Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer
Kabir Sahab Ki Shabdavali
Front matter
॥ निवेदन ॥ संतवानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जक्त-प्रसिद्ध महात्माओं की बानी व उपदेश को जिन का लोप होता जाता है वचा लेने का है। अब तक जितनी बानियाँ हमने छापी हैं उन में से विशेष तो पहिले छपी ही नहीं थीं और कोई २ जो छपी थी तो ऐसे छिन्न भिन्न, बेजोड़ और अशुद्ध रूप में कि उन से पूरा लाभ नही उठ सकता था। हमने देश. देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ ऐसे हस्त- लिखित दुर्लभ ग्रंथ या फुटकर शब्द जहाँ तक पिछले पांच बरस के उद्योग से हो सका असल या नकल कराके मँगवाये और यह कार्रवाई वरा- बर जारी है। जहाँ तक हो सकता है सर्व साधारन के उपकारक शब्द चुन- कर कई लिपियों का मुकाबला करके ठीक रोति से शोध कर संग्रह किये जाते हैं, ऐसा नहीं होता कि औरों के छापे हुए ग्रंथों की भांति बेसमझे और बेजाचे छाप दिये जाय । लिपि के शोधने में प्रायः उन्हीं अथकार महात्मा के पंथ के जानकार भनुयायी से सहायता ली जाती है और शब्दों के चुनने में यह भी ध्यान रक्खा जाता है कि वह सर्व साधारन की रूचि के अनुसार और ऐसे मनोहर और हृदय-वेवक हों जिन से आँख हटाने का जी न चाहे और अंतःकरन शुद्ध हो । कई बरस से यह पुस्तक-माला छप रही है और जो जो कमरें जान पड़ती हैं वह आगे के लिये दूर की जाती हैं। कठिन और अनूठे शब्दों के अर्थ और संकेत नोट में दे दिये जाते हैं । जिन महात्मा की बानी है उन का जीवन-चरित्र भी साथ ही बापा जाता है। परंतु इस सब जतन पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हमारी पुस्तकें निर्दोष हैं अर्थात उन में प्रशुद्धता और क्षेपक नाम-मात्र नहीं हैं। पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के जो दोप उन की दृष्टि में भावें उन्हें हमको कृपा करके लिख भेजें जिस में
२
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कबीर साहब का धावली में पांही भानग
एडिशन प्रेमी और रक्तजन नाम्ने पंग अगले
नीचे लिखी हुई बानों पर उनकी नजद दिलाई
जाती है--
१-कई पद जो क्षेपक या दुवाग कुछ बदले हुए नाच
में छप गये थे उन्हें निकाल कर उन की जगह नीर
साहब के जंचे हुए दृनरे पर रख दिये गये और उन
के सिवाय और भी कितने ही नरें अनि मगर र
रोचक पद बढ़ा दिये गये है।
२-बहुतेरे पदों में ट्रनरी निपिगं काय
कड़ियाँ बढ़ाई या बदली गई धार
की गई है।
३-जीवन-चरित्र में यान या और ":
लिखी गई है।
४-गृढ़ शब्दों के अर्थ और नि:: :
और लोगों के नाम वि.सी पदमा ? ::
कथा संक्षेप के साथ उस पद के. नीने
दी गई है।
५-ऊपर लिखे हुए कारनों से दूसरे मापन
छापे के १२० सप.हे की जगह रहे है और
इस लिये दाम ।।) के बदले ॥) कर दिया ग',
प्रोप्रेटर. रेनडियर
जूलाई १
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॥ सूचीपत्र ॥ अ ... A . अगम प्रस्थान गुम जान बिन ना ली। अधर आमन फिया अगम प्याना पिया। प्रधारी स्याल और अधर की जान। अपने घट दियना धाम रे । प्रय मे खघरदार रहा पाई। अभागा तुम ने नाम न गाना अमरपुर लेचलु हे सुजना । अरे इन दृहुन राह न पाई । अरे मन सरस सेतीवान । प्ररे मन समुझ के नादु गदनिगा। भवधू अच्छर हूं से न्यारा । अवधू प्रगल पर से शाद। अवधू अध पूप अंधियारा । अवधू निरंजन जाल पसारा । श्रवण बेगम देस हमारा। अवधू जम द है न्यारा । अयभू मूले यो पर लाद। अब माया तीन जाई । मोजागी गुरु पागे समुभि परेगा भाई । आटपहर मतथा गो। . 4 मेरा। , ३ सूची शटड़ो की पृष्ठ शब्द उ उटि पछिलहरा ३१ ... ऋ .. मतु फागुन नियरानी। ए r: मममेर कमार बगती रहे। २०६ ऐ ... ८५ ... नाएगा लो। दियानी दुनिया। ११२ क १०४ 99 . ८२ .. . २८ ४३ . 69 कान लान दरियाव के बीच मे। का नना दीदार महल मे प्यारा है। का नैना दीदार यह पिड मे न्यारा है । करम गति टार नाहि टरी । हरी जतन मखी माई मिन्नन की। को रे मन वा दिन की ततवीर । मा भर्म मंमार मय करतु है । बाद दावा करैया कोई और है। या देग दिवाना हुवा रे । सा मांग कुट थिर न रहाई । काया नगर मॅमार मत खेल हारी। वाहन मन यम कीन्हा। मजावेगा यिहिनी पिया बिन । ६ दिन रिजनन यताये जइयो । ... ३२ २४ ५२ ... ११४ १० ११ ...
कृषी मन काम सुनता है सोड प्रेम की पैन मुनाको रे । ཏ जानी। को जाने वात गये मन की। सो मित्र अधमन सोना । पौनो ठगदा नगरिया नूटल । .. " . खेल वरतंद का पिट मे देविया । खेल ले नेहरवा दिन धारि । रा गगन सी सोट निमाना। गगन सी गुफा तर गैस या मदिना । गगन घटा घारानी साधो । गगन गट गेव निगान गरे । गढ़ा निस्मान तह मुन्न ये. धीर । गुरु दयाल याय याि दाया। गुरु ने मेाहि दीनी अजय ज? गुरु बढे भूगी गार गुम हे गी। चिन दाता नहीं उग गागना । । गुग, मोहि पटिया जर पियाई । गुम से लगन एनिभाई। में सजीवर दई। गग स्टी घरो मारा परो । गग भी जयुन पार दो है। --- गुम . ९ यो बीच में ६ र शति पनि। ना. पिरमार गृती गमों की पृष्ठ --ताट जान बुधि तागे। १ -7। ११४ ३४ "ट माही। - फिर धारे नीं। •717 मान माना । -- , . . राग । १०२ १०२ ३० -- ... . १०९ . १९१ . . ७१ १३ .. 1211 आये। 1-12 सा पानीतिमा र माह के गभ दाज। इ. सतगुरु गगन अन्तु बगत। काम आया अमर वा देवा । काले न्दगी मा की चाट । जाग ग भेग मुरत मोहागिन । पानी में या जग की चतुराई । दिन की लगा गुल सा नाही। शि६ नाम ना है हिये । राि जादगे हम ज नी । हाद या विधि मन को लगावै । निका रोनिया यचाय के। जगी जन जागत रहो मेरे भाई । ५४ ह ४२ ... १९१ ३६ แ ... २७ नमानी योनी चदरिया। ७४ hu निदनी दगी र लेना। २२ मा दामा भन्द ड हर नाग और हामी मारे। इंडिया फंदाय धन चनु रे । - त तस्न बनाबाद शाम का जी। तन धर मुखिया कोई न देखा। तन मन धन बाजी लानी हो। तरस मंमार मे फरक फरक मदा । तोरघ ने मय पानी है। तुम जार र विधायो। तेरे गवने का दिन नगिनाना। ताहि मेरि नगन लगाये रे पारिवा। ना दरमन दीजे नाम सनेही । दरिया की लार दरियाव जी । चिाने मन भजन धिमा । दुलहिन अगिया पार न पाया । दुलहिनी गाव नगलबार । देख पावर मे अजय गिरामः । देव दीदार मरतान में है तो । देश पदम भी पक्षन । दो सूर पल साप सेसी। - : :: मानिन ने दा किया नागिन - साना । मापुरे मेरो मन टोप । नासा रा है . . .
सूगी शब्दों की y गद भजा मोई जीता जग में। र सुमिर पछितायगा। द माय मा अतर नाहीं । मेर में दाग लगाय आइ चुनरी । मेरा हम को नहि भाव। २० ४७ १२ प . १०६ ३४ पाप पुन्न CO मी मममेर संग्राम में पैसिये । पाटलिप गीन पियासी । के बीज दो। पाव और पलक की भारती कौन सी। पिगा मेरा जागे मै कैसे साई री । पिया उची २ टरिया तोरी देसन चली। पील प्याला हो मतवाला। ७६ .. ५२ फ मोटाप ऊँचा तरखर । ७५ व २६ ४५ यही नहि सावना या देम । यागी ना ना रे ना जा। भामा गम अगोचर कैमा । बम प्रावो हमारे गेह रे। दिन देने परनातिनाव दिन मनगुम नर न्दत भुलाना। शिन मगर नर नाम मुगाना । ना हुन रदी योरी मी । CC ... २१ मूवी जब्दों को 9 मन्द २ ३ " : " . न भक्ति मद कोर करे भना ना हरै। भत्ती मा नारन मीना२। भजु मन नान गिर रहि घोड़ी। भजो हो सतगुरु नान उरी । भाई कोई मतगुरु मंत कराये । भीजे चुनरिया प्रेम रेंग चूदन । भूला मन ममुझाये। स मन तुम नारक दुन्द चाये । मन तू क्यों भूला रे आई। गन फूला फूना पि.रे । मन बनिया बानि न लोई । मन मरल हुआ तय घयो बोले । मन लागो मेरो यार फकीरी २ । मन हलवाई हो। गएरम होय मो जाम साधो । माधि मतवाल ना बाल माटी करे। माहि मत्शन मन ई हो फेरना । मानत नहि मन मोग मापी । मानुप जनम सुधारो गयो । माया रहाटगनी एम ज्ञानी । माल जिरो न जमा दिया। मिलना पटिन से मिलनी । एसपा वा ३६ प में। བiའqi iཔིརའི ནཱf། F1 + .
मूनी शब्दों की . पृष्ठ 99 १० ... ... २ १० १११ ७२ शाद मामि नेनो बीत्र नबी है। 7 तेरा मनु पाँ कैने इक होउ रे। मेरे मारनाये आज सेलन फाग री । * जाने बूमों अपने पिया की बात री। तो आन पड़ी चोराके नगर । में अपने शाहब सग चली। मो को हाँ दृढ़ो बदे में तो तेरे पास में । मोनियाका रोरे देमवाँ । मा गरी मे परि गयो दाग पिया । गोरे जियरा बड़ा अंदेसया । रे नगि गये बान सुरगी हो । मोहि नाहि लागी कैसे छूट र रम गगन गुफा मे । रहना नहि दम बिराना है। रेन दिन मत यो सोवता देखता। ५८ Cam ७६ ... ल गरे कोड बिरना पद निरबान । ... .. ५३ वा घर ६३ की मुध कोइ न बतावै। वा दिन की कछु मुथ का मन मा । स मचियो हम भई यमुगमी । मनमुत्र सेन ले मैदाना । मनगम के मॅग क्यो न गई री। १० ६२ २१ र :: .:. . मनगुमशान भजमनन त । गतगुरु पारो चरन हिचारी। गतगुरु मेनका। मतगुरु मंगोरो नि । मनगुम हो नाराजनपिनाक घास मत उन तमाम । म्सुक नर मह बिगारी। म.म परफान मृर जगा माी। नहर बेगमपुरा गरम को ना की। राध का वन तो टिकट हा सनी । माधो एस मप मम माहीं । माधो एम आपु मय माही । माधो ऐमा धुध अधियारा । माधो को पद से आया। साधो जो जग उतरे पारा। माधो दुविधा पाई में प्राई । साधो देखो जग बौराना । माधो पानिपुन पासाई । मापी भाई जीवत पारो सासा । माधो यह तन ठाठ तरे या। माधी पतगुरु अलसला सापो नहद मापना की। जो बेष्ट जमाई । साधो रहर सान मो न्यारा । सपी परमाधि भली । i'i ། ”ཏུii fi;;དེ། " " साधी सध्द 1. - १ मूजी शब्दों की पृष्ठ (५ ६९ . २५ ... गद माधो हम घर कत सुजान । मार मञ्द गहि बाचिही मानौ इतवारा। मॉई आपकी सेव । माई के सँग सासुर आई। मॉः दरजी का कोई मरम न पावा । माई बिन दरद करेजे हाय । मिपाहो मन दूर खेलन मत जाव । मुरा सिध की सैर का स्वाद । मुगया पिजरवा छोरि करि भागा। मुनता नहो धुन की सबर । गुमिरन बिन गोता सावोगे । मूर को कोन सिसावता है। मूर परकास तह रैन कह पाइये। मूर संग्राम को देस भागे नहीं। माच मक अभिमानी। सतन जात न पूछो निरगुनियाँ । ५ १३ ४० ४३ ... २३ ३५ ४५ १ १०६ १०. २४ १९३ ... ह .. हम को सोढावे चदरिया चलती विरिया । हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को हाशियारी क्या। हमरी ननद निगोडिन जागे । हनारे को सेले ऐसी होरी । हमारे मन कप भजिहो गुर नाम । हिल मिलि मगल गाओ। ... हमा लोक हमारे ऐहो । हमा हग मिले मुस होई। २३ १६ १४ ३ २9 . 29 ... ३६ ज्ञ पान का गेद का मुन का इ3 कर । पान मममेर को बाध बागी चहै । E १०७ कवीर साहब का जीवन-चरित्र -- -- सं मारा कुटना नियननमा समाजमा विकिमी -मा. पुरुप के जीवन ममात मग का परवार परते है निवेमा दाउन्नीग:-. उन में विशेष गुण है और क्या नाम, करने और परमा का लाभ देने में निक::.--:- है । लेकिन गय में इन पलो माछो 25----- जिम में मार तिमर ठिाने का नाम - है तय गान मे होगनी जाग । सम्बन्ध में अपनी युति मे अनुसार मा भार बहु मो बाते यदा गा पन्ही फारनो से प्राचीन गाना: बायत उग के समय के नोगी .. जीवन-परित्र लिखना नि: Iri ! पाबीर मामा जी-1 नीं लिखा जा सकता पा ! लिस्त है। ऐगा जान पाता है कि पीर PEE: समय में वर्तमान समार त र होने लोदी ने पायीर मारय मरता नेपा:- सारा पीन मारक की पर "दु में भी दिया। "पाटी नागडी पर TF FREE: हो । *re ' ཏུ༌ - . . - । .
जीवन-चरिग । . मजे अनुमार विक्रम सम्बत १५१५ अर्यात सन १५१८ ईस्वी में पामीर माला देह त हुआ। मिकदर लोदी १५१२ ईस्वी मे मरा था उस से पना अनुमान होता है कि कबीर माहन मिकंदर लोदी के समय में थे। और कमोटी . मे कबीर साहन की अवस्था देहात के समय १० बरम की होना लिसा है यदि यह ठीक है तो पनीर साहब का -न्म मम्नत १४५५ अयात १३९ ईस्वी में ठहरता भगीर माह के पिता का नाम नूरअपी और माता का नाम नीमा गालाशी में रहते थे। किसी २ का कयन है कि नीमा के पेट से पीर गाय पैदा हुए परंतु विशेष कर ऐमा कहा जाता है कि नूरअली TITE गगा नदी अथवा लहरतारा तलाव के किनारे सूत धो रहा था कि उम को एजनालक बहता दिसाई दिया उस ने उस को निकाल लिया और अपने घर लाकर पाला पोसा । पंडित भानुप्रताप तिवारी चुनारगढ़ निवामी जिन्हों ने इस विषय में बहुत सेज किया है उन के अनुमार काबीर साहन की अमल मा एका हिदुनी विधवा थी जो मग १४१४ ईदयो में रामानंद स्वामी के दर्शन को गई । दंडवत करने पर रामानंद जी ने आशीर्वाद दिया कि तुम को पुत्र स्त्री घमरा तर रोने लगी कि मैं तो विधवा हूं मुझे पुत्र क्यों कर हो सकता है। रामानद जी बोते कि अब तो मुंह से निकल गया पर तेरा गर्भ किसी को लखाई ग पड़ेगा। उसी दिन से उस विधवा को गर्भ रहा और दिन पूरा होने पर लड़शा पैदा हुभा जिसे उसने लोक निन्दा के डर से लहरतारा के तलाव में डात दिया जहां से उसे नूरू जुलाहा निकाल घर लाया। दावीर पासाटी के अनुसार जेठ की बड़सायत सोमवार के दिन नीर ने पच्चे को पाया। बालकपन ही मे कबीर साहय ने यानी द्वारा उपदेश करना आरम्भ कर दिया था। ऐमा कहते हैं कि कबीर साहब रामानंद स्वामी के जो रामानुन मन के अवलमी धे शिष्य हुए । यद्यपि कधीर साहव स्वतः संत बार उनकी गनि रामानन्द स्वामी से कहीं बढ़कर थी तो भी गुरू हो। - जीवनन्नि धारन करने की तुम पारे . .. - मादा माम मानी गुमना लिया । माते । कि रामानन्द मामी को भी कुछ मात्रा भी न पी। एक दिन म ने आम ची में ना रहे थे: वाघुर जी मार मगरा दिया परंतु ती ना हार पहिया :- 17 : मुण्ट बनार पार पहिग न: १ रोटी पटती थी किरने में गोली मार . मालाक्षी नॉट लोन पर पा :::--... - भार बाहर निकाल कर पET...-." फि मारे गुर । पासीर गार गामा चाहिये कि का कि घास घर 17 मिर्गन चेतन्य देशका धनीमानी :: : '' उनी की प्रकिार उपामना : परमयुगप भार 31 ६. या श्रार हमसे व्यतितिाजी वा पूरे या घरे बागपत।। पाबीर मा यो नि ! .... पज मा दिया एससी एशन Form पE 23r 3. हर पर पर in हिल' या रहित frrr पाते। शिरामानद स्वामी श्री. अपने पिता को मार क्षे दिनादि :- गाया । साधार FILE र.: गेम हमारा: ::::: . उमी परमम्प ६ .. १ . - - T जीवन-चरित्र रहो मरी गाय कमे सानी सायगी? कबीर साहब ने जवाब दिया कि ने हमारे गुगजी के भरे पुरखा पिड सायेंगे। नाम, मद्य बरन हर प्रकार के नशे का कानीर साहब ने अपनी बानी में निषेध किया है। दानोर माहब जुगाहा के घर में तो पले थे ही और आप भी कपड़ा सुनने ला काम बारते थे। वह गृहस्य शाशाम में थे, और भेषो के डिम्ब पागः और हकार को बहुत निदनीय कहा है। कबीर साहय की गी का नाम लोई ओर बेटे और बेटी का कमाल और कमाली था। किमी २ ग्रथकारो का कथन है कि बाबीर साहब बालब्रह्मचारी थे और पासी व्यार नहीं किया, एक मुर्दा लड़के और लड़की को जिलाकर उनका नाग कनाल और कमाली रकता और उनके पालन का भार लोई को जो उसकी चेली थी सौंप दिया पर यह ठीक नहीं जान पड़ता। जो कुछ को लोई कबीर साहब की सच्ची और ऊँचे दर्जे की भक्त ची। एक यार का ज़िकर है कि कबीर साहव ने किसी सोजी को भक्ति का उदाहरण दिखाने के लिये अपने करगह मे जहां वह लोई के माथ दोपहर दो ताना बुन रहे थे धीरे से ढरकी अपनी बहोली में टिपा ली और लोई से कहा कि देख ढरकी गिर गई है उसे ज़मीन र रोज वह उसे तुर्त ढूंढ़ने लगी भाखिर को हार कर कापती हुई उमन अर्ज की कि नही मिलती इस पर कबीर साहब ने जवाब दिया तू पागल है रात को समय बिना दिया बाले ढूढ़ती है कैसे मिले। अपने स्वामी के मुख से यह वचन सुनतेही उस को सचमुच ऐसा दरसने लगा कि अँधेरा है, बत्ती जला पार ढूढ़ने लगी जब कुछ देर हो गई বর্মী माहन सफा हो कर कहा कि तू अंधी है देख मैं ढूढ़ता हूं और उम दो मागने टरकी वहोली से गिरा कर फिर उठा लिया और उसे दिरा कर कहा कि कसे झटपट मिल गई, इस पर लोई रोकर बाली कि स्वामी रिमा करो न जाने मेरी आँख मे क्या पत्थर पड़ गये थे। तब कार माल्य ने दम जिनामू से कहा कि देखो यह रूप भक्ति का है कि हा अगदत के ददी नल को वास्तविक दरसने लगे। ने जीवन-शरित्र ५ वहुत इफ बहुत सी कथायें कवीर साहब की वावत प्रसिद्ध हैं जिन का लिखना अनावश्यक है क्योंकि वह समझ में नहीं भाती । इस में संदेह नहीं कि भक्तजन सर्व सनर्थ हैं और उन के लिये कोई वात प्रसंभव नहीं है पर इसी के साथ यह भी है कि संत करामात नहीं दिखलाते अपने भगवंत की भॉति अपने सामर्थ्य को प्रायः गुप्त रखते और साधारन जीवों की तरह संसार में बर्ताव करते हैं । तैाभी घोड़े से चमत्कार जिन का भक्तमात और दूसरे ग्रथों में वर्णन है और महात्मा गरीवदार और दूसरे भक्तों ने भी उन को संक्षेत में अपनी वानी में कहा है नीचे लिखे जाते हैं क्योंकि उन्हें न केवल सर्व साधारन पतंद करेंगे वरन उन से नहात्माओं की वानी जहाँ यह सौतुक इशारे में लिखे हैं भली प्रकार से समझ में आवैगी। (१) एक बार काशी के पंडितों ने जो कवीर साहव से रखते थे कवीर साहब की ओर से कंगलों के खिलाने का न्योता चारो ओर फेर दिया हज़ारों आदमी कवीर साहब के द्वारे पर इकट्ठा हुए जब कबीर साहब को इसली रूबर हुई तो एक हाड़ी में घोड़ा सा भोजन बनवा कर और कपड़े से ढंक कर अपने किसी सेवक से कहा कि हाथ भीतर डाल कर जहाँ तक निकले लोगों को वाटते जाव इस प्रकार से सव न्योतहरी पेट भर कर खागये और जब पड़ा उठाया गया हाड़ी ज्यों की त्यों भरी निशली । इस कथा को ऐसे भी लिखा है कि भगवंत पाप वंजारे का रूप धर फर वैलों पर अन्न लादे माये और कबीर साहब के ओसारे मै गॅॉज दिया जो सव मॅगतों को टिने पर भी न चुका । (२) जव कबीर साहब की सिद्धि शक्ति की महिमा काशी मे बहुत पैली नार संसारियों की बड़ी भीड़ भाड़ होने लगी तो क्वीर माहब अपनी निदा करा कर लोगों से पीछा छुड़ाने के हेतु एक दिन एक हाय क्षिती वेश्या के गले मे हाल कार और दूसरे हाथ मे पानी से भरी बोतल, शराब का धोखा देने को, लेकर वजार र जिम में लोगों ने समझा कि वह पतति हो गये और उनको घर जाना 2 दिया । .
जीवन चरित्र (3) माही रूप धरे कबीर साहब काशिराज के दौर में पहुंचे किमी ने पादर सत्तार न किया। जब दर्वार मे लौटने लगे तो कोडा मा जल बोतल से धरती पर डाल कर सोच में हो गये। राजा ने मत्रत पूत्रा तो जवाब दिया कि इस समय जगन्नाय जी का रसोइया पुरी के मदिर में भाग लग जाने से जलने लगा था मैंने यह पानी डाल मा भाग बुझा दी और रसोइये की जान बचा ली । राजा ने पुरी में समाचार मंगाया तो यह बात ठीक निकली। (४) मिजदर लोदी बादशाह ने कबीर साहब को मार डालने के गिग गिहा मे बंधया कर गंगागी में डलवा दिया पर न डूबे तब भाग माया पर एक बाल बैंका न हुगा फिर मस्त हाथी उन पर छोड़ा कर भाग गया। कबीर माहम के गुमुख शिष्य जो संत गति को प्राप्त हुए धर्मदास जी पानी के एक प्रसिद्ध वैश्य माहूकार थे। वह पहले सनातन धर्म के अनुयायी थे और ब्रह्मणों की उन के यहाँ बड़ी भीड़ भाड़ रहा करती थी। उन से कबीर साहब मिले और सत मत की महिमा गाई इस पर धर्मदास जी ने उनका काशी के परितो से शास्त्रार्थ कराया जिस में यह लोग पूरी तरह परास्त हुए और धर्मदास जी ने कबीर साहय को गुरू धारन करके उन से उपदेश लिया और बहुत काल तक उनका सतसंग र सुरत शब्द का अभ्याम करको श्राप भो सतगति को प्राप्त हुए । उन की यानो यचन से उन की गुर भक्ति, अपूर्व प्रेम और गति यिदित होती है। काबोर माहब ने मगहर में जो क्षाशी से कुछ दूर बस्ती के जिले में है देह त्याग की । उन के गुप्त होने का समय जैसा कि ऊपर लिस आये हैं मम्बत १५७५ जान पड़ता है। उन के मगहर में शरीर त्याग करने के बहुत से प्रमान है। धर्मदास जी ने अपनी भारती में इस भानि पिसा है-- पटा पारती पोर फदाये । मगहर बागी नदी प्रहाये ॥ । -- जीवन-चरित्र 8 ॥ फूल लेकर नाभा जी ने कहा है :- भजन भरोसे आपने, मगहर तज्यो शरीर । ऋविनाशी की गोद में, दिलसें दास कबीर ॥ दादू साहव का वाक्य है :- काशी तज मगहर गये, कवीर भरोसे नाम । नेही साहब मिले, दादू पूरे काम इन के अंतकात के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि हिन्दुओं ने इन के मृतक शरीर को जलाना और मुसलमानों ने गाड़ना चाहा इस पर बहुत झगड़ा हुना अंत को चद्दर उठा कर देखा तो मृतक स्थान पर शरीर नदारद घा सुगंधित फूल पड़े घे। तव हिन्दु सों ने मगहर में उनकी समाधि बनाई और मुसल्मानों ने कवर । यह समाधि और कवर प्रब तक वर्तनान है और इस बात को जताती हैं कि यह सव वर्ण के झगड़े संतों ने तुच्छ और केवल संधारियों के योग्य विचार कर उन्हीं के लिये छोड़ दिये । इस में संदेह नहीं कि कबीर साहव स्वतः संत थे जिन्हों ने संसार में कर्म धर्म मिटाने और सच्चे परमार्थ का रास्ता दिखाने को कलियुग में पहला संत अवतार धरा जैसा कि उनकी वानी वचन से जिस में पूरा झेद पिड, ब्रह्मांड और निर्मल चेतन्य देश का दिया है विदित है । इस के प्रमाण मे दो शब्द "कर नैनों दीदार महल में प्यारा है" और "कर नैनों दीदार यह पिंड से न्यारा है" (सफ़हा 99 और ८१ देखिये) काफ़ी हैं इन में पूरा भेद सिलसिलेवार दिया है और इन को एक प्राचीन लिपि से लेकर अमृतसर के कवीरपंधी महंत भाई गुरदत्त सिह जी ने भेजा है। कधीर साहब की बानी जैसी मधुर, मनोहर और प्रेम से भिनी हुई है उसका असर पढ़ने से मालूम होता है-उस से किसी बड़े से बड़े कवि या विद्वान की बानी का मुकाबला नहीं हो सकता क्योकि संतमुख यानी अनुभवी है और कयियों की बानी विद्या बुद्धि की ॥
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कबीर साहब की शब्दावली
॥ पहिला भाग।
सतगुरु और शब्द महिमा
॥ शब्द १॥
चल सतगुरु की हाट, ज्ञान बुधि लाइये।
कीजे साहिब से हेत, परम पद पाइये ॥ १॥
सतगुरु सब कछु दीन्ह, देत कछु ना रह्यो ।
हमहिं अभागिनि नारि, सुक्ख तजि दुख लह्यो॥२॥
गई पिया के महल, पिया सँग ना रची।
हिरदे कपट रह्यो छाय, मान लज्जा भरी ॥३॥
जहवाँ गैल सिलहली, चढौं गिरि गिरि पड़ौं।
उठहुँ सम्हारि सम्हारि, चरन आगे धरौं ॥ ४ ॥
भला बना संजोग, प्रेस का चोलना।
तन मन अरपौं सीस, साहय हँसि बोलना ॥५॥
जो गुरु रूठे होयँ, तो तुरत मनाइये ।
हुइये दीन अधीन, चूक वकसाइये ॥६॥
जो गुरु होयँ दयाल, दया दिल हेरि
कोटि करम कटि जायँ, पलक छिन फेरि हैं ॥ ७ ॥
कहैं कवीर ससुझाय, समुभा हिरदे धरों।
जुगन जुगन करो राज, अस दुर्मति परिहरी ॥ ८ ॥
मतगुर और गक महिमा
॥ शरद २॥
सतगुरु चरन अजसमन मूरख,का जड़ जन्म गँवावसरे टेक
कर परतीत जपस उर अंतर,निसि दिन ध्यान लगावस रे॥
द्वादस कोस बसत तेरो साहब, तहाँ सुरत ठहरावस रे ॥२॥
त्रिकुटी नदिया अगमपंथ जहें,बिना मैंह झर लावस रे॥३॥
दामिनि दमकत अमृत बरसत,अजब रंग दरसावस रे॥४॥
इंगला पिंगला सुखमन से धस,नभ मंदिर उठि धावस रे॥५॥
लागी रहे सुरत की डोरी सुन में सहर बसावस रे ॥६॥
वंक नाल उर चक्र सेाधि के,मूल चक फहरावस रे ॥७॥
मकर तार के द्वार निरखि के,तहाँ पतंग उड़ाबस रे ॥८॥
बिन सरहद अनहद जहँ बाजै,कौने सुर जहें गावस ने ॥६॥
फहँ कबीर सतगुरु पूरै से, जो परचै सो पावस रे ॥१०॥
॥ शब्द ३॥
इस सतसंग में
लाभ
मैं तो आन पड़ी चोरन के नगर, सतसंग बिनाजिय तरसे।
बहुत है, तुरत मिलावै
गुर
से॥२॥
मूरख जन कोइ सार न जाने, सतसँग में अमृत बरसे ॥३॥
सब्द सा हीरा पटकि हाथ से, मुट्ठी भरी कंकर से ॥४॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सुरत करो वहि घर से ॥५॥
॥ श६४ ॥
माधोसतगुरु अलख लखाया,जवआपआपदरसाया।ठेका
योज मध्य ज्यों वृच्छा दरसे, वृच्छा मद्धे छाया ।
परमानम में आतम तैसे, आतम मढे माया ॥ १॥
सतगुर और शब्द महिमा ज्यों ना मढे सुन्न देखिये, सुन्न अंड आकारा। नि:अच्छरतें अच्छर तैसे, अच्छर घर विस्तारा ॥२॥ ज्यों रवि मद्धे किरन देखिये. किरन मध्य परकासा । परमातम तेंजीव ब्रह्म इनि, जीव सध्य तिमि स्वाँसा॥३॥ स्वाँसा मद्धे सब्द देखिये अर्थ सब्द के माहीं। ब्रह्म ते जीव जीव तें मन यो, न्यारा मिला सदाहीं ॥४॥ आपहि बीज बच्छ अंकूरा, आप फूल फल छाया । आपहि सूर किरन परकासा, आप बल्ल जिव माया॥५॥ अंडकार सुन्न नम आपै. स्वाँस सब्द अरथाया । निःअच्छर अच्छर छर आपै, मन जिव ब्रह्म समाया ॥६॥ आतम में परमातम दरसै, परमातम में झाँई। झाँई में परछाँई दरसै, लखै कवीरा साँई ॥७॥ ॥ शव्द ५ ॥ . भाई कोई सतगुर संत कहावै। नैनन अलख लखावै । टेक डोलत डिगै न बोलत बिसर, जव उपदेस दृढ़ावै । प्रान-पूज्य किरिया तेंन्यारा, सहज समाधि सिखावै॥१॥ द्वार न रूंधै पवन न रोकै नहिं अनहद अरुझावै । यह मन जाय जहाँ लग जवहीं, परमातम दरसावै ॥२॥ करम करै निःकरम रहै जो, ऐसी जुगत लखावै। सदा विलास त्रास नहिं मन में, भोग में जोग जगावै॥३॥ धरती त्यागि अकास हुं त्यागै, अधर मडैया छावै । सुन्न सिखर के सार सिला पर, आसन अचल जमावै ॥४॥ "प्रान से पूजने योग्य मत्तगुर ।
४
सतगुर और शव्द महिमा
भीतर रहा सो बाहर देखे, दूजा दृष्टि न आवै ।
कहत कबीर बसा है हंसा, आवागवन मिटावै ॥५॥
॥ शब्द६॥
जब ते मन परतीति भई टेक॥
तब तेअवगुन छूटन लागे, दिन दिन बाढ़त प्रीति नई॥१॥
सुरतिनिरतिमिलि ज्ञानजोहरी,निरखि परखिजिनबस्तुलाई
थोड़ी बनिज बहुत है बाढ़ी,उपजन लागे लाल मई ॥२॥
अगम निगम तू खोजुनिरंतर,सत्त नाम गुरु मूल दई ।
कह कबीरगाध की संगति,हुती बिकार से छूटि गई ॥३॥
॥ शब्द ॥
साधो सब्द साधना कीजै ।
जहिं सब्दते प्रगट भये सब सोई सब्द गहि लीजै ॥टेक॥
राब्दहि गुरू सब्द सुनि सिपमे सब्द सो बिरला बूझै।
सोई सिप्य सोइ गुरूमहातम जेहिं अंतर गति सूझै ॥१॥
सन्दै वेद पुरान कहत है सब्दै सब ठहरावै ।
सब्दै सुर मुनि संत कहत हैं सब्द भेद नहिं पावै ॥२॥
सब्दै सुनि सुनि भेप धरत हैं सब्द कहै अनुरागी।
पट दरसन सब सन्द कहत है सब्द कहै वैरागी॥३॥
सदै माया जग उतपानी सब्दै केरि पसारा ।
कहै कबीर जहें सब्द होत है तवन भेद है न्यारा ॥४॥
॥ शब्द ८ ॥
साधो सब्द साँ बेल जमाई ॥ टेक ॥
तीन लोक सापा फैलाई गुरु विन पेड़ न पाई ॥१॥
सतगुर और शब्द महिना
५
सापा के तर पेड़ छिपाना सापा उपर छाई ।
सापातें बहु सापा उपजी दुइ सापा अधिकाई ॥२॥
बेल एक सापा दुइ फूटी ता ते भइ बहुताई।
सापा केविच वेल समानी दिन दिन बाढ़त जाई॥३॥
पाँचो तत्त तीन गुन उपजे फूल बास लपटाई ।
उपजा फल बहु रंग दिखावै वीज रहा फैलाई ॥४॥
वीज माहिं दुइ दाल बनाई मध अंकूर रहाई ।
कहैं कबीर जो अंकुर चीन्है पेड़ मिलेगा आई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ॥
साँई दरजी का कोइ मरम न पावा ॥ टेक ॥
पानी की सुई पवन कै धागा अष्ट मास नव सीयत लागा॥१
पाँच पेवँद की बनी रेगुदरिया तामें हीरालाल लगावा॥२॥
रतन जतन की मेटुकी बनावा प्रान पुरुप को ले पहिरावा३
साहवकवीरअसदरजी पावा बड़े भाग गुरु नान लखावाट
॥ शन्द १०॥
साधोसदसभन से न्यारा । जानेगा कोई जाननहारााटेक।
जोगी जती तपी सन्यासी अंग लगावै छारा ।
मूल मंत्र सतगुरु दाया विनु कैसे उतरै पारा ॥१॥
जोग जज्ञ व्रत नेस साधना कर्म धर्म व्यौपारा।
सो तो मुक्ति सभन से न्यारी किमि छूट जम द्वारा॥२॥
निगम नेति जा के गुन गावै संकर जोग अधारा ।
ब्रह्मा विस्नु जेहि ध्यान धरतु हैं सो प्रनु अगम अपारा॥३॥
लागा रहै चरन सतगुरु के चंद चकोर की धारा ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो नपसिप सन्द हमारा ॥४॥
है मतगुर और शब्द महिमा ॥ शब्द ११॥ तोहिं मोरि लगन लगाये रे फकिरवा ॥टेक॥ सावन ही मैं अपने मँदिन में,सदन मारि जगाये रे(फ०)॥१ बूड़त ही भव के सागर में,बहियाँ पकरि समुझाये रे(फ०)२ एकै बचन बचन नहिं दूजा,तुम मो से बंदछुड़ाये रे(फ०)॥३ कह कबीर सुनो भाई साधो,सत्तनाम गुन गाये रे (फ०)॥४॥ ॥ शब्द १२ ॥ गुरु मोहिं धुंटिया अजर पियाई ॥टेक॥ जब से गुरु मोहिंधुंटियापियाई,भई सुचितमेटीदुचिताई? नाम औपधी अधरकटोरी,पियत अघायकुमति गइमोरीर ब्रह्मा विस्नुपिये नहिं पाये,खोजत संभू जन्म गॅवाये ॥३॥ सुरति निरतिकरपियै जो कोई कहैं कबीर अमर होय साईट ॥ शब्द १३ ॥ जिनकी लगन गुरू सों नाहीं ॥ टेक ॥ ते नर खर कूकर सम जग में, विस्था जन्म गँवाहीं॥१॥ अमृत छोड़ि विपय रस पी, धृग धृग तिन के ताँई ॥२॥ हरी चेल की कोरी तुमड़िया,सव तीरथ करि आई ॥३॥ जगन्नाथ के दरसन करिके, अजहुं न गई कडुवाई ॥४॥ जैसे फल उजाड़ को लागो,विन स्वारथरि जाई ॥५॥ कहै कबीर विन वचन गुरू के,अंत काल पछिताई ॥६॥ .
बिरह और प्रेम 9 बिरह और प्रेम। ॥ शब्द १॥ ॥ चौपाई॥ दरसनदीजे नाम सनेही। तुम बिन दुख पावे मेरी देही टेका ॥ इंद ॥ दुखित तुम विनरटत निसि दिन, प्रगट दरसन दीजिये । बिनतीसुनुप्रिय स्वामियाँ, बलि जाउँ बिर्लंघन कीजिये।। ॥ चौपाई॥ अन्न नभावे नींद न आवे । बार बार मोहिंबिरह सताने ।। ॥ छंद ॥ शिरिधि विधि हम भई व्याकुल, बिन देखे जिव ना रहे। तपत तन जिव उठत काला, कठिन दुख अब को सहे ॥३॥ ॥ चौपाई॥ नैनन चलत सजलजलधारानिसिदिनपंथनिहा तुम्हाराष्ट्र ॥ छंद ॥ गुन अवगुन अपराधछिमा कर औगन कछुन बिचारिये। पतित-पावनराखिये घर अपनापन न बिसारिये ॥५॥ ॥ चौपाई॥ गृह आँगन सोहि कछु न साहाई। बज्ज भई और फिस्यो न जाई ॥६॥ ॥ इंद ॥ नैन भरि अरि रहे निरखत, निसिख नेह न तोड़ाइये। याँह दीजे बंदी-छोड़ा, अबके बंद छोड़ाइये ॥ ७ ॥ हळा। सच बिरह और प्रेम ॥चौपाई॥ मीन मरै जैसे बिन नीरा। ऐसे तुम विन दुखित सरीरा॥८॥ ॥ छंद ॥ दास कबीर यह करत विनती, महापुरुष अब मानिये । दया कीजे दरस दीजे, अपना कर मोहिं जानिये ॥६॥ ॥ शब्द २ ॥ मन मस्त हुआ तब क्यों बोले ॥ टेक ॥ हीरा पायो गाँठि गठियायो चार बार वाकोश्यों खोले। हलकी थी जब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों ताले॥२॥ सुरत कलारी भइ मतवारी, मदवा पी गइ विन ताले ॥३॥ हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोले ॥४॥ तेरा साहब है घट माहीं,बाहर नैना क्यों खोले ॥५॥ कहै कबीरसुनीभाई साधो साहब मिल गये तिल ओले ६ ॥ शब्द ३ ॥ गुरु दयाल कब करिहा दाया । काम क्रोध हंकार वियापै, नाहीं छूटै माया ॥१॥ जो लगि उत्पति विद्वं रचा है, साँच कनहिं पाया । पाँच चार सँग लाय दिया है, इन सँग जन्म गॅवाया॥ २॥ तन मन डस्यो भुवंगमा भारी, लहरै वार न पारा गुरुगारुडी मिल्यो नहिं कयहीं, विप पसस्यौ विकरारा ३ कहैं कबीर दुख का साँ कहिये, कोई दरद न जाने। देहु दीदार दूर करि परदा, तब मेरो मन माने ॥४॥ 'चोट। 'गॉप। जिमफो नाप के बिप उतारने का मंत्र आता है। भारी । ।
विरह और प्रेन n शब्द४॥ बालम आओ हमारे गेह रे । तुम बिन दुखिया देह रोटेक सब कोइ कहै तुम्हारी नारी, मो को यह संदेह रे । एकमेक है सेज न सोवै, तब लग कैसो सनेह रे ॥ १॥ अन्न न भावै नींद न आवै, गृह वन धरै न धीर रे। ज्यों कामीको कामिनि प्यारी,ज्यों प्यासे को नीररे॥२॥ है कोइ ऐसा परउपकारी, पिय से कहै सुनाय रे । अब तो बेहाल कवीर भये हैं, बिन देखे जिव जाय॥३॥ ॥ शब्द ५॥ सतगुरु हो महराज लो पै साँई रंग डाग ॥ टेक ॥ सब्द की चोट लगी मेरे मन में बेध गया तन सारा॥१॥ औषध मूल कळू नहिं लागे क्या करे बैद बिचारा॥२॥ सुर नर मुनि जन पीर औलिया कोड न पाने पारा॥३॥ साहब कवीर सर्वरंग रँगिया सव रेंग ले रँग न्यारा॥१॥ ॥ शब्द ६ ॥ भीजै चुनरिया प्रेम रस बूंदन ॥ टेक ॥ आरत साज के चली है सुहागिन पिय अपने को ढूंढन ॥१॥ काहे की तोरी बनी है चुनरिया काहे के लगे चारो फूंदन । पाँच तत्त की बनी है चुनरिया नाल के लागे फूंदन॥३॥ चढ़िगे महल खुल गइरेकिवरिया दास कबीर लागेशूलनष्ट ॥ शब्द ॥ दुलहिनी गावहु मंगलचार । हम घर आये परम पुरुप भरतार ॥ १ ॥ :- २२ विरह और प्रेम तन रत करि मैं मन रत करिहौं, पंच तत्व तब राती। गुरूदेव मेरे पाहुन आये, मैं जोवन में माती ॥२॥ सरीर सरोवर बेदी करिहौं, ब्रह्मा बेद उचार । गुरूदेव संग भाँवरि लेइहौं, धन धन भाग हमार ॥ ३ ॥ सुर तेंतीसा कौतुक आये, मुनिवर लहस अठासी । कहै कबीर हम व्याहि चले हैं, पुरुप एक अबिनासी ॥४॥ ॥ शब्द८॥ मैं अपने साहब संग चली ॥ टेक ॥ हाथ में नरियर मुख में बीड़ा,मोतियन माँग भरी ॥१॥ लिल्ली घोड़ी जरद बछेड़ी, तायै चढ़ि के चली ॥ २ ॥ नदी किनारे सतगुर भेंदे, तुरत जनम सुधरी ॥३॥ कहै कबीर सुनो भाई साधो, दोउ कुल तारि चली ॥४॥ ॥ शब्दह॥ सखियो हमहूं भई ससुरासी ॥ टेक ॥ आयो जोवन विरह सतायो,अब मैं ज्ञान गली अठिलाती ज्ञान गली में सतगुरु मिलि गे,साद हमें पिया की पाती२ वा पानी में अगम संदेसा, अब हम मरनेकोन डेराती ३ कहत कबीर सुनो भाई साधो,बर पाये अबिनासी ॥४॥ ॥ शव्द १० ॥ कैसे जीवेगी विरहिली पिया बिन,कीजेकौन उपायाटेक दिवस न भूख रैन नहिं सुख है,जैसे कलिजुग जाम । खेलत फाग छाँड़ि चलु सुदर,तज चलु धन औ धाम॥१
विरह और प्लेन
११
बन बँड जाय नाम लौ लादे,मिलि पिय से सुख पाय ।
तलफत लीन बिना जल जैले,इरसन लीजे धाय ॥२॥
बिना अकार रूप नहिं रेखा, कान मिलेगी आय ।
आपन पुरुप समझि ले सुंदरी,देखो तन निरताय ॥३॥
सब्द सरूपी जिव पिव बूसा, छाँड़ो भ्रम को टेक ।
कहैं कबीर और नहिं दूजा, जुग जुग हम तुम एक ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
कैसे दिन कटिहैं जतन बताये जइयो । टेक ॥
येहि पार गंगा ओहि पार जमुना,
विचवाँ मड़इया हमकाँ छवारे जइयो ॥ १ ॥
अँचरा फारि के कागज बनाइन,
अपनी सुरतिया हियरे लिखाये जइयो ॥ २॥
कहत कबीर सुनो भाई साधा,
वाहियाँ पकरि के रहिया बताये जइयो ॥३॥
॥ शब्द १२ ॥
सतगुरु
मोरी
चूक
सँजारो।
हैं। अधीन हीन मतिमारी। चरनन तें जिन हारो टेक।
मन कठोर कछु कहा न माने।बहु वा को कहि हारो ॥१॥
तुम हीं तें सब होत गुसांई। या को बेग सँवारो॥२॥
अब दीजे संगत सतगुर की। जा तेंहोय निस्तारो ॥३॥
और सकल संगी सब विसरें। होउ तुम एक पियारो ॥४॥
१२ बिरह और प्रेम कर देख्यो हित सारे जग से। कोइ न मिल्यो पुनि भारो॥ कहें कबीर सुनो प्रभु मेरे । भवसागर से तारो ॥ ६ ॥ ॥ शब्द १३ ॥ मिलना कठिन है, कैसे मिलौंगी पिय जाय ॥टेक॥ समझि साचि पग धरौं जतन से,वार वारडिग जाय। ऊँची गैल राह रपटोली, पाँव नहीं ठहराय ॥ १ ॥ लोक लाज कुल की मरजादा, देखत मन सकचाय । नहर वास वसौं पीहर में, लाज तजी नहिं जाय ॥२॥ अधर भूमि जहें महल पिया का, हम पै चढो न जाय। धन भइ पारी पुरुप भये भाला, सुरत झकोला खाय ॥३॥ दृती सतगुरु मिले यीच में, दीन्हो भेद बताय । साहब कवीर पिया से भेंटेसीतल कंठ लगाय ॥ ४ ॥ ॥ शब्द १४॥ गुरु ने मोहिं दीन्ही अजब जड़ी ॥ टेक ॥ सो जड़ी माहिं प्यारी लगतु है, अमृत रसन भरी ॥१॥ कायानगर अजब इक बंगला, में गुप्त धरी ॥२॥ पांचा नाग पचीसो नागिन, सूंघत तुरत मरी ॥३॥ या कारे ने राब जग खायो, सतगुरु देख डरी ॥४॥ कहत कबीर मुनो भाई साधो, ले परिवार तरी ॥५॥ ॥ गव्द १५ ॥ गुरु हमें सजीवन मूर दई ॥ टेक ॥ जल घोड़ा बरपा अइ भारी, छाय रही सव लालमई ॥१॥ छिन छिन पाप कटन जब लागे बाढ़न लागी प्रीति नई २ ता
विरह और प्रेम
अमरापुर में खेती कीन्हा, हीरा नग ते भेंट भई ॥३॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो मन की दुविधा दूर भई ॥४॥
॥ शन्द १६ ॥
गगन की ओट निसाना है ॥ टेक ॥
दहिने सूर चन्द्रमा बायें तिन के बीच छिपाना है ॥१॥
तन की कमान सुरत का रोदा, सब्द वान ले ताना है २
मारत बान बेधा तनही तन,सतगुरु का परवाना है ॥३॥
मास्यो वान घाव नहिं तन में जिन लागा तिन जाना है।
कहै कबीर सुनोभाई साधे,जिन जाना तिन माना है ॥५॥
॥ शव्द १७ ॥
जाके लगी सब्द की चोट ॥ टेक ॥
का पोखर का कुआँ बावड़ी, का खाई का कोट ॥१॥
का बरछी का छुरी कटारी, का ढालन की ओट ॥२॥
या तन की बारूद बनी है, सत्तनाम की तोप ॥ ३ ॥
मारा गोला भरमगढ़ टूटा, जीत लिया जम लोक ॥४॥
कहत कबीरसुनो भाई साधो, तरिहै। सब्द की ओट॥५॥
॥ शब्द १८॥
साँई बिन दरद करेजे होय ॥ टेक ॥
दिन नहिं चैन रात नहिं निंदिया, कासे कहूं दुख रोय॥१॥
आधी रतियाँपिछलेपहरवाँ,साँई विनतरसतरसरहीसाय
पाँचो मारि पचीसो बस करि,इन में चहै कोइ होय॥३॥
कहत कबीरसुनो भाई साधो,सतगुरु मिले सुख होय॥४॥
12
निगा और प्रेम
॥ शब्द १० ॥
हमनी ननंद निगोडिन जागे ॥ टेक ॥
कुमति लकुटिया निसि दिन व्यापे,सुमति देखिनहिं भावे।
निमि दिन लेत नाम साहब को,रहत रहत रंग लागे ॥१॥
निमि दिनसेलत रही सखियन सँग,मेाहिं बड़ो डर लागे।
मेरे साहब की ऊंची अटरिया,चढ़त में जियरा काँपे ॥२॥
पग चले तो लज्जा त्यागे,पिय से हिलि मिलि लागे।
बट गोल अंग भर मेंटेनेन आरती साजे ॥ ३ ॥
: कबीर सुनो भाई रााधा चतुर हाय से जाने ।
निज प्रीतम की आस नहीं है,नाहक काजर पारे ॥४॥
॥ गब्द २० ।।
अमरपुर ले चलु हो सजना ॥ टेक ॥
अमरपुरी की संकरी गलियाँ अड़बड़ है चढ़ना ॥ १ ॥
ठोकर लगी गुरु ज्ञान सब्द की उघर गये झपना ॥२॥
वाहि रे अमरपुर लागि बजरिया,सौदा है करना ॥३॥
दाहि रे अमरपुर संत वसतु हैं,दरसन है लहना ॥४॥
मंत रामाज सभा जहें बैठी,वहीं पुरुप अपना ॥ ५ ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो भवसागर है तरना ॥६॥
॥ शब्द २१ ॥
भक्ती का मारग सीना रे ॥ टेक ॥
नहिं अचाह नहिं चाहना चरनन लौलीना रे ॥१॥
विरह और प्रेन
१५
साध के सतसँग में रहे निस दिन मन मीना ॥२॥
सब्द में युत ऐसे बसे जैसे जल मीना रे।
मान मनी को याँ तजे जस तेली पीना ॥४॥
दया छिसा संताप गहि रहे अति आधीना ॥५॥
परमारथ में देत सिर कछु बिलँब न कीना रे ॥६॥
कहैं कनीर मत भक्ति का परगट कह दीना ॥ ७ ॥
॥ शन्द २२ ।।
ऋतु फागुन नियरानी,कोइ पिया से मिलावे ॥ टेक ॥
सोइ तो सुंदर जाको पिय को ध्यान है,
सोइ पिय के मन मानी।
खेलत फाग अंग नहिं मोड़े, सतगुरु से लिपटानी ॥१॥
इक इक सखियाँ खेल घर पहुंची,इक इक कुल अरुझानी।
इक इक नाम बिना वहकानी हो रही ऐंचा तानी॥२॥
पिय को रूप कहाँ लग बरनों, रूपहि माहिं समानी।
जो रँग रँगे सकल छवि छाके तन मन सभी भुलानी॥३॥
याँ मत जाने यहि रे फाग है यह कछु अकथ कहानी।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो यह गति विरले जानी ॥४॥
॥ शब्द २३ ॥
पिया मेरा जागे मैं कैसे सोइ री ॥ १ ॥
पाँच सखी मेरे सँग की सहेली,
उन रंग रंगी पिया रँग न मिली री ॥२॥
िऔर प्रेम - ॥ शब्द २४ ॥ वनमानी ननद दोरानी, उन र गे पिय सार न जानी री ॥२॥ सामम ऊपर सेज बिछानी - न रानौं मागे लाज लजानी री ॥३॥ - विजन मोहिं कूका मारे, मे न गुनी रचि रहि सँग जार रो ॥ ४ ॥ मीर मुनु सखी सयानी, बिन गतगुरु पिया मिले न मिलानी री ॥५॥ गि गये बान सरंगी हो ॥ टेक ॥ 'या गनगा उपदेम दिया है। होइ गयो चित्त भिरंगीहो॥१॥ ध्यान पुरुप की बनी है तिरियाघायल पाँचौ संगी हो ॥२॥ घायल की गति घायल जाने का जानै जात पतंगी हो ॥३॥ करें वीर मुनाभाई साधे, निसि दिन प्रेम उमंगी हो ॥४॥ हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या । हैं आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥१॥ जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर बदर फिरते । हमारा यार है हम में, हमन को इंतिज़ारी क्या ॥२॥ ग्व लक मत्र नाम अपने को बहुत कर सिर पटकता है। हमन गुरु नाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ॥३॥ न पल बिछुड़े पिया हम से, न हम विछुड़े पियारे से । उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ॥४॥ ॥ शब्द २५ ॥
यिरह और प्रेम कवीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से । जो चलना राह नाजुक है,हमन सिर बोझ भारीच्या॥५॥ ॥ शब्द २६॥ मन लागो सेरो यार फकीरी में ॥टक ॥ जो सुख पावो नाम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में १ भला धुरा सब को सुन लीजै , कर गुजरान गरीबी में ॥२॥ प्रेम नगर में रहनि हमारी, मलि पनि आई सबूरी में ॥३॥ हाथ में कुंडी बगल में साँटा,चारो दिस जगीरी में ॥४॥ आखिर यह तन खाक मिलेगा,कहा फिरत मगरूरी में ५ कहैं कबीर सुनो भाई साधा, साहब मिलै सबूरी में ॥६॥ ॥ शब्द २७ ॥ कोइ प्रेम की पेंग गुलाओ रे ॥ टेक ॥ भुज के खंभ प्रेम की रसरी, मन महबूब अलाओ रे ॥१॥ सूहा चोला पहिरि अमोला,निजघट पिय को रिभाओ रे२ नैनन बादर की झर लाओ,स्यास घटा उर छाओ रे ॥३॥ आवत जावत सुत के मग पर, फिकिर पिया को सुनाओ रे कहतकबीरसुनाभाई साधो,पिय को ध्यान चित लाओरे? नाचु रे मेरो मन नट होय ॥ टेक॥ ज्ञान कै ढोल बजाय रैन दिन, सब्द सुनै सब कोई। राहू केतु नवग्रह ना, जमपुर आनंद होई ॥ १ ॥ छापा तिलक लगाय बाँस चढ़ि, होइ रहु जग से न्यारा। सहस कला कर मन मेरो नाचे, रीझै सिरजनहारा ॥२॥ ॥ शब्द २६ ॥ 3 निरत और प्रेम जो तुम दि जाव भवसागर, कला बदी में तेरी। - त्रीर मुनो भाई साधा, हो रहु नौनिधि चेरो ॥३॥ ॥ गन्द २४॥ गुरु मिन दाता कोई नहीं जग माँगनहारा । मौन लोक ब्रह्मड में सब के भरतारा ॥ १ ॥ अपनी तीरथ चले का तीरथ तारे म केन्धि मद ना मिटा का देह पखारे॥२॥ गट की नौका बनी बिच लोहा भारे । गद भेद जाने नहीं मूरख पचि हारे ॥ ३ ॥ मांड मनोरथ पिय मिले घट भया उजारा । गनगुम पार उतारि है सब संत पुकारा ॥ ४ ॥ पाहन को का पूजिये या में का पावे । अठमठ के फल घर मिले जो साध जिमावे॥५॥ कई कबीर विचार के अंधा खल डोले । अंधे को मूझे नहीं घट ही में बोले ॥६॥ ॥ शब्द ३०॥ माधो महज समाधिभली। गुरु प्रताप जा दिन से जागी, दिन दिन अधिक चली ॥१॥ जह जहं डोलाँ सो परिकरमा जो कुछ करौं सो सेवा । जब नावां तय करौं दंडवत, पूजाँ और न देवा ॥२॥ कहाँ सेा नाम सुनौ से सुमिरन, खावे पियौं सेा पूजा । गिरह उजाड़ एक सम लेखौं,भाव मिटावौं दूजा ॥ ३ ॥ 'इच्छा अनुमार । अष्ठमठ तीरप ।
विरह और मेम १९ आँख न मूंदौँ कान न रूंधाँ, तनिक कष्ट नहिं धारौं । खुले नैन पहिचानौं हँसि हँसि, सुंदर रूप निहारौं ॥४॥ सन्द निरन्तर से मन लागा, मलिन वासना त्यागी । ऊठत वैठत कबहुं न छूट, ऐसी तारी लागी ॥ ५ ॥ कहैं कवीर यह उनमुनि रहनी, सो परगट कर गाई । दुख सुख से कोइ परे परम पद, तेहि पद रहा समाई ॥६॥ ॥ शब्द ३१ ॥ गुरु बड़े भुंगी हमारे गुरु बड़े भुंगी । कीट सौँ ले भंग कीन्हा आप से रंगी॥टेक॥ पाँव और पंख और और रंग रंगी। जाति कुल ना लखै कोई सब भये गी॥१॥ नदी नाले मिले गंगै कहलावें गंगी। दरियाव दरिया जा समाने संग में संगी ॥२॥ चलत मनसा अचल कीन्ही मन हुआ पंगी। तत्त में निःतत्त दरसा संग में संगी॥ ३ ॥ बंध ते निबंध कीन्हा तोड़ सब तंगी। कहैं कबीर किया अगम गम नाम रँग रंगी ॥ ४ ॥ ॥ शव्द ३२ ॥ मैं का से बूझौं अपने पिया की बात री॥टेक ॥ जान सुजान प्रान-प्रिय पिय विन, सबै वटाऊ जात री १ आसा नदी अगाध कुमति बहै,रोकि काहू पै न जात री २ काम क्रोध दोउ भये करारे, पड़े विपय रस मात* री ॥३॥ माते ।
चिरह और प्रेम ॥ शब्द ३३ ॥ गंत्रो अपमान के संगी, सुमिरन को अलसात री ॥४ हैं कबीर बिछुनि नहिं मिलिहोज्यौं सरवर बिन पातरी ॥५॥ नारद साध से अंतर नाहीं। जो कोड साध साँ अंतर राखे,सो नर नरके जाहीं॥टेक॥ जागे साध तो मैं हूं जागू, सानै साध तो साऊँ । जो कोई मेरे साध दुखावै, जरा मूल से खाऊँ ॥ १ ॥ जहाँ साध मेरो जस गावे, तहाँ करौं मैं यासा। गाध घरी आगे उठ धाऊँ, मोहिं साध की आसा॥२॥ माया मेरी अर्ध-सरीरी, औ अक्तन की दासी । अठगट तीरथ साध के चरनन, कोटि गया और कासी ३॥ अंतरध्यान नाम निज केरा, जिन भजिया तिन पाई। कहे कबीर साध की महिमा, हरि अपने मुख गाई॥१॥ ॥ शब्द ३४॥ मोहिं ताहि लागी कैसे छूट। जैसे हीरा फोरे न फूट ॥ टेक॥ मोहिं तोहिं आदिअंत बन आई। अब कैसे कै दुरत दुराई? जने कंवल-पत्र जल बासा। ऐसे तुम साहब हम दासा ॥२॥ जमेचकोर तकत निसि चंदा। ऐसेतुम साहब हमवंदा ॥३॥ जसे कीट भुंग ला लाई । तैसे सलिता सिंधु समाई ॥४॥ हम ना खोजा सकल जहाना। सतगुरु तुम सम कोउ न आना कहै कबीर हमरा मन लागा । जैसे सेनैि मिला सुहागा६ चितावनी और उपदेश २१ ॥ शव्द ३५ ॥ . सतगुरु स्वामी मैं सतगुरु के सँग क्यों न गईरी॥ देक ॥ सतगुरु सँग जाती सोना बनि जाती, अब माटी के मैं मोल भई री ॥१॥ सतगुरु हैं मेरे प्रान अधारा, तिनकी सरन मैं क्यों न गही री ॥२॥ दास सतगुरु की, सतगुरु न भूले मैं भूल गई री ॥३॥ सार को छोड़ि असार से लिपटी, धृग धृग धृग मति मंद भई री ॥१॥ मान-पती को छोड़ि सखीरी, माया के जाल में अरुझ रही री ॥ ५ ॥ जो प्रभु हैं मेरे प्रान अधारा, तिन की मैं क्यों ना सरन गही री॥६॥ चितावनी और उपदेश ॥ शब्द १॥ बिनसतगुरुनररहत भुलाना खोजत फिरत राह नहिं जाना। केहर-सुत'ले आयो गरड़िया पाल पोस उन कीन्ह सयाना १ करतकलोलरहतअजयनसँग आपन मर्मउनहुंनहिंजानार केहर इक जंगल से आयो ताहि देख वहुतै रिसियाना ३ 'इस शब्द में कबीर साहब की साप नहीं है परंतु जो कि अति मनोहर है और लाहौर के कवीरपंथी महंत ने कीर साहव वा करते दिया है हम उमे डापते हैं।शेर का रहा। एकरी । ३ पिलायनी और उपदेश परि के भेद तुरत समुझाया आपन दसा देख मुसक्याना ? जग कुरंग बिच बसत बासना खोजत मूढ़ फिरत चौगाना कर उमबास मने में देखे.यह सुगंधि धैाँ कहाँ बसाना ६ अर्थ उर्धघिच लगन लगी है.छक्योरूप नहिं जात वखाना हैं कबीर सुनो भाई साधे उलटि आपु में आपु समाना ॥ शब्द २॥ दिन मनगुरु नर भरम भुलाना ॥ टेक ॥ गतग सब्द क मर्म न जाने भूलि परा संसारा ॥१॥ बिना नाम जम धरि धरि खैहै कोन छुड़ावनहारा ॥२॥ गिरजनहार का मर्म न जाने,धृग जीवन जग तेरा ॥३॥ धग्मगय जब पकरि मंगैहैं, परि है मार घनेरा ॥ ४ ॥ मुत नाग को मोह त्यागि के,चीन्ही सब्द हमारा ॥५॥ गार मन्द परवाना पावो तब उतरो भव पारा ॥६॥ इक मन है के चढ़े नाव पर,सतगुरु खेवनहारा ॥७॥ माहब कवीर यह निर्गुन गावसंतन करो विचारा ॥८॥ ॥ शब्द ३॥ दुक जिंदगी बंदगी कर लेना क्या माया मद मस्ताना ॥टेक रथ घोड़े मुख पाल पालकी,हाथी और बाहन नाना । नेरा ठाट काठ की दाटी,यह चढ़ चलना समसाना ॥१॥ राम पाटा पाटम्बर अम्बर,जरी वक्त का वाना । नेर फाज गजी गज चारिक, भरा रहे तासाखाना॥२॥ बचें को नदवीर करो तुमःमंजिल लंबी जाना। पहिचंते का गाँव न मग में,चौकी न हाट दुकाना ॥३॥ "सोच । 'स्मसान । जनी कपड़ा। चार एक ।
चितावनी और उपदेश जीते जी ले जीत जनम को,यही गोय यहि मैदाना। कहैं कबीरसुनोभाई साधो नहिं कलि तरन जतन आना। ॥ शब्द४॥ सुगवा पिंजरवा छोरि करि भागा ॥टेक॥ इस पिंजरे में दस दरवाजा । दसोदरवाजे किवरवा लागा अँखियन सेती नीर बहन लाग्यो । अव कस नाहिं तू बोलत अनागा ॥ २ ॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो । उड़ि गे हंस टूटि गयो तागा ॥ ३ ॥ ॥ शब्द ५॥ - कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो ॥ टेक ॥ चंदन काठ कै बनल खटोलना। तापर दूलहिन सूतलहो।। उठो री सखी मेरी माँग सॅवारो । दुलहा मो से रूसल होर आये जमराज पलंग चढ़ि बैठे । नैनन आँसू टूटल हो ३ चारि जने मिलि खाट उठाइन । चहुं दिस धूध ऊठल हेोष्ट कहत कबीर सुनो भाई साधो।जग से नाता छूटल हो ५ ॥ शब्द ६ ॥ हम का ओढ़ावे चदरिया, चलती विरिया ।टेक मानराम जब निकसन लागे,उलट गई दूनों नैन पुतिरया? भीतर से जब बाहर लाये,छूटि गई सब महल अटरियार चार जने मिलिखाट उठाइन,रोवत ले चले डगर डगरिया३ कहत कबीरसुनोभाईसाधो,संग चलेगी वहि सूखीलकरिया तिावनी और उपदेय ॥ शब्द ॥ क्या देख दिवाना हूवा २ ॥ टेक ॥ माया मूली सार बनी है, नारी नरक का कूवा रे ॥१॥ हाड़ मास नाड़ी का पिंजर. ता में मनुवाँ सूवा रे ॥२॥ भाई बंद और कुटॅब कबीला,ता में पचि पचि मूवारे ॥३॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो,हार चला जग जूवा ॥४॥ ॥ गब्द ८॥ योती बहुत रहि थोरी सी ॥ टेक ॥ गाट परेनर झीखन लागे,निकर प्रान गयो चोरी सीर भाई बंद कुटुंब सब आये ,फूंक दियो मानो होरी सी॥२॥ पद कबीर मुनो भाई साधो सिर पर देत हैं भौंरी सी॥३॥ ॥शब्दा मोच ममुझ अभिमानी, चादर भइ है पुरानी ॥ टेक ॥ टुकड़े टुकड़े जोड़ि जुगत से, सी के अंग लिपटानी। कर डारी मैली पापन सलोभ मोह में सानी ॥ १ ॥ ना यहि लगो ज्ञान के साबुनाना धोई भल पानी । मारी उमिर ओढ़ते बीती,भली बुरी नहिं जानी ॥२॥ मका मान जान जिय अपने,यह है चीज विरानी। कहत कबीर धर राखु जतन से,फेर हाथ नहिं आनी ॥३ ॥ शव्द १० ॥ खेल ले नैहरवाँ दिन चारि ॥ टेक ॥ पहिली पठौनी तीन जने आये नौवा बाम्हन बारि॥१॥ यात्रुठ जी मैं पैयाँ तोरी लागौं अब की गवन दे ठारिर पितावनी और उपदेश २५ ॥ शब्द ११॥ दुसरी पठौनी आपै आये. लेके डोलिया कहारि ॥३॥ धरि बहियाँ डोलिया बैठारिन,फोऊ नलागै गोहारि॥॥ ले डोलिया जाय बन में उतारिन,कोइनहिं संगि हमारिरा५ कहैं कबीर सुनो भाई साधो,इक घर है दस द्वारि ॥६॥ हँडिया फंदाय धन चलु रे, सिलि लेहु सहेली। दिनाँ चारि को संग है,फिर अंत अकेली ॥१॥ दिन दस नैहर खेलि ले.सासुर निज भरना । पहियाँ पकरि पिय ले चले. तर उजर न करना ॥२॥ इक अँधियारी कोठरी दूजे दिया न बाती। लेहिं उतारि ताही घराँ,जहँ संग न साथी ॥३॥ इक अँधियारी कूइयाँ,दूजे लेजुर टूटी। नैन हमारे अस टुरै,मानो वायर फूटी ॥ ४ ॥ दास कबीरा यों कहै,जग नाहिन रहना । संगी हमरे चलि गये,हमहूं को चलना ॥ ५ ॥ साँई के सँग सासुर आई ॥ टेक ॥ संगनसूती स्वाद न जान्यौ,गयो जोवन सुपने की नाँई ॥१॥ जनाचारि मिलि लगन साधाई,जना पाँच मिलि मंडप छाई सखी सहेली मंगल गावै.दुख सुख माथे हरदी चढ़ाई ॥२॥ नाना रूप परी मन भाँवरि,गाँठिजोरिभड पति की आई। अरघुदैदै चली सुवासिन,चौकहिं राँड़ सई सँग साई ॥३॥ भयो वियाह चली दिन दूलह. बाद जात सनधी सनुभाई। कहै कबीर हम गवने जैवै, तरव कंत लै तूर बजाई ॥४॥ *ररसी। 'तरैगे। ॥ शब्द १२ ॥ 4
तावनी और उपदेश
॥ राज १३ ॥
अनि नहिं आउना या देस ॥ टेक ॥
जे। जो गये बहुरि नहिं आये, पठवत नाहिं संदेस ॥१॥
गुर नर मुनि ओ पीर ओलिया, देवी देव गनेस ॥ २॥
गरि परि जनम सबै भर मे हैं, ब्रह्मा बिस्नु महेस ॥३॥
जोगी जगम औ रान्यासी, डीगग्घर दुरवेस ॥४॥
पिन मुंडिन पंडित लोई, सुर्ग रसातल सेस ॥५॥
कानी गनी नतुर औ कबिता, राजा रंक नरेस ॥६॥
Tीम कोड नाम बखाने, कोड कहे आदेस ॥७॥
नाना भेष बनाय सबै मिलि, ढूंढ़ि फिरे चहुं देस ॥८॥
को कीर अंत ना पैही, बिन सतगुरु उपदेस ॥ ६ ॥
॥ शब्द १४ ॥
वा दिन की कछु सुध कर मन माँ ॥ टेक ॥
जा दिन लैचलु लैचलु होई, ता दिन संग चलै नहिं कोई ।
नान मान मुन नारी राई, माटी के संग दिये समाई
मा माटी काटेगी नन माँ॥१॥
उल फन नेहा कुलफन नारी,किसकी बीवी किसकी बादी।
किमझा माना किसकी चादी, जा दिन जमलेचलिहैवाँधी।
डेरा जाय पर वहि बन माँ ॥२॥
दाँडा नुम ने लादा भारी बनिज किया पूरा ब्यौपारी।
जुवा खेला पूंजी हारी, अब चलने की भई तयारी।
हिन चिन मन तुम लाओ धन माँ ॥ ३॥
चितावनी और उपदेश २७ जो कोइ गुरु से नेह लगाई, बहुत भाँति सेई सुख पाई। माटी में काया मिलिजाई, कहै कबीर आने गोहराई। साँच नाम साहब को सँग माँ ॥ ४ ॥ ॥ श६१५ ॥ जोगी जन जागत रहो मेरे भाई । जागत रहियो सेाय मत जैयो, चोर भूसि ले जाई ॥ १ ॥ विरह फाँसि डालै हित चित करि, मारै ढिंग बैठाई। वाजीगर बंदर करि राखै. ले जाय संग लगाई ॥ २ ॥ रस कसि लेत निचोरि कामिनी, बुधि बल सब लिखाई। गाँडे की छोई करि डार, रहन न देत मिठाई ॥ ३ ॥ तसकर तरजा हरन मृग-चितवन, कंदर्प लेत चुगई। घृत पावक निज नारिनिकटटिंग,कोइविरले जनठहराईट चन के तपसी नागा लूटे, सुर नर मुनि छलि खाई। कहै कबीर सुनो भाई साधो, जग लूटा ढोल बजाई॥५॥ ॥ शब्द १६ ॥ हमारे मन कव भजिहो गुरु नास ॥ टेक॥ बालापन जनमत ही खायो, ज्वानी में व्यापा काम। बूढ़ भये तन थाकन लागे. लटकन लागे चाम ॥ १ ॥ कानन बहिर नैन नहिं सू 1. भये दाँत बेकाम । घर की त्रिया विमुख होइ बैठी, पुत्र कियो कलकान ॥२॥ खटिया से भुइयाँ कर दीन्हा. जम का गड़ा निसान । कहत कबीर सुनो भाई साधो, दुविधा में निकसत प्रान॥३॥ चार । 'टंग । दर लेने वाला । बीर्य। भगड़ा ।
नितावनी और उपदेश ॥ शब्द १७॥ मन हलवाई हो, सतनाम विमल पकवान ॥ टेक ॥ काया कराही कर्म घृत भरु, मन मैदा को सानु । ब्रह्म अगिन उदगारि के तू अजब मिठाई छानु ॥१॥ नन हमारो ताखरी। हो, मन हमारो सेर । पुरति हमरी डाँडिया हो, चित हमारो फेर ॥२॥ गगन मंडल में घर हमारो, त्रिकुट मार दुकान । पनि हगरी उनमुनी, तातें लागि बस्तु विकान ॥३॥ पाभ लहर नदिया यह हो, लख चौरासी धार । विन गुरु माझिन बूट्रिभुए, कोइ गुरमुख उत्तरे पार ॥४॥ फकीर स्वामी अगोचरा, तुम गति अगम अपार । गंनन लावा रान्त नाम,राब विपलायो संसार ॥५॥ ॥ शब्द १८ ॥ ॥ करो जतन सखी साँई मिलन की ॥ टेक ॥ गुड़िया गुड़वा सूप सुपलिया, नजि दे बुधि लरिकैयाँ खेलन की ॥ १ ॥ देयना पिनर भुइयाँ भवानी, यह मारग चौरासी चलन की ॥ २ ॥ सँचा महल अजब रँग बँगला, साँई की सेज वहाँ लगी फूलन की ॥३॥ तन मन धन सब अर्पन कर वहँ, सुरत सम्हार परु पइयाँ सजन की ॥४॥ जगा कर । पिलरा। * चितावनी और उपदेश २९ कहैं कबीर निर्भय होय हंसा, कुंजी बता दो ताला खुलन की ॥ ५ ॥ ॥ शब्द १८ ॥ अपने घट दियना बारु रे ॥ टेक ॥ नाम के तेल सुरत कै बाती, ब्रह्म अगिन उदगारु रे॥१॥ जगमग जोत निहारु मँदिर में, तन मन धन सर वारु रे॥२॥ कूठी जान जगत की आसा, बारंवार विसारु रे ॥३॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, आपन काज संवार रे॥४॥ ॥शब्द २०॥ मन तुम नाहक दुंद मचाये ॥ टेक ॥ करि असनान छुवो नहिं काहू, पाती फूल चढ़ाये ॥१॥ मूरति से दुनिया फल माँगै, अपने हाथ बनाये ॥२॥ यह जग पूजै देव देहरा, तीरथ वर्त अन्हाये ॥ ३ ॥ चलत फिरत में पाँव थकित भे, यह दुख कहाँ समाये॥४॥ झूठी काया झूठी माया, झूठे झूठ लखाये ॥ ५॥ वॉभिन गाय नहिं देहै, माखन कहँ से पाये ॥ ६ ॥ साँचे के सँग साँच वसत है, झूठे मारि हटाये ॥ ७ ॥ कहैं कबीर जहँ साँच वस्तु है, सहजै दरसन पाये॥८॥ दूध ॥ शब्द २१ ॥ मन फूला फूला फिरै जगत में कैसा नाता रे ॥ टेक ॥ माता कहे यह पुत्र हमारा, बहिन कहै बिर मेरा। भाई कहै यह भुजा हमारी, नारि कहै नर मेरा ॥ १॥ पेट पकरि के माता रोवै, चाँहि पकरि के भाई। लपटिझपटि केतिरिया रोवै, हंस अकेला जाई॥२॥ 'वीरभाई।
पितावनी और उपदेश
जब लग जीवे माता रोवै बहिन रोवैदस मासा ।
तेरह दिन तक तिरिया रोवै, फेर करै घर वासा ॥३॥
नार गजी चरगजी मंगाया, चढ़ा काठ की घोड़ी।
गागे कोने आग ल्गाया, फूंक दियो जस होरी॥४॥
हाइजरे जस लाह कड़ी को, केस जरै जस घासा ।
गीना ऐसी काया जरि गड, कोई न आयो पासा ॥॥
की तिरिया ढूंढन लागी, ढूंढ़ि फिरी चहुं देसा।
करगनी भाइ साधो, छाँडोजगकीआसा६||
.
॥ ०६२२॥
*
छोडिदे मन बीरा डगमग ॥ ठेक ।
अब नो जर मरे बनि आवै, लीन्हो हाथ सिंघोरा।
पीन प्रतीन करो दृढ़गुरू की, गुना सब्द घनघोरा ॥१॥
हाइ निगंक मगन है नाचे, लाभ माह भ्रम छाँड़े।
मृग कहा मरन सा डरपे, सती न संचय भाड़े ॥२॥
लोक लाज कुल की मरजादा, यही गले में फाँसी।
आगे ? पग पाछे धरिहा, होय जगत में हाँसी ॥३॥
अगिन जरे ना सनी कहावै, रन जूझे नहिं सूरा ।
सिरह अगिन अंतर में जारे, तव पावै पद पूरा ॥४॥
यह मंमार मकल जग मैला, नाम गहै तेहि सूंचा।
कहैं कार भक्ति मन छोडो, गिरत परत चढु ऊँचा।।५।।
।। ५२३॥
भूला मन समुताव जो अभूला मन समुझावै॥टेक।।
अरब खरब लो दर्व गाडे, खरिचन खान न पावै।
जब जम आइ कर कंठ घेरो, दै दै सैन बुझावै ॥१५॥
चितावनी और उपदेश ३१ योड़ बबूर अंब फल चाहत, सो फल कैसे पाये। खोटा दास गाँठि लै डोलन, भलि भलि बस्तु मोलावै ॥२॥ गुरु परताप साध की संगति, मन-बांछित फल पावै। जाति जोलाहा नाम कबीरा, विमल बिमल गुन गावै।३। ॥ शब्द २४॥ मन बनियाँ यानि न छोड़े ॥ टेक ॥ जनम जनम का मारा बनियाँ, अजहूं पूर न तौलै। पासँग के अधिकारी लै लै, भूला भूला डोलै।। १ ।। घर में दुविधा कुमति बनी है, पल पल में चिन तोरै कुनबा वाके सकल हरामी, अमृत में विप घारै ॥ २॥ तुमहीं जल में तुमहीं थल में, तुमहीं घट घट बोले। कहैं कबीर वा सिप को डरिये, हिरदेगाठि न खोले ॥३॥ ।। शब्द २५ ॥ उठि पछिलहरा पिसना पीस ॥ टेक।। ढोरु पछोरु पलक छिन दम दम । अनहद जाँत गड़ा तोरे सीस ।। १ ।। कर विन चल भीक विन निघरै। चंकनाल चलै विस्वा वीस ॥२॥ मन मैदा मीहीं कर चालौ । चोकर तजि द्यो पाँच पचीस ॥३॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो । आपुइ आय मिलें जगदीस ॥४॥ 'जो चाहै तो । 'चली में जो पीछे से घोडामा अन्न रह जाना है उमे होकर या कोई अनाज डाल कर ओर ची को तेन घलार साफ कर लेते है।
पितावनी और उपदेश ++ ॥ शब्द २६॥ नुम जाइ अजेोरे बिछावा, अँधेरे में का करिहो। टेक ॥ जय लग स्वाँसा दीप जरतु है,जैसे बने तो बनावो ॥१॥ गुन के पलंग ज्ञान के तासक, सूरति तकिया लागावो ॥२ जो मुख नाहो सा सतमहले ,बहुरि दुक्ख नहिं पावो ॥३॥ दाम कबीर गुरु सेज सँवारो,उन की नारि कहावो ॥४॥ की कबीर सुनो भाई साधो,आवा गवन मिटायो॥॥ ॥ शब्द २७ ॥ तो कोड लाखों, करैया कोई और है ॥ टेक ॥ कंगा को बमुदेव को निरबंस करौं । मयमा कहे मिसुपाल के सिर मौर है। ॥१॥ “परम और अविनाशी मुरा सातवें लोक में पहुंचे बिना नहीं प्राप्त हा मरता। गमा कम मे नारद मुनि ने कहा था कि अपने बहनोई वासुदेव जी की मिमी औलाद के हाथ से तुम्न मारे जावगे इम लिये वह अपनी बहिन का मब आनाद को ज्योढी उत्पन्न हुई मारता गया केवल आठवीं मीनाद श्रीकन अचरम रीति मे बच गये जिन्हो ने बाल अवस्थाही में अपने मामा कम का वध किया। जय विजय वैकुट के द्वारपाल थे जिन्हो ने शनकादिक को एक समय में बैकुट के द्वारे पर रोक दिया । इम पर शनकादिक ने सराप दिया हिम के प्रभाव ने उन दोनों ने पहिले हिरगयान और हिरगयकश्यप का चोला पाया, दृमरे जन्म में कुभकरन हुए और तीसरे मन में शिशपान कौर दन्लवक्र । मस्मिनी जी के भाई करम ने अपने यल के घमंड में अपनी वहिन और पिता की इच्छा के विरुद्ध रुक्मिनी जी का व्याह राजा शिशुपाल में ठहराया । जय घरात आई श्रीरुश्न ने रुक्म शिशुपाल और दूसरे भूर यार राजाओं का घमंड तोड़ने और अपने भक्त रुक्मिनी जी और टन के पिता की मनोकामना पूरी करने के हेतुरुक्मिनी को हर कर अपने पाप माह कर लिया । कुछ काल पीछे शिशुपाल और रुक्म दोनों Hि २ अवमर पर श्रीरुश्न के हाथ से मारे गये। रावन और चितावनी और उपदेश ३३ ९ रावना कहै मैं तो जम को भी मार डारौं। मेघनाथ कहै अपार बल मार है ॥२॥ कसिपा कहै पहलाद को मैं मारि डारौं । देखो मेरे भाई याही मेरो कौल है ॥ ३ ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो। भक्त-बछल सतनाम माहीं ठौर है ॥४॥ ॥ शव्द २८॥ नागिन ने पैदा किया नागिन डॅसि खाया । कोइ कोइ जन भागत भये गुरु सरन तकाया ॥१॥ सुंगी रिपि भागत भये बन माँ बसे जाई। आगे नागिन गाँसि के वोही डंसि खाई ॥२॥ नेजाधारी सिव बड़े भागे कैलासा । जोति रूप परगट भई परवत परकासा ॥ ३ ॥ सर नर मुनि जोगी जती कोइ बचन न पाया। नान तेल ढूंढ़े नहीं कच्चे धरि खाया ॥ ४ ॥ 'रावन लंका का राजा और मेघनाद उसका बेटा दोनों भारी शोधा ऐ अंत को रावन श्रीरामचन्द्र और मेघनाद लतनन सी हे हाप से नारे र.ये। नरियकश्यप यहा ईश्वर-द्रोही पा और अपने भगवत-तिबेटे प्रहलाद को शक्ति के अपराध मे मार डालने पर तत्पर पा।दर ने नरसिंहावतार घर पर अपने नर ते हिरण्यकश्यप का पेट पार कर उस का वध किया। गी प्रापिपी फया नित्रित अंग के आखिर शब्द की पहली कड़ी के नोट मे देखिये ।
गिताबनी और उपदेग नागिन इन संत से उहवाँ नहिं जावै । न बीर गुर मंत्र से आपै मरि जावे ॥५॥ ॥ श२९॥ नार तू धर्म पानी निन मीन पियासी।मोहिं सुनि सुनि आवत हाँसी।टे० करतु है, क्या मथुरा क्या कासी ॥१॥ र में बरतु धरी नहिं सूम, बाहर खोजन जासो॥२॥ नाग नाभि में हैं करनूरी, बन पन खोजत बासी ॥३॥ परगना भाई साधी, राहज मिलै अबिनासी ॥४॥ ।। पाठ ३०॥ अब निरंजन जाल पसारा ॥ टेक ॥ का पनाल जीव 'मृत-मंडल, तीन लोक घिरतारा । नन्दा बिरामिव प्रगट किया है, ताहि दिया सिर भारा १ बॉब ठाव नीरथ प्रत थाप्यो, ठगने को संसारा। माया मोह बठिन विस्तारा, आपु भयो करतारा ॥२॥ सतगुरु सब्द को चीन्हत नाही, कैसे होय उघारा । जारि भुजि कोइला करि डारै,फिरि फिरि लै अवतारा ॥३॥ अमर लोक जहें पुरुस विराजे, तिन का मूंदा द्वारा । जिन साहबसे भय निरंजन सेा तो पुरुप है न्यारा ॥ ४ ॥ फठिन काल ते बाचा चाहो, गहो सब्द टकसारा । कसबीर अमर करि राखाँ, मानौ सन्द हमारा ॥५॥ गद ३१॥ चंदा मालक यहि घट माहीं। अंधी आँखन सूझै नाहीं १ . पहिया चंदा यहि घट मूर। यहि घट गाजै अनहद तूर ॥२॥ 'मुगधि । .
पितायनी और उपदेश ३१ यहि घट बाजै तबल निसान। बहिरा सन्द सुनै नहिं कान३ जब लग सेरी मेरी करै । तब लग काज न एका सरै।४॥ जब मेरी समता मरि जाय । तब प्रभु काज सँवारे आय जबलगसिंघरहैरतमाँहिं । तर लग वह बन फूलै नाहिं उलट स्थार सिंघ को खाय । उकिठा* बन फूलै हरियाय ज्ञान के कारन करम कमाय । होय ज्ञान तब करम नसायप फल कारन फूलै वनराय। फल लागे पर फूल सुखाय॥॥ मिरग पास कस्तूरी बास । आपुन खोजै खोजै घात ॥१०॥ पार पिंड' मीन लै खाई। कहैं कबीर लोग बौराई॥११॥ ॥ शब्द ३२॥ सुनता नहींधुन की खबर अनहद का बाजा वाजता । रसमंद मंदिर वाजता वाहर सुने तो क्या हुआ ॥१॥ गाँजा अफीम और पोततामाँग और सराय पीवता। इक प्रेम रस चाखा नहीं अमली हुआ तो क्या हुआ ॥२॥ कासी गया और द्वारिका तीरथ सकल मरमत फिरे । गाँठी नखोली कपट की तीरथ गया तो क्या हुआ ॥३॥ पोथी किता बाँचता औरों को नित समुझावना । त्रिकुटी महल खेजै नहीं बक वा नरा क्या हुआ ।'2 काजी लिता खोजता करता नसीहत और को। महरम नहीं उस हाल से काजी हुआ ते. या हुअा ॥५॥ सतरंज चौपड़ गंजिफा इक नई है बदरंग की। बाजी न लाई प्रेम की खेडा जुआ तो क्या हुआ ॥६॥ मुखा । 'पिंटा।
रितापनी और उपदेश जोगी दिगम्बर सेवड़ा कपड़ा रंगे रंग लाल से । नाशिक नहीं उस नंग से कपड़ा नंगे से क्या हुआ ॥७॥ मंदिर झरोखे रावटी गुल चमन में रहते सदा । बहतेकवीरा हैं सही घट घट में साहव रमि रहा ॥८॥ ॥ शब्द ३३ ॥ जोगिया खेलियो बचाय के नारि नैन चलैं बान ॥टेक॥ गंगी की मिंगी करि डारी, गोरख' के लिपटान ॥१॥ कामदेव महादेव सतावै, कहा कहा करौं बखान ॥२॥ • गी ऋषि और महादेव जी को गित २ प्रकार से माया ने छला या कार्य मिश्रित अंग के आसिर शठप की पहली और चौथी कड़ियों मणिगी। +कहते हैं कि गोररानाय जोगी बन में तपस्या करते थे। एक रोज़ माया नी का रुप धारन करके उनके पास आई और कहा मेरे पति जंगल मे गेर सा गया अव में अकेली धन में डरती हूं दया करके गत को यही रहने दो मुबह को मैं चली जाऊँगी। उन्हों ने कहा अच्छा और एक कोठरी में भिवाड़ भीतर से बंद कराके वैठा दिया और कर दिया कि अगर मै भी आकर कहूं कि खोलो तो भी किवाड़ मत सोला। उसने कहा अच्छा-ऋपिजी बैठे भजन करने तो ध्यान में वह मी मनमा आने लगी उसका नक्श हदय पर पड़ गया पा बार बार वर्ण का रूप नजराई पड़ने लगा, भजन से उठ बैठे, आवाज़ दी कुंडी नागे। दमने कहा हम नहीं खोलेगे तुमने मना किया था। फिर बेचारे ६ दशम यम हो गये कि त तोड़के कोठे में कूद पड़े । दूसरे रोज़ मदी ६ पार दम्दो कंधे पर बैठा कर ले जाना पड़ा। उसने खूब एड लगाई रहा बा टरा घोडा घा इतके लिये मैंने लोहे की लगाम वनवाई पीय लो य नहीं आता था अब देखो मैं उसके सिर पर सवार हूं। मही आया तय माया रूपी ग्री को छोड़ के भागे ।
चितावनी और उपदेश आसन छोड़ि मुछंदर भागे, जल माँ मीन समान ॥३॥ कहैं कबीर सुनोभाई साधो. गुरु चरनन लिपटान ॥१॥ ॥ शब्द ३४॥ तेरेगनेकादिननगिचाना,सोहागिनिचेतकरीरी।टेक॥ घालापन तन खेल गँवायौ, तरुने चाल कुचाल । का उत्तर देइही रे सजनी, पिय पूछे जब हाल । समुझ मन का करिही री ॥ १ ॥ भवसागर औगाध भँवरवा सूझै वार न पार । केहि विधि पार उतरवी सजनी, नहिं खेवट नहिं नाष । खेवैया विन का करिही री ॥२॥ सील सुमति की चुनरी पहिरो, सत मति रंग रंगाय । ज्ञान तेल सों माँग सँवारी, निर्भय सेंदुर लाय । कपट पट खोल धरौ री ॥ ३ ॥ * मुछ्न्दरनाथ का ज़िक्र है कि एक रोज़ किमी ने कहा यि. राज्य का रस और आनन्द बड़ा मीठा है मुख्न्दरनाथ बोले अच्टा तजरया करना पाहिये । जोगी गति तो घी ही दूसरी देह में अपने जीव को प्रवेश करने की सामरघ रखते थे, एक राजा मरता पा उनकी देह मे प्रदेश किया और अपने चेले गोरखनाथ को कह दिया कि भोग विलाम में अगर हम भूल जावै तो तुर्म यह मंत्र आके पढ़ना । राजा जो मरता घा उठ खड़ा हुआ, रानी सब सुश हुई । एद. वरन रन संग भोग विलास किया मगर सौफ़ था कि क्सिी वक्त गोरखनाथ आ जायगा इस लिये हुक्म दिया कि कोई कनफटा जोगी शहर में न आने पाये। राग सुनने का राजा को बड़ा शौक था इस लिये नारसनाप नाना बजाना सीख कर गाने वालों के संग दरबारमे गये और जय नं पटा तष मुन्दरनाय को होश आया-फिर अपने पुराने चोटे मे आये।
पिताननी और उपदेग । जिन घर पेत करी री सजनी, नेहर नाहिं निबाह । ने नाम कहा ले करिहा, मरिहा भर्म भुलाय । पुरुप बिन का करिहा री ॥४॥ मासुर सत्त सब्द निर्वानी, त्रिकुटी संगम ध्यान । लिमिल जोत जहं निसु दिन झलकै, तीन बसै इक ठाम। सुरत दे निरत करो री ॥५॥ कबीर साई सतवंती, पिय के रंग रंगाय । TA लोक हाथै करि लेइ हैं, तेरो सोहाग सोहाय । महल निराराम करी री ॥६॥ ॥ श६३५ ॥ TT इंग मिले सुख होई ॥ टेक ॥ दुहाना पानी है बगुलन की कदर न जाने कोई ॥१॥ जा हंगा नारे प्यास छीर की कूप नीर नहिं होई । यह ना नीर सकल ममता को हंस तजा जस चाई ॥ २ ॥ पट दरमन पाखंड छानवे भेप घरे सब कोई। चार बरन औ बेद किताबें हंस निराला होई ॥ ३ ॥ यह जम नीन लाक को राजा बाँधे अस्त्र संजोई। नद जीन चला हंरा हमारे तब जम रहि है रोई ॥४॥ कहै कबीर परतीत नान ले जिव नहिं जाय बिगाई। ले ठारी अमर लोक में आवा गवन न होई ॥५॥ ॥ शब्द ३६॥ माया महा ठगनी हम जानी ॥ टेक ॥ निग्गुन फाँसि लिये कर डोले बोले मधुरी वानी ॥ १ ॥ घोकर । 'हथियार को ठीक करके ।
चितावनी और उपदेश हूं केसव के कमलाहोइ बैठी सिव के भवन भवानी॥ २ ॥ पंडा के भूरत होइ बैठी तीरथ में पानी ॥३॥ जोगीके जोगिन होइ बैठी राजा के घर रानी ॥ ४ ॥ काहू के हीरा होइ बैठी काहू के कौड़ी कानी ॥५॥ भक्तन के भक्तिन होय बैठी ब्रह्मा के ब्रह्मानी ॥६॥ कहै कबीर सुनो भाई साधो यह सब अकथ कहानी ॥ ७ ॥ ॥ ॥शब्द३०॥ ॥ अवधू अमल करै सो गावै । जौं लग अमल असर ना हावै तौं लग प्रेम न आवै।टेक॥ विन खाये फल स्वाद खान कहत न सोना पाये । बिन शुरु ज्ञान गाँठि के हीने नाहक बस्तु मुलाये ॥१॥ आँधर हाथ लेय कर दीपक करि परकास दिखावे । औरन आगे करै चाँदना आपु अँधेरे धावै ॥ २ ॥ आँधर आप आँधर दस गोहने जग में गुरु कहावै । मूल महल की खबर न जाने औरन को भरमावे ले अमृत मूरख रँड सींचे कलप-गुच्छ बिसरावै । लैके बीज उसर में बोवै पाहन पानी नावे ॥४॥ लागी आग जरै घर आपन मूरख घूर बुतावै पढ़ा गुना जो पंडित मूलै वाको को समुझावै ॥५॥ कहै कबीर सुना हो गोरख यह संतन नहिं भावै । है कोई सूर पूर जग माहीं जो यह पद अर्धावै ॥६॥ जाप में । पत्थर की मूरत पर पानी बढ़ाता है। घर में आग लगी है और धूर पर पानी डालना है ।
पितापनी और उपदेश ॥ ३८॥ तन घर सुखिया कोई न देखा जो देखा सेो दुखिया हो। उदय अस्त की बात कहतु हैं सब का किया विवेका हो ॥१॥ घाटे बाढ़े सय जग दुखिया क्या गिरही बैरागी हो । मुरुदेव अचारजदुख के डर से गर्भ से माया त्यागी हो ॥२॥ जोगी दुसिया जंगम दुखिया तपसी को दुख दूना हो । आगास्ना समको व्यापे कोई महल न सूना हो॥ ३ ॥ गांप कहीं तो कोई न माने झूठ कहा नहिं जाई हो । जाना पिस्नु महेसर दुखिया जिन यह राह चलाई हो ॥४॥ गयधूदुखियाभूपति दुखिया रंक दुखी विपरीती हो। की कारगकल जग दुखिया संत सुखी मन जीती हो॥५॥ ॥ शव्द ३९ ॥ मानुष जनम मुधारो साधो धोखे काहे बिगाड़ो हो। गागमय बहुर नहिं पैहो जनम जुआ मति हारोहो ॥१॥ गुड़ा गुड़ी खियाल जिन भूला मूल तत्त ली लाओ हो। जब लग घट सोंपरिचे नाहीं तब लग कछु नहिं पाओ हो २ नीरव प्रत और जप सप संजम या करनी मत भूलो हो । सरम फंद में जुग जुग पड़िहो फिर फिर जोनि में फूलो हो॥३ ना कछु न्हाया ना कछुधीयाना कछु घंट बजाया हो। ना कछुनेनी नाकछुधोती ना कछु नाचा गाया हो ॥४॥ निंगी मेल्ही भभूत औ बटुआ साँई स्वाँगसे न्यारा हो । कहूँ कयोर मुक्ति जो चाहो मानौ सब्द हमारा हो ॥५॥ 'मरदेव मुनि जो यारह यरम गर्भ में रहे पैदा होते ही जंगल को गयर के भय में भागे । 'मिंगी मुंह से बजाने का याजा और सेलही नाम मामों के परितने की मेरानी का है। - पितावनी सौर उपदेश ४२ ॥ शन्द४॥ जिन के नाल ना है हिये ॥ टेक ॥ क्या होवै गल माला डाले, कहा सुमिरनी लिये ॥१॥ क्या होवै पुस्तक के बाँचे, कहा संख धुन दिये ॥२॥ क्या होवै कासी में रसि के, क्या गंगा जल पिये ॥३॥ हो कहा बरत के राखे, कहा तिलक सिर दिये ॥४॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, जाता है जम लिये ॥५॥ ॥श ४२ ॥ ॥ साधो पाँड़े निपुन कसाई ॥ टेक ॥ चकरी मारि भेडि को धाये, दिल से दरद न आई ॥१॥ करि अन्नान तिलकदै बैठे, विधि साँ देवि पुजाई ॥२॥ आतम मारि पलक में दिनसे, रूधिर की नदी बहाई ॥३॥ अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माहिं अधिकाई ॥2॥ इन से दिच्छा सब कोइ माँगे. हँसी आवे मेहिं भाई ॥३॥ पाप कटन को कथा सुनावै, करम करावें नीचा ॥३॥ धूड़त दोऊ परस्पर दीखे, गहे चाँहि जम खींचा ॥७॥ गाय बधै से तुरुक कहावै, यह क्या इन से छोटे ॥८॥ कहैं करीर सुनो भाई साधो, कलि में ब्राह्मन खोटे ।। ॥ श६४२॥ को सिखवै अधमन को ज्ञाना ॥ टेक ॥ साध की संगतकबहुंनकीन्ही रटत रटतजग जन्म सिराना १ दया धर्म कबहूं नहिं चीन्हा, नहिंगुरु सब्द समाना ॥२॥ मंत्र। बीता।
पोर 27 --- 1 - - --- - ग्रेच्या रात्रै ज्ञाधू आय तो नहिं घर दाना॥३॥ जमपुर जैहै.मारहि मार उठ घमसाना।४। ॥ शद ४३ ॥ कोड करै भरमना ना रे, 1, जगात दुख दुन्द भारी ॥१॥ के जाल में जक्त रात्र फैसि रहा, जग को नोनि जम देव डारी ॥२॥ भी नहीं राब्द बूत नहीं, पीटा नहीं गर्भ धारी ॥३॥ पी नहीं मर्म पूजत फिरे, यिनन क्यों फोरि डारी ॥४॥ मांदगा जीव धरि थाप निरजीव को, जीव हतन अपराध भारी ॥५॥ व का ददं वेदर्द कसकै नहीं, जीन के बाद नित जीव मारी ॥६॥ एक पग ठाढ़ कर जोर विनती करे, शबल जाउं सरन तिहारी ॥ ७ ॥ वहाँ कछु है नहीं अरज अंधा करे, कठिन डंडौन नहिं टरत टारो ॥८॥ यही आकर्म से नर्क पापी पड़े, करम चंडाल की राह न्यारी ॥६॥ चन्त मौभाग जिन साध संगत करी, ज्ञान की दृष्टि लीजे विचारी ॥१०॥ 'कुकर्म ।
मिसावनी लौर उपदेश ४३ सत्त दावा गही आपु निर्भय रहौ । आपु को चीन्हि लखु नाम सारी ॥११॥ कह कबीर तू सत्त पर नजर कर । बोलता ब्रह्म सर घट उजारी ॥ १२ ॥ ॥ शब्द ४४॥ करो रे मन वा दिन की ततवीर ॥ टेक ॥ जब जमराजा आनि पड़ेंगे नेक धरत नहिं धीर ॥१॥ मुंगरिन मारि के प्रान निकासत नैननभरि आयो नीर॥२॥ भवसागर इक अगम पंथ है नदिया वहत गंभीर ॥३॥ नाव न बेड़ा लोग घनेरा खेक्ट है वेपीर ॥४॥ घर तिरिया अरधंगी बैठी सातु पिता सुत माल मुलुक की कौन चलावै संग न जात सरीर ॥६॥ लै कै योरत नरक कुंड में व्याकुल होत सरीर ॥७॥ कहत कबीर नर अब से चेतो माफ होय तकसीर ॥६॥ वीर ॥॥ ॥ शब्द ४५ ॥ सुख सिंध की सैर का स्वाद तब पाई है चाह का चौतरा भूलि जावै । वीज के माहिं ज्यों वृच्छ विस्तार यों चाह के माहिं सब रोग आवै ॥१॥ दृढ़ वैराग में होय आरुढ़ मन चाह के चौतरे आगदीजै। कहैं कबीर यों होय निरवासना तत्त से रत्त होय काज कीजै ॥२॥ तदवीर।
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नितावनी और उपदेश
॥ द४६॥
मायो भाई जीवत ही को आसा ॥ टेक ।।
जीवन सगुझे जीवत बूस जीवत मुक्ति निवासा ।
जिगत करमको फाँसि न काटी मुए मुक्ति की आसा॥१॥
मन छूटे जित्र मिलन कहतु है सो सब झूठी आसा ।
मिला सा तनहुं मिलेगा नहिं तो जमपुर बासा॥२॥
का दूर दूं मन लोभी मिटै न गर्भ तरासा ।
गाध जंत की करे न बंदगी कट करम की फाँसा ॥३॥
गत ग? सतगुरु को चीन्है सत्त नाम विस्वासा ।
कबीर साधन हितकारी हम साधन के दासा ॥४॥
॥ शव्द४७ ॥
आगे समुक्ति परैगा भाई टेक॥
यहाँ अहार उद्ग भर खायो बहु विधि मास बढ़ाई॥१॥
जीव जन्तु रस मार खातु हो तनिक दरद नहिं आई ॥२॥
पहं नो परधन लूटि खातु हौ गल विच फाँसि लगाई ॥३॥
निन के पीछे तीन पियादा छिन छिन खबर लगाई ॥४॥
माघ संत की निंदा कीन्ही आपन जनम नसाई ॥५॥
परग परग पर काँटा धसिहै यह फल आगे आई ॥६॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो दुनियाँ है दुचिताई ॥॥
गाँच कहै तो मारा जावै झूठे जग पतियाई ॥८॥
॥शब्द४८॥
रहना नहिं देस बिराना है ॥ टेक ॥
यह मनार कागद की पुड़िया बूंद पड़े घुल जाना है॥१॥
चितावनी और उपदेश यह संसार काँट की बाड़ी उल पुलझ मरि जाना है ॥२॥ यह संसार ताड़ औ झाँखर आग लगेपरि जाना है ॥३॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो सतगुरु नाम ठिकाना है॥४॥ ॥ शब्द ४९॥ घागों ना जा रे ना जा तेरे काया में गुलजार ॥टेका करनी क्यारी बोइ कर रहनी करु रखवार । दुर्मति काग उड़ाइ के देखै अजब यहार ॥१॥ सन माली परयोधिये करि संजस की वार । दया पौद सूखै नहीं छिमा सींच जल ढार ॥२॥ गुल औ चमन के बीच में फूला अजर गुलाब । मुक्ति कली सतमाल को पहिरु गूंधि गल हार ॥३॥ अष्ट कमल से ऊपजै लीला अगम अपार । कहै कबीर चित चेत के आवागवन निवार ॥2॥ ॥ पद ५ ॥ सुमिरन बिन गोता खावोगे ॥टेक॥ मुट्ठी बाँधे गर्भ से आये हाथ पसारे जावोगे ॥१॥ जैसे मोती फरत ओस के बेर भये झरि जावोने ॥ जैसे हाट लगावै हटवा सौदा बिन पछितावोगे ॥३॥ कहै कबीर सुनो भाई साधो सौदा लेकर जावोगे ॥2॥ ॥ शब्द ५१ ॥ अरे मन समुझ के लादु लदनिया ॥टेक॥ काहेक टुवा काहेक पाखर काहेक भरी गौनियाँ ॥१॥ 'दुकानदार।
रिवानी और उपदेग
मग सुरति कै पाखन पुन्न पापभरी गौनियाँ ॥२॥
--- - लोग जगाती लागे छीन ले करधनियाँ ॥३॥
बार तो यहीं कर आई आगे हाट न बनियाँ ॥४॥
पानी पी तो यहीं पी भाई आगे देस निपनियाँ ॥४॥
नीर गुनो भाई रात्रिो रात्त नाम का बनियाँ ॥६॥
॥ गन ५२ ॥
दिने पन भजन बिना दुख पैही ॥ टेक ॥
लिा जनम भून का पेही सात जनम पछितैही।
- पर ले पानी पैही प्यासन ही मरि जैहौ ॥१॥
हो उनम गुवा का पैही बाग बसेरा लेहो ।
दृष्ट पंग्य बाज मंडराने अधफड़ प्रान गँवैही ॥२॥
बाजीगर के बानर होडही लकडिन नाच नचेही।
ऊंच नीच हाथ पसरिहो माँगे भीख न पैहो ॥३॥
नली के घर बैला होइहा आँखिन ढाँप हुँपै हो।
कोन पचास घर में चलिही वाहर होन न पैही ॥३॥
पंचवाँ जनम ऊंट के पैही बिन तौले बोक्लदैहो ।
में तो उठे न पैहौ घुरच घुरच मरि जैहो ॥४॥
बाली घर के गदहा होइहौ कदी घास ना पैहो ।
गादी तादि आपु चढ़ि बैठे लै घाट पहुंचेहो ॥६॥
पंछी मां तो कौवा होइहौ करर करर गुहरैहौ ।
उड़ि के जाइ मैला पर बैठौ गहिरे चोंच लगैही ॥७॥
मननाम की देर न करिही मनहीं मन पछितैहो ।
कहे कबीर मुनो भाई साधो नरक निसानी पैहो ॥८॥
चितवनी और उपदेश ४३ ॥ शष्ट ५३ ॥ माल जिन्हों ने जमा किया सौदा परिहारे जाते हैं ।टेका ऊँचा नीचा महल बनाया जा बैठे चौबारे हैं। सुबह तलक तो जागे रहना नाम पुकारे जाते हैं ॥१॥ जग के रस्ते मत चल प्यारे ठग या पार घनेरे हैं। इस नगरी के बीच मुताफिर अक्तर मारे जाते हैं ॥२॥ भाई बंध और कुटुंब कबीला सब ठग ठग के खाते हैं। आया जम जब दिया नगारा साफ अलग हो जाते हैं ३ जोरू कौन खसम है किसका कौन किसी के नाते हैं। कहैं कबीर जो बँदगी गाफिल काल उन्हीं को खाते हैं ? ॥ शब्द ५४ ॥ साधो यह तन ठाठ लॅबूरे का ॥ टेक ॥ ऐचत तार मरोरत खूटी, निकसत राग हजूरे झा ॥१॥ टूटे तार बिखरि गई खूटो हो गया धूरम यूरे ज्ञान॥ या देही को गर्व न कीजै, उड़ि गया हंस तेंयूरे का॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो , अगम पंथ कोइ सूरे का ? न ॥ शब्द ५५ ॥ नहर में दाग लगाय आइ चुनरी॥ टेक ॥ ऊ रंगरेजवा के मरम न जाने. नहिं मिलै धोविया कौन करै उजरी ॥ १ ॥ तन के कूड़ी ज्ञान के सौंदन सायुन महँग बिचाय या नगरी ॥२॥ 'रोहना।
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गितावनी और उपदेश
पतित ओढ़ि के चली ससुररिया,
गोंवाँ के लोग कहैं बड़ी फुहरी ॥ ३ ॥
व्हें कनीन सुनो भाई साधो,
विन सतगुरु कबहूं नहिं सुधरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६॥
अरे इन दूहुन राह न पाई ॥ टेक ॥
हिंट अपनी करे बड़ाई गागर छुवन न देई ।
कन्या के पायन तर सावै यह देखो हिंदुआई ॥ १ ॥
गगलमान के पीर औलिया मुर्गी मुर्गा खाई ।
माला केरी बेटी ब्याह घरहिं में करै सगाई ॥२॥
बाहर गे इक मुर्दा लाये धोय धाय चढ़वाई।
मत्र गरिखयाँ मिलि जेंवन बैठी घरभर करै बड़ाई ॥३॥
हिंदुग की हिंदुबाई देखी तुरकन की तुरकाई ।
कहै कबीर सुनो भाई साधे। कौन राह है जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
मिपाही मन दूर खेलन मत जाव ॥ टेक ॥
दूर ग्वेलन से मनुआँ दुखित होय, गगन मॅडल मठ छावा।
यहि पार गंगा वाहि पार जमुना, वीच सरसुती न्हाव ॥२॥
पाँचको मारिपचीस को वस करि, तीनको पकरिअँगाव३
कहै कबीरा धरमदास से, सब्द में सुरत लगाव ॥४॥
॥ शब्द ५८ ॥
हर लागै और हाँसी आवै, अजब जमाना आया रेगटेक॥
धन दौलत ले माल खजाना, वेस्या नाच नचाया रे ॥
मुट्ठी अन्न साध कोइ माँगै, कहैं नाज नहिं आया रे॥१॥
चितावनी और उपदेश ४ कथा होय तहँ स्रोता सावें, वक्ता मूड़ पचाया रे ॥ होय जहाँ कहिंस्वाँग तमासा, तनिक ननोंद सतायारे २ भंग तमाखू सुलफा गाँजा, सूखा खूब उड़ाया रे । गुरु चरनामृत नेम न धारै, मधुवा चाखन आया रे ॥३॥ उलटीचलन चलीदुनियाँ में, ता तें जिया घबराया रे । कहत कबीर सुनो भाई साधो, फिर पाछे पशिताया रे ॥४॥ ॥ शन॥ अवधू भजन भेद है न्यारा ॥ तक क्या गाये क्या लिखि रतलाये क्या भर्म संसारा। क्यासंध्या तर्पन के झीन्हे जो नहिं तन विचारः ॥१॥ मूड़ मुड़ाये सिर जठा रखाये यया लन दाये छाग । क्या पूजा पाहन को कीन्हे क्या फल मिये अहारा ॥३॥ यिन परिचे साहिब हो बैठे विपर करें गौकार । ज्ञान ध्यान का मर्म न जाने वाद करै अहंका॥३॥ अगम अथाह महा अति गहिरा बीजनखेन निवारा। महा से ध्यान मगन है बैठे काट करम नी बारा ॥2॥ जिनके सदा अहार अंतर में केवल तत्त विचारा। कहैं कबीर सुना होगोरखतारौं सहित परिवारा ॥५॥ 'शराब । राख । 'टा । इन डिभी भेषों ने अन्न सेना घो जो अगम अपाह और नहा गहिरा है अपने हदय-स्पी रेल ने नहीं वोया:जिन मच्चे भक्तो ने उसे पता अर्थात नया वीमद हो काट दर ध्यान में मगन हो बेटे । .
शिवानी और उपदेग ॥ श६६०॥ २ अब अच्छरहूं सौं न्यारा ॥ टेक ॥ तुम पवना गगन चढ़ावो करो गुफा में वासा। गगना पवना दोनों बिनमें कहँ गयो जोग तुम्हारा ॥१॥ गगना गढ़े जोती झलकै पानी मद्धे तारा। नीर बिनसि गे तारा निकर गयो केहि द्वारा ॥२॥ • पर तारि दुलैची जोगिन तारी लाया । : गमेर पर साक उड़ानी कच्चा जोग कमाया ॥३॥ वितरी पिंगला विनसे बिनसै सुखमनि नाड़ी। व उनमुनि की तारी टूटे तब कह रही तुम्हारी ॥४॥ गहन बैराग :- है भाई अटके मुनिवर जोगी। अच्छा ली का सम्म बतावै सेा है मुक्ति विरोगी ॥५॥ कह अम् अकह दोऊ तें न्यारा सत्त असत्त के पारा । करें कबीर ताहि लखि जोगी उतरि जावभवपारा॥६॥ ॥ शब्द ६१ ॥ नाव से खबरदार रहो भाई ॥ टेक ॥ रानगुरु दीन्हा माल खजाना राखो जुगत लगाई। पान “नी घटने नहिं पावै दिन दिन बढ़े सवाई ॥१॥ छिमा सील की अलफी' पहिने जुगति लँगोट लगाई। दया की टोपी गिर पर दैके और अधिक बनि आई॥२॥ तु पाय गाफिल मत रहना निसि दिन करो कमाई। यः के भीतर चोर लगतु हैं बैठे घात लगाई ॥३॥ 'उनी आगन । 'साधुओं का यस विना होली का ।
चिंताटनी और उन्देश ५९ तन बंदूक तुमति का सिंगरा नीति का राज ठहकाई । सुरति पलीता हर दम सुलगै वस पर राखु चढ़ाई ॥४॥ वाहर वाला खड़ा सिपाही ज्ञान गम्म अधिकाई। साहब कबीर आदि के अदली हर दम लेत जगाई ॥५॥ ॥शम्म ६२॥ साधो देखो जग दौराना । साँचि कही तो मारन धावै झूठे जग पतियाना॥टेक।। हिन्दू कहत है राम हमारा मुसलमान रहमाना । आपस में दोउ लड़े मरतु हैं मरम कोई नहिं जाना ॥१॥ बहुत मिले माहिं नेमी धर्मी मात करें असनाना । आतम छोड़ि पपाने पूजै तिन का धोया ज्ञाना ॥२॥ आसन मारि डिंभ धरि बैठे मन में बहुत गुमाना । पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ त भुलाना ॥३॥ माला पहिरे टोपी पहिरे छाप तिलक अनुमाना। साखी सन्दै गावत भूले आतरः सनर न जाना ।। घर घर मंत्र जो देत फिरत है माया के अभिमाना। गुरुवा सहित सिप्य सवधूड़े अंतकाल पछिताना ॥शा बहुतक देखे पीर औलिया पढ़ें किताब कुराना । करें मुरीद कयर बतलाएँ उनहूं खुदा न जाना ॥३॥ हिन्दू की दया सेहर तुरकन की दोनों घर से भागी । वह करें जिरह वो झटका मारै आगोज घर लागी॥॥ या विधि हँसत घलत हैं हमको आप कहावे त्याना । कहै कबीर सुनो भाई साधो इन में कौन दिवाना ।।८।।
शिवानी और उपदेश ॥ गम ६३ ॥ मेने जिगरा बड़ा अंदेसमा मुसाफिर जैहो कौनी ओर।टेक। गागार कहर नर नारी दुइ फाटक घनघोर । पनी नाक फाटक के परिहो कठिन झिझार ॥१॥ ', "नको अगाडी बहती विषम धार जल जोर। का मन तुप गाफिल सेवाइहवाँ मार औ तोर ॥२॥ महिनामानि को साहय सेनाहिन कठिन कठोर। Inf. नोध है राजा बसे पचीसा चोर ॥३॥ .5 इस बम पछिम दिसताराों करो निहोर। मानक माह ताहि लावे तब पैदा निज ओर ॥४॥ मट पाछिला पंडा पकड़ा पसरा मना बटोर । का सुनाभाई साधो तब पैहै। निज ठौर ॥५॥ ॥ शब्द६४॥ व्यागों कछुधिर न रहाई, देखत नैन चल्यो जग जाई॥१ इजलख पून सवालख नाती, जा रावल घर दिया न वातीर लंका ना कोट समुद्र सी खाई, जा रावन की खबर न पाई३ ने महल रूपे के छाजा, छोडि चले नगरी के राजा ॥४॥ कोइरीमहलकोई करौटाटी,उड़िजाय हंस पड़ीरहेमाटी आइन नंग न जात संगाती, कहा भये दल बाँधे हाथी॥६॥ को कबीर अंत की बारी, हाथ झारि ज्यों चला जुवारी॥७॥ ॥ शब्द६५ ॥ पीले प्याला हो मतवाला, प्याला नाम अमी रस का रे ॥टेक॥
चितावनी और उपदेश
५३
बालपना सब खेलि गँवाया,
तरुन भया नारी बस का रे ॥१॥
दिरध भया कफ वाय ने घेरा
खाट पड़ा न जाय खिसका रे ॥२॥
नामि कँवल बिच है कस्तूरी,
जैसे मिरग फिरै वन का रे ॥३॥
बिन सतगुरु इतना दुख पाया,
वैद निले नहिं इस तन का रे ॥ ४ ॥
मातु पिता बंधू सुत तिरिया,
संग नहीं कोइ जाय सका २ ॥ ५ ॥
जब लग जीव गुरु गुन गा ले,
धन जोबन है दिन दस का रे ॥६॥
चौरसी जो उवरा चाहै,
छोड्ड कामिनी का चसका रे ॥७॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो,
नख सिख पूर रहा विप का रे ॥ ८ ॥
॥ शब्द६६॥
लखै रे कोइ बिरला पद निरवान ॥ टेक ॥
तीन लोक में यह जन राजा.
चौथे लोक में नाम निसान ॥ १ ॥
याहि लखत इन्द्रादिक थकि ये
ब्रह्मा थकि गे पढ़त पुरान ॥२॥
५५
मिशतावनी और उपदेय
गोरखदत्त बशिष्ठ व्यास मुनि,
सिम्भू थकि गे धरि धरि ध्यान ॥३॥
कहैं कबीर ललै कोइ बिरला,
जिन पायो सतगुरु कर ज्ञान ॥४॥
॥ शब्द ६७॥
जारौं मैं या जग की चतुराई ॥ टेक ॥
सांई को नाम न कबहूं सुमिरै, जिन यह जुगति बताई ॥१॥
जोरत दाम काम अपने को, हम सैहैं लड़िका विलसाई ॥२॥
सो धन चोर मूसि ले जा रहा सहा ले जाय जमाई ॥३॥
यहमाया जैसे कलवारिन, मन पिलाय राखै बौराई॥४॥
इक तो पड़े धूरि में लो, एक कहैं चोखी दे भाई ॥५॥
नुर नरमुनि माया छलिमारे, पीर पैगम्बर कोरिखाई।६।
कोइइकभागयचेसतसंगति, हाथमलैतिनको पछिताई॥णा
कहैं कबीर सुनाभाई साधा, लै फाँसी हमहूं को आई॥८॥
गुरु की दया साधकीसंगति बचिगे अभय निसानबजाई।
-
॥ शब्द ६८॥
जियरा जावगे हम जानी ॥ टेक ॥
पाँच तत्त को बनो है पिंजरा जा में वस्तु बिरानी।
आवत जावत कोइ न देख्यौ डूबि गयौ घिनु पानी ॥१॥
राजा जैहैं रानी जैहैं और जैहैं अभिमानी।
जोग करते जोगी जैहैं कथा सुनंते ज्ञानी ॥२॥
दितावनी सौर उपदेश
पाप पुन्न की हाट लगी है धरम दंड दरवानी ।
पाँच सखी मिलि देखन आई एक से एक सियानी॥३॥
चंदी जैहैं सुरजौ जैहैं जैहैं पवन औ पानी ।
कह कबीर इक भक्त न जैहैं जिनकी मति ठहरानी॥१॥
n शब्दहर॥
मन तू क्यों भूला रे भाई । तेरी सुधि बुधि कहाँ हिराई १
जैसे पंछी रैन घसेरा बसै रच्छ में आई।
भार भये सब आपु आपु को जहाँ तहाँ उडि जाई॥२॥
सुपने में ताहि राज मिल्यो है हाकिम हुकम दुहाई ।
जागि पड्यौ तब लाव न लसकर पलक खुले सुधि पाई३
मातु पिता बंधू सुत तिरिया ना कोई सगो संगाई।
यह तो सर स्वारथ के संगी झूठी लोक बड़ाई ॥१॥
सागर माही लहर उठतु हैं गनिता गनी न जाई।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो दरिया लहर समाई ॥५॥
॥ शब्द ॥
मानत नहिंमनमोरा साधो मानत नहिं मन मोरारोटेक
बार बार मैं कहि समजावौं, जग में जीवनथोरा रे ॥१॥
या काया को गर्य न कीजै, क्या साँवर क्या गोरारे॥२॥
विनाभक्ति तन काम न आवै, कोटि सुगंधि चमोरारे ॥३॥
या माया जिनि देखि रे भूलो, क्या हाथी क्या घोड़ारे॥४॥
जोरि जोरि धन बहुत विगूचे, लाखन कोटि करोरा रे ॥५॥
दुयिधादुरमति औ चतुराई. जनम गया नर चौरारे ॥६॥
पितानगी और उपदेश जाईगनि मिलोसत संगति,सतगुरु माननिहोरा रे॥७॥ ऐन उठाइ परत सुई गिरिगिरि.ज्यों बालक विनकोराँ'२८ कहे कबीर चरन चित राखो.ज्यों सूई बिच डोरा रे॥ ॥ गन्द १२ ॥ अनधू माया तजी न जाई ॥ टेक ॥ गिरा तजि के बरतर वाँधा बस्तर तजि के फेरी । का जिके चेला कीन्हा तहुं मति माया घेरी ॥१॥ कित बाग में अरुझी माहिं रही अरुभाई। पोरं । वह छूटे नाहीं कोदिन करै उपाई ॥२॥ काम बजे ते क्रोध न जाई क्रोध तजे ते लोभा। लोभ नजे अहंकार न जाई मान बड़ाई लोभा ॥३॥ मन बंगगी माया त्यागी सब्द सुरत समाई। कहै कबीर सुनो भाइ साधो यह गम विरले पाई ॥४॥ ॥ शब्द ७२॥ नाम भजा सोई जीता जग में,नाम भजासोई जीताटक हाथ मुमिरिनी पेट कतरनी, पढ़े भागवत गीता रे। हिरदय सुद्ध किया नहिं वौरे,कहत सुनत दिन बीता रे॥१॥ आन देव की पुजा कीन्ही, गुरु से रहा अमीता रे। धन जोबन तेरा यहीं रहेगा. अंत समय चलि रीता रे॥२॥ बावरिया ने बावर डारी, फंद जाल सव कीता रे। बहन कयीर काल आयखैहै, जैसे मृगको चीतारे ॥३॥ 'गोद। में पितापनी और उपदेन ५3 ॥ शब्द ७३ ॥ दुलहिन अंगिया काहे न धोवाई ॥ टेक ॥ बालपने की ली अंगिया त्रिपय दाग परिजाई ॥१॥ बिन धोये पिय रीझत नाहीं सेज से देत निराई ॥२॥ सुमिरन ध्यान के साबुन करि ले सत्तनान दरियाई ॥३॥ दुविधा के बद खोल यहुरिया मन के मेलामाई ॥ चेत करो तीनों पर बीते अब तो रावत नगिचाई ॥५॥ चालनहार द्वार है ठाढ़े अब काहे पछिताई 1 कहत कीर सुनोरी बहुरिया चित अंजन दे आई ॥७॥ ॥ मनः ७४ ।। नाम सुमिरि पछितायगा ॥ ॥ पापीजियरा लेभ करतु हैं आज झाल उठि जायगा ॥१॥ लाल लानी जनल गंवाया माया सरल मुलागा ॥ धन जीवन कागनकीजै कागद ज्योंगलि जायगा ॥३॥ जा जल आय रु गहि पटनादिन कछु न बसायमा सुमिरन भजन दया नहिं कीनी तो मुख चोटा-सायगा ५ धर्मराय जब लेखा माँगै दया सुख लेके जायगा ॥३॥ कहत कबीर सुनो माह साधे साध संग तरि जायगा ॥ ॥ १५ ॥ अभागा तुम ने नाम न जाना ॥ टेक ॥ करिके कौल उहाँ से आयौ इहवाँ भरम भुलाना । सत्त नाम बिसराय दिया है माह मया लिपटाना ॥१॥ दुलहिन । दाल । : छोट।
मिताली और उपदेग
पूल तर लसे
मान पिता गुन बंधु कुटुम्त्री ओ बहु माल खजाना ।
। कि जाजम ले चलि रात्र ही होय बिगाना ॥२॥
सुगना
लिपटाना
गान गई उधियानी फिर पाछे पछिताना ॥३॥
मागोला पाइ के का कर
गुमाना
ग पानी के नुलगुला छिन माहिं मिलाना॥४॥
की गनो भाउ साधो देखो जग बौराना।
{ गये बहुरि नहिं आवो लही जो सत परवाना॥५॥
॥ गन्द६॥
मारी चुनरी में परि गयो दाग पिया॥ टेक ॥
पाँच नन्द की बनी चुनरिया सेारह सै बँद लागे जिया॥१॥
यह चुनरी मोरे मैके तें आई ससुरे में मनुवाँ खेाय दिया॥२॥
मनिमलि धोई दाग न छूटे ज्ञान को सावुन लाय पिया॥३
कहै कबीरदाग कर छुटि है जब साहब अपनाय लिया ॥४
॥ शब्द 99॥
गुरु से लगन कठिन है भाई।
लगन लगेविन काज न सरिहै जीव प्रलय होइ जाई॥टेक
जैसे पपिहा प्यारा बुंद का पिया पिया रटि लाई ।
प्याने प्रान तलफ दिन राती और नीर ना भाई ॥२॥
जने मिलाद सनेही सब्द सुनन को जाई ।
सब्द नुन औं भान दान दे तनिको नाहिं डेराई ॥२॥
चितपती और उपदेश जैसे सती चढ़ी सत ऊपर पिट की राह न भाई। पावक देख हरे वह नाहीं हँसत रेठ रानाई ॥३॥ दो दल सन्मुख आन जुड़े हैं सूरा लेद लड़ाई । टूक टूक होइ गिरे धरनि पर खेत छोडि नहिं जाई ॥४॥ छोड़ा तन अपने को आसा निर्भय है गुन गाई। कहत कबीर सुनो भाइ साधो नाहिं तो जनम नसाई ॥५॥ ॥ भूत 9:11 मैं मेरा तेरा मनुआँ कैसे इक होइ रे ॥ टेक ॥ मैं कहता ही आँखिन देखी, तू कहता कागद को लेखी। कहता सुरक्षावन हारी, तू राख्यो उसकाइ ३ ॥१॥ मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है लोड रे । मैं कहता निमोही रहियो, तू जाना है महि ।। २ ।। जुगन जुगन समुझावत हारा. कही म मानत कोहरे। तू तो रंडी फिरै विहंडी, सब धन हारे खोड रे ॥ ३ ॥ सतगुरु धारा निर्मल बाहै, वा में काया घोड रे । कहत कयीर सुनो भाइ साधो. तय ही वैसा होइ रे ॥2॥ ॥ शब्द: ॥ अवधू अंध कूप अँधियारा ॥ टेक ॥ या घट भीतर सात समुंदर याहि में नट्टो नारा ॥१॥ या घट जीतर कासी द्वारिका याहि में ठाकुरद्वारा ना राग।
२. मितानी और उपदेश न भीतर चंद्र सूर है याहि में नोलख तारा ॥३॥ - घोर सुनो भाइ साधो याहि में सत करतारा ॥४॥ ॥ शन८० ॥ जागो मेरी गुप्त सोहागिन जाग री ॥टेका। तन भोजनमोहनींद में उठिकेभजनियाँ में लागरी 1ो सुनो सरवान दै उठत मधुर धुन रागरी॥२ ..::गि शीम चरनन दे भक्ति अचल बर माँग री॥३ पीर गुनो भाउ साधा जगत पीठ दै भाग री॥४ ॥ शब्द ८१॥ मंगा हो सतगुरु नान उरी ॥ टेक ॥ जगनण साधन कछु नहिं लागत खर्चत ना गठरी ॥१॥ पनि मंत्ति सुख के कारन या सों भूल उहि मुख सत्त नाग नहिं निकसत तो मुख धूरि परी ॥३ कान कवीर सुनो भाइ साधो गुरु चरनन सुधरी ॥४॥ परी ॥२॥ ॥ शब्द ८२॥ अवधू भूले को घर लावै, सो जन हम को भावै ॥टेक।। घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिं जावै। का के गये कलपना उपजे, तब घी कहाँ समावै ॥१॥ घर में जुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरु अलख लखावै। मुन्न में रह समाना, सहज समाधि लगावै ॥२॥ "क्ष्य से। सहज उनसे དེ ཁོང ३. : 118 " सन्त हैं कार कुन महा .. । र! को ज्ञान कात पर नजर रात अँधेरी चोरा हात लाया आँधरनिरग बनै वनडोले लागो वानखबरनावती महा मोह की नीइ परी है चुनरी लेगा तुहागिल तन की। कहैं कबीर सुनो भाइ त्ताधो गुरु जाने हैं पराये नन की ? ॥ रचना नारी रे ॥३॥ समुझ नर मूढ़ विगारी रे ॥ टेक॥ आया लाहा कारने. ते क्यों पूंजी हारी रे ॥१॥ गर्भ वास बिनती करी, सो ते आन बिसारी रे ॥२॥ माया देख तू भूलिया. और सुन्दर बड़े साह आगे गये, ओछा व्यापारी रे ॥en टौंग सुपारी छाँड़ि के, क्यों लादी खानी रे ॥५॥ तीरथ यरत में भटकता, नहिं तन विचारी रे ॥३॥ आन देव को पूजना, नेरी होगी म्बाग रे ॥२॥ 'नान ।
Pानी और उपदेग --: - नग ले चला, करि पल्ला भारी रे ॥८॥ : --- जग यों चला, जैरो हारा ज्वारी रे ॥९॥ ॥ गला ५॥ - लि मंगत माओ मेरी राजनी, भई प्रभात* - गई रजनी ॥१॥ हो भेना, सतगुरु सन्द सेमुकले सैना ॥२ 11i मागग्तगंग लाओ, तब हंसाअपना घरपाओ॥३ {र फूली फुलयारी, मनसामारिकरोरखवारी॥ गांच अमृत फल लागा, पावैगा कोइ मंत सुभागा ॥५ की कबीर गूंगे की सेना, अमी महा रस झाँकै नैना ॥६ ॥ शब्द ८६॥ राचमुच खेल ले मैदाना ॥ टेक ॥ मदद गुरु को दृढ़ करि बाँधो, सुरति की खींच कमाना। लड़ावीन करु मन को वस करि मारो मोह निदाना ॥१॥ पनका फरी ज्ञान का गदका, बाँधि मरहटी वाना। मनमुख जाय लहै जो कोई, वही सूर मरदाना ॥२॥ रंजक ध्यान ज्ञान की पही, प्रेम वरूद खजाना। भरि भरिनोपाडाझड़ मारो, लूटो मुलुक विगाना ॥३॥ कई कबीर मुनो भाइ साधो, प्रेम में ही मस्ताना। जानर लोक में डेरा दे करि, सतगुरु हना निसाना ॥४॥ + मुबह । रात । बहिन । मारा। ।
चिनादमी और उपदेश ६३ ॥शन्द ८॥ भजु मन नाम उसिर रहि घोड़ी ॥ टेक ॥ चारि जने मिलि लेन को आये लिये काठ की घोड़ी। जोरि लकड़िया फूंक अस दीनो जस वृंदावन को होरी ॥१। सीस महल के दस दरवाजे आन काल ने घेरी। आगर तोड़ी नागर तोड़ी निकसे प्रान सुपड़िया फोड़ीसा पाटी पकरि वाकी माता रोवै बहियाँ पकरि सग भाई। लट छिटकाये तिरिया रोवै पिठुरत है मारी हंस की जोड़ी।३ सत्तनाम का सुमिरन करि ले बाँध गाँट न पोढ़ी। कहत कबीर सुनो भाइ साधे जिन जोड़ी निन तोड़ी। 2॥ ॥ जप्द ॥ अरे मन मूरख खेतीवान, जतन दिन मिरगन रोल उजाड़ा ॥टेक ॥ पाँच मिरग पच्चीस मिररानी, ता में एक निंगारा" । अपने अपने रस के भोगी, घरत फिरै न्यारा न्यारा ॥३॥ काम क्रोध दुइ मुक्ख मिरम हैं, नित उठि चरत सबारा । मारे मरै टरै नहिं टारे, विड़वत नाहिं बिडारा; ॥२॥ अति परचंड महा दुख दारुन, वेद साख पचि हारा। प्रेम वान लै चढ्यो पारधी भाव भक्ति करि मारा ॥३॥ सत की वेड़ धर्म की खाई गुरु सब्द रखारा। कह कबीर चरन नहिं पावै अब की बार सम्हारा ॥2॥ 'नीर वाटा, 'स्वेरे । हारने से। शिकारी। शारदीवारी । 'रल्यारा। के
शितानी और उपोग
॥ ९॥
।
ना जाने तेरा शाहव कैसा है ॥ टेक ॥
नीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहब तेरा बहिरा है ।
- केपा नेता बाजे, सो भी साहब सुनता है ॥१॥
... जाग गाय, लम्बी माला जपता है।
पद कारनी रो भी राहिल लखता है ॥२॥
HTTE बनाया, गहिनी नेत्र जमाता है।
in मनगृत्रा नाहीं, रहने को मन करता है ॥३॥
हीदी माया जोड़ी, गाड़ि जमों में धरता है।
हना है गा ले जेहे, पापी बहि बहि मरता है ॥४॥
ननवानी को गजी मिलै नहि, बिस्या पहिरे खासा है।
नहि घर माधू भीख न पावै, भडुबा खात बतासा है ॥३॥
हीरा पाय परख नहिं जाने, कौड़ी परसन करता है।
कहत कबीर सुनो भाइ साधा, हरि जैसे को तैसा है ॥६॥
।
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M
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॥ शब्द ९०॥
मुखड़ा क्या देखै दर्पन में, तेरेट्या धरमनहिं तन में टेक॥
आम की डार कोइलिया बोलै, सुवना बोलै बन में।
घरवारी तो घर में राजी, फकड़ राजी बन में ॥१॥
ठी धोती पाग लपेटी, तेल चुआ जुलफन में।
गली गली की सखी रिसताई, दाग लगाया तन में
॥२॥
पायर की इक नाव वनाई, उत्तरा चाहे छिन में ।
कहर कबीर नुनो भाइ साधे वे क्या चढ़ेंगे रन में ॥३॥
चितावनी और उपदेश । n नन्द ९९ ॥ करम गति टारे नाहिं दरी टिक। मुनि बसिष्ट से पंडित ज्ञानी तोध के लगन धरी । सीता हरन मरन दसरथ को वन से विपति परी ॥१॥ कहँ वह फंद कहाँ वह पारधी कहूँ वह मिरग चरी । सीता को हरि लेगयो रावन सोने की लंक जरी ॥२॥ नीच हाथ हरिचन्द चिकाने पलि पाताल धरी । कोटि गाय नित पुन्त करत नृग गिररिट जोनि पनी ॥३॥ 'रामचंद्रजी का वनोवान. म. पिता र ----- नियोग में प्रान तजना, गारीचको मृगा बना कर राजन दुग ले जाना और फिर रामचंद्र का रावन को मारना और:-T:--मा यह कथा प्रायः सब लोग जानते हैं। शिकारी। राजा हरिश्चन्द्र भारी दानी और सत्यवादी मिमी ने विवामिनी को अपना सव राज पाट यश की दक्षिना मे दे दिया इस पर रनिने तीन भार साना दान-प्रतिष्ठा दा रुपना और गिरान हरिश्चन्द्र ने उस के लिये काशी में जाकर अपने को एक टोन्टे हाथ और अपनी रखी और पुत्र वो एवं बालन से राप देवर मुनि जी सो मंतुष्ट किया । राजा बलि बड़े प्रतापी और दानी थे जिन के द्वार पर आप नल- वान बौना का भेष धर कर तीन परग पृथ्वी नॉगने गये उदराता बनिने संकल्प कर दिया तय भगवान ने वैराट स्पधारन करके एक परम में स्वर्गादिक और एक में सारी पृथ्वी नाप ली और कहा कि अब वानी तीसरा परग देव । राजा ने अपना शरीर भेट रिचा जिने हानरे परग से नाप कर भगवान मे उन्हें अमर करके पाताल का राज दिया। राजा नृग रोज एक लाख गल दान दिया करते थे एक वारवाई गक जो पहिले दिन दान हो चुकी पी नई पदयो में जा मिनी सौर 9 सिगानी और उपदेश 77 जिन से पु सारथी तिन पर विपति परी । न को गर्व घटायो जनु कुल नास करी ॥ ४ ॥ को भानु चन्दा बिधि संजोग परी। -~~7 पीर गुना भाइ साधो होनी होके रही ॥५॥ . A भेद बाजी ॥ शन१॥ :: आप गत्र माहीं। If 'T भरम है किर्टम ज्यों दर्पन में छाहीं ॥ टेक । ग निमि जल ते उपजे फिर जल माहिं रहाई। का भाई पाँच तत्त की बिनसे कहाँ समाई ॥१॥ राजा ने उने अनजान मे दूसरे ब्रासन को सकल्प कर दिया । इस पर पनिने और दृगरे दिन के दान पाने वाले बालनों में झगड़ा मचा और दोनो राना के पाल न्याव को गये। दोनों वही गऊ लेने पर हठ करते घे दम लिये राजा की बुद्धि चकराई और सोच में पड़ कर दोनों की दन पर गिर हिला देते । इस पर उन ब्राह्मनों ने सरान दिया कि नग गिरगिट की तरह मिर हिलाते हो वही बन जावगे । इस लिये राजा नग मरने पर गिरगिट की जोनि पाकर एक अंधे कुए में पड़े हुए थे जब कानावतार हुआ तब श्रीकृश्न ने उन को तारा। 'पालको के रथ पर श्रीरुश्न महाभारत की लड़ाई में आप सारथी यने और दुरजोधन का घमंड तोड़ा और कौरवों के कुल का और परम धान विधारलेले पहिले अपने जदु कुल का भी नाश किया। पांडवों पर निति पही थी कि अपना सब राज पाट अपनी स्त्री द्रोपदी रिके में हार गये और मुद्दत तक बनोवास में हाय गुप दा. र
भेद वानी
या विधि सदा देह राति तय की या विवि ननहिं विचारो।
आया होय न्याव करि त्यारो परम तत्व निरकारो॥२॥
सहजै रहे समाय सहज में ना कहुँ आय न जा ।
धरै र ध्यान करै नहिं जप तप राम रहीस न गावे ॥३॥
तीरथ वर्त सकल परित्याग
सुन्न डोरि नहिं लावै।
यह धोखा जब समुझि परै तब पूजे काहि पुजायै ॥४॥
जोग
जुगत ते भरम न छूटै जब लग आप न सूरी।
कहैं कबीर सोइ सतगुरु पूरा जो कोइ सम्मुझे ॥५॥
॥ शब्द २॥
साधो एक रूप सब माहीं
अपने मनहिं बिचारि के देखो और दूसरी नाहीं ॥ टेक ।।
एकै तुचा रुधिर पुनि एकै विप्र सूद्र के माहीं ।
कहीं नारि कहिं नर होइ बोलें गैर पुरुप वह आहीं ॥१॥
आपै
गुरु
होय मंत्र देत हैं सिप होय सबै सुनाहीं ।
जो जस गहै लहै तल मारग तिन के सतगुरु आहीं ॥२॥
सन्द पुकार सत्त मैं मापा अंतर रास नाहीं ।
कहैं कबीर ज्ञान जेहि निर्मल चिरले ताहि लखाहीं ॥३॥
॥ शब्द ३ ॥
साधो को है कहँ से आयो॥टेक ।
सात पियत बोलत होलताको अंतन पायो।
केहि के मन धौं कहाँ बस्तु है को नाच नचायो ॥१॥
भेद बानी
पाक सर्व अंग काठहिं में को धों डहकि जगायो।
हो गयो खाक तेज पुनि वा को कहु धौ कहाँसमायो॥२॥
भानु प्रकास कूप जल पूरन दृष्टि दरस जो पायो।
आभा करग अंत कछु नाहीं जाति खींचि ले आयो॥३॥
अहै अपार पार कछु नाहीं सतगुरु जिन्हें लखायो ।
कहें कबीर जेहि सूफ बूम जस तेइ तस भाष सुनायो॥४॥
॥ शब्द ४॥
गाची राहजै काया साधो ।
करना आप आपु में करता लख्ख मन को परमाधो ॥टेक ॥
जगे बट का बीज ताहि में पत्र फूल फल छाया ।
काया मढे बुन्द बिराजै बुन्दै मद्धे काया ॥ १ ॥
अग्नि पवन पानी पिरथी नभ ता बिन मेला नाहीं ।
काजी पंडित करो निबेरा का के साँई न माहीं ॥२॥
नाँचे नाम अगल की आसा है वाही में साँचा ।
करना बीज लिये है खेतै बिगुन तीन तत पाँचा ॥३॥
जल अरि कुम्भ जले विच धरिया बाहर भीतर सोई।
उनको नाम कहन को नाहीं दूजा धोखा होई ॥४॥
लहिन पंथ सतगुरु को मिलना खोजत खोजत पाया ।
दल लग खोज मिठी जब दुविधाना कहुं गया न आया ॥५॥
है कबीर मुना भाइ साधो लत्त शब्द निज सारा ।
झापा नवे आपै बोले आप सिरजनहारा ॥ ६ ॥
मेद पानी ॥ शब्द ५॥ साधो दुविधा कहँ से आई। नाना भाव विचार करतु है कौने मतिहिं चोराई॥ टेक ॥ ऋग कहै निराकार निरलेपी अगम अगोचर साँई। आवै न जाय मरै नहिं जीव रूप बरन कछु नाहीं ॥१॥ जजुर कहै सरगुन परमेसर दस औतार धराया। गोपिन के सँग रहस रचो है सेोई पुरानन गाया ॥२॥ साम कहै वह ब्रह्म अखंडित और न दूजा कोई । आपै अपरम अवगति कहिये सत्त पदारथ साई ॥३॥ अथरवन कहै परो पथ दीसै सत्त पदारथ नाहीं । जे जे गये बहुरि नहिं आये मरि मरि कहां समाहीं ॥४॥ यह परमान समन के लीन्हा ज्यों अंधरन को हाथी । अछै बाप की खबर न जानी पुत्र हुता नहिं नाघी ५॥ जा प्रकार अँधरे को हाथी या विधि वेद यखाने । अपनी अपनी सब कोइ भाप का ध्यानहिं ठान ।। साँच अहै अँधरे को हाथी श्री साँचे हैं गरे । हाथ की टोई सापि कहतु हैं हैं आँखिन के अंधरे ॥१॥ सब्द अतीत सब्द सेा अपना वू दिरला कोई । कहैं कबीर सतगुरु की तैना आप मिटे तब ताई ॥८॥ ॥ शब्द६॥ सार सन्द गहि वाचिहा' मानौ इतवारा ॥१॥ सत्तपुरुप अच्छे यिरिछ निरंजन डारा ॥ २ ॥ "एक बेद का नाम । 'भारा । बोने ।
भेद पानी तीन देव साखा भये पाती संसारा ॥३॥ यला वेद सही किया सिव जोग पसारा ॥ ४ ॥ मिस्नु माया परगट किया उरले व्योहारा ॥५॥ निरटेवा व्याधा, भये लिये विप कर चारा ॥६॥ - की बंसी डारि के फाँसा संसारा ॥७॥ जोनिगरपी हाकिमा जिन अमल पसारा ॥ ८ ॥ मीन रोक दराई दिसा जम रोके द्वारा ॥६॥ अमर मिटावी ताहिको पठनों भव पारा ॥ १०॥ काकीर अमर करौं जो होय हमारा ॥ ११॥ ॥ गव्द ॥ महरम हाय रोा जानै साधा ऐसा देस हमारा ॥ टेक बेट कनेत्र पार नहिं पावत कहन सुनन सों न्यारा । जानि बरन कुल किरिया नाहीं संध्या नेम अचारा ॥१॥ विन जल बूंद परत जहँ भारी नहिं मीठा नहि खारा । गुन्न महल में नौवन वाजे किंगरी बीन सितारा ॥२॥ बिन बादर जहं विजुरी चमकै बिन सूरज उँजियारा । बिना मीप जहं मोती उपजै विन सुर सब्द उचारा ॥३॥ जानि लजाय ब्रह्म जहं दरसे आगे अगम अपारा । कहै कबीर बह रहनि हमारी बू गुरुमुख प्यारा ॥४॥ पहिला + पिष्ठीमार।
भेद वानी ७२ ॥ शन्न ॥ अवधू बेगम देस हमारा ॥ टेक ॥ राजा रंक फकीर बादसा सब से कहीं पुकारा । जो तुरू चाहत अहो परम पद बसिहो देस हमारा ॥१॥ जो तुम आये झोने होइ के तो सनी को भारा । ऐसी रहनिरहो रे गोरख सहज उतरि जाव पारा ॥ धरनि अकास गगन कछु नाहीं नहीं चंद्र नहिं तारा। सत्तनाम की हैं महता. साहब के दरबारा ॥३॥ बचना चाहो कठिन काल से गहो सय टकनारा । कहै कबीर सुना हो गोरख सत्तनाम है सारा ॥2॥ ॥ शब्द ॥ जहवाँ से आयो अमर वह देसया ॥ टेक ॥ पानी न पौन न धरती अकसवा । चाँद न सूर न रैन दिवसवा ॥ १ ॥ याम्हन छत्री न सूद्र वैसवा । मुगल पठान न सैयद सेखवा ॥२॥ आदि जोति नहिं गौर गनेसवा । ब्रह्मा विस्नु महेस न सेसवा ॥३॥ जोगी न जंगम मुनि दुरवेसवा । दिन अन्त न काल कलेतवा ॥ १ ॥ गोरस्कार जोगी हो यीर साहब २ सनर ने दे।
७२
भेद यानी
दास कबीर ले आये सँदेसवा ।
सार सब्द गहि चलौ वहि देसवा ॥४॥
॥ शब्द १० ॥
मोतिया बरसै रौने देसवाँ दित राती ॥ टेक ॥
मुरली सब्द सुन मन आनँद भयो, जोति बरै बिनु बाती।
बिना मूल के कमल प्रगट भयो, फुलवा फुलतभाँतीभाँती?
जैरो चकोर चन्द्रमा चितवै, जैसे चाटक स्वाँती।
तैसे संत सुरति के होइके होइगे जनम संघाती ॥२॥
या जग में बहु ठग लागतु हैं, पर धन हरत न डेराती।
कहै कबीर जतन करो साधो, सत्तगुरू की थाथी ॥३॥
॥ शव्द ११॥
नैहरवा हमकाँ नहिं भावै ॥ टेक ॥
साँई की नगरी परम अति सुन्दर जहँ कोइ जाय न आवै।
चाँद सुरज जहं पवन न पानी को संदेस पहुंचावै,
दरद यह साँई को सुनावै ॥ १ ॥
आगे चली पंथ नहिं सूझै पीछे दोप लगावै ।
केहि विधि ससुरेजा मेरी सजनी विरहा जोर जनावै,
विपै रस नाच नचावै ॥२॥
बिन सतगुरु अपनो नहिं कोई जो यह राह बतावै,
कहत कबीर सुनो भाइ साधे सपने न प्रीतम पावै,
तपन यह जिय की बुझावै ॥ ३ ॥
भेद बानी ॥ शब्द १२ ॥ गगन मठ गैब निसान गड़े ॥ टेक ॥ गुदा* में मेख लेस सिर ऊपर डेरा अचल खड़े ॥ १॥ चंद्रहार चॅदवा जहँ टाँगे मुक्ता मनिक मढ़े ॥२॥ महिमा तासुदेख मन थिर करि रविससि जाति जड़े ॥३॥ रहत हजूर पूर पद सेवत समरथ ज्ञान बड़े ॥४॥ संत सिपाही करैं चाकरी तेहि दरबार अड़े ॥ ५ ॥ बिना नगाड़े नौवत बाज अनहद सब्द भरे ॥ ६॥ कहै कबीर पियै जाई जन माता फिरन मरे ।। ७ ।। ॥ शब्द १३ ॥ वा घर की सुध कोइ न बतावै, जा घर से जिव आया होटिंगः ॥ धरती अकास पवन नहिं पानी, नाहीं तय आदिमाया हो? ब्रह्मा बिस्नु महेस नहीं तब, जीव कहाँ से आया हो॥३॥ पानी पवन के दहिया जमायो, अगिन के जामत दीन्हा हो ॥३॥ चाँद सुरज दोउ भने अहीरा, मथि दहिया घिउ काढ़ा हो ॥2॥ यह मनसा माया के लोरी वारवार पछिताया हो । लख नहिं परै नाम साहब का, फिर फिर भटका खाया हो ॥३॥ कहै कबीरसुनो भाइ साधो, वह घर बिरले पाया हो॥॥ 'वानी में टेट हिंदी शब्द गुदा का लिखा है । मन्न । गुदा भेद मामी ॥ राज्य १४॥ गगन घटा बहरानी साधेो, गगन घटा घहरानी ॥टेक। परन दिमि से उठी बदरिया, रिमझिम बरसत पानी जापन आपन मेंडि सम्हारो, वह्यो जात यह पानी ॥ मन के चैत गुरति हरबाहा, जोत खेत निर्बानी । परिभा व छोल कर वाहर, बोवो नाम की धानी ॥ जाग जुक्ति करि कर रखबारी, चर न जाय मृग धानी वाली कार कुटि घर लावे, साई कुसल किसानी ॥ ३ पांच सखी मिलि कीन्ह रसोइयाँ, एक से एक सयानी नां थार बराबर परसे, जे3 मुनि अरु ज्ञानी ॥४। कहै कबीर सुनो भाइ साधो, यह पद है निर्वानी । जो यह पद को परचा पावे, ता को नाम विज्ञानी ॥ ॥ शब्द १५।। झीनी झीनी वीनी चदरिया ॥ टेक ॥ काहे के ताना काहे के भरनी कोने तार से वीनी चदरिया ॥ १॥ इंगला पिंगला ताना भरनी सुखमन तार से वीनी चदरिया ॥२॥ आठ केवल दल चरखा डोले पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया ॥३॥ माई को सियत मास दस लागे ठोक ठोक के बीनी भेद यानी सो चादर सुर नर मुनि ओढिन ओढ़ि के सैली कोनी चदरिया ॥५॥ दास कबीर जतन से ओदिन ज्यों के त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥ ॥ शब्द १६ ॥ फल मीठा पै ऊँचा तरवर कानि जनन करि लीजै । नेक' निचोइ सुधा रस वा को कानिजुगति लेां पीजै ॥१॥ पेड़ विकट है महा सिलसिला', अगह गह्यो नहिं जाये। तन मन डारि चढ़े सरधा से, तब वा फल को खावे ॥२॥ बहुतक लोग चढ़े बिन भेदै. देसी देखा चाँहीं। रपटि पाँव गिरि परे अधर तें, आइ परे सुई लाहों ॥३॥ सत्त सन्द के खूटे धरि पग, धरि गुरु-ज्ञानति टोग। कहैं कबीर सुनो भाइ साधो, नत्र वा फल को तारा।। ॥ शब्द ९७ ॥ भुनियाँ पिंजड़े वाली ना. तेरो सतगुरु है येयपारी टेका पाँच तत्त का धना पिंजड़ा, तारें रहती मुनियाँ । उड़ि के मुनियाँ डार पै बैठी, झीखन लगी रारी दुनियो । अलग डार पर बैठी मुनिया. पिये प्रेम रस यूटी । क्या करिहै जनराज तिहारो, नाम कहत तन छूटी ॥२॥ मुनियाँ की गति मुनियाँ जाने. और की मद की । कहै कबीर सुनो भाइ साधा. गुरु चरनन की दूरी ।'३॥ 'पेड़। 'घोड़ा ला । सिटिम. बापिलाने वाला।
भेद वानी
॥ शब्द १८ ॥
पिया ऊँची रे अटरिया तोरी देखन चली ॥ टेक ॥
ऊंची अटरिया जरद किनरिया, लगी नाम की डोरी।
चाँद सुरज सम दियना वरतु है, ताबिच भूली डगरिया॥१॥
पाँच पचीस तीन घर बनियाँ, मनुवाँ है चौधरिया ।
मुन्सी है कुतवाल ज्ञान को, चहुं दिस लागी बजरिया ॥२॥
आठ मरातिन दस दर्वाजा, नौ में लगी किवरिया।
सिरको बैठ गोरी चितवन लागी, उपराँझाँपझोपरिया३
कहत कबीर सुनो भाइ साधो, गुरु के चरन बलिहरिया ।
गाध संत मिलि सौदा करि हैं, झीखै मूरख अनरिया ॥४॥
॥ शव्द १० ॥
रस गगन गुफा में अजर झरै ॥ टेक ॥
विन बाजा झनकार उठै जहँ समुझि परै जब ध्यान धरै
बिना ताल जहं कवल फुलाने तेहि चढ़ि हंसा केल करै॥२॥
बिन चंदा उजियारी दरसै जहें तहँ हंसा नजर परै ॥३॥
दम द्वार ताड़ी लागी अलख पुरुपजाको ध्यान धरै ॥४॥
काल कगल निकट नहिं आवै काम क्रोधमद लाभ जरै ॥५॥
जुगन जुगन को तृपा बुझानी कर्म भर्म अघ व्याधिटरै६॥
दद कबीर नुनो भाइ साधेो अमर होय कबहूं न मरै॥७॥
भेद यानी 99 ॥ शब्द २ ।। . मुरसिद नैनों बीच नबी है। स्याह सपेद तिलों बिच ताराअवगति अलख रवी है।टेका आँखी मढे पाँखी चमकै पाँखी मढे द्वारा । तेहि द्वारे दुर्बीन लगावै उतरै भवजल पारा ॥२॥ सुन्न सहर में वास हमारी तहे सरवंगी जावै । साहब कबीर सदा के संगी सब्द महल ले आत्रै ॥३॥ ॥ शन्द २१ ॥ सत्त सुकृत सतनाम जक्त जानै नहीं। विना प्रेम परतीत कहा मान नहीं ॥१॥ जीव अनंत संसार न चीन्हत पीर को । कितना कहु समुशाय चौरासि क जीव को ॥२॥ आगे धाम अखंड सो पद निर्वान है। भूख नींद बहें नाहिं निमच्छर नाम है ॥३॥ कहैं कबीर पुकारि सुनेा मन भावना । हंसा चलु सतलोक बहुरि नहिं आवना ॥४॥ ॥ शव्द ॥ कर नैनों दीदार महल में प्यारा है ॥टेका काम क्रोध मद लाभविसारो, सील संतापछिमा सत धारी, मद्द माँस मिथ्या तजि डारो। हो ज्ञान घोड़े असवार भरम से न्यारा है ॥ १ ॥ मालिक।
A भेष यानी जोनी नेनो बस्ती पाओ, आसन पदम जुगत से लाओ कुम्भक कर रेचक करवाओ। पहिले मूल सुधार कारज हो सारा है ॥२॥ मृतकंचल दल नतुर यखाना, कलिंग जाप लाल रंग माना, देव गनेस तहें रोपा थाना। वर व मिध चैंबर ढुलारा है ॥३॥ पाना पट दल विस्तारो, ब्रह्म सावित्री रूप निहारो उलदि नागिनी का सिर मारो। नहीं सब्द ओंकारा है ॥४॥ नाभी आठ कंबल दल साजा, सेन सिंघासन विस्नु बिराजा हिरिंग जाप तासु मुख गाजा। लछमी सिव आधारा है ॥५॥ द्वादन कंबल हृदय के माहों, जंग गौर सिव ध्यान लगाईं, सोहं सब्द तहाँ धुन छाई । गन करें जैजैकारा है ॥६॥ दो दल कंवर कंठ के माही, तेहि मध वसे अविना बाई, हरि हर ब्रह्मा चंबर दुराई । जह भंग नाम उचारा है ॥ ७ ॥ ना पर कंज कंवल है भाई, वग भौंरा दुइ रूप लखाई निज मन करत तहाँ ठकुराई, मा नैनन पिछवारा है ॥८॥ अमला और भीरा अर्थात सेत-श्याम पद ।
भेद पानी ४ , कँवलन भेद किया निर्धारा, यह सत्र रचना पिंड मैंझारा, सतसँग कर सतगुरु सिर धारा। वह सत नाम उचारा है ॥६॥ आँख कान मुख बन्द कराओ, अनहद झिंगा सदसुनाओ, दोनों तिल इक तार मिलाओ। तव देखो गुलजारा है ॥ १० ॥ चंद सूर एकै घर लाओ, सुखमन सेती ध्यान लगाओ तिरवेनी के सिंध समाओ। भार उतर चल पारा है ॥ ११ ॥ घंटा संख सुनो धुन दोई, सहस कँवल दल जगमग होई, ता मध करता निरखो साई। वंक नाल धस पारा है ॥ १२ ॥ डाकिनी साकिनी बहु विकलकारें, जम किंकर धर्म दून हकारें, सत्तनाम सुन भागे सारे । जब सतगुरु नाम उचारा है ॥ १३ ॥ गगन मँडल विच उर्धमुख कुइया.गुरमुख साधू भरभर पीया. निगुरे प्यास मरे बिन कीया। जाके हिये अँधियारा है ॥ १४ ॥ त्रिकुटी महल में विद्या सारा, घनहर गरजें बजें नगारा, लाल वरन सूरज उँजियारा । चनकवल मॅझार सब्द ओंकारा है ॥ १५ ॥ *करनी । बादल।
भेद मानी गाच सोई जिन यह गढ़ लीन्हा, नौ दरवाजे परगट चीन्हा, दसवाँ खोल जाय जिन दीन्हा । जहाँ कुफल रहिया मारा है ॥ १६ ॥ आगे सेन गुन है आई, मान सरोवर पैठो न्हाई, हंगन मिलि हंसा होइ जाई। मिले जो अमी अहारा है ॥ १७ ॥ गर्ग गारग बजे सितारा, अच्छर ब्रह्म सुन्न दरबारा, द्वादरा भानु हंस उजियारा। खट दल कंवल मझार सब्द ररंकारा है ॥ १८ ॥ महा गुन्न सिंधविपमीघाटी, बिन सतगुरु पावै नहिं वाटी व्याघर' सिंघ सरप बहु काटी। तह सहज अचिंत पसारा है।। १८ ॥ अष्ट दल कंवल पारब्रह्म भाई, दहिने द्वादस अचिंत रहाई वायें दसदल सहज समाई। यों कंवलन निरवारा है ॥ २० ॥ पाँच ब्रह्म पाँचौ अँड वीना, पाँच ब्रह्म निःअच्छर चीनो, चार मुकाम गुप्त तहं कीना। जा मध बंदीवान पुरुप दरवारा है ॥ २१ ॥ दो पर्यन के संघ निहारी, भंवर गुफा ते संत पुकारो, हंसा करते केल अपारो। नहाँ गुरन दारा है ॥ २२॥ याघ।
भेद यानी २ सहस अठासी दीप रचाये, हीरे पन्ने महल जड़ाये, मुरली बजत अखंड सदाये, तहँ साहं झनकारा है ॥ २३ ॥ सोह हद्द तजी जब भाई, सत्त लोक की हद पुनि आई, उठत सुगंध महा अधिकाई, जा को वार न पारा है ।। २ ।। पोड़स भानु हंस को रूपा, बीना सत धुन बजे अनूपा. हंसा करत चैवर सिर भूपा । सत्त पुरुप दर्यारा है ॥ २५ ॥ कोटिन भानु उदय जो होई, एते ही पुनि चंद्र लखाई, पुरुष रोम सम एक न होई । ऐसा पुरुप दीदारा है ॥ २६ ॥ आगे अलख लोक है भाई, की तह ठकुराई. अरयन सूर रोम सम नाहीं । ऐसा अलख निहारा है ॥२७॥ ता पर अगम महल इक साजा, अगम पुरुप ताहि को राजा, खरवन सूर रोम इक लाजा। ऐसा अगम अपारा है ॥ ८ ॥ ता पर अकह लोक है भाई, पुरुप अनामी तहाँ रहाई. जो पहुंचा जानेगा वाही। कहन सुनन ते न्यारा है ॥ २ ॥ अलख पुरुप ।
भेद पानी जया भेद किया निर्धारा, यह सब रचना पिंड मँझारा, माया अवगति जाल पसारा । सो कारीगर भारा है ॥ ३०॥ आदि माया कीन्ही चतुराई, कूठी बाजी पिंड दिखाई, अवगति रचन रची अँड माहीं। ता का प्रतिबिंब डारा है ॥ ३१ ॥ गद विहंगम चाल हमारी, कहैं कबीर सतगुर दई तारी, खुले कपाट सब्द झनकारी। पिंड अंड के पार सेो देस हमारा है ॥ ३२॥ ॥ शब्द २३ ॥ कर ननां दीदार यह पिंड से न्यारा है, तू हिरदय सोच विचार यह अॅड मँझारा है ॥ टेक ॥ चारी जारी' निंदा चारो, मिथ्या तज सतगुरु सिर धारो, सतसंग कर सत नाम उचारो, तव सनभुख लहो दीदारा है ॥१॥ जे जन ऐसी करी कमाई, तिनकी फैली जग रोसनाई, अष्ट प्रमान जगह खुद पाई। तिन देखा अंड मँझारा है ॥२। मोरी अंड को अवगत राई, अमर कोट अकह नकल बनाई। सुद्ध ब्रह्म पद तहँ ठहराई। सो नाम अनामी धारा है ॥३॥ बुद्धि मे । ' पर स्त्री गमन ।
भेद यानी
s
सतवीं सुन्न अंड के माहीं, झिलमिलाहट की नकल
बनाई
महा काल तहँ आन रहाई ।
सो अगम पुरुप उच्चारा है ॥ ४ ॥
छठवीं सुन्न जोअंड मँझारा, अगम महल को नकल सुधारा
निरगुन काल तहाँ पग धारा ।
सो अलख पुरुप कहो न्यारा है ॥ ५ ॥
पंचम सुन्न जो अंड के माहीं, सत्तलाक की नकल बनाई
माया सहित निरंजन राई।
सो सत्त पुरुप दीदारा है ॥ ६ ॥
चौथी सुन्न अंड के माहीं, पद निर्वान की नकल बनाई
अवगति कला हो सतगुरु आई ।
सो सोहं पंद सारा है ॥ ७ ॥
तीजी सुन की सुनो बड़ाई, एक सुन्न के दोय पनाई,
ऊपर महासुन्न अधिकाई।
नीचे
सुन्न पसारा है ॥८॥
सतवीं सुन्न महाकाल रहाई, तासु कला महासुन्न समाई
पारब्रह्म कर थाप्यो ताही।
सो निःअक्षर सारा है ॥६॥
छटवीं सुन्न जो निरगुन राई, तानु कला आ सुन्न समाई,
अच्छर ब्रह्म कहै पुनि ताही,
सोई सन्द ररंकारा है ॥ १० ॥
भेद यानी
म सुन्न निरंजन राई. तासु कला दूजी सुन छाई,
पुरुप प्रकिरती पदवी पाई।
सुह सरगुन रचन पसारा है ॥ ११ ॥
पुरमप्रातिदजी सुन माहीं, तासु कला पिरथम सुन आई
जोन निरजन नाम धराई।
सरगुन स्थूल पसारा है ॥ १२ ॥
शिम गुन्न जो जोत रहाई, ता की कला अबिदा बाई,
पुत्रन रॉग पुत्री उपजाई।
यह सिंध बैराट पसारा है ॥ १३ ॥
गत काग उतर पुनि आई, ब्रह्मा बिस्नु समाधि जगाई,
पुत्रन संग पुत्री परनाई।
यह श्टेंग नाम उचारा है ॥ १४ ॥
छठे अकाम मिव अवगति भौंरा, जंगगौर रिद्वि करती चौंरा
गिरि कैलास गन करते सारा ।
तह सोहं सिर मौरा है ॥ १५ ॥
पंचम अकास में बिरनु विराजे,लक्ष्मीसहित सिंहासन गाजे
हिरिंग वैकुंठ अक्त समाजे ।
जिन भक्तन कारज सारा है ॥ १६ ॥
चाय अकास ब्रह्मा विस्तारा, सावित्री सँग करत विहारा
ब्रह्म ऋद्धि ओंग पद सारा ।
यह जग सिरजनहारा है ॥ १७ ॥
भेद पानी
८५
तीजे अकास रहे धर्मराई, नर्क सुर्ग जिन लोन्ह अनाई,
करमन फल जीवन भुगताई।
ऐसा अदल पसारा है ॥ १८ ॥
दूजे अकास में इन्द्र रहाई, देव मुनी बासा तह पाई,
रंभा करती निरत सदाई ।
कलिंग सब्द उच्चारा है ॥ १८ ॥
प्रथम अकास मृत्तु है लोका,मरन जनम का नित जहं धोखा,
सा हंसा पहुंचे सत लोका।
जिन सतगुरु नाम उचारा है ॥२॥
चौदह तयक किया निरवारा, अब नीचे का नुना विचारा,
सात तयक में छः रखवारा ।
भिन भिन सुना पसारा है ॥ २१ ॥
सेस धौल वाराह कहाई, मीन कच्छ औ कुरम रहाई,
से छः रहे सात के माहीं।
यह पाताल पसारा है ॥ २२ ॥
॥ शब्द २४ ॥
कोइ सुनता है गुरु ज्ञानी,गगन में आवाज होती जोनी। १॥
पहिले होता नाद विन्दु से, फेर जमाया पानी ॥ २ ॥
सब घट पूरन पूर रहा है, आदि पुरुप निर्यानी ॥ ३ ॥
जो तन पाया पटा लिखाया, तृस्ना नहीं बुझानी॥2॥
असृत छोड़ि विपय रस चाखा उलटी फांस फॅसानी ॥५॥
ओअं साहं बाजा वाज, त्रिकुटी सुरत समानी ॥ ६ ॥
भेद वानी इडा पिगला सुपमन साधे, सुन्न धुजा फहरानी ॥ ७ ॥ दीद बरदीदहम नजरों देखा, अजरा अमर निसानी ॥८॥ कहै कबीर सुनो भाई साधो, यही आदि की बानी ॥ ॥ शब्द २५ ॥ साधो ऐसा धंध अँधियारा ॥ टेक ॥ या घट अंतर बाग बगीचे, याही में सिरजनहारा ॥१॥ या घट अंतर सात समुंदर, याही में नौ लख तारा॥२॥ या घट अंतर हीरा माती, याही में परखनहारा ॥ ३ ॥ या घट अंतर अनहद गरजै, याही में उठत फुहारा ॥४॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो, याही में गुरू हमारा ॥५॥ ॥ गद २६ ॥ अवध मो जोगी गुरु मेरा, या पद को करै निवेरा।टेक॥ नरवर एक मूल बिन ठाढ़ा, विन फूले फल लागे । माखा पत्र नहीं कछु वा के, अप्ट कमल दल गाजे॥१॥ चढ़ तरवर दे। पंछा बैठे, एक गुरू इक चेला । चे ना रहा से चुन चुन खाया, गुरू निरन्तर खेला ॥२॥ विन करनाल पखावज वाज, विन रसना गुन गावनहार के रूप न रेखा, सतगुरु मिले तो बतावै॥३॥ गगन मंडल में उर्धमुख कुइयाँ, जहाँ अमी को बासा । मगुरा होय से भर भर पीवै निगुरा जाय पियासा ॥४॥ मन्न निम्बर पर गया वियानी धरती छीर जमाया। मामन रहा मो मंतन खाया. छाछ जगत भरमाया ॥५॥ गावै।
भेद वानी 23 पंछी को खोज मीन को मारग, कहैं कबीर दोउ भारी । अपरम्पार पार पुरुपोत्तम, मूरति की बलिहारी ॥ ६ ॥ ॥ गन्द २७ ॥ हंसा लोक हमारे ऐहा, तातें अमृत फल तुम पैही ॥टेक॥ लोक हमारा अगम दूर है पार न पावै कोई। अति आधीन होय जो कोई ता को देउँ लखाई ॥ १ ॥ मिरत लोक से हंसा आये पुहप दीप चलि जाई । अंबु दीप में सुमिरन करिही तब वह लोक दिखाई ॥२॥ माटी का पिंड छूटि जायगा, औ यह सकल विकारा । ज्यों जल माहिं रहत है पुरइन ऐसे हंस हमारा ॥ ३ ॥ लोक हमारे ऐहो हंसा, तब सुख पहो भाई। सुख सागर असनान करोगे, अजर अमर होइ जाई ॥2॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, हंसन करो बधाई। सेत सिंघासन बैठक दैहौं जुग जुग राज कराई ॥ ५ ॥ ॥ शब्द २८॥ वाहर कहीं तो ऐसालो तत ऐसा लो, मैं केहि विधि कथा गॅभीरा ला॥टेक॥ सतगुरु लाजै। भीतर कहाँ तो झूठाला ॥ याहर भीतर सकल निरंतर । गुरु परतापै दीठा लो ॥१॥ दृष्टिन मुष्टिन अगम अगोचर। पुस्तक लिखा न जाई ला ॥ जिन पहिचानातिन भल जाना। कहेन को पतियाई ला॥२॥ मीन चलै जल मग में जावे। परम तत्त धौं कैसा लो। पुहप' वास हूं तें कछु होना । परम तत्त धौ ऐसा ला ॥३॥ हाई ।। पृल।
भदबाना आकासे उड़ि गयी विहंगम। पाछे खोज न दरसी लो । कहै कबीर सतगुरु दाया ते । बिरला सतपद परसीलो॥४॥ ॥ शद २० ॥ यात्रा अगम अगोचर कैसा, तातें कहि समझाओं ऐसा॥टेका जो दीसे से तो है नाही, है सेा कहा न जाई । मैना बैना कहि समझाओं, गूंगे का गुड़ भाई ॥१॥ दृष्टि न दीसे मुष्टि न आवै, बिनसे नाहिं नियारा। एगा जान कथा गुरु मेरे, पंडित करी विचारा ॥२॥ ॥ शब्द ३०॥ बिन देखे परतीति न आवै, कहे न कोउ पतियाना । ममुभा होय सेा सन्दै चीन्है, अचरज होय अयाना ॥३॥ कोई ध्यावै निराकार को, कोइ ध्यावै आकारा । वह तो इन दोऊ ते न्यारा, जानै जाननहारा ॥१॥ काजी कथै कतेब कुराना, पडित वेद पुराना । वह अच्छर तो लखा न जाई, मात्रा लगै न काना ॥५॥ नादी बादी पढ़ना गुनना, बहु चतुराई भीना । कहै कबीर सेा पड़े न परलय, नाम भक्ति जिन चीन्हा॥६॥ * * *
४
झूलना
मूलना
॥ शब्द
झान का गेंद कर सुर्त का डंड कर,
खेल चौगात मैदान माहीं ॥ १ ॥
जगत का भरमना छोड़ दे बालके,
आय जा भेष भगवंत पाहीं ॥२॥
भेप भगवंत की शेप महिमा करे,
शेप के सास पर चरन हरिं ॥ ३ ॥
काम दल जीति के कंवल दल माधि के
ब्रह्म को अधि के क्रोध मारे ॥ १ ॥
पदम आसन करै पवन परिच कर
गगन के महल पर मदन जारै ॥ ५ ॥
कहत कव्वीर कोइ संत जन जौहरी.
करम की रेख पर मेख मारै ॥ ६ ॥
॥ शब्द २॥
पाप पुन के बीज दोड,
विज्ञान अगिन में जारिये जी ॥ १ ॥
पाँचो चोर वियेक तो बस करि
विचार नगर में मारिये जी ॥२॥
चिदानन्द सागर में जाइये,
मन चित दोऊ को डारिये जी ॥३॥
फूलना बहैं क्वीर एक आप कहा, कितने को पार उतारिये जी ॥४॥ ॥ शब्द ३॥ तीरथ में सब पानी है, होवे नहिं कछु अन्हाय देखा ॥ १ ॥ प्रतिमा सकल बनी जड़ है, बोले नहिं बोलाय देखा ॥२॥ पुगन कुरान सब बात ही बात है, घट का परदा खोल देखा ॥३॥ अनुभव की बात कबीर कहैं, यह सब है झूठी पोल देखा ॥ ४ ॥ ॥ शब्द ४॥ दो मूर चले सुभाव सेती, नाभी से उलटा आवता है ॥ १ ॥ बीच इंगला पिंगला तीन नाड़ी, मुपमन से भोजन पावता है ॥२॥ पूरक करै कुम्भक करे रेचक करै झरि जावता है ॥ ३ ॥ कायम कबीर का फूलना जी, दया भूल परे पछितावता है ॥ ४ ॥ स्वर । .
फूलना ८९ ॥ शव्द ५॥ सूर को कान सिखावता है, रन माहिं असी का मारना जी ॥ १ ॥ सती को कौन सिखावता है, सँग स्वामी के तन जारना जी ॥ २ ॥ हंस को कौन सिखावता है, नीर छीर का भिन्न विचारना जी ॥३॥ कबीर को कौन सिखावता है, तत्त रंगों को धारना जी ॥४॥ ॥ शब्द ६॥ तख्त रना हाड़ चाम का जी, दाना पानी क भोग लगावता है ॥ १॥ मल नीर भरै लाहु माँस बढ़े, आपु आपु अंस बढ़ावता है ॥ २ ॥ नाद विंदु के बीच कलोल करै, सो आतम राम कहावता है ॥३॥ अस्थान यही कहँ ढूंढ़ता है, दया देस कबीर बतावता है ॥ ४ ॥ को ॥ शब्द ॥ में दरिया की लहर दरियाव है जी, दरिया और भिन्न कोयम ॥१॥ -तलवार । पया।
"...17 ; TET || सालमा जनमम जाय॥टेक।। 7 जना कति पिचकारी, छिमा चलावनहार । मनहाजा लिन लागे, पांच पचीस मैंझार ॥१॥ : गली में हारी खेले, मची प्रेम की कीच । वन माह दोज कटि भागे, मुन सुन सब्द अजीत ॥२॥ किटी महाल में बाजा बाज, हात छतीसो राग। रन लावी जई देखि तमाराा, सतगुरु खेलें फाग ॥३॥ इंग्ला पिंगला नुपनना हो, सुरत निरत दोउ नारि । भने पिया मंग होरी खेलें, लज्जा कान निवारि ॥४॥ र महर में हार बुतूहल, करें राग अनुराण । पुन दरमन पावें, पूरन प्रेम सुहाग ॥५॥ मन मिले फमा निज पायो, मारग दियो लखाय । चीन जो बह गति पावै, सो जिव लोक सिधाय॥६॥ गुम हो गया। कहते हैं। हा ममता ܦܝܐ ܙ - ।
होली
॥ शन्द६॥
काया नगर सँभार संत खेलें होरी ।
गावत राग तरस तुर सोहै, अति आनंद भयो री॥टेक।।
चंदन सील बुद्धि अरगजा, केसर करनी गहो री।
अगर अगस्म सुगम करि लीन्ह, अभय उर माँहि घरोरी॥१
प्रीति फुलेल गुलाल ज्ञान कारि, लेहु जुगत भरि झोरी
चोवा चित चेतन परकासा, आवति वास घनो री ॥२॥
त्रिकुटी सहल में बाजा बाजे, जगमग जोत उजेरी।
सहज रंग रचि रह्यो सकल तन, छूटत नाहि करेरी ॥३॥
अनहद वाजे दर्जे मधुर धुन, बिन करताल सॅचूरा ।
चिन रसना जहँ राय छतीसा, होत महानंद पूरा ॥४॥
सुन्न महल इक रंग महल से, कहूं टरत नहिं टारी ।
कहैं कबीर समुझि लो साधो, निर्गुन कहो सदा री ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
हमारे को खेले ऐसी होरी, जा में आवागवन लागी
होरी ॥ टेक ॥
स्त्रवन न सुन्यौ नैन नहिं देख्यौ, पिय पिय पिच लागी लौरी।
पंथ निहारत जनम सिराना, परस्ट मिले न चेरी॥१॥
जा कारन गृह में कढ़ि निकसी, लोक लाज कुल तारी।
चोवा चंदन और अरगजा, दपरा रंग भरो री ॥२॥
एकन हूं सृगछाला पहिरी. एकन गुदरी भारी ।
बहुत भेप धर स्वाँग बनाये, लौ नहिं लगी ठगोरी ॥३॥
होती -~~~-7ी रामेसर, देस दिसंतर दारी । ---कोर मी प्रदन्छिना, पुस्कर हूँ में लुटीरी ॥४॥ :गन भागान गीता, चारो चरन ढंढोरी। - या गतगुरु बिनु, भर्म मिटे नहिं भवरी ॥५॥ . ।। गद ४॥ यो गान आये आज, खेलन फाग री। गगन राब बोले, अति सुख मंगल राग॥टेक।। : FAT गाना गंग घाले, अनहद पानी राग री। पानराग हातु है, क्या सावे उठि जाग री ॥१॥ मादा पवन बिछौना, बहुत करौं सनमान री। नीर अमर पद गोही अविचल जुग जुग बासरी ॥२॥ चरन पावार लहुं चरनादक, उठि उनके पग लाग री । पाँच मी मिलि मगल गावें, पिव अपने सँग पागरी॥३॥ पचामिन भाव से लेबों, परम पुरुष भरतार री। महा प्रसाद गंन मुख पावां, आन खुला मेरी भाग री ॥४॥ गनी को बंद छुड़ावन, आये सतगुरु आप री। पान पर्वाना देन जीवन को, वे पावै वे पावै सुख वास री ॥५॥ बाबा चदन अगर कुमकुमा, पुहुप माल गल हार री। गुना मांग मुक्ति फल लहूं, जिब आपन के काज री॥६॥ गरहा सिंगार घनीसा अभरन, सुरत सिंगार सँवार री। न कबीर मिले मुख सागर आवा गवन निवाररी॥॥ नटा। फाग मेनने वालों की भीड़। 1 - - हाला ॥ शब्द ५॥ साधो हम घर कंत सुजान, खेल्यो रंग होरी । जनम जनम की मिटीकलपना, पायो जीवन प्रान रीठेका पाँच सखी मिलि मंगल गावें, गुरमुख सन्द विचार री। वाजत ताल मृदंग झाँझ डफ, अनहद सब्द गुंजार री॥१॥ खेलन चली पंथ प्रीतम के, तन की तपन गई री। पिचुकारी छूटै अति अद्भुत, रस की कीच भई री ॥२॥ साहब मिलि आपा बिसरायो, लाग्यो खेल अपार री। चहुं दिस पिय पिय धूम मची है, रटना लगी हमार री ॥३॥ सुख सागर असनान कियो है, निर्मल भयो सरीर री। आवागवन की मिटी कल्पना, फगुवा पायो कबीर री॥१॥ ॥ शब्द ६॥ जहँ सतगुर खेलत ऋतु बसंत । परमजोत जहँ साध संत ॥१ तीन लोक से भिन्न राज । जहँ अनहद बाजा बजे बाज ॥२ चहं दिस जोति की वहै धार। बिरला जन कोइ उतरै पार॥३ कोटि कृरह जहँ जोरै हाथ । कोटि बिस्नु जहँ नवे माथ॥ कोटिन ब्रह्मा पर्दै पुरान । कोटि महेस जहँ धरै ध्यान ॥५॥ कोटि सरस्वति धारै राग। कोटि इन्द्र जहँ गगन लाग॥६ सुरगन्र्धव मुनि गनेन जायँ। जहँसाहिब प्रगटे आप आय७ चोवा चंदन औ अवीर । पुहुप वास रस रह्यो गंभीर ॥८॥ सिरजत हिये निवास लीन्ह । सो यहि लोक से रहत भिन्न ॥ जव वसंत गहिराग लीन्ह । सतगुरु सन्द उचार कीन्ह ॥१० कहैं कनीर मन हृदय लाय। नरक-उधारन नाम आहि ॥११ -- रेराता " वाता ॥१॥ न दिन गंन बों रोवता देखता, संगार को ओम् नो पीठ दोने। न ओर प्रजन फिर फूट बाले नहीं, नंग ओर गूर को सम्म कोये ॥१॥ Tीवन चकोर ज्यों रहतु है, मग्न जो निरन का तार बाजै । जानिया घग्न न दिन गुन्न में, बार पिङ गगन गाजै ॥ २ ॥ ॥ पाव पटा की आरती कौन सी, न दिन आरती संत गावे । बाल निम्मान नह जब की झालरा, मात्र के घंट का नाद जावे ॥१॥ नई नीव बिन देवरा देव निर्धान है, गगन के नरह पर जुगत सारी । मई कनीर नह रैन दिन आरनी, पानिया पाँच पूजा उतारी ॥२॥ ॥३॥ . गई आपकी सेव तो आप ही जानिहो, आप का भेव कहो कौन पावै । आपनी आपनी बुद्धि अनुमान सो, बचन जिलास करि लहर लावै ॥ १॥ मदिर।
रेमना 3 तू कहै तैसा नहीं, है तो दीखै नहीं, निगम हूं कहत नहिं पार जावै । कहैं कन्चीर या सैन गूंगा तई. होय गूंगा सेाई सैन पावै ॥२॥ ॥४॥ कर्म और धर्म संसार सब करतु है, पीव की परख कोइ संत जाने । सुरत औ निरत मन पवनो पकर कारि गंग और जसुन के घाट आने ॥ १ ॥ पाँच को नाथ करि साथ सोहूं लिया, अधर दरियाव का सुक्ख माने । कहैं कन्वीर सोइ संत निर्भय घरा, जन्म और मरन का भर्म भानै ॥ २ ॥ गंग उलटी धरो जमुन वासा करो.* पलट पंच तीरथ पाप जावै। नीर निर्मल तहाँ रैन दिन भारतु है. न्हाय जो बहुरि भव सिंध न आवै ॥ १ ॥ फिरत चौरे तहाँ बुद्धि को नास है वाज के कपट में सिंघ नाहीं। गंग अर्थात दहिनी स्वॉसा को पढ़ाओ ही जमुन अर्धात बाई स्वॉसा के साथ निलाओ । 13 रेगा पीर उस जुक्ति को गहेगा, जनम जो मरन तब अंत पाई ॥ २॥ ॥६॥ . गोगा में अलब बिराराम है, लोग मोजून तो राही पावे । को बेर उलटा चढ़े, पार पीप को उलटि लावै ॥ १ ॥ ITीर गुरा सिंध का फूलना गोकी गार तह नाद गावे । नीर पिन कबाल नह देख अति फूलिया, का मन भंवर छावै ॥२॥ घर के बीच में कंबल अति फूलिया, नानुका गुश्ख कोइ संत जाने । लुफ नांद्वार औ पवन को रोकना, निरक्रुटी मढ मन भंवर आनै ॥ १ ॥ मन्द की घोर चहुं ओर ही होत है, अथर दरियाव को सुक्ख मानै कहै कबीर यो कूल सुख सिंध में, जन्म मा मरन का भर्म भान। ॥२॥ गंग औ जमुन के घाट को खोजि ले, भंवर गुंजार तह करत भाई। ताला। तोड़े।
रेख्ता R सरसुती नीर तहँ देखु निर्मल बहै, तासु के नीर पिये प्यास जाई ॥१॥ पाँच की प्यास तहँ देखि पूरी भई, तीन की ताप तहँ लगे नाहीं। कहैं कबीर यह अगम का खेल है, गैन का चाँदना देख माहीं ॥ २ ॥ माडि मत्थान मन रई* को फेरना होत घमसान तहें गगन गाजै । उठत झनकार तहँ नाद अनहद धूरै, तिरकुटी महल के बैठ छाजै ॥ १ ॥ नाम की नेत कर चित्त को फेरिया, तत्त को ताय कर घिर्त लीया। कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, परम सुख धाम तहँ लागि जीया ॥ २ ॥ ॥ १० ॥ गड़ा निस्सान तहँ सुन के बीच में उलटि के सुरति फिर नाहिं आवै । दूध को मत्थ कर घिर्त न्यारा किया, बहुरि फिर तत्त में ना समावै ॥१॥ माडि मत्थान तह पाँच उलटा किया, नाम नौनीति ले सुरत फेरी। *राय, राजा । मक्खन ।
रंगवा -::-नीर की रात निर्भय हुआ, जन्म: सरन की मिटी फेरी ॥ ॥ ११ ॥ पाग लें गूर उगा राही, जहाँ रात कूते। त नर बरगत रहे, 15 पी पाँच मूले ॥ १ ॥ . तुन ज्यों देतु अंतर नह ।।शीन भी एक आहीं। - ना माना गंगा तई, त्रमा नाहीं ॥२॥ -. A ॥ १२॥ मान गुरु-भान बिन ना लहै रंग-जान कोइरांत पूरा । बाट पनि खोड़सी परगटै मान जारी तहाँ बजे तूरा ॥१॥ इंला पिंगला गुपनमा सम करे, जी उर्थ विच ध्यान लावै । कीर गोह संत निर्भय रहै, काकीट फिर नाहिं खावै ॥ ॥ १३ ॥ अपर आनन किया खास प्याला मि रेसता १०१ पंथ बिन जाइ चल सहर बेगमपुरे, दया गुरुदेव की सहज आई ॥ १ ॥ ध्यान धर देखिया नैन बिन पेखिया, अगम अगाध सब कहत गाई। कहैं कब्बीर कोइ भेद विरला लहै, गहै सो कहै या सैन भाई ॥२॥ ॥४॥ सहर बेगमपुरा गम्स को ना लहै, होय वेगम्म सो गम्म पावै । गुनों की गम्म ना अजब बिस्राम है, सैन को लखै सोइ सैन गावै ॥ १ ॥ मुक्ख बानी तिको स्वाद कैसे कहै, स्वाद पावै सोई सुक्ख कहैं कब्बीर या सैन गूंगा तई, होय गूंगा सोई सैन जानै ॥ २ ॥ माने । ॥ १५॥ अधर ही स्याल औ अधर ही चाल है, अधर के बीच तहँ मट्ट कीया। खेल उलटा चला जाय शेथे मिला, सिंध के मुख फिर सीस दीया ॥ १ ॥ तिम का।
रंगता ... मन मोर नंकोर तह अधर है, ना ने परस करि पीर पाया। -: --पीर यह मेरा अवधूत का, गति अनभूत घर सहज आया ॥ २॥ ॥१॥ - आभूत मरतान माता रहे, जाना राग गुधि लिया पूरा । 11 गावांरा का प्रेम प्याला पिया, मगन गाली तहाँ बजे तूरा ॥ १ ॥ पोट गंगा गां नाम-राता रहे, जनन जाना लिया सदा खेले । कहै कबीर गुरु पाम मुग्म धाम तह प्रान मेलै ॥ २ ॥ ॥ १७ ॥ उका मा थका फिर देह धारै नहीं, करम औ कपट सब दूर कीया । जिन ग्वाम उरवास का प्रेम प्याला पिया, नाम दरियाव तहें पैसि जीया ॥ १ ॥ चढ़ी मनवाल औ हुआ मन साविता, फटिक ज्यों फेर नहिं फूटि जावै । कहैं कन्वीर जिन बास निर्भय किया, बहुरि संमार में नाहिं आवै ॥२॥ पेट कर । धिर । पीर गाँ शुरखरू, मरगार।
रेखता १०३ । ॥ १८ ॥ तरक संसार सों फरक फर्रक सदा, गरक गुरु ज्ञान में जुक्त जोगी। अर्ध औ उर्ध के बीच आसन किया, वंक प्याला पिवै रस्स भोगी ॥ १॥ अर्ध दरियाव तहँ जाय डोरी लगी, महल वारीक का भेद पाया। कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, परम सुख धाम तहँ प्रान लाया ॥ २ ॥ ॥ १८ ॥ माडि मतवाल तहँ ब्रह्म भाठी जरे, पिवै कोइ सूरमा सीस मेलै । पाँच को पेल सैतान को पकरि के, प्रेम प्याला जहाँ अधर झेलै ॥ १ ॥ पलटि मन पवन को उलटि सूधा कॅवल, अर्ध औ उर्ध विच ध्यान लावै । कहैं कव्वीर मस्तान माता रहै, विना कर ताँतिया नाद गावै ॥ २ ॥ ॥ २० ॥ आठ हूं पहर मतवाल लागी रहै, आठ हूं पहर की छाक पीवै । हूबा हुआ। प्याला ।
रेगाता । 에 गनई पहर मस्नान माता रहे, ल की शोल में साध जीवे ॥ १ सांन ही कहतु ओ साँच ही गहतु है, नको त्याग कनि साँच लागा। काजीर मा साथ निर्भय हुआ, जनम ओ मरन का भर्म भागा ॥२॥ ॥ २२॥ करमकलाल दरियाव के बीच में, ब्रल की छोल में हंस फूले । अर्थनी उर्थ की पंग बाढ़ी तहाँ, पलट मन पवन को कंवल फूले ॥ १ ॥ गगन गाजै नहाँ सदा पावस' करे, होत झनकार नित बजत तूरा । बंद कनव की गम्म नाहीं तहाँ, कहैं कबीर कोइ रमै सूरा ॥ २ ॥ ॥ २२ ॥ गगन की गुफा तहें गैब का चाँदना, उदय औ अस्त का नांव नाहीं। वित्रमा रेन तहे नेक नहिं पाइये, प्रम परकास के सिंध माहीं ॥१॥ आनन्द। जयपा।
रेशता १९५ सदा आनंद दुख दुन्द व्यापै नहीं, पूरनानंद भरपूर देखा । भर्म और भांति तहँ नेक आवै नहीं, कहैं कव्वीर रस एक पेखा ॥२॥ ॥ २३ ॥ खेल नर्लंड का पिंड में देखिया, जगत की भर्मना दूर भागी । बाहरा भीतरा एक आकासवत, सुपमना डोरि तहँ उलटि लागी ॥ १ ॥ पवन को पलट करि सुन्न धरिया में अधर भरपूर देखा । कहैं कबीर गुरु पूर की मेहर सों, तिरकुटी मटु दीदार पेखा ॥२॥ में घर किया, ॥ २४ ॥ देख दीदार मस्तान मैं हाइ रह्यो, सकल भरपूर है नूर तेरा। सुभग दरियाव तहँ हंस मोती चुगैं, काल का जाल तहँ नाहिं नेडा ॥१॥ ज्ञान का थाल औ सहज मति वाति है, अधर आसन किया अगम डेरा। कहैं कबीर तहँ भर्म भासै नहीं, जन्म औ मरन का मिटा फेरा ॥ २ ॥ 14 रेगा ॥२५॥ भासै। राश तह रैन कहें पाइये, नकारा नहिं सूर परमास जज्ञान कह पाइये। ता. अजान तहँ ज्ञान नासै ॥ १॥ - लाव तहं नाम कह पाइये, नाम नह होय तह काम नाहीं । कवीर यह रात्त बीचार है, पद विचार करि देख नाहीं ॥२॥ , ॥ २६॥ एक ममी कसार बजती रहे, चल का गूरमा रांत झेलै । काम दल जीत करि क्रोध पैमाल करि, म मुख धाम तहें सुरत मेलै ॥ १॥ जीवन जह करि ज्ञान का जड़ा ले, आम बागान में खेल खेले। कबीर साउरांत जन सूरमा, जीनांप करि करम ठेलै ॥२॥ ॥२१॥ सरि समोर संग्राम में पैसिये, देह परत कर जुद्ध भाई। ना । 'तरामार।
रेखता १७ काट सिर चैरियाँ दाब जहँ का तहाँ, आय दरवार से सीस नाई ॥ १ ॥ करत मतवाल जहँ संत जन सूरमा. घुरत निस्सान तहँ गगन धाई । कहैं कन्वीर अब नाम सों सुरखा, मौज दरबार की भक्ति पाई ॥२॥ ॥ २८॥ । देह चंदूक और पवन दारू किया. ज्ञान गोली तहाँ खूर डाटी। सुरत की जामकी मूठ चौथे लगी. भर्म की भीत' सब दूर फाटी ॥१॥ कहैं कबीर कोइ खेलिह सूरमा, कायराँ खेल यह होत नाहीं। आस की फाँस को काटि निर्भय भया. नाम रस रस्स कर गरक माहीं ॥२॥ ॥२९॥ ज्ञान समसेर को बाँधि जोगी च मार मन मीर रन धीर हूवा । खेत को जीत करि रिसन सब पेलिया, मिला हरि माहिं अब नाहिं जूबा ॥ १ ॥ जगत में जस्त औ दाद दरगाह में, खेल यहाखेलिहै सूर कोई। 'दास्त । 'दीवार । :विषय ।
२गता -: चोर यह सूर का खेल है, बारा सेल यह नाहिं होई ॥२॥ ॥३०॥ पर गाम को देसि भागे नहीं, देशि भागे रोई सूर नाहीं । मोक्रोध मद लोभ सों जूझना, पायमान राहं खेत माहीं ॥१॥ गार और गांल संताप साही भये, नाम गमरोर तह खूब बाजै ॥२॥ ८. बल्बीर कोड झिह सूरमा, कायरों भीड़ नह तुरत भाजे ॥ ३ ॥ ॥ ३१ ॥ गाय का बल तो विकट बेंडा मती, मनी औ सूर की बाल आगे। पलक दो चार का, मनी घमसान पल एक लागे ॥१॥ भाष नंग्राम है रैन दिन जूतना, र पजन का काम भाई । है कल्बीर दुक बाग ढीली करे, उदि मन गगन सों जमी आई ॥२॥ कर घमासान
मिश्रित
१०९
मिश्रित
॥ शब्द १॥
तन मन धन वाजी लागी हो ॥ टेक ॥
चौपड़ खेलूं पीव से रे, तन मन बाजी लगाय ।
हारी तो पिय की भई रे, जीती तो पिय मोर हो ॥१॥
चौसरिया के खेल में रे, जुग्ग मिलन की आस ।
नर्द अकेली रह गई रे, नहिं जीवन की आस हो ॥२॥
चार बरन घर एक है रे, भाँति भाँति के लोग।
मनसा बाचा कर्मना कोइ, प्रीति निंबाहो ओर हो ॥३॥
लख चौरासी भरमत भरमत, पौ पै अटकी आय ।
जो अबके पौ ना पड़ी रे, फिर चौरासी जाय हो ॥४॥
कहैं कधीर धर्मदास से रे, जीती याजी मत हार ।
अबके सुरत चढ़ाय दे रे, साई सुहागिन नार हो ॥५॥
। शब्द २॥
जन को दीनता जब आवै ॥ टेक ॥
रहे अधीन दीनता भापै दुरमति दूरि बहावै ।
सो पद देव दास अपने को ब्रह्मादिक नहिं पावै ॥१॥
औरन को ऊँचो करि जानै आपुन नीच कहावै ।
तुम ते अवधू
साँच
कहतु
हौं से मेरे मन भावै ॥२॥
सव घट एक ब्रह्म जो जानै दुविधा दूर बहावै ।
सकल भर्मना त्यागि के अवधू इक गुर के गुन
गावै ॥३॥
मितता
न लेप तोला सा अभिमान नसावे ।
में ले गमाई पनि गुनि रात्र बिसरावै ॥४॥
मामी गंगत जोग जुक्ति तें पावै ।
तो गायोनार न भवजल आवे ॥५॥
॥ 3 ॥
-
.
पाराजिनामा आपाडारादेका
- पानी माईकोर्ट को मैं त्यागी।
की जीती अरावन को लागी ॥१॥
-:
मार भाई कोई कहै मैं भोगी।
सपा दृषि न द्वारा कैसे जीवे रोगी ॥२॥
दाना रे भाई कोई कहे मैं तपसी।
जनन नाम निात्रय नहिं जाना सब माया में खपसी३
कर जुगनी सब जानों कोई कहे मैं रहनी ।
आनन देव गो परिचय नाहीं यह सब झूठी कहनी ॥४॥
आई को धर्म सब साधे और वरत सब कीन्हा ।
आप की आँटी निकसी नाहीं करज बहुत सिर लीन्हा ५
व गुमान मब दूर निवारे करनी को बल नाहीं।
लवीर नाव का बंदा पहुंचा निज पद माहीं ॥४॥
॥ शब्द४॥
साका निरजनहार बढ़या इक ना मरै ॥ टेक ॥
बावर मारा व्याह करा दो अनजाया वर लाय ।
निजामा बर ना मिल तो तोहि से मेरा व्याह ॥१॥
मित्रित १९९ ॥ शब्द ५॥ हरे हरे घाँस कदा नगरे बाबुल पानन मड़वा छाय । सुरति निरति की भाँवरि डारो ज्ञान की गाँठि लगाय २ सास मरे ननदी मरै रे लहुरा देवर मरि जाय । एक बढ़ेया ना मरै चरखे का सिरजनहार ॥ ३ ॥ कहै कबीर सुनो भाई साधो चरखा लखो न जाय । या चरखे को जो लखे रे आवागवत छुटि जाय ॥४॥ जहँ लोभ मोह के खंभ दोऊ, मन रच्यो है हिंडोर । तहँ फूलैं जीव जहान, जहँ कतहूं नहिं थिर ठौर ॥ १ ॥ चतुरा झूलें चतुराइयाँ, औं झूलें राजा सेव । औ चंद सूर दोऊ भूलें, नाही पार्व भेव ॥ २ ॥ चौरासी लच्छहुँ जिव मूल, फूल रवि ससि धाय । कोटिन कल्प जुग चोतिया, आने न कयहूं हाय ॥३॥ धरनी आकासहु दोऊ फूलै फूलैं पवनहुं नीर । धरि देह हरि आपहु जूलैं, लखहीं संत कबीर ॥ ४ ॥ - ॥ शब्द ६ ॥ मोको कहाँ ढूंटो वंदे मैं तो तेरे पास में ॥ देश ॥ ना मैं छगरी ना मैं भेंडी न मैं छुरी गँडास में ॥१॥ नहीं खाल में नहीं पूंछ में ना हड्डी ना मास में ॥२॥ ना मैं देवल ना मैं मस्जिद ना काये लैलास में ॥३॥ ना तौ कौनो क्रिया कर्म में नहीं जोग बैराग में ॥४॥ दररी।
लिपि - पिलितों पल भर की तालास में ॥५॥ TIT मेरी पुरी मनास में ॥६॥ नाभागाभागन स्वाँगों की स्वाँस में ॥७॥ ॥ १॥ . 1 .: ।। HTTो लगा। मन के लगाये गुरु पावे? ! ' . [ ग प ठोलिया ढोल बजावे। 1. . . अपर गुरित बांस पर लावै ॥२॥ 11. नी, ओरा बाटने आवे। तिनजिाने मनितज प्रान गँवावे : माकप जला कर छोड़े बतरावे वयन गग राचे, गुरति डोर पर लावै ॥४॥ - चढ़ी मन अपर, अपनी काया जरावे । बिना नब कुटुंब नियागै, सुरत पिया पर लावै ॥५॥ कर दी र नबेद आगजा, ज्ञान को आरत लावै । वीर मुनो भाइ साधो, फेर जनम नहिं पावै ॥६॥ ॥ शब्द ८॥ गरी दिवानी दुनियाँ, भक्ति भाव नहिं बूस जी ॥१॥ को आय नो बेटा माँगै, यही गुसाँई दीजै जी ॥२॥ गई आय दुग्य का मारा, हम पर किरपा कीजै जी ॥३॥ र आवे ना दालन माँगे, भेंट रुपैया लीजै जी ॥४॥ नाई गये व्याह सगाई, सुनत गुसाँई रीझे जी ॥५॥ माप । 'यात करती है। V मरम।
লিন साँचे का कोइ गाहक नाहीं, झूठे जक्त पती जी ॥६॥ कहै कबीर सुनो भाई साधो, अंधों को क्या कीजै जी ॥१॥ ॥ शन्दर॥ साध के सौ सतगुरु चारो बरन बिचारी ॥ टेक ॥ ब्राह्मन वही ब्रह्म को चीन्है, पहिरै जनेव विचारी ॥१॥ गुन जनेव के नौ गुन, सो पहिरे ब्रह्मचारी ॥२॥ छत्री वही पाप को छै करै, ज्ञान बाँध तरबारी ॥३॥ अंतर दिल बिच दाया राखें, कबहूं न आवै हारी ॥2.! वैस वही जो बिसया त्याग, त्याग देय पर नारी ॥५॥ ममता मारि के मंजन लावै प्रान दान देडारी ॥३॥ सूद्र वही जो सूधो राहै, छोड़ देय अपकारी ॥७॥ गुरु की दया साध की संगत, पावै अचल पद भारी ॥८॥ जो जन भजै साई जन उबरै, या में जीत न हारी ॥६॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो. नामै गह। सॅभारी ॥१०॥ ॥ शब्द १० ॥ संतन जात न पूछो निरगुनियाँ ॥ टेक ॥ साध वराम्हन साध छत्तरी, साधै जाती बनियाँ। साधन माँ छत्तीस कौम है, टेढ़ी तोर पुछनियाँ ॥१॥ साधै नाऊ साधै धोबी. साध जाति है बरियाँ । साधन माँ रैदास संत हैं, सुपच ऋपी सो भेगियाँ ॥२॥ सेवाल। 11 ति -- {" -::न ने है. वळू नाहिं पहिचनियाँ । गत मा केली. काल को फंद पसरियाँ ॥३॥ 77 77 है. सब रूप जिन देहियाँ । नो भागाभा. रानाप वहि जनियाँ ॥४॥ ॥ 11 १२॥ .... पिग ने गंवारी। : : प. पिन की सारी ॥ १ ॥ If . . IMF ननी चुनरिया । । पदिया पारी ॥२॥ दिगा में जांचल लागे । नापगति उंजारी ॥३॥ धिन नान यह बनी चुनरिया । बार वीर अलिहारी ॥१॥ ॥ गठन १२ ॥ अग कीन्हा जग मंझाहून मन बस कीन्हा ।टेक॥ निगे बन में लूटे विपै विकार न जाने ईना नृप टमरथ ने पकरि अजोध्या आने ॥१॥ zi - आले. वन में रहते थे पवन का अहार करते थे और एक 2.7 7-7रयाना मारत थे। राजा दशरथ के औलाद नहीं होती दी दलके कुन के परोहित थे उन्होने कहा कि यिधि ?? और होम होगा तय बेटा होने की उम्मेद हो सकती - अर्गा ऋषि के और कोई नहीं करा सकता मलदुलाकि जो कोई शगी ऋषि को यहाँ लायेगा -- निन्त्रित ११५ सूखे पत्र पवन भपि रहते पारामर* से ज्ञानी । भरमे रूप देख बनिता को कामकन्दला। जानी ॥ २ ॥ उमको हीरे जवाहिर का दान कर सर मिलेगा । एक वेश्या ने कहा मैं ले आती हूं वह वहाँ गई देखा कि जति जी बड़ी नानाची में बैठे हैं। লিন दरहू पर कि जबान लगाते थे कही एक उँगनी गुह की नगा दो ऋपि जी ने जब जयान लगाई बाट लग गई गले एक दाणा जान मारते थे उम रोज़ दो दफा मारो दृमरे रोजनीन बार मारी तरह रम बढ़ता गया और ताक़त आने लगी । यह बेश्या जो सिट बेली थी उसने हनुवा पेश किया तब थोड़ा थोडा हनुवा खाने नगे बदन जो दुबला घा वह पुष्ट होने लगा नाश्त आई कन्या पानव कारंवार जारी होगई, दो तीन लड़के हुए । किमी बताने गगी जी : या ने कहा चलो राज दरबार मे यहाँ जंगल ने नारे भूखे मरने है निधारे उनके साथ हो लिये । दो लड़कों को दोनो बाधे। पर उठाया और पर का हाथ पकड़ा पीछे वह वश्या पन्नो । म दशा में राजा दा दरवार मे पहुंचे और यहाँ कृया होम बर्गर की गई किसी ने ताना नारा तय होश आया एक. दम् ला पो यही पटर के आगे और जाना कि. माया ने दिया। -पाराशर ऋषि ने मोदरी से नाव से ग दिपा (यह बी उन्नी बीज से मटली के पेट से पैदा हुई दीजो की गंगा में नहाने बत ऋषि जी का किमी समय मे गिर गया था और एक सलीमे दा निया पा) उप महोदरी ने कहा अभी दिन है लेग देखते हैं तब ऋषि ने अपनी मिद्ध शक्ति ने अंधेरा कर दिया आकाश में बादल आ गये ।हिज रतने कहा से मच्छो की दबू आती है ऋषि ने मद खुशबू कर दिया । नतीज्ञा इस नगर का यह हुआ कि याम जी उस महोदरी ३ पैदा हुए । वाम दला एव परम उन्दर स्त्री साध्या में हो गई है। मेरे बदन ददन गि .:-: जानी नार सुनी सी निस दिन ही संग राखी। .." --- --- नारिलहिल्या निगम कहत है साखी ॥३॥ गनी जाकेता को मन क्यों डोले। देरा मोहिनी हा हा करिके बोले ॥ • TIIT मासा जग-उपराज| कहावै। 11 जीते बिन जिव आराम न पावै॥५॥ - - । • , 11 नी रिया पर राजा इन्द्र मोहित हुए भाषा कि 21 नताने जाते है दम लिये चॉद को हुक्म १ गतो यारद बाजे के वक्त जहाँ कि तीन बजे ', निना और गुर्ग को कहा कि तू बारह बजे रात को '. If riहिया और गौतम धोसा), रााकर अधीरात र फिर दा के नदी को चले गये । इन्द्र भीतर गौतम १ . 4 गोलग गीद के पाये तय मय हाल मालूम होगया- श्राप दिया कि तमको कल लगेगा और अपनी स्त्र - इल्या : दिलिपन्या हो जायगी मुर्गे को कहा कि हिन्दू तुझको .: मनी रसगे भीर इन्द्र को श्राप दिया कि एक काम इन्द्री अपने या अन्या वार किया तेरे गरीर में हज़ार वैसीही छन्द्री गा। शिवनी जिन के पारबती मी मुन्दर बी यी उनको छोड़ के - म माया का देग कर उसके पीछे दौड़े और जोश में वीज a गिर गया (उमी बीज में पारा पैदा हुआ) जब देशा माया का नई नव अपनं उष्टदेव को श्राप दिया कि, जमे हम स्त्री के पीछे 'ही तुम भी दौडगे-पनी में ताजुग में राम औतार हुआ, :- पालेका दीदना म हारने वाला।
( २ )
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वह दूसरे छापे में दूर कर दिये जावें और जो दुर्लभ ग्रंथ मंतवानी में
उन को मिलें उन्हें भेज कर इस परोपकार के काम में महायता करें।
यद्यपि जपर लिखे हुए कारनो मे इन पुस्तकों में बापने में बहुन
व्यय होता है तो भी सर्व साधारन के उपकार हेतु दाम प्राध ब्राना
फ़ी आठ पृष्ठ से अधिक तिमी का नही रचा गया है। जो लोग
मसलेबर अर्थात पके गारूक होकर कुछ पेशगी जना नरदेने जिनकी
तादाद दो रुपये से कम न हो उन को डाक महसूल और मनोआ
मिशन भी हर पुस्तक पर न देना पड़ेगा और जो पुम्न तर
गई है और जिनके नाम आगे लिये हैं मा एक माय नेने
के लिये दान मे एक रुपये की कमी कर दी जायनो मी.
भी न लिया जायगा-पेशगी दाम न भेजने का नाम
केवल डाक महसूल छोड़ दिया जायगा ।
अब भीखा साहय, विहार के दरिया मामी,
दीवानी हाथ में लीगई है ।
प्रोप्रिंटर, नवेरियर RAIPT.
पृलाई ई.
पाही