University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya

संस्कृत शिक्षा प्रथमो भागः

Bhattaachaary Shaaradaa Prasaad · 2006/03/24

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SANSKRIT READER
Part 1
COMPILEC
OR
संस्कृतशिक्षा
CHECKED 197
(व्याकरणोपेत
BY
PANDIT SARADA PRASAD BHUTTACHARYA
पुस्तकालय
पहल कांगरी
PUBLISHED BY
RAM NARAIN LAL
PUBLISHER AND BOOKSELLER
1929
3rd Edition)
[Five Annas.

Privted by RAMZAN ALI Suau at the National Prese, Allahabad.
1st Edition 1921. 2nd Edition 1928.
3rd Edition 1929.

PREFACE.
WITH
the view that Sanskrit may be learnt as
easily as possible, this Sanskrit Reader Part I or
Sanskrit Siksha is written. As it is impossible to
learn Sanskrit without Grammar, rules of Grammar
and examples are shewn and explained in the lessons.
Besides, euphonic combination of letters ( Sandhi )
and declension of bases ( Shabdarupa ) are attached
to the book for the facility of young learners.
KATRA ROAD, ALLAHABAD:
S.P.BHUTTACHARYA.
15th November, 1921.

SANSKRIT READER PARTI
संस्कृतशिक्षा
प्रथमो भागः
स्वरवर्णाः
அ
आ
ho
ई
a.
ऊ
. ऋ
ऋ
ल्ट
ल्लू
ए
R
ओ औ

२ संस्कृतशिक्षा व्यञ्जनवर्णाः क ख ग घ ह च छ भ ज ज ड ट ho ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व

प्रथमो भागः
३
श
स
ner
क का कि की कु कू
के कै को कौ
क्य
कू
ल क क्त
क्म
क्त
कं
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०

संस्कृतशिक्षा
सः गच्छति He is going-वह जा रहा है।
तौ
गच्छतः-They two are going-वे दोनों जा रहे हैं।
ते गच्छन्ति-They are going-वे जा रहे हैं ।
त्वम् गच्छसि-You are going-तुम जा रहे हो ।
युवाम् गच्छथः-You two are going-तुम दोनों जारहे हो।
यूयम् गच्छथ-You are going-तुम (सब) जा रहे हो।
अहम् गच्छामि-I am going-मैं जा रहा हूँ।
श्रावाम् गच्छावः-We two are going-हम दोनों जा रहे हैं।
वयम् गच्छामः We are going-हम सब जा रहे हैं। (बहु०)
सः अगच्छत् He went-वह गया।
तौ
अगच्छताम्-They two went-वे दोनों गये ।
ते अगच्छन्-They went-वे सब गये (बहुवचन)।
खम् अगच्छः -You went-तुम गये ।
युवाम् अगच्छतम्-You two went-तुम दोनों गये।
यूयम् अगच्छत-You went-तुम सब लोग गये।
अहम् अगच्छम्-I went-में गया।
आवाम् अगच्छाव-We two went-हम दोनों गये।
घयम् अगच्छाम-We went-हम सब लोग गये।
सः गच्छेत्-He should go-उसे जाना चाहिए ।

प्रथमो भागः
५
तो गच्छेताम्-They two should go-उन दोनों को
जाना चाहिये।
ते गच्छेयुः-They should go-उन सब को जाना
चाहिये।
त्वम् गच्छ:-You should go-तुझे जाना चाहिये ।
युवाम् गच्छेतम्--You two should go-तुम दोनों को
जाना चाहिये।
यूयम् गच्छेत-You should go-तुम सब को जाना
चाहिये।
अहम् गच्छेयम्-I should go-मुझे जाना चाहिये।
श्रावाम् गच्छेव-We two should go-हम दोनों को जाना
चाहिये।
वयम् गच्छेस-We should go-हम सब को जाना
चाहिये।
'सः गच्छतु-Let him go-उसे जाने दो।
तौ गच्छताम्-Let two of them go--उन दोनों को
जाने दो।
ते गच्छन्तु-Let them go-उन सबों को जाने दो
(बहुवचन)।
त्वम् गच्छ-You go (Singular)-तुम जानो (एक
धवन)।
युधाम् गच्छतम्-You two go-तुम दोनों जायो ।
यूयम् गच्छ-You go (Plural)-तुम सब जानो।

संस्कृतशिक्षा " अहम् गच्छानि-Let me go-मुझे जाने दो। भावाम् गच्छाव-Let two of us go-हम दोनों को जाने दो। षयम् गच्छाम-Let us go-हम सब को जाने दो। सः गमिष्यति-He will go-वह जायगा। तौ गमिष्यतः-They two will go-वे दोनों जायेंगे। ते गमिष्यन्ति-They will go-वे सब जायेंगे (बहु वचन)। त्वम् गमिष्यसि-You will go-तुम जानोगे (एक वचन। युवाम् गमिष्यथ:-You two will go-तुम दोनों जाओगे। यूयम् गमिष्यथ-You will go-तुम सब जानोगे (बहु०)। अहम् गमिष्यामि-I shall go-मैं जाऊँगा। आवाम् गमिष्यावः-We two shall go-हम दोनों जायेंगे। घयम् गमिष्यामः -We shall go-हम सब जायेंगे। उल्लिखित दृष्टान्तों से यह विदित होता है कि क्रिया के तीन पुरुष होते हैं। सः, तौ, ते-ये तीनों रूप प्रथम पुरुष ((Third person) कर्ता के हैं। त्वम्, युवाम्, यूयम्-ये तीनों मध्यम पुरुष (Second person ) कर्ता के रूप हैं। अहम् भाषाम् , वयम्-ये तीनों उत्तम पुरुष (First person) कर्ता के रूप हैं अहम्, प्राषाम् षयम् (अस्मद् शब्द) तथा त्वम्, युवाम्, यूयम् (युष्मद् शब्द को ) छोड़ कर शेष समस्त शब्द ही प्रथम पुरुष- प्रथमो भागः 3B पाची हैं। यथा-सः तौ ते (तद् शब्द), राम, हरि, नर, गज, देव इत्यादि सभी शब्द प्रथम पुरुष के हैं। प्रत्येक पुरुष में तीन तीन वचन होते हैं। एकवचन-Singular, द्विवचन-Dual तथा बहुवचन-Plural-उक्त तीनों पुरुष ही समस्त काल में क्रिया के कर्ता होते हैं और प्रत्येक पुरुष के तीन तीन वचन होते हैं । अतएव ये ही नौ प्रकार के पद समस्त क्रियाओं के कर्ता हुश्रा करते हैं। अर्थात्-सः, तौ, ते ; प्रथम पुरुष के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन के कर्ता होते हैं; त्वम्, युवाम् यूयम्: मध्यम पुरुष के एकवचन, द्विवचन, बहुवचन के कर्ता होते हैं तथा अहम्, प्राधाम्, वयम्, क्रिया के उत्तम पुरुष के एकवचन, द्विवचन, और बहुवचन के कर्ता होते हैं। प्रत्येक किया के साधारणतः तीन काल होते हैं : -वर्तमान, अतीत (भूत) और भविष्यत् । इनके अतिरिक्त अनुज्ञा ( आज्ञा ) प्रतीत होने पर अनुज्ञा ( Imperative mood ) तथा औचित्य अथवा विधि का तात्पर्य होने पर विधि लिङ् ( Potential mood ) का प्रयोग होता है ।* इस पुस्तक में उक्त पाँच काल की क्रियाएं ही प्रदर्शित हुई हैं। सब धातुओं में ही उल्लिखित प्रकार से प्रत्येक काल के नौ नौ पद हुआ करते हैं। अर्थात् प्रथम पुरुष के एकवचन, द्विवचन, बहुवचन, मध्यम पुरुष के एकवचन, द्विषचन, बहुषचन तथा उत्तम पुरुष के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन ये नौ पद होते हैं। और हर एक धातु में दो पद होते हैं। एक तो परस्मैपद दूसरा आत्मनेपद । परस्मैपद पहले हो चुका है, प्रात्मनेपद भी लिखा जाता है। - , इनके अतिरिक्त क्रिया के और और काल भी हैं, वे सब व्याकरणादि में पीछे देखने चाहिये।

संस्कृतशिक्षा - C The following verbs are conjugated alike : - निम्न लिखित धातुओं के रूप समान होते हैं :- हस-to laugh-हँसना । वद्-to speak (say)--बोलना, कहना । दृश (पश्य )-to see देखना । क्रन्द्-to cry रोना । स्पृश---to touch छूना । भ्रम्-to roam (walk) घूमना, भटकना । त्यज-to give up-छोड़ना । पत् -to fall गिरना। पठ-to read पढ़ना । भू ( भव )-to be or exist--होना । तप-tor shine चमकना । ज्वल-to burn जलना । दह-~-to burn जलाना । खाद्- to eat खाना! भज्-to divide or worship भाग देना, पूजना। गज्ज -to roar गरजना। वह-ty flow-~~-बहना । क्रीड्-to play-खेलना । स्था-to stay ठहरना । प्रच्छ ( पृच्छ्) to ask पूछना। पा (पिब्)-to drink पीना । इष् ( इच्छ् ) to wish चाहना । गै (गाय)--to sing गाना । नी (नय)-to lead ले जाना । ( धर् ) to hold पकड़ना । निन्द् to blame निन्दा करना । पचto cook - पकाना । रक्ष to protect-बचाना । वस -to dwell रहना । वह-to carry ढोना । शुच् (शोच ) to lament सोच करना । हृ ( हर ) to steal-धोराना ४ उदाहरण- स हसति-He laughs वह हँसता है। स्वं हससि-you are -laughing तुम हँस रहे हो वा हँसते हो। अहं हसामि-I laugh मैं हँसता हूँ। अहं सामि-I dwell मैं रहता हूँ। स पचति-He cooks वह पकाता है। सूर्यास्तपति-The sun shines सूर्य चमकता है । स्वम अभ्रमः-You walked तुम घूमे । अहम् अक्रन्दम्- I cried-मैं रोया। सेोऽपतत् He fell वह गिरा। त्वं धर-You catch hold- तुम पकड़ो । सः न निन्देत्-He should not blame---उसे निन्दा न करनी चाहिये । अहं न निन्देयम्--I should not blame-मुझे निन्दा न करनी चाहिये । -

प्रथमा भागः
8
आत्मनेपदम्
वर्तमान काल-Present tense
सः भाषते-He is speaking-वह कहता या बोलता है।
तौ भाषेते --They two are speaking-वे दोनों बोल
रहे हैं।
ते भाषन्ते --They are speaking-वे सब बोलते हैं-
बोल रहे हैं।
स्वम् भाषसे-You are speaking-तुम बोल रहे हो।
युवाम् भाषेथे-You two are speaking-तुम दोनों
बोलते हो।
यूयम्
भाषध्वे-You are speaking-तुम सब लोग बोल
रहे हो।
अहम् भाषे-I am speaking-मैं बोल रहा हूँ।
आवाम् भाषावहे-We two are speaking-हम दोनों
बोले रहे हैं।
वयम् भाषामहे-We are speaking हम सब बोल रहे हैं।
भूत व अतीत काल-Past tense
सः प्रभाषत-He spoke-वह बोला।
तौ प्रभाषेताम्-They two spoke-वे दोनों बोले ।
ते प्रभाषन्त-They spoke-वे सब बोले ।
त्वम् अभाषथा:-You spoke-तुम बोले ।
युवाम् अभाषेथाम्-You two spoke-तुम दोनों बोले।

संस्कृतशिक्षा
यूयम् प्रभाषध्वम्-You spoke-तुम सब बोले ।
अहम् प्रभाषे-I spoke मैं बोला।
भावाम् अभाषावहि-We two spoke-हम दोनों बोले।
वयम् अभाषामहि-We spoke हम सब बोले ।
fafafas-Potential mood
सः भाषेत-He should speak-उसे बोलना चाहिये।
तौ भाषेयाताम्-They two should speak-उन दोनों को
बोलना चाहिये।
ते भाषेरन्-They should speak-उन सबों को बोलना
चाहिये (बहुवचन)।
त्वम् भाषेथाः-You should speak-तुम्हें बोलना
चाहिये।
युवाम भाषेयाथाम्-You two should speak-तुम दोनों
को बोलना चाहिये।
यूयम् भाषेध्वम्-You should speak-तुम सबों को
बोलना चाहिये।
अहम् भाषेय-I should speak-मुझे बोलना चाहिये ।
श्रावाम् भाषेवहि-We two should speak-हम दोनों को
बोलना चाहिये।
वयम् भाषेमहि-We should speak-हम सबों को बोलना
चाहिये (बहुवचन)।

प्रथमो भागः
Imperative-श्राज्ञा
सः भाषताम् -Let him speak-उसे बोलने दो।
तौ भाषेताम्-Let two of them speak-उन दोनों को
बोलने दो।
ते भाषन्ताम्--Let them speak---उन सबों को बोलने दो
( बहुवचन)।
त्वम् भाषस्व-You speak (Singular)-तुम बालो (एक
वचन)।
युवाम् भाषेथाम्-You two speak-तुम दोनो बोला।
यूयम् भाषध्वम्-You speak(Plural)-तुम सब बोलो।
अहम् भाषै-Let me speak-मुझे बोलने दो।
श्राधाम् भाषावहै-Let two of us speak-हम दोनों
को बोलने दो।
घयम् भाषामहै-Let us speak-हम सबों को बोलने दो
(बहुवचन)।
भविष्यत् काल-Future tense
सः भाषिष्यते-He will speak-वह बोलेगा।
तौ भाषिष्येते-They two will speak-वे दोनों बोलेंगे।
ते भाषिष्यन्ते-They will speak-वे सब बोलेंगे।
त्वम् भाषिष्यसे--You will speak-तुम बोलोगे।
युषाम् भाषिष्येथे-You two will speak-तुम दोनों
बोलोगे।

१२ संस्कृतशिक्षा लिई - - Tq urfacraat-You will speak-( Plural )--TH सब बोलोगे। अहम् भाषिष्ये-I shall speak-मैं बोलूंगा। प्रावाम् भाषिष्यावहे-We two shall speak-हम दोनों बालेंगे। प्रयम् भाषिष्यामहे-We shall speak-हम सब बोलेंगे। The following verbs are conjugated alike: - निम्न लिखित धातुओं के रूप समान होते हैं ई-to look at देखना । चम्-to forgive माफ़ करना । ग्रस्- to eat खाना (swallow)। चेष्ट-to try कोशिश करना । त्रै-to protect रक्षा करना । स्वर-to hasten जल्दी करना । पुत्-to shine चमकना । प्याय-to increase बढ़ना । बाध्-to thwart or to oppress रोकना । भिक्ष-to .beg भीख माँगना । मुद्-to rejoice प्रसन्न होना । यज-to sacrifice (उभयपदी) पूजा करना । यत्-to try जतन करना । याच-to beg भीख माँगना । रंभ-20 begin शुरू करना । रम-to sport खेलना । लभ-to get पाना। लज्-to be ashamed शरमाना । लोक-to see देखना । वन्दto adore नमस्कार करना । वृध-to grow बढ़ना। बेप--to tremble हिलना । शङ्क-to be afraid डरना । शिक्ष-to learn सीखना । सह---to suffer सहना । हृ-to steal (उभयपदी) चोराना। उदाहरण- स लभते -He gains वह पाता है। अहं समे-I forgive मैं क्षमा करता हूँ। स्वम् अधेष्ठथा:-You tried तुमने कोशिश की थी। The king protects-राजा रक्षति-राजा रक्षा करता है । स त्वरेत- - -

प्रथमो भागः
OM
He should hasten उसको जल्दी करना चाहिये । स अभिवत-He
begged उसने भीख माँगी। अहम् अमादे-[ rejoiced मैं प्रसन्न
हुप्रा । स्वम् यतेथाः-You should try तुमको जतन करना चाहिये।
अहं लज्जे-I am asharmed मैं लजाता हूँ। अहं वन्दे-I adore
मैं प्रणाम करता। वृद्धो वेपते-The old man trembles बुढा
• कॉपता है। स शङ्कते-He is afraid वह डरता है। अहं शिते-
I learn मैं सीखता हूँ। तो अहरेताम्-They two stole उन दोनों
ने चोरी की।
.
प्रथमः पाठः
अश्वो धावति । रविरुदेति । फलं पतति । बालकः कन्दति ।
शिशुहसति । अग्निवलति । गायको गायति । अहं पठामि । युवां
गच्छथः । वयं पश्यामः । यूयम् उपविशत । बालकाः अधापन् ।
'रामोऽहसत् । । यूयम् न क्रीडत । राजा रक्षतु । ब्राह्मणः पचेत् ।
त्वमपतः । हरिभ्रमति । श्रावां तिष्ठाघः । ते अक्रन्दन् ।
Supply appropriate nominatives to the following
verbs:-
निम्नलिखित क्रियात्रों में ठीक ठीक कर्ता जोड़ो:-
अपतम्, प्रहसम्, अहरम्, अशोचः, अपच:, अनिन्दः, अतिष्ठत्
अपिबत्, अधरत्, हसामि, हस, अहसः, अगायः, अभवत्, अभ्रमम्, पठेत्,
रक्षः, पश्यामि, पश्येत् ।
विशेषणम्
In Sanskrit the adjective follows the noun in
gender, number and case : -संस्कृत में विशेषण के लिङ्ग,
वचन और कारक विशेष्य के अनुसार ही होते हैं।
सं०शि० प्र०-२
.
--

१४ संस्कृतशिक्षा नीलं कमलम्-The blue lotus-नीला कमल । नीला गौ:--The blue cow-नीली गो। नीलः प्राकाशः-The blue sky-नीला श्राकाश । लोहितं कुसुमम् - The red flower-लाल फूल । लोहिता जवा--The red Jaba-लाल जवा । लोहितः मेघः-The red cloud-लाल बादल । शुभ्रम् वस्त्रम्-The white cloth-सफेद कपड़ा। शुभ्रा मल्लिका-The white jasmine-सफेद चमेली। शुभ्रः विहगः-The white bird-सफेद चिड़िया । सुन्दराः शिशवः-The beautiful children-eret बालका सुन्दर्य्यः बालिकाः-The beautiful girls--सुन्दर लड़कियाँ। सुन्दराणि नक्षत्राणि-The beautiful stars-सुन्दर तारे । क्षुधिताय ब्राह्मणाय-To a hungry Brahman-भूखे ब्राह्मण को। तुधितायै विधवायै-To a hungry widow-भूखी विधवा 26/my को। क्षुधितेभ्यः अपत्येभ्यः--To hungry sons-भूखे पुत्रों को। उल्लिखित उदाहरणों से विदित होता है कि, यहाँ पर समस्त शब्द प्रायः दो भागों में विभक्त हैं। जिस शब्द द्वारा किसी वस्तु. अथवा व्यक्ति का बोध होता है, उसे विशेष्य पद कहते हैं-यथा, कमलम्, गौः, आकाशः, वस्त्रम्, पुस्तकम्, बालकः इत्यादि । जो विशेष्य के गुण तथा अवस्था का प्रकाश करता है, उसे विशेषण कहते हैं । यथा-नीलं (कमलम् ), नीला (गौः); नीलः (श्राकाशः) प्रथमो भागः शुभ्रम् (वस्त्रम् ), उत्तम (पुस्तकम्), सुन्दरः (बालकः ) इत्यादि। विशेषण पद प्रायः विशेष्य के पूर्व ही प्रादेश होता है । विशेष्य शब्द का जो लिङ्ग, होता है विशेषण शब्द का भी वही लिङ्ग होता है। नील कमलम्, नीला गौः, नीलःप्राकाशः। इसी प्रकार विशेष्य प्रद की जो विभक्ति तथा जो पचन होता है, विशेषण पद की भी वही विभक्ति तथा पचन होता है। यथा-तुधिताय ब्राह्मणाय तुधितेभ्यः अपत्येभ्यः इत्यादि हो रूप होते हैं । एकश्चन्द्रः-The single moon-एक चन्द्र । द्वौ पतौ- The two fortnights-दोनों पक्ष । त्रीणि नेत्राणि-The three eyes-तीनों नेत्र । चत्वारो वेदाः-The four Vedas-चारों वेद । पञ्च बाणाः-The five arrows-पांचा बाण । षड् ऋतवः-The six seasons-छहों ऋतु । सप्त समुद्राः- The seven seas-सातों समुद्र । अष्टौ (अष्ट) घसपः-The eight Vasus-पाठों वसु । नव ग्रहा:--The nine planets- नौ ग्रह । दश दिशः-The ten points--दशों दिशा । Select appropriate nouns with each of the following adjectives :- निम्न लिखित विशेषणों के विशेष्य चुनोः- धाम्मिका, बुद्धिमती, पुण्यवान्, स्नेहमयी, पीतः, पीतम्, प्रियः, प्रिया, सुलभः, दुर्लभा, हितः, वेगवान्, वेगवती, नूतनः, पुरातनम्, विमलम्, विशुद्धः, दरिद्रा, धनवान्, एकः, एका, एकम्, अयः, तिस्रः, त्रीणि, चत्वारः and दश । - - . द्वितीयः पाठः एष पुत्रः, एषा कन्या, एतत् पुस्तकम्, तत् दिनम्, तानि मित्राणि, सा धेनुः, यत् दानम्, यः सहायः, या विद्या, इदमन्नम्,

संस्कृतशिक्षा
.
इमा प्रापः, इमे पशवः, अयम् कृष्णः, असौ गुरुः, अमी शिशवः,
अदः सरोरुहम्, षट् रिपषः, सप्त वाराः, द्वादश मासाः, चत्वारो
युगाः, बृहत् अभिधानम्, महान् तरुः, महती मतिः, महत् कुलम्,
विद्वान् पुत्रः, विदुषी कन्या, विद्वत् मित्रम्, मधुरः उपदेशः, मधुरं
पयः, जीर्णानि पासांसि, उदाराणि चरितानि, कनीयान् भ्राता,
शून्याः दिशः, विपुलं धनम्, गुणहीनः जनः, श्रेष्ठा गतिः, द्वितीया
कन्या, चतुर्थी तिथिः, मृन्मयी प्रतिमा, मृन्मयः घटः, मृन्मयं
पात्रम्।
Supply appropriate nouns or adjectives, as the
case may be, to the following words :--- -निम्न लिखित
शब्दों में विशेष्य अथवा विशेषण जोड़ो:-
विद्वान्, सती, हिरण्यमयः, व्याघ्रः, छात्रः, फलानि, आकाशम्,
सलिलम्, बुद्धिः, शान्ता, एकादशी, कनीयसी, ज्येष्ठा, शिशवः,
पशवः, जन्तवः, बन्धवः, हितकारी, शुभा, विशालः, पुण्यवान्,
धाम्मिकः, वश्यः and सत्यवादी ।
,
-
लट्-Present tense-वर्तमान.काल ।
रविस्तपति-The sun shines-सूर्य चमकता है।
नरस्य हस्तौ भवतः-Man has two hands-मनुष्य के
दो हाथ होते हैं।
वृत्ताः श्यामला भवन्ति-Trees are green-वृक्ष हरे
होते हैं।
बालकाः कलरवमिच्छन्ति -Boys love noise लड़कों को
शोर पसन्द होता है।
अहं गीतं शृणोमि-I hear a song-मैं गीत सुनता हूँ।
हूँ

प्रथमो भागः ईश्वरोऽस्मान् रक्षति-God saves us-ईश्वर हमारी रक्षा करता है। स पाठान् शिक्षते-He learns his lessons-वह अपना पाठ पढ़ता है। तृतीयः पाठः (परस्मैपदम्) (आत्मनेपदम् ) विद्या ददाति विनयम् विद्याहीना न शोभन्ते लेोभात् क्रोधः प्रभवति नाकाले म्रियते जन्तुः संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति मूर्खाः सदा विवदन्ते निःस्वो वष्टि शतम् वृद्धो दुःखशतं भुङ्क्त धम्मो रक्षति धामिकम् रामो धन्यानि भुङ्क्त राजा महीं भुनक्ति समुद्विजे भवद्धतोः कंसादहमधीरधीः Render into English and Hindi-अंग्रेज़ी और हिन्दी में अनुवाद करोः- अन्नं नः प्रधानं खाद्यं भवति । मम पादुके तुरे भवतः। मिथ्या-कथनं पापं भवति (To lie is an sin)। माारा मत्स्यप्रिया भवन्ति (Cats are fond of fish) मृगस्य शृङ्गे भवतः। राम उत्तमो बालको भवति । अश्वस्य चत्वारः पादा भवन्ति । शिक्षको मह्यं क्रुध्यति । Turn into Sanskrit-संस्कृत में अनुवाद करो:- I am a poor boy. Ram is Ram is a rich man. It is inorning. Hari goes to school every day. The cow is a mild animal. I have no cloth.

संस्कृतशिक्षा
लोट-Imperative mood-श्राज्ञा
शय्यायां शेष्व-Go to bed-सोने जाश्रो।
ममान्तिके उपविश-Sit by: me-मेरे पास बैठो।
दुग्धं पिब-Drink the milk-दूध पियो ।
मम वस्त्रमानय-Bring my cloth-मेरे कपड़े लायो।
तस्मै अन्नं देहि Give him some food-उसे अन्न दो।
सोऽत्र प्रागच्छतु-Let him come here-उसे यहाँ
श्राने दो।
चतुर्थः पाठः
(परस्मैपदम् )
(श्रात्मनेपदम्)
दाता शतं जीवतु
विजयतामस्माकं सम्राट
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य
गुरुषु विनयेन वर्तताम्
महाराज ! नमोऽस्तु ते
अन्नं प्रवर्द्धतां नित्यम्
नय मामपि काननम्
छात्रा नित्यमधीयताम्
प्रभो ! दृष्टिप्रसादं कुरु
न दत्स्व धनिने धनम्
शृणु मेऽवहितो वचः
ईश्वरे मन प्राधत्स्व
Render into English and Hindi-अंग्रेज़ी और
हिन्दी में अनुवाद करोः-
चौरंधर । स्वरां कुरु । वृथा समयं न यापय । मम पुस्तकं देहि ।
मम गृहमागच्छ। मित्काय अन्नं प्रयच्छ । मम क्रीडनकमानय ।

प्रथमो भागः ૧૨ परेषामुपकारं कुरु । शिक्षकस्य उपदेशं शृणु । प्रातपतापे न धाव । स गृहं गच्छतु । अहङ्क्तो मा भव । Turn into Sanskrit-संस्कृत में अनुवाद करोः- । Let him come home. Do what I say. Do not play always. Obey your teachers. Drink the water. Be a good boy. लङ्--Past tense-भूतकाल ईश्वरः सर्ववस्तूनि असृजत्-God made all things- ईश्वर ने सब चीज़ों को बनाया। वसुदेवस्य अष्ट पुत्रा अभवन्-Vasudeva had eight sons -वसुदेव के पाठ पुत्र थे । शिशुवृथा अक्रन्दत्-The child cried in vain-बच्चा व्यर्थ राया। अहमिदमकरधम्-I did it-उसे मैंने किया। बालकः कूपे अपतत्-The boy fell into the well- लड़का कुएँ में गिर पड़ा। अहं तं नापश्यम्-I did not see him-मैंने उसे नहीं देखा पञ्चमः पाठः (परस्मैपदम्) (धात्मनेपदम्) धृतराष्ट्रो जन्मान्ध प्रासीत् रामोऽयोध्यायामजायत परशुरामः पृथिवीं पञ्चाशत् का संग्रामेऽनियन्त निःक्षत्रियामकरोत् दैत्यः प्राणभयेन महेशमुपास्त २० संस्कृतशिक्षा पार्वती शिवं पतिमाप्तुमैच्छत् निर्मले नभसि शशी व्यराजत स्त्रियो लाजान् व्यकिरन् हरिबलिं वसुधामयाचत प्रह्लादो विष्णुमस्तवीत् रामरावणावयुध्येताम् राजा प्राचार्य वचनमब्रवीत् लोकविस्मयकारकम् Render into English and Hindi-अंग्रेज़ी और हिन्दी में अनुवाद करोः- हरिदयालुः प्रभुरासीत् । मार्जारो दुग्धमपिबत् । विद्यासागरो विद्याधानभवत् । स दयावानपि प्रासीत् । रजनी अन्धकारमयो अभवत् । बालिका उच्चैरहसत् । अहं पूर्ण चन्द्रमश्यम् । सबै लोकास्तमनिन्दन् । Turn into Sanskrit -संस्कृत में अनुवाद करो:- -- We saw the king. He did not hear my words. Two girls went there. Ram was a good boy. The child played all day long. The boy saw the moon. लिट्-Past tense-भूतकाल रघुः साहसिको राजा बभूव-Raghu was a brave king -रघु साहसी राजा थे। रामस्य दयालुः पिता बभूव-Ram had a kind father- राम के पिता दयालु थे। स भूमौ पपात-He fell down on the ground-वह पृथिवी पर गिर पड़ा। रामो वनं जगाम-Ram went to the forest--राम धन को चले गये।

messartanARMAurnal AirPAL .... प्रथमो भागः १. Kavi 70 २३,२७ स वन्यानि बुभुजे-He ate wild fruits-उसने जंगली फल खाये। कृष्णश्चाणुरं जघान-Krishna killed Chanur-कृष्ण ने चाणुर को मारा। षष्ठः पाठः ( परस्मैपदम् ) ( आत्मनेपदम् ) द्वितःसुतो बालपाठ्यानि पपाठ रेमे शरदि गोविन्दः वा वायुः सुखस्पर्शः रामः सीतामुपग्रेमे दैत्यः पपात च ममार च बुद्धस्तपस्तेपे सुदुःसहम् हरिभूधरं दधार राक्षसः सुमहत् वपुश्चके कुलीरको वकग्रीवां चकर्त नृपस्य चत्वारः सुता जज्ञिरे शुम्भो जगर्ज च ननत च महिषी राजीवलोचनां कन्यां सुषुवे Render into English and Hindi-अंग्रेज़ी और हिन्दी में अनुवाद करो:- पुरा दशरथो नाम राजा बभूव । तस्य चत्वारः पुत्रा बभूवुः । रामः ज्येष्ठः बभूव । स पितुर्वाक्यं शुश्राव । स पाठ्यानि सम्यक् पपाठ । स चुधिताय अन्नं ददौ । पिपासा य च सलिलं ददौ । Turn into Sanskrit-संस्कृत में अनुवाद करो:- He asked me my name. Ram told you every. thing. He drank my milk. Madhu fell down from the tree. The boys went home. Did you do this? पुस्तकालय - २२ संस्कृतशिक्षा farafas Potential mood राजा प्रजाः पालयेत्- The king should protect his subjects-राजा को प्रजा-पालन करना चाहिये। स इदं कुर्यात्---He should do it-उसे यह करना चाहिये। कदापि मिथ्या न वदेत्-One should never speak false words-झूठ कदापि न बोलना चाहिये। न कदापि विषदेत-One should never quarrel- भगड़ा कदापि न करना चाहिये। छात्रो गुरोरादेशं पालयेत्-The pupil should do what his teacher says-छात्र को गुरु की आज्ञा पालन करनी चाहिये। न परुषं भाषेतः-One should not speak rudely- कटुवचन न बोलना चाहिये। सप्तमः पाठः - ( परस्मैपदम्) सदा सत्यं ब्रयात् सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् क्रोधं यत्नेन परिहरेत् यावज्जीवं जडो दहेत् नेन्द्रियस्य वशमागच्छेत केनापि सह वैरं न कुर्यात् न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य (प्रात्मनेपदम् ) कायेन मनसा वाचा मातापितरौ सेवेत तीवेण भक्तियोगेन यजेत पुरुष परम् सहसा विदधीत न क्रियाम् वृत्यर्थ नातिचेष्टेत नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्

प्रथमो भागः
२३
-
Render into English and Hindi-अंग्रेज़ी और
हिन्दी में अनुवाद करो:-
घयं कर्त्तव्यं कुर्य्याम । त्वं सर्वदा सुकर्म कुर्य्याः। स पाठकाले
न हसेत् । अहं असतां सङ्गं त्यजेयम् । त्वमलसो न भवेः । बालकाः
श्रमिण भवेयुः । त्वं तत्र न गच्छेः । वयं तत्र न तिष्ठेम ।
Turn into Sanskrit-संस्कृत में अनुवाद करो :-
We should not be idle. You should go to school
every day. He should not
go
there. We should
not sed the sun. You should be kind to the poor.
He should not say this:
-
लंट्-Future tense-भविष्यत् काल
अहं गृहं गमिष्यामि-I shall go home-में घर जाऊँगा।
सोऽत्रागमिष्यति-He will come here-वह यहाँ श्रावेगा।
स मां रक्षिष्यति-He will save me-वह मुझे बचावेगा।
अहं चन्द्रं द्रक्ष्यामि-I shall see the moon-मैं चन्द्रमा
को देखूगा।
श्वः अवकाशदिनं भविष्यति-To-morrow will be a
holiday-कल छुट्टी होगी।
त्वं पितरौ सेविष्यसे-You will serve your parents--
तुम अपने माता-पिता की सेवा करोगे।

१ ITTE २४ पर + स्यापि :- पधासंस्कृतशिक्षा । १. ग्रेही लिहिंदी माध्यम अष्टमः पाठः र (परस्मैपदम्) (श्रात्मनेपदम् । अहं वक्ष्यामि ते हितम् करिष्ये वचनं तव अचिरेण शान्तिमुपैष्यसि वेदानहमध्येष्ये सदा गुरोर्वचनं श्रोष्यामि परोपकारायाहं यतिष्ये धर्मण सुखमवाप्स्यसि पुत्रो वा कन्या वा जनिष्यते तव अहमुपहास्यतां गमिष्यामि प्रावृषि सर्वाः सरितः पापी पापफलेन विनयति वर्द्धिष्यन्ते Render into English and Hindi-अंग्रेज़ी और हिन्दी में अनुवाद करो वयं गृहं गमिष्यामः । त्वं किं करिष्यसि ? अहं घिनयो भषि- ष्यामि । वयं तत्र न स्थास्यामः । तव पुत्रः सुखी भविष्यति । वयं तत् न करिष्यामः । अहं चन्द्रं द्रक्ष्यामि । ते पश्चात् द्रक्ष्यन्ति । Turn into Sanskrit-संस्कृत में अनुवाद करो:- I shall stay here. We shall see the moon. They will see me. I shall take your gift. You will ask your teacher. I shall tell you a tale. Will you eat rice ? उल्लिखित उदाहरणों से यह पता लगता है, कि क्रिया के भिन्न भिन्न काल होते हैं, उनमें से प्रधानतः, वर्तमान काल अथवा लट्, अनुज्ञा (प्राज्ञा ) अथवा लोट, अतीत (भूत) काल पा लङ् (लिट); विधि अर्थात् औचित्य अथवा विधिलिङ् तथा भवि- ष्यत् काल अथवा लट् हैं, इनके अतिरिक्त संस्कृत में अन्यान्य काल होते हैं । वर्तमान समय में जो क्रिया सम्पादित होती - प्रथमो भागः २५ अथवा हो रही हो उसे बताने के लिये लट वा वर्तमान काल का प्रयोग होता है। यथा-विद्या ददाति विनयम्-विद्या विनय को देती है ( Learning yields modesty )। मम बन्धुरा- गच्छति-मेरा मित्र प्राता है। ( My friend comes ) । अस्ति लङ्का नाम पुरी-लङ्का नामक एक नगर है। (There is a city (named Lanka) । इत्यादि लट् अथवा वर्तमान काल के उदाहरण हैं। अनुज्ञा अनुरोध, प्रार्थना, आशीर्वाद, इत्यादि का भाष व्यक्त करने के लिये प्राज्ञा अथवा लोट् का प्रयोग होता है। यथा-~-दाता शतं जीवतु-दाता दीर्घायु हो (May a charitable man live long)। एतत् कायं कुरु-इस कार्य को करो ( Do this work)। इह पागच्छ–यहाँ पायो (come here) इत्यादि । अतीत अथवा भूतकाल को समझाने के लिये धातु के लिये धातु के परे भूतकाल वा लङ् लिट के भी प्रत्यय प्रादेश किये। जाते हैं। यथा-कृष्णः कसमहन् (जघान)-कृष्ण ने कंस को मारा। ( Krishna killed Kansa ) । रामो नाम राजा अभवत् (बभूव )-राम नाम के राजा थे ( There was a king named Rama)। औचित्य के अर्थ में धातु के उत्तर विधिलिङ् होता है । यथा-सदा सत्यं ब्रूयात्-सदा सच बोलो- ( One should always speak the truth)। परस्य द्रव्यं न हरेः-तुम्हें दूसरे की वस्तु न लेना चाहिये ( You should not steal another's thing )। भविष्यत् के अर्थ में भविष्यत् काल का प्रयोग होता है । यथा-अहं वक्ष्यामि ते हितं- मैं तुम्हारे हित की ही कहूँगा । ( I shall speak what is of good to you)। सः तत्र गमिष्यति-वह वहाँ जायगा- ( He will go there )-इत्यादि । इनके अतिरिक्त उक्त उदाहरणों से यह भी प्रकट होता है कि प्रत्येक काल (लट् - -

२६
संस्कृतशिक्षा
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लोटादि ) दो भागों में विभक्त हैं। प्रत्येक में से प्रथम भाग
परस्मैपद तथा द्वितीय भाग श्रात्मनेपद है। जिस क्रिया का
फल दूसरे का उद्देश्य वाचक होता है उसमें परस्मैपद तथा जो
क्रिया का फल निजाद्देश्य में अभिप्रेत होता है, उसमें प्रात्मनेपद
का प्रयोग किया जाता है । यथा-अहं पक्ष्यामि ते हितम्-मैं
तुम्हारे हित की कहूँगा। अहं वक्ष्ये ते हितम्-स्वयं अपने उपकार
के लिये मैं तुम्हें हित की बात सुनाऊँगा।
करोतीति कर्ता
कर्तरि प्रथमा
[ कर्तृवाच्ये ]
चन्द्र उदेति-The moon rises-चन्द्रोदय होता है।
घायुर्वाति-The wind blows-हवा चलती है।
मेघ गर्जति-The cloud roars-बादल गर्जता है।
वृष्टिर्भवति-It rains-पानी बरसता है।
शिशुः क्रीडति-The child plays-बच्चा खेलता है।
बालिका हसति-The girl laughs-लड़की हसती है।
वृद्धो निद्राति-The old man sleeps-बुड्ढा सोता है।
चौरः पलायते-The thief hies-चोर भागता है।
अत्र उपविश-Sit here -यहाँ बैठो।
-न धाव-Do not run-दौड़ो मत ।
नवमः पाठः
प्रातर्भवति । सूर्य उदेति । विहगाः कुलायेषु मधुरं कूजन्ति ।
कानने धन्यजन्तवः, जले मत्स्यादयः, स्थले मनुष्याः, पशवः, कौटाः,

प्रथमो भागः २७ पतङ्गाश्च प्रबुध्यन्ते । प्रबुद्धाः सर्वे स्वे स्वे कर्मणि प्रवर्तन्ते । बालकाः पाठेषु अवहिता भवन्ति । धेनवः गोचरेषु व्रजन्ति । कृषकाः कर्षणाय क्षेत्रं गच्छन्ति । प्रभाते सर्व एव जाग्रति । केवलम् अल- साः, पेचकाः, निशाचराश्च प्रातर्निद्रितास्तिष्ठन्ति । कियते यत् तत् कर्म; कर्मणि द्वितीया [ कर्तृ वाच्ये ] बालको ग्रन्थं पठति-The boy reads his book-~-बालक पुस्तक पढ़ता है। अहं चन्द्रं पश्यामि-I see the देखता हूँ। सदा सत्यं ब्रूहि-Always speak the truth-सदा सच moon -मैं चन्द्रमा बोलो। पुत्रः पितरं प्रणमति-The son bows down to his father--पुत्र पिता को प्रणाम करता है । राजा प्रजाः पालयति-The king governs his people- राजा प्रजापालन करता है। स गृहमागच्छति-He comes to his house-वह घर पाता है। शिष्या गुरुं पृच्छति-The student asks his teacher- शिष्य गुरु से पूछता है। मार्जारी दुग्धं पिबति-The cat drinks the milk-. बिल्ली दूध पीती है।

२८ संस्कृतशिक्षा दशमः पाठः , ईश्वरो विश्वमसृजत् । स सूर्य, चन्द्र, नक्षत्राणि अकरोत् । स मानवान्, पशून्, पक्षिणः, सरीसृपान्, मत्स्यान् सर्वान् जन्तू. नरचत् । स स्थावरान् जङ्गमांश्च रचितवान् । सेोऽन्नं, जलं, मम सर्वाणि भाग्यवस्तूनि कृतवान् । असौ सर्वान् प्राणिनः पश्यति, तेषां सुखासुखं विद्धाति च । वयं तं नमामः ॥ साधकतमं करणम्--तत्र तृतीया गुरुदण्डेन ताडयति-The teacher beats with his stick-गुरु छड़ी से मारता है। रामो बाणेन रावणं जघान-Ram killed Ravan with his arrow-राम ने रावण को बाण से मारा। कायेन, मनसा वाचा मातापितरौ सेवेत-Man should serve his parents with his body, mind and word- मन, वचन और कर्म से माता पिता की सेवा करनी चाहिये । श्रमेण कार्य सिध्यति-Work succeeds by diligence- परिश्रम से कार्य सिद्ध होता है। सत्येन रक्ष्यते धर्म:-Virtue is preserved by truth- सत्य से धर्म की रक्षा होती है । धनेन बलवान् लोकः-Man becomes powerful by wealth-मनुष्य धन से बलवान हो जाता है। - प्रथमो भागः २९ एकादशः पाठः वयं चतुभ्यो पश्यामः कर्णाभ्यां शृणुमः, नासिकया जिघ्रामः, हस्ताभ्यां स्पृशामः पद्यां च विचरामः । य एकेन नयनेन हीनः । स काणः कथ्यते। द्वाभ्यां चतुया हीनः अन्ध उच्यते । अन्धेन किमपि द्रष्टुन शक्यते । वयं मनसा चिन्तयामः, घाचा कथयामः कर्मेन्द्रियैश्च कर्माचरामः। धयं सत्कर्मणा सुखमनुभवामः प्रस- कर्मणा तु दुःखं विन्दामः । अतः असत्कर्मणः परिवत्तेन सत्कर्मानुतिष्ठेम। सम्प्रदीयते अस्मै इति सम्प्रदानम् तत्र चतुर्थी दरिद्राय धनं देहि-Give riches to the poor-दरिद्र को धन दो। सर्वस्वं गुरवे दद्यात्--Man should give all his wealth to his preceptor-गुरु को सर्वस्व देना चाहिये। मह्य पुस्तकं देहि-Give me a book-मुझे पुस्तक दो । राजा पुत्राय राज्यमयच्छत्-The king gave his kingdom to his son-राजा ने पुत्र को राज्य दिया। नारायणाय पुष्पाददामि-I give flower to Narayana- नारायण को मैं पुष्प देता हूँ। प्रमेध्यं द्रव्यं न कस्मैचित् देयम्-Impure things should not be given to any one-अपवित्र पदार्थ किसी को न देना चाहिये। सं०शि० प्र०-३ संस्कृतशिक्षा , दशरथः कैकेय्यै द्वौ धरौ ददौ--Dasharatha gave two boons to Kaikeyee-दशरथ ने कैकेयी को दो पर दिये। द्वादशः पाठः दरिद्राय धनं दातव्यम् । तुधिताय अन्नं, पिपासा य सलिलं, शीताय वस्त्रं, रोगिणे औषधं च देयम् । यो हि धनवान् स दीनाय प्रार्थिने धनं दद्यात् । अन्धाय, खञ्जाय, रोगिणे, अशक्ताय अन्न, वस्त्र, भेषजं, भैक्ष्यञ्च देयम् । शक्तिमान् अशक्ताय यथा- साध्यं दद्यात् । सर्वशक्तिमान् ईश्वरः अस्मभ्यम् अन्न, जलं, श्वासवायु, सर्वमभिलषितं वस्तु यच्छति । अतोऽशक्तभ्यो वयं यथाशक्ति अन्नादिकं यच्छेम । तेन परमेश्वरः प्रीतो न आकाङ्क्षा- धिकं दास्यति । . यतोऽपायोऽपादानम्-तत्र पञ्चमो वृक्षात् पत्रं पतति-A leaf falls from the tree-वृक्ष से पत्ता गिरता है। faizargrarfa fy:-Madhu comes from school- मधू विद्यालय से प्राता है। faganfareta:—The child is afraid of the tiger बच्चा चीते से डर गया है। विपदस्त्रायते मित्रम्-Friend suves us from danger- मित्र हमें विपद से बचाता है। लोभात् क्रोधः प्रजायते-Anger arises from avarice- लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है। - --

नीचादप्युपदेशो ग्राह्यः-Advice even from a low-class
man should be taken-नीच से भी उपदेश ग्रहण करना
चाहिये।
त्रयोदशः पाठः
बालका गृहाद् विद्यालये आगताः पाठं शिक्षेरन् गुरोरुपदेशं
पालयेयुश्च । वयं सद्विभीमः, व्याघ्राद्विभीमः, क्रूराञ्च विभीमः ।
एतेभ्यस्तु वयं कुकर्मणः बिभोयाम । यो हि कुकर्मणा भीतः, सत्
कर्मण्यनुरक्तः स सदा क्षेममाप्नोति, विपदस्त्राणं लभते च । यो
विपदस्त्रायते सेोऽस्माकं बन्धुः । अतः सत्कर्म अस्माकं सा-
त्तमा बन्धुः । सत्कर्मणः सर्व सुखं सञ्जायते, असत्-कर्मणस्तु
सर्व दुःखं सम्भवति । वयम् असत्-कर्मणा विरता भवेम, सत्-
कर्मणो न कदापि विचलेम।
स्वस्वामिभावादिः सम्बन्धः [शेषः]-तत्र षष्टी
जगतां कारकः कृष्णः-Krishna is the maker of the
Universe-कृष्ण संसार के कर्ता हैं।
नद्या सलिलं विमलम्-The water of the river is
pure--नदी का जल निर्मल है।
प्रभारादेशः पालनीयः-Master's command should
be carried out-प्रभु की आज्ञा पालन करना चाहिये।
तष पुत्री धीमान्-Your son is intelligent-तुम्हारा
पुत्र बुद्धिमान है।

३२ संस्कृतशिक्षा चतुर्दशः पाटः मनुष्यस्य द्वौ हस्तौ भवतः, तस्य द्वौ पादौ, द्वे नेत्रे, द्वौ करें एका नासिका, एका रसज्ञा च भवति । गवां, मेषाणां, महिषाणां, व्याघ्राणां च चत्वारः पादा भवन्ति, तेषां हस्तो नास्ति । पक्षिणा- मपि हस्ता न विद्यते, तेषां द्वौ पादौ भवतः, हस्तविनिमयेन तेषां पता विद्यते । केषाञ्चित् प्राणिनां पादा न सन्ति, तान् सरीसृपान् कथयामः । मत्स्यानामपि हस्तौ वा चरणौ वा न विद्यते। तेषां पक्षौ पुच्छञ्च विद्यन्ते । अस्माकम् सर्वाणि अङ्गानि विद्यन्ते । आधारोऽधिकरणम्-तत्र सप्तमी - कलशे जलमस्ति-There is water in the pitcher- घड़े में जल है। fang: georgi ga—The child lies on the bed बच्चा बिछौने पर सोया है। सिंहो धने वसति-The lion lives in the wood-सिंह वन में रहता है। गङ्गायां घोषो वसति-Mr. Ghosh lives near the Ganges-घोष बाबू गङ्गा किनारे रहते हैं। दुग्धे माधुर्यमस्ति-There is sweetness in milk-दूध में मिठास है।

प्रथमो भागः ३३ य अध्याने तस्यानुरागो विद्यते-He has passion for study-पढ़ने में (पर ) उसका प्रेम है। night Traita vafa--The moon rises in the Might रात्रि में चन्द्रोदय होता है। पुनः दिवसे पञ्चदशः पाठः ये स्थले वसन्ति ते स्थलचराः, ये जले वसन्ति ते जलचराः, ये स्थले जले उभयत्र घसन्ति ते उभचराः, ये प्राकाशे उड्डीयन्ते ते श्राकाशचराः। स्थलचरा जले वस्तुं न शक्नुवन्ति, जलचरा अपि स्थले वस्तुं न शक्नुवन्ति । मनुष्यास्तु स्थले वसन्ति, तरणीम- धिष्ठाये जले तिष्ठन्ति, विमानमवस्थाय च श्राकाशे गच्छन्ति । केचित् प्राणिनः दिवाभागे न पश्यन्ति, केऽपि निशायां दूष्टि- हीनाः, केचित् दिवा तथा निशायां तुल्यदृष्टयः, केऽपि तथा निशायां नावलोकयन्ति । दर्शने सर्वेषां प्राणिनामभिला. षोऽस्ति। उपर्युक्त पाठों से विदित होता है कि दो अथवा बहुपद सन्नि- विष्ट होने से मन का सम्पूर्ण भाव प्रकाश होने पर एक वाक्य की रचना होती है। यथा-अहं गृहं गमिष्यामि-मैं घर जाऊँगा ( I shall go home ) । पाक्य मात्र ही में प्रायः क्रिया की पाव- श्यकता पड़ती है। रामो हसति-राम हँसता है (Rama laughs ) । वाक्य में हसति क्रिया है। क्रिया के सम्पादन में जो सहायता करता है, उसे कारक कहते हैं। यथा-दान किया सम्पादनार्थ, दाता, ग्रहीता, धन, तीर्थादि स्थान, हस्तादि साधन (दाता के) तथा कोपादि पात्र इत्यादि प्रत्येक की सहायता संस्कृतशिक्षा पहुँचती है, अतः इनमें से प्रत्येक कारक है । संस्कृत में छः कारक होते हैं-कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान तथा अधिकरण । जो क्रिया का सम्पादन करता है वह कर्ता कहा जाता है, यथा- रामः ददाति, राम देता है ( Rana gives )। इस वाक्य में राम क्रिया का सम्पादक है, अतः राम कर्त्त कारक है । और राम शब्द के पश्चात् प्रथमा विभक्ति निर्दिष्ट हुई है । इसी प्रकार जो किया जाता है, कहा जाता है, दिया जाता है, उसे कर्म कारक कहते हैं, यथा-धनं ददाति-धन देता है (Gives riches ), इस वाक्य में धनं कर्म कारक है, अतः धन में द्वितीया विभक्ति लगाई गई है। क्रिया-सम्पादन के प्रधान उपाय को करण कहते हैं। जिसके द्वारा किया निष्पन्न होती है, वह करण कारक होता है। यथा- हस्तेन ददाति-हाथ से (द्वारा) देता है (Gives with hand)। इस वाक्य में दान क्रिया सम्पादन का प्रधान उपाय हस्त है। हस्त न रहने पर किस के द्वारा दान होगा? हस्त द्वारा ही दान होता है, अतः हस्त करण कारक है, और हस्त में तृतीया विभक्ति लगी है । दानपात्र-सम्प्रदान कारक होता है, अर्थात् जिसे कोई भी वस्तु दान दी जाती है, वह सम्प्रदान कारक होता है। यथा- ब्राह्मणाय ददाति-ब्राह्मण को देता है (Gives to a Brahman), ब्राह्मण को दान देता है। इस वाक्य में ब्राह्मण दानपात्र है, अतः ब्राह्मण सम्प्रदान कारक है और ब्राह्मण में चतुर्थी विभक्ति श्रादेश हुई है। जिससे कोई पदार्थ पृथक् होता है, उसे अपादान कहते हैं जो कुछ पृथक होता है, वह कर्ता होता है। यथा-कोषात् ददाति-कोष में से देता है (Gives from the bag)। यहाँ कोष अपादान कारक है, अतः कोष में पञ्चमी विभकि लगाई गई है। क्रिया के आधार; अर्थात् जिस स्थान पर क्रिया सम्पादित होती प्रथमो भागः है, उसका नाम अधिकरण कारक है । यथा-तीथें ददाति-तीर्थ में (पर) देता है। (Gives in a sacred place ) तीर्थ में (पर) दान क्रिया सम्पादित होती है। अतः तीर्थ अधिकरण कारक है। तीर्थ में सप्तमी विभक्ति लगी है। समस्त पद इत्यादि सम्मिलित होकर रामः तीर्थे कोषात् करेण ब्राह्मणाय धनं ददाति-राम तीर्थ पर कोष में से हाथ द्वारा ब्राह्मण को धन देता है-(Rama gives riches to a Brahman from his bag with his hand in a sacred place ) इस वाक्य में समस्त कारक प्रदर्शित हो गये हैं। इसके अतिरिक्त सम्बन्ध विदित होने पर (अवशिष्ट) षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है। यथा-रामस्य धनम्-राम का धन । ( Rama's riches ) यहाँ रामस्य षष्ठी विभक्ति है। श्रतएव कारक मात्र का ही क्रिया के सहित सम्बन्ध रहता है। रामः ददाति । यहाँ ददाति क्रिया के सङ्ग 'राम' शब्द का सम्बन्ध है-कौन देता है ? राम देता है। धनं ददाति । इसमें 'ददाति' क्रिया के साथ धन का सम्बन्ध है। क्या देता है ? धन देता है। हस्तेन ददाति । क्रिया 'ददाति के सहित हस्त का सम्बन्ध है। किसके द्वारा देता है ? हस्त द्वारा देता है। ब्राह्मणाय ददाति । यहाँ भी क्रिया ददाति से ब्राह्मण का सम्बन्ध है। किस को देता है ? ब्राह्मण को देता है। कोषात् ददाति । क्रिया ददाति के सहित कोष का सम्बन्ध है। कहाँ से देता है ? कोष में से देता है ? तीर्थे ददाति । क्रिया ददाति के साथ तीर्थ का सम्बन्ध है। कहाँ पर देता है ? तीर्थ में (पर ) देता है। इन समस्त कारकों का ही क्रिया के साथ अन्षय (सम्बन्ध) है। अतएष क्रिया के सहित अन्वय रहने ही से इन्हें कारक कहते हैं। किन्तु रामस्य धनम्-राम का धन कहने से क्रिया के सहित राम का कोई अन्धय अथवा सम्बन्ध न रहने के कारण 'रामस्य' कारक संस्कृतशिक्षा है, - , - नहीं है, केवल पद मात्र है। 'रामस्य' यह सम्बन्ध पद है । सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है । इसी प्रकार 'नरः' कहने से केवल एक ही मनुष्य कर्ता ; अर्थात् ( कुछ काम करता है ) समझ में आता है, नरौ कहने से दो मनुष्य कर्ता विदित होते हैं, एवं नराः कहने से दो से अधिक मनुष्य कर्ता मालूम पड़ते हैं, ( A man does, two men do, men do) अर्थात् एक मनुष्य करता है, दो मनुष्य करते हैं, मनुष्य करते हैं । 'नरम्' कहने से एक मनुष्य को ( कहता है, देखता है, इत्यादि ) कर्म मालूम पड़ता 'नरौ' कहने से दो मनुष्य कर्म एवं 'नरान्' कहने से दो से अधिक मनुष्य कर्म कारक में विदित होते हैं, (Sees) a man, (Sees) two men, (Sees) men ; अर्थात् एक मनुष्य को (देखता है), दो मनुष्यों को ( देखता है ), मनुष्यों को ( देखता है)। 'नरेण, नराभ्याम् नरैः' ; कहने से एक, दो अथवा दो से अधिक मनुष्यों द्वारा निष्पादित होना ही विदित होता है ( करण कारक ) By a man, by two men, by men अर्थात् एक मनुष्य से (द्वारा), दो मनुष्यों से (द्वारा), और मनुष्यों से (द्वारा) होना विदित होता । नराय, नराभ्यां नरेभ्यः' ; कहने से एक दो वा उनसे अधिक मनुष्यों को दान देता है (सम्प्रदान कारक) समझ में आता है-Gives (to) a man, gives (to) two men, gives (to) men---अर्थात् एक मनुष्य (को) देता है, दो मनुष्यों (को) देता हैं; मनुष्यों (को) देता है। नरात्, नराभ्याम्, नरेभ्यः' ; कहने से एक, दो अथवा उनसे अधिक मनुष्यों से गृहीत, भीत, उत्पन्न इत्यादि (अपादान कारक ) मालूम पड़ता है-From a man, from two men, from men-अर्थात् एक मनुष्य से, दो मनुष्यों से, मनुष्यों से डरा अथवा उत्पन्न हुआ मालूम पड़ता है। नरस्य, नरयोः नराणाम्'। कहने से एक मनुष्य का, दो मनुष्यों प्रथमो भागः का अथवा उनसे अधिक मनुष्यों का ( सम्बन्ध पद)प्रतीत होता है। Of a man, of two men, of men-अर्थात् एक मनुष्य का, दो मनुष्यों का एवं मनुष्यों का होना ही मालूम पड़ता है । 'नरे नरयाः नरेषु; कहने से एक मनुष्य में, दो मनुष्यों में अथवा उनसे अधिक मनुष्यों में अवस्थित (आधार-अधिकरण) विदित होता है। In as man, in two men, in men. प्रत्येक कारक ही में इसी प्रकार उल्लिखित एक एक विभक्ति तथा हर एक विभक्ति में तीन तीन वचन प्रयुक्त होते हैं । ६ अगस्त २५ षोड़शः पाठः प्रातरिदम् । सूर्यः शीघ्रमुदेष्यति । शीतलः खलु समीरणः । एष हि अनुत्तमो भ्रमणसमयः। यदि वयं प्रातर्धमेम तदा स्वास्थ्य लपस्यामहे । सूर्योदयात् प्राक वयमवश्यं शय्याया उत्तिष्ठेम । तृणा- परि न विचर। यतस्तानि शिशिरसिक्तानि भवन्ति । तृणोपरि शिशिरविन्दवः कीदृशं उज्ज्वला दृश्यन्ते । वृक्षोपरि विहगाः कीदृशं मधुरं गायन्ति । पूर्वस्यां दिशि कीदृशाः सुन्दरा वर्णा दृश्यन्ते । सूर्यस्तत्र उदेष्यति । सप्तदशः पाठः कोशलराजस्य दशरथस्य अयोध्या राजधानी प्रासीत् । रामः, लक्ष्मणः, भरतः, शत्रुघ्न इति नाम तस्य चत्वारः पुत्रा आसन् । तेषां ज्येष्ठो रामो धार्मिकः, सत्यनिष्ठः, साहसिकश्च अभवत् । स सुन्दरीं राजकन्यां सीतामुपयेमे । राजा तं यौवराज्ये अभिषेक्त ३० संस्कृतशिक्षा मैच्छत् । तस्य विमाता कैकेयी तु स्वपुत्राय भरताय राज्यं दत्वा तं निर्वासयामास । रामः सीतया लक्ष्मणेन च सह चतुर्दश-वर्षाणि धनमगच्चत् । अष्टादशः पाठः मालपदेशे विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणः अधसत् । तस्य गोविन्दः कृष्णश्चेति द्वौ पुत्रौ प्रास्ताम् । तयोायान् गोविन्दो न कामपि विद्यामधीतवान् । कृष्णस्तु विद्यासु कुशला बभूव । विष्णुशर्मा चरमे वयसि सकलमपि स्वस्य धनं गोविन्दाय ददौ । कृष्णाय तु न किमपि दत्तवान् । कतिपयेषु वर्षेषु गतेषु गोविन्दस्य बहवः कुटुम्बा बभूवुः । स कुटुम्बभरणे स्वस्य धनं दिने दिने व्ययितवान् । विद्याहीनत्वात् किञ्चिदपि उपार्जयितुं न शशाक । तेन दुर्गतोऽ- भवत् । कृष्णस्तु विद्याया बहुद्रव्यमर्जयित्वा धनिकोऽभवत् । ३अगस्त १३१ ऊनविंशः पाठः सायमिदम् । अधुनैव रविरस्तं गतः। शीतलो हि समीरणः । नीले नभसि मेघो नास्ति । गावः कोमलतृणोपरि शेरते रोमन्था- यन्ते च । मल्लिकासंस्तरात् सौरभमायाति । प्रफुल्लविहगकुलानि घनारगयमुडीय गच्छन्ति । शस्यानि नपानि श्यामलानि च दृश्यन्ते । चञ्चलैका मक्षिका मदन्तिके गुञ्जति। समाप्तस्तस्या दिवसीयो गुरु- अमः । शोभनं मधुचक्रं प्रतियाति सा। अन्धकार उपजायते । उज्वलकुमुदपतिः तारकाश्च शीघ्रमुदेष्यन्ति अस्मभ्यम् पालोकं वास्यन्ति । ९ अगस्त३३१ प्रथमो मागः ३१ विंशः पाठः पुरा धाहाराज्ये भाजो नाम भूपतिः चिरं प्रजाः पर्य्यपालयत् । स राजा विद्वत्-प्रियः वदान्यशिरोमणिरिति ख्यातिमगच्छत् । एकदा राजमार्ग विहरन् स कमपि विप्रं ददर्श । तस्य हस्ते चर्ममयं कम- गडलु दृष्ट्वा तञ्च दरिद्रं ज्ञात्वा राजा अाह । विप्रं! चर्मपात्रं किमर्थं पाणौ वहसि इति । स च विप्रः मुखशोभया तं भाजं विचा- -ह । देव ! दातृणां शिरोमणौ भाजे पृथिवीं शासति लौहस्य ताम्रस्य च अभावोऽभवत् । तेन चर्ममयं पात्रं पहामि । इति । राजाह । भोजे शासति लौहताम्राभावे को हेतुः ? तदा विप्र आह । अस्य श्रीभोजराजस्य द्वयमेव सुदुर्लभम् । शत्रूणां शृङ्खलैौहं ताम्र शासनपत्रकैः ॥ ततस्तुष्टी राजा तस्मै प्रत्यक्षरं लक्ष ददौ । २३अगस्ती ३१ एकविंशः पाटः पदार्थः जगति चेतनः अचेतनश्च द्विविधौ पदार्थो भवतः ! चेतनया युक्तः सर्वः पदार्थः चेतनः कथ्यते, तथा चेतनया शून्यो जडः अचेतनो वा कथ्यते। नरः, पशवः, पतिणश्च चेतनाः । काष्ठं + पुस्तकं गृहमचेतनम् । चेतनः पदार्थः पुनः जीवः कथ्यते । जीवाश्चतुर्धा विभक्ताः । जरायुजाः, अण्डजाः, स्वेदजाः, उद्भिजाश्च । ये जरायुभ्यः सम्भवन्ति ते जरायुजाः। मनुष्याः, वानरीः, गावा, अश्वाः, व्याघ्राः, सिंहाः, पशवश्च सर्वे जरायुजा भवन्ति ।

४० संस्कृतशिक्षा ये अण्डेभ्यो जायन्ते ते अण्डजाः । पक्षिणः सरीसृपाःमत्स्याश्च अण्डजा भवन्ति । ये स्वेदेभ्यो जायन्ते ते स्वेदजाः । दंशाः, मशकाः, केऽपि कीटाः, पतङ्गा अपि स्वेदजा भवन्ति । ये भूमिम् उद्भिद्य जायन्ते ते उद्भिज्जाः । वृक्षाः, तृणानि, गुल्माः, पल्ल्यः, लताश्च सखा उद्भिजा भवन्ति । चेतना जीवा निर्दिष्ट कालं जीवित्वा अन्ते म्रियन्ते । ते सुखं दुःखञ्च अनुभवन्ति । अचेतनाः पदार्था पुनर्न जीवन्ति न म्रियन्ते वा । ते सुखदुःखमपि नानुभवन्ति । सर्वेषु जीवेषु मनुष्याः श्रेष्ठाः । ते धर्मेण विवेकेनापि युक्ताः । विवेकस्य बलेन ते हितम् अहितञ्च निरूपयन्ति, हितमाचरन्ति च । इतरे जीवाः सम्यक हितं नाचरन्ति । तेषां धर्मस्य ज्ञान- मपि नास्ति। २८अगस्त६३१ विंशः पाठः शरीरम्-इन्द्रियाणि अस्माकं देहे माझं शिरः । शिरसि असंख्याः केशाः सन्ति । केशानामधः ललाटं ततो भ्रुवा ततश्चक्षुषी । चक्षुषोर्मध्ये कनीनिका तारकेति था भवति । सा तारका सर्वेषां वस्तूनां रूपं गृहाति, तेन चक्षुषी दर्शनेन्द्रियं कथ्यते । नेत्रयोरुपरि- भागे नेत्रयोरावरके पक्ष्मणी नेत्रच्छदौ वा भवतः । नेत्रयोर्मध्यात् मुखस्योपरि नासिका वर्त्तते । वयं नासिकया जिघ्रामः, तेनासौ घाणस्येन्द्रियं कथ्यते । नासिकाया अधोदेशे र विद्यते । ताभ्यां प्रथमो भाग -४१ - । श्वासस्य वायुश्चलति । नासिकाया अधः श्रोष्ठः, प्रोष्ठस्याधः अधरस्तिष्ठति । एतयोर्मध्ये मुखविधरम् अस्ति । मुखविघरे, उपरि अधश्च दन्तानां पङ को विद्यते । अभ्यन्तरे जिह्वा, सा रसना रसज्ञा वापि कथ्यते । वयं रसनया पाहााणामावादम् अनु- भवामः । तेन जिह्वा रसनेन्द्रियं कथ्यते। नेत्रयोरुभयोः प्रान्तयोः का विद्यते । एतौ हि शब्दस्य ग्रहणं कुरुतः । तेनैती श्रवणस्य इन्द्रियं कथ्यते । कर्णयोरधः कपोलौ विद्यते । एतत् सर्व हि मुख- मण्डलं भवति । मुखमण्डलस्याधः ग्रीवा । तस्या अधः स्कन्धौ । स्कन्धयोर्मुले हस्ती तयोर्मूले च कतौ भवतः। कक्षयोरधः पाश्वी, तयोरभ्यन्तरे वक्षःस्थलम् । वक्षसः पश्चात् पृष्ठम् , । अधश्च उदम् । तस्याधः कटिः, ततः अरू, ततः, क्रमात् जानु, जना, पदम् विद्यते । हस्तयाः पादयोश्च अडुल्यः सन्ति, तेषु नखा विद्यन्ते । समग्रं शरीरं त्वचा परिवृतमस्ति । त्वचा अस्माकं स्पर्शज्ञानं भवति । तेन त्वक स्पर्शस्येन्द्रियं कथ्यते । ७ सितम्बर ३१ त्रयोविंशः पाठः षड् अमृतवः १-ज्येष्ठो प्राषाढश्च निदाघसमयः । इह हि रवेस्तेजः प्रख- रतामायाति । दिवसा दीर्घतरों भवन्ति निशाश्च क्षुद्रतरा जायन्ते । इह क्षुद्रा नद्यः, तुद्रा जलाशयाश्च शुष्कजला भवन्ति । सर्वे प्राणिनः पिपासया भृशं पीडिता भवन्ति । मानवास्तापभयेन मध्याह्नकाले गृह निरुद्धास्तिष्ठन्ति ।

संस्कृतशिक्षा २-श्रावणभाद्रौ वर्षासमयः । इह हि निरन्तरं वृष्टिधारीणि पतन्ति, गर्जन्ति च पयोदाः ।हंसाः सारसाः, शिखिनश्च हर्षेण नृत्यन्ति मधुरं गायन्ति च । मानवा अपि वर्षाजलेन स्निग्धाः प्रफुल्लाश्च भवन्ति । कृषकाः क्षेत्रेषु हलचालनं कुर्वन्ति । तेन क्षेत्राणि शालिप्ररोहैः श्यामलानि दृश्यन्ते । ३-प्राश्विनकार्तिको शरत्समयः । इह हि प्राकाशं विमलं भवति । सरितः जलाशयाश्च स्वच्छजला भवन्ति । क्षेत्राणि नव- शस्योद्गमैः हरितानि दृश्यन्ते । काननेऽपि नव कुसुमानि विका- शन्ते । शरदि निरन्तरं मृदु समीरा वहति । निशायां पुनः अभ्रमुक्तं गगनं ज्योत्स्नया फुल्लतरं दृश्यते । ४-मार्गशीर्ष-पौषौ हेमन्तसमयः । इह हि निशायां हिमपातेन जगत् शीतलं भवति । हेमन्ते शालि-धान्यानि परिणतानि भवन्ति । ५-माघ-फाल्गुनौ शिशिरसमयः । इह हि सर्वे जीवाः शीतेन सङ्कचिता भवन्ति । दिवसाः पुनः ह्रस्वाः निशाश्च दीर्घतरा भवन्ति । तेन प्राणिनः समधिकं क्लेशमनुभवन्ति । ६-चैत्रवैशाखौ वसन्तसमयः । इह हि सर्व जीवाः फुल्लतरा भवन्ति । वसन्ते तरुभ्यः लताभ्यश्च: नवपत्र--किशलयानि जायन्ते । कानने कुसुमानि विकशितानि भवन्ति । विहगाः शाखि- शाखासु मधुरं कूजन्ति । धनात् वनान्तरमुड्डीय गच्छन्ति । पतङ्गाश्च पुष्पेषु मधुरं गुञ्जन्ति । इह हि सुमधुरः समीरणः कुसुमगन्धं संहृत्य समन्तात् पाति । तद्घाणेन मानवा हर्षनिर्भरा भवन्ति । २१ास -३१

प्रथमो भागः
चतुर्विंशः पाठः
संलापः-Dialogue.
पिता-प्रातों रविः पूर्वस्यां दिशि उदेति तस्य कीद्वश
श्राकारः?
पुत्रः-यादशमहं पश्यामि ताद्शस्तस्य क्षुद्र श्राकारः ।
पिता-नहि वत्स ! स भूमण्डलादपि बृहत्तरः ।
पुत्रः-तत् किमहं तं क्षुद्रतरम् अवलोकयामि ।
पिता-स बहुदूरे तिष्ठति तेन स क्षुद्रो दृश्यते । त्वम् अस्मात्
स्थानात् क्षेत्रे विचरन्तीं धेनुं कीदृशीं क्षुद्रां पश्यसि । पश्य ! तरौ
स्थितं विहगं कीदृशं तुद्रं विलोकयसि । सूर्यः पृथिव्या महति दूरे
वर्त्तते । तेन वयं तं क्षुद्रतरं विलोकयामः ।
पुत्रः-कथं स नियतम् आकाशे न तिष्ठति ? सायं कथमसौ
अस्तं याति?
पिता-सर्व दिन सेोऽस्मभ्यम पालोकम् उत्तापञ्च ददाति
तेन वयं स्वेषां कर्माचरामः । आलोकस्य साहाय्येन वयं श्रमं कृत्वा
जीधिकाम् अर्जयामः । वयं सर्व दिनं श्रमे निरताः दिनस्य शेषे श्रमे
अशक्ताः विमुखाश्च भवामः तदा विश्रामम् लब्धं व्याकुलिता
भवामः। ईश्वरः अस्माकं निद्राया अाल्येन रात्रौ सवितरम्
अपसारयति । श्रालेोकस्य परिवर्तेन अन्धकारं विद्धाति च ।
तेन षयं सुखेन निद्रामः।
पुत्रः-ईश्वरः कीदृशो दयालुर्भवति ।२८सितम्बा १३१

४४ संस्कृतशिक्षा पञ्चविंशः पाठः नाम ? संलापः-Dialogue. कदाचित् वृक एको जलं पातुं काञ्चित् नदीमुपागतः । सोऽदूरे एक मेषशिशु सलिलं पिबन्तमपश्यत् । वृकश्चिन्तयामास । पुष्टदेहोऽयं मेषार्भकः । एष मे पुष्कल पाहारो भविष्यति । अतश्छ- लेन एनं हन्मि । ततः स मेषशिशुमुवाच । वृकः-रे दुष्ट मेषशिशो ! मम पानीयं जलम् प्राविलं कर्तुं किं ते साहसम् मेषशिशुः-नहि वृकभद्र ! नह्येतत् सम्भवतिः। जलं भवतो मदन्तिके अधः प्रवहति । अतोऽहं तव पानीयं जलम् प्राविलं कतु मशकः। वृक-श्रास्तां तावत् । पूर्वे वर्षे त्वं मे निन्दा कृतवान् । अतस्त्वां दण्डयामि। मेषशिशुः - नहि स्वामिन् ! नाहं कदापि ते निन्दामकरषम् । एषा ते भ्रान्तिः। पूर्ववर्षे नाहमजाये । अतः कथं त्वामनिन्दम् । वृकः-भवतु । यदि भवान्न सा ते माता । अतस्त्वामहं खादामि। ततः स वृको निरपराधं मेषशिशुं धृतधान् खादितषांश्च । अतो षयं लक्षयामः, दुवृत्तः अपकर्तुमभिलषन् लीलयामिषमुद्भा. वयति । ५अकबर १४ ३१ प्रथमो भागः . उल्लिखित पाठों से यह विदित होता है कि निमित्तार्थ अथवा इच्छार्थ धातुओं के संयोग से धातु के उत्तर ( पश्चात् ) तुम् ' प्रत्यय श्रादेश होता है । यथा-स्नातुम् गच्छति-स्नान करने के निमित्त जाता है। भोक्तम् इच्छति-अर्थात् भोजन करने के लिये अथवा भोजन करने के निमित्त इच्छा करता है । अप- कर्तुमिच्छन् लीलया मिषम् उद्भावयति-अर्थात् दुरात्मा अप- कार करने की इच्छा करके (अपकार करने के निमित्त इच्छा करके ) अनायास ही छल की उद्भावना करता है। किन्तु उभय क्रिया का कर्ता एक ही होगा। व्याघ्रः जलं पातुं नदीमुपागतः- व्याघ्र जल पान करने के निमित्त नदी पर गया, इत्यादि । इस स्थान पर पान करने का कर्ता तथा जाने का कर्ता एक ही है, अर्थात् जो पान करेगा, वही गया है। एक कर्ता न होने पर 'तुम् ' नहीं होता है किन्तु " शतृ प्रत्यय का श्रादेश होता है । यथा-स तत्र एकम्मेषशिशं सलिलम्पिबन्तम- पश्यत् । इस स्थान पर 'पातुम्' नहीं हुआ ; कारण देखा तो व्याघ्र ने और जल पान करता था मेष का बच्चा- पृथक कर्ता हुआ । शतृ प्रत्ययान्त पद विशेषण होता है ; यथा- सहसन उवाच । केवल दो क्रिया हैं। एक ही समय में सम्पन्न होने पर शतृ प्रत्यय श्रादेश होता है तथा पूर्वकालिक धातु के पश्चात् 'तुम' प्रत्यय लगाया जाता है। संशि० प्र०-४

४६
संस्कृतशिक्षा.
नीतिसंग्रहः
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्म ततः सुखम् ॥
एक एव सुहृद्धम्मो निधनेऽप्यनुयाति यः।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति ॥
वाति गन्धः सुमनसा प्रतिवातं कथञ्चन ।
धर्मजस्तु मनुष्याणां वाति गन्धः समन्ततः ॥
त्यज दुर्जनसंसर्ग भज साधुसमागमम् ।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम् ॥
श्रयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
लोभात् क्रोधः प्रभवति क्रोधाद् द्रोहः प्रवर्तते ।
द्रोहेण नरकं याति शास्त्रज्ञोऽपि विचक्षणः ॥
शतं दद्यान्न विवदेतेति विज्ञस्य सम्मतम् ।
विना हेतुमपि द्वन्द्वमिति मूर्खस्य लक्षणम् ॥
परोऽपि हितवान् बन्धुः बन्धुरप्यहितः परः ।
अहितो देहजो व्याधिहितमारण्यसौषधम् ॥
१२अकूबर१३

प्रथमा भागः २-अश्रा इ ई उ ऊ ऋलए पेश्रो व्याकरणम् वर्ण-निर्णय १-अ, इ, उ, क ख ग इत्यादि प्रत्येक अक्षर को वर्ण कहते हैं। वर्ण दो प्रकार के होते हैं; स्वर तथा व्यञ्जन । स्वर वर्ण (Vowels) को स्वर कहते हैं । स्वर दो प्रकार के होते हैं; ह्रस्व तथा दीर्घ । अ इ उ ऋ ल ये पाँचों ह्रस्व स्वर हैं । आई ऊ ऋ ए ऐ ओ औ ये आठों दीर्घ स्वर हैं। लकार का दोर्घ प्रयोग नहीं होता। व्यञ्जन वर्ण (Consonants ) ३-क ख ग घ ङ, च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण, तथदधन, प फ ब भ म य र ल व श ष स ह, (अनुस्वार ) तथा : (विसर्ग ) ये पैंतीस व्यञ्जन वर्ण हैं* इनमें से कसे लेकर म पर्यन्त पच्चीस वर्षों को स्पर्श वर्ण कहते हैं। समस्त स्पर्श वर्ण पांच वर्गों में विभक्त हैं। क ख ग घ ङ इन पाँचों को कवर्ग कहते हैं। च छ ज झ ञ इन पाँचों को चवर्ग कहते हैं । ट ठ ड ढ ण इन ) *समस्त व्यञ्जन वर्णों का स्वर की सहायता बिना स्वयं उच्चारण नहीं हो सकता । इनका उच्चारण करने के लिये इन्हें अकारान्त कहा जाता है। यथा क ख ग इत्यादि । किन्तु वास्तव में व्यञ्जन वर्णों का आकार क ख ग ध्र इत्यादि है। जिह्वा के अग्र, मध्य तथा मूल भाग को स्पर्श करके उच्चारण होने के कारण इन सब वर्णों का नाम स्पर्श वर्ण है।

संस्कृतशिक्षा . पाँचों को टधर्ग कहते हैं । त थ द ध न इन पांचों को तवर्ग कहते हैं। प फ ब भ म ये पाँचों पवर्ग हैं। य र ल व इन चारों को अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं । श ष स ह इनका नाम ऊष्म वर्ण हैं | अनुस्वार और विसर्ग इन दोनों को प्रयोगवाह कहते हैं | वण का उच्चारण स्थान ४-अश्रा ह इनका उच्चारणस्थान कण्ठ है, इनको कण्ठ्य वर्ण कहते हैं ( Guttural ). ५- क ख ग घ ङ इनका उच्चारणस्थान जिह्वामूल है; अतः इनको जिह्वामूलीय वर्ण कहते हैं ( Guttural ). *वर्ग में होने के कारण इसका नाम वर्गीय ब है । बध, बन्ध, बल, बाध, बुध, ब्रू इत्यादि धातु तथा इनसे बने हुए समस्त शब्दों का ब वर्गीय ब होता है। यथा-बन्धु, बन्धन, बध, बर, बल, बाल, बादु, बडब, बाडब, बालुका, बाह, बुद्धि, ब्रह्मा, ब्रह्म, ब्राह्मण, इत्यादि इन सब शब्दों का ब वर्गीय ब है। इनके अतिरिक्त समस्त धातु तथा शब्दों का व अन्तःस्थ व है। सन्धि तथा प्रत्यय का व भी अन्तःस्थ व ही है। स्पर्श वर्ण तथा उष्मवर्ण इन दोनों में निविष्ट होने के कारण इनको अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं * उष्म वर्ण अर्थात् वायु-प्रधान वर्ण । इन चारों वर्णो का उच्चारण करने में वाय का प्राधान्य रहता है। न तथा म् के स्थान में अनुस्वार होता है और र तथा स् के स्थान पर विसर्ग होता है । इसी लिये संस्कृत व्याकरण की वर्णमाला में इनका योग अर्थात् उल्लेख नहीं किया जाता । इस निमित्त ये प्रयोग हैं, किन्तु ऐसा न होकर भी प्रयोग का निर्वाह करने के कारण वाह है; अतः इनका दोनों प्रकार का धर्म होने के कारण अनुस्वार तथा विसर्ग का प्रयोगवाह नाम . And

प्रथमो भागः
४
६.-इ ई च छ ज झ ञ य श इनका उच्चारणस्थान तालु है।
अतः इनको तालव्य वर्ण कहते हैं ( Palatal )।
७- ऋ ट ठ ड ढ गा र ष इनका उच्चारणस्थान मूर्दा है;
इनको मूर्द्धन्य वर्ण कहते हैं ( Cerebral )।
८-ल त थ द ध न ल स इनका उच्चारणस्थान दन्त है, इनको
दन्त्य वर्ण कहते हैं ( Dental )।
१-उ ऊ प फ ब भ म इनका उच्चारणस्थान प्रोष्ठ है, इनको
श्रोष्ठय वर्ण कहते हैं ( Labial )।
१०-ए ऐ इनका उच्चारणस्थान कण्ठ तथा तालु है, अतः
इनको कण्ठ्यतालव्य वर्ण (Palaato-guttural) कहते हैं।
११-यो ौ इनका उच्चारणस्थान कण्ठ तथा प्रोष्ठ है, इनको
कराठ्यौष्ठय वर्ण ( Labio-guttural ) कहते हैं।
१२-अन्तःस्थ वकार का उच्चारणस्थान दन्त तथा श्रोष्ठ
इसको दन्त्योष्ठय वर्ण ( Dento-labial ) कहते हैं।
१३-- अनुस्वार का उच्चारणस्थान नासिका है इसे अनु-
नासिक वर्ण ( Nasal ) कहते हैं।
१४--: विसर्ग श्राश्रयस्थान भागी है; अर्थात् जब जिस स्वर
वर्ण के परे यह रहता है, उसी स्वर वर्ण का उच्चारणस्थान ही
विसर्ग का भी उच्चारणस्थान होता है।

R
-
संस्कृतशिक्षा
सन्धि-प्रकरण
Euphonic Combination of Letters
सन्धि
१५-दो वर्ण परस्पर निकट होने से आपस में वे मिल जाते
। इसी मिलन को सन्धि कहते हैं। सन्धि दो प्रकार की होती
है-स्वरसन्धि तथा व्यञ्जनसन्धि । स्वर वर्ण की स्वर वर्ण के साथ
जो सन्धि होती है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं। और व्यञ्जन वर्ण
की व्यञ्जन वर्ण में अथवा व्यञ्जन वर्ण तथा स्वर वर्ण में जो सन्धि
होती है, उसे व्यञ्जनसन्धि कहते हैं।
.
.
स्वर-सन्धि
Euphonic Combination of Vowels
..
१-श्र+अ-श्रा; राम+अयनम्-रामायणम् ।
२-अ-प्राश्रा; गुण-श्राकरःगुणाकरः ।
३-श्रा-+अप्रा विद्या- अर्णवः विद्यार्णवः ।
४-श्रा+प्रा-प्रा; हता- श्राशा-हताशा ।
५-इ-+इ=ई ; मुनि+इन्द्रः-मुनीन्द्रः ।
६-इ-नईई; कवि+ईश्वरः कवीश्वरः।
७-ई+६=ई ; सुधी+इन्द्रः-सुधीन्द्रः।
८-ई+ईई ; मही+ईश्वरः महीश्वरः।
६-उ+उ =ऊ ; प्रभु+उपदेशः=प्रभूपदेशः ।
१०-उ+ऊऊ; तरु-+ ऊर्ध्वम् =तरूव॑म् ।
११-ऊ+3-ऊ; वधू+उत्सवाघधूत्सवः।

प्रथमो भागः
3B
१२-ऊ+ऊ==ऊ ; भू+ऊर्ध्वम् =भूर्ध्वम्।
१३---ऋ+ऋ=ऋ; पितृ+ऋणम् पितृणम् ।
१४-+इ=ए; गज+इन्द्रः=गजेन्द्रः ।
१५-+ई =ए ; नर+ईशः नरेशः । *
१६-श्रा+इ=ए; तथा+इति तथेति ।
१७-श्रा+ईए; उमा+ईशः=उमेशः ।
१८-अ+उ=ो ; पुरुष+उत्तमः पुरुषोत्तमः ।
१६-श्र+ऊ=ो; एक-ऊनः- एकोनः।।
२०-श्रा-+-उ=ो; महा+-उपकार:=महोपकारः ।
२१-श्रा+ऊ=श्रो ; यमुना-+ ऊर्मिः यमुनोमिः।
२२-अ-अर् ; ग्रीष्म ऋतुः=ग्रीष्मर्तुः ।।
२३-श्रा+अर्; राजा--ऋषिः राजर्षिः ।
२४-श्र+एऐ ; सर्व+एव सदैव ।
२५-श्र+ऐ=ऐ ; विपुल-+ऐश्वर्य =विपुलैश्वर्यम् ।
२६-श्रा+ए ऐ; तथा-एव तथैव ।
२७-श्रा+ऐ =ऐ ; सेना- ऐक्यम्=सेनैक्यम् ।
२८-श्र+श्रो-ौ ; धान्य--औषधिः=धान्यौषधिः ।
सकिन्तु स्व + ईरम् - स्वैरम् ; स्व-+-ईरिणी स्वैरिणी ।
भिक्ष-+ ऊहिनी-अक्षौहिणी ।
किन्तु शीत+तः=शीताः; हिम+तः= हिमातः ।
विम्ब+ोष्ठः =विम्बौष्ठः अथवा विम्बोष्ठः
स्थूलौतुः अथवा स्थूलोतुः ।
-
, स्थूल+श्रोतुः

.. .. - - संस्कृतशिक्षा २६-प्र+औ=ो ; चित्त+औदार्यम्-चित्तौदार्यम् । ३०-प्रा-+-श्रो=ौ ; सदा+प्रोदनम् =सदौदनम्। ३१-प्रा+ौ=ो ; महा + औषधम् =महौषधम् । ३२-+ इ ईकार से भिन्न स्वर (अर्थात् अश्रा उ ऊ ऋ ए ऐ प्रो औ ) होने पर इ के स्थान में य होता है । अर्थात् इ+=य, इ+पा-या, इ-+-उ=यु, इ+ऊ=यू, इ-ऋ=य, इ+ए-ये, इ+ऐ=यै, इ+ो यो, इ+औ=यौ । यदि+अपि =यद्यपि अति+प्राचारः अत्याचारः; अभि+ उदयः = अभ्युदयः; प्रति+ ऊहः प्रत्यूहः ; मुनि+ऋषभः=मुन्वृषभः ; प्रति- एकम् = प्रत्ये- कम् ; अति-+-ऐश्वर्य्यम अत्यैश्चर्यम पचति+प्रोदनम-पच- त्यादनम् । अति+औदार्य्यम अत्यौदार्यम् । ३३-ई-+ इ ईकार से भिन्न स्वर-ई के स्थान पर य होता है; अर्थात् ई-+-अय, ई+श्रा=या, ई+उ=यु, ई+ऊ=यू, ई+य, ई+ए-ये. ई-ऐ-यै, ई+यो-यो, इ +-ौ-यौ। यथा-नदी+अम्बु नद्यम्बु ; देवी+पागता=देव्यागता; सखी+ उक्तम् =सख्युक्तम् । शशी+ऊर्ध्वगः शश्यूर्ध्वगः ; बली+ ऋषभः=बल्वृषभः ; गोपी+एषा=गोप्येषा ; बली+ऐरावतः= बल्यैरावतः ; सरस्वतो+ोघः सरस्वत्योघः वाणी+औचि- त्यम्-वागयौचित्यम्। ३४-उ+उ उकार से भिन्न स्वर=उ के स्थान पर व होता है; अर्थात् उ+अव, उ+श्रावा, उन-इ-वि, उ+ई =ची, उ+ऋ=वृ, उ+एवे, उ+ऐ-वै, उ+ोवो, उ+ौ वौ । यथा-अनु-+अयः- अन्वयः ; सु+आगतम्स्वागतम्। मधु+इदम् =मविदम् ; साधु-ईहितम् =साध्वीहितम् ; मधु+ ऋते मवृते । अनु+एषणम् =अन्वेषणम् । अनु+ऐषिष्ट =अन्वै- . ।

- - -- - P प्रथमो भागः . B पिष्ट ; पचतु+ोदनम् = पचत्वादनम् ; ददातु+औषधम् =ददा- त्वौषधम् । ३५-3-1-उ= ऊकार से भिन्न स्वर=ऊ के स्थान पर व् होता । अर्थात् ऊ+अ-व, ऊ+श्रा-वा, ऊ+इ=वि, ऊ--ई-वी, ऊ+ऋ-वृ, ऊ+ए-वे, ऊ+ऐ-वै ऊ+श्री-वा, ऊ+औ=वो होता है । यथा-सरयू+अम्बु =सरवम्बु ; वधू+ श्रादिः वध्वादिः ; तनून-इन्द्रियम्=तन्विन्द्रियम् । तनू+ ईश्वरः तन्वीश्वरः । सरयू- एधितम् = सरवेधितम् ; वधू+ ऐश्वर्यम् = वध्वैश्वर्यम् ; सरयू+ोघः=सरवोघः ; वधू । औदार्य्यम् -- वध्वौदार्यम् । ३६-----ऋभिन्न स्वर=ऋ के स्थान पर र् ( ) रेफ होता है ; अर्थात् ऋ+अर, ऋ- श्रा=रा ; ऋ--इ-रि %; +उ-रु ; ऋोरो ; ऋ+ औरौ । यथा-पितृ+ अनुमतिः =पित्रनुमतिः । पितृ । प्रादेशः पित्रादेशः ; पितृ+ इच्छा=पित्रिच्छा ; पितृ--ईहितम् =पित्रीहितम् ; पितृ - उप- देशः=पित्रुपदेशः ; पितृ । ऊहः =पित्रुहः ; पितृ+एषणा= पितृ--ऐश्वर्यम् =वित्रैश्वर्यम् ; पितृ+ोकः पित्रोकः ; पितृ---ौदार्य्यम पित्रौदार्यम् । ३७-ए+स्वर वर्ण =ए के स्थान पर अय् ; अर्थात् ए+१= अय, ए+श्रा=अया, ए-+5=अयि, ए+ई =अयो, ए+उ-अयु ए+ऊ=अयू ; ए+-अय, ए+एअये, ए-ऐ-अयै, ए+श्रो=अयो, ए+औ=अयौ होता है । यथा-शे+अनम् = शयनम् । ने+अनम् =नयनम् ; जे+अति जयति; सञ्चे+अः सञ्चयः अशे+प्राताम् =अशयाताम् । % . - ई-री +-ऐ-रे पित्रेषणा ; - .. . ..

S ५४ संस्कृतशिक्षा . , - - - . शे+इतम् =शयितम् ; अशे+इष्ट अशयिष्ट ; शे+ईतशयीत ; शे+ईरन् =शयीरन् ; शे+ए=शये ; शे+ऐ=शयै । ३८-ऐ-+स्वर वर्ण=ऐ के स्थान पर आय ; अर्थात् ऐ+4= पाय, ऐ+श्रा-पाया, ऐ+इ=आयि, ऐ+ई-आयी, ऐ+उ: आयु , ऐ+ऊ=प्रायू ; ऐन-ए-आये ; ऐ+ऐ-प्रायै ; ऐ+ो प्रायो; ऐ+औ-बायौ होता है । यथा-ने-अकः नायकः ; विनै+-अकः विनायकः ; रै-+-श्रा=राया ; रै+इ= रायि रै-ए-राये; रै-श्रोः=रायोः । ३६-श्रो+स्वर वर्ण-श्रो के स्थान पर अव ; प्रो+=अव, श्रो+श्रा-अवा; श्रो+इ=अवि श्रो+ई= श्रवी; श्रो-+उप्रवु श्रो+ऊ=अवू ; श्री+ऋ-अवृ; श्रो+ए-अवे; श्रो+ऐ-अवै ; श्रो+श्रो अवो। प्रो---औ= प्रवौ होता है । यथा-श्रो+अनम् श्रवणम् ; भो+अनम् भवनम् ; पो+अनः पवनः ; गो-ना-गवा भविता ; पो+इत्रम् = पवित्रम् ; गे+एगवे गो+ोः B ; अर्थात् - -- B . - .. भा+इताः ar -- . .. 3B गवाः *। . - ४०-औ- स्वर वर्ण-ौ के स्थान पर श्राव होता है ; अर्थात् श्रौ----श्राव ; औ-श्रा प्राव ; औ+इ=श्रावि ; औ+ ई = प्रावी ; औ- उ-श्रावु ; औ+ऊ=श्रावू ; औ+ऋ=श्रावृ । औ+ ए=श्रावे; औ+ऐ=श्रावै; श्रौन-श्रो-श्रावा:ौ--ौ श्रावो । यथा-पौ+अकः=पाधकः ; नौ+श्रा=नावा शो शब्द के प्रकार के स्थान पर अव अथवा अव होता है । यथा- गो-+ईशः = गवेशः अथवा गवीशः ; किन्तु गो-इन्द्रः = गवेन्द्रः; गौ+ , भौ+ . -- गवावः।

- प्रथमो भागः B . .. इनि=भाविनि ; भौ--उकः=भावुकः ; नौ+ प्रोः =नावः ; नौ--- मौनावौ। ४१-पद के अन्त में स्थित ए---अए5 (लुप्त प्रकार का चिह्न ) पद के अन्त स्थित प्रो+=ो 5 (लुप्त प्रकार का चिह्न होता है)। यथा-मुने+अनुगृहाण =मुनेऽनुगृहाण । व्यञ्जन सन्धि Euphonic Combination of Consonants. ४२-त्-च-च-च-च+छ-च्छ ; --च्छ। यथा--भवत्-चरणम=भवच्चरणम ; तछाया-तच्छाया । ४३-त्-+- जज ; -- ज=उज; त्+झज्झ ; यथा-उत्+ज्वलः -उज्ज्वतः तद्-झनकारः- तज्मनत्कारः इत्यादि। ४४-न्+ज-अ न्+झ-झ। यथा-महान् + जयः महाञ्जयः ; गच्छन् । झटिति गच्छन्झटिति । ४५-त्+-श=च्छ ;+श=च्छ । यथा-जगत्+शरण्यः जगच्छरण्यः । तद्+शरीरम् तच्छरीरम् । ४६-न्-+-श=छ । यथा-महान्+शब्दःमहाञ्छब्दः । ४७-त्+ह-द्ध द्+ह-द्ध ;उत्+हतः= उद्धतः । विपद् + हेतुः-विपद्धतुः। ४८-च+न-त्र, ज+-न- । यथा-याच+ना- याच्ञा: यज+नः-यज्ञः। ४६-त्-न-ट; दु+ट=; त्+3=ढ़ ; द्+8= टठ-यथा--उत्+टलति = उट्टलति । तद्+टोका तट्टीका ; पत+ठक्कुरःपतट्ठकुरः । 3- 3 . - -- - ५६ संस्कृतशिक्षा x ५०-त्-1-ड-ड्ड ; इ-+-ड=ड्ड; त्+ढ=ढ ; इ +8=ड्ढ़ । यथा-उत्+डीनः= उड्डीनः ; एतद् +ढक्काएत- ढका। ५१- +ड-गडन्+ढ=गढ । यथा-महान्--डामरः= महागडामरः। ५२--+त=ष्ट ; +थ-४ । यथा-न+ता-स्रष्टा । ५३-+-ल=ल्ल दु+ल-ल्ल ; न्-ल-ल्ल (नकार के पूर्व वर्ण में चन्द्रविन्दु लगाया जाता है) । यथा-बृहत् + ललाटम् -बृहल्ललाटम् ; महान्-+-लाभा-महाँल्लाभः । ५४-न्+स्वरवण न। धावन्+अश्वः=धावन्नश्वः । ५५-दीर्घ स्वर के परे न्+स्वर वर्णन (द्वित्व नहीं होता)। यथा-महान् +अाग्रहः-महानाग्रहः । ५६--चश्च न्छ = श्छ । यथा-हसन् + चलति हसंश्चलति ; धावन् । कागः=धाश्छागः । ५७ ---- Fट=ष्ट ; न्-+3=8। महान् + ठकुरः=महांष्ठ- , कुरः। ५८-न्+त= स्तन-1-2='स्थ । पतन्+तरुः= पतंस्तरुः। ५६-म+अन्तःस्थ वर्णम के स्थान पर अनुस्वार ; म्+ ऊष्मवर्ण=म के स्थान पर अनुसार होता है । यथा-सत्वरम् + याति= सत्वरं याति ; मधुरम् +हसतिमधुरं हसति । नियमातिरिक्त-Exception.-सम्+राट् =सम्राट् । ६०-म्-स्पर्श वर्णम् के स्थान पर अनुस्वार अथवा म् स्थान पर स्पर्श वर्ण का पञ्चम वर्ण होता है । यथा-किम् + करोषिकिं करोषि अथवा किङ्करोषि । के

-
प्रथमो भागः
नियमातिरिक्त
स्पर्श वर्ण परे रहने पर पदमध्यस्थ न् तथा म के स्थान पर
उसी स्पर्श वर्ण का पञ्चम वर्ण श्रादेश होता है । यथा-श्राशन्+
कितः=प्राशङ्कितः ; गम्+ता=गन्ता ।
ऊष्म वर्ण परे रहने पर पद मध्यस्थ न के स्थान में अनुस्वार
होता है । यथा-दन्+शनम् दशनम् ।
,
,
६१-स्वर-छ-छ के स्थान में च्छ होता है । यथा-वृक्ष+
छाया-वृत्तच्छाया ।
६२-क+स्वर=क के स्थान में ग ; क्+वर्गीय तृतीय
अथवा चतुर्थ वर्णक के स्थान पर ग ; क्य, र, ल, व, और
हक के स्थान पर ग् हाता है । यथा-दिक्+अन्तः-दिगन्तः ;
पाक्-दानम् = वाग्दानम् ; धिक याचकम् =धिगयाचकम् ।
--त् + स्वर =त् के स्थान में दु; त्+वर्गीय तृतीय अथवा
चतुर्थ वर्ण-त् के स्थान में द् ; त्-+-य, र, ल, वत् के स्थान में
द हो जाता है । यथा--जगत् + ईशः = जदीशः, जगत्-बन्धुः
जगद्वन्धुः इत्यादि।
६४-क्नक के स्थान में ङ्; क्+म्=क के स्थान में
ङ्; त्+न=न ; दु+नन्न हो जाता है । यथा -दिन-नागः=
दिङ्नागः ; प्राक् + मुखः प्राङ्मुखः । जगत्-नाथ:-जगन्नाथः
इत्यादि।
६५--:--च-श्च ; :+छ-श्छ । वायुः+चलति वायु-
श्चलति ; रवेः+छविः=रवेश्छविः इत्यादि ।
६६-:+ट=ष्ट;:+3=ष्ठ । भीतः+टलति-भीतष्टलति।
%E

-
५८
संस्कृतशिक्षा
।
उवाच
६७-:+तस्त;:+2=स्थ । उन्नतः+तरुः =उन्नतस्तरुः ।
६८-अः+4=ोऽ । कः+अयम्=कोऽयम् ।
६६-प्रः+वर्गीय तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण अथवा य, र, ल,
च, ह -श्रः के स्थानों में श्रों होता है। यथा-शोभनः+गन्धः =
शोभना गन्धः ; घामः+हस्तः=वामहस्तः।
७०-अः--प्रकार से भिन्न स्वर-विसर्ग का लोप हो जाता
है। विसर्ग के लोप होने पर फिर दूसरी सन्धि नहीं होती । यथा
-सूर्यः+उदेति सूर्य उदेति । रामः+उवाच राम
इत्यादि
७१-श्राः+स्वर वर्ण अथवा वर्गीय तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण
अथवा य र ल व विसर्ग का लोप होता है। यथा-प्रश्वाः--
इमे अश्वा इमे ; छात्राः--यतन्ते-छात्रा यतन्ते ।
७२-अप्रा से भिन्न स्वर के परे विसर्ग+स्वर वर्ण अथवा
वर्गीय तृतीय चतुर्थ पञ्चम वर्ण वा य र ल व ह=विसर्ग के स्थान
में र होता है। यथा-हरिः+-अयम् हरिरयम् ; साधुः+जयतिः
साधु यति इत्यादि।
७३-प्रकार के परे स्थित विसर्ग-स्वर वर्ण अथवा
वर्गीय तृतीय चतुर्थ, पञ्चम वर्ण वा य र ल वह-विसर्ग के
स्थान र पर होता है । यथा-पुनः+अपि= पुनरपि ; स्वःगतः=.
स्वर्गतः इत्यादि।
७५-र+र=पूर्व के र का लोप तथा उसके पूर्व का स्वर
दीर्घ हो जाता है । यथा -निः (निर् )+रोगः नीरोगः इत्यादि ।
७५-स:+9 से भिन्न स्वर अथवा व्यञ्जन वर्ण-विसर्ग का
लोप होता है । एषः-- से भिन्न स्वर वा व्यञ्जन वर्णविसर्ग
.

प्रथमो भागः का लोप होता है और लोप के पश्चात् पुनः सन्धि नहीं होती । यथा-सः+पागतः=स पागतः । एषः+गच्छति एष गच्छति । ७६-भः+स्वर वर्ण अथवा वर्गोय तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण अथवा य र ल वह-विसर्ग का लोप हो जाता है। लोप के पश्चात् पुनः सन्धि नहीं होतो यया-मः+ईगान=भे ईशान । fagarrafas Exception विद्वस्+जनः=विद्वज्जनः ; पुम्न कोकिलः पुंस्कोकिलः ; पुम्+चकोर=पुंश्चकोरः ; भुवः+ लेोकः भुवाकः ; अहन्+ अहः-अहरहः । इत्यादि शब्द निपात से सिद्ध होते हैं। णत्व-विधान . , ७७-ऋऋ र मूर्द्धन्य ष इन चारों वण के परे दन्त्य न होने पर वह मूर्द्धन्य ण हो जाता है । यथ-नृणाम्, तिमृणाम, चत- सृणाम् ; नृणाम्, भ्रातृणाम् ; दातृणाम् ; चतुर्णाम् ; दोष्णा, पुष्णे । ७८-यदि स्वर वर्ण, कवर्ग, पवर्ग, य, व, ह, तथा अनु- स्वार के मध्य व्यवधान हो तो दन्त्य न का मूर्द्धन्य ण हो जाता है। यथा-करणम्, कराणाम, करिणा, गुरुणा, परेण, अर्केण, मूर्खण, मृगेण, दीर्घेण दर्पण, रेफेण, दर्भेण, द्रमेण, रामेण, गर्वेण, ग्रहण, बृहणम् इत्यादि । ७६-इनके अतिरिक्त वर्ण व्यवधान होने पर दन्त्य न का ण नहीं होता । यथा-अर्चना, मूर्छना, अर्जनम्, किरीटेन, षष्ठेन, मृडेन, दृढेन, वर्णानाम, पात्तन, विमर्दैन, अर्द्धन, विरलेन, स्पर्शन, रसेन इत्यादि । ८०-पद के अन्त वाले दन्त्य न का मूर्द्धन्य ण नहीं होता। यथा-नरान्, हरीन्, गुरून्, भ्रातृन्, इत्यादि । कई एक शब्दों में स्वाभाविक ण होता है। .

संस्कृतशिक्षा
.
स्वाभाविक णत्व
कण, कणा, कोण, कल्याण, कङ्कण, चिक्कण, गण, गुण, गौण,
चाणक्य, पाणिनि, तूण, तूणीर, पाणि, वाणी, विपणि, वणिक,
निपुण, मत्कुण, वेणी, वीणा, वोगु, वाण, पुण्य, लवण, लावण्य,
मणि, शाण इत्यादि ।
,
षत्व विधान
८१-अश्रा से भिन्न स्वर तथा क एवं र इन सब वर्णों के
परे स्थित प्रत्यय के दन्त्य सकार का मूर्द्धन्य ष हो जाता है। यथा-
मुनिषु, गुणिषु, नदीषु, सुधीषु, साधुषु, गुरुषु, प्रतिभूषु, वधूषु,
भ्रातृषु, स्वरसृषु, सर्वेषाम्, अन्येपाम्, गोषु, ग्लौषु, नौपु, वाक्षु,
दिक्षु, चतुर्पु, गीर्षु इत्यादि।
८२-अनुस्वार तथा विसर्ग व्यवधान होने पर भी दन्त्य
स का मूर्द्धन्य ष हो जाता है । यथा-हवींपि, धषि, आशीषु
धनुःषु इत्यादि।
स्वाभाविक पत्व
प्राषाढ, इषु. ईषत्, उत्कर्ष, औषध, अभिलाष, दोष, द्वेष,
पुष्प, भीष्म, मेष, महिष, मूषिक, वृष, वर्ष, पौष, षोडश, पुरुष,
षट्, हर्ष, पापाण, कष्ट, वाष्प, कल्मष, माष, काषाय, तुषार,
कलुष इत्यादि।
,
सुबन्त प्रकरण
प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी
संस्कृत में ये सात विभक्तियाँ होती हैं। प्रत्येक
। प्रत्येक शब्द के उत्तर ये
सातों विभक्तियाँ होती हैं । विभक्ति-युक्त होने पर शब्द को सुबन्त
तथा पद कहा जाता है।

प्रथमो भागः ६१ प्रत्येक विभक्ति के तीन पचन होते हैं-एकवचन, द्विवचन तथा बहुधचन । शब्द में एकवचन की विभक्ति जोड़ने से एक वस्तु प्रतीत होती है, द्विवचन की विभक्ति जोड़ने से दो वस्तुओं का बोध होता है, और बहुवचन की विभक्ति युक्त होने से तीन से लेकर परार्ध पर्यन्त समस्त संख्याएँ ही विदित होती हैं। विभक्ति की प्राकृति एकवचन बहुवचन प्रथमा द्विवचन श्रो श्रो द्वितीया श्रम् भ्याम् भिः भ्याम् तृतीया चतुर्थी ए पञ्चमी षष्ठी सप्तमी भ्यः भ्याम् प्रोः श्रो ग्राम . किस शब्द में कौन सी विभक्ति युक्त होने से कैसा पद होता है, इसे क्रमानुसार लिखा जायगा । सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति के ऐसा ही रूप होता है, किन्तु उसके एकवचन में कुछ विभिन्नता है। इसी कारण एक वचन का रूप पृथक् लिखा जायगा। जहां पर सम्बोधन के एकषचन का रूप पृथक् न लिखा जायगा, वहाँ पर प्रथमा को एकवचन तथा उसमें कोई भेद नहीं है, यह स्वतः ही समझ लेना चाहिये। सं०शि० प्र०-५ ६२ संस्कृतशिक्षा नरैः स्वरान्त शब्द पुंलिङ्ग अकारान्त-नर शब्द ( Man) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा नरः नरौ नराः द्वितीया नरम् नरौ नरान् तृतीया नरेण नराभ्याम् चतुर्थी नराय नराभ्याम् नरेभ्यः पञ्चमी नरात् नराभ्याम् नरेभ्यः षष्ठी नरस्य नरयोः नराणाम् सप्तमी नरे नरयाः नरेषु सम्बोधन प्रायः समस्त प्रकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप नर शब्द के समान ही होते हैं। हस्थ इकारान्त पुंलिङ्ग "मुनि" शब्द (Sage) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा मुनिः मुनी मुनयः द्वितीया मुनिम् मुनी मुनीन् तृतीया मुनिना मुनिभ्याम् मुनिभिः चतुर्थी मुनये मुनिभ्याम् मुनिभ्यः पञ्चमी मुनेः मुनिभ्याम् मुनिभ्यः षष्ठी मुनेः मुन्याः मुनीनाम् सप्तमी मुनौ मुन्याः मुनिषु सम्बोधन मुने प्रथमो भागः ६३ पतिभ्याम् पति, सखि को छोड़ कर समस्त इकारान्त पुंलिङ्ग शब्द मुनि शब्द के समान ही होते हैं। इकारान्त पुंलिङ्ग 'पति' शब्द ( Husband, master ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पतिः पती पतयः द्वितीया पतिम् पती पतीन् तृतीया पत्या पतिभ्याम् पतिभिः चतुर्थी पत्ये पतिभ्यः पञ्चमी पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः षष्ठी पत्युः पत्याः पतीनाम् सप्तमी पत्यौ पत्योः पतिषु सम्बोधन पते हस्व इकारान्त पुंलिङ्ग सखि शब्द ( Friend ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सखायौ सखायः द्वितीया सखायम् सखायौ सखीन् तृतीया सख्या सखिभ्याम् सखिभिः चतुर्थी सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः पञ्चमी सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः षष्ठी सख्यः सख्या: सखीनाम् सप्तमी सख्यो सख्याः सखिषु सम्बोधन सखे दीर्घ इकारान्त सुधी शब्द ( Wise unan ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सुधीः सुधियौ सुधियः द्वितीया सुधियम् सुधियो सुधियः सखा संस्कृतशिक्षा द्विषवन एकवचन द्विवचन बहुवचन तृतीया सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभिः चतुर्थी सुधिये सुधीभ्याम् सुधोभ्यः पञ्चमी सुधियः सुधीभ्याम् सुधीभ्यः षठी सुधियः सुधियोः सुधियाम् सप्तमी सुधियि सुधियोः सुधीषु सम्बोधन सुधीः अनेक दीर्घ इकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप सुधी शब्द के समान होते हैं। यथा--सुश्री ; हतधी इत्यादि । हस्व उकारान्त पुंलिङ्ग साधु शब्द (Sage ) एकवचन बहुवचन साधुः साधू साधवः द्वितीया साधुम् साधू साधून तृतीया साधुना साधुभ्याम् साधुभिः चतुर्थी साधवे साधुभ्याम् साधुभ्यः पञ्चमी साधाः साधुभ्याम् साधुभ्यः षष्ठी साधाः साध्वाः साधूनाम् सप्तमी साधौ साध्वाः साधुषु सम्बोधन साधो प्रायः समस्त पुंलिङ्ग हस्व उकारान्त शब्दों के रूप साधु शब्द के समान ही होते हैं। ऋकारान्त पुंलिङ्ग दातृ शब्द (Giver ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रशमा दाता दातारौ दातारः द्वितीया दातारम् दातारौ दातून प्रथमो भागः ६५ . एकवचन द्विवचन बहुवचन तृतीया दाश दातृभ्याम दातृभिः चतुर्थी दाने दातृभ्याम् दातृभ्यः पञ्चमी दातुः दातृभ्याम दातृभ्यः षष्ठी दातुः दात्रोः दातृणाम् सप्तमी दातरि दात्रो दातृषु सम्बोधन दातः भ्रातृ, पितृ, जामातृ , नृ, इत्यादि कई एक भिन्न समुदाय ऋफारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप दातृ शब्द के समान होते हैं। ऋकारान्त पुंलिङ्ग-भ्रातृ शब्द ( Brother ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा भ्राता भ्रातरौ भ्रातरः द्वितीया भ्रातरम् भ्रातरौ भ्रातृन् इनके अतिरिक्त शेष सब विभक्तियों में भ्रातृ शब्द के रूप दातृ शब्द के समान ही होते हैं। पितृ. जामात, नृ इत्यादि कई एक शब्दों के रूप भ्रातृ शब्द के ही समान होते हैं। पोवल नृ शब्द के षष्ठी के बहुवचन में नृणाम् नृणाम् रूप होते हैं। श्रोकारान्त-गो शब्द (Cow ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गौः गावौ गावः द्वितीया गाम् गावौ गाः तृतीया गवा गाभ्याम् गोभिः चतुर्थी गवे गाभ्याम् । ऐसे दो गाभ्यः संस्कृतशिक्षा एकवचन द्विवचन बहुवचन पशमी गोः गाभ्याम् गाभ्यः षष्ठी गाः गवाः गवाम् सप्तमी गवि गवाः गोषु सम्बोधन गौः पुंलिङ्ग प्रोकारान्त समस्त शब्दों के रूप गो शब्द के समान ही होते हैं। स्त्रीलिङ्ग प्राकारान्त-लता शब्द ( Creeper ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा বন लते लताः द्वितीया लताम् लते लताः तृतीया लतया लताभ्याम् लताभिः चतुर्थी लतायै लताभ्याम लताभ्यः पञ्चमी लतायाः लताभ्यः षष्ठी लतायाः लतयोः लतानाम् सप्तमी लतायाम् लतयाः लतासु सम्बोधन लते प्रायः समस्त प्राकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप लता शब्द के समान ही होते हैं। हुस्स इकारान्त स्त्रीलिङ्ग-मति शब्द ( Mind ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा. मतिः मती मतयः द्वितीया मतिम् मती मती: तृतीया मत्या मतिभ्याम् मतिभिः चतुर्थी मत्यै, मतये मतिभ्याम् मतिभ्यः लताभ्याम् प्रथमो भागः मत्याः, मतेः पकवचन द्विवचन बहुवचन पञ्चमी मतिभ्याम् मतिभ्यः षष्ठी मत्याः, मतेः मत्याः मतीनाम् सप्तमी मत्याम, मतौ मत्याः मतिषु सम्बोधन मते समस्त हुस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप मति शब्द के ही समान होते हैं। दीर्घ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग-नदी शब्द ( River ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा नदी नद्यौ नद्यः द्वितीया नदीम् नद्यौ नदीः तृतीया नद्या नदीभ्याम् नदीभिः चतुर्थी नद्यै नदीभ्याम् नदीभ्यः पञ्चमी नद्याः नदीभ्याम् नदीभ्यः षष्ठी नयाः नद्याः नदीनाम् सप्तमी नधाम नद्योः नदीषु सम्बोधन नदि दीर्घ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग-श्री शब्द ( Beauty ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा श्रीः श्रियौ श्रियः द्वितीया श्रियम थियौ श्रियः तृतीया श्रिया श्रीभ्याम् श्रीभिः चतुर्थी श्रिय, थिये श्रीभ्याम् श्रीभ्यः पञ्चमी श्रियाः, श्रियः श्रीभ्याम् श्रीभ्यः षष्ठी श्रियाः, श्रियः श्रियाः श्रीणाम, श्रियाम् सप्तमी धियाम, श्रियि श्रियाः श्रीषु सम्बोधन श्री ६८ संस्कृतशिक्षा दीर्घ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों में से बहुतेरे शब्द नदी शब्द के समान होते हैं और कुछ शब्द श्री शब्द के ही सदृश होते हैं। यथा-ही, धी, भी इत्यादि शब्दों के रूप श्री शब्द के समान होते हैं। दीर्घ ईकारान्त-स्त्री शब्द (Woman ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा स्त्री स्त्रियो स्त्रियः द्वितीया स्त्रियम्, स्त्रीम स्त्रियो स्त्रियः, स्त्री: तृतीया स्त्रिया स्त्रीभ्याम् स्त्रीमिः चतुर्थी त्रिय स्त्रीभ्याम् स्त्रीभ्यः पञ्चमी स्त्रियाः स्त्रीभ्याम् स्त्रीच्या षष्ठी स्त्रिया: स्त्रियाः स्त्रीणाम् सप्तमी स्त्रियाम् ত্মিস্বীঃ स्त्रीषु सम्बोधन स्त्रि हस्व उकारान्त स्त्रीलिङ्ग-धेनु शब्द ( Cow ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा धेनुः धेनू धेनवः द्वितीया धेनुम् धेनू धेनूः तृतीया धेवा धेनुभ्याम् धेनुभिः चतुर्थी धेन्वै, धेनवे धेनुभ्याम् धेनुभ्यः पञ्चमी धेन्वाः, धेनोः धेनुभ्याम् धेनुभ्यः षष्ठी धेन्वाः, धेनोः धेन्वोः धेनूनाम् सप्तमी धन्धोः धेनुषु सम्बोधन धेनी ह्रस्व उकारान्त स्त्रीलिङ्ग समस्त शब्दों के रूप धेनु शब्द के समान होते हैं। धेन्वाम्, धेनौ प्रथमो भागः द्वितीया धधूम् दीर्घ ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग-वधू शब्द (Daughter-in-law, wife) पकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा वधूः वध्वौ वधौ वधूः तृतीया वध्वा वधूभ्याम् घधूभिः चतुर्थी वध्वै वधूभ्याम् वधूभ्यः पञ्चमी वध्वाः वधूभ्याम् वधूभ्यः षष्ठी वनाः वयोः वधूनाम् सप्तमी वश्वाम वध्योः घधूषु सम्बोधन वधु दीर्घ ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग-भू शब्द ( Eye-brow ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा भ्रूः भ्रवौ भ्रषः द्वितीया भ्रुवम् भ्रुवौ भ्रवः तृतीया भ्रषा भ्रूभ्याम् भ्रूभिः चतुर्थी सुवै, भ्रवे भ्रूभ्याम् भ्रूभ्यः पञ्चमी भ्रवाः, भ्रवः भ्रूभ्याम् भ्रूभ्यः षष्ठी म्रवाः, भ्रमः भ्रुवोः भ्रूणाम, भ्रुवाम् सप्तमी भ्रुधाम्, भ्रुषि ध्रुषोः सम्बोधन भ्रूः दीर्घ ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों में से बहुतेरे शब्द तो षधू शब्द के समान और कई एक शब्दों के रूप 5 शब्द के सदृश होते हैं। चमू ( Army ), चञ्चू ( Beak ), तनू ( Body ), प्रसू ( Mother ) इत्यादि शब्द वधू शब्द के तुल्य हैं । भू ( Earth) शब्द के रूप भू शब्द के समान होते हैं।

प्रथमा संस्कृतशिक्षा ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग-दुहित शब्द (Daughter ) एकवचन द्विवचन बहुवचन दुहिता दुहितरौ दुहितरः द्वितीया दुहितरम् दुहितरौ दुहितः तृतीया दुहित्रा दुहितृभिः चतुर्थी दुहित्रे दुहितृभ्याम् दुहितृभ्यः पञ्चमी दुहितुः दुहितृभ्याम् दुहितृभ्यः षष्ठी दुहितुः दुहित्रोः दुहितृणाम् सप्तमी दुहितरि दुहित्रोः दुहितषु सम्बोधन दुहितः दुहितृभ्याम् केवल स्वस शब्द के अतिरिक्त समस्त ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप दुहित शब्द के समान ही होते हैं । मातृ, यातृ तथा ननान्दू शब्दों के रूप दुहित शब्द के सदश ही होते हैं। ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग-स्वस शब्द ( Sister ) एकवचन द्विवचन बहुववन प्रथमा स्वसा स्वसारौ स्वसारः द्वितीया स्वसारम स्वसारौ स्वसः इनके अतिरिक्त और सब विभक्तियों में स्वस शब्द के रूप भी दुहित शब्द के समान ही होते हैं। नपुंसक लिङ्ग अकारान्त-फल शब्द ( Fruit ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा फलम् फले फलानि द्वितीया फलम् फले फलानि प्रथमो भागः इनके अतिरिक्त दूसरी सब विभकियों में इसके रूप पुंलिङ्ग अकारान्त शब्द के समान हो होते हैं। प्रायः समस्त प्रकारान्त नपुंसक लिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार होते हैं । हस्व इकारान्त नपुंसक लिङ्ग-वारि शब्द ( Water ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा वारि धारिणी वारीणि द्वितीया वारि धारिणी पारीणि तृतीया वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः चतुर्थी वारिणे वारिभ्याम् धारिभ्यः पञ्चमी वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः पष्ठी वारिणः वारिणोः वारीणाम् सप्तमी वारिणि वारिणोः वारिषु सम्बोधन वारे,वारि दधि इत्यादि कतिपय शब्दों के अतिरिक्त प्रायः समस्त हस्व इकारान्त नपुंसक लिङ्ग शब्दों के रूप वारि शब्द के समान ही होते हैं । ह्रस्व इकारान्त नपुंसक लिङ्ग-दधि शब्द ( Curd ) एकवचन द्विषचन बहुवचन प्रथमा दधि दधिनी दधीनि द्वितीया दधि दधिनी दधीनि तृतीया ना दधिभ्याम दधिभिः चतुर्थी दध्ने दधिभ्याम् दधिभ्यः पञ्चमी दनः दधिभ्याम् दधिभ्यः षष्ठी दनः दन्नीः दनाम् सप्तमी दनि, दधनि दनोः दधिषु सम्बोधन दधे, दधि ७२ संस्कृतशिक्षा प्रथमा प्रति, अस्थि तथा सथि शब्दों के रूप अविकल भाव से सब विभक्तियों में दधि शब्द के समान ही होते हैं । हस्व उकारान्त नपुंसक लिङ्ग-मधु शब्द ( Honey ) एकवचन द्विवचन बहुवचन मधु मधुनी मधूनि द्वितीया मधु मधुनी मधूनि तृतीया मधुना मधुभ्याम् मधुभिः चतुर्थी मधुने मधुभ्याम् मधुभ्यः पञ्चमी मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः षष्ठो मधुनः मधुनोः मधूनाम् सप्तमी मधुनि मधुनोः मधुषु सम्बोधन मधो, मधु प्रायः समस्त ह्रस्व उकारान्त नपुंसक लिङ्ग शब्दों के रूप मधु शब्द के समान ही होते हैं । जानु, ( knee , दारु (wood ) अम्बु ( water ), सानु ( Tableland ), इत्यादि शब्दों के रूप भी इसी प्रकार होते हैं। सर्वनाम सर्व शब्द ( All, whole ) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन सर्वः सता सर्वे द्वितीया सर्वम् सबै सर्वान् तृतीया सर्वेण सर्वाभ्याम् सवैः चतुर्थी सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सबैभ्यः पञ्चमी सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः प्रथमा प्रथम भागः सने एकावचन द्विवचन बहुवचन षष्ठी सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् सप्तमी सर्वस्मिन् सर्वयोः सम्वषु नपुंसकलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सर्वम् सधै सर्वाणि द्वितीया सर्वम् सर्वे सर्वाणि अन्यान्य विभक्तियों में इसके रूप पुंलिङ्ग के समान होते हैं। सर्वनाम शब्दों का सम्बोधन नहीं होता। स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सस सर्वे सर्वाः द्वितीया सर्वाम् सर्वाः तृतीया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः चतुर्थी सर्वस्यै सर्वाभ्याम् सवाभ्यः पञ्चमी सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः षष्ठी सर्वस्याः सम्धयोः सर्वासाम् सप्तमी सर्वस्याम् सर्वयोः सर्वासु 'अन्य' शब्द का रूप भी बिल्कुल 'सर्च' शब्द के समान ही होता है । केवल नपुंसक लिङ्ग की प्रथमा तथा द्वितीया के एक- वचन में "अन्यत्" ऐसा पद होता है। पूर्व शब्द ( East) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पूर्वः पूर्वी पूर्वे, पूर्वाः द्वितीया पूर्वम् पूर्वी पूर्वान् सर्वया प्रथमा ७४ संस्कृतशिक्षा एकवचन द्विवचन बहुवचन तृतीया पूर्वेण पूर्वाभ्याम पूर्वैः चतुर्थी पूर्वस्मै पूर्वाभ्याम् पूर्वेभ्यः पञ्चमी पूर्वस्मात्,पूर्वात् पूर्वाभ्याम् पूर्वेभ्यः षष्ठी पूर्वस्य पूर्वयोः पू० षाम् सप्तमी पूर्वस्मिन्, पूर्वे पूर्वयोः पूर्वेषु नपुंसक लिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन पूर्वम् पूर्व पूर्वाणि द्वितीया पूर्वम् पूर्वे पूर्वाणि अन्यान्य विभक्तियों के रूप पुंलिङ्ग के समान होते हैं । स्त्रीलिङ्ग में, इसके रूप 'सर्व' सर्व' शब्द के समान होते हैं, किसी विभक्ति तथा वचन में कोई भेद नहीं पड़ता। पर, अपर, दक्षिण, उत्तर इत्यादि कई एक शब्द पूर्व' शब्द के समान ही चलते हैं। अस्मद् शब्द (I) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अहम् भावाम् घयम् द्वितीया माम्, मा अस्मान्, नः तृतीया मया श्रावाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी प्रावाभ्याम् नौ अस्मभ्यम्, नः पञ्चमी मत् श्रावाभ्याम् प्रस्मत् षष्ठो आवयोः, नौ अस्माकम् नः सप्तमी मयि श्राषयोः अस्मासु तीनों लिङ्गों में ही इसके रूप समान होते हैं । श्रावाम, नौ मह्यम्, मे मम, मे प्रथमो भागः ७५ तुभ्यम्, ते युवयोः, धाम् युष्मद् शब्द (You) द्विवचन बहुवचन प्रथमा त्वम् युवाम् यूयम् द्वितीया त्वाम्, त्वा युवाम्, वाम् युग्मान, वः तृतीया त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः चतुर्थी युवाभ्याम् थाम् युष्मभ्यम्, वः पञ्चमी त्वत् युवाभ्याम् युष्मत् षष्ठी तष, ते युष्माकम्, वः सप्तमी स्वाय यषयोः युप्मासु तीनों लिङ्गों में ही समान रूप होते हैं, कोई भेद नहीं होता। इदम् शब्द ( This) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा श्रयम् इमौ इमे द्वितीया इमम् एनम् इमौ एनौ इमान् एनान् तृतीया अनेन एनेन प्राभ्याम् एभिः चतुर्थी अस्मै प्राभ्याम् एभ्यः पञ्चमी अस्मात् प्राभ्याम् एभ्यः षष्ठी अस्य अनयोः एनयोः एषाम् सप्तमी अस्मिन् अनयो: एनयोः एषु नपुंसक लिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा इदम् इमे इमानि द्वितीया इदम् एनत् इमे एने इमानि एनानि संस्कृतशिक्षा अन्यान्य विभक्तियों में पुंलिङ्ग के समान ही रूप होते हैं । स्त्रीलिङ्ग पकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा इयम् इमे मा: द्वितीया इभाम् एनाम् इमे एने इमाः पना: तृतीया प्रनया एनया प्राभ्याम् माभिः चतुर्थी अस्यै श्राभ्याम् प्राभ्यः पञ्चमी अस्याः श्राभ्याम् प्राभ्यः षष्ठी प्रस्थाः अनयोः एनयोः श्रासाम् सप्तमी अस्याम् अनयोः एनयोः प्रासु किम शब्द ( Who; which; what पुंलिङ्ग पकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा को के द्वितीया कम् को कान तृतीया केन काभ्याम कैः चतुर्थी कस्मै काभ्याम् पञ्चमी कस्मात् काभ्याम केभ्यः षष्ठी कस्य कयोः सप्तमी कस्मिन् कयोः केषु नपुंसक लिङ्ग एकवचन द्विषचन बहुवचन प्रथमा किम् कानि द्वितीया किम् कानि केषाम् प्रथमो भागः अन्यान्य विभक्तियों के रूप पुंलिङ्ग के समान होते हैं । स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा का के काः द्वितीया काम काः तृतीया काभ्याम् काभिः चतुर्थी कस्यै काभ्याम् पञ्चमी कस्याः काभ्याम् काभ्यः षष्ठी कस्याः कयोः कासाम् सप्तमी कस्याम् कयोः कासु यद् शब्द (Who, which, that) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन यौ ये प्रथमा द्वितीया यौ यान् तृतीया येन याभ्याम् यः चतुर्थी यस्मै याभ्याम् पञ्चमी येभ्यः यस्मात् याभ्याम् षष्ठी यस्य ययोः येषाम् सप्तमी यस्मिन् ययोः येषु नपुंसक लिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन ये यानि प्रथमा यत् द्वितीया यत् यानि स०शि०प्र०- यम् ये द्वितीया यस्याम् संस्कृतशिक्षा अन्यान्य विभक्तियों में पुलिङ्ग के समान रूप होते हैं। स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा ये याः याम् ये याः तृतीया यया याभ्याम् याभिः चतुर्थी यस्यै याभ्याम् याभ्यः पञ्चमी यस्याः याभ्याम् याभ्यः षष्ठी यस्याः ययोः यासाम् सप्तमी ययाः यासु तद् शब्द ( He, She, lt) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन तौ ते प्रथमा द्वितीया तम तौ तान् तृतीया तेन ताभ्याम् तैः चतुर्थी तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः पञ्चमी तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः षष्ठी तस्य तयोः तेषाम् सप्तमी तस्मिन् तयाः तेषु नपुंसक लिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा तत् ते तानि द्वितीया तत् ते तानि प्रथम भागः ७६ प्रथम सा ताः तद् और सब विभक्तियों में पुंलिङ्ग के समान रूप होते हैं । स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन ते द्वितीया ताम ते ताः तृतीया तया ताभ्याम ताभिः चतुर्थी तस्यै ताभ्याम् पञ्चमी तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः षष्ठी तस्याः तयाः तासाम् सप्तमी तस्याम् तयाः तासु एतद् शब्द सब विभक्तियों तथा वचनों में अविकल रूप से शब्द के समान ही होता है, केवल इसमें एकार मात्र अधिक होता है । और पंलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग में प्रथमा के एकवचन में इसके रूप में मूर्धन्य षकार का आदेश हो जाता है । यथा एषः, एषा, इत्यादि। अदम् शब्द पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा असौ प्रमू प्रमी द्वितीया अमुम् श्रमू अमून् तृतीया अमुना अमूभ्याम् अमीभिः चतुर्थी अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः पञ्चमी अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः षष्ठी अमुष्य अमुयाः अमीषाम् सप्तमी अमुख्मिन् अमुयोः अमीषु नपुंसकलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अद: अमू प्रमूनि द्वितीया अमू अमूनि शेष सब विभक्तियों में पुंलिङ्ग के समान ही रूप होते हैं स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा असो अमू मूः द्वितीया अमूम् श्रमू अमूः तृतीया प्रमुया श्रमूभ्याम् प्रमूभिः चतुर्थी अमुष्य अमूभ्याम् अमूभ्यः पश्चमी अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः षष्ठी अमुष्याः अमुयोः अमूषाम सप्तमी अमुष्यास अमुयोः अमूषु ॥ इति शम्॥ Printed by RAMZAN ALI SHAH at the National Prese, Allahabad.

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संस्कृत शिक्षा प्रथमो भागः

Author
Bhattaachaary Shaaradaa Prasaad
Title
Sanskrxt Shikshhaa Prathamo Bhaag:
File name
संस्कृत शिक्षा प्रथमो भागः
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2006/03/24
Publisher
Ram Narain Lal, Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
84
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
LANGUAGE LINGUISTICS LITERATURE
DLI number
477398
Barcode
99999990173255.00
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