वरूपको नहीं जानते है । इसप्रकार भी कदा- चित कोई जिनेन्द्र के तत्त्वविचारको जाननेवाला मुनि व्यवहारनयकी अपेक्षासे कहे तो उस मुनिको भी कोई दोष नहीं हो सकता है। भावार्थ-यह व्यवहारनय दूसरेके निमित्त व सहारेसे माने स्वरूपको कहनेवाली है-लोकालोक सर्व ही शुद्धात्मस्वरूपसे भिन्न है । उनका माता कहना सो व्यवहारनयका विषय है । तथा यह आत्मा अपने शुद्ध स्वरूपको जानता है यह विषय निश्चय नयका है क्योंकि निश्चय नय स्वाश्रित है । श्रीसमन्तभद्राचार्य स्वामीने कहा है । यह चर और अचर जगत प्रत्येक क्षण उत्पाद व्यय धौव्यरूप है-यह लक्षण सर्वज्ञ द्वारा सिद्ध है, हे व्याख्यान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तुझारा ऐसा ही वचन हे । टीकाकार कहते हैं-तीर्थनाथ श्रीजिनेन्द्र स सर्व लोकको जानते हैं तथा एक फर्मरहित अपने ही मुसमें लीन ऐसे अपने आत्माको नहीं जानते हैं ऐसा भी यदि कोई मुनि व्यवहारमार्गकी अपेक्षासे कहता है तो भी उस मुनिको दोष नहीं है। अब वितर्ककरके कहते हैं कि यह जीव ज्ञानस्वरूप है:- णाणं जीवस्वरूपं, तझा जाणे अप्पगं अप्पा । अप्पाणणपि जाणदि,अप्पादोहोदि विदिरि॥१७०॥ सामान्यार्थ:-ज्ञान जीवका स्वरूप है इसलिये आत्मा निश्चयसे अपने आत्मस्वरूपको जानता है यदि शान अपने आत्माको नहीं जानता है तो ज्ञान आत्मासे अलग हो जायगा । विशेषार्थ:-ज्ञान जीवका स्वरूप ही है । इसलिये ऐसे ज्ञानका भारी कोई भव्य आत्मा संदरहित, तिरहित, अपने स्वभावमें लीन अत्यन्त अतिशय भाषका स्वामी, मुक्तिरूपी सीका नाप, तथा समावे- पासे रहित ऐसे परमात्माको जानता है। यह निभपसे सभाषा कथन २०४ नियमसार- है। जो वितर्क हे सो इससे विपरीत है । वही वितर्क विभावको कथन करनेवाला है । यह विभाववाद प्राथमिक शिष्यका आभिप्राय है । सो अभिप्राय किस प्रकारसे है सो कहते हैं-आत्मा पूर्वमें कहे हुए अपने आत्मस्वरूपको नहीं जानता है, केवल यह आत्मा अपने स्वरूपमें लीन हुआ रहता है । जैसे उष्ण स्वरूप अनि सो अपने उष्ण स्वरूपको क्या जानती है अर्थात् नहीं जानती है, उसीप्रकार ज्ञान और शेयके विक. ल्पोंसे रहित हो वह आत्मा अपने आत्मस्वरूपमें ही तिधता है अपने ज्ञान स्वरूपको जानता नहीं है । ऐसा अभिप्राय प्राथमिक शिष्यका है उसको श्रीगुरु कहते हैं कि हे शिष्य ! क्या यह आत्मा अनिके समान अचेतन है। ? जिस कारणसे यह आत्मा अपने ही ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता है । यदि ऐसा मानोंगे तो यह आत्मा शानपिना फरसी राहत देवदत्तके समान हो जायगा । जैसे फरसीबिना देवदत्त फरसीदारा होनेवाली क्रियाको न करेगा क्योंकि वह फरसी देवदत्त के स्वरूपसे भिन्न है । इसप्रकार आत्मा भी ज्ञानदिना जाननेकी क्रियाको न करेगा। इस कारण आत्मा ज्ञानसे भिन्न नहीं है। आत्मा और ज्ञानका सभाव संबध है, संयोग संबन्ध नहीं है । स्वभावके कथन करनेवालों को यह बात नहीं मान्य है कि यह आत्मा ज्ञान से अलग है। ऐसा ही श्रीगुणभ. वस्वामीने कहा है. ज्ञानस्वभावः स्यादामा स्वभावानिरस्युतिः । तस्मादच्युतिमाकाशन भावयेत् शानभाग्ना अर्थ-यह आत्मा मानभाव । आत्मा अपन स्वभावसे कभी मिगता नहीं है। इसलिये इम मारमा स्वम्वभावसे अपतित इच्छा करता हुआ ही जो प्राणी है उमे पत्र आत्माकी ज्ञान भावनाका भावना योग्य है । टीकाकार कही हरि यह शान मुद्ध नीका सम्प है। इसी ही ज्ञान पर मरमा भने एक आत्माको जानता है। वह ज्ञान प्रगटरने अपनी सामा+ PM ETHERatARI"भा।

पापपोमाधिकार। स्थासे अपने ही निकट अविनन, आमम्पम्पसे अपने आत्लामा भित्र नहीं जानता से कहा है कि ज्ञान नीरसे पृथफ नहीं है ।शानहर आत्मा जानने में आता है। यदि शान आत्माको भिम जानना यह ज्ञान जीवस भिम हो जायगा। मागे फोकि गुण और गृणी भेदका अभाव है.- अप्पाणं यिणु णाणं, णाणं विणु अप्पगो ण मंदता। तम्हा सपरपयासं, पाणं नह ईसणं होदि ॥5 सामान्यार्थ:--आत्माको शान नानो । ज्ञानको रद. इसमें को संदेहकी बात नहीं है इसलिये ज्ञान म वाला है तसेही दर्शन भी है। विशेषार्थ:-हे शिष्य' मम्पूर्ण पर ट्रयों में अपने ही स्वरूपके जानने गनिमान ऐसे grers सलिये जो विज्ञान है मो ही आत्मा है Prit तच म्पर प्रकाशक है वैसे ही उसके मर प्रकाशक है । इसमें कोई शकाका म्पन्न frre क आत्मा रान दर्शन स्वरूप है। wri अनुभव करो । आन्मा अपने और Hear- उपोत करनेवाला है। . ज्ञात डाका आंग सर्वज्ञ धीतराग ममद कमरे जाणतो पस्संतो, ईहानदिपार कलिणाणी तम्हा, दरांना १

२०६
नियमसार-
सामान्यार्थ-कवली भगवानके जानना देखना इच्छापूर्वक नहीं
होता है। इसी कारणसे केवल ज्ञानी हैं और इससे उनको बन्धरहित
कहागया है।
विशेपार्थ-भगवान अहंत परमेष्ठी आदि सहित और अंतरहित
अमूर्त अतीन्द्रिय स्वभाववान हैं । शुद्ध सद्भूत व्यवहारनयकरके केवल
ज्ञान आदि अपने शुद्ध गुणोंके आधाररूप हैं, इस हेतुसे विना परिश्रमके
सर्व जगतको जानते देखते हैं तो भी मनकी प्रवृत्तिके बिना ईहापूर्वक
ज्ञानका वर्तन उन केवली परम भहारक के नहीं होता है । इसीकारण वे
भगवान केवल ज्ञानी इस नामसे प्रसिद्ध है तथा इसीलिये वे भगवान
कर्मके बंधसे रहित हैं। भावार्थ-इच्छा होनेहीसे राग सिद्ध होता
और राग ही बंधका कारण है। प्रभुके राग न होनेसे बंध नहीं होता,
केवल ईयांपथ आस्रव योग-परिस्पन्दसे होता है परन्तु कपाय विना
ठहरता नहीं है ॥ श्रीप्रवचनसारमें ऐसा ही कहा है-उन पदायोंके
स्वरूप आप न तो परिणमन करता है न उन्हें ग्रहण करता है न उन-
रूप आप उत्पन्न होता है केवलमात्र जानता है, इसीसे ही आत्मा
अबंधक है। टीकाकार कहते है कि श्री जिनेन्द्रदेव सर्व देवामें श्रेष्ठ
देव है । यह उनके स्वभावकी महिमा है जिससे वे तीन लोकरूपी
भवनके भीतरके सर्व पदार्थोको जानते और देखते हैं। मोहका प्रमूके
सर्वथा अभाव है इसलिए अपने आत्मा सिवाय अन्य किसी भी पर
पदार्थको ग्रहण नहीं करते हैं। वे भगवान नित्य अपनी ज्ञानज्योतिसे
कर्मरूपी मलके समूहको नष्ट करनेवाले है तथा सर्व तीन लोकके एक
साक्षीभूत है अर्थात् मात्र दर्शक है उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है ।
आगे कहते हैं कि ज्ञानीके बंधका अभाव है:-
परिणामपुव्ववयणं, जीवस्स य बंधकारणं होई ।
परिणामरहियवयणं, तम्हाणाणिस्सण हिबंधो॥१७३॥

शुद्धोयोमाधिकार। २०७ । ईहापुटवं वयणं, जीवस्स य बंधकारणं होई। ईहारहियं वयणं, तम्हा णाणिस्स ण हि बंधो ॥१७४॥ सामान्यार्थमनके परिणमनपूर्वक जो वचन जीवके निकलते हैं वे बंधके कारण होते हैं परन्तु जो वचन मनकी परिणतिके बिना निक- लते हैं वे बंधके कारण नहीं है । इसीसे सम्यग्ज्ञान के बंध नहीं होता । जो वचन इच्छापूर्वक जीवके होगे वे वचन बंधके कारण होवेंगे परन्तु जो वांछारहित वचन हैं सो बधके कारण नहीं है । इसीलिये सम्यग्ज्ञानी केवल ज्ञानीके बंध नहीं होगा। विशेपार्थ-सम्यग्ज्ञानी केवलज्ञानी जीव कहीं कभी भी अपनी दुद्धिपूर्वक वचन नहीं कहता है अर्थात् उसके मनके परिणाम नहीं चलते क्योंकि सिद्धान्तका वचन है कि 'अमनस्काः केवलिनः' अर्थात् केवली भगवान मन रहित है । भावार्थ केवटीक संकल्प विकल्पमई मनका अभाव है। इस कारणसे जीवके वे ही वचन बंधके कारण हैं जो मनकी परि- णतिपूर्वक कहे गए हैं । केवली भगवानके मनपरिणति पूर्वक वचनोंका प्रगटपना नहीं होता । इच्छापूर्वक वचन ही जीवको बंधके कारण होते हैं । केवली महाराजके मुखकमलसे प्रगट जो दिव्य ध्वनि सो भगवानकी इच्छाविना ही प्रगट होती है। भावार्थ-उसकी प्रगटता भव्य जीवों के पुण्यका उदय ही कारण है । वह वाणी समस्त सभामें विराजित मनु- प्यों हदय कमलोंको आनन्द देनेवाली है । इसलिये जो सम्यग्ज्ञानी केवटज्ञानी है उनके वधका अभाव है। टीकाकार कहते हैं-श्रीकेवटी भगवानके इच्छा पूर्वक वचनोंदी रचना नहीं होती है यह इनकी साक्षात महिमा प्रगट है। प्रभू समस्त जगतके एक मात्र रक्षक हैं। जब बांग्राका कारण मोह प्रभुके नहीं है तब किसमकारसे भगवान के द्रव्य और भाव बंध होवेंगे क्योंकि रागदेवादिका जाल मोहले विना निधयसे होता ही 1 २१८ नियममार- नहीं है। चार पातिया मोनागमे काली भगमन तीन लोक महादेव हे माने सम्पज्ञानमें गिनमान हैं । सम्पूर्ण टोक सम्बन्धी वस्तुमा समूहों के ज्ञाता है। स श्री पटी.भगवान निनंदमें न तो कोई बंध है और न कोई मोक्ष है और न रहा मजा है न कर्म और कर्मफलमई चेतना है। इन ग्ली निनंदमें धर्म और कर्मका पंच- जाल नहीं है। राग अमारसे अपनी अतुल महिमाको लियहुए बीतगग स्वरूप में नया अपने मात्मीक मुराम लीन हैं सिदिरूपी के स्वानी है तथा अपनी शानज्योतिसे ममस्त भुग्नके पदार्थोको चारों ओरसे प्रगट करनंगठे हैं। आगे केवली भवारक अमनस्क है इस यातको प्रकाम करते है:- ठाणणिसेजविहारा, ईहापुब् ण होई केवलिणो । तम्हा ण होइ बंधो, साकडं मोहायस्स ॥ १७५ ।। सामान्यार्थ-तिष्ठना, बैठना तथा विहार केवली भगवानके इच्छा- पूर्वक नहीं होते है इसीलिये उनके बंध नहीं होता है । मोहीय कर्म- सहित जीवके इन्दियोंके प्रयोजन सहित होनेहींसे बंध होता है। विशेषार्थ-परम अरहंतपनेकी लक्ष्म से शोभायमान परमवीतराग सर्वज्ञ केवली भगवान के कोई भी वर्तन इच्छापूर्वक नहीं होता है । इसी- लिये वे भगवान मनकी प्रवृत्तिके अभाव होनेपर 'अमनस्काः केवलिनः इस सिद्धान्तके अनुसार न तो वांडापूर्वक तिष्ठते हैं, न बैठते हैं और न विहार आदिक करते हैं। इसकारणसे उस तीर्थकर परमदेवके द्रव्य और भावमई कोई बंध नहीं होता है अर्थात् चारों बंध नहीं होते हैं। आगममें जो योगकी प्रवृत्तिके निमित्तसे प्रकृति और प्रदेशबंध कहा सो उपचारमात्र है। जो मोहनीय कर्मके विलासमें लवलीन हैं उन्हींके यह बंध होता है । किसलिये होता है, उसका कारण यही है कि उनके . . . - है . ।

मुद्धोपयोगाधिकार। २०९ 1 इन्द्रियोंके विषयोंका प्रयोगन है । अर्थात मोहनीय कर्मके वशमै पढेहुए इन्द्रियों के विषयों के अभिप्रायको धारनेवाले संसारी जीवोंके ही यह बंध होता है। ऐसा ही प्रवचनसारमें कहा है-सडा होना, बैठना, विहार करना व धर्मोपदेश होना यह अरहत अवस्थाके काल में नियमसे ही होता है, जैसे नियोंक मायाचार नियमसे होता है। श्रीकाकार कहते है-जिसके प्रगट होते ही इन्दोंके आसन कंपायमान होते है ऐमे केवल ज्ञानके उदय होनेपर केवली भगवानका सर्व वर्तन मनी प्रवृतिले रहित होता है। केसे हैं प्रभू, मुनिरूपी सुन्दर ललनाके मुसकमल के प्रफुष्ठितकर- नेको सूर्यके समान हैं तथा सत्य धर्मझी रक्षाकेलिये मणिसमान है। पुराणपुरुपके मनका अभाव है। यह सर्व भगवानके उत्कृष्ट अगम्य फेवल शानकी महिमा है। कसे है भगवान, जो पापरूपी बीके भस्म कानेकैटिये अग्निके समान है। आगे शुद्धीवको अपनी स्वभावमई गतिको प्राप्त करने के उपायका संक्षेप कथन कर है:- आउस्स रायेण पुणो, णिण्णासो होद सेसपयटीण। पच्छा पावद सिग्छ, लोयग्गं समयमेण ॥ १७६ ॥ सामान्यार्थ:-आयु कर्मक नाश होते ही शेप कर्मोकी सर्व प्राति- का नाश हो जाता है फिर यह जति शीघ्र ही एक समयमानमें जाकर टोकके अप्रभागमें विराजता है विशेपार्थ:- :-जब केवटी भगवान अपने स्वभावके भीतर जो पिया उसमें परिणमनरूप होते हैं तब उनके परम गुरु ध्यान अर्थात् चौथे शुक्लध्यानरो आयुकर्म के क्षय होत २हरी वेदनीय, नाम और गोत्र ऐसे तीन को की शेष प्रतियोका नाशरा जाता है। से हैं केवरी भग- वान, जो उस समय पृथ्वी आदि मायके नाके से अलग हो नि.सा. १४ - म नियमसार- -- ----- जाते हैं तया मिद शेर मन्मुस होते हैं । तया मा है यह ध्यान, नो ध्यान, ध्येययाता और ध्यान का फल इत्यादि प्रयोजना कि- ल्पांस भून्य है तथा आने आत्मीक वा निश्चल स्थिति है। सामों के नाश होनेपर मत जानी भगवान शुद्र निश्चयनयारक अपने निजस्वपकी सामायिक महिमान टीनताभी न्यबहार नया- से भगवन क्षगर्ने अर्थात् एक समयमें टोके समभाग तनु- यात ग्लयौ गाविगनते है। यह गति समारमे ही होती है । जहान धर्म द्रव्य है यहांता गमन होता है। टीकाकार कहते हैं-पद कायके कममें फंसे हुए प्राणियों लागसे सिद्धका लक्षण अलग है, इसलिये वे सिन्द परमेष्टी ऊर्थ गमन करते हैं और साशिव (कल्याण) कर मोक्षम्वरूप निभल तिप्रते हैं। बंधक छेद होनानम श्री सिद्ध भगवान अपनी अतुल महिमा विराजमान रहते हैं उससमय देव और विद्याधर प्रत्यक्षरूपसे उनकी स्तुति नहीं करसरते । वे देवों के देव प्रसिद्ध सिद्ध भगवान व्यवहारनयस लोमके अग्रभागमें विराजते हैं परन्तु निश्चय नयसे अपने आत्मस्वरूपमें ही अविचल रूपसे तिष्ठते हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भावर पांच प्रकार संसारसे मुक्त पचमगति धारी तथा पांच प्रकार संसारसे छुड़ानेके कारण ऐसे सिद्धोंको में पांच प्रकार ससारसे मुक्ति पानेकेलिये वंदना करता हूँ। आगे कारणतत्त्वका स्वरूप कहते हैं:- जाइजरमरणरहियं, परमं कम्मटुवन्जियं सुद्धं । । णाणाइचउसहावं, अक्खयमविणासमच्छेयं ॥ १७७ ॥ सामान्यार्थ:-जन्म, जरा, मरणसे रहित, उत्कृष्ट, अष्ट कोसे दूरवर्ती, शुद्ध, ज्ञान दर्शन सुरु वीर्य चार स्वभावधारी, क्षयरहित, विनाशविना तथा छेदरहित, जो तत्त्व है वहीं कारण परमात्मा है ॥

- -------- शुद्धोपयोगाधिकार। विशेपार्थ:-स्वभावसे ही नितक संसारमें भ्रमणका अभाव है इस- वह तत्व जन्म जरा मरणसे रहित है। अपने उत्कृष्ट पारिणामिक भावको रसके कारण परमस्वभावमई होनेसे परम (महान) है, तीनों का- टॉम उपाधिरहित हे स्वभाव जिसका ऐसा होनेसे आठो कोसे राहत है तथा द्रव्यकर्म और भावकोसे रहित है इस कारण शुद्ध है । स्वाभाविक ज्ञान, स्वाभाविक दर्शन, स्वाभाविक चारित्र तथा स्वाभाविक चैतन्य शक्तिको धारण करने के कारण यह तत्व ज्ञानादि चार स्वभावरूप है ।। आदि सहित और और अंत सहित मूर्तीक इन्द्रियमई विजातीय विभाव व्यंजन पर्याय अर्थात् नर नारकादि पर्यायोंके अभावसे वह तत्व क्षयरहित है, शुभ अशुभ गतियों में प्राप्त होने के लिये कारणभूत जो पुण्य और पापकर्म इन दोनोंक अमावसे वह तस्व विनाशरहित है, तथा बच, बंध और छेदने योग्य मूर्ति के अभावसे वह तत्व अच्छेय है। ऐसा वह कारण तत्त्व अर्थात् परमात्मा है॥ टीकाकार कहते हैं:-हे भन्य जीव ! तू जिनेन्द्र भगदानद्वारा प्रगट जो दिव्य मुसरूपी अमृत उसको ही वार- वार भन । भावार्थ-परम तत्त्वका मनन कर।सा है यह अमृतमई तत्व जो अचल है, असंढ ज्ञानमई है, द्वैततासे रहित है, प्रिय है, तथा समस्त पापरूपी किलोंके समूहोंको जलाने के लिये अमिक समान है। इमीसे तुम परम निर्मल कंवल ज्ञानमा टाम होगा । फिर भी निरुपाधि अर्थात् उपाधिरहित है साप जिसका ऐसे लक्ष- क धारी परमात्म तत्वका स्वरूप कहते हैं:- अध्यावाहमणिदिय, मणीवमं पुण्णपावणिम्मुन्छ । पुणरागमणविरहिपं, णिच्छ अचलं अणालम्॥१८॥ सामान्यार्थ:---यह परमात्म तद अन्यायाध अर्थात बाधारहित है, अतीन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियों की हो गम्य नहीं है, अनुपम अर्थात् २२० नियमसार- . Anurwana जाते हैं तया मिन्द मन्मुन होते हैं। नया सा वह गुमच्यान, जोमान, ध्येय, पाता और ध्यान कल इत्यादि प्रयोजनक- ल्यास शून्य तया अपने आत्मीक स्वरूप निथल स्थितिमा है। सम्मो के नाश होनेपर केवल ज्ञानी भगवान शुद्ध निश्चयनयकरके अपने निनम्वरूपी स्वाभाविक महिमाम लीन हैं तोनी व्याहार नयक- रके वे भगगन अर्थ भागों अर्थात एक ममय लोक जमनाग तनु- वात लयमें गा विराजते हैं। यह मनि सभासे ही होती है। जहांतक धर्म द्रव्य है वहांतक गमन होता है । टीकाकार कहते हैं-पट कायके कम फंसे हुए प्राणियों के लक्षणसे सिद्धांता लक्षण अलग हैं, इसलिये वे सिद्ध परमेशी ऊर्य गमन करते हैं और सदाशिव (कल्याण) कर मोहम्वरूपमें निश्चल तिष्ठते हैं । बंधक छेद होजानसे श्री सिद्ध भगवान अपनी अतुल महिमामें विराजमान रहते हैं उससमय देव और विद्यावर प्रत्यक्षरूपसे उनकी स्तुति नहीं करसकते । वे देवों के देव प्रसिद्ध सिद्ध भगवान व्यवहारनयसे लोकके अग्रभागमें विरानते हैं परन्तु निश्चय नयसे अपने आत्मस्वरूपमें ही अविचल रूपसे तिष्ठते हैं। द्रव्य, क्षेत्र, फाल, भव, भावरूप पांच प्रकार संमारमे मुक्त पचमगति धारी तथा पांच प्रकार संसारसे छुड़ाने के कारण ऐसे सिद्दोको मैं पांच प्रकार ससारसे मुक्ति पाने के लिये वंदना करता हूं ॥ आगे कारणतत्त्वका स्वरूप कहते हैं:- जाइजरमरणरहियं, परमं कम्मटुवजियं सुद्धं । णाणाइचउसहावं, अस्वयमविणासमच्छेयं ॥ १७७ ॥ सामान्यार्थ:-जन्म, जरा, मरणसे रहित. उत्कृष्ट, अष्ट कमासे दूरवर्ती, गुद्ध, ज्ञान दर्शन मुख वीर्य चार स्वभावधारी, क्षयरहित, विनाशविना तथा छेदरहित, जो तत्त्व है वहीं कारण परमात्मा है ।

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नियमसार- - टीकाकार कहते है-जिसके सदा ही संसारी मुस तुम नहीं है, न निसके कोई बाधा है, न जन्म है, न मरण है, न पीदा है उसी ही भान- तत्वको मैं यहा नित्य कामदेव के सुरासे निभुरा होकर मुनि मुस- लिये नमस्कार करता हूं, उसीकी स्तुति करता है तथा उसीकी भाना भाता है। जो जीर आत्माकी आराधनासे रहित है, रात भरारी , एमा आग कगित है। मैं नित्य ही भानन मन्दिर आत्माको नमस्कार for भी परम निर्माण योग्य गो परम ता उसी 7 परिधिय उपसग्गा, णवि मोहो यिम्बियोण णिशाय। ण पतिण्डा व हा, तच्छंय पछयविणिमाण॥१०॥ मामाल्या. नतानिया नगर्ग १, नमा में न समान निदा, नगा है और न ५॥ निशिरा का dri एक मन शाम ना. rt-1 म मान, मन, प्राण, न श्रीम Attri न है। मनुष्य, Him, innr net 1.) 12.हाहान ५4t and KHERA-नी, hittisनी - intist - fimuanit wintainital fu... 21 महीनt Rai 1 .kaitrin RHTE HALTink दोपयोगाधिकार। २१५ का है, कि नहाँ ज्वर जन्म तथा जराकी वेदना नहीं होती, न जहाँ मरण है, न वहांसे आना है, न कहीं जाना है, ऐसा तच सो गुणमि श्रेषु से श्रीगुरुके चरणकमलोंकी सेवाके प्रसादसे हम लोगों को भी अपने अत्यन्त निर्मल चित्तके भीतर प्राप्त होता है । टीकाकार कहते है:-निस विकल्परहित, तथा अनुपम गुणोसे अलंकृत ब्रह्मस्वरूपमें इन्द्रियोंका नानासकारका भयानकरूपसे वर्तना कुछ भी नहीं है, न जहाँ संसारके मूल कारण ऐसे अन्य सांसारिक गुगांके समूह हैं ऐसे ही परमात्म स्वरूपी मात्मीक सुरसस्वरूप अविनाशी एकरूप ऐसा जो निर्वाण सो प्रकाश नान होता है। आगे सर्व कर्मोसे रहित, शुभ, अशुभ तथा शुद्ध ध्यान और ध्येय इत्यादि विकल्पोंसे मुक्त जो परम तत्त्व उसके स्वरूपको कहते हैं- गपि कम्म गोकम्म, णवि चिंता व अहरुद्दाणि । गवि धम्ममुझझाणे, तत्थेव य होइ णिव्याणं ॥१८॥ सामान्यार्थ:- तो जहां दव्य कर्म है, न जहाँ नो कर्म है, न चिंता है, न आर्च और रोदध्यान है तथा वहां धर्म और भुलध्यान भी नहीं है। ऐसी अवस्थामें ही निर्माण होता है । विशेषार्थ.---वह परम तत्व सदा निरंजन अर्थात् कर्मरूपी अंजनसे रहित है इस कारण उसके आठों ही जाति के द्रव्य कर्म नहीं हैं, ताना- कालोंमे उपाधिरहित स्वरूपमा धारी है इससे उसके पात्रों नो कर्म नहीं मनाहित है इस कारण उसके कोई चिंता नहीं है, औदयिक आदि विभाव भावों का जहाँ अभाव है इससे वहां आर्त और रोद्रध्यान नही है। धर्म और शुलध्यान करने के योग्य अन्तिम ऑपारिक शरीरंक न मध्यान है, न शुलध्यान है। ऐसे ही परम तत्वमें नियमसार- निर्माणका महा आनंद वास करता है। टीकाकार कहते हैं-सर्व कामा अधकार के समूह का जहां नाश हो गया हे ऐसे निर्माण स्वरूपों को भी कर्म नहीं है, न वहां चारो ध्यानामसे कोई ध्यान है । गार परबमस्वरूप ज्ञान का पुन सिद्धरूप हो जाता है तब कोई ऐसी मुक्तिी अवस्था हो जाती है जो वचन और इनसे दूर है अर्थात् न तो जिसे कह सकते ओर न मनसे चार सम्त हैं। आगे कहते हैं कि श्री सिद भगवान के भार मुण होते हैं:- विजवि केवलणाणं, केवलसारसं च कैवलं पिरिये । केयलदिदि अमुत्तं, अस्थित्तं सप्पदेसत्तं ॥ १८२ ॥ सामान्या:-उस सिद्ध भगमन केल तान, मेरल गुस, पर धीम्य, कवल दर्शन, अमूर्ती पना, मातित्वभार गया समसारमा अयोत स्यात प्रबंशीपना होता है। विशेषार्थ - सम्पूर्णपने अंतरंग मामुरा होकर अपने ही मा मा IT मात्रय निमम एम निभय परम ध्यान के करम निबाना गाना इमं नाश हो जाते हैं उम भगान मिल पर शान दर्शन पाय घरगुग अमुनी तिमोर परदेशात आदि म सामाणिक गुण होते है। टीकाकार है- मन दाना श्रीमान भाई म पुरist दिन में किसान नrani सन मा सामान महान 18 आपला तमु artician मनी मांग: NEE एसपीमाकार। भागे सिद्ध सिद्ध जीवमें एकता दिखाते हैं -- णिध्वाणमेव सिद्धा, सिदा णिध्वाणमिदि समुद्दिडा । कम्माविमुमो अप्पा, गच्छद लोयग्गपज्जतं ॥ १८३ ।। सामान्या:--निशण ही सिद्ध ना मिद जीवही निर्माण हे सा कहा गया है। जो आत्मा कम्माम हित होता है यह लोके जाभागना जाता है। विसोपार्थ:-निर्गणशक यहां दो अर्थ है । सिद्ध भगान व्यर. राग्नयम सिंद क्षेत्रमें तिहते हैं परन्तु निवयसे भगान अपने स्वरूपमें हरी टहरते है । इस कारण जोनिणरूप है वही सिद्ध और जो सिद्ध है बह निर्वागरूप है। इस क्रमसे निवीण पाच और सिद्ध शब्दकी एकता सार्थक हुई। तथा जो कोई अन्यन्त निकर भव्य जीव है सो परम गुरुकी कृपासे प्राप्त जो परमभाव उसकी चार २ भावना करनेसे सर्व कर्म फलककी कीचटसे मुन होकर परमात्मा होता हुआ लोम्के अमपर्यंत। चला जाता है । और इसप्रकार निर्माण प्राप्त कर सिद्ध हो जाता है टीकाकार करते हैं कि जिनमतमें मुक्ति और मुक्तजीव में कोई भी भेद नहीं प्रगट है, न कोई भेद युनि से मालूम होता है और न आगमसे। तथा यही ससारी भव्यजीव जव सर्व कर्मोका नाश कर देगा तब परम मुक्तिरूपी मुन्दर कामनीडा मोहनेवाटा हो जावेगा। आगे कहते है कि सिद्ध क्षेत्रके ऊपर जीव और पुद्गलोंका गमन नहीं होता:- जीवाण पुग्गलाणं, गमणं जाणहि जाच धम्मत्थं । धम्मस्थिकायभावे, तत्तो परदो ण गच्छति ॥१८४॥ सामान्याथी-जहातक धर्मास्तिकाय द्रव्य है वहातक जीव और २१८ नियमसार- पुद्गलोंका गमन होता है ऐसा मैं जानता हूं। धर्मास्तिकाय अमावसे उसके ऊपर कोई नहीं जा सकता है ।। विशेपार्थ:-जीवॉकी स्वाभाविक क्रिया सिद्ध लोकमें गमन तथा विभावकिया छः कायके प्राणियोंके क्रमकरके सहित है अर्थात उ: कायोंमें भ्रमण करना है। पुलोंमें स्वभावसे गति करनेवाला एक परमाणु होता है तथा दो परमाणुओंके स्कंध इनको आदि ले जो पुट्ट- लके स्कंध हैं वे विभाव क्रियावान हैं, इसकारण इन सर्वकी गमनक्रिया त्रिलोक शिखरके ऊपर नहीं है। क्योंकि आगे गमनका कारण जो धर्मास्तिकाय सो नहीं है, जैसे जटके अभाव में मछली की चटनरूप क्रिया नहीं हो सकती ॥ जहांतक धर्मास्तिकाय है उसी क्षेत्रतक ही चेतन व अचेतन जड़ पुट्ठल गमन करेंगे इसके आगे नहीं । टीकाकार कहते हैं कि जीव और पुद्गल दोनोंकी गतिक्रिया तीन लोकके ऊपर नहीं हो सकती है क्योंकि आगे गमनमें सहायक जो धर्मव्य उसका अभाव हो गया है। आगे इस शास्त्रकी आदिमें जो नियम शब्द कहा गया है उसके फलको संक्षेपमें कहत है:- णियम णियमस्स फलं, णिद्दिई पवयणस्स भत्तीए । पुवावरयविरोहो, अवणीय पूरयंतु समयण्हा ॥१८५॥ सामान्यार्थ--नियम और नियमका फल प्रवचनकी भक्तिकरके रहे गए हैं। यदि कहीं पूर्वापर विरोध मासे तो आगमके ज्ञाता उसको दूरकर उसकी पूर्ति करे। विशेषार्थ:-गुद्ध रत्नत्रया व्याख्यान जो किया गया उसके द्वारा नियम शब्दको समझाया है । तथा इस नियमका फल परम निर्वाग सो भी कहा गया। यह सर्व कथन कविपनके अभिमानते नहीं किया , ।

पी. rita.ku rh #sar " fhatni Hit Irre Arr Har Hat aarth. TREET पास से ११ - १६.५, ५ . riral in that fur.utner aa rai HAPTEMy fair m intant Entertaine Antact uri.nagi म.pdatNMENaran साभाण पुणा, कई णिनि पुर मगा। मितपणं मांस-मणिमा पुणहनिणमग ॥१८६॥ मामा-माध:-inाई भीर मा भी मास faaival मुनयना अभाल न कर। विधायी कामदासानी नानी बालीम आपरण रहित निन्य आदम सपा विपरहिन किन कारण पर. मामाकम्प प्रदान शान और सामिपो शुद पत्नस्य उसका विरोधी जी मिध्यान कर्म उसके उदय मामध्यंकरक मिथ्या दर्शन शान धारिन टीन है ऐसे मस नीवर्णि भारकरके सर्वज्ञ दीनगग: पाप नियासि रहित भदर मार्ग भी निन्दा करते हैं। कसा हे मुन्दर मार्ग, जो भदोपचार अर्थात् व्यवहार रनाय स्वरूप तथा अभशेपचार अर्थात् निश्चय रत्नत्रयस्वरूप है। अपने स्वरूपम रहित उन सिंध्यादृष्टी नीकि स्वोटे तु और रंगटे दृष्टान्तरि युन फुनके , २२० नियमसार- वचनों को सुनकर जिनेश्वर भगवान कयित शुद्ध रत्नत्रय मान है भन्य! अपनी अरुचि मतकर, किन्तु अपनी भक्ति ही करनी योग्य है। दीकाकार कहते हैं:-जहां देहरूपी युद्धस्थल जरारूपी युद्धसे अनि भयानक है, दुःखोंके समूहरूपी हिंसक पशु जहां पिचरहे हैं, सनम्त जगतो नाश करनेगी भयानक कालरूपी अग्नि जहां जल रही है, युदिरूपी जल जहां मूरा गया है, नानाप्रकारकी सोटी नय सिनकरके भयानक अंधकार जहां फेल रहा है, ऐसे संसारम्प संकटमई जगलमें मिथ्या- दृष्टी नीयोकेलिये एक जैन दर्शन ही शरणम्प है अर्थात रक्षा करने गला है। जिस प्रभुमा ज्ञानरूपी शरीर लोक अलोरको अपनमें रखनेगटा है, व जिसने गृहस्यारस्या नामसे संस वजाकर समस्त भुग्नको सन्मा- यमान किया है अथवा दिव्यपानसे तीनों लोको शोभित किया है । श्री नेमिनाथ तीर्थंकर की स्तुति करने के लिये तीन भुइनमें से को देव या मनुष्य है जो समय हो सकते हैं अर्थात कोई नहीं है, तौभी। जगत में उनकी स्तुति प्रिय जानेका कारण मात्र एक उनागिरी परम उत्माहरूपमा भनिही है । मैं ऐसा मानता हूं। आगे शापका नाम कहते है, मास कथनकी मोत :-- णियमावणाणिमित्तं, मए कई नियमसारणामगुई। बुद्धा निणावंसं, पुण्यापरदोराणिम् ॥ १८ ॥ मामान्या:-नेस नियममार प्रन्याने प्रा.ममा करे निनिन ही श्री जिनन्द Tin दा गा देश महर्ष सिंगा--दरार माध्यं श्री शनार्य मा ata

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भान तर, नो पायका रूप जिसमें वर्णन दिया गया, आदि-
NिE दिपा भा* पो प्रतिपादन करनेवाला, लिप
मनिममण, प्रत्यारम्यान, प्रायश्चित, पाम आलोचना, नियम सर्ग आदि
सकस कियाटि आय वर्णन है। शुभागम गुर ऐमे
न महान उपयोगयो रणन कानमें परमेश्वर है । ऐग इस नियमसार
संवा अभिप्राय दो भेदम्प -एक तात्पर्य्य दूसरा शाह तात्पर्य ।
बका तात्पर्य ती पकी रचना के साथ २ प्रत्यक मूत्रमें कहा गया है।
शाप्रका तात्पर्य यह है कि यह मात्र भोगने योग्य है- अनुभव करने
योग्य है । निर्वाधापी मुंदरी अर्थात् सी इससे उत्पन्न जो परम यीत.
एमई अध्याय निरंतर अतीन्द्रिय परम आनन्द उमको देनमारा है।।
तथा २६ ख श्रेष्ठ, अतिशयरूप नित्य सुद्ध, तथा निरंजन निजकारणा

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Niyamsaar

Author
Sitalparsad
Title
Niyamsaar
File name
Niyamsaar
Text
OCR done
Citation
1922
Published
2011/07
Publisher
Mumbay,vaibhav Press
Language
Sanskrit
Pages
439
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313350
Barcode
99999990311111.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Gc2bSL04uM9
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