Sanmati Library, Jaipur
Atharved Bhashyam Trayodashm Kandam
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. । ॥ ओ३म् ॥ "वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है, वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यो का.परम धर्म है।" आनन्दसमाचार अथर्ववेदभाष्यम्-जिन वेदों की महिमा सब बड़े २ ऋषि, मुनि और योगी गा आये हैं और विदेशी विद्वान् जिनका अर्थ खोजने में लग रहे हैं। वे अब तक संस्कृत में हो के कारण बड़े कठिन थे । ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का अर्थ तो भाषा में हो चुक है। परन्तु अथर्ववेद का अर्थ अभी तक नागरी भाषा में नहीं था. इस महात्रुटि को पूरा कर के लिये प्रयाग निवासी पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी ने उत्साह किया है। वे भाष्य को नागर (हिन्दी) और संस्कृत में वेद, निघण्टु, निरुक्त, व्याकरणादि सत्य शास्त्रों के प्रमाण से या परिश्रम के साथ बनाकर प्रकाशित कर रहे हैं। भाष्य का क्रम इस प्रकार है । -सूक्त के देवता, 'छन्द उपदेश, २-सस्वर मूल मन्त्र ३-संस्वर पदपाठ, ४-मन्त्रों के शब्दों को कोष्ठ में देकर सान्वय भाषार्थ,५-भावार्थ, ६-प्राय श्यक टिप्पणी, पाठान्तर, अनुरूप पाठादि; ७--प्रत्येक पृष्ठ मे लाइन देकर सन्देह निवृत्ति लिये शब्दों और क्रियाओं की व्याकरण निरुक्तादि प्रमाणों से सिद्धि । इस वेद में २० छोटे बड़े काण्ड हैं, एक एक काण्ड का भावपूर्ण संक्षिप्त स्त्री पुरुषों में समझने योग्य प्रति सरल हिन्दी और संस्कृत भाष्य अल्प मूल्य में छपकर ग्राहकों के पास पहुंचता है। वेदप्रेमी श्रीमान राजे, महाराजे सेठ, साहकार, विद्वान और सर्व साधारण स्त्री पुरुष स्वाध्याय पुस्तकालयों और पारितोषिकों के लिये भाष्य मंगावे और जगत्पिता परमात्मा के पारमार्थिक और सांसारिक उपदेश, ब्रह्मविद्या, वैद्यक विद्या, शिल्पविद्या. राजविद्यादि अनेक क्रियाओं का तत्त्व जानकर आनन्द भोगे और धर्मात्मा पुरुषार्थी होकर कीर्ति पावे। छपाई उत्तम और कागज़ बढ़िया रायल अठपेजी है। स्थायी ग्राहकों में नाम लिखाने वाले सज्जन २०) सैकड़ा छोड़कर । पुस्तक वी० पी० वा नगद दाम पर पाते हैं । डाकव्य ग्राहक देते हैं। १ भूमिका ३ | ४, सहित ६ १० सूल्य १२) ११.)/२॥ ) २) शाम ३) | २२) २)| २१) |२||) काण्ड १३ | १४ १४ १५ १६ १७ १८ १९ २० पृष्ठ ३,२०० २) | २८) [१NE २५) काण्ड-१४ छप रहा है । कांड १५ शीघ्र प्रकाशित होगा। हवनमन्त्रा:-धर्म शिक्षा की उपकारी पुस्तक-चारों वेदों के संगृहीत मन्त्र ईश स्तुति, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण, हवनमन्त्र, वामदेव्यगान सरल भाषा में शब्दार्थ सहि संशोधित बढ़िया रायल अठपेजी पृष्ठ ६०, मूल्य ।)॥ रुद्राध्याय:-प्रसिद्ध यजुर्वेद अध्याय १६ (नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः ब्रह्मनिरूपक अर्थ संस्कृत, भाषा और अंग्रेज़ी में बढ़िया रायल अठपेजी, पृष्ठ १४८ मूल्य ।। रुद्राध्यायः-मूलमात्र बढ़िया रायल आठपेजी, पृष्ठ १४ मूल्य ) वेदविद्यायें-वेदों में विमान, नौका अस्त्र शस्त्र निर्माण, व्यापार, गृहस्थ, प्रतिषि सभा, ब्रह्मचर्यादि का वर्णन मूल्य )। पता-पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी १० अगलत १६१८। .५२, लूकरगंज, प्रयाग। (Allahabad ) काण्ड २ ५ म & . १२ लगभग Onkar Press, Allahabad.
१-सूक्त विवरण अथर्ववेद, कांड १३ ॥ सूक्त सूक्त के प्रथम पद देवता 'उपदेश छन्द अनुष्टुप् आदि CAUU • तथा . तथा तथा उदेहि वाजिन यो रोहित परमात्मा और त्रिष्टुप आदि जीवात्मा- २ उदस्य केतवो दिवि सविता रोहित तथा य इमे द्यावापृथिवी रोहितादित्य प्राकृति आदि ४(१) स एति सविता स्वर्दि तथा तथा प्राजापत्याऽनुष्टुप् आदि कीर्तिश्च यशश्चा तथा भुरिक साम्नीत्रिष्टुप ब्रह्म च तपश्व कीर्ति तथा भुरिक्प्राजापत्यात्रिष्टुप् सवा अहोऽजायत तथा तथा प्रामुरी गायत्री आदि भूयानिन्द्रो नमुराद् तथा तथा तथा उरुः पृथुः सुभूभुवै तथा तथा प्राजापत्याऽनुष्टुप् आदि अथर्ववेद कांड १३ के मन्त्र अन्य वेदों में सम्पूर्ण वा कुछ भेद से । अथर्ववेद यजुर्वेद, सामवेदंपूर्वा ऋग्वेद,मण्डल, काण्ड १३) अध्याय, त्रुिक, उत्तरा. चिक इत्यादि मन्त्र संख्या मन्त्र सूक्त, मन्त्र. सूक्त, मन्त्र मन्त्र १। २१ १।४१ १॥ ४२ १। ५६ १।६० २।११ ।७/२८ १। १६४। १७ १।१६४।४१,४२ .१०।५७।१ १०।५७।२ १०।५।१८ १। ५०।१ ४१,३३३३ ७ ॥४१८ ।। पू० १ १ ३२५ २।१६ १ यं त्वा पृषती रथे २ अवः परेण पर ३ एकपदी द्विपदी सा ४ मा प्रगाम पथो, ५ यो यशस्य प्रसाधन ६ पूर्वापरं चरतो माययै ७ उदुत्यं जातवेदसं - | अपत्ये तायवो यथा 8 श्रश्चन्नस्य केतवो १० तरणिविश्वदर्शतो ११ । प्रत्यङ् देवानां विशः १२ येन पावक चक्षला १३ विद्यामेषि रज १४ | सप्त त्वा हरितो १५ अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः १६ / यो विश्वचर्षणि १७ / एकपाद् द्विपदो, १- | वरमहाँ असि सूर्य २।१७ २।१८ २।१४ २। २० २।२१ २। २२ २।२३ २।२४ २।२६ २।२७ १० पू०२ पू०६।१४७ १ । ५०।३ ८।४० पू०६।१४। १।५०1४ ३३ १.३६ पू०६।१४।६ १। ५०।५ पू०६।१४।१० १।५०।६ ३३ । ३२ पू०६।१४।११ १।५०।७ पू०६।१४।१२ १। ५०1 पू०६।१४।१४ १। ५०18 पू०६।२४।१३ १०।१।३ १७ । १६ १०। ११७१८ 18१।११ पू०३४ उ081218 ७।४२ १। ११५।१ १३१४३ पू०६।१४।३ ५।१।१ १५।२४ पू०१।१ उ ०१३ १।१६४।४७ १।१६४।२ १० । १२१ । २,३२५ । १३,१२ १०। १७ । ३३ । ३8 २।२६ १६ चित्रं देवानामुद २१३५ २१४६ ३18 २० प्रबोध्यग्निः समिधा २१. कृष्णं नियानं हरयः २२ सप्त युअन्ति रथमे २३ / य आत्मदा बलदा २४ / एकपाद् द्विपदो . ३।२४ ३।२५
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सू.१ [४]
( २,८८७)
त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥
। ओ३म् ॥
अथर्ववेदः॥
त्रयोदशं काण्डम् ॥
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प्रथमोऽनुवाकः॥
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सूक्तम् १ ॥
..१-६० ॥ रोहितो देवता ॥ १, ६, ७, ८, १०, २०, २२, २३, २४, २५, २७,.
३३, त्रिष्टुप् : २, ३४, ३८, निवृत् त्रिष्टुप् , ३, ४, १२, ४२, निज जगती; ५,
११, ४१, भुरिकं त्रिष्टुप् ६ जगती ; १३ प्रतिशक्करी ; १४ अापी पङ्क्तिः, १५
पापी जगती ; १६ निवृद् बृहती ; १७, ३१ आर्षी जगती ; १८ भुरिगतिजगती;
१६ निचूदतिजगती; २१ गायत्री : २६ विराट् परोपिणक, २८ भुरिगनुष्टुप् :
२६, ३०, ३२, ३६, ४०, ४५-५१, ५३, ५४, ५६, ५८ अनुष्टुप् ; ३५ निचूद् ब्राह्मी
गायत्री ; ३६, ४३ भुरिगार्ची त्रिष्टुप् ; ३७ विराडतिजगती ; ४४ निवृत् परो:
ष्णिक ; ५२ पथ्या पतिः ; ५५ भुरिगाी पङ्क्तिः ; ५७ विराडनुष्टुप् ,५६,
६० गायत्री ॥
अध्यात्मोपदेशः-जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश ।
उदेहि वाजिन् यो झुण्स्वन्तरिदं राष्ट्र प्रविश सूनृतावत् ।
यो रोहितो विश्वमिदं जजान स त्वा राष्ट्राय सुभृतं बिभर्तु,
उत्-रहि । वाजिन् । यः। अप्-सु । अन्तः । इदम् । राष्ट्रस् ।
प्र । विश । सूनृता-वत् ॥ यः । रोहितः । विश्वम् । इदम् ।
जुज़ान । सः । त्वा । राष्ट्राय । सु-भृतस् । बिभर्तु ॥१॥
. (२,८४८) अथर्ववेदभाष्ये सू०.१ [ ४७६]. भाषार्थ-(वाजिन् ) हे बलवान् ! [ सेनापति ] ( उदेहिं ) ऊंचा हो, (सूनृतावत् ) सुनीत से युक्त (इदम् ) इस (राष्ट्रम् ) राज्य में (प्रविश ) प्रवेश कर । (यः ) जो ( रोहितः ) सव का उत्पन्न करने वाला [ परमेश्वर ] (अप्सु अन्तः ) प्रनाओं के भीतर है, और (या) जिस [ परमेश्वर ] ने (इदम्) यह ( विश्वम् ) विश्व [ जगत् ] ( जजान ) उत्पन्न किया है, ( सः ) वह [ पर- मेश्वर ] ( सुभृतम् ) बड़े पोषण करने वाले (त्वा ) तुझको ( गष्ट्राय,) राज्य करने के लिये ( विभक्षु) धारण करे ॥ १ ॥ भावार्थ-जिस पराक्रमी धर्मात्मा राजा को प्रांगण स्वीकार करें, यह राज्य कार्य ग्रहण करके सर्वव्यापक, सर्वजनक, सर्वपोषक परमात्मा के आश्रय से अपना बल बढ़ावे और प्रजा का पालन करे ॥ १ ॥ उद्वाज भा गन् यो अण्स्वर न्तर्विशु पा रौह त्वद्यौनयो याः। सोम दोनोप ओषधीर्गाश्चतुष्पद्रो द्विपद आ वैशये ह ॥२॥ उत् । वाजः । भा। गन् । यः । भूप-सु । अन्तः । विशः । ला। रोहु । त्वत्-यौनयः । याः॥ समम् । दधानः । अपः । मोषधीः । गाः। चतु:-पदः। द्वि-पदः । श्रा। वे शय । दुह २ भाषार्थ-('वाजः ) यह बलवान् [ परमेश्वर ] ('उत् ) उत्तमता से (आ गन् ) प्राप्त हुआ है, ( यः) जो ( अप्सु अन्तः) प्रजाओं के भीतर है, [हे १- (उदेहि:) उद्च्छ (वाजिन्.) अ०४।४।२ । हे बलवन सेनापते (यः) परमेश्वरः (अप्सु) प्रजासु । आपः-श्राप्ताः प्रजाः दयानन्दभाष्ये 'यजु० ६ । २७ (अन्तः):मध्ये (इदम् ) दृश्यमानम् (राष्ट्रम् ) राज्यम्( सूनृतावत् ) अ०७। ६० । ६। सुनीतियुक्तम् (यः ) ( रोहितः) रुहेरश्च तो वा । उ०।३। ६४। रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-इतन् । उद्भावकः । सर्वोत्पादकः परमेश्वरः (विश्वम् )-जगत् (इदम् ) दृश्यमानम् ( जजान ) उत्पादयामास (सः) पर- मेश्वरः (त्वा ) राजानम् ( राष्ट्राय ) राज्यकरणाय (सुभृतम् ),विभतः क्विप् । यथारीति भर्तारं पोषक (बिभर्तु ) धारयतु ॥ २-( उत्) उत्तमतया (वाजः) वाज-अर्श आद्यच् । बलवान् परमे. श्वरः (भागन्) ५०३ । ४ ॥ १। आगमत् (यः) (अपस) म०१ । प्रजासु :. - । N सू०.१ [४] धयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६८) राजन् ! (विशः ) उन प्रजात्रों पर (श्रा रोह) ऊंचा हो, ( याः)जो [प्रजायें] (त्वंद्योनयः ) तुझ से मेल रखने वाली हैं। ( सोमम् ) ऐश्वर्य, (अपः ) कर्म, (ओषधीः ) ओषधियो [भन्न, लोमलता 'श्रादि] और (गाः ) गौ आदि को. ( दधानः ) धारण करता हुआ तू ( चतुष्पदः) चौपायों और (द्विपदः) दो- पायों को (इह ) यहां [प्रजात्री में ] ( आ वेशय)-प्रवेश करा॥ २॥ भावार्थ-राजा को योग्य है कि सर्वनियामक परमेश्वर को ध्यान में रख कर अपनी प्रजा का पालन करें और योग्यता और कार्य दक्षता से अपनी और प्रजा की आवश्यक सम्पत्ति, जैसे अने, गौं, घोड़ा, हाथी मनुष्य आदि को चढ़ावे ॥२॥ यूयमुना मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजी ममणीत शंब न् । आ वो रोहितःशृणवत् सुदानवस्विषनासो मेरुतःस्वादुसमुंद यूयम् । उग्रा: । मरुतः । पृश्नि-मातरः । इन्द्रेण । युजी मुणीत । शत्रून् ॥ श्रा। वः । रोहितः । शृणवत् । सु- दानवः । त्रि-सुप्तासः । मरुतः । स्वादु-समुदः॥ ३ ॥ भाषार्थ-(पृशिनमातरः ) हे पूछने योग्य वेदवाणी को माता समान मान करने वाले, ( उग्राः ) प्रचंड (मरुतः) शूर लोगो ! (यूयम्') तुम' (इन्द्रेणे) बड़े ऐश्वर्य चोले सेनापति (युजा ) मित्र के साथ ( शत्रन ) शत्रुओं को (अन्तः ) मध्ये ( विशः ) प्रजाः (श्रारोह) अधितिष्ठ । त्वधोनयः ) वहिनि: श्रृंयु०।०४। ५१ । यु मिश्रणामिश्रणयोःनि । योनिहनाम-निघ० ३.१४ त्वया सह मिश्रिताः (या) प्रजाः (सोमम् ) ऐश्वर्यम् (दधानः) धारयन् (भंप) आपः कर्माख्यायां ह्रस्वो नुट् च धा। उ०-४ । २०८ । प्राप्त व्याप्तौ-असुन् हस्वश्च । कर्म-निघ० २।१ (ोषधीः) अन्नसोमलतादिपदार्थान् (गाः) गवादिपशन (चतुष्पदः ) पादचतुष्टयोपेतान् (द्विपदः) पादद्वयोपेतान् (वि. शयः) आनीय प्रवेशय (इह) अत्र । प्रजासु ॥ ३-(यूयम् ) ( उग्राः ) प्रचण्डाः ( मरुतः) अ० । १ । २० । १ । हे शूर- वीराः (पृश्निमातरः) ०५।२१। ११ । प्रच्छ शीप्सायाम्-नि । प्रष्टव्या वेद. पाणी मातृवत् सत्करणीया येषां ते ( इन्द्रेण) परमैश्वर्यवता सेनापतिना (युजा) ' , मू०. १ [.४७६ ] (२,८००) अथर्ववेदभाष्य (प्र.मृणीत ) मार डालो। ( सुदानवः ) हे बड़े दानियो ! (विषप्तासः) हे तीन [कर्म, उपासना और ज्ञान के साथ सात त्वचा, नेत्र,काम, जिह्वा, नासिका, . मन और बुद्धि ] को रखने वाले (स्वादुसंमुदः ) हे भोजन योग्य अन्न में मिल कर आनन्द पाने वाले ! ( मरुतः ) हे शूर पुरुषो! (रोहितः) सव का उत्पन्न करने वाला [ परमेश्वर ] (वः) तुम्हारी [प्रार्थना ] (आ.) सब प्रकार (शृण- पत् ) सुने ॥३॥ भावार्थ-जो सेना गणं शिल्प विद्या द्वारा आकाश आदि में जाते हैं, और जितेन्द्रिय होकर प्रीति के साथ मिले कर, रहते हैं, वे परमेश्वर से चल पाकर शूर सेनापति की सहायता से शत्रुओं को मारते हैं ॥३॥ : इस मन्त्र का पहिला भाग पाचुका है.-१०। ५ । २१ । ११ ॥ रहौ रुरोह रोहित मा रुरोह गर्भो जनीनां जनुषामुपस्यम् । ताभिःसंरब्धमन्वविन्दन् षडु/तुमुपश्यनिह राष्ट्र माहा:४ रुहः । रुरोह । रोहितः । या । रुरोह । गर्भः । जनीनांस् जनुषाम् । उप-स्थम् ॥ ताभिः । सम्-रब्धम् । अन । अवि- न्दुन् । षट् । उर्वीः ।'गातुम् । प्र-पश्यन् । दुह । राष्ट्र स् । प्रा.। अहाः ॥ ४ ॥ भाषार्थ-(रोहितः ) सब के उत्पन्न करने वाले . परमेश्वर ने (रुहः) सृष्टि की सामग्रियों को (करोह ) उत्पन्न किया, और ( जनीनाम् ) उत्पन्न करने मित्रेण (प्र) प्रकर्षेण (मृणीत) मृ हिंसायाम् । मारयत ( शत्रून् ).अरीन् (आ) समन्तात् ( वः) युष्मान् ( रोहिताः) म० १ । सर्वोत्पादकः. परमेश्वरः (शृण- वत्) शृणुयात् (सुदामवः) हे महादातारः (त्रिषप्तासः) बहुव्रीही संख्येये डजबहुगणात् । पा०५१४। ७३ । इति डच् , असुगागमः । त्रिभिः कम्मोपासना- शानैः सह सप्त त्वक्वक्ष श्रवणरसनाघूाणमनोवुद्धयो येषां ते 'तथाभूताः (मरुतः) (स्वादुसम्मुदः) कृवापाजिमिस्वदि० । उ९१? प्वद् आस्वादने- उण+सम्+मुद हर्षे-क्विप् । भोज्याने परस्परहर्षितारः ।। ४-(रुहः) रुह वीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-क्विप् । सृष्टिसामग्री: (रुरोह) उत्पादितवान् (रोहितः) म० १. सर्वस्रष्टा (आरोह.) भारत- ।
सू०१ [४] -- त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८०१) की शक्तियों का ( गर्भः) गर्भ [ आधार वह परमेश्वर ] (जनुषाम् ) उत्पन्न होने वाले पदार्थों की (उपस्थम् ) गोद में (ो रुरोह) चढ़ गया । (ताभिः) उन [ उत्पन्न करने वाली शक्तियों ] से (संरब्धम् ) मिले हुये [ उस परमेश्वर को (षट् ) छह [ ऊपर, नीचे, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर] (उर्वीः) चौड़ी [.दिशो ] ने (अनु) निरन्तर (अविन्दन्) पाया है, (गातुम् ) मार्ग (प्रपश्यन्) आगे देखते हुये उस [ परमेश्वर ने ] (इह ) यहां पर (राष्ट्रम् ) अपना राज्य (श्रा) सब ओर से.(श्रहाः ) अङ्गीकार किया है ॥४॥ भावार्थ-परमेश्वर सब सृष्टि के पदार्थों का उत्पादक और नियन्ता होकर और दूर और समीप सवस्थान में वर्तमान रहकर राज्य करता है ॥४॥ इस मन्त्र में (रुह) धातु से बने शब्दों में अनुप्रास अलङ्कार है ॥ मा ते राष्ट्र मिह रोहितोऽहार्षीद् व्यास्थन्मृधी अभयं ते - अभूत् तस्मै ते द्यावापृथिवी रेवतीभिः काम दुहाथामिह शक्करीभिः॥ ५ ॥ आ। ते । राष्ट्रम् इह । रोहितः। अहार्षीत् । वि। भास्यत्। मृधः । अभयम् । ते । अभूत् ॥ तस्मै । ते । द्यावापृथिवी इति । रेवतीभिः। कामम् । दुहाथाम् । दुह । शक्करीभिः ॥ ५ ॥ भाषार्थ-[ हे मनुष्य! ] (रोहितः) सवका उत्पन्न करने वाला पर. - । . वान् ( गर्भः .) आधारः (जनीनाम् ) उत्पत्तिशक्तीनाम् (जनुषाम् ) जने- रुसिः। उ०२ ॥ ११५ । जन जनने-उसि । जन्मवन्ता पदार्थानाम् (उपस्थम्) कोडम् ( ताभिः ) शक्तिभिः ( संरब्धम् ) संबद्धम् (अनु) निरन्तरम् (अविन्दन) प्राप्तवत्यः (पट ) ऊ धोभ्यां सह पूर्वादयः ( उर्वीः ) विस्तृता दिशा: ( गातुम् ) मार्गम् (प्रपश्यन् ) अवलोकयन् ( इह ) अत्र । संसारे (राष्ट्रम् ) राज्यम् ( आ. अहाः) अ०६। १०३ । २। हरतेलुङ बाहृतवान् । समन्तात् स्वीकृतवान् ॥ ५-(ते ) तब ( राष्ट्रम्) राज्यम् (इह ) संसारे (रोहितः) म..। - se] ( २,०२ ) अथर्ववेदभाष्य सू० मेश्वर ) (ते) तेरे (राष्ट्रम्) राज्य को (इहं )यहाँ [ संसार में ](आअहा- पति) लाया है और उसने (मृधः) हिंसक [शत्र ओं] को (वि आस्थत ) गिरी दिया है, (ते) तेरे लिये (अभयम् ) अभय (अभूत् ) हो गया है । ( तस्मै ते ) उस तेरे लिये द्यावापृथिवी सूर्य और पृथिवी दोनों ( रेवतीभिः) धन वाली (शक्करीभिः) शक्तियों के साथ (कामम् ) कामना को (इह) यहां [इस राज्य में ] (दुहाथामताम् ) पूरी करें। भावार्थ-जो मनुष्य ईश्वर की प्राक्षा में तत्पर होकर राज्य चलाता है, उसकी आध्यात्मिक, आधिभौतिक, और आधदैविक क्लेश नहीं होते ॥ ५ ॥ रौहिती द्यावापथिवी जजान तत्र तन्तु परमेष्ठी संतान तत्र' शिश्रिये ऽज एकपादोऽहुद्द्यावापृथिवी बलेन ॥ ६ ॥ रोहितः । द्यावापृथिवी इति । जजान । तत्र तन्तुम् । परमे -स्थी । ततान ॥ तत्रं । शिथिये । अजः । एक-पादः अहत् । द्यावापृथिवी इति । बलेन ॥ ६ ॥ भाषार्थ-(रोहितः) सब के उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर ने (धावा- पृथिवी ) सूर्य और पृथिवी को (जजान ) उत्पन्नं किया, (तत्र ) उर्स में (पर- मेष्ठी) सब से ऊचे पंद्र वाले उस परमेश्वर ] ने ( तन्तुम् ) तन्तु [सूत्रात्मा वायु] को (ततान ) फैलाया । (तत्र ) उसमें ( अजः ) वह मज़न्मा (एकपादः) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः.( आ अहार्षीत् ) भानीतवान् (वि) पृथगभावे (आ. स्थत् ) असु क्षेपणे-लुङ्। क्षिप्तवान् ( मृधः) मृधु उन्दने हिंसायां च -क्विप। हिसकान् । 'शंत्र न (अभयम्) भयरहित्यम् (ते) तुभ्यम् ( अभूत (तस्मै) ताभूताय ( ते) तुभ्यम् (द्यावापृथिवी) सूर्यभूमी (रेवतीभिः) अ०३ ।। धनवतीभिः (कार्मम् ) कामना (दुहाथाम् ) तकारस्य था। दुहाताम्। पूरयताम् (इहै) राज्ये (शक्वरीभिः ) ३१ १३ । ७ । शक्ट शक्ती- वनिम्। शक्तिभिः ६-(रोहितः) म १ । सर्वोत्पादकः (घावापृथिवी) सूर्यभूमी (ज. जान.) जनयामास (तत्र) तस्मिन् (तन्तुम) सूत्रम् । सूत्रात्मानं वायुम् । भाकर्षणम् ( परमेष्ठी) सर्वोत्कृष्ट पदे स्थितः परमेश्वर (ततान ) विस्तारया- .
- मू०.१ [४७८] त्रयोदशं काण्डम्.॥ १३ ॥ (२,६०३ ) एक डग वाला [ सब जगत् में एक रस व्यापक ] (शिनिये ) रा; उसने (द्यावापृथिवी ) सूर्य और पृथिवी को ( बलेन) अपने बल से .(अंडहत्) रढ़ किया ॥६॥ भावार्थ-जैसे परमात्मा ने सब सूर्य पृथ्वी आदि लोकों को उत्पन्न करके, और उनके भीतर सूत्रात्मा वायु वा आकर्षण रख कर सब को नियम में बांधा है, वैसे ही बलवान् पुरुष अपने इन्द्रियों और सब लोगों को विविध प्रकार अपने वशे मे रक्खे ॥६॥ रोहितो द्यावापृथिवी अदूंहुत् तेन स्व स्तंभितं तेनु नाकः । तेनान्तरिक्षं विमिता रजोसि तेन देवा भृमृतमन्वविन्दन् । रोहितः । द्यावापृथिवी इति । मुहूँ हुत् । तेन । स्वः । स्तु- भितम् । सेन । नाकः ॥ तेन । सुन्तरिक्षम् । वि-मिता । रजोसि । तेन । देवाः । अमृतम् । अनु' । अविन्दन् ॥ १ ॥ भाषार्थ-(रोहितः) सब के उत्पन्न करने वाले [ परमेश्वर ने (धावापृथिवी ) सूर्य और भूमि को ( अहत्) दृढ़ किया, (नेन) उसी करके ( स्वः) सामान्य सुख [अभ्युदय ] (स्तभितम् ) थांभा गया है, (तेन) उसी करके (नाक:) विशेष सुख [निः श्रेयस मोक्ष सुख, थांभा गया है] । (तेन) उसी करके ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष और (रजांलि) सब लोक (विमिता ) नाप डाले गये हैं; (तेन ) उस से ही ( देवाः ):विद्वानों ने (अमृतम्) अमरपन [ उत्साह वर्धक मोक्ष सुख ].( अनु ) निरन्तर ( अविन्दन् ) पाया है ॥७॥ मास (तत्र) (शिधिये ) तस्थौ (अजः) अजन्मा (एकपादः) सर्वजगति निरन्तरव्यापकः (अहत् ) दृढ़ीकृतवान् (धावापृथिवी) (बलेन) सामर्थ्येन ॥ ७-(रोहितः) म० १ (चावापृथिवी ) (अहहत् ) दृढीकृतवान् (तेन ) रोहितेन (स्वः) सामान्यसुखम् । अभ्युदयः (स्तभितम्), दृढ़ीकृतम् (तेन ) (नाका ) विशेषसुखम् । निःश्रेयसम् । मोक्षसुखम् ( तेन) ( अन्तरिः तम् ).( विमिता) विविधं परिमितानि (रजांसि ) लोकाः ( तेन ) रोहितेन (देवाः ) विद्वांसः ( अमृतम्) अमरणम् । पुरुषार्थम् (अनु) निरन्तरम् (अविन्दन् ) भलभन्त । " .. सू० १ [8" . ॥८॥ (२,८०४) अथर्ववेदभाष्ये भावार्थ-जिस परमेश्वर ने सब सृष्टि रची है .और जो सब का नियन्ता है, उसी जगदीश्वर के ज्ञान से मनुष्य उन्नति करके प्रानन्द पाते हैं। वि रोहितो. अमृशद् विश्वरूपं समाकुर्वाणः पुरुहो रहश्च । दिव रूढ्वा महुता महिम्ना सं ते राष्ट्र मनक्तु पय॑सा घृतेन वि। रोहितः । अमृशत् ।' विश्व-रूपम् । सुसू-साकुर्वाणः । मु-रुहः । रुहः । च ॥ दिवम् । रूढ्वा । मुहता । महिम्ना । सम् । ते । राष्ट्र म् । अनक्तु । पय॑सा । घृतेने भाषार्थ-(रुहः ) सृष्टि की सामग्रियों (च) और (प्ररुहः.) सृष्टि की वस्तुओं को ( समाकुर्वाणः ) एकत्र करते हुये ( रोहितः) सव उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर ] ने (विश्वरूपम् ) जगत् के रूप को (वि अमृशत् ) विचारा, वंह (परमेश्वर ] ( महता) अपनी विशाल.(महिम्ना) महिमा से ( दिवम् ) विजय की इच्छा में ( रुदवा). ऊंचा होकर (ते) तेरे (राष्ट्रम् ) राज्य को (पयसा ).अन्न से और (घृतेन ).जल से ( सम् अनक्तु ) संयुक्त करे ॥ ८ ॥ भावार्य-जो सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब के कार्य और कारण को जानता है, उसी की महिमा के विचार से मनुष्य उन्नति करके अन्न जल आदि पदार्थ प्राप्त करें। यास्ते रुहः मुरुहो यास्त भारुहो याभिरापूणासि दिवमन्त- रिक्षम् । तामां ब्रह्मणा पर्यमा वावृधाना विशि राष्ट्र जागृहि रोहितस्य ॥६॥ 1 . (वि) विविधम् (रोहितः) म० १। सर्वोत्पादकः (अमृशत् ). विचारितवान् (विश्वरूपम् ) जगतः स्वरूपम् (समाकुर्वाणः ) रोशीकुर्वन्' (प्ररुहः ) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-क्विप् सृष्टिवस्तूनि (रुहः) सृष्टि- सामग्रीः (च) (दिवम् ) विजिगीषाम् (रूदवा) आरुह्य (महता) विशालेन (महिम्ना ) महत्त्वेन (ते) तव ( राष्ट्रम्) राज्यम् ( समनक्तुं) संयोजयतुं (पयसा ) अनेन-निघ०२।७ (घृतेन ) जलेन-निघ. १।१२ ॥
सू० १ [४७८] .यादर्श काण्डम् ॥ १३ । (२,८०५) याः । ते । रुहः । म-रुहः । याः । ते। भा-रुहः । याभि:। श्रा-पृणानि । दिवम् । अन्तरिक्षम् ॥ तासाम् । ब्रह्मणा । पयसा । ववधानः । विशि । राष्ट्र । जागृहि । हितस्य : भाषार्थ-[हे मनुष्य !] (ते) तेरे लिये ( याः) जो,(रुहः) सृष्टि की सामग्री और (प्ररुहः) सृष्टि की वस्तुयें हैं और (याः) जो (ते ) तेरे लिये (आरुहः) सृष्टि की स्थितियां हैं, (याभिः ) जिनसे. (.दिवम् ) आकाश और (अन्तरिक्षम्.) अन्तरिक्ष को ( श्रावृणासि-ति ) सब ओर से वह [ईश्वर भरता है । (तासामु ) उनके (ब्रह्मणा) अन्न और (पयसा) जल से (ववृधानः) . बढ़ता हुआ तूं (रोहितस्य ) सब के उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर ] के (राष्ट्र) राज्य में (विशि ) प्रजा पर (जागृहि ) जागता रह ॥ ६ ॥ भावार्थ-परमेश्वर ने अपने राज्य में मनुष्य को सच सृष्टि से. उत्तम बनाया है । मनुष्य प्रत्येक पदार्थ के कारण, कार्य और स्थिति को विचारकर उसे उपयोगी बनावे ॥६॥ यास्ते विशस्तपसः संबभूवुर्व सं गायत्रीमनु ता दुहागु । तास्त्वा विशन्तु मनसा शिवेन संमाता बुत्सो नभ्येतु रोहितः॥ १० ॥ (१). याः। ते । विशः । तपसः । सम्-बभूवुः । वत्सम् । गायत्रीस् । अन । ताः । दुह । मा । अगुः ॥ ताः । त्वा । आ । विश- न्तु । मनसा । शिवेन । सम्-माता । वत्सः । अभि । स्तु । रोहितः ॥ १० ॥ (१) १-(याः) (ते.) तुभ्यम् (रुहः), म० ८ । सृष्टिसामग्रीः (प्ररुहः ) म० - सृष्टिवस्तूनि (याः ) ( ते ). तुभ्यम् (आरुहः ) सृष्टिस्थितीः (याभिः) (आपणासि .) तस्य सः । श्रापृणाति । समन्तात् पूरयति रोहितः (दिवम् ) आकाशम् (अन्तरिक्षम् ) ( तासाम् )..(ब्रह्मणा ) अन्नन-निघ०२।७ (पयसा) उदकेन-निघ० ११ १२ (ववृधानः ) छान्दसो दीर्घः । वृद्धि कुर्वाणः (विशि प्रजायाम् ( राष्ट्र ) राज्ये (जागृहि ) जागृतो भव (रोहितस्य ) म०१ । सर्वो. 'स्पादकस्य॥
। । 4 . (२,८०६) अथर्ववेदाध्ये. सू०१[४] जध्वों रोहितो अधि नाके अस्याद् विश्वा रूपाणि जनयन् युवो कविः । तिग्मेनाग्निज्योतिषा वि भाति तृतीय चक्र रजसि मियाणि ॥ ११ ॥ जुवः रोहितः। अधि । नाके। भ्रस्यात् । विश्वा । रूपाणि । जनयन् । युवा । कविः । तुिरमेन । अग्निः ज्योतिषा । वि। भाति । तृतीय । चक्रे । रज॑सि । मियाणि ॥ ११ ॥ भाषार्च-[.हे मनुष्य ! 7 ( याः जो (विशः प्रजायें (ते) तेरे लिये (नपतः) ऐश्वर्यरूप [ परमेश्वर ] ले (संबभूवुः } उत्पन्न हुई हैं. (ताः ) वे सब (बन्लम् ) बड़े उपदेशका परमेश्वर और (गायत्रीम् अनु पूजा योग्य वेदवाणी के पीई, पीछे {इंह) यहां (श्रा अगुः ) श्राई है ! (ताः) वे सब (शिवन ) तेरे प्रानन्दकारी (मनसा मनन से (वा) तुझ में आ विशन्नु ) प्रवेश करें; (समाना) समान माता-जननी ], (बत्तः) बड़ा उपदेशक (रोहितः) सब का उत्पन्न करने वाला परमेश्वर ] (अमि) सब ओर से (ए) प्राप्त हो ॥ १०॥ -लब के माता पिता श्रमाला ने जो जो पदार्य मनुस्य के लिये उत्पन्न किये हैं. उनसे धर्मात्मा विज्ञानी लोग भानन्द प्राप्त करके परनेश्वर को महिमा जानते हैं ॥ १० ॥ भाषा-(युवा ) वली, (कविः) बानी रोहितः) सब का उत्पन्न १०-(याः) (ते ) तुभ्यम् (विशः) प्रजाः (तपत्तः) ऐश्वर्या रूपात परमेश्वरात् ( संबभूवुः-) उत्पन्ना बभूवुः- (वन्तम् ) वृतवदिवत्रिवलिक ! उ० ३ । ६२ बद कथने-सप्रत्ययः महोपदेशकम् (गायत्रीम् ) १० १० १४१ । गै गाने-अनन् , लिंच युक् कोप च । गायत्री गायतःस्तुतिकर्मतः-निरु ! १ िस्तुंन्यां वैवाचम् ( अंनु) अनुत्तृत्य (ताः ) प्रज्ञाः (इह ) ( भागुः ) आगमन् (ताः) (त्वों) (आविशन्नु) प्रविशन्तु (मनसा ) नननेन ( शिवेन) मङ्गलकार (समाता) सामान्यजननी ( वत्सः) महोपदेशकः (अमि) सर्वतः (एत ) प्राप्नोतु ( रोहितः) सर्वोत्पादकः । २१-(ऊर्ध्वः) उन्नतः (रोहितः ! साम्पादकः (अधि) अधिकृत्य म० १.[४] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६०७) करने वाला [ परमेश्वर ] ( विश्वा ) सब (रूपाणि) कों [ सृष्टि के पदार्थों ] को (जनयन् ) उत्पन्न करता हुआ (नाके) मोक्ष सुख में (अधि) अधिकार पूर्वक (ऊर्ध्वः) ऊंचा होकर (अस्थात् ) ठैरा है । ( अग्निः) प्रमोशखरूप [परमेश्वर ] (तिग्मेन ) तीक्ष्ण (ज्योतिषा ) ज्योति के साथ. (वि) विविध प्रकार (भाति ) चमकता है, उसने (तृतीये ) तीसरे [रजोगुण और तमोगुण से भिन्न, सत्व] ( रजसि) लोक में [वर्तमान हो कर (प्रियाणि ) प्रिय वस्तुओं को (चक्र) बनाया है ॥ ११ ॥ भावार्थ-जिस सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ परमेश्वर ने सबसंसारको रचा है, विद्वान् लोग उसकी महिमाको प्रत्येकपदार्थ में देखकर अपनी उन्नति करते हैं ११ मुहस्रशृङ्गो वृषभो जातवेदा घृताहुतः सेामपृष्ठः सुवीरः । मा मा हासीनायितो नेत् त्वा जहानि गोपोषं च मे वीर- पोषं च धेहि ॥ १२ ॥ सुहस्र-शृङ्गः। वृषभः । जात-वेदाः । घृत-आहुतः । सोम-पृष्ठः । सु-वीरः ॥ मा । मा। हासीत् । नायितः । न । इत् । त्वा । जहानि । गो-पोषम् । च । मे। वीर-पोषम् । च । धे हि ।१२ भाषार्थ-(सहनङ्गः ) बड़े तेज वाला, (वृषभः ) महाशक्तिमान, (जातवेदाः) वेदों का उत्पन्न करने वाला, (घृताहुतः) प्रकाश का देने वाला, (सोमपृष्ठः) ऐश्वर्य का सींचने वाला, ( सुवीरः ) वड़ा वीर (नाथितः).प्रार्थना . (नाके) मोक्षानन्दे (अस्थात् ) स्थितवान् (विश्वा) सर्वाणि (रूपाणि) सृष्टिवस्तूनि (जनयन् ) उत्पादयन् (युवा ) वली ( कविः) मेधावी (तिग्मेन) तीव्रण (अग्निः ) ज्योतिःस्वरूपः परमेश्वरः (ज्योतिषां) तेजसा (वि) विविधम् (भाति ) दीप्यते (तृतीये ) रजस्तमोभ्यां भिन्न सत्त्वगुणे (चके) रचयामास ( रजसि) लोके (प्रियाणि ) हितकराणि वस्तूनि ॥ १२--(सहनशृङ्गः ) अ०४।५।१ । बहुतेजाः (वृषभः) महाशक्तिमान (जातवेदाः) जातानि उत्पन्नानि वेदोलि वेदा यस्मात् सेः (घृताहुतः] प्रकाश- प्रदः (सोमपृष्ठः) ऐश्वर्यसेवकः ( सुवीरः) महाशूरः (मा) माम् (मा हांसीत् ) . : -- (२,८०८) अंथर्ववेदभाष्य सू०१ [४] किया गया [ परमेश्वर ] (मा) मुझको (मा हासीत्) न छोड़े। (त्वा ) तुझको (न इत्) कभी नहीं (जहानि ) मैं छोडू, ( मे ) मुझको ( गोपोषम् ) विद्याओं की वृद्धि ( च च ) और (वीरपोषम् ) वीरों की पुष्टि (धेहि ) दोन कर ॥ १२ ॥ : भावार्थ-मनुष्य उस महातेजस्वी, सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर की उपा. सना से अपने ज्ञानों और वीरों की वृद्धि करें ॥ १२ ॥ रोहितो यज्ञस्य जनिता मुखं च रोहिताय वाचा श्रोत्रण मनसा जुहोमि । रोहितं देवाः यन्ति सुमनस्यमाना स मा रोहैः सामित्यै रोहयतु ॥ १३ ॥ रोहितः । यज्ञस्य । जनिता । मुखम् । च । रोहिताय । वाचा । श्रावण । मनसा । जुहोमि ॥ रोहितम् । देवाः । यन्ति । सु-मुनस्यमानाः । सः । मा। रोहैः । साम्-इत्यै । रोह यतु ॥ १३ ॥ भाषार्थ-(रोहितः ) सब का उत्पन्न करने वाला [ परमेश्वर ] ( यज्ञस्य ) यज्ञ [ देवपूजा, संगति करण और दान व्यवहार ] का (निता) उत्पन्न करने वाला (च) और (मुखम् ) मुख [मुखिया ] है। (वाचा) वाणी से, (श्रोत्रेण) श्रवण से और (मनसा ) मन से ( रोहिताय ) सब के उत्पन्न करने वाले [ परमेश्वर की सेवा ] के लिये 'जुहोमि ) मैं भोजन करता हूं। (सुमनस्यमानाः) शुभचिन्तक (देवाः ) विजय चाहने वाले लोग (रोहितम्) - ...1 न त्यजतु (नाथितः) प्रार्थितः (नेत्) नैव (त्वा) ( जहानि ) त्यजानि (गोपोषम्) गवानां विद्यानां वृद्धिम् (च) (मे ) मह्यम् ( वीरगोषम् ) शराणां पोषणम् (च.) (धेहि ) देहि ॥ १३-(रोहितः)(यज्ञस्य) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारस्य (जनिता) उत्पादकः ( मुखम् ) प्रधानः (च) (रोहिताय) परमेश्वरोपासनाय (वाचा) : वण्या (श्रौत्रण) श्रवणेन ( मनसा) चित्तन (जुहोमि) हुअंदने । अन्नं करोमि (रोहितम् ) (देवाः) विजिगीषवः ( यन्ति ) प्रामु वन्ति (सुमनस्य- मानाः ) अ० १॥ ३५ १२ शुभचिन्तका (सः) परमेश्वरः (मा) माम् (रोहै।)
मुं० १ [ ४७८.] जयादश काण्डम् ॥ १३ ॥ (३८६) सब के उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर ] को ( यन्ति.) प्राप्त होते हैं, ('सा) वह [परमेश्वर ] (मा) मुझको (रोहः) ऊंचाइयों के साथ ( सामित्यै)..समिति [संगति ] के लिये (रोहयतु ) ऊंचा करे ॥ १३ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य सर्व श्रेष्ठ. व्यवहारों के उपदेशक परमेश्वर की पूरी भक्ति करते हैं, वे शूर वीरों के समान अनेक प्रकार उन्नति करके श्रेष्ठ सभापति होते हैं ।। १३॥ रोहितो यज्ञ व्यदधाद् विश्वकर्मणे .तस्मात् तेजांस्युप मे मान्यागु': । चोय ते नाभिं भुवनस्याधि मज्मनि ॥ १४ ॥ रोहितः । यज्ञम् । वि अदधात् । विश्व-कर्मणे । तस्मात् । तेजोसि । उप । मा। दुमानि । भा। अगुः ॥ वोचेयम् । ते । नाभिम् । भुवनस्य । अधि । मुमनि ॥ १४ ॥ भाषार्थ-(रोहितः) सब के उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर'] ने (यशम् ) यज्ञ [ संगति योग्य व्यवहार को [ विश्वकर्मणे ] सब कामों में चतुर [ मनुष्य के लिये (वि श्रद्धात्) उत्पन्न किया है, (तस्मात् ) उस [पर. : मेश्वर ] से (इमानि ) यह सब ( तेजांसि ) तेज (मा) मुझको (उप) समीप से (श्रा अगुः ) प्राप्त हुये हैं। [ हे परमेश्वर ! ( ते ) तेरे (नाभिम् ) सम्बन्ध को ( भुवनस्य ) संसार के ( मज्मनि) बल के भीतर (अधि) अधिकार पूर्वक ( वोचेयम् ) मैं बतलाऊं ॥ १४ ॥ उनतिभिः (सामित्यै ) छान्दसो दीर्घः । समित्यै । संगतये (रोहयतु) उन्नयतु ॥ १४- (रोहित ) परमेश्वरः ( यशम् ) संगितकरणव्यवहारम् (व्यदधात्) उत्पादितवान् (विश्वकर्मणे) सर्षकर्मप्रवीणाय मनुष्याय (तस्मात) परमेश्वरात् (तेजांसि ) ( उप) समीपे (मा) माम् ( इमानि ) दृश्यमानानि (आ अगुः) प्राप्तानि अभवन् ( योयम् ) वदेयम् (ते) तव (नाभिम् ) सम्बन्धम् (भुवनस्य) 'संसारस्य ( अधि) अधिकृत्य (मज्मनि) टु मसूजो शुधौ-मनिन् । मन्मना बलनाम-निध०२।। बले॥
. (२,८१०.) अथर्ववेदभाष्ये सू०१ [ ४७८] भावार्य-परमेश्वर ने मनुष्य के हित के लिये सब श्रेष्ठ कर्म उत्पन्न किये हैं, जो विद्वान् उसकी.महिमा के प्रकाश को प्रत्येक पदार्थ में देखते हैं. चे बलवान होते हैं ॥ १४॥ पा त्वा रुरोह वृह त्यूत पङ्क्तिरा ककुब् वर्चसा जातवेदः । आ त्वो रोहोष्णिहारो वषट्कार आ त्वा रुरोह रोहिती रेतसा सुह ॥ १५ ॥ । -- . . मा। त्वा । कुरोह । वृहुती । उत । पङ्क्तिः। श्रा । कुकुप् । वर्चसा । जात-धे दुः।। भावा कुरोह । उष्णुिहा-प्रक्षुरः। वर्षट्-कारः। प्रा । त्वा । कुरोह । रोहिता रेतसा । मह ॥१५ भाषार्थ-(जातवेदः) हे प्रसिद्ध शानवाले पुरुष ! (त्या) तुझको (वृहती) विशाल विद्या ने (उत) और ( पङ्क्तिः) कीर्ति ने (आ) सय ओर से और (ककुप् ) मुख फैलाने वाली शोभा ने (वर्चसा.) प्रताप के साथ (आ) सव ओर से (रोह ) ऊंचा किया है। (त्वा) तुझको ( उष्णिहा. क्षरः ) बड़ी प्रीति से फैलने वाले, (वर्षटकारः) दान व्यवहार ने (मा) सब ओर से ( रुरोह ) ऊंचा किया. है । और (त्या) तुझको (रोहितः ) सर्य के उत्पन्न करने वाले [ परमेश्वर] ने (रेतसा सह ) पराक्रम के साथ (श्रा) सब प्रकार से (रुहोह ) ऊंचा किया है ॥ १५ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य विद्या प्रादि शुभ गुणों को धारण करते हैं, पर- मेश्वर उनको संसार में पराक्रमी करता है ॥ १५ ॥ १५--(प्रा) समन्तात् (त्वा) (रुरोह) अन्तर्गतण्यर्थः । उन्निनाय (हती) विशाला विद्या ( उत) अपि (पङ्क्तिः) पचि विस्तारे-क्तिन् । कीर्तिः। पृथिवी (ककुप् ) के सुखं स्कुनाति विस्तारयतीति सा । क+स्कुभ विस्तारे-क्किए । शोभा ( जातवेदः) हे प्रसिद्धझान (आ.), (त्वा ) (रुरोह) (उम्णिहाक्षरः ) उत्+मिणह प्रीती-क्विन्, टाप् । अशेः सरन् । उ० ३.१ ७०, प्रशू व्याप्तौ-सरन् । उत्कृष्टप्रीत्या व्यापकः (वपट्कारः) अ० १ । १० ११! वह प्रापणे-डपटि 1 दानव्यवहारः (त्वा) (रोह) (रोदितः)(रेतसा) सामर्थेन (सह ) साकम् ॥ .
P मू०१ [४७८] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६११) अयं वस्ते गर्भ' पृथिव्या दिव वस्ते ऽयमन्तरिक्षम् । अय भस्य विष्टपि स्वर्लोकान् ध्यानशे ॥ १६ ॥ भूयस् । यस्ते । गर्भम् । पृथिव्याः। दिधम् । वस्ते । अयस् । अन्तरिक्षम् ॥ अयम् । अधस्य । विष्टपि । स्वः । लोकान् । वि । भानुशे ॥ १६ ॥ भाषार्थ-(अयम् ) यह [ परमेश्वर ] (पृथिव्याः) पृथिवी के (गर्भम् ) 'गर्भ [ उदर] को (वस्ते ) ढकता है, (अयम् ) यह (दिवम् ) आकाश और. (अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष को (वस्त) ढकता है। (अयम् ) यह (ब्रनस्य) नियम के (विष्टपि) आश्रय पर (स्वः) सुख से (लोकान्.) लोकों में.(वि भानशे) व्यापा है ॥१६॥ भावार्थ-जो परमेश्वर पृथिवी आदि की सीमा के परिमाणसे अधिक बड़ा है, मनुष्य उसकी उपासना से अपनी वृद्धि करके आनन्द पावें ॥ २६ ॥ वाचस्पते पृथिवी न:स्योना स्योना योनिस्तल्पी नः सुशेवा । इहैव माणः मुख्ये नी अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् पर्य गिरायु'षा वर्चसा दधातु ॥ १७ ॥ वार्चः । पते । पृथिवी । नः । स्योना। स्योना। यानिः । तल्पा । नः । सु-सेवा सेवा ॥ इह । एव । माणः । मुख्य । नः । अस्तु । तस् । त्वा । परमे -स्थिन् । परि मृग्निः। प्रायुषा । वर्चसा । दुधातु ॥ १७॥ १६--(अयम् ) व्यापकः परमेश्वरः (वस्ते ) आच्छादयति (गर्भम् ) उदरम् ( पृथिव्याः) भूमेः ('दिवम् ) आकाशम् ( वस्ते) (अयम् ) (अन्तरिक्षम्) (अयम् ) (घनस्य) अ० १०॥१०॥३१ । बन्ध बन्धने-नक, बधादेशः । नियमस्य (विष्टपि ) वि+टभिः प्रतिबन्धे-क्विपं, भस्य पः । आश्रये ( स्व.) सुखेन (लोकान् ) (विश्रानशे) अशू व्याप्ती-लिट् । व्यासंघान् ॥ ॥ .. ,
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मू०१[४७८] -- . त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६१३) लिये (वैश्वकर्मणाः) सब कर्मों के हितकारी (परि)सव ओर से (संवभूवुः) प्राप्त हुये हैं । (इह एव) यहां ही :[इसी मनुष्य जन्म में ] (प्राणः) प्राण [जीवन वायु] (ना.) हमारी (सख्ये) मित्रता, में (अस्तु) होवे, (परमेष्ठिन्) हे बड़े ऊंचे पद वाले [परमेश्वर!] (तम् त्वा) उस तुझको (रोहितः) उत्पन्न हुआ [ यह मनुष्य ] (आयुषा) आयु के साथ और (वर्चसा) प्रताप के साथ ( परि) सब ओर से (दधातु ) धारण करे ।। १८ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य वसंत आदि छह ऋतुओं को पृथिवी नादि पांच तत्त्वों के सोध उपयोगी बनाते हैं, वेपरमात्मा के गुणों को जान कर अपने जीवन भर स्वस्थ और प्रतापी रह कर उन्नति करते हैं ॥ १८ ॥ वाचस्पते चौमनसं मनश्च गोष्ठे नो गां जनय योनिपु प्रजाः। माणः सख्ये ने अस्तु तं त्वां परमेष्ठिन् पर्य हमायुषा वर्चसा दधामि ॥ १८ ॥ वाचः । पते । सौमनसम् । मनः । च । गो-स्थे । नः । गाः। जनयं । योनिषु । म-जाः ॥ इह । एव । प्राणः । सुख्ये । नः। अस्तु । तम् । त्वा । पुरम -स्थिन् । परि । अहम् । आयु'षा। वर्चसा । दधामि ॥ १६॥ : भोषार्थ- (वाचः पते ) है वेदवाणी के स्वामी [ परमेश्वर 1] (सौम- नसम् ) शुभचिन्तकता, (मनः) मनन, (गा:) वाणियो [नीतो ](च) और (प्रजाः) प्रजाओं [पुत्र, पौत, राज्य जनो] को (नः ), हमारी (गोष्ठे) गोष्ठ [बातों के स्थान ] में और (योनिषु) घरों में (जनय ) उत्पन्न कर। (इह एव ) यहां ही [ इसी मनुष्य जन्म में ] (प्राणः ) प्राण [जीवन, वायु ] (नः) इ हैव स्त्रीपुरुपाभ्याम् (वैश्वकर्मणाः) विश्वकर्मन्-श्रण । सर्वकर्मभ्यो हिताः । (:परि) सर्वतः (सम्बभूवुः) प्राप्ता बभूवुः (रोहितः) मं०१। रुह प्रादुर्भावे- इतन् । उत्पन्नो मनुष्यः । अन्यत्' पूर्ववत् म० १७ ॥ १६-(सौमनसम्) शुभचिन्तकत्वम् (मनः) मननम् (च) (गोष्ठे) वाचालये (नः ) अस्माकम् (गाः ) पाणी। नीती। (जनय) उत्पादय (योनिषु) ३ + . (२,४४.) थर्ववेदभाष्ये सू०१-४७८ ] हमारी (सख्ये) मित्रता में (अस्तु) हो, (परमेष्ठिन् ) हे बड़े ऊंचे पद वाले [परमेश्वर !] (तम् त्वा) उस तुझको (अहम् ) मैं [ मनुष्य ] (श्रायुषां) आयु के साथ और (वर्चसा) प्रताप के साथ (परि) सवओर से (वधामि ) धारण करता हूँ॥8॥ भावार्थ-जो मनुष्य परमेश्वर की वेदोक्त पाशा पर चल कर अपनी सभा और घर को सुनीतिज्ञ बना कर परस्पर हित करते हैं, वेही संसार में यशस्वी होते. हैं ॥ १६॥ . परि त्वा धात् सविता देवो. अग्निसा मित्रावरुणाभि स्यो । सर्वा अरांतीक्रामन्नेहीदं राष्ट्रभकरः सूनृतीवत् २०॥(२) परि । त्वा । धात् । सविता। देवः। अग्निः । वर्चसा । मित्रावरुणौ । अभि । त्वा ॥ सर्वाः । अती। अष-क्रामन् । भा। इहि । इ दस् । राष्ट्र । भ्रकरः । सूनृता-वत् ॥२०॥(२). भाषार्थ-हे परमेश्वर 1] (सविता) प्रेरक, (देवः) प्रकाशमान (अग्निः) अग्नि [सूर्य आदि ] ने (वर्चसा) तेज के साथ [वर्तमान ]. (त्या) सुझको (परि) सब ओर से (धात्) धारण किया है और (मित्रावरुणौ) प्राण और अपान वायु ने (त्वा ) तुझकों (अभि ) सब ओर से[धारण किया है ]। .[हे,लेनापते राजन् !] (सर्वाः) लब. (अरातीः ). वैरी दलों को (अवनामन ) लतियाता हुआ तू.(श्रा इंहि ) श्रा, (इदम् राष्ट्रम ), इस, राज्य. को तू ने (सूनृतावत् ) सुन्दर नीति युक्त (अकरः ) बनाया है ॥ २० ॥ ht गृहेषु (प्रजाः) पुत्रपौत्रराज्यजनान् (अहम्) मनुः (दधामि) स्थापयामि । अन्यत् पूर्ववत् सं० १७॥ २०-(परि) (त्वा) परमेश्वरम् (धात्) अदधात् । धारितवान (सविता.) मेरका (देव:) प्रकाशमानः (अमिः) सूर्यादिः (वर्चसा) तेजसा. (मित्रावरुणौ ) प्राणापानौ (अभि) प्रति (त्वा) (सर्वाः) (अरातीः) अदान- 'शीला शत्रवः (अवक्रामन् )पादेन अधोगमयन् (इह) ( इदम् (राष्ट्रम् ). राज्यम् (अकरः) कृतवानसि (सनृतावत्) सुनीतियुक्तम् ॥
F । भू०१ [ ४७८] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,१५) भावार्थ-जिस प्रकार परमेश्वर सव अग्नि, सूर्य, चायु आदि पदार्थों को वश में करके सृष्टि का राज्य करता है, इसी प्रकार मनुष्य जितेन्द्रिय हो कर विघ्नों को हटा कर आनन्द करे ॥२०॥ यं त्वा पृषती रये प्रष्टुिवहति रोहित। शुभा यासि रिणनुपः२१ यस् । त्वा । पृषती। रथे। प्रष्टिः। वहति । रोहित ॥ शुभा । यासि । रिण । अपः ॥ २१ ॥ भाषार्थ-(रोहित) हे सबके उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर 1] (पम् त्वा) जिस तुझको (प्रष्टिः ) प्रश्न योग्य (पती) सींचने वाली [प्रकृति] ( रथे) रमण योग्य [ संसार में (वहति ) प्राप्त होती है । वह तू (अपः) प्रजात्रों को (शुभा) शोभा के साथ (रिणन् ) चलाता छुपा (यासि ) चलता है ॥ २१ ॥ भावार्थ-खोजने से विवेकी लोग निश्चय करते हैं कि सर्वव्यापक, सर्वनियन्ता परमेश्वर के सामर्थ्य से असीम प्रकृति में संयोग वियोग होने से संसार का प्रादुर्भाव होता है ॥२१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म०१७॥ २८ ॥ अनु'बता रोहिणी रोहितस्य मूरिः सुवर्णा वृहती सुवर्चाः । तया बाजोन् विश्वरूपा जयेम तया विश्वाः पृतना अभि प्योम ॥ २२ ॥ अनु'-व्रता । रोहिणी । रोहितस्य । सूरिः । सु-वणी । वृह ती। सु-वर्चाः ॥ तयो । वाजान् । विश्व-रूपान् । जथे म । तया । २१- (यम् ) (त्वा) परमेश्वरम् (पृपती) वर्तमाने पृपबृहत्मह उ०२८४ पृषु सेचने-अति, ङीप । सेचनशीला प्रकृतिः (रथे) १०४ ॥१२॥ ६। रमणीये संसार (प्रष्टिः) वसेस्तिः। उ०४।१०। प्रच्छ शीपसायाम्-ति प्रष्टव्या (वहति ) प्राप्नोति (रोहित) हे सर्वोत्पादक परमेश्वर (शुभा) शोभया (यासि) गच्छसि । प्राप्नोपि (रिणन) रि हिंसायां गतौं च-शतृ । गमयन (अपः)प्रजाः ॥ .
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प्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ सू०१ [४७८] (२,६५७) तस्य ) उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर ] का (सदः) प्राप्ति योग्य पद है, (असी) वही (पन्थाः) मार्ग है, (येन ) जिल से (पृषती) सींचने वाली प्रकृति ]. (याति) चलती है । (ताम् ) उस [प्रकृति ] को (गन्धर्वाः) पृथिवी वा जल ; धारण करने वाले [ मेघ ] और ( कश्यपाः ) रस पीने वाले [किरण ] ( उत् नयन्ति) ऊंचा करते हैं, (ताम् ) उस [प्रकृति ] को (कंधया) बुद्धिमान लोग (अप्रमादम् ) विना चूके (रक्षन्ति ) पालते हैं ॥ २३ ॥ भावार्थ-प्रकृति की चाल के ज्ञान से मनुष्य परमात्मा की महिमा जानकर अनेक लाभ उठाते हैं, जैसे मेघ जल चरसांकर और किरणे जल खींच. कर और प्रकाश करके प्रकृति के उत्तम गुणों को दिखाते हैं। बुद्धिमान् लोग इसी प्रकृति को निरन्तर खोजते हुये नवीन नवीन अविष्कार करते हैं ॥ २३ ॥ सूर्य स्याश्या हरयः केतुमन्तः सदा वहन्त्यमृताः सुखं रथस् । घुतुपावा रोहितो भ्राजमानो दिव देवः पृषतीमा विवेश ।२४ सूर्यस्य । अश्वाः । हरयः । के तु-मन्तः । सदा। बहुन्ति । अमृताः। सु-खम् । रयम् ॥ धृत-पावा । रोहितः। भ्राजमानः । दिवम् । देवः । पृषतीम् । भा । विवेश ॥ २४ ॥ भाषार्थ- सूर्यस्य ) संप के चलाने वाले परमेश्वर ] के (अश्वाः) व्यापक (केतुमन्तः ) विज्ञानमय (अमृताः) अमर [अविनाशी वा पुरुषार्थी ] उत्पत्तिशतिः (रोहितस्य ) म० १। सर्वोत्पादकस्य परमेश्वरस्य (असौ) (पन्थाः ).मार्गः (पृषती) म०२१ । सेचनशीला प्रकृतिः (येन ) पथा (याति) गच्छति ( ताम् ) प्रकृतिम् (गन्धर्वाः) कृगशृदभ्यो कः । उ० १ १ १५५-। गो+ धृधारणे-वप्रत्ययः,गोमादेशः।गोः पृथिव्या जलस्यपाधारका: । मेघाः (कश्य- पाः) अ० १।१४।४। कश शब्द-फरणे यत् । कशति अनेनेतिकश्यं रसः। कश्य+पा पाने का रसस्य पानशीला: 'किरणाः ( उन्नयन्ति).उसतां व्याख्याता कुर्वन्ति (ताम् ) ( रक्षन्ति) (कंपया) मेधाविनः (अप्रमादम) सावधान यथा तथा॥ २४-(सूर्यस्य ) सर्वप्रेरकस्य परमेश्वरस्प(अश्वाः ) पशु व्याप्ती-कन् । ध्यापका(हरयः) स्वीकरणीया गुणाः (फेतुमन्त,) चायः कि उ०१।७४ । चाय -- . (२,६१०). अथर्ववेदभाष्ये सू०१[ ४७८.] (हरयः) स्वीकार' योग्य गुण (रथम्) रमण योग्य संसार को (सुखम् ) मुख से (सदा.) सदा (वहन्ति ) ले चलते हैं। (घृतपावा) सेचन, सामर्थ्य [वृद्धि ] की रक्षा करने वाले (भ्राजमानः) प्रकाशमान (देवः) ज्ञानवान (रोहितः ) सब को उत्पन्न करने वाले [.परमेश्वर ] ने (दिवम् ) व्यवहार कुशल (पृषतीम् ) सींचने वाली [प्रकृति] में (आ विवेश) प्रवेश किया है॥२४॥ - भावार्थ-जिस परमात्मा के नियमों से यह संसार चल रहा है, वही परमात्मा प्रकृति में प्रवेश करके उसे चेष्टा देता है ॥ २४॥ यो रोहितो वृषभस्तिग्मशृङ्गः पर्य निं परि सूर्य" बभूव । यो विष्टुभ्नाति पृथिवी दिवे च. तस्माद् देवा अधि सृष्टीः सृजन्तेः ॥ २५ ॥ यः । रोहितः । वृषभः। तिग्म-शृङ्गः । परि । भूमिस् । परि। सूर्यम् । बभूव ॥ यः । वि-स्तुभ्नाति । पृथिवीस् । दिवस् । च। तस्मात् । देवाः । अधि । सृष्टीः । सृजन्ते ॥ २५ ॥ भाषार्थ-(यः) जो (वृषभः) महाशक्तिमान् (तिग्मकः) तीन तेजवाले (रोहितः) सब के उत्पन्न करने वाले [ परमेश्वर ] ने (अग्निम् ) अंग्नि को.(परि) सब ओर से और (सूर्यम् ) सूर्य को (परि) सब ओर से (वभूव ) प्राप्त किया है । ( यः) जो [ परमेश्वर (पृथिवीम् ) पृथिवी (च) है जानिशामन्यो:-तुं । केतुः प्रज्ञानाम-निधं०३ 1.8। विज्ञानमयाः (लदा) (वहन्ति) गमयन्ति (अमृताः) अमरणाः । पुरुषार्थयुक्ताः (सुखम् ) सुखेन. (स्थम्) म०.२१ । रमणयोग्यं संसारम् (घृतपावा ).ातो मनिव्वनिन्वनिपश्च । पा०३ । :२१७४घृत+पा.रक्षणे-वनिए । सेचनबलस्य रक्षकः (, रोहितः):सर्वोत्पादकः (भ्राजमानः) प्रकाशमानः (दिवम् ) व्यवहारकुशलाम् ( देवः ) शानवान् (पृष- तीम्) सेचनकुशतां प्रकृतिम् ( आ विवेश) प्रविष्टवान् ॥ २५-(यः) (रोहितः) (वृषभः) महाशक्तिमान् (तिग्मङ्गः ) तीन- तेजाः (परि सर्वतः (अग्निम् ) प्रत्यक्षम् (परि)(सूर्यम्.) आदित्यमण्डलम् (यः) (विएनाति) विशेषेणावलम्बते (पृथिवीम.) (दिवम) आकाशम् (च.
- - सू०१[४७८] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,१६) और (-दिवम् ) आकाश को (विष्ट नाति ) विविध प्रकार थामता है, (तस्मात्) उसी [ परमेश्वर ] से (देवाः) दिव्य नियम (सृष्टीः) सुटियों को (अधि) अधिकार पूर्वक ( सुजन्ते ) उत्पन्न करते हैं ॥ २५ ॥ भावार्थ-परमेश्वर ने प्रत्यक्ष अग्नि, सूर्य आदि और सब लोकों को अपने नियम से उत्पन्न किया है, उसी की उपासनासयमनुष्य करें ॥ २५॥ रोहितो दिवमारुहन्महुतः पयर्ण वात् । सवा रुरोह रोहितो रहः ॥२६॥ रोहितः। दिवस् । श्रा। भुरुत् । अत: परि। भुर्ण वात् ॥ साः । रुरोह । रोहितः । रुहः ॥ २६ ॥ भाषार्थ-(रोहितः) सब के उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर ] ने (महतः) विशाल (अर्णवात् ) समुद्र [अगम्य सामर्थ्य] में से (दिवम् ) व्यवहार को (परि) सव और से (भा अरुहत्) प्रकट किया है। (रोहितः) सब के उत्पन्न करने घाले [परमेश्वर ने ( सर्वाः ) सव (रुहः) उत्पन्न करने का सामग्रियों को (रोह) उत्पन्न किया है ॥ २६ ॥ भावार्थ-परमेश्वर ने प्रत्येक कार्य का आदि कारण होकर सब को उत्पन्न किया है ।। २६॥ वि मिमीष्व पय॑स्वतीं धृताची देवानी धेनुरनपस्पृगेषा । इन्द्रःसोम पिबतु क्षेमौ नस्त्वग्निःमस्तातु वि मृधौ नुदस्व२७ . वि। मिमीष्व । पय॑स्वतीस् । घृताचीम् । देवानाम् । धेनुः। (तस्मात् ) परमेश्वरात् ( देवाः ) दिव्यनियमाः (अधि) अधिकृत्य (सृष्टीः) रचनाः । सृज्यमानान पदार्थान् (सृजन्ते) स्वयन्ति ॥ २६-(रोहितः) सर्वोत्पादकः (दिवंम् ) प्रत्येकव्यवहारम् (श्री अरु.. हत्) प्रादुष्कृतवान् (महतः) विशालात् (परि )सर्वतः ('अर्णवाद) समुद्रात् । अगम्यसामर्थ्यात् (सः) (रुरोह) जनयामास (रोहित) (रुहः) सृष्टि- -- 3 सामग्नीः ॥ .
पियतु । क्षेमः। । (२,६२०) अथर्ववेदभाध्ये ०१[४] अनप- -स्पृक् । एषा ॥ इन्द्रः। सोमम् । प्रस्तु । निः । प्र । स्तुौतु । वि । मृधः । नुदस्व ॥ २७ ॥ भाषा-[ हे विद्वान् ! ] (पयस्वतीम् ) उत्तम अन्नयाती और (घृता- चीम् जल पहुंचाने वाली प्रकृति ] को (वि) विविध प्रकार (मिमीव) नाप, (एया) यह (देवानाम् ) विद्वानों की (अनपरा ) न रोकने वाली (धेनुः ) तृप्ति करनेवाली [गौ के समान है । (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् [यह मनुष्य ] (सोमम् ) अमृत (पिबतु) पान करे, (ईमः) कुशल (अस्तु) होने, और (अन्निः ) ज्ञानवान् यह पुल्प] (स्तोतु) स्तुति करे, (घ) चैरियों को (वि तुदस्व) निकाल दे ॥२७॥ भावार्य-जो मनुष्य सृष्टि के बीच खोज लगाते चते चलते हैं, वे निर्विघ्न होकर ऐश्वर्य प्राप्त करके सकुशल रहके और परमात्मा के गुण गाते ये शत्रुओं का नाश करते हैं ।। २७ ॥ समिद्धो अग्निः समिधानो घृतदृद्धो घृताहुतः अभीषाड् विवाषाडुनिः सुपत्नोन् हन्तु सस्-इ'द्धः । अग्निः । सुम्-धानः। घृत-वृद्धः। घृत-माहुतः ।। भूभीषाट् । विश्वाषाट् । अनि: । स-पत्नन् । हुन्तु । ये । ये मम ॥ २८ ॥ - तु 1 मम ॥२८॥ २७-(वि) विविधम् (मिमीन) मामाने शब्दे च । मानेन प्रामुहि (पयस्वतीम् ) अन्नवतीम् (घृताचीम् ) घृवं जलमञ्चयतिप्रापयति या तां प्रकृतिम् . (देवानाम् ) विदुपाम् (धेनुः १०.३॥ १०॥ १ ! घि धारणे तर्पणे च-नु। धेनुर्धवते घिनोतेर्वा-निरु० ११ । १२ तर्पयित्री (अनपस्पृश) स्पृश स्पर्शने- क्विप् । अप्रतिवाधिका (एपा) प्रकृतिः (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् ननुस्यः( तोमम्) अमृ. तम् । मोक्षसुखम् ( पिवतु ) अनुभवतु (ज्ञमः) लकुशलः(अस्तु) (अन्तिः) विद्वान् पुरुषः (म) प्रकर्येण (स्तोतु) प्रशंसतु (वि) पृथग्भावे (मृधः) हिंसकान् (तुदस्व ) प्रेरय य . - - ९०१ [.४७८. त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६२१) भावार्थ-जैसे] (समिद्धः) प्रकाशमान किया गया और (समिधानः ) प्रकाशमान होता हुआ (घृताहुतः) घी चढ़ाया गया और (घृतवृद्धः) घी से बढ़ा हुआ (अग्निः ) अग्नि हो। [ वैसे ही] ( अभीषा) सब.ओर से जीतने पाला, (विश्वाषाट् ) सब को हराने वाला (अग्निः) तेजखी [शूरे पुरुष] (सपत्नान ) बैरियों को ( हन्तु) मारे, (ये) जो (मम ) मेरे हैं ॥ २ ॥ भावार्थ-जैले अग्नि धृत आदि हव्य पदार्थ से प्रज्वलित होकर रोग कारक दोष को नाश करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या और वीरता से प्रतापी होकर शत्रुओं को नाश करे, यह ईश्वर का नियम है ॥ २८ ॥ हन्त्वनान् म दहुत्वरिर्यो नः पृतन्यति । व्यादाग्मिनो वुयं सुपरनान् प्र दहामसि ॥ २८ ॥ हन्तु'। एनान् । प्र । दुहतु । भरिः । यः । नुः । पृतन्यति ॥ ऋष्य-भदौ । अग्निना । यस् । स-पत्नान् । प्र। दहाममित भाषार्थ-वह [शूर पुरुष ] (एनान् =एनम् ) उसको (हन्तु ) मारे, (प्र दहतु ) जला देवे, (यः अरिः) नो बैरी (नः) हम पर (पृतन्यति) सेना चढ़ाता है । (क्रव्यादा) मांस भक्षक [ मृतक दाहक ] (अग्निना) अग्नि से जैसे, वैसे ] (वयम्) हम (सपत्नान ) वैरियों को (प्र दहामसि) जलाये देते हैं ॥२६॥ ५ २८-(समिद्धः) प्रदीप्तः (अग्निः) होमाग्निः (समिधानः) प्रदीप्य. मानः (घृतवृद्धः) घृतादिहव्येन प्रवृद्धः (घृताहुतः) घृतं हव्यद्रव्यमाहुते दत्तं यस्मै सः (भीषाट ) म० १२॥ १।१४। सर्वतोजेता (विश्वाषा ) भ० १२॥ ११५४ । सर्वजेता(अग्निः ) तेजस्वी शूरः ( सपनान् ) शत्रून ( हन्तु) मारयत (ये) (मम)। २६-(हन्तु ) (एनान ) एकवचनस्य बहुवचनम् । एनम् । अरिम् (). प्रकर्षण (दहतु) भस्मीकरोतु (अरिः) शत्रुः (यः) (नः) अस्मान् (पृत. यति ) पृतनया सेनया युध्यते (कन्यादा) मांसभक्षकेन । शवदाहकेन (अग्नि- ना) भौतिकेन (वयम् ) धार्मिकाः (सपत्नान ) अरीन (अ) (वहामसि) दहामः॥
। १२,४२३) अथर्ववेदभाध्य ६०१ 1:567 भावार्थ-ज्ञानवान् शूर पुरुष अपने शत्रु दोषों को इस प्रकार भस्म कर दें, जैसे अंग्नि से मृतक शरीर भस्म किया जाता है । यह ईश्वर. नियम सब मनुष्यों को मानना चाहिये ॥ २६ ॥ अवाचीनानव जुहीन्द्र वजेण बाहुमान् । अधा सुपर्नान् मानकानुग्नेस्तेजोभिरादिपि ॥ ३० ॥ (३) अवाचीनान् । अव । जहि । इन्द्र । वज्रेण । बाहु-मान् ।। अर्ध । सु-पत्नीन् । भामकान् । अग्नः। तेज:-भिः । श्री। अदिषि ॥ ३० ॥ (३) भाषार्थ--१ इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष! (बाहुमान् ) घलयान भुजाओं वाला तू (वनेण) वन ले (अवाचीनोन्) नोचों [अधार्मिकों ] को (अव जहि) मार गिरा। (अध) फिर (मामकान्) अपने (सपतान् ) वैरियों को (अग्निः) अम्नि के ( तेजोमिः) तेजो से (श्रा अदिषि) मैंने ‘पकड़ लिया है ॥ ३०॥ भावार्थ- -प्रजागण वली, पराक्रमी, प्रतापी राजा को स्वीकार करके शत्रुओं के मारने में सहायक होवें । सब मनुष्य इस ईश्वर नियम का पालन करें॥३०॥ 'अग्ने सुपत्नानधरान् पादयास्मद् व्यथयो सजातमुत्पिपान बृहस्पते । इन्द्राग्नी मित्रावरुणावधरे पद्यन्ताममंतिमल्यू- यमानाः ॥ ३१ ॥ भाग्ने । स-पत्नीन् । अधरान् । पादय । अस्मत् । व्यथय । सु-जातस् । उत्-पिपानम् । बृहस्पते ॥ इन्द्राग्नी इति । मित्रावरुणौ । अधरे । पद्यन्ताम् । अप्रति-मन्यूयमानाः ॥३१॥ : ३०-(अवांचीनान् ) अधोगतीन् ।धार्मिकान् (अव जहि.) विनाशय (इन्द्र ) हे परमैश्वर्यवन् सेनापते ( वज्रेण ) शस्त्रेण (वाहुमान्) प्रबलभुजः (अध) श्रथ (सपत्नान ) (मामकान) १०.१।२६।५ । मम सम्बन्धिनः (अग्नेः) पावकस्य (तेजोभिः) ज्वालाभिः (मा.अदिपि) दातेलु। गृहीतवानस्मि॥ --- . भू०.१ [४७६] प्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ - २,६२, भाषार्थ-(अग्ने) हे प्रतापी राजन् ! (सपत्नान् ) बैरियों को (अस्मत्) हमसे (अधरान ) नीचे (पादय) गिरा दे, (वृहस्पते.) हेबड़ी विद्याओं के स्वामी! [ राजन् ] ( उत्पिपानम् ) टेढ़े चढते हुये ( सजातम्.) समान जन्म, पाले [भाई वन्धु ] को (व्यथय) पीड़ा दे। (इन्द्राग्नी ) हे सूर्य और बिजुली [ के समान प्रताप और स्फूर्ति घाले ! (मित्रावरुणौ) हे प्राण और अपान ! [के समान सुखदायक और दुःखनाशक पुरुप ] (अमंतिमन्यूयमाना) [हमारे- प्रतिकूल क्रोध न कर सकने योग्य [ शत्रु, लोग] ( अधरे.). नीचे होकर (पचन्ताम् ) गिर जायें ॥३१॥ . भावार्थ-विद्वान् प्रतापी राजा पक्षपात छोड़कर धर्म विरोधी दुर- चारी वन्धु भादि को भी अवश्य दण्ड देकर वश में रक्खे ॥ ३१॥ यस्त्वं देव सूर्य सुपस्मानय मे जहि । भवनानश्मना जहि ते यन्स्वधर्म तमः ॥ २ ॥ उत्-यन् । त्यस् । देव । सूर्य । सु-पत्नान् । अव । मे. जहि ॥ अव । एनान् । अश्मना । जहि । ते । यन्तु । अध- मस् । तमः ॥ ३२ ॥ भाषार्य-(देव) हे विजय चाहने वाले ! (सूर्य) हेसप्रेरक राजन् । (उधन् त्वम् ) ऊंचा चढ़ता हुआ तू ( में ) मेरे (सपत्नान ) धैरियों को (श्रव ३१-(अग्ने ) हे प्रतापिन् राजन (सपतान् ) (अधरान् ) नीचान । पामरान (पादय ), पातय (अस्म) अस्माकं सफाशात् (व्यधयं ).पीडय ( संजातम् ). समानजन्मानं यन्ध्वादिकम् ( उत्पिपानम् ) अ०.५ । २० ७। पि गता यङि शानचि छान्दसं रूपम् । उत्पीयमानम् । कुटिलमुद्गच्छन्तम् (बृहस्पते ) वृहतीनों विद्यानां स्वामिन् ( इन्द्रानी ) सूर्यविद्युतैी यथा प्रतापिन् स्फूर्ति मन् (मिनावरुणो ) प्राणापानवत् सुखप्रद दुःखनाशक (अधरे) पामराः सन्तः (पद्यन्ताम् ) अधोगच्छन्तु (अप्रतिमन्यूयमानाः) कण्ड्वादिभ्यो यक् । पा०३।१ । २७ । मन्यु-यक । अस्माकं प्रतिकूल क्रोधं कर्तु मशक्या । ३२-(उद्यन ) उद्गच्छन् (त्वम्) (देव) विजिगीषो (सूर्य) सर्वप्रेरक राजन (सपलान).(मे) मम (अब जहि) विनाशय (एनान) सपतान . 4 (२,८२४.) अथर्ववेदभाष्ये मू०१. [४] जहि) मार गिरा । (एतान्.) इन [शत्रुओं.] को (अश्मना.) पत्थर [श्रादि- गिराने से (अव जहि.) मार गिरा, (ते) वे लोग (अधमम् ) बड़े नीचे. (तमः ) अन्धकार में ( यन्तु) जावें ॥ ३२॥. भावार्थ -राजा को योग्य है कि न्याय व्यवहार में प्रकाशमान होकर शत्रुओं को यथापराध दण्ड देकर कारागार में पीड़ा देवें ॥ ३२ ॥ वृत्सा विराजी वृषभो मतीनामा रुरोह शुक्रपृष्ठोऽन्तरिक्षम् । घृतेनार्कमभ्यर्चन्ति वत्सं ब्रह्म सन्तं ब्रह्मणा वर्धयन्ति ॥३३॥ वत्सः । वि-राजः । वृषभः । मतीनाम् । प्रा । रुरोह । शुक्र- पृष्ठः । अन्तरिक्षम् ॥ घृतेन । अर्कम् । अभि । अर्चन्ति.. वत्सम् । ब्रह्म । सन्तम् । ब्रह्मणा । वर्धयन्ति ॥ ३३ ॥ भाषार्य-(वत्सः) उपदेश करने वाला, (विराज:) बड़े ऐश्वर्य वाला, (शुक्रपृष्ठः) वीरता बढ़ाने वाला (वृषभः) बड़ी शक्ति वाला [पुरुष (मतीनाम् ) बुद्धिमानों के (अन्तरिक्षम् ) मध्यवर्ती दृश्य पर (श्रा रोह) ऊंचा हुआ है। वे [बुद्धिमान लोग] (धृतेन) प्रकाश के साथ [ वर्तमान ] (अर्कम् ) पूजनीय, (पत्लम् ) उपदेश करने वाले परमेश्वर] को (अभि) सब.शोर से (अर्चन्ति) पूजते हैं,और (सन्तम् ) सेवनीय.(ब्रह्म ) ब्रह्म [ सब से बड़े परमेश्वर] को ब्रह्मणा.). वेद द्वारा (वर्धयन्ति ) वड़ाते हैं [ सराहते हैं ] ॥३३॥ । - - (अश्मना) प्रस्तरादिना (अवजहि) (ते) शत्रवः (यन्तु ) गच्छन्तु (अधं. मम् ) अतिनिकृष्टम् (तमः) अन्धकारम् ॥ ३३-(वत्सः) वद कथने लप्रत्ययः। उपदेशकः (विराजः) राजाहः सखिभ्यष्टच । पा०५।४।६१ | विराजेन्-टच् , तत्पुरुषे । विविधैश्वर्यवान् (वृषभः) शक्तिमान् (मतीनाम्) मतयो. मेधाविनः-निध० ३३ १५.! मेधा: विनां मध्ये (प्रारुरोह) आरुढवान् (शुक्रपृष्ठः) शुक्रस्य वीर्यस्य पराक्रमस्यः पृष्ठं सेचनं यस्मात् सः (अन्तरिक्षम् ) अन्तर् मध्ये ईक्ष्यमाणं दृश्यमानं पदम्, (घृतेन ) प्रकाशेन सह (भर्कम् ) अर्को देवो भवति यदेनमर्चन्ति-निरु०५। ४। अर्चनीयम् (अमि) अभितः (अर्चन्ति) पूजयन्ति ( वत्सम् ) उपदेशकम् (ब्रह्म.) प्रबुद्धं परमात्मानम् (सन्तम्) हासभूमिण्टामिला पण संभको-तनः। सेवनीयम् (ब्रह्मणा) वेदज्ञानेन: ( वर्धयन्ति ) स्तुवन्ति । २ - सू०१ [४] प्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८२५) भावार्थ-जिस परमेश्वर ने बड़े बड़े पराक्रमी शूर वीर पुरुष बनाये. है, उसकी महिमा को ज्ञानी लोग जानकर संसार में प्रकट करते हैं । ३३ ॥ दिवं च रोह पृथिवीं च रोह राष्टं च रोह द्रविणं च रोह । मर्जा च रोहामृत च रोहु रोहितेन तन्वर संस्पृशस्व ॥३४॥ दिव'म् । च । रोह । पृथिवीम् । च । रोह । राष्ट्रम् । च । रोह । द्रविणम् । च । रोह ॥ प्र-जाम् । च । रोह' । श्रम तम् । च । रोह । रोहितेन । तन्वम् । सम् । स्पृशुस्व ॥ ३४ भाषार्थ-[हे राजन् ! ] (दिवम् ) व्यवहार को (च) निश्चय करके (रोह ) प्रकट कर, (च) और (पृथिवीम् ) पृथिवी [ की विद्या ) को (रोह प्रकट कर, (च) और (राष्ट्रम् ) राज्य को (रोह ) प्रकट कर, (च) और (द्र- विणम् ] धन को (रोह ) प्रकट कर । (च) और (प्रजाम् ) प्रजा [पुत्र पौत्र राज्य जन ] को (रोह) प्रकट कर, (च) और (अमृतम् ) अमरपन [पुरु- पार्थ ] के (रोह ) प्रकट कर, (रोहितेन) सब के उत्पन्न करने वाले [ परमेश्वर ] के साथ (तन्वम् ) अपने विस्तार को. ( सं स्पृशस्व) संयुक्त कर ॥ ३४ ॥ भावार्य-जो मनुष्य प्रत्येक व्यवहार और विद्या में कुशला होता है, पह,राज्य की सब प्रकार वृद्धि करता हुश्रा परमेश्वर की महिमा में अपने आत्मा को ऊंचा बनाता है ॥ ३४ ॥ ये दे.वा राष्ट्रभृतोऽभितों यन्ति सूर्यम् । तैष्टेरोहितः संविदाना राष्टं दधातु सुमनुस्यमानः ॥ ३५ ॥ ये । देवा: । राष्ट्र-भृतः । अभितः । यन्ति । सूर्यम् ॥ तैः ३४-(दिवम् ) व्यवहारम् (च) अवधारणे (-रोह) रोहय । प्रादुर्भावयः (पृथिवीम् ) भूमिविद्याम् (च) (रोह ) (राष्ट्रम् ) राज्यम् (च.) (रोह) (द्रविणम् ) धनम् (च), (रोह) (प्रजाम्.) पुत्रमैत्रराज्यजनरूपाम् (च) (रोह) (अमृतम् ) अमरणम् । पौरुषम् (च).(रोह ) (रोहितेन ) सर्वोत्पाद देन परमेश्वरेण, (तन्वम्.) विस्तृतिम् (सं स्पृशस्व) संयोजय ! A . . 1 ( २,६२६), अथर्ववेदभाष्य सू० १ [.. ते। रोहितः । सम्-वि दानः । राष्ट्रम् । दुधातु । सु-मनुस्य- मानः ॥ ३५॥ भाषार्थ- हे राजन् ! ] ( ये ) जो ( राष्ट्रभृतः ) राज्य पोषक ( देवाः) विजय चाहने वाले पुरुष (सूर्यम् ) सब के चलाने वाले [परमेश्वर ] को (अभितः) संब और से ( यन्ति ) प्राप्त होते हैं । (तैः) उनसे (संचिदानः ) मिलता हुआ, (सुमनस्यमानः ) प्रसन्न चित्त (रोहितः) सव का उत्पन्न करने वाला [परमेश्वर] (ते) तेरे (राष्ट्रम्) राज्य को ( दधातु) पुष्ट करे ॥ ३५ ॥ भावार्थ-जिस राज्य में विद्वान् लोग ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं, वह राज्य सदा बढ़ता रहता है ।। ३५ . . उत् त्वा यज्ञा ब्रह्मपूता वहन्त्यध्वगतो हरयस्त्वा वहन्ति । तिरः समुद्रमति रोचसेऽर्ण वम् ॥ ३६ ॥ उत् । त्वा । यज्ञाः । ब्रह्म-पूताः । वहुन्ति । अध्व-गतः । हरयः । त्वा । वहुंन्ति ॥ तिरः । समुद्रम् । अति । रोचसे । प्रर्ण वम् ॥ ३६ ॥ भाषार्थ-[ हे परमेश्वर !] (त्वा) तुझ को (ब्रह्मपूताः ) ब्रह्माओं [वेद वेत्ताओं द्वारा शुद्ध किये गये ( यमाः ) यज्ञ [ संगतियोग्य व्यवहार ] (उत् ) उत्तमता से (वहन्ति ) प्राप्त होते हैं, (अध्वगतः) [वेद विहित ] - मार्ग पर चलने वाले (हरयः) मनुष्य (त्वा) तुझ को .(वहन्ति ) पाते हैं। ३५-(ये) (देवा.) विजिगीषवः ( राष्ट्रभृतः ) राज्यपोषकाः (यन्ति) प्रामुवन्ति (.सूर्यम् ).सर्वप्रेरक परमेश्वरम् (तैः) देवैः (ते.) तव (रोहितः) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः (संविदानः ) संगच्छमान: ( राष्ट्रम् ) राज्यम् (धातु) पुष्णातु (सुमनस्यमानः ) शोभनमनाः ॥ ३६-(उत्.) उत्तमतया (त्वा) परमात्मानम् (यज्ञाः) संगतियोग्यव्यव- हारा: (ब्रह्मपूताः) वेदवेतृभिः'शोधिताः (वहन्ति ) प्राप्नुवन्ति (अध्वगतः) वेदविहितमार्गगता (हरया) मनुष्याः-निव०२।३ (वा) (घरन्सि) । m - ०१[१८] प्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ २७) (अर्णवम् ) जज से भरे (समुद्रम् ) समुद को (तिरः) तिरस्को तू (अति) अत्यन्त करके (सेचस्ले ) प्रकाशमान होता है ॥ ३६॥ . भावार्थ-परमेश्वर में लय पदार्थ व्याप्त हैं, वेदानुयायी पुरुप बहुत खोज कर अगम्य स्थानों में भी पाकर आनन्दित होते हैं ॥३६॥ रोहिते द्यावापृथिवी अधि निते वसु जिति गोजित संध- नाजिति । सहस्त्रं यस्य जनिमानि सुप्त च धीचेय ते नाभि भुवनुस्याधि बज्मनि ॥ ३७॥ रोहिते। द्यावापृथिवी इति । अधि । श्रुिते इति । वसु- जिति । गो-जिति । संधन-जिति ॥ सहस्रम् । यस्य । जनि- मानि । सप्त । च । बोचेयम् । ते । नाभिम् । भुवनस्य । अधि । मुज्मनि ॥३७॥ भाषार्थ-(वसुजिति ) निवास स्थानों के जीतने वाले ( गोजिति) विद्याओं के जीतने वाले (संधनजिति)संपूर्ण धन के जीतने वाले (रोहिते) सबके उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर में (घावापृथिवी) सूर्य और पृथियो ( अधि) अधिकार पूर्वक (श्रिते ) ठहरे हुये हैं। (यस्य ) जिल [ परमेश्वर ] के (सह- स्त्रम् ) सहस्र [असंख्य ] (जनिमानि ) उत्पन्न करने के कर्म (च) निश्चय फेरके ( सप्ल.) खात [ त्वचा; नेत्र, कान, जिह्वा नाक, मन और बुद्धि के साथ हैं, [ हे परमेश्वर !] (ते ) तेरे (नाभिम् ) सम्बन्ध को.(भुवनस्य ) संसार के (मज्मनि) बल के भीतर (अधि) अधिकार पूर्वक (वोचेयम् ) मैं. बत- लाऊ ।। ३७ ॥ (तिरः) तिरस्कृत्य (समुद्रम् ) समुद्रवदगम्यम् ( अति ) अत्यन्तम् (रोचसे) दीप्यसे (अर्णवम् ) जलपूर्णम् ॥ ३७-(रोहिते) म० १ ,( द्यावापृथिवी ) सूर्यभूमी ( अधि) अधिकृत्य (श्रिते) माश्रिते (वसुजिति) निवासानां जेतरि ( गोजिति) विद्यानां जेतरि (संधनजिति ) साहितिको दीर्घः। समस्तधनानां प्रापके (सहसूम् ) बहूनि । असंख्यानि ( जनिमानि.).प्रजननकर्माणि ( सप्त) सप्तभिस्त्वक्चत भोत्र- रसनामाणमनोबुद्धिभिः सह (च.) निश्चयेन । अन्यत् पूर्ववत्-म० १४॥ - - ।
. . (२,८२०) अथर्ववेदभाध्ये सू०१ [४७६] भावार्थ-वह सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान परमेश्वर सब लोकों का स्वामी है , उसने शरीरों को इन्द्रियों सहित बनाया है, उसी को जितेन्द्रिय योगी जन प्राप्त होकर सुखी होते हैं ॥ ३७॥ इस मन्त्र का अन्तिम पाद ऊपर मन्त्र १४ में आया है ।। यशा योसि म.दिशो दिशश्च यशाः पशूनामुत चर्षणीनाम् । यशाः पृथिव्या अदित्या उपस्थे ऽहं भू यासं सवितेषु चारु॥३८ यशाः । थासि । प्र-दिशः । दिर्शः । च । यशाः । पशूनाम् । उत । चर्षणीनाम् ॥ यशाः । पृथिव्याः । अदित्याः । उप- स्थे । अहम् । भूयासम् । सुविता-इव । चारुः ॥ ३८ ॥ भाषार्थ-[हे परमेश्वर !] ( यशाः ) यशस्वी तू (प्रदिशः) बड़ी दिशाओं (च) और (दिशः ) मध्य दिशाओं में (यांसि ) चलता है, और तू (पशूनाम् ) पशुओं [गौ सिंह आदिकों ] (उत ) और (चर्षणीनाम् ) मनुयों में (यशाः ) यशस्वी है । (अहम् ) मैं (पृथिव्याः) पृथिवी की और (अदित्योः) अखण्ड वेवाणी की ( उपस्थे) गोद में (यशाः ) यशस्वी होकर ( सविता इच) सब के. चलाने वाले शर[अथवा सूर्य] के समान (चारुः) शोभायमान (भूयासम् ) होऊं ॥३८॥ भावार्थ-जैसे परमेश्वर अपनी महिमा से समस्त लोकों का राजा है, पैसे ही मनुष्य ईश्वर की उपासना से पृथिवी पर प्रिय होकर अपनी उन्नति करते रहे ॥३॥ . ३८-(-यशाः) अ०.६३.३६ । ३ । सुप आत्मनःक्यच् । पा०३।१।। यशस्-क्यच्, ततः क्विप, अलोपयलोपौ । यशस्कामः । यशस्वी (यासि) गच्छसि (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः (दिशः). अन्तर्दिशाः (च) समुच्चये (यशाः) (पशूनाम् ) गवादीनाम् (उत) अपि (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम् (यशा) (पृथिव्याः) (अदित्याः) अदितिर्वाङ्नाम-निंघ० ११ ११ । अख- ण्डिताया वेदवाण्याः (उपस्थे) कोडे (अहम् ) उपासकः (भूयासम्) (सविता व ) सर्वप्रेरका शरः सूर्यो.वा यथा (चार) शोभायमानः ॥ - ॥ - सू० १ [४७८] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२६) सुत्र मनिह वैत्य तः संस्तानि पश्यसि । दुतः पश्यन्ति चनं दिवि सूर्य विपश्चितम् ॥ ३८ ॥ अमुचे । सन् । इह । वेत्यु । इतः । अन् । तानि । पश्यसि इतः । पश्यन्ति । रोचनस् । दिवि । 'सूर्यम् । विप:-चितम् भाषार्थ-[ हे परमेश्वर ! ] (अमुत्र ) वहां पर ( सन्) रहता हुआ तू ( इह ) यहां (वेत्थ ) जानता है, ( इतः ) इधर (सन् ) रहता हुआ (तानि) उन [ वस्तुओं ] को ( पश्यलि ) देखता है । ( इतः ) यहाँ से (दिवि ) प्रत्येक व्यवहार में (रोचनम् ) चमकने वाले (विपश्चितम् ) बुद्धिमान् (सूर्यम् ) सब के चलाने वाले [ परमेश्वर को ( पश्यन्ति ) वे [विद्वान् ] देखते हैं ॥ ३९ ॥ भावार्थ-परमेश्वर समीप और दूर से सर्वव्यापी होकर सर्व नियन्ता है, ऐसा विचार कर बुद्धिमान् लोग अपने व्यवहारों में उन्नति करते हैं ॥ ३ ॥ देवो देवान् मर्चयस्यन्तश्चरस्यर्ण वे । समानमग्निमिन्धते तं विदुः कुवयुः परै ॥ ४० ॥ ( ४ ) दे वः । दे वान् । भर्च यसि । अन्तः । चरसि । अर्णवे ॥ सु- मानम् । अग्निस् । इन्धते । तम् । विदुः । कुवयः । परै ४०(४) भाषार्थ-[हे परमेश्वर ! ] ( देवः ) विद्वान् तू ( देवान् ) उत्तम गुणों को (मर्चयसि ) बतलाता है, (अर्णवे अन्तः ) समुद्र [संसार] के बीच ३६-(अमुत्र ) तत्र । दूरदेशे ( सन्.) वर्तमानःसन् ( इह ) अत्र ( वेत्थ) जानासि ( इतः) अत्र ( सन् ) (तानि ) दूरस्थानि वस्तूनि ( पश्यलि) निरी- क्षसे (इतः) (पश्यन्ति ) अवलोकयन्ति (रोचनम् ) प्रकाशमानम् ( दिवि) प्रत्येकव्यवहार (सूर्यम् ) सर्वप्रेरकं परमेश्वरम् (विपश्चितम् ) मेधाविनम्- निघ०३।१५॥ ४०-( देवः ) बुद्धिमान् ('देवान् ) दिव्यगुणान् (मर्चयसि) मर्च शब्दे। शब्दयसि । उपदिशसि (अन्तः ) मध्ये (वरसि) विचरलि (अर्णवे) समुद्र ५ { २,८३०). अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [ ४७६ ] (चरसि ) तू विचरता है। (समानम् ). खमान [ एकरस ] ( तम् ) उस (अग्निम् ) ज्ञानवान् [ परमेश्वर ] को (परे ) बड़े ( कवयः) बुद्धिमान् , लोग (विदुः) जानते हैं और ( इन्धते ) प्रकाशित होते हैं ॥ ४० ॥ भावार्थ-जी परमेश्वर संसार में व्यापक रहकर संदा शुभ गुणों का उपदेश करता है बुद्धिमान् लोग उसी का उपदेश कर के संसार में यश पावें ॥४०॥ अवः परेण पुर एनावरेण पुदा वत्सं विभ्रती गौरुदस्थात् । सा केंद्रीची कं स्विदv , परागात् के स्वित् सूते नहि यथे अस्मिन् ॥ ४१ ॥ अवः । परैण । पुरः। एना। वरेण । पदा। वत्सम् । 'बिभ्रती। गौः । उत् । अस्थात् ॥ सा । कुद्रीची। कम् । वित् । अधैम् । परी । श्रृंगात् । क्व । स्वित् । सुते । नहि । यूथे । अस्मिन् ॥ ४१ ॥ भाषार्थ- परेण ) दूर स्थान से (श्रवः ) इधर और ( एना) इस (अवरेणं ) वर [ सभीप स्थान ] से ( पंरः) परे [ दूर वर्तमान ] (वत्सम् ) सब के निवास देने वाले वा उपदेश करने वाले [ परमेश्वर ] को (पदा ) पद [अधिकार ] के साथ ( बिभ्रती ) धारण करती हुयी (गौः ) वेववाणी ( उत् 'अस्थात् ) ऊंची उठी है । (ला) वह '['वेदवाणी ] ( कद्रीची) किस ओर (समानम् ) सामान्यम् (अग्निम् ) ज्ञानवन्तं परमेश्वरम् (इन्धते ) दीप्यन्ते (तम) प्रसिद्धम् (विदुः) जानन्ति (कवयः) मेधाविनः-निघ०.३ । १५ (पर) श्रेष्ठाः॥ ४१-अयं मन्त्री व्याख्यातः-०.६।६।१७ (अवः) अवस्तात् । समीपदेशे ( परेण) दूरदेशेन :( परंः) परस्तात् । दूरदेशे ( एनापनेन । अनेन (अवरेण ) समीपस्थेन ( पदा) पदेन । अधिकारेण ( वत्सम् ) वस निवासे, 'पदं व्यक्तायां घाचि सप्रत्ययः । सनिवासकम् । सर्वोपदेशकम् (विभ्रती) धरन्ती (गौः ) वेदधाणी ( उत् ) जफर्षेण ( अस्थात् ) स्थितवती (ला ) वेद. । -- सू० १ [ ४७८] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८३१) चलती हुयी, (के खित् ) कौन से ( अर्धम् ) ऋद्धिवाले परमेश्वर को (परा) पराक्रम से (अगात् ) पहुंची है, ( क स्वित् ) कहां पर (सूते ) उत्पन्न होती है, (अस्मिन् ) इस [ देहधारी] (यूथे) समूह में (नहि) नहीं [उत्पन्न होती है] ४१ भावार्थ-विद्वान् लोग परमेश्वर के सर्वव्यापकता आदि गुणों को, विचारते हुये अपौरुषेय वेदवाणी को उसके ज्ञान का आधार समझ कर उसके विषय में जो प्रश्न करें, उसका उत्तर आगे के मन्त्र में है ॥४१॥ यह मन्त्र ऊपर प्राचुका है-08 18 । १७ और ऋग्वेद में भी कुछ भेद से है -म०१ । १६४ ॥ १७ ॥ एकपदी द्वि पदी सा चतु'प्पाष्टापदी नवपदी बभूवुषी । सुहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याःसमुद्रा अधि विक्षरन्ति ४२ एक-पदी । द्वि-पदी । सा। चतु':-पदी । मुटा-पदी । नव- पदी । बभूवर्षी ॥ सुहस्र-मक्षरा । भुवनस्य । पङ्क्तिः। तस्याः। समुद्राः । अधि । वि । क्षरन्ति ॥ ४२ ॥ भाषार्थ-(सा) वह [घेदवाणी ] ( एकादी ) एक [ ब्रह्म ] के साथ व्याप्ति पाली, (द्विपदी ) दो [भूत भविष्यत् ] में गतिवाली, (चतुष्पदी ) चार [ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ] में अधिकार वाली, (श्रष्टापदी) ] आठ पद [छोटाई, हलकाई,प्राप्ति, स्वतन्त्रता, बड़ाई, ईश्वरपन, जितेन्द्रियता और सत्य- सङ्कल्प, आठ ऐश्वर्य] प्राप्त कराने वाली, (नवपदी ) नौ [मन बुद्धि सहित दो । वाणी (कद्रीची ) क गच्छन्ती ( कंस्वित् ) (अर्धम् ) ऋधु वृद्धौ-धम् । वृद्धि शीलं परमेश्वरम् । परा) पराक्रमेण ( अगात् ) अगमत् (क) कुत्र (स्वित्) (सूते) सूयते । उत्पद्यते (नहि ) निषेधे (यूथे ) समूहे ( अस्मिन् )". . ४२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ०४।१०।२१ ( एकपदी ) एकेन ब्रह्मणा पदं व्याप्तिर्यस्याः सा (द्विपदी) भूतभविष्यतोर्गतिर्यस्याः सा (ला) गौः । वेद. वाणी ( चतुष्पदी) चतुर्वर्ग धर्मार्थकाममोक्षेषु पदमंधिकारो यस्याः सा (अष्टा- पदी) अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा । ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावसायिता ॥ १ ॥ इत्यप्टैश्वर्याणि पदानि प्राप्तव्यानि यथा सा ( नव. . .
॥ ॥ (३,८२२) अथर्ववेदभाष्ये सू०.१ [४] कान, दो नथने, दो प्रांखें और एक मुख ] से प्राप्ति योग्य, ( सहस्राक्षरा) सहस्रो [नसंख्यात ] पदार्थी में व्याप्ति चाली (वभूपी ) होकर के (भुवनस्य ) . संसार की ( पङ्क्तिः) फैलाव शक्ति है, (तस्याः) उस [वेदवाणी] से (समुद्राः) समुद्र [ समुद्र रूप सब लोक ] ( अधि) अधिक अधिक (वि) विविध प्रकार से (क्षरन्ति ) वहते हैं ॥ ४२ ॥ भावार्थ-यह मन्त्र गत मन्त्र का उत्तर है । वेदवाणी परमेश्वर से उत्पन्न होकर संसार में सब उत्तम ज्ञानों का भण्डार है, उसी को विचार कर विद्वान लोग अानन्द भोगते हैं॥४२॥ यह मन्त्र पहिले आ चुका है-'अ० ६ । १० । २१ । और कुछ भेद से ऋग्वेद में भी है -म० ११ १६४ । ४१, १२ ॥ भारोहुन् द्यामुमृतः मा मे वचः । उत् यज्ञा ब्रह्म- पूता वहन्त्यध्वगतो. हरयस्त्वा वहन्ति ॥ ४३ ॥ भुा-रोहन् । द्याम् । अमृतः । मः। अव । में । वचः ॥ उत् । त्वा । यज्ञाः । ब्रह्म-पूताः । बहुन्ति । अध्व-गतः । हरयः । त्वा । वहुन्ति ॥ ४३ ॥ भाषार्थ-(द्याम् ) प्रकाश के ऊपर (पारोहन् ) चढ़ता हुआ (अमृतः) अमर तू (मे वचः) मेरे वचन को (प्र) भले प्रकार (अव) सुन । [हे परमे- श्वर |] ( त्वा) तुझ को (ब्रह्मपूताः) ब्रह्मात्री [ वेदवेत्ताओं] द्वारा शुद्ध । उत् त्वा 4 पदी ) मनोबुद्धिसहितैः सप्तशीर्षण्यच्छिद्रः प्राप्या, (वभूवुषी) भवतेः कसु, ङीप् । भूतवती ( सहस्राक्षरा) अशू व्याप्तौ-संर । असंख्यातेषु पदार्थेषु व्याप- नशीला (भुवनस्य ) संसारस्य ( पङ्क्तिः ) पचि व्यक्तीकरणे -क्तिन् । विस्तृतिः (तस्याः.) वेदवाण्याः सकाशात् (समुद्राः ) समुद्रूपा लोकाः (अधि) अधिकम् (वि) विविधम् ( क्षरन्ति ) संचलन्ति । ४३--(भारोहन्) अधितिष्ठन् ( द्याम् ) गमेझैः। उ०२। ६७ । धुत दीप्ती, यद्वा धु अभिगमने-डोल । दीप्तिम् (अमृतः) अमरः । अविनाशी परमे- . मू०१ [ ४७८] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८३३ किये गये ( यज्ञाः) यज्ञ [संगति योग्य व्यवहार] ( उत्) उत्तमता से (वहन्ति ) प्राप्त होते हैं, (अध्वगतः) [वेद विहित ] मार्ग पर चलने वाले (हरयः ) मनुष्य (त्वा) तुझ को ( वहन्ति ) पाते हैं ॥ ४३ ॥ .. भावार्थ-योगी जन प्रकाशस्वरूप जगदीश्वर का ध्यान करके तपश्च- रण के साथ उसे प्राप्त करके श्रानन्द पाते हैं ॥ ४३ ॥ इस मन्त्र का उत्तर भाग ऊपर मन्त्र ३६ में प्राचुका है। वेद तत् ते अमर्त्य यत् ते आक्रमणं दिवि । यत् ते सुधस्थ परमे व्योमन् ॥ ४४ ॥ वेद । तत् । ते । ममर्त्य । यत् । ते । अा-क्रमणम् । दिषि ॥ यत् । ते । सुध-स्थम् । परमे । वि-भीमन् ॥ ४४ ॥ भापार्थ-(अमर्त्य ) हे अमर ! [ अविनाशी परमेश्वर ] ( ते ) तेरे (तत्) उस को (वेद ) मैं जानता हूं, ( यत्) जो (ते.) तेरा (आक्रमणम् ) चढ़ाव [व्याप्ति ] (दिवि ) प्रत्येक व्यवहार में है और (यत् ) जो (ते) तेरा (सधस्थम् ) सह स्थान ( परमे) सब से बड़े (व्योमन् ) विविध रक्षा साधन [ मोक्ष पद] में है ॥ ४४ ॥ भावार्थ-योगी को योग्य है कि उस नित्य शुद्ध परमात्मा को प्रत्येक पदार्थ में साक्षात् करके मोक्ष सुख प्राप्त करे ॥४४॥ सूर्यो द्यां सूर्यः पृथिवीं सूर्य प्रापोऽति पश्यति । सूया भूतस्यैक चक्षुरा रुरोह दिव महीम् ॥ ४५ ॥ : P 1 श्वरः (प्र) प्रकर्पण (अव) अव रक्षणश्रवणादिषु शृणु (मे) मम ( वचः) वचनम् । अन्यत् पूर्ववत् म० ३६ ॥ ४४.-(वेद ) जानामि (तत्) प्रसिद्धम् ( ते ) तव (अमर्त्य ) हे अमर। अविनाशिन् ( यत् ) (ते) (अाक्रमणम् ) उपरिगमनम् ( दिवि ) प्रत्येकव्यवहारे ( यत् ) (ते ) ( सधस्थम् ) सहस्थानम् (परमे ) सर्वोत्कृष्टे (व्योमन् ) विविधरक्षासाधने मोक्षपदे ॥ .
. - - सूर्य (२,८३४) अथर्ववेदभाष्ये सू०१ [४७८] ।। द्याम् । सूर्यः । पृथिवीम् । सूर्यः सूर्यः । प्रायः ॥ आपः। अति पश्यति ॥ सूर्यः । भूतस्य । एकम् । चक्षु: । आ । कुरोह दिवम् । महीम् ॥ ४५ ॥ भाषार्थ- सूर्यः) सब का.चलाने घाला [ परमेश्वर ] (धाम् ) प्रकाश मान सूर्य को, (सूर्यः) वह सर्वप्रेरक (पृथिवीम्.) पृथिवी को, (सूर्यः) वह सर्वनियामक (आपः ) प्रत्येक काम को (अति पश्यति) निहारता है । (सूर्यः) वह सर्व नियन्ता (भूतस्य ). संसार का ( एकम् ) एक (चक्षुः) नेत्र [ नेत्र कप जगदीश्वर ] (दिवस् ) श्राकाश पर और (महीम् ) पृथिवी पर (श्रा रुरोह ) ऊंचा हुश्रा है.॥ ४५ ॥ भावार्थ-वह समदर्शी जगदीश्वर सब संसार और सब कामों को देखता हुआ सब को अपने नियम में रखता है ॥४॥ उर्वीरोसन् परिधयो वेदिभूमिरकल्पत । तत्र तावुनी माधत्त हिमं घुसं च रोहितः ॥ ४६ ॥ उर्वीः । आसन् । परि-धयः । वेदिः । भूमिः। अकल्पत ॥ तत्र । एतौ । अली इति । प्रा । मृधुत्त । हिमस् । घुसम् । चु । रोहितः ॥ ४६॥ भाषार्थ-[संसार में ] ( उर्तीः ) चौड़ी [ दिशायें] ('परिधयः) परकोटा रूप ( श्रासन् ) हुयीं, ( भूमिः) भूमि (वेदिः) चेदि [ यज्ञ कुण्ड ] ४५-(सूर्यः) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः ( द्याम् ) प्रकाशमानं सूर्यम् (सूर्यः) सर्वनियामकः (पृथिवीम् ) (सूर्यः । (आपः) प्रारः कमाख्यायां ह्रस्वो नुन च वा । उ० ४ । २० ८। श्रापल व्याप्ती-प्रसुन् । कर्म (अति पश्यति) अत्यर्थं विलोक- यति ( सूर्यः ) (भूतस्य ) संसारस्य (एकम् ) अद्वितीयम् (चक्षुः ) नेत्रं यथा (श्रा हरोह) अधिष्ठितवान् ( दिवम् ) आकाशम् (महीम् ) भूमिम् ॥ '', ४६-( उर्वी.) उर्व्यः । विस्तृता दिशा (श्रासन्) (परिधयः) प्राकाररूपाः (वैदिः) यज्ञकुण्डरूपा (भूमिः) (भकल्पत) रचिताऽऽसीत् (तत्र.) (एतौ) सू० १ [४७६] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८३५) . . कर (अकल्पत ) बनायी गयी। (तत्र) उस में (रोहितः) सव के उत्पन्न करने वाले परमेश्वर ने (पतौ । इन (अग्नी ) दो अग्नियों [सूर्य और चन्द्रमा ] को (ध लम) ताप (च) और (हिमम् ) शीत रूप ा अधत्त) स्थापित किया ॥ ४ ॥ भावार्थ-मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के बनाये दिशाओं, भूमि, सूर्य, चन्द्र, ताप, शीत आदि से विज्ञान. पूर्वक उपकार लेवें ॥ ४६॥ हिम चाधाय यूपान् कृत्वा पर्वतान् । वर्षाज्यानो ईजाते रोहितस्य स्युर्विदः ॥ ४७ ॥ हिमम् । घुसम् । च । श्रा-धाय । यूपान्। कृत्वा । पर्वतान् ॥ वर्ष-प्रोज्यौ । अग्नी इति । ईजाते इति । रोहितस्य । स्व:-विद ॥ ४ ॥ भाषार्थ-(हिमम् ) शीत (च ) और ( घसम् ) ताप को (अाधाय ) स्थापित करके, ( पर्वतान् ) पर्वतों को (यूपान् ) जयस्तम्भ रूप ( कृत्वा ) बनाकर, ( वर्षाज्यौ ) वृष्टि को घी रूप रखने वाले (अग्नी) दोना अग्नियों [सूर्य और चन्द्रमा] ने (स्वर्विदः) सुख पहुंचाने वाले (रोहितस्य ) सब के उत्पन्न करने वाले परमेश्वर के लिये ( ईजाते ) यज्ञ [ संयोग वियोग व्यवहार] को किया है ॥४७॥ प्रसिद्धौ ( अग्नी) सूर्याचन्द्र मसौ ( आ अधत्त) स्थापितवान् ( हिमम् ) शीतम (घ्रसम् ) दिवः कित् । उ० ३ । १२१ । धृ दीप्तौ-असच , कित्, पृपोदरादि- त्वाद् नकारः। सेोऽहर्नाम-निध० १ । । । तापम् (च) ( रोहितः । सर्वोत्पा. दकः परमेश्वरः॥ ४७ - ( हिमम् ) शीतम् (धूंसम् ) म०४६ । तापम् (च) (धाय ) स्थापयित्वा (यूपान् ) जयस्तम्भान् यथा ( कृत्वा) विधाय ( पर्वतान् ) शैलान (चर्पाज्यौ) वर्ष वृष्टिघृतयययोस्तौ (अग्नी ) सूर्याचन्द्रमसौ ( ईजाते ) यंज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-लिट् । यशं संयोगवियोगव्यवहारं कृतवन्तौ (रोहि- तस्य ) चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि । पा० २।३ । ६२ । इति षष्ठी। रोहिनाय । सर्वोत्पादकाय परमेश्वराय (स्वर्विदः) विद्ट लासे-किप् । सुखप्रापकाय ॥ .
॥ ४ ॥ - (२,८३६ ) अथर्ववेदभाष्ये. सू० १ [४७६] भावार्थ-परमेश्वर के सामर्थ्य से सूर्य चन्द्र आदि लोक नियमित होकर ताप, शीत, वृष्टि, पर्वत श्रादि की उत्पत्ति और स्थिति के कारण होते हैं ॥१७॥ स्वर्विदो रोहितस्य ब्रह्मणाग्निः समिध्यते । तस्माद् घुसस्तस्मा द्धिमस्तस्माद् यौऽजायत ॥ ८ ॥ स्व:- :-विदः । रोहितस्य । ब्रह्मणा । अग्निः । सम् । इध्यते ॥ तस्मात् । सः । तस्मात् । हिमः । तस्मात् । युज्ञः । अजा- युत भाषार्थ-(खर्विदः) सुख पहुंचाने वाले (रोहितस्य ) सब के उत्पन्न करने वाले परमेश्वर के ( ब्रह्मणा ) वेद ज्ञान द्वारा (अग्नि ) अग्नि [सूर्य आदि] (सम् इध्यते ) यथावत् प्रकाशित होता है । (तस्मात् ) उसी [ परमेश्वर ] से (नसः) ताप (तस्मात् ) उसी से (हिमः ) शीत और (तस्मात् ) उसी से (यक्षः ) यज्ञ [ संयोग वियोग व्यवहार ] (अजायत ) उत्पन्न हुआ है ॥ ४ ॥ भावार्य-परमेश्वर के सामर्थ्य से ही सूर्य चन्द्र आदि पदार्थ उत्पन्न होकर ताप शीत, संयोग वियोग द्वारा संसार का उपकार करते हैं || ४ || ब्रह्मणामी वावृधानौ ब्रह्मवृद्धौ ब्रह्माहुतौ । ब्रौद्धावनी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः ॥ ४ ॥ ब्रह्मणा । अनी इति वधानौ । ब्रह्म-वृद्धौ । ब्रह्म-माहुतो " ब्रह्म-इद्धौ । भुनी इतिः। ई.जाते इति । रोहितस्य । स्व:- विदः ॥ ८ ॥ .. 1 ४-(स्वर्विदः) सुखप्रापकस्य (रोहितस्प) सर्वोत्पादकस्य परमेश्व रस्य ( ब्रह्मणा) वेदशानेन (अग्निः) सूर्यादिः (समिध्यते) यथाविधि दीप्यते (तस्मात् ) .परमेश्वरात् (घ्रसः) तापः (तस्मात् ) (हिमः) शीतधर्मः ( तस्मात् ) ( यशः) संयोगवियोगव्यवहारः (शजायत. उद पचत ॥
त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ । २०. १८४७६] (२,८३७) भाषार्थ-(अग्नी ) दोनों अग्नि [सूर्य और चन्द्रमा ] (ब्रह्मणा) वेद- ज्ञानद्वारा (ववृधानौ ) बढ़ते हुये, ( ब्रह्मवृद्धौ) अन्न से बढ़े हुये, (ब्रह्माहुतौ) जलकी आहुति [ग्रहण और दान ] वाले हैं । (ब्रह्म धौ) धन के साथ प्रकाश किये गये (अंग्नी ) उन दोनों अग्नियों ने (खर्विदः) सुख पहुंचाने वाले (रोहि- तस्य.] सब के. उत्पन्न करने वाले परमेश्वर के लिये ( ईजाते) यश [ संयोग वियोग व्यवहार को किया है ॥ ४ ॥ भावार्थ-ईश्वर की शक्ति से यह सूर्य और चन्द्रमा प्राणियों के लिये अन्न, वृष्टि और धन के कारण होते हैं ॥ ४ ॥ सत्ये अन्यः समाहितोऽस्व न्यः समिध्यते । ब्रह्मेद्धावनी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः ॥ ५० ॥ (५) सत्ये । अन्यः । सुस्-माहितः। अप-मुः। अन्यः । सम् । दुध्यते । ॥ ५० ॥ ( ५) भाषार्थ-('अन्यः) एक [ परमाणुरूप पदार्थ ] ( सत्ये ) सत्य [नित्य- पन में ( समाहितः) सर्वथा ठहरा हुआ है, (अन्यः) दूसरा [ कार्यरूप पदार्थ] (अप्सु) प्रजाओं जीवधारियों के बीच (सम् इध्यते) यथावत् प्रकाशित. होता. है । (ब्रह्मद्धौ) धन के साथ प्रकाशित किये गये मन्त्र. ४६५०. भावार्थ-संसार में दो. प्रकार के पदार्थ हैं, एक नित्य . परमाणुः रूप, और दूसरे अनित्य कार्य रूप । यह सब ईश्वर की श्राशा से संसार का उपकार करते हैं ॥५०॥ ४६-(ब्रह्मणा) वेदशानेन (अग्नी) सूर्याचन्द्रमसौ (ववृधानौ ) वर्धमानौ (ब्रह्मवृद्धौ) ब्रह्माऽन्न नाम-निघ०२।७। अनेन प्रवृद्धौ ( ब्रह्माहुतौ) ब्रह्मोद. कनाम-निघ० १ ॥ १२॥ जलस्याहुतंग्रहणदानव्यवहारो. ययोस्तौ (ब्रह्म धौ) ब्रह्म धननाम-निघ० २। १० । धनेन प्रकाशितौ। अन्यत् पूर्ववत्-म०४७ ॥ ५०-(सत्ये) नित्यत्वे (अत्यः) एकः परमाणुरूपः पदार्थः (समाहितः) यथावत् स्थापितः (अप्सु ) प्रजासु (अन्यः ) कार्यरूपः पदार्थः (समिध्यते) यथाविधि दीप्यते। अन्यत् पूर्ववत्-म०४६ ॥ . a .
(२,३८) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [४७८] यं वातः परि शुभति यं वेन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः । ब्रह्मेद्धावनी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः ॥ ११ ॥ यस् । वातः । परि-शुम्भति । यम् । वा । इन्द्रः । ब्रह्मणः । पतिः ॥ ब्रह्म-इद्धा । अनी इति। ई नाते इति । रोहितस्य ।। स्व:-विदः ॥ ११ ॥ भोषार्थ-(यम् ) जिस [परमेश्वर] को (वातः ) पवन, और (यम् ) जिसको (वा) निश्चय करके ( ब्रह्मणः) अन्न का (पतिः) रक्षक (इन्द्रः) मेघ (परि शुम्भति) सव ओर से प्रकाशित करता है। (ब्रह्मद्धौ) धन के साथ प्रकाशित किये गये..."मन्त्र ४६॥५॥ भावार्थ-श्रादि कारण परमात्मा के उपकारों को कार्यरूप पवन, मेघ, सूर्य, चन्द्र आदि उपकारी पदार्थों द्वारा साक्षात् करके विद्वान् लोग उन्नति करते हैं।। ५१॥ वेदि भूमि कल्पयित्वा दिव व कृत्वा दक्षिणाम् । चूंसं तदग्नि कृत्वा चकार विश्वमात्मन्वद् वर्षेणाज्येन रोहितः ॥ ५२. ॥ वैदिम् । भूमिम् । कल्पयित्वा। दिवम् । कृत्वा । दक्षिणाम् ।। चूंसम् । तत् । अग्निम् ।' कृत कृत्वा चकार विश्वम् । भात्म- न्-वत् । वर्षेणं । प्राज्यैन । रोहितः ॥ ५२ ॥ भाषार्थ-(भूमिम् ) भूमि को (वेदिम् ) वेदि [यज्ञकुण्ड ] रूप ( कल्पयित्वा ) रचकर, (दिवम् ) आकाश को (दक्षिणाम्.) दक्षिणा [प्रतिष्ठा ५१-(यम् ) परमात्मानम् (वातः) पवनः (परिशुम्भति) सर्वतो दीपयति (यम् ).(वा) अवधारणे ( इन्द्रः) मेघः (ब्रह्मणः) अन्नस्य (पतिः) रक्षक ! अन्यत् पूर्ववत् -म०४६॥ . ५२-(वेदिम् ) यज्ञकुण्डं यथा ( भूमिम् ) ( कल्पयित्वा) रचयित्वा' ( दिवम् ) आकाशम् (कृत्वा) विधाय (दक्षिणाम् ) प्रतिष्ठादानं यथा (सम्) सू० १ [४७६ ] . त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ , (२,८३८) न का दान ] रूप (कृत्वा ) बनाकर, (तत्) फिर (अग्निम्) अग्नि को (घसम् ) तापरूप ( कृत्वा ) सिरजकर, (रोहितः ) सब के उत्पन्न करने वाले [परमेश्वर] ने ( वर्षेण ) वृष्टि रूप (आज्येन) घी से (आत्मन्वत्) आत्मा वाला (विश्वम्) स्व जगत् (चकार ) बनाया ॥५२॥ भावार्थ-परमात्मा ने भूमि, आकाश श्रादि प्राधार और अग्नि आदि पदार्थ बनाकर सब जगत् को श्रात्म बल देकर पुरुषार्थी बनाया है । उसी सर्व- शक्तिमान की भक्ति से पुरुषार्थी मनुष्य उच्च पद पावें ॥ १२ ॥ वर्षभाज्य घूसी अग्निदिभूमिरकल्पत । त तान् पर्वतानग्निर्गीर्भिाँ प्रकल्पयत् ॥ ५३ ॥ वर्षम् । भाज्यम् । घुसः । अग्निः । वेदिः । भूमिः । भूक- ल्पत ॥ तत्र'। एतान् । पर्वतान् । अग्निः । गुी-भिः । ऊर्वान् । अकल्प यत् ॥ ५३ ॥ भाषार्थ-(वर्षम् ) वृष्टि ( श्राज्यम् ) धीरूप, (घसः) ताप (अग्निः) अग्निरूप, (भूमिः) भूमि ( वैदिः) वेदिरूप (अकल्पत) बनाई गयी । (तत्र ) उस [भूमि ] पर ( एतान् पर्वतान् ) इन पर्वतो का (अग्निः) तेजः स्वरूप [परमेश्वर वा पार्थिव ताप] ने (गीर्भिः) वेदवाणियों द्वारा (ऊर्ध्वान् ) ऊंचा.(अकल्पयत् ) बनाया ॥ ५३॥ .. म०४६ । तापं यथा (तत् ) तदा (अग्निम् ) सूर्यादिकम् ( कृत्वा ) (चकार) रचयामास ( विश्वम् ) सय जगत् (प्रात्मन्यत्) अ०४।१०।७।सात्मक स्थावरजङ्गमात्मकम् (चर्पण ) वृष्टिरूपेण (आज्येन ) घृतेन (रोहितः ) सर्वा. त्पादकः परमेश्वरः॥ ५३-(वर्पम् ) वृष्टिः (श्राज्यम्) घृतं यथा (घ्र सः) म० ४६ । तापः . (अग्निः) तेजोविशेषः (वेदिः) (भूमिः ) (अकल्पत) अरंच्यंत (तत्र) भूमौ ( एतान् ) दृश्यमानान् (पर्वतान् ).(अग्निः ) तेजास्वरूपः परमेश्वरः पार्थिवतापोवा (गीर्भिः) घेदवाणीभिः (ऊर्ध्वान् )' उन्नतान् (अकल्पयत्) अकरोत् ।। .
(२,६४२) अथर्ववेदभाष्ये मू०१ [४] भावार्थ-जैसे यड के लिये वृत प्रादि हव्य पदार्थ होते हैं, वैसे हो. वृष्टि प्रादि बनाकर प्राणियों के सुख के लिये पार्थिव नाप द्वारा ईश्वर नियम से पहाड़ बने हैं ॥१३॥ गीर्भिर्वान् कल्पयित्वा रोहितो भूमिमब्रवीत् । त्वयीद सबै जायतां यत् भूतं वर्च भाव्यम् ॥ ५४ ॥ गी:-भिः । जुर्वान् । कल्पयित्वा । रोहितः । भूमिम् । अत्र- बीत् ॥ त्वयि । इदम् । सर्वम् । जायताम् । यत् । भूतम् । यत् । । । भाव्यम् ॥ ५४ ir- भाषार्च-(गीभिः) वदवाणियों द्वारा (जधान मंत्र ऊंचे पहाड़ों को । कल्पयित्वा ) रचकर (रोहितः स का उत्पन्न करने वाला परमेश्वर (भूमिम् ) भूमि ले (अत्रवीत् ) बोला- (त्वयि ) तुम पर (इदम् सर्वम् ) यह सब (जायताम् ) उत्पन्न होत्र, (यत्)जो कुछ (भूतम् ) उत्पन्न है, (च) और (यत्) जो कुछ (भान्यम् ) उत्पन्न होने वाला है" ॥ ५४॥ भावार्थ-परमेश्वर ने अपने नित्य वेद ज्ञानद्वारा सब पर्वत आदि बनाकर सृष्टि के निवाल के लिये भूमि को बनाया ॥ ५४॥ स यज्ञः प्रथमो भूतो भव्या अजायत । तस्माद्ध जज इदं सर्व यत् किं चेदं विरोचते रोहितेन ऋषिणामृतम् ॥ ५५ ॥ स: ! युज्ञः। मृचमः । भूतः। भव्यः। अजायत । तस्मात् । हु ।' जुई। इदस् । सवैम् । यत् । किम् । च । इदम् । वि-रोचते। रोहितेन । ऋषिणा । आ-भृतम् ।। ५५ ॥ ५५--(गीर्भिः चेदवाभिः (ऊर्चान् ) उन्नतान् पर्वतान् (कल्पयित्वा) सष्वा (रोहितः.) परमेश्वरः (भूमिम् ) ( अब्रवीत् ) अवदत् ( त्वयि } भूम्याम् (इदम् ) प्रत्यक्षम् (सर्चम् । (जायताम् ) उत्पद्यताम् (यत्) (भूतम् ) उत्पन्नं वर्तते (यत्) (च) (भाव्यम् ) भवतेयए । उत्पत्स्यमानम् !"
Bord n सू० १ [४७८ त्रयोदशं काण्डम् ।। १३ ॥ (२,८४१) भाषार्थ-(सः ) वह (प्रथमः ) सब से पहिला (भूतः ) वर्तमान हुआ और ( भव्यः) आगे वर्तमान रहने वाला ( यज्ञः) पूजनीय [ परमेश्वर ] (अजायत ) प्रकट हुआ । (तस्मात् ह) उस से ही ( इदं सर्वम् ) यह सब ('जशे ) उत्पन्न हुआ ( यत् किं च ) जो कुछ भी ( इदम् ) यह [जगत् ] (ऋषिणा ) ऋषि [ बड़े ज्ञानी] (रोहितेन ) सब के उत्पन्न करने वाले [ पर. मेश्वर ] करके (आभृतम् ) सबं ओर से पाला गया (विरोचते) झलकता है ।५५ भावार्थ-जो अविनाशी परमात्मा भूत और भविष्यत् में वर्तमान रहता है, उसी ने अपने सामर्थ्य से यह सब जगत् रचा है। बुद्धिमान् लोग ऐंला निश्चय करके अपना सामर्थ्य बढ़ावे ॥ ५५ ॥ यश्च गां पदा स्फुरति मृत्यङ् सूर्य चे मेहति । तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करोऽपरम् ॥ ५६ .. यः । च । गाम् । पदा। स्फुरति । मृत्यङ् । सूर्यम् । च । मेहति ॥ तस्य । वृश्चामि । ते । मूलम् । न । छायाम् । करवः । अपरम् ॥ ६ ॥ भाषार्थ-(यः) जो कोई (प्रत्यङ्) प्रतिकूलगामी पुरुष ( गाम् ) वेदवाणी को (पदा) पग से [तिरस्कार के साथ ] ( स्फुरति ) ठोकर मारता है, (च च ) और (सूर्यम् ) सूर्य [समान प्रतापी विद्वान् मनुण] को (मेहति ५५-(स.) प्रसिद्धः (यक्षः) यजनीयः परमेश्वरः (प्रथम:) आदिमः (भूतः) भूतकाले भवः (भव्यः ) भविष्यति भवः (अजायत) प्रादुरभवत् (तस्मात् ) परमेश्वरात् (ह) एव ( जज्ञे ) प्रादुर्बभूव ( इंदम्) (सर्वम् ) जगत् ( यत्) (किं च ) किमपि (इदम् ) (विरोचते) विविधं दीप्यते दृश्यते ( रोहितेन ) सर्वोत्पादकेन (ऋषिणा) सर्वदर्शिना महाशानिना (आभृतम्) समन्तात् पोषितम् ॥ ५६-(यः) दुराचारी (च) (गाम् ) वेदवाचम् (पदा) पादेन । तिरस्कारेण ( स्फुरति ) संचालयति ( प्रत्यङ्) प्रतिकूलगामी ( सूर्यम् ) सूर्य- पत्तेजस्विनं विद्वांसम् (च] (मेहति ) मिर्च मेध मेधाहिंसनयो, धस्य हः । ।
, - . भ (२,४२) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [.४७८] मेधति ) सताता है । (तस्य ते ) उस नेरी (मूलम् ) जड़ को (वृश्चामि ) में कारता हूं, तू (छायाम् ) छाया [ अन्धकार वा अविद्या ] को (अपरम् ) फिर (न ) न ( करवः ) फैलावे । ५६ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य सत्य वेदवाणी का तिरस्कार करके विद्वानों को काट देवे, उस को लोग दण्ड देकर नाश करें ॥६॥ यो मोभिच्छायमुत्येपि मां चाग्नि चन्तिरा। तस्य वृश्चामि ते मूलं न छायां करवोऽपरम् ॥ ५७ ॥ यः । मा। अभि-छायम् । मृति-एपि । माम् । च । अग्निम्। च । अन्तरा ॥ तस्य । व वृश्चामि । ते । मूलम् । न । छायाम् । करवः । अपरम् ॥ ५७ ॥ .: भाषार्य-(यः)जो तू ( माम् ) मेरे ( च ) और (अग्निम् अन्तरा) अग्नि [अग्नि समान ज्ञान प्रकाश के बीच [ होकर] (अभिच्छायम् मा) मुझ तेज पाये हुये को (अत्येषि ) उलांघता है। (तस्य ते) उल तेरी (मूलम ) जड़ को (वृश्चामि ) में काटता हूं, तू (छायाम् ) छाया- [अन्धकार वा अविद्या ] को (अपरम् } फिर () (करकः) फैलाये ॥ १७ ॥ । - मेधति । हिनस्ति (तस्य ) दुष्टस्य (वृश्चामि) छिनद्मि (ते ) तब (मूतम् ) (न) निषेधे (छायाम् ) माछालसिभ्यो यः ! उ०४ २०६ को वेदनेय, टाप् । छयति प्रकाशमप्रकाशं वा । छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रतिविम्वमनातपः- अमर० २३ । २५७ । अनातपम् । अन्धकारम् । अज्ञानम् ( करवः । .क विज्ञपे. लेट , छन्दसि तनादित्याप्रत्ययः, गुणे च कृते, करु सिप । लेटोऽडाटौ। पा० ३।४।१४। इत्यटि गुणे च कृते सकारस्य विसर्गेच जातरूपसिद्धिः विक्षिण। विस्तारय { अपरंम् ) पुनः ।। ५७--(यः) दुराचारी (मा) मां ब्रह्मचारिणम् (अभिच्छायम् )छाया कान्ति:- म० ५६ । अभिगता छाया कान्तिस्तेजो येन तं विद्वांसम् (अत्येपि) उल्लवयसि (माम् ) (च) ( अग्निम् ) अग्विवद् ज्ञानप्रकाशम्, (..) (अन्तरा ) मध्ये ! अन्यत् पूर्ववत्-म०.५६॥
- ०१ [४७८ त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८४३). भावार्थ-जैसे जलते हुये अग्नि का प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है और कोई दोनों के बीच में पड़ कर प्रकाश को रोक दे, ऐसे ही जो दुराचारी चेदविद्या और ब्रह्मचारी के बीच विघ्न डालकर उत्तम व्यवहार के प्रचारों को रोके, उसे लोग दण्ड देकर नाश करें॥ ५७ ॥ यो अद्य देव सूर्य त्वां च मां चान्तरायति । दुष्वप्न्यं तस्मिलमलं दुरितानि च मृज्महे ॥ १८ ॥ यः । अद्य । देव । सूर्य । त्वाम् । च । माम् । च । अन्तरा । अर्यति ॥ दुः-स्वप्न्यस् । तस्मिन् । शमलम् । दुः-इतानि । च । मुज्महे ॥ ५ ॥ भाषार्थ-( देव ) हे प्रकाशमान ! (सूर्य ) सूर्य [ सूर्य समान तेजवी विद्वान् ! ] (यः ) जो कोई [ शत्रु] ( अद्य ) आज ( त्वाम् ) तेरे (च च,) और (माम् अन्तरा) मेरे बीच (अयति ) चलें । (तस्मिन् ).उस विषय में [आये 'हुये] (दु वपन्यम् ) बुरे स्वप्न, (शमलम्.) मलिन व्यवहार (च) और (दुरितानि ) दुर्गतियों को (मृज्महे ) हम शुद्ध करते हैं ॥ ५ ॥ भावार्थ:-जो मनुष्य दुष्टता के कारण शुभ गुणों के, प्रकाशों को रोके, विद्वान् लोग उन सव विघ्नों को हटाने के लिये प्रयत्न करें ।। ५८ ॥ मा म गौम पुथो वयं मा यज्ञादिन्द्र मोमिनः । मान्त स्युन! अत्तयः ॥ ५ ॥ , मा। प्र,। गाम । पथः । वयम् । मा। यज्ञात् । इन्द्र। मोमिनः । मा । अन्तः । स्थुः । नः । रातयः ॥ ८ ॥ y-(यः) शत्रु ( अद्य ) अस्मिन् दिने (देव) हे प्रकाशमान (सूर्य) मादित्यवत्तेजस्विन् विछन् ( त्वाम् ) (च) ( माम् ) (च) (अन्तरा) मध्ये (अयति ) गच्छति ( दुष्वपन्यम् ) दुष्टस्वप्नम् ( तस्मिन् ).पूर्वोक्त विषये (शम- लम् ) भ्रष्टव्यवहारम् ( दुरितानि) कष्टानि (च ) मृज्महे .),शोधयामः ॥ - A । । (२,८४४) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [ ४s ] भाषार्थ-(इन्द्र ) हे बड़े ऐश्वर्य वाले जगदीश्वर ! ( पथः ) वैदिक मार्ग से (वयम् ) हम ( मा प्र गाम ) कभी दूर न जावें, और (मा)न (सो. मिनः) ऐश्वर्य युक्त ( यज्ञात् ) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान व्यव- हार] से [दूर जावे ]1 (अरोतयः) अदानी लोग (नः अन्तः) हमारे बीच ( मा स्थुः) न ठहरें ॥ ॥ भावार्थ-विद्वान् लोग परमात्मा की उपासना करते हुये सदा वैदिक मार्ग पर चल कर श्रेष्ठ कर्म करें और सुपात्रों को योग्य दान देते रहें ॥ ५ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म००५७।१॥ यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तु'दै व वाततः । तमाहृतमशीमहि ॥ ६० ॥ (६) यः । यज्ञस्य 4 प्र-साधनः । तन्तु': । देवघु। आ-ततः ।। तम् । मा-हुतम् । अशीमहि ॥ ६० ॥ ( ६ ) भाषार्थ-(यः) जो [परमात्मा ] (यनस्य ) यज्ञ [देवपूजा, संगति- करण, दानव्यवहार] का (प्रसाधनः ) बड़ा सोधक ( तन्तुः ) तन्तु [त्रा त्मा रूप] होकर (देवेषु) देवों [इन्द्रियों, लोको, और विद्वानों ] में (आवतः) निरन्तर फैला है। (तम् आहुतम् ) उस सब ओर से ग्रहण किये गये [परमे- श्वर ] को (अशीमहि ) हम प्राप्त होवें ॥६०॥ भावार्थ-मनुष्य उस जगत् पिता, सर्वनियन्ता, सर्वव्यापक परमात्मा को ध्यान में रख कर अपनी उन्नति करें ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म०१०। ५७ ॥२॥ इति प्रथमोऽनुवाकः ।। ५8-(मा प्रगाम.) नैव दूरे गच्छम: (पथः ) वैदिकमार्गात् (वयम् ) धार्मिकाः,(मा.),निषेधे ( यज्ञात् ) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारात् ( इन्द्र). हे परमैश्वर्यवन्, जगदीश्वर (सोमिनः), ऐश्वर्ययुक्तात् (अन्तः ) मध्ये (मा स्थुः.).न तिम्डेयुः (नः),अस्माकम्: (अरातयः) अदानशीलाः.॥ ६०-(यः) परमात्मा (यक्षस्य ) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारस्य (प्रसाधनः ) प्रकर्षेण सांधकः (तन्तुः) सूत्रात्मा यथा (देवेषु) इन्द्रियेषु लोकेषु विद्वत्सु च (पाततः) समन्ताविस्तृतः (तम् ) परमात्मानम् (आइतम् ) समन्ताद् गृहीतम् (अंशीमहि ) प्राप्नुयाम ॥
सू०२ [ ४८० ] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ Munity. NA अथ द्वितीयोऽनुवाका - HA .. .. P- सूक्तम् २॥ ..१-४६॥ संविता रोहितो देवता ॥१, १२-१५, २६, २६ २, ८, २७, ४३ निवृज् जगती ; ३ जगतो; ४-७, ६, ३१-३३, ३५, ३६. ३, ४६ त्रिष्टुप् : १० निदास्तारपक्तिः, ११ विराट त्रिष्टुप् ; १६८२४ गायत्री, २१ अँरिंग ब्राह्मी गायत्री; २६ भुरिग जगती ; २८ आर्षी त्रिष्टुप् ३० खराडार्षी जगती ; ३४ पङक्तिः ; ३७ प्रार्षी जगनी ; ४२ मुरिक त्रिष्टुप् ४४ भुरिगार्जी जगती ४५ आर्षी जगती॥ आध्यात्मोपदेशः-परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश । उदस्य के तवो दिवि शुक्रा भ्राजन्त ईरते । आदित्यस्य नृचक्षसो महिव्रतस्य मीढुषः ॥ १॥ उत् । अस्य । के तव': । दिवि । शुक्लाः । 'भाजन्माई रते ॥ श्रादित्यस्य । नु-चक्षसः । महि-व्रतस्य । मीढुषः ॥ १ ॥ भाषार्थ - (अस्य ) इस ( नृचक्षसः ) मनुष्यों के देखने वाले ( महिन- .तस्यः) बड़े नियम वाले, (मीदुषः ) · सुख बरसाने वाले (आदित्यस्य) अविनाशी परमात्मा के (शुक्राः) पवित्र (भाजन्तः)-चमकते हुये (केतवः) विज्ञान ( दिवि ) प्रत्येक व्यवहार में ( उत् ईरते ) उदय होते हैं ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! वह सर्वदर्शी, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अपनी महिमा से प्रत्येक व्यवहार में वर्तमान है, तुम उस को खोजकर अपना विज्ञान बढ़ानो॥१॥ ॥ - -- १-( उंदीरते ) उद्यन्ति (अस्य) प्रत्यक्षस्य (केतवः.). विज्ञानानि । ..केतुः प्रज्ञानाम-निघ० ३ । 8 (दिवि) प्रत्येकव्यवहारे (शुक्राः) शुचयः ।पवित्राः (भ्राजन्तः ) प्रकाशमानाः (आदित्यस्य) अविनाशिनः परमेश्वरस्य (महिव्रतस्य) महानियमयुक्तस्य (मीदुपः) दाश्वान साहान- मीदवांश्च । -पा० ६ ।।१.११२) मिह संचने-क्कतु, निपात्यते । सुखवर्षकस्य । . ७.
. (२,८४६ ) अंथर्ववेदभाष्ये सू० २ [४८०.] दिशां प्रज्ञाना स्वरयन्तमर्चिषो सुपक्षमाशुं पतयन्तमर्णवे। स्तवाम सूर्य भुवनस्य गोपा यो रश्मिभिर्दिश भाति सवाः२ दिशाम् । प्र-ज्ञानाम् । स्वरयन्तम् । अर्चिषो । सु-पक्षम् । श्रीशुस् । पतयन्तम् । अर्ण वे ॥ स्तवाम । सूर्यम् । भुवनस्य । गोपाम् । यः । रश्मि-मिः । दिशः। श्रा-भाति । सवाः ॥२॥ भाषार्थ-(प्रज्ञानाम् ) बड़े ज्ञान कराने वाली (दिशाम् ) दिशाओं का (अर्चिषा) अपने पूजनीय कर्म से ( स्वरयन्तम् ) उपदेश करने वाले (सुपक्षम्) सुन्दर रीति से ग्रहण करने वाले, (श्राशुम् ) सर्वव्यापक, (अर्णवे ) समुद्ररूप. संसार में ( पतंयन्तम्.) ऐश्वर्य करने वाले (भुवनस्य ) संसार के (गोपाम् ) रक्षक (सूर्यम् ) सब के नायक परमेश्वर की (स्वतोम ) हम स्तुति करें। (यः) जो [परमेश्वर ] ( सर्वाः ) सव (दिशः.) दिशानी में (रश्मिभिः) अपनी व्याप्तियों से (आंभाति ) निरन्तर चमकता है ॥२॥ भावार्थ-मनुष्यों को उचित है कि सर्वव्यापक, सर्वरक्षक परमेश्वर की उपासना कर के अपनी उन्नति करें.॥ २ ॥ यत् प्राङ् प्रत्यङ् स्वधया यानि शीर्भ ननारूपे अहनी कर्षि माययो । तदादित्य महि तत् ते. महि अवो यदेको विश्वं परि भूम जायसें ॥ ३॥ यत् । पाङ् । मृत्यङ् । स्वधा । यासि । शीभम् । नानोरूपे - २-(दिशाम् ) दिशानाम् (प्रज्ञानाम् )प्रज्ञापिनीनाम् (स्वरयन्तम् )उप. दिशन्तम् (अर्चिषा) स्वपूजाकर्मणा (सुपक्षम्)पक्ष परिग्रहे-अच् । यथावत् परि- ग्रहीतारम् ( आशुम्) अशू व्याप्ती उणं । सर्वव्यापकम् (पतयन्तम् ) ऐश्वयं "कुर्वन्तम् (अर्णवे) समुद्ररूपे संसार ( स्तवाम )- प्रशंसाम ( सूर्यम् ) चराचरा- मान सर्वनायक परमेश्वरम् ( भुवनस्य ) संसारस्य ( गोपाम् ) रक्षकम् (श्मिभिः) अंश्नोतरश्च । उ०४ । ४६ अंशू व्याप्तौ-मि, रशादेशः । स्वव्या. प्तिभिः (दिशः) दिशाः (अाभाति) समन्ताद् दीप्यते ( सर्वाः ) ॥
-- 5 सू० २ [४०] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८४७.) इति नानी-रूपे। पहनी इति ।. कर्षि । मायया ॥ ततः। आदित्य । महि । तत् । ते। महि । श्रवः । यत् । एकः । विश्वम् । परि । भूमं । जायसे ॥ ३ ॥ भाषार्थ-(यत् ) जिस कारण से कि तू (प्राङ) सन्मुख [वा पूर्व में ] जाता हुआ और ( प्रत्यंङ ) पीछे [वा पश्चिम में] जाता हुआ (स्वधयां) अपनी धारण शक्ति से (शीभम् ) शीघ्र (यासि ) चलता है, और (मायया) अपनी बुद्धिमत्ता से ( नानारूपे) विरुद्ध रूप वाले (अहनी) दोनों दिन राति को (कर्षि) तू बनाता है । ( तत् ) उसी कारण से, (श्रादित्य') है प्रकाश- स्वरूप परमेश्वर ! (तत्) वह (ते) तरी (महि महि) बड़ी बड़ी ( श्रवः) कीर्ति है, (यत् ) कि (एकः ) एक ही तू (विश्वम् ) लब (भूम परि) बहुतायंत [संसार ] में सव ओर से ( जायसे ) प्रकट होता है ॥ ३॥" भावार्थ-अद्वितीय परमात्मा सृष्टि के आदि अन्तं और स्थिति में वर्तमान रहकर विरुद्ध स्वभावं वाले प्रकाश और अन्धकार युक्त दिन राति को बनाता है, वैसे ही वह जड़ और चैतन्य जगत् को रचकर सब का पोषण करता है, उसी प्रकार मनुष्य विघ्नों को हटा कर आत्मबल बढ़ा कर पुरुषार्थ करें ॥३॥ विपश्चित तुरणि 'भ्राजमान वहन्ति यं हुरितः सुप्त बह्वीः । ख़ुताद् यमत्ति दिवमुन्निनाय तं त्वां पश्यन्ति परियान्त- माजिम् ॥ ४ ॥ विप:-चितम् । तरणिस् । 'भ्राजमानम् । वहन्ति । यस् हरितः । सुप्त । बह्वीः ॥ सुतात् । यम् । अत्तिः । दिवम् ।। ३-(यत्) यस्मात् कारणात् (प्राङ) आभिमुख्येन पूर्वदिशि वा गच्छन् । प्रत्यङ्.) पश्चात् पश्चिमदिशि वा गच्छन् (स्वधया) स्वधारणशक्तया ( यासि ) गच्छसि ( शीभम् ) क्षिप्रम्-निघ० २ ! १५ ( नानारूपे) विरुद्धरूपे (अहनी ) अहोरात्रे (कर्षि ) करोषि (मायया) प्रज्ञया (तत्) तस्मात् कार- रणात् (श्रादित्य ) हे प्रादीप्यमान परमेश्वर ( महि) महत् (तत्) (महि) (श्रवः) कीर्तिः ( यत्) ( एकः ) अद्वितीयः । असहायः (विश्वमं ) (सर्वम्) (परि ) अभितः ( भम ) बहुत्व' ससारम (जायले') प्रादुर्भवसि ॥ :-.. ..
। m (२,४८) भववेदभाप्ये ... : सू०.२ [४८७] उत्-निनाय । तम् । त्वा। पुन्ति । परि-यान्तम् । मानिम् भाषार्य-यन् } जित (विपश्चितम् ) विविध प्रकार [ पार्थिव रस]. एकत्र करने वाले (ब्राजनानम् ) प्रकाशमान, (तरणिम् ) [अन्धकार से. पार करने वाले सूर्य को (सप्त ) लात [शुल, नीन, पीन, रक, हरित, कपिश, चित्र वर्ण वोली ] बट्टीः) बहुन [ भिन्न मिन्न प्रकार वाली ] (हरितः ) आकर्षक किरण (बहन्ति ) ले चलती हैं । (यम् । जिल] को- (अतिः) .नित्य ज्ञानी [ परमात्मा ] ने (बुतार ) बहते हुये [ प्रकृति- ए समुद्र ले (दिवम् ) भोकाश ने (उन्निनाय मंचा किया है, (तम् त्वा ) उस तुझ [ सूर्य को (आजिम् ) मर्यादा पर { परिचान्तम् ) सर्वथा चतता हुना ( पश्यन्ति ) वे [विद्वान् ] देखते हैं ॥४॥ भावार्य-जिस रमात्मा-ने. प्रलय के पीछे अनेक लोकरे के धारक अाकर्षक सूर्य को रबार दृढ़ता से आज्ञाश में चलाया है, विद्वान् लाग.परमेश्वर की उस बड़ी महिमा को विचार कर वैदिक नार्ग पर दृढ़ होकर चलते हैं ॥ ४ इस सन्त्र से नन्न २४ तक सूर्य का वर्णन करके परमेश्वर की महिमा का वर्णन किया है मन्त्र-२४ की टिप्पणी देखो ! मा त्यो दभन् परियान्तमाजि. स्वस्ति दुर्गा अति याहि शोभम् । दिवं च सूर्य पृथिवीच दे वीमहाराजे विमिमानो: यदेषि ॥ ५॥ . । ४-(विपश्चितम् ) चि+प्रचि चयने-लिप. तुक् ! पार्थिवरसानां विविधं चयनशीलम् (तरणिम् ) अन्धकारात् तारकंस्य (नानानम् ) अंका- शमानम् ( वहन्ति ) गमयन्ति (यम् ) (हरितः ) हस्तृतहियुषिभ्य इतिः । उ० ॥ ६७ । हृञ् प्रापल्सीकारस्तेयनाशनंषु-इतिप्रत्ययः । हारत प्रादित्यस्या दिष्टोपयोजनानि-निघ० २।१५ रसांकर्यकाः किरणाः ( सप्त) शुक्लनील- पीतरक्तहरितकपिशचित्ररूपयुक्ताः (दहीः) वहयः अनेविधाः (त्रुताद) श्रवणशीलात् प्रतिरुपतमुद्रा (यम् ) (अनिः अंदेस्त्रिनिश्च ! उ०४६ अत सातत्यगमने-त्रिप्। सदाज्ञानवान् परमात्मा र दिवन् । आकाशम् ( उन्नि- नाय ) उन्नतवान् (तम् । (वा) (पश्यन्ति ) अवलोकरन्ति विहांसः ( परि यान्तम् । परितो गच्छन्तम् (भाजिम्) अज्यतिभ्यां च । उ०४ : २३१ भज गविक्षेपदयो:-इए। मर्यादाम् । संग्रामम् ॥ - । है . - सू० २ [४८०.] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ . ( २,८४८) मा। त्वा । भन् । परि-यान्तम् । श्राजिम् । स्वस्तिः। दुः- गान् । प्रति । याहि । शीभम् ॥ दिवम् । च । सूर्य । पृथि- वीम् । चु । दे वीम् । अहोरात्र इति । विभिमानः । यत् । যৰি भाषार्थ-[हे सूर्य ! ] (आजिम् ) मर्यादा पर ( परियोन्तम् ) सब ओर से चलते हुये ( त्वा) तुझ को वे [विन] ('मा दभन् ) न दवावें; (दुर्गान् ) विघ्नों को ( अति ) उलांघ कर (स्वस्ति । श्रानन्द के साथ (शीभम् ) शीधू ( याहि ) चल । ( यत् ) क्योकि (सूर्य) हे सूर्य ! [लोकों के चलाने वाले पिण्ड- विशेष ] ( दिवम् ) आकाश ( च च ) और (देवीम् ) चलेने वाली (पृथिवीम्) पृथिवी को (अहोरात्र ) दिन राति ( विमिमानः ) विविध प्रकार नापता 'हुश्री (एपि) तू चलता है ॥ ५ ॥ भावार्थ-जिस प्रकार ईश्वर नियम से सूर्य अन्धकार आदि विनों को मिटाकर जगत् का उपकार करता है, वैसे ही मनुष्य दोषों को त्याग कर सबको सुखे पहुंचाने में प्रयत्न करें। ५॥ स्वस्ति ते सूर्य चरसे राय येनोभावन्तौ परियासि मुद्यः । यं ते वहन्ति हरितो वहिष्ठाः शुतमश्वा यदि वा मुप्त बही६ स्वस्ति । ते । सूर्य । चुरसे । राय । येन । उभौ । अन्ता परि-यासि । सद्यः ॥ यम् । ते। वहन्ति.। हुरितः। वहिष्ठाः। शुतम् । अश्वाः । यदि । वा । सुप्त । बह्वीः ॥ ६ ॥ ५-(मां दभन् ) मा हिंसन्तु ते विघ्नाः (त्वा) सूर्यम् (परियान्तम् परितो गच्छन्तम (आज़िम्) म०४ ,मर्यादाम (स्वस्ति) मङ्गलेन सह (दुर्गान् ) विधान (अति ) उल्लङ्घ्य (याहि ) प्राप्नुहि (शीभम्) शीघ्रम् ( दिवम् ) आकाशम् (च) ( सूर्य ) हे प्रेरक रवे (पृथिवीम् ) (च) (देवीम ) दिवु गतौ-अच् । गतिशीलाम् ( अहोरात्र) (विमिमानः) विविध मानं 'कुर्वन् ( यत् ) यस्मात् कारणात् ( एषि) गच्छसि ॥ .
. ]. ] . . . ( २,८५० ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४८८ भाषार्थ-(सूर्य ) है सूर्य ! [ लोकों के चलाने चले पिण्डविशेष ] (ते) तेरे (रथाय ). रथ [गति विधान ] के लिये ( चरसे) चलने को (स्वस्ति ) कल्याण है, ( येन ) जिसके कारण से तू ( उभौ ) दोनों (अन्तौ ) अन्ती [भागे , पीछे दोनों ओर, "अथवा उत्तरायण और दक्षिणायन' मार्ग ] को (सद्यः) तुरन्त ( परियार्सि) घूमता चलता है। (यम् ) जिस [ रथ ] को (ते.) तेरी (सप्त ) सात. [ शुक्ल, नील, पीत श्रादि वर्ण वाली.-मन्त्र ४] ( वह्वीः ) बहुतसी [भिन्न भिन्न वर्ण वाली ]( वहिष्ठाः) अत्यन्त बहने वाली [शीघ्रगामी] (हरितः) 'आदर्षक किरणे ( यदि.वा) अथवा (शतम्) सौ [असंख्य ] (अश्वाः ) व्यापक गुण [ घोड़े समान ] ( वहन्ति ) ले चलते हैं ॥ ६ ॥ भावार्य-सूर्य गोल पिण्ड है, उसका प्रकाश आगे पीछे सब ओर होता है और वह उत्तरायण और दक्षिणायन मार्ग पर चलता और किरणों द्वारा आकर्षण और वृष्टि श्रादि करके लोकों का धारण पोषण करता है, उसी प्रकार मनुष्य विद्या आदि शुभ गुणों से प्रकाशमान होकर आगा.पीछा सोचकर संसार मैं अपना कर्तव्य पूरा करें॥६॥ मुखं सूर्य रयमंशुभन्तै स्योन सुवन्हिमधि तिष्ठ वाजिनम् । यं ते वहन्ति हरितो वहिष्ठाः शुतमश्वा यदि वा सुप्त बह्रीं: भु-खम् । सूर्य । रथम् । अंशु-मन्तम् । स्योनम् । सु-वह्निम् । अधि । तिष्ठ । काजिनम् ॥ यम् । ते । वहन्ति । हुरितः । वहिष्ठाः । शुतम् । अश्वाः । यदि । वा । सप्त । बह्वीः ॥७॥.. भाषार्थ (सूर्य) हे सूर्य ! लोको के चलाने वाले पिण्डविशेष) (सुखम्) ६-(स्वस्ति ) कल्याणम्.(ते.) तव (सूर्य) हे रवे (चरसे) गमनाय ( रथाय ) रथोरंहतेर्गतिकर्मणः-निरु० ६।११ । रहणसामर्थ्याय । गतिविधा- नाय (येन ) ( उभौ) (अन्तौ) परं चापरं च देशौ । उत्तरायणदक्षिणायनमार्गी (परियालि ) परीत्य गच्छसि (सद्यः ) नत्क्षणम् (यम् ) रथम् (ते.) तव (वहन्ति) गमयन्ति (हरितः) म०४ । आकर्षकाः किरणा: ( वहिष्ठाः) वहि- तृतमाः । अतिशयेन वहनशीलाः । गन्तृतमाः (शतम् ) असंख्याताः (अश्वाः 'व्याप्तिगुणाः । तुरङ्गा यथा (सप्त) म० ४ ( बह्वीः) बह्वयः ।। ७-( सुखम् ) सुखेन गच्छन्तम् (सूर्य) रविमण्डल (रथम् ) म०६ । । -- .
मू० २ [ ४८० ] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६५१) सुन से चलने वाले, (अंशुमन्तम) तेजो मय, (स्योनम्) आनन्ददायक (सुवह्निम् ) भले प्रकार ले चलने वाले, (वाजिनम् ).बल वाले ( रथम् ) रथ,[गति विधान] पर (अधि तिष्ठ) अधिष्ठाता हो। ( यम् ) जिस [रथ] को (ते ) तेरी (सप्त) सात [ शुक्र, नील, पीत अादि वर्ण वाली-मन्त्र ४] (बह्वीः ) .बहुत सी [भिन्न भिन्न वर्णों वाली ], ( घहिष्ठाः) अत्यन्त बहने वाली [ शीघ्र गामी ] (हरितः ) आकर्षक किरणें, ( यदि वा ) अथवा (शतम् ) सौ [असंख्य ] . (अश्वाः ) व्यापक गुण [घोड़े समान ] (वहन्ति ) ले चलते हैं ॥ ७ ॥ भावार्थ-सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने जैसे प्रत्येक सूर्य मण्डल को अनेक लोकों की स्थिति के लिये रचा है, वैसे ही उसने मनुष्य को अनेक प्राणियों के पालन के लिये बनाया है।॥ ७ ॥ सप्त सूर्यो हुरितो यातवे रथे हिरण्यत्वचसो हुतीरयुक्त । अमौचि शुक्रो रज॑सः पुरस्ताद् विधूयं दे वस्तमो दिवमारुहत्. सुप्त । सूर्यः। हुरितः । यातवे । रथ । हिरण्य-त्वचसः। बृहतीः। अयुक्त ॥ अमौचि । शुक्रः । रजसः । पुरस्तात् । वि-धूर्य । देवः । तमः । दिवस् । प्रा । अरुहुत् ॥८॥ भाषार्थ-( सूर्यः) सूर्य [ लोकों के चलाने वास्त पिण्ड विशेष ] ने ( सप्त ) सात [शुक्ल, नील, पीत श्रादि वर्ण वाली-म० ४], (हिरण्यत्व- चसः) तेज की त्वचा [ ढकन ] रखने वाली, (वृहतीः) बड़ी [दुर दूर जाने वाली] (हरितः ) आकर्षक किरणों को ( रथे ) अपने रथ [गति विधान ] में (यातवे ) चलने के लिये ( अयुक्त ) जोड़ा है । (शुक्रः ) तेजस्वी वह (रजसः) - गतिविधानम् (अंशुमन्तम् ) तेजोमयम् ( स्यानम् ) सुखप्रदम् (सुवह्निम् ) सुवोढारम् (अधि तिष्ठ ) श्रारोह (वाजिनम्) बलवन्तम् । अन्यत् पूर्ववत्-, म०६॥ :-( सप्त ) शुक्लनीलपीतादिवर्णयुक्ताः-- --म० ४ (सूर्यः) लोकानां प्रेरकः पिण्डविशेपः ( हरितः ) आकर्षकान् किरणान् ( यातवे ) गन्तुम् (रथे)- म० ६ । गतिविधाने (हिरण्यत्वचसः ) त्वच संवरणे--असुन् । तेजोमयत्वग- युक्ताः ( हनीः) महतीः । दूरगमनाः (अयुक्त) योजितवान् (अमोचि ) अत्या.
-. .... T . (२,८५२ : अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४०] धुन्धलेपन से ('परस्तात् ) दूर (अमोचिं) छोडा गया है और (देवः) प्रका- शमान [ सूर्य.] ( तमः) अन्धकार को ( विधूय ) हिला डालकर ( दिवम् ) आकाश में (श्रा अंरुहत् ) ऊंचा हुआ है ।। || भावार्थ-जैसे सूर्य दूर पहुंचने वाली किरणों द्वारा अन्धकार को नाश करके अनेक लोकों को आकर्षण में रखकर ऊंचा ठहरा है, वैसे ही मनुष्य अविद्या मिटाकर विद्या का प्रकाश करके प्रतिष्ठा प्राप्त करें ॥ ८ ॥ उत् के तुना बृहृता द्वे व भागुन्नपावृक् तमोऽभि ज्योतिस्श्रेत् । दिव्या संपूर्णः स वोरो व्यख्यददितेः पुत्रो भुवनानि विश्व उत् । के तुनौ । बृहुता । दे वः। प्रा। अगन् । अप । अव क् । । अभि । ज्योतिः । मृत् ॥ दिव्यः । सु-पुर्णः । सः । वीरः । चि । अख्यत् । अदितेः। पुत्रः । भुवनानि । विश्वा भाषार्थ--( देवः ) प्रकाशमान सूर्य (वृहत्ता केतुना ) बड़ी सजधज से ( उत्-श्रा अंगन् ) ऊंचा होकर आया है, उसने (तमः) अन्धकार को (अप अवृक् ) हटा दिया है। और ज्योतिःअंभि) ज्योति को प्राप्त करके (प्रत्) ठहरा है ।- (दिव्यः-) श्राकाशनिवाली, ( सुपर्णः ) सुन्दर नीति से पालन करने वाला, (अदितेः.)-अखण्ड प्रकृति के (पुत्रः पुत्र..[ समान ]. (सः) उस (चीस) वीर [विविध गति वाले सूर्य.] ने- (.विश्वा ) सर (भुवनानि ) . . जि (शुक्रः) प्रकाशमानः (रजसः) अन्धकारात् । धूम्रवर्णात् (..परस्तात् ) दूरे ( विधूय ) पृथक् कम्पयित्वा (देवः) प्रकाशमानः सूर्यः ( तमः ) अन्धकारम् (दिवम् ) आकाशम् (श्रा अरुहत्) आरूढवान् ॥ 8- उत् ) ऊर्ध्वः सन् ( केतुना) प्रज्ञानेन (हता) महता (देवः) प्रकाशमानः सूर्यः ( आ अगन् ) आगतवान् (अप अवृक् ) अपवर्जितवान् (तमः) अन्धकारम् (अनि) अभिगत्य (ज्योतिः ) प्रकाशम् (अधैत्) निन् सेवायाम्-लुङि छान्दसं रूपम् । आश्रितवान् दिव्यः ) दिवि प्राकाशे भवः (सुपर्णः) शोभनपालन: (सः ) प्रसिद्धः (वीर) वि+ईर गतौ-अच् । विवि- धगतिः (व्यख्यत्) व्याख्यातानि प्रसिद्धांनि कृतवान् (अदितेः) अस्खण्डि- *- सू०२ [४०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२५३) लोको को (वि अख्यत्) प्रसिद्ध किया है ॥ ६ ॥ भावार्थ-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य ने प्रकृति से उत्पन्न होकर अन्धकार मिटाकर संसार में उजाला फैलाया है, वैसेही तुम ब्रह्मचर्य आदि शुभ गुणों से तेजस्वी होकर कीर्ति बढ़ायो।। उद्यन् रश्मीना तनुषे विश्वा सुपणि पुष्यसि । उभा. समुद्रा क्रतुना वि भासि सवाल्लोकान् परिभूर्धाजमानः ॥ १० ॥ (७) उत-यन् । रश्मीन् । प्रा । तनुषे । विश्वा । रूपाणि । पुष्यसि ॥ उभा । समुद्रौ । क्रतु'ना । वि । भासि । सवान् । लोकान् । परि-भूः । भ्राजमानः ॥ १० ॥ (७) भाषार्थ-[ हे सूर्य ! ] ( उद्यन् ) ऊंचा होता हुआ तू ( रश्मीन) किरणों को (श्रा) सब ओर से ( तनुषे) फैलाता है, और (विश्वा) सब (रूपाणि ) रूपों [ वस्तुओं ] को (पुष्यसि ) पुष्ट करता है। (उभौ) दोनों ( समुद्रौ) समुद्रो [ जड़ चेतन रूप संसार ] को, (सर्वान् लोकान.) सब लोकों के (परिभूः) चारों ओर घूमना हुआ और (भ्राजमानः ) चमकता हुधा तू ( केतुना ) अपने कर्म से (वि भासि ) प्रकाशित कर देता है ॥ १० ॥ भावार्थ-जिस प्रकार सूर्य ऊंचा होकर सृष्टि को प्रकाशित करके पुष्ट करता है, वैसे ही सब मनुष्य विद्या से सुभूषित होकर परोपकार करें ॥ १० ॥ पूर्वापरं चरतो माययै तौ शिशू क्रीडन्तौ परि याताऽर्ण वम् । विश्वन्यिों भुवना विचष्टे हैरण्यैन्य हुरिता वहन्ति ॥१५॥ तायाः प्रकृतेः (पुत्रः) पुत्रो यथा (भुवनानि ) लोकान् (विश्वा) सर्वाणि ।। १०-( उद्यन् ) उद्गच्छन् ( रश्मीन ) किरणानं (आ) समन्तात् (तनुषे) विस्तारयसि (विश्वा) सर्वाणि (रूपाणि) वस्तूनि (पुष्यसि ) वर्धयसि ( उभा) द्वौ (समुद्रौ) जड़चेतनरूपी संसारौ ( केतुना) कर्मणा (वि) विविधम् (भासि ) दीपयसि ( सर्वान् ) (लोकान् ) (परिभूः) परिग्राहकः । परिभ्राम्यन् (भ्राजमान:) प्रकाशमानः ॥
. (२८५४) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [ ४८०] पूर्व अपरम् । चरतः । माययो । सुतौ । शिश इति । क्रीड- न्तौ । परि । यातः । मृर्ण वम् ॥ विश्वा । न्यः । भुवना। वि-चंष्ट । है रण्यैः । अन्यम् । हुरितः । वहुन्ति ॥ ११ ॥ भाषार्थ-(पतौ) यह दोनों [सूर्य चन्द्रमा ] ( पूर्वापरम् ) आगे पीछे (मायया) बुद्धि से [ईश्वर नियम से ] (चरतः) विचरते हैं, (क्रीडन्तौं) खेलते हुये (शिशू) दो, बालक [जैसे ] ( अर्णवम् ) अन्त- रिक्ष में :(परि ) सब ओर ( यातः) चलते हैं। (अन्यः) एक [सूर्य ] (विश्वा) सब (भुवना) भुवनों को. ( विचष्टे ) देखता है, (अन्यम् ) दूसरे [चन्द्रमा ] को ( हरितः ) [ सूर्य की आकर्षक किरणें ( हैरण्यैः ) तेजोमय [वा सुनैले ] कामों के द्वारा ( वहन्ति ) ले चलती हैं ॥११॥ भावार्थ--सूर्य और चन्द्रमा ईश्वर नियम से उत्पन्न . हुये हैं, तेजस्वी सूर्य प्रकाश रहित चन्द्रमा को अपने आकर्षण में रख कर प्रकाशित और उप- कारी करता है, वैसे ही मनुष्य शुभ गुणे से प्रतापी होकर दूसरों को गुण- वान करें ॥११॥ इस मन्त्र के प्रथम तीन पाद कुछ भेद से ऋ०१० । ८५ । १८ में है,और . पीछे-अथर्व०७।०१।१ में आचुके हैं, और आगे-१० १४ । १ । २३ में हैं ।। दिवि त्वात्ति रधारयुत् सूर्या मासाय कर्तये । स एषि सुधृतस्तपन् विश्वा मताव चाशत् ॥ १२ ॥ दिवि । त्वा । अत्ति । अधारयत् । सूर्य । मामाय । कतवे । ११-(पूर्वापरम् ) यथा तथा पूर्वापरपर्यायेण (चरतः) विचरतः (मायया) ईश्वरप्रशंया ( एतौ ) दृश्यमानौ सूर्याचन्द्रमसौ (शिशु) ०७॥ ६१।१। बालकौ यथा (क्रीडन्तौ )विहरन्तौ (परि) (सर्वतः) ( यातः ) गच्छतः (अर्णवम् ) समुद्रम् । अन्तरिक्षम् ( विश्वा) सर्वाणि (अन्यः) एकः सूर्यः (भुवना) चन्द्रादिलोकान् (विचष्टे) विविधं पश्यति ( हैरण्यैः) विकारे अण् । तेजोमयः सुवर्णमयैर्वा कर्मभिः (अन्यम् ) द्वितीयं चन्द्रमसम् (हरितः) आकर्षकाः किरणाः ( वहन्ति ) गमयन्ति ॥ .
1. सू०.२ [४०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८५५) सः। ए पि । सु-घृतः । तपन् । विश्वा । भूता । अव- चाशत् ॥ १२ ॥ भाषार्थ-(सूर्य ) हे सूर्य ![लोको के चलाने वाले रवि मण्डल], (अत्तूिः) सदा शानवान् [ परमात्मा ] ने ( मासाय) महीना [ काल विभाग] (कर्तवे ) करने के लिये ( त्वा ) तुझ को (दिवि ) आकाश में ( अधारयत्)' धारण किया है । ( सः) वह तू ( सुधृतः) अच्छी प्रकार धारण किया गया, (तपन् ) तपता हुश्रा, और (विश्वा भूता ) सब प्राणियों को (अवचाकंशत.) निहारता हुआ (एषि ) चलता है ॥ १२ ॥ भावार्थ-परमात्मा ने सूर्य को बहुत से लोकों पर आकर्षण, ताप, वृष्टि आदि पहुंचाने के लिये बनाया है, मनुष्य उसी प्रकार तेजवी होकर पर.. स्पर पुरुषार्थ करें ॥ १२॥ उभावन्तौ समर्षसि वत्सः सैमातराविव । नन्वे ३ तदितः पुरा ब्रह्म दे वा अमी विदुः ॥ १३ ॥ उभौ । अन्तौ । सम् । पृर्ष सि । वत्सः। स मातरी-इव ॥ ननु । एतत् । दुतः । पुरा । ब्रह्म । देवाः । ममी इति । विदुः॥१३॥ भाषार्थ- है सूर्य !] तू (उभौ ) दोनो (अन्तौ) अन्तो [ पूर्व पश्चिम अथवा आगे पीछे दोनों ओर ] को ( सम् ) ठीक ठीक' (अर्षसि) पहुंचता है, (इव ) जैसे ( वत्सः ) बालक (संमातरौ ) दो सामान्य [मिली हुयी ] माताओं को । ( ननु ) निश्चय करके (एतत्) इसः (ब्रह्म ), ईश्वर शान १२-(दिवि ) आकाशे (त्वा ) सूर्यम् (अत्तिः) म०.४ । सदा शानवान परमात्मा (अधारयत् ) स्थापितवान् (सूर्य ) साहितिको दीर्घः । हे रविमेण्डल (मासांय ) कालविभागायेत्यर्थः (कर्तवे) कर्तुम् (सः') 'स त्वम् (एषि.) गच्छसि ( सुधृतः ) सुपुष्टः (तपन ) तापं कुर्वन् ( विश्वा) सर्वाणि (भूता) लोकान् (अवचाकशत् ) १०६।०१। भृशं पश्यन् ॥ १३-( उभौ.) द्वौ ( अन्ती) पूर्वापरौ पूर्वपश्चिमदेशौ वा (सम्) सम्यक् (अर्षसि ) प्राप्नोषि ( वत्सः) बालकः (संमातरौ) समानजनन्यौ (घ ) यथा (:ननु:) निश्चयेन (एतत् ) प्रत्यक्षम् । इतः') अस्मात् कालात् - . । ( २,५६ ); अथर्ववेदभाष्ये मू०२ [४८०..] को ( इतः पुरा.), इस समय के.पहिले से (अमी. ). यह ( देवाः), विद्वान् लोग: (विदुः) जानते हैं ॥ १३ ॥ भावार्थ-परमेश्वर ने सूर्य को ऐसी उचित रीति से बनाया है कि वह निरन्तर घूमकर सृष्टि का उपकार करे, पूर्वज, विद्वान् लोग ईश्वर के ऐसे नियमों को जानकर सुधार करते रहे हैं ॥ १३ ॥ • यत् समुद्रमनु श्रुितं तत् सिषासति सूर्यः । प्राध्यास्य वितता महान् पूर्व श्चापरश्च यः ॥ १४ ॥ यत् । समुद्रम् । अनु । श्रुितम् । तत् । सिषासति । सूर्यः ॥ श्रध्वा । अस्य । वि-ततः । महान् । पूर्वः । च । अपरः। च। यः ॥ १४ ॥ भाषार्थ-( यत् ) जो कुछ (समुद्रम् अनु) समुद्र [संसार ] में (श्रितम् ) ठहरा हुआ है,, (तत् ), उस को (सूर्यः): सूर्य [ लोकों का चलाने. वाला रवि] (सिषासति ) सेवा करना चाहता है । (अस्थ ) उस [सूर्य ].का. (अध्वी ) मार्ग (विततः) फैला हुआ और (महान् ) बड़ा है, (यः) जो [ मार्गः] ( पूर्वः) भागे ( च च ). और ( अपरः) पीछे [अथवा पूर्व और पश्चिम ],है ॥ १४॥ भावार्थ:-यह सूर्य अपने घेरे के भीतर सब लोकों को आकर्षण, वृष्टि आदि से सेवता है,उस नियम को निरखकर विद्वान् लोग मर्यादा पर.चलें ।१४ तं समाप्नोति जूतिभिस्ततो नाप चिकित्सति । तेनामृतस्य भक्षं देवानां नाव रुन्धते ॥ १५ ॥ (पुरा.) पूर्वम् (ब्रह्म) ईश्वरज्ञानम् (: देवाः) विद्वांसः (अमी) वर्तमानाः, (विदुः) जानन्तिं ॥ १४-(यत्) वस्तुजातम् (समुद्रम् ) संसाररूपम् (अनु) प्रति (श्रितम्) स्थितम् (तत्).(सिषासतिः) षण संभक्तौ-सन् । सेवितुमिच्छति (सूर्यः) मादित्यलोकः (अध्वा.) मार्गः (.अस्या) सूर्यस्य (विततः) विस्तृतः (पूर्व) (च.),(अपरः), पश्चाद् भवः पश्चिमः (च) (यः)मार्गः॥
॥ सू० २ [४०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २५७) तम् । सम् । प्राप्नोति । जूतिः-भिः । ततः । न । नपं । चिकित्सति ॥ तेन । अमृतस्य । भक्षम् । देवानाम् । न । अव । रुन्धते ॥ १५ ॥ भाषार्थ-(तम् ) उस [मार्ग] को ( जूतिभिः) अपने वेगों से (सम् प्राप्नोति.) वह [ सूर्य ] समाप्त करता रहता है; (ततः ), उस मार्ग से (न अप चिकित्सति) वह भूल नहीं करता। (तेन ) उसी कारण से (देवानाम् ) विजय चाहने वालों के (अमृतस्य ) अमरपन [जीवन सांधन] के (भक्षम् ) सेवन को (न अवः रुन्धत ) वे [विघ्न ] नहीं रोकते हैं ॥ १५ ॥ भावार्थ-सूर्य निरन्तर घूम कर संसार में प्रकाश करता रहता है, उसी से सब पुरुषार्थी जन जीवन सामग्री पाते हैं ॥ १५ ॥ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति के तवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥ १६ ॥ उत् । ऊ इति । त्यम् । जात-वैदसम् । देवम् । वहन्ति । के तवः ॥ दृशे । विश्वाय । सूर्यम् ॥ १६ ॥ भाषार्थ-(केतवः) किरणे ( त्यम् ) उस ( जातवेदसम् ) उत्पन्न पदार्थों को प्राप्त करने वाले, ( देवम् ) चलते हुये (सूर्यम् ) रविमराडल को (विश्वाय दृशे) सब के देखने के लिये (3) अवश्य.(उत् वहन्ति) ऊपर ले चलती हैं ॥ १६ ॥ १५-(तम् ) मध्वानम् (समाप्नोति ) सम्यक् प्रामोति. (जूतिभिः जवनैः। वेगैं: (ततः ) तस्मात् मार्गात् (न ) निषेधे (अप) (चिकित्सति) कित व्याधिप्रतीकारनिग्रहांपनयननाशनसंशयेषु-खार्थे सन् । संदेहं प्रमादं करोति (तेन) कारणेन (अमृतस्य ) अमरणस्य । जीवनसाधनस्य । (भक्षम् ) वृतवदिवचि० । उ० ३। '६२। भज सेवायाम्स । सेवनम् ( देवानाम् ) विजिगीषूणाम् (न), निषेधे (अव) (रुन्धते.) वर्जयन्ति विघ्नाः॥ १६-(उत्) ऊर्ध्वम् ( उ) निश्चये ( त्यम् ) तम् (जातवेदसम् ) यो जातान पदार्थान् विन्दति तम् ( देवम् ) गच्छन्तम्-(वहन्ति) गमयन्ति (केतवः) किरणा:-( हशे) द्रष्टुम् ( विश्वाय।) सर्वस्मै जगते ( सूर्यम्) रविमण्डलम् ॥ - --- . . ( २,८५८० - अथर्ववेदभाष्ये सू० २ [ ४८० ] भावार्य-जिस प्रकार सूर्य किरणों के आकर्षण से ऊंचा होकर सब पदार्थी को प्रकट करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या और धर्म से उन्नति करके सब का उपकार करें १६ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।५०।१, यजु०७।४१ । ४१६.३३ । ३१ तथा सामवेद.पू०.१ । ३ । ५। तथा निरु०१२ । १५ में व्याख्यात है । अप त्ये. तायवौ यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः । सूरीय विश्वचक्षसे ॥ १७ ॥ अप । त्ये । तायवः । यथा। नक्षत्रा। यन्ति । अक्तु-भिः सूरीय । विव-चक्षसे ॥१७॥ भाषार्थ-(विश्वचक्षसे ) सब के दिखाने वाले (सूराय ) सूर्य के लिये ( अक्तुभिः ) रात्रियों के साथ (-नक्षत्रा) चलने वाले तारागण (अप यन्ति ) भाग जाते हैं, ( यथा ) जैसे (त्ये) वे (तायवः ) चोर [भाग जाते हैं ] ॥१७॥ भावार्थ-सूर्य के प्रकाश से रात्रि का अन्धकार मिट जाता है, मन्द चमकने वाले नक्षत्र छिप जाते हैं और चोर लोग भाग जाते हैं, वैसे ही वेद- विज्ञान फैलने से अधर्म का नाश और धर्म की वृद्धि होती है ॥ १७ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-२ । ५० । २, और सामवेद में पू० ६ । १४ । ७ ॥' अदृशन्नस्य के तवी वि रश्मयो जना अन । भ्राजन्तो अगयो यथा ॥ १८ ॥ अटूथन् । अस्य के तवः । वि । रश्मयः । जनान् । अनु' । १७-(अप) दूरीभावे (त्ये.) ते ( तायवः) ताय सन्तानपालनयोः यद्वा तमु उपक्षये-उण सस्य यः । चोराः । स्तेनाः-निध० ३ । २४ (यथा.) • (नक्षत्रा) अमिनक्षियजि० । उ०३ । १०५। णत गतौ-अनन् । नक्षत्राणि नक्षतेर्गतिकर्मणः-निरु०३ । २० । गतिशीलास्तारकाः (यन्ति ) गच्छन्ति (भक्तुभिः ) प. किश्च । उ०१ । ७१ । अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-तुन्, कित्, नलोपः । रात्रिभिः सह-निरु० १२ । २३ (सूराय ) सूर्याय (विश्वचक्षसे) विश्वस्य चनो दर्शनं यस्मात् तस्मै । सर्वदर्शकाय ॥ . - ।
सू०.२ [४८०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८५८) भ्राजन्तः । अनयः । यथा ॥ १८ ॥ भाषार्थ-(अस्य ) इस. [ सूर्य ] की (केतवः) जताने वाली (रश्मयः) किरणे (जनान् अनु) प्राणियो में (वि) विविध प्रकार से (अदृश्रन् ) देखी गयी हैं । ( यथा ) जैसे (भ्राजन्तः) दहकते हुये (अग्नयः ) अंगारे ॥ १८ ॥ 'भावार्थ-जैसे सूर्य की किरणें धूप , विजुली और अग्नि के रूप से संसार में फैलती हैं, वैसे ही सव मनुष्य शुभ गुण कर्म और स्वभाव से प्रकाश- मान होकर आत्मा और समाज की उन्नति करें॥ १८ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१ । ५०।३। यजु०८।१०। और साम० पू०६।१४।८॥ तरणिर्वि श्वदर्शता ज्योतिष्कृदसि सूर्य । विश्वमा भौसि रोचन ॥ १८ ॥ तरणिः । विश्व-दर्शतः । ज्योति:-कृत् । असि । सूर्य विश्वम् । प्रा । भासि । रोचन ॥ १८ ॥ भाषार्थ-(सूर्य ) हे सूर्य ! तू ( तरणिः) अन्धकार से पार करने वाला (विश्वदर्शतः ) सव का दिखाने वाला और (ज्योतिष्कृत् ) [चन्द्र श्रादि में ] प्रकाश करने वाला (अलि ) है। (रोचन ) हे चमकने वाले तू ( विश्वम् ) सब को (श्रा) भले प्रकार ( भासि ) चमकाता है ॥ १६ ॥ भावार्थ-जैसे यह सूर्य अग्नि, विजुली, चन्द्रमा, नक्षत्र प्रादि पर अपना प्रकाश डालकर उन्हें चमकीला बनाता है, वैसे ही परमात्मा अपने . . ॥ १८-(अधिन् ) दृष्टा अभूवन् (अस्य ) सूर्यस्य (केतवः ) शापकाः (वि) विविधम् ( रश्मयः) किरणाः (जनान् अनु) जातान् प्राणिनः प्रति (भ्राजन्तः) प्रकाशमानाः (अग्नयः) पावकाः (यथा)॥ १६-( तरणिः ) अन्धकारात् तारकः ( विश्वदर्शतः),सर्वस्य दर्श. यिता (ज्योतिकृत् ) चन्द्रादिलोकेषु प्रकाशस्य कर्ता (असि) (सूर्य) ( विश्वम् ) लवं दृश्यमानम् (आ) समन्तात् ( भासि ) प्रकाशयसि (रोचन ) हे प्रकाशमान ॥
. . (२,६०) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४०] सामर्थ्य से सब सूर्य आदि को रचता है और वैसे ही विद्वान् लोग विद्या के प्रकाश से-संसार को प्रानन्द देते हैं ॥ १६ ॥ इस मन्त्र पर ऋग्वेद में सायणाचार्य का लेख इस प्रकार है-"रात्रि में जलमय चन्द्र आदि वियों पर सूर्य की किरणे लौटकर अन्धकार को हटाती है, जैसे द्वार पर रक्ख दर्पण पर गिरायी गयीं सूर्य की किरणें घर के भीतर के अन्धकार को हटाती हैं। यह मन्त्रं कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१ । ५०४, यजुर्वेद ३३ ३ ३६, और सामवेद पू०६ । १४ १६॥ मृत्यङ् दुवानां विशः मृत्यङ्देषि मानुषीः । प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दू शे ॥ २० ॥ (0 मृत्यङ् । देवानाम् विशः। प्रत्यङ् । उत्। ए.पि । मानुषीः ॥ मृत्यङ् । विश्वम् । स्वः। दृशे ॥ २० ॥ (८) भाषार्थ [हे सूर्य ! ] (देवानाम् ) गतिशील [चन्द्र श्रादि लोकों ] की (विशः ) प्रजाओं को (प्रत्यङ् ). सन्मुख होकर, (मानुपीः ) मानुपी मेनुष्य संबन्धी [पार्थिव प्रजाओं] को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर. और (विश्वम) सब जगत् को (प्रत्यङ ) सन्मुख होकर ( स्वः) सुख से (दृशे ) देखने के लिये ( उत् ) ऊंचा होकर ( एषि ) तू प्राप्त होता है ॥ २० ॥ भावार्थ-सूर्य गोल श्राकार बहुत बड़ा पिण्ड है, इसलिये वह सब लोकों को सन्मुख दीखता है, और सब लोकं. उसके श्रांकर्षण प्रकाशन आदि से सुखं पाते हैं, ऐसे ही परमात्मा के सर्व व्यापी. और सर्वशक्तिमान होने से उसके नियम पर चलकर सब सुखी रहते हैं ॥ २० ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१ । ५०, ५, और सामवेद -पू० ६।१४।१०॥. येनी पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जना अनु' । २०-(प्रत्यङ) अभिमुखः सन् (देवानाम् ). गतिशीलानां चन्द्रादि- लोकानाम् ( विशः ) प्रजाः (प्रत्यङ्) ( उत्) ऊर्ध्वः सन् (पषि) प्राप्नोषि ( मानुषीः ) मनुष्यसम्बन्धिनीः पार्थिवप्रजाः (प्रत्यङ्) (विश्वम् ) सर्व (स्था) सुखेन (शे) द्रष्टुम् ।।
. येन । पावक । . . , ॥ सू० २ [ ४८० ] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६६१) त्वं वरुण पश्यसि ॥ २१ ॥ चक्षमा भुरगयन्तम् । जनान् । अनु॥ त्वम् । वरुण । पश्यसि ॥ २१ ॥ वि द्यामषि रजस्पृथ्वहुर्मिमानी अक्तुभिः । पश्यन् जन्मानि सूर्य ॥ २२ ॥ वि । द्याम् । एषि । रजः। पृथु । प्रह। मिमानः अक्तुभिः । पश्यन् । जन्मानि । सूर्य ॥ २२ ॥ भाषार्थ--(पावक ) हे पवित्र करने वाले ! ( वरुण ) हे उत्तम गुण वाले ![ सूर्य, रविमण्डल ] ( येन ) जिस ( चक्षसा ) प्रकाश से (भुरण्यन्तम् ) धारण और पोषण करते हुये [ पराक्रम] को (जनान् अनु ) उत्पन्न प्राणियों में ( त्वम् ) तू ( पश्यसि ) दिखाता है ॥ २१ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।५० । ६, यजु० ३३ । ३२, और साम पू० ६।१४।११॥ भाषार्थ-[ उस प्रकाश से ] (सूर्य) हे सूर्य ! [ रविमण्डल ] (अहः) दिन को (अक्तुभिः ) रात्रियों के साथ (मिमानः ) बनाता हुआ और (जन्मानि ) उत्पन्न वस्तुओं को (पश्यन् ) दिखाता हुआ तू द्याम् ) आकाश में (पृथु ) फैले हुये ( रजः) लोक को (वि) विविध प्रकार :( एषि), प्राप्त होता है ॥ २२॥ भावार्थ-जैसे सूर्य अपने प्रकाश से वृष्टि आदि द्वारा अपने धेरै के २१-( येन )- (पावक ) शोधक (चक्षसा) प्रकाशेन (भुरण्यन्तम् ) भुरण धारणपोषणयोः-शत,। धरन्तं पोषयन्तं च (जनान् अनुः) उत्पन्नान प्राणिनः प्रति ( त्वम् ) (वरुण) उत्तमगुणविशिष्ट ( पश्यसि ) दर्शयलि ॥ २२-(वि) विविधम् (धाम् ) कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे । पा० २।३। ५। इति द्वितीया । श्राकाशे (एषि ) प्राप्नोषि ( रजः) लोकम् (पृथु ) विस्तृ- तम् (ग्रहः ) दिनम् (मिमानः ) रचयन् सन् (अक्तभिः) रात्रिभिः ( पश्यन् ) दर्शयन् ( जन्मानि ) उत्पन्नानि वस्तूनि (सूर्य) लोकप्रेरक रविमण्डल ॥ ३.
. । (२,८६२) अथर्ववेदभाष्ये सू० २ [४०] सब प्राणियों और लोकों को धारण पोषण करता है, वैसेही मनुष्य सर्वोपरि विराजमान परमात्मा के ज्ञान से परस्पर सहायक होकर सुखी होवें ॥ २२,२२॥ मन्त्र २२ कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१।५०१७ मौर साम० पू० ६।१४ । १२॥ सुप्त त्वा हुरितों रथे वहन्ति देव सूर्य । शोचिष्कर्श विचक्षुपम् ॥ २३ ॥ सुप्त । त्वा । हुरितः । रथे । वहन्ति । देव । सूर्य ॥ शोचिः-कैशम् । वि-चक्षणम् ॥ २३ ॥ भाषार्थ-(देव) हे चलने वाले (सूर्य) सूर्य ! [रविमण्डल ] (सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीतं आदि-म०४] (हरितः) आकर्षक किरणें (शोचि- केशम् ) पवित्र प्रकाश वाले (विचक्षणम् ) विविध प्रकार दिखाने वाले (त्वाम् ) तुझ को (रथे) रथ [गमन विधान ] में (वहन्ति ) ले चलती हैं ॥ २३ ॥ भावार्थ-यह प्रकाशमान सूर्यलोक शुक्ल, नील, पीत श्रादि सात किरणों द्वारा अपनी धुरी पर अपने घेरे में घूमता है । इस नियम का बनाने पाला वह परमेश्वर है ॥ २३ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।५०८ , और साम० पू० ६ । १४ । १४ ॥ प्रयुक्त सुप्त शुन्ध्युवः सूरी रथस्य नप्त्यः । *ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः ॥ २४ ॥ प्रयुक्त । सुप्त । शुन्ध्युवः । सूरः । रय॑स्य । नुप्त्यः तोभिः । याति । स्वयुक्ति-भिः ॥ २४ ॥ भाषार्थ-(सूरः) सूर्य [ लोकप्रेरक रविमण्डल ] ने (रथस्य ) रथ २३-(सप्त ) नीलपीतादिसप्तवर्णाः-म० ४ (त्वा ) ( हरितः) पाक- र्षकाः किरणा: (रथे) म०६। गमनविधाने ( वहन्ति ) गमयन्ति (देव) हे गमनशील (सूर्य) रविमण्डल (शोचिकेशम् ) शोचिषः शुचयः केशाः प्रकाशा यंस्य तम् (विचक्षणम् ) विविधं दर्शकम् ।। २४-(प्रयुक्त ) योजितवान् (सप्त) सप्तसंख्याका:-म०४ (शुन्ध्युवः) .. ।
सू०२ [४८० - त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६६३ ) [अपने चलने के विधान ] की (नप्त्यः ) न गिराने वाली (सप्त) सात [शुङ्ग, नील, पीत आदि म०४ ] (शुन्ध्युवः) शुद्ध करने वाली किरणों को (अयुक्त) जोड़ा है। (ताभिः ) उन ( स्वयुक्तिभिः ) धन से संयोग वाली [किरणों के साथ ] ( याति) वह चलता है ॥ २४ ॥ भावार्थ-जो सूर्य अपनी परिधि के लोकों को अपने आकर्षण में रख- कर चलाता है और जिसकी किरणे रोगों को हटाकर प्रकाश और वृष्टि, आदि. .. से संसार को धनी बनाती हैं, उस सूर्य को जगदीश्वर परमात्मा ने बनाया है॥२४. मन्त्र ४ से इस मन्त्र तक सूर्य के गुणों का वर्णन करके परमेश्वर की महिमा का वर्णन किया है । अब फिर वही प्रकरण परमेश्वर विषयक चलता है। यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१ ॥ ५० ॥ ६, और सामवेद-पू०, ६। १४ । १३॥ • रोहितो दिवमारहत् तसा तपस्वी। स योनिमैति स जायते पुनः स देवानामधिपतिर्बभूव ॥ २५ ॥ रोहितः । दिवम् । आ । अरुहत् । तपसा ।' तुपस्वी ॥ संह। योनिस् । मा। ए ति । सः । ऊ इति । जायते । पुनः। सः। देवानाम् । अधि-पतिः । बभूव ॥ २५ भाषार्थ-(तपस्वी ) ऐश्वर्यवान् (रोहिता.)सब का उत्पन्न करने वाला [ परमेश्वर ] (तपसा ) अपने सामर्थ्य से (दिवम् ) प्रत्येक व्यवहार में . .- यजिमनिशुन्धि० । ३० ३ । २० । शुन्ध विशुद्धौ-युच् । शोधिका ( सूरः) प्रेरणे-न् । लोकप्रेरका.सूर्यः (रथस्य ) गमनविधानस्य (नप्त्या) हक् कृप्यादिभ्यः । वा० पा० ३ । ३ । १० । नञ् + पत्ल पतने-इक् । तनिपत्यो श्छन्दसि । पा०६॥ ४ । ६8 । इत्युपधालोपः, शलो,जस् । नप्ती अपातनशीला।। न पातयित्रीः (ताभिः) (याति) गच्छति (स्वयुक्तिभिः) स्वस्य धनस्य योजन- शक्तिभिः ॥ २५-(रोहितः ) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः- ( दिवम् ) प्रत्येकव्यवहारमें (आ) समन्तात् (अरुहत् ) प्रादुरभवत् (तपसा) स्वसामर्थ्येन (तपस्वी) । ..
सू०२ [४०] ॥ । (२,६६४) अथर्ववेद्भाष्ये (भा) सव ओर से (अरुहत् ) प्रकट हुना है । (सः) वह (योनिम्) प्रत्येक कारण कारण के कारण ]' को (श्रा एति ) प्राप्त होता है, (सः उ) वह ही (पुनः ). फिर (जायते) बाहिर दीखता है, (सः) वही (देवानाम् ) चलने वाले लोकों का ( अधिपतिः ) बड़ा स्वामी (बभूव ) हुआ है ॥ २५ ॥ भावार्थ-परमेश्वर अपने सामर्थ्य से कारणों का आदि कारण होकर और बाहिर से भी सव कार्यरूप जगत् का नियन्ता बनकर सव लोका का स्वामी है ॥२५॥ यो विश्वचर्षणिकृत विश्वतोमुखी यो विश्वतस्पाणित विश्वतस्पृथः । सं वाहुभ्यां भरति सं पतनै र्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥ २६ ॥ यः । विश्व-चर्षणिः । उत । विश्वतः-मुखः । यः । विश्वत:- पाणिः । उत । विश्वतः-पृथः ॥ सम् । बाहु-भ्योस् । भरति । सम् । पतः । द्यावापृथिवी इति । जनयन् । दे वः । एकः २६ : भाषार्थ-(यः.) जो [परमेश्वर] (विश्वचर्षणिः) सव का देखने वाला, ( उत) और (विश्वतोमुखः) सब ओर से मुख [मुख्यव्यवहार वा उपाय ] वाला, (यः) जो (विश्वतस्पाणिः) लब ओर से हाथ के व्यवहार घाला, (उत) और (विश्वतस्पृथः) सब ओर से पूर्तिवाला है। (एकः) वहनकेला (देवः) प्रकाशस्वरूप [परमात्मा ] (बाहुभ्याम् ) दोनों [धारण आकर्षण ऐश्वर्यवान् (योनिम् ) कारणम् (श्रा ) समन्तात् (पति) प्राप्नोति (सः) (उ) एव (जायते ) प्रादुर्भवति.(पुनः ) पश्चात् ( सः ) (देवानाम् ) गन्तॄणां लोका- नाम् (अधिपतिः ) सर्वस्वामी (बभूव ) ॥ : २६-(यः) परमेश्वरः (विश्वचर्षणिः) सर्वद्रष्टा-निघ० ३॥ ११ (उत) अपि (विश्वतोमुखः) सर्वतोमुखं प्रधानं व्यवहार उपायो वा यस्य सः (यः) (विश्वतस्पाणिः ) पण व्यवहारे-इण । सर्वतो हस्तसामर्थ्य यस्य सः ( उत) ( विश्वतस्पृथः) पातृतुदिवचि० । उ०२।७। पालनपूरणयोः-धक् , टाए। 'सर्वतः पृथा पूर्तिर्यस्य सः ( सम्) सम्यक् (बाहुभ्याम् ) धारणाक- -- सू०२ [ ४८० ]. प्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (६५) रूप] भुजाओं से ( पतत्रैः सम् ) गमनशोल परमाणुओं के साथ (द्यावा. पृथिवी ) सूर्य पृथिवी. को (जनयन् ) उत्पन्न करता हुश्रा ( सम् ) यधावत् (भरति ) पुष्ट करता है ॥ २६ ॥ भावार्थ-निराकार सर्वशक्तिमान् अकेले जगदीश्वर ने संब श्रागा पीछा देख, सब प्रकार के संयोग वियोग आदि उपायों से परमाणुओं में धारण श्राक पण सामर्थ्य देकर कुम्भकार के समान सब जगत् को रचा है, उसकी उपासना सब मनुष्य करें॥२६॥ यह मन्त्रं कुछ भेद से ऋग्वेद में है १० । १ । ३, और यजुर्वेद १७ ॥१६॥ एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पुश- चात् । द्विपाद्ध षट्पदो भूयो वि चक्रमे त एकपदस्तन्व? समासते ॥ २७ ॥ एक-पात् । द्वि-पदः । भूयः । वि। चक्रुमे । द्वि-पात् । त्रि- . पादम् । अभि । एति । पश्चात् ॥ द्वि-पौत् । हु । षट्-पदः। भूयः। वि । चक्रमे । ते । एक-पदः। तन्वम् । सम् । भासते २७ भाषार्थ-(एकपात् ) एक रस व्यापक परमेश्वर (द्विपदः) दो प्रकार की स्थितिवाले [जगम स्थावर जगत् ] से (भूयः) अधिक आगे (वि) फैलकर (चक्रमे) चला गया, (द्विपाद् ) दो [भूत भविष्यत् ] में गति वाला परमात्मा ( पश्चात् ) फिर (त्रिपादम् ) तीन [प्रकाशमान और मप्रकाश. मान और मध्य लोको ] में व्याप्ति वाले संसार में (अभि) सव ओर से (पति) पणरूपभुजाभ्याम् (भरति ) पुष्णाति ( सम् ) सह ( पतत्रैः) गमनशीलैः पर- माणुमिः (धावापृथिवी ) सूर्यभूमिलोकी (जनयन् ) उत्पादयन् (देवः) प्रकाश- स्वरूपः ( एकः) अद्वितीयः॥ २७-(एकपात् ) निरन्तरव्यापकः परमेश्वरः (द्विपदः ) द्विप्रकार- स्थितियुक्ताज् जङ्गमस्थावररूपसेंसारात् (भूयः) अधिकतरम् (वि) विस्तीर्य ( चक्रमे ) जंगाम (द्विपात् ) द्वयोभूतभविष्यतोः पादो गतिर्यस्य सः पर- मेश्वर (त्रिपादम् ) प्रकाशमानाप्रकाशमानान्तरिक्षलोकेषु व्याप्तिमन्त संसारम् (अभि ) सर्वतः ('एति ) प्राप्नोति ( पश्चात् ) पुनः(द्विपाद् ) जङ्गमस्थांवर.
- .- . - (.२,८६६ ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२. [-४८०] प्राप्त होता है, (द्विपात् ) दो [ जङ्गम और स्थावर जगत् ] में व्यापक ईश्वर .. (इ.).निश्चय करके (षट्पदः). छह [ पूर्व दीक्षण पश्चिम उत्तर ऊंची और. नीची दिशाओं ] में स्थिति वाले ब्रह्माण्ड से (भूयः ) अधिक प्रागे (विचक्रमे.) निकल गया, (ते) वे. [ योगी जन.] ( एकपदः ) एक रस व्यापक परमेश्वर की (तन्वम् ) उपकार क्रिया को ( सम् ) निरन्तर (पासते ) सेवते हैं ॥ २७॥ भावार्थ-वह अकेला सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान परमात्मा जङ्गम स्था. घर, भूत भविथत्, प्रकाशमान और अप्रकाशमान और दोनों के मध्यस्थ लोका: और पूर्व प्रादि दिशाओं की सीमा से बहुत बड़ा है। ऐसे परमात्मा की उपा- सना से महात्मा लोग अपने आत्मा की उन्नति करते हैं ॥ २७ ॥ इस मन्त्र का पूर्वाद्ध कुछ भेद से ऋग्वेद-१० । ११७ । ८ का पूर्वार्द्ध है, और पूरा मन्त्र ऋग्वेद का श्रीगें अ० १३ । ३.२५ में है। अतन्द्रो यास्यन् हुरितो यदास्थाद् द्वे रूपे कृणुते रोचमानः। के तुमानुद्यन्त्सहमानो रजौसि विश्वाः प्रादित्य प्रवतो वि भौसिं ॥ २८॥ अतन्द्रः । यास्यन् । हुरितः। यत् । श्रा-मस्यात् । द्वे इति । रूपे इति । कृणुते । रोचमानः ॥ के तु-मान् । । उत्-यन् । सहमानः। रजासि। विश्वा। आदित्य । म-वतः । वि । भासि २८ भाषार्थ-(यत् ) जब (अतन्द्रः) निरालसी वह [ परमेश्वर ] (या- स्यन् ) चलने की इच्छा करने वाला [होता है ], वह (हरितः ) आकर्षक दिशा- ओ में (बा-अस्थात् ) आकर ठहरता है, (रोचमानः ) प्रकाशमान वह जगति व्यापकः परमेश्वरः (इ) निश्चयेन. (षट्पदः ) ऊोधः पूर्वादि षड़: दितु गतिवतो ब्रह्माण्डात् (भूयः ) अधिकतरम् ( विचक्रमे.) (ते) योगिनः . पुरुषाः ( एकपदः ) निरन्तरव्यापकस्य परमेश्वरस्य (तन्वम् ) उपकारक्रियाम् . (सम्.) सम्यक् (आसते ) सेवन्ते॥ २८-(अतन्द्रः), निरललः परमेश्वरः (यास्यन् ).यातु गन्तुमिच्छन् (हरितः) आकर्षिकाः दिशाः ( यत् ) यदा (आस्थात् ) लडथै लुङ् आगत्य : तिष्ठति (हे रूपे ) जड़चेतनरूपे जगती (कृणुते ) सृजति (रोचमानः:) प्रका- - لسا - सू०२ [४८०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८६७) [जगदीश्वर ] (द्व) दो (रूपे) रूप [जड़ और चेतन जगत् ] को ( कृणुते) बनाता है। (श्रादित्य ) हे श्रखण्ड ! [परमेश्वर ] ( केतुमान् ) ज्ञानवान् (उद्यन्) चढ़ता हुआ, और (रजांसि ) लोकों को (सहमानः ) जीनता हुआ , तू (विश्वाः ) सर ( प्रवतः ) आगे बढ़ने की क्रियाओं को (वि भासि ) चमका देता है ॥२०॥ भावार्थ-बुद्धिमान लोग खोज करके परमात्मा को प्रत्येक दिशा में व्यापक और सव सृष्टि का कर्ता साक्षात् करते हैं। मनुष्य उस जगदीश्वर की उपासना करके अपनी उन्नति का प्रयत्न करें ॥२८॥ बरामहाँ सि सूर्य बादित्य महाँ. असि । महांस्ते महतो महिमा त्वमादित्य महाँ असि ॥ २६ ॥ बट् । महान् । भूमि । सूर्य । बट् । श्रादित्य । महान् । असि ॥ महान् । ते । महुतः । महिमा । त्वम् । श्रादित्यं । महान् । असि ॥२८॥ भाषार्थ-(सूर्य) हे चराचर प्रेरक [ परमेश्वर !] तू (बट ) सत्य सत्य (महान् ) महान् [बड़ा] (असि ) है, (आदित्य ) हे अविनाशी ! तू ( बट) ठीक ठीक (महान् ) महान् [ पूजनीय ] (असि ) है । (:महतः ते ) तुझ बड़े को ( महिमा) महिमा (महान् ) बड़ी है, (श्रादित्य ) हे प्रकाश ख- रूप ! (त्वम् ) तू (महान् ) बड़ा (असि ) है ॥ २६ ॥ । शमानः ( केतुमान् ) प्रज्ञावन् (उद्यन् ) ऊो गच्छन् (सहमानः ) पराजयन् (रजांसि ) लोकान् (विश्वाः ) लर्वाः (आदित्य ) हे अविनाशिन परमेश्वर (प्रवतः ) प्रकृष्टगतिक्रियाः (वि) विविधम् ( भासि ) भापयसि । दीपयसि ॥ २६--(ब) बट बट वेष्टनसामादिषु-क्विप् ! सत्यम्-निघ० ३ । १० (महान् ) विशालः। पूजनीयः ( असि) (सूर्य) सर्वप्रेरक परमेश्वर ( बेट) (मादित्य ) हे अविनाशिन् (महान् ) (असि ) (महान् ) (ते ) तव ( महतः) पूजनीयस्य (महिमा) महत्त्वम् (त्वम् ) (आदित्य ) हे श्रादीप्यमान परमेश्वर (महान् ) (असि) (२,८६८) 1 अथर्ववेदभाष्ये सू० २ [ ४८० ] भावार्थ-जिस परमात्मा के बड़े होने को संसार में बड़े से बड़े भी मानते हैं, हे मनुष्यो! उसकी उपासना करके प्रयत्न से अपने को बढ़ाओ ॥ २६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-- 18१ । ११, यजु० ३३ १३६, और साम० पू०३!.६४ तथा उ०६।१।६॥ रोचसे दिवि रोचसे अन्तरिक्षे पतङ्ग पृथिव्यां रोचसे रोचसे अप्स्वर न्तः । उभा, समुद्री रुच्या व्यापिय दे वो देवासि महिषः स्वर्जित् ॥ ३० ॥ (८) रोचसे । दिवि । रोचसे अन्तरिक्ष । 'पतङ्ग । पृथिव्याम् । रोसे । रोचसे। अप-म । अन्तः॥ उभा । समुद्री । रुच्यो । वि। आपिथ । देवः । देव । प्रसि । महिषः । स्व:-जित् ३० (८) भाषार्थ-(पतङ्ग) हे ऐश्वर्यवान् [जगदीश्वर ! ] तू (दिवि ) प्रका. शमान [ सूर्य आदि ] लोक में (रोचसे ) चमकता है, तू ( अन्तरिक्ष) मध्य लोक में (रोचसे) चमकता है,तू (पृथिव्याम् ) पृथिवी [ अप्रकाशमान ] लोकं में (रोचसे ) चमकता है, तू (अप्सु अन्तः) प्रजाओं [प्राणियों के भीतर '. (रोचसे ) चमकता है। (उभा) दोनों (समुद्रौ ) समुद्रों [ जड़ चेतन समूहों] में (रुच्या ) अपनी रुचि [प्रीति ] से (विं प्रापिथ ) तू व्यापा है, ( देव ) हे '. प्रकाश स्वरूप ! (देवः) तू व्यवहार जानने वाला, (महिषः) महान् और (स्वर्जित् ) सुख का जिताने वाला (अलि ) है ॥ ३० ॥ भावार्थ-जैसे परमात्मा अपने ऐश्वर्य से प्रत्येक लोक और पदार्थ में : प्रकाशमान होकर सब का धारण पोषण करता है, वैसे ही हे मनुष्यो ! तुम अपने विद्याबल से व्यवहार कुशल होकर सब को सुख पहुंचाओ ॥ ३० ॥ ३०-(रोचसे ) दीप्यसे (दिवि ) प्रकाशमाने सूर्यादिलोके (रोचसे) (अन्तरिक्षे) मध्यलोके (पतङ्ग) ० ६ । ३१ । ३। पत गतौ ऐश्वर्य च-अङ्गच् । हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् (पृथिव्याम् ) अप्रकाशमाने पृथिव्यादिलोके (रोचसे) ( रोचसे) (अप्सु ) प्रजासु । प्राणिषु (अन्तः) मध्ये ( उभा) द्वौ (.समुद्रौ ) जड़चेतनरूपसमूहौ (रुच्या ) प्रीत्या (व्यापिथ) व्याप्तवानसि (देवः ) व्यवहारकुशलः (देव ) हे. प्रकाशमान (असि.) (महिषः ) महान् ( स्वर्जित् ) स्वः सुख जयति जापयति यः स परमेश्वरः ॥ ."
NA . सू०२.[४०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,६६८ ) अर्वा पुरस्तात् प्रयतो व्यध्व भाशुर्विपश्चित् पुतयन् पतङ्ग विष्णुर्विचित्तः शवसाधितिष्ठन् प्र केतुनो सहते विश्व- मेजत् ॥ ३१॥ अर्वाङ् । पुरस्तात् । प्र-यतः। वि-मृध्वे । श्राशुः । विप:- चित् । पुतयन् । पतङ्गः ॥ विष्णु । वि-चित्तः। शवसा। मृधि-तिष्ठन् । प्र । के तुनो । मुहते । विश्वम् । एजेत् ॥३१॥ भाषार्थ-(परस्तात् ) दूर से लेकर (अर्वाङ्) समीप में वर्तमान, (व्यध्वे ) विविध मार्ग में (प्रयतः) फैला हुआ, (आशुः) शीघूगामी, (विप- श्चित् ) बुद्धिमान् , (पतयन् ) पराक्रम करता हुआ, (पतङ्गः) ऐश्वर्यवान् , (विष्णुः ) सर्वव्यापक (विचित्तः) विविध प्रकार अनुभव किया गया, (शवसा ) वल से (अधितिष्ठन् ) अधिष्ठाता होता हुमा [परमेश्वर] (केतुना) अपनी बुद्धिमत्ता से ( एजत्) चेष्टा करते हुये (विश्वम् ) सब [ जगत् ] को (प्र सहते ) जीत लेता है ॥ ३१ ॥ भावार्थ हे विद्वानो | उस सर्वत्र वर्तमान महाबलवान् परमात्मा की उपासना से व्यवहारकुशल होकर अपने मात्मा को बली और महान् बनायो॥ ३१॥ चित्रश्चिकित्वान् महिषः सुपर्ण भारीचयन् रोदसी अन्त- रिक्षम् । अहोरात्रे परि सूर्य वाने प्रास्य विश्वा तिरतो वीर्याणि ॥ ३२॥ चित्रः । चिकित्वान् । महिषः । सु-पूर्णः । श्रा-रोचयन् । ३१-(अर्वाड ) अवरे समीपे वर्तमानः ( परस्तात् ) दूरात्. (प्रयतः) यमुलक । विस्तृतः (व्यध्वे ) उपसंदध्वनः । पा०५। ४।७५ इत्यच् । विविध मार्गे (भाशुः) शीघूगामी (विपश्चित्) मेधावी (पतयन् ) पराक्रम कुर्वन ( पतङ्गः) ऐश्वर्यवान् (विष्णुः) सर्वव्यापकः (विचित्तः) विविध शातः (शवसा ) बलेन (अधितिष्ठन् ) अधिष्ठाता सन् (केतुना) प्रेशया (प्र सहते ) पराजयते (विश्वम् ) सर्व जगत् ( पजत्) चेष्टमानम् ॥ १० (२,८७०) अथर्ववेदभाष्यैः । सू०२ [४] रोदसी इति । अन्तरिक्षम् ॥ अहोरात्रे इति । परि । सूर्यम् । वाने इति । मं । अस्य । विश्वौ । तिरतः । वीर्याणि ॥३२॥ भाषार्थ-(चित्रः) अद्भुत; (चिकित्वान् ) समझ वाला, (महिपः ) महान् (सुपर्णः) बड़ा पालन करने वाला [ परमेश्वर ] (रोदसी). दोनों सूर्य और पृथिवी [प्रकाशमान प्रकाशमान लोको) और (अन्तरिक्षम् ) [उनके मध्य लोक को ('भारोचयन् ) चमका देता हुआ [ वर्तमान है ] । (सूर्यम् ) सूर्य लोक को (परि) सब ओर से ( वसाने ) ओढ़े हुये ( अहोरात्रे) दोनों दिन और रात्रि (अस्य ) इस [ परमात्मा ] के (विश्वा ) व्यापक (वीर्याणि) वीर कर्मों को (प्रतिरतः ) बढ़ाते हैं [ प्रसिद्ध करते हैं ] ॥ ३३॥ भावार्य-परमेश्वर चड़ा आश्चर्य स्वरूप सब सृष्टि का कर्ता है। उसी के नियम अनुसार सूर्य और पृथिवी के घुमाव से दिन रात्रि उत्पन्न होकर हमें पुरुषार्थ के योग्य बनाते हैं, हे विद्वानों! उसी परमेश्वर को पहिचान कर अपने को बढ़ाओ ॥ ३३॥ तिग्मा विभ्राजन् तन्वै १ शिनोऽरंगमास मवतो राणः। ज्योतिष्मान् प्रक्षी महिषो वयोधा विश्वा भास्यात् प्रदिशः कल्पमानः ॥ ३३ ॥ तिग्मः । वि-भ्राज़न् । तन्वस् । शिशानः । रम्-गमास': । प्रवतः । राणः ।। ज्योतिष्मान् । पक्षी । महिषः। वयः-धाः। विश्वाः । प्रा । स्यात् । प्र-दिशः । कल्पमानः ॥ ३३ ॥ भाषार्थ-(तिग्मः ) तीव्र स्वभाव, (विभाजन् ) बड़ा चमकता हुआ, ३२-(चित्रः) अद्भुतः (चिकित्वान्) कित शाने कि ज्ञाने वा-वसु। मानवान् (महिषः) महान् -( सुपर्णः) बहुपालनोपेतः (श्रारोचयन् ) प्रदीप- यन् (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (अन्तरिक्षम् ) (अहोरात्र) (परि) सर्वतः (सूर्यम्) लोकप्रेरक- रविमण्डलम् वसाने ) आच्छादयन्ती (प्रतिरतः) वर्धयतः प्रसिद्धानि कुरुतः (अस्य) परमेश्वरस्य (विश्वानि) व्यापकानि (वीर्याणि ) वीरकर्माणि- ३३-(तिग्मः) तीन (विभाजन् । विशेष प्रकाशमानः (तन्वम्) उप- १ सू०२ [४८० 140" त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ - (२,८७१). । । (तन्वम् ) उपकार शक्ति को ( शिंशानः ). सूक्ष्म करता हुआ, (रंगमासः) पूरी प्राप्तियोग्य (प्रवतः ) आगे बढ़ने की क्रियाओं को (रराणः) देता हुआ -(ज्योतिष्मान ) प्रकाशमय, (पक्षी) पक्ष [ सहारे ] वाला (महिपःः) महान् (वयोधाः) जीवन धारण करने वाला,( कल्पमानः) समर्थ होता हुआ [ जग- दीश्वर] (विश्वाः) सव (प्रदिशः ) बड़ी दिशाओं में (आ) आकर (अस्थात्.) ठहरा है ॥ ३३॥ भावार्थ-वह परमेश्वर तेजोमय सर्व कामनासाधक, भक्तपालक है, हे मनुष्यो । उसी के पन में रहकर अपना पक्ष बढ़ाओ ॥ ३३॥ । चित्रं देवानी के तुरनीक ज्योतिष्मान् प्रदिशः सूर्य उद्यन् । दिवाकुरेराऽति द्युम्नस्तमासि विश्वौतारीद् दुरितानि शुक्रः३४ चित्रम् । दे वानाम् । के तुः । अनीकम् । ज्योतिष्मान् । प्र- दिशः । सूर्यः । : उत्-यन् ॥ दिवाकरः... अति । द्युम्नैः ! तमासि। विश्वा । मृतारीत् । दुः-दुतानि । शुक्र: ॥ ३४ ॥ भाषार्थ-(चित्रम् ) अद्भुत (अनीकम् ) जीवनदाता [ ब्रह्म] ( देवानाम् ) गतिमान् लोको के ( केतुः ) जताने वाले, (ज्योतिष्मान ) तेजोमय (सूर्यः) सर्वप्रेरक [ परमात्मा ] ( प्रदिशः) सब दिशाओं में ( उद्यन् ) ऊचे. होते हुये, (दिवाकरः ) दिन को रचने वाले [ सूर्य रूप], (शुक्रः) वीर्यवान . - कृतिम् ( शिशानः) सूक्ष्मीकुर्वाणः' (अरंगमासः) अलम् + गम् गतौ-असुन्, छान्दसो दीर्घः । पर्याप्तमाप्तियोग्याः (प्रवतः.) प्रकृष्टगतीः (रराणः) प्रयच्छन् (ज्योतिष्मान् ) तेजोमयः (पक्षी) पक्षवान् । आश्रयवान् (महिषः) महान् ( वयोधाः ) जीवनधारकः ( विश्वाः ) सर्वाः (ओ) आगत्य (अस्थात् ) स्थित- घान् (प्रदिशः) (कल्ययन् ) समर्थः सन् ॥ ३४-- (चित्रम् ) अद्भुतम् ( देवानाम् ) गतिमतां लोकानाम् (केतुः) शापकः (अनीकम् ) अनिषिभ्यां किच्च । उ०४ । १७ ।अन प्राणने-ईकन् । अनयति जीवयति यत् तद् ब्रह्म (ज्योतिष्मान् ) तेजोमयः (प्रदिशः) (सूर्यः) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (उद्यन् ) उत्कर्षेण प्रामुवन् (दिवाकरः) दिवाविभा. - (२,८०२) जगतस्त- अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४८० [परमेश्वर ] ने (द्युम्नैः) अपने प्रकाशों से (तमांसि ) अन्धकारों को (अति) लांधकर (विश्वा) सव (दुरितानि ) कठिनाइयों को (अतारी ) पार किया है।॥ ३४॥ भावार्थ-जैसे यह सूर्य अन्धकार नाश करके दिन बनाकर प्रकाशमान है, वैलेही वह परमेश्वर सूर्य आदि लोकों को रचकर घारण आकर्षण द्वारा सब की रक्षा करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या से प्रकाशमान होकर विनों को हटाचे ॥३४॥ यह और अगला मन्त्र आगे हैं-अ० २० । १०७ १ १३, १४ ।। चित्र देवानामुदंगादीक चक्षु मि वस्स्य वरुणस्याग्नेः । मामाद् द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य अात्मा स्युषश्च ॥ ३५ ॥ चित्रम् । देवानोस् । उत् । अगात् । अनौकम् । चक्षु मित्रस्य । वरुणस्य । अग्नः ॥ प्रा । अमात् । द्यावापृयिवी इति । अन्तरिक्षम् । सूर्यः। अात्मा। जर्गतः। तस्युषः । चु३५ भाषार्थ-(देवानाम् ) गतिमान् लोकों का (वित्रम् ) अद्भुत (अनी. कम्) जीवनदाता, (मित्रस्य ) सूर्य [वा प्राण ] का. (वरुणस्य) चन्द्रमा अथवा जल वा अपान] का और (अग्नेः ) विजुली का (चक्षुः) दिखाने वाला [ब्रह्म (उत्) सर्वोपरि ( अगात् ) व्यापा है । (सूर्यः) सर्वप्रेरक, (जगतः) जङ्गम निशा० । पा० ३। २३२१ । दिवा+करोतेः-टप्रत्ययः । दिनकरः। सूर्यो यथा (अति ) अतीत्य (घुम्नैः) द्युतिभिः। दीप्तिभिः (तमांसि) अन्धकारान् (विश्वा) सर्वाणि (अंतारी ) अपारयत् (दुरितानि) कष्टानि (शुक्रः) शुक्र-अर्श प्राध। वीर्यवान् ॥ ३५-(चित्रम् ) अद्भुतस्वरूपम् (देवानाम् । गतिमतां लोकानाम् (उत्) सर्वोपरि (अगात् ) व्यापत् (अनीकम् ) म०३४ । जीवनप्रदम् चिज्ञः) दर्शकं ब्रह्म (मित्रस्य ) सूर्यस्य प्राणस्य (वरुणस्य ) चन्द्रस्य । जलस्य ! अपानस्य (अग्नेः ) विद्युतः (आ) समन्तात् (अप्रात् , प्रा पूरणे-लड़ .
4 मू०२ [४८०] . त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८७७) (च),ौर (तस्थुषः) स्थावर संसार के (भात्मा) आत्मा निरन्तर व्यापक परमात्मा] ने ( द्यावापृथिवी ) सूर्य भूमि [प्रकाशमान अप्रकाशमान लोको] और (अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष को (आ) सब प्रकार से (अमात्) पूर्ण किया है॥३५॥ भावार्थ-जो अद्भुत स्वरूप परमात्मा सूर्य, चन्द्र, वायु प्रादि द्वारा सय प्राणियों को सुख देता है, मनुष्य उसको उपासना द्वारा जानकर आत्मो- अति करें॥३५॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१ । ११५ । १५ यजुः०७ । ४२ तथा १३ । ४३ , और साम पू०६॥ १४॥ ३॥ उच्चा पतन्तमरुणं सुपर्ण मध्ये दिवस्तरणिं भ्राजमानम् । पश्याम त्या भवितारं यमाहुरजस्रं ज्योतिर्गदविन्ददत्तिः३६ उच्चा । पतंन्तम् । अरुणम् । सु-पूर्णम् । मध्य । दिवः । तरणिम् । भ्राजमानम् ॥ पश्याम । त्वा । सवितारम् । यम् । माहुः । अजस्रम् । ज्योतिः । यत् । अविन्दत् । भत्ति ॥३६॥ भोपार्य-(उच्चा ) ऊंचे पतन्तम् ) ऐश्वर्यवान् होने हुये, ('अरुणम् ) सर्वव्यापक, (सुपर्णम् ) बड़े पालने वाले, (दिवः) व्यवहार के (मध्ये ) मध्य (तरणिम् ) पार करने वाले (भ्राजमानम् ) प्रकाशमान, (सवितारम्) सर्व प्रेरक (स्वा) तुझ परमेश्वर] को (पश्याम) हम देखें, (यम् ) जिसको (अज. - पूरितवान (द्यावापृथिवी) प्रकाशमानाप्रकाशमानलोको (अन्तरिक्षम् ) (सूर्यः ) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (आत्मा) भतति सततं गच्छति व्याप्नोतीति । अन्तर्यामी परमात्मा (जंगतः ) जङ्गमस्यं (तस्थुपः) ष्ठा गतिनिवृत्तौ कसु। स्थावरस्य (च)॥ ३६-(उच्चा) उच्चैः ( पतन्तम् ) ऐश्वयं प्राप्नुवन्तम् (अरुणम्) अर्तेश्च । उ०३ । ६० । ऋगतौ-उनन , चित् । मर्वव्यापकम् (सुपर्णम्) शोभनं पर्ण पालन यस्मात् नम् ( मध्ये ) (दिवः) प्रत्येकव्यवहारस्य (तरणिम् ) तारकम् (भ्राज- मानम् ) दीप्यमानम् (पश्याम) अवलोकयाम (त्वा) (सवितारम् ) सर्वप्रेरकम् - .. ।. (२,८४) अथर्ववेदभाव्ये सू०-२॥ ४८० त्रम् । निरन्तर (ज्योतिः) ज्योति (आहुः) वे [विद्वान् लोग ] ताते हैं, यह) जिल [ज्योति को प्रतिः निरन्तर जानी [ योगी पुरुष ने (अविन्दर) पाया है। ३६ भावार्य-जिस सर्वोपरि विराजमान, सन्तिर्यानी परमेश्वर का धान करके योगी जन आनन्द पाते हैं. उसी को आराधना करके हम पुत्भार्य के साथ उन्नति करें।.३६॥ दिवस्पृष्ठे धावमानं सुपूर्णमदित्याः पुत्र नायाम उप यामि भीतः । स नः सूर्य प्रतिर दीर्घमायुर्मा रिषाम सुमतौ ते स्याम ॥ ३० ॥ दुिवः । पृष्ठे। धावमानम् ! सु-पर्णम् । अदित्याः । पुत्रम् । नाय-कामः । उप । यानि । भीतः ॥ सः। नः । सूर्य तिर । दीर्घम् । आयु': । मा । रिपान । मु-मृतौ । ते । स्याम .३७ ॥ भाषार्थ-नायकानः नाय [ ईश्वर को चाहने वाला, (मोतः) डरा हुआ मैं । दिवः) आकाश की (पृष्ठे) पीड पर ( धाबमानम् ) दौड़ते हुने, (परम्) बड़े पालने वाले, (अदित्याः अन्त्रण्ड वेदवाणी के पुत्रम् ). शोधने वाले परमेश्वर को ( उप ) श्रादर ले (यानि ) पहुंचता हूं। (सः) सोत, (र्य है सर्वप्रेरक जगदीश्वर] (नः} हमारे लिये (दीर्यम् ) مك - .. M (यम्) (आहुः कथयन्ति विद्वांसः (अजन्नम् }निरन्तरम् । ज्योतिः) तेज: (य) अविन्दन) अनुमत( अत्तिः) मा निरन्तरज्ञानी योगिजनः । ३७ (दिवः) प्रकाशस्य (पृच्छे) उपरिनागे । घावमानम् । शीनं गच्छन्तम् ( सुपर्णन ) सुपात्तकम् ( अदित्याः) अदितिवाङ नाम-निध० : १९१ अनुण्डिद्वारा वेवाण्याः (पुत्रम् ) पुत्रों द्वस्वश्च । ०४ १६५ ! पून, शोधने- शोधकम् (नायकानः ) ईश्वरं कानयमानः ( उप') आदरे (यामि प्राप्नोलि (भीतः) भयं प्राप्तः सः) स त्वम् (नः) (अस्मभ्यम् ) ( सूर्य हे 1 सू०२ [४०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८०५ दीर्घ (आयुः ) जीवन समय को (प्र तिर ) बढ़ादे, (मारिषाम ) हम दुखी न हो, (ते ) तेरी ( सुमतौ ) सुमति में ( स्याम ) हम रहे ॥ ३७ ।। भावार्थ-मनुष्यों को योग्य है कि आकाश को भी वश में रखने वाले, सर्वपालक, शुद्धवेदवाणी के देने वाले परमेश्वर की आशा में रहकर अपने जीवन को यशस्वी ननावे और विघ्नों को हटा कर सदा अानन्द से रहें ॥ ३७॥ सहस्रायं वियंतावस्य पक्षी हरेहुँ सस्य पततः स्वर्गम् । स दे वान्त्सर्वानुरस्युपुदद्य सं पश्यन् याति भुवनानि विश्वा ३८ महत्र-अह्नघम् । वि-यंतौ । अस्य । पुक्षौ । हरै। हं सस्य । पता: । स्व:-गम् ॥ सः । देवान् । सर्वांन् । उरसि । उप- दद्य । सम्-पश्यन् । याति । भुवनानि । विश्वा ॥ ३८ ॥ भाषार्थ-(स्वर्गम् ) मोक्ष सुख को ( पततः ) प्राप्त हुये (अस्य ) इस [सर्वत्र वर्तमान ] (हरेः) हरि [ दुःख हरने वाले ] (हंसस्य) हंस [शानी वा व्यापक परमेश्वर] के (पक्षी),दोनों पक्ष [ग्रहण करने योग्य कार्य और कारण रूप व्यवहार ] (सहस्रायम् ) सहस्रो दिनों वाले [अनन्त देश काल ] में (.वियतौ) फैले हुये हैं। (सः) वह [ परमेश्वर ] ( सर्वान ).सव (देवान् ) (दिव्य गुणों को [ अपने ] ( उरसि ) हृदय में ( उपदद्य ) लेकर (विश्वा) सव (भुवनानि ) लोकों को ( संपश्यन् ) निहारता हुआ (याति).चलता है ॥ ३॥ भावार्थ-जैसे परमेश्वर अन्तर्यामी रूप से अनन्त कार्य और कारण रूप जगत् की निरन्तर सुधि रखता है, वैसे ही मनुष्य परमेश्वर का विचार करता सर्वप्रेरक परमेश्वर (प्रतिर) प्रवर्धय (दीर्घम् ).(आयुः ) जीवनकालम् (मा रिपाम) मा रिप्यामहै । मा हिंस्यामहै ( सुमतौ) कल्याण्यां बुद्धौ (ते) तव (स्याम)॥ 1... ३८-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अथर्व, १० । ८ ! १८ । तत्रैव द्रष्टव्यः । (हंसस्य) वृतृवदिवचिवसिहनि० उ० ३। ६२ । हन हिंसागत्याः-स शाननो व्यापकस्य परमेश्वरस्य॥ - रहता - . . ।
+ .. (२,८७६ ) अथर्ववेदभाष्ये सू० २ [४] हुना सब कामो में सदा सावधान रहे ॥ ३८ ॥ यह मन्त्र पा चुका है-अथर्व० १० । । १८, और आगे फिर है-प्र० १३।३।१४॥ रोहितः कालो अभवद् रोहिताग्ने प्रजापतिः । रोहिता यज्ञानां मुखं रोहितः स्व१ रामरत् ॥ ३८ ॥ रोहितः । कालः । अभवत् । रोहितः । अग्ने । मुजा-पतिः ॥ रोहितः । यज्ञानाम् । मुखम् । रोहितः । स्वः । भा । अभ- रत् ॥३८॥ भाषार्य-(रोहितः) सब का उत्पन्न करने वाला [ परमेश्वर ] (अन) पहिले से [वर्तमान होकर ] .( कालः) काल वाला [ तीनों कालो का स्वामी ], और (रोहितः) सब का उत्पन्न करने वाला [परमात्मा] (प्रजापतिः ) प्रजात्रों [ उत्पन्न पदार्थो ] का पालने वाला (अभवत् ) हुआ। (रोहितः ) सर्वोत्पादक [ईश्वर ] ( यशानाम् ) संयोग वियोग व्यवहारों का (मुस्त्रम् ) मुस्त्रिया [प्रधान] . है, (रोहितः) सर्वजनक [ परमात्मा ] ने (स्वः) आनन्द को (आ) सब प्रकार (अभरत् ) धारण किया है ॥ ३॥ भावार्थ-सर्वोत्पादक अनादि अनन्त परमेश्वर परमाणुओं के संयोग वियोग से सृष्टि बना कर सब का कारण हुश्रा है, लव लोग उसी की भक्ति कर के पुरुषार्थ पूर्वक सुखी रहे ।। ३६ ।। रोहिता लोको अभवद् रोहितोऽत्यतपद् दिवम् । रोहितो रश्मिभिभूमि समुद्रमनु सं.चरत् ॥ ४० ॥ (१०) रोहितः । लोकः । अभवत् । रोहितः । प्रति। अतपत् । - ३६-(रोहितः) अं० १३ । १।१ । सर्वोत्पादक परमेश्वरः ( कालः) काल-अर्शश्राद्यच् । कालवान् । त्रिकालखामी ( अभवत् ) ( रोहितः) (भग्रे) सृष्ट्यादौ (प्रजापतिः) प्रजानी सृष्टपदार्थानां पालकः (रोहितः) (यज्ञानाम) संयोगवियोगव्यवहाराणाम् (मुखम् ) मुख्यः । प्रधानः (रोहितः.) (खः) सुखम् (आ) संमन्तात् (अभरत् ) धारितवान् ।
- - सू०२ [.४०] प्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ - ( २,८७७) दिवम् ॥ रोहितः । रश्मि-भि: । भूमिस् । समुद्रम् । अनु । सम् । चरत् ॥ ४० ॥(१०) भाषार्थ-(रोहितः ) सर्वजनक [ परमेश्वर ] (लोकः ) लोकों वाला [सब लोकों का स्वामी ] (अभवत् ) हुआ, (रोहितः ) सर्वोत्पादक [ईश्वर] - (दिवम् ) सूर्य को ( अति ) अत्यन्त करके ( अतपत् ) ताप वाला किया । (.रोहितः ) सर्वसधा [ईश्वर ] ने ( रश्मिभिः) [सूर्य की ] किरणों से (भूमिम्) भूमि और ( समुद्रम् ) अन्तरिक्ष [आकाशस्थ चन्द्र तारागण श्रादि लोक समूह ] को (अनु) अनुकूलता से (सं चरत् । संचार वाला किया ॥ ४० ॥. भावार्थ-परमेश्वर ने सब लोको का स्वामी होकर सूर्य द्वारा उनमें ताप पहुंचाकर उनमें घूमने और चलने की शक्ति दी है ॥ ४० ॥ सर्वा दिशः समचरद् रोहितोऽधिपतिर्दि वः । दिवं भूतं संवाः । दिशः । सस् । अचरत् । रोहितः। अधि-पतिः। दिवः ॥ दिवस् । समुद्रस् । प्रात् । भूमिम् । सर्वम् । भूतम् । वि । रक्षति ॥ ४१ ॥ . भाषार्थ-(दिवः ) प्रकाश के ( अधिपतिः) अधिपति [बड़े स्वामी], (रोहितः) सर्वजनक [ परमेश्वर ] ने (सर्वाः) सब (दिशः ) दिशाओं में (सम् अचरत् ) संचार किया है । (दिवम् ) सूर्य, ( समुद्रम् ) अन्तरिक्ष (आत्) विरक्षति ॥ ४१॥ समुद्रमाद् भूमि सर्व - । ४०-(रोहितः) सर्वोत्पादकः (लोकः) लोक-अर्श आधच् । लोक- वान् । सर्वलोकवामी (मभवत्) (रोहितः ) ( अति ) अत्यन्तम् (अतपत्) तापवन्तं कृतवान् (दिवम् ) सूर्यम् (रोहितः) (रश्मिभिः) सूर्यकिरणैः (भूमिम्) (समुद्रम् ) अन्तरिक्षम्-निघ० १।३ ( अनु) आनुकूल्येन (सम्). सम्यक् (चरत् ) अडभावः, अन्तर्गतण्यर्थः । अचरत् । अचारयत् । चालितवान् ॥ ४१-(सर्वाः) (दिशः) पूर्वादिदिशाः (समचरत्) विचरितवान् • ( रोहितः) सर्वजनकः परमेश्वरः (अधिपतिः ) अध्यक्षाः (दिवः) प्रकाशस्य (२,८७) ७. " अथर्ववेदभाष्ये मू०२ [४०] और (भूमिम्) भूमि और ( सर्वम्) सव (भूतम् ) सत्ता वाले [जगत्.] की (वि) विविध प्रकार ( रक्षति ) रक्षा करता है ॥ ४ ॥ भावार्थ-सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब में व्यापक होकर सय की रक्षा करता है, सब मनुष्य उस की उपासना करें ॥४१॥ भारोहन्छुक्रो बृहुतीरतन्द्रो दू) रूपे कगुते रोचमानः । चित्रश्चिकित्वान् महिषो वातमाया यावतो लोकानभि यद् विभाति ॥ ४२ ॥ श्रा-रोहन् । शुक्रः । बृहतीः। भन्द्रिः । द्वइति । रूपे इति । णुते। रोचमानः ॥ चित्रः । चिकित्वान् । महिषः । वांतम्- प्रायाः । यावतः । लोकान् । अभि । यत् । वि-भाति ॥ ४२ ॥ भाषार्थ-(शुक्रः) वीर्यवान्, (अतन्द्रः) निरालसी, (रोचमानः ) प्रकाशमान [ परमेश्वर ] (बृहतीः) बड़ी [दिशाओं में (पारोह ) ऊंचा होता हुआ (द्वे ) दो ( रूपे ) रूपों [जंगम और स्थावर जगत् ] को (कृणुते ) बनाता है, ( यत् ) जब (चित्रः) मद्भुत (चिकित्वान् ) समझने वाला, (महिषः.) महान् (वातमायाः) वायु में व्याप्ति वाला [ परमेश्वर ] [ उन] ( लोकान् अभि ) लोको पर [व्यापक है ] ( यावत् ) जिनको (विभाति ) वह धमकाता है ॥ ४२ ॥ भावार्थ-वह जगदीश्वर सब दिशाओं में सर्वश्रेष्ठ होकर, पवन प्रादि में'चेष्टा देता हुआ सब का अधिष्ठाता है, सब मनुष्य उसी की आशापर चलें ॥४२॥ (दिवम् ) सूर्यम् ( सद्रम्() अन्तरिक्षम् (आत् ) अपि (भूमिम् ) ( सर्वम् ) (भूतम् ) लत्तान्वितं जगत् (वि) विविधम् ( रक्षति ) पाति ॥ ४२.-(प्रारोहन ) अधितिष्ठन् (शुक्रः ) वीर्यवान् (वृहतीः) महतीदिशाः (अनन्द्रः) निरलसः (द्वे रूपे) जङ्गमस्थावररूपे जगती (कृणुते ) सृजति (रोचमानः । प्रकाशमानः (चित्रः) अद्भुतः (चिकित्वान् ) कित शाने-कसु । मानवान् (महिषः) महान (शतमायाः) वात+आ+अव गतौ-असुन्, सुगागमः । वायुव्यापकः (यावतः ) यत्संख्याकान् ( लोकान् ) (अभि) प्रति (यत्) यदा (विभाति) विभापयति । प्रकाशयति ॥
- सू०२ [४०] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,७८) अभ्य न्यदेति पर्य न्यदस्यतेऽहोरात्राभ्यो महिषःकरपैमानः सूर्य वयं रजसि क्षियन्त गातुविद हवामहे नाधमानाः ॥४३॥. अभि । अन्यत् । एति । परि । अन्यत् । अस्यते । महो- रामाभ्याम् । महिषः । कल्पमानः ॥ सूर्यम् । त्यस् । रजसि। क्षियन्तम् । गातु-विदम् । हुवामहे । नार्धमानाः ॥ ४३ ॥ भाषार्थ (अन्यत् । एक कोई [ उजाला ] (अभि ) सन्मुख (पति) चलता है, (अन्यत् ) दूसरा [ अन्धेरा] (परि ) सब ओर (अस्यते) फेंका जाता है, [ इस प्रकार ] ( महिषः) महान् [ सूर्य लोक ] (अहोरात्राम्याम् ) दिन और रात्रि [ बनाने के लिये ( कल्पमानः ) समर्थ होता हुआ [वर्तमान है ] । (रजसि ) सब लोक में (क्षियन्तम् ) रहते हुये, (गातुविदम् ) मार्ग जानने वाले ( सूर्यम् ) सर्व प्रेरक! परमेश्वर ] को ( नाधमानाः ) प्रार्थना करते हुये (वयम् ) हम लोग ( हवामहे ) घुलाते हैं ॥ ४३ ॥ भावार्थ-सूर्य के सर्वथा प्रकाशमान गोले के साथ घूमते हुये पृथिवी आदि लोक एक ही समय दो काम करते हैं-प्रकाश को आगे बढ़ाना और अन्धकार को पीछे की ओर बढ़ाना और आगे को हटाना, अर्थात् सूर्य न कभी अस्त और न कभी उदय होता है, पृथिवी के श्राधे गोले पर प्रत्येक समय प्रकाश और दूसरे श्राधे पर अन्धकार रहता है, ध्रुव के समीप भी सूर्य और पृथिवी के घूमाव से दिन और गति अधिक बड़े होते हैं। मनुष्य ऐसी अद्भुत रचना करने वाले परमेश्वर की उपासना सदा करें ॥ ४३ ॥ पृथियीनो महिषो नाधमानस्य गातुरदब्धचक्षुः परि विश्व ४३-(अभि) अभिमुखम् (अन्यत्) एकम् । प्रकाशद्रव्यम् (पति)- गच्छति (परि) सर्वतः (अन्यत्) द्वितीयम् । अन्धारद्रव्यम् ( अस्थते) तिप्यते (अहोरात्राभ्याम् ) अहोरात्रौतुम् ( महिपः ) महान् । सूर्यलोकः (कल्पमानः) समर्थः संन् वर्तन (सूर्यम् ) सर्वप्रेरकं परमात्मानम् (वयम् ) ( रजसि ) सर्व स्मिन् लोके ( नियन्तम् ) निवसन्तम् ( गातुविदम् ) मार्गशातारम् (हवामहे): भाहयामः । नाधमानाः) प्रार्थयमानाः ॥ . ।
सू०२. ४८ j. - -- । - ( २,८८०) . ववेदभाष्य बभूव । विश्व सं पश्यन्त्सुविदवो यजत्र इदं शृणोतु यदुई ब्रवीमि ॥ ४४ ॥ पृथिवी-प्रः । महिषः । नार्धमानस्य । गातुः । अदब्ध-चक्षुः। परि । विश्वस् । बभूव ॥ विश्वम् । सम् पश्यन् । सु-विदवा . यजत्रः । इदम् । शृणोतु । यत् । अहम् । ब्रवीमि ॥ ४४ ॥ भाषार्च-(पृथिवीनः ) पृथिवी का भरपूर करने वाला. ( महिपः } महान् , (नाधमानस्य ) प्रार्थना करते हुये पुरुष के (गातुः) मार्ग. (अध: चक्षः ) चे चूकदृष्टि वाले [ परमेश्वर] ने (विश्वम् । सब को (परिबभूव ) घेर लिया है । ( विश्वम् ) सब को (लंपश्यन् । निहारता हुना. (मुवित्रः) बड़ा लाभ पहुंचाने वाला (यजत्रः ) पूजनीय [ परमेश्वर] (इदम् ) इस [वचन] को (शणोतु ) सुने, (यत् ) जो (अहम् ) मैं ब्रवीमि कहता हूं ॥१४॥ भावार्य-सर्वान्तर्यामी, भक्तवत्सल मार्गदर्शक परमात्मा की आराधना ले मनुष्य तत्वदर्शी, परोपकारी होकर परस्पर सुरू बढ़ावें ॥ ४ ॥ पर्यस्य महिमा पृथिवी संमुद्रं ज्योतिषा विभ्राजन् पर द्यामुन्तरिक्षम् । स स पश्यन्त्सुविदनो यजब इदं शृणोतु यंदहं ब्रवीमि ॥ ४५ ॥ परि । अस्य । महिमा । पृथिवीम् । वि-भ्राजन् । परि । द्याम् । अन्तरिक्षस् ॥ सर्वम् । सम्- पश्यन् । सु-विदवा यजत्रा इदम् । शृणोतु । यत् । मुहम् । ब्रवीमि ॥ ४५ ॥ समुद्रम् ।. ज्योतिषा ४-(पृथिवीप्रः) भूमिपूरकः (महिपः) महान् (नाधमानस्य) प्रार्थः यमानस्य (गातुः) मार्गः (अधचक्षुः) अहिंसितष्टिः । सर्वदर्शी (विश्वम्) सर्वम् ( परिवभूव ) आच्छादितशन् (विश्वम ) (तस्पश्यन् )त्सर्वथावलोकयन् (सुविः) विदेः कइन् । उ०३६ १०८ विद्ल लाम-कनन् । महालाभ- प्रापकः (यजत्रः) अमिज्ञिरजि० ! ३०३।९०५६ यजतेः-अत्रन्। सर्व पूजनीया (इदम् ) (ोतु) आकर्षयतु (यत.) (अहम् ) ( नामि ) कथयामि सू०२ [ ४८० ] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ भाषार्थ-(अस्य ) इस [परमेश्वर ] की (महिमा) सि पृथि- वीम् ) पृथिवी और ( संमुद्रम्) [पृथिवी के] समुद्र से (परि आगे है,ज्य' (ज्योतिषा) ज्योति से (विभ्राजन् ) विविध प्रकार चमकती हुयी [वह महिमा (धाम् ) सूर्य और ( अन्तरिक्षम् ).अन्तरिक्ष से ( परि ) आगे है । ( सर्वम् ) सब को (संपश्यन् ) निहारता हुआ, (सुविदनः ) बड़ा लाभ पहुंचाने वाला, यजत्रः ) सर्व पूजनीय [ परमेश्वर ] (इदम् ) इस [वचन ] को. (शृणोतु ) सुने, ( यत्) जो (अहम् ) मैं ( ब्रवीमि ) कहता हूं ॥ ४५ ॥ भावार्थ-जिस परमात्मा की बड़ाई पृथिवी, समुद्र, सूर्य और अन्तरिक्ष आदि की सीमा से अधिक है, मनुष्य उसी जगदीश्वर के नियमों में चलकर आनन्दः पावें ॥४५॥ अबाध्यग्निः सुमिधा जनानां प्रति धे नुमिवायुतीमुषासम् । यहा इव भ त्यामुज्जिहानाःप्रभानवासिनते नाकमच ४६(११ अबोधि । अग्निः । सुस्-इधो। जनानाम् । मति । धे नुस्- ईव । भा-यतीम् । उषसम् ॥ यह्वाः इव । प्र। क्याम् । उत्-जिहाना। प्र । भानवः । सिनते । नाकम् । अच्छे ४६(११ भाषार्थ-(अग्निः ) अग्नि [जैसे] (जनानाम् ) प्राणियों में (समिधा) प्रज्वलित करने के साधन [ काष्ठ घृत अन्न आदि से (अबोधि ) जगाया गया है, [अथवा ] ( इव ) जैसे ( उषसं प्रति ) उषा समय [प्रातः सायं सन्धि ४५-(परि) भाधिक्ये (अस्य) परमेश्वरस्य (महिमा ) महत्त्वम् (पृथिवीम् ) ( समुद्रम् ) पार्थिवजलोधम् (ज्योतिषा) तेजसा (विभ्राजन् ) प्रकाशमानः (परि , (धाम् ) सूर्यलोकम् ( अन्तरिक्षम् ) (सर्वम् । अखिलम् । अन्यत् पूर्ववत्-म० ४४॥ ४६-(अबोधि) बुध्यतेस्म (अग्निः) शारीरिकाग्निः ( समिधाः) काष्ठा- घृतादिप्रदीपनसाधनेन ( जनानाम् ) प्राणिनां मध्ये (प्रति) (धेनुम् ) दीग्धों गाम् (व) यथा (आयतीम् ) आगच्छन्तीम् (उषसम् ) साहितिको दीर्घः। प्रातः सायं सन्धिवेलाम् (यहाः) शेवायहजिह्वा०। उ०१। १५४ । .
(२,८८२) अथर्ववेदभाष्ये सू०३ [ ४८१] . घेला ] में (प्रायतीम् ) श्राती हुयी (धेनुंम् ) दुधैल गौ को लोग प्राप्त होते हैं ]i[अथवा ] (इव ) जैसे ( उज्जिहानाः ) ऊंचे चलते हुये ( यहाः) बड़े पुरुष ( वयाम्.) उत्तम नीति को (प्र) अच्छे प्रकार [प्राप्त होते हैं ], [ वैसे ही] (भानवः) प्रकाशमान लोग ( नाकम् ) सुख स्वरूप [ परमात्मा को (अच्छे अच्छे प्रकारे (प्र लिस्रते ) प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४६॥ भावार्थ-जैसे प्राणियोको भोज्य अन्न श्रादिस यथाविधि उत्तेजितं अग्निं प्रिय होता है, जैसे गौ दूध के लिये प्रिय होती है और जैसे विचारशीलों को उचित नीति अर्थात् वेदवाणी प्रिय होती है, वैसे ही सब मनुष्य समर्थ होकर सुखखरूप परमात्मा को पाकर आनन्दित हो ॥५६॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-५।१ । १, यजुर्वेद में १५ । २४ और सामवेद में-पू०१।८।१ । और उ० - । ३ । १३ ॥ .इति द्वितीयोनुवाकः ॥ . . अथ तृतीयोऽनुवाकः ।। . . :: सूक्तम् ३ ॥ १-२६ ॥ रोहितादित्यो देवता ॥ १, १४, १८ चतुरवसानोऽष्टपदाऽऽकृतिः, २ व्यवसानाषट्पदा भुरिगप्टिः, ३ त्र्यवसाना पट्पदाऽष्टिः, ४ व्यवसाना षट्- पदा धृतिः, ५, ६ चतुरवलाना सप्तपदा प्रकृतिः, ७ चतुरवसनि। सप्तपदाऽति. धृतिः; , २२ ज्यवसानाषट्पदा विडित्यष्टिः; 8-१२ चतुरवसाना सप्तपदा भुरिगतिधृतिः, १३, २३ चतुरवसानोऽष्टपंदा विकृतिः, १५ चतुरवसाना नप्तपदा निचुदतिधृतिः, १६, १६ चतुरवसानाऽष्टपदा भुरिगाकृतिः, १७ प्रयवसाना सप्त. पदाकृतिः, २० व्यवसाना षट्पदाऽत्यष्टिः; २१ चतुरवसानाऽष्टपदा निदा- कृतिः; २४ व्यवसाना सप्तपदा विराट् कृतिः; २५ चतुरवसानाऽषटपदा विरोड् विकृतिः, २६ अनुष्टुप् ॥ यज देवपूजादिषु-वन्, जस्य हः । यह्वो महन्नाम-निघ०३।३। महान्तःपुरुषाः (प्र.) प्रकर्षण ( वयाम् ) वय गतौ-अच्, टाप् । गतिम् । नीतिम् (उज्जिहानाः) भो हाङ् गतौ-शानच् । ऊर्ध्व गच्छन्तः (प्र) (भानवः) प्रकाशमानाः प्रभवः पुरुषाः (सिस्रते) सं गतौ-लट, शपः श्लुः, श्रात्मनेपदं छान्दसम् । प्रामु वन्ति ( नाकम् ) सुखस्वरूप परमात्मानम् (अच्छ) आभिमुख्येन ॥ ... .
सू०३ [ ४८१] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८८३) अध्यात्मोपदेशः-परमात्मा और जीवात्मा का उपदेश । य हुमे द्यावापृथिवी जुजान यो द्रापि कृत्वा भुवनानि वस्तै । यस्मिन् चिन्ति मुदिशः षडुर्वीर्याः पतङ्गो मन विचाक- शीति तस्य दे वस्य । क्रुद्धस्यै तदागो य एवं विद्वांस ब्राह्मणं जिनाति । उद् वैपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुच्च पाशान् ॥ १॥ यः । इमे इति । द्यावापृथिवी इति । जजान । यः । द्रापिम् । कृत्वा । भुवनानि । वस्तै ॥ यस्मिन् । क्षियन्ति । मु-दिशः । षट् । उर्वीः । याः । पतङ्गः । अन् । वि-चाक- शीति ॥ तस्य । दे वस्यं ॥ क्रुद्धस्य । देवस्यं ।। क्रुद्धस्य । एतत् । मार्गः । यः । सुधम् । विद्वांसम् । ब्राह्मणम् । जिनाति ।। उत् । वे पय । रोहित । म। क्षिणीहि । ब्रह्म-ज्यस्य । प्रति । मुञ्चः । पाशान् ॥ १॥ भाषार्थ-( यः) जिस [ परमेश्वर ] ने ( इमे ) इन दोनों ( धावा- पृथिवी ) सूर्य और पृथिवी को (जजान ) उत्पन्न किया है, (यः) जो ( भुव. नानि ) सत्ता वाले [लोको ] को (द्रापिम् ) वस्त्र [ समान ] ( कृत्वा ) बना. कर (वस्ते ) ओढला है । ( यस्मिन् ) जिस [ परमेश्वर' ] में (षट् ) छह [पूर्वा दि चार और ऊपर नीचे वाली] ( उर्वीः ) चौड़ी (प्रदिशः ), दिशायें (क्षियन्ति ) रहती हैं, (याः अनु ) जिनकी ओर ( पतङ्गः ) ऐश्वर्यवान् परमे- १-( यः) परमेश्वरः ( इमे ) तश्यमाने ( द्यावापृथिवी) प्रकाशाप्रकाश- मानलोको ( जजान ) जनयामास ( यः) (द्रापिम् ) द्रा कुम्मायां गतौ-क्विप् + पा रक्षणे-कि द्रायाः कुन्सायागते रक्षकंवस्त्रादिकम् (कृत्वा) विधाय (भुवनानि) सत्तात्मकानि लोकजातानि ( वस्ते ) आच्छादयति ( यस्मिन् ) परमेश्वरे (क्षियन्ति ) निवसन्ति ( प्रदिशः ) प्रकृष्टा दिशः (षट् ) ऊध्वार्धः सहिताः पूर्वा दयः (उर्वीः ) ( विस्तूताः ), (याः) (पतङ्गः ) पत ऐश्वर्ये-अङ्गच्। ऐश्वर्यवान् यस्माद् वाता (२,८८४ ) अथर्ववेदभाष्ये : मू०३ [४८१] श्वर] (विचाकशीति ) चमकता चला जाता है । (तस्य ) उस (दस्य ) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर] के लिये ( एतत् ) यह (श्रागः ) अपराध है, [कि ] ( यः ) जो मनुष्य ( एवम् ) ऐसे (विद्वालम् ) विद्वान् (ब्राह्मणम् ) ब्राह्मण [ वेदज्ञाता] को (जिनाति ) सताता है। (रोहित) हे सर्वोत्पादक [ परमेश्वर.! ] [ उस शत्रु को] ( उद्वेषय ) कंपा दे, (प्रक्षिणीहि ) नाशकर दे, (ब्रह्मज्यस्य ) ब्रह्मचारी के सताने वाले के ( पाशान् ) फन्दों को (प्रति मुञ्च) यांधदे ॥१॥ भावार्थ-परमेश्वर सर्वोत्पादक, सर्वव्यापक, सर्वशासक है, वेद का उपदेश रोकने वाला पुरुष ईश्वर व्यवस्था से अविद्या के कारण कष्ट उठाता है। हे मनुष्यों ! तुम उप जगत् पिता को अपना उपास्य देव जानो ॥ १॥ . ऋतुथा पर्वन्ते यस्मात् समुद्रा अधि विक्षर- न्ति तस्य देवस्य । । ० ॥ २ ॥ यस्मात् । वाताः । ऋतु-या। पर्वन्ते। यस्मात् । समुद्राः । अधि । वि-क्षरन्ति । तस्य । ॥ २ ॥ भाषार्थ-( यस्मात् ) जिस [ परमेश्वर ] से (वाताः) पवन (ऋतथा) ऋतुओं के अनुसार ( पवन्ते ) शुद्ध करते हैं, (यस्मात् ) जिससे (समुद्राः) समुद्र (अधि) मर्यादा से (विक्षरन्ति ) बहते रहते हैं । (तस्य) उस (क्रुद्धस्य) (अनु ) प्रति (विचाकशीति ) अ०8181२० । काट दीप्तौ यलुकि रूपम् । विविधं भृशं प्रकाशते (तस्य ) चतुर्थ्यर्थ बहुलं छन्दसि । पा०२।३। ६२ । इति षष्ठी । तस्मै (देवस्य-) देवाय (क्रुद्धस्य ) कुद्धाय (एतत् ) वक्ष्यमाणंम् (भागः) इण आगोऽपराधे च । उ० ४ । २१२ । इण गतौ-अंजुन्, आगादेशः । अपराधः (यः) मनुष्यः ( एवम् ) तथाभूतम् (विद्वांसम् ) जानन्तम् (ब्राह्मणम् ) वेदशा- तारम् ( जिनाति ) ज्या वयोहानौ । हिनस्ति (उत् ) उत्कर्षेण (वेपय ) कम्पय (रोहित ) हे सर्वोत्पादक परमेश्वर (प्र) (क्षिणीहि ) नाशय (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मचारिणो हिंसकस्य (प्रतिमुश्च ) वधान (पाशान् ) वन्धान् ॥ २-(यस्मात् ) परमेश्वरात् ( वाताः ) पवनाः (ऋतुथा) ऋतूननुसृत्य (पवन्ते ) शोधयन्ति ( यस्मात् ) (समुद्राः ) जलौघाः (अधि) अधिकृत्य ।
. मू० ३. [ ४८१ ] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ म (२,८८५) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ परमेश्वर ] के लिये......[म० १] ॥ २ ॥ भावार्थ-मन्त्र १ के समान ॥२॥ यो मारयति माणयति यस्मात् प्राणन्ति भुवनानि विश्वा । तस्य । १० ॥३॥ यः । मारयति । प्राणयति । यस्मात् । माणन्ति । भुवनानि । विश्वो ॥ तस्य । ०॥३॥ भाषार्थ-(यः) जो [परमेश्वर.] ( मारयति ) मारता है, और (प्राणयति ) जिलाता है, (यस्मात् ) जिमसे (विश्वा) सब (भुवनानि ) सत्तो वाले (प्राणन्ति ) जीवते हैं । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य ) प्रकाशमान [परमेश्वर] के लिये......[म० १] ॥३॥ भावार्थ-जो परमेश्वर प्राणियों को कर्मानुसार दुख सुख देता है और सव लोकों की रक्षा करता है, हे मनुष्यो ! तुम उसको उपासना करो ॥३॥ यः प्राणेन द्यावापृथिवी तर्पयत्यपानेन समुद्रस्य जठरं यः पिपर्ति । तस्य ०।०।०॥४॥ यः । माणेन । द्यावापृथिवी इति । तर्पयति । अपानेन समुद्रस्य । जठरम् । यः । पिपर्ति ॥ तस्य॑ ॥ ० ॥ ४ ॥ आषार्थ-( यः ) जो ( प्राणेन) प्राण से ( द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि को (तर्पयति ) तृप्त करता है और ( यः )जो (अपानेन) अपान वायु से ( समुद्रस्य ) समुद्र के ( जठरम् ) पेट को (पिपर्ति) भरता है । ( तस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ परमेश्वर] के लिये...... [ म०१] ॥४॥ मर्यादामनुसृत्य (विक्षरन्ति ) विविधं वहन्ति ॥ ३-( यः) परमेश्वरः (मारयति ) नाशयति (प्राणयति) जीवयति ( यस्मात् ) (प्राणन्ति ) जीवन्ति (भुवनानि ) सत्तायुक्तानि सत्वानि (विश्वा.) सर्वाणि ॥ ४-(यः) परमेश्वरः (प्राणेन ) श्वासेन (द्यावापृथिवी ) सूर्यभूमिलोको (तर्पयति-) तोषयति (अपानेन) प्रश्वासेन (समुद्रस्य) (जठरम् ) उदरम् ('यः) (पिपर्ति) पूरयति ॥
अथर्ववेदभाध्ये सू०३ [४८१] भावार्थ-मन्त्र १ के समान ॥ ४ ॥ यस्मिन् विराट् परमेष्ठी मजापतिरनिर्वैश्वानरःसह पङ्क्तया श्रितः । यः परस्य माणं परमस्य तेज भावुदे । तस्य 01010॥५॥ यस्मिन् । विराट् । पुरमे -स्थी। प्रजा-पतिः । अग्निः । धै श्वानरः । सुह । पङ्क्तया । श्रुितः । यः। परस्य माणस् । परमस्य । तेजः । श्रा-दुदे ॥ तस्य । ० ॥ ५ ॥ भाषार्थ-(यस्मिन् ) जिस [परमेश्वर] में (विराट् ) विविध प्रकाश- मान ( परमेष्ठी) बड़ी स्थिति वाला [आकाश ], (प्रजापतिः ) प्रजापालक [सूर्य ] और ( वैश्वानरः ) सब नायकों [ रस ले चलने वाली नाड़ी श्रादिको ] का हितकारी (अग्निः) अग्नि [जाठर अग्नि ] (पङ क्या सह) अपनी पङ्क्ति [श्रेणि ] के सहित (श्रितः ) ठहरा है, ( यः) जिस [ परमेश्वर ] ने (परस्य) दूर पदार्थ के (प्राणम् ) प्राण को और (परमस्य) सब से ऊंचे पदार्थ के (तेजः) तेज को (आददे ) अपने में ग्रहण किया है । ( तस्य ) उस (क्रुद्धस्य.) क्रुद्ध . (देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर] के लिये......[म. १] ॥ ५ ॥ भावार्थ-मन्त्र १ के समान ॥ ५ ॥ यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च दिशो अधि श्रुिताश्चतस्त्र प्रापा यज्ञ- स्य त्रयोऽक्षरः ।यो अन्तरा रोदसी क्रुद्धश्चक्षुषैक्षत । ०।०।०॥६॥ यस्मिन् । षट् । उर्वीः । पञ्च । दिर्शः। अधि । श्रिताः । तस्य ५-(यस्मिन् ) परमेश्वरे (विराट् ) विविधं राजमानः (परमेष्ठी) परम- स्थितिमान् । श्राकोशः (प्रजापतिः) प्रजापालका सूर्यः (अग्निः) जाठराग्निः (वैश्वानरः) सर्वेषां नराणां नायकानां रसवाहकनाड्यादिकानां हितः, (सह) (पङ्क्तया).श्रेण्या (श्रितः ) स्थितः (.यः) परमेश्वरः ( परस्य ) दूरस्थ- पदार्थस्य (प्राणम् ) जीवनम् (. परमस्य ) उच्चतमपदार्थस्य (तेजः) प्रकाशम् (प्राददे) स्वस्मिन् गृहीतवान् ॥
सू०३ [४८१] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८८७) चतस्रः । प्रापः । यज्ञस्य । त्रयः । भृक्षः ॥ यः । अन्तरा। रोदसी इति । क्रुद्धः । चक्षुषा । ऐक्षत ॥ तस्य । ० ॥ ६ ॥ भाषार्थ-(यस्मिन् ) जिस [ परमेश्वर ] में (षट्) छह [पूर्वादिचार और नीचे ऊपर वाली] ( उर्वीः) चौड़ी (दिशः ) दिशायें ( पञ्च) पांच [पृथिवी, जल, तेज, वायु आकाश पांच तत्त्वो] के सहित, (चतस्रः) चार प्रकार की [ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्ररूप] (श्रापः) प्रजाये और ( यज्ञस्य) [संयोग वियोग वाले संसार] के (वयः) तीनों. [ सत्त्व, रज, तम ] (अक्षराः) व्यापक गुण (अधि) यथावत् (विताः ) ठहरे हैं । (यः) जिस ने (क्रुद्धः) कुद्ध होकर (रोदसी अन्तरा) दोनों सूर्य और भूमि [प्रकाशमान और अप्र- काशमान लोको ] के बीच (चक्षुषा) अपने नेत्र से (ऐक्षत ) देखा है [वश में किया है ] । (तस्य ) उस (क्रुखस्य ) ऋद्ध ( देवस्य ) प्रकाशमान[ ईश्वर के लिये....."[म०१)॥६॥ भावार्थ-मन्त्र १ के समान ॥ ६ ॥ इस मन्त्र के गणिताकों में छह. से लेकर दो तक एक एक घटता गया है। यो अन्नादो अन्नपतिर्बभूव ब्रह्मणस्पतिकृत यः। भूतो भवि- व्यद् भुवनस्य यस्पतिः । तस्य ० १ ० । ॥७॥ यः । अन्न-अदः । अन्न-पतिः । बभूव । ब्रह्मणः । पतिः । उत। यः ॥ भूतः । भविष्यत् ।भुवनस्य । यः । पतिः। तस्य . ॥ । ०॥७॥ ६-(यस्मिन् .) परमेश्वरे (षट् ) ऊर्धाधोभ्यां सह पूर्वादयः (उर्वीः) विस्तृताः (पञ्च ) विभकिलोपः । पञ्चभिः पृथिव्यादिभूतैः (.दिशः) दिशाः (अधि) यथावत् ( श्रिताः ) स्थिताः ( चतसः ) (मापः) ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य- शूद्ररूपाः प्रजोः ( यशस्य) संयोगवियोगवतः संसारस्य (त्रयः) (अक्षरा) अशेः सरः । उ०३१ ७० । अशु व्याप्तौ-लर । सत्त्वरजस्तमोरूपा व्यापका गुणा: (अन्तरा) मध्ये ( रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (क्रुद्धः),कुपितः सन् (चक्षुषा) प्रष्ट्या (ऐक्षत) अपश्यत् ॥
.(२,८) 1 - .. अथर्ववेदभाष्ये सू०३ [ ४८१] भाषा-(यः) जो [ परमेश्वर ] (अन्नादः) अन्न का खिलाने वाला, (अंन्नपतिः) अन्न का स्वामी, ( उत) और (यः) जो (ब्रह्मणः) वेद ज्ञान का ( पतिः ) रक्षक (वभूव) हुआ है, (यः ) जो (भुवनस्य ) संसार का (भूतः) अतीत काल में रहने वाला और (भविष्यत् ) श्रागे रहने वाला ( पतिः । स्वामी है । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवन्य ) प्रकाशमान [ईश्वर ] के लिये...... मन्त्र ₹1 भावार्य-मन्त्र के समान ॥ ७ ॥ अहो रावैर्विमितं शिदङ्गं त्रयोदर्श मासं यो निर्मिमौते तस्य 10/10॥८॥ महोरात्रैः । वि-मितम् । विशत्-नङ्गम् । जयः-दुशम् । मासम् । यः । निः-मिनौते । तस्य । ॥ ८ ॥ भाषार्थ-(यः ) जो परमेश्वर ] ( अहोराः) दिन और रातों के साथ (विमितम् ) नापे गये, ( त्रिंशङ्गम् ) तील अङ्गा वाले [अर्थात् ऋग्वेद प्रादि चारो बेद ब्राह्मए श्रादि चारों वर्ण+ ब्रह्मचर्य श्रादि चार आश्रम अणिमा श्रादि भाइ ऐश्वर्य' पृथिवी प्रादि पांच भूत उद्धालना. गिराना, सकोड़ना, फैलाना और चलना पांच कर्म जिसमें हैं और ( त्रयोदशम् ) तेरह पदार्थ वाले [अर्थात् कान, त्वचा, नेत्र. जीम, नातिको-पांत्र ज्ञानेन्द्रिय, गुदा, उपत्य वा मूत्रमार्ग, हाथ, पांव, बाणी-पञ्च कमेन्द्रियः मन बुद्धि और जीव ७-(यः) परमेश्वरः (अन्नादः) अन्नमादयति भक्षयतीति सः (अन्न- पतिः) (वभूब) (ब्रह्मणः ) वेदज्ञानस्य ( पंतिः). स्वामी (उत ) अपि (यः) (भूतः) अनीतकाले भवः ( भविष्यत् । अनागतकाले वर्तमानः (भुवनस्य) सत्तावतो लोकस्य (यः) (पतिः) ॥ --(अहोरात्रैः) रात्रिदिवसः (विमितम् ) परिमितम् (त्रिंशदङ्गम् ) त्रिंशदवानि यस्य तम् । ऋग्वेदादयश्चत्वारो वेदा ब्राह्मणादयश्चत्वारो वर्णा ब्रह्मचर्यादयश्चन्वार प्राधमा अणिमादयोऽष्टविभूतय उत्तेपणावक्षेपणाकुञ्चन- प्रसारणगमनानीति पञ्चकर्माणि-इति शिक्षानि (योदशम् ) बहुव्रीही संख्येये उजबहुगणात् । पा० ५१४१ ७३ । इति त्रयोदशन-उच्। त्रयोदशपदार्था यस्मिंस्तम् । श्रोत्रत्वचा जिहानालिकापञ्चज्ञानेन्दियागि, गुदोपस्थहत्त- , . - . सू०३ [ ४८१] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८८) के स्थान ] (मासम्) नापने योग्य [ संसार] को (निर्मिमीते ) बनाता है । ( वस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर] के लिये...... [मन्त्र १] ॥८॥ भावार्थ-जिस परमेश्वर ने खोजने योग्य संसार में मनुष्य के सुख के लिये वेद आदि और इन्द्रिय आदि पदार्थ रचे हैं, हे मनुष्यो। उसी को इष्टदेव जानकर पुरुषार्थी बनकर उन्नति करो ॥ - ॥ कृष्णं नियानं हरयःसुपर्णा भूपो साना दिव मुत् पतन्ति । तं भाववृत्रन्त्सदनादृतस्य । तस्य ० ० ० ० ० ॥ ८ ॥ कृष्णम् । नि-यानम् । हरयः । सु-पूर्णाः । अपः । वसौनाः । दिवम् । उत् । पतन्ति ॥ ते । मा। प्रववृत्रन् । सदनात् । ऋ तस्य ॥ तस्य । ॥६॥ भाषार्थ-( हरयः ) जल खींचने वाली (सुपर्णाः) अच्छे प्रकार उड़ने वाली किरण, (अपः ) जल को (वसानाः) श्रोढ़कर, (कृष्णम् ) खींचने वाले (नियानम् ) नित्य गमन स्थान अन्तरिक्ष में [ होकर ] (दिवम् ) प्रकाशमय सूर्य मण्डल को ( उत् पतन्ति ) चढ़ जाती हैं । (ते ) वे [किरण ] (ऋतस्य) जल के (सदनात् ) स्थान [सूर्य] से (ो अववृत्रन्) [ईश्वर नियम के अनुसार] लौट आती हैं । (तस्य ) उस (कुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ईश्वर] के लिये......[ मन्त्र १] ॥ ६ ॥ पादवाणीपञ्च कर्मेन्द्रियाणि मनोबुद्धिजीवाश्चेतित्रयोदशपदार्थाः (मासम् ) मसी परिणामे परिमाणे च । घञ् । मस्यते परिमीयते यः स मासस्तं संसारम् (निर्मिभीते ) रचयति ॥ 8-कृष्णमित्यादि व्याख्यातम्-०६ । २२ ।। अत्र शब्दार्थो दीयते (कृष्णम् ) आकर्षकम (नियानम् ) निस्यगमनस्थानमन्तरिक्ष प्रति (हरयः) रसं हरन्तः ( सुपर्णाः ) आदित्यरश्मयः-निरु० ७। २४ (अपः ) जलानि ('वेसानाः) आच्छादयन्तः ( दिवम् ) प्रकाशमयं सूर्यमण्डलम् (उत्) उद्गत्य (पतन्ति ) प्राप्नुवन्ति (ते ) किरणाः (आ श्रववृत्रन्) आवर्तन्ते । आगच्छन्ति ( सदनात् ) गृहात् । सूर्यमण्डलात् (ऋतस्य ) उदकस्य । . 3 + . (२,६८०) अथर्ववेदभाष्ये सू०३ [४८१j भावार्य-जिस ईश्वर ने सूर्य की किरणों को सूर्य तक जल बोचने, मेघ द्वारा बरसाने और सृष्टि के लिये उपकारी होने का सामर्थ्य दिया है, सा मनुष्य उसकी उपासना करें। इस मन्त्र का (कृष्ण......ऋतस्य) यह भाग पाचुका है-अ०६।२२ १ तथा ।। ११२२ और अग्० । । १६४ । ४७ ॥ यत् ते चन्द्रं कश्यप रोचुनावुद् यत् संहितं पुष्कलं चित्र- भानु । यस्मिन्सूर्या मार्पिता:सुप्त माकम् । तस्य३००॥१०॥(१२) यत् । ते । चन्द्रम् । कश्यपु । रोचन-वत् । यत् । सुम्- हितम् । पुष्कलम् । चित्र-भानु ॥ यस्मिन् । सूर्याः। प्रार्थिताः। सुप्त । साकस् ॥ तस्य । ० ॥ १० ॥ (१२) भाषार्थ-(कश्यप ) हे सर्वदर्शक ! [परमेश्वर ] (यत् ) जो (ते) तेरा (चन्द्रम् ) श्रानन्द कर्म (रोचनवत् ) बड़ी रुचि वाला है, और (यत्) जो (संहितम् ) एकत्र किया हुअा, (चित्रभानु) विचित्र प्रकाश बाला (पुष्क- लम् ) पोषण कर्म है । ( यस्मिन् ) जिस [ परमेश्वर के नियम ] में ( सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीत. रत, हरित, फपिश, चित्ररूप वाली ] (सूर्याः ) सूर्य की किरणे (साकम् ) साथ साथ (पार्पिताः ) जड़ी हैं। (तस्य) उस (अधस्य ) झुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ईश्वर ] के लिये......मन्त्र ]mol भावार्य-जो परमेश्वर सर्वदर्शक अानन्ददाता और पोषणप्रद है. सब लोग इसकी उपासना करें ॥ १०॥ - १०- यत् ) (ते) तव ( चन्द्रम् ) स्फायितञ्चिवञ्चि० 13०२॥१३॥ चदि प्रहादने दीप्तौ च-रक् । श्राहादकं कर्म (कश्यप) पश्यक (रोचन्यत्) रुचियुक्तम् (यत्) सिंहितम् ) एकीकृतम् (पुस्कलम् ) कलँश्च । उ०४५। पुष पुष्टौ-कलन् । पोषणकर्म, (चित्रभानु ) विचित्रदीप्ति ( यस्मिन् ) परमे- श्वरनियमे (सूर्याः) अ०६।४।१४ । प्रेरणे-क्यप , टाप् । सूर्या सूर्यस्य , पत्ती-निरु० १२ १७। सूर्यकिरणाः ( मर्पितमः) स्थापिताः (सप्त) राक्ष नीलादिसप्तपर्णः ( साकम् ) सह ।
सू०३ [४८१] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८८५) बृहदैनमन वस्ते पुरस्ताद् त्यंतरं प्रति गृह्णाति पश्चात् । ज्योतिर्वाने समप्रमादुम् । तस्य ० ।।०॥ ११ ॥ बृहत् । ए नस् । अन । वृस्ते । पुरस्तात् । रथस्-तरम् । प्रति । गृह्णाति । पुश्चात् ॥ ज्योतिः । वंसाने इति । सदम् । अम्र-मादम् ॥ तस्य । ० ॥ ११ ॥ भाषार्थ-( बृहत् ) बृहत् [बड़ा आकाश] (पुरस्तात् ) आगे से (एनम् ) इस [ परमेश्वर ] को (अनु) 'निरन्तर ( वस्ते ) 'भोढ़ता है, ( रथ. न्तरम् ) रथन्तर [ रमणीय पदार्थों द्वारा पार लगाने वाला जगत् ] ( पश्चात् ) पीछे से [ परमेश्वर को] (प्रति ) प्रत्यक्ष (गृह्णाति ) ग्रहण करता है। [दोनों, श्राकाश और जगत् ] (अप्रमादम् ) बिना चूक (ज्योतिः ) ज्योतिः- स्वरूप [ परमात्मा ] को (लदम् ) सदा (वसाने । ओढ़े हुये [ रहते हैं | (तस्य ) उस ( क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य) प्रकाशमान [ ईश्वर ] के लिये...... [म०१ ॥ ११ ॥ भावार्थ-वह परमात्मा इतना बड़ा है कि उसके भीतरयह सब आकाश और सब जगत् समा रहा है, उसकी उपासना तुम करो ॥ ११ ॥ इस मन्त्र का मिलान करो-०८।१० (२॥ ६ ॥ बृहदुन्यतः पुक्ष भासीद् रथंतरमन्यतः सबैले सुधीची । यद् रोहितमजनयन्त देवाः । तस्य । ०। ० ॥ १२ ॥ बृहत् । अन्यतः । पक्षः । आमीत् । रथम्-तुरंम् । अन्यतः सबले इति स-बले । सुधीची इति ॥ यत् । रोहितम् । प्रज- नयन्त । देवाः ॥ तस्य । ०॥ १२ ॥ ११-(बृहत् )महत्। आकाशम् (एनम् ) परमात्मानम् (अनु) निरन्तरम् (वस्ते) आच्छादयति (पुरस्तात् ) अग्रे (रथन्तरम् ) अ० ८ । १० (२) ६ । रथैर- मणीयपदार्थस्तरति येन तज् जगत् ( प्रति ) प्रत्यक्षम् (गृहणाति ) स्वीकरोति (पश्चात् ) (ज्योतिः) तेजः स्वरूपं ब्रह्म ( वसाने) माच्छादयमाने (सदम् ) सदा (अप्रमादम् ) प्रमादरहितम् । सावधानम् ॥ 1 , . । (.२८८२) अथर्ववेदभाष्ये सू०३ [४८१] भाषार्थ-(बृहत् ) बृहत् [बड़ा आकाश ] (अन्यतः) एक ओर से. (पक्षः) [उस परमेश्वर का ] ग्रहण सामर्थ्य (आसीत् ) था, और (रथन्त- रम् ) रथन्तर [ रमणीय पदार्थों द्वारा पार लगाने वाला जगत् ] (अन्यतः) दूसरी ओर से-[ दोनों ] ( सवले ) तुल्य बल वाले और ( सध्रीची ) साथ साथ गति वाले [थे ], ( यत् ) जब (रोहितम् ) सब के उत्पन्न करने वाले [पर- मेश्वर ] को (देवाः) [ उसके ] उत्तम गुणों ने (अजनयन्त ) प्रकट किया । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर ] के लिये...... [म०१] ॥ १२॥ भावार्थ-परस्पर मिले हुये और बहुत बड़े आकाश और जगत् परमा-) त्मा के सामर्थ्य से वर्तमान हैं, इस.बात को उसके गुणों से साक्षात् करके आत्मोन्नति करो ॥ १२ ॥ स वरुणः सायमनिर्भवति स मित्रो भवति प्रातसुद्यन् । स सविता भूत्वान्तरिक्षेण यति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम् । तस्य ।। । ० ॥ १३ ॥ सः। वरुणः । सायम् । अग्निः । भवति । सः । . मित्रः । भवति । मातः । उत्-यन् ॥ सः । सविता। भूत्वा । अन्त- रिक्षेण । याति । यः । इन्द्रः । भूत्वा । तपति । मध्यतः । दिवम् ।। तस्य । ०॥ १३ ॥ भाषार्थ-(सः) वह ( वरुणः ) श्रेष्ठ परमात्मा ( सायम् ).सायकाल.. में (अग्निः).अग्नि [अग्नि समान तेजस्वी ] ( भवति) होता है, (सः) वह [पर १२-(बृहत् ) आकाशम् (अन्यतः ) एकस्मात् प्रदेशात् ( पक्षः) ग्रहण- सामर्थ्यम् (आसीत् ) (रथन्तरम् ) म० ११ । रमणीय पदाथैस्तारकं जगत् (अन्यतः ) ( सबले ) समानबलयुक्त (सधीची) संगच्छमाने ( यत् ) यदा (रोहितम् ) सर्वोत्पादक परमेश्वरम्, (अजनयन्त ) प्रादुष्कृतवन्तः ( देवाः) श्रेष्ठगुणाः ॥ १३-(सः) (वरुणः ) श्रेष्ठः परमेश्वरः ( सायम्.) सूर्यास्ते (अग्निः) अग्नितुल्यः ( भवति ).(सः) परमेश्वरः (मित्रः) स्नेहवान सूर्यो यथा (भवति) A सू०३ [ ४८१] चयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (२,८८३) मेश्वर ] ( प्रोतः) प्रातःकाल ( उद्यन् ) उदय होते हुये ( मित्रः) स्नेहवान् सूर्य के समान ] (भवति) होता है । (स.) वह [ परमेश्वर ] ( सविता) प्ररणा करने वाला सूर्य के समान (भू-वा) होकर (अन्तरिक्षण ) अन्तरिक्ष के साथ ( याति ) चलता है, ( सः ) वह ( इन्द्रः ) परम ऐश्वर्यवान् ( भूत्वा ) होकर (मध्यतः) बीच से ( दिवम् ) सूर्य लोक को (तपति) तपाता है । (तस्य) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य) प्रकाशमान [ईश्वर के लिये" [म. १] ॥१३॥ भावार्थ-जो परमेश्वर सायंकाल के अग्नि, और प्रातःकाल और मध्याह्न के सूर्य समान प्रतापी है, वही इन सब में अन्तर्यामी है । उसके गुणों को जान. कर आगे बढ़ो॥ १३ ॥ सहुस्सालयं वियतावस्य पक्षा हरहुँ सस्य पततः, स्वर्गम् । स. देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य सं पश्यन् याति भुवनानि विश्वा । तस्य ०।०।०॥ १४ ॥ सहस्र-अयम् । वि-यतौ । अस्य । पक्षा। हरैः । हुं सस्य ।। पततः । स्व:-गम् ॥ सः । देवान् । सान् । उरसि । उप- दद्यं । मुम्-पश्यन् । याति । भुवनानि । विश्वा । तस्या०॥१४॥ भाषार्थ-(स्वर्गम् ) मोक्ष सुख को (पततः ) प्राप्त होते हुये ('अस्य.) इस [सर्वत्र वर्तमान ] ( हरेः) हरि [ दुःख हरने वाले ] ( हंसस्य) हंस [ सर्वव्यापक परमेश्वर ] के ( पक्षौ ) दोनों पक्ष [ग्रहण करने योग्य कार्य और कारण रूप व्यवहार ] ( सहस्राहण्यम् ) सहस्रो दिनों वाले [अनन्त देशकाल] में (वियता) फैले हुये हैं । ( सः) वह [ परमेश्वर ) ( सर्वान् ) सर्व (देवान) दिव्यगुणों को [अपने] ( उरसि ) हृदय में (उपदय ) लेकर ( विश्वा.) सब (भुवनानि ) लोको. को (संपश्यन् ) निरन्तर देखता हुआ ( याति) चलती रहता है । (तस्य) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवस्य) प्रकाशमान [ ईश्वर के लिये ......[म०१]॥ १४॥ (प्रातः) प्रभाते (उद्यन्) उद्गच्छन् (सः) ( सविता) प्राणिनां प्रेरकः सूर्यो यथा (भूत्वा) (अन्तरिक्षण) आकाशेन सह (याति), गच्छति. (स.) (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् । जगदीश्वरः ( भूत्वा) (तपति) तापयति (मध्यतः) मध्यात् ( दिवम् ) सूर्यलोकम् ॥ १४-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अथर्व० १० ११८ | तत्रैव द्रष्टव्यः । १३ - (२,८४) अथर्ववेदभाष्ये सू०३ [४८१.] • भावार्थ जैसे परमेश्वर अन्तर्यामी रूप से अनन्त कार्य कारणं रूप जगत् की निरन्तर सुधि रखता है, वैसे ही मनुष्य परमेश्वर का विचार करता श्री संव कामों में सदा लावधान रहे ॥ १४ ॥ श्रावृत्ति छोड़कर यह.मन्त्र आ चुका है-अ० १० । । १६ तथा १३॥ २॥३८॥ अयं स दे वो अप्स्व न्तः सुहस्रमूलः, पुरुशाको अत्ति । य इदं विश्वं भुवनं 'जजानु । तस्य.. 1 0 ० ॥ १५ ॥ अयम् । सः । देवः । अप्-सु । अन्तः । सहस्र-मूलः । शाकः । अत्तिः ॥ यः । इदस् । विश्वम् । भुवनम् । जुजान ॥ तस्य । ॥ १५ ॥ भषार्थ-(अयम् ) यह (सः) वही (देवः) प्रकाशमान, (सहनमूलः) सहस्रों [अनगणित] कारणों में रहने वाला, (पुरुशाकः) बहुत शक्तियों वाला (अत्तिः) नित्यशानी [ परमेश्वर] (अप्सु ) प्रजाओं में (अन्तः ) भीतर है। (यः) जिस ने (इदम् ) इस (विश्वम् ) सब (भुवनम् ) सत्ता को (जजान ) उत्पन्न किया है । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य) प्रकाशमान (ईश्वर] के लिये......[मन्त्र १] ॥ १५ ॥ भावार्य-विद्वान् लोग सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वजनक परमात्मा को प्रत्येक कारणं में आदि कारण खोजकर उसकी भक्ति करें ॥ १५ ॥ शुक्र वहन्ति हरयो रघुष्यदो दे वं दिवि वर्चसा भ्राजमानम् । यस्योर्खा दिव तुन्ध स्तपन्त्य॒र्वाङ् सुवर्णैः परैर्वि भौति । तस्य० । ०।०॥ १६ ॥ १५-(अयम् ) प्रत्यतः (सः) (देवः) प्रकाशमानः (अप्सु)प्रजासु (अन्तः) मध्ये (सहस्रमूलः ) सहस्रष्वसंख्यातेपु मूलेषु कारणेषु विद्यमानः (पुरुशांक:) शक्ल शक्तौ-घञ्। बहुशक्तियुक्तः (अत्ति :) श्रे०१३ २॥४॥ नित्य- बानी परमेश्वरः (यः) परमेश्वरः (इवम् ) दृश्यमानम् (.विश्वम् ) सर्वम् (भुषनम् ) सत्ताम् (जजान ) उत्पादयामास ॥
सू०.३ [४८१] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १६॥ (२,८८५) शुक्रम् । वहुन्ति । हरयः । रघु-स्यदः । दे वस् । दिवि । वर्चसा । भ्राजमानम् ॥ यस्य । ऊर्ध्वाः । दिवम् । तुन्यः । तपन्ति । अर्वाङ् । सु-वणः। पटुरैः। वि । भात ॥ तस्या०१६ भाषार्थ (रघुष्यदः ) शीघ्रगामी ( हरयः ) अशान नाशक मनुष (शुक्रम् ) वीर्यवान्. ( देवम् ) ज्ञानवान्. (दिवि ) प्रत्येक व्यवहार में (वर्चसा) तेज से (भ्राजमानम् ) प्रकाशमान [परमेश्वर ] को (वहन्ति ) पाते हैं। ( यस्य) जिस [ परमेश्वर ] के (ऊर्ध्वाः ) ऊंचे (तन्वः) उपकार (दिवम् ) सूर्य को (तपन्ति ) ताते हैं, (अर्वाङ) समीपवर्ती वह (सुवर्णैः ) बड़े श्रेष्ठ (पटरैः ) प्रकाशों के साथ ( वि भाति ) चमकता जाता है । (तस्य ) उस' (कुलस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य ) प्रकाशमान [ईश्वर ] के लिये" [म० १ ० १६ भावार्थ-बुद्धिमान् मनुष्य निरालसी होकर परमेश्वर की उपासना से पराक्रमी और प्रतापी हो ॥ १६ ॥ येनादित्यान् हुरितः सं वहन्ति येनं युजन बुहधो यन्ति प्रजानन्तः । यदेकं ज्योतिर्वदुधा विभाति । तस्य०५०५० ॥१७॥ येन । श्रादित्यान् । हुरितः। सुस्-वहन्ति । येन। युजन । बहवः । यन्ति । म-जानन्तः ॥ यत् । एकम्। ज्योतिः। बहु-धा। वि-भाति । तस्य । ० ॥ १७ ॥ १६-(शुक्रम् ) अर्श आद्यच् । वीर्यवन्तम् (वहन्ति) प्राप्नुवन्ति (हरयः) हरयो मनुप्यनाम-निघ० २।३। अज्ञाननाशका मनुष्याः ( रघुष्यदः) शीघ्र- गामिनः ( देवम् ) ज्ञानिनम् ( दिवि ) व्यवहारे (वर्चसा ) तेजसा (भ्राजमानम) दीप्यमानम् (यस्य ) परमेश्वरस्य (ऊवाः) उन्नताः (दिवम् ) सूर्यम् (तम्बा) तन उपकारे-ऊप्रत्ययः । उपकृतयः (तपन्ति ) तापयन्ति (अर्वाड्) समीपवर्ती परमेश्वरः (सुवर्णैः ) सुवरणीयः (पटरैः) अर्तिकमिभ्रमिचमि० । उ०.३ । १३२ । पट गतौ, दीप्तौ वेष्टने च-अरप्रत्ययः । प्रकाशैः (वि) विविधम् ( भाति ) दीप्यते ॥
(२,६ अथर्ववेदभाष्य सू० ३ [५] भाषार्थ-(येन) जिसं [परमेश्वर] के साध (हरितः) दिशायें ( आदित्यान् ) आदित्य [ अखएड ] ब्रह्मचारियों को ( संवहन्ति ) मिलकर ले चलती हैं, (येन) जिस [ परमेश्वर] के साध (यज्ञेन ) पूजनीय कर्म से (वहवः) बहुत से (प्रजानन्तः) भविष्यज्ञानी लोग (यन्ति ) चलते हैं । (यत्) जो ( एकम् ) एक (ज्योतिः) ज्योतिः स्वरूप परमात्मा (बहुधा } बहु प्रकार से [प्रत्येक वस्तु में ] विभाति ) चमकता रहता है । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर के लिये.''[ म०१ ] ॥ १७ ॥ भावार्थ-लब मनुष्य उस अद्वितीय प्रकाशखरूप परमात्मा को प्रत्येक स्थान में पाकर भविष्यवेत्ता होकर सामर्थ्य बढ़ावें ॥ १७ ॥ सुतं युज्जन्ति रमेकचक्रुमेको अश्वो वहति सुसनामा । विनाभि चक्रमजरमन यत्रे मा विश्वा भुवनाधि तस्युः । तस्य 01 010॥ १८ सुप्त । युञ्जन्ति । र्यम् । एक-चक्रम् । एकः । अश्वः । वहति । सप्त-नामा ॥ वि-नाभि चक्रम् । इजरम् । अनवम् । यत्र । दुमा । विश्वा । भुवना । अधि । तुस्युः ॥ तस्य । ० ॥१८॥ भाषार्थ-(सप्त ) सात [इन्द्रियां- त्वचा, नेत्र, कान, जीभ, नाक, मन और वुद्धि] (एकचक्रम्) एक चक्र वाले [अकेले पहिये के समान काम करने वाले जीवात्मा से युक्त ] (रधम् ) रथ [वेगशील वा रथ समान, शरीर को. (युजन्ति.) जोड़ते हैं, (एकः) अकेला (सप्तनामा)लात [त्वचा श्रादि इन्द्रियों से मुकने वाला [प्रवृत्ति करने वाला] (अश्वः ) अश्व [अश्वरूप व्यापक जीवात्मा] (त्रिनाभि ) [ सत्व रज और तमोगुण रूप] तीन बन्धन वाले ॥ - - १७-(येन) परमेश्वरेण सह (आदित्यान् ) अखएडब्रह्मचारिणः पुरु- पान् (हरितः ) दिशः-निघ०१।६ (संवहन्ति ) संगत्य प्रापयन्ति ( येन ) (यशेन) पूजनीयन कर्मणा (-वहवः) । यन्ति । गच्छन्ति (प्रजानन्तः) भविष्य- सानिनः ( येत् ) ( एकम् ) अद्वितीयम् (ज्योतिः। तेजःस्वरूपं ब्रह्म (बहुधा) अनेकप्रकारेण (विभाति) विविध प्रकाशते । १८-अयं मन्त्री व्याख्यातः-१०।।२। तत्रैव द्रष्टव्यः ॥
- त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ .. . {०३ [४८१] ( २,८७ ) (अजरम् ) चलने वाले [वा जीर्णता रहित, ] ( अनवम् ) न टूटे हुये (चक्रम्) चक्र [चक्र समान काम करनेवाले अपने जीवात्मा] को [उस परमात्मा में ] (वहति) ले जाता है, (यत्र), जिस [ परमात्मा ] में (इमा ) यह (विश्वा) सब ( भुवना) सत्तायें (अधि) यथावत् ( तस्थुः) उहरी हैं । ( तस्य ) उसे ( क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध ( देवस्य) प्रकाशमान [ ईश्वर के लिये......[ मन्त्र १] ॥ १८ ॥ भावार्थ-यह जीवात्मा इन्द्रियों द्वारा पुरुषार्थ करके संसार के सूक्ष्म. और स्थूल पदार्थों के यथावत् ज्ञान से जगदीश्वर कोजानकर आनन्द पावे ॥१८ आवृत्ति छोड़कर यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-०६।६।२ और ऋग्वेद में है-१ । १६४ । २ ॥ अष्टधा युक्तो वहति वलिरुनः पिता देवानी जनिता मती- नाम् । ऋतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वा दिशः पवते मातरिश्वा । तस्य । ० । ० ॥ १६ ॥ अष्टुधा । युक्तः । वहुति । वह्निः । उग्रः। पिता । देवानाम् । जनिता । मतीनाम् ।। ऋत तस्य । तन्तु'म् । मनसा । मिमानः। सवाः । दिशः । पवते । मातरिश्वो ॥ तस्य । ० ॥ १८ ॥ 'भाषार्थ-(अष्टधा ) पाठ प्रकार से ( यम, नियम, आसन, प्राणा- याम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-योग के आठ अङ्गो द्वारा] (युक्त:) ध्यान किया गया, (उग्रः) प्रचण्ड (वह्निः ) ले चलने वाला, (देवानाम् ) गति- मान् [ पृथिवी आदि ] लोकों का (पिता) पिता[रक्षक] और ( मतीनाम् ) बुद्धिमानों का ( जनिता ) उत्पन्न करने वाज्ञा [ परमेश्वर, संसार को) (वहति) ले चलता है। (ऋतस्य ) सत्यज्ञान के ( तन्तुम् ) तांते [श्रेणी ] को (मनसा) १६-(अष्टधा) अष्टप्रकारेण । यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहरधारणा- ध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि-योगदर्शने.२ । २8 (युक्तः ) ध्यातः ( वहति.) गमयति लोकान् ( वह्निः) वाहका ( उग्रः) प्रचण्डः (पिता) रक्षकः ( देवा. नाम् ) गतिमतां पृथिव्यादिलोकानाम् ( जनिता):उत्पादकः ( मतीनाम् ) मेधा- विनाम्-निघ०३ । १५ (.ऋतस्य ) सत्यज्ञानस्य ( तन्तुम् ) श्रेणिम् । विस्तारम् .
. ( २,८४) अथर्ववेदभाध्ये सू०३ [४८१ अपने विज्ञान से (मिमानः) नापता हुआ, (मातरिश्वा ), आकाश में गति वाला [ परमेश्वर ] ( सर्वाः) सब (दिशः) दिशाओं में ( पवते) चलता व्यापता है ] । (. तस्य ) उस ( क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर के लिये [म० १] ॥ १६॥ भावार्थ-जो परमेश्वर:सर्वस्वामी, सर्वान्तर्यामी, सर्वनियन्ता है, सब मनुष्य योगद्वारा उसकी उपासना करके श्रानन्द पावें ॥ १६ ॥ . सम्यञ्च तन्तु मुदिशोऽनु सा अन्तगायच्याममृतस्य गर्ने । तस्य० । । ० ॥ २० ॥ (१३) सम्यञ्चम् । तन्तु'म् । प्र-दिशः । अनु । सवाः । अन्तः । . गाय च्याम् । अमृतस्य । गर्भ ॥ तस्य । ० ॥ २० ॥ ( १३ ). भाषार्थ-( सम्यञ्चम् ) भापल में मिले हुये (तन्तुम् अनु) तांते के साथ ( सर्वाः) सब (प्रदिशः) दिशायें (अमृतस्य ) अमर [ परमात्मा ]. के (गर्भे ) गर्भ में [ वर्तमान ] ( गायथ्याम् अन्तः ) गाने योग्य वेदवाणी के भीतर [हैं] । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ईश्वर ] के लिये......[ मन्त्र १॥२०॥ भावार्थ-जिल सर्वव्यापक परमेश्वर के सामर्थ्य से सव लोक लोका न्तर परस्पर आकर्षण में ठहरे हैं, हे मनुयो ! तुम उस की उपासना से उन्नति करो॥२०॥ निमुस्तिस्रो व्युषी ह तिसस्त्रीणि व्युषो ह तिनस्त्रीणि रजासि दिवौ अङ्ग (मनसा ) विज्ञानेन (मिमानः) मानं कुर्वाणः ( सर्वाः) (दिशः) (पवते ) गच्छति-निघ० २। १४ । व्याप्नोति ( मातरिश्वा ) मातरि आकाशे श्वयति गच्छति व्याप्नोति यः परमेश्वरः ॥ -( सम्यञ्चम् ) संगतम् ( तन्तुम् ) विस्तारम् (प्रदिशः ) प्रकृष्टा दिशाः ( सर्वाः) (अन्तः ) मध्ये ( गायत्र्यांम् ) अमिननियजि० । ३ । १०५.1 गै गाने-अनन् , स च णित् । आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७ । ३ । ३३ । इति युक् । गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मणः-निरु० ७ । १२ । गानयाग्यायां स्तुत्यायां 'वेदवाचि (अमृतस्य) अविनाशिनः परमेश्वरस्य.(गर्भः) अधिकरणे ॥
सू०३ [४८१] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ ( २,८८) तिनः । विद्मा ते अग्ने वेधा जनित्र बेधा देवानां जन- मानि विद्म । तस्य० । ।०॥ २१ ॥ नि-मचैः । तिनः । वि-उषः । ह । तिस्रः। त्रीणि । रजासि । दिवः । अङ्ग । तिस्रः ।। विद्म । ते । अग। धा। जनि- त्रम् । त्रेधा. । देवानाम् । जनिमानि। विझु ॥ तस्य । ०॥२१॥ भाषार्थ-(निनुचः) नोच गतियां [ मानसिक, वाचिक और कायिक भेद से] (निम्नः ) नीन और (व्युपः ) उच्च गतियां () भो [ मानसिक, चाचिक और कायिक भेद से ] (तिस्रः) तीन हैं, (रजांसि ) लोक [भूत भविष्यत् और वर्तमान भेद से ] (त्रीणि) तीन और (दिवः) व्यवहार क्रियायें ( अङ्ग) भी [ धर्म, अर्थ और काम-इन पुरुषार्थ भेदो से] (तिस्रः) तीन हैं। (अग्ने ) हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! [कर्म, उपासना और ज्ञान द्वारा] (धा ) तीन प्रकार से (ते ) तेरे । जनित्रम् ) प्रत्यक्षपन को (विन) हम जानते हैं, [ सत्त्व, रज और नमोगुण के भेद से ] (धा ) तीन प्रकार पर ( देवानाम् ) गति वाले लोको के ( जनिमानि) प्रादुर्भावों को ( विन) हम आनते हैं । (तस्य ) (क्रुद्रस्य ) युद्ध ( देवस्य ) प्रकाशमान [ईश्वर ] के लिये... ..[मन्त्र १] ॥२१॥ भावार्थ-मनुष्यों को योग्य है कि मानसिक, वाचिक और कायिक अवनति अर्थात् नीच गति को छोड़ कर मानसिक याचिक.और कायिक उन्नति २१- (निनुचः) नि+म्र चु गतौ-क्विप्।अवनतयः। अधोगतयः (तिस्रः) मानसिकवाचिककायिकभेदेन ( व्युषः) उप दाहे वधे च-क्विप् । उन्नतयः (ह ) एवं ( तिनः ) मानसिकादिभेदेन ( श्रीणि ) भूतभविष्यवर्तमान- भेदेन (रजांसि ) लोकाः(दिवः) व्यवारक्रियाः (अङ्ग) अङ्गेति क्षिप्रनाम-निरु० ५। १७ । क्षिप्रम् । अवश्यम् (तिस्त्रः ) धर्मार्थकामभेदेन (विम) साहितिको दीर्घः । जानीमः (ते) तव (अंग्ने ) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् (धा) त्रिप्रकारेण । कर्मोपासनाशानद्वारा (जनित्रम् ) प्रादुर्भावम् (धा) सत्त्व. रजस्तमोगुणभेदेन ( देवानाम् ) गतिशीलानां लोकानाम् (जनिमानि ) प्रादु-- र्भावान् (विम) जानीमः ॥
-- . : ( ३,०००) अथर्ववेदभाष्ये मू०३ [ ४८१.] करके भून भविष्यत् और वर्तमान का विचार करें और पुरुषार्थ पूर्वक परमात्मा के तत्त्वज्ञान से प्रानन्द पावें ॥२१॥ वि य नौणात् पृथिवीं जायमान पा समुद्रमदधादन्तरिक्षे । तस्य ।। ० ॥ २२ ॥'. वि । य: । नौणात् । पृथिवीस् । जाय॑मानः । श्रा। समुद्रम् । अदधात् । सन्तरिक्ष ॥ तस्य । ० ॥ २२ ॥ "भाषार्थ-(यः ) जिंस (जायमानः ) प्रत्यक्ष होते हुये [ परमेश्वर ] ने (पृथिवीम् ) पृथिवी को (वि और्णोत्.) फैलाया, और .(समुद्रम् ) समुद्र को (अन्तरिक्ष ) अन्तरिक्ष में (श्रा) सब ओर से ( अद्धात्) ठहराया । (तस्य) उस (क्रुद्धस्य ) क्रुद्ध (देवस्य ) प्रकाशमान [ ईश्वर ] केलिये...[मन्त १] २२॥ भावार्थ-विद्वान् लोग परमात्मा को पृथिवी श्रादि लोको का कर्ता साक्षात् करके धर्म में सदा उन्नति करें ॥ २२॥ त्वमग क्रतुभिः के तुभिर्हि तो३ क समिद्धउदरोचया दिवि । किमभ्योर्चन्मरुतःपृश्निमातरो यद् रोहितमजनयन्त दे वाः । तस्य० । ०।०॥ २३ ॥ त्वम् । अग्ने । क्रतु'-भिः । के तु-भिः । हितः । अर्कः । सम्- ईद्धः । उत् । अरोचथाः । दिवि ॥ किम् । अभि । भार्च न् । मरुतः। पृश्नि-मातरः। यत् । रोहितम् । अजनयन्त । देवाः ।। तस्य । ० ॥ २३ ॥ भाषार्थ-(अग्ने ) हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! ( त्वम् ) तू (क्रतुभिः) अपने कर्मों से और ( केतुभिः ) बुद्धियों से (हितः) हितकारी होकर (समि) - २२ -(यः) परमेश्वरः (वि औणौत् ) विस्तारितवान् (पृथिवीम.) (जायमानः ) प्रादुर्भवन् (श्रा ) समन्तात् (समुद्रम् ) जलौघम् ( अदधात्.) अस्थापयत् (अन्तरिक्ष)॥ २३-(त्वम् ) (अग्ने ) प्रकाशखरूप परमेश्वर (क्रतुभिः) कर्मभिः ।
. . सू०३ [४८१] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,००१) प्रकाशित ( अर्कः) सूर्य के समान (दिवि ) प्रत्येक व्यवहार में (उत्) ऊपर (अरोचथाः) चमका है। (प्रश्निमातरः) पूछने योग्य वेदवाणी को माता समान मान करने वाले ( मरुतः ) शूर पुरुंपों ने (किम् ) किमको [अर्थात् ब्रह्म को ही ] (अमि.) सब ओर से (आर्चन् ) पूजा है, ( यत् ) जय (रोहितम् ) सब के उत्पन्न करने वाले [ परमेश्वर ] को ( देवाः) [ उसके ] उत्तम गुणों ने . (अजनयन्त) प्रकट किया है । (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य क्रुद्ध ( देवस्य ) प्रकाश मान [ ईश्वर के लिये .....[ मन्त्र] ॥ २३ ॥ भावार्थ-वेदवेत्ता पराक्रमी लोग सर्वहितकारी परमेश्वर को उसके गुण कर्म स्वभाव से जानकर सदा आनन्द पाते हैं ॥ २३ ॥ इस मन्त्र का चौथा पाद ऊपर मन्त्र १२ में आ चुका है । इस मन्त्र का मिलान करो-१० १३ । १ । ३॥ य प्रात्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते मुशिषं यस्य देवाः । यो३' स्ये0 द्विपदो यश्चतुष्पदुः । तस्य० । । ० ॥ २४ ॥ यः । आत्म-दाः । बल-दाः । यस्य मु-शिर्षस् । यस्य । देवाः ।। यः । अस्य.। ईशै । द्वि-पदः ।.. यः । चतु':-पदः ॥ तस्य । ० ॥ २४ ॥' भाषार्थ:-( यः ) जो [ परमेश्वर ] (श्रात्मदाः) प्राण दाता और (बल- दा: ) पल दाता है, ( यस्य यस्य ) जिसके ही (प्रशिषम् ) उत्तम शासन को (विश्वे ) सव (देवाः ) गतिमान सूर्य चन्द्र आदि लोक ( उपासते ) मानते हैं। (यः)जो (अस्य) इस (द्विपदः) दो पाये [समूह] का और (य) जो (चतुष्पदः), निघ० २... १ (केतुभिः) प्रक्षाभिः-निघ०३ 18 (हितः) उपकारी (अर्का) सूर्यः ( समिद्धः) प्रदीप्तः ( उत्) उत्तमतया (अरोचथा) दीप्तवानसि (दिवि) व्यवहारे (किम् ) प्रश्न । ब्रह्मवेत्यर्थः (आर्चन् ) पूजितवन्तः (मरुतः ) अ० १ । २० । १। शरपुरुषाः ( पृश्निमातरः) अं० १ । १३ । १३ । प्रच्छ शीप्सायाम्- नि । प्रष्टव्या वेदवाणी मातृवत् सत्करणीया येषां ते। अन्यत्- पूर्ववत्-म० १२। २४-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ०४।२।१ (यः) परमेश्वरः (आत्मदाः) प्राणदाता (बलदाः ),बलदाता ( यस्य ) (विश्वे) सर्वे (उपासते ) सेवन्ते (प्रशिषम् ) अनुशासनम् ( यस्य ) ( देवाः) गतिमन्तः सूर्यादिलोकाः (य:) । विश्व । उप-मामते ..
ज्य . (३,००२) अथर्ववेदभाष्ये : सू१३.[४८१] चौपाये [समूह ] का (ईशे = ईष्टे ) ईश्वर है । ( तस्य ) उह (क्रुद्धस्य ) कुछ (देवस्य) प्रकाशमान [ईश्वर ] के लिये......[ मन्त्र १ ॥ २४ ॥ भावार्थ-जिस जगदीश्वर के शासन से सव सूर्य, चन्द्र पृथिवी आदि लोक परस्पर धारण आकर्षण द्वारा अपने अपने मार्ग पर चलते है, और मनु- गौ श्रादि सब प्राणी मर्यादा में रहते हैं, उस परमात्मा की भक्ति से मनुष्य आत्मबल बढावे ॥२४॥ श्रावृत्ति छोड़ कर यह मन्त्र आ चुका है। अ०४।२।१ और कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१० । १२१ | २,३॥ और यजु० २५ । १३ , ११ ॥ एकपाद् द्विपदी भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमुभ्येति पश्चात् । चतुष्पाच्चक्रे द्विपदामभिस्वरे में पश्यन् पङ्क्ति- मुंपतिष्ठेमानुः। तस्य दे वस्य क्रुद्धस्य तदागो य एवं विद्वांस ब्राह्मणं जिनाति । 'उद् वैपय रोहित म क्षिणी हि ब्रह्मज्यस्य मंति मुञ्च पाशान् ॥ २५ ॥ एक-पात् । द्वि-पदः । भूयः । वि। चक्रमे । द्वि-पौत् । त्रि- पादम् । अभि । एति । पुश्चात् ।। चतु':-पात् । चक्रे । द्वि- पदाम्। अभि-स्वरे । सम्-पश्यन् । पङ्क्तिम् । उप-तिष्ठ- मानः ॥ तस्मं । दे वस्य । क्रुद्धस्य । एतत् । प्रागः । यः । एवम् । विद्वांसम् । ब्राह्मणम् । जिनाति ॥ उत् । वे पय । रोहित । म। क्षिणीहि । ब्रह्म-ज्यस्य । मति । मुञ्च । पार्थान् ॥ २५ ॥ भाषार्थ-(एकपात्.) एक रस व्यापक परमेश्वर (द्विपदः ) दो प्रकार की स्थिति वाले जङ्गम स्थावर जगत् ] से (भूयः ) अधिक आगे (वि.) फैल कर (चक्रमे ) चला गया, (द्विपात् ) दो [भूत भविष्यत् ] में गति वाला (अस्य ) ( ईशे) तलोपः । ईष्टे । ईश्वरो भवति (द्विपदः ) पादद्वयोपेतस्य (या) (चतुथदः.) पादचतुष्टययुक्तस्य ॥ ' . २५. एकपात्)."." ( पश्चात् ) इति व्याख्याता-१० १३ १ २१:२७ - :
- y० ३ [ ४८१] त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,००३) परमात्मा ( पश्चात् ) फिर(त्रिपादम् ) तीन लोक में [ सूर्य, भूमि अर्थात् प्रका. 'शमान और अप्रकाशमान और मध्य लोक में ] ( अभि) सब ओर से ( एति) 'प्राप्त होता है। (चतुष्याद् ) चारो [ पूर्व आदि चारो दिशाओं] में व्यापक परमेश्वर ने (विपदाम् ) दो प्रकार की स्थिति वाले [ जगम और स्थावरों के (अभिस्वरे) सब ओर से पुकारने पर (उपतिष्ठमानः ) समीप ठहरते हुये और (पङ्क्तिम् ) पांति [सृष्टि की श्रेणी ] को (संपश्यन् ) निहारते हुये (चके) [ कर्तव्य को किया है। (तस्य ) उस (क्रुद्धस्य) क्रुद्ध (देवस्य) प्रकाशमान [ ईश्वर ] के लिये ( एतत् ) यह (भागः ) अपराध है, [कि ] (यः) जो मनुष्य ( एवम् ) ऐसे (विद्वांसम् ) विद्वान् (ब्राह्मणम् ) ब्राह्मण [वेदज्ञाता को (जिनाति) सताता है। (रोहित) हे सर्वोत्पादक परमेश्वर [ उस शत्रु को] ( उद् वेपय ) कंपा दे, (प्राक्षिणीहि ) नाश कर दे, (ब्रह्मज्यस्य ) ब्रह्मचारी के सताने वाले के (पाशान् )फन्दों को (प्रति मुञ्च ) बांध दे ॥ २५ ॥ भावार्थ-जो सर्वव्यापक परमात्मा सदा वर्तमान रहकर सब संसार का पालन करता है, सव मनुष्य उस की उपासना पूर्वक विनों से बचकर श्रानन्द पावे ॥२५॥ इस मन्त्र के प्रथम दो पाद पाचुके हैं-०१३ । २।२७ और, आवृत्ति छोड़ कर शेष मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१० १११७ । ८ ॥ कृष्णायाः पुत्रो अर्ज नो राज्या वत्सोऽजायत । स हु द्यामधि रोहति रही सरोह रोहितः ॥ २६ ॥ (१४) कृष्णार्याः । पुत्रः । अर्जु नः । राज्योः । वत्सः । भूजा- यतु । सः । हु । द्याम् । अंधि । रोहति । रहः । कुरोहं । रोहितः ॥ २६ ॥ (१४) ., भाषार्थ (कृष्णायाः ) कृष्ण वर्णवाली ( राज्याः ) रात्रि से [प्रलय की (चतुष्पात्) चतसृषु दिक्षु व्यापकः परमेश्वरः (चक्रे) कर्तव्यं कृतवान् (द्विग्न- दाम् ) जङ्गमस्थावररूपेण स्थितिवताम् ( अभिस्वरे ) सर्वतः शब्दकरणे : (सम्पश्यन् ) अवलोकयन् (. पङ्क्तिम् ) विस्तारम् ( उपतिष्ठमानः) समीपे वर्तमानः । अन्यत् पूर्ववत्-म० १॥ २६-(कृष्णायाः) कृष्णवर्णायाः (पुत्रः ) पुचो हस्वश्च । उ०४ । १६५ । ... । .
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(2008) अथर्ववेदभाष्य सू. ४ [४८२] रात्रि के.पीछे].(पुत्रः) शुद्ध करने वाला, (अर्जुनः) रस प्राप्त करने वाला (वत्सः.) निवास देने वाला सूर्य [ जिस परमेश्वर के नियम से (अजायत) प्रकट हुआ है । (-सा ह.) वहीं (रोहितः ) सब का उत्पन्न करने वाला-[परमे श्वर (शाम् अधि ) उस सूर्य में ( रोहति.) प्रकट होता है, उस ने (रुहः) सृष्टि की सामग्रियों को ( रुरोह ) उत्पन्न किया है ॥ २६ ॥ भावार्थ-जिस सर्वव्यापक परमेश्वर के नियम से प्रलय के पीछे सूर्य प्रादि लोक उत्पन्न होते हैं, मनुष्य उस की आराधना कर के सदा सुखी रहै २६ ! इस मन्त्र का चौथा पाद आ चुका है-अ० १३ । १४ ॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥ अथ चतुर्थोऽनुवाकः ॥ सूक्तम् ४ ॥ [ षट् पर्यायाः ॥ १-५६॥रोहितादित्यो देवता ॥ प्राध्यात्मोपदेशः-परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश । पर्यायः,१॥ १-१३॥ १. २,४-११ प्राजापत्याऽनुष्टुप् ; ३ निचत् प्राजापत्याऽनुष्टुप् १२ सानी पङ्क्तिः । १३ श्रासुर्यनुष्टुप ॥ सरति सविता स्वर्दि वस्त स्पृष्ठेऽवचाकशत् ॥ १॥ सः । एति । मुविता । स्वः। दिवः। पृष्ठे । अव-चाशत् ॥१॥ भाषार्थ-(सः) वह (सविता ) सव का प्रेरक [.परमेश्वर ] (दिष:) पूष शोधने-कत्र । शोधकः ( अर्जुनः ) रसानां संग्रहीता (राध्याः) प्रलय- रात्रिपश्चादित्यर्थः (वत्सः ) वस निवासे-लप्रत्यहः । निवासहेतुः सूर्यलोकः (अंजायत ) प्रकटोऽभवत् (स.) (ह) एव ( द्याम् अंधि ) सूर्य प्रति(रोहति) प्रादुर्भवति ('रुहः) अ० १३ । १ । ४ । सृष्टिसामग्रीः ( रुरोह ) जनयामास (रोहितः) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः ॥ - १-( सः ) प्रसिद्धः ( एति ) प्रामोति ( सविता ) संप्रेरकः परमेश्वरः F । -- सू०: ४४८२] वयोदश काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,००५) आकाश [वा व्यवहार ] की (पृष्ठे ) पीठ पर [वर्तमान होकर].('अवचाशत् ) देखता हुआ (स्वः) अानन्द को (पति) प्राप्त होता है ॥ १ ॥ भावार्थ - परमेश्वर अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त विशाल आकाश से भी सूक्ष्म और विशाल होकर और प्रत्येक व्यवहार में वर्तमान रहकर सर्वनियन्ता और आनन्दस्वरूप है ॥१॥ रश्मिभिनभ आभृतं महेन्द्र ए त्यावृतः ॥ २ ॥ रश्मि-भिः। नभः। प्रा-भृतम्। महा-इन्द्रः। एति । भा-वृतः।२ भाषार्थ-(महेन्द्रः ),बड़ा ऐश्वर्यवान् (आवृतः) सब ओर से ढका हुमा [अन्तर्यामी परमेश्वर ) ( रश्मिभिः ) किरणों द्वारा ( आभृतम् ) सप प्रकार पुष्ट किये हुये (नभः) मेघमण्डल में (पति) व्यापक है ॥२॥ भावार्य-अन्तर्यामी परमात्मा के नियम से जल किरणों द्वारा खिंच कर मेघमण्डल में वृष्टि के लिये वर्तमान होता है ॥ २ ॥ मन्त्र ३, ४, ५, ६ और ७ के पीछे आवृत्ति का चिह्न गवर्नमेन्ट बुकडिपो बम्बई और वैदिक यन्त्रालय अजमेर के पुस्तकों में दिया है, अर्थात्-मन्त्र'२.की आवृत्ति भानी है। परन्तु यह चिह्न ५० सेवक लाल वाले पुस्तक में नहीं है और न कुछ लेख इसके विषय में ग्रिफ़िथ साहिब और बिटनी सोहिब के अनुवाद - स धाता स विधुर्ता स वायुर्न उच्छ्रितम् । ० ॥ ३ ॥ सः । धाता। सः । वि-धुर्ता । सः । : वायुः । नमः। उत्- श्रितम् । ० ॥ ३ ॥ भाषार्थ-(सः ) वह [ परमेश्वर ] ( धाता) पोषण करने वाला और (स्वः) सुखम् (दिवः) आकाशस्य । व्यवहारस्य ( पृष्ठे ) उपरिमागे (अवचा. काशत् ) निघ०.३ । ११ । अवलोकयन् ॥ . २(रश्मिभिः ). किरणैः (मभः) मेघमण्डलम् (आभृतम्.) समन्तात् पोषितम् (महेन्द्रः ) परमैश्वर्यवान् ( एति) व्याप्नोति (आवृतः ) आच्छादितो अन्तर्यामिरूपेण परमात्मा ॥- ३-(स) परमेश्वरः (धाता) सर्वपोषक (सः) (विर्ता) विविध- , ४८२] --- ܙܫܝ (३,००६ ) अंथर्ववेदभाष्य सू० ४ (सः) वह ( विधर्ता ) विविध प्रकार धारण करने वाला है, (सः) वह (वायुः) व्यापक [वा महाबली परमात्मा ] और ( उछितम् ) ऊंचा वर्तमान (नभः.) प्रबन्धकर्ता वा नायक ब्रह्म] है ॥ ३ ॥ भावार्थ-उस सर्वपोषक सर्वधारक परमात्मा की उपासना से मनुष्य श्रात्मा की उन्नति करें॥३॥ सेोऽर्य मा स वरुणः स कुद्रः स महादेवः । ॥ ४ ॥ सः । अर्य मा । सः। वरुणः । सः। रुद्रः सः। महा-दे का०॥४॥ भाषार्थ-(सः) वह [परमेश्वर ] (अर्यमा ) श्रेष्ठों का मान करने वाला, (सः) वह (वरुणः ) श्रेष्ठ, (सः) वह (रुद्रः) ज्ञानवान् और (सः) वह (महादेवः) महादानी है ॥ ४॥ भावार्थ-मन्त्र ३ के समान है ॥ ४ ॥ सो भुग्निः स उ सूर्य : स उ एव महायुमः । ० ॥ ५ ॥ सः । अग्निः । सः । ॐ इति । सूर्यः । सः । ॐ इति । एव । महा-यमः। ० ॥ ५ भाषार्थ-(सः ) वह [परमेश्वर ] (अग्निः ) व्यापकः (सः उ) वही धारकः ( सः.) (वायुः ) वा गतिगन्धनयोः-उरण युक् च । व्यापकः । बलिष्ठः (नमः ) नहेर्दिवि भश्च । उ०४ । २११ । गह बन्धने-सुन्, हस्य भो, यद्वा, नयते:-श्रसुन्, गुणे "नयः" इति स्थिते बाहुलकाद् यकारस्य भकारः । नभ प्रा. दित्यो भवति, नेतों रसानां, नेता भासां, ज्योतिषां प्रणयः, अपि वा भन एव स्याद् विपरीतः, न न भातीति वा-निरु० २०१४। प्रबन्धक नायकं वा ब्रह्म • ( उच्छूितम् ) ऊध्वं श्रितं स्थितम् ।। ४--(सः) (अर्यमा). अर्यः खामिवैश्ययोः । पा०३।१।१०३ । श्र गतिप्रापाणयोः-यत् । श्वनुतनपूषन् । उ० १११५६। अर्य+माङ्-माने-कनिन्। मर्यान श्रेष्ठान् मिमीते मानयतीति । श्रेष्ठानां मानकर्ता (सः ) ( वरुणः ) (सः). (रुद्रः) रु गतौ-किप तुक्च; रो मत्वर्थीयः । ज्ञानवान् ( स..)..महादेवः) देवो दानाद्वा दीपनोद्घा-निरु०७ । १५ । महादानी ॥ --(सः) (अग्निः ) व्यापकः (सः) (२) अवधारणे (सूर्य) : . . . + तं . सू०४ [४८२] प्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,००७) (सूर्यः ) प्रेरक, (मः उ) वही ( प ) निश्वयं करके (महायमः) बड़ा न्यायकारी है।॥५॥ भावार्य-मन्त्र ३ के समान है ॥ ५ ॥ वत्सा उप तिष्ठन्त्येक शीर्षाणो युत्ता दर्थ । ० ॥ ६ ॥ तम् । वृत्माः । उप । तिष्ठन्ति । एक-शीर्षाणः । यताः । दर्थ । ० ॥ ६. भाषार्थ-(तम् ) उस [ परमात्मा ] को ( एकशीपणः ) एक [ पर- मात्मा को शिर [प्रधान ] मानने वाले (दश) दस [चार दिशाओं, चार मध्य दिशाओं और ऊपर नीचे की दिशांओं से सम्बन्ध वाले ] ( युताः) मिले हुये (परलाः ) निवास स्थान [ सब लोक ] ( उप तिष्ठन्ति । सेवते हैं ॥ ६॥ भावार्थ-जो परमात्मा सूर्य प्रादि सब लोको को धारण श्राकार्षण द्वारा अपनी बासा में रखता है, उसकी भक्ति संब मनुष्य करें ॥ ६ ॥ पश्चात् माञ्च प्रा तन्वन्ति यदुदेति वि भासति । ० ॥ ७ ॥ पुश्चात् । माञ्चः । आ । तुन्वन्ति । यत् । उत्-एति । वि। भासति । ० ॥ ७॥ भाषार्थ-वे [ सय लोक ] [ परमात्मा के ] ( पश्चात् ) पीछे ( प्राञ्चः) प्रागे बढ़ते हुये (श्री) सब ओर से (तन्वन्ति ) फैलते हैं, ( यत् ) जब वह (उदेति) उदय होता है और (वि भासति ) विविध प्रकार चमकता है ॥ ७॥ - प्रेरकः (स) () (एव) निश्चयेन (महायमः) महान्यायाधीशः ॥ ६-(तम्) परमात्मानम् ( वत्साः) वस निवासे--सप्रत्ययः। निवास- स्थानाः सर्वलोकाः (उपतिष्ठन्ति) सेवन्त ( एकशीणः ) एकः परमेश्वरः शिरः प्रधानो ये ते (युताः ) संयुक्ताः (दश) ऊर्ध्वाधोभ्यां सह पूर्वादिचतसृभिः, ईशानादिचतसृभिर्दिगभिः सम्बद्धाः ॥ ७-(पश्चात् ) परमात्मनमनुसृत्य (प्राचः) आभिमुख्येन गच्छन्तः (मा) समन्तात् (तन्वन्ति ) विस्तीर्यन्ते ( यत् ) यदा (उदेति ) उद्गच्छति (वि) विविधम् (भासति ) दप्यते ।। है सू० ४ [ ४८२ . तस्यै ष ५ यह सब .. (३,००८) अथर्ववेदाप्ये : . भावर्थ-विवेकी योगीजन अनुभव करते हैं कि यह सब लोक पर- मामा के हो धारण आकर्षण नियमों में चलते हैं ॥७॥ मारतो गणः स रति शिक्याकृतः॥८॥ तस्य । र षः । मारुतः । राणः । सः। रति । शिक्या-कृतः ॥८॥ भाषार्थ-( तस्य ! उसका [ परमेश्वर का बनाया हुआ ( एषः ) यह (मारुतः ) मनुथों का (गणः) सपूई है. [ क्यों कि ] ( सः ) वह । परमेश्वर] (शियाकृतः) छीके में किये हुये सो ( पनि )यापक है ॥ ॥ भावार्य परमेश्वर मनुष्यों को उन के कर्मानुसार बनाता है. में ऐसा व्यापक है जैस कोई पदार्थ छींके के भीतर रक्खा हो ॥ रश्मिभिर्न प्राभृत महेन्द्र र त्यावृतः ॥ ६ ॥ रश्मि-भिः । नर्भः। मा-भृतम् । महा-इन्द्रः । एति । ना- वृतः ॥ ८ ॥ भाषार्थ-(महेन्द्रः ) बड़ा ऐश्वर्यवान् (श्रावृतः ) सब ओर से ढका हुआ [अन्तर्यामी परमेश्वर ] (रश्मिभिः ) किरणों द्वारा (आभृतम् ) सर्व प्रकार पुष्ट किये हुये (नभः ) मेघ मण्डल में (एति ) व्यापक है ॥ 8.1 भावार्थ-मन्त्र के समान है ॥8. यह मन्त्र ऊपर लग चुका है-मन्त्र २॥ तस्ये मे नव कोश विष्टुम्भा नवधा हिताः ॥ १० ॥ तस्य । इमे । नर्व कोशी। विष्टम्भाः। नव-धा । हिताः १० --(तस्य ) परमेश्वरस्य रचितः । एषः) इंश्यभानः (मारुनः ) मारतं मरुतां मनुष्याणामिदम् -दयानन्दभाष्ये, ऋग्० २ । ११ । १४ । मनुष्यसम्बद्ध (गणः) समूहः (सः) (एति ) व्याप्नोति (शिक्याकृतः ) वंसेः शिः कुन किन्छ । उ०५। १६ । मंसु अधः पतने गतौ-यत् ; कित् कुर् च, धातोः शि-इत्यादेशः, राप् । शिक्यायां काचे कृतो धृतो यथा ।। 8-अयं मन्नो व्याख्यातः-म०२॥
. सू० ४ [४८२] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,००८) भाषार्थ-(वस्य ) उस्म [ परमेश्वर ] के (हिताः) घरे हुये [शरीर के ] ( इमे ) यह (नव) नौ [ दोकान, दो आंख, दो नथने, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ] (कोशाः ) आधार, (विष्टम्भाः ) विशेष स्तम्भ [ोलम्ब, संहारे ] [अपनी, शक्तियों सहित ] ( नवधा ) नव प्रकार से हैं ॥ १० ॥ भावार्थ-परमेश्वर ने नव द्वार वाले शरीर में श्रोत्रादि अद्भुत गोलक बनाकर उन में श्रवण श्रादि नव अद्भुत शक्तियां रक्खी हैं ॥ १० ॥ स प्रजाभ्यो वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न ॥ १९ ॥ : . सः । म-जाभ्यः । वि । पुश्यति । यत् । च । प्राणति । यत् । च । न ॥ ११॥ भाषार्थ-(सः ) वह [ परमेश्वर ] ( प्रजाभ्यः ) उत्पन्न जीवों के हित के लिये [ उस सब को] (वि) विविध प्रकार ( पश्यति ) देखता है, ( यत् ) जो (प्राणति ) श्वास लेता है (च च ) और (यत् ) जो (न) नहीं [ श्वास लेता है ॥ ११ ॥ भाषार्थ जो परमात्मा जङ्गम और स्थावर जगत् की यथावत् सुधि लेकर सब का पालन करता है, उसकी उपासना सब मनुष्य करें ॥११॥ इसका मिलान आगे मन्त्र १४ से करो। तमिदं निगतं राहुः स एष एव ।। १२ ॥ तम् । इदम् । नि-गतम् । सहः । सः । एषः । एकः । एक- वृत् । एकः । एव ॥ १२ ॥ - ष एक एकवृदेक 1 .. १०-(तस्य) परमेश्वरस्य ( इमे) दृश्यमानाः (नव) देहे द्वे श्रोत्रे, चक्षुपी, नासिके च मुखं च दुपापूयस्थे च (कोशाः ) आधारा: ( विष्टम्भाः)., विशेषस्तम्भाः। आलम्बाः (नवधा) श्रवणादिशक्तिभिः सह नव प्रकारेण (हिताः) धृताः॥ ११-(सः) परमेश्वरः (प्रजाभ्यः .) उत्पन्नजीवानां हिताय (वि.) विविधम् ( पश्यति ) विलोकयति (यत् ) सृष्टिजातम् (च) (-प्राणति) प्रश्व- सिति ( यत् ) (च) (न) निषेधे ॥ १५ । १. . - (३,०१०) अथर्ववेदभाष्ये सू० ४ [४८२] भाषार्थ-(इदम् ) यह (सहः ) सामर्थ्य ( तम् ) उस [ परमात्मा] को निगतम् ).निश्चय करके प्राप्त है, ( सः एषः ) वह श्राप (एकः ) एक, (एकवृत्) अकेला वर्तमान, ('एकः एव ) एक ही है ॥ १२ ॥ भावार्थ-उस अद्वितीय परमात्मा में पूर्वोक्त अद्भुत सामर्थ्य है, कोई दूसरा न तो उसके तुल्य है और न उस से अधिक है, वही सब जगत् का स्वामी है ॥ १२ ॥ एते अस्मिन् देवा र कुवृता भवन्ति ॥ १३ ॥ ( १५ ) एते । अस्मिन् । दे वाः । एक-वृतः । भवन्ति ॥ १३ ॥ ( १५ ) भाषार्थ-(अस्मिन् ) इस [ परमात्मा ] में ( एते ) यह सब (देवाः) चलने वाले [.पृथिवी आदि.लोक ] ( एकवृतः ) एक [ परमात्मा ] में वर्तमान (भवन्ति ) रहते हैं ॥ १३ ॥ भावार्य-यह सब जगत् प्रलय में कारण रूप से और सृष्टि में कार्य रूप से उसी परमात्मा के सामर्थ्य के बीच विद्यमान रहता है ॥ १३ ॥ - पर्यायः २॥ १४-२१॥ १४ भुरिक् सान्नी त्रिष्टुप् । १५ श्रानुरी पङ्क्तिः, १६, १६ प्राजापत्याऽनुष्टुप् , १७, १८ पासुरी गायत्री; २० साम्नी पङक्तिः, २१ आसुर्य- नुष्टुप् ॥ कीर्तिश्च यशु श्चाम्भश्च नभश्च च ब्राह्मणवर्चु सं चान्न चान्नाद्य च॥ १४ ॥ कीर्तिः । च.. यशः चु । ब्राह्मण- वर्च सम् । च । अन्नस् । च । अन्न-प्रद्यम् । च ॥ १४ ॥ च । सम्भः च न .. १२-(तम्.) परमात्मानम् ( इदम्') पूर्वोक्तम् (निगतम्.). निश्चयेन प्राप्तम् (सहः ).बलम् (सः) (एषः ) (एकः ) अद्वितीयः (एकवृत्) एको वर्तमानः (..एक:) (एव)॥ १३-(एते) उश्यमानाः (अस्मिन् ) परमात्मनि (देवाः) गतिशीला.. पृथिव्यादिलोकाः ( एकवृतः) एकस्मिन् परमात्मनि वर्तमानाः (भवन्ति ) ।
(३,०१६ ) , ] मू० ४ [.४८२] 'योदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ य एतं दे वमैकवृतं वेद ॥ १५ ॥ यो । र तम् । देवम् । एक-वृतम् । वेद ॥ १५ ॥ भाषार्थ-(कीर्तिः) कीर्ति [ ईश्वर गुणों के कीर्तिन और विद्या आदि गुणों से बड़ाई ] (च) और (यशः ) यश [ शूरता आदि से नाम ] (च) और (अम्भः) पराक्रम (च) और ( नभः) प्रबन्धं सामर्थ्य (च) और (ब्राह्मणवर्चसम् ) ब्रह्मशान का तेज ( च ) और ( अन्नम् ) अन्न (च च) और (अन्नाद्यम् ) अन्न के समान खाने योग्य द्रव्य [ उस पुरुषके लिये होते हैं ]॥१४॥ (यः ) जो (पतम् ) इस ( देवम् ) प्रकाशमय (एकवृतम् ) अकेले वर्त. मान [परमात्मा ] को (वेद) जानता है ॥ १५ ॥ भावार्थ-जो पुरुप सर्वशक्तिमान् अद्वितीय परमात्मा के प्रकाशमय स्वरूप को साक्षात् करता है, वह संसार में उन्नति करके सब प्रकार का आनन्द पाता है ॥ १४, १५ ॥ न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्यु'च्यते । ० ॥ १६ ॥ न । द्वितीयः। न । तृतीयः। चतुर्थः। न । अपि । उच्यते ।० १६ न पंञ्चमा न पुष्ठः सुप्तुभो नाप्यु'च्यते । ० ॥ १७ ॥ न । पञ्चमः । न । षष्ठः । सप्तमः । न । ०॥ १७॥ नाष्टमी न नवमी देशमा नाप्युच्यते । ० ॥ १८ ॥ न । अष्टमः । न । नवमः । दुशमः। न । अपि । उच्यते ।० १८ १४, -(कीर्तिः ) हपिषिरुहि० । उ०४ । ११६ । कृत संशब्दने-इन् । ईश्वरगुणकीर्तनविद्यादानादिप्रभवं नाम ('च ) (यशः ) शौरादिप्रभवं नाम (च) (अम्भः) उदके नुम्भौ च । उ०४।२१० । श्रास व्याप्तौ-असुन ह्रस्वत्वं च नुमागमो भश्चान्तादेशः, यद्वा, अभि शब्दे- असुन् । पराक्रमः ( च ) (नमः) म०३ । प्रवन्धसामर्थ्यम् (च) (ब्रह्मवर्चसम् ) अ० १०। ५। ३७ । ब्राह्मणस्य ब्रह्मशानस्य तेजः (च) (अन्नम ) अन जीवने-नप्रत्ययः । जीवनसाधनं भोजनम् (च) ( अन्नाद्यम् ) अन्नसमानभक्ष्यद्रव्यम् (च)। १५-(यः) पुरुपः ( एतम् ) प्रसिद्धम् ( देवम् ) प्रकाशमयम् ( एक- वृतम् ) अद्वितीयवर्तमानम् (वेद) वेत्ति॥ . है म • श (३,०१२) अथर्ववेदभाष्य मू. ४ [२] भाषाय - वह [अकेला वर्तमान-म०११] (न ( द्वितीयः दूसरा, (न) न (तृतीयः ) तीसरा. न ) न चतुर्थः) चौथा (अपि ) ही (उच्यते) कहा जाता है ।। २६॥ वह (नन (पंञ्चमः) पांचवां, (न)न (पष्टः) दृठा. (न) न (लप्तमः) सातवां (अपि) ही ( उच्यते ) है ॥ १७ ॥ वह (न)न (अष्टमः ) श्राठवां. (न)न (नवमः) नवां, (न) न (दशमः) दलवां । अपि ) ही ( उच्यते ) कहा जाता है । भावार्थ-परनेश्वर एक है, उस से भिन्न कोई भी दूसरा, तीसरा आदि ईश्वर नहीं है, लर लोग उसी सी उपासना करें। इन मन्त्रों में दो से लेकर दस तक दूसरे ईश्वर होने का निषेध इस लियें किया है कि नव संख्या का मृत एक [१] अङ्क है, इसी एक को दो. तीन, चार, पांच, छह. लात. प्राट और नौ बार गणने से २, ३, ४, ५, ६, ७, और अक्षयनते हैं, और एक पर शून्य देने १० दल का अङ्घ बनता है। उस से वेद ने एक ईश्वर का निश्चय कराके दूसरे ईश्वर होने का सर्वथा निषेध किया है, अर्थात् उस के रझपने में भी भेद नहीं और बह शून्य भी नहीं, किन्तु वह सच्चिदानन्द गुण युक्त एकरल ॥ १६-१!! १-यह मन्त्र नहर्षि यानन्द्रकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ब्रह्म विद्या विषय पृ०६०, १र में व्याख्यात हैं, और उन्हीं के ले यहां किया गया है। २-मन्त्र १६ से लेकर २२ तक मन्त्रों के पीछे श्रावृत्ति का बिह गवर्नमेन्ट बुक डिपो बम्बई और वैदिक यन्त्रालय अंजनेर के पुस्तकों में दिया है, अर्थात् मन्त्र ५ की प्रावृत्ति मानी है। परन्तु यह त्रित ए० सेवक लाल वाले पुस्तक में नहीं है और न कुछ इल के विषय में ग्रिफ़िथ साहिब और हिनी साहिब के अनुवाद में है और न महर्षि दयानन्द कृत उक्त पुस्तकने श्रावृत्ति का चिह है। स सबस्मै वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न । ॥ १८ ॥ सः । सर्वस्मै । वि । पश्यति । यत् । ३। प्राणति । यत् । च । न । ० ॥१६॥ परमात्मा . । १६-१०-(न) निषेधे (अपि) एव ( उच्यते) कथ्यते । अत्यत् सुगमम् ।
। " एकवृदेक सू०४ [४] प्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ ('ई,०१६) .भाषार्थ-(सः ) वह [ परमेश्वर ] ( सर्वस्मै ) सबै [ जगत् ] के हित के लिये [ उस लव को ] (वि) विविध प्रकार ( पश्यति) देखता है, .( यत्) जो (प्राणति ) श्वास लेता है, ( च च ) और ( यत् ) जो (न.) नहीं [श्वास लेता हैं ]॥ १६॥ भावार्य-ऊपर मन्त्र ११ देखो, उसी के समान भावार्थ है ॥ १६ ॥ .:: तमिदं निर्गत सहः स एष एक एव । ० ॥ २० ॥ तम् । इदम् । नि-गतम् । सहः । सः । एषः । एकः । सक वृत् । एकः । एषः। ० ॥ २० ॥ सर्व अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति । ७. ॥.२१ ॥ ( १६ ) सर्वै । अस्मिन् । र्दुवाः । एक-वृतः । भवन्ति । ०॥२१॥ (१६) भाषार्थ-(इदम् ) यह ( सहः ) सामर्थ्य (तम् ) उस [ परमात्मा ] को ( निगतम् ) निश्चय करके प्राप्त है, (सः एषः) वह ओप (एका) एक, (एकवृत्.) अकेला वर्तमान, (एकः एव ) एक ही है॥३॥ (अस्मिन्.) इस [ परमात्मा.] में (सर्वे ) सब ( देवाः) चलने वाले [पृथिवी आदि लोक ] (एकवृतः) एक [ परमात्मा ] में वर्तमान (भवन्ति ) रहते हैं ॥ २१ ॥ भावार्य-ऊपर मन्त्र १२ और १३ देखों और वही भावार्थ संमभो ॥ २०, २६॥ यह.दोनो मन्त्र महर्षि दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ब्रह्मविद्या विषय पृ०६०, 8१ में व्याख्यात हैं । पर्यायः २२-२८ ॥२२ भुरिक प्राजापत्या त्रिष्टुप, २३ श्रार्ची गायत्री ; २४ आसुरी पङ्क्तिः ; २५ श्रासुरी गायत्री ; २६ आय॑नुष्टुप् ; २७, २८ प्राजापत्याऽनुष्टुप्॥ १६-(सर्वस्मै ) समस्ताय जगते । अन्यत् पूर्ववत्-म० ११ ॥ २०-व्याख्यातः-म०१२॥ २१-(सर्वे ) समस्ताः । अन्यत् पूर्ववत्-म० १३ ॥ .. ३॥ .
. च। चं॥ -- ( ३,०१४) अथर्ववेदभाष्य सू० ४ [rj ब्रह्मच तपश्च कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नर्भश्च ब्राह्मणव- च सं चान्न चान्नाद्यं च । ॥ २२ ॥ ब्रह्म । च । तपः । च । कीर्तिः । च । यशः । च । अम्भः नभः । च । ब्राह्मण-वर्च सम् । चु' । अन्नस् । चु । अन्न- अद्यम् । च । ० ॥ २२ ॥ भूतं च भव्य च श्रृद्धा च रुचिश्च स्वर्गश्च स्वधा भूतम् । च । भव्यम् । च । श्रद्धा । च । रुचिः । च । स्व:-गः। चु । स्वधा । च ॥ २३ ॥ य एतं देवमैकवृतं वेद ॥ २४ ॥ यः । र तम् । देवस् । ए क-वृतम् । वेद ॥ २४ ॥ भाषार्थ-(ब्रह्म) वेदं (च.) और (तपः) ऐश्वर्य (च)-और (कीर्तिः) ईश्वर. गुणों के कीर्तन और विद्या आदि. गुणों से बड़ाई ] (च) और (यशः) यश [शूरता श्रादि से नाम ]. (च) और (अम्भः). पराक्रम (च) और (नभः ) प्रवन्ध सामर्थ्य (च ) और ( ब्राह्मणवर्चसम्). ब्रह्मज्ञान का तेज (च) और (अन्नम् ) अन्न (चच) और (अन्नाद्यम् ) अन्न के समान खाने योग्य द्रव्य ॥२२॥ ( भूतम् ) अतीत वस्तु (च) और (भव्यन् ). होनहार वस्तु (च) और ( श्रद्धा ) श्रद्धा [विश्वाल ] (च ) और (रुचिः) रुचि [प्रीति ] (च) और (स्वर्गः) स्वर्ग [आनन्द ] ( च च ) और (स्वधा). प्रात्मधारण शक्ति [ उस पुरुष के लिये होते हैं J॥२३॥ ( यः) जो (एतम ) इस (देवम् ) प्रकाशमय (एकवृतम् ) अकेले वर्तमान [परमात्मा] को (वेद) जीनता है॥२४॥ । २२-(ब्रह्म) वेदः (च) (तपः ) ऐश्वर्यम् । अन्यत् पूर्ववत्-म०१४॥ २३-(भूतम् ) अतीतं वस्तु (च ) (भव्यम् । भविषद् वस्तु (च) (श्रद्धा). विश्वासः (रुचिः) प्रीतिः (च) (स्वर्गः) सुखप्रापकः। श्रानन्दः (च) ( स्वधा) आमधारणशक्तिः (च)॥२४-श्रयं व्याख्याता-म० १५॥
. ܀ ܀ सू०.४ [४८२] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,०१५.) भावार्थ-जो मनुष्य परमात्मा के गुणों को साक्षात् करते हैं, वे ही संसार में अनेक प्रकार प्रात्मोनति करके अनेक प्रानन्द पाते हैं ॥ २२.२४ ॥ मन्त्र २२ के लिये ऊपर मन्त्रं १४ और २४ के लिये मन्त्र १५ देखो। स एव मृत्युः सो३' मृतं सो३' व १ स रक्षः ॥ २५ ॥ सः। एव । मृत्युः। सः। अमृतम् । सः। अभ्यम् । सः । रक्षः २५ भाषार्थ-(सः एव ) वही [ परमेश्वर ] ( मृत्युः) मरण करने वाला (सः) वही (अमृतम् ) अमरपन का कारण ,( सः) वही ( अभ्वम् ) महान् (सः) वही (रक्षः) रक्षा करने वाला[ परब्रह्म ] है ॥ २५ ॥ भावार्थ-परमात्मा की उपासना करके मनुष्य क्ल शो से बचकर मुख पाते हुये महान् रक्षक बने ॥ २५ ॥ स रुद्रो वसुधनिर्वसुदयै नमोवाके वषट्कारोऽनु संहितः ॥२६॥ स: । कुद्रः। वसु-वनिः । वसु-देय । नमः-वाके । वषट्-कारः। अनु । सम्-हितः ॥ २६ ॥ भाषार्थ-(सः) वह (रुद्रः) ज्ञान दाता, (वसुवनिः ) श्रेष्ठों का उपकारी [ परमेश्वर ] ( वसुदेये ) श्रेष्ठों करके देने योग्य (नमोवाके) नमस्कार वचन में ( वषट्कारः) दान करने वाला (अनु) निरन्तर (संहितः ) स्था- पित है ॥२६॥ २५-(सः) परमेश्वरः (एव) (मृत्युः) मारकः। मरणस्य हेतुः (सः) (अमृतम् ) अमरणस्य कारणम् (अभ्वम् ) १०४ । १७ । ५। प्रशू पुषि० । उ० १ । १५१ । अभि शब्दे-वन् , छान्दसो नलोपः । अभ्यो महन्नाम- निघ०३।३। महत् ( सः ) ( रक्षः) सर्वधातुभ्योऽसुन् । 'उ०४। १८६ रिक्ष पालने-असुन् । रक्षकं ब्रह्म । २६-(सः) परमेश्वरः (रुद्रः )रु गतौ-विप तुक् च+रा दाने -फ। शानदाता (वसुवनिः) वसु+वन उपकारे-इन् । वसूनां श्रेष्ठानामुपकारक: (वसुदेये ) वसुभिः श्रेष्ठेर्दातिव्ये (नमोवाके) नमस्कारवचने ( वषट्कारः) वह प्रापणे-डपटि । दानस्य कर्ता (अनु) निरन्तरम् (संहितः ) स्थापितः ।
तस्ये में संव ११ - (३,०१६) अथर्ववेदभाष्ये 'सू०४ [ ४८२.]. भावार्थ-वह परमात्मा वेद द्वारा ज्ञान देकर श्रेष्टों का मान करता है और उपासकों को सदा सुख देता है ॥२॥ यातव उप प्रशिर्षमांसते ॥ २॥ तस्य । दुमे । सवै । यातवः। उप । प्र-शिर्षम् । भासते ॥२०॥ भाषार्थ-(इमे सर्वे) यह सब (यातवः) चलने वाले [.पृथिवी आदि लोक और प्राणी ] ( तस्य ) उस [ परमेश्वर ] के (प्रशिपम् ) , उत्तम शासन को ( उप आलते ) मानते हैं ॥ २७ ॥ भाषार्थ -परमात्मा के ही नियम में सब लोक और सब प्राणी चलते हैं ॥ २७ ॥ तस्यासू सर्वा नक्षत्रा वश चन्द्रभंसा सह ॥ २८ ॥ तस्य । अमू । सवा । नक्षत्रा । वर्थे । चन्द्रमसा । सह २८(१७ भाषार्य-( तस्य ) उस [ परमात्मा ] के (वशे) वश में ( श्रम् ) वे (सर्वा) सव (नक्षत्रा) नक्षत्रे [चलनेवाले तारा गण] (चन्द्रमला सह) चन्द्रमा के साथ [वर्तमान हैं ] ॥ २८ ॥ भावार्थ-उस परमात्मा के आकर्षण धारण नियम में यह सब तारा गण आदि ठहरे रहकर घूमते हैं ॥ २८ ॥ attw. . . । पर्यायः ॥ 4 २६ -४५ ॥ २९, ३३, ३६, ४०, ४५ श्रासुरी गायत्री; ३०, ३२, ३५, ३६, ४२ प्राजापत्याऽनुष्टुप्: ३१ साम्नी पङ्क्तिः, ३४, ३७, ३८ सामन्युष्णिक; ४१ साम्नी वृहती; ४३ अार्षी गायत्री; ४४ सामन्यनुष्टुप् ॥ २७:-( तस्य ) परमेश्वरस्य (इमे) विद्यमानाः ( सर्वे) (यातवः) कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्व। उ० १ । ७३ । या गतिपापणयोः-तु । गतिशीलाः पृथिव्यादिलोकाः प्राणिनश्च (प्रशिषम् ) शासु अनुशिष्टौ-क्विम् । उत्तम शासनम् (उपासते ) सेवन्ते ॥ २८-(तस्य ) परमेश्वरस्य (अमू) अमूनि ( सर्वा) सर्वाणि ( नक्षत्रा) गतिशीला तारांगणाः (वशे) शासने (चन्द्रमसा) चन्द्रेण (सह) साकम् ॥ :
सू०.४ [ ४८२] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,०१७) स वा भनौऽजायत्तस्मादहस्जायते ॥ ८ ॥ सः। वै । अह्नः । अजायत । तस्मात् । प्रहः । अजायतु ॥२६ भाषार्थ-(सः) वह [ कारण रूप परमात्मा ] (वै ) अवश्य (अहः) कार्यरूप ] दिन से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् )उस [ कारण रूप] से (अहः) [ कार्यरूप] दिन (अजायत ) उत्पन्न हुआ है ॥ २६ ॥ भावार्थ-कार्यरूप जगत को देखकर विद्वान् लोग निश्चय करते हैं कि सब दिन आदि सृष्टि का बनाने वाला सर्वशक्तिमान् अन्तर्यामी परमेश्वर है २६ स वै राज्यो अंजायत तस्माद् रात्रिरजायत ॥ ३०॥ सः । वै। राज्यः। अजायत । तस्मात् । रात्रिः। अजायत॥३० भाषार्थ-(सः) वह [ कारणरूप ईश्वर ] (वै) अवश्य (राध्याः) [कार्यरूप] रात्रि से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस [ कारण रूप] से (रात्रिः) रात्रि (अजायत ) उत्पन्न हुयी है ॥ ३० ॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान है ॥ ३० ॥ संवा अन्तरिक्षादजायतं तस्मादन्तरिक्षमजायत ॥ ३१ सः । अन्तरिक्षात् । अजायत । तस्मात् । अन्तरिक्षम् । अजायत ॥ ३१ ॥ भाषार्थ-(स) वह [ कारणरूप ईश्वर] (वै) अवश्य(अन्तरिक्षात्) [कार्य रूप ] अन्तरिक्ष से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस [कारणं रूप] से (अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष ( अजायत ) उत्पन्न हुभा है ॥ ३१॥ • भावार्थ-मन्त्र २६ के समान ॥ ३१ ॥ २8-(सः) कारणरूपः परमेश्वर: ( वै) अवश्यम् ( अह्नः) कार्यरूपाद् दिनात् -(अजायत ) प्रादुरभवत् (तस्मात् ) कारणरूपात् ( अंहः) दिनम् (अजायत) उदपधत ॥ ३२-(राज्याः) कार्यरूपाया निशायाः ( रात्रिः ) निशा । अन्यद् यथा म०॥:२६॥ ३१-(अन्तरिक्षात् )कार्यरूपान्मध्यलोकात् (अन्तरिक्षम्)।अन्यद् गैतम् ॥ .... : : . -- . (३,०१८) अथर्ववेदभाष्ये सू० ४ [ ४८२] स वै वायोरजायत तस्माद् वायुरजायत ॥ ३२ ॥ सः । वै। वायो।। अजायत । तस्मात् । वायुः। अजायत ।३२ भाषार्थ-(सः) वह [ कारण रूप ईश्वर ] (वै ) अवश्य (वायोः) कार्यरूप ] चपन से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस कारणरूप] ले (वायुः ) पवन (अजायत ) उत्पन्न हुआ है ॥ ३२ ॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान है ॥ ३२ ॥ स वै दिवाऽजायत तस्माद् द्यौरध्यजायत ॥ ३३ ॥ सः । वै। दिवः । अजायत । तस्मात् । द्यौः। अजायत ॥३३॥ भाषार्थ-(सः.) वह [ कारणरूप ईश्वर] (वै) अवश्य (दिवः) [कार्यरूप ] सूर्य से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस [ कारणरूप ] से ( द्यौः ) सूर्य (अधि') यथाविधि (अनायत ) उत्पन्नात्रा है. ॥ ३३ ॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान ॥ ३३ ॥ स वै दिग्भ्योऽजायत तस्माद् दिशोऽजायन्त ॥ ३४ ॥ सः। वै। दिक्-भ्यः । अजायत । तस्मात् । दिशः। अजायन्त३४ भाषार्थ-(सः ) यह [ कारणरूप ईश्वर ] (वै] अवश्य (दिग्भ्यः). [कार्यरूप] दिशाओं से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस [ कारण रूप].ले (दिशः) दिशायें (अंजायन्त ) उत्पन्न हुयी हैं || ३४ ॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान ॥ ३४ ॥ स वै भूमरजायत तस्माद् भूमिरजायत. ॥.३५ ॥ सः । भूमः । अजायत । तस्मात् । भूमिः । अजायत ॥ ३५ ॥ ३२-(वायोः) कार्यरूपात् पवनात् ( वायुः) पवनः । अन्यद् गतम् ॥ ३३-(दिवः) कार्यरूपात सूर्यात् ( द्यौः) सूर्यः (अधि.) यथाविधि, अन्यद्गतम् ॥ ३४-(दिग्भ्यः) कार्यरूपाभ्यो दिशाभ्यः (दिशः) दिशा (अजायन्तः) उदपचन्त । अन्यद-गतम् ॥ .. - - ०४ [२] प्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,०१६) भाषार्थ-(सः) वह [कारणरूप ईश्वर ] (वै) अवश्य (भूमेः) [कार्यरूप] भूमि ले (अजायत) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस कारणरूप] ले (भूमिः) भूमि (अजायत ) उत्पन्न हुई है ॥ ३५ ॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान ॥ ३५ ॥ स था अगरैजायत तस्मादगिरजायत ॥ ३६ ॥ सः । वै । अग्नी । अजायत । तस्मात् । अग्निः । अजायत ३६ भाषार्थ-(ला) वह [ कारणरूप ईश्वर] (वै) अवश्य (अग्नेः) [कार्यरूप ] अग्नि से (अजायत् ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस [कारणरूप] से (अग्निः) अग्नि [.सूर्य, विजुली श्रादि तेज] (अजायत) उत्पन्न हुना हैं॥३६॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान ॥ ३६ ॥ स वा अभ्योऽजायत तस्मादापोऽजायन्त ॥ ३० ॥ . स। वै । मृत्-भ्यः। अजायत । तस्मात् । प्रापः । अजायन्त३७ भाषार्थ-(सा) वह [कारणरूप ईश्वर] (वै) अवश्य (अभ्या) [कार्यरूप ] जल से (अजायत ) प्रकट हुआ है, (तस्मात् ) उस [कारणरूप] से (आपः ) जल [वृष्टि नदी कूप आदि के ](अजायन्त ) उत्पन्न हुये हैं ॥२७॥ भावार्थ-मन्त्र २६ के समान॥ ३७॥ स वा ऋ ग्भ्योऽमायतु तस्मादृचौ जायन्त ॥ ३८ ॥ सः । वै । ऋक्-भ्यः। अजायत । तस्मात् । ऋचः। भुजायन्त .. ३५-(भूमेः ) कार्यरूपायाः पृथिव्याः (भूमिः) पृथिवी । भन्यद् गतम् ॥ ३६-(अग्नेः) कार्यरूपात् तेजसः (अग्निः) सूर्यविधुवादि तेजः। अन्यद् गतम् ॥३६॥ ३७-(अभ्यः) जलेभ्यः (आपः) वृष्टिनदी कूषादीनां जलानि । अन्य गतम् ॥ "- - (३,०२०) अथर्ववेदभाष्य सू. ४ [ ४८२] भाषा-(सः) वह [ परमात्मा] (वै ) अवश्य ( ऋग्भ्यः ऋचाओं [स्तुति योग्य वेद वारिणयों ] से (अजायत) प्रकट हुभा है, (तस्मात् ) उस- [परमात्मा ले (ऋचः) ऋचायें (अजायन्त ) उत्पन्न हुई हैं ॥ ३ ॥ भावार्थ -परमात्मा के सत्यगुण वेदों से जाने जाते हैं, जिनको उसने मनुष्यों के हित के लिये उत्पन्न किया है ॥ ३॥ स वै यज्ञादजायत तस्माद् यज्ञोऽजायत ॥ ८ ॥ सः । वै । यज्ञात् । अजायत । तस्मात् । यज्ञः । अजायत ३८ भाषार्थ-(सः) [ परमात्मा] (4) अवश्य ( यज्ञात् ) यज्ञ [ संयोग वियोग व्यवहार से (अजायत ) प्रकट हुना है, (तस्मात् ) उस [-परमात्मा ] से ( यज्ञः ) यज्ञ[संगेग वियोग व्यवहार] (अजायत) उत्पन्न हुआ है ॥३६॥ भावार्थ-परमात्मा ने परमाणुओं के संयोग वियोग से सृष्टि रचकर अपनी महिमा दिखायी है ॥ ३ ॥ यज्ञस्तस्य यज्ञः स यज्ञस्य शिरस्कृतम् ॥ ४० ॥ सः..यज्ञः। तस्य । यज्ञः : । सः । यज्ञस्य । शिरः। कृतम् भाषार्थ-(सः) वह परमात्मा] ( यज्ञः) संयोग वियोग करने वाला है, (तस्य) उस [ परमात्मा का ( यज्ञः) संयोग वियोग व्यवहार है, (सः) वह [ परमात्मा ) ( यज्ञस्य) संयोग वियोग व्यवहार का (शिरः शिर [प्रधान ] (कृतम् ) किया गया है।॥ ४०॥ भावार्थ-परमात्मा संसार में परमाणुनों का संयोग वियोग करने से सृष्टि और प्रलय का श्रादि कारण है, ऐला विद्वान मानते हैं ॥ ४०॥ ३--(भ्यः ) स्तुत्याभ्यो वेदवाणीभ्यः (ऋचः) स्तुत्या वेदवाण्यः। अन्यद्गतम् ॥ ३९-( यज्ञात् ) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-नङ् । परमारणूनां संयोगवियोगव्यवहारात् (यः ) संयोगवियोगव्यवहारः । अन्यद् गतम् ।। ४०-(ला) परमेश्वरः (यनः)म०३६ । संयोगवियोगकर्ता (तस्य) परमेश्वरस्य (यनः) संयोगवियोगव्यवहारः (सः) परमेश्वरः (यक्षस्य) संयोगवियोगव्यवहारस्य (शिरः) प्रधानः ( कृतम्) । .::. कृतम् ॥४० बयादर्श काण्डम् ॥ १६ ॥ - भद्राय सू०४ [४८२] (३,०२१) स स्तनर्यात, स वि द्योतते स. उ अश्मानमस्यति ॥ ११ ॥ सा। स्तनर्यात । सः । वि। द्योतते। सः । ॐइति । नश्मा- नम् । अस्यति ।। ४१॥ पापाय वा वा पुरुषायासुराय वा,॥ ४२ ॥ पापाय । वा..। भद्राय । वा । पुरुषाय । असुराय । वा ॥४२॥ भाषार्थ-(सः) वह [ परमात्मा ] (भद्राय ) श्रेष्ठ (पुरुषाय ) पुरुष के लिये (वा ) अंवश्य (वि) विविध प्रकार ( द्योतते) प्रकाशमान होता है, (सः ) वह (पापाय ) पापी के लिये (वा) अवश्य ( स्तनयति) मेघ समान [भयानक ] गरजता है, (सः उ) वही (असुराय ) असुर [विद्वानों के विरोधी] के लिये (वा) अवश्य ( अश्मानम् ) पत्थर (अस्यति ) गिराता है ॥ ४१, ४२ ॥ भावार्थ-परमेश्वर अपनी न्याय व्यवस्था से श्रेष्ठ धर्मात्माओं को आनन्द और दुष्ट छली कगटी लोगों के कष्ट देता है ।। ४१, ४२ ॥ यद्वी कृणोष्योषधीयद्वा वर्षसि भद्रया यद्वा जुन्यमवीवृधः॥४३ यत् । वा । कृणोर्षि । प्रोषधीः । यत् । वा । वर्षसि । भुद्रया। यत् । वा । जन्यम् । अवीवृधः ॥ ४३ ॥ तावास्ते मघवन् महिमोपौ ते तुन्वः शुतम् ॥ ४ ॥ तावान् । ते. सुघ-वन् । महिमा.। उपो इति । ते तुन्वः । शुतम् ।। ४४॥" उपो ते बध्वे बद्धानि यदि वासि न्यर्बु दस् ॥ ४५ ॥ (१८) उपो इति । ते । बध्वं । बद्धानि । यदि । वा । असि । नि, अर्बुदम् ॥ ४५ ॥ (१८) ४१, ४२-(स) परमेश्वरः ( स्तनयति ) मेघ इव गर्जयति (सः) (विविधम् ( द्योतते ) प्रकाशते (सः) (3) एव (अश्मानम् ) दण्डप प्रस्तरम् (अस्यति ) क्षिपति (पापाय ) दुष्टाय (वा)' अवधारणे (भद्राय) श्रेष्ठाय (वा) (पुरुषाय ) मनुष्णाय (अनुराया पुराणां विदुषां विरोधिने (वा) ॥ -- .
(३,०३२) अथर्ववेदभाध्य सू०.४ [ ४८२] r भाषार्थ-(यत् ) क्योंकि [ हे परमेश्वर !] तू (वा) अवश्य(ओपी:) ओषधियों [सोमलता अन्नादिको ] को (कृणोपि ) बनाता है, (यत्) क्योंकि तू (वा) अवश्य (भद्रया) उत्तमता से (वर्षसि ) मेह बरसाता है, और (यत्) क्योंकि तू ने (वा) अवश्य (जन्यम् ) उत्पन्न होते हुये जगत् ] को (अवीवृधः) बढ़ाया है ॥ ४३ ॥ [ उसी से, ] (मघवन् ) हे महाधनी ! [ परमेश्वर ] (तावान् )- उतनी [बड़ी]:(ते ) तेरी ( महिमा) महिमा है, ( उपो) और भी (ते) तेरी (तन्वः) उपकार शक्तियां (शतम् ) सौ [असंख्य ] हैं ॥ ४४ ॥ ( उपो) और भी (ते) तेरे (वध्वे ) नियम में [सब सत्ता वाले] (वद्धानि ) बंधे हुये हैं, (यदि) क्योकि दू (वा.) अवश्य (न्यवुदम् ) निरन्तर व्यापक [ब्रह्म ] (असि) है ॥४॥ : भावार्थ परमेश्वर वृष्टि द्वारा सोमलता अन्न आदि पदार्थ उत्पन्न करके सव प्राणियों का पालन कर्ता हुन्नी अगणित उपकार करता है, और वह सर्वव्यापक होकर सब संसार को नियम में रखता है ॥ ४३-४५ पर्याय: ५॥ ४६-११ ॥४६ श्रासुरी गायत्री; ४७ भुरिगार्षीगायत्री, ४ साम्न्युणिक, ४६.निवृत् साम्नी वृहती ; ५० प्राजापत्याऽनुष्टुप् : ५१ सान्नी पतिः ।। भूयानिन्द्रा नमुराद् भूयानिन्द्रामि मृत्युभ्यः ॥ ४६ ।। भूयोन् । इन्द्रः। नमुरात् । भूर्यान् । इन्द्र । सि । मृत्यु-भ्यः४६ ४३-(यत् । यतः (वा) अवश्यम् (कृणोषि) जनयसि (ओषधीः) सोमलतानादिपदार्थान् (यत्) (वा) (वर्षसि ) वृष्टिं करोषि (मद्रया) उत्तमतया ( यत् ) (वा) (जन्यम् ) जनेयुक् । उ०४ । १११ । जन जनने-यक्! उत्पद्यमानं जगत् (अवीवृधः) वर्धितवानसि ॥४४-(तावान् ) तत्परिमाणः (३) तव (मघवन ) धनवन् (महिमा ) महत्त्वम् ( उपो) अपि च (ते तव (तन्वः) तनु विस्तारे उपकारे च-ऊ। उपकृतयः (शतम्) असंख्यातम् ४५-(उपो) अपि च (ते) तव (वध्वे) इणशीभ्यां वन् । उ०१ । १५२ । धध संयमने-वन् । नियमे (बद्धानि) संयतानि सर्वाणि भूतानि (यदि) त्यतः (वा) अवश्यम् (:असि ) (न्य दम् ) अ०८1 - 101 अर्थ गतौ हिंसने : च उदच । निरन्तरगतिशीलं व्यापकं ब्रह्म n : " . ६. .
सू०४[४ त्रयोदशं कापडम् ॥ १३ ॥ (१३,०२३) - भाषार्थ-[हे परमेश्वर !] (इन्द्रः) परमऐश्वर्यवान् तू ( नमुरत् ) न मरने वाले नित्य परमारमाणु रूप जगत् ] से (भूयान् ) अधिक बलवान है, (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले । तू (मृत्युभ्यः) मरण वालों से [अनित्य कार्य रूप जगत् ] से (भूयान् ) अधिक बलवान् (अलि ) है ॥ ४६॥ भावार्थ-सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर दोनों प्रकारके नित्य कारण रूप और अनित्यकार्य रूप जगत् को अपने वश में रखता है। ४६ ॥ भूयानरोल्याः शच्याः पतिस्त्वमिन्द्रासि विभूः मभूरिति त्वो पास्महे वयम् ॥ ४७ ॥ भूयान् । अरोत्याः । शच्याः । पतिः । त्वम् । दुन्दु.। असि । वि-भूः । म-भूः। उप । आस्महे । वयम् ॥ ४ ॥ भाषार्थ-(इन्द्र,) हे परम ऐश्वर्य वाले [परमात्मन् ! ] ( त्वम्) तू (अरात्याः ) शत्रु से (भूयान् ) अधिक बलवान् , (शच्याः) वाणी, कर्म वा बुद्धि का (पतिः) पति, (विभूः) व्यापक और (प्रभूः).समर्थ (असि ) है, (इति) इस प्रकार से (वयम् ) हम (त्वा उप प्रास्महे) तेरी उपासना करते हैं॥४७॥ भावार्थ-मनुष्यों को योग्य है कि पूर्ण बली सर्वखामी जगदीश्वर की इति । त्वा । ' । ४६-(भूयान् ) अधिकतरो बलवान् ( इन्द्रः) परमेश्वर्यवांस्त्वम् (नमु- रात्) कप्रकरणे मूलविभुजादिभ्य उपसंख्यानम् । वा० पा० ३।२।५। मृ हिंसायाम् , वेदे तु मरणे-क। उदोष्ठ्यपूर्वस्य । पा० ७ । १ । १०२ । उत्वम् । अमरणस्वभावात् (भूयान्) (इन्द्र) (असि) (मृत्युभ्यः.) मतुपो.लोपः। मृत्युवद्भ्यः॥ ४७-(भूयान ) अधिकतरो बली (अरात्याः ) शत्रुसकाशात्.(शच्याः) शची वाङ्नाम-निघ० १।११। कर्मनाम-२ । १ । प्रजानाम-३६ वाण्या: 'कर्मणे बुद्धर्वा (पतिः) पालकः ( त्वम् ) ( इन्द्रः)परमेश्वर्यवन्ः (असि) ((विभूः) व्यापकः (प्रभूः )समर्थः ( इति अनेन प्रकारेण (वा.) त्वाम् (डपा- स्म) सेवामहे (वयम् ) उपसकाः ॥ .
। । (३,०२४) अथर्ववेदभाष्ये सू० ४ [ ४८२] उपासना से प्रात्मवल बढ़ावें ॥१७॥ मन्त्र ४३-५१ महर्पिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाग्यमूमिका उपासमा विष पृ०.१६०-१६१ में व्याख्यात हैं। नमस्ते अर अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यतः ॥ ४८ ॥ नमः । ते । अस्तु । पश्यत । पश्यं । मा । पश्यत ॥ ४ ॥ अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्च सेनं ॥ ४ ॥ अन्न-अद्यैन । यशंसा । तेजसा । ब्राह्मण-वर्च सेन ॥ ८ ॥ भाषार्थ-(पश्यत) हे देखने वाले [ जगदीश्वर !] (ते) तेरे लिये (नमः) नमस्कार (अस्तु ) होवे, ( पश्यत ) हे देखने वाले ! (मा) मुझको (अन्नाद्यन ) भोजन योग्य अन्न आदि के साथ, ( यशला ) यश [ शूरता आदि.से पाये हुये नाम ] के साथ, (तेजला) तेज़ [निर्भयता,प्रताप ] के साथ और. (घ्राह्मणवर्चसा ) वेदज्ञान के बल के साथ [पश्य ) देख ॥४८,४६ ॥ भावार्थ:-मनुष्य सर्वद्रष्टा परमात्मा की उपासना से पुरुषार्थ और विवेक पूर्वक सब आवश्यक पदार्थ पाकर आनन्द भोगें ॥४८, ४६ ॥ अभ्भो अमो महः-सहु इति त्वोपास्महे वयम् 1 0 1 0 ॥ ५० ॥ अम्भः अमः । महः । सहः । इति ।.० ॥ ५० ॥ भाषार्थ-[ हे परमात्मन् ! ] तू (अम्भः) व्यापक, (अमः) ज्ञान- स्वरुप, (महः) पूज्य और (सहः) सहनस्वभाव [ ब्रह्म ] है, (इति) इस + ४,४E-(नमः) प्रणामः (ते) तुभ्यम् (प्रस्तु) (पश्यत ) भृमृदृशि. यजिका उ० ३१११० । दृशिदर्शने-अतच्, छन्दलि अशिति प्रत्ययेऽपि पश्यादेशः। हे दर्शत सर्वदर्शका ( पश्य ) अवलोकय (.मा ) माम् ( पश्यत्त ) सर्वदर्शक (अन्नाद्येन) भक्षणीयेनान्नादिना (यशसाः) शौर्यादिप्राप्तेन नाम्ना (तेजसा.) निर्भयत्वेन प्रतापेन . ब्राह्मणवर्चसेन ) वेदज्ञानवलने । ५० (अम्भः) म १४ । आपल व्याप्तौ-असुन् । व्यापकं ब्रह्मः (अमः) श्रम गतो-अनुन् । ज्ञानस्वरूपम् ( महः ) पूजनीयम् (सहा) सहनशीलम् ।
सू०४ [४८२] त्रयोदशं काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,०२५) प्रकार से (वयम् ) हम (त्वा उप प्रास्महे ) तेरी उपासना करते हैं ॥ ५० ॥ भावार्थ-मनुष्य शुद्ध अन्तः करण से परमात्मा की उपासना करके उन्नति करें। ५०॥ इस मन्त्र से लेकर मन्त्र ५३ तक बम्बई गवर्नमेन्ट बुकडिपो और अजमेर वैदिक यन्त्रालय के पुस्तकों में मन्त्र के पीछे प्रावृत्ति का चिह्न देकर मन्त्र ४ और राक्ष की प्रावृत्ति मानी है, परन्तु अन्य पुस्तको में श्रावृत्ति का चिह्न नहीं है । अम्भी अरुणं रजतं रजः सह इति त्वोपास्महे वयम् ।०1०५१(९८ अम्भः । अरुणम् । रजतम् । रजः । सहः । इति 10॥५१ (१८) भाषार्थ-[ हरमेश्वर 1.]तू ( अम्मा ) व्यापक, (अरुणम् ) झानख. रूप, (रजतम् ) प्रीति का हेतु श्रानन्द स्वरूप, ( रजः) ज्योतिः स्वरूप और (सहः) सहनशील [ब्रह्म ] है, (इति) इस प्रकार से ( वयम् ) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं । ५१ ।। भावार्थ-विद्वान् लोग सर्वव्यापक सर्वश आदि परमेश्वर की उपासना बार बार आदर पूर्वक कर के पुरुषार्थ करें ॥५१॥ पर्यायः ॥ - - ५२-१६॥ ५२, ५३ प्राजापत्याऽनुष्टुप् : ५४ पार्षी गायत्री, ५५ साम्- न्युष्णिक ; ५६ निवृत्सानी बृहती ॥ उरुः पृथुः सुभूर्भुव इति त्वोपास्महे त्यम् ॥ २ ॥ : उरुः । पृथुः । सु-भूः । भुवः । इति । ० ॥ ५२ अन्यत् पूर्ववत्-म०४७॥ ५१.-(अम्भः) म०५० । व्यापकम् (अरुणम्) अत्तश्च । उ०३।६० । गतिप्रापणयोः-उनन् , चित् । शानस्वरूपम् ( रजतम् ) पृषिरविभ्यां कित्। उ०३ । १११ । रज रागे-अतच , कित् । रजति प्रियं भवतीति रजतम् । प्रीति- हेतु । आनन्दस्वरूपम् ( रजः) रख रागे-असुन् । रजो रजते,ज्योतीरज उच्यते- निरु०४।१६ तेजः स्वरूपं ब्रह्म । अन्यद् गतम् ॥
] . . (३,०२६) अथर्ववेदभाष्ये सू०४ [४८२ • भाषार्थ-[हे परमेश्मेवर ] तू (उरुः ) विशाल, (पृथुः) विस्तृत, (:सूभूः) अच्छे प्रकार वर्तमान [ ईश्वर ] और ( भुवः) व्यापक वा शुद्ध ब्रह्म है, (इति) इस प्रकार से (वयम् ),हम (त्वा उप प्रास्महे ) तेरी उपासना... करते हैं ॥५२॥ भावार्थ-परमात्मा सव में विशाल सर्वशक्तिमान् श्रादि गुण युक्त है; ऐसा जान कर मनुष्य उसं की उपसना करें और संसार में कोर्ति बढ़ावें ॥५२॥ मन्त्र ५२ और ५३. महर्षि दयानन्द कृतं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका उपा. सना विषय पृष्ठ १६१, १६२ में व्याख्यात हैं ॥ प्रयो वरो व्यचौ लोक इति त्वोपास्महे वयम् । । । ० ॥३॥ प्रथः । वरः। व्यः.। लोकः । इति । ० ॥ ५३ ॥ भाषार्थ[हे परमात्मन् ! ]तू (प्रथः) प्रसिद्ध, (वर्ग:) श्रेष्ठ, (व्यचः) यथावत् मिला हुआ [ब्रह्म ] और (लोकः ) देखने योग्य [ ईश्वर ] है, (इति) इस प्रकार से (वयम् ) हम (त्वा-उपास्महे ) तेरी उपासना करते हैं ॥५३ ॥ भावार्थ-मनुष्य सुप्रसिद्ध श्रादि जगदीश्वर की उपासना से अपने को सुप्रसिद्ध, श्रेष्ठ, सर्वसम्बन्धी और दर्शनीय बनावें ॥५३ ॥ भवद्वसुरिदद्वसुः सं यद्वसुरायद्व'मुरिति त्वोपास्महे वयम् ॥५४॥ भवत्-वसुः । दुदत्-वसुः। संयत्-वसुः । प्रायत्-वसुः । इति । स्वा । उर्म । मास्महे । वयम् ।। ५४ । - . 1 . AP drinata V- 5. ५२-(उरुः) विशालः (पृथुः ) विस्तृतः ( सुभूः) सुष्टु वर्तमानः (भुव:): भूरखिभ्यां कित्।। उ-४।२१७ ! भू सत्तायां शुद्धौ च-असुन्, कित, महान्याहृति- रियम्। व्यापक-शुद्ध वा ब्रह्म । अन्यत् पूर्ववत् ॥ । ५३ (प्रथा) प्रख्यातम् (वरः) चून वरणे असुन् । श्रेष्ठम् (व्य) अन् । १६व्यच छलें सम्बन्धेच-असुन्। सर्वसम्बद्धम् ( लोक दर्श- लीयः । सन्यत् पूर्ववत् ॥ . ८.१ ८ - • सू०४ [४६२ त्रयोदर्श काण्डम् ॥ १३ ॥ (३,०२) भावार्थ-[हे परमेश्वर !] तू (भवालः) धन प्राप्त कराने वाला (इदद्वसुः ) श्रेष्ठ पुरुषों को ऐश्वर्यवान् करने वाला, (संयद्वसुः ) पृथिवी आदि लोको को नियम में रखने वाला और (प्रायद्वसुः ) निवास साधनों का फैलाने वाला है, (इति.) इस प्रकार से (वयम्-) हम (त्वा उप पास्महे ) तेरी उपासना करते हैं। ५४ ॥ भावर्थ-हे मनुष्णो ! परमेश्वर की उपासना से परस्पर सुधार करो, उसने तुम्हारे लिये सुवर्ण आदि धन, श्रेष्ठ पुरुष. पृथिवी आदि लोक और अनेक सुख के साधन उत्पन्न किये हैं ॥ ५४॥ नमस्ते प्रस्तु पश्यत पश्य मा पंश्यत ॥ ५५ ॥ नमः । ते । अस्तु । पश्यत । पुश्यत ॥ ५५॥ अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्च सेन ॥ ५६ ॥ ( २० ) भन्नु-अद्येन । यशंसा । तेजसा । ब्राह्मण-वर्च सेनं ॥५६॥ (२०) भाषार्थ-(पश्यत ) हे देखने वाले [जगदीश्वर 17 (ते) तेरे लिये (नमः ) नमस्कार (अस्तु ) होवे, (पश्यत ) हे देखने वाले ! (मा). मुझ (अन्नाधेन ) भोजन योग्य अन्न आदि के साथ, ( यशसा ) यश [ शुरता आदि सं पाये हुये नाम] के साथ, (तेजसा ) तेज [निर्भयता, प्रताप] के साथ और (ग्रामणवर्चसा) वेद शान के साथ (पश्य ) देख ॥ ५५, ५६ ॥ भावार्य-मनुष्य सर्घद्रष्टा परमात्मा की उपासना से पुरुषार्थ और । पश्य मा ५४-(भवद्वसुः) भू सत्तायां माप्तौ च-शत् । भवन्ति प्रामुवन्ति वसूनि धनानि यस्मात् सः ( इदद्वसुः ) इदि परमैश्वर्य-शत, नकारलोपश्छान्दसः। इन्दन्ति परमैश्वर्यवन्तो भवन्ति वसवः श्रेष्ठा यस्मात् सः (संयवसुः) यम- नियमे-क्विप् । संयमयति वसून् पृथिव्यादिलोकान् यः सः(प्रायद्वसुः ) पाङ् +यमु उपरमे-क्विम्। आयच्छते विस्तारयति वसूनि निवाससाधनानि यः सः। अन्यत् पूर्ववत् ॥ ५५, ५६-सर्व पूर्ववत्-म०४८, ४६ ॥
(३,०२८) अथर्ववेदभाष्ये ०४ [४८२. विवेक पूर्वक सब प्रविश्यक पदार्थ पाकर प्रानन्द भोगें ॥५५, ५६॥ :- ... ":" इति त्रयोदशं काण्डम् ॥ . इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितेमहांगुणमहिम श्री सयाजीराव गायक- वाड़ाधिष्ठित बड़ोदे पुरीगतश्रावणमासपरीक्षायाम् ऋक्सामाधर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्री पण्डित क्षेमकरणदास त्रिदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये त्रयोदशं काण्ड समाप्तम् ॥ १. इदं ,काण्ड प्रयागनगरे प्राषाढमासे कृष्णषष्ठ्यां तिथौ १६७५, . , [पञ्चसप्तत्युत्तर एकोनविंशतिशतके] विक्रमीये संवत्सरे । धीर-धीर-चिरप्रतापि-महायशस्वि ...: श्री राजराजेश्वर पञ्चमजार्ज महोदयस्य सुसाम्राज्ये सुसमाप्तिमगात् ॥ . १ .IN मुद्रितम्- श्रावणशृङ्गा ४ संवत् १६७५ वि० ता० १० अगस्त १८१८ ई० ॥
अधर्ववेदभाष्य सम्मतियाँ । श्रीमती मार्य प्रतिनिधिसभा, पंजाब, गुरुदत्त भवन लाहौर अन्तरंग सभा के प्रस्ताव संख्या ३ तिथि ६-१२-७३ की प्रति ला० दीवान चन्द प्रतिनिधि आर्यसमाज बटाला का प्रस्ताव, कि.पं. क्षमा करणदास को अथर्ववेद भाष्य के लिये ४०, मासिक की सहायता दी. जावे, उपस्थित हुआ । निश्चय हुआ कि २५) मासिक की सहायता एक वर्ष के लिये दी जावे और उसके परिवर्तन में उतने मूल्य की पुस्तके उनसे स्वीकार की जावें ॥ १. श्रीमती प्रार्यप्रतिनिधि सभा संयुक्त प्रदेश प्रांगरां और अवध, स्थान बुलन्दशहर, अन्तरंग सभा ता० ४ जून १८५६ ई० के निश्चय संख्या १३ (अ) और (ब) की लिपि । (अ) समाजों में गश्ती चिट्ठी भेजी जावे कि वे इस भाष्य के ग्राहक बने तथा अन्यों को बनावें। (व.) सभा सम्प्रति १.वर्ष पर्यन्त १५) मासिक एक क्लर्क के लिये पं० क्षेमकरणदास जी को देवे, जिसका बिल उक्त पंडित जी कार्यालय सभा में भेजते रहें। इस धन के बदले में पंडित जी उतने धन की पुस्तके सभा को देंगे। लिपि गश्ती चिट्ठी श्रीमती प्रार्यप्रतिनिधि सभा जी पूर्वोक्त निश्चय के अनुसार समाजों को भेजी गयी ( संख्या ५८०६ प्राप्त २० जूलाई १८१६ ई०) ॥ ओ३म् ॥ न्यवर, नमस्ते! आपको ज्ञात होगा कि आर्य समाज के अनुभवी वयोवृद्ध विद्वान् श्री पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी गत कई वर्षों से बड़ी योग्यता पूर्वक अथर्ववेद का भाष्य कर रहे हैं। आपने महर्षि दयानन्द के अनुसार ही इस भाष्य को करने का प्रयत्न किया है। भाष्य कारडी में निकलता है अब तक ६ कांड निकल चुके हैं। आर्युसमाज के वैदिक साहित्य सम्बन्ध में वस्तुतः यह बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य हो रहा है । त्रिवेदी महाशय के भाष्य की जानकारों ने खूब प्रशंसा की है। परन्तु खेद है कि अभी आर्यसमाज में उच्च कोटि के साहित्य को पढ़ने की ओर "लोगों की बहुत कम रुचि है । जिसके कारण त्रिवेदी जी अर्थ हानि उठा रहे हैं । भाष्य के ग्राहक बहुत कम है। लागत तक वसूल नहीं होती। वेदों का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना पार्यमात्र का प्रधान कर्तव्य है । अतएव सविनय निवेदन है कि वैदिक धर्मीमात्र श्री त्रिवेदी जी को उनके महत्त्वपूर्ण गुरुतर कार्य में साहस प्रदान करें। स्वयम् ग्राहक पर्ने और दूसरों को बनाये। ऐसा करने से भाष्यकार महाशय, उसे छापने की अर्थ सम्बन्धिनी चिन्ताओं से मुक्त होकर भाष्य को और भी अधिक उत्तमता से सम्पादन करने की ओर प्रवृत्त होंगे। आशा है कि वेदों के प्रेमी. उक्त प्रार्थना पर ध्यान दे इस ओर अपना कुछ 'कर्तव्य समझेगे। प्रत्येक प्रार्य के घर में वेदी के भाष्य होने चाहिये । समाज के पुस्तकालयों में तो उनकी रखना बहुत ही जरूरी है । भाष्य को प्रत्येक कांड का : मूल्य त्रिवेदी जी ने बहुत ही थोड़ा रक्खा है:- त्रिवेदी-जी से पत्र :व्यवहार में लूकरगंज, प्रयाग के पते पर, कीजिये। जल्दा से भाष्य मंगाइये। Sair. नन्दलाल सिंह B.Sc., LL. B. उपमन्त्री। - भवदीयार::. : . AN - ( ४ ) . चिट्ठी संख्या २७० तिथि १०-१२-१५१४, । कार्यालय श्रीमती मार्य- प्रतिनिधि सभा, संयुक्तप्रान्त नागरा व अवध; बुलन्दशहर । आपका पत्र संख्या १०१ तथा अंथर्ववेद भाष्य का तृतीय कांड मिला। इस कृपा के लिये अनेक धन्यवाद है। वास्तव में आर्यसमाज के साहित्य को समृद्धिशाली बनाने में बड़ा कार्य कर रहे हैं, आपकी विद्वत्ता और कृपा के लिये आर्य संसार ही नहीं, प्रत्युत प्रत्येक शिखा-सूत्रधारी को प्रामारी होना चाहिये । ईश्वर आपको उत्सरोचर उस महत्त्व पूर्ण कार्य के सम्पादन और, समाप्त करने के लिये शक्ति प्रदान करें, ऐसे उपयोगी ग्रन्थ प्रकाशन को आप सदैव जारी रखें यही प्रार्थना है। भवदीय मदनमोहन सेठ (एम० ए० एल एल० बी०) मन्त्री समा । श्रीमान् पण्डित तुलसीराम स्वामी-प्रधान आर्य - प्रतिनिधि सभा संयुक्तप्रान्त, सामवेद भाष्यकार, सम्पादक वेदप्रकाश, मेरठ-१६१३.. ऋग्यजुर्वेद का भाष्य श्रीस्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने संस्कृत और भाषा में किया है, सामवेद का श्री पं० तुलसीराम स्वामी ने किया है, अथर्ववेद के भाष्य की बड़ी आवश्यकता थी। पं० होमकरणदास जी प्रयाग निवासी ने इस अभाव को दूर करना प्रारम्भ कर दिया है। भाष्य का क्रम अच्छा है। यदि इसी प्रकार समस्त भाष्य बन गया, जो हमारी समझ में कठिन है, तो चारो वेदों के भाषा भाष्य मिलने लगेंगे, पार्यो का उपकार होगा। श्रीयुत महाशय नारायणप्रसाद जी-मुख्याधिष्ठाता गुरुकुल वृन्दावन मथुरा-उपप्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा, संयुक्तप्रान्त । पार्यमित्र आगरा, २४ जनवरी १६१३। श्री पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी प्रयाग निवासी, ऋक् साम तथा अथर्ववेद सम्बन्धी परीक्षोत्तीर्ण अथर्ववेद का भाषा भाष्य करते हैं, मैंने सम्पूर्ण [प्रथम ] कांड का पाठ किया। त्रिवेदी जी का भाष्य ऋषि दयानन्द जी की शैली के अनु- सार भावपूर्ण संक्षिप्त और स्पष्टतया प्रकट करने वाला है कि मन्त्र के किस शब्द के स्थान में भाषा का कौनसा शब्द आया, फिर नोटों में व्याकरण तथा निरुक्त के प्रमाण, प्रारम्भ में एक उपयोगी भूमिका दे देने से भाष्य की उपयो- गिता और भी बढ़ गई है, निदान भाग्य अत्युत्तम, आर्यसमाज का पक्षपोषक और इस योग्य है कि प्रत्येक आर्यसमाज उसकी एक २ पोथी ( कापी) अपने पुस्तकालय में रक्खे। त्रिवेदी जी ने इस भाग्य का प्रारम्भ करके एक बड़ी कमी के पूर्ण करने का - ( ५ ) उद्योग किया है। ईश्वर उनको बल तथा वेद प्रेमी आवश्यक सहायता प्रदान करै निर्विघ्रता के साथ वह शुभ कार्य पूरा हो...छपाई और काग़ज़ भी अच्छा है। श्रीयुत महाशय मुन्शीराम जी -जिज्ञासु-मुख्याधिष्ठातागुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार-पत्र संख्या ६४ तिथि २७-१०-१९६६ । अथर्ववेद भाष्य आप का दिया व किया हुआ अवकाशानुसार तीसरे हिस्से के लगभग देख चुका हूं आप का परिश्रम सराहनीय है। तथा-पत्र संख्या ११४ तिथि २२-१२-१९६६। अवलोकन करने से भाष्य उत्तम प्रतीत हुप्रा । श्रीयुत पं० शिव शंकर शर्मा काव्यतीर्थ-छान्दोग्योपनिषद् भाष्यकार, वेदतत्त्वादि ग्रंथकर्ता वेदाध्यापक कांगड़ी गुरुकुल महाविद्यालय, आदि आदि, सम्पादक मार्यमित्र-- फ़रवरी १९१३ । अथर्ववेद भाष्य । श्री पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी जी का यह परिश्रम प्रशं- सनीय है ।......आप बहुत दिनों तक सरकारी नौकरी कर और अंब वहां से पेन्शन पाके अपना सम्पूर्ण समय संस्कृत पढ़ने में लगाने लगे। अन्ततः आपने वेदों में विशेष परिश्रम कर बड़ौदा राजधानी में वेदों की परीक्षा दी और उनमें उत्तीर्ण हो त्रिवेदी बने हैं। आप परिश्रमी और अनुभवी वृद्ध पुरुष हैं । आप का अथर्ववेदीय भाष्य पढ़ने योग्य है। श्रीयुत पंडित भीमसेन शर्मा इटावा-उपनिषद् गीतादि भाध्यकत घेदव्याख्याता कलकत्ता यूनीवर्सिटी, सम्पादक ब्राह्मण सर्वस्व इटावा, फ़रवरी १६१३॥ अथर्ववेदभाष्य-इसे प्रयाग के पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी ने प्रकाशित किया है। इसका क्रम ऐसा रक्खा गया है कि प्रथम तो प्रत्येक सूक्त में ..अभिप्राय यह है कि भाष्य का ढंग अच्छा है "भाष्यकर्ता के मानसिक विचारों का झुकाव आर्यसामाजिक सिद्धान्तों की तरफ़ है अतएव भाष्य भी आर्य सामाजिक शैली का हुआ है। तव भी कई अंशों में स्वामी दयानन्द के भाष्य से अच्छा है और यह प्रणाली तो बहुत ठीक है। से प्रारम्भ श्रीमती पंडिता शिवप्यारी देवी जी, १३७ हकीम देवी प्रसाद जी अतरसुइया, प्रयाग, पत्र ता०२१-१०-१९१५ ॥ भीयुत पण्डित जी नमस्ते, महेवा के पते से आपका भेजा हुआ पत्र और अथर्ववेद भाग्य चौथा कांड मिला, मैंने चारों कांड पढ़े, पढ़कर अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुआ। आपने हम सभों पर अत्यंत कृपा की है आपको अनेको धन्यवाद हैं। आशा है कि पांचवाँ कांड भी शीघ्र तैयार होकर पी० पी० द्वारा मुझे मिलेगा।
. . . : ... दो.पुस्तक हवनमन्त्राः की जिसका मूल्य ।। है कृपाकर भेज दीजिये। मेरी एक बहिन को आवश्यकता है-1.. श्रीयुत पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी-कानपुर,सम्पादक सरस्वती प्रयाग, फ़रवरी १९१३ । अथर्ववेद भाष्य-श्रीयुत क्षेमकरणदास त्रिवेदी जी के वेदार्थज्ञान और श्रम का यह फल है, कि आप ने अथर्ववेद का भाग्य लिखना और क्रम क्रम से प्रकाशित करना प्रारम्भ किया है। बड़ी विधि से आप भाष्य की रचना कर रहे हैं । स्वर सहित मूलमन्त्री पद पांठ, हिन्दी में सान्वयं अर्थ, भावार्थ, पाठा- न्तर, टिप्पणी श्रादि से आपने अपने भाष्य को भलंकृत किया है. आपकी राय है कि "वेदो में सार्वभौम विज्ञान का उपदेश है आपका भाग्य स्वामी दया.... नंन्द सरस्वती के वेदभाष्य के ढंग का है : श्रीयुत पण्डित गणेश प्रसाद शर्मा--संपादक भारतसुद्शाप्रवर्तक फतहगढ़, ता० १२ अप्रैल १९१३ । हर्ष की बात है कि जिस वेद् भाष्य. की बड़ी आवश्यकता थी, उसकी पूर्ति को प्रारम्भ होगया । वेद भाष्य बड़ी उत्तम शैली से निकलता है। प्रथम मन्त्र, पुनः पदार्थयुक्त भाषार्थ, उपरान्त भावार्थ, और नोट में सन्देह निवृत्ति के लिये "धात्वार्थ भी व्याकरण व निरुक्तं के आधार पर किया गया है, वैदिक धर्म के प्रेमियों को कम से कम यह समझ कर भी ग्राहक होना चाहिये कि उनके मान्य ग्रन्थ का अनुवाद है और काम पड़े पर उससे कार्य लिया जा सकता है। बाबू कालिकाप्रसाद जो-सिल्क मर्चेन्ट कमनगढ़ा, वनारस सिटी 'संख्या ५८६ ता० २७-३-१३ । : आपका भेजा अथर्ववेदभाष्य का वी० पी० मिला, मैं श्रापका भाष्य देखकर बहुत प्रसन्न हुश्रा, परमेश्वर सहाय करे कि श्राप इसे इसी प्रकार पूर्ण करें। आप बहुत काम एक साथ न छेड़कर 'इसी की तरफ़ समाधि लगोकर पूर्ण करेंगे । मेरा नाम ग्राहकों में लिख लीजिये, जबः २ अङ्क छ:मेरे पास भेज देनी । श्रीयुत महाशय रावत हरप्रसाद सिंह जी वर्मा, मु० एकड़का पोस्ट किशुनपुर, ज़िला फ़तेहपुर हसवा, पत्र ६ दिसम्बर १९१३ । वास्तव में आप का किया हुआ "अथर्ववेद भाष्य" निष्पक्षता का आश्रया लिया चाहता है। आप ने यह साहस दिखाकर साहित्य भण्डार की एक बड़ी भारी न्यूनता को पूर्ण कर दिया है। ईश्वर आपको वैद भण्डारे के प्रावश्य- कीय कार्यों के सम्पादन करने का बल प्रदान करें। - श्रीयुत महाशय पंडित श्रीधर पाठक जी (सभापति हिन्दी साहित्य सम्मेलन लखनऊ), मनोविनोदः श्रादि :अनेक ग्रन्थों के कर्ता, सुपरिन्टेन्डेन्ट गवर्नमेंट सेक्रेटरियट, पी० डब्ल्यू 'डी. श्री प्रयोगरीज, पंत्र त०१७-६-१३। wamyesna .
And [ ७. ] आप कामथर्ववेद भाज्याअवलोकन कर चित्त अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ। आपकी यह पारिहत्य-पूर्ण कृति वेदार्थ जिज्ञासुओं को बहुत हितकारिणी होगी। आप का घ्याख्याक्रम परम मनोरम तथा प्रांजल है, और अन्य सर्वथा उपादेय है। प्रकाश लाहौर १२ भाषाढ़ संवत् १८७३ ( २५ जून १८९६- लेखक श्रीयत पं० श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी) हम पण्डित क्षेमकरणदास जी का धन्यवाद करने से नहीं रह सकते- स्वामी ( दयानन्द ) जी ने लिखा है-कि वेद का पढ़ना पढ़ाना पार्यो का परम धर्म है-इसके अनुकूल श्री पंडित जी अपना समय वेद अध्ययन में लगाते हैं-और आर्यो के लिये परम उपयोगी पुस्तक प्रकाशित करने में पुरुषार्थ करते रहते हैं-पंडित जी ने इस समय तक हवन मन्त्री तथा रुद्राध्याय का भाषा में अर्थ प्रसिद्ध किया है-जो कि आर्यो के लिये पठन पाठन में उपयोगी । इस सम्बन्ध में यह अथर्ववेद के पांच कांड छपवा कर निःसन्देह बड़ा लाभ पहुंचाया है। पार्यो की जो शिक्षा प्रणाली थी उसको टूटे आज पांच हज़ार वर्प हो चुके हैं। ऐसे अंधेरे के समय में स्वामी जी ने वेद के ऊपर लोगों के भीतर दृढ़ विश्वास उत्पन्न करके एक धर्म का दीपक प्रकाशित किया। परन्तु हमें शोक यह है वेद के पढ़ने पढ़ाने में आर्य लोग इतना समय नहीं लगाते जिननाव प्रबन्ध सम्बन्धी झाडी को बाहों में लगाते हैं। हमारा विश्वास है कि जब तक पं० क्षेमकरणदास जी जैसे वेदाभ्यासी पुरुषार्थी लोग अपना समय वेदों के खोज में न लगावेंगे तब तक आर्य समाज का कोई गौरव नहीं बढ़ सकता । अथर्ववेद के अर्थ खोजने में बड़ी कठिनता है। इसके ऊपर सायण भाष्य उपलब्ध नहीं होता, जो इस समय तक छपा हुआ है वह बड़ी अधूरी दशा में है, सूक्त के सूक्त ऐसे हैं कि जिनके ऊपर अब तक कोई टीका नहीं हुई। ...इस समय जो पांच कांडों का भाष्य पंडित जी ने प्रका. शित किया है उसके लिखने का ढंग बड़ा अच्छा और सुगम है । प्रथम उन्होंने सूक्त के तथा मन्त्रों के देवता दिये हैं-पश्चात् छन्द...विद्वानों का यही काम है कि वह जैसे जैसे साधन उनके पास हो वैसा वैसा सोचकर वेद मन्त्रों का, 'अर्थ प्रकाशित करें। ऐसे सैकड़ों प्रयत्न जब होंगे, तब सच्चे अर्थ खोज करना आगामी विद्वानों को सरल होगा। परन्तु इस समय बड़ो भारी कठि- नाई यह है कि प्रकाशित पुस्तकों के लिये पर्याप्त संख्या में ग्राहक नहीं मिजते हैं और विद्वानों के पास सम्पत्ति का अभाव होने के कारण हानि के डर से पुस्तकों का प्रकाशित करना बन्द होता है । इसलिये सब पार्यो को परम उचित है कि पंडित करणदास जो जैसे विद्वान् पुरुषार्थी के ग्रन्थ माल लेकर उनको अन्य ग्रन्थ प्रकाशित करने की आशा देते रहे । त्रिवेदी जी कोई धनान्य पुरुष नहीं हैं, उन्होंने अपनी सारो सम्पत्ति जो कुछ उनके पास है . लगा दी है.........त्रिवेदी जी ने जो कुछ किया है वह वैदिक धर्म के प्रेम से प्रवृत्ति होकर-इस लिये न केवल सब प्रार्य पुरुषों का यह कर्तव्य है कि इस भाष्य को मोल लेकर त्रिवेदी जी को उत्साहित करें किन्तु धनाढ्य आर्य पुरुषों का यह भी कर्तव्य है कि उनकी आर्थिक सहायता करें। । "
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