Sanmati Library, Jaipur
Mathuresh Harikirtanawali
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मिका। ... सर्वमान्य सिद्धान्त है कि इस महाविकराल कलिकाल में मनुष्य के उद्धार के लिये हरिनामसे बढकर कोई उपाय नहीं है । हरेर्नाम हरे म हरे मैव केवलम् । कली नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा । परन्तु भावन्नाम जपने को जब मनुष्य मालाहाथमैं लेकर बैठता है तो चंचल मन हज़ारों कोस दूर भागता है और बिना मनके लगे जप तपस.दि सारे साधन व्यय हैं. इस कारण ने मनको एकाग्रता परम मा वश्यक ठेरी। यदि चितिनिरोधके लिये प्राणायाम आदि योगाभ्यास किया जायतो यम नियम सादि साधनों के बिना अधिकार प्राप्त नहीं होता.. ओर उन साधनों का होना वर्तमानकालमें अतिकठिन है । अब मनकी एकाग्रता क्यों करहो इसके लिये जहांतक महात्मानों का अनुनय है संगोतसे बहकर कोई उपाय नही सिद्ध होता मोठी. सुरोली: आवाज़ में वो सामर्थ्य है कि हिल जैसा चंवत पर मधुर-सग मोरवा : दय तां सुनकर निरवल होकर खड़ा रहनाता है और माणोंतककी उसे कुछ परवाह नहीं रहती। बड़े २ ज़हरीले नाग मधुरध्धति पर मोहित होकर फौंको नचा नवा का मानन्दमें मग्न हो जाते हैं और जब पशुओं की यह दशाती मनुष्य को चित्तवृत्ति गाना सुन्ने के समय मोर स्वयं गाते वक्त निव नहो ऐसा सम्भव नही होसकता। इसी धास्ते कहा है कि-ज्ञानात् परतरं ध्यानं ध्यानात्पर (२) तर जपः ॥ जपोत्परतरं गानं गानात्परतरं नहि ॥ गायन में परे कोई साधन मनकी एकाग्रता का नही है स्वयं भग वान्भी आज्ञा करते हैं कि "नाहं वामि वैकुंठे योगिनां हृदयेन च । मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद" जहां भवत गानकर तहां में अवश्य स्थित रहलाई बैकुण्ठ और योगियों के हृदयमें कठिनाईसेपाताहूं। अत एव भगवन्नामका गान होने से एकतो मन विना प्रयास नि चल होजात है दूसरे जिस स्थलमैं हरिगुणगान होता है अवश्य भग वान् वहाँ विदयमान होजाते हैं और भवतोंके अन्तःकरण में प्रेम पदा र्थ किसी अन्य उपायक बिना सहज ही उत्पन्न होजाता है। . इन कारणों में अवश्यं समझागया कि भगवत् नामों और गुणोंका गान करने के लिये कोई कीर्तनसंगृह. पुस्तक निर्माणकिया जाय । यद्यपि इससे पहले गायन सम्बन्धी कितनेही पुस्तक मुद्रित हो कर प्रकाशित होचुके हैं तथापि उनमें नाम गानार्थ पदय नये केवल भगवत परिव और लीलाओंका गानथा। : ईसलिये इस पुस्तक में विशेष करके हरिनाम कीर्तन मुख्य वखा गया है हरिजनोंसे आशा है कि इसके द्वारा लाभ प्राप्त करके इस म हापातकी अधमशरीर कोभी कृतार्थ करेंगे। हरीनाम कीर्तन निमित रचित भयो यह ग्रन्थ । या द्वारासहजहि मिले हरो प्रेमको पन्ध ॥ हरीनोम गाये सुने मिटै संकलं. भवरलेश अमितम उपजै हिये करै कपा मथुरेशः ॥ ॥ 4 . निवेदक-मधुराप्रसादः .. (३) ॥ वनश्री मयुरेश माधवाष्टक लिख्यते श्री गोपाल दयाल लाल सुनलो मैं हूं महा लालची, अत्याचारि अनीति नित्य करता डरता नहीं चैकहू ।। नोरी तात दयालुता अतितकी तातै निचीतो रहयो, हे माधी मथुरेश या अधमपै जल्दी कृपा २-धाये नाथ अनेकरूप धरके धारा बही धर्मकी, मारे रावण से सबी सुर अरी कंसादि सारे बली ॥ मोकों मन्मथ मन्यु मोह मद हैं मारयो चहैं दैत्य ये, हे माधी० ॥२॥ ३-मेरे जीगुण से क्षमा शतगुणी स्वामी सुनी आपकी, गाढ़े गाहकही गरीब जनके गो गोप गोपी पती॥ दानी दीन दयालु होय हमरी नादानि देखौ कहा, .. हे माधौ० ॥ ३ ॥ काहूको नहि.कोइ रक्षक करी सारी वृथा कल्पना, मेरे पुत्र कला प्राणपति ये भाता पिता आदि हैं।
(२) पुरानी है नैया नहि ढिंग खिवैया लख परै, कृपा चाहूं तेरी अब जननि देरी जिन करौ ॥१॥ ५-रिझाये बन्वारी अमित हितकारी जननके, दिखाई दातारी जब जब पधारी अवनिपै ॥ हमारीही बारी किंस विध विसारी सुध अहो, कृपा चाहूं तेरी अब जननि देरी जिन करौ ॥५॥ ६-पंचे ज्ञानी ध्यानी त्रुति गति न जानी थकित हो, गिरा हूँ बौराली मन सकुच मानी अहिपती॥ कहा मेरी शक्ती पछुक नहि जुक्ती लघुमती, कृपा चाहूं तेरी अब जननि देरी जिन करौ ॥ ६ ॥ -तरे धर्मी कर्मी विदित शुतिमी जन धने, तरे सेवा चारी अचरज कहारीचित धरौ ॥ हमारे से सारे अति जस तिहारे कर परै, कृपा चाहूँ तेरी अब जननि देरी जिन करौ ॥ ७ ॥ -न संसारी वरतूनहिं अज महेन्द्री पद चहू, रहूँ तेरे नेरो पद युगल पेरो महलको । हरी दूरी पूरी करहु मथुरा आस मनकी, कृपा चाहूँ तेरी अवजननि देरी जिन करौः। ॥इति राधाष्टकम् ॥
(३) ॥ अथ श्री मयुरेश माधवाष्टकं लिख्यते । कीजिये ॥१॥ -त्री गोपाल दयाल लाल सुनलो मैं हूं महा लालची, अत्याचारि अनीति नित्य करता डरता नहीं नेकहू ।। तोरी तात दयालुता अतितकी ताः निचीतो रहयो, हे माधौ मथुरेश या अधमपै जल्दी कृपा २-धाये नाथ अनेकरूप धरके धारा वही धर्मकी, मारे रावण से सवी सुर अरी कंसादि सारे बली ॥ मोकों मन्मथ मन्यु मोह मद हैं मारघो चहैं दैत्य ये, हे माधौ० ॥२॥ ३-मेरे औगुण से क्षमा शतगुणी स्वामी सुनी आपकी, गाढ़े गाहकही गरीब जनके गो गोप गोपी पती॥ दानी दीन दयालु होय हमरी नादानि देखी कहा, हे माधौ० ॥ ३॥ -काहूको नहि कोइ रक्षक करी. सारी वृथा कल्पना, मेरे पुत्र कलत्र प्राणपति ये भाता पिता आदि हैं।
• .(२) पुरानी, है नैया लहि ढिंग खिवैया लख परे, कृपा चाहूं तेरी अव जननि देरी जिन करौ ॥ ६ ॥ -रिझाये बन्वारी अमित हितकारी जननके, दिखाई दातारी जब जब पधारी अवनिपै ॥ हमारीही बारी किंस विध विसारी सुध अहो. कृषी चाहूं तेरी अब जननि देरी जिन करौ ॥ ५ ॥ ६-पचे ज्ञानी ध्यानी अति गति न जानी थकित हो, गिरा हूँ बौरानी मन रुकुच मानी अहिपती॥ कहा भेरी शक्ती कछुक नहि जुक्ती लघुमती, कृपा चाहूं तेरी अव जननि देरी जिन करौं ॥ ६ ॥ ---तरे धर्मी कर्मी विदित शतिमर्मी जन धने, तरे सेवा चारी अचरज कहारीचित धरौ । हगार से तारे अति जस तिहार कर पर, कृपा चाहूँ तेरी अम जनान देरी जिन करौ ॥ ७ ॥ न संसारी जस्तू नहि अज महेन्द्री पद चहू', रहूँ, तेरे नेरो पद युगल घेरो महलको । हरौ दूरी पूरी कर मथुरा आस मनकी, कृपा याहूँ तेरी अब जननि देरी जिन करौ॥ ॥ इति राधाष्टकम् ॥ " हा हा नाथ गहोजि हाथ विरहा सिन्धू डुयायो घहै, हे माधौ मथुरेश या अधमपै जल्दी कृपा. कीजिये ।। ॥ इति माधवाष्टकम् ॥ ॥ अय श्री मयुरेशविनयाष्टक लिख्यते ॥ (चाल लायनी) . -सरकार युगलवर तनक दया विस्तारी, मो दीन महा मति हीन की ओर निहारौ ॥ करुणानिधान हैं आप दीन दुखहारी, शरणागतवत्सल आरत जन सुखकारी। छाई तव कीरति नाथ त्रिलोक मझारी, जस गावत नितप्रति शेश शारदा हारी। या तुच्छ जीवके दूजो नाहि सहारो, सरकार युगलवर तनक दया विस्तारौ ॥१॥ २-भवसिन्धु अगाध अपार तरयो नहि जावे, कोउ दीखत नाहि जो बेड़ा पार लगावै। कामादिग्राह मुखफाड़ गुसन की आवै, नहि कोई उपाय जो इनसे बचने पावै। अस संकट में नहि कोइ भी हितू हमारो, सरकार० ॥२॥ ३-हीं यदपि कुकर्मी कुटिल कपटि अपराधी, उद्धार हेत भर जन्म जुगति नहि साधी। अति माया मोहकी लांगी दुस्तर व्याधी, नहि योग यज्ञ तप सधै न ध्यान समाधी। है तुमहि को लज्जा मारी चाहि उवारी, सरकार० ॥३॥ -अस भाग कहां जो प्रभुके दर्शन पाऊँ, छवि गौर-श्याम अभिरान पै चल चल जाऊँ। छिनमात्र युगलको हियसे नहि विसराऊँ निस वासर नैनन नेह नीर ढरकाऊँ। जग माया मोहसे वेग होय छुटकारो, सरकार० ॥१॥ ५-धिक जीवन धिक मानुषतन धिक् चतुराई, मनमोहनि सोहनि झांकी यदि नहि पाई। धिक् संपत् धिक् जस कोरत मान बड़ाई, छवि गौर-श्याम को नैनन नाहि समाई। विन चरण-कमल नख जोति सकल अंधियारो, सरकार॥ ५॥ ६-कब दरोगे हा हा नाथ दरस कय दयोगे, कच मो अनाथको नाथ सनाथ करोगे। कहा निपट कुटिल मोहि जान खबर नहि लोगे, जन डूबत देखहु कहा न वाँह गहोगे। तुम बिन है दूजो कौन प्राण रखवारो, सरकार०॥६॥ .. :-हे कृपानाथ जन दुखहर सुघर मनोहर, हे रूप उजागर सुन्दर अनुपम छविधर । हे कमलनयन सुख दैन ऐन करुणा कर, गुणसागर नागर नवलकिशोर रसिक्वर । इक कृपा कटाक्ष इस ओर गौर कर डारो। सरकार०॥॥ -मथुराके ईश दयाल कहे जाते हो, जन दुखी देख कहा तनक न लजियांते हो।
(4) अति प्यासे मीन दृग्रन को तरसाते ही, रह निकट भी झांकी देते रुकुचाते हो। जन आरतिभंजन प्रणतो. अजि न विसारी, सरकार युगलवर तनक दया विस्तारौ ॥८॥ ॥ इति श्री मथुरेशविनयाप्टकम् ॥ ... - श्रीमन्नारायण नारायण नारायण, ( टेक ) १-मच्छ कच्छ वामन, सूकर तन, जन रक्षा हित धारायण ॥१॥ प्रो० २-धर नर हरि तन हत्यो हिरनाकुश, भक्त प्रहलाद उबारायण ॥ २॥ श्री० ३-श्रीजगवन्दन. दशरथनन्दन, गुण गावत जाके रामायण ॥ ३ श्री. -भिलनीली नोच पखान अहिल्या, व्याध गीध निस्तारायण ॥१॥ श्रीर ५-नन्दनन्दन प्रभु असुरनिकन्दन, लीला प्रेम प्रचारायण ॥५॥ श्री. ६-भवसागर तरणी श्री गीता, वरणी सब श्रुति सारायण ५.६.॥.श्री
,
()
•-त्रुपद सुताको लज्जा राखी,
दुःशासन मद गारायण ॥ ७॥ श्री :
८-डूबत गज हरि नाम पुकारा,
प्यादे हि पांव पधारायन ॥८॥ श्री
-पतितनको सिरताज अजामिल,
तरघो सुमिर सुत नारायण ॥ ६॥ श्रीय
१०-नामा नरसी कवीर से जन हित,
पायो खेद अपारायण.॥ ११॥ श्रीर
११जन औगुण चितमें नहि लावत,
पतित अनेक उद्धारायण,॥ ११ ॥ श्रीव,
१२-मो सम दीन मलीन किरोरन,
तारि
सुजस विस्तारायत.॥ १२ ॥ श्रीय
१३-तुम्हरी हि आस तिहारो भरोसो,..
निज प्रण लेहु संभारायन ॥ १३ ॥ श्री
१४-मधुरापति दीजै. चरणन रति,
सकल विपति दुख टारायन ॥ १४ ॥ श्रीर
.
.
.
-
हरि हरये नमः ।
कृष्ण यादवाय नमः
(१०)
यादवाय माधवाय केशवाय नमो नमः ।
गोविन्द गोपाल राम श्री मधुसूदन ।
* श्री हरिकीर्तनम् *
:*:0
१-श्री हरि वजाङ्गनामनोविहारिणे नमः ।
कृष्ण यादवाय चित्त वित्त हारिणे नमः ॥
२-केशवाय माधवाय मोदकारिणे नमः ।
श्यामसुन्दराय गोपवेश धारिणे नमः ॥
३-इन्द्रमान भंजनाय दुष्ट दैत्य गंजनाय ।
गीपिका दृगंजनाय नौमि भक्त रंजनाय ॥
४-श्री गोविन्द गोकुलेन्दु वेणु धारिणे नमः ।
प्राणयल्लभाविनोद कर्मचारिणे नमः।
* श्री हरिकीर्तनम् *
...):-
[ गजल ]
१-राधागोविन्द केशव माधव हरे हरे ।
जय दीनबन्धु दयासिन्धु कृष्ण सांवरे ॥ रा०
५०
२-जय मन हरन आनंद करन श्याम घन बरन ।
अगरन शरन त्रिताप हरन वेणु मुख धरे ॥ रा०
३-असुरारि दुःखहारि क्षमाधारि प्रेमधन ।
राधारमन मदन दमन अखण्ड रसभरे।।रा
-महिमा अपार कृपाधार करुणा सार तन ।
मधुरासे अधम जाको दया दष्टि में तरे ॥ राधा
-1
पद
१-कीरति कुमारी प्यारी स्वास्नी हमारी हो,
नवलविहारी स्वामी जन सुखकारी हो।
-नीलवरन सारी श्यामागोरी तनधारी,
मेघ घटामें मानो शशि उजियारी हो। की०
३-पीतवसन मनमोहन के तन मानो,
दामिनी: मण्डल विच छाई घटा कारी हो। को
१-दम्पति दयाके निधि दोनन के दुखहारी,
करुणा अपारी दोऊ अधम उद्धारी हो । कीय
-राधे गिरिधारी जय सन्तन के हितकारी,
मथुराके स्वामी प्यारे युगल विहारी हो । कीरति .
1.
(१२)
पद .
१-सांवरा सुघर म्हारा गिरधर प्यारा हो-श्यामसुन्दर
राधावर चितहर नैननका तारा हो ।
२-सीस मुकदै कर्टि काछनी सोहत तन, ..
मोहत मनहि कर रस मेतवारा हो । सो
३-अलख अलख पति कह जी अगोचर
मदन मोहन सोई नर तन धारा हो । सांग
2-बिन दर्शन पल छिन कल नाहि मोय,
बिकल हियो छै म्हारो अतिही दुखास- हो । सांप
५-आवोजी आवोजी यांका चरण-पलोटा म्हे, :
मथुरापति म्हारा जीवन आधारा हो । सां०
पद
१-जय दुवारकाधीश मुकुन्द हरी थी बासुदेव गोविन्द हरी।
हरी हरी बोलो हरी हरी ॥
२-हरि झांको जिहि दं.ष्टि परो-तिनको नैया भवसिन्धु वरी।
हरी हरी बोलो हरी हरी
!
(१३)
३-सांवरि सूरत हिये धरी-हरिने जनकी सब पीर हरी ।
हरी हरी बोलो हरी हरी ॥ . '
-जै जै मनमोहन श्याम हरी-धन धन्य घरी यह धन्य घरी।
हरी हरी बोलो हरी हरी ॥
५-छविरूप माधुरी दृगन भरी-मथुरेश ने इच्छा पूर्ण करी।
हरी हरी बोलो हरी हरी॥
M
[ पद]
धारी॥
१-रसीला थेठो ब्रज जनसुखकारी।
रंगीला छैला मोर
मुकुट
२-यह काया म्हाँकी ब्रजको थली जानी।
हियो म्हाको वृन्दावन जानो ॥ रसीला?
३-गोप्यां छै ईमें चित्त वृत्ति नाना ।
करै छै थांका.प्रमों गुण गाना ॥ रसीला
४-जीवन म्हाको थाँके छै आधीना।
आवोजी आवो नटवर रंगभीना ॥ रसीला.
५-करीजी छैला गोप्यो संग धे रास।
पधारो येजी सेवाकुंज छै पास-॥ रसीला.
६-सुरत थांकी निरख म्हे सुख पास्यां।
बधाई देके प्रेमकी निधि लास्यां। रसीलाल
:- आवोजी म्हाँकी पलकाँपैपगधरके।
मनास्यां थानै चरणों में परके ॥ रसीला०
८-सुरतादासी दरसकी छै प्यासी।
मिलोजी आके श्रीमथुरावासी ॥ रसीला०
-
[हरिकीर्तन]
हरे कृष्ण हरे राम राधे गोविन्द ।
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द ।
सारंगधर मुरलीधर सत्यचिदानन्द । श्रीकृ
रघुपति यदुपति आनन्दकन्द ॥ श्री०
कौशल्यानन्द प्यारे वृन्दावनचन्द । श्री.
माधौ
मुकुन्द
भजी त्यागो छल-छन्द ॥ श्री
[इसी के वजन पर पद]
हरे राम हरे कृष्ण लोकाभिराम ।
श्री गौर श्यामांग नित्यानन्द धाम ॥ १ ॥
सीतावर राधावर आरत हर नाम ॥२॥
हरी बिन काहू छिन नाही आराम ॥ ३ ॥
लक्ष्मी नरसिंह पूरै भक्तों के काम ॥ १॥
हरि हरियोटे होय मनको विसराम ॥ ५ ॥ मधुरा स्वामी प्यारे नामी सरनाम ।। ६ ।। M + [हरिकीर्तन] जय जगमोहन जन मुखदाई । थोलो हिमसी पित्त लगाई। काय मानव वादय राई । घोटे भव-दुरखमों छुट जाई श्री हरि पुपोनम गुणगाई । लोजे मन इच्छा फलपाई ।। जय० -नर हरि घरि घरि भज चितलाई। जन प्रहलाद हेन प्रगटाई । भज श्री राम कृष्ण रे भाई। शरणागत जन सदा सहाई ॥ जय० २-नटवर गिरिधर श्री ब्रजराई ।। जनहिन सुरपति मान नसाई। मन-हर मुरलीधर छवि छाई। कालीमर्दन कुंवर कन्हाई ॥ जय०
(१६)
-त्रिभुवनपति है धेनु चराई।
गोविन्द गोपालक कहलाई ।
दीनबन्धुता जग दरसाई।
जाय कौन विधि महिमा गाई ॥ जय.
५-गोपीजन प्रमामृत दाई।
रासविहारी पद सरसाई ॥
अच्युत अदभुत सुन्दरताई।
शोभा लखि शत मदन लजाई ॥ जय०
६-धन धन द्वारिकेश यदुराई ।
कीनी भक्त जनन मनभाई ॥
द्रुपदसुता को चीर वढाई।
नासी कुरु पुत्रन गुरुताई
-विप्र सुदामा निर्धनताई।
मेटी कर सम्पत अधिकाई ॥
तजि दुर्योधन मेव मिठाई।
भाजी विदुर दीन घर खाई ।
८-श्री रघुनन्दन तन धरि आई।
निगमागम
मरजाद रखाई॥
.
(१७).
जलनिधि ऊपर सिला तराई।
मिलनी दीनहि दीन वडाई ॥ जयः
६-अजामेल गणिका अधमाई।
तनक नगिनी धन्य प्रभुताई ॥
भक्तवत्सल मथुरेश कहाई।
तारे अमित पतित समुदाई ॥ जय०
श्री हरिकीर्तनम् ।
राम सिया राम सिया राम सिया राम ।
रामा जै रामा रामा राम सीता राम ॥
सीता राम सीता राम सीता राम रामा ।
रामा जै रामा रामा राम सीता राम ॥
श्यामप्रिया श्यामप्रिया श्यामप्रिया श्यामा ।
श्यामा जै श्यामा श्यामाश्याम राधेश्याम ॥
राधेश्याम राधेश्याम राधेश्याम शयामा ।
श्यामा जै शयामा श्यामा श्याम राधेश्याम ॥
--
--प्यारे नर तन लाभ यही है-लीजै युगलवर नाम । राधे”
-गर्भ में करी,प्रतिज्ञा भूल्यो-धिक मन मूढ निकाम ॥ राधे
-सकालमनोरथ सिद्ध करन हित-कल्पतरू है हरिनाम। राधे
(१८)
४-तीनों ताप मिट हरि सुमिरे नाम परम सुखधाम ॥राधे०
५-उपजत प्रम अखण्ड नामसो-मन पावै वित्रास । राधे०
६-जेह नीर नैननसों उपके-विलपत आठों जाम ॥ राधे०
७-नाम लिये नामी चलिआव-मिलें श्यामा अरु श्याम । राधे०.
८-अधम उधारण नाम हरी को-सुगति देत सवठाम ॥ राधे०
--गणिका अजामेल से पापी-पहुंचे हरि के धाम । राधे०
१०-कठिन योग यज्ञादिक साधन-सुलभ एक प्रभु नाम ॥ राधे
११-मधुरे मधुरे मधुरे मधुरे-पियो अमृत हरि नाम । राधे०
१२-सुधरे सुधरे सुधरे सुधरे-नामहित सब काम ॥ राधे०
१३-मजरे भजरे मजरे मजरे-हरि पद आठों जाम । राधे०
११--तजरे तजरे तजरे तजरे-क्रोध लोभ मद काम ॥ राधे
१५-श्री मथुरेश नाम जग पावन-मन भावन अभिराम । राधे०
[हरिकीर्तन] -
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ बोली-
बोलौ जी हरि हरि ॐ हरि औम्
१-हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ माधौ-माधौ जै माधौ हरि ओम्
२-हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ केशी-केशौ जै केशी हरि ॐ हरि
३- हरी हरत दुख शरणागत के महामन्त्र हरि ओम हरि०
2-जरत पाप हरि नाम अग्नि से-द्रवत हियो जिम मोम हरिः
५-ओंकार होते सब सृष्टी--हरि हर अज रवि सोम् ॥ हरि०
६-मम तरंग हिये लहरावै-हरपैं तनके रोम ॥ हरि०
७--नारदशारद बीन में गावत-तनन तनन दिरना त्रोम् ॥ हरिण
८-हृदय कमल विकसत हरि बोले-फलत कह जब ओम् ॥ हरि
-हरि बोले हरि मिलंत सहजही-सुलभन किये तप होम ॥ हरि.
१०-हरि व्यापक चर अचर जगत में -हरिमय जल थल भोम ॥ हरि.
११-त्री मथुरेश नाम को सुनके-मुदित सकल महि व्योम॥ हरिक
[संक्षिप्त हरि कीर्तनम् ।
जै
জ
राम सिया राम सिया राम सिया रामा।
रामा
समा रामा राम सीता राम ॥
सीता राम सीता राम सीता राम रामा।
रामा रामा रामा राम राम सीता राम ।।
श्याम प्रिया श्याम प्रिया श्याम मिया श्यामा।
श्यामा
श्यामा श्यामा श्याम राधेश्याम ॥
राधे श्याम राधे श्याम राधे श्याम श्यामा ।
श्यामा
श्यामा श्यामा श्याम राधे श्याम ।।
हरि ओं हरि ओं हरि ओं बोलौ मन पावै विस रामाराध
हरि ओं हरि ओं हरि ओं माधौ-भज मन. आठों जामाराध
जै
जै
(२०) हरि ओं हरि ओं हरि ओं के नाम परमं सुख. धाम। राध? नी मथुरेश नाम जग पावन-मन भावन अभि राम॥राधे - [ तथा हरि कीर्तन] १-जय सत्य ज्ञान सुख रूपधरे श्रीराम कृष्ण गोविन्द हरे २-जो अलखअगम मन बुद्धि परे,सोइ करूणा कर तन पर उतरे॥ ३-जब प्रेम तरंग हिये लहरे, तव निगुन.सगुन सब भेद ट। ४-नित नेह नीर जब दृगन झरे, प्रिय तमपुरुषोतम ताहि वरै॥ ५-प्रिय ध्यान धरत तन सुध विसरै,मनमोहन धायके अंक भरै । ६-हरि नामसुधारस पान कर, मथुरेश पिया उरमें विहरै । [हरि कीर्तन गुजराती गरवी की चाल में ] हरी के प्रेमी हरि हरि हरि बोली- रतन प्रभु नाम है अनमोलो। केशव केशीमाधो वनोमाधी- परम धन हरि नामहि साधो । हरि. श्रीराधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे श्याम- श्री सीता राम सीता राम श्रीराम । नो नर हरि नर हरि दुख हारी- जगतपति शुभ गति सुख कारों । हरि.
- [२१] ने न रांघष नारायण गुण गायो- रम पति अति हित को ध्यावो । हरी० रसीले प्यारे युगल मनोहर अंग- सु छविधारे रहैं सदा जन संग। हरी० मथुरा स्वामी करुणा दया धामी- हिये को जाने प्रभु अन्तरजामी। हरी० हरिकीर्तन तमाशे की चाल में। श्री हरि नाम परम सुख सार-भजलो हरिजन पारंपार ॥ १-दीन बन्धु करुणा के सिन्धू जन दुख भंजन हार । अवम उधारण ताप निवारण भुक्ति मुक्ति दातार ॥ श्रीहरिक २-श्री नरसिंह दयालु विश्वपति पालन पोषण हार । थंभ फार प्रगटे जन के हित तनकन करी अवार ॥ श्रीहरिक ३-श्री रघुनन्दन असुरनिकन्दन, भंजन धरणी भार। व्याध गीध शवरी से नीचहु, कोने भवसे पार ॥ श्रीहरिक ४-त्रिभुवन धन्दन यशुदानन्दन व्रजजन प्राण अधार । विदुर सुदामा सुखप्रद द्रोपदि लज्जा राखनहार ॥ श्रीहरिक ५-शरणागत वत्सल कलिम उदल छलबलमेटनहार । गोविन्द गोपीनाथ वेणुधर गिरधर रस भण्डार ॥ श्रीहरिण
...
[२२]
६-जामेल गणिका से पापी दीने छन में तार ।
नारायण जगदीश कृपानिधि जन दुख देत निवार । श्रीहरिक
-मथुरापति बखरी चरणन रति सावरिया सरदार !
· नाम लिये निश्च ही धाव भेट भुजा पसार ॥ श्रीहरि०
॥
हरि कीर्तन रसीया की चालमें।
हरि सुमिरन अति मंगलकारी। हरिष
१-नारायण पुरुषोत्तम जगपति, केशव माधव अध्हारो॥ हरि०
२-श्रीगोबिन्द यशेदानन्दन, दीनबन्धु जन हितकारी ॥ हरि०
३-राधावर मनमोहन नटवर, जन दुख भंजन गिरिधारी॥ हरि०
४-वंशीधर भवताप विभंजन, मन रंजन हरिभय हारी॥ हरि
५-गोपीनाथ संधिका वल्लभ व्रजपति हितकर बनवारी ॥ हरिण
६-वासुदेव बलवीर.नरोत्तम श्रीगोपाल सुछ विधारी ॥ हरिण
b-गोकुलेश श्रीनाथदयानिधि नवलकिशोर मनोहारी ॥ हरि०
-नागदमन घनश्याम रसिकवर शोभाधाम मुकुटधारी । हरि०
-रघुवर राम-जानकी वल्लभ दशरथ नन्दन असुरारी॥ हरि०
१०-सीतापति अवधेश धनुर्धर धर्मधुरन्धर सुखकारी ॥ हरि
११-शरणागत वत्सल नरहरिप्रभु-मथुरापत्ति पर क्षलिहारी॥ हरिण
२ ३ ५ ८ ६ ५३ १४ २६ २० ૨૨ [२३]. श्री हरिकीर्तन १०८ नाम की माला। श्रीहरि पुरुषोत्तम गुण गाई जीवन सफल करौं रे भाई । -नारायण जगदीश विश्वपति पूरणब्रह्म व्याप्त सब ठोई ॥ लोकनाथ दुखभंजन मोहन सुखद मनोहर भक्तसहाई ॥ २-मनभावन पावन श्रीवामन जनरंजन त्रिभुवन के साँई १७. १८ दोनबन्धु करुणा के सागर दीनानाथ कृपालु गुसाई ।। ३-श्रीनरसिंह असुरमदगंजन जनरक्षक अतुलितप्रभुताई ॥ भवभयभंज आनंदघन प्रभु शरणागतवत्सल हितदाई। -राघव राम जानकीजीवन सीतापति धनुधर रघुराई । श्रोअवधेश कौशल्यानन्दन असुरनिकन्दन अमितबड़ाई। ५-वासुदेव यादव सुन्दरतन देवकिनन्दन श्रीयदुराई ॥ ब्रजपति गिरिधर मदनमानहर राधावल्लभ श्याम कन्हाई ॥ ६-सोकुलेश कालीमदमर्दन रासविहारी छविसरसाई ... केशव कंसनिकन्दन दुखहर गोपीनाथ त्रिलोक रिझाई। ६०... २४ २७ २८ २६ ३०. ३३ ३४ ३७ ३८ ४३ .४५ ४६ ४८ ५१ ६५ ६६ ६० ६६ ७६ ८० ८२ [२१] : -माधव श्रीपति दानी ज्ञानी सत्यरूप शोभा अधिकाई । मोरमुकुटधर कमलनैन शिशुवपुधर गोपति धेनुचराई । -भवनिस्तारण पतितउद्धारण तारण सुवेषसुहाई । नटवर नटनागर करुणाकर प्रेमडोर में सहजधाई ।। -इन्द्रदमन व्रजरक्षक प्रियतम ललितत्रिभंगी मदनलुभाई। बांके चतुर नेहरसछाके करें प्रेम वश जनसिंवकाई ।। १०-प्रेमविवश आधीनभक्त के क्षमाशील शुभगुणसमुदाई ॥ नन्दकिशोर यशोदानन्दन जगवन्दन बन्दों सिरनाई ॥ ११-अलख अगोचर निर्विकार गुणधाम लोक अभिरामै गाई । गोविन्द श्रीगोपाल नवलवपु राधारमण मनोजनसाई ॥ १२-मायाधारी सर्वकलानिधि जाकीमायाजगत भुमाई ॥ इन्द्रियमनपर सोहन चितहरं कृष्णचैतन्य देववलभाई ।। १३-एक सौ आठ नाम की माला रचि मथुरा चरणन वलजाई ॥ गावै सुनै लहै परमानंद श्रीमथुरेश भक्ति ले पाई ॥ शुभ मिति फाल्गुन शुक्ला १५, संवत् १८ 0 .. ८६ 80 १२ ६३ ६७ १०० - १०१ २०२ । .१०३ - २०४ १०६ ।
[२] * श्री हरिः * (रसिया की चाल में हरि कीर्तन ) जोलुख प्यारे कृष्ण भजन में सोती तीन लोक में नाहि । हरि जगदीश श्याम गुणधामी रे-पुरुषोत्तम करुणामय स्वामी रे। अन्तर्यामी. गिरधर नामी जस छायो जगमाँहि ॥ १ ur ४ ६ १० ११ जो सुख० ॥ १॥ गोपीनाथ राधिका जीवन, नन्दनदन नटवर मधुसूदन। १२ १४. १५ १६ १८. कालीदमन कंस मंद मर्दन छविलख मदन लजाँहि ॥ जो सुख ॥२॥ गोकुलेश गोपाल विहारी रे-रासविलासी रसिक मुरारी रे । मुरलीधारी श्रीवनवारी दामोदर कहिलाँहि ॥ १६ २० २१ ર २३ २४ २७ जो सुख ॥ ३ ॥ २८ २६ ३१ राम सियावर अवध दुलारे रे-भरतभात सारंगधनु धारे रे। दशरथ नन्दन प्राणअधारे सुर मुनि सुजस सराँहि ॥ जो सुख ॥ ४॥ ३३ ३४ [२६] कमल नैन घनश्याम मनोहर, जानकी जीवन क्रोदमुकट धर । दशमुखदलन ललन जगपालन अशरणशरण कहाँहि । ३६ ३६ ४१ ४२ ४३ ४५. ४६ ..४७. ५० जो सुख ॥५॥ रघुनायक यदुपत्ति दुखहारी रे-श्री नरसिंह भक्तभयहारी रे मायाचारी सब सुखकारी सुमिरे भवदुख नाँहि ॥ जो सुख ॥ ६ ॥ भक्तवसल जसुमत के लाला रे-करें सदा सन्तन प्रति पाला रे। द्वारकेश दृगबाहुबिशाला मथुरा बल वल जाँहि ॥ जो सुख ॥४॥ ५१ [२७.] ॥ श्री हरि॥ 1. होली हरिनाम संकीर्तन की काफी नीकी श्री हरि नाम की होरी ब्रह्म सच्चिदानन्द जगत पनि जो सब माँहि रम्योरी। राम कृष्ण माधव मधुसूदन नाम से प्रगद भयारी : ताहि निसदिन सुमिरौरो लोकी ॥ १ ॥ काम क्रोध मद लोभ मोह छल मल को ढेर लग्योरी हरी नाम कीर्तन चिनगारी धरत हि सकल जरयोरी । जान भयेः विमल हियारी-नीकी ॥२॥ नारायण केशवें पुरुषोत्तम नाम की केसर घोरी ।... प्रेम रंग. मनं मटकिन भरभर प्रीतम अंग भिजारी ॥ रंग बरसै चहुंओरो-नीकीं ॥३॥ राधावा गिरधर मुरलीधर श्याम नाम रूरोरी। श्री गोपाल गुलाल हाथ, बल बोर अवीर की झरी अनुराग कमारी-नीकी ॥४॥ रघुवर सीतावर सारंगधर बारम्बार स्टौरी। नाम झांझ इफ बाजे व जे लोक लाज राजदोरी पिया बस में करलोरो-नीकी ॥५ भरी ॥
[२८] हिरनाकुश प्रहलाद से पूछी राम बता किस री। तोमें ममें खडग खंव में कह्यो राम सब ठारी । खंब ही तें प्रगटोरी-नोकी ॥ ६ ॥ प्रो मधुरेश नाम की होरी खेली हिल मिल गोरी। करें अवश्य कृषा नंदनदन नो वृषमान किशोरी ॥ परम रसरंग छोरी-नीकी ॥ ७ ॥ (गणगौर की तर्ज पर हरि कीर्तन ) गोविंद गुण गाओजी सुगम येही मारग गही कर गौर निगुन सगुन दोउ रूपरंगीला-राम रमै सब टौर ।। ब्रह्म सच्चिदानन्द विष्णु हरिनाम अनन्त निहोर । वासुदेव बहुपति मधुसूदन-रटिये सायं भोर ।। गिरिधर राधावर नटनागर-गोपियन को चित चोर। रघुबर धनुधर सियवर सुन्दर भजिये सदा कर जोर ।। रोसविलासी प्रेमप्रकोसी-रसिकल को सिर मार । नन्दनदन श्रीकृष्ण सुधरतन-मोहन माखन चोर । नी मधुरेश भक्त भयहारी-बंध्या प्रेम की डोर !
:
[२६]
श्री मयुरेश वरणवन्दना स्तोत्र-
बोलो श्री कृष्ण चरण तोप हरण की जय हो।
दीन दुखियों के शरण मोदकरण की जय हो ॥१॥
प्रटी जिन से पतित पावनी श्री माता गङ्ग।
सर्व संकट हरण विश्व भरण की जय हो ॥२॥
जिस चरण रज से तरी नारि अहल्या तत्काल ।
धन्य भव सिंधु तरण चारु वरण की जयहो ॥ ३ ॥
जि.न के छूते ही हुए सुक्त वो यमलाअर्जुन ।
दामोदर भेषधरण लीला करण की जय हो ॥ ४ ॥
काली के फन पै किया नृत्य दिखाया कौतुक ।
गोप वन बनविचरण श्याम चरण की जयहो॥५॥
मिन के बल और भरोसे पै. हैं निर्भय हरिजन ।
जन के निस्तार करण भय के हरण की जय हो ॥ ६ ॥
जिन के सुमिरन से मिटै सोग भयानक भवरोग ।
फांसी कट जाय तुरत जन्म मरण की जब हो ॥ ७ ॥
जिन की सेवा में अचल हो रहे चपला लक्ष्मी ।
सुख सदन सर्वदा दारिद्र दरन की जय हो ८ ॥
जिन को सीने से लगा गोपियां कृतार्थ हुईं।
रास रस उपजावन त्रास हरण की जय हो ॥६॥
रुक्मणी द्रोपदी गज रक्षा को धाये झटही।
ऐसे अशरन के शरन सुखवितरण की जय हो ॥ १० ॥
[३०] धन्य जन ध्यान में धारें जो हिये में उन को। धन्य धन धन श्री मथुरेश चरन की जय हो ॥ ११ ॥ सेवक की सुध लीजै रे श्याम सलौने- मानौ या न मानौ तुमौ विना दाम में विकानो-करुणानिध करुणा करके दर्शन दीजै रे श्याम सलौना-सेवक की- (इस के वजन पर दूसरा पद) दर्शन की हम प्यासी रे रास विलोसी-दर्शन की- सांवरी सलोनी झांकी ललित त्रिभंगी बांकी-दिखला कर धीरज दीजै हो सुख रासी-रे रास बिलासी-दर्शन की हम०-१ प्राण को रखैया तूहि टेक को निभैया तूही-दीनन दुख भंजन मोहन निधवनवासी-रे-रास विलासी-दर्शनकी०-२ नैना तोरे रतलारे रसिक रसीलेप्यारे-घायल कर डारे तन मन सुरता नासी-रे-रास विलासी-दर्शनकी०-३ फाटत विरह में छाती पल हुन कल आती-घबराती हूँ लल- चाती चित्तहुलासी-रे-रास विलासी-दर्शनकी-- चेरी हूँ मैं तेरी भोरी राख पिया लज्जा मोरी-थोरी तौ महर ननर कर मथुरा बासी-रे-रास विलासी-दर्शनकी-५
[३]
( इसी तर्ज पर दूसरा पद)
घट घट को तुम जानो हो नन्द दुलारे ॥ घट २ की
चेरी हूँ तिहारो प्यारे दया दृष्टि मोपै डारो
शरणागत चरणों परके कितहुन जानो हो ॥ नन्द १
तारो या नतार अवतो विना तोरे ना सहारो
भवसागर नैया डग मग नाँहि ठिकानो हो ॥ नन्द २
कामी हूँ मैं क्रोधीलोभी दुराचारी हे अघहारी
निज प्रणो को नाथ सुमरि के अपनो मानो हो । नन्द २
तेरो ही कहाऊ किसको विधा जाय मैं सुनाऊं
मथुरा पति दुख को हरता हम पहचानो हो ॥
(होली कव्वाली में)
होली खुल खेलौरी चल कर जहां दिलबर अपना ।।
दारी दुनियां है तमाशा ये नहीं घर अपना ॥ १॥
छल कपट का जो है घूघट वो हटालो प्यारी॥
प्रीत की साड़ी नवल प्रेम है जेवर अपना ॥ २॥ होली:
होगये वृक्ष भी तज लाज नगन फागन में।
नाच गा तूभी रिझाले पिया गिरधर अपना ॥ ३ ॥ होली :
तन पै सुर्ता की लगा उस्के तू तक पिचकोरी॥
अंक भर जोडले कर चरणों में धर सर अपना ॥४॥
[३२] रंग अनुराग से जब तुझ को करै तर प्रीतम ॥ जान तव रुतबा हुआ सव सेरी वरतर अपना ।। ५॥ जिस की होली पिया मथुरेश से ऐसी होली ।। कर लियाउसने सहज ही पिया नदपर अपना॥ ६॥ (होली) हो छाई रसीली फाग रंगीली व्रजके सुन्दर वागन में ॥ हो - जमा है एक तरफ़ लाल का सखी मंडल ॥ अड़ा खड़ा है उधर लाडली कागोपी दल ॥ अबीर और गुलालों से छाये हैं बादल ॥ उमंग से भरे दोनों तरफ के हैं दंगल । हो, लता पता सब जोवन- माती रंग राती हैं फागन में हो छाई रसीली- अनेक रंगभरे हौज जिन में फव्वारे ॥ लगे हैं छूटने वहने लगे हैं पत भारे ॥ बजें हैं डफ़ कहीं शहनाई ढोल नक्कारे ॥ विसर के देह की सुध नेह मग्न हैं सारे॥हो होरी के रसिया नाचत गावत नाना रस के रागन में । हो छाई - मचाई दोनो ही टोली ने रसको होली है ॥ युगल में बात जो होनी थी वोभी होली है । अधर सुधा पिया प्यारी ने मिल अहोली है ।, हर एक मुंख से निकलती ये तान होली है हो मथुरा पति राधा गोविन्द रस रसिकन पायो भागन में । हो छाई रसीली- ॥ ,
[२३]
( मन को मनमोहन सिवा दुनिया में कुछ भाता नहीं)
इस
के
वज़न पर
[होली]
फूली देख बसंत वन वन मन हैं ललचाने लगे।
दिन ये होरी खेल के पिय विन
वृथा
जाने लगे।
मच रही है धूम घर घर फाग की अनुराग से ।
नैन विरहिन के पिया बिन नीर बरसाने लगे।
ढफ बजाते नाचते फिरते हैं रसिया हर तरफ।
पंछी भी कुंजों में होरी मस्त हो गाने लगे ॥
मन की मटकी प्रेम के रंग से भरै जब तक नहीं ।
श्याम रसिया प्रेम के क्यों कर इधर आने लगे ।
पहुंची जब सुर्ता यो दूती बन के मन्मोहन के पास ।
मेरा सुन के खुद भी कुछ तो शरमाने लगे।
होरी ज्वाला उठ रही है तन के हर इक रोम से।
ऐसा सुन
वो राधे राधे बंसी में गाने लगे।
बन गये भारी निठुर मथुरा में जा मोहन पिया।
कर के चिकनी चुपड़ी बातें प्रीत दरसाने लगे।
[३४]
1
॥
॥ पद॥
पल नहि कल मोय पियके दरस बिन ।
१-गिन गिन कटी कठिन दिन रतियां।
जी न सकू वाके दरस परस बिन ॥ पल०
२-योग से अधिक वियोग सुहायो ।
रह न सकत ढग छिनहु तरस बिन ॥ पल०
३-सुनियत हैं करुणानिध प्रियतम ।
रुक न सकत भये काहुके बस बिन ॥ पलक
४-लोचन मीन विकल अति प्यासें ।
कैसे रहैं पिय दरस के रस बिन ॥ पल
५-प्रेम के बस मथुरेश दयालू ।
मिले न गान किये वाके जस बिन ॥ पल०
[गज़ल]
विनय सुनलो हमारी नाथ करुणा सिन्धु दुखहारी।
विदित है आपकी अनुपम जगत में भारी दातारी ॥ १॥
मेरा दर्जा है सबसे बढके पतितों में सुनौ स्वामी ।
पतित पावन है तुमसा कौन दुखहर दीन हितकारी ॥२॥
तुम्हरी भक्ति करने से तरे भव सिन्धु से लाखों ।
विना भक्ती मुझे तारौ तौ होगा जस बड़ांभारी ॥३॥
[३५] 4 पड़ो मझधार में नैया न कोई पार लगवैया इधर छाई अविदया की भयानक रैन अँधियारी ॥४॥ कृपादृष्टी जो होजाये ये बेड़ा पार लगजाये। करी रोशन प्रभू मथुरेश जल्दी अपनी सरदारी ॥५॥ (गजल) बोलो श्रीनाथ दया धाम की जैहो जैहो । मन हरन चारु वरन श्याम की जैहो जैहो ॥ १॥ सात दिन उंग्ली पै जिस बालने धारा गिरवर । सुर दभन श्याम विजित कामकी जैहो जैहो ॥२॥ सीस पै मोरमुकुट करमें लकुट पीत सुपट । वीरभट नागर नद नामको जैहो जैहो ॥ ३ ॥ निकला गिरराज से पधराया श्रीबल्लभने । धन्य वो ठाम है व्रज धामकी जैहो जैहो ॥१॥ पा नही सकते पता पचके थके ब्रह्मादिक । प्रेम से बस किया ब्रजवाम की जैहो जैहो ॥५॥ राजपूताने में आये किया पावन यह देश । धन्य मेवाड रुचिर ठाम की जैहो जैहो ॥ ६॥ जिसके दर्शन से मि घोर महा तीनो ताप । प्यारे श्रीनाथ जु अभिराम को जैहो जैहो ॥ ७ ॥ - है .
[३६] धन्य गोस्वामी महाराज श्रीगोवधनलाल। लाल सुकुमार उदर दाम की जैहो जैहो ॥८॥ दे दरस मुझको भी नीनाथने अपनाय लिया। धन्य मथुरेश दिलाराम की जैहो जैहो ॥ ६ ॥ (दोहाष्टकम् ) १-श्रीहरिचरणन मन दियो पूरण तिन के काज अन्य जतन सन्तन कहे कठिन विघन के साज ॥ २-नटखट पियको ना मिलै खटपट से कछु अन्त । उलट कपट चूंघट झपट झेट पट भेटौं कन्त ॥ . ३-तप साधो बाँधो सुरत आराधौ सुर द्वार । विन मायौ उतर नहीं काँधों से भव भार ॥ ४-चक्कर खावै चरख नित चरचत करत पुकार । इम बिन हरि चर्चा रुचे चौरासी संचार ॥ ५-गंग करै अघ भंग तिम हरिजन को सत्संग ! मन मतंग है पंग तब अंग रचै हरि रंग ॥ ६-गुल गुलमें हरि रम रहा अतुल रूप कुल नूर । बुल बुल मन चुल बुल न कर कुल ७-ग्राह गहे गज नाह को और न पाई राह । वाह वाह हरि नाम गुण तुरत गही हरि बांह ॥ में निरख हजूर ।
.
[ ३७]
-प्रेम लेश उर ऊपजे मिटै सकल जग क्लेश ।
देश देश भटकै यथा सुखद सदा मथुरेश ॥
( सोरठा अष्टक)
१-इधर उधर न निहार नर, यदि पर सुख चहत है ।
श्री गिरधर उर धार, सुघर तरै भव सुगम नर।
२-हरि पद कमल पराग, चाहत यदि अलि मन चपल।
विषय सुमन रस त्याग, गाव राग अनुराग युत ॥
३-शरण तिहारी नाथ जो अनाथ अस उच्चरहि।
धरत माथ पर हाथ हरष साथ यदुनाथ हरि ॥
४-मंद छाड छल छंद भज हरि परमानन्द पद।
कोकाट भवफन्द नन्द नदन ब्रज चन्द बिन ॥
५-परत कुमति बस जीव जगत कूप हरि रति बिना।
सुरत करत नहि पीव जत मत साधे प्रीति बिन ॥
६-अहं अहं मत भाष जाय साख अभिमान तें।
अजा पुत्र शत लाख भये राख में में कहे ॥
७-एक निशाना जान, यदपि बाण धारी विविध ।
इष्ट एक पहि चान भेद बुद्धि भयदुखद लखि ॥
-जो सम दृष्टि हमेश सुखी रहै प्रिय सकल को।
सबमें लखि मधुरेश राग द्वेष तजि भजहु हरि ।।
[३८]
मंजु छन्दाप्टक।
मन्मथलज्यो गोपिका मोहीपरे प्रेमके फन्दै ।
थके चंद्र सुर छके मधुर सुन मुरली बोल अमन्दे ।।
रेब्रजचंद भये हमसब तज तवं पद रज के बन्दे।
शरम नकर कर करम चितै इत प्रीतम आनंदकन्दे ॥
मजेदार दिलदार अरज़ इक सुनौ गौर कर मैरी।
थमैनही दिल व्याकुल तुम विन विरह अगिन अति घेरी ॥
रेमन मोहन अधर सुधारस
सींची
धाय
शब्दन निकस जियरा विकसै हा हा खाऊं तेरी ॥
सवेरी।
मदनमनोहर मोरमकुटंधर मेहर नज़र कर हैरौ ।
थकितमयों मन प्रीतको बंधन हाथ गरे बिच गेरो॥
रेहजूर पुरनूर दूर कर जगत जाल उर केरो।
शब्दबोल दिल खोल मोल बिन यह जन चेरो तेरो॥
ममअंखियन में बस्पो सलौने तव तनु मृदल मुलायम ।
थलजल पवन गगन सब ठाई यदपि रूप तव कायम ॥
[३]
रेचंचल किस भांत हिये विचतू रह सकै मुदायम ।
शकल खूब महबूब में ध्याऊं तेरी प्रात अरू सायम ॥
मनोहारि तन श्याम नवल क्या जोबन झलक रहाहै ।
थरपिनिखिष सोभा निधि तो विधि हूचकित अहा है ।
रेसुन्दर जादूगर तैं यह कौतुक रच्यो कहाहै।
शक्लदेख तव अकल होत गुम अचरज यही महाहै ॥
मन माणिक विवेक धन तुझपर सर्वस पा दियाहै ।
थूणी आशा पर तन छप्पर टिक अवलम्ब लियाहै ॥
रेदिलबर देदरस दया कर क्यों दिल सख्त कियाहै ।
शर्त मुहब्बत पूरी कर तू मेरा. प्राणपियाई ॥
मरज इश्क बढगया तलव में आशिक रोता डोले ।
थरथरात मुख बात न निकसै आंखें कैसे खोले ।
रेस वैद मरीज ये तेरा दास भया बिन मोले।
शर्बत पिलो जिला आशिक को दिखला रांस किलो? ॥
--
[४०] .
मत तरसावै श्याम दरस रस प्याला दीजै ।
थुकथुक
करि हैं लोग कौन फिर तीय पतोजे ।
रेअनाथ के नाथ हाथ हमरो गह लीजै ।
शरन घरन की जान विरद निज पालन कीजे ॥
[सवैया अटक
१-दोन मलीन महा मतिहीन में पापन पीन अलीन अनारी।
आप प्रवीन नवीन सदा रस लीनही भक्त अधीन बिहारी॥
मेरे अनेकन जन्मके औगुन देख कहा भयो सोच है भारी।
वीर दयाके प्रसिद्ध अहो मथुरेश कहाँ कैसे हिम्मत हारी ॥
२-बालक काहु को जात गढा बिच देख के पंथि तुरंत बचावै।
आपने पुत्र की ऐसी दशा लखि कौन पिता नर खावन धावै ।
तोसो पिता भव सिन्धु में मोसे अजान को डूबत नाहिरखावै।
मौन गहे मथुरेश विचारिये लोक की दृष्टि में कौन लजावे।।
२-नीच महा गुण हीन हु जान के भोहि तजे न कदापि सरैगो।
पाप हरेरौं कहात हरी तव नाम महातम जान परैगो ।
चन्दन देत सुगन्ध सबै कहा सर्पहि देख दुराय धरैगी।
जो मथुरेश न मोय द्रवौ करुणा कर नाम कौं कोउचरैगो ।
.
.
(४१)
कौन तपावत कीन अजामिल यज्ञकिये गणिका कब खामी॥
व्याधमें कौन आचार विचार रहे कह दीजिये अन्तर्जामी ॥
भीलनिने कव बेद पढे कहा सुकृत हस्ति किये सुखधामी ।
साधन हीन ये तारे सबी मधुरोको निहारत क्यों प्रभुख़ामी।
५ तारे हैं आपने भक्त हजारन जैते आकाशमें दीखत तारे ।
प्यारे लगै सब वे तुमको तुमहू उनको प्रिय ज्यों दुगतारें ॥
लेश नही तव भक्तिको मोमन मायाके लागरहे दृढ तारे ।
कीरत है मधुरेश बडी मुझ भक्तिविहीनको पार उतारे ।
६ पापकरे जिन धापके आपने माफ़ करे जब पा पकरे हैं ।
जोनगहै मथुरेश पदाम्बुज़ जोनं गहै भवचक्र परे हैं ।
मेरे अनेकन जन्मके औगन देखके काहेको नाथ डरे हैं ।
मोरी उबारी जो चाहै करी शरणागत हैं हम पांव परे हैं।
• गौतमनार पखान निहारके तारदई करुणा उर धारी।
वानर तारे मलाई से नीच उबारे हमारे बढी रुचि भारी ॥
चित्त पपान समान विष विष भोग रतो पशुतुल्य हमारी ॥
कर्म चण्डालसे नोच मेरे अब क्यों मथुरेश न म्हेर तिहारी।
८ श्रीनदनन्दन आनदकन्द सुनौ बिनती जगदीश हमारो।।
दीन के नाथ अधीन के साथ नवोन नही बखसोस'तिहारी।।
लाखनके अपराध छमे प्रण राखनको जगमें अघ हारी।।
पोपविशेष मेरे मथुरेश निहारके क्यों निज टेक बिसारी।।
(४२) रामभजी कृष्ण भजौ लाज तजौ प्यारे॥ नाम सुधा पीके मगन होजा मतवारे । १ तात भात जात पात पैंडहू न साथ जात- सूने हाथ चलेजात राव रंक सारे ।। राम भजी २ जो हरि पद शरण जाय ममता जगको मिटाय- ताके नितही सहाय मोर मुकट वारे ॥ राम ३ माधव है सांचो मीत जनसौं अति राखै प्रीत- वाहो की कर प्रतीत पण शरण जारे ॥ राम १ हरिसों जो प्रोत करै तासौं वह नाँहि दरै सारे ही कष्ट हरै गोविंद गुण गोरे ॥ राम ५ पल पल दगाझरै नीर दरस हेत मन अधीर- सालै उर विरह पीर मिलत धाय प्यारे॥ राम० ६ अनुपम मथुरेश मोत जमसे नहि रंच भीत . गावो हरि प्रेमगीत परमानंद पारे ॥ राम० - शुधि प्रति अशुद्ध wheemaanadaanemalore 1 योगे ३ ३ दोगे मोइन कालो श्यामा " काला शयामा ११ १२ १३ सीता मांधव . नारायण गमसीना माधान नरायन मउदल हाग भंज १७ -- ८ . ३ तारण २७ ५ भयारी जरया प्रणा विदया निहार हारी भजन तारण तरण भयोरी जरयो प्रण विद्या निहाल २ ३५ ३७ ४ " नर ३८ १२ केरी निखिष ३६ ४ निखिल बार. घा. 'तीय ६ तीय दोन पौन दीन :