Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Dravyagunvigyaanam Part-i
Front matter
, पुस्तकमाप्तिस्थान- १ मॅनेजर, निर्णयसागर प्रेस, २६।२८ कोलभाट स्ट्रीट, मुंबई २. २ वैद्य जादवजी त्रिकमजी आचार्य, डॉ. विगास स्ट्रीट, मुंबई २० (प्रन्थस्यास्य पुनर्मुद्रणायधिकारा ग्रन्थका खायत्तीकृताः सन्ति ।) Published by Satyabhamaba, Pandurang, for the Nirnaya Sagar Press, 26-28, Kolbhat Street. BOMBAY, Printed by Ramohandra Yesu Shedge, Nirnaya Sagar Press, 26-28, Kolbhat Street, BOMBAY.
निवेदन ON - । आजकल आयुर्वेदके अध्ययन और अध्यापनके लिए विषयप्रधान पाठ्यप्रणालीको मुविधाजनक माना गया है । निखिलभारतवर्षीय आयुर्वेदविद्यापीठने अपनी । परीक्षाओंके लिए विषयप्रधान पाठ्यक्रम तैयार किया है। सारे भारतवर्षमें प्रचलित अन्य आयुर्वेदविद्यालयोंमें भी प्रायः विषयप्रधान पाठ्यक्रम ही चलाया जाता है। परंतु इस पाठ्यक्रमके अनुसार सब विपर्योपर पाठ्यपुस्तकें न बननेसे अध्यापकों और विद्यार्थियोंको पठन-पाठनमें बड़ी कठिनाइयों का अनुभव हो रहा है । अतः विषयानुसार पाठ्यप्रन्योंका निर्माण होना आवश्यक हो गया है। पाट्य विषयों में एक द्रव्य-गुण विज्ञान भी है। इस विपयको मुख्य दो विभागों में विभक्त कर सकते हैं-१ द्रव्यगुण विज्ञानके मूलभूत सिद्धान्तोंका वर्णन; २ औपध और आहारद्रव्योंका वर्णन । इसके अनुसार इस प्रन्थ(द्रव्य-गुण-विज्ञान)को मैंने दो विभागोंमें प्रकाशित करनेका विचार किया है, जिसका यह पूर्वाप है। इसको द्रव्यविज्ञानीय, गुणविज्ञानीय, रसविज्ञानीय, विपाकविज्ञानीय और वीर्य-प्रभावविज्ञानीय इन पाँच अध्यायोंमें विभक्त किया है। ग्रन्थकी सकलनामें प्रत्येक विषयमें पहले चरक, सुश्रुत, अष्टाङ्गसंग्रह (वृद्धवाग्भट), अष्टाङ्गहृदय (वाग्भट) और रसवैशेषिकसून इन आकरग्रन्थोंके वचन अविकल दिये हैं। यद्यपि इन वचनोंमें शब्दपुनरुक्ति और अर्थपुनरुक्ति दोनों हैं, तथापि इन आर्ष वचनोंको अविकल रूपमें देना ही उचित समझा है। उनके नीचे वर्तमान समयमें उन अन्योंकी जितनी व्याख्याएँ उपलब्ध है, वे प्रायः दी गयी हैं । व्याख्याओंमें शब्दपुन- रुचिसे वचनेका प्रायः प्रयत्न किया है । एक ही प्रन्थकी भिन्न भिन्न व्याख्याओंमें प्रथम व्याख्या संपूर्ण देकर शेष व्याख्याओंमें जहाँ उन्ही शब्दोंमें व्याख्या आई है वहाँ xxx ऐसा चिह रखकर उतना अश छोड़ दिया है। अन्तमें मूलका सपूर्ण अनुवाद और व्याख्याओंका आशय हिन्दी भाषामें दिया है । द्रव्य-गुण-विज्ञानके आधारभूत सिद्धान्तोंके विषयमें आयुर्वेदिक ग्रन्थसाहित्यमें जितनी सामग्री उपलब्ध हो सकी उसका इस पूर्वार्धमें एकत्र संग्रह करनेका यथाशक्य यत्न किया है। अन्तमें द्रव्य-गुण-विज्ञानके आधारभूत सिद्धान्तोंके विषयम आधुनिक मत क्या है तथा प्राचीन और आधुनिक विचारधाराएँ कहा मिलती है और कहा पृथक् होती हैं इस विषयपर 'आयुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार' नामक एक निवन्ध मेरे परम मित्र बनारसहिन्दुयुनिवर्सिटीके आयुर्वेदकालेजके प्रिन्सिपल श्रीयुत डॉ. वालकृष्ण अमरजी पाठकने लिखकर दिया है। उसे अन्तमें परिशिष्टके रूपमें जोड़ दिया है। यह निबन्ध लिखकर देनेके लिए मैं डॉ. पाठकजीका अति ४ निवेदन ऋणी हूँ। मुझे आशा है कि द्रव्यगुणविज्ञानका यह पूर्वार्ध, इस प्रन्थके उत्तरार्धमें औषधद्रव्य और आहारद्रव्योंके पारिभाषिकशब्दोंमें सक्षेपसे लिखे हुए गुण-कर्मोको सोपपत्तिक समझने में विशेष उपयोगी होगा। इस प्रन्थकी संकलना इस विषयके अध्यापक तथा उच्च (आयुर्वेदाचार्य), मध्यम (आयुर्वेदविशारद ) और निम्न (भिषक् ) श्रेणीके विद्यार्थी सवको उपयुक्त हो इस दृष्टिसे की गयी है। हिन्दीमें दिया सारांश विशेष करके 'भिषक्' श्रेणीके विद्यार्थियोंके तथा इस विषयके सस्कृतानभिज्ञ अन्य जिज्ञासुओंके लिए है। अध्यापकोंको प्रन्थके प्रारम्भमें दिया हुआ भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका दिग्दर्शन करानेवाला उपोद्धात तथा परिशिष्ट २ में दिया हुआ आयुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार यह निवन्ध प्रथम देख लेना चाहिए। प्रन्थकी प्रेसकापी तैयार करने, हिन्दी अनुवाद करने और प्रूफ देखनेमें मेरे प्रिय शिष्य श्रीरणजितराय आयुर्वेदालकारने बड़ी सहायता दी है। मत. मैं उनको धन्यवाद देता हूँ। प्रन्थके सकलन करने, भाषानुवाद करने और छपवानेके विषयमें बने इतना या किया है । तथापि अनवधानता, प्रमाद आदिके कारण अनेक त्रुटिया रहना सभव है। यदि विद्वद्गण इन त्रुटियोंको लिख भेजनेका कष्ट करेंगे तो अगले सस्करणमें -उनको सुधारनेका यत्न किया जायगा। पूर्वार्धके प्रथम सस्करण की ५०० प्रतियाँ छपवाई थीं। परन्तु एक सालमें सब प्रतियाँ नि शेष हो जानेसे और लोगोंकी ओरसे इसकी विशेष माँग रहनेसे उत्तरार्धके औषधद्रव्यविज्ञानखण्डके छपवानेका कार्य रोक कर पूर्वार्धका यह दूसरा सस्करण तैयार किया है। इस सस्करणमें प्रथम संस्करणमें रह गये हुए कई विषय बढ़ा दिये गये और व्याख्या ग्रन्थोंसे कुछ पुनरुक्तियाँ निकाल दी गई हैं। इस ग्रन्थको . युक्तप्रान्तके वोर्ड ऑफ इन्डियन मेडिसिनने पाठ्यपुस्तकतया खीकृति दी है। - T ता. १०-११-१९४५ डॉ. विगास स्ट्रीट, वंबई नं. २ निवेदक वैद्य जादवजी त्रिकमजी आचार्य । - भारतीय द्रव्य-गुण-विज्ञानका उपोद्धात । - इस शास्त्रको 'द्रव्यगुणविज्ञान' नाम देनेका हेतु- यद्यपि इस शास्त्रमें द्रव्य, गुण (रस, विपाक, वीर्य, प्रभाव) और कर्म (जीवन- बृंहण-वमन-विरेचन आदि ) इन तीनों विपयोंका प्रतिपादन किया जाता है, अतः इसका नाम 'द्रव्य-गुण-कर्म-विज्ञान' रखना उचित है, तथापि 'गुण' शब्द धर्ममात्रका वाचक होनेसे गुण शब्दसे रस, विपाक, वीर्य, प्रभाव और कर्म इन द्रव्यके यावत् धर्मोंका ग्रहण हो जाता है, अत लाघवार्थ इस शास्त्रको द्रव्य- गुणविज्ञान' कहते हैं। द्रव्यगुणशास्त्रमें प्रतिपाद्य मुख्य विषय- द्रव्यगुणशास्त्रके मुख्य अभिधेय-प्रतिपाद्य विपय द्रव्य, गुण तथा गुणशब्दसे संगृहीत रस, विपाक, वीर्य, प्रभाव और कर्म ये सात पदार्थ है । अर्थात् इन सात पदार्थोंका द्रव्यगुणशास्त्रमें विचार और वर्णन किया जाता है। द्रव्यगुणशास्त्रकी दृष्टिसे इन सात पदार्थोके विपयमें भारतीय आयुर्वेदके जो मूलभूत सिद्धान्त (मन्तव्य ) हैं, वे क्रमशः दिये जाते हैं । इन सिद्धान्तोंको प्रारम्भमें ठीक समझ लेनेसे आगे समग्र ग्रन्थको समझनेमें बड़ी सरलता होगी। - १ 'विज्ञान' शब्दका 'शास्त्र' अर्धमें भी प्रयोग होता है । देखिये-- विज्ञान शिल्प- शास्त्रयो." (अमरकोप, का. १, वर्ग ४, लो. ६) । इस उपोद्घातमें मैंने आगे 'द्रव्यगुण- विज्ञान के स्थानपर प्राय. 'द्रव्यगुणशास्त्र' शब्दका प्रयोग किया है। २ पदार्थ उसे कहते हैं जिसमें अस्तित्व, अभिधेयत्व और शेयत्व ये तीन धर्म हो । पदार्थधर्मसंग्रहमें प्रशस्तपादाचार्यने लिखा है की-"पण्णामपि पदार्थानां साधय॑मस्तित्वाभिधेयत्व-झयत्वानि" (द्रव्यग्रन्थ, साधर्म्य-वैधर्म्यनिरूपण) । प्रत्येक शास्त्रके अपने अपने अस्तित्व रखनेवाले, अभिधेय (वर्णन करने योग्य ) और शेय (जानने योग्य) पदार्थ (प्रतिपाद्य विषय ) होते है । जैसे वैशेषिक दर्शनके द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेप और समवाय ये छ: तथा न्यायदर्शनके प्रमाण, प्रमेय आदि पोडश पदार्थ है । इसी प्रकार द्रव्यगुणविज्ञानके द्रव्य, गुण, रस, विपाक, वीर्य, प्रभाव और कर्म ये सात पदार्थ है । भावमिभने 'द्रव्ये रसो गुणो वीर्य विपाक शक्तिरेव च । पदार्थाः पञ्च तिष्ठन्ति स्व व कुर्वन्ति कर्म च" इस शोकमें द्रव्यमें रस, गुण, वीर्य विपाफ और शक्ति (प्रभाव) ये पाँच पदार्थ रहते हैं और वे अपना अपना कार्य करते है" ऐसा लिखा है, द्रव्य तथा गुणशम्दसगृहीत इन पाँच पदार्थों में सातवा कर्म मिलानेसे द्रव्यगुणविज्ञानके सात पदार्थ (प्रतिपाय विषय) होते हैं , ६ भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्रात । - । द्रव्य दो प्रकारका हे-१ कारणद्रव्य, २ फार्यद्रव्य । कारणद्रव्य-आयुर्वेदगें चशेषिकके गतानुगार पृथिवी, जल, रोज और गायु इनके परमाणु तथा आकाश, आत्मा, गन, पाल और दिए इन नांगो मा यष्टिरा कारणद्रव्य (मूलद्रव्य) माना है । अर्थात् गारी गहिनीनोमो मेलसे यनी हुई है। पृथिव्यादि ना ही द्रव्य चेतन शरिफ तगा बारमा पार गरको छोरकर शेष सात द्रव्य अचेतन राष्टिक भारम्भक (यनानेगारे) है। कार्यद्रव्य-कार्यद्रव्य दो प्रकारका है-चेतन, २ बचेतन । पेन न्य भी दो भेद है-१ पहिरन्तश्चेतन-यथा-गनुप्य, पशु भारपा २ अन्त- श्वेतन-यथा-क्ष आदि । चेतन द्रव्यके जरायुज, अण्डज, स्वेदज' और उद्धिज ये चार मेद माने गये है। अचेतन द्रव्य सराप्न आदि मेरो अनेक प्रकारके है, तथापि उन सबमें अचेतनलरूप गामान्य धर्म होनेसे उनमा एकही प्रकार (वर्ग) माना गया है। शासमें उनका पार्थिवद्रव्य नामसे व्यवहार होता है। चेतन और अचेतन वर्गफे सय द्रव्योंका कित्सा में आधार और औपके रुपमें उपयोग होता है । यद्यपि चेतन द्रव्य पृथिवी आदिनी फारणद्रव्यों और पान दम्य आत्मा और मनको छोड़कर शेष सात कारणद्रव्योंचे पने 1, तपापि गप इन्नोवा चिकित्सार्थ निजीवावस्थामें ही उपयोग किया जाता है, इस अवस्था उनमें भामा और मन होते ही नहीं और काल तथा दिक् कार्यमव्यकी उत्पत्ति, समपानिकारण (उपादान कारण) नहीं किंतु निमित्तकारण है, अत. द्रव्यगुणशासम गणनीय राय द्रव्य शेय पृथिव्यादि पञ्चभूतोंसे ही बने होनेसे पाञ्चभौतिक माने जाते है । अतः भगनान पुनर्वसुने कहा है कि-"सर्व द्रव्यं पायभौतिक्मसिमर्थे ( इसी प्रन्य, पृ. १)" । अर्थात् द्रव्यगुणशास्त्रमें द्रव्य शब्दका अर्ध 'आहार और नौषधफे रुपमें उपयोग आनेवाले निर्जीव पाचभौतिक कार्यद्रव्य' इतना ही है। कार्यद्रव्यरूप प्रसिस स्यूल जल, अमि और वायु ये भी पञ्चीकृत पचमहाभूतोंसे उत्पन्न पायभीतिक द्रव्य है, अतः द्रव्य-गुण-शास्त्रमें उनके भी गुण कर्म लिखे गये हैं। १ पृथिवी, जल, तेज और वायु ये चार भूत ही कारणावस्थामें परमाणुरूप सौर कार्या. वस्थामें स्थूल होते हैं । आकाश कारणावस्था और कार्यावसा दोनों में सदा परममाव परि- माणवाला और सर्वगत होता है । यह परमाणुरूप नहीं होता। २ रसवैशेषिकसूत्र भदन्त नागार्जुनने कारणद्रव्योंको मूलद्रव्य नाम दिया है। देखिये-"तय पृथिम्यादीनि मूलद्रव्याणि तेपाम् (म. २, सू ३९) । पृधिन्यादीनि पृथिव्यतेजोयाय्याकाशानि । मूलद्रव्याणि कारणद्व्याणि । तेपामिति स्थावर-जन्माना कार्यद्रव्याणाम् (भा.)।" ३ जरायुज, अण्डज और स्वेदज इन तीनों प्रकारकी सृष्टिको सामान्यत. प्राणी करते हैं। ४ 'द्रव्यहेतुका. निर्जीवद्रव्यमूला.' (इसी ग्रन्धमें पृ. ३०१)। - भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्घात । वाचस्पत्यवृहदभिधानमें 'द्रव्य'शब्दकी व्याख्यामें "मिषजस्तु-रसो गुण- । स्तथा वीर्य विपाक शजिरेव च । पचानां यः समाहारस्तद्रव्यमिति कथ्यते ।" यह वैद्योंके मतसे द्रव्यका एक लक्षण दिया है। यह श्लोक आयुर्वेदके उपलभ्यमान ग्रन्थों में मेरे देखनेमें नहीं आया । 'रस, गुण, वीर्य, विपाक और शक्ति (प्रभावं) इन पाँच गुणोंका जो समुदाय वही द्रव्य है' यह इस श्लोकका अर्थ है । प्राचीन कालमें अपने यहाँ गुणसमुदाय(गुणों के समूह )को ही द्रव्य माननेवाला एक संप्रदाय था। उस संप्रदायका यह मत है । इस मतका नागार्जुनने रसवैशेपिकसूत्र(भ. २ सू. १-२२ )में तथा स. वा. आयुर्वेदाचार्य पं. नारायणदत्तजीने 'द्रव्यगुणादिविवे- चनात्मकममिभाषणम्' नामके निवन्ध (पृ. १६) युक्तिपूर्वक खण्डन किया है। द्रव्यका लक्षण और अनेकविध मेद तथा कर्मानुसार द्रव्योंके वर्ग इस प्रन्थके न्यविज्ञानीयाध्यायमें विस्तारसे लिसे हैं, उनको वहीं देखें। गुण गुर्वादि गुण द्रव्यमें आश्रित होकर रहते हैं और निष्क्रिय होनेसे उनमें कर्तृव नहीं होता, वमन-विरेचनादि कर्मोंमें गुण उपकरण-साधन रूप होते हैं, परंतु कर्ता द्रव्य ही होता है, जो दूसरोंका भाश्रय और कर्ता होता है वह प्रधान होता है और जो अन्याश्रित और उपकरण होता है वह अप्रधान-गौण होता है । गुर्वादि अन्याश्रित और उपकरणभूत होनेके कारण गौण होनेसे 'गुण' कहे जाते हैं । "क्रियाहीनलेन कर्तृलाभावादप्राधान्येन गौणत्वाच तस्य 'गुण' इति सज्ञा" (द्रव्यगुणादिविवेचनात्मकम- भिभाषणम् , पृ. ९)। गुणका लक्षण इसी प्रन्यमें पृ. ९५-९७ पर देखें। चरकने (सू. म. १ में ) "सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ता परादयः । गुणा. इस श्लोक ४१ गुण कहे है (देखें इसी प्रन्थमें पृ. ९८)। आयुर्वेदमें इनमेंसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच आकाशादि एक एक महाभूतके विशेष गुण होनेसे उनको वैशेषिकगुण कहते हैं । गुर्वादि द्रवान्त बीस गुणोंको शारीरगुण कहते हैं, क्योंकि इन गुणों का शरीर और शरीरपर प्रयुक्त होनेवाले द्रव्योंसे ही विशेष सवन्ध है । बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और प्रयत्न ये छः आत्माके गुण होनेसे इनको आत्मगुण कहते हैं । शेष परादि दश गुण महाभूत, शरीर तथा शरीरेतर सबके लिए सामान्य होनेसे उनको सामान्यगुण कहते हैं। द्रव्यगुणशास्त्रमें ४१ गुणोंमेंसे गुर्वादि द्रवान्त बीस शारीर गुणोंका ही मुख्य- तया वर्णन आता है । चरकाचार्यने यज पुरुषीयाध्याय(सू. अ.. २५)में १ "तत्राचिन्त्यक्रियाहेतु 'प्रभाव' उच्यते, या द्रव्याणां शकिरभिधीयते" (क. गहाधरजी च. सू. म..१, श्लो. ५२ पर टीकामें)। २ "गुर्वादय इति गुरु-लघु-शीतोष्ण-खिग्ध-रूक्ष- मन्द-तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-खर-मसण-स्थूल-सूक्ष्म-सान्द्र-द्रवा इति विंशति शारीरगुणाः स्वय वक्ष्यन्ते" (क. गमाघरजी च. सू. म. १, श्लोक ४९ परकी टीकामें)। प्रोका" - भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्घात । । आहारके गुणों का निर्देश करते हुए "विंशतिगुण गुरु x x x द्रवानुगमात्" ऐसा लिखा है । सुश्रुतने सूत्रस्थानके ४६ वें अध्यायमे गुर्वादि वीस गुणोंके ही कर्म बताये हैं। रस भी गुण है, तथापि रसके विषयमें विशेष वक्तव्य होनेसे एक खतत्र अध्यायमें उसका निरूपण किया है। मृदु, तीक्ष्ण, गुरु, लघु, निग्ध, रूक्ष, उष्ण और शीत ये आठ गुण जव उत्कृष्टशक्तिसपन्न हों तब उनको वीर्य कहते हैं। वीयाँके विषयमें भी विशेष वक्तव्य होनेसे उनका एक स्वतन्त्र अध्यायमे वर्णन दिया गया है। परंतु गुर्वादि गुण जव उत्कृष्टशक्तिरहित होते हैं तब इनको गुण ही माना जाता है, अतः गुणों के प्रकरणमें भी उनका वर्णन किया गया है । नागार्जुन गुर्वादि आठ गुणोंको वीर्य नहीं मानते, परतु छर्दनीय आदि कर्मलक्षण वीर्य मानते हैं। अतः उन्होंने शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विशद, पिच्छिल, गुरु, लघु, मृदु और तीक्ष्ण इन । दस गुणोंको कर्मण्य (कर्म करनेमे अधिक शक्तिसपन ) गुण माना है। द्रव्यगुण- विज्ञानमें गुर्वादि वीस गुणोंका वर्णन विशेष आवश्यक होनेसे विस्तारसे तथा अन्य गुणों का वर्णन सक्षेपमें किया गया है। रस यद्यपि आयुर्वेदमें 'रस' शब्दका प्रयोग 'यो रसति भहरहर्गच्छति' स रस' जो निरन्तर शरीरमें गति करता है वह रस कहाता है, इस निरुक्तिसे सप्त धातुओंके अन्तर्गत रसधातुमें, 'यो रसति सर्वान् लोहान्' स रस =जो स्वर्णादि सव लोहोंको अपनेमें लीन कर लेता है वह रस कहाता है, इस निर्वचनसे पारदमें; 'यो रसति शरीरे आशु प्रसरति' स रस =जो सारे शरीरमें शीघ्र फैल जाता है वह रस कहाता है, इस व्युत्पत्तिसे स्वरसादि कल्पोंमें तथा 'यो रस्यते आखाद्यते रसनेन' स रस. जो - रसनेन्द्रियसे ग्रहण किया जाता है वह रस कहाता है, इस निरुक्तिसे मधुरादि छ. रसोंमें होता है, तथापि द्रव्यगुणाधिकारमें 'रस' शब्द मधुरादि छ. रसोंके अर्थमें ही पारिभाषिक माना गया है। रसका लक्षण इसी ग्रन्थमें पृ. ११९ पर दिया है। आयुर्वेदके मतानुसार सब द्रव्य पाञ्चभौतिक होनेसे कोई भी द्रव्य एक रसवाला नहीं किन्तु षस है, तथापि जिस द्रव्यमे जो रस व्यक्त हो उस प्रधान रससे उस द्रव्यका यह मधुर है, यह अम्ल है, इत्यादि व्यपदेश होता है। १ 'गुर्वाधा वीर्यमुच्यन्ते शक्तिमन्तोऽन्यथा गुणा.' (अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. १७)। २ देखें इसी ग्रन्थमें पृ २६७-२७३ । ३ "परमात्मनीव सतत भवति लयो यत्र सर्वसत्त्वा- नाम् । एकोऽसौ रसराज शरीरमजरामर कुरुते" (रसहृदयतन्त्र, १ अववोध, १३ श्लोक)। ४ "तस्मान्नैकरस द्रव्य भूतसङ्घातसभवात्" (अ. ह. सू. अ. ९)। ५ द्रव्योंमें जो रस व्यक्त हो उसको रस (प्रधान रस ) और जो रस मव्यक्त हो या अन्तमें कुछ व्यक्त हो उसको अनुरस (अप्रधान रस) कहते है "तत्र व्यक्तो रस. स्मृत । अव्यक्तोऽनुरसः किविदन्ते व्यकोऽपि चेष्यते" (अ. ह. स. अ..९)।
भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्घात । ९ . आयुर्वेदमें द्रव्योंके गुण लिखते समय यह द्रव्य मधुर है, यह अम्ल है, इत्यादि उनके रस लिये है वहा केवल यह द्रव्य स्वादमें मधुर है, अम्ल है, इतना ही अर्थ न लेना चाहिये, परन्तु मधुरादि रसोंके जो गुण-धर्म लिखे हैं वे सब न्यूनाधिकाशमें उसमें है, इतना ही नहीं परन्तु मधुरादि रसोंके जो विपाक और रस- सहचेर वीर्य लिखे हैं वे भी यदि रसके अनुकूल हों तो उसमें प्रायः विद्यमान हैं, • इतना व्यापक अर्थ उससे समझना चाहिये । जिस द्रव्यमें प्रधान रसके विपरीत विपाक और वीर्य हों प्रायः वहा ही उस द्रव्यके विपाक और वीर्य स्पष्ट शब्दोंमें लिखे हैं। जहाँ विपाक और वीर्य रसके अनुकूल होनेपर भी स्पष्ट शब्दोंमें लिखे हों, वहां वे विशेष स्पष्टीकरणार्य लिखे गये हैं ऐसा मानना चाहिये। विपाक आयुर्वेदमें खाए हुए द्रव्योंका दो प्रकारका पाकै माना गया है-अवस्थापाक और निष्ठापाक । निष्ठापाकको विपाक कहते हैं। अवस्थापाकापेक्षया विशिष्ट पाको विपाका अवस्थापाककी अपेक्षया जो विशिष्ट (भिन-खास) पाक उसको विपाक कहते है। यद्यपि 'पाक' शब्द भाववाचक होनेसे पचनक्रियामात्रका द्योतक है तथापि 'विपाक' शब्द आहारके अन्तिम पाकके समयमें आद्य रसधातुमें उत्पन्न गौरव या लाघवयुक मधुर, अम्ल और कटु इन तीन- रसोंमें लाक्षणिक है, ऐसा समझना चाहिये । इसी प्रन्थम पृ. २१३ पर विपाकका और पृ. २१४ में अवस्थापाकका निरूपण किया गया है। इससे मालूम होगा कि मुखसे लेकर अन्त्रतक महास्रोतसमें तत्तत्स्थानमें मिले हुए मधुर, अम्ल और कटु (क्टुक्षार) रसवाले द्रवों, प्राण और समान वायु (नाडियों-Nervesकी क्रियाओं) और शरीरस्थ ऊष्माके द्वारा महा- सोतसके मिन्न भिन्न स्थानों में जो आहारका पाक होता है उसको अवस्थापाक कहते हैं । भवस्थापाकको आहारपाक या जठराग्निपाक भी कहते हैं । अवस्था- पाककी प्रथम, द्वितीय और तृतीय ये तीन अवस्थाएँ होती हैं । छहों रसोंवाला अन्न प्रथमपाकमें मधुरप्राय, द्वितीयपाकम अम्लप्राय और तृतीयपाकमें कटुप्राय होता है। इन तीनों अवस्थापाकों में क्रमश मल(कीटाश )रूप कफ, पित्त, वात सूत्र और पुरीष की उत्पत्ति होती है। इन तीनों अवस्थापाकोंके अन्तमें जब आहारप्रसादरूप रसधातुकी १ 'तत्र मधुरो रस.xxx खिग्ध शीतो गुरुश्च, अम्लो रस xxx लघुरुष्ण. खिग्धश्च' इत्यादि (देखें इसी ग्रन्थ, पृ. १५३-१५५) । २ 'पाक. पचन द्रव्याणा स्वरूपरसयो परावृत्ति. । सा च स्वरूपान्तरत्वेन रसान्तरत्वेन च परिणति । गङ्गाधर कविराज । ३ देखें इसी ग्रन्थमें पृ २१४-२१८ तक अवस्थापाकनिरूपण, म. म. कविराज गणनाथसेनजीविरचित सिद्धान्तनिदान २ खण्ड पृ ३-६, तथा पृ. २२२ पक्ति ५ में जल्पकल्पतरुन्याख्या।
। भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्धात । उत्पत्ति होती है और धात्वग्निपाक प्रारम्भ होता है तव प्रायः मधुर और लवण रसका मधुर, अम्ल रसका अम्ल तथा कटु तिक और कषाय रसका कटु विपाक होता है । मधुर विपाकसे प्रसादभूत कफ, अम्ल विपाकसे प्रसादभूत पित्त और कटु विपाकसे प्रसादभूत वायुकी उत्पत्ति होती है। ये प्रसादभूत वात-पित्त-कफ सूक्ष्मरूपसे रस धातुमें सचार करते हुए शरीरमें अपना अपना कार्य करते हैं। धात्वमिपाकमें भी रसके किट्टांशरूपमें कफकी और रकके किट्टाशरूपमें पित्तकी उत्पत्ति होती है. अवस्थापाक प्रत्यक्षगम्य है और विपाकका फल देखकर अनुमान किया जाता है। वाग्भटने मधुर, अम्ल और कटु विपाकको उन रसोंके तुल्यफल( गुण कर्म) वाला बताया है । चरक और सुश्रुतने विपाकका फल खतन्त्ररूपसे भी लिखा है। सुश्रुत और नागार्जुन मधुरादि रसोंको नहीं परन्तु पञ्चमहाभूतोंके गुरु और लघु इन दो गुणों के रूपमें विपाक मानते हैं । परन्तु चरक और सुश्रुतके शब्दप्रयोगमें ही अन्तर है, विपाकके फलके विषयमें दोनोंके मतमें अन्तर नहीं है, यह पृ. २४८-२४९ पर स्पष्ट दिखाया गया है। वीर्य और प्रभाव 'वीर' विक्रान्तौ (चु. आ. से.)=विक्रम (शक्तिसंपाद्य कार्य) करना, इस धातुसे 'वीरयते अनेन' इति वीर्य-द्रव्य जिसशक्तिके द्वारा कार्य करता है वह वीर्य है, इस व्युत्पत्तिसे 'वीर्य' शब्दका शक्ति यह अर्थ होता है । इस अर्थको लेकर चरकने द्रव्योंका पाचभौतिक सगठन, रस, विपाक और गुर्वादि गुण इन सबकी अपनी अपनी क्रिया करनेकी जो शक्ति उसको वीर्य माना है 'वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया' (च. सू. अ. २६) । शक्ति दो प्रकारकी होती है-१ चिन्त्य और २ अचिन्त्य । चिन्त्य शक्तिको वीर्य और अचिन्त्य शक्तिको प्रभाव कहा जाता है आयुर्वेदमें वीर्यके विषयमें तीन पक्ष पाये जाते हैं। पहला पक्ष शक्तिरूप वीर्य मानता है, इस मतवालोंको शक्तिरूपवीर्यवादी या वहुवीर्यवादी कहते हैं । चरक इस मतके अनुयायी हैं। दूसरा पक्ष उत्कृष्टशक्तिसपन गुर्वादि पाठ या शीत और उष्ण दो गुणोंको ही वीर्य मानता है। इस मतवालोंको पारिभाषिकवीर्यवादी या गुणवीर्य- वादी कहते हैं । सुश्रुत, वृद्धवाग्भट और वाग्भट इस मतके अनुयायी हैं । तीसरा पक्ष कर्म लक्षण वीर्य मानता है । यह नागार्जुनका मत है । वीर्यका स्वरूप १ "किट्टमन्नस्य विण्मूत्र, रसस्य तु कफोऽसन । पित्त" (च. चि. म. १५)। "रसस्य कफ इति रसे पच्यमाने किट्ट कफो भवति प्रसादश्च रक्त, एव रक्तादिमलेऽपि छेयम् । x x x यथा कफोऽवस्थापाकाद् रसमलतया च भवति" (च. द.) २ देखें इसी ग्रन्थमें पृ २४५ । ३ देखें इसी ग्रन्थमें पृ. २४३-२४४ । इसी ग्रन्थमें पृ २८२-२८३ पर वकव्य । ५ देखें इसी ग्रन्थमें पृ. २५७-२५८ । ६ देखें इसी ग्रन्थमें पृ. २६७ । -- । ४ देखें । भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्धात । बताते हुए शिवदाससेन लिखते है कि-"वीर्य शक्तिः, सा च पृथिव्यादीनां भूतानां यः सारभागस्तदतिशयरूपा वोध्या-द्रव्यमें पृथिव्यादि भूतोंका जो अतिशय सार भाग जिसमें क्रिया करनेकी शक्ति हो, वह चाहे द्रव्योंके पाञ्चभौतिक संगठनरूप हो, रसरूप हो, विपाकरूप हो या गुर्वादि उत्कृष्टशक्तिसंपन्न गुणरूप हो, उसको वीर्य कहते हैं"। रसादिमें 'वीर्य' शब्दका प्रयोग धर्म-शक्ति और धी-रसादि इनके अमेदोपचारसे होता है। वास्तवमें शक्ति और रसादि ये दोनों गुण हैं और गुण सर्वदा द्रव्यको आश्रय करके ही रहते हैं, अतः द्रव्यमें रहा हुआ जो क्रियाजननसमर्थ सारभाग जिसको आधुनिक वैज्ञानिकोंने एक्टिव प्रिन्सिपल्स ( Active Principles ) नाम दिया है उसको वीर्य नाम देना चाहिये, ऐसा जो परिशिष्टमें डॉ. पाठकजीने लिखा है वह ठीक मालूम होता है । आयुर्वेदाचार्योंको द्रव्योंमें भूतप्रसादातिशयरूप सार भाग रहता है इस बातका ज्ञान था, परन्तु उस समय विश्लेषणक्रियाका विकास नहीं हुआ था, इसलिये उनका विशेष विवरण संहिताग्रन्थों में नहीं पाया जाता । रसाचार्योने धातुओं- (खनिजों से विश्लेषणप्रक्रियाद्वारा वर्णादि लोह (मेटल्स Metals ) अलग करके निकाले थे और उनको उन्होंने सत्त्व नाम दिया था। आजकल आधुनिक वैज्ञानिक द्रव्योंसे जो सारभाग निकालते हैं उनके लिये 'वीर्य' या 'सत्त्व' शब्दका प्रयोग करना ठीक होगा। आयुर्वेदमें द्रव्योंकी शरीरपर होनेवाली क्रियाओंकी मीमासा या उपपत्ति उनके पचभूतात्मक संगठन, रस, गुण, वीर्य, विपाक और प्रभावकी सहायतासे की जाती है । अतः आधुनिक वैज्ञानिकोंके निकाले हुए कुनैन आदि सत्त्वोंके कर्मोकी मीमांसा भी आयुर्वेदकी दृष्टि से उनके पञ्चभूतात्मक सगठन, रस, गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव द्वारा ही करनी चाहिये । आयुर्वेदमें यद्यपि वीर्य शक्तिरूप, उत्कृष्टशक्ति- सपन गुणरूप या कर्मलक्षण है ऐसे तीन मत पाये जाते हैं, तथापि द्रव्योंके गुण लिखते समय शीत, उष्ण आदि पारिभाषिक वीर्यवाचक शब्दोंका ही प्रयोग हुआ है। सुश्रुत और नागार्जुनने प्रभाव नामके पदार्थका 'प्रभाव' नामसे उल्लेख नहीं किया है परन्तु सुश्रुतने जो अमीमांस्य और अचिन्त्य मेषजे तथा नागार्जुनने अचिन्त्य वीर्य लिखे हैं, वे प्रभाव ही हैं । कर्म यद्यपि पदार्थविज्ञानकी दृष्टि से वैशेषिकदर्शनमें कर्मपदार्थका “एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम्" ( १११११७) तथा चरकने “संयोगे च विभागे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् । कर्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते" १ देखें इसी ग्रन्थमें पृ. २५१ पर शिवदाससेनकी व्याख्या । २ देखें इसी ग्रन्थमें परिशिष्ट ३, . ३१८ । ३ "शास्त्रे व्यवहारस्तु पारिभापिकवीर्यनयेनैव" (पृ २५१ पर शिवदाससेनकी व्याख्या) । ४ देखें इसी ग्रन्थमें पृ. २८३ । ५ देखें इसी ग्रन्यमें पृ. २३२ ।
१२ भारतीय द्रव्यगुणविज्ञानका उपोद्धात । (सू. अ. १) यह लक्षण लिखा है, तथापि द्रव्यगुणाधिकारमें 'कर्म' शब्दका प्रयोग 'शरीरपर होनेवाली द्रव्योंकी वमन-विरेचन आदि किया, इस अर्थमे होता है। चरकले लिखा है कि-"कर्म पञ्चविधमुक्त वमनादि" (सू. भ. २६)। यहां चमनादि पदमें 'आदि' शब्दसे वृंहण-जीवन आदि द्रव्योंके सब कर्म लेने चाहिये "एतच (वमनादि) प्राधान्यादुच्यते, तेन वृहणाद्यपि योद्धव्यम्" (च. द.)। सुश्रुतने भी "इहौषध- कर्माणि ऊर्ध्वाधोभागोभयभागसशोधन-संशमन-सांप्राहिकाग्निदीपन-पीडन-लेसन-हण- रसायन-वाजीकरण-श्वयथुकरविलयनदहन-दारण मादन-प्राणन-विपप्रशमनादीनि वीर्यप्राधा- न्याद्भवन्ति" (इसी प्रन्थमें पृ. २५८) इस सूत्रमें वमन-विरेचन आदिको मौषध- कर्म कहा है । नागार्जुनने कर्मप्राधान्य प्रकरणमें 'द्रव्योंका शरीर पर जो प्रयोग वह कर्म, ऐसा लिखा है "कर्म सर्वेषाम्" (र. वै. अ. २, सू ३८)। द्रव्यादयः पदार्थाः सर्वे, तेषां कर्म प्रयोग इत्यर्थ ।xxx। प्रयोग. कर्मसज्ञितः षष्ठः पदार्थ." (भा.)। प्राचीन कालमें हमारा द्रव्यगुणविज्ञान एक जीवित शास्त्र था। महर्षियोंने दीर्घकालके परिश्रम और अनुभवसे द्रव्यगुणविज्ञानके आधारभूत सिद्धान्त स्थापित किये थे। कोई भी नया द्रव्य उनके सामने आता था तो वे अपने सिद्धान्तानुसार मनुष्यशारीरपर उसका परीक्षण कर उसके पाचभौतिक संगठन, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और कर्म निश्चित करते थे और उपयुक्त सिद्ध होनेपर उस द्रव्यको प्रन्यों में स्थान देते थे। -परन्तु आजकल हमारा यह शास्त्र मूञ्छितावस्थामें है। इन दिनों में किसी भी उपयोगी नवीन द्रव्यका हमारी आर्षपद्धतिसे परीक्षण करके द्रव्यगुणके ग्रन्थों में उसका समावेश कर लेनेका उदाहरण नहीं पाया जाता । हमारे सहिताग्रन्य या निघंटुओंमें अनुक्क कुछ नवीन द्रव्योंका आजकल वैद्यलोग उपयोग करते हैं परन्तु वह यूनानी या पाश्चात्य वैद्यकमें लिखे हुए उनके गुण-कोको देखकर तदनुसार करते हैं। हमारी मार्यपद्धतिके अनुसार उनका परीक्षण करके द्रव्यगुणके ग्रन्थोंमें उनका समावेश करनेका यन नहीं किया जाता। यदि हम इस शास्त्रको पुनरुज्जीवित करना चाहते हैं तो हम लोगोंका कर्तव्य होगा कि अपने सामने आए हुए नवीन द्रव्योंका अपने सिद्धान्तानुसार परीक्षण करके उनको अपने अन्योंमें ले लें । प्राचीन प्रन्थोंमें कई द्रव्योंके रस, गुण, वीर्य, और विपाकके विषयमें भिन्न भिन्न मत पाये जाते हैं, उनका पुन परीक्षण करके निश्चय करनेकी और उनमें एकवाक्यता लानेकी आवश्यकता है । आयुर्वेदमें प्रचलित कई द्रव्योंके गुण-कर्म यूनानी और पाश्चात्य वैद्यकमें हमारेसे अधिक लिखे हैं, उनका भी परीक्षणपूर्वक संग्रह कर लेना चाहिये । प्राचीन कालमें या आजकल वैद्योंने प्राय औषधोंके गुण प्रामीणों या अन्य देशवासियोंसे पहले जानकर पीछे उनका मनुष्यों या अन्य प्राणियोंपर प्रयोग करके परीक्षण किया है और परीक्षणसे प्राप्त ज्ञानके आधारपर उनके गुण-कर्मोंकी अपनी पद्धतिके अनुसार शास्त्रीय उपपत्ति लगानेका यत्न किया है। हम लोगोंको भी इस पद्धतिका अनुसरण करना चाहिये। वैद्य जादवजी त्रिकमजी आचार्य । ।
द्रव्यगुणविज्ञानान्तर्गतविषयाणां वर्णानुक्रमणिका। ७५ / केश्यम् ७० गर्भपाति विपयः पृष्ठम् | विषयः पृष्ठम् अङ्गमर्दप्रशमनम् ४६ | कफजादिव्याधी रसोपयोगक्रमः २०६ अनुलोमनम् ६० | कर्ममेदेन द्रव्यमेदा. २१ अनुवासनोपगम् ३९ कासहरम् ४३ अभिष्यन्दि ६९ कुष्ठानम् ३२ अर्थनिरूपणम् १०० कृमिन्नम् अर्शीघ्रम् के रसा कं दोपं जयन्ति कंच अवसादकम् कोपयन्ति १८१ अवसादनम् ७१ अवस्थापाकनिरूपणम् २१४ केषा द्रव्याणां रसेभ्य एव गुणा., दोष- अश्मरीनाशनम् ७६ प्रकोपलं, दोषप्रशमनत्वं च विज्ञेयम् १७७ आर्तवजननम् ७७ / कोथप्रशमनम् आविजननम् ७८ / कोष्ठवातप्रशमनम् ૬૨ आशुकारि (0 आस्थापनोपगम् ३८ । गुणलक्षणम् ९५ आस्वाद्यमानस्य द्रव्यस्य गुणविज्ञानीयाण्यायोपक्रमः ९५ रस. कदा उपलभ्यते १५२ गुणसख्या उत्तेजकम् गुर्वादिविंशतिगुणकर्माणि १०२ ७९ गुर्वादिविंशतिगुणनिरूपणम् १०० उत्सादनम् उदर्दप्रशमनम् चरकमतेन विपाकनिरूपणम् २१८ ४६ उपयुज्यमानानां द्रव्याणां वीर्य चक्षुण्यम् कदा उपलभ्यते चेतनाचेतनदेन द्वौ द्रव्यमेदो २७६ छर्दिनिग्रहणम् O उपशोषणम् छेदनम् एकीयमतेन गुणप्राधान्यनिरूपणम् ११७ जगमद्रव्याणामवान्तरमेदा १९ एकीयमतेन द्रव्यप्राधान्यनिरूपणम् जीवनीयम् २२ एकीयमसेन रसप्राधान्यनिरूपणम् मौद्धिदद्रव्याणामवान्तरमेदाः १५ तारकाविकासि 'औपधाहारमेदेन द्वौ द्रव्यमेदो २० | तारकासकोचनम् काव्यम् ३१ | तृप्तिन्नम् ३२ कण्ड्नम् ३३ | तृष्णानिग्रहणम् ९८ ६ ३९ ६२ २०९ ज्वरहरम् ४४ ७८ ४० १६ द्रव्यगुणविज्ञानान्तर्गतविषयाणां वर्णानुक्रमणिका । पृष्ठम् | विषयः पृष्ठम् ५२ स्तम्भनम् ३७ ७९ ६१ विषयः सुश्रुतमतेन विपाकनिरूपणम् सुश्रुतमतेन वीर्यनिरूपणं सूक्ष्मम् सौमनस्यजननम् सौम्यामेयभेदेन रसानां द्वैविध्यं तयोर्गुणाश्च सज्ञास्थापनम् सधानीयम् संशमनम् ससृष्टरसाना द्रव्याणां प्रभाववि- ज्ञानोपाय स्तन्यजननम् स्तन्यनाशनम् स्तन्यशोधनम् २२८ २५८ | स्नेहनम् ६४ | स्नेहोपगम् ७१ | स्फोटजननम् स्रसनम् १४६ । खनजननम् ४८ | खरूपभेदेन द्रव्यभेदा २७ | स्वापजननम् ५२ खेदनम् खेदापनयनम् १९० / खेदोपगम् ३४ | हिक्कानिग्रहणम् ७६ / हृदयोत्तेजकम् १६ ७१ ३८ ३४ | हृद्यम् ३२ - इस ग्रन्थमें दिये हुए संकेत चिह्न । . च. चरकसंहिता। ड. डहण, सुश्रुतव्याख्याकार। सु. सुश्रुतसहिता। हा. हाराणचन्द्र कविराज, सुश्रुतव्याख्या- अ.सं. अष्टाङ्गसग्रह। कार। अ.ह. अष्टाङ्गहृदय। इ. इन्दु. अष्टागसग्रहव्याख्याकार। र. वै. रसवैशेषिकसूत्र । अ. द. अरुणदत्त, अष्टाङ्गहृदयव्याख्या- भा. भावप्रकाश । कार। शा. शार्ङ्गधरसहिता। हे. हेमाद्रि, अष्टाङ्गहृदयव्याख्याकार । वै. द. वैशेषिकदर्शन। भा. रसवैशेषिकसूत्रभाष्य । न्या. द. न्यायदर्शन। शि. शिवदाससेन, चरकसहिता और सि. मे. सिद्धभेषजमणिमाला कृष्णराम द्रव्यगुणसग्रहके व्याख्याकार । भट्टविरचिता। आ. आढमल्ल, शाधिरसहिताव्याख्याकार। च. द. चक्रपाणिदत्त, चरक और सुश्रुतके | का. काशीराम, शार्ङ्गधरसहिताव्याख्या- व्याख्याकार। कार। ग. गङ्गाधर कविराज, चरकव्याख्याकार । डा. वा. दे. डॉक्टर वामन गणेश देसाई, यो, योगीन्द्रनाथसेन कविराज, चरक ओषधिसग्रहकार। व्याख्याकार। पा. पाणिनीय अष्टाध्यायी। ।
- न द्रव्य-गुण-विज्ञानम् । 1 + - P . पूर्वार्धः। (द्रव्य-गुण-रस-विपाक-वीर्य-प्रभाव-विज्ञानात्मकः) द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। अथातो हव्यविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामो यथोचुरात्रेय- धन्वन्तरिप्रभृतयः॥ अस्मिन् ग्रन्थे द्रव्य-गुण-रस-विपाक-वीर्य-प्रभाव-कर्माण्यभिधेयानि । तेषु रसा. दीनामाश्रयभूतत्वेन द्रव्यमेव प्रधानं, तस्मादादी द्रव्यविज्ञानीयाध्याय भारभ्यते । द्रव्यस्य प्रभाव त्वरूप कर्मादिभेदैविशिष्टं ज्ञानं द्रव्यविज्ञानं, तदधिकृत्य कृतो अन्थो द्रव्यविज्ञानीयः॥ इस प्रथम द्रव्य, गुण, रस, विपाक, वीर्य, प्रभाव और कर्म इन सात विषयोंका प्रतिपादन होगा। उनमें द्रव्य ही रसादिका आश्रयभूत होनेसे प्रधान है । अतः प्रारम्भमें द्रव्यका विशेषरूपसे (प्रभाव-स्वरूप-कर्म आदि मेदसे) जिसमें विवेचन होगा ऐसे द्रव्यविज्ञानीय अध्यायका व्याख्यान किया जाता है। द्रव्यगुणविज्ञानप्रतिपाद्यद्रव्यशब्दार्थ.- सर्व द्रव्यं पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थ ॥ (च. सू अ. २६ ।) सर्व द्रव्यमिति कार्यद्रव्यम् । अस्मिन्नर्थे इति अस्मिन् प्रकरणे, द्रव्यगुणाधिकारे इति यावत् । गुणशब्देनात्र धर्मवाचिना -रस-विपाक वीर्य-प्रभाव-कर्माणि सर्वाण्येव द्रव्यधर्माण्यभिधीयन्ते । पाञ्चभौतिकमिति पृथिव्यादिभिः पञ्चभिर्भूतैर्मिलितैरारब्ध- मित्यर्थः । प्रकरणान्तरे यद्यपि पञ्चभूतात्ममनःकालदिशां नवानामपि कारणद्व्याणां द्रव्यशब्देन ग्रहणं भवति, तथाऽप्यस्मिन् द्रव्यगुणाधिकारे द्रव्यशब्देन औपधा- हारोपयोगीनि पाञ्चभौतिकानि गुडूचीगोधूमादीनि कार्यदल्याण्येवाभिप्रेतानीत्यर्थः ।। । वैशेषिकदर्शनमें तथा आयुर्वेदमें भी अन्य प्रकरणोंमें (च. सू. आ. १, श्लो. '४८ भादिमें ) 'द्रव्य' शब्दसे आकाश, वायु, तेज-अग्नि, जल, पृथिवी, आत्मा, मन, काल और दिशा इन नौका ग्रहण होता है, तथापि इस प्रकरणमें (द्रव्यगुणाधिकारमें) 'द्रव्य' - - t .
२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । शब्दसे पञ्चमहाभूतोंके मेलसे बने हुए औषध और आहारके लिए उपयुक्त गिलोय, गेहूँ आदि पाचभौतिक कार्यद्रव्य ही अभिप्रेत हैं। द्रव्यलक्षणम्- यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत् । तद्रव्यं (च. सू. अ. ११) द्रव्यलक्षणं तु 'क्रियागुणवत् समवायिकारणम्' इति ॥ (सु. स. अ. ४०।) द्रव्यलक्षणमाह-यत्रेत्यादि । यत्राश्रिता यत्र समवेताः (समवायसंबन्धन स्थिताः), कर्म च गुणाश्च कर्मगुणाः । कारणं समवायि यदिति समवायिकारणं यत्, द्रव्यमेव हि द्रव्यगुणकर्मणां समवायिकारणम् । समवायिकारणं च तद् यत् स्वसमवेतं कायं जनयति, गुणकर्मणी तु न स्वसमवेतं कायं जनयतः, अतो न ते समवायिकारणे (च. द.)। x x x। व्यवहारभूमावाकाशं परममहदक्रिय चोपलभ्यते, तत् पुनर्भूतान्तरैः संहन्यमानं क्रियावद्भवति (एतेन दिकालावपि व्याख्यातौ)। एवमात्मा निष्क्रियोऽपि मनसः क्रियया क्रियावान् । द्रव्यं यदा उत्पद्यते तदानीमपि तलागुणं, स्वाभाविकगुणानुवृत्तेः । पृथिव्या गन्धः, अपां तेजसो रूपम् , इत्येवमादिकः स्वाभाविको गुणो न शक्यते तदा प्रतिपेद्भुम् । कारणं समवायीति यच्च समवायिकारणम् । समवायीति गुणैः सह अपृथग्भावः समवायः, तद्वत् समवायि । द्रव्यं गुणसमवायवद्धि कारणं भवति, गुणोऽपि द्रव्यसमवायवान् । अनेन समवायस्यापि कारणत्वमुपदर्शितं भवति । अथवा यस कारणं समवायि न पृथग्भवति, यथा-तन्तवः पटस्य, तव्यम् । 'गुणकर्माश्रयः समवायि कारणम्' १ द्रव्यगुणविशनमें 'द्रव्य' शब्दसे जैसे पाञ्चभौतिक कार्यद्रव्य अभिप्रेत है, वैसे ही 'गुण'शम्दसे द्रव्यगुणविशानोपयुक्त शम्दादि पॉच इन्द्रियार्थ तथा गुर्वादि बीस शारीर गुण अभिप्रेत हैं और कर्मशब्दसे द्रव्यगुणविज्ञानोपयुक्त वमनविरेचनादि कर्म ही अभिप्रेत हैं। जैसे कि-इसके आगे मूलमें "तस्य च गुणाः शब्दादयो गुर्वादयश्च द्रवान्ताः; कर्म पञ्चविधमुक्त वमनादि" अर्थात्-उस पाश्चभौतिक द्रव्यके शब्द-स्पर्श-रूप रस-गन्ध तथा गुरु-लघु-शीत-उष्ण-लिग्ध-रुक्ष-मन्द-तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-क्ष्ण-खर-सूक्ष्म- स्थूल-सान्द्र-द्रव ये गुण है, और वमन-विरेचन-आस्थापन-अनुवासन-शिरोविरेचन-वृहण आदि कर्म हैं, ऐसा लिखा है । इससे यह स्पष्ट है कि-द्रव्यगुणाधिकारमें गुणशम्दसे शम्दादि पाँच और गुर्वादि बीस गुण ही प्रधानतया विवक्षित है । वैशेषिकदर्शनमें तथा आयुर्वेदमें भी प्रकरणान्तरमें इच्छा-द्वेष-सुख-दुख तथा परत्व अपरत्व आदि अन्य जो आत्मा मन आदिके गुण - कहे गये हैं वे यहाँ 'गुण' शन्दसे प्रधानतया विवक्षित नहीं हैं । एव 'कर्म'शम्दसे भी उत्क्षेपण-अवक्षेपण आदि नामसे जो पञ्चविध कर्म माने गये हैं, वे यहाँ प्रधानतया विवक्षित नहीं है। अपो रसः, ३ पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । इति द्रव्यलक्षणम् (यो.) । यत्र कर्म परिस्पन्दलक्षणं संयोगविभागकारणं समेताश्च गुणाः यत्र शन्दादयो गुर्वादयो वा बुद्धिर्वा परादयो वा समवेताः यच्च कारणं समवायि, तद्रव्यमुच्यते । एतानि. कर्मगुणायित्व-समवायिकारणत्वानि यद्यपि सर्वाणि सर्वस्मिन् द्रव्ये न विद्यन्ते, तथाऽपि यद्यन्न संभवति तेन तस्य दव्यत्वं कल्प्यम् । तद्यथा-मनसः कर्मगुणायित्वेन, वाय्वादीनां तु कर्मगुणा- श्रयत्वेन समवायिकारणत्वेन च (अ. द.)॥ जिसमें सयोग-विभागका कारण परिस्पन्दनलक्षण(चलनात्मक) कर्म और रूपादि गुण समवाय(नित्य )सवन्धसे आश्रित है और जो कार्यद्रव्यके प्रति समवायि (उपादान ) कारण है, उसे द्रव्य कहते हैं । जिसमें आश्रित होकर कार्य उत्पन्न होत है और जो कार्यसे या कार्य जिससे कदापि भिन्न नहीं रह सकता उसे समवायि कारण कहते है । जैसे-मिट्टी घडेका और तन्तु पटका समवायि कारण है । यद्यपि द्रव्यका यह लक्षण प्रधानत कारणद्रव्यका है, तथापि द्रव्यगुणशास्त्रमें प्रतिपाद्य गुडूच्यादि कार्यद्रव्य भी गुणकर्माश्रय और गुडूच्यादिमोदक आदिके समवायि कारण होनेसे कार्यद्रव्यमें भी यह लक्षण लागू होता है। पञ्चमहाभूतेभ्य. कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिप्रकार तत्र पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां समुदायाद्व्याभिनिर्वृत्तिः, उत्कर्ष- स्त्वभिव्यञ्जको भवति-इदं पार्थिवम् , इदमाप्यम् , इदं तैजसम्, इदं वायव्यम् , इदमाकाशीयमिति ॥ सु सू अ. ४१॥ सर्वकार्यद्रव्याणां पञ्चभूतारब्धव दर्शयित्वा चिकित्सोपयुक्त पार्थिवत्वादिविशेष- माह-तत्रेत्यादि । समुदायादिति मेलकात् । पृथिवीजलानिलादीनां च यद्यपि विरुद्वगुणत्वं, तथाऽप्यदृष्टवशादेकद्रव्यरूपकार्यारम्भकत्व दृष्टत्वादेव भवति । यथा-वातादीनामेकच्याध्यारम्भकत्वं, शुक्रशोणितयोर्वा सौम्याग्नेययोर्गर्भजनकत्वं, सरवरजस्तमसा वा महदायास्म्भकत्वम् । उत्कर्षः प्रत्येकं पृथिव्याद्युत्कर्प. । अभि- व्यञ्जक इति पार्थिवत्वाद्यभिव्यञ्जकः । तमेवाह--इदमित्यादि (च, द.) xxx तारतम्येन समुदितेभ्यः पञ्चमहाभूतेभ्यो द्रव्याभिनिवृत्तिर्भवतीत्यर्थः । तथा चोपपन्नं भवति-उत्कर्षस्त्वभिव्यञ्जक इति (हा.)॥ इह हि द्रव्यं पञ्चमहाभूतात्मकम् । तस्याधिष्ठानं पृथिवी, योनिरुदकं, खानिलानलसमवायानिवृत्तिविशेषौ । उत्कर्षेण तु व्यपदेशः॥ अ.स.सू अ. १७ ॥ द्रव्यं पञ्चभूतात्मकं पञ्चभिर्भूतैरारब्धमित्यर्थः । पञ्च भूतानि पृथिव्यतेजोवावा- काशानि लोके प्रसिद्धानि । आकाशस्य तु शून्यात्मनोऽपि गुणाश्रयत्वात् पृथिव्यादि- वदेव भूतवं द्रव्यारम्भकत्वं च विज्ञेयम् । तथाच नभोभागाधिके द्रव्येऽवयवनि- पिडमावायभावेन स्वरूपमजहदेव नभ; कारणतां याति ।xxx। ननु पृथिज्यादय: 1 द्रव्यगुणविज्ञानम् । 20. । केन प्रकारेण कारणतां तत्र गच्छन्तीत्याह-स्पेत्यादि । सस्य इण्यम, भविमान आश्रयः पृथिवी । सा हि गुदच्याराहारीषधोपयोगिनो यम्योपटम्मेन प्रधान कारणम् । तस्य घ गुइच्यादेः सर्पस्यैव मध्यमा योनि. । 'शु'मिणे, भातुः; तसिन् 'योनिः' इति रूप भवति । कारणं यमायमयोगरि नभोगाय. नलानां समवायात् पृथिव्युदकाम्गामविनामावतियाण मन्यम्य निगतिविदोषी भवतः । निवृत्तिः निप्पत्ति आरमलाभ, विटोरः अध्यागरेणामापन् । तपार संस्थानविशेपलाभायाचयवन्यूटने नभ कारणसो गाति, माफियाटिये पायुः, तेजःप्रसादलभ्याश्या राययस्याविशेषाः; तेनरादुनं भवति-पानामेच मूगाना संयोगात् सर्वव्याणामाहारौपधापुपयोगिना समय. । नेपामेव भूगानामेकादि- तारतम्यादिसंयोगविशेपेण द्रव्याणां परम्परज्यावृतिः । यक्ष पापिय मलमा द्रव्यमित्यादिव्यपदेशः स भूयसा प्रभूतेन महाभूनेन अन्यते । तेन पगगु माये यदधिकं तदीयं व्यपदेश प्रामोतीत्यर्थ. (इ.)॥ पञ्चभूतात्मकं तत्तु, क्ष्मामधिष्ठाय जायते ॥ अम्वुयोन्यग्निपवननभसां समवायतः । तनिर्वृत्तिर्विशेषश्च, व्यपदेशस्तु भूयसा ॥ अ.ह.स.अ.. तुरवधारणे । यत्तदोश्च नित्याभिसंबन्धात् 'यत्' इत्येतदनुकमप्यांटगते । तेनायमर्थः-यद्सादीनामाश्रयभूतं कार्य द्रव्यं-हरीतपयादि खापरे, जागादिया जद्गम, (सैन्धवादि वा पार्थिव,) तत् पञ्चभूनारमक; न तु या कारणं ननयमा. काशादि । तस्य हि पञ्चभूतारमकरवे सत्याकाशादीनां पृथरपेनामरामो न स्यात् । ततश्चेदमाकाशं नाम महाभूतम् , इदं पृथ्वी नाम महाभूतमिति गदिनु न पार्यत, सर्पस्य पञ्चमहाभूतात्मकत्वात् । न च यत् कारण तत् कदाचित् कार्य स्यात् । तस्मात् कार्यद्रव्यस्यैव पज्ञभूतारमकरवं, न कारणद्रव्यस्पाकासादे । अय केन महाभूतेन कथं कृत्वाऽऽरब्ध तद् द्रव्यमित्याह-क्ष्मामित्यादि । पृथ्वीमाधारी- कृत्योत्पद्यते । एव पृथिव्याख्येन भूतेनाधारत्वेनोपकृत्य तेन सदारन्ध अन्य- मित्युच्यते । तथा अम्बु सलिल, योनि. कारणं यस्य वदम्वुयोनि द्रव्यम् । एवं जलं नाम महाभूत रसवत्वाधोनितयोपकृत्य तेन तदारब्धमित्युच्यते ।xxx। तथा अभिपवननभसां समवायात् अपृथग्भावात् , तस द्रव्यस्य निर्वृत्तिः निप्पत्तिः, तथा तस्य द्रव्यस्य यो विशेषः इदमन्यदिदमन्य व्यमित्येवंरूपो नानास्वभाव', सोऽप्य. ग्निपवननभसां समवायात् । एवमग्निपवननभोभिः समवायिकारणवेनोपकृत्य रेतद्व्यमारब्धमित्युच्यते । एवं च सर्व कार्यद्रव्यं पञ्चमहाभूतात्मकं, पञ्चभिर्महा- भूतैरारब्धत्वात् ।xxx(अ. द.)। द्रव्योत्पत्तिमाह-तरिवति । तद् द्रव्यं क्ष्मां पृथिवीमधिष्ठाय जायते, मृदमिव घटः, उपादानकारणं पृथ्वीत्यर्थः । मम्बु उदकं, योनिर्विपरिणामकारणं यस्य तदम्युयोनि, यथा-घटे निप्पाये सवः - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। पिण्डीभावादौ । मध्यादीनां संबन्धात तमिवृत्तिः संपूर्णावयवत्वं, काठिन्य-क्रिया- वकाशादिदानेन । विशेषः परस्परं, सोऽपि तत एव । यथा-पिण्डीभूताया मृदो मणिक-करक-शरावादिभेदः । (हे.)। पृथिवी प्रधानकारणत्वमुपादानलक्षणं भजते, सदवयवानां मिश्रणं करोति जलम् , अग्निरुपादानं पंचति, वायुरू धस्तिर्यगवय- वानुकर्पति, नभोऽवकाशं ददाति; सर्वत्रैवायं क्रमः । आग्नेये चित्रकादौ पृथिव्येव प्रधानकारणं, नाभसे वेण्यादी, वायव्ये तुम्बादौ च (ह. वो.) ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँचों महाभूतोंके समुदाय-मेल से सर्व कार्यद्रव्योंकी उत्पत्ति होती है। कार्यद्रव्योंकी उत्पत्तिमें पृथिवी उनका अधिष्ठान- (प्रधानोपादान )भूत है, जल योनिरूप अर्थात् उनके अवयवोंका(अणुओंका) मिलाने- वाला-समिश्रण करनेवाला है ('यु मिश्रणे' धातुसे 'योनि'शब्द बना है)। आकाश, वायु और तेजके समवाय(मेल)से उनका भात्मलाभ अर्थात् उनकी (गुडूची-गोधूम आदि कार्यद्रव्योंकी ) स्वरूपोत्पत्ति, तथा एक दूसरेसे भिन्नता होती है। अर्थात् आहारौषधो- पयुक्त गोधूम-गुहच्यादि सब कार्यद्रव्योंकी उत्पत्तिमें पृथिवी आधाररूपसे, जल उनके अवयोंके संमिश्रण-सयोग करानेवालेके रूपसे, तेज काठिन्य और रूप उत्पन्न करके, वायु काठिन्य और क्रिया उत्पन्न करके तथा आकाश अवकाशदानसे उनके सपूर्ण वरूप बननेमें और एक दूसरेमे भिन्न होनेमें कारणरूप होते हैं । जैसे-किसी पौधेकी उत्पत्तिमे पृथिवी आधाररूपसे, जल उसके अवयवोंके मिलानेवालेके रूपमें, तेज पाकके द्वारा उसकी अलरादि अवस्थाविशेषकी और रूप(रका-पीतादिवर्ण) की उत्पत्तिमें, यायु उसके काठिन्य तथा अवयव विभाग-नृद्धि आदिमें और आकाश उसके अवयवोंके बीचमें अवकाश दानसे कारण होता है । यद्यपि इस प्रकार सर कार्यद्रव्योंकी उत्पत्ति पाँचों महाभूतोसे होती है, तथापि उनके समवाय( समिश्रण )के तारतम्यमेदसे (न्यूनाधिकभावसे संमिश्रण होनेसे ) अनेक प्रकारके द्रव्य उत्पन्न होते हैं । द्रव्य सब पञ्चमहाभूतात्मक होनेपर भी पृथिवी आदि एक-एक महाभूतकी अधिकतासे 'यह पार्थिव है, यह आप्य है, यह तजस है' इत्यादि व्यपदेश-व्यवहार होता है । अर्थात् जिनमे पृथिवीके गुण-कर्म अधिक हों वे पार्थिव, जलके गुण-कर्म अधिक हो वे आप्य, तेजके गुण-कर्म अधिक हों वे तेजस, वायुके गुण-कर्म अधिक हों वे वायव्य और नभ-आकाशके गुण कर्म अधिक हों वे नाभस कहे जाते हैं। द्रव्याणा वर्गीकरणहेतुः इह खलु जगति द्रव्याणामपरिमेयत्वात् प्रतिद्रव्यं शृङ्गमाहिकयोपदेशो दुष्कर एव । अतस्तेषां सौकर्यण सामान्यज्ञानार्थ समानाकृति-गुण-कर्मात्मकैः साधारणधमै- रुपलक्षिवान् वर्गान् प्रकल्प्य तान्युपदिशन्ति तद्विदः । आयुर्वेदे द्रव्याणि स्वरूप- प्रभाव-गुण-कर्मादिभिर्वर्गशो विभिद्योपदिष्टानि तनवृद्भिः । तेषु प्रधानवर्गा मधस्ता- दुलिण्यन्ते ॥ । + ।
द्रव्यगुणविज्ञानम् । सृष्टिमें द्रव्य अपरिमित-असंख्येय होनेसे शृगग्राहिकन्यायसे प्रत्येक द्रव्यका निर्देश करना असभव नहीं तो दुष्कर अवश्य है। अत उनके सामान्य ज्ञानके लिए जो द्रव्य समान धर्म (आकृति, गुण और कर्म )वाले हैं उनके एक-एक वर्गकी कल्पना करके उनका उपदेश शास्त्रकार करते हैं, जिससे समस्त द्रव्योंका सामान्य ज्ञान सुकर हो जाता है। आयुर्वेदमें द्रव्योंका चेतन-अचेतन आदि स्वरूपमेदसे, रसादि गुणमेदसे तथा जीवन-बृहण आदि कर्मभेदसे अनेक प्रकारका वर्गीकरण तन्त्रकारोंने किया है। इनमें प्रधान प्रधान वर्ग आगे लिखे जाते हैं। चेतनाचेतनभेदेन द्वौ द्रव्यमेदो- तत् (द्रव्यं) चेतनावदचेतनं च ॥ च. सू. अ. २६॥ लेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं निरिन्द्रियमचेतनम् ॥ च. सू. अ. १। कार्यद्रव्याणां चेतनाचेतनतया विभाग चेतनाचेतनयोर्लक्षणं चाह-(यो.) सेन्द्रियमित्यादि । निरिन्द्रियमित्यत्र निःशब्दोऽभावे, निर्मक्षिकमितिवत् ।xxx। यद्यपि चात्मैव चेतनो न शरीरं, नापि मनः, यदुक्त--"चेतनावान् यतश्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते" (च. शा. अ. १) इति, तथाऽपि सलिलोप्ण्यवत् संयुक्तसमवायेन शरीराधपि चेतनम् । इदमेव चात्मनश्चेतनत्वं यदिन्द्रिययोगे सति ज्ञानशालिवं, न केवलस्यात्मनश्चेतनत्वं यदुक्तं-"आत्मा ज्ञः, करणैर्योगाज्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते" (च शा. अ. १) इति । अन्न सेन्द्रियत्वेन वृक्षादीनामपि चेतनत्वं बोद्धव्यं तथाहि-सूर्यभक्ताया यथा यथा सूर्यो भ्रमति तथा तथा भ्रमणादृगनुमीयते, तथा लवली मेघस्तनितश्रवणात् फलवती भवति तेन श्रोत्रमनुमीयते, वीजपूरकमपि शृगालादिवसागन्धेनातीव फलवद्भवति तेन घ्राणमनुमीयते, चूतानां च मत्स्यव. सासे कात् फलान्यतया रसनमनुमीयते, (लज्जालोश्च हस्तस्पर्शमानेण संकुचित- पत्रायाः स्पर्शनानुमान); स्मृतिश्चानुमानं द्रढयति, यथा-"वृक्षगुल्मं बहुविधं तत्रैव तृणजातयः। तमसाऽधर्मरूपेण च्छादिताः कर्महेतुना ॥ अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः ।" (मनुस्मृतिः अ १) इति । तथा तन्त्रकारश्च वानस्पत्या. नूकान् प्राणिनो वक्ष्यति; तेनागमसंवलितया युक्त्या चेतना घृक्षाः (च, द.)। इन्द्रियैः सह वर्तमान सेन्द्रियं द्रव्यं जीवच्छरीररूपं चेतनम् । सेन्द्रियमित्यने- नामन. संबन्धोऽपि लभ्यते, इन्द्रियाणां प्रत्यगात्मनो लिङ्गत्वात् । शरीरस्य चैतन्ये आत्मैव हेतु. । कतिधापुरुषोये च वक्ष्यति-"शरीर हि गते तसिन्छून्यागारम- चेतनम् । पञ्चभूतावशेपत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते" (च. शा. अ. १) इति । आत्मनः साक्षादवचनं विह पाञ्चभौतिकदच्याधिकारात्; भात्मा मनश्चाध्यात्म- द्रव्यम् । चेतनमुक्वाऽचेतनमाह-निरिन्द्रियमिति । न सन्ति इन्द्रियाणि यस्य तन्निरिन्द्रियम् । निरिन्द्रियं द्रव्यं जीवच्छरीरव्यतिरिक्तमन्यत् सर्वमचेतनम् । तब चेतनस्योपकरणम् (यो.)॥
पूर्वार्ध द्रन्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ७ मम कार्यद्रव्य चेतन और अचेतन भेदसे दो प्रकारके है । जो द्रव्य सेन्द्रिय (इन्द्रिययुक) होता है, वह चेतन और जो निरिन्द्रिय (इन्द्रियरहित) होता है, वह अचेतन होता है। जीवित शरीररूप द्रव्य सेन्द्रिय होनेसे चेतन होते हैं; जैसे- जीवित मनुष्यादि प्राणी तथा वृक्षादि उद्भिज । जीवित शरीरको छोड़ कर अन्य जितने द्रव्य है, वे सब निरिन्द्रिय होनेसे अचेतन है । जैसे-स्फटिक-सुवर्ण भादि पार्थिव न्य । इस प्रकार चेतन (सेन्द्रिय-सजीव ) और अचेतन (निरिन्द्रिय-निजीव) मेदसे द्रव्यके दो वर्ग-मेद होते हैं। वकव्ययहाँ 'इन्द्रिय' शब्दसे इन्द्रियाँ आत्माका लिग (ज्ञापक) होनेसे तथा इन्द्रियोंके द्वारा ही भात्माका चैतन्य अभिव्यक्त होता है इसलिये आत्मा(जीव)का भी ग्रहण होता है । अत. सेन्द्रिय गन्दसे सजीवशरीररूप सेन्द्रिय द्रव्य (सजीव प्राणी और उद्भिज) यह अर्थ लेना चाहिये । इस विषयपर विशेष विवेचन उत्तरार्धक औषधद्रव्यविज्ञान नामक द्वितीय खण्डके प्रथम अध्यायमें साशन और अनशन शन्दकी व्याख्यामें किया जायगा । उसको भी देखें। पार्थिवादि(पञ्चमहाभूताधिक्य)मेदेन पञ्च द्रव्यमैदा.- तत्र द्रव्याणि गुरु-खरस्कठिन-मन्द-स्थिर-विशद-सान्द्र-स्थूल-गन्ध- गुणवहुलानि पार्थिवानि, तान्युपचय-सद्वात गौरव-स्थैर्य कराणि; द्रव- स्निग्ध-शीत-मन्द-मृदु-पिच्छिल-रस-गुणवहुलान्याप्यानि, तान्युपक्लेद- नेह-वन्ध-विष्यन्द-मार्दव-प्रहाद-कराणि; उष्ण-तीक्ष्ण-सूक्ष्म-लघु-रूक्ष- विशद-रूप-गुणवहुलान्याग्नेयानि, तानि दाह-पाक-प्रभा-प्रकाश-वर्ण- कराणि लघु-शीत-रूक्ष-खर-विशद-सूक्ष्म-स्पर्शगुणवहुलानि वायव्यानि, तानि रोक्ष्य ग्लानि-विचार-वैशद्य-लाघव-कराणि मृदु-लघु-सूक्ष्म-लक्ष्ण- शन्द-गुणवहुलान्याकाशात्मकानि, तानि मार्दव-सौषिय-लाघव- कराणि ॥ च. सू. भ. २६॥ बहुलशब्दो गुर्वादिभि. प्रत्येकं संबध्यते किंवा गन्धेनैव, यतो गन्धगुणवहुला पृथिव्येव भवति; अत एव द्रव्यान्तरलक्षणेऽपि वैशेषिकगुणोऽन्त एव पठ्यते- 'रसगुणबहुलानि' इत्यादि, तेन तत्रापि रसादिभिरेव बहुलशब्दो योज्यः । सर्व. कार्यद्रव्याणां पानभौतिकत्वेऽपि पृथिव्याधुस्कर्पण पार्थिवत्वादि ज्ञेयम् । सद्धातः काठिन्यं, स्थैर्यम् अविचाल्यम् । बन्धः बन्धनं परस्परयोजनं, प्रहादः शरीरेन्द्रियत- र्पणम् । सूक्ष्म सूक्ष्मस्रोतोऽनुसारि । प्रभा वर्णप्रकाशिनी दीतिः, यदुक्तं-"वर्णमा. कामति छाया प्रभा वर्णप्रकाशिका" (च. इं. स. ७) इत्यादि । विचरणं विचारस, गतिरिस्यर्थः । सौपियं रन्ध्रबहुलता । अत्राकाशबाहुल्य द्रव्यस्य पृथिव्यादिभूतान्त- रास्पत्वेन भूरिव्यक्ताकाशत्वेन च ज्ञेयं, यदेव भूरिशुपिर तमामसम् (च. द.)। १ जीवित दशामें प्राणी और उद्भिज सेन्द्रिय होनेसे चेतन है । परन्तु जब वे भूत होते हैं तन आत्मा और इन्द्रियोंके सबन्धसे रहित होनेसे अचेतन होते है। - F ८ - द्रव्यगुण विज्ञानम् । तत्र तेषु पार्थिवादिपु पञ्चविधेषु द्रव्येपु मध्ये । पार्थिवानि द्रव्याणि । द्रव्याणीति आप्यादिष्वपि योज्यम् ।xxx। गुर्वादयो गुणा बहुला येषु तानि तथोकानि । बहुलशब्देनैतद् द्योतयति-पार्थिवद्व्येऽन्येऽपि गुणाः (मल्पाः) सन्ति, सर्व. द्रव्याणां पाञ्चभौतिकत्वात् ; गुर्वादयस्तु तत्र वाहुल्येन वर्तन्ते । एवमाप्यादिषु बोद्धव्यम् । xxx । गुणानुक्त्वा कर्माह-तानीत्यादि । तानि पार्थिवद्रव्याणि । उपचयः बृंहणम् । ४४ । माप्यान्यौदकानि द्रव्याणि द्रवादिगुणवहुलानि !xx। उपल्लेद आर्द्रभावः, बन्धः संहत्यापादनं, विष्यन्दः वः, मार्दवं मृदुत्वं; तान्या- प्यद्रव्याण्युक्लेदादिकराणि ।xxx। सूक्ष्मः सूक्ष्मस्रोतोऽनुसरणशीलः, विशदः, पिच्छिलविपरीतः ।xxx। दाहः भस्ससास्करणं, पाक माहारादिपाकः, प्रभा तेजः, प्रकाशोऽभिव्यक्तिः, वर्णः गौरादिः । xxx । विचारः मनसोऽनेकविकल्पकरणं गतिर्वा ।xxx। मृदुः कोमलः, श्लक्ष्णः मसृणः खरविपरीतः, मार्दवं मृदुवं, शौपियं छिद्रभावः । xx x (यो.) । तत्रापरिसंख्येयमपि पाञ्चभौतिकं द्रव्यं संग्रहेण परिसंख्यातुमाह-तनेत्यादि । तन्त्र पाञ्चभौतिकेषु द्रव्येषु चेतनावत्स्वचेतनेषु च मध्ये गुर्वादिनवगुणबहुलानि द्रव्याणि पार्थिवानि पृथिवीबहुलपञ्चभूतात्मकानि, शेषाणां भूतगुणानां द्रवादीनामबहुलत्वमेव पार्थिवेषु द्रव्येष्विति ख्यापितम् । तेषां पार्थिवानां कर्माण्याह-तान्युपचयेत्यादि । तानि पार्थिवद्रव्याणि खलपयु- कानि शरीरादीनामुपचयसंघातगौरवस्थैर्यकराणि भवन्ति ।xxx। (ग.)॥ तत्र स्थूल-सान्द्र-मन्द-स्थिर-गुरु-कठिन-गन्धवहुलमीषत्कषायं प्रायशो मधुरमिति पार्थिवं, तत् स्थैर्य-चल-गौरव-संघातोपचयकर विशेषतश्चा- धोगतिखभावमिति, शीत-स्तिमित-स्निग्ध-मन्द-गुरु-सर-सान्द्र-मृदु- पिच्छिलं रसबहुलमीषत्कषायाम्ललवणं मधुररसप्रायमाप्यं, तत् स्नेहन हादन-क्लेदन-वन्धन-विष्यन्दनकरमिति; उष्ण-तीक्ष्ण-सूक्ष्म-रूक्ष- खर-लघु-विशदं रूपवहुलमीषदम्ललवणं कटुकरसप्राय विशेषतश्चोर्ध्व- गतिखभावमिति तैजसं, तहहन-पचन-दारण-तापन-प्रकाशन-प्रभा- वर्णकरमिति; सूक्ष्म-रूक्ष-खर-शिशिर-लघु-विशदं स्पर्शवहुलमीषत्सिक विशेषतः कपायमिति वायवीयं, तद्वैशद्य-लाघवालपन-विरुक्षण- विचारणकरमिति; श्लक्ष्ण-सूक्ष्म-मृदु-व्यवायि-विशद-विविक्तमव्यक्तरसं शब्दवहुलमाकाशीयं, तन्मार्दव-शौपिर्य-लाघवकरमिति ॥ सु. सू. अ.४१। तत्र प्रभूतं द्रव्याभिव्यक्तिकारणं पृथिव्यादिभूतगुणोत्कपं निर्दिशन्नाह- स्थूलेत्यादि । स्थूल. सूक्ष्मविपरीतः, सान्द्रः तनुविपर्ययः, मन्दः तीक्ष्णविपर्ययः, १ 'स्थूल-सार-सान्द्र' इति हाराणचन्द्रसमत. पाठः।
- ९ + 7 पूर्वार्ध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । सरविपरीतः स्थिरः, गुरुः चिरपाकी, कठिनः मृदुविपरीतः । पार्थिवस्य लक्षणाभि- धानेन गुणवावमभिधाय क्रियावरवं दर्शयन्नाह तत् स्थैर्येत्यादि । स्थैर्यम् मचलत्वं,४ उपययः हणम् 1 x निमितम् आईम् Ixxx हादनं सुखोत्पादनं, छेदनम् भाभावः, xविष्यन्दनं द्रवस्रुतिः1xxx तीक्ष्णं राजिकामरिचादिवत् , सूक्ष्मं सूक्ष्मस्रोतोऽनुसरणशीलं, विशदं पिच्छिलविपरीतम् । xxx दारणं मणादेः, तापनं शरीरादिसंतापन, प्रकाशनम् अभिव्यक्तिः, प्रभा तेज., वर्णः गौरादिः।xxx खरं कर्कोटकफलवत् , शिशिर शीव, विशदं धूलिवत् । xxx ग्लपनम् अपृष्यवं, विचारणं मनसोऽनेकविकरपकरणं, 'विचरणकरम्' इत्यन्ये पठन्ति, तन्न गतिविशेषकरमित्यर्थः, 'विधारणम्' इत्यन्ये । xxx लक्षणं मसणं, मृदु कोमलं, व्यवायीति समस्तदेह व्याप्य पश्चात् पाकं गच्छति विषमयवत् ; विवि पृथग्भूतम्, अवयवद्वारेण शून्यम्' इत्यन्ये । अध्यक्तरसं मधुरादिरस- विशेषानुपलब्धेः 1 xxx (ड.)1xxx कठिनं निविढावयवम् । अत्र गुणे गम्भवहुलमितिवचनात् पृथिव्याः सांसिद्धिकेन गन्धवाहुल्येन योगं दर्शयति । एवं जलादिष्वपि सांसिद्धिकेन रसादिविशेषोण योगं दर्शयन् बहुलशब्दं करिष्यति । इंपरकपायमिति पृथिव्यनिलयोगाज्ज्ञेयं, यद्वक्ष्यति-"पृथिव्यनिलगुणबाहुल्यात कपाय." (सु. सू. अ ४२) इति । प्रायशो मधुरमिति मधुरप्रधान, पृथिव्या मधुर- रसकारणस्वात् ।xxx। अधोगतिस्वभावं पृथिव्या गौरवेण । आप्यद्रव्ये स्तिमि- समिति जडस्वकारकं, सरमिति अनुलोमनम् । ईपदम्लमिति अन्यनुप्रवेशाजले मनागम्लता।xxx। मधुरप्रायं तु पृथ्वीवदपामपि मधुरकारणस्वात् । प्रहादनं मन:प्रियस्वम् । x x x । ईपदम्ललवणमिति एतद्रसद्वयस्यापि वह्रिगुण- च्यापारेणारम्भात्; ऊर्ध्वगतिस्वभावमिति अमेरुज्वलनात्मकत्वात् । दहनं दाहकर, पचनं तावद् विक्लेदादिकरणं, वापनं ताप्योपतापजननं, प्रकाशनम् अभिव्यञ्जनं तमसि, प्रभा दीप्तिः । ४ । वायवीयद्रव्यलक्षणे खरं लक्ष्णविपरीतं, xxइपत्तिकं वायोरपि तिके व्यापारात् । ग्लपनं हर्षक्षयकरम् , x विचारणं मनसोऽनेकविकल्पकरं, 'विवरितम्' इति पाठपक्षे विवरणं विविधा गतिः । आकाशीयद्व्ये व्यवायीति देहव्यापकम् , भव्यक्तरसमिति माकाशस्थाव्यकरसता हेतुत्वात् । ४४ (च. द.)। सारं स्थिरांशं पाकादिभिः क्षया(यो)पचयरहितमित्ये- वत्, सान्दं नीरन्धं, मन्दम् अतीक्ष्णवीर्यम्, स्थिर स्वभावादूर्वादिगतिरहितं, खरं सरस्पर्शम् । ४ । स्तिमितम् आर्द्रम् , हादनं तृप्तिः, विष्यन्दनं विखावः x x । विशदं अपिच्छिलम् । शिशिर शीतस्पर्श, ग्लपनमिति स्वार्थिकोऽयं णिच्, हर्षक्षय इत्यर्थः विचरणं मनसोऽनेकधा विकल्पनं, दोषाणां संचारो वा।xxx। विविकम् असंयुक्तं सच्छिद्गमिति यावत्, अव्यकरसं मधुरादि- रसविशेषेणानुपलभ्यमानम् (हा.)॥ ३ १० - द्रव्यगुणविज्ञानम् हण-क्लेदन-पचन-कर्शन-विवरणानि, तेभ्यः संघात-हादन-प्रकाश- शैध्य-सौषिर्याणि च ॥ (र. वै. अ. २ सू. ४७) एवं चाक्षुषत्वं पाञ्चभौतिकरवं च साधितं कार्यद्व्यस्य, इदानी पुनरपि कार्यद्रव्ये भूवानामुपकार प्रदर्शयति-बृंहणेत्यादि । एतानि वृंहणादीनि यथाक्रमं पृथि- व्यादिभ्यः कार्यद्रव्येपु जायन्ते । बृंहणम् अवयवानामुपचयः पृथिव्याः । रूदनम् अपाम् । पचनं परिणामोऽग्नेः । कर्शनं तेपामेवापचयो वायोः । विवरणं छिदप्रदान- माकाशस्येति । एतानि संघातादीनि च यथाक्रमं पृथिव्यादीनामुपकारः (भा.)॥ तत्र द्रव्यं गुरु-कठिन-विशद-मन्द-सान्द्र-स्थूल-स्थिर-गन्धगुणवहुलं पार्थिवम् , उपचय-गौरव-संघात-स्थैर्यकर; द्रव-स्निग्ध-शीत-गुरु-मन्द- सान्द्र-सर-मृदु -पिच्छिल-रस-गुणवहुलमोदकम्, उपक्लेद-नेह-वन्ध- विष्यन्द-मार्दव-प्रह्लादकर; तीक्ष्णोष्ण-रूक्ष-सूक्ष्म-लघु-विशद-रूप-गुण- वहुलमाग्नेय, दाह-पाक-प्रकाश-प्रभा-वर्णकरं; रूक्ष-सूक्ष्म-लघु-विशद- विकाषि-व्यवायि-शीत-खर-स्पर्श-गुणवहुलं वायव्यं, रौक्ष्य-लाघव-वैशद्य- ग्लानि-विचारकर; सूक्ष्म-लघु-विशद-लक्ष्ण-व्यवायि-विविक्त-शब्द-गुण- चहुलमाकाशात्मकं, सौषिर्य-लाघवकरम् ॥ अ. स. स. भ. १७ । तत्र पार्थिवं द्रव्यं गुरुत्वादिगुणयुक्त गन्धगुणेन चाधिकम् ; उपयुकं च देह उपचयादिकरम् । उपचयो महत्त्वम् । स्थैर्य दायम् । औदकं द्रव्यं द्रवस्वादिगुण- युक्तं रसगुणाधिकं च, देहे चोपलेदादिकरम् । विष्यन्दः स्रोतसां सावः (द्रव- सान्द्रयो. परस्परविपरीतयोरप्याईत्वसामान्यादाप्यत्वम् (अ.द.)। प्रह्लादो हृत्तुष्टिः । आग्नेयं तीक्ष्णत्वादिगुणयुक्तं रूपगुणबहुलं च, देहे दाहादिकरम् । वायव्यं रुक्षस्वादिगुणयुक्त स्पर्शगुणवहुल च, देहे - रौक्ष्यादिकं करोति । विचारो धातु- वहनम् । नाभसं सूक्ष्मत्वादिगुणयुक्तं शब्दगुणाधिकं च xx (इ.)॥ जो द्रव्य गुरु, खर (खुरदरे), कठिन, मन्द (चिरकारी), स्थिर, विशद (पिच्छिलविपरीत), सान्द्र (धन-गाढ़े) स्थूल (मोटे) और गन्ध गुणकी अधिकतावाले (च.), कुछ कषाय और मधुर रसकी प्रधानतावाले (सु.) १ क. हाराणचन्द्रजी पार्थिव द्रव्योंके गुणोंमें 'स्थिर' और 'सार' दोनों गुण पढते हैं और स्थिरका स्वभावसे ऊर्वादिगतिरहित तथा सारका पाकादिसे क्षयोपचयरहित, यह अर्थ २ कई व्याख्याकार गुर्वादिगुणोंके अन्तमें प्रयुक्त 'गुणकी अधिकतावाले' (गुणवहुल-गुणोल्वण ) इस पदका सवन्ध केवल गन्धसे मानकर 'गन्धगुणकी अधिकतावाले' ऐसा अर्ध लेते हैं, क्योंकि गन्ध पृथिवीका विशेष गुण है और इसी लिये गन्ध आदि वैशेषिक गुण मन्तमें लिखे हैं । इसी प्रकार आप्य आदिके गुणवर्णनमें 'रसगुणवहुल' इत्यादि पदोंकी ऐसी ही व्याख्या करते हैं करते हैं।
- पूर्वाध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ११ हो, वे पार्थिव है। उनका उपयोग करनेसे वे शरीरमें उपचय (स्थूलता भराव), संघात (काठिन्य), गौरव (भारीपन), स्थिरता (दृढता) (च.) तथा बल करते हैं और विशेष करके अधोगति (नीचे गमन) करनेके खभाववाले होते हैं (सु.)। जो द्रव्य द्रव, स्निग्ध, शीत, मन्द, मृदु (मृदुस्पर्शवाले-कोमल), पिच्छिल (उारदार ) (च.), स्तिमित ( आई वा जह), गुरु, सर (अनुलोमन) तथा सान्द्रगुण वाले, रस गुणकी अधिकतावाले, कुछ कषाय, अम्ल और लवण रसवाले तथा मधुर रसकी अधिकतावाले हों (सु.), वे आप्य है । उनका उपयोग करनेसे के शरीरमें उपल्लेद (आईता), स्नेह (स्निग्धता), बन्ध (अवयवोंका परस्पर सयोजन-बाँधना), विप्यन्द (स्रोतोंसे द्रव झरना), मृदुता और प्रहाद (शरीर, इन्द्रियों और मनकी तुष्टि-तृप्ति ) उत्पन्न करते हैं । जो द्रव्य उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोंमें भी प्रवेश करनेवाले), लघु, रूक्ष, विशद और रूप गुणकी अधिकता- वाले (च.), खर, कुछ अम्ल और लवण रसवाले तथा कटुरसकी अधिकतावाले और विशेष करके ऊर्ध्वगमनके स्वभाववाले हों (सु.), वे आग्नेय (तैजस) हैं। उनका उपयोग करनेसे वे शरीरमें दाह (जलाना), पाक (पकाना-परिणाम), प्रमा (वर्णका प्रकाशन करनेवाली दीप्ति), प्रकाश, वर्ण (च.), दारण (फारना-फोदना) तथा तपाना (सु.), ये कर्म करते हैं । जो द्रव्य लघु, शीत, क्ष, खर, विशद और सूक्ष्म गुणवाले, स्पर्श गुगकी अधिकतावाले (च.), व्यवायी, विकाशी (य. सं.), कुछ तिक रसवाले और विशेषतः कयाय रसवाले हो (सु.), वे घायव्य है । उनका उपयोग करनेसे वे शरीरमे रूक्षता, ग्लानि (हपंक्षय-अमृप्यता), विचार (मनके अनेक प्रकारके विकल्प या नाना प्रकारकी गति), विशदता, लाघव (इलकापन) और कर्शन (रवै.) करते हैं । जो द्रव्य मृदु, लघु, सूक्ष्म, लक्ष्ण (चिकने), शब्द गुणकी अधिकतावाले (च.), विशद, व्यवायी और विविक्त (पृथग्भूतावयव) गुणवाले (सु. अ. सं.), तथा अव्यक्त रसवाले हों (सु.), वे आकाशीय है। उनका उपयोग करनेसे वे शरीरमें मृदुता, सुषिरता (सच्छिद्रता) और लाघव करते हैं । इस प्रकार पार्थिव आदि मेदसे द्रव्यके पाँच वर्ग होते हैं। प्रभावमेदेन द्रव्यभेदा.- किंचिदोपप्रशमनं किंचिद्धातुप्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ मतं किंचित्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ (च. सू अ. १।) द्रव्यकार्य प्रभावकृतं वक्तुं प्रभावभेदेन द्रव्यमेदमाह-किचिदित्यादि । १ यहाँ 'पार्थिव शम्दसे पृथिवीके गुण-कर्म जिनमें अधिक हों ऐसे पाश्चभौतिक द्रव्य, यह अर्ध समझना चाहिये, इसी प्रकार आप्य-तैजस मादि शम्दोंका भी मर्ध समझना चाहिये। । . - -- - १२ द्रव्यगुण विज्ञानम् । किंचिदिति न सर्वम् । दोषस्य दोपयोर्दोषाणां वा प्रशमनं दोपप्रशमनम् । दोप- ग्रहणेन दुष्टा रसादयोऽपि गृयन्ते । तेन द्रव्यमहिना यहोपाणां दुष्टानां रसादीनां धातूनां वा शमकमामलक-दुरालभादि तद्यते । आमलकं हि शिवत्वप्रमावात्रि दोपहरं; दुरालभा चापि वात-पित्त-श्लेष्म-हरी । यद्यपि चामलकस्य "हन्ति वावं तदम्लत्वात्" (सु. सू. अ. ४६) इत्यादिना गुणद्वारा त्रिदोपहरत्वमुच्यते, तथाऽपि तत् प्रभाववृहितमेव बोद्धव्यम् । यतस्तत्राम्लत्वादिना पित्तादिकोपोऽपि युज्यते, स त्वामलकप्रभावान भवति । धातुप्रदूपणमिति वातादीनां समत्वेन शरीरधारणा- स्मकानां तथा रसादीनां च दूषणं किंचित्, यथा-यवक-मन्दक-विपादि । सुदु अवतिष्ठते नीरोगस्वेनेति स्वस्थः, तस्य वृत्तिः स्वस्थरूपतयाऽनुवर्तनं, तन स्वस्थवृत्ती मतमभिमतं पूजितमिति यावत् । संख्येयनिर्देशादेव त्रित्वे लब्धे त्रिविधग्रहणं नियमार्थम् । तेन संशोधन-संशमनादीनामनेकविधानामप्यत्रैवावरोध. । रसायनवा- जीकरणे तु स्वस्थवृत्तिमाने एव । यदुकं-"स्वस्थस्योर्जस्कर यत्तु तदृष्यं तदसायनम्" चि. भ. १, पा. १) इति । प्रतिपादे किंचिद्वहणं दोपहरत्वादिकर्मणां विभिम- द्रव्याश्रयित्वोपदर्शनार्थम् । एककिंचिद्रहणे त्वेकमेव द्रव्यं दोपहरं धातुप्रदूपकं स्वस्थवृत्तिमतं च स्यात् । न च तदभिमतम् । ननु, स्वस्थवृत्तिमतानां रक्तशालि-पष्टिक- यवादीनां दोषप्रशमनत्वमपि दृश्यते, यतो वक्ष्यति तत्र तत्र रक्तशाल्यादीनां ज्वरादौ प्रयोगं, तथा प्रकृति-शरीर-देश-काल-मानाभियुक्तं दोपप्रशमनमपि दोष- करं भवति, यथा-आमलकमतिमात्रमग्निमान्द्यायेत्यादि ज्ञेयं; तथा धातुप्रदूपणमपि दोपशमनं दृश्यते, यथा-विषमुदरहर, तथा यदेव मन्दकादि दोपकर तदेव क्षीणदोषं प्रति दोपवृद्ध्या साम्यापादनेन दोपप्रशमनं भवति, तदेवमव्यवस्थितत्वात् किंचिद्दोपप्रशमनमित्यादि विरुद्धम् ? अनोच्यते-स्वस्थवृत्तिमतं रक्तशाल्यादि- दोषप्रशमनमपि भवति, परं तत् प्रायः स्वस्थवृत्तिहितत्वात् स्वस्थवृत्तिमतत्वेन गृह्यते । वचनं हि-"स्वस्थस्योर्जस्करं यत्तु तद्वृष्यं तद्सायनम् । प्रायः, प्रायेण रोगाणां द्वितीयं शमने हितम् ॥ प्रायः शब्दो विशेषार्थ उभयं [भयार्थकृत्" (चि. अ । पा. १) इति । दोषप्रशमनानि द्रव्याणि विगुणप्रकृत्यादिप्रतिबन्धका- भावे दोषप्रशमनमाचरन्त्येव, प्रतिबन्धकसद्भाचे तु न कुर्वन्ति, न चैतावता तेषां स स्वभावो न भवति; नह्यग्निर्मन्त्रादिप्रतिबन्धात् कदाचिन्न दहतीति दाहकत्वेन नोपदिश्यते; एवं धातुप्रदूषकस्यापि कदाचिद्धातुप्रशमकत्वं निमित्तान्तरयोगाद्भवत्र धातुप्रदूपकवरूपंतां हन्ति, यथा-सलिलस्यामिसम्बन्धादुष्णस्वम् । तस्माद्ययस्य प्रायिकमनन्योपाधिकृत च रूपं, तेनैव व्यपदेशो युक्तः । यश मन्दकादीनां क्षीण- दोषवर्धकत्वेन दोषप्रशमकत्वं, तद्विद्यमानमपि कादाचिस्कत्वात्तथा धुत्तरकालं दोषा- 'वहत्वाचन व्यपदिश्यते दोषप्रशमकत्वेन । ननु, यद्यप्येवं तथाऽपि यदेकदोपहर- मपरदोषकर , यथा मरिचं श्लेष्महरं पित्तकरं चेत्यादि बहुदन्यजात वद कुत्र - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । १३ H - प्रविशतु ! अत्रके वदन्ति-यदुभयात्मकं तद्दोपहर दोषकर च, नचैतावता व्यनि- स्वक्षतिः, यतो न वातादिसंसर्गजन्याधिसभाचे वातादिजन्यत्वेन यत्रैविध्य रोगाणा- मुच्यते वत् खण्डितं भवति; किंवा मरिचादीनां यदुभयकर्तृत्वं न तद्रव्यप्रभावकृतं, किं तर्हि रसादिकृतं, तेन न द्रव्यप्रभावप्रसावे तदुदाहरणीय; नच किंचिगव्यं साशमस्ति यत् प्रभावादेव किंचिद्दोप करोति किंचिच्छमयतीति न दोपप्रशमन- स्वादिप्रभाव प्रति नियमः; अयमेव च पक्षः साधुः । ननु 'किंचिद्दोपप्रशमनं किंचिहोपप्रदूषणम्' इति वा क्रियता, 'किंचिद्धातुप्रशमनं किंचिद्धातुप्रदूषणम्' इति वा। नैवं, तथा सति दोपशब्दस्य मुख्यवृत्या वातादिष्वेव वृत्तित्वात्तथा धातु- शब्दस्य च रसादिवृत्तित्वादुभयग्रहणं न प्राप्यते; उभयपदोपादानेन द्वय निपुणकारी तम्रकारो दूषणत्व-धारणस्व-योगपरिग्रहाद्दोपप्रशमनेन दुष्टरसादिप्रशमनमपि भेपर्ज विविधाशितपीतीयादिवक्ष्यमाणं, तथा धातुप्रदूपणेन वातादिप्रदूपकमपि निदानादि- वक्ष्यमाणं ग्राहयति । प्रशब्दोऽत्र प्रकारे; तेन प्रकारेण मृदुमध्यादिना प्रकोपणं, तथा प्रकारेण संशोधन-संशमनादिना शमनमुच्यते; किंवा धास्वानुवृत्तावेव इमौ प्रशन्दौ, यथा-'च्युतांशः परिधावति' इत्यन्न धावतीत्यर्थः । मादौ दोषप्रशमन- ग्रहणं तस्यैवेहाभिप्रेतत्वात् । ननु स्वस्थवृत्तिमतं द्रव्यं भाविदोपहरत्वेन दोषप्रशम- नमेव । नैवं, नहि स्वास्थ्यानुवृत्तिजनकत्वादोपनिवृत्तिकर दोपहरणमुच्यते, किं • तर्हि समधातूनामवर्धकत्वेनाक्षयकरत्वेन च रसादिस्रोतसां चानुगुणत्वेन धातुसा. म्यानुवृत्तिकरमुच्यते । वचनं हि-"पथ्यं पथोऽनपेतं यत्" (च. सू. भ. २५), इति (च. द.)।xxx। किंचिगव्यं धातून् विषमान् समीकरोति, किचित् समान् विषमीकरोति, किंचिच समान् धातून प्रकृतौ वर्तयति, इति द्रव्यं त्रिविधमुच्यते (यो.)॥ शमनं कोपनं स्वस्थ हितं द्रव्यमिति त्रिधा। अ. स., अ.ह. सू.अ.१। एषां च रसानामाश्रयो द्रव्यं, यद्रसादीननपेक्ष्य प्रभावादेव किंचित् करोति । तविप्रकारं विशिष्ट रसादिभिर्युक्त कुपितानां वातादीनां शमनं नाशकरं गुडूच्यादि, भन्यैर्युक्त कोपनं साम्यनाशकरं यवकादि, अन्यैः स्वस्थहिवं शाल्यादिः यम कुपितस्य समीकरणे समर्थ नापि समस्य कोपने केवलं यथास्थितमेव संचाइयति । केचितु एकस्यैव द्रव्यस्य योग-मात्रा-कालादिभेदात् त्रिरूपतामाहुः (इ.)। इति अनेन प्रकारेण शमनादिमेदेन, निधा त्रिप्रकारं द्रव्यम् । अन्येन प्रकारेण द्विधा, अथवा अनेकधा । इतिशब्दः प्रकारार्थेऽभिहितः । यत् कुपितान् वातादीन् दोषान् शमयति, तच्छमनम् ।xxx। यद्वातादीन दोषान् रसादीन् धातून मूत्रा- दीन्मलांश्च कोपयति, तत् कोपनम् । दोपादीनां मलपर्यन्तानां खप्रमाणस्थितानां साम्यानुवृत्तिहेतुर्यद्रव्यं तत् स्वस्थेभ्यो हितं, यच स्वास्थ्यानुवृत्ति करोति 1- - द्रव्यगुणविज्ञानम् । ऋतुचर्याध्याये सेव्यरवेनोक्तं, तथा मानाशितीयाध्याये रतशालिपरिकपवगो. धूमजानलमांसजीवन्तीशाकदिव्योदफक्षीरादि, तथा यस्करं रसायनयाजीकरण सर्वदा शीलनीयत्वेन निर्दिष्टम् (अ. द.) । प्रभायो रमादिप्यन्तरा इति योतयितुं द्रव्यशब्देनोक्तः ।xxx। यद् द्रव्यं समः समविपरीतंत्रां रसादिमियु- कमपि वातादीन् शमयति तच्छमनम् । तद्यथा-मधुरगीताऽपि जीयम्ती कर्फ शमयति, कटुपाकरसो गुरु. सिग्धोऽपि रसोन. कफासी । यद् व्यं विपरीत समविपरीतैर्वा रसादिभिर्युक्तमपि वातादीन् कोपयति तत् कोपनम् । यथा--- गुरूप्णनिग्धमधुरमपि फाणितं वात कोपयति, तरेव गुणर्मापः पित्तकफी । यद् द्रध्यं वातादीनां क्षयवृद्ध्योहेतुरपि स्वस्थस्य न तथा, तत् स्वस्वहितम् । यथा- गुरु-मधुर-रूक्ष-शीतोऽपि यवः स्वस्थस्य पित्तं न क्षपयति, गुल्मधुर-निग्ध-गीतमपि क्षीरं स्वस्थस्य कर्फ न कोपयति । एव सर्वत्रापि प्रभाव उदाहरणीयः । वक्ष्यति च (सू. अ. ९)-"रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम् ।" इति । अन्ये तु शमनादीन् द्रव्यभेदानाहुः । तत्तु न सम्यक् । द्रव्यभेदत्वे यदेव शमनं, तदेव कोपनं, तदेव स्वस्थहितमिति सकरो न युक्त. । धर्ममेदत्वे तु रसादिमहरययुक्त. । किञ्च द्रव्यभेदाश्चेदमी तदा रसादिधर्मभेदानां प्राक् पश्याहा अभिधेयाः स्युः, न मध्ये । तस्मात् प्रभावमेदा एव शमनादयः (हे.)॥ प्रभावभेदसे द्रव्य तीन प्रकारके होते है-(१) कुछ द्रव्य अपने प्रभावसे यातादि दोष और वातादि दोपद्वारा दृपित रसादि धातुओंका प्रशमन करते हैं; जैसे, आँवला; आँवलेके अन्दर स्थित अम्लादि रस पित्तादि दोषोंको दृपित न करके अपने द्रव्यप्रगावसे वातादि तीनों दोषोंका शमन ही करते हैं, (२) कुछ द्रव्य अपने प्रभावले धातुओं को (समावस्थामें स्थित वातादि दोष शरीरको धारण करनेवाले होनेसे धातु कहलाते हैं . उनको, रसादि धातुओंको तथा समावस्थामें स्थित मूत्र-पुरीप आदि मल मी शरीरको धारण करनेवाले होनेसे धातु कहलाते है उनको ) दृपित करते हैं; जैसे-विष आदि; ३) और कुछ द्रव्य अपने प्रभावसे वातादि दोषोंका प्रशमन या धातुओंका दूषण न करके केवल खस्थके लिए ही हितकर होते हैं; जैसे-रकशालि आदि । इस प्रकार प्रभावमेदसे द्रव्यके दोषप्रशमन (शमन), धातुप्रदूपण (कोपन) और स्वस्थवृत्तिमत (स्वस्थहित) ये तीन भेद-वर्ग होते हैं। योनिमेदेन द्रव्यमेदा तत् पुनस्त्रिविधं प्रोक्तं जगमौद्भिदपार्थिवम् । (पाञ्चभौतिकं द्रव्यं प्रभावभेदेन विभज्य योनिभेदेन विभजति-) तत् १ 'जाङ्गम भौममौद्भिदम्' इति पा० । २ 'क्रियाविशेषेण विभज्य स्वरूपेण विभजति' इति गदाधरः। - पूर्वार्धे द्रव्य विज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । १५ . - पुनरित्यादि । तदिति द्रव्यम् । गच्छतीति जङ्गमम् , उनिय पृथिवीं जायत इति मौदिदं वृक्षादि, उक्कमकारद्वयातिरिक्तः पृथिवीविकारः पार्थिवम् ।xxx। इह ग्यशम्देन पार्थिवद्गव्यमेवोच्यते; तेन जलानिलाम्यादीनाममहणादव्याप्तिन वाया। जामशब्देन जगमप्रभवं गोरसमध्वाधपि ग्राह्यम् । एवमौद्भिदपार्थिव- योरपि ग्रहणं वाच्यम् (च. द.)। तद्व्यं पुन स्त्रिविधं ज्ञेयं-जामं भौममौद्भि- दमिति । भृशं पुनः पुनर्वा गच्छन्तीति जगमा जरायुजादयः, जगमप्रभवं जाम गोरसमध्वादि । भूमेर्विकारो भामं सुवर्णादिकम् । उद्भिद्य पृथिव्यां जायत इत्यौगिदं वनस्पत्यादि (यो.)।xxx। तन्मूर्तिमत् पाञ्चभौतिकं द्रव्यं मेदान्तरेणापि विविधमसिस्त्र प्रयोक्तुमर्हरवेन योध्यं, तेन वारवादीनाममूर्तद्रव्यस्वेनानुपदेशेऽपि न न्यूनरवम् । तत्तु निविधं विमजते-जागमेत्यादि । जनमानामिदमिति जाङ्गमम् । औद्धिदम् उदिप पृथिवीं x जायत इत्युद्भित्, तस्यावयवरूपमिदमौद्भिदं, द्रव्य- मित्यन्वयः । पृथिव्या विकाररूपं पार्थिवं; पृथिवी प्रधानमस्य विकारस्य तद्वा पार्थिव मिति (ग.) योनिमेदसे द्रव्योंके जामम, औद्भिद और पार्थिव ये तीन भेद होते है । (१) जो एक स्थानसे दूसरे स्थानमें गमन करते हैं, उनको जङ्गम कहते हैं; जैसे-जरायुज आदि प्राणी । जगम प्राणियोंसे मिलने वाले गोरस, मधु, मांस, कस्तूरी, गोरोचन आदि द्रव्य जाङ्गम कहलाते हैं । (२) जो पृथिवीको फाड़कर उत्पन्न होते हैं, उनको उद्भिद् या उद्भिज कहते हैं, जैसे-वृक्ष, लता आदि । उनके अवयवरूप मूल, बचा, पत्र, पुष्प, फल आदि द्रव्य औद्भिद कहलाते हैं । (३) पृथिवीके विकाररूप जो द्रव्य हैं, वे पार्थिव कहलाते हैं; जैसे-सोना, सैन्धव आदि । औद्विदद्रव्याणामवान्तरभेदा औद्भिदं तु चतुर्विधम् । वनस्पतिस्तथा वीरद्वानस्पत्यस्तथौषधिः ॥ फलैर्वनस्पतिः पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि । ओषध्यः फलपाकान्ताः प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः ॥ (च. सू. अ. ११) फलेवनस्पतिरिति विना पुष्पै. फलैर्युक्ता बटोदुम्बरादय.।xxx पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपीति पुष्पानन्तरं फलभाज इत्यर्थः।xxx। प्रतानशब्देन लता गुल्माश्च गृह्यन्ते । यदुक्तं हारीतेन-"लता गुल्माश्च वीरुधः” इति (च. द.)। xxx वीरुदिति विशेपेण लताप्रतानविस्तृतीभूय वा रुणद्धि देशमिति वीरुत् । xxx ओपधिरिति उप दाहे, ओषेण भूतामिना माफलपाकादाधीयते इति ओपधिः फलपाकान्ता ।xxx। (ग.)।'x xx फलैरित्यत्र जटाभिस्तापस इतिवत् 'इत्थंभूतलक्षणे' (पा. भ. २।३।२१) इति तृतीया । एवमन्यनापि । xxx (यो.)॥ १ पार्थिवद्रव्यमिति पृथिवीमाधारीकृत्योत्पन्न गुडूची-च्छाग-सैन्धवादि द्रव्यमित्यर्थः ।
द्रव्यगुणविज्ञानम् । तासां स्थावराश्चतुर्विधाः-वनस्पतयः, वृक्षाः, वीरुधः, ओषधय इति । तासु, अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः, प्रतानवत्यः स्तम्विन्यश्च वीरुधः, फलपाकनिष्ठा ओषधय इति ॥ (सु. सू अ. १)। तासामिति द्विविधानामोपधीनां मध्ये । के ते चत्वारः प्रकारा इत्याह- वनस्पतय इत्यादि । तानेव विवरितुमाह-तास्विति; तासु मध्ये । अपुष्पा इति अविद्यमानपुप्पाः, फलवन्त इति फलं येपामस्ति ते वनस्पतय इति; के पुनरी- दृशा.? प्लक्षोदुम्बरादयः । पुष्पफलवन्तो वृक्षा इति उभययुक्ता वृक्षाः के ते ? आव्रजम्बूप्रभृतयः। प्रतानवत्य इत्यादि-प्रतानवत्यः विस्तारवत्यो चीरुधः; न केवळ प्रतानवत्यो वीरुधः स्तम्विन्यो गुल्मिन्यश्च, गुल्मः पुनः वर्तुललतासन्ततिर्विटपः । ४ ४ ४। फलपातिष्ठा इति निष्ठा नाशः, फलपाकेन परिणत्या नाशो यासां वास्तथोक्ताः; ते पुनर्गोधूमादय, अन्ये तु निष्ठाशब्द प्रत्येकं संवदन्ति, फलनिष्ठाः पाकनिष्ठाश्चेति; तत्र फलनिछाः शालि-तिल-कुलत्यादयः, पाकनिष्ठा. कवकादयः कवकश्छत्रक उच्यते (ड.)। तास्विति ते च वृक्षास्ते च वनस्पतयस्ताश्च वीरुधस्ता- श्वौषधय इति; "तदादीनां मिथः सहोक्तौ यत् परं तच्छिप्यते" इत्येकशेषः, वनस्पत्यादिग्वित्यर्थः।xxx। येभ्यश्च पुष्पाणि जायन्ते न फलानि ते सर्ववृक्षेषु वन्ध्या अवकेशिन इत्युच्यन्ते । तेषां सत्यामपि फलसंभावनायां तदभावाद् व्यापनत्वेन वृक्षत्वमेव गम्यते ।xxx। गुल्मा एकमूलाः संघातजाताः पारेक्षु- प्रभृतयः । ४४४(हा.)॥ अन डल्हण-चक्रपाणिप्रभृतिभिर्व्याख्यातृभिः 'भपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः' इत्यस्य 'अविधमानपुष्पाः फलवन्तो वटोदुम्बरादयो वनस्पतयः' इत्यर्थों व्याख्यातः । पर स न मनोरमः, वटोदुम्बरादीनां पुष्पसद्भावात्; पुप्पेभ्य एवं तत्फलानां समुद्भवाच्च । वटोदुम्बरादिषु पूर्व पुष्पाणि, पश्चासेभ्यः फलानि संजायन्ते । परं सूक्ष्मत्वात् कर्णिकयाऽऽवृतत्वाच तानि सन्त्यपि वापतो न दृश्यन्ते । वटादीनां फलमिति नाम्ना व्यवहियमाणं वस्तु नैकं फलं, किन्तु कर्णिकया- ऽऽवृतो बहूनां फलानां समुच्चय एव । इत्थंभूतं फलसमुख्यमेव फलमिति मरवा तत्र बाह्यत पुष्पाणामभावमुपलभ्य एतादृशानि फलानि विना पुष्पमुत्पद्यन्तेऽतो वटादयोऽविद्यमानपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतिशब्दवाच्या इति तैर्व्याख्यातमिति संभाव्यते । पर यद्यामावस्थायां वटादीनां फलवदृश्यमाना कर्णिका द्विधा भिश्वा वृहद्दर्शककाचसाहारयेनावलोक्यते तदानीं तत्र दश्यन्ते सूक्ष्माण्यनेकपुष्पाणि । कियता कालेन तानि फलरूपेण परिणमन्ति । लोकैस्तु प्रायेण परिपक्वान्तःफला कर्णिका भिद्यते तत्र सूक्ष्मा जन्तवः सन्ति न वेति ज्ञानार्थम् । परं तदानीं पुष्पाणां १ 'वर्तुललतासततिविशिष्ट ' इति पा० ।
पूर्वार्ध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । १७ " फलरूपेण परिणतत्वाश दृश्यन्ते तानि । फलानामपि सूक्ष्मत्वात् परिपकत्वाध कर्णिकान्तर्गतबीजान्येव दृश्यन्ते तदा। अतो वटादयोऽविद्यमानपुष्पा इतिश्रमसंभवः स्वाभाविकः । नैतावता वटोदुम्बरादीनामपुष्पत्वं शक्यं वक्तुम् । तस्मात् 'अपुष्पाः' इत्यत्र नन् अल्पार्थे-सूक्ष्मार्थे । अंतः अपुष्पाः सूक्ष्मपुष्पाः, पुष्पाणां सूक्ष्मस्वात् कर्णिकयाऽऽवृतत्वेन बाह्यतोऽदृश्यत्वाच अदृश्यपुष्पा:-गुह्यपुष्पाः इत्यर्थः । शब्दार्थचिन्तामणि-शब्दस्तोममहानिधि-वाचस्पत्यबृहदभिधान-सेन्ट- पिटर्सवर्गडिक्शनरीप्रभृतिकोपेषु दृश्यतेऽश्वस्थस्य 'गुटपुष्पः' इति पर्याय- नाम, तदपीममेवाथ द्रढयति । अन्ये पुनः 'अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्प- फलवन्तो वृक्षाः' इति वचनमन्यथा व्याख्यानयन्ति, यथा-"अपुष्पाः पुष्पं विना, फलवन्तः उत्पत्तिमन्तो वनस्पतयः । 'फलनिष्पत्तौ इति धातुः, ततः फलति निप्पद्यते इति 'फलम्' इति रूपं, तद्वन्तः उत्पत्तिमन्तः । पुष्पं विना उत्पद्यमाना हंसपदी-मयूरशिखादयो अपुष्पा उद्भिजा वनस्पतयः । पुष्पफलवन्तः पुष्पात् फल- वन्तः उत्पधमाना भाम्रजम्वूप्रभृतयः सपुष्पा उद्भिज्जा वृक्षा इत्यर्थः । अनेन सनिजानां 'सपुष्पा', 'अपुष्पा' चेति द्विविधा जातिरुक्का तन्त्रकृता' इति । प्रथमव्याख्यायां वनस्पतिवृक्षशब्दाभ्यां द्वितीयव्याख्याने वृक्षशब्देन च, मोषधि- वीरुधामपि सपुष्पफलत्वेन ग्रहणमापद्यते, परं तासामोपधिवीरुच्छन्दाभ्यां पृथगुक- स्वात् पारिशेप्यावृक्षा एवात्र प्रथमव्याख्याने वनस्पतिवृक्षशब्दाम्यां द्वितीयव्याख्याने च वृक्षशब्देनाभिप्रेता इति ज्ञेयम् । व्याख्यानद्वयमप्येतत् प्रत्यक्षाविरुद्धत्वात् साधु । उद्भिज्जद्रव्योंके चरक और सुश्रुतमें चार अवान्तर भेद लिखे हैं-वनस्पति, वानस्पत्य-वृक्ष, वीरुधू और ओषधि । (१) जिनमें पुष्प (और फल) सूक्ष्म और कर्णिकाके द्वारा आवृत होने( ढके रहने )के कारण दिखते नहीं ऐसे अदृश्य(गुह्य )पुष्प उद्विजोंको वनस्पति कहते हैं जैसे-वड़, गूलर इत्यादि । १ प्रसिद्ध उद्भिज्जवेत्ता स्व. वा. श्रीयुत जयकृष्ण इन्द्रजी अपने गुजराती भाषामें मुद्रित 'वनस्पतिशास्त्र' नामके ग्रन्थमें वडके प्रकरणमें उसके फूलों और फलोंके विषयमें लिखते हैं कि-"इस वृक्षमें फूल और फल बहुत सूक्ष्म होते हैं । ये नीचेसे चौड़ी और नीचेसे ऊपरकी ओर गोलाई ली हुई कर्णिका अथवा पुष्पाधारपर स्थित होते हैं । इस कर्णिका या पुष्पाधारको ही बडका फल समझा जाता है। परन्तु वास्तव में तो बडके फूल और फल इन कणिकाओं ( Receptacles ) के अन्दर सूक्ष्मरूपमें रहते है । ये कर्णिकाएँ बन्द होनेसे उन्हें खोले विना उनके फूल और फल देखे नहीं जा सकते । प्रायः होता यह है कि जबतक बडकी कर्णिकाएँ पककर लाल नहीं हो जाती तब तक उनकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। और जब वे पूर्णतः पक जाती हैं तव उनके फूल खुलकर फलमें परिणत हो गये होते हैं। इसी कारण पकी हुई कर्णिकाओंको जब हम खोलकर देखते है तो उनमें पके हुए सूक्ष्म बीजों जैसे फल दीख पड़ते हैं, जिन्हें हम वटके वीज कहते हैं । सो, वढके फूल देखने हों तो कच्ची कणिकाओंको चीरकर उनका बृहदर्शक काचसे निरीक्षण करना चाहिए"। द्र० पू.२ । - -- । १८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । (२) जिनमें पुष्प और फल दोनों प्रकटरूपसे दिराते हैं, उनको चानस्पत्य या वृक्ष कहते हैं; जैसे-आम, जामुन इत्यादि । (३ ) फल पकनेपर या स्वयं पक जानेपर जिनका अन्त-नाश हो जाता है, उनको ओपधि कहते हैं; जैसे-गालि, गोधूम, छत्राक आदि । (४) जिनकी लताएँ फैलती हैं तथा जो गुल्मके रूपमें होते हैं, उनको वीरुध् कहते हैं; जैसे-गिलोय (लताका उदाहरण), कनेर (गुल्मका उदाहरण), आदि । वकव्य-उल्हण-चक्रपाणि आदि प्राचीन टीकाकारोंने 'अपुप्पा. फलवन्तो वनस्प- तयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः' इसकी "जिनमें विना पुष्प लगे ही फल होते हैं उनको वनस्पति कहते हैं, जैसे बड़-गूलर आदि; और जिनमें प्रथम पुष्प होकर पीछे उनसे फल वनते हैं उनको वृक्ष कहते हैं, जैसे-आम-जामुन आदि" ऐसी व्याख्या की है। परन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है। क्योंकि बड़-गूलर आदिमें प्रथम सूक्ष्म पुष्प लगते हैं और पीछे उनसे ही फल बनते हैं । परन्तु पुष्प और फल दोनों सूक्ष्म होनेसे तथा कर्णिकाद्वारा आच्छादित होने(ढके रहने )के कारण बाहरसे दिखते नहीं । इसलिये संभव है कि बड़-गूलर आदिकी पुष्प-फल-युक समग्र कर्णिकाको फल मानकर और उसमें बाहरसे पुष्पोंका अभाव देखकर उन्होंने ऊपर लिखी हुई व्याख्या की हो। बड़-गूलर आदिमे बाहरसे पुष्प न दिखनेसे ऐसा नम होना सभव है । परन्तु बद्द, गूलर आदिकी अपक्क कर्णिकाको काटकर बृहद्दर्शक काचकी सहायताले उसका सूक्ष्म निरीक्षण करें तो उसमे अनेक सूक्ष्म पुष्प दिसते हैं। अतः 'अपुप्पा.' इस पदमे 'नन्' अव्यय निषेधार्थमें नहीं किन्तु अल्पार्थमें (सूक्ष्मके अर्थम) है यह मानकर अपुष्प याने सूक्ष्मपुष्पवाले और पुष्प सूक्ष्म तथा कर्णिकासे आच्छादित होनेसे अदृश्य( गुट) पुष्पवाले, यह अर्थ करना उचित है । शब्दार्थचिन्तामणि-शब्दस्तोममहा- निधि-वाचस्पत्यबृहदभिधान-सेन्टपिटर्सवर्गडिक्शनरी आदि कोशीमे अश्वत्थ( पीपल के वृक्ष )का गुहापुष्प यह पर्याय नाम मिलता है । उससे इस अर्थकी पुष्टि होती है। कई विद्वान् 'मपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः' इस वाक्यमें 'फलवन्त. इस पदकी 'फल' निष्पत्ती उत्पन्न होना, इस धातुसे 'फलन्ति उत्पद्यन्ते इति फलानि, तद्वन्तः फलवन्त -जो उत्पन्न हों वें फल, उनवाले अर्थात् उत्पन्न होनेवाले' ऐसी व्युत्पत्ति करके "पुष्पके विना उत्पन्न होनेवाले हंसराज-मयूरशिखा आदि अपुष्प उद्भिज वनस्पति और पुष्प तथा फलसे उत्पन्न होनेवाले सपुष्प उद्भिज वृक्ष कहलाते हैं" ऐसी व्याख्या करते हैं, और इस वाक्यसे तन्त्रकारने अपुष्प और सपुष्प ये उद्विजोंके दो वर्ग बताये हैं, ऐसा कहते हैं । प्रथम व्याख्यामें वनस्पति तथा वृक्ष शब्दसे और द्वितीय व्याख्यामें वृक्ष शब्दसे ओषधि तथा वीरुध् (लता और गुल्म ) भी पुष्प-फल-वाले होनेसे उनका प्रण प्राप्त होता है, तथापि उनका 'ओषधि' और 'वीरुध्' शब्दसे खतन्त्र निर्देश किया गया है, - - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । १९ 1 अतः प्रथम व्याख्याने वनस्पति तथा वृक्ष दोनों शब्द और द्वितीय व्याख्या वृक्ष शब्द शेष रहे हुए वृक्षोंका वाचक है, ऐसा जानना चाहिये। उद्भिज शब्दकी निरुक्ति, उद्भिज्जोंके प्रधान मेद तथा उनके अङ्ग-प्रत्यमोंके लिये प्रयुक्त शब्दोंकी व्याख्या, इनका इस ग्रन्थके औषधद्रव्यविज्ञानखण्डके प्रथम अध्यायमें विस्तारसे वर्णन किया जायगा । इन विषयोंको वहीं देखें। जग्गमद्रव्याणामवान्तरमेदा.- जगमाः खल्वपि चतुर्विधाः-जरायुजाण्डजखेदजोद्भिजाः । तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः, खग-सर्प-सरीसृपप्रभृतयोऽण्डजाः, कृमि-कीट-पिपीलिकाप्रभृतयः खेदजाः, इन्द्रगोप-मण्डूकप्रभृतय उद्भिजाः ॥ सु. सू. अ.१॥ जामाः खल्वपीत्यादि । जगमा अपि चतुर्विधाः चतुष्प्रकाराः । तानाह-जरायु- जेत्यादि । (जरायोर्जाता जरायुजाः, जरायुर्गर्भाशयः (उल्बः); अण्डाजाता अण्डजा., 'अण्डं प्राण्याधारो वर्तुलं; भुवः शरीरस्य च संस्वेदादूष्मणो जाताः संस्वेदजाः; भुवमुद्भिध जाता उद्भिजाः।) xxx। व्यालादय इति व्याला हिंस्रपशवो व्याघ्रादयः । अन्ये तु पशुग्रहणादेव हिंसपशूनामपि ग्रहणमिति व्याल- शब्देन सर्पविशेषमाहुः । तदुकं-"सर्पजातिपु अहिपताका जरायुजा" इति । आदि ग्रहणाद् वलाकाजतुकादयः।xxx। खगसप॑त्यादि खगाः पक्षिणः, सर्पा मन्दगामिनोऽजगरप्रभृतयः; सरीसृपाः शीव्रगामिनः कृष्णसर्पोदय., मीनमकरादयो वा, प्रभृतिग्रहणात् कूर्मनकादीनां ग्रहणम् । xxx। कृमिकोटेयादि कृमयः कोटपुरीपादिवाष्पसंभवाः, कीटा वृश्चिकपशिन्दुप्रभृतयः, पिपीलिकाः चिटिकाः; प्रभृतिग्रहणादेवंविधा अन्येऽपि दृश्यन्ते । इन्द्रगोपेत्यादि इन्द्रगोपाः प्रावृट्का- लजा अतिरककृमयः, 'इन्द्रवधू' इति लोके प्रभृतिग्रहणादीदृशा मन्येऽपि (ड.)। जगमवर्गके आयुर्वेदमें चार अवान्तर मेद किये गये हैं-जरायुज, अण्डज, खेदज और उद्भिज । (१) जो प्राणी जरायु(गर्भाशय-उल्य )से उत्पन्न होते हैं, उनको जरायुज कहते हैं, जैसे-मनुष्य पशु आदि । (२) जो प्राणी अण्डेसे निकलते हैं, उनको अण्डज कहते हैं; जैसे-पक्षी, साँप आदि । (३) कृमि, कीट मादि जो प्राणी खेद(पृथ्वीके वाष्प तथा मनुष्यादि प्राणियोंके खेद )से उत्पन्न होते हैं, उनको खेदज कहते हैं । (४) बीरबहूटी, मेंडक आदि जो प्राणी पृथ्वीको फाडकर याहर आते हैं, उनको उद्भिज्ज कहते हैं । वक्तव्य जाम वर्गके जिन द्रव्योंका उपयोग आहाररूपमें होता है उनके भेद . - । - १ यहाँ 'उद्भिज्ज' शम्द जगमके एक मेदके अर्धमें प्रयुक्त है, वनस्पतिवाचक नहीं है Y द्रव्यगुणविज्ञानम् । (वर्ग) आयुर्वेदमें मांसपर्गमें दिये गगे है। तया, पिपिरियारे प्रकरणी काम विपोंमें सपों और सविप रहीटों आदिफा गाँधरण दिया।उने महामनाए। औषधाहारभेदेन द्वी द्रव्यमेवी- (औषधाहारमेयेनापि) द्रव्यं तापद्धिविध-पीयंप्रधानापाच्य, रसप्रधानमाहारद्रव्यं च । तत्रापिघद्रव्यं प्रिनिधं घीय मदान- तीक्ष्णवीर्य, मध्यवीर्य, मृदुवीय चेति (२. सू. स. १. १७.द.)। औपधाहारमेदेन द्रव्य विमजते-मन्यमित्यादि। पीनभानामिनि या मान यस्मिमिति । यद्रव्यमभ्यवाहवं देठे यीयं संशकाम्शीतोष्णापिगुमान प्राधानो. पननयति, न त्याहारद्रव्ययत् प्रधानतया रसागपादन गुप्यानि, धामापर. द्रव्यम् ; औषधद्रव्यसंझकमित्यर्थः । यथा-शुण्ठी-पिपस्यादि । रमाथामिति रसपोपणं प्रधानं कर्म यस्य चद् रसप्रधानम् । यद्रव्यमुपयुर देहे रसभा द्वारा रक्तादिधातूंच प्राधान्येन पुष्णाति, न चौपाध्यवर प्रधानपा देरे भीगोष्णादीन वीर्यसंज्ञकान् गुणाअनयति तद् रसप्रधान, दातारमन्यम् । आहार कमिति यावत् । यया--गोधूमादि । यीर्यगतयारसम्पमेदेनापमानवाति नूपग्रेभा भियन्ते तीक्ष्णवीय, मध्ययीर्य, गृटुयीयं चेति । गया-टप्यीयंदम्पस तीक्ष्ण-मध्य-मृदुभेदेन उष्णतमम् , उगतरम् , उग घेति प्रिविधो भर परप्यते ।। द्रव्योंके औपध और आहार मेदसे दो भेद होते है । जो प्रत्य वामभान रो अर्थात् जिसके उपयोगसे शरीरमें वीर्यसशक शीत-उपग सादि गुनाही सत्यशि प्रधान- तया होती हो, शरीरके रसादि धातुओंका पोपण जिराका प्रधान कार्य न हो, उसको औपधद्रव्य कहते हैं; जैसे-सोंठ, पीपल आदि । जो द्रव्य रसप्रधान क्षे सात जिसके उपयोगसे शरीरमें रस तथा रनसे पुष्ट होनेवाले रफारियातुओंका पोषण प्रधानतया होता हो, शीत-उष्ण आदि वीर्यशफ गुर्जाकी उत्पति (गुनौका सयर) प्रधानतया न होती हो, उसको आहारद्रव्य कहते हैं । जैसे-चावल, गेहूँ आदि । औपधद्रव्योंके (उनके ) शीत-उष्ण आदि वीर्योके तारतम्यमेदरे तीक्ष्णवी, मध्यवीर्य और मृदुवीर्य ये तीन भवान्तर भेद होते है । उदाहरणार्य-उगवीर्य के उष्णतम (तीक्ष्ण ), उष्णतर (मध्य ) और उष्ण (मृदु) ऐते तीन भेद होते हैं। रसभेदेन द्रव्यभेदा- रसभेदेन द्रव्याणां मधुरवर्गः, अम्लवर्गः, रचणवर्गः, कटुक्वर्ग., तिक्तवर्गः, कषायवर्गश्चेति षट्दर्गा भवन्ति । तेषां विवरणं रसविज्ञानीयाध्याये द्रष्टव्यम् ॥ मधुरादि छ: रसोंके मेदसे द्रव्योंके मधुरवर्ग, अम्लवर्ग, लपणवर्ग, फटुकवर्ग, विकवर्ग और कषायवर्ग ये छ. वर्ग-गण-स्कन्ध होते है । उनका विवरण भागे रस- विज्ञानीयाध्यायमें किया जायगा।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । २१ - विपाकमेदेन द्रव्यमेदा.- चरकमते विपाकभेदेन मधुरविपाकम् , अम्लविपाकं, कटुकविपाकं च, इति त्रयो द्रव्यभेदा भवन्ति । सुश्रुतमते विपाकभेदेन गुरुविपाकं (मधुरविपाक), लघुविपाकं (कटुविपाकं) चेति द्वौ भेदौ भवतः । विपाक मेदसे चरकके मतमें मधुरविपाक, अम्लविपाक और कढविपाक ये तीन मेद होते है, तथा सुश्रुतके मतमें गुरुविपाक ( मधुरविपाक ) और लघुत्रिपाक (कटुविपाक ) ये दो भेद होते हैं। वीर्यमेदेन द्रव्यभेदा- वीर्यभेदेन अष्टविधवीर्यवादिमते गुरुवीर्य, लघुवीर्य, स्निग्धवीर्य, रूक्षवीयं, मृदुवीर्य, तीक्ष्णवीर्य, शीतवीर्यम्, उणवीर्य चेति द्रव्याणामष्टौ मेदा भवन्ति द्विविधवीर्यवादिमते शीतवीर्यम् , उष्णवीर्य चेति द्वौ मेदौ भवतः । वीर्यभेदसे अष्टविधवीर्यवादियोंके मतमें गुरुवीर्य, लघुवीर्य, स्निग्धवीर्य, रूक्षवीर्य मृदुवीर्य, तीक्ष्णवीर्य, शीतवीर्य तथा उष्णवीर्य ये आठ भेद होते हैं और द्विविधवीर्य- वादियोंके मतमें शीतवीर्य तथा उष्णवीर्य ये दो मेद होते हैं। कर्ममेदेन द्रन्यभेदा.- आयुर्वेदे द्रव्याणां कर्मानुसारं तन्त्रकारैः कृतमनेकधा वर्गीकरणम् । घरके सूत्र- स्थानस्य द्वितीयेऽध्याये विमानस्थानस्याष्टमेऽध्याये च वमनविरेचनास्थापनानुवास- नशिरोविरेचनोपयोगिनो निर्दिष्टाः पञ्चवर्गाः, सूत्रस्थानस्य चतुर्थेऽध्याये उका महाकपायसंज्ञकाः पञ्चाशद्वर्गाः, सूत्रस्थानस्य द्वाविंशतितमेऽध्याये लखन- वृंहणादीनां लक्षणान्युक्तानि । एते वर्ग औषधद्रव्याणां कर्मानुसारमुक्का इति सोदाहरणं व्याख्याता अस्मिन्नध्याये । चरकादितन्त्रेषु प्रोक्ता रसायन-वाजीकरण- व्याख्याऽप्यत्रैव दत्ता । सुश्रुते सूत्रस्थानस्यैकोनचत्वारिंशत्तमेऽध्याये अप्रभाग- हराधोभागहरोभयतोभागहरवातसंशमन-पित्तसंशमन-कफसंशमनाख्याः । पञ्चवर्गा उक्ताः । तेपो व्याख्या यथास्थानं चरकोकवर्गव्याख्यायामेव दत्ता । सुश्रुतें . सूत्रस्थानस्य सप्तत्रिंशत्तमेऽध्याये शल्यचिकित्सोपयोगिनो विम्लापनादयोऽष्टौ वर्गा उकाः, चरकोक्तवर्गेभ्यो भिन्नत्वात् स्वतन्त्रमेव व्याख्यातास्ते । शाघरे मोकानां चरकोकवर्गाणां शार्ङ्गधरोक्का व्याख्या यथास्थानं चरकोकवर्गेष्वेव प्रदत्ता; अन्येषां सुशाधिरोक्का व्याख्या स्वतन्त्रतयैव लिखिता। चरकसुश्रुतादावाहारोपयोगिनो ये वर्गा उक्तास्ते द्रव्याणां कर्मानुसारं नोकाः, किन्तु आहारद्रव्याणां स्वरूपानुसारमुक्का, इति तेषां व्याख्यानमाहारद्रव्य विज्ञानखण्डे करिष्यते । चरकसुश्रुतोकवर्गाणां व्याख्या प्रायो मूलप्रन्थेषु नोपलभ्यते, अंतष्टीकाग्रन्थेभ्यतन्त्रान्तरेभ्यश्च संगृह्य । यथास्थानं लिखिता। - - २२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । आयुर्वेदमें तन्त्रकारोंने द्रव्योंका उनके कांके (जीवित मानव शरीरपर होनेवाली उनकी क्रियाओंके ) अनुसार अनेक प्रकारसे वर्गीकरण किया है । चरकसंहितामें सूत्रस्थानके दूसरे अध्यायमें तथा विमानस्थानके आठवें अध्यायमें वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और शिरोविरेचन इन पचकोंमें उपयुक्त द्रव्योंके पाँच वर्ग (गण) दिये हैं। सूत्रस्थानके चौथे अध्यायमें पञ्चाशन्महाकपायफे नामसे दस-दस द्रव्योंका एक-एक गण करके पचास गण दिये हैं। सूत्रस्थानके २२ वें अध्यायमें लदन, वृंहण, रूक्षण, स्नेहन, खेदन और स्तम्भन इन छः काफी व्याख्या लिखी है। ये गण औषधद्रव्योंके कर्मानुसार होनेसे मैंने इस प्रकरणमें उन वाँकी व्याख्या और उदाहरण दिये हैं । चरक सुश्रुत आदि तत्रकारोंने रसायन और वाजी- करणकी जो व्याख्या दी है, वह यहाँ दी गयी है । सुश्रुतने सूत्रस्थानके ३९ वें अध्यायमें ऊर्ध्वभागहर, अधोभागहर, उभयतोभागहर, वातसंशमन, पित्तसंशमन और कफसशमन ये पाँच वर्ग दिये हैं। इन वर्गोका उल्लेख यथासंभव चरकके तत्तत् वर्गवाचक (गणवाचक) शब्दकी व्याख्याके साथ ही कर दिया है; सूत्रस्थानके मिश्रकचिकित्सित अध्यायमें शस्त्रकर्मोपयोगी विम्लापन, पाचन, आदि आठ वर्ग-गण दिये हैं, ये गण चरकोक्त गणोंसे स्वतन्त्र होनेके कारण उन गणोंकी व्याख्या और उदाहरण खतन्त्र रूपमे ही दिये गये हैं । अष्टासंग्रह और अष्टाङ्गहृदयमें प्रायः चरक-सुश्रुतोक वर्गीकरण ही पाया जाता है। उनका उल्लेख भी चरक-सुश्रुतोक वर्गोकी व्याख्याके साथ ही दिया गया है। शाईधरमें प्रायः चरक- सुश्रुतोक्त वर्गीकरण ही पाया जाता है। कहीं एक वर्गके कुछ उपवर्ग किये गये हैं और कुछ वर्ग अधिक भी दिये गये हैं। उनकी व्याख्या और उदाहरण भी चरक-सुश्रुतोक्त वर्गोंकी व्याख्याके पीछे दिया गया है, जो वर्ग चरकोक वर्गाके समान हैं, उन वर्गोकी व्याख्या चरकोक्त वर्गों के साथ ही दी गयी है। शार्ङ्गधरको छोड़कर अन्य चरक सुश्रुत आदि मूलग्रन्थों में प्रायः जीवनीय आदि शब्दोंकी व्याख्या नहीं दी गई है। मैंने यह व्याख्या टीकाग्रन्थ और तन्त्रान्तरोंसे सगृहीत करके यहाँ लिखी है । चरक, सुश्रुत, अष्टाङ्गसग्रह, अष्टामहृदय आदिमें आहारोपयुक्त द्रव्योंके जो वर्ग लिखे हैं वे द्रव्योंके कर्मानुसार नहीं परन्तु द्रव्योंके खरूपानुसार लिखे गये हैं, अतः इनकी व्याख्या यहाँ न देकर आगे आहारद्रव्यखण्डमें दी जायगी। चरक, सुश्रुत आदिने प्रत्येक वर्गके उदाहरणरूप अनेक द्रव्य दिये हैं। परन्तु मैंने विस्तारभयसे अनुवादमें वे सव द्रव्य न देकर एक-दो द्रव्य ही उदाहरणरूपमें दिये हैं। जिनको सव द्रव्य जाननेकी इच्छा हो, वे मूल प्रन्योंके उद्धरणोंमें ही देखें जीवनीयम्-जीवनम् । जीवनम् आयुः "शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि नीवितम् । नित्यगवानु- - - . पूर्वार्ध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । २३ बन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥" (च. सू. भ. १) इत्युकलक्षणं, तम हितं जीवनीयम् । जीवनीयशब्देनेहायुष्यस्वमभिप्रेतम् । यत्र च मधुररसगुणे "आयुष्यो जीवनीयः" (च. सू. अ. २६) इति च करिष्यति तत्र मूच्छितस्य संज्ञा- जनकरवेन जीवनीयत्वं व्याख्येयम् (च.द., ग., यो.)। जीवनः प्राणधारणः (सु. सू. भ. ३८६३६ .)। जीवनीयं प्राणानां संधारकम् (अ. सं. सू. म. ३४ इन्दु)। "पृथिव्यपां गुणयुक्तं जीवनीयमिति स्थितिः” (र. वै. स. ४. सू. ३० भाष्य) "जीवकर्पभो मेदा महामेदा काकोली क्षीरकाकोली मुद्रपर्णी मापपर्णी जीवन्ती मधुकमिति दश जीवनीयानि भवन्ति" (च. सू. भ. ४)। "प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्त", "जीवनः ४ ४ ४ विदारिकन्दः" (च. सू. अ. २७)। "काकोल्यादिरयं(गणः)xxx जीवनः" (सु. सू. भ. ३६)। शरीरेऽस्मिन् प्रतिक्षणं धास्वग्निपरिपाकक्रियया धातवः क्षयमापधन्ते, वत्क्षय- परिपूर्त्या प्राणधारणार्थ जीवनीयद्रव्याणां क्षीर-शालिगोधूमादीनां प्रत्याहमुपयोग आवश्यक एव । सत्यपि क्षीरादीनां जीवनीयत्वेऽस्मिन्नौपधद्रव्यसंग्राहके गणेऽनु- किस्तेषामाहारदव्यत्वात् । एवं बृंहणादिगणेष्वपि बृंहणादिकर्मप्रधानानां मांसादी- नामनुक्ती हेतु यः । जीवनीयादिपञ्चाशन्महाकपायेषु प्रतिगणं दशद्व्याणामेवी- पदेशे भगवताऽऽत्रेयेणायं हेतुरुकः-"एतावन्तो हलमल्पबुद्धीनां व्यव- हाराय, बुद्धिमतांच खालक्षण्यानुमानयुक्तिकुशलानामनुक्तार्थशानाय" इति (च. सू. भ. ४) । एतावन्तो यथोकाः । भलं समर्थाः । व्यवहारायेति चिकित्साव्यवहाराय । स्वलक्षणस्य भावः स्वालक्षण्यं, तेनानुमानं, तत्र कुशला अभिज्ञा इत्यर्थः । वुद्धिमन्तो हि जीवकादयोऽमी निग्ध-शीत-मधुरादिगुण- युक्ताः सन्तो जीवन कुर्वन्तीति भूयोदर्शनादवधार्य तद्गुणयुक्त द्राक्षापयोविदार्यादौ वजातीयत्वेन जीवनीयानीत्यनुमिमते (च. द.)। जो द्रव्य जीवनके (आयुष्यके-प्राणधारणके ) लिए हितकर (आयुष्यको स्थिर रखनेवाला) हो, उसको जीवनीय या जीवन कहते हैं। जैसे-जीवक, 'ऋषभक आदि । चरकने (सू. अ. २७ में) दूधको जीवनीय द्रव्यों में श्रेष्ठ और विदारिकन्दको जीवन कहा है। सुश्रुतने काकोल्यादिगणको जीवन कहा है। जीवनीय द्रव्य पृथिवी और जलके गुणोंकी अधिकतावाला होता है अर्थात् पार्थिव और आप्य द्रव्योंके जो गुण-कर्म कहे गये हैं, जीवनीय द्रव्य उन गुण-कर्मोंसे युक्त होता है (र. वै. भा.)। मधुररसके गुणोंमें 'आयुष्यो जीवनीयः' इस प्रकार दोनों शब्दोंका साथमें १ 'मांस वृहणीयाना' (च. सू. अ. २५)। -1 । ।
है २४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । प्रयोग आया है, वहाँ 'गृच्छितको सजा देनेवाला' ऐसा जीवनीय सन्दरा अर्थ जानना चाहिए। शरीरमें प्रतिक्षण धालमियोंकी परिपाकमियासे धातुओं का क्षय होता रहता उसकी पूर्तिके लिये जीवनीय द्रव्यों का प्रतिदिन प्रयोग करना आवश्यक । मपपि चावल गेहूँ दूध आदि द्रव्य प्राणधारणोपयुक होनेरो जीवनीय है, तथापि वे माहामन्य होनेसे उनका यहाँ औषधद्रव्योंके गणोंमे सग्रह नहीं किया है । इसी पकार यहा आदि गणोंमें बृहणर्मप्रधान मास आदिक न लिराने हेतु गनना चाहिये । जीवनीय आदि गणोंमें दस दस ही द्रव्य लिसनेस हेतु यताते हुए भगवान् माय कहते हैं कि-प्रत्येक गणमे उदाहरणरूपसे कहे गये इतने द्रव्य अल्पपुदिनों को चिकित्साव्यवहारके लिये पर्याप्त होंगे और इन द्रव्योंके लक्षणोंसे अन्य अनुशव्यका अनुमान कर सकें ऐसे बुद्धिमानोंको अनुज द्रव्योंके अनुमानके लिये होंगे। युद्धिमान लोग, जैसे यहाँ कहे हुए जीवकादि द्रव्य निग्ध-शीत-मधुर भारि गुणगुण होनेसे जीवन कर्म करते हैं बसे ही द्राक्षा-दूध-विदारीछन्द आदि उन गुणों युफ होने जीवन होने चाहिये, ऐसा अनुमान कर लेंगे। वृंहणीयम्-हणम्- "हत्त्वं यच्टरीरस्य जनयेत्तर शृंहणम् । गुरु शीतं मृद्ध निग्धं वदनं स्यूल पिच्छिलम् ॥ प्रायो मन्द स्थिरं लणं द्रव्यं धृहणमुच्यते । क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्वला नित्यमध्वगाः । स्वीमयनित्या प्रीप्मे च बृहणीया नराः स्टता." ॥ (च. सू.अ. २२) वहलं धनं, मन्दमिति चिरकारि तीक्ष्गविपरीवम् , स्थूलं संहता. वयवं लद्रुक-पिष्टकादि । (च. द.)। वहलं सान्दं, लखनोकळधूप्णादिविपरीत- गुरुशीतादिगुणैर्युक्तं द्रव्यं प्रायो बृंहणमुच्यते (यो.)। देहहणाय हितं वृहणीयम् (ग.)। "हणं पृथिव्यम्बुगुणभूयिएम्" (सु. सू. अ ४१)। "क्षीरिणी-राजक्षयकाय. गन्धाकाकोली-क्षीरकाकोली-वाट्यायनी-भद्रौदनी-भारद्वाजी-पयस्यप्यगन्धाइति ददो. १जीवनीय-जीवनीय द्रव्य स्वस्थावस्या रक्तमें या शरीरम रदते ६ । रोगावसाने ये द्रव्य कम हुए होते हैं। उनकी कमीकी पूर्तिके लिए इनके सेवनकी आवश्यकता होती है। जैसे-लोह, जवाखार, फॉस्फॉरस, नमक । इन्हें अग्रेजीमें Restoratives-रिस्टोरेटिन्तु कहते है (डॉ. वा. दे.) । सालममिग्रीके गुणोंमें डॉ. वा. देसाई लिखते हैं कि- इसका एक तोला चूर्ण प्रौढ मनुष्यके लिये २४ घटेके लिये पूरा अन्न है । इतने मल्ल- प्रमाणमें जीवनको टिकानेवाला दूसरा भन्न नहीं है। इसलिये इसको जीवन कहना उचित है औ.सं. पृ. ७०६) । पाश्चात्य वैषकमें विटामीन पियरीका आविष्कार होने के बाद उस मतका हिन्दीमें अनुवाद करते समय विटामीनोंके लिए भी कई लेसक 'जीवनीय'- शब्दका प्रयोग करते हैं । जीवनीय गन्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुगजी' करते है। २ गृहणीय द्रव्यको यूनानी वैद्यको 'मुसम्मिन वदन' कहते हैं । - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । २५ मानि वृहणीयानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)। 'मांसं वृंहणीयांना' (च. सू. अ. २५)। चरकेणान्यन (सू. भ. २७) मुजातक विदारिकन्द-मृद्वीका-खजूर- फला-तालफल-नारिकेल-वातामाभिपुकाक्षोड-मुकूलक-निकोचकोस्माणि धृहणान्यु- कानि । सुश्रुतेनैवदतिरिकानि मान-पनस-मोचफलानि वातामादिमज्जानः काको- स्यादिगणश्च बृंहणान्युक्तानि ।। जो द्रव्य शरीरमें मोटापन लाता है (शरीरको पुष्ट करता है ) उसे बृहणीय या बृहण कहते हैं। जो द्रव्य गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, वल (घन-गाढा), स्थूल (संहतावयव-स्थूलावयव जैसे-लडू आदि), पिच्छिल, (लुआबदार) मन्द (चिरकारि), स्थिर और लक्ष्ण हो वह प्रायः बृंहण होता है । जैसे-असगन्ध, काकोली आदि (च.)। बृंहण द्रव्य पृथिवी और जलके गुणोंकी अधिकतावाला होता है अर्थात् पार्थिव और आप्य द्रव्यके जो गुण-कर्म कहे गये हैं, बृंहण द्रव्य उन गुण- कर्मोंसे युक्त होता है (सु.) । चरकने सालममिश्री, विदारीकन्द, मुनक्का, खजूर, अजीर, तालके फल, नारियल, वादाम, अखरोट, पिस्ता, चिलगोजा और खुरमानीको बृहण कहा है । सुश्रुतने काकोल्यादिगणको वृहण लिखा है । रोगादिसे क्षीण, प्रणवाले, कृश, वृद्ध, दुर्बल (अशक), नित्य चलनेवाले, नित्य स्त्री और मद्यका सेवन करनेवाले तथा प्रीष्मऋतुम सब मनुप्योंको बृहण द्रव्य देने चाहिये। लेखनीयम्-लेखनम्- लेखनम् ईपधर्मविदरणं घर्षणेन, तसै हितं लेखनीयम् (ग.)। लेखनं कर्शनं, तमै हितं लेखनीयम् (यो.) । लेखनं देहे उपलेपादिकान् भावान् विच्छि- नत्ति (इ.)। लेखनं पत्तलीकरणम् (सु. सू. म. ४० । ५ ड.)। "लेखनम- निलानलगुणभूयिष्ठम्" (सु. सू. अ. ४१) । लेखनं कफमेदसोः (ड.)। मुख-कुछ-हरिद्रा-दारुहरिद्रा-वचा-ऽतिविषा-कटुरोहिणी-चित्रक-चिरविल्व-हैमवत्य इति दशेमानि लेखनीयानि भवन्ति' (च. सू. म. ४) शल्यतत्रे कठिनोत्सममां- सानां व्रणानां शस्त्रेण क्षौमादिभिवा धर्पण लेखनमित्युच्यते । "क्षौमं प्लो पिचुं फेनं यावशूकं ससैन्धवम् । कर्कशानि च पत्राणि लेखनार्थे प्रदापयेत् ॥” (सु. चि. अ. १)। "धावून मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच यत् । लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः" (शा. प्र. ख. भ. ४)। यद्व्यं धातून रसादीन मलान वा, विशोप्य शुष्कान् कृत्वा, लेखयेत् स्थूलस्य कृशतां कारयेत् , तल्लेखनम् । यवा इति बहुवचनग्रहणेनैवंगुणविशिष्टा भन्येऽपि बोद्धव्याः (आ.)॥ जो द्रव्य शरीरके रसादि धातुओं और मलोंको विशेषकर कफ और मेदको सुखाकर निकाल देता है और शरीरको पतला करता है, वह लेखन कहाता है । जैसे- नागरमोथा, कूठ, हल्दी आदि (च.); शहद, गरम जल, बच और जो (शा.)। लेखन याने घर्षणसे चमड़ीका कुछ फटना, उसके लिए उपयुक्त द्रव्यको लेखनीय ܝ ܝ २६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कहते हैं (ग.) । लेखन अर्थात् कर्शन (शरीरको कृश करना), उसके लिए उपयुक्त द्रव्यको लेखनीय कहते हैं (यो.)। कफ और मेदको सुखाकर शरीरको पतला करनेवाला द्रव्य लेखन कहाता है (ड.) । शरीरके अदर चिपकनेवाले कफन फ-मेद आदिको विच्छिन्न करनेवाला द्रव्य लेखन कहाता है (इन्दु)। लेखन द्रव्य वायु और अग्निके गुणोंकी अधिकतावाला होता है (सु.); अर्थात् वायव्य और आग्नेय द्रव्यके जो गुण-कर्म कहे गये हैं, लेखन द्रव्य उन गुण-कर्मोंसे युक्त होता है। लेसन शब्दकी टीकाकारोंने भिन्न भिन्न व्याख्या की है, परन्तु गजाधरजीको छोड़कर सबका तात्पर्य यह है कि-जो द्रव्य शरीरमें चिपकने वाले मेद आदि धातु और कफको सुखाकर निकाल दे और शरीरको कृश-पतला करे, उसको लेखन कहते हैं । शल्यतन्त्रमें लेखनका एक और भी अर्थ लिया गया है-व्रणके अन्दर कठिन और उभरे हुए मांसादिको शस्त्रसे छीलनेको लेखन कहते हैं । यह कार्य जिस औषध- द्रव्यसे हो उसको भी लेखन कहा जाता है। क्षारद्रव्यसे भी लेखनका-छीलनेका कार्य होता है, अतः सुश्रुतने क्षारको लेखन कहा है (सु. सू. अ. ११) "लेखनः कठिनोत्सनमासानां व्रणानाम्" (हा.)। सुश्रुतने सालसारादिगणको (सू अ. ३८) कफमेदोविशोषण (लेखन ) लिखा है। भेदनीयम्-भेदनम्- भेदनाय शरीरान्मलनिर्हरणाय हितम् (ग.)। भेदनं पिण्डितमलानां द्रवीकृत्य यहिःसारणं, तसै हितम् (यो.)। सुवहाकोरुबुकाग्निमुखी-चित्रा-चिनक- चिरबिल्व-शविनी-शकुलादनी-स्वर्णक्षीरिण्य इति दशेमानि भेदनीयानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)। सुश्रुतेन श्यामादिगणो 'विभेदी' इत्युक्तः । “मलादिकमबद्धं च बद्धं वा पिण्डितं मलैः । भित्त्वाऽधः पातयति तद्भेदनं कटुकी यथा" (शा. प्र. ख. अ ४)। यन्मलादिकमवद्धं, मलैर्दोषैश्च कृत्वा पिण्डितपरिपाकात् पिण्डीभूतं बद्धं वा, ईदृशं मलादिकं भित्वा स्थानात् संचाल्य अधः पातयति, तद्भेदनं 'ज्ञातव्यम्' इति शेषः । यथा-कटुकी । बद्धं विबद्धं-शुष्क, अथितं च । तत्र शुष्कं पुरीषविषयं, प्रथितं दोषादिविषयम् । तथा अबद्धं द्रवरूपमपि द्विविधम्-एकं पुरीपविषयम्, अन्यन्मलादिकमिति । मलोऽत्र दोषः । आदिग्रहणात् रूक्षदूपि- ता(तवाता)दीनामपि ग्रहणम् । भित्त्वेति तत् पुरीषं भित्त्वा विदार्याधः पातयति, 'द्रव्यम्' इति शेषः (आ.)। यद्रव्यमबद्धं मलादिकं पिण्डितैः पिण्डीभूतैर्मलैर्बद्ध वा भित्वा विदार्याधः पातयति तद्भेदनम् । (का.)॥ शरीरसे मल और दोषोंका निर्हरण करनेवाले द्रव्यको भेदनीय कहते हैं (ग.)। शरीरमें पिण्डित (जमे हुए) मलोंको द्रव करके बाहर निकालनेवाले द्रव्यको मेदनीय कहते हैं (यो.)। जैसे-निशोथ, एरण्ड आदि (च.)। जो १ लेखनीयको यूनानीवैद्यकमें 'जाली' कहते हैं। ।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। २७ - द्रव्य अवद्ध-द्रवरूप पुरीप और दोपादि, अथवा दोपोंके द्वारा, पिण्डित होकरके विवद्ध- शुष्क पुरीप और प्रथित वातादिके विवन्धको तोर करके उन्हें अधोमार्गसे बाहर निकालता है, उसको भेदन कहते हैं । जैसे-कुटकी (शा.)। सामान्यतः शरीरके सब स्रोतोंमें जमे हुए कफादि दोप और विशेषतः बातोंमे जमे हुए सूखे मल(सुद्दे )को तोड़ टीला करके बाहर निकालनेवाले द्रव्यको मेदन कहते हैं । मेदनको अधो. भागहर वर्गका एक मेद समझना चाहिए। सुश्रुतने श्यामादिगण(सु. सू. भ. ३८)को विवेदी ( मेदन) बताया है । चरकने अम्लवेतसके गुणमें उसे मेदन लिखा है (सू, अ. २७)। संघानीयम्-संधानम्- संधानाय भग्नसंयोजनाय हितं संधानीयम् (ग. यो.)। संधानकं शरीरेऽन्त:- संहतिकरं भावानाम् (इन्दुः)। संधानीयं भामसंधानकारकम् (ड.) । मधुक- मधुपर्णी-पृभिपर्यम्वष्टकी समझा-मोचरस-धावकी-लोध-प्रियहु-कट्फलानीति दशे. मानि संधानीयानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)। भम अस्थि आदिके संयोगके (जोबनेके) लिए उपयुक्त द्रव्यको संघानीय या संधान कहते हैं (ग., यो.)। जैसे--मुलेठी, पिठयन आदि । शरीरके अदर अस्थि आदि द्रव्योंकी सहति (सघात-काठिन्य-अवयवोंका मेल) करनेवाले द्रव्यको संघानक कहते हैं (ई.)। सारांश, शरीरमें टूटे हुए या अलग हुए हट्टी, रक्त- वाहिनी आदिको जोदनेवाले द्रव्यको संघानीय कहते हैं । सुश्रुतने प्रियङ्ग्वादि, अम्बष्ठादि और न्यग्रोधादि गणको सधानीय बताया है (सु. सू. अ. ३८)। दीपनीयम्-दीपनम्-अग्निदीपनम्- दीपनीयं वझेरुद्दीपनाय हितम् (ग.)। दीपनमन्तरग्नेः संधुक्षणं, तस्मै हितं दीपनीयम् (यो.)। "दीपनमग्निगुणभूयिष्ठं, तत्समानत्वात्" (सु. सू. भ. ४१)। "पित्तलान् रसान् गुणांश्च दीपनीयम् । तदानेयम् (र. वै. सू. भ. ४ । १०)। "कटुकाम्ललवणान् रसान् वीक्ष्णोष्णलघून गुणानाश्रितमिति, तदग्मिनैव निर्वयम्" (२. वै. 'पृ. १७९, भाष्य) । "पृथिव्यनिलवाहुन्याद्दीपनं परिचमहे" र. वै. अ. ४, सू. ३०, भाष्य)। "यदमिकृत् पचेनाम दीपनं तयथा घृतम् । दीपनं धनिकृश्वामं कदाचित् पाचयेन वा" (भ. ह. सू. भ. १४१७, स. सु. टीकायामुद्धृतं तत्रान्तरीयं वचनम्)। "पचेझामं वतिकृय दीपनं तद्यथा मिशिः" (शा. प्र. स. भ. ४)। यह्रव्यमामं न पचेद्वलिकृष्ध भवति तद्दीपनं जानीयात् । यथा-मिशि: शवपुष्पा । तथा चोक द्रव्यगुणावल्यां-"शतपुष्पा- १ मेदनके लिये पाश्चात्यमत रेचन' शब्दकी टिप्पणीमें दिया है, उसको वहीं देखें। २ संघानीय-भम अस्थिको जोटनेवाले द्रव्य-Union Promoter-युनियन् प्रोमोटर् (दा. वा. दे.)। (र. - -- २८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । लघुस्तीक्ष्णा पित्तकृद्दीपनी कटुः" इति । ननु, कथमेतद्गुणयुक्ता मिशिर्नाममी भवति, तदविनाशकत्वेन कथमनेः प्रबोधः स्यात् ? उच्यते-द्रव्याणां प्रभावोऽवि. चारणीय इति सुश्रुतः, न हेतुभिर्विचार्यते । तदुक्तं-"नौपधीहतुभिर्विद्वान् परीक्षेत कथंचन । सहस्रेणापि हेतूनां नाम्बष्ठादिविरेचयेत् (सु. सू. भ. ४०)" इति । आम इति अपरिपकरसः । तद्यथा--"जठरानलदौर्बल्यादविपास्तु यो रसः । स आमसंज्ञको शेयो देहदोपप्रकोपणः" इति (आ.)। पिप्पली-पिप्पली- मूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेराम्लवेतस-मरिचाजमोदा-भल्लातकास्थि-हिनिर्यासा इति दशेमानि दीपनीयानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)। अन्तरग्नि अर्थात् जठराग्निको प्रदीप्त करने( बढाने वाले द्रव्यको दीपनीय, दीपन या अग्निदीपन (भूख उत्पन्न करने और बढानेवाला) कहा जाता है । जैसे-छोटी पीपल, पीपलामूल आदि (च.)। दीपन द्रव्य अगिके गुणोंकी अधिकतावाला होता है। अर्थात् आग्नेय द्रव्यके जो गुण-कर्म लिखे हैं, दीपन द्रव्य उनसे युक्त होता है (सु.)। जो द्रव्य आम (अपरिपक्क रस या अन्न ) का पाचन नहीं करता, परन्तु जठरामिका दीपन करता है (क्षुधाको बढाता है) उसको दीपन कहते हैं । जैसे-सौंफ (शा.) । सुश्रुतने पिप्पल्यादि, त्रिफला, त्रिकटु, आमल. क्यादि, विल्वादि, गुडूच्यादि इन गणोंको दीपन बताया है (सु. सू भ. ३८) । जो द्रव्य जठराग्निका दीपन करता हो, उसको दीपन कहते हैं । यह कदाचित् आमका पाचन करता है और कदाचित् नहीं भी करता (स. सुं. टीकामें उदृत तन्त्रान्तर- वचन)। सारांश जो द्रव्य आमका पाचन करे या न करे परन्तु भूख बढ़ावे उसको दीपन कहते हैं । शाईधरने पाचन न करनेवाले परन्तु जठराग्निका दीपन करनेवाले द्रव्यका उदाहरण सौंफ लिखा है, इसकी अपेक्षया यदि वे भाँगका उदाहरण देते तो अधिक अच्छा रहता । कारण, भाँगमें जैसा भूखको बढानेका गुण है, वैसा खाये हुए अन्नको पचानेका गुण नहीं है । र. वै. भाष्यमें दीपन द्रव्यको पृथिवी और वायुके गुणों की अधिकतावाला कहा है । जव अन्नका परिपाक होता हो परन्तु भूख ठीक न लगती हो तव दीपन द्रव्योंका प्रयोग करना चाहिये । पाचनम्- "पचत्यामं न वहिं च कुर्याधत्तद्धि पाचनम् । नागकेशरवद्विद्याचित्रो दीपन- पाचनः ॥" (शा. प्र. ख. भ. ४) । यद्रव्यमाम पचति वहिं न कुर्यात् तत् पाचनं ज्ञेयम् । अन्नापि द्रव्यप्रभावो बोद्धव्यः । तच नागकेशरवद्विधातू जानीयात् । १ दीपन-ये द्रव्य आमाशयमें रक( तथा आमाशयसे निकलने वाले पाचक रस को बढाते हैं । इनसे भूख लगती है, जैसे सुगन्धि द्रव्य, तिक्त द्रव्य, मघ तथा मधघटित योग और क्षार । इनको 'Stomachics स्टोमॅकिक्स्'-कहते हैं । दीपनको यूनानीवैद्यकर्मे 'मुश्वदी' कहते हैं।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। २९ । यत:--"नागकेशरकं सक्षमुष्ण लध्धामपाचनम्" इति ।xx सामानां दोषधातु- मलानां पाचनमित्येके । उभयस्मिकमाह-चित्रो दीपनपाचन इति । चित्रक उभय- कार्यकरो भवति दीपनः पाचन । तदुक्क-"चित्रकः कटुकः पाके वहिकृत पाचनो लघुः" इति (आ.)। पचन्तमग्निं प्रतिपक्षक्षपणेन बलदानेन च यत् पाचयति तत् पाचनं; वन वायवग्निगुणभूयिष्ठम् । (च.सू. म. २२१८, च, द.)। पचतोऽमेः पक्तुं शक्तिमधिको यदुरपादयति तद्रव्यं क्रिया वा पाचनमुच्यते; यथा लहन, मुस्तादि वा (अ. द.)। "पाचन पाचयेद्दोपान् सामान् शमनमेव तु" (अ.ह. स. म. १४७, स. सुं. में उद्धृत तथान्तरीय वचन)। "भग्नेस्तु गुणवाहुल्यात् पाचन परिचमहे" (र. वै. भाप्य पृ. १८७) ॥ जो द्रव्य आम अर्थात् अपक अन्नरस और मलको (एकीय मतमें-आमयुक्त दोषों, धातुओं और मलोंको) पकावे परन्तु जठराग्निको प्रदीप्त न करे, अर्थात् जठरामिको प्रदीप्त करने का गुण जिसमें प्रधान न हो, वह द्रव्य पाचन (या आम- पाचन) कहाता है । जैसे-नागकेसर । जो द्रव्य जठराग्निका दीपन भी करता है ) और आमको पकाता भी है उसे दीपनपाचन कहते हैं । जैसे-चित्रक (शा.)। । । १ कोटवातप्रशमन-ये द्रव्य ऑतोको उत्तेजित करते है, इनसे आँतोंकी शक्ति बढती है, अधोवायु सरता ऐ, रकार आती है और पेटका दर्द कम होता है । उदाहरण सर्व मुगन्धि द्रव्य, सौंठ, त्रिकड, तगर, हींग, करतूरी । इनको 'Carminatives- कामिनेटिव्स' और 'Aromatics-अरोमेटिक्स' कहते है। इन द्रव्योंसे आमाशयकी भी शक्ति बढती है इसलिये , दीपनवर्गमें इनकी गणना होती है (डॉ. वा. दे.)। लवगके प्रकरणमें सुगन्धि द्रव्योंके विपयमें डॉ. देसाई लिखते हैं कि---(१) सुगन्धि द्रव्योंसे भूख बढती है, पाचक रस तयार होता है और मनको आझाद होकर खावें ऐसा मालूम होता है। इसलिये आयुर्वेदमें प्रायः सर्व योगोंमें सुगन्धि द्रव्यों का उपयोग किया गया है । (२) मुगन्धि द्रव्य आमाशय और आँतोंमें स्थित सक्ष्म जन्तुओंका नाश करनेवाले और पूतिहर है। पेटका अफारा सूक्ष्मजन्तुओंसे होता है, वह इन सुगन्धि द्रव्योंसे नष्ट होता है । (३) सुगन्धि द्रव्योंसे रक्तस्थित श्वेत कण वढते हैं । इससे आगन्तु सूक्ष्मजन्तु शरीरमें प्रविष्ट हुए हों तो उनका नाश होता है। आयुर्वेदके प्राचीन तत्रकारोंको सुगन्धि द्रव्योंके इस गुणका अच्छा शान था ऐसा मालूम होता है । इसलिये ज्वरके सर्व योगोंमें इनका प्रयोग किया गया है। (४) सुगन्धि द्रव्य चेतना लाते हैं। उनकी यह क्रिया हृदय, रक्ताभिसरण और भासोच्छ्वासकी क्रियापर स्पष्ट होती है । इसलिये इनका उपयोग त्रिदोष-सन्निपातमें किया जाता है। (५) मुगन्धि द्रव्य शरीरके अन्दरकी दुर्गन्धका नाश करते है । इसलिये कफ, लाला आदिकी दुर्गन्ध नाश करनेके लिये इनका प्रयोग किया जाता है । (७) सुगन्धि द्रव्य मूत्रजनन हैं। इनसे गुर्देसे मूत्रद्वार पर्यन्तके मार्गकी शुद्धि होती है। (८) सुगन्धि - - ३० द्रव्यगुणविज्ञानम् । - जो द्रव्य साम दोपोंका पाचन करे, उसे पाचन कहते हैं। यह पाचन शमनका ही एक मेद है। (स. सु. में उद्धृत तन्त्रान्तरीय वचन ) जो द्रव्य पाचन करते हुए अग्निको बल देकर और विरोधीका नाश करके अन्नादिको पकावे उसको पाचन कहते हैं। पाचन द्रव्य वायु और अग्निके गुणोंकी अधिकतावाला होता है । अर्थात् वायव्य और आग्नेय द्रव्योंके जो गुण-कर्म लिखे हैं, पाचन द्रव्य उन गुणोंसे युक्त होता है। (च. द.)। र. वै. भाष्यमें पाचन द्रव्योंको अनिके गुणोंकी अधिकतावाला कहा है। चरकने (सु. अ ४ के) पचास गोंमें पाचन और दीपनपाचन नामके सतन गण (वर्ग) नहीं दिये हैं, परन्तु (सू. अ. २२ में) पाचनको लेखनका एक भेद माना है। शाईधरने दीपन, पाचन और दीपनपाचन ये तीन वर्ग लिखे है । चरकने दीपनीयगणके उदाहरणोंमें जो पीपल, पीपलामूल, चाच, चित्रक आदि द्रव्य लिले हैं, उनका शाईधरोक दीपन, पाचन और दीपनपाचन तीनोंमें अन्तर्भाव हो सकता है। भत. शाईधरके पाचन और दीपनपाचन गण चरकोक्त दीपनीयगणके पीछे दिये गये हैं। सुश्रुतने पिप्पल्यादि और दशमूलगणको आमपाचन, वचादि तथा हरिद्रादिगणको दोषपाचन (आमससृष्टदोपपाचन, ड.) और मुत्तादिगणको पाचन लिखा है । चरकने सौवीरक और तुपोदकको जरणीय ('जरणीयं पाचनं' यो.) लिखा है। पाचनके लिये 'जरण' और 'जरणीय' शब्दका भी प्रयोग होता है । जव भूत ठीक लगती हो परन्तु अन्नका परिपाक ठीक न होता हो तव पाचन द्रव्योंका प्रयोग करना चाहिये । जव भूख ठीक न लगती हो और खाये हुए अन्नका पाचन भी ठीक न होता हो तव दीपनपाचन द्रव्यका प्रयोग करना चाहिये। वल्यम्-वलवर्धनम्- बलाय हिवं बल्यम् (ग., यो.) । ऐन्द्रयृपभ्यसिरसlोक्ता पयस्याश्वगन्धा. स्थिरा-रोहिणी-वलातिवला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति (च. सू. म. ४)। + द्रव्योंको शरीरके बाहर लगानेपर चेतनाकारक, वेदनास्थापन, पूतिहर, व्रणशोधन सौर व्रणरोपण परिणाम होता है । सुगन्धि द्रव्योंके ऊपर लिखे हुए आठ गुण सर्व सुगन्धि द्रव्योंमें कम-अधिक प्रमाणमें देखने में आते है। पाश्चात्य द्रव्यगुणमें लिखा हुमा कामिनेटिय् वर्ग शाईपरोक्त दीपनपाचन वर्गके समान होनेसे उसको दीपनपाचन वर्गकी टिप्पणी में लिखा है । कोष्ठवातप्रशमनको यूनानीवैद्यकम 'कासिर रियाह' कहते हैं। १ आगे 'लङ्घन' शब्दकी व्याख्या देखें। २ पाचन-ये द्रव्य आमाशय और पक्काशयको अन्न पचन करनेमें सहायता करते हैं । जैसे-एरडखरवूने( पपीते )का दूध, जौका सत्व (मॉल्ट ) आदि । 'इन्हें अग्रेजीमें 'Digestives-हाईजेस्टिस ; Digestants- डाइजेस्टन्टस' कहते हैं । (डॉ.वा. दे.)। पाचनको युनानीवैद्यकमें हाज़िम' कहते हैं। । - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ३१ १ - शरीरके वल'( शक्ति)को बढ़ानेवाले द्रव्यको चल्य या चलवर्धन कहते हैं । जैसे-काँच, शतावरी आदि । सुश्रुतने लघुपञ्चमूलको बलवर्धन लिखा है (सु. सू अ. ३८)। चरकने सालमपँजा (मुजातक), विदारीकन्द, पक्का आम, बादाम, पिस्ता, अखरोट, चिलगोजा और कूर्मके मांसको वलवर्धन लिखा है। (सू. अ. २७)। वण्य-वर्णप्रसादनं-वर्चस्यम्- वर्णाय हितं वर्ण्यम् (ग., यो.)। "वर्थसे प्रभायै हितं वर्णाय हितं वर्चस्यम्" (र. वै. पृ. १८१)। चन्दन-तुङ्ग-पाकोशीर-मधुक-ममिछा-पयस्या-सारिवा-सिता- लता इति दशेमानि वानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ शरीरके वर्ण( कान्ति)को सुधारनेवाले और रोगसे बिगड़े हुए वर्णको फिर खाभाविक अवस्थामे लानेवाले द्रव्यको वर्ण्य कहते हैं । जैसे-चन्दन, पद्माख आदि। सुश्रुतने लोध्रादिगणको वर्ण्य और एलादिगणको वर्णप्रसादन लिखा है (सू. अ. ३८)। रसवैशेषिकसूत्रमें 'वर्ण्य' के स्थानमें 'वर्चस्य' शब्दका प्रयोग किया है। कण्ट्यम्-कण्ठजननम्-स्वर्यम्- कण्ठस्थित्तस्वराय हिवं कण्ठ्यम् (ग.)। कण्ठाय हितं कण्ठ्यम् (यो.) । सारिवेक्षुमूल-मधुक-पिप्पली-द्राक्षा-विदारी-कैडर्य-हंसपादी-वृहती-कण्टकारिका इति दशेमानि कण्ट्यानि भवन्ति (च. सू. म. ४)। कण्ठके खरके लिये हितकर (स्वरको सुधारनेवाले और रोगसे विगड़े हुए खर- आवाजको फिर खाभाविक अवस्थामें लानेवाले ) द्रव्यको कण्ट्य कहते हैं। जैसे- अनन्तमूल, मुलेठी आदि । सुश्रुतने अदरखको खर्य लिखा है (सू. अ. ४६ । श्लो. २२७)॥ १ आयुर्वेदमें अनुत्पन्न रोगोंका प्रतियन्ध करनेवाली और उत्पन्न रोगको दूर करनेवाली शक्तिको भी वल (Vitality-वाइटॅलिटि) नाम दिया है-"वल पल निग्रहाय रोगाणा-वल रोगोंका निग्रह करनेके लिए समर्थ है" (च. चि. भ. ३)। २ बल्य-ये द्रव्य जिन जिन अवयवोंपर क्रिया करते है, उनका वल बढ़ाते हैं किंवा उनको स्वस्थ करते हैं। जैसे-आमाशयके लिए तिक्त और दीपन द्रव्यः सुषुम्णाकाण्डके लिए कुचला, हृदयके लिए अर्जुन और डिजिटेलिस, नाडीसंस्थानके लिए तगर, पेशियोंके लिए कपायाम्ल( टॅनिक ऍसिद् )युक्त द्रव्य, और रक्तके लिए लोह । इन्हें अग्रेजीमें Tonics- टॉनिक्स' कहते है (डॉ. वा. दे)। यूनानीवैधकमें वल्यको 'मुकव्वी' कहते हैं। ३ कण्व्य-ये द्रव्य मुखमें रखकर धीरे धीरे चूसनेसे श्वासनली और कण्ठसे कफको वाहर लाते हैं। जैसे-नौसादर, सैन्धा नमक, गोंद, मुलेठी । इन्हें अग्रेजीमें 'Ciliary excitant-सिलिअरी एक्साइटन्द' कहते हैं (डॉ. वा. दे.)। - - . P - ३२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । - 1 हृद्यम्- हृदयाय मनसे हितं हृद्यम् (ग., यो.) । आम्रानातक-लकुच-करमर्द-वृक्षा- म्लाम्लवेवस-कुवल-बदर-दाडिम-मातुलुझानीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)। 'अम्लं हृद्यानाम्' (च. सू. भ. २५)॥ हृदय अर्थात् मनको प्रिय और हितकर द्रव्यको हृद्य कहते हैं । जैसे-आम आदि तथा, अम्लरसवाले द्रव्य । सुश्रुतने परूषकादिगणको हृद्य बताया है (सू अ. ३८)। तृप्तिघ्नम्- तृप्तिः श्लेष्मविकारः, येन तृप्तमिवात्मानं मन्यते, तनं तृप्तिघ्नम् (च. द.)। तृप्तिः श्लेष्मविकारमेदः, तन्नाशकम् (ग.।) तृप्ति हन्तीति तृप्तिप्तम् , अनमामि- नन्दनात् तृप्तिरिव तृप्तिररोचकः, स च श्लेष्मजो विकारः (यो.)। नागर-चव्य- चित्रक-विडङ्ग-मूर्चा-गुड्ची-वचा-मुस्त-पिप्पली-पटोलानीति दशेमानि तृप्तिमानि भवन्ति (च सू. अ. ४)॥ चालीस श्लेष्मविकारों में 'तृप्ति' नामका श्लेष्मरोग कहा गया है, इससे मनुष्य अपनेको तृप्त जैसा अनुभव करता है । इस रोगको नष्ट करनेवाले द्रव्यको तृप्तिघ्न कहते हैं (च. द., ग.)। तृप्ति अर्थात् अन्नकी इच्छा न होना (अरुचि), उसे नष्ट करनेवाले द्रव्यको तृप्तिन कहते हैं (यो.)। जैसे-सोंठ, चित्रक आदि । सुश्रुतने बृहत्यादि, गुडूच्यादि तथा आमलक्यादि गणको अरोचकहर लिखा है (सू अ. ३८)। चरकने धान्याक और अजगन्धाको रोचन लिखा है (सू. अ.२७)। अघ्निम्- भशासि हन्तीति अर्थोप्तम् । एवं कुष्ठलादयः (यो.)। कुटज-बिल्व-चित्रक-नाग- रातिविषाभया-धन्वयासक-दारुहरिद्रा-वचा-चव्यानीति दशेमान्यझेशानि भवन्ति । अर्श(बवासीर)को नष्ट करनेवाले द्रव्यको अर्शीघ्न कहते हैं । जैसे-कुड़ा, बेल आदि। कुछनम्- कुठं हन्तीति कुष्टतम् । खदिराभयामलक-हरिद्रारुष्कर-सप्तपर्णारग्वध-करवीर- विढङ्ग-जातीप्रवाला इति दशेमानि-कुष्ठप्लानि भवन्ति (च. सू. 'अ. ४)॥ कुष्ठ-खग्दोष(खचाके रोगों)को नष्ट करनेवाले द्रव्यको कुष्ठघ्न कहते हैं । जैसे- खैर, हरड़ आदि । सुश्रुतने आरग्वधादि, त्रिफला, त्र्यूषण और लाक्षादिगणको कुष्ठन लिखा है' (सू. भ. भ. ३८)। १ कुष्टन-ये द्रव्य त्वचापर होनेवाले जीवाणुजन्य रोगोंको अच्छा करते हैं। जैसे- पारा, गन्धक, कासीसाम्ल । इन्हें 'Antiparasitics अन्टिपरसाइटिक्स' कहते हैं। (डॉ. वा. दे.)।
पूर्वार्धे द्रव्य विज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । - कण्ट्रजम्-कपडनाशनम- कण्हं हन्तीति कण्हनम् । चन्दन नलद-कृतमाल नक्तमाल-निम्य-कुटज-सर्पप-मधुकर दारुहरिदा-मुस्तानीति दशेमानि कण्डूप्लानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)॥ पार(खाज )ो नष्ट करनेवाले द्रव्यको कण्डन कहते हैं । जैसे चन्दन, अमल. तास आदि । सुश्रुतने आरग्वधादि और पटोलादि गणको कण्डूनं तथा एलादि गणको कण्डनाशन लिखा है। मृमिनम्-ऋमिप्रशमनम्-मिसूदनम्- रुमीन् हन्तीति कृमितम् । अक्षीव-मरिच-गण्डीर-केवुक-विटङ्ग-निर्गुण्डी-किणिही- वता-वृपपर्णिकाऽऽसुपर्णिका इति दशेमानि कृमिनानि भवन्ति (च. सू. म. ४)॥ गरीरमे उत्पन्न होनेवाले नाना प्रकारके याय और आभ्यन्तर किमि और उनसे उत्पन्न होनेवाले विकारोंको नष्ट करनेवाले द्रव्यको कृमिघ्न कहते हैं । जैसे-सहिजना, काली मिर्च आदि । सुश्रुतने अर्कादि गणको कृमिप्रशमन, सुरसादि गणको कृमिसूदन और लाक्षादि गणको कृमिन लिखा है (सू. भ. ३८)। विपतम्-विषप्रशमनम्-अगदम्- भेपनसामान्यवचनोऽप्यगदशब्दोऽत्र विषहरीपध एव प्रवर्तते, सामान्यशब्द- स्यापि कचिद्विशेषवृश्चित्वात् ; यथा-पञ्चमूलीति (सु. सू. १।३; हा.)। हरिद्रा- सुवहा-मसिहा-सूक्ष्मैला-पालिन्दी-चन्दन कतक-शिरीप-सिन्धुवार-श्लेप्मातका इति दशेमानि विपतानि भवन्ति (च. सू. म. ४)। नाना प्रकारके विप और उनसे उत्पन्न होनेवाले विकारों को नष्ट , करनेवाले द्रव्यको १ कृमिन्न-ये द्रव्य ऑोंके अन्दरके कृमियोंको मारते है, या उन्हें बाहर निकालनेमें सहायता करते हैं। जैसे-(१) किरमाणी अजवायन (और पलाशवीज) गोल कृमि (केंचुए- Round worm) के लिए, (२) (वायविडग ) कमीला, सुपारी, और अनारके मूलकी छाल फीते जैसे चपटे कृमि( Tape worm) के लिए, (३) नमक, चूना मौर फिटकिरीफे घोल( तथा कलुम्बाके फाथ )की आस्थापनयस्ति सूत जैसे कृमि ( Thread worm)के लिए, (४) अजवायनके फूल वडिशकृमि( Hookworm) के लिए । अंग्रेजीमें 'A.nthelmintics-अन्येल्मिन्टिवस्', 'Vermifuge- धमिफ्युन्'; 'Vermicides-वर्मिसाइड्स', 'Antiscolhac--अन्टिस्कॉलिआक्' कहते हैं। जो द्रव्य वाहरके (त्वचा आदिके) कृमियोंको मारते हैं, वे बायकृमिघ्न कहाते है । जैसे-कायफल, वच, निमोलीका तेल आदि । इन्हें अग्रेजीमें 'Insecticides- इन्सेक्टिसाश्ड्स' कहते हैं (डॉ. वा. दे.) । कृमिघ्न औषधको यूनानी वैधकमें 'कातिल दीदान' और 'मुखरिज दीदान' कहते हैं। द. पू.३ - Pr द्रव्यगुणविज्ञानम् । । विषघ्न या अगद कहते हैं । जैसे-हल्दी, मजीठ आदि । सुश्रुतने लोध्रादि, अर्कादि, एलादि, पटोलादि, उत्पलादि और अप्वादि गणको विषघ्न लिखा है। (सू. भ. ३०)। स्तन्यजननम्-स्तन स्तन्यवृद्धिकरम्- स्तन्यं जनयतीति खन्यजननम् (यो.)। वीरण-शालि-पष्टिकेचवालिका-दर्भ- कुश-काश-गुन्द्रेत्कट-कत्तृणमूलानीति दशेमानि स्तन्यजननानि भवन्ति (च. सू. म. ४)॥ स्त्रियोंके स्तन्य(दूध)को उत्पन्न करनेवाले और बढ़ानेवाले द्रव्यको स्तन्यजनन या स्तन्यवृद्धिकर कहते हैं । जैसे-खस, गन्नेके मूल आदि । सुश्रुतने काकोल्यादि गणको स्तन्यजनन कहा है (सू अ. ३८) और विदारीकन्द आदि कन्दशाकोंको स्तन्यवृद्धिकर लिखा है' (स. अ. ४६)। स्तन्यशोधनम्-स्त स्तन्यशुद्धिकरम्- दोषदूषितं स्तन्यं शोधयतीति स्तन्यशोधनम् । पाठा-महौषध सुरदार मुस्त-मूर्वा- गुडूची-वत्सकफल-किराततितक-रोहिणी-सारिवा इति दशेमानि स्तन्यशोधनानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)॥ दोषदूषित (बिगड़े हुए) स्त्रियोंके स्तन्यको शुद्ध करनेवाले द्रव्यको स्तन्यशोधन कहते हैं । जैसे-पाठा, सोंठ आदि । सुश्रुतने वचादि, हरिद्रादि और मुस्तादि गणको स्तन्यशोधन लिखा है। शुक्रजननम्-शुक्रलम्- जीवकर्षभक काकोली-क्षीरकाकोली-मुद्गपर्णी-माषपर्णी-मेदा-वृद्धरुहा-जटिला-कु-. लिना इति दशेमानि शुक्रजननानि भवन्ति (च. सू अ. ४)॥ पुरुषके शुक्रधातुको (वीर्यको ) उत्पन्न करने और वढानेवाले द्रव्यको शुक्रजनन या शुक्रल कहते हैं । जैसे-जीवक, ऋषभक, आदि (च.), असगन्ध, मुसली, मिसरी, शतावर (शा.)। १ अगद-ये द्रव्य विषके लक्षणोंको कम या दूर करते हैं (उतार, वारण)। जैसे- द्रावकाम्लके लिए चूना, तमाखूके लिए कुचला, फिरझोपदशके विषके लिए पारा, सर्पविषके लिए सोना आदि । इन्हें अग्रेजीमें 'Antidotes-एन्टिडोट्स्' कहते हैं (डॉ. वा, दे.) । विषघ्न औषधको यूनानी वैद्यकमें 'तिरियाक' और 'फादज़हर' कहते है। २ जैसे-वकरीका दूध, एरण्डकी पत्ती, सौंफ, गिलोय । इन्हें अग्रेजीमें 'Galactogogue--गॅलॅक्टोगॉग कहते हैं (डॉ. वा. दे.)। स्तन्यजनन द्रव्यको यूनानी वैधकमें 'मुवलिद लग्न' कहते हैं।
-- पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । चरकने पचाम गणोंमें शुक्रजनन वर्ग लिखा है। शुक्रजनन(शुक्रल) यह वाजीकर- (वृष्य )का एक अवान्तर मेद है। अतः वाजीकरणके विषयमें चरक, सुश्रुत आदिमें तथा टीकाग्रन्थों में जो विशेष बातें उपलब्ध होती हैं, वे नीचे एकत्र संग्रह करके दी जाती है- वाजीकरणम्-वाजीकरम्-वृष्यम्- "वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतः स्त्रियः । भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनो- पचीयते ॥ तद्वाजीकरणं, तद्धि देहस्यौजस्करं परम् (अ. सं. उ. अ. ५०; अ. ह. )। येन हेतुभूतेन पुरुपो वाजीव अश्व इवाप्रतिहतोऽङ्गना याति, येन च स्त्रीणामतिप्रियो भवति, येन च धातुरुपचयं प्रामोति, तद्वस्तु वाजीकरण- मित्युच्यते, तद्धि, परं देहस्यौजस्करम् (इ.)। "येन नारीषु सामर्थ्य वाजिवल्लभते नरः । बजेच्चाभ्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत्" (च. चि. अ २, पा. ४)। वाजीकरणशब्दनिरुक्तिमाह-येनेत्यादि । ब्रजेच्चाम्यधिकमिति पुन: पुनर्गच्छेत् ; 'व्यज्यते' इति वा पाठः, तत्रापि भूयो गमनेन नारीपु पुंस्वेन व्यज्यते ।xxx। भनेन निरुक्तेन त्रिविधमपि वृष्यमवरुध्यते; यथा-शुक्रवृद्धिकरं मापादि, तथा मुतिकरं सकल्पादि, शुक्रतिवृद्धिकरं क्षीरादि । यदुक्तमन्यत्र-"शुक्रनुतिकरं किं- चित् , किंचिच्छुक्रविवर्धनम् । स्रुतिवृद्धिकर किंचित् , त्रिविध वृष्यमुच्यते ॥" इति । विविधमपि हीद ल्यवाये बलवस्व पुनः पुनर्व्यवायशक्ति च करोति (च. द.)। "वाजीकरणतन्त्र (वाजीकरण) नामाल्प-दुष्ट-क्षीण विशुष्करेतसामाप्यायन-प्रसा- दोपचय-जनननिमित्तं प्रहर्पजननाथं च" (सु. सू. भ. १)। अल्परेतसः प्रकृत्यैव तोकरेतसः, तेपामाप्यायननिमित्तं; दुष्टरेतसो वातादिदुष्टरेतस., तेषां प्रसाद- निमित्तं, क्षीणरेतसः कारणैः स्वमानादल्पीभूतरेतसः, तेपामुपचयनिमित्त; विशुष्क रेतसः स्वमानादत्यर्थ क्षीणरेतस', तेषां जनननिमित्तम् (यदापध तद्वाजीकरण- मित्यर्थः) । अथवाऽल्परेतसः पञ्चविंशतिमप्राप्ताः, क्षीणरेतसस्तु मध्यवयसः कारणादल्पीभूतरेतसः, शुष्करेतसो वृद्धाः । प्रहर्पजननार्थ चेति स्वस्थस्य शुक्रवृद्धि- सुतिकरणार्थ चेत्यर्थः । अन्ये तु वजनं वाजो वेगः प्रकरणाच्छुफ्रस्य, स विद्यते येषां ते वाजिनः, अवाजिनो वाजिनः क्रियन्तेऽनेनेति वाजीकरणम् ; अन्ये तु वाजीशब्देन शुक्रमभिधीयते, तेन शुक्ररहितस्य वाजी शुक्र क्रियतेऽनेनेति वाजीकरणम् (ड.)। "सेव्यमानो यदौचित्याद्वाजीवात्यर्थवेगवान् । नारीस्तर्पयते तेन वाजीकरणमुच्यते" (सु. चि. अ. २६)।तत् त्रिविधं-जनकं, प्रवर्तकं, जनकप्रवर्तक चेति । तत्र १ 'वृपाय हितं पृष्यम्' (र. वै. भा. पृ. १८३ )। २ 'वाजीव लमते' इति पा० । ३ "नुतिकर स्त्रीस्पर्शादि, वृद्धिकर क्षीरादि, श्रुतिवृद्धिकर मापादि" इति (सु. सू भ. १ टीकाया च. द.)। - ( ३६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । जनकं मांसघृतादिकं, यतस्तद्सादिधातुक्रमेण परिणतं सप्तधातुपुष्टिं करोति प्रवते- कमुचटाचूर्णादिकं शुक्रविरेचनं, तस्य च वैरेचनिकरवे सत्याशुक्षयकारित्वं स्यात् अतो विरेचनं शुक्रस्य पतनायाभिमुखीभावमात्रकरणं; जनकप्रवर्तकं तु गव्यघृत- गोधूम-माप-नकाण्डादिकम् । केवलं देहवलकरं जनकं गोधूमादिकं, केवलमनो- बलकर संकल्पादि तु प्रवर्तकं, घृतक्षीरादि देहमनोवलकर सदुभयकरमिति । घृष्यादिद्रव्याणां सधः शुक्रादिकरणे प्रभावोऽयम् । तथा च श्रीवाग्भट:- "केचिदाहुरहोराबादशाहादपरे, परे । मासात् प्रयाति शुक्रस्वमन्नं पाकक्रमादिति ॥ वृष्यादीनि प्रभावेण सद्यः शुक्रादि कुर्वते । प्रायः करोत्यहोरात्रात् कर्माधन्यप मेषजम्" इति (ड.) । अल्पशुक्रं प्रकृत्यैव यदल्पशुक्रं, तस्याप्यायनाय; दुष्टं दोषतः, तस्य प्रसादाय; क्षीणं स्वमानात् प्राकृतात् , तस्योपचयाय; शुक्मत्य- ल्पत्वाच्छुकमिव, तस्य जननाय; इति विभागः । xxx। (च. द.)। "यस्माद्व्याद्भवेत् स्त्रीपु हर्षों वाजीकरं च तत् । यथा नागवलाधाः स्युजि च कपिकच्छुजम् ॥ यसाच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुकलं च तदुच्यते । यथाऽश्व- गन्धा मुसली शर्करा च शतावरी ॥ दुग्धं मापाश्च भल्लातफलमज्जामलानि च । प्रवर्तकानि कथ्यन्ते जनकानि च रेतसः ॥ प्रवर्तनी स्त्री शुक्रस्य रेचनं वृहती- फलम् । जातीफलं स्तम्भकं च शोषणी च हरीतकी" (शा. प्र. ख. म. ४)। यस्साहव्यात् स्त्रीपु स्त्रीपुरुपयोहर्पः कामशक्ति-सुरतसुखं भवेत् तद्वाजीकर ज्ञातव्यम् । यथा नागबलाधाः स्युरिति नागबला गाङ्गेरुकी, आदिशब्दाजाती- फलाहिफेनभशाप्रभृतीनां ग्रहणम् । कपिकच्छुवीजमपि वाजीकरणं, कपिकच्छु- र्वानरी । द्विविधदृष्टान्तेनात्र द्विविधं वाजीकरणं सूचितम् । एकं वीर्यस्तम्भनरूपम् , अपरं वीर्यवर्धनम् , इत्यनेन पुनरुत्याऽप्यदोषः। शुक्रलमिति शुक्रवृद्धिकरम् । रेतसः शुक्रस्य दुग्धादीनि द्रव्याणि प्रवर्तकानि कथ्यन्ते; न केवलं प्रवर्तकानि उत्पादन कराणि च कथ्यन्ते । प्रस्तावात् वाजीकरणानामौषधानां विशेषानाह-प्रवर्तनीत्यादि । शुक्रस्य वीर्यस्य प्रवर्तनी प्रकटकारिणी स्त्री कथितेत्यर्थः । रेचनं वृहतीफलमिति शुक्रस्येत्यत्रापि संबन्धः । बृहती बृहत्कण्टकारिका, तस्याः फलम् । स्तम्भकम् अवरोधकरं जातीफल भवति; अन्नापि शुक्रस्येति संबन्धः । शोषणी हीन(क्षीण)- त्वकारिणी हरीतकी कथिता । चकारादत्रापि शुक्रस्येत्यर्थः । एके 'शोषणी च हरीतकी' इत्यस्य स्थाने 'कालिङ्गं क्षयकारि च' इति पठन्ति, व्याख्यानयन्ति च- कालिकं वर्तुलफलमिति (आ.)। कालिग ब्रह्मशीप, क्षयकारि स्यात् (का.)॥ जिस द्रव्यके सेवनसे स्त्रीके विषयों ( सुरतके विषयमें ) पुरुष और स्त्री दोनोंको अधिक हर्ष उत्पन्न हो तथा पुरुष अश्वके जैसे अति बलवान् होकर बिना रुकावटके स्त्रीगमनमें समर्थ हो, उसे वाजीकरण या वृष्य कहते हैं । वाजीकर द्रव्यके चार प्रधान मेद हैं-(१) जिस द्रव्यसे शुक्रकी (वीर्यकी ) वृद्धि हो, उसे । ।
+ पूर्वार्धे द्रव्य विज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ३७ शुक्रजनन, शुक्रल या शुक्रविवर्धन कहते हैं; इस वर्गका प्रधान कार्य शुक्र (वीर्य) धातुको उत्पन्न करना और बढ़ाना हैं (देहवलकर), ये द्रव्य साक्षात् प्रवर्तक- स्रुतिकर-कामोत्तेजक होते हैं या नहीं भी होते । (२) शुक्रतिकर-शुक्र- प्रवर्तक-कामोत्तेजक-ये द्रव्य साक्षात् शुक्रकी वृद्धि नहीं करते, परन्तु केवल कामोत्तेजन मात्र करते हैं (मनोवलकर), जैसे-स्त्रीस्पर्शादि । (३) कुछ द्रव्य जनक और प्रवर्तक दोनों होते हैं (देहमनोवलकर), जैसे-दूध, उड़द, भिलावेका मग्ज आदि; उनको शुक्रस्नुतिवृद्धिकर कहा गया है, (४) शुक्रस्तम्भन-ये द्रव्य शुक्र- धातुका स्तम्भन करके सुरतकालको दीर्घ करते हैं, जैसे-आयफल, अफीम आदि । शुकशोधनम् --शुक्रदोषविनाशनम्- दोपदूपितं शुक्रं शोधयतीति शुक्रशोधनम् । "कुठैलपालुक-कट्फल-समुद्रफेन- कदम्यनिर्यासेक्षु काण्डेक्ष्विक्षुरक-वसुकोशीराणीति दशेमानि शुक्रशोधनानि भवन्ति (च. सू अ. ४)॥ दोषदूषित शुक्र(वीर्य)की शुद्धि करनेवाले द्रव्यको शुक्रशोधन कहते हैं । जैसे- कुठ, कायफल आदि । सुश्रुतने विदार्यादि, करमर्दादि और मुष्ककादि गणको शुक्र- दोषविनाशन लिखा है (सू. अ. ३८)। सेहोपगम्- मेहनस्य सर्पिरादेः नेहनक्रियायां सहायत्वेनोपगच्छतीति स्नेहोपगम् । मृद्वीका- दिनेहोपगयुक्तस्य सर्पिरादेः स्नेहने प्रकर्षवती, शक्तिर्भवतीत्यर्थः (च. द.)। नेहोपग इति स्नेहविधी उपगन्तुं पानाहारादिषु शीलं यस्य तत् तथा; एवं परत्रापि व्याख्येयम् (ग.); नेहमुपगच्छति स्नेहनक्रियायां सहायीभवतीति होपगम्, १ वाजीकर-ये द्रव्य मैथुनेच्छा और शिश्नेन्द्रियकी शक्तिको बढाते हैं। जैसे-कुचला, मॉग, फॉस्फॉरस, कॅन्यरिष्ठिस् । इनमें (१) कई द्रव्य शिश्नेन्द्रियकी नाडीके केन्द्रपर प्रत्यक्ष क्रिया करते हैं, जैसे कुचला । (२) कई द्रव्य मूत्राशय और मूत्रनलिकाका क्षोभ करके अप्रत्यक्ष रीतिसे यह क्रिया करते हैं, जैसे-कॅन्थेरिडिस् । इस वाजीकर वर्गके तीन भवान्तर मेद किये नाते हैं-(१) स्तम्भन-शुक्रस्रावके समयको बढानेवाले द्रव्य, जैसे-जायफल । (२) वृष्य-हर्प (कामेच्छा ) वढानेवाले और वीर्यको बढाकर गाढा करनेवाले द्रव्य, जैसे-घृषण । (३) वाजीकर-मैथुनशक्ति बढ़ानेवाले तथा मैथुनके अनन्तर होने वाली थकानको रोकने वाले द्रव्य (जैसे-सालमपजा)। इन्हें अंग्रेजीमें 'Aphrodisiac- अफ्रॉडिसिमक्' कहते हैं । (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैयकमें वाजीकर औषधको 'मुकम्वी याह' और 'मुव्ही', शुक्रननको 'मुवल्लिद मनी' और शुक्रस्तम्मनको 'मुसिक मनी' कहते हैं।
- ३८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । एवं स्वेदोपगादयः (यो.)। मृद्वीका-मधुक-मधुपी-मेदा-विदारी-काकोली-जीवक- जीवन्ती-शालपर्ण्य इति दशेमानि बेहोपगानि भवन्ति (च. स. भ. ४) । जो द्रव्य घृत आदि स्नेहन द्रव्योंके साथ पान आदिमें सहायक रूपमे प्रयुक्त किये जानेपर उनकी स्नेहनशक्तिको बढ़ाता है, उसे स्नेहोपग कहते हैं । जैसे-मुनका, मुलेठी आदि। स्वेदोपगम्---- स्वेदनद्रव्यस्य अग्न्यादेः स्वेदनक्रियायां सहायरवेनोपगच्छतीति स्वेदोपगम् । शोभाजनैरण्डार्क-वृश्चीर-पुनर्नवा-यव-तिल-कुलत्थ-माप-बदराणीति दशेमानि स्वेदो. पगानि भवन्ति (च सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य खेदन( पसीना लानेवाले )द्रव्यों के साथ सहायक रूपमें प्रयुक्त किये जाने पर उनकी शक्तिको वढाता है, उसे खेदोपग कहते हैं । जैसे-सहिजना, एरण्ड आदि । वमनोपगम्- वमनद्रव्यस्य मदनफलादेर्यमनक्रियायां सहायत्वेनोपगच्छतीति वमनोपगम् । मधु-मधुक-कोविदार-कर्बुदार-नीप-विदुल-बिम्बी-शणपुप्पी-सदापुष्पा-प्रत्यक्पुष्प्य इति दशेमानि वमनोपगानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य वमन द्रव्योंके साथ सहायक रूपमें प्रयुक्त किये जाने पर उनकी शक्तिको वढ़ाता है, उसे वमनोपग कहते हैं। जैसे--मुलेठी, कचनार आदि । विरेचनोपगम्- विरेचनद्रव्यस्य त्रिवृदादेविरेचनक्रियायां सहायस्वेनोपगच्छतीति विरेचनो- पगम् । द्राक्षा-काश्मर्यफल-परूषकाभयामलक-विभीतक-कुवल-बदर-कर्कन्धु-पीलू- 'नीति दशेमानि विरेचनोपगानि भवन्ति (च. सू. अ ४)॥ जो द्रव्य विरेचन द्रव्योंके साथ सहायक रूपमें प्रयुक्त किये जाने पर उनकी शक्तिको बढ़ाता है, उसे विरेचनोपग कहते हैं । जैसे-मुनका, गंभारीके फल आदि । आस्थापनोपगम्- आस्थापनद्रव्याणां पाटलादीनामास्थापनक्रियायां सहायत्वेनोपगच्छतीति आस्था- पनोपगम् । त्रिवृद्विल्व-पिप्पली-कुष्ठ सर्षप-वचा-वत्सकफल-शतपुष्पा-मधुक-मदन- फलानीति दशेमान्यास्थापनोपगानि भवन्ति (च. सू अ. ४)॥ जो द्रव्य आस्थापन (आस्थापन बस्तिमें उपयोगी) द्रव्योंके साथ सहायक रूपमें प्रयुक्त होनेपर उनकी शक्तिको वढाता है, उसे आस्थापनोपग कहते है । जैसे- निशोथ, बेल आदि। । ।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । . १३९ है - - अनुवासनोपगम्- राम्रा-सुरदार विल्व-मदन-शतपुष्पा-वृश्चीर-पुनर्नवा-श्वदंष्ट्राग्निमन्थ-श्योनाका इति दशेमान्यनुवासनोपगानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य अनुवासन (अनुवासन वस्तिमे उपयोगी) द्रव्योंके साथ सहायक रूपमें प्रयुक्त होने पर उनकी शक्तिको बढ़ाता है, उसे अनुवासनोपग कहते हैं। जैसे- रामा, देवदार आदि। शिरोविरेचनोपगम्- शिरोविरेचनोपगे तु शिरोविरेचनप्रधानान्येव द्रव्याणि बोद्धध्यानि (च. द.)। ज्योतिष्मती-क्षवक-मरिच-पिप्पली-विदह-शिग्रु-सर्पपामार्गतण्डल-श्वेता-महाश्वेता इति दशेमानि शिरोविरेचनोपगानि भवन्ति (च. सू. अ, ४)॥ शिरोविरेचनमें उपयोगी प्रधान द्रव्यों को शिरोविरेचनोपग या शिरोविरे- चन कहते हैं । जैसे-मालकैंगनी, नकछिंकनी आदि । छर्दिनिग्रहणम्-वमिनिग्रहणम् - छर्दि निगृह्णाति स्तम्भयतीति छर्दिनिग्रहणं, व्याधिहरणवचनेन त तुदोपहरण- मपि लभ्यते, एव परत्रापि (ग.)। छर्दि वर्मि निगृह्णातीति छर्दिनिग्रहणम्, 'एवं तृष्णानिग्रहणादयः (यो.) । जम्बाम्रपल्लव-मातुलनाम्लबदर-दाठिम- यव-यटिकोशीर-मृल्लाजा इति दशेमानि छर्दिनिग्रहणानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)॥ जो द्रव्य वमन-उलटीके कारणभूत दोषको शान्त करके वमनको दूर करे उसे छर्दिनिग्रहण कहते हैं । जैसे-जामुन और आमकी कोंपल आदि । सुश्रुतने आरम्वधादि, पटोलादि और गुडूच्यादिगणको वमिहर लिखा है (सू. अ. ३८)। १ चरकसंहितामें लेहोपग, स्वेदोपग, वमनोपग, विरेचनोपग और आस्थापनोपग गणोंमें जो द्रव्य आये हैं वे लेहन, खेदन, वमन, विरेचन और आस्थापनके प्रधान द्रव्योंसे मिन्न है। सेहोपग आदि द्रव्य प्रधानतया लेहन आदि कर्म नहीं करते, किंतु लेहन आदि द्रव्योंकी शक्ति बढाकर उनकी क्रियाओंमें सहायता करते हैं । शिरोविरेचनोपग गणमें शिरोविरेचनमें सहायक द्रव्य नहीं, किंतु प्रधान शिरोविरेचन द्रव्य ही लिये है । शिरोविरेचन- (Errhines-एहाइन्स) ये द्रव्य नाकमें श्लेष्माको बढाते हैं। इनसे छींकें नहीं आतीं। जैसे-अमोनिया, सिरकेकी भाफ (डॉ. वा. दे.) । छिकाजनन (Sternutato. ries-स्टन्युटॅटरिस्)-ये द्रव्य सूंघनेसे छींकें आती हैं । जैसे-तमाखू , कुटकी, सोंठ, मिर्च, एपिकाक्युआना । छिकाजनन औषधको यूनानीवैद्यकमें 'मुअतिसू' कहते हैं । .२ छर्दिनिमहण-Anti-emetic-~अन्टिरमेटिक्' (डॉ. वा. दे.)। छर्दिनिग्रहण मोपधको यूनानी वैद्यकमें 'मुसकिन कै' कहते हैं । । - द्रव्यगुणविज्ञानम् । तृष्णानिग्रहणम्-तृष्णान्नम्-पिपासानम्-तृप्रशमनम्- नागर-धन्वयासक-मुस्त-पर्पट-चन्दन-किराततिक्त-गुडूची-हीवेर-धान्यक-पटोलानीति दशेमानि तृषानिग्रहणानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य तृषाके कारणभूत दोषको शान्त करके तृपाका नाश करे उसे तृष्णा निग्रहण कहते हैं । जैसे-नागरमोथा, धमासा आदि । सुश्रुतने सारिवादि, परूषकादि, उत्पलादि और अप्वादि गणको पिपासाहर लिखा है (सू. भ. ३८)॥ हिक्कानिग्रहणम्-हिकानम्- शटी-पुष्करमूल-बदरवीज-कण्टकारिका-वृहती-वृक्षरुहाभया-पिप्पली-दुरालभा. कुलीरशङ्गय इति दशेमानि हिकानिग्रहणानि भवन्ति (च. सू. म. ४)॥ जो द्रव्य हिक्का(हिचकी)के निमित्तभूत दोषको शान्त करके हिवाको दूर करे उसे हिक्कानिग्रहण कहते हैं । जैसे-कचूर, पोहकरमूल आदि । पुरीषसंग्रहणीयम्-विग्रहणम्-साग्राहिकम्-सग्राहि-त्राहि- पुरीपसंग्रहणं पुरीपस्य स्तम्भनं, तस्सै हितम् (ग.) । पुरीपस्यातिसरतः संग्रहणं संग्रहः, तत्र हितं पुरीपसंग्रहणीयम् (यो.)। "सांग्राहिकमनिलगुण- भूयिष्ठम् , अनिलस्य शोषणात्मकत्वात्" (सु. सू. अ. ४१) । "दीपनं पाचनं यत् स्यादुष्णत्वावशोषकम् । ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली" (शा. प्र. ख. म. ४)। यद्व्यं दीपनम् अग्निकर, पाचनम् आमादीनां, द्रवशोषक- मिति द्वस्वरूपाणां दोपधातुमलादीनां शोपकमित्यर्थः, उष्णत्वात् उष्णवीर्यस्वाद् द्रवशोपकमिति योज्य; दीपनादिकार्यकरत्वेनोपलक्षितमिति भावः, तद्वाहि विज्ञेयम् । यथा--शुण्ठी, जीरकं, गजपिप्पली च । गजपिप्पली चव्यफलम् । ननु संग्राहकमनिलगुणभूयिष्ठम्, अनिलस्य शोषणात्मकत्वात् , तत् कथमुक्तम्-उष्ण. त्वादिति । उच्यते-पकामग्राहकत्वेन द्विविधं हि संग्राहकम् । तत्र यदहण्यामामं संपाच्य वहिं कृत्वा तत्रस्थं दवं च शोपयित्वा संग्रहणं करोति तदुष्णग्राहकं ज्ञेयं; यद्रव्यमतीसारादौ पक्कमलादिकं संस्तभ्य संग्रहं करोति तच्छीतग्राहकं ज्ञेयम् , एतदनिलगुणभूयिष्ठमित्यदोषः (आ.)। "सांग्राहिकं विजानीयात् पृथिव्यनिल- संभवम्" (र. वै. पृ. १८७)। "लवण-तीक्ष्णोष्णेभ्योऽन्यत् सांग्राहिक, तत् पार्थिववायव्यम्" (र. वै. ४ । ९) । लवणादेतद्गुणद्वयाचान्यद्रसगुणं तस्य (सांग्राहिकस्य) भाश्रयः; तत् पार्थिववायव्यम् आभ्यां भूताभ्यां निवर्त्यते सांग्राहिकम् । (भा.)। "योर्निग्रहणं सांग्राहिकम्"। (र.वै.४१२३)। निग्रहणं प्रशमनम् । द्वयोरित्युक्तं, न विशेपितं, तथा पित्तश्लेष्मणोरिति गम्यते, पार्थिववाय- च्यत्वात्तस्य वीर्यस्य, आश्रयस्य च लवण-तीक्ष्णोणेभ्योऽन्यत्वात् पित्तनिग्रहे समर्थ, पार्थिववायव्यस्वाद्रौक्ष्यवैशद्याभ्यां श्लेष्मनिग्रहे समर्थम् (भा.) । प्रियङ्ग्वनन्ता- १ हिकानिग्रहण औषधको यूनानी वैपकमें 'मुसकिन फवाक' कहते हैं ।
4 पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। ४१ - मास्थि कहा-लोध्र-मोचरस-समझा-धावकीपुप्प-पद्मा-पभकेशराणीति दशेमानि पुरी- पसंग्रहणीयानि भवन्ति (च. सू. अ, ४)॥ जो द्रव्य द्रवीभूत तथा अत्यन्त (बार बार और प्रभूत मात्रामें ) सरनेवाले पुरीषको बाँधे, उसे पुरीपसंग्रहणीय (विग्रहण, सांग्राहिक, संग्राहि या ग्राहि) कहते हैं। जैसे-आमकी गुठली, सोनापाठा आदि (च.)। जो द्रव्य दीपन हो; आमादिकका पाचन करनेवाला हो और उष्णवीर्य होनेसे द्रवरूप मलादिकोंका शोषण करनेवाला हो, उसे ग्राहि कहते हैं । जैसे-सोंठ, जीरा, गजपीपल (शा.)। सुश्रुतने न्यग्रोधादिगणको संग्राही, रोधादि गणको स्तम्मी (स्तम्भन ) तथा प्रियवादि और अम्बष्टादि गणको पक्कातिसारनाशन लिखा है । साम्राहिक प्रव्य वातगुणभूयिष्ठ होता है, क्योंकि वायु शोषण करनेवाला है (सु.) । शाईधरने शोषण क्रियाका हेतु 'उष्णलात्' दिया है, सुश्रुतमें इसका कारण वायुको कहा है। इस मतभेदका समाधान करते हुए आढमल्ल कहते है कि, सग्राहक द्रव्योंके दो भेद है-पक्कसंग्राहक और आमसंग्राहक । इनमें जो द्रव्य ग्रहणीम आमको पका, जठरामिको प्रदीप्त कर और वहाँ स्थित द्रव मलका शोषण करके संग्रहण करता (मलको वाँधता) है, उसे उष्णसंग्राहक कहते हैं । जो द्रव्य अतिसारादिमें पक्क मलादिकका स्तम्भन करके सग्रहण करता है, उसे शीतसंग्राहक कहते हैं । ये पिछले द्रव्य वातगुणकी अधिकतावाले होते हैं । रसवैशेषिकसूत्र में सांप्राहिक द्रव्यको लवण रस तथा तीक्ष्ण और उप्ण गुणको छोड़कर अन्य रस गुणवाला तथा पृथिवी और वायुके गुणोंकी अधिकतावाला कहा है। वक्तव्य-अतिसार और ग्रहणी रोगमें जय पतले दस्त आते हों तव पुरीष- संग्रहणीय द्रव्योंका प्रयोग किया जाता है । जव मल आमलक्षणयुक्त आता हो तन १ सम्भन, माहि, संग्राहक (Astringents-मस्ट्रिन्जन्ट्स)-(१) स्तम्मन- स्थता, कपायता और गीतगुणके कारण आँतोंमेंके पतले द्रव्यों और सावोंको रोकनेवाले द्रव्य । ये द्रव्य शीघ्र और जोरदार क्रिया करते हैं । जैसे-अफीम, कुडेकी छाल, सोनापाठा। (२ अ) ग्राहि-अग्निको प्रदीप्त करके और आमका पचन करके आँतोंके पतले द्रवोंको गाढा किंवा शुष्क करनेवाले द्रव्य । ये द्रव्य उष्णवीर्य होते हैं, इनकी क्रिया धीरे धीरे होती है। जैसे-सोंठ, जीरा, वही पीपल, Carminatives-कार्मिनेटिन्स्, Aromatics-मेरोमॅटिक्स् । (२ ब) संग्राहक-कपाय गुणके कारण पेशियोंका सकोच करनेवाले तथा सयोगको प्राप्त मङ्गों में रूक्षता लानेवाले द्रव्य । ये आँतोंकी लसीका या भावको कम करके उनको गाढा करते हैं । जैसे-माजूफल तथा माजूफलमें स्थित कषायाम्ल जिन-जिन द्रव्योंमें हो वे द्रव्य, द्रावकाम्ल, फिटकिरी (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैषकमें संग्राइक औषधको काविज़' और स्तम्मनको 'हाविस' कहते हैं। 1 . ૬૨ द्रव्यगुणविज्ञानम् । सोंठ, जीरा, सौंफ आदि उष्णसंग्राहक द्रव्योंका तथा जब मल पक्कलक्षणयुक्त आता हो तब लोध्र, मोचरस, धातकीपुष्प आदि शीतसग्राहक औषधोंका प्रयोग करना चाहिये । चरकने उदाहरणरूप लिखे हुए द्रव्य शीतसंग्राहक और शार्ङ्गधरने उदाहरण. रूप लिखे हुए द्रव्य उष्णसग्राहक हैं। पुरीपविरजनीयम्-विनिरजनम्- पुरीषस्य विरजनं दोषसंबन्धनिरासं करोतीति पुरीषविरजनीयम् । एवं भूत्रविर- जनीये व्याख्येयम् (च. द.)। दोषसंबद्धस्य पुरीपस्य दोषसंबन्धाद' विगमेन रजनं रागः, तमै हितं पुरीषविरजनीयम् । एवं मूत्रस्य च व्याख्येयम् (ग.)। पुरीषस्य विरजनं दोषसंबन्धविगमेन रजनं, तसै हितम् (यो.)। जम्बू-शल्लकीत्व- कच्छुरा-मधुक-शाल्मली-श्रीवेष्टक-भृष्टमृत्पयस्योस्पल-तिलकणा इति दशेमानि पुरीष- विरजनीयानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य दोषदूषित पुरीषके दोषको दूर करके उसका वर्ण स्वाभाविक कर दे, उसे पुरीषविरजनीय कहते हैं । जैसे-जामुन, कवाँच आदि । मूत्रसंग्रहणीयम्-मूत्रग्रहणम्- अतिमानं पुनः पुनश्च प्रवर्तमानं मूत्रं संगृह्णातीति मूत्रसंग्रहणीयम् । जम्वाम्र- प्लस वट-कपीतनोदुम्बराश्वस्थ-भल्लातकाश्मन्तक-सोमवल्का इति दशेमानि मूत्रसं- ग्रहणीयानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य अत्यन्त (बार-बार तथा अति मात्रामें ) निकलनेवाले मूत्रको रोके, उसे मूत्रसंग्रहणीय कहते हैं । जैसे-जामुन, । जैसे-जामुन, आम आदि । मूत्रविरजनीयम्-मूत्रविरजनम्- भूत्रं विरजयति दोषसंबन्धनिरासं कृत्वा प्रकृतौ स्थापयतीति मूत्रविरजनीयम् । पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरीक-शतपत्र-मधुक-प्रियङ्गु-धातकीपुष्पाणीति दशेमानि भूत्रविरजनीयानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य दोषदूषित मूत्रके दोषको दूर करके उसका वर्ण स्वाभाविक कर दे, उसे मूत्रविरजनीय या मूत्रविरजन कहते हैं । जैसे-कमल, मुलेठी आदि। मूत्रविरेचनीयम्- मूत्रस्य विरेचनं करोतीति मूत्रविरेचनीयम् (च. द.)। मूत्रविरेचनीयमिति मूत्रस्य वर्तनाय हितम् (ग.)। भूत्रस्य विरेचनं घहिःसारणं, तत्र हितम् (यो.)। वृक्षादनी-श्वदंष्ट्रा-वसुक-वशिर-पाषाणभेद-दर्भ-कुश काश-गुन्द्रेत्कटमूलानीति दशेमानि मूत्रविरेचनीयानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)॥ १ मूत्रसंग्रहणीय (Uline diminisher-यूरिन डिमिनिशर्)-ये द्रव्य मूत्रको कम करते हैं । जैसे-अफीम, जस्तकी भस्म, तगर (डॉ. वा दे.)। मूत्र- सग्रहणीय औषधोंको यूनानी वैद्यकमें 'हाबिस वौल' कहते हैं । - - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । जो द्रव्य मूत्रका विरेचन (प्रवृत्ति-खुलासा) करे उसे मूत्रविरेचनीय, मूत्र विरेचन, चस्तिशोधन या भूत्रले कहते हैं । जैसे-वाँदा, गोखरू आदि । सुश्रुतने परूपकादि और तृणपञ्चमृल इन दो गगोंको मूत्रदोपहर लिखा है । (सू. भ. ३८) । चरकने त्रपुष और विदारीकन्दके गुणोंमें उसे मूत्रल लिखा है। कासहरम्- कासं हरतीति कासहरम् , एवं श्वासहरादय. (यो.) । द्राक्षाभयामलक- पिप्पली-दुरालभा शृङ्गी-कण्टकारिका-वृश्चीर-पुनर्नवा-तामलक्य इति दशेमानि कास- हराणि भवन्ति (च, सू. भ. ४)॥ कास( खाँसी )को नष्ट करनेवाले द्रव्यको कासहर या कासन्न कहते हैं । जैसे-मुनका, हरय आदि । सुश्रुतने विदारीगन्धादि और सुरसादि गणको कासहर लिखा है। (सू. अ. ३८)। श्वासहरम्-श्वासशमनम्- भासं श्वासरोगं हरति हरतीति श्वासहरम् । शटी-पुष्करमूलाम्लवेतसैला- हिरवगुरु-सुरसा-तामलकी जीवन्ती-चण्डा इति दशेमानि श्वासहराणि भवन्ति (च. सू. भ. ४)॥ श्वासरोगको नष्ट करनेवाले द्रव्यको श्वासहर या श्वासशमन कहते हैं। जैसे- - १ 'मूत्रल' शब्द सु. सू. म. ४६ में लो. ९५१३१८ आदि स्थलोंमें आया है। २ मूत्र- जनन (Diuretics-डाश्युरेटिक्स)-ये द्रव्य मूत्रग्रन्थियोंके उत्तेजक तथा मूत्रको मदानेवाले हैं। (१) कई द्रव्य मूत्रग्रन्थियोंको साक्षात् उत्तेजित करते हैं, जैसे-कवाद- चीनी, काली मिर्च, अनन्तमूल, हाउवेर, गन्धाविरोजा, कॅन्थेरिडिस्, मघ । इन्हें मूत्रजनन RStimulating diuretics-स्टिम्युलेटिंग डाइयुरेटिक्स् ) कहते हैं । (२) कई मूत्रग्रन्थियोंमें रकका आयात और रक्तका दवाव बढ़ाते हैं, जैसे-जगली प्यान, बुददाना ( फॉफी), डिजिटेलिम, पुनर्नवा । इन्हें मूत्रविरेचनीय (Hydragogue diuretics-हाईटेंगॉग डाइयुरेटिक्स) कहते हैं । ये मूत्र जोरसे (बलात् ) उत्पन्न करनेवाले द्रव्य है । (३) कई सूत्रग्रन्थियोंको धो डालते हैं, जैसे-पानी, चावलका मॉड, जौखार । इनको मूत्र विरजनीय (Refrigerant diuretics-रिफ्रिजरन्द टाइयुरेटिक्स) कहते हैं । मूत्रका स्वाभाविक रग लानेवाले द्रव्य । मूत्रविरेचनीयवादा, गोखरू, खस, बिसखपरा, पाखाणमेद, डाम, काँस, रोहिपघासके मूल (डॉ. वा. दे.)। मूत्रविरेचनीय द्रव्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुदिरं धौल' कहते हैं। कासदर औषधको 'मुज़य्यक सुफी' कहते हैं। ३ यूनानी वैधकमें द्रव्यगुणविज्ञानम् । - दहनम्- अग्नेर्दहनशक्तिवत्वथ्यांसास्थिदाहे' (र. वै. ४१२२) । दहनं क्षारादीनाम् ड. सु. सू. भ. ४०१५) जो द्रव्य अग्निकी तरह बचा, मांस आदिको जला देता है, उसको दहन कहते हैं। शीतप्रशमनम्- शीतं प्रशमयतीति शीतप्रशमनम् । तगरागुरु-धान्यक-शृङ्गवेर-भूतिक-वचा- कण्टकार्यग्निमन्थ-श्योनाक-पिप्पल्य इति दशेमानि शीतप्रशमनानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)। रानागुरूणि शीतापनयनप्रलेपनानाम् (च. सू. म. २५)॥ जो द्रव्य शीत (ठण्ड लगनेको ) शान्त करे, उसे शीतप्रशमन कहते हैं। जैसे- तगर, अगरु आदि । उदर्दप्रशमनम्-कोठनाशनम्- उदो वरटीदष्टाकार. शोथ., तत्प्रशमन उदर्दप्रशमनः, न पुनरिह महारोगा- ध्याये पठितो वातविकारो गृह्यते, तिन्दुकादीनामुदर्दप्रशमनानां वात प्रत्यननुकू. लत्वात् (च. द.)। "शीतपानीयसंस्पर्शाच्छीतकाले विशेषतः । सरागकण्डू शोफः स्यादुदर्दः स कफोनवः" इति; माधवस्तु-"वरटीदष्टसंस्थानः शोफः सजायते बहिः । सकण्हूतोदबहुलश्छर्दिज्वरविदाहवान् ॥ उददं तं विजानीया. च्छीतपित्तमथापरे" इति (यो.)। तिन्दुक-प्रियाल-बदर-खदिर-कदर-सप्तपर्णा- स्वकर्णार्जुनासनारिमेदा इति दशेमान्युदर्दप्रशमनानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ उदर्द(पित्ती-ददोड़े उठने )को शान्त करनेवाले द्रव्यको उदर्दप्रशमन कहते हैं । जैसे--चिरोंजी, बेर आदि । सुश्रुतने एलादिगणको कोठनाशन लिखा है। अङ्गमर्दप्रशमनम्- विदारीगन्धा-पृश्निपर्णी-वृहती-कण्टकारिकैरण्ड काकोली-चन्दनोशीरैलामधुका- नीति दशेमान्यगमर्दप्रशमनानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य अङ्गमर्द( अंगड़ाई )को शान्त करे, उसे अगमर्दप्रशमन कहते हैं। जैसे-सरिवन, पिठवन आदि। शूलप्रशमनम्- पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-मरिचामोदाजगन्धाजाजी-गण्डीराणीति दशेमानि शूलप्रशमनानि भवन्ति (च. सू भ. ४)॥ जो द्रव्य शूलरोगको शान्त करे, उसे शुलप्रशमन कहते हैं । जैसे-छोटी पीपल, पीपलामूल आदि । १ दहन द्रव्यको युनानी वैथकमें 'मुद्रिक' कहते हैं।
पूर्वार्ध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । 1 । शोणितस्थापनम्-रुधिरसंस्थापनम्- शोणितस्य दुष्टस्य दुष्टिमपहृत्य तत् प्रकृतौ स्थापयतीति शोणितस्थापनम् (च. द.)। शोणित स्थापयति अतिप्रवृचं स्तम्भयतीति शोणितस्थापनम् , एवं वेदना- स्थापनादयः (यो.)। रुधिरसस्थापनं पुरुषस्य रुधिरवृद्धिस्थैर्यकरम् (इ.) । शोणितास्थापनं शोणितातिप्रवृत्तिस्तम्भनम् । (सु. चि. ११४८ ड.) । मधु- मधुक-रुधिर-मोचरस-मृस्कपाल-लोध्र-गैरिक-प्रियङ्गु-शर्करा-लाजा इति दशेमानि शोणितस्थापनानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)। रुधिरं कुखमम् (च. द.); रुधिरं प्राणिरुधिरम् (ई. अ. सू भ. १५)॥ जो द्रव्य दोपदूषित रक्तके दोष( विकृति )को दूर करके उसको खाभाविक स्थितिमें लाए, उसे शोणितस्थापन कहते हैं (च. द.)। जो द्रव्य अत्यन्त बहते हुए रकको रोके, उसे शोणितस्थापन या शोणितास्थापन कहते हैं (ड. यो.)। रुधिरकी वृद्धि और स्थिरता करनेवाले द्रव्यको शोणितस्थापन कहते हैं (इन्दु)। जैसे-मुलेठी, केसर आदि। सुश्रुतने अञ्जनादिगणको रक्तपित्तहर लिखा है । चरकने गंभारीके फल और अजाक्षीरको रकमाग्राहिक और कमलके केशरको रक्तपित्तप्रशमन लिखा है। (च. सू अ. २५)। यहाँ 'शोणितस्थापन' शब्दसे टीकाकारोंने तीन वर्ग लिये हैं,-(१) दुष्ट रक्तको शुद्ध करनेवाले (रक्तसंशोधक-रक्तप्रसादन ), (२) रकस्तम्भन (३) और रक्तवर्धक । रक्तप्रसादन द्रव्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुसफ्फी खून, रक्तस्तम्भनको १शोणितास्थापन (Hematinics---हिमॅटिनिक्स् , Hoematics हिमॅटिक्स, Blood tonics-लड् टॉनिक्स् ) रक्तको पूर्व स्थितिपर लानेवाले द्रव्य । ये द्रव्य रक्तकी लाली वढ़ाते हैं, रक्तको बढाते हैं और इनके द्वारा रक्तकण अच्छे होते है । जैसे-लोह, प्रवाल, जवाखार, सावरसींगकी भस्म, कैल्शियम्(सुधा-चूना)के बने द्रव्य, कोयलेका पत्थर (Manganese-मॅनॉनीझ् ), फॉस्फॉरस्, फॉस्फॉरस्के चूनेके मेलसे पने क्षार, मच्छीका तेल रक्तस्कन्दन (सु. सू अ. १४. श्लो ३३ ) (Styptics---- स्टिप्टिक्स् )--ये द्रव्य चुपटे जानेपर अपने कपाय गुणके कारण तथा प्रत्यक्ष संयोगसे रक्तका स्राव बन्द करते हैं । ये रक्तको जमाते है किवा केशिकाओंको सकुचित करते है। जैसे-फिटकरी, माजूफल, कासीस । ये केशिकाओंको संकुचित करके स्नावको बन्द करते हैं (स्कन्दन)। कपाय द्रव्य रक्तको जमा करके स्राव वन्द करते है (संधान). रकसंग्राहिक (Hemostatics-~-हिमॉस्टॅटिवस्) ये द्रव्य पेटमें पहुंचकर रक्तद्वारा बहते हुए, रफनावको रोकते हैं । जैसे-कैल्शियम् छोराइड्, अर्गट, माजूफल, गधा- विरोजा, सीसा, रानघेवडा(जगली सेम)के मूल (डॉ. वा. दे.) । .
- - द्रव्यगुणविज्ञानम् । 'हाविस दम तथा 'कातिउन्नज़ीफ़' और रक्तवर्धक औषधको 'मुवल्लिद खून' कहते हैं। वेदनास्थापनम्- वेदनायां संभूतायां तां निहत्य शरीरं प्रकृतौ स्थापयतीति वेदनास्थापनम् (च. द.)। वेदनायाश्चिच्छक्केः संतपकं वेदनास्थापनम् (इ.) । शाले-कट्फल-कदम्ब- पनक-तुङ्ग-मोचरस-शिरीप-वक्षुलैलवालुकाशोका इति दशेमानि वेदनास्थापनानि भवन्ति (च. सू. म. ४)॥ जो द्रव्य वेदना( पीडा )को नष्ट करे, उसे वेदना स्थापन कहते हैं । जैसे- शाल (सखुआ), कायफल आदि । संज्ञास्थापनम्-संज्ञादम्- संज्ञा ज्ञानं स्थापयतीति संज्ञास्थापनम् (च. द., यो)। हिगु-कैडरिमेद- वचा-चोरक-वयस्था-गोलोमी-जटिला-पलकषाशोकरोहिण्य इति दशेमानि संज्ञा- स्थापनानि भवन्ति (च. सू. अ.४)॥ जो द्रव्य संज्ञा अर्थात् ज्ञान( होश )को पुन. लानेवाला हो, उसे संज्ञास्थापन कहते हैं । जैसे-हींग, बकायन आदि । प्रजास्थापनम्-गर्भस्थापनम्- प्रजोपघातक दोपं हत्वा प्रजा स्थापयतीति प्रजास्थापनम् (च. द.) । प्रजा गर्भ स्थापयति दोपं निरस्येति प्रजास्थापनम् (यो.) । ऐन्द्री-बाही-शतवीर्या- सहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथा-शिवाऽरिष्टा वाट्यपुष्पी-विष्वक्सेनकान्ता इति दशेमानि प्रजास्थापनानि भवन्ति (च. सू. अ. ४)॥ जो द्रव्य प्रजा(गर्म )की उत्पत्ति या स्थिति के बाधक दोषको नष्ट कर प्रजाकी . स्थापना करे (गर्भधारण कराये ), उसे प्रजास्थापन कहते हैं । जैसे-ब्राह्मी, दूव आदि। - १'शैल" इति अ. स. पा० । २ वेदनास्थापन (Anodynes-अनोडाइन्स् ; Analgesics-अनाल्जेसिक्स्)-ये द्रव्य वेदना कम करते हैं । इनकी क्रिया मस्तिष्क किंवा शाननाडियोंपर होती है । जैसे–अफीम, गॉजा, बेलाडोना, बछनाग (डॉ. वा. दे.)। वेदनास्थापन औषधको यूनानी वैद्यकमें 'मुसक्किन अलम', और 'मुसकिन वजा' कहते है। ३ प्रजास्थापन-ये द्रव्य प्रजा( सन्तान)का प्रतिवन्ध करनेवाले रोगको दूर कर प्रजोत्पत्तिमें सहायता देते हैं । जैसे-फिरङ्गोपदशमें सोना, पूयमेहमें चादी इत्यादि (डॉ. वा. दे.)। १ पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ४९ मयःस्थापनम्-वयस्यम्- चयः वरुणं स्थापयतीति वयःस्थापनम् (च. द., यो.)। "वयसे हितं वयस्य, जरामभिहत्य यौवन रक्षति" (र. वै. पृ. १८३)। अमृताऽभया-धात्री-मुका. वेता-जीवन्त्यतिरसा मण्डूकपर्णी-स्थिरा-पुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति (च. सू. भ. ४)। "मामलकं वयःस्थापनानाम्" (च. सू. भ. २५)॥ जो द्रव्य वय-तरुणावस्था(जवानी)को स्थिर रखे, उसे वयःस्थापन कहते हैं। जैसे-गिलोय, हरड़ आदि । यह वर्ग रसायनवर्गका ही एक मेद है । जो द्रव्य जरावस्थाको रोक कर यौवनकी रक्षा करे, उसे वयस्य कहते हैं। (र. वै.भ ४।२७)। चरकके पैञ्चाशन्महाकपायके नामसे कहे हुए पचास वर्गोंका वर्णन किया गया । चरकके सू. भ. २२ में कहे हुए लड़नादि छः वर्गोमसे वृंहणका वर्णन पीछे पृ. २४,२५ पर किया गया है; शेष लग्न, रूक्षण, स्नेहन, खेदन और स्तम्भन इन पाँच वर्गोंकी व्याख्या की जाती है। लड्नम्- "यस्किचिल्लाघवकर देहे तल्लङ्घनं स्मृतम् ॥ लघूपण-तीक्ष्ण-विशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम् । कठिनं चैव यद्व्यं प्रायस्तल्लद्धनं स्मृतम्" (च. सू. अ. २२)। यत्किंधि- द्रव्य-गुण-कर्मरूपं देहे लघुरवमुत्पादयति तलधनं स्मृतम् । प्रायोग्रहणादेवंगुणमपि कचिल्लद्धनं न भवति, उष्णगुणस्य पिप्पल्यादेवृप्यतया संतर्पणकार्यदर्शनात् । एवं वृंहणेऽप्युभेयम् । यथा-शीतस्यापि प्रियद्गुश्यामाकादेः कर्शनस्वम् (च. द.)। "लधनं लाघवाय यत् । देहस्य" (अ. सं. सू. अ. २४) । देहस्य यल्लाघवाय कल्पते तल्लधनम् । भामेय-वायव्य-नाभसं लखनमिति (इ.)। लघ्वादिनवगुणयुक्तममिवायुनभोगुणाधिकं च द्रव्यं लदनं भवति । चरकेण द्रव्या- द्रव्यरूपं दशविधं लानमुकं, यथा-"चतुष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा मारतातपौ । पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्कनम्" (च. सू भ. २२) इति । चतुष्प्रकारा संशुद्धिरिति अनुवासनं वर्जयिस्वा, तस्य बृंहणत्वात् । पिपासेति पिपासानिग्रहः । मारतो यद्यपि सोमसंबन्धात् तथा लड्नं न भवति, तथापि स्वरूपेण लखनमेव । पचन्तमनिं प्रतिपक्षक्षपणेन बलदानेन च यत् पाचयति तत् पाचनम् ; तप वायवग्निगुणभूयिष्ठम् (च. द.)। अत्र वमन विरेचनास्थापन-शिरोविरेचन-पाचनानि पञ्च द्रव्यरूपाणि, शेपाणि पिपासादीनि पञ्चाव्यरूपाणि लचनानि ज्ञेयानि । वाग्भटेन शोधन-शमनरूपं द्विविधं लछनमुक्तं यथा-"शोधनं शमनं घेति १ वयःस्थापन (Youth preserver-यूथ प्रिझर्वर् , Youth restorer- यूथ रिस्टोरर)-बुढापेको प्रकट न होने देनेवाले द्रव्य (डॉ. वा. दे.)। सग्रहमें पञ्चचत्वारिंशन्महाकपायोफा वर्णन सूत्रस्थानके १५ वें अध्यायमें दिया है द.पू.४ . २ अष्टाङ्ग- १ ।
. ५० द्रव्यगुणविज्ञानम् । द्विधा तत्रापि लखनम् । यदीरयेदहिदोपान् पञ्चधा शोधनं च ततमा निरूहो वमनं काय-शिरोरेकोऽसविस्रुतिः। न शोधयति यहोपान् समान्नोदीरयत्यपि ॥ समीकरोति विषमान शमनं, तथ्य सप्तधा । पाचनं दीपनं क्षुत्तुयायामातपमारुवाः ॥" इति (म. सं, सू. म. २४; अ. ह. सू. भ. १४)॥ जो द्रव्य (गुण और कर्म भी) शरीरमें हलकापन लाता है, उसे लदन कहते हैं । जो द्रव्य लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर, सर और कठिन इन नौ गुणोंसे युक्त होता है, वह प्रायः लहान होता है। 'प्राय' कहने का तात्पर्य यह है कि, ऐसे गुणोंवाला होने पर भी कोई द्रव्य लखन नहीं होता, जैसे-छोटी पीपल वृष्य होनेसे उसका मंतर्पण कार्य देखा जाता है। इसी प्रकार वृंहण आदिमें भी 'प्रायः'शब्दका तात्पर्य जानना चाहिए । जैसे-कॉग और सामा शीत होनेपर भी शरीरका कर्शन करनेवाले हैं । लद्धन द्रव्य अग्नि, वायु और आकाशकी अधिकतावाले होते हैं । लहन द्रव्योंका कोई विशेष गण-वर्ग नहीं बताया गया है, परन्तु उसे चरकने छ• प्रकार के उपभो तथा वाग्भटने दो प्रकारके उपक्रमोंमें अन्यतम उपफम बताया है । चरकने चार प्रकारका शोधन (वमन-विरेचन-आस्थापन-शिरोविरेचन ), तृपाको रोकना, वायु तथा धूपका सेवन, पाचन और उपवास ये दम प्रकारके लहन लिसे हैं । इनमें चार प्रकारके शोधन (वमन-विरेचन-आस्थापन-शिरोविरेचन ) और पाचन ये द्रव्यरूप है और शेष अद्रव्यरूप हैं। वाग्भटने शोधन और शमन दो प्रकारका लहान लिखा है। उन्होंने शोधनमें रक्तमोक्षण और द्रव्यरूप लङ्घनमे दीपन अधिक बताया है। रूक्षणम- "रौक्ष्यं खरस्वं वैशधं यत् कुर्यात् तद्धि रूक्षणम् ॥ रूक्षं लघु खरे तीक्ष्णमुणं स्थिरमपिच्छिलम् । प्रायशः कठिनं चैव यगव्यं तद्धि रूक्षणम् ॥" (च. सू. भ. २२)। रोक्ष्यमित्यादौ रौक्ष्यमेव प्रधान वोद्धव्यं, सरत्व-वैशये तु तदनुगते । रूक्षणद्रव्यकथने यद्गुणमेव लड्नद्रव्यमुक्तं . तद्गुणमेव रूक्षणं यद्यप्युक्तं, तथाऽपि रूक्षगुणस्थान प्राधान्यं, लडने तु लघुगुणप्राधान्य शेयं, तथा लखनम- द्रव्येणोपवासेनापि क्रियते, रूक्षणं तु द्रव्यकार्यतयैव प्राधान्यादुक्तं; तेन लान- रूक्षणयो कता । यत्तु वक्ष्यति-"कृतातिकृतलिङ्गं यल्लद्धिते तद्विरूक्षिते" (च. सू. भ. २२॥३९) इति, तत् प्रायोवादात् । निरूक्षणस्य हि मुख्यः स्नेहाभावः साध्यः, लङ्घनस्य तु गौरवाभाव इति स्फुट एव भेदः प्रतिभाति (च. द.)। प्रायश इति कचिदेवड्गुणमपि द्रव्यं रूक्षणं न भवति । यथा-लध्वपि सापं तैलं छागं दुग्धं च स्नेहनम् । एवं वक्ष्यमाणस्नेहनेऽपि ज्ञेयम् । यधा-यवो गुरुशीत- सारादिगुणयुक्तोऽपि रूक्षण., तथा राजमापोऽपि (यो.)॥ १ वाग्भटने संतर्पण (बृहण) और अपतर्पण (लवण) ये दो उपक्रम लिखे हैं पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। - जो द्रव्य शरीरमें रूक्षता, खरता तथा विशदता (अपिच्छिलता) लाता है, उसे रुक्षण कहते हैं । जो द्रव्य रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण, उष्ण और स्थिर इन छ: गुणोंवाला तथा सपिच्छिल हो, वह प्रायः रूक्षण होता है । 'प्राय.' कहनेका प्रयोजन यह है कि कोई द्रव्य इन गुणोंवाला होता हुआ भी रुक्षण नहीं होता। जैसे-सरसोंका तेल तथा बकरीका दूध लघु होते हुए भी स्नेहन है । स्नेहन द्रव्यके विवरणमें भाये हुए 'प्रायः' शब्दका भी यही प्रयोजन जानना चाहिए । जैसे-यव तथा लोबिया गुरु, शीत, सर आदि गुणयुक्त होता हुआ भी रूक्षण होता है । यहाँ यह जानना चाहिए कि लान द्रव्यके जो गुण कहे हैं वही रूक्षण द्रव्यके भी, परन्तु दोनोंमें अन्तर यह है कि-लखनद्रव्यमें लघु गुणकी प्रधानता होती है और रूक्षणद्रव्यमे रूक्ष गुणकी प्रधानता होती है । अपरं च, लछन अद्रव्यभूत उपवास आदिसे भी होता है, परन्तु रूक्षण केवल द्रव्यका ही कार्य है। मेहनम्- "हनं स्नेह-विप्यन्द-मार्दव-क्लेदकारकम् ॥ दवं सूक्ष्मं सरं निग्ध पिच्छिलं गुरु शीतलम् । प्रायो मन्दं मृदु च यद्रव्यं तत् मेहनं स्मृतम् ॥" (च. सू. भ. २२)। विष्यन्दो विलयनम् (द्रवीभाव इत्यथैः--यो.) (च. द.)। सेहविष्यन्दः शरीरस्य नेहविलयनं, शरीरात् स्नेहक्षरणमिव । मेहविप्यन्दादिभिरनुमीयते देहे स्निग्धत्वमिति (ग.)॥ जो द्रव्य शरीरमें निग्धता, द्रवपना अथवा स्नेहका क्षरण (शरीरसे नेह चूना, टपकनासा), मृदुता तथा क्लेद उत्पन्न करे, उसे स्नेहन कहते हैं । जो द्रव्य द्रव, सूक्ष्म, सर, निग्ध, पिच्छिल, गुरु, शीतल, मन्द तथा मृदु इन नौ गुणोंवाला हो, वह प्रायः स्नेहन होता है। जैसे-घृत, तेल आदि। स्वेदनम्-स्वेदजनकम्- "सम्भ-गौरव-शीतनं स्वेदनं स्वेदकारकम् ॥ उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्म द्रवं स्थिरम् । द्रव्यं गुरु च यत् प्रायस्तद्धि स्वेदनमुच्यते ॥" (च. सू. अ. २२)। खेदकारकं धर्मकारकम् । खेदनगुणकथने स्निग्धं रूक्षमिति स्निग्धं वा रूक्ष वेत्यर्थः । एवं सर-स्थिरावपि विकल्पेन शेयो (च. द.)। स्तम्भो गात्राणां निश्चलीभावः (यो.)। "स्वेदनावरणायुधाः" (च. सू. अ. २७) । १ रुक्षण द्रव्यको यूनानीवैद्यक, 'मुजफिफ' कहते हैं । २ नेहन (Demulcents-डिमल्सन्ट्स्)-न औषधोंका स्पर्श जिस जिस भागसे होता है, उस उस भागका ये द्रव्य रक्षण करते है। ये सिग्ध या तैलयुक्त होते हैं । जैसे-अलसी, बादाम, निशास्ता, मुलेठी (डॉ. वा दे.)। लेहन द्रव्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुरत्तिय' कहते है - ५२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । जो द्रव्य साम्भ (भोंकी निभेटता-जफरनामा), गानमा जो गर गरे और पसीना लावे उसे खेदन कहते हैं । जो द्रव्य रण, सण, नि गा मा, सूक्ष्म, द्रव, सर वा स्थिर तथा गुरु हो, गा पाप सेदन होगा। स्तम्भनग्-स्तम्भि- "स्तम्भनं माम्मयति यननिमन्तं पर गुरम् ॥ मीनं मादं गा मा र सूक्ष्मं वयं स्थिरम् । यद्रव्यं लगु पोरिएं प्रायना नाम्मनं रंगराम् ॥" (प. प. भ. २२) । गतिमन्त्रमिति प्रयागतियुधे, पर पिचिमनाम् (ग.)! गतिमन्तं वहिनिःसरन्तम् । एतहम्यतीगार शोणितणायादी योदण्यम् । यधा m. मन्तश्चलनशीलं, यथा--रधिरपिते; एता पित-क्षारामिटार-विपादिः (यो.)। "रौक्ष्या त्यात कपायवालघुपाकाय यद्धयेत् । यारप, माम्भनं राह मायगा वत्सक टुण्टुको ॥" (शा. प्र. रा. प. ४) । यद्रव्यं संदगार रसगुणार, शैत्यादिति शीतवीर्यस्वात् , फपायादिति रुपायरसत्वार , लघुपारामा मापरिपाकाद पातकृद्भवति तत् सम्मनं स्यात् ; पारागुणयाध हेतचतुष्टयम् । निरस शोपगा. स्मकन्वेनानिलगुणभूयिष्ठं द्रव्यं नम्भनं भवतीत्यभिप्रापः । यथा-वायर टुग्री परसक कुटजः, टुण्टुकः स्योनाकः । पावदित्यनेन को पायोपिष्टान, मार तव्यं स्तम्भनं भवतीत्यर्थः (आ.)॥ जो द्रव्य गतिमान् (स्पष्टगतियुध-ग.; यमन, अविगार जादिके रूप शरीरसे यादर निकलते हुए-यो.) या चल (किंचित् गतिगान्-ग. शरीरके अन्दर गतिमान-गोर और पित्त-यो.) द्रव पदार्थको रोके, उसे स्तम्भन काते है । जो द्रव्य शीत, मन्द, मृदु, पक्ष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, ट्य, गिर तथा लापन नी गुणोपाला दो, पद प्रारः स्तम्भन होता है (च.)। जो द्रव्य रुक्ष, शीत, पपार रसपारा गौर पातफर हो, वह स्तम्भन होता है । जैसे-युदा और सोनापाठा (शा.) । सुश्रुतने लोधादिगणको स्तम्भी कहा है । वमन, भविगार, रप.पित्त, जतिस्पेर मादिरे सपने शरीरसे निकलनेवाले द्रव पदार्थको रोकनेवाला द्रव्य स्तम्भन पहाता । सगमनम्-शमनम्- "आकाशगुणभूयिष्ट मंशमनम्" (सु. स. अ. ४१.)। "पायु-सोम-महोजातं १ स्वेदन (Diaphoretics-टाएफॉरेटिपस: Sudoiifics-गुडॉरिमित )- इन द्रव्योंसे पसीना छूटता है। इनकी क्रिया अनेक प्रकारसे होती है। (१) पुग्गामान्य खेदकेन्द्रको उत्तेजित करके । (२) त्वचाकी रत्तवाहिनियोंको विकसित करफे, जैसे-गरमा, इपिकाक्युाना आदि द्रव्य । (३) स्वेदग्रन्थियों में स्सिा नाठियोंके सिरोंको उत्प्रेजित करके (डॉ. वा. दे.)। खेदन द्रव्यको यूनानी वैयकमें 'मुभरिक' कहते हैं । २ यूनानी वैद्यकमें स्तम्मन द्रव्यको 'हायिस' कहते है।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ५३ . तथा संशमनं विदुः" (र. वै. पृ. १८७)। "न शोधयति यहोपान् समानोदी- रयत्यपि । समीकरोति विषमान शमनं तच सप्तधा ॥ पाचनं दीपनं क्षुत्तृव्याया- मातपमारुताः । बृंहणं शमनं त्वेव वायोः पित्तानिलस्य च।" (भ. ह. सू. म. १४)। संप्रति शमनाख्यस्य लक्षणं प्रमेदं चाधिकृत्याह-नेत्यादि । यदीप, दोषान् वातादीन् न शोधयति वान्तःस्थितान् बहिर्निप्कासयति, तथा समान् स्वप्रमाणस्थानोदीरयति न चोक्लेशयति, विषमांश्च स्वप्रमाणाधीनाधिकभावाच- स्थितान् समीकरोति स्वप्रमाणस्थान् विदधाति, तच्छमनमुच्यते । तच सप्तधा सप्तप्रकार पाचनादिभेदेन । तत्रान्तरे दीपनपाचनयोर्लक्षणमुक्तं यथा-"यदनिकृत् पचेकामं दीपनं तयथा धृतम् । पाचनं तद्विपर्यस्तं यथा वक्ष्यामि लग्नम्" इति; क्षारपाणिनाऽप्युक्तं-"पाचनं पाचयेदोषान्, सामाम् शमनमेव तु । दीपनं झनिकृत्वामं कदाचित् पाचयेन वा" इति । क्षुत्तृट्शब्दाभ्यां क्षुत्तृष्णानिमहाविह गृहीती । पाचनादीनां दोपशमनत्वमुक्तम् । तच वाते वातपित्ते च न संभवती- स्याह-हणमित्यादि । तुशब्दो विशेपे । विशेषस्तु लखनापेक्षया । शोधनं शमनं चेति द्विधा लगनमुक्तम् । बृंहणमपि शोधनं भवति । यथा-दुग्धादिद्रव्यं, शोधनस्वभावद्गव्यत्वात् । तेन तथाविधेन द्रव्येण केवलस्य वातस्य पित्तयुक्तस्य वा कोप भाशयते । यथा-लखनेन शोधनद्रव्येण हरीतक्यादिना । ततो बृहणस्य विशेपार्थस्तुशब्दः कृतः। बृंहणं यच्छोधनं तन्मरुतः केवलस्य पित्तसहितस्य वा शमनं, न तु लहनशोधनवत् कोपनम् । एवकारोऽवधारणार्थः । वृहणं शोधनरूपं वातस्य पित्तयुक्तस्य वा शमनमेवोकं, न कोपनं जातुचिदित्यर्थः । लखनं तूभयरूप- मपि वातस्य वातपित्तयोर्वा कोपनमेव (अ. द.)।xxx। शोधन-शमनव्यति- रिक्तस्यौपधस्याभावात् , तयोश्च लखनभेदत्वाद् बृंहणस्थानौपधत्व प्राप्ते बृहणं शमन- मेवेत्याह-वृंहणं शमनं विति । शुद्धस्य पित्तसंसृष्टस्य च वायोर्विपमस्य समीकर- णाच्छमनम् (हे.)। "न शोधयति न दृष्टि समान् दोषांस्तथोद्धतान् । समीकरोति विषमाम्छमनं तयथाऽमृता ॥" (शा. प्र. ख. भ. ४)। यत्किचित् पीत-लीढाशि- तमनिहत्य दोपं संशमयति तत् संशमनम् । एतेन किमुक्त ? यद्रव्यं न वामयति न विरेचयति किंतु व्याधिना सह एकीभूय तत्स्थमेव व्याधिमुपशमयति तत् संशमन- मिति भावः । दोपशब्दोऽत्र दोपेषु दोपकार्यव्याधिग्वपि वर्तते, कार्य कारणोप- चारात् । असमं समं करोतीति समीकरोति । यथा-अमृता गुडूची संशमनी प्रसिद्धा । x x ४ । केचित्तु-"न शोधयति यहोपान् समानोदीरयत्यपि । समीकरोति च क्रुद्धांस्तत् संशमनमुच्यते” इति पठन्ति । अत्रापि स एवाभिप्रायः । सम्यक् शमयतीति संशमनं, सम्यग्दुष्टदोपस्यानिर्हरणपूर्वकं शमनमदुष्टस्यानुदीरणं च; व्याधिशमने तु प्रस्तुतव्याधिशमनमप्रस्तुतव्याधेरनुदीरणमिति (आ.)। जो द्रव्य सम अवस्थामें स्थित दोषोंका वमन-विरेचनादिके द्वारा शोधन नहीं करता, - ५४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । एवं उन्हें वदाता भी नहीं-उनका प्रकोपण भी नहीं करता, किन्तु यते हुए दोपोंको शरीरके भीतर ही शान्त करता है-पुनः साम्यावस्था, लाता है, उसे संशमन या शमन कहते हैं । जैसे-गिलोय । 'दोप' शब्दसे दुष्ट वातादि और उनके कार्यभूत व्याधि दोनों लिये जाते है। दोपशन्दसे वातादिदोषपक्षमें अर्थ ऊपर दिया है। व्याधिपक्षमें-उत्पन्न व्याधिका शमन करनेवाला और अनुत्पन्न व्याधिको उत्पन्न न करनेवाला, ऐसा अर्थ लेना चाहिए (शा.)। संशमन द्रव्य आकाशके गुणोंकी अधिकतावाला होता है (सु.) । संशमन द्रव्य वायु, जल और पृथिवीफे गुणोंगी अधिकतावाला होता है (र. वै. भा.)। संशमन द्रव्यके वातसंशमन, पित्तसंशमन और कफसंशमन ये तीन भेद करके उनके उदाहरणार्थ तीन वर्ग सु. सू. भ. ३८, अ. स. सू. अ. १४, तथा अ. ह. सू. अ. १५ में दिये गये हैं। वे जिज्ञासुओको वहीं देखने चाहिए। यहाँ विस्तार भयसे नहीं दिये गये हैं। आयुर्वेदमे सब प्रकारके औषधद्रव्योंका शोधन और शमन इन दो वगामें अन्तर्भाव माना गया है (शोधन शमनव्यतिरिफस्योपस्याभावात् है. 1) जो द्रव्य प्रकुपित दोषोंको वमन, विरेचन आदि द्वारा शरीरसे बाहर निकाले उनको शोधन और जो औषध दोषोंको चाहर न निकाले परन्तु उनको शरीरके भीतर ही शान्त करके पुन. समावस्थामे लावे उसे शमन कहते है । शमनके विषयमें थोदा कहने का होनेसे शमनकी व्याख्या पहले देकर अव शोधनके मेद और उनकी व्याख्या दी जाती है- वमनम्-ऊर्ध्वभागहरं-छर्दनीयम्- "दोपहरणमूर्षभागं वमनसंज्ञकम्" (च. क. भ. 1)।अभ्वं मुसेन दोपनि ई- रणं भजत इत्यूर्यभागम् (च.द.) । "तेरोष्ण तीक्ष्ण-सूक्ष्म-व्यवायि-विकाशी- न्यौपधानि स्ववीर्येण हृदयमुपेत्य धमनीरनुसृत्य स्थूलाणुस्रोतोम्यः केवलं शरीरगवं दोषसंघातमाग्नेयस्वाद् विष्यन्दैयन्ति, तैपण्याद् विच्छिन्दन्ति, स विच्छिनः १ सशमन द्रव्यको यूनानी वैधकमें 'मुअदिल' कहते हैं । २ तम्रोणतीक्ष्ण सूक्ष्म-व्यवायि. मिकाशीन्यौषधानि स्ववीयेण हृदयमुपेत्य सौम्याद् व्यवायित्वाच धमनीरनुसत्य लेहेन मृद्कृतेऽन्त शरीरे वेदोष्मणाऽऽदारुवदिष्यण्णे स्थूलाणुस्रोतोभ्यः सकलमपि दोपसतात- मौण्यात् पुनर्विष्यन्दयन्ति, तैयाद्विकाशित्वाच विच्छिन्दयन्ति, स विष्यण्णविच्छिनो दोषसङ्घातः परिप्लवः लेहातभाजनस्य इवोदकालिरसज्जनणुप्रवणभावादामाशयमनुगम्य उदानप्रणुन्नोऽग्नि-वाय्वात्मकत्वादूर्वमागप्रभावाचौषधस्योर्ध्व प्रवर्वते, सलिल-पृयिव्यात्मकत्वादयो- भागप्रमावाच्चौषधस्याध., उभयतश्चोभयगुणात्मकत्वादुमयभागप्रभावाच' (अ. सं. स. म. २६)। ३ 'निभ्यन्दयन्ति महानिम्ने सावयन्ति' (इन्दुः)।
पूर्वार्धे द्रव्य विज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । परिप्लवन् नेहभाविते काये स्नेहाकभाजनस्थमिव क्षौद्रमसजन्मणु-प्रवणभावादामा- शयमागम्योदानप्रणुनोऽग्नि-वाग्वारमकरवादूर्श्वभागमभावाचौषधस्योर्ध्वमुक्षिप्यते" (सलिल पृथिध्यात्मकस्वादधोभागप्रभावाचौषधस्याधः प्रवर्तते, उभयतशोभयगुण- स्वात् )। इति लक्षणोद्देशः" (च. क. अ. १)। संप्रति द्वयोरपि वमन-विरेचन- द्रव्ययोः साधारणोणतीक्ष्णस्वादिगुणयोगकृतदोपविष्यन्दनादिसाधारणकार्यदर्शन- पूर्वकममिवावात्मकरवादिविशिष्टधर्मयोगकृतं विशिष्टं च कार्य वमन-विरेचनं दर्शयन्नाह-तत्रोष्णेत्यादि । उष्णमिति उष्णवीर्यम् । स्ववीर्येणेति स्वप्रभावेण । धमनीरनुसत्येति सकलदेहगता धमनीरनुसृत्य, सकलदेहगतधमन्यनुसरणं च धीर्येण ज्ञेयं, न साक्षात् । आमेयरवाद्विष्यन्दयन्तीति विलीन कुर्वन्ति । विच्छि- न्दन्ति छिनं कुर्वन्ति । परिप्लवन् इतस्ततो गच्छन् । असन्जनिति न क्वचिदपि सङ्गं गच्छन् । अणु-प्रवणभावादिति अणुत्वात् , प्रवणभावाच, प्रवणस्वमिह कोष्ठगमनो- न्मुखत्वम्, अणुस्वं च अणुमार्गसंचारित्वम् । उदानप्रणुस इति उदानवायुप्रेरितः । भग्नि-वाय्वात्मकत्वादिति अग्नि-वायूत्कर्पवत्वात् । ऊर्श्वभागप्रभावादिति ऊर्ध्वभाग- दोपहरस्वरूपप्रभावात् । (एवं सलिल-पृथिव्यात्मकत्वमपि व्याख्येयम् । उभयतश्चेति ऊयमधश्व क्षिप्यत इत्यर्थः । उभयगुणत्वादिति अभिवायवात्मकत्वात् सलिलपृथि- व्यात्मकस्वादूर्वाधोभागप्रभावानेत्यर्थः) । इति लक्षणो देश इति अनन्तरग्रन्थेन वमन-विरेचनद्रव्यस्वरूपाभिधान कृतमित्यर्थः । अत्र च प्रकरणे सामान्येनैव वमन- विरेचनद्रव्याणाम् 'भाग्नेयत्वाद्विष्यन्दयन्ति' इत्यनेनाग्नेयत्वं प्रतिपादितं, पुनश्च विशेषेण 'अग्निवाय्वात्मकत्वात्' इति पदेन वमनद्रव्यस्याम्यात्मकत्वं प्रतिपाद्यते; तेन, सामान्ये विशेपे च वमनद्रव्याणामाग्नेयत्वप्रतिपादनात् प्रकृष्टमाग्नेयत्वं भवति विरेचनद्रव्याणां तु सामान्योक्ताग्नेयरवसंबन्धाद् विशेषगुणकथनप्रस्तावे च सलिल- पृथिव्यात्मकत्वाभिधानाद्वमनद्रव्यापेक्षयाऽपकृष्टमानेयस्वं भवति । x x x । ययात्रोच्यते-वमनं ययूर्वभागहरत्वप्रभावादूर्धयति, तदाऽग्निवाय्वात्मकत्वादिति हेतुवर्णनं न युज्यते; यतः, यत् सोपपत्तिकं कार्य न भवति तत् प्रभावकृतमिति व्यपदिश्यते; उक्तं हि-"प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते" (सू. भ २६) इति । तम, यतः प्रभावस्यैवेह वमनकायें वाय्वश्यात्मकगुणतया वारवन्यात्मकत्वं हेतुरुपदि- श्यते, न तु वास्वन्यात्मकत्वं स्वतन्त्रो वमनहेतु:; तथा हि सति यदन्यदपि वायव. ध्यारमकमूर्यभागदोपहरत्वप्रभावरहितं, तदपि वमनकरं स्यात् ; यथा-कटुकरसे द्रव्ये तत् स्यात् । तस्मात् प्रभावगुणतयैव हेतुवर्णनम् । एवं विरेचनद्रव्येऽपि पूर्वपक्ष-सिद्धान्तावनुसतव्यौ (च. द.)। xxx । स दोषसंघातः विच्छिन्न: सन् परिप्लवः सर्वतः प्लावितः संश्च मेहभाविते काये नेहाकभाजनस्थं क्षौद्रं यथा १ 'परिशन:' इति ग.. .
द्रव्यगुणविज्ञानम् । न ताजने सजते तथा असजन् , प्रवणभावात् प्लावनस्वादामाशयमुपेत्य उदान- प्रणुमः समाप्ति-वारवारमकस्वादूर्ध्वभागप्रेरणप्रभावादौपधत्योर्ध्वमुरिक्षप्यते । प्रवणेति ', गतौ' धातू संवरणादिगतिविशेपार्थत्वात् प्रवणं प्लवनमित्येकोऽर्थः । xxx । ऊज्वलनरवादग्नेः प्लवनस्वाद् वायोरग्नि-वारवात्मकद्रव्येण वमनं, निम्नगत्वस्वभावात् सलिलस्य, गुरुत्वात् पृथिव्याः सलिलपृविच्यात्मकेन द्रव्येण विरेचनं भवति । उभयतश्चोभयगुणस्वादिति यद् द्रव्यमग्नि-वायु-सलिल-पृथिव्यात्मकं तदूर्वाधोगमनप्रभावादुभयतोभागहरं, तेन दोषसंघात उभयतश्च प्रवर्तते (ग.)। "सरस्व-सौम्य-तैक्ष्ण्योष्ण्य-विकाशित्वैर्विरेचनम् । वमनं तु हरेहोपं प्रकृत्या गतमन्यथा ॥ यात्यधो दोपमादाय पच्यमानं विरेचनम् ॥ गुणोत्कर्षाद्रजस्यूर्ध्वमपर्क वमनं पुनः" (सु. चि. अ. ३३)। विरेचनद्रव्येण सह गुणसाम्ये सति कयं वमनद्रव्यस्योर्ध्वभागगामित्वमित्याह-सररवेत्यादि । सरस्य भावः सरत्वमानु- लोम्यं, गयी तु विसरणस्वभावत्वं सरत्वमाह; सूक्ष्मस्य भावः सौम्यं, सूक्ष्मस्रोतो- ऽनुसारित्वं; तीक्ष्णस्य भावस्तैदण्य, शीघ्रवरदोपत्रावणकरत्वम्। उपणस्य भाव औष्ण्यं, सौम्यद्रव्योपमर्दनकरणसामध्यं, विकाशिनो भावः विकाशित्वं, विकाशि- भावेन धातोः शैथिल्यकरणसामर्थ्यम् । भत्र प्रकृतिः, स्वभाषः, शक्तिविशेषः, प्रभावो, वीर्यम् , इत्यनान्तरम् । तेन प्रकृत्या वीर्येण, अन्यथागतम् ऊर्ध्वगतं; सत्यपि सरस्वादिविरेचनगुणसाम्ये वमनस्योर्ध्वगामित्वं प्रभावप्रभावितम्।xxx। तथा हि-"अर्चानुलोमिकं यच्च तत् प्रभावप्रभावितम्" (च. सू. भ. २६) इति । एतेनैतदुक्तं भवति-सरत्वादिभिर्गुणैर्विरेचनमधोदोपानपहरेत् ; वमनस्य तुल्य- गुणत्वेऽपि वीर्येणोर्ध्वगामित्वम् । पत्रिकाकारेण 'प्रकृत्या गतमन्यथा' इत्यत्र 'सम्यग्युक्त्याऽतथाऽन्यथा' इति पठित्वैवं व्याख्यातं-सम्यग्युक्त्या सरत्वादिगुणै- विरेचनमधोभागेन, वमनमूर्ध्वभागेन दोषानपहरेत् ; अतथाऽन्यथेति नमत्र वैपरीत्ये, अतथा असम्यग्युक्त्या विरेचनं वमनं चान्यथा वैपरीत्येन दोपान् हरेदिति । केचित्तु 'सम्यग्युक्त, वृथाऽन्यथा' इति पठन्ति । अयमों युक्तः किल; सरत्वादयो गुणाः सुयुक्ता आशुतरदोपहराः, तथैव चान्यायोपयुक्ता एव जीवशोणित-धातु- रसेन्द्रिय-मन-ओजःप्रभृतीनाकृष्य मारयन्तीति । कीदृशं सत् पुनर्विरेचनं वमनद्रव्यं च दोपानादाय अध जचं च यातीत्याह-यात्यधो दोपमित्यादि । विरेचनद्रव्याणि स्थिर-गुव्यो. पृथिव्यम्भसोर्गुणभूयिष्टानि, अत एव स्थिरत्वात् पच्यमानानि गुरुस्वा. दधो यान्ति; वमनद्रव्याणि तु वाय्वन्योः शीघ्र-लघुगुणयोर्गुणभूयिष्ठानि, अतः शीघ्रगस्वादपक्वान्येव लघुत्वादूर्ध्वमुत्तिष्ठन्ति । द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावात् गुण- प्रभावाञ्च कार्मुकाणि भवन्ति (ड.)। लघुत्वादूर्ध्वमुत्तिष्ठन्ते इत्यत्र प्रभावसहिता. दिति ज्ञेयम् । वायुश्च यद्यपि तिर्यग्गतिः, तथाऽप्यूलगेनाग्निना युक्तो योगवाहिस्वा- दूर्व गच्छतीति युक्तम् (च. द.)। "वमनद्रव्याण्यग्नि-वायुगुणभूमिष्ठाति - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ममिवायू हि लघु, समुवाच तान्यू_मुत्तिष्ठन्ति, तस्माद्वमनमूर्ध्वगुणभूयिष्ठम्" (सु. सू. भ.'४१) । लघुवं ह प्रभावविशेषाधिष्ठितं मदनफलादिसमवेतं मासं, न सघुरखमात्रम्, भम्पथा कपिञ्जल-लावादीनां वामनीयरवं स्यात् । बर्षमुत्तिहम्तीति भूमवज्वालावध । वमनद्रव्यमूर्षगुणभूयिष्टम् अभिवायुगुण- भूयिष्ठमित्यर्थः (इ.)। "अपकपित्तश्लेष्माणो बलादूचं नयेतु यत् । वमनं तदि विज्ञेयं मदनस्य फळं यथा ॥" (शा. प्र. स. अ. ४)। यद्रव्यमपदं पाकमगच्छन्तं पिसश्लेष्माणं व्यस्तं मिश्रितं वा बलात् हठारकारेणोध्वं नयेत् मुखेन कृत्वा वामये. दिस्यभिमायः, तद्वमनं शेय; यथा-मदनस्य फलम् । मलादिति प्रमावसूचकः शग्दः, यतो वमनद्रयाणि वास्वनिगुणभूयिष्ठानि, वायवनी हि लघू, लघुस्वाध ताम्यूर्वमुत्तिहन्ति; लघुस्वं चेह प्रभावविशेषाधिष्ठितं मदनफलादिद्व्यसमवेत प्रागं, न तु लघुस्वमात्रम् ; अन्यथा कपिाल-लाजा(वा)दीनामपि वामनीयत्वं स्यात् । ननु, कफस्य वमनं, पित्तस्य विरेचनं प्रशस्तमिति प्रसिद्धिः, तत् कथं पित्तस्य वमनमिति ? उच्यते-अपकपित्तस्य वमनादेव निवहणं वोदव्यम् । तच दृश्यते हि कटु-तिक-हरिस्पीताम्लवमनेन; यतः पित्तं विदग्धमम्लतामुपैतीति, अत एवाम्ल- पित्तचिकित्सायामादौ वमनमित्यदोपः (आ.) । यद्रव्यमपक्कं पित्तश्लेष्मामचय- मूवं नयेत् , हि निश्चयेन, तद्वमन विज्ञेयम् । अपर्क पिसं च, अपकः श्लेष्मा च, अपकममं च, तेषां चयमपकपित्तश्लेप्मानचयम् (का.)। "तत्र सर्वान् रसानाश्रित्य छर्दनीयम्" (र. वै. ४२) । तेषु वीर्येषु सर्वान् रसान् मधुरादीनाश्रित्य वर्तते छर्दनीयं वीर्यम् (भा.)। "वदाग्नेयवायव्यं च" (र. वै. ॥३)। "तेजो-चायुज- मूर्ध्वगम् ।" (र. वै. अ. ४ सू.३० पर भाष्य)। "वमनं श्लेप्महराणां (श्रेष्ठम्)" (च. सू. अ. २५)॥ जो द्रव्य ऊर्श्वभाग (मुख )से दोषों को बाहर निकाले उसे वमन, ऊर्श्वभागहर या छर्दनीय कहते हैं । वमन द्रव्य उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, व्यवायी और विकाशी गुणोंवाले होते है । वे अपने वीर्य(शक्ति-प्रभाव )से हृदयमें जा, वहाँसे अपने सूक्ष्म और व्यवायी गुणसे धमनियोंद्वारा समग्र शरीरमें पहुँच, स्थूल सूक्ष्म सब स्रोतोंसे दोषोंको अपने आमेय (उष्ण) गुणसे द्रवीभूत और तीक्ष्णतासे विच्छिन्न करते हैं (उखाहते हैं)। वह द्रवीभूत और विच्छिन्न (अपने स्थानसे हटा हुआ) दोष (अपक्क पित्त, कफ तथा अन्न) वमनसे पूर्व शरीरके स्नेहभावित किये जाने के कारण, जैसे नेह लगाये हुए पात्रमे शहद नहीं चिपकता इस प्रकार शरीरमें कहीं भी न चिपकता हुआ वमन द्रव्यके सूक्ष्मस्रोतोनुसरण और आमाशय- गमनोन्मुख प्रभावसे आमाशय-(आमाशयोर्श्वभाग )में आकर और उदान वायुसे १ 'अपकपित्तक्षेप्मानचयमूर्ध्व' इति का. संमत. पाठः ।
द्रव्यगुणविज्ञानम् । प्रेरित होकर वमन द्रव्यके जयभागसे दोप निकालनेके प्रभाव और अमि तथा वायुके गुणों की अधिकतासे मुखमार्गसे बाहर निकलता है (च. सु.)। जो द्रव्य अपक पित्त, कफ या दोनों और अन्नको मुखद्वारा बाहर निकाले, उसे वमन कहते हैं; जैसे मैनफल (शा.)। यद्यपि कफके लिये वमन और पित्तके विरेचनको प्रधान शोधन कहा गया है, तथापि अपक्क पित्तका वमनसे ही निर्हरण होता है। इसी लिये अम्लपित्तचिकित्सामे प्रारम्भमें वमनका उपदेश किया गया है। रेचनं-विरेचनम्-अधोमागहरम्-अनुलोमनीयम्- "दोपहरणमधोभागं विरेचनसंज्ञकम्" (च. क. अ. १) । अधो गुदेन दोप- निर्हरण भजत इत्यधोभागम् (च. द.) । तत्रोप्ण-तीक्ष्ण-सूक्ष्म-व्ययायि-विका- शीन्यौपधानि स्ववीर्येण हृदयमुपेत्य (सौक्ष्याद् व्यवायित्वाय वृ.वा.) धमनी- रनुसृत्य स्थूलाणुस्रोतोभ्यः केवलं शरीरगतं दोपसंघातमाग्नेयत्वाद्विष्यन्दयन्ति, तैक्ष्ण्याद्विच्छिन्दन्ति, स विच्छिन्नः परिप्लवन् नेहभाविते काये नेहाक्तभाजनस्थमिव क्षौद्रमसज्जन्ननुप्रवणभावादामाशयमागम्य xxx सलिलपृथिव्यात्मकत्वादधोभाग- प्रभावाच्चौषधस्यापानप्रणुन्नोऽधः प्रवर्तते" (च. क. अ. १)। "विरेचनद्रव्याणि पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठानि, पृथिव्यापो गुर्व्यः, ता गुरुत्वाढधो गच्छन्ति; तस्माद्विरेचन- मधोगुणभूयिष्ठमनुमानात्" (सु. सू. भ. ४१)। गुरुत्वादिति गुरुत्वं चेह प्रभाव- विशेषाधिष्ठितं त्रिवृतादिसमवेतं प्रागं, न तु गुरुस्वमानम्, अन्यथा मरस्य पिष्टान- मसूरादीनां विरेचकरवं स्यात् । (च. द.)। "विपकं यदपकं वा मलादि द्रवां नयेत् । रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं निवृता यथा ॥" (शा. प्र. ख. भ. ४)। यद्व्यं विपकमपर्क वा, मलादि दोपादिकं, दवतां नयेत् द्रवभावं करोतीत्यर्थः, न केवल गवतां नयेत् रेचयत्यपि च, तद्द्वेचनं ज्ञेयं; यथा-त्रिवृता । मलादिकमिति मादिग्रहणात् दूष्यादीनामत्र संग्रहः ।x ४ (आ.)। "तथाऽनुलोमनीयम् । तद - १ वामक (Emetics-एमेटिक्स् )-इन द्रव्योंसे उलटी होकर माशय खाली हो जाता है । इनके दो भेद हैं । (१) प्रत्यक्ष-ये द्रव्य आमाशयमें क्षोभ या दाह उत्पन्न. कर वमन कराते हैं । जैसे-नीला थोथा, राई, वायुनाका गर्म फाण्ट, नमक, फिटकिरी । (२) अप्रत्यक्ष-ये रक्तमें मिल, रकद्वारा वमनकेन्द्रमें पहुंचकर उसे क्षुभित करते हैं, और इस प्रकार वमन कराते है । जैसे-सुरमा, इपिकाक्युआना, अडूसा, जगली प्यान । इस वर्गके बहुतसे द्रव्य रक्तके साथ वहते हुए आमाशयकी कलाद्वारा वाहर पडते है और उसे उत्तेजित करते हैं (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैद्यकमें वमनद्रव्यको 'मुकई' कहते है।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ५९ पार्थिवमाप्यं च" (र. वै. ४।४,५) । तथेति पूर्वोक्तमाश्रयमाकर्षतीति सर्वान् रसान् सर्वान् गुणांश्चाश्रित्य वर्तत इति । पृथिवी गुरुत्वादेवाधो गच्छति, आपो अवस्वात् सरणमुपजनयन्तीति (भा.) । "अभूमिजमधोभागम्" (र. वै., भ. ४ सू. ३० पर भाष्य) । "विरेचनं पित्तहराणां (श्रेष्टम्), त्रिवृत् सुखविरे- चनानां, धतुरहुलो मृद्धविरेचना, मुक्पयस्तीक्ष्णविरेचनानाम् (श्रेष्टम्)" (च. सू. भ. २५)॥ जो द्रव्य अधोभाग(गुद )से दोषोंका निर्हरण करे, उसे रेचन, विरेचन, अनुलोमनीय या अधोभागहर कहते हैं । उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, व्यवायी, विकाशी (च.) तथा सर (सु.) गुणयुक्त विरेचन द्रव्य अपनी शक्ति(प्रभाव )से हृदयमें पहुँच, वहाँसे अपने सूक्ष्म और व्यवायी गुणसे धमनियोंद्वारा स्थूल और अणु स्रोतोंमें होकर समस्त शरीरमें पहुंचता है, और समप्र शरीरमें स्थित दोपोंके सघातको अपने आनेय गुणके कारण विलीन (द्रवीभूत) करता है और तीक्ष्णताके कारण विच्छिन्न करता है (उखाड़ता है)। वह द्रवीभूत तथा विच्छिन्न हुआ दोषसघात सारे शरीरमें भ्रमण करता हुआ विरेचनके पूर्व शरीरके स्नेहसे भावित किये होने के कारण जैसे नेहसे लिप्त पात्र में शहद नहीं चिपकता उसी प्रकार शरीरावयवोंमें कहीं नहीं चिपकता हुआ अपने अणुप्रवण अणुप्रवण (अणु सूक्ष्म स्रोतोमें संचार करनेवाला) तथा कोष्ठाभिमुखगमन खभाववाला होनेसे आमाशय( आमाशयाधोभाग) में आता है। विरेचन द्रव्य अधोगमन और अधोभागहरवरूपप्रभावविशिष्ट पृथिवी तथा जलके गुणों(गुरुव-स्थिरल-अधोगति )की अधिकतावाले होते हैं । अपने इस विशेष प्रभाव तथा गुणों के कारण नीचेकी ओर गमन करते हुए अपने साथ अपान वायुद्वारा प्रेरित पच्यमान दोपोंको बलात् नीचेकी ओर ले जाकर बाहर निकालते हैं (च., सु.)। जो द्रव्य पक्क या अपक्क मलादिको द्रव करके विरेचनके द्वारा वाहर निकाले, उसे रेचन कहते हैं । जैसे-निशोथ (शा.)। चरकमें पचास कषायवर्गामें केवल मेदनीय (या भेदन ) गण दिया गया है, विरेचन गण नहीं दिया है । चरकने विरेचन द्रव्यके तीन भेद बताये है, १ सुखविरेचन, जैसे-निशोथ; मृदुविरेचन, जैसे-अमलतास, तीक्ष्णविरेचन. जसे थूहरका दूध। १ रेचन (Purgatives---पगेंटिव्स्)-इन द्रव्योंसे शौच (पैखाना ) जल्दी होता है किंवा अधिक होता है । न्यूनाधिक क्रियाके अनुसार इन द्रव्योंके पॉच भेद हैं । (१) आनुलोमिक (च.), सर (सु.) (Laxatives-लॅक्सॅटिव्सू )- मल और वायुकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके उत्तेजक । इनसे मल नरम होता है और ऑतोंकी हलनचलनकी क्रिया (पेरिस्टाल्सिस्) कुछ बढकर शौच होता है । इनसे अपक्क मल नहीं आता । जैसे-यासशर्करा (तुरजबीन), गंधक, सूखे अजीर, मालतुखारा, जैतुनका वेल -- ६० द्रव्यगुणविज्ञानम् । -- वमन और विरेचन द्रव्योंके गण चरक सू. म. २ तथा वि. भ. ८, गु. स. भ. ३९, भ स. सू. अ. १४ और अ. ह. सू. भ.- १५ में दिये गये है। जिनामुमोको वहीं देखने चाहिएँ । यहाँ विस्तारभयसे नहीं दिये गये है। चरकने उभयतोभागहर गण नहीं दिया है। अनुलोमनम्-सरम्- "सरोऽनुलोमनः प्रोक्तः ।" (सु. सू. म. ४६)। अनुलोमनो बावमलप्रसनः (उ.)। "कृत्वा पाकं मलानां यद्भित्या बन्धमधो नयेत् । समानुलोमनं शेयं यया (मॉलिय् मोइल), हरउ । (२) संसन (च.) (Simple Purgatires- सिंपल पर्गेटिन्स् )-इनसे गाँतोंकी हलनचलन किया गढ़ती है, गाँतोकी प्रदियों को काम उत्तेजन मिलता है और इस कारण साधारण पतला-नीलामीन होता है। इनमें पक और भपक मल और मलकी गॉठं निकलती है। जैसे-एसल, सनाय, पारा, प्लुआ। (३) भेदन (च.) (Drastic Purgatives-रिटफ पगेटिव्यू-ये द्रव्य मानन द्रव्यों के समान किंतु उनकी अपेक्षया जोरदार क्रिया करते है। इनसे आँती थोटा सार होता है और ऐंठन होकर पतला शौच होता है । जैसे-निशोत, इन्द्रावन, रेवदनीनी, पोढोफाइलम ( पापा) । स्रसन द्रव्य अधिक मात्रामें दिये जाने से मेदन होते है । (४) विरेचन (च.) (Hydragogue Pugatives-हाइट्रॅगॉग पगटिग्स् ; Hydragogues-हाइड्रेगॉग्स् ) -एनसे आंतोंमें बहुतसा द्रव उत्पाप होता है और पानी जैसा शौच होता है। ये रकमेसे पुष्कल रक्तद्रयका पिरेचन कराते है । मेदनवीय द्रव्य अधिक मात्रामें दिये जानेपर विरेचन क्रिया करते हैं। जैसे-जमालगोटा, पटीली इन्द्रायन । कुछ लवण विरेचन हैं, जैसे-सैन्धा नमक, खारी नमक (सोडियम् नफेट), द्राक्षाक्षार ( पोटॅशियम् टार्टरेट् ) । (५) पित्तविरेचन (Cholagogue Purgatives- कॉलगॉग पगेंटिन्स् )--ये द्रव्य शौचद्वारा पित्तको निकालते हैं। इनमे परे रगका पतला शौच होता है। इनकी यकृत् और ग्रहणीपर उत्तेजक क्रिया होती है । यसक्के उत्तेजनसे पित्तस्राव अधिक होता है और ग्रहणीके उत्तेजनसे उसमें सुत हुआ पित्त शीव नीचे (पका- शयमें) चला जाता है । जैसे-पारा, पाप्रा, यकृतके उत्तेजक, पारा, एलुआ गौर रेवदचीनी ग्रणीके उत्तेजक हैं । ये द्रव्य अल्प मात्रामें पित्तसारक है । चरकने विरेचनके तीन विभाग किये है-(१) मृदुविरेचन-जैसे-एरडवेल आनुलोमिक, (२) सुखविरेचन- जैसे-निशोथ स्रसन, पित्तविरेचन, (३) तीक्ष्णविरेचन-जैसे-धूहरका दूध मेदन, विरेचन (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैद्यकमें मृदुविरेचनको 'मुलरियन' और वीक्ष्ण विरेचनको 'मुसहिल' कहते हैं । इन दोनोंका मेद बताते हुए यूनानी द्रव्यगुणविशानमें लिखा है कि वह औषध जिससे कन्ज निवारण होकर सरलतापूर्वक मलोत्सर्ग हो जाय और केवल आमाशय और मन्त्रस्य दोष विसर्जित हो जाय, उसे 'मुलरियन' कहते हैं; और जो द्रव्य सपूर्ण शरीरस्य दोपका मलमार्गसे निहरण करे, उसे 'मुसहिल' कहते हैं। ।
पूर्वाधं द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ६१ मोका हरीतकी ॥" (शा. प्र. ख. अ. ४) । यद्रव्यं मलानां दोषाणां पाक कोपशान्ति कृत्वा, बन्धं निवन्धं च भित्त्वा भिन्नतां नीत्वा, अधो नयेत् मधः करोति 'वातादिकम्' इति शेपः, तेन प्रतिलोमादनुलोमं करोतीत्यर्थः, तषानुलोमनं ज्ञेयम् । अनुलोमनं वातादीनामधःप्रवर्तनं, सरगुणत्वात्; यथा- हरीतकी । सैवानुलोमनी प्रसिदैव । अन्धमिति दोषाणां परस्परग्रथितस्वम् ; एके वात-मूत्र-पुरीपादीनामप्रवृत्तिरूपं विवन्धमाहुः (आ.)। यद्रव्यमपरिपच्यमानानां मलाना पाकं कृत्वा बन्धं च भित्वाऽधो नयेत् कोष्ठादधः पातयेत् तत् अनुलोमनं ज्ञेयम् (का.)। जो द्रव्य मलों और दोपोंको पकाकर और उनके विवन्धको तोड़कर उन्हें अधोमार्गद्वारा याहर निकालता है, उसको अनुलोमन या सर कहते हैं । जैसे- हरड़ । वात-मूत्र-पुरीपादिकी अप्रवृत्तिको विवन्ध कहा जाता है । दोषोंके परस्पर प्रथित होनेको भी कोई विवन्ध कहते हैं । सर अर्थात् सारक, अधोगतिशील (अधोमार्गसे निकालनेवाला)। यह अधोभागहर वर्गका ही एक मेद है। ससनम्- "पकव्यं यदपत्वैव लिष्टं कोठे मलादिकम् । नयत्यधः संसने तद्यथा स्यात् कृतमालकः ॥" (शा., प्र. ख., भ. ४)। यध्यं मलादिकमपक्त्वैव तेषां पाकम- कृत्वैव अधो नयति अधःपतनं करोति, तत् संसनं स्यात् ; यथा-कृतमालकः । कीदृशं मलादिकमित्याह-पक्तव्यमिति ।-पच्यमानम् ; अत एव कोष्ठे श्लिष्टम् । कोष्ठे इति पाचकस्थाने । श्लिष्टमिति आश्रितम् (भा.)। संसनशब्दो विरेचनसा- मान्येऽपि प्रयुज्यते-यथा-"पित्तं वा कफपित्तं वा पित्ताशयगतं हरेत् । सनं" (च. चि. अ. ३)। ख्रसनं विरेचनम् (यो.)॥ जो चिपके हुए पच्यमान मलादिकोंको पकाये विना ही बाहर निकाल देता है, उसे संसन कहते हैं । जैसे-अमलतास । यह भी अधोभागहर वर्गका ही एक मेद है । शाईधरने 'नंसन' वर्गको किसी तन्त्रान्तरसे लेकर भिन्न बताया है। चरकने 'विरेचन' द्रव्यके लिये ही 'स्रसन' शब्दका प्रयोग किया है। गोधनम्-संशोधनम्-देहसंशोधनम्-उभयतोमागम्- "उभयतश्चोभयगुणत्वात्" (च. क. अ. १)। उभयतश्चेति अर्धमधश्च क्षिप्यत इत्यर्थः । उभयगुणत्वादिति अग्नि-वास्वात्मकत्वात् सलिल्-पृथिव्यात्मकत्वादूधिो- भागप्रमावाश्चेत्यर्थः (च. द.)। "उभयगुणभूयिष्ठमुभयतोभागम्" (सु. सू. अ. ४.)। उभयगुणभूयिष्ठमिति-विरेचन-वमननिर्दिष्टभूतचतुष्टयगुणभूयिष्टमित्यर्थः (ड.)। "स्थानादहियेदूर्ध्वमधश्च मलसंचयम् । देहसंशोधनं तत् स्यादेवदा- लीफलं यथा ॥" (शा. प्र. ख. भ. ४) । यद्व्यं स्थानात् प्रकुपितस्थानात् , १ अनुलोमन (सर) द्रव्यको यूनानी वैधकमें 'मुलरियन' कहते हैं । द्रव्य कोष्ठके अन्दर ५ द्रव्यगुणविज्ञानम् । मलसंचयं-दोपादीनां संचयं, स्वस्थानादूर्वमधन नयेत् महिः करोति, देहस्य शरी- रस्य संशोधनं कथितम् । यथा-देवदालीफलम् । अध्वं मुखेन, अधः पायुमार्गेण (आ.)। यद्यपि देहसंशोधनशब्देन वमन-विरेचनास्थापन-शिरोविरेचन मूत्र विरे. चन-शोणितावसेकादीनि सर्वाण्यपि प्राप्यन्ते, तथाऽपि तेपां पृयगुक्तरवार पारिशेप्यान्मुख-गुदोभयभागनिहरणमेवाम गृह्यते । "वातलान् रसान् पित्तलांत्र गुणानुभयतोभागम् । तत् पार्थिवाप्य-जय-वायव्यम्" (र. वै. ४६,७) । पात- लान् वातजननान् कटुतिक्तकपायान् रसान् , पित्तलान् पित्तजननान् तीक्ष्णोष्णलघून गुणान् , आश्रितमुभयतोभागम् । तदुभयतोमागं पृथिव्युदकाम्या गुरुभ्यामप्नि- वायुभ्यां लघुभ्यां च निर्वतते । उभयतोभागं पमनविरेचनवरम् (भा.)। "तथैवोभयतोभाग माग्यनिलजं मतम् ।" (र. वै., भ.४, २.३० पर भाप्य)। 'जो द्रव्य ऊर्श्वभाग(मुख) और अधोभाग (गुद ) दोनों मार्गोंसे दोर्पोको निकाले, उसे संशोधन, शोधन या उभयतोभाग (हर ) कहते हैं। संशोधन द्रव्य भी वमन और विरेचन द्रव्योंके समान तीक्ष्णलादि गुणोंवाले होते हैं । इनकी पूर्वोक्त क्रियासे दोषसघात भामाशय (आमाशयके ऊर्ध्व और अधोभाग)में आकर उपस्थित होता है । सशोधन द्रव्य उभयतोमागहरलरूप प्रभावसे विशिष्ट पृथिवी, जल, अग्नि और पायुके गुणों की अधिकतावाले होते हैं । ये दोनों मासे निकलते हुए अपने साथ उदान और अपानसे प्रेरित दोषों का भी अधिोभागसे बलात् निर्हरण करते हैं (च., सु.) । जो द्रव्य मलों( पुरीप और दोपों )के संचयको अपने स्थानसे ऊपरके और नीचेके दोनों मार्गोंसे बाहर निकाल दे, उसको देहसंशोधन कहते हैं । जैसे-चन्दाल (शा.)। छेदनम्-छेदनीयम्- "श्लिष्टान् कफादिकान् दोपानुन्मूलयति यदलात् । छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु ॥" (शा. प्र. ख. अ. ४)। यद्व्यं श्लिष्टान् संचितान्, परस्परमथिता. नित्येके, अत्यर्थ कुपितानित्यपरे; कफादिकान् दोपान्; आदिग्रहणेन वात-पित्त- शोणित-कृमिग्रहणम् । ४४४। बलादिति स्वशक्तितः, उन्मूलयति उच्छेदयति, तच्छेदन ज्ञेयम् । यथा-क्षारा यवक्षारादयः, भरिचानीति बहुवचनेन श्वेतमरि- चमपि ग्राह्यम् (आ.)। यद्रव्यं श्लिष्टान् लग्नान् मलादिकान् दोषान् वलादुन्मूलयति स्वभावान्नाशयति तच्छेदनं ज्ञेयम् (का.)। "छेदनोपशम द्वे कर्मणी" (च. अ. २६)। द्रव्याणि हि अम्ल लवण-कटुभिः शारीरक्लेदादीनि छिन्दन्ति (ग.)। हिमुनिर्यास छेदनीय-दीपनीयानुलोमिक-वातश्लेप्महराणाम् (च. सू. भ. २५) । ' जो द्रव्य शरीरमें सचित और चिपके हुए कफादि दोषोंको अपने प्रभावसे निर्मूळ करता है, उसे छेदन या छेदनीय कहते हैं। जैसेक्षार, काली मिर्च, शिलाजीत । १ यूनानी वैद्यकमें छेदन द्रव्यको 'जाली' और 'मुकृत्तिक' कहते हैं। । .
पूर्वार्ध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ६३ ܝܪ E रसायनम्-- "दीर्घमायुः स्मृति मेधामारोग्यं तरुणं वयः । प्रभावर्णस्वरौदार्य देहेन्द्रियवलं परम् ॥ वाक्सिद्धि प्रति कान्ति लभते ना रसायनात् । लाभोपायो हि स्वानां 'रसादीनां रसायनम् ॥" (च. चि. अ. १, पा. १; भ. सं. उ. अ. ४९, भ. ह. उ. ३९)। रसादिग्रहणेन स्मृत्यादयोऽपि गृहमन्ते (च. द.)। शस्तानां रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां लाभोपायः प्राप्युपाय. x x x भतः रसायनमित्युच्यते । (यो.)। दीर्घायुःप्रभृतीन रसायनादधिगच्छति । कस्मादेतानि रसायनाल्लभ्यन्ते ? इत्याह-लाभोपाय इति । श्रेष्ठानां रस-रुधिरादीनां यो लाभोपायः स रसायन- मुच्यते (अ.द:)। "रसायनतनं (रसायनं) नाम वयःस्थापनमायुर्मेधावलकरं रोगापहरणसमर्थ च" (सु. सू. अ. १८)। वयःस्थापनं वर्षशतमायुःस्थापनम् । मायुष्कर शताधिकमपि करोति । अन्ये तु वयःस्थापनं जरापहरणं, तारुण्यं बहुकालं स्थापयतीत्यर्थः । रसाना रस-रक्तादीनामयनमाप्यायनं रसायनम् । अथवा रसानां रस-बीर्य-विपाकादीनामायुःप्रभृतिकारणानामयनं विशिष्टलाभोपायो रसायनम् (ड.)। वयःस्थापन मिति प्रशस्त तरुणवय स्थापनम् । यदुक्तम्---"अस्य प्रयोगा- द्वशतमजरं वयस्तिष्ठति" (च. चि. अ. १ पा. १) इत्यादि । अनियतायुषि युगनियतादधिकस्यायुपः करणम् मायुःकरणम् (च. द.)। "रसायनं च तज्ज्ञेयं यजराव्याधिनाशनम् । यथाऽमृता रुदन्ती च गुग्गुलुश्च हरीतकी ॥" (शा. प्र. ख. अ. ४)। यद्रव्यं जरा-व्याधिनाशनं भवति तदसायनं ज्ञेयम् । रसादीनां धातूनामयनमाप्यायनरूपं रसायनम् । जरा वार्धक्य, व्याधयो ज्वरादयो रोगा ग्रायाः । ननु व्याधिग्रहणेन जरामहणं, तत् कथमत्र जरा पृथगभिहिता? उच्यते-जरा स्वाभाविकी ज्ञेया, यतः सप्ततेरूध्वं स्वभावाभवतीति स्वभावकथन- स्वेन पृथगभिधानमित्यदोषः (आ.)॥ जिस द्रव्यसे प्रशस्त रस-रक्तादि धातु तथा स्मृति, मेधा, आरोग्य, तारुण्य, प्रभा, वर्ण, खर, वाक्सिद्धि, लोकवन्दनीयता, कान्ति और शरीर तथा इन्द्रियोंका उत्तम बल आदि प्राप्त हों, उसे रसायन कहते हैं (च., सु.)। जो द्रव्य जरावस्था और व्याधिका नाश करता है, उसे रसायन कहते हैं । जैसे गिलोय, रुद्रवन्ती, गूगल, हरड़ आदि (शा.)। चरकमें पचास महाकषायोंमें कहे हुए वयःस्थापन और जीवनीय ये दो गण भी रसायनके ही एक मेद हैं। १ प्रणति लोकवन्द्यताम् (च. द.)। 'वृपतां' प्रति पा० । २ रसायन (Alterative-ऑल्टरेटिव् ) ये द्रव्य वैद्यकीय मात्रामें देनेसे शरीरपर उनकी क्रिया प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देती, परंतु इनसे रोग दूर होता है । इनसे शरीरकी धातुपाक( मेटाबॉलिज्म)- की क्रिया सुधरती है और शरीर पूर्वस्थिति प्राप्त करता है । 'अन्य औषधोंसे अच्छे न होनेवाले रोगोंको अच्छा करनेवाले' । जैसे-सोना, सुरजान, सुरमा, पारा, सोमल (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैधकमें रसायन औषधको 'अक्सीरुल बदन' कहते हैं ६ ४ द्रव्यगुण विज्ञानम् । सूक्ष्मम्- "सूक्ष्मस्तु सौम्यात् सूक्ष्मेपु स्रोतःस्वनुसरः स्मृतः॥" (सु. सू. म. १६)। "देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेपु विशेद्यत् सूक्ष्ममुच्यते । तद्यथा-सैन्धवं क्षाद्रं निम्बते रुबूद्भवम् ॥" (शा. प्र. ख. भ. ४)। यहव्यं देहस्य शरीरस्य, सूक्ष्मन्देिषु रोम- कूपप्रभृतिपु, विशेत् प्रवेशं करोति, तत् सूक्ष्ममुच्यते । यथा-सैन्धवादिकम् । सूक्ष्मो गुणविशेषः, सूक्ष्मस्रोतोऽनुसरणशीलत्वात् । सैन्धवं प्रसिद्ध, क्षौद्रं मधु; निम्बतैलं निग्यः, तैलं च; यद्वा निम्बस्य तलं, खूद तैलंच; खुद्भवम् पुरण्ड- संभवम् (आ.)॥ जो द्रव्य देहके सूक्ष्म स्रोतो(छिद्रों )के अन्दर प्रवेश कर सके, उसे सूक्ष्म रहते है । जैसे-सैन्धव, शहद, नीम या नीमका तेल, तिलतैल, एरण्डतल आदि । व्यवायि- "व्यवायी चाखिलं देह व्याप्य पाकाय करपते ॥" (सु. सू. अ. ४५)। अपक्क एवाखिलं देहं व्यामोति पश्चान्मधविषवत् पाकं याति (ड.) । "पूर्व व्याप्याखिलं कायं ततः पाकं च गच्छति । व्यवायि, तद्यथा-महा फेनं चाहिसमुद्भवम् ॥” (शा. प्र. ख. म. ४)। व्यवायी गुणविशेपः, भपकमेवाखिलं देह व्यामोति पश्चान्मद्यविषवत् पाकं याति । यथा-भन्ना, अहिफेनं च । अन्ये तु 'ततो भावाय कल्पते' इति पठन्ति । तत्रापि स्थितये कल्पते नोर्वमधो वा प्रवर्तते इति स एवर्थः । अन्ये पुनर्भावशब्दमभिप्रायार्थमिच्छन्ति । तत्र नियतद्व्यप्रभावे- णात्मशक्त्यनुरूप तद्रव्यं मद्य विपवद् विशेपाभिप्रायाय कल्पते इत्यधः (आ.)॥ जो द्रव्य अपने प्रभावसे सारे शरीरके अन्दर व्याप्त होकर पीछे जठरामिके द्वारा पकता है, उसे व्यवायी कहते हैं । अर्थात् जो द्रव्य जठराग्निद्वारा परिपक्क होनेके पूर्व ही अपने प्रभावसे समग्र शरीर में व्याप्त होकर अपने गुण-कर्म दिखलाते हैं उनको व्यवायी कहते हैं। जैसे-भाँग और अफीम । विकाशि(सि)- "विकासी विकसन्नेवं धातुवन्धान् विमोक्षयेत् ।" (सु. सू. भ. १६) । व्यवायिन सकाशाद्विकासिद्रव्यस्य किंचिझेदं दर्शयन्नाह-विकासीत्यादि । विकासी गुणः । विकसन् प्रसर्पन् । एवमिति अपक्व एव सकलं देह व्याप्य, धातुबन्धं विमोक्षयेत् धातुशैथिल्यं करोतीत्यर्थः (ड.)। "संधिवन्धास्तु शिथिलान् यत् करोति विकाशि तत् । विश्लिप्योजश्च धातुभ्यो, यथा-क्रमुककोद्भवाः ॥" (शा. प्र. ख. अ. ४)। यद्व्यं सधिवन्धान शिथिलीभूतान् करोति तद्विकाशि १ 'निम्वस्तैल' इति पा० पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ६५ बोदव्यम् । 'विकाशी' इत्यपि गुणविशेपः । न केवलं संधिबन्धान शिथिलान् करोति, किंतु धातुभ्य ओजो वलं विश्लेप्य विभज्य 'पाकं गच्छति' इत्यध्याहारः, धातुशंथिल्यमपि करोतीत्यर्थः । चकारादपकमेवेत्यत्रापि संबध्यते । अमुककोगवा इति क्रमुकं पूगफलं, कोद्रवः कुधान्यविशेषः । अत्र मुककोद्रवा मदकरा ज्ञेयाः, धातुशैथिल्यकरत्वात् । मोजो वलमिति; सुश्रुतेन तदुक्तं-"रसादीनां शुक्रान्तानां यत् परं तेजतत् स्वत्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते" (सु. सू. अ. २१); यतः "देहः सावयवतेन व्याप्तो भवति देहिनाम्" इति । संधिप्रभृतीनां शिथिलत्वेन श्रम ठरपद्यते, तेन ओजाक्षयो भवतीत्यभिप्रायः, अत एवाह कश्चित्-"अभिघातात् क्षयात् कोपाट्यानाच्छोकाच्छ्मात् क्षुधः । ओजः संक्षीयते वेभ्यो धातुग्रहण- निःस्तम्" (सु. सू. भ. २१) इति । मन्ये तु सरविशेपो व्यवायी, तीक्ष्णविशेपो विकाशी ति युवते, तम सर्वमतम् (आ.)। जो द्रव्य पाक होनेके पहले ही सधियोंके वन्धनोंको शिथिल करता है और धातुओंसे ओजको विभक्त करके धातुओंमें शैथिल्य लाता है, उसे विकाशी (सी)' कहते है। जैसे-कच्ची और ताजी सुपारी, कोदों आदि । ,मद्यम्-मादकम्-मदकारि- "मधं हृदयमाविश्य स्वगुणेरोजसो गुणान् । दशभिर्दश संक्षोभ्य चेतो नयति विक्रियाम् । लघूपण-तीक्ष्ण-सूक्ष्माम्ल-व्यवाय्याशुगमेव च । रूक्षं विकाशि विशद मयं दशगुणं स्मृतम् ॥ गुरु शीतं मृदुः श्लक्ष्णं बहलं मधुरं स्थिरम् । प्रसन पिटिलं निग्धमोजो दशगुण स्मृतम् ॥ गुरुत्वं लाघवाच्छैत्यमोठण्यादम्लस्व- भावतः । माधुर्य, मार्दव तक्ष्ण्यात् , प्रसादं चाशुभावनात् ॥ रौक्ष्यात् स्नेह, व्यवायि- स्वात् स्थिरस्व, लक्ष्णतामपि । विकासिभावात, पैच्छिल्यं वैशद्यात् , सान्द्रतां - १ विकाशिन् (Antispasmodics-अन्टिस्पॅमॉडिक्स्)-इस वर्गके द्रव्योंकी क्रिया अनेक प्रकारोंसे होती है। जैसे-(१) कई द्रव्य कर्मके केन्द्रोपर या चेष्टावह नाडियोंपर शामक (अवसादक) क्रिया करते हैं। (२) कई सारे शरीरपर अत्यन्त जोरदार शामक किया करते हैं, जिसके कारण शरीरके सव अवयव शिथिल हो जाते है । जैसे-तमाखू, बछनाग, देवनल, कुटकी, पम्मकाष्ठ आदि अवसादक द्रव्य । (३) कई - आँतोंकी शक्ति बढाते हैं, निससे अधोवायु छूटता है और उदरशूल शान्त होता है । जैसे-हींग, करतूरी, तगर और सुगन्धि द्रष्य । इस प्रकारके द्रव्योंको Aromatics-रोमॅटिक्स या Carminatives-कार्मिनेटिन्स कहते हैं । (४) कई द्रव्य अपरतम्मशाखा( श्वास- नलिका )के सकोचनिकासको कम करते जैसे-धतूरा, सुरासानी अजवायन, वेलाडोना (डॉ. वा. दे.)।। २ कोदोंकी एक जाति जो मादक होती है, वह यहाँ 'कोदों' शब्दसे मभिप्रेत है। द्र० पं. ५ द ६६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । मोज भाश्रयः, तथा ॥ सौक्ष्म्यान्मधं निहन्त्येवमोजसः स्वगुणैर्गुणान् । सत्वं तदाश्रयं चाशु संक्षोभ्य जनयेन्मदम् ॥" (च. चि. म. २४)। मयं यथा मदयति तथा प्राहमयमि- स्यादि । दशभिरिति लघ्वादिभिर्गुणैः, दशापि गुर्वादीनोजोगुणान् संक्षोम्य, म द्वित्रादिकैः चेतो विक्रियां नयति विकृतं करोति । येन गुणेन मयस्य भोजोगुण. क्षोभो भवति तदाह-गुरुत्वं लाघवादित्यादि । प्रसादं चाशुभावनादिति प्रसादाख्यगुणमाशुगरवाद्धन्ति; भाशुगत्वं च यद्यपि प्रसादविरुदं न भवति, तथाऽपि मघमेव प्रतिकूलतया भोज.प्रसादं हन्ति, तत्राशुगुण आहनने व्यानियत इति ज्ञेयम् । व्यवायित्वात् स्थिरत्वमिति व्यवायिरवं व्यापकरवं, तय स्थिरत्वं तद्विपरीतत्वादेव हन्ति; आशुगत्व-व्यवायित्वयोश्चायं विशेपः-यदाशुगं शीघ्र गच्छति, व्यवायि तु सर्वव्यापकम् । विकासित्वं विकसनशीलत्वं सरस्वमिति यावत् , तय लक्षणविपरीतत्वादेव लक्षणतां हन्ति । सान्द्रता घनता । एते विका- सित्वाशुगत्वादयो गुणा यद्यपि विशतिगुणगणनायां न पठिताः, तथाऽप्यसंख्येय- स्वाद्गुणानामेषामपि गुणत्वं सिद्धं ये तु तत्र पठितास्ते तावदाविष्कृततमा ज्ञेयाः । आश्रयोपघातादाश्रितोपघातो भवतीति दर्शयन्नाह-सत्वमित्यादि । सत्त्वस्य च ओज उपकार्यम् , यथा-राजाश्रित. पुरुप..(च.द.)। "धुदि लुम्पति यद्व्यं मदकारि तदुच्यते । तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम् ॥" (शा. प्र. स. अ. ४)। यहच्यं बुद्धिं ज्ञानविपयं लुम्पति माच्छादयति, मत एव तमोगुणप्रधानं तमोगुणबहुलमित्यर्थः । यथा-सुरादिकं मद्यम् । बुद्धिशब्दस्त मेधा-ति-स्मृति-मति-प्रतिपत्तिषु वर्तते । एतेपां लक्षणं प्रसंगादुच्यते, तद्यथा- मेधा प्रन्थाकर्षणसामर्थ्य, ति. संतुष्टिः, अन्ये नियमात्मिकां बुद्धिमाहुः; स्मृतिः पूर्वानुभूतस्य सरणम् , अर्थधारणशक्तिरित्यन्ये; मतिः भनागतविषयोपदेशः, त्रिकालविपया बुद्धिरित्यन्ये, प्रतिपत्ति. अर्थावबोधप्रागल्भ्यमिति । सुरादिकमित्यादि- ग्रहणात् सर्वे मद्यविकारा गृह्यन्ते । ननु, मद्यं तु बुद्धि-स्मृति-वाग्विचेष्टादिकरमुक्त, यदुक्तं--"बुद्धि-स्मृति-प्रीतिकरः सुखश्व पानान-निद्रा-रतिवर्धनश्च । संपाठ-गीत-स्वर- वर्धनश्च प्रोक्तोऽतिरम्य. प्रथमो मदो हि" (मा. नि. म. अ.); तत् कथं बुद्धि लोप- कमभिहितम् ? उच्यते-मदस्य चतस्र. पानावस्थाः कथिताः, तत्र प्रथमं मदपानं बुद्ध्यादिकं करोति, शेषास्तु वुझ्यादिकं लुम्पन्तीत्यदोपः । वढुक्कं माधवेन- "भव्यक्तबुद्धि-स्मृति-वाग्विचेष्टः सोन्मत्तलीलाकृतिरप्रशान्तः । आलस्य-निद्राभिहतो मुहुश्च मध्येन मत्तः पुरुषो मदेन" इत्यादि (आ.)। "सर्वान् रसान् तीक्ष्णोष्ण-रूक्ष- लघु-विशदांश्च गुणान् मदनीयम् । तदाग्नेयं वायव्यं घ" (र. वै. ४१११,१२)॥ जो द्रव्य तमोगुणप्रधान (किचित् राजस गुणवाला भी) होनेसे बुद्धिका नाश करके मद (नशा) उत्पन्न करता है, उसे मदकारि, मद्य, मदनीय, मादन और - पूर्वार्ध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । । मादक कहते हैं। जैसे-नाना प्रकारके सुरा आदि मद्य (शा.) । मादक द्रव्य लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, अम्ल, व्यवायी, आशुग (भाशुकारी), रूक्ष, विकाशि और विशद-इन दस गुणोंवाला होता है । ओज गुरु, शीत, मृदु, श्क्ष्ण, पहल, मधुर, स्थिर, प्रसन्न, पिच्छिल और स्निग्ध इन दस गुणोंवाला होता है। मय हृदयमें प्रविष्ट होकर अपने दस गुणोंसे ओजके ऊपर लिखे हुए दस गुणोंको उनसे विपरीत गुणवाला होनेसे क्षुभित और नष्ट करके हृदयको विकृत कर देता है तथा उसके आश्रित सत्त्व(मन)को भी क्षुभित करके मद उत्पन्न करता है । मद्य अपने लघु गुणसे ओजके गुरु गुणका, उष्णसे शीतका, अम्लसे मधुरका, तीक्ष्णसे मृदुका, आशुकारितासे प्रसादका, रूक्षसे मेहका, व्यवायीसे स्थिरका, विकासीसे लक्षणका, विशदसे पिच्छिलका और सूक्ष्मसे सान्द्र गुणका नाश करता है (च.) । मद्य सर्व रसवाला तथा तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, लघु और विशद गुणवाला तथा आग्नेय और यायव्य होता है (र. वै.)। विपम्-प्राणहरम्-प्राणनम्- "लघु रूक्षमाशु विभादं व्यवायि तीक्ष्णं विकासि सूक्ष्मं च । उप्णमनिर्देश्यरस दशगुणमुकं विषं तज्ज्ञः ॥ रौक्ष्याद्वातमशैत्यात् पित्तं, सौम्यादसृक् प्रकोपयति । कफमव्यक्तरसस्वादनरसांश्चानुवर्तते शीघ्रम् ॥ शीघ्र व्यवायिभावादाशु व्यामोति केवलं देहम् । तीक्ष्णरवान्ममनं प्राणनं तद्विकासित्वात् ॥ दुरुपक्रमं लघुत्वाद्वैशयात् स्थादसकगतिदोषम् । दोपस्थानप्रकृतीः प्राप्यान्यतमं घुदीरयति ॥" (च. चि. अ. २३)। विषगुणानाह-लन्नित्यादि । प्रत्येकं गुणानी कार्यमाह-शैक्ष्यादि- स्यादि । भौस्यादिति उष्णत्वात् । सौम्यादसकप्रकोपणम् , असृजोऽपि सूक्ष्म- मार्गानुसारित्वात् । अव्यक्तरसत्वं च कफकोपनाय भव्यक्तरसत्व-कफोरेकजलरूप- .कार्यस्वाभवति । असरसांश्चानुवर्तते इति अव्यक्तरसत्वेन जलं यथा गन्धग्रहणे योगवाहि भवति, तथा विपमपि भन्नरसान् झटित्यनुगतं भवति, तत. शीघ्र तेन भावितमझ भवति । शीघ्रमित्यादी शीघ्रत्वादाशु व्यामोति, व्यवायित्वात् केवलं देह व्यामोतीति ज्ञेयम् । व्यवायित्वं सर्वतः प्रसरणशीलत्वं पानीयपतित. सैलवत् । तीक्ष्णस्वान्ममनमिति मर्मणां सौम्यानां मृदूना तीक्ष्णेन विरुद्धत्वं योद्धव्यम् । विकासित्वादिति हिंसनशीलस्वात् , 'वि'पूर्वश्च कसतिहिंसार्थः । लघुस्वादिति भनवस्थितस्वात् , यस्य चानवस्थितत्व तस्य भैपजेनासंबन्धादुपक्रमणम- किंविरकरम् । असका अविश्रान्ता दोपेपु गतिर्यस्य तत् मसक्तगतिदोप, विशदं हि + १ मदकारि (Dolarifacients-डिलिरिफेशिमन्ट्स्)-इन द्रव्योंसे प्रारम्भमें मद उत्पन्न होता है और पीछे वेहोशी आती है । जैसे-गॉजा, वेलाडोना, खुरासानी अजवायन (डॉ. वा. दे.)। मादकको यूनानी वैधकमें 'मुसकिर' कहते है। 1 ६८ द्रव्यगुणविज्ञानम् पिच्छाभागरहितत्वात् कचिन्न सज्जति । अत्र च गुणानां प्रतिनियमेन विरुद्धकर्म- करणे विपस्याशिवत्वमेव नियामकं ज्ञेयं; तेन रोक्ष्यादिभिः श्लेष्मक्षयादि नाशक- नीयम् । सुश्रुते च विषगुणे यत् पाकित्वमुक्तं, तदाशुकारि विपे निष्प्रयोजनमिति नेहोक्तं; तथाहि-विषं नैतावन्त कालमपेक्षते येन यावत्तस्य पाको भवत्यविचार्यः। सुश्रुते च कालान्तरमकोपित्वमपि दूपी विषगोचरतयोक्त, तदिहापि दूपीविषे चिन्तनीयमिति(च. द.)।"शैघ्य-सौपिर्य-व्यवायित्व-विकापित्वानि च प्राणघ्नम्" । (र. वै.।४।१३,)। शैघ्यादीन् -विशेपगुणान् पूर्वोक्तान् सर्वान् रसानाश्रित्य वर्तते प्राणनम् । चशब्दात्ते च संगृहीताः, षसं विषमिति वचनात् । "उष्णं सूक्ष्मं च तीक्ष्णं च विकापि विशद लघु । व्यवायि रूक्ष शीघ्रं च विपं नवगुणं स्मृतम् ॥ पापक्ति धातूनुष्णत्वात्तैक्ष्ण्यान्मर्मच्छिदं विपम् । सौम्यादातून प्रविशति, विकाषित्वाद्विसपैति ॥ विश्लेषयति वैशयात् सन्धीन् , धावति लाघवात् । व्यामोति तद् व्यवायित्वाद्रूक्षत्वात् स्नेहनाशनम् ॥ शीघ्रत्वान्मारयत्याशु पिं गौतम ! षडूसम्" इति (भा.)। "तदाग्नेयम्" (र. वै. भ. ४।१४)। अग्नेर्दहन-पचन- शक्तित्वादप्कार्यस्य जीवनस्य च प्रतिपक्षत्वात् तत् प्राणनमानेय भवति (भा.)। "व्यवायि च विकाशि स्यात् सूक्ष्मं छेदि मदावहम् । आमेयं जीवितहरं योगवाहि स्मृतं विषम् ॥" (शा. प्र ख. अ. ४)। यद् द्रव्यं व्यवाय्यादिगुणयुक्तं भवति तजीवितहर प्राणहरं स्मृतं कथितम् । यथा-विषम् । तदेव योगवाहि स्मृतमि- त्यर्थः । व्यवायीति समस्तदेहं व्याप्य पश्चात् पाकं गच्छतीति व्यवायी गुण., विकाशी गुणश्च सकलदेहं व्याप्य धातुशैथिल्यं करोति, सूक्ष्मो गुणस्तु सौम्यात् सूक्ष्मेषु स्रोतस्स्वनुसर. स्मृतः । मनो-दोष-धातु-मलादीन् बलादुन्मूलयति तच्छेदि कथितम् । मदावहमिति मदकारकम् । आग्नेयमिति आग्नेयगुणभूयिष्ठम् (आ.)। विषद्रव्य लघु, रूक्ष, आशु (आशुकारी), विशद, व्यवायी, तीक्ष्ण, विकासी, सूक्ष्म,. उष्ण तथा अव्यकरस-इन दस गुणोंवाला होता है। विषद्रव्य अपने रूक्षगुणके कारण वायुको, उष्णताके कारण पित्तको, सूक्ष्मताके कारण रक्तको तथा अव्यक्त रसके कारण कफको कुपित करता है, आशुकारी होनेसे अन्नरसका शीघ्र अनुसरण करता है, व्यवायी होनेसे शीघ्र ही सपूर्ण शरीरमें व्याप्त हो जाता है, तीक्ष्ण होनेके कारण मर्मन्न होता है, विकासी (हिंसनशील) होनेसे प्राणहर होता है, लघु (अनवस्थित, चञ्चल) होनेके कारण दुश्चिकित्स्य होता है, विशद (अपिच्छिल) होनेसे दोषोंमे उसकी गति निर्वाध (अटके विना) होती है। इन कारणोंसे विषद्रव्य दोषों, उनके स्थानों और वातादि प्रकृतिको प्राप्त होकर सर्व दोषोंको विकृत कर देता है (च.)। विष सर्व रसवाला तथा शीघ्र, सुषिर, व्यवायी और विकासी गुणवाला तथा आग्नेय होता है। विष अपने उष्ण गुणसे धातुओंको पकाता है, तीक्ष्ण गुणसे मौका छेदन करता है, सूक्ष्म और विकासी गुणोंसे-धातुओंमें फैल जाता है, विशद गुणसे धातुओंसे ओजको पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ६९ अलंग करता है, लघुगुणसे संधियोंमें प्रवेश करता है, व्यवायी गुणसे समग्रशरीरमें व्याप्त होता है, सक्षगुणसे गरीरके मेहका नाश करता है और शीघ्रगुणसे शीघ्र मारता (र. चै.)। जो द्रव्य व्यवायी, विकाशी, सूक्ष्म, छेदी (छेदन), मादक, आमेय, योगवाही और प्राणहर हो, उसे विप, प्राणहर या प्राणघ्न कहते हैं' (शा)। प्रमाथि- "निजवीर्येण याव्यं स्रोतोम्यो दोपसंचयम् । निरस्यति प्रमाथि स्यात् , तद्यथा मरिच बचा ॥" (शा. प्र. ख. अ. ४) यव्यं निजवीर्यण स्वप्रभावेण कृत्वा स्रोतोभ्यः कर्ण-मुख-नासिकादीनामन्यतमविवरेभ्यो दोषयाहुल्यं निरस्थति, तत् प्रमाथिसंझं कथितम् । यथा मरिच, पचा च । दोपशब्दोऽत्र व्याधिष्वपि वर्तते, कारणे कार्योपचारात् ; तेन व्याधिसंचयमपीत्यर्थः (आ.) । यद्रव्यं निजवीर्येण स्वप्रमावेण, स्रोतोम्यो रसवाहि सिरामार्गेभ्यो, दोपसंचयं निरस्यति दूरीकरोति, तत् प्रमाथि स्यात् । (का.)। जो द्रव्य अपनी शक्तिसे स्रोतोंसे अर्थात् रम-रकादिका वहन करनेवाली सिराओं और मार्गों तथा कर्ण, मुस, नासिका आदिके छिद्रोंसे दोपोंके सचयको दूर करे, उसे प्रेमाथि कहते है। जैसे-कालीमिर्च और वच । अभिप्यन्दि- मभिप्यन्दि दोप-धातु-मलस्रोतसां क्लेदप्राप्तिजननम् (सु.सू. म. ४६।५१ ड.)। "मन्टकं दध्यभिप्यन्दजननानाम्" (च. सू. अ. २५) । "पैच्छिल्यावौरवाहव्यं रूवा रसवहाः सिराः । धत्ते यहौरवं तत् स्यादमिप्यन्दि यथा दधि ॥" (शा. प्र. व. अ. ४)। यद्रव्यं पैच्छिल्यात् पिच्छिलगुणयोगात्, गौरवात् गुरुगुणयोगात् गुरपाकस्वभावाद्वा, रसवहाः सिरा रुष्ट्वा संरुध्य, गौरव गुरुतां धत्ते, तदभिप्यन्द्रि कथितम् । यथा-दधि अभिप्यन्दीति, श्लेष्मप्रकोपीति रूढिः, गुणसाधर्म्यात् श्लेष्माऽपि पिच्छिल-गौरवादिगुणयुक्तः (आ.) । यगव्य पैच्छिल्याचैकण्याद् गौरवाच रसवहाः सिरा रष्ट्वा गौरव धत्ते तदभिष्यन्दि स्यात् (काः) । अभियन्दो दोपधातुमलस्रोतसा छेदप्राप्तिः, कफजोऽयं विकारः । च. सू. २६१६४ पर (यो.)॥ जो द्रव्य अपनी पिच्छिलता तथा गौरव( गुरु गुण या गुरु विपाक) से रसवहा सिराओंको रुद्ध करके शरीरमे गौरव-भारीपन उत्पन्न करे और कफका प्रकोप करे, वह अभिप्यन्दी कहाता है। जैसे-दही । । + 1 २ प्रमाधि भौषधको १ यूनानी वैधकमें विपको 'सम्मी' और 'कातिल' कहते है। यूनानी वैयकमें 'मुफत्तिह' कहते है। .
द्रव्यगुणविज्ञानम् । आशुकारि-आशुगम्-आशु- "आशुकारी तथाऽऽशुत्वाद्धावत्यम्भसि तैलवत् ।" (सु. सू. अ. ४६)। जो द्रव्य अपने शीघ्रल गुणके कारण शरीरमें शीघ्रतासे फैल कर क्रिया करे, जैसे- जलमें तैल, उसे आशुकारी कहते हैं । विदाहि- "द्रव्यस्वभावादथ गौरवाद्वा चिरेण पाकं जठराग्नियोगात् । पित्तप्रकोप विदहत् करोति तदन्नपानं कथितं विदाहि ॥” (सु. सू. अ. ४५।१५८ पर ड. टीकामें उद्धृत तन्त्रान्तरीय वचन)। जो द्रव्य अपने द्रव्यखभावसे अथवा पचने में भारी होनेसे देरमें हजम हो और पकतेसमय अन्नवहा नलीमें जलन, खट्टी डकार आदि करके पित्तका प्रकोप करे, उसे विदाही कहते हैं। योगवाहि- "गृह्णाति योगवाहि द्रव्यं संसर्गिवस्तुगुणान्" (भा.)। एतदेव हि योगवाहित्वं यत् स्वगुणापरित्यागेनांशेन सादृश्यात् परस्य शक्तिपूरणम् (इ.) । “योगवाहि परं मधु" (च. सू. भ. २७)। जो द्रव्य अपने गुणोंको न छोडता हुआ अपने साथ संसर्गमें आनेवाले द्रव्यके गुणोंको बढ़ावे, उसे योगवाहि कहते हैं, जैसे मधु, पारद आदि । पाढ्यकरम्-पुंस्त्वोपघाति- षण्ढस्य भावः पाण्ढ्यं, तत् करोतीति पाठ्यकरम् । 'शुक्रनाशनम्' (इ.)। पुंस्त्वमुपहन्तीति पुंस्त्वोपधाति । "क्षारः पुंस्त्वोपघातिनाम्" (च. सू. भ. २५)॥ जो द्रव्य वीर्यका क्षय करके षण्डता (नपुसकता) लावे और पुरुषलका नाश करे, उसको पाण्ढ्यकर या पुंस्त्वोपघाति कहते हैं । जैसे-क्षार । स्वप्नजननम्- स्वमं निद्रां जनयतीति स्वप्नजननम् । यथा--पारसीकयवानी-सर्पगन्धादि । "माहिपं क्षीरं स्वमजननानाम्" (च. सू. अ. २५)॥ जो द्रव्य निद्रा लावे, उसको खप्नजनन या खापजनन कहते हैं । जैसे-खुरा- 1 - १ पाण्ढ्यकर-इन द्रव्योंसे संभोगशक्ति कम होती है, जैसे-कपूर, तमाखू (Anaphhodisiac-अनेफ्रॉडिझिाक्) (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैद्यकमें पुस्त्वो- पघाति औषधको 'कातिभ बाह' कहते हैं ।
पूर्वार्ध द्रव्य विज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । सानी अजवायन, पीपलामूल, चान्दर (सर्पगन्धा) आदि । चरकने भैसके दूधको स्वप्नजनन कहा है। स्वेदापनयनम्-- स्वेदं स्वेदातिप्रवृत्तिमपनयतीति खेदापनयनम् । "उशीर x x खेदापनयन- प्रलेपनानाम्" (च. सू. म. २५)॥ जो द्रव्य खेद( पसीना निकलने )की अतिप्रतिको रोके, उसे खेदापनयन कहते है। चरकने खसके प्रलेपको खेदापनयन द्रव्यों में श्रेष्ठ बताया है। सौमनस्यजननम्- सौमनस्यं मनसः प्रसन्नता जनयतीति सौमनस्यजननम् । "मधं सौमनस्यजन. नानाम्" (च. सू. भ. २५)॥ जो द्रव्य मनकी प्रसन्नता करे, उसको सौमनस्यजनन या मनःप्रसादकर कहते हैं। जैसे मात्रा और विधिसे पीया हुआ मद्य (च.)। चक्षुप्यम्- चक्षुपे हितं चक्षुष्यम् । “मधुकं चक्षुष्य-वृष्य-फेश्य-कण्ठ्य-वर्ण्य-विरमनीयानाम्" (च. सू. म. २५)। "त्रिफला xxx चक्षुष्याxxx" (सु. सू. भ. ३८)। "चक्षुष्यमण्यं बल्यं च गव्यं सर्पि." (सु. सू म. ४५) ॥ जो द्रव्य नेत्रके (दर्शनशक्तिके ) लिये हितकर हो, उसे चक्षुष्य कहते हैं, जैसे मुलेठी, गायका घी और त्रिफला। केश्यम्- केशेभ्यो हित केश्यम् । "केश्य रसायनं मेध्यं काश्मयं फलमुच्यते" (सु. सू. अ. ४६)॥ १ स्वमजनम-ये द्रव्य प्रारम्भमें मद उत्पन्न किये विना ही निद्रा लाते हैं । (Hypnotics-'हिप्नॉटिक्स् ; या Soporifics -सोपोरिफिक्स्)। (डॉ. वा दे.)। यूनानी वैद्यको निद्राकारक औषधको 'मुनधिम' और 'मुसव्बित' कहते हैं। २ये द्रव्य अत्यन्त पसीना आता हो तो उसको वन्द करते हैं। इनमेंसे (१) कई रक्ताभिसरणपर, (२) कई खेदग्रन्थियोंपर, (३) कई खेदकेन्द्रपर, और (४) कई स्वेदग्रन्थियोंमें जाने- वाली नालियोंके अन्तिम भागोंपर क्रिया करते हैं । जैसे-वेलाडोना, खुरासानी अजवायन, धतूरा, कुनैन (खल्प प्रमाणमें ), जस्त, कपाय द्रव्य आदि (Anhydrotics-अन्हा- बड़ोटिक्स) (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैधकमें खेदापनयन औषधको 'मानिभ अरक' कहते हैं। ३ Exhilerents--एग्झिलरन्ट्स (डॉ वा. दे.)। सौमनस्य जननको यूनानी वैद्यकमें 'मुफ़र्रह' कहते हैं । २ चक्षुष्य औषधको यूनानी वैद्यकमें 'मुकन्धी बसर' कहते हैं। ।
७२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । । जो द्रव्य वालोंको स्थिर रखने और बढानेवाला हो उसको केश्य कहते है; जसे मुलेठी और गंभारीका फल । मेध्यम्- मेधायै हितं मेध्यम् । “मण्डूकपण्याः स्वरसः प्रयोज्यः, क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम् । रसो गुडूच्यास्तु समूलपुप्प्याः करकः प्रयोज्यः सलु शहपुण्याः । मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुप्पी" (च.चि. भ. १ पा.३) ॥ जो द्रव्य मेधा( स्मरणशक्ति)को बढानेवाला हो, उसको मेभ्य कहते हैं, जैसे ब्राह्मी, शंखपुष्पी, गंभारीका फल आदि । पुरीपजननम्- पुरीपं जनयति प्रमाणाधिकं पुरीपमुत्पादयतीति पुरीपजननम् । “मापाः पुरीप- जननानाम्" (च. सू. म. २५)। "बहुवातशकृयवः" (च. तू. अ. २७)॥ जो द्रव्य अधिक प्रमाणमें मल उत्पन्न करे, उसको पुरीपजनन कहते हैं; जैसे उसद, जौ आदि। अय सुश्रुतके कहे हुए शल्यचिकित्सोपयुक्त विम्लापनादि वर्गाकी व्याख्या दी जाती है- विम्लापनम्-शोथविलयनम् यानि व्याणि व्रणशोथे भारम्भत एव प्रयुक्कानि शोथमपाचयित्वैव विम्लाप- यन्ति, तानि 'विम्लापनानि' इत्युच्यन्ते । वातज-पित्तज-श्लेष्मज-सांनिपातिकवण- शोथविल(ला)यनार्थ सुश्रुते मिश्रकचिकित्सिते (सू. अ. ३७) विम्लापनाः प्रलेपा उक्ताः ॥ जो द्रव्य व्रणशोथकी प्रारम्भावस्थामें ही प्रलेपके रूपमें उपयोग करनेसे व्रणशोधको विना पकाये ही बैठा देते हैं, उन द्रव्योंको विम्लापन कहते हैं । सुश्रुत सू अ. ३७ में वातज, पित्तज, कफज और सानिपातिक व्रणशोथके विम्लापनके लिए प्रलेप लिखे हैं। - १ ये द्रव्य व्रणशोथको वैठाते हैं । जैसे-पारा, वछनाग, सुरमा, कुटकी आदि (Antiphlogestic-मन्टिफ्लॉजेस्टिक्) । ग्रन्थिविलयन (Resolvents- रिझॉल्वन्ट्स, Disentient-डिसेन्शिअन्ट)-ये द्रव्य व्रणशोथ किंवा सूजी हुई ग्रन्थियोंको ठीक करते हैं । ये रसग्रन्थियोंको उत्तेजन देते हैं । जैसे-उपक, कुन्दरू, अमरकन्द, पारा । इनसे पूय उत्पन्न हुए विना शोथ बैठ जाता है (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैधकमें विम्लापन औषधको 'मुहल्लिल वर्म' कहते हैं।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । , . - . ! पाचनम्- पाकाभिमुखं व्रणशोथं यानि गव्याणि शीघ्रं पाचयन्ति, तानि 'पाचनानि' इत्युच्यन्ते, यथा-"शण-मूलक-दिशग्रूणां फलानि तिलसर्पपाः । सक्तवः किण्व- मतसी द्रव्याण्युष्णानि पाचनम्" (सु. सू. अ. ३७)। पाचनद्रव्याण्युपनाहरूपेण प्रयुज्यन्ते ॥ जो द्रव्य पकने लगे हुए प्रणशोथको शीघ्र पकाते हैं, उन्हें पाचन (व्रणशोथ- पाचन ) कहते हैं। जैसे-सन-मूली और सहेजनके वीज, तिल, सरसों, सत्तू , किण्व, अलसी-तिसी और सप्णवीर्य द्रव्य (सु.)। इन द्रव्योंका उपनाह( पोल्टिस )के रूपमें व्रणशोधपर वाँधनेमें प्रयोग होता है। दारणम्-प्रदरणम्- पक्कमपि स्वयमविदीर्यमाणं व्रणशोथं यानि द्रव्याणि दारयन्ति, तानि 'दारणानि' इस्युच्यन्ते । यथा-चित्रक-कपोतविद-क्षारादीनि (सु. सू. अ. ३७)। "पित्तलान् रसान् गुणांश्च प्रदरणम् । तत् पार्थिवमानेयं च" (र. वै. भ. ४।१५,१६) । पित्तलान् कटुकाम्ल-लवणान् रसान् तीक्ष्णोष्णौ च गुणावाश्रितं प्रदरणम् । तत् पृथिव्याग्निभ्यां निर्मितम् । पृथिवी खलु रोक्ष्यात् तत्रस्थं नेहमपास्य पृथिवीपर- माणूनामप्संग्रहमपाकरोति; ततस्तैक्ष्यादग्निर्विदारयति ॥ पकनेपर भी अपने आप न फूटनेवाले व्रणशोथको जो द्रव्य फोड़ दें, उन्हें दारण कहते हैं । जैसे-चित्रक, कबूतरकी बीट,-क्षार आदि। दारण द्रव्य पित्तकर रस (कटु- अम्ल-लवण) और गुण (तीक्ष्ण और उष्ण ) को आश्रय करके रहता है तथा पृथिवी और अग्निके गुणों की अधिकतावाला होता है। (र. वै.)। प्रपीडनम्- पक्काभिमानां मर्मादिसमीपस्थानां सूक्ष्ममुखानां वणानां स्वयमेव सम्यक्पूयम- वहतां प्रपीढनं कृत्वा यानि द्रव्याणि तेभ्यः पूयं सम्यग्वाहयन्ति, तानि 'प्रपीढनानि' इत्युच्यन्ते । तथा च सुश्रुते-"पूयगर्भानणुद्वारान् व्रणान् मर्मगतानपि । यथोक्तः पीढनद्रव्यैः समन्तात् परिपीढयेत् ॥ शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीडनं प्रति । न चाभिमुसमालिम्पेत्तथा दोपः प्रसिच्यते" (सु. चि. अ.१)। १ यूनानी वैधको व्रणशोथपाचनको 'मुन जिज वरम' या 'मुकरियह' कहते हैं । २ ये द्रव्य जहाँ लगाये जायँ उस मागका नाश करते हैं, और उस भागके अन्दरके जलको मुसाकर उसका नाश करते हैं । जैसे द्रावकाम्ल, क्षार, सोमल-संखिया ( Escha- 1otic-एस्कॅरॉटिक्, Caustic-कॉस्टिक्) (डॉ. वा. दे.)। यूनानी वैद्यकमें दारण औषधको मुफ़जिर वर्म' कहते हैं। . , द्रव्यगुणविज्ञानम् । पीडनमिति शाल्मलीत्वगादीनां व्रणे कर्मविशेषः (सु. सू. अ. ४०५०। ड.)। "दव्याणां पिच्छिलानां तु स्वड्यूलानि प्रपीडनम् । यवनगोधूम-मापाणां चूर्णानि च समासतः ॥" (सु. सू. भ. ३७)। जो द्रव्य पककर फूटे हुए किन्तु मुख सूक्ष्म होनेसे अच्छे प्रकारसे पूयको न निका- लनेवाले व्रणोंको पीडित कर (दवाकर ) पूयको निकालते हैं, उन्हें प्रपीडन कहते हैं। पिच्छिल वृक्षोंकी छाल और मूल, जौ, गेहूं तथा उद इनका कल्क पूययुक, सूक्ष्म मुखवाले तथा किसी मर्मस्थानके समीपवती प्रणों के चारों ओर प्रलेपके रूपमें लगाया जाता है। इन प्रलेपोंको सूखने देना चाहिए, तथा इनका लेप व्रणके मुखको छोडकर चारों ओर करना चाहिये। शोधनम्- स्वयमेव विदीर्ण शस्त्रेण मेदितं वा व्रणं यानि द्रव्याणि शोधयन्ति, तानि 'शोधनानि' इत्युच्यन्ते । शोधनं पुनरष्टविधं-कषाय-वर्ति-कल्क-घृत-तैलरसक्रिया- चूर्ण-धूपन-भेदेन । शोधनद्रव्यविस्तरस्तु सुश्रुते सूत्रस्थाने ३७ तमेऽध्याये चिकित्सास्थाने प्रथमेऽध्याये च द्रष्टव्यः॥ जो द्रव्य अपने आप फूटे हुए वा शस्त्रसे मेदन किये हुए व्रणोंको शुद्ध करते हैं; उन द्रव्योंको शोधन (व्रणशोधन) कहते हैं । इनका उपयोग कषाय, वर्ति, क्ल्क, घृत, तैल, रसक्रिया, चूर्ण और धूपन मेदसे आठ प्रकारसे होता है । उनका विस्तार सु. स अ ३७ तथा चि. स्था. अ. १ में देखें। रोपणम्- शुद्धं वणं यानि द्रव्याणि रोपयन्ति, तानि 'रोपणानि' इत्युच्यन्ते । रोपणं कषाय-वर्वि-कल्क-धृत-तैल-रसक्रिया-चूर्णमेदेन सप्तविधं भवति । रोपणद्रव्य- विस्तरस्तु सुश्रुते सूत्रस्थाने ३७ तमेऽध्याये, चिकित्सास्थाने प्रथमेऽध्याये च द्रष्टव्यः॥ जो द्रव्य शुद्ध व्रणका रोपण करते हैं (व्रणको भर लाते हैं ), उनको रोपण कहते हैं । इनका उपयोग कषाय, वर्ति, कल्क, घृत, तैल, रसक्रिया और चूर्ण भेदसे सात प्रकारसे होता है । रोपण द्रव्योंका विस्तृत वर्णन से. सू. अ. ३७ तथा चि. स्था. अ. १ में देखें। १ - उत्सादनम्- परिशुष्काल्पमासान् गम्भीरान् व्रणान् यानि द्रव्याणि मांसवर्धनेनोत्सादयन्ति, तानि 'उरसादनानि' इत्युच्यन्ते । “अपामार्गोऽश्वगन्धा च तालपत्री सुवर्चला । १ रोपण द्रव्यको यूनानी वैधकमें 'मुदम्मिल' और 'मुलहिम' कहते हैं।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ७५ - उत्सादने प्रशस्वन्ते काकोल्यादिश्च यो गणः ॥" (सु. सू. भ. २७)। उत्सादनं मासवर्धन; लेपप्रयोगादुरसादनं भवति (ड.)। शुष्क, अल्प मांसवाले तथा गहरे प्रों में मासकी वृद्धि करके जो द्रव्य उन्हें ऊँचे लाते हैं (समतल करते हैं), उन्हें उत्सादन कहते हैं। अवसादनन्- उस्मन्नमृदुमासान् प्रणान् यानि द्रव्याण्यवसादयन्ति, तानि 'अवसादनानि' इत्युच्यन्ते । “फासीसं सैन्धवं किप्वं कुरुविन्दो मनःशिला । कुफुटाण्डकपालानि सुमनोमुकुलानि च ॥ फले औरोपकारले धातुचूर्णानि यानि च । बणेपूत्सन्नमांसेपु प्रशस्तान्यवसादने ॥" (सु. सू. भ. ३७)। अवसादने इति मांसस्फोटने (ड.)। उभरे हुए कोमलमासयुक्त प्रणोंको जो द्रव्य वैठाकर समतामें लाते हैं, उन्हें अवसादन कहते हैं। जैसे-कासीस, सैन्धव आदि । टपशोपणम्- उपशोपणं यच्छरीरे आर्द्रभाव शोपयति (अ. स. सू. अ. १३ में इन्दु)। "कुटजस्वक् ४४ उपशोपणानाम्" (च. सू. अ. २५)॥ जो द्रव्य शरीरमें आर्द्रता (गीलापन) को सुसाते हैं, उन्हें उपशोपण कहते है। जैसे-फुडाकी छाल (च.)। रोम( लोम )शातनम्- मलेपाद् रोमाणि शातयति नारायतीति रोमशातनम् । यथा-हरितालमित्रं शवचूर्णादि (सु. चि. अ. १)॥ जो द्रव्य लगानेसे वालोंको- निकाल दे, उसको रो(लो)मशातन कहते हैं। जसे-हरताल और शङ्खचूर्ण (या चूने ) का लेप । रोम( लोम )संजननम्- रोमाणि सम्यग्जनयतीति रोमसंजननम् । यथा--हस्तिदन्तमसीयुक्तरसाजन- प्रलेपनम् (सु. चि. अ. १)॥ जो द्रव्य जहाँसे वाल निकल गये हों वहाँ प्रलेप करनेसे वालों को उत्पन्न करे, उसे १ उत्सादन द्रव्यको यूनानी वैधकमें 'मुवित लहम' कहते हैं । २ ये द्रव्य शरीर- परके लसीका, पूय आदि दु खदायक और दाइजनक मल पदार्थों का शोषण करते है, किंवा महास्रोतसके अन्दरके वायुका शोषण करते हैं । जैसे लकड़ीका कोयला, विशेप प्रक्रियासे तय्यार की हुई सई (अय्सॉर्वन्ट् कॉटन) । व्रणलेखन (सु.) (Absorbent- अग्सॉर्बन्द) (डॉ. वा. दे.) । उपशोपण द्रव्यको यूनानी वैधक, 'नाशिफ़' और मुनविशफ' कहते है। ३ रोमशातन औषधको यूनानी वैद्यक, 'हालिक' कहते हैं। ++ ७६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । रोमसंजनन कहते हैं । जैसे-हाथीके दाँतकी मसी मिश्रित’ रसौत (सु. चि. म. १)। रक्षोनम्- रक्षांसि अन्तरिक्षचरान् हिंसकान् जन्तून् धूपनादिभिहन्तीति रक्षोत्रम् । यथा--गुग्गुल्वगुरु-वचा-सर्षप-निम्बपत्रादि (सु. सू. अ. ५)॥ जो द्रव्य अन्तरिक्षचर और हिंसक राक्षसोंको (रोगोत्पादक जन्तुओंको) धूपन आदिसे नष्ट करे, उसे रक्षोघ्न कहते हैं । जैसे-गूगल, अगर, सरसों, वच, नीमकी पत्ती आदि। वक्तव्य-ख. वा. डॉ. वामन गणेश देसाईने ओषधिसंग्रह नामके मराठी ग्रन्थमें द्रव्योंके कुछ और वर्ग लिखे हैं, वे आगे दिये जाते है- स्वाप(सुप्ति)जनन-(Anesthetics-अनिस्थेटिक्स् )-ये द्रव्य मस्तिष्क तथा सुषुम्णाकाण्डमें स्थित नाडीकेन्द्रोंपर क्रिया करते हैं और बेहोशी, सज्ञानाश तथा स्पर्शनाश उत्पन्न करते हैं। ये द्रव्य उड़नेवाले होते हैं। इस वर्गमें मद्य, अफीम आदि मादक द्रव्योंका अन्तर्भाव नहीं होता। जैसे-क्लोरोफार्म । कई द्रव्य त्वचा किंवा क्षतपर लगानेसे शून्यता उत्पन्न करते हैं । इनकी क्रिया प्रत्यक्ष ज्ञानतन्तुओंके सिरोंपर होती है। इनसे जहाँ लगाये जाते हैं, उस स्थानपर क्षति नहीं होती । जैसे-जटामांसी, तगर, बर्फ आदि (डॉ. वा. दे.)। विरुद्ध-( Antagonists-अॅन्टॅगोनिस्टस्)-ये द्रव्य एक दूसरेके विरुद्ध क्रिया करते हैं, कोई वीर्यविरुद्ध और कोई सयोगविरुद्ध । जैसे-मय और कुचला; अफीम और बेलाडोना । इनकी क्रिया परस्पर विरुद्ध होती है, अत: इनका सयोग नहीं होता । जैसे-बेलाडोना और घारीकून, धतूरा और पद्मकाष्ठ (डॉ. वा. दे.)। स्तन्यनाशन–(Lactifuge-लॅक्टिफ्युज्)-स्त्रियोंके स्तन्य(दूध)को उड़ानेवाले द्रव्य । जैसे-पानका पत्ता, मोगरेके फूल, कपूरका पत्ता (डॉ. वा. दे.)। अश्मरीनाशन-(सु. सू अ. ३८) (Antilithics-अॅन्टिलिथिक्स्); शर्करानाशन (Lithontriptics-लिथोन्ट्रिप्टिक्स् )-ये द्रव्य शरीरमें बनी हुई या सचित पथरियोंको पिघला देते हैं । जैसे-द्रावकाम्ल फॉस्फोरसकी पथरीको, क्षार लाल रंगकी पथरीको, सोडा सेलिसिलेट पित्ताश्मरीको पिघलाते हैं । (Antilithies--अन्टिलिथिक्स्-पथरीका वनना रोकनेवाले द्रव्य) (डॉ. वा. दे.)। १ रोमसननन औषधको यूनानी वैद्यकमें 'मुंवित शअर' कहते हैं। २ यूनानी वैधकमें वापजनन औषधको 'मुखदिर' कहते हैं । ३ यूनानी वैधकमें अश्मरीनाशन भोपधको 'मुफ़त्तित हसात' कहते है। ।
पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । । कोथप्रशमन (न्टिसेप्टिक्स)-ये द्रव्य सूक्ष्मजन्तुओंकी वृद्धिका नाश करते है और इन जन्तुओंकी वृसिसे होनेवाली सहनेकी क्रिया( कोथ )को रोकते है । ये रोगजन्तुन और दुर्गन्धिनाशन वर्गसे भिन्न हैं । जैसे लवंगका तैल, सुहागा, पोदीनेका सत्त्व, पारा, सर्च सुगन्धि तैल (डॉ. वा. दे.)। पित्तसारक-(Cholagogues-कॉलेंगॉग्स् )-ये द्रव्य यकृत को उत्तेजित करके पित्तका स्राव बढ़ाते हैं । जैसे-नौसादर, सजीसार, पारा, पोडोफिलम (पाप्रा), रेवन्दचीनी, एलआ (डॉ. वा. दे.)। दुर्गन्धहर-(Deodorsnta-डिओडरन्टर )-ये द्रव्य दुर्गन्धका नाश करते हैं। जैसे-कोयला (डॉ. वा. दे.)। रोगजन्तुम्न--(Disinfectants-डिसिन्फेक्टन्टम् )-ये द्रव्य रोग उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म जन्तुओंका नाश करते है । जैसे-कार्योलिक ऍसिड, गर्म हवा (डॉ. वा. दे.)। गर्मपाति-(Ecbolics-एक्वॉलिक्स; Abortifacients. This is श्यन्दम् ) ये द्रव्य गर्भाशयकी पेशियोंका सकोच करते हैं । जैसे-सर्पगन्धा, इशरमूल; गाँजा, टंकण, सताप, मुनन, अर्गट । ये द्रव्य अल्प प्रमाणमे लेनेसे आर्तवको बढ़ाते है, अधिक प्रमाण लेनेसे गर्भको गिराते हैं (डॉ. वा. दे.)। आर्तवजनन-( Einmenagogues-एमिनॅगॉग्स्)-ये द्रव्य आर्तव बढ़ाते है। इनकी क्रिया दो प्रकारसे होती है । (१) प्रत्यक्ष गर्भाशयको उत्तेजित करके आर्तवसाव कराते हैं । जैसे-अर्गट, सताप, कपासकी जद । (२) जिस कारणसे आर्तव मन्द हो उसे दूर करते । जैसे-लोह, कुचला, एलआ, कीडामारी (डॉ. दे.)। मार्दवकर-(Emollients-इमॉलिअन्ट्स् ; Protectives-प्रोटेक्टिव्स् ) ये द्रव्य जहाँ लगाये जाते हैं उस भागमै मृदुता लाते हैं तथा हवासे उसकी रक्षा करते हैं । जैसे-तेल, चवीं, निशास्ता (डॉ. वा. दे.)। श्लेप्मनि.सारक-(Expectorant--एक्स्पेक्टोरन्ट) श्वासनलिका और फेफडोंसे कफको बाहर लानेवाले द्रव्य । इनकी क्रिया अनेक प्रकारसे होती है। (१) श्वासहर-ये श्वासनलिकाके सकोचविकासको कम करते हैं । जैसे-देवनल, तमाखू, धतूरा । (२) उत्क्लेशक -इनसे जी मिचलाकर तथा उलटीकी इच्छासी होकर कफ निकलता है। इनसे कफ पतला मी होता है । अधिक मात्रामे देनेसे ये द्रव्य १ श्लेष्मनि सारक द्रव्यको यूनानी वैयकमें 'मुनफ्फिस वल्गम' और 'मुखरिज वल्गम' कहते है . वा. -- ७८ । । द्रव्यगुणविज्ञानम् । उलटी कराते हैं । जैसे-सुरमा । (३) उल्लेखन-ये श्वासनलिकाकी कलाका शोय कम करते हैं तथा कफका स्राव कराते हैं। सब वमन द्रव्य अल्प मात्रामें देनेसे उनकी इसी प्रकार क्रिया होती है। इन्हें Nauseating or depressant expec. torant-नॉशिएटिंग एक्स्पेक्टोरन्ट, या डिप्रेसन्ट एक्सपेक्टोरन्ट कहते हैं । जैसे-सुरमा, खडकी राना, एपिकाक्युआना । (४) छेदन-ये श्वासनलिकाकी कलाको उत्तेजित करते हैं तथा कफको पतला करते हैं । कफका लेस कम होनेसे वह खाँसते ही वाहर पड़ता है। इन्हें Stimulating expectorant~-स्टिम्युलेटिंग एक्स्पेक्टोरन्ट कहते हैं । जैसे-नौसादर, उपक, प्याज, शिलारस, हींग, गन्धा- विरोजा, अडूसा । (५) उद्भसिकाहरये श्वासक्रियाके केन्द्रोंको शान्त करते हैं। खाँसीके साथ कफ पड़ना चाहिए । कफ न पड़नेसे जो बहुत ही दुखदायी खाँसी होती है, वह इन द्रव्योंसे कम होती है । ये द्रव्य बहुत भयंकर और अवसादक होनेसे सावधानीसे वरतने चाहिए। ये केवल सूखी खाँसी कम करते हैं। जैसे-अफीम । ६) स्नेहन-ये द्रव्य गले और श्वासनलिकाके ' द्वारों में स्निग्धता लाते हैं। जैसे- गोंद, मिश्री, मुलेठी । (७) उत्तेजक-ये श्वासक्रियाके केन्द्रोंमें स्फूर्ति लाते हैं । उनको उत्तेजन मिलनेसे साँसनेकी शक्ति बढती है, और जोरसे खॉसनेके साथ कफ ठीक पड़ता है। जैसे-कुचला, बेलाडोना, पुष्करमूल (डॉ. वा. दे.)। तारकाविकासि-(Mydriatics-मिड्रिएटिक्स् ) ये द्रव्य कनीनिका (आँखकी पुतली ) को विकसित करते हैं । इनसे कनीनिकाकी पेशी दुर्बल होती है, और कुछ काल दिखना कम होता है । जैसे-धतूरा, वेलाडोना (डॉ. वा. दे.)। तारकासंकोचन--(Myoties-मायोटिक्स् ) इन द्रव्योंसे कनीनिकाका संकोचन होता है और आँखोंका तनाव कम होता है । जैसे-अफीम (डॉ. वा. दे.)। मोहजनन-(Narcotics-नार्कोटिक्स् ) ये द्रव्य मस्तिष्कपर क्रिया करते और निद्रा लाते हैं । इनसे आरम्भमें थोड़ा बहुत मद उत्पन्न होता है। जैसे-अफीम, गॉजा, मद्य । ये द्रव्य स्वप्नजनन वर्गसे भिन्न हैं; कारण, स्वप्नजनन वर्गसे प्रारम्भमें मद नहीं होता (डॉ. वा. दे.)। आविजनन-(Oxy tocics-ऑक्सिटॉसिक्स् )-ये द्रव्य प्रसूतिके समय या प्रसूतिके पीछे गर्भाशयकी सकोचन क्रिया बढ़ानेके लिए दिये जाते हैं । जैसे-कुनैन, अर्गट (डॉ. वा. दे.)। शोणितोक्लेशकै-(Rubefacients--रुबिफेशिअन्ट्स् )-ये द्रव्य बचापर १ तारकाविकासि द्रव्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुफ़त्तिह सुक्वहे इनविण्या' कहते हैं। २ आविजनन औषधको यूनानी वैधकमें 'मुखरिज जनीन व मशीना' कहते हैं । ३ शोणितोत्छेशक द्रव्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुहम्मिर' कहते हैं । .
। - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ७९ लगानेसे बचा लाल हो जाती है। जैसे-राई, हुलहुल, चित्रक, पील, कॅन्यरिटीस् । किन्हींसे त्वचा लाल होती है और किन्हींसे छाले उठते हैं (डॉ. वा. दे.)। स्फोटजनन-(Vesicant-वेसिकन्ट्) । जैसे-कॅन्यरिडिस्, राई, चित्रकमूल (डॉ. वा. दे.)। अवमादक-(Sedatires-सिडेंटिन्स् ; Depressants-डिप्रेसन्टस्)- ये द्रव्य शरीरके विभिन्न अवयवोंका अवसाद करते हैं । मात्रा अधिक हो तो वह भाग दुर्वल हो जाता है । (१) नागीसंस्थानके केन्द्रोंके अप्रसादक; जैसे-तमाग्य, देवनल । (२) रक्ताभिसरणके अवसादक, जैसे-चछनाग, सुरमा, पद्मकाछ (डॉ. वा. दे.)। लालाप्रसेकापनयन-(Antisialogogues अॅन्टिसाएलॉगोग्स् )-ये द्रव्य लालाका स्राव कम करते हैं। जैसे-बेलाडोना (डॉ. वा. दे.)। लोलाप्रसेफजनन-(Sialagogues-साएलॅगॉग्स् )-ये द्रव्य लालानावको यदाते हैं । (१) कई द्रव्य मुखमें रसनेपर लालाग्रन्थियोंको उत्तेजित करते हैं और लार बढ़ाते हैं । जैसे-अकरकरा, तमाखू , राई, लाल मिर्च । (२) कई द्रव्य. रक्तमे मिश्रित होकर लालाद्वारा बाहर निकलते हैं और लालास्रावको बढ़ाते हैं । जैसे- पारा (डॉ. चा. दे.)। उत्तेजक-(Stimulants-स्टिम्युलन्ट्स )-इन द्रव्योंसे भोंमें उत्तेजना आती है चाहे इन्हें मुखद्वारा लिया जाय अथवा त्वचापर मसला जाय । इनकी क्रिया विभिन्न अवयवोंपर होती है। (१) सुपुम्णाकाण्डके उत्तेजक, जैसे-कुचला, फॉस्फरस । (२) यकृत् के उत्तेजक; जैसे-नौसादर, पित्तसारक वर्ग । (३) ऑतोंके उत्तेजक, जैसे-रसकपूर । (४) रकाभिसरणके उत्तेजक, जैसे-डिजिटेलिस, वेलाडोना, कपूर । (५) आमाशयके उत्तेजक, जैसे-सुगन्धि द्रव्य, मसाले । (६),त्वचाके उत्तेजक; जसे-राई । (७) नेत्रोंके उत्तेजक; जैसे-रसौत । (८) व्रणशोथ किवा वणके उत्तेजक, जैसे-नीमकी पत्ती, सभालकी पत्ती (डॉ. वा. दे.)। हृदयोत्तेजक-(Cordial-कॉर्डिअल् ) सुगन्धि और उष्ण द्रव्य । ये रक्ताभि- सरणकी गतिको बढ़ाते हैं (डॉ. वा. दे.)। - १ स्फोटजनन द्रव्यको यूनानी वैधकमें 'मुकरह' कहते हैं २ अवसादक औषधको यूनानी वैद्यकमें 'मुसकिन' कहते हैं। ३ लालाप्रसेकजनन द्रव्यको यूनानी वैद्यकमें 'मुहिरै लुआब दहन' कहते हैं। ४ उत्तेजक औषधको यूनानी वैषकमें 'मुहरिक' और 'मुनबिह' कहते है। - ++ ८०. द्रव्यगुणविज्ञानम् । एकीयमतेन द्रव्यप्रधानत्वनिरूपणम्--- सुश्रुतने तथा सुश्रुतमतानुयायी भदन्तनागार्जुनने अपने अपने प्रन्य, द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक इनमेसे प्रत्येककी एकीयगतसे प्रधानता दिरालासर अन्तम इन सबमे द्रव्य ही प्रधान है और द्रव्यादि सब मिलार कार्य उरते हैं, यह सिद्धान्त स्थापित किया है । इस ग्रन्थमें द्रव्य विज्ञानीय, गुणविज्ञाननीय आदि प्रत्येक अध्यायमें प्रव्यादिमेंसे एक-एककी प्रधानता दिखाकर अन्तमें उपसहार प्रकरणमें दोनों भाचार्योंका सिद्धान्त दिया जायगा। द्रव्यविज्ञानीयाध्याय, मूलमें सुश्रुत और टिप्पणमें नागा- र्जुनके मतसे द्रव्यप्राधान्ययाद (द्रव्यप्राधान्यके विषयगे एकीय मत) लिसा जाता है- केचिदाचार्या वते-द्रव्यं प्रधानं, कस्मात् ? व्यवस्थितत्वात् । इह १ द्रव्यप्रभृतीनां तु प्रधान द्रव्यमे के नुक्ते (र. वै. सू भ. १ यू. ९९)।- एव परीक्षितव्यानि परीक्ष्य, तम पलावलचिन्तां चोक्खा, ग्यादीनां पण्या पदार्थाना तर शरीरभूतानामिदप्रधानतेदानीं परीक्ष्यते-द्रव्येत्यादि । भग्न पछी निर्धारणलक्षणा । 'तु'शम्दो. ऽधिकारनिवृत्त्यर्ध (भा.)। द्रव्य प्रधान रसादिभ्य प्रति प्रतिज्ञा, कुतः ? तरतमयोगा- 'नुपलब्धेः (सू १००)।-तरतमयोगो रसादिषु सृष्टः । तत्र योरतिशये तर, बहुभ्योऽतिशये तमप् । --मधुरतरो, मधुरतम , शीततर , शीततमः, दनीपतर, छर्दनीयतम, लघुतरो, लघुतम , कर्मतर, कर्मतममिति । द्रन्येषु नास्ति यष्टीमधुकनरो, यष्टीमधुकनम इति । तस्मात् तरतमयोगाभावाद् रसादिभ्यो द्रव्य प्रधानमिति 1 xxx। (भा.)। सर्वन्द्रियो- पलब्धे (सू १०१)।-द्रव्यप्राधान्यसाधनाधमय च हेतु.-सर्वेत्यादि । मोगादिमिरि- न्द्रियैर्द्रव्य गृयते, रसादयो छकेन्द्रियग्राया । रसनेन रस , शीतादिसर्शनेन वीर्य फलदर्श नाचक्षुपेति कल्पयाम', विपाकरतथैव, कर्म चक्षुपा । द्रव्य पुनश्चक्षुपा दृष्ट्वा यष्टीमधुक जानाति, स्पृष्ट्वा च रात्री यष्टीमधुकमिति प्रतिपयते, रसनेनास्वाघ यष्टीमधुकमिति वेत्ति, प्रात्वा च यष्टीमधुकमित्यवगच्छति, श्रुतं च यष्टीमधुकशान भवति, एवमनेकेन्द्रियग्रापयत्वात् प्रधान द्रव्यमिति (भा.) । व्यवस्थानात् (सू १०२)।xx । व्यवस्सानादिति द्रन्य व्यवस्थित, गुणा बनवस्थिता. उक्त च-"दूर्वानुरनिम भूत्वा फल जम्बास्ततः पुन । मेचक भजते वर्ण पुनरसनसनिमम्" इति । एव तद्गताश्च स्पर्श-रस-गन्धास्थान- वस्थिता. । जम्बूफलमिति द्रव्य सामान्यम् ।xxx। (भा.)। अधिष्ठानादाश्रयात् (सू १०३) Ixx। द्रव्यमाश्रय , आयिणो रसादय इति । मायभूतः प्रधान. स्वामी दृष्ट इति (भा.) । भारम्भसामर्थ्यात् (चु. १०४)। आरम्भश्चिकित्साया क्रियारम्भ -~-~मूलमाहरेत्यादि । तस्मिन् द्रव्यस्यैव सामर्थ्य, न रसादीनामारम्भसामर्यन् । अविकलेन्द्रिय. पुरुष पझोरिति (भा.) । विकल्पसामर्थ्यात् (स, १०५) । ४ ४ । विविध कल्पो विकल्प करक-कपायादिभेदेन, तस्मिन् विकल्पे सामर्थ्यात् , तत् सर्व द्रव्यस्यैव नान्यस्येति ।xxx। (भा.)। प्रतीघात- । -- प्रधानो दृष्ट पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ८१ खलु द्रव्यं व्यवस्थितं न रसादयः, यथा-आमे फले ये रसादयस्ते पक्के न सन्ति; नित्यत्वाच, नित्यं हि द्रव्यमनित्या गुणाः, यथा- कालादिप्रविभागातदेव संपन्नरसगन्धं व्यापन्नरसगन्धं वा भवति स्वजात्यवस्थानाच, यथा हि-पार्थिवं द्रव्यमन्यभावं न गच्छत्येवं शेषाणि, पञ्चेन्द्रियग्रहणाच, पञ्चभिरिन्द्रियैर्गृह्यते द्रव्यं न रसादयः, आश्रयत्वाञ्च, द्रव्यमाश्रिता रसायः; आरम्भसामर्थ्याच, द्रव्याधित आरम्भः, यथा-'विदारिगन्धादिमाहत्य संक्षुद्य विपचेत्' इत्येव- मादिषु न रसादिष्वारम्भः; शास्त्रप्रामाण्याच्च, शास्त्रे हि द्रव्यं प्रधान- मुपदेशे हि योगानां, यथा-"मातुलुङ्गाग्निमन्थौ च" (सु. सू. अ. ३७) इत्यादौ न रसादय उपदिश्यन्ते; क्रमापेक्षितत्वाच्च रसादीनां, रसादयो हि द्रव्यक्रममपेक्षन्ते, यथा-तरुणे तरुणाः, संपूर्णे संपूर्णा इति; एक- देशसाध्यत्वाच, द्रव्याणामेकदेशेनापि व्याधयः साध्यन्ते (न रसा- दिभिः; कस्मात् ? निरवयवत्वात्), यथा-महावृक्षक्षीरेणेति; तस्मा- द्रव्यं प्रधानम् । द्रव्यलक्षणं तु 'क्रियागुणवत् समवायिकारणम्' इति ॥ सामर्थ्यात् (सू. १०६) । प्रवीधात मावरण, तस्मिन् सामर्थ्य द्रव्यस्यैव भवति, मूर्तिमत्त्वात् । अप्रतीपातात्मनां कालदिगात्मादीनां किं प्राधान्य निवार्यत इति ? न सर्वेभ्य, प्राधान्य साधयि- तुमिष्ट, (किन्तु ) रसादिभ्य इत्यदोष । तेपामपि मूर्तिमत्त्वमिष्यत एव कैश्चिदिति । तदप्यसत् । कल्प -प्रतीघातसामर्थात् स्वस्थानेऽन्यस्यानवकाशदानादिति । सपृक्तास्तिष्ठन्तीति । आवरणार्थाऽपि स एव घटते यः स्वस्मिन् स्थानेऽन्यस्यावकाश निरुणद्धि, स प्रधानो दृष्ट.-चक्रवतीति (भा.) । शास्त्रोपदेशसामर्थ्यात् (सू १०७) 1xx। भागमादित्य । शास्त्र एवोपदिश्यते हि-“य एव हि गुणा द्रव्ये शरीरेष्वपि वे स्मृता. । तान् द्रव्यस्तद्गुणैरेव प्रयोगेणाभिवर्धयेत्” इति । सामान्यप्रयोगवचने विशिष्टेन प्रयोगो निर्दिश्यत इति (भा.)। अवयवेन सिद्धेः (स. १०८)1xx। अवयवेन एकदेशेन प्रदेशेन सिद्धे , 'प्रयोगेषु' इति वाक्यशेप. । यथा-मूलत्वगादिना अवयवेन य साधयति स प्रधानो दृष्टः । xx। (भा.) । तदनुविधानाचेतरेपाम् ( स. १०९)।४४ । इतरेषा रसादीनां द्रव्यस्यानुविधानात् । द्रव्यमनुवर्तन्ते हि रसादय , तारुण्ये तरुणा , सपत्तौ सपन्ना , विपत्ती विपना भवन्तीति । ये यमनुवर्तन्ते ते तस्मादप्रधाना दृष्टाः । तद्यथा--गुरो शिष्या इति (भा.) । द्रव्यमाश्रयलक्षणं पञ्चानाम् (र. वै. सू. अ. १ सू १६६)।- रसादीनां पदार्थानां यदाश्रयभूत तद् द्रव्यम् (भा.)॥ १ 'यथा कल्कादिप्रविभाग , स एव संपन्नरसगन्धो व्यापन्नरसगन्धो वा भवति' प्रति रहणसंमत पाठ.। २ कोष्ठकान्तर्गत. पाठो हाराणचन्द्रेन न पठ्यते । द्र०५.६ तस्मादयमन्यः रसादयः । - ८२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । पाको नास्ति विना वीर्याद्, वीर्य नास्ति विना रसात् । रसो नास्ति विना द्रव्याद्रव्यं श्रेष्ठमतः स्मृतम् ॥ जन्म तु द्रव्यरसयोरन्योन्यापेक्षिकं स्मृतम् । अन्योन्यापेक्षिकं जन्म यथा स्यादेटे हिनोः ।। वीर्यसंशा गुणा येऽयौ तेऽपि द्रव्याश्रयाः स्मृताः । रसेपु न भवन्त्येते निर्गुणास्तु गुणाः स्मृताः ॥ द्रव्ये द्रव्याणि यस्माद्धि विपच्यन्ते न पडूसाः। श्रेष्ठं द्रव्यमतो शेयं शेपा भावास्तदाश्रयाः ॥ (मु. सू. अ. ४० ४०)। भन द्रव्यादीनां प्रत्येक प्राधान्यमेकीयमतेन दर्शयितुं द्रव्यप्राधान्ये प्रथमं सहेतु- कमेकीयमतमाह--तत्रेत्यादि । एतय एकीयमतोपदर्शन सम्यग्दच्यादिसमाव- ज्ञानार्थम् ; अभिनिविष्टो हि वादी स्वपक्षसाधनाथं सर्व स्वरूपं प्राधान्ययाप दर्शयति, तेन चान्ते वक्ष्यमाणाचार्यसिद्धान्तसहितेन सम्यक् प्रवीतिमंवति; एत- दर्थमेव चरकेऽपि वातादिप्राधान्यादेकीयमतान्युपन्यस्य चाकलाफलीपादाबाचार्य- मतमुपदर्शितम् । व्यवस्थितस्वादिति अवस्थाभेदेन रसादिभेदेऽपि व्यस्य व्यवस्थित त्वात् , यथा-आम्रफलं प्रथमं कपायाम्लं, मध्येऽम्लं, ततो मधुरम्; एवं रसा- व्यवस्थानेऽपि द्रव्यमानरूपतया व्यवस्थितम् । हेवन्तरमाह-नित्यत्वादिति । नित्यत्वं रसादिनाशेऽप्यव्यवस्थितत्वमिह ज्ञेयं; व्यवस्थितरवं तु रसायन्यथारखे तद्रूपतया व्यवस्थितत्वमिति विशेपः । कालादीत्यनादिशब्देन जलवाताइयो गृह्यन्ते । व्यापन्नरसगन्धमिति नष्टरसगन्धम् । अवैकस्मिन् द्रव्यप्राधान्ये साये बहुहेतूपदर्शन शास्त्रत्वादेव भवति, वादे हि द्वितीयादिहेतुकथनमसाधनामवचन- मिति नोपादीयते । स्वजात्यवस्थानादिति परिणामेऽपि द्रव्यं स्वजाताववतिष्ठते, न जात्यन्तर भवति, यत् पार्थिव तत् पार्थिवमिति, यदाप्यं तदाप्यमेवेत्यादि जात्यपरि- त्यागः, रसस्तु क्षीरे मधुरवं परित्यज्य चाम्लतां यातीत्याद्यनुसतव्यम् । जातिबेह पार्थिवत्वादिरूपा व्यवस्थिता अभिप्रेता, तेन क्षीरस्य दधिरव, गुढस्य शर्करास्वमि- त्यादिजातिभेदो नोद्भावनीय. । पञ्चेन्द्रियग्रहणादित्यन पञ्चभिरिन्द्रियैर्द्रव्यं गृमत इति चक्षुषा स्पर्शनेन तावद्व्यग्रहणमविवादसिद्धमेव, घ्राण-रसन-श्रोत्राणामपि सुरभि चन्दनं, तथा मधुर कोपकारः, तथा सुस्वरा वीणेत्यादि सामानाधिकरण्य- ज्ञाने द्रव्यग्रहणं प्रति स्फुटतरव्यापाराद् द्रव्यग्राहकत्वं ज्ञेयम् । आश्रयस्वाति रसादीनां द्रव्यमाश्चयः, तेनाश्रिता रसादयः परतत्रत्वादप्रधानाः, प्रधानमित्यर्थः । आरम्भसामर्थ्यादिति पष्ठो हेतुर्व्यक्तः । शाखप्रामाण्यादिति शामेण प्रमाणेन प्राधान्येनोपदेशात् । क्रमापेक्षितत्वादिति द्रव्यक्रमापेक्षितत्वाद्रसादीनाम् । तरुणा इति असंपूर्णा । एकदेशसाध्यत्वादिति नवमो हेतुर्व्यक्त. । करसादसा- दीनामप्येकदेशेन न व्याधयः साध्यन्त इत्याह-निरवयवत्वादिति । व्युत्पादित- -- आश्रयस्त पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः। ८३ । .. प्राधान्यस्य द्रव्यस्य लक्षणमाह-द्रव्यलक्षणमित्यादि । क्रियावत् , गुणवत्, सम- वायिकारणं दध्यामिति । क्रिया कर्म, गुणा रसादयः, समवायिकारणं स्वसमवेतकार्य- जनकम् । एते क्रियावस्वादयो रसादिव्यावर्तका इतीहोक्ताः ।xxx। सर्वगव्य- ध्यापक-विजातीयव्यावृत्तं तु लक्षणमिह गुणवत्वमेव । एतदेव क्रियागुणयोर्यथाक्रम द्रव्यव्याप्यक्रिया द्रव्ये विद्यते, गुणाः समवयन्तीति व्याप्य द्रव्यमवतिष्ठन्ते, न हि निर्गुणं द्रव्यं किंचिदस्ति । संप्रति पाकाद्यपेक्षणीयतया पाकाद्याश्रयतया च द्रव्यप्राधान्यं दर्शयमाह-पाको नास्तीत्यादि । शीतवीर्य पृथिवीजलाश्रयं मधुरं गुरुं पाकं निप्पादयति, तथा उष्णवीर्यमध्याश्रयमनिलाकाशलाघवसहित कटुकं लघुपाकं जनयति । यदुक्तं-"द्रव्येषु पच्यमानेषु येवम्बुपृथिवीगुणाः । निर्वर्तन्तेऽधिकास्तत्र पाको मधुर उच्यते" (सु. सू. भ. ४०) इत्यादि । यत्तु शालिपु मधुरशीतेष्वपि कटुपाकरवं, तद्व्यप्रभावसहितवीयोद्भवतीति नोत्सर्ग- सिद्धवीर्यकार्यता । विपाकस्य वीर्यस्य वीर्यव्यापकस्य रसस्य च द्रव्यमाधारकारणमिति विपाक-वीर्य-रसानां सर्वेषामेवाधारकारणतया द्रव्यं प्रधानमित्युक्तं भवति । किंवा विपाकादीनां मुख्यकार्योपदर्शनमेतत् ; यथा द्रव्योपयोगादनन्तर रसः स्वकार्य करोति, तदनु वीर्य परिणामावस्थायां कार्य करोति, ततोऽन्ते विपाकः; तदुकं चरके-"रसो निपाते द्रव्याणां, विपाकः कर्मनिष्ठया । वीर्य यावदधीवासान्नि- पाताचोपलभ्यते" (च. सू. अ. २६) इति । अथ द्रव्यं चेदसस्य कारणं, कारणं च नावश्यं कार्य जनयति, तत् किं रसं विनाऽपि द्रव्यं भवतीत्याशकां निराकुर्वनाह-जन्म स्वित्यादि । तत्र द्रव्यं कार्यद्गव्यं धान्य-फल-वृक्षादि, जन्मशब्देन चाभिव्यक्तिरुच्यते । उत्पादस्य परस्परापेक्षित्वे इतरेतराश्रयादुत्पादश्च न स्यात् , तेन स्वकारणोत्पमं द्रव्य रसं विना गव्यमेव न भवति, नीरसस्य कार्यद्रव्यस्यानुपलम्भात् । किंवा रसशब्देन रसधर्मतयोक्ताः सर्व एव गुणा गृह्यन्ते, तेन रसं विना द्रव्यं गुण- शून्यतया द्रव्यमेव न भवति, यतो 'गुणवत्' इति द्रव्यलक्षणं व्यापकमुक्त, रसस्तु द्रव्यं विना आश्रयामावादेव न भवति । एव दृष्टान्तेऽपि देहो देहिनं विना न भवति, देहिभोगायतनं हि देहः, स शुक्रशोणितावच्छिन्नोऽपि देहिनो जीवस्य सबन्धं विना न देहान्द लभते । देही त्वात्मविशेषः, स नित्योऽपि देहसंबन्ध. प्रयुक्त देहित्वं न देहमन्तरेण लभत इत्यर्थः । अथ 'पाको नास्ति विना वीर्यात्' इत्यादिना मुख्यतया रस द्रव्याश्रय प्रतिपाद्य रसाश्रयतया वीर्यस्यापि द्रव्याश्रयत्वं परम्परया प्रतिपादितम् । सप्रति रसवद्वीर्यस्यापि द्रव्याश्रयत्व प्रतिपादयन्नाह- वीर्यसंज्ञा इत्यादि । अपिशव्दाद स्थूल-सूक्ष्म-सख्या-रूपादयोऽपि गुणा द्रव्याश्रयत्वेन गृयन्ते । एतद्गुणकार्यस्व च स्वल्पं, तच्च द्रव्यधर्मतया रसादिधर्मतया वा वैद्यकतन्त्र- व्यवहाराद्गृह्यते । अथ रसाश्रया. पूर्वममी गुणा उक्ता., तथा रसगुगकथने च "मधुरो रस. शीतः” (सु. सू. अ. ४२) इत्यादिना रसाश्रया वीर्यादयो गुणा - ८४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । वक्तव्याः, तत् कथमिह द्रव्याश्रया उच्यन्त इत्याह-रसेपु न भवन्तीत्यादि । एतेन परमार्थतो रसे गुणे निर्गुणत्वाद् वीर्यरूपा गुणास्तथाऽन्ये संख्यादयो गुणा न भवन्त्येव, एकाश्रयतया तूपचारात् सुखेन व्यगुणप्रतीत्यर्थं रसगोचरतयोच्यन्ते । तदुक्तं चरके-"गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान् भिषक् । विद्याद् द्रव्य- गुणान् , कर्तुरभिप्राया. पृथग्विधाः" (च. सू. अ. २६) इति । विपाकस्यापि द्रव्याश्रयत्वेन द्रव्यप्राधान्यमाह-द्रव्ये द्रव्याणीत्यादि । द्रव्ये आहाररूपे; द्रव्याणीति आहारगतानि पच्यन्ते; न रसा इति रसानां परतन्त्रत्वेन स्वतत्रपाका- विषयत्वात् ; द्रव्ये स्वग्निसंयोगात् पच्यमाने पाकाज्ञा(जा)यमानतया रसः पच्यत इति व्यपदिश्यत इत्यर्थः । यदा 'द्रव्यं द्रव्येण पच्यते' इति पाठस्तदा द्रव्येणेति 'जठराग्निना' इति विशेषः । यत्तु पठ्यते 'द्रव्ये द्रव्याणि यस्माद्धि विपच्यन्ते न षडूसाः' इति, यवो न सर्वत्र द्रव्येपु षसाः पच्यन्ते, येनैकरसं द्रव्यं क्षीरादि, मातुलुङ्गादि मधुराम्लं द्विरसं, निरसं न्यग्रोधफलादि "कपायमधुराम्लानि न्यग्रोधा- दिफलानि च" (सु. सू अ. ४६) इति वचनात् , चतूरसं तिलादि, पञ्चरसमा. मलकादि, षडूसं विह द्रव्यं न हारीते तु एणमासं षडूसमुक्तं, यथा-"एणमांसं लघु स्वादु पडूस कटु पच्यते" इत्यादिः एतच्च प्रकृतार्थासंगतार्थत्वान्न मनोहारि । प्रकरणव्युत्पादितं द्रव्यप्राधान्यं निगमयति-द्रव्यं श्रेष्ठतममिति । शेपा भावा इति रस-वीर्य-विपाकाः (च. द.)।xxx व्यवस्थितत्वात् स्वस्वगुणाभावेऽप्यवस्थानात् । उक्तमर्थमवगमयति-इहेत्यादिना । नन्वेव द्रव्यप्राधान्यमनुपपन्न, य एव हि रसादय आमे फले दृश्यन्ते कालपरिणामात् पक्के त एवान्यथाभावमापद्यन्ते, न तु ते विनश्यन्ति, अन्ये च उत्पधन्त इति निश्चीयते, "अम्लेन सह संयुक्त. स तीक्ष्ण- लवणो रसे । माधुर्य भजते" (सु. सू. अ. ११) इत्यादिना पररसादेः पूर्वरसादिपरि- णामसंभवत्वेनाभ्युपगमात्, ये स्वेवं प्रत्यवतिष्ठन्ते तान् प्रति हेत्वन्तरमुपन्यस्यति- नित्यत्वाञ्चेति । द्रव्यं प्रधानमिति पूर्वेणान्वयः । नित्यत्वं च द्रव्याणां कालपरिणामे- नान्यथाभावेऽपि तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञायमानत्वादवगन्तव्यम् । नित्यत्वाद् द्रव्यस्य प्राधान्यमप्राधान्यं च रसादीनां दर्शयति-नित्यमित्यादिना । परिणामान्यत्वे द्रव्या- न्यत्वमिति येषां दर्शनं, तेपामामपक्कफलयोर्मात्रया परिणामभेदाद् द्रव्यमेदोऽपीति मस्वाऽनुरूपं दृष्टान्तमाह-कल्कादिप्रविभाग इति । कल्कादिरूपेण प्रविभको द्रव्यनिचयः कल्कादिप्रविभागः । अत्र पूर्वापरकालावस्थायिन्यभिन्नपरिमाणे कल्कादि- प्रविभागे सत्येव तस्य गन्धरसयोः सत्त्वमसत्त्वं चेत्यनियतावस्थायिनो गुणा अनित्या उच्यन्ते, द्रव्यं च तदपेक्षया नियतावस्थायि नित्यमाख्यायते इति द्रष्टव्यम् । न चाय कल्कादिप्रविभागो रूपादितो व्यापन्नः सहसा प्रत्यभिज्ञाविषयो भवतीति संप्रधार्य रसगन्धावेवोपात्तावित्यनुसंधेयम् । ननु, चम्पककुसुमादिद्न्यनाशेऽपि सद्वासनावासिततैलादौ तद्गन्धोपलब्धेर्नित्यो गुणो द्रव्यमनित्यमिति वैपरीत्यमापद्यते - पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । इति नित्यत्वहेतोरनैकान्तिकतेत्याह- स्वजात्यवस्थानाचेति । स्वजात्यवस्थानत्वं विवृणोति-यथेत्यादि । शेपाणि परिशिष्टान्याप्यादीनि । रसादयस्तु नैवमिति शेषः, से हि स्वां जाति परित्यज्य जात्यन्तरमाश्रयन्ते । वक्ष्यति हि-"भूम्यम्बुगुण- बाहुल्याम्मधुरः, भूम्यग्निगुणबाहुल्यादरलः" इत्यादि । नन्विदमप्यश्रद्धेयं मांसस्वेन परिणतस्याप्यस्यापि शोणितस्य पार्थिवत्वदर्शनादित्येवं विवक्षुनपाचिकीर्षुहेस्वन्तर- माश्रयते पझेन्द्रियग्रहणाचेति । पञ्चेन्द्रियग्राह्यत्वं तु द्रव्यस्य पञ्चीकृतरवात् "भूमौ करकराशब्दो जले चुलचुलुध्वनिः" इत्यादिवेदान्तवाक्यान्यनुसंधायाध्यव. सितव्यम् । यद्वा पवेन्द्रियग्राह्यत्वमिह द्रव्यस्य तत्तद्गुणपुरस्कारेण तत्तदिन्द्रियग्रहण- विषयरवम् । तथा च लोकेऽनुभवः--दीर्घा शप्कुली मया श्रुता, दृष्टा, स्पृष्टा, आघाता, आस्वादिता चेति । नन्वेवं पञ्चेन्द्रियग्राह्यत्वं पञ्चीकृतत्वादेव वेदान्त- वाक्येनाङ्गीक्रियते, वस्तुतस्तु वाग्वस्तुमात्रत्वेनैतत्पर्यवस्थत्यनुभवेनाविषयीकरणात्, गुणपुरस्कारेण पञ्चेन्द्रियग्राह्यत्वे च गुणानामेव प्राधान्यं स्यात् ; किंच काणादानां सप्ता-गुणस्वयोः पञ्चेन्द्रियप्रायस्वात् प्राधान्यं स्यादित्यर्थान्तरम्, किंच 'गुणा एव इन्द्रियग्राया न गुणवन्ति द्रव्याणि' इति येपो दर्शनं तेषां स्वरूपासिद्धो हेतुरर्थान्तरं चेत्यत आह-आश्रयस्वाथेति । आश्रयत्वात् समवायसंवन्धेन रसादीनामधिष्ठान- स्वात् । नन्वाश्रयत्वस्य प्राधान्य प्रत्यकिंचित्करस्वामित्युत्पश्यामो युक्त्यभावात्, नियमेन हि रसादीनामेव कार्यकरत्वमध्यवस्यन्ति कुशलाः; न हि भिषजः सहस्रमपि संभूय प्रनष्टरसादिकेन केनचिद्रव्येण किंचन व्याधि प्रतिकर्तुमीशते, अत एव गुणप्रकर्षमात्रमभिसमीक्ष्य नवं पुराणं वा द्रव्यं ग्राहयितुमिदमुक्तं च-"विगन्धेना- परामृष्टमव्यापनं रसादिभिः । नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्रासमेव विनिर्दिशेत्" (सु. सू. अ. ३६) इति; यद्यन्न द्रव्यं परमार्थतः प्रधानमभविष्यत् तर्हि द्रव्यविवेक मप्यकरिष्यदित्येवं विप्रतिपमानपनुदति-आरम्भसामर्थ्यावेति । भारम्भसामर्थ्यात् माहरणादिकर्माहवादित्यर्थः । अस्त्वारम्भसामथ्यं द्रव्यस्य, किं स्वत्र "मधुराम्ल- लवणा वातनाः" (सु. सू. भ. ४२) इत्याधनुशासनाद् रसादीनां कर्तृस्वमध्य- वस्य तेषामेव प्राधान्यं पश्यामो नम्वेव द्रव्यस्येति चेन्नेत्याह-शास्त्रप्रामाण्याचेति । अन्वयोऽन्न प्राग्वदेव । उक्तमर्थमवगमयति-शास्त्र इत्यादिना । हिरेको हेतो, अपरश्वावधारणार्थः । यस्माद्योगानां मिश्रकायुक्तानां भेपजानामुपदेशे यथा"मातुलु- मामिसन्यौ च" (सु. सू. भ. ३७) इत्येवंक्रमेण द्रव्यमुपदिश्यत इति शेपः, न तथा रसादय उपदिश्यन्ते; तस्मात् शास्त्रे द्रव्यमेव प्रधानमिति योजना । नन्वनया युक्त्या द्रव्यस्य प्राधान्यं चेदिष्ट तर्हि रसस्यापि प्राधान्यमनिवार्य स्यात् "लवणानि मनःशिला" (सु. सू अ. ३७) इत्यादिना लवणरसद्रव्योपदेशेन परमार्थतो लवणरसस्याप्युपदेशात्, न हि विनष्टरसानि तानि लघीयसामपि व्याधीनामुपशमार्थ कमिश्चिदपि योग उपदिश्यन्त इत्याह-क्रमापेक्षितत्वाचेति ।
८६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । नन्विदमप्यनुपपन्न, परस्परापेक्षिणामेषां द्रव्य-रसादीनां क्रमापेक्षितत्वानुपपत्तः, वक्ष्यति च-"जन्म तु द्रव्य-रसयोरन्योन्यापेक्षिकं स्मृतम्" (सु. सू. अ. ४०) इत्येवं प्रत्यवस्थामपास्यन्नाह-एकदेशसाध्यत्वाच्चेति । रसादीनां तु निरवयवत्वादेक- देशसाध्यत्व नोपपद्यते, तस्माद्रव्यमेव प्रधानमित्ययमभिसन्धिः। स्यादेतत् , किं नाम तद् द्रव्यम् ? इत्यपेक्षायां विनिगमनाविरहाद् द्रव्यलक्षणत्रितयमेवोपदिशति-द्रव्ये. स्यादिना। अत्र हि त्रयाणामेव लक्षणानां लक्षणत्वमेकविधं भवतीति "द्रव्य- लक्षणम्" इत्येकवचनं नानुपपन्नम् । तथा च-क्रियावत् , गुणवत्, समवायिकारणं च द्रव्यमित्यर्थः । क्रियावत्वमन कर्मवद्वृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्वम् । एवमेव गुणवत्वं समवायिकारणं च व्याख्येयम् । तेन गगनादौ, घटादावुत्पत्तिकाले, उत्पमे च यथाक्रम क्रिया-गुण-समवायिकारणत्वाभावेऽपि नाव्याप्तिः । नन्विह किंचिौवं भेषजमस्ति यद्गसेन विनाकृतं भवति, तथा च द्रव्याद्विना रसस्वाभावाद् द्रव्यं चेत् श्रेष्ठं स्यात् तर्हि रसाद्विनाऽपि द्रव्यस्याभावाद्रसस्यापि श्रेष्ठत्वं प्रसज्येत, इत्याशय परिहरति-जन्मेति । देह-देहिनोर्यथा आश्रयाश्रयिभावेनान्योन्यापेक्षिकं जन्म, तथैव द्रव्य-रसयोरित्यर्थः । एतेनाश्रयत्वाद् द्रव्यस्य प्राधान्यमिति सूचितं भवति । रसाश्रयत्वेन द्रव्यस्य प्राधान्यं निरूप्य 'पाको नास्ति विना वीर्यात्' इत्यादिना वीर्य-रसाधीनत्वेनोपदिष्टयोर्विपाक-वीर्ययोरपि परमार्थतो द्रव्यमेवाश्रय इति कृस्वा द्रव्यस्य प्राधान्यं निरूपयति-वीर्येत्यादिना श्लोकद्वयेन । द्रव्ये आहारौषधात्मके शालि-पष्टिक-नागरादौ सम्यगुपयुक्त सति, द्रव्याणि क्षित्यादीनि विपच्यन्ते रसरूपेण परिणम्य स्वयमेव विशिष्ट पाकमापद्यन्त इत्यर्थः । विपाको हि नाम सम्यक्परिणत- रसपरिणामविशेष इत्यवोचाम । हिशब्दो विशेषणार्थः । रसादयस्तु द्रव्यवत् स्वयमेव न विपच्यन्त इत्यर्थः । कुतः? आह-शेषा भावास्तदाश्रया इति । शेषा द्रव्यातिरिक्ता रसादय इत्यर्थः । अतो द्रव्यं श्रेष्ठं ज्ञेयमिति समन्वयः (हा.)॥ कई आचार्य कहते हैं कि द्रव्य, गुण, रस, विपाक और वीर्य इनमें द्रव्य प्रधान है। क्योंकि (१) द्रव्य व्यवस्थित (स्थिर, अपरिवर्तनशील) है । अपने गुणों के बदलनेपर भी जो उसी रूपमें रहे, उसे व्यवस्थित कहते हैं। द्रव्य व्यवस्थित होनेसे प्रधान है। क्योंकि द्रव्य-गुण-रस आदिमें द्रव्य ही स्थिर रहता है, रसादि नहीं । जैसे- एक ही आम्रफल प्रारम्भमें कषायाम्ल, मध्यमें अम्ल और अन्तमें मधुर होता है। इस प्रकार रसोंके वदलनेपर भी आम्ररूप द्रव्य आम्र ही रहता है, वदलता नहीं । इस प्रकार द्रव्य व्यवस्थित और रसादि अव्यवस्थित होनेसे रसादिकी अपेक्षया द्रव्य प्रधान है। (२) नित्य होनेसे द्रव्य प्रधान है। नित्य उसको कहते हैं, जिसमें कालपरिणामसे अन्यथाभावको प्राप्त होनेपर भी 'यह वही है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती हो । जैसे-काल, जल, वातादिके प्रभावसे द्रव्य सपन्नरसगन्ध वा व्यापनरसगन्धवाला होने पर भी वही रहता है । इस प्रकार रस-गन्धादि गुणोंका परिवर्तन होनेपर भी रहनेसे (नित्य होनेसे) । पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । द्रव्य प्रवान है । (३) द्रव्य अपनी पार्थिवादि विशिष्ट जातिमें ही रहता है। जो द्रव्य पार्थिव है, वह पार्थिव ही रहता है; जो आप्य है, वह आप्य ही रहता है। अपनी जातिको छोड़कर अन्य जातिमें परिवर्तित नहीं होता। रस दूधमें मधुरताको छोड़कर अम्लताको भी प्राप्त होता है। परंतु द्रव्य अपनी पार्थिवादि जाविको नहीं छोड़ता, इसलिये द्रव्य रसादिसे प्रधान है । (४) पाँचों इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण होनेसे भी द्रव्य प्रधान है। द्रव्योंका ग्रहण पाँचों इन्द्रियोंद्वारा होता है, परन्तु रसादिका प्रण एक एक इन्द्रियद्वारा होता है, पाँचों इन्द्रियोंद्वारा नहीं किया जा सकता । (५) रसादिका आश्रयभूत होनेसे द्रव्य प्रधान है । रसादि द्रव्यके आश्रित होनेसे परतन्त्र हैं, और परतन्त्र होनेसे अप्रधान है 1 (६) भाहरण, कूठना आदि विविध प्रकारके कर्म द्रव्योंपर ही हो सकते हैं, इसलिए द्रव्य प्रधान है। जैसे-'विदारिगन्धादिगणके द्रव्योंको लाकर कूटे, फिर पकावे' इत्यादि सब क्रियाओंका आरम्भ द्रव्योंमें ही हो सकता है, रसादिमें नहीं हो सकता। (७) शास्त्रके प्रमाणोंसे भी द्रव्य प्रधान है। जैसे-वातशोथविम्लापन प्रयोगका वर्णन करते समय विजौरा, अरणी आदि द्रव्योंका ही उपदेश किया गया है। (८) द्रव्यके क्रम( स्थित्यन्तर )के अनुसार रसादिकोंकी क्रमापेक्षा ( स्थित्यन्तर) होनेसे द्रव्य ही प्रधान है। क्योंकि रसादि द्रव्यकी स्थिति बदलनेसे बदलते रहते हैं। जसे-तरुण पदार्थमें रसादि अपूर्ण (अप्रशस्त ) होते हैं और परिपक्क पदार्थमें पूर्ण (प्रशस्त) होते है । (९ द्रव्योंके एक-एक अङ्गका उपयोग करके व्याधियोंकी चिकित्सा होती है। जैसे-थूहरके दूधसे कई रोगोंकी चिकित्सा होती है, परन्तु रसादि निरवयव होनेसे उनके एकदेशसे चिकित्सा नहीं होती । इस लिए द्रव्य ही प्रधान है। जिसमें कर्म और गुण रहते हैं और जो समवायिकारण है उसको द्रव्य कहते हैं (सु.)। नागार्जुनने द्रव्यका लक्षण इस प्रकार लिखा है-जो गुण, रस, विपाक, वीर्य और कर्मका आश्रयभूत होता है, उसको द्रव्य कहते हैं (र वै. सू. अ. १, सू १६५)। वीर्यके विना विपाक नहीं, रसके विना वीर्य नहीं और आश्रयभूत द्रव्यके विना रस नहीं, इसलिए द्रव्य सबसे श्रेष्ठ है । जैसे शरीर और शरीरी( आत्मा )का आश्रयाश्रयिभाव होनेसे उनका जन्म एक दूसरेकी अपेक्षा रखता है, वैसे ही द्रव्य और रसका आश्रयायिभाव सवन्ध होनेसे दोनोंका जन्म अन्योन्यापेक्षी (एक दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाला) है । वीर्यसंज्ञक शीतादि जो आठ गुण हैं, वे भी द्रव्यमे ही आश्रित होते हैं, रसोंमें आश्रित नहीं हो सकते, क्योंकि गुण खयं निर्गुण होते हैं (रस स्वयं गुण होनेसे उसमें शीतोष्णादि गुण नहीं हो सकते)। आहारौषधात्मक द्रव्योंमें आहारगत पृथिव्यादि द्रव्योंका पाक होता है, रसों का नहीं । द्रव्यके अतिरिक्त अन्य रस-वीर्यादि द्रव्यमें ही आश्रित होकर रहते हैं, इसलिये द्रव्य ही सबसे श्रेष्ठ है।
८८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । द्रव्यविज्ञानीयाध्यायस्य प्रथमं परिशिष्टम् । "सर्वेषां द्रव्याणामौषधत्वनिरूपणम् । अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किंचिद्रव्यमुपलभ्यते तां तां- युक्तिमर्थ च तं तमभिप्रेत्य । न तु केवलं गुणप्रभावादेव द्रव्याणि कार्मुकाणि भवन्ति; द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद् , गुणप्रभावाद् , द्रव्य- गुणप्रभावाच्च तस्तिस्मिन् काले तत्तदधिकरणमासाद्य तां तां च युक्तिमर्थ च तं तमभिप्रेत्य यत् कुर्वन्ति तत् कर्म; येन कुर्वन्ति तद्वीर्य यत्र कुर्वन्ति तदधिकरणं; यदा.कुर्वन्ति स कालः; यथा कुर्वन्ति स उपायः, यत् साधयन्ति तत् फलम् (च. सू. अ. २६) । भनेनेति प्रतिनियतद्रव्यगुणोपदेशेन; यत् पार्थिवादि द्रव्यं यद्गुणं तद्गुणे देहे संपाये तद्भेषज भवतीत्यर्थः । तच्च पार्थिवादि द्रव्यं न सर्वथा न च सर्वस्मिन् व्याधौ मेषजमित्याह-तां तां युक्तिमित्यादि ।-युक्किमिति उपायम्, अर्थमिति प्रयोजनम् , अभिप्रेत्येति अधिकृत्य; तेन केनचिदुपायेन कचित्प्रयोजने किंचिद् द्रव्यमौषध भवति, न सर्वत्र । तेन यदुच्यते-वैरोधिकानां सर्वदाऽपय्यत्वेन 'नानौषधिभूत द्रव्यम्' इति वचो विरोधि, वन्न भवति; वैरोधिकानि हि संयोग- संस्कार-देश-कालाधपेक्षाणि भवन्ति, वैरोधिकसंयोगाथभावे तु पथ्यान्यपि कचित् स्युः । यान्यपि स्वभावादेव विप-मन्दकादीन्यपथ्यानि, तान्यप्युपायंयुकानि ऋषित पथ्यानि भवन्ति, यथा उदरे-"तिलं दधात् विषस्य तु" (च. चि. भ. १५) इत्यादि । यत्तु तृण-पांशुप्रभृतीनि नोपयुज्यन्ते, अतो न तानि मेषजानीत्युच्यते तन, तेषामपि भेषजस्वेदाधुपायत्वेन मेपजस्वात् । पार्थिवादिद्व्याणां गुरु-खरादि- गुणयोगाद् मेषजस्वमुक्तं, तेन गुणप्रभावादेव मेपज स्यादिति शङ्कां निरस्यमाह- न तु केवलमित्यादि । द्रव्यप्रभावाद्यथा-दन्त्या विरेचकत्वं, तथा मणीनां विषादि- हन्तृत्वमित्यादि । गुणप्रभावाद्यथा-ज्वरे तिक्तको रस., शीतेऽग्निरित्यादि । द्रव्य-गुणप्रभावाद्यथा-कृष्णाजिनस्योपरीति, अन्नापि कृष्णत्वं गुणोऽजिनं च द्रव्यमभिप्रेतं; यथा वा-"मण्डलैर्जातरूपस्य तस्या एव पयः शतम्" (चि. म. २. पा. ३), तन मण्डलगुणयुक्तस्यैव जावरूपस्य कार्मुकस्वम् । कथं कुर्वन्तीत्याह- तस्तिसिन्नित्यादि । तां ता युक्तिमासायेति तां तां योजनां प्राप्य । यत् कुर्वन्तीत्यादावुदाहरणं यथा-शिरोविरेचनगव्याणि यच्छिरोविरेचनं कुर्वन्ति, तच्छिरो विरेचनं कर्म, येनोष्णस्वादिकारणेन शिरोविरेचनं कुर्वन्ति, तद्वीय, वीर्य शक्तिः, सा च द्रव्यस्य गुणस्य वा, यत्र शिरोविरेचन कुर्वन्ति तदधिकरणं शिर., नान्यत्राधिकरणे शिरोविरेचनद्रव्यं प्रभवतीत्यर्थः; यदेति वसन्तादौ शिरोगौरवादि- युक्त च काले, एतेनाकाले शीते शिरोविरेचनं स्वन्धत्वान्न कार्मुकं, किं तु स्वकाल पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ८९ एष पथा येन प्रकारेण प्रघमनावपीडनादिना, तथा "प्रसारितामुत्तानं शयने संखरास्तृते । इपरप्रलम्बशिरसं संवेश्य चावृतेक्षणम्" इत्यादिना विधिना कुर्वन्ति, स उपायः, यत् साधयम्ति शिरोगौरवशूलाधुपशमं तत् फलं, फलम् गश्यम् । कर्म कार्य साधनम् , उद्देश्य फलं साध्यं यथा-~-यागनिष्पायो धर्मः कार्यवया कर्म, तजन्यस्तु स्वर्गादिरुदेश्यः फलम् ; एवं धमनादिप्वपि कर्माधि- करणायुधेयम् (च. द.)। जगतः स्थावरजङ्गमस्स पावभातिकत्वकथने यो गुणसमाह-अनेनेति । अनेनोपदेशेन जगत्यनौपधभूतं किंचिद्रव्यं नोपलभ्यते । तो दो युति योजनाम्, अर्थ प्रयोजनं च तं तम् अधिोभागदोपहरणादिकम् , भभिप्रेत्य । विविधार्यप्रयोगवशात् सर्वमेव दन्यं मेपजं भवति । तथा च द्रव्याणि गुणैः कर्माणि कुर्वन्ति, गुणानां नियतरवात् कथं तेषां नानाविधं कर्म उपपद्यते इत्यत भाइ-न च स्खल्विति । न च खलु केवलं गुणप्रभावादेव व्याणि कार्मुकाणि कार्यकराणि भवन्ति । किं तर्हि ? ग्याणि द्रव्यप्रभावात् , गुणप्रभावात्, सम्यगुणयोरुभयोः प्रभावाच । तस्मिन् तस्मिन् काले; कालः संवत्सरास्मा, भातुरावस्थाऽपि । तत् तत् अधिष्टानं देशं भूमि देहं चापि । आसाथ प्राप्य । at a युक्किमथं च त समभिप्रेत्य । यत् कुर्वन्ति तत् कर्म मेषजव्यापारः ऊ धो- भागहरणादि । येन क्रियां कुर्वन्ति तत् वीर्य शक्तिः सामर्थ्यम् । यत्र कुर्षन्ति तत् अधिकरण कर्मणः । तम पर्वमहाभूतशरीरिसमवायी पुरुषः । यदा यस्मिन् काले कुर्षन्ति स कालः । कालः संवरसराईमा शीतोष्णवर्पलक्षणः, भातुरावस्थिकश्चापि । यथा येन स्वरस-कल्क-कषायादिप्रकारेण कुर्वन्ति स उपाय । यत् साधयन्ति निष्पादयन्ति तत् फलमारोग्यरूपम् ।xxx। (यो.)। अनेन निदर्शनेन नानौषधीभूतं जगति किंचिद्रव्यमस्तीति कृत्वा तं तं युक्तिविशेषमर्थ चाभिसमीक्ष्य स्ववीर्यगुणयुक्तानि द्रव्याणि कार्मुकाणि भवन्ति । तानि यदा कुर्वन्ति स कालः, यत् कुर्वन्ति तत् कर्म, येन कुर्वन्ति तद्वीर्य, यत्र कुर्वन्ति तद्धिकरणं, यथा कुर्वन्ति स उपायः, यन्निष्पादयन्ति तत् फलंमिति (सु. सू. अ. ४१)। १ 'कर्मकराणि' इति पा० । २ मनेन निदर्शनेन-समस्त द्रव्य पञ्चभूतात्मक हैं, जिस भूतकी अधिकता होती है उसके अनुसार द्रव्योंके पार्थिवादि पॉच मेद होते हैं तथा उनमें विशेष गुण उत्पन्न होते है, इत्यादि द्वितीय सूत्रसे अष्टम सूत्रतक जो विवरण किया गया है उसके अनुसार । नानौषधीभूतम् अनौपधीभूत द्रव्य नास्तीति सम्बन्ध । अनौषधीभूतम् व्याधिहरणके लिये अनुपयोगी या अपथ्यकर । इस शब्दका तात्पर्य यह है कि यदि वैध फ्याधिनिदान और मात्रादि योजनापरिशानमें निपुण हो तो उसको स्थावरजङ्गमाख्य पञ्चभूतारम्ध जगत्में कोई भी द्रव्य यहाँतक कि सर्पविष मी अनुपयोगी या अपथ्यकर नहीं मालूम - । ९० द्रव्यगुणविज्ञानम् । इदानीं सर्वस्यैव जगतः स्थावरजङ्गमाख्यस्य पाचभौतिकरवेन सर्वमापधं क्रिया. गुणयोगादिभिर्दर्शयन्नाह--अनेनेत्यादि । नानोपधिभूतमिति अनौपधिभूतं मन्यं नास्तीति संबन्धः । युक्तिविशेपमिति युक्तिविशेपो योजनाविदोपस्तोयाग्निसंस्कार- वासन-भावना-मात्रा-कालाद्यपेक्षः । अर्थ चेति अर्थ. प्रयोजनं नानाव्याधिनिघांतनम्। वीर्य शक्तिः, शीतोष्णादयो वाऽष्टौ शक्तिमन्तो गुणाः; गुणा गुादयः, भग्ये तु वीर्यप्रधाना गुणा वीर्यगुणाः, ते पुनः सरत्वादयः। कार्मुकाणि कार्यकराणि Ixx। यथेत्यादि । येन स्वरस-कल्क-शत-शीत-फाण्ट-घृत-तैल लेह-मोदकोस्कारिकादिप्रकारेण कुर्वन्ति स उपायः । यदिति स्वास्थ्यमस्वास्थ्यं वा (ड.)। एवं तदुकपार्थिवादि- द्रव्यस्वरूपस्य सर्वस्थावरजङ्गमस्य भेपजताप्रतिपत्तिफळं यथा भवति तदाह- अनेनेत्यादि । निदर्यते पार्थिवादीनां स्वरूपमनेनेति निदर्शनमागमः, तेनागमेनेति अनन्तरोक्तपार्थिवादिद्रव्यस्वरूपप्रतिपादकेनागमेन । नानापधभूतमिति प्रतिपेपर- येनौषधरूपमित्यर्थः । एतदौपधत्व सर्वव्याणां यथा भवति, यत्र घ भवति, तदाह-इति कृत्वा तं त युक्तिविशेषमित्यादि । इति कृत्वेति सर्वमापधभूतं द्रव्य- मिति वचनेन । युक्तिविशेषाणां सर्वनाना प्रत्यवमर्शः । युक्तिविशेपमिति योजना. प्रकार; स च योजनाविशेपो वाय भाभ्यन्तरश्च शास्त्रे उक्तो वक्ष्यमाणः कालायपेक्षः। अर्थमिति साध्यं, तच्च नानाव्याधिघातेन सुस्थपालनविशेषरूपम् । स्ववीर्य-गुणयुक्का- नीति स्वशक्त्या प्रभावेण गुणेन च युक्तानि रस वीर्य-विपाकयुक्तानीत्यर्थः, कार्मुकाणीति कर्मणि समर्थानि; किंवा स्ववीर्यगुणयुक्तानीति स्वकीयकार्यकरधर्मयुक्तानि; कार्यक्षम हि द्रव्यधर्म 'येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम्' इत्यनेन वक्ष्यति; गुणशब्दोऽयं धर्मवचनः । एतदेवोकं युक्त्यपेक्षकार्यविशेपे वीर्यगुणयुक्तस्य द्रव्यस्य कर्तृत्वं मेदेन दर्शयबाह- तानि यदेत्यादिना यावत् तत् फलमित्यन्तेन । यदेति नित्यगे चावस्थिके च काले; तत्र नित्यगे काले यथा-"साधारणेतुपु वमनादीनां प्रवृत्तिः" (च. वि. ८) इत्यादि भावस्थिके यथा-ज्वरितावस्थायां ज्वरहरणपाचनादि, इयं कालापेक्षा युक्तिरेव भेषजस्य । यत् कुर्वन्तीति दोपहरणादि तत् कर्म; यथा-त्रिदुरसर्गतो दोपहरणं करोति, खदिरः कुष्ठं हरतीत्यादिः तेनैतत् स्वकार्ये द्रव्याणां सामर्थ्यमन्य- होगा। व्यवहार में भी इस प्रकारकी कहावत प्रसिद्ध है-"अमन्नमक्षर नास्ति, नास्ति मूल- मनौषधम् । अयोग्य पुरुपो नास्ति, योजकस्तत्र दुर्लम. ॥" युक्तिविशेष-योजनाविशेप । इस योजनाविशेषमें मौषधिके वायप्रयोगके समय अभ्या-वेद-प्रदेह-परिपेकादिका विचार और अन्त प्रयोगके समय मात्रा-काल-क्रिया-भूमि-देह-दोष गुणान्तरका (प्रधानतया ) विचार होता है । अर्थ-प्रयोजन । "प्रयोजन चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् , मातुरस्य विकारप्रशमनं च" (च सू अ. ३०)। अभिसमीक्ष्य-अमिसमीक्ष्य 'प्रयुक्तानि' इति शेष.। स्ववीर्यगुणयुक्तानि अव्यापन्नवीर्यगुणयुक्तानि । कार्मुक-कर्मणे प्रभवति उकन् , कार्यकर (डॉ. मा. गो. घाणेकरजी कृत सश्रुतन्याख्या, पृ. २२६)।- पूर्वार्धे द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्यायः । ९१ .. । - प्राप्रसिरिस्यादि । भनेन च तं समर्थ मिति व्याकृतम् । येनेति प्रभावेण, रसेन, वीर्येण, विपाकेन वा; अयं च वीर्यशब्दः पारिभाषिकवीर्यवचनो न भवति; किंतु शक्तिमात्रवचनः; यदुकं चरकेऽपि-"नापीयं कुरते किचित् सर्वा वीर्यवती किया" (च. सू. म. २६) इतितेन प्रभावरसादयः सर्व एव स्वकार्य कुर्वन्तो द्रव्यस्य शक्तिपर्यायरूपयीयवाच्या इति शेयाः । एतय येन कुर्वन्ति तवीर्यमिति वयनं स्ववीर्यगुणयुकानीत्यस्य व्याकरणम् । यथा कुर्वन्ति स उपाय इति यथा सरस-करकादिना सोयामिसंस्कार-वासन-भावना-मात्रादिना च कृर्षन्तीति ज्ञेयम् । एतदपि स्वरसाधपेक्ष्ययुक्तिय्याकरणमेव । यभिप्पादयन्तीति भारोग्यविशेप, स्वास्थ्या- नुवृत्तिविधायकं वा, रसायनफलं वा, तत् सपं फलं सुखयुक्तग्वेन दुःखविवर्जितरवेन वा पुरुषस्य नसर्गिकेच्छाविपयः । तोहारोग्यं, स्वास्थ्य वा । कर्म तु दोपहरण-दाह- छेदादिफलसाधकमिति कर्म-फलयोर्विशेषः । यग्निप्पादयन्ति तत् फलमित्यनेनापि तं तममित्यस्य व्याकरणं ज्ञेयम् । अत्र सर्पद्रव्यमेपजस्वकयनं विपाग्निप्रभृतीनामपि तत्र तत्र साध्ये क्वचिद्विहितस्वाधुक्तमेव; येन विपमपि विपहरणे उदरे च विधीयत एक । यत्तु मधु-घृतादि संयोगादिना विरन्द्धं तत् प्रत्येकं मेप पचिगवत्येव, संयुक्त च रोधिकत्वाद् मेपर्ज न भवतीति न काचित् क्षतिः । न यत्र सर्वथा द्रव्याणां भेपजत्वमेव करिपतं, किं तु विवक्षितयोजनादियुक्तत्वेन चेति (च, द.) । उत्पत्तिमन्तः सर्व एव हि क्षित्यादयो भावाः सूक्ष्माणां क्षित्यादीनां समुदायाभि- निर्वृत्ततयोक्तलक्षणाः, तदिदमुच्यते-अनेनेति । निदश्यते विज्ञायते द्रव्याणां स्वभावोऽनेनेति निदर्शनं शास्त्रम् । तदयमर्थ:--अनेन निदर्शनेन, 'तत्र स्थूलसार'- इत्यादिना 'लाघवकरम्' इत्यनेन अन्थेन, जगत्यनौपधीभूतं न किंचिगव्यमस्तीति कृत्वा निश्चितम्' इति शेषः । तं तमिति युज्या समाकृष्टतया "तत्र विरेचनद्रव्याणि" (सु. सू. अ. ४२) इत्यादिना अनन्तर वक्ष्यमाण युक्तिविशेपम्, ते तमर्थ विपयं व्याधिविशेपं चेति यावत्, अभिसमीक्ष्य प्रयुक्तानि स्ववीर्यगुणयुक्तानि गुणवन्ति द्रव्याणि कर्मकराणि भवन्तीति योजना Ixxx। (हा.) इत्थं च नानौषधभूतं जगति किंचिद्रव्यमस्ति विविधार्थप्रयोगवशात् ॥ (अ. स. सू अ. १७)। इत्यम् एवं स्थिते, जगति तद्न्यं नास्ति यदीपधत्वेन नोपयुज्यते । कुतः नानाविधार्थप्रयोगवशात् । अर्थः प्रयोजनं, प्रयोग उपयोगः । तेनैतदुक्तं भवति- विचित्रितो भावः स्वभावः तेन यद्यत्रापथ्यं तत्तत्रैव प्रयोजनान्तरेण पथ्यम् । तथा यत् पानेऽपध्यं तदभ्यङ्गे पथ्यम् । एवं मात्रादिविशेपो विकल्पनीय. । तेन भस्मपा- स्वादीनामपि प्रयोजनवशेनौपधत्वम् (इन्दु.)॥ . ? -- + lubs ९४ द्रव्यगुणविज्ञानम् शानी उपासना करनी শ্রী মি মা এর परते, RAM 1982 -चप्राय, गुना . पक्त्वाऽऽमं पावकं कुर्यात् तत्तु दीपनमुच्यते । कुर मतम् ॥ अथ जिज्ञासा-पाचनदीपनयोः को भे मामादीस्तद्विपाचयेत् । तदुक्तं पाचनं द्रव्य, यथा कथं नाम पाचनो नास्ति दीपनः । वाय्वग्नि औषण्यात् कटुविपाकित्वात् पाचनोऽयमुदाहृतः। मतः ॥ कृष्णात्रेयात्-"यदग्निकृत् पचेन्नाम है स्याधथा वक्ष्यामि लचनम् ॥” इति । लखनपार तद्यथा-"संशोधनानविसाव-सहयोजन-लद्वन दिमाचरेत् ॥ स्रोतसां कफदुष्टाना निर्मलीकरणं', पाचनमिष्यते ॥ जिज्ञासा वर्तते चान पाचने वदतांवर । दोपान पचति माम वा सप्त- धातूनथापि वा ॥ दोपपाकाद्धातुपाकान्मरणं दृश्यते तदा । इति सर्वत्र कथितः पाचनो दोपपाचनः ॥" । अस्योत्तरम्-स्वहेतूपचितान् दोपान् सामान् रसपथा- नुगान् । रसमामं पाचयित्वा कुर्याहोपं पृथक् ततः ॥ स एव पाचनो ज्ञेयो न च दोषान् विपाचयेत् ॥ अत्राह-दोपस्य पाको दृश्येत अर्धाधोगमनं तथा । भति- प्रवृद्धवातस्य पित्तस्य श्लेष्मणस्तथा ॥ पाचनीयेन द्रव्येण दृश्यते पाचनं तथा । वमनीयेन द्रव्येण दृश्यते वमनाद्यपि ॥ मत्रोच्यते-स्वयोनिवर्धनद्रव्यः सुरा-तफ-जलासवै. । घृतादिभि. प्रवृद्धास्ते प्रकृत्या वृद्धिमाप्नुयुः ॥ यथा क्षीरे जई क्षिप्तं क्षीरवद् दृश्यते बहु । सुस्वादुगुणनिर्मुक्तं भसाग्नितपनात् पुनः ॥ जले दग्धे भवेत् क्षीरं तत् स्वादु स्वगुणैर्युतम् । तथाऽत्र धातुसंश्लिष्टा. सामाः स्वहेतुदूपिताः ॥ लङ्घनात् पाचनोल्लेखात् स्वप्रमाणं भजन्त्यपि । पच्यन्ते नैव दोषास्तु पचन्त्यामर- सादयः ॥ कुर्याझ वह्निमाम यत् पचेत्तत् पाचनं मतम् ॥ न शोधयति यहोवान् समानो दूषयत्यपि । शमन तद्विजानीयात्, को मेदः स्वस्थरक्षणात् ॥ अत्रा- हात्रिः-"क्षयस्थाने विवृद्ध्यर्थं दोपाणा यत् प्रयुज्यते । विना संशोधनगन्यैस्तत् संशमनमुच्यते ॥" । तच्चानुलोमनं द्रव्यं यद्वातमनुलोमयेत् । यद्वन्धभेदनं कृत्वा मलान् पक्कानयत्यधः । संसनं तद्विजानीयाद् , भेदनं प्रोच्यते यतः ॥ अधो नयति यद्वद्धमबद्धं भेदनं मतम् । मलं पक्कमपर्क यद्विद्रव्य पातयत्यधः ॥ श्लेष्मपित्ताधपक्क यदुवं नयति वामनम् । दोपानुन्मूलयति यच्छुिष्टांस्तच्छेदनं बलात् । उष्णस्वा- द्दीपनं यच्च पाचनं पाहि तद्भवेत् । लघुपाकात् कपायवानवेद्यत् स्तम्भनं हि तत् । रसायन तदुद्देश्यं जराव्याधिविनाशि यत् ॥ द्रव्येण येन हर्षः स्यात् स्त्रीषु वाजीकरं हि तत् । यसाच्छुक्रस्य वृद्धि. स्याच्छुकलं हि तदुच्यते । यथाऽश्वगन्धा मुशली शर्करा च शतावरी । प्रवर्तकानि कथ्यन्ते जनकानि च रेतसः ॥ शुक्रप्रवर्तनी योपा, क्षुद्रा शुक्रस्य रेचनी । तस्स्तम्भकृजातिफल, कालिग तत्क्षयप्रदम् ॥ तनुच्छि- नेषु सूक्ष्मेषु विशेद्यत् सूक्ष्ममुच्यते । तद् व्यवायि तनुं व्याप्य पूर्व यत् पाकतां ।
पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । ९५ प्रजेत् ॥ विकासि तयत् करोति बन्धान् संधिस्थितान्छुथान् । हस्तपादाञ्छिथि- भयेद् भवेच्छेमि च तन्मतम् ॥ यदुद्धिनाशने दक्षं मदकारि तदुच्यते । धीर्येण दोपान् स्रोतास्थान निरस्यति प्रमाथि तत् ॥ रुणद्धि गौरवाद् द्रव्यं ग्ध्यादस- वहाः सिराः । कलेवरे गुरुवं च धत्तेऽमिप्यन्दि सन्मतम् ॥ उदाहरणमेतेषां क्रमाद् द्रग्येण यक्ष्यते । दीपनश्चिनको ज्ञेयः, पाचनं नागकेसरम् ॥ गुडुची शमनी शेया, हरीतक्यनुलोमिनी । संसनं कृतमालः स्वाद, भेदिनी कटुरोहिणी ॥ रेचनी त्रिवृता क्षेया, मदकारि सुरादिकम् । योगवाहि विषं ज्ञेयं, प्रमाथि मरिचं स्मृतम् ॥ दृध्य- भिप्यन्दि विशेयं सिराणां सन्निरोधनात् (टोडरानन्द-तृतीयहर्ष)॥ इति आचार्योपाहेन निविक्रमात्मजेन यादवशर्मणा विरचिते द्रव्यगुणविज्ञाने पूर्वाध द्रव्यविज्ञानीयो नाम प्रथमोऽध्याय. ॥१॥ - गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः। पूर्वाध्याये द्रव्यं स्वरूपतो भेदतश्च व्याख्यातम् । अग्रे रस-विपाक-चीर्याण्यभि- धेयानि । तत्र रस-वीर्य-विपाकानां गुणरूपत्वात्तद्याख्यानतः पूर्व गुणा एव लक्षणतो मेदतश्च निरूपणीया भवन्ति । अतस्वनिरूपणार्थ गुणविज्ञानीय भारभ्यते- अथातो गुणविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामो यथोचुरात्रेयधन्व. न्तरिप्रभृतयः॥ पहले अध्यायमें द्रव्यका स्वरूप और उसके मेद विस्तारसे कहे गये हैं। आगे रस, विपाक और वीर्यका निरूपण करना है। रस, विपाक और वीर्य ये भी गुणविशेष ही है । अत: उनका व्याख्यान करनेके पहले आयुर्वेदोक्त समग्र गुणोंका निरूपण करना आवश्यक है । इसलिए गुणविज्ञानीय अध्यायका आरम्भ किया जाता है । द्रव्यगुण- विज्ञानशास्त्रमें रस, विपाक, वीर्य ये गुणरूप होनेपर भी विशेष ज्ञातव्य विषय है और उनके विषयमें बहुत कहनेका है, अत: उनका निरूपण एक-एक स्वतन्त्र अध्यायमें ही किया जायगा । इस अध्यायमें शेष गुणोंमसे जो आयुर्वेदमें विशेष ज्ञातव्य है उनका विस्तारसे और अन्योंका सक्षेपसे निरूपण किया जायगा। गुणलक्षणम्- समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः॥ (च. सू भ. १)। समवायीति समवायाधेयः (च. द.) । गुण. समवायी द्रव्यसमवायी । द्रव्यसमवायवान् गुण. कारणं भवति । समवायिकारणं द्रव्यमपीत्यत माह- निश्चेष्टस्विति । तुकारो द्रव्याद् व्यवच्छिनत्ति । नास्ति चेष्टा यस्य स निश्चेष्टः निष्क्रियः । निर्गुणश्वापि "गुणा गुणाश्रया नोक्ता" (च. सू. म. २६) इति ।
द्रव्यगुणविज्ञानम् । द्रव्यं गुणकर्माश्रयः, गुणस्तु गुणकर्मानाश्रय इति दम्पसो भेदः (यो.)1xxx प्रमादिनस्तु वैशेपिके कणादोक्तगुणलक्षणं "भूख्याधण्यगुणवान् संयोग-दिमागे- प्वकारणमन्यापेक्षो गुणः" इति गुणलक्षणं वा गुण-कर्मणी भसमयापिकारणे भवत इत्याहुः, तेपामयं हि प्रमादः । सूत्ररकणादेन सगायिकारणमिति पूर्वानुमचे समवायिकारणपद 'दच्याश्रयी' इत्यादिसूत्रं कृतम् । तेन 'दम्यावरणगुणवान संयोगविभागप्वकारणमन्यापेक्षः कारणं गुण.' इति गुणलक्षणं पयंचसितम् । मदिदि गुणो गुणान्तरस्य समवायिकारणं न भवति कथं तर्हि "गुणाश्च गुणान्तरमारमन्से" (१११११०) इति वचनं तय कणादेनोकं सगटते । गुणा दन्याश्रिता स्प. रसादयः सत्चन्यापेक्षाः स्वाश्रयद्रव्यनिष्टफियापेक्षा. स्वाश्रयदम्पनिहक्रिपया परिणमन्तः कचित् साधारणभूता पृथक्वगुण समवायेनापमाना. एयाभूप तेजोम्बु-भूमिपु लोहित-शुक्ल-कृष्णरूपेण मधुराम्लादिरूपेण गुणान्तरहीनाः मम्तो द्रव्याश्रयिणः सन्तश्च समवयन्ति कायें, इति समयायिन एव कारणानि गुणाः । न च ते स्वाश्रयद्व्याणां संयोगविभागेपु कारणानीति लक्षणसमन्वयः (ग.) ॥ द्रव्याश्रय्यगुणवान् संयोगविभागप्वकरणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम् ॥ (व द. अ. १, आ. १ सू. १६)। यो द्रव्यमाश्रयति, न गुणवान् , न चानपेक्षः सन् संयोगविभागेपु कारणं भवति, सोऽय गुणः । कश्च सयोगविभागेप्चनपेक्ष. कारण ? फर्मत्याए । कर्म संयोगविमागो जनयत किञ्चिदपेक्षते, सयोगविभागी त्वपेक्षेते किञ्चिदिति । द्रव्य नाम दग्यमा- श्रयदपि गुणवदेव भवति न स्वगुणवत् । कर्म स्विस्थंभूतमपि कर्मत्र । गुणस्त दम्प माश्रयति न गुणवानो खल्वपि कर्मेति (चन्द्रकान्तभाष्यम् ) ॥ अथ द्रव्याश्रिता शेया निर्गुणा निक्रिया गुणाः ॥ . कारिकावली गुणप्रन्य। जो द्रव्यमें आधेय (आश्रित) रूपसे रहता हो, चेष्टारहित हो, या चेष्टा( मिया)रूप जो कर्म उससे भिन्न हो, गुणरहित हो, और स्वसमान गुणकी उत्पत्ति, कारणभूत (समवायी कारण ) हो, उसको गुण कहते है । तात्पर्य कि-जो द्रव्यमें आश्रय करके । १ द्रव्य और गुणका जो परस्पर सवन्ध है उसको समवाय संबन्ध कहते हैं- “समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीना गुणैर्मत." (च सू. अ. १)-पृथिव्यादिका गुणोंके साथ जो अपृथग्भाव (नित्य साथ रहना ) उसको समवाय सबन्ध कहते हैं। गुण द्रव्यमें समवाय. सवन्धसे रहता है (समवायाधेय.) (च. द.)। द्रव्य और गुणके समवायमें द्रव्य आधार- रूपसे और गुण आधेय(आश्रित) रूपसे रहता है। ।
। पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । ९७ - - रहा हुआ (द्रव्याश्रयी) हो, गुणरहित' हो, जो कर्मरहित या कर्मसे मिन हो और जो वसमान गुणान्तरकी उत्पत्तिमें समवायिकारण हो, उसे गुण कहते हैं। भवन्तनागार्जुनविरचित रसवैशेषिकसूत्रमें गुणका लक्षण एक और ही प्रकारका कहा गया है। जैसे- विश्वलक्षणा गुणाः (र. वै. अ. १, सू. १६८) ॥ विश्वं विकीणं भिनं लक्षणं येषां ते विश्वलक्षणा गुणाः । इदमत्रोक्तं भवति-- शेपाणां पञ्चानां (द्रव्य-रस-वीर्यविपाक-कर्मणां) पदार्थानामेकलक्षणावरोधो विद्यते । यथा-शब्दादीनामाश्रयत्वं सर्वगव्यभेदानां तुल्यम् , आस्वादग्राह्यावरोधश्च रसमेदानां, कर्मलक्षणावरोधस्वं वीर्याणां, विपाकयोश्च परिणामलक्षणावरोधस्तुल्यः; गुणानामेवमेकलक्षणावरोधो नास्ति । यथा-शीतोष्णादयः स्पर्शनेन्द्रियस्य ग्राह्याः, स्निग्ध-रुक्षौ चक्षुर्यायो स्पर्शनेन्द्रियग्राह्यौ वा, एवं सर्वे एकलक्षणावरोधं न गच्छन्ति गुणाः । यस्मादेवमेकलक्षणावरोधं न गच्छन्ति तस्मादेवतेषामतुल्यं विकीर्णलक्षणत्वमेव लक्षणमिति । चतुर्पु वासस्सु स्थितेषु त्रीणि चिह्रिवान्येकम- चिहितं, तदेव तस्याचिह्नितत्वं तेषु चिहं भवति, तद्वदिहापीति; लक्षणलक्षितेव- लक्षणलक्षितरवाल्लक्षणप्रसिद्धिरिति (भा.)॥ जिनका लक्षण विश्व (विकीर्ण-भिन्न ) हो, वे गुण हैं । गुणको छोड़कर अन्य पदार्थ द्रव्य, रस, वीर्य, विपाक और कर्म इन प्रत्येकका एक एक लक्षणमें अवरोध होता है। जैसे-शब्दादिकोंका जो आश्रय वह द्रव्य, रसनेन्द्रियसे जिसका प्रहण हो वह रस, कर्मलक्षण वीर्य, परिणामलक्षण विपाक; इन लक्षणोंमें जैसे समस्त द्रव्यमेद, रसमेद, वीर्यमेद और विपाकमेदोंका अवरोध होता है, ऐसा गुणका कोई एक लक्षण नहीं है जिसमें सब गुणोंका अन्तर्भाव होता हो। क्योंकि शीतोष्णादि स्पर्शनेन्द्रियग्राय है, स्निग्ध और रूक्ष चक्षुर्माह्य या स्पर्शनेन्द्रियग्राह्य हैं, इस प्रकार सव गुणोंका एक ऐसा लक्षण नहीं बन सकता, जिसमें सव गुणोंका अवरोध होता हो । अतः वे विश्वलक्षण-भिन्नलक्षणवाले हैं, और वही उनका लक्षण है। १ क्योंकि गुण द्रव्योंमें रहते हैं, गुणोंमें गुण नहीं रहते। २ क्योंकि कर्म भी द्रव्यको आश्रय करके ही रहते हैं, गुणोंमें नहीं रहते (क्रियागुणवत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम् । द अ. १, आ. १, स्. १५)। ३ द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारमन्ते गुणाश्च गुणान्तरम् (वे. द. अ. १, आ. १, सू. १०) । अन्यद्रव्य द्रव्यान्तरम् । येनारभ्यते यच्चारभ्यते तदु- भयमपि द्रव्यमिति सजातीयमारभन्ते द्रव्याणि। पृथिवी पृथिवीजातीयमापोऽन्जातीयमिति, एतेन गुणा व्याख्याता ।xxx। अथापि खल नाय नियमो द्रव्येण सत्ता सजातीय द्रव्यमार- धव्यमिति । किन्तु द्रव्य द्रव्यमारममाण सजातीयमारभते न विनातीयमिति । एतेन गुणस्य गुणारम्भकत्व व्याख्यातम् (चं. कां. भा.)। यहाँ क. गङ्गाधरजीके मतसे गुणको समवायिकारण लिखा है । वैशेपिकवाले गुणको समवायिकारण नहीं मानते ॥ ० पू.७ । वे. ।
९८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । -- गुणाः प्रोक्ता गुणसंख्या- सार्था गुर्वादयो वुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः । (च. सू. अ. ११) संप्रति गुणानिर्देष्टुमाह-सार्था इत्यादि । अनेन निविधा अपि वैशेषिकाः, सामान्याः, आत्मगुणाश्वोद्दिष्टाः । तत्रार्थाः शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः । यदुकम्- "अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विपया गुणाः" (च. शा. अ. १) इति । एते च वैशेपिकाः; यत आकाशस्यैव शब्दः प्राधान्येन, वायोरेव स्पर्शः प्राधान्येन, एवमग्न्यादिषु रूपादयः । भन्यगुणानां चान्यत्र दर्शनं भूतान्तरानुप्रवेशात् । वचनं हि-"विष्ट ह्यपरं परेण" (न्या. द. अ. ३, आ. १, सू. ६६) इति । गुर्वाद- यस्तु गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल- लक्षण-खर-स्थूल-सूक्ष्म सान्द्र-द्रवा विंशतिः। एते च सामान्यगुणाः, पृथिव्यादीनां साधारणत्वात् । एते यज.पुरुपीये प्राय आयुर्वेदोपयुक्तस्वात् परादिभ्यः पृथक पठिताः । वुद्धिः ज्ञानम् ; अनेन च स्मृति-चेतना प्रत्यहङ्कारादीनां बुद्धि विशेषाणां ग्रहणम् । प्रयतोऽन्ते येषां निर्देशे ते प्रयत्नान्ताः, एतेन चेच्छा-द्वेष-सुख-दुःख- प्रयत्नानां ग्रहणम् । वचनं हि-"इच्छा द्वेप. सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना पृतिः । घुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मन." (च. शा. भ. १) इति (एते चास्म- गुणाः) । इह चेतनादीनां बुद्धिग्रहणेनैव ग्रहणं, शारीरे तु चेतनादीनामपि पृथगा- स्मगमकत्वेन पृथक् पाठः । एतच्च तत्रैव व्याकरणीयम् । परादयो यथा-"परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च । विभागच पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणाः प्रोक्ताः परादयः" (च, सू. अ. २६) इति । एते च सामान्यगुणा अपि नात्युपयुक्तत्वात्तथा बुद्धिप्राधान्याप्चान्ते प्रोक्ताः । प्रोका इति प्रकर्पण विशेषगुणत्वादिनोता. (च. द.)। गुणानाह-सार्था इत्यादि । अथैः सह वर्तमानाः सार्थाः ।xxx। अर्था इन्द्रियाणामर्थाः शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः । xxx मनसश्च अर्थः चिन्त्यादि. । तथा च-"विन्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च । यत्किंचिन्मनसो ज्ञेयं तत् सर्व यर्थसंज्ञकम्" (च. शा. भ..) इति । मनसः अर्थोऽपि इह गुणः । अस्य गुणत्ववचनं पुनरिन्द्रियोपक्रमणीयेऽपि तथा च-"मनो मनोऽर्थो बुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्मद्रव्य-गुणसंग्रहः" (च, सू. म. ८) इति ।xxx। कणादेनाप्युक्तं-"रूप-रस-गन्ध-स्पर्शाः संख्याः परि- माणानि पृथक्त्व संयोग-विभागौ परत्वापरत्वे बुद्धयः सुख-दुःखे इच्छा-द्वेषौ प्रयनाम गुणा. ॥" (वै. द. १३१६) इति (यो.)। गुर्वादय इति एते आविष्कृततमा एव यज्ज.पुरुपीये उत्का., तेन गुणानामसंख्येयत्वादन्येऽपि ज्ञेयाः । अत एव प्रमेहे श्लेष्मगुणेषु भच्छत्वादयो गुणा. पख्यन्ते । एते च गव्याश्रिता वैद्यनये गुणस्वेन परिभाष्यन्ते (शिवदाससेनः)॥ ।
पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः। ९९ । A , श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियोंके पाँच विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ), सूत्रस्थानके यजःपुरुषीय (२५ ३) अध्यायमें कहे हुए गुरु आदि वीस गुण (गुरु, लघु, शीत; उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, लक्ष्ण, खर, स्थूल, सूक्ष्म, सान्द्र, द्रव), बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, प्रयत्न, परत्व, अपरल, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्तव. परिमाण, सस्कार और अभ्यास, ये ४१ गुण हैं। वक्तव्य-इनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच वैशेषिक गुण कहलाते हैं क्योंकि शब्दादि क्रमसे' आकाशादि पाँच भूतोंके एक-एक विशेष गुण हैं । एकके गुण जो दूसरे भूतमें देखे जाते हैं वे भूतान्तरके अनुप्रवेशसे होते हैं । गुर्वादि द्रवान्त- २० सामान्य गुंण कहलाते हैं, क्योंकि ये पृथिव्यादि पाँचों महाभूतोंमें सामान्यतया रहते हैं । वुद्धिशब्दसे स्मृति, चेतना, धृति, अहंकार आदि बुद्धिविशेषोंका मी ग्रहण होता है । बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दु ख और प्रयत्न ये छ आत्मगुण कहलाते हैं । परखादि दस भी सामान्य गुण हैं, परन्तु गुर्वादिकी अपेक्षया आयुर्वेदमें कम उपयुक्त होनेसे वे अन्तमें कहे गये हैं (च. द.) । कविराज योगीन्द्रनाथसेनजीने पाँच इन्द्रियों के पाँच विषयोंके साथ छठे मनके अर्थ चिन्त्य-विचार्य आदिका भी अर्थोंमें प्रहण किया है, क्योंकि “मनो मनोऽथों वुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्मद्रव्य-गुणसग्रह" (च. सू. अ. ८) इस सूत्र में मनके अर्थों का भी अध्यात्मगुणोंमें उल्लेख है । इस प्रकार 'मनोऽर्थ'को लेकर योगीन्द्रनाथसेनजीके मतमें गुणोंकी संख्या ४२ होती है। शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-विशद-पिच्छिल-गुरु-लघु-मृदु-तीक्ष्णा गुणाः कर्मण्याः (र. वै. अ. ३, सू. १११)॥ रसपदार्थः सर्वथा परीक्षितः । इदानीं गुणपदार्थः परीक्ष्यते । एते शीतादयो गुणाः कर्मण्या इति कर्मणि चिकित्सायां पृथक् पृथक् शास्त्रे योग्या इत्युद्दिष्टाः । रसादयोऽपि गुणा इति वानिकस्य गुणाभिधानस्य ज्ञापनार्थ 'कर्मण्या गुणाः' इति वचनम् (भाष्यम्)॥ भदन्तनागार्जुनने रसवैशेषिकसूत्र में शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विशद, पिच्छिल, गुरु, लघु, मृदु और तीक्ष्ण इन दस गुणोंको कर्मण्य (चिकित्साकर्ममे विशेष योग्यता रखनेवाले) गुण वताया है। चरक सुश्रुत आदिमें अष्टविधवीर्यवादीके मतमें नागार्जुनोक्त कर्मण्य गुणोंको वीर्य . १ कविराज गङ्गाधरजीने गुर्वादि द्रवान्त वीस गुणोंको शारीरगुण कहा है । क्योंकि इन गुणोंका शरीर और शरीरपर प्रयुक्त होनेवाले द्रव्योंसे ही विशेष सवन्ध है "गुर्वादय. इति गुरु xxx द्रवा इति विंशति. शारीरगुणाः स्वय वक्ष्यन्ते" इति (ग.)।
1 १०० - . द्रव्यगुणविज्ञानम् । माना है। परन्तु नागार्जुनने वीर्यशब्दसे छर्दनीय, अनुलोमनीय आदि मिने ही वीर्य वताये हैं। अत. परसामर्थ्यसंपन्न शीतादिको नागार्जुनने कर्मण्य गुण माना है। अर्थनिरूपणम्- अर्थाः शब्दादयो शेया गोचरा विपया गुणाः ॥ (च. शा. अ. १) अर्थ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच इन्द्रियों के विषय ) प्रसिद्ध है और इनमें रसको छोड़कर शेष चार अर्थोंका विशेष विचार शारीरक्रियाविज्ञान और मनोविज्ञानका विषय है, द्रव्यगुणविज्ञानका प्रधान विषय नहीं है, अत: उनका यहाँ विशेष विचार नहीं किया जाता । इन पाँच विषयोंके अन्तर्गत रसका आगे रसविक्षा- नीय नामके तृतीय अध्यायमें विस्तारसे वर्णन किया जायगा। गुर्वादिविंशतिगुणनिरूपणम्- तस्य (द्रव्यस्य) गुणाः शब्दाद्यो गुर्वादयश्च द्रवान्ताः ॥ (च. सू. अ. २६)। स (आहारः) विंशतिगुणः-गुरु-लघु-शीत-उष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द- तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल- सान्द्र-द्रवानुगमात् (च. सू. अ. २५) ॥ गुरु-लम्वादयो युग्माः परस्परविरोधिनो ज्ञेयाः । अनुगमादिति अनुगतत्वात (च. द.)। सुश्रुतस्तु व्यवायीति विकासीति च गुणद्वयं पृथक् पठति ।xxx। अनयोः सर-तीक्ष्णप्रकर्षात्मकतया इह सर-तीक्ष्णयोरवरोधः (यो.)॥ गुरु-मन्द-हिम-स्निग्ध-लक्ष्ण-सान्द्र-मृदु-स्थिराः । गुणाः ससूक्ष्म-विशदा विंशतिः सविपर्ययाः॥ इन्द्रियार्था व्यवायी च विकाषी चापरे गुणाः । व्यवायी देहमखिलं व्याप्य पाकाय कल्पते ॥ विकापी विकषन् धातून संधिवन्धान विमुञ्चति । सर-तीक्ष्णप्रकर्षों तु कैश्चित् तौ परिकीर्तितौ ॥ सत्त्वं रजस्तमश्चेति त्रयः प्रोक्ता महागुणाः । (अ. स सू. अ. १)। तदेव च द्रव्यमाश्रिता विशतिर्गुणा गुर्वादयः सविपर्ययाः सविपरीताः । गुरुः लघुः, मन्दः, तीक्ष्णः, हिमः, उष्णः, निग्धः, रूक्षः, श्क्ष्णा, परुषः, सान्द्रः, द्रवः, मृदुः, कठिनः, स्थिरः, चलः, सूक्ष्मः, स्थूलः, विशदः, पिच्छिलः । खरादयः स्वेतद्देदा एव यथासभवं व्याख्येया.। एतेभ्योऽन्ये गुणा इन्द्रियार्थाः शब्दादयः, व्यवायी, विकापी च । इन्द्रियार्थानां प्रसिद्धत्वात् लक्षणं नोच्यते । सर्व देहं च्याप्य यत् पाकं याति स व्यवायी, विकापी धातून विकपन हिंसन् संधियन्धानु.
- पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः। १०१ पलेपादिकान् विमुञ्चति नाशयति । कैश्चिदाचार्यव्यवायी सरस्वैव प्रकर्ष इति परिकल्पितः, विकापी तीक्ष्णप्रकपंखथा । सत्वं रजस्तमश्च तने व्यवहाराथं महागुण- शब्देनोकाः (इन्दु)॥ गुरु-मन्द-हिम-स्निग्ध-लक्ष्ण-सान्द्र-मृदु-स्थिराः। गुणाः ससूक्ष्म-विशदा विंशतिः सविपर्ययाः॥ (अ. ह. सू. अ. १)। द्रव्यस्य गुणानाह-तत्र द्रव्ये गुर्वादयो दश गुणाः सविपर्यया विंशतिज्ञेयाः । एपां फ्रमाद्विपरीता लघु-तीक्ष्णोष्ण-रुक्ष-खर-द्रव-कठिन-सर-स्थूल पिच्छिलाः । गुरु, सद्विपर्ययो लघुः । मन्दः, वद्विपर्ययस्तीक्ष्णः । हिमः, तद्विपर्यय उष्णः । सिग्धः, तद्विपर्ययो रूक्षः । श्लक्ष्णः, तद्विपर्ययः सरः । सान्द्रः, तद्विपर्ययो द्रवः । मृदुः, तद्विपर्ययः कठिनः । स्थिरः, तद्विपर्ययः सर. । सूक्ष्म, वद्विपर्ययः स्थूलः । विशदः, तद्विपर्ययः पिच्छिला (अ. द.)। गुणमैदानाह-गुरु-मन्देत्यादि । ते च विंशतिः । तत्र गुर्वादयो दश, तद्विपर्ययाश्च लघु-तीक्ष्णोष्ण-रुक्ष-खर-द्रव-कठिन-चल- स्थूल-पिच्छिला दश । यस्य द्रव्यस्य बृंहणे कर्मणि शक्तिः स गुरुः, लद्धने लघुः, शमने मन्दः, शोधने तीक्ष्णः, स्तम्भने हिमः, स्वेदने उष्णः, क्लेदने स्निग्धः, शोषणे रुक्षः, रोपणे श्क्ष्णः, लेखने खरः, प्रसादने सान्द्रः, विलोडने द्रव., श्लयने मृदु, ढने कठिनः, धारणे स्थिरः, प्रेरणे चलः, विवरणे सूक्ष्मः, संवरणे स्थूलः, क्षालने विशदः, लेपने पिच्छिल इति । ननु व्यवायि-विकाश्याशुकारि-प्रसन्न-सुगन्धादयः सविपर्ययाश्चान्येऽपि गुणा दृश्यन्ते । तद्यथा स्वयमेवाह-(नि. म. ६)-"तीक्ष्णोदण- रूक्ष-सूक्ष्माम्ल-व्यवाय्याशुकरं लघु । विकाशि विशदं मयमोजसोऽस्माद्विपर्ययः ॥"; चरकः (सू. म. २७)-"स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं वहल लक्ष्ण-पिच्छिलम् । गुरु मन्दं प्रसनं च गव्य दशगुणं पयः ॥ तदेवगुणमेवौज. सामान्यादभिवर्धयेत् ॥"; सुश्रुतः (सु. म.४६)-"कपायं कफपित्तनं किञ्चित्तिक्तं रुचिप्रदम् । हृद्यं सुगन्धि विशदं लवलीफलमुच्यते ॥"; अयमेव (सू. अ. १)-"पित्तं सनेह-तीक्ष्णोष्णं लघु चित्रं सरं द्रवम् ॥"; चरकः (सू. म. २९) "शीवं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लघु पड्गुणम् । प्रकृत्या दिव्यमुदकं भ्रष्टं पात्रमपेक्षते ॥" इत्यादि । तत् कथ विशतिर्गुणाः ? इति । अत्रोच्यते-य एतेऽतिरिक्ता गुणा दर्शिता., ते विशतावेवान्तभूताः । तथाहि व्यवायि-विकाश्याशुकारिणस्तावन्मधे पठ्यन्ते, प्रसन्नः क्षीरे, मधगुणविपरीता ओजसि, य एवौजसि त एव क्षीरे; ततश्च तद्गुण- परस्परविपर्ययपर्यालोचनया व्यवायी वेऽन्तर्भूतः, विकाशी खरे, आशुकारी चले, प्रसन्नः स्थूले ते हि पारिशेण्याद्' बहल श्लक्ष्ण-स्थिर-सूक्ष्माणां विपर्यया । स्वादु- १ 'शीत स्थिर स्निग्ध' इति गमाघरसमत. पाठ । .
१०२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । शीत-मन्द-स्निग्ध-पिच्छिल-गुरूणां अम्लोष्ण-तीक्ष्ण-रूक्ष-विशद लघवो विपर्यया: प्रसिद्धा एव । व्यवाय्यादिलक्षणं च द्रवादिष्वेव सम्भवति । यदाह सुश्रुतः (सू. म. ४६) "व्यवायी देहमखिलं व्याप्य पाकाय कल्पते । विकाशी विकंपन् धातून सन्धिबन्धान् विमुञ्चति ॥ आशुकारी तथाऽऽशुस्वाद्धावत्यम्मसि तैलवत्" इति । प्रसन्नत्वं स्फुटत्वं, तच्च स्थूल एव, तस्य स्फुटप्रत्यक्षत्वात् । सुगन्ध-दुर्गन्धौ तु मन्द-तीक्ष्णविशेषौ, इन्द्रियप्रसादनोद्वेजनद्वारा शमन-शोधनरूप- त्वात् । यदाह सुश्रुतः (सू. अ. ४६)-"सुगन्धो रोचनो मृदुः । दुर्गन्धो विपरीतोऽस्मात्" इति । शुचि-विमलौ तु विशदविशेपौ; मष्टानां हि मलानां क्षालने शक्तिः शुचित्वं, दृष्टानां विमलत्वम् । शिवं परिणामे हितं, मृष्टं जिह्वाप्रियं; ते च गुणकार्ये; गुणशब्दस्तूपचारात् । यथा-"शुद्धोधनो बस्तिवि- शोधनश्च प्राणप्रदः शोणितवर्धनश्च । ज्वरापहारी कफ-पित्तहन्ता वायु जयेदष्टगुणो हि मण्ड. ॥” इत्यादौ । यत्तु व्यवायि-विकाशिनौ प्रस्तुत्यो सङ्ग्रहे (सू. म. :) "सर-तीक्ष्णप्रकर्षों तु कैश्चित्तौ परिकल्पितौ" इति, तदेकीयमतत्वादनादरणीयम् । तदादरणे यत्तले व्यवायि-बद्धविट्कयोरभिधानं तद्विरुद्धं स्यात्, यच भये तीक्ष्ण- विकाशिनोस्तत्पुनरुकं स्यात् । यत्त पित्ते तीक्ष्ण-विस्रयोरभिधानं, तदिन्द्रियोद्वेजकरके सत्यपि घ्राणेन्द्रियस्योद्वेजनातिशयार्थम् ४४४ (हे.)॥ गुर्वादिविंशतिगुणकर्माणि- अत ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मविस्तरम् । कर्मभिस्त्वनुमीयन्ते नानाद्रव्याश्रया गुणाः ॥ ह्वादनः स्तम्भनः शीतो मूर्छा-तृट्-वेद-दाहजित् । उष्णस्तद्विपरीतः स्यात् पाचनश्च विशेषतः ॥ स्नेह-मार्दवकृत् स्निग्धो वलवर्णकरस्तथा। रूक्षस्तद्विपरीतः स्याद्विशेषात् स्तम्भनः खरः॥ पिच्छिलो जीवनो वल्यः सन्धानः श्लेष्मलो गुरुः । विशदो विपरीतोऽस्मात् क्लेदाचूषण-रोपणः ॥ दाह-पाककरस्तीक्ष्णः स्रावणो, मृदुरन्यथा। सादोपलेप-चलकृहुरुस्तर्पण-बृंहणः ॥ लघुस्तद्विपरीतः स्याल्लेखनो रोपणस्तथा । दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेषां कर्मविशेषणैः॥ . १ 'विकसम्नेव धातुवन्धान् विमोक्षयेत्' इति मुद्रितसुश्रुते पाठः । ३ 'प्रदिग्धाना' इति पा० । २ 'सुगन्धी' इति पा० ।
पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । १०३ 4 दशैवान्यान् प्रवक्ष्यामि द्रवादीस्तानियोध मे। द्रवः प्रक्लेदनः, सान्द्रः स्थूलः स्याद्वन्धकारकः ॥ श्लक्ष्णः पिच्छिलचशेयः, कर्कशो विशदो यथा। सुखानुवन्धी सूक्ष्मश्च सुगन्धो रोचनो मृदुः॥ दुर्गन्धो विपरीतोऽस्माद्धल्लासारुचिकारकः । सरोऽनुलोमनःप्रोक्तो, मन्दो यात्राकरः स्मृतः॥ व्यवायी चाखिलं देह व्याप्य पाकाय कल्पते । विकासी विकसन्नेवं धातुवन्धान विमोक्षयेत् ॥ आशुकारी तथाऽऽशुत्वाद्धावत्यम्भसि तैलवत् । सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात् सूक्ष्मेषु स्रोतःस्वनुसरः स्मृतः॥ गुणा विंशतिरित्येवं यथावत्परिकीर्तिताः॥ (सु. सू. अ. ४६)। पूर्व हि संपादितं "तदस्य शैत्येन निहन्ति पित्तं" (सु. सू. म. ४६) इति, तत्र न ज्ञायन्ते के पुनस्ते शीतादय इति तानिर्दिशन् लक्षणमाह-अत इत्यादि । अथ शीतगुणः कथं ज्ञायत इत्याह-हादन इत्यादि । हादनः सुखकारीत्यर्थः; तृट्-स्वेद- मूछा-दाहजिदित्यर्थः । पाचनो व्रणादीनाम् । नेहेत्यादि निग्धो गुणः स्नेहादिकारण इत्यर्थः । रूक्षो गुणस्तद्विपरीतः रौक्ष्य-काठिन्यकर इत्यर्थः । विशेपात् विशेपतः। स्तम्भनः भतीसारादीनाम् । खरः कर्कशः । पिच्छिलो गुणः । जीवनः प्राणधारण । सन्धानो भास्य । विशदो गुणः । विपरीतोऽसादिति असन्धानोऽजीवनोऽश्लेपी च । लेदाचूषणः आर्दीभावविनाशकर इत्यर्थः । दाहेत्यादि । अन्यथेति अदाह-पाककरोऽ- सावण इत्यर्थः । सादेत्यादि सादः मङ्गग्लानिः, उपलेपः मलवृद्धि, बलं श्लेष्मा । गुरुः गुणः । तर्पणः तृप्तिजनकः । बृंहणः देहवृद्धिकर । लघुरित्यादि । लघुस्तद्विपरीत इति असादानुपलेपादिकृत् कफहरश्चेत्यर्थः । लेखनः पत्तलीकण. । दशाया इति दशसंख्योपेता आधाः शीतादयो गुणा, कर्मतः प्रोकाः कर्मभिः सह प्रोक्ता इत्यर्थः । तेपामिति तेषां मध्ये, कर्मविशेषणैः कृत्वा । द्रवो गुणः; प्रक्लेदन भाद्रभावकरः । सान्द्रो गुणः; बन्धकारक उपचयकारक इत्यर्थः । 'द्रवः प्रक्लेदनो व्यापी शुष्कः स्यादन्धकारकः' इति केचित् पठन्ति । शुष्को गुणः बन्धकारकः, शुष्कस्य शोषणवेनावयवापृथक्त्वमित्यर्थः । लक्षण इत्यादि । श्लक्षणो गुणः पिच्छिल- धज्ञेयः, जीवनः श्लेष्मसन्धानकृदित्यर्थः । कर्कशो गुणः, विशदो यथेति अजीवनोऽश्लेपी च, तथाऽसन्धान कार्यकृय । सुखानुवन्धी सुखोत्पादक इत्यर्थः । सूक्ष्मोऽवगाहकः । सुगन्धो गुणः । हल्लासारुचिकारक इति पुनररुचिग्रहण द्विविधा- रुचिप्रापणार्थ; तेनाहारं न काङ्गति, क्रियमाणाच विरसीभवति । हृल्लासः थूरकरणं, छर्दिरित्यन्ये । सरो गुणः, अनुलोमन. वात-मलप्रवर्तनः । मन्दो गुणः । यात्राकर १०४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । । इति शरीरस्थायित्वादेहस्य यात्रां वर्तनं करोति । व्यवायी गुणः । अखिलमित्यादि अपक्क एवाखिलं देह व्यामोति पश्चान्मद्यविषवत् पाकं याति; अन्ये 'भावाय कल्पते' इति पठन्ति, तत्रापि स्थितये कल्पते नोयमधो वा प्रवर्तत इति स एवार्थः, अपरे तु पुनर्भावशब्दमभिप्रायार्थमिच्छन्ति, तत्र नियतव्यप्रभामेणाम- शक्त्यनुरूप तद्रव्यं मद्यविषवद्विशिष्टाभिप्रायाय कल्पत इत्यर्थः । व्यवासिनः सकाशाद्विकासिव्यस्य किंचिद्भेदं दर्शयवाह-विकासीत्यादि । विकासी गुणः । विकसन् प्रसर्पन् । एवमिति अपक्क एव सकलं देहं व्याप्य, धातुबन्धान विमोक्षयेत् धातुशैथिल्यं करोतीत्यर्थः । अन्ये तु 'सरविशेषो व्यवायी, तीक्ष्णविशेपो विकासी' इति ब्रुवते; तन्नेच्छति गयी । आशुकारी गुणः, भाशुत्वात् । सूक्ष्मो गुणः । भत्र स्थूलगुणमपि केचित् पठन्ति, स च पाठोऽभावान्न लिखितः । गुणा इति नन्वत्र स्थूलगुणेन सह त्रयोविंशतिर्गुणा भवन्ति, कथं विंशतिः कथ्यन्ते ? उच्यते-केषि- दन्न संख्यामभयायवायि-विकास्याशुकारिणामपाठमेव मन्यन्ते; अन्ये पुनराहुः- अधिकायामपि गुणविंशतावुकायां गुणा विंशतिरुकाः, न चात्र नियमो विंशति- रेवेति; व्यवायि-विकासाशुकारिणां तु स्वतन्त्रे परतन्ने च दर्शनात् पाठो न्याय्य एव; अपरे पुनः प्रागेव 'दशैवान्यान्' इत्यस्य स्थाने 'दश चान्यान्' इति चकारं पठन्ति; तेन व्यवायि-विकास्याशुकारिणोऽपि समुच्चीयन्ते (ड.)। नाञ्जसा भिषग्वियायां विपुलप्रज्ञोऽपि कश्चिद् यथोपदेशं द्रवद्रव्यविधिमन्नपानविधि वाऽधिगम्य द्रव्याणां तांस्तान्दौत्यौप्ण्यादिकान् भावान् युक्त्या समन्वीयोपदेष्टुमुपधारयितुं वा प्रभवत्यनायासेन, कर्मानुमेयत्वात् , तदिदानी पूर्वाचार्यप्रसिद्धन क्रमेण द्वेधा विभज्य कर्मतः शीतादीन् गुणानुपदिदिक्षति-अत इत्यादिना । हादन उष्णानां सुखसंजननः, स्तम्भनः शोणितादीनां गतिमतां संनिरोधनः । विशेषतः प्राघुर्येण पाचन इति संवन्धः, उष्णो ह्यग्निगुणबहुल इत्ययमाशयः । रूक्ष इत्यादि । खम्भनो मल-मूत्रादीनामप्रवर्तनः । खरं कर्कशं करोतीति खरः, णिचि पचायच् । गुरुः चिर- पाकी । क्लेदसंशोषणो व्रणरोपणश्चेति छेदाचूषण-रोपणः । यथाविभागमर्थमिम विभज्य शिष्टानर्थानधिकरोति-दशेत्यादिना । तेषां व्याचिख्यासितानां गुणानां मध्ये आद्याः पूर्वाचार्यरादावुपदिष्टाः शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-पिच्छिल-विशद-तीक्ष्ण-मृदु- गुरु लघुसमाख्याता दश गुणा. कर्मतः प्रोकाः, इदानीं तु कर्मविशेषणैः कर्मविशेषै. रुकेतैर. कर्मभिरिति यावत् , दशैवान्यान् द्रवादीन् प्रवक्ष्यामि, तान् मे मत्तो निबोधेति योजना । द्रव इत्यादि । स्थूलं करोतीति स्थूलः, सान्द्रविशेषणमेवत् । ये त्वत्र सान्द्रादनन्तरं 'लक्ष्ण-कर्कशयो. पाठात् सूक्ष्मान्ता द्वादयो द्वादशैव भवन्ति न त्वेव दशेति विप्रतिपद्यन्ते तान् पुनः कटाक्षयवाह-लक्षण इति । अयममि- संधिः-संख्येयं कर्मविशेपमाश्रित्योपदिश्यते, श्लक्ष्ण-कर्कशौ तु पिच्छिल-विवादसाम्या दुक्तगुणौ, नातो द्वादशत्वापत्तिर्गन्धमात्रेणाप्युपलभ्यत इति । कर्मतः सुगन्ध दुर्ग- - । . पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । पगुणानुपदिश्यते-सुखेत्यादिना श्लोकेन । मन्दो मन्दाख्यो गुणः, यात्राकरः कालोपकर., "यात्रास्याद्यापने गा" इत्यमरः (को. ३, च, ३) । विकासीत्यादि । एवमिति अखिलं देह व्याप्येत्यर्थः । उकमर्थमुपसंहरति-गुणा इत्यादिना । विशतिरिति शीवादिभिद्रव-सान्द्र सुगन्ध दुर्गन्ध-सर-मन्द-व्यवायि-विकास्याशुकारि- सूक्ष्मगुणानुगमादित्यनुसंधेयम् (हा.)॥ लधुर्मुरुस्तथा स्निग्धो सक्षस्तीक्ष्ण इति क्रमात् । नभो-भू-वारि-वातानां वह्नरेते गुणाः स्मृताः ॥ लघु पथ्यं परं प्रोक्तं कफनं शीघपाकि च । गुरु वातहरं पुष्टि-लेप्मकृञ्चिरपाकि च ॥ स्निग्धं वातहरं श्लेष्मकारि वृष्यं वलावहम् । रूक्षं समीरणकरं परं कफहरं मतम् ॥ तीक्ष्णं पित्तकरं प्रायो लेखनं कफ-वातहत् । सुश्रुते तु गुणाः प्रोक्ता विंशतिस्तान ब्रुवे शृणु ॥ गुरुर्लघुः स्निग्ध-रूक्षो तीक्ष्णः श्लक्ष्णः स्थिरः सरः। पिच्छिलो विशदः शीत उष्णश्च मृदु-कर्कशौ ॥ स्थूल सूक्ष्मो द्रवः शुष्क आशुर्मन्दः स्मृता गुणाः । श्लक्ष्णः स्नेहं विनाऽपि स्यात् कठिनोऽपि हि चिकणः ॥ स्थिरो वात-मलस्तम्भी सरस्तेषां प्रवर्तकः । पिच्छिलस्तन्तुलो बल्यः संधानः श्लेष्मलो गुरुः ॥ केदच्छेदकरः ख्यातो विशदो व्रणरोपणः । शीतस्तु हादनः स्तम्भी मूछ-तृट्-स्वेद-दाहनुत् ॥ उपणो भवति शीतस्य विपरीतश्च पाचनः। स्थूल स्थौल्यकरो देहे स्रोतसामवरोधकृत् ॥ देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेपु विशेद्यत् सूक्ष्ममुच्यते । द्रवः क्लेदकरो व्यापी शुष्कस्तद्विपरीतकः ॥ आशुराशुकरो देहे धावत्यम्भसि तैलवत् । मन्दः सकलकार्येषु शिथिलोऽल्पोऽपि कथ्यते ॥ (भावप्रकाश, पू ख.)। गुर्वादि वीस गुणोंके सुश्रुत-भावप्रकाश आदिमें कहे हुए लक्षण चरकोक क्रमसे नीचे लिखे जाते हैं- १ गुरु-गुरु गुण साद (अवसाद-शरीरकी ग्लानि), उपलेप (मलोंकी वृद्धि), बल (कफ), तृप्ति और शरीरकी पुष्टि करनेवाला (सु.), वातहर, बृंहण, कफ - - १०६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । )। जिस करनेवाला तथा चिरपाकी (देरीसे पचनेवाला) है (भा.)। जिस गुण(युक्त द्रव्य)में शरीरको पुष्ट करनेकी शक्ति हो, वह गुरु है (हे.) । सामान्यभाषामें गुरुगुणको 'भार, वजन' कहते हैं । जल और भूमिमें पतनकर्म( अधोगमन)का जो कारण है, उसे गुरुत्व कहते हैं "गुरुत्वं जल-भूम्योः पतनकर्मकारणम्" (प्रशस्त- पादभाष्य गुणग्रन्थ ) । गुरु गुण पृथिवी और जलके गुणोंकी (अंशकी ) अधिकता- वाला है "गौरवं पार्थिवमाप्यं च" (र. वै. अ. ३, सू. ११६)। २ लघु-लघु गुण गुरुसे विपरीतगुणवाला (शरीरमें उत्साह-स्फूर्ति, मलका क्षय, अतृप्ति और दुर्वलता लानेवाला), शरीरको कृश करनेवाला व्रणका रोपण करनेवाला (सु.), परम पथ्य, कफघ्न और शीघ्र पचन( हजम) होनेवाला है (भा. गुण( युक्त द्रव्य )मे शरीरको हलका करनेकी शक्ति हो, वह लघु है (हे.)। लघु गुणको सामान्य भाषामें 'हलका' कहते हैं । लघु गुण वायु, आकाश और अमिके गुणोंकी अधिकतावाला है "लाघवमन्यदीयम्" (र. वै. अ. ३, सू. ११५)। ३ शीत-शीत गुण उष्णपीडितको सुख देनेवाला, स्तम्भन, तथा मूर्छा, खेद और दाहका नाश करनेवाला है (सु., भा.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )में स्तम्भन करनेकी शक्ति हो, वह शीत है । सामान्य भाषामें शीत गुणको 'ठण्डा' कहते हैं । शीत गुण आप्य है "शीत-स्निग्ध-गुरु-पिच्छिलास्तत्राप्याः" (र. वै. अ. ३१११२)। ४ उष्ण-उष्ण गुण शीत गुणसे विपरीत (शरीरको असुख देनेवाला, सर- रक्तादिकी प्रवृत्ति करनेवाला, मूर्छा, तृषा, खेद तथा दाहको उत्पन्न करनेवाला) और विशेष करके पाचक है (सु., भा.)। जिस गुण(युक्त द्रव्य )में खेद-पसीना लानेकी शक्ति हो, वह उष्ण है (हे.)। सामान्य भाषामें उष्ण गुणको 'गरम' कहते हैं । उष्ण गुण आमेय है "तैजसमौष्ण्यं तैक्षण्यं च" (र. वै. अ. ३ सू. ११३)। ५ स्निग्ध-स्निग्ध गुण स्नेह और मार्दव( मृदुता) करनेवाला, वल और वर्णको वढ़ानेवाला (सु.), वातहर, श्लेष्मकर, वाजीकर और बल देनेवाला है (भा.)। जिस गुण(युक्त द्रव्य )में शरीरको फ्लिन( आई ) करनेकी शक्ति हो, वह स्निग्ध है (हे.)। निग्ध गुण आप्य है (र वै. अ. ३१११२)। १ पृथिव्युदकाभ्यामन्यसाद्भूतसमूहाद् वाय्वाकाशामिलक्षणाद्भवतीति, (तेषा) त्रयाणा भूताना लघुत्वादिति (भाष्यम्)। २ 'नेहोऽपां विशेषगुण । संग्रह-मृजादिहेतुः। (प्र. पा. भा.) । सग्रह. परस्परमयुक्ताना सक्त्वादीना पिण्डीमावप्राप्तिहेतुः सयोगविशेषः । मजा कायस्योद्वर्तनादिकृता शुद्धि. । आदिशब्दान्मृदुत्व च (न्यायकन्दली)। चूर्ण (आटे आदिके परस्पर असंयुक्त कण)के सग्रह( परस्पर मिलने में कारण भूत गुणको स्नेह कहते हैं।
पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः। १०७ ६ रुक्ष रूक्ष गुण निग्धके विरुद्ध कार्य करनेवाला (रुक्षता और कठिनता लाने- वाला बल और शरीरके वर्णका हास करनेवाला), विशेष करके स्तम्भन, खर (सु.), वातकर और परम कमहर है (भा.)। जिस गुण(युक्त द्रव्य )की शोषण करनेमें शफि हो, वह रूक्ष है (हे.)। रूक्ष गुण पार्थिव और वायव्य है "रौक्ष्य- वेशधे पार्थिव-वायव्ये" (र. वै. अ. ३, सू. ११४)। ७ मन्द-मन्द गुण यात्राकर (कालक्षेप करनेवाला-मन्दता(देरी)से कार्य करने- वाला-मन्दचिरफारी ) होता है (सु.), मन्द गुण सर्व कार्य करने में शिथिल और अल्पकार्य करनेवाला होता है। (भा.) जिस गुण( युक्त द्रव्य )की शमनकर्ममें शक्ति हो, वह मन्द है (हे.)। ८ तीक्ष्ण-तीक्ष्ण गुण दाह, पाक और साव करनेवाला (सु.), पित्तकर, प्रायः शरीरको पतला करनेवाला (लेसन ) तथा कफ और वायुका नाश करनेवाला है (भा.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )की शोधनममें शक्ति हो, वह तीक्ष्ण है (हे.)। तीक्ष्णगुण आग्नेय है (र. वै. अ. ३।१३)। ९ स्थिर-स्थिर गुण वात और मलका स्तम्भन करनेवाला है (भा.)। जिस गुण(युक्त द्रव्य )की धारण-स्तम्भन कर्ममें (रोकनेमें) शक्ति हो, वह स्थिर है (हे.)। १० सर-सर गुण वात और मलकी प्रवृत्ति करानेवाला है (सु., भा.)। अष्टासंग्रह और अष्टागहृदयमें स्थिरके विपरीत 'चल' गुण लिखा है । जिस गुण( युक्त द्रव्य )की प्रेरण करनेमें शक्ति हो वह चल है (हे.)। दोनों वाग्भटोंने चल गुण सरके स्थानमें दिया है, ऐसा प्रतीत होता है। ११ मृदु-मृदु गुण दाह, पाक और स्रावका नाश करनेवाला है (सु.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )की श्लथनमें (कोमल ढीला करनेमें ) शक्ति हो, वह मृदु है (हे.)। मृदु गुण आकाश और जलके गुणोंकी अधिकतावाला है "मार्दवमान्त- रिक्षमाप्यं च” (र. वै. अ. ३, सू ११५)। १२ कठिन-जिस गुण(युक्त द्रव्य)की दृढ करनेमें शक्ति हो उसे कठिन कहते है (हे.)। कठिन गुण पार्थिव है "कठिनत्वं पार्थिवम्" (र. वै , अ. २, सू. ५८)। १३ विशद-विशदगुण पिच्छिलसे विपरीत कर्म करनेवाला, विशेष करके, फ्लेदका शोपण करनेवाला और व्रणरोपण है (सु., भा.)। जिस गुण(युक्त द्रव्य )की क्षालन( लेदको नाश करने )में शक्ति हो, वह विशद है (हे.)। विशद गुण पार्थिव और वायव्य है (र. वै. अ. ३।११४)।. १४ पिच्छिल-पिच्छिल गुण जीवन, वलकारक, टूटी हुई हहीको जोड़नेवाला, - - । १०८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कफकारक, गुरु (सु.) और तन्तुल (लेसदार) है (भा.)। जिस गुण (युक्त द्रव्य )की शरीरके लेपन करनेमें शक्ति हो वह पिच्छिल है (हे.)। पिच्छिल गुण आप्य (जलके गुणोंकी अधिकतावाला) है (र. वै. अ. ३।११२)। १५ श्लक्ष्ण-लक्ष्ण गुण पिच्छिलके समान ही कर्मवाला है (सु.)। लक्ष्ण अर्थात् चिक्कण गुण स्नेहके विना भी होता है, जैसे घिसा हुआ मणि आदि कठिन द्रव्य भी चिकना होता है (भा.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )की रोपणमें (व्रणके रोपण करनेमें ) शक्ति हो, वह लक्षण है (हे.)। श्लक्ष्ण गुण अग्निके गुणोंकी अधिकता- वाला है "तेजसं लक्षणत्वं नाम" (र. वै. अ. २, सू ५८)। १६ खर-खर अर्थात् खरस्पर्शवाला, जैसे-ककोड़ेका फल । सुश्रुतने खरके स्थानमें कर्कश गुण लिखा है तथा कर्कश गुणके कर्म विशद जैसे वताये हैं। जिस गुण(युक्त द्रव्य )की लेखनमें (व्रणादिके अन्दर उभरे हुए मासके छीलनेमें) शक्ति हो, वह खर है (हे.)। खर-परुष (इन्दु)। कर्कश गुण वायुके गुणोंकी प्रधानतावाला होता है "कर्कशत्वं वायव्यम्" (र. वै., अ. २, सू ६०)। १७ सूक्ष्म-सूक्ष्म गुण अपनी सूक्ष्मताके कारण शरीरके अत्यन्त सूक्ष्म स्रोतोंमें भी प्रवेश करता है (सु., भा.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )की विवरणमें (स्रोतोंको खुला करनेमें ) शक्ति हो, वह सूक्ष्म है (हे.)। १८ स्थूल-स्थूल गुण देहमें स्थूलता लानेवाला और स्रोतोंका अवरोध करनेवाला है (भा.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )की सवरणमें (स्रोतोंके अवरोधमें ) शक्ति हो, वह स्थूल है (हे.)। १९ सान्द्र-सान्द्र गुण शरीरको स्थूल और पुष्ट करनेवाला है (सु.)। जिस गुण( युक्त द्रव्यकी) प्रसादनमें शक्ति हो, वह सान्द्र है (हे.)। २० द्रव-द्रव गुण शरीरको आई (तर) करनेवाला (सु.) और सब जगह व्याप्त होनेवाला है (भा.)। जिस गुण( युक्त द्रव्य )की विलोडनमें (व्याप्त होनेमें) शक्ति हो, वह द्रव है (हे.)। पाठान्तर और मतान्तरमें लिखे हुए अन्य अधिक गुण- १ शुष्क-भावप्रकाशमें इसे द्रवसे विपरीत बताया है। २ आशु-सुश्रुत और भावप्रकाशमें इस गुणका कर्म जलमें तैलबिन्दुके समान शरीरमें शीघ्र फैलना कहा है। इसे भावप्रकाशमें 'आशु-मन्द' इस युग्ममें दिया है। १ सुमृन्मणीनामिव स्पर्श. । स खलु भास्वरसामान्यादग्निनोत्पद्यते (भाष्यम्) । २ वायु. शोषणात्मकत्वाद् व्यूहकरणाच पद्मनालादिषु कर्कशहेतुर्भवति (भाष्यम्) । ३ द्रवत्व स्यन्दनकर्मकारणम् (प्रशस्तपादभाष्य-गुणग्रन्थ) । जिस गुणके कारण कोई वस्तु वहती है, उसको द्वस्व कहते हैं। - ।
पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । १०९ - - ३ व्यवायी व्यवायी गुण पहले अपक्कावस्थामें ही सर्व शरीरमें व्याप्त होकर पीछे परिपाकको प्राप्त होता है (सु.)। ४ विकासी (शी, पी)-विकासी गुण इसी प्रकार समस्त शरीरमें अपंक्वावस्था में ही व्याप्त होकर धातुओंमें शैथिल्य उत्पन्न करता है (सु.)। ५ सुगन्धः सुगन्ध गुण सुख देनेवाला, सूक्ष्म, अन्नपर रुचि उत्पन्न करनेवाला और मृदु है (सु.)। ६ दुर्गन्ध-दुर्गन्ध गुण सुगन्धसे विपरीत गुणवाला, तथा हृल्लास (जी मिच- लाना) और अरुचि करनेवाला है (सु.)। वक्तव्य यद्यपि 'सार्था गुर्वादय.' इत्यादि श्लोकमें ४१ या ४२ गुण कहे गये हैं, परन्तु जैसा कि चरकने द्रव्यके लक्षणके अनन्तर लिखा है कि "तस्य गुणाः शब्दादयो गुर्वादयश्च द्रवान्ताः" (च. सू. अ. २६) उस पाञ्चभौतिक द्रव्यके शब्दादि पाँच और गुर्वादि द्रवान्त बीस गुण हैं । अर्थात् द्रव्यगुणविज्ञानमें प्रधानतया शब्दादि पाँच और गुर्वादि वीस इन २५ गुणोंका प्रधानतया विचार और उपयोग होता है। वैसे तो परखापरबादि दस गुणोंका भी गौणरूपसे कहीं कहीं उपयोग किया गया है। बुद्धि, बुद्धिके भेद, प्रयनान्त पॉच गुण ये आत्मगुण होनेसे वे द्रव्यगुणशास्त्रके विचार्य विषयोंमे नहीं हैं। इनका विचार मानसशास्त्रमे ही प्रधानतया होता है । अष्ट- विधवीर्यवादीके मतमें शीत, उष्ण, गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु (मन्दं ), तीक्ष्ण-ये आठ गुण और द्विविधवीर्यवादीके मतमें शीत और उष्ण ये दो गुण जव उत्कृष्ट शक्तिवाले होते हैं तब उनको वीर्य सज्ञा प्राप्त होती है, परन्तु जब ये उत्कृष्टशक्ति- संपन्न नहीं होते तव ये सामान्यतया गुण ही कहे जाते हैं । जैसा कि वृद्धवाग्भटने लिखा है-"गुर्वाया वीर्यमुच्यन्ते शक्तिमन्तोऽन्यथा गुणाः । परसामर्थ्यहीनत्वाद् गुणा एवेतरे गुणाः" (अ. सं. सू. म. १७)। पूर्वोक्ता गुर्वाधा भष्टौ यदोत्कृष्ट- शक्तयः सन्तो द्रव्यं समधिशेरते तदा वीर्यशब्दवाच्याः, यदा तूस्कृष्टशक्तियुक्ता न भवन्ति तदा सामान्यगुणा एव । ये च गुर्वादिविशिष्टा द्वादश गुणास्ते स्वभावेनैव परसामर्थ्यहीना उत्कृष्टशक्तिरहितास्तेऽपि सामान्यगुणशब्दवाच्याः, ते न कदाचिदपि वीर्याख्यां लभन्त इति (इन्दु)। गुरु और लघु ये दो गुण जब निष्ठापाकके रूपमें परिणत होते हैं, तब उनको गुरुविपाक और लघुविपाक यह सज्ञा दी जाती है (सु सू भ. ४०, च. सू अ. २६) । चरक, सुश्रुत, अष्टाङ्गसग्रह और अष्टागहृदयमें गुर्वादि यीस गुण परस्पर विरोधी दस द्वंद्वों( युग्मों-जोडों )के रूपमें दिये गये हैं। उनमें चरक, अष्टाजसग्रह तथा अष्टाङ्गहृदयके दस युग्म या वीस गुण समान हैं। सुश्रुतने १ अष्टागसंग्रहमें 'मृदु'के स्थानमें 'मन्द' पाठ पाया जाता है । सुश्रुतमें गुरु और लघुके स्थानमें विशद और पिच्छिल पाठ मिलता है।
११० द्रव्यगुणविज्ञानम् । मन्द-तीक्ष्णके युग्ममें मृदु-तीक्ष्ण, स्थिर-सरके युग्ममें मन्द-सर और वक्ष्ण-सरके युग्ममे श्लक्ष्ण-कर्कश ये गुण दिये हैं; अर्थात् मन्दके स्थानमें मृदु, स्थिरके स्थानमें मन्द और खरके स्थानमें कर्कश गुण लिया है। सुश्रुतम कठिन और स्थूल ये दो चरकक गुण नहीं दिये गये हैं । भावप्रकाशमें सुश्रुतमतसे दस द्वंद्व या घीस गुण लिखे गये हैं। चरकोक मन्द-तीक्ष्णके और सुश्रुतोक्त मृदु-तीक्ष्ण युग्गके स्थानम भावप्रकाशमें तीक्ष्ण- लक्ष्ण यह युग्म दिया गया है । चरकोक मृदु-कठिन युग्मके स्थानमें भावप्रकाशमें मृदु-कर्कश, सान्द्र-द्रवके स्थानमें द्रव-शुष्क और मन्द-तीक्ष्णके स्थानमें आशु-मन्द युग्म लिखा है । सुश्रुतके वर्तमान पाठमें जो सुगन्ध-दुर्गन्ध गुण कहे गये हैं, वे गन्धके ही मेद हैं, अत• गुर्वादि विंशतिगुणमें इनकी गणना करना ठीक नहीं है। भावप्रकाशमें जो सुश्रुतके गुण लिखे हैं उनमें ये दो गुण हैं भी नहीं । व्यवायी-विकासी ये दो गुण सुश्रुतके वर्तमान पाठको छोड़कर किसी में भी नहीं लिये गये हैं। संभव है कि ये चार गुण पीछेसे प्रक्षिप्त किये गये हैं। सग्रहकारने व्यवायीको सरगुणकी प्रकर्षा- वस्था और विकासी गुणको तीक्ष्णगुणकी प्रकर्षावस्था बता करके समाधान किया और सुश्रुतमें भी ये बीसकी सख्यासे अधिक ही होते हैं । चरकमें मन्द -तीक्ष्णके युग्ममें मन्द मृदुके स्थानमे दिया है, ऐसा प्रतीत होता है। भावप्रकाशमें आशु और मन्द यह'युग्म आशु आशुकारी, और मन्द चिरकारी, इस अभिप्रायसे दिया हुआ है। द्रव्यगुणके प्रकरणमें ये दो शब्द आते भी हैं, और उनकी टीकाकारोंने ऐसी व्याख्या भी दी हुई है। चरक सुश्रुत आदिने यद्यपि कुछ हेरफेरसे ये वीस गुण लिखे हैं, तथापि द्रव्यगुणके प्रकरणमें अन्य गुणोंका भी उलेख पाया जाता है। इस विषयमें चक्रपाणिदत्तने मद्यगुणके प्रकरणमें (च. चि. अ. २४ में ) लिखा है कि-"एते विकासित्वादयो गुणा यद्यपि विंशतिगुणगणनायां न पठिता., तथाऽप्यसंख्येयतया गुणानामेपामपि गुणत्वं सिद्धं ये तु तत्र पठितास्ते तावदाविष्कृततमा शेयाः" अर्थात् विकासी, आशुकारी और व्यवायी गुण वीस गुणोंकी गणनामें नहीं दिये गये हैं, (किंतु यहाँ उन्हे गुण कहा है), तथापि गुणोंके असख्येय होनेसे विकासी आदि भी गुणसज्ञक हैं । बीस गुणोंमें जिनकी गणना की गयी है वे गुण आविष्कृततम (प्रसिद्धतम ) हैं। - १ गुणके विषयमें डॉ. भा. गो. घाणेकरजी सुश्रुतकी व्याख्यामें लिखते हैं कि- गुण-ओषधियोंके वैद्यकीय कार्यके घोतक गुण होते हैं । गुणोंको फॉर्मालॉजिकल अॅक्शन्सू कह सकते हैं । ये संख्या साधारणतया वीस है, परन्तु व्यवायी विकासी इत्यादि अन्य गुण भी होते हैं।xxx। कुछ आधुनिक विद्वान् गुणसे भौतिकगुण (Physical properties) समझते हैं, परन्तु यह मत ठीक नहीं है । ४६ वे अध्यायमें गुणोंका विवरण करते समय लिखा है-“कर्मभिस्स्वनुमीयन्ते नाना द्रव्याश्रया गुणाः" । भौतिक धर्म प्रत्यक्ष होते हैं, परन्तु वैद्यकीय गुण कर्मानुमेय होते हैं । इसलिये रस वीर्यादिद्वारा 1 पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । १११ - 7 सुश्रुतने गुणों के प्रकरणके प्रारम्भमे लिखा है कि-"अत ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्म विस्तरम् । कर्मभिस्वनुमीयन्ते नानाद्रव्याश्रया, गुणा."-अब गुणोंके कर्मोका विस्तार कहा जाता है, क्योंकि नाना द्रव्योंमें रहे हुए शीतोष्णादि गुणोंका उनके कर्म देखकर अनुमान किया जाता है । अत. आगे शीतोष्णादि गुणप्रकरणमें प्रत्येक गुणके जो कर्म लिखे हैं, उन कर्मोको देख करके तत्तद् गुणका अनुमान करना चाहिए, ऐसा वहाँ तात्पर्य समझना चाहिए। बुद्धीच्छा-द्वेष-सुख-दुःख-प्रयवानां निरूपणम्- बुद्धीच्छाद्वेप-सुख-दुःख-प्रयला ह्यात्मगुणाः । एते च मनोविज्ञानविषया इति नेह प्रपशिताः। बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दु ख और प्रयत्न ये आत्मगुण होनेसे इनका विचार प्रधानतया मनोविज्ञानका विषय है । वहाँ ही इनका विशेष विवरण देखना चाहिये । व्यगुणशास्त्र में इनका विशेष विवरण अप्रासगिक होनेसे नहीं दिया जाता। परादिदशगुणनिरूपणम्- परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च । विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा शेयाः परादयः। सिद्धथुपायाश्चिकित्साया लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे ।। देश-काल-वयो-मान-पाक-वीर्य-रसादिपु । परापरत्वे, युक्तिश्च योजना या तु युज्यते ॥ ओषधियोंके जो जो कार्य शरीरमें होते हैं वे सब उनके गुण होते हैं । ओषधियोंके इन गुणोंका उत्कर्षापकर्ष भी सस्कार तथा भावनाओं द्वारा किया जाता है-"गुरूणा लाघव विद्यात् सस्कारात् सविपर्ययम् । व्रीहेर्लाजा तथा च स्यु. सक्तनां सिद्धपिण्डिका." (च. सू अ. २७)। इसमें सदेह नहीं कि गुरु, लघु, द्रव, कठिन मादि शब्द ओपधियोंकी भौतिक स्थिति (Physical State) प्रदर्शित करनेके लिये भी प्रयुक्त होते हैं, परन्तु ओषधिविज्ञानकी परिभाषामें गुण मुख्यतया शरीरगत क्रियाओंके द्योतक होते हैं (पृ. २१९, २२०) । गुणा विंशतिरित्येव-यधपि यहा गुणोंकी संख्या बीस ही निर्दिष्ट की गई है, तथापि वर्णन किये हुए गुण सख्यामें वाईस होते हैं । यदि इस बातका समन्वय करनेकी आवश्यकता हो तो श्वश्ण और कर्कशगुणोंका समावेश पिच्छिल और विशदमें कर सकते हैं । परन्तु वास्तवमें मूल सुश्रुतसंहिताका पाठ कुछ दूसरा ही होनेकी सभावना प्रतीत होती है। क्योंकि आयुर्वेदके अन्य अन्योंमें गुणोंकी सख्या वीससे अधिक नहीं होती और उनमें भी सुगन्धी, दुर्गन्धी, विकासी और व्यवायी गुण नहीं है।xxx। भावमिश्रको जो सुश्रुत सहिता उपलग्ध थी उसके अनुसार उन्होंने वीस ही गुण निर्दिष्ट किये है (पृ. ३०९,३१०)। - ११२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । संख्या स्याद्गणितं, योगः सह संयोग उच्यते । द्रव्याणां द्वन्द्व-सर्वेककर्मजोऽनित्य एव च ॥ विभागस्तु विभक्तिः स्याद्रियोगो भागशो ग्रहः। पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता ॥ परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम् । भावाभ्यसनमभ्यासः शीलनं सततक्रिया । इति स्खलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्व परादयः। चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ (च, सू. अ. २६) संप्रति पूर्वोक्तगुर्वादिगुणातिरिक्तान् परवापरत्वादीन् दशगुणान् रसधर्मरथेनो- पदेष्टव्यानाह-परेत्यादि । तच्च परत्वं प्रधानत्वम् , अपरत्वम् अप्रधानत्वम् । तद्वि- वरणं-देश-कालेत्यादि । तत्र देशो मरः परः, अनूपोऽपरः; कालो विसर्गः पर, भादानमपरः; वयस्तरुणं परम् , अपरमितरत्; मानं च शरीरस्य यथामक्ष्यमाणं शारीरे परं, तोऽन्यदपरं, पाक-वीर्य-रसास्तु ये यस्य योगिनते वं प्रति पराः, अयौगिकारस्वपराः । आदिग्रहणात् प्रकृति-वलादीनां प्रहणम् । किंवा, पररवापरले वैशेषिकोक्ते शेये; तत्र देशापेक्षया सन्निकृष्टदेशसंवन्धिनमपेक्ष्य विदूरदेशसंबन्धित परत्वं, सनिकृष्टदेशसवन्धिनि चापरत्वं भवति; एवं समिकृष्ट-विप्रेकृष्टकालापेक्षया च स्थविरे परत्वं, यूनि चापरत्वं भवति । वयःमभृतिषु परवापरवं यथासंभवं काल-देशकृतमेवेहोपयोगादुपचरितमप्यभिहितं, यतो न गुणे मानादौ गुणाम्तर- संभवः । युक्तिश्चेत्यादौ योजना दोपाद्यपेक्षया मेपजस्य समीचीनकल्पना, मत एवोक-या तु युज्यते; या कल्पना यौगिकी भवति सा तु युक्तिरुप्यते, अयौगिकी तु कल्पनाऽपि सती युक्तिोंच्यते, पुत्रोऽप्यपुत्रवत् । युक्तिश्चेयं संयोग- परिमाण-संस्काराधन्तर्गताऽप्यत्युपयुक्तत्वात् पृथगुच्यते । संख्या लक्षयति- संख्येत्यादि । गणितमिहैक-द्वि-ज्यादि । संयोगमाह-योग इत्यादि । सहेति मिलि- १ "रौक्ष्यात कपायो स्क्षाणा" (च. सू अ २६) श्त्यादिना अन्धेनेत्यर्ध. । २ 'संयोग- माह-योग इत्यादि । द्रव्याणा योग सवन्ध इत्युक्त अवयवावयविसवन्धस्यापि सयोगस्व स्यात् , अत आह-सहेति । साहित्यरूपो योगः, स च पृथसिद्धयोरेव भवतीति भावः । ननु विभुनोरपि सयोग कुतो न स्यादित्याह-द्वन्द-सर्वेककर्मन शति । इन्द्रकर्मजो यथा- युध्यमानयोर्मेपयो , सर्वकर्मजो यथा--भाण्डे प्रक्षिप्यमाणाना माषाणा महुमापक्रियासयोगज', एकतरकर्मजो यथा-वृक्ष-वायसयो , एतच्चोपलक्षण, तेन संयोगजोऽपि बोध्य , यथा- अहुली-तरुसयोगाद्धस्त-तरुसयोग , एतेन विमुद्रव्ययोरुतकारणामावादेव सयोगो नास्तीति भाव. । ननु, सयोगोऽनित्य एव कारणापेक्ष , विमुनोस्तु सयोगो नित्य एव भविष्यतीलाह- अनित्य एवेति । एवेत्यवधारणे । नित्य सयोगो न समवत्येव, अप्राप्तिपूर्विकाया प्राप्ते. 'संयोग- त्वा , नित्यत्वे च तद्विरोधात्' इति शिवदाससेनः । । ।
पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । ११३ तानां द्रव्याणां योगः प्राप्तिरित्यर्थः । सहेत्यनेनेहाकिंचिस्कर परस्परसंयोगं निरा. करोति । तद्भेदमाह-द्वन्द्वेत्यादि । वत्र द्वन्द्वकर्मजो यथा-युध्यमानयोर्मेषयोः, सर्वकर्मजो यथा-माण्डे प्रक्षिप्यमाणानां माषाणां बहुलमापक्रियायोगजः, एककर्मजो यथा-वृक्ष-वायसयोः । अनित्य इति संयोगस्य कर्मजस्वेनालिस्यत्वं दर्शयति । विभागमाह-विभागस्वित्यादि । विभक्तिः विभजनम् । विभकिमेव विवृणोति-वियोग इति; संयोगस्य विगमो वियोगः । तत् किं संयोगाभाव एवं वियोग इत्याह-भागशो ग्रह इति ।-विभागशो विभक्तत्वेन ग्रहणं यतो भव- तीति भावः तेन विमक्तिरित्येपा भावरूपा प्रतीतिः, न संयोगाभावमात्रं भवति, किं तर्हि भावरूपविभागगुणयुक्ता इत्यर्थः । पृथक्त्वं तु 'इदं द्रव्यं पटलक्षणं, घटात् पृथग्' इत्यादिका चुद्धिर्यतो भवति, तत् पृथक्रवं भवति । तयाचार्य स्वैविध्येनाह- पृथस्वमित्यादि । तन्न यत् सर्वथाऽसंयुज्यमानयोरिव मेर-हिमाचलयोः पृथक्त्वम्, एतत् 'मसंयोग' इत्यनेनोक्तम् । तथा संयुज्यमानानामपि पृथक्त्वं विजातीयानां महिप- वराहादीनां, तदाह-वलक्षण्यमित्यादि । -विशिष्टलक्षणयुक्तस्वलक्षितं विजातीयाना पृथक्त्वमित्यर्थः । तथैकजातीयानामप्यविलक्षणानां माषाणां पृथक्त्वं भवतीत्याह- अनेकतेति । एकजातीयेपु हि संयुक्तेषु न वैलक्षण्यं नाप्यसंयोगः, अथ चानेकता पृथक्रवरूपा भवतीति भावः । किंवा, पृथक्त्वं गुणान्तरमिच्छन् लोकव्यवहारार्थ. मसंयोग-वलक्षण्यानेकतारूपमेव यथोदाहृतं पृथक्त्वं दर्शयति । मानं प्रस्थाढकादि तुलादिमेयम् । करणं गुणान्तराधायकत्वं संस्करणमित्यर्थः; यद्वक्ष्यति-"संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते" (च. वि. अ. १) इति । भावस्य पष्टिकादेायामादेवा- भ्यसनमभ्यासः । अभ्यसनमेव लोकप्रसिद्धाभ्यां पर्यायाभ्यां विवृणोति-शीलनं सततक्रियेति, यं लोकाः शीलन-सततक्रियाभ्यामभिदधति सोऽभ्यास इति भावः । अयं च संयोगसंस्कारविशेषरूपोऽपि विशेपेण चिकित्सोपयुक्तत्वात् पृथगुच्यते । न यथावत् प्रयतत इति वचनेन शब्दादिषु च गुर्वादिपु च परादीनामप्राधान्यं सूचयति । (च. द.)। दीर्घजीवितीये गुणेषु परादयः पठिता:-"सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रय- बान्ताः परादयः । गुणाः प्रोक्ताः" (च. सू.स. १) इति; संप्रति तानाह-परापरत्वे इत्यादि । ते च चिकित्सायाः सिद्धयुपायाः, सम्यगनुष्ठानस्य तज्ज्ञानाधीनस्वात् । सम्यग- नुष्ठानादि कर्मणां सिद्धिा, अतस्त्रान् परापरत्वादीन् गुणान् लक्षणैः प्रचक्ष्महे कथयामः। परापरवे माह-देशेत्यादि । परत्वं संनिकृष्ट स्वम् उपयोगितायामासन्नरवं, तद्विपर्ययः भपरवम् । उक्तं च कणादेन-"एकदिकाभ्यामेककालाभ्यां संनिकृष्ट-विप्रकृष्टाभ्यां परमपरं च ।" (वै. द. ७।२।२१) इति । तन्मते परत्वमपरत्वं द्विविधं दिक्कृतं, कालकृतं च । युक्तिमाह-युक्तिरिति । युक्तिरिति लक्ष्य निर्देशः, लक्षणं-योजने- त्यादि । या युज्यते तादशी दोप-देश-काल-मानाथपेक्षिणी योजना युक्तिः । गणिवं गणनव्यवहारहेतुरेक-द्वि-ज्यादिसंख्या । संयोगमाह-योग इति । सह योग: द. ५.८ ११४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । परस्परेण सह योगः संहतीभावः, स संयोग उच्यते । रसविमाने च वक्ष्यति- "संयोगः पुनयोर्वहूनां वा द्रव्यागां संहतीभाव." (च. वि. अ. १) इति । संयोगस्य लक्षणमुक्त्वा भेदमाह-द्रव्याणामिति । स च संयोगो न्यानो - द्वन्द्व-सर्वेककर्मजः । द्वन्द्वस्य द्वयोः, सर्वपां वहनाम् , एकस्य घ फर्मणः जायते तेन त्रिविधः । वैशेपिकास्तु आहुः-"भन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगमात्र संयोगः" (वै. द. ७।२।९) इति । संयोगजः संयोगो यथा-महुली-तरसंयोगात् शरीर-तरुसंयोगः । ननु संयोगः किं समवायवन्नित्यः ? उत नेति ? अत आह- अनित्य इति । संयोगोऽनित्य एव, विभागात्तस्य नाशो भवति । विभागमाह-विभाग- स्त्विति । विभागो विभक्तिः विभक्तप्रत्ययनिमित्तविभजन, प्राप्तिपूर्यिका अप्राप्तिः विभागः। स च संयोगप्रतिद्वन्द्वी गुणभेदः, न तु संयोगाभाव एव विभागः, तयारवे गुण-कर्मणोरपि विभागव्यवहारप्रसंगः स्यात् । तत्पर्यायो-वियोगो भागशो ग्रह इति । वियोग संयोगस्य विगमः । भागशः विभागशो ग्रहः विभक्तम्वेन ग्रहणम् । संयोग- वत् विभागोऽपि द्वन्द्व-सवैककर्मजः, अनित्यश्चापि । पृथत्वमाह-पृथक्त्वमिति । इदमसात् पृथक् मर्थान्तरमिति पृथक्प्रत्ययनिमित्तं पृथक्त्वम् । तरपयांयानाह- असंयोग इत्यादि । पृथक्त्वम् , असंयोगो, वैलक्षण्यम्, अनेकता, इत्यनर्यान्तरम् । इदमस्मात् पृथक् , इदमनेन न संयुक्तम् , इदमसाद विलक्षणं विशिष्टम् , इदमेतम नैकमिति प्रतीतीनां शब्दवैशिष्टयेऽपि अर्थतोऽभिन्नत्वमेव । ननु, भन्योन्याभाव एव पृथक्त्वम् , इदमसात् पृथक् अन्यत् इतिवत् भिन्नमिति प्रतीतेरन्योन्याभावालम्ब- नस्वादिति चेत् ? न, पृथगादिशब्दानां पर्यायत्वेऽपि न अन्योन्याभावार्थरवं, तत्र पञ्चमीप्रयोगानुपपत्तेः; इदमसात् पृथक्, इदम् इदं न भवति, इति प्रतीत्योर्मिन- विषयत्वाच । परिमाणमाह-परिमाणमिति । परिमितिव्यवहारकारणं परिमाणं मानं प्रस्थाढकादि । संस्कारमाह-संस्कार इति । करणं गुणान्तराधायकसंस्करण संस्कारः । रसविमाने च वक्ष्यति-"करणं हि स्वाभाविकानां द्रव्याणामभि- संस्कारः। संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते । ते च गुणास्तोयाग्निसंनिकर्ष शौच- मन्थन-देश-कालवशेन भावनादिभिः कालप्रकर्प-भाजनादिभिश्चाधीयन्ते" (च. वि. अ.१) इति । अभ्यासमाह-भावेत्यादि । भावानामभ्यसनं पुनः पुनरनुष्ठान सातत्येन करणमभ्यासः । शीलनं सततक्रिया च तत्पर्यायौ। उपसंहरति-इतीति । इति सर्वे परादयो गुणाः स्खलक्षणैरुका. । यैरविदितै. येषामविज्ञाने चिकित्सा न यथावत् प्रवर्तते (यो.)॥ परल, अपरख, युक्ति, संख्या, सयोग, विभाग, पृथक्त, परिमाण, सस्कार और अभ्यास ये दस परादि गुण कहलाते हैं । इन दस गुणों के ज्ञान के विना चिकित्सा ठीक नहीं हो सकती है (और चिकित्सा ठीक होनेसे ही रोगनिवृत्ति होती है), इसलिए उनके लक्षण यहाँ कहे जाते हैं।- पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । १-२ परत्व मौर अपरत्व -देश, काल, वय, मान (परिमाण), पाक विपाक), वीर्य, रस आदिमें परल और अपरख व्यवहारके हेतुभूत जो गुण उनको परत्व और अपरत्व कहा जाता है। परख अर्थात् उत्कृष्टल और अपरख अर्थात् भवरल-निकृष्टत्व, जैसे-देशमें मरुदेश पर-उत्कृष्ट, अनूप अपर-निकृष्ट; कालमें विसर्ग पर, आदान अपर, वयमे तरुणावस्था पर, अन्य अपर; शरीरके मानके विषयमें शारीर- स्थानमें जो प्राकृतमान कहा गया है वह पर, अन्य अपर; विपाक, वीर्य और रसोंमें जिनके लिए जो उपयोगी हो उनके लिए वह पर, अन्य अपर । मूलके 'वीर्यरसादिषु' इस पदमे आदिशब्दसे प्रकृति, वल आदिका ग्रहण करना चाहिए। ३ युक्ति-योजना-दोष, देश, प्रकृति, काल आदिको देख करके की हुई औषधकी सम्यक् योजना-कल्पनाको युक्ति कहते हैं । यदि वह कल्पना अयोगिकी (अयुक्त) हो तो कल्पना होनेपर भी युक्ति नहीं कहलाती। ४ संख्या-गणनाके व्यवहारके हेतु एक-दो-तीन आदिको संख्या कहते हैं। ५ संयोग-दो या अधिक द्रव्योंका साथ योग होना-साथ मिलना संयोग कहाता है । यह सयोग द्वन्द्वकर्म(दोके कर्म-चेष्टा)से, सर्वकर्म (अनेकोंके कर्म )से, या एकके कर्मसे होता है और अनित्य है। लड़ते हुए दो मेंढोंका सयोग द्वन्द्वकर्मज- दोकी चेष्टासे होने वाला सयोग है । एक पात्रमे डाले हुए उर्दोका सयोग सर्वकर्मज । - १ वैशेपिकवाले 'वह विप्रकृष्ट-दूर है', 'यह समिकृष्ट-समीप है' ऐसा प्रयोग जिन गुणों के कारण होता है उनको क्रमश परत्व और अपरत्व कहते हैं । उनके मतमें दैशिक और कालिक दो प्रकारका परत्व और अपरत्व होता है। जिसका देश अर्थात् स्थानसे सवन्ध हो उसको दैशिक कहते हैं । यहाँ परका अर्थ दूरदेशीय और अपरका अर्थ निकट- देशीय होता है। जिसका काल अर्थात् समयसे संवन्ध हो उसको कालिक कहते हैं। यहाँ परका अर्थ दूरकालीन और अपरका अर्थ समीपकालीन होता है । आयुर्वेदाचार्योंने सन्निकृष्ट याने उपयोगितामें समीप (प्रधान-उत्कृष्ट ) और विप्रकृष्ट याने उपयोगितामें दूर (अप्रधान- निकृष्ट) ऐसा अर्थ लेकर देश, काल, वय, मान, विपाक, वीर्य, रस आदिमें परापरत्वका संबन्ध बताया २ सयोग याने दो वस्तुओंका वाय सवन्ध । जो पदार्य पहलेसे सपद नहीं ये उनका समयविशेपमें साथ मिल जाना संयोग कहलाता है-"अप्राप्तयोस्तु या प्राप्ति. सैव संयोग ई रितः" । वैशेपिकवाले अन्यतरकर्मज, उभयकर्मज और संयोगज ये तीन प्रकारके संयोग मानते हैं । अन्यतरकर्मज (एककर्मन ) और उभयकर्मज (इन्द- कर्मज)का उदाहरण मूलमें दिया है । हाथ और शाखाके संयोगसे शरीर और वृक्षका जो संयोग होता है उसको संयोगज संयोग कहते हैं। sto -- ६ ११६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । है, क्योंकि इसमें अनेक उर्दोका एक साथ मिलना होता है । यक्ष और काकका संयोग एककर्मज है, क्योंकि वह अकेले कारकी चेष्टासे होता है। विभागसे संयोगका नाश होता है, इसलिए सयोग अनित्य है। विभागे-विभक होना, सयोगका वियोग होना और विभकतया ग्रहण होना इसे विभाग कहते हैं । यह भी सयोगकी तरह द्वन्द्वकर्मज, सर्वकर्मज और एककर्मज इस प्रकार तीन प्रकारका होता है । सयोगसे विभागका नाश होता है, इसलिये विभाग अनित्य है। ७ पृथक्त्व-'यह पट घटसे पृथक् है' इस प्रकारकी बुदि जिससे उत्पन्न होती उसे पृथक्त्व कहते हैं। यह पृथक्त्व तीन प्रकारका होता है. (१) असंयोग- लक्षण-जिनका कभी भी सयोग न हो ऐसे मेरु और हिमाचलका पृथक्त; (२) घेलक्षण्यरूप-विशिष्टलक्षणयुक्त विजातीय द्रव्योंका पृथक्त, जसे-गाय, गॅस, सूअर आदिका; (३) अनेकतारूप -सजातीयोंका भी एक दूसरेसे पृथक्त, जैसे अनेक उर्दोका सजातीय होनेपर मी एक दूसरेसे पृथक्त्व होता है। ८ परिमाण-माप या तोलसे जो मान किया जाता है उम मानव्यवहारका हेतुभूत जो गुण वह परिमाण कहलाता है। ९ संस्कार-मर्दन, भावना, रन्धन आदि अनेक प्रकारकी क्रियाओंद्वारा किसी वस्तुमे जो गुणान्तरका आधान करना, जैसे-रन्धनक्रिया द्वारा शालिसे ओदन (भात), लावा आदि वनाना, इसे संस्कार कहते हैं। है , । । । १ उर्द अचेतन द्रव्य होनेसे उनमें कर्मकी कल्पना करना ठीक नहीं प्रतीत होता, मत. मेले आदिकी भीडमें परस्सर सलग्न होकर जमा हुए मनुष्योंका उदाहरण देते तो ठीक होता । क्योंकि मनुष्य सचेतन होनेसे उनका सयोग सर्वकर्नजका ठीक उदाहरण बन सकता है। २ जिसके द्वारा संयोगका नाश होता है उसे विभाग कहते हैं । जो पदार्थ पहले आपसमें सयुक्त थे उनका अलग-अलग हो जाना ही विभाग है । वैशेपिकवाले अन्य- तरकर्मज, उभयकर्मज और विभागज ऐसे तीन प्रकारके विभाग मानते हैं । जहाँ एक विभाग हो जानेसे दूसरा विभाग भी हो नाता हो, उसको विभागज विभाग कहते हैं। जैसे किसी शाखासे पत्ता गिरनेपर शाखाके साथ घृक्षसे भी पत्तेका विभाग हो जाता ३ आयुर्वेदोक्त सस्कार वैशेषिकोक सस्कारसे भिन्न है । वैशेपिकर्म सस्कारके तीन भेद वतलाये गये हैं-१ भावना, २ वेग और स्थितिस्थापक । पूर्वानुभूत विषयोंका सरण या प्रत्यमिशा (पहचान ) जिस सस्कारद्वारा होता है उसको भावना कहते हैं । यह आत्माका गुण है । मूर्तिमान् द्रव्योंमें (पृथिवी, जल, अमि वायु तथा मनमें) कारणविशेषसे जो गति- प्रवाह उत्पन्न होता है उसको वेग कहते हैं। जिस गुणके कारण पदार्थोके अवयव सानच्युत हो नानेपर पुनः अपने स्वाभाविक स्थानमें आ जाते हैं, उसे स्थितिस्थापक कहते हैं। जैसे है। - - पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः । ११७ है - १० अभ्यास-जिसे भावाभ्यसन (पदार्थीका वारंवार अभ्यास करना-पुनः पुनः सेवन करना), शीलन (एक ही पदार्थका वारंवार अनुशीलन करना) और सततक्रिया (एक ही क्रिया वारंवार करना) कहा जाता है, वह अभ्यास है। उपसंहार-इस प्रकार ये परादि दस गुण, जिनके यथावत् जाने विना चिकित्साकार्य ठीक नहीं हो सकता है, उनका लक्षण कहा गया एकीयमतेन गुणप्राधान्यनिरूपणम्- गुणाः प्रधाना इति केचित् (र. वै. सू. भ. १, सू. १२१)। गुणाद् रसानामभिभवात् (सू. १२२) । इदानीं गुणप्राधान्यपक्षः । गुणान् प्रधानान् मन्यन्ते रसेभ्य इति मन्यामहे, रसानामभिभवादिति वचनात् । रसान- भिभूय गुणाः स्वं काय निर्वतयन्ति । यथा-उष्णोदकं श्लेष्माणं हरति माधुर्य- मभिभूय, तथा पटोलश्च महत्पञ्चमूलं च तिक्तमौरण्याद्वातं जयति । यद् येनामि. भूयते तत्तसादप्रधानं दृष्टम् । यथा-मानोर्नक्षत्रमिति (भा.) । विपाक- कारणत्वात् (सू. १२३)1xxx गुणा विपाकयोः कारणं; शीत-निग्ध-गुरु पिच्छिला गुरुविपाकस्य, लघु-रुक्ष-विशद-तीक्ष्णा लघुविपाकस्येति । कथमेवं रसेभ्यः प्रधाना? इति । रसानां कार्यनिर्वृत्तिः पाकायत्ता, स च पाको गुणायत्त इति । यदपेक्षयाऽन्यस्य वृत्तिस्तस्मात् तस्य प्राधान्यं दृष्टम् । यथा वायोर्दोप- धातु-मलानाम् (भा.) । बाहुल्यात् (सू. १२४) । ४ ४ ४ रसेभ्यो बहेवो गुणाः पृष्टाः-रसाः पद, गुणा दशेति; अल्पेभ्यो बहवो विशिष्टा इति लोक. प्रसिद्धमेककर्मणि (भा.)। बहुधोपयोगात् (सू. १२५)।-किंच, बहुधाs- भ्या-परिपेकावगाहरूपेण शीतादय उपयुज्यन्ते, रसास्तु मुखत एवेति गुणाः प्रधानाः, ये बहुधोपयोगं गच्छन्ति ते प्रधाना दृष्टाः । यथा-कल्पवृक्षाः (भा.) । अनेककर्मत्वात् (सू. १२६) । अनेक कर्म धातुमलानां वर्धन- क्षपणादि वर्णयन्ति तम युक्तम् , अन्येषां च सामान्यादिति; तस्मादन्योऽर्थस्य विन्यासः-अनेकेषां फर्म भनेककर्म, तद् येषां तेऽनेककर्माणः, तस्सादनेककर्म- स्वात् । रसादिसहिताम्तेषां तेषां तत्तत्कर्मणि साहचर्यकरणादनेककर्माण इति (भा.)। महाविपयत्वात् (सू. १२७)। पूर्ववद् रसेपु यथा (भा.)। गुणानु- गृहीतानां रसानां प्राधान्यात् (सू. १२८)।xxx गुणैः शीतादिभिरनु- वृक्षकी शाखाको पकटकर झुका दीजिये, वह नीचे चली आयगी। किन्तु उसे छोड़ दीजिये, वए तुरत ही अपने स्थानपर जा पहुंचेगी। एक इसपातकी पट्टीको मोड़ दीजिये, वह टेढ़ी हो जायगी। किन्तु छोडने पर पुन. सीधी हो जायगी। १ "शीतोष्ण-स्निग्ध-रुक्ष-विशद-पिच्छिल-गुरु-लघु-मृदु-तीक्ष्णा गुणाः कर्मण्याः" (र, वै. म. ३. सू ११०) इत्यगिन् सूत्रे कथिता इत्यर्थ, । .
११८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । गृहीता ये रसास्तेषां प्राधान्यदर्शनाद् रसेभ्यो गुणाः प्रधाना इति विभः । कथं- "शैत्यात् नेहान्मार्दवाय पैच्छिल्यादविभागतः । मधुराणां घृतं श्रेष्ठं विपाके लाघवेन च ॥ अविदाहान्मृदुत्वाच्य कपाय-मधुरान्वयात् । भम्लेप्चामलकं श्रेष्ठं विपाके लाघ- घेन च ॥ नात्युष्णत्वान्मृदुस्वाथ मेहेनानुगमादपि । लवणानां स्मृतं श्रेष्टम विदाहाप सैन्धवम् ॥ मृदुत्वाच्च गुरुत्वाध वात-पित्तप्रकोपणात् । कटुकानां स्मृताः श्रेष्ठाः पिप्पल्यो गुणसंपदा ॥ वृष्यत्वाय गुरुत्वाध मारुतस्याप्रकोपणात् । तिक्तानां तु स्मृतं श्रेष्ठ पैच्छिल्येन च कूलकम् ॥ वृष्यवाहणत्वाच्च हिफायां चातनिग्रहात् । कपा- याणां स्मृतं श्रेष्ठं विविधैश्च गुणैर्मधु ॥” इति (भा.)। उपदेशादपदेशाद- नुमानात् (सू. १२९)।-किं चान्यत् ? उपदेशादिभित्रिभिः पूर्वोक्तरिति । 'तेषां गुरूष्ण-स्निग्धा वातनाः' इत्यादिरुपदेशः । अपदेशः-तीक्ष्णोऽयं पुरुषः, मृदुरयं गीत इति । भनुमानं पूर्ववत् (भा.)॥ कई भाचार्य कहते हैं कि-रसोंसे गुण प्रधान हैं। क्योंकि (१) गुणोंसे रसोंका पराभव होता है। गुण रसोंका पराभव करके अपना कार्य करते हैं। जैसे-गरम जल मधुर रसका पराभव करके कफको दूर करता है। पटोल और महत पञ्चमूल उष्ण होनेसे तिक्त रसका पराभव करके वातको दूर करते हैं । जिसका दूसरेसे पराभव होता हो वह अप्रधान होता है, जैसे सूर्यकी अपेक्षया नक्षत्र । (२) विपाकका कारण होनेसे भी गुण प्रधान हैं । शीत, निग्ध, गुरु और पिच्छिल गुण गुरुविपाकके और लघु, रूक्ष, विशद और तीक्ष्ण गुण लघुविपाकके कारण हैं । इस प्रकार गुण रसोंसे भी प्रधान हैं । क्योंकि रसोंकी कार्यनिष्पत्ति विपाकके अधीन है और विपाक गुणके अधीन है। (३) अधिक होनेसे भी गुण प्रधान हैं । रस छः हैं, गुण दस है। जो ज्यादह होते हैं वे प्रधान होते हैं, यह लोकमें भी प्रसिद्ध है। (४) गुणोंका अनेक प्रकारसे उपयोग होनेसे भी गुण प्रधान हैं । अभ्या, परिपेक, अवगाह इत्यादि अनेक रूपसे शीतादि गुणोंका उपयोग होता है । रसोंका उपयोग केवल मुखद्वारा ही होता है। जिनका अनेक प्रकारसे उपयोग होता है, वे प्रधान समझे जाते हैं । (५) गुण रसादिके साथ रहकर अनेक कर्म करते हैं, इसलिए भी गुण प्रधान हैं । (६) गुणों के विषय-आधारभूत द्रव्य अनेक होनेसे गुण प्रधान हैं। जैसे अन्य इन्द्रियोंकी अपेक्षया मनके विषय अधिक होनेसे मन प्रधान है। (७) गुणसे अनुगृहीत रसोंका प्राधान्य देखा जाता है । जैसे-घृतके गुणोंके लिखा है कि शैत्य, स्नेह, मार्दवं और पैच्छिल्य गुणयुक्त होनेसे और विपाकमें लघु होनेसे मधुर रसवाले द्रव्योंमें घृत श्रेष्ठ है, इत्यादि । (८) गुणोंका उपदेश किया जाता है, जैसे-गुरु, उष्ण और निग्ध वातघ्न होते हैं, इसलिए गुण प्रधान हैं। (९) अपदेशसे-गुणवाचक शब्दोंसे उपमा १ कूलक पटोलफलम् । २ देखें इसी ग्रन्थमें पृ. ९९ ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । दी जाती है, जैसे यह पुरुष तीक्ष्ण है, यह गीत मृदु है, इस प्रकार गुणों के द्वारा व्यवहार होनेसे भी गुण प्रधान हैं। (१०) शीतोष्णादि गुण देखकर द्रव्योंके कर्मका अनुमान होता है कि यह शीत होनेसे पित्तहर है, यह उप्ण होनेसे वातहर है, इत्यादि । इसलिए भी गुण प्रधान है । सुश्रुतने एकीय मतसे द्रव्य, रस, वीर्य और विपाक इन चारोंके ही प्राधान्यका प्रतिपादन किया है। इसपर चक्रपाणि लिखते हैं कि-"अथ द्रव्यादिप्राधान्यविचारे कस्साहुणा नोद्भाविता इत्याह- रसेपु तु गुणसंशेति । रसेष्वित्युपलक्षणं, तेन वीर्य-विपाकयोरपि गुणसंक्षेति चोद्धव्यं; तेन रसादिप्राधान्यव्युत्पादनेनैव गुणविशेषण- प्राधान्यं लभ्यत इत्यर्थ:"-द्रव्यादिप्राधान्यके विचारमें गुणप्राधान्यका विचार क्यों नहीं किया गया ? इसका उत्तर देते हुए सुश्रुत कहते हैं कि-रसोंको (वीर्यों और विपाकोंको भी) गुणसज्ञा दी जाती है । इसलिए रसादिके प्राधान्यनिरूपणसे गुणों के प्राधान्यका निरूपण भी सिद्ध होता है। इति आचार्योपान त्रिविक्रमात्मजेन यादवशर्मणा विरचिते द्रव्यगुणविज्ञाने पूर्वार्धे गुणविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ ? 1 रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः। गुणविज्ञानीयाध्याये इन्द्रियार्थेषु रसोऽपि सामान्यतया निर्दिष्टः । परमायुर्वेदे रसविषये भूरि ज्ञातव्यतया विस्तरेण रसानां स्वरूपोत्पत्ति-भेद-गुणादीतिरूपमितुं रसविज्ञानीय भारभ्यते- अथातो रसविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामो यथोचुरानेयादयो महर्षयः॥ गुण विज्ञानीयाध्याय, इन्द्रियोंके पाँच विषयोंमे रसोंका भी सामान्यतया निर्देश किया गया है, परंतु आयुर्वेदमें रसोंके विपयमें बहुत ज्ञातव्य विषय लिखे हैं, अत रोका लक्षण, उत्पत्ति, मेद, गुण आदिके निरुपणके लिये रसविज्ञानीय अध्याय कहा जाता है। . . रसस्य लक्षणमुत्पत्तिक्रमश्च- रसनार्थों रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा । निर्वृत्तौ च विशेषे च प्रत्ययाः खादयस्त्रयः ॥ (च. सू. अ. १)। रसलक्षणपूर्वकं रसोत्पत्तिक्रममाह-रसनार्थ इत्यादि । रस्यत आस्वायत इति रसः। रसनार्थ इति जिह्वाग्राह्यः । एतच्च पपणामपि रसानामनुगतं रूपादिषु च व्यावृत्तत्वात् साधुलक्षणम् । तस्येति रसस्य । दन्यमिति माधारकारणम् । द्रव्यशब्दो १२० द्रव्यगुणविज्ञानम् । साधारकारणवाची; यथा-"पञ्चेन्द्रियद्व्याणि" (च. सू. अ.८) इति । क्षितिस्त- थेति यथा आप भाधारकारणं तथा क्षितिरपि । 'अप्शिती' इति वक्तव्ये, 'क्षितिसया' इतिवचनात् क्षितेराधारकारणत्वममुख्यमिति दर्शयति । येनापो हि निसर्गण रसवत्यः । तथा यात्रेयभद्रकाप्यीये "सौम्याः सल्यापः" (च. सू. भ. २६) इत्यादिना जल एव रसस्य व्यक्तिरिति दर्शयति । सुश्रुतेऽप्युक्त-"तस्मादाप्यो रसः" (सु. सू. स्था. भ. ४२) इति । क्षिति-स्त्वपामेव रसेन निस्यानुपत्तेन 'रसवती' इत्युच्यते । यतो नित्यः क्षिति-जलसंवन्धः, वचनं हि-"विष्ट परं परेण" (न्या. द. ३१६०) इति । अस्यार्थः-ख-वायवग्नि-जल-क्षितीनामुत्तरोसरे भूते पूर्वपूर्वभूतस्य निस्यमनुप्रवेशः, तस्कृतश्च खादिपु गुणोत्कर्षः । रसस्य किं म्यक्ती अक्षिती कारण? किंवा विशेपे? इत्याह-निवृत्तावित्यादि.। निवृत्तौ च भमिन्यकी। एतेन रसोऽभिव्यज्यमानो जल-क्षित्याधार एव व्यज्यत इति दर्शयति । चकाराद्वि- शेपेऽपि मधुरादिलक्षणे अप्क्षिती प्रत्ययौ । तेन "सोमगुणातिरेकान्मधुरः, पृथिव्यग्नि- गुणातिरेकादम्लः" (च. सू. अ. २६) इत्यादिना जल-पृथिव्योरपि विशेषकारणरवं वक्ष्यमाणमुपपन्नम् । विशेपे च प्रत्ययाः खादय इति मधुरादिविशेषनिर्वृत्ती निमित्त कारणं ख-वाखनलाः, न स्वाधारकारणभूवाः । खादय इत्यनेनैव त्रित्वे लब्धे पुनः 'त्रयः' इति वचन तेषामेव व्यस्तसमस्तानामपि प्रत्ययत्वदर्शनार्थम् । अत एव व्यस्त समस्ताकाशादिसंसर्गभेदागसानां मधुरतर-मधुरतमायवान्वरभेद उपपन्नः । विशेष चेति चकारादभिव्यक्तावप्याकाशादीनां निमित्तकारणत्वं दर्शयति । वक्ष्यति हि- "तास्वन्तरीक्षाश्यमाना भ्रष्टाश्च पञ्चमहाभूतगुणसमन्विता जङ्गम-स्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, यासु पढभिमूर्छन्ति रसाः" (च.सू अ. २६) इति । अन्ये तु विशेपे चेति चकारं खादयश्चेत्यत्र योजयन्ति, तेन चकारात् कालोऽपि विशेषेऽभिव्यक्तौ च कारणं लभ्यते । साक्षात्तु कालस्यावचनेन खादिभ्योऽप्यपकृष्टं कालस्य कारणत्वं दयते । किंवा रसस्यापो द्रव्यं क्षितिस्तथेति पूर्ववदेव, निर्वृत्ती चेति क्षितिरेव निवृत्तावभिव्यक्तौ प्रत्ययो नापः, यत आपो व्यक्तरसा एव, क्षितिसंबन्धादेव च रसोऽभिव्यक उपलभ्यते । उक्तं च-"जङ्गम-स्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, यासु षढभिमूर्च्छन्ति रसाः" (च. सू. म. २६) इति । तेन पार्थिवद्व्यसंबन्धादेवापां रसो व्यज्यते, नान्यथा । विशेपे चेति चकारा- दक्षिती विशेपे कारणे । यद्यपि चापिक्षती विशेपे कारणे, तथाऽपि "सोमगुणाति- रेकान्मधुरः"-(सू. भ. २६) इत्यादौ तु खादय एव तथा सनिविशन्ति यथा सोमोऽतिरिक्तो भवति, तेन तत्राप्यूनत्वेन सन्निविष्टाः खादय एव विशेषहेतव इति । यद्यपि चाभिव्यक्तिर्मधुरादिविशेषरहिता क्वचिद्भवति, तथाऽपि सामान्येन सर्वत्र यदभिव्यक्तयेऽनुगतं कारणमुपलभ्यते क्षितिरूपं जलक्षितिरूपं वा तदभि- व्यक्तिकारणं; यदनुगमात्तु मधुरादिविशेपोपलब्धिस्तविशेषकारणमुच्यते (च. द.)। ।
पूर्वार्धे रसविझानीयो नाम सृतीयोऽध्यायः । १२१ दमस्य पाचमातिकत्वात् तदाधितरमोऽपि पाचभौतिकः । वचनं पद परभूतप्रभवाः" (च. सू. अ. २६) इति । रसस्य पाशीतिकरवं दर्शयति- तस्येत्यादि । तस्य द्रव्यमापः तथा क्षितिः, रसस्य भक्षियोर्गुणत्वात् । तथा ब- "तेपामेकगुणं पूर्व गुणवृद्धिः परे परे । पूर्वः पूर्वो गुणश्चैव क्रमशो गुणिपु स्मृत." (च. शा. म. १) इति । रसोऽपां नैसर्गिका, क्षितेस्तु भवनुप्रवेशकृतः । तेन रसस्य योनिरापः, क्षितिवाधारः; तस्य निर्वृत्ती निष्पत्ती विधोपे मधुरादिभेदे च सादयः खं वायुरनिम्न एते त्रयः प्रत्ययाः कारणानि । गगन-पवन-दहनसमवायात् निर्वृत्तिविशेपो भवतः । अनेन सादीनां त्रयाणां रसं प्रति कारणस्वमुपदर्शिवं भवति, अपां शितेश्र वदनिर्याधमेव । एवं पश्चानां महाभूताना रसं प्रति कारणतया वर्तमानस्वादसस्य पामभौतिकत्वमुपपद्यते (यो.) । वत्र यावद्रसस्वरूपं न ज्ञायते वावत्तद्विशेषधर्माः कयं ज्ञेया इति लक्षणतः, कारणतः, संख्याता रसोऽभिनिरूप्यते। सत्र रससामान्यलक्षणं यदाह चरकः-"रसनार्थो रसः" इति (च.सू. स्था.म.)। रसनेन्द्रियग्रामो योऽर्थः स रस इति लक्षणार्धः । "एतच पण्णामपि रसानामनुगतं, रूपादिपु च व्यावृचस्वात् साधु लक्षणम्" इति चक्रः। अस्मपितृघरणास्तु "यथाधु- समेतलक्षणं रसस्वे रसाभावे चातिव्यापकं, वयोरपि रसनेन्द्रियमानत्वात् व्याऽती- न्द्रियरसे चाव्यापकं, तस्मात् 'रसनेन्द्रियग्रामवृत्तिगुणस्वावान्तरजातिमरवं रसस्वम्' इति लक्षणं योऽयम्" इत्याहुः । ननु, "माप्यो रसः" इति (सु. सू. स्था.म..) सुश्रुतेनोकं, तत्र विप्रतिपयामहे-यद्याप्यो रसस्वहिं कथं पार्थिवद्रव्येषु रसोपलम्भ इति प्रथमा विप्रतिपत्तिः, द्वितीया तु यद्याप्य एव रसस्वर्हिमपामव्यकरसरवेन मधुरादि- विशेपोत्पादो नोपपद्यत इति; मथ 'पाञ्चभौतिकस्वमेव रसस्य' इति मन्यसे तदपि नोपपचते, तेजोवारवाकाशान नीरसत्वात् रसं प्रति कारणस्वानुपपचेः । अत्राहु:- यद्यप्याप्य एव रससथाऽप्युत्तरोत्तरभूतेषु पूर्वपूर्वभूतगुणानुप्रवेशासवरवं पृथि- व्यामप्युपपद्यते । अत एवोक्त-"विष्टं झपरं परेण" (न्या. द. अ. ३, मा. १, सू. ६६) इति । अस्वार्थ:--अपर पूर्व भूतं परेण भूतेनानुप्रविष्टम् । तेन शब्दगुणस्सा- काशस्य पायावनुप्रवेशाद्वायोरपि शब्दवावं, स्पर्शगुणवं च स्वत एव; एवं वायो. खेजस्यनुप्रवेशातेजः शब्द-स्पर्श-रूपगुणं; तेजसोऽपि जलेऽनुप्रवेशाजलं शब्द-स्पर्श- रूपनसगुणम् ; एवं जलस्य च पृथिव्यामनुप्रवेशात् पृथिवी शब्द-स्पर्श रूप-रस-गम. गुणेति शेयम् । नचवं सर्य एव गुणाः सर्वेषामेव प्रसज्येरन् , तत् कथमाप्यो रस इति वायं तेषु तेषु भूतेषु तत्तद्गुणानुप्रवेशेऽप्युरकर्षाभिप्रायेणाप्यस्वादिव्यपदेशात् । मत आकाशाधिके द्रव्ये शब्दोऽधिकः, तथा वाताधिके द्रव्ये स्पर्शोऽधिकः, तथा तेजोधिके रूपमधिकं, जलाधिके च रसोऽधिकः, पृथिव्यधिके. घ गन्धोऽधिका, इति शब्दादीनामाकाशीयस्वादिव्यपदेश इत्यर्थः । तया, अपामव्यक्तरसत्वेऽपि भूतान्तरसंवन्धान्मधुरस्वादिवैजात्यमुपपद्यते । उर्फ च सुश्रुते-"स खल्वाप्यो १२२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । - रसे शेपभूतसंसर्गाद्विदग्धः पविधो भवति" (सु. सू. स्था. म. ४२) इति । अस्यार्थः-स भाप्यो रसो जलादन्यानि भूतानि शेपभूतानि, तेषां संसर्गाद्विदरमा परिणतः कालसहायभूमि-वियदनिलानलसंसर्गण परिणामानारं गतः परप्रकारो 'भवतीति । 'तत्र पृथिव्यम्बुगुणबाहुल्यान्मधुरः, तोयाभिगुणवाहुस्यादम्सः, कृषि- व्यग्मिगुणवाहुल्यालवणः, वाय्य मिगुणयाहुल्यात् फटुकः, पारपाकाशगुणयाहुभ्या- त्तिक्तः, पृथिव्यनिलगुणयाहुल्यात् कपाय.'-(सु. सू. स्था. भ. ४२) इति । ननु, यदि तोयाग्निगुणवाहुल्यादम्ला तर्हि उष्णजलखाप्यम्पसा कुतो न स्यात् ? नेप दोपः, नहि भूतसंसर्गमानादेव रसविदशेपो निप्पयते, किं ताहि विशिष्ट परिणतिम. पेक्षते; तद्यथा-पार्थिवस्यापि लोटस्वामितप्तस्य पृथिव्यग्निगुणबाटल्यापि न कवणता भवति, लवणत्वसाधनविशिष्टविदाहासंभवादिति । एनमेवा शोकेन कत्रिदाह- "वोयामिगुणपाहुल्येऽप्यम्लत्वं नोप्णयारिण. । नकम्मान्तसंयोगाद्विदाहाब रसा यतः" इति । ननु, यदि शेषभूतयोगान्मधुरादिपट्विधरव तस् कथं पृषिम्यम्मुगुण- याहुल्यं मधुरेऽभिधाय मधुरेऽपि विशेपेऽपा कारणस्यमुच्यते; मत्र वदन्ति-मापो रसानामाधारकारणम्, मपां पृथिव्यामनुप्रवेशात् पृथिव्यपि भाधारकारणमेव; तेन जलक्षिती अपि तदाधारतया रसानामभिव्यक्ती, अभिव्यक्तेश्च मधुरादिरूपताम. 'न्तरेणासंभवान्मधुरादिविशेपेऽपि कारणे भवतः । भम्यादयस्तु प्रयो नीरसतया मधुरादिविशेपे निमित्तकारण प्राधान्येन भवन्ति, तव्यतिरेकेणाम्लादिरसामावात्। रसाभिव्यक्तेश्याम्यादिभूतत्रयसनिधानं विनाऽनुपलब्धेरभिव्यकापपि कारणस्वमस्या- 'दीनां भवति । तदुक्तं चरके-"रसनार्थी रसस्तस्य अव्यमापः क्षितिस्तथा। निवृत्ती च विशेपे च प्रत्ययाः खादयस्रयः" (च. सू स्था. भ. १) इति । भत्र हि "चकारद्वयाजल-क्षित्योरपि विशेपे कारणत्वं, तथा खादीनां च निवृत्तावपि कारणस्व- मुक्तं, तेन मधुरे विशेपेऽप्यपा कारणत्वात् सुष्टुक्तं-'पृथिव्यग्युगुणवाहुल्यान्मधुर.', इति, एव 'तोयाग्निगुणवाहुल्यादम्लः' इत्यपि समाधेयम् । न च यथा भूमितीया. धिक्यान्मधुरः, एवं तोययावाधिक्याद् भूम्यामाशाधिक्याद्वा रसान्तरोत्पत्तिः कुतो 'न स्यादिति वाच्यं, स्वभावस्यापर्यनुयोज्यत्वात् । यतः पृथिन्यादिभूतानामेवाम 'स्वभावः-यत्-केनचिदेव भूताधिक्येन व्यवस्थिता रसविशेपोत्पादकाः, न पुनर्यत्किंचिद्भूताधिक्येनेति । अत एव तोयायोः परस्परविरोधात् कथमेककार्या- रम्भकरवमित्यप्यपास्तमुक्तयुक्तरेव । ननु च, रसानां पट्विधरवमनुपपन्नम्, भन्तरीक्ष- जलादावव्यक्तस्य सप्तमरसस्यापि विद्यमानत्वात् । नैव, मधुरादीनामेव पपणा तत्रान्तरीक्षजलादावव्यकीभावेन तस्याव्यक्तरसस्य मधुरादिभ्योऽभिन्नरवात् । नच क्षारस्यापि रसत्वात् सप्तमत्वापत्तिरिति वाच्यं, तस्य क्रिया-गुणयोगेन द्रव्यस्वाद तदुक्तं चरके-"क्षरणात् क्षारो नासो रसः" (च. सू. स्था. अ. २६) इत्यादि । सस्सहचरितस्य लवण एवान्तर्भावः, लवणवर्गपाठात् (शि.)॥
पूर्वाध रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १२३ रसनेन्द्रियसे (जिह्वासे ) जिस विषय( गुण)का प्रहण होता है, उसको रस कहते है । जल और पृथिवी उसके आधारकारण है। रसकी उत्पत्ति और उसके मधुरादि भेदमें आकाश, वायु और तेज ये तीन निमित्त कारण हैं (इस प्रकार रस पाच- भौतिक है)। वक्तव्य-रस्यते आखाद्यते इति रसः'-जिसका जिहेन्द्रियद्वारा आस्वादन (खाद प्रहण करना) होता है, उसको रस कहते हैं । 'अप्क्षिती' ऐसा द्विवचनका प्रयोग न करके 'आपः क्षितिस्तथा' ऐसा अलग लिखकर बताया है कि-जल नैसर्गि- करीत्या रसवाला होनेसे वही रसका मुख्य आधारकारण (उत्पत्तिकारण) है, और पृथिवी जलके अनुप्रवेशसे रसवती होनेसे गौण आधारकारण है। रसकी अभिव्यक्किमें जल और पृषिची आधारकारण हैं यह कहनेसे यह बताया है कि अभिव्यक्त होता हुआ रस जल और पृथिवीमें ही अभिव्यक्त होता है । 'निर्वृत्ती च' इस वाक्यमें 'च'से . मधुरादि विशेषमें भी जल और पृथिवी निमित्त कारण है, जैसा कि आगे कहा गया है कि सोम(जल और पृथिवी ) की अधिकतासे मधुर रस होता है । "विशेपे च' यहाँ 'चकार'से अभिव्यफिमें भी आगश, वायु और अग्नि कारण है यह बताया गया है, जैसा कि आगे सूत्रस्थानके २६ वे अध्यायमें कहा गया है कि-"वह जल अन्तरिक्षसे -गिरता हुआ और गिरकर पञ्च महाभूतोंके गुणों से समन्वित होकर जगम और स्थावर सब मूर्त द्रव्योंका पोपण करता है, जिनके अन्दर छः रस बनते है"। रससंख्या- रसास्तावत् पद-मधुराम्ल-लवण-कट-तिक्त-कपायाः ॥ (च. वि. स. १)। स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च । कपायश्चेति पट्कोऽयं रसानां संग्रहः स्मृतः॥(च.सू.अ. १)। रसविशेषानाह-स्वादुरित्यादि । अग्न सर्वप्राणिनामिष्टरवादादौ मधुर उक्त; तदनु च माण्यमीष्टोस्कर्पक्रमेणैवाम्लादिनिर्देशक्रमो योदव्यः । पट्स इति पुनः संख्याकरणं परवादिमतसप्तसंख्यस्वादिनिषेधार्थम् । अयं संग्रह इत्यनेनावान्तरभेद- बहुस्वं तथा वक्ष्यमाणरससंसर्गबहुत्वं च दर्शयति (च. द.)॥ रसा खाद्वम्ल-लवण-तिक्तोपण-कपायकाः। पडू द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्व बलावहाः ॥ (अ. स. स. अ. १; अ. ह. सू. अ. १) वातादीनामाध्यारिमकानां वाद्येन द्रव्येण सादृश्यम् । द्रव्यं च महाभूतकार्य रस-वीर्य-विपाक-प्रभावः कार्यकरम् । स्वाद्वादयः पडूसाः। रसनेन्द्रियग्रायस्वादसाः। गव्यं निर्विशेष पचभूतात्मकं भूतमाश्रिताः । तेषां (रसाना) च यो यस्मात् पूर्व: - - - १२४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । स तस्लाईहिनो बलावहः स्वभावविशेषात् (इं.) । यथापूर्व च बलावहा इति यो यः पूर्वो यथापूर्व, बलावहा वलप्रापकाः । वलमावहन्ति प्रापयन्तीति यावत् । तस्मात् सर्वेभ्यो रसेभ्यो मधुरो रसः प्रकर्पण देहिनां बलकरः, कपायस्तु सर्वेभ्यो जघन्यबलावहः । तत्र स्वादुर्मधुरो घृत गुढादिः, भम्लोऽम्लिका-मातुलनादिः, लवणः सैन्धवादिः, तिको भूनिस्यादि, ऊपणः क्टुको मरीचादिः, कषायो हरीतक्यादिः । स्वादुमधुरपर्यायः । ऊपण. कटुक्पर्यायः । यथा-घ्यूपणं त्रिकटुक- मुच्यते । कषाय एव कषायक., यथा कटुरेव कटुकः । पदिति पदेव, न म्यूना मधिका वा । यद्यपि ते रसा गुणा. स्वाद्वादिमेदतस्तथा संसर्गवस्तथाऽनुरसवस्तार- तम्यपरिकल्पनावशतोऽपि भिधमानरूपा अपि पदत्वं नातिवर्तन्ते (अ. द.)। अथ साधर्म्य वैधय॑ज्ञानार्थ द्रव्यधर्मानाह । ते च रस-प्रभाव-वीर्य-विपाक-गुणभेदात् पञ्च । तत्र रसनाबायो गुणो रसः, कायाग्निपाकजो विशिष्टो रसो विपाका, तथैवोत्पनो गुणो वीर्य, द्रव्यस्यात्मा प्रभावः । तत्र रसभेदानाह-रसा इति । ते च स्वाद्वादयः पट् । ते च द्रव्यमाश्रिताः, द्रव्यधर्मा इत्यर्थः । क्षारस्य द्रव्यविशेष. वाचित्वादसविशेपवाचिस्वेऽपि लवणविशेषवाचिस्वान्न सप्तमरसस्वम् । बलावहास्यं रसकर्माह-ते चेति । ते च रसा यथापूर्व बलाबहाः । यो यस्मात् पूर्वः स तस्मादधिकं वलमावहति । कषायो चल्यः, तत ऊपणः, तततिक्त इत्यादि ( (हे.) मधुर, अम्ल; लवण, कटु, तिक और कपाय ये छ. रस हैं, जो द्रव्यको आश्रय करके रहते हैं। इनमें अन्तसे पूर्व पूर्व रस अधिक बल देनेवाला है; जैसे-कषायसे १ रसके विषयमें सुश्रुतकी व्याख्यामें डॉ. भा. गो. घाणेकरजी लिखते हैं कि "रस्यते आस्वायते इति रसः । रसनार्थों रस." (चरक)। ओषधियोंका जिहाग्राम अर्ध । इस अर्धके अनुसार समस्त ओषधियाँ मधुरादि छ रसोंमें विभक्त की गई हैं । यद्यपि 'रसनाग्राम' ऐसी रसकी व्याख्या की गई है, तथापि ओषधियोंके रसोंका ग्रहण जिहाके अतिरिक्त अन्य अगोंसे भी होता है; फर्क इतना ही है कि जिलापर रसकी सवेदना अन्य अगोंकी अपेक्षया अधिक और विशेषरूपसे प्रतीत होती है । जैसे कटु या कषाय रसका ज्ञान जैसे जिज्ञापर होता है वैसे ही गले में भी होता है, भामाशयमें होता है, त्वचापर होता है । शरीरमें रसका कार्य निपातस्थानके साथ सबन्ध होते ही होता है, उसमें रूपान्तरकी आवश्य- कता नहीं होती-रसो निपाते द्रव्याणां (चरक), रसं विद्याग्निपातेन (अष्टाग- संग्रह)। रसका यह कार्य बहुधा निपातस्थानके ऊपर प्रत्यक्षतया हुआ करता है और उसी स्थानपर मर्यादित रहता है । यथा फिटकरी जैसी कपाय रसयुक्त ओषधिका त्वचापर प्रयोग करनेसे स्थानिक लसिकानाव तथा रक्तस्राव वध होता है, आँखोंमें करनेसे पानीका स्राव बंध होता है और मुखद्वारा सेवन करनेपर मामाशय तथा अत्रका स्राव (अतिसार) कम होता है। कमी कभी रस स्थानिक वातनाडियोंके अगों ( Nerve terminals ) द्वारा प्रत्यावर्तन (Reflex action) से भी कार्य करता है । "अम्लः क्षालयते मुखं", । - - पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १२५ कटु, कटुसे तिक, तिकसे लवण, लवणसे अम्ल और अम्लसे मधुर विशेष बल देनेवाला है। पढेव रसा इति सिद्धान्तप्रतिपादनम्- एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यः-यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्यतमं जिलावैषयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकादनन्य इति । द्वौ रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणः-छेदनीयः, उपशमनीयश्चेति । त्रयो रसा इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यः-छेदनीयोपशमनीयसाधारणा इति । चत्वारो रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः-स्वादुर्हितश्च, खादुरहितश्च, अखादुर्हितश्च, अखादुरहितश्चेति । पञ्च रसा इति कुमारशिरा भर- द्वाजः-भौमोदकाग्नेय-वायव्यान्तरिक्षाः। षडूसा इति वार्याविदोराजर्षिः- गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रुक्षाः। सप्त रसा इति निमिर्वैदेहः-मधुरा- म्ल-लवण-कटु-तिक्त-कषाय-क्षाराः । अष्टौ रसा इति वडिशो धामा- र्गवः- मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त-कषाय-क्षाराव्यक्ताः। अपरिसंख्येया रसा इति काढायनो वाढीकभिषक, आश्रय-गुण-कर्म-संखादविशेषा- णामपरिसंख्येयत्वात् । षडेव रसा इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुः, मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त-कषायाः। तेषां षण्णां रसानां योनिरुदकं, छेदनोपशमने द्वे कर्मणी, तयोर्मिश्रीभावात् साधारणत्वं, स्वाद्ववादुता भक्तिः, हिताहिती प्रभावी, पञ्चमहाभूतविकारास्त्वाश्रयाः प्रकृति- विकृति-विचार-देश-काल-वशाः, तेवाश्रयेषु द्रव्यसंक्षकेषु गुणा गुरु- लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्षाद्या; क्षरणात् क्षारः, नासौ रसः, द्रव्यं तदनेकरससमुत्पन्नमनेकरसं कटुक-लवणभूयिष्ठमनेकेन्द्रियार्थसम- "लवणः स्यन्दयत्यास्य", "कटुः स्रावयत्यक्षिनासास्यं", ये सब उदाहरण प्रत्यावर्तनके हैं । पाश्चात्य वैद्यकमें आयुर्वेदकी भॉति यद्यपि रसकी कल्पना नहीं है तो भी सुविधाके लिये तिक्त (Bitter ), कपाय (Astringent ) और अम्ल (Ands ) ऐसे रसोंके अनुसार औषधियों के कुछ वर्ग किये गये हैं । पाश्चात्य वैद्यकमें रसके लिये कोई ठीक पर्याय नहीं दिखाई देता जो रसके पूरे अर्थको वतला सके, क्योंकि रुचि ( taste )के अतिरिक्त रसमें आधुनिक परिभाषाके अनुसार ओपधियोंकी स्थानिक, प्रत्यक्ष तथा प्राथमिक क्रिया ( Local, direct and primary action of drugs) भी अन्तर्भूत होती है (सू. स्था. पृ. २१९)। १ चरकमें रसोका क्रम 'कटु-तिक्त-कपाय'-ऐसा है, जो ऊपर दिया है । इन रसोंके बलोंका तारतम्य वाग्भटके अनुसार दिया है । वल-निर्देशमें वाग्भटने 'तिक-कटु-कपाय' यह कम रखा है। मत. हमने भी अर्थमें क्रम बदल दिया है।
१२६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । न्वितं करणाभिनिर्वृत्तम् ; अव्यक्तीभावस्तु खलु रसानां प्रकृती भवत्य- नुरसेऽनुरससमन्वितो वा द्रव्ये; अपरिसंरयेयत्वं पुनस्तेपामाश्रयादीनां भावानां विशेषापरिसंख्येयत्वान्न युक्तम् , एकैकोऽपि ोपामाश्रयाटीनां भावानां विशेषानाश्रयते विशेपापरिसंख्येयत्वात्, न च तस्मादन्य- त्वमुपपद्यते; परस्परसंसृष्टभूयिष्ठत्वान्न चैपामभिनिवृत्तेर्गुणप्रकृतीना- मपरिसंख्येयत्वं भवति । तस्मान्न संसृष्टानां रसानां कर्मापदिशन्ति बुद्धिमन्तः। तचैव कारणमपेक्षमाणाः पण्णां रसानां परस्परेणासंस- टानां लक्षणपृथक्त्वमुपदेक्ष्यामः (च. स् अ. २६) ॥ एक एवेत्यादि । इन्द्रियार्थानामिति निर्धारणे पष्ठी । अन्यतममिति एकम् । अन्यशब्दो ह्ययमेकवचनः, यथा-अन्यो दक्षिणेन गतोऽन्य उत्तरेण, एक इत्यर्थः; तमप्प्रत्ययश्च स्वार्थिकः । जिह्वावैपयिकमिति जिह्वाग्रायम् । रसाभावोऽपि जिदया गृह्यतेऽत आह-भावमिति । उदकादनन्य इति रसोदकयोरेकत्वख्यापनार्थ पूर्षपक्षत्वाददुष्टम् । पूर्वपक्षश्च कपिलमतेन, ते हि रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्र मित्यादिवचनेन गुणाव्यतिरिक्तं द्रव्यमिति युवते । छेदनीय इति अपतर्पणकारकः । उपशमनीय इति बृहणः । साधारण इति आमेय-सौम्यसामान्यादुभयोरपि लधन-बृह- णयोः कर्ता, परस्परविरोधादकर्ता वा । स्वादुरिति अभीष्टः, हित इति आयतावन- पकारी । आश्रीयत इत्याश्रयो द्रव्यं, गुणाः स्निग्धगुर्वादय., कर्म धातुवर्धन-क्षप- णादि, संस्वादो रसानामवान्तरभेदः, एषां विशेषाणां भेदानामित्यर्थः । तत्र द्रव्य- भेदादाधारभेदेनाश्रितस्यापि रसस्य मेदो भवति, आश्रयो हि कारणं, कारणमेदाथ कार्यमेदोऽवश्यं भवतीत्यर्थः । गुर्वादिगुणमेदास्तथा कर्मभेदाश्च रसकृता एव । तता कार्यभेदीदवश्यं कारणभेद इति पूर्वपक्षाभिप्रायः । संवादभेदस्तु एकस्यामपि मधुरजाताविक्षु-क्षीर-गुढादिगतः प्रत्यक्षमेव मेदो दृश्यते, स तु संस्वादभेदः . स्वसंवेद्य एव; यदुक्तं-"इक्षु-क्षीर-गुडादीनां माधुर्यस्यान्तरं महत् । मेदस्तथाऽपि नाख्यातुं सरस्वत्याऽपि शक्यते” इति । सिद्धान्तं पुनर्वसुवचनेनाह-पढेवे- त्यादि । पूर्वपक्षोक्तरसैकत्वादिव्यवस्थामाह-तेपां पण्णामित्यादि । योनिः भाधार- कारणं, कार्य-कारणयोश्च मेदात् सिद्ध उदकाद्रसभेदः प्रत्यक्ष एवेति भावः । क्षितिव्यतिरिक्तमुदकमेव यथा रसयोनिस्तथा "रसनार्थो रसस्तस्य" (च. सू. अ. १) इत्यादौ विवृतमेव दीर्घजीवितीये । तयोमिनीभावादिति कर्मणोरमूर्तयोर्मिश्री- भावानुपपत्ती वदाधारयोर्द्रव्ययोमिनीभावादिति बोद्धव्यम् । साधारणमिति साधारणकार्ययोगित्वम् । भक्तिः इच्छेत्यर्थः । तेन, यो यमिच्छति स तस्य स्वादुः, अस्वादुरितरा, इति पुरुषापेक्षौ धौ न रसभेदकार्यावित्यर्थः । पञ्चमहाभूतेत्यादौ १ 'साधारणकर्मयोगित्व' इति पा० ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १२७ - तु'शब्दोऽवधारणे; तेन आश्रया एव, न रसा इत्यर्थः । किंभूता भौमादयो भूतविकारा आश्रया इत्याह-प्रकृति-विकृति-विचार-देश-कालवशा इति; 'वश'- शब्दोऽधीनार्थः, स च प्रकृत्यादिभिः प्रत्येकं योज्यः । तत्र प्रकृतिवशा यथा-मुद्गाः कपाया मधुराश्च सन्तः प्रकृत्या लघवः, एतद्धि लाघवं न रसवशं, तथाहि सति कषाय-मधुरत्वाद्गुरुत्वं स्यात् । विकृतिवशं च मीहे जानां लघुस्वं, तथा सक्तुसिद्ध- पिण्डकानां च गुरुत्वम् । विचारणा विचारो द्रव्यान्तरसंयोग इत्यर्थः, तेन विचार- णावशं यथा-मधुसर्पिपी संयुक्त विप, तथा विषं चागदसंयुकं स्वकार्यव्यतिरिक्त कार्यकोरि । देशो द्विविधो भूमिः, आतुरश्च तत्र भूमौ 'श्वेतकापोती वल्मीकाधिरूढा विषहरी', तथा 'हिमवति मेपजानि महागुणानि भवन्ति' शरीरदेशे यथा-"सक्थि- मांसाद्गुरुतरं स्कन्ध-क्रोड-शिरस्पदाम्" (च. सू. म. २७) इत्यादि । कालवशं तु यथा मूलकमधिकृत्यो-"तद्वालं दोषहरं, वृद्धं त्रिदोपम्" (च. सू. म. २७), तथा "यथर्तु पुष्प-फलमाददीत" (च. वि. स.१) इत्यादि। भन्न चैकप्रकरणोक्का येऽनुक्तास्ते चकारात् स्वभावादिप्चेवान्तर्भावनीयाः । यदुक्तं-"चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया.। लिङ्गं प्रमाण संस्कारो मात्रा चास्मिन् परीक्ष्यते" (सू. अ. २७) इति । तम्र, चर-शरीरावयव-धातूनां देशेन ग्रहणं, मात्रा विचारे प्रविशति, शेपं स्वभावे, तथा रसविमाने वक्ष्यमाणं चात्राप्रविष्टमाहारविधिविशेषायतनमन्तर्भावनीयं यथा- संभवम् । सिग्ध रूक्षाद्या इत्यत्रादिग्रहणेनानुका अपि तीक्ष्ण मृद्वादयो न रसाः, किंतु द्रव्यगुणाः पृथगेवेति दर्शयति । क्षरणादधोगमनक्रियायोगात् क्षारो द्रव्यं, नासौ रसः, रसस्य हि निष्क्रियस्य क्रियाऽनुपपनेत्यर्थः । क्षरणं च क्षारस्य पानीय- युक्तस्याधोगमनेन, वदन्ति हि लौकिका:-क्षारं नावयामः' इति; शास्त्रं च- "छित्त्वा छित्त्वाऽऽशयात् क्षारः क्षरस्वात् क्षारयत्यध." (च. चि. अ. ५) इति । हेत्वन्तरमाह-द्रव्यं तदनेकरसोत्पन्न मिति; अनेकरसेभ्यो मुष्ककापामार्गादिस्य उत्पन्नमनेकरसोत्पन्न यतश्चानेकरसोत्पन्नमत एवानेकरसं, कारणगुणानुविधायित्वात् कार्यगुणस्येति भावः । अनेकरसत्वमेवाह-कटुक-लवणभूयिष्ठमिति ।-भूयिष्ठ- शब्देनाप्रधानरसान्तरसंबन्धोऽस्तीति दर्शयति । हेवन्तरमाह-अनेकेन्द्रियार्थ- समन्वितमिति क्षारो हि स्पर्शन गन्धेन चान्वितः, तेन द्रव्य; रसे हि गुणे न स्पर्शो नापि गन्ध इति भावः -। हेवन्तरमाह-करणाभिनिवृत्तमिति; करणेन भस्मपरिसावणादिनाऽभिनिवृत्तं कृत्तमित्यर्थः, न रसोऽनेन प्रकारेण क्रियत इति १ "एतद्धि लाघव स्वाभाविकमेव, न तु रसवश, तथा सति कपायमधुरत्वाद्गुरुत्व स्यात् ; वक्ष्यते च-"स्वादुर्गुरुत्वादधिक कपायालवणोऽवर." इति शिवदाससेनः । २ "विचारणा विचारो द्न्यान्तरसयोग इत्यर्थ , तदश यथा-उष्णवीर्यस्यापि तैलस्य चन्दनोशीरादिशीतवीर्य- द्रव्यसस्काराच्छेत्य, तथा शीतवीर्यस्यापि धृतस्य तत्तद्रव्यसंयोगादुष्णता, तथा मांसरससिद्धस्य. रक्तशालेगुरुत्वमित्यादि" इति शिवदाससेनः । - - १२८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । भावः । अव्यक्तरसपक्षं निषेधयति-अव्यक्तीभाव इत्यादि । अव्यक्तीभाव इति अभूततद्भावे विप्रत्ययेन रसानां मधुरादीनां व्यक्तानामेव कचिदाधारेऽव्यक्तरवं, नान्यो मधुरादिभ्योऽव्यकरस इत्यर्थः । रसानामिति मधुरादीनां पग्णाम् । प्रकृतावित्यादि प्रकृती कारणे जले इत्यर्थः । अव्यकावं च रससामान्यमानोपलब्धि मधुरादिविशेषशून्या, सा च जले भवति, यत उक्तं जलगुणकयने सुश्रुते- "व्यकरसता रसदोपः" (सु. सू. अ. ४५) इति, इहापि च 'भव्यक्तरसं च' इति वक्ष्यति, लोकेऽपि चाव्यक्तरसं द्रव्यमास्वाद्य वक्तारो वदन्ति-'जलस्येवास रसो न कश्चिन्मधुरादियुक्त.' इति । विशेपमधुराउनुपलब्धिश्चानुभूतत्वेन । यया- दूरादविज्ञायमानविशेपवणे वस्तुनि रूपसामान्यप्रतीतिर्भवति, न शुक्लस्वादिविशेष. बुद्धिः, तथाऽनुरसेऽध्यक्तीभावो भवति प्रधानं व्यकं रसमनुगतोऽव्यक्त्वेनेत्यनुरसः, यथा-वेणुयवे मधुरे कपायोऽनुरसः । यदुक्तं-"रूक्षः कपायानुरसो मधुरः कफपित्तहा" (च. सू. भ. २७) इति । अनुरससमन्वित इति सर्वानुरसयुक्ते, यया विषे, वचनं हि-"उष्णमनिर्देश्यरसं" (च. चि. अ २३) इत्यादि । किंवा, 'अणुरससमन्विते' इति पाठ; तेन, अणुरसेनैकेन मरिचेन शर्करापले कटुवमव्यक्त स्यात् । अपरिसंख्येयपक्षं दूपयति-मपरीत्यादि । तेपामिति रसानाम् , अपरि- संख्येयत्वं न युक्तम् ; आश्रयादीनां भावानामिति माश्रय-गुण-कर्म-संस्वादानां; विशेषापरिसंख्येयत्वादिति आश्रयादिभेदस्यापरिसंख्येयत्वात् । अन्न हेतुमाह- एकैकोऽपि हीत्यादि । एपामाश्रय-गुण-कर्म-संस्वादानां विशेपानेकैकोऽपि मधुरादिरा- श्रयते, न च तस्मादाश्रयादिमेदादन्यस्वमाश्रितस्य मधुरादेर्भवति । एवं मन्यते- यद्यपि शालि-मुद्ग-धृत-क्षीरादयो मधुरस्याश्रया भिन्नाः, तथाऽपि तत्र मधुरस्व- जात्याकान्त एक एव रसो भवति, बलाका-क्षीर-कार्पासादिपु शुक्लवर्ण इव । तथा गुणानां गुरु पिच्छिल स्निग्धादीनामन्यत्वेऽपि कर्मणां वा रसादिवर्धनायुर्जनन-वर्ण- करस्वादीनां भिन्नत्वे सत्यपि न मधुररसस्यान्यत्व, यत एक एव मधुरस्तत्तद्गुणयुक्तो १ 'मधुरादिर्व्यक्त ' इति पा० । २ 'शर्करापान के' इति पा०। ३ "अपरिसख्येयपक्ष दूपयति-अपरिसंख्येयत्वमित्यादि । आदिशब्देन गुण-कर्म-सस्वादानां ग्रहणम् , आश्रय-गुण-कर्म- सस्वादाना ये विशेषा मेदास्तेषामपरिसंख्येयत्वात्तपा रसानामपरिसंख्येयत्व यदुच्यते तन युक्तं, तत्र हेतुमाह-एकैकोऽपीत्यादि ।-एपामाश्रय-गुण-कर्म-संस्वादाना विशेपानेकैकोऽपि मधुरा- दिराश्रयते, न त्वसादानयादिभेदादन्यत्वमाश्रितस्य मधुरादेर्मवति । एतेन, आश्रयादय एवं पर मिना., मधुरादिस्त्वेक एवेत्यर्थः । तथाहि-यद्यपि शालि-मुद्ग-वृत-क्षीरादयो मधुर स्याश्रया भिन्ना , तथाऽपि तन मधुरत्वजात्याक्रान्त एक एव रसो भवति, बलाका-क्षीरादिपु शुरुवर्णवत् । एव गुणानां गुरु-पिच्छिलादीनामन्यत्वेऽपि तथा कर्मणा रसादिवर्धन-बलवर्णकरणादीनां भिन्न- वेऽपि तथा मधुरस्यावान्तराखादभेदेऽपि न मधुररसस्थान्यत्व, मधुरत्वनात्यनतिक्रमादिति भावः" इति शिवदाससेनः।
. पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १२९ - . भवति, तत्तत्कर्मकारी चेति को विरोधः । तथा मधुरस्यावान्तरास्वादसेदेऽपि मधुरस्वजात्यनतिक्रमः, कृष्णवर्णावान्तरमेदे यथा कृष्णस्वानतिक्रमः । ननु मैवं भवस्वपरिसंपवेयरवं रसानां, परस्परसंयोगात्तु य आस्वादविशेप. स विशेषकार्य- करोऽपि; नहि यन्मधुराम्लेन क्रियते तन्मधुरेण वाऽग्लेन वा शक्यम् ; अतस्तेन परस्परसंयोगेनापरिसंख्येयत्वं भविप्यतीत्याह-परस्परेत्यादि । संसृष्टमिति भावे तेन परस्परसंसर्गभूयिष्टस्यादेपा मधुरादीनामभिनिवृत्तेर्न गुणप्रकृतीनामसंख्येय- स्वमिति योजना; अयमर्थः-यद्यपि रसाः परस्परसंसर्गेणातिभूयसा युक्ताः सन्तोऽमिनिर्वृत्ता द्विरसादौ द्रव्ये भवन्ति, तथाऽपि न तेषां गुणा गुरु लम्वादयः प्रकृवयो वा मधुरादीनां या या आयुष्यत्व-रसाभिवर्धकरवायास्ता असंख्येया भवन्ति, किं तु य एवं मधुरादीनां प्रत्येक गुणाः प्रकृतयश्च उद्दिष्टास्त एव मिन्ना भवन्ति । किंवा गुणकृतीनामिति मधुरादिपमुणस्वरूपाणामित्यर्थ ; तेन रसस्य रसान्तरसंसर्ग दोपाणामिव दोषान्तरसंसर्गे रसानां नापरिसंख्येयत्वमित्यर्थः । प्रकृतिमादेन कर्म चोच्यते, तेन गुणकर्मणामित्यर्थः । मधुरादीनामवान्तरास्वाद- विशेषोऽपि परस्परसंसर्गकृतो ज्ञेयः । यव एव हेतो रसानां संसृष्टानां नान्ये गुणकर्मणी भवतः, अत एव संयष्टानां रसानां पृथकर्म शास्त्रान्तरेऽपि मोक्तमित्याह-तस्मादित्यादि । कर्मशब्देनेह गौरव-लाधवादिकारका गुरुत्वादयो रस-रकादिजननादयश्चापि बोदव्याः । न केवलमन्यशास्त्रकार रसानां संसृष्टानां कर्म नोपदिष्ट, किं तु वयमपि नोपदेक्ष्याम इत्याह-तञ्चैवेत्यादि । तचैव कारणमिति परस्परसंसर्गेऽपि रसानामनधिकगुण-कर्मत्वम् । लक्षणेन पृथक्त्वं लक्षणपृयश्वम् । तत्र लक्ष्यते येन तल्लक्षणम्, अतस्तु 'मधुरो रसः' इत्यादिना अन्येन, वथा 'मेहन-श्रीणनाहाद' इत्यादिना च यद्वाच्यं, तत् सर्व गृह्यते । किंचा लक्षणशब्देन 'मधुरो रस' इत्यादिग्रन्यवाच्य लक्षणमुच्यते; पृथक्त्वं च रसभेद- ज्ञानार्थ यद्वक्ष्यति-'नेहन-प्रीणन' इत्यादि, तद्यते (च. द.)। रसैकस्वपक्षं खण्ढयति-तेपामित्यादि । तेषां पण्णां रसानां योति. उत्पत्तिकारणमुदकम् । उक्तं घ-"मापो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निवृत्तिहेतव. (च. सू अ. २५)" इति । वसादुदकादन्य एव रस.; न स्वनन्यः, कार्य-कारणयोर्भेदात् । छेदनं चोपशमनं १ "गुणप्रकृतीनामिति परस्परससर्गहेतुत्वान्मधुरादिगुणा एव प्रकृतय., तासा मधुरादिपगुण- स्वरूपाणामित्यर्थ । तथा च परस्परसंसर्गभूयिष्ठत्वादेया रसानामभिनिर्धत्ते प्रकृतिभूताना मधुरा- दिगुणानामसख्येयत्वं न चेति योजना । तेन, रसाना रसान्तरससगै रसान्तरभेदसस वा तत्संसर्गाणामेयापरिसंख्येयत्व, न पुन प्रकृतिमृतमधुरादिपड़साना पटवासिकम , यथा- दोपाणा परस्परससर्गमयस्त्वेऽपि नित्वानतिक्रम एत्यर्थ ससृष्टाना रसाना मधुरादि- पडसप्रकृतिकवान रसान्तरत्वम् , अत एव ससृष्टरसाना पृथकर्म शास्त्रान्तरेऽपि नोक्तमित्याद- तस्सान 'समष्टानामित्यादि।" इति शिवदाससेनः । द्र०५१ । । यत - १३० द्रव्यगुणविज्ञानम् । च ते द्वे रसानां कर्मणी । छेदनं दोपादीनां भागशः करणम् । तच्चेह वमन-विरेचना- स्मकं शोधनम् । आस्थापन-शिरोविरेचने तु नाहाररसकर्मणी । रसानां शोधनस्वं "तत्राग्निमारुतात्मका रसाः" (च. सू. अ. २६) इत्यादिना पश्चाद्दर्शयिष्यते । उपशमनं दोपाणामनुल्लेशेन समीकरणम् । रसानां दोपशमनत्वं च-"स्वाहम्ल- लवणा वायु, कपाय-स्वादु-तिक्तकाः । जयन्ति पित्तं, श्लेप्माणं कषाय-कटु-तिककाः" (च. सू. अ. १) इति । तयोः कर्मणोर्मिश्रीभावात् साधारणत्वम् । अनेन रसद्वित्व-नित्वपक्षौ निराकृतौ । स्वाद्वस्वादुता च भकिद्वेषौ इच्छाद्वेषौ । यो यमिच्छति स तस्य स्वादुः, यं द्वेष्टि स तस्यास्वादुः । हिताहितौ रसस्य प्रभावौ । प्रभावः शक्तिः । एवं चत्वारो रसा' इति हिरण्याक्षेण कौशिकेन यदुक्कं तन्निरस्तम् । भौमौदकाग्नेय-वायवीयान्तरीक्षाः एते पञ्चमहाभूतविकाराः । ते हि षण्णां रसाना- माश्रयाः, न तु रसाः । 'पञ्च रसा' इति भरद्वाजवचनमनेन परिहृतम् । गुर्वादीनां पण्णां रसत्वपक्षं निरस्यति-प्रकृतीति । तेषां पण्णां रसानामाश्रयेषु द्रव्यसंज्ञकेषु पञ्चमहाभूतविकारेषु कार्यद्रव्येषु । इह द्रव्यसंज्ञा पञ्चमहाभूतविकाराणाम् । वक्ष्यति च-"सर्व द्रव्यं पाचभौतिकमस्मिन्नर्थे" (च. सू. अ. २६) इति । प्रकृति-विकृति-विचार-देश-कालवशाः गुरु-लघु-शीतोष्ण-निग्ध-रुक्षाद्याः । आद्य- शब्देनान्येषां द्रव्याश्रितधर्माणां ग्रहणम् । गुणा गुर्वादयो हि द्रव्याश्रितगुणाः, न तु रसाः । ते रसेषु उपचर्यन्ते साहचर्यात् । प्रकृति-विकृति-विचार-देश-कालवशा इति-प्रकृतिवशा., विकृतिवशाः, विचारवशाः, देशवशाः, कालवशाश्च । तत्र प्रकृतिवशा द्रव्येषूत्पद्यमानेषु ये गुणा. प्रकृत्यपेक्षया जायन्ते; यथा-अग्नि- मारुतात्मकं द्रव्यं मायेणोलभागं लाघवादुत्प्लवनाच्च वायोः, ऊर्ध्वज्वलनाच वहे। विकृतिवशा. ये प्रकृत्यवस्थायां न सन्तोऽपि भूतेषु अनाधिकभावेन तथा तथा संहन्यमानेषु जन्यन्ते । विकृतिवशत्वं च "पण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माणि" (च. सू म. २६) इत्यादिना दर्शयिष्यते । विचारवशा ये विशिष्ट- मात्रादिभिर्जायन्ते । देशो देह-भूमिलक्षणो द्विविधः । तत्र देहवशाद् यथा "सक्थिमांसाद्गुरुः स्कन्ध" (च. सू. अ. २७) इति । भूमिवशात् अन्यथा जागले, अन्यथा आनूपे । एवं कालवशादपि । 'सप्त रसा मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त- कषाय-क्षारा' इति निमिना वैदेहेनोक्तम् । तत्र मधुरादीनां षण्णां रसत्वमनुमतमेव । क्षारस्य रसत्वं निरस्यति-क्षरणादिति 'क्षरणात् क्षारः' इति क्षारस्य निरुक्तिः । क्षरणात् दुष्टत्वङ्मांसादीनां चालनात् शातनादित्यर्थः, अथवा क्षरणं दोषाणां चालनम् । “तत्र क्षरणात् खननाद्वा क्षार.” (सु. सू. भ. ११) इति सुश्रुतः। खननं दुष्टत्वमांसादीनां हिंसनम् । असौ क्षारो न रसः, तद्धि द्रव्यम् । तदेव विशेषणैरुपपादयति-अनेकेत्यादि । अनेकरसेभ्यो द्रव्येभ्यः पाचभौतिकेभ्यः समुत्पन्न, वसादनेकरसं, कार्यस्य कारणानुविधायित्वात् । अनेकरसत्वेऽपि कटु- - - । । पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १३१ लवणासभूयिष्ठम् । अनेकैरिन्द्रियाथैः स्पर्श-रूप-रस-गन्धैः समन्वितम् । क्षारः शुक्ला, "शुक्लत्वात् सौम्यः" (सु. सू. भ. ११) इति । रसो न रसाश्रयः, न वा तत्र स्पर्शादयः, तस्य गुणत्वात् , "गुणा गुणाश्रया नोक्ताः" (च. सू. अ. २६) इति । करणेन क्रियया अभिनिर्वृत्त, कृत्रिममित्यर्थः; रसस्तु सहजः, तस्मात् क्षारो न रसः, द्रव्यं हि तत् । अष्टौ रसा इति अस्मिन् क्षाराव्यक्तौ अननुमतौ । तत्र क्षारस्य रसवं प्रागेव परिहृतं, संप्रति अव्यक्तरसपक्षं खण्डयति-अव्यक्तभाव इति । रसानां मधुरादीनां पण्णामव्यक्तभावः अव्यक्तत्वं प्राक् प्रकृतौ योनौ उदके भवति । आपो हि भव्यक्तरसाः । अव्यक्तत्वम् अस्फुटप्रतिभासत्वम् । यो रसनेन्द्रियेण मधुरोऽयम् , अम्लोऽयम्, इत्यादिप्रकारेण स्फुटं नोपलभ्यते सोऽव्यक्तः । अनुरसेऽव्यक्तभावो भवति । अनुरसो हि रसेनाभिभूतत्वादव्यकः । अनुरसलक्षणं पश्चाद्वक्ष्यते--"विपर्ययेणानुरसः" (च. सू. अ. २६) इति । ननु, अनुरसेऽपि कचिद् व्यक्तिरस्तीत्यत आह अनुरससमन्विते इति । अनुरस समन्विते द्रव्ये वाऽव्यक्तभावो भवति । द्रव्याणामभ्यवहारकाले रस एवं व्यज्यते, कचिदनुरसस्य यो व्यकभावः, स पश्चात् । मधुरादय एव व्यक्ताव्यका रसानुरस. रूपाः । न तेभ्यः पड्भ्योऽन्योऽव्यक्ताख्योऽनुरससंज्ञो वा कश्चिद्सोऽस्ति । वक्ष्यति च-"रसो नास्ति हि सप्तम." (च. सू. अ. २६) इति । अपरिसख्येयपक्षं दूषयति-अपरिसंख्येयत्वमित्यादि । मानयादीनां भावानामाश्रय-गुण-कर्म-सस्ता- दाना, विशेपापरिसंख्येयत्वात् विशेषाणामपरिसंख्येयत्वात् , तेषां रसानामपरिसख्ये- यत्वं न युक्तम् । माश्रय-गुण-कर्म-सस्वादानां विशेपापरिसंख्येयत्वादसा अपरि- सख्येया भवन्तीति बालीकभिषजा काकायनेन यदुक्तं तन युक्तम् । यत आश्रयादीनां विशेपेष्वपि रसानामपरिसख्येयत्वं न भवति । तदेव दर्शयति-एकैकोऽपीति । सत्यम् । एपामाश्रयादीनां भावानामेकैकोऽपि विशेपमेवाश्रयते, न तस्मात्तेषामन्य- स्वमुपपद्यते । कुतः परस्परसंसृष्टभूयिष्ठत्वात् । अयमर्थ.--रसानामाश्रया द्रव्य- सज्ञकास्तत्तद्गुणमूयिष्ठाः पञ्चमहाभूतविकारा. । भूतानामन्योन्यसंसर्गबहुलानाम- ल्पोत्कर्षापकर्षाभ्यां तेषां विशेषा भवन्ति, न च तेन ते भिद्यन्ते, किंतु ससृष्टरूपा भवन्ति । यथा-संसर्गे दोपा. । न चेति एषां विशेषाणामभिनिवृत्तौ निप्पत्तौ न च गुर्वादिगुणप्रकृतीनामपरिसंख्येयत्वं भवति, येन गुणा अपरिसंख्येयाः स्युः । मतो गुणादीनां विशेषेप्वपि संख्याभेदो न भवति । कर्मभेदोऽपि न भवति, तदेवाह- तस्मादिति । यस्माद् विशेपेषु गुणप्रकृतीना भेदो न भवति । रसोऽपि गुण एव । विशेपेऽपि मधुरादिप्रकृतयो न भियन्ते, येन कर्मभेदः स्यात् । तस्मात् कारणात् । संसृष्टानां रसानामल्पोस्कर्षापकर्पाभ्या संसृष्टरूपाणा रसानाम् । रसानां संसर्गों द्रव्यसंसर्गकृतः । कर्म पृथनोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः, यतस्ते मधुरादिभ्यो न भियन्ते, किं तु ससृष्टरूपा भवन्ति; अतस्तेषां कर्म मधुरादीना कमैव संसृष्टरूपम् । तथैवेति .
१३२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । तञ्चैव कारणमवेक्षमाणाः तस्मात् कारणादित्यर्थः । वयं पपणां रसानां परस्परेणा- संसृष्टानां लक्षणम् आस्वादलक्षणं मुखोपलेपादिरूपं, पृथक्त्वेन पृथक् पृथगुपदे- क्ष्यामः-'नेहनप्रीणन इत्यादिना, न तु संसृष्टानाम् । अंतो नास्वादमेदोऽपि भवति, मधुरस्कन्धनिर्दिष्टेषु-क्षीर-गुडादिषु माधुर्यस्य विशेषेऽपि मुखोपलेपादिरूप- तत्तल्लक्षणस्य तुल्यत्वात् ; तस्मात् पडेव रसाः (यो.)॥ मधुरस्कन्धनिर्दिष्टघृत-तैल-गुडादिषु । गुणास्वादादिभेदेन रसषकं न युज्यते ॥ अस्तु मेदादसंख्यत्वमैक्यं वाऽऽस्वादलक्षणात् । भूतोत्कर्पापकर्षेण मेदो योऽल्पेन कल्प्यते ॥ संकीर्णत्वात् फले चासौ तुल्यत्वान्न विवक्ष्यते । गुर्वादीनां विशेपेऽपि स्वजातेरनतिकमात् ॥ संख्यामेदो यथा नास्ति रसानामपि स क्रमः। दृष्टं मुखोपलेपादि यत् सर्वेषु घृतादिपु ॥ न च तद्दाडिमायेषु षडेवातो रसाः स्मृताः। आनन्त्यैकत्वयोश्च स्यान्न विचित्रार्थतन्त्रणम् ॥ (अ. सं. सू. भ. १७)। ननु रसानां मधुरादित्वेन षट्संख्यानियम उक्तः स न युज्यते केवलमेकरसस्व- मनेकरसत्वं वा । तत्रानेकरसत्वे कारणं वक्ष्यमाणमधुरादित्कन्धनिर्दिष्टानां धृत-तैल. गुड-द्राक्षा-शर्करा-मधु-मधुकादीनां गुणास्वादादिभेदः । तथाहि-त्वया ये मधुरस्वेन निर्दिष्टा गुड-द्राक्षादयः आस्वादनेन ते न परस्परसदृशाः, न च गुरुग्वादिना गुणेन, न चाम्लादियुक्ता इति वक्तुं युज्यते, अतो ज्ञायते अन्ये विशिष्टा एव त इति प्रतिरसस्कन्धमानन्त्यम् । रसैकत्वे कारणं जिह्वेन्द्रियास्वादनसामान्यं, तत्र प्रति- विधीयते-भूतोत्कर्षापकर्षेणेत्यादि । तत्र प्रथमं गुणमेददूषणं परिहियते-योऽय- मल्पेन भूतानामुत्कर्षेणापकण मधुराणां गुणभेदः स संकीर्णत्वात् फले च सरश- स्वात् सन्नपि न विवक्ष्यते । आस्वादभेदादानन्त्यं परिहियते-गुर्वादीनामित्यादि । गुर्वादीनां द्रव्याणां यद्यपि प्रतिद्व्यं वैलक्षण्यमस्ति, तथाऽपि गुरुस्वादिजात्यनतिक्रमाद् गुरुर्गुरुर्लघुर्लघुरिति संख्याभेदाविवक्षया निर्दिश्यन्ते । तद्वन्मधुरादिस्कन्धपठिताना द्रव्याणां यद्यप्यास्वाददैलक्षण्यं दृश्यते, तथाऽपि यन्मुखोपलेप-हादनादि घृतादिषु मधुरेषु दृष्टं न तन्मुखोपलेपादि दाडिम-सैन्धवादिष्वम्ल-लवणादिषु दृश्यते, न घेतान् रसानतिक्रम्य जात्यन्तरं संभवति, अतः षडेव रसा; नोनाधिकाः। यदि सदेवा- नन्त्यमैक्यं वा यथोकप्रकारेण तन्त्रव्यवहारे गृह्यते, ततो विचित्रस्य रसपृष्ठमाविनो वक्तव्यस्थानेकस्य तन्त्रणं शास्त्रे प्रयोगो न स्यात् । अत मानन्वेन रसानां तत्सरूप.
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १३३ ) सणस्याप्यानन्त्यादवकव्यता । एकरसत्वे च विशेषस्थानुक्तन्वात् स्वरूपतश्रणमपि न युज्यत इति (इन्दुः)॥ षट् सूत्रकारप्रामाण्यादाखादाच (र. वै. अ. ३. सू. ५) । सूत्रकार- प्रामाण्यादिति षडेव रसा न सप्तमोऽस्तीति । आस्वादादिति प्रत्यक्षत उपलब्धेरिति । भास्वायमानाः षडेवोपलभ्यन्ते न सप्तमः । अनेनाव्यक्तः प्रतिपिद्धः, अव्यक्तस्य ग्रहणाभावात् । अथाव्यक्तिर्नाम तेषामेव पण्णामपि विवेकाप्राप्तिः । क्षारो गुणः क्षारगुणशक्तिद्रव्यस्येति (भा.)। 'रस छः ही हैं' यह सिद्धान्त स्थापित करनेके पूर्व रसके विषयमें भिन्न भिन्न संख्या माननेवाले वादियोंका मत क्रमश देते हैं।-(१)भद्रकाप्य कहता है कि-रस एक ही है, जिसे पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषयोंमेंसे एक जिह्वेन्द्रियका विषय तथा भावरूप कहा जाता है, वह जलसे भिन्न नहीं है (यहाँ 'भावरूप' कहनेका आशय यह है कि रसाभाव भी जिह्वाका विषय है, पर उसे रस नहीं कहा जाता)। (२ शाकुन्तेय ब्राह्मण कहता है कि-रस दो हैं-छेदनीय ( अपतर्पण-कर्शन-लङ्घन करनेवाला) और उपशमनीय (बृंहण करनेवाला)। (३) पूर्णाक्ष मौद्गल्य कहता है कि-रस तीन हैं-छेदनीय, उपशमनीय और साधारण (लखन या बृंहण दोनोंमेंसे कुछ भी न करनेवाला या दोनों करनेवाला, जैसे-तैल स्थूलको कृश और कृशको स्थूल करता है)। (४) हिरण्याक्ष कौशिक कहता है कि-रस चार हैं- (१) खादु (जिह्वाको प्रिय) और हित (शरीरको हितकर ), (२) खादु और महित, (३) अस्वादु ( जिहाको अप्रिय) और हित, (४) अखादु और अहित । (५) कुमारशिरा भरद्वाज कहता है कि-रस पाँच है-भौम (पार्थिव), औदक' (जलीय), आग्नेय, वायव्य और आन्तरीक्ष (आकाशीय)। (६) राजर्षि वार्योंविद कहता है कि-रस छः हैं-गुरु, लघु, शीत, उष्ण, निग्ध और रूक्ष । (७) वैदेह निमि कहता है कि-रस सात हैं-मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय और क्षार । (८) वडिश धामार्गव कहता है कि-रस आठ हैं-उक्त । सात और आठवाँ अव्यक्त । (९) बाह्रीक देशका वैद्य काढायन कहता है कि- रसके आश्रयभूत द्रव्य, गुण, कर्म और सखाद (एक ही मधुरादि रसवाले द्रव्योंका अपना अपना विशिष्ट खाद) ये अनेक होनेसे रस भी ‘अनेक हैं। रसके विषय में इन एकान्तवादी (एक एक पक्षकी स्थापना करनेवाले ) महर्षियोंके वचन सुनकर भगवान् आत्रेय पुनर्वसु कहने लगे कि-मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ये छः ही रस है । भद्रकाप्यने कहा है कि रस एक ही है और वह जलसे भिन्न नहीं है, परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि जल छहों रसोंका आधार कारण है । जल रसोंका आधार कारण होनेसे रस नहीं हो सकता। आधार और आधेय भिन्न ही होते हैं। मतः रसको जलसे अभिन्न और एक बताना ठीक नहीं है । शाकुन्तेय ब्राह्मणने ।
- । १३४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । छेदनीय और उपशमनीय दो रस वताये हैं और पूर्णाक्ष मौद्गल्यने छेदनीय, उपश- मनीय और साधारण ये तीन रस बताये हैं, ये दोनों मत ठीक नहीं है। क्योंकि छेदन, उपशमन और उनके मिश्रणसे जो साधारणत्व होता है वे रसोंके कर्म है, वे रस नहीं हैं। हिरण्याक्ष कौशिकने खादु हित, खादु अहित, अखादु हित और अखाटु अहित ये चार रस बताये हैं, परन्तु यह मत ठीक नहीं है; क्योंकि खादुता और अम्वादुता ये भक्ति (प्रति मनुष्यकी भिन्न-भिन्न इच्छा) है । जो एकको स्वादु वह दूसरेको अस्वादु, और जो एकको अखादु वह दूसरेको खादु लगता है । अतः ये रस नहीं हो सकते। 'हित और अहित ये दोनों प्रभाव है । प्रभाव रसाश्रित होता है, वह स्वयं रस नहीं होता । कुमारशिरा भरद्वाजने भौम, औदक, आग्नेय, वायव्य और आन्तरीक्ष ये पाँच रस वताये है, परन्तु ये पाँच रस नहीं हो सकते, क्योंकि पञ्चमहाभूतोंके विकाररूप भौम आदि कार्यद्रव्य रसोंके आश्रय हैं। ये प्रकृति, विकृति (संस्कार), विचार (द्रव्यान्तरसयोग), देश और कालके वश (अधीन ) हैं, अर्थात् इनके हेरफेरसे वदलते रहते हैं । अतः ये पञ्चमहाभूतविकार स्वयं रस नहीं हो सकते । राजर्पि वार्योविदने गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और स्क्ष ये छ रस वताये है, परन्तु यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि गुरु, लघु आदि आश्रयभूत द्रव्यके अन्दर रहनेवाले गुणविशेष है, रस नहीं हैं । विदेह राजा निमिने कहा है कि मधुरादि सात रस है; उनमें मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कपाय ये छः रस हमें भी समत है। परन्तु सातवाँ क्षार रस नहीं है । क्षार द्रव्य है, क्योंकि वह अनेक रसवाले द्रव्योंसे बनता है, अत. अनेक रसवाला तथा कटु और लवण रसकी अधिकतावाला है; अनेक इन्द्रियोंसे इसका ग्रहण होता है अर्थात् जिह्वाके अतिरिक्त स्पर्य आदिसे भी क्षारका प्रहण होता है ( परन्तु रसका केवल रसनेन्द्रियसे ही प्रहण होता है ) और क्षार एक विशिष्ट क्रियाद्वारा तैयार किया जाता है। रसमें ये सव बातें नहीं होती; अतः क्षार रस नहीं है, किंतु द्रव्य है । वडिश धामार्गवने कहा है कि मधुरादि छः, क्षार और अव्यक्त ये आठ रस हैं। इनमें मधुरादि छः रस हमें भी मान्य हैं। क्षारके रस होनेका खण्डन ऊपर कर चुके हैं। आठवाँ अव्यक्त रस बताया जाता है, यह भी ठीक नहीं है। रसोंका अव्यक्तपना रसोंकी प्रकृतिमें (दिव्य जलमें ), अनुरसमें या अनुरससमन्वित द्रव्यमें होता है; अत. वह छ. रसोंसे भिन्न सातवाँ रस नहीं हो सकता। क्योंकि छ रसों से किसीका भी व्यक्त न होना ही अव्यकीभाव है। चाहीक वैद्य काद्वायनने आश्रय, गुण, कर्म और सखादोंके अपरिसख्येय होनेसे रस भी अपरिसख्येय हैं, ऐसा जो कहा है वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि प्रत्येक मधुरादि रस आश्रय, गुण, कर्म और सखादके विशेपों( मेदों)को आश्रय करता है, परन्तु इन १ रसवैशेषिकसूत्रका भाष्यकार लिखता है कि-क्षार द्रव्यकी क्षार(क्षणन )गुणयुक्त शक्ति है, रस नहीं है। ..
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १३५ तर्पण आश्रयादिके भेदसे रसोंका अन्यख (मेद) नहीं हो सकता । जैसे-चावल-दूध-धी आदि मधुर रसके आश्रय भिन्न होते हैं, तथापि उन सबमें मधुरत्व जातिवाला एक ही रस होता है । जैसे वगला-दूध-रूई आदि अनेक आश्रयों में शुक्ल वर्ण एक ही होता है। इसी प्रकार गुरु, निग्ध, पिच्छिल आदि गुण तथा प्रीणन, जीवन, आदि कर्म भिन्न होनेपर भी मधुर रस एक ही रहता है । एक ही मधुर रस गुर्वादि अनेक गुणयुक्त, तथा वृंहण-तर्पण आदि अनेक कर्म करनेवाला हो, इसमें क्या विरोध है । इसी प्रकार गुड़, द्राक्षा आदिमें अवान्तर आखाद होनेपर भी उनमें मधुरख जातिवाला एक ही मधुर रस होता है। आप कहेंगे कि आश्रय-गुण-कर्मादि मेदसे रस अपरिसंख्येय न हों, परन्तु परस्पर सयोगसे जो आखादविशेष उत्पन्न होता है, वह विशेष कार्य करनेवाला भी होता है। मधुराम्ल मिले हुए रससे जो कार्य होता है, वह केवल मधुर या अम्लसे नहीं हो सकता । अतः परस्पर सयोगसे रस अपरिसख्येय होंगे। तो इसका उत्तर यह है कि यद्यपि द्वि-त्रिरसादि द्रव्योंमें मधुरादि रस अनेक प्रकारके परस्पर सयोगसे युक्त होते हैं, तथापि उनके गुरु लघ्वादि गुण या जीवन- बृहण आदि प्रकृति ( खभाव-कर्म ) अनेक नहीं होते, किन्तु प्रत्येक मधुरादिके जो गुण- कर्म होते हैं, वे ही द्वि-त्रिरसादि द्रव्योंमें ससृष्ट (मिश्रित) होते हैं । इस कारणसे उनको असख्येय मानना ठीक नहीं है (किंवा गुणप्रकृति अर्थात् मधुरादि छ गुण- स्वरूप, उनके अनेक परस्पर संयोगसे द्वि-निरसादि ससर्गोकी (मिश्ररसोंकी) उत्पत्ति होती है, इससे उनके प्रकृतिभूत रसोंको असंख्येय नहीं माना जा सकता । जैसे वातादि दीपोंके अनेक संसर्ग होनेपर भी उनका त्रिख नष्ट नहीं होता, इसी प्रकार रसोंके अनेक ससर्ग होनेपर भी उनका षट्ल नष्ट नहीं होता-रस छ से अधिक नहीं होते) । ससृष्ट रसोंमें भिन्न-भिन्न प्रकृतिभूत रसोंके ही गुण-कर्म मिश्रित होते हैं, इसलिए ससृष्ट रसोंके जुदे गुण-कर्म शास्त्रान्तरोंमें भी नहीं लिखे गये हैं। इसलिए हम भी यहाँ अससृष्ट एक-एक रसके ही लक्षण(गुण-कर्म )का उपदेश करेंगे। रसानामन्यथात्वगमननिरूपणम् -- अन्यथात्वगमनं स्थानात् (र. वै. सू. म. ३, सू. २९) । एवं रसानां पटत्वं प्रसाध्येदानीमन्यथात्वगमनं वक्ष्यते-अन्यथेत्यादि । अन्यथात्वगमनं नाम भन्यास्वादस्य प्राप्तिः । अन्यथात्वगमनं स्थानाच भवति । स्थान किचियवस्थानम् । यथा--रसतो मधुर ओदन भवस्थापितो धान्याम्ल भवति । अथवा स्थानात् स्थीयतेऽत्रेति स्थानमधिकरणं भाजन, तद्धेतोरपि रसान्तर भवति; अम्लभाजने प्रक्षिप्त क्षीरं मधुरमम्लतामापद्यते (मा.) । संयोगतः, अग्नेः पाकात् (सू.३०)। संयोगवश्व रसानामन्यथात्व भवति । संयोग इति द्रव्यान्तरसंयोग । यथा-सुधाचूर्णेन भस्सना वा संयुक्तं चिञ्चाफलमम्लं मधुरं भवति । भग्नेः पाकात् । ।
१३६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । अग्निनिमित्तं पाकादित्युक्तं भवति । तदेव चिश्चाफलमग्निपक्कं मधुरं भवति, पाकाजाम्बवान्याणि वायुना शोपितान्यम्लानि मधुरीभवन्ति (भा.) । आतपात् (सू. ३३)। तुम्बरुफलान्यातपपरिशोषितानि कपायाणि मधुरीभवन्ति (भा.)। भावनया, देशकालाभ्याम् (सू. ३२) । यष्टिमधुभाषितास्तिला: कपाय-तिक्त-मधुराः सन्तो मधुरा एव भवन्ति । संयोग-भावनयोर्महान् विशेष इति न विपञ्चयन्ते । देश-कालाभ्यां देशतः क्वचिद्देशे मामलकफलानि परममधुराणि भवन्ति किल; कालतः कदलीफलं कषायं मधुरतामापद्यते, तदेवान्यरसं भवतीति (भा.)। परिणामतः (सू. ३३)। परिणामोऽन्यथाभावः । यथा क्षीरं दधि- भावेन परिणतमम्लं भवति, तथा आसवाश्च । अथवा परिणामतः कालव्यतिक्रमा- दतिपरिणामतः । यथा---पनसफलमतिक्लिन्न कालात्ययात् परिणतमम्दं भवति, तथा-तालफल च (भा.)। उपसर्गतः (सू. ३४)। उपसर्गतः कृमिप्रभृतिभि- रुपसृष्टास्त्विक्षवस्तिका अम्ला वा भवन्ति (भा.)। विक्रियातः (सू. ३५)। विक्रियातश्चान्यथात्वगमनं भवति; विरुद्धा विप्रतिपिद्धा वा क्रिया विक्रिया, तद्धेतोश्च रसान्तरप्राप्तिर्भवति । तद्यथा-तालफलं दग्धं भूमौ बहुशः परिवर्तित तिकं भवति; पनसफलं हस्तेन बहुशः परिपीडितं क्लिष्टं चाम्लं भवतीति (भा.)॥ स्थानसे अर्थात् अवस्थानसे (कुछ समय रहनेसे ) रसोंका अन्यथाल (एक रससे दूसरे रसमें बदलना) होता है। जैसे-मधुर रसवाला ओदन-भात जलके साथ मिलाकर कुछ दिन रखनेसे धान्याम्ल( काँजी )के रूपमें बदल जाता है । अथवा स्थान अर्थात् पात्र, पानसे भी रस वदलता है, जैसे-खटाईवाले पात्रमें रखनेसे दूध खट्टा बन जाता है । संयोगसे ( अन्य द्रव्यके सयोगसे ) रस वदलता है; जैसे-चूने या भस्म (राख)के सयोगसे इमलीका खट्टा फल मीठा हो जाता है। अग्निमें पकानेसे द्रव्यका रस बदल जाता है, जैसे-इमलीके फल अग्निमें पकानेसे मीठे हो जाते हैं, जामुनके खट्टे फल अग्निपर पकाकर हवामें सुखानेसे मीठे हो जाते हैं । सूर्यके तापमें सुखानेसे द्रव्योंका रस वदल जाता है, जैसे-कषाय रसवाले तुम्बरु( तेजबल)के फल ( तोमर) धूपमें सुखानेसे मीठे हो जाते हैं । भावनासे द्रव्यका रस बदल जाता है; जैसे-कषाय, तिक्त और मधुर रसवाले तिलोंको मुलेठीके क्वाथकी भावना देनेसे वे मधुर हो जाते हैं। देशविशेषसे कहीं खट्टे फल मीठे होते हैं । काल्से मी रस बदल जाता है, जैसे-कषाय रसवाले केले कुछ काल पडे रहनेसे मीठे हो जाते हैं । परिणामसे (रूपान्तरको प्राप्त होनेसे ) द्रव्यका रस वदलता है, जैसे-दूधका दहीमें रूपान्तर होनेसे अम्लता उत्पन्न होती है । कृमि आदिके उपसर्गसे द्रव्यका रस बदलता है, जैसे-कीडे पड़े हुए गन्ने तिक या अम्ल रसवाले हो जाते हैं । विक्रियासे द्रव्यका रस बदलता है, जैसे-ताल- फलको अग्निमें पकाकर भूमिपर रगड़नेसे वह तित हो जाता है। ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १३७ रसानुरसयौर्लक्षणम्- व्यक्तः शुष्कस्य चादौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते । विपर्ययेणानुरसो रसो नास्तीह सप्तमः॥ (च. सू. अ. २६ ।) पूर्वोक्तरसानुरसलक्षणमाह-व्यक्त इत्यादि । शुष्कस्य चेति चकारादास्य च, भादौ चेति चकारादन्ते च; तेन शुष्कस्य वाऽऽर्द्रस्य वा प्रथमजिह्वासंबन्धे वाss- स्वादान्ते वा यो व्यक्तत्वेन मधुरोऽयमम्लोऽयमित्यादिना विकल्पेन गृह्यते, स रसः, यस्तूतावस्थाचतुष्टयेऽपि व्यको नोपलभ्यते, किं तव्यपदेश्यतया छाया- मात्रेण, कार्यदर्शनेन वा मीयते, सोऽनुरस इति वाक्यार्थः । यतश्च मधुरादय एव व्यक्तस्वाव्यक्तस्वाभ्यां रसानुरसरूपाः, अतोऽव्यक्तो नाम सप्तमो रसो नास्ति । अयं चार्थः पूर्व प्रतिपिद्धोऽप्यनुगुणस्पष्टहेतुप्राप्या पुनर्निपिध्यते । अन्ये त्वाहुः-शुष्कस्य चेत्यनेन यस्य द्रव्यस्य शुष्कस्य चास्य चोपयोगः, तत्र शुष्कावस्थायां यो व्यक्तः स रस उच्यते; यस्स्वार्दावस्थायां व्यक्तः सन् शुष्कावस्थायां नानुयाति, नासौ रसः, किन्त्वनुरसः । यथा-पिप्पल्या माज़्या मधुरो रसो व्यक्तः, शुष्कायास्तु पिप्पल्याः कटुकः, तेन कटुक एव रसः पिप्पल्याः, मधुरस्वनुरसः; यस्तु द्राक्षादीनामाः- वस्थायां शुष्कावस्थायां च मधुर एव, तत्र विप्रतिपत्तिरपि नास्ति, तेन तन्त्र मधुर एव रसः, लित्याईप्रयोज्यानां तु काक्षिक-तक्रादीनामादौ व्यको य उपलभ्यते स रसः, भनु चोपलभ्यते यः सोऽनुरसो युक्तस्तिक्तत्वादिः, तथाऽऽर्द्रावस्थायां शुष्कावस्था- विपरीतो यः पिप्पल्या इव मधुरः, सोऽनुरस इति । किं स्वाऽपि पिप्पली मधुररसैवेति पश्यामः, यतो वक्ष्यति-"मला मधुरा चार्टा गुर्वी स्निग्धा ' पिप्पली" (च. सू. अ. २७) इति; मधुरस्य तत्रानुरसत्वे गुरुत्व-श्लेष्मकर्तृत्वे अनुपपझे; तेन आर्द्रा पिप्पली व्यक्तमधुररसैव, शुष्का तु मधुरानुरसेति युक्तम् (च. द.)। ननु रसानुरसौ कथं विज्ञायते इति ? अत आह-व्यक्त इत्यादि । मुखे क्षिप्तस्य शुष्कस्य द्रव्यस्य व्यको रस आदी लक्ष्यते । तस्य द्रव्यस्यार्दीभावे पुनस्तब्यक्तरसविपर्ययेणानुरसो लक्ष्यते, न स्वतिरिक्को रसो लक्ष्यते । तस्मादिह जगति सप्तमो रसो नास्ति (ग.)। रसानुरसयोर्लक्षणमाह-व्यक्त इति । द्रव्यस्य प्यको मधुरोऽयमम्लोऽयमित्यादिस्फुटप्रतिभासो रसो लक्ष्यते । ननु रसैईच्याणि व्यपदिश्यन्ते, यन्त्र भावस्थामेकस्य रसस्य अभिव्यक्तिः, शुष्कावस्थायां पुनरन्यस्य यथा पिप्पल्याः, तत्र केन व्यपदेशः स्यादिति ? अत आह-शुष्कस्येति । शुष्कस्य द्रव्यस्य । शुष्कस्येति सम्यग्रससंपत्तेरुपलक्षणम् । ननु, अनुरसस्यापि क्वचिदन्ते व्यकिरस्तीत्यतस्तद्वारणाय पुनराह-आदौ चेति । भादौ प्रथमजिह्वासंबन्धे सति यो व्यज्यते स रसः । अनुरसस्य अभिव्यक्तिस्तु- अन्ते । अनुरसलक्षणमाह-विपर्य- येणेति; रसलक्षणविपर्ययेण अनुरसः । व्यक्तः शुष्कस्य चादौ इति रसलक्षणं, तद्विपर्ययश्च भव्यक्तः, मार्द्रस्य च, अन्ते च, इति रसलक्षणविपरीतलक्षणोऽनुरसः ।
१३८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । x x x निष्कृष्टार्थश्चायं-सवं द्रव्यं पञ्चमहाभूतसमवायसंभवं, तस्मादनेकरसं; तत्र यो व्यक्तः स रसः, यस्तु रसेनाभिभूतत्वान्न व्यज्यते व्यज्यते वा किंचिदन्ते सोऽनुरसः, इति रसानुरसयोर्लक्षणम् । एवं हि मधुरादीनां पण्णां व्यक्तानुव्यकरूपाणां रसानु- रससंज्ञा । तस्मात् सप्तमो रसोऽनुरसाख्यो नास्ति (यो.)॥ तत्र व्यको रसः । अनुरसस्तु रसेनाभिभूतत्वादव्यक्तो, व्यको वा किंचिदन्ते ॥ (अ. सं. . सं. सू अ. १७)। तत्र च द्रव्ये रसनेन्द्रियग्राह्यो व्यकः स्फुटो 'रस'शब्देनोक्तः । यश्च रसो यस्मिन् द्रव्येऽनुरसत्वेनोक्तः स प्रधानरसेनाभिभूतत्वादव्यक्त एव तिष्ठति । प्रधानरसविजा- वीयकार्यकर्तृत्वात्तस्य सद्भावोऽनुमीयते, आगमाश्च । अथवा यो रसः प्रधानरस- स्यान्ते किंचियकोऽप्युपलभ्यते सोऽनुरसः (इन्दुः)॥ तस्मान्नैकरसं द्रव्यं भूतसङ्घातसंभवात् । तत्र व्यको रसः स्मृतः। अव्यकोऽनुरसः किञ्चिदन्ते व्यक्तोऽपि चेष्यते ॥ (अ. ह. सू. अ. ९)। अथ को रसोऽनुरसो वेत्याह -तत्रेत्यादि । तत्र तस्मिन् द्रव्ये, यो व्यकः स्फुट उपलभ्यते, स रसः स्मृतस्तन्त्रकृद्भिः । यश्चाव्यक्तः अस्फुटप्रतिभासो रसनेन्द्रियेणो- पलभ्यते, सोऽनुरसः । हीनार्थोऽत्रानुशन्दः, अल्पो रस इत्यर्थः । न चैतावदेवा- नुरसलक्षणमित्याह-किञ्चिदित्यादि । मुखक्षिप्तस्य हरीतक्यादेव्यस्य रसनेन्द्रियेण किञ्चिदन्ते व्यकोऽप्युपलभ्यते य. सोऽप्यनुरस इष्यते, 'मुनिभिः' इति वाक्यशेषः । भन्ते इत्यनेनैतद्बोधयति-अन्ते अवसाने न स्वादावापातमात्रे, न च मध्ये । तयोहि रसस्यैवोपलम्मः । अनुशव्दस्यान पश्चादर्थस्वात् पश्चात् स्फुटोऽपि किञ्चिद्य उपलभ्यते सोऽप्यनुरस इत्यर्थः (अ. द.)। सर्वेषां सर्वधर्मत्वादविशेपे प्राप्त तन्निरासार्थ धर्मतारतम्यमाह-तत्र व्यक्त इति । तत्र द्रव्ये, कश्चिद्धर्मः सयो ज्यका, कश्चिदव्यक., कश्चिदीषयकः, कश्चिदन्ते व्यक्तः । तेष्वाद्यो रसाख्यः, इतरे त्रयोऽनुरसारया. (हे.)॥ सब द्रव्य पाचभौतिक होनेसे अनेक रसवाले होते हैं। उनमें शुष्क या आई द्रव्यको जीभ पर रखते ही प्रारम्भसे अन्ततक यह मधुर है, यह अम्ल है, इत्यादि प्रकारसे उसका जो रस व्यक-स्पष्ट रूपसे मालूम होता है, उसको रस कहते हैं । अर्थात् द्रव्य की शुष्कावस्था, आर्द्रावस्था, प्रारम्भावस्था (जिह्वाका सयोग होते ही) और अन्ति- मावस्था (खानेके अन्ततक) इन चारों अवस्थाओंमें जिसका यह मधुर है, यह अम्ल है, इत्यादि स्पसे स्पष्टतया अनुभव होता हो उसको रस कहते हैं; और जो रस इससे विपरीत हो अर्थात् उक्त चारों अवस्थाओंमें स्पष्टरूपसे न मालूम होता हो किन्तु अव्यक्त-अस्पष्टरूपसे (छायामात्रसे) मालम होता हो, या कार्य देखकर .
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १३९ " जिसका अनुमान किया जा सकता हो उसको, या अन्तमें कुछ स्पष्टरूपसे मालूम हो उसको, या जो आर्द्रावस्थामें उस द्रव्यमें स्पष्टरूपसे मालूम होनेपर भी वह द्रव्य शुष्क होनेपर उसमें वह रस दव जाय और अन्य रस मालूम होने लगे तो उस(आर्द्रावस्थाके रस)को अनुरस कहते हैं । इस प्रकार मधुरादि प्रत्येक रस ही अवस्थामेदसे रस या अनुरस सज्ञाको प्राप्त होता है, अनुरस नामका कोई सातवाँ रस नहीं है (च. द.)। द्रव्यमें जो रस उसको जीभपर रखते ही तुरत स्पष्टरूपसे मालूम हो, उसको रस कहते हैं तथा जो रस अव्यक्त ( कार्यदर्शनानुमेय), कुछ व्यक्त या अन्तमें व्यक्त होता हो उसको अनुरस कहते हैं (हे.)। रसोपलब्धिहेतवः- प्रत्यक्षतोऽनुमानादुपदेशतश्च रसानामुपलब्धिः (र. वै. अ. ३, सू. १०४)। आस्वाध प्रत्यक्षत उपलभ्यन्ते । अनुमानात् पूवोकं लिङ्गं दृष्ट्वा मधुरोऽय- मित्युपलभ्यते । उपदेशतः आगमात् कपायं मधु, मधुरमुदकम् , इत्यादि । अथवा मास्वादतः रसानां सामान्यत उपलब्धिर्भवति, अनुमानाल्लिमपूर्वकाद् विशेषो- पलब्धिर्भवति, उपदेशतः कर्मणि रसानां प्रवृत्तिपलभ्यत इति । अथवा सर्वत्रास्वादत एव रसो न गृह्यते, आगमतश्च क्वचित् क्वचिदनुमानाचेति । "शीतं कषायं मधुरं विषघ्न वयं च मेधास्मृतिवर्धन च । रसायनीयं लघु रुक्ममुक्तं, कषायतिकं लघु रूप्यमाहुः"; अत्रास्वादतो रसो न लभ्यते इति (भा.)। कहीं खादसे, कहीं कार्य देख कर अनुमानसे और कहीं शास्त्रोपदेशसे रसोंका ज्ञान होता है। जैसे नीमूके अम्ल रसका ज्ञान प्रत्यक्षसे और सुवर्णके कषाय और मधुर रसका ज्ञान शास्त्रोपदेशसे तथा सुवर्णके कार्य देख कर अनुमानसे होता है। पाचभौतिकत्वेऽपि रसस्य पविभको हेनु:- पविभक्तीः प्रवक्ष्यामि रसानामत उत्तरम् । षट् पञ्चभूतप्रभवाः संख्याताश्च यथा रसाः॥ (च. सू. अ २६)। षविभक्तीरिति मधुरादिपविभागानित्यर्थः । षद पञ्चभूतप्रभवा इति पञ्चभूत- प्रभवाः सन्तो यथोकेन प्रकारेण 'सोमगुणातिरेकात्' इत्यादिना यथा पदसंख्याताः पदसंख्यापरिच्छिन्ना भवन्ति, तथा वक्ष्यामीति योजना (च. द.)॥ सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लध्व्यश्चाव्यक्तरसाच, तास्त्वन्तरिक्षाश्यमाना भ्रष्टाश्च पञ्चमहाभूतगुणसमन्विता जगम- १ गङ्गाधरस्तु “पञ्चमहाभूतविकारगुणसमन्विता ' इति पठित्वा 'तत्काले पञ्चमहाभूताना विकारभूता एतदाकाश-पवनार्क-चन्द्रास्तथा सततमाकाशे समुडीयमाना मौमास्त्रसरेणवस्तेषा गुरुत्वादिगुणसमन्विता सत्यस्तदधोगाना सेन्द्रियाणा प्राणिना मनुष्यादीना स्थावराणा च वृक्षादीना मूतीरभिप्रीणयन्ति" इति व्याख्यानयति । - १४० द्रव्यगुणविज्ञानम् । स्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, तासु मूर्तिपु षडमिमूर्च्छन्ति रसाः। तेषां षण्णां रसानां सोमगुणातिरेकान्मधुरो रसः, पृथिव्यग्नि- भूयिष्ठत्वादम्लः, सलिलाग्निभूयिष्ठत्वाल्लवणः, वाय्वग्निभूयिष्ठत्वात् कटुकः, वाय्वाकाशातिरिक्तत्वात्तिक्ता, पवनपृथिवीव्यतिरेकात् कषाय इति । एवमेषां रसानां षट्त्वमुपपन्नं न्यूनातिरेकविशेषान्महाभूतानां, भूतानामिव स्थावरजङ्गमानां नानावर्णाकृतिविशेषाः; पडतुकत्वाश कालस्योपपन्नो महाभूतानां न्यूनातिरेकविशेषः (च. सू. अ. २६)। ॥ संप्रति रसानामादिकारणमेव तावदाह-सौम्या इत्यादि । सौम्याः सोमदेव- ताकाः । श्रश्यमाना इति वदता भूमिसंवन्धव्यतिरेकेणान्तरीक्षेरितैः पृथिव्यादि- परमाण्वादिभिः संबन्धो रसारम्भको भवतीति दयते । मूर्तीरिति व्यक्तीः । अभिनीणयन्तीति तर्पयन्ति, किंवा जनयन्ति । अभिमूर्च्छन्ति रसा इति व्यकि यान्ति । अन चान्तरीक्षमुदकं रसकारणत्वे प्रधानत्वादुकं, तेन क्षितिस्थमपि स्थावर-जगमोत्पत्तौ रसकारणं भवत्येव । सोमगुणातिरेकादिति अतिरेकशब्देन सर्वेष्वेव रसेषु सर्वभूतसान्निध्यमस्ति, क्वचित्तु कस्यचिद्भूतगुणस्यातिरेकाद्रसविशेषो भवतीति दर्शयति; एतच मधुरं प्रति अब्गुणातिरिक्तवं विशेपोत्पचौ कारणस्वेन ज्ञेयं; यचाधारकारणत्वमपा, तत् सर्वसाधारणम् । एवं लवणेऽप्यपां कारणत्वं शेयम् । लवणस्तु सुश्रुते पृथिव्यन्यतिरेकात् पठितः, अस्मिंश्च विरोधे कार्यविरोधो नास्त्येव । ननु, उष्ण-शीताभ्यामग्नि-सलिलाम्यां कृतस्य लवणस्याप्युष्णशीतरवेन भवितव्यं, तल्लवणं कथमुष्णं भवति ? नैवं, यतो भूतानामयं स्वभावः-यत्- केनचित् प्रकारेण सन्निविष्टाः कञ्चिद्गुणमारभन्ते, न सर्वम् । यथा-मकुष्ठकेऽभि- मधुरो रसः क्रियते, न स्नेहः, तथा सैन्धवे वह्निनाऽपि नोष्णस्वमारभ्यते । अयं च भूतानां सन्निवेशोऽदृष्टप्रभावकृत एव, स च सनिवेशः कार्यदर्शनेनोमेयः । तेन यत्र कार्य दृश्यते तत्र कल्प्यते, यथा-लवणे उष्णत्वादग्निर्विष्यन्दिस्वाथ जलमनु- मीयते । आगमवेदनीयश्वायमर्थः, नानास्मद्विधानां कल्पनाः प्रसरन्ति । एतेन , १ "पृथ्वी-सोमगुणातिरेकान्मधुरो रस , भूम्यग्निगुणभूयिष्ठत्वादम्ल , तोयामिगुणभूयिष्ठत्वा- छवण., वाय्वग्निगुणभूयिष्ठत्वात् कटुक्र , वाय्वाकाशगुणातिरेकात्तिक , वाय्वाकाशगुणातिरेकात्तिक , पवन-पृथ्वीगुणातिरेकात् कषायः” इति योगीन्द्रनाथसेनसमत. पाठ. । “ननु कारणाना भूताना पञ्चविधत्वेन कार्यस्यापि रसस्य पञ्चविधत्वमेव युक्तमित्यभिप्रेत्य षट्त्वमुपपादयति--सोमगुणातिरेकादि- त्यादि । सोमो जलदेवता, तेन जलगुणातिरेकादित्यर्थ , किंवा सोमशब्देन पृथिवी-जलयोरेव ग्रहणम् , उमयोरपि सौम्यत्वात् , अत एव सुश्रुतेऽपि "पृथिव्यम्बुगुणवाहुल्यान्मधुर" इत्यादि, तथा तत्रैव "पृथिव्यग्निगुणबाहुल्यालवण., तोयामिगुणबाहुल्यादम्ल" (सु. सू. म. ४२) इति यदुक्त तदपि न विरुध्यते, भूमि-जलयोः सौम्यत्वेनैकरूपतया कार्यविरोधा- भावात्" इति शिवदाससेनः ॥ । . । -- 1 पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः १४१ पदुध्यते-तोयवत् पृथिव्योदयोऽपि किमिति पृथग्रसान्तरं न कुर्वन्ति, तथा तोय वातादिसंयोगादिभ्यः किमिति रसान्तराणि नोस्पयन्त इति, तदपि भूतस्वभावा- पर्यनुयोगादेव प्रत्युक्तम् । इह च कारणत्वं भूतानां रसस्य मधुरत्वादिविशेष एव निमित्तकारणरूपमुच्यते, तेन नीरसानामपि हि दहनादीनां कारणत्वमुपपत्रमेव प्युस्पादितम् । रसमेदं दृष्टान्तेन साधयमाह-एवमित्यादि । रसानां पदवं महाभूताना न्यूनातिरेकविशेषात् सोमगुणातिरेक-पृथिव्यायतिरेकादेः पदुरपाद- कारणादुपपन्नं, षड्भ्यः कारणेभ्यः पद कार्याणि भवन्तीति युक्तमेवेति भावः । भूतानां यथा नानावर्णाकृति विशेपा महाभूतानां न्यूनातिरेकविशेषात् , तथा रसानामपीति । भूतानां यथोक्तानां न्यूनातिरेकविशेपहेतुमाह-पट्टतुकत्वादित्यादि । पदृतकत्वेन कालो नानाहेमन्तादिरूपतया कश्चिद्भूतविशेष क्वचिद्वर्धयति, स चारमकायं रसं पुष्टं करोति यथा-हेमन्तकाले सोमगुणातिरेको भवति, शिशिरे वारवाकाशातिरेकः; एवं तस्याशिवीयोक्तरसोत्पादक्रमेण वसन्तादावपि भूतोत्कों ज्ञेयः । पदृतुकाचेति चकारेणाहोरात्रकृतोऽपि भूतोस्को ज्ञेयः, तथाऽदृष्टकृतश्च; तेने हेमन्वादावपि रसान्तरोत्पादः कचिद्वस्तुन्युपपनो भवति । यद्यपि च ऋतुमेदेऽपि भूतोत्कर्षविशेष एव कारणं, यदुक्तं-"ताचेतावर्क-वायू" (सू. भ. ६) इत्यादि, तथाऽपि बीजाकुरकार्यकारणभाववत् संसारानादितयैव भूतविशेषत्वोः कार्यकारण- भावो वाच्यः (च. द.)। रसानां पञ्चभूतप्रभवत्वं दर्शयति-सौम्या इति । xx1 अन्तरीक्षप्रभवा दिव्या आपः । प्रकृत्या शीताः, लध्ध्यः । चकारात् शुधि- शिवस्वादीनामन्येषां वक्ष्यमाणगुणानां समुच्चयः । वक्ष्यति च-"शीतं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लधु पडणम् । प्रकृत्या दिव्यमुदकं" (च सू अ. २७) इति । ता: मन्तरीक्षाद् अश्यमानाः पतन्त्यः अध्यकरसाः। "पानीयमान्तरीक्षमनिर्देश्यरसम्" (सु. सू. मं. ४५) इति । भ्रष्टाः पतिताश्च पञ्चमहाभूतगुणसमन्विता:, "भ्रष्ट पात्रमपेक्षते" (च. सू. म. २७), 'भ्रष्टानां पञ्चमहाभूतगुणसंपर्कः पात्रापेक्षया । जङ्गमस्थावराणां भूतानां मूर्ती व्यकीः Ixx। तासु मूर्तिपु षद रसाः अभि- मूर्च्छन्ति व्यज्यन्ते ।xxx। रसानां पञ्चभूनप्रभववमुक्त्वा संप्रति तेपा पदश्व- मुपपादयितुं यद्यद्भूतगुणातिरेकाधो यो रसो निप्पद्यते तदेव व्याकृत्य दर्शयति--- तेषामिति । तेषां षण्णां 'रसानां मध्ये मधुरो रसः पृथ्वी-सोमयोः पृथिम्युदकयो- गुणातिरेकादुत्पद्यते । पृथिव्यम्योर्गुणभूयिष्ठत्वाद् गुणबाहुल्यादम्लः । एवं लवणा- दयो ध्याख्येयाः ।xxx। दृष्टान्तेन रसानां पदंत्वमुपपादयति--एवमिति । एवं महाभूतानां पृथिव्यादीनामूनातिरेकविशेषादसाना पञ्चभूतप्रभवत्वेऽपि षट्त्वमुप- पद्यते । यथा भूतानी स्थावरजगमाल्मकानां नानावर्णाकृतिविशेपा. महाभूताना- मूनातिरेकविशेषादुपपद्यन्ते एवं रसानां षदरवम् । महाभूतानामूनातिरेकश्च करसाद भवतीत्यत माह-पद्धृतुकस्वाञ्चेति । कालस्य संवरसरात्मनः पट्टतुकरवान्महाभूताना- । - - १४२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । भूनातिरेकविशेष उपपद्यते । शिशिरे वारवाकाशयोर्गुणातिरेको भवति, वसन्ते पवनपृथिव्योः, ग्रीष्मे वारवयोः।xxx। (यो.)॥ आकाश-पवन-दहन-तोय-भूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिवृद्धाः शब्द- स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः, तस्मादाप्यो रसः । परस्परसंसर्गात् परस्परानु- ग्रहात् परस्परानुप्रवेशाच्च सर्वेषु सर्वेषां सान्निध्यमस्ति; उत्कर्षाप- कर्षात्तु ग्रहणम् । स खल्वाप्यो रसः शेपभूतसंसर्गाद्विदग्धः षोढा विभज्यते; तद्यथा-मधुरः, अम्लः, लवणः, कटुका, तिक्तः, कषाय इति । ते च भूयः परस्परसंसर्गाविषष्टिधा भिद्यन्ते । तत्र, भूम्यम्बु- गुणबाहुल्यान्मधुरः, तोयाग्निगुणवाहुल्यादम्लः, भूम्यग्निगुणवाहुल्या- ल्लंवणः, वाय्वग्निगुणवाहुल्यात् कटुकः, वाय्वाकाशगुणवाहुल्यात्तिक्का, पृथिव्यनिलगुणवाहुल्यात् कपाय इति (सु. सू. अ. ४२)॥ रससामान्यस्य प्रथमं कारणसंभवं दर्शयन्नाह-आकाशेत्यादि । आकाश-पवन- दहन तोय- भूमिपु यथासंख्यं शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धा 'जायन्ते' इति शेपः । किंविशिष्टास्ते ? एकोत्तरपरिवृद्धा इति; तथाहि-शब्दगुणमाकाशं, शब्द-स्पर्शगुणो वायुः, शब्द-स्पर्श-रूपगुणं तेजः, शब्द-स्पर्श-रूप-रसगुणा आपः, शब्द-स्पर्श-रूप- रस-गन्धगुणा पृथ्वी परस्परं भूतानुप्रवेशादिस्थमेकोत्तरा वृद्धिईया । भाग्यः जलसंभवः । तत्र सर्वेष्वेव भूतेषु सर्वभूतानां सान्निध्यमस्तीति दर्शयमाह- परस्परसंसर्गादित्यादि । परस्परसंसर्गात् अन्योन्यसंयोगात् , परस्परानुग्रहात् अन्यो- न्योपकारात्, परस्परानुप्रवेशात् अनुप्रवेशादेकात्मीभावात् , सर्वेषु भूतेषु, सर्वेषाम् आकाशादीनां, 'सर्वेषु द्रव्येषु' इत्यन्ये । सर्वेषु भूतेषु सर्वभूतानां सान्निध्यमस्तीति सर्व एव गुणाः सर्वेषां भूतानां प्राप्नुवन्तीत्याह-उत्कर्षापकर्षादित्यादि । -उत्कर्षो वृद्धिः, अपकर्षों हासः; आकाशाधिके द्रव्ये शब्दोऽधिकः, वाताधिके द्रव्ये स्पर्टी ऽधिकः, एवं शेषेषु भूतेषु शेषगुणा., तेन सर्वेषामेव भूतानां सर्वात्मकत्वेऽप्युस्कर्षे- णाभिधानादाप्य एव रसः । यदि पुनरसौ रस आप्य एव, नान्यभूतजः, स एवमपां स्वभावेनाव्यकरसत्वात्तेनाप्यव्यक्तरसेन भवितव्यमित्याह-शेपेत्यादि । पानीयाद- न्यानि भूतानि शेषभूतानि, तेषां ससर्गों मिलन, ततो हेतोराप्यो रसोऽव्यकोऽपि कालसहाय-भूमि-वियदनिलानलसंसर्गेण परिपाकान्तर गतः, पोढा विभज्यते षट्- प्रकारो भवति । तत्र यस्य यस्य शेषभूतस्य संसर्गाद्यो यो रस उत्पद्यते तं तं रसं दर्शयन्नाह-तत्रेत्यादि । ननु च, शेषभूतसंसर्गः प्रतिपादनीयः, तत् कथमुदको- पादानम् ? उच्यते-निष्पत्तावेव तोयनाधान्यमुक्क, विशेषे तु न प्रामोतीति विशेषेऽपि तोयस्य प्राधान्यप्रतिपादनाय 'पृथिव्यम्बुगुणबाहुल्यात्' इस्युक्तम् । 'तोयामिगुणबाहुल्यादम्ल' इत्येके पठन्ति (ड.) । रसस्य कारणं परिपाच्या १ 'भूम्यग्निगुणवाहुल्यादम्ल , तोयामिगुणबाहुल्याउवणः' इति पा० ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १४३ प्राइ-आकाशेत्यादि । एकैकेन शब्दादिगुणेन उत्तरोत्तरे भूते परिवृद्धा एकोत्तर- परिवृद्धाः,xxx। तत्रोत्तरोत्तरे भूते शब्दादयो गुणाः पूर्वभूतानुप्रवेशकृताः, शब्दादयस्त्वाकाशादीनां नैसर्गिकाः । यस्मात् क्रमेण शब्दादयो नैसर्गिकास्तस्मा- दाप्यो रसः । ननु, यद्याप्यो रसस्तरकथ पार्थिवादिसर्वद्रव्येषु शब्द-स्पर्श-रूप- रसाद्यभिधानमित्याह--परस्परेत्यादि । परस्परानुग्रहो भौतिककार्यद्रव्येऽपि स्वगुणे- ऽपीतरभूतानुग्रहदुत्पाद. । अनुप्रवेशस्तु भूतानां मेलका । उस्कात्तु ग्रहणमिति यस्मिनाकाशीयादिद्रव्ये आकाशादिभूतोत्कर्षस्तदुत्कोत्तद्गुणशब्दाद्युत्कर्षः, व्यञ्जको भवति; इदमाकाशीयं, शब्दगुणोस्कर्षात्; इदमाप्यं, रसगुणोद्रेकादित्यादि । एवंविधमेव चरके शुद्धाकाशादिस्वरूपकथने उक्क, यत्-"महाभूतानि खं वायुरनिरापः क्षितिस्तथा । शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ॥ तेषा- मेकगुणः पूर्वो गुणवृद्धिः परे परे । पूर्वः पूर्वगुणश्चेव क्रमशो गुणिपु स्मृतः" (च. शा. म. १) इति । संप्रति अपामव्यकरसत्वेऽपि यथा मधुरादिविशेषवान् भवत्याप्यो रसस्तदाह-स खल्वित्यादि । x x x । विदग्ध इति परिणतः, कालसहितभूम्यादिसंसर्गात् पाकादवस्थान्तरगतः पग्निधो भवतीत्यर्थः । ननु, यदि शेपभूतयोगान्मधुरादिपविधत्वं, तत्कथं पृथिव्यम्बुगुणबाहुल्यान्मधुरो रस इत्यनेन मधुरेऽपि रसविशेपेऽपा कारणरवमुच्यते ? ब्रूमः-आपो रसानामाधार- कारणम् , अपां पृथिव्यामनुप्रवेशात् पृथिव्याधारकारणमेवः तेनाप्क्षिती अपि तदाधारतया रसानामभिव्यक्ती कारणे, अभिव्यक्तेश्च मधुरादिरूपतामन्तरेणासंभ- पान्मधुरादिविशेपेऽपि कारणे भवतःअग्यादयस्तु त्रयो'नीरसतया मधुरादिविशेपे निमित्तकारणं प्राधान्येन भवन्ति, तद्यतिरेकेणाम्लादिरसाभावात् ; रसाभिव्यक्तेश्या. म्यादिभूतत्रयसंनिधानं विनाऽनुपलब्धेर भिव्यक्तावपि कारणस्वमम्यादीनां भवति । तदुक्तं चरके-"रसनार्थो रसखस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा । निर्वृत्तौ च विशेपे च प्रत्ययाः खादयत्रयः" (च. सू. म. १) इति । मत्र हि चकारद्वयाजलक्षित्योरपि विशेपे कारणत्वं, तथा खादीनां च निर्वृत्तावपि कारणस्वमुक्तं; तेन मधुरे विशेपेऽप्यपां कारणत्वात् सुष्टुत-'पृथिव्यम्बुगुणवाहुल्यान्मधुर' इति । एवं 'भूम्यग्नि- गुणबाहुल्यालवण' इत्यपि समाधेयम् । न च रसानां पशिधत्वमुक्त रसान्तर- योगावाध्यते इति वाच्य, यतोऽव्यक्तरसत्वमन्तरीक्षजलादौ यदुकं तदव्यक्त मधुरादिरसरूपमेव । यदुकम्--"अव्यक्तीभावस्तु रसानां प्रकृतावनुरसेऽनुरस. समन्विते च द्रव्ये भवति" (च. सू भ. २६) इति । क्षारस्य च रसत्वं क्षाराध्याय एव निषिद्ध, वधुक्तं पनिधो भवतीति । चरके तोयाग्निगुणबाहुल्या- लवणः पठितः, इह तु तोयोग्निगुणबाहुल्यादम्लः पश्यते; तदत्र प्रमेये विरोधो मास्त्येव, उभयथाऽपि वक्ष्यमाणरसगुणानामुपपत्तेः; अम्लस्य गुणपर्यालोचनया वोयाग्निबाहुल्यमेव युक्तं, तेन चरके प्रमादपाठाद्वा भविरोधोऽयमिति । अम्ले यद्यपि । ।
द्रव्यगुणविज्ञानम् । तोयोम्योर्बाहुल्यं, तथाऽम्लस्योष्णस्वेऽग्निः कारणं, स्निग्धत्वे चापः कारणमिति यथादर्शनमदृष्टवशाद् दृष्टत्वाच्च भवति; नात्र वस्तुस्वभावे युक्तयः क्रोशनीयाः, अपर्यनुयोज्यस्वाद्भावस्वभावानाम् । एवं कपायस्य रुक्षत्वे वायुः कारणं, गौरये पृथिवीत्यादि यथादृष्ट व्युत्पादनीयम् । तथाऽनेकरसे हरीतक्यादौ तद्रसोत्पत्ती भूतानां व्यापारो, न तु परस्परविरोधादभावो रसानां; नापि रसकारणतयाऽव. गतसर्वभूतानां गुरु-लघूष्णत्वादिप्रसंगः, तत्र यथादृष्टगुणे एव परं कारणं भूतानां दृष्टस्वादिः एवमन्यदप्येवजातीयं समाधेयम् (च. द.)॥ रसः खल्वाप्यः प्रागव्यक्तश्च । स षडतुकत्वात् कालस्य महाभूत- गुणैरूनातिरिक्तैः संसृष्टो विषमं विदग्धः षोढा पृथग्विपरिणमते मधु- रादिमेदेन । तंत्र भू-जलयोर्चाहुल्यान्मधुरो रसः, भू-तेजसोरम्ला, जल-तेजसोर्लवणः, वाय्वाकाशयोस्तिक्तः, वायु-तेजसोः कटुकः । वाय्वूयॊः कषायः (अ. स. सू. अ. १८) ॥ रसः खल्वाप्य , योऽयं जिह्वेन्द्रियग्रायः, सोऽबाख्यान्महाभूतात् संपद्यते । स च रसः प्राक् प्रथममनासादितान्यभूतानुरागोऽव्यक्त एव स्वरूपेण । ततो महाभूतानां पृथिव्यादीनां गुणैः पार्थिवादिभिः कैश्चिदूनैः कैश्चिदभ्यधिकैः संसृष्टस्तैश्च गुणैर्विषम- मूनाधिक्यादिनियमेन विदग्धः परिणत्या गृहीतमहाभूतगुणानुराग एक एव रसः पृथक्षाधुराम्लादिभेदेन पनिर्विकारैर्विपरिणमते । कथ महाभूतानामूनाधिक्यम् ? उच्यते-कालस्य संवत्सराख्यस्य षडतुकत्वाद्रसस्यापि प दत्वम् । तथा च शिशिरे वाय्वाकाशयोराधिक्यागसंस्य तिकता, वसन्ते चायु-पृथिव्यो. कषायता, प्रीष्मेऽग्नि- वाय्वोः कटुकता, वर्षास्वग्नि-पृथिव्योरम्लता, शरद्यम्युदकयोलवणता, हेमन्ते पृथिव्युदकयोर्मधुरतेति प्राधान्याद् व्यपदेशः, तेनान्यत॒द्भवानामपि रसानां यथोकमहाभूतद्वयाधिक्यमेव कारण विज्ञेयम् (इन्दुः)॥ क्ष्माम्भोऽग्निमाम्वुतेजःखवाय्वन्यनिलगोऽनिलैः। द्वयोल्बणैः क्रमाद्भूतैर्मधुरादिरसोद्भवः ॥ (अ. हृ. सू. अ. १०)। पृथिव्यादिभिर्महाभूतैर्द्वयोल्बणैः यधिकैः, क्रमात् परिपाट्या यथासमय- मित्यर्थः, मधुरादीनां षण्णां रसानामुद्भवः अभिनिर्वृत्तिर्भवति । द्वयमुल्यणं येषु भूतेषु तानि द्वयोल्बणानि, तैः द्वयोल्बणै. । द्वयोषणशब्दोपादानाच द्रव्यव- द्रसस्यापि पाञ्चभौतिकस्वमिति प्रतिपादयति । कतमत् पुनर्भूतद्वयं कतममिन रसेऽधिकमारम्भकं स्यादिति यथासङ्ख्येन दर्शयन्नाह-क्ष्माम्भ इत्यादि ।xxx। ननु, यथा भूमि तोयाधिक्यान्मधुर., एवमम्बु-वाय्वाधिक्यादन्यो भूम्याकाशाधिक्या- दन्य इत्येवमादिविकल्पैरसङ्ख्येयरसप्रसङ्गः प्रामोति ? भत्रोच्यते-स्वभावादंदोषः। एषां भूम्याकाशादीनामीदृश. स्वमावो यत् 'केनचिदेव भूताधिक्येन व्यवस्थितानि मूम्यादीनि रसान्तरोत्पादनसमर्थानि भवन्ति, न सर्वेणेति (अ. द.)॥' ।
+ पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १४५ तत्र पृथिव्यपां वाहुल्यान्मधुरं विद्यात् । अम्लमपामग्नेश्च । लवण- मन्नेरपां च । कटुकमग्नेर्वायोश्च । तिकं खस्य वायोश्च । कपायमवने- योश्च (र. . अ. ३, स ३८, ३९, ४०, ४१, ४२, ४३)। बाहुल्यं च पञ्चारमकावे सत्यपीत्यर्थः । पृयिव्यम् विशिष्टो मधुर इत्यर्थः । उभयो- विशेषप्रदर्शनार्थमनेलवणकारणस्वे पूर्ववचनं, लवणेऽग्निरधिकः । अम्ले त्वाप भधिका इति (अपां पूर्ववचनम् ) (भा.)। अब, रस पाचभौतिक होनेपर भी उत्पत्तिकालमै पञ्चमहाभूतोंके न्यूनाधिकभावसे मिलनेके कारण रसोंके छ. मेद कैसे होते हैं, यह कहा जाता है। अन्तरिक्षमें उत्पन्न हुआ दिव्य जल खभावसे ही टण्डा, सौम्य, लघु और अव्यक्त रसवाला होता है । वह जल अन्तरिक्षसे गिरता हुआ मध्यमें (आकाशमे) आकाशस्थ और भूमिपर गिरकर भूमिस्थ पञ्चमहाभूतोंके गुणोंसे समन्वित होकर जगम और स्थावर मूर्तियोंको (वस्तु- ओंको) उत्पन्न और तृप्त करता है, जिनके अन्दर छ रस उत्पन्न होते हैं । आकाशका शब्द, वायुका स्पर्श, अग्निका रूप, जलका रस और पृथिवीका गन्ध नैसर्गिक (स्वाभा- विफ) गुण है । परन्तु उत्तरोत्तर महाभूतमें पूर्व पूर्व महाभूतके अनुप्रवेश( मिलने से आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमिमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पॉच गुण, एक-एककी वृद्धिके साथ रहते हैं, जैसे-आकाशमे शब्द, वायुमें शब्द और स्पर्श; इत्यादि । इस प्रकार रस जलका नैसर्गिक गुण होनेसे रस आप्य (जलसे उत्पन्न हुआ किंवा जलप्रधान गुण) कहलाता है । पञ्चमहाभूतोंके परस्पर ससर्ग( सवन्ध )से, परस्पर एक दूसरेपर अनुग्रह( उपकार )से और एक दूसरेमे परस्पर अनुप्रविष्ट होनेसे सब कार्यद्रव्योंमें सब भूतोंका सानिध्य पाया जाता है । परन्तु जिस द्रव्यमे जिस महा- भूतका उत्कर्ष होता है उसपरसे उस द्रव्यका नाभस, वायव्य आदि नामसे ग्रहण किया जाता है । यह आप्य रस शेप महाभूतोंके ससर्गसे (न्यूनाधिकभावसे मिलनेसे) परिपाकको प्राप्त होकर छः प्रकारका होता है, जैसे-मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक और कषाय । इनमे सोम(जल और पृथिवी )के गुणोकी अधिकतासे मधुर, पृथिवी और अनिके गुणोंकी अधिकतासे अम्ल, जल और अमिके गुणोंकी अधिकतासे लवण, वायु और अग्निके गुणोंकी अधिकतासे कटु, वायु और आकाशके गुणोंकी अधिकतासे तिक्त तथा वायु और पृथिवीके गुणोंकी अधिकतासे कषाय रसे उत्पन्न होता है। जैसे पञ्चमहाभूतोंके न्यूनातिरेकविशेपसे संवन्धित होनेसे स्थावर और जगम प्राणी आदिके अनेक वर्ण और आकृति आदि विशेष होते हैं, इसी प्रकार पञ्चमहा- भूतोंके न्यूनाधिकमावसे मिलनेसे पदार्थोमे छ. प्रकारके रस उत्पन्न होते हैं । काल' भिन्न-भिन्न खभाववाले छ. प्रतुओंवाला होनेसे पञ्चमहाभूतोंमें कालेखभावसे न्यूनाधि- कभाव होता रहता है। द्र० ५.१० -- द्रव्यगुणविज्ञानम् । घकव्य-चरक तथा चरकमतानुयायी वृद्धवाग्भट और वाग्भटने अम्ल रसको भूमि और अग्निके गुणोंकी अधिकतावाला तथा लवण रसको जल और अग्निकी अधिकतावाला माना है । सुश्रुतने अम्ल रसको जल और अग्निकी अधिकतावाला तथा लवण रसको पृथिवी तथा जलकी अधिकतावाला माना है। नागार्जुनने अम्ल और लवण दोनों रसोंको जल और अग्निकी अधिकतावाला बताया है । नागार्जुनने अम्लमें अग्निकी अपेक्षया जलकी विशेष अधिकता तथा लवणमे जलकी अपेक्षया अग्निकी विशेप अधिकता अम्लमें जल और लवणमें अग्नि शब्दको पहले लिखकर बताई है। मधुरादिरसाना सोमगुणातिरेकत्वादि कथं निर्धार्यते १ इति प्रतिपादनम्- ते निर्धार्यन्तेऽनुमानात् (र. वै. भ. सू. ४४)। एतैर्भूतरेते रसा निर्वर्तिता इति कथं निर्धार्यत इस्याह-ते इत्यादि । आगमेन पूर्वमुपलब्धानां प्रमाणान्तरेण दृढीकरणार्थमयमारम्भः; आप्तवचनस्य त्रैविध्यात् । श्रद्धेयार्थम् , अनुमेयार्थ, प्रत्य- क्षार्थ चेति । श्रद्धयार्थमुत्तराः कुरवः, स्वर्गेऽप्सरस इति । अनुमेयार्थ प्रत्यक्षार्थ च यथा-चक्षुरिन्द्रियं रूपस्य ग्राहकमिति । चक्षुष्यसति रूपदर्शनं न भवति, तसा- दस्ति चक्षुरित्यनुमीयते प्रत्यक्षतश्च रूपमुपलभ्यते इति । इहाप्ययमागमोऽनुमानार्थः (भा.) । कथमिति ? वर्धनात् समानजातीयस्य, असमानजातीयस्य क्षपणाच (सू. ४५) आप्यस्य श्लेष्मणो वर्धनादाग्नेयस्य पित्तस्य क्षपणाच मधुर- स्थाप्यरवमुपपन्नमिति । एवं शेषाणामपि । अनेनैवाम्ल-लवणयोरामेयस्वाच्छेष्मणः प्रतिपक्षत्वं कस्सान्न भवतीत्ययं कुचोधप्रकारश्च परिहतो भवति । न यायुर्वेदे प्रत्यक्षार्थानुमेयार्थाभ्यामागमाभ्यामन्यच्छूद्धयार्थमस्ति, दृष्टफलत्वादिति (भा.)॥ विरुद्ध महाभूतोंसे उत्पन्न दोषोंके क्षय और समान महाभूतोंसे उत्पन्न दोषोंकी वृद्धिको देख कर यह रस अमुक महाभूतोंकी अधिकतासे उत्पन्न हुआ है यह अनुमान किया जाता है। जैसे मधुर रससे आप्य कफकी वृद्धि और आमेय पित्तका क्षय होता है यह देख कर मधुर रस सोमगुणातिरेकसे उत्पन्न हुआ है, यह अनुमान होता है। विदाह्यविदाहिमेदेन रसानां द्वैविध्यम्- "कट्वाल-लवणा वैयैर्विदाहिन इति स्मृताः । स्वादु-तिक्त-कषायाः स्युर्विदाह- रहिता रसाः ॥ विदाहिनो रसा मूच्छी जनयन्तीति निश्चिता। भविदाहिनस्तच्छमनाः कीर्तिता भिषगुत्तमैः ॥” (र. वै.भा.)॥ कटु, अम्ल और लवण ये तीन रस (वाले द्रव्य) विदाही और मूर्छा करनेवाले हैं; तथा मधुर, तिक्त और कषाय ये तीन रस (वाले द्रव्य) विदाह न करनेवाले और मूर्छाका प्रशमन करनेवाले हैं। सौम्याग्नेयभेदेन रसानां द्वैविध्य, तयोर्गुणाश्च- केचिदाहुः-अग्नीषोमीयत्वाजगतो रसा द्विविधाः-सौम्याश्नाने- - पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १४७ याश्च । मधुर-तिक्त कपायाः सौम्या:, कदम्ल-लवणा आग्नेयाः । तत्र मधुराम्ल-लवणाः स्निग्धा गुरवश्व, कटु-तिक्त कपाया रूक्षा लघवश्च; सौम्याः शीताः, आग्नेया उष्णाः (सु. सू. ४२)॥ केचिदित्यादि । अनीपोमीयरवादिति अग्निश्च सोमश्च योनिर्जगत इत्यर्थः । सौम्याथ्याग्नेयाश्चेति चकारद्वयात् मेह-रुक्ष-गुरुत्व-लघुत्वैरपि द्वैविध्यं सूचयति (ड.)। केचिदित्यादिना एकीयमतमाह; एतच्चाविशेषादविरुद्धत्वादनुमतमेव (च. द.)॥ कई आचार्य कहते हैं कि-जगत् अग्नीपोमीय (अग्निगुण-उष्णता-प्रधान या सोमगुण-शीतता-प्रधान ) होनेसे रसोंके सौम्य और आग्नेय ये दो भेद होते हैं। मधुर, तिक और कपाय ये तीन रस सौम्य हैं; कटु, अम्ल और लवण ये तीन रस आग्नेय है। मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस स्निग्ध और गुरु हैं; तथा कटु, तिक और कपाय ये तीन रस रूक्ष और लघु है। सौम्य रस शीत और आग्नेय रस उष्ण होते है। तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणो_भाजा, लाघवादुत्प्लवनत्वाच वायोरू ज्वलनत्वाञ्च वह्न, सलिलपृथिव्यात्मकास्तु प्रायेणाधोभाजा, पृथिव्या गुरुत्वान्निनगत्वाञ्चोदकस्य; व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतो. भाजः (च. सू. भ. २६)॥ भूतविशेपकृतं रसानां धर्मान्तरमाह-वत्रेत्यादि । प्रायेणेति न सर्वे । रसा इति रसयुक्तानि द्रव्याणि । प्लवनस्वादिति गतिमत्वात् । यद्यपि गतिरधोऽपि स्यात्, तथाऽपि लघुस्वपरिगतगति रिह वायोरूर्वमेव गमनं करोति; यथा-शाल्मली- तुलानाम् । हेवन्तरमाह-ऊर्ध्वज्वलनवायाग्नेरिति; अग्नेरप्यूर्ध्वगतिस्वादित्यर्थः । निम्नगत्वमधोगस्वमेव (च. द.)। रसानां सामान्यतो गुण-कर्माण्याह-तत्रेति । तत्र तेषु, अग्नि-मारतास्मका अग्नि-वायुगुणभूयिष्ठा रसाः, वावग्निगुणबहुलानि दव्याणीत्यर्थः । प्रायेण न तु सधैं । ऊर्ध्वभाजो भवन्ति अर्ध्वमुत्तिष्ठन्ति तूलकवद् धूमवच । कस्मात् ? वायोलाघवात् लघुत्वात् तथा उत्प्लवनस्वान्च ऊर्ध्वगतिमत्वाच्च, वरमेश्वोज्वलनत्वात् । लाघवमग्नेरपि योद्धव्यम् । सलिल-पृथिव्यात्मकाः सलिल- पृथियीगुणभूयिष्ठा रसास्तु प्रायेण अधोभागभाजः अधो गच्छन्ति, उपलादिवत् । कुतः ? पृथिव्या गुरुत्वात् , उदकस्य सलिलस्य निम्नगरवात् अधोगामित्वाच । व्यामिश्रात्मकाः पुनः उभयतोभाजः ऊर्ध्वं च अधश्व गच्छन्ति । तदुक्तं सुश्रुते- नापि-"सत्र विरेचनद्रव्याणि पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठानि । पृथिव्यापो गुळ । ता गुरुत्वादधो गच्छन्ति । तसाद्विरेचनमधोगुणभूयिष्ठमनुमानात् । वमनद्रव्याण्यनि- वायुगुणभूयिष्ठानि । अग्नि-वायू हि लघू । लघुत्वाच्य तान्यूर्वमुत्तिष्ठन्ति । तस्माद्व- मनमूर्ध्वगुणभूयिष्ठम् । उभयगुणभूयिष्ठमुभयतोभागम" (सु. सू. अ. ४१) इति (यो.)॥
। द्रव्यगुणविज्ञानम् । अग्नि और वायुकी अधिकतावाले रस प्राय• ऊपरकी तरफ गति करनेवाले (वमना- दिसे दोषको निकालनेवाले) होते हैं। क्योंकि वायु लघु और ऊपरकी भोर गति करने- वाला है तथा अग्नि ऊर्ध्वज्वलन खभाववाला है। जल और पृथिवीकी अधिकतावाले रस प्राय नीचेकी ओर गति करनेवाले (मल-मूत्रादिका विरेचन करानेवाले) होते हैं; क्योंकि जल खभावसे नीचेकी ओर गति करनेवाला और पृथिवी गुरु होनेसे नीचेकी ओर गति करनेवाली होती है । जो रस ऊपर कहे हुए दोनों प्रकारोंवाले होते हैं, वे उभयतोभाग (वमन और विरेचन दोनों करानेवाले) होते हैं। पड्सविज्ञानम्- पण्णां रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम् ॥ स्नेहन-प्रीणनाबाद-मार्दवैरुपलभ्यते । मुखस्थो मधुरश्चास्यं व्यामुवेल्लिम्पतीव च ॥ दन्तहर्षान्मुखास्रावात् स्वेदनान्सुखवोधनात् । विदाहाञ्चास्यकण्ठस्य प्राश्यैवाम्लं रसं वदेत् ॥ प्रलीयन् क्लेद-विष्यन्द-मार्दवं कुरुते मुखे । यः शीघ्रं लवणो शेयः स विदाहान्मुखस्य च ॥ संवेजयेद्यो रसनं निपाते तुदतीव च । विदहन्मुख-नासाक्षिसंनावी स कटुः स्मृतः॥ प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं खदते न च । स तिक्तो मुखवैशद्य-शोष-प्रह्लादकारकः ॥ वैशद्य-स्तम्भ-जाड्यैर्यो रसनं योजयेद्सः। बनातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ (च. सू अ. २६)। विज्ञायतेऽनेनेति विज्ञानं लक्षणमित्यर्थः । प्रलीयनिति विलीनो भवन् । संसावयतीति संत्रावी । विकासीति हृदयविकसनशीला, उक्तं हि सुश्रुते- "हृदयं पीडयति" (सु. सू. म. ४२) इति (च. द.)। प्रीणन प्रसादन- मिन्द्रियाणाम् । सुखस्य बोधनं शोधन-क्षालनं, तस्मात् मुखबोधनात् । विष्यन्दः रसस्रुतिः । यो रसो निपाते रसनायोगे सति रसनं रसनानं संवेजयेत् उद्वेजयति, विदहन देहं तुदतीव, मुखं नासे अक्षिणी च तत् संसावयतीति मुख-नासाक्षि- संस्रावी, स कटुः स्मृतः । यो रसो निपाते रसनं रसनेन्द्रियं प्रतिहन्ति अन्यरस- ग्रहणशक्किं नाशयतीत्यर्थः, न च स्वदते, मुखस्य वैशथ-शोप-प्रह्लादकारकश्च, स तिक्तः स्मृतः । वैशचं स्तम्भो जाड्यं च । कण्ठं बध्नाति रुणद्धीव (यो.)॥ १ प्रलीयन्निति रसनेन्द्रियसवन्धादेव विलीनो भवतीत्यर्थः । २ "विकासी धातना हिंसक तदुक्त-"विकासी विकसन् धातून" इति; अन्ये तु 'इत्पीडाजनक इत्याहुः" इति शिवदाससेनः । ( ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १४९ रसलक्षणमत ऊर्ध्व वक्ष्यामः-तत्र, यः परितोषमुत्पादयति, प्रहादयति, तर्पयति, जीवयति, मुखोपलेपं जनयति, श्लेष्माणं चाभि- वर्धयति, समधुरः; यो दन्तहर्षमुत्पादयति, मुखानावं जनयति, श्रद्धां चोत्पादयति, सोऽम्ल:; यो भक्तरुचिमुत्पादयति, कफप्रसेकं जनयति, मार्दवं चापादयति, स लवणः, यो जिहानं बाधते, उद्वेगं जनयति, शिरोगृहीते, नासिकांचनावयति,स कटुका,योगले चोपमुत्पादयति, मुखवैशधं जनयति, भक्तरुचिं चापादयति हर्ष च, स तिक्तः यो वर्क परिशोषयति, जिहां स्तम्भयति, कण्टं वध्नाति, हदयं कर्षति पीडयति च, स कषाय इति (सु. सू. अ. ४२) ॥ परितोपः परितुष्टिः । प्रहादयति सुसमुत्पादयति । तर्पयति तृप्तिं करोति । जीवयति प्राणान् धारयति । उपलेपः मलवृद्धिः । दन्तहर्पः दन्तकुण्ठता । कफप्रसेकः श्लेष्मानावः । शिरो गृहीते उद्वेजकग्वेन, न तु कफ-वातवेदनाभिः । चोप आकर्पणम् । हो रोमहर्पः (ड.)। परितोपं भोजनकाले भानन्दम् । प्रहादयति भोजनायोपनीत एव सुखमुत्पादयति । तर्पयति अभ्यवहृतस्तृप्तिमापा- दयति, अम्लेतरेपा भोजनेच्छां निवारयतीति यावत् । चोपं चूपणवद्वेदनाविशेपम् । हर्ष दाह-तृष्णाप्रशमनेन संतोपम् (हा.) ॥ तेपां स्वादुरावाद्यमानो मुखमुपलिम्पति, इन्द्रियाणि प्रसादयति, देहं प्रह्लादयति, पट्पद-पिपीलिकादीनामभीष्टतमः, अम्लस्तु जिह्वामुढे- जयति, उरकण्ठं विदहति, मुखं नावयति, अक्षिध्रुवं संकोचयति, दशनान् हर्पयति रोमाणि च; लवणो मुखं विष्यन्दयति, कण्ठकपोलं विदहति, अन्नं प्ररोचयति; तिक्तो विशदयति वदनं, विशोधयति कण्ठं, प्रतिहन्ति रसनां; कटुको भृशमुद्धेजयति जिह्वाग्रं, चिमचिमा- यति कण्ठकपोलं, नावयति मुखाक्षिनासिकं, विदहति देह; कषायस्तु जड़यति जिहां, वनाति कण्ठं, पीडयति हृदयम् ( अ. स. सू. अ. १८)॥ ननु केन रूपेण रसविशेपो विज्ञायते ? अत आह-तेपामित्यादि । तेषां रसानां मध्ये यो रसो मुखलेपादिकरः स स्वादुरिति विज्ञेयः । आस्वायमानो जिदया संयोग नीयमानः । आस्वाधमान इति सर्वरसानां योज्यम् । प्रह्लादनः आश्वासकरः । मम्लरसो जिद्बोद्वेजनादिस्वरूप.,, उरसि कण्ठे च विदाहं करोति । लवणो मुखमन्त- विप्यन्दयति नावयति, कण्टे कपोलयोश्च विदाह करोति, भन्ने च रुचिमुत्पादयति । तिको मुखवैशद्यादिकरणस्वरूपः । वैशद्य पैच्छिल्यनाशः । कण्ठं चोपलेपनाशनेन शोधयति, रसनं रसनेन्द्रियं प्रतिहन्ति अन्यरसग्रहणशक्किं नाशयतीत्यर्थः । कटुक भास्वाथमानो भृशमत्यर्थमुद्वेजयति जिदाने उद्वेगं करोतीत्यर्थः, कण्ठे कपोलयोश्च 1 1 १५० द्रव्यगुणविज्ञानम् । तैपण्याचिमचिमायनमग्निज्वालासंस्पर्शादिव करोति, मुसादिकं विसापयति, सकले च शरीरे विदाहं करोति । कपायो जिहां जढयति रसनादिक्रियासु मन्दीकरोति, `कण्ठपन्धं श्वासादीनामयथाप्रवृत्तिमिव करोति (इन्दुः) । तेषां विद्याद्रसं स्वादु यो वक्रमनुलिम्पति । आस्वाद्यमानो देहस्य हादनोऽक्षप्रसादनः ॥ प्रियः पिपीलिकादीनामम्लः क्षालयते मुसम् । हर्पणो रोम-दन्तानामक्षि-भ्रुवनिकोचनः ॥ लवणः स्यन्दयत्यास्यं कपोल-गलदाहछत् । तितो विशदयत्यास्यं रसनं प्रतिहन्ति च ॥ उडेजयति जिहाग्रं कुर्वश्चिमचिमां कटुः । स्रावयत्यक्षि-नासास्यं कपोलौ दहतीव च ॥ कपायो जडयेजितां कण्ठस्नोतोविबन्धकृत् । (अ.ह. सू. अ. १०) ननु, स्वलक्षणं विनाऽनुक्तो रसविशेषः कथं ज्ञायताम् ? इति तल्लक्षणार्यमा तेपामित्यादि । तेषां रसानां मध्ये य आस्वाद्यमानो वक्रमनुलिम्पति मुखोपदे जनयति, तथा देहस्य ह्रादन. भाश्वासकः, तथाऽक्षाणामिन्द्रियाणां प्रसादनः प्रसन्नत्वकृत् , तथा पिपीलिकादीनां प्रियः; एते तद्दर्शयति-प्रमेहादिपु मूत्रत्वगादी पिपीलिकोपसर्पणान्माधुर्यानुमानं कृत्वा मधुमेहत्वादि ज्ञायते । इत्युत्तरापि योज्यम् । भम्लो रस मास्वाधमानो मुसं क्षालयते सावयति, तथा रोम-दन्तानां हर्पणः "हपु गलीके" अलीककारी, उद्वेजक इत्यर्थः; तथा अक्षि- श्रुवनिकोचनः अक्षिणी च ध्रुवौ चाक्षिभ्रुवम्, अचतुरादिसूने निपातितम् । लवणो रसो मुखं स्यन्दयति, तथा कपोलयोर्गले च दाहं करोति; अनस्य रोचन इती- हातिप्रसिद्धत्वानोक्त, संग्रहे तु स्पष्टार्थमुक्तम् । यथा-"कण्ठकपोलं विदहति, अझ प्ररोचयति" (भ. सं सू. भ. १८) इति । तिक्तो मुखं विशदयति अपच्छित्ययुक्त करोति, रसनां प्रतिहन्ति जिह्वां कुण्ठति, रसनेन्द्रियं च प्रतिहन्ति भन्यरसग्रहण- शाकिं नाशयतीत्यर्थः । कटुरावाद्यमानो जिह्वानमुद्वेजयति सोद्वेग करोति, धिमचिमा कुर्वन् दहनज्वालासंस्पर्शादिवाक्ष्यादि स्रावयति, गण्टौ च दहतीव । कषायो जिहां जत्यति रसनादिक्रियायां मन्दीकरोति, तथा कण्ठस्य स्रोतासि सिराविशेषास्तेषां विवन्धं करोति श्वासादीनामयथाप्रवृत्तिमिव कुरुत इत्यर्थः (अ. द.)। उपलिम्पति पिच्छिलादिगुणसाहचर्यात् । देहस्य द्वादनः प्रियतमत्वात् सर्वशरीराप्यायनः । भक्षप्रसादनः इन्द्रियवैमल्यकरः । क्षालयते प्रक्षालयते । रोमहर्पणः रोमासकृत् । दन्तहर्पणः दन्तकार्याक्षमत्वकृत् । अक्षि-भ्रुवनिकोचनः भक्ष्णोः ध्रुवोश्च संकोचकः । कटुलक्षणे अग्रग्रहणं संबन्धमान एवोद्वेजकत्वात् । बिमचिमा सर्पपलिस इव आस्वायमान पूर्वाध रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १५१ दुःखानुभवम् । जरयेत् सम्भयेत् । कण्ठसंवन्धिनां स्रोतसां विवन्धमवरोध करोति (हे.)॥ लिई पुनर्मधुरस्य हादन, श्लेष्मजननं, कण्ठतर्पण च वृधत्वं, दन्तहर्षः, प्रस्रावणं, प्रक्लेदनं, चाम्लस्य; लवणस्य विसरणम्, उष्णत्वं प्रसेचनं च; कटोर्जिहाघ्राणवाधः, उद्वेगो, नासानावः, शिरोग्रहश्च तिक्तस्य हर्पणं, हरिमता, शैत्यमास्यस्य, गलद्वारशोपणं च; कपायस्य मुखपरिशोपः, श्लेप्मसंवृत्तिः, गौरवं, स्तम्भश्च (र. वै. अ. ३, सू, १८)। लिङ्गं पुनर्पक्ष्यते । पुनःशब्दो वाक्यालकारार्थः । मधुरस्य लिङ्गमित्यर्थः। हादनं हर्पणं प्रीणनमिति, श्लेष्मजननं चेति कण्टे । एतेनास्वादकाल एवोपलभ्यानीमानि,, न फलकाल इत्युकं भवति । मुसस्थानामेतानि हि रसानां लिङ्गानि, भास्वादस्य प्रत्यक्षागोचरस्य वक्तुमशक्यस्वात् । कण्ठतर्पणं कण्ठस्य पूरणभावं जनयति । हयस्वादि अग्लस्य मुसस्थस्य लिगानि भवन्ति । हृघरवं हृदयप्रीणनस्वम् । दन्तहपः दन्तानां भक्षणेऽसामर्थ्यम् । प्रस्रावणम् आस्यस्य प्रभूतोदकस्वम् । प्रक्लेदः शुष्कगल- कण्ठस्थापि । अथवा प्रस्तावणमन्यस्याम्लभक्षणं दृष्ट्वा लक्षणस्वम् । लवणस्य लिलानि विसरणं सर्वास्यव्याप्तिरिति, उष्णत्वमास्ये, प्रसेचनं मुखस्थानावप्रायवं, चशग्दः समुद्ययार्थः । जिहादाहादयश्च कटोलिङ्गानि । जिवाघ्राणवाधो जिह्वामस्योपाभावः। उद्वेगः प्रतिकूलता । नासानावः नासाया उदकानावः । तेण्याच्छिरोग्रहः शिरो- रुजा । तिक्तस्य हपंणमित्यादि तिकस्य लिगानि । हरिमता हरिमगन्धता गलसंधिमा- श्रित्य । शैत्यमास्यस्य । गलद्वारस्य शोपणं कण्ठविलस्येत्यर्थः । मुखपरिशोषः मुखस्य परिशोपः समन्ताच्छुकता । श्लेष्मसंवृत्तिः श्लेष्मणः संवृत्तिः धनता । गौरवं मुखस्य । स्तम्भो जिह्वायाः सुखपरिस्पन्दनाभावः, कपायस्य लिगानि । एवं पपणा लिङ्गान्युक्तानि, पट्त्वं च (भाष्यम् ) । रसोंका ज्ञान द्रव्यका जिह्वाके साथ सबन्ध होते ही होता है, यह आगे कहा जायगा। यहाँ निपातकालमें प्रत्येक रसकी खादग्रहणके अतिरिक्त अन्य मी जो विशेष क्रियाएँ होती है, जिनसे वह रस अव्यक्त-अस्पष्ट-होनेपर भी उसका ज्ञान होता है, वे कही जाती है । मधुर रस मुखमें जाते ही सारे मुखमें व्याप्त होता है और मुखको लिप्तसा कर देता हैनेहन, सब इन्द्रियोंकी प्रसन्नता, आहाद (सुख), मृदुता (च.), भोजनकालमें आनन्द और तृप्ति उत्पन्न करता है, मूछितको सज्ञाप्रदान करता है, कफको बढाता है (सु), भारों और चींटियोंको अत्यंत प्रिय (अ.सं.) तथा कण्ठ- को तृप्त करनेवाला है (र. वै.)। इन लक्षणोंसे मधुर रस जानना चाहिए । अम्ल रस खाते ही दन्तहर्ष, मुखमै लालास्राव, शरीरमें खेद, मुखकी शुद्धि, मुख और कण्ठका विदाह (च.), अन्न खानेके प्रति रुचि (सु.), जिह्वाका उत्तेजन, छाती और कण्ठका द्रव्यगुणविज्ञानम् । (र. विदाह; नेत्र और भौंहोंका संकोच, रोमाञ्च (थ. सं.) और प्लेदन करता है तथा हृदय(मन )को प्रिय है (र. वै.) । इन लक्षणों(कमा )मे अम्ल रसरा भान करना चाहिए । लवण रस खाते ही मुसमें घुल जाता है तथा लेद, लालालाय, मृदुता, मुसमें 'विदाह (च.), अन्नपर रुचि, कफका स्राव (सु.), और चण्ठ तथा कपोलमें जलन करता है (अ. सं.), सारे मुखमे शीघ्र फैल जाता है और उय्णता उत्पन करता है र. वै.)। इन लक्षणोसे लवण रस पहचाना जाता है। क्टु रस जीभपर लगते ही जीभम उद्वेग, सुई चुभनेकीसी वेदना, निदाहके साथ मुसनासिका और नेनमें स्राव (च.), सिरमें वेदना (सु.), कण्ठ और पोलोंगे चिमचिमाहट और मनपर रुचि (अ. सं.) उत्पन्न करता है । इन लक्षणोंसे कटु रस जानना चाहिए । ति क रस जीभपर रखते ही जीभकी अन्य रसोंके प्रहणकी शकिरा नाश करता है, जीभको अप्रिय लगता है, मुखमे खच्छता लाता है, मुसशोप, ग्रहाद (अरुचिनाश ) (च.), गलेमें कोई खेचता हो ऐसी पीढा, अनपर रुचि तथा रोमहर्प उत्पन्न करता है (सु.) और कण्ठको शुद्ध करता है (अ.सं.) मुंहमें ठण्डापन लाता है और गलेको सुखाता है (र. वै.)। इन लक्षणोंसे तिक्त रस जानना चाहिए । कपाय रस जितामें विशदता, स्तब्धता और जडता उत्पन्न करता है, कण्ठको जकड़तासा है (च.), मुखको सुखाता है, हृदयमें खींचनेकीसी पीडा करता है (सु.), मुखके कफ (लाला)को गाढ़ा करता है और मुखमें भारीपन लाता है (र.चे.)। इन लक्षणोंसे कषाय रसको जानना चाहिए। आस्वाद्यमानस्य द्रव्यस्य रस. कदा उपलभ्यते ? रसो निपाते द्रव्याणांxxxxx। (च. सू. म. २६) रसादीनामेकद्रव्यनिविष्टानां भेदेन ज्ञानार्थ लक्षणमाह-सो निपाव इत्यादि । निपाते इति रसनायोगे । x x x द्रव्याणामिति उपयुज्यमानद्रव्याणाम् (च. द.)। रस-वीर्य-विपाकानामेकद्रव्ये सह वसतां भेदेन ज्ञानार्धमाह-रस इत्यादि । द्रव्याणां निपाते रसनायोगे जिह्वास्पर्शमात्रेण, रसः मधुरादिः, उपलभ्यते (यो.)। यद्येवं व्याणां स्वभावो वीर्य, गुणाश्च रसादयः सर्वाणि वीर्याणि, तत् कधं रसादीनां भेद उपलभ्यत इत्यत उच्यते-रसो निपात इत्यादि । द्रव्याणामभ्यवहियमाणानां मुखे रसनायां निपाते रसो मधुरादिरुपलभ्यते, नतु सर्व वीर्यम् (ग.)॥ रसं विद्यानिपातेन xxxxx। (अ. स. सू. भ. १७) रसादीनां द्रव्यस्थितानां स्वरूपविशेपः कथं ज्ञायत इत्याह-रसमित्यादि । निपातेन जिह्वास्पर्शमात्रेण रसविशेपं विद्याव्यस्य (इन्दुः)॥ खाये जानेवाले द्रव्यका जीभके ऊपर स्पर्श होते ही मधुरादि रसविशेषका ज्ञान होता है।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १५३ प्रीणनो, २ रसानां गुणकर्माणि- तेपां पण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुण-कर्माण्यनुव्याख्यास्यामः। तत्र मधुरो रसः शरीरसात्म्याद्रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मजौजः- शुक्राभिवर्धन, आयुष्यः, पडिन्द्रियप्रसादनो, वलवर्णकरः, पित्त-विष. मारुतघ्नः, तृष्णा-दाह-प्रशमनः, त्वच्यः, केश्यः, कण्ट्यो, वल्यः, जीवनः, तर्पणो, हणः, स्थैर्यकरः, क्षीणक्षतसंधानकरो, घ्राण-मुख- कण्ठोष्ठ-जिह्वाप्रह्लादनो, दाह-मूर्छाप्रशमनः, षट्पद-पिपीलिकानामिष्ट- तमः, स्निग्धः, शीनो, गुरुश्च; स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्य- मानः स्थौल्यं, मार्दवम् , आलस्यम् , अतिस्वप्नं, गौरवम् , अनन्ना- भिलाषम् , अग्नेविल्यम् , आस्यकण्ठयोर्मासाभिवृद्धि, श्वास-कास- प्रतिश्यायालसक-शीतज्वरानाहास्यमाधुर्य-वमथु-संज्ञाखरप्रणाश-गल- गण्ड-गण्डमाला-ल्लीपालशोफ-वस्तिधमनीगलोपलेपाक्ष्यामया- भिष्यन्दानित्येवंप्रभृतीन कफजान् विकारानुपजनयति । अम्लो रसो भकं रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृहयति, ऊर्जयति, मनो वोधयति, इन्द्रियाणि दृढीकरोति, वलं वर्धयति, वातमनुलोम- यति, हृदयं तर्पयति, आस्यमानावयति, भुक्तमपकर्पयति क्लेदयति जरयति, प्रीणयति, लघुः, उष्णः, स्निग्धश्च;' स एवंगुणोऽप्येक एवा- त्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति, तर्पयति, संमीलयत्यक्षिणी, संवे. जयति लोमानि, कर्फ विलाययति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति, मांसं विदहति, कायं शिथिलीकरोति, क्षीण-क्षत-कृश-दुर्वलानां श्वयथु- मापादयति, अपि च क्षताभिहत-दष्ट-दग्ध-भन्न-शून-प्रच्युतावमूत्रित- परिसर्पित-मर्दित-च्छिन्न-भिन्न-विश्लिष्टोद्विद्धोपिष्टादीनि पाचयत्याग्नेय. स्वभावात्, परिदहति कण्ठमुरो हृदयं च । लवणो रसः पाचनः, क्लेदनो, १ प्रसादन.' इति, पा० । २ "ह हि मूर्छामिभूतानां सघो जीवनरक्षण जीवनम् , आयुष्यत्व कालप्रकणायुपो, हितत्वम् । मधुररससमानाधिकरणाः लिग्धादयस्त्रयो गुणाः, रसादिवर्धनानि च कर्माणि । अभिष्यन्दो मुखनासादिस्राव., न तु नेत्राभिष्यन्दो नाम रोग., अध्यामयवचनेन तस्योक्तत्वात् ।" इति गङ्गाधर. । ३ "ऊर्जयति सन्यासादिभिरचेतनस्य मनःप्रवोधनपूर्वकजीवनं स्थापयति । मनो वोधयति मूर्छादिमिरचेतन मनो वोधयति, इन्द्रियाणि दश दृढीकरोति । वल च वर्धयति पार्थिवत्वात् । वातमनुलोमयति पार्थिवत्वेन गुरुत्वात् । हृदय तर्पयति हृदयस्थमनस्तर्पकत्वात् ।' आस्यमानावयति आग्नेयत्वेन तीक्ष्णत्वात् । अम्लो रसो लघुरुष्ण स्निग्धश्च लघूष्ण-स्निग्धसमानाधिकरण', लघ्वादयस्त्रयो गुणा अम्लरसे द्रव्ये वर्तन्ते (एवमन्यत्रापि रसगुणवर्णने व्याख्येयम्) । अक्षिणी संमीलयति मुद्रीकरोति । रोमाणि संवीजयति उद्गमयति । इत्यम्लरसातियोगनिमित्त कर्म । समान-हीन-मिथ्यायोगेभ्यस्तु नैवं, न वा रसान्तरसहितोपयोगाचेति । एवमुत्तरत्रापि व्याख्येयम् ।" इति गङ्गाधरः । -- -- -- , १५४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । दीपनः, च्यावनः,छेदनो, मेदनः, तीक्ष्णः, सरो, विकासी, अधः(य)वंसी, अवकाशकरो, वातहरः, स्तम्भ-वन्ध-संघातविधमनः, सर्वरसप्रत्यनीक- भूतः, आस्यमास्रावयति, कर्फ विष्यन्दयति, मार्गान् विशोधयति, सर्वशरीरावयवान् मृदूकरोति, रोचयत्याहारम् , आहारयोगी, नात्यर्थ गुरुः, स्निग्धः, उष्णश्च, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्य- मानः पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्पयति, मूर्च्छयति, तापयति, दारयति, कुष्णाति मांसानि, प्रगालयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति, दन्तांच्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्यु. परुणद्धि, वलि-पलित खालित्यमापादयति, अपि च लोहितपित्ताम्ल- पित्त-वीसर्प-वातरक्त-विचर्चिकेन्द्रलुप्तप्रभृतीन विकारानुपजनयेति । कटुको रसो वक्त्रं शोधयति, अग्नि दीपयति, भुक्तं शोपयति, प्राण- मानावयति, चक्षुर्विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसक-श्वयधू- पचयोदर्दाभिप्यन्द-स्नेह-स्वेद-केद-मलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं, कण्ड: विनाशयति, व्रणानवसादयति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसंघातं भिनत्ति, वन्धांश्छिनत्ति, मार्गान् विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुः, उष्णो, रूक्षश्च, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्य. मानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति, रस-वीर्यप्रभावान्मोहयति, ग्लपयति, सादयति, कर्शयति, मूर्छयति, नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति, वलं क्षिणोति, तृष्णां जनयति; अपि च वाय्वग्निगुणवाहुल्याश्रम-दवधु-कम्प-तोद- मेदैश्चरण-भुज-पीलु-पार्श्व-पृष्ठप्रभृतिषु मारुतजान् विकारानुपजनयति । तिक्तो रसः स्वयमरोचिष्णुरप्यरोचकनो, विषन्तः, कृमिघ्नो, मूछा- दाह-कण्डू-कुष्ठ-तृष्णाप्रशमनः, त्वमांसयोः स्थिरीकरणो, ज्वरमो, १ "च्यवन. सावकर.। अवकाशकर. सावादिकरणादाकाशाशप्रकाशकर. । आहारयोगी माहारद्रव्यसस्कारकरत्वेन उपयोगशील । मूर्च्छयति तमः प्रवेशयति । मांसानि फुष्णाति हिनस्ति । विषं भुक्त शरीरस्य वर्धयति । खालित्य केशोन्मूलीभाव., नेन्द्रलुप्त नाम । मम्लपित्तं तु अष्टोदरीये यद्यपि नोक, तथाऽपि महारोगाध्याये पित्तन्याधिष्ववगन्तव्यम् ।" इति गङ्गाधरः । २ "वक शोधयति मुखगतछेद छेदयति । घाण घाणेन्द्रियाधिष्ठानम् । प्रणान् भवसादयति अंवसन्नान् करोति । मोहयति रस-वीर्यप्रभावात् कटरसप्रभावाद् ल्क्षोष्णप्रभावाच । कडरसस कटविपाक , तत्प्रभावात् पुंस्त्वोपघाती, न तु रसप्रभावाद्वीर्यप्रभावाद्वा । कणाशुण्ठ्योहिं रसतः क्डत्वेऽपि विपाकतो माधुर्यादृष्यत्वम् । सर्वत्रैव विपाकप्रमावाद् वृष्यत्वावृष्यत्वमवधार्यम् । कर्षति शरीरधातूनपकृष्टान् करोति । मूर्च्छयति अन्धकारमिव दर्शयंश्चेतो हरति । पील इस्ततलम् ।" ~ - -- । इति गङ्गाधरः ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः। १५५ दीपनः, पाचनः, स्तन्यशोधनो, लेखनः, क्लेद-मेदो-घसा-मज-लसीका. पूर्य-खेद-मूत्र-पुरीष-पित्त-श्लेष्मोपशोषणो, रूक्षः, शीतो, लघुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो रोक्ष्यात् खर-विशदस्वभावाय रस-रुधिर-मांस-मेदो-ऽस्थि मज-शुक्राण्युच्छोषयति, स्रोतसां खरत्व- मापादयति, बलमादत्ते, कर्शयति, ग्लपयति, मोहयति, भ्रमयति, वदनमुपशोषयति, अपरांश्च वातविकारानुपजनयति । कषायो रसः संशमनः, संग्राही, संधानकरः, पीडनो, रोपणः, शोपणः, स्तम्भनः, श्लेष्म-रक्त-पित्तप्रशमनः, शरीरक्लेदस्योपयोक्ता, रूक्षः, शीतोऽलघुश्च स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं शोपयति, हृदयं पीडयति, उदरमाध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यववध्नाति, श्यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरा गच्छति, वात- भूत्र-पुरीष-रेतांस्यवगृह्णाति, कर्शयति, ग्लपयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खर-विशद-रूक्षत्वात् पक्षवधग्रहापतानकार्दितप्रभृतींश्च वातविका- रानुपजनयति । इत्येवमेते पड्रसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रश: सम्यगुपयुज्यमाना उपकाराय भवन्त्यध्यात्मलोकस्य, अपकारकरा: पुनरतोऽन्यथा भवन्त्युपयुज्यमानाः; तान् विद्वानुपकारार्थमेव मात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति (च, सू. अ. २६) । यथाद्रव्यमिति यद्यस्य रसस्य द्रव्यमाधारसदनतिक्रमेण । एतेन रसानां गुण-कर्मणी रसाधारे द्रव्ये वोद्धव्ये इति दर्शयति । तनेत्यादि । मधुर भादावुच्यते प्रशस्ता- युप्यादिगुणतया प्रायः प्राणिप्रियतया च । पडिन्द्रियाणि मनसा समम् । जीवना अभिघातादिमूछितस्य जीवनः । आयुष्यस्तु आयु.प्रकर्षकारित्वेन । क्षीणस्य क्षत- संधानकरो धातुपोषकत्वेन; किंवा क्षीणश्वासौ क्षतश्चेति, तेन क्षीणक्षतस्य उरःक्षतं संदधाति । पदपदावभीष्टत्वकथनं प्रमेहपूर्वरूपादिज्ञानोपयुक्तम् । यदुकं-"मूत्रे अभिधावन्ति पिपीलिकाच" (च. वि. अ. ६) इति, तथाऽरिष्टे वक्ष्यति- "यस्मिन् गृान्ति भक्षिकाः" (च. इ. भ. ५) इति, अनेन च मधुरत्वं ज्ञायते । भक्ष्यामयेनैवाभिष्यन्दे लब्धे विशेषोपादानार्थं पुनर्वचनं; किवा अभिष्यन्दो नासादिष्वपि ज्ञेयः । हृदयं तर्पयति हृद्यो भवति । भुक्तमपकर्षयतीति सारयति केदयति तथा जरयति भुक्तमेव । अवमूत्रितं मूत्रविषैर्जन्तुभिः, परिसर्पितं च स्पर्श विशेषैः कारण्डादिभिः । विकासी क्लेदच्छेदनः । अवलंसी विष्यन्दनशीलः । १ "शरीरस्थविपन्न क्रिमितश्च । खर-विशदस्वभावाच्च खर-विशदसहावस्थानस्वभावाच्च पुन. रसादीन्युपशोषयति, ततश्च स्रोतसा खरत्वमुपपादयति ।" इति गङ्गाधरः । ३ "संग्राही चलद्वधातुसंक्षेपकारी । सन्धारणः चलस्तम्मनकारी । स्तम्भन. चलता स्खलता वा भावाना स्थिरीकरण. " इति गङ्गाधरः । - -- प्रभाव: १५८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । ग्लासवः शिथिलमांसशोणिता अपरिलेशसहाय भवति । ये पतिलवण- सारम्याः पुरुषास्तेपामपि सालित्य पालिस्यानि तथा वलयश्चाकाले भवन्ति" च. वि. अ. १) इति ।xxx। वक्र मुसं शोधयति क्षालयति रसनावात् । भुक्तमान शोपयति । चक्षुविरेचयति नापयति । मुख-नासाक्षिसंसायीति इग्नि- याणि स्फुटीकरोति इन्द्रियपाटवं जनयति । भलसकम् भामदोषः, श्वयः, उपचयः स्थौल्यम् xxx अभिप्यन्दः दोपधातुमलस्रोतसां सेदीभाषः, नेहः शरीरस्य स्निग्धस्वं, स्वेदः, क्लेदः, मलश्च, तान् उपहन्ति । अशनमाहार रोचयति । कम् विलालयति उपशमयति । बणान् भवसादयति रोपयतीत्यर्थ. । मांस विलिसति विलेखनम् ईपर्मविदारणम् । शोणितसंघात भिनत्ति द्रवीकरणात् । पन्धान् संधिवन्धान छिनत्ति विश्लेपयति । मार्गान् स्रोतांसि विवृणोति प्रसारयति । स कटुकः । विपाकस्य प्रभावात् कटुरसस्य विपाकः कटुः, "कटु-तिस-पाया विपाकः प्रायशः कटुः" (च. सू. अ. २६) इति । विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति शुक्रक्षयं करोति, कटुविपाकस्य शुक्रनाशनत्वात ; "शुभहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटु." (च. सू. भ. २६) इति । रमस्य चीर्यस्य च तसात् । xxx । सादयति अवसादयति । कर्शयति कार्यमापादयति । नमयति शरीरम् । तमयति, क्लमयति, भ्रमयति, चावनिगुणयाहुल्यात् ; अमः चक्रारुढस्येव । मदः अपसारपूर्वरूपं हर्पक्षयो वा । दवथु. दाहः, कम्पः, वोदः सूचीभिरिव व्यधनं, भेदश्च, तैः; वाय्वनिगुणवाहुल्यात् भ्रमादिकृदित्ययः।xxx। मारुतजान् वातजान् विकारान् उपजनयति, वाय्वग्निगुणाधिक्यात् । x xx। स्वयमरोचिष्णुः स्वयं मुखस्य भरोचनशीलोऽपि, अरोचकं हन्तीति अरोचकरः । मूर्छादीनां प्रशमनः । त्वासयोः स्थिरीकरणः स्थर्यकृत् । क्लेदादीनामुपशोषणः । xx। स तिक्तः । रौक्ष्यात् रूक्षत्वात् खर-विशदस्वभावस्वाप्य रसादीन् धादन उपशोपयति । स्रोतसां मार्गाणां खरस्वमुपपादयति । वलमादत्ते क्षिणोति । धाद नामुपशोषणः । स्रोतसां खरत्वं, वलक्षय-कर्शनादीनि च, एते हि वातजा विकारा। अन्यांश्च वातविकारान् पक्षवध-शुलापतानकार्दितप्रमृतीन् उपजनयति ।xxx। संग्राही मलविबन्धकृत् । संधानकरो भग्नस्य । पीडनो हृदयस्य व्रणस्य वा, वात- कारित्वात् । रोपणो व्रणस्य । श्लेष्मादीना प्रशमनः । शरीरलेदस्स उपयोक्ता उपशोषणः । स कषायः । आत्यं मुखं शोपयति । वाचं निगृहाति, वाडिग्रहो वाक्संगः । स्रोतांसि भवबनाति रुणद्धि । श्यावस्वं श्याववर्णस्वमापादयति, वात- कारित्वात् । विष्टभ्य जरां गच्छति जीर्यति; सवावतोदशूला मलस्याप्रवृत्तिः विष्टम्भः । खर-विशद-रुक्षत्वात् पक्षवधादीन् पातविकारान् उपजनयति Ixxx॥ (यो.)॥
तथा पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १५९ रसगुणानंत ऊर्ध्व वक्ष्यामः-तत्र, मधुरो रसो रस-रक्त-मांस- मेदोऽस्थि-मजौजा-शुक्र-स्तन्यवर्धनः, चक्षुष्यः, केश्यो, वर्यो, यलकृत्, संधानः, शोणितरसप्रसादनो, बाल-वृद्ध-क्षतक्षीणहितः, पट्रपद-पिपी. लिकानामिटतमः, तृष्णा-मूर्छा-दाहप्रशमनः, पडिन्द्रियप्रसादनः, कृमि-कफकरश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेव्यमानः कास- श्वासालसक-वमथु-वदनमाधुर्य-खरोपघात-कृमि-गलगण्डानापादयति, .. तथाऽवुद-श्लीपद-वस्तिगुदोपलेपाभिप्यन्दप्रभृतीञ्जनयति । अम्लो जरणः, पाचनो, दीपनः, पवननिग्रहणः, अनुलोमन , कोप्टविदाही, चहि शीतः, क्लेदनः, प्रायशो हृद्यश्चेति स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थ- मुपसेव्यमानो दन्तहर्प-नयनसंमीलन-रोमसंवेजन-कफविलयन-शरीर- शैथिल्यान्यापादयति, क्षताभिहत-दग्ध-दष्ट-भग्न रुग्ण-शून- प्रच्युतावमूत्रित-विसर्पित-च्छिन्न-भिन्न विद्धोस्पिष्टादीनि पाचयत्याग्नेय- स्वभावात्, परिदहति कण्ठमुरो हृदयं चेति । लवणः संशोधनः, पाचनो, विश्लेपणः, क्लेदनः, शैथिल्यकृत्, उष्णः, सर्वरसप्रत्यनीको, मार्गविशोधनः, सर्वशरीरावयवमार्दवकरश्चेतिः स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेव्यमानो गात्रकण्डू-कोठ-शोफ-वैवर्ण्य-पुंस्त्वोपधातेन्द्रियो- पताप-मुखाक्षिपाक-रक्तपित्त-चातशोणिताम्लीकाप्रभृतीनापादयति । कटुको दीपनः, पाचनो, रोचनः, शोधनः, स्थौल्यालस्य-कफ कृमि- विष-कुष्ठ-कण्हूप्रशमनः, संधिवन्धविच्छेदनः, अवसादनः, स्तन्य-शुक्र- मेदसामुपहन्ता चेतिः स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो भ्रम-मद-गलताल्वोष्ठशोप-दाह-संताप-बल विधात-कम्प-तोद-भेदकृत् कर-चरण-पार्श्व-पृष्ठप्रभृतिषु च वातशूलानापादयति । तितश्छेदनो, रोचनो, दीपना, शोधनः, कण्डू कोठ-तृष्णा-मूर्छा-ज्वरप्रशमनः, स्तन्यशोधनो, विण्मूत्र-क्लेद-मेदो-चसा-पूयोपशोषणश्चेति; स एवं गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो गात्रमन्यास्तम्भाक्षेपकार्दित-शिर:- शूल-भ्रम-तोद-मेद-च्छेदास्यवैरस्यान्यापादयति । कपायः संग्राहको, रोपणा, स्तम्भनः, शोधनो, लेखनः, शोषणः, पीडनः, क्लेदोपशोषण- श्चेति स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो हत्पीडास्यशोषोदरा- ध्मान-वाक्प्रग्रह-मन्यास्तम्भ-गात्रस्फुरण-चुमचुमायनाकुञ्चनाक्षेपण- प्रभृतीजनयति (सु. सू. म. ४२)॥ १ 'रसगुणान् रसधर्मान्' इति चकः । २ 'वहि शीत इति स्पर्शशीतः' इति चक्रः । ३ 'नयनसंमीलनं सर्वदा पिहिताक्षत्वम् इति चक्रः।
१६० द्रव्यगुणविज्ञानम् । रसगुणानित्यादि । पष्टमिन्द्रियं मनः । तस्येदानीमतिसेव्यमानस्यातिसेवा दोप- करी निदर्शयन्नाह-स एवंगुण इत्यादि । अम्लस्य सेवितस्य गुणान् दर्शयबाह- अम्ल इत्यादि । जरण आहारस्य । पाचनो दोपामयोः, व्रणशोथस्य वा । अनुलोमनो वात-मूत्र पुरीषाणाम् । तस्यैकस्यातिसेवितस्य दोपं निर्दिशनाह-स एवंगुण इत्यादि । रोमसंवेजनं रोमाञ्चः । अभिहतम् अभिघातः, दष्टं व्यालादिमिः, भग्नं काण्डभन्नाद्यनेकधा, रुग्ण वक्रीभूतं, प्रच्युतं भ्रष्टं स्वस्थानात् , अवमूत्रितं मूत्र विषाणों जन्तूनां मूत्रसंगः, विसर्पितं स्पर्श विषाणां जन्तूनां विसर्पितसंगः, छिन्नं निःशेषतः, भिन्न कोष्ठादि, विद्धं सिरादि, उत्पिष्टं प्रहारचूर्णितादि ।xxx।संशोधनो वमन- विरेचनाभ्यां, व्रणस्य च दुष्टस्य । विश्लेषण इति पृथकरणः प्रत्यवयवानां, छेदिस्वात् । क्लेदनो व्रणस्य । सर्वरसानां प्रत्यनीको विपक्ष उच्छेदक इत्यर्थः । मार्गविशोधनो मूत्र-नाडीव्रणादिमार्गविशोधनः । कोठः पीडका, पुंस्त्वोपघातः शुक्रायः, इन्द्रि- योपतापः चक्षुरादीनां स्वकर्म-गुणहानिः, अम्लीकेति अम्लोद्गारः । आपादयति करोति । कटुकस्य प्रकृतिकर्म निर्दिशन्नाह-कटुक इत्यादि । अवसादनः . अनुस्साह- कृत् । भ्रम. चक्रारूढस्येव, मद उन्मादपूर्वरूपं, हर्पक्षयो वा।xxx। रोचन इति इतरभक्ष्यवस्तूनां, न पुनः स्वयमेव ।xxx। मन्ये द्वे, तयोः स्तम्भ इति । रोपणो घणस्य । स्तम्भनो गानाणां, मृदूनां वा दृढीकरणः । शोधनो बगस्य । लेखनो व्रणाधुत्सन्नमांसस्य । शोषणो द्वधातोः, व्रणमेहादीनां वा । पीढनो व्रणस्य हृदयस्य वा, वातकारित्वात् ।xxx। चुमचुमायनं राजिकालिप्तस्यैव स्वक्पीडा, भाक्षेपणमतिशयेन कम्पनम् । प्रभृतिग्रहणादन्यानपि वातविकारानर्दितादीन करोति (ड.)॥ तत्र मधुरो रसो जन्मप्रभृतिसात्म्यात् सर्वधातुविवर्धन, आयुष्यो, वाल-वृद्ध-क्षतक्षीण-बल-वर्णन्द्रिय-त्वक्केश-कण्ठहितः, प्रीणनो, बृंहणो, जीवनः, तर्पणः, स्थैर्य-संधान-स्तन्यकरो, वात-पित्त-विष-दाह- मूर्छा- तृष्णाप्रशमनः, स्निग्धः, शीतो, मृदुर्गुरुश्च ॥ एवंगुणोऽपि स सदाऽत्युपयुज्यमानः स्थौल्याग्निसाद-गुरुतालसकातिनिद्राः। श्वास-प्रमेह-गलरोग-विसंज्ञताऽस्य- माधुर्य-लोचनगलाद-गण्डमालाः ॥ छर्युदर्द-मूर्धरुक्कास-पीनस-कृमीन श्लीपद-ज्वरोदर-ष्ठीवनानि चावहेत् ॥ १ 'वहि.शीत इति स्पर्शशीतः । नयनसमीलन सर्वदा पिहिताक्षत्वम् । सर्वरसप्रत्यनीकता लवणस्य लवणयोगे सर्वेषामेव रसानामभिभवादनुभवसिद्धत्वाज्छेया' इति चक्रदत्तः ॥
-- . पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १६१ धम्लोऽनिलनिवर्हणः, अनुलोमनः, कोप्टविदाही, रक्तपिचकृत, उष्णवीर्यः, शीतस्पर्शी, चोधयतीन्द्रियाणि, रोचना, पाचनो, दीपनो, बृहणः, तर्पणः, प्रीणना, क्लेदनो, व्यवायी, लघुः, स्निग्धो, हृयश्च ॥ जनयति शिथिलत्वं सेवितः सोऽति देहे कफविलयन-कण्डू-पाण्डुता-दृग्विघातान् । क्षत-विद्वतविसर्प रक्तपित्तं पिपासां श्वयधुमपि कृशानां तैजसत्वाद् भ्रमं च ॥ लवणः स्तम्भ-वन्ध-संहतिविधमापनः, सर्वरसप्रत्यनीको, दीपनो, रोचनः, पाचनः, क्लेदनः, शोषणः, स्नेहनः, स्वेदनो, मेदनः, छेदनः, सरो, व्यवायी, विकापी, हरति पवनं, विष्यन्दयति कफं, विशोधयति स्रोतांसि, नातिगुरुः, तीक्ष्णोप्णश्च । खलति-पलित-तृष्णा-ताप-मूर्छा-विसर्प- श्वयथु-किटिभ-कोठाक्षेपरोधानपित्तम् । क्षत-विप-मदवृद्धि वातरकं करोति क्षपयति चलमोजः सोऽति वा सेवनेन ॥ तिक्तः स्वयमरोचिष्णुः, अरुचि-विप-कृमि-मूछोत्क्लेद-ज्वर दाह-तृट्- कुष्ठ-कण्डहर, क्लेद-मेदो-चसा-मज-विण्मूब-पित्त-श्लेष्मोपशोषणो, टीपनः, पाचनो, लेखनः, स्तन्य-कण्ठविशोधनो, मेध्यो, नातिरक्षा, शीतो, लघुश्च ॥ धातुवलक्षय-मूछी-ग्लानि-भ्रम-वातरोग-परुपत्वम् । खर-विशद-रौक्ष्यभावैः सोऽतिसमासेवितः कुर्यात् ॥ कटुकोऽलसक-श्वयथूदर्द-स्थौल्याभिष्यन्द-कृमि-चक्ररोग-विष-कुष्ठ- कण्डप्रसाधनो, व्रणावसादनः, स्नेह-क्लेदशोपणो, रोचना, पाचनो, दीपनो, लेखनः, शोधना, शोपयत्यन्नं, स्फुटयतीन्द्रियाणि, मिनत्ति शोणितसंघातं, छिनत्ति वन्धान, विवृणोति स्रोतांसि, क्षपयति श्लेप्माणं, लघु-रूक्ष-तीक्ष्णोष्णश्च ॥ कुरुतेऽतिनिपेवितः स तृष्णा-मद-भूज़-चमि-मोह-देहसादान् । वलशुक्रगलोपशोप-कम्प-भ्रम-ताप-ग्लपनातिकर्शनानि ॥ कर-चरण-पार्श्व-पृष्ठप्रभृतिप्वनिलस्य कोपमतितीवम् । संकोच-तो-मेदवाय्वग्निगुणाधिकत्वेन ॥ कपायो वलासं सपित्तं सरक्तं निहन्त्याशु वनाति वर्षोऽतिरक्षः। गुरुस्त्वक्सवर्णत्वकृत् क्लेदशोषी हिम: प्रीणनो रोपणो लेखनश्च ॥ द्र० पू. ११ १६२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । अत्यभ्यासात् सोऽपि शुक्रोपरोधं तृष्णाध्मान-स्तम्भ-विष्टम्भकार्यम् । स्रोतोवन्धं वात-विण्मूत्रसई पक्षाघाताक्षेपकादींश्च कुर्यात् ।। '(अ. सं. सू. अ. १८) रसानां खरूपमुक्वा वत्र मधुर इत्यादिना कर्म निर्दिशति । तत्र तेषु रसेपु मध्ये, मधुर उपयुक्तो धातूनां रसादीनां सप्तानां वृद्धिकरः । कुतः? आजन्ममारम्याद जन्मनः प्रभृति देहस्य सात्म्यादित्यर्थः । वालभाव एव क्षीरादिना मधुरेण देहवृत्तिः पुरुषस्य । हित इति वालादिभिः संबध्यते । प्रीणनः तुष्टिकरः । जीवन मोजस्यः । एवंगुणोऽपि मधुरो रसः सदैवात्युपयुज्यमानः स्थौल्यादीन् रोगान् कुरुते । यदा स्वतिमात्ररवेन रहितः सदोपयुज्यते तदा सुखकर एव । स्थौल्यादयो रोगाः केचि. द्वक्ष्यमाणलक्षणाः । भर्बुदशब्दस्य लोचन-गलाभ्यां संवन्धः । अम्लोऽनिलनिवहण. स्वादियुक्तः । स चातिसेवितो देहे शैथिल्यादीजनयति । लवणरसः सम्मादीनां विमापनो विनाशकरः । स्तम्भोऽङ्ग-दोषादेः, बन्धः तस्यैव मार्गरोधः । संघातो भावानां निषिढत्वम् । सर्वेषां च शेपाणां रसानामुपलम्मे प्रस्यनीकः प्रतिपक्षः विघातिस्वात् । विष्यन्दयति स्रावयति । नातिगुरु तिस्निग्धश्च । सोऽतिसेवितः खलत्यादीन् करोति, यलादींश्च क्षपयति । तिको रसः स्वयं पुरुपस्यारोचनशीलः, भरुधिं चाहारद्रव्यविषयां नाशयति विपादीश्च, देहे च केदादीनामुपशोषणः । सोऽतिसेवितो धातुक्षयादीन् करोति खरत्वाद्, वैशद्याद्, रोक्ष्याच । कटुको रसोड- उसकादीनां, प्रसाधनो विनाशनः । व्रणस्य चावसादनः रोहणप्रतिबन्धकः । म शोषयति विदहति । सोऽतिनिपेवितस्तृष्णादीन कुरुते । बल-शुक्रयोरुपशोपो हानिः, गठस्य यत्वन्तरुपशुष्कस्वमुपशोपः । करचरणादिष्वनिलस्य वायोः कोपं करोति । फिभूवं ? संकोचादिभिस्तीनं दुःसहम् । एतश्च तृष्णादिकं वाय्वग्निगुणाधिवेन हेतुना करोति । हेतुफीर्तनं देशादिवशाद्धेतोरूनाधिक्येन वत्कार्यस्यापि तथाभावसूचनाय, अन्यत्र घ वढेतुसद्भावे तथैवेति प्रदर्शनाय च । कपायः बलास श्लेष्माण सपिसं सरकं चाशु निहन्ति । वर्चः पुरीष, वनाति रुणद्धि । सोऽप्यत्यभ्यासात् शुक्रो- पघातादीन कुर्यात् (इन्दुः)॥ मधुरो रसः। आजन्मसात्म्यात् कुरुते धातूनां प्रवलं वलम् ॥ पाल-वृद्ध-क्षतक्षीण-वर्ण-केशेन्द्रियोजसाम् । प्रशस्तो वृंहणः कण्ठ्यः स्तन्य-सन्धानकहरुः ॥ आयुष्यो जीवनः निग्धः पित्तानिलविषापहः। कुरुतेऽत्युपयोगेन स मेदाम्लेष्मजान् गदान् ॥ स्थौल्याग्निसाद-सभ्यास-मेह-गण्डादादिकान् । अम्लोऽग्निदीप्तिकृत् निग्धो शुद्यः पाचन-रोचनः ॥
1 . पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । उष्णवीयों हिमस्पर्शः प्रीणन: क्लेदनो लघुः।' करोति कफ-पित्तात्रं मूढवातानुलोमनः ॥ सोऽत्यभ्यस्तस्तनोः कुर्याच्छैथिल्यं तिमिरं भ्रमम् । कण्डु-पाण्डुत्व-वीसर्प-शोफ विस्फोट-तृड्-ज्वरान् ॥ लवणः स्तम्भ-सङ्घात-चन्धविमापनोऽग्निकृत् । मेहनः खेदनस्तीक्ष्णो रोचनश्छेद-भेदकृत् ॥ सोऽतियुक्तोऽनपवनं खलर्ति पलितं वलिम् । तृट्-कुष्ठ-विष-वीसीजनयेत् क्षपयेद्वलम् ॥ तिक्तः खयमरोचिष्णुररुचिं कृमि-विविषम् । कुष्ठ-मूर्छा-ज्वरोक्क्लेश-दाह-पित्त-कफाजयेत् ॥ । क्लेद-मेदो वसा-मज-शकृन्मूत्रोपशोषणः । लघुर्मेध्यो हिमो रूक्षः स्तन्य-कण्ठविशोधनः॥ धातुक्षयानिलव्याधीनतियोगात् करोति सः। कटुर्गलामयोदर्द-कुष्ठालसक-शोफजित् ॥ वणावसादनः स्नेह-मेदः-क्लेदोपशोषणः । दीपनः पाचनो रुच्यः शोधनोऽन्नस्य शोषणः ॥ छिनत्ति वन्धान स्रोतांसि विवृणोति कफापहः । कुरुते सोऽतियोगेन तृष्णां शुक्रवलक्षयम् ॥ मूर्छामाकुञ्चनं कम्पं कटि-पृष्ठादिषु व्यथाम् । कपायः पित्त-कफहा गुरुरनविशोधनः ॥ पीडनो रोपणः शीतः क्लेद-मेदोविशोषणः । आमसंस्तम्भनो ग्राही रूक्षोऽतित्वप्रसादनः॥ करोति शीलितः सोऽति विष्टम्भाध्मान-हृदुजः। तुटू-कार्य-पौरुषभ्रंश-स्रोतोरोध-मलग्रहान् ॥ (अ. ह. सू. अ. १०)। मधुरो रसो धावना बढ़ प्रबलं कुरुते प्रकृष्टया शतया युकं बलं जनयेत् , लिज बलं यत् तत्प्रकृष्टं जनयतीत्यर्थः । वन्यं क्षीरं, संधान श्लेषः, ते करोतीति खन्य- संधानकृद् गुरुम । तथा भायुष्यादिगुणः । ननु, आयुष्य-जीवनयोरेकार्थत्वादेकत- रोपादानमेव युक्तं ? मैवम्, एतयोभिनार्थत्वात् । तथाहि-मायुष्यः स उच्यते योऽपरिमितायुषो हितः, अधिकायुपो हेतुत्वात्। तथा च मुनि:-"तेनायुरमितं लेमे" (च. स. भ. १) इति । यस्वायुषो नियतरूपस्य तामेव मर्यादामनुमनाति, स जीवयतीति जीवन उध्यते । तदनयोः स्पष्ट एव मेदः । तथा जीवनमोजस्स- मिस्पमित्रानो, किं स्वेतयोरपीह यदुपादानं तदोजसो द्विविधाया अपि वृद्धःकारको - १६४' द्रव्यगुणविज्ञानम् । ऽयमिति प्रतिपादयितुम् । तथा च, मधुरो रसो रुधिरादिक्रमेण भोजसो वृदिकरः । सामान्याद्विशेषाच । यथा-क्षीरं धातुवर्धनमुक्कं वृष्यं च । तत्र धातुवर्धनस्वेनैव वृष्यस्वस्योकरवादृष्यशब्दोपादानं यान्यन्यानि वृप्याणि द्रव्याण्यास्मगुप्तादी नि, तेभ्यः सकाशाद्विशेषेणाश्वेव घृद्धिकरमिति द्योतयितुं कृतमिति । मूठम् अननुलोमगं वात. मनुलोमयतीति मूढवातानुलोमनः । आजन्मसारम्याद निरुपाधिकसारम्यादित्यर्थः । प्रबलम् इतररसकृतेभ्यो बलेभ्यः । बलं देहधारणसामर्यम् । स्यौस्यादयो मेद:- लेप्मजानामुदाहरणम् । हृधः हृदय प्रियः । रोचनः जिवायाः । खम्मादीनां विधमापनो नाशनः । स्तम्भः निष्क्रियत्वम् । संघातः काठिन्यम् । अन्धः स्रोतो- रोधः । छेदः विलम्बिमांसादेः । भेदः पक्कशोफादेः । अत्रपवनं वावशोणितम् । खलति-पलिते कपालरोगी । वलिः पौथिल्यकृत्वक्संकोच. । विषजननं बिपाति- वृद्धिजननम् । कण्ठविशोधनः कण्ठरोधहरः । चलव्याधीन् वातव्यापीन् । कर्मा- न्याह-कटुरिति । उदर्दस्त्रिधा-स चोक्त आयुर्वेदप्रकाशे-"उदर्द उक्तो वक्षोऽभिष्यन्दोऽन्यैः शीतवेपथुः । शीताम्बुस्पर्शजः शोफो राग-कण्ट्युतः परैः॥" इति । प्रणावसादनः व्रणोरसेधहरः । स्नेहादीनामुपशोषणः । शोपणः नाशनः, अन्नस्यादनीयस्वं नाशयतीत्यर्थः । स्रोतांसि 'विवृणोति प्रसारयति । माकुचन सिरा- दिसंकोचः । अनविशोधनः रक्तदुष्टिहरः । पीढनः प्रणानामाचूषणः । भामसंस्त्र भमः भामदोषाणां पाकप्रतिबन्धकरः । ग्राही स्तम्भनः । अतिस्वक्प्रसादनः स्वचमति- निर्मकां करोति । पौरुपभ्रंशः शुभहानिः (हे.) अब मधुरादि छः रसोंमेंसे प्रत्येकके गुण और कर्म उनके आधारभूत द्रव्य जो पृथिव्यादि महाभूत, उनके अनुसार कहे जाते हैं।- मधुर रस (मधुर रसवाला द्रव्य) जन्मसे ही मनुष्यके शरीरको निरुपाधिक सात्म्य होनेसे रस-रक्त-मास-मेद-अस्थि-मज्जा-ओज और शुक्रको बढ़ानेवाला, आयुष्यको टिकाने और वढानेवाला, मनसहित छः इन्द्रियों को प्रसन्न करनेवाला, बलकारक, शरीरकी कान्तिको अच्छा करनेवाला, पित्त-विष तथा वायुका नाश करनेवाला, तृपा और दाहका शमन करनेवाला, बचा-केश और कण्ठके लिए हितकर, शरीरको बल देनेवाला, शरीरका पोषण करनेवाला, अभिघातादिसे मूच्छितको जीवन देनेवाला, सृप्तिकर, बृंहण, शरीरको दृढ़ करनेवाला, उरःक्षत और भन्न अस्थिका सधान करने वाला, घ्राणेन्द्रिय-मुख-कण्ठ-ओष्ठ और जिह्वाको आनन्द देनेवाला, दाह और मूर्छाका नाश करनेवाला, मौरों और चीटियोंको अत्यन्त प्रिय, निग्ध, शीत, गुरु (च.); स्तन्यवर्धक, नेत्रोंके लिए हितकर, रक्त और रस धातुको शुद्ध करनेवाला, । - १ स्निग्ध, शीत और गुरु (मृदु भ. सं.) ये मधुर रसके साथ रहनेवाले (सहचर) गुण है तथा रस-रक्त आदिकी वृद्धि करना आदि मधुर रसके कर्म है (ग.)।
पूर्वाधे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः १६५ वाल-वृद्ध और क्षतक्षीणके लिए हितकर, कृमि और कफको करनेवाला (सु.); मृटु (अ.सं.) और रस आदि सव धातुओंको उत्तम वल देनेवाला है (अ.ह.)। मधुर रस ऐसे गुणोंवाला होनेपर भी केवल उसं अकेलेका अति उपयोग करनेसे स्थूलता, मृदुता, आलस्य, अतिनिद्रा, भारीपन, अन्नपर अरुचि, अग्निमान्य, मुख और कण्ठमें मासकी वृद्धि, वास, खाँसी, जुकाम, अलसक (आमविकार विशेष), शीतज्वर, भानाह (कन्ज), मुखमाधुर्य, वमन, संज्ञानाश, खरभा, गलगण्ड, गण्डमाला, श्लीपद, गलेकी सूजन, मूत्राशय, धमनियों और गलेमें फ्लेद (मलमृद्धि, चिकनापन), नेत्रके रोग (आँख आना आदि), अभिष्यन्द (नाक, गले आदिकी सी) आदि कफरोग (च.), कृमि, अर्बुद, गुदोपळेप (गुदामें चिकनाहट) (सु.), प्रमेह, नेत्रावृंद, गलाद, उदर्द, सिरदर्द, उदररोग, वार-वार थूकना (अ.सं.); मेदोरोग और संन्यास आदि (कफप्रधान ) विकारोंको (अ. ह.) उत्पन्न करता है। अम्ल (खट्टा) रस (अम्लरसवाला द्रव्य) अन्नपर रुचि उत्पन्न करनेवाला, अग्नि- दीपन, शरीरको बढ़ानेवाला, उत्साहवर्धक, मनको जागरित (उत्तेजित) करनेवाला, इन्द्रियोंको दृढ़ करनेवाला, बलवर्धक, मूढवातानुलोमन, हृदयको तृप्त करनेवाला, मुखमें लालास्राव उत्पन्न करनेवाला; खाये हुए अन्नको नीचे ले जानेवाला, क्लिन करनेवाला (गलानेवाला) और पकानेवाला; प्रीणन, लघु, उष्ण, निग्ध (च.), व्रणशोथको पकानेवाला, वातहर, पेटमें विदाह करनेवाला, स्पर्शमें ठण्डा (परन्तु वीर्यमें उष्ण), क्लेदन, प्रायः हृद्य (सु.); रक और पित्तको करनेवाला, इन्द्रियोंको उत्तेजित करने- वाला, तर्पण, व्यवायी (अ.सं.) तथा कफकर (अ. ह.) है । अम्ल रस ऊपर लिखे हुए गुणोंवाला होते हुए भी केवल उस अकेलेका अति उपयोग करनेसे दन्तहर्ष, तृपा, नेत्रसमीलन (आँख मिचीसी रहना), रोमाघ, कफविलयन (कफका पिघलना), पित्तप्रकोप, रकदोष, मांसमें विदाह (पाक), शरीरशैथिल्य, क्षीण-क्षत-कृश और दुर्बल पुरुषोंमें श्वययु (सूजन), क्षत-अभिहत (चोट)-सविष प्राणिका दंश-दग्ध (जला हुआ)-टूटी हुई हट्टी-अस्थि आदिका स्थानभ्रंश-अवमूत्रित (सविष प्राणि- योंका शरीरपर पेशाव कर जाना)-परिसर्पित (सविष प्राणियोंका स्पर्श)-मर्दित (अङ्गका जोरसे मसला जाना)-छिन्न (कटना)-भिन्न (फटना)-विश्लिष्ट (सधिका अलग होना)-विद्ध (भागका विधजाना)-उत्पिष्ट (अमका कुचल जाना) आदिमें अपने आपमेय खभावके कारण पाक(पूय)की उत्पत्ति, कण्ठ-छाती और हृदयमें दाह (च.); खाज, पाण्डुरोग, दृष्टिकी मन्दता, क्षतविसर्प, रफपित्त, भ्रम (चक्कर आना) (अ. सं.); तिमिर (आँखोंके आगे अन्धकार लगना), फोड़े, फुन्सी और ज्वर (अ.ह.) इन विकारोंको उत्पन्न करता है। १ लघु, रण और लिग्ध ये अम्ल रसके साथ रहनेवाले गुण है तथा अन्नपर रन्त्रि उत्पन्न करना आदि अम्ल रसके कर्म है (ग.)। 1 . १६६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । लवणरस (लवणरसवाला द्रव्य) पाचन, क्लेदन, दीपन, शरीरके धालादि अवयवोंको अपने स्थानसे च्युत करनेवाला, छेदन, मेदन, तीक्ष्ण, अनुलोमन, विकासी, द्रव करके बहानेवाला, स्रोत भादिमें अवकाश करनेवाला, वातहर, स्तम्भ (अमका जकड़ जाना)- स्रोतोंका अवरोध और काठिन्यको दूर करनेवाला, अन्य सब रसोंका विरोधी (उनके खादको छिपा देनेवाला), मुखमें लालानाव करनेवाला, कफको पिघलानेवाला, स्रोतोंका शोधन करनेवाला, शरीरके सब अवयवोंको मृदु करनेवाला, रोचक, आहारके उपयोगमें आनेवाला; कुछ गुरु, स्निग्ध और उष्ण (च.); संशोधन, विश्लेषण (अपने छेदन खभावसे अवयवोंको पृथक् करनेवाला), शिथिलता लानेवाला (सु.); शोषण, मेहन, खेदन, लटकते हुए मांस आदिका छेदन करनेवाला, अनुलोमन, व्यवायी, तथा कुछ तीक्ष्ण (अ. सं.) है । लवण रस ऊपर कहे हुए गुणोंवाला होनेपर भी केवल उस अकेलेका अति उपयोग करनेसे पित्तप्रकोप, रककी अतिवृद्धि (प्रकोप), तृषा, मूर्छा, ताप, अगोंमें चीरे पड़ना, मांसमें शैथिल्य, कुछमें गलाव, शरीरस्थ विषकी वृद्धि, शोर्चाका फटना, दाँतोंका गिरना, पुंस्वनाश (शुक्रक्षय), इन्द्रियों की अपने-अपने कार्योंमें अशक्ति, वली (झुरी ), वाल पकना, खालित्य (गंजापन), रक्तपित्त, अम्लपित्त, विसर्प, वातरक, विचर्चिका, इन्द्रलप्त (बाल झड़ना) (च.), 'खाज, कोठ (ददोड़े-पित्ती), शोथ, शरीरका वर्ण बिगड़ना, इन्द्रियोंका उपताप, मुखपाक, नेत्रपाक, खट्टे डकार आदि (अन्नविदाहके लक्षण) (सु.); किटिभ (कुष्ठविशेष), आक्षेप, घावको बढ़ाना, भदवृद्धि (नशेको बढ़ाना), बलक्षय, ओजः- 'क्षय (अ. सं.) और कुष्ठ (अ.ह.) इन विकारोंको उत्पन्न करता है। कटुरस (वाला द्रव्य) मुखको शुद्ध करनेवाला, अग्निदीपन, खाये हुए अलका शोषण 'करनेवाला, नासिका और नेत्रोंमें स्राव करानेवाला, इन्द्रियोंको उत्तेजित करनेवाला; अलसक, सूजन, मासादिकी वृद्धि, पित्ती, अभिष्यन्द, स्नेह, खेद, क्लेद और मल-इनका नाश करनेवाला; रोचक, फण्डूका नाश करनेवाला, व्रणावसादन, कृमिघ्न, मांसका लेखन करनेवाला, रक्तके जमावको तोड़नेवाला, बन्धों( स्रोतों की रुकावट )को दूर करके स्रोतोंको खोलनेवाला; कफनाशक, लघु, उष्ण, रूक्षे (च.); शोधन, स्थूलता- आलस्य-कफ-विष और कुष्ठ इनको दूर करनेवाला, सधियोंके बन्धों( जकड़ने )को तोड़नेवाला, स्तन्य-शुक्र तथा मेदका नाश करनेवाला (सु.); लेह और क्लेदको सुखानेवाला, मुखरोगहर, लेखन, तीक्ष्ण (अ.सं.) तथा गलरोगहर (अ.ह.) है। कटरस ऊपर लिखे हुए गुणोंवाला होते हुए भी केवल उस अकेलेका ही भति उपयोग करनेसे कटुविपाकके प्रभावसे पुरुषलका नाश करता है, अपने रस और उष्ण- बीर्यके प्रभावसे मोह, ग्लानि, अवसाद, कृशता, मूर्छा, शरीरका झुकना, अधेरी, चकर, १ गुरु, स्निग्ध और उष्ण (कुछ तीक्ष्ण अ. सं.) ये लवण रसके साथ रहनेवाले गुण और पाचन-छेदन आदि लवण रसके कर्म है (ग.)। लघु, उष्ण और रूक्ष ये कटु रसके साथ रहनेवाले गुण हैं तथा मुखशोधन भादि उसके कर्म है .
पूर्वाधे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १६७ -- - . कण्ठम दाह, शरीरमें ताप, मलक्षय और तृषा उत्पन्न करता है; वायु और अग्निके गुणकी अधिकतासे चकर, दाह, कम्प, सुई चुभनेसी वेदना, भेद और हाथ-पाँव- पार्श्व-पृष्ठ आदिमें वातविकारोंको उत्पन्न करता है (च.); एवं गले-ताल और मोठका सूखना (सु.); वमन, शुक्रक्षय, हाथ-पाँव-पार्व-पीठ आदिमें संकोच, और भेदनसी वेदना (अ.सं.) इन विकारोंको उत्पन्न करता है। तिक रस (वाला द्रव्य) खयं न रुचनेवाला होनेपर भी अरुचिका नाश करनेवाला, विपन्न, कृमिघ्न, मूर्छा-दाह-कण्ड-कुष्ठ और तृषाका नाश करनेवाला, खचा मोर मासको दृढ़ करनेवाला, ज्वरन, दीपन, पाचन, स्तन्यशोधन, लेखन, क्लेद-मेद-पसा-मन्ना- लसीका-पूय-खेद-मूत्र-पुरीप-पित्त और कफको सुखानेवाला, रूक्ष, शीत, लघु (च.); छेदन, शोधन, कोठप्रशमन (सु.); कण्ठशोधन, मेधाको बढ़ानेवाला और उत्क्लेदको दूर करनेवाला तथा अति रूक्ष नहीं ऐसा (अ.सं.) है। तिक रस ऐसे गुणों- घाला होनेपर भी केवल उस अकेलेका अति उपयोग करनेसे अपने रूक्ष, विशद और खरगुणसे रस-रक-मास-मेद-अस्थि-मज्जा और शुक्र इनको सुखाता है, स्रोतोंमें कठिनता उत्पन्न करता है; बलक्षय, कृशता, ग्लानि, मूर्छा, चकर, मुखशोष और इस प्रकारके अन्य वातरोग (च.), शरीरकी स्तब्धता, मन्यास्तम्भ, आक्षेप, अर्दित, सिरदर्द, सुई चुभनेसी वेदना, फटने या कटनेसी वेदना, मुखका अखादपना (सु.) और धातुक्षय (अ.सं.) इन रोगोंको उत्पन्न करता है। कपाय रस (वाला द्रव्य) संशमन, प्राही, संधानीय, व्रणपीडन, रोपण, शोषण, स्तम्भन, कफ-रक्त और पित्तका शमन करनेवाला, शरीरके क्लेदको सुखानेवाला, रुक्ष, शीत, गुरु (च.); लेखन (सु.); विकृत बचाको खाभाविक वर्णमें लानेवाला, प्रीणन (अ. सं.); रक्तशोधक, मेदका शोषण करनेवाला और आमस्तम्भक (आम दोषोंके पाकको रोकनेवाला) (अ.ह.) है। कषाय रस ऐसे गुणोंवाला होनेपर भी केवल उस अकेलेका अति उपयोग करनेसे मुखशोष, हृदयमें पीडा, पेटका अफारा, पाक्संग (बोल न सकना), स्रोतोंका अवरोध, वर्णकी श्यामता और षण्डताको लाता है। पेटगें गुदगुदाहट करके हजम होता है, वात-मूत्र-मल और वीर्यको रोकता है, शरीरमें कृशता-पलानि-तृपा और स्तब्धता उत्पन्न करता है, खर, विशद और रूक्ष होनेसे पक्षाघात, अपतानक आदि वातविकार (च.), मन्यास्तम्भ, मझोंका फड़कना, चुमचुमाहट, आकुम्चन, आक्षेप (सु.) आदि विकारोंको उत्पन्न करता है। इस प्रकार ये छ रस अलग-अलग या एकसे अधिक साथ मिलाकर योग्य मात्रामें ठीक उपयोग करनेसे लोगोंके उपकारके लिए होते हैं। इससे विपरीत यदि अतिमात्रामें उपयोग किये जाये तो हानिकर होते हैं । इसलिए बुद्धिमान् पुरुषको चाहिए कि उपकारके लिये ही इनका योग्य मात्रामें ठीक उपयोग करे। १ रूक्ष, शीत और लघु ये तिक्त रसके सहचर गुण हैं तथा अरुन्निनाशन मादि उसके कर्म है। २ रुक्ष, शीत और गुरु ये कषाय रसके सहचर गुण है तथा संशमन भादि उसके कर्म है। . - - -- १६८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । नागार्जुनमतेन रसानां कर्म- तत्र बृहणीयाः, तर्पणीया, वल्या, वृष्याः, स्वादवो, गुरु विपाका, मेदुराः, स्थिराः, पयस्या, हृद्याः, स्निग्धा, जीवनीयाः, सृष्टमूत्र-पुरीपाः, पूजिताश्चाभ्यवहरणाय पूर्वे भूयिष्ठम् (र. वै. सू. ग. ३, सू. ३४)। इदानी रसानां कर्मोच्यते-तत्रेत्यादि । तत्र तेषु पूर्वोदिष्टेषु पदसु, पूर्वे (मधुराम्ल-लवणाः) इति योज्यम् । बृहणीयाः बृंहणे हिवा योग्या वा। तर्पणीयाः प्रीणनशीलाः । बल्याः वले हिता बलकराः । वृष्याः वृपत्वे हिताः । सादयः मृष्टाः । गुरुविपाकाः चिरपाकिनः । मेदुराः मेदोवर्धनाः । स्थिराः स्थैर्यकराः, अमेदोपचारात्; अथवा स्थिरकारणात् स्थिराः, 'भझं प्राणाः' इतिवत् । पयस्याः सन्यवर्धनाः । हृयाः प्रार्थनीयाः । जीवनीयाः प्राणस्थिति हेतवः । सृष्टमूत्र-पुरीपाः सुखसृष्टमलाः । अभ्यवहरणाय आहाराङ्गत्वाय, पूजिताः पथ्याः; भम्लमूर्तिमधुर- मूर्तिरिति द्विविध एवाहार इति । भूयिष्ठं प्रायशः; तेष्वपि प्रधाना विद्यन्त इत्यर्थः । इतरे विपरीताः (सू. ३५) । इतरे कटु-तिक-कपायाः (भा.)॥ मधुरादि छहों रसोंमें पहले तीन रस (मधुर, अम्ल और लवण) आहारमें प्रधान 'और पथ्य हैं । प्रायः बृंहण (शरीरको पुष्ट करनेवाले), तृप्ति करनेवाले, बलकारक, घृष्य, खादिष्ट, गुरुविपाक (देरीसे हजम होनेवाले), भेदको (चर्वीको) चढानेवाले, शरीरको दृढ करनेवाले, स्तन्य(दूध )को बढ़ानेवाले, हृद्य, निग्ध, शरीरके धारणमें उपयुक्त और मल तथा मूत्रकी सुखसे प्रवृत्ति करानेवाले हैं । शेष तीन रस इन गुणोंसे विपरीत गुणवाले हैं। साहचर्योपचाराद् द्रव्यगुणानां रसेषूपदेश.- गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान् भिषक् । विद्याद्रव्यगुणान् , कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः॥ (च. सू. अ. २६)। संप्रति रसानां परस्परसंयोगो गुण उक्तः, तथाऽग्रे च स्निग्धत्वादिगुणो वाच्यः, स च गुणरूपे रसे न संभवतीति यथा रसानां गुणनिर्देशो बोद्धव्यस्तदाह-गुणा इत्यादि । गुणा गुणाश्रया नोका इति दीर्घजीवितीये "समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः" (च. सू. म. १) इत्यनेन । रसगुणानिति रसे स्निग्धादीन् गुणानिर्दिष्टान् तद्रसाधारद्रव्यगुणानेव विद्यात् । ननु, यदि द्रव्यगुणा एव ते, तत् किमिति रसगुणस्वेनोच्यन्त इत्याह-कर्तु रित्यादि । कर्तुरिति तन्त्रकर्तुः । भभिप्राया इति तत्र तन्नोपचारेण तथा सामान्यशब्दादिप्रयोगेण तन्त्रकरणबुद्धयः, सामान्यशब्दोपचारा- १ 'गुणा गुणाश्या नोका' इति सगुणवे द्रव्यत्वप्रसङ्गादिति भाव., तस्माद्रसनिर्दिष्टान् गुणान् द्रव्यगुणानेव विधात्, एकाधंसमवायेनोपचारादिति भावः' इति शिवदाससेनः ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । -- १६९ दिप्रयोगश्च प्रकरणादिवशादेव स्फुटत्वात् तथा प्रयोजनवशाच क्रियते ।xxx इह व द्रव्यगुणानां रसेषु यदुपचरणं तस्यायमभिप्रायो यत्-मधुरादिनिर्देशेनैव मिग्ध-शीतादिगुणा अपि प्रायो मधुराद्यव्यभिचारिणो द्रव्ये निर्दिष्टा भवन्तीति ने मधुरत्वं निर्दिश्य स्निग्धत्वादिप्रतिपादनं पुनः पृथक् क्रियत इति (च. द.)। "नानौपधभूतं जगति किंचिध्यमुपलभ्यते" इत्यत्र "तां तां युक्तिमर्थ'च तं तम- भिप्रेत्य" (च. सू. अ.२६) इत्युक्तं, संप्रति तदेव विवरीतुमाह-गुणा इति । गुणा न गुणानामाश्रया उक्ताः, गुणेषु गुणा न संभवन्ति; तदुक्तं गुणलक्षणे कणादेन- "द्रव्याश्रय्यगुणवान्" (वै. द., १११११६) इति, सुश्रुतेनापि-"निर्गुणास्तु गुणाः स्मृताः" (सु. सू. अ. ४०) इति; तस्माद् भिपग्रसगुणान् रसगुणत्वेन वक्ष्यमाणान् शीतोष्ण-स्निग्ध-रूझादीन् द्रव्यगुणान् रसाश्रयतत्तद्रव्यस्यैव गुणान् विद्यात् । रसानां गुण-कर्माणि यानि पश्चाद्वक्ष्यन्ते तानि रसाश्रयतत्तद्भवोल्षण- पाञ्चभौतिकद्रव्यस्यैव, रसस्य स्वयं गुणतया गुणकर्माश्रयत्वायोगात् । (यो.)॥ तदाश्रयेषु (रसाश्रयेषु) च द्रव्यसंशकेषु पृथिव्यादिषु गुणाः प्रकृति-विकृति-विचार-देश-कालवशाद् गुर्वादयो रसेषु साहचर्यादुप- चर्यन्ते (अ. स. सू. अ. १७) ॥ तेषां च रसादीनामाश्रयभूतेषु पृथिव्यादिषु पञ्चसु द्रव्यसंज्ञकेषु कार्यद्रव्यावस्थायां ये गुणा गुर्वादयो गुरु-स्नेहोष्ण-सूक्ष्म-लघ्वादयः ते द्रव्यगुणाः सन्तो रसेषु गुणस्वेनो- पचारादुच्यन्ते । उपचारस्य बहुहेतुदर्शनाय साहचर्य विशेषणम् । ननु कथं ते द्रव्यस्येत्याशझ्याह-प्रकृतीत्यादि । क्वचित् प्रकृत्यवस्थायां न सन्तोऽपि नानाविध- क्रियासाध्यया विकृत्या जन्यन्ते । केचित्तु विचारादिभिः; विचारो विशिष्टमात्रादिकः संयोगः । देशो द्विविध उक्तः, तद्वशाद् गुर्वादिगुणयोगो द्रव्यस्य । देहदेशवशात् "संक्थिमांसाद्गुरुः स्कन्धः" (च. सू. भ. २७) इत्यादि । भूमिदेशवशादन्यथा जागलेऽन्यथाऽऽनूप इति । एवं कालेऽपि । तेन यत्रापि प्रकृत्यादिवशादसानां संभवः, तत्रापि ये रसगुणास्ते द्रव्यस्यैव विज्ञेयाः । एषा च प्रकृत्यादिवशाद् गुर्वादि- कल्पना रसाश्रयस्य द्रव्यस्यैव गुणाश्रयत्वात् संभवति, न रसस्य; तस्य तु साहचर्या- दुपचयंते (इन्दुः)॥ गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये । रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः ॥ (अ. ह. सू. भ. ९)। ननु, मधुरादयो रसा गुर्वादिगुणयुक्ताः कथं वक्तुं पार्यन्ते ?; यतो मधुरादयो रसा गुणाः, गुर्वादयश्च गुणा!; न च गुणानां मधुरादीनां गुर्वादिगुणाधारस्वमुपपलं, तथा च वैशेषिका:-"निर्गुणा गुणाः" इति; तस्मिन् पर्यनुयोगे इदमाह-पृथिव्यादा- वित्यादि । पृथिव्यादौ पृथिव्यादिमहाभूतारब्धे द्रव्ये रसाश्रये गुर्वादयो गुणाः परमार्थत माश्रिताः, न तु रसेपु मधुरादिपु; यत्तु रसेषु व्यपदिश्यन्ते तत् साह- । ।
. १७० द्रव्यगुणविज्ञानम् । चर्योपचारतः । सह चरतीति सहचरः, तस्य भावः साहचर्यम् । यमिव गुगदी मधुरो रस आश्रितस्तसिन्नेव गुरुगुण आश्रित इति मधुररस-गुरुगुणयोः सहचर- भावः । साहचर्येण तुल्याश्रयत्वेनोपचारः साहचर्योपचारः, तसात् साहचर्याप- चारतो गुर्वादयो गुणा रसेषु मधुरादिषु व्यपदिश्यन्ते । यथा-गुर्मधुरो रसः, लघुरम्ल इत्यादि । न पुनः परमार्थतो रसेषु गुर्वादयः सन्ति । मस्ति च साहचर्येण व्यपदेशः । यथा-घृतसहचरेण घृतस्थेनाग्निना दुग्धो 'घृतदग्ध' इत्युच्यते (अ. द.)। गुर्वादीनां रसाश्रयस्वाद्व्यस्थासर्वधर्मत्वे प्राप्ते परिहारमाह-गुर्वादय इति । गुर्वादयो गुणा द्रव्य एव, न रसेषु । यस्तु मधुरो गुरुः, अम्लो कषुरित्यादि व्यपदेशः, स साहचर्योपचारतः । एकस्मिनाश्रये द्वयोरवस्थान साहचर्यम् । साह चर्यमेव कुतः ? इत्याह-रसाश्रय इति । द्रव्यं हि गुर्वादीनामिव रसानामप्याश्रयः। अत एकाश्रयत्वात् साहचर्य, तेन उपचारः भविद्यमानस्याप्याश्रयाश्रयिमावस्यारोपः। ननु, किमेतदसायतिरिक्तं द्रव्यं नाम ? इत्यत आह-पृथिव्यादाविति । पृथिव्यादि. शब्दाभिलप्यं द्रव्यमित्यर्थः (हे.)॥ गुरु आदि गुण रसके आश्रयभूत पृथिव्यादिके अन्दर ही रहते हैं; क्योंकि गुण गुणका आश्रय करके अर्थात् गुणोंमें नहीं रह सकता है, इसलिए मधुरादि रसोंके जो गुण कहे गये हैं, वे मधुरादि रसवाले द्रव्यके ही जानने चाहिए। मधुरादि रस और गुर्वादि गुणोंका नित्य साहचर्य-( साथ रहनेका संवन्ध ) होनेसे, गुर्वादि गुण यद्यपि मधुरादि रसवाले द्रव्योंके हैं, तथापि औपचारिक भाषामें 'मधुर रस गुरु है, अम्ल रस लघु है' इत्यादि रूपमें कहा जाता है। वीर्यतो विपाकतश्चाविरुद्धानां रसोपदेशेन गुणोपदेश', तत्रापवादश्व- शीतं वीर्येण यद्रव्यं मधुरं रसपाकयोः। तयोरम्लं यदुष्णं च यद्रव्यं कटुकं तयोः ॥ तेषों रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रहः । , . १ जिन गुड आदि द्रव्योंमें मधुर आदि रस रहते हैं उनमें गुरु आदि गुण भी साथ ही रहते हैं, जैसे कि रसोंके गुण-कर्ममें लिखा गया है कि-मधुर रस स्निग्ध, शीत और गुरु है, अम्ल रस लघु, उष्ण और लिग्ध है, इत्यादि, इस प्रकार मधुर आदि रस और गुरु आदि गुणोंका सहचरभाव (साथ रहनेका संवन्ध ) होनेसे मधुर भादि रस और गुरु आदि गुणोंका आश्रयायिभाव न होनेपर भी मधुरादि रसोंमें गुर्वादि गुणोंका आरोप करके औपचारिक भाषामें मधुर रस गुरु है, अम्ल लघु है, इत्यादि प्रयोग किया जाता २ "संप्रति मधुर-तिक्त कषायाणा शीतत्वं, तथा कट्सम्ल-लवणानां चोष्णत्व, तथा कर तिक्त-कषायाणा चावृष्यत्वमित्यादयो रसद्वारेण द्रव्याणा ये गुणा उक्तास्तदपवादमाह-वेषा- मित्यादि । रसोपदेशेन रसगुणकयनदारेण द्रव्याणां यः शीतोष्णादिगुणसग्रहः कृत., स है - पूर्वाधे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । ११७१ . वीर्यतोऽविपरीतीनां पाकतश्चोपदेक्ष्यते ॥ यथा पयो यथा सर्पिर्यथा वा चव्यचित्रको। ' एवमादीनि चान्यानि निर्दिशेद्रसतो भिषक् ॥ मधुरं किंचिदुष्णं स्यात् कषायं तिक्तमेव च । यथा महत्पञ्चमूलं यथाऽजानूपमामिषम् ॥ लवणं सैन्धवं नोष्णमम्लमामलकं तथा । अर्कागुरु-गुडुचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते ॥ किंचिदम्लं हि संग्राहि, किंचिदम्लं भिनत्ति च । यथा कपित्थं संग्राहि, मेदि चामलकं तथा ॥ पिप्पली नागरं वृष्यं, कटु चोवृष्यमुच्यते । कपायः स्तम्भनः शीतः, सोऽभयायामतोऽन्यथा ॥ तस्मादसोपदेशेन न सर्व द्रव्यमादिशेत् । दृष्टं तुल्यरसेऽप्येवं द्रव्ये द्रव्ये गुणान्तरम् ॥ (च. सू. अ. २६) संप्रति रसद्वारेणैव द्रव्याणां वीर्यमाह-शीवमित्यादि । यद्व्यं रसे पाके च मधुरं तच्छीतं वीर्येण ज्ञेयं, तथा तयोरिति रस-पाकयोर्यदम्लं द्रव्यं वदुष्णं वीर्येण, तथा यश्च द्रव्यं तयोरिति रस-पाकयोः कटुकमुक्कं तम्बोष्णं वीर्येण, 'भवति' इति शेषः । किंवा 'यच्चोष्णं कटुकं वयोः' इति पाठः । वन यदसतो मधुरं तवीर्यतः शीतमिति वकव्ये यत् 'रस-पाकयोः' इति करोति, तन्मधुररसोचितपाकस्यैव मधुरद्रव्यस्य शीतवीर्यतामात्यर्थम् । एवमम्ल-कटुकयोरपि वाच्यम् । तेषामिति मधुरपाकादीनां, रसोपदेशेनेति रसमात्रकथनेनैव, यतो विपाकोऽपि रसत एव 4 । वीर्यतः पाकतश्चाविपरीतानां तेषां वक्ष्यमाणक्षीरादिद्रव्याणामेव निर्देष्टुं शक्य., नत रसविप- रीतवीर्य-विपाकानामित्यर्थः । तेष्वविपरीतवीर्यविपाकानुपदिशति-~-उपदेष्यत इत्यादि । उपदे- क्ष्यत इति 'यथा पय' इत्यादिभि. संवध्यते । एतानि हि द्रव्यगुणकथनप्रसङ्गे रसाविपरीतवीर्य- विपाकतयैवोपदेष्टव्यानीति रसानुरूपगुणत्वमेषां ज्ञातव्यमित्यर्थः । इद तूदाहरणैकदेशमात्र, तेनापराण्यप्येवजावीयान्युदाहर्तन्यानीत्याह-एवमादीनीत्यादि । एवमादीनि एवप्रकाराणि गोधूमादीनीत्यर्थ." इति शिवदाससेनः । १ 'वीर्यतो विपरीतानां' इति गाधरसमत. पाठः । २ "संप्रति विरुद्धवीर्यत्वेन विरुख- विपाकत्वेन वा रसद्वारेण येषां गुणा न निर्देश्यास्तानाह--मधुरमित्यादि" इति शिवदाससेनः । ३ "पिप्पलीत्यादि । अत्र पिप्पली-नागरयोः कटकयोरपि तद्विपरीतमधुरविपाकित्वेन नोष्णत्व यम्" इति शिवदाससेनः । ४ "तमादित्यादि । उक्तरीत्या तुल्यरसेऽपि द्रव्ये यतो गुणान्तर दृष्ट, तमादित्यर्थः" इति शिवदासंसेनः। ५ "इदानी रसविशेषाद्विपाकविशेषाच वीर्यविशेषो सातव्य इत्साह--शीतमित्यादि" इति शिवदाससेनः। र -- , * १७२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । प्रायो ज्ञायते; यद्वक्ष्यति-"कटु-तिक कपायाणां विपाकः प्रायशः कटुः" (च. सू. म. २६) इत्यादि । एतय न सर्वत्रेत्याह-वीर्यत इत्यादि । वीर्यतोऽविपरीतानां रसद्वारा वीर्यज्ञानं, न तु रसविरुद्धधीर्याणां महापञ्चमूलादीनां; न केवलं रसेन किं तर्हि पाकतश्च य उपदेक्ष्यते गुणसंप्रहः "शुक्रहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटुः" (च. सू. भ. २६) इत्यादिना, स च वीर्यतोऽविरुदानां विजेयः, यदि तत्र वीर्य विरोधि भवति तदा विपाकोऽपि यथोक्तगुणकारी न स्यात् । किंवा, पाकतबा. विपरीतानां रसोपदेशेन गुणसंग्रहः शीतोष्णलक्षणो निर्देश्यः, यस्पास्तु पिप्पस्याः कटुकाया अपि विपरीवमधुरपाकित्वं, न तत्र कटुरसत्वेनोप्णावमित्यर्थः । अमित्र पक्षे 'उपदेक्ष्यते' इति 'यथा पयः' इत्यादिना संपध्यते । तान्येवाविपरीतवीर्य- विपाकान्याह-यथा पय इत्यादि । पयःप्रभृतीनि हि द्रव्यगुणकथनेऽविरुखवीर्य- विपाकान्युपदेष्टव्यानि । संप्रति यत्र विरुद्धवीर्यत्वेन रसेनोष्णवादि न निर्देशन तदाह-मधुरमित्यादि । किंचित् कपायं चोष्णं, तिकं चोष्णमिति योजना कषाय- तिक-लवणानामुदाहरणमसूनितानामपि प्रकरणात् कृतम् । महत्पञ्चमूलं चिल्वादि- पञ्चमूलमिह । एतच्च तिकस्य कषायस्य चोष्णतायामुदाहरणम्, अम्जानूपामिपं तु मधुरस्योष्णवीर्यत्वे । वीर्यप्रसङ्गादन्यमप्यम्लादीनां विरुद्धगुणमाह-किंचिदिस्यादि । मभयायामतोऽन्यथेति मभयायां कपायो रसो मेदनश्चोष्णश्चेत्यर्थः (च. द.)। रसद्वारेण द्रव्याणां गुण-कर्माण्युकानि, रसवतीर्य-विपाक प्रभावद्वारेणापि द्रव्यागों कर्म दृश्यते, तदेव दर्शयितुं प्रकरणं सोदाहरणमारभते-शीतमित्यादि । पद् द्रव्यं वीर्येण शीतं शीतवीर्य, रस-विपाकयोर्मधुरं मधुररसं मधुरविपाकं च, वीर्य-विपाको वक्ष्येते; तथा यहव्यं तयो रस-विपाकयोरम्लम् अम्लरसमम्लविपाकं च, (तत्) उष्णम् उष्णवीयं स्यात् । तथा यश्च द्रव्यमुष्णमुष्णवीयं तयो रस-विपाकयोः कटुकं कटुरसं, कटुविपाकं चोक्तं, तेषां तथाविधानां द्रव्याणां रसोपदेशेन गुणसंग्रहो निर्देश्यः वाच्यः । मधुरो रसः शीतः, अम्ल-कटुको उप्णी, विपाकश्च रसैः सुस्यफल:, एवं तत्तद्रव्येषु रसस्य वीर्य-विपाकाभ्यामविरुद्धस्वात्तेषां यथास्वं रसतो गुणान् दोष-कोपशमनस्वं च विद्यात् । विपरीतानामुक्तेभ्योऽन्येषाम् अर्थात् यत्र रस-वीर्य- विपाकानामन्योन्यविरुद्धवं विजात्यन्वयः; तादशद्व्याणां गुणसंग्रहो वीर्यतः, पाकतो विपाकतः, चकारात् रसतोऽपि उपदेक्ष्यते । तथाविधं द्रव्यं रसेन किंचित कर्म कुरुते, किंचिद्वीर्येण, किंचिद्विपाकेनापि । शीतं वीर्येण यतव्यमित्यादौ उदाहर- णमाह-यथा पय इत्यादि । यथा पयः क्षीरं, यथा सर्पितं; गव्ये क्षीर-सर्पिषी मधुररसे, मधुरविपाके, शीतवीर्ये च । यथा वा चव्य-चित्रको; एतौ कटुरसौ, कटुविपाको, उष्णवीयौं च । तयोरम्बं यदुष्णं स्यादित्यस्योदाहरणं मदिरादिकं स्वयमूहनीयम् । भिषक् एवमादीनि चान्यानि तद्विधानि द्रव्याणि रसतो निर्दिशेव, न तु सर्वाणि, कथमिति चेत् ? भनाह-मधुरमित्यादि । किंचिगव्यं मधुरमपि . पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १७३ . उष्णम् उष्णवीर्यम् । यथा-अब्जानूपम् औदकानूपम् , आमिषं मांसम् । किंचित् कपायतितं द्रव्यमुष्णवीर्य स्यात् । यथा-महत्पञ्चमूलम् । औदकानूपपिशितं रसतो मधुरमपि न पित्तं जयति किं तु जनयति, उष्णवीर्यत्वात् । कषायतिकं महत्पञ्च- मूलं वातं जयति न तु पित्तम् , उष्णवीर्यस्वात् । किंचिद्रव्यं लवणमपि नोष्णम् । -सैन्धवं लवणमपि न उष्णम् उष्णवीय, किंतु शीतवीर्यम् । तथा किंचिदम्लं नोणं, यथा-आमलकमम्लमपि नोदणवीयं, किंतु शीतवीर्यम् । लवण सैन्धवं पित्तं जयति, शीतवीर्यस्वात् ; न तु वातम् । एवमम्लमामलकम् । तिक्तानामर्कागुरु- गुचीनामुष्णं वीर्यमिष्यते । तिक्ता अपि अर्कागुरु-गुदच्यः पित्तं जनयन्ति, उष्ण- भीर्यस्वात् । उक्तेपूदाहरणेपु वीर्य रसमभिभूयात्मकर्म कुरुते, रस-विपाक-वीर्याणा- मुत्तरोत्तरातिशायित्वात् ; "रसं विपाकस्तौ वीर्य प्रभावस्तान्यपोहति" (च. 'सू. म. २६) इति । किंचिदम्लमिति किञ्चित् अम्लम् अम्लरसं द्रव्यं, संग्राहि मलविबन्धकृद्भवति । यथा-कपित्थं संग्राहि । किंचिदम्लं द्रव्यं भिनत्ति भेदि भवति । यथा-आमलकं मेदि । कपित्यामलकयोस्तुल्यरसत्वेऽपि गुणमेदो द्रव्य- प्रभावात् । "रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम्" (च. सू. भ. ३६) इति । एवमन्यत्रापि बोद्धव्यम् । पिप्पलीति कटु कटुरसं द्रव्यमवृष्यमुच्यते, किं तु कटुकाऽपि पिप्पली नागरं शुण्ठी च वृष्यमुच्यते । “प्रायः कटुकं वातलमवृष्यं च, अन्यत्र पिप्पली-विश्वभेपजात्" (च. सू. भ. २७) इति । विश्वभेषजं शुण्ठी । कषायो रसः स्तम्भनः शीतश्च, यथा-धातक्याम् ; अभयायां हरीतक्या, स कषायः, अतोऽन्यथा भेदन उष्णश्च । तथा च-"कपित्थं दाडिम चाम्लं पाहि, मामलकीफलम् । कषाया ग्राहिणी शीता धातकी, न हरीतकी" (अ. सं. सू. म. १७) इति । यस्मात्तुल्यरसेऽपि द्रव्ये द्रव्ये प्रतिद्व्यमेवं गुणान्तरं दृष्टं गुणमेदो श्यते, वसादसोपदेशेन न सर्व द्रव्यमादिशेद्भिपक् (यो.) । अथैषां ,द्रव्याणा- मारम्भकभूतन्यून-मध्याधिक-तर-तमादिभेदेनासंख्येयानां गुण-कर्मोपदेशो यथा कतव्यस्तदाह-शीतमित्यादि । यद्व्यं वीर्येण शीवं रस-पाकयोर्मधुरं तस्य गुणसंग्रहो रसोपदेशेन 'मधुरम्' इत्युपदेशेन निर्देश्यो वुद्धिमद्भिः । 'सोमगुणातिरेकात् पञ्चभूवारब्धव्ये मधुरो रसोऽभिव्यज्यते' इत्युक्त्या तन्मधुररससहचरितास्तु नियता गुणाः स्निग्ध-गुरु-शीताः, 'स्वादुर्मधुरं पच्यते' इति च वक्ष्यते, तेन मधुररसोपदेशेन शीतवीर्य-मधुरविपाको ज्ञेयो । पृथिव्यामम्बुप्रवेशे तदुभयाजाता गुणा भूमेगुरु- सर-कठिन-मन्द-स्थिर-विशद-सान्द्र-स्थूल-गन्धास्तथाऽपां द्रव-स्निग्ध-शीत-मन्द-सर- सान्द-मृदु-पिच्छिला गुणा इत्येषां गुणानां संग्रहो निर्देश्यो भवति । तथा यङ्गव्यं तयो रसपाक्योरम्लं वीर्येणोष्णं तस्यापि रसोपदेशेनाम्लरसोपदेशेन गुणसंग्रहो निर्देश्यः । भूम्यमिगुणभूयिष्ठस्वादम्लः, स च "लघुरुष्णः स्निग्धश्च" (च. सू. भ. २६) इत्युक्त्या, तया "भम्कोडलं पच्यते" (च. सू. भ. २६) इत्युच्या 'अम्ल' इति १ - ३ - लघु-रुक्षोष्णवीर्य १७४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । रसमानोपदेशेनोष्णवीर्याम्लरसपाक-लघु-स्निग्धा ज्ञेयाः । वयाऽपि भूम्यामोरन- भिभवाच शेषा गुणा ये भूमेर्गुरु-सर-कठिन-मन्द स्थिर-विशद सान्द्र-स्यूलनायाः, भमेश्च ये उष्ण-वीक्ष्ण-सूक्ष्म-लघु-रुक्ष-विशद-रूपाणि गुणाः, तेपामपि गुणानां संग्रहो निर्देश्यः । एवं यच्च द्रव्यं वीर्येणोष्णं तयो रसपाकयोः कटुक मरिचारिक तस्यापि कटुरसोपदेशेन गुणानां संग्रहो निर्देश्यः । वारवाग्निगुणभूयिष्टत्वात् कटुकः, स च "लघुरुष्णो रूक्षश्च" (च. सू. भ. २६) इत्युक्त्या, "कटु-तिक-कपापाणां विपाकः प्रायशः कटुः" (च. सू. भ. २६) इत्युक्त्या च, 'कटुकम्' इतिमानो- पदेशेन -कटुरसपाका ज्ञेयाः । तत्रापि शेपाणां वाय्वनिगुणानां वायोर्लघु-शीत-रूक्ष-खर-विशद सूक्ष्म-स्पर्शगुणानामनेरष्ण-तीक्ष्ण-सूक्ष्म-लघु-स्क्ष- विशद-रूपगुणानां मेलनेन याशलधुरवादयो भवन्ति ताशानां तेषां गुणानां संग्रहो निर्देश्यः । विपरीतानां वीर्यतः पाकतश्च विपरीतानां मधुराम्ल-कटुकानो वीर्यतः पाकतश्वोपदेक्ष्यते गुणसंग्रह इति । यध व्याख्यायते--यहव्यं रस-पाकयो- मधुरं तद्वीर्येण शीतं, यच रसपाकयोरम्लं तवीर्येणोष्णं, यच्च रस-पाकयोः कटुकं तद्वीर्येणोष्णमिति; तदयुक्तं, 'तेषां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रह' इति वचनस्या- संगतेः। तथा च शीतवीर्य-मधुररस-मधुरपाकद्रव्याणां मधुररसोपदेशेन गुण- संग्रहः-यथा पयो यथा च सर्पिर्मधुर सिग्ध-गुरु-शीतादिकम् , एवमुष्णवीर्याम्ल- रसाम्लपाकव्याणासम्बरसोपदेशेन गुणसंग्रहो यथा-भव्यमम्लं तेन लघूष्ण- स्निग्धत्वादिसंग्रहः, एवमुष्णवीर्य-कटुरस-कटुपाकद्रव्याणां कटुरसोपदेशेन शेषगुण- संग्रहो यथा-चव्यचित्रको । तत्र चित्रक:-"कटुकः, कटुकः पाके, वीर्योग्ण- चित्रको मतः" (च. सू अ. २७) इति वक्ष्यते, तेन लघूष्ण-रूक्षादीनामपि संग्रहः । एवमादीनि चान्यानि शीतवीर्य-मधुररस-मधुरपाकानि द्रव्याणि मधुररसतो यथा, तथोष्णवीर्याम्लरसाम्लपाकानि द्रव्याणि चाम्लरसतः, तयोष्ण- वीर्य-कटुरस-कटुपाकानि द्रव्याणि कटुरसतो भिपग्गुणतो निर्दिशेत् । वीर्यतो विपाकतश्च विपरीतानां मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त-कपायाणां वीर्यत पाकत- श्वोपदेशो यथा तदाह-मधुरमित्यादि । किंचिद्रव्यं यथाऽनूपमामिपं मधुरं वीर्यत उष्णं, तवीर्यतो रसतश्च निर्देश्यम् । तथा किंचिद् द्रव्यं कषायं तिकमेव किंचिद् द्रव्यं यथा बृहस्पञ्चमूलं वीर्यंत उष्णं तद्वीर्यत उपदेक्ष्यते । कषाय-तिको शीतायुक्तौ । ननु तिक-कषाययोः पाक एकान्तेन कटुः, तेन तयो रसोपदेशेन गुणसंग्रहो निर्देश्यः कुतो नोक इति चेत् ? न; रस-विपाक-वीर्याणामसामान्यात् । प्रायेण हि तिक-कषाययोः शीतं वीर्य, कटुः पाक इति । अपरमुदाहरति-लवणमित्योदि । सर्व लवणमत्यर्थ गुरु स्निग्धमुष्णं च, सैन्धवं तु लवणं नोष्णवीर्यम् । तथा सर्वमम्लमुष्णं, लघु, स्निग्धं च; आमलकमम्नं नोष्णमिति वीर्यतो विपरीतं वीर्यतो निर्देश्यम् । तथाऽर्कागुरु-गुडूचीनां तिकानामुष्णं वीर्य न शीतं, "सर्व तिक 1 पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १७५ शीतमुकम्" इति वीर्यवोऽर्कादय उपदेश्या इति । वीर्यतो विपरीवान्युवाहत्य पाकतोऽमुमुदाहरति-किंचिदम्लमित्यादि । अम्लस्याम्लपाके सृष्टविण्मूत्रता कर्म तत्र किंचिदम्बं द्रव्यं संग्राहि, यथा-कपित्थफल संग्राहि, तेनानुमीयते-कपित्थं कटुपाक, वक्ष्यते हि--"शुकहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातकः कटुः" (च. सू. भ. २६) इति तस्मात् पाकत उपदेक्ष्यते न्यम् । भामलकं चाम्लं भेदि शीतं च, तस्मात् पाकतोऽविपरीतं वीर्यतो विपरीतं वीर्यत उपदेक्ष्यते । एवं सर्व कटु प्रव्यं कटुपाकादुष्ण-शुक्ररवादवृष्यं पिप्पली-नागरं तु वृष्यं, तस्सान्मधुरपाकं च पाकतो विपरीतं पाकत उपदेक्ष्यते । कपायः सर्वः स्वम्भनः शीतश्च; कटुपाकात् सम्मनः, सोमगुणः स्तम्मनः शीतश्च अभयायां हरीतक्यां विपर्ययो रेचनश्योप्णश्च । इति वीर्यतो विपरीता हरीतकी, पाकतश्च विपरीता, रेचनत्वात् । तस्मात् सर्व द्रव्यं म रसोपदेशेनादिशेत् । यतु शीतवीर्य-मधुररस-मधुरपाक तन्मधुररसोपदेशेन भादिशेव, यद्योष्णवीर्याम्लरसालपाकं तदप्यम्लरसोपदेशेनादिशेत्, एवं यदुष्ण- वीर्य-कटुरस-कटुपाकं तदपि कटुरसोपदेशेनादिशेदिति निगमनम् (ग.)। जो द्रव्य रस और विपाक दोनोंमें मधुर होता है, वह शीतवीर्य होता है। जो द्रव्य रस और विपाक दोनोंमें अम्ल होता है, वह उष्णवीर्य होता है। जो द्रव्य रस और विपाक दोनोंमें कटु होता है, वह भी उष्णवीर्य होता है। जिन द्रव्योंका वीर्य और विपाक रससे विपरीत न हो अर्थात् रसके समान ही हो, उन द्रव्योंके गुण-कर्म, रसोंके जो गुण-कर्म विस्तारसे कहे गये हैं उनके अनुसार ही जानने चाहिये । जैसे-दूध और घीके रस, वीर्य और विपाक समान ही है अर्थात् उनका रस मधुर, विपाक मधुर और वीर्य शीत है; अथवा जैसे-चव्य और चित्रकका रस कट, विपाक कटु और वीर्य उष्ण है; ये और इस प्रकारके अन्य द्रव्य, जिनके रस, विपाक और वीर्य एकसे हों उनके गुण-कर्म रससे ही जानने चाहिए । तन्त्रकारोंने भी उनके गुण-कर्मका निर्देश रसोपदेशसे यह मधुर है, यह अम्ल है, यह कह है, एतावन्मानासे ही किया है। परन्तु ऊपर कहा हुआ नियम सव द्रव्योमें लागू नहीं हो सकता। क्योंकि कुछ मधुर, कषाय और वित रसवाले द्रव्य उष्णवीर्य होते हैं; जैसे वृहत्पञ्चमूल कषाय और तिक्त होनेपर भी उष्णवीर्य है; एवं जलचर और मानूप प्राणियोंका मास मधुर होनेपर भी उष्णवीर्य है। सैन्धव लवण होनेपर भी उष्ण वीर्य नहीं है (किंतु शीतवीर्य है), आँवले अम्ल होनेपर भी उष्ण वीर्य नहीं हैं (किन्तु शीतवीर्य हैं), आक, अगर और गिलोय विकरसवाले होनेसे इनका वीर्य शीत होना चाहिए, परन्तु इनका वीर्य उष्ण है, कुछ अम्ल द्रव्य प्राही है, जैसे-कथका फल, कुछ अम्ल द्रव्य मेदन हैं, जैसे--आँवले; फटुरसको अवृष्य बताया गया है, परन्तु पीपल और सौंठ वृष्य हैं; कषाय रसको स्तम्भन और शीतवीर्य बताया गया है, परन्तु हरड़ कषाय रसवाली होनेपर भी उष्णवीर्य और मेदन है। इस प्रकार तुल्यरसवाले द्रव्यों में भी भिन्न-भिन्न गुण पाये 7 - १७६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । जाते हैं, अतः रसोंके जो गुणकर्म कहे गये हैं, उनपरसे सन द्रव्योंके गुण-कर्म नहीं बताये जा सकते। ऊपर हमने जो अर्थ दिया है वह चक्रपाणिदत्तके मतानुसार है। चक्रपाणि- दत्तने मूलमें 'वीर्यतोऽविपरीतानाम् (वीर्यतः अविपरीतानाम्') ऐसा पाठ मानकर प्रन्थको लगाया है। कविराज गद्गाधरजी और योगीन्द्रनाथसेनजीने 'वीर्यतो विपरीतानां' ऐसा पाठ मानकर कुछ भिन्न व्याख्या की है। उनके मतानुसार संपूर्ण प्रकरणका अर्थ इस प्रकार होता है-जिन द्रव्योंका रस, विपाक और वीर्य समान हो अर्थात् विपाक और वीर्य रसके समान हों, जैसे-रस मधुर हो, विपाक मधुर हो और वीर्य शीत हो, रस अम्ल हो, विपाक अम्ल हो और वीर्य उष्ण हो; तथा रस कटु, हो, विपाक कटु हो और वीर्य उष्ण हो; ऐसे द्रव्योंके गुण-कर्म केवल रसके उपदेशसे अर्थात् तत् तत् रसके जो गुण कर्म लिखे गये हैं उनपरसे ही जानने-बताने चाहिए। मधुर रस शीतवीर्य है, अम्ल और लवण रस उष्णवीर्य है, विपाक रसोंके तुल्य फल( गुण-कर्म )वाला होता है इस प्रकार ऐसे द्रव्य रस, वीर्य और विपाकमें अविरुद्ध होनेसे उनका केवल रसोपदेशसे ही तत्तद्रसके गुण-कर्म और दोषप्रकोपकल वा दोष. प्रशमकलका बोध हो जाता है। अत. तन्त्रकारों ने प्रायः ऐसे द्रव्योंके गुणोंमें मधुरः, अम्ल., कटुक , इतना ही सक्षेपमें लिख दिया है। परंतु जो मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक और कषायरसवाले द्रव्य वीर्य और विपाक्से विपरीत हैं, ऐसे द्रव्योंके गुण- कर्म वीर्य और विपाकसे कहे जायंगे । जैसे आनूपमांस मधुर होनेपर भी उष्ण वीर्य है, उसके गुण-कर्म वीर्यसे जानने चाहिए । तथा वृहत्पञ्चमूल तिक्त और कषाय रसवाला होनेपर भी उसके विपरीत उष्णवीर्यवाला होनेसे उसके गुण-कर्म वीर्यके अनुसार होते हैं, क्योंकि वीर्य रस और विपाक दोनोंका पराभव करके अपना कार्य करता है । अन्य विरुद्धवीर्यके उदाहरण-लवण रस गुरु, निग्ध और उष्ण वीर्यवाला होता है, परंतु सैन्धव लवण होनेपर भी उष्ण नहीं किन्तु शीतवीर्य है; अम्ल रस लघु, स्निग्ध और उष्ण वीर्यवाला होता है, परंतु आँवले अम्ल होनेपर भी शीतवीर्य हैं; तिक रसवाले द्रव्य शीत वीर्यवाले होते हैं, परंतु आक, अगर और गिलोय तिक्त होनेपर भी उष्ण- वीर्यवाले हैं, अतः ये सब वीर्यसे विपरीत होनेसे उनके गुण-कर्म उनके वीर्यपरसे कहे गये हैं। विपाकविरुद्धके उदाहरण-जैसे-कैथका फल अम्ल होनेपर भी प्राही है, इससे अनुमान होता है कि इसका विपाक कट है, और कटुविपाक होनेसे अम्ल होनेपर भी ग्राही है। कटु द्रव्य कटुविपाकवाले होनेसे उष्णवीर्य और कटुविपाक शुक्रन होनेसे अवृष्य होते हैं, परतु सोंठ और पीपल मधुरविपाक होनेसे वृष्य हैं। ऐसे द्रव्योंके गुण- कर्म विपाकपरसे जानने चाहिए । कषाय रस स्तम्भन और शीतवीर्य होता है, परंतु हरड कषाय होनेपर भी रेचन और उष्णवीर्य है। ऐसे द्रव्योंके गुण-कर्म वीर्य और विपाकसे जानने चाहिये । तुल्यरसवाले द्रव्यों में भी गुणोंमें अन्तर देखा जाता है, इस .
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १७७ लिये सब द्रव्योंका उपदेश रसोंसे नहीं हो सकता। अत: जिन द्रव्योम रस, वीर्य और विपाक समान हों उनके गुण-कर्म रसोंसे और जिनमें रससे विपरीत वीर्य और विपाक हों उनके गुण-कर्म वीर्य या विपाकसे जानने चाहिए। क्योंकि विपाक रसका और वीर्य रस तथा विपाक दोनोंका पराभव करके अपना कार्य करता है "रस विपाकस्तो वीर्य प्रभावस्तान्यपोहति"। केपा द्रव्याणां रसभ्य एवं गुणा दोपप्रकोपकत्व-प्रशमनत्वं च विज्ञेयम् ?- तत्र यन्मधुरं रसविपाकयोः शीतवीर्य च द्रव्यं, यच्चाम्लं तयोरुष्ण- वीर्य च, यद्वा कटुकं, तेषां यथावं रसेभ्यः प्रायो गुणान् दोपकोप- शमनत्वं च विद्यात् (म. स. सू. भ. १७)॥ मनन्तरं वाग्भटस्तत्र यन्मधुरमित्यादिना प्रकृतं प्रस्तौति । यद्रव्यं मधुररसं, मधुर- विपार्क, शीतवीर्य च; तथा तयो रस-विपास्योरम्लं सदुष्णवीर्य; यद्वा कटुकं तयो रस-विपाकयोरुष्णवीयं च; तेषां त्रयाणामपि यथात्मीयरसगुणान् सातिशयान् विद्यात् । रसानुरूपेण च तेषां दोपकोप-शमौ । तेनैतदुक्तं भवति-यत्र रस-वीर्य- विपाकानामेकजात्यन्वयरवं तत्रैकगुणस्वमपि । तथा च-क्षीरे मधुररस-विपाके शीतवीर्य च मधुररसवत् श्लेष्मकोपनत्व, वात-पित्तशमनत्वं च; एवं मदिराया मम्लरस-विपाकाया उष्णवीर्यायाश्चाम्लरसवद्वातशमनत्वं पित्त-श्लेष्मप्रकोपनत्वादिक घ; कटुरस विपाकस्योष्णवीर्यस्य मरिचस्य कटुकरसवत् श्लेष्मशमनत्वं वात-पित्त- प्रकोपन घ (इन्दुः)॥ जो द्रव्य रस और विपाक दोनोंमें मधुर तथा शीतवीर्य हो, जो द्रव्य रस और विपाक दोनोंमें अम्ल तथा उष्णवीर्य हो और जो द्रव्य रस तथा विपाक दोनोंमें कटु और उण्णवीर्य हो, उन द्रव्योंके गुण तथा वातादि दोषोंका प्रकोपकल और प्रशमनल प्रायः उनके रसोंसे (रसोंके गुणों के अनुसार) जानना चाहिये। पूर्वोक्तनियमापवादः- रसादिसदरेण त्वन्यथात्वम् । यथा-मधु मधुरं श्लेष्माणं शमयति कटुविपाकतया सकपायत्वाद्रौक्ष्याच्च, वातं जनयति शीतवीर्यत्वाचा तथा यवोऽपि आनूपौदकपिशितं मधुरमपि पित्तं करोति, उष्णवीर्य- त्वात्। तथा तैलं मधुरं कटुविपाकतया विपाकत एव पद्धविण्मूत्रम् अम्लं कालिकं कर्फ जयति, रूक्षोप्णत्वात्। कपित्थं तु रोक्ष्यात् कर्फ, पित्तं तु शीतवीर्यतया; आमलकं पित्तं शीतवीर्यत्वात् स्वादुपाकतया च, कर्फ रोक्ष्यालाघवाच; लवणं सैन्धवं खादुपाकतया पित्तं जयति, लाघवात् कर्फ च; कटुकाऽपि शुण्ठी स्नेहोण्य-स्वादुपाकैर्वात क्षपयति, पिप्पली च लशुनोऽपि नेहोषण्यगौरवैः पलाण्डच; स द्र० ५.१२ -- म. द्रव्यगुणविज्ञानम् । तु स्नेहगौरवाभ्यां जनयति श्लेष्माणम् , वृद्ध मूलकं च स्वादुपाकतया स्निग्धानि तिक्तानि व्याघी विशल्यार्कागुरुण्यष्णवीर्यत्वात् पित्तं जनयन्ति; कपायतिक्तं महत्पञ्चमूलं वातं जयति, न तु पित्तमुग्ण. वीर्यत्वात्। कपायश्च कुलत्थोऽम्लपाकतया च । इत्येतग्निदर्शनमार- मुक्तम् सं. सू. भ. १७)॥ यन्न सु रसादीनां विजास्यन्वयेन सहरमात्र कचिद्गसाधिययेन कार्यकारिख, कचिद्वीर्याधिक्येन, फचिद्विपाकाधिक्येन, इत्यस्यैवाधस्प यथा मधु मधुरमित्यापुदार रणम् । सुबोधम् । घृद्धमूलकस्य निदोपकर्तुः कटुकस्य कफकरवे यदाचार्य वामटेन मधुरपाकिरवं कारणमुकं तत् स्वय हृदयपठितस्यैव वृदमूलकस्य पटुपाकिरवं स्मृतं, किंचाऽन्यत् किंचिदिति न जाने (इन्दुः) । जहां (जिस द्रव्यमें ) रस, विपाक और वीर्य इनका परस्पर सनातीय (एगा- अनुकूल) संवन्ध होता है वहा रसके जो गुण-कर्म शास्त्रमें लिये हैं उन परसे द्रव्यके समप्र गुण-कर्म जानने चाहिये, यह कार लिखा गया है; परंतु जिस प्रच्या रस, विपाक और वीर्य इनका परस्पर विजातीय (एक-दूसरेके विरुद्ध ) सबन्ध होता है उस द्रव्यम रसके गुणों से विपरीत गुण भी पाये जाते हैं। यहाँ केपल उसके रोंके गुणोंसे द्रव्य के समग्र गुण-कर्म नहीं बताये जा सकते। जैसे-मधु (शहद) मधुर रनवाला है तथापि यह कुछ कषाय, रूक्ष और कटुविपाकवाला होनेसे कफका शमन करता है तथा शीतवीर्य होनेसे वायुको उत्पन्न करता है । वैसा ही जाके विषयमे भी जानना चाहिये । भानूप और औदक प्राणियोंका मास मधुर होनेपर मी उष्णवीर्य होनेसे पित्तको बढ़ाता है। तैल मधुर होनेपर भी कटुविपाक होनेसे मल मूत्रका कब्ज करता है । कॉजी अम्ल होनेपर भी रूक्ष और उप्ण होनेसे कफको शान्त करती है। कैथका फल अम्ल होनेपर भी रूक्ष होनेसे कफको और शीतवीर्य होनेसे पित्तको शान्त करता है। आँवले अम्ल होनेपर भी मधुरविपाक और शीतवीर्यसे पित्तका और रूक्ष तथा लघु होनेते कफका शमन करते हैं । सेन्धानमक मधुर विपाकसे पित्तका और लघु होनेसे कफका शमन करता है । सोंठ और पीपल कटुरसवाली होनेपर भी मधुर विपाक, रूक्ष और उष्ण वीर्यसे वायुका शमन करती है । लहसुन और प्याज कटुरसवाले होनेपर भी निग्ध, उष्णवीर्य और गुरु होनेसे वायुका शमन करते है। प्याज निग्ध और गुरु होनेसे कफको बढ़ाता है । पकी मूली मधुरविपाक होनेसे कफको बढाती है। कटेरी, पाह आक और अगर तिकरस और स्निग्ध होनेपर भी उष्णवीर्य होनेसे पित्तको बढ़ाते हैं। बृहत्पञ्चमूल कषाय और तिक रसवाला होनेपर भी उष्णवीर्य होनेसे वायुका शमन करता है, किन्तु पित्तका शमन नहीं करता। कुलथी कषायरसवाली होनेपर भी मम्स विपाक होनेसे वायुका शमन करती है, किन्तु पित्तका शमन नहीं करती। H पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १७९ ' रसानां गुणतारतम्यम्- रोक्ष्यात् कपायो रूक्षाणामुत्तमो, मध्यमः कटुः। तितोऽवरस्तथोष्णानामुष्णत्वाल्लवणः परः॥ मध्योऽम्लः, कटुकश्चान्त्यः, स्निग्धानां मधुरः परः। मध्योऽम्लो, लवणश्चान्त्यो रसः स्नेहान्निरुच्यते ॥ मध्योत्कृष्टावराः शैत्यात् कपाय-खादु-तिक्तकाः। खादुर्गुरुत्वादधिकः कपायाल्लवणोऽवरः ॥ अम्लात् कटुस्ततस्तितो लघुत्वादुत्तमोत्तमः । केचिल्लंघूनामवरमिच्छन्ति लवणं रसम् ॥ गौरवे लाघवे चैवें सोऽवरस्तूभयोरपि । (च. सू. अ. २६)। रौक्ष्यादित्यादि । रौक्ष्येण कपाय उत्तम इति रूक्षतमः, तिक्तो रूक्षः, कटुस्तु मध्यो रुक्षतरः; एवमन्यत्रापि । कटुकश्चान्त्य इति अवर इत्यर्थः । एवं लवणश्चान्त्य इति भयर इत्यर्थः । लवणोऽवर इति गुरुत्वेनेत्यर्थः । अम्लात् कटुरित्यादौ अम्लात् कटुर्लघुः, ततः कटुकादुत्तमात्तिक्तो लघुत्वेनोत्तमोत्तमः, उत्तमात् कटुकादुत्तम उत्तमोत्तमः । एकीयमतमाह-केचिदित्यादि । एकीयमतं वचनभझ्या स्वीकुर्वन्नाह- गौरव इत्यादि । एतेन गौरवे लाघवे चावरत्वं लवणस्य स्वीकुर्वन् गौरवेऽवर इत्यनेनाम्ल-कटु-तिक्तेभ्यो गुरुवं स्वीकरोति लवणस्य, लाघवे चावर इत्यनेनाम्लादपि बंधुनोऽरुपं लाघवं लवणस्य स्वीकरोति । न च वाच्यम्-अम्ले पृथिवी कारणं, लवणे तु तोयं, ततः पृथिव्यपेक्षया तोयजन्यस्य लवणस्यैव लाघवमुचितमिति यतो न भूतनिवेशेन गौरव लाघवे शक्येते अवधारयितुं, तथा हि-तोयातिरेककृतो मधुरः पृथिव्यतिरेककृतात् कषायाद् गुरुर्भवति (च. द.)॥ रसाः कट्वाल-लवणा वीर्येणोष्णा यथोत्तरम् । तिक्तः कपायो मधुरस्तद्वदेव च शीतलाः॥ तिक्तः कटुः कषायश्च रूक्षा वद्धमलास्तथा। पट्सम्ल-मधुराः स्निग्धाः सृष्टविण्मूत्र-मारुताः ॥ १ तिक्तात् कपायो मधुरः शीताच्छीततर. पर' इति पा० । २ 'लघुत्वादुत्तमो मतः' इति पा० ॥ ३ "मतान्तरमाइ~केचिदित्यादि । प्रतिसंस्कर्ता उभयोरपि मतयोरवबोधार्थ मतद्वय सकलय्य दर्शयति-गौरव इत्यादि । उभयोरपीति मतदयेऽपि स लवणोऽवरः, अग्निवेशमते गौरवेऽवर', मतान्तरे लाघवेऽवरः । एतेन गौरवेऽवर इति येनोच्यते तेनापि किंचिछधुत्व खीक्रियत एव, तथा लाघवेऽवर इति मतेऽपि किंचिद्गुरुत्वमर्थायातमेवेति न कश्चिदर्थमेद इत्यधः" इति शिवदाससेनः । चैवं' इति पा०॥ ५ अल्पमिति अवरम् । - - - " - १८० द्रव्यगुणविज्ञानम् । कपायो गुरुत, परमं गुरू पटोः कषायस्तस्माच्च मधुरः परमं गुरुः। लघुरम्लः कटुस्तस्मात्तस्मादपि च तिक्तकः॥ (अ. ह. सू. अ. १०)। कट्वाल-लवणा रसा यथोत्तरमुष्णवीर्याः । कटुरुष्णः, अम्ल उष्णतरः, लवण उष्णतमः । एवमुत्तरत्रापि यथोत्तरत्वं योज्यम् । तिक्कादयश्च तद्वदेव यथोत्तर शीतवीर्याः । तेन तिकः शीतवीर्यः, कपायः शीतवीर्यतरः, मधुरः शीतवीर्यतम इति स्थितम् । तिक-कटु-कपाया रूक्षा विष्टम्भकृतश्च । तथेति यथोत्तरमित्यर्थः । पदादयः स्निग्धा निःसारितविण्मूत्र वाताश्च । तथेत्यत्रापि वर्वते । अर्थात् लवणात् कायान्मधुरः अतिशयेन गुरुरित्यर्थः । अम्लो लघुः, तस्मात् अम्लात् कटुर्लघुवरः, तस्साच्च कटोस्त्रित्तो लघुतमः (अ. द.)। मय रसानां गुणतारतम्यम् । तत्र वीर्यतारतम्यमाह-रसा इति । कटुको रस उम्ण- वीर्यः, ततोऽम्ला, ततोऽपि लवणः । तितो रसः शीतवीर्यः, ततः कपाया, ततोऽपि मधुरः । तद्वदेवेति वीर्येण यथोत्तरं च । तिको रूझो बद्धमकच, ततः कटु, ततोऽपि कषायः । लवणः निग्धः सृष्टमलच, ततोऽम्लः, ततोऽपि मधुरः । लवणो गुरुः, ततः कषायः, ततोऽपि मधुरः । अम्लो लघुः, ततः कटुः, ततोऽपि तिककः । अनापि 'प्रायः' इत्यनुवर्तते । तेनाम्लस्याप्यामलकस्य शीतवीर्यस्वमित्यादि स्वयमूस्यम् । अत एव "मधुराम्ल-लवणाः स्निग्धा गुरवश्व, कटु-तिक्त-कपाया स्क्षा लघवश्च ।" (सु. सू. अ. ४२, ६) इति सुश्रुतोकमम्लस्य गुरुत्वं, कषायस लघुरवमप्युपपन्नम् ॥ रूक्ष रसोंमें कषाय रस उत्तम (रूक्षतम ), कटु मध्यम (रूक्षतर) और तिक भवर-हीन (रूक्ष) है । उष्ण रसोंमें लवण उत्तम (उष्णतम), अम्ल मध्यम (उष्णतर) और कटु अवर (उष्ण ) है । स्निग्ध रसोंमें मधुर श्रेष्ठ (स्निग्धतम), अम्ल मध्यम (निग्धतर) और लवण अवर (निग्ध ) है । शीत रसोंमें मधुर उत्तम (शीततम), कषाय मध्यम (शीततर) और तिक्त भवर (शीत ) है । गुरु रसोंमें मधुर उत्कृष्ट (गुरुतम), कषाय मध्यम (गुरुतर) और लवण अधम (गुरु) है लघु रसोंमें तिक उत्तम (लघुतम ), कटु मध्यम (लघुतर) और अम्ल अधम (लघु) है। कई आचार्य लवण रसको लघुओंमें अवर मानते हैं (च.)। कटु, अम्ल और लवण ये रस उत्तरोत्तर उष्णवीर्यवाले हैं । तिक, कषाया और मधुर ये उत्तरोत्तर शीतवीर्य हैं । विक्त, कटु और कषाय ये तीनों रस उत्तरोत्तर सक्ष हैं और मलको बाँधनेवाले हैं । लवण, अम्ल और मधुर ये तीनों रस उत्तरोत्तर स्निग्ध हैं और मल, मूत्र तथा अधोवातको साफ लानेवाले हैं। लवणसे कषाय और उससे मधुर गुरु है । अम्ल्से कटु और उससे विक्त लघु है (अ.ह.)।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । के रसाः कं दोपं जयन्ति फोपयन्ति च- स्वाद्वम्ल लवणा वायुं, कपाय-खादु-तिककाः। जयन्ति पित्तं, लेप्माणं कपाय-कटु-तिक्तकाः॥ कसम्ल-लवणाः पित्तं, खाद्वम्ल-लवणाः कफम् । कटु-तिक्त कपायाश्च कोपयन्ति समीरणम् ॥ (च. सू. अ. १)। रसानामुपयुक्तरं कार्यमाह-वाहग्लेत्यादि । भत्र घ वायोनीरसस्यापि रस. सहचरितस्निग्धरवादिगुणैर्विपरीतेः प्रशमो ज्ञेयः । एवं मधुररसस्यापि श्लेष्मणोऽम्क- लवणाभ्यां सिग्धस्वामिप्यन्दित्वादिसहचरितगुणयोगादेव वृद्धिः । अन्न व रसा वातादीनां प्रशमकस्येन नोकास्ते वर्धका बोद्धव्याः । यदाए वाग्भट:-- "वत्राथा मारुतं तन्ति प्रयस्तिकादयः कफम् । कपाय-तिक्त-मधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते" (वा. सू. भ. १) इति । रसकर्मातिदेशेनेव गुण-धीर्य-विपाकानामपि कर्म- निर्देशः कृत एव । यतो मधुरादिरसेनैव सर्वगुणान् वीर्य-विपाका निर्देक्ष्यस्याय- भद्रकाप्यीये-तत्र स्वादुः" (च. सू. अ. २६) इत्यादिना; तथा "कटु-तिका कपायाणां विपाकः प्रायशः कटुः" (च. सू. अ. २६); तथा "अम्लोऽम्लं पण्यते खादुर्मधुरं लवणस्त्रया" (च. सू. अ. २६); तथा "शीतं वीर्येण यतव्यं मधुरं रसपाकयोः । तयोरम्लं यदुष्णं च यचोष्णं कटुकं तयोः" (च. सू. म. २६) इत्यादिना (च. द.)! जयन्ति पामयन्ति । ४४ । एतदुकं भवति-मधुरो वात-पित्तन्नः, श्लेष्मकरः । अम्लो वातं शमयति, कफ-पित्ते च करोति । वणो मारुतं हन्ति, कफ-पित्ते तु जनयति । कटुकः कर्फ नाशयति, वात-पित्ते तु कुरुते । तिका कफ-पित्ते जयति, वातं जनयति । कपायः कफ-पित्ते हन्ति, वातं तु कोपयति (यो.)। कर्माण्याह-स्वाहम्लेत्यादि । स्वादम्ल-लवणा वायुं जनयन्ति पूर्व समं कुर्वन्ति, सम हासयन्ति, क्षीणमतिहासयन्ति । नीरसत्वेऽपि वायो। स्वादादिरससहचरितैः स्निग्ध-गुरुत्वादिभिर्मधुरः, सिग्धोष्णादिभिरम्लः, स्निग्भोष्ण- गुरुग्वादिमिर्लयणः, इत्येते वातविजेतृत्वेन व्यपदिश्यन्ते । कपाय-स्वादु-तिकका पित्तं जयन्ति; कपायः शैत्य-गौरवाभ्यां, स्निग्ध-शीत-गुरुवैः मधुरः, शैत्य-रोक्ष्याया तिका, तिकस्यापि पित्तस्य तिक्केन जयो वीर्याद् , विदग्धस्ये सामस्वे च । श्लेष्माणं कपाय-कटु-तिकका जयन्ति रौक्ष्येण, लघूष्ण-रूक्षत्वैः, रौक्ष्येण, लघूष्ण-रूक्षत्वैः, रूक्ष-लघुस्वाभ्यामिति क्रमेणोनेयम् । एषां वातादिप्रामकत्ववचनेन कटादीनामेभ्यो भियानां वातादि- १. "तृष्ण-तीक्ष्ण द्रव-सर-तिक्तत्वविपरीते. शैत्य-मान्ध-सान्द्र-स्थिर-कपाय-माधुर्यगुणैः पफास पित्तस्य प्रशमनम्। आमस्याम्लस्य विपरीतेन तिवेन प्रशमः । कट्दिति तिक; तेन तिक्त- रसस्य पित्तस्य विदग्धावस्थायामम्लरसत्वे तद्विपरीतत्वेन वितरसपित्तप्रकोपनाशकत्वेनोप पद्यते । उक्त च सुश्रुते-"पित्तं xxx कटुरसं चैव विदग्धं चाम्लमेव च" (सु. सू. ) इति "सलेहमुष्ण तीक्ष्ण च" (च, सु. म. १) इत्यस्य व्याख्यायां गात्परः । - १८२ द्रज्यगुणविज्ञानम् । कोपनत्यमुग्नेयम् xxxभनो प पटन्सि-पर-TATE ARोपन, समीरणम् । फपाय-कटुतिशास, स्याहमणागफम्" र । जय पर लवणा. पितं फोपयनित रक्षोण पदो मा पि नवं करोति उपण तीक्ष्ण-पाटुरवः, क्षीण समं पा एवं पा सको मो सो शि सममुष्ण तीक्ष्णस्वादिभिर परोत, साणं मम पा हदंगा, सोरम रन पित्तं समं वर्धयति उष्णस्व-नीमायाम्यो, दागं सा गा गुर्द या मोमि । -स्वाहम्ल-लवणाः कर्फ फोपयन्ति मधुरो रमा बिगर-भीग गुटकः पं समं पर करोति, अग्लो रस निग्धस्पेन, लामो रमः विमल गुग्णाम्याग म मृदं वा । फटु-तिस-पापा गोपन्धि मीरणमिति महको रमः समीर लघृष्ण-रक्षरः, तितको रमा शीरा नपुग्दै., कपायो रमः गीतस्मयाम्मा समं समीरणं वृवं फरोति, क्षीणं समं गुर या (ग.) || तत्र दोपमेकै प्रयखयो रसा जनयन्ति, प्रयखयोपशमयन्ति । तद्यथा-कटु-तिक्त-कपाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ल लयणास्तवेनं शमयन्ति; कद्दम्ल-लवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुर-तिक-कपायास्वेन- च्छमयन्ति; मधुराम्ल-लवणाः ग्लेपमाणं जनयन्ति, कटु-तिता कराया. स्त्वेनं शमयन्ति (च. वि . १)॥ रसानामसंसृष्टानां फर्माहत्यादि । अनेन रसम्मोपदेशेन गोपालामा तत्तद्सोरपायरय पधा तत्तदसोपशमनीयागुतं गयति । फटु तित-पाया मातं जनयन्तीति असति परिपन्थिनीति शेय, तेनाफांगुर गुरच्यादीनां निकानामपि पाताजनकरये न दोपः । तत्र गुप्णपीयंता परिपयिनी वियते, रोन न ते गातं जनयन्तीत्याधनुसरणीयम् । एनमिति पदेन पा कटादिगो पायुममेव मधुरादयः सर्वात्मवैपरीत्याद्विदशेपेण शमयन्तीति दर्शयति; जागरणादिने हि पायी जागरना. दिविपरीताः स्वमादय एवं विशेपेण पध्याः । एवं पित-पागोरपि पनदेनशाम योस्तास्पयं दर्शयति (च. द.)। रसानां प्रभायमाह- दोपमेकैमिति । दोपशमनत्वं दोपकोपनरवं च रसानां प्रमावः, "हिताहिती घ प्रभाव" (च.सू. भ. २६) इति । कटु-तित कपाया यातं जनयन्ति, फटु-ति-पायाणो वातजननावं सामान्यात् । मधुराग्ल-लवणास्तु एनं पारा शमयन्ति, मधुरांम्ल-लवणानो पातराम- नवं च विपर्ययात् । सर्वत्र वृद्धि-हासयोः सामान्य विपर्ययनियतवार । तदुस- "सर्वदा सर्वभावानां सामान्य वृद्धिकारणम् । हासहेतुर्विशेषत्र" (च. सू. भ..) इति । विशेपो विपर्ययः, "विशेषस्तु विपर्यय." (च. सू. स. १) इति । "एते रसाः स्वयोनिवर्धनाः, अन्ययोनिप्रशमनाच" (सु. सू. भ. ४२) इत्याह सुश्रुतः। रसानां समानगुणत्वं समानभूतभूयिष्टत्वात् । तथा च पारवाकाथ- धातुभ्यां वायुः, पित्तमामेयम्, भम्भाविवीभ्यां क्षेप्मा । पृषियी-सोमयो हुस्या- h । 1 पूर्वाध रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । म्मधुरः, भू-तेजसोरम्लः, अम्ल-तेजसोलंवणः, अनिलानलयोः कटुकः, वाय्वाका- शयोतिक, वायु-पृथिव्योः कपायः, एवं समानभूतभूयित्वात् कटु-तिक्त कषाया वासस्य समानगुणाः, कट्वाल-लवणाः पित्तस्य, मधुराम्ल-लवणाः श्लेष्मणः; तस्मात् कटु-तिक कपाया वात जनयन्ति, कटुम्ल-लवणाः पित्तं, मधुराम्ल-सवणाः लेप्माणम् । मधुराम्ल कवणा वावं शमयन्ति, विपरीवगुणरवात; एवं मधुर-तिक्त कपायाणां पित्तशमनरवं, कटु-तिक्त पायाणां श्लेप्मशमनत्वं च विपर्ययात् । रसानामेवं दोषकोप शमनस्यं दीर्घजीवितीयेऽप्युक्तम् । ४ ४ ४ । तदुक्तं मेलेनापि-"तन वायुगुणैस्तुल्यान् कपाय-फटु-तिक्तकान् । कट्सम्ल-कवणैस्तुल्यान तथा पित्तगुणान् विदुः ॥ मधुरं लवणाग्लो च विद्यात् कफसमान् रसान् । तस्मादम्यस्यमानौहे दोपः प्रवर्धते ॥ गुणसाम्याद्विवर्धन्ते यथास्वं धातवो नृणाम् । यथैकत्र कृतौ राशी द्वौ महत्वमिहच्छतः ॥ रसैस्तद्विपरीतैश्च यान्त्येते क्षयमाहृतः । ययोदकं समासाद्य शान्ति गच्छति पावकः ॥ कपाय-तिक्त कटुकै ही रूझो विवर्धते । मारुतः, स्निग्धभावाच ततोऽन्यैरुपशाम्यति ॥ कदम्क-लवणैः पित्तमुप्णमुष्णविवर्धते । शीतैः शाम्यति शेपैस्तु गुणानामप्यशेषतः ॥ निग्धः निग्धः कफश्चापि वर्धते मधुरादिभिः । रसैः शाम्यति रूझैश्च कषाय-कटु-तिक्तकैः ॥ एकैकमेव सामान्याद् वर्धयन्ति प्रयत्रयः । नन्ति चान्यगुणस्वेन रसा दोष शरीरिणाम" (मेलसंहिता, वि. अ. १) इति (यो.)॥ तत्राद्या मारुतं नन्ति त्रयस्तिकादयः कफम् । कपाय-तिक-मधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ॥ (अ. स. सू अ. १; भ. ह. सू. अ. १)। एषां च रसानां दोपविशेषप्रशमन-प्रकोपनविभागं तत्रेत्यादिना दर्शयति । भन्ने तु कुर्वते इत्येतत् प्रन्तीत्येतच मारतादिभिः प्रत्येकमभिसंबध्यते । तेषु रसेषु मध्ये भायायः स्वादुम्ल-लवणा मारुतमनिलं नन्ति, अन्ये तु तितोषण-कषायाः तमेव चानिलं कुर्वते; तिक्कादयत्रयः तिकोपण-कपायाः कर्फ मन्ति, मन्ये तु मथुराम्ल- लवणाः तमेव कर्फ कुर्वते; कपाय-तिक मधुराः पित्तं प्रन्ति नाशयन्ति, अन्ये त्वम्ल- लवणोपणाः तदेव पित्तं कुर्वते (इन्दुः) । तत्र तेषु रसेपु मध्ये xxx एतेनेदमुकं भवति-मधुरो वात-पित्तनः, श्लेष्मकर); अम्लो वातं हन्ति, कफ-पित्ते तु जनयति; लवणो मारुतं हन्ति, कफ-पित्ते तु कुरुते; तिक्तः कफ-पित्ते नाशयति, घातं तु जनयति कपणः कफ नाशयति, वात-पित्ते तु जनयति; कषायः कफ-पित्ते हन्ति, वातं तु करोतीति (अ. द.) । वातादीनां साक्षानुसाकथनादस्पष्टे दोष-द्रव्ययोः साधर्म्य-वैधयें स्पष्टयति-तत्राचा इति । ४४४। तेन तितोषण. कपाया वायुं कुर्वन्ति, स्वाद्वम्ल-लवणाः कफम्, अम्ल-लवण-कटुकाः पित्तम् । अत १८४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । एव ते ते रसास्तत्र तत्र सन्तीत्यनुमेयम् । उक्तं च कपिलेन-"कदम्ल-लवणं पित्तं, स्वादुम्ल-लवणः कफः । कपाय-तिक्त-कटुको वायुईष्टोऽनुमानत." इति (हे.)॥ तत्र मधुराम्ल-लवणा वातघ्नाः, मधुर-तिक्त-कपायाः पित्तनाः, कटु-तिक्त-कपायाः श्लेष्मघ्नाः । तत्र वायोरात्मैवात्मा, पित्तमाग्नेयं, श्लेष्मा सौम्य इति । त एते रसाः स्वयोनिवर्धना अन्ययोनि- प्रशमनाश्च । ४ ४ ४ । तत्र शैत्य-रोक्ष्य-लाघव-वैशद्य-वैप्टरभ्य- गुणलक्षणो वायुः, तस्य समानयोनिः कषायो रसः; सोऽस्य शत्याच्छैत्यं वर्धयति, रौक्ष्यागौक्ष्य, लाघवाल्लाघवं, वैशधाद्वैशयं, वैष्टम्भ्याडैप्टरभ्यमिति । औष्ण्य-तैय-रौक्ष्य लाघव वेशद्यगुणलक्षणं पित्तं; तस्य समानयोनिः कटुको रसः सोऽस्य औष्ण्यादौष्ण्यं वर्धयति, तैपण्यात्तैक्ष्ण्यं, रौक्ष्याद्रौक्ष्य, लाघवाल्लाघवं, वैशद्याद्वैशघ. मिति। माधुर्य-स्नेह-गौरव-शैत्य-पैच्छिल्यगुणलक्षणः श्लेष्मा; तस्य समा नयोनिर्मधुरो रसः; सोऽस्य माधुर्यान्माधुर्य वर्धयति, स्नेहा नेहं, गौरवागौरवं, शैत्याच्छैत्यं, पैच्छिल्यात् पैच्छिल्यमिति । तस्य पुन- रन्ययोनिः कटुको रसः स श्लेष्मणः प्रत्यनीकत्वात् कटुकत्वान्माधुर्य- मंभिभवति, रौक्ष्यात् स्नेहं, लाघवागौरवम्, औषण्याच्छैत्यं, वैशद्यात् पैच्छिल्यमिति । तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तं भवति (सु. सू भ. ४२) ॥ पण्णां रसानां क्रियाविशेषं दर्शयन्नाह-तत्रेत्यादि । दोषाणामुत्पत्तिकारणमाह- तन्नेत्यादि । आस्मैवात्मेति मात्मैव योनिः वायुतो वातोत्पत्तिरित्यर्थः; पित्तमाग्नेयमिति अनलः पित्तस्य योनिरित्यर्थः, श्लेष्मा तु सौम्य इति सोमादुत्पद्यत इत्यर्थः । स्वयोनिवर्धना इति येभ्यः कारणेभ्यो मधुरादयो रसा उत्पद्यन्ते तानि वर्धयन्ती- त्यर्थः।xxx। समानयोनिः तुल्ययोनिरित्यर्थः। तस्य श्लेष्मणः । प्रत्यनीकरवात् विरुद्धत्वात् । निदर्शनमात्रमुक्तमिति दृष्टान्तमात्रमुक्तम् (ड.) सत्र मधुरेत्यादिना वातादिनाशकत्वे रसद्वि-त्रिकानामभिहितेऽपि रसानां तर-तमभावेनापि शमकत्वं 'तस्य पुनरन्ययोनिः कटुको रस' इत्यादिना वक्ष्यमाणगुणयोगाशेयम् ।xxx। स्वयोनिवर्धना इति स्वकारणवातादिवर्धनाः। तत्र वातारब्धा ये रसाः कटु-तित कपायास्त्रे वातवर्धनाः, ये चाग्निकारणकाः कटुकाम्ल-लवणास्तेऽग्निरूपपित्तवर्धना, यौ जलकारणको मधुराम्लौ तौ जलात्मकं सौम्यं श्लेष्माणं वर्धयतः, तथा लवणोऽपि सौम्यपृथिव्यारब्धतया श्लेष्माणमपि वर्धयति । ये तु भूयसा अनिलाचारधाम कषाय-कटुक-मधुरास्ते भूयसा वात-पित्त-कफान वर्धयन्तीति तत्रेत्यादिनाऽत्रैव दर्श- यिष्यति । एवमन्ययोनिप्रशमना इत्यपि व्याख्येयम् ।xxx। उक्तं स्वयोनि- वर्धनत्वं व्याकरोति-तत्रेत्यादि । वैष्टम्भ्यं विष्टम्भजनकत्वम् । कषायो रसो यद्यपि गुरुश्वरके प्रोक्तः, तथाऽपि तस्य लघुपाकतया इह वातलाघवेन लघुवं तुल्यमुकम् ।
पूर्वार्ध रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १८५ तित्परसो यपि वातयोनिस्तथाऽपि तस्य वातं प्रति सर्वथा तुल्यगुणताभावानोदा- हरणम् । एवं पित्तसमानयोनितया कटुके चोदाहते, लेप्मसमानयोनितया मधुरे चोदाहते, पित्तयोनितया श्लेप्मयोनितया वा अम्ले लवणे चानुदाहृते व्याख्येयम् । तस्य पुनरिस्यादिना अन्ययोनिप्रधान कटुकमाह । पित्तानिलयोरप्यनेन न्यायेना- म्ययोनिप्रधानेन मधुरेण शमनं, तथा तिक्त-कपायाभ्यां च श्लेष्मरामनम् , इत्यादि व सूचयवाह-वदेतनिदर्शनमात्रमिति । निदर्शनं दृष्टान्तः (च. द.)। त एत इत्यादि । ते प्राग्वणो दोपप्रकोपणत्वेनोपदिष्टा एते मधुरादयो रसाः । स्वयोनिः "भूम्यम्युगुणाहुल्यान्मधुरः" (सु. सू. भ. ४२) इत्यादिस्मरणात् तसद्भूम्य- वादियोंनिरिव योनिर्यस्य तस्य वर्धनाः स्वयोनिवर्धनाः, एतेनैवान्ययोनिप्रश- मनामेति व्याख्यातप्रायम् । मत उपपलं भवति-मधुरादीनां वातादिप्रशमनत्वं, कवादीनां च वातादिप्रकोपणत्वं तत्तद्गुणविवेकतो भेदाभेदादित्ययमभिसंधिः । ५ x ५ । संप्रति सुत्रप्रतिपत्तये रसानां स्वयोनिवर्धनस्वमन्ययोनिप्रशमनवं चोदाहरणेनावगमयति-तनेत्यादिना । इदमनावधेयं-'शुक्लः कम्बलो, रोहिणी धेनुः, नीलमुत्पलमिति द्रव्यस्यैव तस्य तस्य तेन तेन विशेषणेन प्रतीयमानरवाद् मथ्यात्मकता गुणस्य' इति येपो दर्शनं, तन्मतमवलम्व्येदमुच्यते-'सोऽस्य शैत्यात् दोस्यम्' इत्यादि, नातो रसानां गुणत्वेन गुणववाभावेऽपि गुणवत्त्वेनायमुपदेशोऽनु- पपलः, भत एवोक्तं चात्रेयेण-"गुणा गुणानया नोक्तास्तस्मादसगुणान् भिपक् । विद्याद् द्रव्यगुणान्" (च.सू. म.२६) इति । तस्य पुनरित्यादि । न तावदेकान्तेन सर्वभिपजः स्वयोनिवर्धनप्रकारपरिज्ञानादेवान्ययो निप्रशमनप्रकारमपि विज्ञास्यन्ति, नापि च यथाकथंचिदुपदेशगम्यस्यार्थस्यास्य यथाक्रममुदाहरणत्रितयेनोपदेशः प्रशस्यत इति संप्रधार्य श्लेष्मणः संनिहितस्वात् क्रमं हित्वेदमुच्यते--तस्य पुनरन्य. योनिरिति । निदर्शनम् उदाहरणम् । परिशिष्टं निगदव्याख्यातम् (हा.)॥ वात, पित्त, कफ इनमेंसे एक-एक दोपको तीन-तीन रस उत्पन्न करते हैं और तीन-तीन रस उनके प्रकोपको शान्त करते हैं । जैसे-कटु, तिक्त और कषाय ये तीन रस वायुको उत्पन्न (प्रकुपित) करते है और मधुर, अम्ल तथा लवण ये तीन रस प्रकुपित वायुको शान्त करते हैं । कट, अम्ल और लवण ये तीन रस पित्तको उत्पन्न (प्रकुपित) करते हैं और मधुर, तिक तथा कषाय ये तीन रस प्रकुपित पित्तका शमन करते है। मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस कफको उत्पन्न (प्रकुपित) करते हैं और कटु, तिक्त तथा कपाय ये तीन रस प्रकुपित कफको शान्त करते हैं । वायु (वातदोष) वायु ही से उत्पन्न होता है, पित्त अग्निसे और कफ जलसे उत्पन्न होता है । अत: जो रस जिन महाभूतोंकी अधिकतासे उत्पन्न होता है, वह स्वभावसे ही १ पित्त पकावस्थामें तिक्त और विदग्ध-आम अवस्थामें अम्ल होता है । पक पित्तका उसके विपरीत मधुर और कपाय रससे तथा विदग्ध पित्तका उसके विपरीत तिक्तसे प्रशमन होता है।
१८६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । उस महाभूतसे उत्पन्न होनेवाले दोषको बढ़ाता है और इससे विपरीत महाभूतसे उत्पने होनेवाले दोषको शान्त करता है (क्योंकि शरीरके धातुओंकी समानसे- वृद्धि और विपरीतसे हास होता है)। जैसे-शैत्य, रौक्ष्य, लाघव, वंशय और वैष्टमय ये वायुके गुण है । उसका समानयोनि और समान गुणवाला कषाय रस है । कषाय रस अपने शैत्यसे वायुके शैत्यको, रौक्ष्यसे रौक्ष्यको, लाघवसे लाघवको, वैशयसे वैशयको और विष्टम्भतासे विष्टम्भताको बढ़ाता है। इस प्रकार कषाय रस सब प्रकारसे वायुको वढ़ानेवाला है । औष्ण्य, तैष्ण्य, रौक्ष्य, लाघव और वैशद्य ये पित्तके गुण हैं । उसका समानयोनि और समान गुणवाला कटु रस है । वह अपनी उष्णतासे पित्तकी उष्णताको, तीक्ष्णतासे तैष्ण्यको, रूक्षतासे रोक्ष्यको और विशदतासे वैशद्यको बढाता है। इस प्रकार कटु रस सब प्रकारसे पित्तको बढ़ानेवाला है । मधुरता, स्नेह, गौरव शैत्य और पैच्छिल्य ये कफके गुण हैं । उसका समानयोनि और समान गुणवाला मधुर रस है, क्योंकि कफ और मधुर रस दोनों जलकी अधिकतासे उत्पन्न होते हैं। इसलिए मधुर रस अपनी मधुरतासे कफके माधुर्यको, स्निग्धतासे स्नेहको, गुरुतासे गौरवको, शीततासे शैत्यको और पिच्छिलतासे पैच्छिल्यको बढ़ाता है। इस प्रकार मधुर रस सब प्रकारसे कफको वढानेवाला है। कफका असमानयोनि कटु रस है; क्योंकि कटु रस अग्निकी और मधुर रस जलकी अधिकतासे उत्पन्न होता है, जो दोनों परस्पर विरुद्ध गुणवाले हैं । इसलिए विरुद्ध गुणवाला होनेसे कटु रस अपने रसके प्रभावसे कफकी मधुरताको, रुक्षतासे कफके स्नेहको, लघुतासे कफके गौरवको, उष्णतासे कफके शैत्यको और विशदतासे कफकी पिच्छिलताको नष्ट करता है। इस प्रकार कटु रस सब प्रकारसे कफका नाश करनेवाला है। यह कटु रसका विषय हमने उदाहरणके तौरपर बताया है। इसी प्रकार अन्य रसोंके विपयमें भी जानना चाहिए। कैर्गुणैः के रसाः कं दोषं वर्धयन्ति प्रशमयन्ति वेति न ज्ञायत इति तस्प्रकाश- नार्थमिदमुच्यते-माधुर्य-स्नेह-गौरव-पैच्छिल्य-मार्दव-शैत्यैः श्लेष्माणं वर्ष- यति मधुरः (र. वै. भ. ३, सू. ६२) ।xxx। अस्य हेस्वर्थमाह- खयोनेरागमाद् विवृद्धिर्दोष-धातु-मलानाम् (सू. ६३)। स्वयोनेरागमात् स्वजातीयस्यागमात् प्रतिलम्भाद् विवृद्धिर्दोष-धातु-मलानां भवति यस्मात् तस्मादेव- मुक्तमित्यवगन्तव्यम् । यस्माच्छब्दो लुप्त इत्यवगन्तव्यः (भा.)। क्षयः कथमिति ? क्षयः प्रतिपक्षस्यागमात् (सू. ६४)। प्रतिपक्षस्य प्रत्यनीकस्य असमानजातीय- त्यागमाद् दोष-धातु-मलानां क्षयो भवति (भा.)। कोपयति क्लेदयति चैन- मम्लः, औपण्यात् तैक्ष्ण्याद् गौरवात् स्नेहाच्च (सू. ६५) । एनं श्लेष्माण, कोपयतीति स्वस्थानात् प्रच्युतं करोति, क्लेदयति चाम्लः । औष्ण्य-तैक्ष्ण्याभ्या- मानेयाभ्यां श्लेप्माण प्रस्तीतं धनं विलीनं कृत्वा क्लेदयति, गौरव-हाभ्यां तस्यो- पचयं च करोति । एवं सौम्याग्नेयोऽम्लः श्लेष्मणः सौम्यस्य सौम्यभावेन चानेय. - पूर्याधे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । भावेन कोपन-कैदने करोतीति प्रदर्शितं भवति । क्लेदयति चेत्यत्र चशध्दः संचयं करोतीत्युपसंग्रहार्यः (भा.)। विष्यन्दयति चैनं लवणः (सू. ६६)। विष्यन्दयति प्रकोपयति चेति औरण्यादिभिः पूर्ववत् (भा.)। काटुक्यौष्ण्य. रौक्ष्य-लाघवैश्च पित्तं वर्धयति कटुकः (सू. ६७) । एभिः काटुक्यादि- भिरारमीयैर्गुणैः पित्तस्य तुस्यजातीयः पित्तं वर्धयति कटुकः । शेपं पूर्ववत् । कटुकस्य वायव्यभागेनोपकारो रोक्ष्य-लाघवाभ्यां भवति (भा.)। पित्तं भृशविदाहित्वा- दुप्णत्वात्तीक्ष्णत्वाञ्च विदाहयति कोपयति चाम्लः (सू. ६०)। धारदः पूर्ववत् (भा.) । अम्लेन लवणो व्याख्यातः (सू. ६९)। एमिर्गुणरेतदेव कर्म करोतीति (भा.)। शैत्य-रौक्ष्य-वैशद्य-वैष्टम्भ्यैर्वायु घर्धयति कपायः (सू. ७०) । एभिः शैत्यादिभिर्वायु वर्धयति कपायः । सर्वत्र वर्धयतीत्युक्ते सर्व एव वृद्धरवस्थाविशेपाः परिगृहीता भवन्ति, तथाऽपि तत्र तत्र विदोपकार्यप्रदर्शनार्थ प्रकोपादिवचनम् । विष्टम्भनं मलानामप्रवृत्तिायो। संचारनिरोभो वा पार्थिवेन भागेन (भा.)। शैत्य-रौक्ष्य-वैशद्य-लाघव- मार्दवैरेनं - कोपयति तिक्तः (सू. ७१) । शेस्य-रोक्ष्यादिभिर्भावैर्वायुना मुस्यजातीयैर्वायोरेवमुपकरोति (भा.)। रौक्ष्य-लाघव-काटुक्यैरेव वायु कोपयति कटुकः । (सू. ७२) । एयशब्दोऽवधारणार्थः । अनयाऽवधारणया नोप्ण-तीक्ष्णाभ्यामित्युक्तं भवति (भा.)॥ भदन्त नागार्जुन कहते हैं कि-मधुर, स्निग्ध, गुरु, पिच्छिल, मृदु और शीत इन गुणोंसे , मधुर रस कफ को बढ़ाता है, क्योंकि स्वयोनि-सजातीय-के आगम- (मिलने )से दोप-धातु तथा मलोंकी वृद्धि होती है और विजातीयके भागम- मिलने से उनका क्षय होता है । अम्ल रस अपने उष्ण, तीक्ष्ण, गुरु और निग्ध गुणसे कफको क्लिम (गाढे कफको पतला) और प्रकुपित करता है । लवण रस अपने उष्ण, तीक्ष्ण, गुरु और निग्ध गुणसे कफको पिघलाता है। कटुरस अपने उष्ण, रूक्ष और लघु गुणसे पित्तको बढ़ाता है। अम्ल और लवण रस अपने अति विदाही, उष्ण और तीक्ष्ण गुणसे पित्तको विदग्ध और प्रकुपित करता है । कषाय रस अपने शैत्य, रोक्ष्य, वैशद्य और विष्टम्भता इन गुणों से वायुको बढ़ाता है । शैत्य, रौक्ष्य, वैद्य, लाघव और मार्दव इन गुणोंसे तिक्त रस वायुको प्रकुपित करता है। कटु रस अपने रोक्ष्य, लाघव और कटुतासे वायुका प्रकोप करता है। रसानां दोपजननेऽपवाद.- प्रायः पित्तलमम्लंम् , अन्यत्र दाडिमामलकात्, प्रायः श्लेष्मलं मधुरम् , अन्यत्र मधुनः पुराणाच शालि-षष्टिक-यव-गोधूमात्, प्राय- स्तिकं वातलमवृष्यं च, अन्यत्र वेत्राग्रामृता-पटोलपत्रात् प्रायः'कटुकं वातलमवृष्यं च, अन्यत्र पिप्पली-विश्व मेषजात् ॥ (च. सू. अ. २७) x १८८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । प्रायः पित्तलमिति विशेपेणान्येभ्यो लवण-कटुकेभ्योऽग्लं पित्तलम् । एवमन्यत्रापि प्रायःशब्दो विशेपार्थो वाच्यः, किंवा प्रायःशब्दोऽम्लेन संवध्यते । अत्र पित्तमावा- चम्लजन्यतयोकं, दोपप्राधान्यस्यानियतत्वाद् उक्तं हि-"न ते पृथक् पित्त-कफानि- लेभ्यः" (च० सू० अ० १९) इति, तथा "समपित्तानिल-कफा:" (इ. सू. अ० ७) इति; किंवा पित्तोमा वह्निः, स चेहानपानपचने प्रधान; यदु- "यदलं देहधास्वोजो-बल-वर्णादिपोपक्म् । तन्नाग्निहेतुराहारान्नापकादसादयः' " (१० चि० भ० १५) इति । तेनेह वहिकारणपित्तजनकमेवादावुच्यते; यतमा पित्तजनकम वक्तव्यम्, अतो रसप्रधानमपि मधुरो नादायुक्तः । मधुन इति विच्छेदपाठेन नवानवस्य मधुनः कफाकर्तृत्वं दर्शयति । इह च पदसस्यैव कमन- मेतप्रयेणैव मनुक्तानां लवण-तिक्त-कपायाणामपि पाकद्वारा ग्रहणात्; यतो लवणा पाकात् प्रायो मधुरः, तिक्त-कपायो कटुको पाकतो भवतः । 'प्रायः सर्व तिक' इत्यादिस्तु ग्रन्थो हारीतीयः, इह केनापि प्रमादाल्लिखितः (च. द.)। दाडिममामलकं च तयोः समाहारः, तस्मादन्यत्र । दाडिममामलकं च वर्जयित्वा सर्पमम्लमम्लरसं द्रव्यं प्रायः पित्तलं पित्तजननम् । प्रायोग्रहणात् कचियभि. चारोऽपि । ४ ४ मधुनस्तथा पुराणाच्छालि-पष्टिक-यव-गोधूमादन्यत्र पुराणान्शाल्यादींश्च हित्वा सर्व मधुरं द्रव्यं प्रायः श्लेष्मलं श्लेष्मकृत् । xxx । वेत्रस्याग्रम्, अमृता गुडूची, पटोलपत्रं च; तस्मादन्यत्र वेत्रामादिकं विहाय तिक्तकं तिकरसं द्रव्यं प्रायो वावलं वातकृत, अवृष्यं च । पिप्पली विश्वमेपनं शुण्ठी च, तस्मादन्यत्र पिप्पली-शुण्ठीवजं कटुकं द्रव्यं प्रायो वातलमवृष्यं च ।xxx। इहापि-कपायः स्तम्भनः शीतः सोऽभयाया- मतोऽन्यथा" इति । मेलेनाप्युक्त-"सर्व तिक्तमवृष्यं च विद्यादन्यत्र फूलकात् । श्लेष्मलं मधुरं सर्व यवगोधूमवर्जितम् ॥ दाडिमामलकादन्यत् सर्वमम्बं । पित्तलम्" (सू. भ. २७)।xxx। इति । कूलकात् पटोलात (यो.)॥ तत्र प्रायो मधुरं श्लेष्मलम् , अन्यत्र पुराण-शालि-यव-गोधूम-मुद्र- मधु-शर्करा-जाइलमांसात् । प्रायोऽम्लं पित्तलम् , अन्यत्र दाडिमाम- लकात् । प्रायो लवणमचक्षुष्यम्, अन्यत्र सैन्धवात् । प्रायस्तिक्त कटुकं वातलमवृष्यं च, अन्यत्रामृता-पटोली-नागर-पिप्पली-लशुनात् । प्रायः कषायं शीतं स्तम्भनं च, अन्यत्र हरीतक्याः॥ (अ. सं. सू. अ. १८)॥ वत्र सर्वेषां मधुरादीनां सामान्येन श्लेष्मलादित्वमुक्त, यन्न चैतन्यभिचरति तद्दर्शयति-तनेत्यादिना । पुराणशाल्यादि वर्जयित्वा सर्व मधुरं प्रायः श्लेष्मकरम् । मधुरदाडिमादि मधुरमपि न लेष्मकरमिति प्रदर्शनार्थ प्रायोग्रहणम् । एवं सर्वेषु प्रायोग्रहणेपूह्यम् । अन्यत् सुबोधम् । अमृता-पटोले तिताना, नागर-पिप्पली-मधुन कटुकानाम् (इन्दुः)॥
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १८९ -- । अम्ल रस प्राय: पित्त करता है, परंतु दारिम-अनार और आँवले अम्ल रसवाले होनेपर भी पित्त नहीं करते । मधुर रस प्राय कफ करता है, परंतु पुराने शालि- पष्टिक-जो-गेहूँ और मूंग, शहद, मिश्री और जामम प्राणियों का मांस मधुर होने पर भी कफ नहीं करते । विक रस प्राय. वायु करनेवाला और अदृष्य होता है, परंतु बेतका अप्रभाग, गिलोय, पटोल (कहुए परवल) की पत्ती ये तिक रसवाले होनेपर मी वायु नहीं करते । स्टु रस प्रायः वायु करनेवाला और अप्य होता है, परंतु छोटी पीपल, सौंठ और लहसुन कटुरसवाले होनेपर भी वायु नहीं करते और प्य होते हैं । लवण रस नेत्रको हानि करता है, परंतु सेंधानमक लवण होनेपर भी नेत्रको हानि नहीं करता। रसानां दोपजनने दोपप्रशमने च युक्ति रस-दोपसन्निपाते तु ये रसा येर्दोषैः समानगुणाः समानगुणभूयिष्ठा घा भवन्ति ते वानभिवर्धयन्ति, विपरीतगुणा विपरीतगुणभूयिष्ठा वा शमयन्त्यभ्यस्यमानाः । इत्येतद्व्यवस्थाहेतोः पट्त्वमुपदिश्यते रसानां परस्परेणासंसृष्टानां, त्रित्वं च दोपाणाम् (च. वि. अ. १)॥ अध कया युक्त्या रसा दोषाअनयन्ति, शमयन्ति चेत्याह-रस-दोपेत्यादि । समिपाते इति अन्तःशरीरमेलके । तुशब्दो विशेपे, तेन विपरीतगुणा एव विशेषेण विपरीतगुणभूयिष्ठापेक्षया शमयन्तीति दर्शयति । रसानां तु यथा उपचारागुणा भवन्ति तदभिहितं.-"गुणा गुणाश्रया नोक्ताः (च. सू. भ. २६)" इत्यादिना सूने । अभ्यस्थमाना इति न सकृदुपयुज्यमानाः । अथ कस्मादस-दोपसंसर्गभूयस्त्वं परित्यज्य रसपदत्वं दोपत्रित्वं चोच्यते ? इत्याह-इत्येतदित्यादि । व्यवस्येति रस-दोपसंसर्गप्रपञ्चसंक्षेपः । परस्परेणासंसृष्टानामिति पदं दोषाणामित्यनेनापि योज्यम् (च. द.)। रसानां त्रिशस्त्रिश एकैकदोपकोपननशमनरवमुक्त्वा सनिपाते। व्यवस्थामाह-रस-दोपसनिपाते विति । रसा दोषाश्च तेषां संनिपातः, सस्मिन् । संनिपात इह समसमवेततया । ये रसाः सदाश्रयद्रव्यं; यैीपैः बहुवचनम विवक्षितं, समानगुणाः समानप्रकृतिकाः समानगुणभूयिष्ठा या भवन्ति; तथथा-कटु-तिक्त- कपायदन्यं वातस्य समानगुणं, तत् श्लेष्मणो विपरीतगुणं, पित्तस्य विपरीतगुणभूयिष्ठ व भवति, मधुराम्ल-लवणं श्लेप्मणः समानगुणं, पित्तस्य समानगुणभूयिष्ठं, तत् पुनर्वावस्य विपरीतगुणं भवति, एवमुग्नेयं; ते रसा अभ्यस्यमानाः सातत्येनोपयुज्य- मानाः, वान् दोपानभिवर्धयन्ति । ये रसाः पुनयः दोपैः सह विपरीतगुणा विपरीतगुणभूयिष्ठा वा भवन्ति ते रसा अभ्यस्यमानास्तान् दोपान् शमयन्ति । सर्वत्र सामान्य-विपर्यययो. वृद्धि हासहेतुत्वनियमात् । रसानां पदव दोषाणां च विश्वमाह-एतदिति । एतम्यवस्थाहेतोः सामान्य-विपर्ययाभ्यां योऽयं वृद्धि-हास- लियमः तदर्थ, रसानां परस्परेणासंस्ष्टानां पदरवं, दोषाणां परस्परेणासंस्थानां - १९० द्रव्यगुणविज्ञानम् । च त्रिस्वमुपदिश्यते । भसंसृष्टा रसाः षद, मसंसृष्टा दोषाश्च त्रयः, तत्रैव सा व्यवस्था संभवति, न तु तेषां संसर्गे (यो.)॥ जब शरीरके अन्दर मधुरादि रस और वातादि दोष मापसमें मिलते हैं तब जो रस जिन दोषोंके समान गुणवाले या समान गुणकी अधिकतावाले होते हैं, वे वारंवार अभ्यास-सेवन करनेसे उसको बढ़ाते हैं। इसी प्रकार जो रस जिन दोषों के विपरीत गुणवाले या विपरीत गुणोंकी अधिकतावाले होते हैं, वे वारंवार अभ्यास करनेसे उनको शान्त करते हैं । इस प्रकार व्यवस्थाके लिए परस्पर असंयुक्त रसोंका षदल और दोषोंका त्रिख कहा गया है। ससृष्टरसाना द्रव्याणां प्रभावविज्ञानोपाय. तत्र खल्वनेकरसेषु द्रव्येष्वनेकदोषात्मकेपु च विकारेषु रस-दोषप्र- भावमेकैकश्येनाभिसमीक्ष्य ततो द्रव्य-विकारयोः प्रभावतत्त्वं व्यवस्येत् । न त्येवं खलु सर्वत्र । नहि विकृतिविषमसमवेतानां नानात्मकानां. परस्परेण चोपहतानामन्यैश्च विकल्पनैर्विकल्पितानामवयवप्रभावानु- मानेनैव समुदायप्रभावतत्त्वमध्यवसातुं शक्यम् । तथायुक्ते हि समुद्ये समुदायप्रभावतत्वमेवोपलभ्य ततो द्रव्य-विकारप्रभावतत्त्वं व्यवस्येत् ॥ (च. वि. अ. १)। अथ कथं तर्हि संसृष्टानां रसानां दोषाणां च प्रभावो ज्ञेय इत्याह-तत्र खल्वित्यादि । तत्र चानेकरसद्व्यस्यानेकदोषविकारस्य च प्रत्येकरस-दोषप्रभावमेसकेन प्रभावं कथयन् रससंसर्ग-दोषसंसर्गयोरपि तादृशमेव प्रभावं कथयति, यतो . रस-दोषसंसर्गप्रभावावत्र द्रव्य-विकाराश्रयिस्वादस-दोषयोर्द्रव्य-विकारप्रभावरवे- नोच्यते । भनेन न्यायेन साक्षादनुक्तोऽपि एकरसद्व्यैकदोषविकारयोरपि प्रभावोऽसंसृष्टरस-दोषप्रभावकथनादुक्त एव ज्ञेयः । एकैकश्येनाभिसमीक्ष्येति प्रत्येकमुक्तरसादिप्रभावेणानेकरसं द्रव्यमनेकदोषं च विकारं समुदितप्रभावमभि- समीक्ष्य । अयं च रस-दोषप्रभावद्वारा द्रव्य-विकारप्रभावनिश्चयो न सर्वत्र द्रव्ये विकारे चेत्याह-न त्वेवं खलु सर्वत्रेति । अत्रैव हेतुमाह-नहीत्यादिनाऽध्यवसातुं शक्यमित्यन्तेन ।xxx। नानारमकानामिति नानाहेतुजनिताना; किंवा नानारम- कानामिति नानाप्रमाणानाम् ।xxx। परस्परेण चोपहतानामिति अन्योन्य- सुपघातितगुणानाम् । परस्परगुणोपघातस्तु यद्यपि दोषाणां प्रायो नास्त्येव, तथाऽप्यदृष्टवशात् कचिद्भवतीति ज्ञेयं; रसानां तु प्रबलेनान्योपघातो भवत्येव । भन्यैश्च विकल्पनैरिति अन्यैश्च भेदकैः, तत्र रसस्य भेदकाः स्वरस-कएकादया, एकस्यैव हि द्रव्यस्य कल्पनाविशेपेण गुणान्तराणि भवन्ति; दोषस्य तु दृष्यान्तराण्येव गुणान्तरयोगाद्भेदकानि भवन्ति । यदुक्तं-"स एव कुपितो दोषः समुत्थान पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १९१ .. . विशेषतः । स्थानान्तरगतश्चैव विकारान् कुरुते बहुन्" (च. सू. म. १८) इति । xxx। द्विविधो मेलको भवति रसाना दोषाणां च प्रकृत्यनुगुणः, प्रकृत्यननु. गुणश्च; तत्र यो मिलितानां प्राकृतगुणानुपमर्दैन मेलको भवति, स 'प्रकृतिसमसम- वाय'शय्दे नोध्यते; यस्तु माकृतगुणोपमर्दैन भवति, स विकृति विपमसमवायोऽभि- घीयते; विकृस्या हेतुभूतया विपमः प्रकृत्यननुगुणा समवायो विकृतिविषमसमवाय इत्यर्थः । अत्रैव विकृतिविपमसमवाये नानास्मकत्वादिहेतुत्रयं यथाविवृतमेव योजनीयम् ।xxx। अथ कयं तर्हि विकृतिविपमसमवायप्रभावज्ञानमित्याह- सथायुक्त हीत्यादि । तथायुक्त समुदय इति विकृतिविपमसमवाये । समुदयप्रभाव- तावमिति मेलकप्रभावतत्त्वम् । समटते हि मधुसर्दिपि सूर्यावर्ताख्ये वा दोपसमुदये न संयुज्यमानमधु-घृतगुणक्रमागतं मारकरवं, न च वातादिदोपप्रभावगतं सूर्यवृद्ध्या यर्धिष्णुत्वं सूर्यापर्तस्य, किं तु संयोगमहिमकृतमेवेत्यर्थ । यच्च गतिद्वयं दोप-रस- मेलकस्य, तेन प्रकृतिसमसमवायरूपं सक्षिपातं ज्वरनिदाने दोपलिझमेलकेन- वोक्तवान् । यदुकं-"पृथगुक्तलक्षणसंसर्गाहान्द्विकमन्यतमं सानिपातिक वा ज्वर विद्यात्" (च. नि. अ. १) इति । यस्तु विकृति विषमसमवेतस्त्रिदोपकृतो ज्वरः, तस्य चिकित्सिते-"क्षणे दाह. क्षणे शीतं" (च. चि. भ. ३) इत्यादिना लक्षणमुकम् । नहि श्याव-रक्तकोठोत्परयादि तत्रोक्तं वातादिज्वरे वचिदस्ति । एवं रसेऽपि यत्राम्राते मधुरत्वं प्रकृतिसमसमवेतं, तत्रानातं मधुरमेतन्मात्रमेवोक्तं; तेन, मधुरसामान्यगुणागतं तस्य वात-पित्तहरस्वमपि लभ्यत एव । यत्र वार्ताके कटुति करवेन वातकरत्वं प्राप्तमपि च विकृति विपमसमवायात्तन्न भवति, तंत्राचार्येण "वार्ताकं वातनम्" (च. सू. भ. २७) इत्युक्तमेव । एवमित्यादि तत्तदुदाहरणं शाखमस्तमनुसरणीयम् । यत्तु प्रकृतिसमसमवायकृतरस-दोपगुणद्वारा प्राप्तमपि द्रष्यगुणं विकारलक्षणं च ब्रूते, तत् प्रकथं स्पष्टाथं चेति ज्ञेयम् (च. द.)। पपणा रसानां त्रयाणां दोपाणां च योऽयं यथास्वं प्रभाव उच्यते स तेषां मिलितानां तु समसमवाये एव योद्धव्य., न तु विपमसमवाये, तदेवाह-तत्रेति । तत्र अनेके रसाः समसमवेततया येषु तेषु द्रव्येषु, अनेकदोपात्मकेपु समसमवेतानेकदोपा. रब्धेषु विकारेपु च, रस-दोपप्रभाव रसानां दोपाणां च प्रभावम् , एकैकश्येन एकै- क्येन, अभिसमीक्ष्य एकैकस्य रसस्य दोपस्य च प्रभाव परीक्ष्य, द्रव्य विकारयोः प्रभावतवं व्यवस्येत् अवधारयेत् । यत्र एको रस एकश्च दोपस्तन रस-दोष- प्रभावेण द्रव्य-विकारयोः प्रभावज्ञानमवाधित्तम् । यत्र पुनरनेके रसा दोपाश्च समसमवेततया संनिपतिताः, तत्रापि रसानां पद्वानतिक्रमात् दोषाणां च विस्वानतिक्रमात्, एकैकस्य रसस्य एकैकस्य दोपस्य च प्रभावमुपलभ्य तेन द्रव्य. विकारयोः प्रभावोऽवधारयितुं शक्यते । नन्वेवं रस-दोपप्रभावेण द्रव्य-विकारयोः प्रभावशाने रसदोपयोरेव प्रभाव उपदिश्यताम्, न तु पृथग्दव्य-विकारयोरियत ।
१९२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । भाह-नत्वेवमिति । एवं रस-दोपप्रभावेण द्रव्य-धिकारप्रभावज्ञानं न सर्वत्र सर्वस्मिन् द्रव्ये सर्पसिन् चिकारे वा भवति । रसानां दोपाणां च पृथक् समसम- वेतानां तथा भवति; न तु विपमसमवेतानां, विपमसमवायेऽपरिसंख्यविकल्पाद । तदेवाह-नहीति । प्रकृतौ विकृतौ वा दोपाणां संसर्गो द्विविधः-समसमवेततया, विपमसमवेततया च । तत्र दोषाणां विकृतिविपमसमवेतानां विकृतिः आहारादि- वशेन स्वप्रमाणच्युतिः, तया विषमं यथा तथा समवेताः संसृष्टाः, तेपाम् । वैपम्यम् ऊनाधिकभावः, स च दोषाणां वृद्धानां क्षीणानां वा तारतम्यकल्पनया युगपवृद्धि-क्षयाभ्यां वा भवति । विपमसमवायो चावलायासु प्रकृतिप्वप्यस्ति, मतस्तद्वारणाय-विकृतीति । नानात्मकानां सर्वेषां वृद्धानां क्षीणानां वा द्वयुहरण- कोल्बणत्वादिना नानाविधानाम् । तथा युगपहृद्ध-क्षीणानां परस्परविरोधात परस्परेणोपहतप्रकृतिकानाम् । अन्यैः युगपट्टद्धि-क्षयकृतैः "वृद्धि-क्षयकृतान्यो विकल्प उपदेक्ष्यते" (च. सू. भ. १७) इति, विकल्पैः "वृद्धिरेकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः" (च. सू. अ. १७) इत्यादिना उक्कैर्विकरिपतानाम् । दोषाणां विकृतिविषमसमवाये नाना विकल्पाः; प्रकृतिसमसमवायस्तु एकः "समैश्चैक." (च. सू. भ. १७) इति । तत्र विपमसमवेतानां रसानां दोषाणां च अवयव. प्रभावानुमानेन एकैकस्य रसस्य दोपस्य च प्रभाव परीक्ष्य, तेन समुदायस्य अवयचिनो द्रव्यस्य विकारस्य च, प्रभावतरवम् उपक्रमोपक्रम्यभावम् , अध्यवसातुम् अवधारयितुं, नहि शक्यं नैव शक्यते । रसानां दोपाणां च विषमसमवेतानाम- परिसंख्यविकल्पतया एकैकशः प्रभावज्ञानस्यैव असंभवः, येन तत्रं द्रव्य-विकारयोः प्रभावोऽध्यवसातुं शक्यते । तर्हि तत्र कथं द्रव्य-विकारयोः प्रभावोऽध्यवसीयेत इति ? अत आह-तथायुक्ते इति । तथायुक्ते यत्र रसानां दोषाणां वा विषमसमवायः तथाविधे समुदाये अवयविनि द्रव्ये विकारे च, समुदायस्थ प्रभावतत्त्वं व्याधेल द्रव्यस्य तदुपशमनसामर्थ्य चोपलभ्य ज्ञारवा एव, ततो द्रव्य-विकारयोः प्रभावतत्त्वम् उपक्रमोपक्रम्याख्यं, व्यवस्येत् अवधारयेत् (यो.)। xxx। ननु रस-दोपसंनिपातः खलु रसानां संसों दोपाणां च संसर्गः, तत्र किं कारणसमानरूपेणैव कार्ये कारणसमवायः स्यात् ? न, कारणगुण-कर्मवैषम्येणापि भवतीत्यत आह-न स्वेवं खलु सर्वत्रेति । सर्वत्र रससंसर्गे सर्वत्र दोषसंसर्गे खलु नैवमुक्तमकारेण व्यवस्येत् । कस्मात् ? न हीत्यादि । हि यस्मात् विकृतिविषम- समवेवानां नानात्मकानां नानारसात्मकानी रसाना, नानादोषामकानां ज्वरावि- विकाराणां; परस्परेणोपहतानां नानारसानामारम्भकाणां, कार्यारम्भे सदाभयदन्यः स्थकर्माणि कालदेशादिवशात् प्रकृतिस्थान् रसान विकृत्य परस्परेणोपहत्य तसदस- प्रभावतो विपमरूपेणापूर्वविशिष्टस्वरूपेण कार्यरसेपु समवायीनि भवन्तीत्येवं परस्परेगोपहतरसजानां; तथा नानादोषाणामारम्भकाणां ज्वरादिकार्यारम्भ पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १९३ तत्तदोपस्थकर्माणि काल-देश-निदानविशेपवशाद् विकृत्य, प्रकृतिस्थस्वरूपं विहाय, परस्परेणोपहत्य, विषमकर्मरूपेणापूर्वविशिष्टस्वरूपेण परिणम्य, क्रियमाणे ज्वरादौ समवायीनि भवन्तीति परस्परेणोपहतकर्मवातादिदोषजानां ज्वरादीनां च, मन्यैर्वि- कल्पनरेककरसप्रभावकर्मविकल्पनकदोपप्रभाव विकल्पनाभ्यां भिन्नर्विकल्पनैर्गुणकृत- गुणविकरपनर्विकल्पितानां कार्यरसानां कार्यज्वरादीनां च अवयवमभावानुमानेन तदारम्भकरसाश्रयद्रव्यस्थकृतैः गुणैरवयवैस्तदारम्भकदोपस्थगुणकृतैर्गुणैश्वावयवैरनु- मानेन समुदायस्य विकृतिविपमसमवेतस्य नानारसारमकरसस्य विकृतिविषमसमवेतस्य नानाटोपात्मकस्य ज्वरादेव प्रभावाणामारम्भकद्व्याणां कर्मातिरिक्तकर्मणां तत्वं मिपग्मिरध्यवसातुं शक्यं न भवतीति । सर्वे हि भावा द्विविधमारभ्यन्ते-समवायिभिः कारणदेश-काल-कारणविशेपवशात् प्रकृतिसमसमवायेन, विकृतिविपमसमवायेन च । यद्रव्यों भाव आरम्यते तद्भावमारभमाणानि द्रव्याणि चेतनप्रयुकानि स्वस्वकर्मभिः परस्परं संयुज्यमानानि पुनः पुनर्विभज्यमानानि खलु संयोग-विभागाभ्यामावर्त्यमा- नानि देश-काल-कारणादिवशात् स्वाध्यद्रव्य-तद्गुणान् स्वानि चानुरूपेण मेलयि- स्वकीकृत्य प्रकृत्यैव जायमाने भाचे समवायीनि कुर्वन्तीति प्रकृतिसमसमवेतः स भावो जायते । तत्र द्रव्याणि सजातीयानि द्रव्यान्तराण्यारभन्ते, गुणाश्च सजातीयानि गुणान्तराण्यारभन्ते, कर्माणि तु सजातीयानि कर्मान्तराण्यारभन्ते विरोधीनि च । यैस्तु द्रव्योऽपरो भाव आरभ्यते तानि द्रव्याणि चेतनप्रयुक्तानि स्वस्वकर्मभिर्देश-काल-कारणविशेपवशेनैकीभूतैर्विजातीयरूपमापद्यमानः संयुज्य- मानानि विभज्यमानानि च पुनः पुनरावर्त्यमानानि कारणानुरूपद्रव्यान्तररूपेण परिणस्य, कारणानुरूपगुणान्तररूपेण गुणाश्च परिणम्य, स्वस्वाननुरूपविशिष्टापूर्व- विजातीयाचिन्त्यरूपेण च स्वयं स्वय परिणम्य जायमाने कार्य समवायीनि भवन्ति सन्ति द्रव्याणि गुणांश्च समवायिनः कुर्वन्तीति विकृतिविपमसमवेतः स भावो जायते । तत्र द्रव्याणि सजातीयव्यान्तरमारभन्ते, गुणाश्च गुणान्तरं सजातीयमे- वारभन्ते, कारणगुणपूर्वको हि कार्यगुणो भवति, कर्माणि तु सजातीयविजातीयं विरोधि कर्म आरभन्ते । तत्तु कर्म भावानां संहतरूपाणां प्रभाव उच्यते इति । ननु च भो द्रव्याणि यदि विकृतिविपमसमवेवानि ज्वरादीनि गुणाश्च रसादयो विकृतिविपमसमवेताः कर्माणि च विकृति विषमसमवेतानि प्रभावा उच्यन्ते, तर्हि कथं सजातीयारम्भकरव द्रव्य-गुणयोन कर्मण इति चेत्, न; यतः कार्यद्व्यारम्भे वत्कार्यस्य कारणानां द्रव्याणां पृथिवी पृथिव्यन्तर मूर्तिविशेषमारभते न तु जला- दिकम् , भापश्च शारीररसादि जलान्तरमारभन्ते, तथा तेजः शारीरतेजोन्तरमा- रमते, इत्येवं सजातीयव्यान्तरमारभन्ते द्रव्याणि, न तु विजातीयव्यान्तरम् । तथा गुणाश्च रसादयस्तत्तद्रव्यस्थाः सजातीयगुणान्तरमारभन्ते, न तु विजातीय- गुणान्तरम् । यथा साधारणो रसोऽप्सु पृथिव्यां च भूतान्तरसंयोगेऽभिव्यज्यमानो द्र० पू. १३ द्रव्यगुणविज्ञानम् । । मधुरादिरसान् सजातीयानारभते । मधुरादिरसवव्यारभ्यमाणे पुनरन्यसिन् हव्ये प्रकृतिसमसमवेते विकृतिविषमसमवेते वा ते मधुरादयो रसाः सजातीयमेव प्रकृतिसमसमवेतं रसान्तरं विकृतिविषमसमवेतं वा रसान्तरमारभन्ते, न तु रूपान्तरं गन्धान्तरं वा विजातीयगुणान्तरम् । एवं रूपादयो गुणा व्यारयेयाः । कर्माणि तु खलूरक्षेपणावक्षेपणादीनि द्रव्यस्थानि सजातीयं कर्मान्तरं प्रकृतिसमसम- वेतमारभन्ते, सर्वाणि चैकीभूय विकृतिविपमसमवेत विजातीयमचिन्न्यं कर्मारभन्ते, यदुच्यते-प्रभाव इति । विजातीयेन कर्मणा सह मिलित्वा कर्म यथा विशिष्टा. पूर्वविजातीयकर्माण्यारभते, न तथा द्रव्याणि गुणा वा विजातीयद्रव्यान्तरेण विजातीयगुणान्तरेण वा मिलित्वा विजातीयं द्रव्यान्तर गुणान्तरं वाऽऽरभन्ते इति । नन्वेवं चेत् तर्हि कथं नानारसात्मकं विकृतिविपमसमवेतं रसं नानादोषारमकं ज्वरादिकं चावयवेनानुमाय तत्समुदायरूपरस-विकारयोः प्रभावतत्वमध्यवस्येत् ? अत माह-तथायुक्त हीत्यादि । तथा कारणविशेपाद् विकृतिविशेपेण परस्परोप- घावादारम्भकप्रकृतिभूतकारणानां विकृत्या स्वकर्माननुरूपकर्मवत्तया समवायेन युक्त रसे विकारसमुदाये एकीभूतरूपे समुदायप्रभावतत्त्वं तथाविधमिलिततयैकी- भूतरूपस्यैव प्रभावतत्त्वं तत्तदनुरूपकर्मप्रभावतत्त्वमुपलभ्य ततोऽनन्तरं समुदाय- प्रभावतत्त्वोपलम्भाद् द्रव्य-विकारप्रभावतत्त्वं तत्समुदायकार्यरूपद्रव्य-विकारयोः प्रभावस्य स्वस्वकर्मकरत्वस्वभावस्य तवं याथार्थ्य व्यवस्येत् (ग.)॥ अनेक रसोंवाले द्रव्योंमें तथा अनेक दोषोंवाले रोगों में प्रतेक रस और दोषका जो अलग-अलग प्रभाव कहा गया है उसको देख कर, उस द्रव्य या विकारके प्रभावका निर्णय करना चाहिए। यह न्याय जिस द्रव्यमें अनेक रसोंका और जिस रोगमें अनेक दोपोंका खाभाविक रीतिसे कारणानुरूप समवाय (मिलना) हुआ हो ऐसे प्रकृतिसमसमवेत द्रव्य और रोगमें ही लागू होता है । परन्तु यह नियम प्रकृति- समसमवेतको छोड़कर अन्यत्र विकृतिविषमसमवेतमें लागू नहीं हो सकता । क्योंकि जिस द्रव्यमें रसोंका अखाभाविक रीतिसे कारणोंके अननुरूप सयोग हुआ है, जिसमें रसोंके गुणोंका परस्पर उपघात हुआ है और जिसकी अनेक प्रकारकी कल्क- खरसादि कल्पनाएँ की गयी हैं, ऐसे विकृतिविषमसमवेत द्रव्यमें एक-एक रसका जो प्रभाव कहा गया है उससे समुदायके प्रभावका यथार्थ निश्चय नहीं हो सकता। इसी प्रकार विकृतिविषमसमवेत रोगमें भी एक-एक दोषके प्रभावको देखकरके समुदायके प्रभावका निर्णय नहीं हो सकता। ऐसे विकृतिविषमसमवेत द्रव्य और रोगमें अवयव प्रभावसे नहीं परन्तु समुदायप्रभाव( मिले हुए रसों और दोपोंके प्रभाव)को देखकर द्रव्य और रोगके प्रभावका निर्णय करना चाहिए। 'प्रकृत्या समः कारणानुरूप. समवायः प्रकृतिसमसमवाय.'-द्रव्यमें पञ्च महाभूतों तथा रसोंका और रोगमें दोष- दूष्योंका स्वाभाविकरीत्या सम अर्थात् कारणानुरूप जो समवाय (सवन्ध ) होता है पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १९५ उसको प्रकृतिसमसमवाय, तथा इस प्रकारके सबन्धसे मिले हुए रसों और दोषोंको प्रकृतिसमसमवेत कहते हैं । 'विकल्या विपम कारणाननुरूपः समवायो विकृति विषमसमवाय-एव द्रव्यमें पञ्चमहाभूतों और रसोंका तथा रोगमें दोष-दूष्योका विकृतिसे अखाभाविक रूपमै कारणों के अननुरूप जो सवन्ध होता है उसको विकृतिविषमसमवाय कहते हैं और इस प्रकारके सवन्धसे सयुक्त रसों और दोषोंको विकृतिविपमसमवेत कहते हैं । प्रकृतिसमसमवेत द्रव्यमें कारणके अनुरूप कार्य होता है, जैसे-चशलोचन गौर मिसरीके बनाये हुए चूर्णमे रस-रूप-गुणादि समुदायमें भी अवयवानुरूप ही होते है। इसलिये ऐसे समवायमें (मिले हुए द्रव्यमें) अवयवभूत रसों या द्रव्योंके प्रभावको देसकर उनपरसे समवायके प्रभावका निर्णय हो सकता है। परन्तु विकृति विषमसमवेत द्रव्यमे कारण के अनुरूप नहीं ऐसे भिन्न ही रूप-रस-प्रभावादि उत्पन्न होते हैं। जैसे-पारद और गन्धकके सयोगसे बनी हुई कजली या रससिन्दूरमें दोनोंकी अपेक्षया भिन्न ही रूपादि उत्पन्न होते हैं, अत ऐसे विकृतिविषमसमवेत द्रव्यों में समुदायके प्रभावको देखकर ही द्रव्यप्रभावका निर्णय करना चाहिये। विपटिरसभेदा., तेपामुपयोगश्च- भेदश्चैषां त्रिपष्टिविधविकल्पो द्रव्य-देश-काल-प्रभावाद्भवति, तमुप- देक्ष्यामः- स्वादुरम्लादिभिर्योग शेपैरम्लादयः पृथक् । यान्ति पञ्चदशैतानि द्रव्याणि द्विरसानि तु ॥ पृथगम्लादियुक्तस्य योगः शेपैः पृथग्भवेत् । मधुरस्य तथाऽम्लस्य लवणस्य कटोस्तथा ॥ बिरसानि यथासंख्यं द्रव्याण्युक्तानि विंशतिः। वक्ष्यन्ते तु चतुष्केण द्रव्याणि दश पञ्च च ॥ खाम्लो सहितौ योगं लवणाद्यैः पृथग्गतौ। योग शेपैः पृथग्यातश्चतुष्करससंख्यया ॥ सहितौ स्वादुलवणौ तद्वत् कट्वादिभिः पृथक् । युक्तौ शेपैः पृथग्योगं यातः स्वादूपणौ तथा ॥ कट्वाधैरम्ल-लवणौ संयुक्तौ सहितौ पृथक् । यातः शेपैः पृथग्योगं शेपैरम्ल-कटू तथा ॥ युज्येते तु कपायेण सतिक्तो लवणोषणौ । पट् तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात् ।। पट् चैवैकरसानि स्युरेकं षड्रसमेव तु । इति त्रिपष्टिव्याणां निर्दिष्टा रससंख्यया ॥ ॥
१९६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । - त्रिषष्टिः स्यात्वसंख्येया रसानुरसकल्पनात् । रसास्तर-तमाभ्यां तां संख्यामतिपतन्ति हि ॥ संयोगाः सप्तपञ्चाशत् कल्पना तु त्रिपष्टिया । रसानां तत्र योग्यत्वात् कल्पिता रसचिन्तकैः ॥ (च. सू. अ. २६) संप्रति द्रव्यमभिधाय विकृतानां रसानामेव भेटमाह-मेदश्चैपामित्यादि । प्रभावशब्दो दव्य-देश-कालैः प्रत्येकं युज्यते; तन द्रव्यप्रभावाद्यथा--'सोमगुणाति- रेकान्मधुरः' इत्यादि, देशप्रभावाद्यथा-हिमवति द्वाक्षा-दाडिमादीनि मधुराणि भवन्ति, अन्यत्राग्लानीत्यादि, कालप्रभावाद्यथा-वालानं सकपायं, वरुणमग्लं, पकं मधुरं; तथा हेमन्ते मोपध्यो मधुरा, वीस्वरला इत्यादि । भनिसंयोगादयो येऽम्ये रसहेतवस्त्रेऽपि काले द्रव्ये वाऽन्तर्भावनीया. । भेदमाह-स्वादुरित्यादि । तत्र स्वादोरम्लादियोगात् पञ्च, शेपैरिति आदिस्वेनोपयुक्तादन्यः, तेनाम्लस्य लवणादियोगा- चत्वारि, एवं लवणस्य कदादियोगात्रीणि, कटुकस्य तिक-कपाययोगाढे, तिक्तव कषाययोगादेकम् , एवं पञ्चंदश द्विरसानि । त्रिस्समाह-पृथगित्यादि । मधुरस्या- म्लादिरसचतुष्टयेन पृथगित्येकशो युक्तस्य शेपैलवणादिभिर्योगो भवति; तत्र मधुर- स्थाम्लयुक्तस्य शेपलवणादियोगाचत्वारि, तथा मधुरस्य लवणयुक्तस्य कवादियो- गात्रीणि, तथा कटुयुक्तस्य तिवादियोगाव, तथा तिक्तयुक्तस्य कपाययोगादेकम् , एवं मधुरेणादिस्थितेन दश । एवमम्लस्यादिस्थितस्य लवणयुक्तस्य कदादियोगामीणि, तथा कटुकयुक्तस्य शेषाभ्यां योगाटे, एवं तिक्तयुक्तस्य कपाययोगादेकम् , एवम- म्लस्य पद । अनेनैव न्यायेन लवणस्य त्रीणि, कटोश्चैकमेव । एवं मिलित- त्रिरसानि विंशतिः । चतूरसे स्वादुम्लावादिस्थितौ लवणादिमिरेकैकइयेन युक्ती शेषैः कट्वादिभियोगात् पड् भवन्ति । स्वादु-लवणौ सहिती आदिस्थिती, कदादि- १ "स्वादोरम्लादियोगात् पञ्च, तद्यथा--मधुराम्ल १, मधुरलवण २, मधुरकटकं ३, मधुर- तिक्त ४, मधुरकषायम् ५, इति । शेपैरिति मादित्वेनोपयुक्तादन्यै., अम्लादय. पृथग्योग यान्ति, तेनापरे दश, तथाहि-अम्लस्य प्रत्येक लवणादिचतुष्कयोगाचत्वार.-अम्ललवणन् १, मल- कटकम् २, अम्लतिकम् ३ अम्लकपायम् ४, इति, तथा लवणस्य कटकादियोगात्रय.- लवणकटुक १, लवणतिक्क २, लवणकपायम् ३, इति, कटकस्य तिक-कपाययोगादौ मेदो- कतिक्क १, कटकपायम् २, इति, तिक्तस्य फषाययोगादेक इति तितकपायम् १, एव हि द्विरसानि द्रव्याणि पञ्चदश भवन्ति ।" इति शिवदाससेनः । २ "इदानीं निरस- द्रव्याणा विंशतिमेदानाह-पृथगम्लेत्यादि । मधुरस्य अम्लादिरसचतुष्टयेन पृथगित्येकैकशो युक्तस्य शेपैलवणादिभिर्योगो भवेत् । तत्र मधुरस्याम्लयुक्तस्य शेपैलवणादिभिर्योगाच्चत्वारो भेदा -मधुराम्ललवण १, मधुराम्लकटुक २, मधुराग्लतिक्त ३, मधुरामलकपायम् ४, ति, तथा मधुरस्य लवणयुक्तस्य शेप कटु-तिक्त कषायोगात्रय -मधुरलवणकटक, मधुर- - पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १९७ भिरिति कटु-तिक्ताम्यां पृथग्युक्ती, शेपैरिति तितकपायाभ्यां, तेनेह बहुवचनं जाती पोदव्यम् । एवं त्रीणि । स्वादूपणी तथेत्यनेन स्यादु-कटुक-तितकपायरूपमेकम् । कट्वायरित्यादावपि बहुवचनं जातौ । अम्ल-लवणो संयुक्तो कटुना सहिती शेषाभ्यां योगाहे, वयाऽम्ल-लवणो तिक्तयुक्तौ शेपयोगादेकम् । अम्ल-कटू तथेत्यनेनाम्लकटु- तिककपायरूपमेकम् । युज्यते वित्यादिना चैकम् । एवं पञ्चदश चतूरसानि । । एवणतिक्त २, नधुरलवणकरायम् ३, इति; तथा मधुरस्य कटयुक्तस्य तिक्त-कपाययोगादी-- मधुरकटुतिक १, मधुरफटकपायम् २, पति, एव मधुरम्य तिकयुक्तस्य कपाययोगादेक -मधुर- तितकपायम् १, इति । एवमम्लस्य लवणयुक्तस्य प्रत्येक कटु-तिक्त-कपाययोगात्रय -अम्ललवण- पटकम् १, अन्रलवणतिक्तम् २, अम्ललवणकपायम् 3, इति, तथा तस्यैव कटकयुक्तस्य तित-कपाययोगाद्री-अम्लकतिक्तम् १, अम्लक्टकपायम् २, इति, तथाऽम्लस्य तिक्तयुक्तस्य कपाययोगादेक -अम्लतिकरूपायम् १, इति । एव ल्वणस्य कट्टयुक्तस्य तिक्त-कापाययोगावी- लवणकटुतिक १, लवणपटकपायम् २, पति, तथा लवणस्य तिक्तयुक्तस्य कपाययोगादेक पति लवणतितकपाय १, पति, कटोश्च तिक्तयुक्तस्य कपाययोगादेक -कतिक्ततपायम् १, इति मिलित्वा निरसानि द्रव्याणि विंशतिर्भवन्ति । ति शिवदाससेनः । १ "चतुप्कसयोगेन पनदशभेदानाह-वक्ष्यन्त मत्यादि । सहिताविति मिलिती स्वादम्ली एवणाश्चतुभिः पृथगेकैकगो योगं गतौ शेपै. कटु-तिक्त कपाये. पृथग्योग चतुष्करससंख्यया यातो गच्न; वेन पद मेटा.-मधुराम्ललवणकटुक १, मधुरामललवणतिक्क २, मधुरामललवण- कपाय ३, मधुराम्लकटुतिक्त ४, मधुराम्लकटकपाय ५, मधुराग्लतिक्तकपायम् ६, इति । अम्लपरित्यागेनापराश्चतुरो भेदानाह-सहितापित्यादि । मिलितो स्वादु लवणी कदादिमि. कट- तिक्त कपाय पृथग्युक्ती, शेपैरिति यथाक्रम तिक्त-कपाय-कटभि पृथग्योग यातो गच्छत , तेन अयो भेदा.--ग्वादुलवणकटतिक्त १, स्वादुलवणतिक्तकपाय २, स्वादुलवणकपायकटुकर ३, इति । अवाघापेक्षया शेपाणा बहुत्वामहुवचनमुपपन्नम् । लवणपरित्यागात् पुनश्चतुर्थो भेद इत्याह-वादूपणी तयेति, स्वादूपणावपि शेपाभ्या तिक्त-कपायाभ्या योग यात., स्वादुकटक- तिक्ततापायम् १, इति, एष चतुप्के मधुरयोगेन दश भेदा । इदानीं मधुरपरित्यागात् पञ्च भेदा- नाह-कट्दारित्यादि । अम्ल-लवणी कट्वायै कट-तिक्त-कपाय. पृथग्युक्तौ यथाक्रम शेपैस्तिक- फपाय-कटुमि. पृथग्योग यातो गच्छत , तेन प्रयो मेदा -अम्ललवणाहुतिक्तम् १, अम्ल- लवणतिक्तकपायम् २, अम्ललवणकयायकटकम् ३, इति । लवणपरित्यागाच्चतुर्थ भेदमाह- शेषेरम्ल कटू तथेति, अम्ल-कटू शेपेरिति शेपाभ्या तिक्त-कपायाभ्या योग यातो गच्छत शेपैरिति जाती वहुवचनम् , अम्लकटतिक्तकपायम् १ । मधुराम्लपरित्यागात्तु पञ्चमो भेद इत्याह--युज्यते वित्यादि । लवणक्टुतिक्तनपायम् १, इति । तदेव चतुष्के पूर्व दशभिमिलित्वा पञ्चदश भेदा उक्ताः ।" इति शिवदाससेनः । मत्र । - १९८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । अपवर्जनादिति त्यागात् । अन च रसानां गुणत्वेनैकसिन् द्रव्ये समवायो योग- मादेनोच्यते । रससंसर्गस्य प्रकारान्तरेणासंख्येयतामाह-~-त्रिपष्टिः स्यादिस्यादि । अनुरसः पूर्वोकलक्षणः । अत्र च त्रिपाट्यात्मकरसे रसानुरसकल्पना नास्ति, केवले मधुरादौ तदभावात् ; तेन यथासंभव सप्तपञ्चाशत्संयोगविपयं रसानुरसकल्पनं ज्ञेयम् । किंवा, एकरसेऽप्यनुरसोऽस्त्येवाव्यपदेश्यः । प्रकारान्तरेणाप्यसंख्येयता- माह-रसास्तर-तमाभ्यामित्यादि | मधुर-मधुरतर-मधुरतमादिमेदादसंख्येयता रसानां भवतीति भावः । किंवा, रसानुरसत्वेनैव याऽसंख्येयता तन्नवार्य हेतु:- रसास्तर-तमाभ्यामित्यादिः । एवमसंख्येयत्वेऽपि त्रिपष्टिविधव कल्पना चिकित्सा. व्यवहारार्थमिहाचार्यः कल्पितेत्याह-संयोगा इत्यादि । तन योग्यत्वादिति तत्र स्वस्थातुरहितचिकित्साप्रयोगेऽनतिसंक्षेपविस्तररूपतया हितत्वादित्यर्थः (च. द.)॥ क्वचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः कचित् । दोषोपधादीन संचिन्त्य भिपजा सिद्धिमिच्छता ॥ द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् वुधाः। रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान प्रति ॥ (च सू.अ. २६) तमेव चिकित्साप्रयोगमाह-कचिदित्यादि । अत्रादिग्रहणाद्देश-काल-बलादीनाम- नुकानां ग्रहणम् । एतदेव संयुक्तासंयुक्तरसकल्पन भिन्नरसद्व्यमेलकाद्वाऽनेकरसैक- द्रव्यप्रयोगादेकरसद्व्यप्रयोगाद्वा भवतीति दर्शयन्नाह-द्रव्याणीत्यादि । द्विरसा- दीनि उत्पत्तिसिद्धद्विरस-निरसादीनि; द्विरसं यथा-कपायमधुरो मुद्गः, बिरसं यथा-"मधुराम्ल-कपाय च विष्टम्भि गुरु शीतलम् । पित्त-श्लेष्महरं भव्य" (च. सू. भ. २७) इत्यादि चरसस्तिलः, यदुक्त-"सिग्धोपण-मधुरस्तिकः कपायः कटुकस्तिल." (च.सू अ २७), पञ्चरसं त्वामलकं हरीतकी च, "शिवा पञ्चरसा" इत्यादिवचनात् , व्यक्तपडूसं तु द्रव्यमिहानुक्त, विपं स्त्रव्यकपलूससंयुक्त, हारीते रवेणमांसं व्यक्तपडूससंयुक्तमुक्तम् । एव हिरसादिद्रव्ययोगाद्विरसाधुपयोगः । तथा संयुक्तांश्च रसानिति एकैक्रसादिद्रव्यमेलकात् संयुक्तान् रसानेकैकशः कल्पयन्ति प्रयोजयन्ति । गदान प्रतीति प्राधान्येन, तेन स्वस्थवृत्तेऽपि बोद्धव्यं; किंवा, द्विरसादिभेदो गद एव, स्वस्थे तु सर्वरसप्रयोग एव; यदुक्तं-"समसर्वरसं सारम्भ समधातोः प्रशस्यते" (च. सू अ ७) इति । एवं च व्याख्याने सति कचिदेको रस' इत्यादिना सममस्य न पौनरुत्यम् । किंवा, 'कचिदेको रसः' इत्यादिना स्वमतमुक्तम् , मनवार्थे 'द्रव्याणि द्विरसादीनि' इत्यादिनाऽऽचार्यान्तरसंमति दर्शयति; अत एवाचार्यान्तराभिप्रायेण कल्पयन्तीत्युक्तं, तेन न पौनरुक्त्यम् (च. द.)॥ १ "पञ्चके पभेदानाह-पडित्यादि । अपवर्जनादिति त्यागात् , यथा-मधुरत्यागात अम्ललवणक्टुतिक्तकपायम् १, एवमम्लत्यागात् मधुरलवणकटुतिक्तकषाय २, लवणपरित्यागात् मधुराम्लक्टुतिककपाय ३, कटुकत्यागात् मधुराम्ललवणतितकषाय ४, तिक्तत्यागात् मधुराम्ल- लवणकटुकपाय ५, कपायत्यागात् मधुराम्ललवणकटुतिक्तम् ६ ।" इति शिवदाससेनः।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । १९९ - . , - अविदग्धा विदग्धाश्च भिद्यन्ते ते त्रिषष्टिधा। रसभेदत्रिपष्टिं तु वीक्ष्य वीक्ष्यावचारयेत् ॥ द्विकान् वक्ष्यामः यथाक्रमप्रवृत्तानां द्विकेपु मधुरो रसः। पञ्चानुक्रमते योगानम्लश्चतुर एव तु ॥ श्रींश्चानुगच्छति रसो लवणः, कटुको द्वयम् । तिक्तः कषायमन्वेति, ते द्विका दश पञ्च च ॥ तद्यथा-मधुराम्लः १, मधुरलवणः २, मधुरकटुकः ३, मधुर- तिक्तः ४, मधुरकपायः ५, एते पञ्चानुक्रान्ता मधुरेण; अम्ललवणः १, अम्लकटुकः २, अम्लतिक्तः ३, अम्लकपायः ४, एते चत्वारोऽनु- क्रान्ता अम्लेन; लवणकटुकः १, लवणतिक्तः २, लवणकषायः ३, एते त्रयोऽनुक्रान्ता लवणेन; कटुतिक्तः १, कटुकपायः २, द्वावेतावनु. कान्तो कटुकेन; तिक्तकषायः १ एक एवानुक्रान्तस्तिक्तेन; एवमेते पञ्चदश द्विकसंयोगा व्याख्याताः॥ त्रिकान् वक्ष्यामः- आदौ प्रयुज्यमानस्तु मधुरो दश गच्छति । षडम्लो, लवणस्तस्मादर्धमेकं तथा कटुः॥ तद्यथा-मधुरामललवणः १, मधुरामलकटुकः २, मधुराम्लतिक्तः ३, मधुराम्लकपायः ४, मधुरलवणकटुकः ५, मधुरलवणतिक्तः ६, मधुरलवणकषायः ७, मधुरकटुकतिकः ८, मधुरकटुकषायः ९, मधुर- तिक्तकपायः १०, एचमेपां दशानां त्रिकसंयोगानामादौ मधुरः प्रयु- ज्यते; अम्ललवणकटुकः १, अम्ललवणतिक्तः २, अम्ललवणकषायः ३, अम्लकटुतिक्तः, ४, अम्लकटुकपायः ५, अम्लतिक्तकपायः ६, एव- मेपां षण्णामादावम्लः प्रयुज्यते; लवणकटुतिक्तः १, लवणकटकषायः २, लवणतिक्तकपायः ३, एवमेपा त्रयाणामादौ लवणः प्रयुज्यते; कटुतिक्तकपायः १, एवमेकस्यादौ कटुकः प्रयुज्यते; एवमेते त्रिक- संयोगा विशतियाख्याताः॥ चतुष्कान् वक्ष्यामः।- चतुष्करससंयोगान्मधुरो दश गच्छति । चतुरोऽम्लोऽनुगच्छेच्च, लवणस्त्वेकमेव तु ॥ मधुराम्ललवणकटुकः १, मधुराम्ललवणतिक्तः २, मधुराम्ललवण- कपायः ३, मधुरामलकटुकतिक्तः ४, मधुराम्लकटुकपायः ५, मधुरा.
.. द्रव्यगुणविज्ञानम् । म्लतितकपायः ६, मधुरलवणकटुकतिकः ७, मधुरलवणकटु- कपायः ८, माधुरलवणतित्तकपायः ९, मधुरकटुतिक्तकपायः १०, पव- मेपां दशानामादौ मधुरः प्रयुज्यते; अम्ललवणकटुतिक्तः १, अम्ल. लवणकटुकपायः २, अम्ललवणतिक्तकपायः ३, अम्लकटुतिक्तकपाय: ४, एवमेपां चतुर्णामादावम्लः; लवणकटुतिक्तकपायः १, एवमेकस्यादौ लवणः; एवमेते चतुष्करससंयोगाः पञ्चदश कीर्तिताः ॥ पञ्चकान् वक्ष्यामः।- पञ्चकान् पञ्च मधुर, एकमम्लस्तु गच्छति ॥ मधुराम्ललवणकटुतिक्तः १, मधुराम्ललवणकटुकपायः २, मधुरा. म्ललवणतितकपायः ३, मधुराम्लकटुतिक्तकपायः ५, मधुरलवण- कटुतिक्तकपायः ५, एवमेपां पञ्चानामादौ मधुरः प्रयुज्यते; अम्लल- वणकटुतिक्तकपायः १, एवमेकस्यादायम्लः; एवमेते पट्र पञ्चकसंयोगा व्याख्याताः॥ पट्कमेकं वक्ष्यामः; एकस्तु पटकसंयोगः-मधुरामललवणकट- तिककपायः; एप एक एव पटसंयोगः ॥ एकैकश्च पडूसा भवन्ति-मधुरः १, अम्लः २, लवणः ३, कटुका ४, तिक्तः ५, कषायः ६, इति (सु. उ. तं. अ. ६३) ॥ कीदृशा रसास्त्रिपष्टिभेदान् यान्तीत्याह-अविदग्धा इत्यादि । भविदग्धा असंयुक्ता एकाकिनः समवायतो भिद्यन्त इत्यर्थः । विदग्धाः संयोगतः समवायतन संयुक्ता रसान्तरसंयोगाद्भिधन्ते । विदग्धशब्दः संयुक्त वर्तते, धातूनामनेकार्थ- त्वात् । भिद्यन्ते एकैकेनानुगमनाभेद यान्तीत्यर्थः । ते रसाः । तत्र यथासंभवं केचित् सयोगतः केचित् समवायतश्च भिद्यन्ते । इदानी रसभेदन्त्रिपष्टिं ग्रन्थेनैव विवृण्वन्नाह-यथाक्रममित्यादि । यथाक्रमप्रवृत्तानामिति मधुरादिक्रमप्रवृत्तानां रसानामित्यर्थः । द्विकेपु द्विकसंयोगेपु । मनुक्रमते अनुगच्छति, अनुगतो भवती- त्यर्थः । दश पञ्चेति पञ्चदशेत्यर्थः । यद्यपि सूत्रस्थाने रसविशेषविज्ञानीयाध्याये पञ्चदश द्विका इत्यादिना द्विकसंयोगादीनां संख्या उक्काः, तथाऽपि पुनरत्र संख्या- करणं नियमार्थम् । तेन इयन्त एव रसभेदा गणनीया न तत्रान्तरोक्तास्तर-तम- योगादिना इत्यर्थः । तेपामेव द्विकानां पञ्चदशसंख्याकानामुदाहरणान्याह- तद्यथेत्यादि । मधुराम्लो विद्यते यत्र संयोगे स मधुराम्लः । एवं शेपेष्वपि ज्ञेयम् । मादावित्यादि । दशेति दशयोगानित्यर्थः । तसादर्धमिति त्रीनित्यर्थः । तेषामेव त्रिकानां विंशतिसंख्याकानामुदाहरणान्याह-मधुराम्लेत्यादि । मधुराम्ल लवणा विद्यन्ते यत्र स मधुरामललवणः । एवं शेपेष्वपि व्याख्येयम् । चतुष्कानित्यादि ।
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । २०१ । दशेति 'योगान्' इति शेपः । तेषां चतुष्करससंयोगे पञ्चदशसंख्याकानामुदाहरणा- न्याह-मधुराम्लेत्यादि । मधुराम्ल-लवण-कटुका विद्यन्ते यत्र योगे स मधुराम्ल- लवणकटुकः, एवं शेपेष्वपि । पञ्चकानित्यादि । पञ्चकानिति पञ्चरससमूहान् । पञ्चेति पञ्चसंख्याकान् , 'योगान्' इति शेपः । तेपामेव पण्णामुदाहरणान्याह-मधुराम्ले- स्यादि । तस्य पदकस्योदाहरणमाह-मधुराम्लेत्यादि । संयुक्ता यथा-बदर-कपित्थ- फलादिकं मधुराम्लम् (१), उष्ट्रीक्षीरोर_मांसादिकं मधुरलवणं (२), कुकुरैशृगा- लमांसादिकं मधुरकटुकं (३), श्रीवास सर्जरसादिकं मधुरतिकं (४), तैल-धन्वन- फलादिकं मधुरकपायम् (५); उपकादिकम् अम्ललवणं (६), चुक्रादिकम् अम्लकटुकं (७), सुरादिकम् अम्लतिकं (८), हस्तिनीदधि-शुकमांसादिकम् अम्लकपाय (९); त्रपु-सीसादिकं लवणतिक्तं (१०), गोमूत्र-स्वर्जिकादिक लवण- कटुकं (११), समुद्रफेनादिकं लवणकपायं (१२), कर्पूर-जातीफलादिकं तिक्त- कटुकं (१३), लवलीफल-हस्तिनीघृतादिकं तिक्तकपायं (१४), भल्लातकमज्जा- हरितालादिक कटुकपायम् (१५); एव द्विरसभेदाः पञ्चदशधा दर्शिताः । अतः परं रैसत्रिवयमेदा वक्ष्यन्ते---हस्तिमांसादिक मधुराम्ललवणं (१), शल्यक- मांसादिक मधुराम्लकटुकं (२), गोधूमोत्यसुरादिकं मधुराम्लतिककं (३), मस्तुतकादिकं मधुरामलकपायं (४), काणकपोतमांसादिकं मधुरलवणकटुके (५), शम्बूकादिमांसं मधुरलवणतिक्तं (६), पद्मकन्दादिक गुंढसंयुक्तं मधुर- लवणकपायं (७), तृणशून्याफल-शुष्ककुस्तुम्बर्यादिक'० मधुरकटुतितकं (८), गोधामांसैरण्डतैलादिकं मधुरकटुकपायं (९), गुडूची-शाखामृगामिष-तुवरकतै- लादिकर मधुरतिक्तरूपाय (१०), रौप्यशिलाजत्वादिकम् अम्ललवणकटुकं (११), हस्तिमूत्रादिकम् अम्ललवणतिक (१२), सरोमकं हस्तिनीदध्यादि अम्ललवणकपाय (१३), मरिचसंस्कृतसुरादिकम् अम्लकटुतितकम् (१४), मम्लवेतसादिकम् अम्लकटुकपायं (१५), कीरमांसयुतसुरादिकम् अम्लतिक्तकपाय (१६), भविमूत्रादिकं लवणकटुतिक्तम् (१७), अरुष्कर सरोमकं लवणकटुकपायं १ क्षीरोरभ्रमत्स्यमासादिकम्' इति सिद्ध भैपज्यमणिमालायाम् । २ 'कुङ्कुमकेशर- शृगालमासादिक' इति पा० । ३ 'एडकादिकम् ऊपकादिकम्' इति सि. भै० । ४ 'द्विरसयोनय.' शति पा० । ५ 'रसत्रिकसयोगा' इति पा० । ६ 'सिश्चितिका- फलादिक' इति पा० । ७ 'अपूर्पणादिमासादि' इति सि. मे० । ८ 'कटुकासस्कृत- गुडादिक' इति पा० । ९ 'ताप्य-कासीसादि' सि० मे० । १० 'कटकाम्लभक्तादि' इति सि० मे०। ११ ०रककवकतैलादिक' इति सि० मे० । १२ 'हस्तिमृगमूत्रादि' इति सि० १३ 'हस्तिनीदध्यादि' इति सि० मे० । २४ 'मथितसंस्कृतसुरादिक' इति पा० । १५ 'अरुष्कासवरोमक' इति सि० मे० । भे० । -- + २०२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । (१८), समुद्रफेनादिक' लवणतिक्तकपाय (१९), कृष्णागरसुरदारनेहादिक कटुतिककपायम् (२०); एव त्रिकभेदा विशतिदर्शिताः । अत पर चतुःसंयोगाः पञ्चदशप्रकारा वक्ष्यन्ते-गोमूत्रान्वितशिलाजतुप्रभृतिकं मधुरामललवणकटुकं (१), गोमूत्रैकशफक्षीरादिकं मधुराम्कलपणतितकं (२), सैन्धवान्विततक्रादिकं मधुराम्ललवणकपायं (३), लशुनान्वितं सुरादिकं मधुराम्लकटुतिकं (४), कालिकान्वितैरण्डतैलादि सदिरान्वितशिलाहादिक च मधुराम्लकटुकपायम् (५), उर्दुम्बरान्वितं यवासशर्करादिकं मधुराम्लतिक्तरूपायं (६), वातांकफलादिक मधुरलवणतिक्तकटुकं (७), गोमूत्रान्विततैलादिक मधुरलवणकटुकपायं (८), तिलगुग्गुल्मादिक मधुरकटुतिक्तकपाय (९), समुद्रफेन-शरा-चित्रकान्वितबदरादि मधुरलवणतिक्तकपायं (१०), सुवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकृतसुरादिकम् अम्ल लवणकटुति (११), सौवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकम् अम्ललवणक्टुकपाय (१२), औद्भिदलवणान्वितं शुरुमांसादिकम् अम्ललवणतिककपाय (१३), बालमूलक-हस्तिनीदध्यादिकम् अम्लकटुतिककपाय (१४), सरोमकं चालयिल्वा- दिक' लवणकटुतिकरुपायम् (३५); एवं चतुप्फरससंयोगाः पञ्चदश कथिताः । अतः पर पञ्चरससयोगाः पद वक्ष्यन्ते-आमरमर्दान्वितं भृष्टवार्ताकफलादिकं० मधुराम्ललवणतितकटुकं (१), कटुवययवक्षारान्विततकादिकं" मधुराम्ललवण- कटुकपायम् (२) औद्भिदान्विततकादिकं मधुराम्ललवणतिक्तकषायं (३) हरीतकी धात्रीफलादिक मधुरामलक्टुतिक्तरूपायं (४), रसोनादिकं मधुरलवणकटुतिक कपायं (५), भल्लातक-रौप्यशिलाजतुमिश्रितनिम्बादिकम् अम्ललवणकटुतिपकपायम् (६); एवं पञ्चरससंयोगाः पड़ दर्शिताः । मतः पर पडूसं वक्ष्यते-एणमांसादिकं मधुराम्ललवणकटुतिक्तरूपायम् । अत. परमेकैकरसानाह-सन्तानिका-गोदुग्धादिकं मधुरम् , (१) मामकरमर्दादिकम् अग्ल (२), रोमकादिकं लवणं (३), चव्यादिक कटुक (४), निम्बपर्पटाटिक तिक्तं (५), पै-न्यग्रोधायकरादिकं १ 'समुद्रफेन समुद्रस्थित' इति सि० भे० । २ 'आादिक' इति पा० । जतुप्रभृतिक' इति पा० । ४ 'कम्ब्वादिक' इति सि० मे० । ५ 'उदुम्बरान्वितयवादि' इति सि० भे०। ६ 'समुद्रफेनशर्करासयुक्त चन्दन मधुरलवणतिक्तकपायम्' इति पा०, 'समुद्रफेन-शर्करासयुक्तचन्दन' इति सि० भे० । ७ 'सुवर्चलासयुक्तलवणापन्वितमदिरादिक' इति पा०, 'सैन्धवसौवर्चलान्वित हस्तिन्यादिकृतसुरादिक' इति सि० मे० । ८ 'वालमूल- कातहस्तिनीदध्यादिक' इति सि० भ० । ९ 'रोमकवालयिल्वादिक' इति सि० भे० । १० 'माम्रकरमर्दान्वितभ्रष्टवार्ताकुफलादि' इति सि० मे० । ११ 'त्रिकटुयवान्विततकादिक इति सि० मे०। १२ 'हरीतकीफलादिक' इति सि० भे० । १३ 'यथा---पारद', एणमासादि च' इति सि० मे० १४ 'आत्रकरमर्दादिक इति सि० भ० । कन्द" इति सि० मे० । ३ 'शिला. । १५ 'पद्य- - पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः। २०३ । ते कषायम् (६); एवं षट् कथिताः । अनेन प्रकारेण त्रिपष्टिः कथिता । कार्तिक- कुण्डस्त्वमुं पाठमन्यथा आपातनिकां कृत्वा व्याख्यानयति; तद्यथा-दोषाणां पञ्चदशधा प्रसरो भेदः, तस्य बहुभिस्निपष्टिरसभेदैः सह प्रयोगो दुर्घटः, अतो दोपभेदानामपि बहुत्वमाह-अविदग्धा इत्यादि । अविदग्धा अप्रकुपिताः, विदग्धाः कुपिता दोपाः, यद्यस्मिन् पाठे दोषाणां त्रिपष्टिमेदा उक्काः, तर्हि पूर्वपाठे पञ्चदशधा प्रसरः किमित्युक्तः ? सत्यं, कुपितदोषस्यात्यन्तचिकित्सनीयत्वापादनार्थम् ; अन्यद् : ग्रन्थगौरवमयात् परित्यक्तम् (ड.)॥ एकैकहीनास्तान् पञ्चदश यान्ति रसा द्विके । त्रिके खादुर्दशाम्लः पट्, त्रीन् पटुस्तिक्त एककम् ॥ चतुष्केपु दश स्वादुश्चतुरोऽम्लः, पटुः सकृत् । पञ्चकेष्वेकमेवाम्लो मधुरः पञ्च सेवते ॥ द्रव्यमेकं पडाखामसंयुक्ताश्च षडूसाः। षट् पञ्चकाः षट् च पृथग्रसाः स्युश्चतुर्द्धिको पञ्चदशप्रकारो। मेदास्त्रिका विंशतिरेकमेव द्रव्यं पडाखादमिति विपष्टिः ॥ रसानुरसतो रसभेदास्तारतम्यपरिकल्पनया च । संभवन्ति गणनां समतीता, दोष-मेषजवशादुपयोज्याः॥ (अ ह सू. अ. १०)। xxx क्षीरं सुरा चिढं निम्बश्वव्यं पन रसाश्रयम् । द्रव्यं स्वादुरसादीनां पण्णां विद्धि यथाक्रमम् ॥ द्रव्य द्रव्यान्तरेणैव योजयेविरसादिपु । धात्रीफलं शर्करया लवणेनाकं तथा ॥ एवमादीनि द्रव्याणि योजयेद्भिपगुत्तमः । कानिचिद् द्विरसादीनि द्रव्याणि स्यु. स्वभावत. ॥ यथैण. पडूसः कृष्णो, यथा पञ्चरसाऽभया । मद्य पञ्चरसं तद्वत्तिलो यद्वम्चतूरसः ॥ एरण्डतलं बिरसं, माक्षिकं द्विरसं यथा । घृतमेकं स्वादुरसं मधुरादिविमागतः ॥ दिमात्रादुदितादेवं शेषमूह्यं मनीषिणा। xxx । ते रसमेदाः त्रिपष्टिरूपाः, रलतो रसवशेन, तथाऽनुरसतः अनु- रसवशेन, तथा तारतम्यपरिकल्पनया अयं मधुरोऽय मधुरतरोऽय मधुरतम इत्येवं- रूपया, गणनां समतीताः संख्यामतिकान्ता. संभवन्ति । दोपेत्यादि दोपा वातादयः, मेषजानि हरीतक्यादीनि, दोपाश्च भेषजानि च दोप-भेपजानि, तेषां वशः अनुरोधः सामर्थ्य वा, तस्माद्धेतुभेदाद्रसभेदा उपयोज्या; न दोषमनपेक्ष्य मेपजं वाऽनपेक्ष्य एवमेवोपयोज्या इत्यर्थः । xxx । दोप-मेषजवशादित्युपल- क्षणार्थ, देशादिवशाद्धि दोपादीन् वीक्ष्य रसभेदा उपयोज्याः । x xx। (अ. द.)।xxx। उक्तरसभेदानामवान्तरभेदैरानन्त्य दर्शयति-ते रसानु- रसत इति । ते रसमेदाः रसानुरसकल्पनया तारतम्यकल्पनया च गणनां समतीताः संभवन्ति । यथा-मधुरामलस्य द्रव्यस्य मधुरस्य रसत्वे, अम्लस्यानुरसत्वे, २०४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । क्वचिदम्लत्य रसत्वे, मधुरस्थानुरसत्वे बहुभेदस्वमित्यादि । तथा मधुरस्य मधुरतरवं, मधुरतमत्वं चेत्यादि तारतम्यम् । सर्वेषां रसमेदानां यौगिकचं दर्शयति-दोप- मेपनवशादिति । दोपवशा पजवशाहा सर्वेऽपि रसा उपयोज्याः औपयोगिका भवन्ति । दोपवशाद्यया-केवलवायावम्लः, पित्तयुक्ते अम्ल-तिको, श्लेप्मयुक्त अम्ल-कटुकावित्यादि । मेषजवशायथा-विरेचनौषधमेकरसमहृद्यं द्वि-त्रिरसादि *कार्यम् ।xxx। (हे.)॥ द्रव्य, देश और कालके प्रभावसे मधुरादि छ• रसोंके परस्पर दो-दो, तीन-तीन, चार-चार, पाँच-पाँच और छ. के संसर्गसे (मिलनेसे) ५७, तथा असंयुक्त स्वरूपमें छः, इस प्रकार ६३ मेद होते हैं। द्विकसयोग अर्थात् दो-दो रसोंके सयोग पन्द्रह होते हैं, त्रिक अर्थात् तीन रसोंके सयोग बीस होते हैं, चतुष्कसयोग अर्थात् चार रसोंके सयोग पन्द्रह होते हैं, पञ्चकसयोग अर्थात् पाँच रसोंके सयोग छ होते है, छ. रसोंका सयोग एक होता है, असयुक्त एक-एक रस छ हैं। पन्द्रह द्विकसयोग इस प्रकार हैं।-(१) मधुराम्ल, जैसे-वेर, कैयके फल आदि; (२) मधुरलवण, जैसे- ऊँटनीका दूध, मेड़का मास आदि; (३) मधुरकटुक, जैसे-कुत्ता, भृगाल आदिका मास; (४) मधुरतिक, जैसे-गन्धाविरोजा, राल आदि, (५) मधुरकषाय, जैसे- तिलका तेल, धामनका फल आदि, (६) अम्ललवण, जैसे-ऊषक (क्षारमृत्तिका) आदि; (७) अम्लकटुक, जैसे-चुक्र आदि, (८) अम्लतिक्त, जैसे-सुरा आदि; (९) अम्लकषाय, जैसे-हथनीका दही, तोतेका मास आदि; (१०) लवणतिक्त, जैसे-राँगा, सीसा आदि, (११) लवणक्टुक्र, जैसे-गोमूत्र, सजीखार आदि; (१२) लवणकषाय, जैसे-समुद्रफेन आदि; (१३) तितकटुक, जैते-कपूर, जायफल आदि, (१४) तिक्तकषाय, जैसे-हथनीका दही आदि; (१५) कटुकषाय, जैसे-भिलावेंके फलका मग्ज, हरताल आदि । अव तीन रसोंके सयोग कहे जाते हैं।-(१) मधुरामललवण, जैसे-हाथीका मास आदि; (२) मधुरामलकटुक, जैसे- सेहका मास आदि, (३) मधुराम्लतितक, जैसे गेहूँसे वनाई हुई सुरा आदि; (४) मधुराम्लकपाय, जैसे-दहीके ऊपरका पानी, छाछ आदि, (५) मधुरलवणकटु, जैसे- जंगली कपोतका मास आदि, (६) मधुरलवणतिक्त, जैसे-शम्बूक (घोंघा)का मांस आदि, (७) मधुरलवणकषाय, जैसे-गुइके साथ मिलाया हुआ कमलका कन्द आदि; (८) मधुरकटुतिक, जैसे-केतकीके फल, सूखा धनिया आदि; (९) मधुरकटुकषाय, जैसे-गोहका मास, एरण्डतैल आदि; (१०) मधुरतिक्तकषाय, जैसे-गिलोय, वानरका मास, तुवरकतल आदि, (११) अम्ललवणकटुक, जैसे-रौप्यशिलाजतु आदि; (१२) अम्ललवणतिक्त, जैसे-हाथीका मूत्र आदि, (१३) अम्ललवणकषाय, जैसे-साभरका नमक डाला हुआ हथनीका दही आदि, (१४) अम्लकद्धतिक, जैसे-काली मिर्च डाली हुई सुरा आदि; (१५) अम्लकटुकषाय, जैसे-अमलबेत आदि; (१६) अम्लतिक- पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । २०५ ६ कषाय, जैसे-तोतेके मांससे युक सुरा आदि; (१७) लवणकटतिक, जैसे-मेहका मूत्र भादि; ( १८) लवणकटुकपाय, जैसे-सांभरका नमकयुक्त मिलवाँ आदि, ( १९)लवण- तिक्तकषाय, जैसे-समुद्रमें रहा हुआ समुद्रफेन आदि; (२०) कटुतिक्तकषाय, जैसे-काला अगर और देवदारका तैल आदि । अव पन्द्रह चतुष्कसयोग कहे जाते हैं।-(१) मधुरा- म्ललवर्णकटु, जैसे-गोमूत्रयुक्त शिलाजतु आदि, (२) मधुराम्ललवणतिक्त, जैसे-गोमूत्र और एक शफवाली घोडी आदि जानवरोंका दूध; (३) मधुराम्ललवणकषाय, जैसे- सैन्धवयुक्त छाछ आदि, (४) मधुराम्लकटुतिक्त, जैसे-लहसुनयुक्त सुरा आदि, (५) मधुराम्लकटुकपाय, जैसे-काजीयुक्त एरण्डतैल आदि, (६) मधुराम्लतितकषाय, जैसे- यासशर्करा (तुरंजवीन ) मिला हुआ गूलरका फल आदि; (७) मधुरलवणतितकटुक, जैसे-बैंगन आदि; (८) मधुरलवणकटुकपाय, जैसे-गोमूत्रयुक्त तिल तेल आदि, (९) मधुरकटुतिककषाय, जैसे-तिल, गूगल आदि, (१०) मधुरलवणतिककपाय, जैसे- समुद्रफेन, शकर और चित्रक मिला हुआ वेर आदि, (११) अम्ललवणकटुतिक्त, जसे-सौंचर मिलाये हुए हथनीके दहीसे वनाई हुई सुरा आदि, (१२) अम्ललवण- कटुकषाय, जैसे-सौचर मिलाया हुआ हथिनीका दही आदि, (१३) अम्ललवणतिक्त- कपाय, जैसे-रेहका नमक मिलाया हुआ तोतेका मांस आदि, (१४) अम्लकटुतिक- फपाय, जसे-कोमल मूलीयुक्त हथनीका दही आदि, (१५) लवणकटुतितकपाय, जैसे- साभरका नमक मिलाया हुआ कच्चा वेलफल आदि । अव पाच रसोंके छः सयोग कहे जाते हैं ।-(१) मधुराम्ललवणतितकटुक, जैसे-कच्चे करौंदेके फलके साथ मिलाया हुआ भुना हुआ वेंगन आदि, (२) मधुराम्ललवणकटुकपाय, जैसे-त्रिकटु और जोखार मिलाई हुई छाछ आदि, (३) मधुराम्ललवणतिक्तकषाय, जैसे-औद्भिदलवण मिलाया हुआ तक आदि, (४) मधुरामलकटुतिक्तकपाय, जैसे-हरड़, आँवला आदि, (५) मधुरलवणकटुतिककपाय, जैसे-लहसुन आदि, (६) अम्ललवणकटतिक्तकषाय, जैसे-भिलावाँ और रोप्यशिलाजतु मिलाया हुआ नीम आदि । पडूससयोग, जैसे-काले हरिणका मास आदि । अव असयुक्त एक-एक रस कहा जाता है।-(१) मधुर, जैसे-गायका दूध, मलाई आदि, (२) अम्ल, जैसे-कच्चे करौंदे आदि; (३) लवण, जसे-सांभर नमक आदि, (४) कटु, जैसे-चवक आदि, (५) तिक्त, जैसे-नीम, पित्तपापड़ा आदि, (६) कषाय, बड़के इस प्रकार रसोंके ६३ मेद उनके उदाहरणोंके साथ लिखे गये हैं। इन ६३ मेदोंमें भी रस और अनुरसकी कल्पना करनेसे (जैसे-मधुराम्लसयोगमें मधुर रस और अम्ल अनुरस अथवा अम्ल रस और मधुर अनुरस, ऐसी कल्पना करनेसे ) तथा तर और तमभावकी कल्पना करनेसे (जसे-मधुरतर, मधुरतम, अम्लतर, अम्लतम इत्यादि कल्पना करनेसे) ६३ से भी अधिक मेद हो सकते हैं । तथापि रसचिन्तकोंने (रसके विषयमें विचार करनेवाले तन्त्रकारोंने ) खस्थ और आतुरकी चिकित्सामें अनतिसक्षेप- जैसे-कमल, अङ्गुर आदि।
- २०६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । विस्तरतया इन ६३ मेदोंको योग्य समझकर ५७ संयुक्त रस और ६ अलग-अलग इन ६३ मेदोंकी कल्पना की है । बुद्धिमान् वैद्य दोष, औषध, देश, काल, वल आदिको देखकर कहीं एक रसवाले एक द्रव्यकी, कहीं एक रसवाले अनेक द्रव्योंकी या कहीं सयुक रसवाले एक वा अनेक द्रव्योंकी कल्पना करते हैं। कफजादिव्याधी रसोपयोगक्रम:- कटु-तिक्त-कपायांस्तु रसान् प्राशो यथाक्रमम् । योगतः कफजे व्याधौ भैषज्यमवचारयेत् ॥ प्रयुक्तः कटुकः पूर्व पैच्छिल्यं गौरवं च यत् । श्लेष्मणस्तं निहन्त्याशु तिक्तस्तस्मादनन्तरम् ।। ह्रासयत्यास्यमाधुर्य कर्फ संशोषयत्यपि । संगृहाति कपायश्च स्नेहं चाप्यवकर्षति ॥ तिक्त-स्वादु-कपायाः स्युः क्रमशः पैत्तिके हिताः। आमान्वयत्वात् पित्तस्य पूर्व तिक्तोऽवचारितः ॥ पाचयत्याशु तं पक्कं ततस्तु मधुरो रसः। शैत्याहरुत्वात् स्नेहाच्च माधुर्याच्च नियच्छति ॥ तद्वत्वविघातार्थ कषायश्चावचारितः। रोक्ष्याद्विशोषिभावाच्च विशोपयति तैजसम् ॥ (वातिके क्रमशो योज्याः पवम्ललवणा रसाः) वातिके लवणः पूर्व संयोगादवचारितः। प्रक्लेदिभावाजयति विवन्धं मातरिश्वनः ॥ निहन्ति शैत्यमुष्णत्वाहुरुत्वाम्चापि लाघवम् । तथैवाम्लो रसः पश्चात्तस्मिन्नेवावचारितः॥ जडीकृतानि स्रोतांसि तेण्यादुद्धाट्य मारुतम् । अनुलोमयति क्षिप्रं स्निग्धोष्णत्वाद्विमार्गगम् ॥ अम्लादनन्तरं पश्चात् प्रयुक्तो मधुरो रसः। वायोर्लघुत्वं वैशद्यं रूक्षत्वं च व्यपोहति ॥ गुरुत्वात् पिच्छिलत्वाच्च खिग्धत्वाच्च यथावलम् । इत्युक्ताः सर्वदोषेषु रसानां प्रविचारणाः॥ ( काश्यपसहिता, खिलस्थान. अ. ६)। बुद्धिमान् वैद्य कफज रोगमें कटु, तिक और कषाय रसों( रसवाले द्रव्यों )का कमसे उपयोग करे । प्रारम्भमें कटु रसका उपयोग करनेसे कफकी पिच्छिलता और गौरवको नाश होता है। उसके बाद तिक्त रसका प्रयोग करनेसे मुखकी मधुरता नष्ट होती है और कफ सूखता है। अन्तमें कषाय रसका प्रयोग करनेसे वह कफको गाड़ा F - -- । - पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । २०७ करता है और कफके स्नेहांशको दूर करता है। पैत्तिक रोगमें तिक्त, मधुर और कषाय रसका क्रमसे प्रयोग करना चाहिये । पैत्तिक रोगमे पहले तिक्त रसका प्रयोग करनेसे वह आम पित्तको पकाता है। पीछे मधुर रसका उपयोग करनेसे वह शीत, गुरु, और स्निग्ध गुणोंसे पित्तके प्रकोपको शान्त करता है । शेपमें कषाय रसका प्रयोग करनेसे वह अपनी रूक्षता और शोषण करनेके गुणसे पित्तकी द्रवताका नाश करता है। वातिक रोगोंमें क्रमसे लवण, अम्ल और मधुर रसका उपयोग करना चाहिये । वातिक रोगों प्रारम्भमें लवण रसका उपयोग करनेसे वह अपने प्रश्लेदी गुणसे वायुके विबन्धको, उष्णतासे वायुके शैत्यको और गुरुतासे वायुके लाघवको दूर करता है। पीछे अम्ल रसका उपयोग करनेसे वह अपने तिक्ष्ण, स्निग्ध और उष्ण गुणसे वायुके अवरुद्ध स्रोतोंको खोल कर विमार्गगामी वायुको अनुलोम करता है । अम्ल रसके पीछे मधुर रसका उपयोग करनेसे वह अपने गुरु, पिच्छिल और स्निग्घ गुणसे वायुके लघुख, वैशद्य और रूक्षलका नाश करके वायुका शमन करता है। रसभेदेन पवर्गा.- अतः सर्वेपामेव द्रव्याण्युपदेक्ष्यामः । तद्यथा-काकोल्यादिः क्षीर-घृत-चसा-मज-शालि-पष्टिक-यव-गोधूम-माष-ऋङ्गाटक-कसेरुक- पुसैर्वारुक-कर्कारुकालावू-कालिन्द-कतक-गिलोड्य-प्रियाल-पुष्करवीज- काश्मर्य-मधूक-द्राक्षा-खजूर-राजादन-ताल-नालिकेरेक्षुविकार चलाति- बलात्मगुप्ता-विदारी-पयस्या-गोक्षुरक-क्षीरमोरट-मधूलिका-कूष्माण्ड- प्रभृतीनि समासेन मधुरो वर्गः, दाडिमामलक-मातुलुन्नाम्रातका- कपित्थ-करमर्द-बदर-कोल-प्राचीनामलक-तिन्तिडीक-कोशाम्रक-भव्य- पारावत-वेत्रफल-लकुचाम्लवेतस-दन्तशठ-दधि-तक-सुरा-शुक्त-सौवी- रक-तुषोदक-धान्याम्लप्रभृती नि समासेनाम्लो वर्गः; सैन्धव-सौवर्चल- विड-पाक्य-रोमक-सामुद्र-पक्त्रिम-यवक्षारोपरप्रसूत-सुपर्चिकाप्रभृती नि समासेन लवणो वर्गः, पिप्पल्यादिः सुरसादिः शिग्रु-मधुशिय-मूलक- लशुन-सुमुख-शीत शिव-कुष्ठ-देवदारु-हरेणुकावल्गुजफल-चण्डा- गुग्गुलु-मुस्त-लागलकी-शुकनासा-पीलुप्रभृतीनि सालसारादिश्च प्रायशः कटुको वर्गः; आरग्वधादिर्गुडूच्यादिर्मण्डूकपर्णी-वेत्रकरीर-हरिद्राद्वये- न्द्रयव-वरुण-स्वादुकण्टक-सप्तपर्ण-वृहतीद्वय-शह्विनी-द्रवन्ती-त्रिवृत्कृत- वेधन-कर्कोटक-कारवेल्ल-वार्ताक-करीर-करवीर-सुमनः-शङ्खपुष्प्यपामार्ग- त्रायमाणाशोकरोहिणी-वैजयन्ती-सुवर्चला-पुनर्नवा वृश्चिकाली ज्योति- प्मतीप्रभृतीनि समासेन तिको वर्गः; न्यग्रोधादिरम्वष्ठादिः प्रियवादी रोनादित्रिफला-शल्लकी-जम्ब्वाम्र-वकुल-तिन्दुकफलानि कतक-शाक- फल-पाषाणभेदक-वनस्पतिफलानि सालसारादिश्च प्रायशः कुरुवक- ।
२०८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कोविदारक जीवन्ती-चिल्ली-पालड्या-सुनिषण्णकप्रभृतीनि वरकादयो मुद्गादयश्च समासेन कषायो वर्गः (सु. सू. अ. ४२)॥ वक्तव्य-हमने विस्तारभयसे यहां केवल सुश्रुतोक छः वर्ग दिये है । चरक वि अ. ८ में, अ. स. सू. अ. १८ में, तथा अ. ह. सू. अ. १० में भी इस प्रकार रस भेदसे ६ वर्ग-गण-स्कन्ध लिखे हैं। जग्धाः षडधिगच्छन्ति वलिनो वशतां रसाः। यथा प्रकुपिता दोषा वशं यान्ति वलीयसः॥ (सु सू. अ. ४२)। इदानी रसानामुपयोगे बलवानेव रसः स्वकायं करोतीति सदृष्टान्तमाह-जग्धा इत्यादि । जग्धा इत्युपयोगोपलक्षणं, तेन नस्याभ्यञ्जनादिप्रयोगोऽपि विज्ञेयः । यो रसो वीर्येणोपचयेन वा बलवान् , तस्येतरे निर्वीर्या हीना वा रसा वशतां यान्ति, तानभिभूय बलवानेव रसः कार्य करोतीत्यर्थः । दृष्टान्तेऽपि बलवाननुबन्ध्यरूपप्राप्तो दोपोऽनुबन्धरूपमप्रधानं तिरस्कृत्य कार्य करोति । अत एवोक्तं-"सन्निपाते तु यो भूयान् स दोषः परिकीर्तितः" (च. 'चि. अ. ३) इति । अन्ये तु वलिनः पुरुषस्य रसा अत्यन्ताम्यासेऽपि बलवदग्नितया वशतां यान्ति न दोपं कुर्वन्ति, यथा दोषाश्च बलवतः पुरुषस्य अग्निबल-देहबलाभिभूतत्वान विकारं कुर्वन्तीति श्लोकार्थ वर्णयन्ति (च. द.)। ननु कथं खल्वत ऊचं "यवः कपायो मधुरो हिमश्च" (सु. सू. भ. ४६) इत्येवमनेकरसत्वेन व्याचिख्यासितानि द्रव्याणीह मधुरादिवर्ग- संग्रहेणापदिश्यन्त इत्येवं ये प्रत्यवतिष्ठन्ते तान् प्रत्याह-जग्धा इत्यादि । जग्धा भक्षिता उपयुक्ता इति यावत् । रसाः षडेव बलिनो व्यक्तस्य रसस्य वशतामधि- गच्छन्ति । अन्न दृष्टान्तो-यथेति । तस्माइलिनो रसानधिकृत्य तेन तेन वर्गसंग्रहेण द्रव्याण्युपदिश्यन्त इति नानुपपत्तिः (हा.)॥ जिनका अग्नि और देह उत्तम-बलवाला है ऐसे मनुष्यके शरीरमें जैसे बड़े हुए वातादि दोष अपना प्रभाव नहीं दिखा सकते अथवा ससर्ग या सन्निपातमें जैसे दुर्वल (अनुबन्धरूप ) दोष बलवान् (अनुवन्ध्यरूप) दोषके वशमें हो जाते हैं अपना प्रभाव नहीं दिखलाते, वैसे ही भोजनादिके रूपमें उपयुक्त छहों रसोंमें जो रस दुर्बल (अव्यक्त या हीनवीर्य) होते हैं वे बलवान् (व्यक्त) रसके वशमें आ जाते हैं। अतः उपर लिखे मधुरादि वर्गों में उनके व्यक्त रसके अनुसार ही द्रव्योंका निर्देश किया गया है। । १ इस लोकके वक्तव्यमें डॉ. भा. गो. घाणेकरजी लिखते हैं कि-सर्व कार्यद्रव्य पञ्चमहाभूतात्मक होनेके कारण एकरसयुक्त नहीं हो सकते-'तस्मान्नैकरसं द्रव्य भूत- सघातसभवात्" (वाग्भट)। प्रत्येक द्रव्यमें एक या दो बलवान् याने व्यक्त रस होते हैं और कई अल्पवल याने भव्यक्तरस होते हैं । ये भव्यक्त रस अपना अस्तित्व व्यक पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । २०९ एकीयमतेन रसप्राधान्यनिरूपणम्- नेत्याहुरन्ये, रसास्तु प्रधानं; कस्मात् ? आगमात् ; आगमो हि शास्त्र- मुच्यते, शास्त्रे हि रसा अधिकृताः, यथा--"रसायत्त आहार इति, तस्मिंस्तु प्राणाः” (सु. सू. अ. १) इति; उपदेशाच्च, उपदिश्यन्ते हि रसके सामने प्रकट नहीं कर सकते-"तत्र व्यको रस. । अनुरसस्तु रसेनाभिभूत- स्वादन्यक्तः (अष्टासंग्रह) । इसलिये प्रत्येक द्रव्यका निर्देश उसके बलवान् रसके अनुसार ही किया जाता है । ऊपर मधुरादि वर्गामें द्रव्योंका जो निर्देश किया गया है वह "भूयसाऽल्प हि जीयते” के तत्त्वानुसार ही किया गया है, यह इस श्लोकका तात्पर्य है" (स. स्था. पृ. २३३) । चरकमें मधुरादिवर्गसग्रहके प्रारम्भमें कहा गया है कि-"यत्तु पट्विधमास्यापनमेकरसमित्याचक्षते मिषजस्तहुर्लभतम, ससृष्टरसभूयिष्ठत्वागन्या- णाम् । तस्मान्मधुराणि, मधुरप्रायाणि, मधुरविपाकानि, मधुरप्रभावाणि च मधुरस्कन्धे मधुराण्येव कृत्वोपदिश्यन्ते; तथेतराणि द्रव्याणि" (च. वि. अ. ८)। अर्थात् एक एक रसवाला छः प्रकारका मास्थापन दुर्लभ है, क्योंकि द्रव्य प्राय. ससृष्ट रसवाले होते इसलिये मधुरस्कन्धमें मधुर, मधुरप्राय, मधुरविपाक और मधुरप्रभाववाले द्रव्योंको मधुर मानकर उनका उपदेश किया गया है, इसी प्रकार अम्लादि वर्गों के लिये भी जानना चाहिये। १ रसाः प्रधाना इति केचित् (र. वै. अ. १, सू. ११०)।-यथा (भा.)। रसानधिकारात् (सू १११) । केचिद् रसान् प्रधानान् ब्रुवतेऽधिकारात । ते यधिकृता- श्चिकित्सायामिति । कथ--'पट्खेव युक्त वमन, पट्सु युक्त विरेचनम् । पट्सु चास्थापन युकं, पसु सशमन हितम्" इत्यादि । यो यस्मिन्नधिकृत. स तस्मिन्नन्येभ्यः प्रधानो दृष्ट. । यथा--सेनायां सेनापतिः (भा.)। तेनोपसंहारात् (सू ११२)। तेन रसेन उपसंहृत्य तन्मुखन शेपस्य वचनम् । यथा-विदारिगन्धादीन् द्रव्यगणानुक्त्वा “यानि यान्येवप्रकाराणि मधुरस्कन्धपरिसख्येयानि भवन्ति, एवमम्लस्कन्धादयः" इति । अस्यार्थमन्यथा वर्णयन्ति केचित् तेन रसेन 'रसधातोरुपसंहारादाहरणादादानात् ; सपन्नरसं द्रव्यमाहरन्ति, अन्यद् वर्जयन्तीति (भा.)। तद्यापत्तौ शेपव्यापत्तेः (सू ११३) । ४४ अनेनास्यैकार्थ- तेति न युक्त, तव्यापत्ती रसव्यापत्ती, रसव्यापत्तिनिमित्त शेषाणा द्रव्यादीना न्यापत्ते, यथा--क्षीरस्य रसे दुष्टे क्षीर न गृपते, तद्विपाकादयश्च विपन्ना इति (भा.)। उपदेशात् (सू ११४) | xx उपदेशः शासम् । सामान्येनोपदिशति--"मधुराम्ललवणा वातं नयन्ति, श्लेष्माण जनयन्ति" इति शास्त्रोपदेश । तत्त द्रव्यस्य रसस्य तुल्यं, कथ रसाना प्राधान्य साधयतीति, नात्र साधकत्वमेवाभिप्रेतम् । किं तर्हि स्वपक्षसाधकस्य व्यपदेश., नोमयत्र सिद्धिरसिद्धिति प्रसानाधम् । कथमिति ? यदि शास्त्रसामर्थ्याद् द्रव्य प्रधान, रसाश्च प्रधानाः शाखसामर्थ्यादेव, यदि रसाः शास्त्रोपदिष्य अपि न प्रधाना , द्रव्यमपि न प्रधान शास्त्रोप- दिष्टत्वादिति (भा.)। अपदेशात् (स. ११५) । ४४ अपदेशादिति अपदेशो नाम द्र०पू.१४ २१० द्रव्यगुणविज्ञानम् । . an रसाः, यथा-"मधुराम्ललवणा वातं शमयन्ति" (सु. सू. अ.४२); अनुमानाच्च, रसेन ह्यनुमीयते द्रव्यं, यथा-मधुरमिति; ऋपिवचनाच, ऋषिवचनं वेदः, यथा--किंचिदिज्यार्थ मधुरमाहरेदिति; तस्मादसाः प्रधान; रसेषु तु गुणसंज्ञा । रसलक्षणमन्यत्रोपदेक्ष्यामः (सु. सू अ. ४०)। रसप्राधान्ये एकीयं दर्शनं निर्दिशन्नाह-नेत्यादि । नेत्याहुरन्ये द्रव्यप्राधान्यमन्ये न ब्रुवत इत्यर्थः । तस्मिंस्तु प्राणा इति आहारे सति प्राणा इत्यर्थः।xxx। इज्यार्थ यागाथ, मधुरमाहरेदिति मधुररसमाहरेत् भानयेत् , न तु द्रव्यमानयेदिति । गुणस्यापि किमिति न प्राधान्यं साधितमित्याशझ्याह-रसेवित्यादि । अनादिशब्दो लुप्तो द्रष्टव्यः; एतेनैतदुक्त भवति-रसादिप्राधान्येनैव साधितेन गुणप्राधान्यं साधितं भवति । यथा द्रव्यलक्षणमुक्तं तथा रसस्यापि किमिति नोकमित्याह- रसलक्षणमित्यादि । अन्यत्र रसविज्ञानीये (ड.)। द्रव्यादपि रसप्राधान्यं दर्शयितुं द्रव्यप्राधान्यं निषेधयति-नेत्याहुरन्ये इत्यादि । एते द्रव्यप्राधान्यख्यापका हेतवो . मन्येनान्योऽपदिश्यत उपमारूपेण । पुरुषसिंह , पुरुपव्याघ्रः, इति प्रधानेन; एवमिहापि अप- देशो दृष्ट.--मधुर गान्धर्व, मधुरा वाणी, कटुक फणीति । केचिदन्यथा वर्णयन्ति-अप- दिश्यन्ते रसा. पश्चादिति । कथ ? कस्यचिच्छेष्मप्रकोप दृष्ट्वा 'भवता मधुराम्ललवणा रसा उपयुक्ता' इति (भा)। अनुमानात् (सू ११६)।xx अस्यायमर्थ.-~अनुमानादिति चेद वाक्यमन्यथा वर्णयन्ति–ते रसा. असौम्यदोषवर्धन दृष्ट्वाऽसौम्यभूतजनिता इत्यनुमीयन्ते, आग्नेयस्य वर्धन दृष्ट्वा आग्नेयभूतननिता इति । अयमपि न घटते, प्रकृतप्राधान्यासाधनात् । तस्मादनुमानादित्येव स्यात्-रसमुखेन द्रव्याण्यपरिच्छिन्नस्वभावान्यपि आस्वाथ रसत परि- च्छेयानि भवन्ति, तस्माद् द्रव्याद् रसा प्रधाना , आस्वाद्यभूतगुणैरित्युतत्वात् (१) (भा.)। नानाविषयत्वात् (सू ११७ )।xx अनेकाधारत्वादिति मधुरस्य तावदिक्षु-क्षीर-शर्करा- खण्डादय , एवमन्येपा च । यद् वहुविषय तत् प्रधान दृष्ट, यथा-मन , अथवा चक्रवर्ती (भा.) तस्मिन् प्रदुष्टे सर्वधातुप्रदोपात् (सू ११८)। xx तसिनसे दुष्टे रक्तादयो धासवश्व दुष्टा भवन्ति । अत्र कथ जिह्वेन्द्रियगाथे रसेऽधिकृतेऽभ्यन्तरो रसः प्रसाध्यत इति । रससामान्य गृहीत्वोक्तमिति चेद् , नहि प्रसरणसामान्याद् गोधा सो भवतीति । तस्मादय- मन्यथाऽस्य विन्यास --तस्मिन् प्रदुष्ट इति, रसस्य प्रदुष्टिनिमित्त जनपदन्याधिरिति । उक्त च तदानी "स्थावरजगमानामुद्धसते रस " इति, रसस्य व्यापत्तिनिमित्ता व्याधय इति । सर्व- धातुदोपादिति सर्वेषा दोषाणा प्रदोषादित्यर्थ , अथवा दुष्टे रसे द्रव्ये उपयुक्ते सर्वदोषप्रकोपादिति (भा.)। तस्मिन् विशुद्ध सर्वधातुविशुद्धेः (सू. ११९)। xx पूर्ववाक्येनैव गतार्थ- मेतद् वाक्यम् (भा.)। भागमाच (सु. १२०)।-आगमाञ्चेति आगमः श्रुति. । तन प्राज्यद्रव्यप्रतिनिधिवचने रसेनैव निर्देश. कृत इति । यथा-आज्यार्थ यत्किचिन्मधुरमाह इति । चेति 'च'शब्द. सर्वसमुच्चयार्थः (भा.)॥
पूर्वार्धे रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः । २११ - वक्तव्यरसप्राधान्यख्यापकहेत्वपेक्षया अप्रयोजका इत्यभिमानो रसवादिनो ज्ञेयः, एवं वीर्यवादिनः, तथा विपाकवादिनश्च; 'नेत्याहुरन्ये' इति वचनमनया दिशा व्याख्येयम् । रसप्राधान्ये भागमादिति हेतुः, आगम एव कण्ठरवेण रसस्य प्राधान्यं कथयतीत्याहुः । उपदेशादिति तु रसेन द्रव्यादिसमुदायकार्योपदेशादित्यर्थमेदो नेयः । ऋपिवचनमिह वेदः, ऋपय आप्ताः, तद्वचनता च वेदस्य ऋपिभिः प्रथम- मुदाहरणान्न तु ऋषिकार्यतया; किंवा न्यायमतेन महेश्वररूपर्षिवचनता वेदस्य शेया । अथ द्रव्यादिप्राधान्यविचारे कस्साद्गुणा नोद्भाविता इत्याह-रसेषु तु गुणसंज्ञेति । रसेवित्युपलक्षणं, तेन वीर्य-विपाकयोरपि गुणसंज्ञेति बोद्धव्यं तेन रसादिप्राधान्यव्युत्पादनेनैव गुणविशेपप्राधान्यं लभ्यत इत्यर्थः । अन्यत्रोपदेक्ष्याम इति रसविशेषविज्ञानीये (च. द.)। मतान्तरमवतारयति-नेत्यादिना । नेति दव्यप्राधान्यप्रतिपेधार्थम् । न खलु द्रव्यं प्रधानमित्यर्थः । किं तर्हि ? इत्याह- रसा इति । तुकारेण रसेवरेपा प्राधान्यं निरुणद्धि, रसा एव प्रधानमित्यर्थः । अधिकृताः प्राधान्येनोपदिष्टा इत्यर्थः । उक्तमर्थमुदाहरणेनावगमयति-यथेत्या- दिना । रसायत्त आहार इत्युक्तानुवादः, 'इति'शब्दो वाक्यसमात्यर्थः । व्याजेन रसानामेकान्ततः प्राधान्यं प्रदर्शयन्नाहारं स्तौति-तसिंश्चेति । यस्तु खल्वाहारः प्राणाधिष्ठानमुच्यते सोऽपि यस्मादसायत्तस्तस्माद्दसानां प्राधान्य प्रति मनागपि नाशक्षितव्यमित्याशयः । नन्विदमयुकं, "रसाः पुनद्रव्याश्रयाः" (सु. सू. भ. १) इति द्रव्याणामप्यधिकृतत्वात्तेपामपि प्राधान्यप्रसक्तेरिति चेनेत्याह-उपदेशाच्चेति । किन्नु खल्वेवमुच्यते-"ऊषकादिः कर्फ हन्ति" (सु. सू. अ. ३७) इत्यादिना रसादिवद्व्याणमिप्यनेकश उपदेशात् , ये त्वेव विप्रतिपद्यन्ते तानपास्यन्नाह- अनुमानाचेति । अनुमानात् अनुमितिसाधनस्वाचेत्यर्थः । ननु किमेतदुच्यते रसेन त्यनुमीयते द्रव्यमिति, न हि द्रव्यमनासाथ निपुणैरपि कैश्चित् केनचिदप्यंशेन रसः परिगृह्यते तदधीनस्वात्, येनानुमिरसते द्रव्यम् । अथ चेत् प्रागेवासाचते द्रव्यं तर्हि ज्ञातमेव तदित्यनुमानमप्रयोजकं स्यादिति चेन्न, प्रमाणकूटानां निःसंशय- करत्वेनाभ्युपगमात्, कचित् प्रत्यक्षपरिगृहीतेऽप्यर्थे उत्पन्नाया अनुमित्सायाः प्रयोजकत्वेनोपलब्धेः । नन्विदमनुपपन्नं द्रव्येणापि रसस्यानुमानात् , तथाहि उप- लब्धाम्लफलरसास्वादस्य पुरुषस्य कालान्तरे तजातीयं फलं दृष्ट्वा तत्राप्यम्लरसमनु- मिमानस्य तद्गर्धिप्रवर्तितो दन्तोदकप्लवो दृश्यते । अपि चानुमितिसाधनत्वादेव चेदसः प्रधानं स्यात्तर्हि इच्छादिमिरात्मनोऽनुमानात् गुणभूतानामिच्छादीना- मप्यात्मतः प्राधान्यं प्रसज्येतेति बचनावसरं सुदूरं परिक्षिपति-ऋपिवचनाचेति । ऋपिवचनं वेद इति ऋपीणां वेदार्थोपनिवन्धत्वाद्वेदवत् प्रमितिसाधनं स्मृतिरिति यावत् । अथवा अतीन्द्रियार्थदर्शिन एव ऋषिपदार्थत्वात् परमेश्वरोऽपि ऋषिः, २१२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । तद्वचनं वेद इति यथाश्रुत एवार्थः । येषामपि वेदराशयो नित्या इति दर्शनं, तेषामपि मम्रद्रष्टुभिरेव वेदाः प्रकाशिता इति वेदस्य ऋपिवचनत्वं नानुपपन्नम् । तदर्शयति-यथेति । मधुररसस्यामूर्तत्वेनाहरणासंभवाद् द्रव्यमाक्षिप्य तेनाहरण- संबन्धो वाच्यः । तेन मधुरं मधुररसप्रधानं व्यमित्यर्थः । अत्र रसप्राधान्येन व्यव्यपदेशानुसाः प्रधानमित्ययमभिसंधिः । उक्तमर्थ निगमयति-तस्मादिति । रसप्राधान्यप्रत्ययकरो हेतुर्गुणप्राधान्येऽपि वुभुत्सितव्यो गुणस्वसाम्यादित्येवोपदिविध रसस्य गुणसंज्ञां सारयति-रसेपु गुणसंज्ञा इति । यस्मादसानां गुणसंज्ञा, तसादस- प्राधान्यनिरूपणादेव तदितरेषां गुणानामपि प्राधान्यं निरूपितमित्ययमाशयः । न चैतदश्रद्धेयम्, "अत ऊध्वं प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मविस्तरम्" (सु. सू. अ. ४६) इत्यादिना शीतादीनामधिकरिष्यमाणत्वात् , "द्रवः प्रक्लेदनः सान्द्रः स्थूलः स्याद् बन्धकारक." (सु. सू. अ. ४६) इत्यादिना द्रवादीनामुपदेशात्, "गन्धलक्षणा क्षितिः" इत्यादौ गन्धादिना क्षित्यादेरनुमानात् , "वायव्यं श्वेतमालभेत" इत्यादि- वेदप्रामाण्याच रसप्राधान्यवदिहापि हेतूपपत्तेः । गुणप्राधान्यहेतवस्त्वेते रसप्राधान्य- हेतव इव व्याख्येयाः (हा.)॥ कई आचार्य कहते हैं कि-द्रव्यको प्रधान मानना ठीक नहीं है । (वे कहते हैं कि-) रस ही प्रधान हैं । आप पूछेगे कि किस हेतुसे ? तो उसका उत्तर यह है- (१) आगमके आधारसे रस ही प्रधान होते हैं । आगम शास्त्रको कहते हैं। आयुर्वेद- शास्त्रमें रस ही अधिकृत किये हैं (रसोंका ही प्राधान्यसे उपदेश किया है)। जैसे सूत्रस्थानके प्रथम अध्यायमें कहा गया है-आहार रसोंके अधीन है और आहारमें प्राण रहते हैं (प्राणोंका पोषण आहारसे होता है)। (२) आयुर्वेदमें रसोंका प्रधानतया उपदेश किया गया है, इससे भी रस प्रधान हैं। रसोंका ही उपदेश किया जाता है। जैसे-'मधुर, अम्ल और लवण रस वातका शमन करते हैं'। (३) अनुमानसे भी रस ही प्रधान होते हैं। रसके द्वारा द्रव्यका अनुमान किया जाता है, जैसे-यह द्रव्य मधुर है । (४) ऋषियोंके वचनोंसे मी रस ही प्रधान है। वेद ऋषियोंका वचन है। वेदमें कहा गया है कि-'यज्ञके लिये कुछ मधुर (मधुर रसवाला द्रव्य) लाओ' इत्यादि । इन हेतुओंसे सिद्ध होता है कि-रस ही प्रधान है। रस गुणोंका ही एक मेद है । इसलिये रस-प्राधान्य हेतुओंसे गुणप्राधान्य भी-सिद्ध होता है। रसका लक्षण अन्यत्र (इसी प्रन्थमें पृ ११९ पर) कहा गया है। इति आचार्योपाहेन त्रिविक्रमात्मजेन यादवशर्मणा विरचिते द्रव्यगुणविज्ञाने पूर्वार्ध रसविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ . - पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २१३ विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः। चरकमते विपाकस्य रसविशेषरूपत्वाद् रसैस्तुल्यफलत्वाच्च रसविज्ञानीयानन्तरं विपाकविज्ञानीयाध्याय मारभ्यते- अथातो विपाकविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामो यथोचुरात्रेय- धन्वन्तरिप्रभृतयः॥ चरकके मतमे विपाक मी रसविशेषरूप होनेसे और विपाकका फल (कार्य) रसोंके तुल्य होनेसे रसविज्ञानीयाध्यायके अनन्तर विपाकविज्ञानीयाध्यायका प्रारम्भ किया जाता है। विपाकके विपयगे आयुर्वेदके जो तन्त्र इस समय उपलब्ध हैं, उनमें दो मत पाये जाते हैं । एकको आत्रेयसप्रदायका मत या चरकमत और दूसरेको धन्वन्तरिसप्र- दायका मत या सुश्रुतमत कह सकते हैं । प्रथम विपाकका लक्षण और पीछे दोनों मत क्रमसे लिसे जाते है।- विपाकलक्षणम्- जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम् । रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः॥ (अ. ह. सू. अ. ९)। विपाकं लक्षयति । जाठरेण औदर्येण अग्निना, • योगात् संश्लेषात् , रसानां परिणामान्ते जरणनिष्ठाकाले, यद् रसान्तरं रसविशेषः, उदेति उत्पद्यते, स 'विपाक' इति स्मृतः मुनिभिः कथित. (अ. द.)। रसानां रसवतां द्रव्याणां जाठराग्निना संयोगाद् यद्रसान्तरमुत्पद्यते स विपाकः । "भादौ पडूसमप्यनं मधुरीभूतमीरयेत्" (अ. हृ. शा. अ. ३) इत्यायुक्तानां मधुराम्ल-कटुपाकानां व्यावृत्त्यर्थमाह-परिणा- मान्ते इति; आहारपरिणामान्ते । ते तु परिणामात् प्रागेव उत्पद्यन्ते, इति तेषां रसत्वमेव (हे.)॥ खाये हुए मधुरादि रसोंका (रसोंके माधारभूत रसवाले द्रव्योंका) महास्रोतमें जठ- रामिद्वारा परिपाक होकर अन्तम जो रसविशेपकी उत्पत्ति होती है, उसको विपाक कहते हैं। वक्तव्य-विपाकका यह लक्षण आत्रेयसप्रदायके मतानुसार वाग्भटने लिखा है। आयुर्वेदमें भुक्त द्रव्योंके दो प्रकारके पाक माने गये हैं--(१) अवस्थापाक और (२) निष्ठापाक या विपाक । पाक अर्थात् पकना-पककर द्रव्यों का स्वरूपान्तरमें और रसान्तरमें (या उसी रसमें ) परिवर्तन होना । खाये हुए आहारका महास्रोतस (मुखसे लेकर गुद तकके अन्नमार्ग)के भिन्न भिन्न स्थानोंमें जो आवस्थिक पाक होता है - .
। अन्नमादानकर्मा २१४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । उसको अवस्थापाक कहते हैं । अवस्थापाकगें अन्नमार्गके विभिन्न स्थानों में आहारमें भिन्न भिन्न परिवर्तन होते हैं । इन भिन्न भिन्न आवस्थिक परिवर्तनों में आहारसे कि- (मल"के रूपमे कफ, पित्त, वात, मूत्र और विष्ठाका पृथकरण होता है। इन परिवर्त- नोंके अन्तमें सार-प्रसाद-रूप रसधातुकी उत्पत्ति होती है। इस रसधातुसे शरीरके गब अवयवोंका (वात पित्त-कफ-रक्त-मास-मेद-अस्थि मज्जा-शुक्र-आदिका) पोषण होता है। आहारपाकके अन्तिम परिणाम( निष्ठा )रूप रसधातुमें खाये हुए आहारके छहों रसोंका मधुर, अम्ल और कटुरूपमें जो अन्तिम परिवर्तन होता है उसको आयुर्वेदकी परिभाषामें निष्ठापाक या विपाक कहते हैं । निष्टापाक याने आहारका (आहारगत रसोंका) अन्तिम परिवर्तन । अवस्थापाकका विस्तृत वर्णन चरक चिकित्सास्थान के १५ वें अध्यायमें तथा अष्टाङ्गहृदय शारीरस्थानके ३ रे अध्यायमें किया गया है। विपाक और अवस्थापाकका मेद जाननेके लिये प्रथम अवस्थापाकका निरूपण किया जाता है। अवस्थापाकनिरूपणम्- तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्पति। तवैभिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥ समानेनावधूतोऽग्निरुदर्यः पवनेन तु । काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ एवं रसमलायान्नमाशयस्थमधःस्थितः। पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बु-तण्डुलम् ॥ अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षड्रसस्य प्रपाकतः। मधुराद्यात् कफो भावात् फेनभूत उदीर्यते ॥ परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः। आशयाञ्चयवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ पक्वाशयं तु प्राप्तस्य शोष्यमाणस्य वसिना। परिपिण्डितपक्कस्य वायुः स्यात् कटुभावतः ॥ (च. चि. भ. १५)। संप्रति संप्राप्तस्यान्नस्याग्निना यथा पाको भवति, यथा च पच्यमानमग्नं देह- धात्वादिरूपतामापद्यते, तदाह-अन्नमित्यादि । मुखप्रवेशादारभ्यानस्य व्यापार १ 'मधुराख्यात्' इति, 'मधुरात् प्राक्' इति च पा० । २ "अन कालेऽभ्यवदत कोष्ठ प्राणानिलेरितम् । द्रवैविभिन्नसवात नीत सेहेन मार्दवम् ॥ सधुक्षित समानेन पचत्यामाशय- स्थितम् । औदर्योऽग्निर्यथा वाह्य स्थालीस्थ तोय-तण्डुलम् ॥ आदौ पड्समप्यन्न मधुरीभूत- मीरयेत् । फेनीभूत कफ, यात विदाहादरलता तत. ॥ पित्तमामाशयात् कुर्याच्यवमान, च्युत पुन । अग्निना शोपित पकं पिण्डितं कटु मारुतम् ।" (अ. ह. शा. अ. ३)। . - -- पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । 1 २१५ - 1 इहोच्यते । आदानमाहारप्रणयनं कर्म यस्य स तया, प्रकर्पतीति नयति । द्रवैरिति पानीयादिभिः । मित्रसंघातमिति अवयवशैथिल्यमापन्नम् । काले इति चुभुक्षाकाले। भुक्तं सममिति मात्राप्रकृत्यादिसमम् । समानेनावधूत इति भग्निपार्थस्थितेन समानेन संधुक्षितः; अयं च समानः प्राकृतत्वाद् वाझो वायुरिव अग्नेः संधुक्षणो भवति न वैषम्यकरः, विकृतस्तु वैपम्यं करोति; तेन वातेन विपमोऽनिर्भवतीति चोपपत्र भवति । एते च द्रवादयः पाचकस्याग्नेः सहाया भवन्तीत्यनेन अन्थेनोच्यते । "आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति तद्यथा-ऊप्मा, वायुः, क्लेदः, खेहः, कालः, समयोगश्च" (च. शा. म. ६) इति । उदर्यः पाचक इत्यर्थः । 'पवनोद्वहः' इत्यग्निविशेपण केचित् पठन्ति । 'समम्' इति भुक्तविशेषणं केचित् पठन्ति । तदा सममित्यनेन मात्रासाम्यमुच्यते; सम्यग्ग्रहणेन तु प्रकृत्यादिसंपदुच्यते । आयुर्विवृद्वये इति शरीरेन्द्रिय-सत्वात्मसंयोगानुवर्तनाय तद्विवृद्धये च । रस-मलाय इति तादयें चतुर्थी । भाशयस्थमिति आमाशयस्यम् । अधःस्थित इत्यनेन भनेरूद्मज्वलनस्वभाव- राया अयस्थानपाके सामर्थ्य सूचयति । मन्त्रार्थे यथेत्यादिना दृष्टान्तमाह । एवं स्थूलपाकक्रममभिधाय, भवान्तरमणुपाकक्रममाह-मन्नस्येत्यादि । भुक्तमात्रस्येति भुकानन्तरमेव । पडूसस्येति प्राशस्त्येनाभिधानं; किंवा पडूसस्यापि प्रथमं मधुरता निरुक्ता भवतीति दर्शयति । प्रपाकत इति प्रथमपाकतः, प्रशब्द आदिकर्मणि । मधुरश्चासौ आयश्चेति मधुरायः; किंवा 'मधुरात् प्राक् कफो भावात्' इति पाठः । फेनभूत इति फेनसदृशोऽधन इत्यर्थः । परमिति आयमधुरपाकानन्तरम् । विदग्ध- स्येति पकापकस्य । अम्लभावत इति जाताम्लस्वरूपतः । आशयात् आमाशयात् । च्यवमानस्य अधोभागं वायुना नीयमानस्य, अनेन च पित्तस्थानसंवन्धं विदग्धा- हारस्य दर्शयति । अच्छमिति मघनम् । उदीर्यते इति पित्तमुत्पद्यते; अम्लं च पित्त- मम्लभावादाहारस्य उत्पद्यत इति युक्तमेव । पक्वाशयं तु प्राप्तस्येति मलरूपतया पक्वाशयं गतस्य । शोप्यमाणस्य वहिनेति यद्यप्यूर्ध्वदाहक्षमो वह्निः, तथाऽप्यस्या- धोगतस्य वह्निना शोप्यमाणत्व पक्वाशयगतस्याप्युपपन्नम् । यतश्चाधोगमने सम्य- ग्वहिव्यापारो नास्ति, अतः पच्यमानस्येति पदं परित्यज्य शोष्यमाणस्येति कृतम् । परिपिण्डितपकस्येति परिपिण्डितरूपतया मलरूपतया पकस्य । वायुः स्यात् कटुभावत इति परिपिण्डितावस्थोद्भूतकटुता वायोरुत्पद्यते । एवमीदृशः षडूसाहारस्याव- स्थापाको भवति । ननु यात्रावस्थापाकवशात् पण्णामेव रसानां कफादिकर्तृत्व- मुच्यते, तदा "कटु-तिककपायाणां विपाक. प्रायशः कटु." (सू. म. २६) इत्यादिना यो विपाक उच्यते स विरुध्यते, अवस्थापाकेनैव बाधितत्वात्, नैवं, १ 'रसानामविशेषेण' इति । शिवदाससेनः । २ "ततश्चात्र रसविशेषाणामेव दोप- विशेषजनकत्वमुक्त तथा" इति शि०। ३ 'उत्चस्तत् सर्व' इति शि० । 1 - २१६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । .. नह्यवस्थापाकोऽयं रसस्वभावं निष्ठापाकं बाधते, किंत्ववस्थायां स्वकार्य करोति सेन रसादयोऽपि स्वकायं कुर्वन्ति, अवस्थापाकोऽपि स्वकीय कार्य करोति; यथा- मधुरतिवादिपलेऽने उपयुक्त मधुरोऽपि स्वकायं करोति, तिकादयश्च स्वकार्य कुर्वन्ति; अयं तु विशेपः-यदि मधुराख्यस्यावस्थापाकस्य मधुरादयः श्लेष्मजनका रसा अनुगुणा भवन्ति तदा स बहुश्लेष्माणं जनयति, यदा त्ववस्थापाको विपरीतकटुका. दिपरिगृहीतो भवति तदा स्तोकमानं कर्फ जनयति; एवं पित्तजनकेऽवस्थापाकेऽपि वाच्यम् । “कटु-तिक्त-कपायाणां" (च. सू. भ. २६) इत्यादिनोतस्त्रिधा विपाकस्तु 'रसमलविवेकसमकालो भिन्नकाल एवावस्थापाकैः सममिति न विरोधः । स . भिन्नकालोऽप्यवस्थापाककार्यदोपानुगुणतयाऽननुगुणतया वा मवस्थापाकाहित- दोषाणां वर्धनं क्षपणं वा करोतीति तस्याभिधानं शास्त्रे प्रयोजनवदेव । यद्यपि सर्वमन्नमवस्थायां विदयते, तथाऽपि येऽत्यर्थ विदाहिनस्त एव 'विदाहिन' इत्युच्यन्ते, विशेषविदाहकर्तृत्वात् । अन्ये स्वाहुः-न तावत् पडूसादप्यन्नात् सामान्येनावस्थापाके कफाद्युत्पत्ति , किंतु पडूसादन्नात् प्रथमे पाके मधुरोऽयमुद्भूतो रसः स कर्फ जनयति, तथा पित्तं विदाहावस्थायामुद्भूतादम्लरसादुत्पद्यते, एवं वायुरपि आहार- कटुतावस्थायां भवतीति । अन्ये त्वाहुः-यत्-नानस्याग्निसंयोगान्मधुराधावस्तिकं भवति, किंतु कफादिस्थानेषु मनुष्याणां स्वभावादेव मधुरादयो रसास्तिष्ठन्ति, ते चान स्वस्वभावं नीस्वा कफादीजनयन्ति । उक्तं हि तन्त्रान्तरे-"मधुरो हृदयादूर्व रसः कोटे व्यवस्थितः । ततः संवर्धते श्लेष्मा शरीरवलवर्धनः ॥ नामीहृदयमध्ये च रसस्त्वम्लो व्यवस्थितः । स्वभावेन मनुष्याणां ततः पित्तं विवर्धते ॥ अधो नाभ्यास्तु खत्वेकः कटुकोऽवस्थितो रसः। प्रायः श्रेष्ठतमस्तन प्राणिनां वर्धतेऽनिलः ॥ तस्मा- द्विपाकस्त्रिविधो रसानां नात्र संशयः" इति । इँह तु तत्रेत्यादिग्रन्थार्थालोचनया यथोक्त एव ग्रन्थार्थो न्याय्यः । तत्रान्तरे तु श्लेष्म-पित्तगतमधुराम्लरसौ वर्णयन्ति, ते कफायधिगता रसा असाकमपि पाकसहकारितया अनुमता एव । यत्तु श्लेष्म- जनकांशस्यैवावस्थापाके श्लेष्मकर्तृत्वमित्युक्तं, तदनुमतमेव; एवं यः श्लेष्मजनोऽश माहारगतः स स्थानमहिना तदाहारस्य मधुरतामापाद्य श्लेष्माणं विशेपेण जनयतीति घूमः । यत्तु, अनेनावस्थापाकेन कफ-पित्तयोरीरणमात्रं क्रियते नतु वृद्धिः, वृद्धिः निष्टापाके एव भवतीति वदन्ति, तदुपपत्तिशून्यं भाति; 'किंच, अवस्थापाकाद ५ 'मधुराधवस्थित १ रसादय इति आदिशब्देन विपाकस्य ग्रहणम् । २ 'मधुरतिक्तायनेकरसे' इति शि० । ३ 'इत्यादिनोक्तश्च निष्ठापाको' इति शि० । ४ जन्य' इति शि०। इति शि०। ६ अत्र विपाकशब्देनावस्थापाकोऽभिप्रेत । ७ 'एतच्च तत्रान्तर पित्तश्लेष्मगत- मधुराम्लरस-वायुप्राभाविककटरसाभिप्रायेण वर्णनीयम् । ते च कफादिगता रसा अस्माकमप्यन्या- शयगतपाकसहकारितयाऽनुमता एवेति । तस्माद्यथोक्त एवार्थो न्याय्य इति" शिवदाससेनः ।
पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २१७ कफपित्तयोवृद्धिः, तथा निष्ठापाकाच मलरूपतया उत्पाद इति युक्तं पश्यामः । (च.द.)। कथमभ्यवहृतममिना पच्यत इत्यत आह-मन्नमित्यादि । प्राणो नाम हृदयस्थः शारीरो वायुरादानकर्मा पानाहारादिकमादत्ते । स तु भभ्यवहिय- माणमा कोष्ठमुदरं प्रकर्षति ।xxx। तत् काले भुक्तं कोष्ठगतमलं, द्रवैः छेदकश्लेप्मद्व., भिन्नसघातं द्रवीभूतं, नेहेन छेदकश्लेष्ममेहांशेन मृदुतां गतं, समानेन पवनेन नाभेर्वामपार्श्वस्थो जाठरोऽग्निः समीपस्थेनावधूतोऽवकम्पितः समुदीर्णो भूरवा, समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये, न तु विपस पचति । पाकप्रकारमाह-एवमित्यादि । एवमनेन प्रकारेणानाशयस्थमनं तदधास्थितो जाठरोऽग्निर्यथा स्थाल्यामम्वुतण्डुलमधःस्थितोऽग्निरोदनाय पचति तथा रसमलाय पचति । कथं रसाय मलाय वा पचतीत्याह-अन्नस्येत्यादि । पढ्सस्यान्नस्य भुक्तमात्रस्य प्रपाकतः पाकारम्भात् मधुराख्यात् भावात् यः फेनभाव उदीयते स कफो नाम मलः । परं तदुत्तरकालं पच्यमानस्य तस्य पडूसस्यान्नस्य विदग्धस्यार्धपरिपक्कस्याम्ल- भावो भवति । आशयात् भामाशयाचयवमानस्य तस्याम्लीभूतस्याहारस्य यत् स्वच्छं निर्मलरूपमुदीर्यते तत् पित्तं नाम मलम् । पक्काशयं प्राप्तस्य वह्निना शोप्यमाणस्य परिपिण्डितपकस्य तस्य पढ्सस्यान्नस्य कटुभावो भवति । तस्मात् कटुभावाद् वायुर्नाम मलः स्यात्" (ग.)॥ साए हुए अन्नको आदान (ग्रहण-आकर्पण करना) जिसका कार्य है ऐसा प्राण वायु कोष्टमें ले जाता है । वहाँ कोष्ठमें क्लेदक कफके द्रवसे उसका सघात ( काठिन्य) नष्ट होकर वह द्रव रूप होता है और क्लेदक कफके नेहाशसे वह मृदु-नरम होता है। पीछे समान वायुसे सधुक्षित जठराग्नि (पाचक पित्त) अन्नकालमे सममात्रामें खाए हुए अन्नको आयुष्यकी वृद्धिके लिये अच्छी तरह पकाता है । खाए हुए छहों रसोंवाले अन्नसे प्रथमपास्में (पाकके आरम्भमें) उद्भूत (उद्रित) मधुर रससे फेन सदृश मलरूप कफ उत्पन्न होता है। पीछे आमाशयमें पाक होते समय और आमाशयसे नीचे अत्रों में जाते समय विदग्धावस्था( पच्यमानावस्था-अर्धपक्कावस्था )में उद्भूत-उद्रित अम्ल रससे मलभूत स्वच्छ पित्तकी उत्पत्ति होती है। वाद पक्काशयमें गये जठराग्निसे शोष्यमाण और पककर पिण्डीभावको प्राप्त हुए आहारसे उद्भूत (उद्विक्त) फट रससे मलरूप वात उत्पन्न होता है (कविराज गङ्गाधरजीने यहाँ और आगे विपाकनिरूपणमें स्पष्ट कर दिया है कि अवस्थापाकमै भुक्तमात्र अन्नकी प्रथम अवस्थामें उत्पन्न मधुरभावसे मलरूप (स्थूल) कफ, पच्यमानावस्थामे उत्पन्न अम्लभावसे मलरूप (स्थूल) पित्त और पक्कावस्थामें उत्पन्न कटुभावसे मलरूप वातकी उत्पत्ति होती है। निष्ठापाकमें रस और मलके विवेक( पृथकरण )के समयमें आद्य रसधातुमें ।
. । २१८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । उद्विक्त मधुर रससे धातुरूप कफकी, अम्लरससे धातुरूप पित्तकी और कटुरससे धातुरूप वातकी उत्पत्ति होती है)। अवस्थापाकमें मुख-कण्ठ, आमाशय और ग्रहणी-अन्न इन स्थानों में तत्तत्स्थानस्थित वोधक कफ, क्लेदक कफ, समानवायु और जठराग्निरूप पाचक पित्तके द्वारा अन्नका परिपाक होता है । आमावस्था, पच्यमानावस्था (विदग्धावस्था) और पक्कावस्थामें छहों रसवाले आहारसे पूर्वोक्त तत्तत्स्थानके संवन्धसे क्रमशः मधुर, अम्ल और कटु रस उद्भूत ( उद्रित ) होते हैं । इस प्रकार आमावस्थामें उद्भूत मधुर, पच्यमानावस्थामें उद्भूत अम्ल और परिपक्वावस्थामें उद्भुत कटुरसकी अधिकतासे क्रमसे मलरूप कफ, पित्त और वायुकी उत्पत्ति होती है। ये तीनों भवस्थापाक अनके चर्वणसमयमें उत्पन्न मधुरता, अम्ल- तिकादि उद्गार तथा वमनमें निकले हुए मधुर-अम्ल-कदादिरसयुक्त द्रव्यादिसे प्रत्यक्ष- गम्य है। अवस्थापाकमें भुक्त द्रव्योंका रस चाहे कोई भी हो, परन्तु स्थानप्रभाव और अवस्थावश ऊपर कहे हुए तत्-तत् स्थानमे एक ही प्रकारका मधुर, अम्ल और कटु रस उत्पन्न (उद्रिक्त) होता है। तीनों अवस्थापाकोंके अनन्तर अन्तमें (रस-मल- विवेक-कालमें ) आद्य रसधातुमें जो रसविशेषकी उत्पत्ति होती है, उसको विपाक या निष्ठापाक कहते हैं। यह निष्ठापाक वातादि दोषोंकी उत्पत्ति, बद्धविण्मूत्रता, सृष्टविण्मूत्रता आदि विपाकलक्षणोंसे अनुमेय है ( अनुमान किया जाता है। ), अवस्था- पाकके समान इसका प्रत्यक्ष नहीं होता। चरकमतेन विपाकनिरूपणम्- परं चातो विपाकानां लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ कटु-तिक्त-कषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः । अम्लोऽस्लं पच्यते, स्वादुमधुरं लवणस्तथा ॥ (च. सू. अ. २६)। संप्रति विपाकस्यापि रसरूपत्वाल्लक्षणमाह-परमित्यादि । प्रायोग्रहणात् पिप्पली. कुलत्थादीनां रसाननुगुणपाकितां दर्शयति । कटुकादिशब्देन च तदाधारं द्रव्य- मुच्यते; यतो न रसाः पच्यन्ते, किंतु द्रव्यमेव । लवणस्तथेति लवणोऽपि मधुर- विपाकः प्राय इत्यर्थः । विपाकलक्षणं तु-जठराग्नियोगादाहारस्य निष्ठाकाले यो गुण उत्पद्यते स विपाक Ixxx (च. द.)। यद्यद्सस्य यो यो विपाकस्तमाह- कदित्यादि । कटु-तिक्त-कपायाणां रसानां विपाकः प्रायशः कटु । प्रायश इति परत्रापि योज्यम् । अम्लोऽम्लं, क्रियाविशेषणमेतत् , पच्यते अम्लो रसोऽम्लं यथा स्यात् तथा पच्यते; स्वादुमधुरस्तथा लवणो मधुरं यथा तथा, क्रियाविशेषणमेतत् , पच्यते । १ धातुपाकके समयमें भी रसधातुसे किट्ट-मल-रूप कफकी और रतधातुसे किट्टरूप पित्तकी उत्पत्ति होती है-"किट्टमन्नस्य विष्मूत्र, रसस्य तु कफोऽसूज. । पित्त" (च. चि म. १५)। . 1 .
पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २१९ - तथा च जतूकर्ण:--"विपाकस्तु प्रायशो मधुरो मधुर-लवणयोः, भम्लोऽग्लस्य, कटुः कटु-तिक कपायाणाम्" इति । कद्दादीनां कटुको विपाकः, अम्लोऽग्लस्य, शेषयोर्मधुर इति । प्रायशोग्रहणात् फचिन्नैवंविधोऽपि । यथा-शुण्ठी-पिप्पल्यादीनां कटूनां मधुरो विपाकः, कपायस्य कुलस्थस्याम्लः, कपाया हरीतकी अम्लमामलकं च मधुरं पच्यते, मधुरो प्रीहिश्वाम्लं, तथाविधं तैलं पुनः कटुकम् । पराशरस्तु पठति- "पाकास्त्रयो रसानामम्लोऽम्र पच्यते, कटुः कटुकम् । चरवारोऽन्ये मधुर, संसृष्ट- रसास्तु संसृष्टम्" इति । अन्ये चत्वारो मधुर लवण-तिक्त-कपायाः । तन्मते तिक्त कपाययोर्मधुरो विपाकः, तयोः कटुविपाकत्वे पित्तहन्तृत्वानुपपत्तेः । तदयुकं, तिक्त-कपाययोः कटुविपाकरवेऽपि पित्तहन्तृत्वं शीतवीर्यस्वेनोपपद्यते । यथा- लवणस्य मधुरविपाकस्यापि पित्तजननत्वमुष्णवीर्यस्वेन । प्रतिरसं पाक इति केचित् । भयमाशयः-यथा स्थालीस्थं तावत क्षीरं पच्यमानं मधुरमेव स्यात् , यथा वा शालिन्यव-मुद्गादयः प्रकीर्णाः स्वभावं न परित्यजन्ति अर्थाच्छालि-यव-मुद्गादिचीजेभ्य उसेभ्यः शालि-यव-मुद्गाधखरा उत्पद्यन्ते, तद्वन्मधुरादयो जठराग्निपकाः स्वं स्वं रूपं मधुरादिकं न त्यजन्ति । मधुरो मधुरमेव पच्यते, अम्लोऽग्लम् , एवमन्ये च; तेन पपणां रसानां पद्विपाका भवन्ति । तदसांप्रतं; यतो मधुरो नीहिरम्लं पच्यते, भम्लमामलकं च मधुरं, मधुरमपि तैलं कटुतां याति न पुनः पिप्पली कटुकाऽपि व्याणां यथारसपाकत्वे नैव विपर्ययः स्यात् । सुश्रुतस्तु प्राह- "भागमे हि द्विविध एव पाको-मधुरः, कटुकश्च" xxx (सु. सू. म. ४०) इति ।xxx। सुश्रुतमतेऽग्लो विपाको नास्ति; पित्तं हि विदग्धमम्लतामुपैत्याग्ने- यत्वात् । तन्मते द्विविध एव पाकः, गुरु-लाघवेन भूतानां द्वैविध्यात् । तत्र पृथिव्यम्बुगुणातिरेकान्मधुरः, अग्नि-वाय्वाकाशगुणवाहुल्याच कटुकः । नन्वेवं चेयामिनास्मकानामम्ल-लवण-कपायाणां कतरः पक्ष आश्रयणीय. स्यादिति ? तत्र पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्टतया स्निग्धानां मधुराम्ल-लवणानां त्रयाणां मधुरो विपाकः, वायुगुणातिरेकाक्षाणां कटु-तिक्त-कपायाणां त्रयाणां कटुकः । एतच हिताहितीये विरुद्धरसद्वन्द्वेपु स्फुटम् । सुश्रुते द्विविधः पाकः, चरके तु त्रिविध उच्यते; अम्लो विपाक एकेनानीक्रियते, भन्येन पुन. प्रतिपिध्यते, इति तब्रदयविरोधे कथमु- पपत्तिः स्यात् ? नेप दोषः, वस्तुतोऽविरोधात् । अम्लस्य मधुर विपाकिस्वेऽपि उष्ण- चीर्यतया पित्तजननोपपत्तेः, लवणवत् । अम्लपाकस्याभ्युपगमानभ्युपगमयोर्वीज तु चरकनये पित्तं प्रकृत्याऽम्ल कटु च, सुश्रुते तु कटुरसं, यत् पुनरम्लत्वं तदस्य विदग्ध- स्वैति सुश्रुतेन पित्तस्य प्राकृतस्याम्लत्वानगीकारात् सुतरामम्लपाकोऽपि नाङ्गी- क्रियते, निष्प्रयोजनत्वात् । इह पुनरम्ल' पाक. सप्रयोजन एव । वस्तुतस्तु दोषाणां वैविध्याद्विपाकस्यापि तदनुगुणतया त्रैविध्यमेवोचितम् । वक्ष्यति च-"शुक्रहा बदविणमूत्रः"xxx (च. सू.म. २६) इत्यादि । ग्रहणीचिकित्सिते च-"अन्नस्य २२० द्रव्यगुणविज्ञानम् । भुक्तमानस्य" xxx (च. चि. म. १५) इत्यादि । अनेन रमपद्धेऽपि व्याणां यद्विपाकत्रैविध्यं मधुराम्ल-कटुलक्षणमुच्यते तदोपत्रैविध्यादेवेति सुष्टुपपादित भवति । ननु ग्रहणी चिकित्सिते पण्णामेव रसानां त्रयः पाका वक्ष्यन्ते; इह पुनरुच्यते-'कटुतिक कपायाणां विपाक प्रायशः कटुः । अग्लोऽम्ल पच्यते स्वादुमधुरं लवणस्तथा ॥' इति; कथमेतदिति चेत् ? न, अन्नस्य पत्र्यमानस तत्तदोपस्थानसंबन्धात् क्रमान्मधुराद्यवस्था भवन्ति, नासौ विपाक,; विपाक: कर्मनिष्ठयेति दिक् (यो.)। नन्वेते मधुरादयो यद्गुणकर्माण उक्का. कथं तरफलम- भिनिष्पद्यत इत्यतो विपाकमाह-परं चात इत्यादि । अतः परं च विपाकानां लक्षणं संप्रवक्ष्यते, यैः पाकैः फलमभिनिप्पद्यते । तद्यथा-कट्त्यिादि । विपाक इति पाकः पचनं द्रव्याणां स्वरूप-रसयोः परावृत्तिः । सा च स्वरूपान्तरस्वेन रसान्तरत्वेन च परिणतिः, तस्या विशेपो विपाक. । जाठराग्नियोगेन भुक्तानां द्रव्याणां जायमाने कि-साररूपेण पृथक्त्वे यः सारभागो द्रवरूप बायो रसाख्यो धातुः, किहभागश्च मूत्र-पुरीपरूपो मलधातु., तद्स-मल-धातुभूतरसान्तरव- द्रव्यान्तरत्वेन भुक्तानां परिणतिविशेषोऽत्र विपाकः । उक्त च-"जाठरेणाग्निना योगात्" (म. ह. सू. अ. ९) इत्यादि । कस्य रसस्य कि रसान्तरत्वेनोदयः परिणामः स्यादिति ? भत आह-कटु -तिक्त-कपायाणां विपाकः प्रायश. कटुरिति । भुक्तानां द्रव्याणां यः कटुस्तिक्तः कपायो वा रसः, स स रसः खलु जाठरेणाग्निना पच्यमानानां भुक्तानां द्रव्याणां रसाख्यधातुरूपेण परिणामे तरपाकेन पच्यमानः सन् प्रायशः कटुर्विपाक. स्यात् । कटुश्च कटुविशेपेणाभिनिष्पन्नः संस्तत्र रसारये धातो वर्तते । तिकश्च रसः कटुविशेषरूपेणाभिनिष्पन्नः संस्तन रसधातो वर्तते । कपायन कटुविशेषरूपेणाभिनिष्पन्नः संस्तन्न रसधातौ वर्तते । प्रायश इत्यनेन कणा-शुण्ठ्या- दीनां कटूनां कटुरसस्य मधुरः पाकः, पटोलपत्र-वेत्राग्रादीनां च तितानां तिकरसस्य मधुरः पाकः, तथा हरीतक्यादीनां कपायगव्याणां कपायरसस्य मधुरः पाको न विरुध्यते । एवमम्लो रसोऽम्लं पच्यते प्रायशोऽग्लो रसोऽम्लविशेपरूपेणाभिनिष्पनः संस्तन्त्र रसधातौ वर्तते । प्रायश इत्यनेनामलकस्याम्लस्याम्लो रसो मधुरः पच्यते इति न विरुध्यते । तथा स्वादुमधुरं स्वादुमधुरो रसः प्रायशो मधुरं यथा स्यात् तथा विपच्यते, मधुरविशेषरूपेणामिनिष्पन्नः संस्तत्र रसाख्यधातौ वर्तते; तथा लवणश्च रसो मधुरं यथा स्यात् तथा प्रायशः पच्यते, मधुररसविशेषरूपेणाभि- निष्पन्न संस्खन्न रसधातौ वर्तते । प्रायश इत्यनेनातसीतैलं मधुराम्लं विपाके कटुकमिति, पाशुजं लवणं कटिति रसोपदेशेन कटुपाकश्योक्त इत्यविरोध इति । अथ सुश्रुते दृश्यते-"वत्राहुरन्ये प्रतिरसं पाक" (सु. सू. अ. ४०)xx इत्यादि । तत्र षडूसेषु द्रव्येषु भुक्तेषु पच्यमानेषु येपु अम्बु-पृथिव्योर्गुयोर्गुणा गुरु-खरादयो द्रवादयश्चाधिका व्यकत्वेनाभिनिर्वर्तन्ते सजातीयरूपान्तरत्वेन निष्पद्यन्ते, तन्न 1 पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २२१ द्रव्येषु स पाको मधुरो नामोच्यते स गुरुः पाक उच्यते, गुरुगुणसाधादम्बु- पृथिव्योः । तसादन 'मधुर'शब्दो गुरपाके पारिमापिको, न तु मधुररसाख्ये पाके । यो हि रसा मधुर-कपाय-लवणा गुरव उक्ताः, उत्तम-मध्यमावरास्ते तत्तद्रसद्व्याणि तथैव गुरूणि, तथैव चिर-मध्यावरकाले पच्यन्त इति गुरुपाक उक्त; न तु मधुर-लवणयो रसमात्रयोः पाको मधुर उक्तः । इह तु मधुररसद्रव्य- लवणरसद्व्ययोः पच्यमानयोर्मधुरो रसो लवणश्व रसो मधुरविशेपरूपेण पच्यते । तत्र मधुररससहचरिताः स्निग्ध-गुरू-शीताश्च तद्विगेपेण नितरां पच्यन्ते, लवणरस- सहचरितास्तु गुरुः सिग्य ठपणश्चेति त्रयोऽपि मधुरत्वेन पाझान्मधुररससहचराः निग्ध-गुरुगीता विशेपेण पच्यन्ते, न तूष्णत्वमापण्यविशेपेण पच्यते इति लवणस्य गुरोर्गुरुपाके पृथिवीगुणानां सजातीयतयाऽऽधिक्येनाभिनिवृत्ती नोष्णगुणसजातीय उप्णो भवति मधुररमपाकात, लवणारम्मकाग्निगुणविनाशे भूमि-तोयगुणोद्रेकात्; निःसारवाहः, भूमितीययोः ससारस्वात्तदुद्रेके शेपाणां भूमि-तोयगुणानामाधिक्ये- नामिनिवृत्तिर्भवतीति द्वयोरविरोध. । एवं कपायरस द्रव्ये पच्यमाने पायो रसः कटुरसविशेषरूपेण पच्यते । तत्र कपायरससहचरा रूक्ष-शीत-गुरवस्तु गुणाः पाकादमूर्तस्य वायोरपगमे तद्गुणस्य शीतस्यापगमे पार्थिवगुणा अधिकरवेनाभि- निवर्तन्ते; वसादयं गुरुः पाको रसपाके कटुरपि मधुर उच्यते । एवं लघुपाकस्य संज्ञा कटुरुका-"तेजोऽनिलाकारागुणाः पच्यमानेषु येषु तु । निर्वर्तन्तेऽधिकास्तन पाकः कटुक उच्यते ॥" (सु. सू. अ ४०) इति; तथा अम्ल कटुक-तिका अधम-मध्यमोत्तमा लघव उक्ता., तत्तद्सद्व्याणि तयैव लघूनि, तथैवावर- मध्यमोत्तमकाले पच्यन्ते, इति लघुपाक उक्तो भूतगुणपाक एव, न तु अम्ल-कटु- तिक्तरसानां पाक उक. । इह तु कटु-तिक-पायाणां कटुरसपाकोऽम्लस्याम्लरसपाक उक्तः । तस्मादम्ल-कटु-तिक्तद्रव्येषु पच्यमानेषु खल्वम्लरसद्व्यपाके अत्राग्निगुणा- नामम्लरसव्यतिरिक्तानामाधिक्येनाभिनिवृत्तिर्भवति, अतोऽयमलघुपाक उक्तः । वत्राम्लो रसस्त्वरल एव पध्यते विशेषरूपेण, तत्राम्लो रसो न तोयगुणो न वाऽग्निगुण., उभयगुणयोगे हि तोयस्याव्यक्तरसः परिणभ्याम्लः पूर्वजातः पश्चादम्ल- विशेषरूपेण पच्यत इत्यतोऽय लघुपाकरूपः कटुपाको भूतगुणानाम् , अम्लरसस्य पुनरम्ल एव पाक इत्यविरोधः । कटु-तिकद्रव्याणां पाके तिक्तस्य कटुरूपेणाभि- निवृत्तिः पाकतो हि तिक्तस्याकाशस्याप्रतिघातामूर्तित्वेन तद्गुणपरिणामाभावेन प्रतिघातामूर्तिमतो वायोर्गुणपरिणामे तेजोगुणयोगात् कटुभावनिप्पत्तिरिति । इत्थ च रसपाकाभिप्रायेण विधा पाक उक्तः, सुश्रुते भूतगुणाभिप्रायेण द्विधा पाक उक्को गुरुर्लघुश्चेति क्रमेण मधुरसंज्ञ. कटुसंज्ञश्चेति । एवं भूतगुणपाके रसपाके चावल- वन्तो बलवतां वशमापद्यमाना नाभिव्यज्यन्ते, बलवन्तश्वाबलवतोऽवजित्याधिक- स्वेनामिव्यज्यन्ते । वक्ष्यते हि-"विरुद्धगुणसमवाये हि भूयसाऽल्पमवजीयते" T ।
२२२ द्रव्यगुणविनानम् । (च. वि. भ. १) इति । इति सर्वमतानि साधूनि । हमे मधुरागल कटुरूपेण रसानां त्रयो विपाकाश्चरमपरिणामा रसारये मायधातौ गुणा भवन्ति, न तु पाकारम्भचरम- पर्यन्तं पच्यमाने पसद्रव्ये प्रथम-मध्यम-चरमावस्यासु मधुराम्ट-कटरूपाः । ते च ग्रहण्यध्याये "भन्नस्य भुक्तमानस्य" (च. चि. अ. १५) इत्यादिनोक्ताः । एवं पक्काहारस्य प्रसादपाको रसो नाम धातु., किटपाको मूत्र-पुरीप-कफ-पित्त-बाता इति (ग.)। इदानीं विपाकगुणा वाच्याः, अतो विपाकन्वरूपं प्रयमं निरूप्यते- अवस्थापाकापेक्षया विशिष्ट. पाको विपाकः । विपाकशब्देनेह लक्षणया विपाकाघेय आहारस्य रसविशेपो गौरवेण लाघवेन वा युक्तोऽमिघीयते । उक्त च वाग्भटेन- "जाठरेणाग्निना योगात्" (वा सू. स्था. अ. ९) इत्यादि । मत्र रसामो परिणामा मधुराम्ल-कटुरूपाययोऽवस्थापाकाः पडूमस्यैवानस्यामाशयादिस्थानमंबन्ध- महिम्ना जायन्ते, ते च चरके ग्रहणी चिकित्सिते "मनस्य भुक्तमात्रस्य पड़मस्य प्रपाकत." (च. चि. स्था. अ. १५) इत्यादिनोक्ता अनुसन्धेयाः; तेपामन्तेऽवसाने पुनर्जाठराग्निसंयोगे सति यद्रसान्तर रसविशेप उदेति म विपाक इत्यर्थः । इह केचिदाचक्षते-प्रतिरसं पाक:-अम्लोऽम्लस्य, मधुरो मधुरस्य, लवणो लवणस्य, कटुक. कटुकरय, तिक्तस्तिकस्य, कपायः कपायस्येति पढेव विपाका:, किमत्र प्रमाणमिति चेत् , उच्यते-यथा-क्षीरमतिपच्यमानमपि मधुरमेव स्थात्, यथा वा शालि-यवादय उप्ताः प्ररूढाः फलिताश्च शाल्यादिस्वरूपा एव भवन्ति, तथा मधुरादयोऽपि निष्ठापाकेऽपि मधुरादिस्वरूपा एव भवितुमर्हन्तीति । उक्तं च- "उप्ता पष्टिक-मापाद्या बायपकाश्च पडूसाः । यान्ति नान्यस्वमित्येवं पाकः प्रतिरसं भवेत्" इति । अन्ये तु ब्रुवते-रसा द्विविधा बलवन्तोऽजलवन्तश्व; बलवस्वं च व्यकत्वेन मात्रावाहुल्येन वा, भबलवत्व पुनरेतद्विपर्ययेण; तत्राल्पतयाऽवलवन्तो रसा बलवतां वशमायान्तीति, तेन निष्ठापाके वलवता रसेन दुर्बलरसाभिभवान रसप्रतिनियमेन मधुरस्य मधुर एवं पाकोऽम्लस्य चाम्ल एवेत्यादिः प्रति नियमा- भावाच्चानवस्थितः पाक इति । भनियतत्वपक्षेऽपि पकत्वमेय, कदाचित् कस्यचित् संभवादिति । उक्त च-"बहवोऽभिभवन्त्यल्पान् बहिर्मिश्रीकृता रसाः । तेना- निश्चितमेवैके पाकमाहुर्मनीषिणः" इति । अन्ये तु वातादिभ्यो दोपेभ्य एव त्रीन् पाकानिच्छन्ति-कफात् वातकफाच्च मधुर., कफपित्तादम्ला, वातात् पित्तात् वातपित्ताच्च कटुक इति । तदुक्त-कफात् वातकफात् स्वादुरम्लः पित्तकफो- अवः । दोपैस्त्रयोऽनिलात् पित्तात् वातपित्तात् कटुर्मतः" इति । तदेतन्मतत्रयं प्रमाणशून्यस्वादुपेक्षणीयमेव । किच प्रतिरसं रससदृश पाकस्तथा बलवत्पराधीनता च पाकस्य रसद्वारा प्रतिपाद्यमानकार्येणैव लभ्यते, तेनैतत् पक्षद्वयमपि न निष्ठा- पाके चिन्तनीय, रसस्वरूपनिरूपणेनैवोक्तार्थत्वात् । दोषावस्थाजन्यश्च पाक उप- पादकहेस्वभावादागमशून्यत्वाच प्रेक्षावनिरुपेक्षणीय इति । चरकेण तु अय एव । - पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २२३ विपाका अगीकृताः कदम्ल-मधुरमेदेन । मतस्तमुचनमुपन्यस्यते-कटु-तिक्त- कपायाणामित्यादि । प्रायश इति वचनात् पिप्पली-कुलत्थादीनां रसाननुगुणपाकतां दर्शयति । पाकस्तु तेज.संयोगरूपो रसेपु न संभवतीति कदादिशब्दैस्तदाधार- दव्याण्युच्यन्ते । एतेन यत् कैश्चिदुच्यते--अवस्थापाकावसाने षड्सस्यैवानस्य कटुरसत्वेन तदानीं तिक्ताटिरसानामभावात्तेपां विपाको नोपपद्यत इति तदप्यपास्त, तिक्तादिरसानामभावेऽपि तदाश्रयद्रव्यस्य विद्यमानत्वादिति । वस्तुतस्तु, अवस्थापाकप्रयेण तत्तदामाशयादिस्थानमहिम्ना मधुराम्ल-कटुरसा उद्भूताः परं फ्रियन्ते, न तु सर्वथा प्राकृतरसाभिभवः, अन्यथाऽवस्थापाकेन प्राकृतानां मधुरादि- रसानां सर्वथा अप्राकृतत्वे तेपां कफादिजनकत्वाभिधानं निरवकाशं त्यादिति । xxxx। अन्ये तु चुवते-न तावत् पडूसादप्यन्नात् सामान्येनावस्थापाके कफाधुस्पत्तिः, किंतु पदस एवान्ने मधुरो य आहारांशः स उद्भूतः सन् कर्फ जनयति; तथा पित्तदोपकोपको य आहारमागतस्माद्विदाहावस्थायामुद्भूतादम्ल- रसात् पित्तमुस्पद्यते; एवं वायुरपि वायुजनकाहारांशात् कटुतावस्थाया भवतीति । एतच्च न संगतं, "अन्नस्य भुक्तमात्रस्य" (च. चि. स्था. अ. १५) इत्यादिग्रन्थ- विरोधात् ; यतोऽत्र पडूसस्यैवान्नस्य सामान्येनावस्थापाकात् कफादिजनकत्व दर्शितं, न तु कस्यचिदाहारांशस्येति । यदि पुन. पलूसाहारगतो यः श्लेप्मजनको भागः स एवं स्थानमहिनोद्भूतः सन सर्वमेवाहारमवस्थापाकसमये मधुरीकृत्य कफ जनयती- त्युच्यते, तदाऽनुमतमेव । अयं च विपाकाधेयो रसो न रसनेन्द्रियग्राल., किंतु तत्तत्कायेंणेवोन्नीयते, यथा-कटुरसाया उष्णवीर्याया अपि शुण्ट्या वृष्यत्वेन मधुरः पाकोऽनुमीयते, तथा लवणस्य सृष्टविण्मूत्रत्वेन मधुर. पाक उन्नीयते, तथा तिक्त कपाययोर्वद्धविण्मूत्रतया कटुपाक उन्नीयत इति । ननु, लवणस्य मधुरपाकिस्वे पित्त-रकादिकर्तृत्वमनुपपन्नं, तथा तिक्त-कपाययोः कटुपाकिस्वे च पित्तहन्तृत्वमनु- पपन्नम् । नैवं, सत्यपि लवणस्य मधुरपाकित्वे तत्र लवणे उष्णवीयं यदस्ति तेन तस्य पित्त-रकादिकारकस्वं, विपाकस्तु तत्र पित्त-रक्तकरणलक्षणे कायें बाधितोऽपि सृष्टविण्मूत्रादिलक्षणेन कक्ष्यत एव; तथा तिक्त-कपाययोरपि कटुविपाको बलवता शीतवीर्यण बाधितत्वान्न पित्तजनक., बद्धविण्मूत्रतया तु लक्ष्यत एव । एतेन यदुच्यते-लवणादिपु विपाको यदि रस-वीर्याभ्यां वाधितः स्वकार्यकरो न स्यात् तत् किं तेनोपदिष्टेने ति, तन्निरस्त भवति, यतोऽस्त्येव सृष्टविण्मूत्रतादि तस्कार्य- मिति । अन्ये स्वेतहोपभयात् 'लवणस्तथा' इत्यत्र तथाशब्देन विप्रकृष्टमम्ल- माकृष्य लवणोऽम्ल पच्यत इति व्याख्यानयन्ति । तन्न, "कदादीनां कटुविपाकः, अम्लोऽम्लस्य, शेपयोर्मधुर." इति जतुकर्ण विरोधात् । नच त्रय एव विपाकाः कथं भवन्ति, तिकादयोऽपि कुतो न स्युरिति वाच्यं, भूतस्वभावस्यापर्यनुयोज्य- स्वात् । ननु, यत्र रसविपरीत. पाको यथा--लवणस्य मधुर., तिककषाययोश्च २२४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कटु', स उच्यता; यस्तु समानगुणो मधुरस्य मधुरः, भग्लस्याम्लः, कटुक्स कटुकः, तत्कथनेन किं प्रयोजनं ?, यतो रसगुणैरेव तत्र विपाकगुणोऽपि ज्ञास्पते । नैवं, लवणादिवद्विसदृशरसान्तरोत्पादकशक्षानिरासार्थ सत्रानुगुणोऽपि विपाको वक्तव्य एव । तथा यत्र समानगुणो विपाकस्तत्र बलवरकायं भवति, विपर्यये तु दुर्वलमिति ज्ञेयम् । सुश्रुतेन द्विविध एव विपाकोऽङ्गीकृतः मधुरः कटुकवेति, द्वैविध्ये च भूतानां गुरुलाघवेन द्वैविध्यमेव हेतुः, यदुक्तं तेनैव-तत्र, पृयिन्य- जो-वारवाकाशानां द्वैविध्य भवति गुणसाधाद्गुरुता लघुता च; तत्र चिन्या. पश्च गुयः, शेषाणि लघूनि; तस्माविविध एव विपाको भवति" (सु सू. स्या. ) इति । अत्रापि सुश्रुतमते यद्यप्यम्ल लवणो मधुरविपाको तयाऽपि तयोर्वातहरत्वे सृष्टविण्मूत्रतायां च मधुरकार्यकरवं, न पुनः पित्तहरत्वे; तथा तिक्त-कपाययोः कटुविपाकयोरपि वातकर्तृत्वे बद्धविण्मूत्रतायां च कटुकार्यकरवं, न पुनः पित्तकर्तृत्वे, अचिन्त्यत्वात् प्रभावस्य । एतदेवोकं माधवेनापि-"स्वाद्वा- दीनां स्वादुपाकः सुश्रुताचार्यसंमतः । तत् कथं पित्तजननी स्यातामम्ल-पटू रसौ ॥ कटुपाको कथं पित्तनाशनौ तिक्त-तूवरौ" इति । सिद्धान्तेऽपि-"अम्ल-पटोः फलं विद्यात् स्वादुपाकः, कटुः पुन. । कपाय-तिक्तयोरित्यं सुश्रुताचार्यसंमतः ॥" इति । ननु, “पञ्चभूतात्मके देहे आहारः पाञ्चभौतिकः । विपकः पञ्चधा सम्यक स्वान् गुणानभिवर्धयेत् ॥" (सु. सू. स्था. अ. ४६) इत्यनेन पञ्चधाऽपि विपाक- स्तेनैवोकः, तत् कथं न विरोध इति चेत् ; नैवम् , उपाधिभेदेन विरोधाभावाद; तत्र हि भूतमेदमवलम्ब्य पञ्चधात्वम् , भत्र तुलाधव-गौरवरूपं भूतगुणवैविध्यमाश्रित्य द्वैविध्यमुक्तमिति'न विरोधः; यथा-पञ्चभूतात्मकत्येऽपि द्रव्याणां सौम्याग्नेयत्वा. वैविध्यमिति । यत् पुन सुश्रुतेनाम्लपाको न मन्यते तच्चरकमतानुयायिनो न सहन्ते, यतोऽम्लपाकतयैव ब्रीहि-कुलत्थादीनां पित्तकर्तृत्वमुपपद्यते; अथ मन्यसे-ग्रीयादे- रुष्णवीर्यरवेन तत्र पित्तकर्तृत्वं? तदसत्, मधुरस्य व्रीहेस्तन्मते मधुरविपाकस्यो- ष्णवीर्यतायामपि सत्यां न पित्तकर्तृत्वमुपपद्यते, रस-विपाकाम्यामेकस्य वीर्यस्य बाधनीयत्वात् ; किंचाम्लपाकत्वाद् नीयादे पित्तमम्लगुणमुत्पद्यते, यदि वष्ण- वीर्यताकृतं स्यात्तदा कटुगुणभूयिष्ठ पित्तं स्यात् , दृश्यते च-व्रीहिभक्षणादम्लोद्गारा- दिनाऽम्लगुणभूयिष्ठतैवेति, किच 'पृथिवी-सोमगुणातिरेकान्मधुरः पाको भवति, वावन्याकाशातिरेकाच कटुर्भवति' इति पक्षे यदा व्यामिश्रगुणातिरेको भवति, तदा सोमाझ्यात्मकस्याम्लस्योत्पादः कथं प्रतिक्षेपणीयः । अथवा तनकारयोः किम- नयोरनेन वचनमात्रविरोधेन कर्तव्य, यतो यदम्लपाकं घरको बूते तत् सुश्रुतेन वीर्योष्णमिति कृत्वा समाधीयते, अनेन न कश्चिद्रव्यगुणे विरोधः । यत्तु सुश्रुते- अम्लपाकनिरासार्थ दूपणमुच्यते-"पित्तं हि विदग्धमम्लतामुपैति" (सु. सू. म. ४०) इत्यादिना, तदनभ्युपगमादेव निरस्तमिति (शि.)॥ ~ A . 4 + पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २२५ विपाकस्तूच्यते--विपाकस्तु प्रायः स्वादुः खादु-लवणयोः, अम्लो- ऽम्लस्य, कंटुरितरेषाम् (अ. सं. सू. भ. १७)॥ स्वादुम्ल-कटुकायो विपाकाः । तत्र मधुरद्रव्यस्य सर्वस्य मधुरविपाकिस्र्य, एवणस्थ, अम्लो विपाकोऽम्लस्यैव; शेषाणां कटुः । विपाकस्तु जठरामिसंयोगे परिणामवशाव्यस्य रसस्य स्वरूपान्तरप्रादुर्भावः (इन्दुः)॥ पराशरस्तु पठति- पाकास्त्रयो रसानामम्लोऽम्लं पच्यते, कटुः कटुकम् । चत्वारोऽन्ये मधुरं, संकीर्णरसास्तु संकीर्णम् ॥ कटु-तिक्त-कपायाणां कटुको येषां विपाक इति पक्षः। . तेषां पित्तविघाते तिक्त-कषायो कथं भवतः॥ (अ. सं. सू. अ. १७)। पराशरनामा मुनिर्विपाकमन्यथा पठितवान् । पाकास्त्रयो रसानामित्यार्याद्वयं पराशरपठितमनुपठति । सर्वेषां रसानां त्रयो विपाका:-मधुरः, भग्ला, कटुन । तत्राम्लरसोऽम्लविपाकः, कटुरसः कटुविपाकः, चस्वारोऽन्ये शेषा मधुर-लवण-तिक कपाया मधुरविपाकाः । संकीर्णरसानां मिश्ररसानां संकीर्ण विपाकिस्वम् । स तु पराशरस्तिक्त-कपाययोर्मधुरविपाकिस्वमिच्छति, अन्ये स्वाचार्याखावेव कटुविपाका- विच्छन्ति, तन्मतं दूषयितुकामः पराशर आह-ये आचार्या. कटु-तिक्त कपायाणां कटुविपाकित्व मिच्छन्ति तेषां तितकपाययोः पित्तहरस्वं न संभवति, मन्मते तु तयोर्मधुरविपाकिस्वात् पित्तहरवं संभवतीति पराशरः। तब न चतुरस्रमिति मन्या- महे । यतः पित्तहरवं रसस्यैव स्वरूपम् । कटुस्तु विपाको यत्र खल्पोऽपि भवति न त कटुः स्वकार्य करोति "यद्यद् द्रव्ये रसादीन" (भ. सं. सू. अ. १७ इति न्यायात् । तथा च-तिक्तरसस्य कटुविपाकस्यापि निम्बस्य पित्तहरत्वमेव । यत्र च विपाकस्य कटोराधिक्यं पत्र तस्य पित्तकर्तृत्वमेव । यथा-तिकरसेऽपि दवे कटोपिाकस्याधिक्याद् बृहतीद्वयस्य पित्तकरस्वम्, एवं कषायेऽपि करूपनीयम् । एवं रसस्यैव स्वभाव. पित्तहरत्वम् । यतश्च तिकरसे कषायरसे च द्रव्ये नैसर्गिकण मलेन रस-वीर्याभ्यां विपाकः प्रायेणाभिभूयते, अत उच्यते-तिक कषायौ पित्तहरा- विस्यसाभिः, अतः परामरमतमचतुरस्रमिव (इन्दुः)॥ विधा-विपाको द्रव्यस्य स्वाद्वम्ल-कटुकात्मकः ।। (अ. स. सू. अ. १, अ. ह. सू. अ. १)। स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। तिकोषण-कषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः॥ (भ. इ. सू. भ. . 'द्र० ५.१५ -- - - t 7 । 77 २२६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । विपाकत्रिविधः सर्वव्याणां परिणामकालभावी कार्यानुमेयो जाठरामिसम्बया- असस स्वरूपान्तरमादुर्भावः स विधव, रसपत्वेऽपि न पोटा। तेन किषित खा. विपाकं, किचिदम्लविपाकं, किशित् कटुविपाकं, द्रव्यम् । तत्र मधुर-सवणयोर्महरो विपाक, अम्लस्याम्ला, तिक-कटु-कपायाणां कटुकः । स च कार्यानुमेयः । तयार पक्ष्यति (सु. अ. ९)-"जाठरेणाभिना योगाद्" इत्यादि ।xxx। मठ पर सोपसर्गः पाकशब्द उपात्तः विशिष्टः पाको विपाकः, न पाकमात्रस्वरूपः । तथा भट्टारकचरकमुनिः (च. सू. अ. २६) "रसो निपाते न्याणां, बिपाक कर्मनिष्ठया । वीर्य यादषधीवासाग्निपातायोपलभ्यते" इति । एवं कर्मनिहानुमिव एकरूपावस्थो जाठरामिसंयोगायो रसामा रसान्तरोगवः, स एव विपाक, न यो जाठरामिसंयोगमात्रादसानामनेकावस्थः प्रामधुरोऽनन्तरं स एव पच्चमा नोऽम्लस्ततो विपच्यमान. स एव कटुः विपाकः । स्वादुः मधुरो गुहादिः, पटुः लवणः सैन्धवादिः, मधुरं यथा भवति तथा कृत्वा पच्यते रस इति संबन्धः मधुरमिति क्रियाविशेषणस्वान्नपुंसकलिङ्गम् । स्वादुः स्वादुविपाकः, लवणोऽपि खादुविपाक इत्यर्थः । अम्लो रसो दधि-कालिकादिः, अम्लं पम्यते मम्मविपाको भवति । तितोपण-कपायाणां प्रायशः कटुर्विपाको भवति । प्रायशोग्रहणं पूर्वत्रापि योजनीयम् । तेन नीहिस्थो मधुरो रसोऽम्लं पच्यत इत्युपपमम् । तया घोक- (म. ह. सू. भ. ६)-"स्वादुरम्लविपाकोऽन्यो चीहिः" इति । तथा, हरीतक्या भूयस्त्वेन यः कपायो रसः स मधुरमेव पच्यते । तथा, कटुको रसः शुण्याईक, पिप्पल्यादिस्थो मधुरं पच्यते । तथा चोकं (भ. ह. सू. म. ६)-"कषापा मधुरा पाके" इति । तथा (म. ह. सू. ६)-"नागरं दीपनं वृष्यं प्राहि हर्ष विवन्धनुत् । रुच्य लघु स्वादुपाकं" इति, "तद्वदाईकम्" इति । तथा (म... सू. म. ६)-"श्लेष्मला स्वादुशीताऽऽ" इत्यारभ्य यावत् "स्वादुपाका" इति । भत्र केचिदाहुः-तिक कषाययोरेव कटुविपाकतया पित्तकर्तृत्वमापत इति । तदेतदसत्, शीतवीर्यत्वेनैतयोः पित्तहर्तृत्वात् । वीर्य हि रसविपाको विजयते । वक्ष्यति हि (अ.ह. सू. अ. ९)-"रसं विपाकस्तो वीर्य" इति (अ. द.)। विपाकत्रैविध्यमाह-स्वादुरिति । स्वादुः पटुश्च मधुरो लवण मधुर पच्यते पको मधुरवं यातीत्यर्थः । मधुरमिति क्रियाविशेषणम् । पच्यत इति कर्मकर्तर्यास्मनेपदम् । एवमम्लो रसोऽम्लं पच्यते । ति कादीनां प्रयाणां कटुको विपाकः । मधुररसस्यापि प्रीहेर्विपाकेऽम्लत्वात्, लवणस्यापि. सौवर्षकस्य कटु- विपाकरवात् , अम्ल-तिकोषणानामपि दाठिम-पटोल-पिप्पलीनां मधुरविपाकस्वाद, कषायस्यापि कुलस्थस्याम्लविपाकरवात 'प्रायश' इत्युकं मतान्तरसंग्रहार्य ! तत्र हौ विपाकाविति सुश्रुतः (सु. सू. अ. ४०111)-"नम्येषु पध्यमानेषु" इत्यादि । ४४४ । पोढा पाकस्तु. संमहे निरतः (भ. सं. सू. म.")- . पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः। २२ "बथारसं जगुः 'पाकान् पद केचित्तदसांप्रतम् । यत् स्वादुव्रीहिरम्हत्वं चाम्कमपि दाडिमम् ॥"याति तैलं च कटुतां कटुकाऽपि न पिप्पली । पयारसर पाकानां न स्यादेवं विपर्ययः ॥” इति (हे.)॥ अय चरकमतसे विपाकका निरूपण किया जाता है-कटु, तिक्त और कषाय इन तीन रसौ( रसवाले द्रव्यों )का विपाक प्रायः कटु (कटुरसवाला) होता है । अम्लरस( अम्ल रसवाले द्रव्यों )का विपाक प्रायः अम्ल होता है तथा मधुर और लवण रस( रसवाले द्रव्यों)का विपाक प्रायः मधुर होता है। वक्तव्य-'प्रायः' शब्दसे यह बताया गया है किसी किसी द्रव्यका विपाक इससे विपरीत भी होता है । जसे सोंठ, छोटी पीपल आदि द्रव्य कटु रसवाले होनेसे उनका विपाक कटु होना चाहिये, परंतु उनका विपाक कटु न होकर मधुर होता है। एवं कुलथी कषाय रसवाली होनेपर भी उसका विपाक अम्ल होता है; हर्ड कषाय रसवाली और आँवले अम्ल रसवाले होनेपर भी उनका विपाक मधुर होता है; मधुर रसवाले बीहिका विपाक अम्ल होता है; तैल मधुर रसवाला होनेपर भी उसका विपाक कटु होता है; सोंचर (काला नमक ) लवण होनेपर भी उसका विपाक कटु होता है; पटोल (कडुआ परवल ) तिक्त रसवाला होनेपर भी उसका विपाक मधुर होता है । इससे मालूम होगा कि ऊपर जो रसोंके विपाक लिखे गये हैं उनमें अपवाद भी देखे जाते हैं, इसलिये 'प्राय.' शब्दका प्रयोग किया है । द्रव्यगुणके प्रकरणमें जहां रसके अनुगुणं (समान) विपाक होता है वहां प्रायः रसनिर्देशसे विपाकका भी निर्देश किया गया ; ऐसा जानना चाहिये । परंतु जहाँ रससे विपरीत विपाक होता है वहा विपाकका स्पष्ट शब्दोंमें निर्देश किया है। ऊपर विपाक ( निष्ठापाक-अन्तिमपाक) और अवस्थापाकका लक्षण लिखा है । इससे मालूम होगा कि कटु, तिक्त और कषाय इन तीन रसोंसे ( रसवाले भुक द्रव्योंसे) भवस्थापाकमें तत्तत्स्थानविशेषके सवन्धसे आम, पच्यमान और पक्क इन तीन अवस्थाओं में क्रमश. मधुर अम्ल और कटु ये तीन रस वदकर मलरूप कफ, पित्त और, वातकी वृद्धि होती है, परंतु जठराग्निकी क्रिया समाप्त होकर जब रस और मलका पृथकरण ( रसमलविवेक) होता है तब ये तीनों (कटु, तिक और कषाय ) रस माय रसधातु जो कि सारे शरीरका पोषण करता है, उसमें कुटु रसके रूपमें उत्पन्न होकर रहते हैं और वह कटुविपाक शुक्रक्षय, बद्धविण्मूत्रता (मल-मूत्र की कब्जियत) और धातुरूप वातकी उत्पत्तिरूप अपने ( कटु विपाकके ) कार्यसे अनुमान किया जाता है। इसी प्रकार अम्लरस भी जठरामि( अवस्थापाक)की क्रिया समाप्त होनेपर रस और मलके पृथकरणके समयमें आय रसधातुमें अम्लरसके रूपमें उत्पन्न होकर रहता है १ शुकहाबविण्मत्रो विपाको वातलः कटु । - 1 1 २२८. द्रव्यगुणविज्ञानम् । और धातुरूप पित्तकी उत्पत्ति, सृष्टविष्मूत्रता (मलमूत्र साफ होना) और शुक्रका बार इन लक्षणोंसे अनुमान किया जाता है। मधुर और लवण रस भी जठरामिकी क्रियासे तीनों अवस्थापाकोंकी समाप्ति होनेपर रस और मलके पृथकरणके समयमें बाप रस- धातुमें मधुररूपमें उत्पन्न होकर रहता है और धातुरूप कफ तथा शुक्रकी उत्पत्ति और मलमूत्रके साफ होनेसे अनुमान किया जाता है। इस प्रकार तीन दोषोंकी उत्पत्तिके लिये छहों रसोंवाले द्रव्योंके कटु, अम्ल और मधुर ऐसे तीन विपाक आत्रेय संप्रदायके - अनुयायियोंने माने हैं (और विशेष वकव्य धन्वन्तरिसप्रदायके मतसे विपाक निरूपणके अनन्तर देखें)। पराशरमुनि कहते हैं कि-मधुरादि छहों रसोंका तीन प्रकारका विपाक होता है। अम्लरसका विपाक अम्ल होता है, कटु रसका विपाक कटु होता है और शेष चार (मधुर, लवण, विक्त और कषाय) रसोंका विपाक मधुर होता है; संकीर्ण (मिश्र) रसोंका विपाक संकीर्ण होता है। अपने पक्षके समर्थनमें पराशर कहते हैं कि-जो आचार्य (चरकादि ) कटु, तिक्त और कषाय इन तीनों रसोंका कटुविपाक मानते हैं उनके मतमें तिक्त और कषाय ये दो रस पित्तनाशक नहीं हो सकते, और अनुभव ऐसा है कि ये दो रस पित्तनाशक हैं। मेरे (पराशरके) मतमें तिक और कषाय दोनोंका विपाक मधुर होनेसे दोनों पित्तनाशक हो सकते हैं। चरकमतानुयायी पराशरके इस मतका खण्डन करते हुए कहते हैं कि-विक्त और कषाय ये दोनों रस, कटविपाकवाले होनेपर भी शीतवीर्य होनेसे पित्तका नाश करते हैं, क्योंकि वीर्य रस और विपाक दोनोंका पराभव करके अपना कार्य करता है । अत. तिक और कषाय रसका कटुविपाक माननेमें कोई दोष नहीं है। सुश्रुतमतेन विपाकप्राधान्यनिरूपणं, विपाकनिरूपणं च- नेत्याहुरन्ये, विपाकः प्रधानमिति । कस्मात् १ सम्यविण्याविपाक १ 'पित्तकृत् सृष्टविण्मूत्र. पाकोऽम्ल• शुक्रनाशन.' । २ 'मधुरः सृष्टविण्मूत्रो विपाक. कफ- शुक्रल.' । ३ विपाकस्य प्राधान्यं प्रत्येके अवते (र. वै. सू. म.१. सू. १४१)।--विपाक साद्गुण्ये तीक्ष्णामीनां न दोषकराधिकपाका (भा.)। तलिमित्तत्वात् प्रशमन-वर्धनमोः (स. १४२)।-दोषाणां प्रशमन-वर्धने तन्निमित्तः सम्यक्पकेनाहारेणौषधेन वा दोषाः प्रशम यान्ति, असम्यक्पकेन वृद्धि गच्छन्तीति । तस्मात् तयोरायुर्वेदसारभूतयो. साधनाद् विपीक प्रधानम् । यद् इद्धि-प्रशमनहेतु. तत् प्रधान दृष्ट, यथा-उत्पत्ति-प्रलयकारण त्रिगुणं प्रधानमिति (मा.)। किंच, धातूपदेहात् (सू. १४३)।-धातूनामुपचय उपदेहः । किमतनं सिद्धम् १ तत्र ग्याध्युत्पत्तिप्रशमनमभिप्रेतम् , अत्र प्रतिदिवस स्वस्थस्य धातुमिति (भा.)। किंच, विपाकापेक्षवादितरेषा, प्रायशो विपासाहुण्ये च गुणवताम- प्पदोषात् ( स. १४४)।-विपाकात तोरणामीनां न दोषकरनिति (भा.) विपार r पूर्वोक्तेनैव पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २२९ स्वात् इह सर्वद्रव्याण्यभ्यवहतानि सम्यमिथ्याविपक्कानि गुणं दोष या जनयन्ति । तंत्राहुरन्ये-प्रतिरसं पाक इति, मधुरो मधुरस्याम्लो. ऽम्लस्यैवं सर्वेषामिति; दृष्टान्तं चोपदिशन्ति-यथा शालि-यव-मुद्रा दयः प्रकीर्णीः स्वभावमुत्तरकालेऽपि न परित्यजन्ति तद्वदिति । केचिद पुनरवलवन्तो बलवतां वशमायान्ति, तस्सादनवस्थितः पाक इति । केचित्रिविधमिच्छन्ति-मधुरम् , अम्लं, कटुकं चेति । तत्तु न सम्यक, भूतगुणादागमाचाम्लो विपाको नास्ति; पित्तं हि विदग्धमम्लतामुपैत्या- मेयत्वात् ; यद्येवं लवणोऽप्यन्यः पाको भविष्यति, श्लेष्मा हि विदग्धो लवणतामुपैतीति । आगमस्त्वाह-द्विविध एव पाको मधुरा, कटु कश्च; तयोर्मधुराख्यो गुरुः, कटुकाख्यो लघुरिति । तत्र पृथिव्यतेजो- यायवाकाशानां वैविध्यं भवति ताणसाधाहरुता, लघुता च पृथि- व्यापश्च गुळः, शेषाणि लघूनि; तस्माद्विविध एव विपाक इति ॥ १ वैगुण्ये गुणवतामपि दोषात् (२. १४५) ।-पथ्याहारस्याप्यसत्पाके सति ब्याधिक रत्वादिति (भा.) । शास्त्रप्रामाण्यात् (सू १४६)।-किंच, शालेऽपि "जीणेऽभत. कुमारस्य त्रितय त्रियु वर्त्मसु । यथावद् वर्वते नित्य हिताहितनिपेवणात" इति । विपाक- साद्गुण्ये इत्यादीनां त्रयाणां वाक्यानामप्यमागमोऽर्धसाधन. (भा.) । किट पदभावे विकिरसाभावात् (सू १४७)।-तस्य विपाकस्याभावे मूलत एव चिकित्सा न स्यात, अग्निना आपकानामौपधानां कार्यकरणं नास्तीति (भा.)। किंचान्यत् ? आरोग्यप्रयोजमस्वा. वायुर्वेदस्य, सम्यग्विपाके तदुपलम्धेः (सू १४८)।-समस्तस्य तनस्य प्रयोजनभूत. सारोग्यस्य साधनार पाकः प्रधानम् । कथ ? सम्यग्विपाके सति तचारोग्यं भवतीति (भा.)। किंच, सर्वशरीरप्रदोषात् तस्मिन् दुष्टे (सू १४९) ।-विसूच्यलसकादिषु सर्वशरीर. प्रदोषो दृष्ट. । तत्र शरीरमहणेन शरीरापयवा दोषा. परिगृहीताः । सर्वदोषप्रकोपादिल. (भा.)। किंच, सर्वशरीरानुमाहात् (सू. १५०)।-इत्येतदप्यनेनैव गताधम् (भा.)। १ विपकत्वात्' इति पा० । २ अय चक्रपाणिदत्तसंमत. पाठः दहणस्तु तत्राहुरन्से- प्रतिरस पाक इति । केचित्रिविधमिच्छन्ति-मधुरमम्लं, कटुक चेति । तत्तु न सम्यक, भूतगणा- दागमाश्चान्योऽम्लो विपाको नास्ति; पित्त हि विदग्धमम्लतामुपैत्यामेयत्वात् , यथेव लवणोऽन्यः -पाको भविष्यति, शेष्मा हि विदग्धो लवणतामुपेतीति । मधुरो मधुरस्याम्लोऽम्लस्यैवं सर्वेषामिति केचिदाः, दृधन्त चोपदिशन्ति-यथा तावत् क्षीरमुखागत पच्यमानं मधुरमेव स्यात् , यथा वा - शालि-यव-मुद्रादय. प्रकीर्णाः स्वभावमुत्तरकालेऽपि न परित्यजन्ति तददिति । केचिदन्ति- मनलवन्तो बलवतां वशमायान्तीति । एवमनवस्थितिः, तमादसिद्धान्त एषः । भागमे हि दिविष पव पाको मधुरः, कटकम्" इत्यादिपाठ पठति, तथैव च व्याख्यानयति ।। P २३० द्रव्यगुणविज्ञानम् । . : भवन्ति चान- द्रव्येषु पच्यमानेषु येवम्बु-पृथिवीगुणाः । निर्वर्तन्तेऽधिकास्तत्र पाको मधुर उच्यते ॥ तेजोऽनिलाकाशगुणाः पच्यमानेषु येषु तु । निर्वर्तन्तेऽधिकास्तत्र पाकः कटुक उच्यते ॥ (सु. सू. अ.,४०)। विपाकप्राधान्यवादिमतं वीर्यवादिमतं निषेधयित्वा प्राह-नेस्याहुरन्ये इत्यादि । विपाकः प्रधानमिति प्रतिज्ञा । विपाकशब्देनेह लक्षणया भन्यवहृतद्रव्यपाका- -धेय माहारस्य रसविशेपो गौरचेण लाघवेन वा युक्तोऽभिधीयते, विशिष्टो नैतिक पाको विपाक इत्यर्थः । भन्न हेतुः-सम्यआिथ्याविपाकत्वादिति । अस्यायं स्या- रोति-सर्वद्रव्याणीत्यादि । सम्यग्विपक्कानि गुणं, मिथ्याविपकानि दोष, जनयन्ति । सम्यक्पाकः समेनाग्निना, मिथ्यापाकस्तु हीनातिपाकरूपो यथाक्रमं मन्देन तीक्ष्णेन वाऽमिना क्रियते । तत्र हीनपाके मामविकाराः, तीक्ष्णपाके च भस्मकविकारा दोषाः; समपाके तु धातुसाम्यं गुणश्च । अयं च पाको यद्यपि जठराम्यपीना सर्वाहारसाधारणो न तु द्रव्याधीनो द्रव्यगुणरूपो य इहाधिकृतः "पिप्पस्यो मधुर- विपाका", (सु. सू. भ. ४६), "भायं मधु कटुविपाकम्" (सु. सू. भ. ५५) इत्यादिना प्रतिपादनीयः । अयमेव हि पाक एतत्प्रकरणसिद्धान्ते च "तद्रव्यमारममा. किंचित्" (सु. सू. अ. ४०) इत्यादौ दर्शितः । तथा धुभयोरपि पाकयोरम्याधेया- न्त्यपाकरूपतया एकत्र प्राधान्ये साधितेऽपरत्रापि सिद्धं भवतीति अम्थाओं नेयः । किंवा सम्यक्पाको द्रव्यानुगुणः पाकः, यथा-"चित्रकः कटुकः पाके" (सु. सू. भ. ४६), तथा "क्षीरं मधुरं रस-पाकयोः" (सु. सू. भ. ४५) इत्यादि । अत्र हि द्रव्यगुणसदृश एव पाकः । मिथ्यापाको तद्व्यगुणविसदृशः पाकः, यथा-"पिप्पस्यः कटुकाः सत्यो मधुरविपाका." (च. वि. भ. १) इत्यादौ । गुणं दोपं वा जनयन्तीति सम्यक्पाके तथा मिथ्यापाके च प्रत्येकं योजनीयम् । तेन द्रव्यगुणानुगुणो हि मधुरः पाकः सृष्टविण्मूत्रादिगुणं, कफजननं दोपं च, करोति; तथा द्रव्यगुणविसाशन पिप्पल्याः कटुकाया मधुरः पाको यथोकं गुणं, दोषं वा, करोति । अस्मिन् व्याख्याने भभिमतव्याख्याधीनपाकप्राधान्ये हेतुरुक्तो भवतीति नासङ्गतार्थत्वमस्य; यस्मादसे भीर्य च तिरस्कृत्यान्त्यो विपाको गुणं दोपं वा जनयति, तेन विपाका प्रधानमिति । संप्रति स्वाभिमत विपाकस्वरूपं दर्शयितुं पराभिमतविपाकानुपन्य- पति-तत्राहुरन्ये इत्यादि । प्रतिरसपाकमेव विवृणोति-मधुरो मधुरस्याम्लोऽम्स- स्वेत्यादि । भत्र स्ष्टान्तमाह-यथेत्यादि । प्रकीर्णा इति उताः,तेन यथा शालि-यवादन उसमस्ताः फलिताब शालि-यवादिस्वरूपा एव भवन्ति, एवं मधुरादयोऽपि निध- पाकेऽपि मधुरादिस्वरूपा एव भवन्ति । भत्रैव पझे मतान्तरमाह-केपिद पुम- पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २३१ - - रियादि । भवलवन्तो रसा अल्पवया, बलवंतामिति उत्षणानां रसाना, वशता पराधीनताम् अल्पवामिति यावत्; तेन निष्ठापाकेन बलवता दुर्बलरसाभिभवान प्रतिनियमेन मधुरस्य मधुर एव पाकोऽम्लस्य वाल: पाक इत्यादि प्रतिनियमा- भावादनवस्थितः पाफ इत्यर्थः । मतान्तरं चरकस्याह-केचिप्रिविधमित्यादि । एतच्च मधुरादिपाकत्रयं नैष्टिकं; चरकमतं कचिद्सद्वाराऽभिहितं यथा-"कटु-तिक- कपायाणां विपाकः प्रायशः कटुः । भम्लोऽम्लं पच्यते, स्वादुमधुरं लवणस्तथा" (च. सू.,भ. . २६); कचिद्रव्यद्वाराऽभिहित “पिप्पल्यः कटुका मधुरविपाका" वि. भ..१) इत्यादि । यववस्थापाके मधुरत्वादि स्थानमहिना "अन्नस्य भुक्त मात्रस्य पइंसस्य प्रपाकतः । मधुरः प्राक् कफो भावात् फेनभूत उदीयते" (प.पि. म. १५) इत्यादिना घरकोक्तं तनैष्ठिकपाकामावादेवेहानधिकृतम् । उतानि परमतानि दूषयति-तत्तु न सम्यगिति । अत्र हेतु:-भूतगुणादिति । अत्र च 'पाकात्' इति शेषः। तत्र तत्र पृथिव्यप्तेजो-वारवाकाशानां द्वैविध्यं भवति' इत्यादिना वक्तव्यगुरु लघुलक्षणद्वैविध्येन द्विविधस्यैव पाकस्योपपनस्वादित्यर्थः । भागमादिति भागमस्स्वाह इत्यादिना दर्शनीयागमात् । पित्तस्य तु -विदाहावस्थायामग्लपाकता भवति, तया समं पाकत्रैविध्यं येऽभिमन्यन्ते तन्मतं चतुर्थलवणपाकप्रसंगेन दूपय- माह-पित्तं हि विदग्धमित्यादि । भागमादिति यदुक्तं तव्याकरोति-भागमसिव- हेत्यादि । मागम इह धन्वन्तरिवचन; तमनुवदति-'द्विविध एव पाको मधुरः कटुकश्च' इति । मधुर-कटुकपाकयोर्यथाक्रमं गुरुतां लघुतां च चिकित्सोपयुक्ता दर्शयति-तयोर्मधुराख्य इत्यादि । मधुरे गौरवस्य कटौ , च पाके लापवस्यो- पपत्ति दर्शयन् भूतगुणादिति हेतुं च व्याकरोति-तत्र पृथिवीत्यादि । पञ्चाना भूतानां कथं द्वैविध्यमित्याह-तद्गुणसाधादिति । अम्लपाकसया पित्तकरस्वं यथा-"मधुरश्चाग्लपाकश्च वीहिः पित्तकरो गुरुः" (च. सू. भ. २७), "उष्णाः . कपायाः पाकेऽम्लाः कफशुक्रानिलापहाः । कुलस्थाः" (च. सू. भ. २७) इत्यादौ; तथा विपाकगुणे "पित्तकृत सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्ला शुक्रनाशन." (च. सू भ. २६) इति चरकोक्त, तत्सर्व सुश्रुते उष्णवीर्यकार्य कचिद्रव्यखभाव इति च स्वीक्रियते । तेन प्रमेये द्रव्यगुणे घरक-सुश्रुतयोर्विप्रतिपत्तिर्नास्त्येव । यस्वत्र वक्तव्यं “पञ्चभूवा- स्मके देहे आहार: पाचभौतिकः । विपक्कः पञ्चधा सम्यक् स्वान् गुणान् परिवर्ष- येत्” (सु. सू. म.-४६) इत्यनेन पञ्चधा पाकोऽभिहितः, स 'द्रव्यस्वरूप. चिन्तनीयो नैतत्पाकद्वयविरोधी; यथा पञ्चभूतात्मकरवेऽपि द्रव्याणां सौम्यामेयस्वा- द्वैविष्यं भवति । या तु घरके भवस्थापाकाभिधाने अन्तिमपाके कटुताऽभिहिता- "पकाशयं तु प्राप्तस्य शोप्यमाणस्य वह्निना । परिपिण्डितपक्कस्य वायुः स्यात् कट- भावतः" (च. चि. भ. १५) इत्यनेन, सा वातप्रकोपमाने हेतु, न नैष्ठिकमधुर- पाकाधेयसृष्टमूत्रपुरीषता-सम्यक्शुक्रजननादिविरोधिनीति न विरोध. (च. द.)। ।
4 । द्रव्यगुणविज्ञानम् । भपर विपाकवादिमतं निर्दिशनाह-नेत्याहुरित्यादि । नेत्याहुरन्ये वीर्य प्रधानमिति केचिश मुवते । तर्हि किं प्रधान ? विपाकः प्रधानमिति; विशिष्टः पाको बिपांक। सर्वद्व्याण्यभ्यवहतानीति इह सर्वशन्दो वामनीयद्रव्याणि वर्जमिरवा शेषः । गुमं दोपं वा जनयन्तीति गुणं सम्यग्विपक्कानि, दोपं मिष्याविपक्कानि । प्रतिरसं पाक इति रसं रसं प्रति पाक उत्पद्यत इत्यर्थः । तत्तु न सम्यक्, त्रैविध्यं न सम्यगित्यर्थः । कथं पुनस्वैविध्यं न सम्यगित्याह-भूतगुणादित्यादि । एतेन त्रैविध्य निरखम् । प्रतिरसं प्राक इति पूर्वोक्तं स्थापयन्नाह-मधुरो मधुरस्येत्यादि । अम्लोडरहस्यैवं सर्वेषा. मिति केचिदाहुरिति पदच्छेदः । दृष्टान्तं चोपदिशन्तीति प्रतिरसपाके इत्यर्थः । उतागत स्थालीगतम् । प्रकीर्णा इति भूमौ निक्षिप्ताः फलितपर्यन्ता इत्यर्थः । तददिति एवं रसा अपि' जठराग्निपक्काः स्खं वं मधुरादिकं न त्यजन्ति । तस्मादित्यादि-तसाद केचित् प्रतिरसं पाकः, केचित्रिविधः, अन्येऽबलवन्तो बलवतां वशमायान्तीति मतानामनियतत्वं तस्मादसिद्धान्त एष भनागम एप इत्यर्थः । स्वमतमिदानी दर्भ- यमाह-गागमे इत्यादि । मागमे शास्त्रे । अन्ये 'आगमस्विह' इति पठन्ति; am तुशब्दोऽप्यर्थः, अथवा विशेषार्थस्तुशब्दः, तेन प्रत्यक्षादिप्रमाणाविरुद्धोऽपि शिक्षा गम इस्यर्थः; भथवा, भागमशब्दोऽयं सिद्वान्तवचनः, तेन सिद्धान्तः पुनरिहेत्यर्थः। पृथिव्यसेज इत्यादि । पृथिव्यादीनां गुणसाधाद् गुणसमानतया द्वैविध्यं भवती- त्यर्थः । गुणमेवाह-गुरुता लघुता चेति । भवन्ति चात्रेत्यादि । निर्वर्तन्तेऽधिका इति जायन्ते उस्कटा इत्यर्थः (ड.) । वीर्यप्राधान्यवादिमतमवमत्य 'विपाक: प्रधानम्' एवंवादिनो मतमनुसंधत्ते-नेत्यादिना ।xxx। सम्यमिथ्याविपाक स्वादिति सम्यक् मिथ्या वा विपाको येषां तेपां भावस्तस्मात् । सम्यमिथ्याविपाक- स्वादेव द्रव्याणां कार्यकरस्वात् विपाकः प्रधानमित्येव स्फुटीकृत्यावगमयति- इहेत्यादिना । सर्वशब्देनेह वमनादितरद्रव्याण्येवाभिप्रेयन्ते, (तस्य) विपाक- मन्तरेणैव कार्यकरस्वात् । अत्र द्रव्यगुणानुरूपो निष्ठापाकः सम्यग्विपाक उच्यते, तद्विपरीतस्तु मिथ्याविपाकः । तयोराधः कटुकश्चित्रकः पाकेऽपि कटुक इत्यादी, द्वितीयस्तु कटुका पिप्पली पाके मधुरा इत्येवमादौ बुभुत्सितव्यः । गुणं दोषं बेति वाशब्दश्चार्थे, सम्यग्विपक्कानि मिथ्याविपक्कानि वा गुणं दोपं च जनयन्तीत्यर्थः । तद्यथा-सम्यग्विपक्कश्चित्रकोऽग्निसंदीपनादिरूपं गुणं, रुद्धमूत्रत्वादिरूपं दोषं च, जनयति; मिथ्याविपक्का पिप्पली च शुक्रवर्धनादिरूपं गुणं, प्रक्लेदजननादिरूपं दो च, जनयति । यदाह चरकः-"पिप्पल्यः कटुकाः सत्यो मधुरविपाका गुम्यों नात्पर्य निग्धोष्णाः प्रश्लेदिन्यः" (च. वि. म. १) इति । यद्वा अग्निसाम्बाद हीनं नापि चाधिकं निष्ठापाकः सम्यग्विपाका, तदन्यस्वग्निवैपम्यान्मिथ्याविपाकः । -वत्र सम्यग्विपाके यथोका गुणाः, मिथ्याविपाके घामादिदोषाः संभवम्तीस्थावुर्वेद विदो भाषन्ते; तस्माद्वीर्यमपि विपाकापीनं भवतीति निश्चीयते विपाविशेषण पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २३३ 'अद्विशेषादित्यतः "सं विपाकस्तो वीम" (च. सू. भ. २६) इत्यस्यानादरादुपपत्रं भवति-सम्पक्षियाविपक्रानि गुणं दोषं चा जनयन्तीति । नातो विपाप्राधान्यं प्रति न काचिद्विप्रतिपत्तिरित्ययमभिसंधिः । संप्रति स्वाभिमतं विपाकप्रकारद्वयमुप- दिदिक्षुः प्रथमं तावत् पविधविपाकवादिना विविधविपाकवादिनां च मतमुपन्यस्य दूषयति-तत्राहुरन्य इत्यादिना लवणतामुपैति इत्यन्तेन संदर्मेण । भूतगुणादिति भूवशब्देनेह प्रत्यासल्या भूम्यग्नी अभिधीयेते, वक्ष्यति हि "भूम्यनिगुणवाहुल्या. दम्लः" (सु. सू. अ. ४२) इति; तथा चाम्लगता पनिगुणा विपाचकालिगुणैः सामान्यादभिवृष्या, अल्पाना स्थूल-सार-सान्द्रादीनां विरुद्धानां वनस्थानां भूमिगुणा- नामवजया भवन्तीस्यम्लो रसोऽमिगुणबाहुल्यात् कटु विपच्यते नैवाम्लं, तदिदमुपपत्रं भवति-भूतगुणादिति । न चैवंगते "तोयानिगुणबाहुल्यालवणः" (सु.सू.म. ४२) इस्यनागवावेक्षणादनयैव युक्त्या कटुविपाकमों लवणो रसः कथं मधुरं विपच्यत इति वाच्यं, तोयस्याम्यवजयस्वभावदर्शनात् । दृढप्रतिपत्तये हेत्वन्तरमुपन्यस्यति- भागमाचेति । भागमस्तावत् "द्रव्येषु पच्यमानेषु' इत्यादिर्वक्ष्यमाणः । नन्वेत- देवावं कथं तोहारोत्तरकालादौ छर्दयतामम्ल भागच्छेदित्याशझ्याह-पित्त- मित्यादि । हिशब्दोऽवधारणार्थः । एतेन प्रतिरसविपाकवादिनस्त्रिविधविपाकवादिना निरसन्ते, तथाविधस्याम्लस्य विपाकरवानुपपत्तेः । न चैतावताऽपि विविध- विपाकवादिनो निरस्यन्त एकान्तेन यथाकथंचित् पाकनैविध्यवादिनो हि ते तया. विधामम्लतामादायैव निविधं विपाकमिच्छन्तीत्येवं ये प्रत्यवतिष्ठन्वे तानिरस्यबाह- यदीत्यादि । यदीयभ्युपगमार्थः । एवमुक्तप्रकारचेदम्लः पाक इष्टस्तहि लवणोऽपि भन्यश्रतुर्पः पाको भविष्यतीति त्रैविध्यपरिहानिर्दुरपनेयेत्ययमभिसंधिः । पुनरपि मतान्तरद्विवयमुपन्यस्य दूषयति--मधुर इत्यादिना । अम्ल विपाकपरिखण्डनेनैव सणिते अप्येते अन्यथा दूपणाय इहोपात्ते इत्यनुसंधेयम् । सर्वेषामिति संयुक्तासं- युकानाम् । उखागतं स्थालीस्थम् । प्रकीर्णा इति उसाः । उत्तरकाले प्ररोहकाले । भवलवन्तोऽणुरवेन दुर्यला., बलवता व्यक्तानां, वशमायत्ततामायान्तीति "बलीयसा दुर्बलं माध्यते" इति न्यायादिति भावः । अनवस्थितिरिति रसानुरसकरुपनेन रसानामपरिसंख्येयत्वादिस्यवधेयम् । यदाह चरकः-"त्रिपष्टिः स्थावसंख्येया रसानुरसकल्पनात् । रसास्तरतमाभ्यां तां संख्यामतिपतन्ति हि" (च. सू.म. २६) इति । एप द्विविधो विपाकवादमार्गः । स्थादेवत् परमार्थतस्तु कतिविधा पाक इत्याह-मागम इत्यादि । हिशब्दः सिद्धान्तानुसरणार्थः । कुतस्तु खलु गुरुलंघुति द्विविधो विपाको भवितुमईति, विपाको हि नाम रसपरिणाम- विशेष इति निमीयते "जाठरेणामिना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्" (म. ह. सू. म. ९) इस्थापनुशासनात्; रसस्वाप्यः, भाग्यश्च गुरुरिति विश्वजनीनस्फुटतरा प्रतीतिर्न शक्या पचनशकैरप्यन्यथयितुम्, न पागमाः सहस्रमपि उष्णमनि शीतं - - - २३४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कर्तुमीशत इत्याह-तनेत्यादि । तत्र विपाकाभिनिवृत्ती पृषिव्यादीनां गुणसाबाद गुरुत्व-लघुस्वधर्मसारयाद् गुरुवा लघुता चेति द्वैविध्यं भवति । साधर्म मानतो दर्शयति-पृथिव्यापश्वस्यादिना । एतेन पृथिव्यपां गुरुवं साधम्प, शेषाणां । लघुत्वम्, इत्याविष्कृतं भवति; तस्मात् पृथिव्यादीनां दैविप्याद्विपाकोऽपि निविय एष भवति, कारणानुरूपं कार्यमिति कृश्येति भावः । उक्तमपं स्फुटीलापमान पति-द्रव्येश्वित्यादिना लोकद्विसयेन । मतिरोहितार्थमेतत् (हा.)॥ विपाकविपये सुश्रुतमतानुयायिनो भदन्तनागार्जुनस्य गतम्- परिणामलक्षणो विपाकः (२. वै. भ. . सू. १७०) परिणामोऽर्भाग्वर- भाषः, जीर्तिरित्यर्थः । एवं विदाहानामपि पाकावयवरवं युज्यते (भा.)। मतःपरं. विपाकचिन्ता-यथारसं विपाकमेके वृवते (र. वै. अ. ४ सू. ३१) थारस मधुरो मधुरं पच्यते, कटुकः कटुकं पथ्यते, इत्येवमादि एक्मेके भाचार्या मन्यन्ते (भा.)। न, भिन्नलक्षणत्वात् (सू. ३२) । नायं पक्षः साधुः । कुरा 'मिसलक्षणत्वात् । 'मास्वादमासो रसः', 'परिणामलक्षणो विपाकः' इति । विपाकर मधुरता कथमास्वायते ? यद्यास्वायेत, रसलक्षणस्वाद रस एवेति विपााभावः यदि नास्वायेत, कथं भवता 'मधुरं पच्यते' इत्युपलब्धमिरयुक्तं भवति (मा.)। एवमुक्के अपरस्स्वाह-विपाकद्वयपक्षेऽप्ययं प्रसङ्गस्तुल्यः (सू. ३१) कथमिति ? 'मधुरः', 'कटुक' इति द्वौ शब्दो रसस्यास्वादप्रामस्य वाचकी । कथमा स्वादेन रसो गृह्यते ? भिन्नलक्षणस्वादिति (भा.) । एवमुके यथारसविपाक- प्रतिषेधिना मधुर-कटुकशब्दाभ्यामसाभिर्न रसौ परिगृहीती, चिराचिरादिति दो काली परिगृहीतो, इत्युक्त परः प्राह-किमस्माकमपि रसशब्दानां काल- वाचकत्वे प्रतिपेघो विद्यते ? (सू. ३४)। तस्मादत्रापि कालवाचका रसखाया इति (भा.)। भम्राह-शब्दान्तरेण कालस्य ग्रह्णमिति चेत्, कतमे पट् कालाः ? (सू. ३५)। शब्दान्तरेण कालवाचकादन्येन रसवाचकेन शम्देन यदि कालः परिगृहीत इति, कतमे पद कालाः ? न सन्तीरयुक्तं भवति । भमाकं पुनर्वियेते द्वौ कालो चिरात्, अचिरात्, इति (भा.)। तथा गुणाः (३१)। शब्दान्तरेण गुणा गृह्यन्ते । यथा-मधुराख्यो गुरुः पाकः, कटुकास्यो लपुरिति । तच नोपपद्यते, गुणमुखेनापि कालपट्कस्यासंभवादिति (भा.) । रसस्यैवेति चेत् केनचित् कथंचित् कस्यचिच्च विपाकादसम्यक् (स्. ३७) । मर्य सावन्मधुरशब्दस्वसदीये पक्षे न गुणवाचक. कालवाचको वा, तस्मान्मुल्य एवं रसवाचकः स्यादिति चेत्, भस्माभिर्मुख्याभिधाने शब्दस्यासंभवान् दृष्ट्वा गुणपक्ष आश्रित इत्युक्तं भवति । अनेन वाचकेन कथमसंभव इति ? केनचिद् विपाकाद रसेन भवति, अन्येनाग्निना भवति, एतदुक्तं भवति-अमिसावि पादमिपाका प्रवर्तमानः कथं जिह्वेन्द्रियसनिकर्पप्रायरसार्थवाचकेन शम्देन मधुरः, कटुक इत्यु पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः। म चते ? माम मुस्यशब्दार्थकल्पना युक्ता । कथंचिद्विपाकासन रसौष वाचको मधुरशम्दः । विपाकः प्रकारेण 'गुरु, लघुः' इति कथ्यते । प्रकारकालापेक्षया पिरादधिरादिति । एवमन्याकारापेक्षस्थार्थस्य विपाकसंज्ञकस्य कथं रसशब्देन कथन मुत्यवचनं भवति । कस्यचिव, विपाकाम रसशब्दवाच्यस्वं यस्य कस्यचिभवति द्रव्यस्य वा पाकः, रसस वा, गुणस्य वा, वीर्यस्य वा, "द्रव्य रस-गुण-वीर्याणां विपाक" (र. वै. भ. २, सू. ३७) इति वचनात् । तस्मादेवमन्यपदार्थवर्तिनः क्रियायां रसशन्दस मुख्यस्य प्रवृत्तिरुपपद्यत इति मधुर-कटुकशब्दाभ्यां रसवचनमसम्यगिति (भा.)। एकरसोपयोगे वाऽनेकोपलब्धेः (सू. ३८) एवं प्रसंगा- गतमपोप इदानीमपि यथारसत्वे विपाकस्यासंभवं प्रदर्शयमाह-एकेत्यादि । एक- रसस मधुरस्य कटुकस्य चा उपयोगे अनेकस्य भिन्नस्य विपाकस्योपलब्धेर्न यथारसं' विपाकः । यथा-मधुरं क्षीरं मधुरविपाकं, मधुरं घृतं केटुकविपाकं, कटुका पिप्पली मधुरविपाका । यदि यथारसं विपाक: स्यात् मधुरेण घृतेन मधुरविपाकेन भवितव्यं, तथा पिप्पल्याऽपि कटुकविपाकया भवितव्यमिति (भा.)। परोक्षत्वाचा- त्यन्तम् (सू. ३९) अयं चापरो हेतुर्यथारसविपाकपक्षबाधकः-परोक्षेत्यादि । मक्षाणां परतो वर्तत इति परोक्षं, परिणामकाले रसानां कथमुपलब्धिर्भव- सन्यत्र वर्तमानस्वादिति । तस्यां रसानामनुपलब्ध्यां कथं यथारसस्वं ज्ञायत इति । मिनलक्षणस्वादित्यनेनैवास्यार्थस्य सिद्धेरिदं वाक्यान्तरं नारब्धव्यमिति । अस्त्यत्र स विशेषः । कथमिति न भिलक्षणस्वादिस्यनेन विपाक-रसयोरेकरवमेवेति । मयारसत्वे , विपाकस्य परिकल्प्यमाने उभयोरास्वादग्राह्यत्वादिति । असालक्षण, मेवदर्शनानास्त्येकत्वामिति । परोक्षस्वादित्यनेन रसनेन्द्रियमासस्य विषयमावमेव नोपगच्छति विपाकः । कथं वस्य रसस्य च भेदः परिच्छिद्यत इति (भा.) । यथाखं दोषवर्धनात् प्रय इत्येके (सू. ४०)। विपाकं प्रत्यन्यत् पक्षान्तर- माह-यथास्वमित्यादि । यथावं दोपवर्धनाद् , यथा-मधुरो मधुरं श्लेष्माणम्, भालोऽम्लं पित्तं, कटुकः कटुकं वायुमिति (भा.)।न, क्षीरादानां वालानां सर्वदोपप्रकोपात् (सू. ४१)। निस्वप्रतिषेधार्थमिदमुच्यते-नेत्यादि । त्रयो विपाका इति नोपपद्यते । कुतः ? इति हेतोरसंभवात् । यथावं दोपवर्धनादित्यय- मसिदः, क्षीरादानां बालानां मधुरविपाकं क्षीरमेवोपयुमानानां योऽपि दोपाः प्रकुप्यन्ति, स्मादेकेन विपाकेन त्रयोऽपि दोपाः प्रकोपमुपयान्तीति विपाकनिमित्ता प्रकोपो न स्यात् । सर्वदोषप्रकोपादित्यत्र विपाकत्रयवादी प्राह-सर्वप्रकोपस्तत्रैक दोषप्रकोपात् (सू. ४२) क्षीरपस्य सर्वदोषप्रकोपो न विपाकनिमित्तः। अन्न सर्वशब्दा ते चत्वारः पदार्थाः पच्यन्तेऽग्निना, तस्मादेतेषां पाकक्रिया पाकस्य विषयप्रदर्शनार्थ- मुता । कर्मणः प्रयोगलक्षणस्यामिना सान्निध्यामावाद् विपाकविषयता नास्ति (मा.) । २ भाष्यकारोक्त एतस्य कविपाकत्व चिन्त्य, चरकाचैतस्य मधुर(गुरु )विपाकत्वेनोक्तत्वात । . -- । M १ द्रव्यगुणविज्ञानम् । शेपसाकल्यवाची । एकस्यैव श्लेष्मणः प्रकोपाद् भवति । "एका दोषा पिता सर्षानेव प्रकोपयेत्" इति (भा.)। न, प्रकोपदर्शनात् पर्यायेण (सू. ५)। अनोत्तरम्-नेत्यादि । यदि कुपितदोषघटनानिमित्तः स्थापछेषदोषप्रकोपः, सके. कालं श्लेष्मप्रकोपपूर्वक एवं स्यात् । एवं न भवति, पर्यायेण भवति । पर्याय भात्मनः पर्यायक्रमः । कदाचित् पित्तस्यैव, कदाचिद्वायोरेवेति । तस्मादेकदोषप्रकोपारिति म युक्तम् (भा.)। तत्रोपहतत्वाद् विपर्ययः पाकस्य (सू. ४४)। एवं पूर्वक एवासिद्धदोष इति व्यवस्थिते पर माह-तत्रेत्यादि । तत्र पर्यायेण प्रकोपे उपहतरबाद दुष्टत्वाद् विपाकस्य, मधुरविपाकं क्षीरं धात्र्यास्त्वपचारैर्दू पितमग्लविपाक कटुक- विपाकं वा भवति, तदा यथास्वं दोपवर्धनमेव भवति तस्मात् श्रय एव विपाका इति (भा.)। संसृष्टस्यानुपपत्तिः (सू. १५)। भस्मिन् पोऽन्यथा दोषमुजार- यति-संस्ष्टेत्यादि (भा.)। प्रचितस्य प्रकोपात्, एकेन चानेकस्याप्रव यात्; प्रतिज्ञाहानिर्वा सति प्रचये (खु. ४६)। कयं संसष्टस्यानुपपत्तिदि- स्याह-प्रचितस्येत्यादि । प्रचितो हि दोषः प्रकोपं गच्छति । एकैविपाकेऽनेकला प्रचयात् प्रचयासंभवादित्यर्थः । दुष्टेन हि क्षीरेणाम्लेन कटुकेन विपनमाधुयेंग या भवितव्यं, नहि युगपत् कटुकायापत्तिः । तस्सादेकस्यैव प्रचयहेतुसंभवः । यथासं दोषवर्धनादिति प्रतिज्ञानादेवमुक्तमप्रचयादिति । एवमसंभवं रसा एकेनैव विपाके नान्यस्यापि दोपस्य प्रचयो भवतीति मतं स्यात् । तत्र प्रतिज्ञा हीयते पूर्वम् (भा.)। यथास्वं दोषवर्धनात् प्रशमनाभावः (सू. ४७)। यदि यो विपाकाबपाणी दोषाणां वर्धनप्रयोजनाः, विपाकनिमित्तं दोपप्रशमनं न स्यात् । किं जावम्, अन्यैर्गुण-रसादिभिः प्रशमनं भवतीति चेत् ? शालेयुक्तस्य प्रशमनसाभाव इति भाषण विरोधः प्रदर्शितो भवति । यथा-मधुरं शीतं निग्धं सर्पिः श्लेग्माणं समपति, लघुविपाकत्वादिति (भा.)। कस्मात् प्रशमनं नास्ति ? अस्त्येव प्रशमनम् (सू. ४८) । पूर्वपाक्षिकस्वाह-कसादित्यादि । यथा-मधुरविपाकेन पित्तल प्रशमनम् , अम्लेन वायोः, कटुकेन श्लेष्मण इति (भा.)। सति वा प्रशमने यथाखं दोषवर्धनं न भवति (सू. ४९)। अत्राह-सति वेत्यादि । एवं प्रशमने परिकल्प्यमाने वर्धनं न स्यादिति । अत्र पूर्वपाक्षिकस्य वचनावकाशो वियते, कस्मात् ? उभयकर्तृकत्वमेकस्यैव विपाकस्य न भवति, रसस्यै(स्ये)व । यथा--- मधुरो रसः श्लेषमाणं वर्धयति, पित्तं शमयति; तन्मधुरविपाकोऽपि शेमा वर्धयति, पित्त शमयति, 'वर्धनाख्यः' इत्युच्यन्ते 'शमनाथ त्रयः' इति । कमान भवति ? विशेषहेत्वभावादिति । अस्योत्तराभासस्य प्रदर्शनार्थमुक्तमिति । केलिए त्राप्यस्त्येव वचनापकाशः । कस्मात् ? मधुरस्य श्लेष्मवर्धनात् पित्तशमनाथ मेवो १ भाष्यकारोक 'लघुविपाकत्वात्' इति चिन्त्य, मुश्रुतेन "तं गुरु, विपाके मधुर" (सु सू अ. ४५) इति प्रोक्तत्वात् ।
पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः। भखादिति । तसादेतत् सति वा प्रशमने यथास्वं दोषवर्धनं नास्तीति वाक्यार्थस्य न भवतीस्थपोहते कचिदिति (भा.)। कालतो गुणतो रसतश्चानुपपत्तिः त्रित्वस्य (स्. ५०)। एवं परस्य हेतुदूषणं कृत्वा विपाकद्विस्वसाधकानां हेतूनां निस्वसाधकस्वेऽमावं दर्शयन्नाह-कालत इत्यादि । कालतमित्वं नोपपद्यते, चिराचिरकालव्यतिरिक्तस्याभावात् ; पूर्व 'कतमे पद काला' इत्यत्र कृतभाष्यम् । गुणतच विस्वं नोपपद्यते; गुरुभूतजनिता, लघुभूतजनिता, इति गुणवैविध्यादिति । रसता विस्वस्थानुपपत्तिः, कटुक-तिक कपायास्तु लघवो, गुरवः परे, इति द्विविध- भेदावरोधादिति । रसत इत्यस्यायमर्थो न भवति, गुणत इत्यत्रैवावरोधात् । तस्मादन्यथा वर्ण्यते-यथाऽस्माकं मधुर-कटुकशब्दौ रसवाचको मुख्यौ गुणवृत्या विपाकेऽध्यारोपितो, तथाऽग्लशब्दस्य विपाकेऽर्थान्तरेऽध्यारोपयितुं न शक्यते गौरवाभावादिति हेस्वभावो "मधुरो गौरवाल्लघुरवात् कटुक" इत्यस्य वाक्यस्य भाष्ये प्रदर्यते (भा.)। द्वौ, द्वैविध्यदर्शनात् परिणामस्य (सू. ५०)। इदानी विपाकस्य स्थितिपक्षं प्रदर्शयाह-द्वावित्यादि । द्वैविध्येन दर्शनात् परिणामद्वैविध्येन दर्शनात् परिणामस्येति, द्वौ विपाको द्वैविध्येन दर्शनादिति द्विधा दर्शनात् तस्य परिणामस्य । पाकस्येति वक्तव्ये परिणामग्रहणं दृष्टान्तवाक्यत्वादस्य विपाकलक्षणस्य परिणामार्थान्तरभावगमनस्य द्वैविध्येन लोके दर्शनात् । यथा सदिरसारादीनि चिरादग्निसंयोगे परिणामं गच्छन्ति, पलालादीन्यचिरादिति '(भा.)। गुणकारणत्वाद् गुणद्वैविध्याञ्च (सू. ५१) । इदानी हेतु:- -गुणस्यादि । इह पाकस्य कारणभूता गुरवश्चिरात् पाकस्य कारणं, लघवोऽधिरात् पार्कस्य, इति गुणवैविध्य, भूतानां द्वैविध्यात् । पूर्वे गुरुणी,' पराणि लघूनीति । न तृतीयः पाका, तत्परिच्छेदककालाभावात् । यत्र यस्य परिच्छेदकं नास्ति, तस्थामावो इष्टः । तपथा-द्वितीयमनीश्वरशिर इति । अथवा द्वौ विपाको, तहकारणदैविध्यात् । यत्र कारणद्वैविध्यं वन कार्यद्वैविध्यं दृष्टम् । यथा-गोशृङ्गयोः । वैभम्यं खावं योज्यम् (भा.)। मधुरो गुरुत्वात्, लघुत्वाच्च कटुकः (स. ५२)। गुणकारणस्याद् द्वैविध्यमित्युकं, सत्र कस्य विपाकस्य को गुणः कारणमिति न ज्ञायत इत्यत्राह-मधुर इत्यादि । मधुरशब्दवाच्यो गुरुगुणनिमित्तः । .कटुकशम्दवाच्यो लघुगुणनिमित्तः । मन द्रव्यादयः षद पदार्था उद्दिष्टाः साधनभूताः, तेषु विपाकस्य लक्षणमुपदिशता 'परिणामलक्षणों विपाक' (र. र. वै. भ. १, सू. १७.) इति विपाकस्य लक्षणमुक; तस्य भेदमुपदिशता मधुरः, कटुक, इति रसभेद उक्तः, मधुर-कटुकशब्दयोरर्थतवाभिधाने गुणमेद उक्ता, तयोर्मधुराग्यो गुरुरिति; एवं (कथं) सर्वत्र मुख्यशब्दार्थलानं कृत्वा रसशन्देन गुणाभिधानं, गुणशग्देन परिणामाभिधानमिति ? उच्यते--निविधा हि शब्दाः- निस्समेछ, गौणा, निस्सं मुख्याः, गौणमुख्याति । प्रवीण कुशलादयः शब्दास्तु 1 - २३८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । गौणा एव, पचति पठतीत्यादयो मुख्या एव, सिंहादयस्तु गौणाम मुल्यांग । मृगे सिंहशब्दो मुख्यः, सिंहोऽयं माणवक इत्यत्र गौणः । इहापि मधुरकाम्दो रसें मुख्यः, गुणे गौणः, यत्रोपपाधस्वात् साक्षादास्वादग्राले इहामवृत्तेः । कुस्साप्र शंसादिगुणसारूप्यात् सिंहशब्दादिषु भवति, अत्र कथम् ? अत्राप्यस्ति सारूप्यमेक- हेतुजन्यस्वं-मधुरोऽपि पार्थिवाप्यः, गुरुरपि गुणः पार्थिवाप्य इति तया गुणशब्दोऽपि परिणामे गुरुर्लघुरिति; गौणगुरुगुणजनितः परिणामे गुरुरित्युक्त, लघुगुणजनितो लघुरिति । आह च-"गुणमात्रेण यत्रास्य तादर्थ्यमवसीयते । मुख्यमर्थ मन्यन्ते, गौणं यत्नोपपादितम् ॥” इति (भा.)। वर्धनक्षपणप्रशमन- प्रकोपेपु तयोरनियमः (सू. ५३) । "यथावं दोषवर्धनास्नयः" इत्पन्न तेषां वर्धनं नैयम्येनोक, किमत्र द्वयोरपि पाकयोधनादिनियमो विद्यत इत्याह- वर्धनेत्यादि । एतेषु दोषाणां वर्धनादिषु द्वयोर्विपाकयोर्नियमो नास्ति । मन्त्र वर्धनं संचयः । लघुविपाकः कचिद् वर्धयति । यथा-लघुविपाकमुदकं श्लेष्माणं वर्धयति, लघुविपाकं मधु श्लेष्माणं हरतीति । तस्मादयमेव गुरुविपाको वर्धन एव, लघुविपाकः शमन एव, इति नियमो नास्ति; अथवा लघुविपाकः श्लेष्माणं शमयति तथा गुरुविपाकोऽपीति (भा.)। मधुरो गुरुभ्यां, कटुर्लघुभिः (सू. ५४)। गुणकारणत्वं कथं भवतीत्याह-मधुर इत्यादि । मधुरो विपाको गुरुभ्यां पृथिव्युदकाम्यां भवति, कटुर्लघुभिरिति त्रिभिरस्यादिभिर्भवति । एवं भूतैरा- धिक्यान्निवर्यमाने पाके तद्गुणसमावेशाच्चिरादचिराच्चेति विशेषो भवतीति । भाह च-"द्रव्यस्य पच्यमानस्य यस्यापा धातुरुत्तमः । निर्वतते पार्थिवा तस्य पाको ध्रुवं गुरुः ॥ आपो निय॑माना हि मृदुं कुर्वन्ति पावकम् । पृथिवी- धातुरप्येवं तस्मात् पाकस्तयोर्गुरुः ॥ एतत्तु गुरुपाकानां द्रव्याणां पाकलक्षणम् । मत ऊ प्रवक्ष्यामि लघुपाकं यथा भवेत् ॥ हीनश्च पृथिवीधातुर्विविक्कामागुणाः स्मृताः । यस्मिन् द्रव्ये भवन्त्येवं तस्य पाको ध्रुवं लघुः ॥" इति (भा.)॥. यथारसं जगुः पाकान् षट् केचित्तदसांप्रतम् । यत् स्वादु:हिरम्लत्वं न चाम्लमपि दाडिमम् ॥ याति तैलं च कटुतां कटुकाऽपि न पिप्पली। यथारसत्वे पाकानां न स्यादेवं विपर्ययः॥ (अ. सं. अ. १५)।, विपाक उपसंहियते-यथारसमित्यादि । केचिदाचार्या रसानतिक्रमेण पाकषक जगुः अवदन् । यथारसमिति यथाविधो रसः स्वरूपेण तथाविध एव तस्य विपाक, तेन मधुरस्य मधुरो विपाकः, कटुः कटोः, कपायः कषायस्वेत्यादि । तमार्यमतम- सांप्रतम् अयुक्तमिति । कुतः ? व्यभिचारात् । एतदेवोदाहरणेन दर्शयति-पदि खादि । यदि हि रससरश. सर्वस्व विपाकः स्यात् तदेवं विपर्ययो न स्यात् (इन्दु.)। " - । .
पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २३९ - AT और लघु । -- । अब दूसरा धन्वन्तरिसंप्रदायका मत या सुश्रुतमत कहा जाता है । सुश्रुतने प्रारम्भमें एकीयमतसे विपाकका प्राधान्य दिखलाकर उस समय विपाकके विषयमें प्रचलित अन्य पादियोंके मत देकर उनका खण्डन किया है, और पीछे गुरु ये दो ही विपाक है, ऐसा अपना मत स्थापित किया है। एकीयमतसे विपाकप्राधान्यनिरूपण-कई आचार्य कहते हैं कि-द्रव्य, रस और वीर्य प्रधान नहीं है, किन्तु विपाक प्रधान है। क्योंकि-सब प्रकारके खाए हुए द्रव्योंका जठराग्निद्वारा सम्यक् पाक हो तो वे धातुसाम्य( आरोग्य )रूप गुण करते हैं, और यदि जठराग्निकी मन्दतासे हीनपाक हो तो आमविकाररूप दोष तथा जठराग्निकी तीक्ष्णतासे अतिपाक हो तो भस्मकविकाररूप दोष करते हैं (असम्यक पाकसे धातुवैषम्य होता है और धातुवैषम्यसे सब प्रकारके शारीर विकार होते हैं)। मतः सम्यग्विपाक आरोग्यरूप गुण और मिथ्याविपाक शारीर विकाररूप दोषका हेतु होनेसे विपाक ही द्रव्यादिसे प्रधान है। टीकाकारोंने 'सम्यस्मिथ्याविपाकलात्' इसका और भी अर्थ किया है। जैसे-सम्यग्विपाक अर्थात् द्रव्यगुणानुरूप विपाक, जैसे-कटु- रसवाले चित्रकका कटुविपाक, मिथ्याविपाक अर्थात् द्रव्यगुणसे विपरीत विपाक, जैसे कटुरसवाली पीपलका मधुरविपाक । उन्होंने 'गुणं दोषं वा' यहाँ 'वा' शब्दको 'च' कारके अर्थमें मानकर सम्यग्विपाक और मिथ्याविपाक दोनों गुण और दोष 'दोनोंको करते हैं, ऐसा अर्थ किया है। उदाहरण देते हुए कहते हैं कि-सम्यग्विपक्क चित्रक अमिसदीपनरूप गुण और रुद्धमूत्रवादि दोष करता है, तथा मिथ्याविपक्क पिप्पली शुक्रवर्धनादि गुण और क्लेदजननरूप दोष करती है। १ इस विषयमें सुश्रुतकी व्याख्यामें डॉ. भास्कर गोविन्द घाणेकरजी लिखते हैं कि-इसमें सन्देह नहीं कि ओषधियोंका शरीर पर कार्य सम्यक् विपाक होनेके पश्चात् ही प्रायः होता है और इस हेतुसे विपाक प्रधान हो सकता है। जैसे कुनीन विषम ज्वरके लिये वही प्रभावी ओषधि है, परन्तु जब उसकी शर्करावगुण्ठित (Sugar coated) गोली सेवन की जाती है तब उसका विषमज्वर पर कमी कमी प्रभाव योग्य विपाक न होनेके कारण नहीं पढता। तथा रस, वीर्य, विपाक और प्रभावमेंसे किसी एककी सर्वश्रेष्ठता सर्वावस्था और सर्व ओपधियोंमें नहीं हो सकती है, न देखनेमें आती है । इस लिये भाचार्यों में इस विषय पर ऐकमत्य नहीं होता है । चरकसंहितामें तथा इस अध्यायके १४-१५ श्लोकोंमें इस मतभिन्नताका समन्वय बहुत सयुक्तिक किया गया है-"किञ्चिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरमें । द्रव्य गुणेन पाकेन प्रमावेण च किंचन" । जैसे तिक्त, उष्णवीर्य और प्रभावी कुनीन अरोचकपीड़ित रोगीमें फेवल रससे रुचि उत्पन्न करता है, प्रतिश्याय-एन्फुएन्जा आदि कफोल्बण रोगसे पीडित रोगियोंमें उष्णवीर्यसे रोगनाशन करता है, ज्वरनिर्मुक्त अवस्साकी दुर्बलतामें विपाकसे शक्ति देता है और विषम ज्वरसे पीडित रोगीमें प्रभानसे ज्वरनाशन करता है (म. स. पू. २२२)। । , २४० द्रव्यगुणविज्ञानम् । विपाक निरूपण-कई आचार्य कहते हैं कि-मधुरका मधुर, अम्सका मम्स, लवणका लवण इत्यादि प्रकारसे प्रत्येक रसका अपने समान रसवाला विपाक होता है। वे इसमें दृष्टान्त देते है कि-जैसे-दूधको पकानेपर भी वह मधुर ही रहता है, अथवा जैसे-चावल, जौ, मूंग आदि बोये जाते हैं तो वे अपना स्वभाव न छोरकर उत्तर कालमें चावल, जौ, मूंग आदिके रूपमें ही उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार मधुरादि रस भी जठराग्निद्वारा परिपक्क होकर अपना स्वभाव नहीं छोड़ते--अर्थात् उनका विपाक मधुरादि रसके रूपमें ही होता है । अन्य कई आचार्य कहते है कि जब भनेक रसवाला द्रव्य खाया जाता है तब जो रस दुर्बल होते हैं, वे बलवान् रसके वश हो जाते हैं । इसलिए आहारमें जो रस प्रबल होगा, तदनुसार ही विपाक होगा। इसलिए अमुक एक रसका अमुक ही विपाक होता है ऐसी व्यवस्था नहीं होती, इसलिये विपाक अनवस्थित (अनियत ) है । कई आचार्य तीन प्रकारका विपाक मानते है-मधुर, अम्ल और कटु । परन्तु यह उनका कहना ठीक नहीं है । पञ्चमहाभूतोंके गुणों को देखते हुए और आगमप्रमाणसे तीसरा अम्ल विपाक सिद्ध नहीं होता । पित्त आमेयगुणवाला होनेसे जब विदग्ध होता है तो अम्लरसको प्राप्त होता है। उसको यदि भिन्न विपाक माना जाय तो लवणको भी भिन्न विपाक मानना होगा; क्योंकि कफ जम विदग्ध होता है, तब लवण रसको प्राप्त होता है । इस प्रकार ऊपर कहे हुए मतोंमें एकवाक्यता देखनेमें नहीं आती, इसलिए ये सब सिद्धान्त नहीं हो सकते । धन्वन्तरिके मतमें दो प्रकारके ही विपाक हैं-मधुर और कटु । गुरु विपाकको मधुर नाम दिया जाता है और लघु विपाकको कटु नाम दिया जाता है। पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच भूतोंके तद्गत गुणोंके साधर्म्यसे दो विभाग होते १ इस मतके खण्डनमें वृद्धवाग्भट लिखते हैं कि-फई आचार्य कहते हैं कि जैसा. रस हो उसका वैसा ही विपाक होता है, परतु यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि प्रीहि (चावल) मधुर होनेपर भी उसका विपाक अम्ल होता है, दाडिम अम्ल होनेपर भी उसका विपाक मधुर होता है, तैल मधुर है परतु उसका विपाक कटु होता है, पीपल कट है परत उसका विपाक मधुर होता है, यदि यथारस (जैसा. रस वैसा ही) विपाक होता तो इस प्रकार विपर्यय देखने में नहीं माता । २ जो रस व्यक्त और मात्रामें अधिक हों वे पलवान् और जो इससे विपरीत हों वे दुर्वल कहलाते है। प्रत्येक रसका उसके सहश विपाक होता है, और दुर्वल रस वलवान् रसके आगे दव जाते है इसलिये जो रस मलवान् होते हैं उनके सघश पाक होता है, ये दोनों पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि इन दोनों मतोमें रसके कार्यसे ही विपाकका कार्य जाना जा सकता है, अत. विपाकको रससे सता माननेकी आवश्यकता ही नहीं रहती (शिवदाससेन) । मनवस्थितविपाकवाद भी पसविपाकवादका ही एक मेद है। अनवस्थितत्रिपाकवादी भी मधुर, अम्ल आदि छ: प्रकारका विपाक मानते हैं। - पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २४१ - हैं-गुरु और लघु । क्योंकि पृथिवी, और जल ये दो गुरु हैं, और शेष तीन तेज, वायु और आकाश लघु है; इसलिए दो प्रकारका विपाक होता है-एक गुरु दूसरा लघु । द्रव्य जव जठरामिके द्वारा पकते हैं, तब जिन द्रव्योंमें पृथिवी और जलके गुण अधिक होते हैं उनका मधुर अर्थात् गुरु विपाक है, और जिन द्रव्योंमें 'अग्नि, वायु तथा भाकाशके गुण अधिक होते हैं उनका कटु अर्थात् लघु विपाक होता है। अर्थात् जिन द्रव्यों में पृथिवी और जलके गुण अधिक होते हैं, वे विपाकमे गुरु (पचनेमें भारी-चिरकालसे पचनेवाले) होते हैं तथा जिन द्रव्योंमे अग्नि, वायु और आकाशके । गुण अधिक होते हैं, वे विपाकमें लघु (पचनेमें लघु-शीघ्र पचनेवाले ) होते हैं। भदन्त नागार्जुन-कहते हैं कि-परिणाम अर्थात् रूपान्तर होना-जरण (पाचन) होना यह विपाकका लक्षण हैं। कई आचार्य कहते हैं कि--मधुरादि छहों रसोंका अपने सदृश विपाक होता है। अत. रसमेदसे विपाक छ. प्रकारका है। परंतु यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि, रस आखादप्राय है (जीभसे रसका ज्ञान होता है ) और विपाक परिणामलक्षण है (परिणाम देखकर अनुमान किया जाता है)। इस प्रकार दोनोंके लक्षण भिन्न होनेसे मोर रस प्रत्यक्ष तथा विपाक नित्य परोक्ष होनेसे मधुरका मधुर विपाक होता है यह नहीं जाना जा सकता, अत प्रत्येक रसका रसके सदृश विपाक होता है यह मानना ठीक नहीं है । कई आचार्य कहते हैं कि-मधुर, अम्ल और कटु ऐसे तीन विपाक हैं । क्योंकि, कफ मधुर है उसकी उत्पत्ति (पोषण) १ विपाकके विषयमें मुमुतकी व्याख्यामें डॉ. भास्कर गोविन्द घाणेकरजी लिखते हैं कि-विपाक-महास्रोतसमें जठराग्निके संयोगसे रसकारणभूत द्रव्योंका पचन होनेके पश्चात् शरीरमें जो रसान्तर उत्पन्न होता है वह विपाक है । विपाकको निष्ठापाक भी कहते है । छः रसोंके मधुर, अम्ल और कटु ऐसे तीन विपाक चरकके अनुसार और मधुर तथा कटु दो ही विपाक मुश्रुतके अनुसार होते हैं । इन विपाकोंका कार्य रसके सदृश होता है। फर्क इतना ही है कि विपाकका कार्य सार्वदेहिक, अप्रत्यक्ष या अनुमेय और द्वितीयक (Systemic, indirect and Secondary) तथा रससे बलवत्तर है । विपाकका बलावल द्रन्यगत रसके बलावलपर निर्भर होता है । यदि द्रव्य अत्यन्त मधुर हो तो विपाक भी उत्कृष्ट होता है, यदि मध्यम मधुर हो तो मध्यम होता है और यदि गल्प मधुर हो तो अल्पलक्षण होता है । रसका शान निहाके साथ सबन्ध होते ही होता है, विपाकका शान शरीरमें ओपधियोंका पचन होने के पीछे दोषोंकी वृद्धि, प्रकोप या प्रशमन देखकर होता है और वीर्यका सान कभी शरीरके साथ संवन्ध होवे ही होता है, कमी शरीर पर जो कार्य होता है उससे और कमी दोनों प्रकारसे होता है । सक्षेपमें रसका शान प्रत्यक्ष, विपाकका अप्रत्यक्ष या कार्यानुमेय तथा वीर्यका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकारसे होता है (मु. सूपृ. २२०)। १६ । - 1 द्र० पूर - - २४२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । । । मधुर रससे, पित्त अम्ल है उसकी उत्पति अम्ल रस और वायु गदै उसकी उत्पत्ति कटु रससे होती है, अत: तीन दोषोंकी उत्पशिफे लिये तीन विपाफ मानना ठीक है । इस मतका सडन करते हुए नागार्जुन पहते है-पालकी रिसे, गुणकी दृष्टिसे या रसकी दृष्टिसे विचार करनेसे तीन विपाक सिर नहा को सफते। कालमेदसे तीन विपाक नहीं बन सकते, क्योंकि चिरकाल और चिरकालसे भिम तीसरा काल नहीं है; गुणसे भी तीन विपाक नहीं हो सकते, क्योंकि गुरु महाभूतोसे उत्पन्न हुए रक्ष गुरु और लघु महाभूतोंसे उत्पन्न हुए रम लघु, ऐसे गुणमेसे दो ही रसमेट होते है, तीसरा मेद नहीं हो सकता । रसमेदसे भी तीन विपाक नहीं हो सकते, क्योंकि जैसे हमने मधुर और कटु इन दो रसवाचक शब्दोंको गौणत्तिसे गुरु और लघु विपाक अर्थवाले माना है, वैसे अम्ल शब्दका अर्थान्तरम-गुरु-लघुसे भिन्न अर्थमें अपारोग नहीं कर सकते, क्योंकि महाभूतोंके गुणोंकी दृष्टि से गुरु-लघुसे भिन्न तीसरा मेद नहीं हैं, अत. विपाक दो ही हैं । लोकमें भी विपाकका लक्षण जो परिणाम यह दो प्रकारका ही देखनेमें आता है, जैसे-सैर आदिकी लकडी देरसे जलती है और पास शीघ्र जलती है । गुरु और लघु इन दो गुणोंके मेदसे महाभूतोंके दो नेद होते हैं । पृथिवी तथा जल ये दो गुरु हैं और ममि, वायु तथा आकाश ये तीन लघु है । गुरु द्रव्य चिरकालसे पकदे हैं और लघु द्रव्य शीघ्र पकते हैं। गुरु गुणसे 'मधुर' नामका और लघु गुणसे 'कटु' नामका विपाक होता है। कोई प्रश्न करे कि अपने 'परिणामलक्षम विपाक है' यह विपाकका लक्षण कहा और उसके भेद बनाते हुए मधुर और कटु ऐसे दो रसमेदवाचक शब्दोंका प्रयोग किया यह असगत है तो उसका उत्तर यह कि-शब्द तीन प्रकारके होते हैं-नित्य गोण, जैसे प्रवीण, फुशल आदि; निल मुख्य, जैसे-पचति, पठति इत्यादि कई मुख्य और गौण दोनों होते हैं, जैसे-'सिंह', सिंहशब्द सिंहमें मुख्य और 'यह बालक सिंह है' यहाँ गाण है। यहाँ भी मधुर और कटु शब्द रसके अर्थमें मुख्य और विपाकके अर्थमें गौण है । निन्दा, प्रशंसा आदि गुणों के सादृश्यसे सिंह आदि शब्दों का गौण अर्धमें प्रयोग होता है । इस प्रकार यहाँ भी मधुर रस पार्थिव और आप्य है तथा गुरु गुण मी पार्थिव और आप्य है, इस प्रकार मधुर रस और गुरु गुणमें गुणसादृश्य होनेसे 'मधुर शब्दका गुरु विपाकमें गौणरूपसे प्रयोग होता है; कटु रस आग्नेय और वायव्य है इसी प्रकार १ कट, अम्ल और लवणसे पित्तकी वृद्धि और मधुर, तिक तथा कपायसे पिचकी शान्ति, मधुर, अम्ल और लवणसे कफकी वृद्धि तथा कुटु, तित और कपायसे कफका बास तथा कषाय, तिक्त और कटु रससे यातकी वृद्धि तथा मधुर अन्ल और लवणसे वायुका क्षय देख कर यह अनुमान होता है कि-पित्त कुटु, अम्ल और लवण, कफ मधुर, अम्ल तथा लवण और वायु कषाय, तिक तथा कटु रसवाला है। देखें इसी अन्यमें पृ. १८४ पर उद्धृत कपिलका वचन ।
पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २४३ 'लघु गुण भी आमेय, वायव्य और नाभस है; अतः गौण वृत्तिसे लघु विपाकमें 'कट' शब्दका प्रयोग किया है । गुरु गुणवाले पृथिवी और जलसे गुरु विपाक तथा लघु- गुणवाले वायु, तेज और आकाशसे लघु विपाक होता है। जैसे तीन-तीन रस दोषोंके बढ़ाने या प्रकोप करनेवाले हैं और तीन-तीन रस दोषोंका क्षय या प्रशम करनेवाले हैं ऐसा विपाको नियम नहीं है । जैसे-लघु-विपाक जल कफको बढ़ाता है और लघुविपाक शहद फफको दूर करता है। विपाककर्माणि- मधुरो लवणाम्लौ च स्निग्धभावात् त्रयो रसा। वात-मूत्र-पुरीपाणां प्रायो मोक्षे सुखा मताः। कटु-तिक्त-कपायास्तु रूक्षभावात् त्रयो रसाः । दुःखाय मोक्षे दृश्यन्ते चात-विण्मूत्र-रेतसाम् ॥ शुक्रहा वद्ध विषमूत्रो वियाको वातलः कटुः। मधुरः सृष्टविण्मूत्रो विपाकः कफशुक्रलः ॥ पित्तकृत् सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः । तेषां गुरुः स्यान्मधुरः कटुकाम्लावतोऽन्यथा ॥ (च. सू अ. २६)। संप्रति वक्ष्यमाणविपाकलक्षणे मधुराम्लपाकयोर्वात-मूत्र-पुरीपानवरोधकत्वे तथा कटोर्विपाकस्य वात-मूत्र-पुरीपविबन्धकरवे हेतुमाह-मधुर इत्यादि । भत्र मधुराम्ल- लवणा निष्ठापाकं गवा अपि सन्तः स्नेहगुणयोगाद्वात-मूत्र-पुरीपाणा विसर्ग सुखेन कुर्वन्तीति वाक्यार्थः । तेन मधुराम्लपाकयोरेतत् समानं लक्षणम् । एवं कटु-तिक्त कपायेष्वपि विपर्ययेऽपि वाक्यार्थः । संप्रति विपाकलक्षण हेतुव्युत्पादितं शुक्रह- स्वादिविशेषयुकं वक्तुमाह-शुक्रहेत्यादि । अतोऽन्यथेति लघुः (च. द.) विपाकलक्षणं विवक्षुर्विपाकस्य रसैस्तुल्यफलरवादादी मधुरादीनां कार्यमाह-मधुर इत्यादि । मधुरो लवणाम्लो अम्ल-लवणौ चैते त्रयो रसाः, स्निग्धभावात् स्निग्ध- स्वात् , वात-मूत्र-पुरीपाणां मोक्षे विसर्गे, प्रायः सुखाः सुखकरा मताः; मधुराम्ल- लवणाः स्नेहगुणयोगात् प्रायेण सुखेन वातादीनां विसर्ग कुर्वन्ति । प्राय:पदेन कपित्यादीनां ग्राहिस्वम् । कट्वादयस्त्रयो रसाः; रूक्षभावात् रूक्षत्वात् ; वातः, विद पुरीषं, मूत्रं, रेत. शुक्रं च, तेपा मोक्षे; दुःखाय दु.खकरत्वेन दृश्यन्ते । कटु-तिक कपायास्त्रयो रसा रोक्ष्यगुणयोगाद्वातादीनि विवधन्ति । विपाकानां लक्षणमाह-शुक्रहेत्यादि । कटुर्विपाको रक्षभावात् शुक्रहा शुक्रनाशनः, बद्धविषमूत्रो, वावलश्च । मधुरो विपाकः स्निग्धभावात् सृष्टविण्मूत्रः, कफ-शुक्रल: कफ-शुक्रकृष । अम्लपाकः पित्तकृत् शुक्रनाशनश्च उष्णयीर्यत्वात् , सृष्टविण्मूत्रः १ द्रव्यगुणविज्ञानम् । - स्निग्धभावात् । मधुरादिविपाकानां गुरूलाघवमाह-तेपामित्यादि । तेषां प्रयाणां विपाकानां मध्ये मधुरो विपाको गुरुः, कटुकाम्लावतोऽन्यथा लघू (यो.)। भय विपाकानां प्रभावमुपदेष्टुं तत्कारणरसानां प्रभावमाह-मधुर इत्यादि । सिग्ध- भावात् उत्तम-मध्यमाधमस्निग्धत्वाद् वातादीनां प्रमोझे प्रायः क्रमेणोत्तम-मध्य- माधमरूपेण सुखाः सुखकरा मताः । प्रायःपदेन कपिरथादीनामम्लादिरसा ग्राहिणः । कटु-तिक्त-कपायाश्चेति कपाय-कटु-तिक्तास्त्रयो रसा रूक्षभावात् , उत्तम- मध्यमाधमरुक्षत्वाद्वातादीनां मोक्षे क्रमेणोत्तम-मध्यमाधमरूपेण दुःखाय दृश्यते । अतिग्राहिणः कषायाः, मध्यग्राहिणः कटुकाः, भल्पग्राहिणस्तिताः । अत एष विपाकस्य प्रभावमाह-शुक्रहेत्यादि । कटुर्विपाकः शुक्रहा, बद्धविण्मूत्रो, वातलम एवं कटुरसस्य ये पूर्वोकाः कर्मविशेपा "वक्रं शोधयति" इत्यारभ्य "लघुरुष्णो रूक्षश्च" इत्यन्ताः, तेऽपि ज्ञेयाः । मधुरो विपाकः श्रेष्टनेहभावात् श्रेष्ठः सृष्टविण्मूत्र-कफशुफलः पूर्वोतमधुररसगुणश्च । मथाम्लपाकः नेहभावस्य मध्यस्वा- न्मध्यमरूपेण सृष्टविण्मूत्रः, शुक्रनाशनश्च मध्यम. पित्तकृष; एवं पूर्वोकाम्ल. रसगुणश्व बोध्य इति । ननु विपाकादेव यदि द्रव्यगुणोदयः स्यात्तदा पण्णां रसानां गुणः कथं स्यादिति चेत् ? न । प्राविपाकाद्धि रसकायं भवति, पाकादुत्तरं विपाक- कार्य भवति । अथैषां त्रयाणां विपाकानां संज्ञान्तरमाह-तेपामित्यादि । तेषां मधुराम्ल-कटुविपाकानां मध्ये मधुरः पाको गुरुः स्यात् , अतो गुरुतोऽन्यथा लघुपाको कटुकाम्लो; तथाहि सुश्रुतादविरोधः (ग.)॥ गुरु-लघुविपाकाबुक्तगुणौ।xxx।गुरुपाको वात-पित्तना,लघुपाक: श्लेष्मनः । xxx । गुरुपाकः सृष्टविण्मूत्रतया कफोक्लेशेन च, लधुर्वद्धविण्मूत्रतया मारुतकोपेन च (सु. सू. अ. ४१)॥ गुरु-लघुविपाको उत्तगुणाविति "तयोर्मधुराख्यो गुरुः" (सु. सू. भ. ४०) इत्यादिना, तथा "द्रव्येषु पच्यमानेषु येवम्बु-पृथिवीगुणाः” (सु. सू. म. ४०) इत्यादिना चोकगुणावित्यर्थः । विपाकस्य नित्यपरोक्षस्वाल्लक्षणेन ज्ञानमाह-गुरुपाक इत्यादि । चकारादागमेन च गुरु लघुविपाकप्रतिपादकेनेति ज्ञेयम् (च. द.)। गुरु-लघुविपाको मधुर-कटुकविपाका वित्यर्थः, "तयोर्मधुराख्यो गुरुः, कटुकाल्यो लघुः" इत्युक्तः । उक्तगुणौ "पृथिव्यलेजो-वाय्वाकाशाना द्वैविध्यं भवति" इत्यादिना मन्थेनोकगुणावित्यर्थः (हा.)॥ रसैरसौ तुल्यफलः॥ (अ. स. सू. अ. १७, अ. ह. सू. अ. ९). असौ विपाकः, रसैर्मधुराम्ल-कटुकैः, तुल्यफलः सदृशफलः। तेन मधुरस्य विपाकस्स ते गुणा ये मधुरस्य रसस्य, एवमम्ल-कटुकयोरपि (इन्दुः) । रसैजिहाविषयक मधुराम्ल-कटुकैः त्रिपाककालोपलभ्यो मधुराम्ल-कटुकलक्षणो यो रसो भवति असौ . 1 -- - पूर्वार्ध विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २४५ 'मुल्यफल: तुल्यं सदृशं फलं यस्य स तुल्यफल । एतदुक्त भवति-अभ्यवहतस्य मधुररसस्य जाठराग्निसंयोगाद् यद्रसान्तरं फलतया निष्पन्नं तद्रसः सदृशफलम् । फळग्रहणेनतत् प्रतिपादयति-फलोपममेव वृष्यादिलक्षणं कायं सहशं, न तु कुसुमोपमं देहालादनादिलक्षणं कार्यमिति । एवमम्लादीनामपि व्याख्येयम् (अ. द.)। नयाणां पाकानां लक्षणमाह-रसैरित्यादि । मसौ त्रिविधो विपाकः, ययावं रसः मधुराम्ल-कटुकैः, तुल्यफलः तुल्यकार्यों ज्ञेयः । मधुरस्य रसस्य कार्य दृष्ट्वा मधुरः पाको लक्षणीयः, एवमम्लस्याम्लः, कटुकस्य कटुकः (हे.)॥ कटुर्विपाकः शुक्रनो वद्धविड् वातलो लघुः । सादुर्गुरुः सृष्टमलो विपाकः कफ-शुक्रलः ॥ पाकोऽम्लः सृष्टविण्मूत्र पित्तकृच्छुक्रनुल्लघुः। (द्रव्यगुणसंग्रह) मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस निग्ध होनेसे वात, मूत्र और मल( पुरीष- विष्टा)को साफ लानेवाले हैं । कटु, तिक्त और कपाय ये तीन रस रूक्ष होनेसे वात, मूत्र और मलका कब्ज करनेवाले हैं। कटु विपाक शुक्रका क्षय करनेवाला, मल और मूत्रका कब्ज करनेवाला और वायुको उत्पन्न करनेवाला है। मधुर विपाक मल और मूत्रको साफ लानेवाला तथा कफ और शुक्रको बढ़ाने वाला है। अम्ल विपाक मल और मूत्रको साफ लानेवाला, शुक्रका क्षय करनेवाला और पित्त करनेवाला है। मधुर विपास गुरु और कटु तथा अम्ल विपाक लघु हैं (च.)। मधुर, अम्ल और कटु ये तीनों विपाक मधुर, अम्ल और कटु रसके तुल्य फलेवाले हैं (अ. ह.)। गुरु विपाक घात और पित्तका तथा लघु विपाक कफका नाश करनेवाला है। फफकी वृद्धि और मल तथा मूत्रके साफ आनेसे गुरु विपाकका अनुमान करना चाहिये । वायुकी वृद्धि (प्रकोप) होनेसे और मल तथा मूत्रके अवरोध( कब्जियत )से लघु विपाकका अनुमान करना चाहिये (सु.)। द्रव्यगुणवैशेप्याद्विपाकलक्षणस्याल्प-मध्य-मूयिष्ठत्वम्- विपाकलक्षणस्याल्प-मध्य-भूयिष्टतां प्रति । द्रव्याणां गुणवैशेष्यात्तत्र तत्रोपलक्षयेत् ॥ (च. सू. अ. २६)। संप्रति यथोक्तविपाकलक्षणानां द्रव्यभेदे कचिदल्पत्वं कचिन्मध्यत्वं कचिच्चों- स्कृष्टरवं यथा भवति तदाह-विपाक्त्यादि । विपाकलक्षणस्याल्प-मध्य-भूयिष्ठता- १ जैसे वनस्पतिजीवनका अन्तिम परिणाम फलोत्पत्ति होता है, इस प्रकार मुक्त भार और औपध द्रव्योंका अन्तिम परिणाम विपाक होता है। हेमाद्रि लिखते हैं कि-यहाँ तुल्य- गुण न लिखकर तुल्यफल लिखा है, इससे यह दिखलाया है कि रसोंके विपाकका परिणाम पुष्प जैसा देहाछादनादिलक्षण नहीं, किन्तु फल जैसा धृष्यत्वादिरूप होता है। . +- -- रा -- ។ - २४६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । मुपलक्षयेत् , प्रति प्रति व्याणां गुणवशेष्याद्धेतोरिन्ययः । एतेन, दयेगुण. वैशेप्य मधुरत्व-मधुरतरस्व-मधुरतमरवादि, तो खोधिपामानामापावादयो विशेषा भवन्तीत्युक्त भवति (च. द.)।xxx विपाकरमणम्प शुकहेस्पातिकमणः स्वल्प-मध्य-भूयिष्ठतां प्रतिद्रव्याणां गुणवदोप्याल्प-मध्य-श्रेष्टवाद तत्र तत्र विपाक- कर्मसु न्वल्प-मध्यम-श्रेपन्यमुपलक्षयेत् । तेन मधुररमनिपाको मधुरः महो विण्मूत्रमोसे कफ-शुक्रवृद्धी घ, लवणरसविपाको मधुरस्वल्पसृष्टरिणमूत्रः-पुर लचाल्पः; अन्लश्च मध्यमसृष्टविण्मूग्रः शुमनासनश्च मध्यमः; तिक-कद-कषावाना तिक्तरसविपाकः कटुरत्परूपेण गुम्दा पदविण्मूत्रो चावला, मटुरमविपाः कटुर्मध्यमरूपेण, कपायरसविपाकः कटुसत्तमरूपेणेति । एवं दयागां बेहनाक्ष्यादि. गुणवैशेप्यादल्प-मध्य-श्रेष्टवामुपलक्ष्य नूयात् (ग.)॥ द्रव्यगुणविशेषेण चात्याल्प-मध्य-भूयस्त्वमुपलक्षयेत् ॥ (स. न. . स. १५)। अस्य च विपाक्स खल्पस्वं मध्यत्वं भूयस्त्वं च दन्यगुणविशेषगोपनावेद । किमुकं भवति ? उच्चते-यत्र रसेन सदृशो विपाको मधुराम्त-कटुकानो प्रयाणां तत्र प्रधानरससमानगुणानामुस्कृष्टत्वाद्विपाकत्स्योत्कृष्टत्व कल्पनीयम् , एवं मामला न्मध्यं, स्वल्पस्वाय स्वल्पत्वम् । यत्र तु रसाद्विपरीतो मिपाको लवण-तिक-कराया तत्र रसविपरीतानां गुणानामुत्कृष्टस्वादुत्कृष्टत्वं फल्लयेद्विपाकसरतानामित्यर्थः। एवं मध्यत्वमल्पत्वं च विपाकस्य एवमूचुश्चरकविद. (इन्दुः) ॥ द्रव्योंके गुणोंके (रसोंके) मधुरस, मधुरतरत, मधुरतमत, अम्लत, सम्लवरल, अम्लतमल इत्यादि तारतम्य (न्यून-मध्य-अधिक) नेदसे विपाक्के लक्षणों( कार्यों )म भी न्यून (अल्प), मध्य और अधिकभाव जानना चाहिये । कविराज गहाधरजी कहते हैं कि-रसोंके श्रेष्ठल, मध्यस और अल्पलते विपाकका भी श्रेष्टत, मध्यत्व और अल्पस जानना चाहिये । जैसे-मधुर रसवाले मधुर द्रव्योंका मधुर विपाक मल-मूबी प्रवृत्ति तथा कफ और शुक्रकी वृद्धि में श्रेष्ठ होता है, लवण रसका नधुर विपाक मत- मूत्रकी प्रवृत्ति और कफ तथा शुल्की वृद्धि, अल्प होता है; अम्ल रसका अन्त विपाक मल-मूत्रकी प्रवृत्ति तथा कफ और शुक्रके नाश करने में मध्यम होता है; तिक रसका कटु विपाक मल-मूत्रके कब्ज करनेमें, शुक्रके नाश करनेमें और वायुको उत्पम करनेमें अल्प (हीन ) होता है, कह रसका कटु विपाक मल-मूत्रके क्ञ करनेने, शुक्रके नाश करनेमें तथा वायुको उत्पन्न करनेने मध्यम होता है; तथा कषाय रसन्न कटु विपाक मल-मूत्रको कन्ज करनेमें, वायुको उत्पन्न करनेमें और शुक्रका क्षय करने में श्रेष्ठ होता है । इस प्रकार द्रव्योंके स्नेह, रौक्ष्य आदि गुणोंकी विशेषता(तारतम्य )से विपाकके लक्षणोंका अल्पत, मध्यन और श्रेष्ठल जानना चाहिये। + पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः । २४७ । विपाकयोपियोसप्राप्तिहेतव द्रव्यप्रमाण-संस्कार-सात्म्याग्निवलावल-देश-काल-संयोग-पाक-विशे- विपाकविपर्यासः (र. वै. सू अ. ४,५५)॥ द्रव्यप्रमाणाद् विपर्यासः-गुरुविपाकं क्षीरमल्पं लघु पच्यते, लध्वतिप्रमाणाद् गुरु पच्यते, यथा-शालिरतिभुक्तः । संस्काराद्-गुरुविपाकं द्रव्यं दीपनीय- संस्कारालघुविपाकं भवति । सात्म्यत:-क्षीरोचितानां क्षीरं लघुविपाकं भवति । अग्निबलात्-तीक्ष्णानीनां गुरुविपाकं लघुविपाकं भवति । देशविशेपात्- जाङ्गलेपु गुरुविपाकाश्च लघवो भवन्ति प्रायशः, अनूपेषु लघुविपाकाश्च गुरुविपाका भवन्ति । कालविशेषात्-ग्रीष्मे लघवो भवन्ति गुरवः, वर्षा-हेमन्तयोलघवोऽपि गुरवः । संयोगविशेषात्-क्षीरं शुण्ठीसंयोगालघुविपाकं भवति । संस्कार- संयोगयोः कः पुनर्विशेष इति ? संस्कारो भावना-परिशोषण-मन्यनादि । पाकविशेषात्-दग्धं विदग्धं वा द्रव्यमुपयुक्तं गुरु विपच्यते लध्वपि, क्षीरं गुर्वपि शुवं लघु भवतीति (भा.)॥ द्रव्यका प्रमाण, सस्कार, सात्म्य, अग्निवल, देश, काल, संयोग और पाक (पकाना) इनके विशेषोंसे ( मेदोंसे ) विपाकमें विपर्यास (विपरीतपन ) होता है। इनके उदा- हरण-प्रमाणविशेषसे विपर्यास होता है, जैसे-गुरुविपाक दूध थोड़ा हो तो शीघ्र पचता है। संस्कारविशेषसे विपर्यास होता है, जैसे-गुरुविपाकवाला दूध दीपनीय द्रव्योंके सस्कारसे शीघ्र पचता है । सात्म्यसे विपर्यास होता है, जैसे-दूध जिनको सात्म्य है ऐसे बालकोंको शीघ्र पचता है । अग्निवलसे विपर्यास होता है, जैसे-तीक्ष्ण अग्निवालेको 'गुरुविपाकवाले द्रव्य शीघ्र पचते हैं। देशविशेषसे विपर्यास होता है, जैसे-जाङ्गलदेशमें 'गुरुविपाकवाले द्रव्य शीघ्र पचते हैं और अनूपदेशमें लघुविपाकवाले द्रव्य देरीसे पचते हैं । कालविशेषसे विपर्यास होता है, जैसे-वर्षा कालमें लघु द्रव्य देरीसे पचते हैं और हेमन्त ऋतुमें गुरु द्रव्य शीघ्र पचते हैं । सयोगविशेषसे विपर्यास होता है, जैसे-सोंठ मिलाया हुआ दूध गुरुविपाक होनेपर भी शीघ्र पचता है। पाकविशेषसे विपर्यास होता है, जैसे-जला हुआ या अधपका हुआ द्रव्य देरीसे पचता है और ठीक पकाया 'हुआ दूध शीघ्र पचता है। मुज्यमानानां द्रव्याणा विपाक. कदा उपलभ्यते-- xxxxxxx विपाकः कर्मनिष्ठया । (च सू. अ. २६)। कर्मनिष्ठयेति कर्मणो निष्ठा निष्पत्तिः कर्मनिष्ठा कर्मसमाप्तिः। रसोपयोगे सति योऽन्त्याहारपरिणामकृत, कर्मविशेषः कफ-शुक्राभिवृष्यादिलक्षणः, तेन विपाको निश्चीयते । एतेन विपाको नित्यपरोक्षः, तत्कार्येणानुमीयते । (च. द.)। तर्हि विपाकोऽपि वीर्य निपाते द्रव्याणां नोपलभ्यते, कथमुपलभ्यत इत्याह-विपाक: حمله -- २४८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कर्मनिष्ठयेति । द्रव्याणां भुकानां यावन्ति कर्माणि तावता कर्मणां निहया परिसमाझ्या विपाक उपलभ्यते (ग.)। विपाकः कर्मणः माहारपरिणामकृवस, निष्ठा निष्पत्तिः दोप-शुक्रवृद्धि-क्षयलक्षणा, तया उपलभ्यते (यो.)॥ (विद्याद् ) विपाकं द्रव्याणां कर्मणः परिनिष्ठया। (अ. सं. स. स. १७)। विपाकविशेष तु कर्मणः तत्कृतस्य परिनिष्टया निष्पत्तेः दोपवृद्धि-क्षयविशेषण विद्यात् (ई.)॥ खाए हुए द्रव्योंका जठराग्निके द्वारा परिपाक होनेके बाद रसोंका जो अन्तिम परिणाम (कफ-शुक्रवृद्धि आदि कार्य) होता है उससे विपाकका ज्ञान होता है। विपाक सर्वदा अप्रत्यक्ष होता है, कार्य देखकर उसका अनुमान किया जाता है। वक्तव्य-सुश्रुतसंहिता और रसवैशेषिकसूत्र देखनेसे मालूम होता है कि- प्राचीन समयमें आयुर्वेदमें (१) यथारसविपाक (रससरशविपाक); (२) अनवस्थित-अनियत-विपाक; (३) त्रिविध विपाक और (४) विविध विपाक ये चार मत प्रचलित थे । उनमेंसे यथारसविपाक अर्थात् मधुरादि छहों रसोंका अपने सदृश विपाक होता है अतः रसमेदसे छ प्रकारका विपाक होता है यह पनिपाकवाद और विपाककालमें दुर्वल रस वलवान् रसके अधीन होते हैं अतः अमुक रसका अमुक रसवाला विपाक होता है इस प्रकारका नियम न होनेसे विपाक अनियत है ऐसा अनवस्थितविपाकवाद, इन दोनों मतोंका तन्त्रकारों और टीका- कारोंने युक्तिपूर्वक खंडन किया है। शेष दो मतोंमेंसे एक मतमें मधुर, अम्ल ऐसे तीन प्रकारका विपाक होता है; यह आत्रेयसप्रदायके अग्निवेश, पराशर भादि आचार्योंका मत है । वृद्धवाग्भट और घाग्भट इस मतके अनुयायी हैं। इस मतको 'त्रिविधविपाकवाद' वा 'रसविपाकवाद' कह सकते हैं । क्योंकि ये छः रसोंकी मधुर, भम्ल और कटु इन तीन रसोंमें विपाक मानते हैं। दूसरा छहों रसोंके (रसवाले द्रव्योंके ) गुरु और लघु दो प्रकारके विपाक होते हैं ऐसा धन्वन्तरि सप्रदायवाले सुश्रुत और नागार्जुनका मत है । इस मतको 'द्विविध विपाकवाद' या 'गुणविपाकवाद' या नाम दे सकते हैं । इस सप्रदायवालोंने गुरुविपाकको मधुरविपाक और लघुविपाकको कटुविपाक ऐसे नाम दिये हैं, तथापि उनको रसविपाकवादी नहीं कह सकते । क्योंकि उन्होंने गुरु और लघु इन दो गुणोंमें मधुर और कटु शब्दका गौणरूपसे प्रयोग किया है। यह बात रस- वैशेषिकसूत्र और उसके भाष्यमें स्पष्टतया बताई गई है। यद्यपि आपातत. इन दोनों मोंमें विरोध मालूम होता है, परन्तु दोनों मतोंमें फलमें विरोध न होनेसे अर्थात दोनों मतोंमें विपाकोंका फल सदृश होनेसे फलमें अन्तर नहीं पाता । चरकने - और कटु । । । -- पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः। २४९ लिखा है कि-मधुर विपाक गुरु' है और कटु तथा अम्ल विपाक लघु है । गुरु- विपाकके जो गुण सुश्रुतने लिखे हैं वे सब मधुर विपाकमें तथा लघु विपाकके जो गुण सुश्रुतने लिखे हैं वे सब अम्ल और कटुविपाकमें पाये जाते हैं । अतः दोनों मतवादियोंकी विचारश्रेणी और शब्दप्रयोगमें ही अन्तर है, फलमें कोई भी अन्तर नहीं हैं। इति आचार्योंपाढेन त्रिविक्रमात्मजेन यादवशर्मणा विरचिते द्रव्यगुणविज्ञाने पूर्वार्धे विपाकविज्ञानीयो नाम चतुर्थोऽध्याय ॥ ४ ॥ - - द वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः। द्रव्य-गुण-रस-विपाकनिरूपणानन्तरं पारिशेप्यावीर्य-प्रभावविज्ञानीयोऽध्यायः प्रारभ्यते- अथातो वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामो यथो- चुरात्रेयधन्वन्तरिप्रभृतयः॥ द्रव्य, गुण, रस और विपाकके निरूपणके अनन्तर शेष रहे हुए वीर्य और प्रभावके निरूपणके लिये वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीय अध्यायका प्रारम्भ किया जाता है। वीर्यलक्षणं संख्या चxxx येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम् xxx॥ (च. सू. अ. २६; सु. सू. अ. ४१)। येनेति प्रभावेण, रसेन, वीर्येण, विपाकेन वा; अयं च वीर्यशब्दः पारिभापिक. वीर्यवचनो न भवति, किंतु शक्तिमात्रवचनः; यदुक्तं चरकेऽपि-"नावीर्य कुरुते किञ्चित् सर्वा चीर्यकृता क्रिया" (च. सू अ. २६) इति; तेन प्रभाव-रसादयः सर्व एव स्वकायं कुर्वन्तः शक्तिपर्यायरूपवीर्यवाच्या इति ज्ञेयाः (च. द.)॥ मृदु-तीक्ष्ण-गुरु-लघु-स्निग्ध-सक्षोष्ण-शीतलम् । वीर्यमष्टविधं केचित्, केचिद्विविधमास्थिताः॥ शीतोष्णमिति; वीर्यं तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्य कुरुते किंचित् सर्वा वीर्यकृता क्रिया ॥ (च. सू. अ. २६)। एकीयमतेन वीर्यलक्षणमाह-मृद्वित्यादि । एतच्चैकीयमतद्वयं पारिभापिकी वीर्यसंज्ञा पुरस्कृत्य प्रवृत्तम् । वैधके हि रस-विपाक-प्रभावव्यतिरिक्त प्रभूतकार्यकारिणि गुणे 'धीर्यम्' इति संज्ञा, तेनाष्टविधवीर्यवादिमते पिच्छिल-विशदादयो गुणा न रसादिविपरीतं कार्य प्रायः कुर्वन्ति, तेन तेपां रसाधुपदेशेनैव ग्रहणं, मृद्वादीनां तु रसाधभिभावकस्वमस्ति, यथा-पिप्पल्यां कटुरसकार्य पित्तकोपनमभिभूय वदते 4 २५० द्रव्यगुणविमानम् । मृदु-शीतवीर्य पित्तमेव शमयत इति, तथा कपाये निशानुरये महनि पामले तत्काय वातकोपनमभिभूगोष्णेन यीयण सदिगदं यातशमननेय क्रियते, तथा मधुरेऽपीक्षी शीतवीर्यत्वेन वातवृहिरिश्यादि । यदुवं सुश्रुते-"एनानि गत वीर्याणि स्वबलगुणोस्कोद्रसमभिभूयात्मकर्म दर्शयन्ति" (मु. म. म. ४९) इत्यादि । शीतोष्णवीर्यवादिमतं स्वप्नीपोमीयरवानगरः शीतोष्णगोरेव प्रापा- न्याज्ञेयम् । उक्त च-"नानारमकमपि द्रव्यमानीपोमा महायला । व्यकामा जगदिव नातिझामति जातचित्" (भ... स. स. ९) इति । एतन मन्यम प्याचार्यस्य परिभाषासिन्दमनुमतमेव, येनोत्तरा "रस-वीर्य-विपाकानां मामान्यं यत्र लक्ष्यते" (च.सू अ. २६) इत्यादा पारिभाषिकमेव वीर्य नियनि । पारिभाषिक वीर्यसज्ञापरित्यागेन तु शक्तिपर्यायस्य चीयस्य लक्षणमा-चीय वित्यादि । वीस- मिति शक्तिः । येनेति रसेन या, विपाकेन या, प्रभावेण वा, गुवांदि-परादिभिगुंजेवां, या क्रिया तर्पण प्रहादन-शमनादिरूपा फियते, तस्यां क्रियायां वदसादि वीर्यम् । अत एवोक्तं सुश्रुते-"येन कुर्वन्ति तवीर्यम्" (सु. सू. अ. ४०) इति । भौग लोकप्रसिद्धामुपपत्तिमाह-नावीर्यमित्यादि । अवीर्यन् , मरायमित्यर्थः । वीर्यकृतेति वीर्यवता कृता वीर्यकृता (च. द.)। सांप्रतं वीर्यमभिधीयते । तत्रादौ परेपी मतमाह-मृहित्यादि । केचित् मृदु, तीक्ष्णं, गुरु, लघु, निग्धं, स्क्षम्, रणं, शीतं च, इत्यष्टविधं वीर्यमाहु. । गुर्वादयोऽष्टी वीर्यमुच्यन्ते ते. ! गुर्वादीनामष्टानां वीर्यसंज्ञा, शक्तिमत्त्वात् ; मन्ये गुणास्तु गुणा एव, सामर्थ्यहीनत्वात् । केचित् शीतोष्णमिति द्विविध वीर्यमास्थिताः अग्नी-पोमात्मकस्वाजगतः केचित् शीतम् , उप्णम्, इति द्विविधं वीयं प्राहुः । ४ ४ ४ । स्वमतमाह- वीर्य विति । 'तु' पूर्वपक्षाद् व्यवच्छेदे । येन या क्रिया क्रियते तद्वीर्य, यद्योगात् क्रिया क्रियते द्रव्ये स्थितं तत् सर्व गुणजातं वीर्यमेव, येन कुर्वन्ति तद् वीर्यमिति । अवीर्य यन्न चीयं तन्न किंचित् कुरते न कांचिदयक्रियां निष्पादयति; यतः सर्वाः क्रिया वीर्येण कृता जनिता', तत. यन्न वीर्य तम किंचित कुरुते (यो.)। ननु नेहादयो गुणा किं कुर्वन्ति, कदा वेत्यत माह-मृद्वित्यादि । मृद्दादिकमष्टविध वीर्यमास्थिताः केचित् , अपरे केचिच्छीतोष्णमित्येव द्विविध वीर्यमास्थिता इति ।xxx। भत्र पिच्छिल-विशदौ न वीर्यसंयोचो, गुरु-लघु च वीर्यसंज्ञयोक्तौ; सुश्रुते(तु तौ) विपाकावुक्ताविति (पिच्छिलविशदौ वीर्यसंशयोक्ती तत्र)। स्वमतमाह-वीर्य वित्यादि । फियते येन या क्रिया तस्यां क्रियायां तस क्रियासाधनं वीयं भवति । तर्हि किं व्याणां गुणा कर्माणि च चिन्त्याचिन्त्यानि प्रभावाख्यानीति सर्व वीर्य भवति ? इत्यत माह-नावीर्यमित्यादि । किंचिदप्य- वीर्य वस्तु न किंचित् कर्म कुरुते । कस्मात् ? सर्वा क्रिया हि यस्माद्वीयकृता द्रव्येष्वारोप्यते । सुश्रुतेऽप्येव-"येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम्" (सु. सू. भ. ४०) . - पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २५१ इति । तथा द्विधा वीर्यमष्टधा वीयं चानयोयोर्मतेऽन्तर्भूतं भवति । ननु सुश्रुते चोक्त-"तद् द्रव्यमात्मना किंचित् किंचिद्वीर्येण सेवितम् । किंचिद्स-विपाकाभ्यां दोषं हन्ति करोति वा" (सु. सु. अ. ४०) इति, स्वयं चात्राध्याये पूर्वमुक्तं-"न तु द्रव्याणि गुणप्रभावादेव कार्मुकाणि भवन्ति । द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद् गुण- प्रभावाद्रव्यगुणप्रभावाय xxx येन कुर्वन्ति तद्वीय" इत्यादि । तत् कथं 'नावीर्य कुरुते किंचित् सर्वो वीर्यकृता हि सा' इति संगच्छते ? उच्यते-तद्व्यमात्मना किंचिदिति यदुक्कं तदारमना स्ववीर्येण प्रभावेणेति च द्रव्यस्य वीर्येणेति, ततो नानुपपत्तिः (ग.)। वीर्य शक्तिः, सा च पृथिव्यादीनां भूतानां यः सारभागस्त. दतिशयरूपा बोध्या; सा च द्विविधा-चिन्त्याचिन्त्यक्रियाहेतुत्वेन; तन चिन्त्य- क्रियाहेतुर्या द्रव्य-रसादीनां स्वस्वकर्मणि स्वभावसिद्धा शक्तिः, अचिन्त्यक्रियाहेतुश्च प्रभावापरपर्याया द्रव्याणां रसाधननुरूपकार्यकरणशक्तिः । उक्त च-"भूतप्रसादा- तिशयो द्रव्ये पाके रसे स्थितः। चिन्त्याचिन्त्यक्रियाहेतुर्वीय धन्वन्तरेर्मतम्" इति । एतेन द्रव्य-रस-विपाकानां स्वस्वकार्यकरणसामर्थ्य वीर्यमित्यर्थः । यत् पुनश्चरके- "वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया" (च. सू. स्था. अ. २६) इत्यनेन रसादीनामपि 'वीर्यस्वमुफ, तद्धर्म-धर्मिणोरमेदादेव समर्थनीयम् । न चैवं द्रव्यस्यापि वीर्यत्व- प्रसङ्गः, येनेति करणे तृतीया, करणस्यैव शक्तित्वात् , द्रव्यस्य च कर्तृत्वात् ; एतेन द्रव्यकर्तृके रसादिकरणके कार्ये रसादीनामपि वीर्यत्वमित्यर्थः । सुश्रुतेऽप्युक्तं- "येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम्" (सु. सू स्था म. ४१) इति । अत्र केचित्-ननु, यदि शक्तिरेव वीर्य न तर्हि शीतोष्णादिलक्षणम् , अथ शीतोष्णादिलक्षणं न तदा शविलक्षणमिति । सत्यं, परमार्थतः शक्तिरेव वीयं, सा पुनर्बलवक्रियानिर्वर्तनक्षमा रसादिनाऽयोगाग्निरुपाधिरिति तस्याः शीतोष्णादयो गुणा उपाधिस्वेनाङ्गीकृताः, ते तु द्रव्यसमवायिनो रसादिषु पुनरुपचरितवृत्तय इति । उक्तं च-"गुणाः कर्म- व्यवस्थाये दव्याणां रस-पाकयोः । शके: कर्मसु शका ये निरुपाधेरुपाधयः" इस्याहुः । यत् पुनः "मृदु-तीक्ष्ण-गुरु-लघु-निग्ध-रुक्षोष्ण-शीतलम् । वीर्यमष्टविध केचित् केचितिविधमास्थिताः ॥ शीतोष्णमिति" (च. सू. अ. २६) इति मतमेदेनाष्टविधं द्विविधं वा वीर्यमित्युकं चरकेण, तत् पारिभापिकवीर्यपुर- स्कारेण । प्रथमवादिमते शक्तिमात्रं वीर्य, तद्योगादसादीनामपि वीर्यसंज्ञा; पारि- भाषिकवीर्यवादिमते तु शक्तिविशेषो वीर्य, तद्योगान्मृदु-तीक्ष्णादीनामेव वीर्यसंज्ञा, नापरेषां गुणानामिति । शास्त्रे व्यवहारस्तु पारिभापिकवीर्यनयेनैवेति । भवन्ति चात्र-"शक्तिमानं तु वीर्य स्यादिति केचिद्धा विदुः । तन्मते द्रव्य-रसयोः पाकस्य च गुणस्य च ॥ मृद्वादेः स्वक्रियोल्पादे शकिर्वीर्यमिति स्थितिः । यदुक्तं चरके-“वीय क्रियते येन या क्रिया ॥ नावीयं कुरुते किंचित् , सर्वा वीर्यकृता क्रिया"। इत्यनेन रसादीनां वीर्यस्वं तदमेदतः ॥ मृद्वादयो गुणा यष्टौ वीर्याणी- । । - . २५२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । स्यूचिरे परे । यस्मात् सर्वगुणोत्कृष्टाः शक्रयुकपंयुता मी ॥ व्यवहारोपयुक्ताब नेदशास्त्वपरे गुणाः । तस्मान्न ते वीर्यसंज्ञा इति शास्त्रविदां मतम् ॥ मन्ये शीतोष्ण- भेदेन वीर्य द्विविधमूचिरे । अग्नी-पोममयं विश्वं यत एतबराचरम्" इति । xxx।(शि.)॥ वीर्य तु केचिद्गुरु-लघु-स्निग्ध-लक्ष-तीक्ष्ण-मन्द (मृ१) शीतोष्णमेदे- नाष्टविधमाहुः । अपरे पुनः पठन्ति- वीर्य द्रव्यस्य तज्ज्ञेयं यद्योगात् क्रियते किया। नावीर्य कुरुते किंचित् सर्वा वीर्यकृता हि सा॥ तैरपि चैवमतिप्रकृष्टशक्तियुक्तानामशेपौपधगुणसारभूतानामष्टाना- मेव गुर्वादीनां वीर्यसंज्ञा विशिष्टान्नायविहिताऽपि लौकिकीति समुद्भाव्यते, तथा हि तया रस-विपाक-गुणान्तरविजयिनो भूयांसश्च वरिष्ठाश्च गुणाः संगृहीताः। विशेपवृत्त्या च तत्र तत्र द्रव्यस्वरूपकथने व्यवहारः प्रवर्तितो भवति । अत एव सर्वातिशायी द्रव्यखभाव: 'प्रभाव' इत्यानातः । सत्यपि च क्रियानिर्वर्तनसामान्ये तद्विपरीता रसायो वीर्याख्यया प्रभावसंज्ञया वा न परामृश्यन्ते । अन्ये तु गुर्वा- दीनामग्नी-पोमात्मकत्वादादान-विसर्गविभागेन कालस्य चोष्ण-शीतात्म- कत्वाद् द्विविधमेवामनन्ति । एवं चाहुः- नानात्मकमपि द्रव्यमग्नी-पोमो महावलौ । व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिकामति जातुचित् ॥ गुर्वाद्या वीर्यमुच्यन्ते शक्तिमन्तोऽन्यथा गुणाः । परसामर्थ्यहीनत्वाहुणा एवेतरे गुणाः ॥ (अ. सं. सू. अ. १७)। केचिदाचार्या अष्टविधं गुर्वादिभेदेन वीर्यमाहुः, अन्ये बहुविधम् , अन्ये द्विविध मिति । ये तु बहुवीर्यवादिनस्ते पठन्ति-बीर्य द्रव्यस्येत्यादि । द्रव्यस्य वद्रीय शेयं यस्य योगाद्व्यं कार्य कर्तुं क्षमम् । न च द्रव्यमवीर्य वीर्येण विना किंचित् कर्म कुरुते, अतः सर्वाः क्रियाः वीर्यकृताः । एवं वीर्य शक्तिः कारणमिति बहुवीर्य- वादिनः । तैश्चानन्तरोक्तैर्नानाविधशक्तित्वाव्यस्य बहुवीर्यवादिभिर्वादीनामष्टानां वीर्यसंज्ञा विशिष्टागमविहिताऽपि लौकिकीति कथ्यते । यतः शक्तिर्वीर्य, सा घ नानाविधा, तद्गुर्वादीन को नियमयितुं शक्नोति, केवलं प्रकृष्टशक्तित्वादशेषाणामौषध- गुणानां मध्ये सारभूतत्वाल्लोके एव कथ्यन्तेऽष्टौ वीर्याणीति । अतो बहुवीर्यवादि- भिर्गुादिगुणनियम मागमविहितोऽपि लौकिक इति कथ्यते, एतदेवाह-तथेत्यादि । १ 'मपि' इति पा० । । .
पूर्वार्ध वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । -- २५३ सया वीर्यसंज्ञया रस-विपाक गुणान्तर-विजयिन एतेऽष्टाचेव गुणा संगृहीता भूयांसश्च परिधाश्च । तेनैतदुक्तं भवति-एपामष्टानामेव वीर्यसंज्ञा, भूयिष्ठत्वाद्वरिष्ठबादसादि- विजयित्वाचेति बहुवीर्यवादिभिरपि बलादमीकृवमेव । द्रव्ये हि न तथाऽन्ये गुणा प्रभूतस्येन भवन्ति यथा गुर्वादय इति प्रभूतत्वम् ; गन्ये च गुणा न तथा देहोप- योगित्वे वरा यथा गुर्वादय इति वरिष्ठत्वं; रसकार्य विपाककार्य गुणान्तरं च द्रव्यस्थितं चीयरवेनाभिभवन्तीति रसादिविजयित्वम् । तत्र रसविजयित्वं यथा- किंचिद्व्यं मधुररसं तीक्ष्णगुणं च, तन तीक्ष्णगुणेनोपलेपादि मधुरकार्यमभिभूयते, एवं विपाककायं गुणान्तरं च । एवं तेपां प्राधान्येन तत्र तत्र हरीतक्याविद्रव्य- स्वरूपकथने गुर्वादीनां विशेपवर्तित्वेन 'गुरु, लघु' इत्यादिव्यवहारः प्रवर्तितो भवति । एवमुरकृष्टा शक्तिर्वीर्यम् । अनयच युक्त्या यो द्रव्यस्य सर्वगुणातिशायी स्वभावः, स प्रभावशब्देनोकः । तेनैतदुक्तं भवति-यथैव गुदीना कार्यकर्तृत्वे प्राधान्यापेक्षया वीर्यस्य, तथैव गुर्वादीनामप्राधान्यापेक्षया कस्याश्चिच्छक्तेः सर्वाति- शायिस्वाद संज्ञा 'प्रभाव' इति । नहि तव्यतिरिक्तेपु रसादिपु कल्प्यमानेषु दृश्यते । मतः स्वमावविशेप एव स. । रसादयो रस-वीर्य-विपाक-गुणान्तराणि यद्यपि स्वां स्वां क्रियां कुर्वन्ति, तथापि गुर्वाद्युक्तप्रकारवैपरीस्मद् वीर्यसंज्ञया न परामृश्यन्ते । एवं बहुवीर्यवादिनामप्यष्टविधवीर्यवादित्वं युक्त्या साधित--तैरपीत्यादिना । भन्ये चीर्यद्वयवादिनः अग्नी-पोमात्मकस्वाद् गुणानां कालस्य चोपण-शीतद्वैविध्याद् द्विविधमेव वीर्यमुष्णं शीतं चेति वदन्ति । तथा हि गुर्वादीनां केचन सौम्याः, केचनानेयाः, महाभूतपरायत्तत्वाद्गुणानाम् । ते गुर्वादयो द्विविधे काले संभव- त्यादाने, विसर्गे च । तत्रादानकालभवानामानेयत्व गुर्वादीनां, विसर्गभवानां तु सौम्यरवमिति स्थितमेव । एतस्यैवानी-पोमात्मकत्वस्य तैदृष्टान्तोपपत्तिरुच्यते- नानात्मकमित्यादिना । नानात्मकं परस्परेण व्यावृत्तमपि द्रव्यजातं, महावलो उत्कृष्ट- माती, नातिकामति नातिवर्तते । अवश्यं किंचिदानेयं भवति, किंचित् सौम्यम् । दृष्टान्तो यथा-नानात्मकमपि जगद् व्यक्तमव्यक्तं च नातिकामति । व्यक्तं तरू 'पर्वत-जलादि, अव्यकं काल-भूतग्रामादि । अस्मिन् पक्षे पूर्वयोरपि पक्षयोरन्तर्भावः, विशेपस्य सामान्येऽन्तर्भावात् । पूर्वोका गुर्वाधा अष्टौ यदोस्कृष्टशक्तय. सन्तों द्रव्यं समधिशेरते तदा वीर्यशब्दवाच्याः, यदा उत्कृष्टशक्तियुक्ता न भवन्ति तदा सामान्य- गुणा एव । ये च गुर्वादिशिष्टा द्वादश गुणाः ते स्वभावेनैव परसामर्थ्यहीना उस्कृष्टशक्तिरहितास्त्रेऽपि सामान्यगुणशब्दवाच्याः, ते न कदाचिदपि वीर्याख्या लभन्ते (इन्दुः)॥ वीर्य पुनर्वदन्त्येके गुरु स्निग्धं हिमं मृदु । लघु रूक्षोण-तीक्ष्णं च तदेवं मतमधा । । - .
- २५४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । चरकस्त्वाह-वीर्य तत् क्रियते येन या क्रिया। नावीर्य कुरुते किंचित् सर्वा वीर्यकृता हि सा॥ गुर्वादिष्वेव वीर्याख्या तेनान्वर्थेति वर्ण्यते । समग्रगुणसारेषु शक्त्युत्कर्षविवर्तिपु ॥ व्यवहाराय मुख्यत्वाद्वग्रग्रहणादपि । अतश्च विपरीतत्वात् संभवत्यपि नैव सा॥ विवक्ष्यते रसायेषु, वीर्य गुर्वादयो ह्यतः। उष्णं शीतं द्विधैवान्ये वीर्यमाचक्षतेऽपि च ॥ नानात्मकमपि द्रव्यमग्नीषोमो महावलो। व्यक्ताव्यकं जगदिव नातिकामति जातुचित् ॥ (अ. ह. सू. अ. ९)। उष्ण-शीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्य द्विधा स्मृतम् । अ. स. सू. अ. १; अ. हृ. सू. अ. १)। अथ वीर्यस्य विपाकादिभ्यः"प्राधान्यात्तच्चा प्रस्तौति-वीर्यमित्यादि । वीर्य पुनर्गुदीनष्टौ गुणान् द्रव्याश्रितानिति समाचक्षते, तत् तस्मात् , एवमनेन प्रकारेण, वीर्यमष्टधा अष्टप्रकारम् , इति गुर्वादिवीर्यवादिनां मतम् । चरकाचार्यः पुनरेवं वकि- येन स्वभावेन या क्रिया क्रियते यत् कर्म निष्पाद्यते तद्वीर्यम् । तदेवं यावर्कि- चिद्गुणजातं द्रव्ये स्थितं तत् सर्व वीर्यमेव । सर्व वीर्य करोतीत्यत एवाह-नावीर्य- मित्यादि । यन्न वीर्य तन्न किंचित् करोति न कांचिदप्यर्थक्रियां निष्पादयति, प्रतिनियतशक्तिपरिश्वतत्वात् सर्वभावानाम् । अत एवाह-सर्वेत्यादि । 'हि' शम्दो यस्मादर्थे; यस्मात् सर्वा क्रिया वीर्यकृता वीर्येण जनिता, ततो या वीर्य तत्र किंचित् कुरुते । यतो वीर्यस्यैव करणसामर्थ्य तेन कारणेन गुर्वादिष्वेवाष्टासु वीर्याल्मा अन्वयेति अनुगतार्थेति भण्यते । एवकारोऽवधारणार्थः । गुर्वादिष्वेव वीर्यसंज्ञा, न तु रस-विपाक-प्रभावेषु मन्द-सान्द्रादिषु वा । किंभूतेषु गुर्वादिषु ? समप्रेत्यादि । समग्राश्च ते गुणाश्च तेषु साराः चिरकालावस्थितयो गुर्वादय एव, तथा च जठराग्नि संयोगेनापि न मधुरादिरसवत् स्वभावमेते जहति । सः ‘स स्थिरे' (पा. भ. २ १७) इति घनि सारशब्दः । तथा अन्येभ्यो मन्द-सान्द्रादिभ्यो गुणेभ्यो रसादिम्पो वा गुर्वादयः शक्त्युत्कर्षविवर्तिनः शक्तः सामर्थ्यस्य, उत्कर्षः भाधिक्यं, विशेषेण वर्गों विवर्तः विशेपेण भवनं, शक्त्युत्कर्षस्य विवर्तः, स विद्यते येषां त एवम् । गुर्वादीना गुणानां व्यवहाराय व्यवहारार्थम् , मुख्यत्वात् ; अन्येभ्यो गुणेभ्यो गुर्वादयः प्रधानभूता इत्यर्थः । तथा च "गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये" (भ... सू. अ. ९) इत्युक्तं, न मधुरादयो गुणा इति । तस्साद्गुर्वादीनां गुणानां अपहार - पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २५५ । मुस्यत्वं रसादिभ्यः । तथा, बाग्रहणात् बहुग्रहणादग्रग्रहणाच । बहवो द्रव्य- रसादयो गुर्वादिभिर्गृहीता भवन्ति । तथा चायुर्वेदशास्त्रेषु रसादिम्यो गुर्वादीनामने ग्रहणं दृष्टम् । यथा वातादिदोपगुणनिरूपणायां गुर्वादीनां पूर्व ग्रहण, न रसादीनाम् । तथा च "तत्र रूक्षो लघुः" (अ. ह. सू. स. १) इत्याचायोऽपठद्वाय्वादिलक्षणे । एवं गुर्वादीनामेवानग्रहणाद् गुर्चादिप्वेव वीर्याख्याऽन्वर्था भनुगतार्थेति भण्यते । । मतः असाच कारणकदम्बकात्, विपरीतस्वात् वैपरीत्येन स्थितत्वात् , न रसादयो वीर्यम् । तथा हि रसस्य सारत्वं नास्ति, जाठरानलसंयोगवशेन रसान्तरोत्पत्तेः गुर्वादीनां तु जाठराग्निसंयोगवशेनापि नान्यथाभावः । तथा च न रसस्य शक्त्यु- स्कर्पविवर्तित्वं, यतो रसस्य गुर्वाधाहितशक्तरेव स्वकर्मणि सामर्थ्यम् । व्यवहाराय यथा गुर्वादेर्मुख्यत्वं, यथा च वयग्रहणं, तथा प्राग्दर्शितम् । प्रभावः सर्वाति- शायी द्रव्यस्वभावः, तस्य च क्रियानिर्वतनसामान्ये सत्यपि वीर्यसंज्ञा पूर्वोक्ताद्धेवोर्न प्रवर्तते । एवं विपाक-कर्मणोरपि चिन्त्यम् । तस्मात् रसायेपु संभवत्यपि विद्यमानाऽपि, असद्रूपेव सा वीर्यसंज्ञा न विवक्ष्यते नोररीक्रियते । आदौ भवः आधः, दिगादित्वायत्; रस आयो येषां प्रभावादीनां, त एवं, तेषु । वीर्यमित्यादि । हिशब्दो यस्मादर्थे । यत एवं सा वीर्यसंज्ञा संभवत्यपि रसादिपु 'वैपरीत्यान्न विवक्ष्यवे, मतो गुर्वादय एव वीयं, न रसादयः । अन्ये आचार्या सणं, शीतमिति द्विप्रकारं वीर्यमाचक्षते । एवकारोऽवधारणार्थः । द्विधैव वीर्य, नाटधेति । अपिचेति निपातसमुदायो युक्तिसमुधये । तेऽपि सयुक्तिकमेवाहुरि- त्यर्थः । तामेव युकिं दर्शयन्नाह नानात्मकमपीत्यादि । नानास्वभावमपि द्रव्यं स्थावर-जगमाख्यं चेतनाचेतनम् , अग्नी-पोमा महाबली उत्कृष्टशक्ती, न जातु कदाचिदतिकामति नोल्लक्ष्य वर्तते, अवश्य हि द्रव्यं किञ्चिदाग्नेयं, किञ्चिरसौम्यम् । मत. किन्निद्रव्यमुष्णवीर्य, किनिच्छीतवीर्यम् । तथा च मुनिः(च. सू भ. २६)- "न मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहियात्; उभयं तिन्मधुरं मधुरविपार्क शीतोष्ण- स्वाद् विरुद्धवीर्य, विरुद्धवीर्यत्वाच्छोणितप्रदूपणाय" इति । अत्र दृष्टान्तमाह- व्यकाव्यकमित्यादि । व्यक्तं चाव्यक्तं च व्यकाव्यक्तं; नानात्मकमपि जगत् त्रैलोक्य कर्तृ, यथा व्यक्तं चाव्यक्त च नातिकामति, तथा द्रव्यमग्नी-पोमावित्यर्थः । व्यक्तं स्थूलं दृश्यमित्यर्थः; सामयानां तु महदादि व्यक्तम् , अव्यक्त प्रधानं पुरुषश्च (सू. अ. ९)। तत्र तस्मिन् द्रव्ये, वीयं द्विविधम् । विंशतेर्गुणानां मध्यावावुष्ण-शीती तदुस्कर्षा- द्वीर्यमिति सर्वायुर्वेदप्रसिद्धी । द्वावेव गुणा शीतोष्णौ वीर्यकरणहेतू । वीर्य शक्तिः। उष्णगुणोस्कर्ष उष्णगुणातिशय एव कश्चिदुष्णवीर्याख्यां लभते, तथा शीतगुणोरकर्षः शीतगुणातिशय एव शीतवीर्याख्याम् । यद्यपि नानात्मकमपि द्रव्यं, तथाऽप्यनी- पोमात्मकत्वाजगतो द्विधैव वीर्यम् (सू. अ. १) (अ. द.) । अथ वीर्य, तत्र परमत दर्शयति-वीर्य पुनरिति । एके खारणादिप्रभृतयः, गुर्वादीन गुणान् वीर्य -- ? २५६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । वदन्ति; एवं च तदष्टधा संमतम् । सुश्रुतस्तु गुरु-लघू विहाय विशद-पिच्छिली पठति-"केचिदष्टविधमाहुः-उण, शीतं, स्निग्धं, रूक्षं, विशदं, पिच्छिलं, मृदु, तीक्ष्णं चेति" (सु. सू. अ. ४०) इति । चरकमतं दर्शयति-चरकस्स्वाहेति । येन क्रियते तद् वीर्य, द्रव्यकर्तृके कर्मणि करणभूतमित्यर्थः । कतिविधं सदी इत्यपेक्षायामाह-या क्रियेति । या क्रिया येन क्रियते तस्यां तद्वीय, यावत्यः क्रियालावन्त्येव वीर्याणीत्यर्थः । कुत इत्याह-नावीर्यमिति । अवीयं द्रव्यं न किमित् कुरुते वीर्य विना कर्तृत्वं नास्तीत्यर्थः । कुतः ? इत्याह-सर्वा वीर्यकृता हि सा। हि यस्मात् सा क्रिया सर्वाऽपि वीर्यकृता । ननु, एवं रसादीनामपि वीर्यस्वप्रसंग इत्याह-गुर्वादिग्विति । तेन चरकेण गुर्वादिप्वेव वीर्याख्या वर्ण्यते । कुतः अन्वर्थेति कृत्वा । इतिशब्दो हेतौ । यतस्तेषु क्रियमाणा वीर्यसंज्ञा अन्वर्था स्यात् । भन्वर्थ स्वमेव दर्शयति-समग्रेत्यादि । करणं हि वीर्य, करणं च साधकतम, साधकतमत्वं च गुर्वादीनामेव । कुतः ? समग्रगुणसारत्वात् समग्रेषु गुणेषु मध्ये सारत्वात् चिरस्थायित्वात् ; शक्त्युत्कर्षविवर्तनात् उत्कृष्टशक्तिस्वात् ; व्यव- हाराय मुरयत्वात् लोके शास्त्रे च मुख्यत्वेन व्यवहियमाणत्वात्; बह्वप्रग्रहणात् बहुगुणगणनायां प्रथमग्रहणात् । विपाकेऽपि स्थिरत्वस्य, प्रभावेऽपि शक्त्युत्कर्षस्य, मृदु-कठिनादावपि व्यवहारमुख्यत्वस्य, रसेप्वपि बह्वग्रग्रहणस्य दर्शनात् चतुर्णामु- पादानम् । एतच्च रसादिपु नास्तीति दर्शयति-अतश्चेति । सा वीर्याख्या, रसादिषु संभवत्यपि विद्यमानाऽपि, न विवक्ष्यते, 'अनुदरा कन्या' इतिवत् । क्रियानिर्वर्तन- सामान्यात् सत्यपि वीर्यत्वे रसादयो वीर्यत्वेन न व्यवहियन्त, इत्यर्थः। कुतः अतः हेतुचतुष्टयाद् विपरीतत्वात् । सिद्धमर्थमनुवदति-वीर्यमिति । हि स्फुटम् । अतः कारणात्, गुर्वादय एव वीर्यम् । गुर्वादीनामष्टानां योगरूढा वीर्यसंडेति भावः । पूर्वमतापरितोषान्मतान्तर दर्शयति-उष्णं शीतमिति । अन्ये सुश्रुतादयः, उणं शीवं चेति द्विविधमेव वीर्यमाचक्षते वदन्ति । उक्तमतस्योपपतिमाह- अपि च नानात्मकमिति । न केवलं मतमात्रमिदं, युक्तं चेदं पूर्वमान्मवाद, इति अपिचेत्यस्यार्थ. । नानात्मकमपि पृथिव्यायनेककारणमपि, द्रव्यमानी-घोमौ जातुचित् कदाचिदपि, नातिकामति तयोर्वशे वर्तते; किञ्चिदाग्नेयत्वादुष्णं, किमि सौम्यत्वाच्छीतमिति द्विधैव गतिरित्यर्थः । कुत.? यतस्तौ महावको, भव एवं सर्वान् गुणान् गुर्वादयोऽभिभवन्ति, गुर्वादीनप्युष्ण-शीतौ । भन्न दृष्टान्तमाह-यमा विश्वं कर्तृ व्यक्ताव्यक्ताख्यभेदद्वयं नातिकामति । वीर्यद्वैविध्यमाह-उष्णेत्यादि । तर उणं, शीतं च । ननु गुरु-लघु-स्निग्ध-रुक्ष-मन्द-(मृदु)तीक्ष्णानामपि वीर्यस्वात कथं द्वे एवेत्यत आह-उष्ण-शीतगुणोस्कर्षात् । यद्यपि कायामिपाकावष्टौ गुणा जायन्ते, तथाऽप्युष्ण-शीक्योर्गुणयोस्कर्पाद् द्वैविध्यम् । गुणान्तरतिरस्कारे शनि पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः। २५७ रुस्कर्षः । शक्त्युत्कर्षे वीर्यशब्दो लोकेऽपि प्रसिद्धः । तत्र द्रव्ये वीर्यमपि द्रव्याश्रय- मित्यर्थः (हे.)॥ द्रव्यगुणशास्त्रमें 'वीर्य'शब्दका दो अर्थोम प्रयोग किया गया है। एक द्रव्यकी शक्ति- रूप वीर्यके अर्थम और दूसरा पारिभापिक वीर्यके अर्थम । टीकाकारोंने द्रव्यगत शक्तिको वीर्य माननेवालोंको शक्तिरूपवीर्यवादी और पारिभाषिक वीर्य माननेवालों को पारिभापिकवीर्यवादी ये नाम दिये हैं । शक्तिरूपवीर्यवादियों का कथन है कि- संसारमें सव कार्य शक्तिसे ही होते है, कोई भी कार्य शकिके विना सपन्न नहीं होता, अत द्रव्यगत जिस कार्यकारिणी शक्केि द्वारा शरीरके ऊपर कुछ भी कार्य होता है उस शक्तिको, वह चाहे द्रव्यखभाव( द्रव्योंकी पार्थिव-आप्य आदि पाश्चभौतिक रचना)- रूप हो, रसरूप हो, विपाकरूप हो या शीतोष्णादिगुणरूप हो, वीर्य कहते हैं । इस मतमें द्रव्यस्वभाव, रस, गुण या विपाक जो भी शरीरमें क्रिया करनेवाली शक्तिसे सपन्न हो, वीर्य कहा जाता है । दूसरे पारिभापिकवीर्यवादियोंका कहना है कि-द्रव्यखभाव, रस, गुण और विपाक इनका आयुर्वेदमें खतन्त्र वर्णन और विचार किया ही गया है, अतः इनके अतिरिक्त उत्कृष्टशक्तिसपन्न और प्रभूत-विशेष कार्य करनेवाले गुर्वादि गुणोंको ही वीर्यसंज्ञा देना उचित है । इन पारिभापिकवीर्यवादियों में भी दो पक्ष है-एक अष्टविधवीर्यवादी और दूसरा द्विविधवीर्यवादी । अष्टविधवीर्यवादी कहते हैं कि-गुरु, निग्ध, शीत, मृदु, लघु, रूक्ष, उष्ण और तीक्ष्ण ये आठ गुण समप्र गुणों में साररूप अर्थात् चिरस्थायी है, अन्य गुणोंसे उत्कृष्टशक्तिवाले हैं, लोक और शास्त्र में मुख्यतया इनसे व्यवहार होता है, अनेक गुणोंकी गणनामें गुर्वादि गुणोंकी पहले गणना है, रस-विपाक और अन्य गुणोंका पराभव करके अपना कार्य करनेवाले हैं, अन्य गुणों की अपेक्षया द्रव्यों में अधिकतासे रहनेवाले हैं और देहोपयोगिसमें श्रेष्ठ हैं, इसलिये गुर्वादि आठ गुणोंमें ही 'वीर्य'-सज्ञा सार्थक है । गुर्वादि आठ गुण जव उत्कृष्ट शक्तिसपन्न होकर द्रव्यमें रहते हैं तब उनको 'वीर्य' कहा जाता है, परंतु जब वे उत्कृष्ट शत्तिसपन्न नहीं होते तव 'सामान्य गुण' ही कहे जाते हैं । अवशिष्ट वारह १ शक्तिरूपवीर्यवादीको 'बहुवीर्यवादी' ऐसा नाम अष्टासंग्रहके व्याख्याकार इन्दुने दिया है। २ जठरानिके योगसे मधुरादि रस-गुण अपने स्वभावको छोड कर अन्यथाभावको प्राप्त होते है, परतु गुर्वादि गुण अपने स्वभावको नहीं छोडते, इसलिये सय गुणोंमें साररूप-चिरस्थायी है। जैसे-"गुर्वादयो गुणा द्रव्ये"(च. सू म. २६ ) इत्यादि स्थलोंमें गुर्वादिका ही ग्रहण किया गया है। ४ जैसे-वातगुणोंमें कहा गया है.-"तत्र स्क्षो लघु• शीत" (च. सू अ. १) इत्यादि । विपाकमें चिरस्थायित्व, प्रभावमें शत्त्युत्कर्यत्व, कठिनादिमें व्यवहारमुख्यत्व और रसोंमें वाहग्रग्रहण ये बातें हैं, अत. उनकी व्यावृत्तिके लिये यहां चारों हेतु एकसाथ दिये गये है। द.पू. १७ -- ३ २५८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । गुण उत्कृष्ट शक्तिरहित होनेसे सामान्यतया 'गुण' ही कहलाते हैं । पूर्वोक्त हेतुओंसे रसादिमें भी क्रिया करनेका सामर्थ्य होनेसे वीर्य संज्ञाका संभव है, तथाऽपि उनमें ऊपर कहे सव लक्षण नहीं पाये जाते, अतः उनको वीर्यसंज्ञा नहीं दी जाती । द्विविधवीर्यवारी कहते हैं कि-यद्यपि जगत्में सव द्रव्य पाचभौतिक हैं, तथाऽपि पचमहाभूतोंमें अनि और सोम (जल ) महाबलवान् होनेसे सब द्रव्योपर उनका प्रभाव विशेषतया पड़ता है और काल भी आदान ( आग्नेय ) और विसर्ग ( सौम्य ) मेदसे दो प्रकारका है, अतः अग्निगुणप्रधान उष्ण और सोम( जल )गुणप्रधान शीत ऐसे दो प्रकारका वीर्य मानना उचित है। सुश्रुतमतेन वीर्यनिरूपणम्- नेत्याहुरन्ये, वीर्य प्रधानमिति । कस्मात् ? तद्वनौषधकर्मनिष्पत्तेः। इहौषधकर्माण्यूाधोभागोभयभागसंशोधन-संशमन-सांग्राहिकाग्नि- दीपन-पीडन-लेखन-बृंहण-रसायन-वाजीकरण-श्वयथुकरविलयन-दहन दारण-मादन-प्राणघ्न-विषप्रशमनादीनि वीर्यप्राधान्याद्भवन्ति । तच वीर्य द्विविधम्-उष्णं,शीतंच,अग्नी-पोमीयत्वाजगतः केचिदष्टविधमाहुः- शीतम् , उष्णं, स्निग्धं, रूक्षं, विशदं', पिच्छिलं, मृदु, तीक्ष्णं चेति । एतानि खलु वीर्याणि खवलगुणोत्कर्षाद्रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति । यथा तावन्महत्पञ्चमूलं कपायं तिक्तानुरसं वातं शमयति, उष्णवीर्य- त्वात् तथा कुलत्थ. कषायः, कटुकः पलाण्डुः, स्नेहभावाच; मधुरश्चे. क्षुरसो वातं वर्धयति, शीतवीर्यत्वात् , कटुका पिप्पली पित्तं शमयति, मृदु-शीतवीर्यत्वात्; अम्लमामलकं लवणं सैन्धवं च तिका काकमाची पित्तं वर्धयति, उष्णवीर्यत्वात्। मधुरा मत्स्याश्च; कटुकं मूलक श्लेष्माणं वर्धयति, स्निग्धवीर्यत्वात् ; अम्लं कपित्थं श्लेष्माणं शमयति, रूक्षवीर्यत्वात् ; मधुरं क्षौद्रं च, तदेतन्निदर्शनमात्रमुकम् ॥ भवन्ति चात्र- ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेपु वै । रौक्ष्य-लाघव-शैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ॥ ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु वै । तैक्ष्ण्योष्ण्य-लघुताश्चैव न ते तत्कर्मकारिणः ॥ ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु वै। स्नेह-गौरव-शैत्यानि न ते तत्कर्मकारिणः॥ १ 'प्राधान्यात्' इति च. द.। २ 'गुरु, लघु' इति हाराणचन्द्रसंमतः पाठः । अत्र विशेषस्तदीयटीकायामग्रे समुद्धृतायां द्रष्टव्यः ।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पश्चमोऽध्यायः । २५९ तस्माद्वीर्य प्रधानमिति (सु. सू. अ. ४०)॥ अपरेषां वीर्यवादिनां मतं निर्दिशमाह-नेत्याहुरन्ये इत्यादि । ईदृशमन्ये न अवन्ति । तद्वशेनेति वीर्यवशेन । कानि पुनस्तान्यौपधकर्माणीत्याह-इहौपधेत्यादि । संशोधनं व्रणादीनां; संशमनमिति वमन-विरेचनादिकं विना तरस्थमेव शमयति संशमनं, संशमनभेदा एव सामाहिकादयः; पीढनमिति शाल्मलीत्वगादीनां व्रणे कर्मविशेषः; लेखनं पत्तलीकरणं, वृंहणं शरीरवृद्धिकर; रसायनं वयःस्थापनादि- करण; वाजीकरण वाजिवद्येनाप्रतिहतः स्त्रियं याति, अन्ये तु वाजिशब्देन शुक्रमुच्यते १ चीय प्रधानमित्येके, वीर्यप्राधान्याद् द्रव्याणाम्--(र. वै. भ. १, सू. १३०)। द्रव्याण्यपि वीर्यविशिष्टानि प्रधानानि भवन्ति यस्मात् तस्माद् वीर्य प्रधानमित्येके, निर्याणि परित्यजन्तीति (भा.)। किञ्चान्यत् तेन कर्मकरणात् (मु. १३१)।- तेन वीर्येण, कर्म ईप्सित फल, तस्य करणात् साधनात् , "सर्वा वीर्यकृता क्रिया" (च. सू. म. २६) इति वचनात् (भा) । किंच, अचिन्त्यत्वात् (सू. १३२ )।- अपरीक्ष्यत्वाच्चानेन प्रकारेण भविष्यतीति, भूतसमुदय गुणसमुदय वाऽऽश्रित्य चिन्तयितु न शक्यते इति । यथा--अन्तर्धानादिष्वचिन्त्यत्वात् प्रधानो विष्णु. (भा.)।xx दैव- प्रतीघातात् (सू १३३ ) ।-दैव राक्षस-पिशाचादि वीर्येण प्रतिहन्यते, न रसादिभिरिति रक्षोनान्यौपधानि दृश्यन्त इति । उक्त हि-"वर्जयन्ति यथाऽरण्य ससिंह मृगपक्षिण । वर्जयन्ति ग्रहास्तद्वत् सौपधं सूतिकागृहम्" इति (भा.) । xx विपप्रतीघातात् (सू १३४) । विप हि स्थावर-जगमात्मक सर्व वीर्येण प्रतिहन्यते । "तेन कर्मकरणाव" इत्यनेनैव सिद्धे ननु आम (१), तथाऽपि सिद्धिदर्शनार्थमन्यपदार्थेभ्य इति न दोष. (मा.)। दर्शनाच्छ्रवणात् (सू १३५)।-एव च विषप्रतीघातादित्यर्थ । तत् सर्व दुन्दुभिध्वनीये कल्पे द्रष्टव्य-"वेन दुन्दुमिमालिम्पेत् पताकास्तोरणानि च" (सु. क. अ ३) इत्यादीति (भा.) । किञ्च तुल्यरस-गुणेषु विशेषात् (सू. १३६) ।--तुल्यरसेपु तुल्यगुणेपु विशेषो दृश्यते-तिक शीतो मृदुर्लघु पिचुमन्द कुछ जयति, तादृश. कदक सदधाति पकातीसारम् । एव विशेपदर्शनाद् द्रव्य-रस-गुणविशिष्टमस्ति प्रधानमृत वीर्य, तस्याधि- ठानमान खल्विमे द्रव्यादय इति जानीम (भा.)। किञ्च, सयोगात् तनिवृत्तेः (सू. १३८)।-द्रव्यादीना संयोगे सति तत्तद्रव्यादिशक्तिविपरीत शक्त्यन्तरमुत्पद्यते । तस्सा- देभ्यो विशिष्टमर्थनिर्वतक वीर्यमस्तीति विशायते । यथा--मधु-वृतयोस्तुल्यधृतयो संयोगाज्जीवन- वृहण-लेखन-सधानादिकार्यविपरीतफल वीर्य दृष्टमिति (भा )। किञ्च, दर्शनाच्याद्भुतादीनां कर्मणाम् (सू १३९)।-अद्भुतानि कर्माणि दृश्यन्ते वीर्यकृतानि । यथा-मायाकारा येन केनौपधेन लिप्त हस्तिन पद्म वा विसृजन्ति, भूमिमस्पृशन्तस्तिष्ठन्तीत्येवमादय (भा.)। आगमाघ (सू. १४०)।-शास्त्रादायुर्वेदादिति । यथा-'वीर्यत कार्यसामर्थ्य द्रव्याणा भिपजो विदु." इति (भा.)। , २६० द्रव्यगुणविज्ञानम् । .. ततोऽवाजिनो वाजिनः फ्रियन्ते येनेति पाजीकरणं, शुक्रोरपाटफमित्या भाकर- विलयनेति कर-विलयनशब्दा धयधुशब्देन सह प्रत्येक संयध्येते, प्रयधुपर-विम्वन' इत्येके पठन्ति, दहनं क्षारादिना; दारणं गृध्रपुरीपादिना, मादनं मत्तताकरणम् , एतच्च मदिरादीनां कर्म; प्राणघ्नत्यं विपादेः; विपशमनस्वमगटादीनां विषयम- मनादीनीत्यत्रादिशब्देन व्रणरोपणमसंजननादयो गृयन्ते । स्वबलगुणोरकपादिति स्वबलोत्कर्षात् , स्वगुणोरकांधेत्यर्थः । आत्मकर्म कुर्वन्ति वातादिदोपशमनं, कोपन वा कुर्वन्ति । अभिभूय निराकरण कृरवेत्यर्थः । स्नेहभावार्थत्यत्रापि पावं शमवतांति योज्यम् । मधुरश्चक्षुरस इत्यादि न केवलं चात न शमयति, बीय रसममिभूर प्रकोपयत्यपि वातमित्यर्थः । कटुका पिप्पलीत्यादि भत्रार्दा पिप्पली यदि गृमते तदा तस्याः स्वादु-गीतस्वात् कटुकेति विशेषणं युकं न स्यात् । मय शुष्का, सवा तसार कटप्णत्वात् पित्तं हन्तीति विशेषणमयुकं भवेत् ; सत्यं, "तेपु गुर्वी स्वादु-शीता पिया ल्यादां कफावहा" (सु.सू.अ. ४६) इत्यत्र पाठे शीसा घेति चकारो द्रष्टव्यः, तेन न केवलं शीता कटुका चेत्यर्थ., ततो नाईपक्षे दोप., शुप्फपसे "शुष्का कफानिलागी सा वृप्या पित्ताविरोधिनी" (सु. सू. भ. ४६) इत्या पित्तेन सहेपविरोधिनीति व्याख्यानाप्न दोपः; केपाचिन्मते 'पित्तप्रसादनी' इति पाठः, तेषां मते पित्तमम नीयत्वं पिप्पल्या घीर्यवादिनां मत, न पुनः सत्यमेपा पित्तं शमयति महिमा मार्दा पित्तप्रशमनी, शुप्का प्रकोपणीति । भम्लमामलकं लवणं सैन्भवं बेस्यत्रापि मृदु-शीतवीर्यस्वात् पित्तं शमयतीति योज्यम् । ति का काकमाचीत्यादि पित्तं वर्षमति केवलं न तु प्रकोपयति, तस्याखिदोपनीत्वात् । मन्ये चात्रैवं वदन्ति-वीर्यवादी एवमुप्णां कार्कमाची मन्यते, माचार्यस्तु नारयुष्णशीवाम् , अत एव त्रिदोषनील काकमाच्या इति । मधुरा मरस्यायेत्यत्रापि पित्त वर्धयन्तीति योज्यम् । मूक बृहन्मूलकं; न पुनर्वालकं, त्रिदोपनत्वात् , । द्रव्याधितं वीर्यकर्माभिभाय रसामित वीर्यकर्माह-भवन्ति चात्रेत्यादि । ये रसा वातशमना मधुराम्ल-लवणाः, ये रसा पित्तशमना मधुर-तिक्त-कपाया:, ये रसा. श्लेप्मशमनाः कटु-तिक कपामाः (ड.)। वीर्यप्राधान्यवादिमतमाह-नेत्याहुरन्य इत्यादि । प्राधान्यादिति प्रधानभर्मयोगार, प्रधानधर्मश्च वीर्यवशेनौषधानां कार्यनिप्पादकत्वम् । एतदेवाह-इहौषधेत्यादि । औषधकर्माणीति औपधकार्याणि । तान्यौपधकार्याण्याह-तद्यथोर्चेत्यादि । अर्थ: भागादिभिः संशोधनशब्दः प्रत्येकमभिसंवध्यते, किवा संशोधन बहिःसंशोधन व्रणसशोधनादि गृह्यते ।xxx। मादिशब्देन पाचन-विरूक्षण-नेहनादिग्रहणम् । अन्न च वीर्यशब्देन द्रव्यस्य द्विविधाऽपि चिन्त्या अचिन्त्या च शक्तिरुप्यते । तर चिन्त्या शक्तिर्या तन्नान्तरे 'प्रभाव' इत्युच्यते सा ग्राह्या, तस्यैव च वीर्यस्य प्रभावा ख्यस्य स्वतन्ने "तद्रव्यमात्मना किंचित्" (सु सू. अ. ४०) इत्यादिना निष्क द्रव्यप्रकारतयोक्तस्य एतदधोभागहरत्व-विषहरस्व-वृष्यत्वादि प्रायः कार्य, महीदमुन्न 1 पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । - शीताम्यां वीर्याभ्यामष्टाभिवोष्णादिभियरुपपद्यते कार्य; तन्त्रान्तरेऽपि---"का. नुलोमिकं यक्ष प्रभावस्तन कारणम्" (च. सू. अ. २६), तथा--"विषं विपात- मुकं यत् तत् प्रभावप्रभावितम्", तथा "रस-वीर्य-विपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते। विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तत्र कारणम् । कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णचित्रको मतः । तद्वदन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम्" (च. सू. भ. २६), तथा- "मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् । तत् प्रभावकृतं विद्यात् प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते" (च. सू. भ. २६) इति । चिन्त्या तु शक्किदव्यस्य रसाः, तथा वीर्याख्या उष्णादयो गुणाः । तत्र रसस्य विपाकस्य च पृथनिर्देशान्न वीर्यव्यवहारः शास्त्रे, परिमाण-संख्यादयश्च गुणा न शास्त्रे तथा कार्यकरा इति नेह पृथक्त्वेन द्रव्य-रसादि- गणनायो गण्यन्ते; चरके तु सामान्यवीर्यशब्देन तेऽपि गृहीताः; यथा--"येन कुर्वन्ति तवीर्यम्" (च. सू. भ. २६) इत्यनेन चिन्त्याचिन्त्यवीर्यम् । चिन्त्यायां वैद्यसंप्रदायेन शीतोष्णलक्षणं द्विविधम् , अष्टविधं वा उष्ण-शीत स्निग्ध-रूक्ष-मृदु- तीक्ष्ण-विशद-पिच्छिलरूपमुच्यते । यदा द्विविधं वीर्य, तदा स्निग्ध-रुक्षादीनां पण्णामपि परिणाम-संख्यादिवदप्राधान्यविवक्षया रसादिधर्मवयैव कार्यग्रहणम् । वक्ष्यति हि-"मधुरो रसः सिग्धः" (सू. म. ४२) इत्यादि । भष्टविध- वीर्यपक्षे तु उष्णादीनां सर्वेषामेव बलवत्कार्यकर्तृत्वविवक्षया वीर्यस्वमिति स्थितिः। संप्रति शास्त्रे व्यवहारसिद्धमेव वीर्य विवेचयमाह-तद्वीर्यमित्यादि । अग्नी-पोमीयस्वादिति अमी-पोमप्रधानस्वात् । कथमेतान्युष्णत्वादीनि वीर्याख्या- नीस्याह-एतानि खल्वित्यादि । स्वबलगुणोत्कादिति बलं शक्तिः, स एव गुणः, प्रशस्तत्वात ; स्वशक्तिरूपगुणोत्कर्षादुष्णादीनि रसमभिभूय स्वकार्य कुर्वन्ति । एतानि -धीर्याणि रसमभिभूय स्वकार्य दर्शयन्तीत्याह-यथा महदित्यादि । अत्र कषाय- तिकत्वाभ्यां वात्रकोपनं प्रायं, तत्र स्वकार्यमभिभूय उणेन वीर्येण तद्विरुद्ध वातप्रशमनमेव क्रियते; अनया दिशा उदाहरणान्तराण्यपि व्याख्येयानि । पिप्पल्याः शीतवीर्यस्वमिहाप्याचार्यण स्वीकृतमेव । येन "तेपु गुर्वी स्वादु-शीता पिप्यल्याः कफावहा । शुष्का कफानिलहरी वृष्या पित्ताविरोधिनी" (सु.सू. अ.४६) इत्यनेन पित्ते ईषद्विरोधिनीतीपदर्थेन नना उक्तं तेन पित्तं स्त्रोकं क्रमेण शमयतीत्यर्थ. । चरके तु "पिप्पल्यः कटुकाः सत्यो मधुरविपाकाः" (च. वि. भ. १) इत्यादिना मधुरविपाकतया भन्यन्तरेण शीतवीर्य पित्ते मैनाक्शमनस्वं स्वीकृतमेव, वैद्याश्च पित्ते पिप्पलीप्रयोग कारयन्त्येव । काकमाच्यास्तु पित्तकर्तृत्वं वीर्यवादिमतमेव परं, नाचार्यमतमिति अवते; येन "ईपत्तिक त्रिदोषघ्न काकमाच्याश्च तद्विधम्" (सु. सू. अ. ४६) इत्यनेन त्रिदोषघ्नत्वानायुष्ण-शीतत्वाय काकमाच्याः पित्तजनक- स्वानुपपत्तेः । तथा चरकेऽपि-"त्रिदोपशमनी वृष्या काकमाची रसायनी । १ पित्तस्य नाशकत्व' इति पा० ।
२६२ दव्यगुणविज्ञानम् । नात्युप्ण-गीता स्वर्या च मेदनी कुष्टनाशनी" (च. सू.स. २७) इति पठ्यते । मन्ये तु वदन्ति यत्-समुदितान् त्रीन् दोपानाचार्यवचनात् काकमाची इन्ति, पृथक् तु काकमाची पित्तं जनयत्येवेत्यविरोध मन्यन्ते । अन्ये तु काकमाचीशाके त्रिदोपतत्वादिगुणं भवतु, मूलं तु तस्या उष्णवीर्यत्वात् पित्तकरमिति व्यवस्था वदन्ति । कटुकं मूलकमित्यादिना वृद्ध मूलकमुच्यते, बालमूलकस्स विदोपहरस्वात् । - यदुकं-"कटु-तिक्तरसा हृद्या रोचनी वह्निदीपनी । सर्वदोपहरी सम्वी काव्या मूलकपोतिका" (सु.सू.अ.४६) इति । संप्रति सामान्येन रसामिभावकावं वीर्यस श्लोकराह-ये रसा इत्यादि । ये रमा वावशमना इति मधुराम्ल-लवणा:, पित. शमना मधुर-तिक्त-कपायाः, एवं श्लेप्मशमना कटु-तिक-कपाया ज्ञेयाः । एतच्लोक त्रयार्थप्रतिपादितार्थस्य च यत्र तु कचिदन्यथात्वं भवति, वत्र द्रव्यादिमहिमा अपवादरूपं भवतीति नास्यार्थस्य व्यभिचारः; कचिदनापत्वमस्य शेकत्रयस्य वर्णनीयमुपपादितम् । वीर्यप्राधान्यमुपसंहरति-तस्मादित्यादि । (च. द.)। xxx वीयं नाम तद् येन रसं विपाकं चामिभूय कर्म क्रियते इति नित्रीयते, "रसं विपाकस्तौ वीर्य, प्रभावखान्यपोहति" (च.सू. म. २६) इत्यानेयानुशासनाद; वदिदमुच्यते-तद्वशेनेति । कानि पुनस्वानि कर्माणीत्याह-इहेत्यादि । संग्राहकमत्र संग्राहित्वं, यथा "अविवेक्यादेः सिदि." (का. १४) इति सांख्यकारिकायाम् । "अविवेकित्वम् अविवेकि" इति वाचस्पति मिश्राः। एवमेव प्राणघ्न-अयथुकरशम्दा. वपि व्यास्त्येयौ । तत्र प्राणनस्व विषादीनां; श्वयथुकरत्वं च भल्लातकादीनां; विलयन श्वयथुनाशनं, तब मिश्रकोकानां मातुलनादीनां कर्मेति वेदितव्यम् । परिशिष्टानि सुखावगम्यानि । केचिदित्यादि । नेह गुल्लघुशब्दापवर्तनेन विशद-पिच्छिलयोः पाठो न्याय्य., शास्त्रेऽस्मिन् कचिदपि तयोर्वीयत्वेनानुपदेशादुपदेशाच गुरु लघुनो., वक्ष्यति हि-"ये रसा" इत्युपक्रम्य "रौक्ष्य लाघवशैत्यानि न ते हन्यु. समीरणम्" इत्यादि । उक्तमर्थमुदाहरणेन स्फोरयति-यथेत्यादि । कटुका पिप्पलीति पिप्पली- शब्दस्येह पिप्पलीलतायां तात्पर्यमित्याहु., मात्रेयादिभिरष्णवीर्यस्वेनाभिहितामाः पिप्पल्या मृदु-शीतत्वानुपपत्तेः ।, काकमाची पित्तं वर्धयतीति काकमाच्याः पित्त वर्धकरवं स्वतन्त्रपित्ताभिप्रायेणेति लक्षणीयं; वक्ष्यमाणं त्रिदोपहरत्वं स्वनुबन्धभूत पित्तहरस्वेनेनि नानुपपत्ति । xxx । नीतावन्त्येव वीर्यप्राधान्यप्रत्ययकराणि भवन्ति, तिकानामर्कागुरु-गुडूचीनामाष्ण्येन वातप्रशमकत्वदर्शनात्, सदिद- मुच्यते-तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तमिति । परिशिष्ट निगव्याख्यातम् (हा.)॥ अन्य आचार्य कहते हैं कि-द्रव्य, रस या विपाक प्रधान नहीं है, किन्तु वीर्य प्रधान है । क्योंकि औपधके कर्म वीर्यसे होते हैं । ऊर्ध्वभागसशोधन (वमन), अधोभागसशोधन (विरेचन ), उभयतोमागसशोधन, संशमन, साग्राहिक, अग्निदीपन, पीडन, लेखन, बृंहण, रसायन, वाजीकरण, वयथुकरण, श्वयथुविलयन, दहन, दारण, पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २६३ मादन (मत्तताकरण), प्राणनाशन, विषनाशन इत्यादि औषधोंके कर्म वीर्यकी प्रधानतासे होते हैं। समस्त जगत् अग्नि-सोमात्मक होनेसे वीर्य दो प्रकारका होता है (१) उष्ण और (२) शीत । कई आचार्य आठ प्रकारका वीर्य मानते हैं-शीत, उष्ण, निग्ध, रूक्ष, विशद, पिच्छिल, मृदु और तीक्ष्ण । ये वीर्य अपने वल (शक्ति)रूप गुणकी उत्कृष्टतासे रसका (विपाकका भी ) पराभव करके अपना कार्य करते हैं । जैसे- बृहत्पवमूल रसमें कपाय और अनुरसमें तिक होनेसे उससे वायुका प्रकोप होना चाहिये, परन्तु वह उष्णवीर्य होनेसे वायुका शमन करता है । वैसे ही कषायरसयुक्त कुलगी और कटरसयुक्त प्याज उष्णवीर्य और स्निग्ध होनेसे वायुका शमन करते हैं। गोका रस मधुर रसवाला होनेपर भी शीतवीर्य होनेसे वायुको बढाता है । कटुरसयुक्त पिप्पली मृदु और शीतवीर्य होनेसे पित्तको शान्त करती है । आँवला अम्लरसयुक्त तथा सेंधानमक लवण होनेपर भी मृदु और शीतवीर्य होनेसे पित्तको शान्त करते हैं । मकोय विक्करसवाली होने पर भी उष्णवीर्य होनेसे पित्तको बढाती है । वैसे ही मछली मधुर रसवाली होनेपर भी उष्णवीर्य होनेसे पित्तको वढाती है । पक्की मूली कह रसवाली होनेपर भी निग्धवीर्य होनेसे कफको बढ़ाती है । कैथ अम्ल रसवाला होनेपर भी रुक्षवीर्य होनेसे कफको शान्त करता है। वैसे ही शहद मधुर होनेपर भी रूक्षवीर्य होनेसे कफको शान्त करता है। यहां दिग्दर्शनार्थ हमने थोड़ेसे उदाहरण दिये हैं । इस प्रकार अनेक कार्य वीर्यकी प्रधानतासे होते हैं। मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस (रसवाले द्रव्य ) वायुको शान्त करते हैं, परन्तु उनमें यदि कक्ष, लघु और शीत वीर्य रहे हों तो वे वायुका नाश नहीं कर सकते। मधुर, तिक और कषाय ये तीन रस पित्तका शमन करनेवाले हैं, परन्तु उनमें यदि तीक्ष्ण, उष्ण और लघु ये वीर्य रहे हों तो वे पित्तका शमन नहीं करते । कटु, तिक और कषाय ये रस कफको शान्त करनेवाले हैं, परन्तु यदि उनमें निग्ध, गुरु और शीत वीर्य रहे हों तो वे कफको शान्त नहीं कर सकते । इस प्रकार वीर्य रसका पराभव . करके अपना कार्य करता है, इसलिये वीर्य प्रधान है। वक्तव्य-यहा डल्हण तथा चक्रपाणिने मूलके पाठमें विशद और पिच्छिल ये वीर्य लिखे हैं। कविराज हाराणचन्द्रजीने विशद और पिच्छिल इन दोनोंके स्थानमें गुरु और लघु ये दो वीर्य लिखे हैं । वे लिखते हैं कि-चरक, वाग्भट भादि आयुर्वेदके किसी ग्रन्थमें विशद और पिच्छिलको कहीं भी वीर्य नहीं लिखा है और सुश्रुतने भी इस प्रकरणके अन्तिम तीन श्लोकोंमें गुरु और लघुको ही वीर्य लिखा है। विशद और पिच्छिलको वीर्य माननेवाले कहते हैं कि-सुश्रुतने गुरु और लघु १ हेमाद्रि भी मुश्रुतमें विशद और पिच्छिलका पाठ मानते हैं । (देखें इसी ग्रन्थमें पृ.-२५६ पर)। -- २६४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । . विपाक माने हैं, अतः सुश्रुतके मतमें ये वीर्य नहीं हो सकते, अतः सुश्रुतने गुरु और लघुके स्थानमें विशद और पिच्छिल दो वीर्य माने हैं । चक्रपाणिने यह भी लिखा है कि कई टीकाकार इस प्रकरणके अन्तिम तीन श्लोकोंको अनाप मानते हैं। वीर्ये भूतगुणोत्कर्षनिरूपण, वीर्यगुण-कर्माणि च- तंत्र य इमेऽष्टौ गुणा वीर्यसंज्ञकाः शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मृदु-तीक्ष्ण- पिच्छिल-विशदास्तेषां तीक्ष्णोष्णावाग्नेयौ, शीत-पिच्छिलोवम्बुगुण- भूयिष्ठी, पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठः स्नेहः, तोयाकाशगुणभूयिष्ठं मृदुत्वं, वायुगुणभूयिष्ठं रौक्ष्यं, क्षिति-समीरणगुणभूयिष्ठं वैशद्यम् । xx। (तत्र कर्माण्यप्युष्णस्य दहन-पाचन-मूर्च्छन-वेदन-वमन-विरेचनानि, शीतस्य प्रह्लादन-विष्यन्दन-स्थिरीकरण-प्रसादन-क्लेदन-जीवनानि, त्रि- ग्धस्य स्नेहन-बृहण-संतर्पण-वाजीकरण-वयःस्थापनानि, रूक्षस्य अनिल- वृद्धि-संग्रहण-पीडन-विरूक्षणोपरोपणानि, विशदस्य क्लेदाचूषण-विरू- क्षणोपरोहणा नि, पिच्छिलस्योपलेपन-पूरण-हण-संश्लेषण-वाजीकर- णानि, मृदो रक्तमांसप्रसादन-सुस्पर्शनानि, तीक्ष्णस्य संग्रहाचूषणाव- दारण-नावणानि । ) तत्र उष्णस्निग्धौ वातघ्नौ, शीत-मृदु-पिच्छिला. पित्तघ्नाः, तीक्ष्ण-रूक्ष-विशदाः श्लेष्मघ्नाः।xxx। तेषां मृदु-शीतोष्णाः स्पर्शग्राह्याः, पिच्छिल-विशदौ चक्षुः-स्पर्शाभ्यां, स्निग्ध-रूक्षौ चक्षुषा, तीक्ष्णो मुखे दुःखोत्पादनेनें ॥ (सु. सू. अ.४१) संप्रति द्रव्यं भूतकार्यत्वेन तत्तद्गुणयोगेन कर्मणा चाभिधाय वीर्याण्यपि तथा निर्देष्टुमाह-तत्रेत्यादि । अम्लगुणभूयिष्ठाविति अम्लरससहचरितगुरुत्वादिगुण- सहचरितौ; एवमन्यत्रापि तत्तद्भूतसहचरितगुणभूयिष्ठता ज्ञेया । तत्रेत्यादिना वीर्याणां कर्माण्युच्यन्ते । अत्रोष्णवीर्यस्य वमन-विरेचने कारणतोक्का, विरेचनं च प्राक् पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठद्रव्यकार्यमुक्तं, तेन तत्रापि विरेचनद्रव्ये उष्णवीर्यता १ "तत्र य इमे गुणा वीर्यसशका शीतोष्ण-स्निग्ध-रुक्ष-गुरु-लघु-मृदु-तीक्ष्णास्तेषां वीक्ष्णोष्णा- वाग्मयौ, गुरु-शीतौ पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठौ, अम्युगुणभूयिष्ठः स्नेह , तोयाकाशगुणभूयिष्ठं मृदुत्व, वायुगुणभूयिष्ठ रौक्ष्यम् , अग्न्याकाश-समीरणगुणभूयिष्ठ लघुत्वम् । xx। तत्र गुरूष्ण-स्निग्धा वातना , मृदु-शीतौ पित्तप्नौ, लघु तीक्ष्ण-रूक्षा श्रेष्मता ।xxx। तेषां शीतोष्ण-निग्धा छादन-पाचन-स्तम्भनादिना, रूक्ष-गुरु-लघवो विरुक्षणोपलेप-लेखनादिना, तीक्ष्णो दहन-पचना- दिना, मृदुस्तद्विपर्यासेनानुमीयते” इति हाराणचन्द्रसम्मत. पाठ । वम्लगुणभूयिष्ठौ' इति चक्रदत्तसमत पाठ । ३ कोष्ठस्थ. पाठो डल्हणादिभिर्न पठितो व्याख्यातश्च, केवल चक्रपाणिनैव पठ्यते व्याख्यायते च । ४ 'तीक्ष्ण सुखदु.खोत्पादनेन' इति चक्रदत्तसंमत. पाठ । २ 'शीत-पिच्छिला- -- पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २६५ दोषक्षोभकारिणी ज्ञातव्या । उपरोपणं व्रणरोपणम् । पूरणम् मामाशयादीनां पूरितत्वं येन भवति । संश्लेषणं संधिसंधानम् ।xxx। वीर्याणां दोपप्रशमनकर्माह-तत्रो- प्णेत्यादि । मयं च वीर्याणामौरसर्गिको गुणनिर्देश, तेन स्निग्धमपि किंचिदाग्नेयं लव- णवद्भवति, यथा-सैन्धवं; जिग्धमपि किंचिदुष्णगुणभूयिष्ट, यथा-अनूपमांसम् ; इत्यादि अपवादरूपं भवति । वीर्याणां ज्ञानोपायमाह-तेषामित्यादि । मृदु- शीतोष्णानां स्पर्शेनापि ग्रहणं भवतीति स्पर्शग्राह्या इत्युक्ताः । येन सैन्धवगवं शीतस्वमनूपमांसगतमौदण्यमित्यादि न स्पर्शमाां; किंतु कार्यानुमेयम् , आगमप्रति- पादनीयं वा; एवमस्पर्शादिग्राह्येष्वप्युदाहरणमुन्नयनीयम् । सुखदुःखोत्पादनेनेति सुखोचितजिह्वादिसुकुमारप्रदेशदुःखोत्पादनेन वा तीक्ष्णत्वं प्रतीयत इत्यर्थः । 'महदुःसोत्पादनेन' इति पाठो व्यक्तः । ४४४ । (च. द.)। इमें वक्ष्यमाणाः । ४४ तत्रोणेत्यादि उष्ण-स्निग्धौ वीर्यमंज्ञो गुणौ । तेपामष्टानां वीर्याणां मध्ये । मुखे दुःखोत्पादनादिति अत्र चार्थों द्रष्टव्यः, तेन घ्राणदुःखोस्पादनाच्चेति द्रष्टव्यम् (ड.) | संप्रति द्रव्यकर्माण्युपदिश्य प्रसंगात्तद्गतवीर्यकर्माण्युपदिदिक्षुः प्रथम तावत् तत्तभूतगुणान्युपदिशति-तत्रेत्यादिना ।xxx। केनचिदनवधानपरेणेह "मृदु-शीतोष्णाः स्पर्शग्राह्याः, पिच्छिल-विशदौ चक्षुः-स्पर्शाभ्यां, स्निग्ध-रुक्षौ चाक्षुपौ, तीक्ष्णो मुसदुःखोत्पादनेन" इति पठ्यते, व्याख्यायते च तथाविधैष्टीका- कृभिरक्षरार्थमात्रसचिवैः; तत्तु न सम्यक, कर्मानुमेयानां वीर्याणामिन्द्रियग्राह्यत्वा- नुपपत्तेः; आयुर्वेदत श्रेपु कचिदपि पिच्छिल-विशदयोर्यित्वेनानुपदेशाध (हा.)॥ तत्रोष्णं दहन-पचन-वेदन-विलयनानिल-कफशमनानि करोति, शीतं छादन-स्तम्भन-जीवन-रक्तपित्तप्रसादनादीनि (अ. स सू अ. १७ ) ॥ तत्रोष्णधीर्यस्य दहनादीनि कर्माणि । शीतस्य हादनादीनि (इन्दुः)॥ तत्रोष्णं भ्रम-तृइ-ग्लानि-खेद-दाहाशुपाकिताः । शमं च वात-कफयोर करोति, शिशिरं पुनः ॥ हादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्त-पित्तयोः॥ (अ. हृ. सू अ. ९) वत्र तयोरुष्ण-शीतयोर्मध्ये, उष्णम् उष्णवीयं भ्रमादीन् करोति । आशुपाकितां शीघ्रपाकित्वम् । शिशिरं पुनः शीतवीर्य तु ह्रादनादीन् करोति (अ. द.)। उष्णं लक्षयति-तत्रेत्यादि । यद्रमादिक करोति तदुप्णवीर्यम् । माशुपाकिता शीघ्रपाकः । शीतं लक्षयति-शिशिरमित्यादि । यत् लादनादीन करोति तच्छीतवीर्यम् । लादनं निर्वृत्तिः । जीवनं मूर्छापनयनादिभिः प्राणधारणम् । स्तम्भः स्वेदापनयनम् । रक्त पित्तयोः प्रसाद निर्मलत्वम् (हे.)॥ शीतं कफ-मारुतकृद्वीर्य गुरु पित्तनाशनं वल्यम् । उष्णं कफ-वातहरं पित्तकरं लध्ववृष्यं च ॥ (द्रव्यगुणसग्रहः श्लो. ८.)
२६६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । , यद्यप्यष्टविधमेव वीर्यं भवति, तथाऽपि तेष्वेव शीतोष्णयोः प्राधान्यासद्गुण- मेवाह-शीतमित्यादि (शि.)॥ वीर्यसज्ञावाले जो शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु, तीष्ण, पिच्छिल, और विशद ये आठ गुण हैं उनमें तीक्ष्ण और उष्ण ये दो गुण ( वीर्य) अग्निके गुणोंकी अधि- कतावाले हैं, शीत और पिच्छिल ये दो गुण जलके गुणोंकी अधिकतावाले हैं, स्निग्ध पृथिवी और जलके गुणोंकी अधिकतावाला है, मृदु जल और आकाशके गुणोंकी अधिकतावाला है, रूक्ष वायुके गुणोंकी अधिकतावाला है तथा विशद पृथिवी और वायुके गुणोंकी अधिकतावाला है । उष्ण वीर्यके शरीरपर दाह ( जलन ), पचन ( अन्न, धातुरस आदिको पकाना ), मूर्छा लाना, खेदन ( पसीना लाना), वमन कराना, विरेचन कराना (सु.); विलयन करना (पिघलाना), वायु तथा कफका प्रशमन करना (अ. सं.); भ्रम ( चक्कर आना), तृषा और ग्लानि उत्पन्न करना (अ.ह.); तथा पित्त उत्पन्न करना ये कर्म होते हैं । उष्ण वीर्य लघु और शुक्रकी हानि करनेवाला है (द्र.गु. सं.)। शीत वीर्यके शरीरपर प्रह्लादन ( सुख उत्पन करना ), 'विष्यन्दन (झराना ), स्थिर करना, प्रसन्नता करना (खच्छ करना ), क्लेद उत्पन्न करना, मूछित आदिको सज्ञा प्रदान करना (सु.); स्तम्भन करना, रक्त और पित्तको शान्त करना ( अ. सं.); तथा कफ और वायुको उत्पन्न करना (द्र.गु. सं.) ये कर्म होते हैं । (अ. हृ.) । शीत वीर्य गुरु और वृष्य है (द्र. गु. सं.)। स्निग्ध वीर्य स्नेहन, बृहण, सतर्पण ( तृप्ति-पोषण करनेवाला ), वाजीकरण, वय स्थापन और वातका नाश करनेवाला है। रूक्ष वीर्य वायुको बढ़ानेवाला, ग्राही, पीडन (व्रणपीडन ), रूक्षता लानेवाला, व्रणको भरनेवाला और कफका नाश करनेवाला है। विशद वीर्य क्लेद( गीलापन )को चूसने-सुखाने वाला, रूक्षता उत्पन्न करनेवाला, व्रणका रोपण करनेवाला और कफका नाश करनेवाला है। पिच्छिल वीर्य चिकनाहट लानेवाला, पूरण, बृंहण, संश्लेषण (चिपकानेवाला), वाजीकर और पित्तका नाश करनेवाला है । मृदु वीर्य रक्त और मासका प्रसादन, स्पर्शमें सुख करनेवाला और पित्तका नाश करनेवाला है। तीक्ष्ण वीर्य प्राही, चूसने-शोषण करनेवाला, व्रणशोथका विदारण (फोड़नेवाला), कफादिका स्राव कराने वाला तथा कफका नाश करनेवाला है। मृदु, शीत और उष्ण वीर्यका स्पर्शसे ग्रहण-ज्ञान होता है । पिच्छिल और विशद वीर्यका १ कविराज हाराणचन्द्रजी कहते हैं कि-यह पाठ ठीक नहीं है, क्योंकि वीर्योका उनके कर्मोसे अनुमान किया जाता है, उनका इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं होता । वे लिखते हैं कि-शीत, उष्ण और लिग्ध वीर्यका आहादन, पाचन, स्तम्भन आदि कर्मोंसे, रूक्ष, गुरु और लघु वीर्यका ल्क्षण, उपलेपन, लेखन आदि कर्मोंसे; तीक्ष्ण वीर्यका दहन, पचन आदि कर्मोसे तथा मृदु वीर्यका उसके ( तीक्ष्णके ) विपरीत कर्मोंसे अनुमान किया जाता है।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २६७ दर्शन और स्पर्शसे ग्रहण-ज्ञान होता है । स्निग्ध और रूक्ष वीर्यका दर्शनसे ज्ञान होता है। तीक्ष्ण वीर्यका मुख और नाकमें दुःख उत्पन्न होनेसे ज्ञान होता है। वक्तव्य-ऊपर हमने जो अनुवाद किया है वह डल्हण और चक्रपाणिकी व्याख्यानुसार है । कविराज हाराणचन्द्रजीने यह पाठ कुछ परिवर्तन करके लिखा है, जो टिप्पणमें दिया है। उन्होंने विशद और पिच्छिलके स्थानमें गुरु और लघु दो वीर्य माने हैं। उनके पाठानुसार समग्र प्रकरणका अर्थ इस प्रकार होता है-वीर्यसंज्ञक जो शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, गुरु, लघु, मृदु और तीक्ष्ण आठ गुण हैं उनमें तीक्ष्ण और उष्ण आग्नेय है, गुरु और शीत पृथिवी और जलके गुणोंकी अधिकतावाले हैं, स्नेह जलके गुणोंकी अधिकतावाला है, मृदु जल और आकाशके गुणोंकी अधिकतावाला है, रूक्ष वायुके गुणोंकी अधिकतावाला है तथा लघु अग्नि-आकाश और वायुके गुणोंकी अधिकतावाला है। उनमें गुरु, उष्ण और तीक्ष्ण ये तीन वीर्य वातघ्न हैं, मृदु और शीत ये दो वीर्य पित्तन्न हैं तथा लघु, तीक्ष्ण और रूक्ष ये तीन वीर्य कफन हैं। मदन्तनागार्जुनमतेन वीर्यनिरूपणम्- कर्मलक्षणं वीर्यम् (र. वै. सू. भ. १, सू. १६९)।-मेधाजननादि (वीर्य) मेधां दृष्ट्वा ज्ञायते, अर्वभागिकमपि तथेति (भा.) । रसगुणमानं वीर्यमित्येके (र. वै. सू भ. २, सू. ३०)।-गुणानन्तरं वीर्यमिदानी चिन्त्यते-सेत्यादि । एके पुनराचार्या रसगुणमानं वीर्यमिच्छन्ति । गुणमात्रं वीर्यमिति वक्तव्यं, रसगुणत्वप्रतिषेधाच्छीतादीनाम् । पूर्व तेषां मतमिति चेद् येऽपि गुणमात्रवीर्यवादिनस्तैरपि न तेषां गुणानां रसगुणत्वमिष्यत इति । तस्मादय- मत्रार्थ:-उत्तरत्र वीर्य चिन्ताध्याये वीर्याणामाश्रयं अवता रसाश्च गुणाश्चोका:- "सर्वान् रसान् गुणांश्चाश्रितं छर्दनीयम्" (र. वै भ. ४ सू. २) इत्यादि तस्मात्तन तेभ्योऽन्येन रसगुणाधिष्ठानेन वीर्येण भवितव्यमिति । अस्य पक्षस्य प्रतिषेधार्थ केचिट्ठवते-रसगुणमात्र, नं रसगुणाधिष्ठानमन्यद् वीर्यमिति; एवं मात्रशब्दश्च सार्थकः स्यात् । रसगुण एव वीर्यमिति भावः । गुणमात्रवीर्यवादिन- स्त्वष्टविधं वीर्य मिच्छन्ति; यथा-"मृदु तीक्ष्णं गुरु-लघु-स्निग्ध-रूशोष्ण-शीतलम् । वीर्यमष्टविधं केचित् केचिद्विविधमास्थिताः ॥ शीतोष्णमिति, वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया । नावीयं कुरुते किंचित् सर्वा वीर्यवती क्रिया" (च. सू. अ. २६) इति । तत्रायं प्रयोग.-'गुर्वादयोऽपि वीर्य, स्पर्शवस्वात् , शीतोष्णवद्' इति । दृष्टान्तः साधनान्वितः । कथं, शीतं वीर्यमुष्ण वीर्यमित्यत्र शीतोष्णशब्दौ न स्पर्श- विशेषवाचकौ, किन्तु सौम्याग्नेयभूतसमुदायवाचकौ; पृथिव्युदकाभ्यां जनितं शीत- वीर्यम् , माझ्याकाशानिलैरारब्धमुष्ण चेति । सौम्याग्नेयत्वाजगतः, चन्द्रादित्ययो- । १ 'वीर्य कृता' इति पा० ।
२६८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । १ श्वाधोगत्यूर्ध्वगत्यात्मकत्वाद्, भूतगुणद्वैविध्या ध्याच द्विविधमेव वीर्यमित्यनवयोऽयं पक्ष (भा.)। न, तुल्यरसगुणेषु विशेषभावात् (सू. ३१)।--गुणपदार्थवीर्य- वादिना पक्षे वीर्यपदार्थस्य पृथगभावात् तत् पृथग्वीर्यास्तिस्वं साध्यते-नेत्यादि । नेति पूर्वपक्षप्रतिषेधार्थ त्वयोकं न' इति । तुल्यरसेपु तुस्यगुणेषु च विशेषो दृश्यते- मधुररसं सिग्धं शीतं च यष्टिमधुकं संदधाति, क्षीरं च ताडगेव संसयतीति विशेषः । अस्य कर्मविशेषस्य दर्शनादेतस्माद् रसगुणाख्यात् कारणमन्यद्विद्यते । अस्थ विशेषस्य साधकं तद् वीर्यमिति जानीम इति । अत्र प्रयोगः-रसगुणकारणव्यति- रिकान्यवस्तुनिर्वर्तितमूर्धभागादिकं, तत्कारणसाम्ये फलविशेषदर्शनात्; यत्र फलविशेषो दृश्यते तत्र तत्कारणव्यतिरिक्तान्यवरतुनिवर्तितत्वं रष्टम् । ययैकस पुत्रयोराट्य-दुर्गतत्वम् (भा.)। मात्राविशेषात् (सू. ३२)।-तुल्यरसगुणे- स्विति पक्षः । तुल्यरस-गुणयोः क्षीर-सर्षिपोः संसने मात्राविशेपोऽन्यत् कारणम- पेक्षते । तत् कारणमेवयतिरिक्तं वीर्यमस्तीति, तव्यतिरिक्तस्य तदाश्रयत्वात् । यस्य यदाश्रय स्यात्, तस्मात् स खलु पृथगेवोपलभ्यते । यथा-चित्रात् कुख्यम् । तस्माद् रसगुणेभ्योऽन्यद् वीर्यमिति । गुणमात्रवीर्यवादिनं प्रत्येवं साधयितुं न शक्यते । नासौ प्रतिज्ञानान्याश्रयत्वे न वीर्यरसगुणा (?) रसगुणा एव वीर्यमिति प्रतिपन्नत्वात् । तस्मादयमत्रार्थ:-यदि रसगुणा एव वीर्य, यत्र रसगुणा न स्युः (न) तत्र वीर्यकर्माणि स्युः, दृश्यन्ते चेति प्रदर्शनार्थमुक्तम् । (भा.)। तब्ध- तिरिक्तस्य तदाश्रयत्वात् (सू.३३)। तद्व्यतिरिकं तेभ्यो गुणेभ्यो व्यतिरिक, तस्य । तदाश्रयत्वादिति तस्याश्रयस्तदाश्रयः, वीर्यस्येत्यर्थः । रसगुणेभ्योऽन्यस्यापि वीर्यस्याश्रयस्य दर्शनादित्युक्तं भवति । एवं प्रतिज्ञायास्तूत्तरमात्रमेतदुकं भवति, हेतुप्रयोगः (भा)। वीर्यविषये चानधिकारात्तेषाम् (सू ३४)।-कथमा श्रयस्वमिति तय्प्रदर्शनार्थमाह-वीर्येत्यादि । तेषां गुणानां वीर्य विषयेऽनधिकारो दृष्टः क्वचिद्दर्शन-श्रवणादिषु । अनेन पताका-ध्वज मेरी-दुन्दुभिप्रभृत्यधिष्ठितौषध- विशेषाधिष्ठानत्वं वीर्यस्य प्रदर्शितं भवति, न रसगुणा इति (भा.)। रसगुण- व्यतिरेकेण चोपलव्धेः कर्मणस्तस्य (सू. ३५) ।-धीर्यस्य लक्षणमुप- दिशता 'कर्मलक्षणं वीर्यम्' इति फललक्षणत्वं वीर्यस्योक्तम् । तस्मात् फलं सत्र दृश्यते तत्रावश्यं तेनापि फलहेतुना भवितव्यमिति प्रदर्शनार्थमाह-रसगुणेत्यादि । तस्य वीर्यस्य, कर्मणः फलस्येत्यर्थः, रसगुणाभावेऽप्युपलब्धेः मन्त्रादिषुः मत्रेण वामयन्ति, मन्त्रेण विरेचयन्तीति । यद् येन विना भवति तत् तस्य कारणं न भवति । यथा-काकवाशितमङ्घरोत्पत्तय इति । एवं तेषामभावेऽपि वीर्यस्य भावः प्रदर्श्यते (भा.)। सत्सु तेषु तस्मिंस्तस्यैवाकरणात् कर्मणः सति सम्य- प्रयोगे (सू. ३६)। तेषां रसगुणानां भावेऽपि वीर्याभावे फलानाममा प्रदर्शयितुकाम भाह-सस्वित्यादि । तेषु रसगुणेषु सत्सु। तस्मिमिति प्रयोगे पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २६९ राष्टफले पूर्वमित्यर्थः । तस्यैव कर्मणः कृतपूर्वस्य शमनस्य वर्धनस्य वा । भकरणात् सम्यक्प्रयोगाभावादिति चेत् सम्यक्प्रयोगे च प्रकृत्यादिपरीक्षालक्षणे सम्यक्प्रयोगे सस्थापि फलप्रवृत्ति स्त्रीति तयतिरिक्तमस्ति वीयं नामेति । यथा-चक्षुपि रूपा- लोकनसांनिध्ये सत्युपहतेन्द्रियेऽशके रूपज्ञानाभावं दृष्ट्वाऽनुमीयते-चक्षुरादि- व्यतिरिक्तमन्यज्ज्ञानकारणमिन्द्रियं नयनाधिष्ठानं परमसूक्ष्मं भूतप्रसादजमस्तीति, तद्वदिहापि गुणेभ्योऽन्य एव वीर्यपदार्थ इति । गुणोत्कर्षवीर्यवादी तावदेवं प्रष्टव्यः कोऽयमुरका नाम । स एव गुणो वा स्यात्, अन्यो वा, गुणस्यावस्था वा? । यधन्यस्तद्वीर्यमिति, स एव गुणश्वेच्छन्दाधिकम् । अथावस्था, शत्यास्यान्या शैत्यावस्था । उस्को नाम किमस्ति ? उत्कृष्टं वा हीनं वा शैत्यमेवेति । किं तारतम्यं प्यते गुणानामिति ? इप्यते स्वजात्यनतिक्रमेणा; यथा-नीलतरो, नीलतम इति । किं तर-तमयोगानीलादन्यत् पाण्डर भवति ? । यत्र शैत्यमुत्कृष्टं तत्र पित्तं शमयति तद् वीर्यमिति इदानी शैत्यं मन्दं न किचित् करोति, गुणकर्माभाव एव स्यादिति । अनेनापि पृथगेव वीर्यमस्त्रीति भवता प्रसाधितमिति "यदस्माभिरनुठेय गन्धर्व- स्तदनुष्ठितम्" इति । एतत् सर्व वृत्तमिति गतमानुपनिकम् (भा)। वीर्याणि पुनश्छर्दनीयानुलोमनीयोभयतोभाग-प्रशमनीय-संग्रहणे-दीपनीय-प्राण- न-मदन-विदारण-श्वयथुकरणविलयनानि (अ. ४. सू. १)।-इदानी- मात्मावसरमाप्तं वीर्य मेदत उत्पत्तितश्च विचिन्त्यते-वीर्याणीत्यादि । वीर्याणीति वीर्यमेदाः । 'पुनः'शब्दः पक्षान्तरनिवृत्यर्थः । छर्दनं जनयतीति छर्दनीयः । अनुलोमनीय वैरेचनीयम् । उभयतोमागं वमन-विरेचनकरम् । प्रशमनीय प्रवृद्धानां प्रकुपितानां दोप-धातु-मलानां साम्यकरमित्यर्थः । संग्रहणं पुरीपसंधानकरम् । दीपनीयमः संधुक्षणं वर्धनमिति । प्राणन्न मारणम् । मदनं मदकरम् । प्रदरण विदारणं शोफानाम् । श्वयथुजननं शोफकरम् । विलयनं शोफानामुत्सेधप्रशमनम् (भा.)। तत्र सर्वान् रसानाश्रित्य छर्दनीयम् (सू. २)।-एतेषां वीर्याणां कस्य काश्रय इत्याह-तनेत्यादि । तेपु वीर्येषु सर्वान् मधुरादीन् रसान् माश्रित्य वर्तते छर्दनीयं वीर्यम् (भा.) । तदाग्नेयवायव्यं च (सू. ३)। वस्य निर्वर्तकं किमित्याह-तदित्यादि । छर्दनीयं वीर्यममि-वायुभ्यामुत्पाद्यत इति । भनेरूर्वगतिस्वाद् वायोगैतिहेतुस्वान्मधुरादिष्वन्यतमस्मिन् गुणे वा भग्नि-वायुभ्या- मुस्पादितं तद् वीर्य तेभ्योऽन्यदित्युक्तं भवति । एवं सर्वन (भा.) । तथाऽनु- लोमनीयम् (सू.४)।-तथेति पूर्वमुमाश्रयमाकर्पतीति सर्वान् रसान् आश्रित्य वर्तत इति (भा.)। तत् पार्थिवमाप्यं च (सू. ५) +-पृथिवी गुरुत्वा- देवाधो गच्छति, आपो गवत्वात् सरणतामुपजनयन्तीति (भा.) । वातलांश्च रसान् पित्तलांश्च गुणानुभयतोभागम् (सू ६)। वातलान् वातजननाम् १०संशमनीय' इति पा 12 सामाहिक' इति पा० । ३ प्रदरण” इति पाय ।
F २७० 'द्रव्यगुणविज्ञानम् । कटुक-तिक्त-कपायान् रसान्, पित्तलान् पित्तजननान् तीक्ष्णोष्ण-लघून गुणानाश्रित- मुभयतोभागम् (भा.) । तत् पार्थिवाप्य-तैजस-वायव्यम् (सू. ७)।- तदुभयतोमागं वीयं पृथिव्युदकाभ्यां गुरुभ्यामग्नि-वायुभ्यां लघुभ्यो च निर्षतते (भा.)। यथाप्रत्यनीकं प्रशमनम् (सू. ८)।-यथाप्रत्यनीकमिति प्रत्यनीक प्रत्याश्रितं प्रशमनं मधुराम्ल-लवणान् रसान् गुरू'ण-स्निग्ध पिच्छिलांच गुणानाधितं वातप्रशमनं, तथाऽन्यानि च; भस्य निर्वर्तकस्यावचनं रसगुणरनुमेयं प्रशमनमिति वक्ष्यति हि यथाप्रत्यनीकग्रहणादेव सिद्धमिति च पृथिव्युदकाग्निभिस्तवीर्यमारम्यते । एवमन्यत्रापि यथासभवं प्रत्यनीकत्वं योज्यमिति (भा.)। लवण-तीक्ष्णोणे- भ्योऽन्यत् सांग्राहिकम् । तत् पार्थिव-वायव्यम् (सू. ९)।-लवणादेव- द्गुणवयाच्चान्यद् रसगुणं तस्याश्रयः । तत् पार्थिव-वायव्यम् , आभ्यां भूताम्या निर्वय॑ते साग्राहिकम् (भा.)। पित्तलान् रसान् गुणांश्च दीपनीयम् । तदाग्नेयम् (सू. १०)।-कटुकाम्ल लवणान् रसान् तीक्ष्णोष्ण-लघून् गुणाना- श्रितमिति । तदग्निनैव निर्वय॑म् (भा.)। सर्वान् रसान् तीक्ष्णोष्ण-रूक्ष- लघु-विशदांश्च गुणान् मदनीयम् (सू. ११)।-सर्वान् रसान् मधुरादीन गुणांश्चाश्रित्य वर्तते मदनीयं वीर्यम् (भा.)। तदाग्नेयं वायव्यं च (सू. १२)।-अग्निवायुभ्यां निर्वर्तितं तत् (भा.) । शैम्य-सौषिर्य-व्यवायित्व- विकाषित्वानि च प्राणघ्नम् (सू. १३)। शैभ्यादीन् विशेषगुणान् पूर्वोक्तांत्र सर्वान् रसानाश्रित्य वर्तते प्राणघ्नम् । चशब्दात् ते च सगृहीताः, पलूस विषमिति पचनात् । एतदर्थमुद्देशक्रमभेदश्च कृतो वेदितच्यो लाघवार्थमेतेपाम् । विकापिस्वं कथमिति । आह हि-"उष्ण सूक्ष्म च तीक्ष्णं च विकापि विशदं लघु । व्यवामि रूक्ष शीघ्र च विपं नवगुण स्मृतम् ॥ पापक्ति धातूनुष्णस्वात्तैक्ष्ण्यान्मर्मच्छिदं विषम् । सौम्यादातून प्रविशति विकापित्वाद् विसर्पति ॥ विश्लेपयति वैशद्यात् संघीन धावति लाघवात् । व्यामोति च व्यवायित्वाद् रूक्षत्वात् मेहनाशनम् ॥ शीघ्रत्वान्मारयत्याशु विप गौतम ' पडूसम्" इति (भा.)। तदाग्नेयम् (सू १४)।-अग्नेर्दहन-पचनशक्तित्वाद् अप्कार्यस्य जीवनस्य च प्रतिपक्षरवात् तत् प्राणनमानेयं भवति । माह-"पडूसं विषमानेयं ब्रह्मणः क्रोधसंभवम्" इति (भा.)। पित्तलान् रसान् गुणांश्च प्रदरणम् (सू. १५)।-पित्तलान कटुकाम्ल लवणान् तीक्ष्णोष्णाश्च गुणानाश्रितम् (भा.)। तत् पार्थिवमानेयं च (सू. १६)।-पृथिव्यग्निभ्यां निर्मितम् । पृथिवी खलु रौक्ष्यात् सत्रस्थं नेहमपास्य पृथिवीपरमाणूनामप्सग्रहमपाकरोति, ततस्तैदण्यादग्निर्विदारयति (भा.) । अमधुर-कपायान् रसान् तीक्ष्णोष्ण-रूक्षांश्च गुणान् श्वयथुजननम् (सू. १७)।-मधुर-कषायवर्जितान् रसान् तीक्ष्णादीन गुणाश्वाश्रित्य वर्तते तद् धीर्यम् (भा.)। तदाग्नेयं वायव्यं च (सू. १८)।-अग्नि-वायू विक्षेपण - पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २७१ कृत्योर्ध्वमुद्भूय शोफजननसमाँ भवत इति (भा.) । सर्वान् रसाशीत- मृदु-पिच्छिलांश्च गुणान् विलयनम् (सू. १९)। सर्वान् मधुरादीन् रसान् शीत-मृदु-पिच्छिलानाश्रित विलयनम् (भा.) । तत् सौम्यं पार्थिव च (सू. २०) ।-अमि-वायुजनितवायुवीर्यनिर्वर्तितत्वाच्छोफस्य तस्य विलयनं तस्प्रतिपक्षभूतनिर्वर्तित भवति (भा.)। शोधनं पुनरन्यस्य हेतोः प्रयुक्त- मप्येकं वाऽने वा शोधयेत्, अग्नेर्दहनशक्तिवत्त्वसांसास्थिदाहे (सू. २१)।-शोधनमिति वमन-विरेचनास्थापनानि । पुनश्शब्दोऽधिकृतो देशपरि- समाप्तिसूचकः । भन्यस्य हेतोः प्रयुक्तमिति श्लेप्महरणार्थ वमनं प्रयुक्तं पित्तं च हरति, पित्तहरणार्थ विरेचनं प्रयुक्तं वातं श्लेष्माणं च हरतीति । भनास्य वचने प्रयोजनं पीयं सामान्येनाधो वा ऊध्वं वाऽपनयति सर्वान् दोषान् धातूंश्च, तत्र यथेष्टकार्यसपत्तिकरण प्रयोक्रायत्तमिति (भा.)। रसगुणैरनुमेयं प्रशमनम् (सू. २२)।-पूर्वोक्तस्य प्रशमनस्य वीर्यस्य निर्वर्तक रसैर्गुणरनुमेयं पूर्वमुक्तक्रमेण । अथवा भत्र प्रशमन रक्षण स्वस्थानां दोपाणां क्षय-वृज्यवस्थाप्राप्तिप्रशमन रसगुणै- रनुमेयम् । दोपाणां रसगुणश्चानुमेयम् । अयमस्य दोषगुणस्य वायो गुणः प्रतिपक्षः, भयमस्य दोपरसस्य बाझो रसः प्रतिपक्ष इति (भा.) । द्वयोर्निग्रहणं सांग्रा- हिकम् (सू. २३) ।-निग्रहणं प्रशमनम् । द्वयोरित्युक्तं न विशेपित, तथा पित्त-श्लेष्मणोरिति गम्यते, पार्थिव-वायव्यात् तस्य वीर्यस्याश्रयस्य च । भलवणं तीक्ष्णोष्णेभ्योऽन्यत्वात् पित्तनिग्रहे समर्थ, पार्थिव-वायव्याद् रौक्ष्य- वैशयाभ्यां श्लेप्मनिग्रहणे समर्थम् । अतीसारस्य वातकर्तृकतामिच्छन्ति केचित् तर युक्तं, पित्तकर्तृकता युज्यते, शीतोपक्रमस्वात् ; "ज्वरे चैवातिसारे च पूर्व पित्तमुपक्रमेत्" (सू. उ. अ. ४०) इत्यागमाच्च (भा.)। दीपनीयं वात-श्लेष्मनिग्रहणमाग्नेयं च (२४) । दीपनीयं द्वयोर्वात-श्लेष्मणोनिग्रहण घेदितव्यम् , आग्नेयस्वादिति (भा.)। सर्वप्रकोपनं प्राणहननं, मदन, प्रदरणं च (सू. २५)।-एतानि वीर्याणि सर्वदोपप्रकोपनानि । पूर्वमुक्तक्रमेण विपे मन्यत्र च यथासंभवं योज्यम् (भा.) । वात-पित्तप्रकोपनं श्वयथुजननं, विलयनं प्रशमनं सर्वेपाम् (सू २६) । वात-पित्तयोः प्रकोपजनन वीर्य स्वशक्तित एवेत्यत्र दोपौ स्वसज्ञयैवोक्ती, विलयनं प्रलयनं, केषां विलयनं वीर्य ? सर्वेषां दोपाणां प्रलयनं प्रशमनं शोफस्य च शमनात् (भा.) । मेध्यायुष्य- वृष्य-वयस्य-वर्चस्य-रक्षोन-पुंसवनसौभाग्यविशल्य विमोक्षोन्मादक्लैब्य- वशीकरण-विद्वेपण-प्रवासनाकर्षणान्तर्धानिक-पौष्टिक-राजद्वारिकप्रभृ. तीनि च (सू. २७) ।-अन्यान्यपि वीर्याणि सन्तीति ज्ञापनार्थमाह- मेध्येत्यादि । मेध्यादीनि च वीर्याणि सन्ति । प्रभृतिशब्दादन्यानि च वीर्याणि विद्याधराणामाकाशगमन-यथेप्सितार्थ निर्वर्तनजनकानि अचिन्त्यान्यपरिमेयानि च २७२ द्रव्यगुणविशानम। सन्तीति । एतेपामनिन्त्यावं स्वयमेनोपर पहपनि । चागं गणाम: । प्राप हित मेध्यं, पचा-सुवर्ण-गादी पीयंम् । भायुपे हिराम श्रायुष्य, दानायुमामिनि। यथा-"मघामएपचूणानि नुवर्णमिति घ अयम । प्रामारिष्टगृहीतोऽपि मुभने प्राणसंशयार" (मु. चि. भ. २८) ति । ममापि दियानि मायनानि हिस वृष्यम् । वयसे हिरा ययस्प, रामभिहस्प मापनमभिरक्षा मापनाव वावगन्तव्यम् । वर्षसे प्रभार्य हिरा यणाय हि पम्मम् । पया-"भामसमो पायुप्यान् भवति, यसाधनमनुफम्पन्त, गायं 7 पपुगंमिपति" इति । रक्षोभ रक्षांस्यपहनिरा यीयण, रामायमममगीनि विषारानि । शया पुंसवनं पुत्र लाभकरम् । यथा-"रक्षणामूर फलयो पर हग्या रसम्पानामाया दक्षिणे छिद्रे मिन्दूनप्टी प्रदापयेत्" इति । मुमगमायः सामाग्य, संवा मधामस्योपरि प्रीतिर्जायते, तस्य देखभृशं पीयम् । यथा-"गोवदना मोहनिरा म मासिक मधु । सुवर्णमिति संयोज्य पेय सामाग्यमितता" इति । विशयार शल्य. स्थापितस्य निष्णामणम् । यथा-पस्यागोयाम्यम्य । मिमोक्षकरणं निगम भजनम् , भालेपमात्रेण निगलानि भज्यन्ते । उन्मापररगं यथा-"मामल मांसानि मधुना सह योजयेत् । पदस्पाने भक्षे या दरामुन्मादयेशाम्" इति । व्यकरण पुस्वविनाशनम् । पर्माकरणं सोणा पुराणी वा भाग्मसाभरणं लोकप्रसिद्धम् । विद्वेपणं परस्परप्रीतिविभेदनम्, औषधविटोपेण मप्रविशेषेण । प्रवासनं देशातिर्वासनम् । यथा-"केशा नगररोमाणि सपनिमोधनी बना । किण्वं च वृश्चिकाली च पदे यस निम्यन्यते ॥ न निएने महरान पामि प्रम- हत्यया" इति । आकर्षणं दूरस्थानां नारीणामालानम् , औपधवीण, भपस्कान्तः श्वाकर्पति, वृक्षस्थानि च फलान्याकृप्यन्ते । अराधांनिकम् भाश्यरूपजनकमौषध हस्ते गृहीस्वा वसा या नष्टच्छायारूपचरति । पौष्टिक लामफरे श्रीसूक्तं नाम विधा, सया सहस्रं लभते । राजद्वारिक राजश्यं, "शायरीपूतं नित्यमुपयुज्य पुनः पुनः सक्षौद्र ससुवर्ण च वशे स्थापयते नृपम्" (सु.चि. भ. २८) इति (भा.) रस गुण-भूतसमुदायाश्रय एपामनवधारणीयः, तथारस-गुण-भूतसमुदाया नामन्येपामन्यथावीर्यत्वात् (सू. २८) ।-एतानि वीर्याग्यचिन्त्यानीति प्रदर्शयति-रसगुणेत्यादिना । एपां वीर्याणा मेध्यादीनां; रस-गुण-भूतसमुदायाप इति रसाश्च गुणाश्च भूतसमुदायाश्च रस-गुण-भूतसमुदायाः, त एवाश्रय इति । न ज्ञायते इदं मेध्यादिवीर्यमिममेव रस गुण वा भूतसमुदाय वाऽऽप्रितमिति । कुत इति ? तथारसगुणेत्यादि ।-तथारस-गुण-भूतसमुदायानामिति तत्तुल्यरसादी- नामन्येषां द्रव्याणामन्यथावीर्यत्वात् । यथा-सुवर्ण लघु शीतं कपाय मेभ्यम् , भन्यत् तादृग्विधमप्यमेध्य च दृष्टमिति । चिन्त्यानामपि वीर्याणामेते यन्ते । यथा-मधुर-कपाय-तिकं निग्धं पिच्छिल मदनफलं वामयति, कषायमपुराः ।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २७३ -- सतिताः स्निग्धा उष्णास्तिला न वामयन्ति । उक्तं हि-"मधुकं सकपाय- तितकं न तु रूक्षं सकट्टप्ण-पिच्छिलम् । कफ-पित्तहृदाशुकारि चाप्यनपायं पवनानु. लोमि च ॥ फलनामविशेपस्त्वतो लभतेऽन्येपु फलेपु सत्स्वपि" (च. सि.अ. ११) इति । "ईपकपाया मधुराः सतिताः सांग्राहिकाः पित्तविवर्धनाश्च । वृष्याश्व बल्याश्च तथोष्णवीर्याः स्निग्धास्तिलाः सर्वश एव दृष्टाः" इति । तस्मादन्यथावीर्य- स्वमेव चिन्त्येष्वपि विद्यते तिलेपु । तद्वीर्यमूर्ध्व भागिकं नारब्धमग्निवायुम्यामतो न वामयन्तीति चेदत्रापि तवीर्य मेध्यं नारब्धमिति शक्यं वक्तुमिति तुल्यत्वान्न किंचिदेतदिति । तथाऽप्यस्त्यत्र विशेषा-अनोप्रभागिकं वीर्यमग्नि-वायुभ्यां निर्वय॑ते, तयोर्ध्वगतित्वात् ; ताभ्यामनारब्धसिति शक्यमवधारयितुम् । अत्र या मेधा सैच न ज्ञायते कस्य भूतस्य गुणः, वशीकरणत्वं वा कस्य भूतस्येति न निर्धार्यत इति । अथवा तथारस-गुण-भूतसमुदायानामिति यथारस-गुण-भूतसमु- दायान्यचिन्त्यवीर्यद्रव्याणि, तथारस-गुण-भूतसमुदायानां तत्तुल्यरस-गुण-भूतसमु- दायानामिति, अन्येषां चिन्त्यवीर्याणां द्रव्याणामन्यथावीर्यत्वात् । तस्मादेवंभूत- भौतिकक्रमेणाचिन्त्यान्येतानि वीर्याणीति जानीम इति (भा.) । समन्त्राणि पुनरेषां कानिचित् (सू. २९) ।-एषां वीर्याणा कानिचिद् अन्तर्धानिक- वशीकरण-पौष्टिकादीनि समस्राणि भवन्तीति । मघ्रतत्त्वं चाचिन्त्यकारणमेव, भूतसमुदायाभावात् (भा.)। कर्मणाऽनुमेया संपत्तिः (सू ३०)।- कथमिदानी निर्धार्यन्त इत्याह-कर्मणेत्यादि । कर्मणा फलेनानुमेया इति । एवं वीर्य परीक्षितं चिन्त्याचिन्त्यमेदेन । तत्राचिन्त्यानि प्रभृतिशब्देनोकत्वाद् बहूनि गम्यन्ते । एतानि किं चिन्त्यान्यपि वीर्याणि छर्दनीयादीनि विलयनान्तान्याहोस्त्रि- दन्यान्यपि ? अन्यान्यपि सन्ति तनेपु, तस्सानोकानीति; अनेनैवाप्यूयत्वान्नोक्ता- नीति । उक्तानि निमिना-"भभूमिजमधोभागं, तेजो-वायुजमूर्ध्वगम् । तथैवो- भयतोभारां माझ्यनिलजं मतम् ॥ सांग्राहिकं विजानीयात् पृथिव्यनिलसंभवम् । वायु-सोम-महीजातं तथा संशमनं विदु. ॥ पृथिव्यनिलबाहुल्याहीपनं परिचक्ष्महे । पृथिव्यपां गुणैर्युकं जीवनीयमिति स्थिति. ॥ वाचनलस्वभावाच प्राणघ्नं मदनं मतम् । प्राणनं तीवभावात्तु दोप धातुप्रकोपनम् । मदनं चलधातुत्वाद् दोषकोप- नमेव तु । अपां गुणवहुत्वात्तु शीतीकरणमिप्यते ॥ भूम्यन्नं शोफकृद् विदि, शोफनं च खवायुनम् । अनेस्तु गुणबाहुल्यात् पाचनं परिचक्ष्महे ॥ दारण मारतानेयं, रोपणं भू-जलानिलम् । एवमेतानि प्रोक्तानि यथावदनुपूर्वशः ॥ दश पश च कर्माणि गुणानां पाञ्चभौतिकात् । द्रव्येप्वेव विजानीयात् कर्माणि दश पञ्च च" इति (भा.)॥ नागार्जुन कहते हैं कि वीर्य कर्म(फल)लक्षण है । शंखाहुलीके उपयोगसे मेधाकी उत्पत्ति (पृद्धि) तथा मैनफलके उपयोगसे वमनरूप कर्म (फल) होता हुआ द्र०५१८ - 4 २७४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । देखकर शंखाहुलीमें मेध्य (मेधाजनन) और मैनफलमें छर्दनीय (वमनकारक) वीर्य है ऐसा जाना जाता है। नागार्जुनने शीत, उष्ण आदि प्रकृष्टशक्तिसपन गुण ही वीर्य है, इस मतका खंडन किया है। उन्होंने अपने पक्षके समर्थनमें जो विस्तार- पूर्वक युक्तिया दी हैं उनको मूलमें ही देखें । हमने विस्तारभयसे यहा नहीं लिखी है। नागार्जुनने छर्दनीय (वामक ), अनुलोमनीय ( विरेचक ), उभयतोभाग (संशोधन, वमन-विरेचन दोनों करानेवाला), प्रशमन (वातादिदोषप्रशमन), सग्रहण (साग्राहिक), दीपनीय, प्राणन्न (विष), मदन (मादक ), विदारण (प्रदरण), श्वयथुकरण, श्वयथुविलयन, मेध्य (मेधाजनन), आयुष्य (जीवनीय), वृष्य, वयस्स (वय स्थापन ), वर्चस्य (वर्णजनन-वर्ण्य), रक्षोन्न, पुंसवन आदि अनेक प्रकारके वीर्य माने हैं । छर्दनीय वीर्य ऊर्ध्वगतिखभाववाले अग्नि और गतिखभाववाले वायुसे उत्पन्न होता है तथा मधुरादि सव (मधुरादिमेंसे किसी एक या अनेक) रसोंको आश्रय करके रहता है । अनुलोमनीय वीर्य अधोगतिखभाववाले जल और पृथिवीसे उत्पम होता है तथा सर्व रसोंको आश्रय करके रहता है। उभयतोभाग वीर्य वायुको उत्पन करनेवाले कटु, तिक्त और कषाय रस तथा पित्तको उत्पन्न करनेवाले तीक्ष्ण, उष्ण और लघु गुण इनको आश्रय करके रहता है । वह पृथिवी, जल, अग्नि और वायुसे उत्पन्न होता है। प्रशमन वीर्य वात, पित्त और कफके अपने अपने रसों और गुणोंसे विपरीत रसों और गुणोंको आश्रय करके रहता है। जैसे-वातप्रशमन वीर्य मधुर, अम्ल और लवण रस तथा गुरु, उष्ण, स्निग्ध और पिच्छिल गुण इनको आश्रय करके रहता है। पित्तप्रशमन वीर्य कषाय, मधुर और तिक्त रस तथा शीत, गुरु, मृदु और पिच्छिल इन गुणोंका आश्रय करके रहता है । कफप्रशमन वीर्य कषाय, कटु और तिक रस तथा तीक्ष्ण, रूक्ष और विशद इन गुणोंको आश्रय करके रहता है । सांग्राहिक वीर्य पृथिवी और वायुसे उत्पन्न होता है तथा लवणको छोड़कर अन्य पाँच रसों तथा तीक्ष्ण और उष्ण गुणको छोड़कर अन्य गुणोंको आश्रय करके रहता है । दीपनीय वीर्य, अग्निसे उत्पन्न होता है तथा पित्तको उत्पन्न करनेवाले कटु, अम्ल और लवण रस तथा तीक्ष्ण, उष्ण और लघु गुण इनको आश्रय करके रहता है । मदनीय वीर्य सर्व रस तथा तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, लघु और विशद गुण इनको आश्रय करके रहता है । वह अग्नि और वायुसे उत्पन्न होता है । प्राणन्न वीर्य अग्निसे उत्पन्न होता है और शीघ्र (आशुकारी), सुषिर, व्यवायी, विकाशी (उष्ण, सूक्ष्म, तीक्ष्ण, विशद, लघु, तथा रूक्ष) इन गुणों को आश्रय करके रहता है । प्रदरण (विदारण) वीर्य पृथिवी और अग्निसे उत्पन्न होता है तथा पित्तको उत्पन्न करनेवाले कटु, अम्ल और लवण रस तथा तीक्ष्ण और उष्ण गुण इनको आश्रय करके रहता है। श्वयथुजनन (सूजन उत्पन्न करनेवाला) वीर्य अग्नि और वायुसे उत्पन्न होता है तथा मधुर और कषायको छोड़कर अन्य चार रस तथा तीक्ष्ण, उष्ण, और रूक्ष गुण इनको आश्रय करके रहता । - है । ।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २७५ और श्वयथुविलयन (सूजनको वैठानेवाला) वीर्य जल और पृथिवीसे उत्पन्न होता है तथा सर्व रस और शीत मृदु, तथा पिच्छिल गुण इनको आश्रय करके रहता है। शोधत वीर्य किसीएक दोपके निर्हरणकेलिये प्रयुक्त हुआ हो, तथापि वह एक या अनेक दोषोंको निकालता है । जैसे--कफनिर्हरणके लिये प्रयुक्त वमन पित्तको भी निकालता है, पित्तनिहरणार्थ प्रयुक्त विरेचन कफ और वातको भी निकालता है। सांग्राहिक चीर्य पित्त और कफका प्रशमन करनेवाला होता है । प्राणघ्न, मदन प्रदरण ये वीर्य सर्व दोषोंका प्रकोप करते हैं। श्वयथुजनन वीर्य वायु. और पित्तका प्रकोप करता है। श्वयथुविलयन वीर्य सव दोपोंका प्रशमन करता है। मेध्य (स्मरणशक्ति या बुद्धि बढ़ानेवाला), आयुष्य (दीर्घायु करनेवाला) वृष्य, वयस्य, वर्चस्य, रक्षोन, पुंसवन (पुरुष सन्तति उत्पन्न करनेवाला), सौभाग्यकर (जिसको देखकर सबकी उसपर प्रीति हो ऐसा करनेवाला), विशल्यकर (गरीरसे शल्यको निकालनेवाला ), विमोक्षकरण (बेडी-जंजीर-को तोडनेवाला), उन्मादकर, क्लैव्यकर (नपुसकता करनेवाला), वशीकरण, विद्वेषण (द्वेष उत्पन्न करनेवाला ), प्रवासन (देशसे निकालनेवाला), आकर्षण (खींचनेवाला), आन्तर्धानिक ( अदृश्य करनेवाला), पौष्टिक (धनादिका लाभ करानेवाला), राजद्वारिक ( राजाको वश करनेवाला) इत्यादि अन्य भी वीर्य है । ये अचिन्त्य वीर्य किन रसों, गुणों और महाभूतोंका आश्रय करके रहे हुए होते हैं इसका निर्णय नहीं हो सकता । क्योंकि ऐसे ही रस, गुण और भूतसमुदायवाले अन्य द्रव्यों में इससे भिन्न ही प्रकारका वीर्य देखनेमें आता है। इनमेसे आन्तर्धानिक, वशीकरण, आदि कई वीर्य तो समन्त्रक (मन्त्रशक्तिसे होनेवाले ) हैं । इनका कर्म-फल देखकर निर्णय किया जाता है। रसवैशेषिक सूत्रके भाष्यमें कुछ निमिके श्लोक उद्धृत किये हैं, उनमें लिखा कि-जल और पृथिवीसे अधोभाग; अग्नि और वायुसे ऊर्श्वभाग पृथिवी, अनि और वायुसे उभयतोभाग पृथिवी और वायुसे सांग्राहिक, वायु, जल और पृथिवीसे संशमन, पृथिवी और अग्निसे दीपन, पृथिवी और जलसे जीवनीय (आयुष्य), वायु और अग्निसे प्राणघ्न और मदन, जलसे शीतीकरण; पृथिवी और जलसे शोथकर, आकाश और वायुसे शोथन; अग्निसे पाचन; वायु और अमिसे दारण; पृथिवी, जल और वायुसे रोपण वीर्य उत्पन्न होता है । पञ्चमहाभूतोंसे इस प्रकार पन्द्रह प्रकारके कर्म ( कर्मलक्षण वीर्य) उत्पन्न होते हैं। १ प्राणन वीर्य अपनी तीव्रतासे सब दोप और धातुओंका तीव्र प्रकोप करता है । मदन (मादक) वीर्य चल (वात) गुणसे दोपोंका (सामान्य) प्रकोप करता है । सब द्रव्य पाञ्चमांतिक है अत यहा पृथिवीसे, जलसे इत्यादिका अर्थ पृथिवीकी अधिकतासे, जलकी अधिकतासे इत्यादि जानना चाहिये । - - २७६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । तनाग्नि-मारुतात्मकं प्रायेणोलभागिकं, तयोर्हि लाघवादूर्घ- गतित्वाच्चाग्नेः प्लवनत्वाच मारुतस्य । भूम्यौदकात्मकं प्रायेणाधो भागिकं, तयोहिं गौरवान्निनगत्वाच तोयस्य । व्यामिश्रात्मकमुभयतो भागम् । शमनं तु दोषविपरीतगुणमुक्तं प्राक् । तत्संकरे च यतो वाहुल्येन कार्यकर्तृत्वं भवति यदेवाधिकं तदेव तत्कार्यकरमिति व्यपदेशः । तथाऽनिलात्मकं ग्राहि । अनलात्मकं दीपन-पाचनम् । उभयात्मकं लेखनम् । भूभ्युदकात्मकं हणम् (अ. स. सू. अ. १७) ॥ तस्य च द्रव्यस्य ये शोधन-शमन-ग्राहि-दीपनत्वादयो विशेपास्तेऽप्येकादिमहा- भूतोत्कर्पापकर्पकृता एवेति प्रदर्शनार्थमाह-तत्रेत्यादि । ऊर्ध्वमागिकं यस्यातिशयो वमनं तदग्निमारुतात्मकम्, अग्निमारुतयोलघुत्वादमेरूर्ध्वगमनसंभवाद्वायोग प्लवनत्वात् । पृथिव्युदकात्मकमधोभागिकं यस्यातिशयो विरेचनं, पृथिव्युदकयो- गुरुत्वादधोगमनं तोयस्य निम्नगरवादपि । व्यामिश्रभूतचतुष्टयाधिक्येनोभयात्मकं वमन-विरेचनम् । शमनं यदुक्तभूताधिक्यरहितं नाधो गच्छति नाप्यूर्धमेति केवळ दोषविपरीतगुणमेव, तच्च प्रकृतिविघातकत्वेन पूर्वमुक्तम् । तेनैतदुक्तं-दोपगुण- वैपरीत्यापेक्षया सर्वस्मिन् द्रव्ये सभवति; नस्वेवं शोधनं, तस्य विशिष्टभूताधिक्य- हेतुस्वात् । यत्र त्वेकसिजेव द्रव्ये ऊर्ध्वगत्वाधोगत्व-शमनस्वानां संभवस्तत्र यतो बाहुल्येन कार्यकर्तृत्वं भवति ततो यदेवाधिकं तदेव कार्यकरमिति व्यपदेश इत्यर्थः (इन्दुः)॥ वृद्धवाग्भट लिखते हैं कि-ऊर्ध्वभागिक द्रव्य (वीर्य) जिसके अतिशयसे वमन होता है, वह अग्नि और वायुको अश्रित करके रहता है । अधोभागिक द्रव्य पृथिवी और जलकी अधिकतासे उत्पन्न होता है। उभयतोभाग द्रव्य अग्नि, वायु, पृथिवी और जलकी अधिकतावाला होता है । वातादिशमन द्रव्य तत्तत् दोषसे विपरीत गुणवाला होता है। ग्राहि द्रव्य वातकी अधिकतावाला होता है । दीपन और पाचन द्रव्य अनिके गुणोंकी अधिकतावाला होता है। लेखन द्रव्य वायु और अग्निकी अधिकतावाला होता है। बृंहण द्रव्य पृथिवी और जलके गुणोंकी अधिकतावाला होता है। उपयुज्यमानानां द्रव्याणा वीर्य कदोपलभ्यते १- वीर्य यावदधीवासान्निपाताचोपलभ्यते । (च. सू. अ. २६)। अघीवासः सहावस्यानम् । यावदधीवासादिति यावच्छरीरनिवासात् । एतब विपाकात् पूर्व, निपातायोवं ज्ञेयम् । निपाताचेति शरीरसयोगमात्रात् । तेन किंचिद्वीर्यमधीवासादुपलभ्यते, यथा-आनूपमासादेष्णस्व; किंचिञ्च निपातादेव लभ्यते, यथा-मरीचादीनां तीक्ष्णत्वादि; किंचिन्छ निपाताधीवासाभ्यां, यथा- मरीचादीनामेव । एतेन रस. प्रत्यक्षेणैव, विपाकस्तु नित्यपरोक्षः, तत्कार्येणानुमीयते। ।
-- पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २७७ । - - वीयं तु किञ्चिदनुमानेन, यथा-सैन्धवगत शैत्यम्, भानूपमांसगतमोष्ण्यं वा; किंचिद वीर्य प्रत्यक्षेणैव, यथा-राजिकागत तैक्षण्यं घ्राणेन, पिच्छिल-विशद- खिग्ध-रूक्षादयः चक्षुः-स्पर्शनाभ्यां निश्चीयन्त इति वाक्यार्थः । एतच वीयं सहज कृत्रिमं च ज्ञेयम् । एतच यथासंभवं गुरु-लघ्वादिपु वीर्येषु लक्षणं ज्ञेयम् । एतष्ठ सक्षणं पारिभापिकवीर्यविपयमेव ज्ञेयम् (च. द.)। xxxxx तेनाघिवसनेन च । वीर्यxxxxxxxxxx॥ (अ. सं सू. अ. १७)। यत्र तु द्रव्ये विपरीतत्वादसेनाभिभूतं वीर्य निपातमात्रान ज्ञायते तत्र काला- धिवासेन देहमार्दवादिकरणाज्ज्ञायते (इन्दुः)॥ कुछ उपयुज्यमान द्रव्योंके वीर्योका ज्ञान निपातसे अर्थात् जिह्वा या खगिन्द्रियके साथ उनके सयोगमात्रसे होता है, जैसे काली मिर्च आदिके तीक्ष्णव आदिका ज्ञान निपातसे होता है; कुछ उपयुज्यमान द्रव्योंके वीर्योका ज्ञान अधिवाससे अर्थात् जबतक वे शरीरमें रहें तबतक शरीरपर होनेवाली उनकी क्रियाओंसे होता है, जैसे आनूपमासके उष्णत्वका ज्ञान जबतक वह शरीरमें रहता है तबतक शरीरपर होनेवाली उसकी क्रियाओंसे अनुमान किया जाता है, कुछ द्रव्योंके वीर्योंका ज्ञान निपात और अधिवास दोनोंसे होता है, जैसे-काली मिर्च आदिके उष्णत्वका ज्ञान निपात और अधिवास दोनोंसे होता है। वीर्यका जान निपातके बाद और विपाकके पूर्व होता है (यह पारिभाषिक वीर्यका लक्षण है, शक्तिरुप वीर्यका लक्षण नहीं है)। प्रभावनिरूपणम्- रस-वीर्य-विपाकानां सामान्य यत्र लक्ष्यते । विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ।। कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः। तद्वदन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ।। विषं विषघ्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् । ऊर्वानुलोमिकं यच्च तत् प्रभावप्रभावितम् ।। मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् । तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥ (च. सू. अ. २६)। १ मधुरादि रौंका ज्ञान प्रत्यक्षसे (जिह्वेन्द्रियसे) होता है। विपाक नित्य परोक्ष है। विपाकका शान उसका कार्य देखकर अनुमानसे किया जाता है । वीर्यका शान कुछ अनुमानसे, जैसे-सैन्धवगत शैत्यका और आनूपमासगत औष्ण्यका, तथा कुछ प्रत्यक्षसे, जैसे-राजिकागत तैधण्यका ज्ञान प्राणेन्द्रियसे और पिच्छिल-विशद-लिग्ध-रूक्ष आदिका शान नेत्र और स्पर्शनेन्द्रिय( त्वचा ) से होता है (च. द.)। . -- ॥ - .
२७८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । प्रभावलक्षणमाह-रस-वीर्येत्यादि । सामान्यमिति तुल्यता। विशेषः कर्मणामिति दन्त्याघाश्रयाणां विरेचनरवादीनां सामान्यं लक्ष्यत इत्यनेन रसादिकार्यस्वेन यन्नावधारयितु शक्यते कार्य तत् प्रभावकृतमिति सूचयति, अत एवोक-प्रमावो. अचिन्त्य उच्यते; रस वीर्य-विपाककार्यतयाऽचिन्त्य इति । अस्यैव दुरभिगमवावु. दाहरणानि बहून्याह-कटुक इत्यादिना । तद्वदिति चित्रकसमानगुणा । विषप्रमुज मिति "तसादंष्ट्राविपं मौलं" (च. चि. भ. २३) इत्यादिना । ऊर्ध्वानुलोमिकमिति युगपदुभयभागहरं किंवा अर्ध्वहरं तथाऽनुलोमहरं च । कर्म यद्विविधात्मकमिति विषहरण-शूलहरणादि । एतच्चोदाहरणमात्रं, तेन जीवन-मेध्यादिद्रव्यस्य रसायचिन्त्यं सर्व 'प्रभाव' इति ज्ञेयम् । प्रभावश्चेह द्रव्यशकिरभिप्रेता, सा च द्रव्याणां सामा- न्यविशेपः दन्तीत्वादियुक्का शक्तिरेव, यतः शक्तिर्हि स्वरूपमेव भावानां, नातिरितं किंचिद्धर्मान्तरम् , एवं प्रदेशान्तरोकगुणप्रभावादिप्वपि वाच्यं; यथोक-"द्रव्यामि हि द्रव्यप्रभावाद्गुणप्रभावात्" (च. सू. २६) इत्यादि । न च वाच्यं दन्त्यादि स्वरूपत एव विरेचयति, तेन किमिति जलाद्युपहता दन्ती न विरेचयतीति प्रतिवन्धकाभावविशिष्टस्यैव प्रभावस्य कारणत्वात् , जलोपहतायां दन्त्यां जलोपघातः प्रतिवन्धक इत्याद्यनुसरणीयम् । नैयायिकशक्तिवादे या च विषस्य विषमस्वे उपपत्ति- रुका अर्ध्वाधोगामित्वविरोधलक्षणा साऽन्तर्भागत्वात् प्रभावादेव भवति; एव- मूर्वानुलोमिकत्वादौ पार्थिवत्वादिकथनेऽपि वाच्यम् (च. द.)। प्रभावोऽचिम्स- क्रियाहेतुवीर्यमेवेति शक्तिविशेष एव 'प्रभाव' इत्यभिधीयते ।xxx। सामान्य- मिति तुल्यता; कर्मणां विशेषः न तुल्यतेत्यर्थः । एतेन द्रव्ययोयो रसादिसाम्ये सत्यप्येकसिन् द्रव्ये जायते कार्यविशेषः, इतरत्र तु न जायते, इत्यत्र यत् कारणतया वाच्यं तदेव प्रभाव इत्यर्थः । तद्वदिति चित्रकतुल्यरस-विपाका । एतेन रसायै- स्तुल्यायामपि दन्त्यां यद्विरेचकत्वरूपं विशिष्टं कर्म तत् स्वकारणं प्रभावमनुमापय- तीत्यर्थः । तथा रसादिजन्यत्वेन यत् कार्य नावधारयितुं पार्यते तदपि प्रभावकृतमेव मन्तव्यं; यथा मण्यादीनां विषहरणादि कर्म (शि.)। यत्र द्रव्ये रस-वीर्य- विपाकानां सामान्यम् अन्यैः सह साम्यं लक्ष्यते, कर्मणां पुनर्विशेषः, तस्य द्रव्यस्य स विशिष्टकर्महेतुः प्रभावः स्मृतः । तन्न दृष्टान्तमाह-कटुक इत्यादि । चित्रका कटुकरसः, पाके कटुविपाकः, वीर्येण चोष्णो मतः; दन्ती तद्वत् चिनक इव कटुरसा, कटुविपाका, वीर्योष्णा च; किं तु प्रभावात् सा दन्ती नरं मानवं विरेचयति, न चित्रकः । दन्ती-चित्रकयो रस-वीर्य-विपाकानां तुल्यत्वेऽपि दन्त्या यद्विरेचनरूपं विशिष्टं कर्म तत् प्रभावादेव । विपं विषघ्नं यदुक्तं तत्र प्रभावः कारणम् । यत् ऊर्ध्वम् ऊर्ध्वभागहरम् , भानुलोमिकम् अधोभागहरं वमन-विरेचनरूपं द्रव्याणां कर्म, तत् प्रभावेण प्रभावितं जनितम् । मणीनां धारणीयानामोषधीनां प विविधात्मकं विषहरण-शूलहरण-शल्याकर्षणादिकं कर्म तत् तेषां प्रभावकृत।
- पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २७९ - तस्मात् प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते । x x x । (यो.)। ननु द्रव्याणां गुणाः कर्माणि च दश्यन्ते पदार्थाः, द्रव्यप्रभावश्च कीटश इति ? अन उच्यते-रसेत्यादि । यत्र वस्तुनि रस-वीर्य-विपाकानां सामान्य यस्य रसस्य यत् कार्य, यस्य विपाकस्य यत् कार्य, यस्य वीर्यस्य च यत् कार्य तत्तस्य सामान्य यत्र वस्तुनि लक्ष्यते, तत्र कर्मणां यो 'विशेपो लक्ष्यते स कर्मणां विशेपस्तस्य वस्तुनः प्रभावः स्मृतः । तदुदाहरति-कटुक इत्यादि । चित्रक' कटुको रसे पाके च, वीयें चोष्णः, तस्य तस्य कार्य सामान्यं कटुरसस्य यत् कार्य, कटुविपाकस्य यत् कार्यम् , उष्णवीर्यस्य च यत् कार्य वल्लक्ष्यते, न चाधिकं कर्म लक्ष्यते; तद्वदन्ती रसे पाके च कटुका, वीर्य चोप्णा, तसविपाक-वीर्याणां कर्माणि शुक्रननादीनि यानि तेपु मध्ये सामान्य लक्ष्यते, विशेपस्तु विरेचन कर्म लक्ष्यते, वत् प्रभावान्मानवं विरेचयति । अपरं च चिप- मित्यादि । विपं विपन्न यदुक्तं जगमविपन्नं स्थावरविपं, स्थावर विपन्न जङ्गमविपं, विपरीतगतित्वात् ; जगमविपमूर्ध्वग स्थावरविपमधोगमिति परस्पर गतिविपरीत- त्वेन मिथो नाशकमपि, यद्गति विपर्ययः स प्रमावादेवेति । यच्चोर्वानुलोमिक द्रव्यं मदनादि-त्रिवृतादिकं तदपि प्रभावप्रभावितम् । एवं चन्द्रकान्तादीनां मणीनां ग्रहपीडादिशान्तिरपामार्गमूलादीनां धारणीयानां यहाह-विषादि-ग्रहपीढादिप्रशम- नादिकं विविधात्मकं कर्म दृश्यते तेषां प्रभावकृतं तत् , तत् कर्म न तु रस-पाक- वीर्यकृतं भवति । ननु, येन या क्रिया क्रियते तस्यां क्रियायां तस्य तवीर्यमुक्तं, ततो वीर्यमेव प्रभावः, कथं वीर्यसामान्ये कर्मविशेप एवं प्रभावोऽतिरिच्यत इति । अत आह, प्रभावोऽचिन्त्य उच्यत इति । येन कुर्वन्ति तद्वीर्यमिति साधारणलक्षणेन रस-पाक-शब्द-स्पर्शादि-गुरु-लाघवादीनि कर्माणि च सर्वाणि वीर्याणि भवन्ति । तत्र यस्य यत् कर्म तत् तस्य चिन्तया निर्वक्तुं शक्यं, तद्व्यतिरिक्तं द्रव्यस्य यत् कर्मविशेषः सोऽचिन्त्यः, तत्तद्रस-पाक-गुण-कर्मभिः कार्यतया चिन्तयितुमशक्यः, ततः प्रभावः शक्तिविशेष उच्यते । प्रभवनं प्रभाव. सामथ्य स्वस्वारम्भकद्रव्यसंयोगे समवेतानां तेपा द्रव्य-गुण-कर्मणां द्रव्य-गुणयोः सजातीयारम्भकत्वात् तत्र द्रव्यात् सजातीय- द्रव्यान्तरं जायते, गुणात् सजातीयगुणान्तरं जायते, कर्मणां तु सजातीयकर्मारम्भ- करवनियमाभावात् कर्मसाध्यकर्माभावाच यत्र विजातीयं कर्म तदारम्भकद्रव्याणां कर्माण्यारभते, तद्विजातीयं कर्म खल्वचिन्त्यं, स प्रभाव उच्यते । कार्यभूतं कर्मेदं, कर्मपदार्थः प्रभावः । कार्यद्रव्यं दन्त्यादिकं तत्कर्म विशेषेण स्वीयेन प्रभावेण 'विरेचनादि कर्म करोतीति (ग.)॥ रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम् ॥ दन्ती रसायैस्तुल्याऽपि चित्रकस्य विरेचनी । मधुकस्य च मृहीका घृतं क्षीरस्य दीपनम् ॥ १ "कर्म कर्मसाध्य न विद्यते" (वै द. ११११११)। । - -- । २८० द्रव्यगुणविज्ञानम् । कटुपाक-रस-स्निग्ध-गुरुत्वैः कफवातजित् । लशुनो वात-कफन्न तु तैरेव यहुणैः ॥ मिथो विरुद्धान् वातादीन् लोहिताद्या जयन्ति यत् । कुर्वन्ति यवकाद्याश्च तत् प्रभावविजृम्भितम् ॥ शिरीषादि विषं हन्ति स्वप्नाचं तद्विवृद्धये । मणि-मन्त्रौषधीनां च यत् कर्म विविधात्मकम् ॥ शल्याहरण-पुंजन्म-रक्षायुर्थी-वशादिकम् । दर्शनाद्यैरपि विषं यन्नियच्छति चागदः ॥ विरेचयति यदृष्यमाशु शुक्र करोति वा । ऊर्ध्वाधोभागिकं यच्च द्रव्यं यच्छमनादि च ॥ मात्रादि प्राप्य तत्तञ्च यत् प्रपञ्चेन वर्णितम् । तच्च प्रभावजं सर्वमतोऽचिन्त्यः स उच्यते ॥ रसेन वीर्येण गुणैश्च कर्म द्रव्यं विपाकेन च यद्विध्यात् । सद्योऽन्यथा तत् कुरुते प्रभावाद्धेतोरतस्तत्र न गोचरोऽस्ति । (अ. से. सू. अं. १७)। एवं रसाद्या ज्ञाताः, प्रभावस्तु न ज्ञातः, भतस्तद्विज्ञानार्थमुच्यते-रसादीत्यादि। रर्स-वीर्य-विपाकानां परस्परसाम्येऽपि यद्यद्विशिष्टं कर्म दृश्यते तत्तत् प्रभावजं विद्धि । एतावतेतदुक्तं भवति-विशिष्टा सर्वातिशायिनी द्रव्यशक्तिः 'प्रभाव'शब्दवाच्या । तस्य च प्रभावजस्य कर्मण उदाहरणमुच्यते-दन्तीत्यादि । दन्ती रसायश्चित्रकस्य तुल्याऽपि विरेचनी, न तु चित्रकमपि विरेचनमिति प्रभावकर्म । मधुकस्य रसायैः सदृश्यपि द्राक्षा विरेचनी, न मधुकमिति प्रभावकर्म । क्षीरस्य रसायैः सदशमपि घृतं दीपनं, न क्षीरमिति प्रभावः । लशुनः कटुरसत्वेन कटुविपाकित्वेन कफजित् , स्निग्धत्वेन गुरुत्वेन वातजित् , स लशुन' स्वैरेव गुणैर्वातकफो न करोतीति प्रभावः। तनैतदुक्तं भवति-कटुकरस-विपाकौ तु लशुने कफच्छिश्वे द्रव्यप्रभावाद पर्याप्तौ, न तु वातकरत्वे, तथा तत्र सिग्धत्वं गुरुत्वं च वातजित्वे द्रव्यप्रभावादेव पर्याप्तं, न तु श्लेष्मकरत्व इति । परस्परविरुद्धानपि वातादीन् रक्तशालिः स्निग्धस्वेन गुरुत्वेन नाशयति, यवकश्च तानेव करोतीति प्रभावकर्म । शिरीष हरिद्रादिक विष नाशयति, स्वम-मेघादि च तदेव विषं वर्धयति, तत् प्रभावकर्म । वृष्यं च द्रव्यं यच्छीघ्रमेव शुक्रं वर्धयति बहिर्विरेचयति वा, तत् प्रभावकर्म । यध द्रव्यं मदन- फलादि अवं देहे गच्छति, हरीतक्यादि वाऽध., तत् प्रभावात् । अन्यच्च शमनं प्रभावादेव । यच्च मात्रादिप्रकरणे प्रपञ्चेन विस्तरेण वर्णितं तत् प्रभावजं विद्धि । अतः प्रभावस्य तत्स्वभावत्वात् स प्रभावोऽचिन्त्यः, कीदृश.? कदा? कुतस्त्यः ? इति ज्ञातुं न शक्यते । सदपि तस्कारणं महाभूतविशेषपरिणामाख्यमस्सद्विधैस्तत्राधिगन्तुं पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः। २८१ - न शक्यत इत्यर्थः । एतमेव प्रभावार्थमुपसंहरति--रसेनेत्यादि । रसादिभिः काणैव्यं यत् कर्म करोति तत् प्रभावेणान्यथा कुरुते विपरीतयतीत्यर्थः । अतस्तस्य प्रभावहेतोर्मार्गणा ने शक्यते, तथाविधभावस्वभावत्वात् (इन्दुः.)॥ रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम् । दन्ती रसायैस्तुल्याऽपि चित्रकस्य विरेचनी ॥ मधुकस्य च मृद्वीका, घृतं क्षीरस्य दीपनम् । (अ. . सू.अ.९)। ननु, 'द्रव्य-रस-विपाक-वीर्याणि कर्मानुमानेन यथास्वरूपाण्येवावगच्छामः, प्रभावस्य तु न ज्ञायते कीदृशं कर्म ? इत्यत माह-रसादीत्यादि । द्वयोव्ययो रसादीनां रस-धीर्य-विपाकानां साम्ये सति, यदेकं द्रव्यमन्यत् कर्म कुरुते, अन्यत् पुनरन्यद्विशिष्टं कर्म, तत् प्रभावज प्रभावाजातमिति ज्ञेयम् । अयमस्य द्रव्यस्य प्रभाव इति विशिष्टकर्मकरणान्निश्चीयत इत्यर्थः । ननु, प्रभावः क उच्यते ? इति चेद् घूमः-रस-वीर्य-विपाकादिगुणातिशायी द्रव्यस्य स्वभावो यः, स प्रभावः । उक्तं च-"रस-वीर्य-विपाकादिगुणातिशयवानलम् । द्रव्यस्वभावो निर्दिष्टो यः प्रभावः स कीर्तितः ॥” इति । अन्न निदर्शनार्थमाह-दन्तीत्यादि । चित्रकस्य 'रस-वीर्य-विपाकैस्तुल्याऽपि दन्ती रसादिभ्योऽतिशायिव्यस्वभावयोगाद्विरेचनी, न चित्रका, मधुकस्य' च मृद्वीको तुल्याऽपि रसादिभ्योऽतिशायिव्यस्वभावयोगात् मृद्धीका विरेचनी, न मधुकं घृतं क्षीरस्य ' रसादिभिस्तुल्यमपि 'धृतं दीपनं, न पुनः क्षीरम् । अन्ये प्रभावलक्षणमन्यथाऽऽहुः-प्रतिवस्तु स्वसंज्ञाप्रवृत्तिनिमित्त- लक्षणो यो धर्मस्व-तलादिप्रेत्ययप्रतीतिसमधिगम्यः स प्रभावः। तघ्रान्तरे चोक्तं- "वस्तूनां यः स्वसंज्ञायाः प्रवृत्ती कारणं स्मृतः । स्व-सलादिप्रबोध्यश्च प्रभाव इति स स्मृतः॥" इति । एवं च 'दन्तीत्वादन्त्या विरेचनकारित्वं प्रभावः, चित्रकस्य 'चित्रंकवादविरेचनकारिरेवं प्रभावः, एवं मृद्वीकात्वान्मृद्धीकाया विरेचनकारित्वं प्रभावा, इत्यादिसकलपदार्थेषु बोध्यम् (अ. द.) । प्रेभावं लक्षयति-रसादि- साम्य इति । द्वयोर्द्रव्ययो रसादिसाम्ये सत्यप्येकस्य यद्विशिष्टं कर्म दृश्यते, तत् प्रभावजम् । तत्र यो द्रव्यधर्मों हेतु. स प्रभाव इत्यर्थः । प्रभावमुदाहरति- दन्तीत्यादि । मधुक-मृद्वीकयोः क्षीर-घृतयोश्च मधुररस-पाकत्वेन शीतवीर्यत्वेन च साम्येऽपि मृद्वीकैव विरेचनी न मधुकं, घृतमेव दीपनं न क्षीरम् (हे.) । जिस द्रव्यमें रस, वीर्य और विपाकका सामान्य हो अर्थात् उस द्रव्यमें रहे हुए रस, विपाक और वीर्यके जो कार्य आयुर्वेदशास्त्रमें कहे हुए हैं वे समान हों (शास्त्रकथना- नुसार हों), परंतु कर्ममें विशेषता हो अर्थात् उसमे रहे हुए रस, वीर्य और विपाकके काँसे भिन्न ही कर्म देखनेमें आवें, उस विशेष (भिन्न ) फर्मका कारण प्रभाव है। जैसे-चित्रक रसमें कटु है, उसका विपाक कट होता है और उसका वीर्य उष्ण है। ।
-- - २८२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । चित्रकमें कटु रसका, कटु विपाकका और उष्ण वीर्यका जो कार्य शास्त्रमें कहा गया है वही देखनेमें आता है, उनसे विपरीत कोई विशेष कार्य देखनेमें नहीं आता; परंतु दन्ती चित्रकके समान रस, वीर्य और विपाकवाली अर्थात् रसमें कटु, विपाकमें कटु और उष्ण वीर्यवाली है, किन्तु उसमें इन रस, वीर्य और विपाकके कार्योंसे विशेष- भिन्न विरेचनरूप कर्म देखने में आती है; दन्तीके इस विरेचनरूप कर्मका कारण प्रभाव है । एक विष जो दूसरे विषका नाश करता है उसका कारण उस विषमें रहा हुआ प्रभाव है । वामक और विरेचक द्रव्य जो वमन और विरेचन कराते हैं उनमें भी प्रभाव ही कारण है। क्योंकि उसके समान रस, वीर्य और विपाकवाले अन्य द्रव्य वमन या विरेचन नहीं कराते । नाना प्रकारके रत्नोंके तथा अन्य वनस्पति आदि द्रव्योंके धारण करनेसे जो विविध प्रकारके कर्म होते हुए देखनेमें आते हैं वे उनके प्रभावसे ही होते हैं । (च.)। मुनक्का मुलेठीके समान होनेपर भी मुलेठी विरेचन नहीं कराती और मुनक्का विरेचन कराती है, घृत दूधके समान होनेपर भी' दूध दीपन नहीं है परंतु घृत दीपन है, लहसुन कटुविपाक, कटुरस और स्निग्ध तथा गुरु वीर्यसे कफ और वातका नाश करनेवाला है परंतु उन रस, विपाक और वीर्यसे वात तथा कफको उत्पन्न नहीं करता, परस्परविरुद्ध गुणवाले वात, पित्त और कफ ' तीनों दोषोंका रक्तशालि नाश करता है, परंतु यवक उनको उत्पन्न करता है; सिरस आदि द्रव्य विषका नाश करते हैं और निद्रा आदि विषको बढ़ाते हैं, मणि, मन्त्र और ओषधियोंके धारण करनेसे नाना प्रकारके कर्म देखे जाते हैं; शल्योंका आकर्षण, पुत्र प्रजा उत्पन्न करना, राक्षसादिसे रक्षा करना, रसायनोंका आयुष्य बढ़ाना, शंखपुष्पी आदिका मेधाको बढ़ाना, मन्त्रादिसे किसीको वश करना, अगदका दर्शन आदिसे विषका नाश करना, वाजीकर द्रव्योंका शीघ्र शुक्र उत्पन्न करना, मदनफलका वमन कराना, हरीतकीका विरेचन कराना, आँवलेका तीनों दोषोंका शमन करना यह सब कर्म प्रभावसे ही होते है (अ. सं.) अत. प्रभाव अचिन्त्य है; अर्थात् रस, वीर्य, और विपाकसे उसकी कल्पना नहीं की जा सकती (रस, वीर्य और विपाकसे उनका कार्यकारणभाव नहीं दिखाया जा सकता)। रससे, वीर्यसे, गुणसे या विपाकसे द्रव्य जो कार्य करता है उससे भिन्न ही कार्य प्रभावसे करता है । उसका हेतु (कार्य- कारणभाव ) समझना कठिन है। वक्तव्य-द्रव्यगत कार्यकारिणी शक्तिको वीर्य कहते हैं । वह शक्ति दो प्रकारकी होती है-एक चिन्त्य शक्ति और दूसरी अचिन्त्य शक्ति । चिन्त्य शक्ति वह है जिसका द्रव्योंके पाचभौतिक संगठन, रस, गुण या विपाकद्वारा कर्मके साथ कार्य-कारण-सबन्ध दिखाया जा सके, इस चिन्त्य शक्तिको आयुर्वेदकी परिभाषामें वीर्य कहा जाता है । अचिन्त्य शक्ति वह है जिसका द्रव्यों के पाञ्चभौतिक संगठन, गुण, रस या विपाकद्वारा १ - - पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । - - उनके कर्मके साथ कार्य-कारणसंबन्ध न दिखाया जा सके, उसको आयुर्वेदकी परिभाषामें प्रभाव कहते हैं। अमीमांस्यान्यचिन्त्यानि प्रसिद्धानि स्वभावतः। आगमेनोपयोज्यानि मेषजानि विचक्षणः ॥ प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाश्च स्वभावतः। नौषधीतुभिर्विद्वान् परीक्षेत कदाचन ॥ सहनेणापि हेतूनां नाम्वष्ठादिर्विरेचयेत् । तस्मात्तिष्ठेत्तु मतिमानागमे न तु हेतुषु ॥ (सु. सू. अ. ४०)। ययोकमेषजानां स्वबुद्ध्या विचारनिषेधं निदर्शयन्नाह-अमीमांस्यानीत्यादि । अमीमांस्यानि न विचार्याणि, अचिन्त्यानि यान्येवाचिन्त्यानि तान्येवामीमांस्यानि । कानि पुनस्तानि ? खदिर-तुवरक-रसाञ्जन-हरिद्रादीनि कुष्ठनानि, न तु सर्वाणि द्रव्याणि अन्यथा “वर्गमपि वर्गेणोपसृजेत्" (च. वि. अ.८), तथा "बीजेनानेन मतिमान कुर्यादतिशतान्यपि" (सु.चि. भ. ३८) इत्यादि विरुद्धं भवेत् । स्वभावतो जन्मतः । भन्ये तु भागमे यानि मेषजानि प्रसिद्धानि तान्यमीमांस्यानि अविचारणीयानि, कुतो हेतोरविचार्याणि ? यतः स्वभावतोऽचिन्त्यानि तेषां स्वभावश्चिन्तयितुं न शक्यत इत्यर्थः; यथा द्रवत्वमपाम्, उष्णस्वमने, इत्यादि । कथं पुनस्तानि प्रयोज्यानी- स्याह-मागमेनोपयोज्यानि, आगमेनैवैकेनोपयोगः कार्य इत्यर्थः । ननु, अनुमान- विरुद्धानि कथमागमैकप्रयोज्यानीत्याशय, आगमस्य प्रत्यक्षफलस्वेन बलीयस्त्वं दर्शयबाह-प्रत्यक्षेत्यादि । प्रत्यक्षलक्षणफला हिताहितभेदेन । कुतः पुनर्हेतुभिर्न परीक्षणीयं मेषजं प्रसिद्धलक्षणफलमित्याह-सहस्रणेत्यादि (ड.) । इदानीं द्रव्यादिविषये परीक्षारूपमीमांसाया दर्शितवादचिन्त्यद्रव्यस्वभावेऽपि मीमांसा वो मा भूदित्याह-अमीमांस्यानीत्यादि । अचिन्त्यानि यानि मेषजानि, यथा-दन्ती चित्रकसमाऽपि विरेचयति, यथा-विषं विषं हन्ति, लोहाकर्पकमणिलोहमाकर्षती- स्यायुक्तानि आगमावधारितानि मीमांसया अपरीक्ष्याणिः कथं तर्हि तानि ज्ञातव्या- नीत्याह-प्रसिद्धानि स्वभावतः । आगमादेव पर प्रसिद्धानि भवन्तीत्यर्थः । एतेन यानि चिन्त्यानि मेपजानि तेषां मीमांसा कर्तव्यैव, यदुच्यते-"दव्याणां तरसमानानां तत्रावापो न दुष्यति" ('सु. चि. अ. १) इति; तथा "स्वयमप्यत्र भिपजा तक्यं बुद्धिमता भवेत्" इत्यादिष्वागमविरोधाध्यवसायः । आगमस्यैवात्र बलवत्वं दर्शयशाह-प्रत्यक्षेत्यादि । प्रत्यक्षेण लक्ष्यते दृश्यते फलं येषां दन्ती-विष- हरमणिप्रभृतीनां ताः प्रत्यक्षलक्षणफलाः । प्रसिद्धा इति आगमप्रसिद्धाः । स्वभावत इति अचिन्त्यस्वरूपतो विरेचकत्व-स्तम्भनस्व-विषहरस्वादेः । हेतुभिरिति आगम- विरुदैः कुहेतुभिः, मागमानुगुणैः सन्देतुभिर्भेषजादीनि सर्वाण्येव परीक्ष्याणि; यदुक्तं - .
1 २८४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । चरके-"न चैकान्तेन निर्दिष्टेऽप्यत्राभिनिविशेदुधः । स्वयमप्यत्र भिषमा तक्य बुद्धिमता भवेत् ॥" (च. सि. अ. २) इत्यादि । इहापि "स्वबुधा चापि विभजेत् कषायादीनि योगवित्" (सु. चि. अ. १) इत्यादि । स्वागमस्यानुमाना- बाधनीयत्वमेवोदाहरणनिष्ठमाह-सहस्रेणापीत्यादि । सहस्रशब्दो विपुलवचनः । अम्बष्ठादिः संग्राहकत्वेन प्रागुको गणः । अत्र 'अम्बष्ठादिविरेचयति, पृथिवी-तोय. गुणयुकत्वात् , त्रिवृतादिवत्' इत्यादिवहुकुहेतुभिरपि आगमबाधितैर्नाम्बष्ठादिविरे- चयति, किं त्वागमोक्त संग्रहणमेव करोति । उपसंहरति-तस्मादित्यादि । तिष्ठेदिति स्थैर्येण तिष्ठेत् । हेतुष्विति भागमविरुद्धेषु हेतुपु (च. द.)। नन्विदमुक्कं "तद्रव्यमात्मना किंचित् किंचिद्वीर्येण सेवितम्" इत्यादि, न चायमस्ति नियमः खल्वेवंजातीयं द्रव्यमेवंजातीयेन साधनेन दोषं हन्ति करोति वेति, दृश्यते हि मधुरोऽयमिक्षुरसः पित्तं शमयति, तथाविधाश्च मरस्याः पुनरेन- द्वर्धयन्तीति, तद्भूयोऽपि युक्त्या समन्वीय विशद विज्ञापयतु भगवान् , येन वयं रस-वीर्य-विपाक-प्रभावाननुसंधाय व्यापदः प्रशमार्थ तं तं द्रव्यविशेष यथा- वदुपयोक्तुं प्रभविष्याम इत्यत आह-अमीमांस्यानीत्यादि । सर्वमिदं निगर- व्याख्यातम् (हा.)॥ जिन द्रव्योंकी कार्यकारिणी शक्ति युक्ति और तर्कसे सिद्ध नहीं होती तथा जो विरेचकत्व, स्तम्भकल, विषहरख आदि अपने स्वभावसे ही शास्त्रमें प्रसिद्ध हैं उन द्रव्योंका उपयोग व्यवहारकुशल वैद्य शास्त्रके आधारपर ही करे । जिन ओषधियोंका फल-कर्म प्रत्यक्ष देखा जाता है और जो खभाव( विरेचकल, विषहरव आदि अपने कर्मे )से शास्त्रमें प्रसिद्ध हैं उन ओषधियोंकी विद्वान् वैद्य (शास्त्रविरुद्ध ) तर्क और युक्तियोंसे परीक्षा न करे । क्योंकि अम्वष्ठादि गणकी ओषधियाँ हजारों तर्क और युक्तियों से यह विरेचन करती है ऐसा सिद्ध किया जाय तो भी विरेचन नहीं करती । इसलिये बुद्धिमान् वैद्य अचिन्त्य और प्रत्यक्ष फलवाली ओषधियोंके विषयमें शास्त्रके वचनोंपर विश्वास रखकर उनका प्रयोग करे, युक्ति और तर्कसे उनका कार्य सिद्ध करनेका यन न करे। विचित्र प्रत्ययारब्धद्रव्यकर्माणि- इति सामान्यतः कर्म द्रव्यादीनां, पुनश्च तत् । विचित्रप्रत्ययारब्धद्रव्यभेदेन भिद्यते ॥ (अ. ह. सू. अ. ९)। १ इन श्लोकोंकी व्याख्याके ऊपर अपने वक्तव्यमें डॉ भा. गो. घाणेकरजी लिखते हैं कि-"आयुर्वेदमें ओषधियोंके वैद्यकीय उपयोगोंकी मीमासा या उपपत्ति उनके पञ्चतत्त्वात्मक संगठन, रस, गुण, वीर्य और विपाककी सहायतासे की जाती है । रसादिद्वारा चिकित्सा प्रयुक्त हुई अधिकसख्य ओषधियोंके उपयोगोंकी कार्यकारणमीमासा ज्ञात हो जाती है । तथापि खदिर, तुवरक, विषमणि प्रमृति कुछ द्रव्य ऐसे भी प्रयुक्त होते हैं जिनके उपयोगोंकी + ।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २८५ सामान्य-विशेषाम्यां यतः सकलं व्याप्तम् , अतो ग्रन्थकार इदमाह-इतीत्यादि । इति प्रकारे, अनेन प्रकारेण द्रव्य-रस-वीर्यादीनां सामान्येन कर्म व्याख्यातं, न विशेषेण । यरेव महाभूत रस-धीर्यादयो द्रव्याश्रिता मारब्धाः, तैरेव तथाभूतै- स्तदाश्रयमपि द्रव्यम् । मतः सामान्यतः कर्म द्रव्यादीनामुक्तम् । सांप्रतं विशिष्टं कर्म प्रतिद्व्यं वक्तुमिदमाह-पुनश्च तदिति । तत् सामान्योक्तं कर्म द्रव्य-रसादीनां संबन्धि, पुनर्भियते विशिष्यते । केन? इत्याह-विचित्रेत्यादि । विचित्राश्च ते प्रत्ययाश्च विचित्र प्रत्ययाः नानाकारससिवेशविशेषयुक्तानि महाभूवानि, प्रतिसत्त्वं प्राकनशुभाशुभकर्मप्रेरितो विचित्रो महाभूतपरिणाम इत्यर्थः । विचित्रप्रत्ययारब्धं च द्रव्यं च, तस्य मेदो विशेषः, तेन विचित्र प्रत्ययारब्धद्रव्यभेदेन, वत् सामा- न्योक्त कर्म द्रव्यादीनां, भिद्यते नानात्वेन संपद्यते । द्रव्याश्रितस्वादसादीनामपि यत् कर्म तदपि द्रव्यमेदेन भिद्यते । ननु, सर्वमपि देश-कालादिवशाद्विचित्रप्रत्य- यारब्ध, परस्परवलक्षण्याव्याणां; परस्परवलक्षण्ये चपां विचित्र प्रत्ययारब्धस्वमेव कारणं, यशादन्यदिदं द्रव्यमिति रूप-रस-वीर्य-विपाकादिभिर्भिनमुत्पद्यते, तथा प्रतिभासते च, तर किन्नु विचित्र प्रत्ययारधद्रव्यभेदेन भिद्यते इति । अत्रा- चदमहे-सत्यमेतत्, किन्तु विशिष्टद्रव्यस्य संग्रहार्थं विचित्रप्रत्ययारब्धमिति विशेपणं शास्त्रकृता कृतम् । यस्य मेदेन द्रव्ये रस-वीर्यादीनां यत् सामान्योकं कर्म तद्भिग्रते; यस्मिन् द्रव्ये रसादीनामन्यानि महाभूतान्यारम्भकाणि, द्रव्यस्य चारम्भ- काण्यपराणि, तद्व्यं विचिन्नप्रत्ययारब्धम् । तदेवं द्रव्याणां द्वैविध्यं, यतः कानि- मीमांसा रसादिद्वारा नहीं हो सकती है । इसलिये इन ओपधियोंको 'अमीमास्य' या 'अचिन्त्य' कहा है । अमीमास्य या अचिन्त्यका अधं 'रस-वीर्य-विपाकतया अचिन्त्य वा अमीमांस्य वा' ऐसा है । ओपधिगत अचिन्त्य कार्यशक्तिका विवरण इन अन्तिम ३ श्लोकोंमें किया गया है । चरक और वाग्मटने द्रव्यगत इस अचिन्त्यशक्तिको ही 'प्रभाव' कहा है। पाश्चात्य ओपधिविशानमें भी ओषधियोंके वैद्यकीय उपयोगोंके संवन्धमें मीमास्य और अमीमास्य ऐसे दो मेद किये जाते हैं । जिनके उपयोगोंकी मीमासा उपलब्ध वैशानिक तत्त्वोंके अनुसार की जा सकती है उनको मीमास्य या रेशनल (Rational) कहते है। जिनके उपयोगकी उपलग्धि वैज्ञानिक तत्त्वोंके अनुसार नहीं की जा सकती अर्थात् जिनका उपयोग फेवल अनुमवोंपर निर्भर होता है उनको अमीमांस्य या श्मीरिकल (Empherical) कहते हैं । विषमज्वरके लिये कनिन (Quinine ); काला आजार, निद्रारोग आदिके लिये अंजन तथा उसके योग (Antimony and its preparations), रानयक्ष्माके लिये स्वर्ण इत्यादि शर्तिया दवाइयाँ इसी अमीमास्य वर्गकी है । इस अमीमास्य वर्गको आयुर्वेदमें प्रभाव कहते है और पाश्चात्य कल्पनाके अनुसार इम्फीरिकल अक्शन (Empherical action ) कह सकते हैं, यद्यपि प्रभावका पूरा पूरा अर्थ इससे निदर्शित नहीं होता" (स. सपृ. २२५)। .
२८६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । चिगव्याणि येरेव महाभूतैर्यथाविधै रसादय आरब्धास्तैरेव तथाविधैर्महाभूते- स्तदाश्रयाणि द्रव्याण्यप्यारब्धानि, तानि रसादिसमानप्रत्ययारब्धान्युच्यन्ते । तानि च यथायथं तत् कर्म रसायनुगुणं सामान्यात् कुर्वते । यथा-क्षीरेक्षु शर्करादीनि । कानिचित् पुनस्तदानितरसादिसमारम्भकमहाभूतान्यन्यानि, तदाश्रयद्रव्यारम्भका- ण्यन्यानि च महाभूतानि, तैरारब्धानि तानि विचित्रप्रत्ययारब्धानि द्रव्याणि । एतदुक्कं भवति–रसादीनामारम्भकाण्यन्यानि, द्रव्यस्य चारम्भकाण्यन्यथाभूतानि महाभूतानि, नोभयनैकरूपाणीति; तानि च यथायथं रसाधनुगुणं कर्म न कुर्वन्ति, भिन्नत्वाद्धेतुभावस्य । तथा हि-रसादीनामारम्मेऽन्यो हेतुः, अन्यश्न तदाश्रय- द्रव्यारम्भ इति । यथा-मकुष्ठ-यव-मत्स्य-सिंहादीनि । एतानि हि यथारसं न वीर्य-विपाककर्म कुर्वन्ति, विचित्र प्रत्ययारब्धत्वात् । इत्थं यानि रसादिसमानप्रत्य- यारब्धानि द्रव्याणि बहून्यपि तेषां रसोपदेशेन कर्म निर्देष्टुं शक्यते । अत एव हेतोः पण्णां रसानां यो गुणनिर्देशः, तस्य सार्थकत्वम् । रसोपदेशमन्तरेण हि बहुवराणां द्रव्याणां समानरूपाणां क्षीरेक्ष्वादीनां कर्म वक्तुं सुखेन शक्यते । यानि तु विचित्र- प्रत्ययारब्धानि द्रव्याणि तेषां प्रतिद्व्यं कर्मोपदेशं विना यथायथं कर्म वक्तुं न शक्यते (अ. द.)। अध्यायार्थमुपसंहरति-इति सामान्यत इति । द्रव्यादीनां प्रभावान्तानां सामान्योक्तं कर्मापवदति-पुनश्च तदिति । तत् सामान्योकं कर्म, भिद्यते विशिष्यते, अन्यथा क्रियत इत्यर्थः । केन ? विचित्रप्रत्ययारम्धद्रव्यमेदेन; विचित्राः परस्परविलक्षणाः, प्रत्ययाः कारणभूता महाभूतससाताः, तैरारग्धं यद्व्यं तस्य भेदो द्रव्यान्तरविशिष्टत्वं, तेन । पार्थिवाद्यवान्तरसामान्यमेदस्य पूर्व- मुक्तत्वात् 'पुनश्च तत्' इत्युक्तम् । एतदुक्कं भवति-कचिद्रव्ये यादगेव भूतसरातो द्रव्यस्यारम्भकः, ताहगेव रसादीनां, तत् समानप्रत्ययारब्धं, तत् सामान्य- गुणानातिकामति, क्वचिदन्याग्भूतसङ्घातो द्रव्यस्यारम्भकोऽन्याध्यसस्थान्यागु- णस्खेत्यादि, तद्विचित्रप्रत्ययारब्धं, तत् सामान्यगुणानतिकामति । तदर्थ द्रवद्रव्या- नस्वरूपविज्ञानीयाद्यारम्भः (हे.)॥ एतदुदाहरणार्थ ग्रन्थकदाह- खादुर्गुरुश्च गोधूमो वातजिद्वातकृद्यवः । उष्णा मत्स्याः, पयः शीतं, कटुः सिंहो, न शूकरः ॥ अ. ह. सू. म. ९)। स्वादुरसोपेतो गुरुगुणयुक्तश्च गोधूमो मधुररसोपदिष्टं वावजित्त्वं यत् कर्म वन करोति, समानप्रत्ययारब्धस्वात् ; यवस्तु स्वादुरसोपेतो गुरुगुणयुक्तश्च मधुररसोपविष्टं यद्वातजिवं कर्म तन्न करोति, अपि तु वातकृत्त्वमेव करोति, विचित्रप्रस्थयारग्ध स्वात् । मत्स्यः स्वादुरसोपेतो गुरुगुणोपेतश्च न मधुररसोपदिष्टः शीतवीर्यः, । - - +- I J ५. पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २८७ तहि ? उरणयीयः, विचित्रप्रत्ययारधरवात् । क्षीरं च स्वादुरसोपेतं गुरुगुणयुक्त च मधुररसोपदिष्टं शीतवीर्य, समानप्रत्ययारब्धस्वात् । स्वादुरसयुक्तो गुरुगुणयुक्तश्च सिंहो न यथारसं मधुरविपाकः, किं तर्हि ? कटुको विपाके, विचित्रप्रत्ययारब्ध. स्वात् । शूकरो मधुररसयुको गुरुगुणोपेतश्च यथारस मधुरविपाक एव, समान- प्रत्ययारब्धत्वात् । एवं यानि समानप्रत्ययारब्धानि द्रव्याणि तेपां रसोपदेशेनैव गुणा निर्दिष्टा भवन्ति । तथा च मुनिः (च. सू. अ. २६)-"शीतं वीर्येण यद्रव्यं मधुरं रसपाकयोः ।xxx।" इत्यादि । बाहुल्येन च रसादिसमानप्रत्यया- रुधान्येव द्रव्याणीति चेतसि कृत्वाऽऽचार्योऽवोचत् । यथा-(अ. ह. सू. अ. ९) "गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये । रसेपु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योप- चारतः ॥” इति । अत एव च बहुवराणि द्रव्याणि रसादिसमानप्रत्ययारब्धानि, अतो रसोपदेशव्याप्त्या तानि निर्देष्टुं शक्यन्ते, नान्यथा। विचित्र प्रत्ययारब्धानि पुनः कतिपयान्येव द्रव्याणि, तानि प्रतिद्रव्यमेवोपदिश्यन्ते । मुनिनाऽप्ययमों युक्त्यै- पोकः । यथा (च. सू. भ. २६)-"मधुरं किञ्चिदुष्णं स्यात् कपायं तिकमेव च।xxx" इत्यादि । ये च रससंयोगा वक्ष्यमाणाने रसादिसमानप्रत्ययारब्धै- मधुराम्ल-लवण तिक्त कटु-कपायरूपैर्मिथः कल्पनीयाः, न तु विचित्रप्रत्ययारब्धै- मधुराम्ल-लवण-तिक्त-कटु-कपायरूपैः । यस्मात्तेपां न यथाशास्त्रनिरूपिता रस-वीर्य- विपाकादयो विद्यन्ते, विचित्र प्रत्ययारन्धत्वात् [भतो रसोपदेशव्याध्या तैव्यस्ते रससंयोगाः कल्पयितुं न युज्यन्ते] । अयं रससंयोगभेद एवगुणोऽयमेवगुणः, एवंगुणस्वाचामुष्मिन् विपये योज्य एतसिन् विपये चायमिति निर्देष्टुं न शक्यते, अनितिस्वरूपस्वात् । न हि विचिनप्रत्ययारब्धैर्ये रससंयोगाः क्रियन्ते, तेपी स्वरूपं कथमप्यवधारयितु शक्यते । अपि च, समानप्रत्ययारब्धैर्ये संयोगाः करुप्यन्ते, तेषां संयोगिनां वीर्यतो यो विरोध. शीतोष्णलक्षणः, स न दोषाय; ये तु विचित्र प्रत्ययारब्धः संयोगाः कल्प्यन्ते, तेपां संयोगिनां य. शीतोष्णलक्षणो विरोभः, स दोपायेति वेधम् । अन्यथा रसाला-पानकादीनामनेकद्रव्यकृतानामन- भ्यवहार एवं प्राप्नुयात् । वथा, प्रयस्त्रिंशद्वर्गा ये वक्ष्यमाणास्तेपु यदयौगिक तज्जद्यात्, यौगिकं स्वनुकमपि युझ्यात्, इति यद्वक्ष्यते तत्र रसादिसमानप्रत्यया- रब्धमेव योज्यं, न विचित्र प्रत्ययारब्धं, तस्य रसवीर्यविपाकाना निश्चयस्य कर्तुम- शक्यत्वात् । तस्मादित्यादि । यत एवं विचित्रप्रत्ययारब्धं विचित्ररूप, तसादसोप- देशेन न तत् सर्व द्रव्यमादिशेत् , अपि तु रसादिसमानप्रत्ययारब्धमेव द्रव्यं रसोपदेशेन निर्दिशेदिति । (अ. द.)। द्रव्यभेदमुदाहरति-स्वादुरित्यादि । यव- गोधूमयोर्मस्स्य-पयसोः सिंहशूकरयोश्च स्वादुस्व-गुरुत्वाभ्या तुल्यस्वेऽपि यव-मत्स्य- सिंहानां विचित्रप्रत्ययारन्धत्वाद् वातलप्रभावस्वोष्णवीर्यस्व-कटुविपाकित्वानि स्वादुरव-गुरुत्वविपरीतानि । गोधूम-पया-शूकराणां तु समानप्रत्ययारन्धस्वाद् वातन- , २६८ द्रव्यगुणविज्ञातम् । । प्रभावत्व-शीतवीर्यस्व-मधुरविपाकित्वानि स्वादुस्व-गुरुत्वयोरविपरीतानि । 'वात. जित्त्व-वातकृत्त्वाभ्यां तस्कारणभूतौ प्रभावी लक्ष्येते (हे.)॥ जिन द्रव्योंमें द्रव्यारम्भक (द्रव्यको बनानेवाले) महाभूत और रस-वीर्य-विपाकारम्भक महाभूत इन दोनोंका एक ही प्रकारके उत्कर्ष और अपकर्ष (न्यूनाधिकता)से समिवेश (संगठन) हुआ हो, उन द्रव्योंको समानप्रत्ययारब्ध (समान कारणों से बने हुए) द्रव्य कहते हैं । जैसे-दूध; दूधमें द्रव्यारम्भक महाभूत और रस-वीर्य-विपाका- रम्भक महाभूत दोनोंका सन्निवेश एक प्रकारका है। अतः दूधमें रस, वीर्य और विपाक एक दूसरेके अनुकूल ही होते हैं । अत ऐसे द्रव्योंके समग्र कर्म केवल रसो- पदेशसे ही कहे या जाने जा सकते हैं। जिन द्रव्योंमें द्रव्यारम्भक महाभूत और रस- वीर्य-विपाकारम्भक महाभूत इन दोनोंका एक दूसरेसे भिन्न प्रकारके उत्कर्षांपकर्षसे सनिवेश हुआ हो उनको विचित्रप्रत्ययारब्ध (विचित्र-विभिन्न प्रकारके कारणोंसे बने हुए) द्रव्य कहते हैं । ऐसे द्रव्योंमें उनके रस, वीर्य और विपाक भिन्न प्रकारके होनेसे उसके कर्म भिन्न प्रकारके होते हैं । जैसे-जौ । इस अध्यायमें हमने जो रस, वीर्य और विपाकके कर्म कहे हैं वे समानप्रत्ययारब्ध द्रव्यके ही जानने चाहिये। विचित्रप्रत्ययारब्ध द्रव्योंमें उनके कर्म रस, वीर्य और विपाकसे भिन्न प्रकारके होते हैं; अत. उनके कर्म केवल रसोपदेशसे न कहकर शास्त्रकारोंने स्वतन्त्ररूपसे कहे हैं । क्यों कि विचित्र प्रत्ययारब्ध द्रव्योंके कर्म उनके रस, वीर्य और विपाकसे भिन्न प्रकारके होते हैं । जैसे-गेहूँ और जौ दोनों मधुररसवाले और गुरु हैं, परंतु गेहूँ समायप्रत्यया- रब्ध होनेसे अपने गुणोंके अनुकूल कर्म वायुका शमन करता है और जो विचित्र- प्रत्ययारब्ध होनेसे अपने गुणोंसे विपरीत वायुको बढ़ाता है। मत्स्य और दूध दोनों मधुर रसवाले हैं, परन्तु दूध समानप्रत्ययारब्ध होनेसे अपने रसके अनुकूल शीतवीर्य है, अत. दूधके कर्म अपने रसके अनुसार होते और मत्स्य विचित्रप्रत्ययारब्ध होनेसे अपने रसके विपरीत उष्णवीर्य हैं, अत उसके कर्म-अपने रससे भिन्न प्रकारके होते हैं । सिंह और शूकर (सूअर) दोनों मधुर और गुरु हैं, परन्तु सूअर समानप्रत्य- यारब्ध होनेसे अपने रसके अनुकूल मधुर विपाकवाला है, अत. उनके कर्म अपने रस तथा विपाकके अनुसार होते हैं और सिंह विचित्र प्रत्ययारब्ध होनेसे उसका विपाक अपने रससे प्रतिकूल कटु होता है और उसके कर्म रसके अनुकूल न होकर विपाकके अनुकूल होते हैं। यस्मादृष्टो यवः खादुर्गुरुरप्यनिलप्रदः । दीपनं शीतमप्याज्यं, वसोष्णाऽप्यग्निसादिनी ॥ कटुपाकोऽपि पित्तघ्नो मुद्गो, माषस्तु पित्तलः।' खादुपाकोऽपि, चलकृत् स्निग्धोष्णं गुरु फाणितम् ॥ - । .
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विशानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २८९ . कुरुते दधि गुर्वेव वर्हि, पारावतं न तु। कपित्थं दाडिमं ग्राहि साम्लं, नामलकीफलम् ॥ कपाया प्राहिणी शीता धातकी, न हरीतकी। अप्रधानाः पृथक् तस्मासाद्याः, संश्रितास्तु ते ॥ प्रभावश्च यतो द्रव्ये, द्रव्यं श्रेष्ठमतो मतम् । (अ. सं. सू. अ. १७)। ते परसादयो द्रव्यात् पृथग्भावेन कार्यकरत्वेन विकल्प्यमाना अप्रधानाः, यतस्ते स्थिता अपि यस्मिन् द्रव्ये तद्रव्ये न तरसदृशमेव कार्य कुर्वन्ति, एतदेव यस्मादृष्ट इस्यादिना दर्शयति । एवं यथा मधुररसे विपर्ययो हटतथाऽन्येप्वपि रसेषु श्यत हत्यप्रधाना रसायाः, द्रव्यं तु श्रेष्ठमित्याचार्याणां मतं; यतस्ते रसाया रस-वीर्य- विपाकाः प्रभावश्च द्रव्यसंस्थिताः तत्परतघ्रा इत्यर्थः (इन्दुः)॥ जो मधुर और गुरु होनेपर भी वायु करता है, घी शीतवीर्य होनेपर भी जठरामिका दीपन करता है, वसा उष्णवीर्य होनेपर भी जठराग्निको मन्द करती है, मूंग कटविपाक होनेपर भी पित्तका शमन करता है, उड़द मधुरविपाक होनेपर मी पित्तको बढ़ाता है, फाणित (राव) निग्ध, उष्ण और गुरु होनेपर भी वायुको बढ़ाता है, दही गुरु होनेपर भी जठरामिका दीपन करता है परंतु पारावत( परेवा-कबूतर) जठरामिका दीपन नहीं करता, कैथ और अनार अम्लरसवाले होनेपर भी प्राही हैं किन्तु आँवले प्राही नहीं हैं, धायके फूल कपाय और शीतवीर्य होनेसे ग्राही हैं परन्तु हर्ड कयाय और शीत होनेपर भी विरेचन करती है। जौ, घी, वसा, मूंग, उड़द, फाणित, दही, कैथ, अनार और हर्ड इनके जो ऊपर अपने रस, वीर्य या विपाकसे विपरीत कर्म कहे गये हैं वे उनके द्रव्यगत प्रभावसे होते हैं (प्रभाव प्रायः विकृति- विषमसमवेत, विचित्र प्रत्ययारन्ध और-विजातीयान्वयवाले द्रव्योंमें रहता है)। रस, वीर्य और विपाक प्रभावकी अपेक्षया मप्रधान हैं और प्रधानभूत प्रभाव द्रव्यमें ही रहता है मत. द्रव्य ही सबसे श्रेष्ठ है (यद्यपि इन श्लोकोंके अन्तमें द्रव्यकी प्रधानता बताई गई है, परन्तु इन श्लोकोंमें जो कर्म बताए गए हैं वे सब प्रभावके ही उदाहरण- रूप हैं और विचित्र प्रत्ययारब्ध द्रव्योंके उदाहरणोंमे जो कर्म कहे हैं उनको भी प्रभावसे होनेवाले कर्म ही कह सकते हैं, अत: इन श्लोकोंको विचित्र प्रत्ययारब्ध कराँके पाद रखा गया है)। नागार्जुनमतेन कर्मणस्तत्प्राधान्यस्य च निरूपणम्--- द्रव्य-रस-शुण-वीर्य-विपाक-कर्माण्यनयोर्मूलम् (र. वै. अ. १, सू. ४)। एवं स्वस्मातरवृत्तकं भेदमुक्त्वा तनेदेवारोग्यानारोग्ययोः साधनस्य सप्रेषु विप्रकीर्णस्य सम्रहार्थमाह-द्रव्येत्यादि । अनयोः आरोग्यानारोग्ययोः स्वस्था- द.पू. १९ २९० द्रव्यगुणविज्ञानम् । तुरवृत्ताधिकृतयोरिति; मत एवानयोरित्याफति, अन्यथा सस्थातुरमसे और भिप्रेते तमुंभयोरित्ययक्ष्यत् । द्रव्याणि च, रसाश, गुणा, पीयोनि श बर्ष भागादीनि, विपाकी च, माणि च प्रेहादीनि; भूई कारण योनिरित्वपः । एते द्रव्यादयो विस्तरेणोत्तरत्र यक्ष्यन्त इति नान्न व्याक्रियन्ते (भा.)। किपालक्षणं फर्म (सू. १७१) । भग्न कर्मति समुदाय क्रिया, वस्या लक्षणरूपेण म्यवस्थाप. माना अपयघफिया । धमनमिति समुदायक्रिया । सम्याः रोहन खेदनाबासन. दिवसतादिवसाहार विधानाधययपक्रिया, ज्याभिध्यज्यते समुदायक्रियेति । यथा-उठकाधिश्रय-तण्दुलधापन-दघिटन-परियायण परियनादय.क्रियाविदोश अवयवभूतानामभिव्यअयन्ति अण्दुलमिप्तिरूपामिति । अयया करणप्रिया- कारणलक्षण कमति । फलप्रतिष्ठितमाफाश, स्वामिना निलंण्डित. कुम्भ इति; स्वास्मनि प्रतिष्टितमिस्याकाशस्थान्य मात्मा न विद्यते, तथाऽपि आधारभावन पृथग्विवक्षित; कुम्भादन्यत् किंचिदात्माल्य तत्र न विचते, तथाऽपि फरणरूपेणोक- मिति (भा.)। तस्य कर्मण. को विषय इत्याद-कर्म सर्वेषाम् (र. म. २, सू ३८)। अन्न सर्पशब्द. परिस्टिनानधशेषवाचकः द्रव्यादयः पत्र पदार्था. सर्व, तेषां कर्म प्रयोग इत्यर्थः । कथं पाकः कर्मपदार्थस्य विषयो भवति ? प्रयुक्त (द्रव्ये) पश्चानवतीति । प्रयोगपूर्पक एव सस्यापि व्यापार इति न दोषः । एवमन्न पचिझियाया. कर्ता धर्म स्यात्, नामि । नापं दोप., हेतुभूतत्वाव: तृणैर्भक्तं सिद्धमिति (भा.)। कर्मपदार्थस्य प्राधान्यं विधास्यते (र. घे. अ. १, सू. १५१) । कर्मतरेषां सामर्थ्यव्यञ्जनात् (सू. १५२)।- इतरेषा द्रव्यादीनां पदार्थानां, सामथ्र्य फलं, तस्य व्यञ्जनात् प्रकाशनात् , दव्यादीन्यप्रयुज्यमानान्यापणस्यानि वनस्यानि वा कर्म पुर्वन्ति । तथ्प्रयोगः कर्मसज्ञित. पष्ठः पदार्थ. प्रधानः । यथा-शर-शरासन-तूणीरसामर्थ्य यजनाद् धन्वी तेभ्यो विशिष्ट इति (भा.)। तदनुग्रहे फलवत्त्वात् , अफलवत्त्वा चोपधाते (सू. १५३)।-किं चान्यत् ? तदनुग्रह इत्यादि । तस्य कर्मणोऽनु- प्रहः तदनुग्रहः, तस्सिन् सति सपने फलवत्यादितरेषां द्रव्यादीनां, कर्ममि विपन्ने तेषा चाफलवत्वादिति; पूर्वोक्तस्यैयार्घ इति चेत् ? एवं सर्वत्र तुस्या- हेतुप्रयोगः प्रयोगान्तरे प्रयुक्त इति विज्ञेय , एकसिन प्रयोगे द्वयोहेस्वोः प्रयोगामावादिति (भा.) । अर्थ निर्वर्तकत्वात् (स. १५४) ।- चान्यत् ? अर्थत्यादि । भर्थः प्रयोजनं, कर्माणि विना न भवतीति (भा.)। तदर्थमुपसंग्रहात् । शेषाणां तत्राभियोगात् । शास्त्रसामर्थ्यात् ! द्रव्यादिव्यतिरेकेण भावात् । तस्य कचिदव्यतिरेकात् । तेनेतरेषां नित्यं सिद्धिः । व्यापदां तत्रैव नियमात् । तेनोपचारादितरेषाम् (सू. १५५-१६२) । तेन कर्मणा उपचाराद् व्यवहाराद् पधनादेति । । - ।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २९१ - इतरेपा द्रव्यादीनाम् । वामनीयं द्रव्यं, विरेचनीयो रस इत्यादि । एवमेते विशेषाः कर्मण्येवायत्ता., प्रायशोऽन्ये पदार्या विषय इति कर्मणः प्रामान्य साधितम् (भा.)॥ नागार्जुनने द्रव्यगुणविज्ञानके प्रतिपाद्य विषयों में कर्म नामका एक छट्ठा पदार्थ माना है। वे लिखते हैं कि-वस्थातुरवृत्तमें अधिकृत आरोग्य और अनारोग्यके , द्रव्य, गुण, रस, वीर्य, विपाक और कर्म ये छ. मूल हैं (मत. ये छहों पदार्थ द्रव्यगुणशास्रके प्रतिपाद्य विषय हैं ) । द्रव्य, गुण रस, वीर्य और विपाक इनका लक्षण उनके प्रकरणों में लिखा गया है । अव कर्मका लक्षण और प्राधान्य कहा जाता है। वमन-विरेचन आदि द्रव्योंका शरीर के ऊपर जो प्रयोग किया जाता है उसको कर्म कहते हैं । द्रव्य, गुण, रस, वीर्य और विपाक ये पाँचों वर्मके विषय है। विपाकका व्यापार भी प्रयोगपूर्वक ही होता है, अतः विपाकको भी कर्मका विषय माना जाता है। द्रव्यादि पदार्थोसे कम प्रधान है । क्योंकि कर्मसे (शरीरपर प्रयोग करनेसे) प्रव्यादि पाँचों पदार्थोका सामर्थ्य अभिव्यक्त होता है (फल पाया जाता है)। वनमें या पनसारीकी दुकानमें पड़े हुए द्रव्य शरीरपर प्रयोग किये विना कुछ भी अपना सामर्थ्य-फल नहीं दिखा सकते । इसलिये द्रव्य आदि पाँचों पदार्योंसे कर्म प्रधान है। द्रन्यादिप्राधान्यवादोपसंहारः- पृथक्त्वदर्शिनामेप वादिनां वादसंग्रहः। चंतुीमपि सामध्यमिच्छन्त्यत्र विपश्चितः॥ तद्रव्यमात्मना किंचित् किंचिद्वीर्येण सेवितम् । किंचिद्रस-विकाराभ्यां दोपं हन्ति करोति वा ॥ (सु. सू. अ. ४०)। १ न युक्तमवधारणमिदमेव प्रधानमिदं नेति चिकित्सायां द्रव्यादिपु वस्तुपु (र. वै. भ. १, सू. १६३ ) । इदमेव प्रधान चिकित्सायामित्यवधारण न युक्तम् , एकान्त- भावाययणमयुक्तमित्यर्थः (मा.) । किं तर्हि ? यथाविपयं हि प्राधान्यं सर्वेपाम् (सू १६४) । यथाविपय सर्वेषां प्राधान्य भवति । सर्वाण्यपि स्वे स्खे विषये प्रधानानि । क. पुनरसौ विषय इति ? हेतुरूपेणोका. सर्वपामधिष्ठानारम्भादिपु द्रव्य प्रधानं शेपाश्च (भा.)। कुत इति ? अनाह-भविनिर्भागाचैपा, परस्परेणानुग्रहाय (सू. १६५)। अविनिमांगादिति द्रव्यादीनि पठपि न पृथग्यःनि; यत्र द्रव्य तन शेपाश्च, यत्र कर्म तत्र द्रव्यादीनि चेति । परस्परानुग्रहकराचते चिकित्सायाम् । यथा-रसे प्रयुज्यमाने द्रव्यमाधार- भावेनानुग्रह करोति, गुणा रससाहचर्याद् , वीर्य शक्तिप्रकाशनात् ; विपाक. परिणामयेत्, कर्म संयोगसाधकमिति, एव पढपि पदार्था विवक्षिता. प्राधान्येन व्यवस्थिताश्च (मा.)॥
२९२ द्रव्यगुणविज्ञानम् । संप्रति व्यादिप्राधान्ये एकीयमतानि दर्शयित्वा स्वमतं सिदारतरूपमाह-- पृथक्त्वदर्शिनामित्यादि । पृथक्त्वेन एकैकश्येन द्रव्यादीनामितरमाधान्यापवादपूर्वक प्राधान्यं द्रष्टुं शील येपां ते पृथक्त्वदर्शिनः । पृथक्त्वशब्दोऽपि प्रकरणागतेम द्रव्यादिप्राधान्येन संवध्यते । यतो न द्रव्यादीनामिह पृथक्त्वं पक्षीकृतम् , एकैक- प्राधान्यं तु पक्षीकृतम् , अत एकैकप्राधान्यमेवानूय तत्प्रतिषेधो युक्तः । एष इति अनन्तरप्रक्रान्तवादसंग्रहा, द्रव्यमेव प्रधानमित्यादिरूपो वादपरिग्रहः । एतत्पक्षविपरीतपक्षं सर्वप्राधान्यं सिद्धान्ततया दर्शयन्नेव एकैकप्राधान्यपक्षावि. धयनाह-चतुर्णामित्यादि । चतुर्णामिति द्रव्य-रस-वीर्य-विपाकप्राधान्यानाम् । समग्रस्येदं सामग्य मेलकमित्यर्थः । अत्रेति प्राधान्य चिन्तायाम् । विपरित इति प्रामाणिकाः। तेन प्रामाणिकेच्छया मेलकस्यैव प्राधान्यं फलति । सामग्येण घेह धर्मेण समग्रा धर्मिणो विवक्षिताः । यत्र द्रव्यप्राधान्यं तत्र रसानामप्राधान्यं, यत्र रसप्राधान्यं तन्त्र द्रव्यादीनामप्राधान्यमित्यायनुसरणीयम् । एतदेव स्व स. विषये द्रव्यादिप्राधान्यमाह-तव्यमित्यादि । तदिति तसाव्यादिसामम्यप्राधा. न्यात् ।- अन्न द्रव्यमेव पञ्चमहाभूत विकारविशेपमन्न-पान भेपजरूपं पाचभौतिक- शरीरस्य धातुवैषम्यरूपं दोषं विकारं, धातुसाम्यरूपं दोपविकारोपशमनं वा समवायिकारणतया कुर्वन् कर्तृत्वेन व्यवस्थाप्यते । तदाश्रितास्तु द्रव्यशक्तिरूप- प्रभाव-रस-वीर्य-विपाका यथायोगं निमित्तकारणतां समवायिकारणता वा भजन्ते न कर्तृतया व्यपदिश्यन्ते, द्रव्यपराधीनत्वात् । यत्तु "मधुराग्ललवणा वातमाः" (सु. सू. भ. ४२) इत्यादिना रसादीनामपि कर्तृत्वं व्यपदिश्यते, तद्रसादि- प्राधान्यविवक्षया, न तु परमार्थतः, तेषां नित्यं द्रव्यपराधीनत्वात् ; तेन वन्य- प्रभावादेव रसादिसाध्ये कार्ये द्रव्यमेव कर्तृतयोपदिशति-तद्रव्यमात्मनेस्यादि । किंचिद्व्यमात्मनेति आत्मशक्या प्रभावाख्यया दोषं हन्ति करोति वा । दोषमिति दोपशब्देन च विकारोऽपि गृह्यते। यदुच्यते--"दोषाः प्रकुपिता विकारशन्दं लभन्ते" (च. वि. भ. ६) इति । शक्तिश्च द्रव्यस्य स्वरूपरूपा सामान्यविशेषास्मिका न्यायदर्शनसिद्धा भवतु, भहनयसिद्धा वा तदतिरिका कार्यगम्या भवतु, नेह वद्विचारः प्रयोजकः, उभयथाऽपि शक्तिसिद्धे । इयमेव च शक्तिस्तत्रान्तरे प्रभावशब्देन, इह चाचिन्त्यशब्देन व्यवहियते । अत्र द्रव्यशक्तिकार्योदाहरणं यथा- कर्षकमणिलोहशल्यमाकर्पति, विषमणिर्विषमपहरतीत्यादि । xxx । किंपि- द्वीर्येणेति यथा--कुलस्थ. कफवातनः कपायोऽपि उष्णस्वादनिलनाशन इति । किंचिद्रसादित्यस्योदाहरणं यथा-"कषाया मारुतं, पित्तमूपरा, मधुरा काम् । कोपयेन्मृद्" (च. चि. अ. १६) इति । किंचिद्विपाकादित्यस्योदाहरणं यथा-गुणी रसात् कटुका, वीर्येण चोष्णा, क्योर्विरुद्धेन विपाकेन मधुरेण घृप्या भवतीत्यादि । रस विपाकाम्यामिति समासोपदेशेन संभूयापि द्रव्यादीनां कार्यकर्तृत्वं सूचितं, . पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २१३ तेन कचिद्रव्यप्रभाव-वीर्याम्यां, चिद्व्यप्रभाव-धीर्य-रसैः, कचिद्रव्यमभाव-रस- वीर्य-विपाकैमिलितः सर्वेरेव क्रियते कार्यम् । यथा-आमलक त्रिदोषशमनं रस-वीर्य-विपाक-प्रमावरेव करोति; यथा-"हन्ति वातं तदग्लस्वात, पित्तं माधुर्य-शैत्यतः । कर्फ कपाय-रुक्षत्वात्" (सु. सू. भ. ४६) इति । अत्र माधुर्यशब्देन मिपाकोऽपि मधुरो गृयते, शैत्यं तु वीर्य, प्रभावश्चामलके शिवरवं; शिवत्वलक्षण- प्रभावोपयघ्रिता अम्लादयो न परस्परं पित्तजननादि कुर्वन्ति, किन्तु दोपशमनमेव कुर्वन्ति । कचिव वस्सिनेच प्रव्ये प्रभावादिना पृथक् कार्य निष्पाद्यते । यथा- गुहवी तिकरसवया पित्त-कफहरी, उष्णवीर्यतया वातहरी, मधुरविपाकतया वृष्या, प्रभावात्तु वातरकमामं हन्ति; इत्याउनुसरणीयम् । अवार्थे चरकः-"द्रव्याणि हि द्रव्यमभावाद् , गुणप्रभावाद् , द्रव्य-गुणप्रभावाय कार्मुकाणि भवन्ति" (च. सू. म. २६) इति । मत्र हि गुणशम्देन रस-वीर्य-विपाकानां गुणरूपाणां सर्वेपामेव ग्रहणम् । ४ ४ ४। अय दोपहरण करणाभ्यामेव च सर्पद्रव्यकार्यावरोधः । यतो रसायन-स्वस्थवृत्त-जीवनादिकारणमपि द्रव्यं धातुसामान्य-विशेषजनकरवाद. भागतरोगप्रशमनकारकमुच्यते । एतच्च द्रव्याणां कार्यकर्तृत्वमसति विरोधके हेयम् । तेनासाध्यव्याधी द्रव्यादीनां व्याधिवलवाधितत्वान कर्तृत्वम् । यथा-- यस्य कोठे पित्तं अलवदस्ति तस्य मधुरशीतमपि क्षीरं विदश्यते । यदुक्तं "म्रोवस्यावहे पित्तं पक्तौ वा यस्य तिष्ठति । विदाहि भुक्तमन्यद्वा तस्याप्य विदसते" (सु. सू. म. ४६) इत्यायनुसरणीयम् । तद्रव्यमात्मनेत्यादिना स्वकार्ये सर्वप्राधान्येऽपि मुख्यकर्तृतया द्रव्यं प्रधानमित्युक्तं भवति (च. द.)। द्रव्यादीनां प्राधान्यमाश्रित्य परस्परं विवदमानानां भिपजां मतान्युपसंहरन् स्वमतमुप- 'न्यसति-पृथक्त्वेत्यादिना । एप सप्रतिवादमुपदिष्टो व्यादिप्राधान्यख्यापको अन्यः, पृथक्त्वदर्शिनी विगृसैकैकशी द्रव्यादिस्वातघ्यमाचक्षाणानां वादिना, वादानां संग्रहोऽत्रेति धादसंग्रहः केवलं तर्कनिचय इत्यर्थः । अत्र प्रतीकारविधी, विपश्चितः तत्वार्थदर्शिनो विद्वांसस्तु चतुर्णा द्रव्य-रस-गुण वीर्य-विपाकानामेव सामर्थ्य योग्यतामिच्छन्ति, भतश्चत्वार एवं प्रधानानीति भावः । अपिशब्दोऽत्रा- वधारणार्थः । चतुर्णा प्राधान्यप्तकार दर्शयति-वदित्यादिना । तत् पक्षतः प्राधान्ये- नोपदिष्ट द्रव्यं द्रव्यजातं सेवितमुपयुक्तं सत्, तत्र किचिद्रव्यमात्मना सर्वार्थ- कारिणा भावविशेपेण प्रभावेनेति यावत् , दोपं हन्ति करोति वेति परेणान्वयः। एवमुत्तरत्रापि व्यास्येयम् ।xxx। नेह गुणानामनुपादानात् "किंचिद्रसेन कुरते कर्म वीर्येण चापरम् । द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेन च किचन" (च. सू. भ. २६) इति चरकवचनं प्रतिषिद्धं भवति, "रसेपु गुणसंज्ञा" (सु. सू. म. ४२) इति प्रागुक्तरित्यनुसन्धेयम् । नन्वेतावता "मधुराम्ल-लवणा वातना" । - - . -- २९४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । (सु. सू. १. ४२) इत्यादिना रसानां कर्तृस्वेन व्यपदेशोऽनुपपक्ष इति क्षेत्र, 'दानं लुनाति' इतिवत् करणे एव कर्तृत्वव्यपदेशात् (हा.)॥ द्रव्य, गुण, रस, विपाक और वीर्यके प्रकरणों में (अध्यायोंमें ) द्रव्य आदि एक एकको प्रधान माननेवाले आचार्योंके मतोंका निरूपण सुश्रुत और रसवैशेषिक- सूत्रके अनुसार किया गया है। सुश्रुतने इन मतोंका उपसहार करते हुए अन्तमें अपने अपने विषयमें द्रव्य आदि सब प्रधान हैं, ऐसा सिद्धान्त स्थापित किया है। वे लिखते हैं कि-इतरके प्राधान्यका खण्डन करके द्रव्य आदि एक एकको ही प्रधान बतलाने वाले एकान्तवादियोंका मत हमने सक्षेपमें कहा है । परन्तु प्रामाणिक (तत्त्वार्थदर्शी) लोग द्रव्य, रस, विपाक और वीर्य इन चारोंको अपने अपने विषयमें प्रधान मानते हैं । क्योंकि सेवन किये हुए द्रव्योंमेंसे कई द्रव्य अपनी पार्थिव- आप्य आदि पाचभौतिक रचनासे, कई वीर्यसे, कई रससे, कई विपाकसे और कई द्रव्य इन चारोंमेंसे दो, तीन या चारोंसे शरीरमें दोषादिवैषम्यरूप विकारोंका नाश करते हैं अथवा दोषादिवैषम्यरूप विकारोंको उत्पन्न करते हैं (यहां दोषादि- वैषम्यरूप विकारोंका नाश अथवा उत्पत्ति इन दो शब्दोंमें शरीरंपर होने वाली द्रव्योंकी सर्व क्रियाओंका अवरोध (समावेश ) किया गया है, ऐसा समझना चाहिये)। नागार्जुन इस प्रकरणके उपसंहार में लिखते हैं कि-द्रव्य, गुण, रस, वीर्य, विपाक और कर्म छहों पदार्थोमेंसे यह एक ही प्रधान है, अन्य अप्रधान हैं, एसा निर्णय करना ठीक नहीं है। क्योंकि अपने अपने विषयोंमें सब प्रधान हैं । द्रव्य आदिको हम विभक्त (अलग) नहीं कर सकते । क्योंकि जहा द्रव्य होता है वहा रसादि शेष होते हैं और रसादि द्रव्यके विना रह भी नहीं सकते । चिकित्सामें द्रव्य भादि एक दूसरेका अनुग्रह करते हैं, जैसे-रसोंके उपयोगमें द्रव्य आधार भावसे, गुण रसोंके साहचर्यसे, वीर्य उनकी शक्तिका प्रकाशन करके, विपाक उनका परिणाम करके और कर्म उनका शरीरके साथ सयोग कराके अनुग्रह करता है। इससे एकको प्रधान और दूसरेको अप्रधान मानना युक्त नहीं है। रसादिद्वारा द्रव्याणां कार्यकर्तृत्वनिरूपणं, रसादीनां नैसर्गिकवलनिरूपण च- किंचिद्रसेन कुरुते कर्म, वीर्येण चापरम् । द्रव्यं गुणेन, पाकेन, प्रभावेण च किंचन ॥ १ 'रस गुणोंका ही एक मेद है, इसलिये रसप्राधान्य हेतुओंसे गुणप्राधान्य भी सिद्ध होता है' ऐसा इसी ग्रन्थमें पृ २१२ पर लिखा है, अत यहां 'द्रव्य, गुण, रस, और वीर्य इन पाँचोंको' ऐसा अर्थ लेना चाहिये । २ नागार्जुनने द्रव्यगुणविज्ञानके प्रतिपाय विषयों में द्रव्य, गुण, रस, वीर्य और विपाक इन पाँचोंके अतिरिक्त 'कर्म' नामका एक छठ्ठा पदार्थ माना है और उन प्रत्येक प्राधान्यका निरूपण किया है। विपाक पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २९५ रसं विपाकस्तो वीर्य प्रभावस्तान्यपोहति । बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ (च. सू. अ २६)। किंचिदित्यादि । द्रव्यं रसेन किंचिच्छुभाशुभं कर्म कुरुते । यथा-मधु कषाय- रसवात् पित्तं शमयति । वीर्येणेति वीर्य शक्तिमन्तो गुर्वादयो गुणाः, तेना- परमन्यत् कर्म कुरते । यथा-कपायतिक्तं महत्पञ्चमूल वातं जयति न तु पित्तम् , उष्णवीर्य स्वात् । गुणेन किंचित् कर्म कुरुते । यथा-मधु रौक्ष्यात् श्लेष्माणं जयति । पाकेन विपाकेन किंचित् कर्म कुरुते । यथा-शुण्ठी कटुकाऽपि मधुरविपाकतया वातं शमयति । प्रभावेणापि किंचन किंचित् कर्म कुरुते । यथा-दन्ती कटुरस- विपाका उष्णवीर्या चापि विरेचयति, प्रभावात् ।xxx। मह वसतां रसादीनां मध्ये ययत् यलवत्तरं भवति तत् इतरदभिभूय कर्म कुरुते ।xxx। ननु यत्र रसादीनां यकसाम्यं तन कस्य कार्यनिप्पत्ती कारणवं स्यादिति ? अत माह- रसमित्यादि । रसं मधुरादिक पविधं तुल्यपलमपि विपाकः अपोहति कार्यकरणे कृण्ठयति । यथा--मधुनि मधुरो रसः कटुना विपाकेनाभिभूयते, तस्मान्मधु मधुररसहेतुकं श्लेष्मजननं कर्म न करोति । तौ रस-विपाको समयली पीयं कर्तृ अपोहति । यथा-मानूपादकपिशिते मधुररस-विपाके उप्णेन वीर्येणाभिभूयेते; तसादानूपौदकपिशितं मधुररस-विपाकतया शीतमपि पित्तं न जयति, कितु उष्ण- वीर्यस्वाद पित्तं जनयति । प्रभावः पुनस्तान् समवलानपोहति । यथा-अम्लरस- विपाका उष्णवीर्याऽपि सुरा क्षीरं जनयति, प्रभावात् । कटुरसविपाका उष्णवीर्या चापि दन्ती विरेचयति, प्रभावात् । अत्र प्रभावेण रस-वीर्य-विपाका अभिभूयन्ते । इति ईदया रसादीनां वलसाम्ये नैसर्गिक वलं स्वाभाविकी शक्तिः (यो.)। तथा चोच्यते-किंचिदित्यादि । द्रव्यं तु रसेन किंचित् कर्म कुरते, अपरं किंचित् कर्म वीर्येण वीर्यसंज्ञकेन गुणाष्टकेन कुरुते, किंचन कर्म गुणेन रस-वीर्यसंज्ञगुणव्यतिरिक्तन गन्धादि-स्थिर-सरादिना कुरुते, किंचन कर्म पाकेन कुरुते, किचन कर्म स्वस्य प्रभावेण कुरुते, इति प्राधान्याद् द्रव्यप्रभाव उदाहृतः । रसादीनां सलु मधुरादी- नामपि यत् स्वस्वलक्षणं स्वभावसिन्दं तत् तस्य तस्य प्रभावकृतमुन्नेयम् । यथाऽग्ने रूपं प्रकाशयति, भूमे रूपं तमो न प्रकाशयति; औपण्य दहति, शैत्यं शीतयतीत्ये- वमादि सर्व प्रभाववदेव, नाप्रभावं किंचिदस्ति द्रव्यं वा गुणो वा र्म वेति । ननु मृदु-तीक्ष्णादयोऽष्टा गुणाः कथं वीर्यसंज्ञया पृथगुपदिश्यन्ते इत्यत उच्यते- रसमित्यादि । द्रव्ये यो रसो वर्तते यदि पाकश्च स एव रसः स्यात् तदा न विरोधः स्यात् । यन्न द्रव्ये रस-पाकयोर्विरोधो वर्तते, यथा-तिकः पित्तशमनस्तस्य पाक: - १ 'गुणसाम्ये' इति पा०। - २९६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । कटुः पित्तवर्धनस्सन विपाको रसमपोहति, स्वयलगुणोरकर्षात् । तिकस्त प्राग्वि- पाकात् स्वकर्म करोति, पाके तु कटुः सन् तिककर्म न कृत्वा कटुककर्म करोतीति । वीर्य तु मृदु-तीक्ष्णादिगुणाष्टकं तो रस-विपाको विरोधिनी अपोहति, स्वबलगुणो- स्कर्षादिति । यथा-अर्कागुरु-गुडूचीनां तिकं रसं कटुं च विपाकमुष्णवीर्यमपोहति । निपातावधि यावधीवासं तिककार्यकटुपाककार्य न कृत्वोष्णवीर्यकार्यमर्कादीनि कुर्वन्ति । प्रमावस्तु तानि रस-विपाक-वीर्याण्यपोहति, स्वयलगुणोरकर्षात् । यथा- दन्ती कटुरसकार्य कटुपाककार्यमुष्णवीर्यकार्य च निरस्य प्रभावकार्य विरेचनं करोति । कुत एवं बलावलं ,रसादीनामित्यत उच्यते-गुणसाम्य इत्यादि । रसादीना. रस-विपाक-वीर्य-प्रभावाणां गुणकर्मतया विशेपे सत्यपि द्रव्यस्य कार्यभूतस्य द्रव्यगुण- कर्मसमुदायारमकस्यारम्भकाणां द्रव्याणां प्राधान्याद् द्रव्यांशस्य प्राधान्यं, गुण-कर्मणा. मारम्भकाणामप्राधान्यात् तदारब्धगुणकर्मणामपि रस-विपाक-वीर्यसंज्ञ-प्रभावाणां गुणीभावाद् गुणसंज्ञा; तद्गुणभावसाम्येऽपि खल्वतियलं रसादधिकं यळं विपाकस्य, विपाकाद् वीर्यस्य, वीर्यात् प्रभावस्य यत् , तन्नैसर्गिक स्वाभाविकं स्वभावसिदं न तु कारणजमिति ।xxx। (ग.) ॥ किंचिद्रसेन कुरुते कर्म, पाकेन चापरम् । द्रव्यं गुणेन, वीर्येण, प्रभावेनैव किंचन ॥ यद्यद्रव्ये रसादीनां वलवत्त्वेन वर्तते । अभिभूयेतरांस्तत्तत् कारणत्वं प्रपद्यते ॥ विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते । रसं विपाकस्तौ वीर्य, प्रभावस्तान्यपोहति ॥ वलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं वलम् ॥ (अ. सं. सू. अ. १७)। एवं स्थितेऽनन्तरप्रक्रान्तमेवार्थ स्फुटयनाह-किंचिदित्यादि । द्रव्यं मन्वादि किंचित कर्म भन्नपित्तोपशमनादिकं रसेन कुरुते, किंचित् कर्म मशमनादिकं विपाकेन, अपरं वातवृष्यादि लध्वादिना गुणेन, अपरं तृदशमनादि वीर्येण शीवेन, किंचन विषापनुत्यादि प्रभावेणेति । ननु च यत्र च्याश्रितानां रस-वीर्य-गुण-विपाक प्रभावानां विरोधस्तत्र तेषां कार्यनिष्पादने समशक्तित्वं न वेत्याशवानिवृत्यर्थमाह- यद्यद् द्रव्य इत्यादि । रसादीनां रस-वीर्य-गुण-विपाक-प्रभावानां यदसो वा वीर्य वा विपाको गुणः प्रभावो वा वलवत्वेन विजातीयाधिक्येन वर्तते तत्तत् कारणरवं कार्यसाधकस्वं प्रतिपद्यते । किं कृत्वा ? इतरान् द्रव्याश्रितान् हीनानभिभूय विफलीकृत्य । यत्र तु द्रव्ये रसादिद्वारको विरुद्धानां गुणानां गुर्वादीनामेव संयोगो, न तु रसादयोऽपेक्ष्यन्ते, तत्र कथं कार्यकर्तृत्वमिति पृष्ट आह-विरुद्धेत्यादिः अथवा रसादिकल्पनाविशेषेणैव यत्र विरुद्धगुणोपनिपातस्तत्र कथं कार्यकरणस्वमिस्याह- - पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २९७ बिरुदेत्यादि । तत्र भूयसा प्रभूतेन गुणेनाल्पं जीयते निष्फलीक्रियते । द्विविधम्न विरोध:-सरूपतः, कार्यतश्च । स्वरूपविरोधो यथा गुरु-लम्बोः, शीतोष्णयोथ; कार्यविरोधो यथा--गुरु-रूक्षयोः, उष्ण-निग्धयोश्च । तथाहि-गुरु श्लेष्मवृद्धिकरः सक्षम गुरोविरुद्धः, गुरुः कार्येण श्लेष्मवृष्याख्येन विरुध्यते । एवमुष्णस्य श्लेष्महन्तृत्वं जिभस्य श्लेष्मकर्तृत्वेन । इह चोभयोरपि विरोधयोहणम् । एकत्र द्रव्ये स्वरूप- कार्यविरुदयोर्भाव आगमलब्धः पञ्चभूतात्मकस्वाद द्रव्यस्योपपद्यते । ननु यथट्रव्ये रसादीनां बलवत् वचत् कार्यकरणशक्कमित्युकं, यत्र तु द्रव्ये रसादीनामुत्कर्षासंभवः परस्परसाम्यं सत्र कस्य कार्यकरणस्वामित्युच्यते-रसमित्यादि । विपाकः कर्ता, रसं कर्म अपोहति कार्यकरणे कुण्ठयति, तो रस-विपाको कर्मणी वीर्य कर्तृ अपोहति, तानि रस-विपाक-वीर्याणि प्रभावो वक्ष्यमाणः अपोहति, इत्येतद् रसादीनां बलसाम्ये नैसर्गिक स्वाभाविकं बलम् । तेनैतदुक्तं भवति-रसादीनां समबलानामपि तथाविधो बलस्वभावो यत् पूर्वस्य बलमुत्तरस्य बलेन समेनाप्यमिभूयते । रसबलं , विपाकबलेन समेनापि स्वभावादेवामिभूयते, एवं रस-विपाकयोर्बलं वीर्यबलेन, रस-विपाक-वीर्यबलं प्रभावबलेनेति । तेन रसादीनां विपमत्वेऽपि स्वभावबलम- पेक्ष्याधिकस्य सामर्थ्य विज्ञेयम् (इन्दुः)॥ xxxxxxxxx तत्र द्रव्यं शुभाशुभम् । किंचिद्रसेन कुरुते कर्म, पाकेन चापरम् ॥ गुणान्तरेण, वीर्येण, प्रभावेणैव किंचन । यद्यद् द्रव्ये रसादीनां वलवत्त्वेन वर्तते ॥ अभिभूयेतरांस्तत्तत् कारणत्वं प्रपद्यते । विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ॥ रसं विपाकस्तौ वीर्य, प्रभावस्तान्यपोहति । यलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं वलम् ॥ (अ. ह. सू. अ. ९)। तस्यादि । तत्र तेपु रस-बीर्य-विपाकादिषु मध्ये, द्रव्यं किंचिच्छुभाशुभ सदसत् कर्म रसेन कुरुते । यथा-मधु मधुर-कषायरसत्वेन पित्तं शमयति । किंचिद्वि- पाकेन । यथा-तदेव मधु कटुविपाकतया कर्फ हन्ति । किंचन द्रव्यं गुणान्तरेण अन्यगुणविवृतस्वादस-विपाकतो भिमो यो गुणान्तरो गुर्वादिः, तेन । यथा-अग्लं कालिकं कर्फ शमयति, रौक्ष्यात् । किंचन वीर्येण । यथा-"कषाय-तिक महत् पञ्चमूलं वात जयति, न तु पित्तम् , उष्णवीर्य स्वात्" (भ. सं.सू.म. १७)॥ किंचन द्रव्यं प्रभावेणैध शुभाशुभं कर्म कुरुते । यथा--अग्लोष्णा सुरा क्षीरं वर्धयति । ननु, यत्र द्रव्याश्रितानां रसादीनां विरोधः, तत्रैषां कार्यनिष्पत्तौ समशक्तित्व न वा इत्याशानिवृत्यर्थमाह-यद्यदित्यादि । रसादीनां रस-वीर्य-विपाक-प्रभावानां 1 . t .
. २९८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । मध्ये, यद् रसादिवस्तु रसो वा वीर्य वा विपाको वा प्रभावो वा बसवस्पेन बलिष्ठतया, द्रव्ये वर्तते अवतिष्ठते, तद् वस्तुजातम् , इतरान् भवलिष्ठान् , ममिभूम विफलीकृत्य, कारणत्वं प्रपद्यते कर्मकरणे कारणतामासादयतीत्यर्थः । अत इंदमाह- विरुदेत्यादि । हि यस्मात् , विरुद्धगुणसंयोगे संहतीभावे सति, यदल्पं वस्तु वत् भूयसा बलवता, जीयते अभिभूयते । गुणशब्देन चात्र रसादयो गृह्यन्ते, न पारिभापिका गुर्वादयः, अप्रकृतस्वात् । विरुद्धगुणसंयोग इत्यत्र विरुद्धगुणसमवेत- द्रव्यसंयोग इति वोध्यं, न विरुद्धगुणसंयोग इति; न हि गुणानां संयोगो वकुं युज्यते, किं तर्हि ? द्रव्याणाम् । तथा च मुनि:-"संयोगस्तु द्वयोर्बहूनां वा द्रव्याणां संहतीभावः" (च. वि. अ. १) इति । विरोधश्च द्विविधः--स्वरूपतः, कार्यतश्च । स्वरूपविरोधो यथा-गुरु-लघ्वोः, शीतोष्णयोश्च । कार्यतो यथा-वायौ जेतव्ये रूक्षोष्णद्रव्यसंयोगोपयोगः । अत्र हि यो गुणानां विरोधः, स कार्येण । तन यदल्पं वस्तुजातं तद् भूयसा वस्तुजातेनाभिभूयते । तत्र यथा-क्षीरं शीतवीर्यमपि मधुररसहेतुकनेह-गौरवादिभिः सहाययाहुल्याद्वातशमनाख्यं कार्य करोति, न पुनः स्वकार्य वातप्रकोपाख्यम् । यत्र तु द्रव्ये रसादीनामुस्कर्षासंभवः परस्परं साम्यं, तत्र कस्य कार्यकारणत्वम् ? इत्याह-रसमित्यादि । रसं मधुरादि- पशिधं विपाकः कर्ता अपोहति कार्यकरणे कुण्ठयति । यथा-मधुरो मधुलि रसः कटुना विपाकेनाभिभूयते, अत एव पवनशमनाख्यं कार्य मधुररसहेतुकं न करोति, अपि तु वातप्रकोपनाख्यं कटुविपाकहेतुकमेव करोति । तौ रस-विपाको वीर्य कर्तृ- भूतमपोहति । यथा-महिपामिपे स्थितौ मधुररस-विपाकावुष्णवीर्याख्यं कर्तृ अभिभवति, अत एव तन्मांसं पित्तादिदूषणम्, अन्यथा स्वादुरस-विपाकिस्वार पित्तशमकमेव स्यात् । प्रभावस्तु त्रीण्यपि रसादीनि विजयते । यथा-अम्लरस. विपाका उष्णवीर्या सुरा क्षीरं जनयति । बलसाम्ये, इति ईशं, रसादीनां नैसर्गिक बलं स्वाभाविकी शक्तिः । एतदुक्कं भवति-रसं समबलमपि विपाकोऽपोहति, रस-विपाकौ च समवलावपि वीर्य स्वभावादपोहति, एतानि च समबलान्यपि प्रभावोऽपोहतीति (अ. द.) । द्रव्यादीनां पृथक् प्रयोजकत्वमाह-तत्र दव्यमित्यादि । गुणान्तरेण रसाद् व्यतिरिकेन गुर्वादिना गुणेन । एतदेव रसादीनामपि गुणत्वं ज्ञापयति । तेन “पलाण्दुस्तद्गुणैन्यूँनः" (अ. ह. सू. भ. ६.) इत्यादि. प्रयोगा उपपलाः । प्रभावेण आत्मनैव । द्रव्यस्यास्मा प्रभावः ।xxx। शुमं दोपशमनं कर्म, अशुभं दोपकोपनम् । किंचिदपरं किंचनेति कर्तृ-कर्मविशेषणम् यदा बहूनि द्रव्याणि एकमेव कर्म कुर्वन्ति तदा कर्तृविशेषणम् , यदैकमेव द्रव्यं बहूनि कर्माणि तदा कर्मविशेषणम् ।xxx। सरस्वपि सर्वेष्वेकस्यैव प्रयोजकत्वे हेतुमाह-यद्यदित्यादि । बलवत्वेन बलाधिक्येन । बलं च द्विविधं-कृत्रिमम् , अकृत्रिमं च । मात्राधिक्येन सहायसंपन्या च कृतं कृत्रिमं, स्वाभाविकमकृत्रिमम् । । 1 ।
पूर्वार्धे वीर्य-प्रभाव-विज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः । २९९ तर सामाविक बळमाह-रसमित्यादि । तो रस-विपाको, तानि रस-विपाक-धीर्याणि भपोहति जयति । बलसाम्ये कृत्रिमयलतुल्यस्वे । यत्र रस-विपाकयोस्तुस्यमानत्वं तुस्यसहायस्वं च तत्र रसाद् विपाको बली, मात्रासहायवैषम्ये तु यो मात्राधिका सहायाधिको वा स वलीत्यर्थः; एवं वीर्यादिष्वपि वाच्यम् । xxx। (हे.)॥ द्रव्य, कुछ कर्म-कार्य रससे करता है, जैसे-शहद अपने कषायरससे पित्तका शमन करता है; कुछ कर्म वीर्यसे करता है, जैसे-कपाय और तिक्त रसवाला बृहत्पञ्चमूल अपने उष्ण वीर्यसे वायुका शमन करता है परन्तु पित्तका शमन नहीं करता, कुछ कर्म रस-धीर्यव्यतिरिक्त गन्ध स्थिर आदि गुणोंसे करता है; कुछ कर्म विपाकसे करता है, जैसे-सोंठ कटुरसवाली होनेपर भी अपने मधुरविपाकसे वायुका शमन करती है, और कुछ कर्म प्रभावसे करता है, जैसे-दंती कटुरस, कटुविपाक और उष्णवीर्य होनेपर भी अपने प्रभावसे विरेचन करती है। रस, विपाक, वीर्य और प्रभाव इन चारोंमें जो बलवान होता है वह दूसरे दुर्बलका पराभव करके अपना कार्य करता है। क्योंकि जहा विरुद्ध गुणोंका संयोग होता है वहा बलवान्के द्वारा दुर्वलका पराभव होता है । परन्तु जहा रस, विपाक, वीर्य और प्रभाव समान वलवाले होते हैं वहां अपने नैसर्गिक (खाभाविक ) वलसे विपाक रसका, वीर्य रस और विपाक दोनोंका तथा प्रभाव रस, विपाक और वीर्य तीनोंका पराभव करके अपना कार्य करता है। परस्परं विरुद्धानामपि रसादीनां कार्यसाधनेऽविघातकत्वम्- विरुद्धा अपि चान्योन्यं रसाद्याः कार्यसाधने । नावश्यं स्युर्विघाताय गुणदोषा मिथो यथा ॥ (अ. स. सू. भ. १७)। ननु यत्र रसादीनामन्यतमस्य कार्यमितरस्य कार्येण विरुध्यते तत्र कस्य कार्य- कर्तृवं भवति ? यदि तु प्रभूतस्य स्वभाववलवतश्चेत्युच्यते, तन्त्राल्पोऽल्पवलश्च किंचित् कतुं शको न वा ? इत्येव पृष्ट इदमाह-विरुद्धा इत्यादि । रसाचा रस-वीर्य-विपाक- गुण-प्रभावाः, भन्योन्यं परस्पर, विरुदा अपि न नाशाय भवन्ति कार्यसाधनकाले। रष्टान्तो-गुण-दोषा मिथो यथेति । गुणाः सस्व-रजस्तमांसि, परस्परं पुरुषाघभि- धानकार्यसाधने, विरुद्धा अपि यथा विघाताय न भवन्ति दोषाश्च वात-पित्त-कफा, देह-रोगादिसाधने यथा मिथो विधाताय न भवन्ति तद्वद्रसादयोऽपि (इन्दुः) । जहां रस, वीर्य या विपाकका कार्य इतरके कार्यके विरुद्ध होता है वहां कौन अपना कार्य करता है ? यदि प्रभूत और बलवान् अपना कार्य करता है, ऐसा कहा जाय तो वहां अल्प और अल्प बलवाला कुछ कर सकता है या नहीं ? इस प्रश्नके उत्तरमें वृद्ध वाग्भट कहते हैं कि जैसे-सत्त्व, रज और तम ये प्रकृतिके तीन गुण जगत्की उत्पत्तिमें, तथा वात, पित्त और कफ ये तीन दोष देहकी उत्पत्तिमें या रोग उत्पन्न - द्रव्यगुणविज्ञाने पूर्वार्धे प्रथमं परिशिष्टम् । भूतानामसाधारण लक्षणम् (लिङ्गम् )। जलस्य लिन वायोलिङ्गं तेजसो लिङ्गं पृथिव्या लिङ्ग नमसो लिमम् । द्रवत्व चलत्व खरत्वं (कठिनत्वं) अप्रतिघातः (मस्पर्शवस्वम्) उष्णत्वं (गतिमत्त्व) भूतानामसाधारणा गुणाः। वायुगुणः भग्निगुणः जलगुण. माकाशगुणः पृथिवीगुणः . . शब्दः रस. गन्ध. 7 स्पर्श भूतानामसाधारणा भूतान्तरानुप्रवेशकृताश्च गुणाः । भाकाशगुणः वायुगुणौ अग्निगुणाः जलगुणाः पृथिवीगुणाः शन्दः शम्द-स्पी शब्द-स्पर्श-रूपाणि शम्द-स्पर्श-रूप-रसाः शम्द-स्पर्श-रूप- रसनाचा भावमिश्रमतेन भूतानां गुणाः । आकाशगुणः भूमिगुणः जलगुणः वायुगुणः अग्निगुणः गुरु खिग्ध. वीक्ष्ण पार्थिवादिपाञ्चभौतिकद्रव्य(कार्यद्रव्य )गुंणाः । पार्थिवद्रव्यं आप्यद्रव्यं आग्नेयद्रव्यं वायव्यद्रव्यं नामसद्व्यं मृदु गुरु खर (खरस्पर्श) कठिन द्रवं खिग्ध शीत उष्ण तीक्ष्ण सूक्ष्म शीतं रूखं सूक्ष्म १ "खर-द्रव-चलोष्णत्व भू-जलानिल-तेजसाम् । आकाशस्याप्रतीपातो दृष्ट लिग यथा- क्रमम् ॥" (च. शा. म १)। २ "शब्द स्पर्शश्च रूप च रसो गन्धश्च तद्गुणा." (च शा अ. १)। ३ "तेषामेकगुण पूर्व गुणवृद्धि परे परे ।" (च. शा. भ. १)। ४ मस्मिन्नेव अन्ये पृ. १०५, पं. ६-७ । ५ अस्मिन्नेव ग्रन्थे पृ. ७-१० । .
पूर्वार्धे प्रथम परिशिष्टम् । पार्थिवद्व्यं भाग्यद्गव्यं माग्नेयगव्यं वायव्यद्रव्यं नाभसद्व्यं लक्ष्ण मन्द मन्दं स्थिर विशदं व्यवायि मृदु पिच्छिल स्तिमित खर विशद विशद खरं विकाशि ऊर्ध्वगतिखभाव व्यवायि रूपवहुल स्पर्शवहुल सान्द्र विशद विविक्त अव्यक्तरसं शब्दबहुल सर रसवाल अधोगतिखमावं गन्धनहुल पार्थिवादिकार्यद्रव्यरसाः। आप्यगव्यं आग्नेयद्रव्यं वायव्यद्रव्यं पार्थिवद्गव्यं नाभसद्रव्यं अव्यक्तरस प्रायशो मधुर प्रायशो मधुर ईपत्कषाय ईपत्कपायाम्ललवणं ईपदम्ललवण ईपत्तिक प्रायशः कटक विशेषतः कपायं पार्थिवादिपाञ्चभौतिकद्रव्यविपाकोः । पार्थिवद्रव्यविपाकः आप्यद्रव्यविपाकः भाग्नेयद्रव्यवि० वायव्यगव्यवि. नाभस- द्रव्यवि० छेदन गुरु. गुरु. लघु. लघु. पार्थिवादिपाश्चभौतिकद्रव्यकर्माणि । पार्थिवद्गव्यकर्म भाप्यद्रव्यकर्म भामेयगव्यकर्म वायव्यदव्यकर्म नाभसद्व्यकर्म । . दहन उपचयः (वृहण) मार्दव विरुक्षण लेहन सौपिर्य सघात. ग्लपन पचन गौरव बन्धन प्रमा विचारण लाघव स्थैर्य विष्यन्दन प्रकाशन वैशद्य विवरण बल मार्दव वर्णः लाघव प्रसादन दारण कर्शन तापन शघ्य - २ असिन्नेव ग्रन्थे पृ. २२९ । ३ अस्मिन्नेव ग्रन्थे १ मसिन्नेव ग्रन्थे पृ ८। पृ. ७-१०।
३०४ द्रव्यगुणविज्ञानम् । गुणाः। वैशेपिकगुणाः शारीरगुणाः अध्यात्मगुणाः सामान्यगुणाः महागुणाः । । गुरुः बुद्धि. परत्वं सवं स्पर्शः रज. लघुः शीतः द्वेष अपरत्व युक्तिः . तमः रस. गेन्ष नागार्जुनमतेनं कर्मण्या गुणा । उष्ण: जिग्ध रुक्ष मन्दः तीक्ष्णः स्थिर. सुख दुख प्रयत्न मनोर्थाः सख्या संयोगः विमागः पृथक्त्वं परिमाण सस्कारः - शीतः उष्णः सिग्ध. अभ्यासः मृदुः कठिन. विशदः विश्दा पिच्छिल: पिच्छिल. गुरुः लघुः मुर्दुः तीक्ष्णः खर स्थूल. सूक्ष्म सान्द्र. द्रव गुरुगुणकर्म गुर्वादिगुणानां कर्माणि । लघुगुणकर्म शीतगुणकर्म उष्णगुणकर्म कादन अवसादः (ग्लानि ) असाद (अग्लानि ) उपलेप. (मलवृद्धि ) अनुपलेप (मलक्षय ) यल बलहानि. तर्पण अपतर्पण (लड्न) गृहणं कर्शन स्तम्भन मूर्छाहरण तृपाहरण खेदहरण महादन (असुखकरण) अनुलोमन मूर्छन तृष्णाकरण स्वेदन १ अस्मिन्नेव अन्ये पृ. ९८-१०२ । २ अस्मिन्नेव ग्रन्थे पृ. १०२-१०९ ।
पूर्वार्धे प्रथम परिशिष्टम् । गुरगुणकर्म लघुगुणकर्म शीसगुणकर्म उष्णगुणकर्म दाहपशमन. वातहरण कफवर्धन चिरपाकित्व दहन पाचन लेखन रोपण वातवर्धन कफहरण अचिरपाकित्व निग्धगुणकर्म रूक्षगुणकर्म मन्दगुणकर्म तीक्ष्णगुणकर्म । चिरकारित्व दहन लेहन मार्दव । शमन पाचन सावणं, ३ काठिन्यं वलहानिः वर्णहानिः स्तम्मन कार्कश्य वातवर्धन पित्तवर्धन । लेखन वर्णः वातनाशन कफवर्धन धाजीकरण शेदनं कफ-वात-हरण शोधन कफहरण , स्थिरगुणकर्म सरगुणकर्म मृदुगुणकर्म कठिनगुणकर्म द्रढन (दृढीकरण) धारणं (वात-मल-स्तम्मन ) मनुलोमन पाकनाशन (वात-मल प्रवर्तन) (अपचन) प्रेरण दाहरण सावनाशनं श्थन विवादगुणकर्म पिच्छिलगुणकर्म लक्ष्णगुणकर्म खरगुणकर्म जीवन लेखन रोपण जीवन वल " छेदाचूषण रोपण अजीवन पलहानि. मसंधान श्रेष्मनाशन सधान कफवर्धन सधान गौरवं कफवर्धन लेपन . लाघव द्र० पृ.२० - ३०६ द्रव्यगुणविज्ञानम् । सूक्ष्मगुणकर्म स्थूलगुणकर्म सान्द्रकर्म वकर्म - गृहण सूक्ष्मस्रोत प्रवेशः विवरण वृष्णं पन्धन प्रदन म्याप्ति विलोटन स्रोतोयरोधः प्रसादन रसानां गुणतारतम्यम् । शीता (सोम्या) रसाः उष्णा (आग्नेया) रसाः गुरवो रसा मधुरः (उत्तम ) तिक्त (अवर ) कपायः (मध्यम ) कड (भवर.) अम्ल (मध्यम ) लवण (उत्तम ) मधुर (उचम.) लवण (अपर.) फपाय (मध्यम.) (क) अम्लः (मु.) सिग्मा रसाः लघवो रसा: रुक्षा रसाः अम्ल. (मवर ) कपाय (उत्तम.) मधुर. (उत्तम ) कटु (मध्यम ) कटु (मध्यम ) अम्ल. (मध्यम ) तिक्त (उत्तम ) (च.) तिक. (मवर ) लवण (भवर.) कषायः (सु.) रससहचरा वीर्यसंज्ञका गुणोः । मधुरः अम्लः लवणः कटुः तितः कपाय: स्निग्ध शीत लघु . उष्ण. शीत शीत खिग्ध. गुरु मूद गुरु. किञ्चिद्गुरु. लघु खिग्ध उष्ण उष्ण वीक्ष्णः तीक्ष्ण. दोषहरा रसाः। पित्तहरा रसाः - वातहरा रसाः कफहरा रसाः । मथुर कपाय कषाय. अम्ल. मधुर कटु लवण तिक्त तिक्त १ अस्मिन्नेव ग्रन्थे पृ १४७, तथा पृ १७९-१८० । २ असिन्नेव ग्रन्थे पृ. १५३- ३ अस्मिन्नेव ग्रन्थे पृ. १८१-१८७ । + पूर्वार्धे प्रथमं परिशिष्टम् । ३०७ ; दोषजनका रसाः। वातजनका रसाः पित्तजनका रसाः कफजनका रसा: कटु कटु तिक्त मधुर, - अम्ल अम्ल. - कपाय लवण लवण रसानां विपाकाः। मधुररसविपाकः अम्लरसवि० लवणरसवि० कटुरसवि० तिकरसवि० कषायरसवि०' मधुर कटु. गुरु लघु . अम्ल. मधुर. कटु. कटु लघु. गुरु लघु लघु चरकमतेन विपाककर्माणि । अम्लविपाकः मधुरविपाकः कटुविपाक: - शुक्रनाशन. नदविण्मूत्र . वातल । शुक्रनाशन सृष्टविण्मूत्र सृष्टविण्मूत्र कफकर '. पित्तकर शुक्रकर गुरु. सुश्रुतमतेन विपाककर्माणि । लघुविपाक गुरुविपाकः पातपित्तन कफकर. सृष्टविण्मूत्र. वदविण्मूत्र वातकर लेप्मान. वीर्यकर्माणि । शीतवीर्यकर्म निग्धवीर्यकर्म उष्णवीर्यकर्म रूक्षवीर्यकर्म दहन लेहन वातवर्धन प्रहादन विष्यन्दन पचन वृहण सग्रहण २ १ मस्सिनेष ग्रन्ये पृ. १८१-१८७ । अस्मिन्नेव ग्रन्ये पृ. २१८-२२९ । ३ अस्मिन्नव अन्ये पृ २४३-२४५ । ४ असिन्नव ग्रन्थे पृ २४४ । अन्ये २६४-२६५ । ५ अस्मिन्नेव ३०८ द्रव्यगुणविज्ञानम् । उष्णवीर्यकर्म शीतवीर्यकर्म स्निग्धवीर्यकर्म रूक्षवीर्यकर्म संतपण वाजीकरण पीडन विरूक्षण रोपण - वय स्थापन मूर्छन स्वेदन वमन विरेचन विलयन वात-कफ नाशनं पित्तवर्धन लाव शुक्रनाशन भ्रम तृषा ग्लपनं खेदन विशदवीर्यकर्म स्थिरीकरण प्रसादन केदन जीवन स्तम्भन रक्त-पित्त-प्रसादन वात-कफ-वर्धन गौरवं बलवर्धनं । - 1 पिच्छिलवीर्यकर्म तीक्ष्णवीर्यकर्म 1- उपलेपन मृदुवीर्यकर्म 1. रक्त-मास-प्रसादनं सुस्पर्शन छेदाचूषण विरूक्षणं उपरोहणं । भाचूषण अवदारणं स्रावण पूरण बृहण सश्लेषण वाजीकरण . . . - -- 4 - -- परिशिष्ट २ . आयुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार लेखक डॉ. 'बालकृष्ण अमरजी पाठक, एम. बी. बी. एस. प्रिन्सिपल आयुर्वेदिक कालेज बनारस-हिन्दुयुनिवर्सिटी आज, जब कि आयुर्वेदके उपासकोंपर विपक्षियोंकी ओरसे यह आक्षेप करनेमें आता है कि-आयुर्वेदमें द्रव्योंका उपयोग उनके शास्त्रीय ज्ञानके विना ही किया जाता है, 'द्रव्यगुणविज्ञानम्' जैसे ग्रन्थका प्रकाशन खागताई है । बहुत थोड़े मनुष्य यह जानते हैं कि आयुर्वेदाचार्योंने मी द्रव्योंके गुणदोषोंके सवन्धमें अनेक विचार किये हैं, इतना ही नहीं किन्तु इन विचारोंको उन्होंने एक सिद्धान्त ( Theory ) द्वारा एक- सूघमें आबद्ध भी कर लिया है, तथा जैसे आयुर्वेदका रोगविज्ञान त्रिदोषवादपर आश्रित है वैसे ही उसका चिकित्साविज्ञान ( Therapeuties) भी व्यगुण- विज्ञानपर आश्रित है। 3; इस पूर्वार्धमें किया गया निरूपण लोकभोग्य नहीं, किंतु विद्वद्भोग्य है; कारण, एक साधारण चिकित्सकको द्रव्योंके गुण-दोषोंकी जानकारीसे ही सतोष हो जाता है । उसे यह जाननेकी आवश्यकता नहीं मालूम होती कि यह जानकारी किन प्रमाणोंपर अवलम्बित है। जो लोग आयुर्वेदको जादू-टोनेकी नवीन आवृत्ति मानते हैं अथवा जिनका यह पूर्वग्रह ( Prejudice) है कि इस देशके वैद्यकीय वाडायमें वैज्ञानिक विचारोंका अभाव है, उन्हें तो मुझे कुछ कहना ही नहीं है । परन्तु जो अवलोकनके आधारपर सत्यासत्यकी परीक्षा किया चाहते हैं, उनके लिए इस प्रन्थमें सगृहीत जानकारी अमूल्य है । आयुर्वेदके उपासकोंको इस प्रन्थमें, मधुमक्षिकाओंद्वारा विभिन्न पुष्पोंमेंसे सुगन्धि द्रव्य सचित करके बनाये हुए मधुके सदृश, आयुर्वेदिक वाङ्मयके विभिन्न प्रन्थोमसे एकत्र करके संकलित की गयी सरस सामग्री उपलब्ध होगी, ऐसा मेरा मत है। - -- - -- 2 Therefore, medical science should always be ready to invostigate claims that can be confirmed or disproved by observation Irrespective of the question as to the possibility of the truth of the theory which led to their discovery. Applied Pharmacology, by Olark.
मव्यगुणविज्ञान पूांध, परिशिष्ट २ । जैसे वर्तमान वेद्यपीग शानया पदार्थविज्ञान (Physics ), रसायनशाम्प (Chomistry ), जीवविधा (Biology), मानराशास्त्र (Psychology ) आदि विज्ञानकी शाखाओं के साथ गाद सबन्ध है, उसी प्रकार भायुदया उस कालके दर्शनोंके साथ गाठ संबन्ध था । गाग्य, वैशेषिया, रोग तथा न्यायशासक साप आयुर्वेदका संवन्ध भायुर्वेद के अभ्यासियोंको मुविदित है। आयुर्वेदाचार्योने संयमधन तपस्थियोंके गम्भीर चिन्तनोंक परिणामन्यरूप उत्तम दार्शनिक मन्तव्यों को चिकित्साके व्यावहारिक क्षेत्र( Practical field ) में नियोजित करके, अपनी वैज्ञानिक दृष्टिका उपयोग किया है। इस प्रन्यके मण्याय इस पातके साक्षी है। साथ ही यह बात भी उदेशनीय है कि प्रानीन आचार्य भन्न यकीय पात्रक प्रति भी उदार दृष्टि रखते थे । जैसे व्यवहारमें संकुचित रएि दन्यानोप्रन्धि. (Inferiority Complex) का लक्षण है, पेसे ही विज्ञान के क्षेत्रमें संयुक्ति दृष्टिवाले मनुष्य अपना मानसिक दौर्बल्य प्रकट करते है। यह कथन विज्ञानके अन्य क्षेत्रोंकी अपेक्षया वैद्यकीय क्षेत्रमें अधिक सत्य है 1 कारण, रोगनिवारण (Cure) तथा रोगप्रतिवन्ध( Prevention )के सतत प्रयास होते हुए भी एक भी चिकित्सापद्धतिको इस कार्यमें संपूर्ण सिसि नहीं गिठी है। यही देराकर तो इस देशमें तथा पश्चिममें साहित्यकारोंने समय-समयपर अपनी प्रतिभाफा उपयोग क्यों या डाक्टरोंके धन्धेका उपहास करने में किया है। वाचकोकों आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानका यत्किचित् परिचय फराने तथा पूर्व और पश्चिमकी विचारधारायें कहाँ-कहाँ मिलती है और कहाँ-कहाँ पृथक् होती है यह बतानेके उद्देशसे ही यह परिशिष्ट लिखा गया है। कहनेकी आवश्यकता नहीं कि इसमें प्रकट किये गये विचारोंकी जवाबदारी मेरी है। जिनको विशेष जिज्ञासा हो उन्हें तो प्राचीन तथा अर्वाचीन आकर अन्य ही देखने चाहिए। १. देखिये-'आयुर्वेद भने दर्शनो' इस नामका दुर्गाशकर केवलराम शामीका गुनरावी निवन्ध, तथा पं. नारायणदत्त त्रिपाठी कृत 'आयुर्वेददर्शन' नामक ग्रन्थ । २. देखिये-"विविधानि हि शाखाणि भिपजां प्रचरन्ति लोफे, तत्र यन्मन्येत. तदमिप्रपधेत शास्त्रम्", तथा-"न चैव पस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पार, तलादप्रमत्त शश्वद- भियोगमसिन् गच्छेत् ...... परेभ्योऽप्यागमयितव्यम् । कृत्लो हि लोको मुस्मितामाचार्यः, शत्रुश्चाबुद्धिमताम् ।" आदि उपदेशवचन (चरक० वि० म० ८)। ३. सस्कृतमें भाणे- प्रहसन आदि रूपकोंमें अन्य अधम कक्षाके पात्रोंके साथ एकाध मूढ वैद्यको नी सदा किया पाया जाता है। अग्रेजी वास्थयमें भी प्रख्यात सिद्धहस्त लेखक वर्नार्ड शॉने Doctors' Dilemma (डॉक्टर्स डाइलेमा) नामके नाटकमें चिकित्साशासके व्यापारी ' मर्यात डाक्टरोंपर कटाक्षरूप शरवर्षा करनेमें कमी नहीं की है। + । - । भायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार पाश्चात्य द्रन्यगुणविज्ञानका इतिहास- पाश्चात्य द्रव्यगुणविज्ञान (Pharmacology ) भवतक विचित्र परिस्थितियोंमेंसे गुजरा है। इसका लोकप्रिय नाम मटीरिया मेडिका ( Materia Medica) है। आजकल लमभग इसी अर्थमें फार्मेकॉलॉजी (Pharmacology ) शब्द व्यवहृत होता है। वैज्ञानिक पद्धतिसे जिन द्रव्यों का गुण-धर्म समझमें आवे उन्हीका उपयोग करना यह इस शास्त्रका आग्रह है। प्राचीन ग्रीक तथा रोमन सस्कृतियोंकी इसपर छाया है। हीपोक्रेटिस, गेलन आदि प्राचीन चिकित्सकोंके लेखोंका इसपर प्रभाव है। ये प्राचीन, पाश्चात्य चिकित्सक भारतके कितने अंशमें ऋणी हैं यह बात ऐतिहासिकोको सुविदित है । सत्रहवीं शताब्दीतकके इतिहासकी परीक्षा की जाय तो तुलनामें, इस देशमें हुई द्रव्यगुणविज्ञानकी प्रगति बहुत संतोषकारक प्रतीत होगी । यूरोपमें लगभग सोलहवीं शताब्दीतक परम्परागत मन्तव्यों किंवा रूढियोंका अनुसरण करने एवं लब्धप्रतिष्ठ वैद्योंका अनुकरण करनेकी परिपाटी प्रचलित थी, किन्तु अमुक औषध अमुक रोगकी चिकित्सामें क्यों देना, वह औषध किस प्रकार कार्य करता है, इस बातका सप्रमाण विचार (Logical thought ), नहीं किया जाता था। • इस स्थितिका मुख्य कारण शरीरव्यापारशास्त्र (Physiology ) तथा संप्राप्ति- विज्ञान(Pathology )के ज्ञानका अभाव था । उस कालमें विज्ञानकी इन दोनों शाखामोंका सतोषप्रद विकास नहीं हुआ था । अतः द्रव्यगुणविज्ञान केवल अनुभव तथा शब्दप्रमाणपर आश्रित था। परन्तु जबतक शरीरके विभिन्न 'अवयवोंके व्यापार न विदित हों तवतक उनकी विकृतियाँ समझमें नहीं आ सकतीं, यह बात दीपकके समान स्पष्ट है। । 'इस विचित्र परिस्थितिके परिणाम भी 'विचित्र थे । विषमज्वर(Malaria)की चिकित्सा इसका ज्वलन्त उदाहरण है। सत्रहवीं शताब्दीमें अमेरिकासे लौटे हुए यात्रियोंने बताया कि सिंकोनाकी छाल (Cinchona bark) मैलेरियाके लिए अमोघ औषध है । उन्नीसवीं शताब्दीमें भारतसे निवृत्त हुए एक डॉक्टरने कहा कि विषमज्वरके लिए कैलोमेल (Calomel) एफ अव्यर्थ औषध है ।' जानकर वाचकोंको विस्मय होगा कि ई. सन् १८४७ तक कंपनी सरकारके राज्यमें कलकत्ताकी हॉस्पिटलमें विषमज्वरकी चिकित्सामें कैलोमलका छूटसे उपयोग होता था । परिणामकी कल्पना की जा सकती है ! ! अन्तत. क्वीनाईनका आविष्कार हुआ और अनेकोंका विरोध होते हुए भी उसका उपयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता ही गया। १ देखिये 'काश्यपसंहिता' का उपोद्यत पृ. १९१ । २ देखिये चक्रपाणिके मननीय शम्द--'तत्र ग्रहणीरोगनिर्दिष्यामिदोपे वक्तव्ये प्रकृतिज्ञानानन्तरीयवाद् विकृतिज्ञानस्य प्रथम तावदविकृतस्याम रूपमाह' (च. चि म. १५)। 7 ।
द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २। 1 । । औषध चिकित्साशास्त्रका महत्त्वपूर्ण अङ्ग है, परन्तु औषध देने में ही चिकित्साकी संपूर्णता नहीं है । अन्य विषयोंपर भी लक्ष्य देना आवश्यक होता है । शारीरशाल तथा सप्राप्तिविज्ञान( Pathology )के घोर अज्ञानके वातावरणमें ऐसा चिकित्सा- शास्त्र रचनेके प्रयास शुरू हुए जिसका खरूप निश्चित हो तथा जो प्रत्यक्ष, अनुमान, अनुभव तथा युक्तिकी भित्तिपर खड़ा (Rational System of Therapeutics ) हो । इसके परिणामखरूप १९ वीं सदीमें यूरोपमें जो परिस्थिति उत्पन्न हुई उसका इतिहास बड़ा मनोरञ्जक है। अठारहवीं शताब्दीसे आजकल अॅलोपॅथी( Allopathy)के नामसे प्रसिद्ध चिकित्सापद्धतिका प्रचार वढा । आजकल डाक्टर लोग इस नामसे चिढ़ते हैं। कारण, इसमें जो दोष विद्यमान थे वे प्रकाशमें आगये हैं । अॅलॉपथीका मुख्य ध्येय रोगफे लक्षणोंको बने वैसे दवा देना था। जैसे, ज्वर आया तो दो खेदल (Diaphoretic) औषध, अतिसार हुआ तो दो प्राही ( Astringent) औषध इत्यादि । और इस ध्येयकी पूर्तिके लिए जौक, सिरावेध, वमन, विरेचन प्रमृतिका पुष्कल व्यवहार होता था। केवल फ्रासमें १८२७ ई. में तीन करोड वीस लाख जौकोंका, उपयोग हुआ था। प्रवाहिका (Dysentery), तथा विषमज्वरकी चिकित्सामें कॅलोमेलकी बीस ग्रेन जितनी बड़ी मात्रा दी जाती थी। फल यह होता था कि प्रायः केसोंमें रोगी सर्वथा अशक और नि.सज्ञ होकर परम-धामको सिधार जाता था। आज भी डॉक्टरोंमें कितनेक इस परंपराको चालू रखे हुए हैं। लक्षणप्रत्सनीकचिकित्सापद्धति(Symptomatic treatment) के सामने हॉमियोपॅथीने सिर उठाया । उन्नीसवीं शताब्दीके प्रारम्भमें ही हेन्मेन (Hahnemann )ने प्रतिपादन किया कि औषधोंकी परीक्षा प्रथम स्वस्थ पुरुषोंपर होनी चाहिए और पीछे उनका प्रयोग रोगियोंपर होना चाहिए। यह विचार उत्तम था और है । परन्तु उसने दो अन्य सिद्धान्त भी प्रस्तुत किये जो विवादास्पद , हैं--(१) स्वस्थ पुरुषको अमुक औषध देनेसे जो चिह्न दृष्टिगोचर हों उन्ही चिह्नोंवाला रोग उस औषधके देनेसे मिट जाता है । (२) औषधको क्रमशः घोटते-घोटते उसकी मात्राका प्रमाण अल्पतर वा अल्पत्तम बनानेसे उसकी रोग- निवारणशक्ति क्रमश अधिकतर वा- अधिकतम हो जाती है । ये दोनों सिद्धान्त अलॉपॅथीके सिद्धान्तसे भिन्न हैं और इतने अशमें हॉमियोपॅथीका, द्रव्यगुणविज्ञान - । । १ देखिये भगवान् चरकके शब्द-इह खलु व्याधीनाxxx अनन्तर दोष-भेषज-देश- काल-बल शरीराहार-सार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसा मानम् ('च. वि. स. १)। २ Like oures like. The aotions of drugs are potentiated by dilution. - । - मायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार ३३ मिण मार्गका अनुसरण करता है । जप हॉमियोपॅथीकी दवाओंसे भी रोगी अच्छे होने लगे तय लोगोंको ख्याल माया कि द्रव्यगुण विज्ञानके सिद्धान्तोंमें भी मतमेदको स्थान है, एवं अलॉपॅथीमें भी कुछ दोप हैं। अस्तु । हॉमियोपॅथीके उपासकोंने औपधद्रव्योंकी इतनी अल्पतम मात्रा देनी शुरू की कि साधारण मनुष्योंको वह हास्यास्पद लगने लगी । परंतु उस कालमें हॉमियोपॅथी मॅलोपथीकी अपेक्षा कम हानि करती थी। कारण, अत्यन्त अल्प मात्रामें औषध देकर रोमियोपैथी शरीरकी खाभाविक संरक्षणशक्तिको रोगका सामना करनेका अवसर देती थी। उधर उस कालकी अलॉपॅथिक पद्धति रोगके लक्षणों को एकदम दवानेका प्रयास करके, रोग रोगीको मारे उसके पूर्व ही उसे यमसदनको पहुँचा देती थी। तथापि, आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्साशास्त्र ( Modern Therapbutics) उपर्युक दोनों चिकित्सापद्धतियों का ऋणी है । अलॉपॅथीमें व्यवहत होनेवाले कितनेक द्रव्य आज व्यवहारमें आते हैं, जव कि हॉमियोपैथीद्वारा इसे शरीरकी अद्भुत संरक्षणशक्तिका ज्ञान हुआ है। रोगका आक्रमण होनेके पश्चात् शरीर खतः स्वाभाविक रीविसे रोगमुक्त होनेका यम करता है, अतः उसे इस प्रयासमें जितनी सहायता दी जा सके, उतनी, ही चिकित्साशासकी सफलता है। हॉमियापॅथीके युगमें साथमै जीवनरसायनशास्त्र( Biochemistry )का मी प्रादुर्भाव हुआ । शरीरमें अमुक अमुक द्रव्योंकी कमीके कारण रोग होते हैं और ये द्रव्य प्रदान करनेसे रोग निर्मूल हो जाता है, इस मतपर यह आश्रित है । इसका औषधसंग्रह खत्प है। सहस्रों व्याधियों का बहुत थोड़े द्रव्योंकी सहायतासे प्रतीकार करनेकी यह चेष्टा कर रहा है। यह अलॉपॅथीकी अपेक्षा हॉमियोपेथीके अधिक - निकट है। -- - इसके अनन्तर जानो औपोंसे उद्विम रोगियों को आश्वासन देनेको अस्थ्युपचार- शास्त्र( Osteopathy )का आगमन हुआ । अस्थियोंके स्थानभ्रंश (Dislocation) किंवा आघातके कारण , रोग उत्पन होते हैं और अस्थियोंका उपचार करनेसे शान्त हो जाते हैं, यह माननेवाले चिकित्सकोंका भी एक पथ खड़ा हुआ, जो आज भी विलायतमें खानगी रूपमें अपना धंधा चला रहा है। इसके बाद इन सय पद्धतियोंको एक ओर रखकर केवल प्राकृतिक उपार्योका अवलम्बन करनेवाली निसर्गोपचारपद्धति ( Naturopathy )का जन्म हुआ। १ यह स्थापना अलॉपयीसे स्पष्टत विपरीत है । लक्षणोंको दवानेसे रोग नष्ट नहीं होता। इसका कारण दूर करनेसे ही रोगका नाश होता है । रोगको नष्ट करनेके लिए, संपूर्ण शरीर यश करता है, यह इसका स्वभाव है। + । । F द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वाधं, परिशिष्ट २ । System) के साथ रहकर कार्य करता हुआ एर अन्य गी रामायनिक तन्त्र विद्यमान है, जो उसके व्यापारोंके नियमनमें भाग लेता है। प्राचीन आयुर्वेदाचायाने वातादि दोषोंका मन किंवा मानसिक व्यापारोंके साथ नरन्ध प्रतिपादित किया है, यह यात तुलनात्मक दृष्टिसे महत्त्वकी है। (२) विकृतिविज्ञान अथवा संप्राप्तिशारख( Pathology)ी चेन इससे भी अधिक महत्त्वकी है 1 गत शताब्दीमें आशुमृतकपरीक्षा (Post mortem examination) द्वारा रोगोंके कारण शरीरमें उत्पन्न हुए परिवर्तनोंका अवलोकन किया जाता था। परन्तु पीछेसे विदित हुआ कि मृत्यु होते ही शरीर प्रत्येक कोप( Cell )में इतने अधिक परिवर्तन प्रारम्भ हो जाते हैं कि या निर्णय करना दुष्कर होता है कि रोगजन्य परिवर्तन कानसे है तथा मृत्युजन्य परिवर्तन कौनसे है ? अतः जीवित शरीरमें होनेवाले विकृतिजन्य विकारोका अवलोकन करना अधिक लाभप्रद है। इस उद्देश्यसे नवीन यत्रों और नवीन परतियों का अन्वेषण होने लगा । इस शास्त्रकी एक शाखाके रूपमें जन्तुशास्त्र (Bactriology) भी खूब पालवित हुआ। इसकी गवेपणामोंसे सिर हुआ कि इन जन्तुओंमेंसे कितनेरुकी प्रवृत्तियोंके परिणामरूप मनुष्यों, प्राणियों एवं वनस्पतियों में व्याधिया उत्पन्न होती हैं। तथा, इन रोगोत्पादक जन्तुओंसे शरीरका रक्षण किया जाय तो इनसे उत्पन होने- वाले व्याधियोंके आक्रमणसे बचा जा सकता है । इन विचारों के फलस्वरूप अनेक निज समझे जानेवाले रोग आगन्तुक समझे जाने लगे । क्षय, विषमज्वर, विचिका, श्लीपद, मायुफ, महाकुष्ठ आदि इसके उदाहरण है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्योको इस दिशाकी झांकी हुई थी, परंतु सप्रति जैसे स्पष्ट विचार प्रचरित है वे उस कालमें न धे । जन्तुशास्त्रकी गवेषणाएँ कायचिकित्सकोंसे अधिक शल्यविदों( Surgeons )को उपयोगी हुई हैं । कारण, जन्तुओंकी छूतके कारण होनेवाले उत्पात शान्त हो गये तथा व्रणशोथ, विसर्प, विद्रधि (Abscess), अश्मरी और मन्त्रद्धिका भय दूर हो गया । प्लेग, कॉलेरा, चेचक सरीखे छुतहे (संकामक) रोगोंका आता भी १ नाडीतनके व्यापारोंमें प्राचीनोक्त वायुका समावेश होता है, जब कि रासायनिक तम्रके व्यापारों में प्राचीनोंके पित्त और कफका समावेश होता है। शरीरके प्रत्येक कोपमें इन दोनों तत्रोंकी क्रियाएँ दृष्टिगत होती है । प्राचीनोंकी परिमापामें, प्रत्येक कोपमें याने प्रत्येक अतीन्द्रिय और अति सूक्ष्म शरीरावयवमें वात, पित्त तथा कफी क्रियाएँ दीख पडती है (देखिये-"शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेन अपरिसंख्येया भवन्ति, अतिमहत्वादतिसौक्ष्म्या- दतीन्द्रियत्वाच्च" (च शा. अ. ७)। वायुफे व्यापार याने शानतन्तुओंके व्यापार, तथा पित्त और कफके व्यापार अर्थात् कोपोंमें प्रवर्तमान भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तन-इन दोनों तम्रोंमें नाडीतत्रका अधिक महत्त्व माना जाता है। प्राचीन माचार्य भी यही मानते होंगे- यह पित्त पङ्गु कफ पड' इस प्रसिद्ध पद्यसे विदित होता है।
आयुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार अब कम होता जाता है। इन गवेषणाओंका प्रभाव चिकित्साशालपर भी हुआ है। कण्ठरोहिणी (Diphtheria), धतुर्वात (Tetanus) आदि रोगोंकी चिकित्सामें विपनाशक किंवा जन्तुनाशक रकज़लों( Antitoxia or Antibacterial Sera) का पुष्कल उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार जन्तुओंमसे बनाई गयी लसीकाओं ( Vaccines )का भी उपयोग होता है । इस चिकित्साके अनेक मूलभूत सिद्धान्तोंमें कई दोप भी जाननेमें आये हैं । जन्तुशास्त्रकी शोधोंके कारण उत्साहाविष्ट लोगोंने रोगोत्पादनमें जन्तुओंको उचितसे अधिक महत्त्व दे दिया और इनका सहार करनेसे ही संपूर्ण सक्रामक रोग निर्मूल हो जायंगे यह मान लिया। इसके पीछे विदित हुआ कि चेतन शरीरमें रोगोंका प्रतीकार करनेकी शक्ति (Immunity ) स्वभावसे ही रहती है। और यदि यह शक्ति टिकाये रखनेका प्रयत्न किया जाय तो जन्तुओंसे डरनेकी आवश्यकता नहीं है । वीज और क्षेत्रमे किसकी देखभाल अधिक करनी चाहिये-यह पुरातन प्रश्न है। वैज्ञानिक जगत् एक वार पुन. मानने लगा है कि क्षेत्रकी देखभाल अधिक महत्त्वकी है। जन्तु अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे, उनके संपूर्ण जीवनव्यापार सूक्ष्मदर्शक यन्त्र- (Microscope )की सहायतासे भी नहीं देखे जा सकते । परंतु अब यह त्रुटि भी दूर हो गयी है । हालहीमें आविष्कृत वैद्युत सूक्ष्मदर्शक यन्त्र- (Electron Microscope )की सहायतासे अव यह सूक्ष्मतम वस्तु भी दर्शनसुलभ हो गयी है । कारण, यह यन्त्र सूक्ष्म वस्तुको एक लाखगुणी वड़ी करके दिखाता है । इस यन्त्रद्वारा जन्तुओंके विष (Toxin ) तथा उसके प्रतिविष (Antitoxin ) के मध्य शरीरमें होनेवाले व्यापार प्रत्यक्ष किये जा सकते है। आशय यह कि पहलेके अनुमानगोचर व्यापार अव प्रत्यक्षगोचर किये जा सकते हैं, एव इतने अंशमें चिकित्साशास्त्र की नींव अधिक दृढ हो गयी है । प्राचीन मायुर्वेदाचार्योंने शरीरको क्षेत्रको अधिक महत्त्व देकर जन्तुओंको गौण स्थान दिया था-इस मतका जो कि आज समर्थन होता है, परन्तु जात्तव सृष्टिकी विस्तृत जानकारी माधुनिक वाब्धय अतिविशाल प्रमाणमें प्रस्तुत करता है। उनका एक अन्य सिद्धान्त भी आज खीकृत हुआ है और वह है रोग और मनुष्यकी प्रकृतिके बीचका सवन्ध । प्रत्येक मनुष्यकी प्रकृति समान नहीं होती । अमुक प्रकृतिवालेको अमुक रोग" होनेकी सभावना विशेषता होती है। यह नियम शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकारके रोगोंकी उत्पत्तिपर समान रूपसे लागू होता है । रोगका आक्रमण होनेपर शरीरका एक भाग नहीं किंतु 'समग्र शरीर रुग्ण होता है और इस रोगके सामने सारा 'शरीर युद्ध करता है । अत एव चिकित्साविधिमें मनुष्यके केवल विकृत या विकृत होते हुए शारीरिक भागकी नहीं परंतु एक व्यक्ति( Personality)की चिकित्सा करनी १ देखिये, Osler's Principles And Practice of Medicine, P. 190. ।
३१० दव्यगुणविज्ञान पूर्वाध, परिशिष्ट २ । - - उचित होता है। व्यक्तिसे पुरुषकी शारीरिक तथा मानसिक उमययिष मनसंपतिका प्रहण है । आयुर्वेदका प्रत्येक अभ्यासी इन सिद्धान्तोंमें प्राचीन आयुर्वेदाचार्योद्वारा उपदिष्ट सिद्धान्तोंकी ही पुनःस्थापना समझे तो कोई विस्मयकी मात नही । (६) रसायनविद्याने चेतन शरीरफे प्रत्येक पदार्थफा रामायनिक दृष्टि अन्वेषण (विश्लेपण) किया और प्रतिपादन किया कि जिन मूल तत्वों( Elements )से यह स्थूल ससार वना है उन्हीसे यह चेतन शरीर भी बना है। परंतु चेतन धारीर, जो कितनेक नवीन यागिक पदार्थ दिलाई परते है उन्हें प्रयोगशालामें निम रीतिसे भी बनाया जा सकता है और जीवित शरीरको प्रदान किया जा सकता है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्योंकी परिभाषामें कहना दो तो जिन पचमहाभूतोंसे यह विश्व मना है उन्हीसे यह मानवदेह बना है और इसमें विद्यमान पदायोंके तुल्य पदार्य पारसे देनेसे उनकी कमी पूर्ण की जा सकती है। आहारकी रासायनिक दृष्टिसे मीमासा होनेपर भाहारशास्त्र (Dietetics) अस्ति- खमें आया । शरीरको अपेक्षित गाद्य पदार्थों तथा उनमें विद्यमान प्रजीवनक द्रव्योंकी गवेषणा महत्त्वपूर्ण है । अनुभवके आधारपर उपयोगी सिद्ध हुए आहारपिपयरु सिद्धान्तोंको इस प्रकार रसायनशास्त्रसे पुष्टि मिली है, इतना ही नहीं किन्तु इन प्रजीवनक द्रव्योंमेंसे कई एक वनस्पतियों को हाथ लगाये विना कृत्रिम प्रकारले प्रयोग- शालामें निर्मित होकर चिकित्साशासकी सेवामें उपस्थित हो गये हैं। अब आदार तथा रोगोंका सवन्ध अधिक प्रमाणमें समसमें माता जाता है, और यढ़े हॉस्पिटलोंमें आहारशास्त्रीकी नियुक्ति आवश्यक मानी जाती है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्योने औषधद्रव्यों और आहारद्रव्योंका विचार एक ही साथ किया है। आज तो सुज्ञ या अज्ञ भी रोगी वैद्यसे मिलते ही पथ्यकी-क्या स्थाना ? A human boing does not exist as rarefiod mind antod with a solid body. He is an organism all of whoso subsidiary funotions contribute to this highest fonction-us mind which brings him not only conscious Doss, but also an antogratod bo haviour in relation to his surronudings. A Toxt Book Of The Protice Of Medicine, By Price P 1805. २ उदाहरणतया नलिकाहीन ग्रन्थियोंके स्राव (Hormones) तथा प्रजीवनक द्रव्यों- (Vitamines )में से कई एक प्रयोगशालामें बनाकर शरीरको प्रदान करनेसे शारीरिक स्वास्थ्य पुन प्राप्त किया जा सकता है। देखिये इस विषयके प्रतिपादक भगवान् चरकके शम्द-"एवमेव सर्वधातुगुणाना सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद् हस." (च शा. अ. ६)। तथा-"सर्वदा सर्वभावाना सामान्य वृद्धिकारणम् । हासहेतुर्विशेषम प्रवृत्ति- रुमयस्य तु" (च. स. अ. १)।
भायुर्वेदिक तया माधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार । मौर क्या न साना इस विषयकी प्रश्नावली उपस्थित करता है । उधर, नव्य या वैज्ञानिक चिकित्साशास्त्र जन्तुओंका आमूल विनाश करनेकी कोरी कल्पना छोड़कर मानवदेदको समुचित आहारद्वारा, योग्य प्रजीवनक द्रव्योंके सेवनद्वारा अधिक शक्ति- संपन बनाकर संक्रामक रोगोंसे टकर लेनेका विचार कर रहा है। परन्तु रसायनविद्याने अधिक मूल्यवान् भाग तो चिकित्साके क्षेत्रमें प्रदान किया हैं। संमोहन (Anesthetics) तथा जन्तुनाशक (Antiseptics) द्रव्यों के आविष्कारने शल्यविद्या तथा चिकित्साशास्त्रको सहायता दी है। शरीरका एक भी अवयव अब शल्यविदोंके लिए दुष्प्राप या दुर्भद्य नहीं रहा है। मस्तिष्क और उदयपर भी शल्यशास्त्र अपना प्रभाव चढ़ाता जा रहा है। अब तो कायचिकित्सामें भी रसायनशास्त्री मुख्य भाग लेने लग गये है-और वह है प्रयोगशालामें निर्मित रासा- यनिक द्रव्योंद्वारा जन्तुजन्य व्याधियोंके नाश करनेका कार्य (इस विषयका अधिक विवेचन आगे आयगा)। धातुओं( Metals)का उपयोग पश्चिममें बहुत देरसे शुरू हुआ । ये धातुएँ अब अर्धद्रव खरूपमें (Colloidal state) चिकित्सामें प्रयुक होने लगी है। -वैज्ञानिक चिकित्सापद्धतिकी धारा ऐसे छोटे-छोटे स्रोतोंके मिलनेसे बनी है इस कारण इसमें कुछ वैविध्य भी आया है। परन्तु विस्मयजनक बात यह है कि इस पद्धतिके सिद्धान्त आयुर्वेदिक चिकित्सापद्धतिसे अधिकसे अधिक प्रमाणमें सैद्धान्तिक रष्टिसे मिलते हैं। इसी कारण कई लोग कहते हैं कि आधुनिक चिकित्सापद्धति, इतिहासका विचार करें तो आयुर्वेदिक पद्धतिका पुनरवतार है। यह स्थापना अत्यन्त विवादास्पद है । इसका निर्णय मै विद्वान् तथा मननशील वाचकोंपर छोड़ता हूँ। द्रव्य तथा उनके गुण-धर्म- अभ्यासकी सरलताके लिए द्रव्यों( Substances )के तीन भेद किये गये है-औषधद्रव्य (Drugs), आहारद्रव्य ( Food) तथा विषद्रव्य (Poisons) । विज्ञानकी इन तीनों द्रव्यसमूहोंका वर्णन करनेवाली शाखाएँ क्रमशः फार्मेकॉलॉजी (Pharmacology-old term-Materia Medica - 1 Proventive medicine hitherto has concerned itself chiefly with the provention of the spread of organisms, but now it appears probuble that much may be done by correct dieting to razce the resistinco of populations.-~-रोगनिरोधक चिकित्साका प्रधान अङ्ग अनतक जन्तुओंके प्रसारको रोकना रहा है। परन्तु अब यह समव प्रतीत होता है कि उचित आहारदारा रोगनिवारणशक्तिको उत्कृष्ट बनाकर मी बहुत इष्टसिद्धि प्राप्त की जा सकती है। जनताकी ३२० द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २। तमा प्राचीन संज्ञा-मैटिरिया मेडिका), डायाटेटिक्स (Dietetics) टॉक्सिकॉलॉजी (Toxicology) नामसे प्रख्यात है। परन्तु कितनेक द्रव्य ऐसे हैं जिन्हें औषध कहा जाय या विष, इसका निर्णय दुष्कर होता है । सो । वाचकोंको ये तीन विभाग सापेक्ष ( Relative) समझने चाहिये। जैसे मधु, भय, द्राक्षा, दूध आदि द्रव्य आहारद्रव्यों एवं औपधद्रव्योंके अन्तर्गत है । यही कठिनाई औषध और विषद्रव्योंका मेद करने में उपस्थित होती है। कारण, कई औषध मात्रा और कालका विवेक न करके दिये जानेपर रोगीमें विषके लक्षण उत्पन्न करते हैं। उधर, कई एक विष युक्तियुक्त सेवनसे अल्प मात्रामे औपधरूप सिद्ध हुए है। जैसे पारदके योग, जमालगोटा, एरण्ड आदि अविवेकसे दिये जानेपर हानि करते हैं जब कि अफीम, धतूरा या सर्पविष युक्तिपूर्वक प्रयोगसे अमूल्य औषधरूप होते हैं। परन्तु इस ग्रन्थका मुख्य विषय औषधद्रव्य होनेसे हम इन्हीकी मीमांसा करेंगे। आयुर्वेदाचार्योंने द्रव्यका सघटन पाञ्चभौतिक माना है तथा गुण और कर्म द्रव्याश्रित माने हैं। अब इस संवन्धमें आधुनिक विज्ञानवादियों का मत देखते हैं। इनके मतानुसार द्रव्योंका संघटन विधुच्छक्तिमय (Electrical ) है । यह दृश्य जगत् ९२ मूल तत्त्वों( Elements)का बना हुआ है । प्रत्येक मूलतत्त्वका समटन तथा गुणधर्म भिन्न भिन्न होते हैं । परन्तु ये मूलतत्त्व मी अणुओं (Molecules) तथा परमाणुओं (Atoms) की लीलामात्र हैं। आशय यह है कि परमाणु मिलकर अणु वनते हैं और अणु मिलकर मूलतत्त्व वनते हैं । एवं ९२ मूलतत्त्वोंके विविध संयोगोंके परिणामस्वरूप अनेक यौगिक पदार्थ (Compound Substances) प्रादुर्भूत होते हैं। अन्य शब्दोंमें कहें तो यह विश्व परमाणुओंका बना है। पदार्थोंका सघटन परमाणुमय है यह मन्तव्य अति प्राचीन है। प्राचीन वैशेषिकों तथा प्रीक तत्त्ववेत्ताओंका भी यही अभिप्राय था। परन्तु आधुनिक परमाणुवाद इन प्राचीन मतोंसे भिन्न है। परमाणु भी विभाज्य घटक है-उसकी परीक्षा करनेसे उसमें प्रॉटोन, इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि 'विद्युद्वाही कण रहे हुए मालूम पड़ते हैं। इससे अधिक १ तुलनार्थ देखिये- "योगादपि विष वीक्ष्णमुत्तम भेषजं भवेत् । भेषज चापि दुर्युक्तं सीक्ष्ण सपद्यते विषम् ॥" (च सू अ. १११२६); तथा-"अन्न हि प्राणिना प्राणास्तुद- युच्या निहन्त्यसन् । विष प्राणहर तच्च युक्तियुक्त रसायनम् ॥" & It is indeed, impossible to distingaish betwoon drugs and poisons. Most remedies given in cause toxic symptoms, wbile many poisons are valuable remedies in small' doses. Phar macology And Therapeutics, by Cushny. । OZCOSS r । मायुर्वेदिक तथा माधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार विस्तार जाननेके लिए पदार्यविज्ञानके आकरप्रन्य देखने चाहिये । प्रत्येक रसायन- व्यापारमें (Chemical Process ) परमाणु भाग लेते हैं । प्रत्येक मूलतत्त्वके परमाणुयोंमें विशिष्ट गुणधर्म होते हैं; कारण, इनका भार तथा इनकी आन्तरिक रचना मिन्न होती है । इसी प्रकार मूलतत्त्वोंके मिलनेसे यौगिक पदार्थ बनते हैं और उन्हें नवीन गुणधर्म भी प्राप्त होते हैं । भूतानुप्रवेशके कारण होनेवाले महाभूतोंके गुणधर्नामें परिवर्तनका निर्देश प्राचीनोंने भी किया है । परन्तु प्राचीनोंके महाभूत माधुनिकोंके मूलतत्त्व नहीं हैं । दोनोंकी विचारश्रेणियोंमें मौलिक मतभेद है । इससे स्पष्ट है कि आधुनिक विज्ञानके मतसे प्रत्येक पदार्थके गुण-धर्ममें पार्थक्यका कारण उनका पृथक् पृथक् परमाणुमय सघटन (Atomic Structure) है और इस संघटनसे उसके भौतिक (Physical ) तथा रासायनिक गुणों( Chemical Properties )का निर्णय होता है। इतना ही नहीं, मूलतत्त्वोंके अथवा किसी भी पदार्यके आणविक संघटनमें कृत्रिम रीतिसे-विद्युत्प्रवाहद्वारा या लोहचुम्बकद्वारा अथवा कोई प्रभावी रासायनिक द्रव्य मिलाकर परिवर्तन किया जाय तो भी उनके गुणों में परिवर्तन हो जाता है । इसके विपरीत प्रयोगशालामें कृत्रिम साधनोंद्वारा अमीष्ट गुणों वाले पदार्थ उत्पन्न किये जा सकते हैं । दूसरे शब्दोंमें कहें तो मूल- तत्त्वोंको मी एक दूसरेके रूपमें परिणत किया जा सकता है, यद्यपि व्यापारी पैमानेपर तो नहीं ही। इस प्रकार आजकलकी प्रयोगशालायें नवीन पदार्थोके आविष्कार तथा प्राप्त पदार्थोके सूक्ष्म संघटनकी शोधमें तन्मयतासे कार्य कर रही हैं। अव पुनः औषधद्रव्योंके विचारकी ओर आते हैं, जो इस प्रन्यका प्रधान विषय । माधुनिक द्रव्यगुणशास्त्रको भूतकालके अनुभवसे बड़ा लाभ हुआ है । एवं वर्तमान कालमें बढ़ती हुई वाहनव्यवहारकी सुविधाके कारण विभिन्न देशोंमें प्रयुक्त होनेवाले औषधोंकी इसे ठीक ठीक सहायता मिलती जाती है । फलतः इसके द्रव्यभण्डारमें विभिन्न प्रकारके द्रव्य दीख पड़ते हैं। इन द्रव्योंके मुख्यत चार विभाग किये जा सकते हैं-वनस्पतिजन्य, प्राणिजन्य, खनिज तथा प्रयोगशालामें कृत्रिम विधिसे ܫܝܙ । १ प्राचीन तथा अर्वाचीन परमाणुवाद-प्राचीनकालमें परमाणु मखण्ड माने जाते थे। आजकल ये विमाज्य समझे जाते हैं । इनका संघटन विद्युन्मय है। परतु विद्युन्मयका अर्थ क्या ? इस प्रश्नका उत्तर कोई नहीं देता । इसके सिवाय परमाणु स्थिर नहीं कितु स्पन्दनशील हैं । विश्वमें करोडों परमाणु प्रतिक्षण टूटते हैं और करोड़ों नये उत्पन्न होते हैं । अर्थात् कितने ही नवीन पदार्थ उत्पन्न होते है और कितने ही नाशको प्राप्त करते हैं । द्रव्य ( Matter ) और शक्ति ( Energy )का संबन्ध अभी पूर्णत स्पष्ट नहीं हुआ है । प्राचीन कालमें प्रीसमें तथा इस देशमें जो परमाणुवाद था उसमें ग्रीसके विचारोंका वैशेषिक दर्शनपर प्रभाव पड़ा है, प्रख्यात विदान कीथका यह मत प्रमाणभूत नहीं है। द्र. पू. २१ ३२२ प्रव्यगुणविज्ञान पूर्याध, परिशिष्ट २ । । निर्मित रासायनिक द्रव्य (Synthetic drugs) । रासायनिक द्रव्य बनानेकी प्रवृत्ति दिन-दिन बढ़ती जा रही है। यह कहने की शायद ही आवश्यकता होगी कि वानस्पतिक द्रव्योंकी सख्या बड़ी है। उनके विषयमें निनोक्त बातोंपर खास लक्ष्य दिया जाता है। (१) गुणोत्पादक तत्त्व-(Active Principles )-प्राय औषधोंमें विशिष्ट रासायनिक संघटनवाले पदार्थ स्थित होते हैं । औषधोंके गुणधर्म प्रायशः इनके कारण होते हैं। ये तत्त्व औषधके विभिन्न भागों में विद्यमान होते हैं । अत एव जिस अङ्गमें ये पदार्थ या तत्त्व मालूम पड़े उसीका चिकित्सार्थ उपयोग होता है; उदाहरणतया, मूल, पन्न, खक्, स्कन्ध, पुष्प, वीज आदि । इन तत्त्वोंका अन्वेषण प्रयोगशालामें रासायनिक विश्लेषणद्वारा किया जाता है। ये विशिष्ट तत्त्व आल्केलॉइड्, ग्लुकोसाइड्स, रेजिन्स् , ऑलीयोरेजिन्स् , गम्स् , वोलेटाइल ऑइल्स् आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं । यहाँ यह स्वीकार करना चाहिये कि औपधद्रव्योंके सपूर्ण गुणधर्म इससे स्पष्ट नहीं होते, परंतु अधिकाशमें समझमें आजाते हैं। (२) प्रशस्त भूमि (Habitat) तथा ग्रहणकाल (Time for collection )- औषध किस भूमिपर उगा है तथा उसका किस कालमें संचय किया गया है इस बातपर औषधकी शक्तिका वहा आधार है । जहाँ पर्याप्त पोषण न मिले ऐसे स्पलपर औषध उगा हो अथवा कुसमयमें सचय किया गया हो तो ऐसे औषधमें उपर्युक तत्त्व यथेष्ट प्रमाणमें नहीं होते । आजकल खास तैयार कराये गये खेतोंमें, भित्र भिम प्रकारकी खाद डालकर वनस्पतियोंकी खेती की जाती है और उनके अोंमें जम गुणोत्पादक तत्त्व अधिकसे अधिक प्रमाणमें हों ऐसे समयमें ही उन्हें एकत्र किया जाता है। ३) वनस्पतियाँ ठीक ठीक पहिचाननी चाहिये । एक वर्गकी ( N. 0.) अनेक वनस्पतियाँ होती हैं और एक ही वनस्पतिकी अनेक जातियाँ (Species ) होती हैं। इन सबकी खिचड़ी न होने पावे यह आवश्यक है। इसी प्रकार इनके सरक्षणपर भी ध्यान देना चाहिए । उचितसे अधिक धूप, सील, कीड़े आदिके कारण औषध । १ देखिये सु. सू. अ. ३९ । इसमें मिन-भिन्न औषधीय कर्मों के लिए फल, मूळ, लक भादि भिन्न-भिन्न अङ्ग लेनेका उपदेश किया है । कारण, औषधोंके उस-उस अङ्गमें खास खास गुणोत्पादक तत्त्व विधमान होते हैं। २ देखिये-सुश्रुत सू. अ. ३७ । इस अध्यायमें दिये गये निर्देशोंका आनकल पालन नहीं होता और निवार्य भौषध ही म्यरत होते हैं, यह शोचनीय है।
मायुर्वेदिक तया माधुलिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार । बिगड़ जाते हैं या निवार्य हो जाते है । प्राणिजन्य औषधों के लिए भी ऐसी ही सावधानी रखनी चाहिए, अन्यथा वे भी निवार्य बन जाते हैं । खनिजोंको सामान्यतः रासायनिक विधिसे साफ करके क्षार, अम्ल आदिके रूपमें उपयोगमें लिया जाता है । सक्षेपमें, रसायनशास्त्र और औषधोंके निर्माणमें गाढ़ सवन्ध है। शरीर और औषध- प्रसिद्ध फ्रेंच साहित्यकार वॉल्टेर (Voltaire) ने अपने कालके चिकित्साशास्त्रका उपहास करते हुए कहा है कि औषध, जिनके सबन्धमें हम कुछ भी नहीं जानते, रोगीके शरीरमें डालना जिसके विपयमें हमारा अज्ञान इससे भी अधिक है, इसका नाम है चिकित्सा या परिचर्या । आज भी यह पढ़कर हँसी आवे ऐसी स्थिति है; कारण, उक्त शब्द लिखे जाने के बाद शरीर और औषधोंके संवन्धमें हमारा ज्ञान बहुत बढ़ गया है, परन्तु अज्ञात प्रदेश अब भी बहुत विशाल है। जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता जाता है वैसे वैसे शरीरके व्यापार और भी जटिल मालूम होते जा रहे हैं, जब कि औषधों और शरीर के मध्य आघातप्रतिघात चन्द्र- प्रहणके सदृश पहलेसे ही हिसाव करके नहीं कहे जा सकते । कारण स्पष्ट है कि एक ओर मानवदेह और दूसरी ओर औषध ये दोनों परिवर्तनशील पदार्थ हैं। उदाहरणतया, प्रत्येक रोगीके बल, वय, जठरामि आदि भिन्न होते हैं जब कि औषधों की रोगनिग्राहक शक्तिके ऊपर भी स्थल, काल, संग्रहणकाल आदिका प्रभाव होता है । अत: दोनों के संयुक्त होनेपर सर्वदा एक ही प्रकारके (निर्धारित ) परिणामोंकी आशा नहीं की जा सकती । फलितार्थ यह कि शरीर न तो घडी है न एंजिन, किंतु एक चेतन घडी या एंजिने है। इसी विचारपरंपराके कारण, केवल प्राणियोंपर परीक्षण करके प्राप्त किया अनुभव मनुष्य जाति के लिए बहुत लाभदायक नहीं हो सकता । अलबत्ता यह बात अन्वेषकोंकी दृष्टिके माहर नहीं है। प्राचीन कालमें औषधोंका अनुभव मानवशरीरपर किये गये प्रयोगोंसे ही प्राप्त किया गया है । इस दृष्टि से हालकी विज्ञानशाखा- द्रव्यगुण विज्ञानशाखा-प्राचीनोंसे भिन्न है। इसके सिवाय, कृत्रिम रोग और स्वयं उत्पन्न हुए रोगकी चिकित्सामें भी मेद होता है । कारण, पहले दृष्टान्तमें शरीरमें प्राकृतिक पल होता है, जब कि दूसरे दृष्टान्तमें वह इस बलसे रहित होकर रोगका भोग हुआ प्रतीत होता है । अत औषधकी शक्तिका निर्णय करते हुए यह बात विचारने योग्य होती है । प्रयोगशालाओंमे बहुधा प्राणियोंमें कृत्रिम प्रकारसे रोग उत्पन करके औषधोंके परीक्षण किये जाते हैं। विज्ञानवादियोंके मतसे तथा प्रत्यक्षानुसार भी शरीर असख्य सूक्ष्म कोषों- १ देखिये-सभुत सू अ. ३७ तथा चरक क. अ. १ । २ देखिये-चरक क. भ. १ में 'नानाविषदेशकाल xxx नानाप्रभाववत्त्वाच्च ।' यह वाक्य तथा इसपर चक्र- पाणिकी टीका।
३२४ अव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट । (Cells) का बना हुआ है । विभिन्न प्रकारके कोष शरीरमें विभिन्न व्यापार करते हैं । औषध द्रव्योंकी क्रिया इन कोपोंपर होती है । औपोंकी क्रिया निम्न तीन से एक प्रकारकी हो सकती है। या तो औषध कोषोंको उत्तेजित करता है (Stimulation), या क्षुब्ध करता है ( Irritation ) अथवा अवसभ करता है (Depression) । आशय यह कि कोषोंका उत्तेजन, क्षोभण या अवसादन ये तीन ही औषधोंकी क्रियाएँ हो सकती है । यहाँ यह याद रखना चाहिए कि औषोंके प्रभावसे कोष अपनी प्रवृत्ति न्यूनाधिक कर सकते हैं या विपथगामी भी कर सकते हैं, परन्तु उसे सर्वशः छोड़कर अन्य प्रकारकी प्रवृत्ति नहीं करने लगते हैं । जैसे, फुप्फुसके कोष रक्तको न्यून अथवा अधिक स्वच्छ करें अथवा न करें परन्तु वे रकके कण उत्पन्न करनेका नया कार्य नहीं करने पाते । एवं, आमाशयके कोष न्यून वा अधिक पाचन करें या उत्क्लेश (Nausea ) उत्पन्न करें परंतु वे रुधिर स्वच्छ करनेका नवीन काम नहीं करने लगते । सच्ची चिकित्साका आदर्श इन कोषों को प्राकृतिक अवस्थामें लाकर उनसे प्राकृतिक कार्य कराना है। अर्थात् क्षुब्ध हुए कोर्षोंके व्यापारका सशमन, उत्तेजित व्यापारोंका अवसाद और अवसन्न व्यापारोंकी उत्तेजना चिकित्साका ध्येय है। प्राचीनोंने धातुओंकी-दोषोंकी साम्यावस्था लानेका उपदेश किया है, कारण उन्होंने शरीरके प्राकृतिक और वैकृतिक कार्योंका खुलासा त्रिदोष- पादके आधारपर किया है और इसकी नींवपर अपने निदान और चिकित्साको प्रतिष्ठापित किया है। औषधद्रव्योंका शरीरमें प्रवेश,शोषण, प्रसर, संचय तथा निःसरण (Entry, absorption, distribution, concentration, and excretion of drugs ) व्याधि दूर करनेके लिए विविध उपयुक्त औषधोंको शरीरमें प्रविष्ट करनेके लिए आजकल अनेक मार्गोका उपयोग किया जाता है। इनका वर्णन आगे होगा। परंतु शरीरमें प्रविष्ट होने के पश्चात् उनके गुणका-फलका आरम्भ होने में न्यूनाधिक समय लगता है। कारण, इस समयमें द्रव्य विविध अवस्थाओंमेंसे गुजरता है।- (१) पिचकारीद्वारा सिरावेध करके रक्तप्रवाहमें डाला हुआ द्राव्य (Soluble) औषध एक-दो मिनिटमें ही सारे शरीरमें फैल जाता है और शरीरके प्रत्येक कोषके । हम जानते हैं कि केशवाहिनियों( Capillaries)की दीवालोंसे स्रुत लसीकाद्वारा धातुओंका पोषण होता है । वस्तुत इस लसीकाद्वारों शारीर कोष वेष्टित या क्लिन्न (भीगे हुए) रहते हैं। जव औषध सारे शरीरमें फैलता है तव वह इस लसीकाके अन्दर भी व्याप्त हो जाता है। यहाँ भिन्न-भिन्न द्रव्योंकी गति भिन्न-भिन्न होती है । (अ) कितनेक द्रव्य कोषोंके बाहरकी लसीकामें ही रहते हैं, परंतु कोषोंके अन्दर घुस नहीं सकते । (ब) कितनेक द्रव्य कोषोंके भदर एक सपर्कमें आता है मायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार ३२५ । । । दम प्रविष्ट हो जाते हैं और कोषोंके चेतनरस (Protoplasm) पर अपनी क्रिया करते हैं। कोषोंकी दीवाल (Cellular wall) उनका मार्ग रोक नहीं सकती । अत. ये द्रव्य बहुत बलवान् माने जाते हैं, जैसे-मद्य । (क) कितनेक द्रव्योंको शारीरिक कोष एकदम अपने अंदर ग्रहण कर लेते हैं, जहाँ इनका कार्य तीव्रतासे होता है अथवा सर्वथा वन्द हो जाता है। जैसे-यकृत् तथा मूत्रपिण्डोंमें कई वार द्रव्य एकत्र होते देखे जाते हैं, जो इनपर क्रिया करते हैं अथवा निष्क्रिय होकर बैठ रहते हैं। परन्तु यह तो नवीन स्वीकृत किये हुए मार्गोकी बात हुई 1 सहस्रों वर्षसे चला आया मार्ग तो महास्रोत (Alimentary Canal) है। इससे भिन्न विविध मार्गासे प्रविष्ट हुए द्रव्य जठराग्निकी क्रियासे बच जाते हैं, जब कि मुखद्वारा प्रविष्ट हुए द्रव्य इससे बच नहीं सकते, यह बात मुख्यतः स्मरण रखने योग्य है। (ख) मुखद्वारा प्रविष्ट हुए द्रव्योंमेंसे बहुत थोड़े मुखके अंदर लालास्रावके साथ मिलकर चूषित होते हैं, किन्तु अधिकाश द्रव्य आमाशयमें जाते हैं । यदि खाली पेट पर्याप्त जलके साथ या अन्य द्रवके साथ औषध लिया जाय तो वह आमाशयमेंसे शीघ्र ही निकलकर प्रहणीमें प्रविष्ट होता है और वहाँसे आगे जाता हुआ अन्त्रोंकी श्लेष्मकला- द्वारा चूसा जाता (Absorbed ) है। इनमेंसे कई प्रतिहारिणी सिरा ( Portal vein ) द्वारा यकृतमें जाते हैं और कई रसायनियोंद्वारा चूसे जाकर रुधिरप्रवाहमें मिल जाते हैं। यकृतमें गये हुए द्रव्योंमेंसे कई एक उसके सूक्ष्म कोषोंमेंसे गुजरनेके नाद रुधिरप्रवाहमें जा मिलते हैं। इसके विपरीत कई विषरूप द्रव्योंको एकत्र करके यकृत् निर्विप (Detoxication) बनाता है अथवा उन्हें रुधिरप्रवाहमें जानेसे रोकता है, भले ही ये द्रव्य खुद यकृतको हानि पहुँचानेवाले हों । इस प्रकार सोमल, फॉस्फरस आदि पदार्थोका शरीरमें प्रमाण वढजानेपर यकृत् उन्हें अधिक हानि करनेसे रोकता है। रुधिरप्रवाहमें प्रविष्ट होने के पश्चात् इनका प्रसार ऊपर कहे गये प्रकारोंसे होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुखमें प्रविष्ट होनेके बाद प्रथम मुखमेंसे ही लालास्राव ( Saliva)की, पीछेसे आमाशयमे जठररस (Gastric juice) की, उससे आगे ग्रहणीमें पित्तरस, अग्न्याशयरस BYARTH (Succus enterncus ) की भौतिक और रासायनिक क्रिया होती है । वादको इसका शोषण १ इसी प्रकार त्वचामें अथवा त्वचाके नीचे मांसपेशियोंमें पिचकारीद्वारा दिये गये द्रव्य न्यूनाधिक समयमें शोपित होकर रुधिरप्रवाहमें मिश्रित हो जाते हैं । जन महास्रोत दोषावृत छो जाता है अथवा शरीरपर तत्काल असर करनेकी आवश्यकता हो तब इन अन्य मार्गोका आश्रय लिया जाता है । इसके भी लाभालाम हैं। चरकोपदिष्ट अन्त:परिमार्जनका यह एक प्रकार है। ।
३२६ द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २। , होता है । यदि भरे हुए पेटपर, थोड़े पानीके साथ औषध लिया जाय तो यह आमाशयमेंसे शीघ्र निकल नहीं सकता, उसके शोषणकी तो वातही क्या ? । यहाँ यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कतिपय द्रव्य (व्यवायी, विकासी या विशद ) आमाशयमेंसे बाहर ही बाहर चूसे जाकर यकृत्मेंसे होकर सारे शरीरमें फैल जाते हैं। इनपर पाकक्रिया पीछेसे होती है। परंतु अधिकाश द्रव्य पाकक्रियाके अनन्तर यकृत्द्वारा रुधिरप्रवाहमें प्रविष्ट होते हैं। आमाशय, क्षुद्रात्र या बृहदन्त्रमें शोषण, वे खाली हों तव शीघ्र होता है, भरे हों तो धीमे-धीमे और कम होता है। एवं, द्राव्य द्रव्योंका शोषण तीव्रतासे, तथा अद्राव्य प्रव्योंका-धातुओंके अद्राव्य योगोंका शोषण बहुत धीमे या अल्प प्रमाणमें होता है। संक्षेपमें, द्रव्योंका शोषण अन्नमार्गकी रिकावस्था तथा औषधोंकी द्रवणशीलता (Solubility )पर मुख्यतया आश्रित है । परंतु रोगीका आमाशय या अत्र रोगके आक्रमणके समय स्वस्थ नहीं होते। ऐसे समय जब कि महास्रोतके इन भागोंमें शोथ, व्रण या इनका तीव्र क्षोभ (Spasm ) हो तब औषधोंपर रसोंकी क्रिया- विपाक तथा श्लेष्मकलाद्वारा उनका शोषण दुष्कर हो जाते हैं। बहुतवार औषध १ पाश्चात्य द्रव्यगुणवेत्ता द्रव्योंकी द्रान्यता (Solubility) पर इतना अधिक भार देते है और उनका यह दृढ मत हो गया है कि इससे भिन्न किसी दशामें द्रव्यकी क्रिया संभव ही नहीं। इस मन्तव्यके परिणामरूप वे सुवर्ण और पारद जैसे अप्रतिम औषधोका यमेष्ट उपयोग नहीं कर सकते । वास्तवमें तो यह उनका पूर्वग्रह (Prejudice ) है और प्राचीन वैद्योंके मतका तथा अनुभवका निष्कारण और अवैशानिक तिरस्कार है । वैज्ञानिक दृष्टिसे देखें तो इनका अभिप्राय निराधार है । जैसे-सुवर्ण और पारद जैसे शक्तिशाली औषधोंको द्रवरूपमें शरीरमें प्रविष्ट करनेपर यकृत् , मूत्रपिण्ड तथा अन्य अवयवोंमें तीव्र क्षोम उत्पन्न होता है, परतु इन्ही द्रव्योंके थोडे परमाणु शरीरको लाभदायी होते हैं । प्राचीन आचार्योंने इसी कारण इन धातुओंका उपयोग अद्राव्य (Insoluble ) रूपमें किया है। पारदके असख्य योग-रस तथा सुवर्णके योग भद्राव्य होते हुए भी शरीरको लाम पहुँचाते हैं, यह अनुभवकी प्रत्यक्षसिद्ध वात है। सुवर्ण या पारदके योग जन महास्रोतमेंसे गुजरते हैं तो इनके कुछेक परमाणु रसमार्गद्वारा शरीरमें प्रविष्ट होते हैं और दूषित प्रदेशपर अपनी क्रिया करते हैं । इतने थोडे परमाणु कैसे क्रिया करते हैं यह शङ्का निरवकाश है । कारण, एड्रीनालीन( Adrenaline )की अत्यन्त अल्प मात्रा-दश मरन यूँदोंमें केवळ एक बूंद प्रभावशाली सिद्ध हो चुकी है, तो फिर सस्कारित सुवर्ण और पारदफे दो चार परमाणु क्या पर्याप्त नहीं होंगे? इस मतमेदके कारण डाक्टर लोग सुवर्ण, ताम्र, मोवी मादिका उपयोग मायुर्वेदशोंके समान नहीं कर सकते, यद्यपि उनके मतकी पुष्टिमें वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। - --- आयुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार ३२७ बमन या मलद्वारा सहसा शरीरके बाहर निकल जाते हैं अथवा इन भागोंकी श्लेष्म- कलापर हानिकारक किया-विपरीत गुण करते हैं । उलटी रोकनेके लिए दिया गया औषध पेटमें नहीं टिकता और अपना गुण नहीं दिखाता, जब कि दस्त साफ लानेके लिए दिया गया विरेचन महास्रोतमें हुए विचित्र रसपाकके कारण अपना गुण नहीं दिखा सकता [प्राचीन आयुर्वेदाचार्योंकी परिभाषामें कहना हो तो ये क्रियाएँ विपाकके अन्तर्गत हैं, इसका विचार आगे होगा] इससे यह न समझना चाहिए कि औषध खाली पेट ही देना चाहिए । औषध विविध उद्देश्योंसे भोजनके पूर्व, साथ या पीछे योग्य अनुपानसे दिये जाते हैं । इसी प्रकार नेत्र, नासिका, वृहदत्र, गुदनलिका (Rectum), मूत्रनलिका तथा अपत्यपथद्वारा दिये गये औषधोंका न्यूनाधिक प्रमाणर्मे शोषण होता है और इनके स्थानिक (Local) तथा सार्वदेहिक कर्म (General action ) न्यूनाधिक प्रमाणमें व्यक्त होते हैं। विभिन्न द्रव्योंका संचय और निःसरण भी न्यूनाधिक प्रमाणमें होता है। कई द्रव्य यकृतमें, कई नाटीसंस्थानमें तथा कई मूत्रपिण्डोंमे सचित होने हैं । इनमें कइयोका निर्विपीकरण ( Detoxication) होता है और कइयोंका नहीं होता । अधिकांश द्रव्यों के रासायनिक संघटनमें भी मेद आता है, परिणामत. नवीन द्रव्य बनते हैं (Synthesis ) । द्रव्योंको शरीरके बाहर फेंक देनेमें यकृत् तथा मूत्रपिण्ड मुख्यतया भाग लेते हैं । मुखद्वारा सेवित द्रव्य यदि अद्राव्य हों तो इनका बसा भाग शोषित हुए विना गुदद्वारसे निकल जाता है । शोषित भाग यकृतमें जाता है। वहां उसमें इनपर अन्य रासायनिक परिवर्तन होकर पुन थोड़ा अंश पित्तनलिका- द्वारा प्रहणीमें और वहाँसे बाहर फेंका जाता है । रक्तमें मिश्रित द्रव्यका कुछ अश मूत्रद्वारा बाहर निकल जाता है। कई द्रव्य प्रश्वासके साथ वायुरूपमें, और कई स्तन्य या प्रखेदके साथ भी बाहर निकलते हैं । जैसे पानी प्रवाहमें आई वस्तुको बाहर धकेल देता है उसी प्रकार मनुष्यशरीर अर्थात् उसके कोष देहमें प्रविष्ट होते हुए बाह्य पदार्थोको शल्यरूप मानकर बाहर फेंक देनेका प्रयत्न करते हैं । केवल, द्रव्योंका जितना भंश शारीरिक कोषोंके लिए हितावह हो उसे ही अपने चेतनरसमें मिश्रित कर लेते हैं। यह कार्य सात्म्यीकरण कहाता है [भस्मोंके निर्माणमें जो भावना या पुट दिये जाते हैं उनका यही रहस्य है।] तो फिर विषकी क्या गति होती है ? कई द्रव्य शरीरमें प्रविष्ट होकर कोषोंके चेतनरसको मार डालते हैं और उनकी क्रियाओंको स्थगित कर देते हैं या नष्ट कर- देते हैं । परंतु सब विष प्रत्येक धातुकी समान रूपसे हानि नहीं करते । अफीम, धतूरा और तामकी क्रिया एक समान नहीं होती। यह अबतक 'शेष प्रश्न' है कि क्यों - , ३२८ द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वाध, परिशिष्ट २॥ अमुक विष अमुक धातुको ही लक्ष्य बनाता है। जो द्रव्य शरीरसे एकदम बाहर निकल जाते हैं उनकी मात्रा वारंवार देनी पड़ती है। परंतु इससे भिन्न वर्गके भी न्य हैं जिनका निःसरण वहुत धीमे धीमे होता है। ऐसे द्रव्यों की, विषमय क्रिया संचित होनेपर, चिरकाल पश्चात् होती है। इनकी एक-दो मात्राभोंकी जरा भी खराब किया नहीं होती। कई द्रव्योंका कार्य इनके लेनेके बहुत काल पीछे मादम होता है। कारण इनका शोषण तथा सात्म्यीकरण वहुत मन्द होता है ( Delayed action)। कई द्रव्योंका प्रभाव सामूहिक रूपमें होता है ( Culminative action)। यदि ऐसा द्रव्य विष हो तो विषके लक्षण एक साथ प्रकट होते हैं, यद्यपि कुछ समय बाद । औषध द्रव्योंकी क्रिया- अधिष्ठानमेदसे द्रव्योंकी क्रिया दो प्रकारकी कही जा सहती है-स्थानिक कार्य (Local action) और देहव्यापी कार्य (General or Systemic action)। शरीरके किसी प्रदेशपर औषध लगानेपर, औषधका शोषण होकर वह रुधिरप्रवाहमें मिल जाय उसके पूर्व ही जो क्रिया होती है उसका नाम स्थानिक कार्य है। जैसे-क्षार आदि लगानेपर उस भागपर दाहक प्रभाव होता है। इससे विपरीत जव औषधका शोषण होकर वह सारे शरीरपर अमुक क्रिया करता है तो उसे देहव्यापी कार्य कहते हैं जैसे-पारा, कुचला आदिका देहव्यापी कार्य । अनुबन्धकी दृष्टिसे भी इसके दो भेद किये जा सकके हैं-प्रत्यक्ष कार्य (Direct action) तथा परोक्ष कार्य (Indirect or remote action)। द्रव्य अपनी विशिष्ट शक्तिसे अमुक अवयवोंपर विशिष्ट क्रिया करते हैं, यह उनकी प्रत्यक्ष क्रिया है । इसके साथ ही अन्य अवयवोंपर प्रतिक्रिया द्वारा (Reflex action ) परोक्ष रूपसे कार्य करते हैं, यह उनका परोक्ष कार्य है । जैसे कई विष मस्तिष्कपर साक्षात् रूपसे (सीधा ) क्रिया करते हैं और असाक्षात् रूपसे श्वासक्रिया, रुधिराभिसरण आदिपर क्रिया करते हैं। विकासी द्रव्य ये दोनों प्रकारके कार्य करते हैं । ओजोनिहरण इनका प्रत्यक्ष कार्य है, तथा मायुषन्धोंको शिथिल करना इनका गौण कार्य है । वामक, विरेचक द्रव्य भी इसी प्रकार प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्य करते हैं। द्रव्य किस प्रकार किया करते हैं, इस विषयमें विविध मत General Theories of Pharmacological action ) ऊपर मैं कह चुका हूँ कि द्रव्य शरीरपर जो किया करते हैं वे प्रत्यक्षगम्य हैं । इस प्रत्यक्षमें मतभेदको स्थान नहीं है, परंतु ये कैसे क्रिया करते हैं इस विषय में प्राचीन १ अथवा, अमुक द्रव्य क्यों शरीरके अमुक संस्थान(System) पर क्रिया करते यह भी 'शेष प्रश्न है । यथा-मद्यकी मस्तिष्कपर क्रिया, कुचलेकी सुषुम्णापर क्रिया, वन्नमस्मकी मूत्रपिण्डोंपर क्रिया, अफीमकी श्वासकेन्द्रपर क्रिया इत्यादि । .
मायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार -- कालमें मतभेद था और अब भी है। इनके विषयमें ऐकमत्य न होनेसे विविध मतोंका यहाँ निर्देश करते हैं । सुश्रुतने इस संबन्धमें विभिन्न मतोंका उल्लेख कर अपना समाधान बताया है। (1) कई द्रव्य अपने भौतिक गुणों ( Physical properties )के कारण । शारीरिक कोर्षोपर-शरीरपर प्रभाव करते हैं। २) कई द्रव्य अपने भौतिक एवं रासायनिक गुणोंद्वारा शरीरपर प्रभाव करते हैं। परंतु कई अन्य शरीरपर किस प्रकार क्रिया करते हैं, यह समझ नहीं आता। हमारा यह अज्ञान तब ऐसा आश्चर्यजनक नहीं प्रतीत होता जब हम यह विचार करते हैं कि एक सादेसे सादे कोपकी रचना तथा अधिकांश द्रव्योंका रासायनिक संघटन कैसा जटिल है।। द्रव्य कोषोंके चेतनरसके रासायनिक संघटनपर क्रिया करते हैं और उसके साथ रासायनिक प्रकारसे मिल जाते हैं, जिससे विविध औषधीय गुण रष्टिगोचर होते है यह मानना मी निर्दोष नहीं है। कारण, भिन्न रासायनिक रचना- चाले भी द्रव्य समान प्रकारका अथवा एक दूसरेसे मिलता औषधीय गुण धारण करते हुए पाये जाते हैं । अत: केवल रासायनिक दृष्टिसे औषधीय गुणोंका समाधान नहीं हो सकता । सच पूछो तो सपूर्ण द्रव्यों की क्रियाओं का समाधान करने में सहायक हो सके ऐसा कोई भी सिद्धान्त अब तक सामने नहीं आया । यद्यपि आजकल औषधोंके रासायनिक संघटनमें परिवर्तन करके भिन्न भिन्न परिणाम उत्पन्न करने के प्रयम हो रहे हैं; जैसे केमोथेरेपी (Chemotherapy) के उपासक जन्तुजन्य व्याधियोंकी चिकित्सामें ऐसे औषध बनाने का प्रयास कर रहे हैं । परंतु एक विलक्षण घटना इन मोषधोंके बनाने में भी देखी जाती है, और वह यह कि कई जन्तुघ्न द्रव्य काच- नलिका (Test-tube ) में जन्तुओंको नहीं मार सकते परंतु शरीरके अन्दर प्रविष्ट होनेपर शरीरके कोपोंकी सहायतासे उनको तत्काल मार डालते हैं । इसके अतिरिक्त कई औषधोका अत्यन्त अल्प प्रमाण, जो कोपके आसपास एक स्तर (Monomolecular layer) रचनेमें भी समर्थ नहीं होता, वह भी इनपर क्रिया करनेकी पर्याप्त शक्ति रखता है। कइयोंके मतानुसार औषधद्रव्य कोपोंके आसपास फैलनेके पश्चात् उनका कवच (Cell membrane) मेदकर उसमें प्रविष्ट होनेका यत्न करते हैं। उनके कुछेक परमाणु उसके अन्दर जाकर चेतनरसमें मिल जाते हैं और अपनी क्रिया करते हैं। कई एक अंदर जाकर निष्क्रिय बन जाते हैं। जब कई अन्दर घुस ही नहीं सकते । इस स्थितिमें द्रव्योंके कर्मों के विषयमें कोई निश्चित सिद्धान्त 1 - १ देखिये-मुसुन सू अ ४० तद् द्रव्यमात्मना किंचित्' इत्यादि सुचतोक्त समाधान । मन तक यह मत नदलनेका कोई कारण नहीं मिला है। & Phys10al and chemical properties, । ३३० द्रव्यगुण विज्ञान पूर्वाध, परिशिष्ट २। घसना कठिन है। हाँ, इतना कहा जा सकता है कि द्रव्योंकी शारीरिक कोषोंपर होनेवाली क्रियामें निम्नोक्त बातें खास तौरपर स्मरण रखने योग्य हैं। (१) भिन्न भिन्न औपवद्रयोंकी रासायनिक क्रिया भिन्न भिन्न कोषों या धातुओं (Tissues) पर भिन्न भिन्न प्रकारकी होती है। अर्थात् औषधोंकी क्रिया औषधों और कोषके जीवनरस( Protoplasm )के पीचकी रासायनिक प्रतिक्रियापर अवलम्बित है। (२) भिन्न भिन्न कोष अपने कोषकवचद्वारा द्रव्योंका सहकार अथवा प्रतिकार करनेकी शक्ति रखते हैं । कोपोंके व्यापार सजीव व्यापार (Biological Response ) हैं-जिजीविषा (Will to live) का एक प्रकार हैं तथा भौतिक और रासायनिक नियमोंसे सदा बँधे नहीं रहते। यहाँ जिजीविषामें मानसिक तत्त्वका भी अन्तर्भाव है। अर्थात् यदि रोगीको आस्था हो तो औषधीय गुण अधिक कार्य करते हैं । कारण, शारीरिक कोर्षोंके व्यापार मानसिक अनुशसे मुक्त नहीं हैं। द्रव्यगुणविज्ञानके संवन्धमें आयुर्वेदके मौलिक विचार- अब तक हमने मुख्यतः वैज्ञानिकोंकी विचारधारा देखी । अब पूर्व और पश्चिम दोनोंकी विचारधाराएँ देखते हैं । ईर्ष्या, द्वेष, अज्ञान तथा जिज्ञासावृत्तिके अभावके कारण डाक्टर तथा वैद्य आपसमें खुले दिलसे विचारविनिमय नहीं करते, अतः इस विषयमें बहुत अनभिज्ञता रहती है । प्रस्तुत ग्रन्थ, आयुर्वेदके द्रव्यगुणविषयक विचारोंका दोहन होनेके कारण अभ्यासकोंके मार्गको सरल करनेवाला है। वैदिक कालसे ही वनस्पतियोंका वैद्यकीय उपयोग छोटे पैमानेपर (अल्प प्रमाणमें) शुरू हो चुका था । परंतु उस कालमें आथर्वणोंका जोर अधिक होनेसे मणि, मन्त्र तथा पवित्र जलका महत्त्व अधिक था । मनुष्य जातिके द्रव्यगुणविषयक ज्ञानका यह उष:- काल था। इसके पश्चात् दैवव्यपाश्रय चिकित्साका जोर घटने लगा, औषधोंका उपयोग बढ़ने लगा । साथ साथ धातुओंका औषधार्थ उपयोग भी बढ़ने लगा । जब हम संहिताकालमें आते हैं तय औषधोंकी सख्या एकदम बढ़ी हुई पाते हैं। इतना ही नहीं, किंतु इन सव औषधों तथा धातुओंके उपयोगको अपने विशाल उदरमें समाविष्ट करनेवाला द्रव्योंके गुणों तथा कौके विषयका सिद्धान्त भी स्थिर हो गया पाया जाता है। यह सिद्धान्त स्थिर होनेके पूर्व अनेक मत-मतान्तर भी खड़े हुए होंगे, जिसका ? The action of & drug on any cell, involves at least two separate processos, namely a Chemical reaotion and the Biological response to this reaction २ देखिये-चरक स. स. ११-त्रिविधमौषधम् xxx इत्यादि -- भायुर्वेदिक तथा भाधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार इशारा चरक और सुश्रुत दोनोंने किया है । प्रस्तुत प्रन्यमें ये मतमेदसूचक एकीय मत देखे जा सकते हैं। उदाहरणत , रसोंकी संख्या तथा द्रव्य, रस, गुण, वीर्य और विपाकके प्राधान्याप्राधान्यसवन्धी चर्चा मनोरमक है तथा एक शक्तिशाली (Virile ) और विचारशील समाजके मानसिक मन्धनका प्रतिविम्ब है। ईसासे हजार-बारह सौ वर्ष पूर्व शुरू हुई औषधोंकी गुणकर्म विषयक चर्चा ईसासे चार या पाँच शती पूर्व एक सिदान्तका रूप प्राप्त करती हुई तथा ईसवी सन्के प्रारम्भमें तो एक व्यापक सिद्धान्तके रूपमें स्थिर हुई दिखाई पड़ती है, औषधद्रव्य (उद्भिज, खनिज तथा प्राणिज द्रव्य) और आहारद्रव्यविषयक विचार एक शृङ्खलावद्ध व्यवस्थित स्वरूपमें दृष्टिगोचर होते हैं । पीछे चाहे हम सहिताचतुष्टय (चरक, सुश्रुत, मेल तथा काश्यप) मेंसे कोई एक लें । इसके बादके वर्षोंमें कितनी ही वनस्पतियाँ भूली गयीं, कितनी ही विदेशी दवाइयाँ खीकारी गयीं, कितनी ही सदिग्ध हो गयीं । यह कालभगवान्की महिमा है। औषध द्रव्यों और रसशास्त्रोक्त प्रयोगोंकी संख्या बढ़ी विकासकी दृष्टिसे यही हुआ । परन्तु सहिताकालमें उपदिष्ट सिद्धान्तमें कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ। सामान्यत कहना हो तो आधुनिक विज्ञानवादियोंकी दृष्टि पृथकरणशील (Analytical ) है, जब कि प्राचीन आर्योकी दृष्टि सदा एकीकरणशील (Synthetic) रही है। परिणामतया, एकको विस्तार ( Detail) प्रिय है और दूसरेको सूत्र । कुछ तुलनात्मक विचार- जब यह देश स्वतन्त्र विचार करनेकी शक्ति रखता था तब इसमें विचारोंके मतभेदको सहन करनेकी भी शक्ति थी, अथवा सहिष्णुना (Tolerance ) हमारे घुद्धिविकासका एक प्रधान चिह था । चरक तथा सुश्रुतमें इस मतमेदसहिष्णुताके प्रमाण मिलते हैं। परिषदोंमें गर्मावक्रान्ति, रसोंकी सख्या, विपाकका स्वरूप, वीर्यके प्रकार, रोगोंके प्रकार आदि विषय विवादास्पद होते थे। विभिन्न विचारोंके आयुर्वेदज्ञ ऋषि इनमें भाग लेते थे। केवल आयुर्वेदके क्षेत्रमें ही नहीं, दार्शनिक क्षेत्रमें भी बहुत विवाद प्रचलित थे । न्यायदर्शनने इन विवादोंको समुचित वैज्ञानिक रूप भी दिया है। जब चरक सुश्रुतने इनकी ओर अङ्गुलिनिर्देश किया है । आधुनिक कालमें W । १ इसी कारण सूत्र' संस्कृत वारमयके विशेष लक्षण हैं । अन्य किसी भाषामें सूत्रग्रन्थ लिखे हुए पाये नहीं जाते । इस सूत्रसाहित्य के स्रष्टा कुशाग्रबुद्धि ऋषियोंकी दृष्टि सृष्टिमें पाये जानेवाले वैविध्यके आरपार देखकर परमतत्त्वका साक्षात्कार करनेमें तल्लीन थी। वैशेषिकोंने समग्र विश्वका समावेश छ• पदार्थों में किया, सांख्यने प्रकृति और पुरुषमें और वेदान्तने केवळ एक अनिर्वचनीय ब्रझमें ही सनका समावेश किया !
नम्यगुणविज्ञान पूर्व, परिशिष्ट । सन् १९३५ में 'मनारगमें एक ऐसी ही परिपरका भायोजन तुमा था, यह सुविदित है। पूर्व तथा पश्रिम में सीरुत गमान गन्तव्य गदों प्रस्तुत गर है।- (१) जो तत्त्व यान जगत, दिगाई लेते हैं नेही मनुष्यशरीरमें भी होते हैं। इस विषयमें माधुनिक विज्ञानका क्या मत है यह कार पहा ना पुरा है । न्य. ( Matter )का संघटन विशुनाय है और विद्युत् एक प्रकारको गफिदै अन्य ( Matter ) और शफि( Force)ज संपन्ध रहस्यपूर्ण है। द्रव्यके भनेर रूप हो सकते हैं । अयतक द्रव्यफे विशिष्ट रूपोंके तौरपर १२ तर ( Elements) विदित हुए हैं । इनमेसे फुटेक मानववेदमें है । प्राचीन सागुदानाोंने गाय और वैशेषिकफे विचारोंका आधय लेकर अपना म्हतार गत टनमें मदापर अपने सिद्धान्न निश्चित किये है । समप्र विश्व पञ्चमहाभूतमय हैद्रव्य पानमांतिक है-और मनुष्यदेह भी पचमहाभूतोंसे ही बना है । ये पगमहाभून है भासश, पायु, तेज, जल और पृथ्वी । इन महाभूतो विचार करते हुए महतोको भ्रम (Delusion) हो जाता है। कारण, दोनों प्रकारफे यगीकरणों के विमिन्दु भित है । शानिरू जगत्का अर्थ है जट जगत् । इसके पदार्थ (Substance ) मी जर पदार्य है। इनकी कार्य करने की साजि ( Force) गी जट है। इस जट शक्फि और उर द्रव्य या पदार्थक सहकारसे विज्ञानकी सटि चल रही है। इसके विपरीत प्राचीन ariffa afe 75 (Inanimato) te Taal Animate )it of हुई है। इसमें आत्मा या परमात्माको स्थान है, जय कि माधुनिक विज्ञान दना बहिष्कार करता है, अथवा इनके प्रति शहाकी दहिसे देखतापाइसके मूल तत्वोंका १ इस विषयमें विशानकी भिन्न भिन्न शाखामोंमें मतभेद है। उदाहरणतया जीरविषा (Biology) या प्राणिविपा, स्पष्ट शब्दोंमें यह नहीं पतावी कि प्राण (Lifo)का अर्थ क्या है ? सजीव द्रव्यफे लक्षण, रचना मादिकी सविस्तर जानकारी देते हुए भी निजींव और सजीव सृष्टिके मध्य भेद माने या न माने यह प्रश्न ममी विषादासर है। पाश्चात्य मानसशास्त्रियों ( Psychologists मेंसे कई एक प्राचीन मौॉफे समान स्थिर मात्माको नहीं मानते, किंतु सहज गृचियों( Instincts )फे समूहरूप मानते हैं। कई मानसशारखी आत्माको मानते भी है । आधुनिक विज्ञानवादियों में कई प्राचीन लोकायतिकोंके समान देहात्मवादी है । अपने यहाँ मी आत्माके स्वरूपके विषयमें विविध मत थे, जिनका विवरण भगवान् शकराचार्यके भाष्यमें मिलता है । देखिये-प्रसस्त १-१-१ पर शांकरभाष्य-'देएमात्र चैतन्यविशिष्टमाम्मेति xxx भात्मा स भोक्तुरि- त्यपरे ।' निर्विशेप मौतिक आत्माका लक्षण भगवान् चरकने वेदान्तसे लिया है, भौर संयोगपुरुष अथवा शरीरी मारमाका लक्षण न्याय-वैशेषिकसे लिया है। न्याय-वैशेषिकने भ्याव- मनको ।
आयुर्वेदिक तथा आधुलिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार अस्तिल प्रत्यक्ष प्रयोगोंके आधारपर सिद्ध है। दार्शनिक परिभाषामें पदार्थका अर्थ है पदका अर्थ । जिसमें ज्ञेयल, अभिधेयल और अस्तित्व ये तीन लक्षण हों वह पदार्थ है। आशय यह कि 'पदार्थ' शब्दसे न केवल जड जगत्का किंतु समग्र जड और चेतन सृष्टिकी वस्तुओंका प्रहण हो जाता है । अर्थात् विज्ञानका पदार्थ ( Element) वैशेषिकके पदार्थसे भिन्न है। इसी प्रकार वैशेषिकों का द्रव्य, जो गुण और कर्मका आश्रय है, विज्ञानके द्रव्य ( Matter ) से भिन्न है । कारण, वैशेषिकोंके मतानुसार आत्मा, मन, दिक् और कालकी भी नव द्रव्योंमें गणना होती है, जब कि आधुनिक विज्ञानवादी खतन्त्र आत्मा और मनका अस्तिव माननेसे कतराते हैं। अस्तु । पञ्चमहाभूतोंको प्राचीनोंने जड सृष्टिका मूल तत्त्व माना है जब कि आधुनिकोंने ९२ मूल तत्त्व मानें हैं, जो प्रत्यक्षसिद्ध है। परंतु उपनिषत्कालसे सृष्टिके उत्पत्तिकमके संवन्धमें जो विचार चले आये हैं और जिन्हें वेदान्तका भी समर्थन प्राप्त है, उनके अनुसार देखें तो पञ्चमहाभूतका अर्थ है जड द्रव्यकी पाँच स्थितियाँ (States of conditions of matter) i जैसे- आकाश-Etherio state वायु=Gaseous state अग्नि-Luminous state जल=Liquid state geai-Solid state उक्त कोष्ठकमें कही अवस्थाएँ विज्ञानको मान्य हैं, कारण, ये प्रत्यक्षसिद्ध हैं। इस प्रकार देखते हुए प्राचीनोंके सिद्धान्तानुसार माधुनिक विज्ञानके मूल तत्त्व इन पाँच स्थितियोंमेंसे किसी स्थितिमें हमारे अनुभवका विषय होते हैं । पञ्चमहाभूतोंके मिश्रणसे अथवा आधुनिकोंके इन पाँचजैसे किसी अवस्थामें स्थित मूलतत्त्वोंके मिश्रणसे, परस्परानुप्रवेशसे या परस्परानुप्रहसे दृश्य जगत्की रचना होती है। आयुर्वेदके - - - -- हारिक अवस्थाका विचार करके आरमाका लक्षण घड़ा है, जब कि वेदान्तने सुषुप्ति, समाथि और मोक्ष दशाका विचार करके आत्माका लक्षण पड़ा है। वर्तमान कालमें, तस्वज्ञान (Philosophy) और विज्ञान( Science )के क्षेत्र दिन-दिन अधिक निकट माते जा रहे है । परतु आधुनिक पदार्थविज्ञान (Physics ) आत्मा, मन आधिको आधिभौतिक पदार्थविज्ञान( Metaphysics)का विषय मानता है। प्राचीन आर्य धर्शनोंका पदार्थवाद इन समको अपने विशाल क्षेत्रमें स्थान देता है । अत एव सुलना करते हुए इस वर्गीकरणका मेद ध्यानमें रखना चाहिए । अन्यथा दोनों पक्षोंको अन्याय होना संभव है। १ देखिए प्रशस्तपादभाष्य पृ. १६ ।
द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २ । । मन्तव्यानुसार पञ्चमहाभूतोंसे आत्माका संबन्ध होनेपर पुरुष बनाता है, जो चिकित्साका भधिष्ठानरूप है (सु. सू. अ. १)। २) शरीरके विकासके लिए, जीवन व्यापार चलानेके लिए जो शक्ति चाहिए उसके उत्पादनके लिए, तथा शरीरमें होनेवाली दृटफूटकी पूर्तिके लिए उपर्युक पदार्थोंकी आवश्यकता है यह वात दोनों पक्षोंको स्वीकृत है । अर्थात् पञ्चमहाभूतमय शरीरको-पाँच अवस्थाओंमें स्थित वैज्ञानिकोंके मूलतत्त्वोंद्वारा बने हुए शरीरको उन्हीके द्वारा बने हुए आहारद्रव्योंकी आवश्यकता है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्योंके पक्षमें यह अभिमान करने योग्य बात है कि उन्होंने आहार और स्वास्थ्य तथा आहार और रोगोंके सवन्धपर प्रारम्भसे ही बहुत ही जोर दिया है । रोगोंके निदान और चिकित्साकी चर्चा में आहारकी वात खास करके आती है। अपने यहाँ आहाररूपमें उपयोगमें आनेवाले वनस्पतिजन्य तथा प्राणिजन्य द्रव्योंकी उन्होंने स्वास्थ्य तथा रुग्णावस्थामें मनुष्यपर होनेवाली क्रियाओंका उल्लेख किया है। अपने देशवासियों को यहाँके जलवायुमें ये द्रव्य अधिक सात्म्य हैं, यह अनुभव है । आहारका पाचन होनेपर रसधातु बनती है । इसपर शरीरकी अन्य धातुएँ आश्रित हैं । अतः आचार्योका आग्रह है कि आहार और जठरामिकी क्रियापर-रोगीके अमिवलपर-वैद्यको खास ध्यान देना चाहिए । पहले कहा जा चुका है कि आहारकी रासायनिक दृष्टि से मीमासा करके, उसमें स्थित प्रजीवनकों (Vitamins) तथा खनिज द्रव्योंके क्षारों (Mineral salts) पर विशेषत. लक्ष्य देकर तथा इन द्रव्योंकी खास्थ्य तथा रुग्णावस्थामें होनेवाली क्रियाओंका निर्देश करके, आधुनिक विज्ञानने मनुष्य जातिकी सेवा की है। एक कदम आगे बढ़कर आधुनिक सप्राप्तिविज्ञान (Pathology) यह बताता है कि रक्क आहारपर अवलम्बित है और इस रकके सघटनमें भौतिक अथवा रासायनिक परिवर्तन हों तो शरीरके कोषोंके पोषण और व्यापारोंपर इसका भनिष्ट प्रभाव होता है, अर्थात् वे शीघ्र रोगके पास हो जाते हैं । औषध द्रव्य भी शरीरके सहकारके विना रोगका मुकाबला नहीं कर सकते । अत., निज अथवा आगन्तुक रोगोंके प्रतिकारको उत्कृष्ट बनाना हो तो, रक्तको बने वैसे उत्कृष्ट खरूपमें लाना चाहिए। ऐसा करनेके लिए उत्तम आहार और कार्यक्षम जठरामिकी खास आवश्यकता है । ऐसी अवस्थामें ही रस धातु जिसपर अन्य धातुओंका आधार है, उत्तम बनता है। (३) द्रव्योंकी शरीरपर होनेवाली क्रियाओंको देखते हुए द्रव्योंके सामान्यतः तीन मेद किये जा सकते हैं । आधुनिक द्रव्यगुणविदोंका मत ऊपर दिया है। प्राचीनोंका मत इस ग्रन्थमें ग्यारहवें पृष्ठपर दिया है । भगवान् चरकके शब्दोंमें द्रव्योंके तीन भेद १ 'मायुर्वर्णो वल स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा। ओजस्तेजोमयः प्राणायोका देहामि देखकाः॥ च. चि.म.१५॥ 1 +w । नायुर्वेदिक तया माधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर सुकनात्मक विचार किये जा सकते हैं । ये तीन भेद द्रव्योंकी शरीरपर होनेवाली क्रियाओंको देखते हुए किये गये हैं। 'शमन', 'कोपन' और 'स्वास्थ्यवर्धन' इन तीन शब्दोंमें प्राचीनोंने द्रव्योंके प्रभावसे होनेवाली क्रियाएँ समाविष्ट कर दी हैं। इनमें आधुनिकोक्त तीनों क्रियाओंका समावेश हो जाता है। (४) भायुर्वेदिक पद्धति तथा वैज्ञानिक चिकित्सापद्धति दोनों हॉमियोपॅथीके सिद्धान्तसे विरुद्ध हैं। कारण, इन दोनों पद्धतियोंमें विपरीत गुणोंवाले आहार और औषधके द्वारा रोग अथवा रोगके मूलका नाश किया जाता है । प्राचीनोंने दोषवैषम्यको दूर करके दोषोंको साम्यावस्थामें लाना चिकित्साका आदर्श माना है, जब कि वैज्ञानिक चिकित्सापद्धतिमें शरीरके दूषित कोषोंके विकृत-बिगड़े हुए- व्यापारोंको प्रकृतावस्थामें लानेको अपना आदर्श स्वीकार किया है। (५) तुलनात्मक दृष्टि से द्रव्यगुण विज्ञानको देखें तो दोनों पक्षोंने प्राणियों और मनुष्योंपर उन्ही द्रव्योंका, उन्ही क्रियाओंके लिए उपयोग किया है। हाँ, उसमें औषधकी मात्रा तथा प्राणीके विशिष्ट देहव्यापारोंका तो ख्याल रखा ही जाता है मनुष्योंकी चिकित्साके साथ इस देशमें पशुचिकित्सा मी ईसाके पूर्व तीसरी या चौथी शताब्दीसे प्रचलित थी। पालकाप्य, मातमलीला, अश्ववद्यक, अश्वचिकित्सा आदि प्रन्थ इस बातके साक्षी हैं । आधुनिक वैज्ञानिक नवीन औषधका गुणधर्म निश्चित करनेके पूर्व उसका प्राणियोंपर परीक्षण करते हैं। इन परीक्षणोंसे प्राप्त अनुभवोंका उपयोग मनुष्योंकी चिकित्सामें करते हैं, कारण, विज्ञान मनुष्यको सर्वोत्तम प्राणी मानता है। (६) दोनों पक्षोंने केवल वनस्पतियोंपर आधार न रखते हुए रसायनशालामें बने, हुए द्रव्योंका उपयोग किया है । प्राचीन सहिताग्रन्थोंमें वनस्पतियों का उपयोग विपुल प्रमाणमें पाया जाता है । धातुओंके उपयोगका उनके औषधसप्रहमें गौण स्थान था। परन्तु पीछेसे धातुओं और खास करके पारदके योगोंका उपयोग बढ़ा और रसशास्त्र वानस्पतिक योगोंके संघर्षमें आया । उत्तम रसवैद्य सपूर्ण चिकित्सा रसोंद्वारा ही करते थे। उन्हें वनस्पतियोंकी अपेक्षा कम होती थी। हाँ, रसोंके निर्माणमें भी कुछ वनस्पतियोंकी आवश्यकता होती थी । पश्चिममें भी आजकल यही परिस्थिति है। घनस्पतियोंका उपयोग घटता जाता है और रसायनशास्त्रके आधारपर बनाये हुए - - । १ Stimulation, Depression, Irritation. २ देखिये चरक सू म. १ के ५८, ५९, ६० ठोक तथा उनमें 'विपरीतगुणैन्यै.' यह स्पष्ट शब्द, मौर "उपशय. पुनहेतुन्याधिविपरीतानां विपरीतार्थकारिणा चौषधाहारविहा- राणामुपयोग. सुखानुबन्ध च. नि. म.१। ३ इसी प्रकार विपदूषित अन्नकी प्राणियों- पर होनेवाली क्रियाओंका भी निर्देश किया गया है। देखिये--स. क.-म.१।
द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २॥ योगोंका उपयोग वढ़ता जाता है । विशेप करके जन्तुजन्य रोगोंकी चिकित्सामें ऐसे नवीन द्रव्योंकी सख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है। अपने यहाँ रसशास्त्रकी प्रगति रुक गयी है, पर पश्चिममें रसायनशास्त्र (Chemistry) आगे प्रगति करता जा रहा है। - ७) दोनों पक्ष मानते हैं कि औषधद्रव्य उनके कर्मको लक्ष्यमें रखकर विभिन्न योगोंके रूपमें दिये जाने चाहिये । औषधनिर्माणशास्त्र (Pharmacy) इन्ही विचारोंपर आगे कूच कर रहा है । वैज्ञानिक चिकित्सापद्धतिने सूचीवेघ( Injec. tion )का उपयोग करके अपनी विशिष्टता बढ़ाई है । इसके लाभालाम वाचकोंको विदित ही होंगे । औषधद्रव्य शारीरिक कोपोंमें शीघ्र मिल जाये और अपने गुण व्यक्त करें इस उद्देश्यसे दोनों पक्षोंने कुछ भिन्न मार्ग लिया है। आधुनिक विद्वान् औषधोंको यथाशक्ति द्राव्य ( Soluble ) खरूपमें लाकर, उनकी मनिष्ट क्रिया न हो ऐसे योगोंके बनानेमें तन्मय हैं । उधर, प्राचीन आयुर्वेदाचार्योंने द्राव्य स्वरूपपर ध्यान न देते हुए, वे जिस खरूपमें शरीरमें अपने गुण प्रक्ट कर सकें और किसी भी प्रकारकी विषमय क्रिया न करने पाएँ ऐसे स्वरूपमें द्रव्योंको देनेकी पद्धति अङ्गीकार की है । अत एव, आयुर्वेदमें कई भस्में, कूपीपक्क रस आदि योग आधुनिकोंके औषध द्रव्योंसे भिन्नता रखते हैं। प्राचीनोंने निरिन्द्रिय धातुओंको-खनिज द्रव्योंको-वनस्पतियोंके रसोंकी भावना देकर, उनका विविध प्रकारसे पाक करके अथवा सस्कार करके उनको सेन्द्रिय खरूपमें (Organic form) लानेका प्रयास किया है, जिससे वे शारीरिक कोषोंके लिए ग्राह्य वनते हैं तथा विषात्मक क्रिया नहीं - करते । विविध भस्मोंको वारितर, निश्चन्द्र तथा निरुत्थ बनानेमें उनका यही उद्देश्य था। इसके फलखरूप सुवर्ण, रजत, ताम्र, नाग आदिका आयुर्वेदिक चिकित्सापद्धतिमें मुफहस्तसे उपयोग होता है, तथा इन भस्मोंके देनेसे यकृत् या मूत्रपिण्डोंपर असर बुरा नहीं होता । पाश्चात्य द्रव्यगुणविज्ञानको अभी इस दिशाका ज्ञान नहीं है। हाँ, उन्होंने हालहीमें धातुओंको उनके अत्यन्त सूक्ष्म-अणुस्वरूपमें उपयोगमें लानेका मार्ग ग्रहण किया है। अर्थात् धातुओंके अणुओंको एक द्रव मिश्रणमें (Colloids) मिलाकर सूचीवेधद्वारा शरीरमें प्रविष्ट किया जाता है, जिससे वे अणु ( Molecules) शरीरमें तत्काल फैल जाय । परंतु इन योगोंमें निर्विषीकरण समुचित नहीं होता, जिससे ये योग भी इच्छित फल नहीं देते । कज्जली, रससिन्दूर और मकरध्वजका अन्तर डॉक्टरोंको समझ नहीं आता। इसका कारण यह है कि प्राचीनोंकी रासायनिक परिवर्तन उत्पन्न करनेकी विधियों का उन्होंने निष्पक्ष होकर अनुशीलन नहीं किया है। अन्यथा हिन्दु रसतन्त्रकारोंने मनुष्योंके रोगनिवारणके लिए जो वुद्धिवैभवपूर्वक श्रम किया है उसके लिए उनके मनमें अवश्य ही आदरभाव उत्पन्न होता। ।
मायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार द्रव्योंकी कार्मुकता- द्रव्य अपनी क्रिया किस कारण करते है ? इस प्रश्नका उत्तर देने में आयुर्वेद अन्य किसी पद्धतिका प्राणी नहीं है। अर्थात् इस प्रश्नका उत्तर देते हुए इसने किसी के विचार अपनाये नहीं है । प्राचीन कालमें द्रव्योंकी रोगनिवारकशक्ति-सबन्धी प्रचलित विचार एक सिद्धान्तके रूपमें व्यवस्थित किये जाकर सहिताकालमें प्रस्तुत किये गये थे । इस कालमें वैशेषिकोंने अनुभवात्मक जगत् (World of experience) का छ या सात पदार्थों में (Catagories) समावेश किया था। इन पदार्थों का वर्णन करते हुए वैशेषिकसूत्र में सत्रह गुण तथा प्रशस्तपादभाध्यमें सात अन्य गुण भी कहे गये हैं। इन गुणोंमें भौतिक ( Material ) तथा मानसिक ( Mental ) गुणोंका समावेश हो जाता है । ये गुण हमें पदार्थोके विषयमें कोई न कोई जानकारी देते है । यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि साख्यकी परिभाषामें गुणका अर्थ सर्वथा भिन्न है । परंतु आयुर्वेदने इन गुणोंका उपयोग पारिभाषिक अर्धमे किया है। कारण, वैशेषिकों का उद्देश्य मनुष्यों को पदार्थोका ज्ञान कराना था, जव कि आयुर्वेदज्ञोंका उद्देश्य द्रव्योंके वैद्यकीय गुण बताना था। अत उन्होंने अपने तन्त्रके लिए उचित परिभाषा निश्चित की । इस ग्रन्थके १०५-११० पृष्ठोंपर विद्वान् लेखकने यह बात स्पष्ट शब्दोंमे कही है, और सामान्य भापामें तथा आयुर्वेदकी परिभापामें. गुरु लघु आदि गुणवाचक गब्दों का प्रसिद्ध अर्थ बताया है। कालक्रमसे द्रव्योंके गुण अधिकाधिक प्रमाणमें ज्ञात होते गये । फलनः विभिन्न आहार तथा औषधद्रव्योंकी शरीरपर होनेवाली क्रियाओंका ठीक-ठीक निर्देश किया गया। इन आयुर्वेदोक गुणोंका वैज्ञानिक परिभाषामे भौतिक, Taryfa# 991 starta yuti (Physical and chemical properties as well as the pharmacological properties of drugs) समावेश हो जाता है। इन गुणोंमें रस गुणका जानना सुगम था । कारण, जिह्वाद्वारा उसकी तुरत परीक्षा हो सकती थी। प्रयोगशालाके किसी भी साधनके सिवाय केवल रसद्वारा द्रव्यों के वर्गीकरणका यह मार्ग अत्यन्त सरल था। इस रसके छ. मेदोंके गुण-कर्म निश्चित हुए। पीछेसे समान रसवाले द्रव्यों का उपयोग करनेपर जव उनकी शरीरपर होनेवाली - १ रसके भेद-आधुनिक शरीरव्यापारशास्त्री केवल चार मुख्य रस (Primary Sensations of taste) मानते हैं---तिक, लवण, अम्ल और मधुर । उनके मतसे फट और कपाय गौण रस ( Mixed Sensations of taste and touch or taste and odour) है । इसके सिवाय इन छ रसोंके मिश्रणके परिणामरूप असंख्य मिश्र रस उत्पन्न होते हैं, जो द्रव्यविशेप तथा व्यक्तिकी रसग्रहणशक्तिपर आश्रित हैं । यहाँ यह भी कहना योग्य है कि कई तज्श छहों रसोंको मुख्य मानते हैं । अर्थात् रसोंके ६० पू. २२ ३३८ द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वाध, परिशिष्ट २ । । क्रियाओंमें भिन्नता अनुभवमें आयी तो विदित हुआ कि कितनेक द्रव्योंमें गुण सामान्य खरूपमें होते हैं जब कि उन्ही रसोवाले अन्य कितनेक द्रव्योंमें बलवत्तर स्वरूपमें होते हैं । इन बलवान् गुणसमूहोंको 'वीर्य' यह पारिभाषिक नाम दिया गया। यह प्रश्न अलग है कि यह वीर्य द्विविध है या अष्टविध । वीर्यशब्दका सामान्य अर्थ द्रव्यकी शक्ति ( Potency ) होता है। परंतु इन रस और वीर्य दोनोंकी सहायता लेनेपर भी कई-एक औपधद्रव्योंके औषधीय गुणों में अन्तर प्रतीत हुआ । आहारद्रव्यों- पर जठराग्निकी क्रिया होती है तो औषधद्रव्योंपर भी होनी ही चाहिए । इस विचारसे औषधद्रव्योंपर जठराग्निद्वारा होनेवाले परिवर्तनोंका निरीक्षण प्रारम्भ हुआ । अवस्था- पाकके वर्णनमें, मुखसे लेकर बृहदन्त्रतक पहुँचते हुए द्रव्योंमें जो भौतिक और रासायनिक परिवर्तन होते हैं, उनका वर्णन किया गया है। लालास्राव, जठररस (Gastric juice ), 495 foa ( Bile ), Tath AQT leiaraitai चरकने अनुभवात्मक दृष्टि से वर्णन किया है। पाचन क्रियाके अन्तमें जो रस (विपाक) तैयार होता था उसके गुण-कर्म द्रव्यके रस और वीर्यको देखकर निर्णय किये हुए गुण-कर्मोंसे कभी मिलते थे, और कमी विरुद्ध भी होते थे । इस स्थितिमें यह तय हुआ कि द्रव्योंका गुण-कर्म ठीक-ठीक जानने के लिए यह बात भी दृष्टिमें रखनी चाहिए कि उनपर पाचन क्रियाका अन्तिम प्रभाव क्या होता है। कारण, यह अन्तिम अवस्थामें तैयार हुभा द्रव पदार्थ अन्त्रद्वारा चूसा जाकर रुधिराभिसरणमें मिल जाता था और शरीरपर अपनी क्रिया करता था। विपाक तीन हैं या दो इस विषयमें भगवान् चरक तथा भगवान् सुश्रुतकी विचारश्रेणियों और शब्दप्रयोगोंकी भिन्नता ही भेदका कारण है, न कि कोई तात्त्विक विरोध, क्योंकि शरीरमे होनेवाले परिवर्तनोंका तो दोनोंने समान रूपसे निर्देश किया है (देखिये इस ग्रन्थका पृ. २४८-२४९)। जहाँ जहाँ द्रव्यके गुण, रस, वीर्य और विपाकद्वारा भी उनकी शरीरपर होनेवाली क्रियाएँ विस्पष्ट न हो सकी चहाँ वहाँ 'प्रभाव' द्वारा उनका स्पष्टीकरण किया गया । अथर्ववेदमें मणियों और मन्त्रोंका प्रभाव था। वैशेषिक न समझमें आनेवाली घटना- चतुष्ट्य अथवा पट्त्वका प्रश्न अभी पूरी तरह निणीत नहीं हुआ । यह मतभेद उपस्थित होनेका कारण यही है कि तिक, लवण आदि मुख्य रसवाले द्रव्य जिलामें स्थित स्वादाङ्गुरों (Taste buds ) और इनमें प्रसृत स्वादवाही (Nerves of taste) नाडियोंके तन्तुओंको उत्तेजित करते हैं, जिसके परिणामरूप हमें स्वादकी प्रतीति ( Perception) होती है । परतु कपाय और कुटुरसवाले द्रव्य जिक्षामें स्थित स्वादग्राही नाडियोंके अतिरिक्त अन्य स्पर्शसशा तथा ऊष्मा, शैत्य, पीडा आदिका वेग वहन करनेवाली नाडियोंको भी उत्तेजित करते हैं, जिनके कारण कपाय तथा कटु रसकी प्रतीति होती है । विस्तारके लिए शारीरव्यापारशास्त्र के आकरअन्ध देखिये।
मायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर सुलनात्मक विचार ओंका समाधान 'महार'द्वारा करते थे । अतः भायुर्वदने भी इन्ही शब्दोंका प्रयोग प्रारम्भ किया । 'द्रव्यप्रभाव' तथा 'व्याधिप्रभाव' शब्द द्रव्यगुणविज्ञान और व्याधि- विज्ञानमें प्रयुक होने लगे और आज भी प्रयुक्त होते हैं । प्राचीन आयुर्वेदाचार्योंके द्रव्यगुणविज्ञानसबन्धी विचार आधुनिक विज्ञानवादियों के विचारोंसे कितने अशमें मिलते हैं और कितने अशमें भिन्न है यह देखनेके पहले इतना ऐतिहासिक सत्य स्वीकारना चाहिए कि आयुर्वेदमें खतन्त्र और प्रतिभाशाली चिन्तन आजकल चन्द हो गया है । आधुनिक वैज्ञानिक विचारोंसे लेखक और वाचक दोनों न्यूनाधिक प्रमाण अभिभूत होते हैं। यह तथ्य मानने के पश्चात् अब हम द्रव्यों के विषयमें विशेप विचार करते हैं। कर्ममेदानुसार द्रव्योंका वर्गीकरण (Classification of Drugs according to their Pharmacological Actions) इस प्रन्यके प्रथम अध्यायमें दिये गये नामोंसे स्पष्ट होगा कि इस विषयमें दोनों विचारप्रवाहोंमें बहुत साम्य है । वमन, विरेचन, संसन, शुक्रल, रतन्यजनन, मूत्रविरे- चनीय आदि कर्मोके कारण द्रव्यमेद दोनोंमें प्रसिद्ध है । परन्तु दोनों के बीचमें अन्तर भी है । आजकल आधुनिकोंने द्रव्योंका वर्गीकरण शरीरव्यापारशास्त्र( Phystology )के अनुमार द्रव्य मुख्यत. शरीरके किस तन्त्र (System ) पर क्रिया करते हैं, हम वातको दृष्टिमे रसकर, और प्रत्येक शरीरयन्त्र (Organ)पर इसकी क्या क्रिया होती है इस पृथक्करणशील (Analytical Uiew point) दृष्टिसे देसना प्रारम्भ किया है। इसके परिणामस्वरूप हमें नाडीतन्त्रपर क्रिया करने- वाले द्रव्य, मूत्रपिण्डोंपर फिया करनेवाले द्रव्य, आमाशय तथा अन्त्रोंपर क्रिया करनेवाले द्रव्य, खचापर फ्रिया करनेवाले द्रव्य इत्यादि द्रव्यसमूह दृष्टिगोचर होते हैं । इसी कारण लेखन, मेहन, सशमन, अभिष्यन्दी, प्रमाथी आदि कर्मोंके पर्याय पाश्चात्य द्रव्यगुण- १ उदाहरण., परमाणुओंका परिरपन्दन, अयस्कान्त मणिकी ओर सुईका आकर्षण, अग्निका अव॑ज्वलन, वायुकी तिर्यग्गति गौर वृक्षोंमें मूलद्वारा चूसे गये रसका ऊर्ध्वगमन भादि व्यापारोंका समाधान 'अदृष्ट द्वारा किया जाता था । 'मणिगमन सूच्यभिगमनमित्यदृष्ट- कारितम्' (वे. स. ५-१-२५) तथा 'धृक्षाभिसर्पणमित्यदृष्टकारितम्' (वे. सू ५-२- ७)। आयुर्वेद में रमसंवहनका कारण व्यान वायुके माथ अदृष्टको भी गिनाया है (अदृष्ट- हेतुकेन कर्मणा' सु. सू अ. १४) । इसी प्रकार जहाँ-जहाँ रोगकी संप्राप्ति तथा लक्षणोंकी उपपत्ति दोष-दूभ्यविशानसे न हो सकी वहाँ वहाँ 'च्याधिप्रभाव' शब्द प्रयुक्त होने लगा। उदाहरणत , ग्रहणीके वर्णनमें--'गृद्धि काझा, एतच्च वातपितान्त करणत्वेन व्याधिमहिना वा' । तथा छिन्नश्वासके लक्षणमें 'रकैकलोचनत्व, व्याधिप्रभावात' माधवनिदानटीका (मधुकोश)।
। (Skin and its appendages ) दापग, खेदापनयन, रोमशातन, रोमसंज- ३४० द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वाध, परिशिष्ट २ । विज्ञानमें नहीं मिलते। इस विषयमें विशेष विचार करनेसे विदित होगा कि शरीरके व्यापारोंके ज्ञानमें वृद्धि होनेसे इस शरीरके तन्त्रों तथा यत्रोंके कार्योंपर होनेवाली द्रव्योंकी क्रियाके द्योतक शब्दोंमें वृद्धि हुई है। परंतु रोगकी क्रिया न्यूनाधिक सारे शरीरपर होती है और द्रव्योंकी क्रिया भी सारे शरीरपर होती है। इस दशामें शरीरके एकदेशपर या उसकी एक मुख्य क्रियापर होनेवाली क्रियाओंके वाचक शब्दोंका प्रयोजन ही क्या है ? इस पूर्वपक्षका उत्तर यह है कि-रोगका अर्थ है दोषवैषम्य, यह सारे शरीरके दोषोंकी असाम्यावस्था सूचित करता है। परंतु कुपित हुए दोष जहाँ स्थान प्राप्त (स्थानसश्रय) करते हैं वहाँ विकृति प्रकट होती है। अत. रुग्ण शरीरमें कुपित हुए दोषोंके आश्रयरूप स्थानपर क्रिया करनेवाले द्रव्य हमें विदित हों तो चिकित्सामै सरलता होती है। सच पूछे तो शरीरके प्रकृतिस्थ व्यापारोंका ज्ञान जितना अधिक होगा उतना ही विकृतियोंकी चिकित्सा करना सुकर होता है। इस दृष्टिविन्दुसे हम इस अध्यायका पुनरवलोकन करेंगे तो प्राचीनोक औषधीय कर्मोंको आधुनिक पद्धतिसे भी व्यवस्थित कर सकेंगे। यथा- १ महास्रोतपर असर करनेवाले द्रव्य स्रंसन, Drugs acting on the (वमन, उत्क्लेशकारि, दीपन, पाचन, Alimentary Canal) विरेचन, ग्राहि आदि । २ रुधिराभिसरणपर क्रिया करनेवाले द्रव्य । हृद्य, बल्य, संज्ञास्थापन, बृंहण, (Heart and Circulation) शोणितास्थापन आदि। ३ मूत्रजननपर क्रिया करनेवाले द्रव्य । मूत्रसग्रहणीय, मूत्रविरजनीय, मूत्र विरेचनीय (Kidneys and Diuresis ) आदि । ४ प्रजननयन्त्रपर क्रिया करनेवाले द्रव्य Genital system and शुक्रल, वाजीकरण, पुंस्त्रोपघाती, प्रजा- Sexual Power ) स्थापन, गर्भास्थापन आदि । ५ खचापर क्रिया करनेवाले द्रव्य ६ श्वसनयन्त्रपर क्रिया करनेवाले द्रव्य ] कासहर, श्वासहर, श्लेष्मप्रसेकी, कफ- ( Respiratory tract) विलयन, लेखन आदि। ७ नाहीतन्त्रपर क्रिया करनेवाले द्रव्य । स्वप्नजनन, मादक, सौमनस्यकर, संज्ञा- (Nervous System) स्थापन आदि। ८ सार्वदेहिक रसव्यापारोंपर क्रिया | रसायन, बल्य, सशमन, जीवनीय, व्यवामि, करनेवाले द्रव्य (Metabolism), विकासि आदि । इस प्रकार आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानके अनुरूप वर्गीकरण भी किया जा सकता है। औषोंके आयुर्वेदोक्त काँका स्थानानुसार भी वर्गीकरण किया जा सकता है। जैसे- - आयुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार 4 काव्य, शिरोविरेचनीय, विम्लापन आदि द्रव्योंकी क्रिया स्थानिक (Local) होती है। देहव्यापी क्रिया करनेवाले द्रव्योंकी सख्या बहुत बड़ी है। इस अध्यायपर दृष्टिपात करनेसे विदित होगा कि आयुर्वेदके द्रव्यसंग्रहमें संज्ञानाशक (Anesthetics), जन्तुनाशक (Germicidal ) तथा निद्राप्रद (Hypnotics) औषोंकी संख्या नगण्य । रक्षोन द्रव्य एक प्रकारके मन्तुनाशक द्रव्य है, आजकल गक्षसोंकी अपेक्षया जन्तु ही अधिक देसनेमें आते हैं। इसके विपरीत पाश्चात्य द्रव्यसप्रहमें मेध्य, रसायन, वाजीकरण आदिकी न्यूनता लक्षित होती है। इस विषयमें क्या होना या करना चाहिए इसका निर्णय वाचकोंपर ही छोड़ता हूँ। औषधीय कर्मों के कारण (Causes of Pharmacological actions of Drugs)। जो आयुर्वेदमें प्रयुफ परिभाषाओंको समझते वे इसमें दिया हुआ द्रव्योंका वर्णन समझ सकते हैं । परंतु देशके दुर्भाग्यसे अनेक सुशिक्षित डाक्टर ये परिभाषा नहीं समझते होनेसे आयुर्वेदका द्रव्यगुणविज्ञान समझनेमें असमर्थ होते हैं, जिससे देशको आर्थिक क्षति होती है। जैसे आहारद्रव्य सब समान नहीं होते और उनकी शरीरपर पोपक क्रिया समान नहीं होती वैसे औषधद्रव्य भी सब समान नहीं होते और उनका रोगनाशक प्रभाव भी समान नहीं होता, यह बात आसानीसे समझमें आ सकती है । औषवोंके गुण-धर्मोका वर्णन सैकड़ों वर्षोंके अवलोकन और अनुभवका परिणाम है। कारणों की चर्चाम प्रभावको एक ओर रखकर हम गुणोंका ही विचार करते हैं। कारण, गुणोंके विचारके साथ रस, वीर्य और विपाकका भी विचार सकलित हो जाता है। १ उदाहरणतया, चरक और सुश्रुत दोनोंने पृतको अग्निदीपन माना है (देखिये सु. सू, अ, ४५ तथा च. सू म. २७) और इसके इस कर्मको प्रभावजन्य कहा है। वर्तमानमें खाद्य पदार्थोपर जो परीक्षण हो रहे हैं उनसे विदित हुआ है कि दालों ( Pulses ) में विद्यमान प्रोटीन ( Protein) मूत्रपिण्डों तथा यकृत्पर पुरी असर रखता है । परतु दालोंका उपयोग यदि घी या कॉडलिवर ऑइलके साथ किया जाय तो इस बुरी असरसे वचा ना सकता है । घीमें स्थित यह गुण एक विशिष्ट पदार्थ( जिसे प्राचीनोंने प्रभाव कहा है ) के कारण है, जो यकृतको विगडने नहीं देता अर्थात् पाचनशक्तिको बिगटने नहीं देता ( देखिये Indian Medical Gazette, Sept. 1943 ) । आधुनिक विद्वान् नहाँ जहाँ विशिष्ट गुणकारक पदार्थ (Active principle) मानते हैं, वहाँ वहाँ प्राचीन विद्वान् वीर्य या प्रभाव मानते थे। - ३४२ नव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २ । औषधद्रव्य किस कारण कार्यसाधक होते है इस प्रश्नका संक्षिप्त उत्तर निल दिया गया है।- तद् द्रव्यमात्मना किंचित् किंचिद्वीण सेवितम् । किंचिद्रस-विपाकाभ्या दोपं हन्ति करोति वा ।। (सु. स. भ. ४०)। द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावात् , गुणप्रभावाद्, द्रव्य-गुणप्रभावाच कार्यक्राणि भवन्ति । (च. सू. भ. २६)। इस उत्तरका विस्तार इस प्रन्यके विभिन्न अध्यायों में आ गया है । जैसे आधुनिक विज्ञानवादी द्रव्योंके गुणोंका सुलासा उनके संघटन(Structure of composition )की दृप्टिसे करते हैं उसी प्रकार प्राचीन आचार्योने द्रव्योंके गुणों का खुलासा उनके पावभौतिक संघटनको दृष्टिमें रसकर किया है। परंतु शरीरके संपर्क आनेके पश्चात् द्रव्यके जो औषधीय गुण देखने में आते है उनमें पारीरमें स्थित पदार्थोकी द्रव्योंपर होनेवाली क्रियाओंका भी अन्तर्भाव हो जाता है। अत: गुणोंको कर्मानुमेय कहा है। आशय यह है कि द्रव्य रोगीको देकर उनकी क्रिया देखे विना उसके गुणों का निश्चय नहीं हो सकता । द्रव्योंकी दोपहरण शक्तिकी (दोपकरण शक्तिकी मी) वास्तविक परीक्षा मनुष्यशरीरपर किये गये परीक्षर्णोद्वारा ही हो सकती है। मद्य तथा विपके वर्णनमें और दीपन, पाचन, व्यवायी, विकासी, वाजीकरण आदिके वर्णनमें जो शैली दिखाई देती है वह आधुनिक द्रव्यविज्ञानके प्रन्थमें स्थान पाने लायक है । यह वर्णन बहुत ही सुसवद्ध है। इससे द्रव्योंके कर्मोका वर्णन करते उनके गुणोंका वर्णन, द्रव्योंकी शरीरमें होनेवाली गति तथा उसमें होनेवाले परिवर्तनोंकी जानकारी परंपरासे हो जाती है। यह विषय सरलतासे समझनेके लिए हमें कुछ बातें दुहरानी पड़ेंगी। आहारद्रव्योका पाचन होकर उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होनेवाला रसका सारभाग मन्त्रोद्वारा शोपित होकर रसधातु बनता है । यह सारे शरीरमे फिरता हुआ समस्त धातुओं का पोषण करता है (देखिये-सुश्रुत सू. भ. १४) । पोपणक्रम समझाते हुए तीन दृष्टान्त दिये गये हैं-क्षीरदधिन्याय, केदारीकुल्यान्याय तथा खलेकपोतन्याय । औषधद्रव्योंकी गति भी इस क्रमके अनुसार है । विपाक (जिनकी चर्चा आगे होगी) होनेके ५ १ आयुर्वेदिक वाग्मयमें यकृत् , फुप्फुस तथा मूत्रपिण्ड जैसे महत्वपूर्ण माशोंका वर्णन नहीं पाया जाता । सूत्रात्मक अथवा मध्यक निर्देश विद्यार्थियों या वाचकोंको लाभकर नहीं होता । द्रव्योंके गुण-कर्मकी चर्चा में ये आशय वारवार आते है । यकृत पाचन तथा रतो. त्पादनकी क्रिया जैसा महत्त्वका भाग लेता है ऐसा ही महत्वका भाग यह शरीरको विप. द्रव्योंसे बचाने में भी लेता है । मूत्रपिण्ड विपरूप द्रव्योंको शरीरसे पाएर करनेमें महत्वपूर्ण - मायुपैदिक तथा माधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार - पश्चात् द्रव्य रुधिरप्रवाहमें प्रविष्ट होते हैं। कई द्रव्य धीमेसे चुसे जाकर और कई शीघ्र चूसे जाकर सारे शरीरमें फैल जाते हैं । कई संपूर्ण धातुओंपर धीमे-धीमे क्रिया करते हैं और कई शीघ्र ही अमुक धातु (Tissue) पर क्रिया करते हैं (मन्द, तीक्ष्ण)। इस बातको उदाहरणसे स्पष्ट करते हैं। दीपन-ये द्रव्य जठराग्निको प्रदीप्त करते है, अर्थात् जठररसको चढ़ाते हैं जिससे. भूस अधिक लगती है, जैसे भाँग । पाचन द्रव्य आमको पचाते हैं परन्तु जठररसमें विशेष वृद्धि नहीं करते, जैसे नागकेसर । इन कर्मोका कारण द्रव्योंका पाचभौतिक संघटन कहा गया है । पृथ्वी और वायुके गुणोंकी अधिकतावाले द्रव्य दीपन तथा अनिके गुणों की अधिकतावाले द्रव्य पाचन कहे गये हैं। आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञान इन कर्मोका कारण इन द्रव्योंके सघटनमें स्थित विशिष्ट गुणजनक पदार्थोका होना बताता है। दीपन और पाचन दोनी सहकारी शरीरव्यापार है और इनका स्थान मुख्य करके आमाशय है । भाठमाहने इनका समाधान द्रव्यप्रभावद्वारा किया है। रसवैशेषिकमें दिया समाधान अधिक युक्तियुक्त है। यहाँ यह भी उल्लेस करना चाहिए कि दीपन और पाचन दोनों कर्म कर सकनेवाले द्रव्य अनेक है। दीपन और आमपचन कर्म स्थानिक कर्म हैं । सो यह इन द्रव्योंकी आमाशयपर होनेवाली क्रिया हुई। इसके पश्चात् ये द्रव्य रुधिरप्रवाहम प्रविष्ट होकर शरीरमें संचार करते हैं और अन्य औषधीय गुणों को प्रकट करते हैं। जैसे माँग और नागकेसरकी शरीरपर क्रिया प्रसिद्ध है। इसी प्रकार वमन, छर्दिनिग्रहण इत्यादि कर्मोंका समाधान किया जा सकता है। अब हम इसी पद्धतिसे अन्य गुणोंकी परीक्षा करेंगे। आशु (आशुकारी), व्यवायी, विकासी आदि गुण रुधिराभिसरणद्वारा होनेवाला द्रव्यका प्रसर सूचित करते हैं । द्रव्योंके इन गुणों के कारण वे रुधिरमें शीघ्र ही प्रविष्ट हो जाते हैं, जैसे मद्य' । मद्यका पाक रुधिर में प्रविष्ट होनेके अनन्तर शुरू होता भाग लेते है । कितनेक औपधद्रव्य शरीरके अनेक स्रोतोंद्वारा बाहर निकल जाते हैं । मल, मूत्र, स्वेद, श्वासोच्छ्वास, आवेव आदिमें इनका अस्तित्व पाया जाता है ( देखिये प्रमाथी द्रव्योंका वर्णन)। मेरी नम्र समतिमें, आधुनिक द्रव्यगुणविशानकी दृष्टिसे द्रव्योंके शरीरमें प्रसर, संचय और नि सरणका वर्णन करना विद्यार्थियों के लिये हितावह होगा। १ द्रव्योंके गुणकर्मोंके विषयमें सभी तज्श एकमत हों यह सभव नहीं, जैसे-मथके विषयमें । मयको सुश्रुत शुक्रनाशक कहता है पर भेल इसे वृष्य कहता है। अब तक बहुतेरे से (मथको) पृष्य ही समझते थे, कारण आरम्ममें इसका इर्षण गुण व्यक्त होता है। परतु मधिक सेवनसे ओजसू और शुक्रका नाश होता है । कदाचित् भेलने तात्कालिक क्रियाका निर्देश किया हो और सुनुतने आनुवन्धिक (न्यूनाधिक कालके पश्चात् होनेवाली) क्रियाका । मथके शेष गुणोंका वर्णन लगभग समान है । देखिये भेलसंहिता पृ २१६ । - द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वाध, परिशिष्ट २। है और वह (मद्य ) शरीरके प्रत्येक कोषको वेष्टित कर लेता है । इसके पश्चात् इसके अन्य गुण उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष आदि प्रकट होते हैं। इसी भाँति विषद्रव्य भी शीघ्र ही रक्तमें प्रविष्ट हो जाते हैं और शरीरके विविध तन्त्र-यन्त्रोंपर अपनी क्रिया करते हैं । इन क्रियाओंका वर्णन गुणवाचक शब्दोंद्वारा किया गया है । चरकने कल्पस्थानमें वमन और विरेचन द्रव्योंकी क्रिया समझाते हुए इन द्रव्यों के वीर्यकी क्रिया हृदयपर होती हुई कही है 'खवीर्येण हृदयमुपेत्य' ( देखिये इस ग्रन्थमें पृ. ५४), . यद्यपि द्रव्य महास्रोतमें स्थित होते हैं। मदनफलका वमनकर्म तथा त्रिवृतका विरेचन कर्म आधुनिक द्रव्यगुण विज्ञानके अनुसार इनमें स्थित विशिष्ट गुणकारक तत्त्वोंके कारण है। इन तत्त्वोंको यदि इन द्रव्योंसे पृथक् कर दिया जाय तो इन द्रव्योंकी वमन और विरेचन करानेकी शक्ति नष्ट हो जायगी। द्रव्योंके गुणोंमें रस गुण( Taste)का स्थान प्रधान है । रसको आप्य विशेषण दिया गया है, जो सार्थक है। कारण, जद्रव्यके ( Matter) विकासक्रममें जबतक जलावस्था (Liquid state) न आवे तबतक रसका आविर्भाव नहीं होता। इसी प्रकार यदि किसी भद्राव्य (Insoluble) पदार्थका जिह्वाको स्पर्श हो तो जिह्वाको रसकी प्रतीति नहीं होती । अर्थात् रसकी प्रतीति के लिए द्रव्य ऐसा होना चाहिए कि वह द्रवित हो सके। यदि द्रव्यके अमुक परमाणु भी जिह्वापर स्थित सावके साथ न मिल जाय-द्रवित न हो जाये तो हमें रसकी प्रतीति नहीं होती। रसमेदका कारण 'शेषभूतससर्ग' है-इस सूत्रकी आधुनिक विज्ञान पुष्टि करता है । एवं, 'रसो निपाते द्रव्याणा' यह परीक्षाविधि मी यथार्थ है, शर्त इतनी है कि द्रव्य ऐसा होना चाहिए कि वह द्रवित हो सके । सोना, चाँदी आदि कठिन पदार्थोंको जिह्वापर लगानेपर उनके रसका स्पष्ट भान नहीं होता । तथापि जिह्वापर स्पर्शकी सज्ञा होती है, जिसे विज्ञानवादी धातवीय रस (Metallic taste ) कहते हैं । रसयुक्त द्रव्य त्वचापर छुआनेसे भी क्रिया होती है, परंतु उसे रसकी सज्ञा नहीं होती । कषाय और कटुरसवाले द्रव्योंकी खचापर स्थानिक क्रिया होती है यह सर्वविदित है। विविध रसोंवाले द्रव्योंके वर्णनमें (देखिये अध्याय ३, पृ. १५३-१६८) रसोंकी मुख और महास्रोतपर होनेवाली स्थानिक क्रियाओं तथा सार्वदेहिक पारंपरिक क्रियाओं- । . 'हर्षणादृष्यमुच्यते', तथा-'तीक्ष्ण चोष्ण तथा रूक्षमाशुकायी व्ययी च' । इस प्रकार मुद्रित उपलब्ध संहिताका पाठ भ्रष्ट है । 'आशुकारि व्यवायि च' यह पाठ होना चाहिए, जिससे संहिताओंमें एकवाक्यता रह सकेगी। हॉ, यह पाठशुद्धि सूचित करता हुआ मैं उनसे क्षमा चाहता हूँ जो मानते हैं कि वर्तमानमें उपलब्ध सहिताओंके पाठ शुद्ध १ 'शरीरावयवान् सर्वाननुगच्छत्यानपि' (भे.); 'विशत्यवयवान् सूक्ष्मान्' (सु.)। हैं . .
। भायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार (General and indirect action ) का भी वर्णन हुआ है । वह आधुनिक विज्ञानसे सपूर्णत: मिलता है । तथापि, आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानमें द्रव्योंका वर्गीकरण रसप्रधान नहीं पाया जाता, किंतु विभिन्न रमोंवाले औषधोंका तथा इन रसोंसे युक्त द्रव्योंके गुण-काँका वर्णन पाया जाता है। पहले कह आये हैं कि आधुनिकोंका वर्गीकरण शारीरिक व्यापारोंको लक्ष्यमे रखकर किया गया है। तुलनात्मक दृष्टिसे देखें तो आधुनिक द्रव्य गुणविज्ञानके अन्धोंमें शर्करासमूह- (Sugars) के वर्णनमें मधुररसके गुण-कर्मोका, ऍसिडों या अम्ल पदार्थोके (Acids) वर्णनमें अम्लरसके गुण-कर्मोका, क्षारों( Salts)के वर्णनमें लत्रण रसके गुण-कर्मोंका, उड्यनशीलतेलवर्ग(Volatile oils )के वर्णनमें कटुरसके गुण-कर्मोंका, विकवर्गके (Butters) वर्णनमें तिकरसके गुक-कर्मीका और प्राहीवर्ग- (Asthingents )के वर्णनमें कपायरसके गुण-कर्मों का वर्णन उपलब्ध होता है। अतः जिज्ञासुओंको आकरप्रन्थोंमें इस विषयका विस्तर देख लेना चाहिए। सब रस एक समान चलवाले नहीं होते । यह बात उनकी जिह्वापर होनेवाली स्थानिक क्रिया तथा शरीरपर होनेपाली सामान्य क्रियासे सिद्ध होती है । ( देखिये अध्याय ३, पृ. १४९-१५१)। यदि जिह्वापर विभिन्न रसोंवाले द्रवद्रव्य छुआए जावें तो इस बातका तत्काल अनुभव किया जा सकेगा । मधुररस सबसे अधिक बलवान् है और कषायरस सबसे दुर्वल है। इसी कारण रोगी जब अत्यन्त निर्वल हो गया हो तो उस अवस्थामें मधुररसवाले द्रव्य मुखद्वारा, खचाके नीचे किंवा सिराव्यधद्वारा दिये जाते हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि कई एक औषधद्रव्य जिह्वाकी रसपाही शक्तिका कुछ कालके लिए लोप कर देते हैं । उदाहरणतया कोकेन (Cocaine ) लेनेसे जिह्वा तिकरसका और मधुनाशिनी (गुडमार=Gymnema Sylvestre) लेनेसे मधुर रसका अनुभव नहीं कर सकती । यह प्रभाव थोड़े समयमें लुप्त हो जाता है। इन रसोंको लक्ष्यमें रखकर द्रव्योंका एक अन्य भी वर्गीकरण किया गया है (देखिये-अ. ३, पृ. २०७-२०८) । इसके पूर्व पहले अध्यायमें कर्ममेदके अभिप्रायसे किया गया वर्गीकरण वाचकों के ध्यानमें होगा। इस वर्गीकरणको उद्देश्य द्रव्यगुणविज्ञानका क्षेत्र वढ़ाना है । रसोंकी शरीरके विभिन्न अङ्गोंपर होनेवाली क्रिया अनुमानगम्य है-रोगीकी अवस्थाद्वारा रसोंके दोषसजनन या दोषसशमन कर्मका अनुमान किया जा सकता है। इसके बाद पुन, अवलोकनपद्धतिका अवलम्बन करना होता है और यह अवलोकन मानवशरीरपर होना चाहिए, न कि केवल प्राणियोंपर । द्रव्यों के प्रधानर्गुण रसका विचार सपूर्ण हुआ। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आयुर्वेदके सिवाय अन्य किसी चिकित्सापद्धतिमें रसके प्रति इतना लक्ष्य नहीं दिया गया है।
३५६ द्रव्यगुण विज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २ । अब हम विपाकका (अ. ४) विचार करते हैं । आहारद्रव्यों और औपघदयों के शरीरमें जानेपर उनकी क्या दशा होती है यह प्रत्यक्ष प्रमाणका नहीं कितु अनुमानका विषय है। अत कर्मनिष्ठाके सिवाय इसे जाननेका कोई उपाय नहीं है । पहले हम आहारद्रव्योंका और पश्चात् औषधद्रव्योंका विचार करेंगे। अवस्थापाक (Stages of Digestion)-भगवान् चरकने इसका विचार प्रहणीचिकित्सामें विस्तारसे किया है (इसी प्रन्यमै पृ.२१४)। मुखमार्गसे प्रविष्ट होकर बृहदन्त्रतक पहुँचनेतक आहारद्रव्योंमें होनेवाले भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनोंका (Physical and Chemical Changes) इसमें निर्देश है । पाचन- सस्थान (Digestive System )के इन व्यापारोंमें नाडीसंस्थान (Nervous system) भी भाग लेता है, जो प्राण और समान वायुके कर्मोद्वारा अभिप्रेत है। इसके बाद मुख, आमाशय, ग्रहणी तथा वृहदन्त्रमें होनेवाले परिवर्तनोंका उल्लेख है। इस प्रकरणमें जठराग्निका अर्थ है आधुनिक विज्ञानवादियोंके पाचनक्रियामें भाग लेनेवाले रस तथा किण्वद्रव्य (Digestive fluids and Enzymes ) जैसे लालानाव, जठररस, अग्न्याशयरस, अन्त्ररस, पैप्सीन आदि । भवस्थापाक होते हुए मलरूप कफ, पित्त और वातकी भी उत्पत्ति होती है, यह बात शरीरव्यापारशास्त्रका कोई भी आधुनिक आकरग्रन्थ वांचनेसे स्पष्ट समझमें आएगी। इस प्रसगमें प्रत्येक अभ्यासीको यह बात ध्यानमें रखनी चाहिए और विद्वान् सग्रहकारने भी अपनी टिप्पणीमें यह बात स्पष्ट की है कि यहाँ कही गयी उत्पत्ति त्रिधातुरूप वात-पित्त-कफ की उत्पत्ति नहीं है। विपाक-निष्ठापाक ( Final Product of Digestion)-पाचन- क्रियाके परिमाणस्वरूप जो द्रव पदार्थ वनता है उसका सारभाग--प्रसादरूप भाग हृदयकी ओर जाता है, और किट्टरूप भाग मल-मूत्र के रूपमें शरीरसे बाहर निकल जाता है। यहाँ स्पष्टीकरणके लिए यह लिख देना योग्य है कि प्रसादरूप आहाररस दो मार्गों- प्रतिहारिणी सिरा तथा रसकुल्या-द्वारा हृदयमें जाता है । एवं किट्टभाग सीधा वस्ति ( Bladden ) मे नहीं जाता, परंतु मूत्रपिण्डों ( Kidneys) द्वारा विश्लिष्ट होकर वस्तिमें जाता है । आयुर्वेदिक वाजायमें यह बात स्पष्ट रूपमें कही नहीं गयी है, यह मेरा नम्र मत है । इस विपाकके परिणामखरूप तैयार होनेवाले द्रव पदार्थका भी अपना रस (Taste ) होता है, जो अनुमानगम्य अथवा कार्यानुमेय है । यह रस १ यह वस्तुस्थिति स्पष्ट न समझनेसे वात-पित्त-कफकी उत्पत्तिके सवन्धमें कैसी उलझन पैदा होती है यह जाननेके लिए देखिये कविराज डी. एन्. रॉयकृत 'The Principles of Tridosh in Ayurved' प्रकरण १३, पृ. १०१ । २ स्व. प. हरिप्रपनजी- तथा म म. कविराज गणनाथ सेनजीने मूत्रपिण्डोंके व्यापारके सवन्धमें जो खुलासा किया है वह मुझे संतोषप्रद नहीं लगता। - w- मायुर्वेदिक तथा माधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार ३४७ मधुर, अम्ल अथवा कटु हो सकता है, ऐसा त्रिविधविपाकवादी कहते हैं । भाधुनिक विज्ञान इसका समर्थन करता है । कारण, आजकल परीक्षणोंसे ज्ञात हुआ है कि प्रोटीनोंके पाचनके अन्तिम परिणामरूप एमाइनो एसिड ( Amino acids) नामके अम्ल पदार्थ तयार होते हैं। इसी प्रकार आहारके कर्वोदित या स्टार्चवाले पदार्थाके पाचनके परिणामरूप ग्लुकोज (Glucose) नामक मधुर पदार्थ तथा चरचीवाले या स्निग्ध पदार्थोके पाचनके परिणामरूप कटुरसप्रधान फॅटी एसिड्स और ग्लिसेरोल ( Fatty acids and Glycerol) नामके पदार्थ तैयार होते हैं । निष्ठापाकके परिणामरूप कौन रस (या किस रसवाला द्रव पदार्थ) वनता है, यह द्रव्यविशेपपर-आहारद्रव्यके प्रकारपर-अवलम्बित है । तथा विपाकमें विपर्यास होना या न होना यह द्रव्यके प्रमाण, सस्कार, सात्म्य आदिपर अवलम्बित है (अध्याय ४, पृ २४७)। यहाँ द्विविधविपाकवादियोंके मतका- गुणविपाकवादका~भी विचार करना उचित है । गुणोंकी दृष्टिसे देखें तो यह मत मी विज्ञानसमत है। कारण, आहारद्रव्योंका पाचन होनेके पश्चात् जो रस तैयार होगा वह या तो गुरु होगा या लघु । विज्ञान कहता है कि सामान्य परिस्थितिमे प्रोटीनोंका ( Proteins ) पाक गुरु होता है, और कर्वोदितों ( Carbohydrates) तथा निग्ध द्रव्यों( Fatty articles )का पाक लघु होता है । फलितार्थ यह कि दोनों विपाकवादियोंके मत शास्त्रीय और सत्य है, तथा अनुभव और अवलोकनके आधारपर स्थापित है। महास्रोतमें आहारद्रव्योंकी जठराग्मिकी क्रियाके परिणामरूप क्या दशा होती है यह हमने देखा । परन्तु इस सौम्य आहाररसका शोषण होनेके पश्चात् इसमें अन्य असंख्य परिवर्तन होते है। इन परिवर्तनोंका अनुमान देहके स्नेहन, जीवन, तर्पण, धारण आदिके द्वारा हो सकता है । रुधिरप्रवाहमें प्रविष्ट होनेके पश्चात् धमनियोंद्वारा शरीरमें फैलते हुए इनमे अन्य भी पाकक्रिया होती है या नहीं यह प्रश्न विचारने योग्य है । शरीरसे बाहरकी दृश्य सृष्टिमें अग्नि और सूर्यकिरणोंकी उप्णतासे पाकक्रिया होती है। शरीरमें जठराग्निके अतिरिक्त कोई अग्नि है या नहीं यह प्रश्न है । भगवान् चरकने इसका उत्तर 'हाँ'में दिया है और पॉच भूताग्नियों और सात धात्वग्नियोंका अस्तित्व प्रतिपादित किया है (देखिये च. चि अ १५, श्लो. १३-१५)। साय ही यह भी कहा है कि ये बारह भग्नियाँ जठराग्निके आश्रित हैं। आधुनिक वैज्ञानिक जिसे मेटाबोलिज्म (Motabolism) अथवा आन्तर्देहिक रासायनिक परिवर्तन कहते हैं उन परिवर्तनोंका आयुर्वेदाचार्योंने धातुओंके उत्पत्तिकम तथा वारह अग्नियोंकी क्रियाओम समावेशित किया है। १ डॉ. धीरेन्द्रनाथ बेनरजीने इस देहोष्माको चौदहवें अग्निके नामसे पुकारा है। यह चौदहवा अग्नि इनका मानसपुत्र है। कारण, आयुर्वेदमें चौदहवें अग्निका निर्देश ही नहीं है और देहोष्माको भ्राजक पित्तका कर्म कहा है । देखिये-सुश्चत. सू, म. १६. 'ऊष्मा ३९८ द्रग्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष २। 2 आहारद्रव्योंके पाचनके परिणामरूप-विपाकके अन्तमें-सारभूत आहाररस हृदयमें जाता है और रसधातु नामसे अभिहित होता है। इससे अन्य धातुएँ बनती हैं। परंतु रस जसे द्रव पदार्थसे अस्थि जैसी कठिन धातुका बनना क्या कम चमत्कार है ? इस घटना के लिए एक पाकक्रियाकी भावश्यकता है, और इसके लिए विशिष्ट गुण-धर्मवाला अमि होना चाहिए। मायुर्वेदाचार्योंके कहे हुए इन अग्नियोंके व्यापारोंको समझनेमें आधुनिक विज्ञान बहुत उपयोगी है । रजस् और शुक्रके समिलनके फलखरूप एक फलित यीजकोष ( Fertilied Ovum) उत्पन्न होता है, जिससे करोडों कोष उत्पन्न होते हैं, और उनके आकार तथा गुण-धर्मोंमें परिवर्तन होता है। इनका आहार-नामिनाली- द्वारा मिलनेवाला माताका आहाररस-एक होते हुए भी क्यों कोषोंके आकार और गुण-धर्मोंमें मेद आता है ? क्यों उनके भौतिक एवं रासायनिक गुणोंमें भिन्नता होती है ? इसका उत्तर खभाव, प्रकृति, ईश्वर जो कहो वह है। परंतु इनके निरीक्षण तथा परीक्षासे ज्ञात होता है कि भिन्न भिन्न प्रकारके कोष भिन्न भिन्न धातुओंका निर्माण करते हैं और अपने अनुकूल पदार्थ आहाररसमेंसे लेकर जीवननिर्वाह करते हैं। उदाहरणतया, रुधिर लोहको ( Iron ) पसद करता है, ज्ञानतन्तु फॉस्फरस तथा प्रोटीनों (Nucleoprotein) को, मासपेशियाँ भी प्रोटीनोंको तथा अस्थियाँ चूनेके क्षारोंको (Calcium Salts) खूब सचित करती हैं। खलेकपोतन्यायके समान अपने अपनेको पसद आहार ग्रहण करनेवाले ये भिन्न भिन्न धातुओंके निर्मापक कोष, प्रहण किये हुए पदार्थको जैसेका तैसा अपने अङ्गमें समाविष्ट नहीं कर लेते, किंतु इन पदार्थोंको किंचित् बदलकर, अपने लिए सात्म्य रूप देकर अपने में-कोषमें प्रविष्ट करते हैं । आहारद्रव्यगत प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा स्नेहवाले पदार्थ जठराग्निके पाकके विना तथा उसके अनन्तर धातुओंके कोषों में होनेवाली पाकक्रियाके विना शरीरके लिए उपयोगी नहीं होते । एक सीधा दृष्टान्त लें। दूध एक उत्तम आहारद्रव्य है, परन्तु तमी जब कि जठरामिद्वारा इसका सम्यक् पाक हो । जव दूधके केवल पन्द्रहसे बीस शरीरोष्मा, स त्वस्थभ्राजकपित्तस्य कर्म'-चक्र० । इसी प्रकार म म. क. गणनाथसेनजीने आग्नेयरससवहनका वर्णन किया है, जो भ्रान्तिमूलक प्रतीत होता है । कारण सुश्रुतने थाहाररसको जोर देकर 'सौम्य' कहा है। १ 'खभावमीश्वर काल यदृच्छा नियति तथा । परिणाम च मन्यन्ते प्रकृति पृथुदर्शिन ॥ सु शा म. १ ।' सजीव तथा निजींव सृष्टिके पार्थक्यका कारण शोधनेके लिए मनुष्यजाति प्राचीन कालसे संलग्न है । इस विचारमन्थनके परिणामरूप जो जो मुख्य बाद सामने ये उनका सुन्दर निर्देश इस श्लोकमें भगवान् सुश्रुतने किया है । आयुर्वेदाचार्योंने इन सयोंका समन्वय करके अपना चिकित्साशास्त्र रचा है।
भायुर्वेदिक तथा भाधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुरुनात्मक विचार ३४९ बिन्दु सूचीवेधद्वारा बचाके नीचे प्रविष्ट किये जाते हैं तो मनुष्यको सहसा ज्वर हो भाता है । कारण, दूधका पोषक तत्त्व (Protein) सम्यक् परिणत न होनेके कारण अमृतके स्थानपर विपकी किया करता है । फलितार्थ यह कि शरीरके अन्य बारह अग्नि जठराग्निकी प्राथमिक क्रियाके विना अपना कार्य ठीकसे नहीं कर सकते। अत एव इसे सर्वोपरि मान दिया गया है-'अन्नस्य पक्ता सर्वेषा पतॄणामधिको मत.. च. चि. अ. १५)। रस, रक्त आदि धातुओंमें ये धावनि तथा भूताग्नि रहते हैं। प्रत्येक धातुका अग्नि इन धातुनिर्मापक कोषोंमे (Tissue Cells) प्रवर्तमान भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तनोंका मूल है, जब कि इन धातुओंका भूताग्नि इस बातका निर्णय करता है कि इनमें कौनसा महाभूत अधिक प्रमाणमें रहता है। उदाहरणतया, कर्णेन्द्रियमें आकाश, जिलामें जल, घ्राणेन्द्रियमें पृथ्वी इत्यादि । आधुनिक विज्ञानवादी अपनी दृष्टि से प्रत्येक धातुका विशिष्ट रासायनिक संघटन बताते हैं । सक्षेपमें कहें तो विपाकक्रिया बहुत लंयी और उलझनभरी है और सभी अग्नि इसमें थोड़ा-बहुत भाग लेते हैं। अन इन तथ्योंको लक्ष्यमें रखकर औषधद्रव्योंका विचार करते हैं । इनके ऊपर पहले जठरामिकी और पीछे धालग्नियों और भूतानियोंकी क्रिया होती है। कई औषधद्रव्य-व्यवायी या विकासी, जैसे मद्य-जठराग्निकी क्रिया पूरी होनेके पूर्व ही रुधिरप्रवाहमें मिल जाते हैं और अपने औपधीय कर्म व्यक्त करने लगते हैं। परंतु धासमियोंकी क्रियासे वे नहीं बच सकते और भिन्न-भिन्न धातुओंमें (Tissues) इनका पाक होने लगता है। परंतु औषधद्रव्योंमें अधिकाश जठराग्निके संपर्कमें आते है । परिणामत द्रव्योंका रूपान्तर होता है, कइयोंका नाश भी होता है और कई द्रव्य विशेषत खनिज द्रव्य-(Metals ) थोडी पाकक्रियाके बाद मलद्वारसे शरीरके थाहर निकल जाते हैं । इसी कारण धातुओंकी भस्में तैयार करते हुए इनका वारंवार पाक किया जाता है, जिससे शरीरके अग्नियों का कार्य सुगम हो जाता है, तथा दोषप्रकोपक गुणों का नाश होकर दोषहरण या दोपसंशमन गुणोंका आधान होता है। विज्ञानकी परिभषामें कहें तो भस्मोंके परमाणुओंमें ऐसे गुण उत्पन्न किये जाते हैं कि जिनकी सहायतासे ये परमाणु शारीरिक कोषोंके जीवनरस ( Protoplasm )में सरलतासे मिल सकते है और अपने औषधकर्म ( Pharmacological action) व्यक कर सकते हैं। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि प्राणिजन्य औषध शरीरमें शीघ्र मिल जाते हैं और उनका विपाक सरलतासे होता है। परंतु खनिजद्रव्य निरिन्द्रिय होनेसे विपाकमें कठिनाई होनेसे शीघ्र शरीरमें मिल नहीं सकते। ये द्रव्य किस प्रकार प्रयुक्त किये जानेसे शरीरके लिए उपकारक हो सकते हैं इस विषयमें प्राचीन और अर्वाचीन द्रव्यगुणविशारद अबतक एकमत नहीं हुए हैं।
३५० द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट । वीर्य (अध्याय पाँचवॉ)-शक्तिमात्रवाचक वीर्य (Potency ) शब्दका इस प्रकरणमें विचार नहीं किया जायगा । परंतु आयुर्वेदाचार्योद्वारा पारिभाषिक अर्थमें न्यवहत वीर्यका ही हम इस स्थल पर विचार करेंगे । आयुर्वेदके परिभाषित वीर्यका अर्थ क्या है ? द्विविध तथा अष्टविधवीर्यवादियोंकी युक्तियाँ पदनेके पश्चात् प्रभूतकार्यकारी गुण-प्रकृष्टशक्तिसपन्न गुण-ही वीर्य है यह मत मुझे ग्राह्य नहीं प्रतीत होता । मुझे बौद्ध द्रव्यगुणवेत्ता भदन्त नागार्जुनकी युक्तियाँ खीकार्य लगती हैं । औषधद्रव्योंमें ऐसी कौन शक्ति है जिसका उनके (औषधद्रव्योंके ) गुणों, रस, विपाक और प्रभावमें समावेश नहीं हो सकता 2 तथा, तुल्य गुण, रस, विपाक और प्रभाववाले द्रव्योंके औषधीय कर्मों( Pharmacological action )में भिन्नताका कारण क्या है ? वीर्यके अस्तित्वके विषयमें तो कोई शसा ही नहीं है मेरी नम्र बुद्धिके अनुसार वीर्यका अर्थ है औषधद्रव्योंमें स्थित विशिष्टगुणो. त्पादक तत्त्व (Active Principles), जिनका वर्णन ऊपर किया जा चुका है। द्रव्योका रासायनिक पृथक्करण (Chemical Analysis ) करनेके साधन जब आजके समान विपुल तथा सुलभ नहीं थे तब भी इनका अस्तिल तथा इनके औषधीय कर्मों का ज्ञान प्राचीन आयुर्वेदाचार्योको हो गया था और चिकित्सा औषध- द्रव्योंका उपयोग करते हुए उनके वीर्यको विशेषत ध्यानमें रखा जाता था यह गौरवास्पद बात है। भदन्त नागार्जुनने प्रचलित मतका-गुणोत्कर्षवादका-विरोध किया, पर कर्मलक्षण वीर्यका ज्ञान उन्हें भी नहीं हुआ। आजकल औषधद्रव्योमेसे इन तत्त्वोंको पृथक् करके इनकी परीक्षा की जाती है। यहाँ प्रश्न यह होता है कि इस वीर्य और द्रव्यका सबन्ध क्या है ? इसका उत्तर यह है कि जैसे गुण, रस, विपाक, प्रभाव आदि द्रव्याश्रित हैं वैसे यह वीर्य भी द्रव्याश्रित है। उदाहरणतया, अहिफेन हो तो ही मोर्फीन ( Morphine ) रह सकता है । किंवा, विपतिन्दुक---कुचला (Nuxvomica) के आश्रयसे इसका वीर्य स्ट्रिक्नाइन (Sthychnine) रह सकता है। अन्य शब्दोंमें कहें तो आधुनिक विज्ञानवादियोंके मतसे द्रव्य और वीर्य-गुणकारक तत्त्वों के मध्य आधाराधेयभाव सबन्ध है। द्रव्यके विना वीर्यका अस्तित्व सभव नहीं १ कितनेक द्रव्योंमें तुल्य रस-गुण होते हुए भी कौमें भिन्नता पायी जाती थी। यह कर्मभेद गुणोत्कर्षके कारण हो तो इस गुणोत्कर्षका कारण क्या है ? ( देखिये पृ २६७)। वीर्य कर्मलक्षण होता है यह कहनेपर भी वीर्य अचिन्त्य ही रहता है । 'अस्य कर्मविशेषस्य दर्शनादेतस्साद् रसगुणाख्यात् कारणमन्यद्विद्यते । अस्य विशेषस्य साधक तद् वीर्यमिति जानीम' इति (भा० ) ये शब्द मेरे इस मतकी पुष्टि करते हैं कि इस मेदका जो साधक हो उसे 'वीर्य' कहते हैं । अर्थात् आधुनिक विज्ञानके 'एक्टिव प्रिंसिपल्स' (Active Princlples) की विद्यमानताके कारण ही तुल्य रस-गुणवाले द्रव्योंमें कर्मभेद एव गुणोत्कर्ष पाया जाता है । द्रव्य वीर्यरहित अर्थात् सामान्य गुणवाले भी हो सकते हैं । मैं 'प्रवल माठ गुण ही वीर्य हैं' इस लक्षणको बदलना नही चाहता । मैं तो केवल कारण बताता हूँ।
- । - मायुर्वेदिक तथा आधुनिक द्रव्यगुणविज्ञानपर तुलनात्मक विचार और द्रव्यके गुणोंका अर्थ है वीर्ययुक्त द्रव्यके गुण । अव आयुर्वेदाचार्योद्वारा निश्चित की गयी व्यवस्थाके अनुसार वीर्यकी परीक्षा करते हैं ।--'वीर्य यावदधीवासान्निपाताचोप- लभ्यते'।-निपात अर्थात् वीर्ययुक्त द्रव्य और जिहा नासिका आदिका संयोग होते ही वीर्यके अस्तित्व की प्रतीति होती है । परंतु जव इस प्रकारसे वीर्यकी उपलब्धि न हो सके तो शरीरमें वीर्ययुक्त द्रव्य जबतक रहे तब तक शरीरपर होनेवाली वीर्यकी फ्रियाद्वारा उसके वीर्य के अस्तित्वका अनुमान किया जा सकता है। परीक्षाकी इस व्यव- स्थाके अनुमार मी आधुनिक विज्ञानवादियोंके गुणकारक तत्त्व मुझे प्राचीन आचार्योंके वीर्य ही प्रतीत होते हैं । वीर्य चिन्त्य भी हो सकता है और अचिन्त्य भी । भदन्त नागार्जुन तथा अन्य महान् आयुर्वेदाचार्योंके मतसे वीर्य विविध प्रकारके है । आधुनिक विज्ञान भी वीर्य अनेक प्रकारके मानता है । देश, ऋतु, भूमि इत्यादिकी किया द्रव्योंपर अर्थात् उसमें स्थित वीर्यपर-गुणोत्पादक तत्त्वोंपर होती है, यह पात सब तज्ज्ञ स्वीकारते है। यदि इस वीर्यका नाश हो जाय अथवा औषधद्रव्योंमें इसका प्रमाण न्यून हो जाय तो औपध हीनवीर्य या निवार्य हो जाते हैं । आयुर्वेदा- चार्योने वानस्पतिक औषधोंके जो-जो अ-मूल, खक् , पत्र आदि-चिकित्सोपयोगी निश्चित किये है उन उन में विज्ञानवादियोंने एक न एक गुणकारी तत्त्वका अस्तित्व सिद्ध किया है, जैसे त्रिमूल, अर्जुनलक् , इन्द्रयव इत्यादि । कई वार औषधद्रव्यके गुण-धर्म उसके वीर्यसे भिन्न होते हैं और कभी समान होते है । कभी एक ही द्रव्यमें अनेक वीर्य होते हैं, इत्यादि । आशय यह कि द्रव्यके कर्मके कारणोंकी मीमासामे गुणोत्कर्षको वीर्य मानने की अपेक्षया इन औषधद्रव्योंमें विद्यमान अमुक विशिष्ट अशको वीर्य माननेकी आजकलके विज्ञानवादियोंकी प्रवृत्ति है। वानस्पतिक द्रव्योंको छोड़कर प्राणिजन्य तथा खनिजद्रव्योंका विचार करें तो मुक्ता, प्रवाल, ताम्र, सुवर्ण, लोह आदिके औषधीय गुणोंके वर्णनमें भी शीतवीर्य, उष्णवीर्य आदि शब्द पाये जाते हैं। यहाँ वीर्यका अर्थ क्या किया जाय यह प्रश्न स्वभावत. उपस्थित होता है । आयुर्वेदिक चिकित्सापद्धति शुद्ध रासायनिक द्रव्योंकी अपेक्षया मिश्र रासायनिक द्रव्य अधिक प्रमाणमें व्यवहृत होते है । भस्मोंके निर्माणमें सेन्द्रिय तथा निरिन्द्रिय द्रव्य (01- ganic and inorganic substances ) एकत्र मिल जाते हैं। इस प्रकार इनके निश्चित रासायनिक सूत्र ( Chemical formule) नहीं बताये जा सकते । परंतु सामान्यत. कह सकते हैं कि इन भोमसे भी अमुक अश-अणु या परमाणु- शरीरमें प्रविष्ट होकर अपने औषधीय गुण प्रदर्शित करते हैं । आधुनिक रसायनशास्त्र कहता है और परीक्षणद्वारा सिद्ध करता है कि शरीरके बाहर और शरीरके अदर होनेवाले रासायनिक परिवर्तनोंमें अमुक मौलिक ( Radioles) खास भाग लेते हैं। ये मौलिक अमुक परमाणुओंके विशिष्ट व्यूह हैं । इसी विचारसरणिका अनुसरण करता हुआ मै । । - ३५२ । द्रव्यगुणविज्ञान पूर्वार्ध, परिशिष्ट २ । समझता हूँ कि मुक्ताभस्मके शीत वीर्य अथवा ताम्रके उष्ण वीर्यका अर्थ है इन भस्मोंमेंसे पृथक् होनेवाला अमुक परमाणुपुञ्ज जो शारीरिक कोपोंपर अपनी विशिष्ट क्रिया प्रदर्शित करता है । आशा है विद्वजन इस प्रश्नपर विशेष विचार करेंगे। प्रभाव ( Specific Action)-जैसा कि ऊपर कह आए हैं, जब औषधके कर्मका कोई भी समाधान कार्यकारणभावके नियमद्वारा न हो सके तो प्रभावके द्वारा किया जाता है। और सव औषधकर्मों का समाधान मनुष्यकी बुद्धि अव तक नहीं कर सकी है। परन्तु एक बात स्मरण रखनी चाहिए। आधुनिक विज्ञान प्रभावको समझनेका दिनप्रतिदिन प्रयास कर रहा है। प्रभावको अचिन्त्य माननेसे वह इनकार करता है। रस, विपाक, वीर्य और प्रभाव समान बलवाले हों वहाँ (पृ. २३२) वीर्य और प्रभावके बलको अधिक बतानेवाला सिद्धान्त आजके विज्ञानके अनुकूल है। उपसंहार इस सक्षिप्त निबन्धमें आरम्भमें दी प्रतिज्ञाके अनुसार पूर्व और पश्चिमके द्रव्यगुण- विज्ञानसबन्धी विचार मैने प्रस्तुत किए और जिस प्रजाका बालक होनेका मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है उस प्रजाने मनुष्यजातिके हितके लिए जो चिन्तन मनन किया है उसका सार यहाँ दिया है। यह तैयार करने में मुझे प्रेरित करनेवाले पूज्य श्रीयुत यादवजी निकमजी आचार्यका मैं अत्यन्त ऋणी हूँ । इसमे प्रतिपादित किये हुए विचारोंकी चर्चा में उत्साहपूर्वक भाग लेनेवाले अपने सहकारी श्रीयुत डॉ. भास्कर गोविन्द घाणेकर, श्रीपण्डित दामोदर गौड, श्रीपण्डित यदुनन्दन उपाध्याय, श्रीपण्डित शिवदत्त शुक्ल तथा श्रीपण्डित राजेश्वरदत्त शास्त्री आदिका भी में सप्रेम आभार मानता हूँ। अपना अन्तिम मनोरथ महाकवि कालिदासके शब्दोंमें व्यक्त करता हूँ- आपरितोषाद् विदुषा न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् । बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत ॥ हिन्दु विश्वविद्यालय बनारस भ्रातृद्वितीया वि. स. २००० स} बालकृष्ण अमरजी पाठक
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