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Shrxn'gaara Haaraavalii
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक - पुरातत्त्वाचार्य जिनविजय मुनि
[सम्मान्य संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ]
-ग्रन्थाङ्क १५-
श्रीहर्षविरचिता
शृङ्गारहारावली
-
प्रकाशक
-
राजस्थान-राज्य-संस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( Rajasthan Oriental Research Institute )
जयपुर (राजस्थान)
चिः सं० २०१३]
प्रति ७५०
[ मूल्य रू.
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राजस्थान
पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक - पुरातत्वाचार्य जिनविजय मुनि
[सम्मान्य संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ]
-ग्रन्थाङ्क: १५-
श्रीहर्षविरचिता
शृङ्गारहारावली
प्रकाशक
राजस्थान-राज्य-संस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( Rajasthan Oriental Research Institute )
जयपुर (राजस्थान)
वि० सं० २०१३ ]
प्रति ७५०
[ मूल्य रू०
RĀJASTHĀNA PURĀTANA GRANTHAMĀLĀ
Published by the Government of Rajasthan
A Series devoted to the Publication of Sanskrit, Prakrit, Apabhramśa,
Old Rajasthani - Gujarati and Old Hindi works pertaining to
India in general and Rajasthan in particular.
General Editor
Acharya JINA VIJAYA MUNI, Puratattvacharya
Honorary Member of the German Oriental Society, Bhandarkar Oriental
Research Institute, Poona and Gujarat Sahitya Sabha, Ahmedabad.
Honarary Director, Rajasthan Oriental Research Institute.
No. 15
SRNGARAHĀRĀVALI
of
SHRI HARSHA
Edited by
Prof. Dr. PRIYABALA SHAH
M. A. Ph. D. (Bombay), D. Litt (Paris)
( Head of the Department of Ancient Indian Culture :
Ramanand Arts College, Ahmedabad. )
Rajasthan Oriental Research Institute
Jaipur
1956
श्रीहर्षविरचिता शृङ्गारहारावली सम्पादिका डो. प्रियबाला शाह. एम्. ए. पीएच्. डी. (बंबई), डि. लिट् (पेरिस) ( प्राध्यापिका, रामानन्द आई कॉलेज, अहमदाबाद ) -: प्रकाशक:- राजस्थान-राज्याज्ञानुसार संचालक-राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर ( Rajasthan Oriental Research Institute ) जयपुर (राजस्थान) - प्रकाशक- संचालक - राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर, के आदेशानुसार - गोपालनारायण बोहरा । जयन्ति दलाल, वसंत प्रिण्टींग प्रेस, घीकोटा रोड, अहमदाबाद, और मुकुन्द के. शास्त्री, इला प्रिण्टरी ( वल्लभ मुद्रणालय) पानकोर नाका, अहमदाबाद ।
प्रधान संपादकीय वक्तव्य * राजस्थान एवं गुजरात, मालवा आदि प्रदेशोंमें प्राचीन हस्तलिखित प्रन्थोंके बिखरे हुए एवं जीर्णशीर्ण दशामें जो संग्रह प्राप्त होते हैं उनमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं प्राचीन राजस्थानी-गुजराती भाषामें रचित छोटी बडी ऐसी सैंकडों ही साहित्यिक कृतियां उपलब्ध होती हैं जो अभी तक प्रायः अक्षात और अप्रसिद्ध हैं । विद्वानोंका लक्ष्य प्रायः अभीतक उन्हीं सुप्रसिद्ध और सुझात ग्रन्थोंके अन्वेषण एवं संशोधनकी तरफ रहा है जो यत्रतत्र यथेष्ट परिमाणमें उपलब्ध होते हैं। ग्रन्थोंके संपादन और प्रकाशन के विषयमें भी प्रायः यही प्रथा चली आ रही है। सुप्रसिद्ध और सुशात ग्रन्थोंके सिवा छोटी छोटी एवं प्रकीर्ण रचनाओंके विषयमें विद्वानोंका विशेष लक्ष्य नहीं जाता है और इसलिये अभी तक ऐसी रचनाओं के संपादन-प्रकाशनका मुख्य प्रयत्न प्रायः नहींसा हुआ है। हमारे प्राचीन इतिहास एवं सांस्कृतिक सामग्रीकी दृष्टिसे इन फुटकर रचनाओं में जो ज्ञातव्य छिपे पडे हैं उनकी तरफ हमारा लक्ष्य बिल्कुल नहीं गया है-ऐसा कहा जाय तो कोई अत्युक्तिकी बात नहीं होगी। राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिरका कार्य प्रारंभ करते समय, हमारा मुख्य लक्ष्य इस प्रकारके प्रकीर्ण साहित्यका अन्वेषण, संग्रह, संरक्षण, संशोधन एवं प्रकाशन आदि करनेका रहा है और तदनुसार, राजस्थान पुरातन ग्रन्थ- माला द्वारा ऐसी अनेकानेक साहित्यिक रचनाओंको, सुयोग्य विद्वानों द्वारा शोधित-संपादित कराकर प्रकाशमें रखनेका आयोजन हमने किया है। संस्कृत और प्राकृत भाषामें रचित मुक्तक-प्रकीर्णक पद्योंके फुटकर संग्रहों के नाम पद्यावलि, मुक्तावलि, हारावलि, मणिमाला, रत्नमाला, पुष्पमाला आदि रूपमें प्रसिद्ध हैं। कुछ कृतियां पद्योंकी संख्याके अनुसार भी प्रसिद्ध हैं-जैसे पांच पांच पद्योंका संग्रह पंचक, आठ आठ पद्योंका संग्रह अष्टक, १० पद्योंका संग्रह दशक, इस तरह षोडशक १६ पद्योंका, २० पद्यात्मक रचना विशतिका, २४ पद्यात्मक कृति चतुर्विशतिका, २५ पद्योंकी पंचविंशतिका, ३० की त्रिशिका, ३२ की द्वात्रिशिका, ५० पद्योंके संग्रहवाली रचना पंचाशिका या पंचाशक, '७० पद्योंकी समूहात्मक रचना सप्ततिका एवं सौ पद्योंके संग्रह 'शतक' आदि नामसे उल्लिखित किये जाते हैं । राजस्थान पुरातन ग्रन्थमालाके १५ वें पुष्पके रूपमें पाठकोंके हाथमे जो अन्य उपस्थित है वह शृंगारहारावलि भी इसी प्रकारकी एक मुक्तक- पद्योंकी संग्रहरूप संस्कृत रखना है। संस्कृतके भिन्न भिन्न छन्दों में, रचे हुए १० पद्योंके .
[ ii . . इस छोटेसे संग्रहको कर्त्ताने शृंगारहारावलि नामसे अभिहित किया है जिससे इसका विषय भी स्पष्ट ही सूचित हो जाता है। कविने समय समय पर स्फुरित अपनी कल्पनाके अनुसार शृंगाररससे संबन्धित जो मुक्तक पद्य बनाये होंगे उनमैसे चुने हुए १०१ पद्योंके संकलन रूपमें यह हारावलि ग्रथित की गई है। इस प्रकारके शृंगाररसविषयक १०० पद्योंका समुच्चय महाकवि भर्तृहरिका बनाया हुआ शृंगारशतकनामक संस्कृत साहित्यका एक उत्कृष्ट मुक्तकसंग्रह सुप्रसिद्ध ही है और इसी तरहका महाकवि अमरुकका बनाया हुआ १०० पद्योंका संचयरूप अमरुकशतक नामका सुन्दर काव्यसंग्रह भी सुविश्रुत है । ऐसी ही एक अन्य और उत्तम रचना नागकविकी है जिसे नागशतक या भावशतक भी कहते हैं । कहने का तात्पर्य है कि इस प्रकारके मुक्तक-पद्योंके संकलन-स्वरूप अनेकानेक साहित्यिक प्रवन्ध उपलब्ध होते हैं जिनमेंसे ऊपर्यु- ल्लिखित जैसे कुछ एक ही प्रवन्ध अभी तक प्रकाशमें आये हैं । गुजरात विद्यासभा, अहमदाबादके प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थसंग्रहमें राजस्थान एवं गुजरातसे प्राप्त सी कई प्राचीन लिखित पोथियां जीर्ण-शीर्ण एवं उपेक्षित दशामें उपलब्ध हैं जिनकी तरफ सहसा विद्वानोंका लक्ष्य आकृष्ट नहीं हो पाता । डॉ. प्रियबाला शाहको रिसर्च स्कॉलरके रूपमें जब इस संग्रहका निरीक्षण करनेका सुयोग मिला तो इनका लक्ष्य इन पोथियोंकी तरफ गया और इनने इनमेंसे प्रस्तुत शृंगारहारावलि, कृष्णगीति, नृत्तसंग्रह, रत्नकोश आदि जैसी कई फुटकर परन्तु साहित्यकी दृष्टिसे महत्त्वकी रचनाओं के विषयमें अपने प्रधान अध्यापक प्रो. रसिकलाल परीखसे जिक्र किया। प्रो. परीखने इन रचनाओंका अध्ययन और प्रतिलिपि आदि करनेकी प्रेरणा की और प्रसंगवश मुझे इससे सूचित किया। प्रतिलिपि और मूल लिखित पोथियोंका अवलोकन करने पर मुझे ये रचनाएं राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित करने योग्य मालूम दी। अतः मैंने सुश्री प्रियबालाको इनका संपादन करने की प्रेरणा की जिसके फलस्वरूप यह शृंगारहारावलि अब विद्वानोंके सम्मुख उपस्थित हो रही है। डॉ. प्रियबाला शाह सस्कृत साहित्यके विविध अंगोंके अध्ययन एवं अन्वेषणमें विशेष रुचि रखती है। इनने बंबई-युनिवर्सिटीकी एम्. ए. की परीक्षा भारतीय प्राचीन इतिहास और संस्कृति के विषयको ले कर पास की और पीएच्. डी. की डिग्रीके लिये विष्णुधर्मोत्तरपुराणान्तर्गत ललितकला- विषयक प्रकरणोंका परीक्षणात्मक संपादन कर उस पर विवेचनात्मक बृहत् निबन्ध (थिसिस) लिख कर, उक्त युनिवर्सिटीको उपस्थित किया जिसके परिणामस्वरूप इनको युनिवसिटीने डॉक्टरेटकी पदवी प्रदान की। प्रस्तुत शृंगारहारावलिका संपादन कार्य समाप्त होने पर था तभी इनने अपने विशेष अध्ययनके लिये फ्रान्सको पेरिस युनिवर्सिटीमें प्रविष्ट हो कर, वहांके संस्कृतज्ञ प्राध्यापक प्रो. रेनों और दुपाँ आदिके मार्गदर्शनमें सूर्यपूजा एवं कृष्णगीति और
नृत्तसंग्रह नामक प्रबन्धोंके आधार पर प्रस्थापित भारतीय संगीत और नृत्य
आदि विषयों पर विस्तृत निबन्ध लिख कर पेरिसकी शोरबॉन युनिवर्सिटीसे
डी. लिट. की उच्चतम पदवी प्राप्त की। डॉ. प्रियबालाकी अध्ययन विषयक
इस प्रकारको सुयोग्यताके लिये यहां पर मैं अपना हार्दिक अभिनन्दन प्रकट
करना चाहता हूं।
वस्तुतः प्रस्तुत ग्रन्थमालाके प्रारंभसे ही मुझे गुजरात विद्यासभाके अंगभूत
प्रो. श्री रसिकलाल परीख, डा. श्री हरिप्रसाद शास्त्री, डॉ. श्री जितेन्द्र जेटली,
डॉ. सुश्री प्रियवाला शाह, अध्यापक श्री के. का. शास्त्री आदि मेरे प्रिय
विद्वन्मित्रमंडलका विविध ग्रन्थों के संपादन और प्रकाशन आदि कार्योंमें अभीष्ट
सहयोग प्राप्त होता रहा है। अतः इसके लिये मैं अपना सविशेष हार्दिक
कृतज्ञभाव प्रकट करना चाहता हूं।
अनेकान्त विहार
अहमदाबाद.
आषाढशुक्ल ११. वि. सं. २०१३
( १८-७-५६)
मुनि जिनविजय
सम्मान्य संचालक
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
जयपुर
PREFACE OF THE GENERAL EDITOR There are still hundreds of old manuscripts big and small in Sanskrit, Prakrit, Apabhramsa and old Rājasthāni-Gujarāti lying scattered over Rājasthāna, Gujarāta, Mālawā and other regions of our country. Many of these are still unknown and unpublished. Up till now scholars have generally devoted themselves to works which are comparatively bulky, well known and available in great number. The same outlook prevails also amongst publishers of oriental series. But in addition to those big and well-known works, there are many small ones on a variety of subjects which have not attracted the attention that they deserve. In fact, no major attempt has been made to edit and publish these small works on important subjects. It would be no exaggeration to say that these works which contain important material for the history and culture of our country and which embody not a negligible part of our ancient learning have been mostly neglected, probably because they are in small manuscripts and rare to find. It has been our endeavour from the very inception of Rājasthāna Oriental Research Institute to search for, collect and preserve mss. of such small works on various subjects and also to edit and publish them. Accordingly we have arranged for critical editions of such works at the hands of competent scholars and their publication in the Rajasthāna Purātana Granthamālā. The collections of Sanskrit and Prakrit detached verses are known by such names as Padyāvali, Muktāvali, Hārāvali, Maņimālā, Ratnamālā, Puşpamālā etc. Some of these collections are also named according to the number of verses collected, e. g. a collection of five, Pañcaka; of eight, Aşțaka; of ten, Daśaka; so also a collection of sixteen would be called şodaśaka; of twenty, Vimsatikā; of twenty, four, Caturvimśatikā; of twenty-five, Pañcavimśatikā; of thirty, Trimśikā; of thirty-two, Dvātrimśikā; of fifty, Pañcāsaka or Pañcāśikā; of seventy, Saptatikā; and so a collection of hundred would be called a Sataka. Śrngärahārāvali, which we are placing in the hands of scholars as the fifteenth number of the Rājasthāna Granthmālā, is a work of this type - a collection of 101 Muktakas or detached verses. The subjectmatter of this work is shown by the very title given by the author to this collection of his of 101 verses in different metres. The author seems to have made this necklace of one hundred and one pearl - like verses Muktakas-by selecting the best out of the love-lyrics that he may have composed at different times.
मानकरलायनमः। कामक
काय करतलेतवाधिकामिनः कांताक्रांत
कपोलमडलले पत्रावलाकर्मणिय सानोविजयाजनतिमदयनरन्पान्याता
निरासोबदमधुमत्पजन्हिजवती सौख्यायस्यादुविधा यात्रशास्त्र
रस्यजगता जेहनगदुदीपस्नसायचविषविचितःचारधहरन्नाव
रियतिदुखकरतलमाननिय पाच या मतमोर शिजवता र ताकटा
होऽहयाशासायचंदनवनिर्मलवायलानी येन त मतितरी करमहमेषा
ग्लानिरन्सुरतजीमरवहनावानगतरलयन्न् सरसावर
गाल
शाखा सरियायस्य मन्तबध्या धरयायुधान्त त्राद शान्त रायधी
वनपविरासानधनु राति त्राप्यामधेशसञ्चार मलिनाव मनोहर
मश्रिाम सुरविरघनसा-नाफान यदायाराजरोचिरन
लारंगारावाला।११।६तियोमहर्षविरचितामारहररावतीसमानासय११)
'पाषाध्यदिने पिन तिदिविचारतातीधरए। मोजोजो
प्रीम कुन-राप्रतबन्धलिना नातावालगत्पश्चलकमलजालोकमाता जयंत्यारे संज्ञा
एगोझारतिजनभन दरमसादयंत्यानामध्ये स्व गोविडनगरभवायी निगहबार । भोपोथायी.
कता परिभ्रममिवयं ने उहावदामह सोक्लीविदितरुपसिधान मस्या सौद्यविधि
बउरावास्यचकेरवायायपष्टुमिन्द्रोमरवनमुकता
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला ]
[ शृंगारहारावलि-प्रथम तथा अन्तिम पत्रको प्रतिकृति ।
Introduction I 'Critioal Notice of the Manuscript The text edited in the present work is based upon a singl the possession of Gujarat Vidyasabha, Ahmedabad. Ms. No. 3601 Name-Sprgärahārāvali Author -Sriharșa Material-Paper Script-Devanāgari Extent of the Ms.-13 folios Size of leaves-9x3 inches Area of writing-7.5x2.25 inches Number of lines-9 lines per page, rarely 8 lines Letters-31 to 33 in each line Writing-fairly uniform and legible Age-1733 Samvat (i. e. 1676 A. D. Friday 9th June ) Begins-श्रीमकरध्वजाय नमः ॥ कामः कौसुमकार्मुकं करतले कृत्वाधिकं कामिनः । Ends-इति श्रीधीहर्षविरचिता शंगारहारावली समाप्ताः । संव. १७३३ आषाढ वदि । शुक्र लिखितं द्विवेदि विद्याधरसुत लक्ष्मीधरेण । श्री। oft I धी। After the colophon, there are two more ślokas in a different hand (see p. 16 ) II The work I undertook to edit this work, even though there was only one Ms. of it, because of the name of Sriharşa and the poetic quality of the work. If, however, the manuscript was not on the whole correct, I would have been compelled to give up the attempt. As will be seen from the text, I have in all made nearly 150 emendations. These are made because the actual readings of the Ms. some cases metrically deficient (e. g. ślo. afar for at $lo. 55 जलमण्डली for जलदमण्डलो, slo. 57 निशाक एष for निशाकर एष, slo. 73 are in vil संभूत for wa) in some, grammatically incorrect ( e. g. ślo. 34 aya JAPAN ślo. 63 alját, ślo. 65 stunt and in some, did not yield any sense or the sense was not as would be required by the context (e. g. ślo. 7 F 716FTE slo. 8 वक्षोजन्मविशोरता, blo. 34 दयत तमसि म, and, slo. 30 कर्णाटीकुटकोटि ) In making these emendations, it is not possible to exclude altogether the subjective test of propriety. It has been, however, controlled by metre and grammar. In emending the readings, I have mainly relied upon the objective consideration of the confusions and mistakes which are likely to arise by the similarity of letters ( like and 27, and a, u and 7, 7 and 2, X and 72, 9 and q etc ). One cannot say how far these emendations represent the author's text until more mss. of the work are discovered. III The Author a name Sriharsa is wellknown in Sankrit literature, Several persons who might have lived centuries apart have borne this name. In fact we know at least two great Harşıs : ane the emperor Harsa of Kanouj (6th cent. A. D.) and the other Śrīharşa (12th cent. A. D.) a great poet and Vedantist,—the author of Naişadhiyacarita and Khandana-khandakhādya. Scholars have discovered several other Harsas? also. Our problem is to find out whether our author is to be identified with one of the known Harşas or whether he is a new find. At the outset I must say that I have not been able to find any decisine evidence which would help one to decide the question. The only thing, therefore, that I could do was to compare śộngārahārāvali with, on one side, the works attributed to Harṣa of Kanouj, and on the other, with the Naişadhiyacarita of the Vedantist poet Sriharsa. Here also I must say that this comparative study has not given me any definite clues. Yet if one is allowed to express one's inclination based upon such a comparative study, one might say that it is more likely that the author of Naişadhiya might have composed this work in his earlier years to emulate works like the Amaruśataka. What goes against this hypothesis is the fact that Sriharșa has not There are as many as five different individuals, possessing the same appelation Sriharşa, known to Sanskrit literature: (1) younger brother of the author of the Kavyapradipa, (2) the author of the Naişadhakāvya, (3) a king of Kashmir to divert whose queen, Somadeva wrote the Kathåsaritsågara, (4) the father of Muñja and the grand-father of king Bhoja of Dhārā, (5) the king of Sthaneśvara. See P.IX Introduction : Nāgānanda of Sri Harśa-edited by Karmarkar ( Second edition, 1923 ) twi e. 8. the use name mentioned Sšngärahārāyalſ in the references to his works made at the end of the several cantos of Naişadhiya. This absence of reference, however, may be explained on the assumption that he might have not regarded this work, presumably of his earlier years, as sufficiently important to stand with his major works. It is wellknown that Sriharşa uses many unusual words in his Mahākāvya. Some of these are sanskritised forms of Deśya words, of the word घुसण in the sense of saffron( Naiş. viii, 80). Now we find that, this word has been used in this work also (ślo. No. 59 ). In addition, the use of the word offer in ślo. 12 is to be specially noted. As I have explained in the notes it is a Sanskritised form of the deśya word uita set or forcent This common tendency of using the Sanskritised forms of the desya words, by itself, is in no way conclusive; yet if we take this fact along with the other fact that Śriharşa and not Harșa is the proper of the authors of Naişadhiya and Sțngārahārāvali, we may be per.nitted the guess that both of them might refer to the same person. This is not good logic, but not so bad as to exclude a guess. Whoever may be this Harșa, he seems to be a person very familiar with the regions of Gujarat and Rājasthāna, as is evident from ślo. 12 (afteri), ślo. 46. (776) ślo. 73 (alferes', ślo. 73 (IKT) The reference to fit in ślo. 30 can be explained as something conventional because it is a sort of कविसमय. The two Elett verses at the end of the Ms., describing in one the beautiful Nāgara women of Vadanagara and in the other the surpassing beauty of its cowherdesses, clearly indicate that the copy of this Ms. was made at Vadanagara. Sriharşa, the author of Naişadhiya, had a great vogue in Gujarat and its oldest commentaries were written solely in Gujarat," So if Sšngārahārāvali is the work of the author of Naişadhiya it would be no surprise if its only known Ms. was copied at Vadanagara. However, as I said above, the evidence is in no way conclusive and the question of the identity of the author of Srngära-hārāvali remains an unsettled problem. IV Age- The Age of this work is undoubtedly earlier than this ms. i.e. 1733 Saṁvat (i. e. 1677 A, D.). If it is a work of the author of Naişadhiya its date would be, that of Sri Harşa (12th cent. A. D.) Beyond this we connot say anything further about the age of Śộngāra-hārāyali. See Literary Circle of Mahămātya Vastupala-B. J. Sandesara (Chap. 5. pages 52-5 I take this opportunity of expressing my sincere thanks to revered Acharya Sri Jinavijayaji, the Honorary Director, of Rajasthan Puratattva Mandir, Jaipur, who is known for the encouragement he gives to young students in the field of research. I am greatly indebted to him ior not only accepting this work for publication in Rajasthan Puratattva Series but for helping me in learning the craft of editing Sanskrit texts. I am also indebted to Prof. K. V. Abhyankar, Honarary Professor of Sanskrit, B. J. Institute of Learning and Research, Ahmedabad, one of my teachers who guided me in my thesis and taught me how to use Mss. for editing a work. The Sanskrit commentary in the notes is the work of the wellknown Vaiyakarana Pandit Satyadeva Miśra of the Brahmachari Sanskrit Pathaśāla-Ahmedabad. I am much indebted to him for this co-operation. I had the good fortune of discussing the various emendations with Pt. Sukhalalji and Sri. K. K. Shastree. Lastly, I must not forget to thank Prof. R. C. Parikh, Director of the B. J. Institute of Learning and Research, Ahmedabad, for the valuable assistance that I have received from him in connection with this work. I am alone, however, responsible for the short-comings of this my first work. Helpful criticism will be thankfully received. Ahmedabad Priyabala Shan 1-7-1952.
छन्दोनुक्रमणिका अनुष्टुप् Slos 6, 7, 16, 36, 37, 50, 51, 66, 67, 68, 82, 83, 91 अनुष्टुप गायत्रः ॥२३॥ चतुष्पादिन्यनुवर्तते । गायत्रैरष्टाक्षरैः पादैवतुष्पाच्छन्दः मनुष्ट्रप्सर भवति । [ पृ० ६२] उपजाति Slo.s. 74,76. माधन्तावुपजातयः ॥ २३ ॥ आघन्तापिति अनन्तरोक्तापिन्द्रपशोपेन्द्रषजयोः पादावाड़। [१० २९१ ] पंशस्थेन्द्रवंशापादयोरपि सङ्करादुपजातयो भवन्ति । [१० २९५ ] पृथ्वी S'10. s. 19, 32, 55, 63 पृथ्वी जमौ जसो यलो म् वसुनवको ॥ १७ ॥ अष्टभिनंवभिच यतिः [१० ३३८] स म - arfosat S'lo.s. 34, 59. मालिनी नौ म्यौ र ॥ १४ ॥ अष्टभिः सप्तभिश्च यतिः । [पृ. ३५४ ] मन्दाक्रान्ता-Slo.s. 33, 40, 41, 54. मन्दाकान्ता म्भौ नतो त्गौ म समुद्रतुस्वराः ॥ १९ ॥ चतुषुः षट्सु सप्तसु च पतिः । [ पृ० ३.१ ] वसन्ततिलका Slo.s. 3, 10, 11, 12, 13. 54, 57, 60, 85, 86, 87. बसन्ततिलका भी नौ गौ ॥ ८ ॥ [ पृ० ३२९ ] वंशस्थ-Slo.s. 23, 24, 25. वंशस्था जुतो जौ ॥ ३४ ॥ [ पृ० ३०३ ] शार्दूलविक्रीडित-Slo.s. 1, 2, 4, 5, 8, 9, 14, 15, 17, 20, 26, 27, 28, 29, 30, 31, 35, 38, 39, 42 43, 44, 45, 46, 47, 48, 49, 52, 53, 61, 65, 73, 76, 77, 79, 80, 88, 90, 92, 93, 94, 95. 97, 98, 99, 100, 101. शार्दूलविक्रीडितं मुसौ जसो तो गादित्यऋषयः ॥ २२ ॥ द्वादशभिः सप्तभिश्च यतिः ॥ [प्र. ३४. ] .
x] शिखरिणी-Slo.s. 64, 70, 71, 78. शिखरिणी यमो नमो भको गृतुरुद्राः ॥ २० ॥ षट्स्पेकादशसु च यतिः [ पृ० ३४२ ] - FTUTT S'lo s. 56, 62, 72, 75, 84 and two s'lokas of the footnote. घग्घरा मौ भनौ यो य त्रिः : संप्तकाः ॥ २५ ॥ सप्तसु . सप्तसु सप्तसु च यतिः [ पृ ३५० ] स्वागता-Slo.s. 81. स्वागता ! भूगौ ग् ॥ २९ ॥ [ पृ० २९९ ] हरिणी-Slo.s. : 18, 21, 22, 69, 89. हरिणी नसौ मग स्लो गृतुप्समुद्र-ऋषयः ॥ १६ ॥ षड् भिधतुभिः सप्तभिध यतिः [ पृ० ३३७ ] From पिङ्गलच्छन्दःसूत्रम् प्रथमसंस्करणम्-१९२८ (कलिकातामहानगा मुद्रितम् ) शुद्धिपत्रक read as लौल्यात् इशाम्बुलोल्यात् प्रेममिलीनail After the readings За इवाम्बु प्रेमणि लीनता 3a Ms. प्रेमनिभेतका धृताया page slo. २ ૧૨ ३ १५ Footnote धृता या 6 4 Footnote ८ १० -अनिता नेत्यंतनो पनर्षिचित्य -हमिय कुसुम सलमाङ्गी घेणीरश्मिः संतत भयोञ्जन चक्रचन्द्रा -जनितां नेत्यंतनो पुनर्विचिन्त्य हमियं कुसुम. संलग्नाङ्गी वेणी रश्मिः संतत नयोरअनं ६० ६० ६२ ६९ -० ११
श्रीहर्ष-विरचिता
शृङ्गार हा रा व ली।
श्रीमकरध्वजाय नमः ।
कामः कौसुमकार्मुकं करतले कृत्वाधिकं कामिनः
कान्ताकान्तकपोलमण्डलतले पत्रावलीकर्मणि ।
युञ्जानो विजयी जगन्ति मदयन् रत्यानुयातोऽनिशं
'सौहार्दान्मधुमत्यजन् हि भवतां सौख्याय भूयाद् भुवि ॥ १
षष्ठो जेत्रशरः स्मरस्य जगतां जेतुं जगद्युद्धतो
व्यस्ते सायकपञ्चके विषयिणां चेतः शरव्यं हरन् ।
स्वर्गादप्यतिदुर्लभं करतलप्राप्तश्रियं पार्थिव
शर्मप्रम तनोतु भूरि भवतां कान्ताकटाक्षोऽक्षयम् ।। २
[ वसन्तकालवर्णनम् ]
आध्य 'चन्दनवनीमलयावनीनां
स्थैर्य भजनतितरां कुसुमद्रुमेषु ।
ग्लानि हरन् सुरतजां मधुरो वधूनां
वातः प्रगेऽतरलयत् * सरसीतरङ्गान् ।
का शाखी सखि यस्य पुष्पमभवत् पुष्पायुधस्यायुधं
छिन्ने तत्र चिरान्निरायुधदशां धत्तं स चित्तेशयः ।
इत्थं सा सुभग त्वदीयविरहे कन्दर्पसंतापिता
बाला बालसखीजनेन सहिता क्रीडावने भ्राम्यति ॥
कान्ते त्वन्मुखचन्द्रमा अभिनवो दन्तावली चन्द्रिका
प्रत्यादिष्टमहावियोगतिमिरः कौरङ्गनेत्राङ्कितः ।
आश्लिष्यन् कुचचक्रवाकमिथुनं पूर्णेऽपि यस्मिन् मिथस्-
तुङ्गायेत मदेन नेत्रनलिनानन्दं वितन्वन् मुदा ॥
1 Ms सौहामधु. 2 Ms जगदुद्धतो. 3 Ms 'वनि 4 Ms
my
४
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६ शृङ्गारहारावली [ श्लो. ६-१२ विद्रावयति संपूर्णो मानिनीसुखचन्द्रमाः । दन्तचन्द्रिकया नूनं वियोगविभवं तमः॥ स्तनौ 'स्तनान्तरन्यस्तौ मुखं सुमुखि सन्मुखम् । ममोत्सङ्गे तवैवास्तु सुश्रोणि श्रोणिमेखला ॥ ७ 'कुश्चत्कोकनदश्रियोनयनयोः प्रक्षालयन्ती जलैर- 'वक्षोजन्मकिशोरको पितृगृहं गच्छन्त्यपाङ्गेन तु । मन्दावर्तितकन्धरा प्रियतम संवीक्ष्य गुर्वन्तिकाद्- अन्तर्बाष्पनिरुद्धकण्ठकुहरं कान्ता चिरं रोदिति ॥ ८ कान्ता किं कुरुते, रतेषु रमते कामाक्षया हे सखे, साकं केन रतं, त्वया, ऽहमिह न, त्वं तत्समीपेऽनिशम् । माहारेषु मनोवलेपवसनेविच्छां हि हित्वा सखी सव्रीडा भवतो रतैरविरतरन्तःस्थितैर्वर्तते ॥ मौवर्णन पुररणचरणारविन्दा श्रोणीभरालसगतिमंगशावनेत्रा । पीनम्तनी सकलचन्द्रमुखी तनोति तन्वी न कस्य हृदि मोहमहो महान्तम् ।। १० अद्याहमालि तलिने सहिता निषष्णा वार्तासु तस्य निरता सरलाशयत्वात् । कान्तेन कामतरलेन भुजोपपीडम् आलिङ्गय मां किमपि तेन कृतं न जाने ।। तोयान्तरुल्ललितमीनयुगाभिरूप- नीरणिकान्तरचरन्नयनं प्रियायाः। पास्यामि पार्वणसुधाकरचारुवक्त्रं शीतं सुगन्धि मरुपान्थ इवाम्बुलौल्यात् ।। १२ 1 Ms स्तन्यसनिहन्य. 2 Ms °लां. 3 Ms किश्चित्. 4 Ms 'रता.
लो. १३-१९] शृङ्गारहारावली स्वेनैव या वरकुचद्वितयेन नूनं संवयं सम्यगपि मे हृदयं दयालुः । वेगातिदुःसहविदारणदारुणेभ्यः सा पश्यति प्रियतमा मम मार्गणेभ्यः॥ १३ रात्रौ यत्सखि कौतुकं समभवचित्रं तदाकर्ण्यतां कान्तेनाद्य समागतेन शयनासीना समालिङ्गिता'। एतस्मिन् समये रसान्तरमसावासाद्य चेतोहरं कान्तो मन्मयतामुपागमदहं जाता 'ततस्तन्मयी। १४ शय्यायां स्मररागमागतवतोः संपन्नयोरावयोः वार्तालिङ्गनचुम्बनानि बहुधाऽभूस्ततोऽनन्तरम् । प्राप्ते प्रेमनिलीनतां सखि परां तन्मन्मयत्वादहो तद्योग्यं तदहं चकार करणं मद्योग्यमेव प्रियः ॥ १५ आक्रान्तहृदयेनाहं सखे सर्वाङ्गसङ्गिना' । प्रियेण रतनाथेन मोहितेनाद्य मोहिता ।। युग्मं कुण्डलयोललौ ललितयोलीलामदो दोलया चापत्यान्मधुरं चकार "रशना रावं नितम्बस्थले । कामिन्याः करकङ्कणैनिकणितं कामाहवस्योत्सवे दृष्ट्वा कान्तपराजयं चरणयोलग्नौ चिरं नू पुगै ।। प्रणतिनिरतः कान्तः कस्मात् त्वयाद्य न वीक्षितः प्रियसखि कृतो व्यर्थाभाषः किमेष सखीजनः । इयमपि गता" पूर्णप्राया पृथुर्हि निशीथिनी कथय कठिने कीहक कोपरतवेष हृदि स्थितः ॥ १८ विसर्जय सुदुर्जनं गणय सज्जनं मानसे कृतार्थय सखि प्रियं प्रकुरु तत्र मा विप्रियम् । रमस्व पतिसंगता विरम मानतः सांप्रतं भजस्व मुदमद्भुतां, कलुषतां द्रुतं संत्यज ॥ १९ 1 Ms 'ताः, 2 Ms 'स्ततस्त. 3 Ms भूय. 4 Ms 'नां. 5 Ms 'नध. 6 Ms °लया. 7 Ms रसनां. 8 Ms गताः पुण्यप्राथाप्रथु. 9 Ms °मुद'. १७ शृङ्गारहारावही [ श्लो. २०-२५ आगम्याङ्गणभूमिकां कथमपि प्रायो वियोगातुरा मार्ग वीक्ष्य विलोचनोत्पलगलल्लोलोदका प्रेयसी । नाद्याप्येष समागतः सखि पुनः 'शून्यं कथं मन्दिरं यास्यामीत्यभिधाय मोहमममत् तावत् समेतः प्रियः ॥ २० त्यज कठिनतामेतामाशु प्रयच्छ शुभां गिरं सफलय ममाबन्धं मुग्धे विलोकनलीलया। चरणशरणं दासीभावं बतानुगृहाण माम् अहह विषमो मानग्रन्थिस्तवाद्य मयीदृशः ।। २१ करुणमनसा प्युक्तं मुक्तं विलोचनजं जलं शिरसि विधृतं भूयः पत्युश्चिरं चरणद्वयम् । सखि परिहता ब्रीडा क्रीडासखीषु मया मनाकू तदपि हृदये नासीत् तस्य प्रियस्य दयोदयः॥ २२ इयं परित्रस्त कुरङ्गलोचना घनस्तनी चारुमुखेन्दुमण्डला । नितम्बिनी मत्तगजेन्द्रगामिनी कृशोदरी मोहकरी च कामिनी ॥ २३ तवेष वक्तेन्दुरवण्डमण्डलः तनोति कान्ति नयनाभिरामकीम् । प्रिये कुचौ कुड्डमपङ्कपिञ्जरौ सुवर्णपकेरुहकोरकाकृती ॥ २४ इति प्रिये भाषिणि पाणिजैर्मुहुः स्तनाननं संस्पृशति प्रमोहिते । विलोक्य तां मन्मथकेलिलालसां ययौ सहासोऽथ सखी सखीजनः ॥ (युग्मम्) २५ 1 Ms शून्ये कथं मन्दिरे. 2 Ms °मनंया.
लो. २६-३१] शृङ्गारहारावली निर्गत्यावसथादहं सखि बहिस्तिष्ठामि यावत् क्षणाद् आयातः 'पुरतः कुतोऽपि ददृशे तावन्मया वल्लभः । मातः किं करवाणि पाणिकमले धृत्वा शठो मां हसन् नीत्वा तत्र जगाम यत्र न जनो जानाति वै कश्चन ॥ २६ बालायाः शनकविलासशयनादुत्यापयन्त्याः पुनः वस्त्रान्ते क नु यास्यसीति रभसादुत्का धृता या मया । सस्मेरं सकलं सलज्जपुलकं वक्रीकृतभूलतं यत् पीतं मुखमुन्नमय्य विदुषां नो तद्रािं गोचरे ॥ २७ अङ्गेऽसङ्गिनि चन्दने न तु कियानेवावलेपो धृतः कष्ठे मौक्तिकगुण्ठितेन* गुणवान् हारोऽपि नारोपितः । संगृह्याञ्जनमजिते न नयने रम्ये तया कान्तया कान्ति किं कथयामि तद्वपुषि यां कामोऽपि नो विन्दति ॥ २८ पान्थप्राणहरं प्रसूनविलसच्चूतद्रुमाणां बने श्रुत्वा कोकिलया कृतं विरहिणी रावं निशीथे मुहुः । मूर्छामाप पुनर्विबुध्य मनसा पन्युः स्मरन्ती ततो मुश्चन्ती नयनाम्बुपूरमरुदत् पान्थप्रिया सस्वरम् ।। २९ [ वसन्तान्तकालवर्णनम् ] कर्णाटीकुर्च कोटिकेलिविलसल्लीलालसाः कोमलाः' कासारप्रसरत्तरङ्गततिषु क्रीडाकरा मारुताः। मल्लीजालविलासलालनकला लोला वसन्तात्यये वान्ति प्रातरनङ्गसङ्गरपरस्त्रीखेदविच्छेदकाः ।। [ ग्रीष्मकालवर्णनम ] धारायन्त्रतुषारसारकणिकानिर्वारितोष्मोदयं श्रीखण्डागुरुधूपवासरुचिरं हयं सचन्द्रोदयम् । शय्या पुष्पमयी च चन्दनरसः कर्पूरकस्तूरिका' वासः स्वच्छमकञ्चुका प्रियतमा ग्रीष्मे सुखस्यास्पदम् ॥ ३१ 1 Ms पुरुतः. 2 Ms 'त्या. 3 Ms 'वाधिलेपो 4 Ms तोन. 5 Ms 'कुट'. 6 Ms लसा. 7 Ms 'मला. 8 Ms कगः. 6 Ms 'कस्तुरिका. ३० [ श्लो. ३२-३८ ३२ शृङ्गारहारावली इदं नु किमु नीरजं, भवति तद्धि पङ्केरुहं किमेष रजनीकरो, ननु स लाञ्छनेनाङ्कितः । अथेति मधुराधरं चलविलोचनं सस्मितं विभाव्य दयितामुखं हृदि दधे मुदं वल्लभः ॥ मन्दं मन्दं निभृतचरणं 'पृष्ठतोऽभ्येत्य तस्याः स्निग्धः सायं करतलयुगेनाक्षिणी मीलयित्वा' । चुम्बत्येवं विपुलपुलकं गल्लयोरुल्लसन्त्याः वक्त्रं कामादधरमधुरं प्राणनाथः प्रियायाः ।। सुतनु मनसि मानं माऽनयानङ्गकेलौ 'दयिततममपि स्वं मानयालिङ्गनायैः । इति निगदितपत्यौ मानतो नालपन्ती कठिनकुचनटे सा नेत्रनीरं मुमोच ।। ३३ आशेयं सखि मे रुणद्धि हृदयं कान्तागमस्यानिशं धार्यन्तेऽपि मया कथंचिदसवस्तत्संगमाकाया । जल्पन्ती पथिकाङ्गनेति सहसा श्रुत्वा स्वरं प्रेयसः सव्रीडा समुदेव साश्रुनयना सा सस्वरा "सम्मग ।। ३५ मत्तद्विरदभूपाललीलागतिरसालसा । आयाति बाला लोलाक्षी मदालिङ्गनलालसा ॥ अनङ्गसरसैरङ्गैः सङ्गं संगम्य कान्तया । तनोमि रतपाण्डित्यं "विलीना निलये सखि ।। ३७ भूयोभिर्दिवसैरयं प्रियतमो देशान्तरादागतो विद्वानप्युचितं तनोति जडतामालापमनो जनः । इत्यालोच्य विलासलोलनयना कामाकुला कामिनी कान्ते चैव सखीजने निशि तनौ दीपे दृशं संदधे ।। ३८ 1 Ms प्र. 2 Ms भत्य. 3 Ms मिलयित्वा. 4 Ms दयत तमसि में स्वं. 5 Ms सस्मराः. 6 Ms विलीनिलये.
४० प्रलो. ३९-४५] शृङ्गारहारावली गच्छामीति समुत्थितो निवसतेः कान्तः समालम्बितो' विश्रब्धं परिरब्ध एव हि मया यातस्ततो निघृणः । यावन्मातरहं विलासशयने सुप्तास्मि चिन्तातुरा तावत् तेन शनैः समेत्य हसता वक्त्रे चिरं चुम्बिता ॥ ३९ स्निग्धं मुग्धे रचय नयनं विभ्रमालोकदक्ष वक्त्रे वाणी रचय सरले कोमलालापरम्याम् । अङ्गं रङ्गत्सुललितमथो भावय प्राणनाथे भूयो भूयो भव तदनुगा त्वं मिथः संकथासु ।। कीदृक् कोपो मनसि वसति प्रेमहारी तवायं पत्यौ नम्र विरमति न यश्चाटुवाचां विधिज्ञे । एभिः कृत्यै रसुजनजनं पूर्णकामं कृथा मा होत्कर्ष गमय सुजनं, तं पति स्वीकुरुष्व ॥ ४१ गङ्गेयं हरिणाक्षि हारलतिकाक्रान्तस्तनोच्चैस्तटा कालिन्दी किल कोमला विलसति त्वनील रोमावली । वक्रोक्न्या च सरस्वती सुललिता सङ्गश्च मध्ये मिथः एतास्तीर्थमुपागतास्त्वयि परं सेव्या त्वमेवासि मे ।। ४२ वक्षोजाचलयातिनी च विमला मुक्तालता जाहवी गेमाली ललिता कलिन्दतनया प्रोध प्रयातेव ते । मध्ये संगतयोस्तव प्रियतमे सौम्यं तयोः संगम संप्राप्नं मनसोऽभिलाषमखिलं सेवे सकामो ह्यहम् ।। ४३ मातमें न परा शरीरपटिमा वका मम भ्रूलता चेतो भीतिपरायणं मम चले स्थाने न मे लोचने । निर्यातौ हृदि गोलकावतितरां गुर्वी नितम्बस्थली मध्यं वापि गतं ममापि चरणौ मन्दां गति संश्रितौ ॥ ४४ धैर्य धेहि निरंतरं स्वहृदये बाले भयं मा कृथाः स्त्रीणामीगपाटवं किल वयःसंधौ समुत्पद्यते । तन्त्रज्ञो गदलक्षलक्षणविधौ दक्षो निदाने तथा वैद्यस्ते दयितः कलासु कुशलस्तस्मै तनुं दर्शय ॥ युग्मम् ४५ 1Ms लिंब. 2 Ms रम. 3 Ms "न्मील. + Ms °था.
४६ ४७ ४८ शृङ्गारहारावली [प्रलो. ४६-१२ [ प्रीष्मान्तकालवर्णनम् ] वहिं प्रोक्तिभर्तृकाहदि भृशं मन्दोऽपि संदीपयन् अङ्गग्लानिमनगरङ्गजनिता संभोगिनीनां हरन् । सुस्पर्शश्च वने नयन परिणति जम्बूतरूणां फलं व्यूढप्रौढकदम्बपुष्पसुरभिीष्मान्तवातो ववौ ॥ [ वर्षाकालवर्णनम् ] पान्थानुत्कलिकाकुलानतितरामुत्साहयन् पद्धतौ कान्तासंगमरागिणां धृतिमतामङ्गे स्मरं जीवयन् । 'जातीकोरकजालमाशु दलयन्नावाति वर्षागमे मेघोन्मुक्तपृषन्सुसिक्तवसुधागन्धं वहन् मारुतः ॥ धन्यः कोऽपि "पुमानलं जलधरे धीरं मृदङ्गोपमं ध्वानं कुर्वति गर्वितालिनिवहे गानं परं गायति । वध्वा सार्धमगारजालमतुलं संश्रित्य कामालसः सानन्दं तडिदङ्गनागणकृतं नृत्यं 'समुद्रीक्षते ॥ तत्रैव त्वरितं बजेति स मम प्राणाधिनाथो यतः त्यक्तं जीवितमेतया प्रियमपि प्रायो वियोगे तव । त्रैलोक्ये त्वति रूपमीदृशमिदं भूयोऽपि नो लभ्यते प्राणास्तां न परित्यजन्ति सुभग 'त्वद्ध्यानलग्ना अपि॥ ४९ 'पतद्गच्छन्निरालम्बान्' रक्षामनार्तिनः समम् । निवेद्य मद्य वो भर्तुः प्राणनाथमिहानय ।। नीरं नीरधरानीकेऽनेकधारं निरस्यति । निजनाथानता नारी नेत्रनीरजनिर्गतम् ॥ दोलत्कुण्डलचञ्चलांशुललितैरालोकिताशामुखः कुर्वन् कङ्कणमेखलाकलकलव्याजेन धीरध्वनिम् । धर्मान्ते जलबिन्दुसुन्दरतरस्तापापनोदाय मे शक्तोऽयं सुपयोधरस्तव घनश्चतःप्रमोदं नयेत् ॥ ५२ 1 Ms जाता. 2 Ms मुमानलं. 3 Ms ° द्वीक्ष्यते. 4 Ms विति. 5Ms सुभगन्धध्यान. 7Ms "लम्ब. 8 Ms ° माधवो. 9 Ms धीरद्ध्वनिम्. 6Ms पतं न.
५३ 3 गलो.५३-५८ ] शृङ्गारहारावली उत्तुङ्गावति'पीवरावतितरां पीनौ सुतीक्ष्णाननौ वक्षोजन्म शिलोच्चयौ राखि परं कान्तः कृशाङ्गो मम । कुर्यां यद्यपरि प्रयाति मरुता नेत्तनो विद्यते' तस्यैव प्रतिपालनप्रवणया रात्रिर्मया नीयते ॥ पीत्वा ममाधररसं दधितो नितान्त तृष्णातुरो मनसि यत् प्रमदं प्रपेदे । मत्तः स तेन सखि मां परिरभ्य वश्यां मुक्तांशुकां तदुचितं च समाचचार ।। ५४ इयं जलदमण्डली मलिनतां नमः प्रापयेद् गृहेऽतिमदनातुरा प्रथमयौवना कामिनी । अहं तु पथि "निष्ठितः कुसुमबाणबाणार्दितः परं विरहनिघृणः' कथमहो विधाता विधिः ॥ [शरत्कालवर्णनम् ] सुस्पर्शाः शालिगोपीविकटकुचतटाभोगयोगाभिरामाः प्रोन्मीलत्सप्तपर्णप्रसवपरिमलप्राप्तसौभाग्यभोग्याः । केदारोदारिवारिप्रसृमरकुमुदान्दोलन'प्रौढलीलाः पान्थस्त्रीणामनिष्टाः प्रियरतसुखदाः शारदा वान्ति वाताः।। ५६ त्वद्वक्त्रशारद निशाकर'" एष कान्ते कान्तांशुजृम्भितविलोचनकैरवोऽपि । 'उन्माद्य आमतनु मोहयते निकामं कुर्यादतो मम मनो मदनाधिरूढम् ॥ ५७ निःश्वासा'नामधरमधुरत्वं च धत्से कपोले संमृज्यन्ते रुचिररचनाः पाणिना यत्र वल्ल्यः । पत्युक्यिं श्रुतमपि न ते त्वन्मनस्ताप' हर्तुर- जातावेतौ सजडहृदये मन्युमानौ प्रिये तौ॥ 1 Ms ° उत्तंगावती'. 2 Ms 'लिलो. 3 Ms 'ध्यते. 4 Ms जलमण्डली. 5 Ms °लिनितां. 6 Ms °धि. 7 Ms °निघृ. 8 Ms शाली..9 Ms °लनापौ 10 Ms °निशाक ५. 11 Ms उन्मां मां तनु. 12 Ms मम 13 Ms हाता. 11 शृङ्गारहारावली [ श्लो. ५९-६४ परिमलमिलितालिर्मालतीपुष्पमाला सुरभिघुसृणमित्रं चन्दनालेपनं च । तुहिनकिरणरश्मिश्चञ्चला चापि दोला शरदि सुखविभूत्यै कामिनी कामलोला ।। ५९ आदौ बभूव कलहः प्रणयेन कश्चित् कालः पराङ्मुखतया शयने प्रयातः। पत्युमुखं सखि मयैक्षि पनर्विचिन्त्य तेनातिमात्रमधरेऽहमिय' गृहीता ॥ ६० ६१ कोदण्डीयति मार्गणीयति लसल्लोलं कृपाणीयति प्रत्यञ्चीयति चेषुधायति तथा सोल्लास पाशीयति । भ्रूवल्ली नयनं च वेगिचटुला हारावली नासिका कामिन्याः पुरुषेषु सुन्दरतरं तत्कर्णपालीयुगम् ।। वक्त्रेन्दु छत्र मीषस्मितमपि कुसुम भूलता चापमासीद् नेत्रद्वन्द्वं शरौघाः श्रवणपग्लिसत्कुण्डले दीपमाला । वक्षोजौ हेमकुम्भौ जघनपरिसरे भीरु सिंहासने ते बाल्यं जित्वातिचक्रं वपुषि हृदिभुवा यौवनस्याभिषेकः ॥ ६२ हिया विनमितानना मदविलोकलोलेक्षणा 'निगूढविहितस्मिता सपुलका नवोढा वधूः । सखीजनमनीदृशं किमपि भावमाबिभ्रती' चकार मदनातुरं रजनिवृत्तसंपृच्छकम् ।। ६३ दधत् कान्ति रम्यामलकविगलन्माल्यमलसं स्मरक्रीडाजन्यश्रमजलपृषन्मिश्र'तिलकम् । रतान्ते संमीलन्नयनकमलं चारु दयितः पपौ कान्तावक्त्रं सुचिरमिति तृष्णातरलितः॥ ६४ 1 Ms °हमीय. 2 Ms गृहीताः. 3 Ms ° सल्लोल. 4 Ms ° पासी 5 Ms 'न्यात्पु. 6 Ms °मिष. 7 Ms निगृह. 8 Ms °वीघ्रती. 9 Ms 'भि.
११ लो. ६५-७१ ] शृङ्गारहारावली कान्ते, वल्लभ, यामि, याहि, भवतो मार्गे शिवं' वर्तताम् आयाहि त्वरितो गृहं पुनरपि स्वं पान्थ देशान्तरात् । अस्माकं भवितव्यतेति विहितेत्युक्त्या सनिःश्वासया रूद्धो लोचनवारिहारिकुचया प्राणेश्वरः प्रस्थितः ।। ६५ अहो स्नेहमहो रूपमहो कान्तिमहो रतिम् । अहो लीलामहो वाणी कदा तम्या लभेमहि ।। ६६ *अपूर्वः कोऽपि रूपन्य योषितां महिमा महान् । मोद्यन्ते योगिनो येन नेत्रगोचरवर्तिना ॥ ६७ लावण्यसलिलापूरा विलासलहरीयुता। चललोचनमीनेयं बाला कामतरङ्गिणी ।। ६८ चरणपतितां सलग्नाङ्गी भवत्यनुरागिणी गतघृण कथं मुग्धामेतां भवानवमन्यते । इति निगदितस्तत्सख्या तु प्रियः प्रणयान्वितो विविधकरणे मनिं मुक्त्वा प्रियां समरञ्जयत् ।। ६९ रथो वामाक्षीय चपलनयने यस्य तुरगौ कशा वेणीरश्मिः सरलतरला हारलतिका । नितम्बो यच्चत्रं कुचयुगवरूथो हरति मे 'तमारूह" श्वेतः कुसुमविशिखः सारथिरसौ ।। ७० विलासावासान्तः कितवचरितेन प्रणयिना सुखेनासीनायाः सुसखि शयने सायकमये । कराक्रान्तौ कृत्वा कथमपि कुचौ मेऽतिकठिनौ हठेनाश्लिष्टायाः परिशिथिलतां नीविरभजत् ।। ७१ 1• Ms शवं. 2 Ms प्राणेश्वरं. 3 Ms 'ति. 4 Ms अपूर्व. 5 Ms मिनेयं. 6 Ms सलग्ना. 7 Ms 'से, 8 Ms निगदितं. 9 Ms करुणै. 10 Ms 'लतला. 11 Ms °तदा". 12 Ms 'ढो.
२ ७२ शृङ्गारहाराषली [ श्लो. ७२-७७ [ हेमन्तकालवर्णनम् ] कन्दादेशजाग्रद्विविधसुरतविकान्तदन्तक्षतोष्ठ'- 'व्यावल्लत्कान्तिराजत्सु ललितललनासीत्कृतापीतवेगाः । हेमन्ते वान्ति वाता विरहितवनितावासोष्माभिनिर्यन्- निःश्वासा वारिधाराधरणबहुलतामुष्णतामुद्वहन्तः ॥ प्रौढा पीनपयोधरोरुकलशा' माञ्जिष्ठरागांशुका सौम्या वृत्तनितम्बचक्रचतुरा पर्यङ्कभृमिस्थिता । अन्तः'सभृतभासुरस्मरबृहद्भानुमनोहारिणी हेमन्ते हिमहारिणी सुरवस्ता नृणां हसन्ती प्रिया । शीतभीतस्तव संगमन मनःस्थितेनैव न सान्त्वयामि । कदावयोरेव विधिविधाता शय्यासने सन्नतगात्रयोगम् ॥ ऊरुभ्यां गाढमूरू मदनभदभवद्राव्य भावोत्तराभ्यां पीनोत्तुङ्ग स्तनेन "प्रमुदितवदना वक्षसालिङ्गय वक्षः। सोत्कण्ठं कण्ठदेशे निजभुजलतया लीलयारुह्य दोलां हेमन्त स्वभर्तुनिशि च सुकृतिनी कापि शेते गृहान्तः।। ७५ ७३ ७४ 134 मुग्धां नाथ वृथा प्रतारयसि रे किं मां वृथा भाषसे नेपास्मीति मया विना भव सखीमान्यो जनो मान्यताम् । मामेवं "वद दुर्वचः पिशुनया कान्ते कया पाठिता वर्तन्ते त्वयि "संतत प्रियतमे प्राणा इमे मामकाः॥ ७६ शय्यायां शयिता समीक्ष्य दयितां बाष्पाम्बुपूर्णेक्षणां पप्रच्छागतसाध्वसः कुत इदं कान्तस्तदालीजनम् । अन्यस्त्रीगमनात् तवेति कथिते तासां प्रतीत्यै पुरः संस्पर्येत 'मुहुर्मुहुः प्रियतमावक्षोजलिङ्गद्वयम् ॥ ७७ 1 Ms °क्षितोष्ठ. 2 Ms ° बलत्का . 3 Ms ° राजसु. 4 Ms "वेगा'. 5 Ms °भिनि. 6 Ms °कलिशा. 7 Ms °संभूत . 8 Ms शांतयामि. 9 Ms °वतबा 10 Ms °त्तङ्ग. 11 Ms °न मुदित'. 12 Ms हेमन्ततो. 13 Ms नैषास्मिती. 14 Ms चद. 15 Ms संतत. 16 Ms पुरूः 17 Ms मुहुर्मुहु. 16 ०. ।
७९ ८० प्रलो. ७८-८५] शृङ्गारहारावल्ली अचिन्त्यापि स्नेहं करकलितमाक्षिप्य वसनं प्रयाते दृन्नाथे सविनयमनादृत्य वचनम् । ततः 'सख्याऽ लक्ष्य प्रियतममथोच्चैःस्वरमहो पटान्तेनावृत्य स्वमुखमनया तत्र रुदितम् ।। इन्दुः सुन्दरि मन्दरश्मिरधुना जातो विभाता निशा कान्तानां कटुरारटीति विकटः कान्ते पटुः कुक्कुटः। हीनस्नेहरसेन रुक्षदशया दीपोऽपि मन्दायते मानं मानिनि मुञ्च वल्लभमिमं कामोत्सवै 'रञ्जय ॥ बाणेनामृदुना 'दुनोति मदनो मन्दोऽपि मां त्वत्कृते दीनेऽस्मिन् नववल्लभे कुरु दयामिन्दीवराक्षि प्रिये । अङ्गैः संगमरङ्गभङ्गिचतुरैरानन्दितालिजन स- तल्पोत्सङ्गविकल्पजल्पनपरं मानेन चालिङ्गय ॥ त्वां नता स्मर कृताञ्जलिरेषा मा विमानय मनोरम काम । आगते तु दयिते भवदाज्ञां धारयामि सरसा शिरसाऽहम् ।। ८१ दुकूले प्रतिकूलं में हारो हा रोचते न मे । मेखला मे खला जाता 'हंसक हिंसकं सखी ॥ मुक्ता "मुक्तालता कण्ठे कान्ते कान्ते समागते । अञ्जनेनाञ्जिते” सख्या नेत्रे नेत्रधृतिः "कृता। ८३ मुक्ता मुक्तालतेयं कुचकलशरुचा कण्ठदेशे मुदेशे वासो वासोचितं स्वं परिहितमनया चारु बिम्बे नितम्बे । नक्तं भुक्तं विभुक्तं विपुलनयनयोञ्जनं रञ्जनं वै भर्ता धर्ता विहर्ता सुरतविलसितै रजिजतोऽ" जितश्च ।।८४ बद्ध्वा दृढ़ रशनया प्रणयप्रकोपा नीत्वा निवासभवनं विहितागसं माम् । कान्ता विलोचनजलप्लुतचक्रचन्द्रा कर्णोत्पलेन सविलासमसौ जघान ॥ ८५ 1 Ms सक्ष्यालक्ष. 2 Ms विभातो. 3 Ms कुर्कटः. 5 Ms हुतोरिमृदुनो.6 Ms राहो. 7 Ms हंसकिं. 8 Ms मुक्त'.9 Ms°ने नोजने. 11 Ms 'तोरं. 12 Ms रसनया. 13 Ms ° भुवनं. + Ms रञ्जयः. 10 Ms कृता..
शृङ्गारहारावली [ श्लो. ८६-९२ आलिङ्गितानि नवपल्लवकोमलानि बाला बलादपि 'मयातिमनोहराणि । अङ्गान्यनङ्गललितानि किमात्मनैव संकोचयत्यनिभृतानि मदालसानि ।। ८६ [शिशिरकालवर्णनम् ] किश्चिद् द्रुमान् मुकुरयस्तरसा रसालान् हेमन्त कान्तमदनं मदयन् जनेषु । 'लीलायितेन मलयाचलमल्लमालाद् आवाति मारुत इतः किल शैशिरोऽयम् ।। एतस्मिन् 'शिशिरे विधौ विमुखिते यासां प्रियः प्रोपितः पत्युः संगमसंभवं सुखमहो यासां च नो जायते मानिन्यो धृतभूरिमानविभवास्तोषं न या लेभिरे तासां किं न मनोभवः सखि मनः 'सीमन्तिनीनां दहेत् ।। ८८ [ वसन्तसमागमः ] प्रियतम न ते युक्तं गन्तुं वसन्तसमागमे मुकुरिततरावङ्कस्थां मां विहाय मनोगताम् । कलकलवान् रात्रौ कृत्वा सकोकिलया 'रुतान भवति चलिते संप्रत्येषा न जीवितुमुत्सहे ॥ वासावासविलासवासित मतिः प्रेमप्रसन्नां प्रियाम् आलिङ्गन दयितो दृढोष्मलकुचां शीतं च नो 'विन्दते । चेतःसंपरिवर्तमानदयितासंदीप्यमानोल्लसत्- 'संसर्पद्विरहाग्नितापितवपुः पान्थोऽपि नो जग्मिवान ॥९० प्राणश्वरे समायाते प्राणा पुनरागताः । सखीदं कौतुकं पश्य मृताहं जीविता पुनः ।। निर्याते दयिते गृहादपि सखि प्राणेगता पृष्ठतः "प्राग्ग्रामे पुनरागतास्मि ''भवनं कुर्वेऽस्य सेवां ततः। स्वप्नेषु प्रतिरात्रिजातसुरनैश्वेतोविमोहात्मकै- स्तत्रापि 'प्रणयातिरेकललिने: प्राणेश्वरो रञ्जितः ॥ ९२ 1 Ms यानि. 2 Ms " मंत. 3 Ms यते'. 4 Ms शिशरों. 5 Ms शशिरे. 6 Ms. ° मंतनी . 7 Ms कृतान्. 8 Ms. °वासितः . 9 Ms विंदत. 10 Ms °लसत. 11 Ms संसर्य. 12 Ms °गता. 13 Ms प्राग्राम. 14 Ms भुवनं. 15 Ms °यति. 16 Ms 'ते. 11 मे 13 ९३ 2% ६ प्रलो. ९३-९९] शृङ्गारहारावली तन्वीयं तरलेक्षणा मम मनः पञ्चषुणा हन्यते वक्षोजावियमुन्नतौ' प्रबहते खिन्नं ममेदं मनः । मध्येऽसौ सुकृशा "मभादृढमतिप्राप्नोति भङ्ग मनो लावण्याम्बुपरिप्लुतेयमबला शून्यं मदीयं मनः ॥ 'यत्रादौ कलमेखलाकलकलः प्रादुर्बभूवातुल- ग्तत्रैवाथ तदेव नू पुररणत्कारम्ततः शुश्रुवे । तन्मन्ये पुरुषायितं प्रमदया वामायितं कामिना पश्चाचित्ररतावसानसमये ताभ्यां स्वभावे स्थितम् ।। ९४ आनन्दं हृदि धेहि कङ्कणमथो संधेहि पाणिद्वये 'महासः परिधेहि हारमुरसि त्वं पादयो५ पुरम् । सामोदानि निधेहि मूनि कुसुमान्यक्ष्णोश्च 'कालाञ्जन मुग्धे साधु विधेहि मङ्गलमथायाते निजप्रेयसि ॥ समागतः पूर्णमनोरथासि तवैव कान्तः परिपूर्णकामः । आगच्छ बाले कुरु मङ्गलानि गौरी प्रसन्नैव तवाद्य नूनम् ।। ९६ सानन्दा भव सादरा भव भव प्रीता सकामा भव साहारा भव भूषिता भव भव प्राणेश्वरे 'प्रेयसी । आयातेन रमस्व वासभवने "बाह्याच्च देशान्तराद् नानामोहनपण्डितेन सहिता कान्तेन कामोत्सवैः॥ चिन्तां मुश्च, भजस्व ''मानिनि धृति, मोहे मनो मा कृथाः 1"द्विवेरेव हि वासरः "प्रियतमप्रत्यागमस्यावधिः । इत्येवं प्रतिबोधयेत् प्रियसखी यावत् प्रियां सादरं तावत् "कान्त उपागतोऽङ्गगभुवि प्रीणाति वाक्यामृतः॥९८ आरूढोऽतिसमुन्नतस्तनमयं सिंहासनं योषितां तद्वक्वेन्दुधृतातपत्ररुचिरस्तव्लताकार्मुकः । तद्वेणीविलसत्कृपागफलकः शृङ्गारिणां पूजित- स्तल्लोलेक्षणमार्गणो विजयते श्रीनन्दनः श्रीमताम् ।। • ९९ .1 Ms. मन्न तौ. 2 Ms मम . 3Ms यात्रादोकल'. 4 Ms °वाप्य. 5 Ms सेवेद्वि.6 Ms द्वासा.7Ms कालीजनं. 8 Ms प्राणेश्वर.9 Ms प्रेयसि 10 Ms बाधष. 11 Is मानिनी. 12 Ms द्वित्रि. 13 Ms. वासरे 14 Ms प्रियतमः. 15 Ms कान्तमुपा. 16 Ms भूवि. ९७ शृङ्गारहाराषली [प्लो. १००-१०१ सौजन्ये निरताः खलेषु विरता 'विद्वद्गुणग्राहिणो लोके विश्रुतकीर्तयो गुणभृतो ये केऽपि शृङ्गारिणः । विभ्राणा करिकुम्भतुङ्गकठिनौ पीनावुरोजौ सदा तेषां वामविलोचना गुणवती भोगाय भूयाद् भुवि॥ १०० उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्मधिवरां सानन्दमुत्कर्षितां' प्राप्योच्चैविलसत्सुवर्णिगुणिनी खेलन्मनोभूमणिम् । 'श्री हर्षः 'सुहृदां विभूषणकृते सद्वाक्यमुक्ताफलै- 'रग्रथ्नाद् द्विजराजरोचिस्मलां शृङ्गारहारावलीम् ॥ १०१ इति श्रीहर्षविरचिता शङ्गारहारावली समाप्ता। 1 Ms विद्वद्गुणा ग्राहिणी. 2 Ms कठिना. 3 Ms सूक्ष्म्य विषरा. 4 Ms 'त:. 5 Ms श्रीहर्ष. 6 Ms सुहृद. 7 Ms यदग्रन्थद्विज'. 8 Ms प्ताः. सं. १७३३ आषाढ वदि ८ शुक्रे लिखित निवेदिविद्याधरसुतलक्ष्मीधरेण ॥ (पुष्पिकानन्तरं श्लोकद्वयीयमधिका समुपलभ्यते ) पूर्णाम्भःकुम्भभाराः प्रजवनचलिताश्चुञ्चुक' चालयन्त्य- श्चील संवेलयन्त्यश्चलकमलशो लोकमालोकयन्त्यः । झंकारैझंझराणां झटिति जनमनःखेदमुत्पादयन्त्यो नागर्यः स्वर्णगौयों वडनगरभवा यान्ति गेहं सरस्तः ॥ १ भो पान्थ' भ्रान्तचेताः परिभ्रमसि कथं नैव दृष्टा कदाचिद वत्सोवाली मृगाक्षी जगति सुविदिता रूपराशिं दधाना । यस्याः सौन्दर्यराशिं विधिरतिचतुरां वीक्ष्य चके घृताची यत्पं द्रष्टुमिन्द्रो मखशतसुकृतकसहन्नं दधार । 1 Ms चञ्चुकं. 2 Ms पान्थ : 3 Ms ता.
श्लोकपति-अनुक्रमणिका [Figures indicate the numbers of verses.] ८६ ११ ८० ३५ ५ ३४ ६९ AD ३८ ७९ १८ अग्रथनाद् द्विजराजरोचि अङ्गग्लानिमनगरङ्ग अङ्गान्यनङ्गललितानि अङ्गे संगिनि अङ्गैः संगमरङ्गभनि अग रङ्गत्सुललितमथो अचिन्त्यापि स्नेह अञ्जनेनाञ्जिते अथेति मधुराधरं अद्याहमालि तलिने अनङ्गसरसैरङ्गैः अन्तर्बाष्पनिरुद्ध अन्तःसंभृतभासुर अन्यस्त्रीगमनात तवेति अपूर्व कोऽपि रूपस्य अस्माकं भवितव्यतेति अहह विषमो मानग्रन्थि अहो लीलामहो वाणी अहो स्नेहमहो रूपमहो अहं तु पथि निष्ठितः आक्रान्तहृदयेनाहं आगच्छ बाले कुरु आगतं तु दयिते आगम्याङ्गणभूमिका आदो बभूव कलहः आधूय चन्दनवनी आनन्दं हृदि धेहि आयाति बाला लोलाक्षी आयातेन रमस्व आयातः पुरतः कुतोऽपि आयाहि त्वरितो गृह आरूढोऽतिसमुन्नत १०१ आलिङ्गन् दयिता ४६ आलिङ्गितानि नवपल्लव ८६ आलिङ्गन्य मां किमपि २८ आवाति मारुत इतः आशेयं सखि मे ४० आश्लिष्यत् कुचचक्र ७८ इति निगदितपत्यौ ८३ इति निगदितस्तत्सख्या ३२ इत्थं सा सुभग ११ इत्यालोच्य विलास ३७ इत्येवं प्रतिबोधयेत् ८ इति प्रिये भाषिणि ७३ इदं नु किमु नीरज ७७ इन्दुः सुन्दरि मन्दरश्मि ६७ इयमपि गता पूर्णप्राया ६५ इयं जलदमण्डली २१ इयं परित्रस्तकुरङ्ग ६६ उत्तुङ्गावतिपीवरा ६६ उन्माध मामतनु ५५ उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्म १६ ऊरूभ्यां गाढमूरू ९६ एतस्मिन् शिशिरे ८१ एतस्मिन् समये २० एतास्तीर्थमुपागता ६० एभिः कृत्यैरसुजन ३ कठिनकुचतटे ९५ कण्ठे मौक्तिकगुण्ठितेन ३६ कर्णाटीकुचकोटि ९७ कर्णोत्पलेन सपिलास २६ कथय कठिने कीहक ६५ कदापयोरेव विधि ९९ कन्ददेशजाग्रद्विविध २३ ર ४१ ३० ७४ ७२ १८ कराक्रान्तौ कृत्वा m ७० ६९ करणमनसाप्युक्तं मुक्तं कलकलरवान् रात्री कशा वेणीरश्मिः कान्ताकान्तकपोल कान्ता किं कुरुते. कान्तानां कटुरारटीति कान्ताविलोचन कान्तांशुजम्भित कान्तासंगमरागिणां कान्ति किं कथयामि कान्ते कामतरलेन कान्त चैव सखीजने कान्ते त्वन्मुखचन्द्रमा कान्तेनाद्य समागतेन कान्ते बल्लभ यामि कान्तो मन्मयता कामिन्याः करकङ्कणे कामिन्याः पुरुषेषु कामः कौसुमकार्मुक कालिन्दी कील कालः पराङ्मुखतया कासारप्रसरत्तरङ्गततिषु ७१ गच्छामीति समुस्थितो २२ गतघृण कथं मुग्धामेतां ८९ गृहेऽतिमदनातुरा ग्लानि हरन् सुरतजा ३ १ घनस्तनी चारुमुखे २३ ९ धमांन्ते जलबिन्दु ७९ चकार मदनातुरं ६३ ८५ चरणपतितां संलमाङ्गी ५७ चरणशरणं दासीभावं २१ ४७ चललोचनमीनेयं ६८ २८ चापल्यान्मधुर चकार ११ चिन्तां मुश्च भजस्व ३८ चीलं संवेलयन्त्य (Footnote p. 16) १ ५ चुम्बत्येवं विपुलपुलकं ३३ १४ चेतो भीतिपरायणं ४४ ६५ चेतः संपरिवर्तमान १४ छिन्ने तत्र चिरान्नि १७ जल्पन्ती पथिकाङ्गनेति ३५ ६१ जातावेतौ सजडहृदये १ जातीकोरकजालमाशु ४७ झकाझकाराणा (Footnote p. 16) १ ६० ततः सख्याऽलक्ष्य ७८ ३० तत्रापि प्रणयाति ९२ ८७ तत्रैव त्वरित ४९ ३२ तत्रैवाथ तदेव नूपुर ४१ तदपि हृदये नासीत् ૨૨ ८ तद्योग्यं तदहं चकार ५७ तवक्त्रन्दुधृतातपत्र ५३ तवेणीविलसत्कृपाणफलका ९९ ५२ तनोति कान्ति २४ १९ तनोमि रतपाण्डित्यं २३ तन्त्रको गदलक्ष ४५ ५६ तन्मन्ये पुरुषायितं ९४ ६१ तन्वी न कस्य १० ४ तन्वीय तरलेक्षणा ९३ ४२ तमारूढप्रचेतः किञ्चिद् द्रुमान किमेष रजनीकरो कीहक कोपो मनसि कुश्चत्कोकनदश्रियो कुर्यादतो मम कुर्या यधुपरि प्रयाति कुर्वन् कङ्कणमेखला कृतार्थय सखि प्रियं कृशोदरी मोहकरी केदारोदारिवारि कोदण्डीयति मागणीयति कः शाखी सखि गङ्गय हरिणाक्षि तावत् तेन शनैः ८८ तर्वेष धन्दुरखण्ड २४ निजनाथानता नारी तल्पोत्सङ्गविकल्प ८० नितम्बिनी मत्तगजेन्द्र २३ तल्लोलेक्षणमार्गणो ९९ नितम्बो यच्चक तस्यैव प्रतिपालन ५३ निर्याते दयिते ९२ ३९ निर्यातौ हृदि गोलका तासां किं न मनोभवः ८८ निवेद्यमद्य वो भर्तुः तुङ्गायेत मदेन ५ निश्वासानामधर तुहिनकिरणरश्मि ५९ निःश्वासा वारिधारा ७२ तृष्णातुरो मनसि नीत्वा तत्र जगाम तेनातिमात्रमधरे ६० नीत्वा निवासभवनं तेषां वामविलोचना १०० नीरनिकान्तरचरन्न तोयान्तरल्ललित १२ नीरं नीरधरानीके त्यक्तं जीवितमेतया ४९ नेत्रद्वन् शरौघाः ६२ त्यज कठिनतामेतामाशु २१ नैषास्मीति मया विना ७६ त्वद्वक्त्रशारद ५७ पटान्तेनावृत्य स्वमुख त्वां नता स्मर ८१ पतद्गच्छनिरालम्बान् प्रलोक्ये त्वतिरूप ४९ पत्युमुखं सखि ६० दधत कान्ति रम्या ६४ पत्युः संगमसंभवं दन्तचन्द्रिकया नूनं ६ पत्युर्षाक्यं श्रुतमपि दयिततममपि स्वं ३४ पत्यो नने विरमति ४१ वित्रैरेव हि वासरैः ९८ पप्रच्छागतसाध्वसः ७७ दीनेऽस्मिन् नववल्लभे पपौ कान्तावक्त्र ६४ दुकूले प्रतिकूलं मे ८२ परिमलमिलिता दोलन्कुण्डलचञ्चलांशु ५२ परं विरहनिघृणः दृष्ट्वा कान्तपराजय ११ पधाच्चित्ररतावसान धन्यः कोऽपि पान्थ प्राणहरं प्रसून २९ धार्यन्तंऽपि मया ३२ पान्थानुत्कलिका धारायन्त्रतुषारसार ३१ पान्थस्त्रीणामनिष्टाः धैर्य धेहि निरन्तरं ४५ पास्यामि पार्वणसुधाकर १२ ध्वानं कुर्वनि पीत्वा ममाधररसं नक्तं भुक्तं विभुक्तं ८४ पीनस्तनी सकल १० नागर्यः स्वर्णगौर्यो (Footnote p.16)१ पीनोत्तुङ्गस्तनेन नानाप्येष समागतः २० पूर्णाम्भः कुम्भभाराः (Footnote. p.16) १ नानामोहनपण्डितेन ९७ प्रणतिनिरतः कान्तः निगूढविहितस्मिता ६३ प्रत्यञ्चीयति चेषुधायति निर्गत्यावसथावह २६ प्रत्यादिष्टमहावियोग २० ४४ ९५ प्रयाते हन्नाथे मातमें न परा प्राग्ग्रामे पुनरागतास्मि ९२ मानिन्यो धृतभूरिमान प्राणास्तां न ४९ मानं मानिनि मुञ्च प्राणेश्वरे समायाते ९१ मामैवं वद दुर्वचः ७६ प्राप्ते प्रेमणि लीनतां १५ मार्ग वीक्ष्य विलोचनो २० प्राप्योच्चविलसत्सुवर्णि १०१ मुकुरिततरावङ्कस्थां प्रियतम न ते युक्तं ८९ मुक्ता मुक्तलता ८३ प्रियसखि कृतो १८ मुक्ता मुक्तलतेयं प्रिये कुचौ कुङ्कम २४ मुक्तांशुकां तदुचितं प्रियेण रतनाथेन १६ मुग्धां नाथ वृथा ७६ प्रोन्मीलत्सप्तपर्ण ५६ मुग्धे साधु विधेहि प्रौढा पीनपयोधरोरु ७३ मुश्चन्ती नयनाम्बु २९ बद्ध्वा दृढं रशनया ८५ मूर्छामाप पुनर्विबुध्य बाणेना मृदुना दुनोति ८० मेखला में खला ८२ बाला बलादपि ८६ मेघोन्मुक्तपृषत्सु बाला बालसखीजनेन मोयन्ते योगिनो येन ६७ बालायाः शनकै- २७ यत् पीतं मुख बाल्य जित्वातिचके ६२ यत्रादौ कलमेखला बिभ्राणा करिकम्भतुङ्ग १०० यद्रूपं द्रष्टुमिन्द्रो (Footnote p. 16)२ भजस्व मुदमदभुतां १९ ययौ सहायोऽथ २५ भर्ता धर्ता विहर्ता यस्याः सौन्दर्यराशि (Footnote p.16)२ भवति चलिते ८९ यावन्मातर ३९ भूयो भिर्दिवसैरयं ३८ यास्यामीत्यभिधाय भूयो भूयो भव ४० युग्म कुण्डलयोललो १७ भ्रवल्ली नयन ६१ युञ्जानो विजयी भोणन्थ भ्रान्तचेताः (Footnote p.16)२ रतान्ते संमीलन्नयन ६४ मत्तद्विरदभूपाललीला ३६ रथो वामाक्षीयं रमस्व पतिसंगता १९ मध्येऽसौ सुकृशा ९३ रात्रौ यत्सखि कौतुकं १४ मध्ये संगतयोस्तव ४३ रुद्धो लोचनवारि ६५ मध्यं क्वापि गतं ४४ रोमाली ललिता मन्दापतितकन्धरा ८ लावण्यसलिलापूरा ६८ मन्दं मन्दं निभृत ३३ लावण्याम्बुपरिप्लुतेय ९३ ममोत्सने तवैवास्तु लीलायितेन मलया मल्लीजालविलासलालन ३० लोके विश्रुतकीर्तयो १०० मातः किं करवाणि २६ वक्त्रं कामादधरमधुरं मत्तः स तन ૨ ૨૨ ७४ २९ २० ૨ ૨૨ ६३ २१ ९ वक्वेन्दुच्छत्रमीष ६२ शय्यायां शयितां वक्त्रे वाणी रचय ४० शय्यायां स्मररागमागत वक्त्रोक्त्या च सरस्वती ४२ शरदि सुखविभूत्यै वर्तन्ते त्वयि संतत ७६ शिरसि विधृतं भूयः वत्सोवाली मृगाक्षी (Footnote p.16)२ शीतभीतस्तव वध्वा सार्धमगार शीतं सुगन्धि मरुपान्थ वहिं प्रोषितभर्तृका ४६ श्रीखण्डागुरुधूपवास वस्त्रान्ते क्व नु २७ श्रीहर्षः सुहृदां वक्षोजन्मकिशोरको ८ श्रुत्वा कोकिलया कृतं वक्षोजन्मशिलोच्चयों ५३ श्रीणीभगलमगति वक्षोजा चलयातिनी ४३ षष्ठो जैत्रशरः वक्षोजावियमुन्नतौ ९३ सखि परिहता ब्रीडा वक्षोजौ हेमकुम्भी ६२ सखीदं कौतुक वातः प्रगेऽतरलयत् ३ सग्वीजनमनीशं वान्ति प्रातरनङ्गसङ्गर सद्वासः परिधेहि वार्तालिङ्गनचुम्बनानि १५ सफलय ममाबन्ध वार्तासु तस्य निरता समागतः पूर्णमनोरथासि वासः स्वच्छमकञ्चुका ३१ सखोडा भवतो वासावासविलास ९० सस्मेरं सकट वासो वासोचित ८४ साकं कन रत विद्वानप्युचितं ३८ सव्रीडा समुदव विद्रावयति संपूर्णो ६ सानन्दं तडिदङ्गना विभाव्य दयितामुख ३२ सानन्दा भष सादरा विलासावासान्तः ७१ सा पश्यति प्रियतमा विलोक्य तां मन्मथ २५ सामोदानि निधेहि विविधकरणैर्मानं मुक्त्वा ६९ साहारा भव भूषिता विश्रब्धं परिरब्ध ३९ साहारेषु मनोऽवलेप विसर्जय सुदुर्जनं गणय १९ स्निग्धः सार्य करतल वेगातिदुःसहविदारण १३ सुखेनासीनायाः वैद्यस्ते दयितः ४५ सुतनु मनसि मानं व्यस्ते सायकपञ्चके २ सुरभिघुसणमिश्रं व्यावल्लत्कान्ति ७२ सुषणपङ्कलह व्यूढप्रौढकदम्बपुष्प ४६ सुस्पर्शश्च वने नयन् शक्तोऽयं सुपयोधरस्तव ५२ सुस्पर्शाः शालिगोपी शर्मप्रेम तनोतु २ सीत्कण्ठं कण्ठदेशे शय्या पुष्पमयी ३१ सौजन्ये निरताः खलेषु or ३२ १३ ९७ ९ ३४ २४ १०.
२२ २ ३ सौम्या वृत्तनितम्ब सौवर्णनूपुररण- सौहान्मधुमत्यजन संकोचयत्यनिभृतानि संगृह्याञ्जनमञ्जितेन संप्राप्तं मनसो संमृज्यन्ते रुचिररचनाः संवर्य सम्यगपि संसर्पद्विरहाग्नि संस्पश्येत मुहुर्मुहुः स्तनाननं संस्पृशति स्तनौ स्तनान्तरन्यस्तो स्मरक्रीडाजन्य स्वप्नेष प्रतिरात्रि ७३ स्वर्गादप्यतिर्दुलभ १० स्निग्धं मुग्धे रचय १ स्त्रीणामीगपाटव ८६ स्वेनैव या वरकुच २८ स्थैर्य भजन्नति ४३ हठेनाश्लिष्टायाः हर्षोत्कर्ष गमय १३ हीनस्नेहरसेन रुक्षदशया ७७ हेमन्तकान्तमदन हेमन्तौ स्वभर्तुनिशि हेमन्ते वान्ति वाता ६४ हेमन्ते हिमहारिणी ९२ हिया विनमितानना ८७. ७ ७२ ७३ ६३ " . NOTES श्लो. १. अन्वयः-विजयी कामः कौसुमकार्मुकं करतले कृत्वा, कान्ताकान्तकपोल- मण्डलतले पत्रावलीकमणि कामिनोऽधिकं युञ्जानो, रत्यानिशमनुयातः, जगन्ति मदयन् , सौहार्दान्मधुमत्यजन् हि, भुवि भवतां सौख्याय भूयात् । विजयोऽस्यास्तीति विजयी । अत इनिठनौ " । काम्यतेऽनेन पुसि संज्ञायां घः, कामः । कुसुमस्येदम् कौसुमम् "तस्येदम्" सूत्रेणाण । कर्मणे प्रभवति, इति कार्मुकम्-'कर्मण उक" सूत्रण उकञ् प्रत्ययः आदिवृद्धिश्च । युङ्क्ते इति युञान:-"लटः शतृशानचौ." इति शानच । करस्य तलं तस्मिन् करतले । कृधातोः क्त्वा प्रत्ययः “समानकर्तृकयोः पूर्वकाले क्त्वा"। कान्तौ च तौ कपोलौ च कान्तकपोलौ, कान्तायाः कान्तकपोलौ, तयोमण्डले (मण्डली वा)। मण्डयतीति मण्डलम् । वृषादित्वात् कलच । तयोस्तलं, तस्मिन् पत्राणामावली, तस्याः कर्म, तस्मिन्, कामोऽस्न्यस्येति कामी, तस्य कामिनः । अनुयात इत्यत्र कर्तरि क्तः, " गत्यकर्मक०" सू. । मदयतीति मदयन् शतृ० । शोभनं हृदयं यस्य सः सुहृत , तस्य सुहच्छ- ब्दस्य सप्तम्यर्थे भवार्थे "तत्र भव'' इति सूत्रेणाण । अनुशतिकादित्वादुभय- पदस्य वृद्धिः । सुहृदि भवं सौहार्द, तस्मात् सौहार्दात् । अथवा इदमर्थेऽण । त्यजतीति त्यजन, न त्यजन अत्यजन, शतृ । सुखस्य भावः कर्म वा सौख्यम् , व्या-तस्मै सौख्याय. भवतां भूयात् । पत्रावली (पत्रभङ्गः) पत्राणां पत्राकृतीनामावली श्रेणी राजि । 'कामः पश्चशरः स्मर' इत्यमरः । The reading teratay of the Ms. has been emended by दन्मिधु." The sense requires पञ्चमी. The omission of 'न' from न्म must be due to the carelessness of the scribe. This is a मङ्गल or benedictory verse. According to दण्डिन, a महाकाव्य begins with' आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम् (का. द, प. १, श्लो. १४.). This, however, holds good about all literary works. In this connection the following sentence is generally quoted from the महाभाष्य of पतञ्जलि-" मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गला- न्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते धीरपुरुषाण्यायुष्मत्पुरुषाणि च भवन्ति अध्येतारच प्रवक्तारो भवन्ति । Dr. A. B. Dhruva in his Notes on स्याद्वादमञ्जरी discusses this tonic im some detail which heimo very instructive. I quote below:
“Much intellectual energy has been spent in Brahmanical books of Logic (ATHIAT and 2017 ) on demonstrating the necessity of Het and on determining the manner in which it acts towards fulfilling its purpose. The duty of performing a Prato is based upon fern (practice of the good and respectable ) which itself presupposes, say the res, a vedic commandment. As regards its modus operandi, while some hold that it brings an undertaking to a successful completion, removing obstacles if any ( Farfe or fafarewafa), others think that its function is simply to counteract the bad luck which causes obstacles (faereae), the completion itself depending upon other natural or supernatural causes. Then, again, while some connect the #5 with the completion (समाप्ति) through the removal of obstacles (विघ्नध्वंसस्तु AFZET ITTH), others believe that a kind of religious mierit ( 3793 ) is created by the 197, which removes the obstacles and produces the completion अपूर्वद्वारैव मङ्गलस्य समाप्तिहेतुता). The scholiasts were not unaware of such incomplete works in Indian literature as बाण's कादम्बरी despitee a मङ्गलाचरण, and complete works without it #Fanato. Consequently, they have endeavoured to explain the breach in the causal law by the hypothesis of ratu done in it previous life (HH:I AF), and also of comparative qui - tities and qualities of the Agata and the evil .... Yet, the trend of their belief in the officacy of HSPETO would seem to be in the direction of rationalism. For the whole subject, see मङ्गलवाद in तत्त्वचिन्तामणि etc. even “The religious belief in the necessity of propitiating gods before commencing any serious piece of work-even the day's routine-is natural, and so we find that in the vedic ritual, the main sacrifice was often preceded by a small introductory offering maile to the gods ( cf. "आग्नावैष्णवमेकादशकपालं चर्क निर्वपेद्दर्शपूर्णमामाधारिप्समानः '). Similarly, as recorded in the WTA artza, a tediously long religious ceremony was performed on the stage, before commercing a dramatic•representation. The ceremony which was originally mixed doing (Fifi) and speaking (af) came, in course of time, to be cut down to the latter; thus, the recitation of the remained the sole survivor of the old elaborate ceremonies o! the पूर्वरा. Thus the मङ्गलाचरण in all iterery works is mostly verbal:- स्तुतिनमस्कारादिषु मङ्गलव्यवहारः शिष्टानाम्...अत एक कुरितनाशकमपि गङ्गास्नानादि न मङ्गलम् । Tat. Ci. Such a मङ्लाचरण generally takes one of the three following forms : (i) माशी: Benediction or Prayer, (ii) नमस्क्रिया Salutation, and (ii) वस्तुनिर्देश Description, the last being supposed to be accomplished even by a bare reference to the name of a god, or the use of a word which means 'a godas, for example, the word gaat in the first line of कालिदास's कुमारसंभव-अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।' (Vide स्याद्वादमअरी, Notes, pp. 1-20) श्लो. २. स्मरस्य सायकपश्चके व्यस्ते (जगत्युद्यतः ) जगपुदतः जगता जेतुंषष्ठो जैत्रभर कान्ताकटाक्षः विषयिणां शरव्यं चेतो हरन् भवतां वदापति- दुर्लभं करतले प्राप्तश्रिकं पार्थिवम् अक्षयशर्मप्रेम धरि तनोतु । स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मरः, स्मृ आध्याने पवायच्, स्मरस्तस्य स्मरस्य । न्युपसर्गादस्तेः क्तप्रत्ययो व्यस्तस्तस्मिन् व्यस्ते, सायकानां पञ्चके तस्मिन् सायक- पञ्चके इत्यत्र स्वार्थिक-क-प्रत्ययः। गच्छतीति बगत् तस्मिन् मगति उद्यतः बगा. यतो का। षण्णां पूरण. षष्ठः "तस्य पूरणे उद्,' षट्कतिपयवतुरां शुद्ध" इति थुक्, षष्ठः। भयतीति जेता, तृचि गुणे जेतृशब्दात् प्रमादित्वावण, वृद्धि। जैत्रश्चासौ शरश्च जैत्रशरः। शरवे हिंस्राय हितं शरव्यम्, उगवादिभ्यो यत् । हरतीति हरन् , शतप्रत्ययः। विषया एषाम् सन्तीति विषयिणस्तेषाम् । दुखेन लभ्यते इति दुर्लभम् , खल् प्रत्ययः । अति-अत्यन्त दुर्लभमतिदुर्लभम् । पृथिव्या इदम् पार्थिवम् , इमर्थेऽण् । कान्ताचा कटाक्षः। परस्य तलम् करतलं तस्मिन् करतले। प्राप्ता श्रीर्यस्य तत् प्राप्तश्रिकम् । नास्ति भयो यस्य तवक्षयर। शर्मयुक्तं प्रेम शर्मप्रेम, मध्यमपदस्य लोपः। भूरि तनोतु ॥ कामः पश्चशरः स्मरः। षिष्टपं भुवनं जगत् । विषयी विषयासके। वित तुचेतो हृदयम्। संवतः प्रलयः कल्पः क्षयः। इत्यमरः । Compare the following us for the names of the five arrows of स्मर i. e. कामदेवः- मन्दोऽयं मलयानिलः किसलयं घूतदुमाणां नवं माद्यत्कोकिलकूजितं विवकिलामोरः पुराणं मधु । वाणानित्युपदीकरोति सुरभिः पञ्चैव पञ्चषवे यूनामिन्द्रियपश्चकस्य युगपत् समोहसंपादिनः ॥१२॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार, Page 384) २६ अरविन्दमशोकं च चूतं च नवमल्लिका । नीलोत्पलं च पञ्चैते पञ्चबाणस्य सायकाः । उन्मादनस्तापनश्च शोषणः स्तम्भनस्तथा । संमोहनश्च कामस्य पञ्च बाणाः प्रकीर्तिताः ॥ ( अमरकोश-महेश्वरटीका-सं. झळकीकर--1896, 5th edition, Page 6) षष्ठो जैत्रशरः...कान्ताकटाक्ष,-Cf. रतिरहस्य. परिजनपदे भृाश्रेणी पिकाः पटुबन्दिनो हिमकरसितच्छवं मत्तद्विपो मलयानिलः । कृशतनुधनुर्वल्ली लीलाकटाक्षशरावली मनसिजमहावीरस्वोच्चैर्जपन्ति नगजितः ॥३॥ (रतिरहस्य, edited by देवदत्त शर्मा, बनारस, १९१२) जगद्धतो-The reading of the Ms. जगदुद्वतः makes the explantion of a difficult because the object of ai is purai (कर्मणि षष्ठी), so either it has to be जगत्युद्धत (भगति+उद्धतः) or a compound like जगद्धतः or जगदुद्यतः. The reading जगद्धतः requires minimum orthographical change. स्वर्गा...पार्थिव शर्मप्रेम. Ordinarily a heavenly thing is more difficult to get than any earthly thing, but in this particular case the bliss of the earthly love is more difficult to get ( अतिदुर्लभ ) than even heaven, fi-Here the reading is fun, but the reading fers would be a better reading. श्लो. ३. मलयावनीनां चन्दनानीराधूय कुसुमद्रुमेषु अतितरां स्थैर्य भनन् वधूनां सुरतनां लानि हरन् मधुरो वातः प्रगे (पातःकाले ) अतरलयत् । मलयस्यावन्यः मलावन्यस्तासां मलयावनीनाम् । चन्दनस्य (बदनानां वा) वन्यस्ताश्चन्दनवनीः (द्वितीयाबहुवचनान्तमिदं पदम् )॥ आधूयेति आधूधातोः क्वाप्रत्यये तस्य ल्यवादेशे वनधातोः इनिःप्रत्यये कोपि वनी स्त्री। कुसुमानां द्रमा- स्तेषु कुसुममेषु । अतितरामत्यन्तम् । स्थाधातोः तिष्ठनोति स्थिर । स्थाधातोः 'अजिरशिशिरे'ति सूत्रेण किरत्प्रत्यये कृते स्थिरशब्दस्य सिद्धिः। स्थिरस्य भावः कम वा । 'वर्णदृढादिभ्यः व्यञ्च' आदिवृद्धिश्च स्थैयम् । भजतीति भजन शत्रन्त: प्रयोगः। शोभनं रत (रमगं रतम् ) सुरतम्, (सुरते जाता 'सप्तम्यां जनेर्ड.' प्रत्ययः टिलोपश्च त्रीत्वे टापि। सुरतजातां सुरतजाम्। ग्लै निप्रत्यये आविग्लानिस्ताम् सरसीतरङ्गान् २७ (ग्लायति अनेनास्मिन् वा “वहिचि०" इति निः । प्रगीयते । अत्र वा गैशब्दे कप्रत्ययः। प्रगे प्रातःकाले । सरस्यान्तरजातान् सरसीतरशान् । तरन्तीति तरका, "तरत्यादिभ्यश्च" इत्यङ्गच् । तरलं करोत्याचष्टे वा प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिन् । ह्यस्तनभूतकाले ( लङि) अडागमे इकारलोपश्च भवति णिचि तस्य गुणायादेशी शपि लकि तिपि। कासारः सरसी सरः। भङ्गस्तर ऊर्मिर्वा, इत्यमरः । प्रगे-means early morning. प्रगे प्रातः प्रभाते-(See Amarakos'a का. ३, S1.19) The reading of the Ms. is 'तरलयन् , but that would make the sentence void of verb. Therefore it is emended into 'तरलयत् . श्लो. ४. सखि ! का शाखी यस्य पुष्पं पुष्यायुधस्यायुधमभवत् (तस्मिन्) तत्र छिन्ने स चित्तेशयश्चिराचिरायुधदांधत्ते, मुभग इत्थं त्वदीयविरहे कन्दर्पसंतापिता सा बाला बाळसखोजनेन सहिता क्रीडावने भ्राम्यति । शाखा अस्य सातीति शाखी। (शाखा अस्यास्तीति विग्रहे "बीह्यादिभ्यति" सूत्रेणेनिः। पुष्पमायुधं यस्य अथवा पुष्पाण्यायुधानि यस्य सः, तस्य पुष्पायुधस्य । आयुध्यन्तेऽनेनेति विग्रहे घनथे कविधानम् । तस्मिन् इति तत्र “सप्तम्यास्त्रल्"। छिदः क्तप्रत्ययः, "रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः" इति सूत्रेण तकारस्य दकारस्य च नकारे छिन्नस्तस्मिन् छिन्ने । चित्ते शेते-दति विग्रहे “समासे अधिकरणे शेते" सूत्रेण टप्रत्ययो भवति अयादेशः। चित्तेशय इत्यत्र शयवास- वासिष्वकालात्" इति सूत्रेण सप्तम्या अलुइ। निर्गतमायुधं यस्मात् (यस्य वा) तस्य दशा ताम् । अनेन एतेन वा प्रकारेण इति इत्थम्। इदमस्थमुः" सूत्रेण इदम्शब्दात् थमुः। शोभनं भगं यस्य (अथवा शोभनो भगो यस्य ) सुभगस्तत्स- म्बुद्धौ सुभग। तवायम् त्वदीयश्चासौ विरहस्तस्मिन् । कन्दर्पण संतापिता कन्दर्पसंतापिता । बालश्चासौ सखीजनस्तेन " सहयुक्तेऽप्रधाने" इति सूत्रेणात्र तृतीया भवति। क्रीडाया वनम्, तस्मिन् क्रीडावने। भ्रमधातोः श्यनि दीर्धे भ्राम्यति लटि तिपिशपि। अनोकहस्तरुः शास्त्री रति धनञ्जयः। पुष्पं प्रसूनं कुसुम सुममित्यमरः । वृक्षो महीरुहः शारवीत्यमरः। आलिः सखी क्यस्या चेत्यमरः । The pang of the arrow of the love is so unbearable to the lady that she wants to find out the tree whose flower has become the cupid's arrow, so that she may uproot it. श्लो. ५. कान्ते अभिनवस्त्वन्मुख चन्द्रमा दन्तावली चन्द्रिका प्रत्यादि- १८ महावियोगतिमिरः कौरनेत्राङ्कितः यस्मिन् (वसन्ते पूर्णोऽपि) (चन्द्रः) मियः कुचचक्रवाकमिथुनं मुदा आश्लिष्यन् मदेन नेत्रनलिनानन्दं वितन्वन् तुझायेत (यस्मिन् पूर्णऽपि )। चन्द्रोऽस्त्यस्याः “अत इनिठनौ ठस्येकः " टापि इत्वे । तव मुखमिति त्वन्मुखम्, त्वन्मुखमेव चन्द्रमाः। दन्तानामावली-दन्तावल्येव चन्द्रिका । महांश्चासौ वियोगश्च महावियोगः। दन्तावली चन्द्रिकया प्रत्याविष्टं महाधियोगति- मिरं येन सः दन्तापलीचन्द्रिकाप्रत्यादिष्टमहावियोगतिमिरः । कुरङ्गस्येमे कोरङ्गे, कौरङ्गे च ते नेत्रे ताभ्यामङ्कितः। इदमर्थे अन्तर्भावितण्यर्थेऽण् भवति । कुधावेव चक्रवाको तयोमिथुनम्। आश्लिष्यतीति आश्लिष्यन्ते वितनोतीति वितन्वते शतप्रत्ययः। तुङ्ग इव आचरति इति विग्रहे "कर्तुः क्या सलोपश्च" इति सूत्रेण क्यहि दीघे आत्मनेपदे विध्यर्थे लिङि तुझायेत। नेत्रे पव नलिने तयोरानन्दस्तम् ॥ (रूपकम् ) आननं लपनं मुखम् इत्यमरः । हिमांशुश्चन्द्रमाश्चन्द्र इत्यमरः । चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना-इत्यमरः। रदना दशना दस्ता इत्यमरः। कोकश्चमश्चक्रवाक इत्यमरः । कुरो हरिण इत्यमरः। तमिदं तिमिरं तम इत्यमरः । नलिन कमलमित्यमरः । श्लो. ६. संपूर्णो मानिनीमुखचन्द्रमा इन्त चन्द्रिकया नूनं वियोगविभवं तमो विद्राक्यति । (रूपकम् , उत्पेक्षा च ) । संपूर्यते स्मेति संपूर्णः, पूरी आप्यायने कर्तरि कर्मणि या क्तः । मानोऽस्त्यम्या इतिमानिनी, “अत इनिठनौ” इनि जीपि मानिनी, मामिन्याः मुखम् मानिनीमुखम्, मानिनीमुखमेव चन्द्रमाः। दन्त एव चन्द्रिका तया दन्तचन्द्रिकया। चन्द्रोऽस्त्यस्याः इति विप्रहे “अत इनिठनौ" "उस्येकः" डापि चन्द्रिका। वियोजनं वियोमः व्युपसर्गात् युज्धातोर्घष गुणे कत्वे च वियोगः। वियोगाद्विभवो ( उत्पत्तिः) यस्य तत्। व्युपसर्गात् द्रुगतौ इत्यस्माद्धातोणिचि वृद्धावावादेशे व लटि तिपि शपि गुणे अयादेशे च कृते विद्रावयति। संपूर्णः सकलः पूर्ण इत्यमरः। प्रमदा मानिती कान्ता-इत्यमरः। रदना दशना दन्ता इत्यमरः। अधरैविभवाः पुंलि इत्यमरः । श्लो ७. (हे) सुमुखि, (तब) स्तनौ (मम) स्तनान्तरन्यस्तौ (तव) मुखं मम सम्मुग्वम् (अस्तु) । (हे) अश्रोणि, मेखला ममोत्सङ्गेऽस्तु । शोभनं मुखं यस्या सासुमुखी-“स्थानाञ्चोपसर्जनादसंयोगोपधात्" इति लीपि मुमुखी, तत्सम्बुद्धौ सुमुनि। अन्यौ स्तनौ स्तनान्तरे, तयोन्यस्तौ स्तनान्तरन्यस्तो।
२१ सम् संगतं मुखं सम्मुखम् । शोभना श्रोणी यस्याः सा सुश्रोणी, तत्सम्बुद्धौ सुश्रोणि। श्रोण संघाते इत्यस्मात्-धातोः “सर्वधातुम्ब इन्" इतीनि प्रत्यये कीपि श्रोणी, श्रोण्याः मेखला श्रोणिमेखला ङीप् प्रत्ययो विकल्पेन भवति-तेन श्रोणी श्रोणि: इत्युभयमपि रूपं भवति । डीम्प्रत्ययविपक्षे श्रोणिमेखला । उत्सअनमुत्सङ्गः, भावे घन, तस्मिन् उत्सङ्गे। अस्थातोर्लोटि प्रथमपुरुषैकवचने अस्तु इति रूपम्। अन्तं राति इति अन्तरम्, रा दाने इति धातोः “आतोऽनुपसर्गे क” इति कप्रत्ययः । स्तनौ कुचौ-इत्यमरः। कटिः श्रोणिः ककुद्मती इत्यमरः। स्त्रोकटयां मेखला काश्ची सप्तकी रशना तथा-इत्यमरः । स्तनौ स्तनान्तरन्यस्तौ-The reading of the Ms. स्तन्यसूनिहन्य makes no sense hence the emendation, श्रोणिमेखलाम्-The reading of the Ms. is grammatically Inappropriate. श्लो. ८. कुश्चत्कोकनदश्रियोनयनयोजलैक्षोजन्मकिशोरको (कोरको ) पक्षालयन्ती पितृगृहं गच्छन्ती भन्दावतितकन्धरा कान्ता गुर्वन्तिकाद् (गुर्वन्तिक- मागत्य ) अपाङ्गेन तु प्रियतमं संवीक्ष्य अन्तर्वाष्पनिरुद्धकण्ठकहरं ( यथा स्यात्तथा) चिरं रोदिति ॥ कुञ्चती च ते कोकनदे च कुश्चत्कोकनदे तयोः श्रियो-श्रीरिव श्रीर्ययोस्तयो कुश्वरकोकनदश्रियोः। कुञ्च कौटिल्ये, धातूनामनेकार्थत्वात्कुञ्चदित्यस्य संकुचिते- त्यर्थः । कोकान् , चक्रपाकान् नदति इति विग्रहे मूलविभुजादित्वात्क, नादयती- त्यर्थः । अन्तभावितण्यर्थोऽयं प्रयोगः। नयनं च मयनं च नयने तयोनयनयोः । वक्षसि (सो) नन्म ययोस्तो पक्षोजम्मानौ, तावेव किशोरको कोरकावित्यर्थः । मलैः, मलन्तीति जलानि, जल अपवारणे पचायच् तेजलैः। प्रक्षालयतोति प्रक्षा- लयन्ती, प्रोपसर्गात् भलघातो. शतृप्रत्यये डोपि नुमाममे च कृते प्रक्षालयन्ती। पितुर्गुहं पितृगृहम्। गच्छन्ती गच्छतीति गच्छन्ती शतृ प्रत्ययो भवति जीपि नुमागमे चोक्तरूपस्य सिद्धिः। गृणाति धान्यादिकमिति गृहम्, प्रहधातो: “गेहे कः" सूत्रेण कप्रत्यये संप्रसारणे व कृते गृहमिति । मन्दम् आवर्तिता कम्धरा यया (वस्था) सा मन्दावतितकन्धरा। के, शिरसो धरा कन्धरा ( प्रीवाय कन्धरा मता)। कम्यते स्मेति कान्ता, कमेः कः दीर्घ-" अनुनासिकस्य' टापि टापि कान्ता। गिरति अज्ञानम्, गृणाति पा उपदेशमिति गुरुस्तस्य अन्तिकं गुर्वन्तिकम् , तस्मात् गुर्वन्तिकात् । अत्र ‘ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे घ" इति चार्तिकेन पञ्चमी भवति, गुस्तिकादित्यस्य गुर्षन्तिकमागत्येत्यर्थः। भतिशयेन प्रियः प्रियतमस्तम्। “अति- शापने समाविष्टमौ०" इति तम। अपान कटाक्षेण संव्युपसर्गादीसकरवारबपि संवीक्ष्य। अन्तर्वापेण निरुद्धकण्ठकहरं यथा स्यात्तथा चिरं रोदिति-रुदो लटि तिपि — रुदादिम्यः सावधातुके०" इति इटि गुणे रोदिति । ( उपमा) रक्तोत्पलं कोकनदम् इत्यमरः । कमला श्रीहरिप्रिया संपत्तिः श्रीश्च लक्ष्मीच इत्यमरः। रगक्षि चक्षुनयनमिति धनञ्जयः। सलिलं कमलं जलम् , उरो वास व वक्षध इत्यमरः । गृहं गेहोदयसितम् इत्यमरः । श्रीषायां कन्धरा मता इत्यमरः । कटाक्षोऽपाङ्गदर्शने ॥ The young wife going to her father's house sees her dear husband in the presence of the elders so she is not able to give expression to the grief freely. So even though weeping for a long time, she has to smother her cry in her throat. कुश्चत् - yields more appropriate sense than किञ्चित् . पक्षोमन्मकिशोरको-It is difficult connect 'किशोरता grammatically with the rest of the sentence. The emended reading though grammatically proper is not quite satisfactory. श्लो. ९. हे मखे, कामाक्षया कान्ता किं कुरुते, रतेषु रमते । केन सा रतं, त्वया (साकम् ), अहम् इइ, न त्वमनिशं तत्समीपे, सबीडा सा सखी, हि, आहा- रेषु मनोवलेपवसनेविच्छां हित्वा अन्तास्थितैर्भवतोरविरत रतै(मत्रीडा वर्तते ।। to कामोऽक्षयो यस्याः सा कामाक्षया, क्षयतीति क्षयः, क्षि क्षये-अच् । नास्ति क्षयो यस्य सोऽक्षयः। कम्यते स्मेति कान्ता, कमे क्तः दीर्घ टापि। रमणानि रतानि स्युद् तेषुरतेषु। केन साकमिन्यत्र “सहयुक्तेऽप्रधाने" इति सूत्रेण तृतीया। रमणं रतम् (क्तः)। अस्मिन् इति इह । “इदमोहः" सूत्रेण इदम्शब्दात् हप्रत्ययः। “इदम इश्" सूत्रेण इदम इशादेशः। तस्याः समीपम् तत्समीपम् , तस्मिन् तत्समीपे । अनिशम् (सततम् संततम् घञ् )। आहरणमाहारःघन्, बहुवचने आहारास्तेषु आहारेषु। मनः अवले- पाच वसनानि च अवलेपवसनानि तेषु इच्छां हित्वा, इषेर्भावे शो यगभावश्च निपात्यते इच्छा इत्यस्य निपातनासिद्धिर्भवति। हाधातोः त्वाप्रत्ययः, आकारस्येत्वे ओहाक् त्यागेइत्यस्मात् धातोः क्त्वाप्रत्ययः, "जहातेश्च कित्व" सूत्रेण आकारस्येत्वे हित्वा। अन्तः स्थितानीति अन्तःस्थितामि तैरतःस्थितैः। न विरतान्यविरतानि तैरविरतैः। विरमणानि विरतानि । बीडया सह (धर्तते) इति विग्रहे "तेन सहेति तुल्ययोगे" सूत्रेण समासे “वोपसर्जनस्ये"ति सूत्रेण सहस्य सादेशे सबोडा। बीड लजायाम् "गुरोश्च हलः" इत्यप्रत्यये टापि वीडा । कामोऽमिलाषस्तर्षक इत्यमरः। प्रमदा मानिनी कान्ता इत्यमरः । रमणे निधुवनं रतं भैथुनम् इत्यमरः। समीपमभ्यर्णमन्तिकम् इत्यमरः। अनिशं सततं संततमित्यमरः। आलिः सबी वयस्था इत्यमरः । स्वान्तं हन्मानसं मनः, चेलं वसनमंशुकमित्यमरः । इच्छा काङ्क्षा स्पृहा इत्यमरः। मन्दाक्ष हीसपा नीडा इत्यमरः ॥ This is a dialogue between a lover and a friend of the beloved. The lover asks about his beloved to her friend. She answers that she is enjoying amorous sports. This naturally irritates the lover, who asks with whom she plays. The friend answers that she plays with him as he is constantly with her. In fact she is so much engrossed in him that she forgetting her food, dress and decoration constantly wears a bashfull expression on account of her feeling of shame for her engrossment. श्लो. १०. सौवर्णनूपुररणचरणारविन्दा श्रोणीभरालसगतिर्मुगशावनेत्रा पीनस्तनी सकलचन्द्रमुखी तन्वी कस्य हृदि, अहो, महान्तं मोहं न तनोति ॥ सुवर्णस्येमे सौवणे, सौवर्णे च ते नूपुरे सौवर्णनूपुरे, ताभ्याम् रणन्ती चरणे पत्र अरविन्दे चरणारविन्दे यस्याः सा सौवर्णनूपुररणश्चरणारविन्दा । श्रोण्याः भरः श्रोणोभरस्तेनालसा गतियस्याः सा श्रोणीमरालसगतिः। मृगस्य शावः मृगशावस्तस्य नेत्रे इव नेत्रे यस्याः सा मृगशावनेत्रा। पीनौ स्तनौ यस्याः सा पीनस्तनी । सकलश्चासौ चन्द्रश्च सकलचन्द्रस्तद्वन्मुखं यस्याः सा सकलचन्द्रमुखी, चन्दतीति चन्द्रः । ( उपमा) सौवर्ण इत्यत्र " तस्येदम्" सूत्रेण इदमर्थेऽण् प्रत्ययो भवति। नुवि पुरति पुर अग्रगमने धातोः “इगुपधशाप्रीकिरः कः इति कप्रत्ययः। श्रोण संघाते इति धातोः “ सर्वधातुभ्य इन्” इति इन्प्रत्यये डीपि च कृते श्रोणीगमनं गतिः स्त्रियां तिन्। मृग्यते व्याधैरिति मृगः, मृग अन्वेषणे धातोपन् प्रत्ययो भवति-अवन्तत्वाद् गुणाभावः। शव्यते इति शावः, शव गतौ धातोः " अकर्तरि च कारके संज्ञाया"मिति घञ् वृद्धिश्च । नीयतेऽनेन “दाम्नी. इति सूत्रेण प्रन्प्रत्यये नेत्रपदस्य सिद्धिः। पीनम्तनी इत्यत्र स्वाहाचोप- सर्जनादसंयोगोपधा"दिति सूत्रेण डोपि। सकलचन्द्रमुखीत्यत्रापि उक्तसूत्रेणैव कीपप्रत्ययो भवति । चन्दतीति चन्द्रः, चदि आह्वाइने धातोः " स्फायितञ्चि सूत्रेण रक्प्रत्ययो भवति । प्यायते स्म इति विग्रहे ओप्यायी वृद्धौ इति धातोः “गत्यकर्मकेति क्तप्रत्ययः " ओदितधे"ति नत्यम्, प्यायः पीति प्यादेशः । तनुशब्दात् “वोतो गुणवचना"दिति सूत्रेण जीपि यणि तन्वीति भवति । अरं शीघ्र विदतीति विग्रहे “ गवादिषु विन्दे” इति वार्तिकेन शः शेमुवादीना"मित्यनेन नुम् । अरविन्दम् ॥ (उपमा) स्वर्ण सुवर्ण कनकमित्यमरः। मजीरो नूपुरोऽलियाम् इत्यमरः । पदांनिश्च रणोऽस्त्रियाम् इत्यमरः। अरविन्दमहोत्पलम् इत्यमरः । कटिः श्रोणि: ककुमती-इत्यमरः। मृगः हरिणः करा इत्यमरः । लोचनं नयनं नेत्रमित्य- " पृथुका मला पोतः पाकोऽर्मको हिम्मः शावकः शिशुः इत्यमरः । पीनस्थूलपीवरेत्यादि स्तनौ कुचौ-इत्यमरः । मूर्छा तु कश्मलं मोह इत्यमरः ॥ लो. ११. (हे) आलि, अधाहम् कामतरलेन कान्तेन सहिता लिने निषण्णा सरलाशयत्वात्तस्य वार्तामु निरता मां भुजोपपीडमालिङ्गय तेन किमपि कृतं न जाने ( अथवा तेन कृतं किमपि न जाने)। । आलयति भूषयति आङपसर्गात् अल भूषणे “ अव" आलि कीपि माली तत्सम्वुद्धौ हे आलि। अत्रास्मिन् अहनि इत्यर्थे “ सद्यः परुत्" इति सूत्रेण अद्यत्यस्य सिद्धिर्भवति। कामेन तरल कामतरलस्तेन कान्तेनेत्यत्र “ सहयुक्तेऽप्रधाने" इति सूत्रेण तृतीया भवति । तल्यते वा इति विग्रहे “ तलिपुलिभ्यामिनन् ” इत्यनेन सूत्रेण इनन् प्रत्ययो भवति, तलिनम् तस्मिन् तलिने। निषीदति स्मेति निसद् “गत्यर्था- कर्मके तिक्तप्रत्यये “ रहाभ्यां मिष्ठानो नः पूर्वस्य च दश्व". इति सूत्रेण तकारस्य कारस्य च नकारे पत्वे ष्टुत्वे निषण्णः, स्त्री निषण्णा। आकुपसर्गात् शीर धातोरस् “परच्" आशयः । सरलश्वासी आशयश्च, तस्य भाव. सरलाशयत्वं तस्मात् अथवा, सरल आशयो यस्या सा सरलाशया तस्या. भावस्तस्मात् । वृत्तिर्लोकवृत्तम् तदस्त्यस्याम् इति विग्रह “वृत्तेश्चेति वार्तिकेन नः इतिश्च टापि। वार्तानिरता संलग्ना। भुजोपपीडं भुजाभ्यां भुजयोर्षा उपपीज्य इत्यर्थे “ सप्तम्यां घोपपोडरुधकर्ष” इति सूत्रेण णमुलि कृते सिद्धि । मालिङ्गति ल्यबन्तप्रयोगः । कृतमित्यत्र कर्मणि क्तः।माने इति आत्मनेपदे लटि उत्तमपुरुषैकवचने रूपम् ॥ आलिः सखी बयस्या इत्यमरः । कामः पञ्चशरः स्मरः । दयितः कान्तः प्रियः। वार्ता प्रवृत्तियत्तान्त इत्यमरः । तलिनम् शय्या तल्यते शयनार्थ गम्य- तेऽत्र । निषण्णा उपविष्टा। तरलेन पञ्चलेन ॥ सलिन-means a couch. श्लो. १२. तोयान्तरूललितमीनयुगाभिरूपनीरविकान्तरचरनयनम् शोतं सुगन्धि पार्वणसुधाकरचारु प्रियायाः वक्त्रं कौल्यात् पास्यामि, अम्बु मरुपान्य इव (पास्यामि ) (उपमा)॥ तोयस्यान्तः तोयान्तः, मीनयोर्युगं मीनयुगम्, तोयान्तरल्ललितं च तत् मीन- युगं च तोयान्तरल्ललितमीनयुगम् , तद्वदभिरूपं नीरनिकाया अन्तरं नीरति कान्तरम् , तस्मिन् बरतीति नीरहिकान्तरचरन्नयनम्, तोयान्तरल्ललितमीन- युगाभिरूपं च तत् नीरविकान्तरचरनयनं यस्मिन् तत् । शोभनो गन्धो यस्मिन् तत सुगन्धि । पर्वणि भवः पार्वणः, “ तत्र भव " इति सूत्रण भवार्थेऽण् वृद्धिमा सुधायुक्ताः करा यस्य सः सुधाकरः, पार्थणश्चासौ सुधाकरच पार्षण- सुधाकरस्तवथारु इति पार्वणसुधाकरवार । पन्धानं नित्यं गच्छतीति पान्थः, मरोः पान्थः मरुपान्थः-पथिन्शब्दात् “ पन्थोण नित्यम्" इति सूत्रेण णप्रत्यये “पथः पन्थ" इति सूत्रेण पथिन्शक इस्प पन्थादेशः पृद्धिश्च, पान्थः । नीयते- ऽनेनेति नयनम्, ल्युट्प्रत्ययः । चरतीति घरन् शवन्तः । इयेक् गतौ भावे क्तः संप्र- सारणादिकार्ये व कृते शीतम् । सुगन्धि-इत्यत्र -सुगन्धशब्दात् “ गन्धस्येदुत्पूतिसु- सुरभि" इति सूत्रेण इथे कृते सुगन्धिपदस्य सिद्धिः। नियन्तेऽस्मि भूता- नीति मरुः । “भूमृशी" इत्युणादिसूत्रेण उप्रत्ययो भवति । उच्यतेऽनेनेति विहे पर परिभाषणे धातोः “ गुरुवीपचिवधिः" इति सूत्रेण प्रत्यये वक्त्रमिति सिद्धिः ॥ समानौ मरुधन्वानौ-इत्यमरः । अम्भोऽर्णस्तोयपानीयनीरक्षीराम्खुशंवरम् इत्यमरः। मीनो वैसारिणोऽण्डजः इत्यमरः । सुधाकरप्रचन्द्र इत्यमरः ॥ नीरनिका-This word is not to be found in Sanskrit lexicons or modern Sanskrit dictionaries. It is a sanskritized form of the देश्य word णोरङ्गी or णिरङ्गी meaning शिरोऽवगुण्ठनम् -(See देशीनाममाला P. 31. s! 81, see also गुठी-निरसी ii. sl.-90, page 118, B. S. Series). This peculiarity of Sanskritzing of Desi words is a characteristic of श्रीवर्ष, the author of नैषधीयचरित. Another interesting point is the reference to मरुपान्य. It is tempting to infer that the author belongs to the Northern India, probably the region round about Marwar and northern Gujarat. The simile also reminds one of a woman of the same region where women have the custom of what is known as 137 or veiling the face in such a way that it lives room for all the coquetry that the eyes of a loving woman are capable of. The eyes of the beloved moving inside the vell are compared to a pair of fishes moving under the water. Incidentally this simile suggests that the veil was as transparent as the surface of water. If we refer some of the Rajput paintings we can find illustrations of this aspect. The arder or the eagerness with which the lover kisses her beloved is suggested by the simile of a thirsty traveller in the desert of Marwar drinking eagerly the cool and the fragrant water of a reservoir growing lotuses.
श्लो. १३. दयालुः या मम प्रियतमा स्वेनैव वरकृचद्वितयेन नूनं वेगाति दुम्सहविदारणदारुणेभ्या मार्गणेभ्यः मे हृदयं संवर्म्य सा (माम्) पश्यति । दयते इति दगलुः, दयधातोः, “ स्पृहिगृहिपतिदपि० " सूत्रेण आलुब्प्रत्ययः । अतिशयेन प्रिया प्रियतमा. 'अतिशायने तमविष्ठनौ" इति सूत्रण तमपप्रत्ययो भवति। परोच तो कुचौ च वरकुचौ तयोद्वितयं वरकु वद्वितयं. तेन वरकुरद्वितयेन । द्विश- वात् ‘संख्याया अवयवे तयप्" प्रत्यपः। वेजनं वेगो घम् तेन वेगेनातिदुःसहाश्च ते विदारणाश्च ते दारुणाश्च तेभ्यः वेगातिदुःसहविदारणदारुणेभ्यः । वर्मणा संनयति इति संवर्मयति तस्मात् नामधातोः क्त्वा ल्यपि संवम्येति रूपम् । व्युपसर्गात् दृधातोणिचि तस्माद् भावे ल्युट् । वारयति चित्तम् इति विग्रहे दृ भये धातोः “कृवि- पारिभ्य उनन्” इति उनन्प्रत्यये दारुणपदस्य सिद्धिः । मृग अन्वेषणे अदन्तः तस्मात् ण्यासश्रन्थो युच् अथवा मार्ग अन्वेषणे ल्युट् ” मार्गणम् । उत्प्रेक्षा) ॥ कलम्बमार्गणशरा इत्यमरः। मागणं यावनेऽन्वेवे मार्गणस्तु शरेऽथिनि इति हैमः । स्यादयालुः कारुणिक., कुवौस्तनौ चितं तु चेतो हदयमि- त्यमरः । धेगः प्रवाहजवयोरपि इत्यमरः । दारुणं भीषणं भीष्ममित्यमरः ॥ श्लो. १४. (हे) सखि. रात्रौ यचित्रं कौतुकं समभवत्तदाकर्ण्यताम् । अध समागतेन कान्तेन शयनासीना(अहम् ) समालिङ्गिना-एतस्मिन् समये असौ कान्तः चेतोहरं रसान्तरमासाद्य मन्मयतामुपागमत् ततोऽहं तन्मयी जाता। राति सुखम् इतिराप्रिस्तस्याम् रात्रौ । राधातोः “ राशदिभ्यां त्रिर' रात्रिः। कर्ण करोत्याचष्टे वा कर्णयति, आपूर्वात् तस्मात् कमणि लोटि प्रथमपुरुषैकवचने आकर्ण्यतामिति । अत्रास्मिन् अइनि इत्यर्थे “सद्य परुतः" इति सूत्रेण अधेति सिद्धिः । सम्-आपसर्गाभ्यां गमधातोः० " गत्यर्थे "ति सूत्रेण कर्तरि क्तः मलोपः समागतस्तेन । शयने आसीना शयनासीना । शय्यतेऽत्रेति विग्रहे शी स्वप्ने भावे स्युट् शयनम् । आस्ते-इति आसीना आस्धातो. शानच् 'ईदास"इति सूत्रेणा- कारस्येत्वे स्त्रोत्वविवक्षायां टापि आसीना। चेतसो हरः चेतोहरः । अभ्यो रसो रसा- नतरम् । सम्-आङ्-उपसर्गाभ्यां लिगि (लिङ्ग) धातोः कप्रत्यये इडागमे स्त्रीत्वे टापि समालिङ्गिता। आसाद्येति ल्यबन्तः प्रयोगः प्राप्येत्यर्थः । मन्मयस्य भावो मन्म- यता ताम् “तस्य भावस्त्वतलौ " इति तल् । “ मत्प्रचुर" इति मन्मयोऽत्र प्राचुर्याथै अस्मदशब्दात् मयट् “प्रत्ययोत्तरपदयोश्चे"त्यनेनास्मच्छन्दस्य मदादेशे -अनुना- सिके मन्मयताम् । उप-आङ्-उपसर्गाभ्यां गम्धातो ङि प्रथमपुरुषैकवचने-उपागम- दिति। तस्मादिति ततः, तद्शब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल "इति तसिल अत्वे पररूपे ततः। तन्मयीत्यत्रापि प्राचुयार्थे मयट् स्त्रीत्वविवक्षायां दित्वात् डीपि, अनुनासिके तन्मयी। बातेति तान्तः । - " आलिः सस्त्री वयस्या इत्यमरः । निशा निशीथिनी रात्रिरित्यमरः। कौतू. हलं कौतुकं च कुतुकं च कुतूहलमित्यमरः । कान्तः प्रियः दयितः धव इत्यमरः । श्लो. १५. सखि, शय्यायां स्मररागमागतवतोः संपन्नयोरावयोः वार्ता- लिङ्गनचुम्बनानि बहुधाऽभूष॑स्ततोऽनन्तरं तन्मन्मयत्वात् अहो-परा प्रेमनिलीनता पाप्ता, तद्योग्यं (यद्वस्तु ) तदहं चकार मद्योग्यमेव करणं प्रियः (चकार)। स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मरस्तस्य रागस्तम् । आगत इत्यत्र आकुपर्सात् गमेः कर्तरि ते मलोपश्च, आगतशब्दात् मतुः मस्य वः षष्ठी-द्विवचने आगतवतोः । पार्ता च आलिङ्गनं च चुम्बनं च वार्तालिनचुम्बनानि। बहुशब्दात् प्रकारार्थे धाप्रत्ययः। भूधातो ङि प्रथमपुरुषबहुवचने अभूवन् इति रूपम्। अभूवन तत इत्यत्र “नच्छव्यप्रशान्" इति सूत्रेण नकारस्य रत्वे अनुनासिके रेफस्य विसर्गे तस्य सत्वे अभूस्ततः । तस्मादिति ततः तद्शब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल्" अत्वे पररूपे तत इति रूपम् । तस्य मन्मयः तम्मन्मय इत्यत्र प्राचुर्यार्थे मयद, मत्प्रचुरः इति मन्मयः । प्रत्ययोत्तरपदयोश्च"इति सूत्रेण अस्मच्छब्दस्य मदादेशः तन्मन्मयस्य भावस्तन्मन्मयत्वम् । भावार्थत्वप्रत्ययः । अहो इति विस्मये- आश्चर्ये। निलीनस्य भावः निलीनता भावे, तल् प्रत्ययः । प्रेम्णि निलीनता प्रेमनिली. नता। प्राप्तेत्यत्र “गत्यर्थे "ति क्तःटापि प्राप्ता । तस्य योग्यं तद्योग्यं । युज्यते इति योग्यम् “ऋहलोण्यत्" अथवा योगाय प्रभवति "योगाद्यच्चे "ति यत् चकारे- त्यत्र परोक्षे लिट् भवति-अत्र तु प्रत्यक्षत्वात् लिट् कथम् इत्यत्र "अत्यन्तापहवे- लिट् वक्तव्य ' इति बलेन चकारेत्यस्य प्रयोगो भवितुमर्हति । चित्तविक्षेपादिना पारोक्ष्यम् । मम योग्यमिति मद्योग्यम् । क्रियते यत् तत् करणम् भावे ल्युट् (कर्मणि) बाहुलकात्। भूवस्ततो-The reading in the Ms is भूयः, but that leaves a sentence without a verb, hence the amendation. प्रेमणि लीनता- cerrect "निलिनतां into प्रेमणि लीनतां Add in the footnote after 3 Ms. प्रेमनिलिनता. This reading makes no sense. So it has been amended into प्रेमणि लीनतां । श्लो. १६. सर्वाङ्गसङ्गिना आक्रान्तहृदयेन मोहितेन प्रियेण रतनाथेन अद्याहं मोहिता। अजन्तीति अङ्गानि, अगि गतौ पचाद्यच्, सर्वाणि च तान्यानि सर्वाङ्गाणि । सजनम् सङ्ग. पक्ष सङ्गे भावे घञ् सर्वाङ्गाणां सा. सर्वानसाः सर्वासमोऽस्त्यस्य सर्वाङ्गसकी “अत इतिठनौ "तेन सर्वाङ्गमजिना। आकुपर्सात् क्रमेः क्त दीर्घश्च आक्रान्तम् । आक्रान्तं हृदयं येन स. तेन आक्रान्तहृदयेन। रमणं रतम्, रतस्य नाथो रतनाथस्तेन । अत्रास्मिन् अहनि इत्यर्थं "सद्यः परुत्" सूत्रेण अधेत्यस्य सिद्धिर्भवति । मुह वैचित्यै-णिजन्तात् अप्रत्यय इडागमश्च मोहितः, स्त्रीत्वविव- क्षायाम् टापि मोहिता। (हे। सखि, ३६ " श्लो. (१७) कामावस्योत्सवे कान्तपराजयं दृष्ट्वा कामिन्याः ललितयोः कुण्डलयोरदोयुग्मं दोलया लीला ललौ, (कामिन्याः) रशना नितम्बस्थले चापल्या- न्मधुरं रवं चकार, (कामिन्याः) करकणैनिकणितं (कामिन्याः) (कामिन्याः) नूपुरो चरणयोः चिरं लग्नौ ॥१६॥ काम्यतेऽनेनेति कामः “पुंसि संज्ञायां घः”। आह्वानम् आहवः आकुपसर्गात् धेञ् स्पर्धायाम् ' आङियु द्धे० '' इत्यम्, संप्रसारणं च। कामस्याहवः कामाहव- स्तस्य। कान्तस्य पराजयस्तं पराजयम्-पराजयः जि अभिभवे परन् इत्यन् । भूयान् कामोऽस्त्यस्याः कामिनी तस्याः कामिन्या “अत इनिठनौ इनिः जीप। नितम्बस्य स्थलं नितम्बस्थलं तस्मिन् । रशतीति रशना, रश शब्दे "बहुलमन्यत्रापि "-इति युच् अनादेशे टापि रशना। चपलस्य भावः कर्म वा चा- पल्यम्, चपलशब्दात् “गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः" ध्यञ् वृद्धिश्च चापल्यं तस्मात्। रवणं रावः, भावे घर तं रावम् । कृधातोः परोक्षे लिट् प्रथमपुरुषेक- वचनम् । दृश् धातोः क्त्वाप्रत्यये षत्वे ष्टुत्वे च कृते दृष्ट्वेति । करयोः कङ्कणानि करककणानि तैः करकङ्कणैः । कं शुभं कणन्ति इति कङ्कणानि, कणशब्दे अन् । निकम् क्तान्ते क्तप्रत्यय इडागमश्च । लगि धातोः “क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नेति०' सूत्रेण निपातनात् लग्नेति द्विवचने लग्नौ । लाधातोः परोक्षे लिट् प्रथमपुरुषकवचने ललौ। संग्रामाभ्यागमाहवा इत्यमरः। रणे भरः पराजयः, मह उद्धव उत्सव इत्यमरः। कामिनी वामलोचना, कुण्डल कर्णवेष्टनम्। कङ्कणं करभूषणम् । कुण्डलयोः ..Compare with विभ्रश्चलकुण्डलं (अमरुशतक slo. 3 ). 'मदोदोलया -The reading of the Ms. is मदोलया. In this reading one sylbable was wanting. So 'दो' is added. श्लो. (१८) हे प्रियसखि, प्रणतिनिरतः कान्तः अद्य त्वया कस्मान वीक्षितः, एष सखीजनः व्यर्थाभाषः (स्वया) किं कृतः, पृथुरियमपि हि निशीथिनी पूर्णपाया गता, कठिने तव हृदि एषः कीदृक् कोपः स्थितः (इति) कथय (त्वमिति शेष):। प्रिया चासौ सखी प्रियसखी तत्सम्बुद्धौ प्रियसखि । प्रणतो निरतः प्रणति- निरतस्तस्मिन् । व्युपसर्गात् ईक्ष दर्शने कर्मणि क्तप्रत्यये दीर्घ च वीक्षित इति । आभाषणमाभाषः घ, व्यर्थ आभाषो यस्य सो व्यर्थाभाषः । एष चासौ सखीजनश्च पष सखीजनः । निशीथोऽस्त्यस्याम् इनिः डिपि निशीथिनी । गमेः क्तः मलोपः टापि गता। कीटक्-“इदंकिमोरीश् की.” सूत्रेण दृक् परे किम् शब्दस्य की-आदेशः। स्थाधातोः गत्यकर्म के "ति सूत्रेण क्तप्रत्ययो भवति कर्तरि “यतिस्पति- भास्थामित्ति किति" इति सूत्रेण आभाषस्येत्वे स्थितः । कुप्यते इति प्रकोपे - - ३७ सम् च भावे घञ् कोपः । प्रकृष्णं नमनम् प्रणतिः। कथय कथः लोटि मध्यमपुरुषैकवचनम् । धातो. भावे क्तिन् । प्रणतिः प्रणाम । दयितःप्रियः कान्तः इत्यमरः । गता पूर्णप्राया--The reading of the Ms. पुण्यप्रायां makes no sense, hence the amendation. The विसर्ग in गताः is not required. श्लो. १९. हे सखि. सुदुर्जनं विसर्जय, मानसे सजनं गणय. प्रियं कृतार्थय, तत्र (प्रिये ) विपियं कुरु, सांप्रतं विरम, पतिसंगता (त्वम्) रमस्त्र, अद्भुतां मुदं भजस्व, कलुषतां द्रुतं संत्यज । दुष्टश्चासौ जनश्च दुर्जनः, सुतराम् दुर्जनः, सुदुर्जनस्तम् । संश्चासौ जनश्चः सज्जनः । कृत निष्पादितः प्राप्तो वा अर्थः प्रयोजनं येन सः कृतार्थः, कृतार्थ करोत्याचष्टे वा प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् (कृतार्थयति ), तस्य लोटि मध्यमपुरुषैकवचने कृतार्थय। तस्मिन् विप्रियं विरुद्धं प्रीणातीति । विप्रियस्तम् । प्रति पतयोः समाहारद्वन्दः, संप्रति- शब्दात् प्रहायण वृद्धिः गणे पाठान्मान्तत्वम्। मानादिति मानतः “पञ्चम्यास्त- सिल्"। व्युपसर्गाद्गमधातोः विरम-रूपम् । पत्या संगता कलुषस्य भावः कलुषता ताम् । पातीति पतिः, पातेडतिः टिलोपश्च पतिः । दुष्टः दुर्बलः अधमः । महाकुलकुलीनार्यसभ्यसजनसाधवः । सांप्रतम् अधुना इदानीम् । श्लो. २०. वियोगातुरां विलोचनोत्पलगललोलोदका प्रेयसी प्रायः कथमपि आङ्गणभूमिकामागम्य मार्ग वीक्ष्य, (हे ) सखि, अद्याप्येषः (प्रियः) न समागतः, पुनः शून्यं मन्दिरं कथं यास्यामि इत्यभिधाय मोहमगमत् तावत् प्रियः समेतः ॥२०॥ वियोजनं वियोगःभावे घञ् । आतुतोति इति आतुरा आडुपमर्गात् तुप त्वरणे धातोः "इगुपधशाग्रीकिरःक" इति कः कित्वाद् गुणाभावः, स्त्रीत्वे टापि आतुरा, वियोगेन आतुरा वियोगातुरा। लोलानि च तान्युदकानि लोलोदकानि । विलोचने उत्पले इस विलोचनोत्पले ताभ्यां गलन्ति लोलोदकानि यस्या मा, गलन्ति व तानि लोलोदकानि गलल्लोलोदकानि, विलोचनोत्पलाभ्यां गलल्लोलोदकानि यस्याः सा। आङ्गणेत्यत्र अगि गतौ “करणाधिकरणयोश्च' इतिल्युट् अनम् पृषोदरादित्वात् णत्वद् अङ्गणम् अङ्गणस्य भूमिका ताम् । भवन्ति भूनान्यस्यामिति भूमिः, भूधातोः भुवः कित्" इति सूत्रेण मिः, भूमिरेव भूमिका, स्वार्थ कप्रत्यय । आपसर्गात् गम्धातोः कवाल्यपि च “वा ल्यपि" सूत्रस्य विकल्पपक्षे मकारलोपाभावे आग- म्येति। अगमत्-गम् धातोर्लुकि प्रथमपुरुषकवचनस्य रूपम्। व्युपसगात् इस ।
धातोः क्त्वाल्यपि दी|, वीक्ष्येति। समागतः कर्तरि प्रत्ययः। अभिधाय अभ्युपसर्गात् धाधातोः क्त्वाल्यपि । समेतः सम्-आङ्-उपसर्गाभ्याम् धातोः कर्तरि अप्रत्यये कृते गुणे समेत इति भवति । उपमा। लोचने नपने नेत्रे, रक्तोत्पलं कोकनबम, उत्पलं कमलम्। आनं (अगणं) बस्वराजिरे इत्यमरः। शून्यं कथं मन्दिर-The reading of the Ms is शून्ये कथं मन्दिरे. These words go with the verb preTIA So accusative is required This verse depicts start whose lover just comes after she has swooned आबन्धं-affection. श्लो. २१. हे मुग्वे, (सम्) हतां कठिनतामाशु स्यन, (आशु) शुषां गिरं (मा) प्रयच्छ, (हे मुग्धे), विलोकनलीलया( वं) ममाबन्धं सफलय, (तव) चरणशरणं दासोभावं बत मामनुगृहाण, अहह तबाद्य ईदृशः विषमो मान ग्रन्थिः मयि (वर्तते इत्यर्थः)॥ कठिनस्य भावः कठिनता "तस्य भावस्त्वतलौ,” इति स्त्रेण तन्प्रत्ययः “तलन्तं स्त्रियाम्" ताम् कठिनताम् । लेलायनं लीला लेला दीप्तौ कण्ड्वादिः भिदाया- प्रत्ययः पृषोदरादित्वात् लीलेत्यस्य सिद्धिः । विलोक्यते इति विलोकनम्, भावे ल्युट् विलोकनस्य लीला विलोकनलीला तया । आबध्यते अनेन इति विग्रहे बन्ध बन्धने धातोः '' हलश्च " इति घञ् आबन्धम्तम् । फलेन सह (वर्तते ) सफलः, सफलं करोत्याचष्टे वेति विग्रहे “प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे " णिचि वर्तमानकाले सफलयति तस्यैव लोटि मध्यमपुरुषैकवचने सफलयेति रूपम् । ( तव) चरणयोः शरणं यस्य स तम् । अथवा चरणौ शरणं यस्य स तम् । भवनं भावः भावे घञ् वृद्धिश्च । दास्यते दीयते भूतिमूल्यादिक यस्मै सा दास, दासस्य स्त्री दासी “ पुंयोगादाख्यागम्" इति डीप् । दास्याः भायो यस्मिन् स तम् दासीभावम् । ग्रन्थते इति ग्रन्थि. " सार्वधातुभ्य इन् " प्रथिकौटिल्ये, मानस्य ग्रन्थि मानप्रन्थिः इदमुपपरात् दृशधातोः ' त्यदादिषु दृशोऽनालोचने- कञ्च" इति सूत्रेण कम्प्रत्ययः । प्रोपसर्गात् दाणघातोलोटि मध्यमपुरुषस्यैकवचने प्रयच्छेति । अनूपसर्गात् गृहधातोलोटि मध्यमपुरुषैकवचने अनुगृहोणेति । कठिनं क्रूरं कठोरं निष्ठुरं दृढमित्यमरः। सत्वरं चपलं तूर्णमविलम्बित- माशु चेत्यमरः । ब्राह्मी तु भारती भाषा गीर्वाग् वाणी सरस्वती । हेलालीलेत्यभी- भावाः क्रियाः शृङ्गारभावमा इत्यमरः । मानचित्तसमुन्नतिरित्यमरः । .
३९ श्लो. २२. (हे) सखि, करुणमनसाप्युक्तं भूयो विलोचननं जलं मुक्तं, (भूयः ) पत्युश्चरणद्वयं चिरं शिरसि विधृतं, क्रीडासखीषु मया घोडा परिहता. तदपि तस्य प्रियस्य हृदये मनाक दयोदयः नासीत । पातीति पतिः पातेईतिः पतिस्तस्य पत्युः। चरणयोद्वयं चरणद्वयम् । करुणा- युक्तंः च तन्मनश्च करुणमनस्तेन करुणमनमा । विलोचनयो. जातम् सप्तम्यां जनेईः " विलोचनजम्, अथवा विलोचनाभ्याम् जातम् “अन्येप्वपि दृश्यते सूत्रेण जनेर्डप्रत्ययो भवति । मुक्तम्-भुन्धानो कर्मणि क्तप्रत्ययः । विधृतम् - व्युपसर्गात् धृधातो कर्मणि क्तप्रत्ययः । पर्युपसर्गात् हृधातो. क्तप्रत्ययः कमणि परिहतः, स्त्रीत्यविवक्षायां टापि परिहृता । वचः कर्मणि क्तः संप्रसारणम् कुत्वं च उक्तम् । दयाया उदयः दयोदयः। क्रीडासु सख्यस्तासु क्रीडासखीषु । आसीत्- अम्धातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचने रूपम् । समुच्चयो विशेषोक्तिस्तथा सकरः । कारुण्यं करुणा घृणा । करुणा तु कृपायां स्यात् इति हैमः । क्रीडा लीला। वल्लभो दयितः पतिः। द्रवकेलिपारिहासाः क्रीडा खेला च नर्म च । इत्यमरः । श्लो. २३. परित्रस्तकुरङ्गलोचना घनस्तनी चारुमुखेन्दुमण्डला नितम्बिनी मत्तगजेन्द्रगामिनी कुशोदरी मोहकरी च इयं कामिनी ( अस्ति ॥) परित्रस्तश्चासौ कुरङ्गश्च परित्रस्तकुरङ्गस्तस्य लोचने इव लोचने यस्याः सा । घनौस्तनौ यस्या सा । चारु च तन्मुखंच चारुमुखं, चारुमुखमेव इन्दु बारुमुखेन्दु, इन्दोर्णमुलम् इन्दुमण्डलम् चारुमुखेन्दुमण्डलं यस्याः सा। नितम्बोस्तोऽस्याः नितम्बिनी। नितम्बशब्दात् “ अत इनिठनौ ' सूत्रेण इनि प्रत्यये ङीपि । गम्धातोः "सुप्यजातो णिनिस्ताच्छील्ये'' णिनिः प्रत्यये वृद्धौ ङीपि गामिनी । गजानामिन्द्र. गजेन्द्रः, मत्तश्चासौ गजेन्द्रः मत्तगजेन्द्रस्तद्वद्गन्तुं शीलमस्याः सा । कृशमुदरं यस्याः सा । मोहं कर्तु शीलमस्या सा मोहकरी | भूयान् कामोऽस्त्यस्याः सा कामिनो । पर्युपसर्गान् सी उद्वेगे धातोः “ गत्यर्थाकमके "ति सूत्रेण कर्तरि क्तप्रत्ययः । परित्रस्तः । प्रस्यति स्मेति त्रस्तः । ईदित्वादनिट निष्ठः । “स्वाहाचोपसर्जनाद- संयोगोपधात्" इति डीपि कृते घनस्तनीर्भवति । कृत्र धातोः " कृतो हेतुता- च्छील्यानुलोम्ये” इति सूत्रेण टप्रत्यये टित्वात् डीपि मोहकरी । कामिनी इति " अत इनिठनौ' सत्रेण इनिः प्रत्ययः डीपि च रूपम् । उपमा रूपकं तयोः संसृष्टिः। प्रस्तः भीतः । पधान्नितम्बः स्त्रीकट्यांः । मतङ्गजो गजो नागः, इत्यमरः । श्लो. २४. हे पिये, अखण्डमण्डलस्तवैष वन्दुः नयनाभिरामिकी कान्तिं तनोति, कुङ्कुमपङ्कपिअरौ तवैतौ कुचौ सुवर्णपङ्केहकोरकाकृती (स्त:) ||२|| । अखण्डं मण्डलं यस्य सः । वक्त्रमेवेन्दुः वस्त्रदुः । नयनयोराभिरामिको नयनाभिरामिको ताम् । कुङ्कुमस्य पङ्कस्तेन पिञ्जरौ कुङ्कुमपङ्कपिअरौ । पके रोहति इति पके हम् । सुवर्णस्य पके हं तस्य कोरकस्तद्वदाकृतिर्य- योस्तौ सुवर्णपङ्केरुहकोरकाकृती, पके रोहत इति पके रुहे, सुवर्णस्य पङ्केरुहे तयोः कोरको तद्वदाकृती अथवा ययोस्तो सुवर्णपक्केरुहे कोरकाकृती । ( अभि- रामे भवा ) अभिरामशब्दात् कि 'आभिरामकी'' आदिवृद्धौ छोपि च कृते आभिरामकी ताम् । पक्रेहम, ठस्येक । पक्के रह इत्यत्र रह धातोः “इगुषध.' सूत्रेण कप्रत्ययः, “ तत्पुरुषे कृति" सूत्रेण सप्तम्या अलुक् । उच्यतेऽनेन इति विग्रहे वच् परिभाषणे धातोः वक्त्रम् “गुवीपचिवचि" सूत्रण प्रत्ययः कुत्वं च । इन्दतीति इन्दुः, इदि परमैश्वर्ये इन्दधातोः “उणादयो बहुलम " इति सत्रेण नुप्रत्यये इन्दु. । रूपकम् उपमा च तयो. संसृष्टिः । कलिका कोरकः पुमान्। समग्रं सकलं पूर्णमखण्डमित्यमरः । विम्बोऽस्त्री मण्डलं त्रिषु । इन्दुः कुमुदवान्धवः । शोभाकान्ति द्युतिश्छधिः, इत्यमराः । काश्मीरं कुङ्कुमेऽपि स्यात्-मेदिनी। सुवर्ण-etc. having the shape of golden lotus buds. Compare अमरुशतक Slo. 27. श्लो. २५. इति भाषिणि पिये पाणिजैर्मुहुः स्तनाननं संस्पृशति (सति ) प्रमोहिते (सति) प्रिये-अथ मन्मथकेलिलालसां तां सखी विलोक्य सहसा सखीजनः (तां) ययौ। पाणौ (पाण्योः ) जाताः पाणिजास्तैः “सप्तम्यां जनेर्डः" इति उप्रत्यय टिलोपश्च-अथवा पाणिभ्यां जाताः इत्यत्र “अन्येष्वपि दृश्यते " सूत्रेण डप्रत्ययः, पाणिजास्तैः पाणिजैः । भाव्धातोणिनिप्रत्यये सप्तम्येकवचने भाषिणि, भाषते इति भाषी तस्मिन् भाषिणि। स्तनयोराननं स्तनाननम् । आनन्त्यनेन अन प्राणने करणे ल्युट । संस्पृशति, इति संस्पृशत् शत् नस्मिन् संस्पृशति । प्रकर्षण मोहित प्रमोहितस्तस्मिन् प्रोपसर्गान्मुह वैचित्र्ये धातो. क्तप्रत्यय इडागमा गुणश्च भवति. प्रमोहितस्तस्मिन् प्रमोहिते । मन्मथस्य केलिः मन्मथकेलिस्तस्याम् लालसा यस्था सा ताम् । केलनम् केलि किल क्रीडायाम् “ सार्वधातुभ्यः " गुणे केलिः । समानं ख्यायते मनैः इति सखी ताम् “सख्यशिश्चेति भाषायाम् ' छीप् । व्युपसर्गात् लोक दर्शने क्त्वाल्यपि विलोक्येति रूपम् भवति । हासेन सह सहास: । सखी चासो जनश्च सखीजनः । या प्रापणे लिट परोक्षकाले प्रथमपुरुषैकवचने रूपम् । श्लो. २६. (हे) सखि, अमावसथात् बहिनिर्गत्य यावत् क्षणात (क्षणं ) तिष्ठामि तावत्कुतोऽप्यायातो वल्लभः पुरतः मया ददृशे। (हे) मातः, किं करवाणि । हसन शठः पाणिकमले धृत्वा मां नीत्वा तत्रजगाम यत्र कश्चन वै जनो न जानाति॥
“ ~ पाणी एव कमले पाणिकमले। आवसन्ति-आगत्य वसन्ति अस्मिन् इति विग्रहे आडपसर्गात् वसधातोरथच् प्रत्ययः आवसथम् तस्मात् आवसथात् । अत्र अपादाने पञ्चमी भवति। निरुपसर्गात् गम्धातोः क्त्वाल्यपि मकारस्य लोपे हस्वस्य पिति कृति तुम्” इति सूत्रेण तुकि कृते निर्गत्यपदस्य सिद्धिर्भवति । कस्मादिति कुतः । किम्शब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल्' इति सूत्रेण तसिल्प्रत्यये कृते कुतिहोः" सूत्रेण किमः कुआदेशे कुतः इति रूपं भवति । आहुपसर्गात् याधातोः गत्यर्थाकर्मके "ति सूत्रेण कर्तरि क्तप्रत्यये कृते आयात इति प्रयोगो भवति । पुरति अग्रे गच्छतीति विग्रहे पुरधातोः “बाहुलकात् " अतसुच् कृते पुरत इति रूपं भवति । दृश्धातोः कर्मणि लिट् ददृशे इति रूपम् । ददृशे इत्यत्र “ अत्यन्ता- पह्नवे लिड़ वक्तव्य” इति वार्तिकेन लिट् भवति अन्यथा परोक्षकाले लिट्लकारो भवति, अत्र परोक्षत्वाभावात् लिट्लकारो न स्यात्, चित्तविक्षेपादिनात्र पारोक्ष्य संभवति अतो लिट् भवितुमर्हति । हसतीति हसन् इति शत्रन्तप्रयोगः । धृत्वा नीत्वा पते क्वान्तौ । तस्मिन् इति तत्र यस्मिन् इति यत्र इत्युभयत्र सप्तम्या- स्त्रल्” इति सूत्रेण अल् प्रत्ययो भवति ।। आवसथं गृहम् । वल्लभो दयितः पतिरित्यमरः । निकृतस्त्वनृजः शठ इत्यमरः । पञ्चशाखः शयः पाणिः। सहस्रपत्रं कमलं शतपत्रं कुशेशयमित्यमरः ॥ gaa: of the Ms. yields no sense, hence the emendation gea: 1 श्लो. २७, शनकै (शनैः) (माम् उत्थापयन्त्याः बालायाः पुनः वस्त्रान्ते (वस्त्रान्त) धृत्वा क नु यास्यसीति रभसादुक्त्वा धृतायाः (बालायाः) मया सस्मेरं सलज्जपुलकं वक्रीकृतभूलतं सकलं मुखमुनमग्य यत्पीतं तद्विदुषां गिरां गोचरे नो॥ शनैरित्यस्याव्ययत्वात् “ अव्ययसर्वनानामकच् प्राक् टेः” इत्यनेन अकचि शनकैरिति रूपम् । विलसनं विलासः भावे घञ् विलासशयनं तस्मात् विलास- शयनात् । उत्थापयतीति उत्थापयन्ती, उदुपसर्गात् स्थाधातोणिचि पुकि पूर्वसव- र्णादिकार्ये कृते उत्थापि-तस्मात् शतृप्रत्यये शबादिकार्ये कृते नुमि-" उगितश्चे"ति डीपि उत्थापयन्ती तस्याः उत्थापयन्त्याः । वस्त्रस्य अन्तम् वस्त्रान्तम् , तस्मिन् वस्त्रान्ते । कस्मिन् इति क्क, किम्शब्दात् “किमोऽत्" सूत्रेण अत्प्रत्यये कृते "क्काति" सूत्रेण किमः क्कादेशे क्वेति रूपं सिद्धम् । वच् धातोः क्वाप्रत्यये संप्रसारणादिकार्य कृते उक्त्वेति रूपम् । धृधातोः क्तप्रत्यये कृते कित्वाद् गुणाभावे स्त्रीत्वविवक्षायाम् टापि धृता तस्याः धृतायाः । स्मेरेण सह (वर्तते) इति सस्मेरम्। लजया सह (वर्तते) इति विग्रहे • तेन सहेति तुल्ययोगे" इतिसूत्रेण समासे “योपसर्जनस्ये"ति सूत्रेण सहस्य सादेशे सलज्जमिति सिद्धम् । पुलकाः सन्ति अस्मिन् इति पुलकम् , सलज्जं च पुलकं चेति सलजपुलकम् । न वक्रा अवक्रा, अवका वक्रा संपद्यमानेति वक्रीकृता, भूरेव लता भूलता, वक्रीकृता भूलता विलासशयनात ६ यस्मिन् तत् वक्रीकृतभूलतम् च्ळ्यन्तप्रयोगः। पाधातोः कर्मणि क्तप्रत्यये कृते "घुमास्थे”ति सूत्रेणेत्वे पीतम् रूपम् । उदुपसर्गानमधातोणिचि क्त्वाल्यपि च कृते “ल्यपि लघुपूर्वाद् "इति सूत्रेण रयादेश अनुनासिके च कृते उन्नमय्येति रूएं. सिद्धम् ॥ रूपकम् ॥ शनकैः शनैः । स्त्रीणां विलासवियोकविभ्रमा ललितं तथेत्यमरः । स्थानिद्रा शयनं स्वाप इत्यमरः ॥ तद् न विदुषां गिरां गोचरे-Beyond the capacity of the speech of even the learned. उत्का means anxious or longing for: उक्त्वा however would be a better reading. Compare अमरुशतक slo. 88-यत्पातं सुतनोर्मया मुखमिदं वक्तुं न तत् पार्यते। श्लो. २८. तया कान्तया चन्दने सङ्गिनि अङ्गे तु कियानेवावलेपो न धृतः, मौक्तिकगुण्ठितो हि गुणवान हारोऽपि कण्ठे नारोपितः, अञ्जनं संगृह्य रम्ये नयने नामिते, तद्वपुषि कान्ति किं कथयामि यां कामोऽपि नो विन्दति ।। चन्दयति इति चदि आलादने णिजन्तः तस्मात् ल्युणिलोपः चन्दनम् तस्मिन् चन्दने । सञ्जनं सङ्ग. भावे घ, सङ्गोऽस्त्यस्येति सङ्गी, न सङ्गी असङ्गी, तस्मिन् असङ्गिनि-' अत इनिठनौ” इति इनिः। अङ्गतीति अङ्गम् अगि गतौ पचाद्यच् । तस्मिन् अङ्गे। कियान् एव इत्यत्र एवशब्दोऽप्यर्थकः, यथा शंखः पाण्डुरेव। किम्परि- माणमस्येति विग्रहे "किमिदम्भ्यां वो" इति सूत्रेण किमशब्दात् वतुपप्रत्ययः स्यात् वस्य च घादेशः “इदंकिमोरीश्की" सूत्रेण किमः क्वादेशः, “आयनेयीनीयियः इति सूत्रेण घस्येयादेशे कियत् नुमि दीर्घादिकार्ये कृते कियान् इति रूपम् । अवलेपनमवलेपः भावे घञ् धृक्तिः कर्मणि धृतः। मुच्यते स्म मुचेः क्तः कुत्वम् स्त्रीत्वे टापि मुक्ता, मुक्तैव मौक्तिकम् “विनयादिभ्यष्ठक् टस्येकः” आदिवृद्धिश्च मौक्तिकम् , मौक्तिकेन गुण्ठितः मौक्तिकगुण्ठितः, गुठि वेष्टने कर्मणि क्तः इडागमश्च । गुणोऽस्त्यस्येति गुणवान् मतुप्। हरणं हारः घञ्। आरोपितः आङपसर्गात् रुपधातोः णिचि कृते सप्रत्यय इडागमश्च। अञ्जू धातोर्म्युटि अञ्जनम्। समुप- सर्गात् ग्रहधातोः क्वा तस्य ल्यबादेश संप्रसारणं च संगृह्य । रम्धातो “पोरदुप- धात्" सूत्रेण यत् रम्यम् द्विवचने रम्ये। अञ्जः क्त इडागमश्च । तस्याः वपुः तद्वपुः तस्मिन् तद्वपुषि। काम्यतेऽनेनेति कामः " पुंसि संज्ञायां घ.' । विद्धातुः तुदादिः “शेमुचादीनाम्” नुमि विन्दति ॥ विभावना ॥ मौक्तिकगुण्ठित-covered with pearls.
४३ . Compare Gujarati fuoc which means making a necklace not merely by putting the thread in the hole but in addition tying each pearl with the thread of gold or of silver or of any kind. This form is derived from the root 9727. I think that ufvea is a Sanskritised form of speeg though it is usually derived from गुठि वेष्टने. हारो नारोपितः-- Compare हारो नारोपितः कण्ठे मया विश्लेषभीरुणा। इदानीमन्तरे जाताः पर्वताः सरितो दुमाः ॥ See (सुभाषितरत्नभाण्डागार Page 297, slo. 1; ed. 1911. निर्णय- सागर प्रेस). The editor refers it to वाल्मीकि. श्लो. २९. विरहिणी पान्थपिया निशीथे प्रमनविलसच्चूतद्रुमाणां बने पान्थमाणहरं कोकिलया कृतं रावं मुहुः श्रुत्य मूर्छामाप, पुनर्विबुध्य मनसा पत्युः स्मरन्ती ततः नयनाम्बुपूरं मुश्चन्ती सस्वरमरुदत् ।। व्युपसर्गात् रहू त्यागे धातोः “पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण" इति सूत्रेण घप्रत्यये कृते विरहः, विरहोऽस्या अस्तीति विरहिणी “अत इनिठनौ” इति इनिः स्त्रीत्वे ङीपि णत्वे विरहिणीरूपम्। पन्थानं नित्यं गच्छतीति पान्थः । पथिन्शब्दस्य पन्थादेशः वृद्धिश्च । पान्थस्य प्रिया पान्थप्रिया। निशेरतेस्मिन् इति विग्रहे शीधातोः “निशीथगोपीथावगथा" इति सूत्रेण थक्प्रत्ययः, निशीथस्तस्मिन् निशीथे। चूतानां द्रुमाशृतद्रुमाः प्रसूनैविलसन्तश्च ते चूतद्रुमाः तेषाम् । हरतीति हरः पचायच्" प्राणानां हरः प्राणहरः, पान्थस्य प्राणहरः पान्थप्राणहरस्तम् । कोकते कोक आदाने लच् प्रत्यये इत्वे च कृते गुणे कोकिलपदस्य सिद्धिः कोकिलत्व- जातिविशिष्टा स्त्री कोकिला तया कोकिलया। कृतमित्यत्र कर्मणि क्तप्रत्ययः । रवणं रावः भावे घञ् तम् रावम् । श्रुधातोः क्त्वाप्रत्यये श्रुत्वेति। मूर्छनम् मूर्छा गुरोश्च हल” इति सूत्रेण अप्रत्ययः टापि मूर्छा ताम् मूर्छाम् । आफ्धातोः परोक्षे लिटि प्रथमपुरुषैकवचने आप इति रूपम् । व्युपसर्गात् बुध्धातोः क्त्वाल्यपि विबुध्येति रूपम् । पातीति पतिः पातेर्डतिः, डित्वात् टिलोपः पतिस्तस्य पत्युः ॥ पत्युः स्मरन्तीत्यत्र कर्मणः शेषयविवक्षायाम् पतिशब्दात्षष्ठी विभक्तिर्भवति । "कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां पष्ठयेव” इति नियमात् स्मृधातोः शतप्रत्यये शबादिकार्ये कृते नुमि “ उगितश्चेति" ङीपि स्मरन्ती। तस्मादिति ततः, तदशब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल्" सूत्रेण तसिल्प्रत्यये अन्वे पररूपे च तत इति। नयनयोरम्बूनि तेषां पूरः तं नयनाम्बुपूरम्, । मुन्धातोः शतृप्रत्यये नुमागमादिकार्ये कृते ङीपि च कृते मुञ्चन्ती। स्वरेण सह सस्वरम् यथा स्यात्तथा । अरुदत्॥ Compare मेघदूत - भर्तुः स्मरसि... पत्युः स्मरन्ती . श्लो. ३०. वसन्तात्यये (मातः) कर्णाटीकुचकोटिकेलिविलसल्लीलालसाः कासारपसरत्तरङ्गततिषु क्रीडाकराः मल्लीनालविलासलालनकलाः अनङ्ग- सरपरस्त्रीखेदविच्छेदकाः लोलाः मारुताः प्रातान्ति । प्रातःकाले वान्ति ।। वसन्तस्यात्ययः वसन्तात्यथः। कर्णाटयाः कुचौ तयोः कोटिस्तयो केलिस्तस्मिन् विलसन्तश्च ते लीलालसाः लीलया (लीलाभिः) अलसाः कर्णाटीकुचकोटिकेलि- विलसल्लीलालसाः । कासारे प्रसरन्तः कासारप्रसरन्तश्च ते तरङ्गास्तेषां ततयः तासु क्रीडां कर्तुं शीलं येषां ते क्रीडाकराः मल्ल्याः (मल्लीनां वा) जालानि तेषु विलासा- स्तेषु लालनकलाः लालनस्य कलाः मल्लीजालविलासलालनकलाः। नास्यङ्ग- मस्येत्यनङ्गः, अनङ्गस्य संगरः अनङ्गसङ्गरः तस्मिन् परा अनङ्गसङ्गरपरा, तत्परा चासौ स्त्री तस्याः खेदस्तस्य विच्छेदकाः । कोटयति कोट्यते वा, कुट कौटिल्ये “अच इः । कोटिः। तन्धातोः क्तिन्प्रत्यये ततिः, बहुवचने ततयः। संगरणम् संगीर्य- ते वा गृशब्दे “ऋदोरप्” “पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण"। क्रीडाकरा इत्यत्र “कृओ हेतु" सूत्रेण टप्रत्ययः, विच्छेदका इति ण्वुलन्तः प्रयोगः ॥ अलङ्कारः परिकरः ॥ कुचौ स्तनौ । कासारः सरसीसरः ॥ मल्लीजाल-the more current form is मल्लिका-Jasminuin lised both for the plant and the flower. श्लो. ३१. ग्रीष्मे धारायन्त्रतुषारसारकणिकानिर्वारितोष्मोदगम् श्रीखण्डागुरुधूपवासरुचिरं सचन्द्रोदयम् हर्म्यम् पुष्पमयी च शय्या चन्दनरसः कर्पूरकस्तूरिका, स्वच्छं वास: अकञ्चुका प्रियतमा सुखस्यास्पदम् ॥ ग्रसते रसान् , असु अदने मक्प्रत्ययः, धातोीभावः षुगागमश्च तस्मिन् ग्रीष्मे । धारायाः यन्त्रं तस्य तुषारस्तस्य सारस्तस्य कणिकास्ताभिनिवारितः प्रीमो- दयो यत्र (यस्मिन्) तत् । धूपस्य वासः धूपवास. । श्रीखण्डश्च अगरु च धूपवासश्च श्रीखण्डागुरुधूपवासास्तै रुचिरं यत् तत् । चन्द्रेण सह सचन्द्रः, सचन्द्र उदयो यस्मिन् तत् सचन्द्रोदयम् । नास्ति कञ्चुको यस्याः सा अकञ्चुका। अतिशयेन प्रिया प्रियतमा। पुष्पप्रचुरा पुष्पमयी, प्राचुर्यार्थे मयद्, “टिड्ढाणञ्” इति डीपि पुष्पमयी। शय्यते अस्याम् शोधातोः संज्ञायाम "समजनिषद" सूत्रेण क्यपि "अयड्यि" सूत्रेण अयङ्, शय्या, स्त्रीत्वात् टापि । चन्दनस्य रसः। कर्पूर- युक्ता कस्तूरिका कर्पूरकस्तूरिका । कसति गन्धोऽस्या इति विग्रहे, कस गतौ खर्जादित्वात् ऊरप्रत्ययः, पृषोदरादित्वात् कस्तूरी, तस्मात् स्वार्थे कः “केऽण इति हूस्वे टापि कस्तूरिका ॥ तुल्ययोगिता दीपकम् ॥ Compare the following two verses of ऋतुसंहार, सर्गः १, श्लोः २ & ३. " निशाः शशाङ्कक्षतनीलराजयः क्वचिद्विचित्रं जलयन्त्रमन्दिरम् । मणिप्रकाराः सरसं च चन्दनं शुचौ प्रिये यान्ति जनस्य सेव्यताम् ॥ सुवासितं हर्यतलं मनोहरं प्रियामुखोच्छ्वासविकम्पितं मधु । सुतन्त्रिगीतं मदनस्य दीपनं शुचौ निशीथेऽनुभवन्ति कामिनः ॥ efterg: -Sandal or sandal tree. श्लो. ३२. इदं नु (दयितायाः) (मुग्वम् ) किमु नीरज (कमलम् ) (पङ्कजम् ) । तद्धि ( कमलम् ) (पङ्कजम् ) पङ्केरुहम् भवति । किमेष रजनीकरः। ननु सः ( रजनीकरः ) लाञ्छनेनाङ्कितः । अथ मधुराधरं चलविलोचनं मस्मितं दयितामुखम् , इति विभाव्य वल्लभः हृदि मुदं दधे ।। नीरे जातं नीरजम “सप्रभ्यां जनेई: "। पके रोहति इति विग्रहे, सह प्रादुर्भावे इगुपधे" ति कः प्रत्ययः, “तत्पुरुषे कृति बहुलम्" सूत्रंण सप्तम्या अलुक्, कित्वात् गुणाभावे पङ्केरुहम्। रजनी करोतीति विग्रहे ‘कृत्रो हेतु०" सूत्रेण ट- प्रत्ययः, गुणे रपरे रजनीकरः । लाञ्छयतेऽनेनेति ल्युट लाञ्छनम् तेन लाञ्छनेन । मधुरोऽधरो यस्मिन् तत् मधुराधरम्। चले विलोचने यस्मिन् तत् । स्मितेन सह सस्मितम् , स्मिङ् ईषद्धसने भावे तः। दयितायाः मुखम् दयितामुखम् । व्युपसर्गात् भू णिचि विभावि इत्यस्मात् क्वाल्यपि णिलोपे विभाव्येति रूपम् । धाधातोः परोक्षे लिद दधे ॥ निश्चयान्तसन्देहः ॥ श्लो. ३३. स्निग्धः ( वत्सलः) प्राणनाथः सायं (सन्ध्याकाले ) मन्दं मन्दं (यथा स्यात्तथा) निभृतचरणं ( यथा स्यात्तथा) तस्याः पृष्ठतोऽभ्येत्य (तस्याः) अक्षिणी करतलयुगलेन मीलयित्वा कामात उल्लसन्त्याः पियायाः गल्लयोः विपुलपुलकमधरमधुरं वक्त्रम् (कामात् ) एवं चुम्बति ।। निभृतौ चरणौ यस्मिन् कर्मणि ( यथा स्यात्तथा ) तत् निभृतचरणम् । पृष्ठ- शब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल" पृष्ठतः । स्निह्यति स्मेति विग्रहे स्निह प्रीतो अकर्म- कत्वात् 'गत्यर्थाकर्मके ति क्त. स्निग्धः। करतलस्य युगलम् तेन । मील संकोचे णिजन्तात् क्त्वाप्रत्यये इडागमे गुणे अयादेशे च मीलयित्वेति रूपम्। उल्लस- तीति उलसन्ती शतप्रत्यये ङीबादिकार्य कृते उल्लसन्ती तस्याः। विपुलः पुलको यस्मिन् तत् विपुलपुलकम् । अधरेण मधुरम् अधरमधुरम्। अभ्याङ् इति युपसर्गान् इण्धातो क्त्वाल्यपि “हस्वस्य पिति कृति तुक्” इति तुकिं यणि गुणे च अभ्येत्य। उच्यतेऽनेन वच परिभाषणे-“गुधृवीपचिवचि०" इति सूत्रेण अप्रत्ययो भवति कत्वं च वक्त्रम् । चुम्बति ॥ स्निग्धो वत्सलः इत्यमरः। वक्त्रास्ये वदनमित्यमरः ॥ Compare अमरुशतक slo. 19-पश्चादुपेत्यादरात्......
. श्लो. ३४. (हे ) सुतनु, अनङ्गकेलौ मनसि मानं मा आनय, स्वं दयितत. मपि आलिङ्गनाथैः मानय, इति निगदति पत्यौ मानतो नालपन्ती सा कठिन- कुचतटे नेत्रनीरं मुमोच॥ सुष्टु शोभना तनूर्यस्याः सा तत्सम्बुद्धौ सुतनु । नास्त्यङ्गमस्येति अनङ्गः तस्य केलिस्तस्मिन् । दय्यते स्मेति दयितः दयधातोःक्तप्रत्ययः । अतिशयेन दयित प्रियः) दयिततमः, अतिशायने “तमविष्ठनी." इति सूत्रेण तमप् , तम् दयिततमम् । आलिङ्गनानि आधानि येषु तानि आलिङ्गनाद्यानि (भोगरूपाणि वस्तूनि। ते आलिङ्गनाद्यैः (संभोगरूपवस्तुभिः)। निगदतीति निगदन तस्मिन् निगदति शत्रन्त- प्रयोगः । कुचयोस्तटम् कुचतटम्, कठिन च तत् कुचतटम् च कठिनकुचतटम् तस्मिन् । नेत्रयोः नीरम नेत्रनीरम् । मुमोच मुचेलिटि मुमोचेति प्रयोगः । इति निगदितपत्यौ इति पाठे तु-इति निगदितं येन स इतिनिगदितः. इतिनिगदितश्चासौ पति. इतिनिगदितपतिम्तस्मिन् इतिनिगदितपतौ इन्यनिष्टरूपापत्तिः स्यात्, अर्थात् इतिनिगदितपत्यौ इति रूपं न स्यात् , पतिः समास एवे "ति नियमात् पति- शब्दस्य समासे एव घिसंज्ञा भवति-घिसंज्ञाभावे पत्यौ रूपं स्यात् घिसंज्ञायां तु पतौ इति रूपं भवति । इतिनिगदितपन्यौ इत्यत्र समासत्वात् घिसंज्ञा भवत्येव । आङपसर्गात् लपधातोः शतप्रत्यये नुमादिकार्ये कृते ङीपि आलपन्तीरूपं भवति ॥ The reading of the Ms. is दयत तमसि मं स्वं; this does not give satisfactory sense, hence the emendation दयिततममपि स्वं...... श्ली. ३५. (हे ) सखि, कान्तागमस्येयमाशा अनिशं मे हृदयं रुणद्धि, तत्सङ्गयाकाङ्क्षया मयापि कथंचिदसवः धार्यन्ते इति जल्पन्ती सा पथिकाङ्गना महमा प्रेयमः स्वरं श्रुत्वा मत्रीडा समुदेव साश्रुनयना सस्वरा सस्मरा( जाता )। आगमनमागमः, कान्तस्यागमः कान्तागमस्तस्य कान्तागमस्य । अनिशम् (अहर्निशम)। संगमनं संगम ग्रहवृदृः इति “सूत्रेण" अप्प्रत्ययो भवति तस्य संगमस्तत्संगमस्तस्य आकाङ्क्षा तत्संगमाकाङ्क्षा, तया तत्संगमाकाया। आङप- सर्गात् काक्षिधातो. "गुरोश्च हल" इति सूत्रेण अप्रत्यये इदित्वान्नुमि अनुस्वारे परसवर्णे च कृते टापि आकाङ्क्षा तया। णिजन्तात् धृधातोः कर्मणि प्रत्यये धार्यन्ते इति रूपं भवति । जल्पधातो शतप्रत्यये कृते शबादिकायें कृते नुमागमे च कृते हीपि प्रत्यये जल्पन्ती इति प्रयोगो भवति । प्रशस्तान्यङ्गानि अस्या इति विग्रहे अङ्गशब्दात् "अङ्गात्कल्याणे" इति सूत्रेण नप्रत्यये कृते टापि अङ्गनेति रूपम् । ब्रीडया सह (वर्तते) इति विग्रहे "तेन सहेति तुल्ययोगे" सूत्रेण "समासे वोपसर्जन- स्य” इति सूत्रेण सहस्य सादेशे सब्रीडा । मुदया सह समुदा। इव पूर्ववत् । अश्रुणा सह वर्तते इति साश्रुणी, साश्रुणी नयने यस्या सा साश्रुनयना ॥ स्वरेण (रेः) सहिता सखरा। स्मरेण सह सस्मरा॥ उपमा ॥ .
. श्लो. ३६. मत्तद्विरदपाललीलागतिरसालसा (मदालसा) मदालिङ्ग नलालसा लोलाक्षी बाला आयाति। द्वो रदौ येषां ते द्विरदाः, मत्ताश्च ते द्विरदास्तेषां भूपालस्तस्य लीला- गतिरिव गतिर्यस्याः सा मत्तद्विरदभूपाललीलागतिः। रसेन अलसा या सा रसालसा (अथवा मदेन अलसा या सा) ( अथवा मत्तद्विरदभूपालस्य लीलागतौ ( त्याः) रसस्तेन अलसा या सा)। मदालिङ्गने लालसा यस्याः सा मदालिङ्गनलालसा। लोलाक्षी लोले अक्षिणी यस्याः सा लोलाक्षी। माद्यतीति मत्त , मदी हर्षे “गन्याकर्म के '' ति क्तः मत्तः। गमनं गतिः स्त्रियां क्तिन् । लोलाक्षिशब्दात् बहुव्रीही “ सक्थ्यक्ष्णोः स्याङ्गात् षन्" इति षच् अनुबन्धलोपे षित्वात् ङीबू लोलाक्षी ॥ उपमा ॥ श्लो. ३७. सग्वि, निलये विलीनः (अहम् ) कान्तया सङ्गं संगम्य अनङ्ग सरसैरङ्गैः रतपाण्डित्यं तनोमि ॥ विशेषेण लीनः विलीनः, लोधातोः क्तप्रत्ययः, “आदितश्च" ति सूत्रण निष्ठा तकारस्य नकारः। रसैः सहितानि सरसानि। अनङ्गस्तेन ( हेतुना) अथवा तद्वत्सरसानि तैः अनङ्गसरसैः। रमणं रतम् , रतस्य पाण्डित्यम् रत- पाण्डित्यम् “ नपुंसके भावे क्तः", समुपसर्गात् गम्धातोः क्त्वाप्रत्यये तस्य ल्यबादेशे कृते "वा ल्यपि" सूत्रस्य विकल्पपक्ष संगम्येति रूपम्। सदसद्विवे. किनी बुद्धिः पण्डा, पण्डा साता अस्येति विग्रहे तदस्य संजातं 'तारकादिभ्य इतच्" पण्डितस्तस्य भाव. कर्म वेति विग्रहे “वर्णदृढादिभ्य प्यञ्चे"ति सूत्रेण प्यञ्प्रत्यये वृद्धिश्च पाण्डित्यम् । श्लो. ३८. भूयोभिर्दिवसः देशान्तरादागतोऽयं प्रियतमः उचितं विद्वानपि जडताम् तनोति (अथवा विद्वानपि जडतां तनोति इति उचितम् नोचितमित्यर्थ इति काकुः)। आलापमग्नो जनः ( सखीजनः परदुःखानभिज्ञत्वात आलापमग्न इत्यर्थः। इत्यालोच्य विलासलोलनयना कामाकुला कामिनी निशि कान्ते सखीजने चैव तनौ दीपे दृशं संदधे ॥ अन्यो देशो देशान्तरं तस्मात्। अतिशयेन प्रियः प्रियतमः। वेत्तीति विद्वान् । जडस्य भावो जडता ताम्। आलापे मग्नः आलापमग्नः। विलसनं विलासः, विला- सेन लोले नयने यस्याः सा विलासलोलनयना । कामेन आकुला कामाकुला । देशान्तरादित्यत्रापादाने पञ्चमी। आगत इत्यत्र" गत्यर्थे ' ति कतरिक्त । विद्वान् इत्यत्र विदधातोः क्वसुनुमादिकार्ये कृते विद्वान् । प्रियतम इति तमवन्त । जडतेति तलन्तः प्रयोगः। आलपनमालाप इति घनन्तः प्रयोगः । मग्नः मगि नुमि अधि मग्नः। आलोच्येति ल्यबन्तः । विलास इति घनन्तः । संदधे इति परोक्षे लिट् ॥ विशेपोक्ति काकुश्च, उपमा । .
हे तनोति जडतामालापमग्नो जनः etc. Compare अमरुशतक slo. 77. आयाते दयिते मनोरथशतैर्नीत्वा कथंचिद्दिनं वैदग्ध्यापगमाजडे परिजने दीर्घा कथां कुर्वति । दृष्टास्मीत्यभिधाय सत्वरपदं व्याधृय चीनांशुकं तन्वङ्गया रतिकातरेण मनसा नीतः प्रदीपः शमम ॥ श्लो. ३९. ( अहम् गच्छामीति (उक्त्वा) निवसतेः समुत्थितः कान्तः मया समालम्बितः विश्रब्धं (यथा स्यात्तथा ) परिरब्ध एव हि ( कान्तः ) ततो निर्पणः ( हे )मात: यावदहं चिन्तातुरा विलासशयने सुप्तास्मि तावत् हसना तेन शनैः समेत्य वक्त्रे चिरं चुम्बिता ( अहम् ) ॥ न्युपसर्गात् वस्धातोशितप्प्रत्यये कृते शबादिकार्ये कृते निवसतिः तस्याः निवसतेः। समुत् इति द्वयुपसर्गात् स्थाधातोः “गत्यर्थाकर्मकेति सूत्रेण क्तप्रत्यये "दयति स्यति." सूत्रेणेन्वे पूर्वसर्वणादिकार्ये कृते समुत्थित इति रूपम् । समालम्बित इति कान्तप्रयोगः। तस्मादिति ततः पञ्चम्यास्तसिल्प्रत्यये कृते अन्वे पररूपे च कृते तत इति रूपम् । निर्गता घृणा यस्य (यस्मात्) स निघृणः । यात इति क्तान्त- प्रयोगः । चिन्तनं चिन्ता चिति स्मृत्याम् “चिन्ति पूजि०" सूत्रेण अङि टाबि चिन्ता चिन्तया आतुग चिन्तातुग । विलसनं विलास भावे घञ्, विलासस्य शयनं विलास शयनं तस्मिन विलासशयने । शी स्वप्ने भावे ल्युट् शयनम् । सुप्तेति तान्त- प्रयोगः। समाङपसर्गात् इण्धातोः क्त्वाल्यपि तुकि गुणे समेत्येति रूपम् । श्रन्भुधातोः क्तप्रत्यये नलोपे तकारस्य धकारे जश्वे विश्रब्धम् इति । पर्युपसर्गात रमे. तप्रत्यये तकारस्य धकारे जश्त्वे परिरब्धः। हसतीति हसन् तेन हसता शत्रन्त- । प्रयोगः॥ Compare अमरुशतक slo. 82. श्लो. ८०. (हे ) मुग्धे, विभ्रमालोकदक्षं स्निग्धं नयनं रचय, (हे) सरले (वक्त्रे) कोमलालापरम्यां वाणों रचय, अथ रङ्गन्सुललितमाम् प्राणनाथे भावय, त्वं मिथः संकथासु भूयो भूयो तदनुगा भव ।। विगतो भ्रमो यस्मात् यस्य वेति सविभ्रमः, आलोकनमालोकः ( घञ्) विभ्रमश्चासावालोकश्च इति विभ्रमालोकस्तस्मिन् दक्षम् विभ्रमालोकदक्षम् । नीयतेऽनेनेति नयनम् ल्युट्प्रत्ययो भवति । आलपनमालापः भावे घन । कोमल- श्वासावालापश्च तेन रम्या ताम् कोमलालापरम्याम् । स्निह प्रीतौ इत्यस्मात् क्त- प्रत्यये स्निग्धमिति रूपम् । उच्यतेऽनेनेति विग्रहे वच्धातोः 'गुधृवीपचिवचि" सूत्रेण प्रत्यये कुत्वे च वक्त्रम् तस्मिन् वक्त्रे। रगिधातोः रङ्गति इति विग्रह शतप्रत्यये रङ्गत् इति रूपम्, रङ्गत् च तत्सुललितम् च रङ्गन्सुललितम् । भावये- त्यत्र भूधातोः णिजन्तात् लोटि मध्यमपुरुषैकवचने रूपम् । अनु पश्चाद् गच्छती- . " ति अनुगा, तस्य अनुगा तदनुगा, अनूपसर्गात् गमधातोः “अन्येभ्योऽपि०" सूत्रंण उप्रन्यये टिलोपे टापि अनुगेति रूपं सिद्धम् ॥ श्लो. ४१. ( हे ) विधिज्ञ, प्रेमहारी कीटक् भयकोपः तव मनमि वसति यः (कोपः) चाटुवाचां विधिज्ञे नम्र पत्यौ न विरमति, एभिः कृत्यैरसुजनजनं पूर्ण- काम मा कृथाः, सुजनं होन्कर्ष गमय (पापय), नं पति स्वीकुरुष्व ।। विधिं जानातीति विधिज्ञा, ठ्युपसर्गान् शाधातोः ' इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः इति सूत्रेण कप्रत्यये आकारस्य लोपे स्त्रीत्वविवक्षायां टापि तत्सम्बुद्धौ विधिज्ञे । (विधिने इति पतिविशेषणे विधि जानातीति विधिशस्तस्मिन् विधिज्ञे । ) प्रेम हर्तुं शीलमस्येति अथवा प्रेम हरतीति प्रेमहारी, हृधातोणिनिः वृद्धिः दीर्घादिकार्य कृते प्रेमहारी पदस्य सिद्धिर्भवति। चाटवश्च ताः वाचश्च तासां चाटुवाचाम् । विरमतीत्यत्र व्यापरिभ्यो रम इत्यनेन परस्मैपदं भवति । न सुजनोऽसुजनः, अमुजननासौ जनश्च असुजनजनस्तम् । कमनं कामः, पूर्ण कामो यस्य सः पूर्णकामस्तं पूर्णकामम् । कृधातोरात्मनेपदे लुङि मध्यमपुरुषक वचने माङ्योगे “न माड्योगे" इत्यनेन अडागमाभावे मा कृथा इति रूपम् । शोभनो जनः सुजन. । उत्कर्षणमुत्कर्षः, कृषेर्घ गुणश्च । हर्षस्य उत्कर्षः हर्षो- कर्पम्तं हर्षोत्कर्षम् । गमधातोर्णिजन्तान् लोटि मध्यमपुरुपैकवचने गमय इति रूपम् । स्वीकुरुष्व लोटि मध्यमपुरुषस्यैकवचनस्य रूपम। विशेषोक्तिः ॥ hence amendation कृत्यैर कृत्यैरमजनजन-makes no sense; असुजनजनं - श्लो. ४२. ( हे ) हरिणाक्षि, आक्लान्तस्तना इयं हारलतिका उच्चैस्तटा गङ्गा कमला न्वन्त्रीलरोमावली किल कालिन्दी विलमति, वक्रोक्त्या च सुललिता सरस्वती विलसति)। मध्ये मिथः मङ्गश्च एताः (नद्यः) त्वयि तीर्थम् (तीर्थभावम्) उपागताः ( तम्मात ) त्वमेव परं सेव्याऽसि ॥ हरिणम्य अक्षिणी इव अक्षिणी यस्याः सा हरिणाक्षी तत्सम्बुद्धौ हे हरि- णाक्षि-हरिणाक्षीशब्दात् “बहुव्रीही सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् पच्” इति सूत्रेण पच्प्रत्यये षित्वात् डीपि हरिणाक्षी। आक्लान्तौ स्तनौ यया सा आक्लान्तस्तना। उच्चैस्तटौ यस्या सा उच्चैस्तटा गङ्गा। हारस्य लतिका हारलतिका। नीला चासौ रोमावली, च नीलरोमावली, तव नील रोमावलीति त्वन्नीलरोमावली। कलिन्द- स्येयं कालिन्दी-इदमर्थऽण आदिवृद्धिः जीप च भवति। वक्रा चासौ उक्तिश्च, वचधातोः परिभाषणे क्तिन् प्रत्यये संप्रसारणादिकार्ये कृते उक्तिरिति रूपं भवति. तया वक्रोक्त्या । सरोऽस्त्यस्या इति विग्रहे मतुपप्रत्यये मकारस्य वकारे कृते डोपि च कृते सरस्वतीपदस्य सिद्धिर्भवति । सुष्टु ललिता सुललिता सरस्वती । सञ्जनं सङ्गः भावे घञ् । तीर्यतेऽनेनेति विग्रहे तृधातोः “पातृ" उणादिसूत्रेण थक प्रत्यये ईत्वे रपरत्वे च तीर्थम् । सेवितुमर्हा सेव्या षे सेवायां धातोः “अहे कृत्यतृचश्व" सूत्रेण ण्यति स्त्रीत्वविवक्षायां टापि सत्वे सेव्येति पदं सिद्धयति । गम्यते प्राप्यते मोक्षार्थिभिर्या सा गङ्गा, गम्धातोः । गम्ययोः " सूत्रेण गन्प्रत्ययः, ततः स्त्रोत्वे टापि गङ्गा । उपमा रूपकं काव्यलिङ्गम ॥ In this verse the author compares the pearinecklace to the Ganges, the darkish hair on the body is compared to Yamunī, while the Speech is called Sarasvati All the three constitute in the Nāyikā, a tirtha, so she becomes azt The same simile is repeated in S'lo 43 श्लो. ४३ (हे ) प्रियतमे. (ते) वक्षोजाचलयातिनी विमला मुक्तालता जाह्नवी ते ललिता रोमालो कलिन्दतनया च पार्श्व प्रयानेच ता मध्ये संगतयो- म्तयो:(नद्योः) सौम्यं सङ्गमम् (अथव) संपाप्तं मनसोऽग्विलमभिलापं च सकामो यहं सेवे (अथवा) सौम्ये तयोः संगमे संपाप्तं मनसोऽग्विलमभिलाषं सेवे ।। " अतिशयेन प्रिया प्रियतमा तत्सम्बुद्धौ प्रियतमे, "" अतिशायने तमविष्टनी सूत्रेण तमप् । वक्षसि जातौ वक्षोजौ “सप्तम्यां जनेई: " वक्षोजावेवाचलौ, तत्र यातिनी वक्षोजाचलयातिनी. याधातोः “ नपुंसके भावे क्तः” तस्मात् क्तान्तात् अत इनिठनौ-"इनिः डीप् च यातिनी। विगतं मलं यस्याः, विगतो मलो यस्याः सा विमला, मल धारणे अन् । मुक्तैव लता मुक्तालता (मुक्तावली)। जोर- पत्यं स्त्री जाह्नवी अपत्याऽर्थेऽण वृद्धिगुणों-अवादेशे ङीपि च कृते जाह्नवी। रोम्णा- माली रोमाली, आ अलति अल्यते वा "सर्वधातुभ्य इन्” कृदिकारात् डीब वा। कलिन्दस्य तनया कलिन्दतनया। प्रकणोय प्रोवे, प्रयाता इव. प्रयाति स्मेति प्रयाता, कर्तरि क्तः । सोम इव सौम्यः, “शाखादिभ्यो यः" ततः “प्रज्ञाद्यण" वृद्धिश्च, सौम्यस्तम्। संगमनं संगमस्तम्। “ग्रहवृद इत्यए। संगतयोरित्यत्र कतरि तः। सम् प्रेति द्वयुपसर्गात् आफ्धातोः क्तप्रत्यय । अभिलपणम अभिलाषः, लप कान्तौ घञ् तम् । षे सेवने परोक्ष लिट् सेवे । रूपकम उत्प्रेक्षा च ॥ सौम्यो वुधे मनोज्ञ स्यादनुग्रे-इत्यमरः । श्लो. ४४. (हे ) मातः, मे (मम) परः शरीरपटिमा न ( नास्तीत्यर्थः ). मम भूलता न वक्रा, मम भीतिपरायणं (चेतः) अस्ति, मे (मम) लोचने चले स्थाने, न हृदि गोलको स्तनौ निर्यातौ, मम नितम्बस्थली अतिगुवौं जाना, (मम) मध्यं कापि गतम्, मम चरणावपि मन्दा गति संश्रितो ।
५१ ७ “ माति गोऽस्यां, मा माने “नप्तनेष्ट्र.” इति उणादिसूत्रेण तृप्रत्ययः, मातृ- प्रथमैकवचने माता तत्सम्बुद्धौ मातः । पटोर्भावः पटिमा “पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा इति सूत्रेणेमनिन् टिलोपे दीर्घ पटिमा । शरीरस्य पटिमा शरीरपटिमा। भ्ररे- व लता भृलता। वञ्चतीति (वञ्चु गतौ) “म्फायितश्चि० " सूत्रण रक स्त्रीत्वे टापि वक्रा। भीतिः क्तिन्प्रत्ययान्तः, भीतेः परायणं, भीतिपरायणम भीतियुक्त- मत्यर्थः । लोच्यते-आभ्याम् ल्युट लोचने ( लोच्लू दर्शने)। निरुपसर्गात याते तः ( कर्तरि ) द्विवचने निर्यातौ। नितम्बस्य स्थली नितम्बस्थली। गुरुशब्दात् "वोतो गुणवचनात्” सूत्रेण जीप यणि गुर्वो। किम् शब्दात् । किमोऽत्' इत्यत् क्वाति सूत्रेण किम् शब्दस्य कादेशः। गम्धातोः क्तिन् गतिस्तां गतिम् मलोपश्च । गतम् कान्तप्रयोगः। समुपसर्गात् श्रिधातोः क्तः, संश्रितौ ॥ श्लो ४५. (हे ) वाले, स्वहृदये निरन्तरं धैर्य धेहि, (बाले) भयं मा कृथाः किल (निश्चयेन) वयःसंधौ स्त्रीणामीगपाटवं किल समुत्पद्यते, तन्त्रज्ञः गद- लक्षलक्षणविधौ, तथा निदाने दक्षः, (तथा) कलाम कुशलः ते (तब) दयितो वैद्य- स्तस्मै तनुं दर्शय ॥ स्वस्य हृदयं स्वहृदयं तस्मिन् स्वहृदये । निर्गतमन्तरात् अथवा निर्गतमन्तर- मस्मिन् इति निरन्तरम् । दधाति धीयते वा इति विग्रहे धाधातोः “ सुसूधाञ्- गृधिभ्यः कन्” “घुमाथे 'ति ईत्वम्। धीर इति धीरस्य भावः कर्म वेति प्यञ् धैर्यम् । धाधातोलोटि मध्यमपुरुषैकवचने "ध्वसोरेद्धौ” इति सूत्रेण एत्वे अभ्यासलोपे च धेहि रूपम् । कृधातोरात्मनेपदे लुङि मध्यमपुरुषैकवचने माङ् योगेऽडागमाभावे सिचो लुकि मा कृथाः। तन्त्रं जानातीति तन्त्रज्ञः “इगुपधे ति कः, आकारस्य लोपः तन्त्रमः । वयसः सन्धिः वयःसन्धिस्तस्मिन् वयःसन्धौ । वयते षय गतौ वेति वा वी गत्यादौ असुन् प्रत्ययः वयः। संधानम् सन्धिः धात्रः “उप- समें धोः किर्" इति किप्रत्यय सन्धिः । स्त्यायन्ति गर्भी आसु इति स्त्रियस्तासां स्त्रीणाम , स्त्यायतेर्डट् टिलोपः यलोपः टित्वात् की। पटोर्भावः कर्म वेति विग्रहे पटुशब्दात् इगन्ताच्च लघुपूर्वात् " इत्यण वृद्धौ गुणे च पाटवम् , न पाटवम- पाटवम् । पदगतौ दिवादिः। समुद् इति द्वयुपसर्गात् पद् धातोः श्यनि समुत्पद्यते । गदस्य लक्षं (लक्षसंख्याकम् ), लक्ष्यते इति लक्षम् घञ् गदलक्षम् । तस्य लक्ष- णम् , लक्षयतीति ल्युट् लक्षणम् तस्य विधिस्तस्मिन् विधीयतेऽनेनेति विधिः, "उपसर्ग घोः किः" इति किप्रत्ययः॥ लक्षं व्याजशरव्ययोः संख्यायामपि इत्यमरः । A dialogue between an innocent young woman describing the signs of youth as if they were the symptoms of some disease, reassured by an elderly woman that these things happen when one passes from childhood to youth-and that her lover would be the proper physician to cure the trouble. “ श्लो. ४६. पोषिततकाहृदि वह्नि भृशं सन्दीपयन संभोनिगीनामनग- रङ्गजनितामङ्गग्लानि हरन बने जम्बूतरूणां फलं परिणति नयन सुस्पर्शः व्युढ- मौढकदम्बपुष्पसुरभिश्च ग्रीष्मान्तवातो ववौ ।। प्रोषितः भर्ता यस्याः सा प्रोषितभर्तृका तस्याः हृद नम्मिन् . प्रोषित- भतृशब्दात् विभृतीति भर्ता भृ तृच “न दयूतश्च "ति का टापि प्रोपितभर्तृका ( अथवा प्रोषिताः भर्तारः यासां नास्तासां हृदि )। संदीपयन समुपसर्गात दीपेर्णि- चि शतप्रत्ययः। संभोक्तुं शीलं यासां ताः संभोगिन्यस्तासां संभोगिनीनां "सुप्य- जातौ णिनिस्ताच्छील्ये" इति णिनिः । अनङ्गस्य रङ्गस्तेन जनिता ताम्-रज्यत्यस्मिन इति रङ्गः । “अकर्तरि चे"ति सूत्रेण घञ् कुत्वं च । जनितेति तृजन्तः । हरतीति हरन् । अङ्गतीति अङ्गम् । नयतीति नयन् अङ्गस्य ग्लानिस्ताम । जम्बूनां नरवः जम्बूतरवः तेषां जम्बूतरूणाम्। तरन्त्यनेनेति विग्रहे भृमृशी" इन्युप्रत्यय तरवः । शोभनी स्पशा यस्य स सुस्पर्शः । ब्यूढाश्च प्रौढाश्च ते कदम्बाश्च व्यूढप्रौढकदम्बा, ब्यूढप्रोढ- कदम्बानां पुष्पाणि तेषां सुरभिर्यस्मिन् सः । ग्रीष्मान्तस्य वातः। ग्रसनेरम्मान मक्प्रत्ययः धातोीभावः षुगागमश्च । . जंबूतरूणां etc. The ripen of Jambu iruits at the end of summer and in the beginning of monsoon is a signiticant feature of the Season in Gujarat. श्लो. ४५. वर्षागमे पद्धतौ उत्कलिकाकुलान् पान्थानतितरामुन्सादयन् कान्तासंगमरागिणां धृतिमतामङ्गे स्परं जीवयन् जातीकोरकजालमाशु दलयन मेघोन्मुक्तपृषन्मु सिक्तवसुधागन्धं वहन मारुतो वाति ।। वर्षणमस्त्यासु इति विग्रहे. अर्श आदित्वादचि टापि वर्षाः। आगमन- मागमः आङपसर्गात् गम्धातोः “ग्रहवृदृ० " सूत्रण अपप्रत्य सूत्रण अपप्रत्ययो भवति । वर्षाणा- मागमः वर्षागमस्तस्मिन् वर्षागमे। पादाभ्यां हन्यते-इति विग्रहे तिन्प्रत्यये हिमकाषिहतिषु चे "ति पद्भावे पूर्वसवर्णे च कृते पद्धतिः तस्यां पद्धतौ । उत्कलिकाभिराकुला उत्कलिकाकुलास्तान् । पन्थानं नित्यं गच्छन्तीति पान्थास्तान् पान्थान् । उत्साहयतीति उत्साहयन इति शत्रन्तप्रयोगः। रञ्जनं रागः रज्यतेऽ. नेनेति वा रागः रङ्ग् धातोः भावे करणे वा घञ् नलोपो वृद्धिश्च । संगमनं संगमः "ग्रहवृदृ" सूत्रेण अप्प्रत्ययो भवति । कान्तानां संगमः कान्तासंगम- स्तस्मिन् रागिणस्तेषां कान्तासंगमरागिणाम् -रागाः सन्ति येपाम् ते रागिणः, रागिण इत्यत्र रागशब्दात् अत इनिठनौ" इति सूत्रण इनिप्रत्ययः। धरणं धृतिः क्तिनप्रत्यये धृतिः एषाम् अस्तीति धृतिमन्तस्तेषाम धृतिमताम । जीवय -- नीति जीवयन् । जातीनां कोरकाः तेषां जालम । दलयतीति दलयन् । मेघैरुन्मु- कानि पृषन्ति तैः सुसिका वसुधा मेघोन्मुक्तपन्सुसिक्तवसुधा तस्या गन्धस्तम वहतीति वहन् । स्वभावोक्तिः ॥ पद्धति (f.)= पदहति - (lit.) foot-stroke; a way: a path. जाति or जाती-(f.) The reading of the Ms जाता is obviously a scribe's error for जाती. Jasminum grandiflorum Compare (Jujarati जाई लो. ४८. कामालसः कोऽपि धन्यः पुमान धोरं मृदङ्गोपमम् अलं ध्यान जलधरे कुर्वति गर्विनालिनिवहे परं गानं गायति (मति) वध्वा सार्धमनुलम- गारजालं संश्रित्य तडिदङ्गनागणकृतं नृत्यं मानन्द समुद्रोसते ॥ कामेन अलस. कामालसः। धनाय हित इति विग्रह धनशब्दात् यत्प्र. त्यये धन्य इति । पुनातीति पुमान् । मृदङ्गस्य उपमा यस्य सः मृदङ्गापमस्तम्। ध्वननं ध्वान इति घनन्त , तं ध्वानम् । करोतीति कुर्वन् तस्मिन् कुर्वति । जलम्य ( जलानां वा) धर. जलधरम्तस्मिन जलधरे । गर्विताश्च ते अलयश्च तेषां निवहस्तस्मिन् । गीयते यत् तद् गानं गै ल्युट् आत्वे गानम् । गायतीति गायन् तस्मिन् गायति । वध्वा इत्यत्र “सहयुक्त प्रधाने” इति सूत्रेण तृतीया भवति । न विद्यते तुला यस्य तदतुलम् । अगारस्य जालम अगारजालम । समुपसर्गात श्रिधातोः क्त्वाल्यपि मंश्रित्येति । तडितः एव अङ्गनास्तासां गणः तडिदङ्गनागण- स्तेन कृतम् । प्रशस्तानि अङ्गानि आसामिति अङ्गनाः “अङ्गावल्याणे " इति न प्रत्यय टापि अङ्गना । आनन्देन सह सानन्दम् । समुद्रीक्षते इति त्र्युपसर्गान् ईश्धातोः वर्तमानकाले समुद्रीक्षते रूपम् । रूपकम् ॥ मुमान - of the Ms. is clearly a scribe's error. अगार (n) -- rarely m. House-apartment जाल a latice window. अगारजालं--a latice window of a house. This verse discribes charmingly the advent of the monsoon as observed by two lovers from the latice window of their house The metaphor of music and dance is beautifully worked out. "लो. ४९. ( हे ) सुभग, यनः(यत्र) स मम प्राणाधिनाथः तत्रैव त्वरितं वज । तब वियोगे प्रियमपि जीवितं प्राय एतया त्यक्तम् । त्रैलोक्ये ईदृशमिद- मतिरूपं भूयोऽपि नो लभ्यते इति (हेतोः) वयानलग्ना अपि प्राणाः तां न परित्यजन्ति ।। यत इत्यत्र “सार्वविभक्तिकतसिल इतराभ्योऽपि दृश्यते " इति सूत्र- सामर्थ्याद् यत्रेत्यर्थे तसिल् । त्वरते स्मेति विग्रहे नित्वरा संभ्रमे त्वर इति त्यदादिषु धातोः गन्यकर्मक." इति क्तप्रत्ययः, "रुष्यमत्वरे" ति सूत्रेण इडागमे त्वरित- मिति शीघ्रमित्यथः । ब्रजधातोर्लोटि मध्यमपुरुषकवचने बजेति रूपम् । वियोजनं वियोगः तस्मिन् वियोगे । जीवधातोः क्तप्रत्यय इडागमश्चेति जीवितम् । त्यज्धातोः क्तप्रत्ययः कुत्वञ्च त्यक्तम् । त्रयो लोकाः इति विग्रहे चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपख्यानम्” इति वार्तिकेन व्यञ् प्रत्ययः आदिवृद्धिश्च त्रैलोक्यम् . तस्मिन् त्रैलोक्ये । इदम् उपपदाद् दृश्धातोः इति सूत्रण कञ्प्रन्यये कृते इदंकिमोरी की" सूत्रंण इदम्शब्दस्य ईशादशे शकारस्येन्संज्ञायाम् ईदृशमिति । अतिक्रान्तं रूपम् अतिरूपम् । लभ्यते इति कर्मणि रूपम् । तव ध्यानमिति वद्धयानं. त्वयाने लग्नाः वयानलग्नाः प्राणाः तां स्त्रियं न परित्यजन्ति ॥ यतः = यस्मिन् The reading of the Ms. rrafa does not yield good sense ला. ५०. पतद्गच्छन्निरालम्बान आतिनोऽमून् समम् (दृतम्) रक्ष, अन्य (न्वया ( वया इदं वस्तु ) वो ( युप्माकं ) भर्नः( भर्ने निवेद्यम् । प्राणनामिहानय । पतन्तीति पतन्तः, गच्छन्तीति गच्छन्तः, निर्गतः आलम्वा येषां ते निरा- लम्बा.. पतन्तश्च (ते) गच्छन्तश्च (ते निरालम्बाश्च (ते) पतद्गच्छन्निरालम्बास्तान् । अस्यन्ते अस्यन्ति वा अमु क्षेपणे “शस्वस्निहि." इत्युप्रन्ययः, असवस्तान् असून् । आपसर्गात ऋधातोः क्तप्रत्यये अनुबन्धलोपे आ कत इन्यत्र “उपसर्गा- दृति धातौ” इति वृद्धौ रपरे अतिशब्दात् इनिप्रत्यये आतिन तम्य द्वितीयावहु- वचने आर्तिनः । असून् समं दृतं वा रक्ष । न्युपसर्गाद्विद्धातोः, “ऋहलोर्ण्यत्" मूत्रण ण्यति निवेद्यम् निवेदितुमहम । त्वया इदं वस्तु. वो भर्तुः युष्माकं भत्रे, विभर्ति भरतीति भर्ता तस्य भर्तुः भृ तृन भर्ता, अस्मिन् इति । इह इदम्शब्दात् इदमो हः" सूत्रण हप्रत्ययः । पतद --- The whole compound qualifies असून माधवो -- The reading of the Ms, makes no sense श्लो ५१, नीरधरानीके निजनाथानता नारी नेत्रनीरजनिर्गतम् अनेक- धारं नो निरस्यति (दूरीकरोति)। नीराणां धरः नीरधरस्तस्यानीकस्तस्मिन् । अननम् अनीकः अन गतौ अन प्राणने वा। 'अनीकादकश्च' इति वार्तिकेन साधुः । निजनाथे आनता निज- नाथानता आपसर्गात् नमेः कर्तरि क्तो मलोपश्च स्त्रोत्वविवक्षायां टाए आनतेति । नरस्य नुर्वा जातिरिति विग्रहे “नृनरयोवृद्धिश्चे" ति वर्तिकेन डोप वृद्धिश्च नारी, अथवा नुर्नरम्य वा धर्म आचारोऽस्याः नृनराभ्यां च वा” इति वार्तिकेन अञ् वृद्धिः डीप नारी । नीरे जाते नीरजे सप्तम्यां जनईः'' : नेत्रे पव नीरजे नेत्रनीरजे । नेत्रनीरजाभ्यां निर्गतं नेत्रनीरजनिर्गतम । अनेको धारी यस्य तत. धार्यते इति धारः धृधातोः णिजन्तात् घञ् अथवा धाराया इदम् धारम . इदमर्थेऽण. अनेक धारं यस्य तत् नीयते इति नीरम् “स्फायिः' इत्युणादि सूत्रेण रकं नीरम् । दिवादि असु क्षपणे निरुपमर्गात अम धातोः वर्तमानकाले निरस्यति दुरीकरोतीत्यर्थः ।। जलधरासारवर्षणम इति हैमः । अनीकोऽस्त्री रणे सैन्ये इति मेदिनी ॥ श्लो. ५२ धर्मान्ते दोलत्कुण्डल चञ्चलांशुललितैः (लसितैः) आलोकिता- शामुखः (प्रकाशिताशामुख इत्यर्थः) कङ्कणमेखलाकलकलव्याजेन धोरध्वनि कुर्वन् जलबिन्दुसुन्दरतरः : स्त्रीपक्षे घमैजलबिन्दुः ) तापापनोदाय शक्कोऽयं सुपयोधरः तव ( त्वद्रूपचनः ) घनः मे चेन: प्रमोदं नयेत् ।। जिघर्त्यङ्गमनेन इति विग्रहे घृ क्षरणदीपयोः घृधातोः "धर्म" सूत्रेण धर्म इति निपातितः, धर्मस्यान्तःधर्मान्तस्तस्मिन् । कुण्डते कुण्ड्यते वेति विग्रहे वृपादि- त्वात् कलन् कुण्डलम् द्विवचने । दोला इव आचरतीति दोलति. दोलन्ती च ते कुण्डले दोलत्कुण्डले. ते एव चञ्चलांशूनी. तयोर्ललितानि तैः (लसितानि नैलेसितै- रित्यर्थः) । आशायाः मुखम् आशामुखम् । अथवा आशानां मुखानि आशा- मुखानि) आलोकितानि प्रकाशितानि आशामुखानि येन सः आलोकिताशामुखः । कं शुभं कणति कणशब्दे अच् मखी गतिं लातीति मेखला पृषोदरादित्वात् साधुः कङ्कणे च मेखला च कङ्कणमेखलाः तासां कलकल तस्य व्याजस्तेन । धीरश्चासौ ध्वनिश्च धीरध्वनिस्तम्। करोतीति कुर्वन् । अतिशयेन सुन्दरः सुन्द्रतरः। जलानां बिन्दवस्तैः सुन्दरतरः। पयसां धरः पयोधरः शोभनश्चासौ पयोधरश्चः सुपयोधरः । अपनुतीति अपनोदः पचाद्यच् तापस्यापनोदस्तस्मै । तव घन इत्यत्र 'राहो शिर" इतिवत् अमेदे षष्ठी । अपटनुतिः रूपक समासोक्तिश्च ॥ घनः सुपयोधरः- There is a pun on धनः सुपयोधरः । श्लो. ५३. (हे) सखि, उत्तुङ्गावतिपीवरावतितरां पीनौ मुतोष्णाननौ वक्षोजन्मशिलोच्चयो (स्तनौ स्तः) परं कशाङ्ग मम कान्तः (तम् कान्तम् ) यदि उपरि (स्तनयोरुपरि ) कुर्या ( तदा मरुता हेतुना) प्रयाति (दूरोभवति ), इत्थं तनौ न विद्यते (स कान्तः। तस्यैव (कान्तस्यैव) प्रतिपालनप्रवणया मया रात्रिर्नीयते ।।
- उद् ऊर्ध्व तुङ्गो उजुङ्गो उदुपसर्गात् तुजि हिंसायाम धातोः उत्तञ्जयते इति विग्रहे घञ् कुत्वं च उनङ्गो । प्यायेते इति विग्रहे प्यैधातोः 'छित्वर०" इति सूत्रेण निपातौ । पीवरी अतिशयितौ पीवरौ अतिपीवरौ । अतितराम् (अत्यन्तम् ) प्यायेते स्मेति विग्रहे ओप्यायी वृद्धौ धातोः “गत्यर्थाकर्मके "ति सूत्रेण क्तप्रत्ययः " ओदितश्च” इति नत्वम , प्यायः पीति पीनौ । सुतेजयत इति विग्रहे तिजे र्दीर्घश्चे" ति सूत्रण स्नक्प्रत्यये सुतीक्ष्णे इति. सुतीक्ष्णे आनने ययोस्तो सुतीक्ष्णाननौ । वक्षसि जन्म ( वक्षसो वा जन्म ) ययोस्तौ वक्षोजन्मानौ । शिलानामुच्चयौ शिलोच्चयो वक्षोजन्मानावेव शिलोश्चयौ वक्षोजन्मशिलोच्चयो कृशमङ्गं यस्य सः कृशाङ्गः । तं कान्तं यदि स्तनयोम्परि कुर्यां तदा तत्र स्थातुं न श नोति । अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्थम् इदमस्थमु” । तनोति तन्यते वेति तनुः तन धातोः "भृमृशि० सूत्रेण उप्रत्ययः तनुस्तस्याम् तनौ । प्रवन्ते गच्छन्ति सुखार्थं जना-अत्रेति विग्रहे पृङ् गतौ धातोः ल्युट अनादेशश्चः स्त्रीत्वविवक्षायां टापि प्रवणा तया प्रवणया। प्रत्युपसर्गात्पालधातोर्म्युट् प्रतिपालनम्, प्रतिपालने प्रवणा तत्परा प्रतिपालनप्रवणा तया । नीधातोः कर्मणि प्रत्यये नीयते इति रूपस्य सिद्धिः। रूपकम् ॥ The reading of the Ms. उत्तङ्गावती is obviously a scribe's error. Similarly also ofrotati in the second line. विद्यते--The reading of the Ms विध्यते can also be made to yield the some sense faca seems better. नेत्थं तनो should be read as नेत्थं तनो श्लो. ५४. (हे ) मग्वि. तृष्णातुरो दयितः ममाधररसं नितान्तं पीत्वा मनसि यत प्रमदं प्रपेदे तेन (प्रमदेन ) ( कारणेन ) मतः सः मुक्तांशुकां वश्यां मां परिरभ्य तचितं च समाचचार । तृष्णया (तृष्णाभिर्वा आतुरः तृष्णातुरः, तर्पणम् तृष्णा जितष् पिपासायाम् , तृष्धातोः ' तृपिशुपिरसिभ्यः कित" इति नः स्त्रीत्वात् टाप तृष्णा । आङप- सर्गात् तुर त्वरणे धातो "इगुपधे ति कः आतुरः । दय्यते स्मेति दयितः दयधातोः कप्रत्ययः इडागमश्च । अधरस्य रसः अधरग्सस्तम्। पाधातोः “घुमास्थे" ति ईत्वे पीत्वा । प्रकृष्टो मदः प्रमदः प्रोपसर्गात् मदीधातोः 'प्रमदसंमदो हर्षे” इति मूत्रेण अ-प्रत्ययः प्रमदस्तम् । प्रपदेलिटि प्रपेदे । अंशुभिः काशते इति अंशुकम् कौर दीप्तौ 'अन्येभ्योऽपि डः'मुक्तमंशुकं यस्याः सा मुक्तांशुका ताम् । वशमधीनत्वं गता इति वश्या तां वश्याम् । वशंगत इति यत् स्त्रीत्वे टाप वश्या ताम् । पर्युपसर्गात् रम्धातोः क्त्वाल्यपि परिरभ्येति रूपम् । समाचचार-समाङिति द्व्युपसर्गात् चरधातोः लिटि प्रथमपुरुषैकवचने रूपम । वचधातोः कितन्प्रत्ययः उचितं युक्तम् , तस्योचितं तदुचितम् ॥
. , श्लो. ६२. (हे) भीरु, ते वक्त्रेन्दुच्छत्रम् आसीत्, ईस्मितमपि कुसुमम् आसीत् , (ते) भूलता चापम् आसीत , (ते) नेत्रद्वन्टुं शरौघाः (आसन ), श्रवण परिलसतकुण्डले दीपमाला (आसीत् ), (तव) वक्षोजौ हेमकुम्भौ (आस्ताम् ), (ते) जघनपरिसरे सिंहासने (आस्ताम् ), हदिभुवा (ते) वपुषि बाल्यं जित्वा यौवनस्याभिषेकः अतिचक्रे ।। बिमेतीति भीरूः, “ऊत" इति का दीर्घ भीरूस्त सम्बुद्धौ भीरु । भियः कुक्लुकनौ क्रुः भीरुः। इन्दतीति इन्दुः, वक्त्रमेवेन्दुः, वन्दुरेव च्छत्रम् । भूरेव लता धूलता। नीयेते आभ्याम् इति नेत्रे, नेत्रयोद्वन्द्वम् (युगलम् )। शराणामोघाः शरौघाः। परिलसन्ती च ते कुण्डले च परिलसत्कुण्डले, श्रवणयोः परिलसत्कुण्डले श्रवणपरिलसत्कुण्डले कुण्डते वृपादित्वात् कलच कुण्डलम् । मां (लक्ष्मीम् ) लातीति माला, दीपानां माला दीपमाला। वक्षसि जातौ वक्षोजी सप्तम्यां जनेर्डः।" हेम्नः कुम्भौ हेमकुम्भौ । जघनयोः परिसरे जघनपरिसरे, परितः सरतः अत्रेति परिसरे। सिंहचिह्निते आसने सिंहासने, मध्यमपदस्य लोपः। हृदि भवतीति हृदिभूस्तेन हृदिभुवा, कर्तरि क्विा “हलदन्तात्सप्तम्या : संज्ञायाम्” इत्यनेन सप्तम्या अलुक् । बालस्य भावः बाल्यम् , ब्राह्मणादित्वात् ष्यम् । यूनो भाव इति विग्रहे “ हायनान्तयुवादिभ्योऽण् वृद्धिश्च अन्" इत्यनेन सूत्रेण प्रकृतिभावः यौवनम् तस्य योवनस्य । जिधातोः क्त्वाप्रत्ययः जित्वा कि- त्वात् गुणाभाव:। अभिसिञ्चनमभिषेक : अभ्युपसर्गात् सिन्धातोर्भावे घञ् गुणे षत्वे कुत्वे च अभिषेकः। अत्युपसर्गात् कृधातोः कर्मणि लिट् प्रथमपुरुषैक- वचने अतिचक्रे ॥ रूपकम् ॥ Correct कुमुम into कुसुमं. श्लो. ६३. हिया विनमितानना मदविलोकलोलेक्षणा निगूढविहित- स्मिता सपुलका किमप्यनीदृशम् (अनिर्वचनीयम्) भावमाबिभ्रती नवोढा वधूः रजनिवृत्तसंपृच्छकं सखीजनं मदनातुरं चकार ।। (हिया) विनमितमाननं यस्याः ( यया) सा विनमितानना। मदेन विलोकः मदविलोकः मदविलोकेन लोले ईक्षणे यस्याः सा मदविलोकलोलेक्षणा, विलोक्यते इति विलोकः भावे घञ् । निगूढं यथा स्यात्तथा, विहितं (कृतं ) स्मितं यया सा निगूढविहितस्मिता। पुलकेन सह ( वर्तते ) इति सपुलका। नवोढा चासौ वधूश्च नवोढावधूः। निगृह्यते स्मेति विग्रहे न्युपसर्गात् गुहधातो तप्रत्यये ढत्वादिकायें व कृते निगूढपदस्य सिद्धिः । व्युपसर्गात् धाधातोः क्तप्रत्यये "दधातेहिः" सूत्रेण धास्थाने ह्यादेशे विहितमित्यस्य सिद्धिः । स्मिधातोः क्तप्रत्यये सितमिति रूपम्। नेदृशम् अनीदृशम् (अनिर्वचनीयमित्यर्थ :)। आबिभर्तीति- १२ आबिभ्रती, आकुपसर्गात् भृधातोः शतप्रत्यये द्वित्वादिकार्ये कृते “नाभ्यस्ता- च्छतु "रिति सूत्रेण नुनिषेधे डीपि कृते-आबिभ्रती। संपृच्छतीति संपृच्छकः, रजन्याः वृत्तं रजनिवृत्तम् , रजनिवृत्तस्य संपृच्छकः रजनिवृत्तसंपृच्छकस्तम् । मदनेन आतुरः मदनातुरस्तं मदनातुरम् । वृत्यते स्मेति विगृहे वृत्धातोः क्तप्रत्यये वृत्तमिति । चकारेति कृधातोः परोक्षकालस्य रूपम् ॥ अनीशं भावं-अलौकिकं भावम् । लो. ६४. दयितः तृष्णातरलितः सन रतान्ते रम्यां कान्ति दधत्- इति ( एवम्) अलफविगलन्माल्यमलसम् अलकविगलन्माल्यमलसम् स्मरक्रीडानन्यश्रमजलपृष- मिश्रतिलकं संमीलनयनकमलं चारुकान्तावक्त्रं सुचिरं पपौ (मुचिरं यथा स्यात्तथा)॥ दृप्यते स्मेति दयितः सप्रत्ययः। तरलमस्य मंजातमिति विग्रहे इतन्प्रत्यये तरलित इति रूपम् । तृष्णया तरलितः तृष्णातरलितः। रमणं रतम् रतस्यान्तः रतान्तस्तस्मिन् रतान्ते रम्यते इति रमा। “पोरदुपधा" दिति यत्प्रत्यये स्त्रीत्वे टापि रम्या ताम् रम्याम् । दधाति इति दधत् । मालायै हितं माल्यम् । अलकेभ्यः विगलन् माल्यं यस्मिन् तत् अलकविगलन्माल्यम् । स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मर. स्मरस्य क्रीडा स्मरक्रीडा, क्रीडनम् क्रीडा क्रीडधातोः “गुरोश्च हल " इति सूत्रेण अप्रत्ययः स्त्रीत्वात् टाप क्रीडा, श्रमस्य जलं श्रमजलम् स्मरक्रीडया जन्यं श्रमजल स्मरक्रीडाजन्यश्रमजलं. तस्य स्मरक्रीडाजन्यश्रमजलस्य। पृषन्ति तैमिश्रः तिलको यस्मिन् तत् । लसतीति लसः पचाद्यच्, न विद्यते लसः कान्तिर्यस्मिन् तत् अलसम्। नयने एव कमले नयनकमले, संमीलन्ती नयनकमले यस्मिन् तत् समीलन्नयन- कमलम् । कान्ताया. वक्त्रं कान्तावक्त्रम् । चरति चित्ते इति चारु, घरातोः उण प्रत्ययः वृद्धिश्च । पातेलिट् पपौ ॥ रूपकम् ॥ श्लो. ६५. (हे) कान्ते यामि, (हे) वल्लभ याहि, मवतो मार्गे शिवं वर्तताम् , (हे) पान्थ देशान्तरात् पुनर्राप स्वं गृहं त्वरितमायाडि, अस्माकमिति भवितव्यता ( त्वया) विहिता (कृता) इत्युक्त्वा सनिःश्वासया लोचनवारिहारि- कुचया मस्थितः पाणेश्वरो रूद्धः ।। अन्यो देशो देशान्तरम् तस्मात् देशान्तरात् , अपादाने पञ्चमी। पन्थानं नित्यं गच्छतीति पान्थस्तत्सम्बुद्धौ, ‘पन्थो ण नित्यम्" इति ण: "पथः पन्थ" इति पथिन् शब्दस्य पन्थादेशः । निःश्वासेन सह (वर्तते) या सा सनिःश्वासा, तया सनिःश्वा- सया। लोचनयोः वारीणि तैः हारिणो कुचौ यस्याः सा लोचनवारिहारिकुचा तया लोचनवारिहारिकुचया । ईशितुं शीलमस्येति ईश्वरः इशधातोः 'स्थेश- भासपिसकसो वरच" इति सूत्रेण वरच् प्रत्ययः, ईश्वरः, प्राणानामीश्वरः प्राणेश्वरः । ') भूधातोः भविष्यत्काले भावे " शक्याईप्रेष्यानुशाप्राप्तकालार्थ चे "ति तव्यप्रत्ययेन भवितव्यम्, भवितव्यस्य भावः भवितव्यता तस्य भावस्त्वतलौ इति तल् । वृत्धातोर्लोटि प्रथमपुरुषैकवचने वर्ततामिति रूपम् । प्रोपसर्गात् स्थाधातोः गत्यकर्मके "ति सूत्रेण कतरि क्तप्रत्यये “स्येतिस्यति" इति सूत्रेण आका- रस्येत्वे प्रस्थित इति रूपम् । रुधूधातोः कर्मणि क्तः रुद्धः । त्वरते स्मेति विप्रहे त्वर धातोः “गत्यकर्म के " ति कर्तरि क्तः, इडागमे त्वरितम् ॥ fara-The reading of the Ms. Ta is not bad Seeing a coffin while going out is regarded as a good sign in some part of the country, specially in Gujarat, but the emendation is made because शिघ is more conventional; e.g. शिवास्ते पन्थानः सन्तु । Compare अमर slo. 62:- तन्व्या बाष्पजलौघकल्पितनदीपूरेण रुद्धः प्रियः ॥ श्लो. ६६ अहो तस्याः स्नेहम् , अहो (तस्या) रूपम् , अहो (तस्याः) कान्तिम् , अहो (तस्याः) रतिम् , अहो (तस्याः) लीलाम् . अहो (तस्याः) वाणी कदा लभेमहि ॥ ܙܙ स्नेहनम् स्नेहः प्णिह प्रीतौ घञ् सत्वे गुणे स्नेहस्तम् स्नेहम् । अहो इति विस्मये आश्चर्य-अव्ययम् । रोपयति (विमोहयति) इति विग्रहे रुपु विमोहने धातोः पचाद्यच दीर्घ, यद्वा रूप रूपकरणे अच् रूपम् । कम् धातोः णिङभावपक्षे क्तिन् अनुनासिकस्येति दीर्घ कान्तिस्तां कान्तिम् । रम्यते अनया इति रमे तिन् मकारस्य लोपे रतिस्ताम् रतिम् । लीलादीप्तौ “भिदाधङ्' यद्वा “ अप्रत्ययात्" इत्यप्रत्ययः-पृषोदरादित्वात् साधुः लीला ताम् लीलाम् । वाणीत्यत्र कृदि- कारात्" इत्यनेन डीप वाणी तां वाणीम् , वणशब्दे वण्यते इति वाणिः प्रत्ययः जी वाणी तां वाणीम् । कस्मिन् काले इति कदा, किम् शब्दात् " सर्वैकान्य- किंयत्तदः काले दा" इति सूत्रेण दाप्रत्ययः । किम्शब्दस्य-"किमः कः" सूत्रेण कादेशः कदा। लभधातोरात्मनेपदे विध्याद्यर्थे लिङि उत्तमपुरुषबहुवचने लमेमहि इति रूपम् ॥ उदात्तालंकारः ॥ श्लो. ६७. योषितां रूपस्य अपूर्वः (अनिर्वचनीयः) कोऽपि महान् महिमा (अस्ति), नेत्रगोचरवर्तिना येन (रूपेण) योगिनो मोह्यन्ते ।। युष्यन्ते योषन्ति वेति विग्रहे युग्धातोः इतिप्रत्यये गुणे योषित इति तासां योषिताम् । रोपयति (विमोहयति) इति विग्रहे रुपु धातो अच्प्रत्यये 'अन्येषामपी." ति दीर्घ रूपमिति तस्य रूपस्य। मह्यते ( पूज्यते ) इति महान् , महतो भाव इत्यर्थे , महत्शब्दात् "पृथ्वादिभ्य इमनिज्वे " ति सूत्रेण इमनिम् ततः टेरित्यनेन टि- लोपे महिमा (माहात्म्यम् )। नीयेते आभ्यामिति नेत्रे, नीधातोः प्रप्रत्ययः, नेत्रयोः गोचरं नेत्रगोचरं, नेत्रगोचरं वर्तते इति नेत्रगोचरवर्ती, तेन नेत्रगोचरवर्तिना। योजनानि योगाः भावे घञ्, योगाः सन्ति एषामिति योगिनः । मुहेर्णिजन्ता- कर्मणि प्रत्यये वर्तमानकाले प्रथमपुरुषस्य बहुवचनम्-मोह्यन्ते ।। श्लो. ६८. लावण्यसलिलापूरा विलासलहरीयुता चललोननमीना कामतरङ्गिणी-इयं वाला ( अस्तीत्यर्थः । ॥ लवणा त्विट सैव ( लवणैव ) चतुर्वर्णादित्वात स्वार्थे प्यञ् वृद्धिश्च लावण्यम् (सौन्दर्यविशेषः), लावण्यमेव सलिलम्-अथवा लावण्यान्येव सलिलानि लावण्य- सलिलानि, तानि आपूरयतीति विग्रहे पचाद्यच् स्त्रीत्वविवक्षायां टापि लावण्य- सलिलापूरा। विलसनानि विलासाः भावे घन, विलासा एव लहर्यः विलासलहर्य: विलासलहरीभिर्युता विलासलहरीयुता। लोच्येते आभ्यामिति लोचने, लोच्छ दर्शने ल्युत्, चले च ते लोचने च चललोचने, चललोचने एव मीनौ यत्र सा चललोचनमीना । तरतीति तरङ्गः तरते: तरत्यादिभ्यश्चे'ति अगच् प्रत्यये गुणे रपरे तरङ्गः, तरङ्गोऽत्यस्या इति विग्रहे “ अत इनिठनौ" इति सूत्रेण इनिप्रत्यये ङ्गीपि णत्वे च कृते तरङ्गिणी, काम एव तरङ्गिणी कामतरङ्गिणी। इयं पाला-(अस्तीति ) ॥ समस्तवस्तुविषयकं रूपकम् ॥ This is a complete th, in which the young woman is compared to a river of love. Her beauty is water and her fare is met and her moving eyes are the fish. श्लो. ६९. (हे) संलग्नहीं भवत्यनुरागिणीम् एतां मुग्धां भवान् कथमवमन्यते इति (एवम् ) तन्सख्या निगदितः प्रणयान्वितः पियस्तु मान मुक्त्वा विविधकरणैः (विविधोपायैः) प्रियां समरञ्जयत् ।। गता घृणा (दया) यस्य स गतघृणस्तत्सम्बुद्धौ गतघृण। चरणयोः पतिता चरणपतिता ताम्। संलग्नान्यङ्गानि यस्याः सा संलग्नाङ्गी- अङ्गगात्रक- ण्ठेभ्यो वक्तव्य" मिति वार्तिकेन डीपि संलग्नाङ्गी ताम् सलग्नाङ्गीम। अनुर- ज्यतेऽनेनेति अनुरागः, रअधातो: अकर्तरि च कारके संज्ञाया" मिति घन नलोपे कुत्वे वृद्धौ अनुरागः, अथवा अनुरञ्जनमनुरागः भावे घन-अनुगगोऽ- स्त्यस्या इति विग्रहे “ अत इनिठना'' विति सूत्रेण इनिप्रत्यये कीपि णत्वे च कृते अनुरागिणी ताम् । भवति भवद्विषये अनुरागिणीम् । तस्याः सखी तत्सखी तया तत्सख्या। न्यगादीति निगदितः, न्युपसर्गात् गद्धातोः कर्मणि क्तप्रत्यये इडागमे च निगदित इति रूपम् । प्रणनयम् प्रणयः, नीधातोः 'परन्” इति सूत्रेण अच्प्रत्यये गुणे अयादेशे णत्वे च कृते प्रणय इति रूपम् , प्रणयेनान्वितः प्रणयान्वितः । प्रीणा- गतघृण, चरणपतितां श्लो. ५५. इयं जलदमण्डली नमः मलिनतां प्रापयेत् , प्रापयेत् , प्रथमयौवनाऽति- मदनातुरा कामिनी गृहे (वर्तते), अहं तु कुसुमबाणवाणार्दितः पथि निष्ठितः, परं विरहनिघृणः विधिः अहो कथं विधाता ।। जलं ददातीति जलदः, “आतोऽनुपसर्गे कः” जलोपपदात् दाधातोः कप्रत्ययः आकारस्य लोपः। मडि भूषायाम् मण्डयति भूषयति, मण्डली, मण्डधातोः कलच् प्रत्ययः मण्डलम् , मण्डलमस्त्यस्या इति-गौरादित्वात् डीव् मण्डली। मलिनस्य भावः “ तस्य भावस्त्वतलौ” इति तल्, मलिनता ताम्। प्रोपसर्गात् आफ्धातोः णिजन्तात् विध्यर्थे लिङ् प्रथमपुरुषैकचने रूपम् । यूनो भावः इति विग्रह “हायनान्तयुवादिभ्योऽण् वृद्धिश्च यौवना अन्" इत्यनेन प्रकृतिभावः, प्रथमं यौवनं यस्याः सा प्रथमयौवना। अतिशयितश्चासौ मदनश्च अतिमदनस्तेन आतुरा अतिमदनातुरा। गृह्णाति धान्यादिकमिति गृहम् तस्मिन् गृहे, अधातोः गेहे कः" सूत्रेण कप्रत्ययः संप्रसारणं च। बणनम बाण. वणशदे घञ्, कुसुम बाणोऽस्येति कुसुमबाणः, बणशब्दे स्वार्थण्यन्तः पचाद्यच्, कामः । कुसुमबाणस्य याणाः कुसुमवाणवाणास्तैरदितः । विरहविषये विरहे निर्गता घृणा (दया) यस्य ( यस्माद्वा) सः विरहनिघृणः। न्युपसर्गात् स्थाधातोः कर्तरि क्तप्रत्ययः इत्वे 'दयतिस्थति०" सूत्रेण इत्वे उपसर्गादिति षत्वष्टुरवे निष्ठितः ॥ विधाता लुट्ल- कारस्य रूपं विधास्यतीत्यर्थे । विधा-किः विधिः ॥ काव्यलिङ्गम् ।। श्लो. ५६. सुस्पर्शाः शालिगोपी (प्त्री) विकचकुचतटाभोगयोगाभिरामाः पोन्मीलत्सप्तपर्णप्रसवपरिमलप्राप्तसौभाग्यभोग्याः केदारोदारिवारिमसमरकुमु. दान्दोलनप्रौढलीलाः पान्थस्त्रीणामनिष्टाः पियरतसुखदाः शारदाः वाताःचान्ति ॥ शोभनः स्पर्शो येषं ते सुस्पर्शा: (घअन्तः शालीनां गोप्यः (गोप्यः) तासां- विकटाश्च ते कुचतटाश्चस्तेषामाभोगाः (घनन्तः ) तेषां योगाः (घप्रत्ययान्तः) तैरभिरामाश्च ये-(मनोहरा इत्यर्थ )। प्रोन्मीलन्ति काण्डे काण्डे, सप्तपर्णानि येषां (येषु वा) ते, तेषां प्रसवाः ("ऋदोरप्") तेषां परिमलाः। मल्यन्ते कर्मणि । प्राप्तं सौभाग्यं येषां ते, तेन ( हेतुना ) भोग्याश्च ये। केदाराणामुहारीणि च तानि वारीणि च तेषु प्रसृमराणि च तानि कुमुदानि च, तेषामान्दोलनानि तेषु प्रौढाः लीलाः येषां ते। पन्थानं नित्यं गच्छन्तीति पान्थाः, पथिन्-शब्दात् "पन्थो ण नित्यम्" इति णप्रत्ययः पथः पन्थ" इति सूत्रेण पथिन्-शान्तस्य पन्यादेशः वृद्धिश्च । पान्थानां स्त्रियः, पान्थस्त्रियस्तासा पान्थस्त्रीणाम् । न इष्टा अनिष्टाः, कर्मणि क्तः। रमणानि रतानि भावे कः, प्रियाणां रतानि प्रियरतानि तेषु। सुखं ददतीति सुखदाः “आतोऽनुपसर्गे कः" इति कप्रत्ययः । शरदि भवाः इति विग्रहे "तत्र भव" इति सूत्रेणाण इति सूत्रेणाण वृद्धिश्च शारदाः । वाताः वान्ति। गोपायन्तीति गोपाः, पचायच्, गोपानां स्त्रियः गोप्यः, गोपायन्तीति गोष्ठ्यः, गुप्धातोः तृचि सीपि गोप्यः ॥ स्वभावोक्तिः ॥ तैः . .
शारदाः वाताः-the autumnal winds. श्लो. ५७. (हे) कान्ते, कान्तांशुजृम्भितविलोचनकैरवोऽपि एषः त्व- द्वक्त्रशारदनिशाकरः मामतनून्माद्य निकामं मोहयते, अतो मम मनो मदना- घिरुलं कुर्यात् ।। कम्यते स्मेति विग्रहे कमु कान्तौ धातोः भिडभावे क्तप्रत्ययो दीर्घश्व कान्तः, स्त्रीत्वविवक्षायांटापि कान्ता. तत्सम्बुद्धी कान्ते । कान्ताश्च ते अंशवश्च तैर्नृम्भितानि विलोचनानि पव कैरवाणि येन सः। तव वक्त्रम् इति त्वद्वक्त्रम् । उच्यतेऽनेनेति पत्रम् , वचेः प्रप्रत्यये वक्त्रम् । शरदि भवः शारदः, “तत्र भवः” इति सूत्रेण भवार्थेऽण् वृद्धिश्च शारदः । निशायाः करः निशाकरः, शारदश्चासौ निशाकरच शारदनिशाकरः । त्वद्वक्त्रमेव शारद निशाकरः त्वत्रशारदनिशाकरः। तन्यते- तनु विस्तारे धातोः ' तनिचरि० इत्युणादिस्त्रेण उप्रत्यये तनुः । काये त्वचि स्त्री स्यात् त्रिष्वल्पे विरले शे-इति विश्वमेदिन्यौ। न तनु अतनु । उदुपसर्गाद् मदी- धातोणिचि णिजन्तात् क्त्वाल्यपि उन्माधेति रूपम्। मदयतीति मदनः घटादिः युद, मदने (मदनविषये) अधिरूढम् अध्युपसर्गात् रुहे: कर्तरि क्तः। निकामम् अत्यन्तम् । मुहेणिजन्ताद् वर्तमाने लट् मोहयते ॥ रूपकम् ॥ कान्तांशु-the moon as well as the lustre of the beloved. श्लो. ५८. (हे) प्रिये, निश्वासेन त्वधरमधुरं त्वं कपोले धत्से यत्र (ते कपोले ) रुचिररचना: वल्ल्य: पाणिना संमृज्यन्ते (दूरीक्रियन्ते) पत्युक्यिं श्रुतमपि तत् (वाक्यं ) त्वन्मनस्तापहन्त न) ते (तव ) सजहहृदये एतौ मन्युमानौ जातौ ॥ निःश्वसनं निश्वासः घञ्, तेन निश्वासेन | अघरस्य मधुरत्वमधरमधुरत्वम्, मधुरम्य भावः मधुरत्वम् "तस्य भावस्त्वतलौ" इति त्वप्रत्ययः। रुचिराश्च ताः रचनाश्च, रच प्रतियत्ने चुरादिः “ण्यासग्रन्थो युच" इति युचि “युचौरनाको" इति अनादेशे टापि बहुवचने रुचिररचनाः । वल्ल धातो. "सर्वधातुभ्य इन्" इति सूत्रेण इन् बहुवचने वल्ल्यः। श्रुधातोः क्तप्रत्ययः श्रुतम् । तब मनस्त्वन्मनस्त्वन्म- नसः तापहन्तृ त्वन्मनस्तापहन्त - तपनं तापः घञ्, हन्तीति हन्त, तापस्य हन्त । जडेन सह सजडं, सजडं च तद् हृदयं च सजडहृदयं तस्मिन् , अथवा सजडं हृदयं यस्या सा सजदया तत्सम्बुद्धौ । मन्युश्च मानश्च मन्युमानौ। घाघातो: वर्तमानकाले मध्यमपुरुषेकवचने आत्मनेपदे धत्से इति रूपम् ।। पल्ल्यः-see the note on पत्रावलि of slo. 1.
लो. ५९. परिमलमिलितालिर्मालतीपुष्पमाला, सुरभिसृणमित्रं चन्दनालेपनं, तुहिनकिरणरश्मिश्चश्चला चापि दोला कामलोळा (च) कामिनी शरदि सुखविभूत्यै (भवतीत्यर्थः) । परिमलेन मिलिताः परिममिलिताः, परिमलमिलिताः अलयो यस्यां सा परिमलमिलितालिः, अल भूषणे " सर्वधातुभ्य इन्" अलिः। मां लक्ष्मी लतति (वेष्टयति ) लत्धातोः मूलविभुजादित्वात् कः गौरादित्वात् डीए मालती। मालत्याः पुष्पाणि तेषां माला मालतीपुष्पमाला, मां लक्ष्मों लातीति माला लाधातोः कप्रत्ययः स्त्रीत्वात् टाप् माला। सुरभीणि च तानि घुसगानि च तैः मिश्रम् , घुष्यते स्तूयते घुष्धातोः बाहुलकात् ऋणक् प्रत्ययः। ल्युडन्तः पृषोदरा- दित्वात् साधुः। चन्दनरालेपनं चन्दनालेपनं, चन्दयति चदि आलादने ण्यन्तात् ल्युट् चन्दनम् । तुहिनाः किरणाः यस्य सः तुहिनकिरणस्तस्य रश्मिः तुहिनकिरण- रश्मिः । कीर्य्यन्ते विक्षिप्यन्ते रश्मयः अस्मात् इति किरणाः 'कृषः" इत्युणादिसूत्रेण कः। चग्चु गतौ घ, चश्चं लाति इति विग्रहे कप्रत्ययः टापि चञ्चला। दोल- यतीति दोला दुल उत्क्षेपे “पचाद्यच् '' टाप् दोला। काम्यतेऽनेनेति कामः "पुंसि संज्ञायां घः" इति घः, तेन कामेन लोला कामलोला । सुखस्य (सुखानां वा) विभूतिस्तस्यै, व्युपसर्गात् भूधातोः स्त्रियां क्तिन् ॥ दीपकं स्वभावोतिश्च ॥ घुसण-saffron : This is a word of rare occurance. It is used by Kashmiri poets. See बिल्हण's विक्रमाङ्कदेवचरितम्, XI-1. after the author of doftero who is fond of using rare words also uses this word. See नैषधीय. VIII-80. See also for unusual words, the vocabulary of xfre given by Handuqiui. श्लो. ६०. (हे) सखि, आदौ प्रणयेन फळहो बभूव, शयने पराङ्मुख- तया कश्चित्काल: प्रयातः, पुनर्विचिन्त्य पत्युर्मुखं मयैसि, तेन (पत्या) इदमइम् अतिमात्रषधरे गृहीता ॥ समानं ख्यायते अनैरिति सखी तत्सम्बुद्धौ सनि। आदीयते (प्रथम) प्रयते इति आदिः आपसर्गात् वाधातोः “ उपसगै घोः किः" इति सूत्रेण कि- प्रत्ययः माकारलोपश्च आदिरित्यस्य सिद्धिः, तस्मिन् आदौ। प्रणयनं प्रणयंः णी प्रापणे धातोः परम् तेन प्रणयेन। कलस्य हननम् कलहः, अन्येभ्योऽपि उप्रत्ययः कलहः । बभूषेति परोक्षकालस्य रूपम्। पराञ्चति अनभिमुखो भवतीति विप्रहे, भञ्धु गतिपूजनयोः धातोः क्विनि प्रत्यये नलोपादिकार्ये कृते पराक् इति प्रयोगो भवति, पराक् मुखमस्येति पराङ्मुखस्तस्य भावः, भावाथें तलू नीत्वे च परारमुखतया। शय्यते अत्र इति शयनम् , अधिकरणे त्युत् ६० प्रत्ययः, तस्मिन् शयने। प्रोपसर्गात् याधातोः गत्यर्थे " ति कर्तरि क्तः प्रयातः। व्युपसर्गात् चिन्तधातोः क्त्वाल्यपि च कृते विचिन्त्येति रूपं भवति। ईक्ष दर्शने धातोः कर्मणि लुङि पेक्षीति रूपम् । मात्रा (स्तोकम् ) तामति- क्रान्तम् गोस्त्रियोरुपसर्जनस्ये "ति ह्रस्वे अतिमात्रम्। गृहधातोः कर्मणि तप्रत्यये संप्रसारणे इडागमे दीर्धे टापि च कृते गृहीतेति रूपम् ॥ "हमिय should be corrected as हमियं The reading of the Ms हमीय is obviously an error. Compare अमरु० slo. 23. श्लो. ६१. पुरुषेषु (विषयेषु) कामिन्याः भ्रूवल्लीकोदण्डीयति, ( कामिन्याः ) नयनं च मार्गणीयति, (कामिन्याः) वेणिचटुला लसल्लोलं ( यथा स्यात्तथा) कृपाणीयति, (कामिन्याः) हारावली प्रत्यञ्चीयति च, (कामिन्याः) नासिका इषुधीयति, तथा सुन्दरतरं तत्कर्णपालीयुगं सोल्लासपाशीयति ॥ " पुरन्ति पुर अग्रगमने धातोः पुर. कुषन् प्रत्यये-अनुबन्धलोपे च कृते पुरुषास्तेषु पुरुषेषु। भूयान् कामोऽस्त्यस्या इति कामिनी-“अत इनिठनौ इति सूत्रेण इनिप्रत्यये ङीपि च कृते कामिनी, तस्याः कामिन्याः। भूरेव वल्ली भ्रवल्ली-भ्रूवल्ली आत्मानं कोदण्डमिव आचरति इति विग्रहे “ उपमानादाचारे इति सूत्रेण आचारेऽर्थे क्यचि कृते “ क्यचि चे"ति सूत्रेणाकारस्य इत्वे च कृते कोदण्डीयतीति रूपस्य सिद्धिः। नीयतेऽनेनेति नयनम् ल्युट प्रत्ययः । मार्गणमिव आचरतीति विग्रहे आचारेऽर्थे क्यचि इत्वे च कृते मार्गणीयति । चटुश्चासौ वेणिश्च इति विग्रहे राजदन्तादित्वात् वेणिशब्दस्य पूर्वनिपातः, अथवा पृषोदरादित्वात्पूर्वनिपातः, अथवा चटुला विद्युद् वेणिरेव चटुला वेणि चटुला- -लसन्ती चासौ लोला चेति लसल्लोलं यथा स्यात्तथा। कृपाणमिव आचरतीति विग्रहे क्यचि प्रत्यये कृपाणीयति। हारस्यावली हारावली-हियते मनोऽनेनेति हारः। प्रत्यञ्चामिव आचरतीति विग्रहे क्यचि प्रत्यञ्चीयति । नासिका इषवो धीयन्तेऽत्रेति विग्रहे “कर्मण्यधिकरणे चे" ति सूत्रेण धाधातो. किप्रत्यये षुधि-पदस्य सिद्धिर्भवति, इषुधिमिवाचारतीति विग्रहे क्यचि कृते इषुधीयति इति पदस्य सिद्धिः। अतिशयेन सुन्दरमिति सुन्दरतरम्। तस्याः कर्णपाल्यो. मुंगं तत्कर्णपालीयुगम् । पाश्यते पाशः घच् । उल्लसनमुल्लासः घञ्, उल्लासेन सह (वर्तते ) इति सोल्लासः, सोलासश्चासौ पाशश्च सोल्लासपाशः, सोल्लासपाशमिव माचरतीति विग्रहे क्यचि सोल्लासपाशीयतीति रूपस्य सिद्धिर्भवति ॥ उपमारूपके॥
६५ तीति प्रियः “ इगुपधशाप्रीकिरः इगुपधशाप्रीकिरःक" इति सूत्रेण कप्रत्ययः। मुचे क्त्वा मुक्त्वा । विविधानि च तानि करणानि च विविधकरणानि, तैः विविधिकरणैः । प्रीणाति या सा प्रिया तां प्रियाम् " इगुपधे "ति के स्त्रीत्वे टापि प्रिया । समुपसर्गात् रञ्ज धातोः णिजन्तात् लकि प्रथमपुरुषैकवचने समरञ्जयत् ॥ Correct सलग्ना into संलग्ना. श्लो. ७०. इयं वामाक्षी ( यस्य ) रथः, चपलनयने ( यस्य ) तुरगौ, वेणी ( यस्य ) कशा, सरलतरला हारलतिका ( यस्य ) रश्मिः. नितम्बो ( यस्य ) यच्चक्रं, ( यस्य ) कुचयुगवरूथः तमारूढो असौ कुसुमविशिखा सारथिः मे ( मम ) चेतो हरति ॥ वामे अक्षिणी यस्याः मा वामाक्षी। नीयेते आभ्यामिति नयने-चपले च ते नयने च चपलनयने । हारमध्वगो मणिः। तरलः, सरलः (निर्मलः ) तरलः विद्यते अस्यामिति सरलतरला-अथवा-सरतीति सरलः स गतौ धातोरलच्प्रत्ययः, सरलश्च तरलं च सरलतरले ते विद्येते अस्यामिति सरलतरला। हियते मनोऽनेनेति हारः। लतति (वेष्टयतीति) लता, लतैव लतिका, स्वार्थे कः हार एवलतिका। हारलतिका । यस्य चक्रं यश्चक्रम् । कुचयोर्युगं कुचयुगम् , कुचयुगमेव वरूथ: (रथगुप्तिः ), आवरणम् , वियते रथोऽनेनेति विग्रहे “वृञ्भ्यामूथन्” इति उणादिसूत्रेण ऊथन्प्रत्यये वरूथपदस्य सिद्धिः। वरूथं चर्म वेश्मनोरिति कोशः। रम्यतेऽत्रे- ति रथः, रम्धातोः “हनिकुषिणीमरमिकाशिभ्य” इति सूत्रेण क्थन्प्रत्यये रथपदस्य सिद्धिः। तुरेण त्वरया गच्छत इति विग्रहे “अन्येभ्योऽपि" इति सूत्रेण उप्रत्यये टिलोपे तुरगौ। आडपसर्गात् रुहेः ढत्वादिकार्ये कृते आरूढ इति रूपम्। कुसुमान्येव विशिखाः यस्य सः कुसुमविशिखः। सरत्यश्वान् इति विग्रहे-सृगतौ धातोः सर्तेणिच्चे "ति सूत्रेण घथिन् प्रत्यये सारथिः । (सरति-त्यस्य सारयतीत्यर्थ अन्तर्भावितण्यर्थः) (अथवा अथवा सरथस्यापत्यं सारथिः) ॥ रूपकम् ॥ Here the young lady is compared to a chariot. Separate auft and then: Her braid of hair is the wheap, while her necklace is the reins. वरुथ (N.) Protection, shield etc. वरूथ also (M.) a sort of wooden ledge or guard fastened round a chariot as a defence against collision.
६६ "लो. ७१. (हे)मुसग्वि, विलासावासान्तः कितवचरितेन पणयिना सायक मये शयने सुखेनासीनायाः मेऽतिकठिनौ कुचौ-कथमपि कराक्रान्तौ कृत्वा हठेन आश्लिष्टायाः (मे) मम नीविः परिशिथिलताम् अमजत ।। शोभना चासौ सखी च सुसखी तत्सम्बुद्धौ सुसखि । कितव (कितवयुक्तं) चरितं यस्य सः, तेन कितवचरितेन, चर भावे क्तः चरितम्। प्रणयनं प्रणयः परच्'' इत्यच्. प्रणयोऽस्त्यस्येति विग्रहे “अत इनिठनौ” इति इनिः प्रणयी, तेन प्रणयिना। आवसन्ति अत्र इति विग्रहे आकुपसर्गात् वसूधातोः अधिकरणे घञ् वृद्धिश्च आवासः, विलसनं विलासः भावे घञ्, विलासस्य आवासः विलासावासः, विलासावासस्यान्तः (मध्ये) विलासावासान्तः। सायकस्य प्राचु- ये सायकमयं, तस्मिन् सायकमये। शय्यतेऽत्र इति शयनं, तस्मिन् शयने। आस्ते इति आसीना आस् धातोः शानच्, अनुबन्धलोपे "ईदासः" सूत्रेण आकारस्येत्वे स्त्रीत्वविवक्षायां टापि-आसीना, तस्या. आसीनायाः । अति ( अत्यन्तम् ) कठिनौ अतिकठिनी। कराभ्यामाक्रान्ती । आश्लिष्यति स्मेति विग्रहे आकुपसर्गात् श्लिष् धातोः कर्मणि क्तप्रत्यये कृते स्त्रीत्वविवक्षायां टापि आश्लिष्टा, तस्याः आश्लिष्टायाः। परिशिथिलस्य भावः परिशिथिलता ताम् । भज धातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचने अभजत् ।। सायकमये- the bed consisting of reeds of which the arrows are made. सायक-शर । शर-a sort of reed or grass used for arrows. श्लो. ७२. हेमन्ते, कन्दर्पादेशजाग्रद्विविधसुरतविकान्तदन्तक्षतोष्ठ- व्यावल्लत्कान्तिराजत्सुललितललनासीत्कृतापीतवेगाः विरहितवनितावक्त्रसोष्मा- भिनियनिःश्वासावारिधाराधरणबहुलताम्-ऊष्मताम् उद्वहन्तः वाताः वान्ति ॥ कन्दर्पस्यादेशः कन्दर्पादेशः तेन तस्मिन् वा। जाग्रतश्च ते विविधसुरतविदश्च कन्दर्पादेशजाग्रद्विविधसुरतविदश्च ते कान्ताश्च, तेषां दन्ताः, तैः शतावोष्ठौ, तत्र व्यावल्लन्त्यश्च ताः कान्तयश्च ताभिः, राजन्त्यश्च ताः सुललितललनाश्च तासां सीत्कृतानि, तैरापीतो वेगो येषां ते विरहिताश्च ताः वनिताश्च तासां वक्त्राणि, तैस्तेषां वा सोमाणस्तेभ्यो अभिनियन्त्यश्च ताः निश्वासावारिधाराश्च ताषां धरणानि, तेषां बहुलता यस्यां सा ताम् । ऊष्मणो भाव ऊष्मता ताम् । उद्वह- न्तीति उद्वहन्तः वाताः वान्ति । कम् (कुत्सायाम् ), कुत्सितो दोऽस्येति कन्दर्पः, यद्वा-कं सुखम् , तत्र तेन दृप्यतीति कन्दर्पः पचाद्यन्। आदेशनमादेशः, भावे, घञ्। जाग्रतीति जाग्रतः जागृधातो शतृप्रत्ययः, जक्षित्यादयः षट्" इति अभ्यस्तसंज्ञा, नाम्यस्ताच्छतु"रिति नुनिषेधः। रमणानि रतानि भावे क्तः, , . शोभनानि रतानि सुरतानि तानि विदन्तीति विविधसुरतविदः। सीत्कृत- मित्यत्र भावे क्तप्रत्ययः॥ श्लो. ७३. प्रौढा-पीनपयोधरोरुकलशा माजिष्ठरागांशुका सौम्यावृत्त- नितम्बचक्रचतुरा पर्यभूमिस्थिता अन्तःसंभृतभासुरम्मरबृहद्भानुमनोहारिणी सुखरता हसन्ती प्रिया हेमन्ने नृणां हिमहारिणी (अस्ति)। धरत इति धरौ, पयसां धरौ पयोधरौ पचाद्यच् । पीनौ च तो पयोधरौ च पीनपयोधरौ, तावेवोरुकलशौ, यस्याः सा पीनपयोधरोरुकलशा। मञ्जि- ठाया अयम् माअिष्ठः, माञ्जिष्ठो रागो यस्य तद् माञ्जिष्ठरागम्, माञ्जिष्ठरागमंशुकं यस्याः सा माञ्जिष्ठरागांशुका । सोम इवेति विग्रहे "शाखादिभ्यो य” इति य- प्रत्ययः, ततः-"प्रज्ञाद्यण्सौम्य इति। नितम्ब एव चक्र नितम्बचक्रम्, सौम्य- मावृत्तं नितम्बचक्रमिति सौम्यावृत्तनितम्बचक्रम्, तेन चतुरा या सा सौम्यावृत्त- नितम्बचकचतुरा । पर्यङ्कस्य भूमिः पर्यभूमिः, पर्यभूमौ स्थिता-इति पर्यभूमि- स्थिता । भातीति भानुः "दाभाभ्यां नुः" इति नुप्रत्ययः। बृहञ्चासौ भानुश्चः बृहद्भानुः, स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मरः, स्मर पव बृहद्भानुः स्मरबृहद्भानुः । भासते इति- भासुरः “भाभासभिदो घुरन्' इति भासूधातोः घुरन् प्रत्ययः, भासुरश्चासौ स्मरवृहद्भानुश्च भासुरस्मरबृहद्भानुः । अन्तसंभृतः भासुरस्मरबृहद्भानुर्यस्याः सा अन्तःसंभृतभासुरस्मरबृहद्भानुः । मनो हर्तुं शीलं यस्याः सा मनोहारिणी। हरतीति हारिणी, हिमस्य-हारिणी हिमहारिणी ( अथवा हिमं हतु शीलमस्याः इति हिमहारिणी)। सुख-सुखकरं रतं यस्याः सा सुखरता (रमणं रतम्)॥ परिसंख्या काव्यलिङ्गं च ॥ माञ्जिष्ठरागांशुका-dressed in cloth dyed with madder. This type of dress is favourite to the women of Gujarai, Mewar and Marwar. श्लो. ७४. शीनर्तुभीतः (अहम् ) मनःस्थितेनंव तब सामेन (मनः ) न सान्त्वयामि ( अथवा न सान्त्वयामि इति तु न किन्तु सान्त्वयाम्येव), विधिः कदा शय्यासने आवयोरेव (आवयोरपि) सनतगात्रयोगं विधाता (विधा- स्यतीति)॥ शीतश्चासौ ऋतुश्चः शीततुस्तेन भीतः, भीत इत्यत्र गत्यर्थे "ति कर्तरि क्तप्रत्यय । मनसि स्थितः मनःस्थितस्तेन मनःस्थितेन, स्थाधातोः “गत्यर्थे "ति "धतिस्यति" इति सूत्रेण आकारस्येत्वे स्थित इति रूपम् । सङ्गमनं सङ्गमस्तेन सङ्गमेन. सङ्गम इत्यत्र समुपसर्गाद् गम्धातोः “ ग्रहवृह०" सूत्रेण अय् प्रत्ययः सङ्गमः । कस्मिन् काले इति कदा, किम्शब्दात् दाप्रत्यये किमः कादेशे कदा। कर्तरि क्तः, विधत्ते इति विधिः, “ उपसर्गे घोः कि"रिति सूत्रेण बाहुलकात्कर्तरि किप्रत्ययः आकारलोपश्च विधिः। शय्यतेऽत्र इति शय्या, शीधातोः संज्ञायां “समज." इति क्य्प् “अयछ क्यपि" सूत्रेण अयङ्टाप शय्या, शय्या एव आसनं शय्यासनम्, तस्मिन् शय्यासने। सन्नते च ते गात्रे च सन्नतगात्रे, तयोर्योगः सन्नतगात्रयोग- स्तम्। विधाता व्युपसर्गाद् धाधातोर्लुट्लकारस्य तृतीयपुरुषस्यैकवचनम्, विधास्यतीत्यर्थः ।। काकुः रूपकं च ॥ श्लो. ७५. हेमन्तौ निशिप्रमुदितवदना सुकृतिनी कापि (स्त्री) मदन- मदभवद्वाष्पभावोत्तराभ्याम् ऊरुभ्याम् उरूगाढम् ( आलिङ्गय) पीनोत्तुङ्गस्तनेन वक्षसा वक्षः (आलिङ्गय ) निजभुजलतया सोत्कण्ठं ( यथा स्यात्तथा ) कण्ठदेश- मालिङ्गय लीलया दोलामारुह्य स्वभर्तुः गृहान्तः शेते ।। हेमन्तश्चासौ ऋतुश्चः हेमन्तर्तुस्तस्मिन् । प्रमुदितं वदनं यस्याः सा प्रमुदितवदना। सुष्टु कृतम् सुकृतं, सुकृतं रूपमस्या इति सुकृतिनी,इनि प्रत्ययःङ्गीप च । मदयतीति मदनः ल्यु, मदनस्य मदः मदनमदस्तेन भवन्तौ बाप्प(धर्म )भावोत्तरौ (बाप्पोदयाधिक्ये ) ययोस्तो, मदनमभवद्वाप्पभावोत्तरौ ताभ्याम् । पीनौ च त्तुङ्गौ च पीनोत्तुङ्गो, पीनोत्तुङ्गो स्तनौ यस्मिन् तत् पीनोनुङ्गस्तनम्, तेन। निज- श्वासौ भुजश्चः निजभुजः, भुज्यतेऽनेनेति भुजः भुजन्युजो" इति निपातनात् साधुः । निजभुज एव लता, लतति वेष्टयतीति लता तया निजभुजलतया । उत्कण्ठनमुत्कण्ठा "गुरोश्च हल" इत्यप्रत्ययः टापि उत्कण्ठया सह वर्तते इति सोत्कण्ठम् । कण्ठस्य देशः कण्ठदेशस्तम् । गृहस्य अन्तः 'गृहान्तस्तस्मिन् । स्वस्याः भर्ता स्वार्ता तस्य स्वभर्तुः । यथासंख्यं रूपकं च ॥ - भवतबां-the reading of the Ms. is not good for metre. Similary स्तनेनमुद्रितवदनो-(metrically bad ). The reading of the Ms. हेमन्तों is obviously a clarical error. श्लो. ७६ (हे) नाथ, मुग्धां किं वृथा प्रतारयसि ( रे मां किं वृथा भाषसे), नैवास्मि (एषा स्त्री यथा तथाहम् नास्मीति भावः ) इति मया विना (त्वम्) सख़ी भव, (भवता) मान्यो जनो मान्यताम् । (हे)कान्ते, मामेवं तस्य दुर्वचः (वच) वद, कया पिशुनया पाठिता (त्वम्); (हे ) पियतमे, मामका इमे प्राणाः सयि सन्ततं वर्तन्ते ।। नाथति ईश्वरो भवतीति नाथः । ययस्तत्सम्बुद्धौ नाथ । मुह्यतीति मुग्धा, मुद्धातोः “गत्यर्थाकर्मके"ति कर्तरि क्तः हकारस्य धकारः तकारस्य धकारः अच्प्रत्यय ६९ टाप् मुग्धा, ताम् मुग्धाम् । प्रोपसर्गात् णिजन्तात् तृधातोः लटि मध्यमपुरुषैक- वचने प्रतारयसीति रूपम् । मयेत्यत्र विनायोगे तृतीया भवति । मान् पूजायाम् धातोः कर्मणि लोटि प्रथमपुरुषैकवचने मान्यतामिति रूपम् (पूज्यतामित्यर्थः।) वदधातोलोंटि मध्यमपुरुषैकवचने वदेति रूपम् । पठेणिजन्तात् कर्मणि क्तः इडागमो णिलोपश्च टापि पाठितेति रूपम् । मम इमे मामकाः। प्रीणातीति प्रिया अतिशयेन प्रिया प्रियतमा तत्सम्बुद्धौ । संततमित्यस्य “समो वा०' इति वार्तिक- विकल्पपक्षे सिद्धिर्भवति। दुष्टं वचः दुःखकरं वचः अथवा दुर्घचः दुर्निन्दितं वचः ॥ Correct the misprint संतत into संततं. श्लो. ७७. बाण बाष्पाम्बुपूर्णेक्षणां शय्यायां शयितां दयितां समीक्ष्य आगतसाध्वसः कान्तः कुत इदम् इति तदालीजनं पपच्छ-तव अन्यस्त्रीगमनात् इति कथिते तासां पुरः प्रतीत्यै प्रियतमावक्षोजलिङ्गद्वयं मुहुर्मुहुः संस्पर्यत । । बाष्पाणामम्बूनि (बाप्पाण्येव अम्बूनि ) तैः पूर्णे ईक्षणे यस्याः सा ताम् । शय्यतेऽत्रेति विग्रहे शीङ् धातोः क्यपि “अयङ् क्यपि" सूत्रेण अयङादेशे टापि शय्या तस्यां शय्यायाम। शीङ् धातोः क्तप्रत्यये "निष्ठा शीङ्" सूत्रेण कित्वाभावे इटि गुणे अयादेशे टापि शयिता ताम् शयिताम्। समुपसर्गात् ईक्षधातोः क्वाल्यपि समीक्ष्या। आगतं साध्वसं यस्य स आगतसाध्वसः। कस्मात् इति कुतः, किम्शब्दात् तसिल “कुति होः" सूत्रेण किमः क्वादेशः, कुतः। आली चा- सौ जनश्च आलीजनः, तस्या आलीजनः तदालीजनस्तम् । प्रच्छेलिट् पप्रच्छ। अन्याश्च ता. स्त्रियश्च अन्यस्त्रियस्तासां गमनम् अन्यस्त्रीगमनं तस्मात् । प्रत्यु- पसर्गात् इण् धातोः क्तिन्प्रत्यये दीर्घ प्रतीतिस्तस्यै प्रतीत्यै । वक्षसि जातो वक्षोजौ सप्तम्यां "जनेर्डः, " प्रियतमायाः वक्षोजी तयोलिङ्गम् (चिह्नम् ) तस्य द्व- यम् प्रियतमावशोजलिङ्गद्वयम् । समुपसर्गात् स्पृशधातोणिचि कर्मणि विध्या- द्यर्थे लिङि संस्पश्चर्येत ॥ संस्पश्येत is not quite clear. श्लो. ७८. अपि (अतीत्यर्थे ) स्नेहमचिन्त्य (अविचार्य ) करकलितं वसनमाक्षिप्य सविनयं वचनमनाहत्य हन्नाथे प्रयाते (सति) ततः सखी पियतममालक्ष्य (आलक्ष्य-लक्षीकृत्य) प्रियतममुद्दिश्य अथानया पटान्तेन स्वमुख- मावत्य तत्रोच्चैः स्वरं रुदितम् अहो-इत्याश्चर्ये अथवा अहो आश्चर्यजनकम् रुदितम् ॥ स्नेहनं स्नेहः घ । चिति स्मृत्याम् चिन्ते क्वाल्यपि चिन्त्यम् , न चिन्त्यम् अचिन्त्य, अत्र पूर्व समासः पश्चात्, क्त्वाल्यप् अथवा समासात्पूर्वमपि-तबुद्धा- ७० वारोप्य क्त्वाल्या भवितुमर्हति। करेण कलितं करकलितम् (करमंबद्धम् )। आक्षिप्य दुरीकृत्य कलेः कर्मणि क्त इडागमश्च । आकुपसर्गात् निर्धातोः क्वाल्यपि आक्षिप्येति रूपम्। आकुपमर्गात् दृधातोः क्त्वाल्यपि "स्वस्य पितिकृति तुक्" सूत्रेण तुकि आदृत्येति रूपम् । न आदृत्य अनादृत्य । विनयेन सह (वर्तते । इति सविनयम् । उच्यतेऽनेनेति वचनम् . वचेर्भावः ल्युट्. सविनयं वचनमनादृत्य । हृदयस्य नाथः हन्नाथस्तस्मिन् । प्रोपसर्गाद् यातेः क्तप्रत्यय कर्तरि प्रयाति स्म प्रयातस्तस्मिन् प्रयाते। अतिशयेन प्रियः प्रियतमस्तम् । आङपसर्गाद् लक्षधातोः क्त्वाल्यपि। पटस्य अन्तम् (अन्तः) पटान्तस्तेन पटान्तेन । आङपसर्गात् वृधातोः क्वाल्यपि तुकि आवृत्य । रुद् धातोः क्तप्रत्ययो भावे इडागमे रुदितम् ।। सक्ष्यालक्ष-the reading inf the Ms is meaningless. प्रियतममलक्ष्य -not seeing her lover who went away becaust sile did not listen to her entreties. -पटान्तेनावृत्य स्वमुखे-Covering her face witin tine hem of her garment. This probably means that she drew down the saree from her head to cover the face. If this is so it indicates the familiarity of the poet with women covering their heads with sarees This is a habit common among the women of Mewar, Marwar and Gujarat. श्लो. ७९. (हे) सुन्दरि, इन्दुः अधुना मन्दरश्मिः जातः, निशा विभाता, अथवा निशि विभातः इन्दुः अधुना मन्दरश्मिर्जातः, (हे) कान्ते, विकटः (विशालः) पटुः कुक्कुटः कान्तानां कटु रारटीति, हीनस्नेहरसेन ( हेतुना) रुक्षदशया दीपोऽपि मन्दायने, (हे) मानिनि मानं मुश्च, इमं वल्लभं कामोत्सवैः रजय ॥ सुन्दरशब्दात् गौरादित्वात् स्त्रीत्वविवक्षायां ङीग् तत्सम्बुद्धौ सुन्दरि । इन्दतीति इन्दुः । अस्मिन् काले इति अधुना इदम्शदात् अधुनाप्रत्ययो भवति, इदम इशादेशे अधुनेति रूपम। मन्दाः रश्मयो यस्य स मन्दरश्मिः । जात इति तान्त- प्रयोगः। कर्तरि व्युपसर्गात् भाधातोः क्तप्रत्ययः स्त्रीत्वात् टापि विभाता। विशब्दात् “संप्रोदश्च कटच" इति कट विकटः विशालः। पाटयतीति पटुः पट् गतौ णिजन्तान् “ कलिपाटी" ति सूत्रेण उप्रत्ययः पटादेशश्च पटुः दक्षः। कोः पृथिव्याः कुटः कुक्कुटः पृषोदरादित्वात् सिद्धिर्भवति । कान्तानां कृते कटु, कटतीति कटु । पुनः पुनः अतिशयेन रटतीति रारटयते, रारट्यते इति रारटीति । स्नेहनं स्नेहः स्नेहस्य रसः स्नेहरसः, हीनचासो स्नेहरसश्च हीनस्नेहरसस्तेन । रुक्षा चासौ दशा च रुशदशा तया। मन्द इवाचरतीति विग्रहे कर्तुः क्यङ्' सूत्रेण क्यङिदीर्घ मन्दायते । दीप्यतेऽनेन यद्वा दीपयतीति घन कप्रत्ययः । मानोऽस्त्यस्याः इति मानिनी, इनिप्रत्ययः डीए च तत्सम्बुद्धौ मानिनि। कामस्योत्सवाः कामो- त्सवास्तैः। दृश्यते इति दशा भिदाद्यङ् टापि दशा। मुञ्चति मुचधातोलाटि मध्यम- पुरुषैकवचने रूपम् । रञ्जय-णिजन्तात् रखधातोलोटि रूपम् ॥ fawrat of the Ms. is obviously a clarical error. कुक्कट: of the Ms. is a clarical error. It should be कुर्कुटः । but more current word is कुकुटः । स्नेह going with दीप means oil, and दशा means wick. श्लो. ८०. (हे) इन्दीवराक्षि, मन्दोऽपि मदनः अमृदुना बाणेन त्वत्कृते मां दुनोति, (हे ) प्रिये दिनेऽस्मिन् नववल्लभे दयां कुछ, संगमरङ्गभङ्गिचतुरै- रानन्दिताकिजनैरङ्गैः तल्शोन्सङ्गविकल्पकल्पानपरं (यथा स्यात्तथा ) मानेन चालिङ्गय ।। इन्दीवरे इव अक्षिणी यस्याः सा तत्सम्बुद्धौ इन्दीवराक्षि। मन्दते इति मन्दः अच् । मदयतीति मदनः ल्युट । न मृदुरमृदुस्तेन । तव कृते इति त्वत्कृते। दीयते स्म ( दीङ्क्षये) “गत्यर्थाकर्मके " ति कर्तरि क्तः तकारस्य नकारः ओदित- त्वात् दीनस्तस्मिन् दीने। नवश्चासी वल्लभश्च नववल्लभस्तस्मिन् । संगमनं सङ्गमः गृहवृदृ" इत्यप्, सङ्गमस्य रङ्गः सङ्गमरङ्गस्तस्य भङ्गि भङ्गस्य करणम् तत्करोति तदाचष्टे वा इति णिजन्तात् “अच इ." सूत्रेण इ. भङ्गिः विच्छित्तिः, तत्र चतुराणि तैः संगमरङ्गभङ्गिचतुरैः। आनन्दिताः आलीजनाः यैस्तानि आनन्दि- तालीजनानि तैरानन्दितालीजनैः। अङ्गः अगि गतौ पचाद्यम् । तल्पते अस्मिन् तल प्रतिष्ठायाम् उणादित्वात् “ खप्पशिल्प' सूत्रेण तल्पेत्यस्य सिद्धिः । उत्सअनमुत्सङ्गः घम्, तल्पस्योत्सङ्गः तल्पोत्सङ्गः तत्र विकल्पं च तद् जल्पनं व तत्परं (प्रधान) यथा स्यात्तथा। मानेन च । आलिङ्गय आहुपसर्गात् णिजन्तात् लिगि सङ्गे लोटि मध्यमपुरुषैकवचने रूपम् ॥ उपमा ॥ gait far agar of the Ms. gives 110 sense, hence gaitfot saatt. श्लो. ८१. (हे) स्मर, कृताअलिरेषा ( अहम् ) त्वां नता; (हे ) मनोरम काम (मां) मा विमानय; दयिते आगने तु मरसाहम् भवदाज्ञां शिरसा धारयामि ।। कृतोञ्जलिर्यया ला कृताञ्जलिः, अज्यतेऽनेन अञ्जू धाताः अलिप्रत्ययः अञ्ज- लिः। काम्यतेऽनेनेति विग्रहे "पुंसि संज्ञायां घः" घ-प्रत्ययः कामः। मनो रमयतीति मनोरमः, मनोरमश्चासौ कामश्च मनोरमकामस्तत्सम्बुद्धौ मनोरमकाम। व्युपसर्गात् चुरादि णिजन्तात् मानधातोलोटि मध्यमपुरुषैकवचने विमानयेति रूपम् ।
आगच्छति स्मेति विग्रहे “गत्यर्थाकर्मके" ति क्तप्रत्यये आगतः। रसेन सह (वर्तते) इति सरसा भवतः आज्ञा भवदाज्ञा ताम् ॥ श्लो. ८२. (हे ) सखि, मे (मम) दुकूले प्रतिकूले, हा ( इति खेदे) मे (मह्यम् ) हारो न रोचते, मे (मम) मेखला खला जाता, हंसकं हिंसकम् ( हंसको हिंसक इति शुद्धः पाठः) । दुष्टं कूलति कूल आवरणे “ इगुपधेति कप्रत्ययः दुकूलमित्यस्य पृषोदरा- दित्वात् सिद्धिः, द्विवचने दुकूले। ह्रियते मनोऽनेनेति हारः घञ्। मेखं गति लातीति विग्रहे “आतोऽनुपसर्गे क" इति कप्रत्ययः। पृषोदरादित्वात् मेखले- त्यस्य सिद्धिर्भवति स्त्रीत्वे टाए। खलतीति खला-खल संचये पचाद्यच् स्त्रीत्व- विवक्षायां टाप्। हंस इव कायति " अन्येभ्योऽपि वा” इति उप्रत्ययः टिलोपः, अथवा हंस इवेति विग्रहे "इवेति प्रतिकृतौ” सूत्रेण कन् हंसकः। हिन- स्तीति हिंसकः, हिंसक इति “निन्दहिस" सूत्रेण वुन, तस्याकादेशे हिंसक इति रूपस्य सिद्धिर्भवति ॥ 'हिंसकः पादकटकः' इत्यमरः । राहो of the Ms. is a clarical error, so हंसकं. प्रतिकूले would be a better reading instead of प्रतिकूलं। हंसकः or हंसकं air ornament for the feet or the ankles said to be formed like goose's foot. Compare शिशुपालबध Vil. 23, मदनरसमहौघपूर्णनाभीहृदपरिवाहितरोमराजयस्ताः । सरित इव सविभ्रमप्रयातप्रणदितहंसलभूषणा विरेजुः । श्लो. ८३. कान्ते, कान्ते समागते (कान्ते मनोहरे कान्ते समागते) सख्या मुक्तालता कण्ठे (मम कण्ठे) मुक्ता, अअनेन अभिते नेत्रे (मम नेत्रे) मंत्रधृतिः कृता॥ मुक्ता एव लता मुक्तालता। समानुपसर्गात् गम्धातोः “गत्यर्थाकर्मके" ति सूत्रेण कर्तरि क्तप्रत्यये समागत इत्यत्र मलोपः, तस्मिन् समागते। कण्शब्दे कणतीति कण्ठः "कणेष्ठ" इति ठप्रत्यय. तस्मिन् । मुच्यते स्मेति, विग्रहे निष्ठाक्त- प्रत्यये स्त्रीत्वे टापि कुत्वे मुक्ता। अज्यतेऽनेनेति विग्रहे अजू धातोः ल्युट् अनादेशे अञ्जनम्, तेन अञ्जनेन । अअधातोः क्तप्रत्यये इडागमे द्विवचने अञ्जिते । नीयेते आभ्यामिति नेत्रे । “दाम्नी" सूत्रेण पक्षे ष्ट्रन नेत्रे, नेत्राम्यां ध्रियते-इद्धि नेत्र- धृतिः स्त्रियां क्तिन् अथवा नीयतेऽनेनेति नेत्रम् तस्मिन् नेत्रे-नेत्राभ्यां धृतिर्यस्याः सा नेत्रधृतिः। कृधातोः क्रियते स्मेति विग्रहे कर्मणि क्तः टापि कृता । रूपकम् ॥
७३ . In harmony with कण्ठे कान्ते कान्ते in the next line ने नेत्र afa: hat would be more appropriate reading. धृति-joy or content, was put on the eye i. e. her eyes expressed happiness. श्लो. ८४. अनया कुचकलशरुचा इयं मुक्तालता सुदेशे कण्ठदेशे मुक्ता, ( अनया ) चारुविम्बे नितम्बे वासोचित स्वं वासः परिहितं, नक्तं भुक्तं, विपुल- नयनयोरअनैः अअनं वै विमुक्तं, धर्ता विहर्ता भर्ता सुरतविलमिनैः अभितो रजितश्च ॥ कुचावेव कलशौ कुचकलशौ तयो रुक, रांचतं इति रुक चिप. नया कुचकलशरुचा । मुक्तैय लता मुक्तालता । शोभना देशा, दिशनीति दश पचा धन्, यस्य स सुदेशस्तस्मिन । चाफ: बिम्बों यम्य म चारुविम्बम्तम्मिन चारुबिम्बे । वमन्त्यत्रेति वामः वसेर्पा अधिकरणे, वामस्य उचितं वामी. चितम । विपुले च ते नयन च विपुलनयने तयोः दिलनयनयोः, नीयते आभ्यामिति विग्रहे ल्युट नयने । व्युपमर्गात मुच धातोः क्तप्रत्ययः कुन्वं च विमुक्तम् । भुजेः क्तप्रत्ययं कुत्वे भुक्तम् । नक्तं रात्री। धरतीति धर्ता, विहरतीति विहर्ता तृच, बिभर्तीति भर्ता । रमणानि रतानि नपुंसके भाव क्त., शोभनानि. रतानि सुरतानि, सुरतानां विलमितानि मुरतविलासितानि तः। अञ्जः क्तप्रत्ययः इडागमश्च अञ्जितः। र ः क्तप्रत्यय इडागमश्च रञ्जितः। अथवा अरंजितः अत्यन्त जितः ।।। रूपकम् ॥ Correct the missprint नयनयोञ्जनं.-रञ्जनम्, अरंजितश्च thoroughly conquered. श्लो. ८५. विलोचनजलप्लुतवक्त्रचन्दा असौ कान्ता प्रणयप्रकोपात् शनया दृढं बद्धवा विहितागसं मां निवास भवनं नीत्वा कर्णपिलेन सविलासं जघान ।। विलोच्येते आभ्यामिति विलोचने लोच दर्शने ल्युट, विलोचनयोजलानि विलोचनजलानि तैः प्लुतं व्याप्तम् । वक्त्रमेव चन्द्रो यस्याः सा, उच्यतेऽनेनेति घक्त्रम्, वचेः त्रप्रत्ययः कुत्वं च । चन्दतीति चन्द्रः, चदि आहलादने रक- प्रत्ययः चन्द्रः । प्रणयनं प्रणयः “एरच" इत्यच । प्रकोपनं प्रकोपः भावे घज । प्रणयस्य प्रकोपः प्रणयप्रकोपस्तस्मात् । रशतीति रशना, रशशब्दे बहुलमन्यत्रापी त्यनेन युच अनादेशे रशना टापि । " दृढः स्थूलपलयो"रिति निपातनात् दृढ- मिति सिद्धयति, तत् क्रियाविशेषणम् । बन्धधातोः कस्याप्रत्यये बद्भवेति रूपम् । विहितम् आगो येन स विहितागास्तम् । निवसन्त्यत्रेति निवासः अधिकरणे घा, निधासस्य भवनम् । कर्णयोरुत्पलं कर्णोत्पल तेन कर्णात्पलेन । विलासेन सह सविलास (यथा स्यात्तथा)। जघान हनधातोः परोक्ष लिट् प्रथमपुरुषै- कवचनम् ॥ रूपकम् ॥
७४ Compare अमरुशतक 3.9. चक्रचन्द्रा-gives some sense but it is not satisfactory. The reading should be amended into 4757ar because as said in the preface and at, and 7 are orthographically very near to one another श्लो. ८६. मया बलादपि आलिङ्गितानि नवपल्लयकोमलानि अतिमनो- हराणि अनङ्गललितानि अनिभृतानि मदालसानि अङ्गानि बाला किमात्मनैव संकोचयति ।। बलति बलते वा बल्यते वा“पचाद्यच' अथवा 'मि मंज्ञायां घः" बरं तस्मात् बलात् । आलिङ्गनानि आर्लािङ्गतानि । नवानि च तानि पल्लवानि च नवपल्लवानि, तद्वत्कोमलानि नवपल्लवकोमलानि । अति ( अत्यन्तम् ) मनो हरन्तीति अति- मनोहराणि “ हरतरतुद्यमनेऽच" इत्यच्प्रत्ययः । अनङ्गवत् वा ललितानि अनङ्गललितानि । न निभृतानि -विनीतानि) अनिभृतानि ( क्तान्तप्रयोगः )। मदेन अलमानि मदालसानि । अतति तान तान् पर्यायान् गच्छति आत्मा तेन आत्मना आङपमर्गात् अतधातो. मनिन् आत्मा । समुपसर्गात् णिजन्तात्कुचेः वर्तमानकाले संकोचयति प्रयोगः ॥ उपमा ॥ श्लो. ८७. तरसा रसालान् द्रुमान् किञ्चिन्मुकुरयन् हेगन्तकान्तमदनं जनेषु मदयन् ( अथवा हेमन्तम् अन्तमदन ) जनेषु मदयन् जनयन् ( उत्पादयन् ) लीला- यितेन ( हेतुना) मलयाचलमल्लमालात् इतः किल शैशिरोऽयं मारुत आवाति ।। तरत्यनेनेति विग्रहे तृधातोः असुन प्रत्यये गुणे तरस तेन तरसा । रसेना. लन्तीति ग्मालास्तान रमालान्-अन्न भृषणादौ)। वः शाखा एषां सन्तीति द्रमा- स्तान् द्रमान " द्यद्रभ्याम" इति भतप्रत्ययः। मुकुरं करीतीति विग्रहे प्रातिपदिकाद धात्यर्थ णिच मुकुरयति, मुकुग्यतीति मुकुरयन् शतृप्रत्ययः । मदयतीति मदन. ल्युट, अन्तश्चासौ मदनश्च अन्तमदनः, हेमन्तकस्य अन्तमदनः हेमन्तकान्तमदनः ( अथवा हेमन्तस्याय हेमन्त इदमर्थऽण हैमन्तम् )। जायन्ते इति जनाः, जनधातारच, तंषु जनेषु । मदयतीति मदयन् शतृप्रत्ययः । लीला इय आचरतीति विग्रहे “ कर्तुः क्यङ्सलोपश्चे"नि सूत्रेण क्याङि लीलायते, तस्मा. नामधातोः भावे क्तप्रत्यय इडागमे अलोपे च कृते लीलायितं तेन हेतुना। न चलतोति अचलः पचाद्यच, मलयश्वामी अचलश्चः मलयाचल.,मल्लते इति मल्लः पचायच, मलयाचल एव मल्लः मलयाचलमल्लः, माति मानहेतुर्भवतीति थिग्रहे माधातो रणप्रत्यये पृषोदरादित्वात रस्य लत्ये मालं क्षेत्रम्। मलयाचल- मल्लस्य मालं मलयाचलमल्लमालं, तस्मात् मलयाचलमल्लमालात् (अथवा मल्लं च तत् मालं च मल्लमालं. मलयाचलस्य मल्लमालं तस्मात् । अस्मादिति इत अथवा मप्तम्यर्थ तसिल, अस्मिन् इति इतः । शिशिरस्यायं शैशिरः इदमर्थेऽण आदिवृद्धिश्च । म्रियन्तेऽनेनेति मरुत्, मस्देष मारुतः "प्रज्ञादिभ्यश्चेति. स्वार्थेऽण वृद्धिः। आकुपसर्गात् वा गतिगन्धनयोः लटि आधाति ।। उपमा ।
हेमन्तमंतमदन- The reading of the Ms. is हेमन्तमंतमदनं. As it stands, it is difficult to interpret it according to grammar either we change it to हैमन्तमंतमदन or हेमन्तक + अन्तमदनम्. Even then it is difficult to understand the propriety of the word 38. It is possible that the reading might have been हैमन्तकान्तमदनं meaning the charming cupid of Hemanta. मल्ल-The original reading might be मल्लि meaning Jasmine. If we take ng as a des’ya word, one of its meanirg is saffron coloured. See Des'inamamala ( VI. 145. Bombay; S. Series ) In both the cases however it is difficult to understand their propriety in relation 10 मटणाचल. It may be that मल्ल he might be for him, which means either Deine of a clistrictlying vest and southwest of Bengal or merely tablelandl of मलयाचल. श्लो. ८८. (हे ) सग्नि, एतस्मिन् शिशिर विधौ विमुखिते यासां प्रिय प्रोपितः, पत्युः सङ्गमसंभवं सुखमहो यासां च नो जायते, धृतभूरिमानविभवाः या मानिन्यस्तोपं न लेभिरे तासां सीमन्तिनीनां मनः मनोभवः किं न दहेत् । विधीयतेऽनेन अथवा विधत्ते इति विधिस्तस्मिन विधी, व्युपसर्गात धाधातोः " उपसगै घोः कि"रिति सूत्रेण किप्रत्ययः आकारलीपश्च विधिः । विरुद्धमननु- कूलं मुखं विमुख तस्मात् (विमुखशब्दात् ) "तारकादिभ्यः इतच्" । विरुद्ध- मननुकूलं मुख संजातमस्येति विमुखितस्तस्मिन् । प्रोष्यते स्मेति प्रोषितः प्रोपस- र्गात वसधातोः कर्मणि क्तप्रत्ययः अथवा प्रवमति स्मेति विग्रहे करिक्त गत्यर्थे ति सूत्रेण । संगमनं संगमः. "ग्रहवृह इत्यप, संगात्संभवी यस्य तत् सङ्गमसंभवम् । भूरिमाना एव विभवाः भूरिमानविभवाः. धृताः भूरिमानविभवाः याभिः ता धृतभूरिमानविभवाः । मानाः सन्ति आसामिति मानिन्यः, “अत इनिटनौ" इति इनिः जीप च । सीमन्ताः मन्ति आसामिति सीमन्तिन्यः इनिः डीप च तासाम । मनसो भत्र उत्पत्तिर्यस्य अथवा मनसि भवति इति मनोभवः पचायच् । श्लो. ८९. (हे ) प्रियतम, मुकुरिततरी वसन्तसमागमे मनोगतामङ्कस्थां मां विहाय ते (तव) गन्तु न युक्तम्, अथ रात्रौ कोकिलया कृतान् कलकलरवान् श्रुत्वा सम्प्रति भवति चलित ( सति ) एषा जीवितुं नोत्सहे ।। 'मुकुराः (कोरकाः) संजाता अस्येति विग्रहे तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतन्" इति सूत्रेण इतच्प्रत्ययः, मुकुरिताः तरको येन स मुकुरिततरु- स्तस्मिन् मुकुरिततरौ । वसन्त्यत्र मदनोत्सवा इति विग्रहे “ तृभूवहिवसि" सूत्रेण सच्प्रत्ययः । वसन्तः, समागमनं समागमः “प्रहवृह" इत्यप, वसन्तस्य समागमः प्रत्ययः ७६ । आवासः तस्य वसन्तसमागमस्तस्मिन् । मनसि गता मनोगता ताम् । अङ्के तिष्ठतीति अङ्कस्था क्विप ताम् । गमधातोः तुमुन् प्रत्ययः गन्तुम् । कलकलाश्च ते रवाश्च कलकलरवाः तान् । श्रधातोः क्वाप्रत्ययः श्रुत्वा । कृधातोः कर्मणि क्तप्रत्ययः कृतान् । भातीति भवान् “ भातंडवतुः " तस्मिन् । चलधातोः क्तप्रत्ययः इडागमः चलितस्तस्मिन् चलित । जीवधातोः तुमुन्प्रत्यये इडागमे च कृते.जीवितम् । उदुपसर्गात् सह- धातोर्लटि उत्तमपुरुषैकवचने उत्सहे ॥ काव्यलिङ्गम् ॥ Fara-The reading of the Ms. does not grammatically fit properly. श्लो. ९०. वासावासविलासवासितमतिः दयितः दृढोष्मलकुचां प्रेमप्रसन्नां प्रियाम् आलिङ्गन् शीतं च नो विन्दते, चेतःसंपरिवर्तमानदयितासंदीप्यमानोल्लसत्- संसर्पद्विरहाग्नितापितवपुः पान्थोऽपि नो जग्मिवान् ।। वसन्त्यति वासः अधिकरण घञ् । आवसनमावासः भावे घञ् । वासे (वासस्यावासः) वासावासः तस्मिन् वा विलामस्तेन वासिता मतिर्यस्य सः । वास्यते स्मेति वास उपसेवायाम् क्त. प्रत्यय इडागमश्च धासित इति । ढौ ऊष्मलौ कुचौ यस्याः सा ताम् ( दृढौं च- ऊष्मलौ च दृढोस्मलौ दृढोष्मलौ कुचौ यस्याः सा ताम् )। प्रेमणि प्रसन्ना प्रेमप्रसन्ना ताम् । आलिङ्गतीति आलिङ्गन् । नो इतिनिषेधार्थकोऽव्ययः । विदधातुस्तुदादिः, धर्तमानकाले आत्मनेपदे प्रथमपुरुषैकवचनम् “शेमुचादीना"मिति नुम् । संपरि- वर्तते इति संपरिवर्तमाना चेतसि संपरिवर्तमाना चेतःसंपरिवर्तमाना, सा चासौ दयिता च । मंदीप्यते इति संदीप्यमानः शानच । उल्लसतीति उल्लसन शतृ । संसर्प- तीति संसर्पन । विरहस्याग्निः विरहाग्निः, चेतःसंपरिवर्तमानदयितया संदीप्य- मानश्चामो उल्लसन चासौ संसर्पन चासौ घिरहाग्निश्च, चेतःसंपरिवर्तमान दयितासंदीप्यमानोल्लत्मसर्पद्विरहाग्निस्तेन । तापित इति तपेर्णिजन्तात् क्तः । तापितं वपुर्यस्य सः । चेतःसपरिवर्तमानदयितासंदीप्यमानोल्लसत्संसर्परिवहाग्नि. तापितवपुः। जग्मिवान इति क्वसुप्रत्ययान्तः, गमेः क्वसुः इडागमे द्वित्व उपधालो. पादिकार्ये कृते जग्मिवान् इति रूपम् ॥ काव्यलिङ्गम् ॥ वासावास-bed-chamber. श्लो. ९१. (हे) सखि, प्राणेश्वरे समायाते मे प्राणाः पुनरागताः । इदं कौतुकं पश्य, मृताहं पुनः जीविता ।। प्राणन्त्येभिरिति विग्रहे अन प्राणने धातोः "हलचे"ति घन प्राणाः, ईशितुं शीलमस्येति ईश्वरः “स्थेशमासपिसकसो वरच" इति वरच, प्राणानामीश्वरः प्राणेश्वरस्तस्मिन् । समायाति स्मेति समायातः समाकुपसर्गात् याते: “ गर्दाथा- कर्मक" ति कर्तरिक्तः समायानस्तस्मिन् । आगच्छन्ति स्मेति आगताः “गत्यथै"ति कर्तरि क्तः । कुतूं कायतीति कैशब्दे “आतोऽनुपसर्गे क " इति कप्रत्यये ( उपपद- समासे) इस्वे च कृते "प्रज्ञायण" वृद्धिः कौतुकम् । मृता जीविता-एतौ कान्तौ।
७७ . :। .. श्लो. ९२. (हे) सखि, गृहात् दयिते निर्यातेऽपि प्राणैः ( चित्तैः सह ) पृष्ठतः गता पुनः प्राग्ग्रामे भवनमागतास्मि ततोऽस्य सेवां कुर्वे । स्वप्नेषु चेनोविमोहा- त्मकः प्रणयातिरेकललितैः प्रतिरात्रिजानसुरनैः तत्रापि प्राणेश्वरो रञ्जितः ( निर्यात- ऽपीत्यत्रापिशब्द एवार्थकः)॥ गृह्णाति धान्दादिकमिति गृहन तस्मात गृहात । दय्यते म्मति विग्रहे नपत्ये दयितस्तस्मिन् । निर्याति स्मति निर्यातम्न स्मिन निर्यातस्त 'गत्यर्थाकर्मक'. ति कतरि क्तप्रत्ययः । प्राणरित्यत्र सहाथै तृतीया । पृष्टशब्दात तमिल पृष्ठतः " आधादिभ्य उपसंख्यान"मिति नियमात " पञ्चम्यास्तसिल" । प्राक् चासो ग्रामश्च प्राग्ग्रामस्तस्मिन । भवन्त्य इति भवनम् तस्मिन । तस्मादिति तत तद. शब्दात पञ्चम्यास्तसिल । स्वप्नेट-इति स्वपेनन प्रत्ययः । चेतसो विमोहात्मकानि चतोविमोहात्मकानि तः । प्रणयनं प्रणयः, अतिरेचनानि अतिरेकाः अन्युप. मर्गात रिचधातोः भावे घन प्रणयस्पातिरेकातललितानि तै प्रणयातिरेकललितः शोभनानि रतानि सुरतानि । जातानि च तानि सुरतानि च जातसुरतानि । रात्रि रात्रि प्रति-इति प्रतिरात्रि, प्रतिरात्रि जातसुरतानि इति प्रतिराधिजातसुरतानि नैः । तस्मिन इति तत्र सप्तम्यास्त्रल । प्राणानामीश्वरः प्राणेश्वरः । र ः क्तः रञ्जितः । ॥ काव्यलिङ्गम् ॥ श्लो. ९३. इयं तन्वी तरलेक्षणा, मम मनः पञ्चेषुणा हन्यते, इयम् उन्नतौ वक्षौजी प्रवहते, ममेदं मनः खिन्नम्, असौ मध्ये सुकृशा, ममादृढमति (अथवा ममादृढम् इति हेतोः) मनोमङ्गं प्रामोति, इयमबला लावण्याम्बुपरिप्लुता, मदीयं मनः शून्यम् ॥ तनुशब्दात् “वोतो गुणवचना"दिति डीपि यणि तन्धी । ईश्यते आभ्याम् इति ईक्षधातोयुट ईक्षणे, सरले ईक्षणे यस्याः सा तरलेक्षणा । पञ्च इषवो यस्य स पञ्चेपुस्तेन पञ्चषुणा । ईष्यते एभिरिति विग्रहे-" ईर्षः किश्च" सूत्रेण उप्रत्ययः आदेरिच्च इषवः। हन्यते इति हन कणि क्तप्रत्यये यकि आत्मनेपदे हन्यते इति रूपम् । उन्नमतः स्मेति उदुपसर्गात् नमधातोः "गत्यर्थाकर्मके "ति क्तः मलोपः उन्नतौ। वक्षसि जातौ वक्षोजौ “सप्तम्यां जनेर्डः” । खिदेः कः तकारइकारयोनकारः शोभना सुतरां कृशा सुकृशा वृद्धः स्थूलवलयोः" सूत्रेण आढमिति निपात- नम् । लवणात्विट्र सैव चतुर्वर्णादित्वात स्वार्थ व्या लावण्यम्, लावण्यान्येष अम्बूनि लावण्याम्बूनि, तैः परिप्लुता (व्याप्ता ) लावण्याम्बुपरिप्लुता। शुने हितम् इति विग्रह "शुनेः संप्रसारणम् वा च दीर्घः" इति यत् । ममेदं मदीयं "वृद्धाच्छः" इयादेशः ॥ असंगतिः रूपकं च ॥ पञ्चेषु-See the notes on Slo. 2. खिन्नम् । ।
७८ श्लो. ९४. अथ यत्रादौ अतुलः कलमेखलाकलकलः प्रादुर्बभूव ततः तत्रैव तदैव नू पुररणत्कारः शुश्रुवे, तत् (तस्मात् ) प्रमदया पुरुषायितं, कामिना वामायितं मन्ये, पश्चाच्चित्ररतावसानसमये ताभ्यां स्वभावे स्थितम् ।। आ प्रथमं दीयते गृह्यते इति आदिः आकुपसर्गात दाधातोः किप्रत्ययः । कला चासौ मेखला च कलमेखला तस्याः कलकलः कलमेखलाकलकलः । नास्ति तुला ( उपमा ) यस्य स अतुलः । तस्मादिति ततः तसिल् । तदा ‘तदो दा च "सूत्रेण दाप्रत्ययः । नृपुरस्य रणत्कारः नूपुररणत्कारः । श्रधातोः कर्मणि लिटि शुश्रुवे । प्रकृष्टो मदो यस्याः सा प्रमदा-अथवा प्रमदो हर्षोऽस्त्यस्या इति विग्रहे “ अर्श आदिभ्यः" अचः स्त्रोत्वात् टापि प्रमदा यया । पुरुष इवाचरति इति विग्रहे क्या- दीर्वे पुरुषायते, तस्माद्भावे कः इडागमश्च 'पुरुषायितम् । वामा इवाचरतीति- विग्रहे “ कर्तुः क्य"मूत्रेण क्यडि दीर्घ वामापते तस्मान्नामधातोः “ नपुंस के भावे क्तः" सूत्रेण क्तप्रत्यय इडागमश्च वामायितम । रमणं रतम तद चित्रं च रतं च चित्ररतम, तस्यावसानं तस्य समयः तस्मिन् । स्थितमित्यत्र नपुंसके भावे क्तः स्थितम, धतिस्थती" दुत्वे स्थितम् ॥ उपमा उत्प्रेक्षा च ॥ श्लो. ९५. (है) मुग्धे, त्वं हृदि आनन्द धेहि, अथ पाणिद्वये कङ्कणं संधेहि, सद्वासः परिधेहि, उरसि हारं परिधेहि, पादयो५ पुरं (परिधेहि),सामोदानि कुसुमानि मूर्ध्नि निधेहि, अक्ष्णोश्च कालाधनं (निधेहि ), अथ निजप्रेयसि आयाते मङ्गलं साधु विधेहि ॥ आनन्द इति घान्तः प्रयोगः (अथवा अर्श आदित्वात् अच) । धाधातो. लौटि मध्यमपुरुषैकवचने धेहि रूपम । पाण्योद्वयं पाणिद्वयं तस्मिन् । समुपसर्गात् धाधातो टि संधेहिरूपम् । कं शुभं कणतीति कङ्कणं, कणशब्दे अच । यस्य ते ( आच्छाद्यते ) अनेनेति वासः, बस अच्छादने “वसेणित्" इति सूत्रेण असुनप्रत्ययः वृद्धिश्च वासः । हियते ( मनो)ऽनेनेति हारः, हृधातोः घा वृद्धिश्च हारस्तं हारम् । नृपुरम् -नुवि पुरति पुरमग्रगमने कः कित्वाद्गुणा- भाषः । आमोदेन सहितानि सामोदानि। कालं च तदञ्जनं च, अज्यतेऽनेन इति अञ्जनम् करणे ल्युट् । निजश्चासौ प्रेयान च अथवा निजस्य प्रेयान, तस्मिन् । आयाति स्मेति आयातस्तस्मिन् आयाते, आकुपसर्गात् यातेः क्तः। मगि सर्पणे मङ्गति मङ्गयते वा, मनेरलच मङ्गलम ।। श्लो. ९६. ( है ) बाले, (त्व) पूर्णमनोरथासि, (यतः) तवैव कान्तः परिपूर्णकामः समागतः,(हे बाले), आगच्छ, मङ्गलानि कुरु,तवाद्य गौरी प्रसन्ना एव ॥ पूर्यते स्मेति पूरी आप्यायने कर्तरि कर्मणि वा क्तः पूर्णः। मन एष रथोऽत्र मनोरथ इव वा मनोरथः, पूर्णः मनोरथो यस्याः सा पूर्णमनोरथा, कामन कामः कमु कान्तौ घा, परिपूर्णः कामो यस्य सः परिपूर्णकामः । प्रासावत् .
. इति प्रसधातोः “गत्यर्थाकमक"ति कर्तरि क्तप्रत्ययः रदाभ्यामि" ति मृत्रण तकारदकारयोनकारे कृते स्त्रीत्वात् टापि, प्रसन्ना । अत्र अस्मिन् अहनि इति सधः परत्" सूत्रेण, अध इति शब्दः साधुः । गौरः वर्णः अस्त्यस्या इति गौरादित्वात् डीबू गौरी ॥ गौरी प्रसन्ना-Here obviously is a reference to गौरीव्रत which young women observe to propitiate if so that they may get good husbands or their married life may be happy. श्लो. ९७. प्राणेश्वरे ( त्वं ) सानन्दा भव, सादरा भव, प्रीता भव, सकामा भव, साहारा भव, भूपिता भव. (प्राणेश्वरे त्वं) प्रेयसो भव, वाह्याच्च देशान्तराद्वास- भवने आयातेन नानामोहनपण्डितेन कान्तेन सहिता कामोत्सवैः रमस्व ( अथवा वासभवने कामोत्सवः रमस्व) । ईशितुं शीलमस्येति इश्वरः "स्थेशभासपिसकसी वरच " मरेण वरच । आनन्देन सह मानन्दा, तेन सहेति "तुल्ययोगे समासे वोपसर्जनस्ये"ति सहस्य सादेशे सानन्दा । आदरेण सह सादरा । प्रीयते स्मेति प्रीझोणने क्तप्रत्ययः स्त्रीत्व- विषक्षायां टाप् प्रीता । कामेन सह सकामा। आहारेण सह साहारा । भूप्यते स्मेति- भूषधातोः क्तः टाप इडागमश्च भूषिता । अतिशयेन प्रिया प्रेयसी । अन्यो देशो देशान्तर तस्मात् । आयाति स्मेति आयातेः “गत्यकर्मके"ति क्तप्रत्ययः, आयातः तेन आयातेन, मुह्यतेऽनेनेति मुहे टि गुणे मोहनम् (सुरतम)। नाना च तद मोहनं च नानामोहनं तस्मिन पण्डितस्तेन ।। श्लो. ९८. (हे) मानिनि, चिन्तां मुञ्च, धृतिं भजस्व, मोहे मनो मा कृथाः, द्वित्रैरेव हि वासरैः प्रियतमप्रत्यागमस्यावधिः इत्येवं यावत् प्रियसखी सादरं प्रतियो- धयेत् अङ्गणभुवि उपागतः कान्तः वाक्यामृतैः प्रियां प्रीणाति ।। मानोऽस्त्यस्या इति मानिनी तत्सम्बुद्धौ मानिनि इनित्प्रययो डीप च । चिन्तन चिन्ता चिति स्मृत्याम् “चितिपूजि" सूत्रेण अङ टाप चिन्ता ताम्। धरणं धृतिः “त्रियां क्तिन्” ताम् । मोहनम मोह मुह वैचिःये घञ् तस्मिन् । कृ लुडि मध्यमपुरुषैकवचने आत्मनेपदे माङयोगे अडागमाभावे सिचोलुकि कृथाः । प्रियतमस्य प्रत्यागमस्तस्यावधिः, अवधानम् अवधिः " उपसर्ग घोः कि"रिति किप्रत्ययः । अविद्यमानं मृत मरणमत्रेत्यमृतम् । प्रिया चासौ सखी प्रियसखी। आद. रेण सह सादरम्। हो वा त्रयो वेति द्विधास्तैः "संख्ययाऽव्ययासन्न''इत्यादिना। "समासे बहुव्रीही संख्यये" इति डचि टिलोपे बहुवचने द्वित्रास्तचित्रैः । पासयन्ति असतेय॑न्तात् “अतिकमिभ्रमिः" सूत्रेण रप्रत्यवे वासरास्तैः वासरैः । अङ्गत्यत्र " करणाधिकरणयोश्चेति ल्युट अङ्गनं, पृषोदरादित्वात् अङ्गण, अङ्गण- स्य भूः अङ्गणभूः तस्याम् । वाक्यान्येष अमृतानि तैः ॥ रूपकम् ॥ .
The reading of the Ms. fafita fe aet is grammatically indefensable hence the amendation, श्लो. ९९. योषितामतिसमुन्नतस्तनमयं सिंहासनमारूढः तद्वक्वेन्दुधृतातपत्र- रुचिरस्तद्भूलताकार्मुकः तद्वेणीविलसत्कृपाणफलकस्तल्लोलेक्षणमार्गणः शृङ्गारिणां पूजितः श्रीमतां श्रीनन्दनो विजयते॥ योषन्तीति योषितस्तासां योषिताम्, युषधातोः "हसरुहियुषिभ्यः" सूत्रेण इतिप्रत्ययः योषितः । अतिसमुन्नतौ च स्तनौ च तयोः प्राचुर्य यस्मिन अतिसमु. न्नतस्तनमयम् तत्प्रकृतिवचने मयट् । सिंहचिह्नितमासनं सिंहासनं मध्यम पदस्य लोपः। आकुपसर्गात् रुदधातोः कर्तरि क्तः ढत्वादिकार्ये कृते आरूढ इति । वक्त्रमेव इन्दुः वक्वेन्दुः, तस्याः वक्वेन्दुः तद्वक्वेन्दुस्तेन धृतमातपत्रम, आतपात् त्रायते इति आतपत्रं, तद्वक्वेन्दुधृतातपत्ररुचिरः । तस्या. भ्ररेवलता तदभ्रलता, मैव कार्मुकं यस्य सः तद्भूलताकार्मुकः, कर्मणे प्रभवति इति कार्मुकम् । विलसन चामी कृपाणफलकच विलसत्कृपाणफलकः । तस्या वेणी तवेणी, तद्वेण्येव विलस- कृपाणफलको यस्य सः तद्वेणीविलसत्कृपागफलकः । लोले च ते ईक्षणे च लोलेक्षणे, तस्याः लोलेक्षणे तल्लोलेक्षण, तल्लोलेक्षणे एव मार्गणौ यस्य सः तल्लोलेक्षणमार्गणः शङ्गं प्राधान्यमियति कर्मण्यण, शृङ्गाराः, शृङ्गाराः सन्ति एषामिति शृङ्गारिणः अत इनिठनौ' इति इनिः, तेषां शृङ्गारिणाम । पूजा संजाता अस्येति पूजितः "तारकादिभ्य इतच" अथवा पूजधातोः क्तप्रत्यये इडागमे च पूजितः । श्रियः सन्ति एषामिति श्रीमन्तस्तेषां श्रीमताम् । नन्दयतीति नन्दनः, श्रीयुक्तो नन्दनः श्रीनन्दनः (अथवा श्रिया नन्दयतीति श्रीनन्दनः )। विजयते इत्यत्र "विपरा- भ्यां जे"रित्यनेन आत्मनेपदं भवति ।। रूपकम् ॥ This sloka. describes the supreme power of श्रीनन्दन. The word starea would mean the soli of श्री i. e. लक्ष्मी i. e. प्रद्युम्न incarnation of god of love. श्रीनन्दन-It appears to me that there is a reference to some person bearing that name but it is difficult to trace the identity . of this person. श्लो. १००. सौजन्ये निरताः खलेषु विस्ताः विद्वद्गुणग्राहिणः लोके विश्रुत- कीर्तयो गुणभृतो ये केऽपि शृङ्गारिणः तेषां करिकुम्भतुङ्गकठिनौ पीनारोजौ बिभ्राणा गुणवती वामविलोचना भुवि सदा भोगाय भूयात् ।। सुष्टु शोभनो जनः सुजनस्तस्य भावः कर्म वा सौजन्यं व्या, तस्मिन् सौजन्ये । निशेषेण रताः निरताः व्युपसर्गात् रमेः क्तप्रत्ययः, । विरम्यन्ते स्मेति विरताः (निवृत्ता इत्यर्थः). विदुषां गुणाः विद्वदगुणास्तान गृहणन्तीति विद्गुण- प्राहिणः “ नन्दिग्रही"ति णिनिः। विश्रुताः कीर्तयो येषां ते विश्रुतकीर्तयः । विभ्र. .
. तीति भृतः, गुणानां भृतः गुणभृतः । तुङ्गो व कठिनौ च तुङ्गकठिनी, करिणः कुम्भी करिकुम्भौ, करिकुम्भौ इव तुङ्गकठिनौ करिकुम्भतुनकठिनौ । बिभृते इति बिभ्राणा "लटः शतृशानचों" इति शानघ । गुणाः सन्ति अस्या इति गुणवती डीए । “तदस्यास्त्यस्मि"निति मतुए "मादुपधायाश्च" सूत्रेण मस्य वः । पामे विलोचने यस्याः सा वामविलोचना । सर्वस्मिन् काले इति सदा "सर्वकान्यकियत्तदः काले दा" सूत्रेण सर्वशब्दात् दाप्रत्ययः, “सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां" सूत्रेण सर्व- शब्दस्य सभावो भवति, सदा सर्वदा । भोजनं भोगः भुज्धातोर्घञ् “चजोः कु"रिति-कुत्वे भोगस्तस्मै भोगाय । भवतु-भूधातोर्लोटि प्रथमपुरुषैकवचने भवतु । विलोच्यते आभ्यामिति विलोचने लोच दर्शने ल्युट् ॥ उपमा ॥ This is a benedictory s'loka. In the first two lines, the qualities of a man of culture and a beau of ancient India are described. श्लो. १०१. श्रीहर्षः उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्मविवरां प्राप्यो चैविलसत्सुवर्णि- गुणिनी खेलन्मनोभूमणि द्विजराजरोचिरमलाम् उत्कर्षितां शङ्गारहारावली सुहृदां विभूषणकृते सद्वाक्यमुक्ताफलैः सानन्दम् अग्रथनात् ।। श्रीयुक्तो हर्षः । उन्मीलन्ती चासौ मतिश्च उन्मीलन्मतिः, उन्मीलन्मतिरेव यन्त्रम् उन्मीलन्मतियन्त्रम् , तेन कृतं सूक्ष्म विवरं यस्यां सा ताम् । प्राप्यते प्राप्या, प्रोपसर्गात् आप्लुधातोः "ऋहण्लोयत्" सूत्रेण ण्यत् टापि प्राप्या। सुष्टु शोभनो वर्णोऽस्त्यस्यामिति विग्रहे “अत इनिठनो" सूत्रेण इनिः की च सुवर्णिनी। गुणाः सन्त्यस्यामिति इन् त्ययो ङीप् गुणिनी, सुवर्णिनी चासौ गुणिनी च सुवर्णि-गुणिनी. प्राप्या उच्चविलसन्ती सुवर्णिगुणिनीति प्राप्योच्चैविलसत्सुवर्णिगु- णिनी ताम् । मनसः मनसि वा भवतीति मनोभूः, भूधातोः क्विए । खेलतीति खेलन् शतृप्रत्ययः, खेलन् चासौ मनोभूश्च खेलन्मनोभूः, खेलन्मनोभूरेव मणिः यस्यां सा खेलन्मनोभूमणिस्ताम् । द्विजराजस्य रोचिः (चन्द्रस्य रोचिः) द्विजराजरोचि- स्तबदमला या सा द्विजराजरोचिरमला तां द्विजराजरोचिरमलाम् । नास्ति मला मलं वा अस्यामिति अमला । उत्कर्षणमुत्कर्षः भावे घञ्, उत्कर्षः संजातोऽस्यामिति विग्रहे "तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतम्" टापि उत्कर्षिता ताम् । शृङ्गं प्राधान्य- मियर्तीति विग्रहे कर्मण्यण शृङ्गारः, शृङ्गारस्य (शृङ्गाररसस्य) हारावली शृङ्गार- हारावली ताम् । हियन्ते मनांसि एभिरिति हाराः घञ्, करणे घञ् । शोभनानि दयानि येषां ते सुहृदस्तेषां सुहृदाम् । विभूषणाय इति विभूषणकृते । उच्यन्ते यानि तानि वाक्यानि, समीचीनानि वाक्यानि सद्वाक्यानि, सद्वाक्यान्येव मुक्ताफलानि तैः सद्वाक्यमुक्ताफलैः। मुक्ताफलमिव (अथवा मुक्तैव फलमिव)। आनन्देन सह इति सानन्दम् । अप्रथ्नात् प्रन्थधातुस्तस्मालकि अप्रथ्नात् ॥ रूपकम् उपमा च ॥ It is difficult to settle satisfactorily the text of this last and historically important verse. I had to make rather very bold changes in the readings of the Ms. I, therefore, give below the text according to the Ms. for comparison and consideration of scholars. उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्म्यविवरा सानन्दमुत्कर्षितः प्राप्योञ्चविलसत्सुवणिगुणिनी खेलन्मनोभूमणिम् । श्रीहर्ष सुहृदं विभूषणकृते सद्वाक्यमुक्ताफलैः यद्ग्रन्थद्विजराजरोचिरमलां शृङ्गारहारावलीम् ॥ This s'loka gives the name of the work as well as that of the author. Here the simile is that of a pearl necklace; just as a hole in a pearl is made by piercing it with a fine instrument, similarly in this case, it is grateforry i.e. blossoming imagination. The other aspect of the simile is obvious. Х Х х Х X At the end of the Ms., we find two s'lokas in the Eater metre. The first s'loka describes the Nāgara women of Vadanagar carrying home water-jars from the lake ( which still exists and is known by the name of शर्मिष्ठा ). In this s'loka two words deserve notice-(I) yas which is a sanskritized form of the des’ya word gegant meaning stane i e. a garland for the head (see iftar HaT iii. 16. B. S. Series ); (2) fres-not given in Sanskrit lexicons, appears to be a des'ya word. Hemacandra gives the word fafcates in the sense of wet. Sir Monier-Williams gives effort and fight (f.)= Eftfrate meaning the hem of an under garment. The meaning here may be a wet under garment. The other meanings of er efter that would be appropriate in this context are (i) a necklace of four pearl strings, (ii) a crest (pet). It is difficult to say exactly what is intended here. In the second s'loka, a milkmaid is described as surpassing in beauty, the divine damsel garant. In this s'loka the word aretaret is to be noted. To understand the meaning of this word we have to compare the following Prakrit word-वच्छवाल or वच्छवाली meaning गोप or गोपी-a cowherdess (पाइअ-सहमहण्णवो, page 917). Compare also the following des'ya word- बच्छीवो-गोपः-a cowherd [ from वत्सीय] (. T. vii. 41-B. S. Series ) *
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला प्रकाशित ग्रन्थ १ प्रमाणमबरी - तार्किकचूडामणि सर्वदेव । २ यन्त्रराजरचना - महा- राजाधिराज जयसिंहदेव कारिता। ३ कान्हडदे प्रबन्ध -महाकवि पद्मनाम । ४ क्यामखांरासा-नवाब अलफखां (कविवर जान)। ५ लावारासा-चारण कविया गोपालदान । ६ महर्षिकुलवैभवम् - विद्यावाचस्पति स्व. श्री मधुसूदनजी ओझा । ७ वृत्तिदीपिका-मौनि कृष्णभट्ट । ८ राजविनोद काव्य - कवि उदयराज । ९ तर्कसंग्रहफक्किका- क्षमाकल्याणगणी। १० नृत्तसंग्रह - अज्ञातकर्तक । ११ श्रृंगारहारावलि - हर्षकवि । प्रेस में १ त्रिपुराभारतीलघुस्तव - सिद्धसारस्वत लघुपण्डित । २ बालशिक्षा व्याकरण-ठक्कुर संग्रामसिंह । ३ करुणामृतमपा-महाकवि ठक्कुर सोमेश्वरदेव । ४ पदार्थरत्नमञ्जूषा-पं. कृष्णमिश्र । ५ शकुनप्रदीप - पं. लावण्यशर्मा । ६ उक्ति- रत्नाकर - पं. साधुसुन्दर गणी । ७ प्राकृतानन्द - पं. रघुनाथ कवि । ८ ईश्वर- विलासकाव्य-पं. कृष्णभट्ट । ९ चक्रपाणिविजयकाव्य - पं. लक्ष्मीधर मट्ट । १० काव्यप्रकाश - भट्ट सोमेश्वर । ११ कारकसंबन्धोधोत - पं. रमसनन्दी। १२ कृष्णगीतिकाव्यानि - कवि सोमनाथ । १३ नृत्यरत्न कोश - महाराजा- धिराज कुंभकर्णदेव । १४ नन्दोपाख्यान - अज्ञातकर्तृक । १५ चान्द्रव्याकरण चन्द्रगोमी। १६ शब्दरत्नप्रदीप - अज्ञातकर्तृक । १७ रत्नकोश - अज्ञातकर्तृक । १८ कविकौस्तुभ - पं. रघुनाथ मनोहर । १९ एकाक्षरकोशसंग्रह - विविधक- विकर्दक । २० शतकत्रयम् - भर्तृहरि, धनसारकृत व्याख्यायुक्त । २१ वसन्त- विलास - अज्ञातकर्तक । २२ दुर्गापुष्पाञ्जलि - म. म. पं. दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी । २३ दशकण्ठवधम् - म. म. पं. दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी। २४ गोरा बादल पदमिणी चऊपइ - कवि हेमरतन । २५ बांकोदासरी ख्यात - महाकवि बांकीदास। २६ मुंहता नैणसीरी ख्यात - मुंहता नेणसी इत्यादि । प्राप्तिस्थान – सञ्चालक, राजस्थान पुरातत्यान्वेषण मन्दिर, जयपुर ।