Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Krishnasraystotram
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मुम्बग्यां
मणिलाल इच्छाराम देसाई इत्यनेन स्वीये गुजराती' पत्रस्य
न्यूस मुद्रणयन्त्रालये"
मुदयित्वा प्रवाशितम् । पोर्ट काळाघोडा, बैर-हाउस लेन.
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श्रीकृष्णाय नमः। BHAR S.N........... कृष्णाश्रयस्तोत्रम् LIBRARY सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डपचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ म्लेच्छाकान्तेपु देशेषु पपिकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ गङ्गादिनीर्थवर्यपु दुष्टैरेवावृतेविह। तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥३॥ अहवारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अपरिज्ञाननष्टेपु भन्नेष्वव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥५॥ नानावादविनष्टंपु सर्वकर्मवतादिषु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ६ ॥ अजामिलादिदोपाणां नाशकोनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एच गतिर्मम ॥ ७ ॥ प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एच गतिर्मन ॥ ८॥ विवेक भक्त्यादिरहितस्प विशेषतः। पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शारणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ।। १० ।। कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोव्रवीत् ॥११॥ पति भीमालभाचार्यचरणप्रादुर्भावित कृष्णाश्रयस्तो सम्पूर्णम् । १ खर्धामणि इतिपाठ: । २ 'कृष्ण' इतिपाठः। *** अष्टमपत्रे चरमपक्तितोऽवशिष्टम् । उच्यते । सा च स्नेहरूपा । तदुक्तं नियन्ये 'माहात्म्यशाने त्यस्य व्याख्याने 'रतिः स्नेह' इति । स्नेहस्तु प्रेमव । न च शाब्दिकोक्तभावार्थविरोधादसङ्गत मिव प्रति- भातीति वाच्य, निरुक्तरपि प्रमाणत्वात् । इतरपा 'कृपेर्वर्ण' इत्यनुशासनसिद्धस्य कृष्ण- शब्दस्यानन्दवाचकत्वं गगनकुसुमायमानं स्यादिति भक्तिसरणिकुशलतमाः परिशीलयन्तु । अधुना देशादिसाधनानामसाधकत्वमिति । अधुना कलावित्यर्थः । आदिपदात् कालद्रव्यमन्त्रककर्मणां ग्रहणमितरत्स्पष्टम् । उक्तं च तवार्थदीपे 'पहिः संपद्यते धर्मस्ते दुर्लभतराः कलाविति । सर्वसाधनरूप इति, पडियसाधनरूप इत्यर्थः । सङ्खचातात्पर्या- • नुरोधेन सर्वपदस्पात्र सङ्कचितयत्तित्वात् । दशलीलेति । 'अत्र सगों विसर्गश्च स्थान पोपणमूतयः । मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रय' इत्येता दालीला इत्यर्थः । सर्व- मेतच द्वितीयस्कन्धसुबोधिन्यामस्मदायविवेचितं विस्तरमयाल्लक्ष्यमात्रमेवोच्यते न कृत्स्नम् । वत्र तावदशरीरस्य विष्णोः पुरुषशरीरस्वीकार: . -- -- ॥ श्रीकृष्णाय नमः॥ ॥ श्रीगोपीजनबलमाय नमः॥ ॥ श्रीपदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः॥ श्रीमद्भगवदनवैश्वानरावतारश्रीवल्लभाचार्य महाप्रभुपूज्यपादप्रणीत कृष्णाश्रयस्तोत्र । यल्लीलालवसंस्पर्शान रोचन्तन्यदाशिषः । तं राधादयानन्ददाय कृष्णमाश्रये ॥१॥ यत्कृपादृष्टितो जन्तुगोविन्दं विन्दते मुदा । भवत्याई तानिनाचार्यानभिवन्देऽर्थसिद्धये ॥२॥ जिसकी लीलाका लवमान (थोडा ) भी मलीभाँति सम्बन्ध हो जानेसे ( जीवको) अन्याशिर्वाद रुचिकर नहीं होते, उस, श्रीराधाके हृदयको आनन्ददानकरनेवाले मानन्दरूप श्रीकृष्णका मै आश्रय करता हूँ॥१॥ जिसके कृपाकटाक्षसे पामर जीव भी विना किसी प्रकारके प्रयत्नसे ही श्रीगोविंदको प्राप्त करता है, उन निज श्रीमदाचार्यचरणोंको मै अर्थ (ग्रन्थसमाप्ति ) सिद्धिकेलिये भक्ति- पूर्वक अभिवादन करता हूँ। ग्रन्थावतरण। श्रीकृष्णका आश्रय प्राप्त होनेसे (ऐहिक पारलौकिक ) सर्वकार्य सिद्ध होते है। निजजनों के सर्व कार्य सिद्ध हों, इसलिये मानों वरदान करते हों, उस तरह श्रीमदाचार्यचरण कृष्णाश्रयस्तोत्रका निरूपण करते है। कृष्णाश्रय में दशश्लोक क्यों हैं ? इस समय देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मन्त्र, कर्म आदि साधनोंके दूषित होनाने के कारण कर्ममार्गादिसाधन सर्वसाधक नही है । भगवद्भक्तों के सर्वसाधनरूप एवं चतुर्विध पुरुषार्थरूप भगवान् ही है। अर्थात् देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मन्त्र और कर्म ये छहों साधन एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप नारों पुरुषार्थोंको मिलानेसे दश सहया की पूर्ति होती है, और साथ ही इस ग्रन्थका आशय यह भी है कि साधन और साध्य सत्र भगवद्रूप है, इसलिये दशलोकोसेही उनकी भगवद्रूपता सिद्ध कीगई है। दूसरा कारण यह है कि भगवान् की लीला सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, उति, मन्त्र- तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रयरूप दशप्रकार की है, अत: भगवदाश्रयका निरूपण मी दश लोकोंसेही करना उचित है। - कृष्णाश्रयस्तोत्र। तीसरा हेतु यह बताया जाता है कि दशविध भक्तोंसे सेव्य श्रीकृष्ण हैं, यह दश लोकों से दर्शाया है। भक्तोंके मेद निम्नादित चक्र के अनुसार है:- - भक्त - सगुण निर्गुण सात्विक राजा तामह राजस राजस तामात तामस तामस तामस साविक सात्विक सात्विक राजस तामस सात्विक राजास तामस सात्विक राजस सगुण के नवप्रकार और एक निर्गुणको मिलाकर दशविषमतों से सेव्य श्रीकृष्ण हैं। चौथा प्रयोजन यह है कि- प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, काल, देवदतं और धनञ्जय इन दविष प्राणों से ही सर कार्य सिद्ध होते हैं, अतः सर्वकार्यसाधक कृष्णाश्रयका भी निरूपण दश श्लोकोंसे प्रार्थनाके निमिवसे श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए किया है। उपर्युक्त देशादि साधनोंमें काल मुख्य होनेकेकारण ससे पहिले काल पुरुषार्थ- को सिद्ध नहीं कर सकता यह बतानेकेलिये कालधर्मका निराकरण करते हुए श्रीकृष्णकी प्रार्थना करते हैं- सर्वमागेपु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ अन्वय-कलौ खलर्मिणि सत्ति, लोके पापण्डप्रचुरे सति, सर्वमार्गेषु नष्टेषु सत्सु, कृष्ण एवं मम गतिरस्तु। कलिकालके खल (दुष्ट ) धर्मयुक्त होनेपर, लोकके विशेष कर पापण्डी होने पर तथा सर्वमार्गाके नष्ट होनेपर भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरी गति-आश्रय हो । कलिकाल खलधर्मी है। खल पुरुष अन्तर्दुष्ट होता है । जो व्यक्ति अन्तर्दुष्ट होता है, वह सत्कार्य में बाधक रहता है। कहीं कहीं "खरधर्मिणी' ऐसा भी पाठ है वहां जिसकी चेष्टा दुःसह हो ऐसा कलिकाल प्रवर्तमान होने पर-सदानन्द भगवान् ही मेरी गति--आश्रय- ऐहिक पारलौकिक अर्थ साधक-होवै । सारा संसार पापण्डप्रचुर बन गया है, अत एवं २ , श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारश्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादपणीत सव मार्ग-कर्म ज्ञान आदि पुरुषार्थ के साधन प्रायः नष्ट होगये हैं। कर्मादि मार्ग नष्टप्राय होगये उसका प्रकार निम्नलिखित है-- आध्यास्मिक , यज्ञादि कर्म करनेवालेको चित्तशुद्धिद्वारा आत्मसुख-अन्तःकरणकी प्रसन्नता प्राप्त होना-ऐसा निसका अर्थ है वैसा स्वर्ग प्राप्त होवै, ऐसा वैदिक सिद्धान्त है। उसमें पापण्डने प्रवेश करके आत्मसुख वाचक 'स्वर्ग' शब्दका 'लोकरके रूपमें भ्रम उत्पन्न किया, उससे कर्ममार्गके द्वारा होने वाली चित्तशुद्धि भटक गई ( अर्थात् कर्ममार्ग जो कि आत्मसुखका साधन था, उसको संसार ही जिसका फल है ऐसे प्रवाहमार्गका मान वना- दिया)। इसीतरह मायावादका आग्रह करके ज्ञानमार्गका, निरीश्वरवादका अङ्गीकार करके योग(खात्य)मार्गका और विभूतिपरक होनेसे उपासनामार्गका मुख्यफलसाधकत्व नष्ट करने पर सर्वमार्ग नष्ट हो गये। शङ्का-भक्तिमार्गीय जीवोंको भी कलिकाल बाघ करेगा ही, क्योंकि वे भी तो गृहा- दिमें आसक्त रहते हैं, लौकिक किया करते है, अतः उनको भी पाप लगनेका सम्भव रहता है, तब फिर आप भक्तिमार्ग से उद्धार होना कहते हैं तथा मुख्यफल साधक कह कर सर्वोत्कृष्टताका समर्थन करते हैं वह असङ्गत प्रतीत होता है। भक्तिमार्ग भी कर्मादि मागौंके समान ही है, तब भक्तिमार्गीय आश्रय करनेसे भी क्या होगा ? समाधान आप कहते हैं वैसा दोष भक्तिमार्गमें नहीं है। अतः कलिकाल भक्ति- मार्गीय जीवोंकेलिये बाधक नहीं है। प्रत्युत कलिकालमें थोड़े ही समय में फलसिद्धि होने से वह साधकही है। इसके प्रमाण में श्रीमद्भागवतादिक वाक्य विद्यमान हैं। "हे राजन् ! कलिकाल दोष का निधि है, तथापि उसमें एक महान् गुण विद्यमान है, वह यह कि श्रीकृष्णके कीर्तनसे ही मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है," "हे राजन् ! सत्ययुगमें निरन्तर विष्णुका ध्यान करनेसे, त्रेतायुगमें यज्ञोंसे विष्णुका यमन करने से, और द्वापर में उपासना करने से नो गति प्राप्त होती थी वह कलिकाल में भगवान् के नाम सङ्कीर्तनसे होती है" "गुणज्ञ और सारग्राही आर्यजन कलिकी प्रशंसा करते हैं, क्यों कि कलिकाल में केवल कृष्णसङ्कीर्तनसे ही सब काम सिद्ध होते हैं ।" इत्यादि । भक्तों को गृहादि पाधक नहीं है । श्रीमद्भागवतमें कहा है कि-"हे भगवन् ! जो मक्क आपके मङ्गलमय नाम तथा रूपका श्रवण करते हैं तथा दूसरोंको सुनाते हैं, स्वयं ध्यान करते हैं तथा समग्र क्रियाओं में भी आपके ही चरणकमल, चित्त लगाकर रहते हैं, उनको पुनः संसारमें आना नहीं पडता है। और भी भागवतमें राजा प्राचीन हिके पुत्रोंको भगवान् उपदेश करते हैं कि "हे राजकुमारों ! जो मनुष्य गृहस्थाश्रममें रह कर सत्कर्म करते हैं और मेरी चर्चाम ही r . . -- ४ कृष्णाश्रयस्तोत्र। . रात दिन बिताते हैं उनको यह संसार बन्धन कर्ता नहीं होता है।" इसी प्रकार ब्रह्माजीने भी स्तुति करते हुये कहा है कि "हे कृष्ण ! जब तक मनुष्य पूर्णतया आपके हुए नहीं है तब तक ही उनको रागादि चोरोंसे मय रहता है, घर कारागृहके समान प्रतीत होता है और मोह वेडियोंके समान " इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है कि भगवद्भक्तोंके गृह आदि भगवान्केलिये ही होनेके कारण वे भक्तोंको वन्धनकारक नहीं होते हैं। भगवद्तोंकी लौकिक क्रियाएं देखने में लौकिकवत् हैं, पर ये सब वास्तविक रुपसे अलौकिकके समान ही हैं । क्यों कि नारदजीने व्यासजीकेप्रति कहा है कि-"सब कर्म, जन्ममरणकी जालमें फँसादेनेवाले हैं, अर्थात् कर्म द्वारा कर्मबन्धनसे मुक्त होनेकी आशा व्यर्थ है, तथापि यदि वे कर्म श्रीकृष्णप्रीत्यर्थ किये जाँय तो अवश्य ,मोक्षदायक सिद्ध हो सकते हैं" इस प्रमाणके अनुसार भक्तोंके कर्म श्रीकृष्णप्रीत्यर्थ ही होनेके कारण लौकिक प्रतीत होनेपरभी उनको अलौकिकके समान ही मानना उचित है । असमय में भी वैदिक क्रिया कर सकते हैं। यदि भगवत्सेवाके समयमें वैदिक क्रिया न हो सके तो समयका अतिक्रमण हो जानेसे प्रत्यवाय नहीं होगा । क्यों कि स्वयं भगवान् ही श्रीमुखसे आज्ञा करते हैं कि " मेरी सेवा करते करते यदि वैदिक क्रियाका काल लोप होजाय, तो उस भगवत्सेवापरायण भक्तका लुप्त- काल कर्म तीन करोड महर्षि करलेते हैं। इस वाक्यसे ज्ञात होता है कि भगवत्सेवा करते हुए यदि वैदिक कर्म यथासमय न हो सके तो उससे प्रत्यवाय नहीं है । इसी प्रकार 'भगवान् हृदयमें प्रविष्ट होकर सब पापोंको धोते हैं" "वे मगवदीय मेरे दण्डके पात्र नहीं बनते" इत्यादि वाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि कदाचित् पाप लग भी जाय तो पातकका फल जो नरकादि होना चाहिये वह भक्तों को भोगना नहीं पडता (किन्तु स्मरण रहे कि यदि कोई दम्भले वैदिक मियामोंका त्याग करता है तो यह अवश्य नरक गामी होता है) भगवद्भक्त कीर्तनादिसे ही पापोंको नष्ट करदेते हैं। आचार शैथिल्य। प्रपत्ति-शरण-मार्गनिष्ठ जीवों से कदाचित् आचारादिका यथोचित पालन न हो तोभी फलसिद्धि होती है । इसविषयमें अर्जुनके प्रति भागवान् आज्ञा करते हैं कि " हे अर्जुन सब तरहसे अन्य सब धर्मोंका त्याग करके मेरे शरण जा" "अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्यरूपसे मेरा भनन करता है तो उसको साधुपुरुप समझना चाहिये । क्यों कि उसका निश्चय उत्तम है" इन भगवद्वाक्यों से, तथा लोकमें मिथ्याचारी, अनाश्रमी होनेपर भी यदि भगवद्भक्त है, तो वह जिस प्रकार सूर्योदय होनेसे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है उसी तरह सारे संसारको पवित्र करता है। इसी प्रकार “हे राजन् ! मगवद्धर्ममें आस्था-श्रद्धा-रखनेवाला कभी " .
श्रीमद्भगवदनवैश्वानरावतार श्रीवल्लभाचार्यमहाप्रमुपूज्यपादप्रणीत ५ प्रमादी होता नहीं है, इतनाही नहीं परन्तु यदि वह आँखें बन्दकर के दौडे तो भी उसको न कहीं ठोकर लगनेका भय रहता है न फिसलनेका ।" इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है, कि प्रपत्ति मार्गमें आचारादि के अभावमें भी फल सिद्धि होती है। भक्ति समय सिद्धिओंका जीवन है। श्रीमद्भागवतमें कहा है कि "हे महर्पियो ! भलीभाँति किये हुए यज्ञादि कर्म भी यदि भगवान् में मक्ति उत्पन्न न कर सकें तो वह केवल श्रम ही है ऐसा समझना चाहिये ।। सत्य और दया से युक्त धर्म तथा तप से प्राप्त की हुई विद्या भी मेरी भक्ति से विहीन मनुष्यको मलीमकार पवित्र नहीं बना सकती" | " अच्युत-भगवान् के भाव विना जो निर- अन ज्ञान प्राप्त होता है वह भी भलीप्रकार शोभायमान नहीं होता है, तब जो कर्म श्रीकृष्ण को अर्पण नहीं किया जाता वह कैसे सुशोभित होसकता है ? फिर चाहे वह कैसा ही निष्काम क्यों न हो?" "विविध कामनाओंसे परास्त पुरुपकी आत्मा जिस तरह श्रीमुकुन्दकी सेवा करके शान्ति प्राप्त करती है उस प्रकार यमनियमादि सम्पन्न योगमार्गसे शान्ति- लाभ नहीं कर सकती।" ब्रह्मस्तुति में ब्रह्मानीने भी कहा है कि, "हे भगवन् सकल- कल्याणकारिणी आपकी भक्तिको छोड़कर जो लोग विना प्रेमके केवल शुष्क ज्ञानकेलिये क्लेश सहन करते हैं उनको परिणाममें भी केश ही सहन करना पड़ता है, जैसे धान्यके विना छीलकों को कूटनेवालेको परिणाम में छीलकोंके चूर्णके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलता" इन विविध प्रमाणों से सिद्ध होता है कि भक्ति यिना कर्म, ज्ञान, कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकते । परन्तु यदि वे भक्तिका सहयोग करें तो सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। अत एव भक्तिही सकल सिद्धिओंका जीवन है। निःसाधन भक्ति भी सर्व साधिका है। श्रीमद्भागवत दशमस्कन्ध, अध्याय बीत श्लोक बत्तीस और सैंतीसमें कहा है कि हे उद्धव ! कर्मकाण्ड, तपस् , ज्ञान, वैराग्य, योग, दान, और इसी प्रकार अन्य भी कल्याणके साधनों द्वारा जो जो कार्य सिद्ध किये जाते हैं, वह सब मेरा भक्त अनायास ही भक्तियोगसे प्राप्त करता है ।" इसी तरह गीता भी कहा है कि "हे अर्जुन ! आर्त, निज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी यह चार प्रकारके पुरुष मेरा मनन करते हैं ।" श्रीमद्भागवतमें शुका- चार्य भी कहते हैं कि अकाम हो, सर्वकाम हों या मोक्षकी कामनावाला हो, चतुर पुरुष को सीव भक्तियोग से परपुरुप का भनन करना चाहिये ।" ब्रह्मानीने भी मककी प्रशंसा करते हुए कहा है कि "जो लोग ज्ञान प्राप्त करने की इच्छासे परिश्रम न करके भक्तोंके मुखसे निकली हुई भगवान्की पवित्र कथाभोंका कानसे श्रवण करते हैं तथा देह, मन, वाणीसे उसका आदर करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं वैसे मक्त, है अनित । यद्यपि आप तीनों लोक में अनेय हैं तथापि आपको सहन ही में जीत लेते हैं।" "श्रीपति भगवान्के प्रसन्न ur अण्णाश्रयस्तोन। - होने पर क्या अप्राप्य रहता है ? तथापि हे राजन् ! भगवान्के भक्त भगवान् की सेनाके विना अन्य कुभी चाहते नहीं है।" "सर्वदुःसहर्ता प्रभु अपने भक्तको रुप, आरोग्य, और अर्थ भी प्रदान करते हैं।" ये सब वाक्य नि साधन भक्ति भी सर्व साधिका है ऐसा सिद्ध करते हैं, . भक्ति सर्व साधिका है, इतनाही नहीं, किन्तु स्वयं ही फलरूपा है । इसका समर्थन निम्नाङ्कित वाक्य करते हैं। श्रीमद्भागवत द्वितीयस्कन्ध प्रथमाध्याय नाम श्लोक में कहा है कि-"निर्गुण- तामें परिनिष्ठित रहने पर भी मुझे प्रभुकी लीरासे आकृष्ट होकर मागवतशास्त्रका अध्ययन करना पड़ा।" और प्रयमस्कन्ध सप्तमाध्यायके दशम श्लोकमे वर्णन किया है कि "श्रीहरि- के गुण ही ऐसे मनोमोहक हैं, कि आत्मामें रमण करने वाले जीवन्मुक्तों को भी प्रभुकी निष्काम भक्ति करने की इच्छा होती है।" इसी तरह तृतीयस्कन्ध पंचविंशाध्यायके चौती- सवे श्लोकमें भगवान् कपिल ने मातृचरण देवतिको उतम भक्तिका लक्षण समझाते हुए कहा है, कि "मेरी चरण सेवामें तत्पर रहने वाले, मेरे लिये ही सब कर्म करनेवाले और सर्वदा एकत्रित होकर परस्पर प्रेमपूर्वक मेरी कया कहने में आनन्द प्राप्त करनेवाले ऐसे पिरल भक्त मेरे साथ एकात्ममावकी-मोक्षकी भी इच्छा करते नहीं हैं। इत्यादि वाक्य भक्ति स्वयं ही फलरूपा है, इस सिद्धान्त को दृढ करते हैं । आधुनिक समय में कर्मादि मार्गों के अधिकार नष्ट हो जाने के कारण अनधिकारी को कर्मफल प्राप्त नहीं होता है । अतः यदि कर्मादि मार्गोंके अनुसार भी भक्तिमार्ग में रहकर आचरण किया जाय तो अधिकार भेदसे उन मार्गोमें कहा हुआ गौण अथवा मुख्य फल मिलनेका सम्भव रहता है। भक्तिमार्गमें मक्तको अनुग्रहसे ही अधिकार प्राप्त हो जाता है । यही उपदेश आचार्यचरणोंने निबन्धमें किया है। आपकी आज्ञा इस प्रकार है "इस कलिकाल में सब अधिकार निवृत्त हो गये हैं, पर यदि प्रेम पूर्वक सेवा की जाय तो वह कलियुग भी श्रीकृष्णके भक्तको फलसाधक हो जाता है" । इस वाक्यसे यह भी ज्ञात होता है कि कर्मादिसाध्यफल भक्तिमार्गमें अनिच्छा से भी मक्तको प्राप्त होजाता है, जब कि भक्तिसाध्यफल अन्य भागों से सम्पन्न नही होता है । इससे सिद्ध होता है कि अन्यमागोंकी तुल्यताका गन्ध भी भक्तिमार्गमें नहीं है। अव यहां शङ्का होती है कि, कर्मादि मार्गाकी अपेक्षा उत्कृष्टता भक्तिमार्गमें यदि है भी तो रहने दीजिये, परन्तु उसमें अर्धकृत से तो कर्मादि तुल्यता होनी चाहिये । इस शङ्का- का समाधान करते हुए कहते हैं कि " विष्णु सतत स्मरणीय है, कभी विस्मरणीय नहीं है, इस प्रकार सदा विष्णुका स्मरण करनेवालेके सब विधि और निषेध किङ्कर हो जाते हैं।" "निस मार्गमें स्मृति मात्रसे सकल कल्याणके मानन प्रभु होनाते हैं उस अजन्मा पुरुष श्रीहरिको मैं शरण हूँ।" "हे श्रीकृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, इस प्रकार जो मेरा स्मरण करता है उस जीवका मैं, जलको भेद कर कमल जिसतरह ऊपर निकलता है उसीतरह नरकसे उद्धार करता हूं।"
श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावधारीवाभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादपणीस.. -- "हे माधव, आपके जन अन्यकी तरह जन्म मरणकै चकमें नहीं गिरते । संय शास्त्रों का मथन करके और वारंवार उनका विनार भी करके एकवात निश्चित हुई है कि नारायण . ही सदा ध्यान करने योग्य है।" इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है कि यदि सर्वाश, मक्ति. न कीगई हो, थोडी भी कीगई हो, तोभी वह भक्ति फलमाधिका है, कर्मादिमागमें पैसा", नहीं है। अतः प्रकृत विषयमें इतने ही प्रमाण पर्याप्त है ॥ १ ॥ पवित्र देश में निवास करनेसे भी धर्मादि पुरुषार्षकी सिद्धि हो सकती है, और आप कहते हैं कि अन्य सब साधनोंका त्याग करके श्रीकृष्णका ही आश्रय करना चाहिये इसमें प्रमाण क्या है ? इस शङ्काका समाधान करते हुए कहते हैं कि पुण्यस्थान भी इस समय पुरुषार्थसाधक नहीं हैं; यही बात श्रीमदाचार्यचरण आता करते हैं- म्लेच्छामान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ अध्यादेशेषु म्लेच्छाकान्तेषु सत्सु च पापैकनिलयेषु, सत्तीडाव्यमलोकेषु, कृष्ण एवं मम गतिः अस्तु । देश म्लेच्छोंके अधीन हैं। माना कि म्लेच्छोने देशपर आक्रमण किया है, पर यदि म्लेच्छ मी न्यायपरायण हों तो आपकी क्या हानी है ? इस आक्षेपका उत्तर देते हैं कि म्लेच्छ तो मूर्तिमान् पाप ही हैं, और पुण्यस्थान पापरूप म्लेच्छों के मुख्यस्थान (राजधानी) बने. हैं। दूसरा अर्थ किया जाय तो पापियोंका अथवा पार्पोका घर हैं, तीसरा अर्थ यह है कि अङ्ग बल आदि देश म्लेच्छों के अधीन है और पाप के भी मुख्य स्थान बन गये है, कि जहां जानेसे ही पुनःसंस्कार प्राप्त होता है। यहां यह भी शङ्का हो सकती है कि पुण्य स्थलों में भी वणिक आदि नातिक भले आदमी रहते होंगे, तो फिरे म्लेच्छोंसे क्या मतलब है ? इसका समाधान इस प्रकार करते हैं कि वणिक् आदि लोक भी स्वधर्माचरण करनेवालों पर जो आफतें आती हैं उनको देखकर किर्तव्यविमूढ बन गये हैं, अर्थात् स्वधर्मनिष्ठपर जो आफतें आती है उनको देख कर सधर्माचरण न करना चाहिये या लौकिक कार्य न करना चाहिये इसका निर्णय वे लोग नहीं कर सकते । अर्थात् सधर्मसे, अच्छा ही होगा ऐसा निश्चय उन लोगोंमेंसे चले जानेके कारण धर्म विषयक श्रद्धादिके अभावमें धर्माचरण करनेवालोंको ये सहायक भी नहीं होते हैं । अतः श्रीकृष्णके आभयके, विना पवित्र देशोंपर अपने उद्धारका आधार रखना निरर्थक है । श्रीकृष्णकाआश्रय करनेवालेको देश भी अनुकूल हो जाते हैं । अत एव श्रीमद्भागवतमें देवोनें “कृष्णसेवा करनेकेलिये भारतवर्ष, मुकुन्दसेवोपयोगी देह प्रदान कीनिये, हम भी भूमिपर जन्म लेना चाहते हैं " ऐसा कहा । इस प्रकार पुण्यभूमिमें स्थिति करनेसे भी, पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती है, अतः :: कृष्णाश्रयस्तोग। .. - -- - । श्रीकृष्णका आश्रय ही करना उचित है, अतः मेरा आश्रय श्रीकृष्ण ही हो, ऐसी प्रार्थना श्रीमहाप्रभुनी करते हैं ॥२॥ गङ्गादि तीर्थ भी सर्व पुरुषार्थ सिद्ध करनेवाले माने गये हैं, तो फिर आश्रयकी प्रार्थना किसलिये करते हैं ? इस प्रश्न उत्तर पूर्वोक्त देशादि छ: प्रकारके साधनोंमें से तृतीय साधन द्रव्य भी फलसिद्धि नहीं करता है यह दर्शानेकेलिये तीर्थ भी साधक नहीं हैं ऐसा निरूपण करते हैं:- ' गङ्गादितीधचर्येपु दुष्टैरेचावृत्तेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥३॥ अन्वयः-इह गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरेवावृतेषु सत्सु तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव मम गतिरस्तु । गङ्गा आदि मुख्य तीर्थ दुर्जनोंसे ही आवृत हैं । गङ्गादि तीर्थों में ब्राह्मणादि भी रहते हैं, तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि सब तीर्थ दुष्टोंसे ही सेवित हैं ? ब्राह्मणादि की स्थिति वहां नित्य रहती है इस कारण अतिपरिचयसे उनकी तीर्थोकेप्रति आदर- बुद्धि कम हो जाती है, तथा वे दान दक्षिणादिसे निर्वाह करते हैं, इसलिये उनके पीछे भी उपा- धियाँ लगी ही रहती हैं, अतएव उन में भी दुष्टता रहती ही है। सर्वविध दोपोंको दूर करनेवाले तीर्थ वहां विद्यमान हैं तो फिर उनमें दोप किस प्रकार रह सकता है; ऐसी शङ्का भी नहीं हो सकती । उसका कारण यह है कि उनमें स्थित भगवानसे बहिर्मुखता तथा नास्तिकता आदि दोषोंका निवारण तीर्थ भी कर नहीं सकते। यह बात निम्नलिखित प्रमाणोंसे सिद्ध होती है । "सौ बार अच्छी तरह मिट्टी लगाकर जन्मसे आजतक प्रतिदिन स्नान करने- वाला भावदुष्ट मनुष्य, गङ्गाके सम्पूर्ण जलसे भी शुद्ध नहीं हो सकता । ऐसा हम निश्चित रूप से कह सकते हैं; मत्स्यादि जलमें रहनेवाले प्राणी रातदिन (गङ्गाआदिक) जलमें ही रहते हैं, परन्तु वे कभी स्नानके फलको प्राप्त नहीं कर सकते । मनुष्य जो कर्म श्रद्धा और विधिपूर्वक शुद्ध भावसे करते हैं, वही उसके अक्षय सुखकेलिये. कल्पित होते हैं; अर्थात् उन्हींसे उनको अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ।" "विधि और श्रद्धासे रहित और कर्मका फल मनुष्यको प्राप्त नहीं होता है। इसका कारण यह है कि वैसे कर्मका फल असुर हरण करलेते हैं । अतः विधिहीन और भावदुष्ट कर्म करनेवाला अत्यन्त मूढ तथा अकृतार्थ समझना चाहिये । श्रद्धारहित, दुष्ट अन्तःकरणवाला, नास्तिक, संशयग्रस्त और कारणवादी ये पांचों तीर्यके फलको प्राप्त नहीं करते हैं।" "जिस तरह गङ्गा आदि नदियां मदिरासे पूर्ण घटको पवित्र नहीं बनादेती है, उसी तरह नारायणसे विमुख मनुष्यको कोई भी प्रायश्चित पवित्र नहीं कर सकता।" ये सब आदित्य पुराण, योगिया- ज्ञवल्क्य, वायुपुराण तया श्रीमद्भागवतके वचनों से सिद्ध होता है, कि तीयों में भगवान् से बहिर्मुख तथा नास्तिक मनुष्यको पवित्र बनानेकी सामर्थ्य नहीं होती है। . भावदुष्ट किये .
, श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारीपलमापार्यमहाप्रमुपूज्यपादप्रणीत यहां इस तरह शङ्का होती है कि वास्तुमें शक्ति होनेपर कार्य अवश्य होता है, वह हुए विना रहता ही नहीं, जैसे दाहकत्व शक्ति अग्नि में विद्यमान है, और, यह जलाती नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता । इस नियम के अनुसार तीर्थमें पवित्र करने की शक्तिके विद्यमान रहते वे पवित्र नहीं कर सकते, ऐसा कदापि न होगा। इसका समाधान करते हुए आचार्यचरण माना करते हैं, कि तीर्थों में पवित्र करने. वाला जो आधिदैविक स्वरूप है वह तिरोहित हो गया है, अतः तीर्थ उनको पवित्र नहीं कर सकते । तीयोंका आधिदैविक स्वरूप सत्पुरुषोंके सम्पर्व से ही प्रादुर्भूत होता है, अत एव निबन्ध में आपने कहा है कि " काशी आदि तीयामें किसी समय किसी एकाध की मुक्ति होती है । तब समझना चाहिये कि जीवके ऊपर प्रभुने अनुमह किया है।" प्रमुके भनुम- हके बिना किसी की भी मुक्ति नहीं होती है। प्रभु तीर्घाका माहात्म्य बढ़ाने के लिये तीयौके द्वारा भी किसीको मोक्ष प्रदान करदेते हैं। और श्रीमद्भागवत में भी कहा है कि भगवद्धत तीयों में मान करते समय अपने हृदयकमल में विराजमान प्रमुके साथ तीयोंका सह करा कर तीयों को पवित्र बनाते हैं । अर्थात् तिरोहित आधिदैविक स्वरूप उनमें प्रकट कर देते हैं, इसको तीर्थीकरण कहते हैं। अन्य प्रकारसे तीनों को और क्या तीर्थ घनाना है ? जल में कुछ दोष तो दिखाई देते ही नहीं। इस प्रकार द्रव्यस्वरूप तीयों में भी स्वतन्त्ररूपसे पुरुषार्थ सिद्ध करने की सामये विद्यमान नहीं है अतः श्रीकृष्णका आश्रय ही क्षणीय है ॥३॥ यदि कर्म करनेवाला अच्छा हो तो सब फल प्राप्त हो सकता है। तो फिर अन्य का निषेध कर आश्रयकी ही प्रार्थना क्यों ? इस शङ्काका समाधान करके कर्मकरने वालोंका स्वरूप मी फल सिद्ध नहीं कर सकता, यही बात चतुर्थ श्लोक में निरूपण करते हैं:- अहङ्कारविमूढेपु सत्सु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयलेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अन्वयः-मासु महङ्कारविमूढेषु पापानुवर्तिषु लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्णः एव मम गतिः अस्तु । महङ्कारके वशीभूत पण्डितगण-हम ही शास्त्रज्ञ है भन्य कोई नहीं-इत्यादि प्रकार के मिथ्याभिमानसे विमूढ हो गये हैं। जिस तरह उनका ज्ञान अभिमानके हो जाने से दूपित हो गया है, वैसे ही उनकी कृति भी दूपित हो गई है। इसका कारण यह है कि वे लोग द्रव्यादि का लाभ और पूजा के लिये ही यत्न करने वाले होते हैं। विष्णुयागादिक पारमार्थिक कर्म मी वे लोग ऐसा समझकर ही करते हैं कि इससे हमको द्वन्य प्राप्त होगा और लोको प्रतिष्ठा बढ़ेगी। साथ ही दुष्ट पुरुषोंका सङ्ग करनेसे सङ्कनन्य दुष्टता और पापका अनुसरण करनेसे अन्नजन्य दुष्टता इसप्रकार दोनों प्रकारकी दुष्टता उनमें होनेसे ये पण्डित मी स्वतन्त्रतासे पुरुषार्थ सिद्ध नहीं कर सकते । परन्तु भगवदाश्रय करके भगवत्कृपासे वेदार्य और स्वदोष की स्फूर्ति होने -- ३ ११२ कृष्णाश्रयस्तोन। . + , । होता हैं। क्योंकि इन पाक्यों में जीव को प्रवृत्त कराने वाला, सारे जगत् की उत्पधि का कारण, जीवमात्रके लिये सेव्य, सर्वविध कर्मोका फलदाता एकमात्र भगवान् ही है ऐसा कहा है। सब जैमिनिके मतके अनुसार उपपन्न नहीं हो सकता इसी तरह यज्ञोंसे देवों की तृप्ति तथा देवोने यज्ञ किया ऐसा प्रतिपादन भी किया गया है। अतः यह भी स्वीकार करना चाहिये किं मन्त्रकी देवता मन्त्रसे पृथक् हैं और वह चेतन रूपा है। " हे अर्जुन ! उसके पश्चात् मुझे तत्त्वतः जानकर मेरेमें प्रवेश करते हैं ।" "हे अर्जुन ! तू मुझे ही प्राप्त करेगा।" "ब्रह्मका आकार आनन्द है" इन वाक्योंमें भगव- सायुज्यको मोक्ष कहा है । तथा आनन्दाकार होनेके कारण भगवान्को ही फल कहा है। जिसमें आनन्दका अनुभव हो वही फल है अतः न्याय और सासय मत भी श्रौतसिद्धान्तके अनुकूल नहीं है ऐसा सिद्ध होता है। इस तरह भिन्न भिन्न वादोंके द्वारा जो कर्म का विनाश हुआ है उसका दिग्दर्शन कराके अव उन वादोंके द्वारा जो प्रतादिका विनाश किया गया है वह भी बताते हैं स्वमत के आग्रह से वे लोग एकादश्यादिवत भी दशमीके वेध से युक्त ही करते हैं, जिसका कि शात्रों में पूर्ण निषेध है । इस प्रकार प्रतोका भी विनाश हो चुका है । यद्यपि व्रत भी एक प्रकारका कर्म ही है तथापि वह ज्ञानादिका अङ्ग होने से यहां उसका कर्मसे पृथक् उपादान किया गया है। अब यहां शङ्का उपस्थित होती है कि एकादश्यादि व्रत करनेका वे लोग भी उपदेश करते हैं और स्वयं भी करते हैं, यदि वे लोग व्रतों को मिथ्या, फलरहित मानते होते तो वे क्यों आचरण करते हैं और उपदेश करते हैसाथ ही उन मतोंके प्रवर्तक शङ्कर जैमिनी गौतम आदि हैं । यह शङ्का भी अयुक्त है क्योंकि उनका प्रयास पाखण्डका प्रचारकरनेके लिये ही है । यह बात वाराह पुराण के "हे महाबाहु रुद्र ! तुम मोह शास्त्रों की रचना कराओ और सत्यको मिथ्या बताओ, अपने स्वरूप का प्रकाश करो और मुझे गुप्त रहनेदो" इह सार्घश्लोकसे तथा पद्मपुराणके " खामाराध्य तथा शम्भो गृहीष्यामि वरं सदा। द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु ।। स्वागमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु ! मां च गोपय येन स्यात्सृष्टिरेपोतरोत्तरा ॥" हे शम्भो ! द्वापरादियुगमें मैं कलात्मक अवतार लेकर मनुप्यादिकमें तुह्मारा अराधन करके वर ग्रहण करूंगा और आपको नवीन शास्त्रोंकी कल्पना. करके लीगोंको मेरेसे विमुख करना चाहिये, और मेरे स्वरूपको छिपा- १ त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय। अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज ॥ प्रकाशं कुरु चात्मानमप्रकाशं च मागुरु ।।
। श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारनीयतमाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत कर अपना स्वरूप ही प्रगट करना चाहिये, ताकि यह सृष्टि उत्तरोत्तर चलती रहे । इस मगर- दाज्ञाके अनुसार शाङ्करादिकी प्रवृत्ति है, वे लोग भी जो कर्म करते हैं वह भी अपनी महत्ता दनिकेलिये ही करते हैं,साथ ही उनका यह भी उद्देश रहता है कि उनके अनुयायी भी वैसा ही कर्म करें। यदि ये लोग स्वयं वैसा न करके अनुयायियोंको ही उपदेश करें तो उनका कोई मानेगा भी नहीं । गीतामें भी कहाहै कि "यद्यदाचरति श्रेष्ठत्तचदेवेतरे जनाः ।" अर्थात् जिस प्रकारका आचरण महत्पुरुषोंका रहता है, उसी प्रकारका आचरण अन्यलोग भी करते हैं। इसी न्यायके अनुसार यदि वे स्वयं न करें तो उनके उपदेशके अनुसार अन्यलोग कैसे चल सकते हैं । शङ्करादि मतप्रवर्तकोके द्वारा आधुनिक लीगोंमें मोह उसन्न हो गया है। ये मतप्रवर्तक प्रायः सर देवता हैं तो फिर आप देवताओंसे प्रवर्तित मतोंको पासण्ड- मत क्यों कहते हैं ? ऐसी शङ्का भी अस्थित नहीं हो सकती। क्यों कि मतप्रवर्तक देवता है इतना एकमात्र कारण रहने से ही वह मत सन्मत है ऐसा नहीं कह सकते । किन्तु जो मत वेदसे विरुद्ध न हो और वेदमूलक हो उसीको सन्मत कह सकते हैं। अन्यथा बृहस्पति प्रक- तित चार्वाक ( नास्तिक) मतको भी सन्मत कहनेकी आपत्ति उपस्थित होगी। इस तरह प्रस- ताप्रसक्तसेही मटकना ठीक है । ये विविधवाद भी कर्मफलसाधक नहीं है। अतः मेरी गति - आश्रय-श्रीकृष्ण ही है ॥६॥ धर्मसे पाप दूर होता है" "धर्ममें सब प्रतिष्ठित है" यह श्रुति पहिले जीवको दोप निवृत्तिकेलिये धर्माचरण करनेकी अवश्यकता बताती है। यह ठीक भी है, कि धर्माचरणके द्वारा चित्तशुद्धि होनेसे भगवन्माहात्म्य तया भगवतस्वरूपको समझकर ही भागवदाश्रयादि करने चाहिये, नकि पूर्वकी दोषयुक्त अवस्थामें । कहां योगियों को भी अगम्य भगवत्स्वरूप और कहां यह दोषयुक्त जीव, वह उसको कैसे प्राप्त कर सकता है ? इस तरह शङ्का करके "निसको यह भगवान् वरण करते हैं उसीको वह लभ्य है।" "हे रहूगण ! भगवान्के स्वरूपकाज्ञान, तपसे या वैदिक कर्मोसे, अन्नादिके दानसे परोपकारसे, वेदाध्ययनसे, जल, अग्नि और सूर्यादिकी उपासनासे प्राप्त नहीं होता है । परन्तु भगवद्भक्तोंके चरणकी रज शिरपर धारण करनेसे ही- भर्याद भक्तोंकी सेवा करनेसे ही प्राप्त होता है । " हे अर्जुन ! मेरी अनन्य भकिसे ही मेरे स्वरूपका सम्पूर्ण ज्ञान, जैसा कि तुझे हुआ है, मनुष्य को हो सकता है । हे परन्तप । भकिसे ही मैं तत्त्वतः ज्ञात हो सकता हूं और वे जीव (जिहोंने मेरा स्वरूप तत्त्वतः नानलिया है। मेरे भीतर प्रवेश कर सकते हैं।" इत्यादि वाक्य स्पष्टतया यह सिद्धान्त देशति हैं कि भगव- दीयके अनुमहसे सदोपनीयको भी भगवत्स्वरूप गम्य हो सकता है, इसलिये, और भगवान्का माहात्म्य मी शास्त्रोंमें वैप्ता ही-अघमोद्धारक आदि-अप्तिद्ध है इसलिये भी सदोषजीवोंके लिये दोपनिवृति अर्थ प्रायश्चित्तादि नहीं, पर महापुरुष, श्रीमदाचार्यचरण एवं उनके वंशनके द्वारा शरण ग्रहण करना ही है। उसीसे सब कुछसिद्ध हो जायगा । अर्थात् भक्तोंके. धर्मादि चतुर्विध पुरुषार्थरूप मावान् ही होने के कारण भक्तोंको भगवान्के आश्रयके अतिरिक्त कुछ कर्तव्य शेप नहीं रहनाता है।
1- कृष्णाश्रयस्तोत्र। पर फल सिद्धि कर सकते हैं, क्यों की वेदका तात्पर्य भगवान् या भगवद्भक्त जानते हैं, ऐसा होनेसे भगवदीय होनेसे ही वेदका तात्पर्य समज सकते हैं। इस तरह भगवदाश्रयके विना पण्डित भी कुछ सिद्ध नहीं कर सकते । अतः श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय होवे ॥ ४ ॥ सुनते है कि शास्त्रों में मन्नों से फल सिद्धि बताई है, तो फिर आश्रय ही करनेकी क्या आवश्यकता है ? मन्त्रों की शक्ति भी नष्ट होगई है, अतः मन्त्र भी कुछ नहीं कर सकते यह दर्शाते हैं:- अपरिज्ञाननप्टेपु मन्त्रेष्वव्रतयोगिपु। तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एच गतिर्मम ॥५॥ अन्वयः-मन्त्रेषु अपरिज्ञाननटेषु व्रतयोगिषु तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं मम गतिः अस्तु । । वेदोक्त तथा नारदपंचरात्रादि आगमोक्त मन्त्र; तात्पर्य, फल तथा देवताके स्वरूपज्ञानके अभावसे नष्ट हो गये है। वैदिमन्त्र नियमपूर्वक पढे नही जाते, अतः उनका सामर्थ्य नष्ट हो गया है । वेदाध्ययनके नियम गुरुकुलमें निवासकरना, ब्रह्मचर्यपालनकरना, शूद्रोंके सामने न पढना, अनध्यायके दिनों में न पढना इत्यादि है। तान्त्रिक मन्त्रोका तात्पर्यही समझमें नहीं आता है, अतः उसका अर्थ और फल समर्पक देवता उन मन्त्रोंसे तिरोहित हो गई हैं, इस तरह तांत्रिक मन्त्रोंका भी सामर्थ्य नष्ट हो गया है । तथापि भगवान्का ही आश्रय रखनेवालेको मन्त्रोंसे भी फल प्राप्त होता है । इसके विषयमें “जिसके स्मरणसे और नामका उच्चारण करनेसे कर्म की त्रुटि पूरीकी जाती है, उस अच्युत भगवान् को मैं प्रणाम करता हूं।" इत्यादि वाक्य प्रमाण है। इस तरह मंत्र भी नष्ट सामर्थ्यवाले होनेसे मेरा आश्रय श्रीकृष्ण ही है ॥ ५ ॥ मीमासा आदिसे मंत्रोके अर्थका निर्णय करके कर्मसे ही फल प्राप्त हो सकता है तो फिर आश्रय की क्या आवश्यकता है ? इस प्रकार शङ्का करके कर्म भी फल साधक नहीं है यह जतानेकेलिये नीचेके श्लोकसे आश्रयकी प्रार्थना करते है:- नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मव्रतादिपु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ।। ६ ।। -सर्वकर्मव्रतादिषु नानावादविनष्टेषु पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव मम गतिरस्तु । सोमयाग आदि सत्र कर्म और एकादशी आदि सब व्रत विविध वादोंसे नष्ट हो चुके है। वे वाद इस प्रकार है- (१) सारा प्रपञ्चमिथ्या है, अर्थात् वेदी प्रपञ्चमध्यपाती होनेके कारण मिथ्या हैं, अत जैसे प्रपञ्च व्यावहारीक होने के कारण व्यवहार में ही प्रमाण है वैसेही वेद और वेद- - अन्वयः- । या - . ।' श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारीवल्लभाचार्यमझामभुपूज्यपादमणीव विहित कर्मको भी व्यवहारमें ही प्रमाण मानना चाहिये । पास्तविकरीतिसें कुछमी करनेका या प्राप्तकरने का नहीं है। (२) पूर्वमीमांसाकारका मत है कि "परमेष्ठिनो वा एष यज्ञोग्रे" इत्यादि वाक्योंसे नसा आदिका उत्कर्षभी यज्ञोंके द्वारा ही सुना जाता है । और उत्तरोत्तर कर्ममें प्रवृत्त होनेमें पूर्ववासना ही कारण होनेसे कर्म ही करना चाहिये । कर्भसे ही फलसिद्धि. होगी। कर्मक अतिरिक्त अन्य कुछ भी उपास्य, फलदाता; किंवा प्रवर्तक नहीं है। इसी तरह मन्त्रकी देवता मी मन्त्रसे पृथक् चेतनरूपा कोई नहीं है, किन्तु मन्त्ररूपा ही है। अर्थात् किसी देवताकी कृपा सम्पादन करके किसी प्रकारके फल की प्राप्ति करने के लिये भी कर्मके अति- रिक्त कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं है । किन्तु उपर्युक्त प्रकारसे उपास्य, फलदाता, प्रवर्तक सब कुछ कर्म ही है। i (३) नैयायिकों का मत है कि शास्त्रसे प्रमाण प्रमेय आदि सोलह पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके उसका श्रवण मनन और निदिध्यासन करनेसे आत्माका साक्षात्कार होता है, तब दुःख की आत्यन्तिकी निवृत्ति होकर जाती है, यही फल है । ईश्वरोपासना करनेकी अथवा ईश्वरको ही फलरूप माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।' (४) निरीश्वर वादी सायोंका मत है कि प्रकृति और उसके.विकारों की उपा- धिका विलय करके पुरुष अब अपनी स्थिति करता है वही फल है, मगवान् फल नहीं है। इस तरह भिन्न भिन्न प्रकारके बाद प्रचलित है । इनसे विशेषकर कोका नाश किया गया है । अतः उलटा ही अर्थ ग्रहण कर लेनेसे कर्म भी फलोत्पादक नहीं रहे । सच्चा वैदिक सिद्धान्त देखनेसे.ये सब बाद एक प्रकारके प्रलाप की तरह प्रतीत होते हैं। क्योंकि "यह सब पुरुष ही है" "यह सब ब्रह्मात्मक है" यह भगवान् सबको वशीभूत रखता है सबके उपर शासन करता है, इत्यादि वाक्य यह सब प्रपञ्च ब्रह्मरूप है, और अत एव सत्य है, इसलिये कर्म भी साल है यह बताते हैं । अत एव शाङ्कर सिद्धान्त उपपन्न नहीं होता है। भगवान् उसी से अच्छे कर्म कराता है जिसको ऊंची गति से लेजाना है। और उसीसे निकृष्ट कर्म कराता है जिसको अधोगति से ले जाना है ।" " हे अर्जुन मैं ही समप्र जगत् की उत्पत्तिका कारण हूँ " " मला ऐसा कौन देह धारी है जो मुकुन्द भगवान् का भजन न करेगा।" "देव हो, असुर हो, मनुष्य हो यक्ष या गन्धर्व हो, मुकुन्द भगवान् के चरणों की सेवा करके मोक्ष को प्राप्त करते हैं । " भगवान् ही सबके फल दाता हैं, क्योंकि जो सबको नियामक हो वहीं फलदाता सकता हैं । यज्ञ तृप्त हुए देवता यज्ञ करनेवाले को तृप्त करते हैं । " निश्चय ही देवोंने यज्ञ किया था।" इत्यादि प्रमाणों से जैमिनी का मत. भी श्रुति स्मृति, और व्यास सूत्रों से विरुद्धसिद्ध कृष्णाश्रयस्तोत्र। . - -- . भगवान् भक्तोंके धर्मादिरूप किस प्रकार हैं यह निम्नलिखित पद्यसे ज्ञात होता है:- अजामिलादिदोपाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७॥ अन्वय:-अजामिलादिदोषाणां नाशकः, अनुभवे स्थितः ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव मम गतिरस्तु ॥ अनामिल, गजेन्द्र, अहल्या आदिको अपने दोपके नाशकरने वाले भगवान् हैं ऐसा अनु- भव हुआथा । अथवा अजामिलके अतिरिक्त अन्यमक्तोंके अनुभवमें आप दोपनाशकरूपसे आये थे। अजामिलका उद्धार परम्परा सम्बन्धसे अपने नामके द्वारा किया था। इसमें अपना सम्पूर्ण माहात्म्य भी दर्शाया है। इन तीन विशेषणोंसे धर्मका कार्य-पापको दूर करके इष्टकी प्राप्तिकराना वह भी भगवान् स्वयं करते हैं। इसलिये दोपके उपस्थित होनेपर भी भक्तोंको दोपनिराकरणार्थ शरणकी भावना ही करनी चाहिये प्रायश्चित्तादि करने की आवश्यकता नहीं है । अथवा पर- म्परा सम्बन्ध से भी आप दोष निवारक हैं । ( साक्षात् सभ्यन्ध होजाय तब क्या कहना है ? ) अजामिल का उद्धार आपने अपने नामके साम्पसे किया। भक्तों के अनुभवसे आप अनुभवमें आते हैं, इसी तरह लीलारूप निखिल माहात्म्य भी आप ही दर्शाते, हैं; अतः श्रीकृष्ण ही मेरी गति-आश्रय-होवै ॥७॥ सदा अध्ययन करना चाहिये" जिस जिस यज्ञका अध्ययन करते हैं उन उन मन्त्रों का फल अध्येता को प्राप्त होता है," अग्नि, वायु और सूर्यका सायुज्य प्राप्त होता है " इत्यादि श्रुतिसे कर्म मार्ग स्थित रह कर भी ब्रह्मयज्ञ अध्ययनके द्वारा अग्नि आदिका सायुज्य प्राप्त कर सकता है, इसी तरह "जो लोग अव्यक्त, अवर्णनीय, सर्वव्यापी अक्षर की उपासना करते हैं वे मेरे अक्षर रूपको प्राप्त होते हैं" इत्यादि वाक्य ज्ञानसे भी अक्षर ब्रह्मकी प्राप्ति बताते हैं, तब फिर श्रीकृष्णका आश्रय करनेमें क्या विशेषता है ? और यदि विशेषता न हो तो उसकी प्रार्थना भी क्यों करें ? ऐसी शङ्का करके उन उन देवताओं और अक्षरके सायुज्यके बीचमें तथा अक्षर और श्रीकृष्णके सायुज्यके बीचमें क्या न्यूनाधिक्य रहा है यह समझानेकेलिये सब स्वरूपोंका निरूपण करके भगवान् भक्तोंके अर्थरूप किस प्रकार है -- " वह बताते हैं: - प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥८॥ १ यहां पूर्णानन्दशब्दके तीन अर्थोका स्वीकार किया है। (१) पूर्ण आनन्दसे जो होता है (२) पूर्ण आनन्द जिसमें है (३) जिससे पूर्ण मानन्द होता है। प्रथम अर्थकी यह स्वारस्य है कि मर्यादा पुष्टिभक्तिको पूर्णानन्दका दान करने में आप साधन सापेक्ष है, द्वितीय अर्थसे आप पूर्ण आनन्द स्वरूप है, गणितानन्द नहीं। तीसरेका अर्थ पुष्टि भकोंके पूर्णनन्दका दान करनेमें आप साधन निरपेक्ष हैं।
श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानराववारश्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत १५ सकला देवाः प्राकृताः वृहत् गणितानन्दकम् , पूर्णानन्दः हरिः तस्मात् कृष्ण एवं मम गतिः अस्तु ।। सब देवोंकी उत्सति सत्याहङ्कारसे हुई है अतः ये सब देवगण अपनी उत्पादिका प्रकृति-त्रिगुणात्मिका माया के अधीन है । अक्षरब्रह्म गणितानन्द है। अब "उस आनन्दका विचार यहां होता है। इस वाक्यसे प्रारम्भकरके "प्रजापति आदिके आनन्दसे शत गुणित माधिक आनन्द वह अक्षर ब्रह्मका आनन्द है" इस वाक्योक्त सम्पूर्ण प्रपाठकसे अक्षर ब्रह्मके भानन्दकी गणना की गई है। और यदि ब्रह्मादि देवोंका सायुज्य भी प्राप्त हो तो भी क्या हुआ? वहांसे भी तो नीयको संसारमें आनेका सम्भव रहता ही है इसका कारण यह है कि भगव- दीताके नवमाध्यायका सोलहवाँ लोक "हे कुन्तीपुर ! मुझे प्राप्त होनेवाला जीव ही फिरसे इस संसारमें आता नहीं है।" इस वाक्यके अनुसार ब्रमा पर्यन्त सत्रदेवोंके साथ सायुज्य होने पर भी वह सायुन्य नहीं माना जाता, यह सायुज्य गुणातीतके साथ न होनेके कारण और संसारमें फिर उत्पन्न होना पडता है इसलिये तथा अल्पमुख वाला होनेसे 'पुण्यक्षीण होनेसे स्वर्गसे गिरता है' इस वायके अनुसार नैसे स्वामें जानेका नाम मोक्ष नहीं है वैसे ही वह सायुन्य सावधिक होनेसे मोक्षरूप नहीं हो सकता । अब रही ज्ञान मागीय अक्षर ब्रह्मके साथ मायुन्य की बात, सो तो यद्यपि अक्षर ब्रह्ममें लय होना निर्गुण मुक्ति हो सकती है, तथापि उसमें भी परिमित ही सुख होनेके कारण अत्यन्त क्षुधातको अतीत स्वल्पभोजन तृप्त नहीं कर सकता उसी तरह बहुत समयसे आनन्दकी गवेषणा करनेवाले जीवात्माको गणित तानन्द प्राप्त होने पर भी क्या होगा? उसको तो पूर्णानन्द प्राप्त होने पर ही तृप्ति होगी। यहां एक बात. विचार करने योग्य है , वह यह कि गणितानन्दका व्याकरणकी रीतिसे क्या अर्थ है-"गणितानन्द" में "क" प्रत्यय अज्ञातार्थ और वह स्वार्थमें हुआ है। उसका तात्पर्य यह है कि अक्षर ब्रह्मका आनन्द पुरुषोत्तमके आनन्दकी अपेक्षा अस्पष्ट एवं न्यून है । इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण ही निर्गुण मुक्तिके दाता तथा पूर्णानन्द होने के कारण उनका ही आश्रय स्तणीय है। "वही यह यदुकुलश्रेष्ठ और कुरुकुलश्रेष्ठ नारायण और नर भगवान् हरिके अंशरूपसे पृथ्वीका भार उतारनेकेलिये अवतीर्ण हुए हैं। " हरिके अंशरूप नर और नारायणसे पृथ्वी अतीव शोमाको प्राप्त होती है।" इत्यादि वाक्योंसे श्रीकृष्णको तो ' अंश- रुप कहते हैं, और आप यहां बताते हैं कि वे पूर्ण हैं यह कैसे सम्भव हो सकता है ? साथ ही भगवान्ने भन्मलिया' इत्यादि वाक्यसै भगवानका जन्म भी सुनानाता है, अर्थात् देवादिकके देह भी पांचभौतिक तथा उत्पत्तिशाली होनेसे भगवान्के श्रीभङ्गको भी पाञ्चभौतिक एवं नन्य - १ तत्तिरीयोपनिषद्को आनन्दवाली में आनन्दकी गणना इस प्रकारकी गई है। . -- .
-- कृष्णाश्रयस्तोत्र। कहना चाहिये । इसी तरह यह आनन्द रूपत्वका प्रतिपादन करते हैं यहभी किस तरह माना- जाय ? और सुनिये, आनन्द अन्तःकरणका धर्म होनेको कारण भगवान्को आनन्दरूप एवं आनन्द जनक किस तरह कह सकते है ? इससे तात्पर्य यह निकलता है कि आपके कहनेके अनुरूप भगवान्का पूर्णत्व, आनन्दाकारत्व, आनन्दवत्त्व , अथवा आनन्दजनकत्व ऊपर बताये हुये प्रमाणोंसे सिद्ध नहीं हो सकता ? । अब इस लम्बे चौडे पूर्वपक्षोंका समाधान भी सुन लीजिये जो लोग उपर्युक्त प्रमाण उद्धृत करते हैं उनको उन प्रमाणोंका अर्थ ही ज्ञात नहीं है। मकोंकी आर्तिका नाश कर उनको आनन्दका दान करना यही भगवान्के अवतारका मुख्य प्रयोजन है। यही प्रयोजन यहां सिद्ध करना है इसीलिये भगवान मूल स्वरूपसे अवतीर्ण हुए। पृथ्वीका भार भी दूर करना था इसलिये भपने अंशभूत नर और नारायणभी यदुकुलोत्पन्न नारायण और कुरुकुलोत्पन्न अर्जुनमें आविर्भूत है। अर्थात् यदुकुलश्रेष्ठ एवं कुरुकुलश्रेष्ठमें उन अंशोंने प्रवेश किया है, अत एव वै दोनों यदूद्वह और कुरूद्धह हुए हैं। जो . मूलस्वरूप है। उसमें अंशत्वकी सम्भावना न होनेके कारण यदूद्वहत्व और कुरूद्वहत्व न था । तात्पर्य यह कि तत्तत्कार्योको सम्पादन करनेके हेतु भगवान्को न्यूहों में तत्तदंशों की अवश्यकता रहती है, अतः, नर और नारायण भी सङ्कर्षणांश होनेके कारण भूभार हरणार्थ अपेक्षितथे । भगवान् भक्तोंकी आर्तिनिवृति करते हुए आनन्द- दानार्थ पूर्णरूपसे तथा भूभारहरणार्थ सङ्कर्षणके अंशरूप नरनारायण को भी अपने में प्रविष्ट- कराकर प्रकट हुए । इससे सिद्ध होता हैं कि उपर्युक्त वाक्यों में उभय अंशो को ही अवतार माना जाय। अन्यथा पूर्णका अवतार न माननेसे "कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं" "वसुदेव के गृहमें परपुरुष भगवान् प्रकट होंगे" इत्यादि वाक्यस्तोम विरुद्ध हो जायगा। अतएव तत्त्वार्थदीपके भगवतार्थ प्रकरणमें आप आज्ञा करते हैं कि "पुष्टिकार्य करनेकेलिये नारायणसे अतिरिक्त स्वरूपसे भगवान् आविर्भूत हुए हैं। नर तो स्वयं आवेशधारक है, भूभार हरण के अतिरिक्त कार्य, पूर्ण कृष्णसे ही किया जाता है, अन्यसे नहीं। "परित्राणाय साधूनां" यह वाक्य मर्यादा भक्तोंका रक्षण करनेकेलिये अंशाक्तारका घोतक है, और भक्तोंकी आति निवृत्तिपूर्वक आनन्ददानकरण यह पुष्टि है। इस उन प्रकारके मार्गोका स्थापन करनेकेलिये अवतीर्ण भगवान् भी यदि अंशरूपसे ही अवतीर्ण हों और पूर्णरूपसे न हों तो पुष्टि कार्य सिद्ध न होता । अतएव अपने दोनों अंशोसे पृथ्वीको सुशोभित की। इस प्रकार विचार करनेसे मानना पडेगा कि भगवान का अवतार श्रीकृष्णरूपसे पूर्णावतार ही है । परन्तु तत्तत्कार्योको सम्पादन करनेकेलिये उनके भीतर उभय अंश प्रविष्ट है। तथा देहके साथ रहनेवाला पांचभौतिकत्व वा नन्यत्व आदि नियम भी प्राकृत देहकेलिये ही समझना चाहिये। अमाकृतके विषय में तो वेदके अनुसार ही अर्थसिद्ध करना पड़ेगा। अर्थात् भगवान् श्री कृष्णका श्रीमङ्ग अमाहत होनेसे . आनन्दमात्र करपादमुखोदरादिः" इत्यादि श्रुसुक्क आनन्द मात्र ही श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारश्रीवासभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीव १७ जानना उचित.होगा। अन्यथा प्राकृत और अप्राकृत पदाथोंका नियम समान होनानेसे अस्म- दादिके ज्ञान इच्छा आदिके समान ही भगवानके ज्ञान इच्छा आदिको मी-अनित्यत्व प्राप्त होगा। "भगवान् का कर्तृत्व तो, ज्ञान इच्छा आदिसे भी उपपन्न, हो सकता है, उसी तरह देहका आनन्दमयत्व तथा नित्यत्व प्रत्यक्षसे भी बाधित है, तो फिर आनन्दमय तथा नित्य देहका स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है ? यदि इस प्रकार शङ्का की जाय तो वह भी अनुपपन्न होगी। क्योंकि "जहां जहां वर्तृव रहता है यहां वहां देवता भी रहती है। जैसे घर के प्रति कुम्हारका कर्तृत्व कहने से वह कुम्भकारभी देहधारी है ऐसा ज्ञान अवश्य ही होता है। इसी तरह "जहां जहां देहक्ता नहीं है वहां वहां कर्तृत्व भी नहीं है" ऐसा भी नियम ही है। जैसे मोसको प्राप्त किये हुए जीवात्मा देहवत्ता न होनेसे उसमें कर्तृ- त्व भी नहीं है । इस अन्वय और व्यतिरेक व्याप्तिके बलसे कर्तृत्वका निर्वाह करनेके लिये ही जैसे नित्यज्ञानका स्वीकार करते हैं वैसे ही आनन्दमय एवं नित्यदेहका भी स्वीकार करना पडेगा। साथ ही प्रभुका जन्म भी शास्त्रोंमें सुनाजाता है। अतः प्रमुके देहका जन्म न माननेका कोई कारण नहीं है, क्योंकि नित्य और सर्वत्र व्याप्त ऐसे अपरिच्छिनवपुका परिच्छिन्नरूपसे प्रगट करना यही जन्म कहा जाता है । " आनन्दसे ही यह सब भूतमात्र उत्पन्न होते हैं। "ब्रह्म नित्यस्वरूप, विज्ञानस्वरूप तथा आनन्दरूप है।" "वह सेंववके तुकडे के समान भीतर बहार समन ही रसघन है, ऐसा निश्चय यह आत्मा भीतर और वहार समग्र ही प्रमानवन है" " ब्रह्म का आकार आनन्द है" "वह आनन्दमय है, क्योंकि श्रुतिमें आनन्दमयस्वरूपकी बार बार उक्ति है" "श्रुति ब्रह्मको आनन्दमात्र कहती है" " आप केवल आनन्दानुभव स्वरूप हैं। भगवान् के श्रीहस्त, चरणारविन्द, श्रीमुख, आदि अवयव आनन्द मात्र है " "गुण और लीलाके अनुसार आपके पुत्र के अनेक नाम तथा रूप हैं" "तीनों वेद, सत्र उप- निपर्दे, साय, योग तथा इन्द्रादि भक्त 'परब्रह्म 'भगवान् ' कहकर जिसके माहात्म्यका गान कर रहे हैं, उसको श्री यशोदानीने अपना आत्मन (पुत्र) माना है" "निसका भीतर या बहार, पूर्व या पर नहीं है, और जो स्वयं जगत्का पूर्व तथा पर एवं भीतर और बाहर है, वह जगद्रूप है" इत्यादि वेद, व्याससूत्र तथा पुराणोंमें अनेक वाक्य उपलब्ध होते हैं । इसी तरह प्रमाण प्रकरणीय बाललीलाओंसे ज्ञात होता है, कि भगवान् श्रीकृष्ण अंशावतार नहीं पर पूर्णावतार ही है । वैसे ही अस्मदादिक की तरह 'आनन्द । यह कुछ केवल आत्मा का गुण होकर ही भगवान में स्थित नहीं है, किन्तु प्रभुका श्रीअ, प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण यह सत्र आनन्दरूप है। साथ ही ज्ञानस्वरूप है । और "ब्रम त्रिकालाबाधित तथा विज्ञान स्वरूप है। ब्रह्माके आयुष्य की समाप्ति होनेपर महाप्रलय उपस्थित होता है जब चौदह- लोकके गहाभूतों में लीन हो जानेपर, महाभूत अपने कारणभूत अहङ्कार में लीन हो आता है, और अहङ्कार अपने कारणभूत महत्तत्त्वमें लीन होता है, महत्त्व अपने कारण भूत प्रकृ- . + ३ १८ कृष्णाश्रयस्तोत्र। " तिमें लीन होता है, अन्तमें प्रभु ही एकाकी शेष संज्ञा से स्थित होते हैं, इत्यादि वाक्यों से आपका " नित्यत्व" " यह प्रमु ही सबको आनन्द प्राप्त कराता है," इसश्रुति से "आनन्द जनकरता है" "इसतरह श्रीकृष्णचन्द्रने गोपालों के साथ आनन्द से आलावित होकर वृंदावनके समीप श्रीगोवर्धन एवं श्री यमुनानी के तट पर पशुओंको चराते हुए रमण किया, " "हे राजन् ! श्री वृंदावन, श्रीगिरिराज और यमुनानी के तटको देखकर श्रीकृष्ण और श्रीदाऊजी को अतीव आनन्द हुआ।।" हे गोपीनन ! पुष्पों की माला से विरचित कर्णभूषण से निसके श्रीमुख की शोभा अपूर्व हो रही है ऐसा श्रीकृष्ण आनन्द में आकर जगत्को आनन्द मन्न बनाते हुए बलदाऊके साथ पर्वतके शिखरोंपर ठाठे रहकर बन्सी बनाते हैं तब नाद श्रवण करने वाले सारे संसारको तदाकार वनादेते हैं।" "हे सखि ! यदुपति श्रीकृष्ण ब्रजकी गायोंके दुरन्त तापको दूर करते सायंकाल होनेके कारण.प्रसन्न वदनसे गजराज की चाल चलते हुए, दिवप्लके अन्तमें जगत्के ताप कोशांत करनेवाले चन्द्रके समान अपने पार पधारते हैं" इत्यादि वाक्योंसे आनन्दवत्व भी उपपन्न होता है, तथापि आनन्दत्वका और देहत्वका विरोध तो वैसाही रहा, अपने अपने अधिकरण-भानन्द या देह-इस दोनों से किसी भी एकमें प्रमाणोंसे. 1. अगर आनन्दत्व या देहत्व की-सिद्धि हो सकती हो तो विरोध कहां रहा ? तथापि आनन्दको धर्मी रूप मानकर उसका धर्मत्व किस प्रकार रह सकेगा ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण कि वह जैसे सैन्धवके तुकडेके समान भीतर और वहार समय रसवन है वैसे ही भरे यह आत्मा समग्र प्रज्ञानघन है। जो सर्वज्ञ है," इन श्रुतियोंमें भगवान्को ज्ञानरूप और ज्ञानके आधाररूप भी कहे हैं। वैसे ही आनन्द को ही धर्म और धर्मीस्वरूप मानने में किसी प्रकारका विरोध नहीं है। यह सब विस्तार पूर्वक हमारे श्रीप्रभुचरणोंने विद्वन्मण्डनमें प्रतिपादन किया है, अतः यहां विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है॥८॥ विवेक और धैर्य को रक्षा करते रहने पर भी भगवान् भक्तके वशीभूत होते हैं, तो फिर दीनता पूर्वक आश्रय की क्या आवश्यकता है ? इस प्रकार शङ्का करके भगवान् सर्व मनोरथ पूरक हैं, अतः सर्वविध फलकेलिये कामना की पूर्तिरूप प्रभुके आश्रय की प्रार्थना है- विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः। पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ अन्वयः-विवेकधैर्यमत्यादिरहितस्य, विशेषतः पापासक्तस्य, दीनस्य मम गतिः कृष्ण एवं अस्तु । पहिले प्रभुके स्वरूपका विचारकर आश्रयका उपदेश किया, अब जीवके स्वरूपका विचार कर आश्रयःका उपदेश करते हैं । " भगवान् अपनी इच्छा से सब कार्य करते है, अतः प्रार्थना न करनी चाहिये" ऐसा निश्चय होना "विवेक" है, सेवामें प्रतिबन्ध करनेवाले , श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावकारश्रीवल्लभाचार्यमहामभुपूज्यपादपणीन दुःखोंकी निवृत्तिका उपाय न करके आधिमौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकारके दुःखोंको सहन करना "धैर्य है" है और फलरूपा एवं साधनरूपा भक्ति आदि शब्दसे पुण्य इन सबसे रहित, किंबहुना इनके साधनोंसे भी रहित-अथवा यदि साधन होंगे तो भी अल्प प्रमाणमें, फल उत्पन्न कर सकें वैसे नहीं, और मैं दीन हूं अर्थात् किसी प्रकारके साधनोंके सिद्ध करने में भी असमर्थ हूं । साथ ही पाप में आसक्तहूं-मलसे । नहीं, पर मानकर पाप करने वाला होने के कारण फल मिलता हो यह भी न मिले-ऐसी परिस्थिति में जीवका रक्षक कौन हो सकता है । श्रीकृष्ण ही है। क्योंकि अन्य मागों में यदि थोडा भी उलटा सीधा कर्म होजानेसे कर्मका फल नष्ट होनाता है और देवता भी नाराज होती है, तब साधकका अनिष्ट होता है, अथवा अल्पफल प्राप्त होता है, परन्तु यहां तो श्रीकृष्ण दयालु हैं, अतः मेरे समान अधमको भी सम्पूर्णफलदान करते हैं, अथवा विवेकादि सिखाकर योग्य' यना कर फलदान करते हैं, अत:मुझे तो श्रीकृष्णका ही आश्रय करना चाहिये । यहां श्रीकृष्ण मेरा आश्रय हो" ऐसा कहनेवाले श्रीमदाचार्यचरण हैं और वे अपने को विवेकादिसे रहित आदि विशेषण लगाते हैं, यह अयुक्त है, अत; उन विशेषणों की क्या, संगति है, यह विचारना चाहिये । सुनिये, इस ग्रन्थको आचार्यचरणोंने जीयोंकेलिये रचा है, अतः नैसे वेदमें यजमान की ओरसे भगवान् आज्ञा करते हैं कि हाथ जोडकर में शरण, आया हूं इत्यादि उसी तरह आचार्य परण भी यहां जीवोंकेलिये जीवोंकी ओरसे इस प्रकार कहते हैं । अतः उपर्युक्त विशेषणों की सति जीवके प्रति ही होनी चाहिये ॥ ९ ॥ सम्प्रभारसे निसाधन जीवको शरण जाने के पश्चात् फलसिद्धि किस प्रकार होगी? क्योंकि भगवान् तो जीवको उसकी कृति के अनुसार फलप्रदान करते हैं । साथ ही यह भी सम्भव है कि जो लोग एकमात्र भगवान ही का आश्रय करते हैं, उनसे प्रमादवश अन्यदेवोंका अपमान भी हो सकता है, और वैसा होनेसे अपमानित देवता फल सिद्धिमें बाधा भी उपस्थित कर सकते हैं । क्योंकि श्रेयके मार्गमें अनेक विनों का होना प्राकृतिक नियम ही है। इस प्रकार शङ्का कर मोक्षके मार्गमें भगवान्के निजस्वरूपका लाभ होनेकेकारण निजस्वरूपका मोक्षरूपल आज्ञा करते हुए तथा जीवोकी ओर से आश्रयकी प्रार्थना करते हुए उपयुक्त शङ्काका समाधान करत है। सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलाकृत् । शरणस्थसमुदारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ अन्वयः-सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्र एवं अखिलार्थकृत, अहं शरणस्यसमुद्धारं कृष्ण विज्ञापयामि।
कृष्णाश्रयस्तोत्र। , , . " सर्वसामर्थ्यशब्दका अर्थ सम्पूर्ण सामर्थ्य, सबका सामर्थ्य, सके उपर जिसका सामर्थ्य है, इत्यादि है । अर्थात् भगवान् अपनी इच्छाके अनुसार सब कुछ करते हैं। यदि मर्यादा की रक्षाकरनी हो तो आप स्वयं भगवान् होनेके कारण आपमें ज्ञान, ऐश्वर्य आदि धर्म तो सिद्ध ही हैं, अत: उसका दान कर जीवको फलप्रदान करते हैं। कमी कमी अक्षर ब्रह्ममें स्थित जीवको भी अपनेमें ले लेते हैं । क्योंकि सर्वत्र उनका ही सामर्थ्य है । "हे अर्जुन जो वस्तुएं विभूतिवाली होती है, शोभायुक्त होती है, बलिष्ठ होती है, वह सब मेरे तेनके अंशसे उत्पन्न हुई है ऐसा जान ।" "मैं समग्र जगत्का उपादान कारण हूं । मैं ही सत्रका प्रवर्तक हूं।" इत्यादि वाक्यानुसार जिप्तमें समग्र सामर्थ्य विद्यमान है , ऐसे सुदर्शनादि आयुध भी आपके पाप्त विद्यमान हैं । उनसे भी आप भक्तके अनिष्ट का निवारण करत है। "निसने विष्णुकी उपासना की है ऐसे भक्तों की, कदापि निष्फल न होनेवाले सुदर्शनादि आयुधोंसे सकल आपत्तियोंमें से, रक्षा करते हैं।" इस वाक्यसे भी ज्ञात होता है कि भक्तोंकी रक्षा भगवान् अपने आयुधोंसे करते हैं। सामर्थ्य होने पर भी कदाचित् आश्रित की रक्षा न करें, अथवा मर्यादामार्गसे ही फलदान करें, ऐसी स्थितिमें आश्रयकी क्या आवश्यकता है? सब देशोंमें, वोमें, आश्रमों में किंवा कर्मादिमार्गमें निखिल अर्थकी पूर्ति करना ऐसा आपका स्वभाव है। "एक वार भी शरण आकर मैं आपका हूं' ऐसा कहनेवालेको अमयका दान करना यह मेरा व्रत है । फिर शरणमें आनेवाला चाहे जो हो ।" "जो भक्त स्त्री, घर, पुत्र, मित्र, प्राण, धन, इसलोक और परलोक की पर्वाह न करके मेरे शरणमें आये हैं, उनका त्याग किस प्रकार कर सकता हूं?" इत्यादि वाक्योंसे एक बार भी यदि शरणमें आनेवाले की आप रक्षा करते हैं, तो फिर शरणमें आकर भक्ति करनेवाले भक्तकी आप रक्षा करें इसमें कहना ही क्याहै ? मर्यादामार्गसे फलदान करनेमें भी अन्यकी अपेक्षाके विना ही-अनन्य होकर रं-भजन करनेवालेको भगवान् मर्यादाकी अपेक्षाके विना ही फलदान करते हैं । जब कि 'वेदमें कहा है इसलिये भजन करना चाहिये' इसप्रकार वेद मर्यादाकी रक्षा करनेकेलिये भनन करनेवालेको प्रभु मर्यादाके अनुसार फलदान करते हैं । जो मुझे निसप्रकार भजते हैं उनको मै भी उसी प्रकार भजता हूं। भगवद्गीताके इस वाक्यमें आपने अपनी मर्यादाका उपदेश किया है । अतएव किसी प्रकारकी क्षति नहीं है । “लोकमें मैं भक्तोंके अधीन हूं ऐसा बतानेकेलिए बाललीलाओंके द्वारा बनके आनन्दको बढाया " " उसके पश्चात् श्रीकृष्णने बलभद्रके सहित समान वयस्के व्रजवासियोंके साथ व्रजवनिताओंको आनन्द देनेवाली क्रीडाएं की" "श्रीकृष्णके दर्शनसे उत्पन्न हुए परमानन्दसे जिसके हृदयका ताप मिट गया है ऐसे गोपीजन मनोरथोंके अन्तको प्राप्त कर सके। अर्थात् उनको किसी प्रकारकी कामना न रही।" सबको मोक्षका दान देनेवाले मुकुन्द भगवान् मुक्तिप्रदान करते है, पर भक्ति नहीं ।" इत्यादि - श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारश्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत वाक्योंसे मृत्यु और यम मी भावान्का आश्रय रखनेवालेके पास नहीं जा सकते तो अन्यकी क्या बात ? अर्थात् अनन्य आश्रय रखनेवालेके अपर सत्र प्रकारके सामर्थ्यसे युक्त भगवान् विराजमान होनेसे उसका कोई कुछ विगाड नहीं सकता है । तथापि इतना तो विवेक अवश्य अनुसन्धेय है कि सर्वस्वनिवेदनपूर्वक शरण गमन करनेवालेका उद्धार आप अनायास ही करते हैं।॥ १० ॥ जीवमात्रके दशप्राण और ग्यारहवां आत्मा रहता है," इस श्रुतिवाक्यसे निस तरह दश प्राणोंसे सब सिद्ध होता हैं, उसी तरह यह कृष्णाश्रय स्तोत्र ही भगवदीयोंका सर कार्य सिद्ध कर देता है। यह ज्ञान करानेके लिये श्रीमहाप्रमुजीने दशश्लोकोंसे कृष्णाश्रय स्तोत्रकी रच- नाकी। जैसे नात्मा क्षयरहित है वैसे ही इस स्तोत्रके पाठ करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है, यह पतानेकेलिए आत्मारूप ग्यारहवे श्लोकमें कृष्णाश्रयस्तोत्रके पाठका फल निरूपण करते हैं:- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसलिधौ। तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोनचीत् ॥ ११ ॥ अन्वयः-यः इदं कृष्णाश्रय स्तोत्रं कृष्णसन्निधौ पठेत् , तस्य आश्रयः कृष्णः भवेत् इति श्रीवल्लभः अब्रवीत्। सब पदार्थामसे निष्ठाका त्याग करके जिससे कृष्णकी सेवा हो सके अथवा जिससे कृष्णका आश्रय सिद्ध हो, या जिससे कृष्ण आश्रय बने वह कृष्णाश्रय है। यही कृष्णाश्रय है । कारण कि कृष्णाश्रय शब्दका यथार्थ अर्थ इसीमें समाविष्ट है । अतः इस कृष्णाश्रयका पाठ श्रीकृष्णके समीप हीनेसे ही कृष्णका आश्रय सिद्ध होता है अन्यथा नहीं । पाठमानसे कृष्णका आश्रय कैसे सिद्ध होगा ऐसी शङ्का भी न कननी चाहिये । कारण कि यह बात कहने वाला श्रीवल्लम है। यहां आचार्यनी अपना नाम निर्देश करके बताते हैं, कि मैं भग- वत्स्वरूपका ज्ञाता हूं, अतः मेरा वाक्य सत्य है इसमें अप्रामाण्यशङ्का न करनी चाहिये। आचार्यजीको सर्वोद्धारकेलिये भूतलपर अवतार लेना पड़ा है, जिसको सर्वोद्धारकेलिये अवतार लेनेकी भगवान्की आज्ञा है, वही भगवान्के यथार्थ स्वरूपको पहचान सकता है। अतः उनके वचनोंपर विश्वास रखना चाहिये । इसीसे भगवत्कृपा होकर सब सिद्ध होगा ॥११॥ श्रीमद्विलनाथपादकमले संवन्ध भक्त्या मुदा कृष्णैकामधियोष तातचरणान् ताहक् पितृव्यानपि । श्रीकृष्णाश्रयसनके स्तुतिको कल्याण रायाभिषः श्रीगोविन्दसुतः प्रकाशमकरोद्यान्मुदे सद्धियाम् । इति श्रीविठ्ठलताथ चरणकतान श्रीकल्याणराय विरचित कृष्णाश्रयस्तोत्रप्रकाशः सम्पूर्णः ।
થોડા વખતમાં છપાઈ બહાર પડનારાં પુસ્તક. નિત્યલીલાસ્થથી સુદામાપુરીવાદીભપાનનગાસ્વામીશ્રી જીવરાચાર્ય સહીત- વૈષ્ણવદ્વિજનિક. (મોટું, ગુજરાતી.) અર્થાત્ ઉપનયન સંસ્કાર પામેલા બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય અને વેશ્યોનું નિત્ય કર્તવ્ય કર્મ.' દરેકને સહેલું પડે તે ખાતર આ આદિકમાં સમ્માદિ નિત્ય કર્મ કરવાની સંપૂર્ણ સમજણ ગુજરાતી ભાષામાં આપવાની સાથે મિત્રે પણ ગુજરાતી કરકમાં છાપવામાં આવ્યા છે, વૈષ્ણવજેિને-બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય, વૈષ્ણવી પદ્ધત્વનુસાર સમ્પાદિનિત્યકર્માનુષ્ઠાન સમજવ- નારું માત્ર આ એક જ આદિક છે. ગુજરાતી ન્યુસ પ્રેસની સફાઈદાર છપાઈ તે મુક મશહુર છે એટલે તે બાબત કશું વકતવ્ય હોય જ નહિ, પખવાડીયામાં છપાઈને બહાર પડે, of-વિહિલા, (ન્ડિી.) हिन्दी भाषाभाषी सजनोंकी सास मुविधा के लिए ऊपर बतलाये गये आहिकका ही यह ठीक-ज्योंका त्यों हिन्दीमें अनुवाद है. एक समाहमें छपकर तैयार हो जायगा. वैष्णव संक्षिप्ताहिक. આ આદિમ દત્તબાવન વિધિ, તિલકવિધિ, મુદાવિધિ, ભગવસેવા, જપવિધિ, નિત્ય પાઠ કરવાને ક્રમ, અન્યાશ્રય વગેરે અનેક ખાસ બાબત ઉપર સંક્ષેપમાં સારે પ્રકાશ પાડ- વામાં આવ્યું છે. વૈષ્ણએ ટુંકામાં ટુંક કેટલું નિત્યકર્મ કરવું આવસ્મક છે તે સમજવા આ આદિક અવશ્ય ખરીદવું જોઇએ. उपदेशमीमांसा. તમારે તમારા શુદ્ધ સનાતન પુષ્ટિમાર્ગ ઉપર “મુખમસ્તીતિ વકવ્યમના ન્યાયે શા- કરનારા આજકાલના વિતરડાવાદીઓને શાસેના પ્રમાણે સાથે મુખડ જવાબ આપે છે ? તે મીમાંસાના સત્વર ગ્રાહક, બને. તેમાં શું છે? “ગાયત્રી મનને ઉપદેશ લીધા પછી બીજે ઉપદેશ લેવાય કે નહિ? “અન્ય દેવના મને છેડીને શ્રીકૃષ્ણના માને ઉપદેશ લેવામાં વિશેષતા શી? “મોપદેશ કોઈ પણ ઉત્તમ બ્રાહ્મણ પાસેથી ન લેતાં શુદ્ધાત વૈષ્ણવ વેલ્લનાડીયા બ્રાહ્મણ શ્રીવલભકુલના આચાર્યો પાસેથી જ લેવાનું કારણ શું? “બ્રહ્મસમ્બન્ધ જ લેવાનું તાત્પર્ય શું? દેશની નિવૃત્તિ તે પ્રાયશ્ચિતાદિકથી પણ શકાય છે તે પછી બ્રહ્મસમ્બધ જ લેવામાં વિશેષતા શી? બ્રહ્મસમ્બન્ધમાપદેશ લીધા પછી થતા ની નિવૃત્તિ શી રીતે કરવી ? સ્ત્રીને તો પતિ જ ગુરૂ છે તો પછી માપદેશ લઈ બીજે ગુરૂ કરવાની આવશ્યકતા શી ? પતિ તથા સ્ત્રી એક ગુરૂ પાસેથી માપદેશ લઈ શકે કે કેમ? નાના બાળકને માપદેશ આપવાથી શું ફળ?” “રાશી તથા બરસે બાવન વૈષ્ણવની વાતમાં તમામને શ્રી ઠાકોરજી- "સાનુભાવ હતા તે આજના સમયમાં કેમ નથી ? આવા અનેક જટિલ પ્રશ્નોના જવાબ સચોટ રીતે તથા યુક્તિપૂર્વક આ ગ્રન્થમાં આપવામાં આવ્યા છે. દરેક વૈષ્ણવે આ પુસ્તક અવશ્ય વાંચવું જોઈએ. પંદર દિવસમાં બહાર પડશે. મળવાનું ઠેકાણું— બુકસેલર, ગિરિધરલાલ, જય શાહ, Go શ્રી જીવનશાચાર્યપુષ્ટિસિદ્ધાન્ત પુસ્તક ભંડાર, લાલબાવા મન્દિર, મુંબઈ નં. ૨. નેટ-ઉપલા એડ્રેસને તમારી બુકમાં નોંધી છે, કારણ કે વૈષ્ણવ સંપ્રદાયનાં તમામ જાતનાં પુસ્તક તથા ચિત્રોને અચૂક રીતે તથા ટાઇમસર સપ્લાઇ કરનાર આ એક જ ઠેકાણું છે.
श्रीगष्णाय नमः। किश्चित्मास्ताविकम् । कृष्णाष्टम्यां कृष्णाश्रयस्तोत्रं पहिवरणसमेतं प्रकाशयितुं तत्मणेत निःसीमानु- ग्रहेण पारयामीति महत्सौभाग्य में । अतीयाय फिल सार्धोन्दो मुद्रणयन्त्रमारोपि- तस्यास्प, किन्तु गोस्वामिनीरणछोटलालजीमहाराजः साकं श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र काशी- क्षेत्र-वरणाघडेलमभृतिष्र्धनेकस्थलेषु यात्रानिमित्तं गतं मयेति,तेषां कुमारश्रीवल्लभलाल- जीमहोदयानां वाराणसीयप्रथमापरीक्षादित्सापि तदन्तर एव जातेति तत्राप्युद्युक्तं, भूयोपि वाराणसी मत्ति मस्थितं तैः सह परीक्षादापनार्थम् , अन्यथाप्येवंविधैहेतुभिरेकर स्थिति- मलभमानेन प्रकटयितुमेतत्स्तोत्रपतिक्रान्तावेला मया । ततश्च बहुभिरिवार पर्यन्वयोजिपि हितैपिमिः किमेवत कृत एतत् कथमेतदित्यादि । किं पुनः प्रतिपद्यतां प्रतिवचन, यत्रैकस्या व्यक्तेरवीनं कार्यवाहुल्यमय च स्थितेरनैयत्यं तत्र भवत्येवैविधो विलम्बः। अस्तु । अन्धोय श्रीपदाचार्यचरणमणीतपोडशमकरणयन्थेषु नवर्मी सावधामावहन्ति । विषयश्चास्य नाम्नैव स्सप्टो यत् कृष्णाश्रयणमन्तरा स्वभावदुष्टनीवानां निस्तारो नास्त्येष कलौ। मामेव ये प्रपद्यन्ते। 'सर्वधर्मान्परित्यज्या 'अपि चेत्सुदुराचार' 'मुमुक्षु शर- णमई प्रपये' इत्यादिवाक्यपरसहरिदपेन दृढीक्रियते । 'फलिदावानलेनाथ साधनं भस्मतां गत मित्यायुक्तिभिः प्रमाणवलं प्रमेयवलमन्तराऽकिश्चित्करमत्यपि निर्विवादम् , अत एव 'कृष्णश्चेत्सेव्यते भक्त्या कलिस्तस्य फलाय ही ति दैवोद्धारार्थग्रहीतावतारे- निबन्ध आक्षतम् । यद्यपि भक्त्यादिमाग जनोदाराय निवन्यादौ सपरिकरं निल पितास्तथापि प्रत्यहं कलेराधिक्येन तेषां दुःसाध्यत्माकलव्य आश्रयस्यैव च सर्वदि- तावहतं पालोच्य स्तोत्रमिदं व्यरीरचन्नाचार्याः । आश्रयभवने तु महदनुग्रहस्यैव हेतुता नान्यस्य । अनयैव दशा प्रणीलोयं अन्य इति प्रवन्धस्यास्यावलोकनेनावनातं भविष्यति श्रीमदाचार्यपादाम्भोव्हमकरन्दलिदो देवसर्गस्येत्यलं पल्लतितन । ग्रन्यस्यास्प परिष्करणे पुस्तफपदानेन मर्शसनीयमुषकारमाचरितवां मे दीक्षा- गुरूणां गोस्वामिश्रीमदनिरुद्धलालजीमहाराजानां काम्यवनस्थगोस्वामिश्रीवल्लभलाल- जीमहाराजानां सुराहीतं नामवेयं मत्यहं स्मरामि । तृतीयपीठाधीश्वरश्रीब्रजभूपणजी- नामध्यापकाः पं. कण्टमणिशर्माणः, पुरुपोचमलालजिमन्दिरस्थदामोदरशास्त्रिणा, सद्गतभगवदीयाः मूलचन्द्र तुलसीदास तेलीपाला' एतेषामपि सर्वेषां पुस्तकमदानको मदुपरि महत्युपतिः । गोसामिश्रीरणछोडलालजीमहाराजा अपि सांप्रदायिक- । ॥ श्रीकृष्णाय नमः॥ मेरे चार शब्द isan पुष्टिमार्गीय हिन्दी भाषामापी वैष्णवों की समस्या गुर्जरमापाभापियों की अपेक्षा कम नहीं है, तथापि हिन्दी भाषाऐं साम्प्रदायिक ग्रन्थोंको अभाव पूर्ववत् विद्यमान ही है । इस महती त्रुटिको दूर करनेके अभिप्राय से "वैष्णव वैभव" मासिक पत्रका आविर्भाव हुआया । दुर्भाग्यसे वह आग तिरोहित दशाका अनुभव कर रहा है. इसके अनन्तर साम्प्रदायिक मौलिक ग्रन्थोंका अनुवाद करना प्रारम्भ किया, आज इन पड्डियोंका लेखक हिन्दी भाषामें साम्प्रदायिक ग्रन्थोंका अनुवाद कर रहा है, इस समय १०० फार्मसे अधिक होसके इतना साहित्य मौजूद है । पोडशग्रन्थों में " विवेक धैर्याश्रय" का अनुयाद गो० श्रीवनरत्न लालनी महाराज की सहायता से छा चुका है। “बालबोध' का अनुवाद भी आपही छपायेंगे ऐसी आशा है । यह "कृष्णाश्रय स्तोत्र" का अनुवाद गो० श्रीरणछोडलालनी महारानकी कृपासे छपा है। ब्रह्मवाद सङ्ग्रह चौखम्बासिरिज के अध्यक्ष सेठ जयकृष्णदासजीने छपवाया है। यदि हिन्दी भाषामापी वैष्णव जनता इन ग्रन्थोंका उचित आदर करेगी तो शुद्धाद्वैत मार्तण्ड, प्रमेयरत्नार्णव, प्रस्थानरत्नाकर, निबन्ध और काशीस्य गो० श्रीगिरिधरनी महाराजकृत विवरणके अनुसार अणुभाष्यका अनुवाद आदि ग्रन्थ.शीघही छपसकेंगे। यह कृष्णाश्रय ग्रन्थ श्रीमहाप्रभुजीके समयकी देशकालकी परिस्थितिका भलीप्रकार परिचय कराता है, जिस समय देश म्लेच्छाकान्त हो चुकाथा, उस समय पुष्टिमार्गका प्रचार हुमा है । ऐसे भयङ्कर समयमें धर्मका प्रचार करना कितना कठिनथा यह विचारशील पाठकों से छिपी हुई बात नहीं है । आज पुष्टिमार्गपर जो लोग आक्षेप करते हैं, उनको इस परम पुनीत सम्प्रादय का साहित्य देखना चाहिये । भाविक वैष्णोंसे प्रार्थना है कि आप यदि अपने बालकों को अन्य धर्मोसे पराभूत देखना नहीं चाहते हैं, तो आप साम्प्रदायिक ग्रन्थोंका सरल हिन्दी भाषा अनुवाद कराके छपवाईये, और हिन्दी में छपने वाले अन्यों को सहायता प्रदान कीजिये। भवदीय ३रा भोईवाडा, भुलेश्वर, वम्बई, रथयात्रा १९८५ हरिशङ्कर शास्त्री वेदान्त विशारद -- } -- । शीघ्र ही छपकर प्रकाशित होनेवाली पुस्तकें . नित्यलीलास्थ गोस्वामीजीवनेशाचार्यजी महाराज (पोरवन्दर) सराहीत .' वैष्णाय दिजाहिक अर्थात् उपनीत ब्राहाणा, क्षत्रिय और वैश्योंका नित्यकर्म इस आहिकमें सन्ध्यादि नित्यकर्म करनेका पूरा परिचय कराया गया है। साथ ही वर्णविभागके अनुसार पद्धति भी समनानेवाला यह एक मात्र ग्रन्थ वैष्णवोंके लिये उपयोगी है । उपदेश मीमांसा यदि आप शुद्धपुष्टि मार्गीय शरण मन्त्र और ब्रह्मसम्बन्धका रहस्य जानना चाहते है, विधर्मी वितण्डवादियोंका मुखमर्दन करना चाहते हैं । गायत्री मन्त्रका उपदेश होनेके पश्चात् अन्य मन्त्रों का उपदेश हो सकता है या नहीं ? अन्य देवोंकी उपासना छोड- कर श्रीकृष्ण ही की उपासना क्यों करनी चाहिये इत्यादि प्रश्नोंका सरल हिन्दी भाषामें उत्तर जानना चाहते हैं तो इस अन्यको अवश्य पढिये। श्रीमद्गोपाल पूर्वतापिन्युपनिषद सम्प्रति विराजमान गोस्वामिवालकोमें सर्वप्रथमग्रन्थकार विद्वान गोस्वामी श्रीमदनिरुद्धा- चार्यनी महारानने इस ग्रन्यपर ब्रह्मामृत भाष्य और पोयूपलहरी टीकाकी रचना की है। इसका हिन्दीअनुवाद भी किया गया है। इस ग्रन्थमें श्रीकृष्ण ही परात्पर पुरुषोत्तम हैं, शिवब्रह्मादि देवता भी उनकी उपासना करते हैं, कर्म ज्ञानकी अपेक्षा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है इत्यादि विषयों पर पूर्ण प्रकाश अलपपा है। ग्रन्थ कोटिका है। सप प्रकारकी पुस्तकें मिलनेका एकमात्र ठिकाना. बुकसेलर गिरधरलाल, ज. शाह.. श्रीजीवनेशाचार्य पुष्टिसिद्धान्त पुस्तक भण्डार, श्रीलालबावाका मन्दिर, मुलेश्वर, वम्बई पो. नं. २.
भास्ताविकम्
साहित्योद्धृतिविषये स्वपितृपादाननुकुर्वन्तीति प्रत्यक्षमेव सर्वेपाम् । एतेपां समाश्रयेणा-
नेके साम्मदायिफाः प्रवन्धा वहिरवतेरुः । पोडशग्रन्थानां सेवाफलादि ग्रन्याष्टकं नवम
कृष्णाश्रयस्तोत्रं चैतेषामेव प्रवन्धवलेन - लब्यावतारं श्रीमदाचार्यवाक्सुधापिपासूनां
भनोरथारकं भवतीति महान् प्रमोदावसरः । अपि चैताहक्सत्मवृत्तौ योग्यविधित्सया
परमकरुणया दशवर्षाणि मे सर्वविधसाहाय्यं दत्तवद्भयो गोस्वामिश्रीगोकुलनाथजि.
देशिकवरेभ्यः साञ्जलि कार्तइयमावेदयामि ।
अस्मिन् सशोधने दृष्टिदोपतो मुद्राक्षरयोजकममादतो वा ‘जातानि स्खलितानि
संशोध्य तास्ता अशुद्धीर्वोधयित्वानुगृह्णन्तु. दयालवो विद्वांसो मामिति प्रार्थयति-
विद्वजनकृपाभिलापि-
कृष्णाष्टमी
हरिकृष्णः शास्त्री,
संवत् १९८३
'शुद्धाद्वैतविशारदः।
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श्रीराणाय नमः। श्रीगोपीजनबल्लभाय नमः। ধীমান্যতমঠবী নমঃ । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्रधुनाथचरणविरचितविवरणविभूपितम् । य आनिरासीद्धोरेस्मिन् कलो श्रीवल्लमाभिधः । निजदास्यं स नो देयादव्यादपि दुराश्रयात् ।। १ ॥ सर्वमार्गेपु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डपबुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ सर्वमार्गेष्यिति । सर्वे कर्मज्ञानोपासनादपस्ते मृग्यन्ते तत्तत्फलाधिभिरिति मार्गा इष्टमात्युपायास्तेषु सर्वेषु नष्टेषु तिरोहितेषु सत्सु । अनेन जीयानां सर्वथैवा- गतिकत्वं सचितम् । एवंविधेऽप्यशक्येर्थे मम सर्वस्वनिवेदिनो दासस्य कृष्ण एवं गतिः शरणं, मातव्योर्थ आश्रयणं च । अत्रास्त्वितिपदं व्याख्यानेऽध्याहार्यम् । एक्कारेणान्यनिषेधः सूचितः । किच, कालातोपद्रवेणाप्यगतिकत्वं कलौ चेत्यने- नाहुः कलाविति । वहिर्मरूपाभासोन्तोपयस्तो धर्मः खलो भवति, तादृशो धों यस्मिन्कलौ । खलानां दांभिकहैतुकपापण्डिनामेव धर्मों यस्मिन्निति था, कवि स्वर- धर्मिणी'त्यपि पाठः श्रूयते, तत्रापि खरो रौद्रो धर्मो यस्येति, अत्रैवं व्युत्पत्तिः- खरवासी धर्मश्चेतिकर्मधारये कृते पश्चान्मत्वीय 'इनिप्रत्ययः, नो चैहुनीही 'क' प्रत्ययः प्रसज्येत । चकारात्कर्मज्ञानाद्यतिरोधानेषु कल्यतिरिक्तकालेष्वपि । किन्च, पापण्डो वेदवाद्यो धर्मः, स प्रचुरः अधिको यस्मिन् , एवंविधे लोके व्यवहार्यजनतायां सत्या, सर्वपकारेण कृष्णाश्रयणं विना निस्तारो नास्त्येवेति सर्वस्यापि फलिताथों ज्ञेयः । अत एव वृहन्नारदीयेप्युक्तं, 'हरेनवि नामैव नामव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथेति । अत्र सर्वत्रापि कचिनिमित्तमममी, कचि दहाणां कर्तृत्व' इत्यनेन ससमी ज्ञेया ॥ १॥ .. धर्मात्पचौ बाह्याभ्यन्तरभेदेन घाघशुद्भावयन्तो निष्पत्यूदं श्रीकृष्णाश्रयणं विदधति । १ आभयो बेति पाठः। , १ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । म्लेच्छाकान्तेपु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेपु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ २ ॥ म्लेच्छाक्रान्तेष्विति । धर्माधिभिर्वासयोग्येषु देशेषु कुरुक्षेत्रगङ्गातटादिषु म्लेच्छराफ्रान्तेषु व्याप्तेषु सत्सु, अत्रोभयथा म्लेच्छा ज्ञेया जात्या कर्मणा च । नन्वेवं- विधेप्यपि देशेषु पुण्यात्मानो भविष्यन्त्येव तैः सह धर्माद्याचरणं कुतो नेत्यत आहुः- पापैकेति । कलिना ग्रस्तत्वात्पापस्यैवैकस्य निलयाः स्थानभूता जाताः । चकारादनेवं- विधेप्वपि । एतेन धर्मादिपु वाह्यसाधननिवृत्तिरुक्ता । ताभ्यन्तरसाधनं स्मरणादि कुतो- नेत्यत आहुः--सत्पीडेति । सतां सत्पुरुपाणां धार्मिकाणां भगवत्परायणानामपि याह- शी पीडा नोचिता तादृश्या अपि दर्शनादन्येपां विश्वासशैथिल्येन व्यंग्रेपु विक्षिप्तचित्तेषु कर्तव्यतामृद्वेषु लोकेषु सत्सु | कृष्ण एवं गतिर्ममेति पूर्ववयाख्येयम् ॥ २॥ ननु गङ्गादिपूर्वोक्तपुण्यदेशानां वस्तुसामर्थेन साधनत्वं कुतो नेत्याशङ्कय वस्तु- सामर्थ्यतिरोधानान तथात्वमिति समाहितिपूर्वकं कृष्णाश्रयमाहुः- गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरवाश्तेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ३ ॥ गलादीति । आधिभौतिकाध्यात्मिकाधिदैविकादिभेदेन त्रैविध्यं तीर्थादावप्यस्ति, वत्र 'पुरुषवाधिदैवत'मितिवचनाद्भगवद्रूपमेव तीर्यादौ सामर्थ्यरूपेणास्तीति मन्तव्यं, तच्च भगवदिच्छयेदानी बहुधा. तिरोहित, न तु सर्वथा, अत एवं विधेषु गङ्गादितीर्थवर्य' तीर्थमुख्येषु म्लेच्छादिभिः केवलदुष्टैराटतेपु सत्सु, इह अस्मिन् भूलोके काले या कृष्ण एव गतिर्ममेति पूर्ववत् ॥ ३॥ अहङ्कारविमूढेपु सत्सु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ४ ॥ अहङ्कारेति । किञ्च, वयं सर्वज्ञाः के वास्मत्तोधिकवेत्तारो यान् वयं पृच्छाम इत्येवंविधाहकारण विशेपतो नूढेपु आत्मोद्धारोपायज्ञानशून्येषु, 'लोकेवितिपदं पूर्व- स्मादध्याहार्यम् । किश्श, सत्सु महापुरपेषु पापं दुष्टाचरणमपकार इति यावत् , तमनुवर्त- यन्यनुतिष्ठन्ति ये ते पापानुवर्तिनः, एवं विधेषु सत्सु, अथवा जीविकाद्यर्थ सत्सु सत्पुरुषेषु पापानुवति निपिद्धाचरणपरेपु । किविशिष्टेषु तेपु लाभपूजेति । लाभो द्रव्यादेः पूजा १ गमाप्रयागेविति पाठः । २ साधात्यमिति पाटः । ३ उच्यते इति पाटः।
श्रीमद्धनाथवरणविरचितविवरणविभूषितम् । ३ स्वोन्नतिपूर्वक लोककृतसन्माननं, अर्थः समयोजनं, एनधितयसिद्धयर्थमेव यान उद्यमी येषां तेषु सत्स, कृष्ण एव गतिमम ॥४॥ अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेवव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ५॥ अपरिज्ञानेति । द्धननगु गुपसत्यभाषेन वियोपशमारपाठार्यविनियोगादी- नामपरिज्ञानेन मन्त्रेषु नष्टेषु तिराहितपु सत्सु, पुनः किविशिष्टेषु अनतयोगिपु अग्रतेषु अवभ्रषु योगः स्थितिास्ति एपामेतेनैवंविधेष्वतिरोहिवानापप्पकिश्चित्करत- मेव । यहा, स्वस्वाश्रमस्या योगिन उच्यन्ते तेवयवतेषु सत्सु । पुनः किपिशिष्टेषु तिरोहितार्थदेवेषु । तिरोहितः गुप्तः अर्थो मन्त्रायः, देवोऽधिष्ठात्री देवता, एतदुप येषां मन्त्राणां न ज्ञायते तः कियानर्थः सेत्स्यतीति भावः ॥५॥ नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मवतादिषु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिमम ॥ ६ ॥ मानावादेति । कुताकिबौद्धाद्यागमोक्ता ये वादा वाग्जालख्याः 'यावजीवे. सुखं जीपंदित्येवंरूपाः, ते कृत्य वैदिकागमायुक्तसर्वकर्मवादिषु विनष्टेषु विशेषतो नारेषु नास्तिक्येन पराङ्मुखेषु सत्सु । किञ्च, पापण्डेषु वेदादिविरुद्धार्थप्देव एकः असाधारणः प्रयत्नः पुनः पुनरुद्यमो येषां, एवंविधेषु लोकेषु कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६॥ विश्वासार्थ सदृष्टान्तमाश्रयणमाहुः- अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ।।७।। अजामिलादिदोषरणामिति । शुद्रीभाबन्धोरजाभिलनाम्नो दोपाणां महा- पातकानां नाममात्रेण नाशकोस्माकपनुपर्व स्थितः, शान्दानुभये अन्त:साक्षिमत्यो वा स्थितो विपपीकृत इति यावत् । 'आदि पदाइजेन्द्रप्रभृतयः, यमलोकस्थिता नारकि- गश्च । इदं नृसिंहपुराणादौ मसिद्धम् । ज्ञापितं देवजीयेप्यखिलं समग्रे निजमाहात्म्य येन, एवंविधा कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ७ ॥ १ आचार्योपसत्यमानेति पादः ।
. . , श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एव गतिर्मम ॥८॥ प्राकृता इति। सकला ब्रह्मादयो ये देवास्ते प्राकृताः, प्रकृत्तिर्माया तन्निबन्ध- नोत्पत्तिस्थितिविलया, अतस्तेपामाश्रयणं न कालादिभयनिवर्तकं प्रत्युत भयजनकमेव । अत एवोक्तं दशमे 'मयों मृत्युव्यालभीतः पलायनित्यादौ । तर्हि बृहदक्षरं तयास्त्विति चेत्तदपि नेत्याह-गणितानन्दकमिति । ब्रह्मापेक्षया शतगुणितानन्दत्वेनापरिमिता नन्दवाभावात्पुरुषोत्तमापेक्षयाल्पत्वाद्धरेः सकलदुःखहारकस्य श्रीकृष्णस्य पूर्णानन्दत्या- दखण्डितानन्दत्वात्सर्वैरूपायैः सर्वात्मना, कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥८॥ विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥९॥ विवेकेति । 'विवेकस्तु हरिः सबै निजेच्छातः करिष्यतीत्येवरूपः, त्रिविध- दुःखसहनं धैर्यपदार्थः। भक्तिपदेन क्रमायातमाश्रयणमुच्यते । आदिपदेन तत्साधनान्यु- च्यन्ते । एतेषां विविच्य निरूपणं तु 'विवेकधैर्याश्रय'व्याख्याने कृतमस्ति तत,एवाब- गन्तव्यम् । विवेकादिभगवद्धर्मरहितस्य मम कृष्ण एव गतिः । किञ्च, न केवलमेत- द्राहित्यमपि तु विशेपतोऽतिशयेन पापासक्तस्य महापातकाचरणरतस्यापि । पापवर्ज- नेऽसमर्थत्वाद्ग्लान्या दीनस्य । भगवताप्ये तादृशानां स्वाश्रयेणैव सिद्धिरुक्ता 'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनय इति, 'अपि चेत्सुदुराचार' इत्यादौ ॥९॥ सर्वस्वनियेदिनां साधनं फलं च स्वमभुरेव संपादयिष्यतीतिमार्थनामपि तथैवाहुः- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्ण विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वसामध्यति । फर्तुमकनुमन्ययाक समर्थत्वात्सर्वसामर्थ्यसहितस्त्वं मम प्रभुः। किविशिष्टः सर्वत्रैव यत्र काप्यखिलान्सर्वान्वाञ्छितानान्करोतीत्यखिलार्थकृत् यतस्त्वमेवंविधः स्वामी अतः कारणात् कृष्ण हे परब्रह्म शरणस्थस्य शरणागतस्य सम्पभुधारं विज्ञापयामि अहं तत्पुरः स्थितः शरणार्थी ॥ १०॥ एतत्पाठमावपरस्पाप्येतदुक्तफलमाहु:- -- १ अन्ययाकरणेवि स. ग.
श्रीमद्रधुनाथचरणविरचितविवरणविभूषितम् । कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसनिधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ।। ११ ॥ कृष्णाश्रयमिति । कृष्ण थानीयते येन स्तोत्रेण तत्कृष्णाभयं, कृष्ण आश्रयः प्रतिपाद्योों यस्येति वा । इदं यः कृष्णसनिधौ समीपे 'सनिधि पदात्तदनन्यभक्त- समीपेपि पठनीय सन्निस्तुल्यत्वात् पठेदधीयीत तस्याश्रपानभिज्ञस्यापि स्वयमेव कृष्णा आयो भवेत् । कथमिदमत्तिदुर्लभमेनापन्माण भवेदिति नाशङ्कनीय, यतः कारणाव इतिश्रीवल्लभोत्रवीत् । इति इममर्थ श्रीवल्लभ आचार्योनवीदत्तबानतः किमाथर्यम् । अनाचार्यवचनानां वस्तुशक्तिरेव प्रयोजिका, यतस्तद्वचनैः मेरितो भग- चांसदाश्रयो भवति न तु तत्कृतमण्यपि साधनमपेक्षते ॥ ११ ॥ सुखेन श्रीयतां कृष्णः किमावेश्चिन्तया मुधा । आचार्यवावसुधासिक्ता माइदं संशयं जनाः ॥ २ ॥ आचार्यचरणाम्भोजे ई विश्वस्य विस्तरात् । रघुनाथश्चकारेदं कृष्णाश्रयविचारणम् ॥ १॥ इति श्रीमहल्लभनन्दनचरणकशरणश्रीरघुनाथस्य कृतो कृष्णाश्रयस्तोत्रविधरणं संपूर्णम् ।
1 1 । श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। - श्रीमत्कल्याणरायचरणविरचितप्रकाशप्रकाशितम् । यल्लीलालवसस्पर्शान्न रोचन्तेऽन्यदाशिपः । तं राधाहृदयानन्ददायके कृष्णमाश्रये ॥१॥ यत्कृपादृष्टितो जन्तुर्गोविन्दं विन्दते मुदा । भक्याहं तानिमाचार्यानभिवन्देऽर्थसिद्धये ॥२॥ श्रीकृष्णाश्रयस्य सर्वसाधकत्वात्स्वीयानां तदर्थं वरमदानमिव कुर्वन्तः श्रीमदा- चार्यचरणाः कृष्णाश्रयस्तोत्रं निरूपयन्ति । तत्राधुना देशादिपैट्साधनानामसाधकत्वं वदन्तो भक्तानां भगवानेव सर्वसाधनरूपश्चतुर्विधपुरुषार्थरूप इति, दशलीलानिरूप्प इति, दशविधभक्तसेव्प इति, माणानामिवास्य स्तोत्रस्य सर्वसाधकत्वमिति च दशभिः श्लोकः प्रार्थनान्याजेन तं स्तुवन्ति । तर प्रयमं मुख्याङ्गतात्कालस्य तपासाधकत्वं वदन्तः कालधर्मनिराकरणपूर्वकमाश्रयं प्रार्थयन्ते- सर्वमार्गेपु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ सर्वमार्गेविति । कलौ खलर्मिणि खलोऽन्तर्दुष्टो धर्मस्तद्वति सति । 'खरध- मिणी'तिपाठे दुःसहचेष्टिते कलौ सतीत्यर्थः। 'कृषिभूवाचके तिवाक्यनिरूप्यः सदानन्दः पुरुषोत्तम एव मम गम्यत इति गतिराश्रय ऐहिकपारलौकिकार्थसाधकोस्त्रिति शेपः । खलधर्ममाहुः-लोके जने पापण्डः प्रचुरः सर्वापेक्षयाधिको यस्मिंस्तादृशे सति । अत एव सर्वे मृग्यन्त इति मार्गाः पुरुषार्थोपायाः कर्मज्ञानादयस्तेषु नष्टमायेषु सत्सु, पापण्डमवेशा- दात्मसुम्बवायकस्वर्गपदस्य रोकभ्रमजननाच्चित्तशुदयनननाकर्ममार्गस्य, मायावादाभि. निवेशाज्ज्ञानमार्गस्य, निरीश्वरवानीकारायोगस्य, विभूतिपरत्वादुपासनामार्गस्य च मुख्य- फलासाधकत्वेन नष्टमायत्वम् । चकारान्महादेवादिषु फलिकालानुगुणेषु सत्सु, एक्का- १ काल-देश-द्रप्प-कर्तृ-मन्त्र-मणाम् । २ ३ कर्मादिभि पुस्पायर्या मृग्पन्वे ।
श्रीमत्कल्याणरायचरणविरचितमकाशप्रकाशितम् । रस्प विशेष्यान्वितत्येनान्ययोगव्यवच्छेदकत्वादशः कलादिवो मतिपास्त्वित्पर्यः । अन्या- थकवादस्य सिद्धत्वेपि माथनं न दोपाय । ननु भक्तिमागीयाणामपि फलिकालस्य वाधकत्वाढहायासक्तिमत्वाडौकिकक्रियापरत्वात्पापसंभवाच भक्तिमार्गस्य कयमुद्धारकत्वं मुख्यफलसाधकत्वं चेति कर्मादितुल्यतारिकपाश्रयेणापीति चेत् , येव, भक्तिमार्ग खटुक्त- दुषणानामभावात् । तथाहि-'फलेदोपनिरिति 'फलौ तद्धरिकीर्तनादिति 'कलि सभा- जयन्ती त्यादिवाक्यैवधिकरवाभावादल्पकालेनैव फलसिद्धेः प्रत्युत साधकलात् । 'शृण्वन् गृणन् । 'मदा यातयामानां न बन्याय गृहा मता' तावदागादयः स्तेना. इत्यादिवाक्यै- भगवत्परत्वे गृहादेवन्यहेतुत्वामावात् । 'एवं नृणां क्रियायोगा' इत्यादिवाययैलौकिककि- पाया अप्पलौकिकतुल्यत्वात्। 'मत्कर्म कुर्वता'मित्यादिवाक्यमगवत्सेवादिना विहिताकर- णेपि प्रत्यवायामावाद, 'धुनोति सर्व हदि संनिविता' 'ते मे न दण्डवहन्ती'त्यादिवाक्यैः कदाचित्यातकसंभवेपि नरकाद्यभाषात्कीर्तनादिनैव पापनाशात् । सर्वधर्मान्परित्यज्य 'अपि चेसुदुराचारः' या कश्चिद्वैष्णयो लोके, “यानास्यायेत्यादिवाक्यैराचाराध. भावपि फलसिद्धः। 'धर्मः सत्पदयोपेतः, धर्मः स्वनुष्ठितः । भावजित "यमादिभियोगाथैः। श्रेयासुति पित्यादिवाक्यै यथा जलौकसां नित्य जीवनं सलिल मतम् । तथा समस्तसिद्धीनां जीवनं भक्तिरिष्यत्' इतिबृहन्नारदीय- वाक्याच भक्तिरहितानां कर्मादीनामसाधकत्वात् , भक्तिसहितानामेव साधकत्वात । 'यत्कर्मभिर्यतपता चतुर्विधाः ' ' अकामः''ज्ञाने प्रयासमुपास्य "किमलभ्यं 'रूपमारोग्यमा नित्यादिवाक्यैः केवलभक्तेरपि सर्वसाधकत्यात् । 'परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्ये 'मात्मारामाश्च नैकात्मता' 'महतां मधुद्विीडित्यादिवाक्यैः स्वतोपि फलरूपत्वात् । अधुना कर्मादीनामधिकाराणां गतत्वाद्भक्तिमार्गे महदनुग्रहस्याधिकारस्वेनाधिकारिकृतस्यैव सफ- लवादत्राधिकार भेदेन गौणमुख्यफलसंभवात् । एतदुक्तं 'तस्वार्थदीपे'-अधुना हाधि- कारास्तु सर्व एव गताः कलौ । कृष्णश्चेत्सेव्यते भत्या कलिस्तस्य फलाय हीति भक्ति- साध्यफलस्यान्यनासंभवादन्यसाध्यस्य भक्तरानुपशिकत्वान्न कर्मादितुल्यत्वगन्धोपि । ननु पूर्णभक्तिमार्गस्याधिक्थेपीह सामिकृत्वस्य तत्तुल्यत्यमिति चेत् , न 'स्पर्तव्यः स्मृते." कृष्ण कृष्णेति न वै जनो नातु' 'कृष्णेति' 'मालोक्य त्यादिवाक्यैः सामिकृतस्यापि फलसापकत्वादन्यस्य तदभावादलमुक्तिभिः ॥१॥ । नैष्कर्म्यमप्यच्युत- - १ एषकारों हि निमकारक: अन्ययोगव्यवच्छेदकोऽयोगध्ययोदकोत्यन्तायोगध्यपच्छेदकौति, विशेष्यान्वितः प्रथमो यया पार्थ एघ धनुरः, विशेषणान्यिको द्वितीयो यथा शशः पाण्डुरेख, क्रियान्वित स्तुतीयो यथा नील सरोज भवत्येवेति । २. चिनास्ति ।
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । . भश्रीगोविन्दराजकृतटिप्पणम् । मिलिन्दन्दोपमचारुकेशं मुमक्तशेपं मुखकारिदेशम् । 'पयोदनीकाशमनोशश तं वेङ्कटेशं शरणं प्रपद्ये ॥ नत्वा श्रीवल्लभाचार्यचरणे शरणे सताम् । कृष्णाश्रयप्रकाशस्य व्याख्यानं मुनिरूप्यते ।। संस्पर्शादिति । सम्यक सम्बन्धादित्यर्थः । सम्मन् सम्यक्त्वं चावान्यापरि- भूतत्वम् । अन्यदाशिप इति । न च अन्याश्च वा आशिषवेति विग्रह मन्याशिष इति भाव्यमिति वाच्यम् , 'अपष्टयतृतीयास्यस्य'ति दुगागमात् । राधाद्यानन्ददायक- मिति । राधाहृदयायानन्दं ददातीति तथा । भगवत्सुखस्यानन्दरूपत्वान्नानुपपत्तिः काचित् , इतरथाऽन्याप्यत्तित्वेन सुखकथनस्पैवोचितत्वात् । अत एवोक्तं 'प्रेमामृत'टी- कायाम् 'आनन्दोन्तःकरणदेहादिसर्वव्यापकः सुखमव्याप्यतीति । ननु 'आनन्दा- दयेव खल्विमानि भूतानि' 'सत्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यादिभिः श्रुतिभिरान- न्दस्य भगवद्रूपत्वात्स्वदायक इत्यर्थः पर्यवसन्न इति चेत्, इष्टापत्तेः, स्वरूपदानस्यो- चितत्वात् । एनेनानयोरभेदः सङ्गच्छते । तदुक्तमाथर्वणीयकृष्णोपनिपदि "पूर्णपेमा- स्पदी राधा श्रीकृष्णमनसोद्भवा', तस्मान्न भिनेति । यत्कृपादृष्टित इति । स्त्रीय- त्येन परिग्रहादित्यर्थः । अभिवन्द इति । भक्त्यार्थसिद्धये निजाचार्यानभिवन्द इति सम्बन्धः । तत्र सेवाविषयकमेम्णा निर्विघ्नग्रन्यपरिसमाप्तिसिद्धयर्थं निनाचार्यनमस्कार- रूपं मङ्गलं करोमीत्येतद्वाक्यार्थः । सेवा त्वर नमनादिरूपा । न च प्रेमविशिष्टसेवयेति वक्तुमुचितं, मत्ययार्थस्यैव प्राधान्यात् । तथा चोक्तमस्मदाचायनिवन्धे 'धात्यर्थः सेवा प्रत्ययार्थ: मेति । सत्यार्थदीपे तु 'प्रेणसेवाला' इति फलिलायनम् , अन्यथा प्रत्ययार्थः प्रधान प्रकृत्यर्थे विशेषणमितिन्यायविरोधः स्यात् । वस्तुतस्तु एतस्य सामान्यन्यायत्वेन विशेषन्यायस्यैव वलीयस्त्वात् । एतदुक्तं विवरणे 'प्रकृतिमत्यययोः प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यमितिसामान्यन्यायादिच्छाविपयतया शब्दवोध्य एव शाब्दसाधनता- न्वय इति स्वर्गकामादिवाक्ये चलप्तविशेपन्यायस्य बलीयस्त्वादन जिगमिपति असिना जिघांसतीत्यादिलौकिकमयोगेश्वादिरूपसाधनस्य तदनेष्टव्यं तद्विजिज्ञासितव्यं मन्त- व्यमित्यादिवैदिकप्रयोगे तव्यार्थभूतविधेश्व 'सन् प्रत्ययाभिहितेच्छाविपय एव गमना- दावन्वयस्य व्युत्पन्नत्वाच प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोग इति । ननु भावे' इत्यधिकारात्मत्ययार्थस्य भावत्वमुचितं न तु प्रेमत्वमिति चेत्, अत्रोच्यते, भावार्थ- कत्वं तु प्रत्ययस्य तावदुभयवादिसिद्धमेव, तत्र भावशब्देन देवादिविपयिणी रतिः प्रकते " , ' प्रकारातहिप्पणसहितम्। टिप्पणम् । सर्गः। पुरुषाब्रह्मादीनामुत्पचिर्विसर्गः । उत्पन्नानां तचन्मर्यादया पालनं स्थानम् । स्थितानामभिवृद्धिः पोपणम् । पुष्टानामाचार ऊतिः । तत्रापि सदाचारो मन्वन्तरम् । तत्रापि विष्णुभक्तिरीशानुकया । भक्तानां प्रपञ्चाभावो निरोधः । निमपञ्चानां स्वरूप- लाभो मुक्तिः । मुक्तानां ब्रह्मस्वरूपेणावस्थानमाश्रय इति । दशविधभत्तसेव्य इति । साचिकसाचिकाः, साचिकराजसा, साविकतामसा: । राजसरानसा, राजस- सायिका, राजसतामसा: { तामसतामसाः, तामसराजसा, तामससाचिका। एके निर्गुणा इत्येतदेशविक्तः सेव्य इत्यर्थः । मानाव्याजेन स्तुवन्तीति । किपासनं से गरुडासनाय स्पनेन प्रार्थनाव्याजेनैव स्तुतिनिरूपणस्यैवोचितत्वादिति भावः । गम्यते पाप्यत इत्यर्थः । ननु 'भाव' इत्यधिकारात्कथमत्र कर्मणि मत्यय इति चेत् , सत्यम् , 'कृत्यल्युटो बहुल'मित्यत्र 'बहुल'मितियोगविभागाचा । अत एव एवं च बहुलग्रहणं योगविभागेन कृन्मानस्वार्थव्यभिचारार्थ पादाभ्यां हियते पादहारकः कर्मणि पतुल्' इति वैयाकरणशिरोमणयः { पापण्ड इति । वेदविरुद्धत्व पापण्डलम् । आत्मसुख- चाचकेति । 'यन्न दुःखेन संभिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम् । अमिलापोपनीतं च तत्सुखं स्वापदास्पद'मित्यनेन स्वर्गपदस्यात्मसुखवाचकवादित्पर्यः । लोकभ्रमजननादिति । लोकत्येन भ्रमजननादित्यर्थः । मायावादाभिनिवेशादिति । विवाधिष्ठानत्वेन मायो- पहितब्रह्मणः कर्टलायनादित्यर्थः । विवर्तस्तु अतारिखकोऽन्यथाभासः । यद्वा, यस्तु- नस्तदसमसत्ताको विवर्तः । अथवा कारणविलक्षणोऽन्यथाभावो विवर्तः । कारणभेदं पिनैव तयतिरेकेण दुर्वचं कार्य विवर्त इति वा । निरीश्वरस्याङ्गीकाराद्योगस्येति । निवजियोगाशीकारादित्यर्थः । योगस्तु चित्तचिनिरोधः स तु भगवद्धयानार्थमङ्गल्ये- नोपयुक्त एकः । ध्यानाभावग्यात्मनोपागभूतो द्वितीयः । उभावपि प्रामाणिकौ । यस्तु स्वतन्त्रतया फलसापकत्येन प्रोक्तस्तथासिद्धिहेतुञ्जनात्मा वा तथान्ये देहेन्द्रियादि- साधकास्तेऽपामाणिकाः । सर्वमेतच निबन्धे स्पष्टम् । कलिकालानुगुणेविति । द्वाप- रादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु । स्वागमैः कस्सितस्त्वं च अनामिद्विमुरसान् कुरु' मां च गोपय. येन स्यात्सृष्टिरेपोत्तरोत्तरे त्यादिपमपुराणायुक्तवचनैर्महादेवादीनां कलि- कालानुगुणवस्य सिद्धत्वादित्यर्थः । अन्यायकत्वादिति । अत्र प्रमाणभूताः 'शुभिके शिर-आरोह शोभयन्ती मुखं मम ममागे वो विहयेष्वस्त्वित्यादय आगगा अनुसन्धेया इति भावः फलेदोपनिये रित्यारभ्या भोपि फल्गु रित्यन्तानां वचनानां सहा-'कले. दोपनिधे राजनस्ति होको महान गुणः । कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तमन्यः परं ब्रजेत् 'कृवे यद्धयायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः । द्वापर परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् 'कलिं ३ कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। टिप्पणम् । सभानपत्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः । यत्र संकीर्तनादेव सर्वः स्वाथोपि लभ्यते' 'शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते। क्रियासु यस्त्व. चरणारविन्दयोराविष्टचिचो न भवाय कल्पते' 'गृहेवाविशतां वापि पुंसां कुशलकर्मणाम् । मद्वार्तायातयामानां न चन्धाय गृहा मता:' 'ताबदागादयः स्तेनास्तावकारागृहं गृहम् । तावन्मोहोधिनिगडो यावत्कृष्ण न ते जनाः' एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संमृतिहेतवः । त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे 'मकर्म कुर्वतां पुंसां काललोपो भवेद्यदि । तत्कर्म तस्य कुर्वन्ति तिस्रः कोथ्यो महर्पयः' 'स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यच्चोत्पतितं कयश्चित् धुनोति सर्व हदि सन्निविष्टः' 'एवं विमृश्य मुधियो भगवत्यनन्ते सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम् । ते मे न दण्डमहन्त्यथ यद्यमीपां स्यात्पातकं तदपि हन्त्युरुगायवाद' ते देव सिद्धपरिगीतपवित्रगाथा ये साधवः समदृशो भगवत्मपन्नाः । तानोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तानैपां वयं न च वयः प्रभवाम दण्डे' 'सर्व- धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं वन । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच' 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभार । साधुरेव स मन्तव्यः सम्पग्व्यवहितो हि स!' 'यः कश्चिद्वैष्णवो लोके मिथ्याचारोप्यनाथमी । पुनाति सकलान् लोकान् सहस्रांशुरि- वोदित' 'यानास्थाय नरो राजन्न प्रमाधेत कहिचित् । धावनिमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह' 'धर्मः सत्यदयोपेतः विद्या वा तपसान्विता । मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक प्रपुनाति हि' 'धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः । नोत्पादयेद्यदि रति श्रम एव हि केवलम्' 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्' 'यमादिभियोगपथैः कामलोभहतो मुहुः । मुकुन्दसेवया यद्वत्तथात्माद्धा न शाम्यति' 'श्रेयःमुर्ति भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलवोधलब्धये । तेपामसौ केशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुपाव- घातिनाम्' 'यत्कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरि- तरैरपि" 'सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेजसा' 'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन । आतो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ। अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।. तीव्रण भक्तियोगेन यजेत पुरुपं परम्' 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् । स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाम- नोभिर्ये प्रायोजित जितोप्यसि तैत्रिलोक्याम् । 'किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिके. तने । तथापि तत्परा राजन् नहि वाञ्छन्ति किञ्चन ' 'रूपमारोग्यमर्थांश्च भोगांश्चैवा- नुपतिकान् । ददाति ध्यायतो नित्यमपवर्गपदो हरिः' 'परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्ये उत्तमश्लोक- .
१ - - प्रकाशतहिप्पणसहितम् । टिप्पणम्। लीलया । गृहीतचेता राज आरपान यदधीतवान् । आत्मारामाच मुनयो निर्ग्रन्या अप्पुरुक्रमे । कुर्वन्त्यहेतुफी भक्तिपित्यंभूतगुणो हरि! 'कात्मता में स्पृहपन्ति केचिन्मत्पादसेवाभिरता मदीहाः । येन्योन्यतो भागवता मसज्य सभामयन्ते मम पौरु- पाणि' ' महतां मधुद्विदसेवानुरक्तमनसापभयोपि फरगुरिति । भक्तिसाध्यफलस्येति भगवत्स्वरूपपरित्यर्थः । तदुक्तमस्मभुभिर्भक्ति से भक्तौ च न स्वरूपातिरिक्त फलमत्वामिति । स्मर्तव्य'इत्यारभ्य तदभावादित्यन्ते वचनानि तु स्मर्तव्यः सततं विष्णुविस्मर्तव्यो न जातचिद । सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतस्यैव च किङ्कराः 'स्मृते: सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषं तमज नित्यं ब्रनामि शरणं हरिम् कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः । जलं भिवा यथा पद नरकादुद्धराम्यहम् । 'कृष्णेति मझले नाम यस्य वाचि प्रवर्तते । भस्मीभवन्ति राजेन्द्र महापातककोटयः । न जनो जातु कथंचनावोन्मुकुन्दसेन्यन्यबदङ्ग संपत्तिम् । स्मरन्मुकुन्दा युपगृहनं पुनर्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः' 'आलोच्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इदमेके सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदेति । तत्र नवविधा भक्तिनिदान, ततः प्रेम, तेन च विशिष्टरूपभगवमाप्तिः, सैव फलमिति फलसहितपूर्णभक्तिमार्गस्वरूपम् । अत एव सर्व- निर्णये 'स ज्ञानक्रियोभययुतः स एव फलं, तत्रापि साधनं प्रेमच तसाधनं नवविधा भक्ति निति श्रीमदाचार्यवाः । तथाच सामिकृतस्थापि स्मरणपर्यन्तं विहितस्यापि कामवाग्निनियोगस्नेहाभावेपि मनोमात्रस्थित्यैव ताशपुरुषविहितस्य वा फलसायकत्व- मिति स्पष्ट एवेत्तरेभ्य उत्कर्षः। तथाचोक्तं निवन्धे-'कायवाम्पिनियोगाभापि स्नेहा- भाषेपि मनोमास्थितौ फलमेतदिति । कर्ममार्गस्य तु न तथा, साहादैदिकर्मणः फला- वश्यंभावनियमादिति तत्वम् ।। १॥ ननु पुण्यदेशस्थितिमात्रेणापि पुरुषार्थसिद्धः किमितीतस्परच्छेदपूर्वकमाश्रयमा धनमित्याशङ्काय देशानामसाधकलं बदन्त आश्रयं प्रार्थयन्ते- म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ २ ॥ म्लेच्छामान्तेष्विति । देशेषु होनेराकान्तेषु सत्सु । ननु म्लेच्छा अपि न्याय वतिनश्चेत्तदा को दोपस्तत्राहु-पापैकनिलयेष्विति । पापरूया एव ते तदेकनिलयेषु, पापा ये मुख्यास्तनिलयेषु, पापस्य वा । अथवा पूर्वोक्तेषु पापैकनिलयेषु च जमझा- दिपु, मन मनमात्रेण पुनः संस्कारसंभवः । ननु लोका वणिजादपः समीचीनाश्त्यापैः १. अगवङ्गकलिनेषु सौराष्ट्रमगधेषु च । तीर्थयात्रा विना गछन् पुनः सरकारमईतीति स्मृतेः प्रकाशः।
१४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। अपरिज्ञाननष्टेष्विति । मन्त्रा वैदिका आगमोक्ताथ, तेषु अपरिज्ञाननष्टेषु अपरिज्ञानेन तात्पर्यफलदेवतास्वरूपाशानेन नष्टमायेषु सत्सु । वैदिकानां गुरुकुलवासनाम: चर्यशूद्रासनिध्यनध्यायराहित्पपूर्वकं पठितानां साधकत्येनानतयोगिनामसाधकत्तान् । आगमोक्तानां तात्पर्याज्ञानेनार्यदेवयोस्तिरोभावादसाधकलात् । भगवदाश्रये तु 'यस्य स्मृत्ये त्यादिवाक्यैः 'सव संपूर्णता यातीति मन्त्राणामपि सापकत्वात् ॥ ५॥ ननु मीमांसादिना मन्त्रतापर्यनिर्धारारकर्मभिरेव फलसिद्धेः किमाश्रयेणेत्याशङ्कप कर्मणामसाकवलं वदन्त आश्रयं मार्थयन्ते- नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मवतादिषु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥ नानावादविनष्टेप्यिति । कर्माणि सोमयागादीनि, प्रतादीनि च, तेषु सर्वेषु प्रपञ्चः सर्वोपि मिथ्येति वेदानामपि तथात्वात्मपञ्चवत्स्वाज्ञानकल्पितत्वेन वेदानां तद्वो. धित्तानां च व्यवहारमात्रेण प्रामाण्यान्न किञ्चित्कर्तव्यं प्राप्तव्यं वास्तीति केपाश्चिद्वादा, 'परमेष्टिनो वा एप यज्ञोग्र इत्यादिवाफ्यैलादीनामपि यज्ञैरेवोत्कर्षापूर्ववासनात एवोत्त- रोत्तरमवृत्तेः कर्मैव फर्तव्यं तेनैव फलं न कोप्युपास्यः फलदाता प्रवर्तको वा, देवतापि चेतना नास्ति किन्तु मन्त्रमय्येवेति नदेवताप्रीतिव्यापार फलं वेति केपाश्चिद्वादः, शास्त्रेण पोडशपदार्थवियेकानन्तरं श्रवणमनननिदिध्यासनैः स्वात्मसाक्षात्कारे सति दुःखात्य- न्ताभाव एव फलंन भगवान्सेव्यः फलं वेति केपाश्चिद्वादः, प्रकृतितद्विकारोपधानविलये पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं फलं, न भंगवानिति केपाश्चिन्मतम् , एवंविधैर्नानापादेविशेषण नष्टेषु सत्सु । विपरीतार्थनिश्चयेन फलाजनकवाद्विनाशः । वस्तुतः 'पुरुष एवेदं सर्वे' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्व' 'सर्वस्प चशी सर्वस्पेशानः 'एप उ एवं तं साधु कर्म कारयति' 'अहं सर्वस्य प्रभवः' को नु राजनिन्द्रियवान्' 'देवोसुरो मनुष्यो वा' 'फलमत उपपत्ते!' 'त एवं तृप्तास्तर्पयन्त्येनमिति 'देवा चै सत्रमासत' 'विशते तदनन्तरम्' 'मामेवैष्यसि 'आनन्दं ब्रह्मणो रूप' मित्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणन्यायैः प्रपश्चस्य ब्रह्मात्मकत्वात्सत्यत्वेन कर्तव्यस्य सफलत्वाद्भगवतः सर्वेश्वरत्वेन सेव्यत्वात्मवर्तकत्वात्फलदातृत्वात्तृप्तिसत्रकरणा- धनुपपत्या देवतानामपि चेतनत्वाद्भगवत्सायुज्यस्य मोक्षत्वादानन्दरूपत्वेन भगवत एवं फलरूपत्वात्पूर्वोक्तवादानां मलपितकल्पत्वात् । स्त्रमताग्रहेणैव निपिद्धदशम्यादिविद्धकाद- टिप्पणम् । प्रलपितकल्पत्वादिति । यत्तु, 'शास्त्रदीपिकायां नवमाध्याये 'देवता वा प्रयोजयेत् अतिथिवभोजनस्य तदर्थवादित्यधिकरणे 'पद्यपि देवत्ता विग्रहवती मतिष्टह्य मुख्या ब्रजति प्रसीदति च तथापि यागादेव फलं विग्रहवती चानित्या' स्यात्, ततश्च नित्य- प्रकाशतट्टिप्पणसहितम् । - - । वेदविषयत्वं न स्यात्, सत्यपि विग्रहे प्रत्तस्य हरिपो देवतया भोगः प्रत्यक्षविरुदो- शक्योभ्युपगन्तुम् , न चाभुङ्गाना मसीदतीति युक्तम् , अत एवामतिपन्नापूर्वत्यागे देवतामसादे वा फलमित्येतदपि निरस्त, न हि तस्या: सादः संभवतीत्युक्त मिति पार्थसारथिमिश्रा: तत्मौविवादमात्रमेव । तथाहि-'पदुक्तं विग्रहवती चानित्या स्यात्ततश्च, नित्यवेदविषयत्वं न स्यादिति, तदपेशलं, अनित्यानामपि यागादीनां वेदविषय- त्वात् (, विग्रहवत्वेनैव फलजनकत्वस्थ 'तप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयती'त्यादि- श्रुत्युक्तत्वाच । मुख्याधेिन न श्रुत्तेरुपचरितार्थत्वम् । अर्थवादानां स्वतः प्रामाण्पं न तु विध्येकवाक्यतया । एतेनास्मिनेत्राधिकरणे यच्छापरभाष्ये सिद्धान्तितं तस्वमता- ग्रहमानमेव । प्रकृतमनुसरामः । यदपि 'सत्यपि विग्रहे प्रत्तस्प इविपो देवतया भोगः प्रत्यक्षविरुद्धोशवयोग्युपगन्तुमि ति, तदप्यविचाररमणीयम् । विश्चादीनामपि प्रत्यक्ष- भोगाभावत्वेन 'सर्वमनुष्या विष्णुनाऽशिवमन्नन्ती तिथुतौ 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भल्या प्रयच्छति । तदई भत्त्युपहतमश्नामि भयतात्मन' इति. स्मृतौ 'विष्णोनिवेदिता- नेन यष्टव्यं देवतान्ताम् । पितृभ्यश्चापि तदेयं तदानन्याय कल्पते "पितृशेष तु यो दद्याद हरये परमात्मने । रेतोधाः पितरस्वस्प भवन्ति शभागिन । इति स्कान्दे 'यः आद्धकाले हरिभुतशेषं ददाति भत्या पितृदेवतानाम् । तेनैव पिण्टास्तुलसीविमिश्रा- नाकल्पकोटि पितरस्तु वृप्ताइति बाटे च प्रतिपादितस्य भोगस्य विरोधापत्तेः । यत्तु निर्णयसिन्धु:-'एतत्सर्वं निवन्धविरोधानिलमिति, तन्न, श्रीधरस्वामिसिंहपरिवर्या- दिमूलं वदता स्वस्यैत्र पदयाघातात् । एतेन 'न चाभुनाने त्यारभ्य प्रसादः संभवती- युक्त'मित्यन्तं यदुक्तं तदेतेनैव निरस्तम् । वस्तुतस्तु विशिष्ट एव देवतेति न काप्यनुप- पत्तिः । एतेन तदुक्तकर्ममार्गस्य प्रलपितकरूपत्वं सिद्धमिति निर्वः । यत्तु मुक्तावल्या- मात्मनिरूपणे 'सुतरामीश्वरभेद' इत्यारभ्य परमं साम्यमुपैतीति श्रूयते' इत्यन्तं पश्चानन- भट्टाचार्या आहुस्तत्मामादिकमेव । तथाहि यदुक्तं 'सुतरामीश्वरभेदोऽज्यथा बन्धमोक्षा नुपपत्ते रिति, तत्तुच्छं, पन्धस्य सांसारिकजीवविश्यत्वेन सुतरां भेदाभावात् । यदर्षि 'योपीश्वराभेद' इत्यारभ्य 'समर्पिता' इत्पन्तं वदन्ति तदपि तथा । तथाहि अभेद- पोधिका किल 'ना वेद ब्रह्मैव भवतीति श्रुतिः । नहि तदीयत्वमतिपादन- द्वारा स्तुतिस्तस्याः शक्योर्थोपि त्वौपचारिकः, न च श्रुतेस्पचरितार्यत्वं संभवति मुख्यार्थावाधात् । अत एवांशो मानाव्यपदेशा'दित्यधिकरणे : अद्वैतश्रुत्यस्तु जातिदेश- फालामेदेन निमित्तोपचारादि'त्युक्त्वा 'नच यस्परास्तदौपचारिकं युक्त'मित्युक्त वाचस्प- तिमियः । न च सर्व एवात्मानः समर्पिता इति श्रुतिविरोधः, सर्वात्मनां तत्वेनैव भवन- -- १२ . कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। हि 1 कि कार्यमत आहुः-सदिति । साधूनां पीडया घ्यग्राः स्वधर्माचरणमेवानिष्टहेतुः प्रत्य- क्षत्वान्न कार्यमुत माकृतं कर्म येति व्याजुला लोका येषु । सद्धर्मस्य शुभहेतुत्वानिययेन श्रद्धाद्यभावात्तेपि सहाया न भवन्तीत्यर्थः । 'अहो अभीपां किमकारि शोभनं प्रप्तन एपां स्विदुत स्वयं हरिः । यर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवौपयिक स्पृहा न' इत्यादिवाक्यैर्देशानां कृष्णाश्रितानुकूलत्वात् । शेपं पूर्ववत् ॥ २ ॥ टिप्पणम् । पापा ये मुख्या इति । फलिताकथनगेत, इतस्या विशेषणसमासे 'पूर्वका.. लैके'त्यनेनैकशब्दस्य पूर्वनिपातः स्यात् । विग्रहस्तु पापेषु ये मुख्या इति । यत्र गमः नमात्रेण पुनः संस्कारसंभव इति । 'अङ्गयाकलिङ्गेषु सौराष्ट्रपगधेषु च । तीर्थयात्रा विना गच्छन् पुनः संस्कारमर्हती त्यनेन तथेत्यर्थः ॥ २ ॥ प्रकाशः। ननु गङ्गादितीर्थैरपि सर्वपुरुषार्थसिद्धः किं केवलाश्रयेणेत्याशङ्कय द्रव्याणाम- साधकत्वं वदन्तस्तीर्थानामाहुः- गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरेवावृतेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥३॥ गङ्गादीति । गादीनि यानि तीर्थश्रेष्ठानि तेपु.दुष्टैरेवाटतेपु सत्सु, अतो न तैः पुरुषार्थसिद्धिः । ननु कथं दुष्टैरेवास्तत्वं तत्र ब्राह्मणादीनामपि सत्वात् , न, अतिपरि- चयादनादरेण तत्र भक्त्यभावेन प्रतिग्रहाद्युपाधिभिरवस्थानाच तेपामपि दुष्टत्वमेव । ननु सर्वदोपनिवारकेषु तेषु सत्सु दुष्टत्वमसंभवीति चेत् , न, 'सर्वेण गाझेन जलेन सम्य- अमृतलाशतेनाप्यथ भावदुष्टः । आजन्मतः स्नानपरोपि नित्यं न शुद्धयतीत्येव वयं पदाम इत्यादित्यपुराणवचनात् , 'मत्स्यकच्छपमण्डूकास्तोये मना दिवानिशं । वसन्तोपि च ते स्नानात्फलं नाईन्ति कहिचित् 'श्रद्धाविधिसमायुक्तं यत्कर्म क्रियते नृभिः । शुचि- टिप्पणम् । द्रव्याणामसाधकत्वं वदन्तस्तीर्थानामिति । तीर्थस्य तद्देशावच्छिन्नप्रवाहात्म- काध्यात्मिकदेवतारूपत्वेन द्रव्यत्वमितिभावः । अत एचोक्तमस्मत्प्रभुमिनिबन्धे "द्वितीयस्य प्रवाहरूपतया तीर्थत्वमिति । यादवकोशेपि-'तीर्थ मन्त्राद्यपाध्यायशास्त्रेप्वम्भसि पावन' इति ।. उक्तं च दशमस्कन्धीयसुबोधिन्यां देवतारूपत्वं 'कालिन्दीति समाख्याते'त्यस्य व्याख्याने 'आध्यात्मिकं देवतास्पमि'ति । प्रायश्चित्तानि चीनी तिवचनत्रयाणि- १. कचिलिङ्गपाठः । २. असंभावितमिति पाठः । ३ .
मफाशवहिप्पणसहितम् । १३ प्रकाशा " , शुद्धेन भाषेन तदानन्त्याय कल्पते "विधिहीनं भावदुष्टं कृतमश्रद्धया च यत् । तदर- न्त्यसुरास्तस्य सुमृदृस्याकृतात्मन' इति योगियाज्ञवलपवनोभिः, 'अश्रयानः पापात्मा नास्तिकोच्छिनसंशयः । हेतुनिष्ठश्च पश्यैते न तीर्थफलभागिन' इति वायुपुराणवचनाच, प्रायश्चिचानि चीनी त्यादिभिश तेषां भगवद्वाहिर्मुख्यनास्विक्यादिदोपानिवार- कत्वात् । ननु वस्तुशयां सत्यां कथमेतत् , न खामिः कदाचिन दहतीत्याशयाधि- दैविकदेवतारूपतिरोधानावस्तुन एवाभावादित्याहुः-तिरोहिताधिदेवेष्विति । दुष्टा- प्रत्याधिदेवतिरोधानासतः प्रत्येव प्रामव्यात् , अन एव श्रीभागवतार्थतत्त्वदीपे 'तीर्या- दापोति । अत एव सतां 'तीनुर्वन्ति तीर्यानी'त्यनेन तीर्थीकरणमुच्यते । आधिदै- विकाभावे जले दृश्यमानदोपाभावारिक नीकिरणं स्यात् । शेष प्राग्वत् ॥ ३ ॥ टिप्पणम् । 'प्रायश्चित्तानि चीणानि नारायणपरामुखम् । न निप्पुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिया- पगा'तीदायपि या मुक्ति कदाचिरकस्यचिद्भवेत् । कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्पत्येति विनिश्चयः भवद्विधा भागवतास्ती भूताः स्वयं प्रभो । ती कुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः- स्थेन गदाभृतेति ॥ ३ ॥ ननु कसमीचीनत्वे सर्वफलसिद्धेः किमाश्रयेऽन्यव्यवच्छेदेनेत्याशशून्य कर्तृणाम- साधकलं वदन्त आश्रयं प्रार्थयन्ते - अहङ्कारविमूढेपु सत्तु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्लेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४॥ अहङ्कारविमूढेष्विति। सत्तु पण्डितेषु अहङ्कारेण वयं शास्त्रज्ञा इतिगर्वेणान्य पृच्छन्त्यपि नेति मायावादायभिनिवेशाद्विशेषेण मूढेषु सत्नु । ज्ञानवस्कृतिरपि तेषां दृष्टे याहुः लाभपूजार्धपत्नेविति । लाभपूजार्थमेव यत्नो येषां, ते पारमार्थिकमपि कर्म लाभपूनाभ्यामेव कुर्वन्ति।पापान पुंसः, पापं वानुवर्तन्तेऽतः सशानदोषाभ्यां दुष्टत्वान्न तैपा स्वतः फलसिद्धिाश्रये तु भगवत्कृपाया स्वत एव वेदार्थस्वदोपयोः स्फुरणास्कलसिद्धिः, भगवान् भगवदीयो या येदार्थ भानातीति भक्तानामेव घेवात्पर्यज्ञानात् । शेपं सुगममा। पूर्ववदाशक्य मन्त्रागामसाधकत्यं वदन्त आश्रयं पार्थयन्ते- अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेष्ववतयोगिए। तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ५॥ , १ कर्तृसमीचीनत्वेनेति ख, ग, प्रकाशः।
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । मिति तदर्थात् । यदपि 'मोसदशायामज्ञाननिटत्तावभेदो जापते इत्यपि न, मेदस्य नित्यत्वे नाशायोगाव' तदप्यसत् , भेदस्य 'भ्रममात्रविपयत्वेन. वस्तुन. एवाभावात् । यदपि 'भेदनाशेपि व्यत्तिद्वयं स्थास्यत्येवेति तदपि न 'एप संप्रसादः अस्माच्छरीरा- समुत्याय परं ज्योतिरुपसंपय स्पेन रूपेगाभिनिष्पयते' इत्यादिश्रुतिविरोधात् । एतेन 'नच द्वित्वमपी'त्यारभ्य 'सर्वजनसिद्धत्वा'दित्यन्तं यदुक्तं तत्सर्वपनेनैव परास्तम् । यदपि 'योपि तदानीमभेदमतिपादक आगमः सोपि निर्युःखत्यादिना साम्यं प्रतिपादयति संपदाधिक्ये पुरोहितोयं राजा संयत्त इतिवदिति, तदपि न लब्धवर्णप्रतीक्ष्यं दत्तोत्तर- स्वात् । निरञ्जनः परमं साम्यमुपैती'ति श्रुतिस्तु जीवन्मुक्तपरा तस्माचाफिकमतस्यापि मलपितकल्पत्वं सिद्धमिति निष्कर्षः। वचनसशाइस्तु-'अहं 'सर्वस्य प्रभवो मतः सर्व प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां चुया भावसमन्विताः' 'को नु राजनिन्द्रियवान् मुकुन्दचरणाम्युज । न भजेत्सर्वतोमृत्युपास्यममरोचमः । देवोसुरो मनुष्यो वा यक्षो गन्धर्व एव वा । भजन्मुकुन्दचरणं स्वस्तिमान् स्याबधा वयम्' 'भत्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्वतः । ततो मां तत्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मागेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिनाने मियोसि में' इति । आचार्यचरणद्वन्द्ववन्दनानन्दितात्मना । -शिष्येण चालकृष्णानां किश्चिदत्र विचारितम् ॥ प्रकाशः ।। , श्यादिवतकरणाच । कर्मत्वेपि व्रतादीनां पृथगुपादानं ज्ञानाबगत्वयोधनाय । ननु तेपि स्वयं कुर्वन्ति परानपि बोधयन्ति मिथ्यात्वनिःफलवाल्मफलत्वानन्दाभावज्ञाने कथं कुर्युः कथं वा बोधयेयुस्तेपामपि मतानां शङ्करजैमिनीगौतमादिमवर्तितत्वाचेत्यत आहुः-पा- पण्डैकप्रयत्नेविति । पापण्डनिमित्तमेव मुख्यः प्रयत्नो येपु त्वं च रुद्रेतिसार्द्धन त्वामाराध्ये तिश्लोकद्वयेन च भगवता महादेवं प्रति तथैवाज्ञापनेन तथैव तेषां प्रवृत्तेः, स्वयं कर्मादिकरणेन स्वस्य महत्वख्यापनेन मतप्रवर्तनात् , ' ययदाचरति श्रेष्ठ इतिन्या- यात् । आधुनिकानां तैरेव मोहितत्वात् । नहि देवादिप्रवर्तितशास्त्रत्वमाग सन्मतत्वं किन्तु वेदाविरोधित्वे सति वेदानुसारित्वात् । अन्यथा बृहस्पतिप्रवर्तितबौद्धशास्त्रस्यापि सन्मतत्त्वप्रसङ्ग इत्यलं प्रसक्तानुमसक्त्या । शेपं प्राग्वत् ॥६॥ .टिप्पणम् । 'वं चेत्यारभ्यः भक्त्या त्वनन्यये'त्यन्तानां वचनानां सङ्ग्रहः- 'वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्त .महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानमप्रकाशं च मां :कुरुः । त्वामाराध्य यथा शंभो ग्रही- ..
१७ प्रकाश प्रकाशतटिप्पणसहितम् । टिप्पणम् । प्यामि वरं सदा । द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु । स्वागमैः कल्पितैस्त्वं च ‘जनान्मद्विमुखान कुरु। मां च गोपय येन स्यात् सृष्टिरपोचरोत्तरा । 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तपदेपेतरो जनः । स यत्नमाणं कुरते लोकस्तदनु वर्तते ॥ ६ ॥ ननु 'धर्मेण पापमपनुदति' 'धर्षे सबै मतिसित मितिश्रुतैः पूर्व दोपाभावाय धर्मः कार्यस्तेन चित्तशुद्धौ माहात्म्ये स्वरूपे च झाते नदाश्रयादिकं कार्य न त्वाशु दोपद- वान्पया क योगिध्येयो भगवान् क दुटो जीव इत्याशङ्कय 'यमेवैप पृणुते' 'रहुगणैतत् । 'भरपा स्वनन्यये ' त्यादीनाङ्गीकृत्या महदनुग्रहेण च भक्पा दोपवतापि गम्यत इति तन्माहात्म्यमपि तथेति महापुरुषद्वारा शरणागतौ सर्वं तत एव भविष्यतीत्यभिमेत्य भक्तानां भगवाने चतुर्विधपुरुषार्थरूप इति प्रथमं धर्मरूपत्वं वदन्तस्तं प्रार्थयन्ते- अजामिलादिदोपाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञाषिताखिलमाहास्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ७॥ अजामिलादीति । अनुभवविषयीभूतोऽजामिलादीनां ये दोपालैपां नाशक ज्ञापित अखिलं माहाम्यं येन तादृशः, तेन पापनिदर्शकत्वमिष्टभापकत्वं च धर्मकार्यमुक्त- मतो दोपोपस्थितापपि तदाश्रयणमेव कार्य भगवदीयानां न तु तं विहाय प्रापचित्ता- दीति सूचितम् । यता, परम्परासंबन्धेनापि पूर्वोक्ता, स्वनामसाम्येनाप्यनामिलोद्धारा अनुभवे स्थितो महदनुग्रहेण ! ज्ञापितमखिलं लीलादिरूप तयेन । शेषं प्राग्वत् ।। ७ ।। टिप्पणम्। रहुगणैतत्तपसा न याति न वेज्यया निर्वपणागृहाहा । न बन्दनान्नैव जलाशि- सुबिना महत्पादरजोभिषेकम् ? ' भत्या स्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्नपेति । अनुभवविषयीभूत इति । अजामिलादीनामिति शेपः । पक्षान्तरे स्वजामिलेतरभक्तविषयीभूतः सन्निति तदर्थः । अभामिलस्य तु पर म्परासम्बन्धन स्वनाम्नैवोद्धारात् । दोषोपस्थितायित्पारभ्य सूचित्तमित्यन्ते-न- 'श्रुतिस्मृती ममैवाले यस्ते उल्लङ्गम्य वर्तते । आशोच्छेदी मम द्रोही मदतोपि न में मिया' इत्यनेन भक्तिमार्गीयस्यापि वेदविहितकरणत्वेन दोषोपस्थितावपि प्रायश्चित्तादेः मापवादित्य कथमुच्यते इति चेत् , सत्य, महादोपोपस्थितौ भागवदिच्छा ज्ञात्वा माप- श्चित्तादिक्षरणम् । तदुक्तं सर्वनिर्णये प्रायश्चितं पातकादीनामिति । अस्पदोपोपस्थिती तु तदाश्रयणमेव कार्य न प्रायश्चित्वादि । एतदुक्तं सर्वनिर्णये-'अनेनाल्पवहिर्मुखताया- मपि भागवतमनुसन्येयमित्युपायः कथित ' इति सर्वं समक्षसम् ।। ७ ।। ३ १८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। ननु 'तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' 'यं यं ऋतुमधीते तेन तेनास्येप्टं भवत्यग्नेयो- रादित्यस्य सायुज्यं गच्छती'त्यादिश्रुतेः कर्ममार्गेपि ब्रह्मयज्ञाध्ययनादिनान्यादिसाय. ज्यसिद्धेय तक्षमित्यादिना ज्ञानेनाप्यक्षरसायुज्यसिद्धेः को विशेषः कृष्णाश्रय इति किमिति तस्यैव मार्थनमित्याशङ्कय तारतम्यज्ञानार्थं सर्वस्वरूपनिरूपणपूर्वकमर्थरूपत्वं वदन्तस्तं प्रार्थयन्ते- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं वृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ८ ॥ प्राकृता इति । यस्मात्सकला देवाः माकृताः सत्त्वाहकारमभवत्वात् । वृहदक्षरं गणितानन्दकं 'सैपानन्दस्य मीमांसा भवती' त्यारभ्य 'ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मण आनन्द' इत्यन्तेन ब्रह्मानन्दस्य गणितत्वात् कृष्ण एव हरिः सर्वदुःखहर्ता टिप्पणम् । ये त्वक्षरमित्यादिनेति । 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्य च कूटस्थमचलं ध्रुवम् । 'संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्रामुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः । क्लेशोधिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिखं देहवद्भिरवाप्यते' इत्येतेन तथेत्यर्थः । सैपानन्दस्येति । 'सैपानन्दस्य मीमांसा भवति । युवा स्यात्साधु युवाध्यायकः । आशिष्ठो द्रदिष्टो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुपा आनन्दाः स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामा- नन्दाः स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणा- मानन्दाः स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते थे शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः स एक आजाननानां देवानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमाजाननानां देवानामानन्दाः स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः, ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः स एको देवानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहः तस्य । ते ये शतं देवानामानन्दाः स एक इन्द्रस्यानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः स एको बृहस्पतेरानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः स एकः प्रजापतेरानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मण आनन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्पे'रयनेन प्रपाठकन .
प्रकाशतटिप्पणसहितम् । प्रकाश - - पूर्णानन्दश्र। पूर्णधासावानन्दथ, पूर्ण आनन्दो येन यत्र यस्मादिति या, तस्मात्कृष्ण एव गतिमास्त्वित्यर्थः । देवादिसायुज्येपि तेषां मकृत्युपधानेन तन्मुक्तेः सगुणत्वेन ' आनाम- भुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुने'तिभगवद्वाक्यात्पुनः संसारसंभयेनासानन्दत्वेन स्वर्गच- दमुक्तित्वात् । ज्ञानमार्गेझारमुक्तेनिर्गुणवेप्पारस्य गणितानन्दत्वेनापत्वात् क्षुधितस्यात्य- पभोजनपभोजनमेवेतिपदभयोजकत्वात् । अशरतार्थ स्वार्थक प्रत्ययेनाव्यक्तवं पुरुषो समापेक्षयाल्पतं च मूचितम् । पूर्णानन्दत्वेन निर्गुणाक्तिदायकत्वेन कृष्ण एव शरणं भाव- नीय इति सिद्धम् । तदुक्तं श्रीमदाचार्यचरणैः 'निर्गुणा मुक्तिरस्माद्रि सगुणा सान्यसे- क्य'ति । ननु 'ताविमौ ३ भगवतो हरेशाविहागतौ । भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरू- दहौ' 'कलाभ्यां नितरां हरे' इत्यादिनांशत्वायनाइहस्य च त्रिदिवेशादावपि पाश्वभौ- तिकवनपत्यनियमेन जन्मश्रवणाद सुखस्यात्मगुगत्येन भेदाय कयं पूर्णत्वं, कथं चानन्द- रूपत्वमानन्दवई नजनकर या परं वक्तुं शक्यमिति चेत् , मैवम् , 'ताविमारित्यादीना. मर्यानवगमात् । तथाहि भगवान् भक्तानापार्तिनाशार्य सुखदानार्थं च प्रकटः भुवो भार- व्ययायेहानयोः कृष्णार्जुनयोस्ताविमौ भगवतो हरेशौ चागतौ कृष्णयोर्यदुकुरुवाहयो पनि प्रत्वाद्यदुकुस्दहौ कृष्णौ च जातो, यत आगतो तत्र यदुकुरुद्वहत्वाभावात् । तत्सत्कार्यकर: णार्थ ज्युहेषु भगवनस्तत्तश्चापेक्षणादनयोरपि सङ्कर्षणांशत्वेन भूभारहरणार्थमपेक्षणात । अंशयोरेवावतारये पूर्णवायाये कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् 'वसुदेवगृहे साक्षाद्भगवान् पुरुषः पर''विदितोसि भवान साक्षात्पुरुषा प्रकृतेः पर' इत्यादिकं विरुध्येतात्र चकारश्च व्यर्थः टिप्पणम् । ब्रह्मानन्दस्य गणितत्वादित्यर्थः । पूर्ण आनन्दो येनेति । मर्यादापुष्टिस्थस्यैति शेषः । येनेति करणे हतीया । ननु करणस्य व्यापारवत्चनियमास्कयपस्य फलोपधानासाधारण- कारणत्वमिति चेत् । अत्रोच्यते, पत्र भगवान् साधनं कारपित्य फलं प्रयच्छति तत्र भागवतः करणत्य, प्रयोज्यमत्युपहिवायोक्तृधर्मस्य साधनकारयितृत्त्वस्य तजन्यत्वेन व्यापारत्वादिति । पूर्ण आनन्दो यस्मादिति । पुष्टिस्यस्पेत्यर्थः । हेतोनियापार- साधारणत्वात् । ननूभयोरपि मुख्यफलपासिवत्वेन को वा विशेषः पुष्टिस्यस्येति चेत साधनानपेक्षत्वस्यैव विशेषादित्यलं बहुना । तापिमावि' सारभ्य 'प्रकृतेः परः' इस तानि वचनानि साविमौ वै भगवतो हरेशाविहागतौ । भारव्ययाय च भुवः कृष्ण यदुकुरुतौ ' 'भौ भूः पकमस्याब्या कलाभ्यां नितरां हरेः' 'अन्ये चांशकलाः पुंस कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' 'वसुदेवगृहे साक्षात् भगवान् पुरुषः परः । जनिष्यते तरिमय संमवन्तु सुरत्रिय' 'विदितोसि भवान् साक्षात पुरुषः प्रकृतेः परः । केवलानुभवानर स्वरूपः सर्वबुद्धिमिति । चकारश्च व्यर्थः स्यादिति । 'भारव्ययाय च भुवः। -- २० कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। स्यात् । तथाचोक्तं श्रीभागवत'तत्त्वार्यदीपे, 'सर्वातिरिक्तरूपेण नरः स्वावेशधारकः । तपोऽतिरिक्तकाय तु पूर्णे कृष्णे न चान्यथेति। 'सर्वे'ति । व्याख्या तु 'सर्वकार्यकर्तृत्वात्स- वरूपो नारायणः । पुष्टिकार्यकर्तृत्वादतिरिक्तोवतारः । तत्राधिकारमाशय परि- हरति 'स्वावेशे'ति । नरस्तु तादृशमशं विभर्ति न त्ववतार इत्यर्थः । 'ताविमौ वै भगवत' इति मूलवाक्यं 'कृष्णस्तु स्वयं भगवाने तेन विरुध्यते इति समाधने 'तपोतिरिक्ते'ति । मार्गद्वयस्थापनार्थमवतीर्णोपि पूर्णमाकटयाभावे कार्य न सेत्स्यतीति पूर्णे कृष्ण एवं पविष्टावंशाविति मूलार्थ' इति । 'वभावि'त्यत्र कलाभ्यामंशाभ्यां भूर्वभौ हरेः सम्ब- धिनी भूः पदैरनुभावैलीलाभिश्च नितरां यभावित्यर्थ इति । अन्यथोक्तवचनविरोधात् । देहस्य पाञ्चभौतिफत्वजन्यत्वनियमस्य प्राकृतविपयवादमाकृते यथावेदमेवार्थसिद्धः, अन्यथा ज्ञानेच्छादीनामनित्यत्वनियमानित्यं ज्ञानादिकमपि तत्र न सिद्धयेत् । ननु ज्ञानादिभिरेव जगत्कर्तृत्वोपपत्तौ प्रत्यक्षवाधाच किमित्यानन्दमयो नित्यो देहोजीकार्य इति चेत्, न, कर्तृवनिर्वाहार्थमेव व्याप्तिवलेन नित्यज्ञानवत्तथाविधदेहस्वीकारान् । नित्यापरिच्छिन्नतनोः प्राकट्यस्यैव जन्मत्वेन जन्यवाभावात् । 'आनन्दादथेव' 'नित्य विज्ञानमानन्द ब्रह्म' 'स यथा सैन्धवचन: 'आनन्दं ब्रह्मणो रूपम्। 'आनन्दमयोभ्या- टिप्पणम्। भक्तातिनाशसुखदानादिकं चकारेण गृह्यते । तच पुष्टिपुरुषोत्तमकार्यमेवेति तदतिरिक्त- कल्पनायां चकारो व्यर्थः स्यादित्यर्थः । व्याप्तिवलेनेति । अन्वयव्यतिरेकव्याप्तिवलेने- त्यर्थः। तथाहि यत्र यत्र कठत्वं तत्र तत्र देहवत्त्वं यथा कुलालादावित्यन्वयव्याप्तिः। यत्र यत्र देहवचाभावस्तत्र तत्र कर्तृत्वाभावः, यथा मुक्तात्मनीति व्यतिरेकव्याप्तिरिति । न चाप्रयोजकत्वम्, देहवत एव कर्तृत्वात् , न ह्यशरीरी कुलालः शक्रोति कार्य कर्तुम्। वस्तुतस्तु आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः' 'सर्वतः पाणिपादान्त'मित्यादिविरोधः । 'अशरीरं शरीरेष्वि त्यादयस्तु पाञ्चभौतिकशरीरनिषेधपराः । न च त्रीहियववत् विकल्पसंभवः मेयापहारनिवन्धनाभावात् । ननु गीतायां चतुर्दशाध्याये 'नान्यं गुणेभ्यः कर्तार 'दा द्रष्टानुपश्यति' इत्युपादाय 'गुणेभ्यो नान्यं कर्तारमनुपश्यत्यपि तु गुणा एव माणि कुर्वन्तीति' श्रीधरस्वामिव्याख्यानाद्धेतुनिरूपितव्याप्तावप्यतिव्याप्तिरिति चेत् , अंत्र वदामः-गुणानामपि देहवत्त्वेनैव तथाकथनं न तु केवलतया । अत एवाग्रे 'गुणा- तीत्ये' त्यस्य व्याख्याने 'देहायांकारः समुद्भवः परिणामो येषां ते देहसमुद्भवास्ताने- स्त्रीनपि गुणानतीत्यातिक्रम्ये'त्युक्तं श्रीधरस्वामिभिरिति विद्वांस एवं विदाकुर्वन्तु । आनन्दमात्रे'त्यारभ्य 'मुदितवक्त्र' इत्यन्तानि वचनानि । 'निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्म- प्रकाशनट्टिप्पणसहितम् । मफाशः। . -- . सात् "माद च तन्मात्रम्' 'केवलानुभवानन्दस्वरूपः' 'आनन्दमानकरपादमुखोदरादिः' 'बहुनि सन्ति नामानि 'च्या घोपनिपशिष ' 'न चान्तर्न वहिर्यस्य'त्यादिश्रुति- न्यापपुराणवाक्यसहसः प्रमाणप्रकरणीयलीलाभिश्न पूर्ण एव देडमाणेन्द्रियान्तःकरणा- सरूप एवानन्दरूपो ज्ञानरूपः पुरुषोत्तमो न त्वात्ममात्रमिति निधिमयोधि । नित्य विज्ञानमित्ति 'पूर्णमेवावशिष्यते । 'भवानेका शिष्यते शेएसंश' इत्यादिना नित्यत्व, 'एप ोवानन्दयाती तिश्रुतेरानन्दजनकत्वम् । 'कृष्णः प्रीतमनाः । वीक्ष्यासीदु- तमा मोतिः' 'जातही 'मुदितवक्त्र उपयाती'त्यादिनानन्दवचं चेति नानुपपन्न किश्चित् । तथाप्यानन्दत्वदेहत्वयोबिरोध इति चेत्, न, स्वस्वाधिकरणे प्रमाणैरेकत्रो- भयोः सिद्धयसिद्धिम्यां च विरोधाभावात् । तथाप्यानन्दस्प धर्मिरूपये कथं धर्मरूपत्व- मिति चेत् स यया सैन्धवयनः ' ' या सर्वज्ञः' इतिश्रुतिभ्यां ज्ञानरूपत्वज्ञानाधार- त्वदानन्दरूपत्वतदाधारवयोरविरोधात् । श्रीमदस्मत्प्रभुचरणैः सर्वमेतद्यथा तथा विद्ध- मण्डने अपश्चिवमिति नात्र मपश्यते ॥८॥ टिप्पणम् । तन्नो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च होना । आनन्दमात्र सरसादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वग- तभेदविवर्जितात्मा' 'बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते । गुणकर्मानुरूपाणि वान्यहं घेद नो जना: 'अय्या चोपनिषद्भिव सांख्ययोगैश्च सात्वतैः । उपगीयमा नमाहात्म्य हरि सामन्यतात्मजमू ' "न चान्तन पहिर्यस्य न पूर्व नापि चापरम् । पूर्वापर पश्चिान्तर्जगतो यो जगच यः' नाटे लोके द्विपरावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन यात भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः' एवं वृन्दावनं श्रीमान् कृष्णः भीतमनाः पशून् । रेमे संवारयन्नद्रेः सरिद्रोधस्सु सानुगः 'चन्दावन गोवर्धनं यमुनापु, लिनानि च । वीक्ष्यासीदृत्तमा भीती राममाधवयोर्चप' 'सहवलः सगवतसविलासः सानु क्षितिभूतो नजदेव्यः । इपयन् यहि येणुदेण जातहर्प उपरम्भति विश्वम्' 'यदुपतिरिद राजविहारो यामिनीपतिस्वैिप दिनान्ते । मुदितवा चपयाति दुरन्त मोचक बनगवां दिनतापमिति ॥ ८॥ . मकाशा ननु विवेकधैर्याभ्यां स्थित्वा भक्तिकरणे भगवानपि को भवतीति किदि देन्येनाश्रयः प्रार्थ्यते इत्याशङ्कय सर्वमनोरथपूरकत्वात्सर्वकलाथै काम्यत्वात्कापस बदन्तरता भार्ययन्ते विवेकेति ।
૨૨ कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥९॥ पूर्व प्रभुस्वरूपविचारणाथयमुक्ता जीवस्तरूपविचारेणाधुनोच्यते । भगवान् स्वेच्छया सर्व फरिप्यति न मार्थनीय इतिनिधयो विवेकः । भक्तिविरोधिदुःखनि- वृत्युपायाकरणेन त्रिदुःखसहन धैर्यम् । भक्तिः साधनरूपापि । आदिपदात्पुष्पम् । विशेषत इति । तत्साधनैरपि रहितस्य । यद्वा, यत्किञ्चित्सवेपि विशेषतो नास्तीति न फलसिद्धिः । किञ्च, दीनस्य दरिद्रस्यातः सर्वसाधनरहितस्य । पापे आसक्त- स्येति विपरीतसाधनवतो न तु पापादिकपापस्य | कृष्ण एवेति पूर्ववत् । अन्यत्र यत्किश्चिद्वैगुण्येपि वैफल्यादेवताकोपादनिष्टजननादल्पदलायेशस्य विवेकादिकं दला स्वतो वा सर्वफलदायकः परमकृपालुः कृष्ण एवेति स एवाश्रयणीय इति हृदयम् । ननस्मच्छब्दस्योचारयित्वाचकत्वादनाचार्यनरणानां तयावाविशेषणान्यसङ्गन्तानीति चेत्, ने, अस्यान्यार्थत्वेनान्याधिकारेण कनाद्भगवता वेदेषु 'मयतपाणिः शरणं प्रपद्ये 'भूयिष्ठान्त नम उक्ति विधेम' 'स्वस्ति मेस्तु वनस्पते' इत्यादौ यजमानाधिकारेण कयन इवादोपत्वादिति सर्वमनवद्यम् ॥ ९ ॥ ननु सर्वथा निःसाधनस्य शरणागतावपि कथं सपी हितसिद्धिः, भगवास्तु तत्त- स्कृतिसापेमस्तस्मै तस्मै फलं ददाति, प्रत्युत भगवदेकशरणस्य तदेकमनसो देवान्त- रानादरेण तत्कृता अपि विनाः स्युः ‘श्रेयांसि बहुविनानी तिवाक्यादित्याशझ्य मोक्षप्राप्यत्वान्मोक्षरूपत्वं विज्ञापनं च बदन्तः. समादधते सर्वसामर्थसहित इति । सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धार कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ टिप्पणम् ।
मकाशतट्टिप्पणसहितम् । २३ प्रकाशन । सर्व पूर्ण सामर्थ्यं सर्वेषां सर्वेषु वा, तत्सहित इतीच्छपा स्वतोपि सर्व फरोति । यदि मर्यादा रक्षेत्तदा भगवत्वेन ज्ञानेश्वर्यधर्मादीनां सिद्धवारत्तदलापि तत्त- स्फलं दयात् । कदाचित्पूर्वस्थितमपि स्वस्मिनयेत् , सर्वत्र स्वस्यैव सापयति । 'यय- द्विभूतिमत् । पत्तः सर्व प्रवतत' इत्यादिवाक्यैः सबै सामर्थ्य येषां सुदर्शनादीनां तैः सहित इति या, तैरपि भक्तानिष्टनिवारणात, 'अव्याहतानि कृष्णस्येतिवाक्यात् , ननु सामथ्र्य सत्यपि कदाचिदाश्रितं न रक्षेव , मर्यादयैव वा यदि फलं दधाचदा किमानयेणेस्थत आहुः सर्वत्रैव देशेषु वर्णेपु आश्रमेषु कर्मादिषु पाखिलाकरोती- त्वखिलार्थकृत् ताच्छील्यादौ किए 'सकृदेव' 'ये दारागारपुत्राने त्यादिवाक्यः सदापि शरणागतं भगवान् रक्षति किं पुनर्भजनः । मर्यादयापि फलदानन्यनरपेक्ष्येण भजतो भावान्मर्यादानपेक्षा फलं प्रयच्छति, विहिलादिना भजतो मर्यादासापेक्षा 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इति तन्मादाया एव तादृशीखान्न इति । अत एव 'वन- स्योवाह वै हर्षम् ' ' चिक्रीटे जनयन्मुदम् । मनोरथान्त श्रुतयो यया ययुः 'मुकुन्दो. मुक्तिं ददाती त्यादि तथा न ते माधव' 'पयों मृत्युपालभीतः पलायन्', वसति मनसि यस्येत्यादिवाक्पैः कालयमादयोपि नेन्दगवदीयानिवर्तन्ते कुतस्तरां पुनरन्पे विश्नकार इति न किशिदूषणम् । पूर्वोक्तं शरणे स्थित सम्पानायासेनोहरति, सकदागतं तुपयाकयचित् । ईदृशं श्रीकृष्णमहमाश्रय विज्ञापयामि । 'कृष्णे तिसम्बोधनपाठे शरण- स्थसमुदार विज्ञापयामीत्यन्वयः । अनेनेश्वरे दीनभावः कर्तव्य इति सूचितम्, दीनभा- चेन कृतस्पैवेश्वरतोपहेतुत्वात् ॥ १० ॥ टिप्पणम् । 'ययदा'रभ्य 'अब्बादतानी'स्पन्तानि यचनानि यद्यविभूतिमत् सत्यं श्रीमदनि- नमेव वर । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेओशसंभवम् अई. सर्वस्य भभको पतः सर्व प्रव तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः' 'अव्याहतानि कृष्णस्य चक्रादी न्यायुधानि तम् । रक्षन्ति सकलापद्भ्यो पेन विष्णुरुषासित' इति । ताच्छील्या किविति । आच्छोलतद्धर्मतत्साधुकारिष्षितिस्मरणात् । 'सकदेवे'त्यार तत्तथा साधयिष्यामी'त्यन्तानां वचनानां सहा- सकृदेव अपनाय तवास्मीति याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्पेतहतं मम ''ये दारागारपुत्राममाणान् वित्ता, - परम् । दिवा मां शरणं याताः कथं तस्त्यिक्त्सह ', 'ये यथा मां अपश्यन्ते सास्त मृत्यवश्यताम् । अजस्योवाह य ह भगवान् वालचेष्टितः । ततस्तु भगवान् कर - दर्शयत्तद्विदां लोके आर २४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् ।. टिप्पणम् । वयस्यैत्रजबालकैः । सहरामो ब्रजस्त्रीणां चिक्रीडे जनयन्मुदम् ' 'तदर्शनाहादविधूत- हुदुजो मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययुः । स्वैरुत्तरीपैः कुचफुङमानितरचीयरूपन्नासनमात्म- वन्धये 'राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदनां देवप्रियः कुलपतिः कच किकरो वः। अस्त्येवमङ्ग भजतां भगवान् मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्दिचित् स्म न भक्तियोगम्' 'तथा न ते माधव तावकाः कचिद् भ्रश्यन्ति मार्गाचयि पद्धसौदाः । त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो' 'मयों मृत्युव्यालभीतः पलायन सर्वान् लोकान् निर्भयानाध्यगच्छत् । त्वत्पादानं प्राप्य यदृच्छयाय स्वस्यः शेते मृत्युरस्मादपैति "वसति मनसि यस्य सोन्ययात्मा पुरुपवरस्य न तस्य दृष्टिपातः । गतिस्थ मम वा तवास्ति चक्रमतिहतवीर्यबलस्प सोन्यलोकः ॥१०॥ प्रकाशः। 'दश वै पशोः प्राणा आत्मैकादश' इतिश्रुतेः प्राणानामिव सर्वसाधकत्वं ज्ञाप- यितुं दशभिः श्लोकैः स्तोत्रं निरूप्य फलस्यात्मवदक्षयत्वं ज्ञापयितुमेकादशेनात्मरूपेण- तत्स्तोत्रपाठफलमाहुः- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्ण आ समन्तात् श्रीयते सेव्यतेनेन, कृष्ण आश्रयो येन यस्मादिति वेति कृष्णाश्रयम्, इदमेव कृष्णाश्रयं यथार्थनिरूपकत्वान्नान्यत् । कृष्णसन्निधौ तनिमित्त वा, इदं यः पठेत् तस्य कृष्ण आश्रयो भवेत् । अत्र 'हेतुहेतुमतोर्लिङ्' मिति नान्यपाठेनेदं फलं, स्वरूपाज्ञानात् । नन्वल्पायासादेतस्तोत्रपाठमात्रेण कथमेत- त्फलं स्यादित्याशङ्कयाह:-श्रीवल्लभ इति । इदमब्रवीत् अवदत् । स्वस्य भगवत्स्व- रूपाभिज्ञत्वाद्भगवता सर्वोद्धारार्थ प्रकटितत्वादुद्धारकस्वरूपत्वाच नात्रामामाण्यशङ्का, नहि भगवान् सत्यवाक् स्ववाचमन्यथाकरोति । यत्र प्रसङ्गानारदकृतं 'तत्तथा साधयि- यिष्यामि यद्गीतं तन्महान्मने ति सदनुग्रहो भगवान् स्वकृतमिव मन्यमानः पुरुषोत्तमः स्वयं व गत्वा नलकूबरमणीग्रीवोद्धारं कृतवान्, तत्र स्वयं सर्वार्थ प्रकटितस्य स्वस्वरूपस्य तौ वचने वा किं किं न करिष्यतीति तत्कृपायां सर्वं भवतीति सर्वमनवद्यम् ॥ ११ ॥ टिप्पणम्। 'देवपि प्रियतमो यदिमौ धनदात्मजौ । तत्तथा साधयिष्यामि यदीतं तन्महात्मनेति' ॥११॥ १ श्रुतिपदं चिनास्ति । २ स्ववच इति पाठः कचित् ।'
मफाशतटिप्पणसहितम् । २५ प्रकाशा श्रीमलिनाथपादकमले संबन्ध भत्त्या मुदा कृष्णकामधियोय सातवरणान् तादृपितृव्यानपि । श्रीकृष्णाश्रयसंज्ञके स्तुतिवरे कल्पाणरायाभिधः श्रीगोविन्दसुतः प्रकाशमकरोट्रयान्मुदे सद्धियाम् ।। १.॥ इति श्रीविठ्ठलनाथचरणकमलैकनाननीकल्याणरायविरचितः कृष्णाश्रयस्तोत्रप्रकाशः समाप्तः ।। टिप्पणम् । दुरीकरोति विकटं किल सङ्कटानां सहूं विशंकटसरं वरसेवकानाम् । यत्पनरागमणिविराजमानं तदेङ्कटेशमुकुटं प्रकटं रटामः ॥ १ ॥ निखिलपण्डितमण्डलमण्डित हरिमुखानसरोरुहमारकरम् । अतुलमङ्गलनामविराजितं जनमनोहररूपमहं भजे ॥२॥ श्रीमत्कल्याणरापाणां नमस्कृत्य पदद्वयम् । कृष्णाश्रयमकाशस्य तत्मणीतस्य टिप्पणम् ।। ३ ।। गुरुथीवालकृष्णानापात्पजेन सतां मतम् । "कृतं गोविन्दराजेन नाम्ना ववनिरूपणम् ॥ ४॥ इति श्रीमत्कल्याणरायचरणकोकनदमधुपायमानान्त:करणतिघरो. पनामकनालकृष्णमहात्मजगोविन्दराजकृतं तत्वनिरूपणाभिधं कृष्णाश्रयप्रकाशटिप्पणं समाप्तिमगमत् ।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमहारिकेश्वरचरणप्रणीतविवृतियुतम् । पशुपतिकृतिभिर्ये भ्रंशिता मुग्धचिना- स्तदनुस्तकृतीन् स्वाज्ञानतः पातुमिच्छन् । अवददविकृतं यः स्वागर्म सर्वभद्रम् तमहमतिदयालु घल्लभारुयं नतोस्मि ।। १ ।। विरचिकृष्णनारदैनिरूपितभृशं सदा चिरन्तनीयसाधनैर्विसम्मतं कलिं विभुः । विलोक्य सर्वतोधिकं निजागर्म ततान यः सदा सुसंमतं सतां विशेपतः कलौ युगे ॥२॥ ननु साक्षात्परम्परया च भगवत्माप्तिसाधनानां बहूनां विद्यमानत्वात्तानि विहाय किमित्याश्रय एव वोध्यते, किञ्च, क्रमेण नवविधलीलाप्रवेशज्ञानानन्तरं द्याश्रयस्तज्ज्ञानं चा स्वत एव भविष्यतीति किमिति तत्प्रतिपादकं स्तोत्रमुच्यते तत्राह-सर्वमार्गेप्विति । सर्वमार्गेपु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ तथापि निरोधस्य सर्वापेक्षया वरीयस्त्यान्मुक्तेरपि लोके तथात्वात्किमिति तौ विहाया. अय एव निरूप्यते अत्रोच्यते 'आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते । स आश्रयः परं 'म परमात्मेति शब्यते 'या या साधनसंपत्तिः पुरुषार्थचतुष्टये । तया विना तदामोति ही नारायणाश्रया' 'सर्वमाश्रयतो भवेदित्यादिवाक्यैराश्रयस्यैव सर्वसाधकत्वेनोक्तवा- सर्वसाधनफलरूपाभ्यां स एव परिणत इति तमेवाह-कृष्ण एव गतिर्ममेति । गतिशब्दः क्रियावाचकः, तेन गतिरित्युपलक्षणं किन्तु स एव भक्तिमार्गनिर्वाह- तबन्धनिवर्तकतया परमभक्तिमतिपादकसाधनीभूततनुवित्तजादिप्रतिपादकशरीरतन्नि- कक्रियारूपो भवत्तित्यध्याहारः । कयश्चित्पूर्वमाश्रयोन्मुखं ज्ञात्वा पश्चाजीवैस्तदा-. - श्रीमहारिकेश्वरचरणमणीनयित्तियुतम् । २७ अपः कर्तव्य इति नार्थः, सर्वतः साशन कार्यसिद्धयभावं निचित्य स्वस्मिय तयाव- निश्चये सत्यस्माकं सर्वया लौकिकालौफिकफलसापकोऽस्मत्कृतिनिरपेक्षः स भक्त ! तयाभवनं तु तदिच्छासाध्यम् । भगवानाश्रयो भवतु मा वा, अस्माभिस्तदानयैः सर्वथा भाग्यमेवेतिनिधित्यायः सर्वथा कार्यः । एवंअपनानामाश्रया सर्वया भवत्येव, अन्यथा 'अनन्या' इति न मे भक्तः मणश्यति' इनिभाद्रवं भज्येत । एवं सति सर्वेफलरूपरत्व- याऽऽश्रयणोक्या साधनीभूतः क्रियते ततोधिकस्य फलस्याभावात , प्रत्युस 'पृश्चिकमिये- तिन्यायेन स्वरूपदानिमसझा स्पादत्र ब्रूमः-कृष्ण एय गतिर्ममेति । एवंच परमभक्तिस्तु 'कृष्णकालिका तदनुमईकलभ्या च, तथासति तसिद्धिप्रतिबन्धनित्तिपूर्वकं तत्सिद्धी तत्साधनादिनिर्वाहकसायनतामापनो न हीनतामापयते । यथा--'योगमायामुपाश्रित' इत्पन्न रसमार्गअन्तरङ्गाश्रयणं न दोपाधापकं तन्मार्गस्यैव तयात्वात् । एवं भक्तिमार्गीयसशसाधने भगरत्तो न साधनरूपत्वमापयत इति सिद्धान्तः । यथा भर्ता सन् भ्रियमाणो विभती स्पन भगवतस्तत्सम्बन्धिनां च परस्परमाधाराधेयभावे पोप्यपोपकभावे च नोभपोमध्ये कस्यापि हीन किन्तु तदेकपोपकत्वं तदेकपोप्यत्वं च भावत कपाधायकं, एवं तन्मार्गपक्षपाताब्यक्तिमार्गे सर्वांशेन फलस्त्रमायनस्य स्वस्य साधनतास्वीकारो न हीन- त्वसंपादक इत्येवमभिसंधायाचार्यरक्तमितिभावा । धर्मादीनां व स्वसाधनसहितानामेन फलसायकत्वं, तन्न देशकालाइयो धर्मसापने तेपामिदानीमतथालं सर्वथा निरूपयन् पूर्व कालस्यातथालमाह-सर्वमार्गेषु मटेष्विति । कलौ सर्वेषु मार्गेषु नयेषु सत्सु देवैः कृष्ण एप गतिर्ममत्येवरूप आश्रयः कर्तव्य इति भावः । मार्गोत्या तेषां सालानां स्वस्था. धिकारानुसारेण फलमापकत्वं निरूप्यते । नाशस्तु तेषां सर्वथा फलासाधकत्वरूपः । फलों उत्तम्मा किञ्चिदुत्तमानां तद्विध्याचरणेपि तत्फलाभाचे दृष्ट्वान्येपामनुपलब्धिप्रमाणेन ! ततो विश्वासापरमाद्वातोपि तदापरणपरम्पराया नाशः स्यादितिभावः । ननु सत्य- युगादीनां यथा धर्मसापकत्वं ततस्यापि तथावे को दोपः कालत्वस्याविशेषादित्यत' आह खलधर्मिणीति । खलाः सर्वया वाह्याभ्यन्तरभेदैन धर्मादिकृत्यनुसन्धानरहिताच. अनुसंधानेपि द्वेपार्थमेव तदनुसन्धान, न च स्वस्थान्येषां वा चिकीर्घायुदिननकत्येन, अत एव 'नन्तं गोमिथुनं पदेति तस्यासाधारणो धो निरूपितः । ननु सर्वया धर्मा स्यक्तारः केचन भविष्यन्ति न तु सर्वे तेन तदुत्त्या सर्वे कथं तादृशा भविष्यन्तीत्य माह पापण्डप्रचुर इति । येपि लोके सन्मागांधावरणं कुर्वन्ति महान्तोपि तेपि मार मनुसत्यैव कुर्वन्ति, अन्यया तदा लोके पूज्यत्वं न स्यात् । पूर्वमपमाधुर्य तत्र - भावेष्यन्यानुरोधेनाप्यन्यथाचरणे स्वबुद्धिरपि तथैव जातेति सन्न स्वयं श्रद्धालको भूत न्येपामपि तथात्वं संपादयन्तः पवारयक्तहियो भूत्वा सुखेन तयाकुर्वन्तीति भावः २८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एतेनान्यानुरोधेनापि सन्मार्गत्यागः योन्यया सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणे तिन्यायेन सर्वथा स्वनाशक इति ज्ञापितं भवति । तेन मावाहिकभक्तिमागोंपि नष्ट इति ज्ञापितम् । चकारः समुचयार्थः । तथाहि-माश्वि सर्वे नष्टास्तादृग्या कलियाविर्भूतः, लोके पापण्डश्च प्रचुरः । एवं सर्वथा सर्वनाशोप- स्थितौ विविधशङ्कास्पदीभूतान्तःकरणान् स्वानुपदिशन्ति श्रीकृष्ण एव गतिर्ममेति । अवतारान्तरं तु मर्यादाल्पमित्येवं निःसाधनानां धर्मादिमतिकूलसाधनवतां वा सर्व प्रतिबन्धनित्तिपूर्वक 'तबास्मी'त्युक्तिमात्रेण भक्पैफलभ्यः पुष्ट्रिपुरुषोत्तम एवोद्धारं कर्तु शक्त इत्येवकारेणांशकलायतारव्यवच्छेदपूर्वकं कृष्ण एव गतिर्ममेत्युक्तमेवमपि ज्ञेयम् । एवं कालस्य धर्मादिविरोधित्वमुक्त्वा देशस्यापि तथात्वमाह-म्लेच्छाका. न्तेष्विति । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ यथा कालत्वस्याविशेषेपि सत्यादिरूप एव कालो धर्मसापको भवति तथा देशत्वस्याविशेषेपि तीर्थादिरूप एव देशो धर्मादिकरणे साधनीभूतः । तीर्थमपि जल- स्थलभेदेन द्विविधं, तत्र पूर्व पुण्यक्षेत्रादिरूपस्य देशस्य पूर्ववदतथात्वमाह-म्लेच्छा: क्रान्तेष्विति । साक्षात्परम्परया च देशाः सर्वे म्लेच्छः आ-समन्तात् क्रान्ताः। तचत्पु- ण्यक्षेत्रादिधर्मस्थानेषु तद्धर्मापगमार्थ द्वेपेण विपरीतकृतिपूर्वक स्थितिराक्रपणम् । कुत्र- चित्पुण्यादिभूमौ साक्षात्तत्रोत्पन्नविषयभोक्तारो भूत्वा तत्रैव तिष्ठन्ति कुत्रचित्तत्सन्नि- हितेषु । एवं तेषां साक्षास्थित्या स्वोत्पन्नविषयाणां तदेकभोग्यत्येन च सर्वदेशानामधर्म- साधनत्वं जातम् । सर्वथा म्लेच्छीयत्वात्तेपाम् । म्लेच्छा अनाविष्टाः सन्तः सर्वथा धर्मा- दिविरोधिनः कलहप्रियाश्च 'मनसा वचसा कृत्या सद्धर्मपरिपन्थिनः । म्लेच्छदेशेषु संजाता भक्ष्याभक्ष्यविचारकाः' । ननु तत्रोत्पन्नाः सर्वे न तथाभूतास्तद्विपरीतानां बहूनां श्यमानत्वात् , यथा म्लेच्छसंसर्गात्सर्वोपि देशोऽधर्मजनकतां यात एवं तद्विपरीतधर्मवतां 'जातीयानामपि संसर्गा'संयोगपृथक्त्वान्यायेन देशव्यवच्छेदेन कियदेशेषु धर्मसाधनता- स्त्विति चेत्तत्राह-पापैकनिलयेष्विति । सर्व एव देशाः पापैकनिलया जाता: पानामेको निलयः स्थानं तादृशा जाताः । तेन कुत्रापि धर्मवार्ता न श्रूयते । यद्वा शास्त एव महीभोक्तारस्तदेकनिलपत्वात्तथा । येपि तद्विपरीतधर्मास्ते तु पूर्वजन्मनि गवा भूत्वा वेदनिन्दां कृतवन्त इति तादृशेषु जन्म प्राप्तवन्तोपि सत्स्येव पविष्टा तेषु । तेन सतामिव तेपामपि धर्मादिनियन्तृत्वाभावः सूचितः । ननु तदाक्रा- . श्रीमहारिकेश्वरचरणमणीवविधतियुतम् । २९ लेवपि देशेषु चातुर्यस्पापि विधमानत्वाझोक्तृत्वपतियोगित्वेन त एव सतां धर्मादि- प्रवर्तने सहायाः कथं न भवन्तीति चेत्तत्राह-सत्पीडेति । चित्तस्यैये हि सर्वेषां स्वध- मांनुसन्धान भवति । सतां चकारात्तदनुवर्तिनां च पीडया सर्व एव लोका ध्यमाः । सता मसले पीडासंभवातदभावे धर्मादि सिद्धधभावायग्रता । तयासति कि कर्तव्यमित्या- काहायामाह-कृष्ण एवेति । सर्वथा साधनाभावादमाभावेपि भक्तिवत्कल्पतरुत्वमा- चत्वेन सर्वधर्ममागायफलतोप्यधिकफलपापकत्वेन श्रीकृष्णा एव गतिर्ममेत्येवरूप आश्रय एव सर्वथा कार्य इत्याचार्याणां परमोक्तिरिति भावः ॥ २॥ एवं स्पलादिरूपतीर्याणामनथात्वमुक्तया जलादिरूपाणामपि नेपामतयात्वपाह---- गङ्गादितीर्थवर्यपु दुष्टेवावृतेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३ ॥ गणादितीर्थवष्विति । ननु 'गङ्गागलेती'त्यादिनोक्तमाहात्म्यवतां गादीनां विद्यमानत्वात् कथं संसर्गदोपा बाधन्ते तत्राह दुष्टैरिति । नहि गङ्गासमं तीर्थम्' 'या के लसदित्यादिना न सर्वेभ्यस्तीर्थेभ्यो गङ्गाया एव वरीयस्त्वस्योक्तत्वादतीर्थानपि तीर्थी- कुर्वन्ती गर गच्छति । एवंविधान्यतयाजातानि । किञ्च, अस्ति गङ्गायां विरूपत्वमा- घिदेविकादिभेदेन । तत्र तीर्थरूप तु दुष्टसम्बन्धादेव नष्ट, तथाहि भगवता 'वं च रुदैत्या- दिवाक्यनगन्मोहनार्थ पशुपतेः भवर्तितत्वात्तत्र यया सर्वे जीवन्तो मुमूर्पन मुग्धा भवन्ति तदर्ध सर्वथा चित्तशुद्धयभावसानीभूततीर्थसम्बन्धाभावार्थ शिवेन स्वगणा गङ्गादिपु स्थापितास्ते तु गणशस्तिष्ठन्ति तत्रत्यानां प्राणापगमे यथा तीर्थसम्बन्धो भवति तथा ते यतन्ते । तत्सम्बन्धात्तीर्थरूपमेव नष्टैं, तथाचोक्तं तैत्तिरीयक 'ये' तीर्थानि प्रचरन्ती'त्यादिना । अत एव तत्र मृतानामपि न तीर्यपरथफलमन एव तत्र मृतास द्रपिशाचं ते प्राप्नुवन्ति न दोपादिनिवृत्तिः काश्यादिपु गुणां मनुष्या मारभ्य तिरक्षामपि । ननु तत्र सूतानामपि तारकब्रह्मोपदेशं शिवः करोतीति तथा सति कथं जलस्थलरूपाणां तेषां न शुद्धिसाधकत्वं, सत्य, तत्तु पूर्वोत्तय वकालाभावे न तु तद्वति । यद्वा 'लं वेतिभगवदुक्तः पूर्व शिवस्तथाऽकरोत्तदनन् तयाकरणे आशाभङ्ग एवं स्यादिति न तथा कृतवान् । तथापि निदर्शनस्यैदानी दृश्यमानत्वात्कथं न करोतीति तर शियोपि वैष्णवत्ताद्भगवत्सम्बतमेव सर्व करोति किच, तथोपदेश कुर्वन्नपि पूर्व वैष्णवस्थेष्यसत्सङ्गेनापराधाद्वा दैत्यापेशे नाते स्वस्था माहात्म्यार्थमागन्तुकदोपपरिहारपूर्वकं पूर्वरूपज्ञासंपादकल्पेन भगवद्धर्माभितयार र ये तीर्थानि प्रचरन्ति सकावन्तो निषङ्गिणाः । य एतायन्वश्च भूयासच दिशो रुद्रा वितरित न ३० कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एव तारकब्रह्मोपदेशं करोतीत्यर्थः । अत एव 'प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपरा- छमुखम् । न निष्पुनन्ती'त्यादिना भगवद्धहिर्मुखस्य पवित्रीकरणसामध्ये तीर्थादिष्वपि नास्तीति जातेपि तत्सम्बन्धे न कृतार्या भवन्तीत्यर्थः । तथा चोक्तं निवन्धे 'तीर्थादावपि या मुक्तिः कदाचित्कस्यचिद्भवेत् । कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति विनिश्चय' इत्यादि सर्वमनवद्यम् । ननु गङ्गादेराधिदैविकरूपस्य विद्यमानत्वात् कथं तादृशैरावरणं तीर्थ- रूपनाशो वा भवेत्तत्राहुः तिरोहितेति । जलस्थलरूपेभ्य आधिदैविकं तिरोहित तस्मादृष्टसंसर्गे अक्षरात्मकमपि तथैव जातम् । एवं सर्वेषां सर्वसाधनापगमे आश्रय एव साधीयानिति तमेवाहु:-कृष्ण एवेति ॥३॥ तथाप्यन्तरङ्गवहिरङ्गभेदेन सर्वधर्मप्रवर्तकानां सतां विद्यमानत्वात्कथं धर्मादि- नाशः स्यात्तत्राह- अहङ्कारविमूढेषु सत्तु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अहङ्कारविमूढेष्विति । यदि तेपि तथाभूता भवेयुस्तदा कार्य सिद्धयेदेव तेषां स्वरूपमाह-परीक्षिति यस्मिन् विद्यमाने तच्छरणागतौ कलेरध्यवसायो जातः स एवाहङ्कार इदानीं सत्सु प्रविष्टः । यथैतत्सम्बन्धात्परमधार्मिकस्यापि विष्णुरातस्य कले: स्थानदानेन त्रिदोपोत्पत्तौ मौढ्याद्राह्मणातिकमे बुद्धिर्जातवं सतामपि तत्सम्बन्धात्स्व- धर्मपरित्यागे युद्धिर्जातत्यहङ्कारेण सर्व एव मुग्धा जाताः । एतेन कर्तृणामप्यसाधकत्वमुक्तं भवति । यदि कार एवाहङ्कारेण विमुग्धा जातास्तदा तत्कृतौ धर्माद्यसाधकत्वं किमाश्चर्य- मिति कैमुतिकन्याय उक्तो भवति । अल्पमौढथे प्रकारान्तरेणापि तदपगमः स्यात्तद- भावार्थ विशेषेण मूढत्वम् । तत्र निदर्शनं पापानुवर्तिष्विति । पापा निपिद्धकृतिभि- संत्फलरूपता प्राप्तास्तदचविषयभोक्तृत्वेनानुवर्तित्वम् । ननु तेपि स्वोपजीव्यान् परम- संजदिकं वोधयन्त इव दृश्यन्ते कथं ते तादृशास्तत्राह लाभेति । लाभार्थं या पूना त्यामेव कृतप्रयत्ना न तु भगवत्कीर्तनादौ सन्तुष्टाः सन्तः परस्परं पूजयन्ति, तादृशी नापेक्षिता । यद्वा, स्वलाभार्थं स्वपूजार्थं च यत्नो येषामेतेनैतादृशकर्तृणां मन्त्रादीना- सत्त्वाव्याणामप्यसाधकत्वमुक्तम् । अत्र कर्तृणां तदनुवर्तिनामेव द्रव्यादीनामसाधक- पूर्व कर्तृणामसाधकत्वमुक्त्वा पश्चाद्रव्याणामुक्त, निमित्तोक्तौ नैमित्तिकोक्तिरपि सङ्ग- ते । तेन 'स्वयं नष्टः परान्नाशयती तिन्यायेन सतां परम्पराप्येवंरूपैव जाता। यदि तेन श्य परस्य वामुष्मिकं सिद्धयेत्तदा ते सन्त एव भवेयुः । वृत्यर्थ तेषां तत्करणात् "भाशया च गृह्णन्ति मम.नामानि चार्जुन । अमुख्यास्ते जनाः पार्थ दूरतः परिवर्जयेत्' + ...
* श्रीमद्यारिकेचरचरणमणीतविकृतियुतम् । ३१ इत्यादिवाक्यैस्तेपामतयावपतिपादनाध्यजिवत्तकृत सर्वपकृतमार्य भवतीत्येवलप- सर्वनाश उपस्थिते सर्वेषां सर्व कार्यमापक आश्रय एवाचापरुपदिष्ट इति तपाइ कृष्ण एवेति ॥ ४॥ ननु गोपालादितान्त्रिकयैदिकमन्त्रहरिदिनवतादीनां विद्यमानत्वाचेपां च सर्वधा शोषकलात्कथं न तैरतेपा पूर्वरूपत्वं तबाह-- अपरिजाननष्टेषु मन्त्रेष्ववतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ५ ॥ अपरिज्ञाननऐपियति । तेषां परितो ज्ञानमङ्गान्युररीकृत्य फलपर्यन्तं स्वरूपनि- र्धारः । किञ्च, गोपालादिमन्त्राणामपि वाराङ्गनावशीकरणादिकं फलत्वेन श्रूयत इत्यम- योपशमं सामाक्तियोगमधोक्षजे' इतिवचनाद्भगवन्मन्त्राणां विषयादिषुपयोगोऽपरि- ज्ञानादेव भवति तेनानर्थोपशमस्य भक्तियोगस्य विषयाशुपयोगे जाते नष्टत्वम् । गुरु- मुलायासब्रह्मचर्यशूद्राश्रवणानध्यायरादित्यपूर्वकपटितानां वेदमन्त्राणां अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पाक' इतिन्यायेन सम्यकतात्पर्याज्ञानेप्यध्ययनमात्रेणैव सर्व साधकलाकथं नष्टत्वं तबाह-अवतयोगिष्विति । व्रतेष्वपोगो येषां, बतानामयोगो येपिवति वा । 'अधुना ह्यधिकारान्तु सर्व एवं गताः कलौ' इतिवचनाकृतानामपि चेपामतयोंगित्वम् । ननु किमित्यायासपूर्वक कर्मवनादीनामसाधकत्वं साध्यते, किञ्च, 'दानवततपोहोम जन्मान्तरसहलेवि त्यादिवाक्यैः कर्मवतादीनां भक्तावपि साघ- कत्वं मन्तव्यं, तेन 'प्रक्षालनाद्धि पकस्य दूरादस्पर्शनं वरमितिन्यायेन पूर्वमेव तेपाम.. सांधकत्वं न वक्तुं वाक्पमिति चेचत्राह-सत्य, तानि वाक्यानि पावाहिकपक्तिपराणि नो न रोधयचि मां योगो न साधं धर्म उद्धय । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापू न दक्षिणा माहि पार्थ पपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्त शूद्रास्तेषि यान्ति पर गतिम्' 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहु श्रुतेने त्यादिश्रुतिस्मृतयश्च न सङ्गच्छेयुः । भक्तौ भगवदिच्छैकसाध्यत्वं धर्माध्यत श्रीमत्स्वामियरक्तिहेतुनिर्णये प्रपञ्चितमस्तीति नात्रोच्यते । तेन पुष्टिभक्तौ तु रोधयति मां योगो न सायं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यया भक्तिममोनिता मदान न तपो नेव्या न शौचं न प्रतानि च मीयतेमलया भस्या हरिरन्यद्विडम्बना, 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरण मजा 'नाई येदैर्न तपसे त्यादिवाक्यसहस्रीभगवदाई कृतानाभव तत्माप्तिः । तस्माद्भगवदाश्रये कर्मादीन्यमयोजकानि । ननु तावत्कर्माणि कुर्व नयेत यावते त्यादिवचनैर्भगवदीयानामपि नित्यनैमिचिकत्रतादिकरणपाय, - N ३२ 'कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । तत्र वेदसाधकत्वं वदति भगवान् तदा भगवदीयानामपि नित्यनैमित्तिकफर्मादिकरण, मेकादशीनन्माष्टमीयतादिकरणं.च व्यर्थमिति चेत् , न । तत्र पूर्व भगवदीयानां कर्मत्र तादीनां स्वरूप वक्तव्य तदेवाहु:-'यक्ष्ये विभूतीभवतस्तत्संपादय नः प्रभो' 'यत्करोपि यदनासि यन्जुहोपि ददासि यत्' इति । तेन भगवदीयकृतकर्मणां 'यस्य स्मृत्ये. त्यादिवाफ्यैः पूर्णत्वमन्येपामपूर्णत्वादसाधकत्वम् । तेन स्यमागीयाणां तेषां तेभ्यो भेदः सूचितः । वस्तुतस्तु पत्र विकधैर्यभक्पादिरहितानामपि तत्माप्तिस्तत्राकामतयापि कृतानां कर्मवतादीनामसाधकत्वं किमाचर्पम् । एतेन सर्वसाधनरहितानामेव भगवदाश्रये मुख्याधिकार इति ज्ञेयम् । तेन तेषां सपरिकराणां ज्ञानामा त एव नष्टा जाता इत्याह नष्टेष्विति । ननु तदधिष्ठातृदेवतानां तद्रूपतापनकलभ्यासादानां विद्यमानत्वात्कथमप- रिज्ञानं नाशो वा भवेत्तत्राह-तिरोहितेति । अर्थरूपा देवास्तेभ्यस्तिरोहिता जातास्तेन गतसाराः सन्तस्तेपि तथैव जाता इति भावः ॥ ५॥ ननु तान्त्रिकमन्त्राद्यभायेप्यनिहोत्रचान्द्रायणकृच्छादिनां विद्यमानत्वात्कथं न कार्यसिद्धिस्तवाह- श्रीमद्वारिकेश्वरचरणप्रणीतवितियुतम् । ३३ पत्नस्तद्रूपत्वमेव स्यात् । एचमखिलकर्मवतानां पापण्डै कमयत्नरुपाये जाते ब्रह्मतत्राणा- मप्याश्रय एव साधीयानित्याह-कृष्ण इति ॥ ६॥ नन्येवं सर्वथा सदोपाणां तृतीयकमार्गप्रवेशयोग्यानां गतिर्ममेत्येवरूपोक्ति पात्रेण कथं भगवान् सर्वनिरपेक्ष आश्रयो भवेत्तत्राद- अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापितासिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७॥ अजामिलादिदोषाणां नाशक इति । ब्रह्मादे भगवतः सर्वाश्रयत्वेपि साये भक्तिमागीयानयस्य जीवानां सर्वथा कर्तव्यत्वादाश्रयभवने महानुत्साहो भवति । यथा स्वनाममाहात्म्पल्यापनार्थ नामोक्तिमात्रेणैवानामिलादीनां सर्वदोषनाशको जाता धर्म- पक्षातादेवं भक्तिमार्गे पक्षपातासन्मागीयाश्रयमाहात्म्यख्यापनार्य ताहगुक्तिमात्रेणैव, भगवास्तथाविधो भवतीति भावः। तथापि क जीवाः क्षुद्रतमाः क वा ब्रह्मादिदुर्लभकथो भगमानित्यायमवननिश्चयाभावे कथं या तमुद्दिश्य तथोक्तौ प्रतिरपि भवेतबाह- अनुभवे इति । अवारमच्छब्दोध्याहर्तव्यः । एवमाश्रयभवनोन्मुखो भगवान् मदनुभवे स्थित इति निर्णीतार्थोई बदामीत्यज्ञानान्यथाज्ञानमतिकूलतकै न्यथा शङ्कनीयमिति भावः । चित्तस्यातथापि निरन्तरं वदनुसन्धानपूर्वकमेतदुत्तौ सत्या मदनुभूतो भग- वानप्यनुभशरूढो भवतीति मदीयैरतदेव सर्वथा कार्यमित्यलं विस्तरेण । ननु यथा कली श्रुत्यादिभितिमाहात्म्या अपि धर्मादयो नष्टा तथा 'कलौ दशसहस्राणि विष्णुस्त्यक्ष्यति मेदिनीम् । तदई जाह्नवीतोप तदर्दू ग्राम्यदेवता' इत्यादिना वाहतो भगवसान्निध्या- भारे नमाहात्म्यमपि तिरोभूतं भविष्यतीति कयमज्ञातपाहात्म्यास्तदायोक्ती महत्ता भविष्यन्तीति चेत्तत्राह ज्ञापितेति । ज्ञापितमखिलमखिलेभ्यो भक्तेभ्यो वा श्रुतिपुराणक्ष भागवतादिना साक्षात्परम्परया वा माहात्म्यं यस्य येनेति वा । तथाहि तस्मादा एनस- दात्मनः' इत्यादिनाऽखिलेभ्यः सृष्टिकर्तृत्ववोधिकया श्रुत्या माहात्म्यख्यापन प्रवृत्तिपराणां कर्ममाहात्म्यरूपमेव भगवन्माहात्म्यज्ञापनं तत्रैव पर्यवसितमतित्वात सेव ज्ञानिनामुपासकानां च । भकानां तु साक्षादेव यथा 'जम्भतो ददृशे इदम् यथा गरिमाणं शिशोवों? न सेहे गिरिकूटवत् ' एवमूयमुरुधा सर्वन ॥ ७ ॥ मनु 'आकाशात्पत्तितं तोयं ययेत्यादिनोक्तप्रकारेण देवनान्तरं भजतामपि सः मुक्तौ भगवरसम्बन्धो भविष्यतीति किमित्येवं निन्थेनाश्रय एवोच्यते तबाह- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ८ ॥ - कृष्णाश्रेयस्तोत्रम् । माकृता इति । ब्रह्माणमारभ्य सर्व एव देवाः माता आधिभौतिकान्तःपा- तित्वात् । वृहदक्षरं गणितानन्दकं स्वार्थे का प्रत्ययः । तेन जीयेपु निरानन्दहंतूनाम- गणितानां विद्यमानत्वायत्र गणितानन्देपि न तेपामानन्दपूर्णता तत्र प्राकृतः कः पुरुषार्थः सिद्धचेत् । तथापि विराडक्षरयोरपि तदात्मकत्वाविशेपेण कार्यसिद्धपभावे कथं मुलाश्रय- णेन सर्वथा तद्भवत्येयेत्येवं निधीयते तबाहः-पूर्णति । नहि प्रयोक्तः करप्यानन्दः पूर्यते । नत्र दुःखापगमामात्र पूरितोप्यपूरित पुन स्याचार-हरिरिति । यद्यप्यस्यैवानन्दस्या- न्यानि भूतानि मात्रामुपजीयन्तीत्यादिना देवेष्यपि तद्वत्वमस्ति तथापि न तथा तेपा• मन्यपूरकत्वं तदल्पीयस्त्वात । निरवधिदारिद्यस्य साधिधनेनापगमस्याशक्यतादेवम- पूर्गानपि प्रतिबन्धनित्तिपूर्वकं कृष्ण एवं पूर्णान् करोति । ' सत्यमानन्दनिधि भजेते सिन्यायेन स एव तथाकर्तव्य इति दिक् ॥ ८ ॥ ननु भवद्भिरेव भत्त्युत्पत्यर्थं तहान्याध वा विवेकवैर्याश्रयाणां निरूपितत्वात्कथमि- तरनिरपेक्षः स एवोच्यते, किश्च, आश्रयरक्षायाध तदुभयरक्षानन्तरं च भवद्भिरेवोक्त लात्कथं श्रीमतामेव वाक्यं विसंवादि भवतीति चेत्तवाह-- विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ - --- श्रीपहारिकेचरचरणमणीतविष्टसियुतम् । णामप्यकारणं तत्र तत्करणे तदाश्रयस्य विद्यमानत्वादन्याश्रये - जाते भगरदाभयानु- सचिः स्पादतो यथा धर्मादित्यागस्तथाऽधर्मस्यापीति भावः । तहि पूर्वकालपमनुपपन्न- मिति चेत्, न, अनश्वोधात् । तथाहि 'एवं सति धर्मादिभतियोगित्वं कलौ सुलभ- मित्याश्रयाधिकारस्य · बहुधा विद्यमानता देतस्पायपर्यः-विवेकमायादिसहितास्तु कलौ दुर्लमा पापकारस्तु सुलभा इति तदाधिकारस्प बहुधा विद्यमानत्वम् । ननु धर्मकर्तारस्तु सर्वथा नमानधिकारिणः परमधर्माकार एवाधिकारिण इत्यायातमिति चेत् ? तत्रोच्यते । धर्मादिमतां विवकर्यभक्तिमतां चेत्तयागपूर्वक केवलाभयकरणं सहसा न भवति तेषु समीचीनत्वयुद्धः । यथा मभुणा सर्वधर्मत्याग उपदिष्टे पार्थस्य दरकरणे शोकोत्तौ पुनः प्रभुणैव 'पापेभ्यो मोक्षयिष्यामी'त्युक्तं, नोचेच्छरणधर्मे तद्- संभवात्तन्मोचनकपनमनुपपन्नं भवति तथैवैतपामपि शोकसंभवः । परं तद्विपरीताता तु प्यसबुद्धया निस्साधनेष्वेव श्रीगोकुलेशाङ्गीकारभाचुर्याचद्रलाच तत्यागः सुलभ इति सुष्टुक्तं 'धर्मादिमतियोगित्वमित्यनेनेति सर्वमनवयम् ॥ ९ ॥ ननु 'श्रेयांसि बहुविनानी तिन्यायेन प्रतिबन्धकानां दृष्टादृष्टभेदाभ्यापुरुषा विद्यमानत्वात्तयमुक्तिमात्रेण चालिएकर्मा भगवानाभयो भवेत्तवाद- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वसामयंसहित इति । कर्तुयकर्तुमन्यथाकतसामादिरूपैः सहिसः । ननु तत्र दृष्टान्तनिदर्शनस्यादृश्यमानत्वात्कथं ज्ञायते तबाह सर्वत्रेति । सर्वत्र योग्या- योग्यविचारेगाखिलानामखिलान् वार्यान् करोति करिष्यत्यकापादित्यादिधर्मस्पाविना शिवेन भावति सर्वदा विद्यमानत्वादाश्रयकरणे कोनव्यवसाय इत्यर्थः । तथापि भगवर सर्वसमत्वात्सर्वमुत्यनवसरेऽभार्थितः कथमुनिप्यतीत्यत आह शरणस्थेति । ये, शरणं गत्वा तस्मिन्नेव धर्मे स्थितास्तेपामुद्धरणे अप्रार्थितोपि भूकृतप्रयत्नः सर्वदेव किं पुनर्मलार्थितः । यथा भूम्युद्धारचिकीर्षायामपि ब्रह्मणा भूम्पा दुःखनिवेदनर, मार्थनानन्तरमेव समाधौ तद्विरः श्रवणानन्तरमेव साक्षागवानरतीयस्मिानुदरिष्यती निधयो जात एवं मत्मार्थितो मदीयानामाश्रयो भवत्येवेति निश्चित्य मदीयः सर्वथा परित्यज्याथय एवं कर्तव्यः । एतदेवाभिसंधायाचार्येक्तं कृष्णं विज्ञापयाम्यहमि यता, पदीयैरेचं स्तुतिरेव कार्या, मत्मार्थित स्क्यमेवाश्रयो भविष्यत्ति नात्र युष्मत्कृतिमपेक्षा नवनिय स्तुतिः पूर्व कर्तव्याश्रयणेप्मुभिः । दशी स्वस्य धर्मस्य साधकं ज्ञापयेदुधः ॥ १० ॥ १ कार्यस्येतिपाटः। ८.
३६ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । पाठफलमाह- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रमिति । कृष्ण आश्रयो भवत्यस्मादिति कृष्णाश्रप इति स्तोत्रस्य नाम । फलाधिकारिणां पाठविधि चाह-सन्निधौ सेव्यस्य गुरोर्वा । उभयोरभावे स्मरणीयस्य वा । धर्मादिषु सर्वेषु असाधनतानिधयः कृतार्थताविपयिष्युत्कटेच्छा च पूर्वा- वधिः अल्पे बहुचसाध्ये भगवान् स्वतःसर्वसाधको भवतीत्येवंरूप आश्रयसिद्धिरुत्तरावधिः। तावदिदं पठनीयमिति सिद्धम् । यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । य एव पठेत्तत्तद्धर्माविष्टान्तः- करणः अतथाभूतो वा। ततः किं स्यादत आह तस्याश्रयो भवेत् । क इत्याकासायां कृष्ण इति । कृष्णः सदानन्दः । तेन तदाश्रितानांवजस्थानामिव सर्वथा दुःखात्यन्ताभावः परमानन्दसम्बन्धश्चोक्तौ भवतः । नन्वत्र किं प्रमाणमेतत्स्तोत्रपाठमानेणैव स तथा भवेद श्रीवल्लभ इति । यथा श्रिया वल्लभो भगवाँस्तथायमपीति भगवद्वाक्यमिवास्यापि वाक्यं वेदात्ममिति मूनि धृत्वा तथैव कर्तव्यमित्यर्थः । किश्च, भगवद्धर्माणां स्वरूपं तद्धर्मनिरता एव जानन्तीति तदुक्तौ न विप्रतिपन्नः कैरपि भाव्यमिति दिक् ॥ ११ ॥ ब्रजपतिरतिमित्यं य: प्रदातुं कृपातः सकलनिगमसारं तत्वतः संजगाद । स्वजनपरिढो ध्रुक संततेः संशयानाम् स भवतु मम सर्व विट्ठलेशः सुकेशः॥१॥ रुचिरचरणयुग्म हुत्मवेशे तितिग्मम् निजमनसि विहारं ध्वस्तगादान्धकारम् । वजिनवनकुठारं प्राप्तलोकोपहारम् सकलनिगमसारं भावयेद्विद्वलेशम् ॥२॥ आश्रयस्तोत्राविति द्वारिकेश्वरशुद्धधीः । आश्रितानां चकारेमामाश्रयज्ञापनेच्छया ॥३॥ इति श्रीमद्गोपीजनवल्लभचरणैकतानद्वारिकेश्वरेण विरचिता कृष्णाश्रयविवृतिः सम्पूर्णा । । ।
BHAA SN... SHAYAR श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।। कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्रजराजचरणविरचितविवरणविभूषितम् । पदारपमानकायनात स्वीयत्वं मनुते हरिः । ते कृष्णवल्लभाचार्याः प्रसीदन्तु सदा मयि ॥१॥ तदनुग्रहतः कृष्णाश्रयस्य विकृतिर्मया। विधीपते पतः कृष्णाश्रयः फलति सर्वथा ॥ २ ॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणा भगवदाजानुसारेण जनानुदत निबन्धादौ सपरिकर भण्यादिमार्गानुपदिश्य प्रत्यहं कलेराधिक्येन तेषां दुःसाध्यत्वमाकलयय विवेकधैर्याश्रय- भन्थे विकधैर्याभ्यां सहितमाश्रयमुपदिष्टबन्ना, सस्वरूपं च तत्र सर्वया सर्वदा मगद- धरणगमनात्मकं सिद्धं, तयाच तत् कायिकादिभेदेन त्रिधा भवति, तन प्रथमं मानस शरणं भावनात्मकं भवति, पश्चात् कायिक तण सिद्धपति, वाचनिकं तु 'प्रपन्नं पाहि मां प्रभो' इत्यादिमानारूपम् । एतादृशस्य भवनेपि कारण भगवदनुग्रह एवेति 'सोह तवायी'त्यतरस्तुतौ असतां दुराप तचाप्यहं भवदनुग्रहमीभ मन्य' इति स्वानुभवेन प्रतिपादितम् । शरणागतिलक्षणं च तत्रैवोक्त 'यदि सङ्घातमनुगुणं कुर्यात् स्याजयेहा तदा शरणागतिः सिद्धति ज्ञातव्यमित्यारभ्य 'सत्सेवाचिर्भगवरस्वरूपज्ञानेच्छा भाई स्छाखपरत्वं चान्तिमजन्मज्ञापक मित्पन्तेन । 'अनुगुणपक्षस्तु सुगम्' इति च । एवं सत्य ताशी शरणागतिविवेकधैर्याश्रयोक्तरीत्यापि साम्भत कठिनति भक्त्यादिमार्गाणां दुर्स ध्यत्वे हेतुरपि तत्र नोक्त इति निबन्धादायुक्तोपि दुर्जेय इति तदुक्तिपूर्वक साङ्गा वार निकी तां सांप्रत साधनत्वेन विवक्षन्तः कृष्णाश्रयस्तोत्ररूपेगा:-सर्वत्पादि। अत्र टीकारम्भ श्रीरघुनायचरणैर्ग्रन्थाववरणिका कापि नोक्ता परन्तु आविरासीद्धोरेस्मिन् कलो श्रीवल्लभाभिधः । निजदास्यं स नो देयादव्यादपि दुराश्रया दितिमङ्गलवाक्ये कलिस्वरूपस्य श्रीमदाचार्येषु प्रार्थनस्य च कयनेन सूचितेति । विरोधः । एवं कल्याणरायैरपि कृष्णाश्रयस्य सर्वसाधकत्व सर्वसाधनानामसाधकर चोक्तमिति नेपामध्ययमेवाशयः । श्लोकसङ्ख्यालात्पर्य वैरेक्युक्त 'भक्तानां भगवान्ने ३८ - कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । देशादिपट्साधनरूपश्चतुर्विधपुमर्यरूपश्चेति, दशलीलानिरूप्य इति, दशविधभक्तसेव्य इति', स्तोत्रार्थरूपे भगवति दशविधाः 'दश वै पशुषु प्राणा'इतिश्रुतेः प्राणानां दशलं, ते यथा साधकास्तथा स्तोत्रमपीति शब्देपि दशविधाः । अतोऽयमनुकूलयन् शब्द एवायं साधक इतियोधनाय मार्थनाव्याजेन स्तुवन्तीति । द्वारिकेश्वरैस्तु 'आभासथ निरोधश्चेति वाक्यलिखनेन 'नच लक्षणलक्षितया यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ती तिवदन दशसहया- पूरकसर्वफलरूपोत्र विवक्षित इत्याशय उद्घाटितः । तथा च 'या या साधनसंपत्तिः पुरुषा- थचतुष्टये । तया चिना बदामोति नरो नारायणाश्रय' इतिवाक्यलिग्वनेनाश्रयशब्दः कृष्णाश्रय इति स्तोत्रनामेति तेपामाशयः । मम वन्यदपि प्रतिभाति-यथाक्रूरेण प्रसन्न- प्रत्यक्षो भगवान् स्वाधिकारानुसारेण शरणतया प्रार्थितस्तथाऽऽचारपि स्वप्रकटितभक्ति- मार्गफलदानानुकूल: प्रसन्नः स्त्रोक्तिपठनमात्रेणाश्रयदानं क समयविशेपे प्रार्थितस्तदों कृतवानिति तज्ज्ञापकमिदं प्रार्थनाघटितं स्तोत्रमिति । अत्र च भगवान् गतित्वेन मार्यते अस्त्विति क्रियाध्याहारेण । तत्र गतिशब्दः फले रुढा, 'सा काष्टा सा परा गतिः' 'अन्ते या मतिः सा गतिः 'नान्या भवेद्गतिररिन्दमे ति श्रुतिपुराणादौ तयाप्रसिद्धः । समाप्तौ तु 'तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण' इत्याश्रयत्वं पाठफलत्वेनोक्तम् । आश्रयशब्दश्च सहाये सृढः, 'सिद्धाखिलार्था मधुसूदनाश्रयाः' 'भवद्भिरमृतं प्राप्त नारायणभुजाश्रयै रित्यादौ तथाप्रसिद्धेः । कृष्णशब्दश्च परब्रह्मवाचकः 'कृषिभूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्तिवाचकः । तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते' इतितापनीयश्रुतेः, 'पापकर्पणो ह वेति च । ब्रह्मवै- वर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे श्रीरुक्मिण्युद्वाहोत्तरं श्रीयशोदा प्रति भगवद्वाक्येपि 'कृपिरत्कृष्टव- वनो णश्च सद्भक्तिवाचकः । अश्वापि दातृवचनस्तेन कृष्णं विदुर्युधाः' 'कृपिच परमानन्दे पश्च तदास्यकर्मणि । तयोर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः' 'कोटिजन्मार्जिते पापे सापिः केशे च वर्तते । भक्तानां णश्च निर्वाणे तेन कृष्णः प्रकीर्तितः' इति त्रिधा निरुक्तः। हाय तृतीयेन 'पापकर्षण' इतितापनीयश्रुतिरुपबंहिता । गौतमीयतन्त्रे अष्टादशार्णव्या- संभायां च 'कृपिशब्दश्च सत्तार्थो णश्चानन्दस्वरूपकः । सुखरूपो भवेदात्मा भावानन्दमय- ५ - श्रीमद्रजराजवरणविरचितविवरणविभूपितम् । ३१ संदानन्दयोरन्वयि निरर्थ सचिदानन्दतया परब्रह्मत्वेन कृष्णलं विटामितिभेदाः। अन्या अपि निरुक्तयो ब्रह्मवैवर्ते नामकरणप्रसङ्गे गर्गेणोक्ता पक्ष सन्ति तास्ततो ज्ञातव्याः। मानन्दे च निरवधित्वमेव परमफालतावच्छेदकमित्यानन्दमयाधिकरणे स्थितम् । 'यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूपैव सुखं भूमा त्वेव निभिज्ञासिचव्यः' इति छन्दोगश्रुते- 'यतो चाची निवर्तन्ते' इतितैत्तिरीयथुतेथ । फलं द्विविधं, साध्यमभिव्यङ्गयं च । नत्राचं यथा परशोपिउदा । द्वितीयं यथा योगादात्मसुखम् । तत्र परे बायाधरूपत्वस्याभावा- द्वितीयरूपतेव याच्या तत्र हेत्वपेक्षायां 'यमेवैप मृणुते तेन लभ्य इतिश्रुत्या स्वीयत्वेन वरणे यत्साक्षादर्शनं तदेव हेतुः । तया सति 'नायमात्मा प्रवचनेने त्यादिपूर्वार्द्ध उपलक्ष- गविषया साधनान्तरनिषेधश्रावणेन वरणद्वारके सन साधनत्यमुक्तं भवति । तदेव च ब्रह्मवैवतोपबृंहणेष्वपि सिद्धम् । तदेतत् सर्व हृदि कृत्वा मूढानां सन्देहनिवारणायादृष्ट- शाखेऽनुरुद्धयमार्गाणां कालादीनां सन्निपत्याराोपकारकाणामसाधक दोपांच बदन्त उक्तरीत्या स्वस्मिन् फलरूपत्वमतिरोभावयिता त साधनरूपोस्विति प्रार्थयन्ति- सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ १ ॥ सर्वे च ते मार्गाश्च ! 'मुजूप् शुद्रौ' पृज्यन्ते शोध्यन्त इति ! 'मृग अन्वेषणे, मुज्यन्ते तत्तत्फलार्थिभिरन्त्रिप्यन्त इति मगाः, स्वार्थेण् त एव मार्गाः 'योगायो म्या प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिय नोपायोन्यास्ति कवने 'त्येकादशे भगवतोक्ताः स्थमाप्युपायाः तेषु नष्टेषु अनुशास्लदौलम्पादिना तिरोहितेषु कृष्णो व्याख्यातरीतिको भगवानेच मम गतिःसावनफलरूपोस्विति सम्बन्धः । अन यस्य च भावेन भावलक्षणमित्यनेन भावलक्षणा समयी । अनुशास्तदौल यादौ हेतुः-खली मणि कलौ लोके पापण्डप्रचुर सतीति । चोवधारणे । खलोन्तर्दुष्टो धो यस्मिन्नस खलधां धांदनिच् केवलादि'त्यनेनानिच् । खलधर्मत्वे हेतुलोकानां पापण्डप्राचुर्यमा पापण्ड उपयों जैनदयादिसदृशस्तस्प प्राचुर्य बाहुल्पम् । कलावित्यधिकरणे सप्तमी आधारस्य चामाभिध्यापकतया कालिमसम्बन्धेन मौणोपश्लेपिकतया वा । तथाचता कलावी लोके सर्वेमार्गेषु नष्टेषु सत्सु तथेत्यर्थः । 'पष्टी चानादरे' इत्यनेनानादरे कलाविति सप्तमी । हेतुहेतुमद्रावस्तु समभिव्याहारादेव लभ्यः । तथाचैतादृशे लोक एवं मार्गेषु सत्सु कलिमनादृत्य तनयं त्यक्त्वा तथेत्यर्थः । 'कलेदोपनिधे राजन्' "का सभामयन्त्यायो' इत्यादिपाक्येषु कलिस्तुतेस्तत्र सापकत्वभ्रमवारगाय कीर्तनस्या ययाकयश्चित्कृतस्य न फलसाधकत्वमितिवीधनाय चात्र कलिलोकयोदोपकथनम् । - ४० . कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । 'कृष्ण पदासंपदाच नैतद्वाक्यविरोध इति बोध्यम्। तथाच जलभेदोंक्तरीत्या कीर्तयितृ- निश्चित्य भगवानाश्रयणीय इति भावः । यद्वा, तादृशे लोके मार्गेषु नष्टेषु 'वादवादांस्त्य- जेत्तर्कान् पक्ष कंच न संश्रयेदितिसप्तमस्कन्धीयनारदवाक्यानुसन्धानेन विवक्षित. मार्गस्यैव दृढग्रहणात् कलौ तत्तन्मार्गाणां साधकत्वतस्तमभावादिकलहे नष्टे । चका- रोत्र तन्नाशसमुच्चायकः । तथा सति तथेत्यर्थः । एवमपि बोध्यम् , प्रथमव्याख्यानरीती कलौ सर्वमार्गेषु नष्टेप्षितिपदानां, कलावित्यस्यैव वाग्रिमश्लोकपञ्चकेनुपङ्गो वोध्यः । एतद्रीत्या व्याकुर्वन्तः पाञ्चः सर्वेपि विशेष्यान्वितस्यैवकारस्यान्ययोगव्यवच्छेदकतयां- शकलावतारव्यवच्छेदं तेनाहः, तदस्माकमप्यभिमेतम् । श्रीरघुनाथास्तु 'खरधर्मिणीति पाठान्तरमप्पुपन्यस्य खरश्चासौ धर्मश्चेति कर्मधारयान्मत्वर्थीयेन्मत्ययं बहुव्रीहिविग्रहे 'क'मत्ययापतिभियाहुः, चकारं च कलिव्यतिरिक्तकालसमुच्चायकमाहुः, मायातरणे प्रपत्यतिरिक्तसाधनाभावस्य सर्वकालेषु तौल्यादिति तेपामाशयः। प्रार्थना तु सर्वमते- प्यन्यार्था ॥१॥ एवं कालदोषेण सङ्गदोपं मार्गनाशं चोपपाद्य कालस्य साधारणत्वेन देशानाम- साधारणत्वेन तदपेक्षयान्तरगत्वात्तत्र च 'काश्यादिपुर्यो यदि सन्ति लोके तासां तु मध्ये मथुरैव धन्या । या जन्ममौञ्जीवतमृत्युदाहेर्नूगां चतुर्धा विदधाति मुक्तिमित्यादिभिर्दे- शस्तावकवाक्यैः साक्षात्साधकत्वस्य देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्भक्तैः साधुभिः श्रितानि'- त्यादिभिवाक्यर्गािनुकूलतायाश्च प्रतीतेः प्राप्तं तथावभ्रम वारयितुं कालेन देशदोपा- दिकं वदन्त आहुः-म्लेच्छेत्यादि । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ अत्रापि भावलक्षणा सप्तमी । चोवधारणे । कलावित्यनुपज्यते । देशेषु म्लेच्छै. सपनैः उपलक्षणमेतत् अतितामसैरिति यावत् , तैराकान्तेपु च्याप्तेषु । व्याप्तिरत्र तदा- धनुरूपस्थितिकत्वम् । तदाज्ञानुरूपस्थितौ को दोष इत्यत आहुः पापेत्यादि । 'एके ख्यान्यकेवलाः' तत्पुरुषगर्भः कर्मधारयः । पापानां व्यभिचारचौर्यदौर्जन्यादीनामेक- मलयेपु मुख्यस्थानेषु । ते हि लुब्धाः कामिनो हिंस्राथ, ततस्तत्र व्यभिचारादिकं वन्ति चौर्यादिकं कारयन्ति च । तदवलोकलोका अपि पैशुन्यशाम्भल्यादिना तथा विदधतीत्येप दोष इत्यर्थः । ननु न सर्वे तादृशा इति नैप दोष इत्यतो दोपान्तरमाहुः- त्पीडेत्यादि । सतां स्वधर्मवनिनां पीडया मिथ्याभिशापदण्डादिरूपलेशेन व्यग्रा उद्विमा लोकाः सम्यञ्चो जना येष्विति । एवं च कलिकृतास्तेषु चत्वारो दोपा उक्ताः।
श्रीमदमरामचरणविरचितविवरणविभूपितम् । HAVALE - . . P तामसमभुक्तम्, पापबाहुल्पम्, सत्पीडा, सदुद्वेगश्वेत्येतैरुपद्रवेण सम्यक मशक्या, सर्व- मार्गेषु नयेषु सत्सु कृष्ण एवेति पूर्ववत् ।। २ ।। एवं कालेन देशदोपादिकमुपपाय तेषां धात्वेन जलस्य चान्तःप्रवेशवहि:- सम्बन्धाभ्यां शोधकतया देशापेक्षयाप्यन्तरसातत्र च सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नामदम्' 'कावेरी च महापुण्या मतीची च महानदी । ये पिपन्ति जलं तासां मनुजा पनुजेश्वर । 'मायो भक्ता भगवत्ति वासुदेवेपलाशयाः' इत्यादिवाक्यः साधकत्वमार्गा- मुलस्वमतीतेस्तेषु तथात्वभ्रमं वारयितुं कालेन तत्रापि दोपं वदन्त आहुः गङ्गादि- तीर्थवर्येष्विति। पादितीर्थवर्येषु दुष्टैरेवावृतेविह। तिरोहिताधिदैवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३ ॥ इह भारतवर्षे गङ्गादीनि यानि नीर्थश्रेष्ठानि तेषु दुष्टैः कर्मणा भावभेदेन च ये पितास्तैरेव वेष्टितेषु । अनापि भावलसणैव सप्तमी । तथाच 'किंचाई न भुवं यास्त्रे नरामय्याभूजन्त्ययम् । मृजामि तदवं शुत्र राजस्ता विचिन्त्यतामितिनवमस्कन्धे भगी- रथं मति गङ्गावाक्यादृष्टावरणेन तेष्वपि शक्तिमौण्ड्यदोष इत्यर्थः । ननु सायो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपादनाः । हरन्त्यय तेङ्गसमातेप्यास्ते ह्यघभिरिरिति तत्रैव मङ्गा पति भगीरथवाक्यातादृशां सादिना भित्तेस्तस्य मायिकलानाय दोष इत्यत आहुः तिरोहिताधिदेवेवित्ति । देवानां समूहो दैवम् , देधे इत्यधिदैव, देव- समूहे विद्यमानं गङ्गादेववारूपम्, तिरोहित अधिदेवं यस्मिंस्तचिरोहिताधिदैवम् त्याच देवसंसदि विद्यमानं यहादेराधिदैविक रूप ततिरोधानाच्छक्तिकौपन्यता दवस्थ्पमित्यर्थः । यद्वा, सिरोहित अधिर्यस्य तत्तिरोहिताधि, तादृशं दैव देवसमा येष्विति । 'ततेपा न प्रियं यन्मनुप्मा विद्युरिति 'विमस्य वै संन्यसतो देवा दारादि पिणः । विश्नं कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानानन्य समियात्परमिति श्रुतिस्मृत्युत्तदिशा मनुष्य क्तिस्तेषां न मियेति तन्नित्यर्थ वाराहपामादौ मुत्यभावाय भगवत्मार्थनावदन तीया दुष्टेवाविश्य प्रतिवन्तस्तिरोहिलाययो भवन्त्यत्तः शक्तिसद्भावेपि दोपतावस्थ्यम, कृष्ण एवेति पूर्ववदित्यर्थः । एतेन 'तीर्थादावपि या मुक्ति कदाचिरकस्यचिद् भवे, कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति पिनिवप' इति नियन्धोक्तौ युक्तिरपि प्रत्यक्षा रूपा दर्शिता ।। ३ ॥ अतः परं न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनन्युरुकार दर्शनादेव साधर' इतिवाक्यातदपेक्षयान्ताङ्गत्वेन तैपांच सशस्य प्रसङ्गमजरे पाशमा ६ ४२ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । कवयो विदुः । स एव साधुपु कृतो मोक्षद्वारमपातम्' 'सतां प्रसङ्गात्' 'सन्त एतस्य छिन्दन्ति' 'सत्सङ्गेन हि दैतेया' इत्यादिवाक्यः साधकत्वमार्गानुकूलत्वातीतेस्तत्र तथा- स्वभ्रमं वारयितुं कालकृतं सत्सु दोपं वदन्त आहुः अहङ्कारेत्यादि । अहङ्कारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ४ ॥ अत्रा'र्हाणां कर्तृत्व इत्यनेन तद्वपरीत्ये सप्तमी । कलौ सत्सु मार्गप्रचारकेषु पुरु- पेष्वहङ्कारेण स्वपाण्डित्याभिमानेन विशेपतो मूढेपु सत्सु । तथात्वे गमद्वयमाहुः पापेत्यादि । पापाः पापकर्तारो राजसास्तामसाश्च म्लेच्छादयस्तदनुवर्तिपु तदुपजीवि- केषु । अक्रूरादेः कंसाधनुत्तिवदनुवतित्वेप्यदोप इति तयावृत्यर्थे विशेषणान्तरं लाभे- त्यादि । लाभो द्रव्यादेः, पूजा उन्नतिः, अर्थशब्दो द्वन्द्वान्ते श्रुतः प्रत्येकं सम्बध्यते, तेन तदर्थं यत्नो वाह्याभ्यन्तर उद्यमो येपामिति । एतवयं विमूढत्वज्ञापकम् । तथाच मार्गप्रचारकेष्वेतादृशेषु जातेषु सतामभावात्सङ्गो. दुरापास्त इति सर्वमार्गेषु नष्टेषु कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ४॥ अतः परं सतां दुर्मिलतया तदपेक्षया मन्त्रसाधनजपादेः स्वमानसाध्यतयान्तर- गावातत्र च 'परिहाय्यापि वेदांस्त्रीन् कर्माणि विहितानि च । गायत्रीमायमाश्रित्य द्विजो भवति निर्भयः' 'गायत्रीहीनवेदास्तु साझा अपि च निष्फला:' 'सर्वेषु वर्णेपु तथाश्रमेषु 'नारीपु नानाद्वयजन्मभेषु । दाता फलानामभिवाञ्छितानां दागेव गोपालकमन्त्र एप' त्यादिवाक्यैस्तत्तन्मन्त्राणां तथात्वमतीतेस्तेषु तथात्वभ्रमं वारयितुं तत्रापि कालेन दोपं दन्त आहुः-अपरीत्यादि । अपरिज्ञाननटेषु मन्त्रेवव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५॥ अपरिज्ञाननष्टेविति । अत्रापि पूर्ववदनुपङ्गो भावलक्षणा सप्तमी च । 'मन्त्रस्य च रिज्ञानमित्येकादशे भगवद्वाक्यात्परिज्ञानेन मन्त्रशुद्धिः। परिज्ञानं नाम गुरुपसत्यादिना भानन्यासपाठार्थतात्पर्यविनियोगादीनां निर्धारस्तदभावोऽपरिज्ञानं, तेन नष्टेषु । स्वरू- श्रावणत्वेपि शुद्धयभावेन 'उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमितिवददृश्यमानेषु । कचि- कस्यचित्परिज्ञानदर्शनादोपान्तरमाहुः-अवतयोगिप्विति । 'अवता चटयोऽशौचा। तेद्वादशस्कन्थे कलिधर्मपूक्तेमन्त्रोपाकरणदशायामेव गुरुकुलावासब्रह्मचर्याध्ययनधर्म- परिपालनाभावादवतेपु योगः सम्बन्धो येषां तादृशेषु । तेन दोपान्तरमप्याहुः तिरो-
श्रीमहाराजचरणविरचितविवरणविभूषितम् । ४३.
हितार्थदेवेष्विति । तिरोहिनावपतीयमानौ अर्थः प्रयोजनं तातयं च देवोधिष्टानी
देवता तो येषाम् । 'प एन शुष्क स्याणौ निश्चेिन्जारिश्रयाखाः प्ररोहेपुः पलाशा-
नी'त्यादिश्रुतिप्रभृत्युक्तनिदर्शनव्यभिचारेण तदुभयतिरोभावस्य स्फुटवान्न तैपामिदानी
। साधकत्वं न या मार्गानुकूलसमतः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ५ ॥
अतः परं मन्त्रापेक्षयापि स्वधर्माणां मनानामाचारस्य च पूर्वोक्तदोपाभावेन
सुकरत्वेन चान्तरङ्गत्वातत्र च स्वधर्मस्थो यजन्यज्ञैरनाशीः काम उन्ध न याति स्वर्गनरको
यद्यन्यन्न समाचरेत् इह लोके वर्तमान स्वधर्मस्थोनघः शुचिः। ज्ञान विशुद्धमामोति मक्ति
च यहच्छत्येकादशस्कन्धीयः 'केदारे उदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते' 'तथा चैकादशी
धेका गर्भवासक्षयङ्करी । एकादशीस पुष्पं न भूतं न भविष्यतीत्यादिभिः पुराणान्वरी-
पैर्भगवद्वाक्य संचारसमको धर्मो धर्मस्य प्रभुरत्युत' इत्यादिभिभारतीयैश्च वाक्यैवता-
दीनां साधकलादिमतीतेस्तेषु सथात्वनय वारयितुं तेष्वपि कालेन दोष बदन्त आहुः
नानेत्यादि ।
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नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मवतादिपु ।
पापण्डकप्रयत्नेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ६ ॥
नानामकारका ये बादाः स्वरूपफलादिविषयकास्तैविशेषेण स्वरूपेण फला.'
दिना च नष्टेषु तिरोहितेषु । तत्र स्वरूपतो नाशो वेदरद्यानां बादात् । 'यावलीय.
सुखं जीयेत्' 'अग्निहोत्रं प्रयीतन्त्र विदण्डं भस्मपुण्डूकम् । महापौरुपनिःस्वान
जीवो जल्पति जीविका" इत्यादिरूपात् । फलतो नाशस्तु यथैकादशीव्रतादौ 'शुक्र,
मोहिता विमा दैत्यानां कारये भुवि । तुष्टयर्थ दशमीविद्धं कुर्वन्ति मम वासरमि
माझे 'पुर देवपिगणः स्वपदच्युतिशङ्कया । सप्तमीवैधनालेन गोपित चाष्टमीप्रतामि
स्कान्देऽन्यत्र च निषेत्रनिन्दादेव॒धस्वरूपनिर्णयस्प च विद्यमानत्येपि तदना,
स्वस्वाग्रहेण वाक्याभासान्यायाभासांथ समुदाहृत्य निर्णयन्ति, तादृशस्यले योध्या ।'
स्वधर्माचारयोरपि विप्रतिपल्या फलतो नाशो योध्या । बाद भयोजकमाहुः पापण्डेति
पापण्डेन दम्भेन एकोन्या प्रयत्न उद्यमो येषामिति । स च 'वेश्यावेदमसु सीधुगन्धि
लनावनातवामोदितैनीत्वा निर्भरभन्मयोत्सवरसैनिद्रचन्द्रायाः । सर्वज्ञा इति दी
इति चिरात्माप्तामिहोबा इति ब्रह्मज्ञा इति तापसा इति दिवा धूनिगरच्या
इतिवद्रोध्या । अत एवं भूयोदर्शनात्स्वधर्मत्रतादीनामपि न स्वतः साधका न:
मार्गानुकूलत्वमतः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६ ॥
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एवं पद्धिर्भक्त्यादिमार्गाणां दुःसाध्यताज्ञापनाय कालकृतसर्वसन्मार्गनाशबोधन- मुखेनाश्रयणस्योपायत्वं साधितम् , तदिदं तदा दृढीभवति यदा भगवानाश्रिते स्वमा- हात्म्यमनुभावयति तदर्थमाहुः अजामिलादीति । अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७॥ अजामिलादीति। अजामिल: पष्ठस्कन्ये मसिद्धो दासीपतिर्ब्रह्मवन्धुः। आदि- पदेन गजेन्द्राहल्याद्या, नृसिंहपुराणे नवमाध्याये मार्कण्डेयमृत्युमसङ्गे उक्ता नारकिणश्च, तेषां ये दोषा इहजन्मनि पूर्वजन्मनि च कृतानि पापानि तेषां नाशकः । एतेन तादृश- माहात्म्ये तदनुभावने च शब्दः प्रमाणमुक्तम् । प्रत्यक्षमाहुः अनुभव इत्यादि । अनु- भवेऽस्माकं स्थितो विषयीभूतो ज्ञापितसमयमाहात्म्यः, एतेन प्रपन्नस्य मायातरणे सति प्रतिबन्धकाभावात्स्वयमेवाये माहात्म्यं गोचरीभवतीति ज्ञापितम् । ततश्च पूर्वमा · शब्दे श्रीमदाचार्यचरणोक्तौ बोभयत्र वा विश्वस्य भगवदाश्रयणे भगवानेव साधनान्तरापेक्षा विना सर्व ज्ञापयंस्तगोचरो भवतीति सूचितम् । कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥७॥ एवमत्र शब्दप्रत्यक्षाभ्यां पूर्वोक्तश्रुतिब्रह्मवैवर्चादिरीत्या भगवानेव पुष्टिमागी- याणां साधन मिति साधितमतः परं पूर्वोक्तश्रुतिगौतमीयतन्त्रोक्तरीतिकं भगवतः फलत्वं साधयन्ति प्राकृता इत्यादि । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ८॥. देवा-अष्टौ वसव, एकादश दा, द्वादशादित्या, इन्द्रः, प्रजापतिश्चेति यखिशव- 'अग्निस्वमो देवानां विष्णुः परपस्तदन्तरेणान्या देवता इत्पत्यादपो विष्णचन्ताः। अत्र णुः कालः, 'स विष्ण्वाख्योधियज्ञोसौ काल: कलयतां वर' इतिवाक्यात्तदन्ताया। सारं ब्रह्माणं नामावुकारं विष्णु हृदये मकारं रुद्रं भ्रूमध्य इति प्रणवमानाधिष्ठातारो चादयो वा प्रजापत्यन्ताः, शतानन्दिनो वा । ते सकलाः कला अंशस्तत्सहिताः, सर्वे कृताः, प्रकृति या 'मायां तु प्रकृति विद्यादितिश्रुतेस्तदधीनाः । कालस्य क्षोभ- पा गुगानुरोधित्वेन गुगाधिष्ठातृ गामभिमानित्येन च प्राकृनत्यम् । वृहदारं गणिता- दक, गणितः स एको मानुप आनन्द' इत्यारभ्य शतानन्दिनां गणने 'स एको ण आनन्द' इत्युत्तरावधौ ब्रह्म गणितम् , अत एवंसत्यात आनन्दो यत्र, स्वाधे तादृशम् । तेन तुरीयकोटिनिविष्टा ओंकारं सर्वेश्वर द्वादशान्त इत्यायुक्ता गुणावतारा "पि तत्रैव मविशन्तीनियोधितम् । हरिः पुरुषोत्तमोऽ'तरात्परनः परः स उत्तमः पुरुषः । , -- . श्रीमद गरामचरणविरचितविवरणविभूपितम् । 'अतोऽस्मि लोके येदे च पथितः पुरुषोचम' इत्यादिश्रुतिस्मृतिपतिपायः । पूर्णानन्दः शतानन्दसहयाने ब्रह्मानन्दस्य सर्वपरत्वेन गणनया मनोवाग्गोचरतामेव प्रतिपाय तदुपरानुवाके 'यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न विभति कुतचने तीतिश्रुतावानन्दस्य मनोवागगोचरत्वकथनेन तदपेक्षयाधिक्यस्यानवधित्वस्य च बोधनात्तथा । तस्मादानन्दे निरवधित्वस्यैव परमफलतावच्छेदकत्वेन तस्य चात्रैव विभागनेः कृष्णः पूर्वोक्तरीतिकः मम परमफलरूपोस्त्विति पूर्ववत् ॥ ८ ॥ एवमष्टभिर्भगवत्स्वरूपविचारणाश्रय एव सर्वथा साधको न त्वन्यः कोपि मार्ग: सारक इति साधितम् । अतः परमानयस्यापि साङ्गस्यैव साधकता विवेकांश्रये सिद्धेति तदङ्गाभावेऽपि यथा स फलं साधयति तमुपायं वदन्त आहुः विवेकत्यादि । विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥९॥ सर्वदुःखहर्ता भगवान् स्वेच्छातः सर्व करिष्यतीत्येतद्विचारपूर्वकमनुसन्धान विवेकः। साचिकादीनां कायिकादीनां भौतिकादीनां विविधदुःखाना प्रतीकारानावरणेनोपेक्षणं धैर्यम् । माहात्म्यानपूर्वकः सुदृहः स्नेहो भक्तिर्नवविधा च । आदिपदेन तदङ्गानि । साङ्गे ज्ञानकर्मणी च । तै रहितस्पैतेन यावत्साधनराहित्य सूचितम् । वाधकसत्तामाहुः विशेषत: पापामक्तस्येति । आसक्तिः सङ्गासिशयोपरिहार्य सङ्ग इति यावत् । एता- वता'नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः ममायत' इतिशक्यस्मारणामत्युत्पत्तौ प्रतिशत वन्धकमपि मूचितम् । एवं बाधकद्वयसद्भावेऽपि येनानाभयस्य सिद्धिस्तदाहुः दीन स्येति । एवं साधकामावराधकप्तभावाभ्यां जात्या ग्लान्या दीनस्प ! दौर्गत्यादेन जस्त्वं दैन्यम् । अनोजस एतादृशस्य कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एवंमकारिकाया म्लान सा दुरापत्वात् सतां मार्यादिकाना ग्लानौ साधनान्तरेषु महत्तेरस तु तादृशम्लानि पपचि-पां तदुभयविलक्षणतया 'सोई तवासी पत्रोक्तानुग्रहस्य स्वस्मिन्कारणत्वेन स ज्ञाप्यते । एतादृशस्यापि फलसिद्धिीतायां 'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य' 'अपि चेत्गुदा चार इत्यन्न भगवतानता ! नव पूर्ववाक्ये पापयोनीनां गतिस्ता न तु पापकर्मणा द्वितीये चानन्यभजनेन पापकर्मणां साधुत्वयुक्त, न त्वाश्रयेणेति नैतद्वपमाश्रयेण सिद्ध कामिति शङ्ख, समृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति च यो वदेत् । अभयं सर्वभूतेभ्यो दई त्येतद्वतं हरेरितिगारुडाव, सकृदेव प्रपन्नो यस्तयास्मीति च यो वदेत् । अभयं से भूतेभ्यो ददाम्येतद्रतं ममेतिपुराणान्तरीयभगवद्वाक्याच भगवतस्तादृशे ते नि ततो भावदनुग्रहेणैव तन्त्र मजुत्तावपि माहात्म्यज्ञानपूर्वक इस्यैव द्वारत्वनिष्पादन
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् ।
भास्वसिद्धया, द्वितीयस्या नित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व मामिति भजनशेपतया
निरूपितत्वेन प्रथमस्य चाञ्जस्यात् । अतो नात्र कोऽपि चोद्यावसरः ॥९॥
एवं नवनिविवेकधैर्याश्रयग्रन्थोक्ताङ्गाभावेप्येतदुक्तरीतिकदैन्येनाप्याश्रयसिद्धिरिति
बोधितम् । अतःपरमेतस्याप्यङ्गस्याभावे द्वाभ्यां साधनान्तरमाहुः सर्वसामयेत्यादि ।
सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् ।
शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥
'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयत' इत्यादिश्रुतिभिः कर्तुमकर्तुमन्ययाकर्तुं च यावन्ति
सामर्थ्यानि तत्सहितस्तदुपपादित मजामिलादीतिपद्येन । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि
भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'एप स्वेवानन्दयाती'त्यादिश्रुतिभिः सर्वत्र देशेषु जीवेषु
चाखिलार्यानां कृत् 'आकेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिवि'त्यनेन ताच्छील्ये किप् कर्ता ।
एतादृशं कृष्णमहं जगदुद्धारार्थमाज्ञप्तो वैश्वानर आचार्यचर्यः शरणस्थानां शरणमार्गव-
तिनां समुद्धारं सम्यक् आज्ञप्तमार्गमाप्यपरमफलपर्यंतमुद्धारं विज्ञापयामि । सामानाधि-
करण्यादध्याहारानाक्रमाच 'प्रथमान्तद्वयमहंपदस्यैव विशेपणं वा । तथाच तादृशदैन्या-
भाषेपि पयि विश्वासेनैतच्छरणमार्गस्थितौ श्रीमदाचार्यचरणकृपयवास्माकमुद्धार इति
निश्चयदायपि तत्कृतं साधनान्तरमनपेक्ष्य मद्विज्ञापनादेवोद्धरिष्यतीत्यर्थः ॥ १० ॥
अतः परमेतन्निश्चयदाढयगमकं वदन्तो विज्ञापनप्रकार स्वरूपं चाहुः कृष्णा-
प्रयमित्यादि ।
कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ ।
तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोववीत् ॥ ११ ॥
कृष्ण आश्रीयतेनेनेति, कृष्ण आश्रयो विपयो यस्येति वा कृष्णाश्रयम् ।
समयपदस्य विपयवाचकत्वं प्रल्हादचरिने 'यत्तत्र गुरुणा मोक्तं अश्रुवेनुपपाठ च । न
साधु मनसा मेने स्वपरासगृहाश्रयमिति सप्तमेऽन्यत्र च प्रसिद्धम् । एतदन्वर्थनामक-
दमुक्तं स्तोत्रं यः कृष्णसन्निधौ भगवन्निकटे पठेत् तस्य कृष्ण आश्रयः सहायो
र । इतीपमर्थ श्रीवल्लभोऽत्रयोदुक्तवानिति । तथाचैवमेतत्पाठ एव पूर्वोक्तनिधय-
गमक इत्यर्थः । एवं च विवेकश्रियोक्तरीतिकवियेकादेरभावे दैन्यपूर्वकमेवैतत्स्तो-
नुसन्धानपूर्वक भगवत्सन्नियायेतत्स्तोत्रपाठः । तत्राप्पनधिकारे श्रीपदाचार्यचरण-
अवासपूर्वक भगवत्सनियों पाठ इवि साधनद्वर्ष मानसवाचनिक-केवलवाचनिक-धारणा-
शतरूपं निर्दिष्टम् ॥ ११ ॥
+ 4 श्रीमद्नरामचरणविरचित विवरणविभूषितम् । ២ ईद पाचां रीतिमनुसृत्य व्याख्यात, पाम त्वन्पोप्यर्थः स्तोत्रस्य प्रतिभाति । तयाहि-अयं मागोऽविहितभक्तिरूपः, अत्र भगवान् रसात्मकः मतिपन्नः । एवं सति तदधिकारिप्येव मन्दमध्यमविचारेणात्र साधनोपदेशो वक्तव्यः । अत एव विवेक- धैर्याश्रयसमासौ भक्पादिमागा' इत्युक्तम् । अन्यथैकादशे 'योगारयो मये' त्यम 'शान की च भक्तिति त्रितयान्ते निवेशिताया भक्तरादित्वकथनं विरुद्धं स्यात् । अतोत्र भक्तिपदेन तत्परामर्शः किलथैतपरमं गुह्यामि त्यत्रोक्तायाः । तथासति सा भक्तिरादिउँपां तादृशा ये मार्गा अविहितभक्तरेव प्रकारभेदा वालादिमावेन भजनरूपास्ते यतो दुःसाध्या इत्यर्थो भवति । एवं सति तत्र तत्रानधिकारे विवेकथैर्याश्रयोक्तरीतिक आश्रयः, अत एव 'स्वाम्यभिभायसंशयात् 'गोपभार्यवत्' इति स्वामिपदं सदृष्टान्तश्च सङ्गतौ भवतः । अतः परं तमाप्यनधिकार इदं स्वोनपटनमपि तस्यैवानुकल्परूपम् । एतन्मार्गमविष्टाना- मतिमपन्यतपाधिकारिणागेतन्मार्गफलसम्बन्धो क्या प्रणाड्या भवति तामनुसन्धायास्यो- कत्वात् । तदर्थ स्वस्वरूपं भगवत्स्वरूप च वक्तव्यम् । तत्र भगवत्स्वरूपं तूतमेव । किश्चाभेदवादानुरोधेन रसस्वरूपविचारे रसालम्पनद्वयाभिन्नरसारमा स्वयं भवति । उपवृहित चेदं ब्रह्मवैवर्तीयश्रीकृष्णजन्मखण्डे गर्गवाक्येषु-'वर्धते सा बजे राधा शुक्ले चन्द्रकला यथा । श्रीकृष्णतेजसोपेन सा च मूर्तिभती सती' 'एका मूर्तिद्विधा भूना भेदो वैदे निरूपितः । इयं खी स पुमान किंवा सा वा कान्ता पुमानयमिति ।.'पिताहमस्य जगतो मातेति गीतायां च । तथासत्याचार्याणामपि 'वैश्वानराद्वाक्पतेः 'वस्तुतः कृष्ण एवेति च वाक्यद्वयविचारे पूर्वोक्तरीत्योभयाखारचिन्दात्मकत्वमुभयात्मकत्व र सिद्धयति । किञ्च, सप्तश्लोक्या सर्वोत्तमे च श्रीभागवतप्रतिपदे त्यादि 'तरसारभूई रासखीभावपूरितविग्रह' इति चोक्तम् । एवं स्वरूपे निश्चिते यदा यदावेन यान् प्रति या पदन्ति तदा तदधिकारिणः प्रति तानि साधनानीति पुस्तोत्रमप्येवं व्याख्यायते तदा न दोषः । उयासत्यस्यार्थस्य गुप्ततया भगवतः परोक्षप्रियस्पेन चात्र परोक्षवादाला प्यदुष्टैव । तत्थायमर्थः । तथाहि सर्वमार्गेषु सख्यादिमोक्तेषु भगवत्माप्युपायेषु ना. तदमापकल्या स्वान्तःकरणेऽनुपायतया भातेषु । खलोन्तर्दुष्ट इप्यारूपो धर्मो यस्मिता कलौ कलहे स्वसमानेपु स्वस्मिन् कुपातिशपख्यातिविषयके नष्टे हृदयादपयाते । चा रेण फलहादेरपि नष्टत्वं ज्ञाप्यते । पापण्डा कलहजननफारणरूपो धर्मः प्रचुरो यस्मिा: शे लोके सख्यादौ चादृश्यमाने । विरहेण तेषु दोषारोप'स्तस्याधमस्यान्तिकमित्या वत, अतो न दोपः । एवं सति दुःखितस्य मम कृष्णः सदानन्दस्तारशतापे हदि वि न्यमान एव गतिवहिःप्राप्तौ साधनरूपो भवस्वित्यध्याहता प्रार्थना । अत्रैवं सर्वसा ( সাঃ খং গীলালবাহা: সাত বিলি করীমনি। " - कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । वैफल्यवोधनेन स्वस्यातिखेदः । एवकारेण तादृशसमये 'रुरुदुः सुस्वरं राजनित्यत्र फलमकरण इव भगवतः प्राकट्यावश्यकत्वं च द्योत्यते । एवमग्रेपि बोध्यम् ॥१॥ अतः परं भगवन्मिलनस्थानभूतानां देशानामप्यनुपायत्वमाहुः-म्लेच्छाकान्ते. त्यादि । म्लाना रसमार्गविरोधिनीच्छा येषां ते म्लेच्छा एतद्रसानभिज्ञास्तैदेशेषु वृन्दाव- नादिप्वाक्रान्तेषु । किञ्च, पापैकनिलयेषु । पातीति पः स्थायिभावः सः अपः अक्षरको यत्रासौ पापो विरहः सन्तापातिशयजनकत्वात् , तदेकनलियेषु 'सोयं वसन्तसमयो विपिनं तदेतत् सोयं निकुञ्जविटपी निखिलं तदास्त । हा हन्त हन्त नवनीरदकोमलाङ्गो नालोकि पुष्पधनुपः प्रथमावतार' इतिचत्तदुद्धोधकत्येन तदेवस्थानेषु । चोवधारणे । तेन पूर्वमतथात्वमनभिज्ञसम्बन्धेन तथात्वमिति ज्ञाप्यते । किञ्च, सतः शरीरस्य या पीडा तया व्यग्रा लोकाः स्वीयैकान्तभक्ता येषु । एतादृशेऽवसरे कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ २ ॥ अतः पर तादृशां तीर्थानामप्यसाधकत्वमाहुः गङ्ग्रेत्यादि । इह वृन्दावनादिदेशे गङ्गा 'सितासिते सरिते यत्र सङ्गत' इति श्रुतौ तस्याः पूर्व पठितत्त्वात्सादिर्यस्याः सा गङ्गादिः, यमुनातलभृतीनि तीर्थवाणि घट्टविशेपाचन्द्रसरोवरश्रीकुण्डाद्या, 'नद्यस्तदे' त्यत्रोक्ता नद्यश्व, तेषु दुष्टैरेतद्भावरहित्येन दुष्टैरेवावृतेषु व्यासेषु । किञ्च, तिरोहि- ताधिवेपु । तिरोहितममोचरमधि उपरि देवं 'दैवं दिष्टं भागधेय : भाग्यमिति कोशादस्मद्भाग्य, त्रैलोकलक्ष्म्येकपदं वपुर्दघद्यत्र । यदुपरि भगवानिदानी न दृश्यते चिह्नानि सन्तीति 'श्रीनिकेतैस्तत्पदकैविस्मर्तुं नैव शक्नुम' इतिवदधिकतापजनके- वति भावः । तथाचैतादृशावस्थायां कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ३ ॥ अतः परं सत्सङ्गस्याप्यसाधकत्वमाहुः-अहङ्कारेत्यादि । निन्दायां सर्वत्र सपाधिक्यमेव धीजं नतु तेषु दोपो चीजम् । अहङ्कारेणास्पदशो भगवानस्मत्मार्थित मान्यत्र फलिप्यतीत्येवरूपेण विमूढेपु स्तब्धेषु । किञ्च, पापानुवर्तिपु पापः पूर्वोक्त- संतको विरहस्तमनु लसीकृत्य वर्तन्त इति तथा । तथाच पूर्व यदश इदानीं तैरपि सह सामिलतीति । तद्गमकं लाभपूजार्थयत्लेषु । लामो भगवत्माप्तिस्तदर्था पूजा लाभपूजा दुर्थ यत्न उद्यमो येषाम् । पूर्व भगवत्प्राप्तये कात्यायन्यर्चिता पुनरिदानीमपि यत्कु- त तेन ज्ञायते न मिलतीति । लीलानां नित्यत्वाचापेनासक्तिभ्रमवचदाविर्भावात्ते- यमिलननिश्चयः । सत्सु एतन्मार्गगुरुष्वेतादृशेषु सत्सु किं तत्सङ्ग्रेनेति कृष्ण ति पूर्ववत् ॥ ४॥ अनः परं ततोप्यतितापेन गुरूणां हार्द विचारयन्तो मन्त्राणामसाधकत्यमाहुः- रीति । अः भगवान् तस्य परिज्ञानं स्वभावज्ञानं 'न नन्दनु'रितिप्रस्थानसाम- श्रीमद्वजराजचरंगविरचितविवरणविभूषितम् । यिकविलापस्यश्लोकोक्तं, तेन नटेष्वसाधकतया तैतिषु । अत एव अवतयोगिपु-ज्ञान- गोचरत्वेपि जपादिनियमायोगिषु । नत्रापि हेतु:-तिरोहितार्थदेवेपु. तिरोहितः अविषयः अर्थोभिधेयो देवोधिष्ठाता च येषां तादृशेषु मन्त्रेषु व्रतचर्यामासनिक-मुख्य- महिपीमासङ्गिक-समर्पणादिमासनिकेषु सत्सु । कृष्ण एवेति पूर्वयम् ॥ ५॥ अतः परं तसोप्यतितापाधिक्येन स्वस्याशक्तिं द्योतयन्तः कर्मादिनाशमाहु:- मानेत्यादि । नानाप्रकारका वादा नानावादाः । भगवान् मथुरायामेवं पुरवनितादीनां कामं वर्धयति, जरासुतादिभिर्युष्यति, द्वारकायामुज्जयिन्यां प्राग्ज्योतिपपुरे इन्द्रमस्या- दायेवमेवं करोतीत्यादिलोकोक्तिरूपाः, श्रीमदुदवानीतसन्देशादिवत्संवादादिरूपा वा, विनष्टेषु अक्रियमाणेषु सर्वेषु गृहादिकर्मभगवद्रतादिषु । किञ्च, पापण्डः कापटपं, तेनैको मुख्या प्रयत्नो पहिरुद्यमो येषां यत्सम्बन्धी। तथाच तादृशेष्वेतगोपनाय लोकिकवैदिकविहितमार्यादिककर्मभगवडतादीनामुद्यम एवं न तु मनस्तस्तस्कृतिरपीति तादृशेषु तेषु सत्सु, 'धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चनेत्येतादृशावस्थायां कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६॥ एवमतिशयिततापे भगवानन्तामादुरभूचतस्तयावस्थयाहुः-अजामिलादीति । जामि आलस्यं 'जामि वैतद्यतस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशावित्यादिश्रुतौ. तथा- 'सिद्धत्वात् 'आत्मा यावत्मपन्नोभूदित्यपात्र परोक्षवादे वैदिकमयोगस्यादोपाच । न जामि अजामि अनालस्यं तेन लान्ति गृह्णत इत्यजामिलाः, आदिपदेन जामिलाश्च । तद्गुणसंविज्ञानः । शैध्येण विलम्बेन च भगवद्विषयोनका इति यावत् । तथाच ताशा दोपा मानादय आज्ञाधकरणादयश्च तेषां नाशकः । अनुभवे मानसे साक्षिपत्यक्षे । स्थितों गोचरीभवन् । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः ज्ञापितमखिलं समीक्षाभावा मथुरादारकास्थित्यादि तत्तलीलादितात्पर्यविषयक सर्वे माहात्म्यमुत्कर्षः परोक्षभज विस्मरणातिमियत्वरूपो येन तादृशः । कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एतेन, योग्यतमानाम तादृशताप एव प्रादुर्भाव ईदृशो न त्वन्ययेति । अन्यथा त्वन्यथेत्यपि सूचितम् ॥. माहात्म्यं यज्ज्ञापितं तन्मध्ये यदनोपयुज्यते तत्प्रकटीकुर्वन्त आहुः-प्राकृत इत्यादि । प्रकृते रसमार्गे भवा विद्यमानाः प्राकृताः । सकला, कला भगवदनुरा चातुर्य तया सह वर्तमानाः । देवा भगवता सह क्रीडापराः । किञ्च, बृहदतरं गुह" परमे व्योमन्याविर्भूतं ब्रह्म गणितानन्दकं, गणितः श्रुतौ सङ्घयात आनन्दो। प्रजापत्यन्तानां यतीनां वा, तेषामेव के सुखं यस्मादिति तादृशं, न तु स्वस्मिन् रि, मात्रेण सकलदेवानां सुखदम् । तथा पूर्णानन्दः कर्मधारयेण बहुव्रीहिणा च । .
५० कृष्णाश्रेयस्तोत्रम् । देवानन्दतिरोभावहर्ता कृष्ण एव तस्मान्मम तथेत्यर्थः । तथाचैतन्मार्गीय फलं केवल- परमानुग्नहैकलभ्यमेवेति सपरिकरभगवन्माहात्म्यं यद्भगवज्ज्ञापितं तत्सूचितम् ॥८॥ एवमनुग्रहस्य तत्फलस्य स्वकृतसाधनासाध्यत्वेनुसंहिते यावस्था तयाहुः-विवेके- त्यादि । विवेकः साधनतारतम्यानुसन्धान, धैर्य दुःखसहनसामध्ये, भक्तिः स्वशरीर- सेवा । आदिपदेन तत्तत्साधनानि, तै रहितस्य । विशेषतोत्यन्तं पापेन पूर्वोक्तविरहा- सकेन असक्तस्य मुक्तसमस्तसङ्गस्य, अत एव दीनस्य तत एवानोजसः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥९॥ एवमतितापेन परमदैन्ये भगवान् पहिमादुर्भूतस्तदातिसन्तुष्टा जीवेषु मन्दमध्य- मेष्येवं विलम्बाभावाय विज्ञापयन्ति सर्वेत्यादि । अयोग्येष्वपि योग्यतासम्पादन कर्तुमकर्तुमन्ययाकर्तुं समर्थस्यैव शक्यमिति तादृशः सन् । तादृशत्वस्य गमकमौदार्यमिति सर्वत्रैवाङ्गीकृतमात्रे अखिलार्थानां पुष्टिपुष्टिमोक्षरूपाणां कृत् ! करणशील ! कृष्ण ! पूर्वोक्तश्रुतिपुराणव्याख्यातरूप ! । श्रीरघुनाथचरणैः कृष्णपदं सम्बुद्धचन्तत्वेन व्याख्या- तमित्यस्माभिरपि तथोक्तम् । द्वितीयान्तपक्षेपि किवन्तमेव । शरणस्थानामेतन्मार्ग- रीत्या शरणागतानां फलपर्यन्तमुद्धारं अहं भवदनुभावप्रकटनार्थाज्ञयावतीणः विज्ञाप- यामि । एतेन स्वस्य विज्ञापने भगवतश्च तथोद्धार आवश्यकता सूचिता ॥ १०॥ विज्ञापनां वदन्ति-कृष्णाश्रयमित्यादि । कृष्णाश्रयं स्तोत्रं श्रीरूप: स्वामि- लीभावपूरितत्वात् वल्लभो भगवतः प्रिय आचार्यवर्योब्रवीदिति, यः पठेत् एवमसन्द. मानो योस्मद्विपयोगावस्यां ज्ञापयन् कृष्णसन्निधौ व्यक्तं कथयेत्तस्य कृष्ण आश्रयो शिवेदिदं विज्ञापनमित्यर्थः । स्तोत्रस्य प्रत्यक्षत्वेनेदमा विनाप्यर्थसिद्धरिति, शब्दान्तरान- माहाराच, अत्र दुरान्वयोप्यदुष्ट एव । 'विमुश्चात्मतनु घोरामित्युक्तो विससर्ज है। वेससर्न तनुं तां वै ज्योत्स्ना कान्तिमाति प्रिया'मित्यादौ भाव एव तनुत्वेन व्यवहाराच करूपत्वोक्तावपि न दोष इति न कोपि शङ्कालेश इति । यथाधिकारं सर्वा एव टीका सयुज्यन्त इति न कापि शकालेश इति । दिक् ॥११॥ इति श्रीवल्लभाचार्यप्रकटीकृतमद्भुतम् । स्तोत्रं कृष्णाश्रयकर विकृतं तत्मसादतः ॥ १॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणकमलचचरीकश्रीश्यामलात्मजश्रीवज- राजविरचितं कृष्णाश्रयस्तोत्रपिवरणं समाप्तम् ।
10880 नीरुणाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । विवरपासमेतम् । पत्कृपाशिष्ट्येकावन्दुस्पर्शे रसाता । कृष्णलीलाधिमा जन्तोन कदापि निवर्तते ॥१॥ तानेर श्रीपदाचार्यचरणानाश्रये मुदा । तेनैव मम तवाक्यबोधो बोध्यो हि जापते ॥ २॥ पुष्टिमार्गादिकीलाभिः स्वानन्दं पूरयनिनम् । स्वाभयं कुरुते यव तमहं कृष्णमाश्रये ॥३॥ अथात्राश्रयो द्वेषा निरूप्यते मर्यादापुष्टिभेदेन । तत्र मर्यादया य आश्रयः स तु स्फुट एव सर्वत्र व्याख्यातः । पुष्टिमार्गीयस्तु गृढः, सच परोक्षवादेन साधनफलस्वरूप निरूपणपूर्वकं निरूप्यते । तत्रापि कालादिपदसाधनानां फलासाधकत्वं वदन्त आश्रय संभावयन्ति । एवं सदि यादृशः पुष्टिमागीपाणामाश्रयस्तादृशोर निरूप्यते मकारसहित इत्पवगम्यते । तथाहि प्रथम परमकपालः साक्षात् भगवान् स्वयं निरूपधिकरणावर सुष्टिफलदानेच्छया यं वृणुते तस्य तदारभ्य स्वत एवोतसहमानुरागतो भगवरसेवा अत्तिर्भवति न तु तव्यतिरिकधर्मेषु । ततस्तादृशानुरामपूर्वकसेवादिकरणोलसि मेमासक्तिजनितपुष्टिमार्गीयभावाकुराणां भगवता सह संलाप' इत्यायुक्तमकारका बनाया अवश्यसंभवात्तत्र तद्धर्मपाकव्ये विजातीयसद्भानुरोधादन्तास्वरूपानुभवातिव सति तदपेशाजनिताा भगवड्यतिरिक्तस्य सन्नित्तेरशक्यत्त्वाच्छरणगतिरुपयत श्रीमदाचार्यचरणास्तत्स्वरूपनिरूपणपूर्वकं श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रं निरूपयन्ति सर्वेति । सर्वमार्गेषु नटेषु कलौ च खलमिणि । पाषण्डमधुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ नाशपुष्टिमागीयस्य सर्वे मार्गाः प्रमाणरूपाः कदियो नष्टा, एक एव ममेयः स्तिष्ठति, यतस्तेषु फलत्वासाधकत्वबुद्धयाऽचिरेयेति तत्त्यागकरणान्नष्ट एवेत्य अथवा पशि अदर्शन इति धारवर्थविचारेण नष्टा अज्ञाता था। तेषां दर्शनशानयोरप्येत । --- कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रतिबन्धकत्वादितिभावः । ननु भक्तानां कलिकालः साधको भवतीति तनिष्ठमार्गाणां पथं तथात्वमिति पुष्टिमार्गीयाणां. तस्य वाधकत्वमाहुः खलधमिणीति । कालस्तु प्रमाणभूता, प्रमाणं साक्षात्स्वरूपं न कथयतीति तद्व्यतिरिक्तस्य सर्वस्य सदोपत्वमेवेति तन्नष्टत्वात् खलो दुष्टो धर्मो धर्मकर्तापि यत्रेति । यद्यपि ' कलेदोंपनिधे राजन् 'कलि सभाजयन्ती'त्यादिवचनैः कलेभगवद्भजनानुकूलत्वमुक्तं, तथाप्यधुनानवतारसामयिकत्वे- नाधिदैविकरूपत्वाभावात् पुष्टिमार्गीयान् प्रत्यानुकूल्यस्य नटत्वमेवेति तथोक्तम् । भौतिककालस्य प्रमाणरूपत्वेन मर्यादोक्तविधिना तेषां भजनं न पुष्टिरीत्या । फलमपि मुक्तिरेव न ततोनिमकक्षापना। अत एव पाषण्डप्रचुरे लोके इत्युक्तम् धमिव्यतिरेकेण केवलधर्मस्य सोपाधिकत्वात्तथोक्तमितिमावः । तानेव धर्ममार्गानुत्तरश्लोकेष्वसाधकत्वेन वक्ष्यन्ति । एवं सति तत्तत्काले तत्तद्धर्मानाचरणे तेषां दोषयुद्धिरेवोपद्यत इति तत्समक्ष तत्तत्काले प्रमाणातिरिक्तं न कर्तुं शक्यत इति कालस्य भावोद्बोधे प्रतिबन्धकत्वादसाप- कत्वं निरूपितम् । चंकारागृहेपि तथा । 'गृहे स्थित्वा स्वधर्मत' इतिवचनात्तत्रापि सेवा- करणे क्रमेण स्नेहासक्तिजनितभावनाया जातत्वात्तत्रत्यानां तदभावात्तत्सङ्गोस्य वाधको विजातीयभाववत्वादित्यर्थः । अथवा, एवं पुष्टिमार्गीयस्य कालतदुक्तमार्गाणां प्रतिबन्धकत्वं निरूप्य तस्य स्वधर्माचरणप्रकारमाहुः-पापण्डेति । लोके पुष्टिमार्गीये पापण्डप्रचुरे सति तत्संसर्गेण भावापेक्षया दोपवाहुल्यै सतीत्यर्थः । यद्वा, पापण्डो नाम स्वान्तनिष्ठधर्म- गोपनेन पहिरन्यधर्मकरणं तदेव प्रचुरो यस्मितादृशे सति । यथा न कोपि जानाति न्या कर्तव्यमापन्नमितिभावः । एवं सत्येतावत्पतिवन्धक विद्यमाने तत्संसर्गेण पूर्वोक्त- मेवानामुच्छलितत्वाभावात्फलाभाव इति तादृशस्प प्रतिवन्ध निवर्तकः साक्षाद्भगवानेव न्य इति कृष्ण एव गतिर्ममेतिशरणमुपदिष्टम् । शरणं गते कृपया स एव सर्व 'रिष्यतीतिभावः ॥१॥ ननु तर्हि भगवल्लीलापदेशेषु गत्वा स्वधर्मनिर्वाहः कर्तव्य इति चेत्तत्रापि प्रतिबन्ध- • जाहुल्येन देशानामसाधकत्वेन शरणमेव निरूपयति म्लेच्छेति । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ २॥ मलिनपदार्थमेवेच्छन्तीति म्लेच्छा विषयिणो, मन्त्राधुपासकाः, कर्ममागीयाश्च । बिपि तेऽनिपिदं विहितमेव कुर्वन्ति तथापि स्वार्यपराः क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ती- अपक्या फर्मफलं मलिनमेवेति तत्पराणां वयात्वेन निर्देशः कृतः । तादृशस्तै- ता: सर्वे प्रदेशा, अत एव तचल्लीलादीनां तिरोभावान ते साधका इतिभावः । दं तु भगवदीयत्वादनुकूलमेव किन्तु भावे नात्पमात्रेण तस्य वाधकत्वम् । तावतापि विवरणसमेतम् । ५३ पत्र प्रतिबन्धात्वं चत्र पेचलविपयाविष्टसम्बन्धिदेशसंसर्गग भावनाशे किमु वक्तव्य- मिति कमुतिकन्यायेनापि देशस्यासापकत्वं निरूपितम् । किम न केवलमाक्रान्तिमात्र किन्तु तन्मय एव जाता इत्याहुः पापैकमिलयेष्विति । कर्मणां हिंसाभचुरत्वात्तयोक्तम् । एतेन तत्र गमनमात्रेण तत्सम्वन्यात्स्वधर्मनाशो भवतीतिभावः । एवं सति भगवतो पन्योपासनायस्पृष्टत्वेनास्सिन्छ-श्लोक मन्त्रोपासनवैदिकनान्त्रिकदीलार्चनानां सङ्घदेणा- साधकत्वं निरूपितम् । आदिपदेन विहितमत्यादीनामपि तथेत्यर्थः । ननु तत्रापि केचन निवृत्तिपरा भविष्यन्तीति चेत्तवाहः सत्पीडेति । निचिपरत्वेन सहपाणि तवत्यानां देहेन्द्रियादीनि तेषां पीडा सत्पीडा, देशसम्बन्ये तानि विषयाविष्टान्येव भवन्तीति शनिग्रहाशक्यत्वान्निष्टचिपराणां खेदो जायत इति तद्रूपैव स्वधर्मनाशजनिता पीडा, तया व्यग्राः कयमस्माकं परलोकः सेत्स्यतीति व्यया लोका धर्मशीला येषु ! यत्र स्थूलदृष्टी- नामपि न धर्मनिर्वाहस्तवातिसूक्ष्मेक्षिकाणां तादृशानां भावशैथिल्ये किम वाच्यम् । ताशानामपि स्यातुमशक्तेरितिभावः । तथाचोक्तं 'अस्साम तमभृति नान्यसमक्षामि'- खुत्र विवरणे या व्यापारी देहाभिमानी ति फलमकरणे । अतस्तदोवपोपणे मंति- चयनिवृत्त्यर्थं शरणमेव भावनीपमिति कृष्ण एवं गतिर्ममेयुक्तम् । अत एवालोंकि कमनःसिद्धाविति विवकधैर्याश्रयेप्युक्तम् ॥ २ ॥ एवं दुःसंसर्गेण देशानामसायकत्वं निरूप्य तत्र भगवद्भक्ता अपि सन्ति ते समीचीनास्तै सह सङ्गो न वापक इत्याशङ्कथ द्रव्यागामशुद्भया पुष्टस्य तेपामपि सङ्गों, वापक इनीतरमार्गीपागामसाधकत्वमाहुः गङ्गादीति । गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरवाटतेष्विह। तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥३॥ गङ्गादितीर्थवर्या भक्ताः । अयं भावः अस्ति गङ्गायां निरूपमिति सिद्धान मुक्तावल्या फुटीकृतं, तविविधत्वमत्रापि क्षेपम् । तेन जलरूपाधिभौतिकादिमें प्रवाहभक्तिमार्गीपज्ञानमार्गीयमर्यादाभक्तिमार्गीया भका निरूपितास्तत्र प्रथमं वा भक्तिमार्गीयाणामसाधकत्वं निरूपयन्ति । यद्यपि गङ्गापदस्यादौ निरूपणाद्शाया मर्याद भक्तिमायिभक्तत्वातन्मागीयभक्तानामेवादौ निरूपणं संभवति तथाप्याधिभौतिक क्रमेण परिदृश्यमानप्रवाहजलस्यैव प्रथमनिरूपणादनाध्यादौ भवाहभक्तिमागीया क्षेयाः । अग्रिमाणामुत्तरश्लोकेषु निरूपणम् । तयाच पदसम्बन्धा, गङ्गा देवी आदि तानि गङ्गादीनि, तस्या एवाधिदैविकादिरूपाणि, वद्रूपा एव तीर्थभूता आदिसाधक नादताः, परन्तु दृश्यमानजलादिरूपाक्रमेण प्रवाहमागीया एवं है, कर्ममार्गीयापेक्षयोत्तम कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । ज्ञापनाय 'वर्य'पदम् । तादृशेष्यपि दुष्टैरेव स्वरूपापेक्षया बद्दोपैरित्ययः । तादृशैर्धर्मत्रते- वाच्छादितेषु सत्सु, धर्मा एव तेषां धर्मिस्वरूपज्ञाने आवरका जाताः । ननु भावद्ध- मनिप्लेषु कथं तद्धर्माणामावरकत्वं बाहुः-तिरोहिताधिदेवेष्विति। तिरोहितमधिदै- वस्वरूपं येषु । यथा जलप्रवाहे मूर्तिमत्या गङ्गायास्तिरोधानं तथा भवाहमार्गेपि साक्षा- पुरुषोत्तमस्वरूपतिरोधानम् । विभूतिरूपस्यैव वेषां भजन तद्रूपमेव फलं, न तत्राधिदैवि- कभजने फलं चेति द्रव्याशुद्धया पुष्टिमार्गीयाणां तत्सङ्गो न साधक इति शरणगतिमे- वोपदिशन्ति कृष्ण एवेति । अत एवायफलाभावे भगवतो दातृत्वं नास्ति सा सेवानाधिदैविकी'स्युक्तं सेवाफले । प्रकृते तु आधिदैविकस्वरूपस्यैव सर्वस्य साधक- वादाधिदैविकरसात्मकसदानन्दस्वरूपज्ञापककृष्णपदमेवोक्तं सर्वत्र शरणागतौ । एतेन तव्यतिरिक्तस्वरूपस्य शरणमपि न साधकमित्यपि सूच्यत इति सुष्टूक्तम् ॥३॥ ननु ज्ञानिनो निर्दोपाः समबुद्धय एकान्तस्थितयः तत्सङ्गः साधको भविष्य- तीति तेपामपि मायामोहितत्वात्साक्षात्पुरुषोत्तमसम्बन्धाभावेनासाधकत्वं निरूपयन्तः कर्तृणां तनिरूपयन्ति-अहङ्कारविमूढेष्विति। अहङ्कारविमूढेषु सत्नु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ ते तु 'अहं ब्रह्मास्मी'त्यहङ्कारेण विशेषेण मूढा, नहि तत्र साक्षात्पुरुषोत्तमस- उन्धः, किन्त्वक्षरमात्रसम्बन्धेन तन्मात्रस्यैव परमफलत्वं मन्यन्त इति सेव्यसेवकभाव- पापि गतत्वाद्विशेषेण मूढास्तादृशेषु सत्सु । ननु अविद्यानिवृत्तौ अनुभवरूपे विज्ञाने पम्पन्ने ब्रह्मणि लयो भवतीति कथं तेषां मोहः संभवतीति तत्राहुः पापानुवर्ति- विति । 'स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिन' इतिवाक्यात्पुष्टिमार्गीयाणा फले प्रति- पकत्वात्साक्षात्पुरुपोचमज्ञानाभावरूपस्य तादृशज्ञानस्य पापत्वाचदनुवर्तिनां पापा- संपतित्वमेवेति तथोक्तम् । किञ्च, तादृशस्य पुनरक्षरलयानन्तरं पुष्टिफलसंभावनैव सयपिज्ञापनाय पापरूपत्वं विशेपेण मृढत्वं चोक्तम् । ननु तथाप्यानन्दानुभयो भविष्य- ति तत्राहुः-लाभपूजार्थयत्नेविति । तन्मार्गे न साधनदशायां न च फळदशायां नुभवः, यतो लाभः पात्मलाभः पूजा तत्साधनाथ मनस्येव कल्पितमूर्तेरुपासनारूपा, यमेव यत्नो येषां तादृशेषु । नद्यात्मन ऐक्ये सर्वेन्द्रियाणां सार्थकता, नाप्पानन्दानु- मानं च, यया जले निमग्नस्य जलपानम् ।बहिरेव पाने तदनुभव इति न तेषामानन्दा. वोपि । प्रकृते तु पृष्टभावापन्नस्य 'भगवता सहे'त्यादिरूपभावनायामपि सर्वेन्द्रियाणां मात्स्वरूपानुभवो, पहिमाकट्ये तदनुभये किं वाच्यमितिभावः । तदुक्तं निरोधवर्णने विवरणसमेतम् । सङ्कल्सापि तत्र हि दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टमित्यादिना । एवं सति पुष्टिमार्गीयस्प न सत्सङ्ग साधक इति शरणमेव निर्दिशन्ति कृष्ण एव गतिः ॥ ४॥ ननु ज्ञानियपि केचन भक्ता भवन्ति, तत्रापि प्रेमयुक्ता, ते पुनद्विविधाः केचन नामनिष्ठा केचन सेवेकनिष्ठास्तेपी सरः सापको भविष्यति तयाचोक्तं 'सास्तेपय ने माय: 'सतां प्रसङ्गादित्यादिनेत्याशय तयोरपि सापकत्वाभावात्मधर्म नामनिष्ठा- नामसापकत्वं वदन्तो मन्त्राणां सन्निरूपपन्ति अपरिज्ञानेति । अपजिाननटेषु मन्त्रेष्वंनतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ५ ॥ यद्यपि 'एक शास्त्रं देवकीपुत्रगीत'मित्यत्र मन्त्रोप्यास्तस्य नामानि यानी'- युक्त्या भक्तानां नामैव परो मन्त्र तत्कीर्तनपराः समीचीना एव तेषां तत्कीर्तने तदा- नन्दानुभवनिताचपुलकादयोपि भवन्ति तथापि तेषां मर्यादामागीपत्वात्स्वरूपतोप- रिज्ञानमेवेति तेषु मन्त्रेषु नामरूपेष्वपरिज्ञानेन नष्टेषु अलक्षितेषु सत्सु । यादृशः कृष्णपदस्य रसात्मकभावरूपोर्थस्तदपरिज्ञानादलक्षितत्वमुक्तम् । नतु कथं सोों न लक्षि. सस्तनाहुः अवतयोगिष्विति । नातं अनन्यवं पतिव्रतावसतिविषयकपरमानुरागंज- नितरसालकभावेन तदेकनिष्ठारूप, तदभावतोऽत्रता: पूर्वोक्ताः, तादृशेषु योग संयोगो येपामिति तथात्वमुक्तम् । ननु तेष्वपि नामधर्माणां दृश्यमानत्वात्कथमेवमुच्यते तबाह तियोहितेति । तिरोहितः, अर्थों रसात्मकस्वरूपेण य: भकट स यत्र तादृशेषु सत्सर अत एव मुकुन्द ! नारायण! यज्ञेश्वर माननिय वासुदेवत्यादीनि मोक्षेछुभिरुच्या नहि पुष्टिमागीयरिव 'बजानातिहन् वीरयोपिताम्' 'मुस्तनात्यादीनि रसात्मका जानि। तेषां मर्यादामार्गानुसारेणैव तदनुभवो भवति न पुष्टयनुसारेणेति न तसङ्गस्ता, साधक इति शरणमेवोपदिशन्ति कृप्या एवेति ॥ ५ ॥ ननु ये सेवापरास्ते तत्सर्वविनियोगेनानन्यवतेन सेवां कुर्वन्तीति न तेष व्रतत्वमिति साधका भविष्यन्तीत्याशङ्गय तेपायसाधकत्वं वदन्तः कर्मणां तदाहा मानापादेति । नानावादविनष्टेषु.सर्वकर्मत्रतादिषु । । पापण्डेकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥६॥ यद्यपि ते पूर्वोक्तापेक्षया सर्वोचमास्तथापि तेप मर्यादामियत्वात्सर्वकर्म दिपु सबै पुष्टिमागीयं यावत्प्रमेयं कर्म तन्मार्गीया सेवा भगवता सद्देत्यादिरूपा 4 ५६ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । लोकवेदनरपेक्ष्येण केवलस्वरूपमात्रैकनिष्ठत्वं, 'आदिपदेन तन्मांगीयश्रवणकीर्तनादीनि ज्ञेयानि, तेषु नानावादविनष्टेषु सत्सु । नानावादा अनेकविधप्रमाणवचनानि मर्यादा- मार्गीयाणि आवरणरूपाणि, तैः कृत्वा विशेषेण नष्टा अलक्षितास्तादृशेषु- सत्सु। तेषां मर्यादामिश्रत्वेन विहितैकदृष्टित्वात् , न तज्ज्ञानमितिभावः । अत एव 'मर्यादया गुणज्ञास्ते इति निरूपितं पुष्टिप्रवाहमर्यादायाम् । ननु तेपि भक्तिमार्गनिष्ठया सेवादिकं कुर्वन्तीति कथं तदज्ञानं तत्राहुः-पापण्डैकप्रयत्नेविति । पापण्डो नामोपाधिस्तद्वप एवैकः प्रयत्न स्तदनुकूलसाधनरूपो येषां सादृशेषु । तेपामपि मिश्रस्वेन पुरुपोचपसायुज्यैकफलत्वा- चत्मयत्नादीनां पुष्टापेक्षयोपाधिरूपत्वमेवेति तथा निरूपितम् । अत एव मध्यमफलत्वं सायुज्यस्य निरूपितं सेवाफले 'सेवायां फलत्रयमित्यनेन । किञ्च, सायुज्यस्य मर्यादाम- क्तिमार्गकफलत्वं तत्वार्थदीपे निरूपितं 'सर्वत्यागेनन्यभावे' इत्यनेन । पुष्टिफलं तु केवलं तादृशानुग्रहभरेण सर्वात्मना निरुपधिभावैकसाध्यमिति तादृशस्यापि सङ्गो न साधक इति शरणमेव निरूपयन्ति कृष्ण एवं गतिर्ममेति ॥ ६ ॥ नन्वेवं सकळमार्गीयसाधनफलानां बाधकत्वेन पुरुषार्थरूपत्वाभावात्पुष्टिमार्गीयस्य के पुरुषार्थाः ? कीदृशया वा कथं वा सिद्धा भविष्यन्तीति प्रश्ने तादृशस्य भगवानेव चतुर्विधपुरुषार्थरूपः, तत्सिद्धौ शरणमेव साधनं नान्यदिति भगवतस्तद्रूपनिरूपणपूर्वक चतुर्भिः: श्लोकः शरणं निरूपयन्ति । तत्र प्रथम धर्मरूपत्वेन निरूपयन्ति अजामिला- दिदोपणिामिति । अजामिलादिदोषाणां नाशकोनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७॥ 'पुष्टिमार्गे हरेदस्यि धर्मोर्थो हरिरेव हि । कामो हरेर्दिसैव मोक्षः कृष्णस्य सोढुवमित्यत्रोक्ताः पुरुपार्या मर्यादामार्गीयेभ्यो भिन्ना उपाधिरहिता इति। तत्र हरेर्दास्य नाम उक्तः । तच 'पुरुषभूपण देहि दास्यमित्यत्र स्वरूपात्मकत्वेन निरूपितमिति समतो धर्मरूपत्वं सिद्धम् । एवं सति धर्मेण यथा दोपनिवृत्तिनिदोपतासिद्धिश्च भवति या भगवान् स्वरूपेणैव दोपनिवर्तक इष्टमापकोपि भवतीति धर्मनिरूपणपूर्वकं शरणं तरूपयन्ति । तथाहि-अजामिलादयः प्रवलदोपदुष्टास्तद्रूपा अत्र सकलेन्द्रियसहा- आस्तेपां दोपाणां नाशकः स्वरूपेणैव न साधनैः । अयं भावः, पुष्टिमार्गीयस्य स्नेहोत्पत्य- गन्तरं 'स्वव्यसनतः स्वतन्त्रपुरुषार्थत्वेन क्रियमाणायां 'भगवता सह-संलाप' इत्यायुक्त विकारफभावनायामन्तलीलासहितसाक्षात्स्वरूपमाफटये सति या सेवोत्तमपुष्टिरूपा तन्द्रि- ताणां भाकृतपदार्थसंसर्गदर्शनस्मरणादिना यः प्रतिवन्धः सोत्र दोपस्तनाशकः । पाऽनामिलस्य नाममात्रेण दोपा दूरीकृतास्तया मते ' तादृशस्य मियो गुणगान• Y भग. .
विवरणसमेतम्। शक्षणनामात्मकलीलया तत्चदिन्द्रियाणां दोष नाशयतीति तयक्तिम् । अनेने होपनियुत्तिर्मकार्यमुक्तम् । इष्टमाप्ति निरूपयन्ति अनुभवे स्थित इति । दोष दूरीकत्यं तत्तदिन्द्रियादिपु स्वयं स्थितो भूत्वा स्वरूपानन्दमनुभावयत्तीतिभावः । अनेनेष्टमामिरूपं धर्मकार्यमुक्तम् । एतत्सबै निरोपवर्णने 'संसारापेशदुष्टानामि त्यारभ्य परिवस्मुखमिय स्पन्तेन स्फुटीकृतम् । ततोपि विशेपमाहुः ज्ञापिताखिलमाहात्म्य इति । ज्ञापितम- खिलं पुटिलीलारूप माहात्म्यं येन । अत एव मस्थितानामपि च लीलानुभवः ।पुष्टिर- पाहमर्यादायामपि 'पुष्टया विमिनाः सर्वज्ञा' इत्युक्तम् । भगवति सामादन्तःभकटे तल्ली- लाधर्माणामप्याविभावाचाज्ञानमप्याविर्भवतीति न किश्चिदनुपपनम् । एवं सति तादशस्य तादभावपोपणादौ ईदग्धर्मरूपो भगवानेव शरणामिति कृष्ण एवं गतिर्ममेत्युक्तम् ।। ननु नेपामिन्द्रियादीनां प्राकृतत्वाचदधिष्ठातॄणां च तयात्वात्कथं दोपनिष्टत्तिरित स्पाशय तेषां सर्वतद्धातरूपः कृष्ण एव भवतीति तस्यैवार्थरूपवं निरूपयन्तः शरणाविमाहुः-प्राकृता इति । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं वृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ८ ॥ प्रपश्चनिरूपणप्रस्ताचे 'जढे सदंशः प्रकट इतरावाच्छन्नौ, जीये आयौ मौ; मानन्दांशस्तिरोहित' इतिनिरूपितम् । पुष्टिमागीयस्य तु साधनदशायां सेवागुण, गानादिपरस्य स्वत एवानन्दांशः प्रकटो भवति । तथाचोक्तं सिद्धान्तमुक्तावल 'ततः संसारदुःखस्येति । तत्रैव पुनः विवरणे यद्यप्यनमिलपिते ते तयापि वस्तुस्वभा वाझवत' इत्युक्तम् । सिद्धान्तरहस्येपि सर्वेषां महाता तत' इत्युक्तम् । सचिदानन्दत स्वत' इति निरोधविवरणेप्युक्तम् । एवं सति ये पूर्व प्राकृता देवा इन्द्रियाधिष्ठाता रस्ते सचिदानन्दरूपात्यात्मात्य सम्पन्ने पुरुषोत्तमावि वात्सकला जाताः । कर रसात्मकब्रह्मविद्यारूपा तत्सहिता जाता। गणितानन्दरूपमक्षरं ब्रह्मा, प्रत्यये ततोपि हस्बोतितुच्छो जीवः स घृहज्जातस्तदपेक्षयापि महान् नातः । उभयत्र हेर, पूर्णानन्दो हरिरिति । यवः सर्वेषां सच्चिदानन्दत्वे सम्पन्ने पुरुषोत्तमाविर्भावाचसम्म धिरसारमका भाषा उत्पधन्त इति तजनितमजुरार्तिशान्त्यर्थमन्तस्तत्तदिन्द्रियादिन तत्स्वरूपः स्वयमेव भूत्वा सर्येषु तेषु पूर्णस्वरूपानन्देदानेन दुःख हरतीति तथोक्ता एवं सत्यक्षरात्मत्वेनाप्राकृतस्ये किं वाच्यम् । किन्तु तस्य समस्तसहतः सीमादसात्मकली लारूपपूर्णानन्दभगवद्रूप एवं भवतीति कुतस्तत्र दोपावकाश इतिभावः । तदेवं श्रीम द -- कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । कुलजीवात्मा श्रीमद्भगोकुलमानसमित्याधुक्तम् । यत एवं भगवत एवार्थरूपत्वं तस्मात्तस्य तथात्वसिद्धथै शरणमेव साधनमिति तन्निरूपयन्ति कृष्ण एवेति ॥८॥ एवमर्थरूपं निरूप्यतादृशस्य प्रचुरार्तिशान्त्यर्थं वहिप्रकटस्य कोटिकन्दर्पलाव- ध्यसाक्षाभगवतः सङ्गस्यैवापेक्षितत्वात्कामरूपत्वं निरूपयन्तः शरणं प्रार्थयन्ति विवेकेति। विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ९ ॥ अत्रेदमावृतम् । पुष्टिमार्गीयभावाविर्भावानन्तरं विरहानुभवार्थे त्यागस्यावश्यक- त्वात्यागानन्तरं पुनः क्रमेण मिथो गुणानुवादजनितप्रचुरभावानामुच्छलितत्वानाशस्य देहाणेन्द्रियान्तःकरणादीनि स्वरूपात्मकानि भवन्तीति पूर्वश्लोकद्वयेन निरूपितम् । एतावत्पर्यन्तं विरहानुभवे. चक्षुरागादित्रपानाशान्ताः सप्तावस्याः संपन्नाः। अस्ति- लोके उन्मादाद्यवस्थात्रयं निरूप्यते । तथाहि-विवेका, धैर्य, भक्यादयस्तै रहितस्य । विवेकराहित्ये विकलत्वं भवति यतो वैकल्ये विवेको न तिष्ठति । तच्चोन्मादावस्थायां भवतीति सा निरूपिता । धैर्यराहित्येनाइनिशं साक्षात्सङ्गाभावजपचुरातिजनितम- स्वास्थ्य तिष्ठति। ननु पूर्व गुणगानेऽन्तः साक्षादनुभवस्योक्तत्वात्कथं धैर्याभावेनास्वास्थ्य तबाहुः भक्त्यादिरहितस्येति । गुणगानदशायां पूर्वमन्तःप्राकटये साक्षाद्भक्ति- उपमुखारविन्दसुधास्वादात् । आदिपदेन साक्षादोगः। साक्षादोगस्पाप्यनुभवात्स्वास्थ्य थतमिदानी प्रलापावस्थायां फलपतिवन्धकत्वेन साक्षात्सुपादानतदुपयोगिवाक्याद्य- सरणादस्वास्थ्यमेव तिष्ठतीति तद्रहितस्वेत्युक्तम् । तत्रापि यत्किश्चित्स्वास्थ्येपि फलम- पन्धकत्येन विशेषतो रहितस्येत्युक्तम् । तथाचोक्तं संन्यासनिर्णये ' भगवान फलरूप- हात' 'स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्य'मित्यादि । एवमस्वास्थ्येपि स्वास्थ्यवाक्यायकरणे प्रचु- हा मूर्छामापतति सा दशा निरूपिता । ततः पुनर्जामदयस्थायां स्वरूपस्थिती सङ्गा- वेन स्थानुमशक्तं गुणावलम्बितचित्तं पुनर्भवति तेन च यत्किञ्चित्स्वास्थ्ये तदेव फले तिवन्धकं भवतीति तस्य पापरूपत्वमिति तत्रासक्तस्येत्युक्तम् । अत एवोक्तं 'ज्ञानं रणाश्च तस्यैव वर्तमानस्य बाधका' इति संन्यासनिर्णये। ततः पुनःक्षणानन्तरं स्थितिरेव न अतीति दशम्यवस्या निरूपिता। एतत्सर्वं फलपकरणीयतृतीयाध्यायान्ते स्फुटीकृतम्। गुणगानानन्तरमनाविर्भाव मूर्छन्तायस्थानिरूपणपूर्वक लीलाप्रवेशमलापः स्वरूप- तौ गुणगानमिति निरूपितम् । अग्रे पुनातिदन्ये जाते 'सहदुः सुस्वर 'तन्यः पाण- वागत'मित्यादिनानिमा सा भूचितेति सर्वमुपपन्नम् । एतादृशस्य पुनः शीघ्रमाविभावार्य भगमेव भावनीयमिति कृष्ण एव गतिर्ममेत्युक्तम् । एतदनन्तरं सर्वयाऽऽविर्भूय परमा- विवरणसमेतम् । नन्दं ददातीति झापनाय कृष्णपदं, शरणं निरूपितम्। तयाचोक्त 'ब्रह्मा विष्णु रुनश्च भूला पुनः कृष्ण एव जात र इति 'तासामाविरभूत्कृष्ण इत्यस्यामासे ॥९॥ एवं दशावस्थाभिः पूर्णविषयोगानुभवे जाते प्रतिवन्धकदेहनिवृत्तौ तस्या- लौकिकं रसात्मकं लीलोपयोगिदेहादिकं संपाय स्वयं सालासकटीभूय बहिः स्वरू- पानन्दं ददातीति मोक्षरूपत्वं निरूपयन्ति सर्वसामयसहितः सर्वत्रैवा- खिलार्थवादिति । सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेद कृष्ण इति श्रीवल्लभोचवीत् ॥ ११ ॥ सर्व यावदलौकिकैचर्यवीर्यादिगुणानां कर्तुमकर्तुमन्ययाकर्तुं यत्सामय तत्स- हितः सन् तंमति स्वरूपानन्ददातुं स्थितो भवतीत्यर्थः । एतदेवोक्तं भगवानपिता रात्री- रित्यत्र भगवसदेन स्वतन्त्रलिखने । ननु मभोः सर्व संभवति परं सादृशेन प्रभुणा सह साम्येन स्वरूपानुभवः कयं सुवचो जीवस्य तबाहुः सर्वत्रवाखिलार्थकृदिति । 'पुष्टि काये- नेतिवाक्यातादृशं तं भक्तं साशासात्मकस्वचरणारविन्दपकरन्दरजसाऽलौकिकदेहादि- सम्पचिपूर्वक लीलासमाने प्रकटीकृत्य सर्वश्रेच देनाणेन्द्रियादिष्यस्त्रिलार्थान् रसात्म- कालौकिकवयोगुणादिरूपानलौकिकैश्चर्यगुणादिसामर्थ्यरूपान् करोतीति तथोक्तम एवालौकिकसामर्थ्य पुष्टिफलं निरूपित सेवाफले। एतत्सव'यथार्भका स्वप्रतिविम्वविध इत्यस्य विवरणे स्फुटीकृत 'स्वसामदियोजनेत्यादि । एवं स्वरूपात्मकतां संपाय स्वच पानन्दं ददातीति मोक्षरूपत्वं निरूपितम् । अत एव 'मोक्षः कृष्णस्य चेद्धुप'मित्युक्तम् मनु मोक्षे आनन्दममता तिष्ठति प्रकृतपि वथैव चेत्स्पात्तदा कयं लीलानुभव इत्याहुःशा जस्थसमुद्धारमिति । अत्र शरणपदं सर्वात्मभावपरम् । अलौकिकसृष्टिः सर्वैतारमा वत्येवेति शरणस्थस्य-सत्मिभावस्थस्य-पूर्वोक्तभक्ततचल्लीलानन्दसमुद्रमास्य-तत उद करोतीति शेषः। अन्यथैकस्यां लीलायां मनस्य द्वितीया साननुभूतैव तिष्ठेत् । एतत्सर्व । एतद्विमुच्यत' इत्यत्र स्कुटीकृतम् । यदा, लीलानुभवशायामपि सत्मभावादेव दैन्या उत्पद्यत इत्यपि ज्ञापनाय शरणस्थेतिपदम् । अथवा, अतःपरं सर्वांशेन शरणस्या जा इति वा ज्ञापना शरणे स्थित्यर्थ उक्त तथासति शरणसमाप्तिापिता किञ्च, एवं स्वरूपानन्दानुभवानन्तरं श्रीमदृष्ट्वोपदिष्टज्ञानेन यादशो निरोधः सिन्डस्लाइयो नि पित इति झापनायोद्धारे सम्यक्त्वमुक्तम् । एवं सति सदा फलरूपपूर्णनिरोधस्थित्यन? - विवरणसमेतम् । ता: स्वरहस्य सर्व कथयन्तीति तासां गुरुत्वं निरूपितं संन्यासनिर्णये । अतिप्रियाय गुरु स्वरहस्यं कथयतीत्युक्तत्वात् । एवं सति तलमत्वेन प्रमोरपि परमप्रेमास्पदीभूत इति तदुक्तं सर्वमङ्गीकृतं भगवतेति ज्ञापितम् । अत एव यतोङ्गीकृतमिति हेतोरवयी- दित्याह, फलमित्यर्थः । किञ्च तद्वलभत्वेन भगवदुक्काझीकारः स्वतः सिद्ध एवेति न धनस्तदुक्तिः कण्ठोक्ता । अनेन फले सर्वथापि निःसन्दिरपत्वं निरूपितमिति सर्वमव- दातम् ॥१०-११॥ अतिमलिनतराशये मदीये किमयमपूर्वतरोदयो विलासः । निरुपधिकरुणैकविभ्रमोपि वितरणशीलविभोरतोद्भुतं नः॥१॥ व्रतवतो महती किल ते कृपा मदपराधगणा अपि तादृशाः । उभयतौल्यविधारणया विभो विजयते तव सैव गरीयसी ॥२॥ अदेयदानैकपरान् महौदार्यगुणैः स्वके । श्रीमदाचार्यचरणान् आभये करुणानिधीन् ॥ ३ ॥ प्रणतालोकसंगातकरुणादृष्टिभिः क्षणात् । संताप हरति श्रीमटिलेशं तमाश्रये ॥४॥ इति श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रविवरणं समाप्तम् । .. समासश्वायं ग्रन्थाः।
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L-17
BRAVAN'S LIBRARY, BOMBAY-7
* N.D.---This book is issued only for one week till
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this data last marked below:
Dutc
Dats
Date
ZAUG 1974
- 27 JAX 1981
Not to be issued
Not to be Issued
Bharatiya--Vidya Bhavan's Grantbåger
ALIRAG/10880
Teile kxshnasraya Stotram.
with Six commentaries.
Author Valla tha chanja
Date of
19 Stie
Borrowers
Date of
Issue
Bortowers
Shri RT vijas
27 JAN 1981
1113
mere
Not to be Issucd