Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Shri Madh Jaina Chariya Amar Chand Jeevan Charitar

Jaina,chariya Amar Singh · 2010/12

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स्त्रका-
-
॥ ओ३म ॥
॥ नमः श्रीवर्द्धमानाय ॥
'श्रीमद् जैनाचार्य श्री १००८
अमरसिंहनी महाराजका
जीवन चरित्र ।
(नमस्कार मत्र को व्याख्या सहिन)
जैनाचार्य श्रीअमरसिंहजीमहाराजकी सप्रदाय
के उपाध्याय श्रीमान् जनमुनि स्वामो
आत्मारामजी महाराज
भौर
सशोधक --श्रीमान्पडित जैनमुनि
ज्ञानचन्द्र जी महाराज।
प्रकाशक-श्रीयुत झाला मिहोमल्छ, छाला हरभगवानवास
ळा पसन्तामल्ल, पाष कुन्दनलाळ सघमोषरसोयर
श्रीधीर मिर्याण स० २४३९ । पूज्य भमरसिंह सं०३३ ।
संवत् १९७० । सन् १९१४६०
--
.
पम्जाप एकामोमीकछ यत्रालय लाहौर में प्रिण्टर
लाला लालमन जैनो के मधिकार से छपी ।
प्रपमापत्ति १५०० [पिना मूल्य वितरण

na * प्रार्थना * । प्राज्ञ पुरुषो! में आपसे सविनय निवेदन करता ह,कि यह परम पवित्र जीवन चरित्र रूप पुस्तक श्रीमान् परम पं० उपाध्यायजी महाराजने लिख कर मुझक्षुल्लक चेतना को सशोधन करने के लिये प्रदान कियाअत मेंने आप की आज्ञानुकूल इस पुस्तक को स्वबुद्धयनुसार सशोधन किया है यदि अब भी प्रेस तथा मेरे प्रमाद से कोई अशुद्धिरहगई हो तो सख्यावान् पुरुष क्षमा करें। क्योंकि कहा भी है कि -अक्षरमात्रपदस्वर हीन व्यञ्जनसन्धि । विवजित रेफम् साधुभिरत्र ममक्षतव्य। कोनविमुह्यति शास्त्रसमुद्रे॥१॥इति अपितु इस पुस्तक को श्रीयुत लाला मिडीमल्ल, पावराम,लुधियाना निवासी तथा ला हरभग- वान्दास,शकरदास कपूर्थलावाले भावडाडब्धी बाजारलाहौर वा लाला कृपाराम, पसतामल्ल, सेकेट्रीजेनसभाअमृतप्तरओर पावूकुन्दनलाल सर ओवरसीयर, सदानद, लुधियानानिवामी, इन धर्म प्रेमी महाशयों ने स्वव्ययसे प्रकाशित कराया है जिसके प्रभाव से उधमहाशयों ने पर्व से भी अतीव सुप्रख्याति की प्राप्ति की है। जैनमुनि पण्डित ज्ञानचन्द्र। - , 1 -- - प्रस्तावना। विदित होघे सर्व सुधजनों को इस संसार चक्र में प्राणी मात्र को पक धम्मदी का माधार है ॥ धर्म के ही प्रभाव से मारमा सनति को माप्त होता है। सो मानुप भष पाने का सारपदाथ धर्म का निर्णय करना ही है अर्थात् धर्म निर्णय से सम्यक्त्व रन की प्राप्ति होगाती है। किन्तु इस मनादि मवाहरूप संसार यम में मनेक प्रकार के धर्म प्रचलित हो रहे हैं मोकि (सय सय पससता गरहतापरंपर्य) इससूत्रके कयमानुसार पाव कररहे हैं मथात् स्व. मतको प्रशला परमत को निंदा करते है। किन्तु विद्वानों का यह पक्ष नहीं है कि पर सत्य पदार्थ को भी मपनी कुयुफियों द्वारा कलंकित करना । विद्वानों का यही धर्म है कि सस्यासस्य का निर्णय करके सत्य को ग्रहण मसस्य का परित्याग करना मपितु इस भारत भूमि मै भनेक प्रफारफे मत प्रसहोरहे हैं जैसे कि- स्थामी क्यामन्द सरस्वती जी मे घेद पा एक पर कोही सृष्टि का मामा शंकराचार्य में एक शिव को ही सर्वोचम यतछाया है। ग्यासपिमे एक पेदान्सदर्शन को ही मयप रपया है। कपिलवेष में सांस्यपर्शन में पम्वपिंशति मछत्तियों से ही सबकुछ मान लिया है इस प्रकार कणादमुमि गौतमाचार्य ने भी मिम्म २ पदार्थ माने हैं। किन्तु मनमावि प्रापियोनयनकम या एप्टिवत्पन्न विषय मारकादि से माना है पूर्व मीमांसको ने घेदपिहित हिंसा को भहिंसा ही करके लिया है।

( २ ) पौदोंने भास्मपदाय को क्षणमर सपा दीपक मकाधषत् लोगों को समझाया है तथा कृश्चिन् यावी इसलाम जैसे-कामिल्या, ग्यामिया, मनसूरिया, भपासीमा, मावस्या.फमालिया, वारफिया-शतानिया, मजामिया, कुदरिया, सुमी, कपरिया, पहापाया, इत्यादि ममेक ही इस के मेद मीर देवसमाज अझसमाज राधास्वामितत्व खालसा गहरगीर गरीयवासीये चारपाक प्रमाण्ड पुराण, पाणाका सुकामत, मलूकदासिये,चमत,सांधी,मनुष्यभक, रेखामानकपपी,पाममार्गादि भनेक प्रकार के मत भनेक प्रकार के तत्वमिन्न २ प्रकार से निरूपण करते हैं तथा स्पा स्वा मत की पूरय कटिषयसदेय ही हो रहे हैं। किन्तु कार तो केवल जिमासु जनो को दी प्राप्त होता है कि ये किस मतको सचा माने भौर पिस मतकोस्पागने योग्य पा प्रदण फरमे पाला माने किन्तु सत्योपदेष्टासनप्रणीव पल पफ जैनपर्म हो है जा सर्व प्रकार स प्राणोमा की रक्षा करमे में परिवद पा उपत दारदा ६ भार दया का सर्या प्रचार करने का उपयश कर रहा है। भार स्वादरूपो तरंगासेसन द्रवत् पानसे प्रतिपूर्ण वस्यपदार्थों का पूर्ण प्रकार से उपदेप्टा दे जिस फी स्तुति भनेक विदाम् सतवमुससे कर रहे सपा भनेक विदशी पिताम् मी जैनमत के तत्वों को देनफर मति मदस्यता प्रगट फरत है। सपा जनमत्रों के मनेक सरलार्थ मपापनी मापा में उन लोगों में करलिये हैं पा पर रहदै पारि यह पदी मनेयम्त मत है जोधि पूर्व काराम मपगी सस्प रूपी पिपा से अय प्राप्त करता था मीर पम्मान पास में मो जय प्राप्त कर रहा है। मौर समतो से प्राचीन पोंकि इस जनमत दीको दिसा रूपोममा सर्प मापरि मस्ति दोपदी है। मपितुशार से सिगा पटतादमिदो पाटफीकसीविविधता है कि जिस जैनमत को परमोच्य श्रेणी में गणम करा जाता था माज उस जैनमत को बहुत से लोग नास्तिकादि नामों से पुकारते हैं। सया इस परम पवित्र मनेकान्तमतको घृपासे देखते है मनुमितता से व्यवहार करते हैं मर्थात् पाव करते है। सो क्या यह मायपुरुषोको खेदका स्थान नहीं है मषश्यमेष है। सो विचारनीय पात है कि यह लोकोऽपवाद फेघस परस्पर की देपता का ही प्रभाव है। क्योंकि वर्तमान समय में भीजैनमत की तीन शाखायें हैं जैसे कि श्वेताम्बर जैन श्वेताम्बरमूर्तिपूजक जैन २, दिगबरजम ३. किन्तु श्वेताम्परमूर्तिपूजक जैनोंकी मो यो शाखाये है वैसे कि श्वेता म्परमूर्तिपूजकजैन , मौरपोताम्बरमूर्तिपूजकचन २,सो माया पीता म्यरमतिपकजैम मनुमित उपदेश या लिखम में सकुचित माष नहीं करते हैं जैसे कि पीताम्परावार्य भारमारामजी का पनाया हुमा-तत्व निर्णय प्रासाद नामक ग्रंथ विक्रमाप्द १९५८ मुबई ईधु प्राकश बाए स्टाक कली०को प्रकाशित हुमा है जिसके पूर्व मारमारामजी का परिभ भी लिखा है मिसमें श्वेताम्बरमत.को ममेक कटुक शम्द तथा मतप्यळेप लिने, सो इन्ही कारणों से उक्तमाक्षेप अनमनों पर छोक करते है। सो यथास्थान कितमेक माझेपो फा इस पुस्तक में उत्तर मी लिना आयेगा क्योंकि यह पुस्तक एक महामाचार्य मी के जीवन की परिया दिखळाने वाला है मतु खंटन मसन को । मपिच विचारशोलपुरुपों का धर्म है कि सत्यमापणसत्यलेमन द्वारा भग्यमीयों के हितपो पर्ने निससे फिर मनुफम स मोक्षाधिकारी होवें क्योंकि शमदम यक सुझ पुरुषोंके गुणामुषाय करमेसे मर्मत कर्मों

(४)
को पर्गणा से जोषमुक्त हो जाता है और फिर मनेत मान को प्राप्ति
होती है शाम से ही सदया है।
यदुक्तम् (पदममाणतउदया) मर्थात् प्रथम मामतत्पश्चात् यया है
सो सम्यक् शाम से ही सम्पक दर्शन प्रगट होता है तथा सम्यक् दर्शन
पूर्वक ही सम्यग्शाम होता है।
युगपत सम्यक होने से सम्यक पारित मी मोहनीकर्म की क्षयोप
शमता से प्राप्त हो आसा है सो इस पुस्तक में सम्पग शान सम्पा
पनि सम्यक् पारिभ युकदी महान पुरुप के परिष लिपमे के लिये
ही उघत हुमा ॥
गाशा है यह परिध रूप ग्रंथमम्य जीयों के मोक्ष रूपपय मपत्य
ही सहायक दायेगा । जिससु जनों को अयश्यमेष ही उत्कंठा होगी
कि ऐसे त्रिगुणयुक मदा पुरुपका क्या माम । पा किस काल में हुये
इत्यादि।
सो महाराज जी का ऐसा माम है या भोप्यताम्परसपर्म
गरीय महामावाट्य श्रीमत्पुम्प भमरसिरजी महाराज ॥
मिन्होंने अपनी मायुको धर्मार्थ मर्पण किया है मिदों में
माहाम्
परिणामों के साथ शुदसपम को धारण करके महाम्दी परोपकार
किया है।
किन्तु पजापदेश में तोस्थामोजोमदारामजी ने स्पामर विपर के
मदान दो परोपकार दिया है क्योंकि मातामहाराज पा ऐसा
राम्प प्रयापदेश था कि जिससे मापनीय शोध ही मम्पमय के साम
पोटाते।
पम स्यामोजो मी परोपकारियों कि मि में शिरोमणी थे।
मौर पिर ममार्ग के परमोपदेशप भीपज्यमी महाराज हुए।
पा मम्यगम उन मारमाशी के शग से मुलहो सो कदापि
नहीं मला ऐसा काम है जो ऐसे महान् परोपकारो मामाजी का

बीवन चरिम सुमना म चाहे तथा ऐसा कौन है जो ऐसे महारमा के गुणानुषाद न करे या ऐसा कौन है जो परम शान्ति मप्राधारी सत्योप देष्टा सद् गुणाकत मावार्यपद के धारक श्रीमान् पूज्य महाराज के गुणों में रफ न हो । अर्थात् भव्यगण गुणादि मै सष हीरक्त है। मम्य जीवों के पदयरूपी कमल में एक महामपि के गुण सदेष दी विराजमान रहते हैं। भम्यजीष मपने तरमे के पास्ते उक माचार्य महाराज जी के सदेष ही गुण कीर्थन करते रहते हैं पोंकि जिन्होंने सूर्य समाम जिनमत का इसलोक में प्रकाश किया मर्यात् स्याद्घाघाणी के द्वारा जीपकर्म को मिन्न२ करके दिमकाया तथा जिनके सुदर भनेकान्तमत के म्याक्यान में ममेक ही सदगृहस्थ उपस्थित होते ये ऐसे महामुनि का यह जीवन परिष है। इस परित्र प्रयमें श्रीमान् परमपरित भावार्य षर्य सवैषहीमय विजय करने पाटे नैनधर्म में सूर्य समाम श्री१०८पूज्यसोहनलाळ जो महाराज जी ने मुझको पात ही सहायतादी है साथ में यास से जीर्ण पम भी प्रदान किये हैं बोकि यथास्थान इस प्रन्य में लिने मायेंगे। भौर श्री श्री १०८ गणा पच्छेदकउपाधि पिपित श्रीस्वामी गणपतिराय जी महाराज जी मे भी यात से पूर्व इतिहास सुनाये है जो कि यथास्थाम में दिए जायेंगे । मौर श्रीमान् लाला घसीलाल सोताराम मलेरी नामा थाले ने मी इस पुस्तक के लिखते समय पहुत से पुस्तकों की सहायता दी है। और बहुत से भग्यजीपों की सम्मति से यह प्रय लिखागया है। मशाइकिमन्यजीवोंके लिये यह प्रथमवश्यमेषही हितकारीहोयेगा। उपाध्याय जनमुनि श्री आत्मारामजी।

* जीवन चरित्र *
नमोसमणस्स भगवतोमहा वीरस्सण ।
भय श्री श्री श्री १००८ श्रीसुधर्मगच्छाचार्य श्रीमद् पृत्य
ममरसिंहजी-महाराज जी का जोपन चरित्र लिखते है।
विदित होये पधाळ (पजाय) श म एक ममृवसर मामफ नगर
यसता है। जो प्राचीन नगरों के गुणों फरफे पिमपित होरहा है ।
जिम की मेदनी शुशामित दारही है मोर नाना प्रकार पे पा
नाना देशों के पसोपाले नामाही प्रकार के व्यापारो लोग पार
प्राय धम परके भी लोग मलामदार विविध प्रकार जला
शप मपमी २ मुदरता दिगार हैं मारामादि परपे मीनगर महान
घोरदा हे नाना दी सफार की एताय पस्म (पुप्प) प्रदान करती
उमपुर भन्यदेशो में शिरप रोगों का शीर्थ मानाजाता
फिन्तु उक नगर में दो परम रमणीप अल करपे सुशोभित
पफ साग (तसाप) है जिसमें स्मण पर मर यसपापाणमय
(गमरमरका)एक स्थान पना दुभा दे जिस में शिप लोगों का धर्म
पुस्तफगुर ग्रंथ साहिप स्थापित किया हुमा है भपित उस स्णन पर
दरिमदिर जी के गामस रोग पुरते हैं।
जिस की पामार स्पेिसम्पदेशी सहा लोकमाते हैमर्याद
अमृतमर मामफ मगर मागरिक गुणी करके संप हा रहा।
•पाकरण में शामममुशिष्टी पात में पपपप्रायपास हो कर
विपशप सिर होता है किन्न मपर्मशभपाद शिगी भाषा
मेसी प्रसिद्ध होता है।

के पश ( ७ ) सो तिस नगर में एक मोसपाल स्वर गोत्रपाला शेठ (भेष्ट शम्द कामपनश शेठ पा सेठ शम्म है) सुशालसिंह पसता था क्योकि महाराजा रणजीतसिंह के प्रभाष से बहुत सीमातियों में सिंहनाम की प्रथा पल पी थी सा भद्यापि पर्यम्त भी कई जातियों में यह प्रथा उसी प्रकार चली मारही है। किन्तु यह वयस्गोषी खुशालसिंह शेठ ज्याहरात की दुकान करता था। सो खुशालसिंह शेठ के तीन पुत्र उत्पन्न हुए जैसे कि पुसिंह, चैनसिंह, जोधमसिंह, साला चैनसिंह के परिवार में लाला मोहनलाल सोहनलाल र शाह फग्गु शाह इत्यादि तुपुरुपए काला जीवनसिंह चाला धनैयामल्ल, लाला मश्यामल, लाला मजनमल्ल इत्यादि यह सब लाला जीवनसिंह के परिधार के हैं मौर लाला युर- सिंह के तीनपुम दुप जैसे कि काला मोहरसिंह, मेहरचद इन का वंश भी मुदर प्रक्ष्यातियुक्त दुमा जैसे कि :- लाला मेरुमल्छ, कमकुमाळ,मामशाह इत्यादि यह एक पत्र के हैं। सृतीय पुष महा तेवत चन्द्र सदश्य सौम्य श्रीमती माता कर्मों को इस से विक्रमाय १८५२ पैशास्त्र कृष्ण द्वितीया के दिम । उत्पन्न दुमा मचात् भमरसिहजो का जन्म मा ॥ पिता जी ने निजपुष का जन्म महोत्सवमस्यानंद से किया याचक लोगों को भलीप्रकार दाम देकर तृप्त किया पुनः सत् कालाही समसिय गणिक वारा भमरसिंहजो की जम कुरलो पन पाई छाला पुर सिंह ममरसिंहजी के मस्सक को देखकर परमानद होता था । कौमाताजी मी प्रियपुम को देखकर मपमे नेभ एप्त करती थी किन्तु इस भनिस्य ससार को भी मिस्प ही समझने लगी। • मोहयालों की उत्पत्ति का स्वरूप देखो जैन समदाय शिक्षा मपरमाम पृहस्थाश्रम शील सौभाग्य मपण माला माममय में n

सम्वत् १८६२ तत्र कुंभाऽ६ तत्र सूर्येष्ट जन्म लग्न
सम्मो
२
क
१.५४.
श.७
-
साय है पैसे देयम्प पुत्र के दर्शन से कौन नहीं भानंदहोता
मर्यात् सर्य हो होते हैं।
पाकिममरसिंहमी पास्वायस्पा में होगामी पार्य पुनः
पुन माता पिता की विमप मक्ति करते थे।
फिर यथा योग्य कर्णवैधादि सरकारों के पश्चात् विपा मापन
संस्कार किया गया मर्याद ममरसिंहजी परम लगे मपितु पुरि ऐसी
तोरण पी कि मन्पकाल में दीपक गमिवादि सपिपा में मिपुर
होगये फिर मपमी दुषनग का काम परमे लग गये योपमायस्पा जप
मास राप पिताजी में मति मदोत्सय के साय, स्याटकोट में, छाला
दोराठासजो (जो हि सहयाले ऐसे माम से मभिर) को पर्मपाली
पार प्रामादेषी जी की पुत्री श्रीमती कुमरो पालादेयी जी के साथ
पाणिप्रहण करपाया पिर पियादयामा करके ममृतसर में भाये गौर
मरपार्मर से फिर दिन जामे संगे।
जितु यह समार मनिरप है कारपक्षपये घिरोपरिमादा है।
जितु मोर के या मामी पाठपक मह र किपास गोर
माप हारसेवा

सो कितने ही काळ के पश्चात् अमरसिंह जी के माता पिता स्वर्ग पास होगये तय मृस्य सरकार के पश्चात् शोक पूर किया गया । क्योंकि यह दिन सब पर ही बड़ा मुभा हे स्यादि विचारों से अब शोक दूर हो गया तप भमरसिंहजी मे सर्ष काम मपनीयुकाम का मपने हाथ में लिया स्तोक काल में ही नामांकित स्पोहरी हो गये। भौर ममरसिंह जी के प्रहस्थाश्रम में निवास करते हुमो के दो पुत्रिये उत्पन्न हुई। पक उत्तमदेषी दिवीय भगवान्देषी सो उत्तमदेवी का हुपोयार- पुर में लाला मम्पोरषद साथ विवाह हुमा भौर मगवान्देषी का सा हेमराज के साथ विवाह किया गया मपितु लाला हेमराजजी । हुशियारपुर के षसने वाले हैं। मौर छाला भम्बीरचा के दो पुत्र हुए,लाला नारायणदास १, लाला छपाराम२, मिन्होंने अमृतसर में जैनसमा सम्पन्धी पातसे कार्य किये हैं। मौर छाला नारायणदासजी के पुत्र छाला मुन्शीराम है। मोर लाला भम्पोरचंदजीके एक पुत्री हुई जिसका नाम मोमति रायणदेयी जी था सो नारायणदेवी जी का विवाह पट्टी नगर मिला साहौर लाला बघाशाह के साथ दुमा जिमके तीम कन्यायें हर जिनके - यह माम है भोमती इन्द्रकोर१, भीमती पारयतीर, भीमती मप्पी३, तो भीमवीन्द्रकौरजी का षिषाह कपूरपला में लाला गणेशदासमी के प्रय पुत्र लाला हरमगपाम्दासमी के साथमा जो मासकल लाहौर * शहर में रहते हैं जिम के पुष एक कन्या है जिनके यह मामलामा । फिरदास, ला०पीयामचम्दर,लाघम्सीलालर ला० प्यारेलाल,भोर पूर्णदेवी १॥ मोकि इस ग्रंथ के प्रसिद करनेवाले हैं मौर श्रीमठी रिपती जी का विवाह लाहौर शहर में लाला दिशाह के साथ जिनके पुत्र लाला उज्जुमल्ल जी हुए भौर श्रीमती सुखदेवोशी फम्भार,मीर श्रीमतीमपी कुमरो का षिया निदीम शहर में लाला गोषपदवीसायमा किम नहसराम जी । म ।

पुमा परमागे दिममर सिा जो पदिमापदी
-साप दाझा पार
मीर लाला छपारामजी के पुत्र लाला ज्यादरमल्ल-राठा पक्ष
वामह जो कि ममृतसर जैसममा मित्री है। और हंसराज, मुख्य
राज,पायराम
यह मी स्य: पितानुकूळ धर्म में रक है मौरमायामदेयी शिसथ
लाला हेमराज जी के साथ पियाद हुमा था उस के एक सामणरेपी
पम्या परपन हुई उसका वियाह निदीन में हुमा ।
किन्तु तिसके गौरी दुर्गादेवी नाम की दो पुत्रिय फकीरधर
मामय एक पुत्र का जन्म हुमा । सो गीरो देवी का विवाह ममृतसर
मैं लाला धमरा के साप दुमा मीर दुर्गादेयो का पिषाह.सुजानपुर में
दिपा गया ।
पिपमित्र परो देखिये धीपज्य महाराज केमे पिशाल कुल में'
उरपरम हुए गौर केमो पिस्तीर्ण कीति घुकाए क्योरि ममरसिंहगी,
पदस्थाश्रममे सदाचारी मन प्रामुमति धर्मारमा पुष्प थे सपा प्रति
से दी शान्तिप।
सो पूर्ण पुप्पोदय से सामारिक पदार्थों से वित को निति
दोने लगी दीक्षा को माशा उपग्न दुई।
सायद पुण्याम् मारमा (दिवोदिते) उदय में उदय होते है,
जप यो भमसिंह जी को पैराम्प माप उत्पन्न दुमा तो भम्पदा
रामप जपपुर में स्पाहरात के पास्त गवे पे सो यहां पर मो?
ख्येगारे साथ पर्म पिपाई।
फिरमपना निम मासप मामा कर दिया तप पेठ
भमसिंदो के मास का सुन कर माग मा गरे।
མཉམྦྷ
गये।
पारसरमो पार al
करने ममसिर और
सोनि मेरोमा

- जब ममरसिंह जी पुनः अमृतसर में माए यो दिनों दिन पैराग्य माय पटने लगा शुसि मुक्ति मार्ग में प्रवेश होगई सो कुछ संसारी पदार्थ ये घे ममित्यता दिखाने लगे मम मिर्ममत्व में लग गया मुनि माष पारणे को भाकांक्षा परती गई श्री जिनवाणी मे कर्मषा जीप के स्वरूप को मिम्म २ कर के दिखा दिया । वम फिर पिच में यह मिश्य य किया कि किसी मुनिराज के मिलने पर दीक्षा धारण करूंगा। फिर कितनेक समय के पश्चात् श्रीमान् परम परित मीस्वामी रामलाल जी महाराज भी भगवान पर्वमान स्वामी के ८५ पटो परि विराजमान भपमे ममृत रूपी व्याख्यानों के द्वारा इस प्रांत में मिप्या पथ का भाश करते थे तप अमरसिंहजी ने चिच में निश्चय किया कि 4 श्रीमहाराज का शिष्य होकर भीमगवत का माग मफाश करूं जिस करके पदुव से मम्य जीष मिथ्या पथ को त्याग कर सुगति के मधिकारी पर्ने क्योंकि मनुष्य जन्म पानेका यही सार है कि धर्म के द्वारा परोपकार करना aप भमरसिंह जी ने अपनी दुकान पर पांच पुरुष पुमाश्ते (पास) करके पठ लाये सब काम उनको समर्पण कर पिया घर का मी नियम पूर्वक कार्य उन को दी कहा गया जिनक माम यह है॥ लाळा घसीटामल्ल १, मस्यामल्ल २, सोहनलाल ३, धनैया मक्ल ५, कोटू मल क्षत्री ५, जम माप सय काम कर चुके फिर यथा योग्य धन सम्बन्धियों को मी देकर दीक्षा के पास्ते ममृतसर से पल परे परंतु उस काल में परम परित भी स्वामी रामलाल जी महाराज दिल्ली (इम्प्रप्रस्थ) में घिरासमाम ये तब यी ममरसिंहमी दिल्ली को हो घले ग्यान रहे उस समय में रेल गाठी का प्रचार म होने के कारण से पाधा कोग इन्द्रमस्थ में जाने वाले सुनामादि मामक मगरों से होते हुए दिल्ली में पहुंचते थे।

जप थी ममरसिंह जी सुनाम में गये पुमा पापक लोगों के
साथ धर्म सम्मग्घी मालाप हुमा तो दो पुरुप दीक्षा के लिये
मन्य भी उचत धो गये जिन के माम यह है कि रामरस्म जी,
अयति दास जी २, सय भी भमरसिंह जी दोनों को साथ ले कर
दिल्ली में पधारे।
सस्य है पुण्यारमा माप घरते हैं मन्य को वार देते हसी पास्ते
दी शमस्तय में भगपत् की स्तुति समय यह सूत्र माया है पया--
(सिण्णार्ण तारयाम) मर्यात भगवन माप तरते हैं मन्य माय
जोपों को वारसे हैं।
जयश्री ममर सिंह जी रामरत्न जो अर्थविदास जी इदमस्थ
पहुंचे पुमा श्री राम खास जी महाराज जी के मामर पूर्वक दर्शन किये
श्री मदाराम जी की प्यास्यान रूपी ममूत पारा से पदय पी कमल
पषिम किया पुमा निज माशय को घरण कमलों में मिपेदन किया।
सप भी राम लाल जी महाराज ने संयम का पासन मति फठिग
पिस्तार पूर्वक कर सुमाया ठप भो ममरसिंह जी में राम रन जो
में मोर जति दास सो मे सहर्ष मुमि धृति स्वीकार की। पयोकि
सत्य है शूरपोर के लिये कौनसी बात पठिन।
फिर दिल्टी पाले भापको मे १८१८ व पिकमा भीर
वैशाग एण वितीया विम दीक्षा महोत्सप स्थापित किया आप
ममर सिंदजी में रामरान जो मे अपंतिदास जो में भीमित राम
ठाल जी महाराम के पाम उत गास में पोझा धारण रोगात
सामायि पारिम प्रहप किया तपपधात् • पञ्चमहामतपटम
रादि मोगम स्याग कप छेदोपस्थापनी मामा चारित्र धारण लिया।
•पांग महा प्रती का स्पाप दमा भो दशकभिष मी
भागारंग सूत्री मम प्यारण सून एयादि सत्रों में मुमि गुण मी
पपारिवगये।

भौर सर्व मुनि गुण युक होते हुए भीपसित जी महाराजके पास मुता ध्ययन करने लगे। क्योंकि भीममरसिंह जी महाराज सप्त गुरु नात्ये जैसे कि- थी दौलत राम जी महाराज १, भी लोटनदास जी महाराज, भी रामरत्न जी महाराज ३. श्री पूज्य ममरसिंह जी महाराज, भी अयंतिदास जी महायम५, श्री देवी चन्द जी महाराज, मी धनीराम जी महाराज ७, ये सर्प यथा विधि शुताध्ययन करते हुओं ने पिफमाद १८८८ का चतुर्मास दिल्ली में किया । किन्तु शोक से लिममा पाता है कि काल की कैसी विषिष गति है कि भी रामलाल जी महाराज जो कि पूर्ण विद्वान ये पट मास के मतरगत ही स्वर्ग पास हो गये तप भी सघ में महान् शोक उत्पन्न हो गया एक महान् जैम संघ में ममूल्य रस्न को हानी हो गई। परन्तु सर कारके समुह तीर्थंकरादि भी स्थिर म रहे तो मला मन्य पुरुष को तो क्या ही पास है, इरयादि विधारों से शोफ दूर किया गया मर्यात उदासी माष पूर हागया । श्री अमरसिंह जी महाराज चतुर्मास के पश्चात् प्राम मगरों में जैन धर्म का प्रकाश करते हुमो ने १८९९ का घमास सुनाम नगर में किया उस काल में स्तोक महाम् मर्थ सचक शास्त्रों की एस्यता प्रगट करने वाला सूक्ष्म हान सीमा सूध भी उत्तम सयोग होने पर पहुत मे मध्ययन किये ॥ मपितु इस द्वितीय चतुर्मास में ही श्री पून्य जी महाराज शास्त्रज्ञ पूर्ण हो गये जिमके दर्शन करके छोग यही कहते पे कि यह *स्तोक शब्द का अपमश पोकदा शाप पना हुभा है क्योंकि योकों में महान सूत्रों का इस्य शान भरा हुमा है सया पोक शम्य समूह का पापी होने से भी ठीक है क्योकि योकों में सूत्रों का योक .

साधु होमहार है जैम धर्म के परमोधासक होगे। सत्याग मापा शीघ्र ही फलीभूत हो गई। पुमा नामा पटियारा छींटापाल स्यादि मगरों में पोपदेश देते हुमों ने १९०० का चतुर्मास सम्पाला मगर में किया नगर में धर्मों पोत मावही हुमा क्योंकि श्री ममरसिद जी महाराज धममता सदय दी धर्म परि में कटि पर थे पुन धर्म के पूर्ण प्रकार से पर चारक ये चतुर्मास के मनतर पन्ह, सरर रोपट, माछीवाडा, मुधियाना, जगतया, धूर पम जीरा, फोरोज़पुर, रस्यादि मग में सत्य धर्मोपदेश देते हुए जीयों को भयसागर से वारत हुए तसे यापकों की भाति बिप्ति होने से १९०१ का धतुर्मास फरीदरोट में किया सो भी महाराम म जंगल देश के लोगों पर महान् परोपकार किपा, पात से भम्पसमा के भमत रूप जिम पाणी से मात करण पवित्र किये पोफिभी महाराज में जिन याणी उच्चारण को मक्षा शषियी मीर पारोर की प्राप्ति देसी थी कि पादिजन दम पर दो चियाप की भाशास्याग कर दीसा करिये उपत होते थे याम्यान बीमी स्टीमफपनीय योग भी महाराज ने इस मास मै भी उपपाई सूत्रानुसार पाहत दो तप दिया तथा सूत्रों का उपभाम माम छानि (माघम्सादि) मी तप क्यिा, तुमास पे पापात प्रामामु प्राम पिदार करते दुपगेगापित हे संशष मास करते एधी महाराज ममतप्तर में पधारे तर गगर में मायागर हा गपा पदुम से रोग परमापासे दम परमे पो गाते थे पुग नग परके मापामंद होते क्योंकि भी माराम पूर्ण स्वास्था में ममृतसा में पप सुपसिर अदारियों में मेमामानित जौहरीपे॥ रस सदी ममृतसर में भीस्पामी मागर मन्ठजीमापन - का एक शिष्य घटे राय जी मामक घिरासमान था सिसमे यहां पर सप करना प्रारम्भ कर रखा था । फिन्त उपधासादि तप करत हुए परिणामों की शिथिलता बट गई थी। मपितु भी पुन्य महारास यूटेरायजो के मन के भाष न जानते हुए वप फर्म में सहायक हुप फिन्तु पाप कर्म गुप्त कय रह सका है इस कदापत के मनुसार भन्यदा समय यूटेराय जो श्री महाराज जी से कहने लगे कि हे भमर सिंह जी भाजकळ तो साघु पप काही म्यवच्छेद है तव श्री महाराज ने कहा कि माप मपने माप को क्या समझते हो। सम प्टेरायजी ने कहाकि मैं तो मपने मापको प्रापक मानता श्री महाराज ! पूटेराय जी भगवती सम में लिखा है कि पञ्चम काल के अंत समय पर्यन्त मी पहर थीसंघ रहेगा, माप अपने मन को मिप्यास में क्यों प्रवेश कराते हैं तथा बारिमादि को भी देखीये ।। पूटेराय ! मैं तो भाषक हूँ यह यही यूटेराय नी है जो एवेताम्बर मत को छोय कर पीताम्पर शाला में गये थे जिनका नामयुदि पिसय रफ्मा गया था किन्तु यह मसत पा हिंदी भाषा भी शुर महीं पटे हुए ये देखो इनकी बमाईदुई मुखपती घरघा मामक पुस्तक मपितु यह एक परिप्रद पारी पोवाम्बरी के शिष्य हुए थे। | मुखपती घरखानामक पुस्तक में पटेरायमो लिस्पते । कि-ममी जैन सिद्धान्त के कहे मुजष काई साघु धमारे देखने में महीं माया भीर हमारे में भी तिस मुमय साघ पणा नहीं तिस्से हम भी साधु नहीं है रतिषवमात इसी प्रकार सतर्थ स्तुति कोदार के प्रस्तावमा पृ: ३१ मै भो दिसा है जो गजेंद्र विजय भरणेन्द्र पिसय सवेगी कायनाया दुभा है ॥

( १६ ) तब भीभमरसिंहजी महाराज ने कृपा करी कि मे लिखा है कि (गिहिणोयेयापरिष) मर्यात् साधु पहस्थ की पैपावृत्य करे तो भनाधीर्ण है इसी पास्ते मुनि गृहस्प की यापूरप न करे । सो मैं शो सूचानसार काम करूंगा तप श्री पूप जी महाराज में लाला सोरमलाल छाला मोहनलाल इत्यावि.सप धायकों को सर्य इतात कह सुनाया तप भाषगणने मी यूटेराय जी को यात सी हित शिक्षाय दी किन्तु घटेराय जी ने एक मी म मानी तव पायक पर्ग में मीजामलिया कि इस यूटेराय जी का चित भस्पिर दो गया है। (सरय है माहनी कर्म किस २को नहीं म पाता) मम पद पतित मयत्यमेपदी हो जायेगा । सो पसे दो होगया तप फिर लोगों ने भी महाराम को बतुर्मास की मस्पम्त दी यिप्तिकरीवप भी पूज्य मदागाजी मे १९.२ का चतुर्मास अमृतसर में दो वित्या किन्तु इस बीमाम में भी जो मदाराजवधियाही पूर्ण प्रकार से गायपन परते रह गोर इस धीमास मै परमत पास पो पातसा लाम दुमा पौमास के परणत् स्यासकोट के मारयों को पान दो विससि होमे से भी मदागज मे स्यालकोट फो मोर विहार पादिया फिर पसकर गुमपपास इसका जम्यू पादि मगरों में धर्मापदेश देते हुए स्यावाद सपो मत से मिपास्य पा माश करती ने सम्यग १९०३ का पौमासा स्पाल कार में दो फरविया तिम पीमासे में साला सौदागरमल जी मारि परे शास्त्रा तिम से पातसा मान भीरमी प्राप्त पिया। सो पतुर्माम मस्पार्मर से पूजा हो गया किन्तु इम सीमा साला मुस्ताकराप जीका मतिमीण पैराग्य माप उपान हो गया। पद पदी माला सौदागरमपएसोनियो म पर पार यात मे शासकीय प्रमाप रेपर परेराप जी को समापा या जाऐराप जो मे परमी शारमोल ममाप ग स्पोकिया यम बोवागमन्टनी vaN 1 ( १७ ) सत्य है ऐसे ही मिथ्या हठों से जिन मार्ग की यह दशा हो गई ६ अर्थात् न्तन शारखे उत्पम्म हो गई हैं। छालामुस्ताफराय जो लाला हीरालाल स्मरपाळे की पुत्रीज्याला देवी के सगेमाई थे। चौमासे के पश्चात् भी मशाराम मे इन का भी दीक्षित किया यह *महारमा जी श्री महाराज के ज्येष्ट शिष्य हुए फिर श्री पूज्यती महा राज प्रामानुप्राम विचरते हुए भव्य जीषों को सस्योपदेश देते हुए लाहौर (लपपुर) में पधारे फिर कुशपुर (फसूर ) में फिर फिरोजपुर रस्यादि नगरों में विचरफे फिर फरीदकोट पाले माईयो की विज्ञप्तिको स्वीकार करके १९०४ का चौमासा फरीदकोट में ही करदिया पूर्वपत् ही धर्मोद्योत मुमा फिर चौमासे के पश्चात् मनु ऋम पिचर के १९०५ का चौमास मालेरकोटले में किया तो मालेरकोटले में धर्मोपोत पछुत दी हुमा ज्ञान की पा तपादि को पूरि मतोव पुई वर्षोंकि उस काल में मालेरकोटरे में सूक्ष्म शाम का प्रधार था कई माहगण शास्त्र मी ये मपितु घरों की सपा भी महत् थी, फिन्त भय भी मम्य मगरों को अपेठा महत् हो है॥ चौमासे के पश्चात् माम मगरों में विचरते हुए धर्मोपदेश देते ए मन्यदा समय श्री महाराज मामामगर के समीप ही एक छींटा पाल मामक उप नगर बसता है सिस मगर में पधारे जय राषीको ने रामनगर के भाषकों से कहा कि यह यूटेराय जी तो सयम से शिथिळ हो गया है तुम फ्धौ पवित्र मार्ग से पतित होते हो तय रामनगर के भाइयों ने कहा कि यदि यूटेराय जी पनस्पति विकिय मो करने लगवाये तय मी दम तो गुरु करके ही मानेगे । 'श्रो स्थामी मुस्ताकराय जी महाराज के शिष्य स्वामी हीराकाल जी महाराज हुए विम के शिष्य श्री स्वामी तपस्यी गोविंद पब जी महाराज पिपजमान है।

( १८ )
पात से धायक जम एकस्व हुए तो श्री महाराज जी एक मिन स्तुति
पा मनोहर उपदेशक पद कहने लगे तो पफ जयचन्द्र नामा
गृहस्थस्यरों का पेठा उपस्थित था विस में श्री महाराज के स्वरको
सुम के कहा कि श्री महाराज का ऐसा "स्पर कि.--
इन का १०० शिप्य का परियार होयेगा साय है स्वरोजाम
कथम शीघ्र हो फलीभूत हो गया फिर भी पूज्य जी महाराज मन्या
विहार कर गये किन्तु बहुत से मारों को विधि होने से १९०१
चतुर्मास सुधियाना में दिया ।
धर्मोघोत पाहत दी हुमा तया सभ्यमय में लोग द हो गये
मिप्या माग का नाश करते हुए ममुमान कार्तिक मास में ही एक
फिरोजपुर नामक मगर से पन भाईयों का लिया हुमा पापा तिस
में लिमा पाकि-भी योगराज जी के गाय के दो साथमोपमा
सोमास मर्यात् भी स्वामी गगाराम जो महाराम भार श्री स्वामी
हरपाल जी महाराज मिस में स्वामी हरपासमो मदाराममति रोग
पीडित दो प्रसलिये भी महाराजमो फिरोजपुर को मारी
ही पिहार कर
इस पत्र के समाचार को सुमते दो धो पूम्य जी महाराज में
एघियामा से फिरोमपुर को भार विधार पर दिया ममुकमवा से पलते
दुप फिरोजपुर में जय पपार गये तय माया लोग परमामद हुए कि
स्थामी हरपाल जी महाराज रोगस भति पोटिस दो रद ऐसा
श्री मदारामजी ने प्राय पत्र पासमाय पोदेग पर स्वामी राम
सूम भी स्पानांग जो सूत्र गनुपांग वार को एक स्थर
मस पर्णन रिपागा दे, विस मरल मै मुमतया ये सपस स्वा
रिणे जसे घि-पट १ मापम ५ गधार मापम पम्चम ५
पे । मिपादन सण स्पों का फल मोदक सूत्र में दो पिस्तार
पूर्वारपन लिया गया है।
६

मी को मनशन करवाया सो पह मल्पकाल में ही देवगत हों गये फिर भी गगागम जी महाराज अब एकले ही रहगये तो फिर भी पूज्य मी महाराज ने विचार किया-यदि एक शिष्य नया हो जाये तो यह श्री गंगा राम जी साधु दो हो जायेंगे तय इन के सयम का निर्वाह मी सुख पूर्वक हो जायेगा । सत्य है पुण्यवान् की भाशा शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है सय उस काल में ही एक मोसवाल अगल देश के नौरमाम के पसने वाले धायक जीवमरामजी दीक्षा लेने पास्ते फिरोजपुर में स्वताही मागये सब भी पूज्य जी महाराज ने 'मोषनराम जी को भली प्रकार से रद करके मौर फिरोजपुर में ही दीक्षित करके स्वामी गगारामजी को समर्पण करदिये । धन्य है पेसे परोपकारी महारमा को फिर भी पूज्य श्री महाराज जो मम्यन विहार करगये। मौर प्राम २ में जैनधर्म का प्रकाश करते हुए अनुक्रमता से दिल्ली मगर में पधारे फिर बात से लोगों की विज्ञप्ति होने के कारण १९०७ का चौमास इन्द्रप्रस्थ में दो करदिया चतुर्मास में मध्य जीयों को ममृतरूपी सोक्तमान पिलाया और प्रावक सोगों मे मो जैनधर्म की मनेक प्रकार से प्रभावमायें करीं क्योंकि एफ सोधी पस्यजी महाराज की दिल्ली में दीक्षा ही हुई थी, द्वितीय श्री महारास परम परित ये इस कारण से लोग नाना प्रकार का उत्साह करते थे। *यह पद्दी भोजीपमरामजीमहाराज हैं जिनके शिष्य मात्माराम मी हुए थे फिर भी अपनराम जो महाराज ने मात्माराम का मयोग्य भात फरके स्वागच्छ से वाघ क्यिा था धोंकि भात्माराम जी का विशेष वर्णन भागेलिना जायगा, भौर जिनके गच्छ के पूज्य श्री पदबी विद्यमान है।

( २० ) फिर श्री महाराम ने चतुर्मास के पश्चात लोगों के परोपकार के पास्ते जयपुर की भोर विहार किया । किन्तु स्वामी मुस्ताफ्राय जी महाराज या म्यामी 'गुलापराप जी महाराज की मी यही यिप्ति थी जप श्री महाराज मरयर में पधारे और जिन वाणी का प्रकाश फिया तर पाय से मम्पजनों को धेराग्य माय उत्पन्न होगया जिस का फल मागे लिगा भन्यथा समय थीपूज्यजी महाराजजी ने जय मलयर से पिदार किया फिर मनुक्रमसे जय जयपुर में पधार गये सप जयपुर में मायाद सत्पम्न होगया धारो मोर भोजन प्रदेषो नामफामाव होने गा -पापीसाधु नामपी समासे साफपुकारने टगे क्योंकि पूर्वकाल में श्रीमान भावार्य मन्दयन्द्र जी महाराज मे अयपुर में महान धर्मोपोत किया था। फिर पारों मोर से चीमास को विज्ञप्ति पोटगी तप श्री मदाराज जी ने १०८ वा चतुर्मास जयपुर का दो स्यीकार फरलिया फिर जयपुर के समीप २ पिचरके चीमासदेपास्ते जप जयपुरम पधारे तपदी पिशवरायजी दीक्षा लेने पास्ते अपपुर में दीमाग फिर भी मदाराज पिलासराय जी पर दोसिव पर निम शिष्य पनाया। • यह थी गुप्तापरायमी महाराज मो श्री पम्प सी मदागम जोरदो शिष्य धे पिम्स इम को दीक्षा मनमाग १९०४ पा १९०५फी है, गति पाठपगपसमा कर पात से दोशापम से उपराएगही हुए इसलिय में मनुमान राष्ट्र प्रहप फरसाई पि यह मदामा जो फरीदपोट के पासी एफ सुप्रसिदभासपाल । यह पदी भी स्यामो पिसासराय जो मदारास जिहोंने १९१८ विद्रादि मपधारियां पा मनिप्रमाण पो प्रगर पारे थो पुप जो माताराम से पिनियो धो फि इस दुर्गप पापणे गुप्त पारसग श्री पश्य महाराज सीम यिनद्रादि मेधारियों को गए सपासपर दिया यादिम का पाप भाग farn .

किन्तु यह भी स्वामी विलासराय मी महाराज पाहत ही दीर्थ
पशी शान्ति रूप ये मौर इनका सम्म मालेरकोटला मामक मगर फा
था दुकान कृधियाना नामक नगर में करते थे।
जय चौमास भस्यामद से प्यतीत होने लगा तप मकस्मात्
भळयर से रामपक्ष जी स्वर परली युक्त दीक्षा के वास्ते जयपुर में दो
उपस्थित हुए तप श्री पूज्य जी महाराज मे रामपम जी सुखदेव जी
को जयपुर के बीमास में ही दीक्षित किया।
भौर तिनकी पानी भी मार्यानी के पास दीक्षित हो गई।
किन्तु यह महात्मा जी-जैन धर्म में सूर्यवत् प्रकाश करने
घाले हुए है मोर पसाय देश में श्री स्वामी परम परित रामपक्ष
जी महाराब ऐसे माम से सुमसिस हुए हैं।
क्योंकि स्वामी जी महाराज पानाकर ये स्वामी जी का जन्म
१८८३ जन्म लग्न में इस प्रकार से प्रहस्थित हैं।
सकि-विक्रमाद १८८३ माविषम मास शुक्ल पक्षे १५
रवि वासरे मृग शीर्ष नक्षेष ब्रह्मनाम योगे कोळप करणे जन्म परम् ॥
पु.
प्रा.
मै.८
५० ५.३
के.
•भी पूज्य रामयक्ष श्री महाराज जी क पांघ शिप्य हुए है
भी पर शिषपाल सी. विनवम्बजी मोफि सपेगी दो गये थे २॥

(२२) मोर यह 'महारमा जी परम स्यागी चैरागी थे। सो जयपुर के बीमास में धर्मायोत बहुत ही मुमा सत्पश्चात् भी पूज्य जी महाराज चतुर्मास के पीछे मक (मारवाट)देश में पियरने लगेसा जोधपुरादि मगरों में पिचरते हुए यौकामेर (यकापुर) में पधारे तप नगर में धोस्साह पात ही हुमा । संकटो नर मारी पर करके मस्यान होते थे। तथा मापा पना सपाय निर्मुस करते थे। जय श्री महाराज म्यास्याम करते थे तर मम्यगण सशयों से नित होकर सहप चौमास की पिहरित करते थे। अप लोगों न पहुत ही पिशक्ति करी तपश्री पूज्य जी महाराज जी मे सम्यत् १९.९ का धीमास पीकामेर में दो कर दिया धर्म की प्रमायना भी पडत हुई। किन्तु पतुर्मास के मंतर गत दो दिन पाता श्रीमान् कोठारी रायतमल्ल जी श्री महाराज से पूजन हगे कि- छपा माप म मन की जो गेम शाग्मायें यतमान बल में हो रदीरे में से सरप प्रतिपादक तपा सुपमा स्वामी की मम्पपछिन्न परपरा से कौनसी शाणा घलो माई है। तप श्रीमहाराज मे शाति माय से यह उत्तर दिया कि- भापक मोजा भाप्ण प्रणीत सूची में समय गपया मुनि गुण क्या किये भीतपस्यी मोयापति राय जी महाराम शिनक शिष्य भी स्यामा दरमाम दास जी महाराज हुए जो कि रोपर ये यामी एक समसिय मौसपाल शिनशिप श्री स्वामी मयाराम जी महाराज भी स्थामी जयादर सामग्री मदाराम ९ए शधी म्पामी दस मारली महाराज समीर भी स्पामी परित धर्मनम्न सो मदारासनिक शिष्य मी म्पामी तिपदपाल सी महाराम मोर भी मापाय पर्ण सोहन नगन मी महापाप कि परमाम ममप में मुर्पपा सपा पर रहे६ मिना स्याप भागलिगे।

( २३ ) सो जो सन तत्वो का येचा मुनि गुण धारण करने वाला पुरुष है अर्यात् जो जीघ सम्या प्रकार से तत्वों का ज्ञाता हो करके मुनि पद धारण करता है उसी ही जीप को सूत्र कर्वा युर पुष के माम से लिखते हैं। तप श्रीमान् श्रापक जी ने कहा कि हे महाराज जी आप का कथन सत्य है मपितु जो कुछ मापने हस्व घाफ से महान् मर्य सूचक उत्तर दिया है में इस को शिरो धारण करता है किन्तु इस कथन को सत्यतापूर्वक मापके घरण कमलों में निवेदन करता स्वामिन् जो दिगंपरी लोग हैं ये एकारत मय के स्थापक होने से ममेकान्त मत में भयोग्य होते हुए स्प मारमा को स्वयमेष ही तिरस्कार करने घाळे हो गये है॥ मौर जो श्वेताम्बर मत से भिन्न हो कर पीताम्बर कदलाते हुए। सपागच्छादि घारी लोग हैं ये लोग मी मनेकान्त मत से पृथक् हो है। क्योंकि-चोर शासन में एक श्वेत वस्त्र धारण करने की माठा है, किन्तु यह लोग उक्त माझा फो न मानते हुए मनमाने पीतादि पस्त्र धारण करते हैं। मौर यह लोग घीतराग भापित च्या मार्ग से पृथक हो कर पट्काय षध रूप मदिरोपदेप्टा हो गये हैं मौर श्री नंदी जी सूत्र में यह कयम है कि जो भूत चतुर्दश पूर्वधारी का कथम किया हुमा है पा पश पूर्व पारी का कथन बि.या मा है ये सम्यक शुत है मौर थे प्रमाण करने योग्य है ऐसे कपन होते हुए भी यह लोग उक कथन को सादर पूर्वक न देखते हुए जो मांध पुरुषों के रचे हुए प्रय हैं जिन में सापद्य निर्यच फा कुछ मी सियेक नहीं किया गया है उन प्रयों के यह लोग परमोपदेशक हो रहे है तथा शास्त्रोक सीर्य मोचतुरघरूप को त्याग करके पाझर पापाणरूप तीर्थो के स्पर्श करने से अपना कल्याण समझते है भजीय में जीप साधारण M ( २४ ) करते हुए मुख से मुखपत्ति उतार परके हाय में रमते या मार्ग को न पालन करते हुए पुन: २ मसत्योपदेश देते हैं। इत्यादि कारणों से यह गेग मी मनेकान्त म मनधिकारी है सो सम्यक् दृष्टि से देखा जाय तो घोर शासन में शुद मार्गोपदेष्टा श्वेताम्पर साध मार्गी जैन दी जय श्रीमान् भायफ जो ऐसे स्थन कर चुके सय श्री महाराज में पाफरि कि- धाम जो यह कपन माप का मत्यन्त ही निष्पक्षता का सूचक है सप फिर थायफ जो पाने कि हे स्थामिन् यीविधा प्राप्ति श्री साता धर्म फ्यांग इत्यादि सूत्रों में तप संयमादि नियमों को यात्रा पवलाया हे पिस्तु यह लोग उस सूत्रोत पाठ होते हुए मोज्यानपूर्वक महा देखते हैं इसोही कारण से यह लोग सम्यक् सान से पराठ मुन्न । वप श्री महाराज में छपा करके श्रापक मी रहीं कारणों से मात्मा ने मनह जम्म मरण किये है फिर भार भी प्रापर जो म मन पूछे सोस्यामी जी ने सूत्रागुतार युपि पूर्यप ने उत्तर दिये किभापर सी परमामद हो गये मोर भी महाराज पी परम पीचिरनेटग सो गाद के साथ १९०९ का थीमासा पूर्ण होने के पश्चात् पूती पोटे याले धीस्थामी, फकीरपरजी महाराज मिसे तिन साय मो धर्म पाचयि पातदोवो दी तथा नेप सूत्र जो मापन मदी को घे पद सत्र मीभी महाराज जो मे स्वामी फकोरपन जोसेफ स्पामो पफारपद सो धो पूग्य महाराज जी की पुरि पायोग ममा मादेष रमनि भामद दाते थे मीरभापपन मेम पूर्ण कराने पिया मायमन कामे पंपणात फिरपी मदाराम पोफामेर मेंदी भी स्वामी हरमीयम जो मदारात यो मिले सा उमारे साथ प्रेम पूर्वक चार्वाहा। पति मो भीमहागजमों के गमता यापपरी ( २५ ) परमानंद हो जाता था सो मनुक्रम से श्रीपूज्यजी महाराज विहार करते हुए था यातसे मुनियों को मिलते हुए पुनादिल्ली में विराजमान होगये । लोगों को परम उत्साह उत्पन्न हो गया पुनः चतुर मास करने की विज्ञप्ति हाने लगी सव श्री महाराज ने प्रीप्म ऋतुको हात फरके १९१. का धौमास दिल्ली में ही फर दिया पुनः चतरमास के पूर्ण मापार मास में धर्म के घोतक श्री मोतीराम जी, रामचन्द्रजी, मोहमलाल जी, मेवाराम जी, यह चार माई लुधियाना से दीक्षा के पास्ते दिल्ली में भागये तो श्री पूम्यजी महाराज ने इनको दद करके मापार कृष्णा मी, को दिल्ली ही दीक्षित किया पुना स्व शिष्य पनोये मिस में श्री पूज्यों के पहधारी श्री पूज्य रामयक्ष जी महाराज बोके परषांत श्री 'सपने भी स्वामी । मोतीरामजी महाराज जी को १९३९ में मार कोटले शहर में भावार्य पर दिया भपित पह स्यामी जो महाराज महान यान्ति मुद्राके धारी। जिमर मुनियों को मिले थे,उम के नाम सर्थ मेरे को उपलब्ध पए है इसलिये जीवन परिष मैसर्प नाम नहीं लिये गये हैं नाही मरुस्थल के प्राम मगरों के पूरे नाम मिले हैं नाही मालधे के। भी पूज्य मोतीराममो महाराज का जन्म लुधियाना के जिले में एक बहलोलपुर नामक मगर बसता है तिस में विझमाप्द १८८० भापार मास में हमा या शाति के कोली क्षत्री दोक्षा १९१०दिल्ली में। आचार्य पद १९३९ मालेरकोटळेमें मोर स्यगवास१९५८माश्विनमास, लुधियामे में, भपित भीमहाराज के पांष शिष्य टुप जैसे कि श्रीस्वामी गांगमजी महाराज श्री स्वामी गणादिक यो गणपति राय जी महारोज २ ओ चंदजी जो कि पूर्व पापोव्य से सपमसे पतित दोगये भी वपस्वी हर्षचम्द जी ४ो तपस्यो होरालाल जी महाराज किन्तु श्री गणापछेदिफ जी महाराजजी के शिष्य श्री स्वामी जयराम जी महाराज सस्य शिष्य श्री स्वामी शारिपाम जी महाराज तस्य शिष्य इस पुस्तक के लिसने पाला उपाण्याप मास्माराम नामक महत . 1 । N । . 4 11 ( २४ ) करते हुए मुस से मुमपचि उतार फरफे हाथ में रमो फो न पारन परते हुए पुनः २ मसत्योपदेश देते हैं। श्यादि कारणों से यह पेग मी मनेफान्त मा सो सम्पष्टि से देगा माय तो घोर शासन में दपेताम्पर साए मानी जैन ही है जय भीमाम् धार कर चुके तय श्री महाराज रुपाफरि कि-दधार माप का मायन्त दो निष्पक्षता का सूचक है तप पि कि हे स्यामिन् यीवियाह मशप्ति श्री माता धर्म सप सपमादि मियमों को यात्रा पतलाया हे पिम् । पाठ होते हुए भी ग्यानपूर्वक महो देखते है तो सम्पनशान से पराठ मुपद तप धी महाराज में पा र श्राप मामा ममम जम्म माप क्रिफिर मार पुणे सोस्वामी जी गे सूचानमार पति पृथकता जो परमानंद दो गये मोर भी मारा फोग, मामद के साय १९०९ का चौमासा पूर्व पाले घोस्यामो, फरीरपाजी महाराज : पापि पास होठोरही। वया पब जो मापन महों को प जो मे स्वामी फोरपर जोसे पर स्यामा ५ ५१ माराम जोको दिया पोग मुदा यो देय मेरमाया प्रेम पारा । पिया मापन करने परमन फिर पोर मी स्वामी दुस्मोघम जी महापस पो मिर पूर्ण। पा को मोम्दागोरन पर M - - ( २७ ) यादृस्य करते थे मोर भी महाराज जी साधुनों को विधि पूर्वक युवाभ्ययन कराते थे। क्योंकि सूषस्थानाग जी के पाचवे स्थान के प्रतोयोऐशफ में लिया है कि यदुतम्। पहिठाणेहि सुत्त वापज्जा तज्जहा संग्गहठ- याप उवग्गहठयाय णिज्जरठियाय सुचेवामे पज्जव- याते भविस्तंति सुत्तस्तवा अयोछिन्न थयठयाते ॥ मस्या-पंच कारणों से गुय शिष्य का सूक्ष पठाये । प्रथम तो ममे इस को सपहा है दितीयलयम में मह स्थिर हो जायगा तो गड्छ में माधार भूत होयेगा वतीय निर्जरायें चतुर्ष मेरा ध्रुव मस्यन्त्र निर्मक होमायगा पवम् भव की शैली मध्ययछेदनायें इन कारणों से भाचार्य मुताध्ययन मुनियों को फराधे ॥ सो भी महाराज विधि पूयक मुनियों को शुवाश्ययन कराते थे भर्यात् इस बीमासे में पात से सुनियों को भुत विद्या फा काम भा। सो धीमासे के पश्चात् गनुक्रम से विहार करते हुए सया जेम मत का स्थान २ में प्रचार करते हुए मालेरकोटले पाले भाईयों को पुमा मस्यन्त विमप्ति के प्रयोग से १९१२ का चौमास मालेरफोटले नगर में हो कर दिया सो पूर्ववत् धर्मोद्योत हुमा पपित भावगों में भी मदा राम जी को पक उपासम्म रूप धार्ग सुनार सो यह है कि स्वामी जो मापने श्रीजीयन राम जी महाराज को १९०१ में दीक्षा दी थी पन्होंने विक्रमाप्प १९१० में हमारे मगरमै एक पालक को दोसाधी है किन्तु रस पालक को शासि तो शुख थी ही नहीं मपितु दीक्षा के पूर्ष एक रात्री मेहदी का भ्रान्ति में मकस्मात् यसमा दी लग गया जय मावा काळ में उस वाटक के हाथ पाद देखे तो छष्ण वर्ण बीफने रष्टि गोरर हुए फिर हम लोगाने धो जोषनराम जा महाराज से विज्ञप्ति कपेकि-रे स्वामी जो यह पालक धर्म का विरोधि दोयेगा ।

इनका पूर्ण स्वरूप (मेरा पनाया गुमा) भी पूज्य
मोटोरामजी
महाराज का जीयन चरित्र नामक पुस्तक से देग्रो तारपा पद है कि
दिल्ली में १९९०के चतुर्मास में बहुत हो मानद हुमा ।।
चौमासे के पश्चात् ग्राम नगरों में बिहार करते हुए तथा परापार
करते हुए मामा मगरके पास टापाल नामक उपनगर में पधारे सो
पहा स्वामी पालक रामजी महाराज को १९१५ पेशाम मास में
दीक्षित किया. वोमा,के पीछे श्री महाराज जय विमय फरते हुए
सम्पाठा (मम्पकाल्य) मामफ नगर में पधारे धर्माधोत मतीप दुमा।
भौर परमत याले लोग मी श्री महाराज जी के दर्शन करने
फो पदुत से मातेचे पुमा स्पस्या संशय मित करते येसप भाइयों
पोधीमासा के यास्ते पाठदी यिमप्ति होने एगी सोधी पूज्य मदाराज
मे १९९१ का धौमास मयाले मगर में ही पर दिया ।
फिन्तु धीमासा मंतरगत दोधी स्वामी दोरामाल जी महा
राज भी स्यामी मामफषम्न जी महाराज की दीक्षा फरोमीर उस
फाल में श्री स्वामी + एस पत्र जो महागल श्रीमदागा जी की परम
• स्पामोपासक राम जी मदाराम जी के दाक्षिप्य हुए भी
स्थामी लाल जी महाराज भी म्यामी प्रेमामो महाराज
स्थामो लालपाद जी महाराज के शिष्य पूर्ण पादादि साप है।
श्री प्रेम सुघ जी महाराज के शिष्य भी भ्यामो शादीम जी
मदाराम।तिन के शिप्प स्यामी दरिदयन्द्र तोमदागज'पादि।
+पामि गप पन्द्र जी महाराज को दीक्षामामान १९९५
चौमामे से कोईयद स्मो मोन्टिी मिपासी पर सिर
भोपपति फे जाहरोपेको शिष्य भो स्पामिनपस्पो गरी
सिहजी महाराज या स्पामोपचापागम जोपा सामोशी
शिरपूर्ण पपाप सेसनामारापासमतीराम, हुरूप पदयादि
अनि म पyिar II गपे पनि नाम
पपा पाग में निगाहापगा

( २७ ) यास्य करते थे मोर भी महाराज जी साभों को विधि पूर्वक युवाध्ययन कराते थे। क्योंकि सूत्रस्थानाग जी के पाम्यये स्थान के वसोयोऐशक में सिमा है कि-यदुक्तम्- पचहिंठाणेहिं सुत्त वारज्जा तज्जहा संग्गहठ- याए उवग्गहठयाय णिज्जरठियाय सुत्तेवामे पज्जव. याते भविस्सति सुत्तस्सवा अवोछिन्न ययठयाते ॥ मस्या-पच कारणों से गुरु शिष्य को सूप पठाचे । प्रथम वो मैमेस को समाहा है दितीय सयम में यह स्थिर हो जायगा तो गष्ठ में माघार मत होयेगा वतीय निर्जरा चतुर्थ मेरा श्रुत मस्यम्त निर्मल दोसायगा पम्बम् अत की शैली मम्यषछेदमायें इन कारणों से भापाऱ्या मुताश्ययम मुनियों को कराये । सो भी महाराज विधि पूषक मुनियों को भुताध्ययन कराते थे मर्थात इस धीमासे में बहुत से मुनियों को भूत विद्या का छाम पुमा । सो बीमासे के पश्चात् मनुक्रम से विहार करते हुए तया बन मत का स्थान २ में प्रचार करते हुए मालेरफोरले पाले मारयों की पुना मस्यन्त विज्ञप्ति के प्रयोग से १९१५ फा चौमास मालेरकोटले नगर में हो कर दिया सो पूर्वपत् धर्मोद्योत मा भपित वावगणों ने श्री महा राम जी को पफ उपासम्म रूप धार्या सुना तो यह है कि- स्वामी जी मापने भी जीधन राम जी महाराज को १९०१ में दीक्षा दी थी उन्होंने विमान १९१० में हमारे नगरमै एक पालफ को दीक्षादी किन्तु उस पालक की हावि तो शुष यी दी गहीं मपित दीक्षा के पूर्व एक रात्री मेहदी को प्रान्ति में मकस्मात् यसमा दी लग गया अय प्राता में उस पालक के हाथ पाद देखे तो कृष्ण घर्ण बीफने रष्टि गोचर हुए फिर हम लोगामे भी जीवनराम जा महाराज से घिराशि फरी कि स्वामी जो यह पालक घर्म का विरोधिरोयेगा।

( २८)
तप भी जीवनगम जी महाराज ने रुपा की कि हे भापोजो कुछ
इमपारप के भाग गे सीहो जायेगा इसनी या कहकर फिर रस
पारप पा दीक्षित पिया। सो उस पालक का नाम प्रथम दो
दिसामस पाता फिर धीजीयनराममी महाराज ने उस पासक
माम 'भारमाराम रगम दिया ।
सो यह पार्य भयोग्य पी एमा क्योरिन कारणों से पिरित
क्षोसा कि धर्म पामें विघ्न गायत्पमेय दो होयेंगे मर्यात पर
धर्म पानी विरोधिहो जायेगा। तभी महाराज मे स्पारी!
नाम पारणों से तो यह पाम मादिरा दी दुमा दै तथा धर्म
पप में इस सापापिणी काम्ये ममाप से मौर मी मिन दोघेगा!
मस्प है गर पापय पवापि गसाय मही होता मर्यात् जैसे भी
महागसमे एपापोगी पैसेही पाप हुमा क्योंकि भीमदायमा
(कमपम शिपामा बामे से पह ममुचित कार्य महीं मादे सपा
मापी पागगा जमाली जोपातमे याश्य भीमहाराज
एमलोग परमार दाग लोगों ने किसे सारच ही
करमापा

पार करके वह भाचार्य पद ( २९ ) स्वामी जी महाराज जय विजय करते हुए लोगों को मुक्ति पथ का मार्ग दिखलाते हुए दिल्ली में विराजमान होगये भौर श्री ५ कनीरामसी महाराज भी दिल्ली में ही विराजमान थे जो कि भी ५ भाचार्य योरीमाळसी महारास की सप्रदाय के थे । तब श्री फनीराम जी महाराज ने कहा कि ममरसिंह जी माप को व्यवहार सूत्र के भमुसार वतीय पद के धारक होना योग्य है। क्योंकि म्यषहार सूत्र में लिया है कि जो साधु दीक्षाभूत परि सयुक होघे के योग्य होता है, तो भाप वीन ही गुणों फर के सयुक हैं मपितु उक ही सम्मचिराय होठ बांद मल्ल भनमेर मिवासी जी के पिता जी सुधाधक श्रीमान् लामा मम्बीरमल्क जो की मी थी किन्तु पुनः पुनाइन्होंने यही सम्मति दी किमीस्वामि भमरसिंहजो महाराम माघार्य परपी के योग्य हैं। फिर भी कमीराम जी महाराज जी ने यह भी सपा फरी.कि श्री सुधम्म स्वामी बी से छेकर माज पर्यन्त माप के गछ में भाषाय की श्रेणी पली माई है मौर माप के गब्छ के माचार्य भुत पारिप में परिपूर्ण घे पुनः ताश ही माप है। तव दिल्ली में भी सपएफस्य हुमा फिर श्री सघ मे उसम्मति सहर्ष स्वीकार करके पारादरी नामक उपामय में भी महाराज विराजमान पे पहा पर श्रीसघ मी पापा तव भीसंभ मे उक विज्ञप्ति भी महाराज को परी साप हो श्री कनीराम जी महाराज मी थे। फिर भी महाराज ने स्वामी कलीराम जी से कहा जैसे माप मण्य क्षेत्र काळ साप देखें वैसे ही करें। तप रोकनीरामजी महाराज ने श्री सम की सम्मत्यनुसार भी स्वामी अमरसिंहजी महाराज को 'भाचार्य पद मारोपण किया । परम्परा से भाचार्य पद देने की यह प्रथापछी भाई दे कि

तप हो भी सघने दीर्य (उदाता) स्पर के साथ यह उबारम
कर दिया कि माज करत मारत भूमि माघार्य पर से प्राया दीन दो
रही है क्योंकि पत से गन्छों में भाषाप्य पद की प्रथा उठ गई है
किन्तु यह काम सूत्रोत मे विषय है क्योंकि सूत्रों में यह भाग रप्टि
गोघरकि एक गयउ में एक भावार्य एक उपायाप भयश्य ही
स्थापन करने योग्य
सो माम दिन घोलपमे सूत्रोक्त प्रमाण के साथ भी स्वामी ममर
सिंह जी महाराज को भाचार्य पर दिया है क्योंकि इस गय में
मम्पयछिन्नता में भी सुधर्म स्वामो से मेकर भाजपर्यन्त मामार्य
पर घसा माषा हे सोमाज परम गानंद पासमपदक भी पर्वमान
स्थामोजी ८६ पहापरि भी माघार्य भमरसिद जी महाराग
सायमा
मोसंपनी सम्पयनुसार जिस मुमि का मापार्य पर दना रासस
4 सपारी (बापर) 1 कार से पिपित कर पास्पासादि
से मलपन करके मार उस मुनिष नाम प्रिफे भोसंप के सामु
सापुरम पार को उस मुनि के ऊपर फिर एक मनि गण
दोहर गापा के गुण पा मापाप्य गण
६ मोर ग को भावार्य ने साय से पर्तना यादिव पारि संदर
रस भरे सपनों से RAREनियंप पर रे सुनाये फिर गप यथा
म्पाप मो मापाय मदानगीमाया रोपारण भीर
मान्ति से ग्पामाप गपि, गनापरिष, पदो पी विधि मोगाननी
पारि॥
भी भाग पर्यमाम शामी और ८५पा-प्रीमो माया
पार्वती साम दोपिराममा भोपापमानीतमयी महाराज
पशीपर लिपा नियमाप भीमाम् जेमसागर के सपादर
मि• पाडोगी सारिपुरला में प्रशिदोरम
.

. ( १ ) विराजमान हुए है भौर पुनः पुनः जय जय शम्द का भी संघनाद करता हुमा विष्ठियों में घा पत्रों में सही से श्रीपज्यपाव भीमाचार्य भमरसिंहजी महाराज ऐसे नाम लिममे लग गया तथा तब ही से श्री पूज्य महाराज चारों मार ऐसे माम प्रसिस हागया फिर मोमहाराज ने दिल्ली से बिहार करके भनुक्रम विघरते हुए १९१३ का चौमास सुमाम नगर में किया सो पूर्वपत् चौमासे में धर्मोपोप हुमा। फिर चौमासे के पश्चात् श्रीस्वामी शिवपालमी महाराज की दीक्षा हुई। श्री महाराज फिर प्राम नगरों में धर्मोपदेश देते हुए पटियाला, नामा, मालेरकोटला, सृधिपामा, फलौर, फगवाडा, जाळघर, कपूर पळा, गुरुका हरियाला इरयादि नगरों में बैनमत का प्रचार करते हुए मा गोपालवत् जीयों की रक्षा करते हुए ममृतसर में पधारे सो लोगों की मति विमप्ति होने से१९१४का चौमास ममृतसर में ही कर दिया । भनुमान उत दी वर्ष में-बाति के मामण विश्नषद को दीक्षित क्यिा पोंकि यह विश्नसराय शेठ मम्बीरमल्ल राय शेठ घावमल्ल जी की भोजन शाला में रसोइये का काम करता था, किन्तु यह चवळ स्थमाष था संयम से पराम्मुख हो कर मारमाराम जी के साथ ही पळागया था । - क्योंकि श्री महाराज ने जब इम्हों का मनुचित व्यवहार देखा तय ही स्था गठसे घाछ कर दिये जिना स्वरूप भागे लिखेंगे। सो मस्यानद से यौमासा पूर्ण होगया फिर परोपकार करते हुए श्री पम्य महाराज मोरे शहर में पधार गये पुम लोगों की मति विति होमे से १९१५ का धीमामा भी जोरे नगर में हो करदिया, सा धर्म ग्यान पाहत होइमा क्योंकि उस काल में जोरे नगर के सर्प माईसम्यगाष्टि।

फिर भीमासे के पश्चात् श्री महाराज ने रादों, नयांदप
जेजो, पंगा, टोटा,जालंघ, नगर में परोपकार कर १९९१
का घोमास शियारपुर में किया, स्पावादपा पाणी से मापानी
का माता करण पवित्र किग, जाग दशमा मन्य नगरी के माते
पद
थी
पूज्य महाराज का दर्शन करके अग्म को पवित्र
परते थेn
अप चौमासा शान्ति, पूर्वक पूर्ण दोगया तो माईयों की मति
विज्ञप्ति से पांगर देश की मार विहार कर दिया माम नगर्ग में परोप
फार करते हुप १९१७ का घोमास सुमामनगर में रिया धीमा से
में
पूयपत् उपोत दुमा ।
फिर भी पाप महाराज यीमासे के परमात्माम नमरों में धर्मोप
देशपरने लगे।
पितु उन दिनों में भी स्वामी रामपाजी महागल पा पिन
पन्द्रादि साप यमुना पार के क्षेत्रों में पिस्ते पे
मपितु गामाराम मी मरूपास मारपण स्थितपा
जोभीरामरक्ष जी महाराज के दम करने का मिस्पी थापयोति
भोरामपसनी मसराम भर यि में परिवर्ण पद में भवितरण
मोमामारास मी मा विवाद पर याम्त मरे पास ही
मागरे सो स्वामी माग मम पूरभुत विधामा दानपिपा
1
सम्बत् १-१५-१६।१७-म मोजदीक्षारिस
पर मजमिन पदोमा सिपा, reite
गरमे रक्षा पर घिसममापिपानी पाप
+मागमतीपन गरिध में हिना ५८
पीमापारे पदयात् भारमा रामो म राम विनयबादि सापुर्या

( ३ ) 'पौर श्री पूज्य महाराज ने बहुत से मय जीवों को सम्मार्ग में स्थापन करके १९१८ का षौमासा पटियाला में करदिया ।सो चौमासा में लाला शिशुराम (मी कृष्णदास) मागरमरल, पल्लनमल्ल, फरोटा लाला काशीराम, दीयाम, ळाला घनैपामल, इत्यादि माईयों ने जैन धर्म का परमोद्योत किया फिर भी पूज्य महाराज चौमासे के पश्चात् ग्राम मगरों में धर्मोपदेश देने लगे मनुक्रम विवरते हुए दिल्ली में पधारे जिन पाणी का प्रकाश किया लोग प्याल्याम सुन के परमामद होते थे फिर धौमासा को विषप्ति फरमे लगे किन्तु श्री महाराज जयपुर की बार विहार कर गये। सय श्री महाराज जयपुर में पधारे तो मगर मै परमोस्साह उत्पन्न हो गया वीमासा की विधप्ति होने लगी तो स्वामी सोम १९१९ का चौमासा मयपुर में हो कर दिया । धर्मधुदि मतीय मपितु षोमासा में ही स्वामी गणेशदास षा स्वामी अयचादनी को श्रीपूम्य महाराज मे दीक्षित किया। क्योंकि श्री महाराज श्री का ऐसा पैराग्य मय उपदेश था किम यजम सुनते ही संसार मार्ग से भयमोत होते हुए दीक्षा के लिए उयत हो माया करते ये पुनः दीक्षित होकर मुक्ति पर की क्रिया के साधक यनते थे। किन्तु मी महाराज चौमासा के पश्चात् ममुझम विहार करते हुए पुनाविल्ली मे दी विराजमान हो गये। तय ही धर्म के प्रकाश करमे दारे पापड मार्ग उत्यापक सोन पुरुष दोक्षा के लिए दिल्ली में दी उपस्थित हुए को आवारांग सूत्र, ममुयोग द्वार सूत्र, जीयामिगमादि सूत्र पढाये। सो यह निफेघल ममुचित लेख हे पौकि परम परित श्री स्वामी राम यसमो महाराज से मात्माराम जी विण पढते येऔर स्वामीजी की सहायता से पजाप देश में विचरना चाहते थे। परतु प•चन्द्रादय माग सोय के पृष्ट २७ थे पर लिया है कि, मारमाराम मी का पहुधा । बघ स्वभाष ही था कि दूसरे को दोप देमा इस्यळम् ।।

रिमोसापनिगप की। पमपममी, दरेरमल जी आलों ने
भी महाराज से पिमणि की बी हम दीक्षा प्रदान करोवर मी
महाराज ने तो काहाशित परफे श्रीस्वामी रामरक्ष जी महारा
शिप पर दिये किन्तु 'श्री धर्मचन्द्र जो मदागावी बुद्धि पाम
• स्वामी जी का जन्म १८.४ माघ नाम तापक्ष १३ बुधवार
का था स्वामी जी की जन्म कुलोस यही सिद होता है कि
मदारमा सो परम परित पैराग्य सपा
जन्म कुडली इदम्
क.
७
११. 1
घलन चक मिद
."
HILE

( ५ ) पोषण थी जिस करके मस्पतालमै ही पंडित की उपाधि से विभूषित होगये। जिन्हों ने ममेक बार भीरमाराम की युतियोंका सरन किया वापात से भम्पजीयों के अन्य कयकियौ करके जो पिहल होगये 'ये दिन की कुयुक्तियों का मारा करके सिन के उदय कपी कमझ में सम्यक्स्वरूपी सूर्यस्थापन किया था। क्योंकि मारमाराम जो का मानचित भापणकरने का भम्माल कुछ न्यून नही था फिर प्राग्यत ही लेग लिखते थे अमे कि मारमाराम जी के जीवन चरित्र के-४५ प्रप्टोपरि लिया कि-रामपस जी मे भास्मारामजी से माघीनता के साथ प्रार्थना करी कि माप इस मुलक पजाम में भागये है मौर मेरे गुरु मारवार कोषले गये हैं इस पास्ते मापने इस पंजाप देश में जोर लगा कर मनीष मत को जद काटते रहना इत्यादि सो यह उक लेस निकेवल मसत्त्व है क्योंकि हम दिनों में मारमारामजी भोस्वामी रामवक्षनी महाराज की सहायता से पंजाय देश में फिरमा चाहते थे स्वामीनी से पिया सम्पयन करते थे किन्तु स्यामाषिक गुण स्यागना दुष्कर है। इसी पास्ते चतुथस्तुति निर्णय शंकोबार के पृष्ट ५ पर लिखा है कि स्यारेस्या भोममदायादमा साधी तथा भीसममा भावी मा मुल धो पार्ता सामली के मारमाराम की ने उम्त्र भाषण फरपानी वया बोली मे फरीधामो कशो विषार नयी ने मईकार म् पूर्तर्छ ते भमेसारी पेठे खाणीए छीप, श्यादि यह लेख तपगच्छाधिपति का दी है किन्तु भी महाराम में प्रथम दी मारकाटले म भाईयों को कर दिया था कि-म मियामों से यही सिंद होता है कि यह पाठक में पप में विण करेगा सो पैसे दो होमे के चिन्द दिखने लगे। बोकि विक्रमाप १८--१९-२० के-मम्मान में पूर्व का के प्रयोग से महंस मापित सिडसम्तों में मारामारामजो को माया होने ही मुनिरुस्यों से मावि मियामोरनी केबससे ऐसी माशास्त्पन्न हुरे कि परिपत्र -

*
अपों में देखि होगई असे कि मि शास्त्रों में क्षेत्र पर धारण करने
को माहा है किन्तु गारमारामजी की भाशा पीताम्पर पारने की हो
गई जिनशास्त्रों में मुग्रपत्ति मामसे लिती है जिसका अर्थ को पार
कि जो सदेय दी मुचके साप लगो र तिस हो नाम मुमपति।
किन्तु मारमारामजी ने यही मन में निर्णय किया कि में सोदाय मुग
परिमोरपगा। तया जमशाखों में मपिनाका विभ्यिन् मो कपन
पा विधान नहीं है मपित् गारमारामी में यही विचार vिals
मप लोग कुछ जागने लगे हैं फिर भी हम लोगों को एक महान् परम
गेरमा धादिये मर्यात सूत्रों में मिस पस्त पा पिधान मदीद उस पात
पादीसपदेश करमा मा योग्य सीपारते मामारामजी मे मोहनी
फर्म प्रपलता सेभनीय पदार्य में जीरोभदा करलो:
मीर महात्मा गारमागमसी से पदमी सिर होता है कि
मामागम जोन विधार रियाफिज सत्रों में पदी मी मसाप मापन
परमेपोमारामही पिमपपिसी मम्पल से काम करना चाहिने
सोपास्ते मारमाराम जोसम्वापारासार पृष्ट २५१ये पर
सितेनि-भपाद मार्गमापा पोल्पागी भाशापनणे, प्यादि
का भम्पमोहापामागियरवाना मारमाराममी के मम्सा
मनागपितु पदार र राहगा पा मा१९५०का बीमासा मारमा
राममो ने भागरे शहर में धीमाम् प. रागन जी के पास शिपाया
विवाशापना रिपतसूर पास: मापा दे मपयादि पान
पर सीमासे पागत विरार पिस्नु पापयामरम्प संकि
गदी पात जसरिरमाराम सीजीयमपरिषहरपूना
परिस्तिपिपामा समदनी में मारमाराम जी पो पद
दीपिका भी जिम मतिमा कोमी मी निमामही करनी॥
दूरारा पेशापारपिना आपापस्मो मो शाम को महीएगाना।
भारतीय पारमा सागमा ! मनमय भीममा
मामा पापा ममपा१५. RA

है (३७ ) मुखपती बांधी है मौर तेरे पदों ने भनुमान दोसी (२०.)वर्ष सेधिनी शुरु की है, यह इंटकमत भनुमान सपा दो सौ २२५ वर्ष में बिना गुरु अपने भाप मन कल्पित पधारणकरके निकाला गया है, इस्पादि यह लेस मसमजस है क्योंकि जो प्रथम लेम्न प्रतिमा विपय लिया है कि मतिमा किमिंदा मकरमी रस लेख में हम मी सम्मत इससे यह भी सिम होता है कि मारमाराम जी प्रथम प्रविमा की निंदा करते होंगे तमी तो उन्होंने शिक्षा दी कि मुनिझनों को क्या भाषश्यकता है। कि जर की निन्दा करें किस्त को खाग प्रतिमा को मईत की सदस्य मानते पुमम्मद मैं जीयता की संहा धारण करते हैं पूजा की सामग्री ले उसे प्रसन्न करते हैं उसपोलिये मंदिर की प्रतिष्ठा करते हैं मयषा उसके सम्मुम्न पावित्र धनाते हैं स्यादि फियाय मिथ्यात मार्ग को पुष्ट करती है इस प्रकार महारमा अम उपदेश करत है तुमिपा । सो यदि मारमा राम जी के माशयानुसार ५० रस्मयद जी का माशय होता तो उनके शिष्य (मकीसप्रदाय के स्वामी कापिरान मी सत्यार्थ सागरादि प्रय काहेको पनाते जिस में मूर्तिपूमा की जर काटी है।मात् मस्मिा का युक्ति या शास्त्रामुकर निषेध किया है इसलिये मारमारामनी काप्राग्लेख मथम शिक्षारूप कल्पित है। दूसरा लेन लिम्वा है कि स्वामी रमचंद जी ने कृपा करी कि-पेशाप करके पिना हाथ धोये कमी मी शान को नहीं लगामा, मित्रगण ! माप स्वयं विधार करें कि जप एक कार्य मारमाराम जी करते होंगे मी तो प. जी मे शिक्षा दी है। मोर रस लेश से यह तो स्वतादी सिय है। स्थानक पासी महारमाजम मारमा रामजीका पुन पुन शिक्षा करते थे ऐसा काम मत किया करो। क्योंकि जिस शाखा में मारमाराम जी जाना चाहते थे या जिस शामा के प्रत्य मी पटे थे उस शाखा में इतकार्य मयोग्य महीं पतलाया है। उदाहरण श्री प्रतिक्रमण सूत्र भाषफ भीमसिंहमाणक के द्वारा मकाशित भानो सम्पत् १९५१माघयदी १३मोह मयो में। तिस पके पृष्टोपरि यह गापा लिखो है जैसे कि । ।

4 पक जो (३८) खाइमे भत्तोसफलाइ साइमेसुठिजौरअजमाइ महुगुडतबोलाई अगाहारमोयनिंबाई ॥१४॥ मिस के मय में यह लिखा है कि गोसे कर सर्प जानिमनिस्ट उपवासादि छस्यों में पोमे कल्पते हैं क्योंकि महन् के मत में उपवास में *पातुराधार का नियम हैं किन्तु भूष मणाहार है। तथा भोर भी देखिये-भाय दिन रुस्य १८७१० बनारस जैनप्रमा करप्रेस का प्रकाशित हुमा जिस के ३६ पनापरि हिमा है कि-भाषक साधु को दो प्रकार का पान देखें । मादार का पात्र । दूसरा प्रभाव का पात्र २ इति वचनात् मय सुमजन विचार करेंगे कि-जय संवेगी मुनि मलायका पान रखते हैं। तथा जय विहारादि क्रिया करते हैं विस समय घेवमा करते होंगे। क्योंकि मादार के पात्र के साथ मनाव पान का स्पर्श कराते हैं या मही यदि फहोगे हम मध्यप का पाप नहीं रखते हैं तो पापमपने पर्या पायों से विरुम हुए। यदि कहोगे हम माज कल महीं रखते हैं। वो हम कहते हैं भाप के परे पूर्व रपते थे क्योंकि समी तो भाषक को प्रषाय का पात्र ने की भाडा लिखी है। परि कहोगे या न हमको मप्रमाण है। सो हम कहते हैं जो इन ग्रंथों में पूजा की विधि के ममा कल्पित लेख लिस्मे है तो उमको प्रमाणिक यो मानते हो । यदि कहोगे दम मादारादि के पात्र से स्पर्श नहीं कराते । सो यह मार्गही भसमय है क्योंकि । पात्रों का समूह तो माप एकही दाय में रमते मराहार पद है।मन्न १ पाणी २ सापमफछारियापकामादि स्पापमपूर्णादि। - गच्छमें तीसरा छेस भात्माराम श्री का यह है कि । पंरितरत्नवाद जी कहा कि दस हाथ में खदा रनमा सो यह भी फयम भयोक्तिक है पाकि-यदि पं० रस्तचर जी की घर रस्त्र ने की अदा होती तो उसके यह भया मषश्य हो घल पाता किन्तु उनके गच्छ में सक प्रया का प्राय सर्वथा ममाष है क्योंकि वृद्ध रागी के लिये सूत्र में पर कहा है मपितु सर्ष के लिये नहीं क्योंकि जय माई के मत में रखोहरण का दर मिमा पल पेष्टन किये रसमा मही कल्पता है कि कोरंजीव मय न पाये तो मला दस की माला सदैव काल के लिये कैसे संभष होसकी है किन्तु सपेगी छोकदस से जो काम रेवे हैं उसका उदाहरण से निश्चय कर लीजिये यथा । श्रीगणापच्छेदिक श्री ५ गणपतिरायसी महाराज भीस्वामी अयराम जी महाराज श्रीस्वामो शालिग्राम जी महाराज रुपाने पन्च का चतुर मास १९५१ का मंबाले मगर में पा। उस काल में ही बंदनधिजय नामक पच संवेगियों का मी चौमासा मंमाले में ही था। तो एक दिन की पाव है कि एक संधेगी हाप दर लिये जारहा था तो एक मार्ग मे महिप बसी हुई थी तो उस डी नेपदेही पल के साथ एक दर महिप के मारा तो महिष दस बाते ही माग गई मार्ग स्पष्ट हो गया तो सम संधेगी महाशय में पीछेको २वा तो दोसाधु धीरशासन के परि गोषर पुए तो वह परी मी पोपपलके भाग गया 4- अमर पाठकगण मपश्यमेष ही विचार करेंगे कि संवेगी सोग दर से इरमादि काम लेते है किन्तु यह लोग खग पप से मी पतित है पोकि इनके प्रेयो मै १एक संपेगी को पंच एंड रमने की माता है परन्तु यह लोग एक ही बंट रसते हैं यथा मानदिनकस्य मंथ के ३१ पम को पदो पप घर विषभिकार ! माणे जीवन परिष में लियाई कि-हमारे पौने १५. से मुख पर मुखपती बांधी है रेपरों ने २०० वर्ष से मुखोपरिमुष, ३ - .

(४० ) पती योधी किन्तु यह एफमव विना गुरुके मन कल्पित पिना गुरु के मिकाला गया है इति वचनात् ॥ समीक्षा-सो यह लेख भी भारमाराम मी को पुद्धि का परिचय स्नूप देता है क्योंकि यदि प०रत्नभद्र जी महाराज की हकप्रया होतो तो यह शीघ्र मुखपची मुम से सतार डालते सपा मपने शिष्यो कोसदेव हो एक उपदेश दिया करते हो तो उन्होंने माही कउपदेश दिया है और न अपने मुख से मुम्रपती उतारी है सो इससे सिर हुमा कि मारमाराम जो सस्य से परामुम्न ही रहते थे । प्रिय वाचकपम्म-भारमाराम जी काही मत जिम शासन से विरुय मल्पकाल से उत्पम्ममा है जिस का स्वरूप मागेलिगे किन्तु यह श्री जैन श्वेताम्पर स्थामक पासी ही जैग भी भमण मगयत् पर्वमान स्वामी से मप्रापि पच्यन्त मम्पपछिम्मता से पले माये है हां यह अवश्य ही माममा पडेगा कि किसी काल में मधिक किती काल मे स्वल्प होते भाए हैं मुहाची मुधपर पौधता येही जैमयम कालिक है तथा सर्व पिदामो मे जैनमत का पेप यदी लिखा है- शिषपाप्प मारियों में यह सर्य प्रमाण शास्त्रार्थ 'मामा सया सपगी मुखमरदम में प्रकाशित हो चुके हैं। इसी पास्ते यदा पर नहीं लिखें। किम्म फेयको प्रमाण ही विग पर्थम मात्र लिखते है जैसे कि बर्थ स्तुतिकोमार के प्रथम परिच्छेद के पृष्टपम्पोपरि लिया है कि सभ्यत १९५० मी सालमा मारमारामजी महमदापाव मा समापार छापामा म्यावयाम के मपमरे माहपत्ति पांधी हम मच्छी आनते है पण कोई कारण से नहीं पाते। मामा शहर में रामसमा के माप में भो स्यामो उदयसम्र जा महाराम देसम्मम सधेगी पाटन पिजप जी परामय प्राप्त कर सो.क पूर्ण का सारा सर । शास्त्रार्थ मामा नामक पुस्ता मशित हो चुका है। । .

. (४१ ) एहेवुलपाव्युत्यारे विद्याशालानी बेठकना भाषकोए मारमाराम जीने पूठा साहेब मार्प मोदपचि पाधषी कसो जाणोछो तो पांचवाफेम नयी स्पारें मारमाराम जी एतेने पोतानारागि करपामे का के हम ईहां से विहार करके पीछे अधिगे । स्यादि पिय गण | जम मारमाराम जी म्पारपान के समय मुहपति पांधनी मच्छी जानते हैं तो रसले सिय हुमा कि जो पुरुर सदेव ही मनोपरि मुह पती यांधते हैं जिनामानुकल काम करते हैं क्योंकि जिम लि हाने से। तथा गजरात देश में प्राय पटेरायमी की सम्प्रदाय के बिना शोप सर्व संपेगी लोग मुहपसी बांध के व्यायाम करते है तथा किस मेक सगी लोग भपने भापको साघु नहीं मानते ई सो पद अच्छे । क्योंकि यह मसस्य भापण से बचाव करते, सो मारमारामजी के कपन से ही मुहपचि सिर है मगोपरि पांधनो । तथा साप्रति कार के पिताम् मी अगमत का पेप मुहपदी करपे मुस्ख पाँधमा पेसे मानते हैं देखिये जगत् प्रसिद सरस्वती पत्र । एप्रिल १९११, भाग १२ संख्या ४॥ सपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी-रियनस- जो प्रकाशित होता है। तिसके २०४ पत्रापरि सप्तपशावाला का वित्र दियागया है जिस में दावशमा विष प्रामादिनाथ (ऋपनदेष) भगवान् का है तिस पित्रोपरि मुत्रपती मुह पर पाँधीहुर है पर्थात्- भोजपमदेव मगयाम् के चित्र के मुसोपरि मुसपती यांपीहर ऐसे सिमेनमत का दिखाया गया है। सो पाठकवृन्द ! जय पर मत पाळे मी मैनमत का घेप मुझोपरि मुहपती पापना मानते हैं मौर श्री जैन मी उतराप्ययन सूत्र, मी मगश्वी सूत्र भी प्रश्न व्याकरण सत्रा भोनशीय सूत्र, इत्यादि सूधों में भी मुनि का लिन मुापती मामा तांत भारमाराम जी का क्षेत्र मुहपतो विषय हठ है। तथा परित रस्नधान जो की अशा पदि मामागम जी के लिग मा सार होतो तो उनके पनाये मोठ मार्गादि प्रयो में वह अयान मषय ही पायानाता [-प्रयाग है

(१२)
किन्तु उनके पमाये ग्रंथों में उक्त अदा का लेश भी नहीं है मपित मी
मान परिसजी महाराज के हाथ का लिम्वाभा एक हमारे पास बी
पत्र है जिसमें देव गुरु धर्म के विषय में लेख लिखा है। यह मम्पबीयों
के दर्शनार्थे कैसे लेन है मैसे ही (प्रतिरूप) (माल) लिया जाता है
जिसको पढके भम्यजन स्वयमेव हो पातकर लेगे कि प्रोप.रस्मनी
महारास का क्या माशय याप्रमथ देषगुरू धमनीष सिसीया-
१-देषप्तम्याप्टि के मिप्यारष्टी ।
२-देव जामी के माहानी ।
३-देव सम्बरीके मसंपरी ।
५-देव प्रस्यायपानी के ममरपाल्पानी ।
५-देष समतो के मसंमतो।
-देव वृति के भति ।
७- देवपकेन्दी के परिन्द्रि।
८-देव प्रस के स्पायर ।
-देव मनुष्य के वियष ।
१. सागार के भणागार ।
११-देय सूक्ष्म के पादर ।
१२-येय परिप्रहपारी मपरिप्रधारी।
१३-देय माहारिक मणाहारिफ।
१५-देय मापक के ममापक।
१५-देव पीवरागी के सरागी ।
११-पहाण पुप्पपिछेपण मोगी के ममोगी।
१०-देय ८ मास मास बिहारीमविवारी।
१८-देव बीयेमारे के पचमे मारे।
१९--देव शम्पमाता के मभोता ।

( १३ )
२१-देव सर्वहके मसड।
१३-देव ८ कर्म सयुक्त के फर्म संयुक ।
२५-देष सपणी के मसण्णी ।
२५ व ४ प्रजा के प्रमा।
२५-देव १० प्राण के चार प्राण ।
२७-देष मुकगामी के ससारगामी।
२८-ऐष १३ गुणस्थाने के चौथे गुणस्थाने ।
२९-देष शुक्ल मेशी के मलेशी।
३०-देव पुरुष द स्त्री घेद के नपुसक घेदी।
३१--देष उपदेश दे के दे।
१२-देव रोमाहारी के फवळादारी।
१-देष त गर के भात गर ।
३५-देव मुक के ममुक।
गुरु
१-गुरु हिंसक के महिंसक।
-गुरु सायपादी के मसायषादी।
-गुव मदतमायो के वचमायो।
४-गुरु कनक काममी के त्यागी के भस्यागो।
५-गुव परिमधारी के मामधारी।
१-गुरु प्रतिघंधक के मप्रविषयक।
-गुरु धर्मोपदेशो के हिंसा उपदेशी।
८-गुह मामषी के भयाभयो।
३.-
धमा
१-धर्म बीच हिंसा जीवदया में ।
धर्म डोममें के महान में।

" ३-धर्म दर्शनों के भदर्शन में । ४-धर्म पारि के मधारित्र में। ५-धर्म माश्रय में के सम्पर में E-धर्म निर्जरामें केवधौ । ७-धर्म १२ मदी तपस्यामै के मतपस्या में। ८-धर्म भगवान को माता के माशावाहिर । पाठकगण! यह सर्व पं० जीके हाई के लिये एप पत्र को नकस है माप स्वयं विषारे किमारमाराम जोके लेख का कितना, मन्तर है इससे सिर होता है कि भारमाराम जी का प्रकृति महीं थे किन्न बट धर्मी थे। 3 स पास्ते चतुर्थ स्तुति कोसार के २८५ बैं प्रप्टोपरि जिला फिकेमके मारमाराम जी मामन्द विजय जीने समझायामे मय जो फदाध महा विदेश क्षेत्र पी केवली भगवाम भाषेप पोवो समय सोम थी इस्यादि सो पूर्व कमों के पस से मारमाराम जीवित में ममेक सशय उत्पन्न दुपयो कि यया स्थान पर दिखलाये जागे भपित भी पूज्य महाराज जोमे १९२० का घीमासा दिल्ली में ही कर दिया सो धर्मादीत भसीप ही दुमा । सो धौमासा के पश्चात् बीमाम् महाराम भनुशाम से बिहार करते पनामा शहर में पधारे सा मामा मगर में मतीय बीमासा को यहतिदुई सो मोसयान या अप्रवास मारपों के मति माह से १९२१ का पौमासा मामा मगर में हो कर दिया। मपपाठकका या मो विमाप्लाते है कि पूर्व वमोदय से भारमारामजी को भया पावश्यक से भी विषम होगा क्योंकि भी भगयम् पदमान स्शमी से भपापि पर्यम्त पम्प्पयहारामुगल जो मायापक क्रियामप्ठान सहा भाता है उसको मो मिप्या समझने लगे किन्तु जो कन्पित भाषाक मौर ( १५ ) मिश्रत मापायुक्त माविमों को घंदना रूप इस में उधि पदने लगी पोकि मी मगपन की भईमागधी भाषा है। यथा-भी समषायांगमी सूम स्थान ३५। सत्र-अद्धमागधीएभासाए धम्ममाइखति २२ सावियाण अद्धमागधी भासा भासिरिजमाणिते सिंसवेसिं मायरियमणा रियाणदुप्पय चउप्पयमिय पसुपक्खिसरिसिवाण अपणो हित सिवसु हवाए भास ताए परिणम्मई ॥ २३ ॥ भस्या:-धीसमवायोग नी सूत्र के ३४ स्थान के। २-१३ सूममै पह लिखा है कि भी भगवान की मर्च मागधी ही भाषा है भर्थात् मगपम् मर्च मागभी भाषा में ही धर्म कथा कहते सो षह मापा माय मनार्य द्विपादयतुद मग पशुपति सर्यादि सर्व जोव मपमो भपनी मापार्म ही समझ जाते हैं। तथा प्रहापण स्त्र के प्रथम पद में ऐसे कयम है :- सूत्रम्- सेकित भासायरिया, भासाय रिया अणेगविहापणचा तज्जहा जेणअद्धमागहायभासाए भासति जयण वौलिवीपवत्तई वीणलिविए अठारस्तविहेलेह विहाणे प०तबंभी १जवणालिया २ दोसा ३ :पुरिया १ खरोटी ४ पक्वरमारिया ६ भोगवइया पहाराडयाउय ८ अतखरिया ९ अक्षर- पुठिया. १०वेणइया ११ णिपक्ष्या १२ अकलिनी १३ गणितलिथी १४ गंधव्वलिषी १५ आदशलिची १६ माहेसरी १७वामिलीपोलवी १८ सेतभासाय रिया॥ -

( ४३ )
मस्या:-शिष्य प्रश्न करता है कि हे भगवन् मापा और
हैं। गुरुउत्तर देते हैं कि हे शिष्य मापार्य के भने के भेद है किन्तु
जो मर्म मागधी भाषामापण करते है मापार्य है मौर में
"प्रीकिपी के भष्टादश मेव ई प्रमो छिपी के साथ ही मई मागणी
मापा का प्रयोग होता है येमीमापार्य है।
तपा श्री पिघाह प्रमाण स्थ के पम्वम शतक के चतुर्योदेश में
पासूत्र
यथा-देवाण भतेकयराए भासाए भासति
कयरावा भासा भासि जमाणी विस्तसति गोयमा
देवाण अद्धमागहाए भासाए भासति सक्रियण अद्ध
मागहा भासा भासिज्जमाणी विस्तसति । ।
इतिवचनात्॥
मस्या-भी गौतम प्रमु धीमगपन भीयमान स्यामी से
पूछते हैं कि हे भगवन देवते कौनसी मापा भाषण फरत है तथा
कोमसो मापा मापम की देषों फो मिय लगता है। समग
पाम् उत्तर देते हैं कि हे गौतम देयते मय मागपी मापा भाषण
करते हैं पहरी मापा मापण की हुई देवतो को प्रिय ळगती है।
सपा इंटरसादिय गपने रघे संक्षिप्तहिंदुस्ताम के इतिहास में
लिखते हैं कि हिंदुस्तान की मूलमापा पुराणो प्रारत है सपा कदर
प्रणीत पाकारको टिप्पणी करम पाले लिखते हैं कि माफतमापा
सप मापामो से प्रथम है।
• यह मटा दश प्रचो लिपिक मेर किसी स्थान पर सविम्बर
मेथ देखने में मदी माये है इसलिये नती लिने छ सूत्र में तो
केपउमामही

( १७ ) तथा हिंदुस्तानका इतिहास इस्पायुधापसन्म एम०ए० मी सर्व भाषामों से पुराणी सर्व भापागोंको माया मारत ही है भात् सर्ष भापा माछत से निकली है ऐसे लिखते है तथा पंट व्याकरणका पति का यूरोपियन विवान मी पूषषर ही लिखता है सो यह मागधी भाषा भनत मर्थ की सूचक है इसीवास्ते गणघर देयोने मागम प्रारुव षा मागधी मापा में हो रचे और आवश्यक कियाय मी मागणी भाषा में ही रखी है। किन्तु जो पागछियों का भाषश्यक है चे सर्व मागधी माषा में नहीं है मपितु सस्कत ! प्राफत, मारपासी, गुर्मर इत्यादि मिम मापा में हैं तो इसीवास्ते यह गणघर छत विदित नही होता। फिर श्री मनुयोग द्वार जी सूम में पावश्यक के विषय में पह गाथा लिखी है। यथा -सावज्ज जोगविरई उकीतण गुण वउ पडि वत्ती खलियस्स निदण पण तिगिच्छे गुण धारणाचे? भास्पार्थ ~मायश्यक सूत्र का साषय योग मिईसि रूप प्रथमा प्यायो १। सतुर्यिशति देषकी स्तुति रूप द्वितियाण्याय है । गुणपतों को पंदना रूप तियाध्याय है। पाप से मतिम रूप बतुर्याग्याय है। पाप को मालोषना रूप पन्चमाग्याय है ५ । प्रत्याश्याग रूप पप्टमाण्याय है । सो यह सर्व मध्ययम विद्यमान है किन्तु सगी छोगोंमे पराषषयक में ममा कल्पित पाय पपना स्थापनाचार्य व्यंत. रादि देवता की स्तुविये सिख धरी है। •दिग्दी भाषा की उत्पत्ति मामक पुस्तक में सम्पाक सरस्वती पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जी मी प्रारुत मापा को पात हो माषोन मिखते है।

(४८) सो मारमाराम जीको प्रया समातन पावश्यक से मो विषम मई मना कपित माघश्य को परि भया एट होगा। बष भात्माराम जी मालेरकोटले में भाए तो पिनयन्द्राति साघुयो को भी सम्पफ्स्य से पतित किया क्योंकि इसी पास्ते सूत्रों लिम्मा कि (संग क्या क्या नहीं मकार्य कगता) मर्यात सर्पह मार्य इसी से होते है किन्तु जो मारमारामजी के सम्म चरित्र में पा ळिसा है कि यिमवद में पेशाव से हाथ घाए मारमाराम जी ने पर की सदकिय प्रियपाठकगण ! यई सर्य असमसको लेखाषि मास्माराम जी का यह पापी दी स्पमाव था हिमपमा दोष पर शिरपरमा स्पर्य ॥ भौर यह प्रथा सधेगी लोगों में अब तक में प्रवलिया है किन्तु इस का प्रमाण मागे लिखेंगे मपितु यह संवेगी लोग पाया मसरय लिममे से फिम्मित् मी मप नहीं करते देखिये पाच चन्द्रोदय माग तीसरा पृष्ट १२ पंक्ति ७ एक संयेगो साघु जो के जितने पर हमारे गुरु महारास के पास भाये सब झूठ लेखों से सरा सर मरे हुए थे, पत्यादि सो मारमाराम जी की भया पूर्व कर्मों की महत्वता से टिम्न मिझम हुई घर भी माचार्य महाराज जी का १९२१ का चौमासा मामा मगर मैं मानंद पूर्यक व्यतीत हा गया फिर भी पम्प महाराम प्रामानुग्राम विचरते हुए तथा जप पणा दाय देते हुए मालेरकोटला, एघियामा, फलोर, फगपारा, जालंधर, पपरपळा, रियादि मगरों में धर्मोपदश करके १९२२ का पोमासा मारयों के मटीव भामह से गुरु पे जरिमाले में दो कर दिया । में हम पातको पुलिस का कि पर्ष कर्मादय से भारमाराम जी का विच सम्पमय मे ता परामुन हो ही गया था किन्तु मा माया में भी प्रति मारमाराम मो की मपिक हो गई जैसे कि मारमा राम मोरे जोपन परिवारमावि । मारमारामजी ने विचार किया कि इस समय कुछ पंजाप देश में माया एकमतका जोर है, भोर मैं अकेला शुख भदाम प्रगट करूंगा तो कोई भी नहीं मानेगा इस पास्ते भदर शुब भवान रस के पाय व्यवहार दूकों का दो रख के कार्य सिर करमा ठीक है मषसर पर सप मच्छा हो जायेगा। यादि ! पाठकगण उक्त लेख से स्वयमेष ही विचार वे कि मारमा राम जी माया में भी कैसे प्रवीण थे, मला भरताका यही लक्षण हे या सस्य षादियों का! तथा भी सूत्र काग के प्रथम भुव स्कप के दितीयाण्याय के प्रयमोदेशक की ९षी गाथा में लिया है कि- 'जइषियणि गणेकिसे चरे जइवियभुजामास मतसो जेइह मायाईमिज्जई आगताग-भाय' अण तसो॥९॥ मस्याधर-यदि कोई मम्म मो हो माघे शरीर को कश भी करे विवरे मास २ के भस्तरे मी भाहार करे पदि पेसो युधि युज हारमो छठ करे तो भनंत काळ पर्यन्त गर्नादि..मैं ममेश . पेश में करता है। प्रिप मिभगम ! भारमाराम जी में उक्त सूत्रोक कथम को मी पिस्मत कर दिया। फिर भी कमीराम जी महाराज मारमाराम जी को मिले तिम्दों ने मी भरमाराम को बहुत हित शिक्षायें दी। किन्तु मारमारामजी को उन शिसामों से कुछ भी छाम म हुमा मपित भनेक प्रकारषीपातो से मामारामजी ने विश्नवम्दादि साथम मी सम्पप से पतित किया ! . -- . ( ५० ) मीर भावफ लोगों को भी जिनमत से विमुख क्यिा मिन्त शिन पुरुषों के माघार भी शुई महीं ये उनको धर्म को परीसक ठवराग सकिमारमारामजी के जीवन चरिष ३४८चे पत्रोपरि लिया है कि पट्टी पाले लाला घसीटान ने मपमा संशय पूरी करने के पास्ते भपने पुत्र ममीसा को व्याकरण पदोना शुरु कराया अब घो पढ़कर तैयार हो गया व घसीटामल्ल ने कहा कि पुत्र किसीका भी पक्षपात नहीं करना जो शास्त्र में यथार्थ वर्णन होघे सो तू मुझे समाना तम ममीसंद ने कहा कि पिता जी जो कुछ आरमा, राम जी तथा विश्न चद पगैरह कहते हैं सो सर्प ठीफ ठीक मोर पस्य धीममर सिंह जी तथा उनके पक्ष के दूदक साधुमोका जो कुछ पयन देसी सर्व मसत्य मोर जैन मत से पिपरीत है, यह सुन कर हाला घसीटामष्ल मोहक मनको छोटके शुय भयाम याले होगये पूर्पोक ममी चद इस समय गुजरात मारयास पसाप वगैरह देश पारित भमो चंदगो के नाम से प्रसिय ई मौर प्राय मारमाराम जी के मग मत मंगीकार किये पीछे सिवने मूतन शिष्य हुए सर्वमेयोस पावजार हो परितमी के पास विद्याभ्यास किया यकिमय तक कियेही जोते" प्रिय पाठरागण ! यह पहो परित जो है जिनका स्परूपं पा पन्द्रोदय माग तीसरे के स्वप्न के ख्याल में लिया गया है देसिये पृष्ट ५. पर- भपित भी पूज्य महाराज चौमासा के पश्चात् ममृतसर मे पिराजमान हो गये घर से भारमारामजी विनयन्द्रादिगण मी भीमहाराज के दर्शनार्य अमृतसर में ही मागये। तब मारमारामादिगम भोपूज्य महाराम मो को पावदी पिम्प करने लगे फिस्सु भी पूज्य महाराज महामन पुरुप प्रमुमणामी घे तिम्दोंने भारमाराममी को हो ग्याषयान करने की मारादेवी मनित सच कदापिसोकपि मे, प्राण फ्धों मार पर महर्ति मजेथे कि ।

है इस कहावतके अनुसार बारमारामजी म्याक्याममें उत्सूत्र मापण करने लगे तब भीपूज्य महाराज ने घा लाला सौदागरमळ (जो कि स्याल फोट से भी पूज्य महाराम जी के दर्शनार्थ माये हुए थे)। तिन्दों ने भी मारमारामजो को पात ही हित शिक्षायें भी मौर श्रीमहाराज ने भारमाराम को यह भी कहा कि-हे शिष्य यह मनुष्य मन मिलना पुनः पुन दुर्लम है हिंमा धर्म से ही भास्मा ममादि काल से परिभ्रमण करता मला माया ह एक वर्ण मी सूधका मन्ययाःकिया जाये तो मारमा मनत भषों के कर्म एकस्वकर लेता है। है। मौर तू क्यों मर्यों का ममर्थ करता है यदि तसे किसी बात की शाका वालनिर्णय कर लेषा शास्त दिनोय पार पडले ।। I सय मारमाराम विएमबन्द्रादि साघुमी ने भी पूज्य महारार्म के चरण कमल प्रकः छिये पुन:- हय जोड के कहने लगे कि । हे महा राम जी हमवो माप के पास है जो-कलमापको भयाई सो हमारी है ओ हममे सूम से विरुय कहा है तिसका इम् को यपा-म्पायू प्राय श्चित दे या क्षमा कर दे त्यादि परम मनवा करते हुों को सपा भी महारान मे यथा योग्य देदिया । फिर उन्हों ने भपने भाप ही एक पत्र लिमकर भो पम्प महाराज को दे दिया ! पाठकगण पर इस लिये दिया सिव होता है कि उन्होंने यह विचार किया होगा कि पत्र लिख कर देने से हमारी प्रतीव ठीक २ श्रीमहाराज के वित्त में पैठ जायगी क्योंकि जय प्रतोत हो जायेगी तथ हमारा काम निर्षितता से होगा भपित पत्र भी मामालित करके दिया। सो भम्य मोषो को इस स्थान पर एक पत्र की प्रतिरूप (मकल) लिख कर दिखाते हैं । जिस के पटमे से पाठकों को भली मावि निश्चय होजायगा कि पिनचन्द्रादि साधनों की विद्या युदि केसी पी। . . . .

-- सम से शामामृत को सुम करके दोष दूपमळ को छोस्ती है गुम को धारण करती है वह सहात परिषद है। महात परिपद ऐसी होती है असे प्रतिका मधुर मयात पालावस्था करके युक्त मृग का बालक सिंह का बालक कुट का पालक जैसे ममुप्यादि का सग करता है। प्रया से हो प्रकृति युक्त होजाता है तथा जैसे रखम भूल में फरार हो सो घूम के दूर होने पर घे रत्न शुय हो माता है ऐसे ही हावापरिप्रया भण्ले महारमामो कासगफरमे से पविषधोजातोहा दुधिवग्ध परिपद स प्रकार से है जैसे 'किमी ने गुरु के मुख सेतो पानी का निर्णय नहीं किया किन्त बिना गुरु के मर्य दिये ही भवने आप सीपर कहलाने लगा यदि किसीपिशाम् कासयोग मिलता हतो मपमाम के भय से उनसे दूर ही रहता है भपित मषिमामौके माय में परित कहलाता है किन्तु जैसे पाय करके पूर्व (पस्थिपाय) मशक,जल से दो हीन होतो हे महात जनों को बळ से भरी दिसतो है, सी प्रकार यह पुरुप मान से वा होम है भीर छठ मे rust माही ६ठ को जेटता है उस पूरुष को सुपुरुषों को शिक्षा से कुछ मी माम नहीं होता इसी प्रकार मारमाराम मो को भीमहाराज को शिक्षामो से भी जाम महुमा किन्तु कपर से पिनय मकि फरवार्डमा निम माशय कि,ममाप्ति देखते हुए ने अमृतसर से बिहार करके १९३९ काम्रोमासा हुधिपारपुर में जा किया भौर श्रीपूज्य महायगने १९९३ कापीमासा ममवासर में दो कर दिया मीर उक्त पर्व में हो सुनाम नगर कहने पाला घेश्य तुलसीराम ने भी महाराज के पास दोसा धारण करी पाठको पो स्मृमि दागा कि भो महाराज ने गो मारमाराम जी कोनिक शिक्षादी पी तिनके हो प्रयोग से मारमाराममो मे १५ मान १९२१ के धौमाले में लिखकर यूटेराप जी पो भेजे क्योंकिडस बार -- में बटेगम जी का चौमाता गुजरषाले में था सो हम भी यह प्रश्न जैसे के तसे ही भग्यजीयों के जामने के वास्ते लिमाते हैं। स्वस्ती भीमच्छांतिनाथायनमः। अथ प्रत लिखते हैं १-भी सिांत में मार्ग सोम कया है उत्सरग १ अपवाद २ घोप ३ मने मन्ट दस पाप स्थामक कद्दे हैं सोई उत्सरंगमार्ग में मष्टरस पाप स्यानक किस रीव से वर्णन फरधा है मने मपघाद मार्ग में भष्ट दस पाप स्थान कैसे काम किये हैं भने घोप मार्ग में कैसे मष्ट दुस पाप स्थान का निरूपण कोपा है एवंपूर्वोच्च प्रकारेण तीनों मार्ग ५५ पाप स्थानक पुये मोरम ५४ का प्यारा २ स्वरूप लिषमा फिर मैसे लिपणा इन्दी ५४ मध्ये मला मगवान् जो की कौन से पाप सेघने की हैकौन से में मही इति २-थी प्रषचनसारोबार में भाषक के १५सी फौरकार १२ साप ८७ हजार २०२ मांगा इन का सर्व प्रयास स्वरूप लिपणा फिर मैसे लिपणा कोमसे मांगे प्रतिमा जी का पुखना है मने कौनसे मांगे में यात्रा करणी कही है इति।। ऐ-तपागच्छ पाळे कहते हैं भगवान् जी के मिंदिर में सरणी घेस्या का नाटक करपामा भने स्वरतरागच्छ पाले निपेघ करते हैं तो तुमारे तो कौन सी पाव सपा है भमे साल मस्ये सरणी मयवाय था हीजरा पह वीना माहि किम का माष करयाणा फदा है इति -भौर पागछीये कहते है साघु से म रखा जाय तो बेस्मादि से कुशील सेवे तो पाप महीं भोर भावारंगमी पहा शोछने परें तो गल पासादि फरी मरे सो इनका समाधान कैसे है ५-मागे तपागीय कहते हैं द्रोपदी भाषिका है म उनियुक्ति मे लिपया है मिम्या विष्टनी कहीदेसासका न्याय कैसे है।

मौर कप मूल में लिपा है २ हजार वर्ष भगवान् जीरे
पोछे उदय २ पूजा सामु साध्वो को होगो सो मस्म मह कार रवरका
कीम से सपत में ग्वय २ पूजा हुई।
७-भोर वर्तमान में माचार्य कीमसा है सपाध्याय कौनसा है
विसका नाम मिपणा सूरमंष परिसइत कौनसे देश में है।
८-और भादस पाप स्याम उपर पृथग २ सात भय का
स्वरूप छिपणा प्रणाति पात पर सावनय मृपावाद उपरि सात
मय एवं सर्व परि तारणी फिर लिपणा कौन सीमय के मन में
पाप अप्टादस मेयने की महा है कौन सी नय के मन में पाप
सेखने का मिष है।
९-फिर साव कुविश्न माये स्पावार के मांगे पारे २ पसे
पमते है फिर कौन से मांग में सात फुयिपन सेष की भहा है।
१०-निर्यात में मुप यताका जो घलो दे जो थुक गिरने की
रक्षा पास्ते है या पायु के मोर्या को रसा पा है या लिंग पास्ते है
इति प्रपन १०-
११-मदा मोशोप के पक्ष मपनीव सार भापयन में प्रस
स्थामि के सिय ४९९ पर्णम में ऐसा पाठ है चंद्रप्रम की यात्रा में
प्रदर हे तोर्यपाषा गाणे से करणार एपात भसंजम होता है इस
माणदेतीपात्रा का निषेध किया गया है महा निसोय सूच३५.
मापम पासना ५२. सायनार५००५ मोनो मोहिलिपन देर सेना
उसका तात्पर्य सिपणा ९ प्रहमा का समाप टीका या या प्रकर्म वा
सूम
के पाठ शुमा लिपना मुथा या न छिपणा परपसम् सपा
भारमाराम. १९२३-
प्रिय पाठणगो ! यह प्रश्न मामपनो मे जैसे यूटो य जी
कोमेले से ही हमने लिप दिये है फितु यह मान मराभारा
-

में लिखे हुए हैं हम प्रमों के देखने से यह तो भली प्रकार विदित हो जाता है कि मारमाराम जो म्याकरण के भी अनमिष थे सो पूर्ण समालोचना २४ के चौमास में लिखेंगे मपितु पटेरायजी मे इन प्रश्नों, का विध्वत मी उत्तर महीं दिया है क्योकि पटेराय जी कोई पिताम् पुरुष नहीं माहो उन्हों मे कोई सूक्ष्म पान सीखा था शेप इन की बनाई हुई मुखपती चर्चा मामक पोथी से निर्णय हो जाता है कि यह यूटेराय जी विद्याम नहों थे मौर सपगष्य को मो मन्ताकरण , से मच्छा नहीं समझते थे क्योंकि इस बावको, पहेबप श्री. ने भपनी पनाई पुस्तक में स्पष्ट कर दिया है । . •प्टेरायजी का जन्म-पंजाब-पेश में लुधियाना शहर के सरफ पळोठपुर से सात माठ कोंसे दक्षिण के तरफ दूलषां गाम में टेक- सिंह जाट को को नामा स्त्री को कूम से विफम सपत् १८१६ में हुआ था पुण्योदय से रम्हों ने सम्बत् १८८८में भी १०.८ अन्य मलकर घर जो महाराज के गठ के भी मुमिनागरमल्ल जी महाराज पास दीक्षा धारण करी फिर यह चित को चंचलता के प्रयोग से, पकले ही फिरने लगे मम्पदा समय यह पंजाय' देश के स्यालकोट जिला- मैं पसकर मामक मगर में चले गये सो वहां पर म्हों ने अपने उपदेश धारा मूलचव माशपाल को पैराग्य दिया मोर ना हो गए लिया तब मलय का ताया(महपिता) सोहनशाह स्पाळकोट- पापा जीर्घदेशाह मावरा पसरपाठा जोकिमुमधदका मामा(मातुर) या तिन्दों में गुजरांवाला में पटेराय जी को पा मुळयद की मुसपति वार साझी फिर मन से कहने लगे भापने किसको माहा से शिप्य किया है यदि तुम सूत्रानुसार क्रिया नहीं करसके हो तो तुम मुहपति को मत रो मर्यास् मुखोपरि मत पांघो क्योंकि साधु के यह कर्म नहीं है तब रन को अदा मुत्रपचि बांधने की उत्तर गई किन्तु जो ( ५८ ) यूटेण्य जी तो क्या किन्तु अन्य किसी भी सम्वेगी महा शयने इतना साहस नहीं किया है कि इन प्रश्नों का पयार्य उत्तर दे दे भौर Arमारामजी के जीवन चरित्र के पढ़ने से यह तो स्वता हो निश्चय होगाता है कि मारमाराम जी भी महागम के सन्मुम्न होने में मसमर्थ थे जप कमी दर्शन करते थे तो श्री पूज्य महाराजजी को स्तुधि करके किनारा एकरते थे किन्तु सत्य से परामुम होकर स्वकपोल कश्पना मारा छोगों को प्रम में सालते थे मोर पूछने पर मतप्य माषण का प्रयोगमभित करते थे जैसे कि मारमाराम जी के जोपन चरित्र के ५१ प्रप्टोपरि लिया है कि-दुपारपुर में लेश करके गणेशीलाल यूटेराय जी के पास जाकर सम्धेगी दीक्षा कर विचरने लगा और टिकामे ठिकाने कामे लगा कि-भारमाराम जो के मदर गुर समावन जेममय की भा होगा है मौर मस्या मैं ढक मत का मेप भोर व्यवहार रपमा परम्त दकमत को मास्था विठकुल नहीं है। मछषद को लेग थे सो मूलयद फिर मोपटेराय जी के पास मागया सौ यूटेरापमी ने फिर भी बिन मामाहो मृण्मलिपा फिर पटराय जी अपने भापको साथ बहाना नहीं चाहते थे इसलिये इन्होंने मुप्रपति मुमोपरिस उतारालीमपित यसपागको मो मंतरंगसे मा नहीं जामते वे जसे कि महारमा जी मरमी पनाई मुमपति घर्ष मामक पुस्तक में जिससे कि-मेरो सरधा तो श्री जसोपिमय जी के साप पणो मिले है जिमदपाध्याय जो नाम मात्र तपेगासस पजीलाता पा टिम मेरे को भी माम मात्र तपेगच्छ का काहिसा जोरए ममे उपाणपनी के गमुराग करके सोकम्पपहार मात्र ममाचारो मंगीर करी-राजमार मध्ये सुमागपिसयतयामणिधिमय पराग पारीने दम तथा मुमचंद क्या एमिर सेठा को धर्मशाला में पके माए एता रमसाथ मेरा संबंध धो-मेने वर्म जोरे पांचमा बास में ( ५९ ) इसके ऐसे मनुचित समय में इस बार के फयम से मौर पोक काररषाई भगीकार करने से कितन हाशहरों के लोगों को समातन जैमम की शुर भया प्राप्त होनी पर होगई क्योंकि बात मममान लोगों ने बिना हो समझे हट करामद करके मारमाराम जी वगैरह के पास मामा माना बंद कर दिया इस्यादि पाठकगण ! क्या विधामों का यही क्षण है कि सदेपाल ही स्थानुसार पर्वाद करना सब कमी स्वछत प्रगट होसाये तो शोक करना चाह!!! खिस बोष के पूर्वोक्त छस्प हो उस को सत्य यता मानना क्योकि बम लिया विरागपिण माग्यागुरु समगन मिल्पा से पाप का पदा इस्पादि कयम से लिया है कि यूटेराय जी वपगच्छ को मन्त, करण से मच्छा मी नहीं जानते थे किन्तु नाम ही वपगए का रखते थे मौर जिनके पास वपगग्छ पारण किया था उनका स्वरूप टेराय जी मुखपति पर्धा मामक पोथी के ५ पृष्टोपरि लिखते है कि पाइदिक्षा मे पाली थी ते साधा को रूपाये चढाय फ पूजा करने लगी प्रथम तो रूपाये वटारमे रस्म विजयजी की पूमा करी फिर मणिविजयजीमे मागे रुपैये घडामे पूजा करी पीछे मेरेको रूपये वावगे ठगो विवारे नित विजयजो बोल्या हमारे मागे रुपये पदावने का कुछ काम नहीं हमारे रुपयों को सप न थीम फहीने ममे कर दोनो तिघारे हम सये वहां ने मठ के चले माये तिमोंने पाई दिक्षा देके शहर में पले गये स्यादि इस प्रकार पतुर्थ स्तुति निर्णय को भार के पृष्ट २८षा २९ पे पर भो लिया है। पाठकगण देणिये सप मणि विजयादि संयेगी प्राय रखते थे और प्टेराय जी मपमे भाप को सा हो नहीं मानते थे ना ही यूटेराप मी को गुर का सयोग मिला नाही सपाग को भग्ताकरण से मला समझते थे-तो फिर मला तपागछिये किस तरह कह सक है कि इमारी परम्पराय शुभ संपमधारियों को है।

11 - । (६० ) मग मरिमाराम जी सस्य में बद न्याय पक्षी येतो इतमा प्रविहारको करते थे जो कि उनके जीवन परित्र से सिव है। तब भीपज्य महाराज ने ममृतसर से बिहार करके मम्य सोयों के अवय सस्यत्व रूपो ज्योति से प्रकाश करते हुए सम्वत् १९२४ चौमासा फीरोजपुर में ही करदिया मोर पूर्वोक्त सम्पत मर में दो ममृतसर में तीन दीक्षायें हुई। जैस कि-चाला मम्पोरपद निधाममल्ल, निहालबन्द पड़ वीम ही एहस्थ रापळपिरो के निवासी थे। मौरक हो में छाला खोवयल्ल वी दिल्ली के पासी (पय मासोयणा)मापा मग्य के कर्चा जोकि बैराग्य मुद्रा ये सिम को भीमन माघार्य रामयक्ष मी मदाराम ने भुतषिपा का दान दिया था षहमी मारमाराम जी को मिले चिन्हों ने भी मात दी हित शिक्षा मारमारामजीदी मीर का प्रम भी पूछे जैसे कि- साला जी ने प्रश्न किया कि महात्मा जो सूत्रों में नि प्रकार से धर्म प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-मुनिधर्म १ गृहस्थ धर्म २ सो प्रतिमा भी का पजन किस सूत्र में कहा गया है। क्योकि से उस दिप्रकार के पर्म का सर्यिस्तार उमाई मादि सूत्रों में मानदेय में किया है इसी प्रकार फिप्त सूत्र में महनदेय में प्रदिर के बनाने को विधि प्रतिष्ठा की विधि विष को मूलमायक पनाना स्पारि विधि कपन करी है मोर ऐसा पंथन करने पाला कीममा सूत्र या सूत्र पा पीठ मौर गाय को मदीर मानना भगोय हो जीप माममा पर मिप्याय दे पा नहीं मिजोय में जीय सहा पारण परलो यहाँ परम मिपारप है फिर किस सत्र में श्री गौतम स्वामी ने मगयम से प्रश्न पिया हे नि प्रतिमा को के पूजन से जीप मोक्षम बटा जाता है। . . F फिर धर्म हिंसा में है पा दया में है और भगवान को भामा महिसा में है या हिंसा में है। पवि कहोगे समपाठ व्यपरटेन होगये हैं। तो हम कहते हैं जो *मन्यधर्म विषय भनेक ही पाठ है यह म्यपच्छेद क्योंना होगये मला कोई दिमाम यह पात मान सका है कि सियात के नियम तो भ्यपच्छेद न हो और नित्य नियम म्पपच्छेद होजाये सो महास्माजी उक पाठों का शान्ति पूर्षक मुझे सचर दीजिये 'जब छाला ओं में इस प्रकार मारमाराम जी को मनेक प्रश्न पूछे तव मारमाराम जी ने एक ही मौम धारण कर लिया सस्प है उत्तर देते फ्धा संभों में एक विपय का कोई भी फपन नहीं है। इसी पास्ते मारमाराम जी के लीयन चरित्र में ५२ पृष्टोपर लिखा है फि मारमाराम जी ने हाला जीतमल को भयोग्य समठ के उपेक्षा करळी स्यादि थाहजो बाहर जिस के प्रश्न का उत्सर न माघे घदी धर्म के भयोग्य-सो सो पास्से लाला जी को हठधर्मी था धर्म के भयोग्य लिखा है पाठकगण ! पद मारमाराम जी को पिसा है किन्तु श्री महाराज ने फीरोजपुर के पामासा के पश्चात् भनेक प्राम मगरों में धर्मोपदेश देकर १९२५ का धौमासा गुरु को नसियाला में किया. सो रक्त बीमासे मै पात्रक लोगोको बाम का परम लाम हुमा कर मम्य जीष प्रश्न पूछ के निस्म. •प्रश्न प्याकरण सत्र पा उपासक दशांग सत्र मापश्यादि भनेक सभा में मुमिधर्म था गृहस्थ धर्म का पर्ण स्वरूप प्रतिपादन किया गया है इतना ही नहीं कि तु भो अमु पोगारशी सूत्र में भाष पयादि मधिकार में परमा के भनेक मदिरों के विषय में पाठ है मपित श्री पतुसंघ को दो समय मिस्यम्प्रति पहायश्यक करने की हो माया लिपी है इसीलिये जो कहना है कि मंदिर विषय के पाठ पवम्छेद होगये मोनिका स्वकपोस कल्पित कपम६ 1 ( म्देह हुए पुन' उक्त धर्म में रखसराम मोसवाल स्मालकोट का पस पाला तिस का भी भी महाराज ने दीक्षित किया। मपितु अप १९२८ सम्वत् में भीपम्प महाराज मे विपनचंद्रादि साघुमी को भपमे गच्छ से पाय किया था वप रलाराम को मी तिम केही साथ गच्छ से मिम्म किया था किन्तु पह मिग्न होता ही पति दोगया था। सम्बत् १९५० का खौमा भोगणायब्छेदिक भी १००८ स्यामो गणपतिराय जो महाराम स्थामे ७ का पीमास स्पालकोर में था पुम में भी श्री महाराज जी के पास ही था तब उस काल में यह रसागम पग्य मी स्यालकोट में ही स्थित था सो मैंने पफ दिम रला रामजी से भारमाराममो वा विपनचंद्रादि के मळग होने का कारण पूछा सब रलाराम मो मे भसीय घृणा दायक मारमाराम जी का पिननम्दादि का माचार सुनापा मपिस तिस के लिसने को दमरी किम्बित भी आवश्यकता नहीं है । क्योंकि हमारा धर्म मदिसाई जिस करके किसी भी मन मारमामों को दुप प्राप्त होये पर लेय हम नहीं लिखेंगे माही किसो का मर्मकारी शम्द या नाम प्रगर करेंगे पर यह ता पाठकगण जान हो गये होंगे कि जप मारमागमती से भईन मापित सुन्दर क्रिया म पळ सकी तपदी मारमारामजी प्येताम्पर मत से पृपाइए क्योति मिर्यच पूति का पालमा मनीष कठिन है भोर सो पारवे येताम्पर मुनियों को मनुचित सिपने सोहि बम्म परिनके पृष्ट ५३ परमिजादै कि- सुहारा गाम में पत के समय फिर जीयनमन्ल जी पेकर पारने लगे तथा रिल्लो याढे पायक पात खुश हुए पर्यापरने में मरान नागमे एपारि- मिरा! यह मारेन..मामाराम आहे. मनुषित पोलिभारमाराम मी स्मपम नम करते थे जोकि - ( ६३ ) के लिने पम से सिम है भन्यगण को एक पत्र की नकळ मागे लिख कर दिखलायेंगे मपितु जब मारमाराम जी का व्यवहार स्मा मुकूम रहा तप ही स्वामी जीवनराम जी महाराज ने भारमाराम मी को स्वगाछ से वार कर दिया तय ही मारमाराम जी दम करने लगे तो स्वामी जी ने कृपा करी कि भप रोने से क्या बनता है। मौर दिल्ली को यह बात है कि मष दिल्ली में भारमाराम जी गये तव हो छाला जीतमल्लादि मावको की भेट हुई तप यहाँ से विहार ही करना सूसा क्योंकि ला० गीतमल्ल से प्रथम एकसार षा: अपहो चुका था, विस कारण बेदी मारमाराम जी मे शीघ्र, विहारकर दिया मौर श्रीमहाराजने मी धीमासा के पश्चात् फरथळे की मोर विहार कर दिया फिर जालन्धर,फगवादा, जेगो बादास्यादि नगयें में पिरोपकार कर के १९२९ का चौमासा इशियारपुर में किया इस चौमासा में जिन माईयों को मिप्या भ्रम हो रहा था विस का माश किया भयात ममाछेदन किया किन्तु जो हठामही ये विन को प्रमो. चर करके मिरचर किया क्योंकि श्रीमदाराम स्वमतपरमत के परम माया घे। सा बीमासे के पश्चात पात से भम्यजीषों को सम्यक्रव का पोष देकर १९२७ का चौमासा झाम्पर नगर में कर दिया तो पीमासा में परमोधोतहमा । फिर भीमदाराम चौमासे के पश्चात् विषरते हुए जगराओं शहर में पधार गये फिर मम्पदा समष जगरा से विदार करके भीमहाराज किशनपुरे को बारहे ये रैपयोग्य से भारमाराम जी मा में ही मिलगये पुम श्रीमहाराज के परप कमल पकर लिये मुझसे कहने लगे कि श्रीपूज्य महाराज मी मैं तो माप का दास ई गापने मेरे ऊपर इतमा सपकार किया है कि जो ऋण में मष भव में नदी देसलाई पोंकि मापने मेरे गुद महाराज को दीक्षित किया मोर मुझेशान पाया।

( ६४ ) सप ,श्रीमहाराज फहमे लगे कि हे मारमाराम त मिप्यास्त्र म पेश करके क्यौ जन्म को बिगारना है क्या व ने उत्सम भापो के फूल को महीं सुना है कि मो ममतकाल पर्यम्स उत्सव के मापो सम्यक्प की मो प्राप्ति नहीं होती। 1 मोर जो तेरे मन में शकार्य है तो तू निर्णय करले क्योकि सूर्मा मैयह पुन २ कहा है कि जो मजीव को जीप मानता है वही मिथ्या राष्टिई सो जब तू एक पापाण के संर को महन मानता है तो मसा फिर तू मिथ्यास्य मार्ग से कैसे विमुक्त हो सका है। ३ मौर फिर तू लोगों के पास व्हसा है कि पून्य जी मेरी रोग पई करते हैं। 1 प्रियपर ! दमको मंतराय केमे को क्या भाषश्यकता देखिन्त जैसे त् कर्म करता है इग कमी से तो यही सिय होता है तुम को मामुष्य मच पाना ही दुर्टम हो जायगा तात्पर्य यह है कि कामो को प्रकाश का भोर हम उनाकामों का समाधाम फरेंगे। मपित वसा से पपि मत कर श्यादि अप श्रीमहाराज रूपा करपके तप मारमारामजी कुछ भी चरम देसके मपितु ममता रके भपमे मार्ग पळसे मये। सत्य है द धर्मी पुरुष को मौनदी का शण है क्योंकि ममता पाप करमा मामारामजी के जोयन परिम से हो सियदेखिये मोपन बरिम पर ५६---जय भा'मागम जी अगराया में यिनदार, साधनों को मिरे तप विश्मदो ने कहाकि महाराज जी मन से ने हम सदादी माप के साथ मिरे हुये है, पौषि गापमे गुर समातन जनमत का ययाय स्परप दिमादमारे ऊपर जा पकार पारे हम सफा पाला मर भय में मो मही देमाने है, परंतु पथ पर भपना मतलप सिर करमे के यास्से ऊपर अपर से झुदाई रखते हैं यदि तनी भी जुदाई न रपे तो पूग्य जो गाराम हो जाते है और उनके नाराज होने से मपना कार्य सिर होना मुश्किल है इस्यादि प्रिय पाठकगण उक लम्न को स्वय पढकर विचार किमारमारामजो था विश्मयादि साधुमो का मम्सरग या पान पियारसा विचार नीय है मौर फिर विश्नधद्रादि साधु जगराधा से विचार करके अमुझमें भम्याला छावनी में पहुंचे फिर अपने हाथों से एक (चिठ्ठी) पत्र लिस कर मम्बाला छावनी से मम्बाला शहर में माफत लाला ममामियां मक, मालमल्ल को भीपूज्य महाराज जो को मेजा जाफि १९२८ ज्येष्ठ छाण १५ का लिखा दुभा सा पाठकों के मानने पास्ले हम उस पष की मकल यहां उसत करते हैं धीपीनगगायनम स्वस्ति सोमत सुमस्थाम विराजमाम श्री श्री श्री परम पुज्य परम दयाळू परम कृपा परम स्वेगी चाग्नि निधी दया के सागर पिमा के मदार सूरवार धीर गमोर भनेक गुमारी पराजमान ।। कागज थाहा गुनघगा, मोपे कमा न जाय । सागर में तो जल घना, गागर म न ममाय ॥ भी श्री भी परम पुज्य जो महाराज हमारे सिर के छत्र समाम मस्तक के मुकट सामान भनेक गुनकरी विराजमान म्यामो जी महा राम पुरषदजी महाराज के घरणा यिम पदमा नमस्कार घासना पोस्वामी जी विश्नचवमा महाराज धरण। बाकर गुलाम हुकमे को पदमा ममस्कार यहुत २ करके पंचनी चरणा विच सासलगा एमा पांवना ठामे ७ को जुदो २ यवना नमसार यस २ फरक पाया। सबका पान मापके चरणा घिष लगराहा हएगा स्वामी विश्नचदजी का चरणा + गुळाम का एकमे का प्याम हरदम भापर चरणा खि लगा रहंदा देगा मापने हमारो तरफ सेति किस बातको विना सोचम करना नहीं दम को at भापके मरमा फा पठा भचार इएगा घन उदिन होगा जिस दिन मापका दम होयेगा हमारे को पात मपटार लग रही हएगो श्री श्री श्री १००८ श्री भो भी पुज्य जी महाराम परणों घिय यिनचद की हुकमद को यदना ममस्कार तिनो के पाठ से १००८ बार पुनर २ पाषणो सुपसाता पान २ करक पुण्मी भागे मेरी तथा हुकमघर की मरजो मापके चरणो में चौमात करने फी हेगी सो घना क्षेत्र हो वा हुकमचद कहे के मेरा पिव पूज्य को महाराज के पास चौमासा करण का है सो भाप जोण से स्थान सहर विष पिराममाम दोगे सो हमारे उपर दया भाय फरके महर दिपी करये इस लिपाये देणो हम इस ठीकाणे हैं हमारे सिव की पूति श्राप के घरणा म पा रहे है मपास पात में विल कुल फरक नहीं समममा अपपपसोतमेर तथा हुकमचय गाइहगी पश्यमी महाराज के परप विध चतुरमासा कर के सपा पाणी भाप पावर जमा रखणी मापरे तायेदार है चरणो के घाफर है इसीतरा सामना घणु पघा ली थी फेयलो महाराज जानतेरे हमारा तो मापमे पग उपकार किया है सो हमारे मन में एदि है भाप + पास रहे २ शास्त्र यिबारे ममायान मापता तो हमारी मनसा पुगे पे सो भयके वो दुरफा मदमारे फेर मेरा फरमायोगे उसतरा दोयेगी इसम फरक नदी जामणा पह पान यततपरम से लिमोह भाप पडे गभीर दो उत्तम हो मापके गुप्या पा पार नहीं है सो भाप करके साता को पपर जयर मेजमी रुपा परफे जमर जागं भापमि सुपसाता पी गयर जन्दी एपार देमारयो सेतो पानी हमारा ध्यान यात लगरया पपगा-ति -भार इस पत्र मितीय पृप्टा परि येक्ष्य होणे का जो (पही) 'शा है यह पत्र मतिमीण होम सेरस स्थान पर्ष दो र गये ६ पत्र भी लिन मिन्म हो रहा है किन्तु इस स्पाम में ऐसे राम प्रतीत होते हैं कि मै माप जो गाहा भेजोगे तया जिस परा पुग्मा पोग-स्यादि- - मित्पम् पनादि में हिंदी लिखने में भावीपर लिखी है सस में लिखा है कि-मम्माला छावनी का पता भार पत्र भेजा लाला मतानियामल भाळमाल की माफत भी पूज्य महाराज को मजा १९२८ ज्येष्ट कृष्ण १४-स्यादि-मौर मारमारामजी के जीवन परिन के ५७ चे पृष्टो पर लिखा है कि-कितने दिनों पीछे ममरसिंहजी की तरफ से पन कपर पत्र माने से लाचार हो कर श्रोषिश्नचंदमो लुधी माने से विहार करके मम्माका पाहर में जा चौमासा रहे इस्यादि- प्रिय पाठक बन्द एक पत्र विश्मयर वा हुकमचा का लिखा हुमा है पत्र में दामो प्रकार के वर्ण पियामान है तथा दोनों ने ही पत्र को घणां से भक्ति किया है। मपित पत्र भशुमा पटुन हो है सो उक पष के पदमे में निश्चय हो जाता है कि यह महात्मा जी व्याकरण के भप उत थे भपितु संपेगी लोक इनको यिया की महान् स्तुति करते हैं सो ठीक है-यथा- प्रिय मित्रयरो इस सारे पत्र की सर्व ५० पकिये ई प्रत्येक परिक में मशपियों की भरमार हे यधा प्रथम पक्कि में तोन मशुखिये हैं यथा- मत् के स्थानो परिमत ऐसे लिखा है पा शम स्थान के स्थान में सुम स्पाम लिखते हैं भयवा पूज्य शब्द का पुज्य लिया है तथा पक्ति २ कपाशाम को कपालु निधि शब्द को निधी प० ३ क्षमाका, पिमा, प० ४ फागज को कागद में को मे पूज्य शप्प को पूज्य महाराज शम्प को महाराज ७-८-९-१०-स्यादि पक्तियों में स्यमाम, मुगट, पुष पद गमस्कार, दएगा, हेगो, इत्यादि भनक प्रकार की मशुचिये है प्रगट होता है कि महामाजी सम्हन हिंदी था उर्दू मापा के विधाम पनने की इच्छा से लिखना चाहते थे परसु उक्त मापामों को ही उपालम्म है जो पिना पटै महात्माजो के घदय में प्रवेश न कर गई मर्यात पर मशुशियों से माहित कर दिया है मौर पर पोजमा फा तो कहनादो वधा है धन्य है सधेगमतके पपाध्यायजा को किस्त माचार्यजी को पिया का स्वरूप मम्यजन ३५ के पर्व के चौमास मे पान करेंगे। .

उष्ट्राणा विवाहहेतु रासभास्तत्रगायकाः ।
परस्परप्रशसति अहोरूप महोवानि ॥
एमी हो म्याय से लोक महारमा जो को स्तुति करते।
हस्यर्थ पुन मारमाराम जी के जीवन परिमलगा है कि पर
जो रे बारम्यार पत्र माने से लापादकर विनयदादि माघ
एघिमाना से विकार करने मम्बाला चौमाता जा रहे स्यादि पाठक
गण! यह फसी अयाकिक बार हेरि भोपाय, मदागम के पो से
सम्याला में चौमाम हुमा क्या विनवर जो के पर से सिम होसळप
कि थी महापस नियन्द का पत्र माने थे कदापि महीं ! मो
भय विनचन्द जी क लिने हुए पत्र का मी पिवार लीजिये कि
पदि उक्त पत्र विनयन्द जाम मकाण मेवा लिहा दायेगा
चार पत्र के लिये मनुसार ही मार हाग तप जा भारमागम मोरे
जीवमवरिष में लिग्नादकि-
जगरा में मारमाराम मोपा विनचंद्रादि माप भिमत
विगवन्द्र जी ने कहा मारमागममा को हम ar भवर में सदा
गाप से मिले हुए हैं पाह्य में जदाई र स्यादि ।
पदि यह पथन यिमन जी काही हे पविषमयाम
माराम सीकेदा माथ प्रपन किया!
मेर यिनमायना न पसान पहा तप अगमवरिष
सिनेमाले ने ममवित छिना है। या माकरण मेजेकर मामा
राम जो साथ घी मिल हुए थप मम्पाला यायनास पर क्षिा
पर भोपज्य महाराज की सेवा में मेमा माया पी।
सोहागण ।
जो पहप मापा में ही प्रयोग ई मा य पर परीक्षामने
मापिमड़ी।

सो स्यादि कुस्सित विधि यिनयान जी ने भाग्माराम जी से सीमी चौकि भारमाराम जी ने रिएनम्रम्ब्रादि माघमा को भी भपने ही समान कर लिया। मपितु जप श्रीपूज्य महाराज जी को विश्नचन्द्र जी का लिना हुमा पत्र मिला तप श्रीपस्य महाराज ने दण्य क्षेत्र काळमाष को देख फर एक पत्र का किम्मित भी उत्तर नहीं दिया पुन श्रीमहाराज में १९२८ का घमासा जोरे नगर में कर दिया। चतुर्मास में यात से भग्यजनों के संशय छेदम क्येि, गपित पाहुल संसारियों के लिये क्या उपाय पन सक्का है जय के गौशालाजी घा अमाळीखो को भगवान भी शिक्षा करने में मसमर्थ होगये ! सो चौमासा में पहुत दी धम्मोचत हुभा फिर श्रीपस्य महाराज मी चौमासा क पश्चात् भनु कम से विहार करते हुए मार्गशीर्ष शुम पप में लाला साबसिंह मोसवाल जौहरी की बैठक में जगरापा शहर में विराजमान गये । और श्रीस्वामी विलासराय जी महा गज भी स्वामी पज्य गमषक्षजी महाराज श्री स्वामी पन्य मोती राम जी महाराज यो स्वामी हीरालाल जी महाराज श्री स्वामी. धर्मयम्मी महाराज श्रीस्वामी तपस्वी रामचन्द्र जी महाराम इत्यादि मुनि भी महाराज साये भौर श्रीस्वामी रानबन्द्रमी महाराज स्वामी प्रयाहरलाल मी भी स्वामी हीरालाल जी महाराज स्यादि पांच साधु मारवारो भो भी पूज्य मदागब जा के दर्शनार्थे जगरावा शहर ही माये मी तय ही पिशनचन्द्रादि नाघु मो भम्वाला शहरसे विहार करके लुधियाने में मागये थे। आप इन्हो मे समा पि जगरायो शहर में भीपज्य महागजपा पन्य पास में साधु एफस्य एए है तय इन के विश्व में यह निश्चय हुमा कि जो हम सूत्रों से विरुवाषर्ण करते हैं मा श्रीपज्य महाराज भली प्रकार से जान गये हैं भय हम को गच्छ से याब करने के लिये दो एकाप हुए है।

- ( ७० ) सत्य है प्रतिक्षारक पुरुप मपनीमाया को स्मृति कर मारी भय पाता है, इसलिये जो हमारे पास सत्र हैं यह सब माई छोग सेंगे इस बास्ते पुस्तकादि उपकण लुधियाना में हो रप कर फिर भी पम्प महागम के वर्शन करे नय सर्य पुस्तकादि एधियाना में दो रस कर विहार करके अगरापां शहर में दी भोपज्य महाराज के दर्शन जा किये। फिर मम्मवादि करने लगे मा भोज्य महाराजगो ने सप साप एकरव करके कहा कि मैं इन विदनव द्रादि दम्य साधुमो कामपन गष्य से पृथक् करता हूं कि इरादो कानता चारित्र ही शुर रहा है माही दर्शन शुख है इसी पास्ते यह मिचारे छल करत मपने वार दांपने के लिये भामरय पोलते हैनप भी पिलासरायमी माराजने या मारवाडी मुनियों ने कहा कि सरे हुए साम्पत (पाम)को रसमा किसो मकार मी भन्छा नहीं हामा इसी प्रकार यह विपनयन्द्रादि मो भखरय पोलते है पा छल करने हैं मोर नाही इन्दों का पारिन गुर है मादी पर्शम सो इसी पास्ते इम को ग स शीम हो पारि करना पाहिये। तय विमसम्द्रादि भो पात पो मम्रता करमे लगे मोर मईम सिगेकी शप जाने लगे पुन उगम परगे इए गदगद पाणी पोलमें लगे, मोर पुनः पुमा यह कहत हुए कदम करत ये है धीम्य महा राजजो मपदमारा मपराध क्षमा गे फिर आएगाप रपाकोने सोई दम भाग हम मल गई म भ भय हो दमारामप पक्षमा करें। तप भी पूज्य माराम ने छपारी मरेदी प्रपनी दोघोलि तुम लुधियाना में पो पुस्तशविर का मारहा लिये सिर होता है कि तुम्हारे मन में एमप में तुम पो मापि - ( ७१ ) गठ में महीं रस्गा ।क्योंकि तुम मसस्य हो लिकते हो । मसस्पहो पोलसे हो। अस काल में ही लाला टीकमराय, छाला राधामरळ, अंगोरीमल्ल, गणपतिराय, शंकरदास, छम्जुमल्ल घोसुमरल स्यादि माई भी स्थित थ। सो उन्हा ने मोनोपूज्य महारामनी से पातदी पिप्ति करी कि भी पूज्य महाराज जी भय इन पर क्षमा करो क्योंकि यह मय भूल गये हैं । तप भी पूज्य महाराज जी मे कपा करी कि हे माझ्या यह विश्नचन्द्रादि महान् एल कर रहे है मौर इन का चारिष था पर्शम फलंकित होगया है भोर भी न का सर्व भाचार श्रीफल्म महाराज ने अब भाईयों को सुनाया तपस माई कहने लगे कि महारासमो अबइम को नितान्त मत रमोसी दो समय श्री महाराज में विश्नवन्द्रादि गण को भपने गाउ से पास करदिया तप यह लाला सोपसिंह की बैठक से मोचे उतार गये बिनके माम यह यथा !~~ विषमचन्द्र बी १. हुकमचन्द्र बो २ निहालचन्द्रजी३, निभानमस्त जो ,सलामतरायओ५ तुलसीरामनी मयामस्ळजी ७,चम्पालाल जी, कल्याणचम्दजी ९, हाकमयम्दजो १०, गुरदिचामरळ जी, १५, रसारामजी १२,जप यह जगसंषा से दो घा तीनकोस के मनमाम पळे गये तप इनके मन में न जाने क्या बात माई फिर यह जगराम दीमा गये पुन श्रीमहाराज जी से सदन करते हुए विज्ञप्ति करने मगे कि आप हमारा भपराध क्षमा करें मोर जो इच्छा हो षही प्रायश्षित दे घेघे हम मापके दास हैं मपितु यह कथन भी इनका एक ही का था क्योंकि इनको इच्छा मीर भी कतिपय मग्य जीवों को सन्मार्ग से बहुत से पर विश्नचन्द्रादि साधुओं ने भईम की शपमा कर भीमदाराम को लिमकर दिये थे। शाक हे प्रमार से यह पप जिन मिम्म गये ।

( ७२ )
।
परान करने को थी। किम्व भीपज्य महाराज जी ने ग्नक एस
कथा को फिर भी म स्वीकार हिया मोर प्रोमदाराम में फिर मी
यही कृपा को कि हम को तुम्हारे वचनों की प्रतीत गई गौर
भसस्यवादो पोशा के मो भयोग्य हान है सो धमन मत्रानुसार काम
किया दम श्रीपज्य महाराज ने इनका T म रचना माहो तो
फार क्यिा तय यह मिराशय हाकर लुधियाना महो भागये । तिस
काल में भारमाराम जी जालघर में य तय विमपन्द्रादि साघुभारमा
राम को मा उम्पर गेही आ मिल फिर इम्हाने सोया कि बर माने
के लिये का उपाय करना चापिये मो कि मामारामजीकेदी जीपग
परिव से सिम है जैसे कि जाया धरिम के पृष्ठ ५. पर मारमा
राम जी कहते है कि यदि तुम को इस देश में पिवरना हो सो जोर
छपा कर शहरों शहर भावक भीर गामो प्राममरिक शुभ भयान
फा उपदेश फरके श्रापक समुदाय पनामो पोंकि विमा भाषक
समुदाय के इस पस्यमवाल सयम का पालना काठम है यादि
फिर पपपत है कि
प्रापासपही क्षत्रों में देर रमन जितना ठिकाना दम कर रहा
इस देश को दम पदापिन छोडेंगे यारिफ्धन स उबर पापण उपाय
विचार कर लिया किन्तु जब सभी पूज्य महाराजगे इनका मपमे
गच्छ से याम किया तपश्यात् मायाकार मो माय इन गमापा
पयेश में गहीं फसा किरत जा प्रथम हो भपने गगका कर रखे पेपर
भी कितने मन्माग भागये। पित जालघर से यिनचवानि
सम्पनि मियाजार विद्या पास्से उपर पुर।।
फिरपा जंग पाघ गरेभार घीमामा मापद हालिया किन्तु
जप माला मशाद मशाह परदाम, गणेशवास, नियालशाद.
वोतशाद इस्पादि मायों व सम्मुगनिज भासय प्रशित कामे हो
सय फिसो मे मोम मसस्पोपदेशको म स्वीकार किया।

( ७३ ) भपितु लाला रणजीवसिंह ने अपू में पधार कर विश्मर्चद्रादि के साप.प्रश्नोतर कर के तिन को मिक्चर किया सो उस फाल का स्वरूप विश्नवदी ही जागते थे इस ही प्रकार प्रायः मन्य मगरों में मो इसके साथ यही पर्याय होता रहा । मौर श्रीपज्य महाराज के गच्छ में रहने वाले श्री धीरशासन के मुनि इन की स्थकपोल कल्पित पातों को मसस्य करके दिखाने लग पा सापियें भी यथाशकि इनके मसत्याप देश की सूत्रों द्वारा समालोचना करके भव्यशोषों को दिखाने लगी भपितु धी महाराज मे १९२९ का धौमासा पटियाला नगर में ही कर दिया। तय ही छाला पसीराम नामे पास ला• शिशुराम (श्रीकृष्णदास) परियाले वाले इस्यादि पानसे सद्गृहस्थाने स्व सम्मस्पनुकूल परित शम्नाय को एक पत्र देकर प्रायः पजाव घेश में पह प्रगट फर दिया कि यह विश्नयद्रादि घेषधारी जिनामा स पिरख उपदेश फरते है भौर विरुददीन का चारित्र होरहा है सो यदि यह किसी मो मम्य को मिठ्याउपदेश देये सो यह उपदेश मानने योग्य नहीं है तथा किसो के मन में कोई भी शंका हो यह सूत्रों द्वारा निणय कर लेये मोर इन का माचार व्यबहार जैन मतानुकूल नहीं रहा है अप ऐसे जयन को पण्डित जी ने मगर नगर माम माम में प्रसिस कर दिया वप लोगों ने उक्त प्राह्मण को यह उधर दिया कि पंडित जी इमने वो प्रयम होस पास को विधारा दुमा है सो कइयों ने पत्रोपरि लिखिवादि भी कर दी। • भीमती भार्या पार्वतीजी मे मो सयेगियों को पात ही सुन्दर उत्तर दिये है का स्थान पर इन कोपराजय भी किया शानदीपिकादि कई सुन्दर पुस्तकमा लिने है देखोइन का जीवन परित्र उर्दू भाषा मेमोपा हुमा है ( ७४ ) भय पाठकगम यिधारे कि यदि आत्माराम जी का पा वित घद्राविण्य लिहियों का सत्योपदेश था फिर क्यों न किसी प्रे सस्य पथ पर लाये किन्तु जिन को प्रथम दी मपने मतानुसार कर रसा था उमफो हठ त्यागना दुष्कर होगया । मय यतलाइये मारमा राम जी ने चार पणेी में से किस को जैन धर्मी यनाया । फिर प्रोपून्य महाराज बीमामा के पश्चात देश में अपने सत्यो पदेश द्वारा प्रमोच्छेदन करते हुए विवरमे लगे । मोर इसी प्रकार मी स्वामी जोपनराम जी महाराज ने भी 'टघम मामक प्राम में मात्माराम जी को मपने गच्छ से पृथफ किया तय मारमाराम जी याहुनही सद्ग परने सगे तय थी जीवनरामजी महाराज ने रूपा फरी हिमपर्धा मना रोता है तुमको तो मप मय में स्वत करमा परगा गपिट में सुम को भय गष्य में कदापि म रगा। सय भात्माराम प्री में स्वाप्रकरयाकल यह काम किया कि पम लिपर धी स्यामी जीपन राम जी महाराज पो देदिया । भीर साय दी यह कह दिया कि यदि कोई भाप से पूछे कि मारमाराम पागापने पर्चा गच्छ से पाय कर दिया सप मापने पह मेरा किया मा पत्र दिसला देना। स्वामी जी महाराज महाग मन पुष्प पे उन्होंने इस पात को स्पोकार परपे गारमारामजी से पसलिया गय हम भी उस पर को नास भाप जीयों के दिखाने वारते इस स्थाग पर लिख देते हैं यथा पपम् । धीजीयणगममी पो भया भारापना वादांगकी पर मोश में जाये है गीर जो श्रीगंदी जो मैं स्मां के माम है सा तम भगवान 'यद पश्यन माम पजाप दश फोसपुर मिले में सोरे नगर से पांच पोसरे मंतर पर पसता है।

७५ ) के बनाय हई नही माघार्य के षमाय दुर है सो सर्व सच्चे मही मापनी मत कल्पमा से मेल संमेल करके घणाय है। मौर जो षतमाम में ग्यारा भग हैण में मी मेललमेल करवा हमा है पह अदाम भी मोषमराम का। पतीसूत्र पईसाठी सूम बौरासी सूत्र तथा १४००० हजार पसर्व मत कल्पना के षणाय इय है भगवान की पाणी नहीं। माराधना शावांगी करके मोक्ष जाये है और भीनंदीजो में मितम सूत्रों के माम हे सा सव सच्चे है। भीर जो पिछले माघाय प्रमाणी का के घाणाय इय जो प्रय है सो झूठे नहीं पद भवान मारमाराम की है ति। यह पष किसकर भारमारामजी में श्रीस्वामी सीवनराम जी मदाराम को ददिया भोर भीमहाराज ने मारमाराम को गम्छ से मिग्म करके १९२९ का चौमासा फिरोजपुरमै ही करदिया पाठकगण मारमा रामजी की यिधाको मो येन थे । सो मम्माम कार्तिक मासमै छाला रणमीमसिंह जी मो फोरोजपुर में ही भागये तय श्री जीवनराम जी महाराम ने यह पत्र भारमारामजी का लिस्मा हुमा श्रीमान भाषकजी को दिखा दिया नो रस में कहा कि मारमाराम जी ने माप के साथ प्रपन्च किया है क्योंकि जो कुछ भारमारामजी ने भापको असा विषय लेख लिया तो क्या पह लेख माप को सम्मत है तब स्वामी जी महाराख ने छपा फरी कि मुझे तो उक्त लेख प्रमाण नहीं है भौर नाही मेरा रक फपनानुसार प्रदान है तप श्रीमाम् में कहा कि जो कुछ मापका मन्तव्यामतम्य है सो पर इस पत्र पर ही लिखें क्योंकि जो इस पत्र को पढेगा उसको भापका असाम पा मारमाराम जो पा भयान विदित हो जायेगा तय स्वामी जी ने उस पनोपरि ही यह देख लिख दिया । घेखिये ( ७४ ) भय पाठकगण विधारै कि यदि आत्माराम जी का पा पिन चद्रारिम्य लिलियों का सत्योपदेश था फिर क्यों न किसी को सत्य पथ पर लाये किम्तु सिम को प्रथम दी सपने मतानुसार कर रखा था उमको हठ त्यागना पुष्कर होगया । भव पतलाइये भास्मा राम जी ने घार वर्ग में से किस को जैन धर्मी पनाया फिर श्रीपूज्य महाराज चौमासा के पश्चात् देश में मपने सायो पवेश द्वारा प्रमोष्ठेदन करते हुए पिघरमे लगे । ओर इसी प्रकार भी स्वामी जीवनराम जी महाराज ने भी चूरचम मामक प्राम में मारमाराम जी को अपने गच्छ से पृथक् किया सब मारमाराम जी पद्धत ही रुवम करने लगे तय भी जीवनराममी महाराज ने रूपा फरी मच पयो समा राता है तुमको सो भव भव में खन फरमा पडेगा गपितु में तुम को गप गच्छ में कदापि न रसुगा तय मारमाराम जी मे स्वम्मकत्यामुळ यह काम किया कि एक पत्र लिखकर प्रो स्वामी जीयनराम जी महाराज को देदिया। भोर साथ ही यह कह दिया कि यदि फाई भाप से पूछे कि मारमाराम को मापने पो गन्ध से घाम कर दिया सम भाप पह मेरा हिस्सा हुभा पर दिखला देना। स्वामी जी महाराज महान् मद्र पुरुप ये उदो मे इस पात को स्वीकार करके मारमारामजी से पत्र ले लिया भय हम भी उस पन को मकळ भम्प जीयों के दिखाने वास्ते इस स्थान पर लिन देते है पपा पत्रम् । श्री जीवणरामजी को श्रया माराधना वादशांग की करके मोस में जाये है मीर जो धीमधी जी में सूत्रां के माम है सो सूप मगधाम 1 "यह चरमक प्राम पंआप देश के फीरोमपुर मुिळे में जीरे मगर से पांच कोश के मवर पर बसता है।

( ७५ ) के पनाय हुई नदी भाषार्य के यमाय मुर दै सो सर्य सच्चे नही भापमी मत कल्पना से मेल संमेळ करके घणाय है। मोर जो षतमान में ग्यारा भग हैण में मी मेल समेल करघा मा है पह अयान भी बीवमराम का पत्तीसूत्र पईसाली सूम चौरासी सूत्र सपा १४००० इमार पसर्ष मत कल्पना के षणाय इय है भगवान की पाणी नहीं। मारापना वादशांगी करके मोस जाधे है मौर भीनंदीजी में जिवन सूत्रों के माम हे सो सव मच्चे है। भीर जो पिछले माचार्य प्रमाणी फा के पापाय हुय जो प्रय है सो झूठे नहीं है पर अखाम भारमाराम की है ति। यह पत्र लिखकर भारमारामजीने धोस्वामी जीवनराम जी महाराख को ददिया भौर श्रीमहाराज ने मारमाराम को गन्छ से मिम्म करके १९२९ का चौमासा फिरोजपुरमें ही कर दिया पाठकगण भारमा रामजी की विधाको मो ऐप ळे । सो भनुमान कार्तिक मासमै छाला रमजीतसिंह जी मो फोरोजपुर में ही भागये वप श्री जीवनराम जी महाराज ने यह पत्र मारमारामजी का लिसा हुमा भीमाम आषकमी को दिसला दिया तो उसने कहा कि मारमाराम जी ने माप के साथ प्रपञ्च किया है क्योंकि जो कुछ मारमारामग्री मे मापको प्रया विषय लेस सिमाहे वो क्या पद लेन माप को सम्मत है तप स्यामी जी महाराज ने छपा करी कि मुझे तो उक्त लेख प्रमाण नहीं है मौर नाही मेरा उक कपनानुसार अमान है तय भीमान् ने कहा कि जो कुछ मापका मन्तव्यामतन्य है सो यह इस पत्र पर ही लिखें क्योंकि जो इस पत्र को पटेगा उसको मापका भयान या मारमाराम जी का मयाम विदित हो माघेगा सय स्वामी जो मे सज पनोपरि हो यह गलिश दिया । देखिये

-
( ७६ )
३२ सूत्र परमुख सर्वमत रुपमा माय एप पर की
लिसत मुला कर हिस्खी सो नहीं परमाण विपतमाम पिप सममा
परूपण करि होते सप मिच्छामिदु. २ पोझेस,१९२९ कार्यकम 11-
१२ भगवी भगवान केपलीहानी के परपे सर्व तहत प्रमाण खो गणधर
मादेष धृत फेघली के कहे सप सासभधार र परमाण है। दिस
धर्म का सासन परमाम नहीं इ० नीषणराम साधु के फोरोजपुर में ।
मिययरो!जैसे उक पत्र में स्लेम है से ही मने मी लिम दिन
छाये है। अप देखिये जा भी जोधमराम जी महाराज सायम
लिखते हैं कि
ऊपर की हिम्मत मुछा कर लिसी इत्यादि मय पाठकगण ! स्वयम्
पिधारेंगे कि भारमारामजी के जीवन चरित्र में लिसा हे कि जीवन
राम बोको नमालिपा भप पाठकगण विचार किमीजीपनरामजी को
फिसमे भ्रमाया प्रियघरो मयश्य हो कहना पडेगा मारमाराममो में।
मपितु श्रीपज्य महाराज नगर २ माम २ से मिथ्या मत का माश
करते हुए नालपर नगर में पधार गये।
सो यहाँ हो १९३० मापार शुरू ५ मी को स्वामी हरमामदास
जी पा स्वामी गार्षिदरामजी या स्थामो पपायाराम मी को दीक्षा
देकरके १९३० का थोमासा दुशियारपुर में मा किया।
सो पहुत से मम्य जोयों का मिथ्या मार्ग से मुक्त करके जिन
धर्म का उपोत करते हुए चोमासे के पश्चात मनुनम से विहार करके
लुधियाना में पधार गये सम लुधियाना में लाला प्रधामन्य मामा
मरहीमल्ल लाला हमल्ल लाला गारोमल्स इत्यादि सधायकों ने
अमधर्म में हद होकर समधर्म का पहुन हो उपोत किया फिर
भीपूज्य महाराज मे मदौर शहर की मोर विहार कर दिया।
क्योजिविस समय मोर सादर में तपस्यो सेवकरामजी महा

- राज ने तपस्या की थी जप, भीमहाराज मदीर शहर में पधारे सय भाईयों की मतीव विज्ञप्तिके प्रयोग से १९३१ का चौमासा मदीर में ही कर दिया सो चौमासा में घरोंचोत बहुत ही मुमा चौमासे के पश्चात श्री महाराज पिचरते हुए मम्य जनों के शय दन करते हुमो ने १५३२ का चौमासा मामा मगर में कर दिया सो मामे मगर के पासी मोसवाळ घा घेश्य लोगों ने धर्मोपोत पातही किया मौर इस चौमासा में लोगों में जान मी भतीष सीमा । भव पाठक जनो को यह माकांक्षा मी मषश्य होगो कि जब श्री पूज्य महाराज ने विश्नधद्रादिमों को मपने गच्छ से मिम्म किया था मोर प्रो जीवनराम जी महाराज ने मारामारामजी को स्थ'मछ से प्रपन किया था तो फिर पाकिस महारमाके शिष्य पर्ने मोर उस महारमा के पूर्वज महारमा से थे सो पाठकों के सह छेदनार्थे हम इस पास के मिपया स्व लेखनी को मारूद करते । प्रिय मित्रपरो! जय मारमाराममो या विवनयमादि सषद्रव्य हिती सुधर्मगच्छ से पृथक किये गये फिर इन का समुचित उपदेश मायः किसी भी भष्पमे म प्रहण किया किन्तु इन फोही लोक गुरु होम कहने लग गये फिरहोंने अनुमान १९३२ में भगवान पर्वमान स्वामी का लिसा परिपतन कर दिया मोर शहर महमदाबाद मे पहोंष गये फिर वहां पर घुधि विजय को गुरु धारण किया जोकि पूर्व सुधर्म गच्छ से मिकलकर नपागन्छ गया था जिसका नाम क्टेरायजो था। ध्यान रहे रलारामजी ? गरुविचामल्ल जी! तामसे प्रथमही + पृथक हो चुके थे। फिन्तजा महमदाबाद में पहोष गये थे उन्होंने नपाग छ का यासक्षेप लिया था। भोपूज्य महाराज मे इसी सम्बालरमै गष्य को उन्नरपर्थे सम पानकल ३२ मालिसे थे जोकिमयापि पय्यम्त गग्स में प्रमालित है।

( ७८ ) भप हम पीताम्मर मतका किन्धि वृत चतुर्यस्तुति निय पाकोद्धार से लिखते हैं। सनमम मना ! चतुर्थ स्तुतिमिर्षय शंकोसार प्रस्तावना पृप ५४ पकि १४ ची से देखिये ६ वमारे धायक लोकों में विचार करयो ओईये फे भारमाराम जोनी बीसी पीढ़ी थी चोपी पीढी पाला उन्लो परिप्रहमसंयम तो सर्व सघर्मा प्रसिमरने जैम शारखाना भमिप्राय थी सो पमनी सर्व पेटीयो बसयमी सिर थायछे केमके आरपाराम जी मानद विजय जो पो तानी यमाली पूजामा गुरु मायळि लपीछे से पहयोछ । सस्य विजय १कपर विजय २ क्षमा विमप ३ मिन विजय उत्तम विजय ५ पमषिमय रूप विजय ७ फीचि विजय ८ कस्तुर बिमय र ममि विजय १० मुधि विजय ११ मुकि विजय १२ तस लघुम्राता मामंद विजय पसर्व पेढीया धो गच्छाचार पोळपत्र प्रमुखग्रंथों मा भमिमाययो ममे जैन लिंग यो विश्व सिम्याथ छे केमकेपोमा पलियांपर सपा पित प्रमुख रंगेला म घारका पालामे गुम गठ भाचार्य माग्या रहित मलिंगथी विरापि खाछे मे प्रथम एमनी पेटीमा भी सत्य विजय जीपम्पासे गुरु मामा विमा पलियायर करश मेश्यार पछी फेटलोक पेटी वाछार एकायियारया मेपोवो फरक रंगीला केशरी या काय ते पर्ममाममा पर्ने छ तथा जैम प्रथम तो भाधार्य सपापायनो निधायपिना माकनामघोने मारमारामजी पोते तथा तेममी पेटो वाला श्री तपागमन नामपरायोमे भी तपागच्छना गाषा में शिपिस सयमो माणो सेममो मापामा प्रयता मापी में गणीप्रमुग्न पदयी पोतानो मेले धारण करेछे पप भी मंगमिया प्रमुख जैग सूत्रोमा गुरुगा माघार्य विमा पोवामो मेछे गणो प्रमुख पदवी धारवा याला मे महा मिस्यापटि गराधक पावं मतियों में इप्पिये पण देख पा पाछे में मारमाराममी मानव विभव जोगी J ( ७९ ) गुव पर परामा मचापि जुभी कोई भाचार्य उपाध्याय थया नयी तो पपकोई सयमो गुरुगष्छा पार्य पासे उपसंपदा चार्य पदवासक्षेप कराया बिना मर्थात् नयोदिक्षाने भाचार्य पद पासक्षेप कराव्या पिना मनेपालीनाणार्मा कोई संयमी भाचार्य ने सं माचार्य पदवी दी धाषिमा पोताना इष्टिरागी पाणियाउ मा पीधेळो भाचार्य पदस्वीकार फरी पोतामा। करेला प्रश्नोतरातम प्रथमा २१४ मा पृष्टमा छपा म्युछेके पालीताने में चार प्रकार महा सपके समुदाय ने भाचार्य पद दवा •चर्चा पन्द्रोदय भागतीसरेके पृष्ट ३० पछि ५ पर लिखा है कि प्रश्न ? तुम भोरमाराम जीके नाम के साथ में सूरीश्वरपद देक कर क्यों अळते हो भनुमाम होता है तुमको सनसे कुछ डेप माय है। उचर-मित्रवर हम जळते भी नहीं है मोर हमको पन से कुछ मेपमाय भी नहीं परंतु परिद्री का नाम लस्मीपति रसगा पुछ महीं सपक्षास्य होता है। प्रक्ष्म-वधा भारमाराम जी को सकल थी सघन रिपद नहीं दिया है (उत्तर) सपत ( १९४३) में मारमारामजी ने पालिताणे में चौमासा किया मीर कात्तिक शुक्ल १५ को शत्रुजय तीर्थ की मात्रा को भनेक भाषक माते ही हैं। उनमेसे दो चार शहर के रहने पालो मेरो मारमाराम जीके रागी थे) मारमारामची से कहा दम मापका मापार्य पदयो ऐना चाहते हैं मात्माराममोने ममालूम पना काम जाम फर इसमात को स्वीकार करलिया मौर मनमे फूलगये इतना मो महीं कहा कि हमारे घरे गुरुभाई गणि जो भी मरषदजी महाराज सया भी पूरि जी महाराज से इसपात में सलाह भोर माझा ऐना पाहिये दूसरे दिन भाषकों ने शेठ मरसिंह केशव जी को धर्म शाला में एक मकान सझा कर भारमाराम जोको पाट पर पैठाय दिया मोर किवमेक भाषको ने इकडा हो कर मंभापम किया कि मामळ मारत नाम विजयानद सरिभपर प्रसिद माम भास्माराम मुनि इस्पादि पोतानी भाचार्य पदधराषो मारमारामजी ने नरक निगोदना कारा गारमा परवानो इच्छा करयो न सोइये ।। मादे मारमाराम जामा हितमे घारले तमन्ने कहिये छोय के से भूमि माघार्य पदसे धीन हो गई मसकी सलाह हो तो श्री भारमाराम जीका रस पासे धिमूपित करें कितनक भावाने सर्बको कि महाराम पर भावार्य पद का पाउलेप कौन करेगा। पास झेप करने वाला साधु होना चाहिये जा महाराज से दीक्षा में पमहाधे माघार्य पर मिले पोछे महाराम जी गणि जीओ मूळघरद जी महाराम तथा पनि चद्रजी महारास को पदमा करेंगे या नहीं करेंगे ता भाचार्य पद की म्यनवा दोगा गोर नहीं करेंगे तो परस्पर विरोध होगा इस पात को सोख लो किसनेक भावकों में कहा कि सोम लिया जो काय करने को मापळोग इकटे हुय है उसको करना हो मुनासिब हैपस इतने में माम मोर पसा के कितनेक भावों में जो मारमा राम जी के माम्य भायक गिन जाते हैं उंचे स्वरस कह दिया कि पोळो भी सूरीश्वर महाराम की जय म किलो से पासक्षेप ख्यिा म कुछ किया मनुष्टान किया मारमाराम जी उस दिन से अपने भापको सरिमानमे छगे शिष्यवर्ग से कादिया मामसे हम का पूरि लिया करो हम कहते है अंगल में मोर माया किसने मात्यादि कपन उक पुस्तक में हैं मपितु उत पुस्तक साधुमागियों की विरचित नही है शोकमामाराम जीके जोधन परित्र लिसा है कि ३५... सहन ममुप्प में रिपद मारमाराम घी मे प्राप्त किया सोहम पाते हैं । भावार्य पदसा देस है या गृहस्थी मोर क्या घिधि क्या पर्णन है भीर किस गच्छ के भारमाराम जो आचार्य बनाये गये क्योकि भिारमाराम जी के गुरु के पचेत परत घे मोर मारमाराम मोके पौत, मात् पीछे मरम इत्पर्य मारमाराम जो मवमोक होय तो जेम मी जैम शास्त्रोमा न्यायपी प्रोजी धौथी पेढी पाला श्री प्रमोद विजय जीना गुरूने संजमी। माणी वया साधू समापारी पोतानो परपरामा सर्घपा जिउन नया तो पण श्रीगुरू मामाए क्रियावत संयमी गुरुनोहा ये दिक्षा प्रमुख साधू समाचारी तथा गुरू परंपराए माघेलो महासघ समस श्री गुरु पोधेछी माघार्य पदयोना धारक थो विजेयराजेन्द्र रिजो ने सयमो वाणोतेमनी पासेउपसपद मर्यात् नयो दीक्षा ग्रहण करी क्रिया उद्धार करपो ते एमने पण सयमी मुनीनी पासे चारित्रोप संपत् मर्यात दीक्षा भी जोइए केम के फरी दीक्षा लेवी थी एक तो कुलिंगपना म फलकटली अमीमान येग लोया अशे ने पोमु पोते साधू गयी तो पणममे साधू डीए लोकोमे कहे षु परे छे॥ तद रूप मिथ्या भाषण दुपणधी यषो जसे ? मने प्रोजु से कोई मोळा पाषकपम ने साध करीने माने छे से भावका नु मिथ्यात्य पण गनु था अशे एयादि षा गुण सस्पग्न थशे माटे जो भारमाराम जी भामंदविनयमी भारमार्यों छे तोए ममा कहे परमोपकाररूप जाणी •में भगीकार करशे सपा भाचार्यपर लेवामी पांछा हाय तो भारमाराम जी ने उचित छे के प्रथम कोई परपरागत सयमी भावाय सोने सपा जयु मम परंपराए पोसह सालाप पमाय वाचार के महाणु मागस रिणोगण पोसग घारगा संयमे सुपवा ! स्यादि श्रीभग लिया प्रमुख जैन सुमोनो माहाना धारक श्रीसुधर्म परंपराए पोपघसाला प्रमुख परिग्रह ममाव छोसोने मर्यात शिपिला पारपणु मुको ने किया पसारना करया पाळा पया कोई महाणु मागसूरिभावार्य मो इसेमनी पासे दीसा लेई माघार्य पधारण करे वो मागमनी मग रूप दुपण पीपयोजाय अमेएम ने मावार्यमानषा पाला प्रायकोनु मिरयास्व पण वेग लुपालय मे नरकनिगोदरूपो कारागारमी मोजमान घानो मयपण दली जाय केमके ममाचारीने वाघू तया मनापार्यने मावार्यमाम घोपम wmom ( ८२ ) हादु मिथ्यारप छे षष्ठी परपरागत रूपमी गुरूमाचारनी पासे पारिनोप संपदा चार्यपद मर्थात् पीक्षाभने माचार्य पद लीधाषिमा कदापि जैन शास्त्रमा साधू पण तथा माघार्य पणुमान्य करधन थीं । माटे सयमी गुरु सपा माघार्यनी पासे संपम लेने साधू पषु तथा माघार्य पणु मात्माराम जी ने धारण कर्मध मोरयेने पूर्णांक रोतो थी साधू पण, सपा भाचार्य पणु धारण नहीं करो तो जनमत गा शास्त्रो नी थमा पाला पम ने जैनमत ना सापू तथा भाषाय केपी पते परमाण करी भगीकार करशे । स्यादि तथा उक हो पुस्तक के पृष्ट २९ पर लिखा है कि पहिले मारमारामजो थारूपयो दुदिया था नेपछी स्वलिङ्ग योमहावीर स्वामिमा यति मा स्पेत मानो पेत कपलामो छोरीमे गम्पलिा पीताम्मर मयतिनो प्रहण करको परम्सु कोई सपमी गुरु नीपासे धारिभोप सपत् मर्यात् फरीने दिया लीधी नहीं मने जैनी पासे दिक्षा प्रहण कर पामु को छे तेएममा गुरु पासे मुख फहसाफे में संयमी नहीं होतया पीयाम्पर मणिविजपादिक मी गुरुपरंपरातो बहु पेटीया थी संयम रहित हतो तो फरी मसंपती मी पासे दीक्षाने उष संपद प्रहन करवीप जिनमत ना शास्त्रोधी विरुद स्पादि वया पृप्ट २९ पतपरि लिखा है कि फारम सोमाम पिजयजी तो ओम श्रीरूप धिमयजीए रूपसी पदममी माममोरियो पलायो तेम सोमाग विजयजी पणहरियो चलायता तपा मतपम मचि भी गुर्जर मारवारस पेशमा सर्य संघमा मसिद छे इस्पारि वया पृष्ट ३१ पर लिया है कि श्री प्टेराय जीए सर्पसंपेगी नामधारी मे पुगुरुसमझो तेमनो लिंग स्यागन करो स्थेत कपटा धारण फरी इत्यादि सपा पृष्ट २७ पर लिमाई कि मारमाराम जो मामदपिअपनी स्रो यिवान पणामो गमिमाम धारण करी दुदकमत माथो मोकलीने पूलिंग पर्णपारण करघुपणको सपमोगुरूदेखी मनी पासे व्यसपद नयी दिक्षालोपोनही स्पादि। .

पाठकगण! सक लेस भात्माराम जी के हो गडछका हैलो र्य विचार करें कि आरमाराम जी श्री भगवाम पर्द्धमान स्वामी उपादम किया साधु धर्म पा लिम छोर करके परिग्रह पारियों शिष्य बने जो कि सयम से रहित धन से विभूपित हुंगियों ये पाठकगण क्या जाने मारमारामजी में इनके धन को ही देख विधार लिया हो कि यही भगपन के शाप्सम के हैं। धोकि इनके पास धम पटुत है सो भगवान् मी ससार पक्ष पुत्र होने से परे ही धनादध ये शोक !!! शेष समीक्षा इनके । पाठकों पर छोरसे है। क्योकि मषिक समालोचना में विस्तार का मय है सो यह तो गम जान दी गये होंगे कि मारमाराम जी सयमयुतो स्याग कर ह धारियों के शिष्य दुए मोर न तो कोई उनके गच्छ में यदी मा है माही उपाण्याय सत्य है जप संयम ही नहीं है तो माचार्य कहां से हो। किन्तु श्री पूज्य महाराज का १९३२ का चौमासा मामे शहर में द से पूर्ण होगया श्री महाराज चौमासा के पश्चात् विहार हे देश में जय विजय करने लगे। फिर भी पूज्य महाराज ने मारेरकोटला, रामपुरा, लुधियाना र, फगवासा, जालंधर, कपूरथला, गुरुका अंरियाळादि नगरों में घोत करके लाला हरनामधाम सवलाल गोसपाळ फो बैठक में १३ का चौमास कर दिया । चौमासा में धार्मिक कार्य यहुन से हुए भोर चौमासा में हो :पक्षप धर्म के प्रकाशक पत्रक्षयोपशमता के कारण से घेराग्य र को प्राप्त होते हुए ममृतसर में ही मागये जैसे कि-श्री पूलो मी, १ श्रीशियघालमी, २ श्री सोहनलालमो, ३ भी गणपतिराय

,
( ८४')
जो, ४ सो श्री धूळोरायमी पसकर के यासी मौर श्री शिवधासभी
रोहतास के षसमे हारे और प्रोसोहनलालमी समरयाले के पसने
पाले श्री गणपतिरायमी पसकर के रहने पाले तिम्होने भोपून्य महा
राज के पास दीक्षा के वास्स विज्ञप्ति की श्री महाराज में विमप्तिो
स्वीकार करके १९३३ मार्ग शीर्ष शुका पञ्चमी चंद्रधार के दिन
चारों को दी दीक्षित किया।
फिर बीमहाराजने पूछोययशो को भी सबचम्ब्रजी महाराम के
शिष्यकर दिये मोर याशिवाजी महाराज याश्रीसोहनलाल जी
भी धर्मचन्द्र जी महाराज के शिष्य कर दिये श्रीगणपतिरायजी महा
राज श्री मोतीरामजी महाराज के शिष्य किये गये।
जिम में से पो सोहमाळ मी महाराज ने विधामभ्ययन करके
थोरेही काल में संवेगमत का पराजय किया स्वामी जी महाराज को
युकि के समुष मारमाराममी खरे मही हाते थे मौर जिन्हों में बहुत
से मम्यमीयों की मिप्पास्य को नष्ट करके पुना उमको सम्यवस्य
में स्थिर किया है भाज दिन सुधर्म स्वामी के ८९ पट्टोपरि
विराजमान है सूर्य समान प्रकाश कर रहे हैं।
अपम योदूसोराय की को या पूज्य मोतीरामजी महाग की
निभाय किया था गपिन थी महाराम में स्वीकार नहीं किया फिर
श्रो प्यचंद्रजी महाराज का शिष्य किया गया।
भो भगयान पर्वमान स्वामी के ८९ पट्टापरि विराजमान भी
पज्य सोहनमाळमी महाराज है जिन्होंमे संगमत का मार मारा का
घार परामय दिया है जिनका स्वरूप मागे लिला जायगा।

अपितु श्री पम्य महाराज (भी सोहमळाळजी) का अन्म सम्पत् १९०६माघ मास कृष्ण पक्ष प्रतिपदा स्यालकोट के जिला समस्याल मामक मगर के छाला मथुरादासजी को धर्म पत्नी माई लक्ष्मीदेवी के क्षसे हुमा है देखिये जन्म कुरली तथा भावार्य षर्य श्रीपूज्य सोहन सामजी महाराजका अन्म लग्ना ग्रोविक्रमाद १९०६ पोह मास धमार्क मषिप्टा १८ माघ कामा प्रतिपदा रषिषासरे ऐन्द्र योग पुनर्षसु नक्षणे वृश्चिक छनोदये भोसवंश । श्रीपज्य सोहनलालजी महाराज की जन्म कुण्डली । शु०९सून .१ रा. श०१२ श्री पूम्य महाराज परमशास्ति मुद्रा हैं भी गणपतिराय जो महाराम भी उक्त गच्छ में गणाषष्छेदिक पा स्थविर पदसे विभूषित हो रहे है जो महाम दीर्घ दी है मौर श्री सघ के परम हितपी है स्थामीजीका जन्म पसरूर शहर जिला स्यालकोट पीयिझमापर९०१ मान पद कृष्णा पक्ष तृतीय मगल पार के दिन लाला गुरुवासमल्ल भीमाल की धर्म परनी माई गोर्या की कुक्षसे हुमा है स्यामीजी के जन्म सागरे मह देखने से यह स्वयमेषहो सिर हो जाता है कि स्पामोजी महाराज परम हिलपी।

अथ श्रीगणावच्छेदिक गणपतिराय जी महाराज की
जन्म कुण्डली।
विक्रमाय १००६माद्रपद कृष्ण पस तवीया मीमयासर।
-
ट
श०१२
म०२
१९क०.
सोयह कयन प्रसगसे मत्र लिखा गया है।
किन्तु दीक्षा देकर भी पूज्य महाराज ने प्राम मगरों में धर्मोप
पेश कर रुधियाना माछीपाडा, सरप, रोपर इत्यादि नगरौ
में विचरर के १९३५ का खौमासा भालागर में जा किया सो चौमासे
में मोद्योतयात हुमा।
पाठको को स्मृति होगा के हममे पूर्व लिखा था कि १९३४ के
चौमासा में मारामारामजी काम करना सिस करेंगे सो पाठक वृन्द!
ग्याम से परें कि १९३४ का पोमासा मारमाराममी का जोधपुर में या
भौर श्रीस्वामी जीधनराममी महाराज का घोमासा तपाही अंगळदेश
के भाई फोट मामक मगर मे था सप गमाराम जी मेजोधपुर से
अपने दाप से एक पत्र लिन फर स्वामी जीयनराम जी महाराज की
मार कोट में भेजा सो उस पन की मकल यपातम्य मम्य जीपों के
दिनाने धास्ते लिखता ! मोर मिसफे पदम से पाठको फा मारमा
राम मी की पिया मुसि भली प्रकार से विदित हो जायेगी।

८७ ) अथ पत्रम्। स्वस्ति श्री माश्या काटे साधू जी श्री श्री श्री श्री श्री श्री जीवणरामको योग छिपो जोधपुर सेतो मारमाराम मे सुपसावापिमा. पणा संपकरी सयधी षष्ठत बहुत करके वाचमी मागे मापने तो मेरे क मूलाय दीया है परन्तु मेरे मन में तो भाप घरी एक भूलते नहीं है कारण पण हे जोपाळ भषस्थापी मापने मेरी पालना करी ममे पता या जो विया मेरे कुमार है सो सर्ष मापका उपगार है भमे भय जो मनुमाने लापा भाषक मेरी सेवा करते तथा १४ साधू मेरे साथ है एसर्व माप ही का उपागार है सो भाप क् मिळणे के बहुत ममि लापा लग रही है सो माप के गुण सो मेरे . सर्व मालूम है मुहस कई मही जाते है माम घरचक में भाप से घणो मरज करी थी के मेरे क माप दुर म करो परम्स भाप वो गुरु के दर पे सो मेरा फ्या खोर चळवा पा दुसरा मने तो भापका मविनय कदेषी नही कोया भने माज दिन तक मपमा मदा यो कदे भाप को निदा महो करी पलके माप माद्रिक स्पमाप का तथा प्रापर्य का तथा सपस्या की महिमाघणे लोको मागल करता परन्तु बद् भाप याद भाउदे हो तथा दिल भरभसिदा है मापों में पाणी भाना है सो मेरे क पटा पाह होता है सो तो कहां लगलिप सो मप मापने कपा करके मेरे फूमपना मूख कमल का पर्शन करावणा सो उठे घौमाले में दिल्ली की वर्फ विहार फरके माठगा महीने माघ सक सो मापने पी पागर केगामा में विहार करके पधारणा । सो मापफा मेल हो जायेगा भने जो मैं समुद्र के मंतलग रचना देखी है तथा ओर्ण तार पत्रों के मगर देने है सो समाप क सुणा मंगा मेरा जैसा राग गाप के उपर था मैसाही राग मष है मै सो भन्छो तर जाणता जो भाप परमय सुधारणे के पास्ते मटेदो ( ८८ ) अमे भाप क मलूम ही है मिवने मत अप अन नाम के हो ये है मागे माप कू किसी धाधक के मुलाहज से मेरे से मिलना पद नहीं करमा भाप ओ मेरेसे म्यारे रहते ही पमेरे कूपरा दुख है मेरी मरमी पर हैजो भाप की सेवा क्रू सदा पास रख पुस्तक मेरे करवये मिले है सो गिणती से याहिर है। भाषक वो ममुमाने १०००००० दस लाप सेघा करत है भने साधू मेरे पास है सो परे पिनप पान है परन्तु एक माएका विमोग है यही मेरे कदास है मैसे मैसे क्षेत्र है जिनमे ७.००हनार प्रापश्य के पर है मरमेश्वर की दरे साधु क मानते हैं क्षेत्रवी ५०.. हमार गुम रात में होगे परंसु साधु भगवान के पोरे हैं साधू त्यागी भनुमान ७.पा ८. हे सापपीया १५० के मनुमान है सो हमारी एमजी है जो मापके साप फेर सर्प देस ममे तीर्थ मिन के उपर २५०० मंदिर मने २०से पर्प के षणे हुए मदिर भय तक क्सरे ए सर्य वस्त का हाल भाप मिलोगे मय फगा सर्व साधु माप क पाहये है ममे मेरे साधू जनेन्द्र व्याकरण पगैरे घणे २ शास्त्र भणे है ए सर्प माप जप मिलोगे तव देपोगे ए मिट्टी मेमे पूर्व रागपी लिस्रो है। घुमा कोर मतराव नहीं इतने दिम जो चिट्ठो नही लीसी सो मापने ममा कर दीया था। परन्तु में कहालग सपर कर इस प्रास्ते लिसी खो इसका समाचार सर्प पाछा लिखणा। जोधपुर में मालचंद पारप की दुकाम उपर चिट्ठी लिस्रो स. १९३५ कार्तिक पदि ८ दसमत मारमाराम के। भय किम्वित् उक पत्र की समालोषमा करके मम्पमनों को दिखाता है। प्रियपाठकघुम्द ! जो मारमाराम जी के जीवन परिष के । पृप्टोपरि लिखा है कि-मारमाराम जी ने १९२१ धीमासा में, सार सपना परिका, कोष, भए फार म्याय काम्यादि प्रय पढे । सो पाठक ६ - ( ८९ ) गणस्थय ही विचार करने फिरतमे पिशाम का ऐसा नियम पिपय पत्र बोसका है कापि नहीं इससे स्यत ही सिर होगा कि मारमाराम नीमे व्याकरण कोही फलनि किया तथा नाही मारमारामजी सुदर पर रखना करके शायर लिखना ही जानतेथे जेसेफि उनके लिये पत्र से स्पष्ट सिर हे सथा लिखिने की शैली इस प्रकार से प्रहण करते हैं कि-परतु जब माप याद आउदो हो तदा दिल मर माग्दा है भाषा में पाणी पाजांग है तो मेरे को पग दाह होता है सी सो कहां लिख । इस्पादि मियरो क्या यह व्याकरण के विद्वानों की भाषा है क्योंकि उक्त लेग से सिर होता है कि मारमाराम जी को ग्याकरण का नितान्सम पोध महीं था यदि योध होता तो उक पत्र विमपि विम छन्त प्रत्यय समासादि से विस क्यों लिखते सपा व्याकरण का यदि सहा प्रकरण मी देखा होता वो पी के स्थान तो हात हाजाते जेसे कि म्याकरण के संबा प्रकरण में लिखा है कि- अकुहविसर्जनीय जिव्हामूलीयानां कपठ तथा अटुरषाणां मुझे ॥ मर्यात मटादश प्रकार का भवर्ण पुनः कवर्ग जैसे कि-ख ग घस, मोर विसर्जमोप सिहा मूळोया इनका कण्ठ स्थान हे मोर अषर्ण के मष्टादश मे टवर्ग से कि-टठरण र, प, नका मून स्थान है? मित्रषरो उक पत्र में भारमाराम मो मे प्राय कण्ठ स्थान के वणी के स्थानोपरि मधंस्थान के वणों को ही हिस्सा हेजेसे कि-मापां में पाणी मामादा है.(कलिग लिपू)इत्यादि सो क्या यह मारमराम जी मे मपनी गदि का परिमय नहीं दिखाया है मयदय दिखाया है। 'पाद !!! सी सुम्दर काम्प मारमाराम जी ने लिखोई मिस से एमयम्दादि महामावायी की कार्य लग्नित होरही है।

7 फिर सरगी लोग कहते हैं कि--मामाराम जी ने दुवा मत मना कल्पित जान के त्याग दिया। वित्त महारमा जो मपने पत्र में लिखते हैं कि-भापके गुण तो मेरफा सर्घ माछन है मुह से कई नहीं जाते गाम बसचक में माप से घणी भग्जरी थी कि मेरे को माप सुर न करो परन्तु भाप तो गुरु के दरजे के ये सो मग या जोर चलता स्यादि। पाठकगण ! माप घय विचार करें कि उक लेन से वमा सिर होसक्ता दैया का यह पह सका है। फि मामा राम जी ने श्री स्वामी जीपमराम मो महाराज का छार दिया था टक मत को मनाक रिपत सात फरफ रयाग दिया ! किन्तु अब मात्माराम जी का पर्शम बारिश शुरन रहा तो गच्छ में भी रखमा भयोग्य था इसीयास्ते स्वामीजी म भारमागममी को पार से मिाम विथा फिर लिखाद कि-मैंने मी मी पापा गयिमय नहा किया किन्तु स्तुति परसा रहता है-इस्यादि- जय धीरशासम के मुमियों को मसत्य कटुकवावध प्रदान किये वो पधा यह मषितय नहीं है भषश्य है तथा सम्पादयशम्पासार मामक ग्रंथ को पठफर देख लीजिये (मोकि महारमा ओफा रचा दुभा है) मय से इतिपर्वत पठन परते हुए भापका साप, मूदुपाए कहीं मोरष्टि गोधर महीं भाग । हा-दूदिये चमार, मुसलमाम, मिरक दुर्गति के पढमे वार श्यादि शष्यों की वर्षा मच्छो को हर मात - मरमार है। फिर मोर मी देखिये मामाराम मी कथम में सरपटामो मतीत नहीं होती है जैसे कि भारमाराम जी स्थपत्र में लिप्त हक ओ में समुद्र के अंत लग रपमा देनी है तथा आर्ण सारपत्रों के मंसार देते हैं सो सय भाप यो सणाऊंगारपाधि पाठपपम्द मारमा रामजी कोनसे समुद्र के मत सगरमा देगकर माय-पधा साप सम्द्र या कालो-वधि-तथा स्वयंमरमम समुद्र सो पण यह मा ( ९१ ) पित रेख नहीं है भषश्य है क्योंकि सांप्रतम काल के शोधावन तो यह कहते हैं कि-उमें कोई भन्त नहीं मिला। फिर एक यह भी बात है कि-भात्माराम जो १९३२ सपत्म पसाप देश से घिसार फरफे ममदापान में चौमास जा रहे फिर १९३३ का थीमास मायमगर में किया १९३४ का धौमास जोधपुर में किया तो क्या यह तीनही नगर समुद्र के मन में बसने वाले हैं। हा यदि किसी मालका नाम भारमाराम जी ने समुद्र कल्पन फरलिया हो सब यो स्यारी पान है फोकि जय भारमाराम जी ने एक मन्त्रित दव्य को महम मान लिया है तो मला समुद्र की तो क्या हो कि भार किसी प्रकार मो भारमाराम जी का समुद्र तक रचना क्षेत्रमा सिट महों हो सकता फ्याकि मारत षष के सूत्रों में ३२००० हजार देश लिम्ने किम्त मारमागमनी के जीवन चरित्र में फेवल पताप, गुजरात ,मारवार,माळवा, इत्यादि देशोदे हो माम लिने है मत भन्य देशों के नाम । सो शोकहे ! ऐसे लिखने पर फिर लिमादे कि मैं भष्छी तरह जानता हु जो भाप परमय सुधारणे के पास्ते कठे हो तथा मेरा जसा राग मार के उपर था पेसा ही राग भय है इत्यादि मित्र परो ! जप राग की म्यूनता मी म हुर स्वामी मी परलोक पास्ते उस्थित हुए मो निश्चित होगया । तो फिर दिया शाद ग्रहण करके धीरशासम के मुमियों की म्पर्य निन्दा करके पर काले धौ किये है॥ मपिर मो किये हैं इस से मारमागम जी में मपनी पुरि का परिस्य दिशा दिया है। पुमा लिया है कि मेरी मरजी यह है बो भापकी सेवा कर सदा पास रा पुस्तक मरे कहनने मिले अ' गिगती से पाहिर है मापकतो मनुमाने दश १०००००० लाख सेवा करते हैं यादि।

प्रियगण ! जो सेवा पास्ने मत करण से लिवाहोयेगा ने सिर होताद फि-संपेग मनपा तपागच्छ मारमाराम जी को प्रिय नहीं एगा होषमा पूटेरायमीयत । फिर लिखा है कि-युस्तक मेरेक इतने मिले है जो गिमती से वाहिर है.सो गणना से वाहिर तो भसष्य या मनम्त हो शब्द है तो क्या मारमारामजी को मसल्प पुस्तक मिळ गये थे किन्तु माअकस सो प्राय महाम् २ पुस्तकालय की भी लिष्ट विद्यमान है जैसे जम हिसपी नामफ मासिक पत्र में प्रकाशित हमा है कि सदन नामक सुप्रसिर नगर में एक मा पुस्तकालय है जिस के पुस्तक भनुम से रो जाये तो ४२ या मील के स्थान में रखे जा सके। देखिये वना महत् पुस्तकामय मी गणमा से पाहिर म हुमा तथा जैन सूत्रों में सबसे महाम् इष्टिमाद मामा है भपित तिस के मी सस्पाते ही वर्ण लिसे है। तो मठा मारमाराम जी को गणना से पाहिर पुस्तक कहां से मिल गये! मला यदि कल्पना कर मी सेप कि मारमाराम जी कोरतमे पुस्तक मिमगये थे जो कि गणमा से बाहिर ही थे। तो फिर श्री पूज्य जी महाराम के सूत्र था भी जोधमराम जी महाराम के सूत्र पिमा माला पधों लेगये थे। तथा फिर मी घद सूत्र नहीं दिये तो क्या पक पुस्तकों को मात बमामा था हा शोक। फिर हिमा है कि १०००००० इस छात्र माधक मेरी सेवा करते हैं यह भी देखकथन माघ दी हैपयोंकि प्रथम a यह खेम महबार का सूचक दै जोकि साधु धर्म से विषय है फिर यह रेव देखिये सत्यता कहांसप रखता है क्योंकि जैम इतिहास पाय पमारसीदास एम. ए. पा बनाया दुभा जिसके प्रथम पा पर सिमा किसाब I २५ सहन १..पकसो५८ सर्य जैन है इसीप्रकार मारतमिव मामक पत्र में भी प्रकाशित होचुका है। तथा किसी २ तारीन में जैन १५ कास्न मी लिने है सो पर्समान काल में जेममव को सीन शाखें है जैसे कि श्वेताम्बर जैन श्वेता म्पर मूर्तिपूजक जैन २, दिगंबरजैन श्वेताम्बरमूर्ति पूजक जैनों की शामा हो एक पीताम्बर जैन हैं। सो सर्घ जनों में पांच ग्राम वो भनुमान भीश्वेताम्बर स्थानक पासी जैन है। शेपदिगपर श्वेताम्बर जैन है मब विधारने की पात है कि सब पीताम्बर जैन ही मारमाराम जी के लिये ऽनुसार दो महीं, तो मला संषा की तो क्या ही माशाद वथा भीश्रमण मगवत् परमान स्वामीके भाषक १००००० काम सनसठ सहन ही कल्प सूत्र में लिये हैंसो मात्माराम जी का कयन मसमंजस है फिर लिखा है कि साधू भगवान के शासनके पोसे हैं साधू त्यागी मनुमाम पा८०सापबीया एक सौ पचास १५. के भनुमान हैं। मिमयरो जैसे मास्माराम जी स्यागी घेरागीधे तैसेहो पह७.८. साधु १५. सामिये होगी धम्म हे ऐसेर परीक्षकों को पुन मदिर विपर लेख लिखा है यह भी पानसर के वीर्यषत् ही होघेगा। पुमा देखिये मारमाराममो को जब मोजोवनराम जी महाराजने स्वाग से मिम्न किया था। फिर मारमाराममो को किसी मी पर बारामही पाहा किन्तु मारमाराम जी लिखते हैं कितने दिन जो पीठी नही लीपो सो मापने मना कर दिया था परंतु में कहालग सपर का स्यादि पाठकगण-देखिये मारमाराम जी के लेन को परंसु स्वामी जीपमराम जी महाराज ने इस पत्र का मी कोई मी प्रत्युत्तर मही दिया । सो रक पत्र से पाठकों को भारमाराम जी की विधा यि विवेक सत्य सर्व हात होगया दोषेगा।

- ( ९४ ) मपित यीपूज्य महाराज का मी चौमासा मस्यामद से पूर्ण होगया फिर श्रीमहाराज देश में परोपकार करते हुमों ने लोगों के मतीय माह मे १९३५ का घोमामा नामा में किया पाठकों को पात हो १९३५ का पौमामा भारमागम जी फा लधियाने में पा किन्तु सुधि यामे मै मारमाराम जी ज्यर से भयमीत होते हुए रेल गाटी में माहट हो कर चौमासा में ही भम्याले में जा रहे थे। मपितु मारमाराम मी के जीवन परिष में लिखा है कि भारमाराम जी मम्पाला में गये वर विधारते है। में कदां भागया ह क्या मुझे कोई स्थप्न भाया या कोई द्रमाल हो रहा है या मुह भ्रम हो रहा है इत्यादि भनेक हासस्पर्स पषम लिने है। तो पाठकगण भारमाराम ओ के स्थमाव को तो जानते ही। भौर योग्य महाराजने मामा मगर में जैनधर्म का, परमोपोत किया पुनामी महाराज मे एक दयाशत्तक मामफ महाम प्रय भी निर्माण किया जिस मे भनेक समों के प्रमाणो धारा मगधाम की माता दया ग लिय करके सम्यक्त्व को पुष्टाहो है फिर पतुर्मास के पश्चात श्री पुज्य महाराज मे बहुत से भम्प जीयों का प्रतिमाघ देकर १९३१फा घोमासा छुधियाना में किया ! सो खुधियामे म पहुत ही धर्मापात दुमा मपितु छाला मामल्ल, साला मल्लीमल्ल लामा अहमल्ल गौरोमल,ठाला जमनादास, छाला पारसम, लाखा प्रायो मल्ल, लाला निहालचय इस्पादि माइयों ने धर्म की ममायना पहुत पी सा बीमासे के पश्चात श्री महागज भनेक प्राम नगरों में धर्मों पदेश करने हुए ममृतसर में पधारे तप श्रोमाम लामा हरमामदास साठाल श्रापक को बैठक में विराजमान होगये नव प्रति दिन धर्म स्थान को परि होने लगो संकदो लोग दर्शन परने को भालेमने। ।

( ९५ ) तबाही भारमाराम जी विधनधादि संधेगी साधु मी ममृतसर में ही मागये। किन्तु घिनदादि सगियों ने कहा भेजा कि! हमने मी श्री पश्य महाराम के दर्शन करने हैं सो हमको दर्शन करने की माझा मिलनी चाहिये। तर भो पज्य महाराज में छपा करीकि-जैसे समकी उछा हो। तप ही विश्नचद्रादि सपेगी साघु श्रीपज्य महाराज के दर्शनार्थे लाला हानामदाम, सतलाल जी पेठक में हो मागये इच्छामि समासमणो इरपालि पाठ पद के स्थित होगये पुम प्रेम की पातें करने लगे तप श्री पूज्य महाराज ने छपा करीकि-विश्नचजी क्या देखा ! सप विश्नचंदजी करने लगे। हे महाराज जी सिद्धावस को देखे? तथा ममेक मन्दिर देने है तप श्रीमहाराजजी मे कहा कि-क्या कोरजाई छोप में ऐसा स्थाम है कि-महां कोई मो सिम नहुमा हो ! फोकि भय तो यह स्थान ऐसे हैं जैसे किसी शेठ की दुकान चलती है तब मनेक लोकशेठ मोके पास भाते ई म्यापार करते हैं जप पद मापण मठाई जाती है या शेठ इस मुक न को छोड़ जाता है पद भापम गिर पटना है फिर यह व्यापारी सन यहां पर नहीं माते है। इसी प्रकार सिदाबलादि पर्यत् । क्योंकि जय मुनि मन पर्धनो पर साक्षात विद्यमान घे तय भनेक परस्प पा जिवासु जन मह जाया करते थे मोर माम दर्शम पारिमका लाम उठाते थे? पतलामा म क्या है पदों पर ! तय श्री साहनलाल जी महाराम में श्री पूज्य महाराज स विधि करी कि-मुझे माझा हाये तो मैं उनसे कुछ पाया। सय भी पूज्य महाराज जो मे श्री स्वामी सोहमलाल सो महा राज को माछा दी। माश पाते ही श्री स्वामी सोपालाल जी महाराज ने यिन चंद्रादि तपागछिया का निम्नलिखित प्रश्न किये।

है , माप लोग प्रतिमा जी की भावातमा ८४ मामते है कहना चाहिये मतिशय प्रतिमा की कितनी है। जैसे किमहत देव की अम्म मतिशय वोक्षा के पश्चात को भविशय प्रगट होती है वा केवळ पान के पीछे मतिशय प्रारम्बार सर्ष का वर्णन पृथक् २ है ऐसे ही प्रतिमा जी की पवळााये ॥ २ मगवम् को भाशा दया में है या हिंसा में यदि हिंसा में कहोगे तो मषकोटी प्रत्यायमान कैसे रह सकता है जेकर दया में मात्रा तप माप का वि सूत्रानुसार महीं है ।। जब माप लोग मविप्यत काछ में मोक्ष होने वाले जीवों को नमोरयण के पाठ से अपना करते हैं तब मिन मंदिर में शिवलित पा श्रीकृष्णसी की प्रतिमा क्यों नहीं प्रतिष्ठित की जाती है कमोकि शिषनी को भाप के मन में भवति सम्यक् रष्टि धायक मामागया है। ४ जब द्वारका जी मस्म होगई थी तप द्वारका में जिम मदिर थेषा नहीं यदि पे तय भस्म क्यों हुए यदि नहीं थे उप मत कल्पित सिर होयेगा तया फिर मतिशय कहा रही। 'देखो भापा पूजा समद नामक पुस्तक पृष्ट की पंकि ही श्री वृपमादि पीरान्त चतुर्यि पाति जिन समूह मत्र भब तर मयतर सपोपट ही श्री पृपमादि पोरान्स प्रतुर्दिशति जिन समूह मत्र तिष्ठ विष्ठ ठ ठ॥ *ही भी धूपमादि षोराम्त पतु र्षि शतिमिन समूहममममसम्मिहितो मयमय पपर । पदवो मामान का प्रमाण मर यिसम का प्रमाण भी दलिये उक्त ही पुस्तक पप्प ५८ को प्रथम या दिन ये पकि पूर्ण के बाद विसर्मम करना चाहिये स्यादि सो यह प्रतिष्ठा या पूमा परने पाले मात्र है। मियपरा या लोक प्रतिष्ठा के समय मोक्ष प्राप्त नोकरी का मामानादि कर्म करते है भीर मम मो पद हैं। T - ( ९७ ) ५ द्रोपति जी ने किस जिनकी पूजा करी उस जिनका क्या नाम कर उसका मदिर यना किस माचार्य ने प्रतिष्ठा करवाई। ६ भगवान ने किस नगरी में प्रतिमा के पूजन का उपदेश किया फिस श्रापकने धारण किया विधि विघाम मो पूछ। ३२ नमे कौनसा सूत्र कौनसा आषक मौर पञ्च समित त्रिगुप्ति का घमा स्वरूप है। ७ हिंसा का कारण क्या है प्याफा कारण क्या है। और इन के कार्य क्या २ पमते हैं। ८ ममस्कार मन के पच पदों के ४ मिसेप कैसे बनते हैं फिर वह पंदनीय कितने है मदनीय कितने हैं। एयादि अप प्रश्न पूछे मला यहां उत्तर की क्या माशा थी तप विश्नचंद्रजी कहने लगे कि हमतो भी पूज्य महाराज के दर्शन करने वास्ते भाये है सब धीसोहनलाळजी महाराजने कहाकि हां दर्शन करें। मपित जव विश्नचंद्रादि साघु जामे लगे, तब फिर कहने लगे कि यदि भारमारामजी मे दर्शन करने होघे तो यह मो करले तप थी पूज्य महायम पाकरी जैसे उसकी इच्छा हो फिर पिनचंद्रनी वोठे । यदि प्रश्नोत्तर करने हो। तब श्रीपज्य महाराज ने रुपा करी कि-यदि मारमाराम जी की इच्छा प्रश्नोचर करने को है तो हम तरयार है। यदि किसी मौर में करने हों या किसी मन्यस्थान पर फरमे हो तो हम धी सोहमलाल जी को भेजेंगे। मला प्रश्नोचर किसने करने थे। यह वो केवळ कहने मात्र ही पा' जब विमपंद्रादिपळे गये। तब श्री सोहनठालनी महाराज ने १०० प्रपन लिख कर भारमाराम जी को मेले तप भारमाराम जी मे १.. प्रश्न लेकर जरियाला की भोर विहार फर दिया। किन्तु उत्तर देने का काम ही क्या था । फिर श्री पूज्य महाराज को लोगों की मवीय विधि होने लगी तब भी महाराज ने १९३७ का चौमासा ममृतसर में ही कर दिया।

चौमासा हाँधोक्तपातहीमा किन्तु यता माप्त के पदणात शमा वलक्षीण हो जाने के कारण से भी पूज्य महाराज ममृतसर में विराजमान हो गये ! सो श्री पूज्य महाराज के घिराममान होने से द्रग्य क्षेत्र, काळानुसार श्रावक जम धार्मिक कार्य करमे स्यामौर फिर भमृतसर में ही सीन पुरुषों को दीक्षा भी पम्प म्हाराज ने प्रदानकरी ! जैसे कि-श्री स्वामी नामचन्द्र जी महाराज १, यो स्वामी देसरीसिंहजी महाराज श्रीस्वामी देवीचमहारास ३: किन्तु काल की विषिध गति है यह सप को ही देखता रहता है समय को म देखता हुमा किसी मिमिरा को सम्मुख रख कर शीघ्र ही गा घेरता है तो १९३८ भापास करणा १५ को श्री राज्य महाराज मे पक्षी सपष सफिया फिर भापास शुक्ला प्रतिपदाका अप पारणामा सो यह सम्यक प्रकार से प्रणमत न हमा आप भी पूज्य महाराज ने मपने मान पल से भपनी मायुको मात करके पुन मालोयणादि सर्व विधि विधान करके भोर सर्व जीर्षो से क्षमापन (ममाषना) करके शान्ति माषों से श्री संघ के सन्मुस दिन के तीन पजे के मामान मनशन पर दिया । फिर परम सुम्पर भाषों के साथ मुमसे मर्दम् महम का जाप करते हुए १९५८ मापार गुहा दिवीय दिम के एप के मनुमान मी पूज्य महाराज इस मनिस्य ससार से स्वर्ग गमण हो गये। तपदी देश में श्री सघ का शाफ उस्पन होगया पुनः मस्त सर प्रापक मंडल ने सारद्वारा नगर २ में थी पूज्य महाराज के स्वर्गयात योमे का समाRT सुधित किया मो साधार मुमते ही प्राम २ मगर २ का धायक महछ ममृतसर में ही उपस्थित होपया। पौर लोग माना प्रकार के शो से मोदोदय से पिलापात करते थे क्योंकि एक प्रकार का उस समय सूर्य मस्त ही हो गया था भी पूज्य महाराज योर शासम मे सूय यस प्रकाश परमे हारे थे फिर भी स्थामोसाहनलाल जी महाराज ने भी संप को महान संसारका मनिस्पता दिखलाई फिर लोग निरामद होते हुए एक सुन्दर विमान बना के तिस में श्री पम्य महाराज के शरीर को मास्ट करके महान महोस्तष के साय जिन क विमानो परि ९४ शाळे परे हुए पे वादिन पजते हुए मुत्य संस्कार की भूमि में पहोंच गये । फिर चंदन के साथ मृत्यु सस्कार किया गया जिन लोगों ने उक्त महोत्सव को देखा है यह लोग महाराजा रणशीतसिंह जी के मृरय महोत्सव की उपमा दिया करते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा श्री पूज्य महाराम बी का परिव मृत्यु समाधि युकमा यातले दो छोगों ने परम महोत्सष के साथ भी पूज्य मदाराम के शरीर का मरिन सस्कार किया। मिषवरी भी पूज्य महाराज ने इस मारत भूमि म जैन मार्ग का परम प्रकाश किया। भोर मात्मा को शुदि म जिन्हों में एक से लेकर ३३ उपयास पऱ्यात तप किया मीर प्रति चौमासाम एक मष्टा वश भक त्याग रूप तप करते रहे मर्यात हर एक चौमासा में एक महार करते थे भापका सदीक्षा काल चापारिंशति वर्ष हुमा और मी मापने बससे पप्टम मष्टम् मद मास मास स्यादि वप किये । भाप माहत १ सस्कृत र भौर जैनसूत्रों या परमत के शास्त्रों के मो देता थे। सो ऐसे मदानाबार्य के स्वाघास को देख कर मम्य मग ससार को अमिरयता विचारते थे। क्योंकि अप इस भूमि पर तीर्थकर चक्रवर्ती, पलयेष, वासुदेव दयादि म रहे तो मला मम्प की तो क्या दी पास है। इस्यादि विचारों से लोगों में मारमा को शान्स किया फिर भावार्य पद स्थापन करने की सम्मति होमे एगी क्योंकि सूत्रों में यह कयम है कि भावार्य उपायाय मिना गराछ के मुनियों पा यिपरमा नहीं पता है किन्तु श्री पूज्य महाराम के दायरा शिष्य हुए मिन के निम्नलिखित माम है सपथा । पर्तमाम काल में श्री पूज्य महाराज के शिष्यों का परियार में देष तो किसी के मो घर के देव नहीं हैं मपितु मणगार में मौर देवा- घिदेष है । तथा यदि भूनाधि सिर करोगे तब सम्पाय दूपम लगता है कामदेष भाषक के स्वरूप को पदके देखो। ३ मोमियुक्ति के प्रमाण से मारमाराम जी ने द्रोपवा श्री को विषाह से प्रथम मिथ्यादिप्टमी सिम किया । देखो प्रश्न ५ पो जो मात्मारामजी ने १९२३ मे ११ प्रश्न यूटेराय जी को पूछे ये तिन में। किस्तु अप मारमाराम जी मूर्ति विपय दोपतो जी का प्रमाण देकर मन पुरुषों को मिश्यारूपी जाल में फंसाते हैं मम पतलाइये मामाराम जी का कौन सा प्रमाण सस्प है, यदि प्रथम प्रमा सरय है तो भव प्रमाण ऐना मिथ्या है बेकर द्रोपता जी का मस्ति पूजन हो पिपय सिद है सा प्रथम प्रमाण मसिय हुमा जय ऐसा हो रहा सप मारमा राम जी परस्पर घिरोघ फयम फरमे पाले सिर हुए । ४ किस भईन ने किस स्थान पर मतिपमा का उपदेश किया है क्योंकि पाष महामत मोर वावश यायफ के मत इमका पूर्णपिपि से उपदेश तीर्थंकर भापित सूत्रों में पिधमान है तो नसा मूर्ति का विधि विधान क्यों नहीं फयन किया गया । ५ तथा किस भहन ने पति की प्रतिष्टा करपार पोंकि अप ठीर्थकर देष सदनों सोषों को दीक्षित करता है तो ही जीपों को मादश भाषक के प्रत प्रहण करपाते है काममा मूर्षिको प्रतिष्ठा मी कराते दोगे सो किस उक्त विधाम है। जप यह प्रम थायू तिलोकचंद्र जी भात्माराम.सी पास गये भार मारमाराम जी को सुना भो दिप किन्तु मारमाराम जी मे १७ मी उत्तर मही दिया सस्प है उत्तर क्या ये सो म पो पाठ मी मिसे मपितु फरिपत प्रयो में भनेक म जीयों की प्रान्तियुक्त करने पास्ते गाया पना फर लिग घरी है जैसे कि भार दिन के पविशति पमो परि लिया है कि- ( १०३ ) केवली जोगेपुच्छा कहणे बोही तहेव स्वेट किहत्यमुचियमिणिह चेइयवस्स बुद्वित्ता ॥१२० कन्न चासोमयाए सूरोवातेयवतया । रइनाहव्वरूवेण भरहोव्वजणहठया ॥१०६ ।। कप्पनु मुवचिंतामणिब्ध चकिव्ववासुदेवव्व । पूइज्जतिजणेण जिण्णुद्धारस्त कतारा ॥१०७॥ माषा-रम गापामों का साराश इतमा हिहै कि देषली भगवान ने कहा है कि चैत्य दम्य को वृद्धि करने से मनोकामना पूरी होती है वथा कास्य कला की शक्ति चन्द्रपस सौम्यरूप क्या सूर्य समान फ्रान्ति कामरूप को जनों को मानदकारी फल्पवृक्ष तुल्य तथा चिंतामणि ररन समाम सपा घावयासुदेष के समाम पूज्यनीय होता हैमा पदप खोर्ण मदि का सहार करता है । प्रिय मित्रघरो! यह मनोक कपात नहीं तो मौर क्या है क्योंकि किस केवलो ने उक्त उपदेश किया है किस सूत्र में गौतम जी ने उक्त विषष काई मी प्रश्न किया है सो इससे स्वताही सिर हो जाता है कि यह सप मुतन प्रयकारों हो की लीला है । फिर मचपध्यक्माणपाम्ना में लिखा है कि नियदव्वम उव्वजिणिद, भवणाजिणविषवरपाठासु । वियरइपसत्यपुत्थए,सुतित्यतित्ययरपूआसु ॥३१ मापायी-स गाया में यह दिसताया है कि पापक जिन मंदिर हिम पिय प्रतिष्ठा जिन पूजा तथा पुस्तक सिमाने में घम को वे इरपामि तपा माराधना पाम्ना को ११ पो गाथा में ऐसे लिखा पिया। -

( १०४ )
जविरईविणासो चईयदव्यस्सजविणासतो।
अन्नेउविक्खिउमे मिच्छामि दुकडतस्स।
मापार्थ-यदि मैंने चैत्यद्रव्य का विनाश किया हो तया विनाश
करसे को अनुमोदमा करि हो तिस का मछमिच्छामि दुकर हो ।
समीक्षा--मित्रघरो यद किस महम का सत्योपदेशा है किस
सूत्र में मई मे मदिर के पास्ते धन देने की माला लिचो तया
किस केषली में प्रतिष्ठादि फिया फरयाई है तो यह सर्व मनोक
कपम है।
मम --भानंद भावक ने भीमदुपासकदशांग सूत्र में सिसा
है जिन
पूजा
फरी है ऐसे हमारे भारमाराम जी सम्यक्रम शल्पोबार
मामक प्रप में लिससे है सो यह पया उनका मसत्य कथन है।
उत्तर-हेमव्यगण ! यह मारमाराम जी का मसस्यही कपन
है क्योंकि उक्त सूत्र में जिन पूजा का विधान ही नहीं है मपितु हमारे
इस लेख को मारमाराम जी भी स्वीकार करते है।
पूर्णपक्ष -मारमाराम जी मे किस पुस्तक में लिखा है कि उक
सूत्र में जिन पूजा का विधान नहीं है ॥
उत्तरपक्ष-सम्याप शल्योयार में
पूर्वपक्ष-यह लेख हमको मी दिनलाये ॥
उखर पक्ष-देखिये मम्यक्स्थ शस्योसार प्रथम पार का प्रका
शित दुमा प्रष्ट ११ महारमा जी क्या लिगते हैं पापि तपासक
पांगमाते पाठ देना ठामधी कारण के पूर्यायायाए स्त्रो संपीना
स्यांछेपिण मामद भापो जित प्रतिमा पूजीदती हरयादि ।
मियरो) जप मारमाराम जी को उपासक दशांग में मानंद
भाषक के मूर्ति पूजा के पिपप का पाठ दिमवारी गी वो भला
मानर भापक गिम पूमा कर्ता कैसे मिय होगा फिर मो यह
सिवा है कि सापित होगये सो यह क्यम भी अतिशय

( १०५ ) हो है पोंकि जय भानंद पायक का सूत्रका ने व्यापारादि षा बादश मत एकादश भावक प्रतिमा इत्यादि सय कपन कर दिये तो महाविचारने को यात वै फि एक नित्यनियम रूप जिन पूजा का ही पाठ सक्षेप करना था कि जिसकी माप के कथमानुकूल परम भाषश्यकता पोरस से सिर होता है कि यह कयन हो हठ रूप है। फिर जो भारमाराम जी ने भो समषायांग जो सूत्र का प्रमाण दे फर स्व सेवकों को मामद किया है वह मी कथन मारमाराम जी का हासमाम्य है क्योंकि :- भी समयाांग भी सूत्र में तो केवळ उपासक पशांग सूत्र का इतना हो कथन है कि, भावको के मगर' के नाम मगरों के बाहिर के उद्यानों के माम फिर उधामों में गिम देयतों के मदिर थे उनके नाम भावकों के धर्मावास्यों के नाम पादि कथन है किन्तु जिन मदिर का की मी कपन मही है इसलिये मारमारामजी का कथन ममान्य है। सो भो पूज्य महारास मारमाराम जी के साय शास्त्रार्य करने वास्ते अयपुर तक पधारे तो मला मारमाराम जी कमा शकि रखते थे कि भी पम्प महाराज के सम्मुम माते । क्योंकि मिन छागों में मात्मारामजी के साथ प्रश्नोतर किये है घे कहते है कि मारमाराम जी को प्रश्नोत्तर करने की शक्ति पात दी न्यून थी। मैसे कि कृधियाना में मारमाराम मी ठहरे हुए थे भौर श्री पूम्य महाराज भी सुधियामे में ही विरासमान थे तब श्रीमान् लाला यलियामल्स, लाळा सोहनलाळ यह दो भाषक मारमाराम जी के पास गये भौर पूछने का कि हेमदारमन । एक पुरुष ने श्रीरामचन्द्र जी का मदिर पनपापा मोर एक में १०४ ) जविरईउविणासो चेईयव्यस्सजविणासतो। अन्नेउविविखउमे मिच्छामि दुकहतस्स॥ मापार्य-यदि मैंने चैत्यग्य का विमाश किया हो सथा मिनाश करते को अनुमोदना करि हो तिस का मुझेमिच्छामि दुलर हो । समीक्षा-मित्रपरो यह किस मईम का सत्योपदेश है किस सूत्र में मईत् ने मदिर के पास्ते धन देने की माया लियो है क्या किस केली ने प्रतिष्ठादि क्रिया करवाई है सो यह सर्व मनोज क्षम है। प्रश्न -भामंद भावक में श्रीमदुपासकदशांग सूत्र में लिखा है जिन पूजा करी है ऐसे हमारे मारमाराम जी सम्यक्स्व शक्पोबार नामक प्रथ में लिखते हैं खो यह क्या उनका मसस्य कपम है। उत्तररा-मण्यगण ! यह मारमाराम जी का मसत्य ही कपन है क्योंकि उक्त सूत्र में जिन पूजा का विधान हो नहीं है मपितु हमारे इस लेख को मारमाराम जी मी स्वीकार करते हैं । पूर्वपक्ष -मारमाराम जो में किस पुस्तक में लिया है कि सूत्र में जिन पूजा का विधान नहीं है। उत्तरपस-सम्परष शल्योबार में पूर्षपक्ष-यह लेख इमको मो दिसलायै ।। उतर पक्ष-देखिये सम्यक्रम शरयोदार प्रथम यार का मका शित एमा पृष्ट १११ महात्मा जी क्या लिखते है यपि पपासक पांगमाते पाठ देमा तो नयी कारण के पूवार्योए सूमो समे पीना यापिण मामद मापके मिन प्रतिमा पूजीहती स्यादि । मिनयरो! जप मारमाराम जी को उपासक दशांग में मार धायक के मचि पृगा के पिपय का पाठ रिचता ही नहीं तो ममा मानंद भावक मिन पूमा को कैसे सिर होगा फिर जो पा लिखा है कि सम प्रक्षेपित होगपेसो यह कपन भी युक्षिाप - र १०५ ) दी है क्योंकि अप मानद भाषक का सूत्रका में व्यापारादि पा मादश ग्रत एकादश भावक प्रतिमा इत्यादि सय कयन कर दिये तो भाषिधारने को पास है कि एक मित्यनियम रूप जिन पूजा का ही पाठ सक्षेप करना था कि मिसकी माप के कथनानुकूल परम मावश्यस्ता थोरस से सिर होता है कि यह कयम हो हठप है। फिर ओ मारमाराम जी ने श्री समयायांग जो सूत्र का प्रमाण देकर स्व सेवकों को मानंद किया है वह भी फथम भारमाराम जी का हासजम्य है क्योंकि:- श्री समवायांग भी सूत्र मै तो केवल उपासक पांग सूम का इतना हो कथन है कि, भावकों के नगर के माम नगरों के वाहिर के उधानों के माम फिर सचानो में मिन देवों के मदिर ये उनके नाम भाषकों के धर्मावास्या के माम स्यादि कथन है किन्तु जिम मंदिर का कहीं भी कपन नही हैं इसलिये मारमारामजी का कपन ममाम्य है। सो भो पूज्य महाराज मारमाराम जी के साथ शास्त्रार्य करने वास्ते जयपुर तक पधारे तो मला मारमाराम जी पवा शकि रमते थे कि यो पूज्य महाराम के सम्मुख माते । क्योंकि जिन लोगों मे आरमारामजी के साथ प्रश्नोतर किये है कहते है कि मारमाराम जो को प्रमोसर करने को शक्ति पात दी न्यून पी। से कि लुपियामा में भारमाराम जो ठहरे हुए थे भौर श्री पून्य महाराज मो दुधियामे में ही विराजमान थे तय मीमाम् छाला पलियामळ, लाला सोहनलाल यह पो थाषक मारमाराम जी के पास गये मोर पूछने छग कि हेमहारमन । एक पुरुप ने भीरामयन्द्र मी का मंदिर पमपाया मोर एक में

( १०६ )
श्री पार्धनाय तोकर का मदिर पनादिया छो भाप कृपा करें कि
मादशमा स्वर्ग किस के लिये है पाकि जैन सूमों में लिखा है कि।
श्रीरामचन्द्र जी भार श्रीपापर्धनाय जी यह दोमो दी मापुष
मोक्ष में गये।
सप मारमाराम जो मे कहा कि, श्रीपायनाथ जी के मंदिर के
बनवाने पाळा तपसयम के मल से दावशस्यर्ग में जासका दे कित
रामचन्द्र जी के विषय में कुछ मही कह सका।
तप थापकों में कहा कि क्यों नहीं माप पह सके जबकि
भाप मदिर के पदेष्टा है फिर मापने सपसयम के साथ मावशमा
स्वर्ग माना है तो फिर मदिर की मधिकता ही क्या रही।
इसमे कहने पर मारमाराम जी फ्रोध के शरणमा प्राप्त हुए।
पाठकगण ! यह केसी निर्यठता का लक्षण है जय कि दोनों ही
महारमा मोक्ष में गये फिर एक रे पूजक को १२षो स्पर्ग । एक के
पूजक को मौन ! पाह!!!
सो सस्य है जेकर दोनों हो पूलको को मादशमा स्यर्ग मारमा
राम जो कहदेवे सप मारमाराम जी का मतही विग्जामित दो माता ।
सो छठ धर्म को प्राप्त हुमा जीप धार नहीं कार्य करता
और पिस २ को नहीं दोपारोप्पण करसा मास् सप को ही दोष
देता है।
जैसे कि सम्पपरप शल्योसार नामक प्रय के १० प्रप्टो परि
लिखा है कि मने पदस्था पास मापण तीधफर सिवनी प्रतिमा
पूजे एपादि।
समालोचना ! यम तो सिख हो गयी है मग काये
भरपी की प्रतिमा से पन समिदे।
फिर वोपकर देव हरयामास में ही काम के धारक

( १०७ ) किस प्रकार मजीष में जीव संहा धारण करते होंगे क्योंकि यह मिथ्यात्व कम है। । क्योंकि मारमाराम जी मी सत्व निर्णय प्रासाद नामक प्रथ के ३५२ पयोपरि लिखते हैं कि। प्रतिमा पल्प युद्धीमा ! मर्यात प्रतिमा का पूजन मल्प पुनिषालों के षास्ते ही है । सो पचा मारमारामजी मे तीन शाम के धारको को मल्प युरिपाळे महीं सिद किया है मपश्य मेव किया है। सो यह क्या महात्मा भी की पुष्टि का परिचय नहीं है। मवश्य है। सपा सदेष काल से बीयों की लाम में भधिक रुधि होती है सो लोम के वशीभूत हो कर बहुत से मम्याम धर्म से भी पतित हो जाते हैं। जैसे कि परमाराम जी के जीवनचरिम के १४५ पृप्टोपरि लिखा हैकि ! महमदाबाद में एक दिन भी सघ ने सलाह करके श्री महाराज जी साहिब भारमाराम जो से प्रार्थना करी कि मापने देश पसाय में जो मये पापक पनाये है दिन को हम मदद देमी चाहते। तब मारमराम जी मे कहा कि तुमारी मरमो सुमारा धर्म ही है कि मपने स्वामियों को मदद पेमी इस्यादि पाठकगण फिर बहुत से पदार्थ महमदाबाद से मार देश में पाए सोफई मद्रसनमार्गसे परामस हए क्योंकि महम् प्रमु का पपक्षयोपशममाष का है म सुलोम का। किन्तु महारमा भारमाराम जो का यह धर्म दीपा कि जिस से गुम लिया जाये उसी दी की मसापरूप निंदा करणी मे किलीपन परिव पृष्ट ३३ पर लिखा है कि मौर कितनेक लोको के दिल म हरकों का मनिष्पा परण देखने से अंम धर्म के ऊपर रेप हो रहा पा दूर किया ! क्योकि लोकों को मालूम हो गया कि:- जो म्याधे हैं ये मलीम है मौर यापी पर धारन करने वाले ग्मळ धर्म पापक हूँ भव इस षसत भी किसी क्षत्रीय माक्षण के ( १०८ ) साथ पात चीत होने लगती है तो उसी घखत घे कहने लग जाते कि पजाय देश के मोसपाल (माम) तया बरवाल तो श्री मार विजय (मारमाराम जी) महाराज में सुधार दिये क्योंकि प्रथम तो या भाषसे लोक मुहबंचे गधे गुरुमो की सापच से परे ही मळोन हो गये थे मोर इसी पास्ते पजाब देश में प्रायः सब अगा यह लंका के पुरे के माम से प्रसिद पे भय मी ओ शेपटक रह गये हैं उनको नोक परे समझते हैं मोर समसे परहम मी रखते हैं यादि पाठपुम देलिये जिस श्री श्वेताम्पर स्थानक वासी मुनियों से विद्या पदी मोर जिस मत में २० पा २२ वर्ष व्ययतीत किये उन लोगों को सका सुरे के माम से लिसना ऐसा साहस गारमारामजी विनाकीन कर सका है फिर जो लिखा है कि-टोये गंधे हैं ! इस्यादि- मिषरो! क्या ही सुन्दर म्याय है कि जो पंच प्रविषमण के मनुसार कार्य करने वाले हैं यह तो मळीम म हुए सिम्तु जो तामा सूत्रानुसार झिपा मरत ये गदे है धम्पद मारमारामजी कीपुगि। फिर लिया कि मामरे लोक मारमाराम जी ने सुधार रिपे तो क्या भारमारामजी मे मोसवाल छोकों का प्राशय क्षत्रीयादिको से परस्सर कम्या दामादि का लेन देन करा दिया है नहीं ठो कहिये प्रियगण! उनका सम्बन्ध किन के साथ दे। फिर लिखा है । इंडियों से लोक परहेज मी रखते हैं मिरगण ! इस विषय में में मधिर महीं लिखता केवल इतना दीमाप लोगो ये स्मति कराई कि गुहरषाले की पात स्मृति करसिया करें जो महारमाना की प्रतिष्ठा पर पर्याय मा या मिस समय पागनियों से जामण क्षत्रियों में बदक सम्माय मी र दिपा या तो क्या पहो सुधार किया। रिस्तु जो पुष्प इनके मव को देखता है ये लपोत्यागमाया है जैसे वि १९४७का पौमासा श्रीपूरप महापस का मालेरकोरसे में था भीर सरदी भारमाराम जी का मीमोमासमालेरकोटले में दोधा।

फिर भीपस्य महाराज मेवातसे तपागछियों के साथ प्रश्नोचर
किये । मौर इसकोको को भस्यन्त ही निरुत्तर किया।
मपितु यह लोग हठाम ही होनेसे स्वापक्षको स्याग नहीं करते
है किन्तु सुपर्णोध अन इन में रहना स्वीकार भी नहीं करते जैसे कि
मालेरकोटमे दीपक महाशयने सधेगी मस को मसस्य हात करके श्री
पूम्य महाराम को शरण ली थी जिस का माम गणेशीलाल था मौर
वर ही लुधियाने से एक सवेगो संक्षेप मव को स्याग के रायकोट में
भी गमावछेदिक श्री गणपतिराय जी महाराज के पास पहोम गया
बिस का नाम सुशालचंद या इत्यादि मौर भी कई मग्य जन सी
प्रकार इस मन कल्पित मत के साथ पाप करते हैं क्योंकि सूों में
पुमा २ यही कथन है कि मारमा तप संयम से ही पार होता है।
तु मम्प पदार्थों से।
तो इसी प्रकार योगशास में हेमचन्द्राचार्य मपमे पनायेमितीय
मकाश में ठिसते है कि
कवण मणि सोवाणथमसहस्तो सिर्यभुषण्णतल
जोकारिज जिणहरतओपितषसंजमो अहिओ।१११,
मस्यामचन्द्राचार्य कहते है कि किसी पुरुष मे स्पर्म
मध्यापि युक्त सहस्रो स्तनों से विभूषित परम एमनीय ऐसा जिम
मंदिर माया किन्तु तिस से भी सप सयम का फल महान है ।
'काम्बानमणिप्तोपानस्लम्मसहस्रोधिप्रसुवर्णतठम।
पाकारयेज्जिनराईवाऽपितप' संपमोऽधिका १.
करदमणतगुणो।
संपोषसत्चरित्तोतु-
*वणमपिसोयाणेपाम सहस्ससिपसुपन्मतोळे ।
साकारणमिणहरतमोचितवसममो मणवगुप्पोधि।
पर्षपाठोपयते ।

( ११० )
देखिये पामावार्य जो मुक्ति से मदिर का निपेय हो करते।
किन्तु यह लोग र धर्म के पश हो कर युक्तियों को क्या समझते हैं।
फिर भी पूज्य महाराज सम्बत् १९४८ में ममृतसर
पपारे
मीर भारमारामजीधा पहुस से सधेगी मीममृतसर में ही माय एवं
किम्त श्रीपूज्य महाराज के सम्मुख फिस की शकि थी किठहर सके।
परंतु परस्पर कितनेक धिमापन भी प्रगट हुए जब भीपश्य महाराज
चर्चा के लिये तस्यार हुए तप ही मारमाराम जो ममृतसर से बलपो
सस्य है सम्र्य के सम्मुख मंधकार कम ठहरे।
फिर श्री पूज्य महाराज मे चौमासे के पश्यात् जेजो (पपरांगसी)
में सपेगिमों को पराजय किया ।
इस प्रकार दुशोभारपुर में भी बहुत से मदनोत्तर होते रहे किन्तु
मारमागम जी प्रतिमा पूमन सूत्रों सेनादी सिय करसके तबाही
इशिभारपुर में मला यूटेराप जी, लाला घोकसमन्न, छपाराम
चोपरी म माईयों में मारमाराम जी के कथन को सत्रों से विषय
मात करक मोपूज्य महाराम से मच्छी प्रकार निर्णय करके भी पूज्य
'महाराज से हो सम्यास्य धारण करी मोर तपागच्छ दो सूत्रों से
पिक्म जान के त्याग दिया।
पाठकमनों 1 मारे मिय संधेगो माईयो को माय वीरो से
मी पिंप का अधिक राग है भोर सोसास्ते माय पीकरों के ग्प
देश का यह लोग मनादर करते है और लिखते मो सो प्रभर
जैसे कि सम्यक्पशापोबार के १३४ये प्रष्ट पारबारा
जो लिखते हैं कि, मावतीधर धोपण
महाधर्मवी मे उयापे -
पायपादि।
(समीक्षा) देपिये मा
-
-

सीखी। तप माममा ही पडेगा कि मात्मारामजी का जाविदो स्वमाष या (सी पास्ते प्रधाई सी सूत्र में लिखा है कि, जाति कुल शुद हामा चाहिये, पाठकगण हम मारमाराम जी के कयम की क्या समीक्षा करें हम को तो ऐसे पचम भी भाषण करने कल्पते नहीं है किन्तु मारमाराम जी शीघ्र ही अपमें कहे पवन से पृथक भी हो जाते थे? बैसे किसी श्वेताम्बर में मारमाराम जी से प्रश्न किया कि महारमा जी अरमाप माष नार्थंकर से प्रतिमा को मधिक मानते हो फिर उस प्रतिमा को स्त्रिये संघष्टा क्यों करती है तब इस पात का उत्तर मास्मा जी सम्यवशयोदार के १३६ घे पृष्टोपरि इस प्रकार लिखते है। प्रतिमाले ते स्थापनापमाटेतेने स्त्री सघटा कारपण दोप गयी कारण के कई भाषमरहत नथी पण भरहतमी प्रतिमा स्यादि। (समीक्षा) पाठकगण देखिये, सक्तप्रक्ष्म होने पर मारमाराम जी ने भपनी लेखनी को किस मोर करलिया है इस मे सिय होता है भारमाराम जो परस्पर विक्स लिस्नमे में मी किश्चित् सकुचित भाष महीं करते थे, क्योंकि प्रथम छेमा में भाष तीर्थंकर से प्रतिमा मधिक सिट करी है इस लेख में माषमहत्प्रतिमा से मधिक लिख दिए है। फिर यह लोग तपकर्म भी सूत्रों से पिछक्षण ही करते हैं जैसे कि, जिस मगर में जिन मदिर महीं होता यहां पर यह लोग यह ममिप्राह करके बैठ जाते हैं कि जब तक माप लोग मन्दिर नहीं पन पायेंगे सपतक हम हम्हारे नगर में पारणा नहीं करेंगे। घर मात से मोठे भाई इस प्रपच को मा जामते हुए इस गोरम बाल में फंस जाते हैं फिर पटकाया की हिंसा में कटियर होमाते है किन्तु विचार शीलगृहस्प रस र पम से युफिदारा मुक (एट) हो पाते है। ।

( १९२ ) जैसे कि, जीरे भगर के समीप एफ घरघड नामक प्राम पसवा है तिस प्राम को सिर करमे के पासो फांमधेगी मन पगार गये फिर जावेदी तपसा करदी। फिर माईयो ने विपप्ति करि कि स्यामो जी पारणा करो भात घते दुग्धादि लेमायो । सप सयेगी जन फहम लग कि यापत काल माप लोग भी मंदर जी की मीष यहीं रखेंगे वापतकाल हम यहां पर पारणा नहीं करेंगे सय सुभाषकों में कहा कि यह तो सप हमने किसी भी सूत्र में नहीं सुना या फिर मो हमारी इच्छा माप के तप रम को संताप लेने की नहीं है क्योंकि एक तो भाप के तय की दम भंवराय हेये हितोय पद् फाया के पघ करने वाले पर्ने एवीय मईत भाश से विस्य दो इसलिये यह काम हमारे से नहीं बन परता सो महाशय जो जितमी भाप की इच्छा है पापप्तपटमास पर्यन्त तपसा करे । अब इतमा भाषकों में कहा उपही सगी साधु तपकर्मको म्पुस्पर करके विहारही करगये। प्रियपाठ को पह सगी लोगोंके तपकर्म है। भक्ति श्री पूम्यमहाराज देश में अयपिजय करते हुए तथा दांसी मादि नगरोमें जो तेरा पंपोनामक एक जैममतकी मूमन शाखा मलित हो रही है जो कि महिंसाधर्म से विषय कार्य कर रही है जिस को भी पराअप करके श्री पूज्यमहाराज १९ में शुधियामे में पधार गपे किन्तु मुधियाना में परम पाप पारित मुद्रा भी संघ के दितपी परम पतित महत् प्रत्यातिएक जिन की परमपषिष याग शक्तियो मायार्ययर्य भी मोतीराम जी महाराज विराजमान थे । तिस ममप में ही प्री बामपन्द्रजी महाराम भीगोविन्दरामजी महाराज भीशिवपाल सी महारा। भी गणाषछेदिक भी गणपतिराय जी महाराज, भी मपाराम सी माराम पादिर सामुमों के मनुमाम एकस्प हप मौर मी मसिमामा पार्यठोजी परमुक परपी माय मी एकस

(११३ )
१. मोर भनुमाम ०१ नगरों के बहुत से भाषकजम भी दर्शनार्थे
ये हुए थे मौर फिर महान महोत्सव के साथ दो दोमा मोहुई।
- श्रीपरमाघार्य भीमोतीराम जी महाराज ने श्री लघ की
म्मत्यानुसार भोसोहनलाल जी महाराज को १९५२ चैत्र शुस ११
युधराज पद पर स्थापन कर दिया ।
मौर श्रीमती भार्या पार्वती जी को गणापच्छेदिका की पदवी
न गई पुन' मामन्द के साथ महोत्सव पूर्ण हुमा ।
किन्तु सिस समय में एक पुरुषोछम नाम का सगो मारमाराम
के माचार को कुरिसत ऐम कर श्रीपूजन महाराज के पास
क्षित हुमा ।।
मश्न-दमने सुना है माप लोग जिस सूत्र में मूर्ति पूजा का
बधान माता है वह सूत्र लोगों को समाते हो नहीं जेकर सुमारे
पह पाठ जो मूर्ति पूजा को सिद्ध करता है उसे छोड़ जाते हैं मौर
ही २ सूों में जो भो पाठ मूर्ति पूजा से सम्बंध रखते हैं उन को
रताळ से मिटा देते है सो क्या यह कथम सत्य है ।
उत्तर- भष्य ! यह सर्यकयन मिप्या है उक्त कार्य हम
ही करते हैं मोर माही सूत्रों में मूर्ति पूजा का विधान है ॥
सो इस प्रकार भारमाराम जी मी मपमे बनाये 'भमान तिमिर
स्कर नामक अन्य के दितीयस्वर के २९४ पृष्ट पक्कि १४ी से
स प्रकार से लिखते है।
मदन-सुमने कहा है जो सूत्रों में काम करा है सो परूपण
रे जो पुन सत्र में नहीं कराई मौर, विवादास्पद लोकों में है कोई
से कहता और कोई किसी तरह कहता है तिस विषयक जो कोई
नऐ सब गीतार्थ को क्या करणा सचिप्त है।
रचर--मो षस्तु मनुष्ठाम सूत्र में महिं कयन करा है करणे
यह निधीयापुति के पत्र का प्रमाण है।
.

११४ )
योग्य त्यापन भाषदयफा दियत और प्राणातिपात की तरह सत्र में
निध भी नहीं गईभौर सोषी में चिरकाल से रुधिरप बसा
भाता है सो भी ससार भीरु गोसार्थ स्वमति कल्पित दूपणे करी
दूपित न फरे गीता के चित में ये यात सहा प्रकाश मान रहती
है सोई दिखाते हैं स्यादि ।।
फिर प्रष्ट २९६ पति ध्यो पर लिया है कि चिरंतन जनामे
मायरण फरो है तिम को मधिघि कहर के निषेध करते, मौर
कहते है यह क्रियाभों धर्माजनो को परणे योग्य नहिनि किन
मियामो विषय ॥
चैत्य पस्येपुस्मात्र पिंपप्रतिमा करपादि तिन विपे पूर्व पुरो
की प परा फरके मो विधि चली भाती तिस को गविधी करते
है और इस फाल पी चलाई को पिधि कहते है ऐसे कहने पाले
भनेक दिनलाई ते ६ घे मदासाहसीक है ।
प्रश्न-तिनोंने जो प्रवृत्ति करी है तिसको गीता मासे
महि प्रशसे।
उत्तर-एक प्रवृति को बिगुवागम पामामसारभया है जिन की
पेसे गीतार्थ सूप संपाद र यिना भर्थात् सूत्र में जो महि कथन परा
दे तिस विधि का पहमाग महिं करते हैं किन्तु तितका मवीरण
मर्यात निरादर करके मापस्य माप से उपसा करके समानुसार
कपन परते हैं प्रोवा अमोको उपदेश परतेपादि।
समीक्षा-पाठकगण उस कपन में भारमाराम जी स्पष्ट
तया सिय करते है फि जैम सत्रों में स्पयंदन का विधान मही
है किंतु चिरकाल से कटिस्प बलामानासो सत्य है हम इस
कपन को सहर्ष स्वीकार करते है। किंतु जो सपेगोजन पर बहते है
कि.मो.मै स्पान २ पर मचि पण कर विभाग परत ये

( ११५ ) दिखलाते नहीं है तो क्या घे मसत्य मापण नहीं करते तथा क्या सूओं से मामिल नहीं है मषश्य है। पोंकि यदि सूत्रो मै भारमाराम जी को मूर्ति पूजा का पाठ मिला तो फिर घे ऐसे क्यो हिनते कि सूत्रों में वैस्य पदन का विधाम नहीं है सो सक कपन से सिख ही होगया कि भारमाराम जी को कोई मो मूर्ति पूजा के विषय में सूत्रों से पाठ जप म मिळा तय ही मारमाराम मीने से लिखा ॥ किंस जय भारमाराम मो मर्सि पूजा को मदिरूप मानते है वो फिर मद्र जीवों को सूत्रों के नाम से क्यो भ्रम में डालते हैं सो यह इन का हठ है। फिर लिखा है कि यादव गीताों के चित्त में सदा प्रकाशमान रहती है सो सत्य है क्योंकि गोवाध हो स पात को सूत्रों से विरुण नामके बद पूजा का निषेध करते हैं। सो हे स्पेगी लोगो भव तो आरमारामजो केही कथन को स्वीकार करके जैन सूत्रों में मूर्ति पूजा चळो है इस मसाय कप पाणी को णेगे । यदि भाप लोग मारमाराम जी भधिक विज्ञान हो सप पा मारमाराममी के लेख को मतस्प रूप लिद करके प्रकाश फरो पदि भारमारामजी से स्वरूप विद्वान् हो तप इस मसत्य कथन को स्यागो। फिर मारमाराम जी चैत्य घदन को विरूप सिर करते हैं। सो भी षह कथन युक्तिवाधित ही है। क्योंकि यह रूटि मो पकाया देवध रूपस्याज्य है जैसे हिंसक पर्ष, फिर विधारमोय पान है यदि यह कदि सस्य रूप होतो तो सूम का मूळ सूम में ही रखते। कों ने मैं उक कथम को रखा ही नहीं इस से सिर होगया कि यह कार्य न कर्ता मे बिरुद है मर्यात सूम धम्मत नहीं है। मोर प्रोपन्य महाराम का १९५३ का चौमासा सम मल ( ११६ ), हुशियारपुर में था तिस काल में ही पौर विजय मादि संवेगियों का मी चौमासा हशिमारपर में था किन्तु कोई मी सघनी भीमहाराज सन्मण नहीं हुमा । फिर श्री पूज्य महाराज ने १९५८ का चौमासा मालेरकोटले में किया । मौर सिस समय ही भी परमाचार्य शान्ति मा सान में समुद्रपा ज्य मोतीरम जी महाराज या भीगणायच्छेदिक भी गणपतिरायजो महागम इस्यादि साधुमीका चौमासा लुधियाने में था सप मी पूज्य मोतीरामजी महाराज को जार माने लगा मपित सर्षानी की प्रति वृधि दो जामे से तथा मायुस्वल्प होने के कारण से श्रीपूज्य मगराज १९५८ मारियम कृष्णा द्वादशी को स्वर्ग गमम हो गये। सप बीमासे के पश्चात श्री गणपतिराय की महाराज पा भी छाल घन मी महाराज इत्यादि २५ साध पटियाले में एकस्य हुप फिर श्री रघमे सम्मति करके भम्याला मिपासी लारा छनमन्स अन्ला मरख पा ममृतसर निवासी प्राधा की सम्मति क साप पा भोमान् लालाशिशुराम पटियाळायालेको भी सम्मति मनुकमायीसंघ हाग भामद के साथ,थीपूज्य मातीराममो महाराज की भागनाळ १९५८ मार्गशीर्ष शुक्ला ८ मी का वृहस्पति पार के दिम मापान्द के समय पूर्वोक्त पिधि के साथ भी रुघने भी स्वामी साहनष्ठासमो महाराज को भीमाचार्य पद पर स्थापन कर दिया सम से ही पत्रों में मोर धीपूज्य सोयमलाल की मदाग ऐसे लिममा मारंभ हो गया भी सभमे शान्ति के प्रमाय से मनेर धार्मिक कार्य होने लगे या दो मपितु पी पूज्य महाराम मगधम परमाम स्वामी फेला परे परिनिरासमाम। प्रोग्य महाराजने मैनधर्म का प्रकाश प्राम मगरों में कर १८॥ सावीमालासर में पा , ( १९७ ) फिर पौमासा के पश्चात् मघापळ सीण हो जाने के कारण पा शरीर व्यपा के प्रयोग से भी पूज्य महाराज अमृतसर में ही भीमान् मला हरनामदास सतलासकी कोठीमें विराजमान होगये । किस्सु श्री माधार्य महाराज के पधारने से ममृतसर में धार्मिक मनेक कार्य हुए पा हो रहे हैं। प्रिय पाठ को ! एक पात भोर मो तपागछियों में परी मधामठा से चल पडी है कि किसी मझात मुमि को यह छोग किसी मफार के फ में येप्टन करके मनातम जैमधर्मसे पतित कर देते हैं। फिर मापदी मसत्य रूप निंदा लिख के सस के नाम से मुद्रित कराते हैं पुन कहते हैं, माआयो यह प्रथम दिया था फिर इसमे दूढ़ियों फा भनिष्टाधरण देख कर तथा जैन सूत्रों में स्थान २ मूर्ति पूजा के पाओं को पटकर (खो पाठ दिये किसी को सुमाते नहीं) पिचार किया फिर सम्यक्त्व शल्योहार को देखा तष ही इस के चित्त में भूति एमा मईत मापितस्थित हो गई फिर इसने परे दकों के साथ प्रमोचर पिये किन्तु किसी भी दफ में इस को उचर नहीं दिया, तो फिर इस मे आम लिया कि यह यूएफ मत तो स्व' कपोल कल्पित ही है पुन इसने शुर सनातन जनमत भूति पूजा रूप स्वीकार करलिया, प्रियपाठको। यह सप इनके स्वकपोळ फरिपत कयम है इम भापको इस विषय का उदाहरण देते हैं । जैसे कि मनुमाम १९६४ वर्ष में पल्लम विजय सीने ममवसरसे एक धूमीलाल येताम्पर साधु को किसी प्रकार मपने फेरे में राल कर पनारस जैन पाठशाला में भेज दिया । मौर ससको एफ ठेव मी नमत की निंदा रूप लिपफर मेमा मौर साथ में यह भी लिव दिया कि माप मपने नामोपरि इस लेख को प्रकाशित करा दो वो पुतीलाल जी मे एक पत्र लिमकर पल्लम विभप जी को भेजा घो पाठकों के मानने पास्ते सर्ष पत्र की मकल जैसो है सीदी मम स्पान पर देते है देखिये।

(११८) भी जिमेन्द्राय नमः। विदित हो कि जो मजएम यना कर मापने उपपाने के वास्ते मेरेक मजा सो ऐसा मिंदा रूप भूठा लेख में मपने माम पर मरि छपवा सकता भागे भिभाप को लिखा गया था ससत लेख में मपनि तरफ स नहिं छपवा सकता मगर हरज मरज के जम्मेवार माप मनो वो मेरे को कोई हरकत महि । भार मापमे जो यहां मरे को पटने के लिये भेमा था तो मैने प्रहळे माप को कई दिया था कि परकर ओ मेरे को साप मापेगा सो प्रहण कागा मप में पन्दर चलाने में या यहा से मि मापको लिया गपा था के मेर फ्याळ मजे भापके मसग के नहीं है तो मापने एफ पम में लिया था कि सम माघार गुधार मत देखो परमे कि सरफ पाल रममा, पढकरके जा तुम को अछा लगेगा सो परमा तो फिर माप यां लिखते हा के उनके परमालाफ छपामो मोर लोगों को लिखते हो के इसको पका ठोक फरोस पास्से माप को एप प्रश्न लिमाताई घोंकि। यो तो कोई ठीक करन पाया मही है सो माप ही छपा करके शंका का समाधानको जो में प्रश्न लिमताई उनका सुपाप मेरे को मूल पाठोस भागर्मों के जरिये मारमानद परका माहौर म छपया फर प्रगट कर दो पोंकि मेरी का मिठीक दो मायेगो वदनंतर दुसरे माणीयों को लाम होगा इस प्रश्नों का जाब पम्परा रोग के मिछर मारमामद पक्षी लाहौर में प्रकाश कर मागमो अनुसार मप मान लिखते हैं। प्रश्न जो पम्प प्रयीममम तुम तथा सुमार सेपक (भापक) परते है पो पालिस मागमों से किस मागममें है। २-कारिहरा, ये जो गुरको शाता पुछने वाला सो किस मागम में घटा है। 1-सामापक पारने का सामारपपपमुचो जो सूत्र है सो का। ।

-अगसिंतामणि चैत्यपन्दन मात्र पढकर "मुरती को नमस्कार फरनी कि शास्त्र में लिखी है। ५-नमाऽईट सिद्धाचार्यों पाध्याय सर्ष साधुभ्य ये मंत्र किस मागम मे है ६-जावति याद किस मागम में हैं। ७- उपसग्गइर लघुशान्तीस्तय जो प्रतिक्रमण में पोळने हो किस शास्त्र में लिखा है के प्रतीक्रमण में स्तोत्र पदमे । ८-प्रतीझमण में स्तपन मोर सज्झाय पोलते हो सो कोण से मागम में चले। ९-वीर्य पदमा जो तुमेरे पंच प्रतीक्रमण में है सो किस शास्त्र के जरीये। १०-पोसहनुपच्यफ्लाणवा पोसहपारपानी गाया किस मागम मे मो सुमारे मन में प्रचलित है। ११- सियाचल पर्वत को वैस्यवदन करमी ये काह लिसी है। १२-पाळीवामे के पास जो सेतरूजी नदी है उस में स्माम फरमा महारम फिस मागम से पतलाते हो। १३पर्ने मौर कोपरा जंगद इत्यादि षस्तु प्रणाहारक कहते हो सो किस मागम में ऐसी वस्तु को मनाहारक हिस्सा है साथ इस क ये मी निरणे किया आये के पूर्वोक्त पस्तुभों को जो तुम रात्री में खाते हो वो तुमारा गयी मोजन प्रत मा होता है या नहीं। "पत्र जैसे लिम्मा मुमा था सेसे ही यहां पर लिखा गया है किन्तु दमने पत्र को शुद्ध करमा ठीक नहीं भातकरा क्योंकि लेखक की जो माशा है पह मण्यमम शोत ही जाम लेंगे इस प्रकार मन्य पत्र मी शुर महीं किये गये, तथा यदि शुरु फरके दिसीया यार लिखते तो पुस्तक के मतोष दधि होने का भय था ।

( १२० )
१४-वशमा धातु फी रखीपाला दोलार यामे धातु की कलमें मौर
पस्त्र रसम के लिये टोनीयां पेटीया जिमत की सयोपा मसवार
फ लिये मोर माने की वस्तु गुद इलायचीयों का तेल हरे देकार
वैगेरा ये सर्व प्रगरे में दान है या नही मीर ये फैसला किया जाये
के जेहैमो तुमारा पचमा महा प्रत प्रगरे और छठा रात्रो मोबन
घन मामा प मा जेकर कहों के ये मिले प्रगरे में सामल महियो
पतलामो किप में शाम है भागम से अबाप देना पंप का इपासा
मही मजुर।
।
१६-हरें जो है सविच के भवित ।
१६-मूर्ति पूजा का उपदेश चीयो तोर्यकरो में किस तीकर
महाराज मे किया।
१७-मत्य मो ने चीयोर तीर्थंकरों कोया चीयो मर्जयो पन
पारया बतलाते हा सो किस बागम में लिया है।
१८ मत्ती पर सचित्त जल पा पुष्प फलादि पानसेमाणाती
पातादिक दोप लगता है या नहीं।
१९-जैसे उत्तराध्ययन भगवी जी में मत पोप समारक
पूछना परेना मादिक का फळ लिम्या है ऐसे किमि मागम में मुची
पूजा का फल लिया है अ चला है तालिमो, किस मागम में पता है।
२०-तुम लोक पेशाप यमारी के पासतेमाल करते हो मोर
फरते हो देवार में कोर हरफल गदिलो कदा रिसा।
२१-जिस रियाल में पेशाय का उस फिरमा पुण्ने दो
मौर मा धोते हो तो क्या उम में छोएम बीर परमही।
२२-देवने पम्मी ममम्मीदें माप में शास्त्र का पाठ
सिवगा।
२३--
तोरपद का हेन क्या है।
१५-मुह पणे हाप मरपनी कि मागम में ची।

२५ शये कालिक माधारांग जी में मो घोषन प्रत मा चापळा
दिक का बळा है पो क्यो महि लेते पपा कारण ।
समवघुनीलाल।
पाठकगग! म प्रश्नों का उत्तर भारमानंद जैम पधि का में
प्रकाशित नहीं हुमा है षिवारणे की पात है हमारे प्रिय सगी भाई
सस्यादि प्रतों को व्यक्त करके क्या २
काम कर रहे हैं क्योंकि
सवेगमत में शास्त्राभ्यास नो स्वल्प दी है किन्तु मम कल्पित रुप
प्रयों का मभ्यास महाम है इस पास्ते इन लोगों की गरि विहल हो
रही है,मौर फिर यह हमारे प्रिय माई इसि पास्त प्रश्न का उत्तरम
मामे से शीघ्र ही मोघ करने लगमाते हैं मुन से अपशप मोलते हैं।
सदाहरण ! जैसे कि सम्बम् १९४७ में भारमाराम जी कसूर
(ापुर) में ठहरेप घेता श्री श्वेताम्मर स्थानक घासी भाषक
समुदाय जैसे कि लाला झोत्रमशाह पधाशाह जीघदेशाह,
दिवानषद, छपाराम, लाला भासाराम, गुर्मावशाई दुमिचंद,
मामशाद, पिल्लेशाह, लाला गौरीनारशाह गए परमामद पळीटर
मातोराम, स्यादि भाषक मारमाराम जी के पास गये मोर यह
मदन किया।
कि माप हमको एक म शास्त्र के मूल पाठ से मूचिपूजा
सिय करके दिखलायें।
भारमाराम नी-जैनशास्त्र में मत्तिपजा का विषम है।
'मात्माराममी के मोदम चरित्र के पदने समी मिश्चय होता है कि।
भारमाराम जी ने को कुछ पठन किया है पे सर्घ श्री श्येताम्पर सम
ममियों से ही किया है किन्तु सपेगमत के धारण करने के पश्चात्
किसी मी सगी से कार मा पुस्तक महों पटा है।
एक मामो से कई पायक अन मा माराम मो के पास नहीं गए
ये भोर कर मन्प मिल गये थे।
.

यायकममल
( १२२ )
धामकमंडर--कोनसे सूत्र है।
मात्माराम जी-दशय फालिक सत्र में है।
भाषकमरळ-हम मापको श्रीमान लाला हरजसराय जी।
मसार से दशकाटिफ सा देते है भाप हमको पाठ दिसला दें।
मारमाराम जी-गच्छा लादी।
में
अप श्रीमाम् लामा हरजसरायमो क मरार में
से श्री दशप कालिक सूप टाफर मात्माराम जी को दिसलाया
भौर कहा कि भाप रस में मूर्ति पूजा दिसला वम मात्मापम जी ने
थो दशौ कालिक सूप के पोछे भो लिका लिपी होती है उस में
से एक गाया दिसलाई ठप भी धायफमरल में कहा कि पद
सूप को गापा महीं है भोर भाप की मतिना यह 'यो कि हम श्री दश
कालिक
सूत्र से दिनळागे सो लिफा न सूत्र है गाहो ममापीक है
भीर इसका फत्ता कौम है।
जप इतना भायक नंदल ने कहा सय भारमाराम जो भोपा
तुर होगये फिर मनुचित शम्ब पोलम लग गये क्या जामे मायक
मस्छ भन्छे मर्त में म गया होगा जिस पास्ट मारमाराम जी गये।
सपाधी सूत्रात गमें ठीक पाहा कि (मा उसे सरण जति) भर्षात
हारे हुए पुरुप पो फाप ही का शरण है, सो इसी प्रकार मारमाराम
जी ने श्रीभाषक मल के साथ पसाय किया।
मिप्रगण, पह सयेगी लोग चाय शब्द सदी मूर्तिमा सिय
परणी पादते । सो यद पदीप शमजिसके विषय गमरवरप
में ऐसे उल्लेप है यथा :--
'स्वस्पमापतम नियमायतन मदस्य) भात् चाय भीर मापतन
यद दोनों मामयमशाला की भूमिका के हैं।
जिस पोसपेगी लागा में म्ययात करते ६ शोर।
मदम-मति म्याम बापारण है इस लिये ही पूजम पोपारे।

( १२३ ) उत्तर-मित्रवर ! यह भी कयन माप का हास्ययुक्त है क्योंकि कारण के सदृश ही कार्य होता है सोचेतन का कारण अबरूप नहीं हमा करता यदि मर्यि कारण मानोगे तो क्या कार्य पर्वत बनाने इसलिये चेतन के प्यान का कारण जीव अजीवकी मनप्रेसा ही है ॥ मन-जैसे सामायिक करने में भासनादिक की मावश्यकता है इसी प्रकार घ्याम के समय में मूर्ति की मायश्यकता है। उत्तर-मध्य यह मी माप का कथम ममाननीय है क्योंकि मासमादिक को भावश्यक मैं केवलजीवरक्षा क षास्ते दी भाषश्य कता है माफि मासन पूज्यमीय है फिर जो महारमा जिनकल्पो होते ₹ासमादि के मी स्यागी होते हैं इस लिये यह मापका हतु काय साधिकमहीं है फिर मासन मपम्प है इसी प्रकार मूर्ति मी भपूज्प है। सपा नत्यनिर्णय प्रासादमामक प्रध में जितने दिगम्बरों की मोर से पआरमाराम जो मे मूत्तिविषय माझप तो लिने है किन्तु उमका युक्तिपूर्वक एक मी उत्तर महीं दिया रे भपितु सम सत्तरों से मूर्सि ममाननीयही सिरहानी है। यथा उदाहरण सत्यनिर्णय प्रासाद स्तम।। --अब मिम प्रतिमा जिमघर के समान मामले हो तो फिर मिन प्रतिमा के टिश का चिन्द क्यों नहीं करते। रचर-जिनेन्द्रके तो मतिशय के प्रभाष से लिंगादि महीदीखते हैं और प्रतिमा तो भतिशय महों है इस पास्ते तिस के लिंगादि दिस पद स्यादि । प्रियघरो! देखिये जय जिन प्रतिमा को काई मी मनिशय नहीं है वो फिर सस को माय तीर्थकर से मी मधिक मानना सो पधा यह हठ धर्म महीं हे अवश्य है। तया जो पदार्थ माप दो शून्य रूप हे घे शाम *केषस भासा पम्यमीय नहीं होता है किन्तुमासनारूद सीर शुर कप पूज्यनीय है अर्थात बदनीय है। -

इठ करते
( १२४ )
दाता कैसे पन सका है। हमोलिये यह मर्सिपूमा युक्तिया सूत्रमारा
पाधित ही है। तथा मिस प्रकार यह लोग तिमा
में
है इसी प्रकार मुखपति विषय में मी धर्ताव करते हैं जिसके लिये
ममक सूत्रों पा प्रन्यों के पाठ होते हुए भी यह लोग महपचि हायमें ही
रखते हैं सो निधासुजनौ ! इस के प्रमानार्थे जैमहितेपछु, पत्रको
सन् १९०६ माह जुसार, मंक पृष्ट से दनिये
भीमान् संपादक यासीलाळजी लिखते हैं कि मुहपत्ति का सवाल
के जिसको हमने पिळफुल छोर दिया था उसको छेर के गंभीर का
मे पाले माल्यो खुद मिन फितापों का मानते हैं उन किसानों
ममिमाय यहां पतलाते हैं ! मुहपसि पाटा. वाढी, भौर जो तरकी
भिरमसा ।
हित शिक्षाराश ! श्री विजयसम सूरि के प्रमाणिक धापा ने
संपत् १९८२ में धमाया है उस में लिम्मा है फि:-
मुखबाधेते मुहपति, हेठीपाटोधार ।
अतिहठेदाढाथइ, जोतरगलेनिवार ।।
एक कान धज सम कही,खभे पछेवटी ठाम ।
केडेखोशीकोथली, नावे पुण्य ने काम॥२॥
सब स दास्प रस पुष काम्प में मुहपचि का हेतु बराबर सम-
जाया है। टेटे में पैसे की कसनी मांध रम्रमे से क्या पुण्य रोगा।
पैसे की कममो तोहात में रणमे से दो उपशेगीभोष्ठग्यि विभपजी.
साधु मिस फो करते है सम्पत् १८१० में श्री लम्पि विजयी मा.
राज ने, परिपल मच्छो का रास पाया है इसमें प्रमात संधीप
केपारे म उपदेश दिया कि:-
सुलभधोधी जीवडा मांडे निज पटकम,
साधुजन मुखमुपति याधी कहे जिन धर्म ॥१॥

( १२५ ) सुविहितमुनिजानीये मांडे निजषट कर्म ॥ साधुजन मुखमुपति बाधी कहे जिन धर्म ॥२॥ भो ओघनियुक्ति गाथा १०१६-६४ को सूर्णी। चउरगुल विहस्थी एर्यमुहणतगस्सउपमाण बीय मुहप्पाण गणणपमाणेणइकि॥१॥ सपाइमरयणु पमझणठावयसिमुहपत्ति नासं- मुहच बधइ तीएवसहिपमझतो ॥२॥ सपातिमसत्वरक्षणार्धजल्लनिर्मुखेदियतेरजः स चितरेणुस्तत्प्रमार्जनाथमुखवस्त्रिकावदति नामिका मुखचवध्नातिययासुखवस्त्रिकयावसतिप्रमार्जयन्ये नयेनमुखायोनरज प्रविशति । श्रीप्रवचनसारोद्धार गाथा ॥५२१॥ सपातिमजीवमाक्षिकाद्या रक्षणार्थ भाषमाणे,खेमुखवस्त्रकादीयतेतथारज सचितपृथ्वी स्तत्प्रमार्जनार्थच मुवपातिकांवीयते । रेणुप्रमार्जनार्थ प्रतिपादयति तीर्थंकरादयस्तथा वसति प्रमार्जयन् साधु सा मुख च बध्नाति आ. छादयति। पुरिमका प्रायश्चित । मी महानिशीप में सपत्रिका वगैरह इरिया पहिया परिकमै पपणाप्रति फमण मन्मायकरावमादे-ले तो पुरिमहका पापदिषत का है-योगशाम को वृत्ति में पापमा पृष्ठमा के धमत महपत्ति बोपना हारे।।

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फरत ( १२७ ) ऐसा कह कर पषता में गौतमस्वामी के एक हात की मगुलि पकर के रस्ते में बातें करते करते दोनों चले। मप जय एक हाथ में झोली है मोर पूसरा हाथ पपता मे रोका है तथ (जो मुहके मागे मुह,पसीमही पांधी हो तो क्या गौतमस्वामी मुल्ले मुह से पातचीत करते गये होंगे। इस तर से चारों पाजु से विचार करने से मुहपत्तीमापित होती है ऐमा होकर मी एक फकत मत की पान है कि कितने उसको माधर उदा देते हैं। व्याख्यान के वफत मो मुहपती नहीं पांधने वाले पर्ग के साघुमों को पादमरने के समके कान छेद के मुहपत्ति यांपनी परसी है इससे मुस्लि तरह से दुराग्रह साबित होता है। जिस मुहपती को शास्त्र स्थापन करता है जिस मुहपत्ती का उपयोग पारसी मावि मन्य धर्म के गुरु भी धर्म कथा वस्त जिस मुहपति को हाल के सुघरे हुए जमाने के युरोपियम राक्टर चिरफार के एक मुह के भागे पांघते हैं। मओ सुहपति मुद नहीं पांधने वाले मारमाराम जी महाराख नाहों में मान्य रखी भौर नुव फ्धौ नहीं बांधते इस के समम पवगने मैं पकडे गये भौर भपने पर्ग में मूठे परे । पेसी मुदपत्ति जैन मुनि का चिम्ह है । जैन यो फा हथियार है मैन शासन का भूगार है और सब को माममीय है ।। मामा में दो पम्त उसका जय हुषा यह कुछ माश्चर्य वार्तामही रसका सम हमेशा विजय,ही है लेकिन जिस का नाम मुहपचि मुष्ठ पपत्ति मुह को कपजे में रखने पाली उसक धर्म का पाम विन्द माममे पाछे छोग उमके निदकों के मुषाफिक वर्षा के पहाने से कमी पदवा वरा मिथ्या मापण सुपछ शव योगे ही नहीं मुह पर का पहका के जो सम्जनाई पा लक्षण है उस को वजियाम्मार लोग विसिता ठहराने उससे क्या मुहपत्ति के मज मिल थम जायेंगे गौतम भी भापकोण महास: J प्रिय पाठकगग ! यह सर्व उक लेन हमने ययावत उस पर से उदघृत किये हैं सो एल क्यों से सिर है कि जैन धर्म के मुनियों का विम्ह मुहपति मुहपर पाघना ही सिर है सो इतने प्रमाण होते हुए जा संवेगी लोग मुहपछि मुख के साथ महीं पांचते हैं ये नत्र मसत्य पठ है। 'तथा जो यह लोग सुपुरुषों को पुनः पुना कटु पाद प्रदान करते है तिल का मूल कारण यही है कि मो सुइ पुरुष शासान कूळ गुसरो पदेश करता है उस पुष्प से ही यह लोग प्रतिकल हो जाते हैं मोर फिर उस को ममुचित शार पोलमे वा लिख में लग जाते है । उहाद रण ! जैसे कि ग्रोमाम् धायक लोका मो ने सम्बत १५०८-२ के पर्ष में श्री महमदाबाद में सैम धर्म का शुय उपदेश किया तर या लोग उसके प्रतिकल हो गये मोर का जोकने मनुमित शमस्तिने मग गये क्योंकि सोका जो समानुसार उपदेया करते थे। सा जो उपदेश लोकानो ने किया था तिस समय में ही उन्होंने एकापम ८ मफ युक लिय लिया था भपितु उसी पका मतिकप जोर्ग पर एक हमारे पास है सो उस (जो गर्जर मापा मैदेशित यहाँ पर दिम्दी करके सिनते हैं) में से दुमकथा मम्प शिलाप भरपाठकों के पाता इस स्थान पर लिपसा॥ १यली नगयाम् शिकाळा सो उन्होंने तीन काल कासार स्व शाम में ऐसे योदेणाफिसम्यक साम, सम्यक दर्शन सम्प पारित या मपवारमादि के माने पिना कोई मो मौष मास में नदी गया मही जागा मपितु प्रतिमा रे मने से कोर मी जीप मोसनही गया गौर मादी जागा मादो जाता है।

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- ( १२८) मिथ पाठकगन ! यद सर्प उक्त लेम्स इमने पपावत् उक पा से उपत किये हैं सो उक्त कथनों से लिय है कि जैन धर्म के मुनियों का चिन्ह महपति मुहपर पापना ही सिर है सोतने प्रमाण होते हुए ओ संवेगी सोग म्हपति मुख के साथ नहीं पाते हैं ये रन मसस्य इट। तथा जो यह लोग सुपुरुषों को पुनः पुनः कद शम प्रदान करते हैं तिल का मूल कारण यही है कि जो सुस पुटप शासानुकुम पुरी पदेश करता है उस पुरुष से ही यह लोग प्रतिकल को आवे मोर फिर उस बो ममुचित शाह योलमे पा लिसने लग आते हैं। रण ! जैसेकियोमान् धायक लोंका जी ने सम्म १५०८-५ के ष मैं श्री महमदाबाद में जैन धर्म का शुय उपदेश क्यिा सरीपा लोग उसके प्रतिकल हो गये मोर लौका जी को ममुमित शारसियो छग गये क्योंकि यफा जो सूधानुसार उपदेश करते । सो सा उपदेश लोकामो मे किया पालिस समय में ही उन्होंने एकोपर १८ मंफ युक लिग लिया था अपितु सो पा प्रतिरूप जीर्ण पदमारे पास है सो उस (जागर मापा में प्रति पर हिम्पी करके लिप है) में से कुछ मकथा मम्य शिक्षाप मेकपाठोपाता इस स्थान पर लिपता ॥ १ फेपली नगयाम् विकालाई सो रगहोंने वोग काल का स्वार स्प बाम में से दो देवा कसम्यरक्षाम, सम्यकपन, सम्पद धारित पा मपसत्यादि के माने पिमा कोई मौजीर मोक्ष में गदीं गया मही आपेगा मपित प्रतिमा पूजनेस का भी जोर मोस नहीं गया मोर मादी जागा नाहो जाता है। भोर माही मूत्रों में किमी मूर्ति पूजा का अधिकार है किमक जोव मूर्ति पूजते पूमते मोस दो गया येसे मर्प मानना । सो बात पर्यन पारित से दो मोक्ष दे देषो समकताग प्रपyaww.tr ४ सम्यक्त्व ( १२९ ) २ जीयराशि मजोयराशि सूपों में यह दोनों ही राशि कहाँ है सो यदि काई तोसो राशि प्रति पादन करे ता यह निम्प है देखो सूत्र उयपाई ओ ! प्रश्न १९॥ ३ जो खीय का नहीं जानता भजोर का मो मरों जामता तो मला सयम माग कैस जान सका ह दे सो सूत्र दशवकालिक भ०४ । के पिना सम्यक ज्ञान नहीं सम्यक मान के बिना सम्पक धारिश नहीं सा सम्यक् शान सम्यक् दर्शन, सम्पक चारित्र के पिना मोक्ष महीं उपाध्ययम सू. म० २८ ॥ ५ साधु स्वल्प मोर मसाधु पटुत्य है दशर्यकालिक स.म०७ ।। ६ साघुमों के पष्च महाप्रत सर्पया प्रकारे हैं देश मात्र महीं इसीषास्ते सामों को मंदिर का उपदेश करमा सूप विरुम है देखा स. वशयकालिक म०४॥ ७ शाम पिमा दया नहीं दया हो सयम है सू० दश० म०४ ॥ ८ भगवान् ने अपने मम्म से (भहिंसा सजमातषा) यही धम पस मतु मूर्ति पूजा ॥ ९ भगवन भी पर्चमान स्वामोजो न शास माहार ग्रहण किया सपा मन्य मुनियों को प्रहण करने का उपदश दिया दरो सूत्र संग प्रथम भूतस्कंध भ०९ उपाण्ययन भ०८ ॥ १० पायक केयली भगवान का ही प्रतिपादन किया हुमा धर्म प्रहण फरे देखोस्प बयारमो प्रश्न २०मपितु हिंसाधम म ग्रहण करे। ११ जो प्रपयन है सो भय है किन्तु शेष मय गमर्थ रूप है देखो स० उधार प्रश्न २०॥ १२ साघु गृहस्थादिसे कोई भी कार्य म कराये सू नशीय उदेश १३ 'मिध भाषा मापण फरने घाला जीव महा मोहमो कर्म की • भारमाराम जी के जीवन चरित्र में जो गुजरांराले के पिपय में हेन्स लिने हैं चे सर्व अनुचित है ।। - काया है भाचा ।

( १३० )
प्रकृति पाघता है स० समपायांग भी स्थान ३० षो मयमा समा
शुवस्कघा
१४ मिश्र मापा सपथा ही स्याज्य है देखो स० पश- म०॥
१५ सप्तनप घनिक्षेप का स्वरूप मनुयोग बार मी सत्र में है
फिन्तु मावनिक्षेप ही पंदनीय है मत मन्य ॥
१६ साधुके भप्टादश पाप सेवनका रयाग सर्वथा प्रकारे हे गत
देशासो मप सर्वथा स्याग व ममिमहादि धारण करके मदिरा
का पनषामा जिम पूजा का उपदेश करना कैसे हो सकता है, सापय
सूत्र विषय है ऐसी सूम० उम्पार जो सापुति ॥
१७ मिस यस्तु पर पूर्ण माप है यही परिमहा देखो.
पशवकालिक म० ६॥
१८ मगयाम् मे दोनों प्रकार का धर्म प्रतिपादन किया है सूत्र
स्थानांग स्थानदिनोय।
१९ गवस्थ धर्म में बादश प्रत एकादश प्रतिमा ही माहि
मुक्ति पूजा, देखिये उपासक दाग सूष पा पशामुताध सूत्र ।
२० मईम् मम ही सर्पयत् है देखो सूभ उत्तयायपन म०३।
२१ साए के मोटोमरपावपामई तो पलाये प्रतिमा का पूजन
किस मांगे में है मवकोटी का स्याप देखो सा स्थानांग स्पान १
२१ राग पदो पाप कर्म पोज बा.मम..
२३ तपारि सुकर्म बल मिर्जरा होकर मद मम्पायें ।
२५ पाप पुष्प पहनानीहो मा सय होयेंगे ताती मोम होगी
देखो स० मा. म. २१ ॥
२५ मंयम से पतिय दर की प्रशंसा को तो प्रायश्चित मावा
मोसा मशीप॥
२१ दोमो प्रकार घ माप मगगन ने बताया हे भार मत्यु

पमित मुत्यु सो किम किम जोषों का कौन कौनसा मृत्यु होता है रेबोस. मा. म. ५॥ २७ केवळी षा १५ पूर्वधारी से लेकर १० पूर्वधारी परत सर्व - समभुत है मंदी जी मूम में देम लीजिये । २८ बो केपली मगवान् ने भपायोर्म कहे हैं वे सर्ष मुनियों को त्यागनीय है देखो सू. पश० म० ३ ॥ २९ भगवान का प्रतिपादन किया दुषा धर्म एकाम्व हितकारी रेखो० प्रश्न व्याकरण ३. दयाका ही माम पूजा है या यह है प्रथम व्याकरण स्म० २१ सदेव ही शान्ति का उपदेश करमा देखो स्पषा.म.१०॥ ३९ पानदर्शन पारिष ही यात्रा है माता जो सूप पा भगषतीजी सूत्र में इस का वणम है। २३ भगवान ने ससार से पार होने के मार्ग पम्य संघरदी का है प्र० म्या०॥ ३४ श्री मम योग्यतार जी सूत्र में उमय (दोनों) कास साधु साधी भावक भाविका को परावश्यक फरमे की माता है नतु मदिर पूमने की। ३५ मो में पुना २ यह उपदेश है कि पिपा धारिल से ही मोस है मत मध्य से सू० स्थामांग स्थान द्वितीय २५ मिन पथनों में किम्पित् माम भी सापप उपदेश नहीं है २२खोसूच भाषश्यकादि। पाठकगण अप भीमान काशाजी मे स्यादि प्रश्न पूछे षा सूत्रोक्त लोगों को सायोपदेश सुमाया तव ही मूर्षि पूजक अन पा शिपिलाचारी लोक लोकासोको निंदा करने लग गये मोर उनके लिये भाषित शम्द लिनने सगे सो पह पाप हम लोगों का दठ धर्मसिय करता है क्योंकि शुर पूजा मुकि मार्ग के देने वाला हे मत दम्प पूजा श्य पमा कहो या माय पूमा कहो दोनो का एक हो मर्ष है दखिये ( १३२ ) भाष गमावा विधान ममाघिसन प्रथम पुन्दकुम्माचार्य शिष्य पर्यत नामक मुमिने समाधि सपके पासावाधर्म इस प्रकारसे लिया है। में गत काल से भ्रमण यग्ता थी र के उपदेश से सप सम्म रूप देय अपने दो पाया है भीर प्रा गुरु दी। उपदेश से उपशम रूपी सगेयर के घोच मे स्माम किया है जिस के परमे से मेरा मशान का दाह नष्ट हो गया हे भार फिर मैंने अपनदी पास सिर क्षेत्र देण्यादै पन भमूति (जोध) को मुसिमाम शरीर में भलो प्रकार स निणय कर लिया है फिर मैंने ममचिमान जीप को शान्सि रूपी जल से शुर किया भीर शुम माप रूपी पुप्पोंसे मेमे पूमा भी कर ली फिर सभ्य रूपी दीपा जलाका मे मारती भी उसा हेभोर फिर मने मानद पी पोती (परिबंधम) पदम के माय पूमा परी , सो इस पूजा से भमादिगार की पाए गष्ट करके मामी मोक्ष में जा पिगममान ताद। प्रियसुसपुरपा ! यदी मारम पूजा है इसके करने से मामा शान्ति फ मदिर में पिराममान हो जाता है। मोर जन्म मरण के पुत्रों से मा मुक्त दोसावा ऐ सा हे माय मा पूजा का श्री गाया महाराज में उपदेश दिया है इसलिय हो भम्य जीपों के मोपाय धो महारान का जीवन चरित्र लिपादेफिन्त माग म सम्पपिसो कवितको मेदित करने का महाहमा पाशाह माय जन भो महंगाया पर्व याममरसिंद जामदाराम के जीवन परिप्र को निष्पक्षता से पदरे गयश्य हो भपर्म भमल्प नमु य जग्य का सफल पर। * उपसंहार* माम्यरर महाशयो! R पिचार घोट पुरुषको मारय सम्म प्राप्त पर पोम्प किये परोपकार हितपिता मारि मगमो द्वारा अपने पीरुपिक कम से उगाय सपकास परिभम परोसे ( १३३ ) कि श्री भाचार्य जी महाराज ने परोपकार किये हैं मर्थात् जिम्हों में परोपकार की भाशा से मसारा ससारोऽयं, गिरि नदी गोपम योषम, तृणाग्निसमजोतं, शरदम्रछाया सरशामोगा स्वप्न साशो मित्र पुत्र फळभ भृत्यवर्गसम्बन्ध, हरयामि सद्विचारों सरापरम पैराग्य तथा सुशीलना को उपार्जन कर इस क्षण मंगुर ससार को त्याग दिया भीर मुनि पुति प्राण की क्योंकि कहा है :-भादौचितेतत कार्यसका सम्पयतेमरा, मसातु पुनः कायेमेषयिते कदाचन इति । पुमा मापने महत् योग्यतासे स्वल्प कालमै ही भुत विद्याक हस्य सथा गूठाशय को प्रहण किया पुन तप क्षमा दया,शान्सिइमकी महाम स्वरसे उधोपमा की, मौर मृदु सकोमळ सत्योपदेश रूपी तोपण शस्त्र से मम्य जीयों के पदयों से मिथ्यास्य रूपी कठिम वरमों को उत्पाटन किया, पुनः सुयोग्य मनोहर प्याफ्यामोसे महममत को उसेजन किया प्रेममाष पथा सम्पकी वृद्धि की, देशदेशान्तरों में पर्यटन फरके भने काही प्राणियों का महन भाषित सत्य धर्म में उपस्थित करके रड किया, मौर स्य मारम शुरद्यर्थे महान् मप किया पुन मण्यातम योग द्वारा मारमा को निर्मळ भौर पषित पनाया मोर मत में भईम महन करने तथा मा हमोमा हमो, ऐसा उपदेश करते हुए स्पगे गमन हो गये । इसलिये प्रियवये, ऐसे महामाचार्य के गुणानषाद फरमे से सपा । इसके गुणों का ममुकरण करने से घा इमका मोवनचरित्र परमेसे गाय पापरूपो मर को म्युरहम करते हैं इसलिये मार्यमा है कि ऐसे महात्मा के नाम को चिरस्थायी करके मोक्षाधिकारी पनों ॥ सुपेरियामा। ॐशान्ति ! शान्तिः शान्तिः || समाप्त प 59HME

भीजिनाय नम..
प्रस्तावना।
सर्घ पिन्जमों को विदित हो कि भोजन मिसान्त प्राप'
भर मागधी मापा में ही प्रतिपादन किए हुए हैं क्योंकि जेन सूत्र
(शाख) भी प्रदान पाकरण के द्वितीय श्रत स्करप के दितीपापाय
मे छिपा है -
(तहयकम्मुणाहुँसिदुवालसविहाय होइ भासा)
मर्यात-मादश प्रकारको माग होती पथा-प्रात !
मंसत २ मागधी ३ पिशाधको । सरसनो ५ भपमंश यही पट
गप प मौर पर ही पप प एप सावश प्रकार को मापार्य है। सपा
जैन शास्त्रों (सों) से पामो प्रगट होता है कि-माहवार पर
मापायें मनादि से मार्य लोगों की भाषासापास्ते जहावाप्यों
ने माछत या मागपो मादि मापामों के पात पसर्गरवादिप्रकरण
प्राप' संस्कृत में दी र है। पावा शिक्षा में भी दोनों (मारुत
संस्कत) मापामों को तुमय पर्षन किया है जैसे कि-
गाळपट मापामोरे गम्याम्यपट दी प्रकार प्रयोग सिर होते
हैं यथा. सरिमो यह शपमा मापामै मर्पका बाधक है । मान
परससव मापा स्याण का नाम है। शिमाला मागपी मारा
मैं गाय कोसते . उसनं पिशाप को भाषा में पाप
प्रीम का पाव है सो सरसैनी भाषा में इस म एस
५बरी मधमाश मत का पारस्पारित किस
पम्पही माषामों के प्रपोग REA से मिलते जुलते हैं मात लप
चिम्वित् हो मेरा

( १३५ )
त्रिषष्टिः चतुःषष्टि वर्णाः शम्भु मते मताः।
प्राकृत सस्कृतचापि, स्वयंप्रोक्ताः स्वय भुवा ॥१॥
सो समति काल में भिवमे संसत मापा के व्याकरण उपाय
होते हैं तिमसे अति प्राचोन स्वल्प परिमम सपा पर फल मद भी
शाकलायम म्याकरण मता पाणिनीय व्याकरण की मष्टाण्यायो के
एवीप अन्याय के पतुर्ये पाद के १९१ चे मूभ में शाकटायम मुनिका
मत तथा पून में माम ग्रहण किया है यथा-
( घाटायनस्यैष) मपितु स्वामी दयानम्प सरस्वती जी मी
मप्टाप्यायी के कारक प्रकरण के हिन्दी माप्य के ४८ पृष्ट में ऐसे
लिखते हैं कि-(उपशाकराव घेयाकरणा ) भर्थात् म्यून है भम्प
व्याकरण शाकटायन म्याकरण से। सो खुप पुरुषो ! मीशाफटापमा
चार्य नेम मतानुयायिही सिख हो चुके हैं। क्योंकि इस व्याकरणोपरि
ममेक टीकार्य जैमाचार्यों ने ही करी हैं। मपितु शाकटाममाघार्य भी
मपमे मापको भूत फेवली देशोयाचार्य ऐसे मामसे लिखते हैं जोकि
बमधर्मके उकसांकेतिक शम है। तया जैम मतानुसारदी प्रक्रिया है
पौर चिन्ता मणि नामक टीकायसवर्मा चार्य ऐसे प्रति पादन करते
है कि-मास्योपयोगी पही म्याकरण है जैसे कि
-
•श्लोक:-
स्वल्पग्रन्थ सुखोपाय, सपूर्णयनुपकमम् ।
शब्दानुशासनसार्व महच्छासनवत्परम् ॥१॥
इन्द्रचन्द्रादिभि शाब्देर्यदक्तशब्दलक्षणम्
तदिहास्तिसमस्तच यन्नेहास्तिनतत्कचित् ॥२॥

( १३६ )
पादि पात से कपमों से स्पष्ट सिरमोगया किा-श्री शाह
टायनाचार्य पूर्ण अनानुयापी थे, सा मधुमा में श्री शाकटापमापार्य
छत शाकटायन म्याकरण या हेमचन्द्राचार्य रुन सिय हेमामुशासन
(मपर नाम हेमवप्राचाय कृत मारत व्याकरण ३) मष्टमापाप के
सूत्रों से भाग जोयों के प्रमोदार्थ मामकार युक महामन्म के घात्यादि
का स्यरूप लिपटा घोंकि जेन मा में उम को मरापमा
मामा है । सा इस महा मन्त्र को ग्याल्पा पूर्ण मोति से करने के लिये
तो महाग समय को भायश्य सवा दे कि इस समय मन दिगम
माघ म्याल्यापरिहोस्या लेखमी को मार दिया है मामला है कि
समान अन इस महा मन को मापयन करक मपश्यमेषदोभारमनस्य
को प्राप्त करेंग।
मैं सप साविध पुरापो स ममता पूर्वक प्रार्थना करता है कि
यदि इस ज्यास्था में किमो प्रकार टि का घेता इस महा मात्र
के धास्यादि को गुर पास पा स्त्रमा द्वारा सूचित करें।
.
महाशय ! महा मात्र पो (ममाफार) मप्र मोपहते हैं मात
द्विसीय माम मदा मन्त्र का मामार मन्त्र मी है परन्त पाई परम
ममोकार के स्पामोपरि मकार मन्त्र पसे मो उपारण करतेसो
पदमी सस्य है क्योंकि प्रारत व्याकरण में इसका पियेपर से
किया देवया
रुदनमोवं ॥प्रा०व्या०अ०८ पा०४८० २२६॥
अनयोरन्त्यस्यवो भवति ॥
भयांत् सम्म से हमार मन घात के मरत पर्न को यहार हो
गया जैसे 1-(पद) (मया) यानि इस सत्र से (कार)पेसे
सिर इमा पुन नमस्कार सदमे ममामार समरस मित्र
kar
-

( १३७ )
मता इस महा मत्रके धास्यादि फो मषिक नर मावश्यकता है
किन्तु कोई भी पुस्तक उक्त विस्तार युक्त हष्टिगोचर नहीं हुमा इसी
प्रयोजन से प्रेरित हो कर मैने उक्त दो व्याकरणों के सूत्रों से इस को
प्याल्या को लिखा है। सो महामाशा तया हद विश्वास है कि
पमित मन रस महामन्त्र की प्यास्या को पठन कर मेरे परिभम
को सफल करेंगे।
उपाध्याय जैनमुनि आत्मारामजी पजाबी।
नमस्कारपरस्परद्वितीयस्य ॥ प्रा० अ०८ पा०१
सू०६२॥ अनयाविनीयस्य अनओत्व भवति ॥
इस सून से नमस् शप के दिनीय शाप के मकार को अर्थात्
ममस् शप्प के मकार के मकार को मोकार हो गया जैसे कि (नमो
स्कार) पुन:-
क-ग-ट-ड-त-द-प-श ष स क पामवंलुक् ॥
प्रा० अ०८ पा०२सू.७७॥ एषांसयुक्तवर्ण सम्बन्धि
मध्वंस्थितानांलुक् भवति ॥
इस सूत्र से सकार का लोप हो गया, तप (ममोकार) ऐसे
पा पम:-
अनावो शेषादशयोदित्वम्॥प्रा०अ०८पा०२सू०८९ ॥
पदस्यानादौ वर्तमानस्यशेषस्यचादेशस्यद्वित्वभवति।
इस सूत्र से ककार हिम्म हो गया तब परिपक प्रयोग (ममोकार)
पसे सिय हुमा, मत पया 6 से 7 से मागे मान्ति नोनों प्रयोग शुष
सियप

( १३८ )
श्री यमानाय नमः
॥ अथ महामन्त्रः॥
अनमो अरिहताण।नमा सिद्धाण ।
नमा आयरियाण । नमो उपल्झायाण।
नमोलोए सब साहण । इति ।
भगवति सूत्र शत्तक १ उद्देश १॥
मर्याध्यय'--(नमो)(मम ) ममस्कार (मरिहताण) (मदम्य)
मईपुमायां धातु से जो शतृ प्रत्ययान्त दो पर महत् शब्द पनता है
तिसका नाम माश्स मापा म मरिससोतिमरिहंत मगन्ती के
ताई ममस्कार दो भर्धात उन पो नमस्कार दा (ममा) (गम) ममस्कार
दो (सिदाण) (सिक्षम्या) पिपराधी धातु से जो क मस्ययात हो
पर सिरसाद पनमा है मति जो सिद्ध पुस, जर,म,मशरीरी,
सर्या सर्व दशी तिमपे तार ममस्कार दो (नमो) (मम) समसार
हा (मारियाण) (माघायेभ्य) जो माङ् उपसग पूर्वक भागति
मक्षणयो पानुसे पदम्तफायण प्रत्ययान्त होगर सिप होगाई मर्यात
• पाई २ पुरए पक्षपानी मालपो स्वाग में प्याज पर
तथा दट पर से मी मापण परते है कि (पमोकार) पशुप
पर्धात् जिस पो पर्ष गकार होय पहा गुर है गम्य मर्य मम ।
परम्स
माहन प्याकरण में मनमिए है पॉहिमालपारम
सिरायपा
वादो प्रा००८ पा०१ स०२२९ । असंयुकस्या
दो वर्तमानम्यणोधाभवति ॥गरो नरो गई नई इनि॥

मर्थात् थापत माधाकि ताई नमस्कार हो,(नमो) (नम)नमस्कार हो (उपसायाण) (उपाध्यायेम्प') जो कि उप अधि उपसर्ग पूर्वक एक माययने पातुसे छदस्त का घम् प्रत्ययान्स हो कर पमता है अर्थात उपाध्यायों क ताई नमस्कार हो (ममो) (नम) ममस्कार हो (छोए सम्ध साणं) (लोक सर्वसाधुभ्य.) खो लोकदर्शने धातु से लोक शप्प मोर स गती धातु से सर्प तथा साध संसिनी धाससे उण प्रत्ययात हा कर साधु शम्द इम सपकी एकस्थता से (लोए सम्म साहूण) ऐसे पर सिर होता है लोक में साधु हैंतिम को नमस्कार हो। मावार्य -स महा मन्त्र में यह वर्णन है कि मनम्न गुण युक्त चतुर्कति कमी के मष्ट कर्ता मौर जिनके बावश गुण प्रगट हुए है परम पूज्य ऐसे गुणगुणाळकत श्री मरिहत जी महा राओं को मम स्कार हा पुमा जिमके मशरीरीसिस पसाजराम रेस्यादि अनेक माम सुप्रफ्याति युक्त प्रसिद है जिन के सर्व कर्म क्षय हो गये है मत सो फर्म कपिरजसे विमुक हो गये हैं और जिन के मष्ट गुण प्रादुर्भूत हुए हैं इत्यादि अनेक सुगुणों सहित श्री सिद्ध महाराखों को नमस्कार हो भपितु जो पट विंशति गुणों युक्तमर्यादा से क्रिया करने वाले जिन को मानमें गति भधिक है नपा जो सम्यक प्रकार से गच्छ (साधु समुदाप) की सारणा (रक्षा करमा) धारणा (स्थिलाधार होते हुए को) साषधान करना) साघ मण्डल को हित शिक्षा देना तथा पस्न पाषादि द्वारा भी ममिपों को सहायता देनो वा परम्परा शुरु शाखार्य पठन कराना और मा दुयळ मथात बघायलझीण रोगादि युक्त साधु दो उन की यथा योग्य सहायता करना इत्यादि भनेक गुणों से युक है भोर उक्त पार्तामों के पूर्ण करने में मदेष कटियर है ऐसे श्रीभाषायीं को नमस्कार हो, तथा जो पंचविशति गुणों से मलर का दोरहे है मात् जो एकादशा सपा दावशोपान को स्वयं पढने है मौरीका पढाते हैं विन शास्त्रों के नाम यह है यपा:-

( १४० )
अथासूत्राणि । अयोपासूत्राणि।
(श्री भाचारामजी। (0) मी उपचाई जी।
(२) श्री सूरगाह जी। (२) भोरापोणी जी।
(३) श्री ठाणा जी। (२) घी जोयामिगमगी।
(1) श्री समपायात जो। (1) थी पमपन्नासी।
(५) थी मियाद प्रतियो। (५) भी मम्योपप्राप्ति भी।
(६) श्री माताधर्मकांगजी। (६) घोचममाप्तिमी।
(७) श्री उपासक दशामो। (७) भो सम्यप्राप्ति की।
८) श्री मंदगद जी।
(0)ो निरालिवानो।
(९) भी ममुशायराई जो। (९) भी पुफिपा जो।
(१०)धी प्रश्नग्याकरण जी। (10) मी काप्पया भी।
(११) श्री विपाक को। (११) भी पुष्फन्छिकाजी।
(१२) मी पहिरशानी।
भात जो पूल शाखो का मम्पास स्वयं करते हैं भोर मारों
पो यथा गयकाश पा पथाऽसमापठनाम्पास करपात मौरजिरे
माय धर्म नपा पिया की वृधि हो महो दार्य करके परिफस्सित
होते हैं ऐसे परम पण्डिस मदाम् पिताम् पापी पामोपकारी भी
उपाण्याय जी महाराज का नमस्कार हा, जो कि भूत पियाकीमापा
से ममेका हो मम्पनीमा को मंसार रस्तार से चोरी करते।
भम्पर ममस्कार हो सर्व सामोसमा तोकम समोसे परिपूर्ण
तपा रिमपित सदा ही परापपरो भारपान रेसाग स्पमारमा
पा सम्पामामों के शासन काम सिरका मपित सन
शति गुप्ष युकलिन ममियों को पुनः पुनमस्कार दो
"पानमामो
मारिनु पर्तमाग मारोगमा एप
पशासि॥

( १४१' )
प्रियपरो! इस महा मन्त्र का पाठ मथषा यह मदा मन्त्र श्री
भगवती मघश्यकादि सूत्रों (शाओं) में विद्यमान है पदि कोई से
देसमेकी ममिळाषा करे तो उस को योग्य है कि जैन शासो का
अभ्यास करे क्योकि सूमो के पठन से उसे स्वयमेष ही उपलब्ध
हो जायगा।
॥ अथोक्ता मन्च के धात्वादि ॥
प्रियमुनखनो ! भप उक्त महा मन्त्र के धास्यादि को लगा कर
मापके सम्मुख करता है। जैसे कि -(नमस् ) शब्द मग्यय है सो
गमस पाम्द के सकार को'-
सजूरहस्सोऽतिप्पक स्रनसुबनसोरि ।।
शा०व्या० अ. १ पो०१
सू०
७२।।
सजूष अहन्नित्ये तयोरन्त्यस्य पदान्ते सकारस्य
च रिरादेशो भवति वस्त्रन्सुध्वन्सु इस्येतान्
वर्जयित्वानतिपि ॥ इति सस्यरि इदित् ॥
इस सब से रिकार हो गया, पुन' कार की इत्साहा होने से
तिस का लोप हुमा मता पश्चात रेफ रहा । तर ऐसे कप पना, जैसे
(मम+र)पुन:-
रः पदान्ते विसर्जनीय ॥ शा० अ०१ पा०१।
सू०६७॥ पदान्ते रेफस्यस्थाने विसर्जनीयादेशो
भवति॥
*श्लोक -शृमवहालवत्सस्य, कुमारीस्तनयुग्मवत् ।।
नेत्रवत्कृष्णसर्पस्य, विसर्गोऽयमइतिस्मृत ॥१॥

(१४२ ) - इम सत्र से पदाम्त के रेफ को पिमनीप पा मादेशमा,तर (ममा) ऐसे स्पसिय दुमा पुन्छ- अतोडोविसर्गस्यामा०व्या०अ०८पा०स०३०॥ सम्कृन लक्षणोत्पन्नस्य अत परस्य विसर्गस्य स्थानेडो इत्यादेशो भवति ॥ इस सबसे सस्तृत लक्षणोत्पन के मत् से परे विसर्जनीय पे स्थान में भर्यात विसग को सोका भादेश ६ गया, तर ऐसे कप पमा यथा-(नम+सो) पुम-फार को इसम्मा हो जामे कारण से विसा लोप हो जाता है मौर साप मै मस्यऽज का लोप मी होता दे सप ऐसे प्रयोग दुमायथा (मम्+मो) फिर (ममक शम रूप पर वर्णमाप्रयेत इति मन्निा)स धन से म्यम्सन रूप मकारमाकार मायय हुमा तो ऐसे रूप पना(ममो) मर्यात पफ रूप ऐसे सिर दुमा । इसके गनम्तर (मरिहताण) इस फी प्यायपारिप है यथा- भर पेसा धातु है तिस फो'- सल्लडवत्र्य लुटोवाऽनितो ॥ शा०अ०१ पा० सू०७आमनिलटो भविष्यति लटच अनपत् शतृवा भवति तह वदानशनेता॥शापिती ।। इस सभ से पर्तमान मट में भा पात गोदावरमय दो गण सप (मर+शन) पेमप पर गपा मार सकारको तमा होगे से सिम ना लोर दुगा, तप (महत) ऐमें प ना. फिरा- उच्चाहति।प्रा०व्या अ०८पा.२०१११॥ आईन् शचे संयुक्तम्यान्य व्यञ्जनात् पर्य उत् । अदि तो च भवतः।

-- - (' १४३ ) इस सूत्र में यह कथन है कि महत् शम्प में सयुक के मन्त। म्यम्नम से पूर्व अर्थात् विश्लेप करके फिर हकार से पूर्व कार उकार भकार यह तीन हो जाते हैं तय ऐसे रूप मे यथा (भराहत) (महत) (भरभहत ) पुम (मरिहत्) (मराहत ) (मराहत ) मपितु ऐसेहो टिका पुति म मो रम्ळेश है पुम:- शत्रानश ॥प्रा० अ०८ पा० ३ स० १८१। शत आनश् इत्येतयो प्रत्येकन्तमाण इत्येता वा देशी भवत ॥ में यह विधान है कि शासप्रस्यय को न्त भौर माम दि भावेश होते हैं। किन्तु पाटी का किया हुभा काय मत के मझोपरि होता है अर्थात् मईत् शम्प के तकार को (ल) ऐसे मादेश हो गया सप (मरिहन्त+ममहम्त+मरहत) ऐसे बन गये तो छ म ण नो व्यञ्जने । प्रा० अ०८ पा०१ सू० २५ ॥ अ ण न इत्येतेषास्थाने व्यजने परे अनुस्वारा भवति ॥ 'दूद्धिका-उत ११ घ मई०१ मईत महतीति महोए भष् प्रत्यया चौकार मई इसिमाते र इति विश्लेपे अनेम प्रथमेह पूर्व उ द्वितीये ह -पूर्व म तृतीये ह पूर्व सर्वत्र लोकास् ११ मत सेरों भरुहो । अरहो मरिहो। महतोनि महंत ध्रुगशिपाई शदशतुस्तस्ये शम्ह व प्रत्यय' मतलोकात माईतत्रमाणो गत स्थानेत म्पसनावदसेऽत लोकात् ममेन रह इति विश्लेपे प्रथम ह पूर्व उ. दितीय म तृतीय र लोका ११ अरहम्तो मरहम्ता मरिहन्तो। ॥ १११ ॥ +हिसीय विधि इस प्रकार से मी है यया (अरिहत्+महत+ मरदत्)ऐसे प्रयोग स्थित है फिर- . ( १९४) इम सूत्र से मकारको ममुस्वारादेश दो गया सब (मरिहंत+ भवहर+मरई) ऐसे प्रयोग पमे, पुन नमस्कारार्य में शक्तार्थवषणनम स्वस्तिस्वाहा स्वधाहित ॥ शा० अ० १ पा० ३ ० १४२ ॥ शतार्थेषडादिभिश्च युक्त प्रधानात्यैवर्तमाना चतुर्थी नित्यभवति ॥ चैत्रायशक्तोमंत्र।मल्लायप्रभवतिमल्ल.।पुरुषायाल यवति । अग्नयेवपद् । अर्हतेनम धर्मायस्वस्ति। इन्द्रायम्वाहा । गुरुभ्यस्स्वधा । सर्वस्मे हित । उगिदचोऽनधादे ॥शा०अ०१ पा•२ स०११४ । उगितोऽञ्च तेश्चनम् भवनि शावनप्प्युटि परे ने धादे ॥ इस सूधर्म यह विधान है कि जिसका उr(r+) इरसंहा पाया हो निमको भोर मम्यपात को भी मम हो जाता है शि मोर मासद् परे होते हुए भपित पपादिपो को नहीं होता तिसरण से मा मोदित होने से नम्मा (मित्या दमपापम पग भपति) इस फयम से ऐसे कप सिम हुए पपा (मदिनमत + मकहनमत भरहममत्) फिर (ममायिता) इस पथन में मशरकार को समा दुई पासप कप (महिन्त ) स्यादि से रहे फिर- व्यजनाददन्ते। प्रा० अ०८ पा०४सू०२३९ ।। व्याजनान्ताद्धातोरन्ले अफारो भवति । इस RR में यह पिपर्ण है रिप्यनारत (द) पात के मरत में मार समागम दोता है सप इन मकार सराणातो सारस बने पपा (मन्ति, मपमा भएस) Thi

( १४५ )
शाकटायम व्याकरण के इस सूत्रसे धतुर्थी विमति के पापचन
म्पस् प्रत्ययकीभत्रमाप्ति थी, किन्तु -
चतुर्थ्या षष्टी ।। प्रा० व्या० अ०८ पा० ३
स० १३१ ॥ चतुर्थ्या स्थाने षष्टी भवति ।
मारुत व्याकरण के इस सत्र से चतुर्थी विमक्ति के स्थानोप
रिपष्टी विमति हुई तब (मरिहत) शब्द को पप्टी का पहुएवम
माम् प्रत्यय होने से (मरिहत+माम् ) ऐसे रूप होगया पना-
जस् शस्तप्सित्तोदोद्वामिदीर्घ ॥ प्रा० अ०८
पा० ३ सू०११॥एषु अतो दीर्घा भवति ।
इस सूत्र से मरिहत शम्प के तकार का मत दीर्घ होगामे से
(परिहंता+माम्) ऐसे पन गया तदनन्तर
टा आमोणं ॥ प्रा० अ०८ पा०३ स. ६ ॥
अत परस्य टाइत्येतस्य षष्टी बहुवचनस्य च
आमोणो भवति ।।
इस सूत्र से भाम् प्रत्यय को पकारादेश होगया तो (मरिक्षया
+ण) ऐसे रूपबन गया, तत्पश्चात्
कृत्वा स्यादरे णस्त्रो ॥ प्रा० अ० ८पा०१
। सू० २७ ॥क्वाया स्यादीनांच योणसूत योरनुस्वारो
ऽन्तोषामवति॥
इस सूत्र से णकार को विकल्प से मनुस्वार मी हो जाता है
तर एक पक्ष में (नमागरिहवाण+ममोमबहताण+ममोमरवाण)
मौर दितीय पक्ष में (नमोमरिहताण+ममोभा ताण+ममोमरहवाण)
रस्पादि वीन प्रयोग इस प्रकार सिय प॥
-

( १९८)
टा आमोर्ण ॥ प्रा० व्या० अ०८ पा०३ सू०६ ।
इस सूम से पूर्ववत् भाम प्रत्यय को पारादेश हुमा पपा(सिम
+ण) फिर
जस् शस् असित्तो दोहामि दीर्घ. ॥ प्रा० व्या
अ०८पा०३२०१२॥
इस से मूत्र प्राग्वत् सिर शम्द का मकार वीर्य हो गया जैसे
(सिसा+पोपश्यात् ।
क्वास्यादेरणस्योर्वा ॥ प्रा०अ०८ पा०१स०२७ ।।
से णकार को विकल्प से गनुस्वार हो गया घर परि
पाप (ममा सिदाण) या (णमा सिसाण) ऐसे सियदुए।
अपितु "सिद्ध"शब्द पिधो शास्त्रे माङ्गल्ये च
इस धातुसे मा धन जाता है हिमा र विधिषिपान पूर्ववत् हो ।
ति सियाण पदकी साघमिका ।
इस सूत्र
॥ अथ आचार्य शब्द की साधनिका॥
-
ममस् शप्प पूर्वपत हो सिय पोता दे मला गावार्य शरमार, ..
उपसग मर्यादा पुरु मर्ष में जो ध्यान है मो पूर्ण होने से पुन
पति मसम्योः पातु को रुदम्स का पण प्रत्यय करने से भाग ।
शाद पनता है जैसे पि (मा+घर) ऐसे आप हे पुर
ध्यण ॥ शा०व्या० अ०४ पा० ३ ०६॥
धातोयण प्रत्ययो भवति ॥
इस सूत्र से भार पूर्वक घर धान को प्यम् मस्यय हो गया कि
पपापिसी मर्यात् पावर नारसमा ने faranath

इससम
( १४९ )
है मपितुस्कार की मो इससम्मा होती है वष (माल+पर+
थम्) ऐसे रूप से (मा+घर+य) ऐसे रूप शेष रहा फिर :-
ञ्णिस्यस्याः ॥शा०म०४ पा०१ स० २३०॥
धातो रुपान्त्यस्यात् आद्भवति । बितिणिति च
प्रत्ययेपरे॥
में यह विधान है कि जिस प्रत्यय का मण लोप हो
गया होतो धातु के उपान्त (अन्स्यस्समीपमुपान्यम् ) मत् को मात हो
बाघे, इस रीत्यनुसार उपान्त षकार के मत को मात् हुमा जैसे.
(आ+चार+य) पुन (अनच्कशब्दरूपपर वर्ण
माश्रयेत् ॥
इस पाक्य से ऐसे शपषम गया, यथा (भाचार्य) फिर
नमस् शम पूर्ण करने से तथा नमस्कारार्थ में चतुर्थी तिमलि
का बहु पनामान्त होने से ऐसे सिय हुमा, (मम आचार्यम्या) इति।
मन माछत में इस के रूप पनाकर दिमाते हैं उपसर्ग, धातु,
प्रत्यय यह तो सर्व प्राग्यत हो है मपित भावार्य शम्द के धकार के
पास्ते प्रारुत के व्याकरण में यह सूप प्रति पावन किया गया है
बेसे कि
। आचार्येचोच्च ॥प्रा० अ०८ पा० १ स्• ७३॥
आचार्य शन्दे चस्यात् इत्वम् अग्वचभवति ॥
मर्यास भाचार्य शप्प के षकार को भत् इत, यह दो मादेश
-
होते हैं पुमः-
ऐसे रूप हुए, यया, (मापर्य) माक्षिय) पदयात्-
क-ग-च-ज-त-द-प-य-या प्रायोलुक् ॥
प्रा० अ०८पा० १सू०१७७॥
-

( १५० )
स्वरात्परेपामनादि भुनानामसंयुक्तानांकग व
जतदपयवानां प्रायोलुग भवनि ।।
इस सूप से (भाषर्य) ऐसे सप के मो धार कारोप होगा
जैसे (पामय) (मार्य) फिर.-
अवर्णोयभुति ॥ प्रा०व्या० १०८ पा० १२०
१८० ॥ कगचजेत्यादिनालुकिसति, शेप.
अवर्ण अवर्णात्परोलघुप्रयत्नतरयकार ध्रुति
भवति ॥
इस भूप में यह पणन है कि जिसके कगार परस्पारि
सोप होगर हो। दोष जो मार रहजाये, जो उसके स्थान पर
यकार मोहो जाता सारसी नियम से इस स्थान में शाप मगर
स्थानोपरि यहारादेश होगपा, ऐसे पहुए (माम) (मापर्य)
(मारव) पुना-
स्यान्नव्यचैत्य चोर्यसमेपुयात् ॥ प्रा० अ०८ पा०
२ सू० १०७॥ स्यादादिपुचौर्य शब्देन समेपु.
चासयुक्तस्य यात् पूर्वइट भयनि ।
इस सत्र में यह कथन इन स्माद भाप चीयो पारि
शामों में लिप राष्प से पूर्व इस्दा जाता है पोम्पाप मरेफ यार
पोग भर्गत विष होमे से रेफ का इत होने से पेसे कपमा,
(भापरिप) पुम परी का पा पपा मा पापामा सो (माप
रिप+माम् ) पसेपमा पुम माम् पो (टा आमोण) मा
से माम को नायर दोसने से (मापरिय+4) मा. परवान:-
(जस् राम् डमिचोदोदामि दीर्घः)
पर पसरवी रोगपा. १ (मात्मिा+)-
.

(पास्यादेस्वोर्षी) इस सूम से णकार का विकल्प से मनु-
स्थार हो गया, फिर परिपकम्प ऐसे हुए (नमो मायरियाणं) षा
(नमो मा मरियाण) षा (नमो भाइरियाण )तथा (अणेषयश्रुति)
इस सत्र से पकार को मकार भी हो जाता है तप (मायरिम) ऐसा
रूप पमा, किन्तु
अतोरिआररिज्जरीअ ॥प्रा० अ०८पा० २सू.
६७॥ आश्चर्येअकारात्परस्ययस्यरिअ अर रिज्ज
रीअइत्येते आदेशा भवन्ति ॥
इस सूत्र को मन प्राप्ति नहीं है मौर घोष कार्य प्राग्वत् ही है।
॥ इति मायरियाण शम्द की सानिमा ।
॥ अथ उपाध्याय शब्दकी साधनिका॥
उप मौर मधि उपसर्ग पूर्वक र माययमे धासु को घम् प्रत्य
पास हो कर उपाध्याय शण बनता है जैसे कि (ठप+अधि+र)
ऐसे स्थित है पुन'-
इकः । शा० अ० ४ पा०४ सू० ४॥इलोकतरि
घञ् भवति । अध्याय । उपाध्याय ।
इस सूत्र से एमापयने धातु को पम् प्रत्यय की प्राप्ति हुई
तय (उप+मधि+र+घम्) ऐसे पमा पश्यात् रपमान की
इस्तम्पा दोने से छोप हुमा और शेषा-(सप+मपि++म)
पेसे दोदा, मपित भकार को इस्तम्मा होने से-

(१५२ )
आरचोऽध्यादे। शा०अ०२पा०३२०८४॥ प्रा
तेरचा मादेरच आ आर् ऐच् इत्येते आदेशा
भवन्ति मिति णिति च तद्धिते प्रत्यये परे।
पण धातु को कार को इस सत्र से ऐकार हो गया पुमा-
(उप+मपि++म) ऐसे प्रयोग हुभा फिरा--
एचोऽच्य यवाया ।। शा० अ०१ पा०१ २०६९ ।
एचः स्थानेयथा सरुप अय् अ आय आव्
इत्येते आदेशा भवन्ति अचि परे।।
इस सत्र से कार के स्थान में मार होने से (प+मपि+माए
+म)ऐसा प्रयोग बमा तो (भमरु राप रूप पर पण मामत)
इस पचनानुसार (उप+मधि+माप) ऐसे कप बन गया कि
दीर्घ ॥शा अ०१ पा०१ स०७७॥
अक स्थानपरणाचा महितस्य तदासन्नो दीपों
नित्य भवत्यचि परे । यथा दण्ड अप्र दण्डाम।
इस सूप से उप उपमा धरा प्रकार मार गघि पमर्ग
के मारिका मफार पमप मिळफर दो हामे (उपाधि+माय) ऐसे
रूपना पुम.-
अम्बे। शा० अ०१ पा०१ म०३॥
इक' स्थाने यत्रादेशा भाति अस्वेऽनि परे सग
अथवा इकः परोयञ् भवति अम्बेडमि परे ।
दम्यन॥
इस सब सपामा पा (पा एमा)

मनशादेति पचन (उपाध्याय) रूपमा, पुन ममस्कारार्थ में (शक्तार्थ वषण्नम स्वस्ति स्वाहा स्वधा हित ) शाकटायन व्याकरण के इस सूत्र से चतुर्थी विमति का बहुपधन भ्यम् मस्यय होने से तथा ममस मग्यय पूर्ण होमेसे (ममा उपास्या ये म्या) पेसा परिपक रूप संस्कृत मापा मै सा सिर होगया किन्तु भव मान्त में जिस प्रकार रूप बनवा है सो देखिये। यथा (सपाध्याय) ऐसे स्थित है तबा- द्वस्व सयोगे॥ प्रा० अ०८पा०१ स०८४ ॥ दीर्घस्य यथादर्शनं संयोगे परे इस्त्रो भवति ॥ इस मूमसे (सपा) का पकार अस्प होगया तो (उपध्याय) ऐसे रुप बना पुमा-- साध्वस ध्य झांझ ॥प्रा० अ०८ पा०२ सू०२६॥ साध्वसेसयुक्तस्यध्यायोश्चझोभवति ॥ इस सूत्र से (ज्य) मात्र को हुमा फिर (स्पसाय) ऐमा प्रयोग बमातो:- पोव ॥प्रा० अ०८ पा०१ सू० २३१॥ स्वरारप- रस्यासयुक्तस्यानादेपस्यप्रायोवो भवति ॥ इस सूत्र से पकार को धकार दाबाने से (उपशाय) ऐसे रूप बना, पुमा- अनादौशेषादशयोदित्तम् ॥प्रा०अ०८पा०२सू०८९ पदस्यानादौवर्तमानस्यशेषस्यादेशस्यचद्विस्वभवति इस सूत्र में यह वर्णन है कि मादि मिन मादेशम्प प्रकार केदारूप होजाते हैं जैसे कि ।-(उधम्झाय) पश्चात् ।

( १५४ )
द्वितीयतुर्ययोरुपरिपूर्व ॥ प्रा०अ०८ पा०२५.०९० ।
द्वितीयतुर्ययोद्वित्वप्रमगेउपरिपोभवत द्वितीयस्यो
परिप्रथमश्चतुर्थम्योपरितृतीय इत्यर्थ ॥
(स सूत्र में यह कपन है कि चतुप पण मा विस्व किया है मो
पूर्ववत के स्थान में हनीय यण हो जाना है। जैसे (उपरसाग) पुम'-
माम प्रस्पप करने से (ज्यदाय+माम ) फिर (टामामोन) मसूत्र
से भाम को णकार होगया तो (उपशाय+ण) ऐसे पमा वमन्तर
(परयास्पादनस्योर्या) इस सूप से मनुस्यार दोगपा। यण (अपग्मा
प+ण) पुमा-(जसससहमिचोदोशामिदी) इस सूत्र से पार
दीर्घ दोगण । तप (ममोउपजायाण) (ममो उपग्मायाण) ऐसे दो रूप
सिब हुए मर्यात जो भूत पिपा के पटाने वाले हैं जिनको गम
स्कार हो।
॥इति उपन्हापार्ण पदपी सापनिार ॥
*अथ नमोलोए सव्वसाहण शब्दकी
साधनिका*
ममस् मापप पूर्वपत् हो रे भपित "छोई दौरे पातु हो।-
प्रनिहादिभ्यश्च ।शा० अ०४पा०३ स्०८५॥
धानालिहादिभ्यश्न प्रवृत अन प्रत्यया भवन्ति
नचायिनो।
म सूत्र में भए शप कर छोरा मा irr
सनमनप (स) पेम पाउमाफिर।-

( १५५ ) कगवतदयनांप्रायो लुक् ॥ प्रा० अ०८ पा० १ स० १७७॥स्वरास्परेषामनादिभूतानाम संयुक्का ना कगचतदपयवाना प्रायोलग् भवति ॥ इस सूत्र से ककार का लोप होने से दोप एकार अर्यात् (छोप) ऐसे प्रयोग हमा, फिर 'सब शव को- सर्वप्रलवरामवन्द्रे ॥ प्रा० अ०८ पा० २ सू० ७९ ॥ वन्द्र शब्दादन्यत्र लवरासर्वत्र सयुक्तस्यो र्वमश्चस्थितानांलुग भवति ॥ इस सूत्र से सयुक रेफ का लोप हागपा जैसे (सय) मपितु (अनादो शेषादयोदित्वम् ) इस सूत्र स शेष षकार दिस्य हो गया ययाः (सत्य ) मर्थात् (नमोलोएसम्म) रूप बमा फिर (राप- साघससियो) इस साथ् पातु को कृवापाजिमिस्त्रदिसाध्यशूभ्य उण्॥ शा० उणादि० पा. १ सू०१॥डुकृञ् करणे।वा गतिगन्धनयो । पापाने। जि अभिभवे। डमिञ् प्रक्षेपणे । प्वद् आस्वादने । साधससिद्धौ । अशव्याप्तौ । एभ्योऽष्टधातभ्यउण प्रत्यय स्यात् ।। सानोतिपरकार्यमितिसाधुःसज्जन ।। सर्वनिवरिष्वलष्प शिवपक्षप्रहृष्वातन्त्रे॥ उणादिति । पा० १८० १५३ ॥ सर्वादयोवन प्रत्ययान्नानिपात्यतेऽतन्ऽकर्तरि मृगतो। सर्व, निरवशषम्॥ .

.
( १५६ )
ससूत्र से उण प्रत्ययान्त होने से साधु शम्द सिर एमा, फिर:-
ख घथ धमाह ॥प्रा० अ०८ पा०१सू०१८७॥
स्वरात्परेपामसंयुक्ता नामनादि भूताना खघय
धभ इत्येतेषावर्णाना प्रायोहोभवति ।
इस सत्र से पफार को इकार होगा, (ममोसोपसमसार)
ऐसे रूप पमा, पुना-
पप्टी का पटु पचम भाम् मापय मा. तिस पो (टा मामोर्णः)
इस सूत्र से पकार का माद मा, यथा, (ममोठोपसम्पसार
+ण) फिर
(जस् शस् सिचोदोदामिदीर्घ इस सूत्र से पूर्व स्पर
दी होगपा, यपा.-
(ममोटोपसम्यसाग) पून -
(कस्यास्पावर्णस्या) इस सूप से पाहारगे पिपल्प से मम
स्पारदा गया, तप पा सपा गुरमयोग (नमोलोपसणसाला
(गमालोपसयसापा से सिद हुमा, मपित मर्य प्रारपत से है।
-
--
-
पति ममोलोपसम्पप्तापूर्ण परीसापनि

( १५७ )
---
* अथोक्तरूपसमुच्चयः *
१-(नमो अरिहताण) (णमो अरिहताण)
(नमो अरिहताण) (णमो अरिहंताण
(नमो अरुहताण)
(णमो अरुहताण
नमो अरुहताण) (णमो अरुहताण)
(नमो अरहताण)
(णमो अरहताण)
(नमो अरहंताण) (णमो अरहताण)
२-(नमो सिद्धाण) (णमो सिद्धाण)
(नमो सिद्धाण) (णमो सिद्धाण)
३-(नमो मायरियाण) (णमो आयरियाण)
(नमो आयरियाण) (णमो आयरियाण)
(नमो आयरिआण) (णमो आयरियाण)
(नमो आयरिआण) (णमो आयरिआण) )
(नमो भाइरियाण) (णमो माइरियाण)
(नमो आइरियाण) (णमो आइरियाण)
४-(नमो उवज्झायाण) (णमो उपज्झायाण)
(नमो उपज्झायाण) (णमो उवज्झायाण)
५-(नमो लोएसव्वसाहूण) (णमोलोएसब्बसाहूण)
(नमो लोएसव्वसाण) (णमो लोएसव्वसाइण)

( १५८ )
अथ चूलिकापञ्च पदों का माहात्म्य
रूप गाथा।
एसोपच नमोकारो, सव्वपावपणासणो ।
मगलाणच सम्बेसि, पढम हवइ मगल ॥
अर्याम्यय--(पसा) (प.) पद (पम) (पम्स) पम्य (ममोकारो)
(नमस्कार ) समसार रूप पद (मम्य) (सप) मारे (पाप) (पाप)
पापों के (पणासपो) (प्रणाशम) प्रणाशन हार भात पापों में
मष्ट फरमायाले ई (मगराण) (मगलागा)मंगली (ब)() मोर
भपितु पाम्यय है (ससि) (सपा) सर्पस्पामा परि पटे हुए(पर्म)
(प्रथम) प्रथम मात दायादि पदार्थो स पूर्ष (इपा)(मपति) दोवा
६ (मगर) (भारम्) मालोक
मापार्य -स मदा मात्र पाहो ममारप पर सर्च
पापों के माशकरोयाले । तया मगलीश भार मर्ष स्थानोपरिपतन
पिपे हुए दायादि पदा से मी पहिले गिरीकोंकि भारत
गुण युजमदामाद
॥ अथ ओम् शब्द निर्णयः॥
पिपुरो-पापों का ही पोरम मोम रामा
जसे रि-
|| गाथा ॥
मशिता असरीरा, आयरिय उपसागा।
मुणिणोपचवर निप्पण्णो ओंकारोपचपरमही।

मर्यान्वय,- (मरिहंता) (महम्ता) महम् शम्द का माघषर्ण
मकार है (मसरीरा) (मशरीरा) मशरीरी शम्द जोकि सिख
पर का ही धाधक है तिसका मी भाच घर्ष मकार हे पुन (मायरिया)
(माघार्या) भाचार्य पर का माद्यवर्ण म्पकार है तथा (सवनमाया)
(सपाध्याया)उपाध्याय परका मापवर्ण उकार है मौर (मुमिणो)
(मुनिना) मुनि पद का भाषण स्थर रहिव मर्यात व्यस्मन रूप
मकार है न पाम्बों को एकस्य करना (पघसर) (पञ्चाक्षर) पांचा
सर जैसे कि (म+म+मा+:+म्) (निप्पम्नो) (निष्पन्मा) निप्पन्न
(मोकारा) (ओंकारर)मोम शम्प है सो (पच परमेष्ठी) (पच परमेष्ठि)
पचपरमेष्ठि का हो पावक है।
माषाथ-पांच पदों में से पूर्व के दो पदों के माध वर्ण मकार
है तृतीय पद का माधवर्ण माकार है तथा चतुर्थ पद का आय वर्ण
सकार है मोर पम्धवै पद का मापवर्ण मकार है भप पाँची की एक
स्पता-
(म+म+मा+र+म्) ऐसा प्रयोग स्थित है पुमा-
दीर्घः ॥ शा० अ० १ पा. १ सू० ७७ ॥
अफ स्थाने परेणाचा सहितस्य तदासन्नो दीपों
निस्य भवत्यचि परे॥
इस सत्र
से मार दीर्ध होगया, तप (मा+ मा+उ+म)
ऐसे रूप हुमा, तो
ओमारिपर ॥शा० अ०१ पा० १८०८६ ॥
अवर्णस्य स्थाने साचः परोऽजादेशो भवतिओं
शन्दे आलादेशचपरे।

( १६० )
इस सूम से भाचार्य पद पा माकार पर रूप होगपा सरप
(मा+उ+म्) ऐसे रहा।
इक्येहर् ।। शा० अ०१ पा०१ २०८२ ।।
अवर्णस्यस्थानेपरणाचासहितस्पक्रमेण एड् अर्
इत्यादेशाभवन्ति इकिपरे ॥
इस मन्त्र से मपर्ण उपर्ण एकरप होने पर माहार दोगपा। तर
ऐसे कप दुमा ।
जैसे कि -(मो+म्) पुना
मम्मोहलिनी ॥ शा० अ० १ पा०१ स०१११ ॥
ममागमस्यपदान्तस्पच मकारस्य परस्त्रोऽनुना.
सिकोऽनुस्वारश्चपर्यायेण भवनि हलिपरे।
समूत्र से मकार जा स्वर रहित पजम पसिसका
मनुस्वार दोगा। नप (मी) देसे आप पर गया । एमा-
आम प्रारम्भे । शा० अ०२ पा०३ सू०२१ ।।
प्रारम्भेवर्तमानस्याम प्लुतोवामवति ॥
ओ३म् अपमपवित्रम् । आ३म् श्री शान्ति
रम्नु सुग्वमस्तु ।प्रारम्भेति किम् ओम् इत्यादि।
एस एत्र में पद विपाम प्रारम्म(रि) वर्तमान मोम
•सिौरपारपत्र पेसा मी क्षेत्र है -
ग्लोक -अदीची दीर्घनांयातिम्मिदीर्घम्पदीर्घना।
पूर्वदीर्घस्परावा,परलापोविधीपते ॥१॥

- ( ११ ) विकल्प से अप्लुत हो जाता है । उक्त सूत्रों से मोम शब्द पम्च पद का ही पायक सिब हुमा ।। इस लिये विद्वानों ने ओम् शप्प को पांच पदों का पोज माना है। Viane ॥ इति शुमम ॥ ॥ इति महामन्म तत्त्व प्रकाशा समाप्तः । 2 . " लोक -जानुप्रदक्षिणीकृत्य, नद्रतनविलम्वितम् । अनलिस्फोटनकुर्यात् सामातिप्रकीर्तिता ॥१॥ घटकोरोत्येकमात्र द्विमात्ररोतिवायस । त्रिमात्रतुशिखीरोति हस्वदीर्घप्लतमात्॥२॥ ॥इति॥

( १३२ )
प्रो पोतरागाय मम।
* प्रार्थना
मिपम्राव गर्णो यह मामल्य महिसामप, सरपपदापों का उपदेना
श्रीममा मापदाप किस प्रकार से पाया है। जिसके पाप
परमे से माप जगत में सदाघारीपमाते मिस पारलरने
से भाप परोपकारिपोरेगप्रपोय पनते है। जिसरे
धारण
माप मोसमार्ग के साधक होते हैं। शिप के प्रमाय से गाप सम्या
डान सम्यक दर्शन, सम्यक पारित्र के गोराधिरोमा पाइने ।
मित्रो यह पर्म केपल गहन पेपरी मारित पोचाय को
होपासे भापरेशाप में गाया देदिगिये गापके पूर्या मानाने
ममेक प्रकार के सपट सक्षम काम पपिप जमपर्म दोगमारो
मीर सदसों मगन प्रप र ममफ यिार पापों से पिसप पे भर
मत पी मशा पदरा। मगर पापियें परमय
पासपर
सी, सदेप पाट जिममायाको साँवम पटापा। इस पवित्र
ममतपेपास्ते मपनो गाए गप्पण वरी।
पारिप भगपण भी पयमाग स्यामी के १८.६
पित भी पविंगणी समा ममप मो माग ग माRT मो
..तर संपरप सनारथापित को जिस में धान पर
मोमरत पटनाये।फिर भी मपये मामला
सपिसिसी पासे मात दिनसमझोगगरिमालोजको
है। फिर सिम मापार मरनी पिपा मारा मानो
rafraid परमपणे धोयार ािपर
पण परिसखा (मार) पान ful

--- (१६३ ) जिन के मदाम् परिप्रमका फळ माप लोगों की पुष्टि गोधर होरहा है। अपि शोक से कहना पटता है जिन भाषाय्यों ने माप लोगों पर इतना परोपकार किया किन्तु माप लोगों ने उन के ममूल्य परिश्रम का फळ कुछ मी म दिया शोक !! मळा फ्या माप छोगों ने उनके नाम की कोई सस्था स्थापन करी! फ्धा माप छोगोंने उन मावा के रषित पुस्तकों को पदा या उनका पुनरुवार किया। कुछ मी महो तो क्या यह शोक का स्थान नहीं है । मषश्य है। मला माप दूर की पाव वाने दीजिये । किन्तु समीप काळ को कीजिये । सम्ही माघायों में से एक महान माघार्य परम जेनोपोत करने वाले जिम्हों ने भनेक ही फप्ट सहन करके इस पवित्र जैन धर्म का स्थान २ प्रचार किया फिर पापंस मत को पराजय किया पजाव देश में जिन्हों ने पिशेप करके जैनधर्म का प्रचार किया रसत्यमार्गभव्य जनों को युक्ति पर्षक पवळाया। ऐसे मदान् गुणों के धारक भीमद भाधार्य भमर सिंह जी महाराज हुए हैं । तो भला माप लागों ने उनका नाम धिरस्थायि बनाने का क्या प्रयत्न किया शोका'ऐसे पर- मोपकारी महात्मा के नाम से कोई भी संस्था महो। देखिये विशाळ घदय के धारक महान् भावार्य की दया इस हुराषसघिमी काल के प्रभाव से मिस्यास्यको सदैवमल हो वृद्धि है इसी कारण से कितनेक मशात मन यह कहने लग गये थे कि पृदस्यो लोगों को सूत्र पठम करने नहीं कल्पते हैं क्योंकि उन लोगों के मन में यह विचार था कि यदि गृहस्थ लोग भो सत्र पठने लग जायेंगे वो उस का फल हमारे लिये शुम न होगा इसलिये यह छोग सूत्र के पठन का गृहस्थ लोगों को निपे करते थे। अपितु उकपिशालय मदपिने सो पारा यह सिख किया कि मईम् कान के पार हो सप मधिकारी हैं पार हो सघ योग्यता धारण करते हुए सूत्रों को पढ़ सकते हैं। सो देखिये उक महर्षि ने केसो 1 १

-
( १६४ )
पया माप स्लेगों पर की है। किसाप खोग शासन मसी प्रकार से
'पन सकेपिर मोर मीगिये उक महारमा परिममा पत्र
इस पमाप देशम जिनके सायोपदेशदारा भनुमान १०. सा.
या ७० गायी के भनुमान स्थान में जैन धर्म का प्रचार करणे
भोर मम्प सोगों का महम के उपदेश के मारा सम्यतय साम
दिया रद । सो यह सर्प धीमन् माचार्य ममानिद जी महाराज
परियम पर दो फम है जिस प्रकार उन मदारमामोग दमारे पर
पपा माव पिया है।
इसी प्रकार पम मी उह मदारमा के गामो परिपोरवपित्र धर्म
कार्य करें जिस पे करमे में हम अपाचोग होयें सो पर परप पर
स्पान २ उनके माम में धर्म मस्थाये स्थापन करे पि भमर
जैन पाठशाला भमर राम, ममर दाल ममा पनिम, अमर
पुम्मकालप, पमर मोपपासप, भमर जोरपा फर, ममा पिपया
भम, ममर मनापाश्रम, ममर गुदाल गमरमप्रपागमाभम, समा
गनिमशारा, ममर म्यापमा भमर पिपाशाना, समरसत
सरपा यादिपाश्रम उत महरिमामो पर हापारिज
तो हम काम से रोनदो महे।
सोस्पेि हमारी सर्व मायनों से प्रापमा दहिये नीम ही पपा
मापदपाता उतसंस्था स्थापन रे मोरदमागे FOTRA ममप
मर गाP TAITR परमेबारमोद प्रकार हमारे
मागासापादेजिरा पर हम शीनदी साम
मोरि पर साप्तामापोगोहीमपने परमापा नामको
ममररने पाठी मोरमोमग मनोरा पEVM पाण।
भवदीयानुनरी
आमान्याय् परमानंद जैन,पी०ए०पल पली.
यकील कसर,पालाला फत्तुराम(प्रियदर्शी जेगलुधिपाना

अथ शुद्धि पचम्
।।
प्रियसुस जनो ! पृष्ठ ८ ३४ ८६ को अमरलियों में किम्बित
माम मयियें रह गई है इस कारण से निम्म लिमित कुमाठियों
को मनुकमवा से शुर शाव करना चाहिये । यथा :-
पृष्ट ३४ की
के०
पृष्ट की
११मो०
५५०
६०१०
न
२०११०
०८
१
F
पुन्म स०
१२रा.
पृष्ट ८६ की
रा०५३.
.
४००
1
२०
११ के.

(१६६) पृर पछि मगुपि शुद्धि -pr परमा घृय पदप मापा प्येताम्यर सनमतोपर भौमी है येताम्बर जैनमत ऊपर भी P द मुशोमिव फसम सुशोभित पुस्म गणिक मरण पिचर गणक २१ चिती जिनके सत्रिय सत्रो १ परम सम्पर - परपात मिराप मित देगी परमा (१६७) शुदि प्रष्ट पकि मशुद्धि 1 २ वरिष संज्ञानसार धरियं सूषानुसार ४ - है १८ सगे सहोदर ११ फिरोजपुर फीरोजपुर चौमास धौमास है पज्य २३ मनिप्ट परण को ममिष्टाचरण को १४ विकमाए विक्रमाद २० २० 1 ૨૨ १२ कि कि करि कि सूत्र १९ सय २६ २४ २८ २९ शाति पध्यम पश्चात् ॥ कष्योरी फशर केगसमाचार ४ पश्चम पश्चात कधौरी फेशर जैन समाचार प्रति जैसे २१ प्रफस्य असे १२ मिप्यात २१ जीका मिथ्यात्व जीको पतुणार चावराहार (१६८) पंकि माथि शुशि ४० २ ४ " 53E: . परिपत पिनापुर के पपिस है मामापि मपापि मुअमरन मुरमईम माडे म पपाप पचाप ममत मनकाळ ममुरछ पदमे मासिरिख मामिल २ २२ मार सर्पियन सापिय ६ M . " ve ४ उमोता पीप नित निरण मास्था मस्पाची निविपाम्पाप है वीपाय है। तमिपा বীৰা माएको सामो मापन पाएमा मो मारामागिन मारामात मामों गामी रिणा प पुष्प पंकि शुचि (१६९) मशुसि पटेरय तपाछ भोशवाल पटेराय प्टेराय तपागच्छ मोसषाल बटेराय . २ खसे पोक फिताहा घाघ करमक पूर्वोच्च किती साघु " २४ १ मगरम महिमा स पर्ण पूजन भगवान् महिंसा सों पूर्ण पस्य कपर फपर १२ २२ षों २१ को। भार लिस्यते मस्कार मीर लियते नमस्कार २९ पति (१७०) मधुरि पिदमपद पुदि न में पम्प पुत्व पिदार शिकार मेर मारयों मारपा सिपे उतार लिमिय मास्यानुकमा तिपित महमन्स पर्मापोत 1 ३ ३ सामन्च पापोव समा अपो एपी सोना -- १५ १० पप परोपरि पत (१७१) पशुयि पक्ति शुचि ११क ८८ है म लिखने भास्माराम माय लिखिने मात्मराम आयह २३ १९ होगया घोषगा लिष्ट छोगये होगा लिष्ट *म ९२ जम ९२ ९४ १ 22 पश्चान पर्वत जिनक लोगो पष्टम् मष्टम् पश्चात पर्वत जिम लोगों पष्टममष्टम ५ श्रीमान् होगे श्रीहान् दोधेगे ६ करते है ८ ४ को करनेते की महम् सन माईन सम २० -- ( १७२) पृष्ट पति मगुदि मुनि ૨૪ ૧ २७ सुचन्मतोले नही घच्चम मार्याप सम्मत्यानमार १९५२ गमापदिरा मुपपवळे मदी रम मापयि सम्मपनुसार १९५१ मपवित्र ४ पाप मतिमा पपरा मतिपमा महारे मोनोरम २१ मोतीराम १५ मति मति में ११ ४ पेमे . म मक प्रति म (१७३) पंक्ति अशुदि शुचि १२२ २ सम ३ बीके भी अर्थात श्री मर्यास् " पस्य " शष्य करणो २१ २३ २३ करनी चैत्य घस्य " चत्य वैस्य . मनि मूर्ति के मनेक भनक ३ ६ २४ एवीप कनियाबार રક १ पतीय कमियालोर सूत्र पूजा होता है जीष पमा हावाद पाप पाकरापन घाटायन यह २॥ २१ रसे पेसे ४ कोक मोर मोर

1
('१७४)
पंक्ति
मामि
प्रति
१५२
सम
सुष
१॥
म
पत्
मिसन
इससबमे
"
पुग मामको
पुम
(भपणेपपति)
दाजाम
(সালমান)
दोमा
१८
"
पारपा
शोपारणे
मोर

Shri Madh Jaina Chariya Amar Chand Jeevan Charitar

Author
Jaina,chariya Amar Singh
Title
Shri Madh Jaina Chariya Amar Chand Jeevan Charitar
File name
Shri Madh Jaina Chariya Amar Chand Jeevan Charitar
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2010/12
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
545937
Barcode
99999990024137.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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Shri Madh Jaina Chariya Amar Chand Jeevan Charitar