Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shrisangpattak
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भामिनर सरिमाचीनपुस्तकोग्रारफण सुरत) प्रम्यार-६१
भाईम् ।
भीपरवरगमपर नवापत्तिकार भीजिनममयदषसरिसट्टाहार विपकर्षि
श्रीमशिनष्ठमसरिमिरविता--
-
श्रीसङ्घपट्टकः।
.
श्रीसाघुकीर्तिगणि निर्मिताषाविभूषिता, लक्ष्मीसेनरपिसटीकपा
ममतावा हर्पराज उपाध्यायविहित लपात्या सनायीकवष ।
श्रीमधिनरूपाचन्द्रयरीपरशिप्प उपाध्यायपदालात निभीसुम्पसागरोप
दशाव घेष्ठिवर्ण्य वायू प्रसन्नचन्द्र पोपरा, पापू गोपिन्दचन्द्र भ्रा क्या
महासमर भीसा इस्यादि भामयपिहितेन द्रम्पसाहाय्पेन,
श्रीजिनदत्तसूरिज्ञानभण्डार,
म मरत
सि.न. २००९
मेट.
[वि ५..
पुस्ता प्रामिस्वाम- मी जिनपचसरि जानमगा, लि. पोपापुरा बोसमठ मोम ससुरत (गुजरात)। श्री सापक के द्रव्य साहाय्यक महाशों की शुभ नामावली:- कलकता। . - महासमुद। ४५०) बार प्रसपचन्दबी पोषरा २५०) पार मोगिन्दपन्दबी गरा २५०) महासमद मीसकेबानसावे से- रस्ते-पुतमछमी पीपा १०१) स० गुलाबपदमी सेठिया स्मरणार्थ- वस्पुत्र तेममलमी सेठिया... १०१) भीपद सससासमी यसकरणजी चोपड़ा १५१) सुषार छणावत धर्मपत्नी सौमाग्यवती मंगुलाई २१) एक पाई की तरफ से . पाठापाटा H राजनांदगांव। नरसिंहपुर। मरसिंहपुर। २०१) भी छोटमामि मनमाठीधि की सौ. पंपापा १०.) सेठ सोमागमति सपा मइन्वाइमारतिरागा. स० नागपुर मार गुणावर पस्तुमाई भी महोरस प्री प्रेस-मापनयर ।
-- *नि वे द न:- संपपहरू, मो माप के करकमों में विरापित है, के-पयिता आचार्य भी बिन मछमहरिबी महाराज हैं। उनम्न मस्तित्व समय वि से ११२५-६७ है, जैसा कि- भी जिनपंद्रपरि रचित संमेगरंगशाला से सिद्ध है। परिगीने उपर्युछ अन्न का संशोधन बि स १९२५ में लिया मो। इस संपपदक की रपना माकस्मिक घटना मही पर एक सस्पामित सिद्धान्त पर भाव है। मी दिनयामपरिगी के भीवन से ज्ञात होता है कि, उनका चित्रकूट-पिवौड़ में मच्छा प्रमाण मा । मापने यहाँ पर, अनेक प्रकार के काट व यातनाएं सह कर, बैन शासन की मो सेवा की है, यह उलेखनीय है। मैन संस्कृति के इतिहास में इन सेवाओं का बहुत मग महत्व है। यही कारण है कि, रिचौर का भी संप सरिमी का परम मक मौर मात्रा मुवी बा। भाप के सदुपदेश से, पहों के भावकोंने शासननायक महावीरस्वामी का नवीन विविधस्प निर्माण करवाया था। रिमी द्वारा ही इस की प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हुमा मा और संप म्मवस्या सूबरु प्रस्तुत संपपक" मूग, (०० लोक) उपर्युष विपिपस्य के मुख्य द्वार पर पापाप-शिण पर सुदवा कर, भगाया गया था, जैसा अंबरगष्टीय श्री महेन्द्रपरि प्रणीत 'अपनी' से सिद्ध होता है। म साहित्य में, इस प्रन्य का स्माम कितना आवरणीय समझा आसा है, इस का मम्पयन कितने म्यापक रूप से होता आया है इस का ज्ञान हमे, उन परियों से होता है, मो समय समय पर विमिच मापार्य, मुनि मौर चैन ग्रहस्यों द्वारा इस पर रची गयी, रीकामों से विदिस होसा है कि मध्यकालीन वैन संस्कृति मौर साहित्य में यही एक ऐसी मुस्पवान् रुति है, जिस पर मन्त्रण परियों को माप्य मिसना पग। यह माफर्पण म्पति मुफ महीं पर गुणम्नक है। मपावपि रचित प्रतियों की सत्ता भाठ तो ज्ञात हो चुकी है। इन का उत्तम प्रो मेर न ममार हो । “ हरि दामोदर पेरुणकर गुम्फित "मिनरत्नकोष" में हुमा है। पियों में सर्वह र माचीन "सचि" है, घिसका प्रणयन प्राण परित मौर सामाी मीधिनपति सेरिबी म धारा हुभा। यह इति क्या है। एक मकार से महामाष्य है । इस में भाचार्य महाराबने अपने सैद्धान्तिक धानब से तयुत सी में, सुन्दर रूप से मूग अन्वगत विषय का समर्थन किया है। मस्तव संस्करण तैयार करने में निम सिरिसित प्रसियों का उपयोग किया है, बिन का परिचय इस प्रकार है- प्रति परिचय- (१) A संपपाक-जापूरि, साघुकीर्ति गणि रचित, रचनाकास सं १५१९ । मह " प्रति पनि कान्तिसागरची के निजी संमद की है। पत्र १, विपाठ, विस का चित्र इस प्रन्म में दिया मा रहा है। इस की सन पञ्चस्ति इस प्रकार है- "सं १८५५ वर्षे कार्षिक रुप्मपक्षे पचम्पा वर्मपाखा ॥ ॥ मीमविषय सनिना मिलेसि भी फछपदिकापी पतुर्मासी पके ॥भीरस्तु ॥ B संबपा-गरपरि यह " पति" बाबू पूर्वदमी नाहर के संमह से उनके सबोम्ब-पुत्र राष्ट्रसेपी भी विजयसिंहगी माहर की उदारता से प्राप्त हुई थी। बि २००३-४ के हमारे कामता पतुर्मास के सबब इस की प्रतिकित करी गमी पी । मति संवर सवाय माय शुद्ध है। A संपपरक-टीका, का, लक्ष्मीसेन, रचनाकाल से १५१३, इसकी प्रति" हमें रॉयल एशियाटिक सोसायटी बॉफ गार के १ प्रमण्ड भापक माह बादाबाद से १७१ पता लगा माशम्वर फागौर १और बाकी स्थिति में देसवे एए विचारमीन मी। ५ भाषा मा म सब बारितीय प्रतिभासम्म माम् दो मपित पित्तरमरा निवि भी थे। बाप अनि सिम पोषिके प्रन्य रक्त प्रवर पागिसपूर्व विचारपरम्परा " H अन्तर्गत "वोरियप्टर सायमेरी" से प्राप्ठे हुई थी। सापेक्षसः यह माचीन है। मन्तिम इस प्रकार है- ॥ इति श्री संघपाकस्य टीका परिपूर्णा, लिखिता प बिनयसोमेन, सवापनार्यम् ॥ B संपपहरू-टीका, यह " प्रति " अनुयोगाचार्प स. भी केचरसनिसी गम्मि के सिप्प मुनिवर प पुद्रिसनिमी गणिने प्रतिलिपि मेबी पी । A संपपटा लघुषि, कर्मा-पराम उपाध्याय, प्रति में श्री अगरचंदवी नाहटा द्वारा माध हुई थी। मूग पति मगिरफर मॉरियण्टल रीसर्च इन्स्टिटयूट "-पूना में सुरक्षित है। पत्र संख्या २७, प्रति प्राचीन व पंच पाठ है। इस की लिपि बहुत सुन्दर मौर सुपाठन है। देसिये म्ोक । B संपपरक-लघुचि, पह " प्रति" भनुयोगाचार्य स० भी फेयरमनिमी गणि के शिष्य मुनिवर प पुदिसानिमी गणिमे इस की प्रतिलिपि मिनवाई पी। मूल पति के सेसन प्रशस्ति इस प्रकार है- संवत् १९०८ पर्ने माह सदि ५ दिने शनिपारे भीस्वरतरगच्छे भीधिनमाणिक्य परिवियपरान्ने भीविक्रमनगरे गणपर-योपरामोरे सा. देवराजस्तस्पुत्र सा० जगसिंह स्तरपु. सा. कम्मा मा.बा. कौतिकदेषा: पु० रल सा० रापपास मुरताप संसारषद ममुसपरिवारपुतेन सा० रापपालन शामपषमीतपस उपापने मीसहपहरुम्माधिप्रतिनिहरा पिता मीपनरामोपाध्यायानो । वाम्ममाम चिरै नन्दन ॥ शुम फरमाणमस्त। भीषनराबो पाम्पायमिमा प्रसादीता पतिरिय वा अपमुन्दरमणे । शुर्म भातु लेखकपाठकयो । कस्पाणमः। मीः। मामार- समबम हम परमपूम्म गुरूर्य उपाप्माय पद विमित १ .८ पुससागरमी महाराब सा के प्रति हम अपनी इस प्रकार करते है, जिनके सतत् मम से यह २-२.४ पासचा में।
- . संस्करण तैयार हो सका। इस में प्रयुफ प्रतियों के मेषण में बिन मानुमापों (नाम ऊपर मासगिक रूप से मा चुके है) सहायता कर हमारा कार्य सरर किया, उनको, व पूम गुरुदेव के सदुपदेश से बिन घिन मावोने, भानापर्ष आर्थिक मदद की, उन सब में धन्यवाद देमा मावश्यक ही नहीं, अपितु भनिवास कम्य समझते है। भी विमबाम- मरिनी महारामा को पित्र (काठपहिका) प्रकाशित किया जा रहा है, उसका म्मे बीकानेर से मॅपरमम्मी नाहटा द्वारा प्राप्त हुमा पा । तब थे मी भन्मगाव के पात्र है। इसके छोमन में रविदोष से या समापित कारप से यदि स्तम्ना रह गई तो पाठक सहानुभूतिपूर्वक मुझाने का का करेंगे। 1 सिवनी, (सी० पी.) मा.शु ७, २००९ शुमाकांक्षी, मुनि मगळसागर प्रेस में छप रहे है- १ महावीर स्तोत्र अपरिसर A मूस-भी मिनबालमरिबी, मपरि, कर्ता-भी नरसुन्दर गपि । चन्दत-काम्प B फर्ता-धी विमसकीर्ति गणि, पिस्प्रकोप ० कर्ता भीम गणि, २ सप्तोपपानपिषि ३पंपप्रतिक्रमण सपिषि प्रकाशक - जिनदत्तरि शाममार, सुरत
समर्पण
अगम-युगप्रषान-महारक-१००८
श्री जिनकृपाचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज
परम गुरुवर्य
के
करकमलों में श्रद्धापूर्वक
समर्पित
मुनि मंगलसागर
उपोद्घात - हुगपरणगमपीस-पापपीमियममाया ममा । मेण मिपारेण, गुरुमा समाबरे ॥ विस समय श्रमवापी मापापन शारगर को प्रमानवा रेकर सपायरपत्र सम्विक मारमा बपासना रहे मगाचाम' ही पेनों में रिवापर ऐसे ममातियों में वार पलों के समिधरोबर करमय समाप में मान-स्मा मना हे पे इस समय में इस पर पुर्पगस्य से पवित होकर परचम मानार्थ प्री हरिमाने इस पुरापार प्र उम मरोर किसा का पर सन्नी प्रेग परिषम मा हो का मही असावा । वदनम्तर प्रमुखम से रम विरोष परनेराले भागार भी विपरमरि हुए, बिनोगे ममासियों प्रमुख नपरी गमाहिलपुरपत्तर में मार, महाराणा प्री पुमराम के समय मसि वाचायों के सम्मुख ही सहातिर बाराबाओ पर अनिहिल पा [परवर पबी सारा की दी। विदित पीप भाषाओं के प्रसार और ममासी सम्मापामिया - ANT काम हो इस अपरमारपी। काम्पकार- प्रमो प्रनेडा मीनियमति है। या सम परिका से - विधायगुमर्गमरमनासीर मुनोतीस, समानेमा निनं बरपपुः मीडियमे परम् । पमे मनकषासुरनरे। शो में निश्चिा, पम्मारि विगु सपा पसाउनेशान्वयनम् ।। ॥१८॥ "बिनबाठमेन गपिनेर बो लिगाम बाप राम पिप 1 साल Rो भनिय बाम एवं बन्त प्रमानों से किया सस्ता है। विपतिपरि सिप भौशिवपासोपापापप्रवीत बारपसाधर मुमप्रभामा पसी में और सुमतिगविरचित परवावा वाराति में इस पर गोश पिम्य है। बिमाम परिम पुनियानी पुरीष भाभिवण्बार्य के सिम 1 सिसम्वापरय ने पानस्थित भाषातर श्रीअमरपति के पर बो। बापमामलोपरान्त विदित परयो प्रमाणित ऐर, पुर शिवेशाचा. बाबा प्राम, मरणाम प सप र ति सबपरेका पात उपसम्म प्राप । इनी बमदेवाच रे मरेन प्रसववनाचा सिप मारेबमदाचार्पने * १६. पित्रात में ममपरेवाचार्य के पर पर ममिपित र सिमामयी माम परित मिा और 1.5ोकि शो कि मम सर्गग्रस रामा। सवानी प्रपों की पुरि बम्प परवरपर पश्मिों मी होती है। १ मिपास मासिथ दुर्ममिधाम मबासी मिनेपाविप ।
. १. प्राममयोगबारे पास सिमान्तों के बप्पान ६ दिने पपेपे और पीछे से नामी के पास ही तपसम्पदा माप की पी मर्याद नभयर ही धिम बने । 1 मीरेसमावाने ही इस प्रेममरदेवाचार्म पर पर स्पापित किराना। बन्दय प्रमानों में बापित (विमानमरषित) प्रश्नोत्तरेपपिशवक प्रम को उपसम्परा पूर्ण हो रच पया था सप्तमें रे भौजिनपराचार्य प्रेमद्गुरको मिनेनरसूरपा' सम्मोपन से और मार्ण बमपर रे 'सारपोऽन पारसरणीमभुता विश्रुताः भीमदमपरेमाचार्याः' पम्पोषन से पर। इस पर तो निषित हो हो माता मिनपाचार्य इनके मूग सागुव पे और मान्तिक (विपापुर) गुरु ने भावार्य गमगरेप । (३)ो भीबिनयामपिापित सामापिधारमारोवार प्रकरण (पास) पर बार पकीय बीपनेम्परामार्यम से 1901 में पैन की रचना है। उसमें १५९५ पप प्याक पोस:- "बिलासपपिति" निममममपभिमान मतिमय सम्मसमाहिस्यामापोपापमापरिधान सिविषमाप्रमापतिपुपारपवियपराममयमा भीमदमयदेवपुरोषा सिपे सिंचित कर्मप्रसारिगम्मार पामेमः मनमर्म विपामानिधिम् । " र प्रमानों पर सर प्रातरि नियामक पपाडीतिमा नाचार्य मममरेजसरि के सिप। वापराम्त अविदितपदीय धिमेनपवा के पार पाचार्मार भीतिमयसरि रचित संबेग रंगवाणा पुमिका “वि भीमविरमनपरिकवा वहिनेय मोप्रधनववधरि धमपितेव मुपपनगणि [ना] प्रतिसतसा बियामपणिय र परेपपासावता समाप्ता । से या मूतमस्त प्रम में माती-गुमय पनि बो भाचर्ष पये पर देवमायके नाम से प्रमिर हु बने परम माम- विषय परा ११५ एपी-उपत्र वरपर किया बीर भागिनतम गनिने सम संषर किया। इस यी नही सिय होता है कि, A सं १२५ के पूर्व ही जामिनासामने गमगोपचाई रे पास अपसम्परा प्रामपरगी। भौजियपान उपसम्परा पूर्व पषि पही या गाव -पसम्परा पूर्ण एपित बप बो से मन प्राप्त है। इनमें निम्नविविध पहिलो से प्रवीत -प्रथम अति पाईपत्तोष पर ११ (पादि-मस्साहचविपतिपतित्वोपविनयत् ] में 'ममा प्रवमप्रासाद पार नामा बाम और स्परम्मति परिवायएपति! कपि हम, बोन) मा इस प्रयोपनिपु कसम्ममात स्पर ।। वे पाविताना पुखर समोऽम्मोनियः। मिनीविषामप्रिय औधीपणा के पवम् । .१५९० मगरसो बिवरपरका पार पावरमाषि! 5 मरतो मारो मम तरी!, सामयाविषन पर रवि शिकाः। पानी सिरभिमिति मुनि मानन्ति वारेमापा मारपोनपावरमगामवानिमुः।।१५ *भीमरमरदेवाचा ३ बगनाइपिति रिपवे प्रभमसम्मासात् अपिलस पत् । विधिसम्ममा विभपाचाडण्मुपै मग ॥१ H १ ४ "मिनाम सुपित करते है। मौरी प्रपा प्रमोकपष्ठियतककाम्य में मी ' विमेय पर से मी ही सूपित करते हैं। मनपसम्पड़ा पयात् ही बाचा बमयरेखो गति' पर प्रश्न पिया हो ऐ प्रवीत होता है। इनके मका इन्दी के पापर सुमनयन धीदिनदयसरि सषित पारसाया में मानों से परिसिनबमोतिरा अपने प्रयत समर मम्मों में निरामति को ममस्मर पर सवि भार करवे हो। बत कारि समिषित पाप ए मन्तर प्रमाणे से वह विधित हिवाम गपि पति {परसरमौर श्रीममधी विष एवं पर। , प्रन्परचमा। परियर पीबी समर गिनों में से एक। राम बगरमा उम्पस मारण पर प्रोविर और प्रशस्तिक रियों पर एकाधिपरम पा। इसने अपने बीमयमा विविध विषयों पर सेकों प्रमों की रबरा श्री पी फिम्त व पिपाक से गत से बमम्स मन वा पर। और इस पमा इस समय इमके मर ॥ मन ही प्राप्त करें। उपम्प प्रयो तासि मम्- १ पामा विचारपाचर प्रकरण ( IN), १ माघमिमस्तपिचारघर प्रकरण (परवि) पिबनिदि प्रकरण सा बर्मपिता प्रकरम संवपाल .परवतिमि प्रकरण, प्रवि- कमन समाचारी परीक्षा (गोव-गला पाम बाप्रमशित) प्रभोत्तरेकशितसम्मम् "मार (बाप-)" समावियर (बाम) मा सप्तति (बपुपकार) १. पर्वगीषवरीगणमाना राम प्रामा १५ धारामा पा. बारिमाणादि चरित्र पथ से ॥ पौरपरिण (बसगरम ) मा पा ५२२ मावाविवारपत्र मा । १५ पु मधिग्याम्वियम (मि ) मा मा पंचभागाचा (पम्मे बमिश्ष ) श बा ५५ सचिरपषमना कर (पमिय पर ) माया २५ पचम्मान स्वोत्र (प्रविणपियत् ) सं पर ।। २. प्रमानक पा (पुरन्दर पुरस्पर्दि) से पप , १० महामविर्मासमिति (मेगामेव ) प्रा ब २० १७ पास्तोत्र (नमस्तावि) . पय ३५ । पर्योत्र ( गम्त्य ) ई पर ३१ । प्रयोग (सिरि- ममममन्पुर)प्रपा " १. पार्थ स्तोत्र (लमेष पाता त पवा) सं. पर पार्ष स्तोत्र २४ महारपिष्ठिध (मुरबरससररर)प्रपा ११५ पीतगपतिः (वासा) सेप , पविर स्वोर (समम्मुमपिर) मा. 1. सोयपारपास्तोत्र (पमिरमरापुर) प्रा 16 परस्तोत्र (पिय मंदिर ) न पा. १५, ११ विवस्वोत्र (प्रीतिप्रधब) परिणति विप स्तोत्र (भौममा )- बा १४ ४. रामपुति (मस्सोमामि ) प्रा पा सरस्सी स्वोत्र (रमसम्पर) .. १५ १ समरस्तम (पर) पश । ) ४ २ पप १७, - इस 'प्रबो में पास पासोति मौर 'पिपपिदि ये तीनों ही शान्ति प्रम्प गुप हो महल। इन प्रबों पर वाचार्य मठमगिरि, बनेपाबार्य परिभाचार्य प्रीषमापा मादिने तलास हो पात् पीती में दो नएं पर इनकी साममिक उपयोगिता पोषित , और इसके प्राय समम प्रबों पर पनेको टोपएं प्राप्त होती है। ममम मममम ममारती के नाम से में सम्पादन र पाहूँ। उसमें 'ममिनी समधिन पर प्रभागसंगा। बत गर्दा पर उनकी विश्वप्रामाता पर विचार नहीं कर रहा। १. क्या पिशविशुदि पृथक है। पर्तमान युग में की मुवियन पिपिदि को परखर मिनपाम ही है किन्तु इसी माम प्रो पापपर्य या रपमा । ऐसा मानते है। उनमें मप्रगम माम पम्पाप मुनि-मानविषयमी मब।बपनी 'पिमपिसि प्रस्तावना में पायामोह से बमेक पावें इतिहासविस्य, प्रमाण मान पा सम्पोसमापनोडापित बने प्रपरकीच उपस्वित पर ऐमा प्रतिपादित मते-श्री मिनेघरमूरि, भीखमपरेपरि मविहितपशीव (परवरपम्हीय ) वही में उमप या प्रतिपादन कहाँ तक मुभिमुख। सम्र चार में अपनी पाममारती की प्रस्तावना में वितरस्म से समा। फिन्त बिना माम सम्बन्ध में मिला है उसम्र सापेक्ष प्रस्तावमा ॥ २-1-ने निम्नलिखित है- " नामपूर मर है इस प्रकार का प्रस्मप मम रतन ने रे ये किया पया है। २ पर सम्मान की उत्सूत्रप्रस्मथ करने के घरप बरतर निमगाम में सपरित किया गम पा बता बमपरेप्रपा सिप्प मी नहीं हो सकते। । तत्पब एपित त्रयों में सौ मी गैषधर भाषाम यह मिस मही मिनाक परवर परगबीर बमपरेषापर्व पिप । । ऐसे सा पशिनात मत्स्त्र प्रसारे मन्म पर भीवनपरि से समप टीचभर मेन महीं रख सकते । बत या मुसा पिपपिरिपा परतर नहीं है किन्तु पर एतनामचार मापा । इप माम्बद्ध पर विचार करें तो वेनम यही प्रतीत होता है कि प्रस्तावना मा ऐतिहासिक परंपरागों से मिश। प्रमाणों में माह सेमप्रम र प्रमाण दिया है। इस प्रमान से मी किसी अपर पिपिरामिभर पप इस विषय में प्रो प्रयापही पग्द । जरी वात-मिनपामहरि मी मतान में एभौर सेमप्रमकार १७वी यमि ये दवा सेन प्रश्न पण मी अपमान धर्ममायामी सम्मानप्रसव पथात् ही मव बर्मसापरीर मचा का प्रयन इस पर पूर्णरूप से पग। ऐसी बस्था में प्रपनर बीवन और प्रयों पर विचार करणे सिने सेनप्रश्न प्र उपग्रेम कचित् भी नहीं मिल पा समय । परम्त तत्समैन पत प्रमाको के भार पर ही निर्भर करना चाहिये कि-सा बिनाम समाप्रमाणे संगरिमा और बमपरेषा शिष मही1- पनिमी परकम्पामा प्रस्मन-पत्नप्रसपा नही पी चिन्न वैयम्तिा प्रस्प हो दी। परि सूमप्रसच हो तो तत्कालीन समप्र गोंगाचार्य राम अमरोष करते मौर दुर्गम औपनापूरि येन सा विमरणानपार प्रबमाम सूरत १९५५ में प्रमस्ति।
४ 'दिनमाम पुनित मोहै। भौर इसी प्रभर प्रमोपष्ठिशतककाम्प में मी विमानेन पर ये मी ही नित करते । पसम्पदा पपात हो भाचर्य वमयदेसवे पर पिया ऐ ऐस्य प्रतीत होता है। एसके मलमा इमी के पापर सुपमपान भीमिनरचरि मषित पपपरपाईसा में ५ भागामो 'परिधिमाशाहो' स्ववि है तपा अपने प्रीत समय माबों में 'मिनी में ममस्थर एन स्तुति भयापूर्वक करते हैं। पत कसरि समिचित पाप एवं मन्दरा प्रमानों से शामिपित भिमनाम पनि समिडिव [बरवरपमेन ] भीममतपरि शिम एवं पावर थे। ग्रन्परचमा। - पवियर पी पी गत शियों में से एक। बम बमशरणास मा मान, रसंग जोतिष और सन्तिा सिपरों पर एपिपय पालने अपने समय में विविध विषयों पर पैगों मम्मों को एषना की बिक दुरिपाक रेत से बम्प प्रम पर ऐपए । बौर इस पया इस समर सरे पर १ प्रबो मत होते हैं। उपमन मम्मों की तामिण निम्मी- १ मा विचारसाऐगर प्रारच (पार्यपवर), १ माममिमारिचारपार प्रकरण (पति) ३ पिसमिति प्रबरम बा ५पर्मनिया प्रकरण सपा • पौषपविपि प्रकरण, “प्रकि- समन धमचारी प्रा . बाप्तपरीणा (गोव-राससक पाम वामप्रमसूरिजात), १ प्रभोत्तरेसिपम्पम् "मारक्षक (भनुपाल) १ समापरिचर (भनुपाम) १ मा पप्तदि (बनुपम्प) १४ सीपरीषयाय प प्रा पा १५ भारतमा मा प्प बारिनाबाद परिज पर बीरचरित (अपमपम ) पा. १५ १२ भावाविवारपत्र पा . २५ पु मविप्रसामिपा (मामि ) मा पा पंचमानमा (सम्म ममिरन ) प्रा पप १५ सर्वपिपरा (परमिक पुर) २. परमात जोत्र (प्रावित्रिसद) फर ११ २० प्रमानक पा (पुरबर पुर) पप, १८ महामधिससि विठिन (सेमामेव ) प्रा २. १७ पास्पोन (ममस्तान) 4. पप ॥ । स्त्र (मात्पी ) पत्र १९ ॥ प्रोत्र (सिरि- मगमपुरे) वा " १ पा स्तोत्र (लमैप मावा ले पिता) ... पाप स्तोत्र १४ महापौरविविध (रवरपकरण) सपा ११ १५ पोतरावसातिः (देशपापड ) प . समगिर स्त्र (समुचिर) प्रा. प १. धोसमारपस्तोत्र (पमिरमर) प्रा 1 परस्तोष (परिम परिस) प्रा. म. १५,१९ पर्वनिरस्तोत्र (प्रतिमसबमुब) चितिबिन स्तोत्र (मौसमय ) पा 10 समस्तुति' (मरवीमि ) मना । ५सरस्सवी स्पोत्र (परमस्सर) १५ । पारस्वप (पर) मप । प्रा. ) भाप मन परेक दिन है। सरे पर में मोवादों में योग्नवा प्रेरिखम्मा है।३-४ पप में अपमानों परासयसियों ने पियोधि प्रमर्ष पिट पोए पूर्व पप में । मौरोशित ममप ३ मिनण में सिपाय, पतिमास प्रति मार्च ४ इम्पसमा ५ माफ म र प्रति ममत रेश सोपा (सम्पा) - पी परिप मापन समय मापरप . मितमार्ग में मा वौर । अपियों के प्रविधि विनास र विसनीय पचहारों पर पिसे । पप परन्त पर हारों पविन पिया। 11-२५ में परचना प परम पर, १५-१. अपिहित था. र पूर्वधार की प्रथा की है। १८ २९- पप में ममम्मे पैम्प में पपमा प्रदायर समर्पया करते हुए उपसंहार मिल है। इस सुपर सरिक प्रव प्रेमी पविधीये निवना मप्रस्तुत प्रथा वर्षान्तरम्पाट नुस्मयोमिता मा पमा बमुप्रामाथि बम्घरों से सबितर अपनी पाहुमुखी प्रतिमा का मगर परिचय दिया है। साथ ही इस में सम्परा साविकीस्ति मनामन्ता सिखरिषी विपरी पृषी मागिनी बसन्ततिकम मादि । पुपर मों में प्रषित कर नपान पर एअभिपस भी सिर मिला है। समम पम्प बोवन से परिपूर्ण होने के परम पाठकोदय में मी पापम ही सत्सव र देवा है। सरपहर की टीकाएं-दस प्रमअन्य पर बनेर मनोपियोंमे माप इति पारि एलोप भारि रच र इसी माता, उपयोगिता स्थापित दी है। वर्तमान में इस पर ति मारि माठ त्ति ही प्राप्त होती है। जिसकी वाठिन सिमसिमित है। पादाति विपविसरि पुति श्रीममौसेन माति राव गमि . सामुनि निकाली पाति पासपोषमावाम । इनमें बाचार्य श्रीभिनपतिप्रि का सबसे बगे। मौर पर मो। पायेका बागर पर में प्रमपित से है। फिर बार या मा भारि और रोमातियों के साथ प्रापित हो । मपत्रिकार- महोपाप्याम धापुकीधि पतरमच्छीम भीबिनमहरि भै परम्परा में पाया- चार्य भीममरमाणिस्य पिपये। अपने + १६१. बुगापान भनिनवानमरि रषित पीपप विधिप्रकरणातिका संयोजक मिाा ११५ में बापरा में समार पपरकी पमा में पौरप विपि तफ्स में भी पुलिसागरजी साप पानाप र गर्ग सित्तर दिया था । ११९ में अपर सरि १५ो भीबिनवरिमाने बाप उपाभ्याप पर प्रदान किया था। सं १९ माष परि १४ भामेर में माप प्र सर्यपाए एमापा। अपने अपने प्रेमनग्राम में सप्तस्मरण पाठापयोपबारिममें प्रत्यो प्रेरणा मि में मेरे-मोरे प्रान्ड प्राप्त होते है। प्रस्तुत बापूरपना १९ माप परि ५ ६षमा पूर्व हुई। पर बार हो र मी सर्व प्रचरित मेरे पान यही सारश्य रखती है। सामीसेन-दन पम्पब में बम्बई मी डोर प्राप्त होते है। कैगर इस चैनौ प्रदिप खरे गि-परखरंगच्यय विमाप्रति भार वीरपास पौत्र और औरोर x* 4-1-विरलपानुसार ११ पुगापन मियपनी १९२-ये पर, सीम५ इसी प्राथ.rt-17 मे 1-1-1-५ भीडमीर । होने वा फरार्या नाम की येन (पमा 10 में है। समारो दुसरे आम की टीम १९ पर्ष की बरस्था में पवाय बन के पाभिम का पोतक है। यह ज्यर्षा बाम घामाम्म सो ही है। प्रकार की प पर पानिक पाप पान त्याग र भाषा-वासर्य मात्र ही प्रश्न करने उहा प्रतीत होती है मताईसमें का निवन अस्सामा एमप। साप ही इन सन्मुख नाश होना सामों में नदी पा प्रमहरस पिम्पास कर दिया है। इस में वाबी पस्त पारेकि इस प्रम्प र १९ पपयेष-प्राप्त नही होती है। इस सम्पादन में पू पाध्यायसीने तीन प्रतियों का उपयोप बिना है और इस एक प्रति मेरे संयम मी पर किसी में भी इस मेषको न पीगोपर नहीं होती है। पर इस प्रश्रय में लापारेच पर श्रीराम मनिही १५२ प ध प में है। पंपस भीधिनमदमरि सिम महोपाग्याप भीसियाम्तच प्रसिप भी ममयमोम निप्प । इन सम्मान में विश्व जन्त मत नहीं होता। इसी प्रचरित में पत्र- संपत्भ गोख भी नहीं है, पर महो भी सिसम्वपि प्रसिप होने पर इसकी रपय मताम्मि प्रारम में हो। मामाधि पखत पत्ति नहीं है किन्तु भौमिनपति पाईनन संक्षिप सस्करण मात्र ही है।ध में प्रचित पर विस्तप्रतिपादन वापमित्र ग्यरष एमाद का स्याम पर बम्बावपारिका समम रीशमा परम्म से बन्द कवि-पति महर-बसरमरण कर संविस संसारपसार किया है। उप केस में पर श्री प्रेम की परिये । परिवे- मिनपतिसरि टीका-"साम्प्रद प्रकरस्पर प्रहर धमाप्यधिरेषतावरण मसानमा एपबारमेन लनाममापिरिमारामपुर- 'विमामिणु'मास्य-विपने पति सम्पन्न । विम्याई रिमुवनाविषयि बदविसति जमलेगास्यन्त पोममा भमर्य' बाजार बस्मा मस्विमग्य भुतोमाने चिन्तामतिमे बनाचार भाव-मनोरम बाति-प्रगति मामा, म बाचा-बनायव भुपातिकमभरिव पुंधो पर मम्तामित्यर्थः । मनानामपि समानेम-प्रसार कामेमामाधला मास्सन्द 'विन ती स्मारि। मतः या सातमा प्रतिपारित हो पा रहा कि पाना संसरम हो मौगिक नहीं। पुष्प गापायपरामस्त पुषि-भीसुवसापरखी मधे प्रस्तुत स्पोमात निघको मधे मार RAा है पप बाप हूँ। बम्सापागदेव सपत्रम पूण बीवियमपियापरमपटवासि पा मि. उपामार बिनपसागर पारिकपर्य व संगाली साहित्परल [तत हिलो समय । ==
श्री जिनवल्लभसूरि-रचित सघपट्टक वृत्ति
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निरनियमाम साहवरमामय
प्रतवरदम
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घमागवान जसमापध्यक्ष
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तामरना
पाशाने
बाप र पारपछि मरित्रित श्री जिनाममूरि मन्ति (मम्मर)
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॥ श्रीस्तम्ममपार्श्वमापाप नमः ॥
भीलरतरगच्छाकार-नबाङ्गीतिकार-प्रीमिनमयदेवरिशिष्प-कवीमहामणी
श्रीधिनषष्ठमत्रिविरचिताः।
जिनभद्रसूरिशास्त्रान्तर्गत-साधुकीर्तिगणिनिर्मितावनीसमकता
श्रीसंघपट्टकः
.
भीमसाबिन मस्या, सर्षसम्पतिवायकम् ।
सहपाठामस्पा-ऽक्षरा विनोम्यहम् ॥१॥
हरि पुरा वशन्नताप्नीतिब भीमदपहिलपचने दुलभराजसमायां पैस्पवासिनो
मिनिस्पि प्राप्तवरतरविभवः भीजिनेश्वरसरिः, तत्पवे जिनपन्द्रसरि, तहिनेयः भी
स्तम्मनपार्भप्राफबाद नवाङ्गीतिविपासा प भीमभयदेषपरि , तपिछप्पा भी
जिनवल्लभारि सिथिलापारनिरासाय परोपकारकरणाप प भीसहस्प पहकरूप
भीसंपरान्पपरसाई पकार, स्पाय काम्यम्-
पहिम्बागवठी उपपमपनपीमातरस्तोककोड़-
स्पा सेवाय नाग मठमुनितपा स्पष्ठपन् पुष्टमुर।।
पाकारण्पामृणाम्पिर्दिषुरमपि किस क्षस्म सपाप्रपप,
माता कार्य मार्गस्मठममिति बगादेव रेप स्तुमस्वम् ॥ १॥
प्पाल्पा-"पहि" व देषं स्तुमः । समिति की पो भगवान् मासुरमे
यस्तोकसोकस्प-समस्तसोकस्प अंग्रे नाम-सर्प संदर्प-दर्भयित्वा प्रामा परिणत
'हमार्गस्तासन कार्यम्' इति मगादेव-इति कपयामासेय । फयम्भूत नाग ! पतिमा
सावलीरम्-अपिनालाम्पाप्तम् । कपम्भूतो मगनान् ? पथस्प-हमार्गस्य मयने पी-
पुदिर्यस्य । पुनर्मगमान् हिर्षन् ! उपा-बस्पर्म कमठमनिरुपा दुई स्पष्टपन्-मकटी
ईन् । कपम्मतो भगवान् ! फालयमताम्पिा-कासम्पस्पामृतस्प अम्भिा-समनः ।
किवा मार्गस्समन फार्य ? सत्रा-'किस' इति सस्पे सस्प-मारममा सप-
पिपुरमपि-करमपि प्रपप-मीस्प । इति प्रथमकाम्पार्पः ॥१॥
कस्वापामिमिवेशवानिति गुणमाइति मिनापब,- प्रस्पीति विनीत इमठ इमोचिस्पारीदि पाधिष्पीति एमीति नीतिमविवि स्वीवि पेीति सार- पौषि विकसमिति सुपीरिस्पुनसे तं ममा ॥ २ ॥ व्याया-कल्या०॥ फरपाण:-अमा, अमिनिघेना-मनापरिणामो यस्येति करपावामिनिषेत्रवान् इति । गुणग्राहीति। मिथ्यापपस्य-मार्गस्य प्रस्पर्षीरी, इति । पिनीत पति । अठा-सरस(इति) ओपिस्पकारीति-योग्यताकारीति । प-पुन: दाधिम्पीति । दमी-प्रिवेन्द्रिय इति । नीतिमृत्-न्यायमार्गपारक इति। स्पे- स्थिरसवान् इति । धर्म-धीरस्ववानिति । सर्मस्सापीति । पियकवानिति । मुभी-- मुपदिरिति । । चिम्प ! एपंगुणविशिष्टस्स्त्रम्, मत एक मयोपसे स्वमिति, सो प्रस्पां पम्मीति काम्पा: ।। २ ॥ पर किस कठिकाणम्पाम्पत्राम्वयम्-निविजुपि गवलपीविनीतिमचारे। प्रसरगनपयोपप्रकरकापौष, सगिवमुगविमार्गे सम्मति प्राणिवर्गे ॥३॥ प्रोत्सर्पमरासिपहसमदतमामर्पसामाग्यपुष्प,- म्मिप्पास्वपावर बगवि विरमदो यति बेनेगमार्गे। सहडिएदिसम्बप्रसनामनाम्रापरलेग्निोति,- प्रस्पी सापेपैविपयिमिरमिता सोऽपममाथि पम्पाः ॥४॥ व्यास्पा-पह० ॥ प्रो० ॥ विषपिमिा-विषयसेवकैः साधुपै।-लिङ्गपारि- मिर्दानाचारोत्पासिमिः ममिता-समन्तात् सोऽय पन्या 1-मार्गः अमाथि-पिम्तारिसः। क सति ? सम्प्रति दा-दणमाकाले फिलेवि सस्पे प्राणिवर्गे एपंविघे सति । कपम्मवे प्राषिवर्गे ? कसिकास एम-तुपमाकाल एव म्यास:-सर्पस्तस्य वयान्तराल-मसान्त राल, तत्र स्पिति:-स्थान सो शुपवे-सेवते या सः। पुनः कसम्मते ! गतसप- प्रीतिनीतिप्रपारे-गतो तपप्रीति, नीसिप्रपारम न्यायप्रषारस्तो यस्य सः। पुना फयम्भूत ! प्रसरत्-प्रसरणधीतो योऽनबयोपा-प्रधान सेन प्रस्फरस्कापयौपा-मार्ग समूहस्वन स्पगिता-मान्छादितः सुगविमार्गा-दवगस्यादिममधो पस्य सः ॥३॥ पुना क मति ? वगति बैनन्द्रमार्गे विरसा याति सति । कपम्मवे नन्द्रमार्गे ? "प्रोस्सर्प" प्रोत्मपन्-उधमत् पा मस्मराशि हस्तस्प ससा-मित्रं पासमार्यम्- असपसिनासषण तस्प सामान्य तन पुम्पन्-प्रपईन् मिप्यास्समेन मान्व-तमस्तेन । रुदे । कपम्भूतः साधुः ।, सलिटो-ौद्राध्यबसायपान् हिटो-मस्सरी मूगा-भूस्से प्रसला- -दुर्खन परा- -दुर्मेधा एपम्भूतो यो मनस्तस्य सास्सस्प आम्नापा-परम्परा तत्र रको रूपम्मतः पन्या ? बिनोको-मगबननस्य प्रस्पीति काम्पार्पः ॥ ४॥ भय द्वारमाह-- पचौरशिकमोबन मिनपूरे पासो बसमप्रमा, स्वीकारोऽयंगास्पयरमसदमेष्वप्रेझिवापासनम् । सावपापरिवारर मुवपवाजमा गुणिनी- धर्मः कर्महरोत्र चेपपि मम्मेरुखदाअभी परेत् ॥ ५ ॥ ग्याल्पा-यघो० ॥ पत्र मार्गे मौदेशिकस्प-भाषाकर्मणो मोसनम् ॥ १ ॥ मिन गरे पासा-सनम् ॥२॥ सस्पपमा-सतिम्-उपाभम प्रति भषमा- मात्सर्यम् ॥३॥।॥ ४ ॥ गास्पः ॥ ५॥ त्यसदने -धेस्पगोषु स्वीकार ॥ ६ ॥ अप्रेषितादि-अप्रमार्मिवादि वासनम् ।। ७ । सागपाधरणापामादरः ॥ ८॥ भुतपयस्य-सिद्धान्तमार्गस्य अपना-नीला ॥९॥ गुणिषु पपीः ॥ १० ॥ मत्र पये- दमदारसंपुक्के वेद-पदि धर्मः कमहर। स्याचदा मेरुपर्वसे 'मम्धौ तरेत् ' इति निषेध पाम्प, कदापि न भवति ॥५॥ औदेशिकमोबनशारं म्पारूपानयति- पदहापामुपमर्थ मिदंपसुपीनापाप परसापित, शामेष प्रतिपिम्यते पदसहभिवंशवाऽऽायि पत् । गोमासापुपम पारय पद मुक्स्वा पठियोमपा, वको नाम मिपस्सटी सपमा समादिम गिदम् ॥ ६ ॥ प्पास्या-पदः ॥ पट्कापान्-पृषिम्पादीत निर्दपम् उपमर्प-आरम्प पत् आपार्म मपीन्-साप्न् मापाय-मनस्यापार्य साधित-निष्पादितं यत् शाखेप मसच-पारंपारं प्रतिपिम्पते, परपुननिति(स्वासवापापि-निनिंसवाया-निाशूक- स्वस्प आपापि-कारफ यद् गोमांसाघुपम-गोमासावितरपमाहुस्तीकरा, मम पर- मशन सस्ता पतिः मधा-नरके याति । एर पपस्पानमाषाकर्म व सदादिनिमिष मशन तदिति कोमलामन्त्रणे दर-मगति का सपण -सदपो पिपिस्सति-मोकुमिन्छति। हिन् । मिदन-मानन्, एतापवा पास्वा नोपि मोमिन्तीति ॥ ६ ॥ -
हितीपद्वारमा-
गापम्पमृत्यत्पपरमणिरणपुगुबम्परता-
खममगुपम्मृगमरम्सनुहोषणाबमोधे ।
राम्पोपमोगभुव मठपविवाऽऽनावमाम्यवसम्ता,
सम्ता मणियोग्ये म मम मिमगोजम्मवका वसन्धि ॥७॥
प्यासपा-गाय• ॥ चिनगृहे भावपेस्ये मन्मिया-मवावारा सन्ता
सम-निमित म बसन्ति । कपम्भूते परमे । गायद्गपर्याः मापन्तो गन्धर्वा पत्र,
सुस्पम्ती पगरमणीपक्ष्या पत्र, रबडेपुा-रणन्स-पद हर्पन्तो वेमयो-या पत्र,
गुबन्तो मनाःमुबला पत्र तद् गुमन्मृदङ्ग प्रेस्सस्पुम्पसह-प्रेक्लनस्पो-छासहाप
मानाः पुष्पसमा-पुप्पमाला पत्र, उप-समप्ठसवगन्यो-मृगमदा-कस्तूरिका यत्र,
लसन्ता दीप्यमाना टोचा-चन्द्रोदया पत्र, पवनौपा-पचन्ता-महापानमसादि
भूपमपिता भनौपा:-भावकसा पत्र स सर्भपदेकयसमासः । स्पे एतस्स भवति ।
किम्मताः सन्तः ? देव० देवदम्पस्मोपमोग व निवितं या मठपविता भाशावना
वामपक्षपनाप्सनादिरूपा, ताम्पा असन्तः । पम्भूते पैस्पे । समकिपोग्पे,
पतामता परपमतिः कार्या, सा पासो न कार्यः ॥७॥
एसीपदारमार--
सापानिमर्गणम निपेवितो, मिस्सगवाऽप्रिमपर मुनिपुजमानाम् ।
सप्यावरोखिममगारपर र बानम्, विद्वेरिक परगणे पसर्वि समर्णः ॥ ८॥
पाण्या-साक्षा०॥ का सम्र्ण:-विद्वान् परगृहे-मापकोपाभये पसति-
स्याम विदेटि-तत्र देप पचे भपितु न कोऽपि। कपम्मा बसावि सापानिना-सीर्षक,
गणपरेप-गौवमादिमिा निपेपितोका-निपेविवा-सेपिता उस्का च भम्पेम्पः । पुना
किम्भूता पसति । मनिपुङ्गवाना-मनिप्रवरानो निस्सावाग्रिमपद-निस्सङ्गवाया
मनिम-प्रधान पद-स्पान परगृहे बसता साना सहोऽपि न म्यात् । सनः हिन् ।
उप्यारोकि पप्पया-सस्या सरति संसारसागरमिति सप्पावरस्तस्प सक्किा-कपनं, प
पुना-अनमारपद न पियते मगारं-गर यस्प सा मनमारस्तस्प पद मानम्, एतापता
मनगारस्प भादगी पसनमेव भयः ॥ ८ ॥
-पुनरपि तयारमेवाह- पित्रोत्सर्गापवारे पनि शिवपुरीतमू निशीये, मागुच्य भूरिभेरा गरियाबसती कारणेऽपोप पचात् । मीसंसपरियुळेऽप्ममिदिवपतमाकारिणं सेपवार्मा, सत्रागारिपाम्नि म्यपनि म तु मता कापि स्पे निवासः ॥ ९ ॥ व्याख्या-चित्रो० ॥ यत्-पस्मात्, ह-प्रवचने निधीपे-निशीपमन्ये निशीपनाम्नि छेदप्रये सर्वत्र भगारपाम्नि-भावगरे संपताना-साना निकासो न्मपमि-मियमेन प्रतिपादिसः । कपम्मते निशीथे ! चित्रोस्सर्गापवादे-चित्रौ-नाना प्रकारी उत्सर्गापपादौ नयी यत्र तत्, सत्र नपाइपस्प पिस्सरप्पास्याऽस्तीति । पुनः फिम्म्से ! शिवपुरीद्वभूते-शिवपुर्पा:-मोधनगर्या समते सत्र प्रपे प्रार-प्रपम् भूरिमेदा-भनेकप्रकाराः रियासती:-गृहिण गृहमेव मसतया-उपाप्रपास्ता उपत्या पमात्कारणे सति अपोप-अपवादविपयीकस्य पूर्वमुत्सर्गेम 'स्त्रीसंसत्तपावियुके उपामये न वस्तव्य माधुना' इस्युत पपादपत्रादमार्गेण ता पसनीपमिस्पपि प्रोकम् । फयम्मत अगारपाम्नि ? मीसंसक्स्पादिपकेऽपि-श्रीपशुपणकानां संसर्गादि पुकेपि वसनीयम् । फपम्भूतानां सपनानाम् ? अमिहिस-पतनाकारिमाम्-भमि दिवा-मोक्का पा यतना-परिच्छदादानरूपा तस्कारिणाम् । एवमुरमर्गेण भपनादेनापि गृहस्वर एप पसनीय न पुनः कापि स्पे निवासोऽनुमत ॥९॥ मनग्याप्रतिपम्पिन मनु पमस्वीकारमाहुर्मिनार, सारम्मिपरिग्रह स्वसिमहासापपमाषस्पते । त्यस्त्रीकरणे हु गस्तितम स्वाम्माठपस्प पवे,- रिस्पेयं प्रतपेरिणीति ममता युका न मुहमर्षिनाम् ॥ १० ॥ पारुपा-मम्र० ॥ ननु-निमित बिना:-तीर्थकरा पनस्तीकारम्-मर्याङ्गीकार प्रनम्पाप्रतिपपिन-दीपापिरोपिनम् बाहु:-कपपन्ति तु-पुना सारम्मिपरिग्रई, सर्वारम्मिा-गृहस्थानां परिप्रा-स्वीकार ममैते गृहस्मा इति, अतिमहामारपम्- अस्पन्त महापापम् आषप्त पदन्नि । सु-पुना यता-सापोः स्पस्तीकरण-पैरपममरखे गरिववमम्-मरपन्तगरणीय मारपरप-मरपतिस्त्र स्पा । इस्पषप्रकारण सक्राधिना-
.
मुक्त प्रापकानां सानां ममता न युक्ता, कपम्मता ममता ! प्रतरिमी, इति--
गावस्पस्वीकारा । इति द्वारपर्य पारुपातम् ॥ १० ॥
मपति निववमत्रासपमा स्वामिभूमा, नृपतिकामेसोमासब मियोः ।
स्फुटवर हा सा पावधीस्वमुझे-रिवि म मा मुमुमो संगत गडिकाऽपि ॥११॥
प्पास्या-भवति ॥ मत्र-मम्बिकापासने नियतं-निमिवर मसंयमो मावि
गम्बिकादरीना प्रतिलेखपितुमक्षपस्यात् । विषा-श्रोमा स्यात् महापुरुषसेपनीयस्वात् ।
एतद्-मासनसेवन सुपविकाद-रामपि प पुन: मिझो-सापोलोकनासा स्पा-
'महो! समितोऽप्पेषविपासनेषु पमिमति' । गम्भिमासने पुगपरिग्रहः स्फुरतरा-
प्रकटता उप-मत्पर्ष सावधीससं-मुसलम्पटलम् । इति तो सह-निषित समपो-
सापोः गम्विकादि, मादिशवात् मगरकासिंहासनादे। परिणाम, ठ न संगत- न युतम् ।
भप्रेषिठापासनद्वारं पारुपातम् ॥ ११ ॥
सापचापरितद्वारमाह-
गही निवतगामाग बिमगोऽधिकारो यो, प्रसमसमावि सापुषु पया वाऽरम्मिमिः ।
प्रवातिनिधिकारणा सपिदिवास्तिकेऽगारिणा, गतानुगतिरपा ममसंस्तुत प्रस्तुतं ।। १२ ।।
ग्याल्या-गही० ॥ ग्री-भावका निपतगम्छमार, निय-निमित समन्न
मेव भवतीति नियतगम्छमार, सगळं मुक्त्वाऽन्पा न गन्तम्पम्, यते-सागो-
मिनगद-स्पेऽधिकारा-सचिन्ताकरण 'प्रदेयमशनादी' स्पादि, भारम्मिमि:-परस्पैः
साघुप अपनादि-अपनपानसादिमस्मादिमादि पपातपा -येन तेनापि प्रकारेण प्रदेयं
वत्राशरदानेऽपि दोपो न भगारिगां-गस्पाना समिहितान्ति के साधुसमीपे प्रतादि
विपिवारण साघुसमीपे शीसनवादि नारगीकरणीय गतामुमविक:-परकानप्रवाहपतिवर
पैस्पवासिमिा बदा-पूर्पोकम् मसंस्तुतम्-प्रयुकं कप-केन प्रकारेण प्रस्तुत-
प्रारम्पम् ।। १२॥
अवषयापारमा-
निर्वाहानिमुकिात गुणम्मेरमातशीगम्बर,
वादृग् पसबलुणेन गुरुणा सार्वाय मुपीकतम् ।
पदिश्यावगुपाम्या अपि बमा म्मोप्रगयामाहा,-
पेभ्योऽपिकमर्षपम्ति महतो मोइस्प वमृम्मितम् ॥ १५॥
७ प्यास्पा-निर्याहा० ॥ यद-पस्मारस्कारणात् एषरिमा जना एपनिषं गुरुं देवेम्पोऽपिकमर्षयन्ति सत् महता-प्रपलस्य मोहस्य-मोदनीयकर्मणो मृम्मित- मात्म्यम् । फपम्भत गुरु ? निर्वाहापिन-निर्वाहस्प-उदरभरणस्यार्थिनम् । पुनः फिम्भूतम् ' गुणसः-गुमले उनिमत-स्पतम् । पुनः किम्भूतम् ? ममावशीलान्ययम्- अवास सोसम्-प्राचारः अनयम-कुलं यस्य स (तम्।) पुनः किम्भूतम् । सारगपक्षम पढगेन गुरुणा शिप्पतुरयामासादिरशेन सगुणेन-मिप्यतुस्पगुणेन एवविधेन गुरुमा सा य-स्वोदरमरणाप मणीरुत सादसणारसमेव मुण्टयते । कपम्भूना मनाः रिस्पास गुणान्वया अपि विस्म्पाता:-प्रसिदाः गुणान्वयो पशो येषां ते सगुणा:-सालोपमा बपि। पुनः किम्मसाः । लमोग्रगन्छपदा, सम उपा-उस्कटो गन्छग्रहो येषां ते ॥१३॥ पुनरप्पेवद्वारमाह- हुप्मापा गुरुर्मसमयमा सर्मपुखिनृणा, बावापामपि दुरीमा शुमगुरु प्राप्तः स पुज्येम पेत् । म स्वहित तपाऽप्यतममी गरास्पिनिम्याहवा:, मा कमिहाभयेमहि कमाराप्येम कि कमरे ॥ १४ ॥ प्पाम्पा-धुप्मापा० ॥ गुरुकर्मस पपवता-गुरुकर्मसम्पां नृणां सर्म पुदिन-प्रपानधर्मयदि दुष्मापा गुरुकर्मस्वात् सर्मपचिर्न फरापित् सर्मपुत्रो जाता पामपि पुनरपि शुमगुरुः दुर्तमा-दुःप्रापः पद्-पदि स गुरुः पुण्येन प्रामा, सपापिएर सामग्रीयोगेऽपि ममी भादाः स्वहिस कर्नु नाल-न समर्पाः । कपम्भूता मनाः । गम्छस्थिविम्यासा:-गपछस्पित्या-गम्छमर्यादया म्पामा-पनीरुसाः। एम स्थिते क पुरुष मूमा, क पुरुषम् श-नगवि माथपमहि-परम प्रपमति, क पुरुपम् मारापमरि- भाराप्पामः किधर्महे ॥ १४ ॥ मुरमामा जिप दोऽपि रशिला प्रप्रम्प पेरये कपिन्, घरपा पम पममधिवाति माहवाचार्यकम् । पिसगा गदी पति निने गछे इटुम्पीपति प सहीयठि पातितीपनि पुपाम् विध परापयति ॥ १५ ॥ गामपा-पुरधामः ॥ हिमति समापनापा कोऽपि भुन्यामा-सुमपा धामा-धीमा पुरधामः एपम्मनो रशिफ -सम्पपासः स वैराग्पामावपि कपिल ८ पिनगरे स्पे प्रब्रम्प-दीक्षा ग्रहीसा सता कसन पुर्व पध-साम सा क्रमेष तर भाचार्यकम्-मापार्यसं प्राप्तः । कपम्मतः सा अधितकसित-अक्षिता मनिहा कति:-कलमो पस्प स कलापुतः। एतत् चित्रम्-मामयं स भाचार्षपदवीप्राप्तो निर्गुषोऽपि बेलगो पदीयति-'ममेद पैत्य'-मिति गासपदाचरसि । निो मम बहुम्मीयति-दुम्बिपुरुषवराचरति । स्वम्-मास्मान शकीपति-शात्-इन्द्रमदाचरति । पुधाम्-पम्पिवान् बालिषीपनि-मुखीपति । मिन-बगत , पराकीपति-पराकपदापरति पैस्पबासि एव साधा यते ॥ १५ ॥ पुनरपि भुवपथाववादारमाह- पेबोवो न परिवो ननकीवोऽपमों म, प्रागडो नप पारपयो न प म र प्रेयाम प्रीजितः । रेपामषमापमः स्वमुनिम्यौनगर पामते, म स्मोवापसुषमनोऽयमनिश मीराम ! जगत् ॥ १६ ॥ प्यारूपा-यैर्जातो० ॥ यः-विषिलापारिगुरुमिः भप जना-भादसोका पिटरूपेग वेन म बनित:-सन्म प्रापिता, व पुनः पर्दिवा-गादि नीसा, न श्रीता- मसेन गीता, न प ये गुरूणाम् अपमणः-मर्षदावा, न पाहस्त उचमा, प्राद प्रथम प्या :-विसोकिता, न प सेषां पापा-माता, न प प्रेपान्-सहमा, न पैर्गुलमिः प्रीणिताप्रदिप्रदानेन सन्तोपिता, न ग सेरेव गुरुमिः मनिश-निर न्तरम् अप मना पता-ठात् नस्पोतः पचवत्-नस्तित पमबत् पापतेनवस्वको माम्पते । परम्मतेस्तै । मस्पधमापमे:-अति प्रत्यर्पम् मरमेम्पोऽधमा । पुना कसम्मः। इत-मनि पाया-बिहिवमनिरूप, या एष !' इति खेदे अगद मीरामम्-अधिपतिषियुक्त, यस्पाने पस्किप स राजा नास्तीति ॥१५॥ हिरमोहमिवाः लिमम्प-पिराः किबोगवा, किषोपावा किमत' किवा किंवा महापेसिताः । हरमा मूर्तिपर मुतस्त्र पदमी पोलोग पपि, पानि इपबामा म परतेऽसूयन्ति श्रवकते ॥ १० ॥ प्पाम्पा-किं विस्मोहा० ॥ ममी जमा-माः किं दिमोह-विषाममा इता-प्राप्त! | किम् म पापिरा:-म पाप पपिराम, भषणविकसः पादविप्रलेपादि . - "
पोगा, मलनादि चूर्ण, योगपूर्ण कता:-मस्तकादिषु योगचूर्णप्रक्षेपेम वशीकता, कि
देसोपहतार-देवेन-प्रतिकुलदेवेन किमपाताः ।, किमत ठकिता:-'मोति कोमला
मन्त्रणे कि किता:-पग प पश्थिताः ।। किंषा ग्रहावेशिसा! ?, ग्रह-पन्सरा
दिमिा वारेसिवा:-अपिष्ठिताः । पते तस्य न बानन्तीति परान्ता। पता-यस्मात्
अमी महाः रुपयात्-उमार्गाद् म्यादि-निचि न दघत-न र्षन्ति । किं त्या !
भुतस्प-सिद्धान्तस्य मुनि-मस्तके पद-पाद कृत्वा-सिद्धान्तोक्तमविगणम्पेस्पर्पः ।
कपम्म्सा मठा! रटोग्दोपा अपि, हटा ठरमा-गरिठा दोपा यैस्ते, प्रस्पक्षसो
दोपान् पश्यमानाः छमार्गनितिन कुर्वन्ति अत एव दिमोहादिषिशेषणम् । ष-पुना
पतक्त-उपचम्पावृधिकते पुरुपा ये अम्पन्तिनपा कृर्षन्ति, स्पप रुपषष्याइति न
हन्ति, ये हन्ति तेम्पो बटा मस्यन्तीति विसपनसफलता ॥ १७ ॥
.
मुखपपावसाधारमाह-
इष्टापाप्तितुष्टनटविटमटटरपेटफाइल,
निपुबनपिपिनिगरोदनरनारीनिकरसहलम् ।
राग पमरमरेप्यो पममपपरे निमजन,
मनपस्येच मूमनपिदितमविपिना नमननम् ॥ १८ ॥
व्यासपा-ठायाप्तिः ॥ यविधिना-प्रविधिप्रकारेण रात्रौ इस्पा, मा
बनविदित-मूर्खसोकात मैनमसन-तीर्थकरस्नाचम् अपपके निमसन-पापपरे पुरन
बनपस्पेर-करोस्पेन । एपकारो निपपा । किम्मत रात्रिमानम् । इटाराप्तितुष्टविट
नटमरपेटकपरफास्तम्-रष्टा-पाठमा स्त्री रामायागता सुस्पा अराप्तिा-प्राप्तिस्सपा
तुश-सन्तुष्टा ये विगा-पेश्यापतया, नटा-नाटफिना, मटा:-सुमटा, फा-
दामास्तेपी पटक-समुदायस्तन मामुलम् , रात्रौ प्रापस्त समागच्छन्ति । पुन कि
म्मत ! निघुपनलिपि निघुपन-मेपुन सम्प पिपिा-शिलसित, सत्र निपट-कतो
दोहदा-ममिलापो येन सन् । एवविध नरनारी निकर-मनुप्पस्नीपन्द वेन सहर-पाप्तम् ।
पुनः किम्मत ! रागदेपमत्सरेपिनं, गगा-स्ना-पा-कोषा, मरमर:-झोपविशेपा,
परगुण्या सरिता-पा-मां परण बसन्ती रमा झोपकरण, न-निपिर
परुपादिगिदिममर्दा रात्री निषिदं मगपस्तात्र पहममममप्रापिसाप ॥ १८ ॥
बिनमतपिमुखविशिवमहिवाप म ममममेव नये, किम् सपथरिन-पानाधपि बनरपि न स शिषमयम् । भविवि-विविक्रमाविनाबापि अमुम-मुमार वापते, किं पुनरिवि घिसम्पनैवाहिवन प्रवायते ॥ १९॥ - प्पास्पा-जिन ॥ ममनमेष-स्नात्रमेव मिनमतविमुसपिहिस-बिनमवाद- मगमन्मवाद विमुस-विपरीतम् प्रविषितया विहित-क मारलं-निकालम् परिवार न किन्तु उपभरित्रदानापपि-तप -मनमनावि, चारित्र-देशसर्पविरतिरूप, दानम्-अमया विरूपम् , मादिशमा विनपवैयापयादिग्रहण, तदपि प्रविपिकत सह-निमित शिव फल-सतिफलं न मनपति, हि-निमितं मिनाबाऽपि-मगरदाहापि अबिपिविपिनमात्- मबिपिम विषिष तयोः क्रमाद् माममाय बायसे-ममति, अविपिना अपमाय, विपिना सुमाप निरिति विडमनवाहितोतर्न प्रवापसे, इस्यमुना प्रकारेमाऽविधि- कियामिरम्मना एवारिसोतु प्रतिस्प संसारस्प हेतुः कारण किं पुनः न प्रतापते न निस्वार्यवै अपितु विस्तार्यत एव एतारता मविधिनिया मिरखना एम बहिवताप कम्पस एव॥१९॥ बिमगृह-बिनभिग्य-मिनपूबम-निमयात्रावि विपिछत पानवपोजवादिगुरुमचिमुतपठनावि चारपम् । स्पादिह एमवारकुमाछमोमोशनशिक्षा, एफुटमनमिमवकारित परमोसममिव विपम्पनिवेशतः ॥ २० ॥ पास्या-मिन० ॥ जिनगृह-विनमान, मिनबिम-भगवत्प्रतिमा, बिन पूमन-मगवस्पूचा, मिनपात्रा-अष्टाहिकादिमहोत्सबा, आदिशम्दासिनपठिष्ठाविसहा, एष धर्मकर्त्य विधिकत-शास्रोकप्रकारेण विहित दानम्-ममपदानादि, सपा-दाद प्रकार, प्रवानि-स्पूसप्रामातिपातपिरममानि, बादिपम्दात् अमिनहारिन, गुरुमक्किा- भर्मापार्यमक्किा, भुरूपठन-विहान्तपठनम् , माविष्ठम्या सिद्धान्तार्थ मरमादिग्रहणं, प पुनः भारतम्-मादरण फवम् , पसरसर्पम् इप-अपपने इमत-गुरु-मारोप देशनांचवा-कमत-परतीपिकमत, इगुरुा-सिदान्तार्पमोटका, हाहाकदामा, गोपा-इरिसतमान, अइसना-धर्मरुपा तासाम् अंशा-सेमस्तस्मात्, फट-प्रकम्, मनमिमतकारि-अनिष्टकारि संसारकारण स्यात् । एन्धमाह-विपसानिधतो पर मोबनमिप, पपा विपलमप्रवेशेण परमोचन-प्रधान मोमममपि भनिएकारि तथा विधि धर्मकस्यमपि कमविष्णुर्मादिदेशनामिमि संसारकारममिति ॥२०॥ मार्ट मुग्प-मीनाम् परिशपिशिवपदिम्बमारप में, वमाम्ना रम्परूपानपवर-कमठाम् पेष्टसिप पिचाप्य । यात्रा-स्नात्रायुपायुर्ममस्तिक-निशानागराविमाध, मनामनाम नामलित इस पठेबापते ! चनोऽपम् ॥ २१ ॥ म्याग्या-आमष्टुं० ॥ नाम मैना-नाममात्रेण धना नाममनास्त:-लित पारिमिः । इति खेरे अय भदालना-मायकमनो पजपते-परामस्याते । फपम्मू मिना ! शठा-पूः । फपम्मूतः भझाल। । छलिव इस-पन्तराधिष्ठित इस प्रपिठ इस छठनप्रकारमार-मुग्ममीनान-समत्स्यान् मामा-मामपितुं परिवपिधिवत्- परिस-मस्स्पग्रापाप लोकप्टक, तपिचिप्स-मांसमोरफ तदर जैनं निम-मिनप्रतिर्मा आदार्म-दर्शयिस्वा, पया, मासखणेन मस्स्पा पचीक्रियन्ते तपा मुग्धप्रतारणाय तेरपि मेनपिमा दर्शितम् । ननु प्रिनपिम्मस्प फष परिष पिशिवोपमा ! उच्यते-मविपि प्ररूपिवस्प हीनापारिप्रतिष्ठितस्प पुक्कैव न तु विपिप्रतिष्ठितस्य । पुन: किं कसा? माम्ना-निननाम्ना (म्परूपान्-मनोहरस्वरूपान् भपारफमठान् , अपारकार-अन्त निलपा मठा:-स्थानविशेषास्वान् विषाप्य-काराप्प, फस्यै ? स्वेरसिस-स्वस्पेटसाप 'अस्माकमिष्ट मषिम्यता'-मिति मिपेज मगरमालागारमठादिनिर्मापण फारपन्ति । वे पुनः के भावान् छलन्ति ! यात्रास्नाभायुपापा, पात्रा-पूर्वमापुरेशेन बिनगद यात्रा स्नाप्रप कम्पम् , आदिवम्दात् भूतानुक्कपग्रहा, एवंप्रकार उपाय:- मिपा, से: । पुन: नमसितकनिश्शामागरादिग्छठेप, नमसितकमिनादीन् उदिवप ट्रम्प सितस्तकरणम् उपद्रवनिये यद् द्रम्प म्पयामीति निपमाफरम निभायागरो-रात्रि मागरणम् मादिसम्मात् शान्तिरूपौष्टिकादिना, पतम्छन-एतरप्रकार दर्शपिस्वा बनान् पञ्चपन्ति । मनेन फामेन भरिपिमिनरिम्पपात्रास्नापनमसितकनियामागरण निपिर्व, विधिना तु सो कम्प, घरकर्चम्पस्य सप्तमकाम्मे विंधविरामकाम्मे पूर्णोके स्थापिवस्वादिति ॥ २१ ॥ सर्वचारपगितासमा स्पपिपसम्पासहसमिपाः, पसागौरपणदणानुरगाः पुष्पकपायोरगाः । नाप, साहसतोऽपि हमभुनान्स्याअपरावामिता, स्थित्वा सम्मुनिमूबसूरतषिपस्तुम्पम्वि पुष्यन्ति ॥ २२ ।। प्पास्या-सर्प ॥ महो! कष्ट एवंविधाहीनापारिणोऽघुना स सनिमर्पसु-सस्सा धुमस्तकेष स्वित्या तुष्यन्ति-सोपं प्राप्नुवन्ति, व पुना पुष्पन्ति-पर्यन्ते । काम्प्ता (हीनाचारिमा) ? समंत्र मस्पगिवासवाा-मनाम्छादिताम्रकार | पुनः किम्मता। सपिपयेषु-मास्मात्मविपपेषु म्यासक्तानि-ग्यापारिवानि सन्द्रिपाणि-स्पर्षनारीनि यस्तैः । पुनः फिम्मसाः ! परगन्ता-उच्छलन्ता गौरवो सातादिमि परा-ौद्रा दपा-मनोदमादिकास्तुरगा येषां ते दमानां पपसस्वानुरगोपमानम् । पुनः कर म्भूताः । पुण्यस्कपायोरगाः, पुष्पन्त:-अपमाना। पापोरगा:-पापसा पेपो ते । पुनः किम्भूताः ? परियकस्पोऽपि-सर्वाकार्यकारका अपि । पुनः किम्भूता ! बन्पापर्य समामिताा, मन्पमापर्यम्-असंपतपूमालपणं तदेव रामा उदाभिवाः । पुनः किम्भूताः । उदाधिपा-उसकपश्यः ॥ २२ ॥ सौरम्मपरिग्रहस्थ पृहिप्पोऽप्येकाशमापेकदा परमात्माय म रमिवो दि मोचीमोऽनुवापस्वा । पद्कस्यामिविध मिसननिम प्रोच्यापि मनम्ति पे, तेपो का समापन कमानिता प्रवम् ! ॥२५॥ व्यास्या-स०॥ सौरम्मपरिग्रास्य-सफरुसावपण्यापारमनपा पादिसा इतस्परस्प गरिनोऽपि-गृहस्पस्प एफापनादि-एकबारमनन यचद एकापनं तदादिप स्प धम् एकाप्मनादि, आदिसम्बाद निकितिकादि प्रस्पास्पातम् एकदा-पदिदिषसे प्रत्यास्याप-कस्मा फराचिद् विस्मरप्पेन न रक्षिसस्तस्य रक्षण न क षेद् मनः स्पाचदा हरि सीमोऽनुवापा-पपाचापो मषेत्-'बहो ! मया मन्दमाग्मेन प्रस्पास्वान भनम् । ये हीनापारिमा पदस्था- पदमारान् प्रिचार-सायाप्रविप्रमणे त्रिवार माव: प्रतिक्रमणे वि विविध, प्रिपा-मनोपाकापा-करमकारमानुमतिपर्वनेनेति, अनुदिन- निरन्तरं प्रोप्प-मुखे उपार्यापि ममन्ति वेपो सपक, सरयापन कर, पानिता की, मक! अपि तु न कश्चित् ॥ २३॥ रेनार्थम्पपतो पधारशिवे सर्वतुंम्ये मठे, मिरपस्मा पिपस्तूपशपना समिकापासनाः ।
सारम्मा अपरिमहा सविपयाः सेाः सकारमाः सदा, साधुवादविटा बहो । सिवपटा कट परन्ति प्रकम् ॥२१॥ म्याख्या-देषा० ॥ महो। इति मामये सिवपटा-वाम्बरा मत फर्ट- हासतया परन्ति-समाषरन्ति । फिम्भूताः ! मठे-स्वस्थाने निस्पस्पा:-नित्यवासिनः। कपम्मते मठे! देवार्थम्पयता-देवद्रम्पप्पयाद् यथाचिकते-स्वेच्छया विरपिते, सेच्छाचारिणो देमन्द्रम्प स्वस्पानेषु लगपन्ति । पुनः पम्मसे ? सर्परिर्तुरम्पे-भनेक मासिकागवाक्षादिकरणे पहरितुमनोहरे । पुनः किम्मतास्ते पुषया पवित्रा पार पाहतूल्यो-इसरतादिमया पाविशेपास्तत्र अपनाः । पुनः फिम्भूताः ! सद्गम्पिका पासना-पानगरिदकापासनाः, माविषम्यान्मसरकादिग्रहा । पुन: किम्मता ? पारम्मा:-आरम्मसदिताः । पुनः फिम्भूताः । सपरिणा-परिग्रहेण सहिता, पुनः किम्भूताः ! सविषयाः मिपपा पक्षप्रकारस्तेन सहिताः । पुन: सेर्पा, सहर्पया पर्यत इति सर्पाः । पुनः किम्वा सदा-निरन्तरं सकारखाः, सहकाहापा-द्रव्पादि पाछपा पर्यते ये ते सकाहाः । पुनः साधुम्पानेन-साघुम्छसेन रिटा:-लम्पटा इम, दुराचारदर्शनेन तेषां निन्दनम् ॥ २४ ॥ इस्पापुरवसोपहासबपसा स्मु प्रेक्ष्य छोक स्थिति, मुस्वाज्येऽमिमुना भपि भुतपचार मुम्पमातम्यते । मिप्पोक्पा मुरमोऽपि विप्रति ममः सम्भोगाप पेपा ननु सर्पयाधिमपयप्रस्पपिनोऽमी ततः ॥ २५॥ ध्यास्पा-इस्पा० ॥ सोका:-परवीथिकादयः स्पिति-दीनाचारिसामाधारी प्रेक्ष्य-विलोप इस्यापुरवसोपहासाथसा, इस्पादिपूर्वोकपिटादिप्रकारेण उसानि- उत्कटानि सोपहासानि-दास्पसहितानि पासि मेपा ते, पपंविधा स्पा-भषेयः, हास्य इन्तीस्पर्षः । मन्मे फेधन तपामाधार भूत्वा प्रमिला -स मुखा वाऽपि भुतपपात्- सिद्धान्तमार्गाद पैमुरूप परामस्तसम् आठवटे-ममन्ते । येपा हीनाचारिणों मिथ्पो उत्पा-मिष्यामापपेन ओ! अमी मन्ययावादिनोपयाकारिणः, इतिरूपेण सुशोऽपि- सम्पयशोपि पुरुषाः मनःसन्देहदोसापरु पिप्रति-पारपन्ति, सन्देह एव दोठा सपा पतम्, 'द सत्पमिद मा सस्प'-मिति सन्देहास्पदे मना स्यात् , ननु-निमित वेमी- पैस्यपासिनः सका-मुस्मास्सर्वपा शिनमतस्पर्धिना-जिनमतवैरिणा |॥ २५ ॥ ,
सपैमारकापटपटस। सरपुण्योपमा,
सम्पामा समस्वपिपुराषि-म्याधि-दुष्पमा।।
भूम फरमकारि मानसममु दुर्भागैमासेतुपा,
पौराम्पेम मियप्नुपा मिनपप पावसेस्य पाम् भवः ॥ २६ ॥
प्यास्या-सई०
० ॥ बम-प्रसिई पैस्यवासिपिहित दुर्गिस् बासेदुपा-सेम्म
मानानां मानसं-चित्त मून-निमित क्रम् भकारि-कसम् । केर १ बार-
समस्कटकालकटपटल।-मस्पग्रसपोपातिविपसमूह, सा-समस्त। अपुग्योषा-
पापराक्षिमिः । पुनः सर्पष्पासालैः-समस्ताशीविपसमूहः । पुना समस्तविषुरापि
भ्यापिष्टप्रह।, सर्व विधुर-कष्टम्, माधि:-मानसी पीरा, म्यापित-रोगा दुष्टाहास्तः।
एसे पमहादृष्टं तेपी मनः कृतम् । कपम्भूतानां तेषां ! दौरात्म्पेन-दुष्टात्म्पत्वेन
मिनपर-निनमार्ग निवस्तुस्ताम्-उम्छेत्तु कामानाम् । पुनाकिम्भूतानां ! वाघा-बाया
एप पास मार्गः' इत्पा-कपिलगां दुर्मार्गमपि ममार्गठया प्ररूपागामिति ।।
'मतः' इवि मिमपदम्-मस्मात्कारमात् ॥ २६ ॥
हाकारणमाह-
दुमवकरखुमाहमहामास्तोमास्तमी चमुची,
सियाम्सविषयो मिरम्बरमहामोहायहम्मानिनाम् ।
नयानो स्वयमम्बनासमहवे पशोपमामा सपा,
मिथ्याचारपती पोसि करते न सबनी करम् ॥ २० ॥
व्यास्या -दुर्भव० ॥ मिप्यापारबतां मिप्पा-विपरीत भाषारो मे से
मिप्याचारपतस्तेपा हीनाधारिणां पोसि-बास्पानि सकों-विद्वान् क प केन
प्रकारेण हलवे अपितु हीनापारि धर्मोपदेशवास्पमपि न प्रोतम्मे कमवाना धर्मेद.
दुर्मेदो-तुरुन्दा स्फरन्-दीप्त उग्र-उस्कटो पाहा-कदाग्रहासएप समस्तमोऽकार-
पटस वेन वस्त माच्छादित पीचा-चानलोचन येषां ते । पुनः कपमताना सिद्धांत
विपता-सिदारियां पुनः कर्ष सूतानां निरंतरमहामोहान्-निरवरमहामोहनीय-
कर्मणा साक्षात् भामानिना-प्रमिमानपवा पुन: कि सपमात्मनानटाना-प्रारानां
पुनः कषभूतानां सदा अन्य नाभनकतन्यशकगप पोपमाना-कतोपमानां सर्व
नटोन्यामाषपति इति मतएप तेपो वषो न भोतम्पमिति ॥ २० ॥
. पतिप्रितिवर्ष पवम्यनुपि पाठोपयोकोचरो- चीर्ष पर मबहेतरेप मविनों पण्डामपापाकरम् । वचटर्म इति गम्ति पियो गास्वदईग्मत,- भाम्मा मम्ति पहा! दुरम्तवनमामर्यस्प पिकम्तिम् ॥ २८ ॥ पाल्पा-पस्किमि०॥ कृषिपा-फुपपितास्तच पस्तुधर्मरूपसया पनि, तस्कि ! यत् किं सत्रार-प किंचित विपन मलीक भेगिकरावरोहरणबदनादि पदापि अनुचित भयोग्य पित्रापुरेक्षेन पात्राफरणादि अपवा मिनमदिरे उरमीडादिममोग्यं, यद लोकलोकोचरोजीर्ण-लोकलोकोचरमार्गत उचीर्ण पाम स्वफगृहे मिधामहगादि रमसलापूमा, दीनजातिम्या परमेष्ठिमन्त्रपाठन दीक्षण बेनेन्द्रप्रतिमाकारण च, तपा या मपिना-मम्पाना मवहेसु:-संसारदेसुः । एवं निभयेन मिनमन्दिरे बसीरादि पत् शासस्य पापाफर-सिदान्तमिरुवम् भाषाकर्ममोमनादि । भय भावणाधिक पप्प पापा भष्ठीवितमे हि विपानम् , इस्पादि धर्मतया प्ररूपयन्ति मृग-मूर्खास्त भई न्मचान्स्पा-मगर मतम्रमेण सान्ति-स्त्रीहन्ति शुकिशकले रनसवत् । 'हा' इति सेदे तुरन्तदनमाधKस्पटासंपतमासक्षषस्य विस्फर्षित-विलसित पश्यतेति ॥२८॥ कट नष्टविझा मुणों पपरसा बासम्यमिक, कान्वारे प्रविसस्यमीप्सिसपुराप्पान किलोसम्परा । पवलावर तु सोऽपि मुसा सम्मार्गगारवरिष- स्वाक्यानपचिमो इसति पस्सापनमज्ञानि च ॥ २९ ।। प्यापा-कष्ट० ॥ यस्मास्फारमात् फिलेवि सत्येन नपा-मनुप्पाणां चास्य न्यदेक्षिका, पास्या-अमना मपा-नेत्रविफल , स पासौ पैदेशिका-विदियोपमः। एवम्मतः कमित् काम्वारे-मटप्पाम् ममीप्सितपुरावानम् , अमीप्सितस्प-पष्टस्य पुरस्म अधान-मार्ग प्रदिपति दर्शयति वस्कष्टम् । कपम्भूतानां नृणां ? नष्टदिशा- विष्म्गनाम् । पुनः पम्मताम् । भरा-रटिविकलानामन्या-नाम् फयम्भूतो बारप पदचिका ! उस्कन्परा-ऊपीरुग्रीवा, यो मार्ग दर्शयति स ग्रीवामी करोति । सु-पुनः एतद् फटतरम्-प्रतिश्पन कर, वदा-सोऽपि वास्लम वैदेशिका पद-पस्मात मुरमा-मुनेत्रान् पुरुषान् इसति तरकष्टतरम् । कपम्भूतान सरकार सन्मार्गगान्-शोमनमार्गगमनशीलान् । पुना फपम्मवान् । तदिदा-शोमनमार्गगमन पावन पुना कपम्भूतान् ! तापाननुवर्तिना, सदाक्य-वास्य मासे अनुपर्धिना- , . न प्रवर्षकास्तान् । कयं इससि ! सत्रार-सापह-साकारम् अहानिप-प्रसानिए, पपा मवा इसन्ति तथा सोऽपि इसति-प्रो! माक्पेन गच्छति। एतत पर पचस्प मार्गदर्षन व कठम् ॥ २९ ।। सैपा हुण्यपसर्पिण्यनुसमवासम्पमावानुमावा,- विशमोमप्रदोऽयं सखनममितवर्षस्पिविमस्मराशिः। मम्स्य पापर्यमेतमिममवरवये तरसमा दुष्पमा पे,- स्पेष दुष्टेषु पुरेपनुकम्ममुना दुश्मो मेनमार्गः ॥ ३०॥ प्यास्या-सैपा० ॥ मा एपा-प्रत्यक्षा गावसर्पिणी-हुणसस्थानेन सहिता- असर्पिणी-एतत्कालः । कपम्भूता ! मनुसमपाइसमयमाषानुमावा, अनुममर्य-प्रति समयं प्रसन्ता-दीपमाना: माया-प्रपाना!, भाषा:-पदार्पास्तेपामनुमावा-प्रमाको यस्यां सा-मनुसमयाइसम्पमाषानुमावा । च-पुनः त्रिशा-धिनयमोऽय मस्मराषि रुमा उस्कटप्रहा। फमम्मका ! एकराठौ ख-स नलमिवरस्थिविर, सं सं-पूनम शून्य नसाः विशतिस्ता मत(२०००) पर्पस्थितिा-मशना पक्रगस्या दिसहमवर्ष स्थितिः । च-पुनः एवम्-प्रत्यषम् भन्स्यमावर्पम्-असंपतपूबारुषग तरसमा पूर्वोक त्रिरितुस्पा, दुष्णमाकाठमेदा, निनमतहसपे-मिनमवहानिकरमाप, इस्मे पर्ने दुशेष-अशुपु मनुरुलं-निरन्तरं पुष्टेषु सरस मधुना मेनमार्गो र्समा । एकस्पापि वैरिका पोरे साघुरादिर्न कप पम्प पोपे मैनमार्ग पशिः १ ॥ १० ॥ अथ गुणि पपीहार दर्षयति- सम्बगमागेपुषः प्रशाम्तवपुषः प्रीतोडसामुपा, मामम्मसिमुपेयुषः रमपमुषा करुयप्पा । सिशाम्तापनि वपुषा मयुपासत्पूरमतो बग्मुप सरसापून बितुपा मणः सतुषः साम्बन्धि नोपयुषः ॥ ३१ ॥ ग्याच्या-सम्यग् ॥सठा -बनाः स्मवासिनः सस्सापून्-शोमनानन गारान् न पाम्पन्ति । पम्मतान् ? सम्यग्मार्गप्पा-मार्गपोपहान् । पुनः पिविष्टान् । प्रशान्तपपुपा-प्रशान्तस्यस्पशरीरान् । पुनः कपम्मतान् ! प्रीते सहमती पापी मेगा व पान् । पुना किम्मवान् ! भामग्पर्दिचरित्रसमनिसपेशपा-माप्नुपन्तः । पुनः किम्मवान् । स्मपापा, स्मपम्-माहारं मुप्णन्तीति माहारविरसारिया पुनः , . किम्भूतान् ? कन्दर्पधप्पा-कन्दर्प एर कई-भुप्फतण त प्नुपन्ति-दहन्ति ये है। पुनः किम्मवान् ? सिदान्तामनि-सिद्धान्तमार्गे वस्पुपः-स्थितन्तः । शमयुप:- उपपमयुकान् । पुनः किम्भूतान् । सत्सून्पा-सिवकिपम्पस्वं मसपा-माप्ताम् । पुन: विदुपा-दधान । भय कीशा स्वताः ! दुपा-विहितदोषाः । पुनः किम्भूताः । उपपा उपन्-प्रस्टीमवन् रूप-रोतो ये वे, एषम्भूता, गुणिपुरेप बान्स्पेष ॥३१॥ देवीपस्पुरोपिणा मतमहारोपानदेवीपति, सजीपति मूर्ममुपपनिया वास्वपमहीपति । उम्मार्गीयसि ममार्गमपप सम्पग्पपीयस्यहो, मिप्यास्वपहिणे मनः स्वमगुणामण्य हसायति ॥ ३२ ॥ प्याश्या-देवी० ।। 'महो?' इस्पाप मिथ्यास्वादिलो बना-मिप्यास्पेन गर्गीवो छोका, एष रूस, त्राह-उरुदोपिणा-प्रासदोपयुतान् देसीपति-देखतपा म पते । अप धतमहादोपान , पता:-(विनाशिता महादोषा यैस्त वान् वीतरागान् प्रमस्थेन अदषीयति-देवतया नाङ्गीकरोति, पुनः मूलमुम्पनिपा-संप्रभानसमूह सर्पशीपति-सर्वक्षतपा मन्पवे, तब-सत्वज्ञापारम् अपीयति-अन्वया मन्पते । पेनमार्गम मार्गीपति । पुन: अपप-कमार्ग सम्पक पपपति-समार्गवया मन्यते । अगुणैरप्रर्प-निर्गणप्राधान्यं सम्-आरमान कवायति गुपचपा मन्यते ॥ २२ ॥ सामाकरस्पष्टपतिवस्याम्वस्त वाम्पत,- स्वम्मुद्रारपाझवापनपता अकरम न स्पम्पितम् । मुम्प कस्सिवामधीस्तपसोऽप्येतस्कमस्थापिना, साम्पाप्रसस्य अमर रिममावस्म मोहा इस 1 ॥ ५ ॥ प्यारूपा-सहमा० ॥ जन्तुहरिगमावस्प, अन्त:-मागिनो भम्पास्त एष परिणा-मृगास्वेपो माव-सम्हस्तस्य-मध्यमनमृगसम्हस्य मोक्षा-सक्ति पमपि तु म। कपम्भूतस्प बन्नुहरिणवायस्प ! सहम्पाघ्रपाठस्प, सह-दीनापारिसमाया, स एम प्पाघा-मृगारिस्तायस्प-पसीमतस्प | यथा म्पान-वक्षस्य हरिणस्प मोक्षा-छुटन न सपा सम्पाप्रवनस्प मम्पहरिणस्य सक्तिगमन न । कपम्भूतस्प अन्तुहरिणमातस्य ! सहवासस्पटपवितस्य, सदस्प-शिलिसमदायस्य दानाय सतानि सवारुतानि पानि घरपानि-मिनमरनानि भावनिर्माप्प सिनिम्यो दचानि, दर 'पा' प्रस्पपा, . ३ तान्पेष-पैस्पान्येष इटा हरिणपन्धनपत्राणि सत्र पवितस्यान्पस्य मगस्प घटे पक्तिस्म मोषा मष्टेन । पुनः कथम्मतस्य ? तराम्-अत्पर्यम् अन्ता-मम्पादये वाम्पता-सेदाता 'कवाछटिप्पे'-मिति सिपमानस्प । पुना कपम्भूतस्य । वन्मादूरपाषा पनवता, वस्य सहस्प मद्रा-मर्यादा अस्मस्य एष समागन्तम्म-मिति, सैव -निपिरो या पातस्तस्प पपन यस्य स तस्यान्यस्य हरिणस्य दपरिकादिनिर्मितविपिन पाशे पतितस्प मोषो नेति । पुनः फिम्भवस्म ! सन्दितु-पलितु न शकस-1 समर्षस्य । पुनः किम्भूतस्प मम्पयन्तो ? मुत्री-पुरुप करिपतदानधीलतपसोऽपि कस्पितम्-माचरित स्वारसा दान भील सपो येन वस्प, पपपि तपाप्रति सम्पर्क फरोति तथापि न मोषः। पुनः फपम्मूसस्प ! एतत्तमस्थापिना, एवस्य-साम पाकमा-परम्परा तत्र स्थापिनः । परिणपक्षे एपस्य समस्प महारार्थ सजिवा प्रम:- चरणस्तत्र स्थायिनः पादपतितस्पेस्पर्पः ॥ ३३॥ ॥ इति द्वारवशक म्यास्पातम् ॥ पुनरप्पा- स्वं मिप्पापमपनया सध्ययापीर फपिन्- मे मासीनुचितममो मा अपलोऽपि पस्मात् । बेनप्राममा अपपतिवार मेस्प मुस्तामोहरा, पोहाय किमपि उपपा कल्पिले पस्सिव च ॥ ३४ ॥ प्याल्पा-रस्थ० ॥ इत्यम्-अपना प्रकारेण सम्पयाऽपि-सस्पपापि मिथ्या पपकपनपा, मिथ्यापपस्प-दीनापारिमार्गस्य सपना-प्रकटना तया, हा प्रापने कमि समिनमासनस्पा मा इद पासीत्, यदिदं परदीपोत्पाटनम् मनुषितम्-अयोग्यम् । मयो-जयपा कोऽपि-कपिदपि मा छप्पा-मा पुग्यते यत् 'किमनेन रागोपवासेने'- विकोप-रेप मा करोतु पस्मारकारणात् नम्रान्स्पा-चैनमार्गममेण पपपति वान रूपये हीनापारीप्ररूपिते पठीतान् नन्-नरान् प्रेक्ष्य मय वरप्रमोहापोहाप, सपा-बन्ना प्रमोह-मशान तस्यापोहा-निराकरण तस्मै, तन्मोइनिराकरमाप इद-प्रस्पक्ष किमपि किम मात्र रुपपा-दपया 'महो। ममी पराका कप मविप्पन्ती! सि रुपया कस्पित- प्रोत प-पुनर्गस्पित-प्र परपनपा प्रारम्पं न त रागपाम्पामिति ॥ २४॥ तत्र कारणमाह मोरवेऽमन्तभागकछिमनिरपे नाम नेपध्यतोजन, मार्गमास्ति पानेऽप पवामिमरे वालोऽस्मिम् दुरणे ।
कारण्यार प लोप भूप निरसिसिपुर्वोपसम्म वियमे, रम्मोऽम्मोपेः प्रमिस्सेत् स सफगगनोजान पा पिपिरसेत् ॥ १५ ॥ म्पास्पा-मो० ॥ यः पुरुषः भस्मिन् दुरचे-दृष्टमार्गे हीनापारिप्रसपिते दोपसमयाम्-नपचया दोपपरिमार्म पिपवेदनकुमिच्छेद स पुरुपः मम्मोपे:-समवस्य अम्मा-पर्स प्रमित्सेद-प्रमातुमिन्छन् या-अयमा सकलगगनोल्लन-समस्वाकायस्प पदम्यामलान पिपिस्सेत् कर्तुमिच्छेन् । यथा समुद्रमतमानम् भाकालदर्न कम शप तथा हीनापारिदोपसरस्पा पहुं न पार्यत इति । कयम्भूतः १ या कारुपात्- दपावो मधु-नरेष इयोप-कृतसमान निरसिसिपुर-मक्तुमिच्छा । कपम्मूते दुरये ! मनन्तकालाव (-अनन्तकालेन प्रोमूते-संभावे । पुनः किम्भूते ! कसिमलनिठप-पाप स्पाने । पुनः किम्मते ? नामनपप्पता, नाम्ना नेपप्प-वेपस्तस्माद नाममात्रक्षेप पारणवोन्मार्गम्रान्ति माने 'बो! ममी षेपमात्रपारका मपि सापा'ति मान्ति निमायके । अथ प-पुनरपि तमा-परमाता-तमिमरे, सस्प-न्मिवस्प अमिमरे-पात के चौरमाये, पषा पौरा। मम्छमाया पेपपरापन रामादिक मधि धथा एतेऽपि लिङ्गमात्रपारकत्वेनाभन्मार्गपातका एषेति ॥ ३५ ॥ न सापयाम्नाया न पल-शीरोचितपति, हियामुम पुष म मर-ममता-जीवनमयैः । न हिशापेक्षा मामिनिपेशा म कपट,- पिया पे तेऽपापि स्पुरिए पतपः सूबरतपः ॥ १६ ॥ प्यासपा-न सा ॥ भवापि-साम्प्रवमपि इह-भिनपासने पतपा-सापना स्था य एरिपाः । किम्मता १ न सापपाम्नाया:, सापपा-सपापा भाषाफर्म- मोमनादिरूपम् माम्नाया-परम्परा पा से क्या पत्पपासापानापमन्तो य नेस्मयः । पुनः किम्मता पाइसीलोपितपति-फ्रियामुक्ता न, बह-समलम् मविपारपरेन पारिप या पहना, इस्सिा पीछ-परम पा सरुनीताः, पापिता-पोग्या पा पतिक्रिया-साघुसामापारी तपा मुका-वियुका न पे वार पशमीलामियान्वस्ते पुना मसापक एप, पकशकशीले दि पापरिसित्प" इविषपनात् । अत्र पर निप्रपा-पट-मीठ-पुसाक-निर्म प-स्नातकमेदान् । बारा द्विरिपा उपकरण-देहमेदाद । ये प्रस्पासचिमन्तरणापि कदापि पखादिकं पावि सस्या पचादि विषन्ति, कदापिस्परिदपते, पापदरापपि पटवेसादिप्रथमोस्पादित २० . तेमस्कप पारयन्ति, उपकरणमप्यतिरिक्त पार्थ पन्ने के उपकरणवशाये करपरम नसादीन् कदापिभिनिमित भूपयन्ति से देखताः । इमे शिषिपा अपि हिप्पादि परिवारादिको विभूति सपापाणित्यादिप्रमव व पाला प्रार्थयन्ते, प्रमोदन्ते छेदाामाति परिर्पमिः परिता अपि कर्मक्षयासपता इस्पादि । कुनीलो द्विविधा भासेपना कपाय मेवात् , ये मानदर्शनधारित्रवासि किभिपजीवन्धि से पासेपनाषीसा, ये झोपादिमिः कपाय-नाविगुणान् पिरापयन्ति ते कपायकक्षीला मूलोचरगुमविराधकाम पनिम्र थमम्मे केऽपि । पश्चानां विस्वरतः स्वरूप भी भगवतीसम्राविम्ब हेयम् । ननु ये एवं शिपिसक्रियायुकाः फसितकशा उपकरणमारकाः मोचरगुणविराधकास्ते निर्ग्रन्या कप पा स्वरूप केन प्रकारेण ! इतिघेदुम्यते-एसेपों कर्मण्यता वार प्रवाह मार्गेम नास्ति किन्तु कदाचिन्महवि कारपे बाते पावनादिका निया, इवि, मसगुन विरापन घ मनम पिरापनादिप्रकारेपेति रहस्प सदा सस्कर्षम्यता मास्तीति ।। पुनः किम्मता: १ मदममताचीमनमयः, मदो-गी, ममता-प्रतिभा, मामीपनमप मिषापा बीविकामयं, तैर्मदममसामीपनमयः न युक्ताः-न स्पृष्टाः। पुनः किम्भूवान संधस्प-रौद्राम्पासायस्प आवेशा-उरों मेपी से न संश्लेशावेशाः। पुनर्न कद मिनिवेशा, फन्-त्सिता ममिनिवेशा-कदाग्रहो येपी थे, सया कपटप्रिया-माया पछमा न पुनः किम्भूतानतया एत्रे रतिर्येपी से समरतया-सिद्वान्तरुषपः ॥२६॥ सविनाः सोपरेसाः मुतनिकपविदः क्षेत्र काणयपेल्या,- ऽनुपाना शुखमार्गप्रकटनपटन प्रास्तमिवामवादा।। पम्पा सस्सापोऽस्मिभियम-सम-मौरिप-गाम्भीर्य-पैप,- स्वागयोपोविनय-य-पा-पक्ष्य-पाक्षिण्यपुण्याः ॥ ३॥ प्यारूपा-संपिना० । अस्मिन्-प्रिनधासने पवम्भूता सस्सापा-बोमन- मापयो बन्पाः । किम्भूताः । संविधा -मोधामिलापुकाः। पुनः किम्मता ! सोप देवाः, सा उपरशेन-धर्मोपदेशेन वर्मन्त ये से सोपदेशाः। पुनः किम्भूता भुवनि कपविदा-मुवमन-शानमेष निकपा-कपपस्तविदा-भागमहस्पनिपुणा । पुनः किम्भूताः । क्षेत्रकासापपल्यानुष्ठाना क्षेत्र-कासापपेप-चप्रमालापनुसारि, मादि शम्दानगरपसादिग्रदः, मनुठान-फर्चप्पता या वे ट्रम्पपत्रकालमापानपत्य किया कर इति । पुनः किम्मता ! शुभमार्गप्रकरनपरया, शुदमार्गस्य प्रकरने परया- सारपाना । पुनः पिम्भूता! प्रास्ता -धीवा मिष्पाप्रमादो पेस्ते प्रास्तमिप्पा . "
२१
.
"
प्रपारा। पुनः किम्भूता! निपम, नियम -अमिनहरा, शमा-उपशमा, दम:-
इन्द्रिपञ्जया, औचिस्प-योग्यता, गाम्भीर्यम्-अलक्ष्यविकारत, ये-पीरस्व, स्पेये--
पिसृष्टकारित्वम् , औदार्यम्-उदारत्वम् मार्यचर्या-सरपुरुषप्रापिा, विनया-सम्पु
स्थानावि, नया-न्यापा, दया-कपा, दक्ष्य-धर्मक्रिपानासस्प, दाक्षिण्यं-सरलता,
एमिर्गुले पुष्पा:-पवित्राः ॥ ३७॥
स्पनामगर्मितकाम्ममाह-
विभाजिष्णुमगर्षमस्मरममासाएं मुपोमाने,
समानपुमणि बिनं परमपुर-पीचमिकामेघरम् ।
बने पर्यमनेकपाऽसुरनरे, सोम पैनमिा,
एम्मारि विदुषां सा सुवचसाऽनेकाम्तयारम् ॥१८॥
ग्यास्या-मिना० ॥ बिन-वीर्षकर बने । किम्मत मिन ! विमाविम्यस्-
भतिषः शोमापमानम् । पुनः अमर्षस्-माशाररहितम् । पुनः अस्मर-कन्दर्परहितम् ।
पुनः किम्भूत भुतोहाने-सिमान्ताधाऽतिकमे बनातादम् , माशा-मनोरप ददातीति
भावादा, न माशादोऽनाशादस्वम् । पुनः किम्भूत । सम्बानमणि, सज्ञानेन प्रपान
केवमानेन घुमणि-सूर्यम् । पुनः किम्भूख ! परा-प्रपाना बपुरमी:-परीरफान्तिा सैव
पन्द्रिका-पोत्स्ना वया मेमर-नपानाप चन्द्रम् । अमरनरे:-दानबमानः सकेग-
इन्द्रेप अनेकपा-मनेकप्रकारेण पर्य-वर्णनीयम् । पुनः एनपिछदस्, एना-पार्प
छिनचीति पापप्लेनकमिस्मनः । पुनः दम्मारिं, दम्मस्प-कपटस्प अरिस-वेरी दम्मा
रिस्तम् । पुना विदुपा-पमिताना सदा-निरन्तर सुवचसा-मुगारमेन भनेकान्तरमा
प्रदम् , अनेकान्त -स्पाद्वादस्तस्प रहस्त प्रददादीति भनेकान्तरणमदस्तम् । वपनेन
मगवान् स्पावादसे मम्पपन्तीति । कमाषसम, पथा मापकाम्मे चामन्यवया पर्यवे
तथाच घममाषतुस्यं पका 'लिमपल्लमेन गणिनेदं पफ्रे' इति नाम पर्वते ।
परस्पापमा मसिदैव ॥२८॥
.
लिमपतिमदुणे ममता साफ,-
पिपयिमिरमिभूते भस्मकम्पसम्पः ।
समसमाबमाना श्योग स्था,
स्थितिरियमपुना तेरमपि स्वामिनी ॥ २९ ॥
-
પર
ग्याल्या-जिनपतिः ॥ से-पैस्पपासिमिः इस सामन्तस्विवि-सम्म
मर्यादा मधुना-साम्प्रवम् मप्रवि-विस्तारिता । कस्पा सार्वसिस-सोदरमरणप्रयो
बनाप । कपम्भवा । सपशवरवनानां, सपठार-आत्मवता ये पगा-मा बना:-
लोकास्तेपी भूपता इस 'बस्मान् विमुष्प नान्यत्र गन्तम्पम्' एवं शा।
सति ! साधु-साधुवेपमाप्रपारकैस्वैरेष फालता पत्रमारकात् मिनपतिमनदुः
ममिमते-पराभूते, बिनपतेः-तीर्थकरस्य मत-शासनं तदेव दुर्म:-कोहविशेषस्तस्मिन् ।
कपम्मतः । पिपयिमिा-विपपसेवकैः । पुनः किम्भूतः मस्मकम्सेप्छसैन्पः, मस्मका-
मस्मग्रह एष म्लेच्छा-तुरफाधिपतिस्तस्य सैन्याः सैन्यस्वरूपास्ते, पषा तुरणाविपते
सैन्यं भवति वषा मस्मफास्ते सेन्पा इति ॥ ३९ ॥
सम्पत्यप्रतिमे इसापपुषि प्रोणम्मिते मस्मक-
म्झच्छानुसार हुरम्पतमामय र विसर्विते ।
पौरि जम्मुषि मोहनष्ट छोरत्ववाहापर-
रेकीभूप समागमस्म कायाऽपीत्वं करामहे ॥ ४०॥
॥ इति भीसहपढकसूर्य सम्पूर्णम् ॥
ग्याल्या-सम्म० ॥ लोयम् इरपम्-असुना प्रकारेन कदमिरे। या
सदागमस्प कषयाऽपि, सन्-प्रपानः भागमा-सिदान्तस्तस्प सदागमस्प रुपयापि-
रुपनेनापि । पदा घरमार्गस्प कपाऽपि नियते तदा लोकाः कदर्पना जन्तीति ।
क सति । सम्प्रति-मधुना भस्मकम्लेच्छातुम्छाले मोन्मुम्मिते, मस्मका-मस्मदा,
स एव म्लेच्छा-तुरफाधिपतिस्तस्य मतुम्छ-प्रपुरै बलं तस्मिन् प्रोन्मृम्मिवे-प्रोपीते
सति । कथम्मवे पले ? मप्रतिमे-महातेमसिनि, पुनः कपम्म । सा-पुषि,
इसदा-दीनाचारिसह एव यपा-भरीरं यस्प स तस्मिन् प्रत्यक्षतो एयमानइसारीरे
प-पुन: पुरन्तदक्षमाप-दुष्टासंयतपूमातषणदयमापर्ये विस्फमिते-प्रकटीमवे सति ।
कमिवरमा दसमावर्षस्य पञ्चमारके प्रादुर्मापा । पुनः मोहरामकटके-मोहनीयकर्मम्प
रामसेन्पे पौरि-विस्तारस बसपि-प्राप्तपति । मस्मरूपापस्यपास्पादया सर्वेऽपि मोह
नीयसेन्यरूपा एक । हिंसा फदामहे ! एकीम्प-एकपधा कस्वा । कसम्भूते-
सो! सदामापरे, सम्प-मोहरायस्प भामा, तर पराा-सापधानास्ता-मोहराया
पलिमिा । संसारस्पनगरे मोराजा दुस्साहस्सस्य से प-मस्मग्रहो महासामन्तो
पसमाप दितीया सामन्त इति रास्पमिति सम्पार्थः ॥ १० ॥
प्रन्धकारमशस्तिा भीमस्वरवरगळे भीमविनमसूरिक्षाखावाम् । भीपप्रमेहमगुरु–म्मेवार्यलयमुरे दुरि १ ॥१॥ वमिम्मो बामतिथि, भीमम्मविपर्समो गुरुर्गीपात् । भीमेडतिम्मनामा, वस्त्रायमकस्पिका समभूत् ॥ २॥ वभिप्पो प्रबरगुणो, पापम्ससदणिप्रमाणुमणिम् । भमरमाणिक्ममुगुणा, समस्तसिखाम्तधोरेपा ॥३॥ पपिप्प मुविहिवा, मुगमेमं सामुगिपिनाऽपि । एकोनश्मिसेमविक,-योग्मसंवत्सरे प्रबरे ॥१॥ मापमासे छापणे, पचम्पां प्रपरपोगपूर्णायाम् । पियुष प्रपपमाना, समस्वमुमाविमी भवतु ॥ ५॥ ॥ इति श्रीजिनवष्ठभसूरिकत-सपाषचूरि सम्पूर्णा ॥
विषा िभीबिनमहमहरिपिरपिता पनिवलक्ष्मिसेन विदितमा लामो
मिपया ग्रास्यासमाया।
सङ्कपट्टकः
इन्दीवरप्रममनिदिवकोविज्ञावि-
पामावि मुरवरैः किए वासपापैः ।।
श्रीममिनेशचरणं तरणाव सपः ।
सबमा नमत संहावाम्म चिन्ताम् ।। १॥
गम्मीरागसत्पदरते. मीसंपपामिष,-
पम्पस्पास्प बमाम प्रकुलते टीका फुयामिपाम् ।
मम्मीसेनमुपीः मुधीरनिषा प्रीस्पै चिनेसममोो
पारामा-नम्प सम्मति रवि भीमाम् हमीरात्मनः ॥ २॥
सत्र तापदायमोकार्यविवेपनमारम्पसे-
पहिवामपसी सपमपनपीमातरस्वोकटोक ॥१॥
ग्यास्पा-वहिरिति- देव-पार्थनाप पय स्तुमा-प्रणमामा | को
देवः इति मगादेव-उक्तमानिष इति, कि ? प्रा-पण्ठित सपा-तस्वबारेच इमार्ग-
स्वसन कार्य-कम्य, सिदान्तविरुदमयनिगार कर्सम्प-मिस्पः । किस्सा!
स्वस्प मारमन: विषुरमपि प्रपप । मपि सम्मापने कोऽयी मार्गस्खलनाइ पदि
बारमनो विघुरमपि किविद् मपति तचापि इसि । हिन् उक्तवान् ? फमठमनिवपा
उप-मतिश्चयेन दुष्ट प्रकटपन्-प्रष्टी छन् । को कमठनामसापसस्तावदेकर कमि
चपसी पनामि नाम सपा कुर्वन् पार्थनायेनावठोकित, तस्प सत् सपो मगमता दुई उस
मिस्पर्पः ।। किंवा ! असिसठोकस्यग्रे गलस्काष्ठमध्यात्सर्प सन्दर्य, न फेवलं बक्षिस
लोकस्पाने मातुर्वामदेग्पामा पामादेषी मगवन्माता, सस्पा मपि पुरतः इस्पा कि
विशिष्टं नाग ! " मग्निनासावली" भग्निशिसाका लिव-अदरम्प मिस्पर्यः कसम्मको
पा परमेश्वर ? मार्गछेवनपरियुक्तः । पुनः कथम्भूतः ! कारुण्यामसाम्पिा-कपा
पीपसागर॥ ॥१॥
भीउपदेशमणनयोग्प भोसारं निरूपितुमाह- कस्पानामिनिमेशवामिवि गुणामाहीति मिथ्यापया ॥२॥ म्यानपा-कल्पाणामि०-भोवा चतुर्दशगुणा, भोपशम्दा। सर्वेऽप्यत्र हेवाः । मप सोकानय -मो भोता! मया प्रन्यका समन्पसे-कप्पसे कथमिति करपाणामिनिवेशवानिति, कोयः शुमरूपानावान् शोमनस्य रूपस्य मानहो विपते भस्मेति स तपा। पुनः कपमिति गुपग्राहीवि गुणग्रहीतु शीलमस्मेति गुणग्राही । पुना कयमिति ! मिष्पापथप्रत्यर्थीति पषा-छन्दः प्रपितोस्सूत्रमार्गस्तस्प पिरोपी, पुनः कपमिति । मिनीत इति मनुस्लमान इति, अर्पाद् गुईदिए । पुनः कपमिति अमठ इति अपूर्व इति । पुनः फपमिति १ बौषिरपकारीति-उघिसस्प माप औचिरप, तर कतुं श्रीतमस्मेति । पुनः कपमिति ! दाक्षिपीति दाधि पयुक्तः । पुन, कयमिवि ? दमीति-मितेन्द्रिया, पुना फसमिति ! नीतिमदिति-नीति विमर्गीति नीतिमृत्- सदाचारपरापप इत्यर्थः पुनः फयमिति ! स्वैति-स्यैर्यगुणयुक्ता स्पिर इस्पर्वः । पुनः कपमिति ? धैर्याति-धीर इस्पर्थः । पुनः कपमिति ! समर्मार्थीति-समां पर सपर्म वस्पार्य, सोऽस्पास्तीति सोमनपर्मगोपः। पुनः फसमिति ! विवेकवानिति- युमायुक्तविषारपतुः इस्पर्यः । पुना फसमिति ! सुपीरिवि प्राय इस्पर्यः ॥२॥ इदानी युग्मश्लोकयो-र्यालयानमारम्पते- इह किस कमिफारम्पावत्राम्पराग. ॥३॥ प्रोस्सी मामरासिमहसतरसमाचर्यमामाग्पपुप्प. ॥ ४ ॥ व्यापा-पह• ॥ प्रो० ॥ “फिलेति " प्रसिद्धिः स भगति रिपपिभिः सरुपन्दनपनितादिसेपिमिा अमिता-समंसात् । सोय पया मप्रार्षि-प्रार्षिसः-फपा पिता। कपम्भवा पपा ! विनोक्तिप्रस्पी-पेनशाखविरोपी, कस्मिन् सति । प्राणियगे बीपसम्हे मैनन्द्रमार्गे-निनशासने विरला-मुठा याति सति, पम्मूते प्राणिवर्गे ! कठिफालम्पालबक्रान्तरास्पितिपि । कतिकाल एष व्यास:-सर्पस्तस्प बन तस्यान्तराम-मम्प तत्र स्पिति:-स्थान, व्द मुफ्त सेपसे या तस्मिन् । पुनः कपम्भवे प्राषिबगें ? गतवत्सप्रीविनीतिप्रपारे । गौ-नौ हामप्रीतिनीतिप्रभारी पस्प सस्मिन् , यानी प्राणिवर्गे तस्वप्रीतिर्नास्ति । नीते प्रपारो पबहारम नास्तीस्पर्पः।
पुनः कपम्भवे । प्रसरदनबोधे-प्रादुर्मपत् सम्पसिहान्तापरिक्षाने, फो
सिहावार्यसम्पग्शानरहिते । पुनः कयम्भूते ? प्रस्फुरत् कापपोषस्पमितसुमति-
सर्गे उन्मीसन्ता-प्रकटी मषतः ये मार्गा-कस्सितमार्गाः ते स्थगिता-तिरसतो
रुदा-अपवर्गसधणाया। सुगतेः सर्मो-निम्पचिर्पस्प तस्मिन् । कथम्भूतः सारे।
विषयिमिः। संविएशिष्टम्पसमनामनाम्नायरको । सो समानधर्मबनो
पतापकारि-मस्सरियोपादेपविमर्शश्न्पप्रकपिएनः इरिचतुर्विध संपा, तस्त्रा
म्नाया-शिम्पप्रशिम्पादिसंवाना, तत्र रका-प्रीतिमता, ते । पुनः काम्पते।
साधु-सन्मुनिपिपारिमिः कथम्भू चैनेन्द्रमार्गे ! 'प्रोत्सर्प 'दित्यादि प्रोन्नृम्म
माणो मो मस्मराधिनामा प्रवाहा, तस्स सला-मित्रम् , असपतपूजास्पं रिपुविजय
पुरःसरं मानेपर्य गईमान अवस्थे तत्वप्रतिपपमानरूप यत् दक्षमापर्य तस्प साम्रा
न्पेन-प्राचुन पुप्पन्भाइर्मवन् मिथ्यास्व, तदेव माव-समिन सेन पावे ।
मम्पोऽपि मागों पपपकारातो मवति तदोच्छमसा यास्पब ।। ३-४ ॥
इदानी योग्यस्य भोतुः पुरतो घुर्तकरिस्पते पपि दशमिरिस्ता निरपि धर्म
प्रतिपादयन् वस्य धर्मस्प फर्मनिर्मसन सामर्ममर्स माग्यबार-
पत्रौदेशिकमोबम बिमारे पासो बसस्पक्षमा- ॥५॥
प्पासपा-
.
-" यौ०" पस्मि मार्गे औदेशिकमोपन, कोः १ यतीन् मनसि
हस्सा निष्पादितं, निनगृहे पासा-महद्भपने सर्वदा निपासा, सत्यधमा-गरम
गरे पास प्रति मात्सर्यम्, अर्प गृहस्थत्पसदनेषु स्वीकार-व्रम्प भारबिनगहेड
यहीकारा, मप्रेषितापासन-पापा अष्ट-मासनम्, सावपापरिवारा-सपाप
पदापरितं, तस्माद, भुतपपापना-सिद्धान्तमार्गस्यानादरा, गुणिोधी-पति
पशिश, इति दशद्वाराणि । एतैर्दशद्वारे प्ररूपितो धर्मः । अत्र-असाघुकरिखते पषि
कर्महग्मेद् मोव-कर्मभपकारी मषेत् तदा मम्मी-समुद्रे मेहस्तरेत् । पदा मेला
समटे रवि तदा एतस्माद् पौद मोमो मावीपर्य। ॥ ५ ॥
साम्प्रतमेवेषामेव दशद्वारागा पपाक्रम प्रस्यास्पाने पिकी प्रथम पायजीवोप
मर्ददोपल्टपा औदेशिकमोमनदारं निपेमार-
पट्झापान पमर्थ मिरंपपपीनापाय पत् सापित..॥ ६ ॥
RE व्याख्या-पद्कायामुपम• 1 नामेति समापनायास् , -प्रमपने सपो- दयास का त मोमन मोमिच्छति १ अपितु न कोऽपि-स्पर्पः। किन ? सक्षादिनिमियमेतमिप्पममिति मानन् । किं वोमनं यत् पट्कापान्-पहिमजीपनि कायान उपमर्थनवा निर्दय यथा स्यात्, एपम् पीन्-पवीन पादाय-मनधि कस्ता पर सापित निप्पादित पद मोमनम् असह-पार पारं शाखेप प्रतिपिम्पसे-निवार्यते निधीपादिग्रन्येषु पस्प निपेपो वर्तते, तद् मोगन निखिशवाघापि निफरगताकारकम् । पुना यद् मोबन पणिवा गोमांसापुपमम् माहुर-गोमांसादिसाम कपपति मूसादि । पर मोसन एस्मा पतिरपोयाति -नरक गति सद् मोजनं प्रायः कोऽपि न मोफु मिच्छवि-इस्पर्मः ॥ ६॥ प्रयम वापत् मोसनद्वारं निपेभ्य मिनराहनिवासं निपेपयितुमार- गापद् गम्भनुमत् पमरमभिरणा बेमुराधम्परा ॥७॥ प्यापा-"गापद् गन्पर्व" सल इति नियरे मन्तिमवज्ञा-विनशास निपुणाः सन्तः बिनगहे न वसन्ति-न सततमबतिष्ठन्से । हता! विकारस्यात् । कि विशिष्टाः सन्तः । सन्ता, काम्पा ! देवम्योपमोगठबमठपतिवाऽध्यावनाम्पः । देवाम्पस्प गिननैवेद्यादेः उपमोगा, समय शयनं, भोजनादिकरपे उपमोगः, हप- निमय मठपतिता-मठाधिपत्य, सपा मगपवधावना:-बिनाना पसुरशीविराशावना, एतेम्पः बिम्पन्तः । कथम्म दिनगरे !' गाय गापर्षे 'स्पादि, गायन्तः गा प्रपानगापना! या नृत्पन्स्पा पणरमम्पो-वेश्या पत्र, रणन्तो-मधुरं मनन्तो बेग पो-माः पत्र, गुलन्दो गम्मीर स्मनन्तो मला प्रेशन्स्पोलम्पमानाः पुम्पसमा-पुप्प मासा पत्र, सपत्-सर्वतः प्रसरद भामोदद्वारेण मृगमदा-कस्तूरिका पत्र, लसन्ता- पहचकमपत्वादीप्पमाना उन्लोषानि-मिसानानि पत्र, महापनासनभूमगारागादि भूपिवपरीरस्वाद छोममाना मनौपा:-भावकसमूहा पत्र, तस्मिन् ॥ ७ ॥ पसस्पषमाद्वारे निरसित मोदसेना- सामाबिनेगमपरम मिरितो ॥८॥ विशोत्सर्गापमारे बारह शिषपुरीवभू निशीपे ॥९॥ पाल्पा-साक्षा० सम्र्ण -सभषणा का पुमान् परएरे-गास्मरहे यमसिं- २८ निवास घिदेष्टि । अः पुमान् को विना सिद्धान्तोकामपि परग्रहवसतिम्-अनावर निपेघेदपि । पा पुनः सकणा-भवनः स परग्रहवसर्वि पतीनामनुमोदयस्येष, न ऐष्टि। किन् ! मनिपुङ्गमाना-पतिभेष्ठाना बनगारपदं बानन्-न वियते बगारो यस्येति वानन् । अषषा किं विशिष्ट पसति ! 'भरपावरोक्ति'मिति, पम्मा सविरा स्पावा यविम्यो दानसपा, वरति ममाम्मोपि यया अनगारपदं शाने हि पतिवार फस्वेन प्रविपद पवे । ननु स्वगृह एप किमिति यतयो न पसति । बार- धनिपुङ्गमाना निसंगता-समनादि राहिस्प अग्रिमपदं-पुस्पस्पानम् । किविषिष्टा निासंगवा ! साक्षात्-प्रस्पप मिन:-वीर्षकमिः निपेपिता-उपएका, सरसेन उका कापिया, न केवल मिनर्गनपरेष-पौतमप्रमृतिमिः । पतीनां सरा नास्स्पेष, अतः परपसविरेन मेपसीत्पर्यः ॥ ८॥ व्याम्पा-'चिनोत्सर्गा०' सर्वत्र-सर्पस्मिन् वसति अधिकारे मागारपाम्नि- परस्प यह एप यतीना निवासो न्पयामि, कोम: म्यवस्थापिता, न तु कापि-कस्मि पपि प्रन्ये, पैस्पे-बिनगो निपासो निम्पितः । किं कस्ता ? प्रागुवा-प्रवर्म निधीचे प्रिमेदा:-बहुमेरा पसती। उमा । किं विशिष्टे निलीये! पित्रोस्सर्गापवाद। चित्रौ-मानाविधौ पाप्रकारौ उस्सर्गापपादौ-सामान्पविधि-विशेषविपी पस्मिन् । पुना कपम्भूवे निधीचे विषपुरीद्धमते-सहपुरीसन्देषारसपथे। पुना कि स्वा! पपात्-तदनन्तरं कारणेपोम-भपवादविपपीकस्य । किं रिविष्टे अमारपाम्नि ! श्रीसंसदपादि मुक्केऽपि-बीपणकादिसहितेऽपि । ननु विकारसामग्रीसहिते गहस्स- परे कप पतीना निनासा! इस्पार-ममिदिवयतनापारिवामिति-निशीषोपयतना सावधानाना संपताना किं विकारोतुमिरिस्पनी ॥९॥ ननु पथ पतना सापपानानां पेस्पपासेऽपि को दोपः इत्पवः बार- प्रजम्यापरिविन मनु मनस्वीकारमार्षिमाः ॥ १० ॥ प्यास्या- ननु निषितं सीपकराः पनस्तीकार-व्रम्पस्पानी- कारं प्रपन्यापरिपंपिनमाहुः ॥ को ? दीपापहमत कपपन्ति स्म । पनसंप्रदा। करीपेतिद्वारम् । तु पुनः सरिम-परिग्रह-सकलपापसहिताना गरिव । परिमई मति महासा मतिश्पमहासपार्प बाचक्षते-कषयति । वन ग्रामपरिणा, सर्पमा पतीनां नोषित इवि द्वारम् । पैस्पस्सीकरपे तु माठपस्ममेव स्पात् । पदा पतीना बिनगरस्य " प्रब्रम्पा.
२९
सीकारास्तदा मठाधिपस्पमेन भवेत् । कथम्भूत माठपत्यम् गस्तितम-प्रकप
निन्दित । यता इति तोक्यर्षिनां पुंसाम् इति ममता पुका न-द्रम्पादिपु ममत
पुक नेस्यर्थः । कपम्मूता ममता ? प्रवरिपी चारित्रधष्ठभूता ॥ १० ॥
तम दशमारामां मध्ये पर पारा निषेप भवशिष्टदारपतुष्टप निषेषयितुमार सोक
पष्टपेन-
भवति नियवमत्रासंपमा स्याद् विभूषा ॥ ११ ॥
गृही नियवगममाइदिनगरेऽपिरो पटः ॥ १२ ॥
निर्वाहार्पिममुक्षित गुणमेशावधीताम्बयं ॥ १३ ॥
दुष्पा गुरुकर्मसंचयपर्वा समनुसिणी ॥ १५ ॥
पाल्पा-मत्र लोके सप्तम दारं गम्बिकापासन निपिम्पते । भा गम्दिका
पासमे विना स्पा-
-योमा भवेत् । न केवलं शोमा, मसंयमय भवति । कोय!
जीवरक्षामाषष मति नियत-सर्पदा मम्बिकापासने 'फप शोमा भवेत् । वत्रा
"नुपतिकाद" एतविति, यतः एतदासन नुपतिकहुदाम्यचिमिति । न शोमाम्प्प
मीटबेस्याह-सोकदासपेति गम्बिकापासने मिझो। केवलं शोमैन न मनवि किन्तु सोको
पहासम मपति-'मो! मिक्षोपजीविनो समिता मपि एपिपेपासनेप्पविशति' ।
दर संगा लोकपिदिसा गदिमादौ परिहा, उर-अविष्मयेन सासष्ठीसस्पं-मुस
छोडपता, इति देतो समषो मोषामिछापिमा पुरुषस्प गमिकापासनं संगत न-पुक
मेस्पः । इति सप्तम द्वारम् ॥ ११ ॥
सापपापरिवादरारुपमएम शारं निरूपपमाह-
प्याल्या-'गही नियातगा.' गतानुगतिक-परिकामगाहरूपैः मन
गारिका-पतीनाम् संस्कृतम्-मनुचितम् , सदा-एतत् रूप प्रस्तु-पारम्पम् । एतत्
कि पी-भाषको निपतगम्छमार मवति, कोय! धारमसष्ठो गो पाम् वेपा
मेप समदाप ममनेन गुणोपादिक रिचारपति अन्य य: मनोमिनोमपिका पदापि
विरुह-मेष, अपरं आरमिमिा-गृहिमिः साधुपु-पतिषु पपा पा, को ! येनैप
प्रकारेप सेनेव मरमपि मचनादि-मकपानादिप्रदेय-बितरणीपम् । एतदपि विरुटमेन।
अपरं च प्रवादिविपिपारणं-मपिरस्यादिविधेरिम-निपेपः। एतदपि निरुतम् ।
सपिहिताविके-सन्तिक-समनियमिपे कप प्रारम्पमित्पपा । भटम द्वारम् ॥ १२ ॥
नगम द्वारं निशेषयितुमार- प्यालया-मिर्षा० मना:-लोकाः यत् र पति देवेम्पोऽपि-मिनेम्मोऽपि मषिर्क पवा स्पास् तपा मर्षयन्ति-पूमयन्ति वस् महता-प्रबलस्प मोहस्प-महानस्थ मृम्मित-सीतापित । कीर यति ? निर्वाहापिनं, फप ? निर्वाहो-चीविका भवतीस्वय मेवार्यः प्रयोजन पस्प सम् । पुनः कीरमं । गुणस-गुणलेटेरपि उन्निव-स्पतम् । पुनः कथम्म ! मजावटीसावर्य अविविवाचारलं पुना कपम्भूव गुरुना- -पाचाग स्वार्षाप-प्रयोमनाय मुणीव-दीषा नीसम् । फपम्मतेन गुरुना! वारणपरत गुपेन-तारक्षिप्पयतमातेन तलुपेन-मिम्पसाठगुपेन । किंपिविष्टा मना ! विरूपात गुमानपा अपि-प्रसिदगुणवंशनासा मपि । मासीना-सीन पूर्वपति वदा प्रपन्त, (किन अलीना अपि मालीन पूषयन्ति, इविमोह प्रापस्पम् । पुना किपिनिया सग्नो प्रगम्छा-घेवसि निविष्टो पा उप्रगम्छप्रतिबन्धः सद् पुका इस्पा । बारम् ॥९-१३।। 'गुणदेपपी 'इविवार निपेपपिसुमार- ग्यास्या-दुष्पाप्पा० ॥ गुरुकर्मसभयवा-गरिष्टसंसारमन्महेतुकमाणाना प्राधिना सर्मपदिईप्राप्या, कोय? दुःखेन प्राप्यते तस्या समबुद्धौ मातापामपि उस्पभायामपि प्रमगुर्द्धर्सम यो गुरुरिष्टतरं किमिदुपदिशति । सोऽपि प्रमगुरु पुगेन यदि प्राप्यते सचापि अमी बनाः सहित फतुं नालं-मात्मनो रित क न समर्मः। कि विशिष्टा बना ? गच्छस्थितिम्पाहता:- पुम्मसालातोऽप गच्छस्वत एनं वर्ष स्यमा मपनि न्यपाएँ भवम-सम्पयनवप्रतिपस्यादिक विधेयम्' इति पास्मस पतिसिरिता म्यवस्था, तपा गम्हस्पित्या पाहसा-पनीरुवा इत्पा, मवो तो घुमा-किं मणाम ! -संसारे, फिम् आभयेमरि-निपेमहि । किम् मारामार- कम्पारापना इम:! किंवा धर्मो-विदम्मा, इति दशम द्वारम् ॥ १५ ॥ पसेन प्रयन्पाऽपिछलीनस्यैष योग्मति प्रतिपादयमार- सुरक्षामा किस कोऽपि रशिशुकः प्रनम्प पेस्पे कचित् ॥ १५ ॥ प्पामया-'सुरक्षामा 'किति समापने कोपि रएशिशुका-मबारनामा सुरधाममन्स्चार्षसः सन् कपिदनिर्दिएनाम्नि स्पे-मिनगद प्रवग्य-दीधा गृहीरवा कान भाषक पध कसा वदामा प्राप्त परिपई गत सन् , कपम्मता।
नपात:- अवतकलि। अमणिकला चित्रम्-पापर्य-स्पो ग्रहीयसि गृह व भाचरति । निजे गरे इटम्पीयवि-नटुम्ब इवाचरति । स्व-आरमान शक्रीयति-पक्रमिवापरति पुषान्-पपिवान् पालिसीयति-मूर्खानिवापरवि । विश्व-मगत् पराकीयति-मि पाचरसि, मतो मूर्सगार बगत्, पसे इछशीलादिक न विचारयवि किश्चित् मोहनोपा टनापवमवलोक्य दृष्टमपि यति देवपत् पूर्वपन्तीत्यर्थः ॥ १५ ॥ अस्मिभेना-अपरमपि चमाह- पे तो म पम्तिो न म प श्रीवोऽपमणों न ॥१६॥ ग्याल्या-यैर्जातो॥ तेरे अपमाषमैः-अस्पषम यतिमिः अप मनो-सोक पलान इटार वायते-या सत्र नीपवे अवाहा! इति फटे इस बगत् नीराम-रामशून्य, राजा पेद् भवति वदा एतदनुषित न भवति-इस्यर्थः । ते? पैः पतिमिरप लोको :-नोत्पादितः योगक्षेमादिसंपादनेन, पैर्न व पर्दितः-शरीरपोषण न प्रापिता, यैर्न प फ्रीवा-अन्यस्मान्मपदानेन न गृहीता, न प भपमणेन-उदारादिप्रयोगेम गृहीतः, न प प्राम-पूर्व ए-अवलोकिता, न च पान्मयः पिदम्पमासमन्यवान् , न प्रेयान् गमता, न प प्रीमित:-तोपितः । एतापसा ये पता न रटा, न भुवा, न च समधिना, तिमिः अप बनो सोका बलाद वापते । किंग ? नस्योत पभुगत यथा नस्पिसा पर्यत्रतत्र नीयते इस्पर्षः । चकार सर्वपाषयाः ॥ १६ ॥ रुपपावस्पिायरमनानबसोप्प प्रफरणारा प्राह- किंदिग्मोहमिवाः किमम्परपिरा कि योगचूर्णीयाः ॥ १० ॥ प्यास्या -'किंदिगमोह०' पद परमादेसोः अमी अड़ा-मूर्साः मनाः रूपवाद-मार्गाः म्याइचिम्-मपसरम न दषते-न हर्मते तस्मादेवोः एते जना:-- सोकार कि दिग्मोहम् इवा पूर्णदिविध पमिमादिविनमः दिग्मोहात प्राप्ताः । कि म पहिराः जाता ! अन्या:-मेघहीनाः । पपिरा:-कर्णहीनाः। किंमा योगपूर्मी वा ?-मस्तकादिप पूर्णवेपेग बधीरुताः । किं या देवोपहताः १ देवेन-विपिना उपहार-विमंश प्रापिता'गति संगोपन । किंमा ठगिमा-सापचीरुवार। फि पा प्रहावेशिता :-भूतारिशरीरापिष्ठानाः। न केवलं कृपयप्रसवार एवं सति किन्तु एतत् सते, कोपा ? बिनमार्गकते निनमार्गनिमिर्च भएपन्ति प-पो ईन्ति च । - किंवा मुतस्प मुनि-पानमस्तके पद-परण कस्पा-दिपावेस्पा किंविषिष्टा ममी। रटोरदोषा अपि-सामादसोफितरुपपदोपा अपि मराटदोपा हि विरेफिनोऽपिवान निवर्तित समीइन्ते किं पुनः अन्पेऽपि दोपा से मूर्खा अपि पवानिवर्तन्त रवि सोकाः ॥ १०॥ सिद्धांत हिरमन्पा मिनस्ना पापपके निमबनाय प्रवदति इस्मत बार- इटावाप्ति-ता-पिटमटमवतकपेटका ॥ १८ ॥ म्यासपा-यबाप्ति०' बिन मधनं-बिनस्नान अरिपिना-सिहानोकपिषि परीस्पेन बनेन विहितः सन् मनपरे-पापकर्दमे निमजनमेष मनपति, कोण ? सिद्धान्तोकप्रकारेण यदि देवस्नान न विधीयते तदा स्नात्रादपि नरकपतनमेव माती स्मर्पः। कपमत स्नानम् । इप्टा माप्ति सुष्टविटनट-मटपेटक-पेटकाइलम् , सापा- प्रियायाः स्नात्रदर्षन पावेनागतापा ममाप्तिा-मिसन, सपा पूरा विटा: 'निम्मा मनापनः मुरवणीसाप्रपतिप्पो' इसि पिया मदिना विटा-वेश्यापतया, नटा-नता, मटा:-प्रासादिकसाशीविना, पेटका:-मासादि नियमि[चि]प्राहिमा पसेपा पेट- सा, तेन माइसं-सुमितम् , पुना धम्मत स्नात्र निघुमनविधि निषर दोहर नरनारी निकरसंह-निषुपन-मुरतं तदर्य निबनो रोदा-अमिगो पेस्तैनरनारीनिमा- सोः संहम-म्याप्तं । वमत स्नान ! रागदेपमरसपिन-कस्पषित् परममिनी प्रति रागा-स्नाः, सप्रेयसी मन्नेन सा संगम्छमानां पश्यतस्तबिसिया देशा, मस्सरप-पडामामन्येन पा रूपम्तीमविलोमतः पुरुषस्य, वसरिता-सा, वामिर्पन-सान्द्रम्, एतापता सकसविकारसामग्री परिपूरितसमनवि हित-स्नानादपि नरके पतनमेष मबीत्या ॥ १८ ॥ न फेल स्नानमेष नरफयनक किंतु मविधि कर प्रतापपीस्पाइ- बिममतबिमुस-विरिठ-महिवाय म मनमेव देवम् ॥ १९॥ प्याम्पा-'जिनमत ' केवळ जिनमत-भिमुखपिहित-गिनपानाविपरीत छत मधनमेष महिवाय ' संसाराप न भवति कितti (fa) सपपरित्रदानापपि भनयनादि सर्पविरति मपि विवफल-सफिम्पफ न मनपति । एतामता बिनपास विपरीत एवं सर्वमेव निष्फरमेवेति सोच । हि-पता कारमात् प्रविपिरिधि मात् सिद्वान्तानुकोकप्रकारेग, सिद्धान्ते पभोक वेन प्रकारेन बिनाशापि- दागमोका . . - ॥ - मुष्ठानमपि अनुमशुमाप-अकरपायसंपचये मायते । कि 'मिस्याक्षेपे पापमेदे पा, 'पुन 'रिति एप्रकारेण महितहेत -संसारप पनहेतुः पिरम्मनेप-ठोकोपहासा स्पदमन न प्रसार्यढे न विस्तार्यत ! अपि तु बिस्तार्यत एवेस्पः ॥ १९ ॥ मन्पदप्पाह-- मिन-गा-जैनपिम्म-गिनपूजन भिनयात्रादि विपिकत ॥ २० ॥ म्याल्या-'जिनगद'-प्रवचने पतदपि सर्व स्फुट-प्रगट पक्कमेर मनमिमवकारि मपति-अनिएरिपापि मवेत् ॥ कस्मादिस्याह-मत-गुरु-माह इमोप-कदेखनांशतः, असापा-कृस्सित मत कमत, इस्सितो गुरुः गुरु, कपाहा- सिमान्तग्रामस्थमविकस्पितासम्पदार्थसमर्पनानुष्ठाणविषयो मानसोऽमिनिषेध, मिन शाखस्यामानादन्यया परिच्छेदः इषोपा, सिदान्तामिदिवाना पिपासेन प्ररूपणा मपिता इवषना, तासाम् यता-लेसमः । एस कि बिनराई-मादान, मैननिष- मागपती प्रतिमा, मिनपूमन-मगात्पमा, मिनपात्रादि-मगवस्करयाणकाष्टाति फादि, एतत् सर्व विमिरुतमपि-निनोक्तप्रकारेण निप्पादिवमपि दानवपोप्रवादि-दान तपसी पूर्व पारुपातम्, प्रवादि-स्प्तमाणाविपातपिरमपादि, गुरुमक्किा-मापार्य शुभषा, भुतपठनादि-सिद्धान्ताम्पयनं । एतत् सर्वमपि उक्तोतो। मनिष्ट विमाथि मरेत् मादृतमपि-सबहुमानमपि । किमिम ? परमोबनमिय यपावसरं स्पं मोशन विपसपनिक्षेपता-गरलकणनिक्षेपात् मनभिमतकारि भवति-अनिरविवापि मपति, एवापता एमवादि संसर्गानिनपूषनादिकमपि शुमदापि न मातीपर्यः ॥ २० ॥ सकपटपति वर्षयतुमाद- भागष्ट मुग्ग-मीमाम् पम्मिपिशितष विममाश्य भेनं ॥ २१ ॥ हा' इति कटे, मप मनो-सोका पटे:-पूर्वविमिः पते- विप्रलम्पट । किं विशिष्टः । भवासा-पिवेकविकछः धर्मेन्छामान्, फस! शाकि न्यादिवशीकस इष पपा शाकिन्यादिपशीरुवा फनविद् वापत ।। ।। यात्रामात्रा पुपापे, पात्रा-मिनपात्रा, मात्र-बिनखानम् , इत्यादया उपापा:-प्रकारास्तै, न फवल पात्रापुपाया, मममितक-निशानागरादिष्ठलैम, नमसितर्क-उपपापित मिदानीमीरम उपद्रमा समुपस्थितस्तम्मान् मस्तितिाप मिनगोत्रशासनसुरामा प्पास्पा- मावा + इपद् म्यमेषणीय "मिति । निक्षामागरादिग्छसै!-विनागरमादिम्पामा हिला मापसे ! नविम्म आदर्प वर्मयिस्था, कभी १ मिनमतिमा वसयित्वा । न केवल बिनप्रतिमा दर्शयिस्मा तमामा-जिननामधेयेन स्पेसिस-मास्मामिमनिप्पचये गान् कारपिस्वा, फपम्भूतान् गृहान् ! रम्यरूपान्-मनोहरान् चित् दर्शपिरगा। मुग्धमीनान् माक्रष्टुं परिशपिशिता , पपा म्यापो परिभे-मस्सवेपने पिशित-मांस विमाय मुग्धमीनान्-मुग्धान् मत्स्यान् आकर्षयतिरेयोपायोदयविचारधन्यतया धर्म भदासपस्तएप मस्स्पास्वान् ॥ २१॥ सर्वत्रास्पगिताभवाः सविपयम्पासठसन्निमाः ॥ २२ ॥ . प्यारूपा-फटमिति खदेन उद्धवधिया-' नास्त्मस्मद् समो मगति संप्रति कमन 'ति दर्पाप्मासपुदया सुम्पन्ति-मोदन्ते, पुष्पन्ति-पबन्ते च, किं कसा स पनि मूर्दसु स्थित्ता-मनिमस्तक स्थिति विषाप, किं विशिष्टाः ! अन्त्यापर्यराबाभिता:- वसमापनपानुगता, पपा नीपा मपि कपन रामादेरपएम्मेन महतामपि मूनिमा स्म पुप्यति । एपमेसेपि दष्ठमाषयरामाभिवा महामनीन् परिम्प पुष्पन्तीस्पर्पः । पुनः किं विशिष्टाः । सर्वारुत्पकसोऽपि-कोऽ: ! सोलोकोपरविरुवा- सेवनपुष्पफळापुपमोगापसदापारकारिणोऽपि सर्वमफस्प हवीस्यपः। सर्वत्रास्थ गिवामगाः लोकममधम् अनिरुपामगाः । पुनः किम्भूता: । सविषयम्पासक सन्द्रिपा, स्ममिपयपु-स्पादिपु म्पासकानि-विशपणसग्नानि इन्द्रियानि-स्पगा दीनि येपो वे । पुनः किम्मan ! परगागौरपपण्डदणारगा, परगन्ता-परम्छया प्रसरता गौरः परा:-उत्कगा, दगा-प्रलमनोगामाया एप तुरगा येप से । पुनः किम्भूताः । पुष्यत् कपायोरगाः सुपुटझोपपर्पाः। एसारता पपापरमिरमणे- पश्शेन्द्रियनिग्रह-दण्डप्रविशति-पापपतुष्टपप-तधगमश्चपिघसंपममिहीना अपि ते ससाप्नविकामन्सि, इति सोकायः॥ इदानीं दुएपसिम्यो गृस्या एव श्रेष्ठा इति वर्मयितुमार- सौरम्म-परिमहरय गृहिणोऽप्येकाशनापेकदा ॥ २१ ॥ 'सर्यारम्भ.' गृहिणोऽपि रदि सीनानुतापो मवेद । निष्ठर पावापो नायते । किरिशिष्टस्य गृहिणा! न रयता-न पालपणा, रिम् । एका व्यामपा- अनादि-एकमतादिकिं कस्वा ? प्रस्यास्याप-नियम्य । क! एकदा-अष्टम्पादि सिथिषु । यदि कषिद् गृहम्पः अएम्पादितिथिषु एकमतादेनियम गृहाति पमान व-समयवि वस्प घेतसि महान् पयाचापो ममतीत्यर्पः। किं विशिष्टस्य गरिमा सर्वा रम्मस्य परिग्रहस्प-सालपापम्यापारतस्परस्प सदा-सर्पदा, ये पुमा त्रिपा-मनोपावर कापास्पेन विविध-कतकारिसानुमतिलक्षण पापं पट् कृत्वा-पड़ाराम् प्रतिदिन-प्रति बासरं प्रोम्यापि उपवापि मजन्ति-खण्डपन्ति क्षेपाम् मसानो कता ? तपो नास्ति, सस्पवपन नास्स्पेस । बानिता-सिदान्तपरिच्छेतृत्व नास्ति । प्रत दीक्षा मास्तीत्यर्थः ।। २३ ॥ " पाप-म्पपतो यमारपिकवे समंदरम्ये मठे ॥ २१ ॥ पाण्या -'देवा' महो। इति बाष सिसपटा:-घेवाम्परा र पर्व परन्ति-दुम्फर चारित्र मनुतिष्ठन्ति । किंपिशिटा ! साघुम्पामविटा:-पतिम्याजेन पूर्चाः । पुनः कथम्भूताः पथा रुपिकते-समनोमिसापरूपे मठे निस्पस्थाः सर्वदा मनोरमजिनगृहनिवासिनः। किं कुर्वन्तः ? ऐसाथै म्यपता-तदेवद्रम्प म्पय कुर्वन्तः । कथम्भूते मठे । सर्परम्पे-सकलसंतादिनानुमनोहरे । पुनः क्षम्मता ! भूपिपड़ तसमपना-निर्मलपहासयुत् तुलसपनाः कोमलसम्यायापिन इत्पर्धः। पुना फष ममता ! सद्गन्दिकापासना-कोमलगदिकापासनमायः । पुनः पम्भवाः । सार म्माः पारंमसहिताः । पुनः फयम्भूताः । सपरिग्रहा-पनपान्यादिमाण्डसंग्रहपरापमा, - सविषयाः-पिपासकषेपसः सेाः-सकोपा | सकाहा सम्मोगविसासोत्कष्ठिता, सदा-सर्वदा ॥ २५ ॥ इस्पापुरवसोपहासपषसः स्युः प्रेम छोकार रिपति ॥ २५ ॥ प्पास्या-'इस्यामुदत.' येपो मियोप्पा-मिप्पास्पपपनेन मुष्ठोऽपि सम्परताना मपि मनो विमसि-पारयति । कपम्मत मन ! सन्देरदोतापर्ट दं समापीन इदं पा इति य सदेहः स एष दोठा-नोलकस्तेन घनस, ननु निषित मर्षया मिनपपप्रस्पर्षिनः, कोय! अस्पयननुभूताः टोका -जनाः स्पितिम्-मना पाररूपा भरता इत्पादासोपहासवपसा स्पः, फोउक्तप्रकारेण सहास्पापना मया-'मो बैनाः अन्यपारादिनः अन्पपाकारिणा, अस्माकमेव दर्शन घेपा, इत्यादि पपनसन्दर्मेण, भयो हेतोः ममिमुस्ता मपि बनाः भुतपपाद-मिनसिद्धान्त - मार्गाद पेमस्प-मिसता आतन्नते-बिस्तारपति । मिथ्यापादिना मिपावरमेन अमिसा मपि मना मिनमादि विमुखा मन्ति, इति लोकाः ॥२५॥ सडकटकापटपट सीरपुपोषयो, भ्याया-'सधैक्स्कट' ॥ १६ ॥ 'लता' इति पाचार लोकस्यात्र परी सतो देवो-पश्चादुक्क देवो-अम-तुर्मार्गम् भासेदपा-प्रस्पिताना मानसं नून निश्चि एतैः छरमकारि-रै रुपम् एते है ? सबै उस्कन कालकूटपटलो अस्थापिरसमूहै। न केवळ नस्फटकाराष्टपटली सो भपुग्योदया-सकाळपापराविमिः, न केरसमेवः सोपी सहम-बशेषसर्पसमूह, न कपलमेः समस्तविषुराधिम्पापिष्टप्रोः सकलालमनो म्पयामशालादिपाप है। कयम्भूतानां ! दौरासम्मेन-दृशमपपेन बिनपर्व नियम पास्-उम्मेवा, पुनः कपम्मतानाम् १ पचनेन इवि कपास-अमिषुपाम् ॥ २५॥ , धर्मेपत्करदुमपतमा स्वोमारपीपा ॥२७॥ ग्यास्या-'दुर्मेपस्फुरदुप' अतो हेतोः सदा-सर्वदा मिप्पापारा- मोषमार्गविपरीवाधारयुताना पासि सनी-सभामा कय कर्णे हस्ते ? का भपये भारपति ! अपि तु न कपमपि इस्पर्धः । कपम्मवाना मिप्याचारपणा ! सर्प नहा नाम् पुनः पम्भूतानाम् । मन्पनाभनरुते-परनामाप पोषमाना सयम् नष्टा परा नपि नारायन्तीस्पर्पः । पुनः कथभूतानां । 'महामोहा 'पन-प्रपुरवरा-विवेकान' 'बई मानिना' -भीमेव, नान्यः इति मानिनां । पुमा सम्भवाना ! सिद्धान्तविपा- बिनपावरिणाम् । पुना कपम्मवाना ? दुर्मेपस्फरमप्रातमास्वोमास्तपोषा- दुर्मेपाः दुम्छेप्पा करतो-मनसि बासरूपा ये उग्रमदा:-मिनगरनिवासादपस्त पप तमास्वोमा प्रकारपरलानि, रस्त पापितं धीरेन पापा सेपाम् ।। २० ॥ पलिभित् विवा परप्पनुपिदं यहोक-छोकोतरो ।। २८ ।। पत् किषित' यत् इषिपा-सपा वचर्म इति हन्ति- मयमेर धर्म इति कपपन्ति तत् दुरन्त-पषमामर्मस्प विस्तार्मि-विमृम्मित, तर, किं पत् किधिच विवष-मतीक पदिति सामान्पो निर्दिश मिनेषतोऽनिर्विएनामा, पदप्पनुषितम्-प्रपोग्य पछोकलोकोपरोचीगं-निनमार्गाद् वहितं मिनप्रएपनमाम , ठपारूपा- . . - . -- . मिनमार्गादतीतमिस्पा, पनाविना-देहिनां समोसुरेष येन संसारपन्पो मवतीस्पर्षी, पतः भाजपापाकर-सिदान्तविरुद न केवल पर्म इति कषपन्ति । मन्मिवान्पा लान्ति प, फो। निमार्गोऽममिति मिप्पाघानेन गृहन्ति प, कपम्भूवास्ते । मृगा ॥२८॥ साम्प्रत मुग्ध बनान् प्रति समतं मोक्षपपतया दिखत, सत्पथगामिनय पार्मिकान् सवपनाननुरोपिस्पेनादवया भवनानानस्म कस्पचिपया छन्दाचार्य प्राम म्पोऽप्रस्तुत प्रशंसपा सरूपमा:- का माविशी मुर्गा यदिशा बासनपरेमिकः ॥ २९ ॥ प्यास्या-'कट' दासमेतममेवसि पर्वते, पस्किमिरपाइ-पदिति पाक्योप पे, पनामा मास्य पौदेशिका कान्सारेऽमीप्सितपुरामानं प्रदिसतीवि सम्पन्या । वन 'माँ' पुंसां नष्टदृक्षा-मछोपनस्वास् कान्तारपासेन दिएमास्वाप प्रमामाची प्रतीच्यादिपकपनिमागपरिच्छेदाना, मदृक्षा-कापकामकादिना दृषिकलाना, न तु मन्मान्माना, मन्मान्पो च मामिम्पास्या सोचनरहितः । ननु सोऽपि नदेयमाव वरेम्पा भवबादिना निकाय कयनिविष्टपुरपर्व देक्ष्यतीति प्रोक्त "वैदेशिक" इति, विदेशे- पोमनवम्मपरिते देशान्सरे बाटो पदिकवि पैदेशिकः। सहि तदेशस्मस्पमात्रस्पा प्पनमिास्माकम प्रहमार्ग मानीपावपि । पता कर्मधारयः। कान्तारे' मनसबार शून्पे दुर्गमर्मनि 'प्रविषति' प्रतिपादयति अमीप्सितपुरामानं-विपमिपिसनगरमार्ग, किसेवि वाया, उस्कन्धरा-उद्धी परामुममय सबदगमविप्प कपपतीति कप्टमेछन् । तुः पुनर, इद पक्ष्यमान पुन कटतर-पूर्वमादपि कटान्मााफट, पर विमिस्पाह-'सोऽपि' प्रागुतो मार्गदेश 'सुष्यो' निर्मसनपनानत एप 'सन्मार्गगान्' इटनगरमुममपचास्थिवान् सहिदा' सम्पक्सन्मार्गवान् यत् इसति, सायमिति क्रिया विशेपन, साप मानिन, यथा मार्गामिझा मार्गसुपविलन्त उपास्पन्से लोफेन, तसेऽपि सेन । एवं प्रमुखमपमान योवयित्वा प्रस्तुसपमेयमिदानी योग्यते, कष्टमेवर-' पत् नमा' सस्पषेछापुहपाना नएप्पा-अविमुग्णतया सत्पपपपषिमा गानभिधानात् , भाशा सम्पदानदर्षनपिकलानो मात्पपा-सिदान्सरस्पलेखान मिशः सर्पमा अगीवार्यः, सोऽपि गीवासवासादेः कपत्रिमोक्षपषकपनप्रमीला स्पा चवाह-वैदेशिको गरिताधारस्याद् गीतार्थनिपुङ्गापमङ्गमात्रमितः एष चाधुनिकदुस्सा- प्रमो निशर निभेयप्तपथप्रस्पर्षिमार्गकपनदीक्षियोऽय पचान्दविरोमणिः कबिदा . .
१८ - पार्यो मन्तव्यः । फान्तारे-मबमहाटम्यां प्रविश्वति नमीप्सितपुराम्मान-किमार्म उत्कमरो-रक्षिसाहारविकारा, सपा व सोऽगीतापी उत्पत्रमानको मिथ्यादित कपभिरपि सस्पप मोक्षमार्ग न वेति, नाप्पन्न गीतान प्रतिपादितोऽपि प्रस्वेवि इति कटं, एतस्कारवर लिसि पूर्ववत् , सोऽपि प्रागमिहितो पवाग्छन्दाचार्यः सुरक्षा-सम्प बानवर्धनपुनः मन्मार्गगान् जानवर्धनचारित्रतषणमुक्तिपरप्राचान् तडिदरो-मुक्ति- मार्गविज्ञान् पार्मिकान् सुविहितसाधून पस् इसति सावधमहानिक, पथा-कममी भगी वार्या मूर्सविरोमगपः सिमान्तरहस्यं मानन्ति !, महमेप सकलभुतपारावारपारस्था, वको पमा प्रवीमि स एकिमार्ग इति । किमिस्पेयमपासतीत्यत बार-तम्महाराष्टमित पमानोपमेयपोस्तुस्पतया योचना । अत्र प मुग्पमनपुरवो निकल सकस्पिन पत्य- पासादिकास्पर्ष प्रवपशिपिविषपपारतापप्ररूपपानिपुषान् , मुगुरुसम्प्रदायानुवर्तिनः सपिहितानस्ययोपासन् सम्पति पर्वमानः इसहाकार्यपोज्नया मापा कविना प्रति पादित इतिचापः ॥ २९ ॥ साम्प्रतं भूतपथावादारमपसखि मुखबिनमार्गस्य दृष्टोपचिवसादिवका रवासापेन सम्प्रति दुर्समा प्रतिपारपमाह- सैपाण्डासपिम्पमुसमपासमम्पमावानुमाषा ॥ ३० ॥ यस्पा -'सैषा हा॥ एष भमना प्रकारेम अनुशल-प्रविसमय दुष- रेषु पुष्टेषु पस्म मैनमागों दुर्लमा-मस्पियो दुष्प्राप्पा, पदा सु फराः पुष्टास्तदा मेन मार्गो दुर्लभो आव इस्पः । एवं कप ! सैपा हुमानाम्नी बबसप्पिणी-कासपिशेषः । कपम्भूता- मनसप्पिनी ? अनुसमर्म सम्पमावानुमाषा, मनुसमर्प-प्रतिसमय प्रतिषणं प्रसन्-नीपमान! मम्पमनानां शुममावस्पानुमाका-अमापो पस्यां सा । मर्य त्रिशन उपप्राम। बिनसिान्दोकाष्टाशीतिग्रहमध्यात् विनता पूरणो मनराशिा, कपम्मूतो मस्म राशि! स-स-नसमितिवर्षस्पिति "पभानुपर्णा बकरपना बातम्या । सं- शूर्प, सस्पमात् पुनः सं-शून्प, पत् पपामसं-विधतेरेका एताइन् (२०००) स्पिति। मन्स्पदयममामयं च अर्सपसपूजाऽनापारप्रतिपादकमापर्प प तरसमा रुपमा व तेरैप-मपिभीमस्मराशिदपमापी समा वस्समा दुपमा दासकारिणी, वस्पै जिनमतातपे-मिनमर्गोच्छेदनिमिच पपेते तुष्टास्तदा नमार्गो दुर्सम इस्पर्षः ॥३०॥ पर मारवादनाङ्कः प्राधेन लिङ्गिना भुतपपावमा प्रतिपादिता । संप्रति 'गुषदेरपी 'रिति द्वार निरास्तेपो गुणदेष दर्शयमाह- ३९ सम्पगमार्गपुषः ॥ प्रशाम्तवपुप प्रीत्योहसरापः ॥ ३१॥ ग्यारुया- सम्यगमार्गपुपा० ॥ उपदपा-प्रघणकोपा सस्साधून सविहिवयसीन् न धाम्पन्सिन सहन्ते । किंरिशिष्टान् सस्सापून् ! सम्यमार्गपुपा- मानादित्रयस्य मोक्षपयो स्प]विस्तारकान् सम्यग्नान-सम्यग्दर्शन-सम्पचारित्रपप पोपकान् । पुन: किंविशिष्टान् ? प्रशान्तयपुपा-रागपादिरदिवशरीरयुतान् । पुनः किंविशिष्टान् ? प्रीस्योसबसुपा-प्रसमोस्फछनयनान् सर्वत्र सदयापसोकिन इत्यर्थः । पुनः किपिविष्टान् ! भामग्परिसपेषुषा-पचमहापससम्पचिं पासपा-पनामहाप्रवानि- प्राणातिपात-मपावादा-दचादान-मैथुन-परिग्रहाणां स्पागस्वस सम्पपिं उपगसानि- इस्पर्षः । पुनः किम्मवान् ! सयमुपा-निराहारिणः । पुनः किम्भूमान् ! कन्दर्पफव प्पा-ममपटकवणदाहिनः । पुना किम्मतान् ? सिद्वान्तापनि वस्पा-मिनोक्त सम्पग्मार्गे स्विवान् तस्परानित्पर्पः । पुनः किम्भूतान् ! अममुपा-शान्तियुक्ताम् पुनः फिम्मतान् । सस्पूज्यमा बसपा-विक बनाराम्यस्व प्रापितान् । एष गुणविषिष्टानपि सत्यवीन उपवरूपः-प्रबलकोपाः न पाम्पति-न सान्ते इत्पर्यः ॥ ३१ ॥ ऐसीयत्पुरोपिणः पवमहायोपानदेवीपति ॥ ३२ ॥ प्पाण्या-वेपीयस्यु' 'मो' इस्पायर्य मनो-ठोका अगुणाग्रम्प मगुपममा स-मास्मान कवार्थीपति-कवार्थमिवापरति-आस्मान पिरितमास- कम्पमिवावरति, कयम्भूतो मना ! मिथ्यात्वमहिला-प्रपसमिथ्यात्वगम्भीर प्रच मामिप्यास्वामिनिषष्ठप्राग्रहीताः पुनः किं करोति ? उदोषिणा-प्रबुरापरापान देवी पति-देवानिवाघरति, ये प्रबलदोपास्तान् । देवान्-धिनसरक्षान् मन्पत इस्पा । पुनः किं करोति । पतमहादोपान् प्रमष्टप्रचुरापराधान् मदेवीपति-मदेमान् इवापरचित । पुनः किं करोति ! मूर्खपुस्यनिषा-महाससम्ह समीपति-सर्पमिषाचरति । पुनः किं फरोति ! तसवम् महीपति-पवर्षनवेचारं मूसमिपावरति । पुना कि करोति ! बैनमार्गम् सुमार्गीपति-मार्गमिपाचरति । पुनः किं करोति ! अपर्य- मार्ग सम्परु-पथीपति-सन्मार्गमिवाचरति । एतापता सर्वमेव विपरीवायरनमापरवी स्पर्षः ॥ ३२॥ ये केचन दुष्टपतिनो सुकमिवारमाने म पन्ते तान् पपितुमाह- सत्तास्तपैमष्टपतिवस्पाम्वस्तरां दाम्पत ॥ ३३ ॥ सहप्राकृ.' बन्तुहरिमनातस्य तो मोक्षा ! बन्दर एक पास्या- -
हरिमा, सेपो समस्प तो मोषा-टो निर्माणम् । फपम्मतस्य अन्तु हरिममावस्य!
साम्याप्रमशस्य उस्म प्रमापका स्वच्छन्दपारी विपयलोलपा साधु-सामी-भावक
भाविकासमवायो भूयानिह सा उच्यते, स एष म्पामा, यथा ग्याना यचस्प इरिष
मातस्य मोधा स्टनं न मपति तपेवेति । पुनः कयम्भूतस्म ? सहका-भाषकहोरेन
कृतस्पझटपतिवस्प मक्पा तदायची फूतानि मिनहागि, एतान्येव इटाः मृगपंचन-
पन्त्रविशेषास्तेषु प्रतिमदस्म ! पुनः किं विशिष्टस्य ? अन्तस्तरां वोमर्मणि ताम्मता
लिपमानस्य मृगोऽपि पदः सन् घेतोमर्मण्पतितरां लिपति पुना कि विशिष्टस्प !
स महापाप पनवः सन्-तस्प सहस्प मुद्रा पतुर्दश्यादिपविषयस्ता एप स
पाशा, धन, उद्युक्तस्य । अव एक स्पन्दितु-पक्षित मपि न पतस्प-न समर्मस्प ।
पुना कपम्भूतम्य साप-मोक्षार्य फरिपतदानशीलतपसः-विहितदेशपारिवानधना
देरपि । एतत्तमस्पापिना-एतस्प-सक्षस्य कमो-राधिनात्रादिका परिपाटी नविनः।
एतावद-पन्धनपुकस्य तत्रापि संपसाईलमानस्य मन्सु-रिणावस्प इतो मोपन
सोऽपीस्पर्पः ॥ ३३॥
इब मिप्यापपापमपा वप्पपापीह कयित् ॥ ३४
ग्यास्या-'इस्प मिध्या.' ॥ इह-लोक इद मनुषि-अपोग्य कमिमा
शासीत् । इद निनवलमे-नोक्त संपपासप भमुषिमिति मा कश्चिन्मस्त कपा। इस्प-
पूर्वोकप्रकारण मिप्यापपकपनया-दिगमरोक्तमिप्यापपप्रकपनपा। कपम्पकपा !
वयपापि-सस्पयापि। अथानन्तरं फपिन् मा पत्-मा क्रोध कात् ि। बप पर्व
मिप्यापपकपनन परेपो झोपमा तदासो न फयनीय एवेस्पार-' यस्मा 'दिवि
पस्मात् कारणावत् किमपि दिग्माष कपपा-अनुरूपपा करिस -सकृत-मरिपत प-
मतिमनोक प। किं कृत्वा ! नृन्-मानपान् प्रेक्ष्प-मवलोक्प । फषम्भूतान् नून् !
मैनप्रान्स्पा-'अप लेनमार्गा' इति मिथ्यावानेन उपपपतिवान्-कमार्गप्रस्थितान्
स्मै फसित ? तरप्रमोहापोहाय-सेषां नृणां प्रषणमोहनामाप । पपाश्मी महा।
कृपय स्वरूप विधाय तत्परिस्पागेन सस्पर्षे गृहीत्या संसारसागर वरिप्पपीति कृपया
मत्तिवमिस्पर्पः ॥ ३५॥
किमपि दिग्मात्र बसिवम् ! इति कपमुक्त यात्रता मुकसमेव कप नोक-
मिति-अता माह-
प्रारऽनम्सकामात निमनिरपे नाम मपध्मवान् ॥ ३५ ॥
व्यापा-प्रोत० या कश्चित् नपु-मनुप्पेषु सोपं निरसिसिप सन् श्वेष नोस्पादित द्रीकमना सन् दरम्प-कमार्गे दोपसंहम्पा विवक्षेत्-'हमार्गे एतावद- संस्या को दोषा' इति धातुमिच्छेन स पुमान् मम्मो मोपेः प्रमिस्सेद-प्रमातुमिन्छेत् । पेति पधान्तरं सकलगगनोलहन विपस्सेस्-सकलाकारस्यातिकमणमिच्छेन् । पोऽम्मोऽ म्मोपेरषमाइत, पम समस्तगनस्पोल्छपन करोति सकुमार्गे दोपसंख्यां वदति, मतो दिग्मात्र घरिपतमिरपुर, तस्मात् कोष निरसिसिपुः कारुण्यात्-'माऽमी संसारसागर मुग्न्तु' इति कृपावा कपम्भूसे दुरमे अनन्तकासात् प्रोत-अनन्तार्पमामाशिसुना संमा, कलिमसनिलये-दासमहापासहनिवास । पुन कथम्मते ! नाम नेपम्पसा- नाममात्रापरमतः मई मार्गमान्ति-साविमिनमार्गमासय दाने-विमाये । पुन: किम्भूते दुरम्पे ? तसता-परमार्षत: तद मिमरे-आमार्गपातक यमा अमिमराः प्रच्छम पातका सवेपेभ राप्रदिक हत्तुमचक्नुपन्तो बेपपरिपन कृत्वा राशादिफ निमती सथा- पतेऽपि गृहस्पवेपेमाई मार्गोमेद कमपारपंतो यति-पेपोम्छेदयन्तीस्पर्पः ॥३५॥ म सारपामावा म पाय-असीपिवयति, ॥१६॥ - ग्यास्पा-सपा 'न सापया०'-प्रवचन एवे यतय-सामा अपापि दुपमा कालेऽपि सूत्ररसया :-सिद्धान्ताम्ययनाम्यापन-म्यासपान-प्रवणपरायणाः मयेयुः। किम्भूता ! मेन सापपाम्नापाः न सपापसंप्रदायाः। पुनः किम्भूताः। न महसीलो वित यति-क्रियाका बकर्ण पठमतिधारेण समरु प्रक्रमाचारित्र, या इस्सिर्व चरम पेपा, नेपालविवा-पोग्पा[क्रिया]पापु-सामाचारी क्या न पुका-न सरिता, सिम्पति क्रिपारपिता इस्पा । पुनः किमिटिष्टा ? मदममवासीवनभरा-न पुकार-मास्पादि मदममवा-परस्पादिपु जीविकानि हस्तस्माद् मय पो ते वास्ता न । पुनः हिं विशिष्ट ? न सक्लेशापेशा-न रौद्राम्यवसायोस्को, पुनः किं भूवा न कदामि निवेशाः' न इस्सितमानसा ग्रासन्ता, पुनः कपं भूता ! न कपटप्रिपा न मापा बछमा, एतावता इम्पमाकासप्रमाषद् बपक मपारयत इस्पः ॥ ३६ ॥ संविधा सोपरशा मुनिकपषिकात्र-कामपपेशा ॥३॥ प्याख्या- 'सविना सो०' अस्मिन्-पिनशासने सस्सापा-मपिहित सनया बन्पाः । किपिविष्टा सरसाप । संविधा:-निणेम्छन। । पुनः किंविशिष्टाः। . ६ , सोपदेषा:-धर्मोपदेशतत्परा। पुनः किंविशिष्टात भुतनिकपविदा-पाखरदस्प निवृषा पुनः किम्भवाः क्षेत्रकालापपेधानुष्ठाना:-क्षकालानुपारेन विहारादिमियारम्मिनः। पुनः किंविषिष्टा १ खमार्गप्रकटनपटवा-पपार्थभुवपथप्रकाशनवधा पवार्थमेव पास पथ प्रकाशयन्सीत्पर्पः। पुन: किंविशिष्टा! ? प्रास्वमिध्याप्रसादा-नीकृमिया चासोकपः । पुनः किम्भूताः ? नियमशमदमेस्पादि-नियमो-द्रव्यापा, धमा- कपायनिग्राम, एम-इन्द्रियदमन औषिस्प-सर्वत्र योग्यतानुसारेण पिनयादि प्रयोक्त्वं, गाम्भीर्य-मरुधादिविकारत्व, पेय-विपरसु मपि मविसिमस्व वेतसोऽहम्प, सौर्य- विपार्य फरणीपकारित्व, बौदार्य पिनयादिनाऽम्पापनवितरम, जार्यचर्या-मस्तुरूप- क्रमप्राचिसा, विनय -अम्पुरवानादिना गुरुप प्रतिपतिः, नयो-लोक लोकचराविद पर्वित्त, दया-पुरास्पितादिदर्शना[ वा ]न्ति [फरपत्र ] इति दाक्ष्य धर्मप्रियामु नालस्प, पम्प सरलपिचता, सो इन्द्रसमासा, एमिर्गुणैः पुग्पाः पवित्राः । ईला सापो बन्दनीया इस्पर्पः ॥ ३७॥ सांप्रत प्रकरणकारा प्रकरम समाप्नुमन्-पष्टदेववा-यामेनाबमानमाल, म पाय चकबन्न सनामधेयमाविर्षिमावयितुमाह- विभाषिप्मुमगमस्मरमनासार भुतोमने ॥ ३८ ॥ म्यानपा-मद विन बन्दे-तीपर नमस्करोमि । किम्मत । विमाविष्णु-अत्यन्त पिराममानम् । पुनः किम्मत गर्व गर्न रहित । पुनः किम्भूत मस्मर-मितान्दपै । पुना किम्मत ! भनामादम्-अरममतान्पम् । पुनः किम्भव ! भुतोडाने समानएमणि- शासोडाने फेसबामपं । पुनाकरम्मत परवानीपन्द्रिकामे पर-भेष्ठभरीर-चार्तिक- कौमुदीनपनाप, पुनः किम्भूत ! बाप-स्तुस्य, कथम् ! भनेकपा-पहुपा, कर असुर नरे:-देस्पमनुमा, न कालदेस्य मनुष्पैः शमण व-इन्द्रेण ष। पुनः यम्मू। एनप्छिद- पापछचार । पुनः पम्स ! विदुपा-पगिताना दम्मारि-पापणाई पुनः कपम्भूतं ! सदा-सदा एकान्तरङ्गप्रद, फेन ! सुवचसा-मधुरगिरा सदसभिस्पादिरूपतया अनेकान्त प्रदातारम् । मप्र लोक सपस्नन पक्राप उमाबनीया ॥३८॥ पक्रमिदमासमम् ।। मिमपविमवदुर्गे कामता सापुरे, ॥ ३९ ॥ -'जिनपतिमतदुर्गे' मधुना-दानी सैविपपिमिाइप स्यगन्छ- स्थिति मामि विस्तारिता । कस्मै ! स्वार्थसिरी-निमकार्यनिम्मघर, करत साश ८पामया-
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मनमाना पालेम आरमाऽऽपची कृता ये मूलमना तेपो पपनाप शन-निगर
इम | कस्मिन् सवि! साघुमेपर-पूतः मिनपतिमतदुर्ग-च्छिामनप्राकारे अमिभूने
सति, म्छासनमेव दुर्ग प्राकार! "कोट" इति मापया तस्मिन् विपयिमि:-कामिमि:
उपते सति यदा मगपच्छासनमेव दुर्ग प्रकार: धूः उपद्रुत तदा । इयं गच्छ
स्थितिः निघगम्छ-मुद्रा विस्तारितेरपर्थ । एतः ममिमते मति ? कालता दुपमाकाल
दोपास् । कै? भस्मकम्लेच्छसैन्पा, पषा म्लेच्छसैन्यं फस्मिपिदापि दुर्गे स्वसमबलेन
गृहीते द्रम्पार्च सदन्तचिनागरिकलोकापनाय मला प्रसारपंति प तपा सिलिना
सकार्या समनापनाप गछस्पिति प्रसारितपन्त इस्पर्पः ॥ ३९ ॥
संमत्यप्रतिमे सामपुपि प्रोवृम्मिते भस्मक ॥ ४०॥
व्यारुपा 'संप्रस्प-प्रतिमे। इत्प-ममुना प्रकारेण लोकपर्य करामहे-
उपास्यामहे । कया ! सदागमस्प कषयापि-शुदसिदान्तपर्मस्प देशनापिपारमात्रे
णापि । किं कृत्वा ? एकीम्य-एकमा कृस्मा । फषम्म सो ! तदाधापरे:-मोर
रामाबापरे । कस्मिन् सति । मोहरामकरके प्रति समपि सति, कोपः १ मिथ्याधान
रामसेन्पे प्रौरतां पाति सति । न केवलं मोहरामकरके पौरि बग्मपि सति प्रागुफासा
घरीरे प्रोम्जुम्मिते सति-सम्पपते सति, पुनः कस्मिन् सति । दुरन्तदधमापर्यम्-प्रस
पतालक्षणम्, पस्मिन् विमति मति । इसक्षमपूपि । किम्मते ? संप्रति-प्रधुना
अप्रतिमे-भमाशे कसम्मते दशमाप ? मस्मकम्लेच्छातुन्छाले-मस्मराधिनुरुम्फामि
पतिसेन्पा-मस्मो मस्मराणिग्रहा, स पवान्छिासनरवानामेकापारिपायित्वात् म्ले
छा:-तुरुकास्तेसो सम्पैः। यपा कमि महाराजाधिरामो म्लेच्छामहा सामन्तैमर्स
सापपवि दमा अपमपि मोहरामा मसकादिमिर्जिनशासनमविसापतीस्वपः ॥ ४ ॥
धृत्तिकार-प्रशस्तिः।
-बिनबामरिसरस्वती, कच मिझोर्मम वापिमयोदपः ।
शुबतिमा मुममाः ममु
भरपयो कात् प्रकरिम्पय ॥१॥
भीगीरदास इति पीरथिने परस्प, पादामापूजनपरापपवित्तिा।
भीमानभूरमर्दिविवामन, येमाः गगविर कापास्मोन ॥ २ ॥
वस्पास्मनोऽभवदनम्तगुणाः समप-सम्परूपसमाविवनिपुण्यराभिः ।
भीमार हमीर इति वीरवरा शरीरा, बाइकमहिरनिय निनपूममापः ॥३॥
दस्युमोऽधिपवित्रफर्मनिरतः सहिपना सवा,
स्माता पोम्सहापनोऽप्यरवपत् टीका झाषामिधाम ।
ठल्मीसेन इति पसियमहिमा रेपान गुरुनगन् ,
पीपाजीपदपापरा परपरीवापाऽतिदन्ता पररा ॥ ४ ।।
बय समर्पमा-
विम मावणमासे, पर्षे त्रि-महिपु-पन-(१५१३) मंगुपिते ।
इमाम् मममीसेन,मीको श्रीपापस्प ॥५॥ प्रयो५०१॥
॥ इति भीलक्ष्मीसेनकृता भीसापाकटीका सम्पूर्णा ॥
माम् नमः। भीमिनवमसूरिपिरपितः मीरपरामोपाम्पायविहितग्मुराणियुषः श्रीसंघपट्टकः बने शातिदिन शान्ति-कर भॊतरोग्भिवम् । महोवेदिरोबार, विमसावपातकम् ॥१॥ मिला दुप्पर्मदुर्ग भमरमवता साधिकारहाणे- मे वीरभी: सविनयवती कीम्पा बेन सुभ्यः । मम्मान प्रवास मुरमणिरहो । | इवस्त्वं हि सा- स्टेना मां गप्प सविममणमत पर्चमामः ॥ २ ॥ मिनबहमसूरीन्द्र, स्व: भीमापदफा । इम्पापामसपी , छीनुसारवा ॥३॥ प्यास्या-अप ' साप[क] ' इति का शम्दार्पः १, उपवे- सहस्प' मानादिगुणसमदायरूपस्प-साम्पादेयतुर्विधस्य पहको' म्यवस्थापन, पथा राबादयः सनियोगिम्पो परस्पापत्रं प्रपप्छन्ति ' मनपा म्परस्पपा पुमामिर्प पाम्प'-मिति, एषमिहापि साधाविपक्षयोपदर्शनद्वारेण सपक्षसहस्य व्यवस्था पक्ष्यमाणा दर्पत इति सापका । तत्रादि-चम्- परिमाणवीर सबमपनमीर्मावरस्तोकडोक ॥ १ ॥ व्यास्पा-'स्तुमा' प्रशुमा, मस्मत् प-प्रपम्पमानेऽप्युचमपुरुषप्रयोगकपना इसमिति कधूपदं सपमिह ये काम, दीपसे-तूपवे प्रमादिमिरिति देगा स पात्र प्रकरणास्-मपिष्टदेवतास्वेन स्तमासाजिना, सोऽपी. कमठसपोदएतास्पटनसपमा साधारणविशेष[प]योगास्पार्यनाथः । तं देष समः, यो'सगादेव' प्रतिपादयामासेव । इस पम्दोषि प्रेमापोतका कि इति तदेवाह-निपुरमित्यादि । 'पा' प्रेशापनि 'कार्य' विषय 'रुपपस्वसन' सर्प सामन पूर्वापराविसंपादिशास्त्रविरुदमननिराकरण । .
4 स्मिा ! 'प्रपच मङ्गीकस्य, कि! 'पिपरमपि-म्यसनमपि । अपिः सम्मापने, एसस्सम्माषपति सति सामर्थे सापायनश्या पथस्सस्नायपीर लनन्तजीवसंसार कारपस्वेन मातेऽनवर्षायति । कस्य विधुरं ! 'सस्प' आस्मनः क ? सपस्तवक्षनात् । फिलेरपातपादे । कस्मादेव मगादेव । इस्यत बाह-वाहण्यामृताग्थिा-'करमयं बनो मपा इमामपपादुदरणीया' इति पापीयपसागरी मगवान् । नहि सोकका विना फस्विकष्टमङ्गीकरोति । किंर्माण एव अगादेव! इत्यत भाइ-'स्पष्टपन्' प्रकटी हर्षन् , !ि कमठमनितपा-कमठामिपान-चौकिक-तपस्वि-पबामिरूप-कानुष्ठाता उष्टं प्राणिवप-नाम-पूमा-सयातिकामनादिदोषयुकं । कप दुट ! सबरविपमेन । किं कत्वा ! 'सन्दर्य' दर्शयिस्ता ? 'नाग' पचाग्नितपोनिमिचम्मलिताग्निमावि काठकोटरमभ्यग समज । किपिषिष्ट ! 'पहिन्नासावली' निरन्तर प्रमाशिनासा- व्याप्त भईदग्पमिति पावन । क ? 'भने पुरता, कस्याः ! 'मातु' सपनन्या, न केवल मातुर, सपा समस्तसोकस्प । कस्मात्सकसमनमध्ये मगस्तिचपस्तिरमकार ? पता उपपमबनधी असन्मार्मोन्छेवदया। एष झानस-पावकमठपिपास्यमानबलपर पारासम्मावादिस्वापापाम्पुपममेनापि कमठवपसो दुष्टल स्पस्पताऽदेिवस्प्रत्यपादि-- पर मद व मपतिरपि मार्गस्ससनं साष्टाङ्गीकारेगापि कार्पमिति सपाः ॥ १॥ तदेवमिष्टदेवतास्तवममिपाप-दानी साम्यवस्मोपदेसव कपनीयं, सब योग्यपुमस्प प्रतिपापमान साफरपमासादयेत् , तेनोपदेशहस्पमननयोग्य मोतार निरूपपितमाह- कस्पापामिमिवेशवामिति गुणमाहीति मिथ्यापथ ।। २ ।। प्पाल्पा-'उम्पसे' उपदिश्पसे, त्वमिति पुग्मदो मोवनिर्देषा, मयेवि रास्मनिर्देशः। ततम मोः भोवामया सं साम्पवरपा प्रतिपापसे इस्पर्षः । कस्मात् । स्यार-करपानामिनिवेठपानिति । इति पदा मत्र सर्वेऽपि स्वः । करपाया-रामोऽमिनिवेश:-माहा, सप्राइस्पा, तान् , साहिलो हि सदुपदेश रस्नभवये परमानन्दः समसति १ । तथा गुणग्राहीति-अपीयसोऽपि गुमस्प प्रहण प्ररमा, दोपैमाहिमो हि भविषमानेऽपि दोषे तबाइकस्वमेव स्वात् २ । वा मिया पषप्ररपर्षीति, मिथ्यापपो पक्ष्यमानो पवाछन्दप्रपितोत्पत्रमार्गः वस्य 'प्रस्पी' विरोधी, उस्त्रमार्ग भोमपनि, उस्त्रपपामिलाएफस्य पवार्य सिद्धान्तोपदे समासाप स्पात् ।। सपा पिनीत इति गुदिपम्पुरपानादि करमसालसा, बिनीता . .
. गुरपा सिद्धान्तप्तत कषयन्ति । तथा मठ इति-मुस्त्रमावा, गुर्वादिपु बीरिका (निहिति) निरपधप्राधिरिस्पर्प, ठोहि न विपापोम्प: ५। तपा मौषिस्पकारीति घ लाफागमाविरोधेन गुर्गादिषु यपानुरूप विनयादिप्राचिरौचित्प, सस्करणशीला, औचित्य-हीनस्प शेपगुणाः सन्तोऽपि कासम्ममममाः६ । तथा दाक्षिण्पीति, दाक्षि प-मनुकूलता-प्रनचितानुपतिस्प, तवान् , निर्दाक्षिण्यो हिसघूनामप्युटेगरुवातमा दमिति-जिसेन्द्रियः, मजितेन्द्रियो दि गुरुसवायामपि मन्दायत ८। तथा नीतिविसि- सदाचारपरायना, ततो हि सर्वेऽपि साहाय्य मचन्ते [संदधे] ९ । तया स्पैर्मीसि, स्पैर्य- कार्यारम्मेऽनौत्सुक्य,तमान् ,उत्सुकाहिरामम्यन कार्यमारममावाः शास्तारमप्रेमपन्ति १०॥ तथा पीलि, धैर्षी-बापरस्पपि मनसोध्योम्यस्य वद्वान् , अपीरोऽपि विमाइलित घेता गुरुमपि हीलपति ११ । तथा सदाति, स [ ] न (१)-थोमनो धर्मों लोकप्रहरहित माशानुगता शुद्धो मार्गः तस्यार्थी-गषेपका १२ । तथा विका निति, पारिणामित्या पुस्सा युकापुकविमों विक , सदान् १३ । तया सुपीरिति, मधी:-प्रापा, मा हि वकाऽपि गुरुन किविरसंस्कारमापातुमिष्टे १४ । वदव पूर्वोदित सकलगुणग्रामसम्पमा स मोः भोता, वतो मपोपदेशसर्वस्व माम्पस इति सवा ॥२॥ इदानी योग्य मोवार प्रति याकम्प तरप्रस्तावनामारपयितु चापमाह- पर बिग फलिकाछम्पापपत्राम्हरा ॥ ३ ॥ प्रोस्सर्पस्मरामिमहसवतमाचसापाम्पपुप्पम् ॥ ४ ॥ व्याया-एब षिषे प्रापिबर्गे सति साघुपैः सोऽय ' पन्या: ' मार्गः अपाथीति समन्मा । 'प्रतानि ' पिस्तारिता, कोसौ ! 'पया' म्वेम्छाकस्सिस मत 'स इति सकलजनप्रसिदः 'मय'मिति इदानी प्रत्यधोपलक्ष्यमाणः । फवमप्राधि ! 'अमिता ' समन्ताद् भूरिदेशमित्यर्थः । के ? माघुमेपैः, सापोः ममिदितस्पेष यपो- रयोहरमादि नपप्पं, न सापारो, ये से तथति, सनिलिङ्गमात्रपारिमिः। इस एत दिपार-विपपिमिा, विपपरन्ति-समारगुप्तौ पनन्ति मासेविन प्रामिनमिति विषपा:- शम्दादया सान्निा, पिपयासको हिपतीनां दीपपा विरुश्यते । किंस्पा पन्या! [मिनोफिप्रस्पी ] बिनानासकि-चनमागमः सस्य 'प्रस्पी विरोपी।कस्मादेवं विषा पन्या प्रपियस्तैः सहिरेस्यादि, सलिएा-सातस्पन पार्मिकपनोपतापक रौद्राप्प पसापान , विशे-मरसरी-गुणवद् गुणपसनप्रगुणपुनित मो-योपादेयनिमःशून्पा, मसला-प्रकन पिश्चना गुणपद् गुणासपमोरोपपपतुरा, मरो-तुर्मेधा पो मन-स्तामेव - . , ५८ . - पतुर्मिधाम सहस्सस्याम्नाया-भिप्पप्रशिष्यादिमन्तानः तत्र रसाा-प्रीतिमन्ता, महा सहशियादिमिशेषणोपेतो बनो नाम मुविहितमावस्याम्नायो गुरुपारम्पगित भुपिकता पारणा, का रफा-पधपातिनम्ता, न हि समाशवनापरित प्रामाण्पेन प्रतिपपन्ते, मत एष एवविधा बिनोकप्रस्पर्विनमेष मार्ग प्रथयन्ति । अय दीप्यमाने मयें इस पारमेभरे पथि स एव प्रपनस्य तमम इवानकायस्सपाह-'खगति' ला 'बिरसता' स्तोका-अस्पबनाम्पुपगमनीयता 'पाति' प्राप्नुवति मति । कस्मिन् ! मैनेन्द्रमाम- मगरत्नपीवे सखे प्रतिमोतसि पपि । कस्मादेवन ? इस्पत बाह-प्रोवसर्पदिस्वादि, प्रोसर्पद-भीपीरमक्तिसमये सबन्मराषिसफ्रान्त्या उत्सवसास्प पापापियामिस्मात् प्रोग्मृम्ममापो मस्मरामिनामा-मङ्गलादिषद क्रग्रहस्तस्प 'सत्ता' मित्र, राजादिस्वाद । सतम प्रोस्सर्पमस्मराशिग्रामख पदशमापर्यम्-असपतपूवारूषण । भत्र च सरप मस्म- राविषमापर्यपोसौंकिकमसमोरिष द्वयोरपि साहचर्येण दुग्न ऐकका] चरिस्व पणा- उन्दप्रापस्पारिस्पेन मिच्यास्मपोपस्तस्य सामान्पमिय, सामान्य यया रानास्पषित सफल-मगलाधिपस्परिपुषि]प्रयपुरस्सरमापर्य सामान्याम्पते, एवमिहापि मुपिरित मन-तिरस्कारेग सकससोकस्पासंपवयनमवर्षिस्य दक्षमापर्यस्प साम्रारप, वेन 'पुष्पर' एपमान-पईमानं 'मिभ्यास' बताये तस्वप्रविपचिरूप, तदेव 'मान्त अन्धकार, सम्परवानावलोकन-निरामक्षमस्वात् , तेन 'ए' पाले मैनेन्द्रमार्गे। अब सवि मैने न्द्रमार्गे। मिष्पास्वान्त स्वादिरसता प्राप्ते। इस्या- फिसेस्मादिह-अगति, किस-पदार्पस्स्वग्रे पक्ष्यत, प्राणिवर्गे-मानवममुदाये सति । स्पेिसोकोस्पा कलि कासो मिनोसपा दुपमाकासस्तेन, कलिकास एप-पमाकाल एष निखिलानापार मरठनितपस्वाद म्यासार -सर्पस्वस्य 'बनान्तरास' बदनमध्य, सब स्पिति' प्रस्थान 'सुपात' सबत पातस्मिन् । अत एव सरवेपु मगवस्पनीले बीपावीवादिषु 'प्रीति। एताम्पेष मास्तमानि तपानि, न तु तीपिकप्रणीतानि, [इति] घेतसः प्रमोदः। सपा 'नी' पिस्प-सदापारस्प 'प्रचार प्राधिः । तम गती -पपाक्रम वर्षनाम्पास-दर्षि दग्पोन प्रमादाझान्तत्वेन र मष्टौ [वस्थ]प्रीति-नीति-प्रचारौ यस्प स वमा, तस्मिन् । तया, 'प्रसरत्' तयाविषगुरुसम्प्रदायामापात्-माधुर्मवद् मनपोषा' सम्प सिद्धान्तार्षापरिधान, न परिस्फरन्वा कापपाना 'मोपा!' सम्हास्वः 'स्पगिता' तिरस्कतः ममतेरपपर्गसधणायाः 'सगों निप्पचिर्यस्प स तपा, तस्मिन् । 'सम्प्रवि' रवानी। किलेति सम्मापने, सम्माम्पते एतत् पस्कटिकालानुमावास् सम्प्रत्येमविये प्राणिवर्ग इति तायार्पः ॥ ३-४ ॥
. . . - . पदानी योग्य मोतुर साघुषेपकस्पिते पपि दमाः तस्मरूपित धर्म कपयन् तस्य प कर्मनिप्छनपमस्वमसम्माषयन् इदमाह- पत्रौदेशिकमोमेम मिनगरे पासो पसस्पषमा ॥ ५॥ व्यास्पा -अत्र पपि अप धर्म:-पेत्कर्महरो मवेस् वदा मेलम्ची तरेरिति सम्ममः। 'बा' मस्मिन् प्रस्पोपसम्यमाने ' पषि' मार्ग-लिङ्गिकरिपते मते धर्म गौरशिकमोननादि, भय 'षेत्' यदि 'कमहरो' मानावर्षादिमंसदधो ' मवेत् ' स्यात् सदानी मेसिधयोधनमाना-पर्यवरानः 'मम्पो' सागरे वरेत् । अय प 'निदर्शना सहारा-तपायमर्थ:-समद्रे पापामसपस्य तरणमसम्मयि किं पुनर्मेरो , तो यषा मरोः समुद्रतरगमपटमान एषमस्य धर्मस्य कर्महरस्ममिति । 'पा' पस्मिन्पथि, किं यतीनामौदेशिकमोमनादिर्म इप्पत इति सर्वत्र कियाऽम्याहार । तपा हदेशेन' विकल्पेन-पतीन्मनसि कस्था निात-निष्पादित औदेशिक । फ्रीवादिफस्सा-कण । तब तझोजन पापनादि । यद्यपि सिद्धान्ते औरत्रिकसम्म उद्गमदोपद्वितीयमेवाः भूपवे, सपापीह पक्ष्यमाणाचार्थपासोपनेन थापाकर्मणि पर्चसे, वस्यैह केवल पतिनिमित्त विधीयमानस्पेन महादोषतया विवक्षितसाद, उपनिवचस्प च सामान्य म्हस्पश्पर्यस्योमयत्रापि समानस्यात् । अत्र पतीनामौदेखिकभोमनगरमे यपाछन्दा पुति दर्षपन्ति-पूर्व हिपहनोऽस्पन्त दानभदायका भाडा अभूवन् , तेन यतीनो प्रामुकैपणीयेनापि मैक्ष्येण निराबाघ निर्वाहोऽभूत् , इदानी दुप्पमाकासदोपाद दरिद्रता मल्पता व गग्छत्स पादेषु ऐदयुगीनमुनीनां वपामियम फिसानननिकलाना परेन मकादिना संयमनिहामापे पदि कपिम्पदाहस्तीविप्लेदमिच्छ. भावा साधु सानिमिचरुवमकादिनाऽपि पर्मापार घरीरमपरम्मयस् तदा को दोपः १ मारमा प पतिना यया कपडन रपणीयः, तस्मापतीनामाषाकर्मिकभोवनमदुष्ट, संयम- परीरोपष्टम्मकस्का , कस्पानपण्यमोमनशा। तपा पतिमिरामाकर्मिकमोमन विपेय, भाभदाहितिवाद, धर्मदेशनपदिति प्रयोगापप्युपपपते १। सपा 'बिनाना' नासा' सर्पदास्थान | पर मषिसुखशीलतयोपसबिहार कर्तुमश्चक्नुबन्यो यतीना स्प पर सदानस्थान युक्तमिति प्रतिपेदिरे, से पाहा-तस्मात् इदानी मिनगृहसास एष साप्ना सन्ता प्रतिमासि, न प त्रापार्मिकादयो दोपा, तीपंकरा रुपस्वात् । पेस्पम्दानीन्तनानीनामुपमोगपोग्य, प्रामार्मिकदोपरहित साद, उदाहारपदिस्पादि । तदेव सम्ममा पिममता विदुषी पिचे पत्पमान एपेदा ईगो गृह, तत्र . " मीन्तनमुनिना सङ्गतिमङ्गति २। सपा पसत्पधमेति, वसधौ-परा निवासं प्रति अषमा-मास्सप, भाषाकर्म-वीसंसफ्यादिदोपत्रातरहितजिनगृहमाससमे नापार्मिक पसतिवासस्प अस्पन्तमनुचितत्वात् । को पुमचा पप्यापनप्राप्तावपध्यमभीयात् , तस्मा- स्परगृरबसविरसमीपिनाऽधुनावनपसीनां । यमागमे परग्रहवासा भूयते स तारकासिक- खालिक यति अस्पपेक्षति ३।दवा 'स्वीकार। ' स्वायचापादनं, कात्यार-वर्षों' द्रविणं 'गास्था' भार! 'त्पसदन ' विनगृह ततोऽर्थभेत्यादिन्दा, । तब द्रम्प मीकारस्पागमे निपिस्वेऽपि साम्प्रतयतीना सस्स्वीकारो मुक्ता, सविना ग्लान-परपक दुर्भिधापषस्थापा मैपमपध्यापनुपपचे: । प्रायेण गृहमेपिना कालदोपामिश्नरमेन निर्य मत्वेन च पसिपिन्तापविधानाव, नार्यस्वीकारः साम्प्रसिकमनीनां सात रामातीति ४। तथा भावकस्वीकारोऽपि मपवनमनीनामुत्सर्गापपादपदविदुरामा न निर्पमिका । पूर्ण हि कासस्य सौरम्पादसिधयपपुरमपाल्पालेनमवनामा अपि मना वामरमिधुम्पा सपहुमान मिषादिक पिनेरु, साम्प्रत तु बेनमार्गपेपरम्पेन तेषां तथाविध वामर- विस्सापा ममावाद, अता भावस्वीकार बिना मिधाऽवाप्रप्पनुपपणेपुकः सम्प्रति भावस्मीकारः ५॥ पा स्पस्वीकारोऽपि ममीना समीपीना, सम्प्रति गास्थाना चैत्यचिन्ता प्रति निरपपानमा यतिस्वीकारमन्तरेण कासेन तर्मय सम्ममा मार्गसोपप्रसन्न घाममे वर्षापश्या वस्वीकारस्पामिपानात् ६ । तपा न विपते 'प्रेषित' पशुपानिरीक्षण, माविशम्पास्त्रमार्यन रमोहरमादिना यत्र वदासन पिष्टर प्पूतगम्बिकादौ विरगम्भीरसिंहासनावौ र प्रस्पेषनादि पतीना न भुसति, तेन च तत्र न करपवे उपरे ! चैत्यारासिनव प्रतिपयन्वे-प्राचनप्रमाननादतोस्तादृषासनो परेशनस्यापि सापिपस्वाद, प्रबचनप्रमाबनायाः प्रभानदर्षनाङ्गत्वेन पचाकमान विप्रेयस्यात् । तसः सिदमिद-आचार्यानो गम्बिकापासनापादेय, प्राचनप्रमावना स्वाद, सम्मस्पादिप्रमाणधानाभ्ययनपत् ७ । तपा 'सार' सपापं 'भापरिस' वाप रपा, तत्र 'भादरा' मग्रहः । भाषरमा दि निरसपैर प्रमाण, एता व साबपा, ] (1) दिम्म पापाचरणापभ्युपगमे यतेस्सद्विपीपमाननिलिम्पापारम्मानुमस्पापापा, नपा मेगा रेस्पासिमिरादृता, यतस्तेषामयमाशया-प्रायेम सम्प्रतिवन-पतीनां सरस्था न्योऽन्याला सोनाम्यवस्थया सर्वमसमञ्जसमापपते, तस्मादेवाऽप्यापरमाध्यतन कागपेक्षया पुफिमतीति ८। तमा 'भूतस्य' सिदान्तस्प 'पपा' मागस्तवाना- भनादरा । पेरमाहु:-मगरिसदान्तो हि नैकान्सनिष्ठो, विहितानामपि फेपचिदनु छानानां कपिभिषेपात निविदानामपि कपिदिघानास् , असो न आस्था कस्वा फासपा सिदान्तम्पवस्पा किमपि कर्नु परिरमा पार्यते, नागमपदिशापि काचिस्मामार क्रिया भपवनसाघुप्रवचिता विवेफिना निम्प्रेयमाय मविप्पति, किं भुवेनेसि ९ । तपा 'गुणि' सानादिवस पविपु 'देपमी मात्सर्यपुदित, सय निर्गुमानां तद्गुणानसहि प्णूनां तापमिर्षासया दृष्टा मतिरिति एते प परगृहपासिनो पार्मिक मन्या पास्मान मेक गुरस्कर्पपन्तो निखिसानप्पपरान् पपन्त ऐदयुगीन सहमप्यवमन्पमा नास्वप्राचि दरेण पहिरन्तो लोकम्पबहारमप्यवानाना सरमामा एष, भसस्सर्मथैरते उम्मचम्पा, देप एपेषु भेयान् १.। "गौवमारिपु परिवा-चारशेषु पतिमिः। कममेषु वव १, निर्गुणेपासेवियेत् ॥१॥" "करपभोमियां पान, गुनायोगेऽपि बचते । निम्बाविपु वहमानो,विमा विप्रविपत्तिवा ॥२॥" "पपा बासरस्नाना, गुणामापेऽपि वारसाम् । काचे साम्प्रधि पारविषये, मणिशमा प्रयुम्पवे" "तीचमादिगुणामोगे-पीवानीवनमा । पम्म स्वसत्तमेष, प्रयापति पतियामि ॥४॥" इति पास्सप धान्पादिदशपिपपविधर्मस्पर्दयैव यपाछन्दः प्रदर्शितो धर्मोऽप स्कमहरो मदिस्पादि पूर्णम्याफ्यातमिति चापः ॥५॥ इदानीमेशानि पहारामि याममं कपपन् प्रपमं वापजीपोपमर्दापनेकदोप प्रकटनपूर्णमौरेठिकमोमनद्वारं प्रत्यास्यातमाह- पद्कापानुपम्प नियमपीनापाय पस्माधिः ॥ ६ ॥ पास्या-कासपूणो' पयासुदिन्-सादिनिमिचमेसभिप्पममिति बानन् पति प्रबपने 'गिपरसति' भातुमिच्छति ।। "अदा सनन्तस्य षसादेशे रूप"। किंवत् ! सहा' साघुसायीरूपा भमनगणः मादिषम्पादेकरित्रादिभमनपरिग्रहा, सस्म मत- तत्तते नियमधनादि, नामेति सापा, अतीय कृस्तितमेवक पतीना, बानो मने रुपालोरेप विष मकं मोक्तं न फास्पस इस्पर्षः। कप सास्सित । मत माइ- पस्सापिस, तम्छम्मस्प पम्हमेन निस्यामिसमषाद, सतर पनत 'मापित' निष्पादित, गास्थनेवि शपः । किं कस्वा! मापाप ' उदिष्प, फान् ! 'पापीन् ' पतीन् , यतिम्पो मयैवरेपमिति घिचे स्पेस्मर्पः। अब निरपपाया यविनिमिर्च कतेऽपस्मिन् को दोप? इस्पार-' उपमप' विमस्य ‘पटुकायान् ' पपिम्पसेमो पायु-पनस्पति-साम्पान् पक्षियमीपनिकायान् । कपमुपम्प इस्पाह-निर्दयमिति निपाविशेषण । ननु मपत्वेवयत्य सापित कस्सित, तथापि सिहान्तानिपेपाम . + ५९ . - - " - दुप्पटीत्पाह-'शानेप' प्रन्येषु निशीपादिपु 'प्रतिषिम्पते ' पतिमोन्पतया निवार्यते पनक, कय । बसव-अस्पन्सदुष्टतास्पापनाय मदर्सहः, तथा च माहारोपपि-सरपा पाकर्मविचारापसरे निशीवेऽमिहित- " एप सामनपर्ष, माहाडम्म तु गिण्दप (मुंबई] मोउ । मो भाणा भणवस्य, मियचविराहणं पाये ॥१॥ वधा पिणनिर्पकारपि-- "माफम्म मुंगा न परिचमए पवस्म ठापरस। एमेष मारमोगे,छचविलपोहयोगे॥२ दफासिकनिर्पकापपि- "परिहकर मुंबापमपमहणेवर कुमा। पाचवम्गप,गोपीबा कहन्न सो साह १३॥ नन्वस्त पबमागमनिपेषा तयापि तस्य मनिना स्वयमकवाचरिताननुमवस्तार दा ददानस्प वस्प मने। को दोपः १ इल्पाह-निखिंया' निश्का-निर्दपस्त 'बाप' फरोति पत्तचदापायि-निश्शूमताकारकं पदक । अयं मामा-सयमकवापप्पामार्म भानम् गृवानो सनिर्मतिमन राहिणा प्रसङ्गामअनाव अस्पन्वनुनिश्करम सचिवमपि न नपान, मका कप न दोपः १, सदुप- "सब बावि मुणतो, गिलवो पराए पसगं से। निजसो प गियो न मुबा सनियंपि सो पच्छा। मत पब मस्यन्तम् पठस् मिहापयिषपा गणपरा भामुरूप्येन-उपमानानि रर्षयामाः। तथा पार-गोमासादीति, गो-सरमेमास, माविसम्दात् वान्तोचारमुरा प्रारूपमा सादृश्य पस्प तथा । पनसमाहु-Hषत ममपरा, पपाहि मोमांसमपर्ण लोकपर्मविरुदपेन महापापोतत्वादस्पन्सनिन्दितस्वाध विकिना सर्वथा इयं, तयाऽऽपा कर्ममकमपि, एक वान्तादिप्मपि यथासम्म पोन्प | अपति प्रकारान्तरे, यगत सम्मा सनिति-गम्छति 'मपो'ऽपस्वात् , संयमादिति शेय, अषमा मपोमति-नरक । भत्र चाचे एक वाक्यम्भेना यामेन सफलवाफ्याचे दीपिते पत्मविपद यम्सम्दो पादानं सस्महादिमकस्पारपन्तपरिहरणीयता स्यापनापं । यस्माषामा-बानीन्तन पालापेषया यतीनामाषाकर्ममोबनमपीपते तदनुमानाम्यां निषिध्यसे, पाहि-पतीना माषाकर्ममोमनमनुपादेय, पद्धीपनिकायोपमर्द निप्पमतवाद, पाविध वसस्पादिवत् । तपा पतीनामाषाकममोसनममोन्य, धर्मठोकविरुवस्वान्, गोमामादिवदिति । एवं पोपपभमेवत्-सदादिमस्त पसीना न मोक्तम्पमिति इवाः ॥ ६ ॥ । . , , . - . इदानीं देवद्रष्योपमोगपगप्रदर्शनद्वारेण बिनगृहवासनिराकरणाया:- गायद्गापर्वतमपणरमणिरमाणुगुलन्मृदङ्ग । पाण्या-खलर्निभये, मिनरहे । अन्मितदा' मगबदागमनिपुना पतपो नैर पसन्ति, वदागमे व निवासस्यास्पन्त निवारणास् , मन्तो-विवेकिनः । तात्पत भा-'सती' शोमनात्रिमा मक्किा तस्या 'योग्य' उषित, तस्मिन् , मक्तिरेय पतस्तत्र का पुग्यसे । मक्किपोग्पतामेव विशेषतो विशेषगद्वारेण दर्शयति-गापदि स्पादि, गापन्तो-मगवद् गुणानयोस्कीयन्तो 'गन्धर्षाः ' प्रधानगापना पा सचषा, नस्पन्ती-नाठाशाखोकामेण करपरमादि-अङ्गविक्षेपहर्वती 'पपरमणी पारखी नस्पकी पत्र वचपा, रणन्तो-मुस्लमख्वामिपावान्मपुरै पनन्तो णमो' पंशा पत्र उचषा, गुञ्जन्तोमार्दशिक पाणिम्पा तारना गम्भीर स्वनन्तो ' मृदङ्गा' मस धरा पत्र सत्पा, प्रेन्यो-सम्पमानत्वात् मन्दपवनन कम्पमाना दवसेपार्थ विरषिवार 'पुष्प समा' पुप्पमाला यत्र तत्मा, उपस्-मगवत्प्रतिमा विलेपनार्य विमर्दन मान्छसद्गप द्वारेन प्रसन्मगमदा-कस्तूरिका पर सचथा, लसन्ता-पकिमयत्वान्मकाफलादि विच्छिपि युकरवाष दीप्यमाना मलोपा-पन्द्रोदया यत्र तपा, पती-महापन पवासहारासातपरीरस्यात् प्राविष्णयो 'धनौषाः' भाषकसता यत्र सधपा, पतष गापद् पर्व प सस्पस्पमरमणि पेत्पादि कर्मपारपस्तस्मिन् । एतानि हिमगवगुण गानादीनि प्रमराणि मिनराव मक्किहतुकानि, मायानां शुममावोलासोवतार मदालमिा झियन्ते, अवमिम मक्तियोग्पविनग्रो किमिति सापयो न निवसति ! भस मार- 'प्रसन्तो' पिम्पन्तः, तो रेपदम्पस्प 'अपमोगः' सतत तब अयनासनमोमनादि करणेन उपयोगः सपा 'बा' सापती-पावभीर मपमा 'ग' निधिलं 'मठो' घिनगमगतीमम्पदो पतिनिमित्तनिप्पम उपाभपस्तस्प 'पतिता' माधिपस्प-मिन गृहलस्यकोद्वारिणिका कर्मान्तरादि सकलपिन्ताकारिस्पेनापिकारित्वमिति पापत् । सपा मगरस्पतिमा-प्ररपामघौ मोमन-शयनामन-निष्ठीपनापरिधिकरणेन ममस्पायातना भरमा, सतब दवद्रम्पोपमागमेस्पादिया। शाम्पः । अथ गृहिना मगरभिमिच स्त्र द्रविणेन निर्मापित दवगृहे समतो देवद्रम्प कनकादिकमनुपमञ्जमानस्प यतः कर्ष देव द्रम्पोपमोग !, बिनम्पनिप्पमे हि पत्र निवमतस्सट्रम्प साक्षासुझानस्य गुदतो राम स्मादिति पेम, गृहिणा स्वद्रम्यनिर्मापिवत्वऽपि तस्मिन् देवाय तत्वेन बद्रापसात् , कपा म सुत्र वमनः माधापदनमनुपमझानम्पापि सनर्देषद्रम्पोपमोगोपपते, मावास ट्रम्पनिष तफा ना ? इति यनिमिर्धिनगदे न पामा कार्य इति आचार्य ।। ७ ।। - इदानी बिनायासेषिततेन सिदान्तोफस्पेन च पतीनां परगारसर्ति मस्पापपन् पसस्पषमा द्वारं काम्पत्येन निरसिसिपुराह- सामाजिनावरेस निसेपितोत्र ॥ ८ ॥ चिनोत्सर्गापबारे परिह शिषपुरीसमूवे निसीपे ॥५॥ पास्पा-का सकर्मः पुमान् 'परगहे' गृहस्पगृहे 'पसति' निवास 'विदर' मास्साद न धमते-निपेपयति । सनिपुङ्गपाना-सुपिडितयतीना, न कमिदिस्पर्षः । अपमा-अकों दिकौं बिना सिद्धान्तोकामपि परगावसतिमनारयन् हिम्पादपि, या पुन: सकर्ण: सभवमा अप र सहदया-परगृहवासस्पान्तसगुणदोपविचारपतुर इति, स परगावसति पतीनामनुमोदपस्पेष, न तु देटि । किरपा पमति ! 'निषेविता'। सोफा चेति कर्मधारयः। कप ? 'सापात्' प्रस्पष-स्वपमिस्पी के मिन-स्तीर्य कदिर्गगपरे-गौतमसामिप्रससिमिः । पासबसे । मिनादिमिरुका, तो । तमा सम्पते सम्पते मनोऽस्मिमिति सहा-गापन-कनक तनप पनिवा समन-प न-परिमनादिपरिग्रह निर्गताः सङ्गाद निस्समास्तेषां मावस्वचा, तस्मा ‘मत्रिम' सरूम 'पद' स्थान मनीना परगावसतिा, अपना निस्सझताया 'अग्रिम' मौलं 'पद' सम-लिङ्गमिरपर्यः "परम्पयसितत्राम-स्थानसमाहि वस्तुपु" इस्पनेकापनाद । निस्सहावा हि नित्व लक्षण, बहिरिष दाहपाकादिसामर्यस्प, वस्पाप सिङ्ग परग्रहवसति, नहि स्वापीने विमषे विद्वान् पिस्परमपमीदिति । अत्र च पदशमस्पावि[मिसिस्वाम विशेष्यलिङ्गता किं कुर्वन् विदेटि! इस्पत आर-'मानन् ' आमममवनानमुखमाने।। का ! शप्पातर इस्युक्ति-र्मापा, ताम् । सिद्धान्ते हि सम्पासर इति मापा भूपते, न पासौ माधना परगृहवास विनोपपपते, तपाहि-'भरपापा' पसत्या पतिम्पो दान, तया वरति संमारसममिति भरयातरममा, परगृहवसति विना पतीनां न कमि रसाघुपस्यादान पनेस, न प उरममस्तीति परपावरसम्मस्प स्वार्थासामे निर्विपपता पापा सिद्धान्त प्रतिस्थानमुपारणं फपमिव शोमा विममा १, तस्मादागम सम्पावर सम्बभुवेरपि परगावसतिर्सनीनां धापते | तपा बनगारपद प, मानमिति सम्मापते । पा महषये। न विपने ' अगारं ' गृह पस्पामौ भनगार, ततम अनगार इति पद पपरेशा, भुत पनगारपद पवित्रापर्क प्रतिपदं धूपते तब से स्वागरामायेन परा गारवासन प माछम । अपपा सागारमझाये परपरासे पा यथाक्रम यतर्गपति- मठपति-पपदेशप्रसाना-नगारपदपर्वमापतेसि । ननु पदि हि सर्मागमे पेस्प . पासोऽनमिमा स्याचदा परगावसविर झम्पेतापि, यदा तु ता कपिरस्पनासे कपित्वेऽपि ठेनैव भवद्रिा परगृहरसतिरास्थीयते, तदा रुथ धम्पते ! इस्पार- चित्रोत्सर्गत्पादि, पपस्मार इहप्रवचने 'निशिये' प्रहरपाम्पपने पबमोदेशकादौ विभवे ? सामान्यविपिक्सनः विशेपपिपिरपवादः । उत्सर्गभापपादपेति मनः। ततम 'मित्रो' नानाविधी पसरपादिगोपरापुत्सर्गापपादो-सामान्यविशेपनिधी पत्र सभा, सत्र तथा 'शिरपूर्या' मोषनगर्या 'इतस्ता सन्वेषारसाशास्तत्र, भूसक्षम्दस्यात्र सास- वामित्वात् , 'प्राई' प्रथम 'नाना' प्रविपाप 'मरिमेरा:' प्रसवप्रकारा ' गरिया पसती गरस्थसदनरूपोपामयान् पाद-परम कारणे अपपिपपसरपलामलक्षपे इतौ 'अपोप' अपवादविपपीकस्य, वा एषेति गम्पते । अयम-निशीष पूर्वमौसगिका पसविमेदा पविवासयोग्यस्पेन कपिता, । - पवा- “ मूखचरगुणविमुख, बी-मम्मु-पक विपत्रिम बसहि । बिन सयाम, विमाए दुदि सामो॥१॥ " विधिहमा सम्यिा, पमाणसुत्ता सिविह बसहीमो । पापीपाम अणे, वस्व पोशा इमे इति ॥२॥ सपा सापीरुदिषयोदित- "गुचागुवारा अपचे सचि-मत-मीरे। मीरपरिस्समापिए, ममा सिजापरे भनिए॥१॥ भणशासकमारा, सागारियभगिणिमाइ पेरता । निष्पपापमोगा, विपिठापुरोग (पमानका ) वसही ॥ २ ॥ पलामे पपाचा एपापवादोविवाः। यपा-द्रम्पप्रनिहायामपि पसनो कारपेन पस्तम्य, सया पाह- "भापमिगाई, विम्हपो मगिरण असहर । गीयरथा अपनाए, पसंति दो दम्पपगिये ॥१ . भामरणगिही, त्यामधारमोयमे गये। भाव-ना-मारय, गीए सपणे प एमम्मि ॥०॥"
7 "षमाणानिग्गयाई, विस्पो मग्गिठण बाप । गीयरबा अपमार, पसंति तो माषपरिब ॥ ३ ॥ मा कारणे पुरिसेस पर कारणे इपिपासु विसति । पनामवाससाबयोणेस प कारगे बसा ॥४॥ वत भपोप कि कतमिस्पत मार-पपमि, संमतानो निवास इति सम्म । 'संपताना' मुविहिवाना निवासो-ऽस्थान पयमिक!' मगारिपाम्नि' गृहस्थो । फीरक्षेत्रीमा ' संसक्किा' संसर्गो-रूपापापासप्रस्पासचिः । आदिग्रहमापापण कादिग्रहा। 'तत् पुस्तेऽपि तसहितऽपि, मास्ता तारित इस्पपि चमार्ग । ननु बमवयस्स अगुची इस्पादि पचनास्त्रीसंसक्किमति- " पमुपंडगेम पिर, मोहानमीरिमाण बरो। पायममुहा पपिची, पुग्यमवम्मासमोसा॥' इस्पादि वपनास्पभुपणकर्ससक्किमति प परसदने बसता सपतानां ममपोरक सिकापनकदोष सम्मवार कप सा पासो नियमितः मार-ममिहिवा निसीचे प्रतिपादिता पमना सीससत्यादि सम्ममत्कन्दर्परिकारा मसत् प्रातिनिाविपटीयसी तिरस्करणी कटापन्तनिरूपा पेटा, यदार- "पीठ पभूबवरा, सप्पविपि विनिविधिमसन पत्र्य । सिमा विगाबमो, सा अपमाणाप विपम्मि ॥१॥ मानाए विहयमि'चि मापा-माप्तोपदपनीमा 'विपदि' ट्रम्प क्षेत्र मास माना दीरपर्षः। 'तस्कारिणां' वापताना, पपार- " भावम्मि ठायमामा, परम सपदि हापरिपये। सदिय पारिसिमिमी, तस्मा सइठंति पासपने। १॥' " पासबने मत्तरस, गमे प्रमत्व चिनिमिहये। सम्झाए साणे वा, भाबरणे पापरणे य ॥ २॥" "बहि पप्पपरा रोसा, भामरणाईण पूर उमिया । निमिममिति बागरण, गीप पन्झाच सामाई ॥३॥"
"अनापमिमापाई, विम्मुत्तो मग्गिऊण बसईए । गीवस्था असणाए, बसंति सो रब सागरिए ॥ ८॥" "मसापनिगमाई, पासे साषयमय । मापलिपा तिषिोपी, पसंति बबणाइ गीयत्वा ॥ ९॥" इप यतना सीससक्तिवसतिमधिकरयोफा । पशुपमकसंसक्कापामपि बमवी बसताम् एतदनुसारेण सम्मपिनी पतना एम्पा, सदयमा-श्रीसमस्यादि सम्भवेऽप्येष विष यतना साबपानानां मनीना तखन्या दोषाः प्राहम्पन्ति सर्वत्रेति, सरमिन् भपि बसस्पषिकारप्राचोदेशकादौ । नन्वेष पवनावता त्यासेऽपि को दोप? इस्पत बाह न तु, 'तु' पुनर्मेरेऽवधारणे पा, वेन न पुनव या 'मत' इP: कापि उदेषकादी वैस्पबिन गरे निवासी निवाम इस्यमयत्र योग्मते, एकदुक भवति-पदि हि स्पवासो यतीना कषिन्मता स्यात् तदा श्रीसंसक्पादि पुक इस गृह पसा, सत्रापि काशिव पवना ध्यात् न , ततोऽनसीपते-अमारिपाम्न्येव संयता-पतीनां पासो, न पेस्प इति । समात् न सकन तत् देपो विषय इति काम्पत्याः ॥ ९ ॥ साम्प्रतमादित्रय-गोचरस्वीकार-शारत्रयमेकाचेनाह- मनग्यापतिपन्विन न तु बमस्वीकारमार्मिमा, ॥ १० ॥ प्पास्या-नस्विस्यक्षमायो, न पम्पत एतद, यहुत-साधना पनस्वीकार इति, पतो 'पनस्वीकारं' द्रम्पसता 'माह।' वन्ति भिना, मा बिनानाम् इदानी मनीवस्मेनोपदेशासम्मवात् 'माहुर' इत्यत्रातीतविमतिप्राप्मावपि यार्चमानकपनं वा सागमा प्रन्थसहाविपाकप्रतिपादक। फलपतपाऽप यावदनाचिमिग्मेवाष्पवसायेन वर्षमानतयानमासात् तदुपदशदानप्रदर्शनेन लियाना पनस्वीकारं प्रस्पतिमिही यपा स्पादिति मापना एवं उचरपदेऽपि पोन्पम् । कीरत ! 'प्रग्रम्पापा' सर्वसा- स्मागरूपापा दोषापा 'प्रतिपनियन' विरोपिन, विरोपमात्र पम्पपावलाना तपाहि- द्रम्पसतो मूर्छापरिपामा प्रवन्या पतदितिपरिणामः त्यो पात्र बसवता मूर्थोपरि पामेन वीरविपरिनामो वायत्त इति तपा 'सारम्भिपां' सकससावधारम्मप्राचाना पुरिया परिग्रहो मम्छरितुः मामकसहि म तपा, २ । सुसमोऽस्वीकाराव मस्प मेदप्रदर्शनार्यः। मविषयेन ' मासा' मासपापं भावयते' परन्ति, बिना इति पूर्वस्मात् मनुकम्पते। भत्र पाहुरिति रियामापत्रमावपसिझावाचयत इति पुनरमिपान . . . - . . द्वारान्तर-निराकरणमेतदिति चापनार्पम् । अयमा गहिपरिखो दिवसतकारितादि सकलमहारम्म-महापरिग्रह-मनितपापानुमस्याविना यतीनामपि तसतादिनिखिपाप प्रसङ्गोऽया फष तम्य नातिमहासापपता, पररुतमहापापस्पारमन्यम्मारोपवमेष चातिसम्दा।। एक-"प्रारम्मनिर्भर गृहस्पपरिप्रदेव, वस्पातक सकसमात्मनि सन्दपाना।। सस्पात् पवन्स्प-करमोपदोप, मारम्पनिमामय सिमिशुपाया ॥१॥" इति । अतएर गदिपरिग्रहो यतीना प्रामिपापापा भुवे निवारिता, पदुक " मोसम-गिहिस सहुगे" स्यादि । एतेन हिस्वीकार प्रति यस्परस्प पूर्ण विकासस्थ सौस्यादिना पुश्पमिपानं तदपि निरस्तम् । कालदोषास् चीपिकावि-भूपस्पेऽपि गृरिस्थीकारमन्तरेवापि मद्रकादि भाटेम्पो यतीनामधुनाऽपि मिधादिप्राप्तेरुपपवे, असा फेषस औदरिफास्वापरयातीयोपहासपद विदुला सदर्भस्वस्तीकार इति । योऽपि "मा सम्स ठिई चा मस्स संधि पुरपुरिम कय मेरो सोतं मा मतो बनत संसारी उ हो । इस्यागमोपन्पासा सोऽपि न मबदमिमतप्रसापका, अन्पास्वात् , न हि पति परिग्रहसापकोऽय प्ररुसाममा, किन्तु गमपराहीना शिष्य-प्रतिशिष्यपरिमाविषयः, तबाहि-पा कापित् मस्य गमपरतिप्पप्रतिक्षिप्यादे स्पिति:-प्रतिकमगान्वनादौ न्यूना पिक-धमाभमणदानादि-सपणा सामाचारी, या पापस्य सन्ततिरुपारम्पर्येमालोष मादि दानविषया सम्प्रदापा, पा घ पूर्वपुरुषहता गणपराविषयर्षिता मेरा' मर्यादा- गठम्पपश्चा, नामसिकामन् मनन्तर्स पारिको मसीति, अब हि गनमाथिम्मादीना स्मस्मगुरुमवर्षित-स्विस्यापविक्रमेमन्वसंसारितापल्या प्रतिनियतगणभरपरिमाविषयत्व मवसीयस, भानकाणां तु सर्पधार्मिकगच्छेप्पविशेपेन मरूपानादि मस्पमिपानात् । पर्मगुरुपु सगळे वा विशेष दानमतिप्रतिपादनं पां उपतीकारवया, न वत स्वीकारविषयतमेति । एवं गृहिपरिग्रह मषा पटीना नोचित इति ५। तमा स्स' मिनगास्य 'सीकरण' स्वायत्तापा तत्र । तुरत्रापि प्रपमहानदस्स मेदमाह- गस्तितम ' प्रस्या सकलस्यास्पपिन्ता तहम्योपमोगादिना लोकेशम्यति निन्दिसं ' माठपस्प ' मठनापक ' स्यात् ' मवेत् 'पहे. 'मनेः। एसफ मबति- स्पस्वीकार हि यतीना तपिन्सन सकसमनुष्ठेयं, तरप पारम्मदोपपतपा द्रम्पस्तबलेन पतीनां निवारणाव , एष च समेष परिमामय मार्गानुसारिन् या पुरक्षा पनर्देवा विकार चिन्तयता कप माठपत्पमतिकस्सित न प्रसन्यत । इति । सौफिका माया:- तपा-" यदीपमरक गन्सु, सपुत्रपनुपामा पिपिति त्-िनो प प्रास च॥१॥ सपा " नरकाप मविस्ते घेव, पौरोहिस्प समापर । व पाबस्किमन्न, माठपत्र्य दिनापम् ।। १ ॥३॥ . " .
, - इदानी निगमयति-पस्मात् अर्पे यस्मात् एष-मित्युक्तकमेग 'प्रतवैरिपी' पारित्र- प्रतिपन्पिनी, इति इस मिमममा म पाने योल्पते, ममता-अर्यादिषु स्वीकारमुदित, पति पस्मादेतोर्न युक्ता-नोपपमा-'मुस्पपिना' निर्माणामिलापिणा सनिनामिति आचार्षः ॥ १-१०॥६॥ साम्प्रवम् असंयमादि-दोपप्रदर्शननाप्रेषितापासन-चार निराक माह-- मबति नियवमत्रासपमा स्माधिभूपा ॥ ११ ॥ प्पा-'मपति' मापते 'नियत' सर्पदा 'मत्र' गम्बिकापासनेऽसंपमो चीन रक्षाऽमाना, गम्बिकादेनिस्पस्यूतस्यादिना प्ररपुपक्षमादि अमारे विपरादिना तदन्ता प्रवि एाना तदन्सर पोस्पमानां वा प्रमादीना उप्रोपवेशनेन विनाससम्मवात् । मिक्षोरिति चमम्पस्य पद सर्पम सम्मम्पते । 'स्पात् ' मवेत् 'बिम्पा' शोमा, सोपविष्टस्प वगतोऽप्युपरिवर्पहमिति विभपा कार्यमिमानाचा, पिम्पा च पतीनामवश्य वर्मनीया, पाक-"मिसावधिय मिक्ख, कम्म पपर पिरम । संसारसायरे पोरे, लेग पग दुरुत्तरे ॥१॥" इति । 'नृपते।' राजा 'क' पिर, रामादीनामेप प्रायेण महर्दिकानां तत्रोपवेशन-दर्शनाद । 'लोकहासों मनतोरपासनं, परम्दो दोपसपुचपे । 'मियो-यता' महो! 1 मिझोपमीविनो मण्डिता मपि एवं विभासनपूपविधन्तीस्यादि सर्पमनरपन भरणात् 'स्फटसरो' लोकप्रकटः । इह गमिकादौ 'महा' परिग्रहो महापनरवेन मुर्छा हेतुस्मात् 'सावनीलस्व' सुम्पलालमत्त, तदन्तरेण मरूतविपर्येषु मुस्पछेषु वपाविमा सनेषु पति मनुचितवपा सिदान्सनिपिदेपूपयेष्ठोऽमम्ममी, उप-रतिक्षपेन, इति देती। एम्पो हतुम्पो 'न म' नेम, स्वछरवपारप्पे सरधो-मोधार्षिनो पतेः 'सहर' युक्तियुक्त गमिकापासनं, उपमोगतमति शेषः । सोकप्रसिदो रुवादिमृत भासनषिपो गन्दिका । माविसम्मान-मरसिंहासनादिपरिग्रहः । एतेन पदपि " नाणाहिशो परतरं " इत्याचा गमपठेन प्रापनप्रमापनावपा पतीना गप्दिकामिहामनादि-आसनोपवेशनसमर्थन वदपि सुस्वपीलतारिनमिनु । मुदेन यतीना गरिएकापाससमनुपादेष, अपमोतुस्वात् , बापाकमिकमोमनपादिति चापः ॥ ११-७॥ साम्प्रत मनामोचार-सावपापरिवामिपान-पुरस्सर-तरोपप्रदर्शनेन सावध्य- परितवार निरस्पमार- गृही निपतगामाग मिनगरेऽभिकारो पतेः ॥ १२ ॥ (पप्पी) व्यास्पा-'गतस्प पूर्व प्रस्थितस्प इस्पषित् मनु पमा गत ममन मन्यस्य यचद् गतानुगत, तदेषामस्तीति गतानुगतिकाः। मस्स्पर्षे समस्यपस्तरितः। अपमर्मी-पपागरिका: काशन दिध प्रतीत्य कानिदेनमविरको पुरोगान्तीमपसोरम तदनुमार्गेण पामारपाः सर्वा अपि सामनुगच्छन्ति, न मार्गस्प मुगम-दुर्गमस्वारिक मम पन्ते, ज्या मिनप्रसपने सुखलोसतया कविदेक प्रमामार्गे गन्मन्त वीक्ष्य तीनवपार न्येऽपि वर न्यायान्पापतामविषारयन्तो मे तमनुगच्छन्ति ते संसारपचामिनन्दितस्वाद वयोध्यन्ते, तैर्गतानुगतिक लोकप्रवाहपतित-पत्पामासै: 'भद' एवरसकसमनप्रस्थ गरिनियतगम्छममनादिकं सावपाचारितम् , अस्प सापपारितस्य अनेकविषस्थापि समदापरूपतयेकस्य विपक्षमा । फयमिति क्षेप "गर्ममकारसपनो निपाता" केन इस्सिव प्रकारेण 'यसंस्तुस' पपीनाम्-अस्पतया भपरिचितम् अपि अनुपितमिति पारत् । प्रस्तुत' प्रारम्भमारतमिस्पः। तदेव नाम मामा-ग्रही भावको 'नियत' गमान्तरपरिहारेन एकतर 'ग' माचार्य प्रविषद यतिसराय 'मयते' परिगृहाति स तपा, गहिना नियत. गच्छमाक्स्पे हि पतीनामिदानी सर्व मनपानादि निरापापं निरवीति पिपा ताण गुरुपदेशेन ही निमिवनिमगप्छमार मरतीति प्रियापदं पपासम्भवमामाहार्म, पदि नियतगप्छमाक्स्वा यतीना पद्गतसकसारम्भानुमत्यादिना पापसत्प्रसना-संस्तुव । तपा 'बिनगरे देशमदने 'ऽपिका सकसवतस्यचिन्तनं नियोमो 'पते'मन, भावाना- मिदानी तषिन्तानिरमपानता-प्पाक्षेम प्रस्य वासंस्तुतसं पैस्यस्वीरवार-निराकरणे मागेब दर्शित | था 'प्रदेप' विवरणीय अनादि मन-मोमनमोदनादि, आदि सम्याद पानकारिग्रहः 'सापु' परिपु । सा प सम्प्रदानेऽपि विपपरिपक्षया सप्तमी । 'यथा-उपा' येन तेन प्रकारेन मरमपीरपर्यः। 'भारम्मिमि हस्थैरघुना फेमतेन शुदे नापनादिना निर्वाहामावादिवि, छपना मशाधनादि पानपर्यनस्प चासंस्तुवस्वम् मोरे शिकमोसननिरसनावसरे प्रतिपादित । तथा 'पर्व' सबविरतिः, भाविसम्पादेशमिरवि सम्पमारोपण वदन्तिकगमनादिमाग, तवम 'मवादिविषः' मर्यविरस्मादि-अम्मुपगमस्प 'पारम निरेप: 'मुपिहितान्तिक' सनिसमीपे मगारिगा-मादाना, एवत् एषनापरिण वान्ताकरपा न अस्मरलाई धादिकमी गुडीप्पन्ति रवि पुला, एतस्प पासंस्तुवतं तेपो सपिरिताम्यासे देषनार्मन-प्रवादिनिपेधेन परपामास उत्स्वदेशना मसिससार- एन-विवेकमस्तकसपा, तदेतुकानिधारित-प्रमरदुर्गविषमपाता-पावनात् , मन्यदुर्गति पानं च पतीनां पापादपि पापीपा । एवं पिनरपमानमापुनिकानीना मारणा- परितमागमविरुदवाया कप न मापटीति । इति काम्पार्थः ॥ १२॥८ .
. इदानी भुतपधा-पा-द्वार-निरासमुपझमवे- मिहाभिममुझिव गुण मेरमातीगन्नप ॥ १५॥ ग्पाल्पा T-'निर्माहापिन' फलोदरभरणप्रपोजन, न तु संसारनिस्तार कोक्षिण, उन्मितीनं 'गुमला' मादिलक्षेरपि, प्रवन्पायोग्पो हि पुरुपः धमादि गुभवान् मबति, तदुक-" पानाए चोग्गा, मारिपदेसम्मि बे समुप्पमा। मार इलेहि मिसिहा, पाखीमप्पापकम्ममता ॥१॥ एष पगार विप, मरगय संसारनिग्गु मसहावा । तचोय तविरचा, पपणु-कमायऽप्पहासा य ॥२॥" अय तु धमादि अशनापि स्पतः । तथा 'सी' समावा सदाच प ' मनयम'स, शीलं पान्धपति इन्दः, वसा अमाता-पिदितौ शीलान्यपी यस्म म तपा, हा परीक्षित-शीलकुलस्य हि मनपा पानं मानेऽमिरित, मरिदितसमायो हि पायदृष्टादिना कपिदपराधे गुदिना विधितः तमपि मिपासति, एपमधाताचोऽपि तस्करादिः प्रमजितः तम्झीसत्पात् स-वैन्या दिक पदापिदारपम् मम्छमपि सुसापामारोपयति, धपा अविदितहलो दीक्षितः कपमपि कर्मोदयात् दीया मिहामनिरहसतया महास्येव, छीनस्तु कदाचिदकार्य विकीरपि मौलिन्प-सवतगुरुशिषा-निविरनिगरनियमितो न करोत्येव । तथा 'सी' दीक्षित 'गुरुणा' मापार्पण । वादृधि-पिनेयवसमे बझे गावः स तथा लोग इस्पर्ष । तपा तेन उत् समातीपविनय तुरया गुणा निधीलवादयो धर्मा पस्प स वषा | सवः फर्ममारयस्वेन कर्मधारपसमासकरन क गुरुचिप्पयो पंचगुणास्पन्तमावास्य पनक्ति, वारको हिसारटमेष मुणपसे "समानशीलम्पमनपु सरुप"मिति पमनास् । 'स्वापाप' सप्रपोमनाप-समरीरशुभूपादिदेववे, नतु संसाराखेम्पो मोषयित, रमेव विप 'पार्षपन्ति' मलपम्-घु-मण-पनसारादिना बखादिना च मतं पूमपन्ति । 'मपिक' मिति नियाविशेषण-मतिरिकं 'दषेम्यो 'जिनेम्पोऽपि 'मनाः' मारो।। ननु वे से पूर्वपता सागुमा एप मविप्पन्तीस्पत माह-'विरुयावगुणान्वया भपि' मगती प्रतीतगाम्मीयादाय-प्रमादिगुममाइला अपि, मास्ता सदितर इस्पपि सम्दाः । कस्मादेवमित्यत आर-समोमगम्छमहा इति देतगर्म विपर्म । सग्ना-पेतसि निमिष्ट 'उपो' से 'गम्छग्रहो' गछप्रतिषपो येपी व सपा । मासु निगुमो गा गुणी पाऽयं, कि नोऽनपा चिन्तया ! गुरुमिरपमस्माफ प्रदर्शित , तपा अस्मईयरपि प्रप गुरुस्वेनाम्पुपगतः, न प वप वेम्पोऽपि परीक्षा दया, भवा नरपरिपाटीमनुरुप्पमाना नैन हास्पाम इति विहिवागन्छगोषरमनोऽमिनिवेश स्पर्षः । अप निराणामपि पा .
सारे निर्मन्ये को हेतुरिस्पात मार-'महतो' अतिप्रबलस्प ' मोहस्प' मियाऽमिनिदेष स्पापि तथाविधाम्पर्धनादिकं 'नृम्मित लीसापित, तचाहि-न गुरूपदामितवं निर्गुणेऽपि तप्छिम्मे बम्पर्षनादि निधन, यदि हि गुहा सामयादिना निमिचेन निर्गुनमपि स्वक्षिय मोहाद गुरुवया दर्पयति नैतावताऽसौ गहुमानाति, विपिना गुमानामेष पहुमान हेतुस्वात् , से पेत् तब न सति तदा कि निष्फलेन गुरूपदर्शितत्त्वेन !, कपा समयमाम्पुपगमस्यापि निर्गुणगुरु पहुमानहेतुस्खे उक्ष्मीप्राप्तावपि सूमो सासनमा गतदारियादेरपरिस्पागप्रमशाद न लोक उपसम्पते, यदुक्तं-" मगुरुमाप्तौ , क्रमानुपक्कमपि मासि धीमन्तः । पिपरिपितमपि नोनाति, निषिलामे को तु दौर्म स्यम् ॥ १॥" तमेवं स्थिवे पभिनेऽपि गुस्ताम्मुपगमेनाम्पनामि सपिास महामोह महिमा पर इतिचाः ॥ १३ ॥ एतर्हि गडमद्रासद्रिवतया लोकाना सदर्माप्रतिपरपादिना भुतावामीयमानाः सरिसादमार- पुप्मापा गुरुपर्मसनववा सयमधुरिया ॥ १४ ॥ प्पारपा-'दुष्पापा' दुर्समा 'सदमवद्धि मंगवस्मणीत-निरूप-परित-धर्मगि पूषा। पारमेपरस्प धर्मस्प सर्वस्वापि कोमनस्ताविशेषाद कि सदिति विशेषपेनेति चेत् । न,वस्पापीवानी कामहोपा अनुभोवा-प्रतिषोतोपखेन देविष्प वर्षनात् , मारि-शुस पीहमने सिदान्तनिरपेष-सम्छन्दमतिप्रवर्तिवो पहमनप्राचियोपारा मनुमोवा, श्रुवोकसकसपुफ्स्युपपमा सर्प मगबद-प्रहापिता प्रेधावत् प्रापिपिपस्तु प्रतिभोवा, वोऽनुभोवोपरफेवन प्रविमोठा सद्रहीतुं सदिति विशेषम । सो दुष्प्रापा ! 'तगा' घुसा 'गुरुकर्मसनममता महादानावरवादिसम्मारमाया, सम्प्रति हि गुरुकर्मस्वातीवाना न प्रायेण प्रतिभोवसि प्राचिरुपसम्पते, पाक-" अयोग्यमाषा गुरुकर्मयोगा-छोक प्रबासरया पुरापा । प्रापो बनानामधुना प्राधिा, पपि प्रविमोतसि मैनचन्द्रे ॥ वातापामपि कवकिचित् मम्पत्यपरिपाकात् प्रादुर्मूतापामपि सहर्मपुही 'दुर्समो दुरासदा 'मगुरुयपासिमान्तप्ररूपनिपुमा सोकप्रवाहपहिमतपेठोधित कासावपेवानुष्ठान पटिया परिः । अपमा-सदममनोरपमावेऽपि सदुपरष्टगुरु बिना नामापासापते, पाच-" पम्मापरिएम विना, अमीता सिदिमाहणो । पाप । भरपा तुरसग्गा, ममति संसारपकम्मि ॥१॥" स प प्रपेन साम्प्रतमस्एपमापकाचार्यमाधुर्यन तपारियो नाषमाग्पसम्पा, मार्क-"पस्पानस्परिकसमसारीपुरुपा रुया, समं वर - " - . पन्ति संसदि मद बिस्ता वादिनाम् । यमोस्पषपद न गातु दिववि पास्यास स प्रायते, सचारित्रपरित्रितः शमगुरुः पुष्पैरगापर्यदि ॥१॥ प्राप्ता-समासादिवा 'H' उदिसगुणगुहा 'पुण्येन' मवान्तरसम्भूतमुकतेन 'चेन् । यदि, सवापि- शमगुरुमातापि 'क' पिघातु 'सहित ' मास्मन भापतिसुखाया कर्म सर्म प्रतिपपिसवर्ष 'नास' न समर्धा 'ममी' पुण्यप्राप्तवमगुरवो माः । भषा सादिवसगुस्वोऽपि ते किमिति न स्वहिसाप यतन्ते । इस्पत भाइ-'गन्छस्प' स्वशा भ्युपेत यतिधर्मस्य 'थितिर युप्मसातोऽय गम्छोश एनं विहाय पुष्पामिः नान्म देसना-मरम-सम्पप-प्रतिपस्यादिक विधेयमिति गहिमा प्रतीस्प लिझिरुवा म्प पस्पा, म्या 'प्यासा' एवषिषनुमगुरु प्राप्तावपि निम्सस्वतपा किमेना गम्छस्पिति सभामी न घेतीति कर्मयतोप्रान्तान्ताकरणा। एक गम्छस्पितिभ्याइव तेषां स्वरित करमासामीपलम्प तड्पषिकी पेशा समसरकरमापारापारः प्रफरपकारा पाह- 'के प्रम' स्पादि, मा पुरुपषिशेष 'ममो' ममामः !, क'' बगति 'आम मेमर' सवरिफ 'भाराम्यम' दानादिनोपपरामा , एतपों मगनारीनो मध्यातिक कुमी' विदम्मा १, यदि कस्पपिमहात्मनो मणनेन माराधनेन या गच्छस्पिति पिसम समप्रतिपक्या एते स्पतिवमाषरन्ति वदैठदपि कियवे, परोपकति दी-विस्पासु पुरुषाणामिति । अपपा यदाहि प्राप्तमगुरमोऽपि त मानाना अप्पेव गच्छस्विरया म्यानमन्ति सदा क मम इस्पादि, भयमपी-प्रज्ञानानो हितस लय या कस्पपिनम नारापनादिना वा दोषयिस्ता सहमे स्थाप्पेतापि, एसे व मा बानन्तोऽपि गन्छ स्थितिष्पाहता, इति कप तत्र स्थापपितु पार्यते ?, वन सम्पास्मतस्पमीपा समा गम्पवस्थापने न कपिपायः प्रतिस्फरवि, अतः 'कि मो' इति विषादवपनं । इदमदम्पर्य-महासस्मससोपादेयो पप सद्धर्म:, पते पातिल्लीमाः म पपा किं विदुपा गम्छस्पितिमिया , यदि हि सिलिना स्वसामादिहेतना गम्छस्थिति दर्षपन्ति, तथापि गृहिणा परीक्षा घमः प्रतिपयम्प इति चाया ॥ १४ ॥ इदानी फस्यमिद पोरदस्पा-चार्षपदमाया सदसवष्टित प्रदर्शनेन भुतावा मापपमाह- सुरमाम मिस फोऽपि रमिक प्रभम्म स्पे चित् ॥ १५॥ प्पास्या-'सुरक्षाम:' पुसमा धीमक्षिा गास्पाबम्पापां, मिलति सम्मान, ग्रेऽपि-महावनामारो' मिक्षाको एक इत्सितोऽनुकम्तिो पा 'शिशुको' पासा, "इस्सापामनुकम्पन वा " | तो रहमासौ शिशुरुमेति धर्मधारय । एस्य पा - ६४ कस्यचित् शिशुक इति, प्रनन्य-मुण्डीभ्य 'चत्ये' सिङ्गिमम्बन्मिमिनगृहे, कपि- दनिर्दिष्टनाम्नि 'कस्वा' विधाप समादिना कान कमपि परम्स मसीगास पति भाव पापवं सहाय, न मारक्साहाय्य विना सारशाम्-आचार्यपदलामसम्मका । ' मास' पस्किमिमिमिचमानं प्राप्य शिक्षादिमिः सा निरपमसणितकला: 'प्राप्त प्रासादित [स्सन् ]वान् सन् (1) वदिति विवकिनां विडम्मनास्पद 'माचार्य आपार्वत-परि- पदमिस्पर्यः । 'चित्र' मझुवमेव 'पेस्पगरे' दरमनने 'गहीपति' गावापरति, गमा निजगहे ग्रही भयना-सन-पान-सम्मोग-वाम्तमक्षपादिक निश्शर समाचरति, पथाऽयमपि । तपा'निजे' स्वकीये गम्छे 'इझुम्पीयति' जम्माचरति, यपाहि सहस्सा मुगुम्मे पर्वदिनेषु दानानुप्रदानादिपु प्रपते, एष एपोऽपि साधुमाम्पादिपर्मे तमा प्रवर्षमान एवमुम्यते । यदि बा आपार्पण हि स्मारणवारणादिपूर्वक प्रस्सुपेक्षमप्रमान शिप्पाभ्यपनाध्यापनादिनोचरोपरगुणस्थानाधिरोपपेन स्वगच्छो नित्यमेवेषणीयः पया दोप प शिक्षणीय इति सिदान्तस्थितिः । यथा ग्रही द्रम्पार्यनगृहकर्मादिकरमर पुत्राधिक बहुमन्यते तदन्य पाबम पते तथा गम्छमम्पादिभाममादि सनाकारिम सदोगमपि भूपपते बदन्म साममपि पति, रवि हिम्मप्रक्रियाबस्लिाव या ममिपीयत इति । वषा '' भास्मान 'सकीयति' प्रक्रमिष-पुरन्दरमिपाचरति, सहि नीचस्वात् वपाविपरस्पद्रम्प-शिप्पभावकादि-समृदिदर्शनात् रामविष्णुः पोशामित्व मिमम्पत इति । तथा कतिपयशाससिद्धान्ता तपा 'बासिनीपति' पाखिशानिष-पूर्वा निपापरवि 'पुपान्' विषषणान्, महमे सकसशासपारमामी लिममी या विदन्तीति । तपा मतएव विषं 'बराकीपति' बराकमिक-मिवाचरति । अपमा शपा-परो हि मित्ममन्प प्राप्ताचार्यपदः सम् निम्पिकतया कपचिस् पैत्यगृहारिए ग्रहीयसीस्पादिक विरधामोऽपि न तवा ठोकाना त्रिीपते, गृहखासेऽपि सोईस्तमा दर्शनात् , भप तु यषिविता परिपदासादनन तथा अपि मनानागपहास सिपापा महदापर्पमावनं, तो मस्यन्तमाचार्यादिमनुपित पैरपगहे गृही-चस्प दिमा नसटिवेन भुवपपापका पापानां मउिनपति प्रवचनमिति प्राचार्यः ॥ १५॥ सम्पति पुत्रपित्रादिसम्बन्ध विनाऽपि ठाहिनिसोकवाहनोपासम्मवारेन भुतामा प्रतिपादयमाह- पै तो मन बसियो मच नीवोऽपमों न ॥१६॥ म्गापा-पः सितिमिरय बनो न प बातो, मनरान्तरारितेनस्वात्-न बनिता-पित्रादिरूपतया न बन्म समिवः । पकाराः सर्वेऽपि सम्बया मनपारमा । मय गा। अप माम मातस्तथापि पदितो मविप्पति, एसावताऽपि बलात् सहाहनसिदि। अब आर-पर्दियोन पेति, एवघरपदपप्पाशवच योजना कार्या, बर्दितो-योगक्षेमादि सम्पादनेन धरीर-पोपं प्रापितः। न प 'क्रीतो मूल्पदानेना पस्मात् गीता । अषमों नप, उपमर्णप्रकाशात् उदारादि प्रयोगणार्यगृहीवाऽपमः। अत्र प पैरिति फर्वतया समन्धानुपपायपामिति सम्पपविधया यच्छम्मो योप, अपराधिमकिपरिणाम इति न्यापात् । वेन या निहिनामय मनोऽयमोंमपारपिता न मपति, एवमुचरत्रापि पयासम्मष पेपामिति समपनी । तया य: प्रार' पूर्व रटो असोकियो न, मपमधी-ये लिनिमिः सयाना प्रदेशावित्पात् कदाचिदपि न टास्तेऽपि स्वगच्छया अस्वस्तादन्य गुरु पापाऽपि न सम्मापन्त, तम गम्मगुरु पापन्तः कालमति पाहपन्ति । 'पापा' पिता-मासम्पादिसम्पमाग् न प य न प 'प्रेमान्' पक्षमतरी मेम्यादिममपेन, न प्रोणितो' दानझानातिशयादिना घोपितः, तेरेप प्रागुक्तसमभामाषेन लोकवाहनयोग्यताविकलैलिङ्गिमिरन । " एष इस्यम्पपमिह परिमये पद पा । सतब महापरामयोऽप-पत् तारपि लिलिमिलोंको पामत इति 'बलात् 'रठेन, न तु प्रगयेन ‘वामते ' यमीकस्य स्वकार्यामि कार्यते' गप्छमहामहगृहीतः प्रत्यक्षोपसम्यमानो 'अना' भावलोको 'नस्योतो' नास्तिक इस 'पशुपत् ' मादिस लिलिमिस्तूतसम्म विनाऽपि पदप लोको पामते वन्महा परिमय इसि, नमूकसम्पप बिनाऽपि सद्गुरुरवेन सेपो नस्तितपशुपाडोका कार्यामि निर्मापपिम्पन्ति, न मनुपात-परहिवरतानां गुरुपा पमदानोपकारस्प परपुपकार कतुं शक्यते, मत आइ-मस्यधमाधमैरिति, लोकलोकोपरगतिवम-सामीप्रतिसेवा देवइम्पमषम-समिदिवपात-शासनोहाइप्रसूति-भूरिपापकर्मनिर्माणात् मविशपेनाप मेम्मोऽपि-दीनजातीयम्पोऽप्यपनिा, अतः कथमेपो सबगुरुतपा सोको पारनीयो मषिप्पति, अवंविधा एमिर कप सरि पादयितु सोकः पाते । अत मार-'तपनि म्पाः' प्रपश्यतुरतया विमासोत्पादनेन भग्वननस्य विप्रलिप्सया रविवश्चान्वरूप मासोपनासकरमादि छपभिः । अयमपी-एसमसमञ्जसफारिणोऽपि लिहिनो पिमम्म हेतु पाविषपतिरूपप्रदर्शनेन सुकरपपप्ररूपपेन प मुलछम्मान मुग्पान् प्रलोम्प पपेछ पापन्तीति । असमपार्य समर्थपितु प्रकारान्तरम लोकवानप्रतीघरमसम्माषयम् सविषाद पेपमान्तिान्पासमार-'नीराम मिगतमहापर्व-पापरक्षित-प्रभाए शिक्षामिटरक्षा-विपक्षणभूप । किं राजसरितमपि नीरामकमिव मीरामफास्पद हाइति विमादे, वग-रसान, न पन्ययोदिता गुपमावि-रामनि मलालोकपादन कम्पवे । .
भयमापा-यथा सगुण रामानं विना देशा प्रतिमप-मसिम्सुपादिमिा उपडूबते एप सम्प्रति प्रौरसाविक्षय-पहुमनापेक्षपीप-गणपरादि पुरुषसिंहविरसाहिनिमिरय मारयनो पामत विपाः ॥१६॥ अधुना लिगिनां पैमसं दृष्ट्वाऽपि कबामहात् वरप्रपित-कापपाद मनिपर्चमाना न्मान् दिक्सूखत्यादिना विकल्पपमाह- कि रिमोइ मिलाः फिमम्मपपिया कि पोगीहवाः ॥१७॥ व्यासपा-किशम्दाः सर्वेऽपि विकल्पाः, किममी मग विमोहा-तिमिद दृष्टादि निमिचा प्राप्पादि दिनु प्रतीष्पादिप्रमास्त मिता प्राप्ताः । अयमपी-पषा दिर मूगा प्राची प्रतीचीपेन परस्पन्दो लोकेन पुष्पा झापितवमा अपि तदप्यवसापा न निवर्धन्ते, एवमेतेऽपि पिदिवरुपपदोपा अपि हतोऽपि देवोर निवर्धमानाः तस्माम्याच पोपन्ते । झिमपा-नपनहीना 'पपिरा' उपसभामा, अन्माम पपिरामेति प्रमा, से किम पा बिमिरा इत्पर्यः। पपा भन्मादग्विाससारसम्पस पानम् अमानाना मपपमपि सस्पषतयाऽपगम्प तप गम्छन्वो हिपिणा सस झाप्यमाना मपि सारा न निबन्ने, पपा पपिरा भुविविकासस्वादनाकर्णपन्तो दृष्टीवालिकादि पपो निन्दा । स्तुस्पर्वतयाऽजगम्प तानादौ प्रवर्चमानास्वप मोमिता अपि सनिर्भ भाव न निषचन्ते, एषमेवेऽपि सदोपमपि पप स्वगम्छादिग्रहाद निर्मोपितयारपुष्प ततोऽनिवर्चमानास्त पोष्यन्ते । एपसघरपरेपपि मापनीयम् । तथा किं बक्षीकरमादिहेतरमेन्द्रम्पमेसका पादप्रलेपादियोंगा, वागेर नपनाजनादि पूर्व, योगय पूर्ण च, से मियते येषामिति विनो तदस्यास्तीतीम् । भयोगर्णिमा योगसून कवा, अभूततनाये घि।। मस्तकादि योगपेक्षेपेण मशीता इस्पर्यः । पपा केनापि न विषयोगपूर्णाः पुमास मारम नोभीतपिनमपि तरिमिपा मन्यमाना केनापि तव प्रत्पाग्यमाना अषि योगादि ममापेण तापनकरपात् न निमन्ते, तपेतऽपि पयाविति पूर्वपत् । किं देवेन' प्रतिविधिनोपहता-सादिम प्रापिता, तेहि सिपियन विपर्यस्तमतिवाद- मकस्पमपि स्तेपादिक हस्पतया मन्नानस्तसं प्रतिपापमाना भपि हुदैवमहिम्ना सतो न निपर्यन्ते, तपैतेऽपि । किं अङ्गेति-पार्थवामन्त्रम, उकिवा-मन्त्रादिप्रयोगेग, साय चीकता, यपाहि फेपन फेनापि दुरमान्टिकेण पधीकरममन्त्रेण तपास्ता वापनमस्पन्वं मुमीपीनस्याम्पुपगम्छन्मा तपमवगमिता अपि म प्रमहिम्ना न तो निरन्ते, एम मेसेऽपि । किति पधान्तर । 'ग्रो 'भूतादिमिा 'मश्रिता' तापेशा-पिदितमरीरा - . " पिष्ठग्ना इति यामत , यथा भूतापपिष्ठिता सदावेशात् विषेपापरिधानेनामिषेयमपि पिद महारादिक विदधानास्ततो निवार्यमाना अपि न निवर्षन्ते, एवमेतेऽपि सदसस्विक विफलतया उपपादन निरर्चन्त इति । अत्र पस्मिगदि बहुविकल्पप्रदर्भमाधुनिकमा लोकानामस्पन्नानिपप बगच्छाइग्रस्तत्वज्ञापनायें। 'सा' विधाय 'मर्मि' पाई 'भुतस्प 'सिमान्तस्प, सिद्धान्तोकासिक्रमेण निश्वरतया स्वगुरुसिङ्गिप्रवर्तिता सन्मार्गपोषणमेव सुवप्निपादकरम, पता " ननि विंची" स्यापागमसकलस्स बरस चराई-"एमा वेसि भाषा, कले सोण होगा" इति । अस्म पायम: एपा मग पवामाधा, परकायें सत्पेन मषितम्प, फो! कार्य-बानादित्रय, सस्य व संयमा, यपा पथा मानादिकं संपममोस्सर्पस्तपातया पविना निर्माये यतिवम्य, पदाह-"कर्ज नापाईप, सवं पुण संबमो सपेयो । वा वह सो रोइ पिरो, तह वा कापाय इणस ॥ १ ॥ दोसा मेण निसन्मति, बेग सिजति पुम्माइ । सो सो सस्लोवायो, रोगाव स्थासु समणे ॥२॥ न पागमे मुससिप्सया फिनिस्पत्रिव, कि सर्दिपाषवा पिना संयमानादि यात्रा नोत्सर्पति मा मात्रस्यैव विदितनिवारणस्प निपारित विधानस्प प भगवहिर पुष्टालम्पनेन कादापिकतया सत्रानुमानात् । एष प कप भुत स्पाम्पमस्मा ! भवदस मार्गस्प चौदेशिकमोसनादेः सर्वस्यापि सादिकतया निमि वरवेन केबलसुसानुमपोरेशेने प्राव । सपा प सस्प महासावपस्पेन घानादियात्रा दाबापमाणसाद फप प्रामाण्पमिस्याह-मालिवगुणदोपरिमागा, स्वपक्षानुरागो यस्या मासानां पसगवन्मवस्पाम्पवस्याऽपादनेन समसम्योरपर्पप्रदर्शन । किन-तीर्थकर पूर्नपरादिसातिपमहापुरपरिरहे सम्प्रति सिदान्त एव ना प्रमाण । पक-" एव पि अम सरण, ताणं परस् मई पायो प। मपय सिद तो पिपा अविरुहो इह शादि सस्प प प्रामाम्पानम्युपगमे वरमपेतुर्मगवतोऽप्यप्रामाण्पाम्पुपगम प्रसझेन मवतस्तन्मन रमोहरमादिपेपपरित्यागापचिा, सथा पाप मुलाठपा मग स्करिपता पमाः सोऽपि निरुत्ससे, एव प सिङ्गिनां भुवस्प मूर्ति पारकरणमनु विवमपि धास्ता पदमी प्रस्पधगोपरा: भाषक भनाः सुरागच्छप्रहमन्यपो 'स्टोर दोपा भपि ' माधाररुतगुरुतरपूर्वोदितापपापरापा अपि, माटोपा हि विपेकिनोऽपि इपपादपि न निर्मितमीयते, किं पुनरन्य इस्पपि पम्दा: । 'पाइपि' अपसरण पपात् ' कुमार 'बमा' स्वहिताहितविवेकशून्पा ' म दयते' न पेवसि धार पन्ति म प तीनपः। न काल पापि सर्प न दयते 'मस्पन्ति पर्यन्ति, सगुणेऽपि दोपमारोपयन्तीति पाइन् । पा साधये । एतो पपम्पादि करोति, एतत् देहि ॥१॥ " . .
छन् तस्मै, "इप-वोपेस्पाविना चतुर्थी,महासम्वाप कस्मैचिव पचम्पाचिरिक्षापिने। बा पोचरवास्पार्यमतत्वेन प्रपन्यमानो पम्छम्दस्तम्छा होपादानं पिनाऽपि तदर्ष गमपति, वेनापमा-पहिलोपत्वात् उपपात् तापत्यं माचिका पुका, मा स्वोऽपि देवोः सयं न म्याषचन्ते सदा तदम्पाधिकारिणि प्रमोदो विपातुं सड़या, यत् पुनरमी इपमध्यादेकमपि फतुं नोसान्ते, प्रस्पुत उपपनि चिमिषायिनि कस्मिपित एफस्मिमपि द्रोपद्रवाप यतन्ते, तस्किममी दिरमोहमिया इस्मादि योग्य, वेन एवमुक मपति-दिस्मादयो दिदिपिना पाचमाना मपि दिरमोरमारेर्माधि मात्रमेव न हर्षन्ति, एते तु न केवलं इपपात् नम्पावय॑न्ते याक्वा उपपम्पाचिकारिये मपन्स्पपीति तेम्पोऽप्पमी हस्सिता इतिचार्यः ॥ १७ ॥ साम्मत सिङ्गिदेशनपा भाटेरपिपिकतस्प बिनमममस्यापि दुर्मतिपातीस प्रतिपादनद्वारेन भुतपधारा वर्षपमार- पहावाप्सितुष्टविटनरमटरेटकपेरमाई ॥ १८॥ म्पारपा- 'मैनमखन' ममाहिमस्नान कई मनपस्पेप' सम्पादपस्ते, नतु कदाचित् न मनपस्पपीस्येवकाराः । 'भपपई पापकर्दमे 'निमखन न कर्म, वस्कर्तृनामिसिशेषः । अप कर्ष पुग्याय विपीपमान मिनस्ना पापपहनिमखनाप प्रमावि इसि मार-'मविपिना' सिदान्तोकममविपर्ययेन, प्राकनविशेषणाम्पमाञ्चप परपा राप्रापिस्यपी, सिद्धान्ते हि रमन्यां मिनस्नान निवारिवमवस्तर वर्षाकर्षन पासकामिस्पर्ष।। अप क दोपममिप्रेरप सिमान्ते रात्रिम्नानिपारणमिति दोपप्रदर्षनाप देतगर्म विशेषणप्रय मसनस्पाइ-इटावाप्ति इत्यादि, राया-पल्लमापा मसनदर्सन मिरे गागमापा 'अवाप्ति'मेछकस्तपा तुष्टा-निमशहमत्राप ना मुरवसीठा प्ररपतीवि पिया सदिसा 'पिटा' पेश्मापसया 'नटा' नाटकामिनपकलोपजीरितः 'महा'सादिकला. मीरिना 'पेटका' मासादि-नियमितपचिग्राहिणा, एपो 'पटक' समुदायस्तेना-'पत' सुमिस,प्रेपसी प्राप्पा साविकमावनाइलीकतविटादिमनाकीस्वात् मवमप्युपपारादाल, वषा 'निषुवनपिपिनिषदोहदा' मोहनविससितविदिशामिलापाः या 'नरनार्यः' पुरुष योपिता वासो 'निफरेण' निपपेन 'साहस' ज्याप्त । नारीणां प्रायो निघुपनार्य मेम मजनाब रोकनछपना नत्र गमनात् , पाविधम्पाममन्तरेन रावौ वाप्यागमनासम्मवाद, पिपग्याजेन पान्पत्र गन्तुमभक्त्वात् । मत एव 'रागा' कवित् परवी प्रत्पमिधाप' सग्रीमन्मन सा सामानो पक्षमा पअिपामा 'म' चित्तौमाग्मेन कपापित .
सापटमानमालोकपता सर्य व तां कामयमानस्य तव सौमाग्यम्यवेच्छा पा सष मामन्येन माई प्रलपन्तीमीक्षमामस्प असहिष्णुता, सतो रागधेस्पादिदातामिः पन' सान्द्र वापिसागादिमछोकपनत्वात् मानमप्पुपचारात सधा, कामुकलोकमेलके कि जिन रहेऽपि मिचायां रामादप एषोन्नृम्मते, न पसापि धर्ममावना, तस्मात् दिन एस स्नान भर्मापिनो मेयो,न राप्रापित्ति । मन मिठ उच्यते-रात्रिस्नान कपिरोपा,मिनरममन नस्प घोण तयामिपानात् , तपादि-सर्वेऽपि चिनेन्द्रा राधियामदयसमय एष नापन्वे, वैदेर हरेन्द्रा मेलगिरिशिखरं नीला तान् स्नपयन्तीति भूपते, प्रस्म पतपा स रोपले पका तथा म ति, तस्मादिन्द्रा परितमामाम्पात् निधापामपि स्नपन निपातम्पमिति पेत् न पको मिनममने मेरौ परोतीति मन्पामहे, न तु यामिनीयामद्वितीय इति, मेस- धिसरे सूर्योपास्वमयाभावेन राविदिनम्यवहारामापात् । फर्ष का प्रकाशामाये तो न्द्रामा जिनमलनादिपिपिरिति पेम, रस्नास्य निरस्तवमास्तोममपपोतेम बिमस- माणिस्पषिसामरीचिनिपर्यन देवमहिम्ना प निरन्तरं मासुरवात् । एवं चन्द्रापरिता पहम्मेन फर रात्रिस्ना समर्प्यमान सङ्गच्छते , भावानां त्रिसम्मं बिनधापा दिन कुत्पतोन सिदान्तेऽमिषानात् । ततम " विधि-किरिया पिला " इस्पारेरयमों- प्रमावादि- माया प्रतिनिमिपमानिन्पादिम्पमसात् पचित पपूमा न पाप्रियते स दिनमम्मे एन महर्चादिना सम्पाविक्रम पावता पूजा करोतु, न पुनरस्पापमों, पदुधापरादेन रात्रौ फरोति, दिनरुत्यता हानिप्रसङ्गात् प्रभूसापस नाफरगादि दोपप्रा- येति । एवेन रात्रौ दिनसक्ने पति दान-नन्दि-प्रतिष्ठादि-विधानमपि निरस्त, प्रायो मन नेन समानयोगक्षेमत्वाद, निशिस्नात्रोक्तदोपामा बलिदानादापि सम्मवात् । समादि- पीपाप नन्दिकाम, पक्षा १ स्थूलसूक्ष्मप्रामातिपारिरविलक्षमा, रात्रौष प्रकाश निमिचमसितमूरिदीपपवेवसायिकभीवाना सय शरीरपर्पनेन म्यापादनात्, प्रती पेप १ सतत निपतता पवहादि बन्दना व्यापधिमाबाद । कीरथी दादग्रहीयो। सर्वपिरति नियस्य दीक्षाप्रपमषणाशराम्प प्राणातिपावप्रथा, दीधारातुम दोप सम्पापि वस न पायवे, मच्छिमपा तापम तुमातम्पापासप्रश्वा । सदहो । मा! एवारन्त पापालापमात्म पारोपपन्तो माविमरमममात् मनागपि न धिम्यन्तीवि। किश दिपसे दीक्षादितग्नालामा रात्री परमाणे बिहारक्रमवरपवादेन कमाविद्रावावपि नदि पियों को दीपा इति पेम, विहारकमस्सापादेन राप्रापि प्रविपादनात् नत्र पदापि तत्काम पुक, नन्दिविधानस्प पापवादनाप्पागमे राबावममिवाना कम पहि पाने का सही है। क्रियापपादिक कम्यान रामिविहारसमादीनां सपा प्रापपिच ममिहितमागमे, न प निमि नन्दिपियानस्य सोजगम्यते-नास्स्पपवादेनापि रबरमा नन्दिषिपान, एप निष्क्षि मिनप्रतिमा प्रतिष्ठायामपि सफरमेसन पगजात विविन्य पार्ष, तदुक्त-" प्रादुपदोपपोपापा, दोपापा सापपन्ति ये। जिनपिम्पप्रतिष्ठा , प्रविहां सस्प तर्गतौ ॥ १ ॥" सदेव दोपकलापदर्शनाद्रात्रौ मानादि विपापिना पापपरे निमजनं मपतीति पपस्थित । इद पक्ष्यमाण व सदय विपदीष्ठन्द इति च ॥ १८ ॥ माम्प्रत प्रसङ्गेन ममना अन्पस्पापि धर्मकम्पस्य संसारनिमिचर्य प्रकटपमार- मिनमाविमुम्वविदितमहिताप म मजनमेव पम् ॥ १९ ॥ . म्याम्पा-'बिनमतमिमुखविहितं ' मगपदागमरेपरीस्प-निर्मित 'मजनमेव' पनपनमेष 'फवस 'एक 'महिताय' संसाराय न मरवि-स्नानमे परिधिपिडित संमारकारणमिति नास्ति, फिन्त किंत! तपते पावलोऽनुमकर्मामि पानेनेवि उपो ऽनशमादि, सवा 'परिश्र' सर्पविरतिः 'दान' पाप न्पायामिग्मुहमकादिविवरण, आविधमा मिनपरपावत्पादिना, तवस्तपत्रेत्यादि इन्द्रमो बानीहिः । ततबेरमा पप्यनुष्ठान धिनमसनैपरीस्प निहित, न केस ममनमिस्पपि धमा। 'न सह' नैष 'जनपति' सम्पादयति शिवफस' सफिरूप फलं । मप कस्मादेव! इस्यत मार-'' पस्मात् 'अविपिविधिकमान्' सिदान्तानुक-दुक्कप्रकारेण 'मिनाशाऽपि ' मगपास नोक्तानुठानमपि 'अनुमनुमाय' प्रमेया मेपसे, परेवापादकाचन । 'बाप' मम्पपते, पपासखेपनात्र पोमना, तनापमपा-फिल जिनपूचा-तपाप्रमृतिप्रापनासिर मिनामा, भगवता निापममापनस्पेनाशापितस्यात् । तथा न तदप्यामिपिफमेन-"काले मुरम्पम " इस्पापुरूपिषिविपर्ययन क्रियमाणमसमाप माति, रिषिक्रमेण सुसम्पात्र या-रापनशुषिमनस्वादिना सदेव शुमाप।विष्यपिपिम्पा मगवदामाऽभराधना-नारापन योरेव मोघसंमारफलरवाद । किं पुनरिस्यादि वाक्य माना योग्य । मार किमित्या धेपे, पुनरिनि बाक्पमेदे, इति प्रकरणे । सनेपा प्रतारात्रिमझनादिका क्रिया 'सिम नेर' प्रापनापनामनैप-लोकोपहामारपद न स्वेपा मिनासाऽपीत्येवघराः । अहित इस संसारनिापन ' न प्रधापन' न विस्तापत, किन्तु अरिठदेपुस्पेन प्ररूपाप्पते एक, समुहं मपति-भिनाज्ञाऽपि ठपाप्रमृतिका आपपारिफा-पाकर्ममोमनादिका का पदा मरिधिना विधीपमाना मयफमा तदा किं पुनरस्या विडम्मनापा:-सपामिन बपनपाधाया रात्रिमझनादिकाया पतप! सुतरामेपा मगदेतरस, अतोऽदिवसस्पेन . .
प्रस्पाप्यते येन सा गया प्रसपाप्यमाना कस्यापि पुण्यारमना सवो निरर्चनाय प्रमब तीति प्रतापी ॥ १९ ॥ इदानी निमकारणमपि निमर्गेण मिनादि निर्मापण गृहिणः एमवादि निलेमस्पाप्पनु पात् मवोतने मातीस्पेवर प्रदर्शनायाह- मिनगृह-निनषिम-जिनपूरन बिमपाना- विपि ॥२०॥ पारया-'बिन' मिनमबन 'बनपिम्प ' मागपती प्रतिमा 'जिन पूचन' मगवस्त्रविमापा समादिमिा अम्पर्षन 'जिनपात्रा' घिनान् प्रतीया-टाहिका कल्याणक-रपनिप्पणादि महामाकरण, वतो जिनगृह स्याविन्द्रगर्मो पहुप्रीति, एपचरपदयोरपि । मादिग्रहणात् यिनान्दनप्रतिष्ठादिग्रहा। इस घासरुजिनपदोपादान भगववोऽस्यन्तमफिगोचरतया तदोशेन विधिना बिन गृहनिर्माणस्प परम मुक्यात रूपापनापं, एवमादि धर्मकममातमिति शेपः । विपिना' भुतोक्न प्रकारेण 'कप्त निर्मापित । तपाहि-धिनगृहनिर्मापगनिधिः शुमिपरिग्रहादिका, जिनपिम्मे विपिना निर्मापिते प्रतिष्ठापित पाय पूषनरिधि-- -सपा प्रये विपिना सुषिमूखा मगपत् मिम्म अदावाम् पुप्पादिमिरर्षपति, तपा तन प फरयाणकादिदिनेषु पात्रा प्रस्तूपते, वत्र पाय विधि:-पपाशक्ति दान-उपमरण-भरीरविम्पा-शिनगुणमान-ादित्रादिकरण । वया 'दान'ममयदानादि तपोऽनप्सनादि 'प्रवानि' स्पूलमाणातिपावपिरमणानि । मादिष्टम्पाद-विचित्रामिग्रहः । तसा पन त्यादिः । वया 'गुरोः 'मर्मावायस्म 'मक्किा' पपा पागच्छदमिमुलगमनोस्पिताऽम्पुरयान-गन्छइनुगमन-बिमामपा- पिनमकपानादि दानबिचानुरंजनादिकाः। भुतपठनं सिद्धान्तापपन । श्रादिप्रदाणम् वदर्षभरगमननादिग्रहा। एतच विरकिना पिशपेण विषेय, एतरपुरस्सरस्मात्सफलप्रागुफ मिनगृहादिकरपपिभिप्रतिपः। पदाइ-"अमेसि पविधीए, निपधणे होइ विहिसमारंभो । सो सचाइ नखार, हो हम परया ॥ १ ॥ मुना भरथे प्रत्तो, गियरो नारि रोड पायो । इचो उमयविधि, मुयर्ग फर सुचमिति ॥ २॥" एवदन्तरेण समस्त स्यापि क्रियाकलापस्पा पम्क साम्यापचे। ववो गुरुमक्तिमेस्पादिमा पा समुपये । भारत सपहुमान, न स्वपहराया । पतरसम्ल मिनगादि-दामादि-गुरुमपापमुष्ठान, किमिस्पाइ- स्था' मषे दा प्रपन, मनमिमतकारीवि समाप। कस्मात् अत मार- कमवेस्पादि, 'रुमत' परतिधिसमयामिरिस क्रिपाकदम भावपन्द्रोपराम- सहान्ति-मापमासा-अपादानादि, गुरु-स्वदेशनाकरमप्रायः सन्माइसनरायो पार्मिकसनमुद्रोपद्रमतस्परः मुसोसतया पविक्रियापिकलो जनविप्रतिसिप्पा पर क्रियानिष्ठोऽपि वा छामप्मास्पासिकामा इस्सित बापानी, महा-सिदान्तमान-स मसिफरिपत-स्वाम्पुपेवासत्पदार्थसमर्म-नानुष्ठानगोषरो मानसोमिनिरेपानोपोन्न पा परस्मितस्य मगमवागमार्पस्पादानादिविरसम्प्रदायामानामाऽनपा परिगेमा, हदेशना-भुतोकार्पाना संतपादनाना मिथ्याऽमिनिषा परीस्पेन प्ररूपमया गुरुमापन हवेशनासामेपि प्रषगुपादानं तस्याः सम्लेवरदोपेम्पो महलवार नार्म, वतः कम घेस्पादिया, तासामलो-सशस्वस्मात्, पास्ता इमवादिम्मा समग्रेम्या, फिन्तु तेपामशमात्रादपि 'स्फुट 'पक निमितमिति यावत्, अनभिमत फारि-अनिष्टपिपापि उरन्तसंसारकान्तारनिरन्तरपर्यटनकारणमिस्पर्प।। ननु कपमेवानि गरीपांसि पर्मकस्पादि लेशमाप्रेणापि प्रतिरुमन्ते ? नहि मनासन्तुना दन्तिना प्रवि मधु पार्यन्त इस्पाइप पिक्षिवार्यप्रसाधनानुगुणापमानमाह-'परमोजनमिप' स्निग्प-मधुर-मुस्वादमनमिक, नेस्युपमानयोकमग्पय । 'विपतपनिवेशवो' गरसम्म प्रक्षेपास् । भयम:-नधी हि विपकणस्यापि पारिगामिका अक्तिर्यया स्वमपि पापि मोमन क्षणादेव सकतमसौ स्वारममाषेन परिममपति, तथा परिणमित च तत् सम्पमान मपापाय नायत यथा, तथा इमवादिदेवस्पापि मिप्यारूपतस्मात-एपरियो महिमा, बेन महियोऽपि गिनगृहविपानादि धर्मकर्मस्वस्वरूपतया मावपति, किन दिपीप मानमपि संसाराप मम्पयन इति, अत एव सम्पादित कर्षम्पाया अमिरिवा न्यप्पेवान्यसमजसाषा हिपमामानि इमावापादकरपेन भुपन्त, पहादुर भीहरिमा या-" पाएणणत पउल प्रिणपरिमा फारिया न बीहिं । ममम प्रसविपीए, न प सियो दसणलको वि ॥ १॥" सदेव विपसनसंगलिसमोमनोपमानेन भिनगादिविषा नस्प अमवादिलेशसस्पठिनोऽप्पमिमवफारिस्त म्पपस्थिवमिति पपार्षः ॥ २० ॥ मधुना पानाकर्षणनिमित-बिनपिम्पप्रवर्धनादि शरेम लिगिना सोकप्रवारम दर्शममार- भाकर मुग्प-मीनार पिडित-पिक्षिवत्-विम्ममावर्य नं ॥१॥ म्पारपा-माझष्ट ग्यमीनान् मैनविममादर्प नाम अननोऽम पते इति सम्पावत्राममिति सपठमानत, न तु पुज्यमर्मपित पा-योपादेशरिचार - . . शून्पतया धर्मभज्ञासवः त एस बरपतितपा स्वहिताहितपरिमानकरपसापम्मदि मीनामत्स्पास्तान 'पिम प्रतिमा 'मैन' मागान्त 'आदर्य दर्शपिस्ता, यपा-मो मम्पा! ऐहिकाएमिकमुस्सविधानदधमिदईविम्म, ससा पूमयत भस्मेति सामान्पोऽपमा मा विः पतविम्यमाईत निर्मापित, ते पेदमेव प्रस्पई निपमेनापसन् , सतो मपहिरपीद मेव विशपेय पूमनीप, तपाद बिम्पनिर्मापणमेव सम्पति मपयलधिनिपतसन्तुसारणा पालमिति भवनि सोपसे नमीन मगमटिम्म स्वनामा विपापनीयमिति विशेषतो सम्पमनपुरता प्रसाप्पेस्पर्षः। किल पतिना देवनाद्वारेण मिनपिम्पार्चनादे-परिपुर फसम्पवर्मनीप, सफललिप्सया तदनुमारेण गरियः सपमेव तकरपादौ प्रायो, न त साक्षात् वनिर्मामनिर्मापनमोरुपदेषो दातम्या तदुपदेशस्य माषपसमा योनिपेचात् ,लिहि नस्तु रूपमाअन्मामी गृहियोऽस्मा पापा मषिष्पन्तीति पिया ऐहिकमेव साय पलं पिन्तपन्यो पूर्वतया पूर्वपुरुषसम्बन्धितादि क्रमेण मुग्म्यो मिनबिम्बमादर्शयन्ति, सेतु मुग्भस्वाद तदानपमनपमुध्यमाना अनुभदालतार्पयश्मस्नेह-सकारित-ममवादिना पत्र मिनपिमादौ निस्प द्रम्म म्ययते, लिनिय तदुपयुजते सेष्ठति मपति सदाकणार्य सिशिना बिनविदर्षनमिति । किमिवेस्पार-'पिडिम' मस्स्पवपन, तदने मस्स्पपिठो मनाप स्पापित 'पिलित' मांस, तत् । पतिरुपमाने, सदिय । यथा धीवरा मस्स्यार्प माप पिडिमाने पिषित स्थापयन्ति, तप छोलसपा सापापमागामिनमविमानयन्तो गम्मीरादपि नीरायपामिर्गस्य मुग्पस्चात् वा विलीयमाना पम्यन्ते, एव सिङ्गिनोऽपि पुग्म बनाना सरपसामिपानायोकपिधिना मगरहिम्ममादर्शपन्ति, न सु संसारनिस्वरणाप। ननु कप बिनविविशिपिशिवयोरुपमानोपमेयमावः! समानगुणयोरेनोमयोरलाहार पन्यापमानोपमेयमावप्रतिपादनाव , महाकमिकाम्पेषु वषेष दर्शनात् , मत्र तु मिन पिमस्प सफलत्रिसवनाविलापिना सर्वोपमातीवतात-अरपुचमास्त्पमापोग्पस्सावा, विरिपपिवितस्प प सस्पताीनस्वास्क देनोपमा ?, प्रत्चममावस्यापि हीनमारेगा प्युपमानोपमेयभावो न पत्त , किम्पुना सर्वोचमस्पास्यन्ताममेन !, एवं प बिनसिमस्प पिरिमपिशिसेनोपमानोपमेयमारप्रदर्शन कवेमहापापममता, समर्पया मापापमानोप मेपमाको पटा प्रानदीति (म्बे)मा सोकाकर्पगेर सनिर्माहोवोलिमिपरिग्रहीतस्प गिन विम्बस्योदमस्याप्पसहपाविषशात् दुप्परिवारपरिश्वराबादरिष बाछितफलासापा- स्वाद दीनवापारोपणोपमानन साम्पापादनापमानोपमेयमारोपः। मत्र पापरिप्रेष पिरिसपिक्षिसेनोपमा सिपिरिगणीवप बिनषिम्पस्मात्पम्तपदा पापना,मागमे - ।
. तिदयस्यापाकदि। गोर्मासादिनवोपमानोपमेपदर्शनादिवि पुछाई 'विशिपिक्षित 'निम्ममादीमैन मिति । साम्प्रत प्रावपाम्पते-पा 'तनाम्ना गिननामषेयेन- भगवद्वानागारनिमिचमेवे निर्माप्यन्ते, नास्ममिमिचमिति म्पपदेन 'सम्परूपान्' फपिररचनया दृष्टपमनपा च मनोहराकारान् 'अपवरका' भन्तर्गहा 'मठा' निकम विशेपास्ततो इन्द्रस्तान 'स्पेष्टसिसे' क्यमेवामन्ममुसेन परस्पाम इस्पारमामिमवनिक चये 'पिपाप्प' कारयित्वा, वे हि ठाः स्पनिमिचमपबरकादीन् निपादयन्ति पाब मानवे-मिननिमिचमिस्पहो !! एतेषां विनमकिरिति, से वे रन्यन्ते योपनीमन्व इति पवनप्रकारा। तथा 'यात्रा' पित्रापुरेशेन मपहिरमाटारिस कम्मा, भामिना मासादायमुना भाटेन भीमत्या देखरे यात्रा कठास्वस्मादपहिरपि तमेव विषेपा। वपा 'स्ना भावपवादिपु पित्राः भेपसे युप्मामिरन स्नान कम्पमिस्फुपदेशम्मान यात्रास्नाइपिपापन, वो इन्द्रः। मादिशम्दापछवानुरूपर्पग्रहः । तदाइप 'उपाया' सम्पषिप्रसम्मनप्रकारास्त: । ननु कपमेषविषपात्रारीन एम्पानप्रसारकस्म ! पारवा पघातपा मगवरपूयायाः सानुपपोतलादिति पेम, एव हि सोदाहरणप्रामाम्मेन मगवस्मापिपाने मगवतोपामाग्यो(प)पादनम मिप्पास्वाविप्रसाद, पाक- "मिम्मि विममापे, उपिए माविमपम । प्रेमाहरण(१)पहा, पपरे भगवतपपणम्मि ॥१॥ सोयो गुरुवारगो लस, एक सा ममायोपिशोधि । मिल्छ चमो य एवं एसा भासायपा परमा ॥२॥" तथा 'नमसितक उपपापितक-ममता मिदानीमीरगुपद्रमा समुपस्विसः तस्मास्तिमिाचसे मिनमोत्रदेवताऽम्मिरिया सनमुराणामियाम्पमेषणीयमिति गहिना प्रतिबिनापुरेशेन विचमपविधापनमिति पावत् 'निशामागर' उपसर्गगर्गोपशमनाप प्रवचनदेषवादीना पुरवो बस्पादिस्थापन- गीत-बापसास्यपुरस्सर साठरानिमागरम । ततो इना। बाविद्यावावन्मेषामपि शान्तिकपीटिकानां सहस। तदादीनि 'छसानि' छपानि-सोकोपमोपनार्थमागमान मिशिवस्वेन रिसोमननिमिचानीति यावद, ते करममता, पशम उतपचनप्रकार समवये । मसाल-विवेकषिरुसपर्मेच्छापान , विवेकिनो हि प्रायेण नैपरि प्रतारमित पार्पन्त । 'नामता' संझामानेन ने-जिनदेवतर्न त क्रियपा, मापारवाना, वेन सिङ्गिमिरिस्पः । 'ठ' प्रपनापशनमतुरे, छसित स्पपमान, पपा 'छडिता' शाजिम्पादिमिर्चशीकता वषाविषपैतन्पराहिल्यास्मुखेन पयितुं शक्यते, बाऽप-एप पना' भाइसोको दा! इति निनाद 'पाप' विप्रसम्पते, मानपम् अस्मतसि विपादो-पहर्मापी सोको पूर्वः स्वार्थ पयिस्था दुर्गवी पास्यत इति पचाप ॥ २१ ॥ . .
इदानीम् अरपालानामपि नाम मैनाना दशमार्पानुमावात् मम्मुश्य स्प
विवादपुरस्सर पीपभाद-
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सवारपगितामा विषपम्यासहसमिपा ॥ २२ ॥
पासपा-'सर्पन ' लोकममपमसमक्ष प, आपपति-सचिनोति बीघा फर्मे
मिरित्पाभरा पत्र प्रापातिपातादयः सतपास्पगिता-प्रनिरुदा मामा पैस्ते सपा ।
स्वपिपरेषु मारमप्रापपु रूप-रस-न्ध-स्पर्शचम्नेषु 'पासकानि' उपमोगपरणानि
'सन्द्रियाणि सकलकरगानि-पशु-मन-धाम सह-पोत्राणि येपो त था, पविना
दि निगृहीतेन्द्रियेण मनितम्प, अन्यथा प्रमन्पापा भीगनमानवापचे। सपा गौरपाणि
भारमन्पुरकर्षमस्पपदेवयोडायबसायनिक्षेपास्तानि च अद्विरमसासाऽतिरेक-तुकरपेन
कारपे कार्योपचारात्-रिदिरममावर्सहान्ये त्रीणि, वैभण्डा-वस्सारापेनोरा दमा
पल्पने-दुगतिपातेन दुल स्पाप्पन आरमा ममीमिरिति दणा-प्राचलमनोरामापा
त एर देविनामुम्पपवर्षकलापपरवार 'तुरगा' असा वम 'परगयो' निपमिनाया
परम्पा मसरन्तो गौरवगा दणतरगा पेपा से क्या 'पुप्यन्ताः' प्ररसीमम तापमा
पोरगा येपो वे सपा । पतीना हि भामापरेफरपोस्पादनाव फापाक न पम्पन्ते ।
एवं तारस्पनाथपविरमण-पोन्द्रियनिग्रादपत्रपरिरनि-फरापपराष्टपप्रपतयणगात
परिधर्सपमामान सेता लोचरवायत प्रदर दानी लोकलोकोत्तरवापरपमपि
दमपतीरपार-'मर्शहस्प होप सोलोकोचरबिरुवाममयवनपुष्पफमायुपमोगाप
मदापारचरिगोऽपि नाम ना इति प्रारुतं 'कट' माराम्नमेवत् 'मधुना' सम्प्रति
"रिपरका मारम 'म सनिम्स' सपिदिनानिमस्तका, प्रतिपक्षमएपपा पिहितामाम
समारोपेग सापपोम्पादनमेव हि सपा उन्मूलसारपान । 'उद्यपिपो' नामयामरगमो
जगति उम्प्रति मिदिति दर्पाप्मावश्या 'तपति' विदितं मापा मापा मामा
मिर्चपूरुवा स्पायन मोदन्त 'पुप्पति मापारिपरिधारग मादादि पाप
पदन्ते । 'पा' सम्पपे। अप पर पिपा मपि म हनिमपिप्पानन मे तुन
पुष्पन्ति पेरपा मार-'मनपापपरामापिता' पामारपापपाधिशानुगता, 'ansth
देसगर्म रिशेषम् । एतदर्स मानि-न पारिपाहरपरिपापिनो महानीना Antar
स्पान पारपन्नि, पपिरगा मदिरा न तो पो पन प्रामुनि, मापनि
विरमरपावणापि वारिगामिरे सनि भरणा , पर परसपनारिंगोलि सिEिAL
सरितास्तिरापापि ममन्ति मन मापर्पमदिमापमित ना ॥१५॥
साम्प्रत वेषां प्रत्या सर्वविरतिरूपप्रत्यास्यानमारणेन तपपरणापमान प्रवि पादपमाह- सारम्म-परिगृहस्प गृहिणोऽप्येासनापेका ॥ २३ ॥ . व्यासपा-'सरम्म परिग्रहस्प समसमापयष्यापार पनपान्यादिसम्रा-वत्परस्प 'गणिोऽपि भारस्पापि, मास्वा महामुनरिस्पपि शम्माः । 'एकाधन' अन्तविसमे कमारनियमितमोबना प्रत्यासपातमेदः सदादिर्यस्य निकितिकादेः वदादिपरवापान 'एकदा कदाधिदरम्पादितिथिषु प्रमादबाहुस्पेन निस्पप्रस्यास्पानामापात् 'प्रस्वाहपाप' निपम्प, तदपि कदाचित कमेकाशनादि न रक्षतो'ऽनामोगसाम्राकारादिना न पाल पनो-मलत इस्पर्षः । 'रवि' घेससि 'मवेद' वामेत 'तीमो' निष्ठुरोऽनुवापो-बाना कालेन ताबदप प्रत्यास्पानं कसं तदपि मया मन्दमाग्येन मग्नमवो पिरमा, कब मे शुभिर्मविष्यवीस्पेरूपापमाचाप:'मदा' सदा यायामापमिर्च गुरुम्पो नासादपवि। 'पदमा श्रीन् पारान्सापन्तनप्रतिकमपे । जीप प्रगेवनप्रतिक्रममे पागारान् "सर एपापा पारे रुस्सस् तदितः" विविध पिपिधेति, बनेन सामापिकरबापतक्षपति, फिल सामना सापन् मातम प्रतिक्रमणे सामापिकापारपन्तनिर्षि त्रिविषनेवि पठन्ति, पथा-"[करेमि मते ! सामाइयं मां सापन भोग परस्सामि भाजीपाए, तिमि तिविदेणं मणेण पापाए फाएप"मिस्पादि] | विविधमिति विस्रो रिपा पस्पेति विवि-कवकारितानुमतसक्षण, प्रिविषति प्रिरिपेन फरपेन मनोकापरूपेग मारप योग प्रस्पास्पामि इस्यप रूपतया 'अनुदिन' प्रसिगासरं 'प्रोन्प' अमिपाप-प्रतिमाया पीस्पी, मप्रतिमासानुष्ठानस्प हि मानापि न क्या दोष इस्यपि छमार्पः । 'मञ्जन्ति' समपन्ति मे सिमाप्राचया सपा । '' गरिणो मेदप्रदर्शनार्थी, क सम्माः सर्वेऽप्य धमाम्पअकाक्षेपार्याः । 'पो'ऽनमनावि, निस्पप्रत्यास्पानस्प सर्वसागपपोगविरति रूपम्प समारतोसमधमम्पपेतस्प मापदर्शनेन नैमितिकात्याममानस्यापि कषि छोकपरपा पिहितस्पोपपासादे महानुमानाद-नास्स्पर सेपो कषितप । 'सत्पबपने वप्पार !, सर्व मारप योग न करोमीत्यमिषाय पुनस्तरयममेव समिपेरमाद, प्रत्यक्षमपावादिताप्रसोनाशनापि सस्परपनामापात् । क 'पानिता' सिद्धान्तास्प परिग्छस्त्व, पानस्प दि फ्तं विरति: सस्पाय मावनीउतपा से सम्मन्मठनात् तपा कविरसतोऽपि धान पाकिभिरकररवेन सदामासस्थात्, बानगन्पोऽपि ा नास्तीति। 'मत' दीपा, दीमापादानऽपि प्रस्पास्पान महादसीझमापमेन दीवाना , अपापापापादनात् मत तेषां नास्ति । भत्र पासककाम्दोपादानेन लोके लोकोपरे प चपाप्रमूवे वपस्स्वादिफ न सम्भवतीति झाप्पते, तेनापमाशया-पदा फिल गृहिणोऽपि सतत गारम्मरम्मपस्वात्प्रमादमरनिर्मरा अप्पनरगततया मपि कदाचित्प्रत्यास्पान- मङ्नेरमनुतप्यन्ते, तदा तरी यतीनां सर्वसापपयोगविरसाना विविवागमसाराणां कपषित पिरतिमो पापापा प्रापपिचग्रहम पुक्का, ये तु निश्शूकतया व मञ्जन्तो मनासनामपि नादपवि तपो नास्त्येष तपाप्रसवीति चापः ॥ २३ ॥ दानी पो लोकोपहासपुरस्सर मिनपथपरिपन्मिस्त पदयेन प्रकटयभार- रेवार्थम्पपतो पपारबिझने सर्तुरम्पे मठे ॥ २४ ॥ इपापुरवसोपहासषपसः स्पुः प्रेक्ष्य मोकार स्पितिम् ॥ २५ ॥ ध्यास्पा-पो स्पिति प्रेक्ष्य लोका: सोपहामवयसः स्युरिति सम्पन्या । कपमिरपाइ-होइति विस्मय, सितपटा-प्रेतामराः 'कार्ट' दुष्करं 'परन्ति' मनुतिछन्ति 'मत' प्रमन्पा, महदापर्यमेतत्-यत्-सितपटा कलाबप्पेरविर्ष प्रतकटमनुमपन्ति, नहि सम्प्रतिवनर्मानपैरल्पमत्सरे विष कर्ट फत्तु सस्पते, भप । सबैरप्रेषरूपं मन कई पापत एक, सुखदेतुस्वादिस्युपहासः। अप फयमेषमुपदासा सेपो वे क्रिपत? इस्पत माह- 'साघुम्पाजन' पतिउपना मिटाः, नामी मापवः सबषमायोगात् , किन्तु सम्पाजेन विटाः, सफलतपणोपपचे। सदेवाह-'देमार्यम्पपतो बगापिपस्पे न समुद्रामिणस्प वदमीनताद बिनविषविनियोगेन 'पयारुषि' स्ममनोमिलापानुरूपमित्यर्पः । 'क' निप्पादिते 'सर्प नरम्प' सकसपसन्तादिरूपता विमतकालनिशेपमनोहरे मढे प्रतीवे, तत्र 'निस्यस्याः सततरासिना, मुरिरिता हि देवदम्योपमोगमपात् पविनिमिचनिर्मितत्वेन मासानपत्याए मा न बमन्ति, किन्तु याषिते पाशि-तारचि परग्रहादावेर, सत्रापि ना[न] रस पसन्ति, निस्पवामस्य १ पठीना भावादिप्रतिबन्धलापवादिहतस्वेन प्रति पेपा , उपविहारस्पैर ममाराघुम्छेदनिमित्चस्वेनामिपानात् । एवे स सावठम्पटतपा मटे निस्पातस्थितयो पिसमन्तीति कप न भवन्ति विगा।। तपा 'पपो' निर्मला 'पहनस्या' पकसंगीता सरुवादि मपाः अय्यापिशेरा, पहा 'पहार' श्रीपर्णादि दारुनिर्मिता तार सपन' पपनीय येपो हमा, सापयो हिकमलादि संस्तारक पर शरत, न पडल्यादिप, तामा प्रमानापनुदे विमामातमीठसम्पन्न पाठोपदामातरवाय, एसे तु ष याना बिटरव प्रकटपन्ति । तया 'सद्गन्दिका पासवा' घोमनगम्दिकापामना:-योमनगन्दिकामयरकादि विष्टरमात्रा, गन्दिकायुप .
से पेशने च दोषा मनीनां प्रागेवोकाः । 'सारम्माः' मठ-बाटिका-कम्पादि-महासापा- ब्यापारकरण-कारण-प्रपणा! 'मपरिग्रहा। गहिवद माणिन्यादिप्रयोगनेन पनपान स्नेहादिमागसतापरायमाः 'सविपया।' पचरादीन्द्रियानुश्त-नकीवर्धन-ताम्मत स्वादन-वन्दनापाराग-गपर्नगीस-पवमादिविषय-सतवानुषकमेवमा विषयासकवाट कामुकत्स्वामिमतां योपितमन्पेन साईमासापारिविवधानामोल प्रस्पक्षमामामः 'सकांपा' सम्मोगनिसासाम्पासारप्रतिषण नपनोपमायमानरिरंसो कलिका: । मारम्मादयष यतीना पदोस्वाइनेकपा निपिछा एप । 'सदा सर्वदा, विषयामामनादिमवाम्पासद, कदाचित् स मनेरपि कस्पापि तोरिकारमा पाल्पाव, न सर्वदा, वदैव सेपो धानाहशेन सषिचमारुप्प मिष्पापवादि प्रायविषमति पतो, इवि सात-साधुम्पाशविटा' इति ॥ २५ ।। 'इति' उक्तप्रमाणि, मादिशदाद मन्पान्पप्पर प्रापणि विस्मना म्पकानि पासि गृपन्ते । ततम इस्यादीनि-उवानि-पवनपरनस्य सदापितुमपस्वातनि श्वासपोटानि, सर्वत्रास्तालिवामीति यापत् । 'सोपहासानि' उस्मासमाजि'पपीमि' वचनानि पेपा ते वया स्पु-भषेपोंका-प्राकृतना नीषिकमाविताम चैनपषमस्सरिता 'प्रेम' सापास्कस्प, येपामिति पदं तुर्पपादस्पित समछ वाक्प दीपपति, वेन पेक्षा स्थितिमिरपादि समापसे । 'स्पिति' यवि अनुमितासमझामसामाचारी,सस्पेलेर वागत् मस्सरिणा सर्वस्पाप्यपहार्स हर्वन्ति, किम्पुनः सम्प्रति निरतिसपस्य जिनशासनस्प', तत्रापि शिबिना धारूपं उर्स म्पहार पीय कपकार नर्सरिस्पर्पः। व्या भुत्ता' आकर्ष पां स्पिति 'भन्ये ' अपर 'ममिमुसा 'शेपदर्शनेम्पा सकलो पपधिपतितमिदं नवीन, पठयोऽप्पत्र दर्शने छान्तास्माना क्रियानिहायोपसम्पन्ते, ववोऽस्माकमपीदमजीक मुषितामिति पेठसोऽमपगमविपपीकसजिनशासनास्तेऽपि, भासतां तदपर इस्पपेरर्थः । 'भूतपघात' मैनसिदान्तमार्गावरूप, पतापन्तमनेरस अयमेवम् बास्पाम-यदेवदेव वास्तिकं धर्मदर्शन निरपवाद, परं पदनाप्पे विषा सदा पारकारिको विछोरपन्ते ताऽछमनन ताम्र-हिरण्मपा-सहारदेशीपेनान्यो निस्सारण परिर्मात्रमनोहरेण सर्वथा, प्रामस्वीकवमेगास्माकं दर्शन भेया, मो मैना अन्पमा पादिनोऽन्यपाकारिण इस्यादि पपनसन्दर्मेण 'पैसस्प ' परारमुखत्त सर्वथा पति रिमिति पास 'भात वसे' दयन्ति । तपा येतो 'मियोप्या' मपापपनेन, हिस्ससितापारस्पेन सर्वशक्षितस्वात् मममसमवेष्टित प्रति कनमित्मष्टासन्तो मटि म्तमपष्टीक भान्ति, यथा-क एषमा !-न नयमेरिधमेर फारिण इति । वाम . .
। . सुप्योऽपि' सम्पराष्टयो निनमवान्तास्था भपि प्राया, फिम्पनरन् । इस्प पेरपः । 'विमति पारपन्वि-उर्धन्तीति पाषद, मना-पेत 'सन्दर' इद किमयमन्पया घेस्समयकोटी उल्लेख्यनवधारमशानं संशया, स एवं एफयानवस्पितरूपत्तसापयारोला, क्या पलं, पपा दोगत बस्तु तस्पायसवाचल, एष सुरक्षामपि मनः। मपा 'सनोन फरवमवेन बोलावबल येपो नाम बैनाना ते अमी सर्वत्र सम्प्रति प्रसवस्वाद पुरोगचिनः । ननिस्पक्षमायां । 'सर्वधा' सर्व प्रकार विनपथप्रस्पार्पनो' भगवन्मक- प्रस्पनीका, न तु फेनापि प्रकारेण सवनुकूला अपि चैनदर्शनोहास-सदमिमुसमुक्या पारनादिना बिनधासननुपचयहेसुस्पेन पम्सुतरतेपो बाछेदकस्यात् । परी चापरावेन शक्षपरफरविश भगवम्छासन लोकोपहासपिपासादयो दोपाः प्रादुाम्पन्ति वेऽनन्त संसारिमा सिमान्ते प्रतिपादिवार, महापापीयस्तात् । 'तत्' इस्येतत्पदमप्रिमाची सम्मस्पत इति पचायाः ॥ २५ ॥ साम्प्रत पनि विधिपप प्रत्येकान्तिकीमारपन्तिकी निरुपमा प मनसो श्वासपसम्प तदुस्पाद प इतरमनमनाकारणसामध्या बसम्माषयः सविसपना तदुस्पाद सामग्री सम्माननाद्वारेभार-- सविस्करकापटपरमा सर्परपुण्योदयः ॥ २६ ॥ प्यास्पा- 'तसा धम्मस्प प्राकनाचस्थस्या समपान, यतो मी सर्वचा सत्सम बुटवेतमा वा तस्मादेतो, किमित्यार-नूनमिवि सम्माननायो, भामेवं सम्मा पपामि-यापनस्पविष्टवस्तति प्रगति सन्ति तावद्भिर्टर्मागमासेडपो पुरै मानसमकारीति समापा, कथमन्पपा समनसोऽतीय क्रूरता ? इतरमनमनासाधारणकारणसामग्रीका ववमुपपत्ते, कारमानुरूपस्तालाप, न परोपमीत्रास्पिधुमन्दप्रयोहः । स्तैरिस्याह-'सर' सलेमस्कटकाराष्टपटले- -भूतनस्वादस्पग्रसपोपातिविपमेदसमूह, पहिश्यादिमिरनुस्कय कासटशकस्तस्पटसै तापक्रमनसो मनयितुमचाप स्वादनमक । एवमचरपदेमपि योग्य | मफल कासटपटहेरव फरले प्ररुसमनस: कमतपस्वात्-अपम्योपैरिस्पादि बापावार,तवम स-अखिलेरपुपोषये पाप राविमिा, सम्पाइसे:-प्रक्षेपासीविपसन्दा समस्तविधुराषिम्पाभिएन।' उत्स्नम्प सनषेतः पीग-गइ-मालादि पारग्रहरेमिरसिईष्टेरेकमामग्रीमावेन सम्भूप 'ई' स मार्गपातकं मानस' पेतः 'अकारि निर्मम । मरूपस्य मनसो निर्माण रिपेपमत्र, एवेनास्प ममस इतरमनोमिः सावास्यमपि निरस्तमिस्पेवरपि सम्मापयामि श्वरमनो .
विसषमसामग्रीमन्पत्वेन बास्पोपपा, न हि मुस्पिपदमादि-सन्तुवेमादिपिसण सामग्रीमन्पयोर्पटपटयो। सामास्य नाम, तथा च तन्मनसः कदाचिदपि न ममावता- पचि, न हि भूनिम्मस्प-भरामावा शिरिषमतेनाप्पापादयितु शस्पते, तस्वस्म देतो! स्वस्त्रसामम्पा मिमातीपतयेव वयोरुत्पचेरिति । वा मनः सिदमेब तस्प तुरत पिमेय,तस्प काखम्टादिमिा साम्म । अपास्मि पवे स्वस्पोपाधिकस्यात् मपगमप्रसो, पसादिषु महारअनरागस्प तथा दर्षनादिति षेम, औपापिरस्पापि धर्मस्य कयामिद सामग्या मन्पमानस्पानगमवर्धनात् , यपा पक्षकादिपु नीलीरागस्यौपाकिस्मानि न कवाधिदपगम इति । सापपममेतन्नून बरमकारि मानसमिति । 'भा' प्रस्थ 'हुर्मार्ग' रुपय ' पासेदुर्गा' मम्मपेयपी लिहिना वकाना वेति शेषः । ननु मातु सेपो रै मनस्तपापि किं न पिछममिस्पत भार-बौरासम्मेन ' तुटाशपस्वेन 'निय नुपा' उपिच्चिा मिनप' ममवत्प्रणीत सस्पर्ष सन्मार्गरपिनासुपसर्गकरपेन पस्तुतो चिनमार्ग प्रष्ठ पम्मिा छिममिस्पर्य। म बिनपनि [भ] मां तेषा बिगारीनामिव किं दशनान्तरपरिव्रीय मतान्तर प्ररूपमा नेस्या-'वाचा' पपनेन समति परिपतमप्पोदेशिक मोमनादिमार्ग ' एपमा' भयमेन स मिनप्रगीत: पन्ना नान्य 'इति' एवं प्रकारेण 'उनुपां' अमिरपुरा, नसे दर्शनान्तरस्याः स्थमा परपयन्ति, तस्वैबिनपपवर्षिनो बनस्प प्रवारयितुमपामस्वात् , किन्तु मस्मि मेष दर्षने वेपमान स्पिता: स्प्ररूपित मार्ग मेनमार्गतमा पदन्तो पुग्पो म्पामो इसन्सीस्पपी, पतापता संरम्मेण सस्पर्ष प्रस्पटीप प्रत्पनीकत्व वेगा प्रकटित । इस सेस्पन 'स' पम्दादिमनीयसोपे समितिमेऽपि " से बदा पापपुरतो सन्धि "रिवि विशेषसक्षपेन सन्पिविधानमिति पायी ॥ २६ ॥ मत इस्प ' न्तरा पदापोरप्पनयोचियोः समन्पयोपना, बारिमार स्पादौ पोल्पते, इदानी वेपो वचनमात्रमपि बिकिना भोतुं न पुन्मत इस्पार-व- हुरस्कारममावमा स्तोमास्वषी भाषाः ॥ २० ॥ ग्यापा-पत एक नामैते अनपर्य प्रति दुष्टा, मतो-ऽस्मादेवो, विकिरपा तेषां 'बासि 'पपप्रतिपादकानि कनानि 'इस्ते' विषचे को समाये 'सनी' सभोषः। स च सहदया कप कन प्रकारेण न कधिदिस्पपा । नहि सस्प धर्मनि स्परपरमर्मावि पचनानि ससाना भोतु एक्कानि, किन्तु कर्मपोरेतदेव पर पस्पीपमाएका अपासिताका पर्वा एतया भूपन्ते । मप र सहर्मस्य प्रेवारत:
+ 'मर्स'म रुपयनचिना मापितानि कर्णे तु न अन्यन्ते, तवणस्य साधूनामपि मिथ्यास्वनि पन्यनामिपानात् । कीदृशामिस्पाह-'दुर्भदो' निविडस्वार-कुरुम्बा' करत् मनसि सत्तापस्थितवया मागरूक 'यो सहर स्पिपासादि प्रतिष्ठापनपिपपो मिप्पा भिनिवेशा स एष 'तमः स्तोमः' सत्पथदर्शनान्तर्षायकरपादपतमसः पटस, तेन 'पी' प्रेक्षा, सैव सत्पपप्रकाशकत्वात् पमुझेपन पां ते तपा, सेपा, यथा म स्तोमेन तिरोहितचा पपान न पश्यवि तथा सेपामपि पोर इग्रहेण तिरस्कृत सात् न सन्मार्ग मृगयते । तया सिद्धान्तविपता' वरिपर्यस्ता-चप्ररूपमया सदुम्छेद प्र अपस्वादागमरिणा, निरन्तरमहामोहा-म्यमनातिरेकाविकात् । महमिति निपासोऽस्म पर्या ताप वपमेष भेष्ठाः, नास्मसमः भिदित्यास्मानं मन्यन्ते य ते भाम्मानिनस्तेपा, विवेकिनो हि गम्भीरत्वेन महति गुणगणे सस्यप्पनुत्सेकाद, माना तु सुन्छसपा स्तोफेऽपि तस्मिम्-गगतोऽपि हलतमा मनना , तया 'पप' धात्मना 'नष्टा' मुसलो सतपानबरतम्-मन्याय्ये पथि प्ररर्चमाना बनपुरतः सस्थापयितुमक्षानुपन्तः ‘क पर्मक सम्प्रति प्रतिन इत्यादि नास्तिस्य प्रतिपमाः नेपा, 'मन्येषां' भारमम्पति रिकाना 'नाशनकत' नास्तितापादापादननिमिच गयोपमाना' पदि हि एवानप्यास्मना कपबिस्समी धर्मस्तदा सुन्दर मबस्यन्यपेत पार्मिकमन्याः परुपमाग्मिा बस्मान् सन्त क्षिप्यन्तीत्यापेन हमाघनाय पिहितप्रयत्नानां ' सदा ' मर्षदा 'मिष्पापारा ' कि पपषिपरीताः समाधारा मिप्याला-विरति-प्रमाव-कपाप-दुपयोगठषणा, अपना लोकप्रतम्मनहेस-कमायेन्द्रियसपमपुरस्सरं विषयप्रणिहितमनस्कर, पदार " पामन्द्रि पाणि संपम्प, प प्रास्ते मनसा स्मरम् । इन्द्रियाम् विमात्मा, मिथ्याचारः स उच्यवे तरता' पुकानां, भवः वापितानि सपिहिता सुभाषकम न भोतम्पानीति वारपर्यमिति पाचार्यः ॥ २७ ॥ मधुना वित्यादिरूप धर्मदेशिनामपि पी पधप पधाविष-मुग्भमनोपारपर्ण सरिसाद प्रतिपाइपमार-- पक्ष विचित् विष परप्पनुषित पहो- मोडायरो ॥ १८ ॥ प्पारुपा-तदिति वीसपा सर्वसामाह-पर्मसाधनममुष्ठानमिा धर्म: तम पर्म इति' मामिदमित्येवरूपप्पा पुरन्ति' परम्ति ' इपिषो' दुर्मेसो नाम चैना। परिकमिरपार-परिकशिपिति, मामान्पो निदिए शिपयोनिरिएनामक ॥१॥" तवम
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"
'वितर्व' मलीक भेणिकराजरजोदरणवन्दनादि, न पेठदागमे चितिशिवमस्ति, बेन
सत्पं स्पात् , पर सिदिनः सपा पतापादनायै तदपि पर्म इति मापन्ते, पदाह-" भी
भमिका विधिपतिः किल सारमेप-छाबमसनिहित पतिपरान्वे । मध्या रयोहरण
मिस्पन पदन्ति, दी !!! सिस्निो वृषतया इपिपा प्रसम्धुम् ।। १॥ वमा परपि,
अपि सबसे । पचानुषित-मयोग्यं पित्रापुरेशेन पात्राकरणादि निमिच हि धर्मनिमिर्च
हिस्पसात दिनमन्दिरे फ चित, नान्यत् । पित्रामुरेशेन तु पात्रादि तत्र विधीय
मान गुणपाहुगानविकरकेवठस्नानिम पनस्वाम धमा, पर तदपि लिङ्गनो धर्मोऽम
मिस्पमिपाप सोपयोगाय पिपापयन्ति । तपा यल्लोने-बैनमार्गपतिमा शिश्वना
'लोकोचरो' बिनप्रपयनं, साम्पामुचीर्ण-पार्म तकमिधामस्मादि, एतत् हि लोसोको
परयोर्षिवस्मात् न पर्मस्ते तु गादिवतनैवदपि पर्म इस्यमिदमति,
याह-"मिया
मतकमन्दिरे मगमा पूमा मलि पा सिपा, हीनानां परमेष्ठि संस्तपिपिडित
दीक्षणम् । मेनेन्द्रप्रतिमाविधापनमहो सालोकोमोचर-प्यावरण-सुमप्पपिपना
भेयस्सया पक्षसे ॥१॥" तथा यमपोतरेप-संसारकास्यमेव 'मपिनो' देहिना बिन
मन्दिरे जलकीरादि । एतदि मदनोदीपनस्वास् क्रीरामानवेनासासिकस्याच संसारपईन
भेम, परमेतदपि लिहिनो धर्मप्छपना स्थापसोकनावदलेन कारयन्ति । या पद
'शानापाक सिद्धान्तविरोषापायकम् औदेशिकमोमनादि, पपा पौरिधिकारीनां पास
भाभिवस्य वया प्रायोपपादित, अवरा मापारपतुर्मासकात् पाशवमदिनप्रतिपादिवय
पपणापर्वणः भाषणापाधिफ्पपति वर्षेऽनीसितमेऽहि विधान । ननु पन्तु ते समति
करिसत मार्ग, सपा वितपादिस्वमाषचाच न कोऽपि ग्रहीपति, सपा पोकोऽप्यनुक्त
कन्पो सोकोपादानामावेन प्रसरामाषादिस्पत माह-'मग' मानिना टर्मम्पाजेन
लिङ्गिनरूपित मतं भन्मसम्रान्स्या मिनमार्गोऽपमिति मिनाहाने 'तान्ति' उपपादते ।
मयमः पयोमपगवषाकधिक्यादि सदृश्योपसम्मास् परस्परम्यापकदेखनास्पादि मेर
धर्मामुपसम्माप भरमनेऽपि एतिकायो रमसमेतदिवि पिपा मान्ताः मन्ते, मबहापि
सन्मार्गासन्मार्गगतमिनदेवताऽभ्युपगमवायपादि समानधर्मागमादन्योन्यग्यममोर
करिष्यनिषिप्रष्यादि विशेषधर्मानरगमाप वितपस्वादिना बस्ततोऽना मतेऽपि प्राव
मार्गे मतमेतदिसि पुरचा माः प्रवर्धन्त इसि, न कासमवे मार्ग मन्ति मास्तु व
गृहन्त्यपीति प शम्दाः।। इति खेद 'पुरन्तवमापर्यस्प' दुम्माषमानान्ममार्पस्प
'विस्मृमिव विमृम्मितमवदिति, पमन्पपा उपपस्याप्यतस्य पसग्धजनोपापयवा स्पा
दता फष्टमतत् यत् अयापिय मार्गोऽस्वसिवप्रसरोज्नुपर्यत इति सचार्यः ॥ २८ ॥
4 साम्प्रतं मुम्पयनान् प्रति समत मोक्षपपतया दिसतः सत्पथगामिनष पार्मिकान् साचनाननुरोषित्वेनामवपा मवमानानस्य कल्पचिपया छन्दाचार्यप्रामम्पोम्प्रस्तुत प्रथमपा सरूपमाह- कष्ट नवितो नृणां पदसा बास्पम्पदेशिका |॥ २९॥ - . म्पामया-'कट' इस्मंसद ना घेवसि पर्वते, यत् सिमित्पाद, पदिति माश्योप पे, पठणामदृषा जास्पदेशिका कान्तारेऽमीस्मितपुरामानं प्रदिशतीसि सम्म पः। तब 'पूमा 'मा 'नष्टदुषां ' बलोचनवारकान्तारपातेन विस्मरपाच प्रमटयाची प्रतीम्पादिकपविमागपरिच्छिदाना 'या' काधकामलादिना दृषिकलाना, न तु मन्मान्मानां, मन्मान्मो-प्रन्ममिम्पापा लोपनरहितः । न सु सोऽपि तदेशजाव इवरम्या भाषादिना निम्नाय रूपनिदिष्टपुरपथ वेपतीति तमोक्त 'पेदेशिक ' इति । विदेशे- पोभनम्परहिते दशान्तरे चावो बर्दिवति पैदेशिकः । महि तदेवस्वरूपमात्रस्पाप्प नभित्तारूप प्ररुतमार्ग मानीयादपि, पता कर्मपारपः । कान्वारे' बनसमार शून्ये दुर्गवर्मनि प्रविशति प्रतिपादपति । 'अभीप्सिसपुराधान' निगमिपिता नगरमार्ग, फिलेति मापां ।' उस्मन्परः' उग्रीवः कंपरामुममप्प समदरिषप्प पपतीति कायमेतत् । सुः पुनर । 'द' बक्ष्यमाण पुनः 'कटतरं ' पूर्वस्मादपि ध्या महत्तष्ट । यत् किमिस्याह-' सोऽपि ' प्रागुको मार्गदेष्टा 'मुग्यो' निर्मलनयना नव एप 'सन्मार्गगान् ' इएनगरसुगमपपपस्थितान् 'पदिदः ' मुम्परु समार्गवान् पत् इसति, साझमिति मियाविशेषण-सामहेत 'मानानिष ' मार्गानमिमानिन । पपा मार्गानमिन्ना मार्ग पदिशन्त उपास्यन्ते लोकेन, तपैवेऽपि सन ! एक प्रस्तुतमुपमान योजयित्ता प्रस्तुतमपमेयमिदानी योन्पते-कष्टमेतत् यनुमा-सत्पपेन्गुरुपामा ‘नष्ट इस मतिमुग्यतया सस्पपपपरिमागानमिन्दानात् अरमां-सम्पग्वानदर्शनविकताना मास्पा' सिदान्तहस्पलेशानमियः सईया भगीताः । सोऽपि गीतार्यसंवासादे कपम्मित् मोक्षपयायनप्रवीचा स्पा-त्राह-वैदेशिको' गर्दिवापारसवात् गीतापमुनि पुरवसामाप्राश्रितः। एप पानिकदुसमप्रमरो निनर निम्भेपमपयप्रस्पाधिमार्ग रूपनषितो पपाठन्दशिरोमणिः पिदापार्यो मन्तप्पा कान्तारे ' मरमा रम्पो 'प्रदिपति' ममीरिपतपुराणान-मुक्तिमार्ग 'उपरो' दर्भितारशर रिकारः। सपा प सोऽगीवार्य उरएपमारो मिम्पारटिश सपतिदपि 'मरपथ मोपमार्ग म पेपि, नाप्पन्पेन गीठान प्रतिपादितोऽपि प्ररपेति, इति कष्ट, - " . . एउमटवर 'तु' इति पूषन् । सोऽपि प्रागविदितो पपाछावाचा: 'सका सभा मानवनिमुमः ‘सन्मार्गमान् ' गानवर्षनचारित्रलपणमतिपक्षप्राधान् 'तो' मधिमार्गामिहान पार्मिकान् मुविहितसाम् पदसति सापकमानिन, पवा-फिममी ममीतार्था सशिरोमपया सिमान्तरहस्य आनन्ति , मामेग सकस भुतपारावारपार एमा, वो यमा प्रवीमि स शक्तिमार्ग इति । फिमिस्पेषापासवीस्थत मार-महा कष्टमिस्पपमानोपमेपयोस्तुत्यसपा पोमना । अत्र च मग्भमनपुरवो निप सकस्सिर्व पेस्पवासाविकमुत्नपथ प्रपपन् बिपिविषयपारसनयमरूपमनिपुषान् सुगुम्सम्प्रदाय पनि मुविहितानऽसूपपोपासन् सम्प्रति पर्चमानः इसहापार्यवर्गोऽनपा मकवा कविना प्रतिपादित इति वाचार्यः ॥ २९ ॥ साम्प्रत भुव-पपा-हा-दारमुपसबिहीर्षः वदधिनमार्मस्य दुष्टोपवितसादित कारणासापेन सम्प्रति दुखमस्त प्रतिपाइपमार- सैषा पावसर्पियनुसमाससम्ममावामुभाषा, ॥३०॥ प्यास्पा-पा आगम-प्रक्षेपागामितया सिसितायेते, सा मा सम्पति प्रत्यक्षा, फासस्पाप्रत्यक्षस्पेऽपि तापकार्याणी प्रस्पक्षेणोपसम्मेनोपचारादेपेपर्क । 'मनसर्पन्ति' प्रतिक्षणमाया परीरप्रमाणादयो माषा पनि गच्छन्ति प्रापिनामस्मा मिस्परसर्पिणी सिदान्तप्रसिद्धः कासपिशेपा, हुणं-सकसानोपाजाना पोकमान बैकस्पोतु पष्ठ संस्थान, तेनोपषितासमर्पिनी दुग्णावसर्पिणी, पुत्पचिमा पेई, तसवस्मनन्तवम-कालमा पसंयतपूमानिव धनं चैत्यवास्सुस्पारोसा ममानहानिकारक कास मेदो हुण्डार्पिणी, सा च मगवति मोष-गवे जातेति । समया-परमात्मा काला, वयानुसमप-प्रसिधर्म 'मम्याना' सक्तिगामिनी, प्रमा 'परिमामा 'ममुमाराम ' प्रमापा मषि-निपपा बा, वसम 'प्रसन्तो'हीप माना मम्पमानामुमाषा पस्पा सा क्या । हुण्गवसर्पिग्यां हि मासस्वाभाम्पात् पर्मावि नामपि प्रामेन मामा पादृशा वर्षमान पसे न मादृषाा धमान्तरे इत्यादि ममेव प्रति धर्ण सरसवारवम्याप्रातसपोपचापमाना उपसम्पन्ते, सपा ए प्रकरणकारेणेर प्रबर जान्तरे प्रदर्शित-"कातस्स भइफिसिरपेण मासेसिपरिस-विरहेण । पापमहग्मचेष प, गुरुकम्मलेन प मिपाम १ || किर गिपत्रिपमपापिह, मीकपसरिसपम्म- मग्गामि । पापमहसमिसिहा, पमरथी विस्य दीससि ॥२॥"भत्र पसदिस्पनन संयोग पररपेपि पूर्वपर्णस्य न गुरुस, छन्दा शार्पयस्थित[पापा कवितवभिोपात् । । मदया मम्पा भाषा । तपा 'विवा' पेनसिमान्तोकायामीतिग्रा-मम्याभिशता पूरणा, पा समपये, उपग्रहो- दिनप्रपपनस्पोदोपसर्गकारित्वाव-दारुणो प्रहा, भय-मेष प्रत्यक्षोपसम्यमानकायों मस्मराधिनामा, स-बकास, तस्य च शून्पस्वास्तमिति गणितम्यवहारे शून्पस्प- पिन्दो संघा, नवा इति च पिंशवे संमा, नसानां पिछतिसरस्पस्वात् , सम सप संप नस्साघेति मन्दा, पमानुपा महरपया स्थापित मितानि-परिसरूपावानि 'पणि' संवरसराः 'स्पिति' रकस्मिन् रानामपि स्थान यस स तथा, एफराक्षौ मर्प- सहमपस्थितिकात्पर्यः(९००० सहि प्रहो मगषभिगकालानन्तरं पर्वसहस्रदय यार धरस्वात-मगरसन्मरासौ मसान्सस्मान-मगमन्त च मुसस्पेन इस्तीफा मषतवाद- तस्पषतपैर प्रापनस्य पार्श करिम्पति । तया 'मन' वधर्म, पा समयये । 'मा' मनन्दवम-काठमाषित्वावयुवम-संयसपूमास्य 'एन' इदानी प्रस्पषं 'मिनमाये' मारवप्रसपनापनामनापादनाप वस्समाः 'है: प्रागुक्कै निमिः समा' स्परा ‘रुपमा 'इer-ठोक्नुासकारिम्प 'समा' बर्षाणि यस्पो सा सपा, कालचस्प पररकस्प पनमोरफ', पमा प्राशनालयः मादिता बिनमत नन्ति तथा पती इसमाधी । पा पूर्वपत् । इवि प्रकरणे । 'ए' प्रवेषु णावसर्पिण्यादिषु 'एप' दर्शितप्रकारेप प्रसिपर मुमिहितलापासपतगौरवापादनलक्षणदएकार्यदर्शनारपिय परेषु' ऋष 'पुटेप' प्रकर्पोटिं प्राप्लेप हुण्डासर्पिण्यादिषु चतुर्ष 'मनुक्त प्रतिसमय 'बधुना' माम्मत 'दसमो' दुरापो अनमार्गी, प्रविपतिविघ्नकारियाणा पसदिग्पादीनां इएस्सार मदिना व भूयोसोफस्य भवामिनन्दिरमाकसिपपसालिक मनोपारेप इति यावत् 'मेनमागः' प्रतिमोतीरूप-मगरस्पय इति बचाः ॥ ३० ॥ एवं वावदादमिर्पः प्रपन लिहिना भूतपचापदा प्रतिपादिता, मम्प्रति देरेर धर्मसपा प्रतिपादिवं गुणिटेपपीरिति मार निराहस्सेनां गुपिटेप दर्शपमार- सम्यग मार्गपुपा प्रशान्तवपुषः प्रीवोनसपाषः ॥३१॥ प्पाण्या-म्परा मरमान् न वापतीवि सम्मपत्र 'ससा' सुमित मस्मारिणा प्रकरणादितिमा। कवप इति पपातु किसन्तोष दोपपर्यापा। तवप कता' सिरिता 'सो' दोपा:-स्वपमनेफनी येस्ते तपा, परसमावस्तार से अपना 'का' मारोपिता '' दीपा येस्त तथा, निमसेपापि ममनिगुणेषु लोकमप्ये सापापादनाप सपिया मिस्तिदोषारोपा इस्प: । गुणास मोपारो पणस्प सिनतरसाए । 'उपत् इसा निनिमिर्च सपिहिनदर्षनभावणेर प्रकटिय .
. - . . . ललाटतरहठ्यादिकोषरिफारा। न धाम्पन्ति' म सरन्ते, सिन्तीस्पर्म का देशेऽमीपा प्रचारेण षय लोकस्यागौरख्या भविम्याम इस्पादि मुसा मात्सर्याचनावस्था- तुमेव सेपो न ददतीत्पर्यः। सुविहित पतीन् सरमाधुत्व मेवानुगुणविशेपमेस्पा माषपति- 'सम्परमार्गपुपा' मगपस्प्रमीतमानादित्र परूपमोषपपस्प मम्याना मुझोपरेषप्रति पोपहारेण विस्तारकाः । एतेन संपामुस्पत्रमापणप्रविपेपमा । 'प्रधान्तवपुषः 'पहिर सवितरागादि विकारठरीरमाबा, एवेनान्तरपि प्रबलरागापमाप प्रकाशपति, अन्तस्त- झापे महिः सर्पदा प्रशान्तत्वानुपपचेः । 'प्रीवोइसपनुपः ' निशानपि प्रसीव प्रसबो- फसलोपना, एठन पहिः कोपविकारपरिहारमामिकरोति । 'भामण्या ' प्रापाति पातपिरमगाविपञ्चमहानमविभूतिष्पेयपः-मासेर्पा, पवेन रीपासून सर्वपिरतिसम्म दर्शयति । 'स्मपापा' अहहारतिरस्कारिमा, एसेन वाग्मिसपिचाइहामिमान देतो मुस्पपि सदभार प्रकटपति । कन्दर्पकपप्लुप।' मन्मथकदमदाहिना, एतम सर्मवतमध्ये निरपवादममवतदार्य द्रश्यति । 'सिदान्साम्बनि' शवागममामें वस्पुपा' स्पिवपतम्तरपरानिस्यपी, एतेन स्मपमुस्स्त्रक्रियानिपेष प्रतिपादपति । अमपा' धमामामा, पतेनान्वरपि होपनिरासं पापपति । ' मन्पो 'बिसी अनसेम्पती मगमपा' प्राप्नुपः, एवेन सफलभमणगुणगणसम्पधिमापिमाषपवि, निर्गुणानां विषेफिसोकपूमनामम्मपात् । 'पिदुपा' विषक्षणान् , एतेन ससमपपर ममममार पिदुग्ता विस्तारपन्ति । न चैव गुणशासित पतित पा कत्तुं पुता, भगीयमोऽपि वापस्य मफलगुमिगमगुणदेपरूपस्नेनानन्वमरभमननिय पनस्वाद, सिरा न्वाप्पमिति " मरहेपपबिदा, पमरम पि कम्मममिया साह । एकम्मि दीसिपम्मी, मातहीलिया हुति ॥ १॥ संतगुणछायणा मठ, परपरिवाभो योर मलिय प। पम्म य अवमाणो, साहपभोस य ममारो ॥ २ ॥ ततः प्रेधावता गुणिपु पहुमान एर कम्पो, न टेप, इनि चापः ॥ ३१ ॥ अथ कयमेवं पिपानपि मस्साध्न् सहा न धाम्पन्ति ! मिप्पास्वपावरया दिति ममा, अत एव ददतो ममनस्य नामभेनपपपिना सम्प निम्पपमाह- सीपरयुगोपिणः मनमहायोग न सीपति ॥ १२ ॥ -महो। मितात्यारिलो अन उरुदोपिणो दसीपठीस्पादि सम्मा 'अहो' इति पिस्मप, प्रर पेठमोऽपम् निापा,सोऽस्पास्तीति,मस्स्पर्षे इस् प्रत्ययावसितम समिप्पास प्रकरणादामिनिमधिर्फ गपते, प्रायेण चैनमिप्यादृष्टीना " गोडामादित . । पापा- - माइये" स्यादिनाऽऽमिनिषेनिफस्पैप तस्य प्रतिपादनाम् । सतप सन 'महिला' प्रारमिघ्पामिनिषेशगरगृहीव इस्पः । 'सनो' धर्मममि-मकमाइलोका तरणो- महान्तो यतिबनस्यास्पर्षमनुचितत्वेन 'दोपा' अपराधा रागद्वेषप्राणानिपातापादप सदोषाः बात आपार्यादीनिति गम्यं । 'देवी यति' देनानिय-जिनानियापति, पादृशा दया नीरागा प्रतिश्चयादि मन्तम सादृशा ममी, सस्मादाराध्या इति दवा सानु पमिमी, न प वादृक्षां तेषां तदुपमान ममीषीन, तेषां महादोपरत्वेन देवोपमान दिपानस्य मापातक इतस्मात् पर मिथ्यास्त्रस्प विपर्यासरूपत्वात् विपरीतपुद्धि तामा नपि वयोपमिनोति, एषमचरपदम्पपि मापनीय । 'पतमहादोपान् ' प्रगटप्रागुक्तपद परापान पुगप्रपानादीनिति अपः। 'अवीयति' भदेवानियाभरवि, नामी वर्ष सरसा, सदोपत्ता-निरतिश्पत्वास, तस्मादनाराष्पा इति । भत्र प क्षीणप्रायदोपानां देवकपमान सिद्धान्तेऽप्युदिन-" परिहयो तेपम्मी" इस्पादापाचार्यगुणभक्त पता 'प्रविरुपः' मिशन्त पात्पर्यपरिच्छेददशनाऽतिशयवत्वादिना द्विपपरिजनकत्वाधीर्य अतिरिमाप इसिम्याएपाना , स प विपर्यस्त-मसित्वाचया न करोति । एवमदप प्रापे दवदिदेवप्रापे घादवपुद्धिरिति मिथ्यात्तस्वरूप प्रतिपापा-गुरौ गुरुपुत्साविरूप दार- समीपति' सर्वशमिय-सर्मपिदमिपावरति ' मूर्सस्पनिषद' मनाममि सम्द स्वाम्पतगण्डस्थित पतिधन, यथा-सर्वसाशोऽप मदीयो पविजनः किंfe शाप्पावन पीति। सपम' पडदर्शनसर्कफर्कमपिर्ष स्वपरममयनिर्मपभूमि परि पिसम 'मझीपति' भन्ममिय-मासिवमिमापरति, यपा-न विधिप्पप मानाति । अपमधी-न दि मूसविरोमण सानोपमान युक्त नापि सवारपालन, अस्पन्तमननु भस्वा, परं स मिथ्यावानात् एपमपि फरोसि । मधुना प्रमार्गे मार्गपुस्मादिरूप मिप्यास्त्र सपति-उभागीयति उन्मार्गमित्र-उसपमियामरति । अनमार्ग 'ब ममात्र, यया नाय मगयस्मीतो मागः चिन्ता इति। माप' मा माप्रति पारितमौलिकमोमनादि मसित सम्पर पथिपनि सम्पर परमिर-म मागमिष- सन्मागमिवापरति । अत्रापि यत्-मिनमार्गम्प पन्द्रमप्र कायस्पो मार्गेग- वाममन] नाम बैनन साइपापादना मार्गस्प प सस्पयरपतापादन सम्मि पास्योपामिति । नपा 'स्व' भारमान 'प्रगुणाप्रप' निगुमपुरानार्थी पनि कामिन-विदित पाठप्रपोमनमिमावि मत्रापि मम निगुणसुम्पाप हान ' गुमिसुम्पना पमानमरिपारमादिति । ofanायतरिम्नपिपप मिRERI बाप सोरपिपममि प्रमाद सिभित्-दापन-'मिप्यासा अन' अपिहिमादि ' - मिथ्यास्वात्-नमतमहिमती सोका 'दवीपति' बानियाचरति, सम्पर्षमारामतपा देवस्पेनाम्प ती]वि पावत् । सदोपिमो-रागादिमतो लोकप्रतीवान् परिहरादीम्, कस महायोपान् वीतरागान् सोकोचरविभुतान् भदेसीपति-अनारायसेनानुमन्पते। बाप म्-एवन्मिप्यास्त्वमिति पेत् । उम्पते-मतस्मिन्-तदिति प्रस्मयस्यैव पवस्वाद, वस्मान न रामादिमन्तो देवा । दया सर्वबीयवि-सर्वविदयमित्यमिमन्यते सूखमपनिगर- मन्पपरतीपिकसमूई प्रापातिपातापनिात । तथा तमा-समस्तष्टाहारास्पवेदिन पर महातपारिम सतप्राय पुमप्रभामहरि 'महीपति' म्ीयति । एष पतमो गुरावा सारोपो मिथ्यात्व-विम्मित, एतावता पागुरौ गुरुमाषना गुरौ पागुरुपीरिति मिया स्व सविस | मार्गीपति-उपवस्पेन मन्पसे बैनमार्ग, अपप-वीर्षकमा सम्बास भीपति सन् मार्गीपति तदा समगुणासम्पमित्पावित पूर्ववत् । तदापर्यम्-एतन्मि प्यास्वोपडता यदेष विपर्यनच सर्वमवसाप गुमिनो द्विपन्तीति पार्षः ॥ ३२ ॥ ननु फिमिदानी गुणिमिा प्रयोमन ! सा एव ममपाम्-निक्षेपदोपमोपथमः समामीयता, मगवताऽपि तस्य मावन नमसतस्वात् तवा प तदाहया वर्षमा नामा मोषा प्रापिनो सम्परस्पत इस्पातश्पा-धुनासनसावचिनो म पवनस्पाक्षेप पूर्व मोघामानमुपविवर्षपिपुराह- समारेसनपतिवस्यान्तस्वयं पाबत ॥५॥ ग्याल्पा-'बन्तपो' पर्मापिनो मम्पसमात पावसत्तात्-पग्पस्वात् सरप रविवस्वाद-परिणा' मृगा नद्रावस्य-तस्समुदायस्प-उत्पपाच-उस्त्रज्ञापका अवमाननिरपेषः सन्दचारी पातमोरुपः साधु-साधी-भाव-भाविकासमायो भूपानिा सह उपते, स एष पसिष्ठत्वात् मूरत्वाप म्पाप्रा शाईस्तषस्प-सरपीन स्प-दासबद-पत्र तत्र निपोम्पस्मेति यावत् । द्वितीयपक्षे वासविपपीमवस्प 'मोक्ष' इति भिएपद, वेन बन्नुपये ' मोपो' निर्वाय, हरिणपणे पटनं पाप्रापसापनमिति पावत् । 'ता' का स्यात् । न फनिविस्यर्थः । ननु सरपनुगुमा-नुष्ठाना-मावाचस्प मोवामावा, फिमापात ! सहस्सेस्मत माह-सात् 'निायसाय कसितदानशील तपसोऽपि' स्पपसापिहित मिनादिविवरण देशपारिवानपनादेरप्यास्तां वविवरस्पपि सन्दाः । कप नहिं मोक्षामार। इस्पस माह- सहाय' सिधिसमदायाप 'देपानि' कतानि । दयेवापेसि धा तरिका । सतम 'सहवाहवानि 'भावकलोकैन मच्या सद्र विवेन निर्माप्य सिद्धिम्या सत्-देषनष पासापर्व समर्पपन तदापचीकतानि स्थानि' - बिनापदनानि, वान्पेन 'इटा' हरिपबन्धनयंत्रविशेषाः । मप टप पन्पोतरमि पीपते, मोपनहेतु-नाइलोमहवपम्प, तथा पसिद्धान्तविधिना लिहिना निमा निवासविहेण मादेर्यानि पैस्यानि विपाप्यन्ते तानि संसारगतिमोधननिषपनानि मपन्ति, एतानि प्रसवपस्पानि मुग्धान् प्रोरसास स्वनिवासापप कपम्-आमन्मामी भादा बस्मा मोग्या मविप्पन्तीरपाश्चमेन सेपो त ममझारोस्पादनन नियमापर्य लिहिमिः कारिवानि, तस्कपमेतेपो मोपनहेतुत । प्रत्युत पपननिमन्मनस्वमेव । एक पैत्याना स्टोस्पन्त परेतसाम्पना-मेदविपक्षणापुक उपमानोपमेयमाप इति । समारप टेर 'पतितस्स' प्रतिपदस्प कपवित् सत्सय प्रतिपत्सोरपि सत्र गोष्ठिम्यादिना स कारितप्रतिमा ममरवादिना पा निपमितत्वात् वसो निर्गन्तुमशास्त्रवि यावद । द्वितीय पक्षे 'पवितस्प 'पदस्य । सपा ' मन्तस्तरां ताम्यतः' मन्मार्गबहुमानिस्वायतो निर्षि ममिपोरपि निर्गमासामात् मषिता कदापिदिन यतस्मात् अमस्पपादा निर्गमिष्यामि घरपे रामतिपेनान्वाकरणमम्म 'साम्पवा' सिपमानस्प, व ! इत्यत आइ- वहरेन सहा पराश्यते, तस्प-सहस्य 'मद्रा' चतुर्दश्पादिका पसिथया, एतदा पार्यसंपादन तपोनिपमादिकसे प्रमाणीकर्षम्या, नान्पपेस्पेरमादिका परस्था, ततः सदा प्रबर्षिता, पराकान् मग्नमारमान् ! पर्यु पागुरा इष ! सतम समय '' निविर 'पायो' मृगादिपनार्थ देवरकादिनिर्मितमन्यिपिशेपः सेन 'पपन' संपमन, वरत-स्वदन्वितस्य । सहि सरसामुद्रितः ततो निर्गमनवामिपि कस्पापि परतो वस्तु न शक्नोति, किपुननिर्गन्तमिस्या । तपा एतस्य-सहस्प फ्रम-स्तभिर्दिष्टा राशिस्नावादिका परिपाटी, तायिन-वर्तिनः । रितीपप तु हरिणप्रहारार्य- धिप्प मजितः पादाक्रम तोपरगतस्पति तोऽयम -पपा पाप्रपासविषय स्प वन् ममोपरस्प, पापि पठितस्प, मन्यथा हि पताप्पापि कपनिषतो मोषः सम्परवि । वापि निमिमिया पेसि वाम्पतो पासपमितस्पेनासम्पन्दनमात्रमपि कपास्य TROMIT Ma मा सम्माति, एमस्यापि पेस्पति पदस्प समार्गस्सापा निर्गन्त मममि सियमानस्यापि समसया कीसिवस्येन मस्पपा म्युपमम प्रति उपन्तमप्पामतः वस्फममनविकामतः सम्प्रतिमन महापारायस्प अन्त सन्दाहस्प म निर्याप मप्रापत इति । भए पमिह महस्प मुतपा पामेमोपमान ! मा पप गुलमीतवानुरागाद सहमपि मह पमिदमत प्रापषिच प्रतिपादित मिछान्ने । पदार- संप संप ज, ममानि गगे बाप दोउम । ऐमो पा मन ना, - 18 . . पछि वापर वेसि ॥१॥" तस्मापुक्त मूरतमा प्रसास्य व्याप्रतपानि रुपये, वथा च सिर वासस्म प्राणिगणस्प मोधामाव इति । नन ई सिदान्तोकलयमस्म सहस्प सम्प्रस्पमावान् ममन्मवे तीयों मेवः प्रमन्यत इति षेम, पदुकमागमे-"निम्मल नायपायो, सबसुझो परिचगुपजुचो । तिरपयरामाविलो, धुवा एपारिसो संपो ॥१॥ भापममनियं बो, पमवेह साए मगर मामपि । तेलकदापिसो, ममकाले चिसो संषो ॥२॥" अन्पपा "दुप्पसाव परम" इस्पादेरादापात पारिवानाधिपतिपाद फस्प मगवापनस्प म्पापावापी, भावसामन्तरेप तापन्तमनहस पारिवानापेरस म्मवात् । नमु मातु सिदान्तप्रामाग्पाद-इदानीमपि माषसोपीपस्तिथापि मगा यापम पयत इसि पेठ ! अग्दिर्शितस्पेन मास्सपैन वा मरतः तददर्शनस्पा-पमा सिद्धस्पात् , सपते व पायमलपितषापा भिकर्षेऽपि निपेसो मनुष्पादेरनुपरम्मा, सतो पदि स्म शुरुपयसापासुस्तदा मास्सर्पगत्वार्य माम्पसपमास्पाय सम्मप्रेषणा परीषस मावसई, येन कचिस्प्रेषसे, मैवमेष नास्तिकत्तामबलम्म्य माम्मोपी मरथी रिति । तस्मात् ममपापना पपाऽनुपपरपा सम्प्रस्पप्पस्ति मावस, स एव या पता दुस्साता परिहारेगाम्पपेतम्य इतिचाः ॥ ३३॥ वदेसमौदेशिकमोमनादि वारदशन रिद्धिमिः प्रबापितम पर्मस्पोस्पपस्मप्रकास नेन भराना पेवसि कोपानिर्षि सम्मावयंस्तरक्षम तत्प्रदर्शनप्रयोमनमानिमिकीराह- इत्वं मिप्यापरकपनपा पम्पवासीर कमित् ॥ ३४ ॥ इस्य' प्राप्रतिपादिवप्रकारेण 'मिष्पापपापनपा ' रपवासि प्रापितोत्स्त्रमार्गप्रकटनमा करनमनपा 'तप्पयापि' पपार्ययापि, असरपपारि तपा फोपोरपादापपि स्पापि सम्माम्पवे इत्पपि शम्दामार' के प्रपने का कथित् 'मिनशासनस्यो मा पासीत्, पदिद मिप्यापपपपसमापने अनुपित' मसङ्गत, पदि दीद रागहेपाम्पामवघ्प पिपियेव सदाऽनौपिरप स्मात्-न परमस्ति । यो इस्पानन्तऽम्पपं । सनानुषितहानानन्तरे ‘मा छपद ' मा कुम्पत् 'कोऽपि' कथित् । पदि देवनुपितं स्याचदा सन्मानान्तर कोपोऽपि कपमित् पुन्पेस, न थे, तस्मान रोपनीप । बप यचर मिष्पापपकपनेन परेसा कोपानिर्माणमा तदाऽसौ न कपनीय एम, परसलेशहेतोसस्पस्पापि पचनस्पावलम्पस्वेनामिपानाद । यस्मात् देवोन प्रान्त्या माधुमामी भावकमाविका पैस्यापाकारदर्षनात् भाईसमेतत्यापनमिति मिथ्या घानेन, नहि सिमपादयः सवव माईसाः, उतन्पायेन मा तपा स्वस्पापाकरणात् । . पारूया- , . . .
सया एतऽपि नराः इसापनापामिवान्तारमा पस्तुनोऽनाईतम् अप्पेनहिनि पाईस मिति रिपर्यम्पन्तीति नमान्तिनया पचपतिवान् 'हमार्गप्रस्पितान् 'मन्' मानान् 'प्रेक्ष्य' मवलोक्य 'तस्प्रमोहापोहाय' इपथपतिवनर-प्रागुकापल-मिथ्याचानोपनोदाप 'ई' एतल्लिशिना मिथ्यापपस्वरूप 'किमपि ' दिमात्र 'रुपया' कपममी महा। तीर्पामासकर्षिताः पपस्वरूप विद्याप सस्परिहारेण मरपपमम्पपेस्य मपोइपि वरि पन्तीस्पनुभम्पया 'करिस्पत' मम्मे प्रतिपिपादयिपपा मफलं सरलय प्रथम पेवसि मनितं, सतो 'अपित्त ' अधारपनया रपं, तयन्तरेण परस्म पुरतः सम्भत्रतिपादित हायस्पस्तात् । पा समुपये। अतः पपपहनिमजन-नरनिकरोदरणाय मपा किविद् मरिरमिदमिति मुक्त मगवता प्रकरणकारेपेवि पार्षः ॥ ३४ ॥ अप कपमिति विस्मात्रमेवामिहि । यावता निश्शेपदोपप्रकासनेन हि मिप्पा पया पाना मुस्पषम भवतीस्पासनप तमिरासपोवकेन 'पत' इति पदेनान्तरापूर्व खोपामानन्स्पेनामिभानाशस्यस्व निदर्शनयापि माषयमाह-पता- प्रोवेऽमम्तकागकसिमहमिग्ये नाम नेपप्पोम् ॥ १५ ॥ प्यास्पा- पठ' इति यस्मादेतोरस्मिन् दरम्पेऽनन्तकालारप्रोम्ने पो दोष सहमपा पिरोदिस्यादिसम्म पः। तत्र 'मोम्ने ' माते ' मनन्तकाला ' अनन्ते नानासा, अनन्तोत्सपिपासर्पिणी परिवर्तनेनास्प मागस्पापर्षदमकान्ता पातिस्वेन सिद्धान्ते प्रादुर्भावप्रतिपादनाद । कलिमलनितपे' दुषमापातनिवासे, दुममा कालोहि मपरासापथपा महापापा, मात्रातीवासमासप्रापिदर्षनाए सम्माम्पत-सह उपमामस दुरधेऽस्मिन्-निक्सवि, अपना कठिरेप पसा पर 'मलं कि, यस निलरे । तपा नाम' ममिपान, यथा सिवनेऽपि लोका पतारो-मप-ममी बेना अमी सि(पोवामरमियन इत्यादि, नपप्प-मोहरगादिवेपः, ततोम माम नपप्यता-सविहितसापारणा नामभामाद नेपथ्यदशनापार माग प्रान्ति-वारिक दिनपथसाराम पानेऽपिरिमाये, मन्मय पमाः की मिनमाग एक मविपतीरपत मार-अप पेति प्रतिकूलपधारपोत कम पपम् 'तपा' परमापता 'मिमरे' मां मार्गपातक, भपम:-पपा अमिमराा' प्रछमपातका सोपेग रासादिधार्ग गपगनुपन्तो परपरावन रामादिक पापादपन्ति, तापि गप्परमार मार्गों एर पारिपाठमपारपम्तो पतिरेपग मिरुस्प्ररूपगरितादिनामार्गपरिजनीति माति-ममिपरा। इनम दुरग-रपारिनोरमीपपाराव पार पामा 1 'मस्मिन्' .
. - - प्राग्मनितस्त्रापे 'दरम्ये 'मार्गे 'अमापात्' मास्मामी रम् बरा अस्मिन् एप परति दयाऽभ्यवसापात् 'पा' कमिन्मामलो 'सा' सिदिमावनामारिते नरें। मोपदेषनोस्पादितमससपेपि मस्पषमम 'निरसिसि विमिस्सा । बदित कपशिदमीषा भूगना रामदोपतामस्म दर्षनेनाप सोपो विर्मस तामी उपकता मपन्तीस्पायसेन दोपसमपा पपेषा 'विषक्षेत' भमिपित्सेत्, एतापत् समस्यामा मार्गे वोपा सन्वीवि पतुमिन्छेदिस्पः। स पुमान् 'अम्मो' बस मम्मोपे-परस्त्र मस 'प्रमिस्सेद ' पदनाम्म इति उकादिमिा संचिम्पासेत् । बसभिमतप्रमिस्सासि- दर्षनेन दरमहोपामामसरस्पतासिसा अपरिसम्पन् विवधिवानन्स्प विपापविषया निवर्धनान्तरमा-'सकसगगनोहान पो समप्रान्तरिधान्त प्रापन, पेति पपान्तरे, विपिस्सेद-चिकीत । अप च निदर्षननामाला।। तोऽयमपा-पमा सागराम्भो सिभूपस्स्वात् प्रभातुमधाप, उपा दरमस्य महामिप्यात्वरूपस्य सोकोचरविरुवासमा सषेटिव-शवमाससम्मविस्मात् वोपसम्मयाऽम्पतिवारपाइकुमक्षसेवि, असो विस्मात्रमेमोवाइस, वामन्मात्रेमापि सावित्पुपारमना मोहापोहेन सस्पषामुपगमो मपिप्पतीसि धिमेति पार्पः ॥ १५ ॥ ननु-सफन्पायेन सिक्निा पेत् पतयो न भवन्ति नई म सन्स्पेन, पवित्सम्पति मुतोकसषणमाको पतयोअर्धनार , क्या शानदर्शनाम्यामेव मगचीर्वमनुपर्वत इति मन्पवेत प्रस्पार-वा- . म सापपाम्नाया म बहस-सीमेपिव-पतिः ॥१६॥ . म्याम्पा-वेति, पमा सम्प्रति भूयासो सिदिनः सन्ति 'पा' वेन प्रका- रेग पिरसा मुविहिता भपि, इस्पेवदेवाह-वेऽपापि स्परिह पदप इति समन्मः। 'माम्नायो' गुरुमिप्पप्रतिक्षिप्पादिक्रमेण सम्प्रदाया 'सारमा' प्रागनित मौरपिक- भोमनापुपमोगाः सपाप आम्नायो ये वे तया, नमा वेषां निपेपा । भानावन यौरशिकमोपन-परपरासादिना सारपसम्प्रदायरन्तो पन मन्ति, पपा पार सबस-मतिपारपरेन समस, प्रामाचारिक, समय पासवारिधयोगारसापकोऽपि पार ते प दिमिषा-उपकरण-देहमेदान् । तत्रोपभरपरकमा ये पमित्यासपिमन्तरेणापि कदापि बत्रादिक पावन्ति, सणाभादि पामिपन्ति कवापिस्परिपते प, पात्र एमापपि पूएं ताविनायोसारित वेमकं प पारपति, उपकरणमप्पतिरिकमा - पन्त इति । देवशास्तु ये करचरणनखादीम् कदाचित् निनिमिच भूपपान्तीसिस इमे प दिविभा भपि निप्पादिपरिवाराविको मिति तपः पाणिरत्यादि प्रभप च यः प्रार्थपन्ते, सदासापने न १ प्रमोदन्ने, छेदाभाविधार्मिहुमिः उपसिता अपि फर्मपयार्थप्पया इस्पादिप्रवनयुका पाः। परफ-" उपगरम-देह-चोक्ला, हड्डीरसगारवा सिपा मिर्ष पिएमपस छयहचा, निग्गंधा पाठमा भणिया ॥१॥ तपा स्मित 'धील पण येषां से सपा, वेऽपि द्विषा-मासेमना-सापमेदाद, तनासेरनाइटीला ये पान दर्भमचारित्रसपासि किनिदपनीयन्ति, पायधीलास्तु से झोपादिभिः कपापनावि गुपान् मन्ति, अपमा रूपायैनादीन् पे निरामपन्ति भयोछेवायोपस्थिवा अपीस्पादि सभणमाप मीसा इति । वो पाठाप मधीलायेति मन्या पातपिता- पोपा 'पतिक्रिया' प्रस्युपेषाप्रमानप्रमृतिका साधुमामाघारी, तपा 'मुका' रहिता पेन मन्ति, प्रस्पद यतिकस्य च तत्-"पहिलेषापमअभा-मिक्खिरिपा-सोपांममा पेर। पपगरपलियारा, परिसमावस्मपाई ।। १ ।" इस्पादि विषयमालसामा पारीपरिन इस्पर्धः । पदुक भीउमासातिवाचकवतस्वार्पने भाप्ये प पुला- बह-धील-निन्ध-स्नातका निर्ग्रन्या." [९५,४९] [माये] पुलाको पक्षा थीलो निन्या स्नातक हस्पते पर निर्मन्यविशेषा मरन्ति । तर सततमप्रतिपातिनो बिनोकादागमात्-नि-पपुलामा प्रध्य प्रति प्रस्थिता परीरोपकरणविषानुन पिता परिपपरकामा मतगौरवाधिताः अपिवितपरिणा। मषिविका इति न प्रय पाद प्रपाता। परिका करिषसकेला, पपरिया परिवारो येपो ते, मसपुकार सरदेसाई भतीधारमनिममसन-चिम्म पुकार, पताइधीला दिविषा- प्रतिसेपसाइशीला पापलीलाम, तत्र प्रतिसपनाइनीसा नपं प्रवि प्रस्थिताः ये मनिपतेन्द्रिया मजितन्द्रिपा रूपादिविषयेषणहवादगः कपनि कपिपणे विरा पपन्ता परन्ति, प्रतिसपनापीमा प्रतिसपनापिकारे प्रतिसेवनापत्रानो सगुणाना रात्रिभोधनपिरतिष्ठानपिरामियोगा पसारकारणान्यतम प्रविसबमान: पुलालाम्पाद, भएनमिरपेक । सो दिविषा-उपकरणपइसा भीरपामय । वनोपकरणामिपक पिपोनिविपपिपित्रमहापनोपहरणपरिमायुक्तर-बिरिषदसमेइन, सिविनकपीवादि मिनिमूरपोपहतियुष रविनेपोपकरण काढायुको । गए- मिग मृदु-र- पिरादि-पुकोपकर मातापिसापा, निर वरप्रतिकारसमी, निरोप-परा 'तस्प' उपकरणस्प ' प्रतिसरका' प्रधान-मारपन-पटिकाटनादि, तरसेपी मिष्पकरमा माति । परामिपुतरितो पिसार्य तरप्रतिकारसपी पीर पाशः । प्रतिसेवनानीलम मूलगुणानविराधयन् नुवरगुनेषु काशिदिरापना प्रतिसेयते । कमायशीस-निर्मप-स्नातकानां प्रतिसेषना नास्ति । पुसाकस्पोमष्टस्थितिषु देवो सासारे, पहष-प्रतिसपनाशीलयो विषतिमागरोपस्थितिषु आरमामृतकतो, मषेपामपि नपन्यः परयोपमपृषपरसस्थिति सौपर्मे उपपातः । अब पता-निर्जन्य स्नातकपरितारेम यत् बहसइसीसोषितक्रियायुक्तपविगवेपण वगैरेष सर्वतीराया वीर्षप्राची, “ मामिमाणं घमा, बहसासीलेहि बाए सित्वं । " इति पचनाव । वषा न युका' न स्पृष्टा ' मदो' मारपादिमिरारमोस्कमित्यप . ममता' यास्माधि प्रतिष भो, ममैसे योगक्षेम पहन्ति, सतो पपमीपा काप्पनिटं न मम्पपत इस्पादि स्नोन तमुखासाम्पा पतेरपि पति पापन् । 'भाबीपन ' आनीविनिर्वाह स्तस्माद् मयं, तदमावसम्माषनया मीविहिमिर्षिदिवसेपिस्याः सिदान्वाम्पपनादिति हिता वा गास्थन्छन्दोऽनुचि बिना निस्पृश्तया शुई प्ररूपपन्तो मा, एतस्कृतनिर्वाहा मारन कप पप मीविष्याम । इत्यापम्पवमाय इस्पर्षः। ततब मदरस्यादि इन्द्रा। ते। महासत्यानां हि स्वमन-मन-पुत्र कसत्रादि-मङ्गस्पागेन प्राग्याप्राहिणा तस्स्पो स्पादिप ममतापमाना, श्रीमानामेव पनामा । ए प पति ने ममवादिमिर्म बिताः। तथा 'सरनेम मविम्छिमप्रवासया प्रतीयमानो औद्राम्यवसायास्प बामेस' आवेगा-वस्फों यपामिति म्यधिकरिणो पहुमीहिए। वे, सपा से न भवन्ति, सम्जसन कमायोदयरवेन वेपो तभिवपनलप्रपमादिकपायोदयाभागा । ' न फदमिनिवेशा' मनामोगादिना पपाकारं स्वप प्रयते मम्मुपगते पा वस्तुनि इस्सितमानसानालन्तो प न ममन्ति, तरकारणमिप्यामिमानामाषास् । 'म कपरप्रिया' मापाप्राधान्येनानु छामनिष्ठा ये म मपन्ति, तमिमिचमनरम्यनापरिनामामापात् । ममवामीपनमयादयम सापुस्वमारकवाव-पतीनां मर्पपा हेपा एव इस्पवस्वेपामिह निपेपो विशेपेण प्रदर्षित।। पदुक्तं-" एवं च संकिसिहा, मावाणम्मि निपतखिन्छा। मातीवियमयपरथा, मा नो साहुमो नपा ॥१॥ य एव गुणगणोपेवास्ते । साप: 'पापि समापुरसितपा परिस दुप्पमाकातऽपि, मास्ता दुप्पममुपमादानिस्पपि पदार्थः । म्युर्मवे' 'र' प्रवचन 'परतपा' सिदान्याध्ययनामापन पास्पानभानपरा पणा, मप्पयनादिकचापता पिपतपैर रोपां शादीपसिधामामात् । पानं-"वामा म्पयन पाप्पापन प, मशिन्तन पारमनि पापमापन प मतां, परन: मस्मिना कार्यः॥१॥"नलिदिन र प्रमरपादिनमारम्प पारमादिप्रयोगतस्परा! पतेन सपास मानापमारप्रतिपादिता, महारमना पत्राप्पपनावरेस पलसात् । एतेन . " यतया - न मन्स्येव सम्प्रति पयोकसषमायो पत्तयोऽदर्षनादिस्पादि पदावहितं तदपास्त, काठादिदोपान-प्रायः तपापिप-पसीनामदर्शनेऽपि कापि से न सतीस्पनाबासस्य क मयोग्यस्थात्, तदुक्क-" कालाइबोसो फाषि, पापि दीमति सारिसा न मा । सात्य नावि नरिपधि, नेस फुझा प्रणास्सिास] प्रासं (1) ॥ १॥" मातीर्थमा गमे बार-नीलानामनुाधिभत्रणात् । पदाह-"न विणा वित्य नियठेहि, नातिम म निपठया । कायसममो मात्र, ताप अनुस्मसणा दुन्द ॥१॥" इसि, बकशील पोरनाधिरिति वत्र पाण्यानात् , तया प धानदर्शनाम्पामेव सम्प्रति तीर्पमिति हमाणस्य मत प्रापपिचापः, पदाह-" फसिधि पाएसो, दमणनाणेहिं पाए नित्यं । पुम्छिम च परिच, पपमाणे भारिपा घडरो ॥ १ ॥ मसन्ग्रहात् सदनिन्छ तम समापसप्रमाबाद, पदम-"जो मवा नरिय पम्मो, नप सामाइप न पेव प बपाई। सो समयसंपन्यो, कायो ममणसंपेग ॥ १ ॥ तस्मात् मन्स्येवापापि सिरसाः प्रायगितगुणा मुनयो। यदाइ-"मो मामरासिमहविरिप कि, वह दक्लिपे मिस लिथे । मरिय शिषि] प मा वित्यं, पिरलतरा फार मणिपपरा || १" इति " , प्रचाः ॥३६॥ सदर दुप्पमापामपि सपिहित पतिमा व्यवस्थाप्प माम्प्रत मामान्पपिशेपगुण पपया वेपामर पन्दनीयता प्रदर्भयमाह- परिमाः मोपरेसा मुतनिरूपविता सराणापपेसा ॥ ३० ॥ प्पारुपा-प पा सत् साधपोऽस्मिमिति मम्मपः। 'संविमा ' मोवामिला पुमा मामीरवो गा, न तु परोको पुस्पेनालोकप्रतिपदाः। परविमा मपि सनि स्वारय एष पनिप्पन्ति, सपा प कि रिस्पन मार- सोपदा' धर्मदेखना वसा न खालस्य मातटीलस्वादिना तद्विमुसा, सरिता मम्पोपकारामागावस्य पापाप पविना विषेपस्यात् , अन्पचा आत्मम्मरिखमात्र प्रमाद , यपाकपधित् नमन पक्तिगाहकनापि प रुपेन मगपता मापकोपचिफीपपा सदापरणा, ग्लादि नाऽप्यापार्येण धर्मम्पामपानमा कम्पमिरपाममे मिपानाप । पदार-"रा पैक मतगाई, रोतकाइप मदोमगम्मपिए । एवं रि निपं, पकनागिमति मावस्यो ॥१॥" 'पुननिरूपविदा मागमरहस्सनिपुमा, एतेन गीतार्पतमा धर्मकपापिकारिणमा, भगीनापरप नदपोगा। परिपा अपि सय किपाश्रिपिता मरिष्प तीरपत आर- परयतापप ' मस्मिन् घो मामिन् पार, मादिग्राणाप्रपलादिग्रस परिष - - - सबसे सति विपीपमानमेतदनुष्ठानम् अस्माकमारमसंयमशरीरपोरवावर मरिणीति देशसमयबसानुसार्पनुष्ठानं विहारक्रमादि त्रिपाकाण येषां ते वचा, अनेन पहन मानझियावयानुगामित्व वेपो निपदित, वरप्रधानरवा दीक्षायाः केजलपोरनिष्टपात्या मिपानन समदिवयोरेप तयोः पहायपोरिएफलसापकतया वैः इष्टतात् । यस्ता अपि मतोऽपि कवाग्रहगरसोद्गाराम-उस्त्र महापपिप्पन्तीपत मा-परमार्मप्रष्ट नपटमा ' पपार्षभुतपपप्रमशचतुरा, जणीपसोऽप्यस्स्प्रपदस्य रारुप सिपाक मिनता कपमपि त हम बान्तीस्पर्पा, मत एर पचिव नर्मदोषाद परपसापाहसेनापि एक एप मार्गः प्ररूपपीया, यदुवं-"बहुमण पचो, सरीरालया। मयिामा मस्यो । परमपरपे मसहो, मर मग्ग परुविना ॥१॥" सपाविपस्पापि शतपय प्ररूपणाद प्रेस्प पोधिप्राप्रपा पनिसमारपारावार निस्ताराव, मारपपप्ररूपकस्म दुष्करक्रियापरिगोऽपात्र बोपित्यानन्दमयनिर्धिनात् , मत एक ताशस्प दर्शन मात्रमपि भूत निवारित, यदाह-" उम्मग्गवसणाए, परग नासंति बिवारिंदा । मारमदसपा सस, न लम्मा वारिसा ॥१॥" मवः एसपथमब वे प्रबपति, मत एष 'प्रास्तमिप्याप्रमादा, ' सपर्ष निराकतोस्रोपावप-कम्पवा परसवे व निरस्तपादुकमवा: 'गन्पा' पथाभं द्वादशापर्यवन्दनादिना प्रगमनीपा: सस्सापा ' मविहिवयतया मस्मिन् दिनमासने दुपमाझाले पानिपमो' दम्पाव- मिहाशम:' पापनियाः 'दम' इन्द्रिपबधीकारः 'औचिस्प मर्वत्र योग्यवामु सारेण विनयादिप्रयोदय ' गाम्मीर्य' मासापदन्यादिविकारत ' ' विपरमपि षेतमोऽहम् ' स्वैर्य' विमृश्य कार्यकारिस्व औदार्य' मिनेपानामप्पापनादि विपुलापता बार्यपा' सरपुरुषाहमापिता 'रिनयो' गुर्वादिषम्मुत्पानादि प्रति पतिः 'नपो' लोकतोकचरा-विरुद-सारित 'या' इस्पिता' करपल 'वाम'धर्मकिपासनातरम 'दाधियं ' सरसपिचता, गुणा ' पुम्पा' पवित्रा मनोबा वा सानो बन्दनापान्तीतिचा साम्प्रत प्रकरणारा प्रकरगं समा अपयन् ममान सनामपयमापिमापपिपु विभामिष्णुमगांमस्मरमनाशाह . . - T ग्पाफ्या-चिर्न कन्द इति समयः। f पारिशयस्पेन मास्पन्त शोममानं 'मग' उा .
, - . 'भूगोहान' सिदान्तासिकमे अनासाद, माशा-मनोरर्य ददाति' प्रयति मासादा, न माशादोऽनायादात, श्रुतामातिकमकारिणः पुंसो नानुमन्दारमित्यर्थः । सदधानामपि, सत् मानन-फेबलवानेन लोकालोकापमासकवाद-मास्सन्त 'मिन' वीर्षकरं, सपा " सबसुरा र रूस, मंगुापमाणय विउविजा । भिणपायंगुष्ठपो, न सोए महिं गालो ॥ १॥" इस्पादिपचनेन 'बरा' मसिमगा 'पुः भीः' भरिकान्तिा, सेर पन्द्रिका' मगतीमनप्रमोददापिस्वाद कौसरी, क्या 'मेश्वरं' लवत्रनाथ, पन्द्रिकया पनवदपुरिया विमगदाहादफमिस्पर्यः । 'पन ' स्तुव गम्य ' स्वस्य 'अनकपा' पापा 'अमुग्नः' दानवमानः 'फ्रेण ' मपोना, 'पा' मारप, एनश्छिद-करमपसर्वश्प 'दम्मारि' शाल्मनिष्ठापक 'विदुषा' विपक्षिा पदा' मर्मदा 'सुत्रबमा' मधुरगिरा 'मनकान्तरप्रद ' किस मैनदर्शने सोक्प पमिकस पम्तमात सदनित्यानित्पादिस्पतयानमान्तारमझमम्पुपगम्पत, वषेष प्रभागापरमस्सा, न परतीपिकारसदेवामदेय पा नित्य मेगानिस्पमेन घेन्यादिरूप उपेक्षान्धारमा, वस्प विषारामास्यात् । तताऽनकान्ते-निकान्तारमकवादे ए-मनुराग प्रदप यास व्या म, बनकान्तबावनीस्पुपादक, सर्फशकरारसस्पन्दिन्पा पापा तपा मगवाननमन्तबाद ग्युस्सादपति, पपा पिामा शादर्शनस्पागेन तोप रन्पन्त इत्यर्थः। पमिद' पर 'मारमुर्म' पारया वर्मन्पामपरिपाच्या मापकाम्प स्वपक्रान्त 'मापकाम्पमिद-शिशुपालपप' इस्पारूपो नामाध' प्रादुर्मति, पहापि नारपेयति मापममवापः, अप "जिनामेन गगिने पझे" इति नामर या स्थापना पेप-एनष पक्राधान्यासस्वरूप पक्तमिति पत्ताः ।। ३८ ॥ जपानन प्रकरणन मपम मिप्पार पम्पप्रटिस प्रसपीमिनमाडमरापा घिमस्या प्रमापा लिहिनो ममिपिता ! इति कनाप्पुपालम्पास्तस्प प पनि मन मम पापमाणाचायनाप पास प्रस्तदपि प्ररुतानुपातित्वादशेष प्रकरणrs निगर मदिरानी पाल्पापत इस्पाह- मिनतिमतदुर्गे काम! सापुरः ॥३॥ भागया-मिनपनिमतमा-मगरमहामनपेव मिप्पासादि परिवाररपाक्षम मा-पदमनापार प्रतिपक्षप्परबाट उपमिमरवन इगल्याए ‘र्ग' पाक तस्मिन् 'प्रमिभून' उपहन-रमित इस्पध । मापुरते-हिनिमि'मम्मको' मम्म गनिमः, RURAUTमनरनाना नानारिपारिपापिया -33-मकापि। . .
- - . -- तस्प से पाः सदनुपरिवेष्तिस्मात् सैनिकास्तबिपिमिा-ए। हितीपपरेसी रुतपापदेशः । अप कपमेववियस्यापि धिनमतदुर्गस्प विपयिभिरपि सिङ्गिमिरभिनव ! इस्पत बार-'कालतो' दुप्पमासमपदोपाल, भभिम्पन्न हि कासनमान्महावेगस्ति नोऽपि, तसभ 'स्वापारजनानां ' सम्पमापारोपणष्पा नास्मायतीचीडवायो- काना 'स्वगन्छस्पितिः' एत पय सम्प्रदायागता पुप्माक गुरपस्तस्मात् राषिदपि न मोकम्पा इस्यादिका प्राक्प्रतिपादिवा निमगछमुद्रा 'स' मा 'भारा' इदानी '' साधुषेप। 'ममपि सर्वश्रेफमस्पेन मतानि । 'सार्वसिस'मस्माक मते मोग्या भविष्यतीति नियमार्यनिप्पचये, अप्राऽनुरूपएपमानमाह-'पाप' निगर म । एवंदुस माति-पया म्लेच्छसैन्पा फस्मिमिदपि दुर्गे सागरलेन गहीवे द्रविणापथ तदन्तर्मतिनागरिकलोकसंयमनाप माला प्रसारपन्ति, सपेतेऽपि सिजिनः सोपमोगा मग्मधमनियमनाय गच्छस्थिति प्रपपाममरिति सचाः ॥ ३९ ॥ ननु से यदि गम्छस्पिति सर्वत्र पिस्वारयामासरेवाववाऽपि पिड मार- सम्मस्प प्रतिमे इसापपुपि मोम्पम्मिते मरमक-॥ ४ ॥ ग्यासपा-मोहरामटके मौरि जमपि लोकर्षय कदामा वि समन्या । 'सम्प्रति' मामा 'प्रोन्नम्मिते' मम्मुदिते ' मस्मकम्सेफ्छाप्यार' मस्मराशि- तुरफाधिपतिसारसैन्ये 'मातिम' समस्विवयाऽन पसाभारये 'इस एप' प्राग्मर्षित- निर्गुणसामादिसमदाप एष 'बा' घरीर स्वरूप पम्प वचवा, तस्मिन् । मस्मर म्सेस्स हिदुस्साह एप सैन्य, ततो पपा म्लेच्छोग्यादिसापनेन परमनपदममि माति, एक मस्मकोऽपि प्रबल दामापसेन मगरछासन मालिन्पोस्पादनेन विरतरते, तदा 'दुरन्तदषमापर्य' दुरासंयतपणास्पान्साप, १ सम्बपे, 'विस्फति' प्रम वित्री, एवं सवि प्रौस्फाति अगापि' प्राप्मुषि ' मोह एप' मिभ्यासान मेष, सिरियप्तसंसारमार्गस्यारिकारमसात् अविदुयत्तात् रामाविप्रमजस्ताव 'राम' पार्षिक वस्प करके ' अनीके प्रागुकस्म मस्मनदेः सर्पस्यापि मोहरामपरिष्य वस्वन तस्करपारपस्वाद, अपम:-मोहो हि दुष्ट मौलराधकम्पः तस्य इस सपनपतुलसकठितो भस्मको म्हेन्डामपमहासामन्तम्पा, दक्षमापर्यत स्त एपातिप्रवकस्वाद साहापान्तरनिरपेयमेन द्वितीपमतमामन्तप्ररूपं, ततो यपा कमिन्म बारामाधिराबो म्यारिमहासामन्वैमणसं सापपछि, तपाऽयमपि मोहराम्रो भस्म कादिमिर्मिनसासनममिमबसीति, ततो 'लो' सामने सदापरे-मोहरामशासन .
+ सदागमस्य' . मनतिकामहिमवादविमृश्पस्वाद अधिमृश्यकारिमिरित्यर्थ । 'एकीभ्य' दुष्टस्पेनैक मस्य विपाप, इन्य महतवनमतीदेराकोम-तर्मन-नीलादिमिः प्रकारे रायसेन पय कारामा' पीरपामा-उपहास्पामा इस्यर्थः । केन रेतनस्यार- लिप्रिपित-मिथ्यापथोस्पयताप्रतिपादकस्य शुदसिदान्तस्य 'कपपाऽपि' धर्मदेशना द्वारा पिपारमात्रेणापि, यदि हि पक्षप्रतिपक्षपरिप्रदेण साधनपणोपन्यासै प्रकृतविपप परैः सह पादसपझमामहे उदा न चिपस्त किमपि वर्षीरन् इत्यपि सम्दाय, वथा प पय सिद्धान्तविपारं मम्मेम्योधिपवयोपदिन्नन्तो नारपीयां समप्यपालम्भमर्दामः । पदुक्त-" ने निरीक्ष्य विपकंटफसर्पफीटान् , सम्यह पया प्रयत तान् परिस्य सन्ि प्रमान-भूति-पाटि-कुमार्गदोपान् , सम्पणिधारपत कोष परापपादः १ ॥१॥" इति पापा ॥१०॥ [अथ प्रन्यकृष्प्रशस्ति ] भीमसि सरतरगच्छे, भीमिनमद्रामिषा गणाधीशा। सिदान्तचिौरा-मूपानाः सन्ति तमिछप्पाः ॥१॥ भीमदमयसीमास्तू-पाण्यापास्तदिनेयरिस्याताः । तम्हिप्पहर्पराजो-पाध्यायेन हि कता प्रचित ॥२॥ सम्धिवाग्गुरुमद्रो-दपसाहाय्पाप सपहस्य । भीमशिनपविपरीवर-कसद सत् टीकाता ॥३॥ निमिा इसकम् ॥ पदा पराजेन, लिखित मविमान्यता । विरुद्ध च सदस्यत्रं दुः सोपं सद्विमिः ॥ ४ ॥ ॥ इति सरपरकलपवृत्तिा मम्पूर्णा ॥ [लेखक प्रशस्ति ] संबन १६०८ बर्षे माहसदि ५ दिन शनिवार भीम्वरतरगच्छे भीदिनमाणिस्प परिपिपराम्प श्रीविक्रमनगरे गपपर पोपरागोप्रे मा. दपरास्तस्पुत्र मा० मग सिस्तिरपु० मा रुम्मा मा० या दौतिकदमा पुरस्न मा० रापपास सुरवाण समार पद प्रहमपरिवारपुनेन मा० रापपाउन धानपप्रमीतपम उपापने भीमपातपाति प्रनिरिएरापिता पीपनरागोपाप्पापाना पापमान निरं तन्दतु ॥ शुम फरपाग गस्त । भीपनगरापापमिभी प्रमादीला प्रतिरिप बा• अपमुन्दरगः । धर्म मयतु हेमक पाठरपोः । पम्पाणमस्तु । श्रीः ।
१००
म चक्रवन्धोऽयम्-
"जिनवाडभेन गणिनेद चके
इति नामान्मा स्थापना । सं० प० लोक-१८॥
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श्री सघपट्टक का हिन्दी भाषानुवाद । -- 'पहिज्याला०'-पप-धर्म के स्वपन करने में वत्पर, करुणारूपी भमत क सागर पार्षप्रमुन अपनी माता तथा मन्य बहुत से लोगों के मामने कमठमनि (वापस ) की पनी में जलती हुई लकडी क छिद्र में धनी की न्याला से मलितप्राय नाग को विस्वलाकर फमठमुनि क तप को दुष्टतप उदोपिम किया और प्रसने समिमिक्ष मनः उपमों का भी सान किपा । फमठमनि फ ठपको दुष्ट सप ठोपित करते हुए मगानन मानो लोगों से कहा कि "प्राशो को उचित है कि-घे उठाकर भी लोगों को इमार्ग पर मान स रो" दुम्माधि से लोगों को, परामर्थन करन-टाने में तत्पर ऐसे पार्मनायनामक जिनदस फी म स्तुति करते हैं ॥१॥ 'कल्याणामि०'- शिष्य ! सुमारा मानसिक परिमाम शुम है, तुम गुणपाही हो, मार्ग के प्रस्पर्षी न हो, विनयशील हो, सरल हो, पपोषिक्ष कार्य करन में सर्वदा प्रपत रहत हो, उदार, मितेन्द्रिप, नीतिमान् , स्थिरता एष धीरसा से युक्त, सर्भ क ममियपी, विवेक एव समुदि से युक्त हो इसीठिय हम सुमको उपपन्न इतरे मन मा म्पवस्था का प्रतिपादन करत हैं ॥२॥ पर क्लि.' इति-दस दुप्पमा काठ में प्राणिवर्ग कलिकालम्पी महामर्प के दा में पर इए , प्राणियों में तय क प्रति प्रीति क्या नीतिमा का पिठाउ ममार रो गया है, ममान एम इपय फी अहनिम्न प्रतिफ कारण प्राणियों का मुगतिमाग मर्यात् गति आदिस सम्पप एकदम बिमिटम हो गया है । स ममप इम जगत में मरममा भौर उमरा मित्र मसंयमियों की पूनाम्प दसम मार्प शुष उमति पाए, मिष्णाम्नम्प मापार दिन दोगुना रात चौगुना पर रहा है । इम मिप्यास्त के कारण भैनन्द्र माग विरसता मपा क्षीणता को प्राप्त । पुका है । एसे भामर में रौद्र मापनमापान देपी, मग, वन नया सुदियों क संप की पाम्पग में अनुरन, सिपमरी, मापुरपपागे, मामागीन पत्यशमियोंन जिनोममाग ग xि inो पारों और पेमा रमा॥ 'पोनि.' -प्रापारमित भोपन १, हिमानग में पाम २, (मति) .
. उपाभप के प्रति मत्सरता ३, पन भर्पस्वीकार ४, यह भाइस्वीकार ५, वमा पैस्वसदन का स्वीकार ६, भप्रस्युपेक्षित आसन गही पर पैठना ७, साषण आचरण में प्रादर रखना ८, भुतमार्ग का अपमान करना ९, और गुपिवनों के प्रति द्वेष रसना १०, ने दशहर रुप निस मार्ग में धर्म माना गया है। यदि इस प्रकार का धर्म कर्म -मस को र करनेवासा हो तो मेरुपर्वत मी समुद्र में तैरने सम भाप । वर्षात् बैसे मेसात समुद्र नहीं विर सकता, उसी प्रकार या पर्म मी कदापिरपि फर्महारक नहीं हो सकता ॥५॥ (१) बौदेशिक माहार विपपफ प्रथम द्वार करते हैं- पटकाया०' इति । प्रपिषी मादि पट्काय फ बीयों को निर्दपठापूर्वक सम मदित करके मनियों के निमिच मो माहार बनाया गया है, मिस बाहार का पात्र में मारंवार निपेप किया गया है, जो माहार निसनता-निर्दयता का पूषक है, बिस भाहार को सीरवादिने गोमांसतुस्प कहा है, बिमको साकर नि नरकगामी होता है। भमणसर मादि के निमिच पनाये गये पसे प्रापार्मिक आहार को कौन दयाल मुनि प्राण करने की इच्छा करेगा ! मर्याद कोई नहीं ॥ ६ ॥ (२) मा मिनगृहनिपास विपया इसरा हार करते है- गायत्' इति-गन्धगापक) मा गीत गा रहे हैं, पेम्पा यहां नाच ही, गर्जा पाठी की पनि मुसरित हो रही है, महा मृत मनि गूग रही है महा पुष्पमाताएं सासहा रही है, कस्तूरी की समय से वहां देवमान सरमित होता है, वहां पर मरीदार चंदोषा घमघम चमक रहा है, या मा सुन्दर बसाम्पमों से मुसहित भापक-भाविकाओं के समुदाय र यहाँ वाने-बाने का वाता (परम्परा) लमा हुमा है, जो कि मात्र मगमगगान मक्ति के लिये उपपक है। उन स्पो-मन्दिरों में देवद्रम्प का उपभोग, ताम्मत मधप, पपन, भासन मादि करने इस माशातनामों से स्रते हुए नैनसिदान्त क मर्मज्ञ पनि कमी मी निवास नहीं है। (३) परग्रहणास विषयक तीसरा द्वार करते है- साक्षा.' इति-मगवाम् तीबरोने तथा गनपरोंने महां सय निवास किया है, मौर सर सामों को भी वहाँ पर निवास करन की बाधा दी है, वो भेट मनियों के लिये निस्सता का प्रधान स्पान परगड( उपाभप ) है, उसका पम्पावर (सवितान द्वारा संसारमागर को पार करनेवासा भाबक ) मौर मनगार( जमार-पर . .
। - सहित ) इन दोनों का अर्थ माननपाठा कौन एसा पिठान होगा बो देप करेगा ? मन विद्वान् पुरुष कमी मी उसका देप नहीं करेगा ॥ ८ ॥ फिर मी फरते है- चित्रोत्सर्गाः' इति-इस दिन प्रपचन में नो निशीथएन नाम का छेदएर है पर वो मानो मोक्षनगरी का एक ही है। वह निश्शीपरत्र अनेक प्रकार के उस्सर्ग मौर अपपाइनय के प्रतिपादन से युफ है । उस निधीपत्र में ग्रहस्यों के पर में उतरने क बहुत से मेद कहे गये है। उसमें पहले सत्सर्गरूप स कहा गयाहै फिर भपवाद से सी, पर, पमक मादि के संसर्ग से युक्त पमति में साधु को नहीं उतरना चाहिये, इस प्रकार सेकसकर उसका अपवाद भी किया है फि-साधुलोग ऐसी वसवी में मी यवना से रह सस्ते है। इसका निफ यही हुमा कि निश्चीयरप में सी पशुपमक आदि से पुक भषमा उससे रहिस, इन दोनों प्रकार क गृहस्थ फ परों में साधुओं का उतरना नियमतः प्रतिपादित है। पर सुमिनमन्दिर में उतरने क लिये की मी नहीं हा गया है ।॥९॥ (५-५-६ ) मप गास भौर चैत्य, इनका स्मीकार विषपक चतुर्ष, पबम तथा प इन तीन द्वारों को करते है- मनग्या०' इति-तीपरोंन पन स्वीकार करनेको प्रवन्पाका विरोधी कहा है। फिर में मेरे भावक है। इस प्रकार स सर्वारम्मी भावकों पर ममस्त रखना तो मस्पन्त सापप है। फिर यदि यह मिनालय मेरा है' म प्रकार मिनासप क प्रति साथ, ममता रखे तो फिर उसमें अस्पन्त निन्दनीय मठपसिस्प-मठपारीपना-मा माता है। इस लिये सक्ति के अमिलापी साधुओं को चाहिये कि ये मर्थ भावक और मिनासप, इन समों पर प्रनन्या को दूपित करनपाली ममता कमी मी न करें ॥१०॥ (७) अप्रमार्षित मासन विपपक सासमा द्वार काते है- 'भवति.' इति-गरी पर बैठन स असयम अवश्यम्भाषी है, क्यों कि उसकी प्रविलेसना नहीं हो सकती । तथा गद्दी पर बैठन स विपा-मामा होती है और माधुओं के लिये निम्मा का शान में निपेप किया गया है। गदी पर पैठना पर एक रामषिदर मता मापुत्रों क लिय म्यान्य है। गहरी पर बैठन से लोग मापुमों प उपहाम फरत है कि-'अरे ! ना ऐम या सण्डित हार भी गरी पर पैठना है।' इस प्रकार सोगों में निन्दा मी जाती है। और इसमें परिग्रह दोष मो पर है। गरी पर बैठनस मापु श्री सुमभागरूप तीन प्रमिसापा भी प्रकार होती है। इस लिये साघुषों को गद्दी पर कमी भी नहीं पैठना चाहिये । इसी प्रकार मरक सिंहासन-तक्रियेदार मासन-भादि पर मी नहीं पैठना पाहिये ॥११॥ (८) सावपापरित विपपक आठमा द्वार कहत है- ग्रही गहरिया प्रवाह में पडे हुए इन चैत्पपासियोंन इन बागे कही बानगाती मपुक वासे कैसी फैला रखी है। इस प्रकार काते हैं-भाषक आन अपन नियत किये हुए गच्छ के ही साधुओं को माने । मिनालय में साधुओं का अधिकार हो । गृहम लोग साधुओं को मशन पान सादिम स्वादिमरूप पतुर्विध माहार दि परि का विचार किप विना दीदें वो कोई दोप नहीं है। सपा भारफ लोग सुविदित साधुओं फ समीप शीलादि व्रत न लें, इस्मादि ॥ १२ ॥ (९) भुवपथ मबज्ञा विषयक नौना द्वार कहते हैं- 'निर्वाहा.' इति-ऐसा गुरु कि-जिम फ शील और वंश का इछ मी पता नहीं है, जो गुण से हीन है, जिसने सिर्फ अपना पेट मरन के लिये ही प्राम्पा सी है, पर गुरु हदरम्मरी-पेट्, गुणहीन, महातमीस पक्षपाले लोगों को सार्थक फारम मते है, उन मणिों की मसिद्ध गुण पप्रमाल भाषक मी गप्छरूपी महामा म गृहीत होकर देवता से मी परमार उनकी (स्यबासियो की) पूमा करते हैं, पर एक मोहनीय फर्मोदय का प्रमाण है॥ १३ ॥ फिर मी- 'दुष्मापा०' इति-गुरुफर्मी (मारेकर्मी) लोगों को प्रपम तो सहर्मबुद्धि होना ही कठिन है। यदि पश्चित् सद्धर्मबुद्धि हुई मी सोनम गुरु का मिसना दुर्लम है। यदि पूर्मपुण्य के प्रभाव में एसे गुरु भी मिल गये तो मी य भाषकलोग गम्छ स्थितिक पधीमत हो भपनी आत्मा का हित नहीं कर सकते। अर! अब ऐसी स्थिति है सब हम अपनी मानसिक बदना किम फ आगे प्रगट करें ! फिम की धरण में मा १ किम की आराधना करें । मरे ! छ भी नहीं समता किस्पा करें क्या न करें । ॥ १५ ॥ फिर मी- सुरक्षामा' इसि-मुम्न फ मारे मिमका बी मा रहा था ऐमा कोई दखि फ पालकन वैराग्य क न रान हुए मी किसी जिनामप में प्रव्रज्या लसी | फिर पलाम स उमन किसी पुरुष को अपन पत्र में धन-प्रपत्र दाग पर लिया। गिर पा मापाप पन बैठा। यह प्रस्यन्त प्रापर्य है कि-एस मापु का आपापडी मिल - " गई। बा आपार्यपद प्राप्त कर लिया तब यह गुणहीन साधु मिनालय को अपना पर समलसा है। मपन को इन्द्र मानता है। विद्वानों को मूर्ख मानता है मौर संमार को तुच्छ समझता है। वैल्पवासियों की या पात सर्वविदित है॥१५॥ फिर मी- 'धैर्जातो' इवि-मघमों में मी मपम, मनिपेपपारी ठग, इन भावकों को नापे हुए बैठ के समान इधर-उपर वहाँ पाई यहाँ नचाते हैं। ये भाषफ न उनक पुत्र है, न टन से पालिव है, न खरीदे हुए हैं, न उनके भणी है, न पहले कमी भेंट हुई थी, न ये उनके मित्र , न इन ठगों ने पाले फमी रुपये-पैसों से उन को सन्तुष्ट किया है। भरे ! सो मी देखो यह क्या विषिधिष्प है जो य भाषफ लोग इन ठगों क अधीन हो गये । भदो 1 इस अधापान का प्रतीकार कैसे? इस अनर्प का प्रयोकार नहीं हो रहा है। इससे यही बात होता है कि इस समय संसार में कोई शासक नहीं रहा, कि जिस आगे जाकर पुकार की चाय ॥ १६ ॥ फिरमी- 'कि०' इति-मरे । पपा इन मूर्ख लोगों को दिग्नम( बेसमझी ) हो गया है। पाप से मोर पोर हो गये हैं। क्या इन लोगों को योग मन्त्रादि प्रयोग) और धूप( शिरपर राछन की सरकी ) द्वारा पक्ष में कर लिपा है !, पा इनका माग्य सागर हो गया है। अपया पूर्वान इनें ठगलिया है क्या? या ये लोग प्रा गृहीत( पागल ) तो नहीं हो गये है। मो कि प्रचुर दोपों को देखते हुए भी घे छोग मिनागम के शिरपर पैर रखकर मार्ग पर परे हुए है, उस परसे हटने का नाम ही नहीं खेले । मरे ! इसना ही नहीं मो लोग इपथ को र फरने का प्रपरन फरते है वो उनसे म मूर्स लोग दे मी करत है, महो! या कैमा भयहर पतन है। ॥१०॥ फिरमी- 'इष्टापाप्ति:'--मविधिपूर्वक अर्थात् रात्रि में मूर्ख ठगेको शारा विहित तीर्थस्नात्र, पापरूपी पर मैं अवश्यमेव जाता है। क्योंकि अब रात्रि में सीर्यहरस्नान फिपा पाताह उस समप इकए मनसमुदाप भपात् स्त्री पुरुषों क स में पहुवसः एसी सियों जाती है सो विटों की मान वेश्यापतियों की, नटों की अर्थात् नाट करने वालों की, मटों की भर्पाइ सस्ता गुणों की अर्थात् दासों को प्रिय उपनापिका होती है, इस लिपे य विट नर प्रादि मी रात्रि में तीसरस्नात्र में एकत्रित होता है। समी नर-नारियो एप में संगम की अमिखापा लिप हुए हनी है । तया में लोग- राग, रेप, मामा-मर क गुगो क प्रति भमहिष्णुता, तपा ईर्पा प्रपा अपनी . , " प्रियतमा को दूसरे पुरुष से पाते करत देसफर झोप फरना, इन सबों से मरे हुए एने है। रात्रि में किये गये तीर्थरस्नात्र में तो ऐसे सी-पुरुप एकत्रित होते है बिससे मिनालय में असमञ्जस प्रचि होती है इस सिप रात्रि में वीर्यवर स्नात्र सर्वमा पनीर है॥ १८॥ फिर मी- 'जिममत०' इसि-मिनोक मत से विरुन प्रकार से किया गया वर्षाद मविधिपूर्वक किया गया नात्र ही फेवल भहित के लिये होता है, इवनाही मत समझो किन्तु जिनमत विरुद्ध विधि से किये गये तप-अनशन प्रादि, चारित्र-देशविरति और सर्पविरति, दान-ममपदान आदि, वपा विनय पेयास्प मादि मी मुक्तिरूप फलक दायक नहीं होते हैं। क्यों कि जिनामा मी यदि अपिपिपूर्वक की बाती है वो यह मसुम फल देनेपाली होती है, और यदि विषिर्मक की जाती है तो बम फल देनवाली होती है। फिर इन पैस्यवासियोंने यो विधि क्रिया का गेम फैला रखा है उससे क्या अनन्तससार की प्राप्ति नहीं रोगी होगी ही ॥ १९॥ फिर मी- 'जिनगह ' इति-विधिपूर्वक-अर्याद घाखोफ प्रकारसे किये गये गिन मपन, प्रिनपिम्प-मगपान की प्रतिमा, मिनबन, बिनयावा अर्थात् अष्टाहिकादि महोत्मन, मिनप्रतिष्ठा, सपा दान-प्रमपदानादि, पप-अनशन भादि बारह प्रकार का सप, मत मादि अर्थात् स्पूल पानाविपातविरमण और ममित्रह मादि, गुरुमधि- पर्मापार्य की मक्ति और तपठन मर्पात् सिदान्त का साम्पाप तपा सिदान्त में भों का भषण आदि, ये मा भादरपूर्वक किप मान पर मी पदि इन में इमत, इगुरु, फदाग्रह-स्मित प्रामा, अनोप और देशना का अंश मात्र मी मिल नाप माय जिनमपन आदि गप अनन्त संसार के कारण हो बास हैं। मैसे उबम से उचम भोमन क्यों न हो? यदि उममें पोगमा भी विप मिल गया हो तो या मनिष्टकारी हो ही जाता है। २०॥ 'आक्रष्टु' इति-मैसे मन्डीमार पहिश-पसी (मण्डी पकाने का कांटा) में मांस फ टुरेको सगाकर मछलियों को मार करते हैं उसी प्रकार से पूर्व स्प पासी लोग भगवान की प्रतिमा दिखलायर प्रयास मापक योगों को मार करते है। भगवान के नाम पर भपनी इए सिदि के लिये य सनर १ अन्वर्ग और मठ, उन भापो सपनाते है । सत्य हो कास उनका अपन स्वार्थ पर है, परन्तु ममाम के नाम पर भारकों को ठगकर उनस प प पनाम है । क्या-पात्रा मात्र प्रान् पर्पयों क गोश्य से मिनासय में यात्रा और जिनमात्र मादिक उपायों से और वमसितक-मर्षात् भार उपद्रव की निधि के लिये दिनमगवान के उपश्य से 'इतना दम्य देवा । इस प्रकार के नियम कराने क, रात्रिमागरण और पान्तिक पौष्टिक भारि कर्म के छल (पाहना ) से नाम मात्र के अन इन पर्च पैस्यमासी लोगों के शरा पे भदाउ मोलेमाले श्रावक मृतलगे के समान ठगे जा रहे हैं, या अस्पन्त खेद की पात है। इस विपपमें समझने की पात इतनी है कि ये समी इन लोगों के मारा विधिपूर्वक कराये पाते है इस लिये इन सब का प्रसिपेप किया गया है, विधिपूर्वक तो इन की फर्मण्यता इष्ट की है। इन की कर्मभ्यता का स्थापन पूर्वोक्त सातये और पीस काम्य में किया गया है ॥ २१ ॥ 'सर्वत्रा०-ति-घिनके मानब अर्थात् पापागमन के द्वार खुले हुए हैं, मिनकी भोत्रादि पापों इन्द्रियाँ भपने विपयों में भामक है, गौरस अर्पास् यादि रस घाता, इन तीन गौरव से चम-ौद्र मनोदणरूपी सूफानी पोरा मिनका उछल रहा है, पापल्ली सर्प बिनके का है, जो समी प्रचार क अस्प कर्म करने में सर्वदा तत्पर रहते हैं, मो सभी प्रकार के मकस्य कर्म करने में सर्वदा वस्पर रहते है-जो मन्स्प-अन्तिम अर्थात् दनां मापर्य-भसंपतिपों की पूषारूप बो कि सा-दशों मामों का रामा है उसके आभित रोकर रावत पुशिवाले ये हीनापारी लोग भेष्ठ- सदाचारी पनियों के मस्तक पर खड़े हो कर खुश हो रहे है, एष ममात्र में प्रतिष्ठा मी पा रहेरे, प्रार!!! पर कैसा मन हो रहा है। ॥ २२ ॥ 'सरिम्म.'--समी प्रकार के साथप म्यापार-पनपान्यादि संग्रह-तत्पर परस्य लोग मी पदि पर्व भादि दिनों में एकासन विगयरहित मोमन बादि का मस्यास्यान-नियम सकर उनक पातन में पशित् भूल फर पेठते है लोप भी मत्यन्त मनुताप-पछवावा-करते है कि-'मत कर्ममागी का प्रस्पारपान मप हो गया' परन्तु ये हीनापारी लोग छ पार-तीन बार मामा क प्रतिक्रमण में और तीन बार प्रावासाठफ प्रतिक्रमण में, इस प्रकार पार-'प्रिविष-मन वपन काया के तीन योगों से, निपा-करण १, कारण २, अनुमोदन ३, इन तीन कारणों से प्रत्या सपान करता है' इस प्रकार प्रतिदिन दोनों समय मह स मोलकर मी स्वपमा उमका समन भास है । एसे हीनापारी सोग पपा कमी तपस्ती, मानी या प्रती हो सकते कमी मी नही। इनमें सप पान और प्रब का होना तो अपमान वेमा दो मममना पाहिये ।। २३ ॥
८ . 'देषार्प०' इति-देवोदश्पक धन-देवगष्प-से अपनी रुषि के मनुस्म एम समी ऋतुओं में सुखप्रद एस मठ पनवाकर उस मठ में सर्वदा रहनेगाले ने हीना धारी लोग खूप सन्छ कोमल ह स मरे हुए सुन्दर पिछौमे पर सोते हैं। इसी प्रकार के गरी मादि मापनों एवं महरियो-फिदार आसनों पर बैठते हैं। ये वर्षा आरम्म, परिग्रह और भोमादि पषिों इन्द्रियों क विषयों से युक, या वर्मा और द्रम्पादि फी भाकाहा से मर्षदा पान्दोलित लयमासे होकर रहा करते हैं। ऐसे येत पनपारी, साधु के पेप में छिपे हुए लम्पट ये हीनाचारी लोग महावों को भी लामिछत कर दिये है। इनके द्वारा साधुमार्ग कसहित दो पुत्र है ।। २४ ॥ इत्या०' इति-परतीधिक लोग इन होनापारियों की सामापारी को देखकर 'ये लोग साधुवेपमें छिपे हुए लम्पट 'म प्रकार समी मैनानियों के विपक्ष में मे उपहास करते हैं। और इन हीनापारियों की लीला सुनकर भुतमार्म के मामिल हुए लोग मी इस स पिमुल हो जाते है। इन दोनापारियों की मिध्यापरूपमा के कारण सम्पररटि सोग मी सन्देहयुफ होन लगते है। इस सिये या निमिठ हुआ फि-ये दीनापारी पैरमपासी लोग मिनप्ररूपित सिद्धान्त से सपा विध भाषण फरनेवाले ॥२५॥ 'सर्व' इति-त्पवासियों द्वारा विहित मार्ग को सेपन करनवाले, इसी मार्ग को मिनमार्ग कानेवाले, सपा अपनी दुरास्मता से मिनमार्ग का उपोरन फरमेपाल लोगों के मन को, संसार के समस्त सपोपाती अस्पुत्फट कासष्ट दिनों के समान, संसार के समस्स पापोन, समी रिर्पले सर्पोन और समस्त फट, माधि-मान सिकम्पपा, म्याधि-रोग क्या हुए प्रहोने निषय ही म मना हाता है ।। २५ ॥ इस कारण स-पहा कारण कहते हैं- धर्मेद.' इवि-इन हीनावारी रपवासियों के पुलिरूपी नेत्र गो फमी मी नहीं दूर होमकते ऐसे फदामहरूपी अस्पना गार म सकार-पुञ्ज से पाच्छादित है। रेबापमासी लोग सिद्धान्त फश है। निरन्तर महामोपनीय फर्म के उपान करते गने के कारण ये महाअमिमानी है। य सप तो नए हो ही पूफ है और दूसरों को मी विनाश करनमें मपदा उपत है। ऐस ओ ये मिथ्यापारपाले घरपवासी लोगो इन फ पपन पर कोई विद्वान् मनुप्प कैस पान दगा ! अपात् इन फगानों को से मानगा सिदान् मनुप्प एस लोगों क पपन को सुन ही नहीं सका इस लिये। शिष्य ! मम मी इन क पपनों में कमी नहीं सुनना ॥ २० ॥ क्यों कि- । 'पस्किषिः' इति-शो एकदम अमरय है, जैसे कि भेगिक रामा का रखोहरण को भन्दन करना आदि, सपा सो मत्पन्त मनुचित है, जैसे पिता मादि के उदेश्य स यात्रा आदि करना, भषया बिनालयमें लटकीरा ( रासलीला ) करना मादि, और बो लौकिक तपा लोकोपर दोनों से पाप है, जैसे-एतकपाले पर से मिषा लेना, रजस्वलाका जिनेन्द्रपूवन, दीनमातियों को परमेष्ठि मन्त्र पड़ाना, उन को दीपा दना और उनस विनन्द्र की प्रतिमा कराना, तथा मो मम्प प्राणियों के लिये संसार का कारन है, वैसे-बिनमन्दिरमें बलमीरा आदि, एष मो शाखामासे विरुद्ध है, बेस भाषाकर्मिक मोसन मादि, अपना अधिक भावण हो बाप तो अस्सी २ दिन पर्पपमपर्व करना आदि, इन समोंको ये मूर्स पुदि पैत्यबासी लोग धर्म फहते १और पे मूर्ख लोग इनको सीपमें चांदी के समान प्रमसे जिनमतानुसार समझकर सप इनका स्वीकार मी परते। मर ! देखो या दुरन्स-परिणाममें अश्विकर इस असंयतपूनारूप दशम मापये की कैसी करसूत है । ॥ २८ ॥ फष्ट' वि~या अस्पन्त खेद की बात है कि-अन्मसे ही अन्मा और पैदेशिक (पहां का नहीं बनेपाला ) बोनस मार्ग को भच्छी तरह नहीं चाननवाला मनुम्प मपनी गर्दन उठाकर दिया भूल हुए अपों को मामयर भरण्यमें उनके पन्तम्प नगर का मार्ग दिखला रहा है (१)। इससे मी अपिक खेद की पात पाहै कि-निनकी आँखें अच्छी है, जो सुनर एस पिम रहित मार्ग को मानसे है उनको भी वह पैदशिक अमाप मनुष्य मार्ग दिसलान का साहस करवा है (२)। सीसरी सेद की बात सपस मधिक यह कि-मप वे मार्ग नेत्रमान् मनुष्य इस रेमिक बन्माप की बात नही मानते हैं तो पर उनकी इस प्रकार सी करता है बेस किसी मूर्स की इसी की माती है ॥ २९ ॥ सेपा' इति-विममें समय-समय अर्थात् प्रतिसमप मम्प मानो का दास हो रहा है एमा हुण संम्पानबासा अपमर्पिणी फाल इस समप विधमान है (१)। दोहमार बर्ष सक एक रामि पर किनवाला मम्मराटि नामक बीमा कर प्रर का मपिफार है (२) भौर वीमा मसंपति मारूप यह प्ररपध दशमा मार्य वेगस मपना प्रभाव प्रमा गा है(३)। यहीन और नीचा दुप्पमाकाठ (४)। ये पारों बिनसिद्धान्त को धत-विषत करन के लिय पर्याप्त पटपरिफर है। य पारों पा इस समप प्रतिपस-निरन्तर सूप परिपुष्ट रो रहर, ऐस ममप में मोरकर पिशुद बेन मार्ग भस्पन्त दुसम हो गया है। बस एक अट के रन पर मी मापुदि नहीं होती है तो परिपुए परापरी के चार अनुमों को सिपमानता में बैनमार्ग की पति से होसफती है।॥३०॥ (१०) जप गुणिपधी नामका दशा द्वार कहत है- सम्यग् 'इवि-बो सम्यगमार्ग अर्थात् मिपुर मार्ग के पोको, सात ही मिनफा प्रक्षम मात्र को प्रकट करता है, जिनके नत्रों में पदकाय बीलों के प्रति करुणा का मान उमर रहा है, जो विशुद्ध पारिप क धारापक है, मिनोंने भार को मार भगाया है, रखे हुए पासों के रेर को जिवनी सरलतासे बसाकर रास कर दी बाती है उसी प्रकार विनोंने फामको बलाकर राख कर गला रे, बो सरा सिद्धान्तरूपी राममार्ग पर चलते हैं, उन्मार्ग पर भी नहीं, समाबो उपचम मापसे पुक, एव विकी सजन लोग जिनका सर्वदा प्रादर-सम्मान किया करते हैं पसे विद्वान् सस्साधुओं से भी दोरों के मणार तील समाषपाले (बस्पन्त कोपी) महापाठ ये स्पपासी सोग रेप किया करते है ॥२१॥ मप उनके मिष्याम वर्णन करते है- 'देवीय.' इति-मिप्यावरूप प्रासे प्रहिल (उभच) ममुष्प इस असमें दोपों के भण्डार को देव मानवे हैं, जिनोंने परे ९ दोनों को नर पर रासाहे मात् पीतराग देव । उनको देवरूपमें स्वीकार नहीं करते हैं। महामुर्सरामों को सपना मानस है और तत्वों को यस मानते हैं। बेनमार्ग को मार्ग प्रते। और मार्गको सन्मार्ग फाते है । तथा दुर्गुणों के विरोमणि होते हुए भी अपने को गुणवान् काते है पासप कितने बापर्य की पात है ॥ ३२ ॥ सर' इति-इन हीन आचारपाले स्पमासियों को देने के लिए पनागे भये स्परूप ष्ट बर्षात् बासमें मो फसे हुए हैं, इसी हेतु मो अन्तारण से छटपटा हे, परन्त इन पैस्पवासियों की मुद्रा मर्यात् 'हमारे पैस्य को छोड़कर मम्पत्र मत भागो' ऐसी रागाहा(मत )प गपन से रपे हुए दोन के कारण मो भरा भी हिल-रु नहीं सकते हैं । एफिक सिपे सो वान शीस तप आदि करते है, परन्त इन होनापारियों के इस की परम्परामें पड़े हुए हैं। ऐस गो ये दपनीप मध्य प्राणीरूप हरियों फ एण, उनका हीनाचारियों के सारूपी प्यार से छुटकारा कहा ! मर्यात् मैसे हरिकसमा मा पामप्रम-पाप्रपरम्परा, मामाता है। तब उसका इटकारा मसम्मा हो जाता है। उसी प्रकार इन हीनाचारियों के म पाप्रफ झम (फन्दै) में पो हुए मम्पप्रापीरूप इरिगोंका छटकारा कहा ? अर्थात् उनका मुकिममन के से हो सकता है। ॥ ३३ ।। इस्प' इवि-इस पूर्वोक प्रफारसे नो मैने मिथ्या पय के विपयमें बिलकुल सस्प पात कही है, इसे कोई एमा न समझे कि-'इनों ने परदोपोद्वारनरूप बनुषित पर्य किया है। अपना-इन रागोपात्मक गाय से क्या लाम ?' इस प्रकार मेरे ऊपर कोई समन मोप मी न करें। क्योंकि मैन-न होनापारी स्पवासियों द्वारा प्रकसित नमार्म क भ्रमसे कुमार्गमै परे हुए लोगों को दसकर उनकी प्रान्ति को करने के लिये है भर्षात् इन 'पिचारों का पा रोगा? इस उद्देश्य से ही करुम मापसे माकान्त हो यह सब कहा है, और इसकी अपरूपमें रचना मी की है। इसमें राग, मपा पेभुन्य कारण नहीं है ॥ ३४ ॥ इसमें कारण प्रते है- 'मोमूते' इसि-बो कोई मजन करुणा क पन हो लोगोंमें फारसे हुए हाथ को र हटाने की इच्छा से हीनापारी इन चैत्पवासियों द्वारा प्ररूपित दुष्ट मार्ग फ- बोपा मार्ग मनन्त काल से उबुत हुमा है मर्थात् यो पहल अनन्त कालमें कमी नहीं था, तपा यह पाप का स्थान है, नाममात्र के बेपस बो बिनमार्गकी प्रान्ति को उपम करसा है, परतुवा पा भिनमार्ग का पातक है, एमा जो पा हुए मार्ग है उसके-दोपों की संख्याको कोई ना का तो मानो पा समाफ बलको मापना पा दवा है, अपपा पग से समस्त आमाश फो लोपना चाहता है, मर्याद असे समद के बस का मापना, पग से याफाश सापना कठिन है इसी प्रकार इस मार्ग क दोपों का प्रमा भी कठिन है भाई इस मार्गमें इसन असफ्प दोप है कि बिनकी पत्चा (इरान दोपए सी संस्पा) रोमही सकसी ॥३५ ।। मा सरमाधुनों का वर्णन करते है- न सावधा' पसि-शो सापप भाम्नायपास नहीं है, अर्थात् भाषाकर्मिफ माहारादि का प्राग करना मिनका परम्परामें नहीं है, अपान मो स्पबासी नहीं है, सपा को मान और हुसीलों की किपास रहित है अर्थात पास और फुलीलों की क्रिपा का भावरण नहीं करनाल है। मद ममता और प्राचीविका फ मपस भो रक्षित है। सोश अर्थात् रौद्र मम्पयमाप सिरे नहीं होता है, जो कदापदी मात सीरी। पटी अर्थात् मापारी मी नहीं है। सपा मो पत्रो-सिदान्तों में रुपि . . .
रसनेपाले है पसे मुनि लोग तो प्रात्र मी इस बगवमें सरसाधु कासापेंगे ही वर्षाद एसे मुनि को रिवेकी मन सस्साघु फोगे ही ॥ प्रमझ से यहां पात्र प्रादिकी पाल्मा की भावी है- पाच प्रकार के निर्घन्ध हाये है-पाश १, इनीस २, पुलाक , निर्गन्ध, और स्नातक ५। इनमें पास दो प्रकार के होता है (१) उपकरणास और (२) देहपाश । उपकरणपश घे कालाते है मो वर्षमे पिना आवश्यकता के मी कमी कमी पवादिको पोते हैं, समविका रेष्ठमी पक्षों को ग्रहण करने की इच्छा रखते है एवं फमी परिनत भी है, पात्र दण्णा मादि को पी तेल माक्लन बादिसे चमकदार बनाते हैं, अधिक उपफरमो की मी पाचना करते हैं (१)। पासवे होते बो विना कारण ही हाथ पैर नस माविको मिपित-मुसोमित करते राते है (२), दोनों प्रकार के ये पट विपादि परिवार आदि विभूतिको तथा सप और पामित्प मादिसे नस्पम हुए पक्षको चाहते हैं और मानन्द मनाते हैं, या सेनयोग्य बहुव मतिषारों से उपलित करिव मर्षात् मलिन होते हुए भी कर्म धपके लिए उपत रात है, इत्यादि लक्षणवाले होते है॥१॥ इपीस मी दो प्रकार के होते है-आसेबनाइटीस और जापापील । यो ज्ञान, वर्षन, चारित्र भोर तप का विभिन्माष भाराधन करते है वे वासेपनाइपीस है। और मोमोपादिक माों क वष्ठ होकर पानादि गुगों की पिरापना करते हैं और मूसोचर गुणों क विपायक होते है वे कापहीत ॥ २॥ इन पांचो का विस्वत समरूप भीमगवतीख आदि से बान सरें। पहा शहा होती है किया ये पिपिस मियापाले है, केसों का सोचन करके ची से केश काटते हैं, मन्दर-सुन्दर उपकरण रखते है वौर मूल गुण उधर गुपके पिथपको लो फिर ये 'निर्जन्य' आम्दसे कैसे को मावे है। इनका स्वरूप किस प्रका रसे है, इसका समाधान पा है फि-नकी पूर्वोक क्रियाएँ प्रवाह पसे (हमेशा- सर्मदा) नहीं-कमी कमी विक्षेप फारम को लेकर पापनादि क्रिया करते है, और सूतोचर गुणों की पिराधना मानसिक विराधनाने लेकर है अर्थात् मनसे कभी विरा पना पेठले हैं, पर पहा सारांश है, किन्तु इनके सदा इन हियामों से पता नहीं है, इस लिये इनको 'निग्रन्य' पम्दसे कहा है ।। १६ ।। । मग सरसाधुनों का वर्णन करते हैं- 'सपिग्ना.' इति-जो मोष क ममिलापी है, सर्पदा लोगों को धर्मोपदेश देते हसे है, मागम फ रास्प को जानते है, द्रव्य क्षेत्र काल मौर माप को देखकर किया करते है, शर मार्ग-मर्पात् बिनमार्ग को प्रकट करने में सर्वदा सावधान रावे है, सपा विनोंने मिथ्याप्रथादों को दूर करदिये है, एवं यो नियम-अमिना, उपशम, दम-न्त्रिपवियप, बौविस्प-योग्यता, गाम्भीर्य, प, स्पैर्य, औदार्य, आर्यचर्या- समुपोषित प्रापि, विनय-प्रम्पुस्पानादि, न्याय, दया, धर्मझिया, इन में आठस्या माव-उपतपना और सरलता आदि गुणों से पवित्र हैं, एसे खो मिनधासन क सस्साघु है तो सर्वदा पन्दनीय है ।। ३७ ॥ भर प्रयकार मिन भगवान को बन्दन करते हुए पफस्पापनासे सनामगर्मित काम्प का है- पिघ्राजिष्णु०' इति-मपन अतिशयो से सोमायमान, मआशर एन कामसे सर्पदा सरित, सिदान्त की माता के महान का निपेप फरनेवाले, फालयानद्वारा मोकासोक के प्रकाशक होने से पर्पसमान, भेष्ठ शरीर की फान्तिरूप पन्द्रिका के द्वारा पन्द्रमा के समान पीसल कान्तिपाले, असुर नर मौर इन्द्र से प्रशसित, पापको नष्ट करनपाले, दम्म-(पट-मापा ) के लिये अनुसमान, विद्वानों को अपनी सुन्दर वाणीद्वारा स्यावाद के मानन्दसे आनन्दित फरनेवाले, ऐसे मो दिन भगवान हैं सनको में पन्दन करता है, पर माम्य काम्पहै। प्रपकारने इसमें "जिनपाष्टमेन गणिनेव चके" (बिनमछमगपिने इस को बनाया है) इस वाक्य को अपनी सम्परचना पातरी फे प्रमापसे काम्यान्तर्गमित कर दिया है ॥ २८॥ 'जिमपत्ति-ति-विषयसोछप, साधुवेपधारी और भस्मप्रारूप, म्लेषा रामक सैन्पसमान यो पे पैस्पवासी लोग है, इन अस्पवासियों से इस पशम कास (बारा) के कारण मिनेटमा मतरूप दुर्ग(फिका) मानान्त हो गया है भर्षात् मस्मक प्रह के सेन्परूप इन चैत्यवासियोन बिनेन्द्र मवरूप दुर्ग पर आक्रमण कर लिया है, इसी छिय इस समप पे लोग अपने वशमी भावकों के लिये हमको छोरकर “मन्यत्र भी नहीं बाना" इस प्रकारकी पाठा समान मपने मग्छ की मर्यादा को स्वार्थ सिद्धि मात् अपना पेट मरनेके लिये विस्तारित येि हुए है ।। ३९ ॥ 'सम्पत्प०'-इति-इस समप-इस पत्रम मारा में हीनापारी क्षेत्पवासियों के इमामा परीर मप्रतिम मर्यास् भनुपम समाती होगा है, मस्मग्रारूप म्लेच्छ . चक्रपन्य राम के सम्प दिनानुदिन परते ही ना रहे है । दुष्ट मसंपतियों की पूजारूप दशम बापर्व प्रतिदिन अधिक से अधिक रूप में पलिष्ठ हो रा है, मोहनीय-फर्मरूपी रामा के पूर्वोक्त सैन्य पारों और फेसकर अपना अधिकार ममा पेठे है। एसे समयमें यदि हमारे सबसे 'सदागम-शुदमार्ग बह भम्र मी निकल आवारे तो मोहनीय कर्मस्पी राजा की बाबा में सदा तत्पर गनेमाले मायकर के सोग हमारी फदर्थना-हाठात- करगलते है॥ या ससार नगर है, मोहनीय कर्म इसका रामा है, इसा इस रागा का सैन्य , मस्मग्रा महा-सामन्त-महामन्त्री है, और दुए बसपतियों की पूजारूप दशम मापर्य उसका दूसरा सामन्त है ॥ ४० ॥ ॥ इति भीजिनवछमसूरिविरचित सहापटक का हिन्दी भाषानुवाद सम्पूर्ण ॥ भी जिनदधसूरि ज्ञानभरार के प्रकाशन । पपपरसाशतक। पदस्थानप्रकरणम्। (अंतर्गतमकरणम्)। पम्पशासिमपरिणम् । अपविणभणपति। पम्पपरित्रम्। दिवाखीपस्पः। सामावारीपतकम् । प्रमोत्तरसार्यशतकम् । कम्पसब-कम्पमताम्पापा। विशेषशतका। मारुतम्पाकरवा संपादोगापमोति। विधिमार्गमपा। पमिगिकरणम् । सप्तस्मरपटीका। चैत्यदनापतिप्रति पापासानी। भनुयोगशारसममूर्ख। मणिमुखमुनिवरिषम् । कम्पनुमारिकामापातरम् । गणपरसार्पराकम्माधिः। संबेगरंगशाला। कम्पनुमकशिकारीका। भीपायपरिष मास-मापतिर। पुष्पसारकथामकम्। मापशपर्वम्पादयाममापा। पर्षदि प्रापप्रयी। जीवविधारादि प्रकरणमापा। प्रेम पातुमतिमा सप। स्पायर्मरिरस्तोत्रटीका। मापीन पी पप संग्रह। भकामरस्तोगरीका। बीशस्थान तप विधि। मावशकुमाविबरणम्। रणसिघ बरियम् ।
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