University Liberey Allahabad

K Athopanishad

Shankar Bhashaya · 30.05.06

PDF Proofread

Front matter

कठोपनिषद् सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित

मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं. १९९२ से १९९९ तक १३,२५०
सं० २००२ पञ्चम संस्करण ३,०००
सं० २००८
संस्करण १०,०००
कुल २६,२५०
मूल्य 1) नौ आना

प्राकथन । । कठोपनिषद् कृष्णयजुर्वेदकी कठशाम्बाके अन्तर्गत है। इसमें यम और नचिकेताके संवादम्पम ब्रह्मविद्याका बड़ा विशद वर्णन किया गया है। इसकी वर्णनशैली बड़ी ही सुवाध और सरल है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी इसके कई मन्त्रोंका कही शब्दतः और कही अर्थतः उल्लेख है। इसमे, अन्य उपनिषदोकी भाँति जहाँ तत्त्वज्ञानका गम्भीर विवेचन है वहाँ नचिकताका चरित्र पाठकोंके सामने एक अनुपम आदर्श भी उपस्थित करता है। जब वे देखते हैं कि पिताजी जीर्ण-शीर्ण गौएँ तो ब्राह्मणोंको दान कर रहे हैं और दूध देनेवाली पुष्ट गाये मेरे लिये रख छोड़ी है तो बाल्यावस्था होनेपर भी उनकी पितृभक्ति उन्हे चुप नहीं रहने देती और वे बालसुलभ चापल्य प्रदर्शित करते हुए वाजश्रवास पूछ बैठते हैं-'तत कमै मां दास्यसि' (पिताजी ! आप मुझे किसको देगे? ) उनका यह प्रश्न ठीक ही थाः क्योंकि विश्वजित् यागमे सर्वस्व दान किया जाता है, और ऐसे सत्पुत्रका दान किये बिना वह पूर्ण नहीं हो सकता था। वस्तुतः सर्ववदान तो तभी हो सकता है जब कोई वस्तु 'अपनी न रहे और यहाँ अपने पुत्रके माहसे ही ब्राह्मणोंको निकम्मी और निरर्थक गौएँ दी जा रही थी. अतः इस मोहसे पिताका उद्धार करना उनके लिये उचित ही था।

-- ( ४ ) इसी तरह कई बार पूछनेपर जब वाजश्रवान खीझकर कहा कि मैं तुझे मृत्युको दूंगा, तो उन्होंने यह जानकर भी कि पिताजी क्रोधवश ऐसा कह गये हैं, उनके कथनकी उपेक्षा नहीं की। महाराज दशरथने वस्तुस्थितिको बिना समझे ही कैकेयीको वचन दिये थे; किन्तु भगवान् रामने उनकी गम्भीरताका निर्णय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझी । जिस समय द्रौपदीके स्वयंवरमें अर्जुनने मत्स्यवेध किया और पाण्डवलोग द्रौपदीको लेकर अपने निवास- स्थानपर आये उस समय माता कुन्तीने बिना जाने-बूझे घरके भीतरसे ही कह दिया था कि 'सव भाई मिलकर भोगो'। माताकी यह उक्ति सर्वथा लोकविरुद्ध और भ्रान्तिजनित थी, परन्तु मातृभक पाण्डवोंको उसका अक्षरशः पालन ही अभीष्ट हुआ । ऐसा ही प्रसङ्ग नचिकेताके सामने उपस्थित हुआ और उन्होंने भी अपने पिताके वचनकी रक्षाके लिये उनके मोहजनित वात्सल्य और अपने ऐहिक जीवनको सत्यकी वेदीपर निछावर कर दिया। हमारे बहुत-से भाइयोंको इस प्रकारके अनभिप्रेत और अनर्गल कथनकी मर्यादा रखनेके लिये इतना सरदर्द मोल लेना कोरी और भोलापन ही जान पड़ेगा। किन्तु उन्हें इसका रहस्य समझनेके लिये कुछ गम्भीर विचारकी आवश्यकता है। योगदर्शनके साधन- पादमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह-इन पाँच यमोका नाम-निर्देश करनेके अनन्तर ही कहा है-'जातिदेशकाल- समयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्' (यो० सू०२ । ३१ ) अर्थात् जाति, देश, काल और कर्तव्यानुरोधकी अपेक्षा न करते हुए इनका सर्वथा पालन करना महाव्रत है तथा जाति, देश और कालादिकी अपेक्षासे पालन करना अल्पव्रत कहलाता है। इनमें अल्पव्रतमें ही लोकाचार, सुविधा और हानि-लाभ आदिके विचारकी गुंजाइश है। उसे हम व्यावहारिक धर्म कह सकते हैं । वह किसी विशेष सिद्धिका कारण नहीं हो सकता; सिद्धियोंकी प्राप्ति तो महाव्रतसे ही होती है। योगदर्शनमें इससे आगे जो भिन्न-भिन्न यम-नियमादिकी प्रतिष्ठासे भिन्न-भिन्न सिद्धियोंकी प्राप्ति बतलायी है वह महाव्रतीको ही हो सकती है। इस प्रकारका महाव्रत, व्यवहारी लोगोंकी दृष्टिमें , । भले ही व्यर्थ आग्रह और मानसिक सङ्कीर्णता जान पड़े तथापि वह परिणाममें सर्वदा मङ्गलमय ही होता है। भगवान् गमका वनवास. परशुरामजीका मातृवध, पूरुका यौवनदान तथा पाँच पाण्डवोंका एक ही द्रोपदी के साथ पाणिग्रहण करना-ये सब प्रसङ्ग इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं। ऐसा ही नचिकेताके साथ भी हुआ ! उनका यमलोक-गमन उन्हींके लिये नहीं उनके पिताके लिये और सारे संसारके लिये भी कल्याणकर ही हुआ। यमलोकमें पहुँचनपर भी जबतक यमराजस उनकी भेंट नहीं हुई तबतक उन्होंने अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। इससे भी उनकी प्रौढ सत्यनिष्ठाका पता लगता है। उनका शरीर यमराजको दान दिया जा चुका था, अतः अब उसपर यमराजका ही पूर्ण अधिकार थाः उनका तो सबसे पहला कर्तव्य यही था कि वे उसे धर्मराजको सौंप दें। इसीस व भोजनाच्छादनादिकी चिन्ता छोड़कर यमराजके द्वारपर ही पड़े रहे । तीन दिन पश्चात् जब यमराज आये तो उन्होंने उन्हें एक-एक दिनके उपवासके लिये एक-एक वर दिया। इससे अतिथिसत्कारका महत्त्व प्रकट होता है। अनिधिकी उपेक्षा करनेस कितनी हानि होती है-यह वात वहाँ ( अ०१. व०१ मं०७.८ में) स्पष्टतया बतलायी गयी है। इसपर नचिकेतान यमराजस जो तीन वर माँग हैं उनके क्रममें भी एक अद्भुत रहस्य है। उनका पहला वर था पितृपरितोष। वे पिताके सत्यकी रक्षाके लिये उनकी इच्छाके विरुद्ध यमलोकका चले आये थे। इससे उनके पिता स्वभावतः बहुत खिन्न थे। इसलिये उन्हें सबसे पहले यही आवश्यक जान पड़ा कि उन्हें शान्ति मिलनी चाहिये । यह नियम है कि यदि हमारे कारण किसी व्यक्तिको खद हो तो, जवतव म उसका म्वेद निवृत्त न कर देंगे, हमें भी शान्ति नहीं मिल सकती। यह नियम मनुष्यमात्रके लिये समान है। और यहाँ तो स्वयं उनके पूज्य पिताको ही खेद थाः इसलिये सबस पहले उनकी शान्ति अभीष्ट होनी ही चाहिये थी। यह पितृपरितोष उनकी दृष्ट शान्तिका कारण था, इसलिये सबसे पहले उन्होंने यही वर माँगा। ।

लौकिक शान्तिके पश्चात् मनुष्यको स्वभावसे ही पारलौकिक सुखकी इच्छा होती है। यहाँतक कि जब वह अधिक प्रबल हो जाती है तो वह ऐहिक सुखकी कुछ भी परवा नहीं करता। इसीलिये नचिकेताने भी दूसरे वरस पारलौकिक सुख यानी स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधनभूरी अग्निविज्ञान माँगाः किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे स्वर्गसुखके इच्छुक थे। जिस प्रकार उनके पहले वरमें पिताकी शान्तिकामना थी उसी प्रकार इसमें मनुष्यमात्र- की हितचिन्ता थी। सबके हितमें उनका भी हित था ही। वे स्वयं स्वर्गसुखके लिये लालायित नहीं थे। यह बात उस समय स्पष्ट हो जाती है जब यमराजके यह कहनेपर कि- ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामा श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ।। (१ । १ । २५) वे कहते हैं- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकेतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥२६॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राइम चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥ अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः कधःस्थः अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्धे जीविते को रमेत ॥२८॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥ (अ० १ व० १) उपर्युक्त उद्धरणोंसे उनकी तीव्र जिज्ञासा और आत्मदर्शनकी अनवरत पिपासा स्पष्ट प्रतीत होती है। इसीसे प्रेरित होकर उन्होंने प्रजानन् ।

तृतीय वर माँगा था। यमराजने उनकी जिासाकी परीक्षाके लिये उन्हें तरह-तरहक प्रलोभन दिये और बड़े-बड़े मनमोहक सब्जबाग दिखलाये, परन्तु अन्मान के लिये लालायित नचिकेताने उनपर कोई दृष्टि न देकर यही कहा 'वरस्तु में वरणीयः स एव 'नान्यं तस्मानचिकेता वृणीत' इत्यादि। इस प्रकार, जब यमराजने देखा कि व लौकिक और पारलौकिक भोगोंस सर्व उदासीन हैं, उनमें पूर्ण विवेक विद्यमान है, वे शम- दमादि साधनोंसे सर्वधा सम्पन्न हैं और उनमें तीन मुमुक्षाकी प्रच्छन्न अग्नि तेजीसे धधक रही है तो उन्हें उनकी शान्तिके लिय ज्ञानामृतकी वर्षा करनी पड़ी। वह ज्ञानवर्षा ही सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेके लिये आज भी कठोपनिषद्के रूपमें विद्यमान है। परन्तु उससे विशुद्ध बोधरूप अंकुर तो उसी हृदयमें प्रस्फुटित हो सकता है जो नचिकेताके समान साधनचतुष्टयसम्पन्न है । परम उदार पयोधर जल तो सभी जगह बरसाते है। परन्तु उससे परिणाम भिन्न-भिन्न भूमियोंके योग्यतानुसार मिन्न-भिन्न होता है। ठीक यही बात शस्त्रोपदेशके विषयमें भी है । शास्त्रकृपा और ईश्वरकृपा तो सीपर समान है। परन्तु आत्मकृपाकी न्यूनःधिकताके कारण उससे होनेवाले परिणामोंमें अन्तर रहता है। हम उस अनुपम अमृतका पानकर अमर जीवन प्राप्त कर सके-ऐसी तीव्र आकाङ्गासे हमें उससे लाभान्वित होनेकी योग्यता प्राप्त करनी चाहियः क्योंकि "इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहा- वेदीन्महती विनष्टिः' ( के० उ०२।५) इस श्रुतिके अनुसार इस मानवजीवनका परमलाभ आत्मामृनकी प्राप्ति ही है। इसलिये इसकी प्राप्ति ही हमारा प्रथम कर्तव्य है। भगवानसे प्रार्थना है कि वे हमें उसकी प्राप्तिकी योग्यता प्रदान करें। ---अनुवादक श्रीहरिः विषय-सूची विषय .. १. शान्तिपाठ २. सम्बन्ध-भाष्य ११ प्रथम अध्याय प्रथमा वल्ली ... १२ :: २४ ३. वाजश्रवसका दान ४. नचिकेताकी शङ्का ५. पिता-पुत्र-संवाद ६. यमलोकमें नचिकेता ७. यमराजका वरप्रदान ८. प्रथम वर-पितृपरितोष ९. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन १०. द्वितीय वर-वर्गसाधनभूत अग्निविद्या ११. नाचिकेत अग्निचयनका फल १२. तृतीय वर-आत्मरहस्य १३. नचिकेताकी स्थिरता १४. यमराजका प्रलोभन २५. नचिकेताकी निरीहता द्वितीया वल्ली १६. श्रेय-प्रेयविवेक १७. अविद्याग्रस्तोंकी दुर्दशा १८. आत्मज्ञानकी दुर्लता १९. कर्मफलकी अनिल ... ४३ ४९ ... ६१ (९) 220 ६३ ६४ २०. नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा २१, आत्मज्ञानका फल २२. सर्वातीत वस्तुविषयक प्रश्न २३. ओङ्कारोपदेश २४. आत्मस्वरूपनिरूपण २५. आत्मा आत्मकृपासाध्य है २६. आत्मज्ञानका अनधिकारी .. ९ तृतीया वल्ली -- ८७ .. ८८ .. .. २७. प्रामा और प्राप्तव्य-भेदसे दो आत्मा २८. शरीरादिमे सम्बन्धित रथादि रूपक २९. अविवेकीकी विवशता ३०.विवेकीकी स्वाधीनता ३१. अविवेकीकी संसारप्राप्ति ३२. विवेकीकी परमपदप्राप्ति ३३. इन्द्रियादिका तारतम्य ३४. आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है ३५. लयचिन्तन ३६. उद्बोधन ३७. निर्विशेष आत्मज्ञानमे अमृतत्वप्राप्ति ३८. प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा ९८ C द्वितीय अध्याय प्रथमा वल्ली ३९. आत्मदर्शनका विन्न-इन्द्रियोकी बहिर्मुखता ४०. अविवेकी और विवेकीका अन्तर ४१. आत्मज्ञकी सर्वज्ञता ४२. आत्मज्ञकी निःशोकता ४३. आत्मज्ञकी निर्भयता ...

११५ ... ११९ ... १२१ ... १२२ १२४ ... ... ... १३२ ... १३४ ... १३५ ... ( १० ) ४४. ब्रह्मज्ञका सार्वात्म्यदर्शन ४५. अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि ४६. प्राणमे ब्रह्मदृष्टि ४७. भेददृष्टिकी निन्दा ४८. हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म ४९. भेदापवाद ५०. अभेददर्शनकी कर्तव्यता द्वितीया वल्ली ५१. प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान ५२. देहस्थ आत्मा ही जीवन है ५३. मरणोत्तरकालमें जीवकी गति ५४. गुह्य ब्रह्मोपदेश ५५. आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व ५६. आत्माकी असङ्गता ५७. आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है ५८. सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व तृतीया वल्ली ५९. संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष ६०. ईश्वरके ज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति ६१. सर्वशासक प्रभु ६२. ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति ६३. स्थानभेदसे भगवदर्शनमें तारतम्य ६४. आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन ६५. परमपदप्राप्ति ६६. आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है ६७. अमर कब होता है ? ६८. उपसंहार ६९. शान्तिपाठ १३७ ... .. ... १४३ ... ... १५० १५१ ... १५२ १५९ १६२ ... १७० ...

कठोपनिपद्
harubina
MA
Tharuft
Ramana
यम और नचिकेता

तत्सद्ब्रह्मणे नमः
कठोपनिपद
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
यस्मिन् सर्वं यतः सर्व यः सर्व सर्वहक्तथा।
सर्वभावपदातीतं स्वात्मानं तं स्मराम्यहम् ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य
करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु ।
मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
वह परमात्मा हम ( आचार्य और शिष्य ) दोनोंकी साथ-साथ
रक्षा करें। हम दोनोंका साथ-साथ पालन करें। हम साथ-साथ विद्या-
सम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें । हम दोनोंका पढ़ा हुआ तेजस्वी हो । हम
द्वेष न करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो।

१२ कठोपनिषद् सम्बन्ध-भाष्य केतसे च। निरुक्तिः ॐ नमो भगवते वैवखताय ॐ ब्रह्मविद्याके वाचार्य सूर्य- मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचि-| पुत्र भगवान् यम और नचिकेताको नमस्कार है। अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां अब कठोपनिषद्की वल्लियोंको सुखार्थप्रबोधनार्थम् अल्पग्रन्था सुगमतासे समझानेके लिये इस वृत्तिरारभ्यते। संक्षिप्त वृत्तिका आरम्भ किया जाता है। सदेर्धातोर्विशरणगत्यवसा विशरण ( नाश ), गति और दनार्थस्योपनिपूर्व- | अवसादन (शिथिल करना )-इन तीन अर्थोंवाली तथा 'उप' और उपनिषच्छब्दार्थ स्य किप्प्रत्यया- नि' उपसर्गपूर्वक एवं विप्' प्रत्ययान्त 'सद्' धातुका उपनिषद्' न्तस्य रूपमुपनिष- | यह रूप बनता है । उपनिषद् शब्दसे, जिस प्रन्यकी हम व्याख्या दिति । उपनिषच्छब्देन च करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्य- | और वेद्य ब्रह्मविषयक विधाका वस्तुविषया विद्योच्यते । केन प्रतिपादन किया जाता है। किस अर्थका योग होनेके कारण उपनिषद् पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन शब्दसे विद्याका कथन होता है, विद्योच्यत इत्युच्यते । सो बतलाते हैं। ये मुमुक्षवो दृष्टानुश्रविकवि जो मोक्षकामी पुरुष लौकिक और पारलौकिक विषयोंसे विरक्त षयवितृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्द- होकर उपनिषद् शब्दकी वाच्य तथा वाच्यां वक्ष्यमाणलक्षणां विद्या- | आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त विद्याके समीप जाकर अर्थात् उसे मुपसद्योपगम्य तनिष्ठतया निश्च- प्राप्तकर उसीकी निष्ठासे निश्चय- येन शीलयन्ति तेषामविद्यादेः । पूर्वक उसका परिशीलन करते हैं যার্থ १३ . संसारबीजस्य विशरणाद्धिंसनाद् | उनके - अविद्या आदि संसारके विनाशनादित्यनेनार्थयोगेन विद्या बीजका विशरण-हिंसन अर्थात् विनाश करनेके कारण इस अर्थके उपनिषदित्युच्यते । तथा च योगसे ही ·उपनिषद्' शब्दसे वह वक्ष्यति-"निचाय्य तं मृत्यु- विद्या कही जाती है । ऐसा ही मुखात्प्रमुच्यते" ( क० उ०१। आगे श्रुति कहेगी भी कि “उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्युके ३ । १५) इति । मुखसे छूट जाता है।" पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षुन्या परं अथवा पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त मुमुक्षुओंको ब्रह्मविद्या परब्रह्मके ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मगमयितृत्वेन पास पहुँचा देती है- इस प्रकार योगाद्ब्रह्मविद्योपनिषद् । तथा च ब्रह्मके पास पहुँचानेवाली होनेके कारण इस अर्थके योगसे भी ब्रह्म- वक्ष्यति-"ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभू- | विद्या 'उपनिषद्' है । ऐसा ही "ब्रह्मको प्राप्त हुआ पुरुष विरज द्विमृत्युः" (कउ०२ । ३ । १८) ( शुद्ध ) और विमृत्यु (अमर ) हो इति । गया” इस वाक्यसे श्रुति आगे कहेगी भी। लोकादिर्ब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्त जो अग्नि भूः, भुवः आदि लोकोंसे पूर्वसिद्ध, ब्रह्मासे उत्पन्न द्विषयाया विद्याया द्वितीयेन और ज्ञाता है उससे सम्बन्ध रखने- वरेण प्रार्थ्यमानायाः स्वर्गलोक- वाली विद्या, जो कि दूसरे वरसे माँगी गयी है, और स्वर्गलोकरूप फलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवासजन्म- फलकी प्राप्तिके कारणरूपसे लोकान्तरोंमें पुनः-पुनः प्राप्त होने- जरायुपद्रववृन्दस्य लोकान्तरे वाले गर्भवास, जन्म और वृद्धावस्था आदि उपद्रवसमूहका अवसादन पौनःपुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयित- अर्थात् शैथिल्य करनेवाली है, अतः त्वेन शैथिल्यापादनेन धात्वर्थ- | वह अग्निविद्या भी “सद्' धातुके - १४ कठोपनिषद् , योगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्य- | अर्थके योगसे 'उपनिषद्' कही । तथा च वक्ष्यति-"स्वर्ग- जाती है । "स्वर्गलोकको प्राप्त होने- लोका अमृतत्वं भजन्ते" ( क० | वाले पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं।" उ०१।१ । १३ ) इत्यादि । ऐसा आगे कहेंगे भी । ननु चोपनिषच्छब्देनाध्ये- शङ्का-किन्तु अध्ययन करने- वाले तो 'उपनिषद्' शब्दसे ग्रन्थ- तारो ग्रन्थमप्यभिलपन्ति । उप-| का भी उल्लेख करते हैं, जैसे—'हम उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते निषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च । हैं। इत्यादि। एवं नैष दोषोऽविद्यादिसंसार समाधान- ऐसा कहना भी दोषयुक्त नहीं है। संसारके हेतु- हेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य | भूत अविद्या आदिके विशरण आदि जो कि सद्' धातुके अर्थ हैं, ग्रन्थमात्रमें तो सम्भव नहीं हैं ग्रन्थमात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां किन्तु विद्यामें सम्भव हो सकते हैं। सम्भवात् । ग्रन्थस्यापि तादर्थेन | ग्रन्थ भी विद्याके ही लिये है। इसलिये वह भी उस शब्दसे कहा तच्छब्दत्वोपपत्तेः, आयुर्वै घृत- जा सकता है; जैसे [ आयुवृद्धिमें उपयोगी होनेके कारण ] 'घृत आयु मित्यादिवत् । तसाद्विद्यायां ही है। ऐसा कहा जाता है। इसलिये ‘उपनिषद्' शब्द विद्यामें मुख्यया वृत्त्योपनिषच्छब्दो मुख्य वृत्तिसे प्रयुक्त होता है तथा वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति । ग्रन्थमें गौणी वृत्तिसे । एवमुपनिषनिर्वचनेनैव विशि इस प्रकार 'उपनिषद्' शब्दका निर्वचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट ष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः । विष- अधिकारी बतला दिया गया । यश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परं तथा विद्याका प्रत्यगात्मस्वरूप पर- शाङ्करभाष्यार्थ १५ ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं | ब्रह्मरूपं विशिष्टविषय भी कह दिया। इसी प्रकार इस उपनिषद्- चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी का संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति संसारनिवृत्तिब्रह्मप्राप्तिलक्षणा और ब्रह्मप्राप्तिरूप प्रयोजन तथा इस प्रकारके प्रयोजनसे इसका सम्बन्धश्चैवभूतप्रयोजनेनोक्तः। [साध्य-साधनरूप ] सम्बन्ध भी अतो यथोक्ताधिकारिविषयप्रयो- | बतला दिया । अतः उपर्युक्त जनसम्बन्धाया विद्यायाःकरतल- अधिकारी, विषय, प्रयोजन और न्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन सम्बन्धवाली विद्याको करामलकवत् प्रकाशित करनेवाली होनेसे ये विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजन- कठोपनिषद्की वल्लियाँ विशिष्ट सम्बन्धा एता वल्लयो भवन्ति अधिकारी, विषय, प्रयोजन और इत्यतस्ता यथाप्रतिभानं सम्बन्धवाली है, सो हम उनकी व्याचक्ष्महे । यथामति व्याख्या करते हैं।

দ্মশ্র স্থা पथमा वल्ली -OGIO वै वाजश्रवसका दान उशन्ह वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥ प्रसिद्ध है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [ विश्वजित यज्ञमें ] अपना सारा धन दे दिया । उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था ॥१॥ तत्राख्यायिका विद्यास्तु- यहाँ जो आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है । उशन् त्यर्था । उशन्कामयमानः, ह अर्थात् कामनावाला । ह' और वै। ये निपात पहले बीते हुए वा इति वृत्तार्थस्सरणार्थौ निपातौ । वृत्तान्तको स्मरण करानेके लिये हैं। 'वाज' अन्नको कहते हैं; वाजमन्नं तदानादिनिमित्तं श्रवो उसके दानादिके कारण जिसका यशो यस्य स वाजश्रवा रूढितो श्रव यानी यश हो उसे वाजश्रवा कहते हैं; अथवा रूढिसे भी वा । तस्यापत्यं वाजश्रवसः किल यह उसका नाम हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवसने, विश्वजिता सर्वमेधेनेजे तत्फलं जिसमें सर्वस्व समर्पण किया जाता कामयमानः । स तसिन्क्रतौ सर्व- है उस विश्वजित् यज्ञद्वारा उसके फलकी इच्छासे यजन किया । उस वेदसं सर्वस्खं धनं ददौदत्तवान् । यज्ञमें उसने सर्ववेदस् यानी अपना वली १] शाङ्करभाष्याथ तस्य यजमानस्य ह नचिकेता | सारा धन दे डाला। कहते हैं, उस यजमानका नचिकेता नामक नाम पुत्रः किलास बभूव ॥ १॥| पुत्र था ॥ १ ॥ तह कुमार सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धा- विवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥ जिस समय दक्षिणाएँ ( दक्षिणाखरूप गौएँ) ले जायी जा रही थीं, उसमें—यद्यपि अभी वह कुमार ही था--श्रद्धा ( आस्तिक्यबुद्धि) का आवेश हुआ । वह सोचने लगा ॥ २ ॥ तं ह नचिकेतसं कुमारं जो कुमार अर्थात् प्रथम अवस्थामें प्रथमवयसं ही स्थित है और जिसे पुत्रोत्पादन- सन्तमप्राप्तजनन- की शक्ति प्राप्त नहीं हुई, उस शक्तिं बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः बालक नचिकेतामें श्रद्धाका अर्थात् पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रवि- पिताकी हितकामनासे प्रयुक्त ष्टवती। कस्मिन्काल इत्याह आस्तिक्यबुद्धिका आवेश-प्रवेश हुआ। किस समय प्रवेश हुआ? इस- ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षि- पर कहते हैं-जिस समय ऋत्विक णासु नीयमानासु विभागेनोप- और सदस्योंके लिये दक्षिणाएँ नीयमानासु दक्षिणार्थासु गोषु लायी जा रही थी अर्थात् दक्षिणांके लिये विभाग करके गौएँ लायी जा 'स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अम-रही थीं, उस समय नचिकताने न्यत॥२॥ श्रद्धाविष्ट होकर विचार किया ॥२॥ कथमित्युच्यते- किस प्रकार विचार किया सो बतलाते हैं- क० उ०२- १८ कठोपनिषद् [अध्यारा नचिकेताकी शङ्का पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दानाम ते लोकास्तान्स गच्छतिता ददत् ॥३॥ जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्तिका भी अभाव हो गया है उन गौओंका दान करनेसे वह दाता, जो अनन्द ( आनन्दशून्य ) लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥ ] दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते दक्षिणाके लिये लायी दुई गौओंका विशेषण बतलाते हैं; पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, जिन्होंने जल पी लिया है, जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्ध- वे पीतोदका कहलाती हैं, तृणाः, दुग्धोः दोहः क्षीराख्यो | जो तृण (घास ) खा चुकी हैं [अर्थात् जिनमें और घास खानेकी यासां ता दुग्धदोहाः, निरि- शक्ति नहीं रही है ] वे जग्धतृणा न्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा हैं, जिनका क्षीर नामक दोह दुहा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता जा चुका है वे दुग्धदोहा हैं तथा निरिन्द्रिया--जो सन्तान उत्पन एवंभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणा- करनेमें असमर्था अर्थात् बूढ़ी और बुद्धया ददत्प्रयच्छन्ननन्दा | निष्फल गौएँ हैं उन इस प्रकारकी अनानन्दा असुखा नामेत्येतद्ये | गौओंको दक्षिणा-बुद्धिसे देनेवाला यजमान जो अनन्द अर्थात् सुख- लोकास्तान्स यजमानो हीन लोक हैं उन्हींको गच्छति ॥ ३॥ जाता है ॥ ३॥ ते वल्लो १] আহ্বৰসাত্যায় पिता-पुत्र-संवाद स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥ तब वह अपने पितासे बोला--'हे तात ! आप मुझे किसको देंगे ?' इसी प्रकार उसने दुबारा-तिबारा भी कहा । तब पिताने उससे मैं तुझे मृत्युको दूंगा' ऐसा कहा ॥ ४ ॥ करना तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं तब इस प्रकार यज्ञकी पूर्णता न होनेके कारण पिताको प्राप्त पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता होनेवाला अनिष्ट फल मुझ-जैसे निवारणीयमात्मप्रदानेनापि क्रतु-| सत्पुत्रको आत्मबलिदान करके भी सम्पत्तिं कृत्वेत्येवं मत्वा पितरम् | निवृत्त चाहिये-ऐसा उपगम्य स होवाच पितरं हे मानकर वह पिताके समीप जाकर तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय बोला-'हे तात ! आप मुझे किस ऋत्विग्विशेषको दक्षिणामें दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसी- देंगे? इस प्रकार कहनेपर पिता- त्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्य- द्वारा बारम्बार उपेक्षा किये जानेपर माणोऽपि द्वितीयं तृतीयमप्युवाच | भी उसने दूसरे-तीसरे बार भी यही कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां बात कही कि 'मुझे किसको देंगे ? दास्यसीति । नायं कुमारस्वभाव मुझे किसको देंगे ?' तब पिता यह सोचकर कि यह बालकोंके से इति क्रुद्धः सन्पिता तंह पुत्रं खभाववाला नहीं है, क्रोधित हो किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय गया और उस पुत्रसे बोला- मैं वा त्वां ददामीति ॥४॥ | तुझे सूर्यके पुत्र मृत्युको देता हूँ' ॥४॥ स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयाञ्चकार । इत्युच्यते- कथम् ? पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र एकान्तमें अनुताप किस प्रकार ? सो बतलाते हैं. करने लगा, - कठोपनिषद् [अध्याय १ बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः। किविद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥ मैं बहुत-से. [ शिष्य या पुत्रों ] में तो प्रथम ( मुख्य वृत्तिसे ) चलता हूँ और बहुतोंमें मध्यम ( मध्यम वृत्तिसे ) जाता हूँ। यमका ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरेद्वारा सिद्ध करेंगे ॥ ५॥ रहता । परन्तु यमका बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि मैं बहुत-से शिष्य अथवा पुत्रों- गच्छामि प्रथमः सन्मुख्यया में तो प्रथम अर्थात् आगे रहकर मुख्य शिष्यादि वृत्तिसे चलता हूँ शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः। मध्यमानां तथा बहुत-से मध्यम शिष्यादिमें च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव | मध्यम रहकर मध्यम वृत्तिसे बर्तता हूँ। अधम वृत्तिसे मैं कभी नहीं वृत्त्यैमि । नाधमया कदाचि- उस ऐसे विशिष्ट- दपि । तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्रं | गुणसम्पन्न पुत्रको भी पिताने मैं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् । तुझे मृत्युको देता हूँ ऐसा कहा । ऐसा कौन-सा पिता । स किविद्यमस्य कर्तव्यं कर्तव्य-प्रयोजन इन्हे पूर्ण करना प्रयोजनं मया प्रत्तेन करिष्यति है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मेरेद्वारा सिद्ध करेंगे ? यत्कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनम् अवश्य किसी प्रयोजनकी अपेक्षा अनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान् न करके ही पिताने क्रोधवश ऐसा कहा है। तथापि पिताका वचन पिता । तथापि तत्पितुर्वचो मिथ्या न हो ऐसा विचारकर मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परि- उसने अपने पितासे, जो यह सोचकर कि मैंने क्या कह डाला ? देवनापूर्वकमाह पितरं शोका- शोकातुर हो रहे थे, खेदपूर्वक विष्टं कि मयोक्तमिति ॥५॥ कहा ॥ ५॥ rahan वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ me अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः॥ ६ ॥ जिस प्रकार पूर्वपुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमानकालिक अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये । मनुष्य खेतीकी तरह पकता ( वृद्ध होकर मर जाता ) है और खेतीकी भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६॥ अनुपश्यालोचय निमालय आपके पिता-पितामह आदि पुरुष अनुक्रमसे जिस प्रकार अनुक्रमेण यथा सन्मार्गः सदैव आचरण करते आये हैं उसकी येन प्रकारेण वृत्ताः सेवनीयः आलोचना कीजिये-उसपर दृष्टि पूर्वे अतिक्रान्ताः डालिये। उन्हें देखकर आपको पितृपितामहादयस्तव । तान्दृष्ट्वा उन्हींके आचरणोंका पालन करना च तेषां वृत्तमास्थातुमर्हसि । वर्त- चाहिये । तथा वर्तमानकालिक जो मानाश्चापरे साधवो यथा वर्तन्ते | उनकी भी आलोचना कीजिये । दूसरे साधुलोग आचरण करते है तांश्च प्रतिपश्यालोचय तथा | उनमेंसे किसीका भी आचरण अपने न च तेषु मृषाकरणं वृत्तं वर्त- कथनको मिथ्या करना नहीं था और न इस समय ही किसीका मानं वास्ति । तद्विपरीतमसतां है । इसके विपरीत असत्पुरुषोंका वृत्तं मृषाकरणम् । न च | आचरण मिथ्या करना ही है । मृषा कृत्वा कश्चिदजरामरो | किन्तु अपने आचरणको मृषा करके कोई अजर-अमर नहीं हो सकता। भवति । यतः सस्यमिव मर्यो क्योकि मनुष्य खेतीकी तरह पकता मनुष्यः पच्यते जीर्णो म्रियते । अर्थात् जीर्ण होकर मर जाता है, तथा मरकर खेतीके समान पुनः मृत्वा च सस्यमिव आजायत उत्पन्न-आविर्भूत हो जाता है। आविर्भवति पुनरेवमनित्ये जीव-| इस प्रकार इस अनित्य जीवलोकमें कठोपनिषद् [ अध्याय १ लोकें किं मृषाकरणेन । पालय | असत्य आचरणसे लाभ ही क्या है ? अतः अपने सत्यका पालन आत्मनः सत्यम् । प्रेषय मां कीजिये अर्थात् मुझे यमराजके यमाय इत्यभिप्रायः ॥६॥ पास भेजिये ॥ ६ ॥ एवमुक्तः पितात्मनः यमलोकमें नचिकेता पुत्रके इस प्रकार कहनेपर पिताने अपनी सत्यताकी रक्षाके सत्यतायै प्रेषयामास । स च लिये उसे यमराजके पास भेज यमभवनं गत्वा तिस्रो रात्रीः दिया । वह यमराजके घर पहुंचकर तीन रात्रि टिका रहा, क्योंकि यम उवास यमे प्रोषिते । प्रोष्यागतं उस समय बाहर गये हुए थे । यमममात्या भार्या वा ऊचुर्बोध- प्रवाससे लौटनेपर यमराजसे उनकी भार्या अथवा मन्त्रियोंने समझाते यन्त:- हुए कहा- वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैता शान्ति कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥ ब्राह्मण-अतिथि होकर अग्नि ही घरोंमें प्रवेश करता है। साधु पुरुष ] उस अतिथिकी यह [अर्य-पाद्य-दानरूपा'] शान्ति किया करते हैं। अतः हे वैवस्वत ! [ इस ब्राह्मण-अतिथिकी शान्तिके लिये ] जल ले जाइये ॥ ७ ॥ वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् साक्षात् | ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें साक्षात् प्रविशत्यतिथिः सन्ब्राह्मणो वैश्वानर-अग्नि ही दग्ध करता हुआ-सा घरोंमें प्रवेश करता है। गृहान्दहनिव तस्य दाहं शमयन्त उस अग्निके दाहको मानो शान्त इवाग्नेरेतां . पाद्यासनादिदान- करते हुए ही साधु-गृहस्थजन यह लक्षणां शान्ति कुर्वन्ति सन्तोऽति- पाद्यादि दानरूप शान्ति किया थेर्यतोऽतो हराहर हे वैवस्वत | करते हैं । अतः हे वैवस्वत !

बल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ २३ उदकं नचिकेतसे पाद्यार्थम् । यत- | नचिकेताको पाद्य देनेके लिये जळ ले जाइये । क्योंकि ऐसा न करनेमें थाकरणे प्रत्यवायः श्रूयते ॥७॥ | प्रत्यवाय सुना जाता है ॥ ७ ॥ + आशाप्रतीक्षे संगतसूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूश्व सर्वान् । एतद्देङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥ जिसके घरमे ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात वस्तुओकी प्राप्तिकी इच्छाएँ, उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणीसे होनेवाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मों के फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदिको वह नष्ट कर देता है ॥ ८॥ आशाप्रतीक्षेऽनितिप्राप्येष्टा जिसके घरमे ब्राह्मण बिना र्थप्रार्थना आशा भोजन किये रहता है उस अतिथ्युपेक्षणे नितिप्राप्यार्थप्रती- मन्दमति पुरुषके 'आशा-प्रतीक्षा'- दोषा. क्षणं प्रतीक्षा ते आशा-जिनका कोई ज्ञान नहीं आशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगज है उन प्राप्तव्य इष्ट पदार्थोंकी इच्छा फलम्, सूनृतां च सूनृता हि प्रिया तथा अपने प्राप्तव्य ज्ञात पदार्थोकी वाकनिमित्तं च, इष्टापूर्ते इष्टं | प्रतीक्षा एवं संगत-उनके संयोगसे मग पूर्तमारामादिक्रियाज | प्राप्त होनेवाले फल, सूनृता-प्रिय फलम्, पुत्रपशृंश्च पुत्रांश्च पशूश्च | वाणी और उससे होनेवाले फल सर्वानेतत्सर्व यथोक्तं वृक्त होनेवाले फल और पूर्त-बाग- 'इष्टापूर्त'-इष्ट—यागादिसे प्राप्त आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्- | बगीचोके लगानेसे होनेवाले फल पुरुषस्याल्पमेधसोऽल्पप्रज्ञस्य तथा पुत्र और पशु-इन उपर्युक्त यस्थानभन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे | सभीको नष्ट कर देता है। अतः तात्पर्य MAA

No text on this page.

वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ २५ संप्रसादनार्थमनशनेनोपोषिताम् । अपनी अधिक प्रसन्नताके लिये तुम एकैकां रात्रि प्रति त्रीन्वरान् बिना भोजन किये बितायी हुई। एक-एक रात्रिके प्रति मुझसे तीन वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् वर-अपने अभीष्ट पदार्थविशेष प्रार्थयस्व मत्तः॥९॥ माँग को॥९॥ नचिकेतास्त्वाह-यदि दित्सु नचिकेताने कहा-यदि आप रान्- वर देना चाहते हैं तो प्रथम वर-पितृपरितोष शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या- द्वोतमन्युौतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१॥ हे मृत्यो ! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, "प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जाय तथा आपके भेजनेपर मुझे 'पहचानकर बातचीत करे--यह मैं [ आपके दिये हुए ] तीन वरोमेसे पहला वर मांगता हूँ॥ १० ॥ शान्तसंकल्प उपशान्तः जिस प्रकार मेरे पिता गौतम संकल्पो यस्य मां प्रति यमं प्राप्य मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प-जिनका किं नु करिष्यति मम पुत्र इति | ऐसा सङ्कल्प शान्त हो गया है कि स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रसन्न- 'न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा', सुमनाः- मनाश्च यथा स्याद्वीतमन्युर्विगत- प्रसन्नचित्त और वीतमन्यु-क्रोध- रोषश्च गौतमो मम पिता मामि रहित हो जायँ और हे मृत्यो ! मां प्रति हे मृत्यो किं च त्वत्प्र- | आपके भेजे हुए–घरकी ओर सृष्टं त्वया विनिर्मुक्तं प्रेषितं गृहं | जानेके लिये छोड़े हुए मुझसे प्रति मामभिवदेत्प्रतीतो लब्ध- विश्वस्त-कधस्मृति होकर अर्थात् कठोपनिषद् २६ [ अध्याय स्मृतिः स एवायं पुत्रो ममागत ऐसा स्मरण करके कि यह मेरा । वही पुत्र मेरे पास लौट आया है, इत्येवं प्रत्यभिजानन्नित्यर्थः सम्भाषण करें। यह अपने पिताकी एतत्प्रयोजनं त्रयाणां प्रथममायं प्रसन्नतारूप प्रयोजन ही मैं अपने वरं वृणे प्रार्थये यत्पितुः परि-! तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता तोषणम् ॥१०॥ हूँ॥ १०॥ मृत्युरुवाच- । मृत्युने कहा- यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः सुख५ रात्रीः शयिता वीतमन्यु- स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम्॥११॥ मुझसे प्रेरित होकर अरुणपुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा और शेष रात्रियोंमें सुखपूर्वक सोवेगा; क्योंकि 'तुझे मृत्युके मुखसे छूटकर आया हुआ देखेगा ॥ ११ ॥ यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् तेरे पिताकी बुद्धि जिस प्रकार पूर्वमासीत्स्नेहसमन्विता पितु- | पहले तेरे प्रति स्नेहयुक्ता थी उसी प्रकार वह औद्दालकि अब भी स्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव | प्रीतियुक्त होकर तेरे प्रति विश्वस्त पिता तथैव प्रतीतवान्सन्नौदा- हो जायगा । यहाँ उद्दालकको ही लकिः उद्दालक एवौदालकिः। है तथा अरुणका- अरुणस्यापत्यमारुणिः,द्वयामुष्या- पुत्र होनेसे वह आरुणि है । अथवा यह भी हो सकता है कि यणो वा । मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञातः | वह द्वयामुष्यायण* हो । 'मत्प्रसृष्टः' * जो एक ही पुत्र दो पिताऔद्वारा संकेत करके अपना उत्तराधिकारी निश्चित किया जाता है वह 'यामुष्यायण' कहलाता है । वह अकेला ही दोनों पिताओंकी सम्पत्तिका स्वामी और उन्हें पिण्डदान करनेका अधिकारी होता है । जैसे पुत्ररूपसे स्वीकार किया हुआ पुत्रीका पुत्र अथवा अन्य दत्तक पुत्र आदि । अतः अकेले वाजश्रवसको ही औद्दालकि और आरुणि कहनेसे यह सम्भव है कि वह उद्दालक और अरुण दो पिताओंका उत्तराधिकारी हो। औदालकि' कहा वल्ली १] আমাথ २७ सन् इतरा अपि रात्रीः सुखं । अर्थात् मुझसे आज्ञप्त होकर वह प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीत- शेष रात्रियोंमें भी सुखपूर्वक यानी मन्युर्विगतमन्युश्च भविता स्यात्वां प्रसन्न चित्तसे शयन करेगा तथा [ यह सोचकर ] वीतमन्यु-क्रोध- मुखान्मृत्युगोचरात प्रमुक्तं के मुखसे अर्थात् मृत्युके अधिकारसे सन्तम् ॥ ११ ॥ मुक्त हुआ देखा है ॥११॥ ] पुत्रं ददृशिवान्दृष्टवान्स मृत्यु- हीन हो जायगा कि तुझ पुत्रको मृत्यु- -- नचिकेता उवाच- नचिकेता बोला--- स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१२॥ हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोकमे कुछ भी भय नहीं है । वहाँ आपका भी वश नहीं चलना । वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भी नहीं डरता । स्वर्गलोकमें पुरुष भूख-प्यास--दोनोंको पार करके शोकसे ऊपर उठकर आनन्दित होता है ॥ १२ ॥ स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्तं स्वर्गलोकमें रोगादिके कारण भयं किंचन किंचिदपि नास्ति । होनेवाला भय तनिक भी नहीं है “च तत्र त्वं मृत्यो सहसा हे मृत्यो ! वहाँ आपकी भी सहसा प्रभवस्यतो जरया युक्त इह दाल नहीं गलती । अतः इस लोकके समान वहाँ वृद्धावस्थासे लोकवत्त्वत्तो न बिभेति कुतश्चित युक्त होकर कोई पुरुष आपसे कहीं तत्र । किंचोमे अशनायापिपासे नहीं डरता । बल्कि पुरुष भूख- तीवा॑तिक्रम्य शोकमतीत्य | प्यास दोनोंको ‘पार करके जो गच्छतीति शोकातिगः सन् शोकका अतिक्रमण कर/जाय ऐसा

२८
कठोपनिषद्,
[ अध्याय
१
से
मानसेन दुःखेन वर्जितो मोदते , शोकातीत होकर---मानसिक दुःख-
छुटकारा पाकर उस दिव्य स्वर्ग:
हृष्यति स्वर्गलोके दिव्ये ॥१२॥ | लोकमें आनन्दित होता है ॥१२॥
द्वितीय वर-स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या
स त्वमग्निश्स्वयंमध्येषि मृत्यो
प्रब्रूहि त्व:श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त
एतदद्वितीयेन वृणे
वरेण ॥१३॥
हे मृत्यो ! आप स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हैं, सो मुझ
श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन कीजिये, [ जिसके द्वारा ] स्वर्गको प्राप्त हुए
पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते हैं । दूसरे वरसे मैं यही माँगता हूँ॥ १३ ॥
एवंगुणविशिष्टस्य स्वर्गलो-
हे मृत्यो! क्योंकि आप ऐसे गुण-
कस्य प्राप्तिसाधनभूतमग्निं स त्वं | वाले स्वर्गलोककी प्राप्तिके साधनभूत
मृत्युरध्येषि सरसि जानासि अग्निको स्मरण रखते यानी जानते
इत्यर्थः, हे मृत्यो यतस्त्वं प्रत्रूहि | हैं, अतः मुझ स्वर्गार्थी श्रद्धालुके प्रति
कथय श्रद्दधानाय श्रद्धावते मह्यं उसका वर्णन कीजिये जिस अग्निका
स्वर्गार्थिने; येनाग्निना चितेन चयन करनेसे स्वर्गको प्राप्त करने-
स्वर्गलोकाः स्वर्गों लोको येषां ते वाले पुरुष अर्थात् स्वर्ग ही जिनकी-
स्वर्गलोकाः यजमाना अमृतत्वम् | लोक है ऐसे यजमानगण अमृतत्व-
अमरणतां देवत्वं भजन्ते प्राप्नु- | अमरता अर्थात् देवभावको प्राप्त
वन्ति तदेतदग्निविज्ञानं द्वितीयेन | हो जाते हैं । इस अग्निविज्ञानको
वरेण वृणे ॥१३॥ | मैं दूसरे वरद्वारा माँगता हूँ ॥१३॥

वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ -- मृत्योः प्रतिज्ञेयम् | यह मृत्युकी प्रतिज्ञा है- प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध वर्म्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥ हे नचिकेतः ! उस वर्गप्रद अग्निको अच्छी तरह जाननेवाला मैं तेरे प्रति उसका उपदेश करता हूँ। तू उसे मुझसे अच्छी तरह समझ ले । इसे तू अनन्तलोककी प्राप्ति करानेवाला, उसका आधार और बुद्धिरूपी गुहामें स्थित जान ॥ १४ ॥ प्र ते तुभ्यं प्रब्रवीमिः हे नचिकेतः ! जिसके लिये तुमने प्रार्थना की थी उस स्वर्ग्य- यत्त्वया प्रार्थितं तदु मे मम स्वर्गप्राप्तिमें हितावह अर्थात् स्वर्गके वचसो निबोध बुध्यस्वैकाग्र- | साधनरूप अग्निको तू एकाग्रचित्त मनाः सन्स्वयं. स्वर्गाय हितं होकर मेरे वचनसे अच्छी तरह स्वर्गसाधनमग्निं हे नचिकेतः समझ ले, उसे सम्यक् प्रकारसे जाननेवाला-उसका विशेषज्ञ मैं प्रजानन्विज्ञातवानहं सन्नित्यर्थः। तेरे प्रति उसका वर्णन करता प्रब्रवीमि तन्निबोधेति च शिष्य- हूँ । 'मैं कहता हूँ' 'तू उसे समझ ले ये वाक्य शिष्यकी बुद्धिसमाधानार्थं वचनम् । बुद्धिको समाहित करनेके लिये हैं। अधुनाग्निं स्तौति । अनन्तलो अब उस अग्निकी स्तुति करते काप्तिं स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनम् | हैं । जो अनन्तलोकाप्ति अर्थात् इत्येतत्, अथो अपि प्रतिष्ठाम् स्वर्गलोकरूप फलकी प्राप्तिका साधन आश्रयं जगतो विराड्पेण, तमेत- तथा विराट्पसे जगत्की प्रतिष्ठा- आश्रय है, मेरेद्वारा कहे हुए उस मग्निं मयोच्यमानं विद्धि जानीहि इस अग्निको तू गुहामें अर्थात् त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुषां बुद्धिमान् पुरुषोंकी बुद्धिमें स्थित बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ॥ १४ ॥ जान ॥ १४ ॥ .

कठोपनिषद्
[अध्याय १
इदं श्रुतेर्वचनम्-
यह श्रुतिका वचन है-
लोकादिमग्निं तमुवाच
तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स
चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-
मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥
तब यमराजने लोकोके आदिकारणभूत उस अग्निका तथा उसके
चयन करनेमे जैसी और जितनी ईटे होती हैं. एवं जिस प्रकार
उसका चयन किया जाता है उन सबका नचिकेताके प्रति वर्णन
कर दिया । और उस नचिकेताने भी जैसा उससे कहा गया था वह
सब सुना दिया। इससे प्रसन्न होकर मृत्यु फिर बोला ॥ १५ ॥
लोकादि लोकानामादि प्रथम नचिकेताने जिसके लिये प्रार्थना
शरीरित्वादग्निं तं प्रकृतं नचि- की थी और जिसका प्रकरण चल
रहा है प्रथम शरीरी होनेके कारण
केतसा प्रार्थितमुवाचोक्तवान्
लोकोके आदिभूत उस अग्निका
मृत्युस्तस्मै नचिकेतसे । किं च यमने नचिकेताके प्रति वर्णन कर
या इष्टकाश्चेतव्याः स्वरूपेण, दिया। तथा स्वरूपतः जिस प्रकारकी
और संख्यामे जितनी ईंटोंका चयन
यावतीळ संख्यया, यथा वा
करना चाहिये एवं यथा यानी
चीयतेऽग्निर्येन प्रकारेण सर्वमेतद् | जिस तरह अग्निका चयन किया
उक्तवानित्यर्थः । स चापि नचि- जाता है वह सब भी कह दिया ।
तथा उस नचिकेताने भी, जिस प्रकार
केतास्तन्मृत्युनोक्तं यथावत्प्रत्य-
उसे मृत्युने बताया था वह सब
येनावदत्प्रत्युच्चारितवान् । अथ | समझकर ज्यो-का-त्यो सुना दिया ।
तस्य प्रत्युच्चारणेन तुष्टः सन्मृत्युः | तब उसके प्रत्युच्चारणसे प्रसन्न
हो मृत्युने इन तीन वरोंके अतिरिक्त
पुनरेवाह वरत्रयव्यतिरेकेणान्यं और भी वर देनेकी इच्छासे उससे
वरं दित्सुः ॥१५॥ फिर कहा ॥ १५॥

चल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ ३१ नाम्ना कथम्- कैसे कहा [सो बतलाते हैं- तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव भवितायमग्निः सङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥ महात्मा यमने प्रसन्न होकर उससे कहा--अब मैं तुझे एक वर और भी देता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगा और तू इस अनेक रूपवाली मालाको ग्रहण कर ॥ १६ ॥ तं नचिकेतसमब्रवीत्प्रीय अपने शिष्यकी योग्यताको देख- माणः शिष्ययोग्यतां पश्यन्तीय-| कर प्रसन्न हुए–प्रीतिका अनुभव माणः प्रीतिमनुभवन्महात्माक्षुद्र- | करते हुए महात्मा–अक्षुद्रबुद्धि यमने बुद्धिवरं तव चतुर्थमिह प्रीति- | नचिकेतासे कहा-अब मैं प्रसन्नताके कारण तुझे फिर भी यह चौथा वर निमित्तमद्येदानीं ददामि भूयः और देता हूँ। मेरेद्वारा कहा हुआ यह पुनः प्रयच्छामि । तवैव नचि- अग्नि तुझ नचिकेताके ही नामसे केतसो नाम्नाभिधानेन प्रसिद्धो | प्रसिद्ध होगा तथा तू यह शब्द भविता मयोच्यमानोऽयमग्निः । करनेवाली रत्नमयी, अनेकरूपा किं च सतां शब्दवती रनमयीं / विचित्रवर्णा मालाका भी ग्रहण- मालामिमामनेकरूपां विचित्रां विचित्रां खीकार कर । अथवा सङ्का यानी कर्ममयी अनिन्दिता गतिका ग्रहण गृहाण स्वीकुरु । यद्वा सङ्काम् कर । तात्पर्य यह है कि इसके अकुत्सितां गतिं कर्ममयीं गृहाण सिवा अनेक फलका कारण होनेसे अन्यदपि कर्मविज्ञानमनेकफल. तू मुझसे कर्मविज्ञानको और भी हेतुत्वात्स्वीकुर्वित्यर्थः ॥ १६॥ स्वीकृत कर ॥ १६ ॥ १ ३२ कठोपनिषद् [ अध्याय १ - v.ama पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह यमराज फिर भी कर्मकी स्तुति ही करते हैं- नाचिकेत अग्निचयनका फल त्रेणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेत अग्निका तीन बार चयन करनेवाला मनुष्य [ माता, पिता और आचार्य--इन ] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म · और मृत्युको पार कर जाता है । तथा ब्रह्मसे उत्पन्न हुए, ज्ञानवान् और स्तुतियोग्य देवको जानकर और उसे अनुभव कर इस अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ १७॥ त्रिणाचिकेतस्त्रिःकृत्वो जिसने तीन , बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है उसे नाचिकेतोऽग्निश्चितो येन त्रिणाचिकेत कहते हैं । अथवा स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्त- उसका ज्ञान अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला ही त्रिणाचिकेत है । दध्ययनस्तदनुष्ठानवान्वा वह त्रिणाचिकेत माता, पिता और त्रिनिर्मातृपित्राचार्यैरेत्य प्राप्य आचार्य-इन तीनोंसे सन्धि- सन्धि सन्धानं सम्बन्धं मात्राद्यनु- सन्धान यानी सम्बन्धको प्राप्त होकर अर्थात् यथाविधि माता आदिकी शासनं यथावत्प्राप्येत्येतत् । शिक्षाको प्राप्त कर; क्योंकि एक तद्धि प्रामाण्यकारणं श्रुत्यन्तराद् दूसरी श्रुतिसे, जैसा कि-"माता, अवगम्यते यथा “मातृमान्पित- पिता एवं आचार्यसे शिक्षित पुरुष कहे” इत्यादि श्रुतिसे जाना जाता मानाचार्यवान्व्यात्" (बृ. है, उनकी शिक्षा ही धर्मज्ञानकी उ०४।३।२) इत्यादेः । प्रामाण् िकतामें हेतु मानी गयी है, - .

वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३ तथा ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मज----ब्रह्मा , वेदस्मृतिशिष्टै प्रत्यक्षानु- | अथवा वेद, स्मृति और 'शिष्ट पुरुषोसे या प्रत्यक्ष, अनुमान और मानागमैर्वा, तेभ्यो हि विशुद्धिः आगमसे [ सम्बन्ध प्राप्त करके ] यज्ञ. अध्ययन और दान-इन तीन प्रत्यक्षा, त्रिकर्मकृदिज्याध्ययन- कर्मोको करनेवाला पुरुष जन्म और मृत्युको तर जाता है-उन्हे पार दानानां कर्ता तरत्यतिक्रामति कर लेता है, क्योकि उन ( वेदादि अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणो ) से स्पष्ट जन्ममृत्यू। ही शुद्धि होती देखी है। किं च ब्रह्मजझं ब्रह्मणो यानी हिरण्यगर्भसे उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भाजातो ब्रह्मजः। ब्रह्मज ब्रह्मज कहलाता है इस प्रकार जो थासौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ब्रह्मज है और ज्ञ ( ज्ञाना ) भी है उसे ब्रह्मजज्ञ कहते हैं, क्योकि वह ह्यसौ । तं देवं द्योतनाज्ज्ञानादि- | सर्वज्ञ है । उस देवको—जो द्योतन आदिके कारण देव कहलाता है गुणवन्तमीडचं स्तुत्यं विदित्वा और ज्ञानादि गुणवान् होनेसे शास्त्रतो, निचाय्य दृष्ट्वा चात्म- ईड्य-स्तुतियोग्य है, उसे शास्त्रसे जानकर और निचाय्य' अर्थात् भावेनेमां स्वबुद्धिप्रत्यक्षां शान्तिम् आत्मभावसे देखकर अपनी बुद्धिसे उपरतिमत्यन्तमेत्यतिशयेनैति प्रत्यक्ष होनेवाली इस आत्यन्त्रिक शान्ति-उपरतिको प्राप्त हो जाता वैराजं पदं ज्ञानकर्मसमुच्चयानु- है। अर्थात् ज्ञान और कर्मके समुच्चय- का अनुष्ठान करनेसे वैराज पदको ठानेन प्रामोतीत्यर्थः ॥ १७॥ प्राप्त कर लेता हे ॥ १७ ॥ , इदानीमग्निविज्ञानचयनफलम् अब अग्निविज्ञान और उसके चयनके फलका तथा इस प्रकरणका उपसहार करते है- उपसंहरति प्रकरणं च- क० उ०३- कठोपनिषद् [ স্বাস্থ ! त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाश्चिनुते नाचिकेतम्। स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥ जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको [ यानी कौन ईंटें हों; कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय—इसको] जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पूर्व ही मृत्युके बन्धनोंको तोड़कर शोकसे पार हो स्वर्गलोकमें आनन्दित होता है ॥ १८ ॥ त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या जो त्रिणाचिकेत अग्निके पूर्वोक त्रयको जानकर अर्थात् जो ईटें इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् होनी चाहिये, जितनी होनी चाहिये विदित्वावगत्य यश्चैवमात्मरूपेण | तथा जिस प्रकार. अग्नि चयन करना चाहिये-इन तीनों बातोंको अग्निं विद्वांश्चिनुते निर्वर्तयति समझकर उस अग्निको आत्मस्वरूप- नाचिकेतमग्निं क्रतुंस मृत्युपाशान् से जाननेवाला जो विद्वान् अग्नि- क्रतुका चयन करता-साधन करता अधर्माज्ञानरागद्वेषादिलक्षणान् है वह अधर्म, अज्ञान और पुरतः अग्रतः पूर्वमेव शरीरपातात् | रागद्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोंका इत्यर्थः, प्रणोद्यापहाय शोकातिगो पुरतः-अग्रतः अर्थात् देहपातसे पूर्व ही अपनोदन ---त्याग करके मानसर्दुःखैर्वर्जित इत्येतत् शोकसे पार हुआ अर्थात् मानसिक स्वर्गलोके मोदते दुः वैराजे खोसे मुक्त हुआ स्वर्गमें यानी वैराज लोकमें विराडात्मस्वरूपकी प्राति विराडात्मस्वरूपप्रतिपच्या ॥१८॥ होनेसे आनन्दित होता है ॥ १८ ॥ mama वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वग्र्यो यमवृणीथा द्वितीयेन द्वितीयेन वरेण । एतमनिं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥१९॥ हे नचिकेतः ! तूने द्वितीय वरसे जिसका वरण किया था वह यह वर्गका साधनभूत अग्नि तुझे बतला दिया । लोग इस अग्निको तेरा ही कहेंगे । हे नचिकेतः ! तू तीसरा वर और माँग ले ॥ १९ ॥ एष ते तुभ्यमग्निवरोहे नचि हे नचिकेतः ! अपने दूसरे वरसे तूने जिस अग्निका वरण केतः स्वर्यः स्वर्गसाधनो यमग्निं किया था जिसके लिये तूने प्रार्थना वरमवृणीथाः प्रार्थितवानसि की थी वह स्वर्गप्राप्तिका साधनभूत द्वितीयेन वरेण सोऽग्निवरो दत्त यह अग्निविज्ञानरूप वर मैंने तुझे दे दिया । इस प्रकार उपर्युक्त इत्युक्तोपसंहारः । किञ्चैतमग्निं अग्निविज्ञानका किश्चैतमग्निं अग्निविज्ञानका उपसंहार कहा तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनसो गया। यही नहीं, लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे पुकारेंगे। यह जना इत्येतत् । एष वरो दत्तो तुझसे प्रसन्न हुए मैंने तुझे चौथा वर दिया था। हे नचिकेतः ! अब तू मया चतुर्थस्तुष्टेन । तृतीयं वरं तीसरा वर और माँग ले; क्योंकि नचिकेतो वृणीष्व । तस्मिन्ह्यदत्त उसे बिना दिये मैं ऋणी ही हूँ- ऋणवानहमित्यभिप्रायः ॥१९॥ | ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ १९ ॥ एतावद्धयतिक्रान्तेन विधि विधि-प्रतिषेध ही जिसके प्रयोजन हैं ऐसे उपर्युक्त मन्त्र- प्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणनाव- ब्राह्मणद्वारा इन दो वरोंसे सूचित गन्तव्यं यद्वरद्वयसूचितं वस्तु ।। इतनी ही वस्तु ज्ञातव्य है।

कठोपनिषद् [अध्याय १ न . आत्मतत्वविषययाथात्म्य- | आत्मतत्त्वविषयक यथार्थ ज्ञान जो विज्ञानम् । अतो विधिप्रतिषेधार्थ- | इसका विषय नहीं है । अब, विधि-प्रतिषे का विषय है, आत्मामें विषयस्यात्मनि . क्रियाकारक- | क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप करना ही जिसका लक्षण है तथा फलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभावि- जो संसारका बीजवरूप है उस कस्याज्ञानस्य संसारबीजस्य स्वाभाविक अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उससे विपरीत ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान निवृत्त्यर्थं तद्विपरीतब्रह्मात्मकत्व- कहना है, जो कि क्रिया, कारक विज्ञानं क्रियाकारकफलाध्या- और फलके अध्यारोपरूप लक्षणसे शून्य और आत्यन्तिक निःश्रेयसरूप रोपणलक्षणशून्यम् आत्यन्तिक- प्रयोजनवाला है। इसीके लिये निःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमिति आगेके ग्रन्थका आरम्भ किया जाता । इसी बातको आख्यायिका- उत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते । तमेतमर्थ द्वारा विस्तृत करते हैं कि तीसरे द्वितीयवरप्राप्त्याप्यकृतार्थत्वं वरसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके बिना द्वितीय वरकी प्राप्तिसे भी तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण अकृतार्थता ही है, क्योंकि इत्याख्यायिकया प्रपञ्चयति-- आत्मज्ञानमें उसी पुरुषका अविकार है जो पूर्वोक्त कर्मविषयक साध्य- यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्य- साधनलक्षण एवं अनित्य फलोंसे साधनलक्षणादनित्याद्विरक्तस्य विरक्त हो गया हो। इसलिये उनकी निन्दाके लिये पुत्रादिके उपन्याससे आत्मज्ञानेऽधिकार इतितनिन्दार्थ नचिकेताको प्रलोभित किया पुत्राद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते । जाता है । नचिकेता उवाच तृतीयं वरं 'हे नचिकेतः ! तुम तीसरा वर माँग लो' इस प्रकार कहे जानेपर नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्- नचिकेता बोला- - वल्ली शाङ्करभाष्यार्थ तृतीय वर-आत्मरहस्य "येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥ मरे हुर मनुष्यके विषयमे जो यह सन्देह है कि कोई तो कहते हैं रहता है। और कोई कहते हैं 'नहीं रहता'; आपसे शिक्षित हुआ मैं इसे जान सकूँ। मेरे वरोंमें यह तीसरा वर है ॥ २० ॥ सम्बन्ध येयं विचिकित्सा संशयः प्रेते मरे हुए मनुष्यके विषय में जो इस प्रकारका सन्देह है कि कोई मृते मनुष्येऽस्तीत्येकेऽस्ति शरीरे- लोग तो ऐसा कहते हैं कि शरीर, न्द्रियमनोबुद्धिव्यतिरिक्तो देहा- इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे अतिरिक्त देहान्तरसे रखनेवाला न्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येके नायम् आत्मा रहता है और किन्हींका अस्तीति चैके नायमेवंविधोऽस्तीति कथन है कि ऐमा कोई आत्मा नहीं चैकेऽतश्चास्माकं न प्रत्यक्षेण नापि रहता; अतः इसके विषयमें हमें वानुमानेन निर्णयविज्ञानमेतद्वि- अथवा अनुमानसे कोई निश्चित ज्ञान नहीं होता और परम ज्ञानाधीनो हि परः पुरुषार्थ पुरुषार्थ इस विज्ञानके ही अधीन इत्यत एतद्विद्यां विजानीयामहम् है । इसलिये आपसे शिक्षित अर्थात् विज्ञापित होकर मैं इसे भली प्रकार अनुशिष्टोज्ञापितस्त्वया । वराणाम् जान सकूँ । यही मेरे वरोंमेंसे बचा एष वरस्तृतीयोऽवशिष्टः॥२०॥ हुआ तीसरा वर है प्रत्यक्ष *<3-6-> कठोपनिषद् [ अध्याय १ विचिकित्सितं पुरा किमयमेकान्ततो निःश्रेयस यह ( नचिकेता ) निःश्रेयसके साधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्प- साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया है या नहीं—इस बातकी परीक्षा रीक्षणार्थमाह- करनेके लिये यमराजने कहा- देवैरत्रापि न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः । अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१॥ पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था; क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जानने योग्य नहीं है। हे नचिकेतः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक । तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥ देवैरप्यत्रैतस्मिन्वस्तुनि विचि इम आत्मतत्त्वके विषयमें पहले-पूर्वकालमें देवताओंने भी कित्सितं संशयितं पुरा पूर्व न हि विचिकित्सा संशय किया था । सुज्ञेयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतै- साधारण पुरुषोंके लिये यह तत्त्व सुने जानेपर मी सुज्ञेय-अच्छी जनैर्यतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो तरह जानने योग्य नहीं है। क्योंकि धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्धफलं वरं ! यह 'आत्मा' नामवाला धर्म बड़ा ही अणु-सूक्ष्म है। नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोप- नचिकेतः ! कोई दूसरा निश्चित रोत्सीरुपरोधं मा कार्षीरधमर्णम् | फल देनेवाला वर माँग ले। जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी इवोत्तमर्णः । अतिसृज विमुञ्च प्रकार तू मुझे न रोक । इस वरको एनं वरं मा मां प्रति ॥ २१ ॥ तू मेरे लिये छोड़ दे ॥ २१ ॥ अतः

वल्ली १]
शाङ्करभाष्यार्थ
नचिकेताकी स्थिरता
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥
। नचिकेता बोला- ] हे मृत्यो ! इस विषयमें निश्चय ही
देवताओंको भी सन्देह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमतासे जानने
योग्य नहीं बतलाते । [ इसीसे वह मुझे और भी अधिक अभीष्ट है
तथा इस धर्मका वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता
और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है ॥ २२ ॥
देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि विचि-
यह बात हमने अभी आपहीसे
कित्सितं किलेति भवत एव न:
सुनी है कि इस विषयमें देवताओंने
भी सन्देह किया था । और हे
श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यद्यसान्न मृत्यो : आप भी इस आत्मतत्त्व-
मुझेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि, को सुगमतासे जानने योग्य नहीं
अतः पण्डितैरप्यवेदनीयत्वाद् बतलाते । अतः पण्डितोंसे अज्ञातव्य
वक्ता चास्य धर्मस्य त्वादृक्त्वत्तुल्यः | होनेके कारण इस धर्मका कथन
करनेवाला आपके समान कोई
अन्यः पण्डितश्च न लभ्यः और पण्डित ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल
अन्विष्यमाणोऽपि । अयं तु वरो सकता । और यह वर भी
निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः । अतो नान्यो | निःश्रेयसकी प्राप्तिका कारण है।
सदृशोऽस्त्येतस्य
अतः इसके समान और कोई भी
वरस्तुल्यः
वर नहीं है। क्योंकि और सभी वर
कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य
अनित्य फळयुक्त हैं--यह इसका
सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥२२॥
अभिप्राय है ॥२२॥

कठोपनिषद् [ अध्याय १ am- -- यमराजका प्रलोभन एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभ-1 नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर भी मृत्यु उसे प्रलोभित करता यन्नुवाच मृत्यु:- हुआ फिर बोला- शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् भूमेर्महदायतनं वृणीष्व खयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥ हे नचिकेतः ! तू सौ वर्षकी आयुवाले बेटे-पोते, बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े माँग ले, विशाल भूमण्डल भी माँग ले तथा स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह ॥ २३ ॥ शतायुषः शतं वर्षाण्यायूंषि जिनकी सौ. वर्षकी आयु हो एषां ताञ्शतायुषः पुत्रपौत्रान् | ऐसे शतायु पुत्र और पौत्र माँग वृणीष्व । किं च गवादिलक्षणान् तथा गौ आदि बहुत-से पशु, हाथी बहून्पशून् हस्तिहिरण्यं हस्ती और सुवर्ण तथा. घोड़े और पृथिवी- च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम् का महान् विस्तृत आयतन- अश्वांश्च किं च भूमेः पृथिव्या आश्रय-~-मण्डल अर्थात् राज्य माँग महद्विस्तीर्णमायतनमाश्रयं मण्डलं । परन्तु यदि स्वयं अल्पायु हो राज्यं वृणीष्व । किं च सर्वमप्येतद् अनर्थकं स्वयं चेदल्पायुरित्यत तो ये सब व्यर्थ ही हैं. इसलिये आह–स्वयं च जीव त्वं जीव कहते हैं—तू स्वयं भी जितना धारय शरीरं समग्रेन्द्रियकलापं | जीना चाहे उतने वर्ष जीवित रहा शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि अर्थात् शरीर यानी समग्र इन्द्रिय- जीवितुम् ॥ २३॥ कलापको धारण कर ।। २३॥ ले वल्ली.१] মক্কল্যাণ্ড एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥ इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले । हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो । मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगने- वाला किये देता हूँ॥ २४ ॥ एतत्तुल्यमेतेन यथोपदिष्टेन | इस उपर्युक्त वरके समान यदि सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तू कोई और वर समझता हो तो उसे भी माँग ले। यही नहीं, धन तमपि वृणीष्व । किं च वित्तं अर्थात् प्रचुर सुवर्ण और रत्न आदि प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां तथा उस धनके साथ चिरस्थायिनी च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत् । जीविका भी माँग ले । अधिक क्या, महत्यां भूमौ हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव । तू राजा होकर वृद्धिको प्राप्त हो। और तो क्या, मैं तुझे दैवी और किं चान्यत्कामानां दिव्यानां मानुषी सभी कामनाओंका काम- मानुषाणां च त्वा त्वां कामभाजं भागी अर्थात् इच्छानुसार भोगने- कामभागिनं कामाहं करोमि । वाला किये देता हूँ; क्योंकि मैं सत्यसंकल्पो ह्यहं देवः ॥ २४॥ सत्यसङ्कल्प देवता हूँ ॥ २४ ॥ किं बहुना . ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाश्श्छन्दतः प्रार्थयख ।

४२ कठोपनिषद् [ अध्याय इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयत नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥ : मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वच्छन्दता- पूर्वक माँग ले । यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं । ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने होग्य नहीं होती। मेरेद्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी सेवा करा । परन्तु हे नचिकेतः ! तू मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ।॥ २५ ॥ ये ये कामाः प्रार्थनीया मर्त्यलोकमें जो-जो दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वांस्तान् कामनाएँ--प्रार्थनीय वस्तुएँ दुर्लभ कामांश्छन्दत इच्छातः प्रार्थयस्व । हैं उन सबकी छन्दतः--इच्छा- नुसार माँग ले। इसके सिवा ये किं चेमा दिव्या अप्सरसो रामा--जो पुरुषोंके साथ रमण रमयन्ति पुरुषानिति रामाः सह करती हैं उन्हें 'रामा' कहते हैं, रथैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः | ऐसी ये दिव्य अप्सराएँ, सरथा-- सवादित्राताश्च न हि लम्भनीयाः रथोंके सहित और सतूर्या-तूयों प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यै- ( बाजों ) के सहित मौजूद हैं। मत्रमदादिप्रसादमन्तरेण । हम-जैसे देवताओंकी कृपाके बिना ये अर्थात् ऐसी स्त्रियाँ मरणधर्मा आमिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः | मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं परिचारिणीभिः परिचारयस्व हैं । मेरेद्वारा दी हुई इन आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां अर्थात् पादप्रक्षालनादि सेवा करा; परिचारिकाओंसे तू अपनी परिचर्या कारयात्मन इत्यर्थः । नचिकेतो किन्तु हे नचिकेतः ! मरण अर्थात् वल्ली] शाङ्करभाष्यार्थ मरणं मरणसंबद्धं प्रश्नं प्रेतेऽस्ति | मरनेके पश्चात् जीव रहता है या नहीं-ऐसा कौएके दाँतोंकी नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं परीक्षाके समान मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ, तुझे ऐसा प्रश्न करना मानुप्राक्षी0वें प्रष्टुमर्हसि ॥२५॥ उचित नहीं है ॥ २५॥ e HAPATRANSURROTHER एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचि इस प्रकार प्रलोभित किये जाने- पर भी नचिकेताने महान् सरोवरके केता महादवदक्षोभ्य आह- समान अक्षुब्ध रहकर कहा- नचिकताकी निरीहता श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत- सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तंजः । अपि सर्व जीवितमल्पमेब तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥ हे यमराज ! ये भोग कल रहेंगे या नहीं.--इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं । यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें हमें उनकी आवश्यकता नहीं ॥ २६ ॥ statein श्वो भविष्यन्ति न भवि आपने जिन भोगोंका उल्लेख प्यन्ति वेति संदिह्यमान एवं किया है वे तो श्वोभाव हैं- येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां जिनका भाव अर्थात् अस्तित्व कल रहेंगे या नहीं। इस प्रकार सन्देह- भोगानां ते श्वोभावाः । किं च युक्त हो उन्हें श्वोभाव कहते हैं। मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो बल्कि हे अन्तक–हे मृत्यो ! ये यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तजरयन्ति अप्सरा आदि भोग तो मनुष्यका जो अपक्षयन्त्यप्सर प्रभृतयो भोगाः | यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तेज है उसे कठोपनिषद् [अध्याय १ अनायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजो- | जीर्ण-क्षीण ही कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज और यश. यशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । आदिका क्षय करनेवाले होनेसे ये यां चापि दीर्घजीविकां त्वं अनर्थके ही कारण हैं । और आप दित्ससि तत्रापि शृणु । सर्व | जो दीर्घजीवन देना चाहते हैं उसके विषयमें भी सुनिये । ब्रह्माका यद्ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव जो सम्पूर्ण जीवन-आयु है वह किमुतास्मदादिदीर्घजीविका । भी अल्प ही है. फिर हम-जैसोंके दीर्घजीवनकी तो बात ही क्या है ? अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः अतः आपके रथादि वाहन और तथा नृत्यगीते च ॥ २६॥ नाच-गान आपके ही रहें ॥ २६ ॥ 45 किं च- | इसके सिवा- न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यों लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥ मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता। अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे। जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥ न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यको अधिक धनसे भी तृप्त नहीं किया जा सकता है। लोकमें मनुष्यः । न हि लोके वित्त- धनकी प्राप्ति किसीको भी तृप्त लाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः। करनेवाली नहीं देखी गयी।

वल्ली.१] शाङ्करभाष्यार्थ यदि , नामास्माकं वित्ततृष्णा अब, जब वित्ततृष्णा अब, जब कि हम आपको देख चुके हैं तो, यदि हमें धनकी लालसा होगी स्याल्लप्स्यामहे प्राप्स्यामह इत्ये- तो, उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे। तद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं इसी प्रकार दीर्घजीवन भी पा लेंगे। चेत्वा त्वाम् । जीवितमपि तथैव । जबतक आप याम्यपदपर शासन जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् करेंगे तबतक हम भी जीवित रहेंगे। आपके ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः कथं भला कोई भी मनुष्य सम्पर्कमें आकर हि मयस्त्वया समेत्याल्पधनायु- अल्पधन कैसे रह सकता है ? भवेत् । वरस्तु मे वरणीयः स किन्तु वर तो वह जो आत्मविज्ञान एव यदात्मविज्ञानम् ॥२७॥ है वही हमारा वरणीय है ॥२७॥ अल्पायु और - SAMORIGINE यतश्च-- क्योकि- अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घ जीविते को रमेत । २८॥ कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथिवी- पर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [ स्त्रीसम्भोग आदि ] सुखोंको [ अस्थिर रूपमें ] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥ अजीर्यतां क्योहानिमप्राप्नु वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों-देवताओं- वताममृतानां सकाशमुपेत्य की सन्निधिमें पहुँचकर उनसे उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोज- प्राप्त होने योग्य अपने अन्य प्रयोजनको-प्राप्तव्यको नान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजानन् । जानताप्राप्त करता हुआ भी M ] उत्कृष्ट कठोपनिषद् [ अध्याय १ madrasiapias उपलभमानः स्वयं तु जीर्यन्मयो | जो स्वयं जीर्ण होनेवाला और मरण- धर्मा है अर्थात् जरामरणशील है जरामरणवान्वधःस्थः कुः पृथिवी | ऐसा वधःस्थ–'कु' पृथिवीको कहते हैं, वह अन्तरिक्षादि लोकोंकी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया अपेक्षा अधः --नीची होनेके कारण तस्यां तिष्ठतीति वधःस्थः सन् 'क्वधः' कहलाती है, उसपर जो स्थित होता है वह कधःस्थ कहा कथमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं ! जाता है; ऐसा होकर भी इस प्रकार अविवेकियोंद्वारा प्रार्थनीय पुत्र वित्तहिरण्याद्यस्थिरं वृणीते । पुत्र, धन और सुवर्ण आदि अस्थि पदार्थों को कैसे माँगेगा ? क तदास्थ इति वा पाठान्त- कहीं कधःस्थः' के स्थानमें 'क तदास्थः' ऐसा भी पाठ है । इस रम् । असिन्पक्षे चाक्षरयोजना । पक्षमें अक्षरोंकी योजना इस प्रकार तेषु पुत्रादिष्वास्था आस्थितिः करनी चाहिये । उन पुत्रादिमें जिसकी आस्था आस्थिति अर्थात् तात्पर्येण वर्तनं यस्य स तदास्थः । तत्परतापूर्वक प्रवृत्ति है वह 'तदास्थ' है। जो उनसे भी उत्कृष्टतर और ततोऽधिकतरं पुरुषार्थ दुष्प्रापमपि दुष्प्राप्य पुरुषार्थको पानेका इच्छुक प्रापिपयिषुः क तदास्थो भवेन्न है वह पुरुष उनमें आस्था करनेवाला कैसे होगा ? अर्थात् उन्हें असार कश्चित्तदसारजस्तदर्थी स्याद् समझनेवाला कोई भी पुरुष उनका अर्थी ( इच्छुक ) नहीं हो सकता, इत्यर्थः । सर्वो ह्युपर्युपर्येव बुभूषति क्योंकि सभी लोग उत्तरोत्तर उन्नत मैं पुत्र-धन लोकस्तस्मान्न पुत्रवित्तादिलोभैः ही होना चाहते हैं; अतः आदि लोभोंसे प्रलोभित नहीं किया प्रलोभ्योऽहम् । किं चाप्सर:- जा सकता । तथा वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले अप्सरा आदि प्रमुखान्वर्णरतिप्रमोदाननवस्थित- सुखोंकी अस्थिररूपमें भावना करता वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ रूपतयाभिध्यायन्निरूपयन्यथावत् | हुआ; उन्हे यथावत् (मिथ्यारूपसे) अतिदीर्घ जीविते को विवेकी! समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष अति रमेत ॥ २८॥ दीर्घ जीवनमे प्रेम करेगा ? ||२८|| अतो विहायानित्यैः कामः अतः मुझे इन मिथ्या भोगोसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैने प्रार्थना की है- प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम् - - यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराय महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २६ ॥ हे मृत्यो ! जिस (परलोकगत जीव ) के सम्बन्धमे लोग है या नहीं है। ऐसा सन्देह करते है तथा जो महान् परलोकके विषयमें [ निश्चित विज्ञान ] है वह हमसे कहिये । यह जो गहनतामें अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं मॉगता ॥ २९ ॥ यस्मिन्प्रेत इदं विचिकि हे मृत्यो । जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसा सन्देह त्सनं विचिकित्सन्ति अस्ति करते है कि मरनेके अनन्तर रहता नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो है या नहीं रहता' उस महान्- महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराये परलोकविषये महति साम्पराय-परलोकके ...--परलोकके सम्बन्धमें महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनो | उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान

कठोपनिषद्
[ अध्याय १
निर्णयविज्ञानं यत्तद्रूहि कथय | है वह हमसे कहिये । अधिक क्या,
नोऽस्मभ्यम् । किं बहुना योऽयं यह जो आत्मविषयक प्रकृत वर है
प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं वह बड़ा ही गूढ---गहन है और
गहनं दुर्विवेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः दुर्विवेचनीयताको प्राप्त हो रहा है।
तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थ- | उस वरसे अन्य अविवेकी पुरुषोंद्वारा
नीयमनित्यविषयं वरं नचिकेता प्रार्थनीय कोई और अनित्य वस्तु-
न वृणीते मनसापीति श्रुतेर्वचन- विषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं
मिति ॥२९॥
माँगता—यह श्रुतिका वचन है ॥२९॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ — कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १ ॥

हितीया कल्ली श्रेय-प्रेय विवेक परीक्ष्य शिष्यं विद्यायोग्यता इस प्रकार शिष्यकी परीक्षा कर और उसमें विद्या-ग्रहणकी योग्यता जान यमराजने कहा- चावगम्याह- अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय- स्ते उभे नानार्थे पुरुष५ सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उप्रेयो वृणीते ॥ १॥ श्रेय ( विद्या ) और है तथा प्रेय ( अविद्या ) और ही है। वे दोनों विभिन्न प्रयोजनकले होते हुए ही पुरुषको बाँधते हैं। उन दोनोंमेंसे श्रेयका प्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयका वरण करता है वह पुरुषार्थसे पतित हो जाता है ॥१॥ अन्यत्पृथगेव श्रेयो नि: -! श्रेय अर्थात् निःश्रेयस अन्यत्- श्रेयसं तथान्यदुताप्येव . प्रेयः भिन्न ही तथा प्रेय यानी प्रियतर वस्तु भी अन्य ही है। वे श्रेय और प्रियतरमपि । ते प्रेयाश्रेयसी प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले उमे नानार्थे भिन्न प्रयोजने सती होनेपर भी अधिकारी यानी पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं | वर्णाश्रमादिविशिष्ट पुरुषका बन्धन कर देते हैं, अर्थात् सब लोग सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्म- उन्हींके द्वारा अपने [ विद्या- कर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः। अविद्यासम्बन्धी ] कर्तव्यसे जाते हैं। अभ्युदयकी इच्छावाला भेय प्रेयसोभ्युदयामृतत्वार्थी प्रेयसे और अमृतत्वका ] युक्त हो पुरुष प्रेयसे क० उ०४- कठोपनिषद् [ अध्याय १ ते एकका पुरुषः प्रवर्तते । अतः श्रेयःप्रेयः- | इच्छुक श्रेयसे प्रवृत्त होता है। प्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध अतः श्रेय और प्रेय इन दोनोंके प्रयोजनोंकी कर्तव्यताके कारण सब इत्युच्यते सर्वः पुरुषः। लोग उनसे बद्ध कहे जाते हैं। यद्यप्येकैकपुरुषार्थसं वे यद्यपि एक-एक पुरुषार्थसे बन्धिनी विद्या विद्यारूपत्वाद्विरुद्ध सम्बन्ध रखनेवाले हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होनेके कारण इत्यन्यतरापरित्यागेनैकेन पुरुषेण परस्पर विरुद्ध हैं, अतः सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयो- परित्याग किये बिना एक पुरुषद्वारा हित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान न हो सकनेके कारण उनमेंसे अविद्या- केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः रूप प्रेयको छोड़कर केवल श्रेयका ही साधु शोभनं शिवं भवति । स्वीकार करनेवालेका साधु--शुभ यानी कल्याण होता है। जो मूढ यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ- वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पुरुषार्थ अर्थात् परमार्थसम्बन्धी पारमार्थिकात्प्रयोजनानित्यात् नित्य प्रयोजनसे च्युत हो जाता है; वह कौन है ? वही जो प्रच्यवत इत्यर्थः। कोऽसौय उप्रेयो प्रेयका वरण अर्थात् ग्रहण करता वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥१॥ | हैयह इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥ यद्युभे अपि कर्तुं स्वायत्ते यदि श्रेय और प्रेय इन दोनों- हीका करना मनुष्यके स्वाधीन है पुरुषेण किमर्थं प्रेय एवादत्ते | तो लोग अधिकतासे प्रेयको ही क्यों स्वीकार करते हैं ? इसपर बाहुल्येन लोक इत्युच्यते---- कहा जाता है- वल्ली २] शाङ्करभाष्यार्थ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत- स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दा योगक्षेमावृणीत ॥ २ ॥ श्रेय और प्रेय [ परस्पर मिले हुए-से होकर ] मनुष्यके पास आते हैं। उन दोनोंको बुद्धिमान् पुरुष भली प्रकार विचारकर अलग-अलग करता है । विवेकी पुरुष प्रेयके सामने श्रेयका ही वरण करता है; किन्तु मूढ़ योग-क्षेमके निमित्तसे प्रेयका वरण करता है ॥ २ ॥ सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः वे मनुष्यके अधीन है-- यह बात ठीक है । तथापि वे श्रेय और फलतश्च मन्दबुद्धीनां दुर्विवेक- प्रेय मन्दबुद्धि पुरुषोंके लिये साधन रूपे सती व्यामिश्रीभूते इव और फळदृष्टिसे जिनका पार्थक्य करना बहुत कठिन है ऐसे होकर मनुष्यमेतं पुरुषमा इतः प्राप्नुतः परस्पर मिले हुए-से ही मनुष्य यानी इस जीवको प्राप्त होते हैं । अतः हंस श्रेयश्च प्रेयश्च । अतो हंस इवाम्भसः जिस प्रकार जलसे दूध अलग कर पयस्तो श्रेय प्रेय पदार्थो सम्परीत्य लेता है उसी प्रकार धीर--बुद्धिमान् पुरुष उन श्रेय और प्रेय पदार्थोंका सम्यक्परिगम्य • मनसालोच्य भली प्रकार परिगमन कर--मनसे गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति उनकी आलोचना कर उनके गौरव और लाघवका विवेक यानी पृथक्करण धीरो धीमान् । विविच्य च करता है। इस प्रकार श्रेयका श्रेयो हि श्रेय एवाभिवृणीते विवेचन कर वह प्रेयकी अपेक्षा अधिक अभीष्ट होने के कारण श्रेयका प्रेयसोऽभ्यर्हितत्वात् । कोऽसौ ? ही ग्रहण करता है। परन्तु ऐसा करता कौन है ? वही जो बुद्धिमान है। धीरः।

कठोपनिषद् [अध्याय १ , यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धिः स इसके विपरीत जो मन्द-अल्प- विवेकासामर्थ्याद्योगक्षेमाद्योग- | बुद्धि है वह, विवेकशक्तिका अभाव. होनेके कारण, जो योग-क्षेमका ही क्षेमनिमित्तं शरीराद्युपचयरक्षण- कारण है अर्थात् जो शरीरादिकी निमित्तमित्येतत्प्रेयः पशुपुत्रादि- वृद्धि और रक्षाका ही निमित्त है उस पशु-पुत्रादिरूप प्रेयका ही लक्षणं वृणीते ॥२॥ वरण करता है ॥ २ ॥ etbspe SRCIENJamana Aartamannews nasarawimkhadeep स त्वं प्रियान्त्रियरूपाश्व कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैताश्सङ्का वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ हे नचिकेतः ! उस तूने पुत्र-वित्तादि प्रिय और . अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंको, उनका असारत्व चिन्तन करके, त्याग दिया है और जिसमें बहुत-से मनुष्य डूब जाते हैं उस इस धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुआ ॥ ३ ॥ स त्वं पुनःपुनर्मया प्रलोभ्य हे नचिकेतः ! तेरी बुद्धिमत्ता मानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन् | धन्य है; जिस तूने कि मेरे द्वारा प्रियरूपांश्चाप्सरःप्रभृतिलक्षणान् बारम्बार प्रलोभित किये जानेपर भी पुत्रादि प्रिय तथा अप्सरा आदि कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तेषाम् प्रियरूप भोगोंका, उनकी अनित्यता अनित्यत्वासारत्वादिदोषान् हे और असारता आदि दोषोंका नचिकेतोऽत्यस्राक्षीरतिसृष्टवान् विचार करके परित्याग कर दिया, परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता और जिसमें मूढ़ पुरुष प्रवृत्त हुआ तव । नैतामवाप्तवानसि सङ्कां करते हैं उस वित्तमयी—धनप्राया सुर्ति कुत्सितां मूढजनप्रवृत्तां निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं वल्ली २] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ वित्तमयीं धनप्रायाम् । यस्यां सृतौ । हुआ जिस मार्गमें कि बहुत-से मूढ़ मजन्ति सीदन्ति बहवोऽनेके | पुरुष डूब जाते अर्थात् दुःख मूढा मनुष्याः॥३॥ उठाते हैं ॥ ३ ॥ . - तयोः श्रेय आददानस्य साधु उनमेंसे श्रेयको ग्रहण करने- वालेका शुभ होता है और जो प्रेयका वरण करता है वह स्वार्थसे भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत पतित हो जाता है। ऐसा जो ऊपर ( इस वल्लीके प्रथम मन्त्रमें) कहा गया है, सो क्यों ? [ इसपर इत्युक्तं तत्कस्माद्यत: यमराज कहते हैं, ] क्योंकि- दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥ जो विद्या और अविद्यारूपसे जानी गयी हैं वे दोनों अत्यन्त विरुद्ध खभाववाली और विपरीत फल देनेवाली हैं। मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ ? क्योंकि तुझे बहुत-से भोगोंने भी, नहीं -कुभाया-॥ ४॥ दूरं दृरेण महतान्तरेणैते विप-। ये दोनों प्रकाश और अन्धकार- के समान विवेक और अविवेकरूप रीते अन्योन्यव्यावृत्तरूपे विवेका- होनेसे 'दूरम्' अर्थात् महान् अन्तरके साथ विपरीत हैं—आपस- विवेकात्मकत्वात्तमःप्रकाशाविव । में एक-दूसरेसे व्यावृत्तरूप हैं । विधूची विषूच्यौ नानागती भिन्न- और विषूची अर्थात् नाना गतिवाले हैं यानी संसार और मोक्षके कारण फेले संसारमोक्षहेतुन्वेनेत्येतत् । ' होनेसे विभिन्न फलयुक्त हैं ।

कठोपनिषद्
[अध्याय १
के ते इत्युच्यते। या चाविद्या वे कौन हैं--इसपर कहते
प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया हैं --जो कि पण्डितोंद्वारा प्रेयको
विषय करनेवाली अविद्या तथा
ज्ञाता निर्मातावगता पण्डितैः ।
श्रेयोविषया विद्यारूपसे जानी गयी
तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं हैं ।' उनमें तुझ नचिकेताको मैं
नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । विद्याभिलाषी अर्थात् विद्यार्थी
कसाद्यस्मादविद्वबुद्धिप्रलोभिनः | मानता हूँ। क्यों मानता हूँ ? क्योंकि
अविवेकियोंकी बुद्धिको प्रलोभित
कामा अप्सरःप्रभृतयो बहवोऽपि करनेवाले अप्सरा आदि बहुत-से
त्वा त्वां नालोलुपन्त न विच्छेदं भोग भी तुम्हें लुभा नहीं
कृतवन्तः
सके...--उन्होंने तेरे हृदयमें अपने
श्रेयोमार्गादात्मोप-
भोगकी इच्छा उत्पन्न करके तुझे
भोगामिवाच्छासंपादनेन । अतो श्रेयोमार्गसे विचलित नहीं किया ।
विद्यार्थिनं श्रेयोभाजनं मन्य
अतः मैं तुझे विद्यार्थी यानी श्रेयका
पात्र समझता हूँ--यह इसका
इत्यभिप्रायः॥४॥
अभिप्राय है॥४॥
अविद्याग्रस्तों की दुर्दशा
ये तु संसारभाजना
किन्तु जो संसारके पात्र हैं---
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥
वे अविद्याके भीतर रहनेवाले, अपने-आप बड़े बुद्धिमान् बने हुए
और अपनेको पण्डित माननेवाले, मूढ पुरुष, अन्धेसे ही ले जाये जाते
हुए अन्धेके समान अनेकों कुटिल गतियोंकी इच्छा करते हुए भटकने
रहते हैं।॥ ५॥

वल्ली २]
शाङ्करभाष्यार्थ
अविद्यायामन्तरे मध्ये घनी वे घनीभूत अन्धकारके समान
भूत इव तमसि वर्तमाना | अविद्याके भीतर स्थित हो पुत्र-पशु
आदि सैकड़ों तृष्णापाशोंसे बंधे हुए
वेष्टयमानाः पुत्रपश्वादितृष्णा-
[ व्यवहारमें लगे रहते हैं ] । जिस
पाशशतैः
। स्वयं वयं धीराः प्रकार अंधे यानी दृष्टिहीन पुरुषसे
प्रज्ञावन्तः पण्डिताः
शास्त्र- विषम मार्गमें ले जाये जाते हुए
कुशलाश्चेति मन्यमानास्ते दन्द्र-
बहुत-से अंधे महान् अनर्थको
प्राप्त होते हैं उसी प्रकार 'हम बड़े
म्यमाणा अत्यर्थं कुटिलामनेक-
धीर यानी बुद्धिमान् हैं और
रूपां गतिम् इच्छन्तो जरामरण- पण्डित अर्थात् शास्त्रकुशल हैं'
रोगादिदुःखैः परियन्ति परि- इस प्रकार अपनेको माननेवाले वे
गच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धे-मूद--अविवेकी पुरुष नाना प्रकार-
नैव दृष्टिविहीनेनैव नीयमाना करते हुए जरा, मरण और रोगादि
की अन्यन्त कुटिल गतियोंकी इच्छा
विषमे पथि . यथा बहवोऽन्धा दुःखोंसे सब ओर भटकते रहते
महान्तमनर्थमृच्छन्ति तद्वत् ॥५॥ हैं ॥ ५ ॥
अत एव मूढत्वात्
अतएव मूढ़ताके कारण--
'न (साम्परायः प्रतिभाति बालं
प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुनः
पुनर्वशमापद्यते
मे ॥६॥
धनके मोहसे अंधे हुए और प्रमाद करनेवाले उस मूर्खको परलोक-
का साधन नहीं सूझता । यह लोक है, परलोक नहीं है-ऐसा माननेवाला
पुरुष बारम्बार मेरे वशको प्राप्त होता है ॥ ६॥

कठोपनिषद्
[ अध्याय
अनन्तर
न साम्परायः प्रतिभाति । उसे साम्पराय भासित नहीं
होता । देहपातके
सम्पर ईयत इति सम्परायः पर- जिसके प्रति गमन किया जाय
लोकस्तत्प्राप्तिप्रयोजनः साधन-
उसे सम्पराय--परलोक कहते
हैं । उसकी प्राप्ति ही जिसका
विशेषः शास्त्रीयः साम्परायः । प्रयोजन है वह शास्त्रीय साधन-
विशेष साम्पराय है । वह बाक
स च बालमविवेकिनं प्रति न अर्थात् अविवेकी पुरुषके प्रति
प्रतिभाति न प्रकाशते नोपतिष्ठत प्रकाशित नहीं होता, अर्थात् वह
उसके चित्तके सम्मुख उपस्थित
इत्येतत् ।
नहीं होता।
प्रमाद्यन्तं प्रमादं कुर्वन्तं
तथा जो प्रमाद करनेवाल
पुत्रपश्वादिप्रयोजनेष्वासक्तमनसं | है--जिसका चित्त पुत्र-पशु आदि
प्रयोजनोंमें आसक्त है और जो
तथा वित्तमोहेन वित्तनिमित्तेना-नके मोहसे अर्थात धननिमित्तक
विवेकेन मूढं तमसाच्छन्नं अविवेकसे मूढ़ यानी अज्ञानसे
सन्तम् । अयमेव लोको योऽयं आवृत है [ उस मूढ़को परलोकका
दृश्यमानः स्त्र्यन्नपानादिविशिष्टो | साधन नहीं सूझा करता ] । 'यह
जो स्त्री और अन्न-पानादिविशिष्ट
नास्ति परोऽदृष्टो लोक इत्येवं
दृश्यमान लोक है बस यही है,
मननशीलो मानी पुनः पुन- | इससे अन्य और कोई [स्वर्गादि ]
जनित्वा वशं मदधीनतामापद्यते लोक नहीं है' जो पुरुष इस प्रकार
मे मृत्योर्मम । जननमरणादि- लेकर मुझ मृत्युकी अधीनताको प्राप्त
माननेवाला है वह बारम्बार जन्म
लक्षणदुःखप्रबन्धारूढ एव भव- होता है। अर्थात् वह जन्म-
तीत्यर्थः। प्रायेण ह्येवंविध एव
मरणादिरूप दुःखपरम्परापर ही
आरूढ़ रहता है। यह लोक प्रायः
लोकः ॥ ६॥
इसी प्रकारका है ॥६॥

वल्ली.२] যালান্যা tharoomnamaneumonileon आत्मज्ञानकी दुर्लभता RE" यस्तु श्रेयोऽर्थी सहस्रषु किन्तु जो तेरे समान श्रेयकी कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधो इच्छावाला है ऐसा तो हजारोंमें यसात्- कोई ही आत्मवेत्ता होता है क्योकि- श्रवणायापि बहुभियों न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यों वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा- श्वर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ जो बहुतोंको तो सुननेके लिये भी प्राप्त होनेयोग्य नहीं है, जिसे बहुतसे सुनकर भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्वका निरूपण करनेवाला भी आश्चर्यरूप है, उसको प्राप्त करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्यद्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्यरूप है ॥७॥ श्रवणायापि श्रवणार्थ श्रोतुम् जो आत्मा बहुतोको तो सुनने- अपि यो न लभ्य आत्मा के लिये भी नहीं मिलता तथा दूसरे बहुभिरनेकैः शृण्वन्तोऽपि बहवो- बहुतसे अभागी अशुद्धचित्त पुरुष ऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युन जिस आत्मतत्त्वको सुनकर भी नहीं जान पाते। यही नहीं, इसका विदन्त्यमागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः । किं चास्य वक्तापि वक्ता भी आश्चर्य अर्थात् अद्भुत-सा आश्चर्योऽद्भुतवदेवानेकेषु कश्चिद् होता है । तथा सुनकर भी इस ही है--वह भी अनेकोमें कोई ही एव भवति । तथा श्रुत्वाप्यस्य आत्माका लब्धा ( ग्रहण करनेवाला) आत्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु तो अनेकोमें कोई निपुण पुरुष ही लब्धा कश्चिदेव भवति । यसाद् होता है; क्योकि जिसे [ आत्म- आश्चर्यों ज्ञाता कश्चिदेव कुश- | दर्शनमें ] कुशल आचार्यने उपदेश लानुशिष्टः कुशलेन निपुणेन किया हो ऐसा इसका ज्ञाता भी आचार्येणानुशिष्टः सन् ॥७॥ आश्चर्यरूप ही है ॥ ७॥ [ कठोपनिषद् [ अध्याय १ कस्मात्-- | क्योंकि न नरेणावरेण प्रोल सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्त गतिरत्र नास्ति अणीयान्ह्यतय॑मणुप्रमाणात् कई प्रकारसे कल्पित किया हुआ यह आत्मा साधारण बुद्धिवाले पुरुष- द्वारा कहे जानेपर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता । अभेददर्शी आचार्य- द्वारा उपदेश किये गये इस आत्मामें अस्ति-नास्तिरूप ] कोई गति नहीं है; क्योंकि यह सूक्ष्म परिमाणवालोंसे भी सूक्ष्म और दुर्विज्ञेय है ॥ ८ ॥ न हि नरेण मनुष्येणावरेण यह आत्मा, जिसके विषयमें प्रोक्तोऽवरेण हीनेन प्राकृतबुद्धिना तुम मुझसे पूछ रहे हो, किसी इत्येतदुक्त एष आत्मा यं त्वं मां अवर-हीन यानी साधारण बुद्धि- वाले मनुष्यसे कहा जानेपर अच्छी पृच्छसि न हि सुष्टु सम्य- तरह नहीं जाना जा सकता ग्विज्ञेयो विज्ञातुं शक्यो यस्माद् क्योंकि इसका बादियोंद्वारा अस्ति- बहुधास्ति नास्ति कर्ताकर्ता नास्ति, कर्ता-अकर्ता एवं शुद्ध- অদ্ভান্ত इत्यायनेकधा अशुद्ध-इस प्रकार अनेक तरहसे चिन्त्यमानो वादिभिः । चिन्तन किया जाता है। कथं पुनः सुविज्ञय इत्युच्यते तो फिर यह किस प्रकार अनन्यप्रोक्तेऽनन्येन अच्छी तरह जाना जाता है ? इसपर अपृथग्दर्शिना कहते हैं-अनन्यप्रोक्त-अनन्य दैशिकादेशस्य आचार्येण प्रतिपाद्य- | अर्थात् अपने प्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूपको ब्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त आत्मनि प्राप्त हुए अपृथग्दर्शी आचार्यद्वारा गतिरनेकधास्ति नास्तीत्यादि- कहे हुए इस आत्मामें अस्ति-नास्ति- लक्षणा चिन्ता गतिरत्रास्मिन् | रूप गति यानी चिन्ता नहीं है। आत्मनि नास्ति न विद्यते सर्ववि- क्योंकि आत्मा सम्पूर्ण विकल्पोंकी कल्पगतिप्रत्यस्तमितत्वादात्मनः।। गतिसे रहित है । विद्योपलब्धौ प्राधान्यम् वल्ली] যালাখ अथवा Rana - अर्थात् स्वात्मभूत अथवा खात्मभूतेऽनन्यस्मिन् अनन्यप्रोक्त-अपने खरूपभूत अनन्य आत्माका गुरु- आत्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्त गतिः द्वारा उपदेश किये जानेपर अन्य अत्रान्यावगतिर्नास्ति ज्ञेयस्यान्यस्य | ज्ञेय वस्तुका अभाव हो जानेके कारण उसमें कोई गति यानी अन्य अभावात् । ज्ञानस्य ह्येषा परा | अवगति (ज्ञान) नहीं रहती; क्योकि आत्माके एकत्वका जो विज्ञान है निष्ठा यदात्मैकत्वविज्ञानम् । यही ज्ञानकी परा निष्ठा है । अतः अतोऽवगन्तव्याभावान्न गतिः ज्ञेय वस्तुका अभाव हो जाने के कारण फिर यहाँ कोई और गति अत्रावशिष्यते । संसारगतिर्वात्र नहीं रहती। अथवा उस अनन्य आत्मतत्त्वके नास्त्यनन्य आत्मनि प्रोक्ते उपदेश कर दिये जानेपर समारकी गति नहीं रहती; क्योकि उसके नान्तरीयकत्वात्तविज्ञानफलस्स अनन्तर तुरत ही आत्मविज्ञानका मोक्षस्य । फलरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्म अथवा जिसका आगे वर्णन किया जायगा उस ब्रह्मात्मभूत आचार्यद्वारा भूतेनाचार्येण प्रोक्त आत्मनि उपदेश किये हुए इस आत्मतत्त्वमे अगतिरनवबोधोऽपरिज्ञानम् अत्र | फिर अगति--अनवबोध अर्थात् अपरिज्ञान नहीं रहता। अर्थात् नास्ति । भवत्येवावगतिस्तद्विषया आचार्यके समान उस श्रोताको भी श्रोतुस्तदस्म्यहमित्याचार्यस्येवे- यह आत्मविषयक ज्ञान हो ही जाता है कि 'वह (ब्रह्म ) मै हूँ । एवं सुविज्ञेय आत्मा आगमवता इस प्रकार शास्त्रज्ञ आचार्य- द्वारा अभिन्नरूपसे कहा हुआ आत्मा आचार्येणानन्यतया सुविज्ञेय होता है। नहीं तो, यह इतरथा ह्यणीयानणुप्रमाणादपि अणुप्रमाण वस्तुओसे भी अणु हो त्यर्थः। प्रोक्तः।

कठोपनिषद् [ अध्याय १ सम्पद्यत आत्मा । अतय॑मतयः | जाता है। अपनी बुद्धिसे निकाले केवल तर्कद्वारा इसका ज्ञान नहीं खबुद्ध्याभ्यूहेन केवलेन तर्केण हो सकता । यदि कोई पुरुष तर्क तर्यमाणेऽणुपरिमाणे केनचित् करके उस अणुपरिमाण आत्माको स्थापित आत्मनि ततो ह्यणुतरम् स्थापित भी करे तो दूसरा उससे भी अणु तथा तीसरा उससे भी अन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणु- अत्यन्त अणु स्थापित कर देगा; तममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा | क्योंकि कुतर्ककी स्थिति कहीं भी कचिद्विद्यते ॥ ८॥ नहीं है ॥ ८॥ नैषा तण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ हे प्रियतम ! सम्यक् ज्ञानके लिये शुष्क तार्किकसे भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा कही हुई यह बुद्धि, जिसे कि तू प्राप्त हुआ है, तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है । अहा ! तू बड़ा ही सत्य धारणावाला है। हे नचिकेतः ! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला प्राप्त हो ॥ ९ ॥ अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मनि अतः अभेददर्शी आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए आत्मामें उत्पन्न उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्म- हुए जो यह शास्त्रप्रतिपाद्य आत्म- विषयक मति है वह तर्कसे अर्थात् मतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्धयभ्यूह- अपनी बुद्धिके ऊहापोहमात्रसे प्राप्त मात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थः । होने योग्य नहीं है । अथवा [ यह समझो कि ] यह आत्मबुद्धि तर्क नापनेतन्या वा न हातव्या शक्तिसे अपनेतन्य यानी छोड़ी वल्ली २] शाङ्करमाष्याथे ६१ , तार्किको ह्यनागमज्ञः खबुद्धि- | जाने योग्य नहीं है; क्योकि तार्किक तो अध्यात्मशास्त्रसे अनभिज्ञ होता परिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथ- है, वह अपनी बुद्धिसे परिकल्पित यति । अत एव च येयमागम- चाहे जो कहता रहता है। अतः हे प्रेष्ठ -प्रियतम ! यह जो प्रभूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेन शास्त्रजनित आत्मबुद्धि है वह तो आचार्येणैव तार्किकात्प्रोक्ता सती तार्किकसे भिन्न किसी शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा उपदेश की जानेपर सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम। ही सम्यक् ज्ञानकी कारण होती है। का पुनः सा तर्कागम्या अच्छा तो, तर्कसे प्राप्त न होने योग्य वह मति कौन-सी है ? इस- मतिरित्युच्यते- पर कहते है- यां त्वं मतिं मद्वरप्रदानेन जिस मतिको तूने मेरे वर- आपः प्राप्तवानसि. । सत्या प्रदानसे प्राप्त किया है। जिस तेरी धृति सत्य अर्थात् यथार्थ पदार्थको अवितथविषया धृतिर्यस्य तव सत्वं विषय करनेवाली है वह तू सत्य- सत्यधृतिर्बतासीत्यनुकम्पयन्नाह | धृति है । 'बत' इस अव्ययसे अनुकम्पा करते हुए यमराज आगे मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञान- कहे जानेवाले विज्ञानकी स्तुतिके स्तुतये । त्वादृक्त्वत्तुल्यो नः लिये नचिकेतासे कहते है-'हे अस्मभ्यं भूयाद्भवताद्भवत्वन्यः नचिकेतः ! हमे तेरे समान प्रश्न करनेवाला और भी पुत्र अथवा शिष्य पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा; कीदृग्या- मिले । परन्तु वह हो कैसा ? जैसा दृक्त्वं हे नचिकेतः प्रष्टा ॥९॥ कि तू प्रश्न करनेवाला है ॥ ९ ॥ पुनरपि तुष्ट आह-- नचिकेतासे प्रसन्न हुए मृत्युने फिर भी कहा- - कठोपनिषद् [ अध्याय १ Malangana कर्मफलकी अनित्यता जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि- रनित्यैव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥१०॥ मैं यह जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है; क्योंकि अनित्य साधनोंद्वारा वह नित्य [ आत्मा ] प्राप्त नहीं किया जा सकता । तब मेरेद्वारा नाचिकेत अग्निका चयन किया गया । उन अनित्य पदार्थोंसे ही मैं | आपेक्षिक ] नित्य [याम्यपद ] को प्राप्त हुआ हूँ॥ १० ॥ जानाम्यहं शेवधिनिधिः कर्म जिसके लिये निधि (खजाने) के फललक्षणो. निधिरिव प्रार्थ्यत | समान प्रार्थना की जाती है वह कर्मफलरूप निधि ही शेवधि' है। इति । असावनित्यमनित्य इति यह अनित्य-सदा न रहनेवाली जानामि । न हि यस्मादनित्यैः है—ऐसा मै जानता हूँ। क्योंकि अध्रुवैर्नित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमा- | इन अनित्य यानी अस्थिर साधनोंसे स्माख्यः शेवधिः । यस्त्वनित्य- वह परमात्मा नामक नित्य-स्थिर निधि प्राप्त नहीं की जा सकती। सुखात्मकः शेवधिः स एवानित्य- जो निधि अनित्यसुखस्वरूप है वही द्रव्यैः प्राप्यते । अनित्य पदार्थोंसे प्राप्त होती है। हि यतस्ततस्तस्मान्मया जान क्योंकि ऐसा है इसलिये मैंने तापि नित्यमनित्यसाधनैर्न | यह जान-बूझकर भी कि 'अनित्य साधनोसे नित्यकी प्राप्ति नहीं होती' प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः नाचिकेत अग्निका चयन किया था; अनित्यैव्यैः पश्वादिभिः | अर्थात् पशु आदि अनित्य पदार्थों से स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निनिवर्तित | वर्ग-सुखके साधनस्वरूप उस अग्नि वल्ली २] शाङ्करमाष्यार्थ ६३ इत्यर्थः । तेनाहमधिकारापन्नो | का सम्पादन किया था । उसीसे मैं अधिकारसम्पन्न होकर आपेक्षिक नित्यं याम्यं स्थानं स्वगाख्यं नित्य वर्ग नामक याम्यस्थानको नित्यमापेक्षिकंप्राप्तवानसि ॥१०॥ प्राप्त हुआ हूँ॥ १० ॥ नचिकताक त्यागकी प्रशसा कामस्याप्ति जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम्। स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥११॥ हे नचिकेत. । तूने बुद्विमान् होकर भोगोकी समाप्ति ( अवधि ), जगत्की प्रतिष्ठा, यज्ञफलके अनन्तत्व, अभयकी मर्यादा, स्तुत्य और अहती ( अणिमादि ऐश्वर्ययुक्त ) विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठाको देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया है ॥ ११ ॥ त्वं तु कामस्याप्तिं समाप्तिम्, किन्तु हे नचिकेत ! तुमने तो धीर-धृतिमान् होकर कामनाओं- अवेहैव सर्वे कामाः परिसमाप्ताः, की प्राप्ति—समाप्तिको, क्योकि इस [हिरण्यगर्भ पद ] मे ही सम्पूर्ण जगतः साध्यात्माधिभूताधि- कामनाएँ समाप्त होती है, तथा देवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्म- | सर्वात्मक होनेके कारण अध्यात्म, अविभूत एव अधिदैवरूप जगत्की कत्वात, क्रतोः फलं हैरण्यगर्भ प्रतिष्ठा यांनी आश्रयको, यज्ञके अनन्त्य--आनन्य अर्थात् अनन्त पदमनन्त्यमानन्त्यम्, अभयस्य फल हिरण्यगर्भ पदको, अभयके पार च पारं परां निष्ठाम्, स्तोमं अर्थात् परा निष्ठाको और स्तोम---

कठोपनिषद्
[ अध्याय
तथा
स्तुत्यं महदणिमाद्यैश्वर्याधनेक- । स्तुत्य तथा महतु-अणिमादि ऐश्वर्य
आदिक अनेक गुणोंके सङ्घातसे
गुणसंहतं स्तोमं च तन्महच्च
युक्त, इस प्रकार जो स्तोम है और
निरतिशयत्वात्स्तोममहत, उरु- | महत् भी है ऐसे सर्वोत्कृष्ट होनेके
गायं विस्तीर्णा गतिम्, प्रतिष्ठा कारण स्तोममहत् उरुगाय–विस्तीर्ण
गतिको प्रतिष्ठा--अपनी
स्थितिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा
सर्वोत्तम स्थितिको देखकर भी उसे
धृत्या धैर्येण धीरो धीमान्सन् धैर्यपूर्वक त्याग दिया । अर्थात्
नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः परमेव | एकमात्र परवस्तुकी ही इच्छा
आकासन्नतिसृष्टवानसि सर्वम् करते हुए इस सम्पूर्ण सांसारिक
एतत् संसारभोगजातम् । अहो | अहो ! तुम बड़े ही उत्कृष्ट
भोगसमूहका परित्याग कर दिया ।
बतानुत्तमगुणोऽसि ॥११॥
गुणसम्पन्न हो ! ॥ ११ ॥
..
जिस आत्माको तुम जानना
यं त्वं ज्ञातुमिच्छस्यात्मानम्- चाहते हो-
आत्मज्ञानका फल
तं
दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं
गुहाहितं गहरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं
मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति ॥ १२ ॥
उस कठिनतासे दीख पड़नेवाले, गूढ स्थानमें अनुप्रविष्ट, बुद्धिमें
स्थित, गहन स्थानमें रहनेवाले, पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी प्राप्तिद्वारा
जानकर धीर (बुद्धिमान् ) पुरुष हर्ष-शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥

वल्ली.२] शाङ्करभाष्यार्थ तं दुर्दर्श दुःखेन दर्शनम् | अति सूक्ष्म होनेके कारण अस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात् दुर्दर्श--जिसका कठिनतासे दर्शन हो सके उसे दुर्दर्श कहते हैं, गूढ गूढंगहनमनुप्रविष्टंप्राकृतविषय- अर्थात् गहन स्थानमें अनुप्रविष्ट यानी शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विकारविज्ञानः प्रच्छन्नमित्येतत्, विज्ञानसे छिपे हुए, गुहा--बुद्धिमें गुहाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं उपलब्ध होनेके कारण उसीमें स्थित तथा गहरेष्ठ--गह्वर--विषम यानी तत्रोपलभ्यमानत्वात्, गह्वरेष्ठं अनेक अनर्थोंसे सङ्कुलित स्थानमें रहनेवाले । देवको जानकर धीर गहरे विषमेऽनेकानर्थसंकटे पुरुष हर्ष-शोकको त्याग देता है ] ! तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एवं क्योंकि आत्मा इस प्रकार गूढ स्थानमें अनुप्रविष्ट और बुद्धिमें गूढमनुप्रविष्टो गुहाहितश्चातो स्थित है इसलिये वह गह्वरेष्ठ तथा गहरेष्ठ होनेके कारण गहरेष्ठः, अतो दुर्दर्शः। दुर्दर्श है। हटाकर आत्मामें लगा तं पुराणं पुरातनमध्यात्म- उस पुराण यानी पुरातन देवको योगाधिगमेन विषयेभ्यः प्रति- अध्यात्मयोगकी--चित्तको विषयोंसे देना संहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोग है, उसकी प्राप्तिद्वारा अध्यात्मयोगस्तस्याधिगमरतेन जानकर धीर पुरुष अपने उत्कर्ष- मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्ष- अपकर्षका अभाव हो जानेके कारण शोकावात्मन उत्कर्षापकर्षयोः हर्ष-शोकका परित्याग कर देता अभावाजहाति ॥१२॥ है ॥ १२ ॥ है किं च- | इसके सिवा- क० उ०५-

कठोपनिषद्
[अध्याय १
वार्थ
एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य - मर्त्यः
प्रवृह्य
धर्म्युमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीय५ हि लब्ध्वा
विवृत५ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥१३॥
मनुष्य इस आत्मतत्त्वको सुनकर और उसका भली प्रकार ग्रहण कर
धर्मी आत्माको देहादि संघातसे पृथक् करके इस सूक्ष्म आत्माको पाकर
तथा इस मोदनीयकी उपलब्धि कर अति आनन्दित हो जाता है । मैं
[ तुझ ] नचिकेताको खुले हुए ब्रह्मभवनवाला समझता हूँ [ अर्थात्
हे नचिकेतः ! मेरे विचारसे तेरे लिये मोक्षका द्वार खुला हुआ है ] ॥१३॥
एतदात्मतत्त्वं यदहं वक्ष्यामि
इस आत्मतत्त्वको, जिसका कि
अब मैं वर्णन करूँगा, उसे सुनकर-
तच्छ्रुत्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्म-
आचार्यकी कृपसे भली प्रकार
भावेन परिगृह्योपादाय मो आत्मभावसे ग्रहण कर मरणधर्मा
मरणधर्मा धर्मादनपेतं धर्म्य | मनुष्य
इस धर्म्य-धर्मविशिष्ट
प्रवृह्योद्यम्य पृथक्कृत्य शरीरादेः | आत्माको शरीरादिसे उद्यमन करके
अणुं सूक्ष्ममेतमात्मानम् आप्य
यानी पृथक् करके तथा इस अणु
अर्थात् सूक्ष्म और मोदनीय--
प्राप्य स मा विद्वान्मोदते मोद- हर्षयोग्य आत्माको उपलब्ध कर वह
नीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा । मरणशील विद्वान् आनन्दित हो
तदेतदेवंविधं ब्रह्मसम भवनं | जाता है । इस प्रकारके तुझ
नचिकेताके प्रति मैं ब्रह्मभवनको खुले
नचिकेतसं त्वां प्रत्यपावृतद्वारं
द्वारवाला अर्थात् अभिमुख हुआ
विवृतमभिमुखीभूतं मन्ये मोक्षाहं | मानता हूँ। अभिप्राय यह कि मैं तुझे
त्वां मन्य इत्यभिप्रायः॥१३॥ | मोक्षके योग्य समझता हूँ॥ १३ ॥

वल्ली २]
शाङ्करभाष्याथ
यद्यहं योग्यः प्रसन्नश्वासि
[नचिकेता बोला-] भगवन् !
यदि मैं योग्य हूँ और आप मुझपर
भगवन्मां प्रति--
प्रसन्न हैं तो
सर्वातीतवस्तुविषयक प्रश्न
'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥१४॥
जो धर्मसे
पृथक
अधर्मसे
पृथक् तथा इस कार्यकारणरूप प्रपञ्चसे
भी पृथक् है और जो भूत एवं भविष्यत्से भी अन्य है--ऐसा आप
जिसे देखते हैं वही मुझसे कहिये ॥ १४ ॥
अन्यत्र धर्माच्छास्त्रीयाद्धर्मा-
जो धर्म यानी शास्त्रीय
धर्मानुष्ठान, उसके फल तथा [कर्ता-
नुष्ठानात्तत्फलात्कारकेभ्यश्च
कारण आदि ] कारकोंसे अन्यत्र-
पृथग्भूतमित्यर्थः । तथान्यत्र
पृथग्भूत है, तथा जो अधर्मसे भिन्न
अधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् | है और कृत-कार्य तथा अकृत-
कृतं कार्यमकृतं
कारणमस्मात्
कारण इस प्रकार इस कार्य-कारण
अन्यत्र । किं चान्यत्र भूताच्चाति- यही नहीं भूत अर्थात् बीते हुए,
(स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च ) सेभी पृथक् है,
क्रान्ताकालाद्भव्याच्च भविष्यतश्च भव्य -आगामी तथा वर्तमान
तथा वर्तमानातः कालत्रयेण | कालसे भी अन्यत्र है; तात्पर्य यह
यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः । यद् नहीं है । ऐसी जिस सम्पूर्ण व्यवहार-
है कि जो तीनों कालोंसे परिच्छिन्न
ईदृशं वस्तु सर्वव्यवहारगोचरा- | विषयसे अतीत वस्तुको आप देखते
तीतं पश्यसि तद्वद मह्यम् ॥१४॥ हैं वह मुझसे कहिये ॥ १४ ॥

कठोपनिषद् [ अध्याय । इत्येवं पृष्टवते मृत्युरुवाच पृष्टं वस्तु विशेषणान्तरं च विवक्षन्- इस प्रकार पूछते हुए नचिकेतासे, पूछी हुई वस्तु तथा उसके अन्य विशेषणको बतलानेकी इच्छासे यमराजने कहा- ओङ्कारोपदेश सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदसंग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥१५॥ - सारे वेद जिस पदका वर्णन करते हैं, समस्त तपोंको जिसकी प्राप्तिके साधक कहते हैं, जिसकी इच्छासे [ मुमुक्षुजन ] ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पदको मैं तुमसे संक्षेपमें कहता हूँ। ॐ7 यही वह पद है ॥ १५॥ सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं समस्त वेद जिस पद अर्थात् गमनीयमविभागेनामनन्ति प्रति- गमनीय स्थानका अविभागसे यानी एक रूपसे आमनन-प्रतिपादन पादयन्ति तपांसि सर्वाणि च करते हैं, समस्त तपोंको भी जिसके यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थानीत्यर्थः । लिये कहते हैं अर्थात् वे जिस यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य गुरुकुल- स्थानकी प्राप्तिके लिये हैं, जिसकी वासलक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थं | इच्छासे गुरुकुलवासरूप ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ज्ञातुम् और साधन करते हैं, उस पदको अथवा ब्रह्मप्राप्तिमें उपयोगी कोई इच्छसि संग्रहेण संक्षेपतो जिसे कि तू जानना चाहता है, मैं संक्षेपमें कहता हूँ। ब्रवीमि।

वल्ली २]
शाङ्करभाष्यार्थ
ओमित्येतत् । तदेतत्पदं ॐ यही वह पद है। यह
जोॐ है यानी जो ॐ शब्दका
यबुभुत्सितं त्वया । यदेतद्
वाच्य और ॐ ही जिसका प्रतीक
ओमित्योंशब्दवाच्यमोंशब्दप्रतीक है वही वह पद है जिसे तू जानना
च ॥१५॥
चाहता है ॥१५॥
अत:-
इसलिये-
एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥१६॥
यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर है, इस अक्षरको ही
जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, वही उसका हो जाता है ॥ १६ ॥
एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्मापरमेत यह अक्षर ही अपर ब्रह्म
और यह अक्षर ही पर ब्रह्म है।
येवाक्षरं परं च । तयोहि | यह अक्षर उन दोनोंहीका प्रतीक
। इस अक्षरको ही 'यही उपास्य
प्रतीकमेतदक्षरम्, एतद्धयेवाक्षरं
ब्रह्म है। ऐसा जानकर जो पर
ज्ञात्वोपास्यब्रह्मति यो अथवा अपर जिस ब्रह्मकी इच्छा
करता है उसे वही प्राप्त हो जाता
यदिच्छति परमपरं वा तस्य है । यदि उसका उपास्य पर ब्रह्म
तद्भवति । परं चेज्ज्ञातव्यमपरं हो तो वह केवल जाना जा सकता
है और यदि अपर ब्रह्म हो तो प्राप्त
चेत्प्राप्तव्यम् ॥१६॥ किया जा सकता है ॥ १६॥
है
-
यत एवमतः-
क्योकि ऐसी बात है, इसलिये-
एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१५॥

कठोपनिषद् [अध्याय १ यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही पर आलम्बन है। इस आलम्बनको जानकर पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥ एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्या यह [ ओंकाररूप] आलम्बन ब्रह्मप्राप्तिके [ गायत्री आदि ] लम्बनानां श्रेष्ठं प्रशस्यतमम् । सभी आलम्बनोंमें श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है। पर और एतदालम्बनं परमपरं च परापर- अपर ब्रह्मविषयक होनेसे यह आलम्बन पर और अपररूप है। ब्रह्मविषयत्वात् । एतदालम्बनं तात्पर्य यह है कि इस आलम्बनको ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परस्मिन् | जानकर साधक ब्रह्मलोक अर्थात् परब्रह्ममें स्थित होकर महिमान्वित ब्रह्मणि । परस्मिंश्च ब्रह्मभूतो होता है तथा अपर ब्रह्ममें ब्रह्मत्वको प्राप्त होकर ब्रह्मके समान उपासनीय ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः॥१७॥ होता है ॥ १७ ॥ अन्यत्र धर्मादित्यादिना उपर्युक्त 'अन्यत्र धर्मात्' इत्यादि पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्य श्लोकसे नचिकेताद्वारा पूछे गये सर्वविशेषरहित आत्माके तथा मन्द आलम्बनत्वेन प्रतीकत्वेन चोकारो और मध्यम उपासकोंके लिये अपर निर्दिष्टः; अपरस्य च ब्रह्मणो | ब्रह्मके प्रतीक और आलम्बनरूपसे मन्दमध्यमप्रतिपत्तृन्प्रति । अथे- | ओंकारका निर्देश किया गया । अब, जिसका आलम्बन ओंकार है दानीं तस्योङ्कारालम्बनस्यात्मनः उस आत्माके स्वरूपका साक्षात् साक्षात्स्वरूपनिर्दिधारयिषया निर्धारण करनेकी इच्छासे यह कहा इदमुच्यते- आत्मस्वरूपनिरूपण न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । जाता है- वल्ली.२] शाङ्करभाष्यार्थ अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१८॥ , यह विपश्चितू-मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है; यह न तो किसी अन्य कारणसे ही उत्पन्न हुआ है और न खतः ही कुछ [ अर्थान्तररूपसे ] बना है। यह अजन्मा, नित्य ( सदासे वर्तमान ), शाश्वत ( सर्वदा रहनेवाला ) और पुरातन है तथा शरीरके मारे जानेपर भी स्वयं नहीं मरता ॥ १८॥ न जायते नोत्पद्यते म्रियते यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तु- अनित्य वस्तुके अनेक विकार होते न मरता ही है। उत्पन्न होनेवाली नोऽनित्यस्य अनेकविक्रियाः हैं। यहाँ---आत्मामें सब विकारों- तासामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे का प्रतिषेध करनेके लिये 'न जायते म्रियते वार ऐसा कहकर विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते सबसे पहले उनमेंसे जन्म और प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थ न विनाशरूप आदि और अन्तके जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मे- | विकारोंका निषेध किया जाता है। कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप धावी अविपरिलप्तचैतन्यस्व- | खभावके कारण आत्मा विपश्चित यानी मेधावी है। किं च नायमात्मा कुतश्वित् तथा यह आत्मा कहींसे अर्थात् किसी अन्य कारणसे उत्पन्न नहीं कारणान्तराद्रभूव । खस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तर- अपनेसे ही हुआ है । इसलिये यह हुआ और न अर्थान्तररूपसे स्वयं भूतः। अतोऽयमात्माजो नित्यः आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत शाश्वतोऽपक्षयविवर्जितः । यो| यानी क्षयरहित है; क्योंकि जो यशाश्वतः सोऽपक्षीयते; अयं | अशाश्वत होता है वही क्षीण हुआ मावात् । ।

कठोपनिषद् [अध्याय १ स तु शाश्वतोऽत एव पुराणः | करता है। यह तो शाश्वत है, इसलिये पुराण भी है यानी प्राचीन पुरापि नव एवेति । यो खवय- होकर भी नवीन ही है । क्योंकि जो पदार्थ अवयवोंके उपचय ( वृद्धि ) वोपचयद्वारेणाभिनिर्वय॑ते से निष्पन्न किया जाता है वही इस इदानी नवो यथा कुम्मादिः। समय नया है। ऐसा कहा जाता है; जैसे घड़ा आदि । किन्तु आत्मा तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धि-उससे विपरीत खभाववाला है; विवर्जित इत्यर्थः। अर्थात् वह पुराण यानी वृद्धिरहित है। यत एवमतो न हन्यते न क्योंकि ऐसा है; इसलिये शस्त्रादिद्वारा शरीरके मारे जानेपर हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शस्त्रादिभिः भी वह नहीं मरता---उसकी हिंसा शरीरे । तत्स्थोऽप्याकाशवदेव नहीं होती । अर्थात् शरीरमें रहकर भी वह आकाशके समान निर्लिप्त ॥१८॥ ही है ॥ १८ ॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तु५ हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ नविजानीतो नायरहन्ति न हन्यते ॥१६॥ यदि मारनेवाला आत्माको मारनेका विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है ॥ १९ ॥ एवं भूतमप्यात्मानं शरीर ऐसे प्रकारके आत्माको भी जो देहमात्रको ही आत्मा समझनेवाला मात्रात्मदृष्टिहन्ता चेद्यदि मन्यते किसीको मारनेवाला पुरुष यदि चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनम् | किसीको मारनेका विचार करता

वल्ली२]]
शाङ्करभाष्यार्थ
न
इति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि है—यह सोचता है कि मैं इसे
मारूँगा, तथा दूसरा मारा जानेवाला
चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहम् भी यह समझकर कि मैं मारा
इत्युभावपि तौ न विजानीतः | गया हूँ' अपने (आत्मा) को मारा
गया मानता है तो वे दोनों ही अपने
स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति आत्माको नहीं जानते; क्योंकि
अविक्रियत्वादात्मनस्तथा
आत्मा अविकारी है, इसलिये वह
मार नहीं सकता और आकाशके
हन्यत आकाशवदविक्रियत्वा-
समान अविकारी होनेसे ही मारा
देव । अतोऽनात्मज्ञविषय एव
भी नहीं जा सकता । अतः धर्मा-
धर्मादिरूप संसार अनात्मज्ञसे ही
धर्माधर्मादिलक्षणः संसारो न सम्बन्ध रखता है, ब्रह्मज्ञसे नहीं।
क्योंकि श्रुतिप्रमाण और युक्तिसे भी
ब्रह्मज्ञस्य । श्रुतिप्रामाण्यान्न्या-
ब्रह्मज्ञानीद्वारा धर्म-अधर्म आदि
याच धर्माधर्माद्यनुपंपत्तेः॥१९॥ नहीं बन सकते ॥ १९ ॥
कथं पुनरात्मानं जानाति तो फिर मुमुक्षु पुरुष आत्माको
किस रूपसे जानता है ? इसपर
इत्युच्यते-
कहते हैं-
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः
पश्यति बीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०॥
यह अणुसे भी अणुतर और महान्से भी महत्तर आत्मा जीवकी
हृदयरूप गुहामें स्थित है। निष्काम पुरुष अपनी इन्द्रियोंके प्रसादसे
आत्माकी उस महिमाको देखता है और शोकरहित हो जाता है ॥२०॥

कठोपनिषद् [ अध्याय १ अणोः सूक्ष्मादणीयाञ्झ्या आत्मा अणुसे भी अणुतर अर्थात् श्यामाक आदि सूक्ष्म पदार्थोंसे भी माकादेरणुतरः। महतो महत्परि- सूक्ष्मतर तथा महान्से भी महत्तर माणान्महीयान्महत्तरःपृथिव्यादेः। यानी पृथिवी आदि महत्परिमाणवाले अणु महद्वा यदस्ति लोके पदार्थोंसे भी महत्तर है । संसारमें अणु अथवा महत्परिमाणवाली जो वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येन कुछ वस्तु है वह उस नित्यस्वरूप . आत्मवत्संभवति । तदात्मना आत्मासे ही आत्मवान् (स्वरूप- विनिर्मुक्तमसत्संपद्यते । तस्माद् सत्तायुक्त) हो सकती है। आत्मासे परित्यक्त हो जानेपर वह सत्ताशून्य असावेवात्माणोरणीयान्महतो हो जाती है। अतः यह आत्मा ही अणु- से-अणुतर और महान्-से-महत्तर महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपाधिक- है; क्योंकि नामरूपवाली सभी त्वात् । स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादि- वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं । वह आत्मा स्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य ही ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी गुहा- गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः हृदयमें निहित है अर्थात् अन्तरात्म- स्थित इत्यर्थः। रूपसे स्थित है। तमात्मानं दर्शनश्रवणमनन देखना, सुनना, मनन करना और जानना-ये जिसके लिङ्ग हैं विज्ञानलिङ्गमक्रतुरकामो दृष्टा- उस आत्माको अक्रतु--निष्काम दृष्टबाह्यविषयोपरतबुद्धिरित्यर्थः । पुरुष अर्थात् जिसकी बुद्धि दृष्ट और अदृष्ट बाह्य विषयोंसे उपरत यदा चैवं तदा मनआदीनि हो गयी है; क्योंकि जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय करणानि धातवः शरीरस्य मन आदि इन्द्रियाँ, जो कि शरीर- को धारण करनेके कारण धातु धारणात्प्रसीदन्तीत्येषां धातूनां कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं--सो, घल्ली२] शाङ्करभाष्यार्थ प्रसादादात्मनो महिमानं कर्म- । इन धातुओके. प्रसादसे वह अपने आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और निमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्यत्ययम् क्षयसे रहित महिमाको देखता है; अहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि 'मैं यह हूँ'।[ऐसा जानकर] ततो वीतशोको भवति ॥२०॥ फिर वह शोकरहित हो जाता है॥२०॥ अन्यथा दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा अन्यथा सकाम प्राकृत पुरुषोके लिये यह आत्मा बड़ा दुर्विज्ञेय कामिभिः प्राकृतपुरुषैः, यस्मात्- है; क्योकि-- आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। कस्तं मदामदं देवं यदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥२१॥ वह स्थित हुआ भी दूरतक जाता है, शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है । मद ( हर्ष ) से युक्त और मदसे रहित उस देवको भला मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? ॥ २१ ॥ आसीनोऽवस्थितोऽचल एव आसीन-अवस्थित अर्थात् अचल होकर भी वह दूर चला सन् दूरं व्रजति । शयानो याति | जाता है तथा शयन करता हुआ सर्वत एवमसावात्मा देवो मदा- भी सब ओर पहुँचता है । इस आत्मा-देव समद मदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च और अमद यानी हर्षसहित और हर्षरहितविरुद्ध धर्मवाला है । विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वाज्ज्ञातुं अतः जाननेमे न आ सकनेके कस्तं मदामदं देवं मदन्यो कारण उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान ज्ञातुमर्हति ? प्रकार वह सकता है।

७६ कठोपनिषद् [ अध्याय १ असदादेरेव सूक्ष्मबुद्धेः यह आत्मा हम-जैसे सूक्ष्म- बुद्धि विद्वानोंके लिये ही सुविज्ञेय पण्डितस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा है। स्थिति-गति तथा नित्य और स्थितिगतिनित्यानित्यादिविरुद्धा- | अनित्य आदि अनेक विरुद्धधर्मरूप उपाधिवाला तथा विपरीतधर्मयुक्त नेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुद्धधर्मव- होनेसे यह चिन्तामणिके समान वाद्विश्वरूप इव चिन्तामणिवदव- विश्वरूप-सा भासता है । अतः मेरे भासते। अतो दुज्ञेियत्वं दर्शयति सिवा उसे और कौन जानने योग्य है' ऐसा कहकर उसकी दुर्विज्ञेयता कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति । दिखलाते हैं। करणानामुपशमः शयनं इन्द्रियोंका शान्त हो जाना शयन है। शयन करनेवाले पुरुष- करणजनितस्यैकदेशविज्ञानस्य का इन्द्रियजनित एकदेशसम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है। जिस उपशमः शयानस्य भवति । यदा समय ऐसी अवस्था होती है उस चैवं केवलसामान्यविज्ञानत्वात् समय केवल सामान्य विज्ञान होने- से वह सब ओर जाता हुआ-सा सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञान- जान पड़ता है; और जब वह स्थः स्वेन रूपेण स्थित एव स्वरूपसे . अविचल रहकर भी विशेष विज्ञानमें स्थित होता है तो सन्मनआदिगतिषु तदुपाधिक- | मन आदि उपाधियोंवाला होनेसे उन मन आदिकी गतियोंमें जाता त्वाद्रं व्रजतीव । स चेहैव हुआ-सा जान पड़ता है। वस्तुतः वर्तते ॥ २१॥ तो वह यहीं रहता है ॥२१॥ तद्विज्ञानाच शोकात्यय इत्यपि तथा अब यह भी दिखलाते हैं कि उस आत्माके ज्ञानसे शोकका दर्शयति- अन्त हो जाता है वल्ली २] शाङ्करभाष्यार्थ अशरीरर शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ जो शरीरोमे शरीररहित तथा अनित्योमे नित्यखरूप है उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शौक नहीं करता ॥ २२ ॥ अशरीरं स्वेन रूपेण आत्मा अपने स्वरूपसे आकाश- के समान है, अत देव, पितृ और आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं | मनुष्याडि शरीरोमे अशरीर है, शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थित-अवस्थितिरहित यानी अनित्योमे अवस्थित-नित्य अर्थात् अनवम्थेनस्थितिरहितेष्ववस्थितं अविकारी है, तथा महान् है- [ किससे महान् है-इस प्रकार ] नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्नं महत्त्वमे इतरकी अपेक्षा होनेकी महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह-- शङ्का करके कहते हैं उस विभु विभुं व्यापिनमात्मानम्-आत्म- | अर्थात् व्यापक आत्माको जानकर यहाँ 'आत्मा शब्द अपनेसे ब्रह्मकी ग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, अभिन्नता दिखाने के लिये लिया आत्मशब्द: प्रत्यगात्मविषय | गया है, क्योकि 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्मविषयमें ही मुख्य है- एव मुख्यस्तमीदृशमात्मानं मत्वा ऐसे उस आत्माको यही मै हूँ' ऐसा अयमहमिति धीरो धीमान्न | जानकर धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योकि इस शोचति । न ह्येवंविधस्यात्मविदः प्रकारके आत्मवेत्तामे शोक बन ही शोकोपपत्तिः ॥२२॥ नहीं सकता ॥ २२ ॥ - यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा यद्यपि यह आत्मा दुर्विज्ञेय है तो भी उपाय करनेसे तो सुविज्ञेय तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह- ही है, इसपर कहते हैं- ७८ कठोपनिषद् [ अध्याय १ आत्मा आत्मकृपासाध्य है नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूरखाम् ॥२३॥ यह आत्मा वेदाध्ययनद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारणाशक्ति अथवा अधिक श्रवणसे ही प्राप्त हो सकता है। यह [ साधक ] जिस [ आत्मा ] का वरण करता है उस [ आत्मा ] से ही यह प्राप्त किया जा सकता है। उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपको अभिव्यक्त कर देता है ॥ २३ ॥ नायमात्मा प्रवचनेनानेक- यह आत्मा प्रवचन अर्थात अनेको वेदोको स्वीकार करनेसे वेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञेयो नापि प्राप्त यानी विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा यानी ग्रन्थार्थ-धारणकी मेधया ग्रन्थार्थधारणशक्त्या । शक्तिसे ही जाना जा सकता है और न केवल बहुत-सा श्रवण न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन करनेसे ही । तो फिर किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है, इसपर तर्हि लभ्य इत्युच्यते कहते हैं- यमेव स्वात्मानमेष साधको यह साधक जिस आत्माका वरण- प्रार्थना करता है उस वरण करनेवाले वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना आत्माद्वारा यह आत्मा स्वयं ही प्राप्त वरित्रा स्वयमात्मा लभ्यो ज्ञायत किया जाता है—अर्थात् उससे ही यह ऐसा है। इस प्रकार जाना जाता एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानम् है । तात्पर्य यह कि केवल आत्म- एव प्रार्थयत आत्मनैवात्मा! लाभके लिये ही प्रार्थना करनेवाले निष्काम पुरुषको आत्माके द्वारा ही लभ्यत इत्यर्थः। आत्माकी उपलब्धि होती है। - चल्ली २] যাত্রা ७९ है, कथं लभ्यत इत्युच्यते किस प्रकार उपलब्ध होता तस्यात्मकामस्यैष आत्मा वि- , इसपर कहते हैं उस आत्म- कामीके प्रति यह आत्मा अपने वृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकी पारमार्थिक स्वरूप अर्थात् अपने तनूं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यम् | याथात्म्यको विवृत—प्रकाशित कर इत्यर्थः ॥२३॥ देता है ॥ २३ ॥ किं चान्यत्- इसके सिवा दूसरी बात यह भी है- आत्मज्ञानका अनधिकारी नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेननमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ जो पापकर्मोंसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है वह इसे आत्मज्ञानद्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ २४ ॥ न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छुति जो दुश्चरित-प्रतिषिद्ध कर्म यानी श्रुति-स्मृतिसे अविहित पाप- स्मृत्यविहितात्पापकर्मणोऽविरतः कर्मसे अविरत—अनुपरत है वह नहीं, जो इन्द्रियोंकी चञ्चलताके अनुपरतो नापीन्द्रियलौल्याद् कारण अशान्त यानी उपरतिशून्य है वह भी नहीं, जो असमाहित अशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमा- अर्थात् जिसका चित्त एकाग्र नहीं हितोऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्तः, है जो विक्षिप्तचित्त है वह भी नहीं, तथा समाहितचित्त होनेपर समाहितचित्तोऽपि सन्समाधान- भी उस एकाग्रताके फलका इच्छुक कठोपनिषद् [ अध्याय १ फलार्थित्वान्नाप्यशान्तमानसो होनेके कारण जो अशान्तचित्त है-जिसका चित्त निरन्तर व्यापार व्यापृतचित्तः प्रज्ञानेन ब्रह्मा- करता रहता है वह पुरुष भी इस विज्ञानेननं प्रकृतमात्मानमाप्नु- प्रस्तुत आत्माको केवल आत्मज्ञान- द्वारा नहीं प्राप्त कर सकता । यात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत अर्थात् जो पापकर्म और इन्द्रियों- की चञ्चलतासे हटा हुआ तथा इन्द्रियलौल्याच्च समाहितचित्तः समाहितचित्त और उस समाधानके समाधानफलादप्युपशान्तमान- फलसे भी उपशान्तमना है वह आचार्यवान् साधक ही ब्रह्मज्ञान- सश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तम् द्वारा उपर्युक्त आत्माको प्राप्त कर आत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥२४॥ सकता है ॥२४॥ - यस्त्वनेवंभूतः-- किन्तु जो (साधक) ऐसा नहीं है उसके विषयमे श्रुति कहती है]- यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ जिस आत्माके ब्राह्मण और क्षत्रिय---ये दोनों ओदन--भात हैं तथा मृत्यु जिसका उपसेचन ( शाकादि ) है वह जहाँ है उसे कौन [ अज्ञ पुरुष ] इस प्रकार ( उपर्युक्त साधनसम्पन्न अविकारीके समान ) जान सकता है । ॥ २५॥ यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्म-। सम्पूर्ण धर्मोंका धारण करने- वाले और सबके रक्षक होनेपर भी विधारके अपि सर्वत्राणभूते उभे ब्राह्मण और क्षत्रिय--ये दोनों वर्ण ओदनोऽशनं भवतः स्याताम्, जिस आत्माके ओदन--भोजन हैं बली २] शाङ्करभाष्यार्थ सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनम् । तथा सबका हरण करनेवाला होनेपर भी मृत्यु जिसका भातके लिये इवौदनस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्तं | उपसेचन ( शाकादि ) के समान है, प्राकृतबुद्धियथोक्तसाधनरहितः अर्थात् भोजनके लिये भी पर्याप्त नहीं है, उस आत्माको, जहाँ कि वह सन् क इत्था इत्थमेवं यथोक्त- है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधनोंसे रहित साधनवानियेत्यर्थः, वेद विजा- और साधारण बुद्धिवाला पुरुष है जो इस प्रकार-उपर्युक्त साधनसम्पन्न नाति यत्र स आत्मेति ॥ २५॥ पुरुषके समान जान सके ? ॥२५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ २॥ क० उ०६-

वृतीया पल्ली
प्राप्ता और प्राप्तव्य-भेदसे दो आत्मा
ऋतं पिबन्तावित्यस्या वल्लयाः इस ऋतं पिबन्तौ' इत्यादितृतीया
सम्बन्धः
वल्लीका सम्बन्ध इस प्रकार है-
विद्याविद्ये नानाविरुद्धफले
ऊपर विद्या और अविद्या नाना
प्रकारके विरुद्ध धर्मोंवाली बतठायी
इत्युपन्यस्ते न तु सफले ते यथा- | गयी हैं; किन्तु उनका फलसहित
यथावत् निर्णय नहीं किया गया ।
वनिर्णीतेतनिर्णयार्था रथरूपक-
उनका निर्णय करनेके लिये ही
[ इस वल्लीमें ] रथके रूपककी
कल्पना की गयी है। ऐसा करनेसे
कल्पना, तथा च प्रतिपत्ति-
उन्हें [ अर्थात् विद्या-अविद्याको]
समझनेमें सुगमता हो जाती है।
सौकर्यम् । एवं च प्राप्तृप्राप्य- | इसी प्रकार प्राप्त करनेवाले और
प्राप्तव्य वस्तु तथा गमन करने-
गन्तृगन्तव्यविवेकार्थ द्वावात्मानौ वाले और गन्तव्य लक्ष्यका विवेक
करनेके लिये दो आत्माओंका
उपन्यस्येते.
उपन्यास करते हैं-
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति
पञ्चानयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥१॥
ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट
ब्रह्मस्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्मफलको भोगनेवाले छाया और घामके
समान परस्पर विलक्षण दो [ तत्त्व ] हैं। यही बात जिन्होंने तीन बार
नाचिकेताग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले भी
कहते हैं ॥ १॥

वल्ली] शाङ्करभाष्यार्थ ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात् । ऋत अर्थात् अवश्यम्भावी होनेके कर्मफलं पिबन्ती, कारण सत्य कर्मफलका पान करने- एकस्तत्र वाले दो आत्मा, जिनमेंसे केवल एक कर्मफलं पिबति भुङ्क्ते नेतरः; कर्मफलका पान-भोग करता है, तथापि पातृसम्बन्धात्पिबन्तौ दूसरा नहीं; तो भी पान करने- वालेसे सम्बन्ध होनेके कारण यहाँ इत्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृत- छत्रिन्यायसे* दोनोंहीके लिये स्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतम् पिबन्तौ' इस द्विवचनका प्रयोग इति पूर्वेण सम्बन्धः; लोकेऽस्मिन् हुआ है, सुकृत अर्थात् अपने किये शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ | हुए कर्मके फलको भोगते हुर, यहाँ 'सुकृतस्य' शब्दका पूर्ववर्ती 'ऋतम्' प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाश- | शब्दके साथ सम्बन्ध है। लोक संस्थानापेक्षया परमम्, परस्य अर्थात् इस शरीरमें गुहा-बुद्धिके ब्रह्मणोऽधं स्थानं . परार्धम् । भीतर देहाश्रित । आकाशस्थानकी अपेक्षा उत्कृष्ट पर- तसिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, ब्रह्मके अर्ध यानी स्थानमें प्रवेश किये अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे हुए हैं। क्योंकि उसीमें परब्रह्मकी उपलब्धि होती है। अतः तात्पर्य प्रविष्टावित्यर्थः। यह है कि उस परम परार्ध यानी हृदयाकाशमें प्रवेश किये हुए हैं। तौ च च्छायातपाविव विल वे दोनों संसारी और असंसारी क्षणी संसारित्वासंसारित्वेन | होनेके कारण छाया और धूपके परम-बाह्य * जहाँ बहुत-से आदमी जा रहे हों और उनमेंसे किसी एकके पास छाता हो तो दूरसे देखनेवाला पुरुष उन्हें बतलानेके लिये 'देखो, वे छातेवाले लोग जा रहे हैं। ऐसे वाक्यका प्रयोग करता है। इस प्रकार एक छातेवालेसे सम्बद्ध होनेके कारण वह सारा समूह ही छातेवाला कहा जाता है। इसे 'छत्रिन्याय' कहते हैं। इसी प्रकार यहाँ भोक्ता जीवके सम्बन्धसे ईश्वरको भी भोक्ता कहा गया है।

कठोपनिषद् [अध्याय १ ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । | समान परस्पर विलक्षण हैं---ऐसा ब्रह्मवेत्तालोग वर्णन करते-कहते न केवलमकर्मिण एव वदन्ति । हैं। [ इस प्रकार ] केवल अकर्मी पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च ही ऐसा नहीं कहते बल्कि जो त्रिणाचिकेताः त्रि:कृत्वो नाचि- त्रिणाचिकेत हैं--जिन्होंने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया केतोऽग्निश्चितो यैस्ते त्रिणाचि- वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले केताः॥१॥ गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं ॥१॥ यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतश्शकेमहि ॥ २ ॥ जो यजन करनेवालोंके लिये सेतुके समान हैं उस नाचिकेत अग्नि- को तथा जो भयशून्य है और संसारको पार करनेकी इच्छावालोंका परम आश्रय है उस अक्षरब्रह्मको जाननेमें हम समर्थ हों ॥ २ ॥ यः सेतुरिव सेतुरीजानानां दुःखको पार करनेका साधन यजमानानां कर्मिणां दुःखसं- होनेसे जो नाचिकेत अग्नि यजमान अर्थात् कर्मियोंके लिये सेतुके समान तरणार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्तं वयं होनेके कारण सेतु है उसे हम जानने ज्ञातुंचेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः। और चयन करनेमें समर्थ हों। किं च यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तथा जो भयरहित है, और संसारके पार जानेकी इच्छावाले ब्रह्मवेत्ताओं तितीर्षतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदा का परम आश्रय अविनाशी आत्मा यत्परमाश्रयमक्षरमात्माख्यं ब्रह्म नामक ब्रह्म है उसे भी हम जानने में समर्थ हो सकें। तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः । अर्थात् कर्मवेत्ताका आश्रय अपर परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये | ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ताका आश्रय -- .

वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ यह इस वेदितव्ये इति इति वाक्यार्थः । । परब्रह्म-ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं- वाक्यका अर्थ है। एतयोरेव ह्युपन्यासः कृत ऋतं | 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादि मन्त्रसे इन्हीं दोनों [ ब्रह्मों का उल्लेख पिबन्ताविति ॥ २॥ किया गया है ॥२॥ तत्र य उपाधिकृतः संसारी उनमें जो उपाधिपरिच्छिन्न संसारी मोक्ष एवं संसारके प्रति विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्ष- गमन करनेके लिये विद्या और गमनाय संसारगमनाय च तस्य अविद्याका अधिकारी है उसके लिये उन दोनोंके प्रति जानेके तदुभयगमने साधनो रथः साधनस्वरूप रथकी कल्पना की कल्प्यते- |जाती है- -- 'शरीरादिसे सम्बद्ध रथादि रूपक आत्मान५ रथिनं विद्धि शरीर५ रथमेव तु । बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ तू आत्माको रथी जान, शरीरको रथ समझ, बुद्धिको सारथि जान और मनको लगाम समझ ॥ ३ ॥ तत्र तमात्मानमृतपं संसारिणं उनमें उस आत्माको-कर्मफल भोगनेवाले संसारीको रथी--रथका रथिनं रथस्वामिनं विद्धि | स्वामी जान, और शरीरको तो जानीहि । शरीरं रथमेव तु रथबद्ध- | रथ ही समझ; क्योंकि शरीर रथमें हयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाण- | बँधे हुए अश्वरूप इन्द्रियगणसे खींचा जाता है । तथा निश्चय करना ही त्वाच्छरीरस्य।बुद्धिं तुअध्यवसाय- जिसका लक्षण है उस बुद्धिको लक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेत- । सारथि जान; क्योंकि सारथिरूप कठोपनिषद् [अध्याय १ प्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथिनेत-। नेता ही जिसमे प्रधान है उस रथके समान शरीर बुद्धिरूप नेताकी प्रधान इव रथः । सर्व हि देहगतं प्रधानतावाला है; क्योकि देहके सभी कार्य बुद्धिकर्तव्यमेव प्रायेण । मनः कार्य प्रायः बुद्धिके ही कर्तव्य हैं। और सङ्कल्प-विकल्पादिरूप मनको संकल्पविकल्पादिलक्षणं प्रग्रहं प्रग्रह--लगाम समझ; क्योंकि जिस रशनां विद्धि । मनसा हि | प्रकार घोड़े लगामसे नियन्त्रित होकर चलते है उसी प्रकार श्रोत्रादि प्रगृहीतानि श्रोत्रादीनि करणानि इन्द्रियाँ मनसे नियन्त्रित होकर ही प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वाः ॥३॥ अपने विषयोमे प्रवृत्त होती हैं ॥३॥ इन्द्रियाणि हयानाहुविषयाश्स्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको घोड़े बतलाते है तथा. उनके घोड़ेरूपसे कल्पित किये जानेपर विषयोको उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ॥ ४ ॥ इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान् रथकी कल्पना करनेमे कुशल आहू रथकल्पनाकुशलाः शरीर- पुरुषोने चक्षु आदि इन्द्रियोको घोडे बतलाया है, क्योकि [ इन्द्रिय स्थाकर्षणसामान्यात् । तेष्वेव | और घोड़ोकी क्रमश. ] शरीर और इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु | रथको खींचनेमे समानता है । इस प्रकार उन इन्द्रियोको घोड़ेरूपसे गोचरान्मार्गान्रूपादीन्विषयान् परिकल्पित किये जानेपर रूपादि विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं | विषयोको उनके मार्ग जानो तथा शरीर, इन्द्रिय और मनके सहित शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं अर्थात् उनसे युक्त आत्माको मनीषी- संयुक्तमात्मानं भोक्तेति संसारी- विवेकी पुरुष यह भोक्ता—संसारी त्याहुर्मनीषिणो विवेकिनः ।। है' ऐसा बतलाते हैं ।

वली.] शाङ्करभाष्यार्थ न हि केवलस्यात्मनो भोक्त केवल (शुद्ध) आत्मा तो भोक्का है नहीं, उसका भोक्तृत्व त्वमस्ति बुद्धयाधुपाधिकृतमेव तो बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही तस्य मोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्य- है। इसी प्रकार "ध्यान करता न्तरं केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्श- | हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा” यति-"ध्यायतीव लेलायतीव" इत्यादि एक दूसरी श्रुति भी केवल आत्माका अभोक्तृत्व ही दिखलाती (वृ० उ०४।३।७) इत्यादि। है । ऐसा होनेपर ही आगे कही एवं च सति वक्ष्यमाणस्थकल्प- जानेवाली रथकल्पनासे उस वैष्णव- पदकी आत्मभावसे प्रतिपत्ति (प्राप्ति ) नया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया बन सकती है और किसी प्रकार प्रतिपत्तिरुपपद्यते नान्यथा स्व-नहीं; क्योंकि स्वभाव कभी नहीं मावानविक्रमात् ॥ ४॥ बदल सकता ॥ ४ ॥ अविवेकीकी विवशता यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ किन्तु जो [ बुद्धिरूप सारथि ] सर्वदा अविवेकी एवं असंयत चित्तसे युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इसी प्रकार नहीं रहती जैसे सारथि- के अधीन दुष्ट घोड़े ॥ ५ ॥ तत्रैवं सति यस्तु बुद्धयाख्यः किन्तु ऐसा होनेपर भी जो बुद्धिरूप सारथि अविज्ञानवान्- सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽविवे- अकुशल अर्थात् रथसञ्चालनमें अन्य सारथिके समान अकुशल की प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च भवति [ इन्द्रियरूप घोड़ोंकी] प्रवृत्ति- ययेतरो रथचर्यायामयुक्तन निवृत्तिके विवेकसे रहित है, जो कठोपनिषद् [अध्याय अप्रगृहीतेनासमाहितेन मनसा | सर्वदा प्रग्रह ( लगाम ) स्थानीय प्रग्रहस्थानीयेन सदा युक्तो भवति / अयुक्त-अगृहीत अर्थात् विक्षित चित्तसे युक्त है उस अनिपुण तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथः बुद्धिरूप सारथिके इन्द्रियरूप घोड़े इन्द्रियाण्यश्वस्थानीयान्यवश्यानि रथादि हाँकनेवाले ] अन्य सारपिके अशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा दुष्ट अर्थात् वेकाबू घोड़ोंके समान अवश्य यानी जिनका निवारण अदान्तावा इवेतरसारथे- नहीं किया जा सकता ऐसे [ भवन्ति ॥५॥ जाते हैं ॥ ५॥ विवेकीकी स्वाधीनता यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥ ६ ॥ परन्तु जो ( बुद्धिरूप सारथि ) कुशल और सर्वदा समाहित चित्तसे युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथिके अधीन अच्छे घोड़े ॥ ६॥ यस्तु पुनः पूर्वोक्तविपरीतः किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथि.] सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्रगृहीत- | पूर्वोक्त सारथिसे विपरीत विज्ञानवान् मनाः समाहितचित्तः सदा (कुशल)--मनको नियन्त्रित रखने- वाला अर्थात् संयतचित्त होता है तस्याश्वस्थानीयानीन्द्रियाणि प्र- उसके लिये अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ वर्तयितुं निवर्तयितुं वा शक्यानि प्रवृत्त और निवृत्त किये जानेमें इस वश्यानि दान्ताः सदश्वा इवेतर-प्रकार शक्य होती हैं जैसे सारथिके सारथेः॥६॥ लिये अच्छे घोड़े ॥ ६॥ तस्य पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो उस पूर्वोक्त अविज्ञानवान् बुद्धिरूप सारथिवाले रथीके लिये श्रुति यह फल बतलाती है- बुद्धिसारथेरिदं फलमाह- - m- वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ अविवेकीकी संसारप्राप्ति यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाशुचिः। न स तत्पदमाप्नोति स५सारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ किन्तु जो अविज्ञानवान्, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहनेवाला होता है वह उस पदको प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसारको ही प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवति अ किन्तु जो अविज्ञानवान्, मनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः स अमनस्क—असंयतचित्त और इसी- लिये सदा अपवित्र रहनेवाला होता तत एवाशुचिः सदैव, न स है उस सारथिके द्वारा वह [ जीव- रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदम् रूप ] रथी उस पूर्वोक्त अक्षर परम आमोति तेन सारथिना। न पदको प्राप्त नहीं कर सकता । केवलं कैवल्यं नाप्नोति संसारं| वह कैवल्यको प्राप्त नहीं होता- केवल इतना ही नहीं, बल्कि च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति जन्म-मरणरूप संसारको भी प्राप्त ॥ ७॥ होता है ॥ ७॥ विवेकी की परमपद प्राप्ति यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ किन्तु जो विज्ञानवान्, • संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उस पदको प्राप्त कर लेता है जहाँसे वह फिर उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥ यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् किन्तु जो दूसरा रथी अर्थात् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान् | विद्वान् विज्ञानवान्-कुशल सारथि- ९० कठोपनिषद् [ अध्याय १ इत्येततः युक्तमनाः समनस्कः | से युक्त, समनस्क—युक्तचित्त और इसीलिये सदा पवित्र रहनेवाला स तत एव सदा शुचिः स तु होता है वह तो उसी पदको तत्पदमाप्नोति,यस्मादाप्तात्पादाद् प्राप्त कर लेता है, जिस प्राप्त हुए अप्रच्युतः सन्भूयः पुनर्न जायते | पइसे च्युत न होकर वह फिर संसारे ॥८॥ संसार में उत्पन्न नहीं होता ॥ ८॥ विद्वान् पुरुष वह पद क्या है ? इसपर किं तत्पदमित्याह- कहते हैं- विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धि-सारथिसे युक्त और मनको वशमें रखनेवाला होता है वह संसारमार्गसे पार होकर उस विष्णु ( व्यापक परमात्मा ) के परमपदको प्राप्त कर लेता है॥९॥ . विज्ञानसारथिर्यस्तुयो विवेक जो पूर्वोक्त विद्वान् बुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनःप्रग्रह- विवेकयुक्त बुद्धि-सारथिसे युक्त मनोनिग्रहवान् यानी निगृहीतचित्त- वान्प्रगृहीतमनाः समाहित- एकाग्र मनवाला होता हुआ पवित्र चित्तः सञ्शुचिर्नरो विद्वान्सो- है वह संसारगतिके पारको यानी ऽध्वनः संसारगतेः पारं परमेव परमात्माको प्राप्त अधिगन्तव्यमित्येतदामोति कर लेता है। अर्थात् सम्पूर्ण संसार- मुच्यते सर्वसंसारबन्धनैः। तद्विष्णोः | बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है । उस व्यापनशीलस्य ब्रह्मणः परमात्मनो | विष्णुः यानी वासुदेव नामक सर्व- वासुदेवाख्यस्य परमं प्रकृष्टं पदं परमात्माका जो परम---उत्कृष्ट पद-स्थान अर्थात स्थानं सतवमित्येतद्यदसौ स्वरूप है उसे वह विद्वान् प्राप्तः आमोति विद्वान् ॥९॥ कर लेता है॥९॥ अवश्यप्राप्तव्य व्यापक परब्रह्म वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ अधुना यत्पदं गन्तव्यं तस्य अब, जो प्राप्तव्य परम पद है इन्द्रियाणि स्थूलान्यारभ्य सूक्ष्म- | उसका स्थूल इन्द्रियोंसे आरम्भ तारतम्यक्रमेण प्रत्यगात्मतया करके सूक्ष्मत्वके तारतम्य-क्रमसे अधिगमः कर्तव्य इत्येवमर्थमिदम् चाहिये, इसीलिये आगेका कथन प्रत्यगात्मस्वरूपसे ज्ञान प्राप्त करना आरभ्यते- आरम्भ किया जाता है- - इन्द्रियादिका तारतम्य इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः॥१०॥ * इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन उत्कृष्ट है, मनसे बुद्धि पर है और बुद्धिसे भी महान् आत्मा ( महत्तत्त्व ) उत्कृष्ट है ॥१०॥ स्थूलानि तादिन्द्रियाणि इन्द्रियाँ तो स्थूल हैं । वे जिन तानि यैर!रात्मप्रकाशनाय शब्द-स्पर्शादि विषयोद्वारा अपनेको प्रकाशित करनेके लिये बनायी गयी आरब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्यः हैं वे विषय अपने कार्यभूत इन्द्रिय- स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यर्थाः सूक्ष्मा वर्गसे पर-सूक्ष्म, महान् एवं महन्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च । प्रत्यगात्मखरूप हैं। तेभ्योऽप्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं उन विषयोंसे भी पर--सूक्ष्म, महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः मन:- महान् तथा नित्यस्वरूपभूत मन है, जो कि 'मन' शब्दका वाच्य और शब्दवाच्यं मनस आरम्भकं भूत- मनका आरम्भक भूतसूक्ष्म है; क्यों- सूक्ष्मं संकल्पविकल्पाद्यारम्भ- | कि वही सङ्कल्प-विकल्पादिका आर- कत्वात् । मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा | म्भक है । मनसे भी पर—सूक्ष्मतर, १२ कठोपनिषद् [अध्याय १ महत्तरा प्रत्यगात्मभूता च बुद्धिः | महत्तर एवं प्रत्यगात्मभूत बुद्धि अर्थात् 'बुद्धि' शब्द-वाच्य अध्य- बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसाया- वसायादिका आरम्भक भूतसूक्ष्म द्यारम्भकं भूतसूक्ष्मम् । बुद्धरात्मा है । उस बुद्धिसे भी, सम्पूर्ण प्राणियों- की बुद्धिका प्रत्यगात्मभूत होनेसे सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूत- आत्मा महान् है; क्योंकि वह सबसे त्वादात्मा महान्सर्वमहत्त्वात् ।। बड़ा है । अर्थात् अव्यक्तसे जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ तत्त्व है, अव्यक्ताद्यत्प्रथमं जातं हैरण्य- | जो ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे गर्म तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महा- सम्पन्न होनेके कारण ] बोधाबोधा- त्मक है वह महान् आत्मा बुद्धिसे भी नात्मा बुद्धेः पर इत्युच्यते॥१०॥ पर है-ऐसा कहा जाता है ॥१०॥ अव्याकृत महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥११॥ महत्तत्त्वसे अव्यक्त ( मूलप्रकृति ) पर है और अव्यक्तसे भी पुरुष पर है । पुरुषसे पर और कुछ नहीं है । वही [ सूक्ष्मत्वकी ] पराकाष्ठा ( हद ) है, वही परा ( उत्कृष्ट ) गति है ॥ ११ ॥ महतोऽपि परं सूक्ष्मतरं महत्से भी पर--सूक्ष्मतर, प्रत्यगात्मभूतं सर्वमहत्तरं च प्रत्यगात्मस्वरूप और सबसे महान् अव्यक्तं सर्वस्य जगतो बीजभूतम् अव्यक्त है, जो सम्पूर्ण जगत्का बीज- अव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्व- | भूत, अव्यक्त नाम-रूपोंका सत्ता- खरूप, सम्पूर्ण कार्य-कारणशक्तिका कार्यकारणशक्तिसमाहाररूपम् सङ्घात, अव्यक्त, अव्याकृत और अव्यक्ताव्याकृताकाशादिनाम- आकाशादि नामोंसे निर्दिष्ट होने- वाच्यं परमात्मन्योतप्रोतभावेन | वाला तथा वटके धानेमें रहनेवाली , वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ समाश्रितं वटकणिकायामिव क्ट-1 वटवृक्षकी शक्तिके समान परमात्मा- वृक्षशक्तिः। में ओतप्रोतभावसे आश्रित है। तस्मादव्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः उस अव्यक्तकी अपेक्षा सम्पूर्ण सर्वकारणकारणत्वात्प्रत्यगात्म- कारणोंका कारण तथा प्रत्यगात्मरूप होनेसे पुरुष पर—सूक्ष्मतर एवं त्वाच महांश्च अत एव पुरुषः । महान् है । इसीलिये वह सबमें पूरित सर्वपूरणात् । ततोऽन्यस्य परस्य | रहनेके कारण 'पुरुष' कहा जाता प्रसङ्ग निवारयन्नाह पुरुषान्न परं है । इसके सिवा किसी दूसरे उत्कृष्टतरके प्रसङ्गका निवारण करते किंचिदिति । यस्मान्नास्ति पुरुषात् हुए कहते हैं कि पुरुषसे पर और चिन्मात्रघनात् परं किंचिदपि कुछ नहीं है । क्योंकि चिद्धनमात्र वस्त्वन्तरं तस्मात्सूक्ष्मत्वमहत्त्व- पुरुषसे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है इसलिये वही सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठा-स्थिति पर्यवसानम्। अर्थात् पर्यवसान है। अत्र हीन्द्रियेभ्य आरभ्य इन्द्रियोंसे लेकर इस आत्मा सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः। अत ही सूक्ष्मत्वादिकी परिसमाप्ति होती । अतः यही गमन करनेवाले एव च गन्तॄणां सर्वगति- अर्थात् सम्पूर्ण गतियोंवाले संसारियों- मतां संसारिणां परा प्रकृष्टा की पर---उत्कृष्ट गति है, जैसा कि गतिः “यद्गत्वा न निवर्तन्ते" "जिसको प्राप्त होकर फिर नहीं (गीता ८ । २१; १५। ६)इति | लौटते” इस स्मृतिसे सिद्ध होता स्मृतेः ॥११॥ है ॥११॥ है " ननु गतिश्चेदागत्यापि शङ्का-यदि [ पुरुषके प्रति ] गति है तो [ वहाँसे ] आगति भवितव्यम् । कथं यस्माद्भ्यो | ( लौटना ) भी होना चाहिये। फिर 'जिसके पाससे फिर जन्म नहीं न जायत इति ? लेता' ऐसा क्यों कहा जाता है ?

कठोपनिषद् [अध्याय १ नैष दोषः, सर्वस्य प्रत्यगा- समाधान-यह दोष नहीं है। क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा होनेसे त्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युप- आत्माके ज्ञानको ही उपचारसे गति चर्यते । प्रत्यगात्मत्वं च दर्शि- कहा गया है । तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे आत्माका परत्व प्रदर्शित तमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन । यो कर उसका प्रत्यगात्मत्व दिखलाया गया है। क्योंकि जो जानेवाला हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रूपं है वह अपनेसे पृथक् अनात्मभूत गच्छन्त्यनात्मभूतं न विपर्ययेण | एवं अप्राप्त स्थानकी ओर ही जाया करता है। इससे विपरीत अपनी तथा च श्रुतिः-"अनध्वगा| ही ओर नहीं आता-जाता । इस विषयमें "संसारमार्गसे पार होनेकी अध्वसु पारयिष्णवः" इत्याद्या । इच्छावाले पुरुष मार्गरहित होते हैं" तथा च दर्शयति प्रत्यगात्म- इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है । तथा आगेकी श्रुति भी पुरुषका सबका त्वं सनस्य- प्रत्यगात्मा होना प्रदर्शित करती है- आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥१२॥ सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता । यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ॥ १२ ॥ एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादि यह पुरुष ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब- पर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ यानी स्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृतो छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामाया- | कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ सबका अन्तरात्मस्वरूप [ ] च्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत | मायासे आच्छादित है। अतः होनेके आत्मत्वेन कस्यचित् । अहो कारण आत्मा किसीके प्रति प्रकाशित अतिगम्भीरा दुरवगाया विचित्रा नहीं होता। अहो ! यह माया माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः बड़ी ही गम्भीर, दुर्गम और विचित्र परमार्थतः परमार्थसतत्वोऽप्येवं है, जिससे कि ये संसारके सभी जीव वस्तुतः परमा र्थस्वरूप होनेपर बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न भी [ शास्त्र और आचार्यद्वारा ] वैसा गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादि- बोध कराये जानेपर •मैं परमात्मा सङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि | हूँ' इस तत्त्वको ग्रहण नहीं करते; बल्कि जो देह और इन्द्रिय आदि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र सङ्घात घटादिके समान अपने दृश्य इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । नूनं हैं उन्हें, किसीसे न कहनेपर भी मै परस्यैव मायया मोमुह्यमानः इसका पुत्र हूँ' इत्यादि प्रकारसे आत्मभावसे ग्रहण करते हैं। निश्चय, सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा| उस परमात्माकी ही मायासे यह च स्मरणम्-"नाहं प्रकाशः सर्व- | सारा जगत् अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है। ऐसे ही "योगमायासे आवृत स्य योगमायासमावृतः" (गीता हुआ मैं सबके प्रति प्रकाशित नहीं ७। २५) इत्यादि। होता” यह स्मृति भी है। ननु विरुद्धमिदमुच्यते शङ्का-किन्तु "उसे जानकर "मत्वा धीरो न शोचति" (क० पुरुष शोक नहीं करता” [ "वह गूढ उ० २।१।४) "न प्रकाशते" | आत्मा] प्रकाशित (ज्ञात) नहीं होता, (क० उ०१।३।१२) इति च । यह तो विपरीत ही कहा गया है। नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्धरवि समाधान-ऐसी बात नहीं है। आत्मा अशुद्धबुद्धि पुरुषके लिये ज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् । अविज्ञेय है; इसीलिये यह कहा

कठोपनिषद्
[अध्याय १
दृश्यते तु संस्कृत्या अग्र्या | गया है कि वह प्रकाशित नहीं
होता' । वह तो संस्कारयुक्त और
अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपे- | तीक्ष्ण--जो किसी पैनी नोकके
समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रतासे
तयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तु- | युक्त और सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षणमें
लगी हुई तीव्र बुद्धिसे ही दिखलायी
निरूपणपरयाकै?सूक्ष्मदर्शिभिः
देता है। किन्हें दिखलायी देता
'इन्द्रियेभ्यः परा ह्याः' इत्यादि-
है ? [ इसपर कहते हैं-] सूक्ष्म-
दर्शियोंको। इन्द्रियोंसे उनके विषय
प्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन | सूक्ष्म हैं' इत्यादि प्रकारसे सूक्ष्मता-
की परम्पराका विचार करनेसे
परं सूक्ष्म द्रष्टुं शीलं येषां ते जिनका पर--सूक्ष्म वस्तुको देखने-
का स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी
सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः | हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितोंको [ वह
दिखलायी देता है - यह इसका
पण्डितैरित्येतत् ॥ १२॥
,
भावार्थ है ॥ १२ ॥
लयचिन्तन
तत्प्रतिपत्त्युपायमाह-
अब उसकी प्राप्तिका उपाय
बतलाते हैं-
यच्छेद्वाङ्मनसा प्राज्ञस्तद्यच्छज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥१३॥
विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाश-
खरूप बुद्धिमें लय करे, बुद्धिको महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको
शान्त आत्मामें नियुक्त करे ॥ १३ ॥

वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ यच्छेनियच्छेदुपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी पुरुष यच्छेतू' अर्थात् विवेकी; किम् ? वाग्याचम् । नियुक्त करे---उपसहार करे, किसका उपसहार करे ? वाक् अर्थात् वाणी- वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रि- का । यहाँ वाक् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका याणाम् । क ? मनसी मनसीति-/ उपलक्षण कराने के लिये है। कहाँ च्छान्दसं दैर्घ्यम् । तच्च मनो उपसहार करे ? मनमे, 'मनसी' पद- में ह्रख इकारके स्थानमें दीर्घ प्रयोग यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे बुद्धौ छान्दस है। फिर उस मनको ज्ञान आत्मनि । बुद्धिहि मनआदि- अर्थात् प्रकाशखरूप बुद्धि--आत्मा- करणान्यामोतीत्यात्मा प्रत्यक् मे लीन करे। बुद्धि ही मन आदि इन्द्रि- योमे व्याप्त है, इसलिये वह उनका तेषाम् । ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति -प्रत्यक्स्वरूप है। उस ज्ञान- प्रथमजे नियच्छेत् । प्रथमजवत् | खरूप बुद्धिको प्रथम विकार महान् आत्मामे लीन करे अर्थात् प्रथम खच्छस्वभावकमात्मनो विज्ञानम् उत्पन्न हुए महत्तत्त्वके समान आत्मा- आपादयेदित्यर्थः। तंचमहान्तम् खच्छवभाव विज्ञान प्राप्त वात्मानं यच्छेच्छान्ते सर्वविशेष- करे । और महान् आत्माको जिसका प्रत्यस्तमितरूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे खरूप सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित है और जो अविक्रिय, सर्वान्तर तथा सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य बुद्धिके सम्पूर्ण प्रत्ययोंका साक्षी है वात्मनि ॥१३॥ उस मुख्य आत्मामे लीन करे॥१३॥ आत्मा- का एवं पुरुष आत्मनि सर्व प्रवि-! मृगतृष्णा, रज्जु और आकाशके खरूपका ज्ञान होनेसे जैसे मृगजल, लाप्य नामरूपकर्मत्रयं यन्मिथ्या- रज्जु-सर्प और आकाश-मालिन्यका ज्ञानविजृम्भितं क्रियाकारकफल- बाध हो जाता है, उसी प्रकार मिथ्याज्ञानसे प्रतीत होनेवाले समस्त लक्षणं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानेन' प्रपञ्च यानी नाम, रूप और कर्म क० उ०७- ९८ कठोपनिषद् [अध्याय १ , main मरीच्युदकरज्जुसर्पगगनमलानीव । इन तीनोंको, जो क्रिया, कारक और फ्लरूप ही हैं, स्वास्मतत्त्वके मरीचिरज्जुगगनस्वरूपदर्शनेनैव यथार्थ ज्ञानद्वारा यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरुष अर्थात् आत्मामें लीन करके मनुष्य स्वस्थ, स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये भवति यतोऽतस्तदर्शनार्थम्- | उसका साक्षात्कार करनेके लिये- उद्बोधन उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य, वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता, दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥१४॥ अरे अविद्याग्रस्त लोगो ! ] उठो, [ अज्ञान-निद्रासे ] जागो और श्रेष्ठ पुरुषोंके समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो। जिस प्रकार छुरेकी बार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस मार्गको वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं ॥ १४ ॥ अनाद्यविद्याप्रसुप्ता उत्तिष्ठत ! अनादि अविद्यासे सोये हे जन्तव आत्मज्ञानाभिमुखा | हुए जीवो ! उठो, आत्मज्ञानके अभिमुख होओ तथा घोररूप भवतः जाग्रताज्ञाननिद्राया | अज्ञान-निद्रासे जागो गो—सम्पूर्ण घोररूपायाः सर्वानर्थबीजभूतायाः अनर्थोंकी बीजभूत उस अज्ञान- क्षयं कुरुत। निद्राका क्षय करो। कथम् ? प्राप्योपगम्य वरान् किस प्रकार [ क्षय करें] : श्रेष्ठ-उत्कृष्ट आत्मज्ञानी आचार्योंके प्रकृष्टानाचार्यास्तद्विदस्तदुपदिष्टं पास जाकर--उनके समीप पहुँच- सर्वान्तरमात्मानमहमस्मीति नि- कर उनके उपदेश किये हुए सर्वान्तर्यामी आत्माको 'मैं यही हूँ! बोधतावगच्छत । न ह्युपेक्षित- | ऐसा जानो। उसकी उपेक्षा नहीं वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९९ ? व्यमिति श्रुतिरनुकम्पयाह मात्- | करनी चाहिये-ऐसा माताके समान कृपा करके श्रुति कह रही है। वत् ! अतिसूक्ष्मबुद्धिविषयत्वा- क्योंकि वह ज्ञेय पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म ज्ज्ञेयस्य । किमिव सूक्ष्मबुद्धिः बुद्धिका ही विषय है। सूक्ष्म बुद्धि इत्युच्यतेः क्षुरस्य धाराग्रं निशिता कैसी होती है ? इसपर कहते हैं- तीक्ष्णीकृता दुरत्यया दुःखेनात्य- निशित अर्थात् पैनायी हुई छुरेकी धार-अग्रभाग जिस प्रकार दुरत्यय यो यस्या सा दुरत्यया । यथा सा होती है-जिसे कठिनतासे पार किया पद्धयां दुर्गमनीया तथा दुर्ग जा सके उसे दुरत्यय कहते हैं । जिस दुःसंपायमित्येतत् पथः पन्थानं प्रकार उसपर पैरोंसे चलना अत्यन्त कठिन है उसी प्रकार यह आत्म- तत्त्वज्ञानलक्षणं मार्ग कश्यो ज्ञानका मार्ग बड़ा दुर्गम अर्थात् मेधाविनो बदन्ति । ज्ञेयस्याति- दुष्प्राप्य है-ऐसा कवि--मेधावी सूक्ष्मत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य पुरुष कहते हैं। अभिप्राय यह है कि ज्ञेय अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण दुःसंपाद्यत्त्रं वदन्तीत्यभिप्रायः मनीषिजन उससे सम्बद्ध ज्ञान- ॥ १४॥ मार्गको दुष्प्राप्य बतलाते हैं ॥१४॥ तत्कथमतिसूक्ष्मत्वं ज्ञेयस्य उस ज्ञेयकी अत्यन्त सूक्ष्मता किस प्रकार है ? इसपर कहते हैं। इत्युच्यतेः स्थूला तावदियं मेदिनी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोपचिता गन्ध-[ इन पाँचों विषयों ] से वृद्धिको प्राप्त हुई तथा सम्पूर्ण सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम्। इन्द्रियोंकी विषयभूत यह पृथिवी स्थूल है। ऐसा ही शरीर भी है। तत्रैकैकगुणापकर्षण गन्धादीनां उनमें गन्धादि गुणोंमेंसे एक-एकका सूक्ष्मत्वमहत्त्वविशुद्धत्वनित्यत्वा- | अपकर्ष-क्षय होनेसे जलसे लेकर कठोपनिषद् [अध्याय १ दितारतम्यं दृष्टमबादिषु याव- | आकाशपर्यन्त चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व, महत्त्व, विशुद्धत्व और नित्यत्व दाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व आदिका तारतम्य देखा गया है । किन्तु स्थूल होनेके कारण जहाँ एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता गन्धसे लेकर शब्दपर्यन्त ये सारे यत्र न सन्ति किमु तस्य सूक्ष्म- विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्वादिकी निरतिशयताके विषयमें क्या कहा त्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यम् जाय ? यही बात आगेकी श्रुति इत्येतदर्शयति श्रुतिः दिखलाती है-- निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे भी पर और ध्रुव ( निश्चल ) है उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है ॥ १५॥ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा अरस, नित्य और तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् अगन्धयुक्त है--ऐसी जिसकी एतद्व्याख्यातं ब्रह्माव्ययम् व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म यद्धि शब्दादिमत्तव्येतीदं तु | अविनाशी है; क्योंकि जो पदार्थ अशब्दादिमत्त्वादव्ययं न व्येति शब्दादियुक्त होता है उसीका व्यय होता है, किन्तु यह ब्रह्म तो न क्षीयते, अत एव च नित्यं अशब्दादियुक्त होनेके कारण अव्यय यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु न | है; इसका व्यय-क्षय नहीं होता, १ , चल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ व्येत्यतो नित्यम् । इतश्च नित्यम् । इसीलिये यह नित्य भी है; क्योंकि जिसका व्यय होता है वह अनित्य अनाद्यविद्यमान आदिः कारणम् है । इसका व्यय नहीं होता इसलिये यह नित्य है। यह अनादि अस्य तदिदमनादि । यद्धयादि- अर्थात् जिसका आदि-कारण विद्यमान नहीं है ऐसा होनेसे भी मत्तत्कार्यत्वादनित्यं कारणे | नित्य है; क्योंकि जो पदार्थ आदिमान होता है वह कार्यरूप प्रलीयते यथा पृथिव्यादि । इदं कारणमें लीन हो जाता है; जैसे होनेसे अनित्य होता है और अपने कि पृथिवी आदि । किन्तु यह तु सर्वकारणत्वादकार्यमकार्य- आत्मा तो सबका कारण होनेसे अकार्य है और अकार्य होनेके त्वान्नित्यं न तस्य कारणमस्ति | कारण नित्य है । इसका कोई कारण नहीं है, जिसमें कि यह यस्मिन्प्रलीयेत । लीन हो। तथानन्तम् अविद्यमानोऽन्तः- इसी प्रकार यह आत्मा अनन्त भी है। जिसका अन्त अर्थात् कार्य कार्यमस्य तदनन्तम् । यथा | अविद्यमान हो उसे अनन्त कहते कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादनेन | हैं । जिस प्रकार फलादि कार्य उत्पन्न करनेसे भी कदली आदि अपि अनित्यत्वं दृष्टं न च पौधोंकी अनित्यता देखी गयी है उस प्रकार ब्रह्मका अन्तवत्त्व नहीं तथाप्यन्तवत्वं ब्रह्मणः; अतोऽपि देखा गया । इसलिये भी वह नित्यम् । नित्य है। महतो महत्तत्त्वाद्बुद्धया- नित्यविज्ञप्तिस्वरूप होनेके कारण ख्यात्परं विलक्षणं नित्यविज्ञप्ति- बुद्धिसंज्ञक महत्तत्त्वसे भी पर अर्थात् विलक्षण है; क्योंकि ब्रह्म सम्पूर्ण स्वरूपत्वात्सर्वसाक्षि हि सर्वभूता- | भूतोंका अन्तरात्मा होनेके कारण स्मत्वाद् ब्रह्म । उक्तं हि "एष सर्वेषु सबका साक्षी है । यह बात उपर्युक्त "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न भूतेषु" (क० उ०१।३।१२) ' प्रकाशते” इत्यादि मन्त्रमें कही ही

१०२
कठोपनिषद्
[अध्याय १
इत्यादि । ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं | गयी है । इसी प्रकार वह ध्रुव-
कूटस्थ नित्य है। उसकी नित्यता
न पृथिव्यादिवदापेक्षिकं नित्य-
पृथिवी आदिके समान आपेक्षिक
त्वम् । तदेवंभूतं ब्रह्मात्मानं नहीं है । उस इस प्रकारके
ब्रह्म-आत्माको जानकर
निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्यु- मृत्युमुखसे—अविद्या, काम और
पुरुष
मुखान्मृत्युगोचरादविद्याकाम कर्मरूप मृत्युके पंजेसे मुक्त-वियुक्त
कर्मलक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते१५ हो जाता है ॥ १५ ॥
--
प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह अब प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके
श्रुतिः
लिये श्रुति कहती है-
प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥
नचिकेताद्वारा प्राप्त तथा मृत्युके कहे हुए इस सनातन विज्ञानको
कह और सुनकर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥ १६ ॥
नाचिकेतं नचिकेतसा प्राप्त नचिकेताद्वारा प्राप्त किये तथा
नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्यु-
मृत्युके कहे हुए इम तीन वल्लियों-
प्रोक्तमिदमाख्यानमुपाख्यानं
वाले उपाख्यानको, जो वैदिक
होनेके कारण सनातन-चिरन्तन
वल्लीत्रयलक्षणं सनातनं चिरन्तनं
है, ब्राह्मण.से कहकर तथा आचार्यो-
वैदिकत्वादुक्त्वा ब्राह्मणेभ्यः
सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्मलोक-
श्रुत्वाचार्येभ्यो मेधावी ब्रह्मैव में ब्रह्म ही लोक है; उसमें
लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत महिमान्वित होता है अर्थात् सबका
आत्मभूत उपास्यो भवतीत्यर्थः आत्मस्वरूप होकर उपासनीय
॥१६॥
से
होता है ॥ १६ ॥

बल्ली३]
शाङ्करभाष्यार्थ
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७॥
जो पुरुष इस परम गुह्य ग्रन्थको पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणोंकी सभामें
अथवा श्रद्धकालमें सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता
है, अनन्त फलवाला होता है ॥१७॥
यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं
जो कोई पुरुष इस परम-
प्रकृष्टं गुह्यं गोप्पं श्रादयेद् ग्रन्थ- प्रकृष्ट और गुह्य-गोपनीय प्रन्थको
पवित्र होकर ब्राह्मणोंकी सभामें
तोऽर्थतश्च ब्राह्मणानां संसदि
अथवा श्राद्धकालमें भोजन करनेके
ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा लिये बैठे हुए ब्राह्मणोंके प्रति केवल
श्राद्धकाले वा श्रादयेद् भुडानानां पाठमात्र या अर्थ करते हुए सुनाता
है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला
तच्ड्राद्धमसानन्त्यायानन्तफलाय
होता है। यहाँ अध्यायकी समाप्तिके
कल्पते संपद्यते । द्विवचनम् लिये 'तदानन्त्याय कल्पते' यह
अध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १७॥ वाक्य दो बार कहा गया है ॥१७॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये तृतीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ ३ ॥
इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥१॥

ল্পিী জ্বাস্থ मयमा बल्ली में आत्मदर्शनका विघ्न-इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा 'सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ वह आत्मा प्रकाशित नहीं होता; वह न प्रकाशते दृश्यते त्वग्रयया तो एकाग्र बुद्धिसे ही देखा जाता है। ऐसा पहले (१।३।१२ बुद्धयेत्युक्तम् । कः पुनः प्रति- कहा था । अब प्रश्न होता है बन्धोऽग्रयाया बुद्धेर्येन तदभावात् | प्रतिबन्ध है जिससे कि उस ( एकाग्र कि एकाग्र बुद्धिका ऐसा कौन आत्मा न दृश्यत इति तददर्शन- | बुद्धि ) का अभाव होनेपर आत्मा दिखायी नहीं देता ! अतः कारणप्रदर्शनार्था वल्ल्यारभ्यते । आत्मदर्शनके प्रतिबन्धका कारण दिखलानेके लिये यह वल्ली आरम्भ विज्ञाते हि श्रेय प्रतिबन्धकारणे की जाती है; क्योंकि श्रेयके प्रति- बन्धका कारण जान लेनेपर ही उस- तदपनयनाय यत्न आरब्धुं शक्यते की निवृत्तिके यनका आरम्भ किया नान्यथेति- जा सकता है, अन्यथा नहीं पराश्चि खानि व्यतृणस्वयंभू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् खयम्भू ( परमात्मा ) ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। इसीसे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं। जिसने अमरत्वकी इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्माको देख पाता है ॥१॥ १ वल्ली १ शाङ्करभाष्यार्थ पराश्चि परागञ्चन्ति गच्छ- जो पराक् अर्थात् बाहरकी ओर न्तीति खानि तदुपलक्षितानि | उन्हें पराञ्चि' ( बाहर जानेवाली ) अञ्चन करती-गमन करती हैं श्रोत्रादीनीन्द्रियाणिखानीत्युच्य- | कहते हैं । 'ख' छिद्रोंको कहते हैं, न्ते । तानि पराञ्च्येव शब्दादि- उनसे उपलक्षित श्रोत्रादि इन्द्रियाँ 'खानि' नामसे कही गयी हैं। विषयप्रकाशनाय प्रवर्तन्ते । वे बहिर्मुख होकर ही शब्दादि यस्मादेवं स्वाभाविकानि तानि विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये व्यतृणद्धिसितवान्हननं कृतवान् प्रवृत्त हुआ करती हैं। क्योंकि वे ऐसी हैं इसलिये खभावसे ही उन्हें इत्यर्थः । कोऽसौ ? स्वयंभूः हिंसित कर दिया है--उनका हनन कर दिया है। वह [ हनन परमेश्वरः खयमेव स्वतन्त्रो करनेवाला ] कौन है ? स्वयम्भू- भवति सर्वदा न परतन्त्र इति । परमेश्वर अर्थात् जो स्वतः ही सर्वदा खतन्त्र रहता है-परतन्त्र नहीं तस्मात्पराङ् पराग्रूपाननात्म- रहता । इसलिये वह उपलब्धा भूताञ्शब्दादीन्पश्यत्युपलभत सर्वदा पराक् अर्थात् बहिःस्वरूप अनात्मभूत शब्दादि विषयोंको ही उपलब्धा, नान्तरात्मन्नान्त- देखता-उपलब्ध करता है, 'नान्त- रात्मानमित्यर्थः। रात्मन्' अर्थात् अन्तरात्माको नहीं । एवंस्वभावेऽपि सति लोकस्य यद्यपि लोकका ऐसा ही स्वभाव है तो भी कोई धीर-बुद्धिमान्– कश्चिन्नद्याः प्रतिस्रोतःप्रवर्तनमिव | विवेकी पुरुष ही नदीको उसके प्रवाहके विपरीत दिशामें फेर देनेके धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं | समान [ इन्द्रियोंको [ इन्द्रियोंको विषयोंकी * नपुंसक 'ख' शब्दका प्रथमा-बहुवचन ।

कठोपनिषद् [अध्याय २ तथा प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगा- | ओरसे हटाकर ] उस अपने प्रत्यगात्माको [ देखता है ] । जो स्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो प्रत्यक् ( सम्पूर्ण विषयोंको जानने- लोके नान्यस्मिन् । व्युत्पत्ति- | वाला ) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं। लोकमें आत्मा पक्षेपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते । शब्द 'प्रत्यक्' के अर्थमें ही रूढ़ है, और किसी अर्थमें नहीं । व्युत्पत्ति- "यच्चामोति यदादत्ते पक्षमें भी 'आत्मा' शब्दकी प्रवृत्ति उसी ( प्रत्यक्-अर्थ ही ) में है जैसा यच्चात्ति विषयानिह । कि "क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और यचास्य संततो भाव- इस लोकमें विषयोंको भोगता है स्तस्मादात्मेति कीत्यते ॥" इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह 'आत्मा' कहलाता है।" (लिङ्ग. १। ७० । ९६) | इस प्रकार आत्मा शब्दकी व्युत्पत्ति- इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात् । के सम्बन्धमे स्मृति है। तं प्रत्यगात्मानं स्वं स्वभाव- उस प्रत्यगात्माको अर्थात् अपने स्वरूपको ऐक्षत्'-देखा यानी मैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि | देखता है । वैदिक प्रयोगमे कालका नियम न होनेके कारण यहाँ वर्तमान कालानियमात् । कथं पश्यतीत्यु- कालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया च्यते । आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृत्तं | [ ऐक्षत् ] का प्रयोग हुआ है। वह किस प्रकार देखता है ? चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातम् | इसपर कहते हैं-'आवृत्तचक्षुः' अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और अशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षुः श्रोत्रादि इन्द्रियसमूहको सम्पूर्ण विषयोंसे व्यावृत्त कर लिया है- स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस पश्यति । न हि बाह्यविषया- प्रत्यगात्माको देख पाता है। एक वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ लोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य ही पुरुषके लिये बाह्य विषयोंकी आलोचनामें तत्पर रहना तथा संभवति । किमर्थं पुनरित्थं महता प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना- ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं। प्रयासेन खभावप्रवृत्तिनिरोधं 'अच्छा, तो, इस प्रकार महान् परिश्रमसे [ इन्द्रियोंकी ] स्वाभाविक कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति प्रवृत्तिको रोककर धीर पुरुष इत्युच्यते प्रत्यगात्माको क्यों देखता है ? ऐसी अमृतत्वममरण- आशङ्का होनेपर कहते हैं-- धर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन् 'अमृतत्व-अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्माकी नित्यस्वभावताकी इच्छा आत्मन इत्यर्थः ॥१॥ करता हुआ [ उसे देखता है ] ॥१॥ यत्तावत्स्वाभाविकं परागेव| जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्म- दर्शन है वही आत्मदर्शनके अनात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकी कारणरूपा अविद्या है। प्रतिबन्धकारणमविद्या तत्प्रति- क्योंकि वह उस ( आत्मदर्शन ) के कूलत्वात् । या च पराक्ष्वेवा- प्रतिकूल है । इसके सिवा अविद्यासे दिखलायी देनेवाले दृष्ट और अदृष्ट विद्योपप्रदर्शितेषु दृष्टादृष्टेषु बाह्य भागोंमे जो तृष्णा है उन अविद्या और तृष्णा दोनोंहीमे भोगेषु तृष्णा ताभ्यामविद्या- जिनका आत्मदर्शन प्रतिबद्ध हो तृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः- अविवेकी और विवेकीका अन्तर पराचः कामानंनुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते । रहा है वे कठोपनिषद् [अध्याय २ अल्पज्ञ पुरुष बाह्यभोगोंके पीछे लगे रहते हैं। वे मृत्युके सर्वत्र फैले हुए पाशमें पड़ते हैं । किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्वको ध्रुव ( निश्चल ) जानकर संसारके अनित्य पदार्थों में से किसीकी इच्छा नहीं करते ॥२॥ पराचो बहिर्गतानेव कामान् | बाल--मन्दमति पुरुष पराक् काम्यान्विषयाननुयन्ति अनु- बाह्य कामनाओंका--काम्य विषयों- का ही अनुगमन--पीछा किया गच्छन्ति बाला अल्पप्रज्ञास्ते करते हैं । इसी कारणसे वे अविद्या, तेन कारणेन मृत्योरविद्याकाम- काम और कर्मके समुदायरूप कर्मसमुदायस्य यन्ति गच्छन्ति | मृत्युके वितत--विस्तीर्ण--सर्वत्र विततस्य विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्त पाशमें [ पड़ते हैं ] । जिससे व्याप्तस्य पाशं पाश्यते बध्यते | जीव पाशित होता है—बाँधा येन तं पाशं देहेन्द्रियादिसंयोग- जाता है उस देहेन्द्रियादिके संयोग- वियोगरूप पाशमें पड़ते हैं । अर्थात् वियोगलक्षणम् । अनवरतजन्म- निरन्तर जन्म-मरण, जरा और रोग मरणजरारोगायनेकानर्थवातं आदि बहुत-से अनर्थसमूहको प्राप्त प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। होते हैं। एवमथ तस्माद्वीरा क्योंकि ऐसी बात है इसलिये विवेकिनः प्रत्यगात्मस्वरूपाव-धीर--विवेकी पुरुष खरूपमें स्थितिरूप अमृतत्वको स्थानलक्षणममृतत्वं ध्रुवं विदित्वा, ध्रुव (निश्चल ) जानकर—देवता देवाघमृतत्वं ह्यध्रुवमिदं तु प्रत्य- आदिका अमृतत्व तो अध्रुव गात्मस्वरूपावस्थानलक्षणं "न | किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थिति- कर्मणा वर्धते नो कनीयान्" | रूप अमृतत्व "यह कर्मसे न बढ़ता (बृ० उ० ४ । ४ । २३ ) इति है न घटता है" इस उक्तिके ध्रुवम् । तदेवंभूतं कूटस्थमवि- अनुसार ध्रुव है-इस प्रकारके अमृतत्वको कूटस्थ और अविचाल्य चाल्यममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु जानकर वे ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता सर्वपदार्थेष्वनित्येषु निर्धार्य । लोग इस अनर्थप्राय संसारके सम्पूर्ण , यत प्रत्यगात्म- " वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ वे ब्राह्मणा इह संसारेऽनर्थप्राये न | अध्रुव--अनित्य पदार्थोंमें से किसी- प्रार्थयन्ते किंचिदपि प्रत्यगात्म- की इच्छा नहीं करते; क्योंकि वे सब दर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्त- | तो प्रत्यगात्माके दर्शनके विरोधी ही लोकैषणाभ्यो व्युत्तिष्ठन्त्ये- | हैं । अर्थात् वे पुत्र, वित्त और वेत्यर्थः ॥२॥ लोकैषणासे दूर ही रहते हैं ॥ २ ॥ यद्विज्ञानान किंचिदन्यत् ब्राह्मणलोग जिसका ज्ञान हो जानेसे और किसी वस्तुकी इच्छा प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम नहीं करते उस ब्रह्मका बोध किस इत्युच्यते- प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं- आत्मज्ञकी सर्वज्ञता येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाश्व मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ जिस इस आत्माके द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखोंको निश्चयपूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह जाता है ? [ तुझ नचिकेताका पूछा हुआ ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥ येन विज्ञानस्वभावेनात्मना| सम्पूर्ण लोक जिस विज्ञान- रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पांश्च स्वरूप आत्माके द्वारा रूप, रस, मैथुनान्मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्य- गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन-- यान्विजानाति विस्पष्टं जानाति मैथुनजनित सुखोंको स्पष्टतया सर्वो लोकः। जानता है वही ब्रह्म है । ननु नैवं प्रसिद्धिलॊकस्य शङ्का-परन्तु लोकमें ऐसी कोई आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं वि- | प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादिसे विलक्षण जानामीति । देहादिसंघातोऽहं जानता हूँ। सब लोग यही समझते विजानामीति तु सर्वो लोकोऽव- हैं कि मैं देहादि संघातरूप ही गच्छति । सब कुछ जानता हूँ। आत्माद्वारा कठोपनिषद् [ अध्याय २ दृग्दृश्य- तथा न त्वेवम् । देहादिसंघात समाधान-ऐसी बात तो नहीं स्थापि शब्दादिस्वरूप- है; क्योंकि देहादि संघात भी त्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वा- समानरूपसे शब्दादिरूप विवेचनम् विशेषाच न युक्तं वि- विज्ञेयस्वरूप है; अतः उसे ज्ञाता ज्ञातृत्वम् । यदि हि देहादिसंघातो मानना उचित नहीं है । यदि देहादि संघात रूप-रसादिवरूप होकर भी रूपाद्यात्मकः सन्रूपादीन्वि- रूपादिको जान ले तो बाह्य रूपादि जानीयाबाह्या अपि रूपादयोऽन्यो- भी परस्पर एक-दूसरेको तथा अपने- न्यं स्वं स्वं रूपं च विजानीयुः। अपने रूपको जान लेंगे; किन्तु यह न चैतदस्ति तस्मादेहादिलक्ष- बात है नहीं । अतः लोक देहादि- णांश्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यति- स्वरूप रूपादिको इस देहादि- व्यतिरिक्त विज्ञानस्वभाव आत्माके रिक्तनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना द्वारा ही जानता है। जिस विजानाति लोकः । यथा प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलाता येन लोहो दहति सोऽग्निरिति है उसे अग्नि कहते हैं उसी प्रकार [जिसके द्वारा लोक देहादि विषयोंको तद्वत् । । जानता है उसे आत्मा कहते हैं । आत्मनोविज्ञेयं किमत्रास्मि उस आत्मासे जिसका ज्ञान न हो सके ऐसा क्या पदार्थ इस लोकमें लोके परिशिष्यते न किंचित्परि- | रह जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं शिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना रहता-~-सभी कुछ आत्मासे ही जाना जा सकता है। [इस विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेयं न प्रकार ] जिस आत्मासे अविज्ञेय कोई भी वस्तु नहीं रहती वह किंचित्परिशिष्यते स आत्मा आत्मा सर्वज्ञ है और यही वह है। सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यत् वह कौन है ? जिसके विषयमें तुझ नचिकेताने प्रश्न किया है, जो नचिकेतसा पृष्टं देवादिभिरपि देवादिका भी सन्देहास्पद है तथा वल्ली १] शाङ्करभाष्याथ विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् जो धर्माधर्मादिसे अन्य विष्णुका परमपद है और जिससे श्रेष्ठ और विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति कुछ भी नहीं है वही यह [ ब्रह्म- पद ] अब ज्ञात हुआ है—ऐसा तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः॥३॥! इसका भावार्थ है ॥ ३ ॥ अतिसूक्ष्मत्वादुर्विज्ञेयमिति वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्विज्ञेय है-ऐसा मानकर उसी बातको बारम्बार कहते हैं- मत्वैतमेवार्थ पुनः पुनराह - आत्मज्ञकी निशोकता खप्तान्तं जागरितन्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्नमे प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रतमे दिखायी देनेवाले- दोनो प्रकारके पदार्थोंको देखता है उस महान् और विमु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नही करता ॥ ४ ॥ स्वमान्तं स्वममध्यं स्वमवि खप्नान्त-स्वप्नका मध्य अर्थात् खप्नावस्थामें जानने योग्य तथा ज्ञेयमित्यर्थः तथा जागरितान्तं जागरितान्त-जाग्रत् मध्य यानी जाग्रत् अवस्थामे जानने जागरितमध्यं जागरितविज्ञेयं योग्य—इन दोनो स्वप्न और जाग्रत्के अन्तर्गत पदार्थोंको लोक च उभौ स्वप्मजागरितान्तौ येन जिस आत्माके द्वारा देखता है आत्मनानुपश्यति लोक इति सर्व | [ वही ब्रह्म है; इस प्रकार ] इस वाक्यकी और सब व्याख्या पूर्व पूर्ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं ! मन्त्रके समान करनी चाहिये । उस अवस्थाका कठोपनिषद् [अध्याय २ मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षात् | महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् 'वह परमात्मा मैं ही हूँ' अहमस्मि परमात्मेति धीरो न | ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक शोचति ॥४॥ नहीं करता ॥४॥ -- तथा- किंच- आत्मज्ञकी निर्भयता य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ जो पुरुष इस कर्मफलभोक्ता और प्राणादिको धारण करनेवाले आत्माको उसके समीप रहकर भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] के शासकरूपसे जानता है वह वैसा विज्ञान हो जानेके अनन्तर उस ( आत्मा ) की रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता । निश्चन यही वह [आत्मतत्त्व ] है ॥ ५॥ यः कश्चिदिमं मध्वदं कर्म जो कोई इस मध्वद-कर्मफल- फलभुजं जीवं प्राणादिकलापस्य | भोक्ता और जीव-प्राणादि कारण- कलापको धारण करनेवाले आत्माको धारयितारमात्मानं वेद विजानाति समीपसे भूत-भविष्यत् आदि तीनों अन्तिकादन्तिके समीप ईशानम् कालोंके शासकरूपसे जानता है, ईशितारं भूतभव्यस्य कालत्रयस्य वह ऐसा ज्ञान हो जानेके अनन्तर ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मानं उस आत्माका गोपन-रक्षण नहीं न करनी चाहता; क्योंकि वह अभयको विजुगुप्सते न गोपायितुम् प्राप्त हो जाता है। जबतक वह इच्छत्यभयप्राप्तत्वात् । यावद्धि भयके मध्यमें स्थित हुआ अपने भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मानं मन्यते आत्माको अनित्य समझता है तभी- तावद्गोपायितुमिच्छत्यात्मानम् ।। तक उसकी रक्षा भी करना चाहता धंल्ली१] शाङ्करभाष्यार्थ यदा तु नित्यमद्वैतमात्मानं । है। जिस समय आत्माको नित्य और अद्वैत जान लेता है उस समय विजानाति तदा किं कः कुतो कौन किसको कहाँसे, सुरक्षित वा गोपायितुमिच्छेत् । एतद्वै रखनेकी इच्छा करेगा ? निश्चय यही वह आत्मतत्त्व है---इस प्रकार तदिति पूर्ववत् ॥ ५॥ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥५॥ यः ] प्रत्यगात्मेश्वरभावेन जिस प्रत्यगात्माका यहाँ ईश्वर- भावसे निर्देश किया गया है वह सबका अन्तरात्मा है-यह बात निर्दिष्टः स सर्वात्मेत्येतद्दर्शयति-। इस मन्त्रसे दिखलायी जाती है. ब्रह्मज्ञका सार्वात्म्यदर्शन यः पूर्वं तपसा जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहांप्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत ॥ एतद्वै तत्॥६॥ जो मुमुक्षु पहले तपसे उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ ] को, जो कि जल आदि भूतोसे पहले उत्पन्न हुआ है, भूतोके सहित बुद्धिरूप गुहामे स्थित हुआ देखता है वही उस ब्रह्मको देखता है। निश्चय यही वह ब्रह्म है॥६॥ यः कश्चिन्मुमुक्षुः पूर्व प्रथम जिस मुमुक्षुने पहले तपसे-~- ज्ञानादिलक्षण ब्रह्मसे उत्पन्न हुए तपसो ज्ञानादिलक्षणाद्ब्रह्मण हिरण्यगर्भको । किसकी अपेक्षा इत्येतजातमुत्पन्नं हिरण्यगर्भमः | पूर्व उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको ? ऐसा किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह-अभ्यः प्रश्न होनेपर कहते हैं जो जलसे पूर्व अर्थात् जलसहित पाँचों पूर्वमप्सहितेभ्यः पञ्चभूतेभ्यो न तत्त्वोसे, न कि केवल जलसे ही, फेवलाभ्योऽभ्य इत्यभिप्रायः, पूर्व उत्पन्न हुआ है उस प्रथमज - क. उ०८- ११४ कठोपनिषद् [ গুহ अजायत उत्पन्नो यस्तं प्रथमजं | ( हिरण्यगर्भ ) को देवादि शरीरों- देशदिशरीराण्युत्पाद्य सर्वप्राणि- को उत्पन्न कर सम्पूर्ण प्राणियोंकी गुहा--हृदयाकाशमें प्रविष्ट हो गुहां हृदयाकाशं प्रविश्य तिष्ठन्तं देहेन्द्रियरूप भूतोंके सहित शब्दादि शब्दादीनुपलभमानं भूतेभिभूतः | विषयोंको अनुभव करते जिसने कार्यकरणलक्षणैः सह तिष्ठन्न देखा है यानी जो इस प्रकार देखता है | वही वास्तवमें देखता यो व्यपश्यत यः पश्यतीत्येतत् । है ] । जो ऐसा अनुभव करता है य एवं पश्यति स एतदेव वही उसे देखता है जो कि यह पश्यति यचत्प्रकृतं ब्रह्म ॥६॥ प्रकृत ब्रह्म है ॥ ६ ॥ , तथा- किंच- या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिउन्तीं या भूनेनिय॑जायत॥ एतद्वै तत् ॥७॥ जो देवतामयी अदिति प्रागरूपसे प्रकट होती है तथा जो बुद्धिरूप गुहामें प्रविष्ट होकर रहनेवाली और भूतोंके साथ ही उत्पन्न हुई है [ उसे देखो ] निश्चय यही वह तत्व है ॥ ७ ॥ या सर्वदेवतामयी सर्वदेवता जो सर्वदेवतामयी--सर्वदेव- खरूपा अदिति त्मिका प्राणेन हिरण्यगर्भरूपेण प्राण अर्थात् हिरण्या रूपसे परब्रह्मसे उत्पन्न परस्माद्ब्रह्मणः संभवति शब्दा- होती है। शब्दादि विषयोंका अदन ( भक्षण ) करनेके कारण उसे दीनामदनाददितिप्तां पूविद् अदिति कहते हैं---बुद्धिरूप गुहामें गुहां प्रविश्य तिष्ठन्धीमदितिम् । पूर्ववत् प्रविष्ट होकर स्थित हुई उस अदितिको [देखो] । उस अदिति- खामेव विशिनष्टि-या सूतेभिः । की ही विशेषता बतलाते हैं- चल्ली] शाङ्करमाष्यार्थ भूतैः समन्विता व्यजायत उत्पन्ना | जो मूतोंके सहित अर्थत् भूतोंसे समन्वित ही उत्पन्न हुई है। [वही इत्येतत् ॥७॥ तेरा पूछा हुआ तत्व है ] ॥ ७ ॥ अरगिस्थ मग्निमें ब्रह्मदृष्टि तथा- किंच- अरण्योनिहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिगीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥ एतद्वै तत् ।। ८॥ गर्निगी त्रियोंद्वारा नला प्रकार पोषित हुए गर्भके समान जो जातवेदा ( अग्नि ) दोनों अरणियोंके बीचमें स्थित है तथा जो प्रमाद- शून्य एवं होम-सामग्रीयुक्त पुरुषोंद्वारा नित्यप्रति स्तुति किये जाने योग्य है यही वह ब्रह्म है ॥ ८॥ योऽधियज्ञ उत्तराधरारण्योः जो अधियज्ञरूपसे ऊपर और निहितः स्थितो जातवेदा अग्निः नीचेकी अरणियोंमें निहित अर्थात पुनः सर्वहविषां भोक्ताध्यात्मं स्थित हुआ और होम किये हुए च योगिभिर्गर्भ इव गर्भिणीभिः सम्पूर्ण पदार्थों का भोक्ता अध्यात्म रूप जातवेदा-अग्नि है; जैसे अन्तर्वनीभिरगर्हितानपानभोज गर्भिणी-अन्तर्वनी स्त्रियाँ शुद्ध नादिना यथा गर्भः सुभृतः सुष्टु अन्न-पानादिद्वारा अपने गर्भकी सम्यग्भृतो लोक इवेत्थमेववि- बहुत अच्छी तरह रक्षा करती हैं भिर्योगिभिश्च सुभृत इत्येतत् । उसी प्रकार यज्ञ करनेवाले तथा किं च दिवे दिवेऽहन्यहनीड्यः योगीजन जिसे धारण करते हैं, तथा स्तुत्यो वन्धश्च कर्मिभिर्योगिभि- धृत आदि होमसामग्रीयुक्त, कर्म श्वाध्वरे हृदये च जागृवद्भिः परायण एवं जागरणशील—प्रमाद- जागरणशीलवद्भिरप्रमरित्येतत् शून्य याजकों और ध्यानभावना-

कठोपनिषद्
[अध्याय २
तथा-
na-
অনস্ব
हविष्मद्भिराज्यादिमद्भिर्ध्यान युक्त योगियोंद्वारा जो [ क्रमशः ]
यज्ञ और हृदयदेशमें स्तुति किये
मावनावद्भिश्च मनुष्येभिर्मनुष्यैः जाने योग्य है, ऐसा जो अग्नि है
अग्निः। एतद्वैतत्तदेव प्रकृतंब्रह्म ८ वही निश्चय यह प्रकृत ब्रह्म है ।।८॥
R
प्राणमें ब्रह्महष्टि
किंच-
यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥९॥
जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त होता है
उस प्राणात्मामें [ अन्नादि और वागादिक ] सम्पूर्ण देवता अर्पित
हैं। उसका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता । यही वह ब्रह्म है ॥९॥
यस्मात्प्राणादुदेति जिससे.--जिस प्राणसे नित्य-
उत्तिष्ठति सूर्योऽस्तं निम्लोचनं प्रति सूर्य उदित होता है और
जिस प्राणमें ही. वह नित्यप्रति
यत्र यस्मिन्नेव च प्राणेऽहन्यहनि अस्तभावको प्राप्त होता है उस
गच्छति तं प्राणमात्मानं देवा प्राणात्मामें स्थितिके समय अग्नि
आदि अधिदैव और वागादि
अग्न्यादयोऽधिदैवं वागादयश्च अध्यात्म सभी देवता इस प्रकार
अध्यात्म सर्वे विश्वेऽरा इव स्थ- अर्पित हैं-प्रविष्ट किये गये हैं जैसे
रथकी नाभिमें समस्त अरे; वह
नाभावर्पिताः संप्रवेशिताः स्थिति- प्राण ]
[प्राण ] भी ब्रह्म ही है। वही यह
काले सोऽपि ब्रह्मैव । तदेतत् सर्वात्मक ब्रह्म है। उसका अति-
सर्वात्मकं ब्रह्म । तदु नात्येति क्रमण कोई भी नहीं करता अर्थात्
नातीत्य तदात्मकतां तदन्यत्वं उस ब्रह्मके तादात्म्य भावको पार
करके कोई भी उससे अन्यत्वको
गच्छति कश्चन कश्चिदपि
प्राप्त नहीं होता। यही वह
एतद्वै तत् ॥ ९॥ CE, CE, I ( ब्रह्म ) है ॥ ९ ॥

वल्ली १] शाङ्करभाष्याथ ११७ यद्ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वर्त जो ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें वर्तमान है और भिन्न- मानं तत्तदुपाधित्वादब्रह्मवदव- भिन्न उपाधियोंके कारण अब्रह्मवत भासमानं संसार्यन्यत्परस्माद् भासित होता है वह संसारी जीव परब्रह्मसे भिन्न है-ऐसी किसीको ब्रह्मण इति मा भूत्कस्यचिदाशङ्का शङ्का न हो जाय, इसलिये यमराज इतीदमाह- इस प्रकार कहते हैं- भेददृष्टिकी निन्दा यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ जो तत्त्व इस ( देहेन्द्रियसंघात ) में भासता है वही अन्यत्र ( देहादिसे परे ) भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है । जो मनुष्य इस तत्त्वमें नानात्वं देखता है वह मृत्युसे मृत्युको [ अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है ॥१०॥ यदेवेह कार्यकरणोपाधि- जो इस लोकमें कार्यकरण ( देहेन्द्रिय ) रूप उपाधिसे युक्त समन्वितं संसारधर्मवदवभास- होकर अविवेकियोंको संसारधर्मयुक्त मानमविवेकिनां तदेव स्वात्म- भास रहा है स्वखरूपमें स्थित वही ब्रह्म अन्यत्र ( इन देहादिसे परे) स्थममुत्र नित्यविज्ञानधनस्व- नित्य विज्ञानघनस्वरूप और सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित है। तथा जो भावं सर्वसंसारधर्मवर्जितं ब्रह्म । अमुत्र-उस आत्मामें अर्थात यच्चामुत्रामुष्मिन्नात्मनि स्थितं परमात्मभावमें स्थित है वही इस लोकमें नाम-रूप एवं कार्य-करणरूप तदेवेह नामरूपकार्यकरणोपाधिम् उपाधिके अनुरूप भासनेवाला अनुविभाव्यमानं नान्यत् । आत्मतत्त्व है और कोई नहीं ।

११८ कठोपनिषद् [अध्याय २ प्रकार तो सत्युपाधिखभादभेद ऐसा होनेपर भी जो पुरुष दृष्टिलक्षणयाविद्यया मोहितः। उपाधिके स्वभाव और भेददृष्टिरूप अविद्यासे मोहित होकर इस सन् य इह ब्रह्मण्यनानाभूते पर- अभिन्नभूत-एकरूप ब्रह्ममें मैं मादन्योऽहं मत्तोऽन्यत्परं ब्रह्मेति परमात्मासे भिन्न हूँ और परमारमा मानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते मुझसे भिन्न है, इस स मृत्योर्मरणान्मरणं मृत्यु पुनः मृत्युको अर्थात् बारम्बार जन्म- भिन्नवत् देखता है वह मृत्युसे पुनर्जन्ममरणभावमाप्नोति प्रति- मरणभावको प्राप्त होता है । अतः पद्यते । तस्मात्तथा न पश्येत् । ऐसी दृष्टि नहीं करनी चाहिये । बल्कि मैं निर्बावरूपसे आकाशके विज्ञानकरसं नैरन्तर्येणाकाशवत समान परिपूर्ण और विज्ञानकरस- परिपूर्ण ब्रह्मैवाहमसीति पश्येत् स्वरूप ब्रह्म ही हूँ! इस प्रकार देखे। इति वाक्यार्थः ॥ १०॥ यही इस वाक्यका अर्थ है ॥१०॥ एकत्व-ज्ञान होनेसे पहले आचार्य प्रागेकत्वविज्ञानादाचार्यागम- संस्कृतेन- और शास्त्रसे संस्कारयुक्त हुए.---- मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११॥ - मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है, इस ब्रह्मतत्वमें नाना भी नहीं है । जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको जाता है ॥ ११॥ मनसेदं ब्रह्मकरसमाप्तव्यम् मनके द्वारा ही यह एकरस यात्मैव नान्यदस्तीति । आ| ब्रह्म 'सब कुछ बामा ही है, और वही १] शाङ्करभाष्यार्थ । नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया। कुछ नहीं है। इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है। इस प्रकार उसकी प्राप्ति अविद्याया निवृत्तत्वादिह ब्रह्मणि हो जानेपर नानात्वको स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो नाना नास्ति किञ्चनाणुमात्रम् जानेसे इस ब्रह्मतत्त्वमें किश्चित्- श्रपि । यस्तु पुनरविद्या- अणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता। किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव तिमिररोगग्रस्त दृष्टिको नहीं त्यागता पश्यति स मृत्योमत्युं गच्छत्येव ! बल्कि नानास्त्र ही देखता है वह इस प्रकार थोड़ा-सा भी भेद भेदमध्यारोपयन् | आरोपित करनेसे मृत्युसे मृत्युको [ अर्थात जन्म-मरणको ] प्राप्त इत्यर्थः ॥११॥ होता ही है ॥११॥ खल्पमपि हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म पुनरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह- फिर भी उस प्रकृत ब्रझका ही वर्णन करते हैं- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ एतद्वैतत् ॥१२॥ जो अङ्गुष्टपरिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है, उसे भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] का शासक जानकर वह उस ( आत्माके ज्ञान ) के कारण अपने शरीरकी रक्षा करना नहीं चाहता; निश्चय यही यह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥ १२ ॥ अड्डष्टमात्रोऽङ्गुष्ठपरिमाणः । अङ्गुष्टमात्र यानी अङ्गुष्ठपरि- माण; हृदयकमल अङ्गुष्ठके समान अङ्गुष्ठपरिमाणं हृदयपुण्डरीकं परिमाणवाला है। उसके छिमें सच्छिद्रवदन्तःकरणोपाधिः रहनेवाला जो अन्तःकरणोपाधिक बराबर समान कठोपनिषद् [अध्याय २ अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठमात्रवंशपर्वमध्य- । अङ्गुष्ठमात्र---अँगूठेके परिमाणवाले बाँसके पर्वमें स्थित वय॑म्बरवत् पुरुषः पूर्णमनेन आकाशके अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष शरीरके मध्यमें सर्वमिति मध्य आत्मनि स्थित है-उससे सारा शरीर पूर्ण है, इसलिये वह पुरुष शरीरे तिष्ठति यस्तमात्मानम् है.----उस भूत-भविष्यत् कालके शासक आत्माको जानकर [ ज्ञानी पुरुष अपनेको सुरक्षित रखनेकी ईशानं भूतभव्यस्य विदित्वा न इच्छा नहीं करता इत्यादि शेष पदकी पूर्ववत् व्याख्या करनी तत् इत्यादि पूर्ववत् ।। १२ ।। चाहिये ॥ १२ ॥ तथा- किंच- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ एतद्वै तत्॥१३॥ यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। यह भूत- भविष्यत्का शासक है। यही आज ( वर्तमान कालमें ) है और यही कल (भविष्यत्में ) भी रहेगा । और निश्चय यही वह (ब्रह्मतत्त्व ) है ॥१३॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योति- वह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है । मूल मन्त्रमें रिवाधृमकोऽधूमकमिति युक्तं जो 'अधूमकः' पद है वह [नपुंसक- लिङ्ग 7 ज्योतिः' शब्दका विशेषण ज्योतिष्परत्वात् । यस्त्वेवं लक्षितो होनेके कारण 'अधूमकम्' ऐसा होना चाहिये । जो योगियोंको योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य | इस प्रकार हृदयमें लक्षित होता है वह भूत और भविष्यका शास्ता स नित्यः कूटस्थोऽद्यदानों नित्य कूटस्थ आज-इस समय वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ प्राणिषु वर्तमानः स उ वोऽपि । प्राणियोंमें वर्तमान है और वही कल भी रहेगा, अर्थात् उसके समान वर्तिष्यते नान्यस्तत्समोऽन्यश्च कोई और पुरुष उत्पन्न नहीं होगा। जनिष्यत इत्यर्थः । अनेन नाय- | इससे कोई कहते हैं कि यह नहीं मस्तीति चैक इत्ययं पक्षो है। ऐसा [१।१। २० मन्त्रमें कहा हुआ ] जो पक्ष है वह यद्यपि न्यायतोऽप्राप्तोऽपि स्ववचनेन न्यायतः प्राप्त नहीं होता तथापि उसका और बौद्धोंके क्षणभङ्गवादका श्रुत्या प्रत्युक्तस्तथा खण्डन भी श्रुतिने खवचनसे कर भगवादश्च ॥१३॥ दिया है ॥ १३ ॥ भेदापवाद पुनरपि भेददर्शनापवादं ब्रह्ममें जो भेददृष्टि की जाती है उसका अपवाद श्रुति फिर भी ब्रह्मण आह- कहती है- यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । धर्मान्पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥१४॥ जिस प्रकार ऊँचे स्थानमें बरसा हुआ जल पर्वतोंमें (पर्वतीय निम्न देशोंमें ) बह जाता है उसी प्रकार आत्माओंको पृथक्-पृथक् देखकर जीव उन्हींको ( भिन्नात्मत्वको ही ) प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ यथोदकं दुर्गे दुर्गमे , देश जिस प्रकार दुर्ग-दुर्गम स्थान उच्छ्रिते वृष्टं सिक्तं पर्वतेषु पर्वत- । अर्थात् ऊँचाईपर बरसा हुआ जल प्रदेशोंमें फैलकर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार विकीर्ण सद्विनश्यति एवं धर्मान् धर्मा अर्थात् आत्माओंको पृथक्- आत्मनो भिन्नान्पृथक्पश्यन्पृथक् । प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न देखने- वत्सु निम्नप्रदेशेषु विधावति पर्वतों-पर्वतीय निम्न कठोपनिषद् [ अध्याय एव प्रतिशरीरं प्रतिशरीरं पश्यतानेव वाला मनुष्य उन्हीं-शरीरभेदका शरीरभेदानुवतिनोऽनुविधावति । अनुसरण करनेवालोंकी ओर ही जाता है, अर्थात् बारम्बार भिन्न- शरीरभेदमेव पृथक्पुनः पुनः भिन्न शरीरभेदको ही प्राप्त होता प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ १४॥ है॥१४॥ यस्य पुनर्विद्यावतो विध्वस्तो जो विद्यावान् है, जिसकी उपाधिकृत भेददृष्टि नष्ट हो गयी पाधिकृतभेददर्शनस्य विशुद्धवि- है और जो एकमात्र विशुद्धविज्ञान- ज्ञानधनकरसमद्वयमात्मानं पश्यतो धनैकरस अद्वितीय आत्माको ही देखनेवाला है उस विज्ञानी विजानतो मुनेर्मननशीलस्य आत्म- मुनि-मननशीलका आत्मा कैसा स्वरूपं कथं सम्भवतीत्युच्यते- होता है ! यह बतलाया जाता है- अभेददर्शनकी कर्तव्यता यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तागेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥१५॥ जिस प्रकार शुद्ध जलमें डाला हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है उसी प्रकार, हे गौतम ! विज्ञानी मुनिका आत्मा भी हो जाता है ॥१५॥ यथोदकं शुद्धे प्रसन्ने शुद्धं जिस प्रकार जलमें आसिक्त-प्रक्षिप्त (डाला प्रसन्नमासिक्तं प्रक्षिप्तमेकरसमेव हुआ,) शुद्ध-खच्छ जल उसके साथ मिलकर एकरस हो जाता नान्यथा तागेव भवत्यात्मा- है-उससे विपरीत अवस्थामें नहीं प्येवमेव भवत्येकत्वं विजाजतो रहता उसी प्रकार हे गौतम ! एकत्वको जाननेवाले मुनि- मुनेननशीलस हे गौतम । मननशील पुरुषका आत्मा भी वैसा -स्वच्छ वल्ली १] शाङ्करभाष्यार्थ वसात्कुतार्किकभेददृष्टिं नास्तिक- ही हो जाता है। अतः तात्पर्य यह है कि कुदृष्टिं चोज्झित्वा मातृपितृसहस्र- नास्तिकको कुदृष्टिका परित्याग कर सीको कुतार्किककी भेददृष्टि और म्योऽपि हितैपिणा वेदेनोपदिष्टम् सहस्रों माता-पिताओंसे भी अधिक हितैषी वेदके उपदेश किये हुए कत्वदर्शन शान्तः आत्मैकलदर्शनका ही अभिमानरहित आदरणीयमित्यर्थः ॥ १५॥ होकर आदर करना चाहिये ॥१५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमदाचार्यश्रीशंकरभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाध्ये द्वितीयाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥१॥(४) द्वितीया कल्ली प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान - पुनरपि प्रकारान्तरेण ब्रह्म ब्रह्म अत्यन्त दुर्विज्ञेय है; अतः ब्रह्मतत्त्वका प्रकारान्तरसे फिर भी तत्वनिर्धारणार्थोऽयमारम्भो दुर्वि- निश्चय करनेके लिये यह आगेका शेयत्वाद्ब्रह्मणः- ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है- पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वैतत् ॥१॥ उस नित्यविज्ञानस्वरूप अजन्मा [ आत्मा का पुर ग्यारह दर- बाजोंवाला है । उस [ आत्मा ] का ध्यान करनेपर मनुष्य शोक नहीं करता और वह [ इस शरीरके रहते हुए ही कर्मबन्धनसे मुक्त हुआ ही मुक्त हो जाता है। निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ १ ॥ पुरं पुरमिव पुरम् । द्वार [ यह शरीररूप] पुर पुरके समान होनेसे पुर कहलाता है। पालाधिष्ठात्राउनेक- द्वारपाल और अधिष्ठाता ( हाकिम ) पुरोपकरणसम्पत्ति- आदि अनेकों पुरसम्बन्धिनी सामग्री दिखायी देनेके कारण शरीर पुर दर्शनाच्छरीरं पुरम् । पुरं है। और जिस प्रकार सम्पूर्ण सामग्रीके सहित प्रत्येक पुर अपनेसे च सोपकरणं स्वात्मनासंहत- असंहत ( बिना मिले हुए ) स्वतन्त्र स्वतन्त्रखाम्यर्थ दृष्टम्; तथेदं खामीके [ उपभोगके ] लिये देखा जाता है उसी प्रकार पुरसे सदृशता पुरसामांन्यादनेकोपकरणसंहतं होनेके कारण यह अनेक सामग्री- शरीरस्य ब्रह्मपुरत्वम् वल्ली २] शाङ्करभाष्यार्थ २५ . .. शरीरं स्वात्मनासंहतराजस्था- , सम्पन्न शरीर भी अपनेसे पृथक् राजस्थानीय अपने खामी आत्मा। नीयस्वाम्यर्थ भवितुमर्हति । के लिये होना चाहिये। यह शरीरनामक पुर ग्यारह तच्चेदं शरीराख्यं पुरमेका- | दरवाजोवाला है। [ दो आँख, दो कान, दो नासारन्ध्र और एक मुख दशद्वारमेकादश द्वाराण्यस्य सप्त इस प्रकार सात मस्तकसम्बन्धी, शीर्षण्यानिनाम्यासहाञ्चित्रीणि नाभिके सहित ! शिश्न और गुदा मिलाकर तीन निम्नदेशीय तथा शिरस्येकं तैरेकादशद्वारं पुरम् ।। ब्रह्मरन्ध्ररूप एक शिरमें रहने- वाला~इस प्रकार इन सभी द्वारोंसे कस्याजस्य जन्मादिविक्रिया- । युक्त होनेके कारण ] यह पुर रहितस्यात्मनी राजस्थानीयस्य | एकादश द्वारवाला है । वह पुर किसका है ? [ इसपर कहते हैं--- पुरधर्मविलक्षणस्य । अवक्रचेतसः अजका, अर्थात् पुरके धर्मोंसे विलक्षण जन्मादि विकाररहित राज- अवक्रमकुटिलमादित्यप्रकाश- स्थानीय आत्माका । इसके सिवा जो अवक्रचित्त है--जिसका चित्त- वन्नित्यमेवावस्थितमेकरूपं चेतो विज्ञान अवक्र-अकुटिल अर्थात् विज्ञानमस्येत्यवक्रचेतास्तस्यावक्र-सूर्यके समान नित्यस्थित और एक- रूप है उस अवक्रचेता राजस्थानीय चेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्मणः । ब्रह्मका [ यह पुर है, यस्येदं पुरं तं परमेश्वर जिसका यह पुर है उस पुरस्वामी स्वात्मानुभवेन पुरस्वामिनमनुष्ठाय : परमेश्वरका अनुष्ठान ----ध्यान करके, शोकादि- निवृत्तिः ध्यात्वा--ध्यानं हि क्योंकि सम्पग्विज्ञानपूर्वक ध्यान ही तस्यानुष्ठानं सम्य- उसका अनुष्ठान है; अतः सम्पूर्ण ग्विज्ञानपूर्वकम्--तं सर्वेषणा- एषणाओंसे मुक्त होकर उस सम, विनिर्मुक्तः सन्समं सर्वभूतस्थं । सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित ब्रह्मका ध्यान १२६ कठोपनिषद् [अध्याय २ ध्यात्वा न शोचति । तद्विज्ञानाद् । कर पुरुष शोक नहीं करता । ब्रह्मके विज्ञानसे अभय-प्राप्ति हो अमयप्राप्तः शोकासराभावात् जानेसे शोकका अवसर न रहनेके कुतो भयेक्षा । इहैवाविद्याकृत- कारण भयदर्शन भी कहाँ हो सकता है ! अतः वह इस लोकमें ही कामकर्मबन्धनषिमुक्तो भवति । अविद्या कृत काम और कर्मके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। इस विमुक्तश्च सन्विमुच्यते पुनः प्रकार वह मुक्त जीवन्मुक्त) हुआ मुक्त (विदेहमुक्त) होता है; अर्थाव शरीरं न गृहातीत्यर्थः॥१॥ पुनः शरीरग्रहण नहीं करता ॥१॥ स तु नैकशरीरपुरवातात्मा परन्तु वह आत्मा तो केवल एक ही शरीररूप पुरमें रहनेवाला नहीं है, बल्कि सभी पुरोंमें रहता है। किस प्रकार रहता है ? [सो कहते हैं- किं तर्हि सर्वपुरवर्ती । कथम्- - हसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथि- दुरोणसत् । नृषद्वरसहतसद्वयोमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ वह गमन करनेवाला है, आकाशमें चलनेवाला सूर्य है, वसु है, अन्तरिक्षमें विचरनेवाला सर्वव्यापक वायु है, वेदी (पृथिवो ) में स्थित होता ( अग्नि ) है, कलशमें स्थित सोम है। इसी प्रकार वह मनुष्योंमें गमन करनेवाला, देवताओंमें जानेवाला, सत्य या यज्ञमें गमन करनेवाला, आकाशमें ज.नेवाला, जल, पृथिवी, यज्ञ और पतोंसे उत्पन्न होनेवाला तथा सत्यस्वरूप और महान् है ॥ २ ॥ - वल्ली २] যাকুখ . हंसो हन्ति गच्छतीति । यह गमन करता है इसलिये आत्मनः सर्व- शुविषच्छुचौ दिव्या- 'हंस' है, शुचि-आकाशमें सूर्य रूपसे चलता है इसलिये 'शुचिषद' पुरान्तर्वतित्वम् दित्यात्मना सीदति है। सबको व्यात करता है इसलिये वसुर्वासयति 'वसु' है, वायुरूपसे आकाशमें सर्वानिति । वाय्वात्मनान्तरिक्षे चलता है इसलिये 'अन्तरिक्षसत् है, "अग्निही होता है।' इस श्रुतिके सीदतीत्यन्नरिक्षस । होताग्निः अनुसार होता' अग्निको कहते हैं। "अग्नि होता" इति श्रुतेः। वेद्यां वेदी—पृथिवीमें गमन करता है अतः पृथिव्यां सीदतीति वेदिषद् । 'वेदिषद्' है जैसा कि यह वेदी पृथिवी (यज्ञभूमि) का उकृष्ट "इयं वेदिः परोऽन्तः पृथिव्याः" मध्यभाग है, इत्यादि मन्त्रवर्णसे (ऋ० सं० २।३ । २०)इत्यादि- प्रमाणित होता है । यह अतिथि- मन्त्रवर्णात् । अतिथिः सोमः सोम होकर दुरोण-कलशमें स्थित होता है इसलिये 'दुरोणसद सन्दुरोणे कलशे सीदति इति है । अथवा ब्राह्मण अतथिरूपसे दुरोणस । ब्राह्मणः अतिथिरूपेण दुरोण-घरोंमें रहता है इसलिये वा दुरोणेषु गृहेषु सीदतीति । वही 'अतिथिः दुरोणसत्' है। नृपन्नृषु मनुष्येषु सीदतीति वह मनुष्योंमें जाता है इसलिये 'तृषत्' है, वर-देवताआमें जता मृषत् । वरसद् वरेषु देवेषु है इसलिये 'वरसत्' है, ऋत- सीदतीति, ऋतसदृतं सत्यं यज्ञो सत्य अथवा यज्ञको कहते हैं, उसमें वा तस्सिन्सीदतीति । व्योमंसद् गमन करता है इसलिये 'ऋतसदा व्योम्न्याकाशे सीदतीति व्योम- | है, व्योम-आकाशमें चलता है इसलिये व्योमसत्' है । अप-जऊ- सत् । अञ्जा अप्सु शङ्खशुक्ति- में शंख, सीपी और मकर अदि मकरादिरूपेण जायत इति । रूपोंसे उत्पन्न होता है इसलिये १२८ कठोपनिषद् [ अध्यायं. गोंजा गवि पृथिव्यां व्रीहियवादि- 'अब्जा' है । गो-पृथिवीमें व्रीहि-यवादिरूपसे उत्पन्न होता है रूपेण जायत इति । ऋतजा इसलिये 'गोजा' है । ऋत--- यज्ञाङ्गरूपेण जायत इति । यज्ञाङ्गरूपसे उत्पन्न होता है इस- लिये 'ऋतजा' है । नदी आदि. अद्विजाः पर्वतेभ्यो नद्यादिरूपेण रूपसे अद्रि पर्वतोंसे उत्पन्न होता जायत इति । है इसलिये 'अदिजा' है। RULAR सर्वात्मापि सन्नृतमवितर्थ- इस प्रकार सर्वात्मा होकर भी वह ऋत-~अवितथस्वभाव ही है स्वभाव एव । बृहन्महान्सर्व-| तथा सबका कारण होनेसे बृहत्- महान् है । [असौ वा आदित्यो कारणत्वात् । यदाप्यादित्य एव हंसः ' इत्यादि ब्राह्मणमन्त्रके मन्त्रेणोच्यते तदाप्यस्यात्मस्व- अनुसार ] यदि इस मन्त्रसे आदित्य- का ही वर्णन किया गया हो तो रूपत्वमादित्यस्येत्यङ्गीकृतत्वाद भी आदित्य [ इस चराचरके ] आत्म- स्वरूप हैं,' ऐसा अङ्गीकृत होनेके बाह्मणव्याख्यानेऽप्यविरोधः । कारण इसका उस ब्राह्मणप्रन्थकी व्याख्यासे भी अविरोध ही है । सर्वव्याप्येक एवात्मा जगतो अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यही है कि जगत्का एक ही सर्वव्यापक आत्मा नात्मभेद इति मन्त्रार्थः ॥ २॥ है, आत्माओंमें भेद नहीं है ॥ २ ॥ आत्मनः स्वरूपाधिगमे लिङ्ग- आत्माका स्वरूपज्ञान मुच्यते- कराने में लिङ्ग बतलाते हैं--- १, सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋ० सं० १ । ८ । ७)।

घल्ली २] शाङ्करभाष्यार्थ आत्मनः प्राणापानयोः ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रयगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ जो प्राणको ऊपरकी ओर ले जाता है और अपानको नीवेकी ओर ढकेलता है, हृदयके मध्यमें रहनेवाले उस वामन-भजनीयकी सब देव उपासना करते हैं ॥ ३ ॥ ऊर्ध्व हृदयात्प्राणं प्राणवृत्ति जो हृदयदेशसे प्राण-प्राण- वृत्तिरूप वायुको ऊर्ध्व-ऊपरकी वायुमुन्नयत्यूचं गम- ओर ले जाता है तथा अपनको यति। तथापानं प्रत्य- प्रत्यक्-नीचेकी ओर ढवेलता अधिष्ठातृत्वम् गधोऽस्यति क्षिपति य है। इस वाक्यमें यः ( जो )' यह पद शेष रह गया है । हृदय- इति वाक्यशेषः । तं मध्ये हृदय- कमलाकाशके भीतर रहनेवाले उस पुण्डरीकाकाश आसीनं बुद्धावभि- वामन अर्थात् भजनीयकी, जिसका विज्ञानरूप प्रकाश बुद्धिमे अभिव्यक्त व्यक्तविज्ञानप्रकाशनं वामनं सं- होता है, चक्षु आदि सभी देव- मननीयं विश्वेसर्षे देवाश्चक्षुरादयः इन्द्रियाँ और प्राण रूप-रसादि विज्ञानरूप कर देते हुए इस प्राणा रूपादिविज्ञानं बलिमुपा- प्रकार उपासना करते हैं जैसे हरन्तो विश इव राजानमुपासते वेश्यलोग राजाकी अर्थात् वे चक्षु आदि उसके ही लिये अपना व्यापार तादर्थेनानुपरतव्यापारा भवन्ति बंद नहीं करते । अतः जिसके लिये इत्यर्थः । यदर्था यत्प्रयुक्ताश्च और जिसकी प्रेरणासे प्राण और इन्द्रियोंके समस्त व्यापार होते हैं वह सर्वे वायुकरणव्यापाराः सोऽन्यः उनसे अन्य है-ऐसा सिद्ध हुआ। सिद्ध इति वाक्यार्थः ॥३॥ यही इस वाक्यका अर्थ है ॥ ३ ॥ क० उ०९-

कठोपनिषद्
[अध्याय २
देहस्थ आत्मा ही जीवन है
किंच-
तथा-
-
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ ४॥
इस शरीरस्थ देहीके भ्रष्ट हो जानेपर-इस देहसे मुक हो
जानेपर भला इस शरीर में क्या रह जाता है ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं
रहता ] यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ ४ ॥
अस्य शरीरस्थस्यात्मनो वि इस शरीरस्थ देही-देहवान्
आत्माके विख्रसमान-अवलंसमान
स्रंसमानस्यावासमानस्य भ्रंश-
अर्थात् भ्रष्ट हो जानेपर इस
मानस्य देहिनोदेहवतः विप्रेसन-प्राणादि समुदायमेंसे भला क्या
शब्दार्थमाह-देहाद्विमुच्यमान-
रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी
नहीं रहता। 'देहाद्विमुच्यमानस्य'
स्येति किमत्र परिशिष्यते | ऐसा कहकर विस्रंसन शब्दका अर्थ
बतलाया गया है। नगरके खामीके
प्राणादिकलापे न किञ्चन परि-
चले जानेपर जैसे पुरवासियोंकी
शिष्यतेत्र देहे पुरस्वामिविद्रवण | दुर्दशा होती है उसी प्रकार इस
शरीरमें, जिस आत्माके चले जाने-
इव पुरवासिनां यस्यात्मनोऽपगमे
पर, एक क्षणमें ही यह भूत और
क्षणमात्रात्कार्यकरणकलापरूपं | इन्द्रियोंका समुदायरूप सब-का-सब
बलहीन-विध्वस्त अर्थात् नष्ट हो
सर्वमिदं हतबलं विध्वस्तं भवति
जाता है वह इससे भिन्न हो सिद
विनष्टं भवति सोऽन्यःसिद्धः॥४॥| होता है ॥ ४ ॥

वल्ली२] शाङ्करभाष्यार्थ स्यान्मतं प्राणापानाद्यपगमात् यदि कोई ऐसा माने कि यह शरीर, प्राण और अपान आदिके एवेदं विध्वस्तं भवति न तु चले जाने से ही नष्ट हो जाता है, तद्व्यतिरिक्तात्मापगमात्प्राणा- | उनसे भिन्न किसी आत्माके जानेसे नहीं; क्योंकि प्राणादिके कारण ही दिमिरेव हि मों जीवतीति मनुष्य जीवित रहता है--तो ऐसी नैतदस्ति- बात नहीं है, [ क्योंकि--] न प्राणेन नापानेन मर्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ कोई भी मनुष्य न तो प्राणसे जीवित रहता है और न अपानसे ही । बल्कि वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ॥५॥ न प्राणेन नापानेन चक्षु- कोई भी मर्त्य-मनुष्य अर्थात देहधारी न तो प्राणसे जीवित रादिना वा मर्यो मनुष्यो देह- रहता है और न अपान अथवा वान्कश्चन जीवति न कोऽपि चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ही; क्योंकि परस्पर मिलकर प्रवृत्त होनेवाले जीवति न येषां परार्थानां संहत्य- | तथा किसी दूसरेके शेषभूत ये इन्द्रिय आदि जीवनके हेतु नहीं कारित्वाजीवनहेतुत्वमुपपद्यते । हो सकते। लोकमें किसी. खतन्त्र स्वार्थेनासंहतेन परेण केनचिद-| और बिना मिले हुए अन्य [ चेतन पदार्थ ] की प्रेरणाके बिना गृह प्रयुक्तं संहतानामवस्थानं न दृष्टं आदि संहत पदार्थोंकी स्थिति नहीं देखी गयी; उसी तरह गृहादीनां लोके तथा प्राणादी- संघातरूप होनेसे प्राणादिकी स्थिति नामपि संहतत्वाद्भवितुमर्हति । भी स्वतन्त्र नहीं हो सकती।

१३२ कठोपनिषद् [अध्याय - अत इतरेणैव संहतप्राणादि अतः ये सब परस्पर मिलकर विलक्षणेन तु सर्वे संहताः सन्तो प्राणादि संहतपदार्थोंसे भिन्न किसी अन्यके द्वारा ही जीवित रहते-प्राण जीवन्ति प्राणान्धारयन्ति। धारण करते हैं, जिस संहतपदार्थ- यस्मिन्संहतविलक्षण आत्मनि भिन्न सत्वरूप परमात्माके रहते हुए सति परमिन्नेतौ प्राणापानौ ही यह प्राण-अपान चक्षु आदिसे संहत चक्षुरादिभिः संहतावुपाश्रितौ, होकर आश्रित हैं; तात्पर्य यह है कि यस्यासंहतस्यार्थे प्राणापानादिः जिस असंहत आत्माके लिये प्राण- स्वव्यापारं कुर्वन्वतते संहतः | अपान आदि संहत होकर अपने सन्स ततोऽन्यः सिद्ध इत्यभि- व्यापारोंको करते हुए बर्तते हैं वह प्रायः ॥५॥ आत्मा उनसे भिन्न सिद्ध होता है ।।५।। मरणोत्तरकालमें जीवकी गति हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६॥ हे गौतम ! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा, तथा । ब्रह्मको न जाननेसे ] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है | वह भी बतलाऊँगा ॥ ६॥ हन्तेदानीं पुनरपि ते तुभ्यम् अहो ! अब मैं तुम्हें फिर भी इस गुह्य--गोपनीय सनातन- इदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातन चिरन्तन ब्रह्मके विषयमें बतलाऊँगा, चिरन्तनं प्रवक्ष्यामि यद्विज्ञानात जिसके ज्ञानसे सम्पूर्ण संसारकी निवृत्ति हो जाती है तथा जिसका सर्वसंसारोपरमो भवति, अवि- ज्ञान न होनेपर मरणको प्राप्त ज्ञानाच यस्य मरणं प्राप्य होनेके अनन्तर. आत्मा जैसा हो वली २] शाङ्करभाष्यार्थ यथात्मा भवति यथा संसरति जाता है, अर्थात् वह जिस प्रकार जन्म-मरणरूप । संसारको प्राप्त तथा शृणु हे गौतम ॥६॥ होता है. हे गौतम ! वह सुन ॥६॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथा श्रुतम् ॥ ७ ॥ अपने कर्म और ज्ञान के अनुमार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर-भावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥ वृक्षादिस्थावरभावम् कर्म और योनि योनिद्वारं शुक्रबीज अन्य-कुछ अविद्यावान् मूद समन्विताः सन्तोऽन्ये केचिद् देहवारी शरीर धारण करनेके लिये वीर्यरूप बीजसे संयुक्त होकर अविद्यावन्तो मूढाः प्रपद्यन्ते शरीर- योनि-योनिद्वारको प्राप्त होते हैं त्वाय शरीरग्रहणार्थं देहिनो अर्थात् किसी योनिमें प्रविष्ट हो जाते देहवन्तः योनिं प्रविशन्तीत्यर्थः । हैं । दूसरे कोई अत्यन्त अधम पुरुष मरणको प्राप्त होकर यथा- स्थाj कर्म और यथाश्रुत स्थाणु यानी अन्येऽत्यन्ताधमा मरणं प्राप्यानु- वृक्षादि स्थावर-भावका अनुवर्तन- संयन्त्यनुगच्छन्ति । यथाकर्म अनुगमन करते हैं। तात्पर्य यह यद्यस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्यादृशं कि यथाकर्म यानी जिसका जो कर्म हे अथवा इस जन्ममें जिसने कर्मेह जन्मनि कृतं तद्वशेनेत्ये- जैसा कर्म किया है उसके अधीन तत् । तथा च यथाश्रुतं यादृशं होकर तथा यथाश्रुत यानी जिमने च विज्ञानमुपातिं तदनुरूपमेव जैसा विज्ञान उपार्जित किया है शरीरं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । । उसके अनुरूप शरीरको ही प्राप्त होते १३४ कठोपनिषद् [ अध्याय २ "यथाप्रज्ञं हि संभवाः" इति | हैं । "जन्म अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हुआ करते हैं। ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही प्रमाणित श्रुत्यन्तरात् ॥ ७॥ होता है ॥ ७ ॥ ब्रह्म यत्प्रतिज्ञातं गुह्यं पहले जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं तुझे गुह्य ब्रह्म बतलाऊँगा'-उसे वक्ष्यामीति तदाह- ही बतलाते हैं- गुह्य ब्रह्मोपदेश य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ प्राणादिके सो जानेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थोकी रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र ( शुद्ध ) है, वह ब्रह्म और वही अमृत कहा जाता है। उसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं; कोई भी उसका ठूल्लङ्घन नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥८॥ य एष सुप्तेषु प्राणादिषु जो, यह,प्राणादिके सो जानेपर जागता रहता है---[उनके साथ ] जागर्ति न स्वपिति । कथम् ? | सोता नहीं है । किस प्रकार कामं कामं तं तमभिप्रेतं है--] अविद्या के योगसे स्त्री आदि जागता रहता है ? [ इसपर कहते स्न्याद्यर्थमविद्यया इच्छित-अभीष्ट पदार्थोंकी रचना करता हुआ अर्थात निष्पादयञ्जागर्ति पुरुषो यस्तदेव | उन्हें निष्पन्न करता हुआ जागता है वही शुक्र-शुभ्र यानी शुद्ध है । शुक्रं शुभं शुद्धं तद्ब्रह्म नान्यद् गुह्यं । वह ब्रह्म है, उससे भिन्न और कोई निर्मिमाणो | अपने-अपने बली२] शाङ्करभाष्यार्थ १३५ ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाशि | गुह्य ब्रह्म नहीं है । वही सब शास्त्रोंमें अमृत-अविनाशी कहा उच्यते सर्वशास्त्रषु । किं च गया है। यही नहीं, उस ब्रह्ममें ही पृथिवी आदि सम्पूर्ण लोक पृथिव्यादयो लोकास्तमिन्नेव सर्वे आश्रित हैं; क्योंकि वह सभी लोकोंका कारण है। उसका कोई भी ब्रमण्याश्रिताः सर्वलोक्कारण- अतिक्रमण नहीं त्वाचस्य । तदु नात्येति कश्चन | [निश्चय यही वह ब्रह्म है ] इत्यादि [आगेकी व्याख्या ] पूर्ववत् समझनी इत्यादि पूर्वदेव ॥ ८॥ चाहिये ॥ ८॥ कर सकता अनेकतार्किककुबुद्धिविचालि- अनेक तार्किकोंकी कुबुद्धिद्वारा तान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नम् जिनका चित्त चञ्चल कर दिया गया है, अतः जिनकी बुद्धि सरल अप्यात्मैकत्वविज्ञानमसकृदुच्य- नहीं है उन ब्राह्मणोंके चित्त, मानमप्यनृजुबुद्धीनां ब्राह्मणानां प्रमाणसे युक्त सिद्ध होनेपर भी, आत्मैकत्व-विज्ञान बारम्बार कहे वेतसि नाधीयत इति तत्प्रति- जानेपर भी स्थिर नहीं होता। अतः पादन आदरपती पुनः पुनराह| उसके प्रतिपादनमें आदर रखनेवाली श्रुतिः श्रुति पुनः पुनः कहती है- आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ६ ॥ - कठोपनिषद् [ अध्याय जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवनमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि प्रत्येक रूप ( रूपवान् वस्तु ) के अनुरूप हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा उनके रूपके अनुरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है।॥ ९॥ अग्निर्यथैक एव प्रकाशात्मा जिस प्रकार एक ही अग्नि प्रकाशस्वरूप होकर भी भुवनमें- सन्भुवनं भवन्त्यसिन्भूतानीति | इसमें सब जीव होते हैं इसीसे इस लोकको भुवन कहते हैं, उसी इस भुवनमयं लोकस्तमिमं प्रविष्टः लोकमें अनुप्रविष्ट हुआ रूप-रूपके अनुप्रविष्टः रूपंरूपं प्रतिदादि- प्रति अर्थात् काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न प्रत्येकदाह्य पदार्थके प्रति प्रतिरूप- दाह्यभेदं प्रतीत्यर्थः प्रतिरूपः उस-उस पदार्थके अनुरूप हुआ तत्र तत्र प्रतिरूपवान्दाह्यभेदेन | दाह्य-भेदसे अनेक प्रकारका हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक बहुविधो बभूवः एक एव तथा ही अन्तरात्मा-आन्तरिक आत्मा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वेषां भूतानाम् अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण काष्ठादिमें प्रविष्ट हुए अग्निके समान अभ्यन्तर आत्मातिसूक्ष्मत्वाद् सम्पूर्ण शरीरों में प्रविष्ट रहनके दादिष्विव सर्वदेहं प्रति प्रविष्ट-! कारण उनके अनुरूप हो गया है तथा आकाशके समान अपने त्वात्प्रतिरूपो बभूव बहिश्च स्वेन अविकारी रूपसे उसके बाहर अविकृतेन स्वरूपेणाकाशवत् ॥९॥ भी है ॥ ९ ॥ तथान्यो दृष्टान्त:- ऐसा ही एक दूसरा दृष्टान्त भी है-

वली २]
शाङ्करभाष्यार्थ
वायुयथैको भुरनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥
जिस प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूपके अनुरूप
हो रहा है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके
अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है ॥ १० ॥
वायुर्यथैक इत्यादि । प्राणा जिस प्रकार एक ही वायु
प्राणरूपसे देहोंमें अनुप्रविष्ट होकर
त्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूप प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है
उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही
रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यादि | अन्तरा मा प्रत्येक रूपके अनुरूप
हो रहा है ] इत्यादि पूर्ववत् ही
समानम् ॥१०॥
समझना चाहिये ॥ १०॥
एकस्य सर्वात्मत्वे संसारदुः इस प्रकार एकहीकी सर्वात्मकता
खित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत भी परमात्माका ही सिद्ध होता
होनेपर ससारदुःखसे युक्त होना
इदमुच्यते-
है; इसलिये ऐसा कहा जाता है-
आत्माकी असङ्गता
सूर्यो यथा मर्वलाकस्य चक्षु-
न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोक दु.खेन बाह्यः ॥ ११ ॥

कठोपनिषद् [अध्याय २. जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका नेत्र होकर भी सूर्य नेत्रसम्बन्धी बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा संसारके दुःखसे लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है ॥ ११ ॥ सूर्यो यथा चक्षुष आलोकेन जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाशसे लोकका उपकार करता हुआ अर्थात उपकारं कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचि- मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंको प्रकाशनेन तद्दर्शिनः सर्वलोकस्य प्रकाशित करनेके कारण उन्हें देखनेवाले समस्त लोकोंका नेत्ररूप चक्षुरपि सन्न लिप्यते चाक्षुषैर- होकर भी अपवित्र पदार्थादिके शुच्यादिदर्शननिमित्तैराध्यात्मि- | देखनेसे प्राप्त हुए आध्यात्मिक को पापदोष तथा अपवित्र पदार्थोंके पापदोषैर्बाह्येश्चाशुच्यादि- संसर्गसे होनेवाले बाह्यदोषोंसे संसर्गदोषः । एकः संस्तथा | लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा भी लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता, लोकदुःखेन बाह्यः । प्रत्युत उससे बाहर रहता ] लोको ह्यविद्यया स्वात्मनि लोक अपने आत्मामें आरोपित अविधाके कारण ही कामना और अध्यस्तया कामकर्मोद्भवं दुःखम् | कर्मजनित दुःखका अनुभव करता अनुभवति । न तु सा परमार्थतः है किन्तु वह [ अविद्या ] परमार्थतः स्वात्मामें है नहीं, जिस प्रकार कि. स्वात्मनि । यथा रज्जुशुक्तिको- | रज्जु, शुक्ति, मरुस्थल और आकाश- में प्रतीत होनेवाले ] सर्प, रजत, परगगनेषु सर्परजतोदकमलानि जल और मलिनता-ये उन रज्जु न रज्ज्वादीनां खतो दोषरूपाणि | आदिमें खाभाविक दोषरूप नहीं हैं

घल्ली २]
शाङ्करभाष्यार्थ
सन्ति । संसर्गिणि विपरीतबुद्धय- | बल्कि उनके संसर्गमें आये हुए
पुरुषमें विपरीत बुद्धिका अध्यास
ध्यासनिमित्तात्तदोषवद्विभा होनेके कारण ही वे उन-उन
दोषोंसे युक्त प्रतीत होते हैं। किन्तु
व्यन्ते । न तद्दोषैस्तेषां लेपः । उन दोषोंसे उनका लेप नहीं होता;
क्योंकि वे तो उस विपरीत बुद्धि-
विपरीतबुद्धयध्यासबाह्या हि ते । जनित अध्याससे बाहर ही हैं ।
तथात्मनि सर्वो लोकः क्रिया इसी प्रकार सम्पूर्ण लोक भी
कारकफलात्मकं विज्ञानं सादि- [ रज्जु आदिमें अध्यस्त ] सर्पादिके
समान अपने आत्मामें क्रिया, कारक
स्थानीयं विपरीतमध्यस्य तनिमित्तं और फलरूप विपरीत ज्ञानका
आरोप कर उसके निमित्तसे होने-
जन्ममरणादिदुःखमनुभवति । न | वाले जन्म-मरण आदि दुःखका
त्वात्मा सर्वलोकात्मापि सन् | अनुभव करता है । आत्मा तो
सम्पूर्ण लोकका अन्तरात्मा होकर
विपरीताध्यारोपनिमित्तेन लिप्यते | भी विपरीत अध्यारोपसे होनेवाले
लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता ।।
लोकदुःखेन । कुतः ? बाह्यः, क्यों नहीं होता ? क्योंकि
रज्ज्वादिवदेव विपरीतबुद्धय-
वह उससे बाहर है-अर्थात् रज्जु
आदिके समान वह विपरीत बुद्धि-
ध्यासबाह्यो हि स इति ॥११॥ जनित अध्याससे बाहर ही है ॥११॥
तथा-
.
आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है
किंच-
एको वशी
सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥

कठोपनिषद् [अध्याय २ जो एक. सबको अपने अधीन रखनेवाला और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा अपने एक रूपको ही अनेक प्रकारका कर लेता है, अपनी बुद्धिमें स्थित 'उस आत्मदेवको जो धीर ( विवेकी ) पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्य सुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥ १२ ॥ स हि परमेश्वरः सर्वगतः वह खतन्त्र और सर्वगत परमेश्वर एक है । उसके समान स्वतन्त्र एको न तत्समोऽभ्य- अथवा उससे बड़ा और कोई नहीं धिको बान्योऽस्ति । वशी सर्व है । वह वशी है; क्योकि सारा जगत् उसके अधीन है। उसके ह्यस्य जगद्वशे वर्तते । कुतः ? | अधीन क्यों है ? [ इसपर कहते हैं- ] क्योंकि वह सम्पूर्ण भूतों- सर्वभूतान्तरात्मा । यत एकमेव का अन्तरात्मा है । इस प्रकार सदैकरसमात्मानं विशुद्धविज्ञान- जो अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण अपने एक-नित्य एकरस रूपं नामरूपाद्यशुद्धोपाधिभेद- विशुद्धविज्ञानखरूप आत्माको नाम रूप आदि अशुद्ध उपाधिभेदके वशेन बहुधानेकप्रकारं यः करोति कारण अपनी सत्तामात्रसे बहुधा- स्वात्मसत्तामात्रेणाचिन्त्यशक्ति- अनेक प्रकारका कर लेता है, उस आत्मस्थ अर्थात् अपने शरीरस्थ त्वात् । तमात्मस्थं स्वशरीर- | हृदय, काश यानी बुद्धिमें चैतन्य- वरूपसे अभिव्यक्त हुर [ आत्माको हृदयाकाशे बुद्धौ चैतन्याकारेण जो लोग देखते हैं उन्हींको नित्य अभिव्यक्तमित्येतत् । सुख प्राप्त होता है। न हि शरीरस्याधारत्वमात्मनः आकाशके समान अमूर्तिमान् होनेसे आत्माका आधार शरीर नहीं आकाशवदमूर्तत्वात आदर्शस्थं है [ अर्थात् आत्मा निराधार है । ] वल्ली २] शाङ्करभाष्यार्थ मुखमिति यद्वत् । तमेतम् | जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुखका आधार दर्पण नहीं है। जिनकी ईश्वरमात्मानं ये निवृत्तवाह्य- बाह्य वृत्तियाँ निवृत्त हो गयी है वृत्तयोऽनुपश्यन्ति आचार्या- ऐसे आचार्या- ऐसे जो धीर-विवेकी पुरुष उस ईश्वर-आत्माको देखते हैं- गमोपदेशमनु साक्षादनुभवन्ति आचार्य और शास्त्रका उपदेश पानेके अनन्तर उसका साक्षात् अनुभव घीरा विवेकिनस्तेषां परमेश्वर- करते हैं उन परमात्मस्वरूपताको भूतानां शाश्वतं नित्यं सुखम् प्राप्त हुए पुरुषोंको ही आत्मानन्द- शाश्वत-निर सुख प्राप्त आत्मानन्दलक्षणं भवतिनेतरेपां होता है । किन्तु दूसरे जो बाह्य पदार्थों में आसक्तचित्त अविवेकी बाह्यासक्तबुद्धीनामविवेकिनां स्वा- पुरुष हैं उन्हें यह सुख स्वात्मभूत होनेपर भी अविद्यारूप व्यवधानके स्मभूतमप्यविद्याव्यवधानात्।१२।। कारण प्राप्त नहीं हो सकता ॥१२॥ रूप किंच- इसके सिवा--- नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३ ।। जो अनित्य पदार्थों में नित्यखरूप तथा ब्रह्मा आदि चेतनोंमें चेतन है और जो अकेला ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्माको जो विवेकी पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्यशान्ति प्राप्त होती है; औरोंको नहीं || १३ ।।

कठोपनिषद्
[ अध्याय २
नित्योऽविनाश्यनित्यानां जो अनित्यों-नाशवानोंमें
है, चेतन
विनाशिनाम् । चेतनश्चेतनानां नित्य--अविनाशी
अर्थात् ब्रह्मा आदि अन्य चेतयिता
चैतयितॄणां ब्रह्मादीनां प्राणिनाम् प्राणियोंका भी चेतन है । जिस
अग्निनिमित्तमिव दाहकत्वम् प्रकार जल आदि दाहशक्तिशून्य
अनग्नीनामुदकादीनामात्मचैतन्य- पदार्थोंका दाहकत्व अग्निके निमित्त-
से होता है वैसे ही अन्य प्राणियोंका
निमित्तमेव चेतयितृत्वमन्येषाम् । चेतनत्व आत्मचैतन्यके निमित्तसे
किं च स सर्वज्ञः सर्वेश्वरः | ही है । इसके सिवा वह सर्वज्ञ
कामिनां संसारिणां कर्मानुरूपं तथा सर्वेश्वर भी है; क्योंकि वह
अकेला ही बिना किसी प्रयासके
कामान्कर्मफलानि
खानुग्रह- | अनेक सकाम संसारी पुरुषोंके
निमित्तांश्च कामान्य एको बहूनाम् | कर्मानुरूप भोग यानी कर्मफल तथा
अपने
अनेकेषामनायासेन विदधाति
अनुग्रहरूप निमित्तसे हुए भोग
विवान करता अर्थात् देता है । जो
प्रयच्छतीत्येतत् । तमात्मस्थं ये | धीर (बुद्धिमान्) पुरुष अपने आत्मा-
अनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः | में स्थित उस आत्मदेवको देखते हैं
उपरतिः शाश्वती नित्या स्वात्म-
उन्हींको शाश्वती--नित्य यानी
खात्मभूता शान्ति---उपरति प्राप्त
भूतैव स्यान्नेतरेषामनेवंविधानाम् होती है—अन्य जो ऐसे नहीं हैं
॥ १३॥
उन्हें नहीं होती ॥१३॥
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥१४॥
उसी इस [आत्मविज्ञान ] को ही विवेकी पुरुष अनिर्वाच्य परम सुख
मानते हैं। उसे मैं कैसे जान सकूँगा । क्या वह प्रकाशित ( हमारी बुद्धिका
विषय ) होता है, अथवा नहीं ॥१४॥

चल्ली २]
शाङ्करभाष्यार्थ
यत्तदात्मविज्ञानं सुखम् अ-
यह जो आत्मविज्ञानरूप सुख
निर्देश्यं निर्देष्टुमशक्यं परमं प्रकृष्टं है वह अनिर्देश्य --कथन करनेके
अयोग्य, परम अर्थात् प्रकृष्ट और
प्राकृतपुरुषवाङ्मनसयोरगोचरम्
साधारण पुरुषोंके वाणी और मनका
अपि सन्निवृत्तैषणा ये ब्राह्मणास्ते
अविषय भी है तो भी जो सब प्रकार-
यत्तदेतत्प्रत्यक्षमेवेति मन्यन्ते ।
की एषणाओंसे रहित ब्राह्मणलोग
कथं नु केन प्रकारेण तत् हैं वे उसे प्रत्यक्ष ही मानते हैं । उस
सुखमहं विजानीयाम् । इदम् आत्मसुखको मैं कैसे जान सकूँगा !
इत्यात्मबुद्धिविषयमापादयेयं यथा अर्थात् निष्काम यतियोंके समान
निवृत्तषणा यतयः
। किमु वह यही है। इस प्रकार उसे कैसे
तद्भाति दीप्यते प्रकाशात्मकं
अपनी बुद्धिका विषय बनाऊँगा !
वह प्रकाशस्वरूप है, सो क्या वह
तद्यतोऽस्मबुद्धिगोचरत्वेन वि-
भासता है--हमारी बुद्धिका विषय
भाति विस्पष्टं दृश्यते किं वा होकर स्पष्ट दिखलायी देता है,
नेति ॥ १४॥
या नहीं? ॥१४॥
अत्रोत्तरमिदं भाति
च
इसका उत्तर यही है कि वह
भासता है और
और विशेषरूपसे
भासता है । किस प्रकार ?
[ सो कहते हैं--]
विभाति चेति । कथम् ?
सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व
न तत्र सूर्यो. भाति न चन्द्रतारक
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्व
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१५॥

कठोपनिषद् [ अध्याय २ वहाँ ( उस आत्मलोकमें) सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारे भी नहीं चमकते और न यह विद्युत् ही चमचमाती है; फिर इस अग्निवी तो बात ही क्या है ? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है और उसके प्रकाशसे ही यह सब कुछ भासता है॥ १५ ॥ न तत्र तसिन्वात्मभूते वहाँ--उस अने आत्मस्वरूप ब्रह्ममें सबको प्रकाशित करनेवाला ब्रह्मणि सर्वादभासकोऽपि सूर्यो होकर भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता भाति तब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। अर्थात् वह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । इसी प्रकार ये तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो चन्द्रमा, तारे और विद्युत् भी भान्ति कुतोऽयमस्मदृष्टिगोचरः | प्रकाशित नहीं होते । फिर हमारी दृष्टिके विषयभूत इस अग्निका तो अग्निः । किंबहुना यदिदमादिकं कहना ही क्या है ? अधिक क्या सर्व भाति तर.मेव परमेश्वरं | कहा जाय ? यह सूर्य आदि जो कुछ प्रकाशित हो रहे हैं वे सब भान्तं दीप्यमानमनुभान्यनु- उस परमात्माके प्रकाशित होते हुए ही अनुभासत हो रहे हैं, जिस दीप्यते । यथा जलोल्मुकाद्यग्नि- प्रकार जल और उल्नुक ( जलते संयोगादग्नि दहन्तमनुदहति न | हुए कष्ठ ) आदि अग्निके संयोगसे अग्निके प्रज्वलित होते हुए ही स्वतस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या | दहन करते हैं, स्वयं नहीं, उसी सर्वमिदं सूर्यादि विभाति । प्रकार उसके प्रकाश--तेजसे ही ये सूर्य आदि सब प्रकाशित होरहे हैं। यत एवं तदेव ब्रह्म भाति क्योंकि ऐसा है इसलिये वही ब्रह्म प्रकाशित होता है और विशेष- च विभाति च । कार्यगतेन रूपसे प्रकाशित होता है। कार्यगतः बल्ली२] शाङ्करभाष्यार्थ विविधन भासा तस्य ब्रह्मणो | नाना प्रकारके प्रकाशसे उस ब्रह्म- मारूपत्वं खतोऽवगम्यते । न हि की प्रकाशखरूपता खतः सिद्ध है; क्योंकि जिसमें वितः प्रकाश खतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य नहीं है वह दूसरेको भी प्रकाशित कर्तुं शक्यम् । घटादीनाम् नहीं कर सकता, जैसा कि घटादि- 'अन्यावमासकत्वादर्शनाद्भासन- का दूसरोंको प्रकाशित करना नहीं देखा गया और प्रकाशवरूप पाणां चादित्यादीनां तद्- आदित्यादिका दूसरोंको प्रकाशित दुर्शनात ॥ १५॥ करना देखा गया है ॥ १५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाप्ये द्वितीयाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥२॥ (५) क० उ०१०- कृतीया कल्ली संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष तूलावधारणेनैव मूलावधारणं लोकमें जिस प्रकार तूल (कार्य) का निश्चय कर लेनेसे ही वृक्षके वृक्षस्य क्रियते लोके यथा, एवं मूलका निश्चय किया जाता है संसारकार्यवृक्षावधारणेन तन्मूल- | उसी प्रकार संसाररूप कार्यवृक्षके निश्चयसे उसके मूल ब्रह्मका स्वरूप- ब्रह्मणः स्वरूपावदिधार- निर्धारण करनेकी इच्छासे यह छठी यिषयेयं षष्ठी वल्लयारभ्यते वल्ली आरम्भ की जाती है- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्र तब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १॥ जिसका मूल ऊपरकी ओर तथा शा वाएँ नोचेको ओर हैं रेसा यह अश्वत्थ वृक्ष सनातन ( अनादि ) है । वहा विशुद्र ज्योतिःवरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है । सम्पूर्ण लोक उसीमें आश्रित हैं। कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता । यही निश्चय वह [ ब्रह्म ] है ॥ १ ॥ ऊर्ध्वमूल ऊवं मूलं यत् ऊर्ध्व ( ऊपरकी ओर ) अर्याद जो वह भगवान् विष्णुका परम तद्विष्णोः परमं पदमस्येति सो- पद है वही जिसका मूल है ऐसा यह ऽयमव्यक्तादिस्थावरान्तः संसार- अव्यक्तसे स्थावरपर्यन्त संसारवृक्ष 'ऊर्ध्वमूल' है। इसका व्रश्चन-छेदन वृक्ष ऊर्ध्वमूलः । वृक्षश्च व्रश्चनात् ।। होनेके कारण यह वृक्ष कहलाता है। १. 'तूल' कपासको कहते हैं। वह कपासके पौधेका कार्य है। अतः यहाँ 'तूल' शब्दसे सम्पूर्ण कार्यवर्ग उपलक्षित होता है ।

वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ जन्मजरामरणशोकाबनेकाना- जो जन्म, जरा, मरण और शोक आदि अनेक अनर्थोंसे भरा हुआ, त्मकः प्रतिक्षणमन्यथास्वभावो क्षण-क्षणमें अनुर्वथा भावको प्राप्त होनेवाला, माया मृगतृष्णाके जल मायामीच्युदकगन्धर्वनगरादि- और गन्धर्वनगरादिके समान दृष्ट- बद्दष्टनष्टस्वरूपत्वादवसाने च | नष्टस्वरूप होनेसे अन्तमे वृक्षके समान अभावरूप हो जानेवाला, वृक्षवदभावात्मकः कदलीस्तम्भ- केलेके ग्वम्भेके समान निःमार और वनिःसारोऽनेकशतपारखण्डबुद्धि- सैकड़ों पाखण्डियोंकी बुद्धि के वि- कल्पोंका आश्रय है, तत्त्वजिज्ञासुओं- विकल्पास्पदम्तत्त्वविजिज्ञासुभिः द्वारा जिसका तत्व इदम्' रूपसे निर्धारित नहीं किया गया, वेदान्त- अनिर्धारितेदंतची वेदान्तनिर्धा- निर्णीत परब्रह्म ही जिसका मूल और सार है, जो अविद्या काम रितपरब्रह्ममूलसारोऽविद्याकाम- कर्म और अव्यक्तरूप बीजसे उत्पन्न काव्यक्तवीजप्रभवोऽपरब्रह्मवि- होनेवाला है, ज्ञान और क्रिया ये दोनों जिसकी स्वरूपभूत शक्तयाँ हैं, ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयात्मकहिरण्य-वह अपरब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ ही गाङ्कुरः सर्वप्राणिलिङ्गभेद- जिसका अङ्कुर है, सम्पूर्ण प्राणियों- के लिङ्ग शरीर ही जिसके स्कन्ध स्कन्धस्तृष्णाजलावसेकोद्भूत-हैं, जो तृष्णारूप जलके. सेचनसे बढ़े हुए तेजवाला बुद्धि, इन्द्रिय और दर्पो बुद्धीन्द्रियविषयप्रवालाङ्कुरः विषयरूप नूतन पल्लवोंके अङ्कुरों- वाला, श्रुति, स्मृति, न्याय और श्रुतिस्मृतिन्यायविद्योपदेश- ज्ञानोपदेशरूप पत्तोंवाला, यज्ञ, दान, पलाशो यज्ञदानतपआयनेकक्रिया- तप आदि अनेक क्रियाकलापरूप सुन्दर फूलोंवाला, सुख, दुःख और सुपुष्पः सुखदुःखवेदनानेकरसः । वेदनारूप अनेक प्रकारके रसोंसे , १४८ कठोपनिषद् [ अध्याय २ दिभूतपक्षिकृतनीडः प्राणिसुख- [ कर्म-वासनादिरूप प्राण्युपजीव्यानन्तफलस्तत्तृष्णास- | युक्त प्राणियोंकी आजीविकारूप अनन्त फलोंवाला तथा फलोंके लिलावसेकारूदजडीकृतदृढबद्ध- | तृष्णारूप जलके सेचनसे बढ़े हुए और [ सात्त्विक आदि भावोंसे ] सत्यनामादिसप्तलोकब्रह्मा- मिश्रित एवं दृढतापूर्वक स्थिर हुए [ अवान्तर] मूलोंवाला है; ब्रह्मा आदि पक्षियोंने दुःखोद्भूतहर्षशोकजातनृत्यगीत- जिसपर सत्यादि नामोंवाले सात लोकरूप घोंसले बना रक्खे हैं, वादित्रक्ष्वेलितास्फोटितहसिता- | जो प्राणियोंके सुख-दुःखजनित हर्ष-शोकसे उत्पन्न हुए नृत्य, गान, क्रुष्टरुदितहाहामुञ्चमुश्चेत्याधनेक- वाद्य, क्रीडा, आस्फोटन, ( खम ठोकना ) हंसी, आक्रन्दन, रोदन शब्दकृततुमुलीभूतमहारबो वेदा- तथा हाय-हाय, छोड़-छोड़ इत्यादि अनेक प्रकारके शब्दोंकी तुमुलध्वनि- न्तविहितब्रह्मात्मदर्शनासङ्गशस्त्र- से अत्यन्त गुञ्जायमान हो रहा है तथा वेदान्तविहित ब्रह्मात्मैक्य- कृतोच्छेद एष संसारवृक्षो- दर्शनरूप असङ्गशस्त्रसे जिसका ऽश्वत्थोऽश्वत्थवत्कामकर्मवातेरित- | उच्छेद होता है ऐसा यह संसाररूप वृक्ष अश्वत्थ है, अर्थात् अश्वत्थ नित्यप्रचलितस्वभावः, स्वर्ग- | वृक्षके समान और कर्मरूप वायुसे प्रेरित हुआ नित्य नरकतिर्यक्प्रेतादिभिः शाखाभिः | चञ्चल स्वभाववाला है। स्वर्ग, नरक, तिर्यक् और प्रेतादि शाखाओंके अवाक्शाखः, सनातनोऽनादि- | कारण यह नीचेकी ओर फैली शाखाओंयाला है तथा सनातन स्वाच्चिरं प्रवृत्तः। यानी अनादि होनेके कारण चिर- कालसे चला आ रहा कामना यदस्य संसारवृक्षस्य मूलं इस संसारका जो मूल है वही तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं ज्योतिष्मत् शुक्र-शुभ्र-शुद्ध-ज्योतिर्मय -ज्योतिर्मय अर्थात् वल्ली३] शाङ्करभाष्यर्थ स्वभाववाला चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावं तदेव | चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप है। वही ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् । तदेवामृतम् सबसे महान् होने के कारण ब्रह्म है वही सत्यखरूप होने के कारण अमृत अविनाशस्वभावमुच्यते कथ्यते अर्थात् अविनाशी सत्यत्वात् । वाचारम्भणं विकारो कहा जाता है। विकार वाणीका नामधेयमनृतम् अन्यदतो विलास और केवल नाममात्र है अतः उस ब्रह्मसे अन्य सब मिथ्या मर्त्यम् । तस्मिन्परमार्थसत्ये और नाशवान् है। उस परमार्थ- ब्रह्मणि लोका गन्धर्वनगर- सत्य ब्रह्ममें उत्पत्ति, स्थिति और मरीच्युदकमायासमाः परमार्थ- लयके समय सम्पूर्ण लोक गन्धर्व- नगर. मरीचिका-जल और मायाके दर्शनाभावावगमनाः श्रिता समान आश्रित हैं, ये परमार्थदर्शन आश्रिताः सर्वे समस्ता उत्पत्ति- हो जानेपर बाधित हो जानेवाले हैं। स्थितिलयेषु । तदु तद्ब्रह्म जिस प्रकार घट आदि कोई भी कार्य मृत्तिका आदिका अतिक्रमणा, नात्येति नातिवर्तते मृदादिमिव नहीं कर सकते उस प्रकार कोई भी विकार उस ब्रह्मका अतिक्रमण घटादिकार्य कश्चन कश्चिदपि नहीं कर सकता। निश्चय यही वह विकारः। एतद्वै तत् ॥ १॥ [ ब्रह्म ] है ॥ १॥ यद्विज्ञानादमृता भवन्तीत्यु शङ्का-जिसके ज्ञानसे अमर हो जाते हैं। ऐसा जिसके विषयमें च्यते जगतो मूलं तदेवं नास्ति | कहा जाता है वह जगत्का मूलभूत ब्रह्म तो वस्तुतः है ही नहीं; यह सब ब्रह्मासत एवेदं निःसृतमिति । तो असत्से ही प्रादुर्भूत हुआ है। तन्न- समाधान-ऐसी बात नहीं है [ क्योंकि---] कठोपनिषद् [अध्याय २ ईश्वरके ज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति यदिदं किं च जगत्सर्व प्राण एजति निःसृतम् । महद्यं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ यह जो कुछ सारा जगत् है प्राण-ब्रह्ममें, उदित होकर उसीसे, चेष्टा कर रहा है। वह ब्रह्म महान् भयरूप और उठे हुए वज्रके समान है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥ यदिदं किं च यत्किं चेदं यह जो कुछ है अर्थात् यह जो कुछ जगत् है वह सब प्राण यानी जगत्सर्व प्राणे परस्मिन्ब्रह्मणि परब्रह्मके होनेपर ही उसासे प्रादु- सत्येजति कम्पते तत एव निःसृतं भूत होकर एजन—कम्पन-गमन अर्थात् नियमसे चेष्टा कर रहा है। निर्गतं सत्प्रचलति नियमेन इस प्रकार जो ब्रह्म जगत्की उत्पत्ति आदिका कारण है. वह महान् चेष्टते। यदेवं जगदुत्पत्यादि- भयरूप है । यह महान् भयरूप हे अर्थात् इससे सब भय मानते है, कारण ब्रह्म तन्महद्भयम् । महच्च इस लये यह महद्भय' है। तथा तद्भयं च विभेत्यस्मादिति मह- उठाये वज्रके समान है। कहना द्भयमः वज्रमुद्यतमुद्यतमिव यह है कि जिस प्रकार अपने सामने उठाये देखकर सेवक लोग नियमानुसार खामिनमभिमुखीभूतं दृष्ट्वा भृन्या उसकी आज्ञामें प्रवृत्त होते रहते हैं नियमेन तच्छासने वर्तन्ते तथेदं उसी प्रकार चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारा आदिरूप यह सारा जगद चन्द्रादित्यग्रहनक्षत्रतारकादि- अपने अधिष्ठाताओंके सहित एक लक्षणं जगत्सेश्वरं नियमेन क्षणम् क्षणको भी विश्राम न लेकर नियमा- अप्यविश्रान्तं वर्तत इत्युक्तं नुसार उसकी आज्ञामें बर्तता है । वज्रम् । यथा वज्रोद्यतकरं | स्वामीको हाथमें वज्र

धली ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
भवति । य एतद्विदुः स्वात्म- अपने अन्तःकरणकी प्रवृत्तिके
साक्षीभूत इस एक ब्रह्मको जो लोग
प्रवृत्तिसाक्षिभूतमेकं ब्रह्मामृता
जानते हैं वे अमर--अमरणधर्मा
अमरणधर्माणस्ते भवन्ति ॥ २॥ हो जाते हैं ॥ २ ॥
कथं तद्भयाजगद्वर्तत इत्याह-
A
उसके भयसे जगत् किस प्रकार
व्यापार कर रहा है ? सो कहते हैं-
-
सर्वशासक प्रभु
सूर्यः ।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥
इस ( परमेश्वर ) के भयसे अग्नि तपता है, इसीके भवसे सूर्य तपता
है तथा इसीके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ।। ३ ।।
भयादीत्या परमेश्वरस्याग्निः। इस परमेश्वरके भयसे अग्नि
तपति भयात्तपति सूर्यो भयात्
तपता है, इसीके भयसे सूर्य तप
रहा है तथा इसीके भयसे इन्द्र,
वायुश्च मृत्युर्धावति वायु और पाँचवों मृत्यु दौड़ता
है । यदि सामर्थ्यवान् और ईशन-
पञ्चमः । न हीश्वराणां लोक-
शील लोकपालोंका, हाथमें, वज्र
पालानां समर्थानां सतां नियन्ता उठाये रखनेवाले [इन्द्र ] के समान
कोई नियन्ता न होता तो खामीके
चेदज्रोद्यतकरवन्न स्यात्स्वामि-
भयसे प्रवृत्त होनेवाले सेवकोंके
भयभीतानामिव त्यानां नियता
समान उनकी नियमित प्रवृत्ति नहीं
प्रवृचिरुपपद्यते ॥३॥
हो सकती थी॥३॥

कठोपनिषद्
[अध्याय
१५२
ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति
और उस ( भयके कारण-
खरूप ब्रह्म) को-
तच-
-
इह चेदशकद्बोद्धु प्राक्शरीरस्य विस्रसः ।
ततः सर्गेपु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
यदि इस देहमें इसके पतनसे पूर्व ही ब्रह्मको [ जान सका तो
बन्धनसे मुक्त हो जाता है और यदि ] नहीं जान पाया तो इन जन्म-
मरणशील लोकोमे वह शरीर-भावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ४॥
इह जीवन्नेव चेद्यद्यशफत् यदि इस देहमे अर्थात् जीवित
शक्नोति शक्तः सञ्जानात्येतद्भय- रहते हुए ही शरीरका पतन होनेसे
कारणं ब्रह्म बोधुमवगन्तुं
पूर्व साधक पुरुषने इन सूर्यादिके
भयके हेतुभूत ब्रह्मको जान लिया
'पापपूर्व शरीरस्य विस्रसोऽव- तो वह संसारबन्धनसे मुक्त हो
स्रंसनात्पतनात्संमारवन्धनाद्वि-
जाता है। और यदि उसे न जान
मुच्यते । न चेदशकद्धोधुं ततः | सका तो उमका ज्ञान न होनेके
अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु कारण वह सोंने जिनमे स्रष्टब्ध
स्रष्टव्याः प्राणिन इति सर्गाः प्राणियोकी रचना की जाती है। उन
पृथिव्याइयो लोकास्तेषु सर्गेषु पृथिवी अदि लोक में शरीरत्व-
लोकेषु शरीरत्वाय शरीरभावाय शरोरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ
कल्पते समर्थों भवति शरीरं होता है अर्थात् शरीर ग्रहण कर
गृह्णातीत्यर्थः । तसाच्छरीर- | लेता है । अतः शरीरपातसे पूर्व
वित्रंसनात्प्रागात्मबोधाय यत्न | ही आत्मज्ञान के लिये यत्न करना
आस्थेयः॥४॥
चाहिये ॥ ४॥

वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ यसादिहैवात्मनो दर्शनम् | क्योंकि जिस प्रकार दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है आदर्शस्थस्येव मुखस्य स्पष्टमुप- | उसी प्रकार इस ( मनुष्यदेह ) में ही आत्माका स्पष्ट दर्शन होना पद्यते न लोकान्तरेषु ब्रह्मलोकाद् सम्भव है, वैसा दर्शन ब्रह्मलोकको छोड़कर और किसी लोकमें नहीं अन्यत्र, स च दुष्प्रापः, कथम् १ | होता और उसका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है। सो किस प्रकार ! इत्युच्यते-- इसपर कहते हैं--- स्थानभेदसे भगवदर्शनमें तारतम्य यथादर्श तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५॥ जिस प्रकार दर्पणमें उसी प्रकार निर्मल बुद्धिमें आत्माका [ स्पष्ट दर्शन होता है तथा जैसा खप्नमें वैसा ही पितृलोकमें और जैसा जलमें वैसा ही गन्धर्वलोकमें उसका [ अस्पष्ट ] भान होता है; किन्तु ब्रह्मलोकमें तो छाया और प्रकाशके समान वह [ सर्वथा स्पष्ट ] अनुभूत होता है ॥५॥ यथादर्श प्रतिबिम्बभूतम् | जिस प्रकार लोक दर्पणमें आत्मानं पश्यति लोकोऽत्यन्त- / प्रतिबिम्बित हुर अपने-आपको विविक्तं तहात्मनि स्वबुद्धौ अत्यन्त स्पष्टतया देखता है उसी आदर्शवन्निर्मलीभूतायां विक्क्तिम् प्रकार दर्पणके समान निर्मल हुई अपनी बुद्धिमें आत्माका स्पष्ट दर्शन आत्मनो दर्शनं भवतीत्यर्थः। होता है-ऐसा इसका अभिप्राय है यथास्वमेऽविविक्तं जाग्रद्वास- जिस प्रकार खप्नमें जामद्वास- नाओंसे प्रकट दुआ दर्शन अस्पष्ट नोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तम् ' होता है उसी प्रकार पितृलोकमें

१५४
कठोपनिषद्
[अध्याय २
एव दर्शनमात्मनः कर्मफलोप-1 मी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है;
क्योंकि वहाँ जीव कर्मफलके उप-
भोगासक्तत्वात् । यथा चाप्सु | भोगमें आसक्त रहता है । तथा
जिस प्रकार जलमें अपना खरूप
अविभक्ताक्यक्मात्मरूपं परीव | ऐसा दिखलायी देता है, मानो उसके
अवयव विभक्त न हों उसी प्रकार
ददृशे परिदृश्यत इव तथा गन्धर्व-गन्धलोकमें भी अस्पष्टरूपसे ही
लोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मनः।
आत्मा का दर्शन होता है। अन्य
लोकोंमें भी शास्त्रप्रमाणसे ऐसा ही
एवं च लोकान्तरेष्वपि शास्त्र- [अर्थात् अस्पष्ट आत्मदर्शन हो ?
माना जाता है
प्रामाण्यादवगम्यते। छायातपयोः
लोकमें ही छाया और प्रकाशके
इवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एव समान वह आत्मदर्शन अत्यन्त
स्पष्टतया होता है । किन्तु अत्यन्त
एकस्मिन् । स च दुष्प्रापोऽत्यन्त- विशिष्ट कर्म और ज्ञानसे साध्य
होनेके कारण वह ब्रह्मलोक तो
विशिष्टकर्मज्ञानसाध्यत्वात् ।
बड़ा दुष्प्राप्य है। अतः अभिप्राय
तस्मादात्मदर्शनायेहैव यह है कि इस मनुष्यलोकमें ही
आत्मदर्शनके लिये प्रयत्न करना
कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥५॥
चाहिये ॥५॥
। एकमात्र ब्रह्म-
यत्नः
Rob-
कृथमसौ बोद्धव्यः किं वा उस आत्माको किस प्रकार
जानना चाहिये और उसके जानने-
में क्या प्रयोजन है ? इसपर
तदवबोधे प्रयोजनमित्युच्यते- कहते हैं-
आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥

वल्ली३] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ कारण पृथक्-पृथक् भूतोसे उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियोंके जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्पत्ति और प्रलय है उन्हें जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ६॥ इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां स्वस्व- अपने-अपने, विषयको ग्रहण प्रयोजनके विषयग्रहणप्रयोजनेन स्वकारणे- करनारूप अपने कारणरूप आकाशादि भूतों- भ्य आकाशादिभ्यः पृथग से पृथक्-पृथक् उत्पन्न होनेवाली उत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात् श्रोत्रादि इन्द्रियोंका जो अत्यन्त केवल विशुद्धस्वरूप चिन्मात्र केवलाञ्चिन्मात्रात्मस्वरूपात्पृथग- आत्मस्वरूपसे पृथक्त्व अर्थात् भावं स्वभावविलक्षणात्मकतांतथा खाभाविक विलक्षणरूपता है उसे तेषामेवेन्द्रियाणामुदयास्तमयो तथा जाग्रत् और स्वप्नकी अपेक्षासे इन्द्रियोंके उदयास्तमय- चोत्पत्तिप्रलयौ जाग्रत्वापावस्था- उत्पत्ति और प्रलयको जानकर पेक्षया नात्मन इति सत्वा ज्ञात्वा अर्थात् विवेकपूर्वक यह समझकर कि ये इन्द्रियोंकी ही अवस्थाएँ हैं, विवेकतो धीरो धीमान्न शोचति । आत्माकी नहीं, धीर-बुद्धिमान् आत्मना नित्यकस्वभावस्य पुरुष शोक नहीं करता; क्योंकि सर्वदा एक स्वभावमें रहनेवाले अव्यभिचाराच्छोककारणत्वानुप- आत्माका कभी व्यभिचार न होनेके पत्तेः । तथा च श्रुत्यन्तरम्'तरति कारण शोकका कोई कारण नहीं ठहरता। जैसा कि "आत्मज्ञानी शोकमात्मवित्" (छा० उ०७। शोकको पार कर जाता है। ऐसी १ । ३) इति ॥ ६॥ एक श्रुति भी है ॥ ६॥ उन यसादात्मन इन्द्रियाणां जिस आत्मासे इन्द्रियोंका पृथक्त्व दिखलाया गया है वह कहीं पृथग्भाव उक्तो नासो बहिरधि- | बाहर है-ऐसा नहीं समझना १५६ कठोपनिषद् [अध्याय २ गन्तव्यो यस्मात्प्रत्यगात्मा स चाहिये, क्योंकि वह सभीका अन्तरात्मा है। सो किस प्रकार ? सर्वस्य । तत्कथमित्युच्यते- इसपर कहते हैं- इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ इन्द्रियोंसे मन पर ( उस्कृष्ट ) है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे महत्तत्त्व बढ़कर है तथा महत्तत्त्वसे अव्यक्त उत्तम है ॥ ७ ॥ इन्द्रियेभ्यः परं मन इत्यादि। इन्द्रियोंसे मन पर है [ तथा मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है ] इत्यादि । अर्थानामिहेन्द्रियसमानजातीय- इन्द्रियोंके सजातीय होनेसे इन्द्रियों- त्वादिन्द्रियग्रहणेनैव ग्रहणम् का ग्रहण करनेसे ही विषयोंका भी ग्रहण हो जाता है। अन्य सब पूर्वदन्यत् । सचशब्दाबुद्धि- | पूर्ववत् ( कठं० १ । ३ । १० के समान ) समझना चाहिये। सत्त्व' रिहोच्यते ॥७॥ शब्दसे यहाँ बुद्धि कही गयी है ॥७॥ ] अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ अव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक तथा अलिङ्ग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ अव्यक्तातु परः पुरुषो अव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है। वह आकाशादि सम्पूर्ण व्यापक व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादेः पदार्थों का भी कारण होनेसे व्यापक सर्वस्य कारणत्वात् । अलिङ्गो है। और अटिङ्ग है जिसके द्वारा

वल्ली ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
लिङ्ग्यते गम्यते येन तल्लिङ्गं | कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि
आदि लिङ्ग कहलाते हैं। परन्तु
बुद्धयादि तदविद्यमानमस्येति
पुरुषमें इनका अभाव है इसलिये
सोऽयमलिङ्ग एव । सर्वसंसार- | यह अलिङ्ग अर्थात् सम्पूर्ण संसार-
धर्मवर्जित इत्येतत् । यं ज्ञात्वा और शास्त्रद्वारा जानकर पुरुष
धर्मोंसे रहित है। जिसे आचार्य
आचार्यतःशास्त्रतश्च मुच्यते जन्तुः जीवित रहते हुए ही अविद्या आदि
अविद्यादिहृदयग्रन्थिमिर्जीवन्नेव
हृदयकी प्रन्थियोंसे मुक्त हो जाता
है तथा शरीरका पतन होनेपर भी
पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च | अमरत्वको प्राप्त होता है वह पुरुष
गच्छति सोऽलिङ्गः परोऽव्यक्तात् | अलिङ्ग है, और अव्यक्तसे भी पर
है-इस प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे
पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्धः॥८॥ ही सम्बन्ध है ॥ ८ ॥
कथं तलिङ्गस्य दर्शनम्
तो फिर जिसका कोई लिङ्ग
( ज्ञापक चिह्न ) नहीं है उस
उपपद्यत इत्युच्यते-
आत्माका दर्शन होना किस प्रकार
सम्भव है ? सो कहा जाता है-
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६ ॥
इस आत्माका रूप दृष्टिमें नहीं ठहरता । इसे नेत्रसे कोई भी नहीं
देख सकता । यह आत्मा तो मनका नियमन करनेवाली हृदयस्थिता
बुद्धिद्वारा मननरूप सम्यग्दर्शनसे प्रकाशित [ हुआ ही जाना जा सकता ]
है। जो इसे [ ब्रह्मरूपसे ] जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥९॥

कठोपनिषद् [अध्याय २ ३ न संदृशे संदर्शनविषये न इम प्रत्यगात्माका रूप संदर्शन- दृष्टिक विषयमें स्थिर नहीं होता। अतः तिष्ठति प्रत्यगात्मनोऽस्य रूपम् । कोई भी पुरुष इस प्रकृत आत्माको अतो न चक्षुषा सर्वेन्द्रियेण, चक्षुमे—सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे । अर्थात् समस्त इन्द्रियोंमेंसे किसीसे ] भी चक्षुर्ग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वात् . नहीं देख सकता अर्थात् उपलब्ध पश्यति नोपलभते कश्चन कश्चिद् नहीं कर सकता । यहाँ चक्षुका ग्रहण सम्पूर्ण इन्द्रियोंका उपलक्षण अप्येनं प्रकृतमात्मानम् । कराने के लिये है। कथं तर्हि तं पश्येदित्युच्यते।। तो फिर उसे किस प्रकार देखें ? हृदा हृत्स्थया बुद्धया । मनीषा इसपर कहते हैं-हृदयस्थिता बुद्धि- मे, जो कि सङ्कल्पादिरूप मनकी मनसः सङ्कल्पादिरूपस्येष्टे नियन्त्री होकर ईशन करनेके नियन्तृत्वेनेति मनीट तया हृदा कारण मनीट' है उस त्रिक पशून्या ? मनीषाविकल्पयित्र्या मनसा बुद्धिसे मन अर्थात् मननरूप यथार्थ मननरूपेण सम्यग्दर्शनेन दर्शनद्वारा सब प्रकार समर्थित अभिक्लप्तोऽभिसमर्थितोऽभिप्र- अर्थात् प्रकाशित हुआ वह आत्मा जाना जा सकता है। यहाँ 'आत्मा काशित इत्येतत् । आत्मा ज्ञातुं जाना जा सकता है। यह वाक्यशेष शक्यत इति वाक्यशेषः । तम् है। उस आत्माको जो लोग 'यह आत्मानं ब्रह्मतो विदुरमृतास्ते ब्रह्म है। ऐसा जानते हैं वे अमर भवन्ति ॥९॥ हो जाते हैं ॥ ९ ॥ सा हृन्मनीट् कथं प्राप्यत वह हृदयस्थित [ सङ्कल्पशून्य ] बुद्धि किस प्रकार प्राप्त होती है ? यह बतलानेके लिये योगसाधनका उपदेश किया जाता है- इति तदर्थो योग उच्यते- --

वल्ली ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
परमपदप्राप्ति
यदा पञ्चावतिष्ठन्ने ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विवेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १
जिस समय पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके सहित आत्मामें 7 स्थित हो
जाती हैं और बुद्धि भी चेटा नहीं करती उस अवस्थाको परमगति
कहते हैं ॥१०॥
यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो जिस समय अपने-अपने विषयों-
नि:तितान्यात्मन्येव
से निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ-
पश्च
ज्ञानार्थक होनेके कारण श्रोत्रादि
ज्ञानानि-ज्ञानार्थत्वाच्छोत्रादीनि
इन्द्रियाँ ज्ञान' कही जाती हैं-
इन्द्रियाणिज्ञानान्युच्यन्ते-अप मनके साथ अर्थात् वे जिसका
तिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि | अनुवर्तन करनेवाली हैं उस
मङ्कत्यादि व्यापारसे निवृत्त हुए
तेन संकल्पादिव्यावृतेनान्तः-
अन्तःकरणके सहित [आत्मामें ]
करणेन; बद्धिश्चाध्यवसाय- स्थिर हो जाती हैं और निश्चया-
लक्षणा न विचेष्टति स्वव्यापारेषु त्मिका बुद्धि भी अपने व्यापारोंमें
चेयशील नहीं होती-चेया नहीं
न विचेटते न व्याप्रियते
करती-व्यापार नहीं करती उस अत्र-
तामाहुः परमां गतिम् ॥१०॥ स्थाको ही परमगति कहते हैं॥१०॥
---
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरानिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
उस स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं। उस समय
पुरुष प्रमादरहित हो जाता है; क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाश-
रूप है ॥ ११ ॥

१६० कठोपनिषद् [अध्याय २ तामीदृशीं तदवस्थां योगम् उस ऐसी अवस्थाको ही जो वास्तवमें वियोग ही है-योग इति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम् । मानते हैं; क्योंकि योगीकी यह सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा अवस्था सब प्रकारके अनर्थसंयोग- हीयमवस्था योगिनः । एतस्यां की वियोगरूपा है । इस अवस्थामें ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोप- ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जि- से रहित स्वरूपमें स्थित रहता है। तखरूपप्रतिष्ठ आत्मा । स्थिराम् | [ उस अवस्थाको ही ] स्थिर इन्द्रिय- इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् धारणा कहते हैं-स्थिर अर्थात अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां और आन्तरिक करणोंका धारण धारणमित्यर्थः। करना। अप्रमत्तः प्रमादवर्जितः समा तब उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त-प्रमादरहित हो जाता धान प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा है अर्थात् चित्तसमाधानके प्रति तसिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो | सर्वदा सयन रहता है। जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते । [ उस समय ऐसी स्थिति होती न हि बुद्धयादिचेष्टाभावे प्रमाद- है ]-ऐसा इस वाक्यके सामर्थ्य- संभवोऽस्ति तस्मात्प्रागेव से जाना जाता है; क्योंकि बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव हो जानेपर बुद्धयादिचेष्टोपरमादप्रमादो प्रमाद होना सम्भव नहीं है। अतः बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव होने- विधीयते । अथवा यदैवेन्द्रियाणां से पूर्व ही अप्रमादका विधान किया स्थिरा जाता है । अथवा जिसी समय धारणा तदानीमेव इन्द्रियोंकी धारणा स्थिर होती है निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः अमि- । उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तस्व होता वल्ली ३] আহ্বার্থ १६१ धीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति ।, है; इसीलिये उस समय अप्रमत्त हो जाता है। ऐसा कहा है। ऐसी कुतः ? योगो हि यस्मात् बात क्यों है ? क्योकि योग ही प्रभव प्रमवाप्ययौ उपजनापायधर्मक और अप्यय यानी उत्पत्ति और लयरूप धर्मवाला है। अतः तात्पर्य इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः यह है कि अपाय ( लय ) की निवृत्तिके लिये प्रमादका अभाव कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥ करना चाहिये ॥ ११ ॥ बुद्धयादिचेष्टाविषयं चेद्ब्रह्मदं यदि ब्रह्म बुद्धि आदिकी चेष्टाका विषय होता तो यह वह तदिति विशेषतो गृहत बुद्धया- ब्रह्म] है, इस प्रकार विशेषरूपसे गृहीत किया जा सकता था; किन्तु झुपरमे च ग्रहणकारणामावात् बुद्धि आदिके निवृत्त हो जानेपर तो उसे गृहीत करनेके कारणका अनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म । अभाव हो जानेसे उपलब्ध न यद्धि करणगांचरं करणगांचरं तदस्तीति तदस्तीति होनेवाला वह ब्रह्म वस्तुतः है ही नहीं। लोकमें जो वस्तु इन्द्रिय- प्रसिद्धं लोके विपरीतं चासद् गोचर होती है वही 'है' इस प्रकार प्रसिद्ध होती है और इसके विपरीत इत्यतश्चानर्थको योगः अनुप- [इन्द्रियगोचर न होनेवाली ] वस्तु 'असत्' कही जाती है, अत. योग लभ्यमानत्वाद्वा नास्तीत्युपलब्ध- व्यर्थ है । अथवा उपलब्ध होनेवाला न होनसे ब्रह्म नहीं है। इस प्रकार- ध्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते- जानना चाहिये-ऐसा होनेपर यह कहा जाता है- सत्यम्, ठीक है- प्राप्त क० उ०११- कठोपनिषद् [अध्याय २ आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति बुबतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥१२॥ वह आत्मा न तो वाणीसे, न मनसे और न नेत्रसे ही प्राप्त किया जा सकता है; वह 'है' ऐसा कहनेवालोंसे अन्यत्र ( भिन्न पुरुषोंको ) किस प्रकार उपलब्ध हो सकता है ? ॥ १२ ॥ नैव वाचा न मनसा न चक्षुषा तात्पर्य यह कि वह ब्रह्म न तो वाणीसे, न मनसे, न नेत्रसे और न नान्यैरपीन्द्रियैः प्राप्तुं शक्यत | अन्य इन्द्रियोंसे ही प्राप्त किया जा इत्यर्थः । तथापि सर्वविशेष- | सकता है । तथापि सर्वविशेषरहित होनेपर भी वह जगत्का मूल है। रहितोऽपि जगतो मूलम् | इस प्रकार ज्ञात होने के कारण वह है ही, क्योंकि • कार्यका विलय इत्यवगतत्वादस्त्येव कार्य- किसी अस्तित्वके आश्रयसे ही हो प्रविलापनस्य अस्तित्वनिष्ठत्वात् । सकता है। इसी प्रकार सूक्ष्मताकी तारतम्यपरम्परासे अनुगत होनेवाला तथा हीदं कार्य सूक्ष्मतार- | यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग भी सद्बुद्धि- निष्ठाको ही सूचित करता है तम्यपारम्पर्येणानुगम्यमानं सद्- जिस समय विषयका विलय करते बुद्धिनिष्ठामेवावगमयति । यदापि हुर बुद्धिका विलय किया जाता है विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्य-| उस समय भी वह सद्वृत्तिगर्भिता हुई ही लीन होती है। तथा सद माना बुद्धिस्तदापि सा सत्प्रत्यय- और असत्का यथार्थ गर्भंव विलीयते । बुद्धिर्हि नः जानने में तो हमारे लिये बुद्धि ही प्रमाणं सदसतोर्याथात्म्यावगमे । प्रमाण है । स्वरूप वल्ली३] शाङ्करमाध्यार्थ १६३ मूलं चेजगतो न स्यादसद- यदि जगत्का कोई मूल न होता तो यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग असन्मय न्वितमेवेदं कार्यमसदित्येवं गृह्येत ही होनेके कारण 'असत् है। इस न त्वेतदस्ति सत्सदित्येव तु प्रकार गृहीत होता । किन्तु ऐसी बात नहीं है। यह जगत् तो गृह्यते; यथा मृदादिकार्य घटादि है-है। इस प्रकार ही गृहीत होता है, जिस प्रकार कि मृत्तिका मृदायन्वितम् । तमाजगतो आदिके कार्य घट आदि [ अपने मलमात्मास्तीत्येवोपलब्धव्यम् । कारण ] मृत्तिका आदिसे समन्वित ही गृहीत होते हैं । अतः जगत्का कस्मात् ? अस्तीति ब्रुवतोऽस्तित्व- | मूल आत्मा है। इस प्रकार ही वादिन उपलब्ध किया जाना चाहिये । क्यों: आगमार्थानुसारिणः क्योंकि आत्मा है। इस प्रकार कहने- श्रद्दधानादन्यत्र नास्तिकवादिनि वाले शास्त्रार्थानुसारी आस्तिक पुरुषोंसे भिन्न नास्तिक. नास्ति जगतो मूलमात्मा निर- वादियोंको, जो ऐसा मानते हैं कि न्वयमेवेदं कार्यमभागान्तं प्रवि- | 'जगत् का मूल आत्मा नहीं है, जिसका अभाव ही अन्तिम परिणाम लीयति इति मन्यमाने विपरीत- है ऐसा यह कार्यवर्ग कारणसे अनन्वित हुआ ही लीन हो जाता है।- दर्शिनि कथं तद्ब्रह्म तत्वत | ऐसे उन विपरीतदर्शियोंको वह ब्रह्म उपलभ्यते न कपचनोपलम्या | किस प्रकार तत्त्वतः उपलब्ध हो सकता है ? अर्थात् किसी प्रकार इत्यर्थः ॥ १२॥ उपलब्ध नहीं हो सकता॥१२॥ श्रद्धालु तस्मादपोह्यासद्वादिपक्षम् । अतः असद्वादियोंके आसुरी पक्षका निराकरण कर- आसुरम्- १६४ कठोपनिषद् [अध्याय २ अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥ वह आत्मा है। इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये तथा उसे तत्वभावसे भी जानना चाहिये । इन दोनों प्रकारकी उपलब्धियोंमेंसे जिसे है। इस प्रकारकी उपलब्धि हो गयी है तत्त्वभाव उसके अभिमुख हो जाता है ॥ १३ ॥ अस्तीत्येवात्मोपलब्धव्यः । बुद्धि आदि जिसकी उपाधि हैं तथा जिसका सत्त्व उसके कार्य- सत्कार्यों बुद्धयाधुपाधिः । यदा | वर्गमें अनुगत है उस आत्माको है। तु तद्रहितोऽविक्रिय आत्मा कार्य | इस प्रकार ही उपलब्ध करना चाहिये । जिस समय आत्मा उस च कारणव्यतिरेकेण नास्ति । बुद्धि आदि उपाधिसे रहित और निर्विकार जाना जाता है तथा "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कार्यवर्ग "विकार वाणीका विलास और नाममात्र है, केवल मृत्तिका ही मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छा० उ० सत्य है'' इस श्रुतिके अनुसार अपने ६।१।४) इति श्रुतेस्तदा यस्य | कारणसे भिन्न नहीं है-ऐसा निश्चित होता है उस समय जिस निरुपाधिक निरुपाधिकस्यालिङ्गस्य सदसदा- | अलिङ्ग और सत्-असत् आदि प्रतीतिके विषयत्वसे रहित आत्मा- दिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मनः का तत्त्वभाव होता है उस तत्त्व- तत्त्वभावो भवति तेन च रूपेण खरूपसे ही आत्माको उपलब्ध करना चाहिये- इस प्रकार यहाँ आत्मोपलब्धव्य इत्यनुवर्तते । 'उपलब्धव्य' पदकी अनुवृत्ति की तत्राप्युभयोः सोपाधिकनिरु सोपाधिक अस्तित्व और निरु- पाधिकयोरस्तित्वतत्त्वभावयोः पाधिक तत्त्वभाव इन दोनोमेंसे- जाती है।

बल्ली३] शाङ्करभाष्यार्थ निर्धारणार्था षष्ठी—पूर्वमस्तीत्ये- | यहाँ 'उभयोः' इस पदमें षष्ठी वोपलब्धस्यात्मनः सत्कार्योपाधि- | निर्धारणके लिये है-पहले तो है। इस प्रकार उपलब्ध हुए आत्माका कृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य अर्थात् सत्कार्यरूप उपाधिके किये इत्यर्थः पश्चात्प्रत्यस्तमित हुए अस्तित्व-प्रत्ययसे उपलब्ध हुए सर्वोपाधिरूप आत्मनस्तत्वभावो आत्माका और फिर जिसकी सम्पूर्ण उपाधि निवृत्त हो गयी है और जो ज्ञात विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वयस्व- एवं अज्ञातसे भिन्न अद्वितीयखरूप भावः "नेति नेति" (वृ० उ०२। है, उस "नेति-नेति'' "अस्थूल- ३। ६,३।९। २६) इति मनण्वहत्वम्।" "अदृश्येऽनाम्ये- "अस्थूलमनण्वहस्वम्" (बृ० | ऽनिरुक्तेऽनिलयने” इत्यादि श्रुति- उ०३।८।८) "अदृश्येऽनात्म्ये- योंसे निर्दिष्ट आत्माका तत्वभाव 'प्रसीदति'-अभिमुख होता है ऽनिरुक्तऽनिलयने" (तै० उ०२ । अर्थात् जिसे पहले 'है' इस प्रकार ७।१) इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टः आत्माकी उपलब्धि हो गयी है उसे प्रसीदत्यभिमुखीभवति आत्म- | अपना स्वरूप प्रकट करनेके लिये प्रकाशनाय पूर्वमस्तीत्युपलब्ध- [ वह तत्वभाव अभिमुख प्रकाशित बत इत्येतत् ॥ १३॥ होता है ] ॥ १३ ॥ - - अमर कब होता है ? एवं परमार्थदर्शिनोः । इस प्रकार परमार्थदर्शीकी- यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मयोऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥ १. 'यह (स्थूल) नहीं है, यह ( सूक्ष्म ) नहीं है।' २. 'अस्थूल, असूक्ष्म, अह्रस्व ।' ३. 'अदृश्य ( इन्द्रियोंके अविषय )में, अनात्म्य ( अहंता-ममताहीन) मे, अनिर्वचनीयमें, अनिलयन (आधाररहित) में ।'

कठोपनिषद् [अध्याय २ कामत्यागेन जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो कि इसके हृदयमें आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं उस समय वह मर्त्य ( मरणधर्मा ) अमर हो जाता है और इस शरीरसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥ यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः जब-जिस समय सम्पूर्ण काम- कामयितव्यस्यान्यस्या- | नाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थका भावात्प्रमुच्यन्ते विशी- | अभाव होनेके कारण छूट जाती अमृतत्वम् यन्ते येऽस्य प्राक्प्रति- | हैं-छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होनेसे पूर्व इस विद्वान्के बोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता हृदय-बुद्धिमें आश्रित रहती हैं- आश्रिताः बुद्धिर्हि | क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि कामानामाश्रयो नात्मा। "कामना, संकल्प [और संशय-ये "कामःसंकल्प" (वृ० उ०१। सब मन ही हैं ]" इत्यादि एक ५। ३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च । दूसरी श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधात् तब फिर जो आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्म- आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्या- ज्ञान होनेके अनन्तर अविद्या, कामना कामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्वि- और कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे अमर हो जाता है। नाशादमृतो भवति । गमनप्र- परलोकमें गमन करानेवाले मृत्युका योजकस्य मृत्योविनाशाद्मनानु- विनाश हो जानेसे वहाँ जाना सम्भव न होनेके कारण वह इस पपत्तेरत्रेहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्व- लोकमें ही दीपनिर्वाणके समान बन्धनोपशमाद् ब्रह्म समश्नुते सम्पूर्ण बन्धनोंके नष्ट हो जानेसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है, अर्थात ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ ब्रह्म ही हो जाता है ॥१४॥ - वल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६७ - समय यह-जीवित ग्रन्थिमेद दृढ़ बन्धनरूप कदा पुनः कामानां मूलतो परन्तु कामनाओंका समूल नाश कब होता है ? इसपर विनाश इत्युच्यते कहते हैं- यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मोऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥१५॥ जिस समय इस जीवनमे ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणवर्मा अमर हो जाता है। बस. सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥ यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदम् जिस उपयान्ति विनश्यन्ति रहते हुए ही इसके हृदयकी- बुद्धिकी सम्पूर्ण प्रन्थियाँ अर्थात् हृदयस्य बुद्धरिह जीवत अविद्याजनित एव ग्रन्थयो ग्रन्थिवद् प्रतीतियाँ छिन्न-भिन्न होती-भेद- दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया को प्राप्त होती अर्थात् नष्ट - हो ' जाती हैं- मै यह शरीर हूँ, यह इत्यर्थः । अहमिदं शरीरं मेरा धन है, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी ममेदं धनं सुखी दुःखी चाहम् | हूँ' इत्यादि प्रकारके अनुभव अविद्या-प्रत्यय हैं; उसके विपरीत इत्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मा- ब्रह्मात्मभावके अनुभवकी उत्पत्तिसे त्मप्रत्ययोपजननाद् ब्रह्मवाहमस्मि | 'मैं असंसारी ब्रह्म ही हूँ. ऐसे बोधद्वारा अविद्यारूप ग्रन्थियोंके असंसारीति विनष्टेष्वविद्या- नष्ट हो जानेपर उसके निमित्तसे ग्रन्थिषु तन्निमित्ताः कामा मूलतो हुई कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती विनश्यन्ति । अथ मोऽमृतो हैं, तब वह मर्त्य ( मरणधर्मा जीव) अमर हो जाता है। बस, इतना भवत्येतावद्धयेतावदेवतावन्मानं ही सम्पूर्ण वेदान्तोका अनुशासन- नाधिकमस्तीत्याशङ्का कर्तव्या। आदेश है; इससे अधिक कुछ और एखामृतत्वम् १६८ कठोपनिषद् [ अध्याय २ अनुशासनमनुशिष्टिरुपदेशः सर्व- । है ऐसी आशङ्का नहीं करनी चाहिये । यहाँ 'सर्ववेदान्तानाम्। वेदान्नानामिति वाक्यशेषः।१५। । यह वाक्यशेष है ॥ १५॥ [ निरस्तापविशेषव्यापि जिसमें सम्पूर्ण विशेषणोंका अभाव है उस सर्वव्यापक ब्रह्मको ब्रह्मात्मप्रतिपल्या अभिन्नसमता ही अपने आत्मवरूपसे जान लेनेके कारण जिसकी अविद्या विद्यादिग्रन्थेर्जीवत एव ब्रह्मभूतस्य | आदि समस्त ग्रन्थियाँ टूट गयी हैं और जो जीवितावस्थामें ही ब्रह्म विदुषो न गतिविद्यत इत्युक्तमत्र भावको प्राप्त हो गया है उस विद्वान्- का कहीं गमन नहीं होता-ऐसा ब्रह्म समश्नुत इत्युक्तत्वात् । “न | पहले कहा गया, क्योकि [ चौदहवे मन्त्रमें ] 'इस शरीरमें ही ब्रह्मभावको तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव प्राप्त हो जाता है...ऐसा कहा है। "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, सन्ब्रह्माप्येति" (वृ० उ० ४। वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्ममें लीन हो जाता है" इस एक दूसरी ४।६) इति श्रुत्यन्तराच्च । श्रुतिसे भी यही निश्चय होता है। ये पुनर्मन्दब्रह्मविदो विद्या किन्तु जो मन्द ब्रह्मज्ञानी और अन्य विद्या (उपासना) का न्तरशीलिनश्च ब्रह्मलोकभाजो ये परिशीलन करनेवाले ब्रह्मलोक प्राप्तिके अधिकारी हैं अथवा जो च तद्विपरीताः संसारभाजः उनसे विपरीत [जन्म-मरणरूप] संसारको ही प्राप्त होनेवाले हैं, उन्हींकी किसी गतिविशेषका वर्णन तेषामेव गतिविशेष उच्यते यहाँ प्रकरणप्राप्त ब्रह्मविद्याके उत्कृष्ट फलकी स्तुति के लिये किया प्रकृतोत्कृष्टब्रह्मविद्याफलस्तुतये ।। जाता है।

बल्ली ३ शाङ्करभाष्यार्थ -- किं चान्यदग्निविद्या पृष्टा इसके सिवा नचिकेताके पूछने- पर यमराजने पहले अग्निविद्याका प्रयुक्ता च । तस्याश्च फलप्राप्ति- भी वर्णन किया था, उस अग्नि- विद्याके फलकी प्राप्तिका प्रकार भी प्रकारो वक्तव्य इति मन्त्रारम्भः। बतलाना है ही। इसी अभिप्रायसे इस मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। वहाँ [कहना यह है कि- शतं चैका च हृदयस्य नाड्य- स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ इस हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई है । उसके द्वारा ऊर्ध्व-ऊपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है । शेष विभिन्न गतियुक्त नाडियाँ उत्क्रमण ( प्राणोत्सर्ग) की हेतु होती हैं ॥१६॥ शतं च शतसंख्याका एका पुरुषके हृदयसे सौ अन्य और च सुषुम्ना नाम पुरुष- सुषुम्ना नामकी एक-इस प्रकार सुषुन्नामेदेन स्य हृदयाद्विनिःसृता [एक सौ एक ] नाडियाँ-शिराएँ नाड्यः शिरास्तासां निकली हैं। उनमें सुषुम्नानाम्नी मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता नाडी मस्तकका भेदन करके बाहर निर्गता सुषुम्ना नाम । तयान्त- निकल गयी है । अन्तकालमें उसके काले हृदय आत्मानं वशीकृत्य | द्वारा आत्माको अपने हृदयदेशमें योजयेत् । वशीभूत करके समाहित करे। तया नाडयोर्ध्वमुपर्यायन् उस नाडीके द्वारा ऊर्ध्व-ऊपर- की ओर जाने वाला जीव सूर्यमार्गसे गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरण- अमृतत्व-आपेक्षिक -आपेक्षिक अमरणधर्मत्व- अमृतत्वम्

कठोपनिषद्
[अध्याय २
धर्मत्वमापेक्षिकम् । “आभूतसं-| को प्राप्त हो जाता है, जैसा कि
पुर्व स्थानममृतत्वं हि भाष्यते" “सम्पूर्ण भूतोंके क्षयपर्यन्त रहने-
वाला स्थान अमृतत्व कहलाता है।"
( वि० पु०.२ । ८ । ९७ ) | इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है।
इति स्मृतेः । ब्रह्मणा वा सह अथवा [ यह भी तात्पर्य हो सकता
कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति
है कि ] कालान्तरमें ब्रह्माके साथ
| ब्रह्मलोकके अनुपम भोगोंको भोगकर
भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोक-
मुख्य अमृतत्वको प्राप्त करता है।
गतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः | इसके सिवा जिनकी गति विविध
अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं भाँतिकी हैं ऐसी अन्य सब नाड़ियाँ
प्राणप्रयाणकी हेतु होती हैं, अर्थात्
भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव वे संसारप्राप्तिके लिये ही होती
भवन्तीत्यर्थः॥१६॥
हैं ॥ १६ ॥
इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहा-
रार्थमाह-
अब सम्पूर्ण वल्लियोंके अर्थका.
उपसंहार करनेके लिये कहते हैं-
-
उपसंहार
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥१७॥
अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवोंके हृदयदेशमें
स्थित है । पूँजसे सींकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर
निकाले [अर्थात् शरीरसे पृथक् करके अनुभव करे ] । उसे शुक्र
(शुद्ध) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे ॥१७॥

वल्ली३]]
মাম্যাথ
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरा-
अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जिसकी
व्याख्या पहले (क० उ०२।१।
त्मा सदा जनानां सम्बन्धिनि
१२-१३ में ) की जा चुकी है और
जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका
हृदये संनिविष्टो यथाव्याख्यातः
अन्तरात्मा है उसे अपने शरीरसे
तं वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेत् | बाहर करे-ऊपर नियन्त्रित करे-
निकाले अर्थात् शरीरसे पृथक् करे ।
उद्यच्छेनिष्कर्षे पृथक्कुर्यादित्यर्थः। किस प्रकार पृथक् करे? इसपर कहते
हैं-धैर्य अर्थात् अप्रमादपूर्वक इस
किमिवेत्युच्यते मुञ्जादिव
प्रकार अलग करे जैसे पूँजसे उसके
इषीकामन्तःस्थां धैर्येणाप्रमादेन । भीतर रहनेवाली सींक की जाती
है । शरीरसे पृथक् किये हुए उस
तं शरीरान्निष्कृष्टं चिन्मात्रं विद्या- ( अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ) को ही पूर्वोक
चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म
द्विजानीयाच्छुक्रममृतं यथोक्तं
जाने । यहाँ 'तं विद्याच्छुक्रममृतम्।
ब्रह्मेति । द्विवचनमुपनिषत्परि- | इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति"
शब्द उपनिषद्की समाप्तिके लिये
समाप्त्यर्थमितिशब्दश्च ॥ १७॥ हैं ॥ १७ ॥
विद्यास्तुत्यर्थोऽयमाख्यायि अब विद्याकी स्तुतिके लिये
यह आख्यायिकाके अर्थका उपसंहार
कार्थोपसंहारोऽधुनोच्यते-
कहा जाता है-
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा
विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु-
रन्योऽप्येवं यो विध्यात्ममेव ॥१८॥

कठोपनिषद् [ अध्याय २ , -- ? मृत्युकी कही हुई इस विद्या और सम्पूर्ण योगविधिको पाकर नचिकेता ब्रह्मभावको प्राप्त, विरज (धर्माधर्मशून्य ) और मृत्युहीन हो गया । दूसरा भी जो कोई अध्यात्मतत्त्वको इस प्रकार जानेगा वह भी वैसा ही हो जायगा ।। १८ ॥ मृत्युप्रोक्तां यथोक्तामेतां मृत्युकी कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या और कृत्स्न--सम्पूर्ण योग- ब्रह्मविद्यां योगविधि च कृत्स्नं विधिको, उसके साधन और फलके समस्तं सोपकरणं सफलमित्ये- | सहित, वरप्रदानके कारण मृत्युसे प्राप्त कर नचिकेता, क्या हो गया ! ततः नचिकेता वरप्रदानात् [इसपर कहते हैं- ब्रह्मभावको प्राप्त मृत्योर्लब्ध्या प्राप्येत्यर्थः, किम् ? हो गया, अर्थात् मुक्त हो गया । सो किस प्रकार ? [इसपर कहते हैं-] ब्रह्मप्राप्तोऽभून्मुक्तोऽभवदित्यर्थः। विद्याकी प्राप्तिद्वारा पहले विरज- कथम् ? विद्याप्राप्त्या विरजो | धर्माधर्मसे रहित और विमृत्यु- काम और अविद्यासे रहित होकर विगतधर्माधर्मो विमृत्युर्विगत- [ मुक्त हो गया । ऐसा इसका कामाविद्यश्च सन्पूर्वमित्यर्थः। तात्पर्य है। न केवलं नचिकेता एव केवल नचिकेता ही नहीं, बल्कि नचिकेताके समान जो दूसरा अन्योऽपि नचिकेतोवदात्मविद् भी आत्मज्ञानी है अर्थात् जो अपने अध्यात्ममेव निरुपचरितं प्रत्यक्- | देहादिके अधिष्ठाता उपचारशून्य स्वरूपं प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभि- प्रत्यक्खरूपको–यही तत्त्व है, अन्य अप्रत्यक्रूप नहीं-ऐसा प्रायः; नान्यद्रूपमप्रत्यग्रूपम् । जानता है, जो उक्त प्रकारसे अपने उसी अध्यात्मरूपको जानता है तदेवमध्यात्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद अर्थात् जो उसी प्रकार जाननेवाला विजानातीत्येवं वित्सोऽपि विरजः है वह भी विरज (धर्माधर्मसे पल्ली ३] शाङ्करभाष्यार्थ सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युभवतीति | रहित ) होकर ब्रह्मप्राप्तिद्वारा मृत्यु- हीन हो जाता है-यह वाक्य- वाक्यशेषः ॥ १८॥ शेष है ॥ १८॥ ) भुनक्तु । सह वीर्य शिष्याचार्ययोः प्रमादकृता- अब शिष्य और आचार्यके न्यायेन विद्याग्रहणप्रतिपाइन-प्रमादकृत अन्यायसे विद्याके ग्रहण और प्रतिपादनमें होनेवाले दोषोंकी निमित्तदोषप्रशमनार्थेयं शान्तिः निवृत्ति के लिये यह शान्ति कही उच्यते- जाती है- शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥ १६ ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! परमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। हमारा साथ-साथ पालन करे। हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें ॥ १९ ॥ सह नावावामवतु पालयतु विद्याके खरूपका हम दोनोंकी साथ-साथ विद्यास्वरूपप्रकाशनेन । कः ? रक्षा करे। कौन [ रक्षा करे ? स एव परमेश्वर उपनिषत्प्रका- इसपर कहते हैं- वह उपनिष- प्रकाशित परमेश्वर ही [ हमारी शितः। किं च सह नौ भुनक्तु रक्षा करे ] । तथा उसके फलको तत्फलप्रकाशनेन नौ पालयतु । प्रकाशित कर वह हम दोनोंका साथ-साथ पालन करे। हम अपने सहैवावां विद्याकृतं वीर्य सामर्थ्य विद्याकृत वीर्य-सामर्थ्यको साथ-साथ करवावहै निष्पादयावहै । किं ही सम्पादित करें-प्राप्त करें। और प्रकाशन कर कठोपनिषद् [ अध्याय २ च तेजस्विनौ तेजस्विनोरावयो- हम तेजस्त्रियोंका जो अध्ययन किया हुआ है वह सुपठित हो। र्थदधीतं तत्स्वधीतमस्तु । अथवा अथवा तेजस्वी हो अर्थात् हमलोगों- तेजस्वि नावाभ्यां यदधीतं का जो अध्ययन किया हुआ है वह अत्यन्त तेजस्वी यानी वीर्यवान् हो । तदतीव तेजस्वि वीर्यवदस्तु हम शिष्य और आचार्य परस्पर विद्वेष न करें अर्थात हम प्रमादकृत इत्यर्थः। मा विद्विषावहै शिष्या- अन्यायसे अध्ययन और अध्यापनमें चार्यावन्योन्यं प्रमादकृतान्याया- हुए दोषोंके कारण परस्पर एक ध्ययनाध्यापनदोषनिमित्तं द्वेषं दूसरेसे द्वेष न करें। 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः मा करवावहै इत्यर्थः । शान्तिः शान्तिः' शब्दका तीन बार शान्तिः शान्तिरिति त्रिर्वचनं उच्चारण [ आध्यात्मिकादि ] सम्प दोषोंकी शान्तिके लिये किया गया सर्वदोषोपशमनार्थमित्योमिति१९ है । इत्योम् ॥ १९ ॥ , प्रकार इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमदाचार्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली समाप्ता ॥३॥ (६) G- इति कठोपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥२॥ समाप्त श्रीहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका मन्त्रप्रतीकानि व. अग्निर्यथैको मुवनम् २ २ १३५ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः २ १२ ... १२० " " " ३ २८ २० ६ १ १ २१ १ २ १ १ .. २ ६७ २ १ २ ५ २ ३ ८ ... ३ १५ १०० ... १ २ २२ ७७ २ ३ १३ १६४ १३० २ २ अजीर्यताममृतानाम् अणोरणीयान्महतः अनुपश्य यथा पूर्वे अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् अन्यत्र धर्मादन्यत्र अरण्योर्निहितः अविद्यायामन्तरे अव्यक्तात्तु परः अशब्दमस्पर्शम् अशरीर शरीरेषु अस्तीत्येवोपलब्धव्यः अस्य विस्रंसमानस्य आत्मानश्रथिनम् आशाप्रतीक्षे संगतम् आसीनो दूरं ब्रजति इन्द्रियाणां पृथग्भावम् इन्द्रियाणि हयानाहुः इन्द्रियेभ्यः परं मनः इन्द्रियेभ्यः परा इह चेदशकद्बोद्धम् उत्तिष्ठत जाग्रत ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्व प्राणमुन्नयति कर्वमूलोऽवाक्शाखः ... १ السلم ३ .. १ १ २ १ २१ .. २ ३ ३ ... १ سع ४ ... २ ३ १५६ १ ३ २ ३ १५२ ३ ९८ १ १ १ १६ २ २ ३ १२९ ... २ ३ [ १७६ ] मं० व० मन्त्रप्रतीकानि ८९ १ ३ १३९ २ १२ मृत पिबन्तौ सुकृतस्य एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा १ २ .. १ एतच्छ्रुत्वा सपरिगृह्य एतत्तुल्य यदि मन्यसे २४ १७ १६ २ १ १ ३ .. १ १२ ११ १ २ एतदालम्बन श्रेष्ठम् एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एष तेऽग्निर्नचिकेतः एष सर्वेषु भूतेषु कामस्याप्तिं जगतः जानाम्यह शेवधिः तरह कुमार सन्तम् तदेतदिति मन्यन्ते तमब्रवीत्प्रीयमाणः ६२ १ २ १ २ १४२ १४ २ २ १ १६ २ १२ तं दुर्दशैं गूढम् १५९ २ ३ ९ २४ or १ १ १८ ३४ ता योगमिति मन्यन्ते तिस्रो रात्रीयंदवात्सीः त्रिणाचिकेतस्त्रयम् त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः १ ३२ १ १ २ १ ३८ दूरमेते विपरीते २१ २२ देवैरत्रापि विचिकित्सितम् " २ १८ २ ८ १ ૨ २ १३१ २ न जायते म्रियते वा न तत्र सूर्यो भाति न नरेणावरेण न प्राणेन नापानेन न वित्तेन तर्पणीयः न संदृशे तिष्ठति न सापराया प्रतिभाति २७ ३ ६ १ २ .. ३ १ ७८ नाचिकेतमुपाख्यानम् २३ नायमात्मा प्रवचनेन २ २४ १४१ नाविरतो दुश्चरितात् नित्योऽनित्यानाम् [१७७ ] मन्त्रप्रतीकानि पृ० ३ १६२ २ २ १०७ २ १०४ १ १ ३ १८ ૨ २ १२४ १ २० २ ३ ३ २ ११८ ११ ११ ९२ ૨ ३ ३ ३ १८ १ नैव वाचा न मनसा नैषा तर्केण मतिः पराचः कामाननुयन्ति पराञ्चि खानि व्यतृणत् पीतोदका जग्धतृणा पुरमेकादशद्वारम् प्र ते ब्रवीमि तदु बहूनामेमि प्रथमः भयादस्याग्निस्तपति मनसैवेदमाप्तव्यम् महतः परमव्यक्तम् मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतः य इमं परमम् य इमं मध्वदम् य एष सुप्तेषु जागर्ति यच्छेवाङमनसी यतश्चोदेति सूर्यः यथादर्श तथा यथा पुरस्ताद्भविता यथोदकं दुर्गे वृष्टम् यथोदकं शुद्ध शुद्धम यदा पञ्चावतिष्ठन्ते यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते यदिदं किं च जगत्सर्वम् यदेवेह तदमुत्र यस्तु विज्ञानवान् २ २ २ ३ ૨ २ १ २६ २ १ १२१ ... १५९ २ १६७ ३ ३ २ ३ २ १५० ११७ . ar ३ ६ ८८ " ३ ८ यस्त्वविज्ञानवान् ३ ८७ ३ " " १ ४७ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च २ २५ क० उ०१२- [१७८ ] मन्त्रप्रतीकानि मं० पृ० २ ६ १ ३ RO २ २ १ ११४ २ ३ १०९ २० १ २५ ४१ यः पूर्व तपसः यः सेतुरीजानानाम् या प्राणेन संभवति येन रूपं रसम् येयं प्रेते विचिकित्सा से ये कामा दुर्लभाः योनिमन्ये प्रपद्यन्ते लोकादिमग्निम् वायुर्यथैको भुवनम् विज्ञानसारथिर्यस्तु वैश्वानरः प्रविशति शत चैका च हृदयस्य ... २ २ ar १५ २ १० १ ३ ९० ar १ ७ ૨૨ २ १६ १६९ शतायुषः पुत्रपौत्रान् १ १ २३ .. १ १ २५ ૨ ५७ .. १ २ २ * १ १ २६ ४३ १ १३ २८ १ ૨ ३ ५२ २ १५ ६८ शान्तसकल्पः सुमनाः श्रवणायापि बहुभिः श्रेयश्च प्रेयश्च श्वोभावा मर्त्यस्य न त्वमग्नि स्वय॑म् स त्वं प्रियान्प्रियरूपाश्च सर्वे वेदा यत्पदम् सह नाववतु सहोवाच पितरम् सूर्यो यथा सर्वलोकस्य स्वप्नान्तं जागरितान्तम् स्वर्गे लोके न भयम् हसः शुचिषद्सुः हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि २ ३ १७३ १ २ २ १३७ २ १ १ १२ २ २ २ १२६ १३२ ६ हन्ता चेन्मन्यते २ ૭૨

K Athopanishad

Author
Shankar Bhashaya
Title
K Athopanishad
File name
K Athopanishad
Text
OCR done
Citation
1956
Published
30.05.06
Publisher
Ghanshayam Das Jalan Geeta Press Gorakhpur
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
University Liberey Allahabad
Classification
Sanskrit(literature)
DLI number
487345
Barcode
5990010097008.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
H06Juj2kbAa
Download PDF

K Athopanishad