Central Library Jai Narayan Vyas University,jodhpur
Apabhramsa-hindi-kosa Volu-1
Front matter
Apabhramśa-Hindi Dictionary
by Dr. Naresh Kumar
प्रकाशनाधिकार-डॉ. नरेश कुमार
मूल्य : 250/- रुपए
प्रथम संस्करण सन् १९८७ ई०
Jodhpur University Library
226482. Supesab
Bcca No
gall No
...DIH
।
भारत में प्रकाशित
मुद्रक-तथागत प्रिंटिंग प्रेस
तेजाब मिल, जी० टी० रोड, गाजियाबाद ।
प्रकाशक-इण्डो-विजन प्रा० लि.
II ए-२२० नेहरूनगर, गाजियाबाद-२०१००१
46328
Published by
Indo-Vision Private Limited
II A, 220, Nehru Nagar, Ghaziabad-201001 (U. P.) India
समर्पण
जिनका सारा जीवन छात्रों एवं शोधार्थियों को निःस्वार्थ भाव से निर्देशित
करने में व्यतीत हुआ।
जिनका रोम-रोम हिंदी-साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में समर्पित रहा,
जो प्राचीन गुरु-परंपरा के साकार स्वरूप हैं, उन्हीं श्रद्ध य डॉ. जयचन्द्र राय
को सादर समपित ।
-नरेश कुमार
दो शब्द एक अपभ्रश कोश की प्रतीक्षा बहुत दिनों से थी। आज डॉ. नरेश कुमार के 'अपभ्रंश-हिंदी-कोश' को देखकर प्रसन्नता हुई। कोश कैसा बन पड़ा है, यह तो उपयोग की प्रक्रिया से गुजरने पर ही ठीक-ठीक पता चलेगा। किंतु उड़ती नज़र से देखने से इतना तो आभास हो ही जाता है कि कोशकार ने शब्द-संग्रह का कार्य केवल कोश-ग्रंथों से ही नहीं किया है, बल्कि स्वयं अपभ्रंश के काव्य- ग्रंथों का भी उसने आलोड़न-विलोड़न किया है। संभव है, खोजने पर कुछ-एक अभीष्ट अपभ्रंश शब्द इस कोश में न मिलें, लेकिन इतने से ही यह प्रयास व्यर्थ सिद्ध नहीं होता। इस दृष्टि से कोई भी शब्दकोश पूर्ण नहीं कहा जा सकता। अपनश शब्द के विद्यार्थी अभी तक श्री हरगोविंद दास त्रिकमचन्द शेठ के 'पाइअ-सद्द-महण्णवो' से ही काम चलाया करते थे, क्योंकि प्राकृत के बहुत-से शब्द अपभ्रश में भी ज्यों के त्यों स्वीकार कर लिए गए थे, फिर भी अपभ्रंश के काव्य-ग्रंथों में ऐसे अनेक शब्द मिलते रहते हैं जो उक्त कोश में दुष्प्राप्य हैं । इस आवश्यकता की पूर्ति एक स्वतंत्र अपभ्रंश कोश ही कर सकता है—ऐसा कोश जो अपभ्रंश काव्य-ग्रंथों में प्रयुक्त शब्दों के आधार पर निर्मित हो। डॉ० नरेश- कुमार का प्रयास इसी दिशा में है, इसलिए स्वागत योग्य है। अपभ्रंश-कोश की सबसे बड़ी समस्या अर्थ-निर्धारण की है । ध्वनि-परिवर्तन के विविध नियमों के कारण संस्कृत के शब्द अपभ्रंश में ऐसा रूप ग्रहण कर लेते हैं कि प्रायः एक ही अपभ्रंश शब्द अनेक संस्कृत शब्दों का वाचक होता है । ऐसी स्थिति में अत्यंत सावधानी अपेक्षित है। मुझे यह देखकर संतोप हुआ कि इस कोश में ऐसी सावधानी वरती गई है । ऐसे स्थलों पर मूल ग्रंथ से प्रयोग के उदा- हरण उद्धृत करके सही-गलत के निर्णय की सुविधा भी प्रदान की गई है। सच पूछिए तो डॉ. नरेश कुमार ने वह कार्य किया है जो प्राय: किसी संस्था के ही बूते का है । इस अध्यवसाय के सम्मुख नतमस्तक होने के अतिरिक्त वह व्यक्ति और क्या कर सकता है जो पैंतीस वर्ष पहले अपभ्रंश पर एक छोटी- सी पुस्तक लिखने के बाद विद्या की उस ड्योढ़ी से दूर चला आया। फिर भी ग्रंथकार के अनुरोध पर यदि आशंसा के दो शब्द कहने का साहस जुटा रहा हूँ तो इसलिए कि यह मेरा पुराना प्रेम ही नहीं, बल्कि प्रथम प्रेम है। इस समय तो मन में यही भाव है कि जो मुझसे न हो सका उसे करके दिखाने वाला कोई तो आगे आया ! "क्रिया केवलमुत्तरम्' । नामवर सिंह भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, ३०-११-१९८६ नई दिल्ली-११००६७ 11 - आमुख भाषा नदी के समय परिवर्तनशील होती है। वैदिक एवं लोकिक संस्कृत के दुर्बोध होने पर पालि, प्राकृत आदि भाषाएं प्रचलित हुई; संस्कृत भाषा की विभ- क्तियों का वाहुल्य और उनकी · अनिवार्यता के नियम प्राकृतं और अपभ्रंश में शिथिल होते गए । आधुनिक भारतीय भाषाएं निविभक्तिक होती गई। कारक : विभक्तियों के स्थान पर इनमें परसों का व्यवहार होने लगा। प्रांतीय अपभ्रंशों- महाराष्ट्री अपभ्रंश, मागधी अपभ्रंश, अर्धमागधी अपभ्रंश, शौरसेनी अपभ्रंश और पैशाची अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं-उपभाषाओं एवं बोलियों के विकास की प्रक्रिया प्रारंभ हुई । ई० १००० के पश्चात् विकास की यह अवस्था देखने में आती है। अपभ्रंश भाषा से उद्भूत माषाएं- 'पं० हरगोविन्ददास टी० सेठ ने अपभ्रंश भाषा से उत्पन्न विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं का विवरण इस प्रकार दिया गया है- "त्रिस्त की पञ्चम शताब्दी के पूर्व से लेकर दशम शताब्दी पर्यन्त भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में कथ्य भाषाओं के रूप में प्रचलित जिस-जिस अपभ्रंश भाषा से भिन्न-भिन्न प्रदेश की जो जो आधुनिक आर्य कथ्य भाषा (Modern vernacular) उत्पन्न हुई है । उसका विवरण यों है: महाराष्ट्री-अपभ्रंश से मराठी कोंकरणो भाषा । मागधी-अपभ्रंश की पूर्व शाखा से बंगला, उड़िया और आसामी भाषा। मागधी-अपभ्रंश की विहारी शाखा से मैथिली, मगही और भोजपुरिया । अर्धमागधी-अपभ्रंश से पूर्वीय हिन्दी भाषाएँ अर्थात् अवधी, बघेली और छत्तीसगढी । सौरसेनी-भपभ्रंश से बुन्देली, कनौजी, ब्रजभाषा वांगरू, हिन्दी या उर्दू ये पाश्चात्य हिन्दी भाषाएं । नागर-अपभ्रंश से राजस्थानी, मालवी, मेवाडी, जयपुरी, मारवाडी तथा गुजराती भाषा। टाक्की- अपभ्रंश (सौरसेनी के प्रभाव-युक्त) से पूर्वीय पंजावी । बाचड अपभ्रंश से सिन्धी भाषा। पैशाची अपभ्रंश से कश्मीरी भाषा" | . पं० हरगोविन्द दास टी० सेठ ने उपयुक्त भाषानों में तमिल, मलयालम, तेलुगु और कन्नड का उल्लेख नहीं किया है । वस्तुतः तमिल और मलयालम, तेलुगु और कन्नड की शब्दावली और लिपि में परस्पर समानता मिलती है। इन भाषाओं की उत्पत्ति किस भापा से हुई, अभी भी यह विवादास्पद विषय बना हुआ है। असमी भाषा का विकास पूर्वी क्षेत्र में प्रचलित प्राकृत भाषा; गुजराती का १. पं० हरगोविन्द दास टी० सेठ, पाइंअ-सह-महण्णवो, संस्क० १९२८, उपोद्घात, पृ०४६ । .
(ii) विकास गुर्जर अपभ्रंश से हुआ। मराठी की शब्दावली संस्कृत, प्राकृत और अप. भ्रंश के माध्यम से आयी है । सिन्धी, पंजावी, ब्राचड़ और पहाड़ी भापाएँ भी शौरसेनी अपभ्रंश से प्रभावित हैं। निर्यसन के अनुसार शौरसेनी.अपभ्रश से पश्चिमी हिन्दी (बांगरू; खड़ी- बोली, व्रज, कन्नौजी और बुन्देलखण्डी), राजस्थानी अपभ्रंश से राजस्थानी बोलियां (मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, जयपुरी), गुर्जर अपभ्रंश से. गुजराती; पूर्वी हिन्दी समूह, अर्धमागधी अपनश से (अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी , मागधी से भोजपुरी, मैथिली, मगही, बंगला, उड़िया; महाराष्ट्रो अपभ्रश से मराठी का विकास हुआ । नीचे अपनश भापा के प्रादेशिक भाषाओं एवं बोलियों के साथ सम्बन्धों को सिद्ध किया गया है । विद्यापति की 'कीर्तिलता'- (चौदहवीं शताब्दी की रचना) में भूतकाल में 'ल' प्रत्यय का प्रयोग-कहल, चलल, मारल आदि शब्दों में मिलता है । मैथिली के भूतकालिक कृदन्त, यथा-देखल, सुनल, हंसल आदि प्रयोग मेंअवहट्ट भाषा की परम्परा सहज रूप में द्रष्टव्य है। अपभ्रंश धातु 'वइसई' (बैठने के अर्थ में) मैथिली में और अपभ्रंश 'बइठिउ' (वैठने के अर्थ में) बुन्देली और बघेली में विद्यमान है। रोडाकृत 'राउलवेल' (११ वीं शती की रचना) में भूतकाल के भाव को प्रकट करने के लिए 'अल' प्र यय का प्रयोग 'ओढिअल,' 'पहिरअल' शब्दों में हुआ है, जिसका प्रयोग आज भी बंगला, भोजपुरी, मैथिली में मिलता है। अपनश भाषा में वे प्रवृत्तियां विद्यमान हैं, जो कि बाद में भारतीय भापाओं और बोलियों में विकसित हुई । विकास की दृष्टि से अपनंश के शब्दों से भारतीय भाषाओं की कड़ी जोड़ी जा सकती है। उदाहरणार्थ; उडिया के 'अंकुश' (सं० अकुश>अप० अंकुस), 'अंगार' (सं० अङ गार>प्रा० अप० अंगार=जलता हुआ कोयला) 'अंगुलि' (सं० अङ गुलि-ली>प्रा० अप०. अंगुलि >हिं० उगली), 'अन्त' (सं० अन्त>प्रा० अप० अंत-आखिर), 'अंधार' (सं० अन्धकार>प्रा० संघयार>अप० अंधार), 'आग' (सं० अन>प्रा० अग्ग, अप० अग्गइ, अग्गई, अग्गएँ) आदि शब्दों के लिए अपभ्रंश साहित्य उपजीव्य रहा है । पंजाबी के 'इकासी' (सं० एकाशीति->अप० इक्कासी>हिं० इक्यासी), 'अग्गे' (सं० अग्र>प्रा० अग्ग>हिं० मागे), अट्ठ (सं०. अष्टन् >प्रा०प० अट्ठ >हिं० आठ), 'श्रद्धा' (सं० अर्ध>प्रा० अद्ध >अप० आध); 'मास' (सं० आशा >प्रा० आसा>अप०. आस), 'आसण' (सं० आसन>प्रा० आसण>अप० आसण्ण-जिस पर बैठा जाता है वह चौकी आदि), 'अन्हां' (सं० अन्ध > अप० संघ), 'अन्हेरा' (सं० अन्धकार>प्रा० अंधकार>प्रा० अंधयार>अप० अंधार), 'इक्क' (सं० . एक >अप० एक्क, · इक्क); 'वडडा' (अप० वड्ड>हि० बड़ा), 'छड्ड' (सं० छर्दय् >प्रा० अप० द्दड्ड, अप० छंड>हिं० छोड़ना). आदि शब्दों के उदाहरण से अपनश की व्युत्पत्तिमूलक महत्ता स्वतः सिद्ध है।
(ii) - अपभ्रश के अनेक शब्द पंजाबी में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं' यथा-अपनश 1/सि (होने के अर्थ में) पंजाबी और हरियाणवी में विद्यमान है । स्वयंभू रोडाकृत 'राउवेल' में प्रयुक्त 'चांगउ' (४,८), स्वयंभू, पुष्पदंत और धनपाल द्वारा प्रयुक्त 'चंग' शब्द की परम्परा पंजाबी में 'चंगा, चंगी' के रूप में आज भी जीवित है। असमी के आढ़े (सं० अर्कोनतृतीय>अप० अड्ढाइय >हिं० अढ़ाई), आठावन (सं० अष्टपंचाशत् >अर्धमागधी उट्ठावण>अप० अठ्ठावण>हिं० 'अट्ठावन), आठचल्लिस (सं० अप्टचत्वारिंशत्>अर्धमागधी अचत्तालीस, अठचालीस > अप० अठतालिस, अठ्ठचालीस >हिं० अड़तालीस), आपोन (सं० आत्मन् >प्रा० अप्पण>अप० अपन>हिं० अपना) आदि शब्दों के विकास का अध्ययन बिना अपभ्रंश के अध्ययन के अधूरा ही कहा जायेगा। गुजराती के 'आंख' (सं० अक्षि >प्रा० अक्खि>अप० आंखि), अगाउ' (सं० अन>प्रा० अग्ग>अप० आगुआगे), 'आध' (सं० अर्ध >प्रा० अ> अप० आध , आळस' (सं० आलस्स>प्रा० आलस्स > अप० आलस), 'वींछी' (सं० वृश्चिक >प्रा० विचुभ, विछुभ, विछि.>अप० विही), 'शाणो' (सं० सज्ञान >अप० सयारिणअ), 'हुँ' (सं० अहम् >अप० ह, हुं), हैडु (सं० हृदय> प्रा. हिमय, हिय, अप० हियड), 'छोडवु (सं० छर्दय् > अप० छड्ड >हिं० छोड़ना) आदि शब्दों के अध्ययन से सिद्ध है कि अपभ्रंश और गुजराती का घप्निठ सम्बन्ध है। वस्तुतः अपभ्रंश भाषा गुजराती की जननी है । अपभ्रंश और मराठी के परस्पर साम्य की चर्चा निम्नलिखित शब्दों से पुष्ट की जा सकती है। मराठी के 'अंगठा' (सं० अङ गुष्ठ>प्रा० अप० अंगुट्ठ>हिं० अंगूठा), 'अठरा' (सं० अष्टादशन् >प्रा० अप० अट्ठारह >हिं० अट्ठारह), अड- सष्ट, अडसट (सं० अष्टषष्ठि>अप० असट्ठि), 'माणूस' (सं० मनुष्य >अप० मणुसु>हि मनुष्य), 'विंच' (सं० वृश्चिक>प्रा० विचुअ, विछुअ, विछि.>अप० विछी), 'खांव' (सं० स्तम्भ >प्रा० अप० खंभ) 'अन्धार' (सं० अन्धकार>प्रा० अंधयार>अप० अंधार) आदि शब्दों का व्युत्पत्तिमूलक अध्ययन अपभ्रंश भाषा के अध्ययन के विना असंभव है राजस्थानी के 'पाव' (सं० पाद >अप० पाअ), 'आदौ' (सं० अर्द्धक >प्रा० अद्वअ>अप० अ), 'सवा' (सं० सपाद >सवाञ), 'अडाई' (सं० अद्धोनतृतीय> अप० अड्डाइय), 'कीजई' (सं० क्रियते>अह० कोज्जइ), 'कहीजइ' (सं० कथ्यते >अप० कहिज्जइ), 'करीयई' (सं० क्रियते>अप० करिज्जइ, करीजइ); 'जोई- अइ' (सं० द्योत्यते > अप० जोइज्जइ), आधुनिक राज० 'लागौ,' पु० राज० 'लागउ' (सं० लग्नक >अप० लग्गउ) आदि शब्दों के उदाहरण इस तथ्यको पुष्ट करते हैं कि राजस्थानी भापा का व्युत्पत्तिमूलक अध्ययन बिना अपभ्रंश भाषा के अध्ययन के अपूर्ण रहेगा। वंगला के 'अंग' (सं० अङ्ग>प्रा० अप० अंग), 'अंगार' (सं० अड्.गार> . - - (IV) % 3D प्रा० अप० अंगार), 'अंगुल' (सं० अङ्गुल >प्रा० अप० अंगुल), 'अंध' (सं० 'अंध्र' >अप० अंघ, हिन्दी अंधा), 'अठारा' (सं० अप्टादशन् >प्रा० अप० अट्ठारह > हि अठारह) आदि शब्दों के विकास को दिखाने के लिए अपभ्रंश भाषा कासहारा लेना होगा। कोंकणी के 'भावु' =भागिनी पति (अप० भाओ), "भावज' (सं० भ्रातृजाया >अप० भावुज्जा), 'मेटिण' =भार्याभगिनी (अप० मेहुणिया) 'व्होलि' ज्येष्ठ भार्या (अप० 'वहुणी) अव्वयि' =माता (अप० अन्या), 'व्होरेतु'-दर (सं० वर, अप० वरइत्त), 'चुळबुळेवप' स्पन्दन (अप० चुलुचुलइ), व्हिळव्हीळि =कोमलता (अप० विलिव्विली) आदि अनेक शब्दों का मूल रूप अपनश में विद्यमान है। मगही के 'आखि' (अप० अकिखआँख), 'कू'या' (लप० कूव कुबा), 'छन,सन' (अप० खण), 'धरनी' (अप० घरिणी गृहिणी), 'चेला' (अप० चेल्लु-चेला), 'दरसन' (अप० दरिसण =दर्शन), 'नइया' (अप० नाई नाव), 'आद्धा (अप० अड), 'डेड' (अप० दियड्ढ), 'तीज' (सं० तृतीय, अप० तइज्ज, तीज), 'पहिल' (सं० प्रथम>प्रा. अप० पढम, पहिल), 'चउट्ठ, चउठ, चीठ, चौठा' (सं० चतुर्थ>अप० चउठ, चौत्यन), 'कउन' (अप० कवणु=कौन), 'कोई' (अप० कोवि-कोई), 'जे' (अप० जो-हि० जो), तोहि (अप० तई- तुम्हारे), आदि मगही के शब्दों के उदाहरण से स्पष्ट है कि मगही के तद्भव और देशी शब्दों का विकास अपन्नश भाषा से हुआ। इसके अतिरिक्त अपभ्रंश की क्रियाएँ यथा- मेल्लिउ, (मेलना), घल्लिउ (घालना), अकखइ (चखना), अफ्फुण (उफनना), छोल्ल (छोलना), जिम (जीमना), पलोट्ट (पलोटना) नादि हिन्दी में विकसित एवं प्रचलित हुई । अप- भ्रंश के सर्वनाम 'हउँ,' तहूँ (मैं-तू); अम्हई, तुम्हई, (हम-तुम); परसर्ग 'मझि' (में), उप्परि (पर) यादि प्रयोग हिन्दी भापा-गठन पर प्रकाश डालते अपभ्रंश-कोश संपादन की आवश्यकता अपनश-कोश के निर्माण के भाव में व्युत्पत्तिमूलक दृष्टि से हिन्दी राज- स्थानी, गुजराती, मराठी, बंगला, असमी, उड़िया, पंजाबी, कोंकणी आदि भापानों के कोश-निर्माण का कार्य अपूर्ण ही रहेगा, क्योंकि अपभ्रंश भापा प्राचीन आर्य भाषाओं और आधुनिक भारतीय भापाओं के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है । अतः उपर्युक्त भाषाओं के शब्दों की संरचना को समझने के लिए अपनश-कोश के संपादन की आवश्यकता एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय आवश्यकता कही जा सकती है। प्रस्तुत कोश के संपादन से जहाँ भारतीय आर्य भाषा संस्कृत के विकास की मध्यकालीन अवस्था का वोष हो सकेगा, वहाँ अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भापाओं का संबंध जोड़ने का वैज्ञानिक आधार मिल सकेगा; साथ ही कीथ की यह (७) मान्यता-'अपन्नंश जाधुनिक भाषानों के विकास नावश्यक तोपान नहीं है, निर र्थक सिद्ध हो सकेगी। हिन्दी-जगत् में अपनश जती महत्त्वपूर्ण भाषा के शब्द-कोश का संपादन आज तक न हो पाना एक नाश्चर्य का विषय बना हुना था। हिन्दी के शब्दों की व्युत्पत्ति को बताने में भी इसका अभाव अनुभव होता था। इस सम्बन्ध में डाल वासुदेवशरण अग्रवाल ने कहा या "अपनश साहित्य का जब तक कोश के रूप में संग्रह न होगा तव तक हिन्दी एवं अन्य प्रादेशिक भापानों के सहनों शब्दों की व्युत्पत्ति का उद्धार नहीं हो सकता। प्रस्तुत कोश के संपादन से इस दिशा में बनाव की कुछ सीमा तक पूर्ति हो सकेगी, ऐता मेरा विश्वास है। 'अपभ्रंश का अर्थ शब्द-कल्पद्रुम' में 'रूपन्न ज्ञ' की व्युत्पत्ति 'अप, स+घञ्' से वताकर 'अपभाषा' इसका पर्याय दिया गया हैं- "अपभाषा-तत् पर्यायः" । 'शब्दार्थ- चिन्तामणि (प्रयन भाग) में अपनश' शब्द की व्याल्या 'अपशब्द कह कर की गई है और इस सम्बन्ध में यह कथन व्यातव्य है-"अशास्त्र शन्दे । जसंस्कृतशब्दे । मान्य भाषायाम् ।" 'जनरकोश' के अनुसार- "अपन्न शोऽपसन्दः स्यात् । वामन शिवराम आले ने अपने 'संस्कृत-हिन्दी कोन में 'लपत्रंश की निन्न प्रकार व्याख्या की है-"भ्रष्ट शब्द, भ्रष्टाचार (अत.) अशुद्ध शब्द चाहे वह व्याकरण के नियनों के विपरीत हो और चाहे वह ऐसे जर्य में प्रयुक्त हुआ हो जो संस्कृत न हो । भ्रष्ट भाषा, (काव्य में) गड़रियों नादि के द्वारा प्रयुक्त प्राकृत बोली का निम्नतन रूप, (शास्न में) संत से निन्न कोई भी भापा" (पृ० ५७) । इस प्रकार आप्टे के मतानुसार जो शब्द बगुल या व्याकरण के निदनों के विरुद्ध है, उसे अपनश या अपशब्द कहा जाता है। हिन्दी-गन्द-सागर में दिया गया अर्थ भी उपर्युक्त र्य से मिलता-जुलता है-"ना पृ० (२०) नीचे गिरना, पतन, विगाड़, शब्द का विकृत रूप, प्राकृत भाषाओं का प्रवर्ती रूप जिसने उत्तर भारत की आधुनिक आर्य भाषाओं की उत्पत्ति मानी जाती है । वि० बिगड़ा हुआ ।" 'अपनज्ञ'शब्द के प्रयोग.की प्राचीनता सर्वप्रथन नहर्षि पतंजलि ने · महाभाप्य' में जपनंश शब्द का प्रयोग किया है-"भूचांसो पशब्दाः अल्पीयांतः शब्दा इति। एकंवत्स्य हि शब्दस्य बहवो पन्नं शाः । तद् यथा गौरित्वस्य शब्दस्य 'गावी,' गोणी, गोता, गोपोतालि- केत्यादयो बहवोऽपनशा," अर्थात् अपशब्द बहुत हैं, सब्द रूप अल्प हैं । एक-एक १. कीय, हिन्दी साफ संस्कृत लिटरेचर, पृ० ३२ । २. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, वर्ष ६३, अंक १, पृ० ४६। ३ महाभाष्य, प्रयन शालिक ।
(VI) शब्द के बहुत से अपभ्रंश हैं, जैसे 'गो' शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि । स्पष्ट है कि महाभाष्यकार पतंजलि ने 'अपभ्रंश' शब्द का प्रयोग अप- शब्द' के अर्थ में किया है। भरत के नाट्यशास्त्र (ई० ३०० के लगभग) में संस्कृत और देशी के अतिरिक्त 'विभ्रष्ट' भाषा का उल्लेख मिलता है, जो कि आभीरों की बोली मानी जाती थी और उकार की बहुलता इसकी प्रमुख विशेषता की। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (ई० ४०० के लगभग) के समकालीन कवि कालिदास ने अपने नाटक 'विक्रमोर्वशीय' के चतुर्थ अंक में अपभ्रंश का भी प्रयोग किया है । भर्तृहरि (५ वीं शती) ने शब्द-प्रकृति की व्याख्या करते हुए लिखा है- "शब्द-प्रकृतिः अपभ्रंशः।" अर्थात् 'अपभ्रंश की प्रकृति शब्द अर्थात् संस्कृत शब्द है । भर्तृहरि ने कहा है कि विकृत शब्द भी अपने अर्थ की प्रतीति कराते हैं । अपभ्र श शब्द इतने लोक-प्रसिद्ध हो गए हैं कि वे स्वयं वाचक हैं और साधु शब्द के भी स्मरण करने की आवश्यकता नहीं है । भर्तृहरि ने संस्कारहीन शब्दों का अपभ्रश के शब्द कहा है-"शब्द संस्कारहीनो यो गारिति प्रयुयुक्षिते । तमपभ्रंश- मिच्छन्ति विशिष्टार्थनिवेशिनम् ।" छठी शताब्दी के आचार्य भामह ने 'अपभ्रंश' शब्द का प्रयोग 'काव्य- विशेप' के लिए किया है और गद्य-पद्य काव्य को भाषा की दृष्टि से संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश में विभक्त किया है-''शब्दार्थो सहितौ काव्यं । गद्य पद्य च तद्विधा। संस्कृतं प्राकृतं चान्यद् अपभ्रंश इति विधा।" सातवीं शताब्दी में दण्डी ने 'अपभ्रंश' शब्द का प्रयोग वाड्.मय के लिए किया है- "तदेतद्वाङ्मयं भूय: संस्कृतं प्राकृतं तथा । अपभ्रंशश्च मिश्र चेत्याहुराप्ताश्चतुर्विधम् । इस प्रकार है कि छठी शताब्दी तक 'अपभ्रंश' शब्द का प्रयोग भापा-विशेष के अर्थ का द्योतक बन गया था। दण्डी के अनुसार-''अपभ्रंश' एक भाषा है, जो पण्डितों की वाणी संस्कृत से भिन्न आमीर आदि द्वारा प्रयुक्त होती है। दण्डी द्वारा सस्कृत के व्याकरण १. वाक्यपदीय, काण्ड १, कारिका १४८ का वार्तिक । २. द्रष्टव्यः वाक्यपदीयम् १-१५३, १५४ । ३. वाक्यपदीयम् काण्ड १, कारिका १४८ । ४. काव्यालंकार, १११६।२८ ५. काव्यादर्श, ११३२ । ६. आभीरादिगिरः काव्येप्वपभ्रंशः इति स्मृताः।-काव्यादर्श १३६ (vii) ३ शास्त्र से इतर शब्द को अपभ्रंश कहा गया है। आरम्भ में अपभ्रंश को आभीरों की भाषा माना जाता.था, परन्तु बाद में यह लोक भाषा बन गई। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि अपभ्रंश केवल आभीरों या अहीरों की ही भाषा नहीं थी। नवीं शताब्दी तक अपनश भापा अपने साहित्यिक रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थी और देश-विशेष के अनुसार अनेक भेदों में विभाजित हो चुकी थी। रूद्रट ने लिखा है- प्राकृत-संस्कृत-मागध-पिशाच भाषाश्च शूरसेनी च । षष्ठोऽन्न भूरिभेदो देश विशेषादपद्मशः।' दशवी शताब्दी के विद्वान् राजशेखर ने 'काव्य-पुरुष' की कल्पना करते हुए संस्कृत भाषा को मुंख कहा हैं और 'अपभ्रंश' भाषा को जघन (जंघा) कहा है और पशाच को पादं कहां है- शब्दार्थी ते शरीरं, संस्कृत मुखं, प्राकृतं वाहुः । जघनमपभ्रंशः, पैशाचं पादौ, उरो मिश्रम् । वस्तुतः ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ होते-होते अपभ्रंश भाषा अपना प्रति- ष्ठित स्थान बना चुकी थी। अपभ्रंश भाषा के लिए अपभ्रष्ट, विभ्रष्ट, अपशब्द, अवभंस, अवहंस, अवहत्य, अवहट्ट और अवहट आदि अनेक शब्दों का प्रयोग मिलता है । अपभ्रंश भाषा को देशी भाषा भी कहा गया। स्वयंभू ने अपनी अपभ्रंश भाषा को देशी भाषा कहा है। ग्रियर्सन ने अपनशों को प्राकृत का स्थानीय अथवा प्रादेशिक विकार कहा है । वास्तव में, अपभ्रंश भाषा कोई एक भाषा न होकर प्रदेश-भेद से अनेक प्रकार की हो गई। अपभ्रंश भाषा का काल-निर्धारण अपनश हमारे देश की लगभग ६०० वर्षों तक राष्ट्रभाषा रही और लग- भग एक हजार वर्षों तक इस भाषा में साहित्य का सृजन होता रहा। अपभ्रंश भाषा के काल के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद मिलता है। सर्वप्रथम डॉ. वासुदेवशरण, अग्रवाल के कथन को उद्धृत करते हैं-"लग- भग नवीं शताब्दी से अपनश भाषा का विस्तार हो चुका था और बारहवीं १. दण्डी, काव्यादर्श; १, ३,६ । २. काव्यादर्श, १, ३, ६ ३. डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, ३, पृ० ५१ । ४. काव्यालंकार, २-१२। ५. काव्यमीमांसा--३-६ ६. पउमचरिउ, प्रथम संधि २१३, ४ ७. लिग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया, जिल्द १, पृ० १२३ ॥ . - (viii) । शताब्दी के लगभग अपभ्रंश भाषा से ही और विकसित होकर नई भाषा-शैली का परिवर्तन प्रारम्भ हो गया था। यही भाषा-शैली आगे आने वाली प्रान्तीय भाषाओं की जननी थी।" एक अन्य स्थान पर डॉ० अग्रवाल ने लिखा है-"अपनश-काल (८०० से ११०० तक) के अनन्तर लोक भाषाओं का जन्म हुआ।" यहां यह उल्लेखनीय है कि डा० अग्रवाल ने अपभ्रंश-काल (८०० से ११०० ई० तक) का उल्लेख काल-निर्धारण की विशिष्ट समस्या को लेकर नहीं किया। लोक-भाषाओं के परस्पर मौलिक साम्य की चर्चा करते हुए उन्होंने यह संकेतमात्र ही किया है। अपभ्रश साहित्य के क्षेत्र के अन्तर्गत तत्कालीन शोध के आधार पर ही उन्होंने अपना उपयुक्त विचार व्यक्त किया है। डॉ० अग्रवाल की मान्यता है कि पतं- जलि, कात्यायन और पाणिनि के काल से भी पूर्व शिष्ट भाषा के साथ-साथ लोक भाषाओं में अपभ्रश का समावेश पा। उन्होंने अथर्ववेद के 'पृथिवीसूक्तं' का उल्लेख करते हुए वेदों के समय में भी लोक-भाषाओं के प्रचलन को स्वीकार किया है।" डॉ० सुकुमार सेन ने अपनश का काल १-६०० ई० तथा अवहट्ठ भाषा का काल ६०० से १२०० ई० तक माना है। डॉ० हरिवंश · कोछड़ ने अपभ्रश का काल ८ वीं सदी से १३ वीं शताब्दी तक-माना है । डॉ० वीरेन्द्र श्रीवास्तव ने अपभ्रश-काल की सीमा ५ वीं शताब्दी से चौदहवीं तक मानी है। डॉ० उदय- नारायण तिवारी का मत है-"ईसा की छठी शताब्दी से अपनश के काव्य-रच- नाएं प्राप्त होने लगी और पन्द्रहवीं सोलहवीं शताब्दी तक होती रहीं।" डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार "अपभ्रंश काकाल मोटे रूप में ५०० से १००० ई० तक है।" इसी से मिलता हुआ विचार श्री जगन्नाथराय शर्मा ने व्यक्त किया-"अपभ्रंश भाषा अनेक भाषाओं का एक समुदाय है। जितनी प्राकृतें हैं, वे सब मृत होकर साहित्यिक रूप में जीवित रहीं। उनकी वोलचाल का १. डॉ० अग्रवाल, माताभूमि, पृ० ६५ । २. भारत की मोलिक एकता, पृ० १४६, १४७ । ३. डॉ० अग्रवाल, की० संजी व्या०, भूमिका पृ० ६३ । ४. वही, पृ० ६३, ६४ । ५. डॉ० सुकुमार सेन, तुलनात्मक पालि-प्राकृत-अपभ्रंश व्याकरण, अनुवादकः महावीर प्रसाद लखेड़ा, पृ० १५ । ६. अपभ्रंश-साहित्य, पृ० ३४ । ७. अपभ्रंश भाषा का अध्ययन, परिशिष्ट-४, पृ० २६१ । ८. हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास, पृ० १२२ । ६. ॉड० भोलानाथ तिवारी, भाषा विज्ञान, संस्क० १८८४ शकाब्द, पृ० १८३॥ - (ix) स्थान अपभ्रशों ने ले लिया । यह समय ५०० ई० से १००० ई० तक था।" अपभ्रंश भाषा के साहित्य के प्रकाशन के उपरान्त डॉ० भोलानाथ तिवारी एवं श्री जगन्नाथ राय शर्मा के मत अग्राह्य है । वस्तुतः १००० ई० के पश्चात् भी अपभ्रंश-कृतियों की रचना होती रही । उदाहरणार्थ, वीर कवि द्वारा रचित 'जंवूसामिचरिउ' की रचना वि० सं० १०७६ में माघ शुक्ल दशमी के दिन पूर्ण हुई। रोडाकृत 'राउलवेल' ११ वीं शती का शिलांकित भापा-काव्य है । पं० दामोदर द्वारा विरचित 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण' की रचना-काल १२ वीं सदी का पूर्वाद्ध है। मुनि नयनंदी विरचित 'सुदंमणचरिउ' का रचना-काल वि० संवत् ११०० का है । हरिभद्रसूरि द्वारा लिखित 'नेमिनाहचरिय' वि० सं० १२१६ (ई० सन् ११६०) है ।' 'भविसयत्तकहा' और 'भविसयतचरिउ' का रचना-काल क्रमश: वि० सं० १२३० और वि० सं० १५३० माना गया है । वड्ढमाणचरिउ के रचयिता श्री विबुध श्रीधर का रचना-काल वि० सं० ११८६ से १२३० निश्चित किया गया है। पं० नरसेन द्वारा रचित 'सिरिवाल चरिउ' की पहली प्रति वि० सं० १५७६ (ई. १५२२) की है। डॉ० ह० चू० भायाणी तथा श्री अगरचन्द-नाहटा द्वारा संपादित 'प्राचीन गूर्जर काव्य सञ्चय' में देपाल द्वारा रचित 'कयवन्ना-विवाहलउ,' नेमिनाथ-धवल' आर्द्र कुमार धवल' नामक शीर्षक वाली रचनाएँ १५ वीं शताब्दी की है और इनके अतिरिक्त शेप संपादित रचनाएँ १३ वीं शताब्दी के आसपास की हैं।" अब्दुल रहमान कृत 'संदेश रासक' (ईसा की वारहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध) शालिभद्र की रचना 'बाहुबलीरास' (बारहवीं शताब्दी;) जिनपदसूरि द्वारा लिखित थूलिभद्र फागु (बारहवीं शताब्दी), अम्बदेव सूरि द्वारा लिखित 'समरास' (सन् १. जगन्नाथराय शर्मा, अपभ्रश-दर्पण, पृ० २१ । २. डॉ० विमल प्रकाश जैन, वीर कवि कृत जंवूसामिचरिउ की प्रस्तावना पृ० १३ । ३. (अ) डॉ० कैलाश चन्द्र भाटिया, हिन्दी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ, पृ ६ । (आ) डॉ० माताप्रसाद गुप्त, राउलवेल और उसकी भाषा, प्रकाशकीय वक्तव्य, पृ० ४. डॉ० सुनीतिकुमार चादुा का मत, उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण, पृ० १। ५. संपादक: डॉ० हीरालाल जैन, प्रस्तावना, सुदंसणचरिउ, पृ० १४ । ६. संपादकः हरिवल्लभ चू० भायाणी, सणतुकुमारचरिय, भूमिका, पृ० ३ । ७. डॉ० राजा राम जैन, प्रस्तावना, वड्ठमाणचरिउ, पृ०६ । ८. वही, पृ० ७॥ ६. द्रष्टव्य: डॉ० देवेन्द्र कुमार जैन का मत सिरिवाल चरिउ, प्रस्तावना, पृ० ३ । १०. डॉ० हरिवल्लभ भायाणी, 'प्राचीन् गूर्जर 'काव्य सञ्चय,' संगृहीत रचनाओं की भापा, पृ० १० । -- - . - ( x ) १३१४ ई०), तरुणप्रभ सूरि द्वारा रचित 'पडावश्यक-वायवोध' (सन् १९५४ ई०) ज्योतिरीश्वर ठाकुर कृत 'वर्णरत्नाकर' (चौदहवीं शताब्दी), विद्यापति द्वारा रचित 'कीतिलता' (चौदहवीं शताब्दी) आदि रचनाओं का काल यह सिद्ध करता है कि १००० ई० के पश्चात् भी अपनश में साहित्य का मृजन होता रहा । यहां यह भी यह उल्लेखनीय है कि कविवर हरिपेग ने 'धर्म परीक्षा की रचना पद्धडियां छंद में वि० सं० १०४८ में की थी और भट्टारक श्रुतकीर्ति ने 'धर्म परीक्षा की रचना वि० सं० १५५२ में की थी। ब्रह्म वूचराज द्वारा लिखित 'सन्तोष तेलक जयमाल' (रूपक काव्य) नामक कृति वि० सं० १५६१ में हिसार नगर में लिख. कर पूर्ण हुई थी। मुनि भट्टनन्दि द्वारा लिखित 'वारक्खडी' या 'पाहुउदोहा' का लेखन-काल वि० सं० १५६१ है।' इससे ज्ञात होता है कि सोलहवीं शतानी में भी अपभ्रंश-साहित्य की रचना होती रही। आज तक हुए शोध के दावार पर अपभ्रंश-काल का आरम्भ छठी शतानी माना जा सकता है । डॉ० भायाणी के स्वयंभू का समय ६७७ ई० से १६० ई० के मध्य माना है। मतः निश्चित है कि सपनश का प्रयोग भाषा विशेष के लिए इससे काफी पूर्व अर्थात् लगभग ६०० ई० में साहित्यिक भाषा के रूप में हो चुका था । ग्रियर्सन का मत भी इसी तय की पुष्टि करता है-"ईसा की छठी शती में वलभी नरेश धरसेन के ताम्रपत्र के उल्लेख एवं संस्कृतालङ्कारिकों के कथन से स्पष्ट है कि उस समय तक अपनश भाषा जन नापा के रूप में प्रतिप्ठित हो चुकी थी। उपयुक्त तथ्यों के आधार पर अपम्रा साहित्य का युग छठी शतानी से पन्द्रहवीं शताब्दी तक माना जा सकता है । अपभ्रंश की ध्वनियां एवं वर्ण-क्रम को समस्या- स्वर-संस्कृत में निम्नलिखित १४ स्वर थे-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ,ल, ल., ए, ऐ, ओ, औ, । अभिनवगुप्त की व्याख्या के अनुसार ऐ, ओ, ऋ, ऋ, लु, विसर्जनीय श, प, ङ्, ब और न ये १२ वर्ण प्राकृत में नहीं पाये जाते हैं । प्राकृत के वाद अपभ्रंश में किसी स्वर की कमी नहीं हुई। वैसे तो अपभ्रंश में मूल स्वर माठ थे-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, दो नए स्वर-हस्व 'ए” तथा ह्रस्व "औं” की वृद्धि हो गई। १. डॉ० देवेन्द्र कुमार शास्त्री, लेख-अपभ्रंश के साहित्यकार, राजस्थान का जैन साहित्य, पृ० १४५। २. वही, पृ० १५१ । ३. वही, पृ० १४६ । ३. डॉ० भायाणी, पउमचरिउ (स्वयंभू देव), भूमिका, पृ० ६. । ५. जार्ज अब्राह्म ग्रियर्सन, अनुवादक: डॉ. उदयनारायण तिवारी, भारतीय आर्य भापाएँ, पृ० ७७॥ ल, मो; परन्तु .
(si) 'ऋ' का उच्चारण प्राकृत भाषा में समाप्त हो जाने के कारण अपनश वर्णमाला में इसको स्थान नहीं दिया गया । प्रसिद्ध विज्ञान डॉ० पिशल का विचार है कि अधिकांश अपभ्रंश बोलियों में 'ऋ' नहीं मिलता है।' डॉ० तगारे भी यह मानते हैं कि कुछ अपवादों को छोड़कर अपभ्रंश भाषा में 'ऋ' उपलब्ध नहीं है।' यद्यपि अपनश में 'ऋ' रि में परिवर्तित हो गया, परन्तु संस्कृत के प्रभाव के कारण १२ वीं शती से पुनः स्थान पाने लगा। 'उक्तिव्यक्तिप्रकरण' में 'ऋतु' (१५-२४) का प्रयोग मिलता है। विद्यापति की 'कीर्तिलता' में भी 'ऋ' का प्रयोग उपलब्ध है । हेमचन्द्र ने भी 'ऋ' की उपस्थिति स्वीकार की है, यथा-अप० तणुतृणु (सं० तृण) । अप० सुकिदु>सुकृदु (सं० सकुतम्) ।' यहां यह उल्लेखनीय है कि अपभ्रंश में विसर्ग का पूर्णतः लोप हो गया था। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा संपादित 'कीर्तिलता' में 'औ' से प्रारम्भ होते हुए कतिपय शब्द उपलब्ध हैं । अतः प्रस्तुत कोश में 'ऋ,' औं' को भी वर्ण-क्रम में स्थान दिया गया है। व्यंजन ध्वनियां विद्वानों ने अपभ्रंश में २७ व्यंजन के अस्तित्व को स्वीकार किया है- क, ग, । ख, घ च, ज, ड. ढ ण - ट, त, ध - to 5 P ro no व, भ, ल, य, व । स, । उपयुक्त व्यंजनों के अतिरिक्त अपभ्रंश-साहित्य में कुछ अन्य व्यंजन भी मिलते हैं, जिनकी यहां चर्चा की जा रही है। डॉ० तगारे अपनश में 'य' ध्वनि का बहिष्कार करते हैं, परन्तु 'संदेश रासक,' 'पउमचरिउ,' 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण, 'कालस्वरूप कुलक' 'जिणदत्त चरिउ' आदि अपनश की रचनाओं में 'य' से प्रारम्भ होते हुए शब्द मिलते हैं । अतः प्रस्तुत कोश के वर्ण-क्रम में 'य' वर्ण को स्थान दिया गया है। अपभ्रंश में 'क' और 'अ' के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सरलीकरण की प्रक्रिया के कारण चला । यद्यपि विद्वानों द्वारा यह माना जाता रहा है कि अपनश १. पिशल, प्राकृत भाषाओं का व्याकरण, पृ० ६६ । २. डॉ० तगारे, हिस्टारिकलग्रामर आफ अपभ्रंश, पृ० ३६ । ३. हेमचन्द्र, अपनश व्याकरण, ४, ३२६ । ४. (अ) डॉ० रामगोपाल शर्मा 'दिनेश,' अपनश भाषा का व्याकरण, पृ० ३२ ।
(xii) में 'इन' उपलब्ध नहीं है' और 'न' वनि का स्थान 'ण' ने ले लिया है, तथापि व ध्वनियां अपनज की कुछ संपादित कृतियों में मिलती है । यथा-'अङ्गार' 'अड गुलिर," 'मअङ्क" आदि । 'पउमचन्टि,' 'कीर्तिलता,' हेमचन्द्र कृत 'अप- गंज व्याकरण' आदि में दी गई 'इ' ध्वनि के आधार पर प्रस्तुत कोग में 'इ' वनि को ज्यों का त्यों स्थान दिया गया है और जहाँ कहीं अपनश की सम्मादित ऋतियों में अनुस्वार दिया गया है, वहां उसका अनुनानिक रूप में ही प्रयोग किया गया है। उपर्युक्त समस्या को दृष्टि में रखते हुए वर्ण-क्रम में पंचामाक्षर युक्त शब्दों को उनके वर्ग में ही स्थान दिया गया है, परन्तु यदि अपनश की संपादित कृतियों में पंचमाक्षर मनुस्वार-युक्त रूप में लिखा हुआ उपलब्ध है तो उसे जैसा का तैसा वणंगत क्रम में ही रखा गया है। अपन में 'ब' ध्वनि का अभाव तो है, परन्तु यह कहना ठीक नहीं है कि यह व्वनि बिल्कुल ही नहीं मिलती है । परमचरित में कञ्चण (कंचन नामक वृक्ष), कोञ्ज (कोज नामक वृद्ध), कोच' (द्रौञ्च); कीतिलता में काञ्चन', अलोन (मं० एवम्), नेहां" (यहाँ); चुकनो' (सं० नंश का वात्वादेश चुक्क == भ्रष्ट होना), मुकत्रो" (त्यागना), भासत्रो' (कहना), जो"(क्योंकि), अञ्चल" आदि में वकार का प्रयोग मिलता है। कीर्तिपताका' में 'बटनु 'लज्जा' आदि १. द्रष्टव्यः (अ) परम मित्र शास्त्री, सूत्र शैली और अपभ्रंश व्याकरण, पृ० १११ । (आ) डॉ० रामगोपाल वर्मा 'दिनेश,' अपना भापा का व्याकरण, पृ० ३५ । २. डॉ० हरिवल्लभ चूनीलाल भायाणी, परम चरिट १३, ७, १.० । ३. आचार्य हेमचंद्र का अपभ्रंश-याकरण (अनुवादक शालीग्राम उपाध्याय) ३३१,१। ४. वही, पृ० ४० । ५. डॉ० भायाणी द्वारा संपादित परम चरित (३,१, १०) । ६. वही ३, १,११॥ ७. वही ३, ५, ५॥ ८. डॉ. वासुदेवारण अग्रवाल द्वारा संपादित कीतिलता, २, २४२ । ६. वही, २-२३६ । १०. वही, ३-१ । ११. वही, २-४३ । १२. वही, २-४८॥ १३. वही, २८५ । १४. वही, २-४७॥ १५. वही, ४-२१६।
(xiii) . शब्दों में "अ' का प्रयोग उल्लेख्य है। अत: प्रस्तुत कोश में उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वर्ण-जम की व्यवस्था 'अ' को भी स्थान दिया गया है आचार्य हेमचन्द्र के अनुसार 'देश्य भाषा' में 'नकारादि' शब्द एकदम अस- म्भव है, यह मान्यता भी उचित नहीं है । वस्तुत: प्राकृत के प्रारम्भ से अपभ्रश के विकास तक 'न को 'ण' उच्चारित करने की प्रवृत्ति प्रधान रही है । वस्तुतः अपभ्रंश में दन्त्य 'न' का कम प्रयोग हुआ है । परन्तु 'न' का बिल्कुल अभाव रहा हो, यह कहना अनुचित होगा। 'अपभ्रंश-व्याकरण,' (हेमचन्द्र कृत), पउम चरिउ संदेशरासक, चर्यापद, उपदेश रसायनरास, महापुराण, राउलवेल, उक्ति-व्यक्ति- प्रकरण, कीतिलता, यकृमार चरिउ, सरह के दोहाकेश में नकारादि शब्द मिलते हैं । अतः प्रस्तुत कोश में 'नकार' की स्थिति को स्वीकार करते हुए दर्ण-क्रम में इसे स्थान दिया गया है । अंत में यह भी उल्लेखनीय है कि अपनश में ड, ढ़ व्यंजन नहीं थे। मंयुक्त व्यंजन अपनश भाषा में क्ख, क्क, च्च, च्छ्र, ज्ज, है, ट्ट ड, त्त, स्थ, ६, ६, प, प्फ, ध्ध, व्ब, पण, न्न, न्ह, म्ह, ल्ल, ल्ह, व्व, एवं स्स आदि संयुक्त ध्यनियों का प्रयोग होता है। यहां यह भी स्पष्ट कर देना अपेक्षित होगा कि इस कोश के वर्ण-क्रम में देवनागरी वर्णमाला का क्रम ही अपनाया गया है। लिंग-निर्धारण की समस्या लिग-निर्धारण की जटिलता प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश में बनी रही। पुल्लिग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग का विधान ' होने के कारण लिंग-निर्गय में कठिनाई हुई । उदाहरण के लिए, संस्कृत में 'देवता' शब्द स्त्रीलिंग है, जब कि हिन्दी में पुल्लिग है। इसके विपरीत 'पत्नी' के अर्थ वाला 'दार' शब्द पुल्लिग है। हिन्दी में 'अग्नि' और 'महिमा' शब्द स्त्रीलिंग है, परन्तु संस्कृत में पुल्लिग है। यह भी ध्यातव्य है कि संस्कृत में लिंग के भेद से अर्थ में भी परिवर्तन हो जाता है, यथा-'मित्र' शब्द पुल्लिग में सूर्य तथा नपुंसक लिंग में सखा (Friend) के अर्थ का वाचक है। यह भी देखने में आया है कि एक ही अर्थ के वाचक शब्द विभिन्न जिंगों में पाये जाते हैं, जैसे 'सखा' पुल्लिग है और 'मित्र' नपुंसक लिंग हैं। इसी तरह 'भार्या' के पर्यायवाची शब्दों का लिंग भिन्न- भिन्न हैं-दार पुं०, पत्नी स्त्री०, कलत्र नपुंसक लिंग। तनिक प्राकृत में जिग-व्यवस्था पर दृष्टि डालिए । यद्यपि प्राकृत में लिंग व्यवस्था संस्कृत के समान है, परन्तु कुछ शब्दों के लिङ्ग-निर्धारण में भिन्नता मिलती है, यथा-प्राइप, भरद्, तरणी शब्द नंस्कृत में स्त्रीलिंग हैं, परन्तु प्राकृत - (xiv) -- कम्मो, में पहले में पाउसो, सरओ, तरणी आदि शब्दों का प्रयोग पुल्लिग में होता है । ' दामन्, शिरस् और नभस् को छोड़कर प्राकृत में शेप सकारान्त शब्द, यथा---'यशस्-यशः >प्रा० जसो०, पयस् - पयः >प्रा० पओ, तमस्-तमः>प्रा० तमो, तेजस्~- तेजः >प्रा० तेओ, सरस्-सर:>प्रा० सरो, और नकारान्त शब्द, यथा-'जन्मन्- जन्म >प्रा० जम्मो, नर्मन्नर्म>प्रा० नम्मो, कर्मन्-कर्म>प्रा० वर्मन्-वर्म>प्रा० वम्मो आदि पुल्लिग में प्रयुक्त होते हैं, जबकि संस्कृत में ये शब्द नपुसक लिंग हैं ।' संस्कृत और प्राकृत में कुछ शब्दों में लिङ्गव्यवस्था समान भी रही है। वयस्-वयः>वयं; सुमनस्-सुमनः>सुमण; शिरस्-शिरः >सिर, नभस्-नभः> नहं को संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं में इन्हें नपु. सकलिंग माना गया है। प्राकृत में लिंग-विधान के सम्बन्ध में डॉ० वीरेन्द्र श्रीवास्तव का कथन उद्ध- रणीय है-"प्राकृत में लिङ्ग विधान अपेक्षाकृत सरल हुआ । नपुंसक लिङ्ग के रूपों भी केवल प्रथमा तथा द्वितीय विभक्ति में ही भेद पड़ता था अन्यत्र पुल्लिङ्गवत् ही रूप रहते थे । व्यंजनान्त शब्द स्वरान्त हो ही गए थे। नकारान्त और सकारान्त न० लिं० शब्द पुं० लि. में प्रयुक्त होते लगे । कम्मो, वम्मो, जसो, सरो रूप पु० लि. में आ गए । अपवाद सिर >शिरः और णहं>नभः रह गये । सम्मिलित परिणाम यही था कि कुछ रूपों को छोड़कर शेष सब न० लि. शब्द पु० लि० में आ गए।"३ अपभ्रंश में लिंग निर्धारण आचार्य हेमचन्द्र के अनुसार अपभ्रश में लिंग अतंत्र होता है। कभी स्त्री लिंग पुल्लिग हो जाता है तो कभी पुल्लिग स्त्री लिंग हो जाता है। उदाहरणार्थ, 'कुम्भई (सं० कुम्भान् =गजों के कुम्भ स्थल), खलाई (सं० खलान्) में पुल्लिग का नपुंसक लिंग हो गया है । अव्भा (सं० अन-वादल) में नपुंसक लिंग को पुल्लिग हो गया है। सं० अन्नं (अंतडी) नपुसक लिंग का अपभ्रश में 'मन्त्रडी' स्त्री लिंग हो गया है । सं० डाल स्त्री० लिंग शब्द अपभ्रंश में 'डालई" नपुंसक लिंग हो गया है।" अपभ्रंश में लिंग-भेद का प्रकरण बड़ा जटिल और पेचीदा बना हुआ है । प्राचीन लिंग-व्यवस्था बदल गई। प्रायः लिंग का निर्धारण शब्द की प्रकृति पर निर्भर करने लगा । कोमलता, लघुता अथवा हीनता का ज्ञान कराने के लिए स्वा- १. प्रावृटशरत्तरणयः पुसि-हे. ८, १, ३१ । २. हे० प्रा० व्या० ८, १, ३२ । ३. वीरेन्द्र श्रीवास्तव, अपभ्रंश भाषा का अध्ययन, पृ० १२६ । ४. द्रष्टव्यः हे० अप० व्या०, ४४५ । - (xv) थिक 'डी' प्रत्यय का प्रयोग स्त्रीलिंग शन्दों की रचना में होता है । आकारान्त, ईकारान्त और ऊकारान्त वर्गों के स्त्री लिंग को सरलता से पहचाना जा सकता है, परन्तु अकारान्त, इकारान्त और उकारान्त शब्दों के लिंग-निर्धारण में निश्चय ही कठिनाई होती है। अपनश में नपुंसक लिंग के सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि कर्ता और कर्म कारकों में ववचन में 'इ' विभक्ति लगती है। आचार्य हेम- चंद्र के अनुसार प्रथमा और द्वितीया के बहुवचन की विभक्तियों के स्थान पर 'इ' आदेश होता है।' विद्वानों की यह भी मान्यता रही है कि अपनश में नपुंसक लिंग व्यावहरतः लगभग लुप्त ही हो गया, परन्तु अपभ्रश के 'अलिउलई (भ्रमर-समूह), 'कमलई', 'करिगण्डाई" (हाथियों के गण्ड-स्थल) आदि शब्दों तथा सर्वनाम (यथा-तु, त्र, तं , ताई आदि) में भी नपुंसक लिग के रूप मिलने से यह सिद्ध होता है कि संस्कृत और प्राकृत के समान अपनश में भी नपुसक लिंग की परम्परा बनी रही और बाद में आधुनिक भारतीय भाषाओं में यह परम्परा कोंकणी, मराठी, गुजराती और काश्मीर के निकट बोली जाने वाली कुछ हिमालय-पर्वतीय भाषाओं तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड और प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी में भी जीवित रही। गुजराती में नपुंसक लिंग कपडु (एक व०) कपडाँ (बहुव०) आदि शब्द द्रष्टव्य हैं । डॉ० एल० पी० तेस्सितोरी ने पश्चिमी राजस्थानी में नपुंसक लिंग का संकेत किया है, जो कि 'उ' में अंत वाले रूप में मिलता है>यथा-आरोग- पणउँ, (शीलोपदेशमाला ३), माथउँ (श्रावकाचार), युक्तउँ (इन्द्रिय पराजयशतक ११), जैकल्याणमंदिरस्तोत्र अवचूरि)< सं० यत् । हूयें (दशवकालिसूत्र टीका)<सं० भूत । प्राकृत और अपभ्रश की शब्दावली में बहुत अधिक समानता मिलती है। आचार्य हेमचंद्र के सूत्र--'शौरसेनीवत्,' 'अपभ्रंशे प्रायः शौरसेनीवत् कार्य भवति' अर्थात् अपभ्रंश में प्रायः शौरसेनी के समान कार्य होते हैं । इस तथ्य को दृष्टि में रखकर 'पाइअ-सद्द-महण्णवो' में प्राकृत के जिन शब्दों को नपुंसक लिंग माना गया है, यदि वे शम्द अपभ्रंश-साहित्य में भी प्रयुक्त हुए हैं तो उन्हें सामान्यतया पूर्ववत् नपुंसक लिंग के रूप में स्वीकार किया गया है परन्तु साथ ही लोक-ग्यव. हार में शब्द के प्रयोग को दृष्टि में रखते हुए लिंग-निर्धारण किया गया है । हिन्दी १. आचार्य हेमचन्द्र का अपभ्रंश व्याकरण, सूत्र ३५३ । २. (क) डॉ० नामवर सिंह, हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, पृ० ६१ । (ख) डॉ० रामगोपाल शर्मा दिनेश, भाषा का व्याकरण और साहित्य पृ० ४४ । ३. डॉ० एल० पी० तेस्सितोरी, पुरानी राजस्थानी (अनुवादक : नामवर सिंह), पृ० ५४॥ - ।
में नाम लिंग व पुलिग वाल गया है। वस्तुन. हिन्दी में नी लोक-व्यय. रीमिका निर्धारण होता है। उदाहरणार्थ, हिन्दी में 'भातल्लिग, परन्तु 'दालम्बी लिंग है । यद्यपि दोनों ही खाद्य पदार्थ है । 'पुस्तक' म्बी लिग दी ग्रामलिग है। । दादप-रचना पण मी पुन्नकों में गभी पदों के रूप एक म्यान पर अनुपलब्ध है। मनों के का नीचे दियं जा रहे है- अकागत दुल्लिग: पुत्त (पुस ) के र - एनयन बा वचन कर्ना-कुन , पुनपुनी. पून. पुना पुन, पुना - पुनहि क . , पा-पुन, पुन, पृ. पुनिय, पुन . पुनदि, पुनहि पुनि सम्मवान)-नाम. पुन, पुनहु । पुनण. पुनागं, पुत्तह, पुत्तह, मन्यन्ध पुतहा पुनाह, अपादान-पुत्तहु, पुतह, पुतह, पुतही, (पुत्तह), पुनहं अधिकर,~पनि, पत्ते, पुनई, पुन, पुत्तहि, पुनिहि, पुत्त सु, पुता, पुतम्मि, सम्बोधन---पुन, पुत्ता, पुत्तहु, पुत्तहो, अकारान्त पुल्लिग बन्द 'देव' एमवचन वहुवचन फर्ता-देव, देवा, दु, देव देव, देवा कम-देव, देवा. देवु देव, देवा करणा-य, देवें, देवेन (दविण) देवहि, देवहि -देवहे, देवहु सम्बन्ध-दव, देवनु. वस्तु, देवही. देवह देव, देव अधिकारा-देव, देव सम्बोधन--देव, दंबा, देवु. देवों देव, दवा, दबहा नस लिग पदों के कतिपय उदाहरण अकारान्त 'फमलाद' देवद + देवहि वर्ना, कामकमलु कामल, हुवचन कमलई, कनलाई नेप पुलिलगवन (xrii) नपुंसकलिंग मह (मधु) शब्द एकवदन बहुवचन कर्ता, कर्म-महु, नई महूई, महूई और सम्बोधन- शेप ऊकारान्त पुल्लिग वाऊ (वायु:) शब्द के रूप के समान नपुंसक जिग 'वारि' शब्द एकवचन वहुवचन कर्ता और कर्न वारि, वारी वारिई, वारी नपुंसक लिग 'पत' एकलवन बहुवचन कर्ता और कर्म फल, फलु फलई, फलाई इकारान्त पुंल्लिम अगी या अणि शब्द (बन्तिः) एकवचन वहुवचन नर्ता-अग्नी, अनि बग्गी, लगिहो कनं करण-अग्गिण, अन्गिं, मग्गिएं अग्नीहि आदान-अग्गिहें, अपिहितो अग्निहुँ, बग्गीहितो सम्बन्ध-अगिहें अग्निहि, अगि, अग्नि अधिकरण-अन्निहि अग्निहि, अन्गिहुँ सम्बोधन-अग्निी, जग्गी अन्हिों इकारान्त 'गिरि' पुल्लिग एकवचन बहुवचन कर्ता- गिरी गिरि, गिरी कर्म- गिरी, गिरी गिरि, गिरी करण-गिरिएं, गिरिण, गिरी गिरिहि अपादान-गिरिहे गिरिहुं सम्बन्ध-गिरि, गिरिहे गिरि, गिरि, गिरिहुं अधिकरण-निरिहि गिरिहुं मन्त्रोपन-गिरि, गिरी गिरि, गिरिहो स्तो लिंग अकारान्त या लाकारान्त रूप (मुग्धा-मुक्षा) एकवचन वहुवचन मुद्राउ, मुसानो मुझाउ, मुखामो गिरि, - : . का-मुख मुद्धा कर्म-मुख मुद्धा (xviii) करण-~-मुद्धए (मुद्धइ) मुद्धहिं अपादान-मुखहे (मुद्धहि) सम्बन्ध-मुद्धहे (मुद्धहि) मुद्धहु अधिकरण-मुद्धहि मुहिं सम्बोधन-मुद्ध, मुद्धा मुद्ध, मुद्धा, मुद्धहो, मुबाहो। कह कहा (कथा) एकवचन बहुवचन कर्ता-कह, कहा कहाउ, कहाओ कर्म- करण---कहए (कहइ) कहहिं अपादान-कहहे (कहहिं) कहहु सम्बन्ध-" अधिकरण-कहहि कहहिं सम्बोधन-कह,कहा कह, कहा, कहहो, कहाहो ह्रस्वीकरण प्रक्रिया से स्त्री लिंग के दीर्वान्त शब्द प्रायः ह्रस्वान्त हो जाते हैं, परन्तु ह्रस्व अकारान्त होने पर भी स्त्री लिंग के रूप पुल्लिग से भिन्न हैं। ऊकारान्त पुल्लिग वाऊ (वायुः) शब्द के रूप एकवचन वहुवचन फर्ता-कर्म-वाऊ, वाउं वाउ करण-बाउण, वाउं (वाएं) वाऊहि, वाऊहिं, वाऊहि अपादान-वाउह, वाउहितो वाउहुँ. वाऊ-हिन्तो सम्बन्धबाउह" वाउहि, वाउहुँ, वाउ प्रधिकरण -वाउहिं वाउहि, वाउहुँ सम्बोधन-बाउ, वाऊ वाउहों आकारान्त स्त्रीलिंग 'वाला' शब्द के.रूप एकवचन वहुवचन कर्ता, कर्म- वाला वाला, वालाउ, बालउ करण-बालाएँ, वालाए वालहिं, बालहिं अपादान-बालहे बालहु सम्बन्धबालहें वालहु, वालह, वालहँ अधिकरण बालहि, बालहिँ, वालहिं, वालहिँ, वाल हुँ, वाल हुं सम्बोधन-वाला, वाल वालज, वालाउ, वाला वाऊ, -- (xix) ईफारान्त स्त्रीलिंग रणदी (नदी) के रूप एकवचन वहुवचन कर्ता, कर्म-दी, णदि णदी, णदिउ करण-~णदिएँ, दिए णदीहि, णदीहि अपादान--णदिए, णदिहे। णदिहु, (णदीणं सम्बन्ध में हो) अधिकरण-णदिहि, णदी, णदि णदीहि, णदिहि, णदिहुँ सम्बोधन–णदि गदिहो सर्वनाम (उत्तम पुरुष) अस्मद् एकवचन बहुवचन कर्ता-हउँ (हउं) अम्हे, अम्हई (अम्हइ) कम-मई (मई) करण- अम्हेहिँ (अम्हेहिं) अपादान,सम्बन्ध-महु मज्झु, मझ अम्हह (अम्हहं) अधिकरण-मई', (मई) अम्हासु संस्कृत 'युष्मद्' (मध्यम पुरुष) के अपभ्रंश वाले रूप एकवचन वहुवचन कर्ता -तुहुँ (तुहु) तुम्हे, तुम्हइ, तुम्हई कर्म-पई, पईतई, तई करणा- तुम्हे हिं, तुम्हें हि अपादान तउ, तुझ, तुध्र (तुहु) तुम्हें, तुम्हहँ सम्बन्ध-तुज्झह, तुह अधिकरण-पई पई, तई तई तुम्हासु अन्य पुरुष तद् (सो) एकवचन वहुवचन प्रथमा (पुं०) सो, सु, स (स्त्री०) सा, स (स्त्री०) ताउ, ति (न०)-तं, तंतु (न०) ताई द्वितीया- (०) तं (स्त्री०) तं (स्त्री०) ताउ (न०) ताई तृतीया (पू) तेण, तें (पु) तेहि तई, तेण ताहं ति तेहि (स्त्री०) ताइ, तिए, तीए, ताए,तए (स्त्री०) तेहि " -- (पुं०) ते (पु.) ते (न०) तं (xx) (पुं०) जं जस्स, चतुर्थी और पप्ठी-(पु०) तासु, तहो, तहि, तसु, तहु, तहिं (स्त्री०) तिहि ताहि (स्त्री०) ताहि सप्तमी-(पु०) तहिं, तहि (पु०) तहिं (स्त्री०) तहि, तहिं (स्त्री०) ताहिं सम्बन्ध वाचक सर्वनाम यत् (जो) एकवचन वहुवचन प्रथमा (पुं०) जो (पु) जे (स्त्री०) जा (स्त्री०) जाउ (न०) जं (न०) जाई द्वितीया (पु०) जे (स्त्री०) जं (स्त्री०) जाउ (न०) जं, जु (न०) जाई तृतीया (पु) जेण, जि, जें (पु०) जेहिं (स्त्री०) जाई, जाए, जिए (स्त्री०) जाहिं चतुर्थी (पु०) जासु, जसु (पुं०) जाहं, जाह षष्ठी जहो, स्त्री० जाहि स्त्री० जाहिं पंचमी (पु०) जउ (जहे) (पुं०) जहुँ (स्त्री०) जाहे (स्त्री० जाहिं सप्तमी (पु) जहिं, जिम्म (पु) जहिं (स्त्री०) जहि (स्त्री०) जाहिं प्रश्नवाचक सर्वनाम 'क' के रूप एकवचन बहुवचन प्रथमा (०) को, कु (पु) के द्वितीया (स्त्री०) का, क (स्त्री०) कायउ, काउ (न०) काई तृतीया (पु) केण, कई (पु०) केहि (स्त्री०) काई, काए (स्त्री०) केहि, काहि चतुर्थी और (पु०) कहो, कहु, कस्स, कासु (पुं०) काहं-ह षष्ठी (स्त्री०) काहिं, काहि (स्त्री०) काहि पंचमी (पु) कउ, कहे (पु०) कहुँ (स्त्री०) काहे, (स्त्री०) काहिं सप्तमी (०) कहि, कहिं (पु०) काहिं (स्त्री०) काहि (स्त्री०) काहि . (न०) कि - (xxi) निश्चयवाचक सर्वनाम एतद् से बना 'एह' के रूप एकवचन बहुवचन कर्ता, कर्म-एहो, एहु इय (स्त्री० एह, एय) करण- एण एयहि, एय सम्बन्ध- एयहो एयह (स्त्री० एयहि) इदम् से बना 'आय' के रूप एकवचन बहुवचन कर्ता, कर्म-आउ, माओ, आअ आइउ,आयउ आआ, आए करण-आएण (स्त्रीलिंग-आयएं, आयहि) आयहि, आयएहि अपादान आयहो। तथा सम्बन्ध-स्त्रीलिंग में, आआ आयई । सर्वनाम के अन्य रूप सन्द (सं० सर्व) कारक- एकवचन वहुवचन कर्ता-सव्वु, सव्वो, सव्व, सब्बा, सव सव्वे, सव्व, सव्वा कर्म-सव्वु, सव्वे, सव्व, सव्वा सव्वे, सव्वि, सव्व, सव्वा करण-सव्वेण, सव्वें, सव्वे सव्वेहिं, सवाहि, सवहिं, सब्वे अपादान-सव्वहं, सव्वाह सव्वहुं, सवाहुं सम्बन्ध-सव्वसु, सव्वासु, सव्वसु, सब्बहो, सव्वेसिं, सव्वहं, सब्व, सव्वा सव्वाहो, सव्व, सव्वा अधिकरण-सवहिं, सव्दाहिं सवहि, सव्वोहिं, सव्वासु, सबसु अण्ण (सं० अन्य) बहुवचन एकवचन कर्ता, कर्म अण्ण, अण्णु करण अण्ण सम्बन्ध मण्णह अधिकरण अण्णाहिं अण्णाहि (xxji) - २८द-संग्रह कोश-रचना का कार्य अत्यन्त वैज्ञानिक एवं पद्धतिपरक है । शब्द-संग्रह का पार्य कोश-संपादन की प्रथम महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है । प्रस्तुत कोश में अपभ्रंश की प्रका- शित एवं अप्रकाशित कृतियों से शब्दों का संग्रह किया गया है। प्रमाणस्वरूप, प्रत्येक प्रविष्टि के अंत में पुस्तक का संदर्भ दे दिया गया है । अपश की रचनाओं में अनेक देशी शब्द मिलते हैं । अत: 'देशीनाममाला' के शब्दों का संकलन करना भी आवश्यक समझा गया । अपनंग और अवहट्ठ में भेद न कर अवहट्ट की रचना यथा-कीतिलता' के शब्दों को भी इस कोश में स्थान दिया गया है। अपभ्रंश-शब्दावली वहुत विस्तृत है। इसका संकलन करना अपने में एक चुनौती हैं । अपभ्रंश के विपुल साहित्य से संबंधित सभी रचनाएं अब तक प्रकाशित नहीं हो पायी हैं। डॉ० हरिवंश कोछड़ ने अपनी पुस्तक 'अपभ्रंश- साहित्य' में उन अप्रकाशित रचनाओं का उल्लेख किया है और साथ ही अप्रका- शित रचनाओं से सबंधित मूल अंश भी प्रस्तुत किया है, जिनके आधार पर अप्रकाशित रचनाओं के शब्दों का संकलन किया गया है। व्युत्पत्ति कोश में व्युत्पत्ति का विशेष महत्त्व होता है । इससे शब्द के इतिहास का ठीक प्रकार से ज्ञान होता है। प्रस्तुत कोश में मूल शब्द को कोष्ठक में देने का प्रयास किया गया है। कहीं-कहीं कोष्ठक से बाहर दिया गया संस्कृत शब्द पर्याय है, न कि व्युत्पत्तिमूलक शब्द । संस्कृत के मूल शब्दों का आधार प्रामाणिक संस्कृत- कोशों की शब्दावली रही है और प्राकृत के शब्दों का आधार. 'पाइअ-सह-महण्णवो' तथा 'अभिधान-राजेन्द्र कोप' रहा है। प्रस्तुत व्युत्पत्ति-अध्ययन से निश्चय ही संस्कृत और प्राकृत के साथ अपभ्रंश के सबंध के स्वरूप का बोध हो सकेगा, ऐसा संपादक का विश्वास है। भारतीय भाषाओं के शब्दों से तुलना भारतीय भाषाओं में परस्पर आदान-प्रदान होता रहा है । भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भारतीय भाषाओं के उद्गम एवं विकास के इतिहास को समझने के लिए यह आवश्यक समझा गया कि विभिन्न प्रांतीय भाषाओं से अपभ्रंश के : शब्दों की तुलना की जाए । अतः इस कोश में राजस्थानी, गुजराती, मराठी, पंजावी आदि के शब्दों से यत्र-तत्र तुलना की गई है। निश्चय ही अपनश भाषा का आधुनिक भारतीय भाषाओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने से राष्ट्रीय एकता को बल मिल सकेगा।
(xxiii) अर्थ-विचार शब्द कोश का महत्त्वपूर्ण अंग अर्य का निर्धारण करना होता है । प्रस्तुत कोश में अर्थ की प्रामाणिकता एवं प्रासंगिकता बनाये रखने का पूर्ण रूपेण प्रयास किया गया है। ठीक अर्थ की छानबीन के प्रयास में मैंने अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं रखी है । शब्दार्थ की उपयुक्तता को सिद्ध करने के लिए आवश्यकता- नुसार यत्र-तन मूल उद्धरण दे दिये गए है। मुहावरे एवं लोकोक्तियां अभिधात्मक अर्थ के साथ यदि किसी शब्द का प्रयोग लाक्षणिक एवं व्यंग्याओं में हुआ है तो उसे भी देने का प्रयास किया गया है। संस्कृत और प्राकृत साहित्य के समान अपभ्रंश साहित्य में भी सूक्तियों, मुहावरों और लोकोक्तियों के सुंदर प्रयोग मिलते हैं, जिन्हें प्रस्तुत कोश में प्रसंगवश यत्र-तत्र उद्धत करने का प्रयास किया गया है। शब्द-रचना अपभ्रंश के शब्दों की रचना को समझने के लिए प्रत्यय-विधान पर भी विचार करना अपेक्षित है तरित प्रत्यय- इसके पांच भेद हैं- १. स्वाधिक प्रत्यय- नाम (संज्ञा) शब्दों से अ, डा, डुल्ल , अल्ल, इल्ल, उल्ल, इय, क्क, उ, ए, आदि प्रत्यय लगते हैं। संस्कृत के स्वार्थे प्रत्यय 'क' से अपभ्रंश में 'अ' का विकास हुआ है, यथा-लघुक से लहुअ, गुरुक से गरुम । अन्य प्रत्ययों के कुछ उदा- हरण हप्टव्य हैं हृदय >हियडा । माणिक्य >माणिक्कडा । अल्ल, इल्ल, उल्ल- यथा, हिअउल्ल (हृदय), विलउल्ल (विलोल), बहिनुल्ल (भगिनि),। - स्त्री-प्रत्यय- स्त्रीलिंग शब्दों में डी प्रत्यय लगता है, यथा-गोरी से गोर+डी, मृत्ति से मिठडी। यदि शब्द के अंत में 'ड' प्रत्यय हो तो अन्तिम ड का अकार इकार में परिवर्तित हो जाता है, यथा-धूलड से धूलडिया । -सिआ (श्री), अज्जा (आर्या)। इ–णइ (नदी), तरुणि (तरुणी)। ई-वाइणी (वादिनी)। णी-सिस्सिणी (शिष्या)।
(xxiv) २. संयुक्त-प्रत्यय- उल्ल तथा अ के योग से-मोल्लम; अल्ल+डा-वलुल्लडा। क- 'क' प्रत्यय शेप रहने पर इस प्रत्यय के इक, इय, क, रूप भी मिलते हैं, जैते-घानुक्किय, धानुक्क । उ, एं जैसे- -पुणु, अवसें। ३. भाववाचक प्रत्यय- भाववाचक अर्थ में प्प, प्पण, त्त, तण तथा अण का प्रयोग होता है, जैसे- देव+प्पण, वड्ड+प्पण, वड्ड+त्तण । उत्कोपन >उक्क्रोवण, अवेक्षण>अविक्षण। - ४. कर्तत्व बोधक- ये प्रत्यय कर्ता का बोध कराते हैं, जैसे- अ-खवण्ण आर-सोन्नार; कर्तारः>कत्तार । इर-हिंसिर अण-सुहावण हार-करणिहार : इल्ल-कणिल्ल आवा -नटाव - आल-सोहाल । ५. संवध-सूचक प्रत्यय- जैसे- इत-जोवण्णइत (यौवनवती) इ-जोइ (योगिन्) व-हणव हनुवत् (हनुवत्) वन्त-पुनवन्त (पुण्यवान्) मई-सिरिमई (श्रीमती) वाल-थणवाल (स्यानपाल) आलु-सद्धालु (श्रद्धालु) इय-पराइय (परकीय)।
(xxv) - - - - कृदंत प्रत्यय कृदंत प्रत्यय क्रिया (धातु) के साथ लगते हैं । , संस्कृत के तुमुन् प्रत्यय के स्थान पर अपभ्रंश में एप्पि, एप्पिणु, एवि, एविणु, एवं, अण, अणहं और अहि प्रचलित हैं- यथा करेप्पि, करेप्पिणु, करेवि, करेविणु, करेवं, करण, करणहं, करणहिं । इस संबंध में एक बात यह ध्यान देने योग्य है कि गम् धातु से परे 'तुमुन्' अर्य में प्रयुक्त 'एप्पिणु' और 'एप्पि' के 'ए' का लोप विकल्प से होता है, यथा---गमिप्पणु (हे० ४४२), गम्पि, गमेप्पि। संस्कृत के क्त्वा (त्वा) प्रत्यय के स्थान में इ, इउ, अवि, एप्पि, एप्पिणु, एवि, एविणु होते हैं, जैसे- कृत्वा--करि, करिउ, करिवि, करवि, करेप्पि, करेप्पिणु, करेवि, करेविण । अन्य उदाहरण- मारि, मज्जिउ, चुम्विवि, विछो- डवि, जेप्पि, देप्पिणु, लेवि, झाएविणु । संस्कृत के 'तव्य' प्रत्यय के स्थान पर अपभ्रंश में इएबउ, एव्वउ, एवा, एव्व होता है, तथा— करिएव्वउ, सहेन्वउ, सोएवा, देवखेव्व । वर्तमान कृदंत- संस्कृत शत् प्रत्यय का 'अंत' या 'अतय' रूप होता है, जैसे- करंत, मुणंत । अपभ्रश में संस्कृत के शानच् का माण मिलता है, यथा- गच्छमाण, णच्चमाण, पइसमाण । भूत कृदंत- संस्कृत के क्त और क्तवतु प्रत्ययों का उपभ्रंश में त और तवत् रूप मिलता है। क्त के रूप-त,-इत या-ण्ण अपभ्रंश में प्रयुक्त होते हैं । अपभ्रंश में विशेषतः त ही शेप रहा । तकार का लोप होने पर-अ शेप रहा और उसमें य की श्रुति आने पर अ, इअ, और उसके परिवधित रूप य, इय, इयअ के प्रयोग मिलते हैं, यथा- हुइय, पेसिय । स्त्रीलिंग में इय का ई हो जाता है, जैसे- तुट्टी, चडी। भविष्यत् और विधि कृदंत संस्कृत में 'तव्य' प्रत्यय भविष्यत्काल के अर्थ में प्रयुक्त होता है । संस्कृत के तत्य प्रत्यय के स्थान पर अपभ्रंश में 'इएव्बउँ, 'एव्वउं', 'एवा', 'एव्व', 'इअब्ब' 'अव्व' का प्रयोग होता है, यथा-करिएबउ, मारिएव्वउ, सोएवा, देवखेव, - देखव, पढव, धरव, आदि । पूर्वकालिक रूप. पूर्वकालिक क्रिया के निम्नलिखित प्रत्ययों का प्रयोग होता है- इ- चलि, पढि, मारि, करि। इउ, इ- कहिउ, मज्जिउ, भज्जिउ । अवि- मुयवि, विछोडवि परिसेसवि । पि- गम्पि। वि- आणिवि, लेवि । इवि. पणविवि (प्र+नम् >पणव+इवि), अवलोइवि (अव+/लोक्>अवलो इवि), पेक्खिवि (प्रेक्ष> पेक्ख इवि)। एदि-पणवेवि (प्र+/नम् पणव+ एवि . । - । - (XXVI) - ' सुणेवि (श्रु>सुण+ एवि), लहेवि (Vलभ > लह+एवि), धारेवि (धृ>धार +एवि)। एप्पिणु- पणवेप्पिणु (प्र+नव >पणव+एप्पिणु), । एफि~ जेफि । एविणु लहेविणु (1/लम्> लह+एविणु), करेविणु (/कृ>कह+ एविणु), लहेविणु (Vलभ >लह+एविणु) । णिसुणेविणु (नि <श्रु>सुण+एविणु), सुमरेविणु (स्मृ>सुमर एविणु). । घातु-प्रत्यय संस्कृत, पालि और प्राकृत में क्रिया-रूप श्लिष्टता प्रधान हैं, किन्तु अपभ्रंश अश्लिप्टता की ओर बढ़ी है। अपभ्रंश में संस्कृत के लकारों की विविधता में कमी आई । अपभ्रंश में संस्कृत के आत्मनेपद और परस्मैपद का भेद समाप्त हो गया। परस्मैपद रूप ही प्रचलित रहे। आत्मनेपद प्रायः लुप्त हो गये; अपवाद स्वरूप आत्मनेपद के दो रूप शेष रह गए, उसके 'ए' का 'इ' में विलय हो गया। द्वि वचन का सर्वथा लोप हो गया । कर्तृवाच्य तथा कर्मवाच्य के क्रियापद का भेद केवल धातु के रूप तक ही सीमित रहा । अपभ्रंश में लट्, लोट् और लुट् तीन लकार अवशिष्ट रहे और भूत- काल के लिए 'क्त' प्रत्यय का प्रयोग हुआ। अपभ्रंश-धातुओं से पद-रचना के लिए इन प्रत्ययों का प्रयोग होता है । - इ, ई, हिं, उ, उ, हु, हु, ए, एदि, हि, सि, मि, अहु, आमि, एइ, थि, ति, न्ति, एमि, इमि, मो, मु, ह, स, इहि, ईस इत्यादि। वर्तमान काल के प्रत्यय--- इ, हि, हि, हु, उं, हुं । लोट् लकार के प्रत्यय हैं- उ, न्नु, (९), (हि), इ, उ ए, हु, उ, हुं। भूतकाल के प्रत्यय- इ, उ, ए, अ, इअ, य, इय,। भूतकाल के लिए संस्कृत के 'क्त' प्रत्यय के अपम्रश में त, यत, या ण्ण रूप वन गए । यथा- पडिय, जाणिय, चडियउ । भविष्यत्काल- संस्कृत के भविष्य सूचक प्रत्यय 'स्य' का अपभ्रश में 'स' और ध्वनि-परिव- र्तन से 'ह रूप बना है । 'इहि' तथा 'ईस' भी भविष्य सूचक प्रत्यय हैं । प्ररणार्थक क्रिया- जव कर्ता को किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित किया जाता है तो प्रेरणार्थक क्रिया का प्रयोग किया जाता है। संस्कृत के 'णिच' प्रत्यय के स्थान पर अत्, एत, आव, आवे आदेश होकर धातु रूप बनता था, यथा, दरिसइ, कारेइ करावइ, करावेइ, हासेइ, हसावइ, हसावेइ आदि । . - :
(xxvii) . बहु वचन प्रथम पु० मध्यम पु० उत्तम पु० बहु वचन कुछ क्रियाओं के रूप नीचे दिये जा रहे हैं- धातु रूप-रचना (तिङ् विभक्ति) कर् धातु के रूप वर्तमान काल (लट् लकार) एक वचन प्रथम पु०- करइ, करदि करहिं, करहि, करन्ति मध्यम पु०-- करसि, करहि, करहु करहिं, करहि उत्तम पु०- कर, कर, करामि, करहुँ', करहुँ, करिमु करेमि 'चल' धातु की रूप- रचना लट् लकार एक वचन द्वि० वचन चलइ चलहि चलहि चलहु चल चलहु अपभ्रश में 'चल' के अन्य प्राकृत रूप भी निम्न प्रकार प्रचलित हैं- एक वचन चलए, चलन्ति, चलन्ते चलेदि चलिरे चलहि, चलहु चलसि चल चलहुँ चलउ, चलमु चलामा चलामि चलामो आज्ञार्थफ (लोट् लकार) में कर धातु के रूप एक वचन बहु वचन वचन X x मध्यम पु० करू,करहि, करहिं, करह, करहु, करें, करह; करि करहि X X भविष्यत् काल (लुट् लकार) एक वचन बहु वचन करिसिइ, करिहइ करिसहि, करिहहि करीहिसि, करिसहि करिसहु, करिहहु करीसु, कीसु करिसहुं, करिस प्रथम पु० म० पु०. चलह, चलिद्ध उ०. पु० चलमि, प्रथम पु० उत्तम पु० प्रथम पु० मध्यम पु० उत्तम पु० - - (xxviii) -- म० पू० - - हस धातु एक वचन वहु वचन प्र० पू० हसिहिइ, हसीसह हसिहिहिं, हसीसहि हसिहिहि, हसीसहि हसिहिहु, हसीसहु उ० पु. हसिहि हसीस हसिहि, हतीस कृतज्ञता-ज्ञापन प्रस्तुत कोश के संपादन-कार्य में मुझे अपनश-साहित्य की संपादित रचनाओं से सहायता प्राप्त हुई है । अपनश-साहित्य से संबंधित संपादक सर्व श्री डॉ० वासु- देवशरण अग्रवाल, डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ० हीरा- लाल जैन, डॉ० आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्ये, सी० डी० दलाल एवं पाण्डुरंग- दामोदर गुने, डॉ० हरिवल्लभ भायाणी, मधु सूदन मोदी, अगरचन्द नाहटा, डॉ० देवेन्द्र कुमार जैन, डॉ० पी० एल० वैद्य, डॉ० माता प्रसाद गुप्त, जिन विजय मुनि, २० म० शाह, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ राजाराम जैन, विमल प्रसाद जैन, डॉ. रमणीक भाई शाह, डॉ० भोला शंकर व्यास आदि विद्वानों के प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। उपर्युक्त विद्वानों के अतिरिक्त निम्नलिखित विद्वानों ने भी अपनश भापा का शोधपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किया- डॉ० एल०- पी० तेस्सितोरी, डॉ० परममित्र शास्त्री, डॉ० नामवर सिंह, डॉ० वीरेन्द्र श्रीवास्तव, डॉ० जी० वी० तगारे, डॉ० सुकुमार सेन, प्रो० शालिग्राम उपाध्याय, डॉ० हरिवंश- कोण्ड़ । उपर्युक्त विद्वानों की पुस्तकों में दिए अपभ्रंश के शोधपूर्ण अध्ययन से मैं लाभान्वित हुआ, उनका ऋपि-ऋण मुझ पर बना हुआ है। डॉ० कुवर वेचैन, डॉ० रामरज पाल द्विवेदी एवं डॉ० रामकृष्ण कौशिक के सहज स्नेह एवं सौजन्य का स्मरण करते हुए मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं, जिनसे मुझे पुस्तकों की सहायता प्राप्त हुई। अपभ्रंश के वर्ण-क्रम एवं ध्वनियों के संबंध में सर्व श्री डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया डॉ० नामवर सिंह, डॉ० एल० वी० राम अनन्त, डॉ० राधेश्याम मिश्र, डॉ० त्रिभुवन नाथ शुक्ल से समय-समय पर चर्चा हुई, उनके कृपापूर्ण स्नेह के लिए मैं बहुत आभारी हूँ। इस कोश की प्रकाशन संबंधी तत्परता का समस्त श्रेय आदरणीय डॉ० महेश- भारतीय को ही है, उसके लिए मैं डॉ० साहव के प्रति सात्विक श्रद्धा व्यक्त करता हूँ। मुद्रण-कार्य में सहयोग के लिए सर्व श्री डॉ० एल० वी० राम 'अनन्त', आनन्दशर्मा, शरद कुमार एवं कमल कुमार धन्यवाद के पात्र हैं। इस कोश को मैं आदरणीय डॉ० श्री जयचंद्र राय को समर्पित करता हूँ, जिन्होंने इस दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरणा दी थी। अंत में मैं अपनश-साहित्य के विद्वानों से सुझावों की आकांक्षा करते हुए विनम्र निवेदन करता हूं। उनके उपयोगी सुझाव मुझे उपकृत तो करेंगे ही, साथ ही इस राष्ट्रीय महत्त्व के कार्य को आगे बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होंगे। - - नरेश कुमार जे २३५, पटेलनगर प्रथम, गाजियावाद, (उ० प्र०) २०१००१ (xxix) संकेत-सूची जरखी नेपाली अचा अकर्मक धातु अनु० अनुध्व० जप अर्द्धना० बच्च अनुकरण चन्द अनुध्वन्यात्मक अपनेज भापा अहंभागधी अवहट्छ जव्यय असमिया आज्ञार्यक आधुनिक गुजरातो उदाहरण एक वचन बोड़िया कश्मीरी पंजावी पत्नन पहनदी पालि पुल्लिग दु० न० पुलिग तपा ननकाना पुरानी नरागे पु० राजा पुरानी राजस्मानी पुल्लिा तथा स्वोनित पू० का कि पूर्व कानिक क्रिया 40 पैशाची पृ० TO मी मा० गु० लो० कानी प्रा. कों . प्राहि कोकणी किया कियादिजेपन प्राकृत प्राचीन हिंदी फारसी ता क्रि० वि० कृ iri जन परि गुजराती जैन परिमापा जैन महाराष्ट्री टिप्पणी बहुवचन दुदलबन्दी प्रचनापा भविष्यत् काल भार वाचनः नंना 1. महाः टि. FE दुकी गलिस हत तु तुला ถึง दे० तेनु नोडवरी धातु नाही नाम धातु नहार नाम पातुन दिया (xxx) ला० लो० व० व० कृ० वि० विभ० विस्म० वै० व्या० लाक्षणिक लोकोक्ति वर्तमान काल वर्तमान कृदंत विशेपण विभक्ति विस्मयादि वोधक वैदिक व्याकरण संस्कृत संयोजक सकर्मक धातु समुच्चय वोधक सर्वनाम सिंधी स्त्रीलिंग हिंदी सं० संयो० सक० समु० सर्व० सि० स्त्री० हिं० का० दो० को०-काण्हपा दोहा कोप को०-कीतिलता चं०-चंदप्पह चरिउ च०-चर्यापद जस-जसहरचरिउ. जंबू०-जंबूसामिचरिउ जि०-जिणदत्त चरित ण० -णयकुमार चरिउ ऐ०-णेमिणाह चरिउ दे० ना० मा०—देशी नाम माला दे० सा० दो०-देवसेन (सादयधम्म दोहा) प० १०-पउम चरित प. सि० च०-पउमसिरि चरित (घाहिल) पर०-परमप्पयासु परमा०-परमात्म प्रकाश-योगसार (जो इन्दु द्वारा लिखित) पाइञ०-पाइअ-सद्द-महण्णवो पास-पासणाह चरिउ पाहु०-पाहुड दोहा प्र० को०-प्रवन्ध कोश प्रा० गु०--प्राचीन गूर्जर काव्य संग्रह प्र० चि०-प्रवन्ध चिन्तामणि प्रा० ५०-प्राकृत पैगलम वा०-वाहुबलि चरित भ०-भविसयत्तकहा भ० च०-भविसयत्त चरित मय०-मयणपराजयचरिउ महा०-महापुराण यो०---योगसार रा०-राउलवेल रि०-रिट्ठणेमिचरित व०-वड्ढमाणचरिर विशेष्य बिग / धातु का चिह्न । > व्युत्पन्न, यह चिह्न पूर्व रूप से पर ल्प के परिवर्तन को बताता < यह चिह्न पररूप से पूर्व रूप को बताता है। * संभावित रूप। । प्रमाण अन्यों के संकेतों का विवरण संकेत--ग्रन्थ का नाम उ०-उपदेश रसायन रास क०-करकंडचरिउ का० -कालस्वरूप कुलक (xxxi) -- वर्ण०-वर्णरत्नाकर रत्नाकर, प्रा. लि०, वम्बई-४; संस्क० विला--विलासवईकहा मार्च, १९६० । वी.- वीर जिणिदं चरिउ २. (अ) डॉ० आदिनाथ ने मिनाथ उपाध्ये षड्-षड्भाषाचन्द्रिका द्वारा संपादित, परमप्पयासु, प्रकाशक : सं० ० रा०--संदेश रासक सेठ मनिलाल रेवा शंकर झावेरी, परम- संधि-संधिकाव्य-समुच्चय श्रुत प्रभावक मंडल, बम्बई, १९३७ ई०। सः दो० को०-सरहपा (दोहा कोष) सण-सनत्कुमारचरित (आ)डॉ० आ०ने० उपाध्ये द्वारा संपादित सणदु०- सणतुकुमारचरिय (अपभ्रंश 'योगसार' और परमप्पयासु (परमात्म महाकाव्य 'नेमिनाहचरिय' अन्तर्गत) केप्रकाश) साथ प्रकाशित, प्रकाशक: सेठ सा०-सावयधम्म दोहा मनिलाल रेवा शंकर झावेरी, परमश्रुत सि०-सिरिवाल चरिउ प्रभावक मंडल, बम्बई, १६३७ ई। सु०-सुकुमाल चरिउ ३. डॉ० आर० पिशेल, हेमचंद्र का सुद०-सुदंसणचरिउ सुअंध-सुअंधदहमीकहा प्राकृत व्याकरण, बम्बई संस्कृत सीरीज, १६००। ह-हरिवंशपुराण हिं० का०-हिंदी काव्यधारा ४. उदयचन्द्र, सुअंघदहमी कहा, संपादक : हे.---हेमचन्द्र का अपभ्रंश व्याकरण डॉ० होरा लाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ हे० प्रा०-हेमचन्द्र का प्राकृत व्याकरण प्रकाशन, संस्क०.१९६६ ई० । ५. कनकामर, करकड चरिउ, संपादक : संकेताकों का विवरण डॉ० हीरालाल जैन, संस्क० १६६४ ई० भारतीय ज्ञान पीठ प्रकाशन, नई (१) डॉ० एल०. ०. पी० तेस्सितोरी दिल्ली। (२) डॉ० परम मित्र शास्त्री ६. कृष्ण लाल वर्मा, हिंदी-मराठी कोश; ग्रंथ भंडार, माहीम, बम्बई; संस्क० संदर्भ-ग्रंथों का विवरण १९५१। (शब्द-संकलन के स्रोत तथा उद्धरणों में ७. जयदेव मुनि, भावना संधि प्रकरण, प्रयुक्त संदर्भ ग्रंथों का विवरण क्रमशः एनल्स आफ भंडारकर ओरियंटल रिसर्च लेखक का नाम, मंथनाम, प्रकाशक और इंस्टिट्यूट पूना, भाग ११, सन् १९३०, प्रकाशन वर्ष यहां दिया गया है)। पृ० १-३१ पर एम० सी० १. अब्दुलरहमान कृत संदेश रासक, संपादित । यह छह कडवकों की. रचना संपादक : हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा . है, जिसमें प्रत्येक कडवक में १० पद्य विश्वनाथ त्रिपाठी, प्रकाशक, हिंदी-ग्रन्थ हैं। . मोदी द्वारा (xxxii) - ८. जिनदत्तसूरि, उपदेश रसायन रास, आ) डॉ० एच० जेकोबी द्वारा सपा- ला० भ० गांधी द्वारा संपादित, अपभ्रंश दित, १९१८ । काव्यत्रयो ओरियंटल इंस्टिट्यूट, वड़ोदा, (इ) श्री दलाल और गुणे द्वारा संपादित, सन् १९२७ । गायकवाड़ ओरियंटल सीरीज, ग्रन्यांक ६, जिनदत्त सूरि, काल स्वरूप कुलक, २०, संस्क० १६२३ ई० । (३२ पद्यों की कृति), इसका दूसरा नाम १६. धाहिल, पउमसिरी चरिउ, मधु. उपदेश कुलक भी है । इसका उल्लेख सूदन मोदी तथा हरिवल्लभ भायाणी पत्तन भण्डार की ग्रंघ-सूची में मिलता द्वारा संपादित, भारतीय विद्या भवन, है, (द्रप्टव्य : हरिवंश कोछड़, अपभ्रंश बम्बई, वि० सं० २००५ । साहित्य, पृ० २६०)। १७. नयनी, सुदंसणचरिक, संपादक : १०. दामोदर, उक्ति व्यक्ति प्रकरण, डॉ० हीरालाल जैन, प्रकाशक : प्राकृत, सिंधी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ, भारतीय जन शास्त्र और हिंसा शोध-संस्थान विद्या भवन, बम्बई संस्क० वि० २०१०॥ वंशाली (विहार), संस्क० १६७० । डॉ० देवेन्द्र कुमार जैन, अपभ्रंश और १८. नरसेनदव, सिरिवालचरिउ, संपा. हिंदी राजस्थान प्राकृत भारतीय संस्थान, दक : डॉ० देवेन्द्र कुमार जैन, भारतीय जयपुर संस्क० १९८३ ई० । ज्ञानपीठ प्रकाशन, संस्क० १९७४ ई० । ११. डॉ० देवेन्द्र कुमार शास्त्री, राज १६. नागदेव, मयणपराजयचरिउ, संगा- स्थान का जैन साहित्य; 'प्राकृत भारती दक : डॉ० हीरा लाल जैन, भारतीय जयपुर संस्क० वि० सं० २०३४ । जानपीठ काशी, संस्क० अप्रैल १९६२ १२. देवसेन, सावयधम्म दोहा, प्रो० ई० । हीरालाल जैन द्वारा संपादित, अम्बादास २०. डॉ० नामवर सिंह, हिंदी के विकास चवरे दिगंवर जैन ग्रंथमाला २, वि० में अपभ्रंश का योग, साहित्य भवन सं० १९८६ 1. लि. इलाहाबाद, संस्क० १९५४ ई० । १३. देवसेन गणि, सुलोचना चरिउ, २१. परममित्र शास्त्री, सूत्र शंली और अप्रकाशित ग्रन्य, आमेर शास्त्र भण्डार में अपभ्रंश व्याकरण, सं० २०२४ वि०, हस्तलिखित प्रति सुरक्षित । ना० प्र० सभा, काशी। १४. धनपाल, वाहुबलि चरित, अप्रका २२. पुष्पदन्त विरचित जसहरचरिउ. शित ग्रंथ, (हस्तलिखित प्रति आमेर संपादक : डॉ० हीरालाल जैन; भारतीय शास्त्र भण्डार जयपुर में उपलब्ध)। ज्ञानपीठ प्रकाशन, संस्क० १९७२ ई० । १५. (अ) धनपाल, २३. पुप्पदन्त, ‘णयकुमारचरिउ, संपा- संपादक : सी०डी० दलाल एवं पाण्डु दक : डॉ० हीरालाल जैन, संस्क० सन् रंग दामोदर गुने, प्रकाशक : ओरियन्टल १६७२, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, इन्स्टिट्यूट बड़ौदा, संस्क० १६६७ । नई दिल्ली। : भविसयत्त कहा, (xxxjii) २४. पुष्पदंत, महापुराण, संपादक : शित कृति; (आमेर शास्त्र भण्डार में डॉ० पी० एल० वैद्य, भारतीय ज्ञान पीठ हस्तलिखित प्रति सुरक्षित)। प्रकाशन, संस्क० सन् १९८३ । ३४. २० म० शाह, संपादक, संधिकाव्य- समुच्चय प्रकाशक : लालभाई दलपत- २५. पुष्पदंत, वीर जिणिद चरिउ, संपा- भाई भारतीय संस्कृति विद्यामंदिर, अह- दक : डॉ० हीरालाल जैन, भारतीय ज्ञान पोठ प्रकाशन, संक० १६७४ ई० । मदावाद, ६; संस्क० जनवरी १९८० । टि०-इस पुस्तक में निम्नलिखित २६. भट्टोजिदीक्षित विरचित सिद्धान्त- लेखकों की रचनाएँ संकलित हैं १. कौमुदी; प्रकाशक-खेमराज-श्रीकृष्णदास, रत्नप्रभसूरि, वीरजिण- पराजय-संधि बम्बई, सं० २००६ । (रचना-समय ई० स० ११८२); गयसुउ- २७. डॉ० भोलाशंकर व्यास, प्राकृत माल-संधि (रचना-समय; ई० स० पैगलम् भाग १, प्रकाशिका : प्राकृत ग्रन्थ ११८२); सालिभद्द-संधि (रचना-समय परिपद् वाराणसी-५॥ ई० स० ११८२) अवंतिसुकुमाल- २८. डॉ० भोला शंकर व्यास, संधि (रचना-समय : ई० स० ११८२) । प्राकृत २. जिन प्रभसूरि, मयण रेहा (ई० स० पैंगलम्, भाषा शास्त्रीय और छंद शास्त्रीय अनुशीलन) प्रकाशिका : १२४१); जीवाणुस ट्ठि-संधि (ई० स० प्राकृत ग्रन्थ १२२५), नमयासुदरि-संधि (ई० स० परिषद्, वाराणसी, सं० २०१८ । १२७२); चउरंग-भावण-संधि (ई० स० २६. मगनभाई प्रभुदास देसाई, हिंदी १३०० पूर्व)। ३. विनयचन्द्रसूरि, गुजराती कोश, गुजरात विद्यापीठ अह आणंद-सावय-संधि (ई० स० १३०० मदाबाद; संस्क० १९६४ ई० ।. पूर्व । ४. रत्नप्रभ गणि, अंतरंग संधि ३०. डॉ० माता प्रसाद गुप्त, सम्पादक, (ई० स० १३०० पूर्व) । ५. राउल वेल और उसकी भापा, मित्र अज्ञात, केसीगोयम-संधि (ई० स० प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद । १४१७) । ६. जयदेव मुनि, भावणा- संधि (रचना-समय : ई० स० १४०० ३१. मुरलीघर वनर्जी, दि देशीनाममाला पूर्व, लेखन-समय : ई० स० १४१३) । माफ हेमचन्द्र, प्रकाशक कलकत्ता विश्व- जयशेखरसूरि-शिष्य, सील-संधि विद्यालय, १६३१ । रचना-समय : ई० स० १४०० पूर्व, ३२. मेरुतुङ्ग, प्रबन्धचिन्तामणि, सम्पा.. लेखन-समय : ई० स० १४१३); अव- दक जिनविजय मुनि, प्रकाशक : सिंधी हाण-संघि (रचना-समय : ई० स० जैन ज्ञानपीठ, विश्वभारती शान्तिनिके- १४०० पूर्व)। ८. कर्ता: अज्ञात, हेम- तन बंगाल संस्क० १६८९ । तिलयसूरि-संधि (रचना-समय : ई० स० ३३. यशःकोति, चंदप्पह चरिउ, अप्रका १४०० पूर्व) । ६. विशालराजसूरि, तव- लेखक: - (xxxiv) : सदन, संधि (रचना-समय ई० स० १४०० पूर्व, ना० प्र० सभा काशी, सं० २०१२ लेखन-समय : ई० स० १४४६) । ६. वि०॥ कर्ता : मजात, अणाहि-महरिसि-संवि, ४३. वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत- (ई० स० १४०० पूर्व, लेखन-समय : हिंदी कोश, प्रकाशक : मोतीलाल वना- ई० स. १४३०) । १०. हेमसार, उव रसी दास; संस्क० १६६६ ई० । एस-संधि (रचना-समय : ई० स० ४४. डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल, विद्या- १५०० पूर्व)। पति कृत कीतिलता, साहित्य ३५. राजशेखर सूरि, प्रवन्ध कोश, सिंधी चिरगाँव झांसी प्रथम संस्क० १९६२ जैन ज्ञानपीठ शान्ति निकेतन, विक्ष ई०। १९९१ । ४५. विवुह-सिरिहर, वड्ढनःण वरिल, ३६. डॉ० राम गोपाल शर्मा 'दिनेश संपादक : डॉ० राजाराम जैन, भारतीय अपभ्रंश भापा का व्याकरण योर साहि- ज्ञानपीठ प्रकाशन, संस्क० १६७५ । त्य, प्रकाशक : राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ ४६. वीरकवि विरचित जंबू सामिचरित, अकादमी, प्रथम संस्क० १९८२ संपादक : विमल प्रकाशन जैन, भारतीय ३७. रामसिंह, पाहुड दोहा प्रो० हीरा. ज्ञानपीठ प्रकाशन; संस्क० सन् १९६८ । लाल जैन द्वारा संपादित, वि० सं० ४७. डॉ० वीरेन्द्र श्रीवास्तव, अपभ्रंश १६६०, कायजा जैन पब्लिकेशन, सोसा भापा का अध्ययन, एस० चन्द एण्ड इटी, कारंजा, वरार। कम्पनी लि०, नई दिल्ली; संस्क० १६७६। ३८. राहुल सांस्कृत्यायन, हिंदी काव्य- ४८. श्रीधर, पासणाह चरिउ, अप्रका- धारा, प्रयाग, १६४५ ई० । (इस पुस्तक में दिये गये 'चर्यापद के में उदाहरणों के शित ग्रन्थ, आमेर शास्त्र भण्डार हस्तलिखित प्रति सुरक्षित । आधार पर शब्द संकलित)। ४६. श्रीधर, भविसयत्त चरिउ, अप्रका- ३९. लक्खण या लाखू, जिणदत्त चरिउ, : शित ग्रन्थ, आमेर शास्त्र : भण्डार में अप्रकाशित ग्रन्थं, आमेर भण्डार में हस्त..- इसकी हस्तलिखित.प्रति सुरक्षित है । लिखित प्रति सुरक्षित। ५०. श्रीधर, सुकुमाल चरिउ, (ग्रन्य- ४०. लक्ष्मीधर, पड्भापाचन्द्रिका, बम्बई , रचना का समयं वि० सं० १२०८), संस्कृत एण्ड प्राकृत सिरिज,.. १६१६ । . अप्रकाशित ग्रन्थ, आमेम शास्त्र भण्डार ४१. लखम देव, मिणाह चरिउ, अप में हस्तलिखित प्रति सुरक्षित । काशित कृति, पाटोदी शास्त्र भण्डार, ५१: डॉ० सम्पत्ति आर्याणी, मंगही-भापा जयपुर में हस्तलिखित प्रति सुरक्षित और साहित्य, विहार-राष्ट्रभाषा परिषद्, ४२. डॉ० एल० पी० तेस्सितोरी, पुरानी • पटना; प्रथम संस्कं० विक्रमाब्द' २०३२ । राजस्थानी, अनुवादक : नामवर ५२. सर मोनियर विलियम्स, ए संस्कृत- .. सिंह (xxxv) २. जिन इंग्लिश डिक्शनरी, यूनि० प्रेस आक्स दक : डॉ० देवेन्द्र कुमार जैन, भारतीय फोर्ड. संस्क० १८६८ ई० । ज्ञानपीठ, वि० सं० २०४२ । ५३. सिद्धसेनसूरि (गृहस्थावस्था का नाम ५६. हरगोविन्द दास निकमचंद शेठ, 'साधारण'), विलासवईकहा, संपादक : पाइअ-सह-महण्ण्वो, प्रकाशक : हरगो- डॉ० रमणीक भाई शाह, एल०डी० इन्स्टी- विन्द दास टी० शेठ। सी, योरोपियन ट्यूट, अहमदाबाद, संस्क० १६७७ ई० । आसिलम लेन, कलकत्ता; सं० १९८५ । ५४. सीताराम लालस, राजस्थानी सबद ६०. संपादक : डॉ० ह० चू० भायाणी, कोस, प्रकाशक चौपासनी शिक्षा समिति अगरचन्द नाहटा, प्राचीन गूर्जर काव्य जोधपुर, प्रथम संस्क० । सञ्चय, प्रकाशक : लालभाई दलपतभाई ५५. डॉ० सुकुमार सेन, तुलनात्मक भारतीय संस्कृति विद्यामंदिर अहमदा- पालि - प्राकृत - व्याकरण, अनुवादक : वाद-६ प्रथम संक०, जून, १९७५ । महावीर प्रसाद लखेड़ा, लोक भारती प्राचीन गुर्जर काव्य संचय में संक- प्रकाशन, इलाहावाद, प्रथम संस्क० । लित-१. केसीगोयम-संधि । ५६. सुप्रभाचार्य, वैराग्यसार, प्रो० हरि- प्रभसूरि (रचना-समय ई० १२७२) नम- पाद दामोदर वेलणकर ने एनल्स आफ यासुदरि-संधि । ३. जयशेखरसूरि भंडार कर ओरियंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट, (लेखन-समय १४३७ ई०) सील-संधि । जिल्द ६, (पृ० २७२-२८०) में इसे ४. वज्रसेन, भरहेसर-बाहुबलि-घोर संपादित किया है। (रचना-समय : ११६६ के लगभग)। ५७. स्वयम्भूदेव विरचित पंउमरिउ, ५. आसिग, जीवदया-रास (रचना-समय भाग १ (i) मूल संपादक : डॉ०० एच० १२०१)। ६. आसिग, चंदनवाला-रास सी० भायाणी, अनुवादक डॉ० देवेन्द्र (लेखन-समय १३८१ ई०) । ७. पाल्हण, कुमार जैन, संस्क० १९७५ ई०, भार.. आबू-रास (रचना-समय १२३३ ई०)। तीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली। ८. देल्हण, गयसुकुमाल-रास (रचना- (२) संपादक : डॉ० हर्मन जेकोबी, समय ई० १२५०) । ६. जम्बस्वामि-' प्राकृत ग्रंथ परिषद्, अहमदाबाद, वि०) सत्क वस्तु (सन् १३८१)। १०. उपा- सं० २०२५.। (३) पउम चरिउ, प्रका-. घ्याय 'विनयप्रभ, गौतमस्वामी-रास, शक, : जैन-धर्म-प्रसारक-सभा, भावनगर,। (रचना-समय-१३५.६) । ११. नेमिनाथ- प्रथमावृत्ति। (४) : स्वयंभूदेव, पउमच रास । १२. लम्मीतिलक गणि, शांति- रिउ, संपादक : डॉ० हरिवल्लभ चूनी: नाथ देव- रास. (रचना-समय : १३. वीं लाल भायाणी, संस्क० वि० २००६, शताब्दी) । १३. शांतिनाथ-रास, १४. सिंधी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ, भारतीय. राजतिलक, सालिभद्र-रासु लेखन-समय विद्याभवन, बंबई.... १३८१)। १५. अभयतिलकगणि-महा- ५८. स्वयंभूदेव, रिट्ठणेमिचरिउ, संपा वीर रास (रचना-समय) थूलिभद्द-रासु- - ..
(xxxvi) २२. जिन ६३. डॉ० Emenean, (लेखन-समय १३८१) 1 १७. नवकार ६२. हरिदेव, मयणपराजयचरिउ, संपा- रास। १८. वर्म-चच्वरी । १६. दक : डॉ० हीरालाल जैन, भारतीय चचरी । २०. दिघम-सवरी-भास । ज्ञानपीठ काशी, संस्क० १६६२ ई० । २१. जिनचंद्रसूरि-फागु । हरिवंश कोछड़, अपन्नश- पद्मसूरि, सिरि-यूलिभद्द-भागु (रचना- साहित्य, प्रकाशक : भारतीय साहित्य समय १३००-१३५०) । २३. विनयचंद्र- मन्दिर, फवारा-दिल्ली । मूरि, नेमिनाथ-चतुप्पदिका (रचना ६४. हेमचंद्र, अपभ्रंश व्याकरण, शालि. समय : १३वीं शताब्दी) । २४. पाल्हण, ग्राम उणव्याय (अनुवादक), भारतीय नेमि-वारहमासा (रचना-समय, १३वीं विद्या प्रकाशन वाराणमी, संस्क० १९६५ शताब्दी) । २५. देपाल, कयवन्ना-विवाह- ई० । लड, (रचना-समय १५वीं शताब्दी) । ६५. डॉ० हेमचंद्र जोशी (अनुवादक) २६. देपाल, नेमिनाथ-बवल (रचना आर० पियाल, प्राकृत भापाओं का व्या- समय १५वीं शताब्दी)। २७. देपाल, करण, विहार राष्ट्रभापा परिपद् पटना, आर्द्र कुमार-धवल (रचना-समय १५वीं प्रथम संस्क० । शताब्दी) । २८. अंबिकादेवी-पूर्वभव 66. Burrow and वर्णन-तलहारा। २६. नेमिनाथ-बोली। Dravir Etymological Dictionary, ३०. यूलिभद्र-मुनि-वर्णना-बोली। ३१. Oxford at the clarendon Press, शांतिनाथ-बोलिका । ३२. वासुपूज्य- Ed. 1961 वोलिका । ३३. सर्वजिन-कलश । ३४. 67. Davids and william, Pali युगादि देव-कलश । ३५. वीरजिन- Text Society London, Ed. 1952. कलश । ३६. जिनेश्वरसूरि, महावीर- 68. Ganesh Vasudev Tagare, जन्माभिषेक (रचना-समय ११ वीं Historical Grammar of Apab. शताव्दी) । ३७. मासिग, कृपण-गृहिणी- hramsa, Deccan College, Poona संवाद, (रचना-समय १२०० के पश्- Ed. 1948. चात् । ३८. प्रकीर्ण-दोहा। ३६. 69. (1) Hindi Words Common दंगडु । ४०. नवकार-फल-स्तवन । to other Indian Languages, ६१. हरिभद्रसूरि, सणतुकुमारचरिय, (2) Hindi-Assamese; 1959; संपादक : हरिवल्लभ चू० भायाणी एवं (3) Hindi-Marathi, 1959, (4) मधुसूदन चि० मोदी, प्रकाशक : लाल Hindi-Punjabi; 1960; (5) Hindi भाई दलपत भाई भारतीय संस्कृति Gujrati; 1958; (6) Hindi-Oriya; विद्यामंदिर, अहमदावाद, ६; सस्क० 1958; published by M/o Edu- जनवरी, १९७४ । cation, Govt. of India. .
अपभ्रंश-हिन्दी कोश अ - प्रा० अंक- अव्य० (दे०)- निकट, समीप; धयकुसछत्तदंड", इन तीनों बांसों के (दे० ना० मा० १,५)। २-० (सं० ध्वजा, अंकुश और छन्न के प्रचण्ड दण्ड अंक) संख्या (भ०); ३- रत्न-विशेष, बनाने वाले हैं; क० २, ८, २)। रत्न की एक जाति; (संचि० २,३,७) । २. आंकडी; (हे० ३४५) । ४- भासन; (जंबू ८,१२,१२) । अंकय-वि० (सं० अकृत>प्रा० बेकय)- अंकुसइय-न० (दे०) अंकुश के आकार नहीं किया हुआ; (पाहु० १७७)। वाली वस्तु; (दे० ना० मा० १,३८) । अंकवाली स्त्री० (सं० अङ्कपालि> अंकुसिय-वि० (सं० अङ कुशित >प्रा. प्रा० अंकवाली)- आलिंगन; (उ० व्य०. अंकुसिअ)-अंकुश की तरह मुड़ा हुआ; प्र० ६-१७) । (जंबू० ४,१६,१५)। अंकार- पु० (दे०)-सहायता; (दे०- अंकोल्ल-पुं० (सं० अङकोठ>प्रा० ना० मा० १,६)। अंकोल्ल)-वृक्ष एवं पुप्प-विशेष; (जंबू० अंकि-न० (दे०)-आलिंगन (दे० नाः- ५,८,६)। मा० १.११) । /अंकोस-(सं०आक्रोशति)-१. जोर से अंकित-वि० (सं० अङ्कित > चिल्लाना, २. भर्त्सना करना, ३. कोसना; संकिअ)-चिह्नित (भ०; जस० १,५,६) । (उ० व्य० प्र० ४६-१३)। मंफियंग- पु० (सं० अङ्कित+अङ्ग)- अंग-पु. (सं० अङग>प्रा० नंग)- विभूषित बंग; (जंबु० १०, १, १२) । शरीर के अवयव; (भ०; की० ३,१५६)। अंकुड-पु० (सं० अङ कुश> प्रा० -चाम पु० (सं० अङ्ग + त्याग) संकुश)-लोहे का एक हथियार, "अंकुडेण कायोत्सर्ग; (जस० ४, ६, ६)। णिहणइ कड्ढेप्पिणु", (म० २,१६,१) । अंगि- पुं० अंग, "गोरइ मंगि वैरंगा संरक- पुं० (सं० अङकुर > प्रा० कंप्यू" गोरे रंग पर दोरंगा कंचुक अंकुर)-कोंपल, संखुवा, फुनगी; (भ०; जस० ३, ३५, ३)। (ऐसा लगता) है; (रा० १७)। अंगेर- अंक रिस-वि० (सं० अङ्कुरित>प्रा० पुं०, अंग "मांगहि मांडणु बंगेर अंकुरिय)- अंकुर-युक्त, जिसमें अंकुर उजालु", -(उसके) अंगों में मंडन उत्पन्न हो वह; (जंबू०४, १६, १३)। (उसके) लंगों का मौज्ज्वल्य है, (रा० अंकुस-पुं० (सं० अङकुश)-१. अंकुश २५) । बङ्ग-पुरंग (हे० ३३२,२)। के आकार वाली बांस से बनी वस्तु, अङ्ग चङ्ग- वि०, शरीर से तगड़े; "तिहि वंसहि एयहिं अइपयंड, होसहिं (की० ४,७०) ।
अंगण (२) अंजणपध्वय -- संगणन० (सं० अङ्गगं, अङ्गनं > १,६,५) । प्रा० अंगण)- आंगन, चौक; (भ०)। अंगुलि- स्त्री० (सं० अङ गुलि-ली, अंगरिण-स्त्री० बगड़ी, चौक; (सुअंध अङ गुरि-री> प्रा० अंगुलि, अंगुली)- १,१२,१) । उंगली (भ०; जंवू० २,५,१३) । अंगुलि; अंगय-वि० (सं० अङ गज)-शरीर पर (पाहु० ११७) । उपजा हुआ; (जस० १,२,१)। अंगुलिणी-स्त्री० (द०)-प्रियंगु, वृक्ष- अंगरक्ख-वि० (सं० अङ् + रक्षक > विशेप; (दे० ना० मा० १,३२) । प्रा० अंग+रक्खग, रक्ख)- शरीर की अंगुलीय-पुं० नं० (सं० अगुलीयक)- रक्षा करने वाला; (जंबू० ३,४,६) । अंगुठी; (प० च० ५४,६)। अंगराम-पु. (सं० अङ गराग>प्रा० अंधिव- पु० (अंध्रिप)-वृक्ष; (ग. अंगराग, अंगराय)-सुगन्धित लेप, शरीर ६,७,१५) । पर सुगंधित उवटन का लेप; (जस० २, /अंच-(सं०अञ्च्)-पूजना । अंचइ- १२,१)। सक० (सं० अचंति)-पूजा करना, सत्कार अंगह-पु० सं० (अङ्ग+ रुह अंग करना (भ०)। अंचमि-- क्रि०, व० पर उत्पन्न)-रोम; (जस० ४,२०,४)। पूजना (क० १०,३,१०) । अंचए; अंगरुहु-पु०, पुत्र (जंवू ३,५,१०) । (भ०) । अंचएवि- पू० का० क्रि०, अंगवइ- सक० (सं० अङ्गी+कृ) - अर्चना करके; (क० १०, १७, ३) । अंगीकृत करना, स्वीकार करना; (की० अंचिज्जइ-क्रि०, व० (ण० ४,३,११) । २,२२)। अंचल-पु० (सं० अञ्चल)-कपड़े का अंगार- पुं० (सं० अङ, गार>प्रा० शेष भाग; (भ०)। अंगार)-जलता हुआ कोयला; (भ०) । अंचिय- वि० (सं०. चित)- पूजित -पुंज पु० (सं० अङ्गार+पुञ्ज) अंगार सम्मानित, (म० १,१,२; प्रा० गु० १०, का ढेर (जंवू ६,१५,१५) । –य, पुं० ५) । (सं० अङ्गार+क) अंगारा; (सुदं० २, अंछिय- वि० (दे०)- खींचा हुआ, ११,१)। माकृप्ट; (दे० ना० मा० १,१४) । अंगालिय-न० (दे०)-ईख का टुकड़ा; अंजण- पुं० (सं० अञ्जन > प्रा० (दे० ना० मा० १२, ८)। अंजण)-वृक्ष-विशेष; (जंबू० ३,६,१७)। अंगिय - स्त्री० (सं० अङगिका)-अङ्ग- संजणइसिपा- स्त्री० (दे०)- वृक्ष- देशीया स्त्री; (सुद० ४,६,४) । विशेष, श्याम तमाल का वृक्ष; (दे० ना०- अंगुट्ट-पुं० (सं० अङ्ग प्ठ>प्रा० अंगु मा० १,३७) । ट्ठ)-अंगूठा; (ण० १,१७,४) । अंजणईस-न० (दे०)-श्याम तमाल का अंगुल न० (सं० अङ्गुल > प्रा० पेड़; (दे० ना० मा० २,३७) । अंगुल)- नाप या मान-विशेष, (जस० अजगपव्यय- पु० (सं० अञ्जन+ अंजणिआ अंतरिक्स - पर्वत)-पर्वत-विशेष; (रि०, छठा सगं)। -रंग- पु० (सं० अन्त+ रङ्ग)- अंजणिमा-स्त्री० (दे०)- वृक्ष-विशेप, आत्मीय, स्वजन । वि० निकटस्थ, (जस० श्याम तमाल का वृक्ष; (दे० ना० मा० १,२,५) । १,३७)। अंत-पु. (सं० अन्त >प्रा० अंत)- अंजणु- पुं० (सं० मञ्जन > प्रा० आखीर; प्रा० ५० १,१७) 1 अंतए (प्रा० अंजण)-काजल, अंजन; (महा० २२ पै० १,१६४), अंतिणा (प्रा० पं० २, ३)। ७४), अंतहि-आखीर में; (प्रा० पै० २, अंजलि-स्त्री० (सं० अञ्जलि>प्रा० १००)। अंजलि, ली)- हाथ का संपुट; (भ०; अंतर- अव्य० (सं० अन्तर् > प्रा० जस० २,३४,५) । अंजुलि स्त्री० कर. अंत)-मध्य में (प्रा० ५० १,६७) । अत- संपुट (सि० १, ४३)। रंग पु० (सं० अन्तरङ्ग) आभ्यान्तर अंजस-वि० (दे०)-सरल, ऋजु; (दे० उपादान; (जंवू० १०, ४,१) । सुद्धि- ना० मा० १,१४) । स्त्री० (सं० अन्तरशुद्धि)- आन्तरिक अंज- (सं० अञ्>प्रा० अंज)-आंखों शुद्धि (जंवू १०,२०,१२)। में अंजन आंजना। -हि सक० आंजना; अंतरवणु- (सं० अन्तवन)- अन्तरवन "काई णयण अंजणहिं अंजहि", आंखों में नामक वन-विशेष, "संतरवणु संपत्तु जंतु- अंजन क्यों आंज रही हो; (सि० २, ४, जंतु रमणीसरु"--चलते-चलते वे रमणी- श्वर नागकुमार अन्तरवन में पहुँचे; (ण० अंडय- पु० (सं० अण्डज)-मछली, ७,३,१२) । मत्स्य; (दे० ना. 'मा० १,१६) । अंतराप्र-न० (सं० अन्तरायिक.>प्रा० मंत' पुं० (सं० मन्त्र> प्र.० अंत अंतराइय)-विघ्न, रुकावट; (जंबू० २, न०)-आंत (ण ४, १५,५) ।- (सं १५,८)। अन्न) आंत (जंवू ४,२,१७) । अंताई- अंतराल-पु० (सं० अन्तराल> प्रा० अंतराल) अंतर, वीच का भाग; (जंबू० न०, आंत (रि० ७,६) । अन्त (सं० ५,११,१०) । आन्त्र) आंत; (प० च० १३, ४, ७) । अतरि-अव्य० (सं० अन्तर)-में; "दल- -आवलि-स्त्री० (सं० मन्त्र+मावलि) अंतरि सण-णाणु चार", (सि० १,१७, अंतड़ियां (ण ८,१५,८) । -याल, पुं० १६)।-अ, वि० (सं० अन्तरित>प्रा० (सं० अन्तकाल) (सि० अंतरिय)-अंतरवाला; (जंवू० १०, १३ २, ३३)। ७)। अत: अव्य० (सं० अन्तर> प्रा० अंतरिक्ख-पु० (सं० अन्तरिक्ष)-पृथ्वी अंत)- आभ्यन्तर, मध्य में "पिय-चलण और दूसरे ग्रहों या नक्षत्रों के बीच का अंतें धरि उत्तमंगु,"-प्रिय के चरणों में स्थान, आकाश; (भ०) ।तरिक्ति अपना सिर रख दिया; (सि० २,७,१)। (महा० ६८,५)। - . अन्तिम समय; - अंतीहरी (४) अंवा अंतीहरी-स्त्री० (दे०)-दूती;(दे० ना०. अंधार, अंधारउ पुं० न० (सं० मा० १, ३५)। अन्धकार> प्रा० अंघयार)- अंधेरा; अंतेउर- न० (सं० अन्तःपुर>प्रा० अंधकार; तुल०म० अन्धार, गु० अन्धेर अंतेउर)-रानियों का निवास-गृह, रनि- (क० १०, ६, ७; प्रा० ५० १, १४७; वास; (सि० २,३४; ण० २,१,२) जस० २, २५, ४)। अतेल्ली-स्त्री० .(दे०) कल्लोल, तरंग; अंधारिय-वि० (सं० अन्धकारित > (दे० ना० मा० १,५५)। प्रा० अंधारिय)-अंधकार वाला; (जंवू० अंतोहुत्त-वि० (दे०)-अधोमुख; (दे०- ६, ५, ४; भ०)। ना० मा० १,२१)। घि- स्त्री० (सं० अक्षि)- नेत्र । बंदोयरण- न० (सं० आन्दोलन)- अधिहि; (रा० १६) । हिलना-डुलना, स्पंदन; (जस० १, अधिआ-स्त्री० (सं० अधिका)-धूत- ५)। अंदोल-- (सं० आन्दोलय > प्रा० विशेष; (दे० ना० मा० २, १)। अंदोल)-कंपाना, हिलाना । बन्दोलइ- अंधुघु-पु० (दे०)-कूप, कुआ; (दे० . ना० मा०.१, १८) । सक०-झूलना; (प० च० १४, ३, ७) । अंदोलय-० (सं० आन्दोल+क> अघो-पु० (सं० अन्ध:)-वस्तु छंद का प्रा० अंदोलग)- हिंडोला, तुल० म० भेद; (प्रा० ५० १, ११४) । अंदोला; (भ०) । अन्दोलय (प० च० अंब-न० (सं॰आम्र)-आम्र-फल; (रि०, १४, ४, ६)। सर्ग द्वितीय) । स्त्री० (सं० अम्बा>प्रा० संघ-- पुं० (सं० आन्ध्र)- १. देश- अंबा) स्त्री, माता; : जं० २,१७, २)। विशेष; (क० १०, ६, ७)। -देस | -देस अंबड्य- स्त्री० (सं० अम्बिका)-आम (सं० आन्ध्र देश) (ण० ६, १, ७) । की कलियां; (ण० ८, १, १२) । २. (सं० अन्ध) अन्धा (प्रा० ५० १, अंबड-वि० (दे०)- कठिन (दे० ना० ११५; जस० १, १६, २)। ल. (सं० मा० १,१६)। अन्ध) (जंवू० २, ६, ८) । ३. आंध्र मंवय-पु० (सं० भाम्र>प्रा० अंब)- देशीय मनुष्य, (संधि० १०, २,५)- १, आम का पेड़, २. न० आम, आम्र- यविट्ठि-पु० अंधकवृष्णि नाम-विशेष फल; (ण० ७, १, ११) । (रि० प्रथम सर्ग)। अवर- न० (सं० अम्बर > प्रा० अंघन-पुं० (सं० अन्धक)-दैत्य का (सं० अन्धक)-दैत्य का अंबर)- १. वस्त्र । अंबरा-न० वस्त्र नाम; (प्रा० ५० १, १०१)। (की० २, ८६)। २. नाकाश (प्रा० अधघु-पु (दे०)-कूप; (दे० ना० पैं० १, १८८)। मा० १, १८)। टि०-- अंघ (तमस्, संवा- स्त्री० (सं० अम्बा > प्रा० अंधकार) से अंघधु शब्द कुए का द्योतक अंबा)- माता, मां; (सि० १, १७) । इसलिए हो गया क्योंकि कुएं में अंधकार --इय, स्त्री०, माता; (प्रा०गु०५,४७) । होता है। -देवय स्त्री० (सं० अम्बा देवी) अम्बा ।
अंबिलं ( ५ ) अइउच्चिय - धरातल - नामक देवी; (जंबू १, २, ६) । -विउ, - वाय, पु० (सं० अश्रु पातः) आंसू वि० प्रचारित, "जिणि संवच्छरु महि गिराना; (भ०) । -वाह, पुं० (सं० अंबाविउ अंबरि चंदिहिं नामु लिहाविउ", अश्रु -प्रवाह >प्रा० अंसु+पवाह) आंसू तुल०गु० अंबाव; (प्रा०ग० ५, ५३) । बहाना; (जस० २, २५, ६) । "अंसुवाह अंबुल स्त्री० ० माता; (सुदं० ८, ६, णिवडंति धरयले", पर आंसू २)। बहा रहे थे; (ण० ६, १८, १८) । अंबिल-न० १. (सं० आचाम्ल) प्रा० असु'–न० (सं० अंशुक >प्रा० अंसुय)- आयंबिल)- तप-विशेष; (संधि० १६, वस्त्र, कपड़ा; (प० च० १४/८/९) । २, २)। २. वि० (सं० आम्ल) खट्टी य, व-न०-वस्त्र (भ०)। वस्तु, तुल० म० आम्विल; (भ०)। अंहि-पु. (सं० अंह्नि>प्रा० अंहि)- अंयुहरु- पू० (सं० अम्बुधर)-मेघ; पाद, पाँव, (प० च० ३६, १४, ६) । (ण० ६, १४, ८)। अ-संयो० (सं० च>प्रा० अ)-और अवेसि, अधेसि पुं० (दे०)-घर के (सं० रा०; प्रा० ५० १, ७; की० २, दरवाजे का लकड़ी का तख्ता; "अवेसी.. १००)। तथा अंबेसी गृहद्वारफलहकः", (दे० ना०- मइ-अव्य० (सं० अति>प्रा० भइ)- मा० १, ८) । यह अव्यय नाम और धातु के पूर्व में अंबोडय-पु० (दे०)- सं० केशकलाप, लगता है और निम्नलिखित अर्थ में से वालों का ढेर; तुल० गु०अंबोडो; (संधि० किसी एक को सूचित करता है- २, ११, ३)। १. अतिशय, अतिरेक, २. उत्कर्ष, महत्त्व, अभ-पु. (सं० अम्भस् >प्रा० अंभ) ३. प्रशंसा, ४. अतिक्रमण, ५. ऊँचा; जल; (जस० ३, १६, ३)। (सं० रा०; भ०; जस, १, ५, ५; ण. १, अंस-पुं० (सं० अंश>प्रा० अंस) १,७; क०१, ३, १०; की० २, २१३) । भाग, खंड, अवयव; (जस० ३,२६,८) । अई-अहो (सम्बोधन के अर्थ में) (क० –य, पु० (सं० अंश+क) अंश "जाई १, ३, १०)। असय सत्तई देसिउ"-जाति, अंश, सत्व, भइम-वि० (सं० मतीत)-गत, बीता देश, (सुदं० ४, ५४)। हुआ; (म० २, ३७, ११) । असु'-पु.० (सं० अंशु>प्रा० अंसु)- प्रअड्ड-. वि० (सं० अति विकट)- किरण, प्रकाश किरण; (ण० २, ५, बहुत भयंकर; (जस० २, ६, १२) । ४)। प्रइआर पुं० (सं० अतिचार)- असुर-न० (सं० अश्रु> प्रा० अंसु) १. मर्यादा का उल्लंघन, २. अतिक्रमण आँसु, अश्रु-जल; तुल० गु० आंसु (भ०; (भ०)। प० च० १४, ८, ६; हे० ४१४१३) । अइउच्चिय--वि० (सं० अति+उच्च+ अंसु- अश्रु (प्रा० ५० १, . ६६)। क>प्रा० अइ+उच्चअ)- . अति उच्च, - अंइउर्जु । ६) अइतोस - - बहुत ऊँचा या लम्बा; (क० ७, ७, १०३)। ११)। अइजुज्झइ-अक० (सं० अति+युध्यति मइउज्जु -वि० (सं० अति- ऋजु>प्रा० >प्रा० अइ+जुज्झइ)- बहुत लड़ाई अइ+उज्जु)- अत्यन्त निष्कपट, सीधा करना, जूझना; "संगामरंगि तुम्हे हिं या सरल; क० १०, १३, ४) । सहे अइजुज्झइ", (क० ३, ११, १०)। अइकडुय-वि० (अतिकटुक >प्रा० अइ अइझीण- वि० (सं० अति+क्षीण)- कडुअ)- बहुत कडुआ; (ण० ६, २०, प्रा० अइ+झीण)- अत्यंत दुर्बल; (क० ८)। २, ७, ६) । मइक्कम-सक० सं० अतिक्रम्>प्रा० अइह-वि० (सं० अदृष्ट)- जो देखा अइक्कम) उल्लंघन करना । अइक्क- न गया हो; (म०; जंवू १, ५, १८) । मंत-व० कृ० (सं० अति + क्रम् + अइडरिप्र-वि० (सं० अति+दीर्ण> शतृ (जंतु ८, ८, ८)। प्रा० अइदरिस)- बहुत डरा हुआ; मइकमिय- वि० (सं० अतिक्रान्त) (क० ७, ११, २) । १. आगे बढ़ा हुआ, २. बीता हुआ, गया प्रइण-न० (दे०)- गिरि-तट, तराई, हुआ; (प० च० ६, ६, ५) । अइक्कमित्र पहाड़ का नीचे का भाग (दे० १, १०)। वि०-अतिकान्य (जस०) । अरिसम्मल- वि० (सं० अति + अइकम्म-पु० (सं० अतिक्रम > प्रा० निर्मल>प्रा० अइ+णिम्मल)- अत्यन्त अइकम्म)-उल्लंघन; (व० ५, २, ८) । विशुद्ध; (क० ४, ७, ५)। मइकिण्ह- वि० (सं० अति+कृष्ण) प्राणिय- वि० (दे०)- आनीत, लाया विलकुल काली; (जंवू० ४, १३, १४) । हुआ; (दे० १, २४) । अइकुडिली-वि० (सं० अति कुटिल+ अइणिण्ड - वि० (सं० अति-+-निकट > क> प्रा० अइ कुडिल+अ)- वहुत प्रा० अइ+णिबड)-अति निकट कुटिल, अत्यंत टेढ़ी; "अइकुडिली भउहा (क० ४, ४, २)। वलि"-अतिकुटिल भौंहों की आवलि, अइरिगरुत्त - वि० (सं० अति + (क० १, १६, १२) । निश्चित)-पूर्ण रूप से, अत्यन्त निश्चित, मइकुर- वि० (सं० अतिकर)-अत्यन्त (क० ५, १४, ५; दे० ना० मा० ४, निर्दयी; (जस० १, ८, ६)। ३०)। अइगयं-वि० (दे०)-१. जिसने प्रवेश अइतुरिय- वि० (सं० अतित्वरित > किया हो वह; (दे० ना० मा० १,५७) । प्रा० अइ+ तुरिअ)- अतिशीघ्रगामी; २. न०-मार्ग का पिछला भाग (दे०. (ण० ५, ५, १२)। अइतुरिअ; (क० ना० मा० १, ५७) । ५, १०, २)। अइचल-वि० (सं० अति+चञ्चल) अइतोस- पुं० (सं० अति+तोप > अति अस्थिर या चंचल; (प्रा० पं० २, प्रा० अइ+ तोप)-अति संतोष, अति , अइत्यि (७) अइरतए प्रसन्नता; (क० ५, १३, ६)। प्रा० अइ+भिड)- बहुत लड़ना; (क० अइत्यि पु० (सं० अगस्ति>प्रा० ८, १८, ६)। अगत्थिय, अगत्थि;-अगस्त्य नामक एक प्रइभिण्ण-वि० (सं० अति भिन्न > तारा; (सं० रा०)। प्रा० भइ+भिण्ण)-अत्यंत भिन्न, (क० प्रइविहि-स्त्री० (सं० अति+धृति > ६,१०, ५)। प्रा० अइ+दिहि)-अति धीरज; (क०, अइमरणहर-वि० (सं० अति+मनोहर> ४, ७, २)। प्रा० अइ मणोहर, मणहर)- बहुत अइनीह- वि० (सं० अतिदीर्घ>प्रा० सुन्दर; (क० ३, ३, ३) । अइ+दीह)- बहुत लम्बा; (जस० ४, अइमत्तउ-वि० (सं० अतिमत्त> प्रा० १०, ११)। अइमत्त)-बहुत मतवाला; (जंवू ३-१२) । अइदुम्मण-वि० (सं० अति+दुर्मनस्> बइमत्तहं- वि० अत्यंत मतवाले (ह. प्रा० अइ+दुम्मण)- अति उदास, अति ४३८, २)। उद्विग्न-चित्त; (क० ५, २, ६; जस०) । अइहुर- वि० (सं० अति+मधुर> अइपउरु- वि० (सं० अति+प्रचुर> प्रा० अइ+महर)-अति मीठा, "अइमहु- प्रा० अइ+पउर)-बहुत अधिक, "अइ- क्यणेण"-अति मधुर वचन द्वारा, (क. पउरु पवड्डिउ णेहु तासु"; (क० २, ६, ५, ११, ८)। १) । अझ्युत्तउ-वि० (सं० अति मुक्तक:)- प्रापयंड)- वि० (सं० अति+प्रचण्ड अतिमुक्तक का फूल,"वियसियकुसुम जाउ प्रा० अइ+पयंड)-बहुत प्रखर; (क० २, अइमुत्तउ"; (जंबू० ३, १२, १२) । ८, २)। समुत्तय- पुं० (सं० अतिमुक्तक)- प्रइपसत्यु- वि० (सं० अतिप्रशस्त > अतिमुक्तक नाम की इमशान की भूमि; प्रा० अइ+पसत्य)- अति प्रशंसनीय; (व० ६, २१, १६)। (ण० ३, ४, ७)। अइयार- पु (सं० नतिचार>प्र० अइंपिय-वि० (सं० अतिप्रिय >प्रा० अइयार)- उल्लंघन, अतिक्रमण; (ण. अइ+पिअ)-बहुत प्रिय; (क० ४, १२, ६, २०, ६)। अर-अव्य० (सं० अचिर)- जल्दी, अइमत्ती-स्त्री० (सं० अति+भक्ति > शीघ्र; (व० १, २, ११) । प्रा० अइ+भत्ति)- अति भक्ति, अति मइसाइ.-वि० (सं० अतिशायिन् >प्रा. आदर; (क० ५, ७, ४)। अइसाइ) दूसरे को मात करने वाला; अमल्ल- वि० (सं० अतिभद्र>प्रा० (जंबू० १०, १,६)। अइ+भल्ल)-बहुत भला; (ण० ५, १२, अइरजुबइ- स्त्री० (दे०)- दुलहिन; (दे० ना० मा० १,४८)। मइमिडति-क्रि० (सं० बति+भटति > अइरतए- वि० (सं० अतिरत्त>प्रा० अइरमण (८) अइसणिद्ध - " दर से - अइरत्त)-अतिअनुरक्त; )हे. ४३८/२)। अवइविउल--वि० (सं० अति+-विपुल > प्रइरमरण-वि० (सं० अति+रमणीय > प्रा० अइ + विउल)- अति विशाल, प्रा० अइ+रमणीअ)- अति मनोरम, (जस०)। अतिरम्य, “अइरमणभूमि देक्खंतररण" अइविरिय- वि० (सं०. अतिवीर्य)- रमणीक भूमि देखते हुए; (क० ५, ५, १. महा-पराक्रमी, २. पु० इक्ष्वाकु वंश ४)। का एक राजा; (प० ५० ५, ५) । अइरवण्ण-वि० (सं० अतिरम्य>प्रा. ३. नन्दावर्त का एक राजा; (प० च० अइ+रम्म, रवण्ण, रवन्न)-बहुत सुन्दर; ३७, ३)। (ण० १, ७, ८)। अइविहाइ- क्रि० (सं० अति+विभाति अइरहसें- क्रि० वि० शीघ्रता में प्रा० अइ-+शो० प्रा० विहादि, विहा= (rashly, in haste) (HETO), शोभना, चमकना)- दिखायी देना, अइरावत-पु० (सं० ऐरावत > प्रा० "दूराउ वहंती अइविहाइ" अइरावय)-इन्द्र का हाथी; (क० ३,१६, बहती हुई ऐसी दिखाई दी; (क० ३, ४) । भइरावय- पुं०, इन्द्र का हाथी; १२, ६)। (भ०)। भइसंसप्र- पुं० (सं० अंति+संशय > प्रइराहा- स्त्री० (सं० अचिराभा)- प्रा० अइ+संसय)-अति संदेह; (क० ५, बिजली, चपला; (दे० ना० मा० १, ३४ १८, ५)। टि०)। अइस-वि० (सं० ईदृश)- ऐसा, इस प्रहरिप-पु० (दे०)-बातचीत, कहानी; तरह का; (की० २, ५२)। अइसी (दे० ना० मा० १, २६) । (रा० ५), अइसउ (रा०३२)।-नओ, अइरि पु० (सं० आचार्य >प्रा० ऐसा भी (की० २, १५०)। अइसो आचारिअ, आयरिय)-पाशुपत आचार्य; (रा० २७; हे० ४, ४०३) । (दो० को०) 1 टि०-यहाँ अर्थ-संकोच द्रष्टव्य है। अइसअ-वि० (सं० अतिशयिन् >प्रा० वि० अतिरुद्र > प्रा० रोद्द, अइसइ)-अतिशय वाला, विशिष्ट, "तहों रुद्द)-विपुल, विशाल; तुल० म० रुंद= णंदणु अइसयगुणमहंतु" विस्तृत; (ण० १, १, ७) । पुत्र अतिशय गुणशाली, (क० ६, १,६) । प्राइवहल-वि० (सं० अति+बहल > पुं० (सं० अतिशय > प्रा०. अइसय) प्रा० अइवहल)- अत्यधिक, तेज, "ता १. श्रेष्ठता, २. प्रमुखता (भ०) । मिलिय णहंगणे अइवहल. चउदिसिहि अइसच्छयइ- वि० (सं० अतिशय+ भमेविणु णिम्मलिय"--वह दीप्ति इतनी छायावत् >प्रा० अइंसय+छायांइत्तय)- निर्मल और तेज थी कि चारों दिशाओं अतिशय छायायुक्त; (सं० रा०)। घूमकर आकाश में जा मिली; (क०. अइसरिणख-वि० (सं० अति+स्निग्ध > ४, ८, ८)। प्रा० अइ+सिणिद्ध, सणिद्ध)-अति स्नेह- -उस राजा का. . - अइसमइणा ( 8 ) अकज्ज युक्त; (क० १०, १३, १०)। ४,३)। अइसमहणा-वि० (सं० अतिशय+मन अउपरण-वि० (सं० अपुण्य >प्रा० अ+ स्विन्)-अतिशय बुद्धि वाले; (महा ६६, पुण्य, पुण)-पुण्य रहित; (प० च० २८, १६, ६)। २११) । अइसय-क्रि० (सं० अति+शी)- मात अउर-वि० (सं० अपर)-अन्य, दूसरा; करना, (प० च० ६०, १५) । अउरु; (रा० २८) । अइसयवंत-वि० (सं० अतिशयवत्)- अउन--वि० (सं० अपूर्व >प्रा० अपुब्ब, अतिशयों से युक्त, अतिशयवाला; (ण. अउव)-अनौखा, असाधारण, अद्वितीय; ६, १३, ६)। अइसयवन्त-अतिशयवत् (ण० १, १५, १० जस०; भ०; सं० (म०; जस०)। रा०)। अइसुंदर-वि० (सं० अति+सुन्दर > मकर-वि० (सं० अपूर्ण > प्रा० अपु- प्रा० अइ + सुदर)- बहुत सुंदर; ण)- जो पूरा या भरा न हो, अधूरा; (जस०)। (भ०)। अइसुहुम-वि० (सं०अति+सूक्ष्म>प्रा० अओका- वि०, इसका; (की० २, अइ+सुहुम)-अत्यन्त छोटा, बारीक; १६३)। (क० १०, १०, ७)। अकंट- वि० (सं० अ+कण्टक)- अइसेनो- . वि० (सं० अतिश्रेयस्)- निष्कंटक, निर्विघ्न; (प्रा० पै० २,२११)। अपेक्षाकृत . अधिक अच्छा; (की० २, अकर-वि० (सं० अकाण्ड)-आकस्मिक; २१३) । "तिं सो अकंडमच्चुगलए, बद्धउ चामी. अइहव-- पुं० (दे०)- वाद्य-विशेष; यरसंखलए,- उसने उस शीघ्र अकाण्ड (भ०)। मृत्यु से मरने वाले कुत्ते को गले में सोने अइहार-- . स्त्री० (सं० अति+हार)- की सांकल बांध कर रखा (जस० २, अत्यंत हार या पराजय "अइहारियं ३२, ५)। मयणराएण"-मदनराज की अत्यंत हार अकंडतलिम- वि० (दे०)- १. स्नेह- हो गई; (प० २, ७५, १०) । रहित, २. जिसने शादी न की हो वह; अइहारा-स्त्री० (दे०)-विद्युत, चपला; (दे० ना० मा० १, ६०)। (दे० ना० मा० १, ३४) । अक्ल-पु० (सं० अक्ष>प्रा० अक्ख)- अउखध न० (सं० औषध > प्रा० अक्षजीव, द्वीन्द्रियभेद; (व०.१०,८,१) । मोसह)- दवाई, भैषज; तुल० गु० अरखर पुं० न० (सं० अक्षर>प्रा. ओखद; (प्रा० गु० ४०, ४)। अक्खर) अक्षर, वर्ण; (प्रा० पैं० १, अउज्भ-पुं० (सं० अयोध्या)- नगर- १२)। विशेष; (प० चं० २१,१,२)। -(अउ अकज्ज वि० (सं० अकृत्य>प्रा० ज्झ) अयोध्या नगर; (प० च० २१, अकज्ज)- अकार्य, करने को अयोग्य%3; - - - - - अकत्तिए (१०) अक्खजूभ - अकपत्य- - (भ०; जस० १, 5, ६) सूर्य; "चंदअवकसुक्कभाहरणएहि" अकत्तिए- पु० (सं० अ+कात्तिक:) (ण० १, १६, ५)। कातिक न होने पर; (जंबू० ४,८,१२) । अक्कमइ-सक० (सं० आक्रमति, आ- अकम्म-न० (सं० अ-कर्मन्)-कम का क्रम् प्रा० अक्कम)- आक्रमण करना अभाव; (जंवू ६, १५, ४) । (रि० सातवाँ सर्ग)। वि० (सं० अ-+कृतार्य)- (अ)क्फरिस- पुं० (सं० उत्कर्ष >प्रा. जो आपना कार्य हो जाने के कारण उक्कस्स)-उत्कृष्टता; (सं० रा०)। प्रसन्न और संतुष्ट न हो; (सं० रा०)। अक्कसाला- स्त्री० (दे०)-१. बला- अकयवंर- वि० (सं० अविकृताङ ग)- त्कार, जवरदस्ती करना, २. उन्मत सी जिसके अंग विकृत न हो; (जंबू० ७, १, स्त्री०; (दे० ना० मा० १, ५८) । १३)। अक्कुठ वि० (दे०)- अधिष्ठित, अफिट्टिय-वि० (सं० अकृत्रिम)-स्वा- स्थापित; (दे० ना० मा० १, ११)। भाविक; (जस० ४, २८, ३०)। प्रक्कोड- पु० (दे०)-वकरा; (दे० पकित्ति- स्त्री० (सं० अकीति)-अप ना० मा० १, १२)। यश; (सि० १, ४)। अक्ख'-(सं० आ+ख्या>प्रा० अरखा, अकित्तिम- वि० (सं० अकृत्रिम)-जो अक्ख)- कहना, बोलना; (ण० ३, ८, कृत्रिम या बनावटी न हो, स्वाभाविक; ७) । अक्खंदह- ७) । क्खंदहं- क्रि०, वोलना (रा० (व० ४, १३, ६)। १५)।- इ-सक० (सं० आख्याति) अफुलोरण- वि० (सं० अकुलीन) प० च० १, १४, ७) । अक्खा- जो कुलीन न हो, अप्रतिष्ठित, जो उत्तम सक० (जस० २, २५, १०) । अक्खिउ- कुल में उत्पन्न न हो; (रि०, सातवाँ भू० का० (प० च० १४, १२, १) । सर्ग)। अक्खियउ~-भू० का० (सि० २, २१) । प्रकुसल-वि० (सं० अकुशल)-अनिपुण; -मि० (क० ५, १६, ८)। -हि, (जंबू० ११, ६, ३)। अकूवार- पुं० (सं० अकृत-+वारि)- (परम० २, १; क० ४, १२, ५) । समुद्र; (व० ८, १०, ४)। - खेवि--पू० का० कि० (क०३, २०, अकोह-पु० (सं० अकोध)- क्रोध न ६)। --णह, वि.० वर्णन करना (है. करना; (व० ८, १०, १०)। ३५०, १)। -हु, क्रि० बताइये (सि० अवकंद- पुं० (सं० आक्रम > प्रा० १, ४७, १५) । तुल० गु० भाखवू, पं० अक्कम)-आक्रमण, घड़ाई; (सण.)। अक्ख'-पु(सं० अक्ष>प्रा०अक्ख)- अक्क'-स्त्री० (सं० अक्का -माता)- भगिनी, अम्बा, तुल० म० १. अक्ष, रावण का पुन, २. यक्ष-बहेड़ा (बहन), (क० ८, ५, ५; ३० ना० मा० वृक्ष; (जंवू ५, ८, ३४)। अक्सबूम-पु. (सं० अक्षत)-जुआ, अक्क'-पु.० (सं० अर्क>प्रा० अक्क)- चौसर का खेल; (ण० ३, १३, ६)। (भ०; - । . . आख । अक्का अक्सणवेल ( ११ ) अक्खोहिणी अक्खाण- प्रक्षणवेल-न० (दे०)- १. मैथुन, शन्द हुमा हो वह प्रतिध्वनित; (देना०- संभोग, २. संध्याकाल; (दे० ना० मा० मा० १, २७)। १, ५६)। अक्खवाय-पु. (सं० अक्षपाद)-न्याय- अखदाण-पुं० (सं० अक्षयदान>प्रा० दर्शन के प्रणेता गौतम; (ण० ६, ७, ३)। अक्खय+दाण)-अभयदान, "अक्खदाणु अक्खसुत्त-पुं० (सं० अक्षसूत्र)-रुद्राक्ष अक्खयहं रइज्जई", पीड़ितों को अभयदान माला के दाने; (प० च० ६/१/३)। दिया गया, (म० २, ७८, १३) । अक्खाडय-पु० (सं० अक्षवाटक >प्रा० अक्षय- वि० (सं० अक्षय > प्रा० अक्खाउग, अक्खाडय)- व्यायाम-स्थल, अखय)- क्षय रहित, अविनाशी (प०. च० २/१७/८)-णिहि-स्त्री० (सं० ४/१२/२) । अखाड़ा । तुल० गु० अखाडो । (प० च० अक्षय निधि)-क्षय रहित निधि; (जंबू० न० (सं० आख्यान >प्रा० ३, १४, १६)। -तइय, स्त्री० (सं० अक्खाण)-कथानक; (भ०)।-य, न० अक्षय तृतीया>प्रा० अक्खय+तइया) (सं० आख्यानक > प्रा० अक्खाणय)- वैशाख शुक्ल तृतीया (जंबू ४, १४, २१)। कहानी, वार्ता (भ०; १० च० १, १४, अक्खय'- पु० (सं० अक्षत > प्रा० ७)। अक्खय)-विना टूटे चावल, अखण्ड चावल अविख- स्त्री० (सं० अक्षि > प्रा. "क वि अक्खयघूव भरेवि थालु"--कोई अक्सि)-नेन, आंख; तुल० मगही आंखि; अक्षत व ध्रुप से थाल भरकर, (क० ६, (सं० रा०)। २, ६; भ०)। अक्सिम-वि० (सं० आख्यात >प्रा० अपसर- पुं० न० (सं० अक्षर अखिञ)-प्रतिपादित, कथित; (क० १, > प्रा० अक्खर)- अक्षर (भ०) । ८,७) । अक्खिय (म० १, १७, १०) ! अक्खरु-१. अक्षर (ओऽम); "सुरसुक्खरु अक्खुडिअ-वि० (सं० बखण्डित >प्रा० अवखरु झाइयउ", देवों को सुखकारी अक्खुडिअ)-संपूर्ण अखण्ड, त्रु टि-रहित; अक्षर (ओ.म) का ध्यान किया । (प. गु० अबूट; (संधि० ११, ६, ११)। ६, २, ८)। २. अक्षर, वर्ण; तुल० अवखुहिय-वि० (सं० अक्षुभित>प्रा० राज०. आखर (क० १, ७, ७; की०, अन्खुहिय)- क्षोभ-रहित (जंबू ४,२१, १,१६; भ० सं० रा०; जस० १, २४, १५)। ३)।-डंबर- (सं० अक्षराडम्बर) प्रक्खोह-वि० (सं० नक्षोन्य)-क्षोभ- शब्दों का आडम्बर; (रि०, प्रथम सर्ग)। रहित, स्थिर; "अक्खोह रणभर"- अपसरवास-पुं० (सं० अक्षरव्यास) अक्षोभ्य युद्ध (रि०, प्रथम सर्ग)। अक्षरविस्तार; (प० च० १, २, २) । असोहणि-स्त्री० (सं० अलौहिणी> अस्खलिउ-वि० (सं० अत्खलित)-जो प्रा० अक्खोहिणी)-एक बड़ी सेना जिसमें गिरा न हो; अपततितु> (विला०)। २१८७० हाधी, २१८७० रथ, ६५६१० अवखलिय-वि० (दे०)-जिसका प्रति- घोड़े और १०९३५० पैदल होते हैं, . - अक्खोहणियां ( १२ ) अगहार (प०च०२, ५, ६) । अखोहणी (प० च. ३, ८, ६)। १२, ८, १)। अडिगेह- वि० (दे०)-यौवनोन्मत्त; अक्खोहणिया- वि० (सं० अक्षोभ (दे० ना० मा०, १, ४०) । णिका)- जो क्षुब्ध न हो; (ण० ६, ६, अगज्जर-न० (सं० म+गजि)- गर्जना १२) । न होना, गर्जन रहित; "अंगज्जिरं निरं- प्रलंडिम- वि० (सं० अखण्डित)- जो तरं न विज्जुपुजयं", (जंबू० २, ३, ३)। टूटा हुआ न हो; (जस० ४, २७, २८)। अगड-पुं० (सं० अवट, प्रा० अगड)- अखस वि० (सं० अक्षय > प्रा० कूप; तुल० गु० कूवो; (संधि० १२, ३, अक्खय)-जिसका कभी क्षय-नाश न हो; १६)। म० १, ३१, ६) । अखइ, वि० अक्षय अगणिय-वि० (सं० अगणित>प्रा० (पाहु० १६६) । अगिणय)-न गिना हुआ; जंबू० ५, ७, अखत-न० (सं० अक्षाब>प्रा० अखत्त २६)। क्षत्रिय विधि को अतिक्रमण करने का अगरणेय-वि० (सं० अगणित)-अनगि- कार्य, क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध; (प० च० नत; (को० १, ८५)। १५/३/३)। अगत्थि- पुं० (सं० अगस्ति >प्रा० अखन्ति-स्त्री० (सं० अक्षान्ति)-अस- अगत्थि)- १. इस नाम का एक ऋषि, हिष्णुता, स्पर्धा, ईर्ष्या; (प० च० ६/३/ २. वृक्ष-विशेष; (दे० ना० मा० ६, २) । १३३) । अखलिय-वि० सं० अस्खलित>प्रा० अगम-वि० (सं० अगम्य)- जहाँ कोई अक्खलिय, अखलिम)-१. अवाधित, २. न पहुंच सके; (प्रा० ५० १, १८६) । अपतित; (संधि० ६, ६, १)। अगय-पु० (दे०)- दानव (दे० ना०. अखिल- वि० (सं० प्रा० अखिल) मा० १, ६)। सर्व; (जंवू० १०, १, १०)। अगर-पुं० (सं० प्रा० अगरु)- अगरु- अखुहिय- वि० (सं० अक्षुभित)-क्षोभ. चंदन; (व० ४, २२, १२) । रहित, (जंबू ४, २१, १६) । अगलिय- वि० (सं० अगलित, गल् अखोहु वि० (सं० अक्षोभ)-क्षोभ -गिर पड़ना)-पृथक् न किया हुआ, न रहित; (सि० १, ७)। गिराया हुआ; (जंवू० ६, ३, १०) । अखउरि-वि०, अखौरी, जिसमें कोई अगठव-वि० (सं० मगर्व >प्रा० खोर या दोप न हो; (की० ३, ११६)। व्व)-गर्व या अभिमान से रहित, निर- अखरि- स्त्री० एक नामांत पदवी; भिमान; (जस० ४, २४, १६) । (की० ३, ११६)। अगहार---पु. (सं० अग्रहार)-राजा की अस्याणिहाण न० (सं० अक्षय + ओर से ब्राह्मण को योगक्षेम के लिए निधान)-अक्षय धन या खजाना; (जंबू० किया हुआ भूमि का दान; (जम० सकल, अग- - अगहिय ( १३ ) अग्गिम - . २ २६, १५)। आगे कुछ भी नहीं है, (म० १, ७, ५) । अगहिय-वि० (सं० अ+गृहीत >प्रा० २. अगला, अधिक (प्रा० पैं० १, अ+गहिअ)-१. अप्राप्त, २. जो न लिया ५१)। हो, जो पकड़ा हुआ न हो; (ण० ३, १४, अग्गलि-अव्य० (सं० अग्रे)-समीप में; ४)। तुल० गु० आगळ ; (संधि० १२, ४, २)। अगा-वि० (सं० अगम्य >प्रा० अग अग्गलु- वि० (दे०)-प्रा० अग्गल)- म्य)- जाने को अयोग्य; (प० च० २, अधिक; (हे० ३४१, २) । ३, १२) । अ गवेअ- पुं० (दे०)-नदी की बाढ़, अगाव-वि० (सं० अगर्व >प्रा० अग नदी की तेज धारा; (दे० ना० मा० १, व्व)- निरभिमान; (जस० ४, २०, २६)। १७)। अग्गहरण न० (सं० अग्रहण> प्रा० प्रगाह- वि० (सं० अगाध)- गहरा, अगहण)- अनादर, अवज्ञा; (दे० ना०. गंभीर; (जंवू १०, १७, ८) । मा० १, १७)। अगिवान-पु. (सं० अग्निबाण>प्रा० अग्रहारु-पु. (सं० अग्रहार)- अग्रहार अग्गिवाण)-अग्निबाण; (सि० २, १३) । नामक ग्राम; (जंवू० २, ४, ८)। अगुरग- वि० (सं ० अ+गुण>प्रा० अग्नि-पु स्त्री० (सं० अग्नि > प्रा० अउण)-गुण रहित, निर्गुण; (जंबू० ४, १, १)। अग्गि)- आग, वह्निः तुल० गु० आग; अगुरु- पुं० न० (सं० प्रा० अगुरु)- (संधि० १३, ८, १; भ०; की० ३, १५) सुगंधित द्रव्य (प्रा० पै० २, १७७) । जस० ३, ३, ६) । अग्गिं (हे० ३४३, अग्ग न० (सं० अग्र-प्रा० अग्ग) १)।-ट्ठउ--वि० (सं० अग्निष्ठ> १. आगे का भाग, ऊपर का भाग, पूर्व प्रा०अग्गिट्ठ) आग में स्थित; (हे०४२६, भाग; भ० ण० १,७,५; जस० १,६,७)। १)। -मित्त पु० (सं० अग्निमित्र)- वि० अगला (प्रा० ५० १, १३३) । नाम-विशेष; (भ०)। अग्गी-स्त्री०- -अ, अव्य० (सं० अग्रतः)-आगे (जंबू० अग्नि (प्रा० ५० १, ५५) । १०, १६, १२) । -इ, अव्य० आगे अग्गि-पु० (दे०)- १. एक प्रकार (क० १, १४, ४)।-इं, अव्य० (सि० क्षुद्र कीट, २. वि०, मन्द;(दे० ना० मा० १, ६; २, १४)।-ए, पु०, आगे का ५१, ३) अग्निज्वाला अग्गिजाला-स्त्री० (सं० भाग (प० च० २, ६, ६) ।-रा, वि० अगले (प्रा० पै० २, १६, ६)। >प्रा० अग्गि + जाला)- अग्नि की अग्गपखंध-पु० (दे०)-रण-भूमि का शिखा; (जस० ३, ३, ६)। आगे का भाग (दे० ना० मा० १, २७)। अग्गिम-वि० (सं० अग्निम)- १. प्रथम अगल-अव्य० (सं० अग्र>प्रा० अग्ग)- (क्रम श्रेणि आदि में); प्रमुख, मुख्य, १. आगे, "महु अग्गलउ ण कोई" मेरे २. बड़ा, ज्येष्ठ (प० च० १३/१२/ - अग्गिले (१४) मचलु ४) । ३. अगला, आगे का (की० ३, अन्यत्रत्त)-पूजा का पान; (ण० ६, १, २) !~य (प० च० ३४, १३, ३) । ६; जस० ४, १७, १८)। तुल० गु० अगमा। अग्याइय- वि० १. (सं० आध्रात > अग्गिले(') प० (सं० अग्रिले)-पहले। प्रा० अग्धाइय)- सूघा हुआ (भ०)। अग्गिवंतु--वि० (सं० अग्नि, मतुप्)- २. (६०)-विराजित- २. (दे०)-विराजित-देदीप्यमान, प्रद- अग्नि-युक्त; (जं० २, १, ६) । णित; "पगुणगुणहि अग्वाइउ", (भ० १५, अग्गीहर-पु० (सं० अग्नि गृह>प्रा० १२, ३) अग्गिहर)-अग्निगृह; (सं० रा०)। अचाण वि० (दे०)-तृप्त, संतुष्ट । अर्ग- क्रि० वि० (सं० वग्र>प्रा० तुल०राज० अघाणो, म० अवाणा । (दे०- अग्ग)--आगे, "जो भुवमंडल-मंडल अग्नें" ना० मा० १, १८)। -भूमण्डल के मण्डल में जो सबसे आगे अघडिम- वि० (सं० अघटित) जो है, (मि० १,४,१) घटित न हुआ हो; (जं० ८, ६, ६)। अग्गेय- वि० (मं. आग्नेय > प्रा० अङ्गय-पुं० (सं० अङ्गद)-पुरुष-विशेष; अग्गेय)-१. नाग से संबंध रखने वाला, (प० ५० ४०, १६, ६) । प्रचंड, २. अग्नि को अर्पित; (प० च० मङ्गार- पुं० (सं० अङ्गार > प्रा० ७/७/६)। संगार)-अंगारा, दहकता हुआ कोयला अग्गेसर वि० (सं० अग्रेसर>प्रा० या काप्ठखंड; (प० १० १३/७/१०)। अग्गेसर)-अगुआ; (जंतु १०, ५, १०) । अङ्गलिउ-स्त्री० (सं० अंगुलि >प्रा० अग्धंजलि-स्त्री० (सं० अर्धाञ्जलि)- अंगुलि)-उंगली; (हे० ३३१, १) । अर्धाजलि, "सुरसमरसएहिं अणिट्टियर, अचप्पिल- वि० (सं० आक्रम का अग्धंजलि करिवि समुट्टियउ'-जो असुर घात्वादेश चप्पयाक्रमण करना)-जना- देवों के साथ सैकड़ों संग्राम करके भी क्रान्त; (जंवू ५, ३, २)। मरा नहीं था वह नागकुमार के सम्मुख अर्धाजलि करके उठ खड़ा हवा; (ण० अचयंतु-व० कृ० (सं० अ + त्य। ५, १२, १३) शत)-त्याग करके; (जंदू० ६, ६, ४) । अ.घ--वि० (सं० अर्य>प्रा० नग्ध)- अचल-न० (दे०)-१. घर, २. घर का पूजा में दिया जाने वाला जलादि द्रव्य; पिछला भाग, ३. वि०, कहा हुआ, ४. (प्रा० पै० २, २०१)। निष्ठुर, ५. नीरस्; (दे० ना० मा० १, अन्यइ~ सक० मिलना, "संपइ कढउँ ५३) । वेस 'जिव दुगु अग्इ दवसात",-'यदि अचलु-वि० (सं० प्रा० अचल चल)- १. व्यवसाय मिले तो संपत्ति को, वेश्या के अटल, स्थिर, निश्चल; (प० च० १२/ समान निकाल लूगा, (हे० ३८५, १)। ८/४)-जस० २, २१, १)। २. पहाड़ी अग्यवत्त- न० (सं० बऱ्यापात्र>प्रा० राजा; (प्रा० ५० १, ८७) । - F अचलत्तण (१५) अच्छ अवलत्तण-० (सं०' अवलत्व)-निर अच्चरिउ- न० (सं० आश्चर्य>प्रा० चलता, स्थिरता, (जस० ३, ३८, ६)। अच्चर, अच्चरिअ, अच्चरीअ)-आश्चर्य, अचित- वि० (सं० अचिन्त्य >प्रा० विस्मय; (व० २, २, ६)। अच्चरिय; अचित)-जो सोचा भी न जा सके, समझ (भ०; सं० रा०) । से परे; (भ०) । अचिन्त- वि०-जो अच्चहिय-वि० (सं० प्रत्याहित)-बड़ा- सोचा न जा सके; (प० च० १६, १, भय, २. असत्य ३. अत्यधिक; (सं०. रा०)। अधितिय-वि० (सं० अचिन्तित>प्रा० अच्चुन्नड- वि० (सं० अत्युद्भट)- अचितिय)- सहसा, आकस्मिक; (सं० अति प्रवल (भ०)। रा०)। अच्चुयनाह-० (सं० अच्युत नाय अचेयरण- वि० (सं० अवेतन>प्रा० >प्रा० अच्चुअ+णाह)- बारहवें देव. अचेयण)-चैतन्य-रहित, निर्जीव; (जस० लोक का इन्द्र; (भ०)। २, १६, ७)। अच्चुयसग-पुं० (सं० अच्युत+स्वर्ग प्रच्चंत- वि० (सं० अत्यंत > प्रा० >प्रा० अच्चुअ+सग्ग)- वारहवाँ देव- अच्चंत)- अत्यधिक, अत्यन्त (ण० ४, लोक; (भ०) । ५, ८; विला; जस०; प० च० १२, अच्चुद-पु० (सं० अच्युत)- वारहवा ६, ३) । अच्चन्तन्त -वि०-अत्यन्त-रक्त देवलोक, अच्युत स्वर्ग; (व० १०, २०, (प० च० २६, १८, ८)। १३)। /मच्च-(सं० अचं > प्रा० अच्च)- अचोक्खन- वि० अमाजित, अशुचि, पूजना, सरकार करना; (जस० २, ७, अमृष्ट; (जस० ३, ३६, १७) । १३)। -मि, सक०, पूजा करता हूँ प्रच्छ'-क्रि० (सं० आस् >प्रा० अच्छ, (ण० ७, ६,१)। अच्छइ)-बैठना; (ण० १,८,१०)।-इ, अच्चग्गल-वि० (सं० अति+अग्रल)- अक० बैठना; "जा अच्छइ सुहेण जामा- वहुत आगे; (जंवू० ८, १०, १६) । यउ, ता तहिं एकु पुरिनु संपायउ", प्रच्चण न० (सं० अर्चन > प्रा० दामाद वही सुखपूर्वक बैठा हुला था कि अच्चण-पूजा, सम्मान; जस० १,१६, एक आदमी वहां आया, (सि० २, ६, १२; (भ०; ण. १, ६, ५)। अच्च- १३; (क० १, ६, १)। अच्छंतहिं णिय-अर्चना (क० ३२, ८, २) । (जंवू० ३, १, ६)। अच्छिज्जइ-कि० अच्चन्भुअ- वि० (सं० अत्यद्भुत> व०-का० बैठना, 'नीड निवसिएहि प्रा० अच्चन्भुय)- बड़ा आश्चर्यजनक; · अच्छिज्जई"; (जंवू० ६, १०,४) । तुल० गु० अचंभो, अचंबो; (प० अच्छ'-अक० (सं० बस्)- होना, है २४, २, ६) । अच्चम्भुय (प्रा० गु० १२, (सं० रा०)-इ (ति: १,११, भ०रा० २, १३)। ३६)।-उ (रा० ६)। अच्छिउ- . च० अच्छं ( १६ ) अच्छे र - . रहेना "पर अच्छिंउ पडिमहें रक्ख अच्छरिअ-न० (सं० आश्चर्य > प्रा. वालु" --पर मैं तो इस प्रतिमा का रक्ष अच्छरिअ)- विस्मय, चमत्कार; (ण. पाल होकर रहा हूं। तुल० गु० छ । ६, ७, ४, सुदं० १२, ६, ७; प० च० (क० ४, १७, ५)। अच्छन्ते कृ०, रहते ३, ६, १) । अच्छरिय-न० आश्चर्य हुए (च०)। (भ०)। अच्छ-न० (दे०)-१. अत्यन्त, विशेष, अच्छरिय- स्त्री० (सं० अप्नरंस्, २. शीघ्र; (दे० ना० मा० १,४६)। अप्सरा> प्रा० अच्छरसा, अच्छरा)- वि० सं० प्रा० अच्छ) स्वच्छ, निर्मल; इन्द्र की सभा में नाचने वाली देवाङ - तुल० अवधी आछी (उत्तम), ब्रज आछे गना, जो गन्धर्षों की स्त्रियां कही जाती (भले, उत्तम); (प्रा० पैं० २, १३४) । हैं, (सि० २, ८, ८)। अच्छइर)- क्रि० (सं०. ऋच्छति = प्रच्छायण न० (सं० आच्छादन)- १. कड़ा या सख्त होना,२. जाना, ३. ढकना; (दे० ना मा० ७, ४५) । क्षमता का न रहना) तुल० पु० राज० अच्छि- स्त्री० (सं• अक्षि > प्रा० अछवउ, सामान्य वर्तमान, उत्तम पुरुष अच्छि)-आँख; (सं० रा०; भ०; जस० एक ३० छउँ, छु, मध्यम पु० एक व० १,५, ५)। -उड पु० (सं० ० अक्षि- अछइ; अन्य पु० एक व० अछइ, छइ; पुट)-आँख का परदा, आँख के कोए पर उत्तम पु० बहु० व० छे; मध्य पु० बहु० झिल्ली; (जस० २, ५, ११)। व० अछउ; अन्य पु० बहु० व० अछइ, अच्छिअ- वि० आसीन, बैठा हुआ; छइ, छि। अच्छति- अक०, ठहरना; (उ० व्य० (जस० ४, १७, २)। प्र० १५-२८)। अच्छिघरुल्ल, अच्छिहरुल्ल- वि० अच्छन्तउ-वि० (सं० अच्छन्द > प्रा० (दे०)- १. अप्रीतिकर, २. पुं०. वेष, अच्छंद)- निश्चेष्ट, पराधीन, "जिह पोषाक; (दे० ना० मा० १, ४१) । धुअगाउ रस-लम्पडु अच्छन्तउ",-जिस अच्छिन्न-वि० (सं० अच्छिन्न>प्रा० प्रकार रस लम्पट यह भ्रमर निश्चेष्ट है, अच्छिण्ण, अच्छिन्न)-नहीं तोड़ा हुआ; (५० च०,५,. १४, ०)। (जंवू० ६, ६, ६)। प्रच्छभल्ल पुं० (सं० ऋक्षभल्ल)- अच्छिवडणं-न० (सं० अक्षि+पतन)- भालुक (दे० ना० मा० १, ३७) । आँखों का मूदना; (दे० ना० मा० १/ अच्छर-स्त्री० (सं० अप्सरस् > प्रा० ३६)। अच्छरसा, अच्छरा)-अप्सरा; (म० . २, अच्छिविसच्छि, स्त्री० (दे०)-आपस ७८, ७; भ; जस० १, २५, १०; क. की खींचतान; (दे० ना० मा० १, ६, ३, १०).। अच्छरा-स्त्री० अप्सरा ४१)। (जस० ४, ३, १)।-हु, अप्सरा (ण अच्छेरम- वि० (सं० आश्चर्यक)- १, ६, ६)। विस्मय-जनक; (जंबू०.६, १०, १३) । - - ( १७ ) अजीमाणि . अच्छे रय (भ०)। विशेष का नाम; (ण० ६, १५, ८)। अच्छ-क्रि० (प्रा० अच्छ)- विद्यमान अजंगम-वि० (सं० अजङ्गम)-अचेतन; है; (को० ३, १२७) । अच्छिउ-स्त्री० (जं० २, १, ७)। स्थिति; (प० च० २६, ७, ७) । अजब-० (सं० प्रा० अजय)-पट्पद- अच्छोउण- न० (सं० आच्छोदन)- छंद का एक भेद; (प्रा० ५० १, १२१)। मृगया, शिकार; (दे० ना० मा० १, अजगर-पुं० (सं० प्रा० अजगर, प्रा० ३७)। अयगर)-मोटा सांप, (भ०) । अजयर- अच्छोडिउ-क्रि० भू० का० (सं० अव पुं०, (प० च० ६/७/३; जस० ४, १६, छोटितः)- छोड़ दिया, "जं अच्छोडिउ ६)। अंहिमुहूँ पाडिउ"; (जंबू० ७, १०, अजर-वि० (सं० प्रा० अजर)-वृद्धा- १८)। वस्था-रहित; (जस० १, १७, ३)। अच्छोडिय-वि० (दे०)-१. फटा हुआ; अजराजर- वि० (दे०)-उष्ण, गरम; (प० च० ४, ८, ६)। २. आस्फोटित; (दे० ना० मा० १, ४५) । (जस० २, ७, ४) । ३. आकृप्ट; (जस० अजरामर-सं० प्रा० अजरामर)-बुढ़ापा और ३, १०, ८)। मृत्यु से रहित; (जस० ३, १६, अछ- क्रि० (सं० आ+क्षि = रहना; ६) । अजरामरु; (पाहु ३३) । क्षि निवासे)- > प्रा० अच्छ, अच्छइ अजाति-स्त्री० नीच जाति; (को० २, (वैठना, रहना) है, "मेरहुँ जेल गरिटु १३) । अछ मन्ति विअक्खना भाए"-बड़े और अजिमचित्त-वि० (सं० अज़म्भचित्त) सम्मानित व्यक्ति मर्यादा में रहते हैं। सरल चित्त वाला; (णि० ३, ४, ६) । मंत्री नीतिकुशलल ही अच्छा लगता है; अजिण- न० (सं० अजिन > प्रा० (की० २, ४२)। अजिण । वाघ, सिंह या हाथी, हिरण पछए-अक० (प्रा० अच्छ)- है, "तसु आदि पशुओं विशेषकर काले हिरण की अछए मन्ति आनन्द खाण"-उसके पास रोएंदार खाल, जिसके आसन वनते हैं आनन्देश्वर न.म का मंत्री है; तुल० अथवा जो पहनने के काम में आती है; प्राचीन गु० अच्छ; (को० ३, १२६)। (प० च० १८, ६, ७)। अछण- पुं० (सं० आसन)- वैठने का अजिन्भ-वि० (सं० अजिह्व)-जिह वा- स्यान (रा. २२)। रहित; जंबू० २, २०, ५)। अधम्म वि० (सं० अछद्म)-कपट अजिय- पुं० (सं० अजित)- द्वितीय रहित; (जस० १, १५, १२) । तीर्थकर नाम; (जस० १, २, २) । वि० अधेय-वि० (सं० अच्छेय)- जो छेना · अपराजित; (व०३, ५, ५) । पुं० अजि- न जा सके; (प० च० १५/१०/६)। तनाथ तीर्थकर; (व० १, १, ३)। अशेय'- पु० (सं० अक्षय)-व्यक्ति अजीमाणि-वि० (सं० अजीर्णमारण) - - -- अजुअलवण्ण (१८) अज्जिय - अज्जव- बिना पचा हुआ; (संधि० ४, २, ६) । ६२) । अज्जण-(को० १, ४८) । अजुअलवण्ण-पु० (सं० अयुगलपर्ण)- अज्जमहि- स्त्री० (सं० आर्यमही)- सप्तच्छद, सप्तपर्ण वृक्ष; (दे० ना० आदरणीय महिला; (जस० ४,२०,१५)। मा० १, ४८) । अज्जय-पु० (दे०)- १. सुरस-नामक अजुत्त- वि० (सं० अयुक्त > प्रा० तृण, २. गुरेटक-नामक तृण; (दे० ना०- अजुत्त)-अयोग्य, अनुचित; (जस० ३, मा० १, ५४)। १८, ८) । अजुत्त - वि० अयुक्त (व० न० (सं० आर्जव > प्रा० ५, ३, ११)। अज्जव)-सरलता, निष्कपटता; (जस० अजेएँ- वि० (सं० अजय्य > प्रा० ४, १५, ७; क० ६, १३, ४)।-खंड- अजेअ)-जो जीता न जा सके; (व० २, पु. आर्जवखण्ड, देश-विशेप नाम; २, ३)। (भ०)। -भाव, पु० (सं० आर्जव- अजोग्ग- वि० (सं० अयोग्य >प्रा० भाव), सरलता का भाव (जंबू० ११, अजोग)-जो लायक न हो, अयोग्य; (ण० १४, ४)। अज्जा- स्त्री० (सं० आर्या > प्रा० ६, २१, ६) । अज्ज-अव्य ० (सं० अद्य > प्रा० अज्ज)- अजा)-गौरी, पार्वती; (भ०; दे० ना. मा० १, ५)। आज; (को० ३, १४; सं० रा०)। अज्जिअ- वि० (सं० अजित >प्रा० अज्जु-आज (क १, १४, ५) । वि० अज्जिअ)-उपाजित, पैदा किया हुआ; अव्य० (सं० अद्य+अपि>प्रा० अज्ज+ (जस० ४, २८, ६; भ०; क० २, ५, अवि)-१..अभी; "जहिँ णिविट्ठ तहिँ १०) । अज्जिय (जंवू० ३, ६, १८) । अज्जवि अच्छइ"; (भ०; सि० १, ४७, अज्जिवि-पू०का० क्रि० (सं० अर्जयित्व) ३); २. आज भी; (क० ११, १८, ३)। उपाजित कर;(क० २, १०, ६) । अज्जे- -कल्लि, अव्य० आजकल; (प्रा० गु० व्वअ-कृ० जितव्य (जस० ४, १५, २७, ३, ५) । अज्जु- (१) अव्य०, ६) । टि०-सं० तव्य >अप० इए वर्ड, आज; तुल० म० आज, गु० आजे; (शब्द के अंत में अ या उसका दीर्घ (भ०) । (२) वि०, आर्य (जस० ३, रूप), एवा। १६, १३)। --णिज्ज-वि० अर्जनीय; अज्जिउ-अध० (सं० अद्यखलु)-आज (जस० ४, ६, ४)। ही; (प्रा० गु० १६, ४७)। सक० (सं०/अर्ज )-अजित अज्जिय-स्त्री० (सं० आर्थिका>प्रा० करना; (प्रा० पैं० २, १०१) । अज्जिआ)-साध्वी, संन्यासिनी; "खुल्लय- अज्ज-वि० (सं० आर्य>प्रा० अज्ज)- अज्जिय-उत्तमसावहि, बहु-समाणु तिहु- उत्तम, श्रेष्ठ; (व० १०, १६, ४) । विणउ करावहि" क्षुल्लकों, आयिकाओं पु० (सं० अर्जन > प्रा० और श्रेष्ठ सावकों को सम्मान अज्जण)- . उपार्जन, कमाई - (की० ४, उनकी तीन प्रकार से विनय · करायें, . . अज्ज- अज्जन- दें, अज्जुन ( १६ ) अलैंग (भ०; सि० २, ३३, २) अज्जिा अज्भेल्ली-स्त्री० (दे०)-दोहने के उप- स्त्री० आयिका (जंबू० १०, २१, ५) । रान्त भी जिसका पुनःपुनः दोहन हो सके अज्जिया-स्त्री० आजी (जंदू० ३, १३, ऐसी गाय; (दे० ना० मा० १, ७) । १४; जस० ३, १३, २)। अज्जियाई अज्झोल्लिा-स्त्री० (दे०)- वक्षःस्थल स्त्री० जैन साध्वी; (सि० २, ३२) । के आभूषण में की जाने वाली मोतियों अज्जुन- पु० (सं० अर्जुन > प्रा० की रचना; (दे० ना० मा० १, ३३)। अज्जुण)-१. तीसरा पांडव; (को० ४, सञ्चल- पुं० (सं० अञ्चल>प्रा० २३६)। अज्जुण (को० ३, १४४)। अंचल)-साड़ी या चादर का सिरा या २. अर्जुन वृक्ष (जंबू० ५, ८, ३१) । किनारा, पल्ला; (को० ४, २१६) । अज्जेणप्र- अव्य० (सं० अद्यतन)- अञ्चिय- वि० (सं० अचिंत>प्रा. माधुनिक, आज का; (जंबू० ५, २, अच्चिन)-अर्चना किया गया; (क० २६, १०)। ५, १)। प्रज्जेवण-न० (सं० अ+जेमन >प्रा० अटलें- वि०-१. अट्टाल के समान मजिमण)-अनशन; (म० २, ६९, ६)। विशाल, २. अटल, स्थिर; (को० ४, अज्जो पुं० बुद्ध, बौद्ध या जन ४४) । भिक्षुक; (दे० ना० मा० १, ५)। टि. अट्ट- वि० (दे०)-१. कृश, दुर्वल; -'अज्जो' का मूल अर्थ स्वामी है। २. महान् ३. निर्लज्ज, ४. सुस्त, ५. पुं० यहां अर्थ-संकोच द्रष्टव्य है शुक, ६. शब्द, आवाज; ७. न० सुख, अज्स-पुं० (दे०)- यह (पुरुष); (दे० ८. असत्योक्ति; (दे० ना० ना० मा० १, ५०)। ५०) । ६. आतं, (जस० ३, २१, ६) । अम्झत्य- वि० (दे०)-आगत, आया -झाण पुं० (सं० आत-ध्यान)-ध्यान- हुआ; (दे० ना० मा० १, १०)। विशेप-इष्ट-संयोग > अनिष्ट-वियोग, प्रशसिय वि० (दे०)- देखा हुआ; रोग-निवृत्ति और भविष्य के लिए (दे० ना० मा० १, ३०)। चिंता न करना, (व० १०, १३, ५) । अझस्स, अज्झस्सिय- वि० (दे०) जिस अट्टहास-पु० (सं० अट्टहास)-ठहाका, पर आक्रोश किया गया हो वह; (दे०- खिलाखिला कर हंसना; विकट हास; ना० मा० १, १३) । (जस० १, १६, ६; भ०)। अज्मा- स्त्री० (दे०)- १. असती, अट्टरउछ- वि० (सं० आतं+रौद्र>प्रा० कुलटा, २. प्रशस्त स्त्री, ३. दुलहिन, अट्ट+रोद्द, रउद्द)-पीडित और भयंकर; ४. युवती स्त्री, ५. यह (स्त्री); (दे०- (क० ६, २३, २) । ना० मा० १,५०)। अलैंग- पुं० (सं० अप्ट+ -अङ्ग)- अज्झासा- स्त्री० (सं० अवि+आशा) १. आठ प्रकृति रूप अंग, "णिक्कलु कि -अभिलापा; (ण० ५, १०, ३) । अळंगई धारइ"-निप्कल अष्ट प्रकृति । मो० १, - ० ब (२०) रूप संगों को कैसे धारण करता है, (ण. न०, माठ, संधा-विशेष; (प्रा० ५० १, ६, ६, ८). २. बाठ शरीर के अंग; १००) । अट्ठारह- वि० (सं० अप्टा. (जस० ३, ७, १३)। दशन् >प्रा० अट्ठारह, अट्टाराह, महार) मळ-वि० (सं०अष्टन् >प्रा० बढ़) मठारह; (ण० ३, १, १) । माठ; तुल० म० आठ; (भ०, सं० रा०, बट्टासी-वि० (सं० अष्टाशीति >अर्ध- की०, ४, १२३) 1-ई (सि० २, ३४)। मागवी यासीइ)-अठासी (प्रा० पै०) । -गुणी, वि० सं० अप्टगुणी, अप्ठ- अदिव्बाउ-- पुं० (सं० अधिवात)- महाप्रातिहार्ययुक्तइत्यर्थः (जस० १, १५, मस्यियात नामक रोग 'तणु . मोहड़ १०)-त्तर-वि० (मं० अप्टोत्तर > फोडइ अट्टिवा' अस्थिवात उसके . प्रा० अछुत्तर) आठ से अधिक; (क०, शरीर को मोड़ने व फोड़न लगा; (जंबू. १०,२६, २०) ।--वि० (सं० अप्ठार्य) ३, ११, ४)। माठ का आधा; (व० १०, ६, १३) । अट्ठोत्तर-सर- वि० (सं० अष्टोत्तर --पयास-- वि० (सं० अष्टप्रकार) मात>प्रा० अछुत्तर सय)-एक सौ आठ; बाठ प्रकार की; (सि० १, ३५, ६) । (सि० २,६१, १२)। ---अट्टोत्तरमहास वि० माठवा; (ग० ८, ६, ८) । वि० (सं० अप्टोत्तरसहस्त्र)-एक सहन -मि >स्त्री० (सं० अष्टमी > प्रा० आठ; जस० ३, ५, २)। ममी) माष्टमी की तिथि, तिथि- विशेष, (सि० २, ३१, ३; जस० ३,३०, मटिक- स्त्री० (सं० अस्थि > प्रा० १५) ।-याल, वि० सं० मट्टि) हड्डी; तुल० म० अ०ली; (जस० दप्टचत्वा- १, १६, १३; भ० ण० ८, १५, रिंशत्) अठतालीस; (म०)।-बरिस- वि० सप्टवीय; (जंबू० ३, ४, ६)। ११)। -य-स्त्री० (सं० अस्थिक) -विह, वि० (सं०अप्टविय) आठ प्रकार हड्ड; (ण० ३, १४, ७) । का; (भ०; जस० ४, १६, ६) - मठ्यिपत्त-पु० (सं०अस्थिपात्र >प्रा० मकि, वि० (सं० अप्ट पप्ठि) बड़- अट्टियपत्त)-हड्डी का पात्र; (ण० ६, ६, स०; (० ६, ७, ६)। -सकि, वि० ११) । बड़सठ; (सि० १,१८, ४) । अदिव्यभूषण-पु० (सं० दस्यि-भूषण वि० (सं० सप्टशत>प्रा० महसय) एक >प्रा० अव्यि + भूमण) हड्डी का वना सौ आठ; (ण. ६, २४, ७)।-सहन, हुआ भाभूषण; (ण० ६, ७, ८) । वि० (सं० अप्ट सहन > प्रा० अट्ट। मठतालिस-वि० (सं० बप्टचत्वारिंशद सहस्स) एक हजार और माठ; (सि० >प्रा० अट्ठतालीस)- अठतालिस, तुल० २, १६) । बट्टाइसओ- वि० (सं० रा० अडतालीस; (प्रा० ५० १, ११७) । अष्टविशतिः>प्रा० अट्टाइस, बट्टाईस) अड'-० (सं० बवट)-कूप; (जस० बाईस; (की० २, २८४) । अट्टाई- ४, २७, २०)।-य, पुं०, कूप (सुदं० - । . -सय, ( २१ ) अणंताणंत ६, १६, ११) । अड्डवियड्ड-वि० (सं०अर्द+वितर्द)- अड' --वि० (सं० अष्टन् >प्रा० अट्ठ)- आड़े-टेढ़े; “अड्डविड्डहहुसंघडियउ", आड़े आठ; (प्रा० गु० ४०, १३) । टेढ़े हाड़ों से यह संघटित है; (जंबू० ११, अडइ-स्त्री० (सं० अटवी>प्रा० अडइ ६, २)। >अडई)-भयानक जंगल; (ण० ७, १, अड्डा- स्त्री० (दे०) बाधा। (रा० १०) । अडवि- स्त्री० (सं० अटवी) १५)। वन (क० ७, ३, ३)। -रुण्ण-पुं० अड्डाइय- वि० (सं० अर्कोनतृतीय)- (सं०अटवी+रोदन>प्रा० अड+रोअण) ढ़ाई, अढाई; ढ़ाई, अढाई; (भ०) । तुल० असमी अरग्य-रोदन (ण० ४, ३, १३)। बाड़े; (भ०)। अडसम्म-नि० (दे०)-संभालना, रक्षण अडिय- वि० (सं० आढ्य > प्रा० करना; (दे० ना० मा० १, ४१) । अड्ड)-पूर्ण, युक्त; (प० च० ३७, १) । अडली-स्त्री० (दे०>प्रा० अडयणा). अड्ढिवंत- वि० (सं० ऋद्धिमत)- कुलटा, व्याभिचारिणी स्त्री; (दे० ना० विकासयुक्त; समृद्धियुक्त; (ण० ६, १२, मा० १,१६)। ५)। अडदह-वि० (सं० अप्टदश > प्रा० अडार- वि० (सं० अप्टादश>प्रा० अट्ठदह) अट्ठारह; (सि० १, १३, ११)। अट्ठारसम, अढारसम)-अठारहवां, तुल० अडयण-स्त्री० (दे०)-कुलटा, व्यभि गु० अढार; (संधि० १२, ३, ६)। चारिणी स्त्री; (सुदं० ८, ३१, ६) । अगंग----पु० (सं०अनंग>प्रा० अणंग)- अइयरणा-स्त्री०, कुलय (प० च० ३७, कामदेव; (जस० १,१८, ४; भ०; रा० ७, २)। १७) । अणंगु-पु कामदेव (ति० १, अजह-क० (सं० अट् >प्रा० अड)- ३१) । अनङ्ग (को० २, १३५) ।- भ्रमण करना, फिरना, "रिणद्दिछ मुएवि दाह. पु०-अनंग की दाह "जय पास भिखाई अडह", निर्दिष्ट आहार का अपास अणंगदाह", अर्थात् अनङ्ग की दाह त्याग करते हुए भिक्षाचार के लिए से अस्पृष्ट पार्श्वनाथ की जय हो; (व० फिरो, (जस० ४, ६, १०) । १, १, १४)। अडिल्ला-स्त्री० (सं० प्रा० अडिल्ला) अणंत-१. वि० (सं० अनन्त > प्रा० छन्द-विशेप; (प्रा० १० १, ११७) । अणंत)-अनंत, निःसीम; (जस० १, २, अडड-० (दे०)- चौराहा (cross ७; भ०)। २. पुं० अनन्त, चतुर्दशways); तुल० गु० बाडु (across); (across); तीर्थकर नाम; (जस० १, २, ७) । (प० च० ५१, १३, २) । अणंतु; (सं० रा०, परमा०)। अड्डवि-स्त्री० (सं० अटवि, वी>प्रा० अगंताणत-वि० (सं० अनन्त+अनन्त)- अडवि, वी) भयंकर जंगल, गहरा वन; वहुत अधिक अनन्त (अतिशयेन अनन्त- (व० ३, २१, ४)। मित्यर्थ) ( जस०४, ११, १२) । - अणंतें ( २२ ) अणरसिय - अन् + अस्त- - अंगते-पु. (सं० अनन्त)- श्री कृष्ण अणग्घमणि- स्त्री. (सं० अनर्थ्य+ द्वारा (रि०, सातवां सर्ग)। मणि)- बहुमूल्य मणि; (व० ३, २३, अण' कि० वि० (सं० अन् >प्रा० १२)। अण)-अन, निषेधार्थक, (सं० रा०; व० अणच्छ-वि० (सं० अनल्प; जो थोड़ा न १०, १, १२)। हो; (संधि० ० २, ३, ६)। अण-पु० (सं० अनस्)-शकट, गाड़ी; अपज्ज वि० (सं० अनार्य >प्रा० (जस० ३, २१, २)। अणज्ज)-आर्य-भिन्न, दुष्ट पापी; (भ०)। अणअ- पुं० (सं० अनय)- अन्याय, अण्णई- (सं० भन्नादि)-अन्न आदि; दुर्नीति; (जस० ४, २५, १७) । (व० ८, ५, ११)। अगइच्छन्त- वि० (सं० अनिच्छत्)-न अण्णु-वि० (सं० अन्य)-दूसरा; (व. चाहता हुआ; (भ०)। १, १६, १२)। अणंउछिअ-वि० (सं० अपृष्ट)-अन अरणत्थ-० (सं० अनर्थ>प्रा० अण- पूछा; (जस० १, ६, ८)। ट्ठ)-१. नुकसान, हानि; (भ०; ण. अरगउ~ -० (सं० अ+नय)- अनीति, ३, २, १२; जस० ४, ६, ५)। अन्याय; (जंवू० ५, १३, ८)। अणथमिअ पुं० (सं० प्रगकिय- वि० (सं० अकृत>प्रा० मित)- सूर्यास्त से पूर्व का व्रत; (सुदं० अकय)-बिना किए; (सं० रा०)। १०, ७, २)। अरगक्ख-वि० (सं० अनक्ष)-दृष्टिहीन, प्रणयमिए-क्रि० वि० (सं० - अन्+ अंधा; (भ०)। अस्तमित)-सूर्यास्त से पूर्व; (ण० ४,२, अणक्खर-वि० (सं० अनक्षर)-अशि- ६)। क्षित, मूर्ख, निरन्तर; (जस० ३, २६, अणप्प-पु० (दे०)-खड्ग; (दे० · ना० ४; सं० रा०)। अगखाइय-वि० (दे०)-अप्रसन्न, रुष्ट; दुराचरण; मा० १, १२) । तुल० गु० अणख; (प्रा० गु० ५, ६)। प्रणययार-पु० (सं० अ+नय+चार)- वि० (सं० अस्खलित)- अनीत्याचार; (जंवू ५, १२, २४) । अबाधक, असम्भव; "तुहं अघडंतु घडहि प्रणयार- पु० (सं० अनाचार>प्रा० अणखालउआ", प रोष में आकर अस- अणायार)- शास्त्र-निषिद्ध आचरण; म्भव को सम्भव वनाना चाहते हैं; (म० (म० २, ५४, २) । १, १५, ५)। अणरइ- स्त्री० (सं० अन्+रति)- अगखुट्ट-वि० (दे०)-अत्र टित (भ०)। १. अरति, बेचैनी; (सं०रा०) । २. रति- अणगारधम्मु-पु० अनगार धर्म (वह रहित; (4० २, २०, ६) । धर्म जिसमें काम के राग रंग छोड़ दिए अणरसिय- वि० (सं० अन् + रसिक)- जाते हैं)-(ण० ४, ४, ५) । अरसिक; (सं० रा०)। । अणखालउ- अंणरांमय ( २३ ) अणाउ अणरामय-पु० (दे०)-अरति, वेचैनी; (भ०)। अपराह- पुं० (दे०)-सिर में पहनी जाती रंग-वेरंगी पट्टी; (दे० ना० मा० १, २४) । अरगरिवक-वि० (दे०)-अवकाशरहित; (दे० ना० मा० १, २०)। अणरुइ-वि० (सं० अनिरुपित)-बिना विचारे, बिना सोचे; (सं० रा०)। अगल- पु० (सं० अनल > प्रा० अणल)-अग्नि, आग; (सं० रा०; भ०; जस० १, २८, १; १०, १, १४, १)। २. अग्निकुमार देव; (व० १०. २६, ७)। अगलिय- न० (सं० अ-+अलीक् > प्रा० अरण+अलिय)-सत्य वचन; (जस० ३, ३०, ६; ण० ४, २,५) । प्रणवग्ज- वि० (सं० अनवद्य>प्रा० अणवज्ज.)-निर्दोष; (म० १, २०, ४)। अणवत्थ-वि० (सं० अनवस्थ)-अव्य- वस्थित, अनियमित; (दे० ना० मा० १, १३६)। प्रणवर---वि० (सं० अनवरत >प्रा० अणवरय)- सतत, निरन्तर; (क० ३, १०, ७) । अणवरत, (को० ४, १५ ), अगवरय; (जस० २, ३०, ७) । अणवरयदारण (सं० अनवरत+ दान>प्रा० अणवरय)- लगातार किया जाने वाला दान; (व० ५, १८, ८)। अगवस-वि० [अरण : (नकारात्मक) + वश] अपरवशीकृत undefeate; (प० च० १२।६।६)। अगविहेय-वि० (सं० अविवेय)-जिसे बस में न किया जा सके, विपरीत; (भ०)। अणसण- न० (सं० अनशन > प्रा० अणसण)- आहार का त्याग; उपवास; (जस० ४, २५, २३; क० ५, १०, ५; भ०)। अणसार-वि० (सं० असार)-सारहीन, -उ (रा० ३६)। अणह-वि० (सं० अनघ>प्रा० अणह)- निर्दोष, निष्पाप; (सुदं० २, ५, ८) । अणहा.-अव्य० (सं० अन्यथा)-नहीं तो, प्रकारान्तर; (प्रा० .० १, १०५) । अणहारय-पु० (दे०)-खल्ल-१. वह खरल जिसमें डालकर कोई वस्तु कूटी जाए, चक्की, २. चमड़ा, ३. चमड़े की मसक; "अणहारओ खल्लम् निम्नमध्य- मित्यर्थः"; (दे० ना० मा० १, ३८)। अणाइ- वि० (सं० अनादि>प्रा० अणाइ) आदि-रहित, आदि काल से चलता हुआ, नित्य; (ण० ६, ११, १०; जस० १, २१, १४; भ०; सं० रा०) । -वन्त, वि० (सं० अनादिमत् > प्रा० अणाइमंत, वंत) अरादि काल ने प्रवृत्त; (भ०) । अणाउल-वि० (सं० अनाकुल > प्रा० अणाउल)-अव्याकुल, धीर; (प० च० २०।१०।६) । अणागय- पुं० (सं० अनागत>प्रा० अणागय)-भविष्यकाल; (विला०) । अणागारिउ-पु० (दे०)-घूमने फिरने वाला, संन्यासी; (व० ७, ६, ६)। अगाड- पु० (दे०)-जार, उपपतिं; (दे० ना० मा० १, १८)। , - - अणदियण ( २४ ) अणिल्ल . अरणादयण-वि० (सं० अनायतन)-जो ८)। स्थान वेदी न हो; "देवसत्वगुरुमूढविव- अणि व्य- वि० (सं० अनिष्ट ==न ज्जिय । कुसुरकुगुरुसेवासंगमपर, तह य चाहा हुआ)-शत्र; (प० च० १२११) । कुसत्थकुसुयपाढयणर मिच्छालिगिय तह अणिदिव्य-वि० (स० अ+निष्ठित > सेवयजण, जेहिँ ण सेविय छह अणादयण प्रा० अणिट्ठिय)-निस्सीम; "अवरहु मि (ण० ६, १२, ८)। अणिट्ठिय-भुयवल हुँ", दूसरे निस्सीम वाहु- अणाय-वि० (सं० अजात)-अपरिचित; बल वालो को आदेश दिया, (ण० ५, (५० च० २।१३।२)। १२, ३) । २. असंपूर्ण (म०)। अणायपार-वि० (सं० अज्ञात + पार)- ३. अनिप्टित, अकृत्रिम; (व० १०, १३, अपार; (प० च० १६।१२।५) । अणायर- पुं० (सं० अदादर>प्रा० अणि - वि० (सं० अनिष्ठ>प्रा० अणायर)-अपमान; (भ०) । अणिट्ट)- अनि टकारी; (व० ३, - १७, अणाविउ-क्रि० भू०का० बुलाया, "अणा ६)। विउ सो सुयणामु भणेवि"-नाम लेकर अणित्ति-स्त्री० (सं० अनीति)-नीति, उसे बुलाया; (क० ८, १४, २) । न्याय, औचित्य आदि का न होना; (प० अणाह- वि० (सं० अनाथ)- विना च० १५।३।४)। स्वामी के; (जस० १, २३, ५)। अणिमाइय-पु. (सं० अणिमादिक)- अणिद वि० (सं० अनिन्द्य>प्रा० अणिमादिक गुण । अष्टसिद्धियाँ अर्थात् अणिदिय)-जिसकी निन्दा न की गई हो; १. अणिमा, २. महिमा, ३. लधिमा क० ५, ६, २; जस० ३, २८, ११) । ४. गरिमा, ५. प्राप्ति, ६. प्राकाम्य, अणि उत्त-वि० (सं० अनियुक्त)-जो ७. इशित्व और ८. वशित्व; नियुक्त न किया गया हो; (भ०)। ११, ३)। अणिच्च वि० (सं० अनित्य>प्रा० अणिमिस-पुं० (सं० अनिमिप)-मस्य, अणिच्च)-नश्वर, अस्थायी; जस० (४, मछली; (व० १०, १०, ६) । वि० (सं० २६, १)। अनिमेप) निनिमेप; जंवू० ८, ६, ८). अणिज्जिउ- वि० (सं० वि० (सं० अनिजित)- अणियच्छिय-वि० (दे०)-अदृष्ट, (जंबू जिस पर विजय न की गई हो; (व० २, १, १, ६.) । ६.६)। अणियन्त:- कृ० (दे०)-अवलकोन नं अणि? वि० (सं० अनिष्ट>प्रा० करते हुए; (भ०)। अणि?)- अप्रीतिकर; (जस० ४, ६, अणिल-- पु० (सं० अनिल >प्रा० १२)। अनिष्ठित) अणिल)-वायु; (जंवू० ६, ८, ५)। असमाप्त (जस०)। -संघ पु० (सं० अणिल्ल न० (दे०)-प्रभात, सवेरा; अनिष्ट-+संघ) शत्रुसंघ; (जंवू० ४, ५, (दे० ना० मा० १, १६)। (व० २, . - -अ, वि० (सं० अणिवार ( २५ ) अनुगामिनी पई पुणु अणियार- वि० (सं० अनिवारित)- अणुप्र-पु०(दे०)१- आकृति । २- पु. जिसे रोका नहीं गया, अबाधित, "तं स्त्री० धान्य-विशेप; (दे० ना० मा० १, दसणजनधारिहिं, संचिवि ५२) । पु० (सं० अनुज >प्रा० अणुअ) वड्ढारिउ अणिवारहि", अर्थात् उसे छोटा भाई; (जंवू० २, ५, १०) । आपने अपनी दर्शन रूपी अबाधित जल अणुअतई-अक० (सं० अनुवर्तते वर्तते, धारा से सींचकर बढ़ाया है; (व० ४, तिष्ठति)-ठहरना, (भ०) । २, ११)। अगअल्लन० (दे०) प्रभात, सुबह; (दे० अणिविष्ण- वि० (सं० अनिविण्ण) ना० मा० १, १६)। थकानहीन, बिना थकावट के; (प० च० अगइय-पुं० (दे०)-घान्य-विशेष, चना; १७।१०।१०)। (दे० ना० मा० १, २१) । अणिसाभोयणु-पु० (सं० अनिशा+ /प्रगुकंप-(सं० अनु०+/कम्प्)- भोजन) रात्रि-भोजन न करना; (जस० अनुकम्पा करना ।-इ सक० (जस० ४, ३, ३०, १०)। १८, ३)। अणिह-वि० (दे०) १. सदृश, तुल्य । अणुकम्पिय-वि०(सं० अनुकम्पित> २. न.-मुख, मुंह (दे० ना० मा० १, प्रा० अणुकंपिअ) जिस पर अनुकम्पा की ५१)। गई हो वह; (भ०)। अरिगहण पुं० (सं० अनिधन) अनादि अणुकारिम =वि० (सं० अनुकारिन्) निधन (अनन्त इत्यर्थः), कुलधिपति, अनुकरण करने वाला; (जंबू० ५, १, (जस० १, २, १४)। २५)। अणिहय वि० (सं० मनिहत) अहत, अणुकूल=वि० (सं० अनुकूल>प्रा. नहीं मारा हुआ; (भ०)। अणुऊल) अप्रकूिल; (जस० ३, २७, अणोइ-स्त्री० (सं० अनीति)नीति का ३)। विरोध, अन्याय, अन्धेर, अत्याचार; (व० अणुगय–वि० (सं० अनुगत) अनुगामी, ३, १, १३)। अनुसृत, जिसका अनुसरण किया गया हो अणु-वि० (सं० अन्य) दूसरा; (व० १, वह; (जस० १, ६, २)। ५, ११)। अणुग हिम-वि० (सं० अनुगृहीत>प्रा० अणुआंच-क्रि० (सं० अनु+कृष्>प्रा० गिहीअ )जिस पर अनुग्रह किया गया अणुअंच). पीछे खींचना । अणुअंचि हो; (दे० ना० मा० ८, २६,) । पू० का० क्रि० खींचकर; सं० रा०)। अनुगामिनी-वि० (सं० अनुगामिन्:> अणुअंचिवि-पू० का० क्रि० (म०) । प्रा० अणुगामि, अरणुगामिय) अनुसरण अणु-अणु- पु० (सं० अण्ड+अण्ड) करने वाली, पीछे-पीछे जाने वाली; परमाणु; (जस० ४, ६, ६)। जस० २, २२, ८))। - अणुग्गह ( २६ ) अणुभाव - - अगुंग्गह-पु. (सं० अनुग्रह >प्रा० अणु- हो वह; (दे० ८, ४८) । गह, अणुगह) १- कृपा, २- उपकार; अण्गुण्णु-वि० (सं० अन्योन्य) परस्पर, (ण ३, ३, ६)। एक दूसरे को या पर; (प० च० २२, ५, अणुचिट्ठ=कि० (सं० अनु+ ५)। चेष्ट)-पालन करने योग्य होना । अगदिय- वि० (सं० अनुद्दिष्ट) अणुचेठेउ; (जंबू ३, ७, १६) । अपने उद्देश्य से न बनाई हुई,"अणुदिट्- मणज्ज' वि० (सं० अनृजु)-जो सरल ठयभिक्खफलाणुमेउ;" (जंबू० १०, २१, न हो, कुटिल; (भ०)।-अ, वि० (सं० ६)। अनृतु+क) दुष्ट (भ०)। अणुदिणु-न० (सं० अनुनिन > प्रा० अणज'-वि० (सं० अनवद्य) निर्दोष; अणुदिण)-दिन-प्रतिदिन, हमेशा; (भ०; (जस० ४, २३, ७) । य (सं० अनु- क० ४, १०, ६; प० च० ६, ६, ६) । द्युत) (जस० २, ६, ६)। अगुदिस-० (सं० अनुदिक) अनुदिस- अणठा-क्रि० (सं० अनु+/स्था> वासी देव; "तिजय-णाडि तिह पेक्खहि प्रा० अणुट्ठा)-अनुष्ठान करना, शास्त्रो- अणुदिस पंचाणत्तर उज्जोविय-दिस," क्त विधान करना; (जस०) । अणुटठउ (व० १०, ३४, १४) । -भू० का० अनुष्ठान किया," जं जाणइ अगुपच्छएं- अव्य० (सं० अनु+पश्च) तं सो वि अणुट्ठउ" (ण० ५, ६,७)। वाद में, पश्चात् (प० च० ५, ६, ८)। अणुट्ठाण-न० (सं० अनुष्ठान >प्रा० अणुमेहा-स्त्री० (सं० अनुप्रेक्षा>प्रा० वणुट्ठाण) १. शास्त्रोक्त विधान, २. अणुपेक्खा) भावना, चिन्तन; (जंवू० कृति; (जस० १, १, १,) । ११, १५, १४) । अणुणप्रक्रि० (सं० अनुनय्) अनुनय मणबंधि-वि० (सं० अनुवन्ध >प्रा. प्रार्थना करना; (जंवू० ४, ७, अणुबंध पु० निरन्तरता) निरन्तर, ११)। अणुणत-कृ० (सं० अनुनय+ "अणुबधि तिब्बु पेम्मु तवइ" निरन्तर शत); (जंबू० ६, ३, ११)। आसक्ति से तीव्र प्रेम ताप उत्पन्न होता अणुणइ-क्रि (सं० अनुनयति) मनाना, है; (जस० २, १०, १३) । अनुनय करना; (भ०) । अणुणेइ (हे० अणुविधिय-वि० (सं० अनुविम्बित) ४, १४, ४) । अणुणिज्जइ- कर्मवाच्य अप्रतिबिंबित, जिस पर प्रति छाया न व०, प्र० ए० (सं० अनु+ नी>प्रा० पड़ी हुई हो; (भ०)। अणुणी)मनाया जाता है। अणुन्मठ-वि० (सं० अनुद्भट >प्रा० अणुरणय-पु० (सं० अनुनय) विनय, अणुभड) १. जो श्रेष्ठ न हो; २. जो प्रार्थना; (व० ४, १५, १२) बहुत ऊँचा न हो; (प० च० ४०, ७, अणुरणीय-वि० (सं० अनुनीत>प्रा० ११)। अगुणीअ) जिसका अनुननय किया गया अणुमाव-पुः० (सं० अनुभाव>प्रा० करना, अणुभुञ्ज ( २७ ) अणुव - अगुभाव, अणुभाय) मनोगत भाव की (भ०)। सूचक चेप्टा; (भ०)। अगयत्त-वि० (सं० अनुत्त>प्रा० अणभुञ्ज-कि० (सं० अनु-+भुज् >प्रा० अणुवत्त, अणुयत्त)-प्रवृत्त, अनुकूल किया अग्ण भुज)-भोग करना; (प० २० १२ हुआ; (भ०) । १०/६) । अणुरंज-क्रि० (सं० अनु+रञ्जय > मणुमाग-न० (सं० अनु+मार्ग>प्रा० प्रा० अणुरंज)अनुरागी करना । -इ ५० अणुमग्ग)-पीछे; (जस० ३, ३५, ३)। (५० २,१,७)अणुरंजिउ-क्रि० भू० का० –यर वि० (सं० अनुमागं चर) अनुचर; (जस० २, ६, ८,)। (सं०अनु+रञ्जय >प्रा० अणुरंज)प्रसन्न अणमण्ण-(सं० अनुमोदय)-अनुमोदन हुए; "णरवइ अणुरंजिउ परियणु रंजिउ" करना ।-पिणवि पू० का कि० (जंबू० ७, -राजा प्रसन्न हो उठा और परिजन भी ७,८) । अणुमन्नइ-सक० (सं० अनुमन्यते प्रसन्न हुए; (ति० १, १८, ११)। >प्रा० अणुमण्णे, अणुमन्नइ) अनुमति अणु रंजरण-न० (सं अनुरञ्जन >प्रा० देना; अनुमोदन करना; (भ०) । अणुरंजण राग, आसक्ति । प्र शुभरण-न० (सं० प्रा० अनुमरण) अरण रत्त-वि० (सं० अनुरक्त >प्रा० १. मरना, २. सती होना, (भ०)। अणुरक्त, अणुरषक)- अनुरक्त, प्रेम- अगमणिम-वि० (सं० अनुमतमनु- प्राप्त; (सणतु० ४५३) । मोदित; (जंवू० २, ८, ११)। अणुराम-पु. (सं०अनुराग >प्रा० अणु- प्रणुमाण-न० (सं० अनुमान>प्रा. राग, अणुराय)-आसक्ति, निष्ठा, प्रीति, अणुराय; (सं० रा०; १० १, ६, २) अणुमाण)-अटकल ज्ञान, हेतु के द्वारा म०; सि० २, १७)। अज्ञात वस्तु का निर्णय; (जस० ३, २२, मणुराइय-वि० (सं० अनुरागिन् >प्रा० ५; (प० च० १११११४) । अणुराइ) अनुरागी, प्रेमी; (सं०रा०भ०) प्रणमाल-अक० (सं० अनु+मालय > अणुरुवु-वि० (सं० अनुरूप>प्रा० प्रा० अणुमाल)-शोभित होना, चम- अधुरूव, अणुरूम)- अनुरूप, अनुकूल; कना । अणुमालिवि-पू० का० कि० माला (सणतु०४६०) । को वना-कर; (भ०)। पण मेय-वि० (सं० अनुमेय >प्रा० अणुरूव-वि० (सं० अनुरूप >प्रा० अणु मेअ) अनुमान के योग्य; (जंबू० १०, अनुरूप, अणुरूप)-सदृश, समान (जंवू० १०, ६, २)। २१, ६)। अणुमोइय-वि० (सं० अनुमोदित > अणुलग्ग-वि० (सं० अनुलग्न >प्रा० प्रा० अणु मोइय) प्रशंसित, अनुमत, भणुलग्ग)-किसी के साथ लगा, मिला सम्मत; (भ०)। या जुड़ा हुआ अणुला; (हरिवंशपुराण अणुमोयन० (सं० अनुमोद)-प्रसन्नता, ५१७) । अणुलग्गी- वि० पीछे लगी (भ०) ।-ण न० (सं० अनुमोदन> हुई; (रि० ३, १)। प्रा० अणुमोयण) अनुमति, सम्मति, प्रशंसा अणुव-वि० (सं० अनुज)-जो पीछे अगुवच्च ( २८ ) अणुसुत्ति अणुव्रत >प्रा० उत्पन्न हुआ हो; (व० ३, ५,२) । ६, १५) । अणुवेकख-स्त्री० (सं० अनु- अणुवच्च-(सं० अनु+व्रज् >प्रा० अणु- प्रेक्षा) (जंबू० ११, १,४) । वच्च) अनुसरण करना ।-वि, पू० का० अगुव्यजमाणु = =क्रि० आ० (सं० अनु+ क्रि०-पीछे जाकर, (जंवू० २, १२, व्रज >प्रा० अणुवज्ज) पीछे-पीछे जावे, ४)। अनुसरण करे; (ण० ६, २१, ६)। अगुवज्ज-क्रि० (दे०) सेवा-शुश्र पा अणुव्वय--न० (सं० करना; (दे० ना० मा० १, ४१)। अणुव्वय) छोटा व्रत; (भ०)। : अणुवमवि० (सं० अनुपम>प्रा० अणुसंग-पु० (सं० अनुपङ्ग) प्रसंग, अणुवम) उपमा-रहित, अद्वितीय; (क० प्रस्ताव; (भ०)। १, १, ३)। अणुसंघट्टण-पुं० (सं० अणुसंघट्टन)- अरण वय-न० (सं० अनुव्रत >प्रा० संघर्पण, ''अणुसंघट्टणि. सदु विहा- अणु व्वय, अणुवय) छोटा व्रत; (जस० वइ,"~वायु में संघर्पण होने से.ही शब्द ४, २१, ४; क० ५, १२, १) । उत्पन्न होता है, (जस० ३, .२६, ३)। अणु वल-पुं० (सं० अनुबल) सहायक अनुसंघ -(सं० अनुसम् +धा)-खोजना, सैन्य; (जंवू० ५, ४, १७)। गवेपण करना। अनुसंधिवि-पू० का० अणुवल्सदि- क्रि० (सं० अनुपालयति) क्रि० खोजकर, ढूढ कर; (भ०) । अनुपालन करना; (भ०)। अणुसंधिय- न० (दे०) निरन्तर प्रण वहुआ- स्त्री० (दे०) दुलहिन; हिचकी; (दें० ना० मा० १, ५६) । (दे० ना० मा० १, ४८) । अणुसर-(सं० अनु+सृ>प्रा० अणु- अणुपाय—० (सं० अनुवाद)-अनुभा सर) अनुसरण करना । -इ, षण, उक्त बात. को फिर से कहना; (दे० (सं० अनुसरति) अनुवर्तन करना; ना० मा० १, १३१)। (भ०)। -हिं, क्रि०, पीछा करना अणु वासिय- वि० (सं० अनुवासित) (सा० ११७) । अनुसरिय-क्रि० भू०, सुगंधित किया हुआ, धूपित; (भ०) । अनुसरण किया, (सं० रा०) । अनुसर- अरण विवखा-स्त्री० (सं० अनुपेक्षा) क्रि० आ०, अनुसरण करो; (को० ४, ध्यान से देखना; (जंबू० ११, १५, २५१)।- रेवि पू० का० क्रि (जंबू १४)। ६, ३, १३)। मग वेकख-स्त्री० (सं० अनुप्रक्ष्) अणुसरिस-वि० (सं० अनुमदृश >प्रा० अनुप्रेक्षा, देखकर अनुसरण करना; अणुसरिस, अनुसरिच्छ) १. समान, "णिझाग्यइ जो अणुवेकख चल वइ राय तुल्य, २. योग्य; (प० च० ६/५/४) । भावसंपत्तउ"--जो वैराग्य-भावको प्राप्त अणुसार--पु० (सं० होकर इस अनित्य-अनुप्रेक्षा का ध्यान अणसार). अनुसरण, अनुवर्तन; (भ०)। करता है, (क० ६, ६, ६); (जस० ४, अणुसुत्ति-वि० (दे०) अनुकूल; - सक० . " अनुसार>प्रा० D अणसूआ ( २६ ) अण्ण चावल उपमा . अनुकरण करते बहुत; (सं० , ना. मा० १, २५) । सिव"-लक्ष्मी के सुखों का उपभोग करने अणुसूया-~-स्त्री० (दे०) शीघ्र ही प्रसव वाले; (ण० ६. ४, १३) । करने वाली स्त्री; (दे० ना० मा० १, अणहूय-वि० (सं० अनुभूत >प्रा० २३)। अणुहूअ) जिसका अनुभव किया गया हो अरण हर--(सं० अतु+ह>प्रा० अणुहर, वह; (जस० १, २०, ६)। अणुहरइ)-अनुकरण करना, नकल करना; अणु-पुं० (दे०) शालि भे (प० च० १, ६,८) ।-हरंत कृ० (सं० का कोई प्रकार; (दे० ना० मा० १, अनु०+ह्र+शत) (जंवू० ६, ६, ११)- ५)। माण कृ० (सं० अनुहरत् == अनुकुर्वत्). अणूप- वि० (सं० अनुपम) हुए। -हि, सक० व० रहित, वेजोड़; (जंबू० ४, १६, २२) । (सं० अनुहरन्ति)अनुकरण करते हैं, (हे. अरोग-वि० (सं० अनेक >प्रा० अणेक्क, ३६७)। अणेग)-एक से अधिक अणहरमाणी-वि० (सं० अनुहृत> रा०)। अणेय-वि० (सं० अनेक) प्रा० अणुहरिय) समान, "रावण रिद्धिहे (जस० १, ७, ८; क० २, १, १; ण. अणुहरमाणी," अर्थात् रावण की रिद्धि २, ५, ५.)। अनेअ-वि० अनेक के समान थी; (रि० १, ५) । (की० ४, २८) । अणेय-~-वि० (भ०)। अणु रिअ--वि० (सं० अनुहत)-अनु- अणेसण-वि० (सं० अन्+एषण- कृत; (जंबू० ४, १६, २२) । इच्छा० रहित) शुद्धि-रहित (जै० अणुहव-(सं०. अनु+भू>प्रा० -अणुह परि०); (संधि० ७, २, ७) । वइ)-अनुभव करना; (जस० २, १६, २; अण-पु० (सं० अनय>प्रा० अणय)- प० च०१६, ६, १०)।-इ अनीति, अन्याय; (की० २, १८१)। (रि०, प्रथम सर्ग)। अणुहवेइ-अनुभव अण-भणे-क्रि०, ऊटपटांग वकता है; करता है, (क०) । अणुहुत्तउ-भू० का० (की २, १८१)। (सं० अनुभूत>प्रा० अणुहुत्त) अनुभव अरपोरपार-वि० (दे०) अति विस्तीर्ण; किया; (म० २, ३७, १४ । (व० कृ०- (प० च० १७, २६) । अणोलय-न० (दे०) प्रभात, (ण ४, अणुहवंत (अनुभव करते हुए) ६, ४) । —हविवि-पू०का० क्रि० (जंबू काल; (दे० ना० मा० १,१६)। अणोवम-धि० (सं० १०, १७, १६)। (सं० अनुभूत)- तीय, उपमा-रहित; (भ०) । जिसका अनुव किया गया हो वह; अण्ण-~न० (सं० अन्न>प्रा० अण्ण)- (जवू १०, १७, १७)। अन्न, कच्चा धान्य-चना, जौ, चावल अणुहुंज--(सं० अनु+भुज>प्रा० अणु आदि; (प० च० १, १०,८) । अण्णु- हुज) भोग करना; (जस० ४, २, १)। अन्न (णे०)। अणुहुंजिय-वि० (सं० अनु + भुक्त) अण्ण-वि० (सं० अन्य >प्रा० अण्ण)- उपभोग करने वाले, "अणु हुंजियलच्छी- दूसरा, भिन्न; (प० च० २, १७, २; सक० प्रातः ." अनुपम)-अद्वि- अणुहविअ-वि० .
अप्ण ( ३० ) मण्णारिस प्राणु-वि० जस० १, ४, ५)। -त-अन्यत्व; ध्यान किसी और तरफ हो; (प० १० (जस० २, २६,८)। १८/५/९) अणु-वि० (प० च० १, १६, ७) । माणमय-वि० (दे०)-पुनरुक्त; (दे० अण्महि-अव्य० अन्यत्र (प० च० १०,३, ना० मा० १, २८)। ६) तुल० म० आण, आन । बन्न अररिद्धि-स्त्री० (सं० यात्मन् ऋद्धि वि०, अन्य (भ०)। >प्रा० अप्यण+रिद्धि) अपनी सिद्धि; अग्ण'- वि० (सं० अनृण)-जो कर्जकार (मि० १, ३३, ८) । न हो; (म० १, २५, ६)। अरव-पुं० (सं० अर्णव>प्रा० अण्णन-पुं० (दे०)-१.ग, २, देवर। अण्णव)-समुद्र; (जस० ४, १८, २) । वि० तरण, युवा; (दे० ना० मा० १, अग्णवण-पु० (सं० अन्य + वर्ग)- अण्णई-वि० (सं० जन्य>प्रा० दूहरा शब्द; (जंबू १, २, १४)। अश्य)-दूसरा; तुल० पु० राज० अनई, अण्णहा-अव्यः अण्णहा-अव्यः (सं० अन्यथा>प्रा. संयो० और, अन्यानि; (० २, १, ५) अण्ण्हा, अण्णह)-अन्य प्रकार से, विपरीत -वि० (सं० बज्ञानिन् >प्रा० रोति से, प्रकारान्तर, नहीं तो, (रि. अगाणि)-अनानी, अज्ञानो; (महा० १०/३/१५) । ६६,३,११)। अहि-अव्य० दूसरी दोर (रि०, अपगण-वि० (सं० अन्योन्य >प्रा० प्रथम सर्ग)। वगृष्ण)-परस्सर, एक दूसरे को या पर; अण्णण (सं० अज्ञान >प्रा० (क० १, १४, १७,) । अण्णोण्ण (अन्यो- अण्णाण १. वोव या ज्ञान का अभाव, न्य) (क० ५,४, १)। २. मूर्खता; (जस० ३, ६, ६; दे० ना०- अण्णत्त-अव्य० (सं० मा० १, ७,५०० ८/८५, म० २, अण्णत)-दूसरी जगह, भिन्न स्थान में। १८, २)। बज्ञान्नि -हि; (भ०)। अण्णेत्तहे-अव्य० अन्यन्न; अज्ञानी; (जस० १, ६ १२) । (प० च० ३, ३, ३) । संग्णाणिय-वि० (सं० अज्ञानिन् >प्रा० अण्पत्ति-स्त्री० (दे०)- अवज्ञा, अप,- अग्णाणि)-अज्ञानी; (म०) । मान; (दे० ना० मा० १, १७) । अण्णाय-वि० (सं० अन्याय>प्रा० प्रण्मत्य-वि० (सं० अन्यन्त्र)-दूसरी अण्णाय) न्याय-रहित, अनुपयुक्त; (ण० जगह; (जंवू० १०, १०, ५)। १, २, ६) -त्त वि० (सं० अन्यायत्त) · अपराभवन्तर-पु० (सं० अन्यभवान्तर क्वीन, " जीव सहाउ ण अण्णायत्तर" अण्ण+भवअंतर) अन्य जीव का स्वभाव अन्य वस्तु अधीन (पहले) जन्म की अवधि; (प० च० ५/ नहीं है; (जस० ३, २८, ४) । ६/१) !- अण्णमण-वि० (सं० अन्यमनस् >प्रा० लगारिस-वि० (सं० अन्याश>प्रा० अण्णमण)-१. खिन्न, उदात, २. जिसका बण्णारिस) दूसरे के जैसा; (प० च० न. अन्यत्र>प्रा. वि० (सं० . >प्रा० , के মশালাৰ ( ३१ ) अत्तावण गयउ जु १६१६४८) । अतिशय, उतिरेक; (रा० ४) । अपरगालाव-वि० पुं० (सं० अन्यालाप) अतिताउ-वि० (सं० मतृप्त) असन्तुष्ट; अन्योक्ति; (जंबू २, १२, ७) । (जंबू० १, ११, ४)। अग्णासत्त-वि० (सं० अन्यासक्त)-जो अतित्व-वि० (सं० अतीव्र) जो तीव्र अन्य पुरुप में आसक्त हो; "कुकलत्तहि न हो; (जंबू० २, ३, ३) अण्णासत्तहि चित्त ण केण वि विप्पइ;" अतीउ-वि० (सं० अतीत) गत, बीता (जस० २, १२, २०) । हुआ; (व० १०, ३६, ६)। अण्णासिरी---स्त्री० (सं० अन्नय+श्री) अतीतउ-क्रि०, भू० का०, बोता गया, अपूर्व शोभा; (जं० ४, ८, ११) । अतीत हो गया; "सिरिवालु अतीततउ अणिया, प्राणी-स्त्री० (दे०) पिता वीतउ रयणमंजूसा स्वहि कहो, की बहिन; (दे० ना० मा० १, ५१)। (सं० १,४३ )। अतुठ्ठि-स्त्री० (सं० अण्णुण्ण-वि० (सं० अन्योन्य>प्रा० अतुष्टि; (जस० ४, १४, ५)। अण्णोण्ण, अण्णुण्ण)-परस्पर, आपस में; प्रतीत्त -वि० (सं० अतृप्त) जिसकी (जस० ४, १६, १४)। सन्तुष्टि न हुई हो; (व० ५, ४, १२) अपरोक-सर्व० (सं० अन्य+एक) प्रतुल-वि. (सं० अतुल>प्रा० अउल) अन्य. दूसरा; (ण० २, १, ६) । अत्यन्त (जस० ३, १६, १२)।-तर--- अणक्क; (जस० २, ३४, ३,) (प० च० वि० अत्यन्त, अधिक असीम; (की० १, ३. १२, ४)। अण्णे तहिं—(सं० अन्ये ६२) ६२)। -सत्ति-स्त्री -सत्ति-स्त्री० (सं० अतुल तन) दूसरे वहां; (जंबू० ११, १२, ८) शक्ति ) अपार शक्ति; (जस० १, ७, अप्रणेसम-सक० (सं० अनु+इए; अन्वे- १२) । पय्) खोजना ।-वि पू० का० क्रि० अस–वि० (सं० आतं>प्रा० अत्त) (जंबू० १०, ११, ८)। १. कष्ट प्राप्त, पीड़ित, २. बीमार, ३. अणोण्ण-वि० (सं० अन्योन्य >प्रा० संकटग्रस्त;(सं० रा०) । वि० (सं० अप्त अण्णोण्ण, अण्णुण्ण) परस्पर, एक दूसरे >प्रा० अत्त) ज्ञानदि-गुण-सम्पन, गुणी; को या पर; (प० च० २२, ५,५) । (प० च० १६, १०, ३)। अण्हाणु -न० (सं० अस्नान+प्रा० अ+ अत्ता-स्त्री० (दे०) १. व्हाण) स्नान न करना; जस० ४, १६, २. सासू, ३. वूआ; ४. सखी; (दे० ना. १४)। मा० १, ५१,)। मण्हेअम-वि० (दे०) भ्रान्त, भूला हुआ; अत्तावरण-वि० (१) आतापनी, जिस (दे० ना० मा० १, २१)। पर तपस्या की जाए; (प० च० १२, अत्तय-वि० (सं० अतथ्य>प्रा० अत ११, ६)। -ई-आतापन, आत्मताप त्य) असत्य, झूठा; (को० १, २६) । करे, "फलभोयणई भत्तावणई", (जस० अति-अव्य० (सं० अति>प्रा० अइ) २, १८, १३)। माता, मा;
अत्तावणि-सिल (३२) अत्याणि . अत्तावरिण-सिल-स्त्री० (सं० आतापनी अत्यदक-अव्य० (दे०) १. अकस्मात्, शिला) आत्म-संयम का अभ्यास करने विना देर के; (प० च० ४१ १४१ ६) । २. के लिए शिला; (प० च० १३, ८, अनवसर (भ०)।-एँ, क्रि० वि०, शीघ्र तापूर्वक; (प० च० ३२, १४, ६) । अत्तिल्लु-वि० (सं० अत्यन्तम्) अत्य. अत्यग्घ-वि० (दे०) अगाघ गम्भीर; धिक, बहुत बड़ा; (प० च०, १६॥ १०॥ (दे० १, ५४)। ८)। अत्यड्ड-दि० (सं० विढ्य) धन से अत्तिहरु-वि० (सं० आतिहर) पीड़ा सुसम्पन्न; (सुदं० २, ५, ८)। या व्यवस्था को नष्ट करने वाला; (ण० अत्यन्तय-व० कृ० (सं० अस्तं यत् > ६, १४, १२)। प्रा० अत्यंत) मृत, अस्त होता हुआ; अत्य-पु० (सं० अर्थ>प्रा० अट्ठ (प० च० २५, २०, ३) । अत्य) १. धन; (जस० २, १, ३२) । २. प्रत्यम-अक० (सं० 'अस्तम् + इ>प्रा० पदार्थ; (जंवू० २, १,. ८) । ३. आशय, अत्यम) अस्त : होना ! अत्यमाण-कृ० प्रयोजन, लक्ष्य, (जस० १, २२,) १३ (सं० अन्तमन) अस्त होने, "रवी रत्त- अभिप्राय:, (८०, १, १, ५; सं० रा०;) माणो गओक्त अत्यमाणो,'-'सूर्य रक्तवर्ण -इरि (सं० अस्तगिरि) अस्ताचल, अस्त होकर अस्त होने चला; (ण० ६, १७, गिरि; (क० १०, ६, ४) । अत्याणुल्व १०)। -(सं० अर्थ+ अनुरूप) अर्थ के अनुरूप; अत्यमिय-वि० (सं० अस्तमित) अस्त (जंवू०.७, १, ३) अत्याथि- वि० (सं० हुआ, अदृश्य हुआ; (भ०) । अर्थ+अधिन्) अर्थ चाहने वाला, धन अत्ययारिआ-स्त्री० (दे०) के याचक; (जंवू० ८, ८, ९)। सहेली; (दे० ना० मा०. १, १६)। अत्य, अत्यन्तउ-वि०. (सं० अस्त> अत्यवरण- न० (सं० अस्तमन >प्रा० प्रा० अत्य=यविद्यमान) १. छिपा हुआ, अत्यमण; मत्थवण) (सूर्य का डूबना; तिरोहित, २. अदृश्य, ३. डूबा हुआ, ४. (जस०४, १०, ८; १० च० १३१ १२: नप्ट; (जस० २,१, ३१; प० च० १६॥ ५) । ३१)। अत्याण-न० .(सं० आस्थान>प्रा० अत्यइत्त-वि० (सं० अर्थवत्) धन अत्याण) सभा,सभा-स्थान; - (जस० २, वान्; (प० च० १४.१३.५ )। १३, १; प० च० २।६।७; क०६, १, अत्यइरिं-पु(सं० अस्त+गिरि> ।-अत्याण-णिवन्धरण-सभा लगाना; प्रा० अत्यइरि) अस्ताचल, "अत्यइरि (प० च० १६॥ २॥ ३) । सिंहरि पत्तइ इंणम्मि,"-सूर्य यस्ताचल अत्याणि-स्त्री० (सं० आस्थान >प्रा० शिविर पर पहुंच रहा था; (व ६, २० अत्थाण, :न०) सभा, सभा-स्थान, ४)। "अत्याणि परिट्टिउ घरणिपाल" (ण० १, सखी, .
अत्यार अदीण ० ८, ६)-य-पु० (सं० आस्यानिक) अदृढ़; (भ०)। अत्यीर (अस्थिर) (प्रा० सभासद् (भ०) । पं० २, १४२) । अत्यार-पु (दे०) सहायता; (दे० अत्युड-वि० (दे०) लघु; छोटा; तुल० ना० मा० १, ६)। गु० थोडु (कम), म० थोडका (अल्प); अत्यासिउ-वि० (सं० अस्त+आसीन) (दे० ना० मा० १, ६)। अस्ताचल पर स्थित, "अत्यासिउ रत्तउ अत्युरिय-वि० (सं० आस्तृत) विछाया मित्त जहिं," जहां अस्ताचल पर सूर्य हुआ; (दे० ना० मा० १, २३) । अनुरक्त (लाल) हुआ; (जस० २, २, प्रथक्क-वि० (सं० अस्थिर>प्रा० १)। अस्थिर) जो दृढ़ न हो, चंचल; (प० अत्याह-वि० (सं० अस्ताघ) थाह- च० १७।६। ६)। रहित; तुल० म० अधाक; (भ०) । अट्ट-वि० (दे०) अस्तब्ध; (भ०) । अत्यि-क्रि० (सं० अस्ति >प्रा० अस्थि) प्रयेरउ-वि० (सं० अ+स्थविर) अजर, होना' क्रिया कावर्तमान-कालिक एक वचन अविनाशी, "तहिं साहीणु सुक्खु महुकेरउ। रूप । तुल० पु० म० आथी; (सि० १, अखउ अणंतु अदुक्खु अथेरउ"-मोक्ष में १६, ३३; ण० १, ६, ४; १० च० १२, मुझे स्वाधीन सुख मिलेगा जो अक्षय, ६, ७) । -काय पु० (सं० अस्ति + अनन्त दुखरहित और अजर है, (म० १, काय>प्रा० अस्यिकाय) जैन धर्म के पांच अस्तिकाय-जीव, पुद्गल, धर्म, ३१, ६)। अधर्म एवं आकाश; । (ण. अदत्तादाण--न० (सं० अदत्तादान) १,१२, अपरिग्रह, धन आदि का संग्रह न करना; २) । -जण० वि० (सं० अर्थीजन) धनी व्यक्ति; (जंबू० ३, ३, ११) । (भ०)। अत्यि-न० (सं० अस्थि>प्रा० अत्यि) अदप- (अ० अदब) अदव, शाही- हाड, हड्डी; (प० ० १८। । ७)। दरवार का शिष्टाचार; (को०.३, ४१) । काय पु० (सं० अस्तिकाय). जैन शास्त्रा अदभुद-वि० (सं० अद्भुत) विचित्र; नुसार वे सिद्ध पदार्थ जो प्रदेश या तुल० गु० अदबद; (प्रा० गु० ३२, स्थानों के अनुसार कहे जाते हैं । ये पांच २)। हैं- १. जीवस्तिकाय, २. अदवक्किय-वि० (दे०) निर्भय; (जंवू० काय, ३. धर्मास्तिकाय, ४. अधर्मास्ति ६, १४, १४)। काय, ५. आकाशस्तिकाय । अदियहें - (सं० अ+दिवसे)-रात्री; भत्यिजण-पु० (सं०.अथिन्जन>प्रा० (प० च० ६॥ ७॥ ४)। अत्पिजण) याचफ लोग; (संधि० १, ३, प्रदीण-वि० सं० अदीन>प्रा० अदी- .. ८) । अत्थिजन (की० १, ६६) । ण) दीनता-रहित; (जंवू १०, २६, अत्यिर-वि० (सं० अस्थिर) चंचल, ६)। पुद्गलास्ति- .
अदुगुछिय ( ३४ ) अद्धससी अदुगुछिय-वि० (सं० अ+जुगुप्सित) ३, ६, १०)।-द्ध (सं० अर्द्ध +अर्द्ध) अनिन्दित, अघृणित; (ण० २, ७, १०; आधे का आधा, "अद्ध दुवार" अर्द्ध द्वार हे० प्रा० ४, ४)। का आधा भाग; (जस० २, ५, ६ )। अदुन्मइ-वि० (सं० अदुर्मति)-दुर्भा- अर्ध-अधु वि० (सं० अर्द्ध+अर्द्ध > वना से रहित; (जस० १, १३, ११)। प्रा० अद्ध-+अद्ध) आधा-आधा; (व. असिउ-वि० (सं० अदूषित)-जो १०, ३२, १३ )। दूपित न हो; (व० २, ११, ७)। अद्धखण-न० (दे०) प्रतीक्षा करना; अइंसण-वि० (सं० अदर्शन >प्रा० राह देखना; (दे० ना० मा० १, ३४) । अदंसरण) जिसका दर्शन न हो, अदृष्ट । २. परीक्षा करना; (दे० ना० मा० १, -हूई (सं० अदर्शनी-भूत) अदृश्य; (जस० ३४) । ४, २१, १७) । असणे (क० ५, १४, अदक्खियं-न० (दे०) इशारा कमना, ८)। अद्द-पुं० (सं० अब्द>प्रा० अद्द)- अब्द>प्रा० अद्द)- संकेत करना; (दे० ना० मा० १, ३४) । वर्ष; (क० ४, १७, ७) । वि० (सं० अद्ध कखु-पु (स० अध्यक्ष) विभागा- आर्द्र>प्रा० अद्द) गीला; तुल० गु० ध्यक्ष; (ण० ३, ३, ८)। आदु; (संधि० १४, ४, ५) । अद्धचरिक-पु. (सं० अर्द्ध +चक्रिन् > अद्दप्प-पुं० (सं० "तं अदर्प) घमण्ड न प्रा० अद्ध+चक्कि) चक्रवर्ती राजा, करना; (भ०)। फुडु अद्धचक्कि-तणु लक्खणु;" (व० ३, १६, ७)। अद्दा-स्त्री० (सं० आH>प्रा० अद्दा) उपजाति छन्द का भेद; (प्रा०प० २, अद्धजंघा-स्त्री० (दे०)एक प्रकार का १२१)। जूता; (दे० ना० मा० १, ३३) । अद्दिय-वि० (सं० आदित) आद्र अद्धमियंक-पु० (सं० अर्द्ध भृगाङ्क) किया हुआ; (भ०)। वाण; (व० ५, १७, १७) । अद्धग-पु० (सं० अर्घाङ्ग); अर्धांग अद्धरत्ति-स्त्री० (सं० अर्ध+रात्रि > (प्रा० ५० १,६८)। प्रा० अद्ध+रत्ति) आधी रात; निशीथ; अद्ध जिउ-भू० का०क्रि० + तुल० गु० अधरात; (सि० २, १२; प० अजित) अधूरा अंजन लगाया; । च० २६, ४, १०; रण० ६, १७, १३)। अद्धजिउ एक्कु जि नयणु फारु; (जंबू० अद्धवह-पुं० (सं० अर्धपथ>प्रा० ४, ११, ६)। अद्ध+वह)आधा मार्ग; (ण० ८, ६, अद्ध-वि० (सं० अर्द्ध >प्रा० अद्ध) १४) । आधा, पूरे के दो वरावर भागों में से प्रद्धविमीसिय-वि० (सं० अर्द्ध+विमि- एक । पुं० खंड, टुकड़ा; तुल० म० आद, श्रित)आधा मिला हुआ; (व० १०, ४ राज० आघो; (म० २, ७५, ८; जस० १२) । ४, १२, ६)-इंदु पुं० अर्ध चंद्र (व० अद्धससी-पु० (सं० . अर्ध+शशिन् > (सं० अर्द्ध ( ३५ ) अनेरउ भी; तुल० अनन्त>प्रा० - " अद्ध प्रा० अद्ध+ ससि)-आकार में दिखाई देने अनस-पु० (सं० अनय >प्रा० अणय) वाला चन्द्रमा का आधा भाग; (प० व० अनीति, अन्याय: (को० ४, २२२)। • - १७। ५। ७)। अना-वि० (सं० अन्यदपि-अन्यत् + अद्धा-अव्य० (दे०) तत्वतः वस्तुतः; अपि) दूसरा गु० अने; (प्रा० १० १, ११५)। (संधि० १८, १, ३)। प्रद्धिंदु-पु० (सं अर्धन्दु>प्रा० अद्ध+ अनन्ता-वि० (सं० इंदु) आधा चन्द्रमा; (क० १, १६, . अणंत) १. शाश्वत, २. अपरिमित; (की० २, १७३)। प्रद्धि-पु० (सं० अद्रि>प्रा. अद्दि) अनावाटा-वि० (सं० मनावत) जो पर्वत, पहाड़ (व० ८, १०, ४) । इस संसार के आवत भंवर से छुट अद्ध म्मिल-वि० (सं० अर्द्ध+उन्मी जाता है, (हिं० का०, च० १५) । लित >प्रा० अद्ध+उम्मिल्लिय) अर्ध- अनित्यु-वि० (सं० बनित्य>प्रा० विकसित; (ण० ३, ८, ५)। अणिच्च) नश्वर, अस्यायी; (उ० व्य० म्मिल्लय-वि० आधा खुला हुआ, प्र० १०-३)। आंशिक रूप से दिखाई देने वाला; (५० अनु-संयो० तथा "करडिम्व अनु कांच- च० १४, ७, ६)। डिअउ कानहि,"-कानों में करडिम अधुर-वि० (सं० अघ्र व>प्रा० अद्- (एक गहना) और कांचडियां (एक धुव) चंचल, अस्थिर; जंबू० ११, १, ३) प्रकार का काभरण) हैं; (रा० ११)। प्रद्धदु (सं० अर्द्ध+इन्दु) आधा अनुमग्गयारि-वि० (सं० अनुमार्ग- चन्द्रमा; (जंवू० ४, १३, १४) । चारिन् >प्रा० अणुमग्गचारि) पीछे-पीछे जाने वाला; (क० ७, ३, २)। अद्धोअद्धि-वि० (सं० अर्धाधं >प्रा०. अनुरंजिअ-क्रि... भू० का० (२० अनु। अद्ध अद्ध) दो टुकड़े वाला आधा-आधा; रञ्जय > प्रा० अणुरंज) अनुरंजित तुल० गु० अरधोमरध; (५० च० २६, किया; (की० २, २४६) । अनुरंजियं-वि० (सं० अनुरञ्जित> अवंग-पुं० (सं० अङिग) अर्वाग प्रा० अणुरंजिय) अनुरक्त किया हुआ, (प्रा० ३०१, ६)। अनुरागी बनाया हुआ; (भ०) । अधोगति-स्त्री० (सं० अधोगति)-१. अनुरवते-वि० (सं० अनुरक्त>प्रा० पतन, २. अवनति, ३. दुर्दशा; । (की० अणुरक्क) अनुरक्त, जिसके २, १४२)। किसी के प्रति अनुराग हुआ हो; (को० अधम्नु-पु० (सं० अधर्म>प्रा० अध- ३, १४६)। म्म) पाप-कार्य; (व० १०, ३६, ३) । अनेरउ-वि० (सं० (अन्यतर) दूसरा, अघोर-वि० (सं० बधीर) धैर्य-रहित, भिन्न, दो में से एक; तुल० गु० अनेरो; उद्विग्न; (जंबू० १०, २६, ७) । प्रा० गु० ११, ८,)। -- मन में अनेसउ ( ३६ ) अपमाण - अन्ध>प्रा० (प्रा० गु० ११, ८)। अन्तावली- स्त्री० (सं० अन्नावली) अनेसउ-वि० (सं० अन्यादृश)-दूसरे अंतड़ी; (की० ४, १६६) । प्रकार का; (प्रा० गु० २०, ४) । अन्धार-पुं० (सं० अन्धकार>प्रा० अन्तयरि-वि० (सं० अन्तकरी)-विना- अंधार) अंधेरा; तुल० गु० अंधार; शिका; (५० च० १५।१३।६)। (को० ४, १६; प० च० ७३१८) । अन्तर-वड-पु० (सं० आन्तर-पट> य, अंधकार; (प० च० ६, ६, ६)। प्रा० अंतर+पड) भीतरी वस्त्र; (प० अन्धारिस-वि० (सं० अन्धकारित्> च० ३१, १२, ७)। प्रा० अंधारिय) अंधकार वाला, तुल० अन्तरिप्ख-पुं० (सं० अन्तरिक्ष>प्रा० गु० अंधारणे; (प० च० ७।२।३) । अंतरिवख पुं० न०) पृथ्वी और दूसरे अपजस-पु० (सं० -पु. (सं० अपयश) अकीर्ति; ग्रहों या नक्षत्रों के बीच का स्थान; (की० ४, ६६)। (की० ४, १८८)। अपडिबद्ध-वि० (सं० अ+प्रतिवद्ध> अन्तर-पु. (सं० अन्तर>प्रा० अंतर प्रा० अपडिबद्ध)-प्रतिबन्ध-रहित, बेरोक; : न०) दो वस्तुओं के बीच का भेद; (हे० (ण० ४, ४, ६)। ४०६, ३)। अन्धलय-वि० (सं० अपणी-वि० (सं० आत्मीय>प्रा० अंघल, अंघरअ) नेत्र-हीन, तुल० गु० अप्पण) अपनी, स्वकीय; (उ० व्य० प्र० आंधळो; (प० च० ३४, २, ६)। ५२-१६)- अन्न,--वि० (सं० अन्य >प्रा० अण्ण, प्रपत्त-वि० (सं० अपान) कुपात्र; अण) ।-इ (सं० अन्यानि) अन्य (हे. (जस० १, १६, ७) । ४२७, १)। अन्नु-वि० अन्य (हे० ३३७, अपथिय-वि० (सं० अप्रथित) जो १) । अन्ने-दूसरा (हे० ४१४, १) । प्रार्थित न हो; (भ०)। अन्नेक्क-वि० सं० अन्यक) कोई दूसरा; अपन-निज वाचक सर्द ० (सं० आत्मन् तुल०म० आणीक; (भ०)। >प्रा० अप्पण) अपनी; (भ०) । अप- अन्न-पु० (सं० अन्नम् >प्रा० नेहु-सर्व ०-अपना.भी (की० ३, ३६) । न०) आज, चावल, जो टि०-संस्कृत के आत्मन् से अपभ्रंश में (उ० व्य० प्र० ६-१५; जंदु० १०, १२, अप्प निजवाचक सर्वनाम बनता है। १०)। अन्नह–अव्य० (सं० अन्यथा>प्रा० यप्पा, अप्पण, अप्पणु, अप्पारण, अप्पर इत्यादि रूपों में भी इसका प्रयोग प्राप्त अण्णह) अन्य प्रकार से, विपरीत रीति होता है। से; "अन्नह कह एरिस कन्न महायस अस- रिसु कइय वि वरु वरइ,"; (विला०) । अपमत्त-वि० (सं० अप्रमत्त>प्रा० अहि(')-१० (सं० अन्तस्मिन्) में, • अप्पमत्त, अपमत्त) प्रमाद-रहित;(भ०) । भीतर । अपमाण- माण-वि० (सं० अप्रमाण>प्रा. - अण्ण आदि धान्य;
अपरज्जिय ( ३७ ) अप्प अपाप>प्रा० अप्पमान की दाह अपनाण) असीम, अपरिमित; "त्यत्यि मपारमग-० (दे०) विधान्ति; पिहरभ दयपहारण विजयद्ध पसिहर (दे० ना० मा० १,४३) । अपमाणु"-इतो भारत देश में पर्वतों सपाद-वि० (सं० में प्रधान, प्रसिद्ध और असीम विजयाई मपाव) पाप-रहित; (भ०) । पवंत है; (क० २, २१) । नपास-वि० (२० अस्पृप्ट) अप्रभावित (क० २, २, १)। "जय पास अपास अपंगदाह"-अनङ्ग प्रज्जिय-वि० (सं० अपराजित > से अत्यूप्ट पाश्र्वनाय की जय प्रा० अपराइय) अजेय, जो जीता न हो; (६० १, १६, १)। गया हो; (भ०)। अपिरिणज्ज-वि० (सं० सप्रेक्षणीय) भपरपास-पुं० (२० अपर पक्ष) प्राद्ध जो विचारणीय या देखने के लिए उपयुक्त पक्ष; (प्रा० गु० २८, ७)। न हो; (०) । अपिपमाण-कृ० (सं० अपवग्ग-पु. (सं० अपवर्ग>प्रा० अप्रेक्षमाण); (म.)। पवरग)-मोक्ष, मुस्ति; (भ०) । अपुज्ज-वि० (सं० लपूज्य) जो मादर- अपह-वि० (सं० अप्रभ>प्रा० अपह) पीय न हो, (भ०)। निस्तेज; (दे० ना० मा० १, १६४)। अपुसिप-वि० सं० ज+प्रोञ्छित) अपहत्प-पु० (सं० अपहस्त>प्रा० बमाजित, (न ५, १०, २१) । अपहत्य, नवहत्प) मारने के लिए या अपूर-वि० (२० अपूर्ण>प्रा० नपुग)- करने के लिए अचा अधुरा, अपरिपूर्ण; तुल० गुरु अपूर, (५० किया हुना हाय, (भ०)। क्रि० (सं० च. ४१, २, ७)। अपहस्तय् >प्रा० नवहत्प) हाय को अपेम-वि० १. (सं० अपेत-गत ऊंचा करना। इत्यर्थः) गया हुना; (जस०); २. (सं० अपाम-वि० (सं० ब+पाप>प्रा० अपेय) न पीने योग्य; (जस०४, १४, ६; नपाव)-१. पाप-रहित; २. न०-पुज्य; जंबू १, ६, १०)। (ग० २, ३, १२)। अन्र-सवं० (सं० लात्मन् >प्रा० बप्प) भपाउस-पुं० (सं० न+प्राप) वर्षा निज, स्वयं; (जस० १, ६, ८, की काल न होना; (जंदू ४, ८, १३) । २,२, ११)-अ, सर्व बपना(जत० २, अपामन-वि० (सं० लपावन) अपवित्र; ११, ३)1-3, स०अपने नापको(सि० (को० २, ३७)। ३६, १)। -कज्ज पुं० (सं० प्रात्मकार्य) नपायर-वि० (सं० कप्रकट>प्रा० (०१७, ३८,)।-गज-सर्व०सपना न+पयड) जो प्रकट न हो (जस०) । सि० २,७,१४).। -न सर्व०अपना (को० अपार-वि० (सं० प्रा० अपार) अनन्त, ४, १४९) । -वस वि० अपने वदा में पार-रहित; (भ०)। नपार-वि०, (को० १, ७४)। अप्पुण-सर्व० स्वयं लत्पषिक; (प्रा० ५० १, १०२) । तुरु० गु० म० नापण (५०५० ५, १४, निकाल बाहर अप्प (३८) अप्पसाय. क० ४, ३, ४)। - च० ४) । अप्पुणु-सवं. (प० च० २२,३,६; अप्पण) अपना; (हे० ३३८, १)। -हिउ पु० (सं० अप्पणि-वि०, स्वकीय (संधि० १६, १०, आत्म-हित) अपना हित; (यो० ४६)। ३) । अप्पणिय-सर्व० अपना (प० ० अप्प--(सं० (सं० अर्पय्) अर्पित करना; १२, ४,४)। अप्पणीय-वि०, स्वकीय इ (जंवू १, ११, २०) । अप्पंत-कृ० (सि० १, ३१)। अप्पाण-सर्व०, अपना (सं० अर्पय+शतृ) (जंबू० ८, १४, ६) । (पाहु० ३३) । अप्पुणहु-सर्व०, अपना अप्पहि-क्रि० आ० (सं० अर्पय) अर्पित (सुअंध० २, २, १९) । 'करो; (क० ३, ४, ७; की० ४, ३)। अप्पमत- वि० (सं० अप्रमत्त>प्रा. अप्पिआ -कि भू० का०, अपित किया अ+पमत्त) जो प्रमादी या प्रमाद-युक्त (को०३, ७६) अप्पिवि । पु० का० क्रि० न हो; (जस० ४, १६, १६) । (क० २, ६, ५)1 अप्पेंवि, पु० का०क्रि० , अप्पमाण-न० (सं० अप्रमाण >प्रा० तुल० गु० आप ( प० च० १६, ११, अपमाण) झूठा, असत्य; (प० ३)। १०१६॥५) । वि० असीम (जंबु० ५, ३, अप्पज्जत्ता-वि० (सं० अपर्याप्तिक) ३)। जैनशास्त्रानुसार वह पाप कर्म जिसके अप्परूयिय-वि० (सं० आत्मरूपित)- उदय से जीव की पर्याप्ति, (निवारण, आत्मरूप, "अप्पाणे ज्जि अप्परूवियमणु" 'पूर्णता न हो; (व० १०, ५, १२) । आत्मा में ही आत्म-रूप होकर; (जंबू० अप्पडिम-वि० (सं• अप्रतिम>प्रा० १०, २३, ६)। अप्पडिम) असाधारण; (महा० ६८. अप्पलद्धि-स्त्री० (सं० आत्मलब्धि> प्रा० अप्पलद्धि) आत्म-प्राप्ति या लाभ; अप्पण-सर्व० (सं० आत्मीयम्)-स्व- (ण० ३, २, ६) कीय; (प्रा० गु० ३८, २४) । अप्पणत्त अप्पवह-० (सं० आत्मवध > प्रा० पुं० अपनत्व (जंवू० १०, २३, ५)। अप्पवह) आत्मघात; आत्महत्या; (जस० अप्पणय -सर्व० (सं० आत्मन् >प्रा० २, १४, ६)। अप्पण) स्वकीय, निज का; "जं अवुहु अप्पसण्णु-वि० (सं० अप्रसन्न) नाराज, पदरिसिउ अप्पणउ,-"और "हउँ अप्पसण्णु मुह.एत्थु जेण" मैं अज्ञान प्रदर्शित किया है; तुल० गु० यहां अप्रसन्न-मुख हूँ; (व० ३, १६, २) । आपणे ; (प. (प० च० १ । ३ । १२)। अप्पसत्तु-वि० (सं० आत्मसन्तु) आत्मा- अप्पणु-निज वाचक सर्व०, सम्बन्ध · भिमानी; (व० ५, ११, ४)। कारक; (हे० ३३७, १) । अप्पाणु सर्व० 'अप्पसमाण वि० . (सं० आत्मन्+ (सं०आत्मानम्) (पं० च० २३, ५, २) । समान) आत्म सदृश; (व० २, ११, १) तुल० म० आपण। अप्पसाय- पुं० (सं० अप्रसाद>प्रा० अप्परणा-सर्व० (सं० आत्मन् >प्रा० . अ+पसाय) अप्रसन्नता; (भ:०) । ३)। - अपना अप्पा ( ३६ ) अब्बभण अप्पा- हाथ फटकार कर . - - . सर्व० (सं० आत्मन् >प्रा० पू० का० कि०, अप्प)- १. आप; (ण० १, १०, ६)। "कर अप्फालि विविणिवि धाइय"- २. स्त्री० (सं० आत्मन्) आत्मा, जीव; हाथ फटकारते हुए दोनों दौड़े; (सि (परम० १, १, ५१) । ३. सर्व०, अपना २, २४, २) । (की० ४, १७६)। -अप्पी-सव०, अप्फालिय–वि० (सं० आस्फालित प्रा० अपने आप; (प्रा० पैं० २, १५७) ।-ण, अप्फालिय) १. जोर से, उन्नत स्वर में; सर्व०, अपना ।—णय-सर्व०, स्वयं (प. "दुदुहि अप्फालिय केहिं फार"-किन्हीं च० १, १, १६) । अप्पाण-सर्व० (सं० ने जोर से दुन्दुभी बजायो; (क० ४, ११, आत्मन्)-अपना, म० आपणु (भ०) । ५)। २. हाथ से ताडित, आहत (प. अप्पु-सर्व०, अपना (की० ३, ८०)। च० २, ४, १) । क्रि० भू० का०-(सं० अप्पुणु- सर्व० अपना (जस० १, ५, आस्फालय >प्रा० अप्फालय), बज उठे, १७)। तूरभेरि अप्फालिय"-तूर्य नगाड़े बज अप्पाइत्तउ-वि० (सं० आत्माधिकृत) उठे; (सि० १, १८, १२) । अपने ऊपर अधिकार, 'किंकर होइन अप्फुणं-वि० (सं० अपूर्ण>प्रा० अप्फु- अप्पाइत्तउ', (व० ४, २४, १३)। ण्ण) अधूरा; (दे० ना० मा० १, २०) । अप्पाणअ-सर्व० (सं० आत्मनः)-निज, अबद्ध-वि० (सं० अबद्ध) जो बंधा न अपना; (जंबू० ०६, ५, ११)। हो, मुक्त; (जंवू० १०, ५, १) । अप्पिण- सक० (सं० अर्पय्)-अर्पण अबल-वि० (सं० अवल) वल-रहित; करना; अप्पिवि-पू० का० क्रि० सौंप (जंवू० ११, ७, ५)। कर "रायहाँ धुर अप्पिवि सुअहों जाउ', अबाहि-वि० (सं० अवाध) निधि, -राज्य का भार सौंप कर निश्चिन्त अखंड; (जंवू० ३, १०; ४) । हो गया, (व० १, १२, १)। अवुद्धसिरी-स्त्री० (दे०) इच्छा से भी अप्पिय- वि० (सं० अर्पित > प्रा० अधिक फल की प्राप्ति; (दे० ना० मा० अप्पिय) भेंट किया हुआ; (ण० ७, ८, १, ४२)। अवे-अव्य० (सं० अयि) अवे (गाली), अप्फालइ-क्रि० (सं० आ+स्कालय > अरे, (बहुत छटे या हीन व्यक्ति के लिए) प्रा० अप्फाल, अप्फालेइ) १. हाथ से संबोधन; (को० २, १७०) । आघात करना, २. पीटना, ३. ताल अन्वेज्ज()-(पूर्वी अप०) स्त्री० (सं० ठोकना; (प० च० २८, ६, ७; भ०); अविद्या) अविद्या। अप्फालउ-वर्त० उत्तम एक व० (सं० अब्बभण-पु० (सं० अब्रह्मण्य) अब्रह्म, आस्फालयामि)हिला डालू; (प्रा० .० १, ब्राह्मण के अयोग्य कर्म, हिंसादि; "तह १०६) । अप्फालहिव०, म०पु० (प० च० अब्बभण कहिं मि ण माइय"-अब्रह्म के ५५, २, ७)। अप्फालमि व० उ० पु० अनेक भेद तो कहीं समाते भी नहीं थे, (प० च० ४, १२, २) । अप्फालिवि- (म० १, ३३, १२) । - . - अबुइ अभिड ( ४० ) - अन्तुइ-पु० (सं० अर्बुद) आबू जो अम्भसह-क्रि० विध्यर्थक (सं० अभि+ जैनों का तीर्थ स्थान है; (प्रा० गु० 1/अस् अघ्ययने)-अभ्यास करो; (जस० २४)। ४, ६, ६)। अब्बुय-पुं० (सं० अर्बुद) आबू पर्वत; अमरहुल्ल-वि० (सं० अभ्यर्हणीय) (जंवू० ६, १६, ६)। सम्माननीय, आदरणीय; (भ०)। अव्वो -अव्य० मातृ (सम्बोधने) (सुदं० अटभस (सं० अभि+अस् > प्रा० ८, ६, १०)। अन्भस) अभ्यास करना ।-इ सक० अभंगिड-क्रि०विध्यर्थक (सं० अभ्यक्त) (जंदू० २, २०, २)। -मालिश करो; (जस० २, ११, ६) । अभसिय-वि० (सं० अभ्यस्त >प्रा० अभंतर- न० (सं० अभ्यंतर>प्रा० अन्भसिय, सीखा हुआ, जिसका अभ्यास अभंतर) भीतर, भीतरी भाग; तुल० किया गया हो; (ण० ३, १, ७) । अ०भ- गु० भीतर; (जंवू० ३, २, ४) 1 अभं- सियम-वि० (जंबू० ४, ६, ६)। तरु (क० ५, ३, २; जस० ३, २१ अन्भहिप- वि० (सं० अभ्यधिक > १८)। प्रा० अब्भयि) विशेष; ज्यादा; (सुदं० अभंतरउ-वि० (आभ्यन्तरिक) आंत ३, ५, ४)। रिक; (जंवू० १०, २३, ८)। अभा---पु० (सं० अभ्र>प्रा० अभ) अन्म-न० (सं० अभ्र>प्रा० अब्भ) मेघ, बादल; (हे० ४४५, १)। आकाश; (व० ६, १०, १६) । अरभायत्त- वि० (दे०) प्रत्यागत, अभइय-वि० (सं० अभ्यधिक >प्रा० वापिस आया हुआ; (दे० ना० मा० १, भन्भहिय) विशेष, ज्यादा; (प० ५० ३१)। २६, ५, ५)। अन्भास न० (सं० अभ्यास >प्रा० अभक्षण-न० (दे०) अपयश; (दे० अन्मास) बार-बार किसी कार्य को ना० मा० १, ३१) । करना; (भ०)। अब्मत्थण न० (सं० अभ्यर्धन) अन्भासइ-सक० (सं० अभ्यासयति, सस्कार, अभ्यर्थना, प्रार्थना; (जंबू० १, अभि+1/अस् >प्रा० अब्भास) अभ्यास २, ६)। करना; (भ०)। अम्भस्यिय-वि० (सं० अभ्यर्थित >प्रा० अन्भासओ-वि० (सं० अभ्यस्त) अनु- अभत्थिय) प्रार्थित; (क० ७, १४,६)। भूत, जिसका अभ्यास किया गया हो, -उ वि०, अभ्यथित; (रि०, चतुर्थ (विला०)। अभिट्ट-वि० (दे०)सामने माकर भिड़ा अन्नपिसाय-० (सं० अभ्रपिशाच) हुआ; (प० च०) । कि० सामने आकर राहु; (प०.च० २८, ११, ३; दे० ना० भिड़ना ।—अक० इ(जंवू० ६, १,८) । मा० १, ४२)। अभिउ अक० (प्रा० अन्भिर, अन्भि- - सर्ग)।
अभिडिअ ( ४१ ) अमणोज्ज प्रभाउ- डइ =मिलना) भिड़ना (encounter) -पु० (सं० प्रा० अभाव) (जस० २, ३२, १; प० च० ४६, ५, अविद्यमानता; (जंवू० १०, ३, ६)। १)।-इ, कि० मिलना, संगति करना अभाग-पु० (सं० अभाग्य) दुर्भाग्य, (प० च० १७, १)। -~-उ कि० भू० . (को० २, २३६)। का०, भिड़ गया, "रणि अन्भडिउ", युद्ध अभिज्ज-वि० (सं० अभेद्य) जो टुकड़े- में भिड़ गया; (सि० १, २७) । टुकड़े न किया जा सके, जो वेधा न जा प्रतिमडिप- वि० (दे०)१- समागत, सके; (व० ५, १५, ५)। (क० ३, १६, २; ण० ८, १५, ६; हे० अभिणउ- पुं० (सं० प्रा० अभिणय) प्रा० ४, १६४)। २- संगत (दे० ना० शारीरिक चेष्टा द्वारा हृदय का भाव मा० १, ७८)। ३- मजबूत (दे० ना० प्रकट करना; (प्रा० पैं० २, ४८) । मा० १, ७८)। अन्भुस्यारण-पु. (सं० अभ्युत्थान) उन्नति, अभिष्णपुर-० (दे०) खाली पुड़िया सम्पन्नता; (भ०)। जिसे बच्चे हंसी-दिल्लगी रास्ते पर अब्भुद्धर- (सं० अभ्युद्+ > प्रा० बाजार-मार्ग में रख देते हैं; (दे० ना० अब्भुद्धर) उद्धार करना ।-इ, सक० मा० १, ४४)। अभिमत- वि० (सं० अभिमत) इष्ट, (भ०)। अब्भुद्धरण- न. (सं० अभ्युद्धरण प्रा० वांछित । पुं० मत, विचार(प्रा० पैं० अब्भुद्धरण) उद्धार; (भ०)। २, १३८) । अभी- वि० (सं० अन्भुय- वि० (सं० अद्भुत > अभीत) निडर; अन्मुय)आश्चर्य-कारक; (जस० १, १८, (जस० १, ५, १७)। अभीओ-वि० ३०; ण०६, १५, ८) । निर्भीक; (व० ४, ५, १) । अभोर-वि० अभंग-वि. (सं० अभड्.गिन) न टूटने (सं० प्रा० अभीरु) निर्भीक शूरवीर (न० ६, १६, १४) । वाला; (जस०१, १८, ४) । अभउ-क्रि० (सं० अ+भू, अभूतः) हुआ; अभीस- वि० (सं० अ+/ भेष= (जबू० ३, ५, ११)। डरना, प्रस्त होना) निर्भय; (व० ४, ३, अभवख- वि० (सं० अभक्ष्य> प्रा० २) । अ+भक्ख) न खाने के योग्य; (भ०)। अभुल्लउ-वि० (दे०) अचूक, न भूलने अमगु-वि० . (सं० अभग्न > प्रा० वाला (जस० ४, २४, १)। अभग्ग) अखण्डित; (जस०; भ० च०)। अमेय-वि० (सं० अभेद) अभेद्य; (प. अभय- वि० (सं० प्रा० अभय) निर्भय; च० १५, १०७) अमंगल-न० . (सं० अमड्.गल) अशुभ; (प्रा० ५० १, १११)। अभयदान (व० ३, १६, १)। (जस० ३, ६, १२)। अमणोज्ज-वि० (सं० अमनोज्ञ)- अभषियवि- वि० (सं० अभव्य > प्रा० अभविय, अभब्ब) असुन्दर, अचारु; (व० असुन्दर, "किं तेउरु अमणोज्जु जाउ" १०, २०, १६)। क्या अन्तःपुर अमनोज्ञ हो गया; (जत० प्रा० दाणु न० - अमग्ग ( ४२ ) अमियतणु १२)। २. अमय- . २, १२, १३)। निर्मल; (जस० ४, ११, अमग्ग-पु० (सं० अमार्ग, कुमार्ग, यथार्थ रूप में; (व० १०, ३, ३) । खराव रास्ता; (भ०)। कित्ति-स्त्री० अमल कीति; (व० ४, अमणूस- पु (सं० अमनुप्य) मनुष्य- १२, १३) --मइ-वि० (सं० अमल- भिन्न; (भ०)। मति >प्रा० अमल-इ) निर्मल वुद्धि- न० (सं० अमृत >प्रा० अमय । वाला, (सि० २, ६)। अमयणिग्गमन० (सं० अमृतनिर्गम)- अमलिय–वि० (सं० अमलिन >प्रा. चन्द्रमा; (दे० ना० मा० १, १५) । अ+मलिण) निर्मल; (जस० ४,११ अमयवाह-पू० (सं० अमृतवाह)- १२) । चन्द्रमा; (प० च० २५, १३, ८) । अमाण-वि० . (सं. अमान>प्रा० अमयासण-पु. (सं० अमृताशन)- अमाण) १. अमाप, अमन्त, असंख्य; देवता; (व० १०, २२, ५) । (म० २, ७, ७) । २. मानरहित; (जस० अमरकोसु-० (सं० अमरकोश) अम- १, १८, २६)। रकोश नामक संस्कृत का कोश; (सि० १, ७)। प्रमाया--स्त्री० (सं० अमाया) कपट- शून्यता, ईमानदारी, निष्कपटता; अमरगय-पुं० (सं० अमर+गज) (भ०)। ऐरावत; (जंबू० १, ११, ३) । अमारिअ-वि० (सं० अ+मारित) अमरगिरि-पुं० (सं० प्रा० विना मरा हुआ; (अर्थात् मृत्यु से बच- गिरि) मेरु पर्वत; (व० ७, १, ३) । कर) एवहिं कहिं जाहि अमारिज'; अमरणियर-पु. (सं० अमरनिकर)- (जंबू० ७, ६, ३६) । देव समूह; (जस० ० १, २, ११)। अमि--न० (सं० अमृत> प्रा० अमरत्त-पु० (सं० अमरत्व)अमर होना अमिय) अमृत, (की० १,२०) । (जस० १, ७, १३) । अमिअ-न० अमृत; (प्रा० ५० १,६७)। ममरपुरसुन्दर-पुं० छन्द; (सुदं० ६, अमिय (क० २, १५, ६)। हलु १०, १३)। अमृतफल; (सि० १, १५)। अमिउ अमरालय-पुं० (सं० अमरालय) १. (सा० २) । अमिय; (वा० १, ६) । स्वर्ग लोक; (व० १०, ३०, ७) । २. अमित्त-० न० (सं० अमिन >प्रा० सुमेरु पर्वत (व० ७, ६, २)। अमित्त) रिपु, दुश्मन; (जस० ३, १२ अमल-पु. १. छप्पय . छन्द का भेद, १०) । (प्रा० ५० १, १२३) । २. देव; (व० २, अमियकित्ति-पु० (सं० अमितकीति)- १६, १२)। मुनिराज; (व० २, ८, ३)। अमल-वि० (सं० प्रा० अमल) १. अमियतणु-पुं० (सं. अमृतततु)- अमर- ।
अमियतेय ( ४३ ) अम्हें-अम्हां चन्द्रमा, (प० च० २७, १०. ६) । दहो" देवों ने नवीन नीरधर-मेघ के अमियतेय-पु० (पं० अमितेज) अर्क समान गर्जना करने वाले बलभद्र-विजय कीर्ति का पुत्र; (व० ६, ७, ७) । को उसकी जीत हेतु गदा, लांगल, मुसल अमियप्पह-पु० (सं० अमृतप्रभ) मुनि और अमोघगुखी शक्ति दी; (८० ५, ६, विशेष; (व० २,८, ३) । अम्बर-न० अमिय बुठ-पु० (सं० अमृत वृष्ठि) (सं० अम्बर>प्रा० अमृत की वर्षा; (प्रा० गुरु १०, ४०)। अंवर) वस्त्र; (की० २, २१६) । अमियालय-पु० न० (सं० अमृता- अम्म-स्त्री० (सं० अम्बा>प्रा० ल्य>प्रा० अमयालय) स्वर्ग; (प० च० अम्मा) अम्मा, माता; (जस० ण० ३,६, १८।२।)। १६) । अम्माएवि -स्त्री० अम्बा देवी अमियासण-पु. (सं० अमृताशन) देव; (मातेत्यर्थ) (जस० २, १६, ६) । अम्मा (व० ७, ६, ६)। पिइ----अम्बा-पितृ, (प्रा० गु० २,१, ८)। अनुश्क-वि० (सं० अ मुक्त) युक्त; अम्मि-स्त्री० अम्ब (संबोधने) (जस० २, (जंबू० ३, १०, ३)। १६, ३; हे० ३६५, ५) । -पिह, पु. अमुणिय-वि० (सं० अज्ञात >प्रा० (सं० अम्बा+पितृ) माता-पिता; (संधि अणाय, अविदित; (प० च० ८।६। ४) । ६, १, ८)। अमुणंत-कृ० अम्मत्तिय-वि० (सं० उन्मत्तिका)- १. अ+ज्ञा+ शतृ) नजानते हुए; (जं० ७, ११, मदमाती, नशे में चूर, २. पागल, ३, अकड़ा हुआ। अम्माइआ-स्त्री० (दे०) अनुसरण अमेभ-वि० (सं० अमेय) १. असीम, करने वाली स्त्री; (दे० ना० मा० १, २. अचि त्य; (क० ७, ५, ६) । अमेय- २२)। वि० (सं० अमेय) अज्ञेय; "नियवइ चितामणि अमेय, मानों अज्ञय चिता- अम्माहीरउ-पु० (दे०) लोरी, स्वा- मणि के समान; (व० १, ३, १३)। fait (lullaby) "अम्माहीरउ गेउ अमोह-वि० (सं० अमोघ) अचूक, झुणिज्जइ"; (प० च० २४, १३, ८) । निर्धान्त, अत्यर्थ; (भ०) । -उ, वि० अम्वेअल-पु. (दे) १. आमेल, प्रचुर, (जंवू० १, १३, ७) । आमेलग अथवा आमेलय नाम का अमोहु-पु० (सं० अमोघ) अमोघ शिरोभूषण, २. जूड़े के ऊपर वांषी जाने . (शक्ति) "गय-लंगलु मुसलु अमोह मुहू वाली माला (रा० २०) । देवयाई वलहद्द (हो) । दिण्णइ विजय- प्रम्ह, अम्हां- सर्व० (सं०. अस्माकम्) हो विजयहो कएण णव-णीरहरु णिण- हमें । (सं० .
अम्ह (४४) अरण्ण अजयज्ञ>प्रा० (सि० १, ८, ११) । अम्ह-सर्व (सं० अस्मद्>प्रा० अम्ह) अयंग-वि० (सं० अचङ्ग) अचारु; (भ०)। हम (उ० व्य० प्र० २१-६;)। ई-सर्व०, अय-पु. (सं० अज= ब्रह्मन्) ब्रह्मा; न०, व०, (सं० अस्माकम्) हम (हे० (जस० २, ३०, ६, ण० ६, ७, ५)। वि० ४, ३७६; की० ० ३, १३४) -तो (सं० अति) वहुत; (व० ८, २, ५) । (सं ० अस्मद् ) (उ० व्य० प्र० १४-२८ अयपक, अयग-० (दे०) दानव; (दे० १४-२६) । टि०- अपभ्रंश में अस्मद् ना० मा० १,६)। शब्द का पंचमी और षष्ठी की बहुवचन- भयजण-पु० (सं० विमक्ति के साथ 'अम्हह आदेश होता अअ, अय+जण्ण) अजयज; ६) । है,(हे० ३८०) । अम्हाण-सर्व० (रा. भयट-पु० (सं० अवड) कूप, कुआ; १०)। अम्हणियो-सर्व० (प्र० चि०), (दे० ना० मा० १, १८) । अम्हराइ (रा० २८) । अम्हारे-सवं० अयर-पु० (सं० अगरु) अगर लकड़ी; (रा० २०)। टि०-अपभ्रंश में सं० अस्मद् (जं० ६, १२, २) । काएक व० में हां, हउ और व० व. अपस-पु० (सं० अयशस् >प्रा० अयस, में अम्हे, अम्हई शेप रहा। अजस) अपयश, अपकीति, (प० १० ११, अम्हह-सर्व० (सं० अस्मद् > प्रा० अम्ह) हमारे; (व० २, १, ८) । अम्हाण प्रयाग-वि० (सं० अज्ञान) अज्ञानी, -सर्व० (सं० अस्माकम्) हमारा; (जदू (दे० ना० मा० ७, ७३; हरिवंशपुराण ७, ३, ८)। अम्हेत्य-सर्व० हमारे लिए; ५१॥ ७)। अयाणा-वि०-अज्ञानी (क० (व० ६, १७, ८)। ८, ४, ७) । वि०-मूर्ख "किउ मंतु सम्वु अम्हार-सर्व (सं० अस्मदीय) 'हम' का कूल्हें अयाण'-उस मूर्ख सेठ ने सब हमारा; (म० १, प्रकार कूट मन्त्रणा की; (सि० २, २,१) । २५, ११; उ० व्य० प्र० १६, २०)। तुल० गु० अजाण अजाण्यु। उ, सर्व० (अस्मत्कार्यकः) हमारा, (सि० प्रयाल-पु. २, १६ ) अम्हारी-(ण. ३, १३, ३) अयाल) अनुचित काल; (ण. १२)। -अम्हारे अम्हारा; (हे० ३४५, १)। अयालि-पु० (दे०) दुर्दिन, मेघाच्छन्न -सर्व० मेरे (सि० १, २२, . ७)। दिवस; (दे० ना० मा० १, १३) । अम्हे-सर्व० (व० सं० अस्मे) (उ० व्य० :-पु.० (सं० अर) अठारहवें तीर्थङ्कर प्र० १४-२७, है० ३७६, १) । का नाम; (जस० १, २, ६)। अम्हारिस-वि० (सं० अस्मादृश>प्रा० अरणइ-स्त्री० (सं० अरति) असुख; अम्हारिन्छ) हमारे जैसा; (ण० २, (प्रा० गु०.११, ६)। ४, ३, १० च०६।६।८) । अम्हेत्य अरण्ण-न० (स० अरण्य >प्रा० अरण्ण हमारे लिए। वन, जंगल; (प० च० ॥ ४१२)। अरन्न . सम्बन्ध कारक रूप (सं० अकाल>प्रा० अरमाहर (४५) मरीस (भ०)। (सं० अरिक्षय) शव का नाश (पि. प्ररमाहर-वि० (सं० अरमा (अलक्ष्मी) २, २०) । -गणु पु० शन्नुजन (व० २, +हर) दारिद्रय नाश; (जस० १, २, २, १०)। -दमण पुं०; एक राजा का ६)। नाम (ण० ४, ७, १४)। -नयरं पु० अरल-न० (दे०) कीट-विशेष, मच्छर; नगर का नाम (भ०)। -वम्म पुं० (स० (दे० ना० मा० १, ५३) । अखिमंन्) राजा-विशेष, (ण० ७, ४, परविद-न० (सं० अरविन्द>प्रा० ५) -हु पुं० (सं० अरि+हन्तृ>प्रा० अरविंद) कमल; (जस० ४, २१, ६)। अरिहंत) जिन-देव; (व० ६. १६, अरविरर-वि० (दे०) दोघं, लम्बा; (दे० ना० मा० १, ४५)। मरिठ्ठ-पु. (सं० अरिष्ट =अशुभ) अरहंत-वि० (सं० अहंद >प्रा० अरिष्टा नामक नरक; (व० १०, २१, मरहंत) पूजा के योग्य, पूग्य; (जस० २, १३)।-उर (सं० अरिप्टपुर) नगर- १, १; प० १, ५, ६) । अवलि (अर- विशेप; (प० ० ३३, ६, २) । हंतालि) अहंदावली; जिननामावलि; अरियाणु-पु० (सं० अरि+स्थान) (जस०) । अरहंतु-पु.० (सं० अरयत्) शव-स्पान; (क० ३, १५, ७) । बौद्ध या जैन आचार्य, (मूल अचं योग्या- परिमहण-पु. (सं० अरि+मथन) धंक था) (भ०)। शन्न -विनाशक; (क० ५; १३, १०)। प्ररहट्ट- (सं० अपघटट>प्रा० परिरामन्ह-० (सं० (सं० अरि+राजन् अरहट्ट) अरहट, पानी निकालने का प्रा० अरि+राय) शव राजा; (की. यन्त्र-विगेप; (प० च० ३१, ६, ८) । ४, ५६) । अराइन्न-वि० (सं० यरात्रिग) राति मरिविदु-पु. (सं० अरविन्द) अर- को न जानने वाले (निशाचर; (भ० ५, विन्द नाम का राजा; (क० २, १६, १७, १)। ३)। अराइवरख-पु० (सं० राति+पक्ष) अरिहंत-वि० (सं० अहंत्) पूजा शय पक्ष; (प० ५० १६॥ १४॥ ३) । योग्य, पूज्य; (भ०)। अराय-पु. (सं० अ+राग) प्रेम अथवा हर्प या प्रियता रहित; (प० अरिह-पु० (सं० अहंत) तीर्य कर, जैनियों के पूज्य देवता; देवता; "तिय-लोय च० १।२।८)। झाएह अरिह"; अराहिम-कि० (सं० आराधितवान्) (संधि० ० १०, पाराधना की; (की० ३, ६)। २३)। मरि-पु. (सं० प्रा० अरि) दुश्मन; अरोस-पुं० (सं० मरि+ईश>प्रा० (प० च० ४, १४, ७) । -उर पु० अरि+ईस) शन्न राजा; (ण० ६, १३, (भ०)। -खय पु०, १५)। . के नगर का नाम (४६) अलंघ (ण० ३,४, रुघ>प्रा० ग्झ) उलझी , , अरु-संयो०, १. और; (सि० १, १०; अरोजग) गुस्सा-रहित; की० ३, १६) । २. वि० (सं० अपरं) ४) । दूसरा; (संवि० १, १२, ६) ! अरे-अव्य० (सं० अहो) निम्नांकित जन्माल-वि० (मं० अर्थों को प्रकट करने वाला अव्यय १. या माझी हुई; "अरु क) आश्चर्ष, (ख) पीडाजनक आश्चर्य ज्झाल अन्ताव ती जाल वद्धा"; (की० ४, (ग) शोक या खेद, झिड़की। २. बुलाना १६६) । (सम्बोधन) (उ० व्य० प्र० १६-१०) अरुण-न० (दे०) कमन; (दे० ना० ३. संभाषण का (सूचक, की० २, ३१; मा० १, ८)। -त-पु. अरुणत्व (जं. रा० २१, १० च० ७, ७, २)।-रे ६, ६,१)।-भासु पु (स० अरुणभास) सम्बोधने; (प्रा० ५० १, ६) । द्वीप-विशेष; (३० १०, ६, ७)। -~-र- प्ररोचकु-पुं० (सं० अरोचक >प्रा. (सं० यरुशकर) सूर्य; (जस० २. १२, अरोअअ) रोग-विशेष; "जरू दाहु अरो- ३)। चकु हुयउ तासु"-तया उसे ज्वर एवं अरुणायवत्त-पु० न० (सं० अरुणात अरोचक दाह भी हो उठा, (क० ३, ४, पन्न लाल छन्न; (जस० २, १२, ५) । ११)। अरुरिणय-वि० (सं० अरुणित) लाल अर्थी-वि० (सं० यथिन >प्रा० अत्यि) वर्ण का; (जस० ३, १, ६)। १. प्राप्त करने की चेष्टा करने वाला, अरुषि-स्त्री० (सं० अवरुद्धि) रुकावट, अभिलापी, इच्छुक २. अनुरोध करने प्रतिबन्ध, थाम, रोक; (उ० व्य० प्र० वाला, (उ० व्य० प्र० ५२-२३) । ५०-१)। अलंकर-सक० (सं० अलं+कृ) अह-वि० (सं० अहंतु >प्रा० अल्ह, भूपित करना । अलंकरेह-अलंकृत की अरह) पूजा के योग्य, पूज्य; के योग्य, पूज्य; (प० च० जिएगा; (विला०)। २, ६, ६, ण० १, ५, ६)। -खर अजंकरिय-वि० (सं० अलकृत) विभू- पुं० (सं० अहंतु + अक्षर) (जस० ४, २६, पित; (भ०)। ६) ।-णाह-पुं० (सं० महन्तनाथ) अलंकार--पु० (सं० अलङ्कार) भूपण, अरहनाथ; (जंबू० ३, १३, ७)।-भत्त गहना; (जंबू० ४, १२, १२) । पुं० अर्हन् + भक्त (जंवू० १, ११, अलंकिंग-वि० (सं० अलङ्कृत>प्रा० ८)। अलंकिव) विभूपित, सुशोभित; (जस० अरुअ-वि० (सं० अरूप>प्रा० अख्व) ४, २४, २) । अलंकिय-वि०,-अलंकृत ल्प रहित, अमूर्त;(जस०) । अरूव (क० (भ०)। ५, ६, ५) । अरूवि-वि० (सं० अरूपिन् अलंघ-वि० (सं० अलय >प्रा० अरूप, (जस०). उल्लंघन करने को अशक्य, उल्लंघन मरुसरण-वि० (सं० अ+रोपण>प्रा० करने को अयोग्य (भ०) ।
अलंघणयर (४७) अलहंत - . - अलंधणयर-पु. (सं० अलंघनगर) सर्ग)। अलंघनगर, नगर-विशेष; (ण० ७, ११, अलते-क्रि० (सं० उत्क्षिप् का धात्वा- १३)। देश अल्लत्य) ऊंचा; फेंकना; (को० ४, अलंप-पु० (दे०) मुर्गा; (दे० ना० ११५)। अलद्ध-वि० (सं० अलब्ध) अप्राप्त; म.० १.१३)। (जंबू० ७, ६, १८)। अनी-वि० (सं० अ+लम् + इरी) अलमंजुल-वि० (दे०) आलसी; (दे० (तान्छील्येस्त्रियाम्) न पा सकने वाली; ना० मा० १, ४६)। (जंवू० ४, २१, १२) । प्रलमलवसह-पु० (दे०) उन्मत्त बैल; अनकातिलका-स्त्री०-मुख के अलंकरण (दे० ० ना० मा० १, २५)। विशेषक; (को० २, १३६) । अलय-न० (दे०) विद्रुम, प्रवाल; अलक्ख-वि० (सं अलक्ष्य)-जो लक्ष्य (दे० ना० मा० १, १६) । अलयावलि में न आ सके; (भ०)। स्त्री० (सं० अलक + अवलो) अलकें; अलक्खण-पुं० न० (सं०. अलक्षण > (जंबू ४, १३, ३)। प्रा० अ+लवखरण) वस्तु-स्वरूप-हीनता; भसयाउरे - स्त्री० (सं० अलकापुरी) --(जस० ३,१०,१)।- वि०व्याक- रण से शून्य, कइसणु नगरी-विशेष; (व० ३, १८, ८)। कन्वु अलकख. रण'; (महा० ६६, ७, ३)। अलयानयरी-स्त्री० (सं० अलकानगरी) अलका नामक नगरी; (व० ४, ४, अलक्खिय-वि० (सं० अलक्षित >प्रा० अलक्खिय) अज्ञात, अपरिचित; (भ०)। १३) । अलसंत -न० (सं० अलग्गी-वि० (सं० अलग्न). बिना आलस्स) आलस, सुस्ती; "अलसंतेण मिलाये, "जइ अहरअनग्गी पढहि गाह" पिसुणजणसंगें"-आलस करने व नीचे यदि तू अपने होठों को विना मिलाये पुरुषों की संगति से; (ण० ३, २, २) । एक गाथा पर दे, (क० २, १४, ५)। अलस-वि० १. (दे०) कुसुम्भ रंग से अलग्ज-वि० (सं० प्रा० अलज्ज) रंगा हुआ, (दे० ना० मा० १, ५२)। निर्लज्ज; (भ०)। २. (सं० अलस) आलसी; तुल० गु० अळ- अलज्जिय-वि० (सं० अलग्जित) जो सियु; (संधि० ११, ५, ४) । ३. प्रमा- लज्जित न हो; (प० च०८॥ ३॥ ४)। दहीन, सौम्य; 'जय अलस ससि किरण', अलज्जिर-वि० (सं० भलज्जालु>प्रा० (व० ६, १५, ५)। पुं० आलस्य; अलज्जिर) निःसंकोच, निलंज्ज, (सं० ( (जंबू०१० २३, ४)। रा० प्रकम १, छन्द १७)। मलहंत-कृ० (सं० अ+लभ+आन् अलत्तउ-~ (सं० अलक्त) मालता (शानच) प्राप्त न करते हुए; अलभमान, स्त्रियां हाथ-पैर को लाल करने के लिए किसी वस्तु को प्राप्त होने के योग्य न जो रंग लगाती हैं वह; (रि०, प्रथम होना; (क० २, १५, ६, भ०; प० च० आलस्य-प्रा० - - अलहना (४८) अलेहिउ - लभ>प्रा० रहा है, . १।४।२)। प्रा० अलि पु०+ कुल > उल न०) भौंरों अलहना-क्रि० (सं० अ+लभति> का समूह; (जस० ३, ३६, १).1-य (प० प्रा० अ+लभइ, अ+लहइ) कुछ नहीं च० ११ १३॥ ६) । अलिउलई-न० (हे. पाना, (की० २, १३४) । ३५३, १) । मलहन्तु-क्रि० भू० का० (सं० अ+ अलिण-पुं० (दे०) बिच्छु; (दे० ना० अ+लह) प्राप्त नहीं हो मा० १, ११)। सका; (प० च० १२। ३। ८) । टि० भलिमाला-स्त्री० (सं० अलिमाला) -अपभ्रश में हेतहेतुमद्भूतकाल में भ्रमर पड्क्ति; (जंवू० १, ११, ६)। अलिय-वि० --वि० (सं० अलीक>प्रा० 'न्त' का प्रयोग अवशिष्ट जैसे करन्तु; मरन्तु । अलीग, अलीय, अलिय) अप्रिय, अरुचि- अलाव-पु. (सं० आलाप) बातचीत; कर; (जस० १, ६, १; प० च०७ । २। ७)। (व० १०, ८,८)। अलियमासि-वि० अलावणि-स्त्री० (सं० आलापिनी) (सं० अलीकभा- षिन् >प्रा० अलिय+भासि) झूठ वोलने आलापिनी वीणा; "रयणमंजूस अलावरिण वाला; (ण० ६; ८, २)। लावइ सेट्ठिहिणं हियवउ सल्लावई" अलीढ-वि० (सं० अलीक>प्रा० रत्नमंजूषा नामक स्त्री आलाप भरती, अलिय=निष्फल, व्यर्थ) व्यर्थ; (क० ६, सेठ के हृदय में कराह उठती; (सि० १, २४, ४)।-ईक्रि० वि०, शीघ्रता से, ३८)। "तं अत्याणु अलीढं लंधिउ'; (भ० १०, अलिंगणु-पु० (सं० आलिङ्गन >प्रा० २, ५)। आलिंगण न०) आलिंगन, भेंट; (उत्तर- अलीहा-स्त्री० (दे०) अलीहा-स्त्री० (दे०) मिथ्याचारिणी पुराण)। कुलटा; (सुदं० ८, ३६, ३७) । अलि-पुं० (सं० प्रा० अलि) भ्रमर; प्रलोसस-पुं० (दे०) शाक-वृक्ष, साग (सि० १, ३३; जस० १४; का पेड़; (दे० ना० मा० १, २७) । भ०)। (सं० अलुप्त>प्रा अलिअ-न० (सं० अलीक>प्रा० अलुत्त) अलुप्त, जिसकी सत्ता अलिय) असत्य वचन; (ण० १,१५, न हुआ हो; (को० ४, ११९) । १३) । अलिय-भूठ (भ०; सि० १, २४) अलेव -पुं० (सं० अलेपक) परमात्मा; अलियउ-झूठमूठ, (रि०, पांचवा सर्ग)। "णमो भयवंत अरूव अलेव"-नमस्कार है अलिमा-स्त्री० (दे०) सखी; (दे० ना. हे भगवन्त, अरूप, अलेप; (क० ५, ६, मा० १, १६)। ५) । अलिआर-न० (दे०) दूध; (दे० ना० अलेहिउ-क्रि० (सं० आ+ लिख> मा० १,२३)। प्रा० आलिह) चित्रित किया, "णियर- अलिउल-पु० (सं० : अलि+कुल > मणु अलेहिउ तग्गयाएँ" उसने चुपचाप १, १७, अलुता-वि० का लोप .
अलोह (४६) अवक M - मन लगाकर अपने पति का चित्र लिखा; अवन्ति नाम का देश; (क० ८,१, (क० ६, १४, ३)। ६)। अवंतिराअ-पुं० भवन्तिराज अलोह-पु० (० अलोभ> प्रा० (जस०)। अलोह) १- लोभ का अभाव, सन्तोष । २. वि०, लोभ-रहित, सन्तोपी; (भ०)। भव--अव्य० (सं० प्रा० अव) निम्न- लिखित अर्थों का सूचक अव्यय; १. अल्ल-न० (दे०) दिन; (दे० ना० मा० १, ५)। निम्नता, २-. तिरस्कार; ३- खरावी, मल्ल-क्रि० (ध्वन्यात्मक); चिल्लाना, बुराई ४- गमन, ५- हानि, ६- अभाव, अल्लविउ; (व० १०, २७, ८) । ७- मर्यादा; (सि० १, २६, ४४; २, अल्लयन० (सं० आर्द्रक) अदरक २२)। (जंवू० ७, १, २)। अवमक्खिम अवच्छिन-न० (दे०) अल्लल्ल-वि० सं० आर्द्र+आद्र> मुंडाया हुआ मुह; (दे० ना० मा० १, प्रा० अल्लत्य) १. जलार्द्रा; (सुदं० ८, ३७ ४०)। ११) । २, केयर, भूषण विशेष- (प. अवमण्ण-पुं० (दे०) अखल; (दे० च० ११७।४)। ३. पुं०मयूर; (दे० ना० मा०.१, २६) । अव+अर-क्रि० ना० मा० १, १३)। (सं० अव+/तृर्) । (तर्) उतरना, अल्लदिय-वि० १: (सं० आलपित> अवअरु .(अवतीर्णः); (प्रा० . ० .१, प्रा० आलत्त) संभाषित, ओभाषित(भ०)। १.६३)। २. (दे०) "(प० च० २१, अवाण-वि०. (सं०. अवती>प्रा. ५,८); अर्पित(भ०) । कि०, भू० का०, अवइण्ण) १- उतरा हुआ,. नीचे आया अपित कर दिया (रि०, चतुर्थ सर्ग)। मल्लहज-पु० (सं० आद्रं चणकाः) हुआ, २- जन्मा हुआ; (प०' च० १॥१६॥ गीले चने; (जंवू० ३, १२, १५) । ५; भ०; जस० २,२८, १ ० ४, अल्ला-स्त्री० (दे०). माता, मां, (दे० १२, १०) । अबइण्णेण-अवतीर्ण होने १, ५) । पर; (रि०, पांचवां सर्ग)। अल्लोण-वि० (सं० आलीन >प्रा. भकिण्ण-वि० (सं० भरकीर्ण) परि- अल्लीण) आश्रित; (प० च० १३, १२, श्यक्त; (दे० ना० मा० १, १३०) । ५): प्रकित्ति-स्त्री. (सं० अपकीत्ति) अप- अबंक-वि० (सं० अ+वक्र>प्रा० अ+वंक) जो टेढ़ा या कुटिल न हो; यश; (दे० ना• मा० १, , ६०)। (ण० ६, १३, ५; भ०) । अवकोरिम-वि० (३०) वियुक्त; (दे०. अपंग-पु० (दे०) कटाक्ष; (०दे ना० ना० मा० १, ३८)। मा० १, १५)। अबक्क-नि० (सं० अवाक) - १- मौन; अवंतो-स्त्री० (सं० अवन्ति, न्ती) (जंबू. १०, २५, ६) २. (सं० भवक्र) - समपित, । - अवलकखण (५४) अवसणु : अपलाय 'सत्य . .... अवलकखण-न० (सं०. अपलक्षण> अवलोइम--वि० (सं०. .अवलोकित) प्रा० अवलक्खण) स्वराव लक्षण, बुरी लक्षण, बुरी देखा हुआ; (क० ४, ११, १०)। अव- आदत; (प. चं० ११, २,६)। लोइउ अवलोकित; (व० २, १५, २)। अवलम्पणिय-पुं० (सं० अवलम्ब- भवलोय-पु० (सं० अवलोक >प्रा. निका) नीचे लटकता हुआ एक प्रकार अवलोय) अवलोकन; (प० च० ३०, ७, का आभूषण; (प० च० १४, ७, ४)। ६) । -णिय स्त्री० अवलोकिनी विद्या; प्रवलय-न० (दे०) घर, मकान; (दे० (व० ५, ६, ८)। अवल्लाव-पुं० (सं० ना० मा० १, २३)। वात की जानकारी विचार एवं भाव को अवलि-स्त्री० (सं० प्रा० आवलि छिपाना) असत्य कथन; (दे० ना० मा० १- पंक्ति, २- समूह (प्रा०० १, १८)। अवलिअ-न० (दे०) असत्य, झूठ; १, ३८)। (दे० ना० मा० १, २२) । प्रववहहु- वि० (दे०) · अग्निकायिक प्रवलित्त--वि० (सं० अवलिप्त) लिप्त; (जीव), "उण्हे वयह अंववहहु मुणि- ज्जइ" इसी प्रकार अग्नि-कायिक जीवों (जस० ३, १६, ६)। की उष्ण योनि समझना चाहिए; (व० अवलुभा-स्त्री० (दे०) क्रोध; (दे० १०, १२, ११)। ना० मा० १, ३६)। अववोह-० (सं० अवबोध) ज्ञान; अवलेहहि-क्रि० (सं० अव+लोक् > (व० ८, १२, १३)। प्रा० अवलोअ) देखना चाहिए; "पुणु अवस'-अव्य० (सं० - अवश्यम् >प्रा.. दल अवलेहहि समग्ग"-फिर एक-एक अवस), अवश्य, जरूर; (को०३, २६)। दल को समग्र भाव से देखना चाहिए, अवसं (ण० ८, १०, ८)। -उ (प्रा० (सि०.१, १७, १५)। ० २, १०३) । अवसनो; - (को० १, अवलोम-सक० (सं० अव+लोक) २०) । अवसि; (जस० ३, ४०, १६) । देखना । अवलोयइ-सक० (सं० अव+ प्रवसु; (संधि०.२, १०, ५) । अवसें- लोक्>प्रा० अवलोअ) देखना, अवलो- अव्य० सर्वथा, जरूर, निःसन्देह; (महा० कन करना; (प० च० २, १६, ५)। १५, २२,१७; प० च० १८, ३, ८)। अवलोइउ-क्रि० भू०का० अवलोकन किया; अवस'- वि० वि० . (सं० अवश>प्रा० (ण० १, ८, ४) । अवलोवइ-क्रि० व० अवस) पराधीन; (व० २, १, ४)। (सि० १, ३१, ११)। अवलोइवि-पू० का० अवसउरण-न० (सं० अपशकुनं प्रा० क्रि० (सिं० १, । ८) अवलोऍवि-पू० का० अवसउण) खराव शकुन; (जस० ३, कि० (देखकर); (प० च० २, १५, ८) । '१८, ५) । अवलोयहि (विधि०); (जंबू० १०, १५, अवसणु-वि० (सं० अ+व्यसन) व्यस- ६) । अवलोयहु, यहो (विधि०); (जंवू० नहीन, “अवसणु सच्छु अरुसणुसू रउ," ६, ६ १३)। (ण० ३, ४, ४)।
अवसेद्द (५५) अवहार - च० १, .. . - लेना । -इ. प्रवसई-पु० (सं० अपशब्द >प्रा० अवहट्ठा- स्त्री०, अवहट्ठ भाषा अवसद्द) बुरा वचन; (भ०)। (की० १, ३६)। अवसप्पिणि-स्त्री० (सं० अवपिणी अवहड-न० (दे०) मुसल; (दे० ना० >प्रा० ओसप्पिणि) दश : कोटाकोटि मा० १, ३२) । सागरोपम परिमित काल-विशेष, जिसमें भवहत्थरा--स्त्री० (दे०) पाद-प्रहार; सर्व पदार्थों के गुणों की क्रमशः हानि हो (दे० ना० मा० १, २२) । जाती है; (प० १२, ६)। अवहत्यिय- वि० (सं० अपहस्तित) कालचक्र; (जंबू०. ३, १,.१०) । हाथ से त्याग हुआ, परित्यकत; (जस अवसप्पिय-वि० (सं० अपसर्पित) १ ४, १६, १७; सुदं०८, ३६, ४८) । निवृत्त, २. अवतीर्ण, ३. अपसृतः अपसृत; .. /अवहत्य-(सं० अपहस्तय् >प्रा० अव. : (भ०)। हत्थ) त्याग करना ; अवहत्थे वि पू० का० अवसर-पुं० (सं० प्रा० अवसर) काल, (सं० अपहस्तय>प्रा० अवहत्य) त्याग-.. समय; (भ०.) अ वसरि--अवसर; (रि०, कर, छोड़ कर, (५० च० १, ४, १)। प्रथम सर्ग)। मवहर-(सं० • अप+ह) दूर करना अवसवण-न. (सं० अपशकुन >प्रा० अपहरण करना, छीन अवसउण) अनिष्ट-सूचक. अथवा खराव सक० (विला.): । अवहरी (रा० ४३)। शकुन; (म० २,.२४, ४; प० च० ३५, .. -मि सक० दोष, अनिष्ट करना; (ण०. ६, .५, १.) । -हुं (रा० अवसहं-न० (दे०) १ उत्सव, २ ३६) । अवहरेइ-(क० ६, १४,. ४) । नियम; (दे० ना० मा० १, ५८) । अवहरंतु, वि० (अपहरण करने वाली) प्रवसाग-न० (सं० अवसान >प्रा० (क० ६, १६, ७) । अवह वि-पू०का०, अवसान) अन्त, समाप्ति; (जस० १, क्रि० छीनकर (प० ५० ५, ३, ६) ! १३, ७; क० १, १७, १५; सुअंघ २, प्रवहरिम-वि० (सं० प्रवहरिम-वि० (सं० अपहृत >प्रा० : १, ११,) । अवसान; (को० ४; १५३)। अवहरिअ) छीन लिया हुआ; (जस० ४, अवसिठ्ठउ-वि० (सं० अवशिष्ट) २८, २६; क० ५, ७, १०) । बचा हुआ; (प्रा० ५० १, ३५) । अवहाय-पुं० (दे०) विरह, वियोग; अवसेस-पु० (सं० : अवशेष>प्रा० (दे० ना० मा०.१, ३६)। अवसेस) अवशिष्ट, बाकी। वि०-सव; 1/अवहार:-(सं० अप+ह :>प्रा० अवहर, भवहरइ). अपहरण करना, छीन . प्रवसोयण- स्त्री० :(सं० : अस्वापनी). सं० : अस्वापनी). लेना; (भ०) ।.. तिद्रा; (प्रा० गु० ३५, ७).. अवहार-० (सं० अपहार) अपहरण, - अवहट्ट-वि० (दे०) अभिमानी; (दे० परित्याग । अवहारु; (रा० २४) । क्रि० ना० मा० १, २३)। (सं० अप+ह>प्रा० . . अवहर) छीन आदि दूर: (भ०)।::
अवमाण (५२) अवर गणना करना । - - प्रवमारण-पु० (सं० अपमान) तिर अवयरिय-वि० (सं० अवतीर्ण>प्रा. स्कार; (भ०) । अवमाणु; (विला०)। अवयरिस) १. जन्मा हुआ, २- नीचे प्रवमाण-(सं० अव+मानम्) अवं उतरा हुआ; (प० च० ३१) । अव- अवमाणइसक० रित; (व० ३, १६, ३). (भ०)। -हि (विधि०) (जंबू ५, १३, अवयव-पुं० (सं० अवयव), अंश, २४) । अवताग वि-पू० का०, कि० अवज्ञा विभाग, "संझावयव नाई नह तम्बिर, करके; (५० च० १६, ७, ८)। यहां अंश से तात्पर्य गोधूलि के समय अवमाणिय-वि० (सं० अवमानित > संध्या काल की किरणों से है, (भ० ५, प्रा० अवमाणिय) तिरस्कृत; (जस० ४, ६, ११) । २४, २४)। य (प० च० १६, १, अवयाणं-~-न० (दे०) खींचने की रस्सी, ६)। "अवयाणं आकर्षणरज्जुः," (दे० ना० अवज्जिय-वि० (प्रा० अवयच्छिय) मा० १, २४)। दृष्ट, देखा हुआ; (प० च० ३६, १, अवयार-पु. (दे०) १- माघ-पूर्णिमा १)। का एक उत्सव, जिसमें ईख से दतवन अवढिअ-वि० (दे०) युद्ध में पकड़ा आदि किया जाता है; (दे० ना० मा० हुमा; (दे० ना० मा० १,४६)। १, ३२) । २. (सं० अवतार) देहान्तर- अक्र्यापणउ-क्रि० (सं० अव-+गणित) धारण; (जंबू० १०, १, ७) । उपेक्षा की; (ण० १,१०, १०)। अवयास-पु० (सं० अवकाश >प्रा० अवयपुण्णु-वि० (सं० अ+वयः+पूर्ण) जो अपनी आयु न पूरी कर पाये हों; अवगास, अवयास) फुरसत; (जंवू० २, १८)। (जस० १,७,१०)। /अवयर--(सं अव+तृ>प्रा० अव- अवयासिरणी--स्त्री०. (दे०) नासा-रज्जु, यर, अवयंरइ) नीचेउतरना । अवयरइ- नाक में डाली जाने वाली रस्सी; (दे० सक० (सं० अवतरित); (भ०)। -हूं ना० मा० १, ४६) । उत रें; (ण०.६, ५, ६) ! अवयरंत-कृ०: प्रवर-संयो० (सं०. अपर). १- और (सं० अव+त+शत); (जंवू० ५; २, (जस० १, ६, १०; म० १;'. .१५, ४; ३) । अवयरिउ-भू० का० अवतरित की० ३, १६). 1 २. पश्चिम (व०.५; हुआ; (ण० २, ५, ६); उतर आया २०,७) । अवरु-और. (सि.० २, ८; (भ० १, ५)। अवये रवि-पू० का० की० २, २३) । वि० (सं० अपर>प्रा० क्रि० नीचे उतर कर; (प० च०, १३, अवर) दूसरा, अन्य; (ण० २, १, ७) । -पक्ख पु(सं० अपर+पक्ष) (जस० ३, प्रवयरिस-पुं० (दे०) वियोग, विरह;:. ४०, १७) । -कमेण पुं दूसरे पैर के द्वारा (दे० ना मा० १, ३६)। (रि०, पांचवां सर्ग)। - अवरज्ज ( ५३) अवलंबिय व्याप्त, अवरज्ज-पु० (दे०) १-गत दिन, २ आया हुआ, उतरा हुआ; (व० २, ८, आगामी दिन, ३. प्रभात; (दे० 'ना० ४)। मा० १, ५६)। अवरिहड्ढपुसरण-न० (दे०) १. अवरोह-पु० (सं० अपराह्न) दिन अकीर्ति; अपयश, २- असत्य, ३. दान; का तीसरा पहर, दोपहर वाद, दिन का (दे० ना० मा० १, ६०)। अन्तिम या समापकहर; (व० १०, २, अवरुड-(दे०) आलिंगन करना; १०)। -य (प० च० ।२।४)। (सुदं० ८, ३५, ४) अवलंडियउ-क्रि० अवरत उ-पुं० (दे०) अभिलाषा;(प्रा० भू० का० आलिंगन किया; (क० १०, ६, गु०६, १६)। ८)।-डेवि, पू० का० क्रि० (सं० आलिङ्- अवरंतम-पु० (दे०) पश्चाताप, अनु गयित्वा) आलिंगन करके; (जा० ६, ४, ताप; (जंबू० १०, १४, १४) । अवरत्तउ; १५)। ण न० आलिड्.गन; (दे० (सुदं० ६, २३, ७)। ना० मा० १, ११; भ०)। अवरह्न-० (सं० अपराह्न) दिन का अवरु डिउ-वि० (दे०) १. तीसरा प्रहर; (भ०)। आलिङ्गित; (सुदं० २, १, ११) । २. अवराइए--वि० (सं० अपराजित) सुशोभित; (व० १०, १, २१)। अजेय; (व० १, १०,७)। अवरुडिऊरण-न० (दे०) आलिड्.गन; अवरामुह-वि० (सं० अपराभिमुख> (दे० ना० मा० १, ११) । अवरुण्डिय- प्रा० अवराहुत्त) १ पराङ्मुख, २. न० (दे०, प्रा० अवरुडण, अवरु डिअ) पश्चिम दिशा की ओर मुंह किया हुआ; (प० च०४।६।८)। आलिड्.गन; (प० च० ५, ७, ११) । अवराह-पु ०१. (दे०) कटी, कमर; अवरूप्परु,अबरोप्परु-वि० (प्रा. अव-. (दे० ना० मा० १, २६) । रोप्पर) परस्पर, आपस में; (क० ६, (सं० अपराध>प्रा० अवराह) गुनाह १०,-५; ण०.८, ३,८; प. च०-३, ७, (भ०) । अवराहु-पु० अपराध; (व० ३, २.)। अवरेक्क-वि० १४, ७)। (सं० अपर+एक) अवरिदक-वि० (दे०) १. बेमौका, दूसरा; (प० च० १०, ५, १)। अंसामयिक, २. जिसको काम-काज से अवरोप्पर- वि० (दे०) परस्पर; फुरसत न मिले; (दे० ना० मा० १, (जस०-१, १५; १५)। २०) । ३. : (सं० अपर--एक) दूसरा अवरोह-पु० (दे०) कटी, कमर; (दे० एक; (जंबू० ६, ६, ३)। ना० मा० १, २८). प्रवरिज्ज-वि० (दे०). अद्वितीय, असा अवलंबिय-वि० . (सं० अवलम्बित) धारण; (दे० ना० मा० १, ३६) । आश्रित; (जंबू०६, ६,.३)। : अवल अवरिय-वि० (सं० अवतरित) नीचे म्बिय; (भ०)। . २-० अवक्करसं :: (५७) अवज्झाय : . सर्ग)। करना जो टेढ़ा न हो; (जं. ११, १४, ४) । ' अवगाहन) स्नान, डुबकी लगाना; अवबफरस-० (दे०) दास, मध; (भ०)। (दे० ना० मा० १, ४६) । अवगाहिय - वि० (सं० अवगहित) अव- अवगण-क्रि० (सं० अव+गण्) तुच्छ गाहन किया हुआ; (जस० ४, २७, ; समझना; अवगण्णमि; (जस० १,१५, १०) । १८)। अवगुंठण-न० (सं० अवगुण्ठन >प्रा० अवक्कु-न० (सं० अ-वाक्य) शब्द अवउठण) १- मुह ढकने का वस्त्र, समूह का अभाव; (भ०)। २. ढकना; (दे० ना० मा० अवश्ख-क्रि० सं० दृश्, देखना । अव अवगुण-पुं० (सं० (सं० प्रा० अवगुण). क्खए-दिखने पर (रि०; पांचवां दुगुण; (जस०, ४, २३, ५) ! - कारिय-वि० (सं०अवगुणकारिका) अव- अवक्लेर-क्रि० (दे०) खेद गुण या दोष का घंधा या व्यवसाय; (तेरि संज्ञा-खेद) अबसेरइ; (भ०) । (प० च०१६।५।४)। व० कृ०-अवखेयंत (भ०)। अवगूढं-न० (दे०) १. छल, कपट; अवगण्णइ क्रि० (सं० अव+गणय > २- अपराध; (दे० ना० मा० १, २०( । प्रा० अवगण, अवगण्ण) तिरस्कार करना अवगृह-वि० (सं० प्रा० अवगूढ) (भ०) अवगणिवि-पू० का क्रि० चिन्ता आलिगित, व्याप्त; (प० च० १७, ४,. न कर; "अवगणिवि मंडन राइउ" : ४)। चिन्ता मकर राजा ने मण्डप बनवाया; अवग्गेहि-पुं० (सं० अवग्रह) अवग्रहों (सं० ११३, १४.) के द्वारा । शरीर-प्रमाण दूरी से आकर अवगव-वि० (दे०) विस्तीर्ण; विशाल; प्रतिष्ठित व्यक्ति को प्रमाण करना अव- (दे० ना० मा० १, ३०)। ग्रह है, (रि०, नौवां सर्ग)। /प्रवंगम---(सं० अव+गम्) जानना, अवछंद-वि० (सं० अपच्छंदस्क) छन्द निर्णय करना। -हि (विधि); (जंबू० के लक्षण से रहित; (प्रा० ५० १, १०)1, १०, १०, १५) अवजसु-पु० (सं० (सं० अपयशस् >प्रा० अवगम्मन० (सं०. अवगमन>प्रा० अवजस) अपकीर्ति; (सि०.१,, १६) 1. अवगमण) दुर्गति, "तहु विद्धिएँ हम्मई अवनाढउ-वि० (दे०). सुशोभित हय अवगम्मई णित्तु लउ"-धर्म-वृद्धि 'तिरिय लोउ लच्छी अवजाढउ,' तिर्यच का इयं (प्रासांद) दुर्गतियों को नष्ट लोक की लक्ष्मी से सुशोभित; (व०.१०, करने वाला; (व० २, ६, १७)। १३, ८)। अवगह-4 (सं० अवग्रह) वर्षा-प्रति अपसा--स्त्री० (सं० अवध्या) अयोध्या बंध (व० १, ३, १२.) । नगरी; (प्रा० गु० ४, ६)। अवगाहण-न० (सं० अवगाहन >प्रा०; अवज्झाय- (सं० उपाध्याय>; - ..
अवट्ट. (५१) अवमग - . का जन्म. अंवडअ-- - प्रां० उवज्झाय, उवज्झय)... अध्यापक, श्वर) पुरुष का नाम; (भ०) । पढ़ाने वाला; (दे० ना० मा० १, ३७) । अवण्ण-न० (दे०) अवज्ञा, निरादर; अवट्ट-पु० (सं० आवतं) आवर्त; (द० ना० मा० १, १७) । (संधि० ५, ६, ६)। अवणिय-वि० (सं० अवगणित) अवउंभ-पु० (दे०) ताम्बूल, पान; अवमानित, तिरस्कृत; (जंवू० ७, ६, . (दे० ना० मा० १, ३६)। २६.)। अवठंभ-(सं० अव+/स्तम्भ >प्रा० अवतरिम-वि. (सं० अवतीर्ण) उतरा अवट्ठव, अवठंभ) अवलम्बन करना। हुआ; (प्रा० ५० २,.२१३)। भवठम्भमि-सक० (प० च० ४०, १४, अवतंस-(सं० अप+वस्)-इ (अवत: २)। सइ).क्रि० व० का० .(सं० अप+त्रस्) अवड-कि० (सं० आपद्यते). प्राप्त. डर के मारे भाग जाना; (प० च० ८, करना; (उ० व्य० प्र० २२, ११)। ११, ६)। अवड'-पुं० (दे०) कूप; (दे० ना० अवतार-पु० (सं० अवतार) जन्म-. मा० १, ५३; जंबू०६, ७, १६)। ग्रहण, मनुष्य-रूप में देवता (दे०) पक्षी आदि को लेना; (भ.०)। डराने के लिए बनाया जाने वाला पुआल अवत्तयं-वि० (सं० भ+पान+क) १- आदि का पुतला, तृण-पुरुष; (दे० ना० अपात्र; (ख० ४, ३, २) ।२- अव्यव. मा० १, २०)। स्थित, (दे० ना० मा० १, ३४) । अवडिअ-वि० (दे०) खिन्न, परिश्रान्त; अवत्य-स्त्री० १- (सं० अवस्था>प्रा० (दे० ना० मा०:१, . २१) । अवस्था) अवस्था; (जस० ४, २६, ४;. अवडुअ-पुं० (दे०) उदूखल; (दे० ना० भ०; म० १, २४, ५)। २- दशा, मा०, १, २६)। होलत, (रि०, प्रथम सर्ग)। अवण-पु० (दे०) पानी का प्रवाह; अवस्थरा-स्त्री० (दे०) पाद-प्रहार; (दे० ना० मा० १,५५) । अणिव-पु० (सं० अवनीन्द्र) पुरुष (दे० ना० मा० १, २२)। अवत्यु-न० (सं० अरस्तु) अभाव, का नाम; (भ०)। प्रवणिहर-पु० (सं० अवनिध्रः) असत्त्व; (भ०)। अवपुसिम-वि० (दे०) - संयुक्त; (दे० पहाड़; (व०.८, १५, ७)। अवरणी-स्त्री० (सं० अवनि>प्रा० ना० मा० १, ३६) अवणि) भूमि; (ण० ४, २, २)।- अवबोह-पु. (सं० अववोध>प्रा. रुह पु० (सं० अवनिरुहः) वृक्ष; (व० २, भवबोह) ज्ञान, बोध; (भ०) । १,१) । -वहो वि० अविनीत; (व०४, अवमग्ग-पु० (सं० अपामार्ग) वृक्ष- ११, १)। -सर पुं० विशेष; (दे० १, ८)। ६ - (सं० अवनी- अवहार (५६) यवाह । - १५)। . लेना; हरण करना (भ०)। पान; (दे० ना० मा० १, २२)। (सं० अवधारण) मिश्चय, निर्णय; Vअवज-(सं० उप+भुज) भोगना (जंवू० १०, २२, ३)। -हि "पावें नरयदुक्खु अवहुँहि, (जंवू० १०, ५,५)। अवहार- -(सं० अव+घारय>प्रा० अवहेर-पु० (सं० अपहार) अपहरण; अवहार) निश्चय करना, निर्णय करना। (जंवू० ६, ५, २)। -हि सक०, ग्रहण करना, "अवहारहि अवहेरि-स्त्री० (सं० अवहेला>प्रा० पहु दिवे पित्त" हे प्रभु, दिव्य चित्त अवहरि, अवहरी) तिरस्कार, वेइज्जती; वि० से इन्हें ग्रहण कीजिए, (ण. ५, १३, (प० च० २, १५, ३)। -उ ४)। (सं० अवधीरित) विचारि; (५० ४, १०, ८)। अवहारि-वि० (सं० अपहारिन् >प्रा० अवाण-पुं० (सं० आपानक) शरा- अवहारि) अपहारक, छीनने वाला; (ण. वियों की गोष्ठी; (जंबू० ४, १७, १, १७, १३; जस० १, २९, ३) । प्रवाहि-स्त्री. (सं० अवधि >प्रा० अवाय--पुं० (सं० अपाक) अजीर्ण, अनपच; (क० ६, १४, १)। अवहि, ओहि) समय की सीमा, (प० अवार--पु० (दे०) दुकान, हाट; (दे० च० १३, ६, २)। अवही-स्त्री १. ना० मा० १, १२)। ज्ञान-विशेष (ण० ६, १८, १०), २. समय अवारिउ-वि० (सं० अ+वार) तात्का- की सीमा; (सि० २, १२) । अव्य० लिक; (प० च० ६, २५, १३) । अवार- अभी; (को० ३, ४२) । अवहिए-अव मन्य० शीघ्रता से; (प० च० '५, २, धिज्ञान; (जस० ४, २६, २)।-गाणि ५) । -वि० अवधिज्ञानी; (० (व० १०, ४०, अवारियं -वि० (सं० म+वारित) रोक या प्रतिबंध मुक्त; (व० ४, ११, २)। ३)। -त्त वि० (सं० म+विभक्त) अविभाजित; (जंवू० २, ५, ६)। अनालुया-स्त्री० (दे०) १- ओष्ठ का प्रांत भाग, २- मुख के दोनों ओर के अवहोई-स्वी० अवधि; (महा० ६८, २, कोने; (दै० ना०मा०.१, २८)। १०)। अवास- (सं० आ/वस्) रहना (उ० अवहीर-(सं० अव+धीरय) तिरस्कार प्र० ५२, ४ । अवासियउ-क्रि० करना । अवहेरिउ-सक०, भू०का० अवग- भू० का० (सं० प्रा० आवास, सं० आ णना की, तिरस्कार किया, अवहेलना Vवस्, अववसत्) निवास "खंधावारू गवासियत. 'जेत्तहि, जहां की; (ण० ३, ६, १०)। पर सैन्य का पड़ाव था या छावनी रह अवहेरे वि-पू०का० कि० तिरस्कार रही थी; (सि० २, १५, १):। कर; (प० च०२८, ११, ६) प्रवाह-वि० सं० अवाघ). बाधा, प्रवहीसर-वि० (सं' अवधीश्वर) रहित, "हउँ देमि परित्ती तुह अवाह" मैं तुझे बाधा से रहित (कर' आदि अवधिज्ञानी (जस०४, २२, १३) । की) भूमि दूंगा। अवहेम-वि० (दे०) दया-योग्य, कृपा अवि-अव्य० (सं० अपि >प्रा० अवि) व्य किया, अविअ.. ( ५७ ) अविरह . - भी (को० २, १००)। अविन-वि० (दे०) १- उक्त, कथित; (दे० ना० मा० १, १०) । २- रक्षित (दे० ना० मा० ५, ३५) । अविभाह-वि० (सं० अवितृष्ण) अतृ- प्त; (प० च० ३४, ५, ८)। अविआणि-वि० (सं० अविज्ञायक >प्रा० अविजागय) अविज्ञात, अन- जान; (प० च० २०, ७, ६)। अविउल-वि० (सं० अविकल) जो वेचन न हो; (५० च० २, १२, १)। अविओल-वि० (सं० अविकल >प्रा० अविउल) १- जो उद्वेग-युक्त न हो, अनु- द्विग्न; (प० घ० ४, १२, ८) ।२- अखिन्न; (प० च० ४६,१३, ७) । प्रविषखरण-न० (सं० अवेक्षण>प्रा० अविक्खण) अवलोकन, निरीक्षण; (भ०)। अविग्घ-वि० (सं०, अविघ्न) बाधा से रहित; (जंबू० १, १८, ७) । अविचल-वि०.(सं० अविचल) अथल; (भ०; प० च० १०, ४, १)। प्रविचितिउ-वि० (सं० अविचिन्तित) अचिन्तनीय (उत्तम), "अविचितिउ विइ- रयइ सुवणखलहँ,', समस्त खलजन भी उत्तम कार्य करने लगते हैं; (व० ४, १२, ५) । अविज्ज-स्त्री० (सं० अविद्या) अज्ञान; (जंबू० ३, ८, १३)। अविठ्ठ-वि० (सं० म+विनण्ट). जो नष्ट न हुआ हो; (जंबू० ८, ४, १२,)। अविणउ-पु. (सं० अविनय >प्रा० अविणय) शिष्टता या. शालीनता का अभाव; (व. ५, १, १६) । (भ०) । अविणय; अविणयवइ,-अविणयवर-पुं० (दे०) जार, उपपति; (दे० ना० मा० १, १८)। अविरणास-पु. (सं० . अविनाश) क्षय या. बर्वादी का न होना; (भ०)। अविणीय-वि० (सं०. अविनीत) जो विनम्र न हो; (जस० १, २०, २) । अपितत्तअ-वि० (सं० अवितृप्त) वेश्याजन; (जंबू० ६, १२, ८) । अविभाइ-वि० (सं० अविभाग) अवि- भागी, जिसके टुकड़े न हो सकें, (व० १०, ३६, ११)।. प्रवियड्ठ-वि० (सं० अविदग्ध >प्रा० अवियड्ठ) अनिपुण; (जस० ३, ४, ६)। 'अवियाणअ-वि० (सं० अविजानत् > प्रा० अविजाणय, अवियाणय) अज्ञानी; (जस० १, ११, १४)। अवियार' (सं०. अविचार) बुरा विचार, (भ०)। अवियारिय-वि० (सं० अविचारित) जिस पर विचार म किया गया हो; (भ०)। अवियारें- (सं० अविचारेण) बिना किसी विचार के, शीघ्रता से; (प० ० च० ५, ८, ३)। प्रवियार'-पु० (सं० अधिकार) हक, वह शक्ति जो किसी को कानून अपने पद, मर्यादा अथवा योग्यता के कारण प्राप्त हो; (भ०)। अवियारिय-वि० (सं० अविचारित) जिस पर विचार न किया गया हो; (जंबू० १०, ४, ७)। अधिरइ-स्त्री० (सं० अविरति >प्रा० - अविरुद्धन (५८) अवेकख अविरइ) १- अविच्छिन्नता; (क० ६, १२, ४) । वि० अविरत; (व० ६, १४, १)। अविरुद्धम-वि० (सं० अविरुद्ध) निर्दोप; (जंवू० १०, २०, १०)। मदिरोल-वि० (सं० अविरल) लगा- तार (सुदं० ३, ४, ७)। अविलासबंक-दि० (सं० अ-+विलास वक्र) स्वभाव से सुन्दर; (जस० १, १७, २०)। अविलंव-कि० वि० (सं० अविलम्ब) विना देर के, (जंबू० ३, ८, १३)। अविवंक-वि० (सं० अ+वि+वक्र) अति सरलं; (जस० १, १५, ६) । अविवाय-पु० (सं० अविपाक) १- अपरिपक्व होना, २- अपाचन; (क० ६, १४, १०)। अविवेह-वि० (सं० अविवेकी) अज्ञानी; (जंबू० ७, ८, १४) । अविसट्ट-वि० (सं० अविसृष्ट) अस्य- क्त, "तेहइवि कालि अविसट्टमोह" (भ० १४, १४, ५)। अविसन-वि० (सं० अविषण्ण) प्रसन्न, जो खिन्न या उदास न हो; (भ०) । अविसाय-पु० (सं० अ+विपा> प्रा० अ+विसाय) प्रसन्नता; (जंबू० ११, १५, ३)। प्रविसिठ्ठय-वि० (सं० अविशिष्ट प्रा० अविसिट्ठ) साधारण; असभ्य; (भ०)। अविसुद्ध-वि० (सं० अ+विशुद्ध> प्रा० ब+विसुद्ध) निर्मल, निर्दोष; (भ०)। प्रविहंग-वि० (सं० प्र+वि+भंग) अमंग, "एयई धम्महो अंगई, जो पालइ अविहंगई' -जो अभंग रूप से इन धर्मों के अंगों का पालन करता है; (ण० ६, १०, १५)। अविहत्व-वि० (सं० अविभक्त >प्रा० अ+विभत्त, विहत्त) जो बांटा हुआ न हो; (भ०)। अवि हाय-पु० (सं० अ+विभाग> प्रा० अ+विभाग, विभाय, विहाय) पूर्ण, अविभाजित वस्तु; (भ०) । अविहायउ-वि० (सं० अविभाग) अविभागी (वंश); (जस० ४, १२, ७)। अविहावि-वि० (दे०) १०.दीन, गरीव, २- मौन; (दे० ना० मा० १, ५६)। अधिहि-स्त्री. (सं० अवधि) अन्याय; (व० १, १, ७)। अविहिण्ण-वि० (सं० अविभिन्न अभिन्न; (जस० ४, ४, १३)। अविही-स्त्री० (सं० अविधि) कुपथ; (व० १, १, ७)। अविहेड-वि० (सं० अविधेय) न किये जाने योग्य; (व० ६, ३, ९)। अबुझिय-वि० अमात; (प० च० १६, ५, ४) । अबृह-वि० (सं० अबुध>प्रा० अवुह, अयुह) अनजान; (प० . च० १,३, १२)। अबे-अव्य०, अव; (को० ३, २४)। अवेरख-स्त्री० (सं० अपेक्षा>प्रा० अवेकखा) आकांक्षा, इच्छा; (जंबू०६, - अवेक्खिणी (५६) असच्च - करना। अर्थ का खेद; - १२, १७)। असंहनं-पु. (सं० अ+ सम्भ्रम) व्या. अवेविखणी-वि० सं० अपेक्षिन् > कुलता या घबराहट न होना; "कारणं न अवेक्खि) अपेक्षा करने वाली; (ण० १, यारिणमो असंहम"; (भ० ४, ७, ११)। १६, ८)। अस-वि (सं० ईदृश) ऐसा, इस प्रकार अव्वा-स्त्री० (दे०) माता, जननी (दे० का; (को०२,१७) २. पुं० (सं० अश्व > १, ५)। प्रा० अस्स)घोड़ा; (प्रा० ५० १, २५) । अव्वुअ-पु० (सं० अर्बुद) देश-विशेष; Vप्रस-(सं० अश्>प्रा० अस) भोजन (प० न० ४५, ४, ५)। प्रजो-अव्य० नीचे के अर्थों में से, प्रसइ-सक० (सं० अश् >प्रा० अस) प्रकरण के अनुसार, किसी एक भोजन करना, खाना; (प० च० १६, सूचक अव्यय-१- सूचना, २. ७, ३) । असमि-कि० खाना; (क० ६, (ण. ३, ७, १) । ३- मात (सम्बोधने) ६, २) । (सुदं० ८, ४, १)। प्रसई-स्त्री० (सं० असती>प्रा० अष्खर-० (सं० अक्षर>प्रा० असई) कुलटा, व्याभिचारिणी स्त्री; अक्खर) अक्षर, वर्ण; (को० २, ४५) । (जस० २, ६, १६, हे० ३६६, १)। असंक-वि० (सं० अशक>प्रा० वेश्या (जंवू० १०, १०, ७) । असंक) असंदिग्ध; (जस० १, ७, ६) । प्रसइ-अव्य० (सं० असकृत) अनेक असंकिस-वि० (सं० अङ्कित वार; (भ०)। शङ्का रहित, (जस० ४, २४, २)। असईयल-स्त्री० (सं० असती+जन) असंखु-वि० (सं० असंख्य>प्रा० कुलटा, व्याभिचारिणी स्त्री; (क० १०, असंख) संख्या-रहित; (सुअंध० १,८, ६, ६)। १२)। असक्क-वि० (सं. अशक्त>प्रा० असंगय-न० (दे.) वस्त्र; (दे० ना० असक्क) (१) असमर्थ; (प० च० १६, मा० १, ३४)। ८, ८) । (२) अशक्य, असम्भव; (को० असंझहि-अव्य० (सं० अ+सन्ध्या) ३, १५८) । ३. अशङ्क; (प० च० ५१, सन्ध्या पूर्व; (को० २, २५३) । ७, १) । असंतु-वि० (सं० असन्त) दुष्टतापूर्ण; असगाह-पुं० (सं० असदाग्रह >प्रा० 'णय-रहिउ असंतु वि पहु अजुत्त' असगाह, असग्गह, असग्गाह) दुराग्रह; अथवा न्याय नीति रहित असंत एवं कदाग्रह; (प० ५० २१, १०, ६; सुदं० अयुक्त (कार्य करने वाले) प्रभु; (व० ५, ३, ३, ६)। ३, ११)। असच्च-(सं० असत्य >प्रा० असच्च) असंभव-वि० (सं०. असम्भव) जो असत्य, झूठ; (जस० २, १६, ६; ण० सम्भव न हो; (जंबू० १०, ३, ६)। ६, १३, १५) असच्चु (चं० १, ६)।
असच्चि (६०) असमाहिल्य -- अथवा *- - असच्चि-वि० (सं० असत्मा असती) १- भूठी, २. जो सती या पति- व्रता न होः (प० च० १५, १४, २)। असज्झ-वि० (सं० असाध्य) १- दुष्कर, २. न होने योग्य; (क० ३, १६, ७)। ३- असाध्य; (जस० १, ८, २) । असछ--वि० (सं० अशस्तम् =अप्रशं- सित, असराहनीय) निषिद्ध या बुरा, "लइ अज्जुवि किज्जइ अंतसठ्ठ;" (भ०)। असड्ढलअ-वि० (सं० असाध्य+क) जो सम्पन्न न किया जा सके या पूरा न किया जा सके; (सुदं० ८, ४१, ३) । असड्ढलु-वि०, असाधारण, अनुपम; (हे० ४२२, ७)। असण-वेल-स्त्री० (सं० अशन+ वेला >प्रा० असण+वेला) भोजन का समय; (प० च० २५, ११, ६)। असणिघोष-पु? (सं० अशनिघोप) विधाद्यर योद्धा; (व० ५, १८, ६)। असणिवेय-पुं० (सं० अशनिवेग) व्यक्ति-विशेप का नाम; (भ०)। असणु-न० (सं० अशन >प्रा० असण) भोजन, खाद्य पदार्थ; (हे. ३४, १, २)। असणेह-पु. (सं० अ+स्नेह) अप्रीति, प्रेम का अभाव; (भ०)। असण्णि-वि० (सं० अ+संज्ञिन्) अचे- तन; (जस० ४, १६, २) । असन्न-वि० (सं० असंज्ञ). संज्ञाहीन;(भ०) ! असत्य-वि०.१-(सं० : अपशक्त>प्रा० असत्त) असमपं; (क० ४, १३, ३) । २- वि० (सं० अस्वस्थ>प्रा० असत्य) जो स्वस्थ न हो; (भ०) । असन्त-वि० (सं० अशान्त >प्रा० अ+ सन्त) क्रोध-युक्त, जिसमें क्षोभ, चिंता, दुःख, उद्वेग आदि हों; (भ०) । असन्ति--स्त्री० (सं० अशान्ति >प्रा. अ-+-संति) मन की वह अवस्था, जिस में क्षोभ, चिन्ता, दुःख आदि हों; (भ०)। अस-पष-पुसं० आस्य (मुख, सामने) >प्रा० आस>अस । पाच (=वगल)>पास>पस) आस-पास में; (को० ४, १२०), असमंजसु-वि० (सं० असमञ्जस) अस्पष्ट, असंगत "चरिउ णिरंकुसु निरु असमंजसु"; ( (व०४, ११, १)। असम-वि० (सं० प्रा० असम) अस- मान; (भ०)। असमच्छर-स्त्री० (सं० अप्सरा) अनुपम अप्सरा; (सुदं० १, ४, ८)। असमत्त-वि० (सं० असमाप्त) जों समाप्त न हुआ हो; (जंवू० ८, ६, ७)। असमत्य-वि० (सं० असमर्थ>प्रा० असमत्य) असमर्थ; अशक्त; (सं० रा० २, ८०-८१)। असमद्धय-वि० (सं० असमृद्ध) दरिद्र; (म० २, १६, ७)। असमारण--वि० (सं० म+समान) जो बरावर न हो; (जस० २, ३३, ६)। असमाणिय-वि०, ससमाप्त; (भ०)। असमाहि - वि० असामयिक; (प० च० १६, ६, ३)। असमाहिल्य-वि० (सं० अ-समाधि+ इल्ल (मत्वर्थीय) समाधि रहित; (जस० असम- -- .
असम्मय (६१) असि बहुत, - . -पालन १, १६, ५)। असम्मघ-वि० (सं० अ+सम्मत) सह- मत, स्वीकृत, माना हुआ; (भ०) । असरण-वि० (अशरण >प्रा० असरण) निराश्रय; (क० ६, ७, ११)। - (असरण) वि० (सं० अशरंण) निरा- श्रित; (प्रा० ५० १, ६६) । प्रसराल-वि० १- (अजस्रतर) लगा- तार; (रि०, प्रथम सर्ग) २- प्रचुर; (प० च० २, १६, ४; ३५, १४, ३)। ३- स्त्री० (सं० अश्वशाला>प्रा० अस्स+माला. साल) अश्वशाला; (सि० १, ३६) । ४- वि० कराल; (सुदं० १०, ६, १५) ५.. क्रि० वि० कष्टपूर्वक, "परिपालेवियु मुउ असराले, कर कष्टपूर्वक मरा, (व० २,१६, १०)। असरासई-न० (दे०) दुष्टाश्य; (व० ५, २१, १३)। प्रसरिस-वि० (सं० अ+संदृश) अस- मान; (ण० ३, १७, ८) । असरिसु; (विला.)। असरीर-वि० (सं० अशरीर) विना देह के; (भ०)। असलेष-स्त्री० (सं० 'आश्लेपा) नवें नक्षत्र का नाम; (प्रा० गु० . २४, ३) असवार-पु. (सं० अश्व+वार) घुड़- सवार; (जंवू०६, ५, ७)।. असहना-वि० (सं० अ+सहन >प्रा० असंहण) असहिष्णु, ध, सहन न करने वाला; (को० ३, ३०) । असहन्ती-कृ० असहमाना; (भ०) । असहन्तु-कृ०- सहन न करता हुमा; (प० . च०.११, ११, १) । असहंतउ-कृ०, सहन न कर (क० २, १२, ४) । असंहाय-वि० (सं० प्रा० असहाय) सहायता-रहित; (भ०)। असहिय-वि० (सं० अ+सह्य) जो सहन न किया जा सके; (जं० ६, ७, २)। असाए-पु० (सं० असात् >प्रा० अप० असाय) दुःख, पीड़ा; (की० ४, ६३)। प्रसामण्ण-वि० (सं० म+सामान्य > प्रा० असामण्ण, असामन्न) “जो सामान्य न हो; (जस० ४, १७, २०; ण० २, ११, ७) । असारम-पि० (सं० असारक) सार- हीन; (जस० २. २५, १०)। असारत्त-वि० (सं० अ+सारत्व) सार-हीनता; (जस० ४,२४, ३) । असालिय-वि० (सं० असारक) निस्तेज; (सुदं० ११, २०; २३) । असासय-वि० (सं० अशाश्वत >प्रा० असासय) अनित्य; (भ०)। असि'-पु. (सं० प्रा० असि) तलवार; (प० च० २,८, २, ८, ६)। -धाय पुं० तलवार कीचोट; (जंबू० ६, १, १६) । -घेणुय, स्त्री० (सं० असि+घेनुका) छुरी (जस० २, २६, १०)। -पंजल-पु० लोहे का पिंजड़ा; (व० १, १४, ७)।- फरू पुं० असिफल शस्त्र; (व० १, १२, '१३) । -लय स्त्री० (सं० असि+लता) खड्ग-लता, तलवार; (क० , २, ३, १०)।-वत्त, पु० (सं० असि-- पत्र> प्रा० असि-पत्त) तलवार (ण० ८, १५, १०) । -वर पुं० श्रेष्ठ तलवार (सि '. .
असि (६२) असुहरण 4० १, हसत्य २, २३)।-यपक्खु-पु. (सं० असित +पक्ष) कृष्णपक्ष; (रि०, छठा सर्ग)। असि'-वि० (सं. अशीति >अध मागधी असीइ) अस्सी; (प्रा० १७) । असी (प्रा० पैं० २, १४५) । असि-कि.० (सं० अस्ति) है; 'कयात्या- सि'-कृतार्य है; (जंबू० ६, १, २) । असिद्ध-वि० (सं० प्रा० असिद्ध) मनि- पन्न, अनुपलब्ध; (जंबू० ६, ४, १२) । असिगाहिणिहे-वि० (३० गृहीत, असत् को पकड़ने वाली, (रि०, नौवां सर्ग)। असिय-न० (दे०) दांती; (दे० ना० मा० १, १४)। असिरिव-वि० (दे०) निघंन (भ० ११, ६, १२)। असिहम-वि० (सं० मसिद्ध) अप्राप्त; (जंवू० ६, १०, २२)। असो-स्त्री० (सं० अशीति) सख्या विशेष, अस्सी; (प्रा० गु० ५, २७) । असीस-स्त्री० (सं० आशिप्>प्रा० आसी, आसीसा) आशीर्वाद; (सि० २, २२; ण० ६, ४, १०)। असीसा (प० च० २८, १२, ३)। असु-पु. (सं० प्रा० असु) प्राण; (व० १०, २५, २)। (सं० अशुचि>प्रा० असुइ) अपवित्र, मलिन; (क० ६, २, १)। असुउ-वि० (सं० प्र+श्रुत) नहीं सुना हुआ; "असुउ असंभउ अच्छरिउ," (भ० ५, ६, १०)। असुत्त-वि० (सं० अ+सुप्त) जो सोया हुआ न हो; (जंवू० १०, ६, ४)। अनुत्तउ-वि० (सं० अ+सूत्र) विना धागे के; (ण० ५, ८, १४)। असुबउ-वि० (सं० अशुद्ध>प्रा० अशुद्ध) १. असुद्ध, २. दुष्ट; (प्रा० ५० १, ११६) । अतुन्दर-वि०, (सं० अ+सुन्दर) अ- सुहावना, अमनोहर; (प० च• ३, ७, ४)। असुमे:-पुं० (सं० अश्वमेघ) अश्वमेघ यज्ञ, (सि० १, ६, ८)। असुर-पु० (सं० प्रा० असुर) दैत्य; (प्रा० ५० १, १०१)। असुरत्तण-पु. (सं० असुरत्व) दानव- पन; (भ०)। मसुरत्याण-पु० (सं० मसुर+स्थान) असुर का स्थान; (ण० ५, १२, ११)। असुरमन्ति-पुं० (सं० असुरमन्त्रिन्) शुक्र, व्यासपुत्र शुक्रदेव का नाम; (प० च० २, ३, ६)। असुह-वि० (सं० अशुभ) खराव, असु- न्दर । न० अनिष्ट । (जस० २, ३३, २)। असुहत्त-पु. (सं० अशुभत्व) अनिष्ट होने का भाव; (क० ६, २०, २१,)। असुहर-पु० (सं० असुधर) प्राणी (व० १०, ३५, १३) । पुं० असुहरग्राम; (व० १०, ४१, ४)। मसुहरण-पुं० (सं० प्रा० असु (प्राण) +हरण> प्रा० असु पुं०+हरण न०) प्राण-हरण (जस०. १, १५, ११)। असुइ-वि० असुहाई ( ६३ ) अहद्द , असुहाई-वि० (सं० अशोभनीय) अशोभनीय, "जा राएं असुहाई गणिया" -जिसे राजा ने अशोभनीय गिना था, (क० ४, १४, १)। प्रतुहारि-वि० (सं० अशुभ+कारिन) अशुभ करने वाली; (ण० ८, १०, ६)। असुहावउ. -वि० (सं० अशुभ >प्रा० असुह) असुहावना; (क० २, १० १०)। मसुहावणय-(सं०. अशोभन>प्रा० असोभण) खराब, असुन्दर; तुल० गु सोहामणु; (प० ५० ३, ७, ४) । अतुहाविय-वि० (सं० असुखापित) स्वादरहित; (जंबू०.१, ७, ६)। असुहासिया-वि० (सं० अशुभाश्रित) अनिष्टं पर आधारित; (40 ३,८, ७)। असुहु-न० (सं० अशुभ) मशुभ, दुःख, पाप-कर्म (व० ६, १८, २) । असेव-स्त्री० (सं० अ+सेवा>प्रा० अ-+सेवा, सेव) सेवा न करना; (भ०)। मसेस-वि० (सं० अशेष>प्रा० असेस) निःशेष, सर्व; (जस० १, ८, ५; रु० २, ८, ३) । अतोप्र-वि० (सं० अशोक) शोकहीन, (रा० ३६) । असोय; (ण २, ११, असोहण-वि० (सं० अशोभन > प्रा० असोभग) शोभा-हीन, खराव; (ण० ३, ६, ७)। अस्स-पु० (सं० अश्व >प्रा० अस्स) घोडा; (जस० १, २६, २६; की ३, ७१)। अस्सवार-पु० (सं० अश्ववार) घुड़- सवार, अश्वारोही, (को० ३, ७१) । अहं-सर्व० (सं० अहम्) मैं; (जं० १, १८, १)। अहंग-वि० (सं० अभंग) अखंड, अटूट, पूर्ण; (क० १, ४,. ३; ण ३, ६, १५)। -इ.स्त्री० (सं० अघमगति) बुरी या निकृष्ट दशा; (व० १०, ७, १२)। अह-न० (सं० अघ>प्रा० अह) १- पाप; (ण० २, ३, १८) । २ दुःख; (दे० ना० मा० १, ६)। अह-अव्य० (सं० अष>प्रा० मह) (१) अथवा, "कि जीवइ अह किं सो मुयउ"- (क० ७, १४, ८) । (२) इस प्रकार; (हे. ३३६) । (३) इसके वाद; (प्रा० ५० १, २२)। अहगार-वि० (सं० अध+कार) पापी; (ग० ३, २, ११)। महचरिय-पु० (सं० अधश्चरित)> प्रा० अह+चरित्त न०) नीच वृत; (जस० ४, २३,५) । अहरिणसु-अव्य० (सं० अहनिश>प्रा० अहण्णिस, अहन्निस) दिन-रात, सर्वदा; (सि० १, ३१, ८) । अहण्णिसं; (प्रा० ५० २, १२०)। महद्द-अभ्य० (सं० अप+मन्द>प्रा. १५)। असोय-पु. (सं० अशोक >प्रा० असोग) वृक्ष-विशेप;. .(जस०३, १७, २) । असोम पु०-वृक्ष-नाम; (प्रा० ५०, २, १६३)।
अहम (६४) . अहि , - अह+अद्द) वर्ष बाद; (ण. ६, २१, २३)। अहम-वि० (सं० अधम >प्रा० अहम) अधम, नीच; जस०३, ३१, ४; ण० ४, ३, ५)। महमिदामर-पु० अहमिन्द्र देव; (व० १०, ३३, ६)। अहिमुख-पु० (सं० महिमुख) सपं- मुख; (३० ७, १२, १०)। वि० (सं० अभिमुख > प्रा० अभिमुह) संमुख, सामने स्थित; (व० ५; १७, ५) । प्रहम्म-पु० (सं० अधर्म>प्रा० अध- म्म, महम्म) पाप-कार्य, निषिद्ध कम (क. १०, २२, ४; सुदं० ८, ३१ ७; ण० ३, २, १०)। अहयर-वि० (सं० अधस्+चर) पापी, पापाचारी; (जस० ३, २०, ३)। अहर-पु० (सं० अधर>प्रा० ४ हर) होठ, ओष्ठ; (ण० ८, १३, १४; की० ३, ३४; क० २, १४, ५)। वि० अधम (जंवू० ६, १२, १२) । अहरु (हे. ३३२, २; रा० २)।-गु (सं० अधर-+ अग्र>प्रा० अहर+भग्ग) अघर का अन भाग; (ण० ५, १, ११)।-त पु. (सं० अहोराद) दिनरात; (व० १०, ७, १४)। -मुद्द-स्त्री० अधर भुडा (जंबू० ४, १३, ७)। प्रहरषि-पु. (सं० अपर+विम्ब) होठ का प्रतिबिंब; (जंवू० २, १५, १५)। अहरम्म-वि० (सं० अभिराम) सुन्दर, मनोहर; (भ०)। अहरोवाहि-स्त्री० . (सं० अधर+ उपाधि) सन्निधि, नकट्य; (जंबू० १, १०, ४); अहल-वि० (सं० अफल >प्रा० अहल) निष्फल; (जंबू० ८, १४, ४)। अहवइ-संयो० (सं० अथवा>प्रा. अहवा) या, अथवा; (प० च० १३, ४, ४)। अहंवा-अध्य० (सं० अथवा>प्रा० अहवा) अथवा; (ण० ३, १२, ३; ५० च० २०, ८, ३; सि० १, १५) । महव्या-स्त्री० (दे०) असती, कुलटा स्त्री; (दे० ना० मा० १, १८)। प्रहह-अव्य० (सं० प्रा० अहह हा, हा इन अर्को का सूचक अव्यय--१- खेद, आश्चयं, २. दुःख, (को० ३, ११२) । अहाती-क्रि० (सं० आमाषिताः, सं० आ+भाप्>प्रा० आभास, आहास) कही गई है, "चउविह जुवईजाइ अहासी,” युवतियों को जाति चार प्रकार की कही गई है; (सुदं० ४, ५, ६).। अहि-अव्य (सं० अधि) इन अर्थों का सूचक अग्यय--१- अधिक्य, २- अधि- कार, ३- ऐश्वर्य, ४, ऊँचा; (भ०) । अहिंस-न० (सं० अहिंसन>प्रा० अहिंसण) अहिंसा; (जस०)। अहिंसा; (भ०)। अहि-० (सं० अहि) षट्कल गण का नाम'। -टि० षट्कल के तेरह भेद होते हैं-हर, शशि, सूर, शक्र, शेष, अहि, कमल, ब्रह्मा, कलि, चंद्र, - -- ध्रुव, धर्म, अहि .. (६५.) अहिमुख १ : शालिकर; (प्रा० १० १, १५)।-गण ष्ठित; मुणिवर तवतेयाहिउ, (भ० पुं० पंचकल गण के. एक भेद का नाम; १८, ६,११) । (छंदशास्त्र में प्रयुक्त); (प्रा० पै०-१, अहिट्टिन-वि० अधिष्ठित; (जंबू० ४, अहि'-० (सं० प्रा० अहि) १- शेप- अहिणंदन-पु० (सं. अभिनन्दन) नाग, २- मर्प; (की० ४, ६७; रा० चतुर्थ तीर्थकर-नाम; (जस० १, २, २)। ६)...२- अव्य (सं० अथ) तव; (प० अहिणं दिल-वि० (सं० अभिनन्दित च० १३, ६, २)। >प्रा० अभिणंदिय, अहिणंदिय) जिसका अहिल-अव्य० (सं० अधिक) ज्यादा; अभिनन्दन किया गया हो वह; (ण० ३, (जस० १,२७, ८) अहिउ-वि० (सं० ६, ४) । (जंबू० २, १३, १) । बहिणं- अहित>प्रा० दिय; (ण० ३, ६, ४) । अहिय) अहितकारी; लो०-“अहिउ णिस- अहिणव-वि० (सं० अभिनव>प्रा० गंउ वइरे लग्गज । ण समइ सामें पय- अहिणव) नूतन, नया; (ण० ७, ८,८; णिय कामे, अर्थात स्वभाव से ही हित- ५० च० १३, ६, ६)। कारी तथा शत्रु कर्मों में लगा हुआ अहिणाण-न० (सं० अभिज्ञान >प्रा. व्यक्ति प्रम अथवा सामनीति के प्रदर्शन अहिष्णाण, अहिणाण) पहचान, प्रत्या- से शांत नहीं हो सकता; (व०४१७, १-२.)। स्मरण: तुल० गुः एवाण; (ण० २, अहिवखण-न० (दे०) उपालंभ; (दे० ११, २; प० च० १६, १, १४) । 'अहि- ना० न० १,३५)। नाणं, (साये १, ३, १३)। अहिखित्तु-वि० (सं० अधिक्षिप्त >प्रा० अहिणाणिय-वि० (सं० अभिज्ञानिक) अहिदिखत्त) १- क्षिप्त, फेंका हुआ, २. अभिजात; (जस०४, १२, १५) । "अरिदमणे भडु जं. अहि: अहिणूण-वि० अन्यून; (व० १०, ३ 'वित्त;" (५० च० ३१, १०, १) । अहिगम-पु० (सं० . अधिगम) प्राप्ति; नहिन्हि-वि० सं० अहितकारिन्, शन्न; (की० १, १०१)। (दे० ना० मा० ७, १४) । अहिनाण-न० (सं०: अभिजान>प्रा० अहिचंद-पुं० (सं०-. अभिचन्द्र) नाम- अहिणाण) पहचान, प्रत्यास्मरण; (प्रा० विशेष; (ण० ७, ११, ३) । . गु० २, ३, १३)। अहिछत्त-पु. (सं० अहिच्छन्न) नगर- अहिभवण-पुं० (सं०. अहि+भदन) नाम; (जस० ४, २, ४) । नागमंदिर (जंवू० ३, १३, ३) । महिजलंण-पु० (सं० अभिज्वलन) अहिमाण-पु० (सं० अभिमान्) गर्व, जलना, “णं कोबसई महिजलेणलिंग,". घमण्ड; (ण० : १, २,०२, को०.३, ८४)। मानो शेषनाग के क्रोधवश जल उठने के अहिमार-पु० (दे०). वृक्ष-विशेप; चिह्न हों, (क० ४, १४, २) (जंबू० ५, ८, ६)। अहिछ--वि० (सं० अधिष्ठ) अधि अहिमुख-वि० (सं० अभिमुख), किसी त्यागा हुआ, २)। .
(भः अहिय (६६) अहिसारिया की ओर मुड़ा हुमा, सामने; (ण० १, अहिलासिप्र-वि० (सं० अभिलपित) १०, १) । अहिमुहेंण-वि० किसी की इच्छिन, चाहा हुआ; (ण० ६, २, ६) । ओर मुख किए हुए; (प० च० १२, ५, प्रहिलासी-वि० (सं० अभिलाषिन् > ३) । अहिमुह; (भ०) । अहिमुहिहूआई प्रा० अभिलासि) चाहने वाला, इच्छुक; क्रि० (सं० अभिमुख) अभिभुख होना; (जंबू० ४, १४)। (प० च० ८,१)। प्रहिव-पु० (मं० अधिप>प्रा० अहिय-वि० १- (सं० अधिक) वहुत, अहिव) राजा, प्रभु, शासक; ज्यादा; (भ०)। २- पुं० अहरनाथ, जस० ४, २, ४)। नाम-विशेप; (व० १, अधिपति>प्रा० अहिवइ-पुं० (सं० १, ११) । ३- (सं० अहित) शत्र ; (व० ६, ३, ३)।- अहिवइ) राजा, भूप; (ण. १, ७, ६)। शिरोहिणी- स्त्री० (सं० अहितनिरो. अहिवन्दण-पुं० (सं० अभिवन्दना> प्रा० अभिवंदणा) नमस्कार, प्रणाम; (प० धिनी) अहितनिरोपिनी नामक विद्या; च० २६, १, ६) । (० ४, १८, ११)1 -यर वि० अनेक अहिवर-लुलिस-स्त्री. (सं० अहिवर- विध हितकारी; (३० १, १, ११.) । लुलितं) सांप को लीला या गमि; (प्रा० अहिपरिवि-पू० का क्रि० (सं० अधि- पं० १, ६२)। रुत्य) अधिकृत करके; (भ०) । अहिवर-पुं० (सं० अहिवरः) दोहा पहियारिय-वि० (सं• अधिकारिक) छंद का भेद; (प्रा० ० १, ८०)। अधिकार-संपन्न; (जस० १, ८, ५) । अहिवास-पु० (सं• अभिप्राय) आशय, अहिरास-० (सं० अधिराज) प्रभु उद्देश्य, प्रयोजन; (सुदं० ४, ५, २) । सत्ता प्राप्त, सम्राट; (ण० १, ६, २)। अहिवायण-पु? (सं० अभिवादन) अहिराम-वि० (सं० अभिराम) मनो प्रणाम, नमस्कार; (भ०)। हर, सुंदर; (क० ३, ५, ७) । अहिवाल-पु. (सं० अभिपास) रक्षक; अहिराय-० (सं० अधिराज) महा- (भ०) राज; (भ०)। अहिवासु-पुं० (सं० अधिवास) रहने महिल-वि० (सं० अखिल) सम्पूर्ण; की जगह; (म०)। (व० ८, ८, ८) । अहिदि-वि• (सं० अविधवा) सधवा, अहिलस-(सं० अभि+लए >प्रा० सौभाग्यवती, सुहागिन; (प्रा० गु: २५ अभिलस, अहिलसइ) अभिलापा करना । ८) -इ सक० (भ०) । महिलसहि-क्रि० अहिषेक-पुं० (सं.० अभिषेक >प्रा० २० अभिलाषा करते हैं; (क० ५,१, अभिसेम) राजा के, १२) अहिलसंत-कृ० (सं० अभि+लए करना; (को० ४, २५५) । +श) (जंवू० ६, १०, २१) । पहिसारिया-स्त्री० (सं० अभिसारिका अपिलास-पु० (सं० अभिलास ०) नायिका का ऐक नेद; (जंवू० ८, १५, इन्छा, कामना; (भ०)। १) । : पद पर आस्त -- ..
अहिसिंच (६७) आंग अहितिचइ-क्रि० (सं० अभिपिञ्चति) अहों-अव्य० (सं० प्रा० अहो) दीनता अभिषेक करना, जल छिड़कना; (भ०)। एवं कुतूहल सूचक अव्यय; (प० १० १, अहिसिञ्चे वि-पू० का० क्रि०, अभिषेक १२, ६; की० २, २३८) । अहो-अव्य० कर; (प० च० १४, ६, ३) । संबोधने (जस० १, १८, १८); पुं० अहिसिंचिउ-क्रि० ° भू० का० (सं० (सं० अहः, अहन्) काव्य छंद का भेद; अभिसिञ्चित) अभिषेक किया गया, "जो (प्रा० ५० १, ११४) । सुरसरिसिधुहि अहिसिंचिउ,”—जिसका अहोगइ-स्त्री० (सं० अधोगति) पतन, गंगा और सिन्धु नदियों से अभिषेक दुर्दशा, (जस० २, २, ३)। किया गया; (व० २, १३, ७) । अहोड-कि० (सं० आहोडति, महो- अहिसेउ-पुं० (सं० अभिषेक) राज्या- डति वा) जाना; (उ० व्य० प्र० ४६- भिषेक; (ण० ६, २३, ८)। १०)। अहिसेप-पु. (सं० अभिषेक) राज्य- अहोमुह-वि० (सं० अहोमुह-वि० (सं० अधोमुख) नीचे तिलक करना, (जस० ४, ७, ४) । मुह किए हुए; (क० २, ३, ५) । अहो. अहिसो रबि-पू० का० कि० (सं० मुहूं (व० ४, २१, ४)। अभि+सारय्) जुलूस के रूप में अहोयर-वि० आश्चर्यकारी; (जस० ४, बाहर ले जाकर; (५० च० ५, १६, ७)। २४, ४)। वस्त्र, अहिहषिय-वि० सं० अभिभूत) प्रहोरण-न० (दे०) उत्तरीय चकित; (सुदं० ४, ३, ३) । चद्दर; (दे० ना० मा० १, २५; १० च० अहिहाण-पु० (सं० अभिधान); नाम १४, ७, ८)। (जंवू० ३, ५, ११)। अह्म--सर्व० (सं० अस्मद्>प्रा० अम्ह) हमारा; (को० ३, १३२) ।-हं-हमारा अहीणु-वि० (सं० अ+हीन) परा- हमारा (सि० २, ६, १)। क्रमी; (व० ३, १३, ६) । अहोर-पुं० . (सं० भाभीर>प्रा० अहिर) १- ग्वाला, २- एक जाति प्रा जिसका कामं गाय-भैंस रखना और दूध आंकम-पुं० (सं० आक्रमण) हमला; बेचना है; (क० ८, ६, ५)। २-छंद का (उ० व्य० प्र० ६-२१)। नाम; (प्रा० ५० १, ११४) । आंखि-स्त्री० (सं० अक्षि>प्रा० अहीरु--वि० (सं० अभीरु) जो डरपोक अक्खि) आंस, नेत्र (रा०, उ० व्य० प्र० न हो; (भ०)। ६-२) । -हिं (रा० २)। अहेअ-पुं० (सं० आखेटक >प्रा० आंग-पु. (सं० अङ्गम् >प्रा० अंग) आहेडय न०) शिकार, मृगया; (क० ७, शरीर के मस्तक आदि अवयव, अंग; १, ६)। (उ० व्य० प्र० ४६-७) ।
आंट (६८) आइज्झइ रोग । २- पं०१७ - + अञ्चल>प्रा० " किस . ". ७)। -उ (रा० ४) आंगिहि (रा०. ७)। होना; (प्रा० ५० १, ३७) । ... आँग (की० २, ११०) । प्राअल्ल-पुं० (दे०) १- आंट-स्त्री० (दे०) द्वेप; (रा० २३) । वि० चंचल, चपल; (दे० ० ना० मा० १, श्रांतर-पु. (सं० अन्तर >प्रा० अंत) ७५) । मध्य, भीतर। आंतरे; (रा. २४) । आआ-स्त्री० १- (सं० . आद्या=मास आंतर--अव्य० वीच में; (को०२, ६२)। की प्रथम तिथि) प्रथम; (प्रा० आंतु-वि० (दे०) भयानक; (रा० ६)। ५८) । आँकुस-पु० (सं० अङ कुश>प्रा० आइ-क्रि० (सं० आयाति) आ जाना; अंकुस अंकुश; (की० ४,२५)।' "जत लेक्खहु तत लेक्खहु · आइ"- इस आंग-पु० (सं० अङ्ग >प्रा० अंग) ढंग से लिखने परः लेख आ जाता है; शरीर; (की० २, १०७) । प्रा० .० १, ४१)। आआ-क्रि० भू० आँचर--पु० (सं० का०, आया; (को०)।..: अंचल) कपड़े का शेप भाग, पल्ला; आइ-पु. (सं० आदि>प्रा० आइ) "कइसे लागत आँचर वतास, प्रारंभ; ''आइ ण अंत ण मज्झ गउ" प्रकार उनके अंचल की हवा लगे;-(की० (क० १०, १५, ६; स० दो० को०)। २, १५०)। अव्य०, वगैर, प्रभृति (ण०.१, ५, १)। मांतरे-अव्य० (सं० अन्तर) बीच-बीच श्राइम-वि० (सं० यागत):आया. हुआ;. में; (की० २, ६२) । "सव्व सेन महु पलइ पातिसाह कोहान मांबुला-पु० (सं० आम्र>प्रा० अंव) आइअ" अर्थात् सारी सेना मेरे ऊपर टूट . आम का पेड़, "अरे पुरि पुरि आँवुला पड़ी है। वादशाह ने क्रोध करके चढ़ाई मउरिया कोइल हरखिंय देह,” तुल० गु० की है; (को०, ४, २२१;)। (जंबू० १, आंवलो; (प्रा० गु० २१, ७)। ११.१०) आइय-क्रि० भू० का० (सं० आ-क्रि० भू० का० (सं० आगत >प्रा० आगत)आई; (क० ३,१६,७) । आइयय- आमअ) आया; । (उ० व्य० प्र० १४- कि० भू० का० आया; (सं० रा०) । २६)।-अ, वि० आया हुआ (रा०)-आ, आइच्च -पुं० (सं० 'आदित्य>प्रा० क्रि० भू० का०, आए थे, (की० २, आइच्च) सूर्य; ( क० ३, १२, ८)। २१८) । -इल भू० का० आया; मगही आइजिणु-पु० (सं० दिजिन) आदि आयल; (विरूपा, : चर्यापद) i -इवि,. जिनेश्वर; "तिजयाहिव-सामिउ आई- कृ० (फ० ४, १, ६)।-ई (रा० ३७)। जिणु," -तीनों लोकों के अधिपति आदि माअत< वि० . : (सं० आयत्त>प्रा० जिनेश्वर; (व० २, १५, १) । आयत्त>, आअत) अधीन; . (की० ३, आइज्झइ-क्रि० (दे०) , पहना देना, "कुण्डल-जुअलु झति आइज्झई"--शीघ्र आमत्ति-क्रि० (सं० आयति). प्राप्त ही कुण्डल युगल उन्हें पहना देता है; (प०. .
आइट्छ (६६) आउण्ण आदिष्ट>प्रा० . करने से क्या भासिउ महु,"- (व० १०, ६, ४) । आइ-वि० (सं० आउ-न० (सं० आयुप् >प्रा० माउस, आइट्ठ) जिते आदेश मिला हो; (जंबू० आउ) आयु; (यो० ४६) । २. क्रि० ५, ६,३)। (मं० आगतः) आया; (जा २, १३, आइद्धय-वि० (सं० आविद्ध>प्रा० २)। आइड) पहना हुआ; fasten (as an आउखय-पुं० (सं० आयुष+क्षय)>. ornament) (प० च० ३५, ४, ६)। आयु का क्षय होना; (जस० २, १४, २- प्रज्वलित; 'रोसाइद्धणं माहिदेणं ११)। मारिउ सो पीयंतु जलु,' रोष से प्रज्व- प्राउगंठि-स्त्री० (सं०. आयुग्रं न्यि) आयु लित होकर उसे जल पीते-पीते ही मार का बंधन या गांठ, "जइ बज्झइ रायोह डाला था; (जस० ४, २६, २०) । आउगंठि ता कि किउ सोहणु जणिय- आइरियउ-पुं० (सं० आचार्य:>प्रा० तुट्टि," अर्यात् यदि राग के द्वारा आयु की आयरिय) गुरु, शिक्षक; (ग० ६, १०, ग्रन्थि ववती है, तब फिर तत्काल सन्तोप ५)। देने वाला अच्छा काम आइसु-पु० (सं० आदेश >प्रा० लाभ'; (जस०.४, १०, ६)। आएस) आज्ञा; (सि० १, १३) । 1/आउच्छ- (सं० आ+प्रच्छ>प्रा० प्राच-(सं० आ+कुञ्चय् >प्रा० आपुच्छ, आउन्छ) अनुज्ञा लेना, आज्ञा आकुच, आउंच) संकुचित करना, समे लेना।-इ (मं० अपृच्छति). (भ०)। टना; (ण० ६, ६, ४)।- आउच्छिउ--कि. भूका० (सं०.आ+ (सं० आकुञ्चयति) (भ०)। पृच्छ>प्रा० आउच्छ) पूछा; (ण० ५ आउचण-न० (सं० आकुञ्चनः>प्रा० ७, ५) । आच्छे वि :-पू० का०क्रि० आउंचण) संकोच, गात्र-संक्षेप; (ण० ६, पूछकर; (प०च० ६, १, २) । २५, १)। आउच्छिय-वि०. (सं० आवृष्ट>प्रा० प्राचिय-वि० (सं० आकुञ्चित > उन्छिय) जिसकी आज्ञा ली गई हो प्रा० आउचिअ) संकुचित; (रण० १, ८, वह; (प० च० १६, १) । ७; जंवू ८, १३, ३)। आउज्ज-पुं० न० (सं० मातोद्य >प्रा० प्राउडउ-पु० (सं० मा+पिण्ड) संपूर्ण आओज्ज, आउज्ज) वाजावाद्य; (ण. शरीर, शरीर-समेत; "आउंडउ जो राउ ६, ७, ११)। (ल सो) हइ," -राउल, जो तू आपिण्ड आपिण्ड माउट्टि-स्त्री० (सं० नाकुट्टि>प्रा० (सम्पूर्ण शरीर से) शोभित . हो रही है, बाउट्टि) हिंसा, मारना; (संधि० ११, ५, (रा० ११)। १५)। आउ-पुं० (दे०) कायिक जीव; "पहुई माउण्ण-वि० (सं० माउण्ण-वि० (सं० आपूर्ण>प्रा० बाउ तेउ वाएँ सहु, हरिकाय ण चलइ आपुण्ण) पूर्ण, भरपूर; (जंदू० ४, ६, .सक० आउत्त (30) आएम आयु का ५) । -य (प० च० ६, ४, ३) । च० १०,१०, २)। उत्त-पु० (सं० आयुक्त) १. गाँव आउस-न० (सं०आयुष्>प्रा० आउस, का नियुक्त किया हुआ मुखिया; (दे० १, आउ) आयु, जीवन-काल; (भ; ण० १, १६) । २. अधिकारी (जंवू० १२, ११)। -म, वि० (सं० आयु- १०)। एमय) दीर्घजीवी; (जंवू २, २०, १०)। प्राद्ध-न० (सं० आयुष>प्रा० आउह-न० (सं० आयुष>प्रा० उह) आउह) शस्त्र, हथियार; (प० च० ३१, शस्त्र, हथियार; (भ०)। १४, ७)। आउहोह-पुं० (सं० आयुव+ ओघ > आउपमाण-पुं० (सं० आयुप्-+-प्रमाण) प्रा० आउह+ओघ, ओह) आयुध-समूह, प्रमाण; (जस० ४,१०, शस्त्र समूह; (रि०, तृतीय सर्ग)। १०)। प्राज-न० (सं० आयुप>प्रा० उस) प्राउर' -वि० (सं० मातुर>प्रा० आयु; (ण० ६, १८, ६)- आउर) पीड़ित; (भ०) । आउरा पाऊसउन० (सं० आयुकम्) जीवना- दुःखित; (व० ६, ४, ६)। विधि, "वरिसा सउ आऊखउ लोए, असी माउर-न० (दे०) लड़ाई, २- वि० वरिस नहु जीवइ कोई,"तुल०गु० मावखु; बहुत अधिक; ३- गरम; (दे० १, ६५; (प्रा० गु० ५, २७)। ७६)। आऊर-(सं० आ+पूरय् >प्रा० आउल-वि० (सं० माकुल >प्रा० माऊर) भरना, पूर्ति करना, भरपूर माउल) व्यग्र; (क० १, १७, १०)। करना। -इ सक० (सं० आपूरयति) -मणु वि० (सं० आफुलमन) दुःखी मन; (प० च० ४, ६, ३; भ०)। (व० ३, १२, ८)। आउलि-वि० आऊरिय-वि० (सं० आपूरित>प्रा० (सं० आकुल) आकुल, "ता आउलि पुर- आऊरिय) भरा हुमा, व्याप्त; (प० च० यणु हुउ खणेण"-तब एक क्षण में पुर ५, ३, ३)। जन व्याकुल हो उठे; (क० ३, १३, पाउरेप्पिणु-पू० का० क्रि० (सं० आ+ १)। रोपय > प्रा० आरोव) अरोपण कर, आउलिय-वि० सं० आकुलित >प्रा० स्थापन कर, "सुक्कझाणु मणि आऊरे- आउलिअ) आकुल किया हुआ; (व० ५, प्पिणु"-शुक्ल ध्यान का आरोपण कर, १३, १५)। (ण० ६, २५, १४)। आउलिहुय-वि० (सं० आकुलीभूत> आए-क्रि०, भू० का०, (सं० आ+या) प्रा० माउलीभूअ) घबड़ाया हुआ; (प० आती थी, (की० २, १०६)। च० २६, ३, २)। आएस-पुं० (सं० आदेश >प्रा० माउलेइ-क्रि० (सं० आकुलय्>प्रा० आएस) आज्ञा, हुक्म; (५० च०. १५, १;. माउल) व्यग्न करना, दुःखी करना; (प० १; ण० ३, १६, १५)। आएसु;
आएसि (७१) आगच्छ १,४, - न० .(विला०)। आकास) आकाश; (को० ४, १३०) । आएसिअ- वि० सं० आदेशित) जिसको आकुंच-(सं० आ+आकुञ्चय >प्रा० आज्ञा दी गई हो वह; (जंवू० आकुंच) संकोच क..। आकुचइ-क्रि० आएसिय -वि० (आदिष्ट) (सं० आकुञ्चयति) (भ०) । आकुचिविं (भ०)। पू० का० कि० (भ०)। मामोहए (सं० आयोधन माकोयण-पुं० (दे०) फैलाव; (सं० >प्रा० आओहण) युद्ध, लड़ाई; (भ०)। रा०) । आख-क्रि० (सं० मा+कांक्ष>प्रा० /आकोस-(सं० आ+1/क्रुश्, क्रोशय, आंकख) चाहना, इच्छा करना; (रण० ७, प्रा० आमोस) क्रोध करना । आको: २, ११) । स्त्री० (स० आकाङ्क्षा>प्रा० संति; (जस० ३, ३५, १०) । आकंसा) अभिलाषा; (भ०) । माकोसण-पुं० (सं० भाक्रोशन>प्रो० प्राकखिरिय-वि० (सं० भाकाइभिन्> आओसण) तिरस्कार, गाली-गलौज; प्रा० आकंखि) आकांक्षावाली, अभिलाषी; (ण० ६, २५, ४)। आक्रोन्डते-पुं० (सं० रा०)। (सं० आक्रोडन न०), आकतिय-वि० (सं० अग्क्रान्त) पकड़ा अखाड़ा, (को० २, ६६) । 1/आखंच-(सं० हुआ, पराजित, पराभूत (सं०. रा०)। आ+ कृष्) पीछे माविय-वि० (सं० आक्रन्दित) जिसने खींचना । आखंचइ-क्रि. (सं० आकर्षति) आकन्द किया हो वह, (दे० ना० मा० गु० म० खेचणे; गु० ७, २७)। खिंचवुः (भ०)। आकंतु-पु. (सं० आक्रन्दन), रोना; आखंग्ल-पु० (सं० भाखण्डल>प्रा. (व० ७, १४, ८)। आखरल) इन्द्र; (को० १, ८०)। Vआकंप-(सं०. मा+कम्प्.>प्रा० /आख- (सं० मा+ख्या > प्रा० माकप)कापना । आकपिउ-क्रि० भू० का०, माअक्ख)कहना, बोलना । आखइ; (रा कांप गया; कम्पायमान हो गया; (40 ६), आखहि; (रा० १५)। २, १२, २)। प्राग-पुं० (सं० अग्र>प्रा० अग्ग) आकग्णन-न० (सं० आकर्णन>प्रा० भागे का भाग। -अ (सं० आगत) आकण्णन) श्रवण; (को० १, ४०) । (जंबू० १०, १८, ६)। माकरिसण-न० (सं० भाकर्षण>प्रा० आगे; (को० ४, १६४) । आगें; (रा. आकड्वण) खिंचाव; (जंवू० ६, १२, १६)। मागह-अव्य० (सं० अग्रे>प्रा० अग्ग) आकारे-पुं० (सं०; आकार) आकृति, आगे; (संधि० १२, ६, १; सं० रा०) । रूप; (को० ४, ५०)।। /भागन्छ-(सं० आ+गम् >प्रा० आग- . आकास--पु.० त० (सं० आकाश>प्रा० च्छ). माना, आगमन करना। भागच्छु- खींचना; तुल० मागु-अव्य० आगम (७२) आछ. .. आगमन>प्रा० ; क्रि० आ०, आओ, आगमन करो; (प० आगिवारिण-पु० (सं० । अग्रानीक) च०१७, ३, ८)। -माणु व०. कृ.०, सेना का क्षागे चलने वाला भांग "ता आते हुए, (व० ३, ४, ३) । पहिलइ रिण-रंगि ए, अनलवैगु तहि प्रागम-० (सं. अभियउ । पडियउ भंगोभंगि, आगिवाणि आगमण) आगमन; (भ०) । --ण न. भरहह तणए, तुल० गु० आगेवानं; (सं० आगमन); (जंबु० २, १०, १०)। (गु० प्रा० ४, २७) । आगम-पुं० (सं० प्रा० आगम) शास्त्र; आगु-अव्य० (सं०. अग्र>प्रा० अग्ग) (सि. १, २२; जस० १, ७, ८)। आगे; तुल० प० अग्गे; (को० ४, १६४) 1 आगय-वि. (सं० आगत'>प्रा० -रु, वि०-पूज्य, गुरु-स्थानीय; (जंवू० आगय) आया हुआ; (भ०) क्रि० भू० ६, १७, १३)। का०-आ गई, "एत्यंतरि आगय जणणि प्राघुट्ट-वि० (सं० ' आयुष्ट >प्रा० तासु' (विला०) । - (आ गया) आगंताः आयुट्ठ) घोषित; (भ०) । आ गया; (जंवू० ६, १७, ७) । /आघोस--(सं० मा घोपय् >प्रा० मागर-पु. (सं० प्रा० आकर, प्रा. आघोस) घोषणा करना, (जस० ३, २१, आगर) खान, समूह; (प० ३० ४, २, १४) । ३) :.. आचारः-पु (सं० प्रा० आचार, प्रा० आगरि-वि० सं० आकर =Jष्ठ) आयार) आचरण; "(भ०) । आचारक- श्रेष्ठ, उत्तम, (को० २, ११५) । पुं० आचार; (को० ३, १२१) । आगलिय-वि० (सं० अग्र) आगामी, आच्छ-क्रि० (सं० आस्, आस्ते, प्रा० अगला; "एक रयणि वीरसागलिय, कुमरि आस) वैठना; (उ० व्य० प्र० . भणइ किम करि पभणांउ,". तुल० गु० माच्छ--क्रि० (सं० सस्मि) हूँ; (उ० आगळ; (प्रा० गु० २४, ८)। व्यं० प्र०२०-१६)। आगहनमास-पु० (सं० अग्रहायणमास) प्राच्छिह-क्रि० (सं० : स्थास्यति)- प्राचीन वैदिक क्रम के अनुसार वर्ष का रुकेगा, व्हरेगा; (उ० व्य० प्र०, २१- अगला या पहला मास, मार्ग शीर्ष; (व० ११) । ९, २०, ४).1- याच्द-वि० '१: खड़ा हुआ, रहा आगामि-वि० (सं? भागामिन् >प्रा० हुआ, ठहरा हुआ २. खड़ा होने वाला, आगामि) आगामी, आने वाला; (व० ३. उठा हुआ; (उ० व्य० प्र०, १२०- १०, ३६, ६)। १२) । : मागासण-पुं० (सं० आग्रासन.) आगे प्राछ-क्रि० (सं० अस्) होना ।।-इ का शासन; (सि. १, १३) । (सं० अस्ति) है; तुल० गुं० छे; (प्रा० मागि-स्त्री० (सं० : अग्नि>प्रा०. गु० ७, १८)। आहि. . (रा०७)। अग्गि) आग, वह्निः (को०.४, १०). माछे-होना; (प्रा०, १०२-१४४) २०-७) . व्य० प्र० ..
आजम्मु (७३) आणंदु करना, शुरू -यर, माजम्मु-कि० वि० (सं० आजन्म) हुमा; (ण० ३, ६, ४)। जन्म-पर्यन्त; जीवन भर; (भ०)। आढप्पइ-क्रि० (सं० आ+रभ् >प्रा० आजाणु-वि० (सं० आजानु) जांघ या गाढव, आढप्प) आरंभ घुटने तक लम्बा; (जंबू० ६, १८, २) । करना; (प० च० १, २, १२) । आठम्वि-स्त्री० (सं० अष्टमी>प्रा० आढविन-वि० (सं० आरब्ध>प्रा० अट्टमि) तिथि-विशेष, आठवीं तिधि आढत) शुरू किया हुआ; (जबू० ३, ६, (रा० ३०)। १०)। प्रार-स्त्री० (दे०) ओट, आड़। /आणंद- (सं० मान द् > प्रा० आडाहं (रा० ३०)। आणंद) खुश होना, आनंद प्राप्त करना । आडम्बर-पु. (सं० आडम्बर >प्रा० आणंदइ (सं० अ.नन्दयति); (भ०) । आडंबर) ऊपरी दिखाव, ढोंगः (प० च० आणंद-पुं० (सं० आनन्द) हर्ष, खुशी; १, १३, ८)। (भ०) । -ण न० (सं० आनन्दन) हर्ष; आरविय-पु० (सं० आटविक) सेना (जस० २, १४, ४)। वि० का एक भेद; (प० च० १६, १२; ६)। आनन्दकर (जंबू० ८, ४, ६) । -यरी, भाडो-वि० तिरछी; (को० २, १७७) । वि० मानन्दकरी (स्त्रीयाम्) (जंबू० ३, प्राडुमालो-स्त्री० (दे०, प्रा०५/साडु- =मिश्रण करना, मिलाना) मिला- माणंदप्पह-स्त्री० आनन्दप्रभा, स्त्री०- वट, मिश्रण, " आडुआली मिश्री भावः" विशेप का नाम; (ण० ७, ११, ६)। (दे० ना० मा० १, ६६), आणंदि-वि० (सं० आडोविअ-वि० (दे०) आरोपित, आरोपित, रहने वाला; (भ०)। क्रोषित; (दे० ना० मा० १, ७०)। प्राणदिम -वि० (सं० आनन्दित >प्रा० पै०२, माडोह-गडबड करना, किसी काम में आणंदिय) हर्ष-प्राप्त; (प्रा० वेकार भिड़े रहना; अस्तव्यस्त कर देना; २१३)। -य (आणंदिय) आनन्दित; -इ, क्रि० व० (प० च० २६, ७, १)। (जंवू० ४, ६, ७)। आडोहे वि-पू०का०क्रि० (दे०) हिलाकर; आणदिउ-क्रि०, भू० का० (सं० मा+ (प० च० ४, १०, ३) नन्द >प्रा० आणंद) प्रसन्न हुए, खुश आढत्त-वि० १. (सं० आरघ>प्रा० हुए; (मि० ० १, ३४, १५)! आढत) प्रारब्ध, शुरू. किया (भ०; हुआ; आनन्दित>प्रा० आणदिय-वि० (सं० सुदं० ३, ४, ५; प० च० २, ४, ३)। आणंदिय) हर्ष-प्राप्तः (सरणतु० ४७०) । २. पुं० (सं० भाज्ञप्त) आदेश; (जस० आणदिर-वि० (सं० मानन्दिन् >प्रा० करने आणंदिर) (इर प्र०) आनन्दित १, ८, ३)। आढत्तउ--क्रि० भू० का० (सं० ना+ वाले; (जस० १, १५, १६)। रम् >प्रा० आढव, आठवइ) प्रारम्भ , आणं-पु मानन्द नामक छंद "इय आनन्दिन्) खुश २ याण १ यानन>प्रा० ,६०, लाता है; (की०४, आणा) आदेश, (७४) आणाई छंदु नाणंदु" (सुदं० ४, १२, १६)। जाए; (को० २, १८५) । आनु–त्रि०, आण-वि० (सं० भन्य>प्रा० अम्स) भू० का० लाये; (की० ४,४१) । १. दूसरा, कुछ और; (को० ३, ४७) । आणकर-वि० सं० आज्ञाकारिन्) २. स्त्री० (सं० आना) आना; तुल० गु० आनाकारी; (जंबू० ३, ३, १६)। म० आरण; (प० च०८,२,; मि०२, आरण- (सं० ३१; की०४, ११६) आनक-वि० दूसरे बाणण) मुख बथवा हार; (जस० १, ४, का; (को०२, १०८) । नानका-वि० ८)। अन्य को; (की० २, १०८)।-रि आणत्त-वि० (सं. आज्ञप्त>प्रा० स्त्री०-(सं० अन्य नारी) अन्य स्त्री आणत्त) जिसको आदेश दिया गया हो (सि० १, २०) वह; (ण० ६, ५, ६)। आण-क्रि० (सं० मा+Vणी>प्रा० आणत्ती-स्त्री० (सं० आज्ञप्ति>प्रा० आण) लाना, पानयन करना, ले आना। आत्ति) आजा, हुम; (प० च० ३५, -इ, क्रि० ब० (प० २० २, १६, २); ६, ७)। तुल० गु० आणवु', म० माणणें । -हि, माणयर-वि० (सं० आना+कर) क्रि० लोट लकार-लाओ, लाई जाए; याज्ञाकारक, नौकर, सेवकगण; (ज० ६, (हे० ३४३, सुबंब २, ६, १) । आणि १४, १)। क्रि० ० का०, ले आया; (क० ३, १०, आणदयर-वि० सं० मानन्दकर) २) । आणि-पू० का०नि० लाकर; (सं० आनन्द देने वाला; (प० चं० १०,४, रा०)। आणावहि-क्रि०, लोट लकार, ६) । मंगवा, "यागावहि वन्धिहें दुद्ध तुई" आगवडियो-वि० सं० आज्ञावती) उससे व्यात्री का दूध मंगवा; (क० आज्ञाकारी; "याणवडिओ य वट्टेइ मह १०,२०, १०) आणि-क्रि०, ले जाया परिवणो"; (संधि० १६, ३, ६)। (क० ३, १०, २) । आणिवि-पू० का० आण-वडिच्छय-वि० माना-पालका कि० (क० ४, १५, १०); बाणेप्पिणु (प० च० २४, ११, ३)। (रण०.१, १५, १५)। वाणेइ-कि० प्राणवडीय-वि० (सं० बाजा प्रतीप) लाना (प्रा० ५० १, ७४) । यानए मानाविरुद्ध; (५० ५० १२, ४, ६)। कि० ब०, लाता है; (को० २, २०२)। याणा-स्त्री० १. याणा-स्त्री०१. (सं० माज्ञा>प्रा० हुकम; (सुदं० १, १०, ३)। आनलि-कि०, भू० का०, लाई ८; ण० १, १६, १; को०४, ११३) । हुई; (को० २, १४६) । आनिम-क्रि० २. बायु, प्राण "सयलवि भू० का०, लाया; (की० ४, ५८) । माहारण, व० १,७,११)। आनिया-क्रि०, लाए गए; (की०४, आणाइ-पु० (दे०) शकुनि, पक्षी; (दे० २८) । मानिन-कि०, ना० लाइए,' लाया ना• मा० १, ६४)। - . याणा पाण आणाकारिणी (७५) आनयि आज्ञाका- . . । प्राणाकारिणी-वि० (सं० आतिथ-न० (सं० आतिथ्य>प्रा० रिणी) आज्ञाकारी; (जस० १,४, आतित्थ, आइत्थ) आतिथ्य, अतिथि- १५)। सत्कार; (को० २, ७३)। आतिथ्य; आणाव-क्रि० (सं० अ+नायय) मंग (की० २, ६२) । वाना । आणावइ (सं० आनाययति) आथि-क्रि० (सं० अस्ति>प्रा० अत्थि) (भ०)। है; (रा० १३; उ० व्य० प्र० ५-४) । आणाविय-वि० (सं० आनायित >प्रा० आदण्ण-वि० (दे०) व्याकुल, आकुंल; माणाविय) मंगवाया हुआ; (क० ३, ४, (प० च० २, १३, ५) । (दे०) १) । व्याकुल (जंवू० ६, ६, १४) । आ न्न- आणा-विहेय-स्त्री. (सं० आज्ञाविधेय) वि०-पीड़ित (हे० ४२२, १६) । किये जाने योग्य आज्ञा, पालन होने के आदेस -पु (सं० आदेश>प्रा० योग्य.आज्ञा; (५० च० २२, ६, ७) । आएस) आज्ञा; (प० च० ८, १०, ७) । आणिअ--वि० १. (सं० आनीत >प्रा० आध-वि० (सं० अर्ध >प्रा० अद्ध) आणिअ) लाया हुआ; (ण. आधा । आधहं (रा० ३८) । १,१४, आधार+सत्ति-स्त्री० १०) । २. (सं० आरत >प्रा० आढिअ, (सं० आधार+ आणिअ) सम्मानित ; (दे० ना० मा० १, शक्ति) आधार शक्ति, "जा तिल्लोक्कहीं आधार सत्ति," जो इस त्रलोक्य की ७४) । आणिय; (जस० १, १०, ८)। आधार शक्ति आणी-(सं० आ+/नी> है; (जस० ४, आणी) लाना; (जस० १, ८, ४) आणिअइ-सक० (सं० आनीयते) लाना; आनंदिअ-वि० (सं० आनन्दित >प्रा० (हे. ४१६) । आणिउ भू० का० लाया आणंदिय, हर्षित; (रा० ६)। गया; (महा० ६८, ५)। आनए-क्रि० आन-पु० (सं० अन्न>प्रा० अण्ण)- ले आता है; (की० २, २०२) । भक्ष्य पदार्थ, चावल का भात; (की० २, प्राणुअ-न. (दे०) १. १८५)। स्त्री० (सं० आज्ञा>प्रा० मुख, २. आकार, आकृति; (दे० ना० मा० १, आण) आज्ञा; (को० ३, १९) । वि. ६२)। (सं० अन्य) दूसरा; (रा० २); ' आनु आणूव- (दे०) डोम, अत्यन्त नीच (रा० ३), आनहिं (रा० ११), आनु जाति का आदमी; (दे० ना० मा० १, (रा० ३८), आन्न; (२०१८) । ६४)। आनक-वि० (सं० अन्य >प्रा० अण्ण) आतावणे-वि० (सं० आतापन) उष्ण, दूसरे का; (को० ० २, १०८)। "सरि-तडि आतावणे थिउ. मुर्णिदु," नदी आनथि-क्रि० भू० (सं० आ+णी> किनारे आतापनी शिला पर मुनि बैठे थे, प्रा० आण=लाना) लाते थे; (को०४, (सि० २, २६)। ८१) । आनहि-लाते हैं; प्रा० ११)। - की० २, आनन ( ७६ ) आम प्रानन-न भू० का० १७, ५)। नी प्रा० लाया; १०) । अनिन-क्रि० लाइए, लाया जाए हैरान करना, २. दवाना; (जंबू०४, (की० २, १८५)। १७, ११)। (सं० आनन>प्रा० आपु-सर्व० (सं० आत्मन् >प्रा० माणण) मुख, मुह; (को० ३, ५) । अप्पण) अपना, निज; (को० ४, ४५) । आ+नमसोय-वि.० (सं० आपुल-वि० (सं० आपूर्ण>आपुण्ण) नमस्कृतम) नमस्कार किया; (जंबू० ६, पूर्ण, भरपूर । आपुली (रा० ६)। आपुलउ-सर्व० (सं० आत्मन् >प्रा० आनलि-क्रि० भू० का० (सं० (सं० आ+ अप्पण) मात्मीय, अपना; तुल० म० /नी>प्रा०माण) प्राप्त किया, "रसिके आपुला, गु० आपणु; (प्रा० गु० आनलि जू आ"---रसिकों ने जिन्हें जुए ५) । आपुलु (प्रा० गु० २०, १३)। में प्राप्त किया था; (की० १, १००) । आप-पु० (सं० अर्पय>प्रा० अप्प- अर्पण करना, भेंट करना) भेंट के लिए; आनिस-क्रि० भू० का (सं० आ+/ "आ रहि रहि आवन्ता," वे एकान्त में आणी) (को०)। भेंट करने के लिए उत्कण्ठा से आते रहते आनु-भू० का०, लाये; (को०)। थे; (को० २, २२३)। मानिक-वि० (दे०, प्रा० आणिक्क) आफर-पु० (दे०) धून, जुआ; (दे० वक्र, वांका; (रा० ७) । आनिकु (रा० ना० मा० १, ६३)। ८)। आभिट्ट-(दे०) भिडना; (जंबु० ६, आपण सर्व० (सं० आत्मन् >प्रा० १२, ६)। -इ, क्रि० (सुदं० ६, ४, अप्पण) स्वकीय । आपणु (रा० १)। १)। -पउ सर्व० स्व, निज; (प्रा० गु० १, आभरण-पु० छंद शास्त्र में ४८) 1 आपणि-सर्व० अपना; तुल० गु० द्विकल गण (5) का नाम; (प्रा० ३० १, आपणे; (प्रा० गु० १०, ४४) । २१)। प्रापण्डुर-वि० (सं० आपाण्डुर) सफेद आभास-पु० (सं० आभास-चमक) रंग का; (प० च० ८, १, १).। प्रकाश; (को० ४, १२५) । आपीण-वि० (सं० आपीन) विशाल, आमंतण-न० (सं० आमन्त्रण>प्रा० 'घणापीणतुंगत्थणी मज्झखीणा, 'जिणु- आमंतण) निमंत्रण; (सि० २, ३३) । सस्स गंथस्स पंधम्मि लीणा, सघन, आमंतिय-वि० (सं० आमन्त्रित) निमं- विशाल और उन्नत स्तनों से युक्त क्षीण- नित, आमन्त्रिता स्त्रियाम्) (जंबू० १०, कटि वाली वह देवी अब जिनेन्द्रोक्त २५, ४) । शास्त्र के पक्ष में लीन हो गई; (जस० ४, प्राम-अव्य० जब तक; (हे. ३८६) । १७, २२)। आमई-स्त्री० (सं० प्रा० आमय) आपीलइ-क्रि० (सं० आ+पीडय) १. व्याधि, रोग; (जस० २, ११, ६)। प्रथम - मामभायण (७७) आय - तुल० म० - १, १२, भाममायण-पु० मिट्टी का वर्तन; आमोप्र-पु० (सं० आमोद) हर्ष, प्रस- "दुद्ध आम भायणे किं किउ लहु," नता; (दे० ना० मा० १, ६४)। यदि दूध को कच्चे घड़े में रख दिया आमोय (भ०)।-य नामोद (जंबू० जाए, (व० ४, १५, १)। ५, १, २२)। मामलय-न० (दे०) नूपुर रखने का आमोड-पु. (दे०) १. लट, २. जटा स्थान, (दे० ना० मा० १, ६७) । २. की गांठ, जूड़ा, ३. समूह; (दे० ना० मा० पुं० न० (सं० आमलक >प्रा० आमलग, १, ६२)। आमलय) १. आमला का पेड, २. आमोडा-स्त्री०(२० बानमुकुट) भाम आमला का फल (भ.); का वार; "अरे सिरि अमोडा लहलहहिं आवळा, गु० आमळो। कसतूरिय महिवटु," तुल गु० अबोडो; मामल्लि-नि० (सं० आ+ मुच्) (प्रा० गु० २१, ११)। छोडना । आमिल्लइ (भ०) । मोय-पु० (सं० आमोद >प्रा० आमिस-न० (मं० आमिप>प्रा० आमोअ) हर्ष, खुशी; (जस० आमिस). मांस; (ण. ४, २, १३)। आमिसु-मांस (सा० ४०) -गतिरु क्रि० प्रामोसहि-स्त्री० (सं० आमोपधि) (सं० आमिप+ ग्रसन-शील) मांस खाए; ऋद्ध-विशेष; (जस० ३, ३७, ३) । (जंबु० २,.१८, ६); आयंब-वि० (सं० आताम्र>प्रा० (. आ+मुक्त) आयंब) घोड़ा लाल; (क० ३, २, ४) । त्यक्त; (जंबू० ५, ११, १३)। आयंविर-वि० (सं० आतान>प्रा० आमुख्य--पु. (फा० अमरूद; तु० बायंबिर) थोड़ा लाल; (भ०) । मुरूद) अमरूद; (सं० रा०)। आवंबिरछ-स्त्री०. (सं० आ+ताम्र आमहिलय-वि० (सं० आ+मुक्त> अक्षि) ताम्रवर्ण के रंग की आंखें; (ण. प्रा० नामुक्क) त्यकत; मुक्त; (सुई० ६. ४, १, ६)। ४, ६)। आय-सर्व० (सं० इदम्) इस, (भ०) /आमिल्ल-सं० आ+मुन् >प्रा० -ई अन्य० पूर्व में (व० ५, २, ५)। आमिल्ल) छोड़ना । -इ सक० (भ -उ, यह (जंबू० ६, ६, ११)।--ए. आमेल्लेंवि-पू० का कि० मुक्त कर; (प. इस (प० ५० ५, १३, ८)। च० २,१२,६)। 1/आय- (सं० ला+या>प्रा० आया, आमेल-पु० (दे०) लट, जला; (दे० आव) बागमन करना; नाना; तुल० गु० ना० मा० १, ६२)। नायो; (प० च० १, ७, ९) । २. आये 1/आमोअ--(सं० मा+मुद्) खुश (सं० आगत) (क० २, ७, ८)। ३. होना । नामोयह (सं० नामोदते)। आगता (स्त्री०) (जंबू० ८, ५, ५) । नामोएवि-पू० का० क्रि० (भ०) । प्रायअ-वि० (सं० आगत) आया हुआ; आ नुक्क-वि० - मान्यनु (७८) आयवन्त अागमन>प्रा० (ज० १,८,१३)। भवनों से परिणो मत; (जस० ४, २३, 'आयच्छतु-पुं० (सं० आगमाक्षर) बंद ११)। या मास्त्र का जान; "नई नियमग मुहि /मायन्न- (सं० आ: कर्णय >प्रा. आयच्छन्नु' भ० १५, १६, ६)। मायग) सुनना। आयन्नइ(सं० आकर्ष- आयड्ढण-२० (सं० आकर्षण >प्रा० पति) (भ०)। आयन) आकर्षण, दींचाय; (५० ५, भायपत्त-पुं० (सं० दानपत्रम्) याता; ८, १८)। (नि० १,१०) । यायवत (छत्र): (रि०, आयडि-स्त्री० (मं० आकृति) बाक ३, ७)। पंग, वींचाव; दि० ना० मा० ६, २१)। मायम-पुं० (सं० प्रा० आगम) आग- यावि० (मं० आकृप्ट) प्राप्ति; मन (जं. ३, ६, १६) । (अंदृ० ४, ६,१)। प्रायम्ब-दि० (सं० यातान>प्रा० आयग-न० (मं० आयंत्र) लाल रंग का; (५० च० ४, ६, आगमण) याना; (मि० १, १६)। ६) आयन्विर-वि०, लाल रंग का. 1/बाया-(० आकर्णय > प्रा० ५० १० ८, ९,३; १२, ४, २)। आयन) सुनना, (म००, बायय-यु (सं० आत्मज) पुत्र ०१, ३, १)। मायहि-क्रि० (म०) । सुनिए; "आइय आयहि पहु पुकारि," आयर-पुं० (सं० आदर>प्रा० आयर) राजन्, मृनिए, बाहर से पुकारा सत्कार, सम्मान; (न० २, १३,६;सि० न्ही है; (नि० १,१५.) । कृ०-प्राणिवि १,२६) । आयत; (हे० ३४१, २) । -पृ०का०कि. मृनकर; (ण०१,५.१) । मायरिय-यु० (२० माचार्य>प्रा० प्रायष्णण-२० (० आकर्णन>प्रा० मायरिय) गुरु, शिक्षक; (जं. थायगण) यवरा; (क० ३, ७,४)। ६)! आयग्णिय-वि० (सं० नाकर्णित) सुना नायरेइ-सक० लेता है, "सोवीराहान हुदा; (म० १, १२, ७)। जो माया"--जो कांजी का आहार वायत्त-वि० (सं० प्रा० आयत्त) लेता है; (क० ६, १४, ८) । बायरेहु बावीन, स्व-बा; (५० १० १, ७, ३)। -कि० मादर करो (सं० माह) (क० पायात-दि० संतप्त; "तहिं नाव १०,१७, ८) मत्तड परमायलट नाइ मुट्ठ नं मुच्छि पायल्ल-वि० (सं० बाकुल>प्रा० यर," अर्यात उस पर नहीं जान पड़ता माउल) व्याकुल; (भ० ६, २०,४)। था कि वह मृत है या संतप्त, मुह है या मायल्लिय-दि० पीड़ित (बाल्लिया- मृद्धित; (विला) वैचनी, भाजल्ल-रोग-विशेष) (५० च० आयदण-० (सं० बायतन) भवन, २, ३, ७)। "मवायदणहि परितोहि-'गन्धवों के मायवत्त-न० (सं० (सं० मात्तपत्र प्रा. है आयह (७६) धारत्तेज आयवत्त) छत्र, छाता; (ण० १, ६,८; १, ७२)। तिलय-पु० आकाशतिलक, रि०, तृतीयं संगं)। शहर का नाम; (भ०)। मायहं-पुं० (सं० आगम) आगम में; मारंभ-पु० (सं० - आरम्भ =प्रयत्न, (व० १०, ७, ३)। निर्माण>प्रा० आरंभ) निर्माण; (की० आयहि-सर्व० (सं० अस्मिन्) इस; १, १६) । (हे० ३८३, ३)। आरंन (सं० आ+रम् >प्रा० आरंभ) प्रायहु-सर्व० (सं० अस्य, एतस्य) शुरू करना। -मो, कृ०,.आरंभ करके इसका, (जंवू० ५, १२, १६)। (को० १, २) आयहे सर्व० (सं० अस्पा) इसकां; /आरंभ-पु. (सं० आरम्भ >s. (व० ६, ५, १२) । आरंभ) प्रारम्भ; (जस० ४, ६, ८)। आयाम- (दे०) बल, जोर; (दे० · आरंभिल-पु० (दे०) माली; (दे० ना० मा० १, ६५)। ना० मा० १, ७१) । वि० (सं० आर- प्रायाम-(सं० आ+यमय> प्रा० ब्ध) प्रारब्ध, शुरू किया हुआ; (भ०) । आयाम) लम्बा करना। आयामेप्पिणु- भारक्ख-वि० (सं० आरक्ष>प्रा० पू० का० क्रि० लम्बाकर, वल लगाकर; (प० १० १७, ३, ८) । आयाने वि- आरक्ख) रक्षण करने वाला; (दे० ना. मा० १, १५)।. पू० का० कि० लम्बा कर; वलं लगा कर; आरखिय-पु. (सं० आरक्षिन्) (प० व १७, ७,६) /आयार-पुं० १.(सं० आकार>प्रा० घोकोदार; (प० च० १०, ६, १) । (भ०) । २. आयार) भाकृति, रूप; (सं० आ+रट्) विलाप करना । आरडत-कृ० (सं० आरटत्) (सं० आचार>प्रा० आयार); आचरण (जस० ४, २४, १६)। (जंवू० ८, ८, ४)। आयावरण-न० (सं० आतापन) व्रत- बारडिम-न० (दे०) विलाप, क्रन्दन; विशेष; (जस० २, १८, ११)। २. वि० चित्र-युक्त; (दे० ना० मा० १, /आयास--(सं० आ>/यस्=प्रयास ७५) । ३. (सं० आरटित) विलापयुक्त; करना) तपस्या करना ।-मि - (जस० ३, ..(जपू०.७, ८, ६)। २०. ८) "भिक्ख चरमि अप्पउ आया. . आरण-न० . (३०) १. अधर, २. समि," -मैं भीक्षा मांगता हूं, तपस्या फलक; (दे० ना० ७६)। करता हूं; (जस० ३, २०, ८)। न० (सं० आरणाल) आरनाल, आयात-पु. नं०. (सं० आकाश>प्रा० कांजी, साबूदाना; (जंबू०.३, ६, १०)। आगास, आयास) आकाश, अन्तराल; आरत्त-वि० .(सं० बारक्त) लाल; (ण० ६, १३, ६)1--तल न० (दे०) (क० ७, १२, १०) । प्रासाद का पिछला भाग; (दे० ना० मा० : भारतउ-क्रि० भू० का० (०. बार- - 1/आरड- मा० १, -आल - . - मारत्तिम (८०) आम्ह भवसायर . क्त) लाल हो गया. (प० च० १८,६, "आराहइ सोलह कारणाई ४)। -भवण णिवारणाई"-भवसागर भारत्तिम-न० (सं० यारात्रिक >प्रा० भवन से निवारण करने वाली सोलह मारत्तिय) भारती; (पा० १९६) । भावनाओं की आराधना किया करता भारा-स्त्री० (सं० प्रा० आरा) बार, था; (व० ८,१६, ६)।-हि, क्रि० बा०, लोहे की पतली कोल जो सांटे या पैने में आरावना करो, (सि० १, १७) । लगी रहती है; (ण०३, १६, ३)। आराहरण-न० (सं० आराधनम्) मव्य० (सं० आरात्>प्रा० आरा) अर्चना, उपासना; (जस० ४, २१, १)। पहले; (दे० ना० मा० १, ६३)। आरिम-वि० (सं० आर्य>प्रा० अज्ज) आराइम-वि० (दे०) १, गृहीत, स्वी उत्तम, पूज्य; (संघि० १०, २, ११) । कृत; २. प्राप्त; (दे० ना० मा० १, मारिय -स्त्री० (सं० आर्या>प्रा० ७०)। अज्जा) पूज्या स्त्री; (भ०)। आराडो-स्त्री० (दे०) देखो आरडिन; आरिल्ल-वि० (दे०) पहले जो उत्पन्न (दे० ना० मा० १, ७५) । हुआ हो; (दे० ना० मा० १, ६३) । माराधि-कृ० (सं० मा+राघय >प्रा० मारिप-वि० (सं० आ4) ऋषि-सम्ब- बाराह) माराधना करके; (को० १, (को० १, घी; (क० ८, १०, ६)। ७६) । सेवा करके; (की० १, ६३)। आरिस-वि० (सं० ईदृश) ऐसा; (जंबू० बाराहन्त-कृ०-भक्ति करते हुए, धारा ६, १६, ७) । -कहा (सं० आपकथा) धना करते हुए; (प० च० ६, ८,८). ऋषि-कथा; (जंवू० ८, २, ..१) । प्राराम-पुं० (सं० प्रा० आराम) उप आट्ठ-वि० (सं० आरुप्ठ>प्रा० वन; उद्यान; (जंवू० ५, ३, १०) । थाल्छ) ऋद्ध, रुष्ट; (जंवू० ७, ६, ४) सारायणु-पु० युद्ध-रचना; (प० च० आरुट्ठा; (को०४, १७७)। १२, ८, ४)। प्रारू-वि० (सं० प्रा० यारूढ) ऊपर 'याराव-पुं० (सं० प्रा० मारव) शब्द, चढ़ा हुआ; (जस० १, १६, ४)। यावाज, ध्वनि; (जस० ४, १७, १४)। Vारुस-(सं० आरुष > प्रा० यारासरु-वि० (दे०) यासक्ति वाला आरुस) क्रोच करना, शेप करना; मारु- (होकर); "पाणई जंतइ धरु पिय आरा- सेवि-पू० का० क्रि० क्रोध करके, शेष सरु पणएणालिंगेविणु," प्रणयपूर्वक करके; (प०च० १२, ७, ५} ! आलिंगन कर हे प्रिये, (मुझ में) आसक्त आलसण-पुं० |-पु० (सं० मा+/रुप > होकर अव मेरे जाते हुए प्राणों को बचा- प्रा० भारुस) कोपन, क्रोध; (प० ० इये; (व० २, २१, १३) । १६, २,६)। /आराह-(सं० आ+राघय्) आराधना /पारुह-(सं० मा+रुह, >प्रा० बाल्ह) * करना। -इ, सक० (सं० आराधयति) - करर बढ़ना । आम्हइ-क्रि० (सं० आरो- ~ " -प्रणयपूर्वक आरुहण (८१) आलत्त - आरुढ>प्रा० हति) (भ०) । आल्हे वि-पू० का० क्रि० (दे० ना० मा० १, ६८)। उपर चढ़ कर, ऊपर बैठकर (प० च० प्रालंकियय-वि० (सं० अलंकृत) विभू- १३, ११, १०, १२, ७, ५) । पित; (सं० स०) ! आरहण-न० (सं० आरोहण) ऊपर आलंब-न० (दे०) भूमि-छत्र, वनस्पति- बैठना; (जम० ३, ३३, ६)। विशेष जो वर्षा में होता है; (दे० ना० आरुहिय-वि० (सं० मा० १, ६४)। आरहिय) उपर चढ़ा हुआ; (प० २० आल-न० (सं० प्रा० बाल) १- मिथ्या १५. ४, ६)। भियोग, दोषारोपण; तुल० गु० माळ; आरेइम-वि० (दे०) १- संकुचित, २. (प्रा० गु० २३, ३६)। २. मिथ्यावचन भ्रान्त, ३. मुक्त; ४. रोमाञ्चित; रोमाञ्चित; (दे० (प्रा० गु० २३, ३६) -माल पुं० धन; ना० मा० १, ७७)। तुल० मगही आलमाल; (सरहपा, दोहा- 1. प्रारोक्क -(सं० निरुध्) रोकना, कोश)। गतिरोध करना; तुल० गु० रोक-इ आल-न० (दे०) १- छोटा प्रवाह; २- (प० च० ५३, ६, ७)। वि० कोमल; (दे० ना० मा० १,७३)। प्रारोग्ग-(दे०)खाना, भोजन करना। -बालु न० (सं० प्रा० बालवाल) -इ, सक० (दे० ना० मा० १, ६९)। क्यारी थाला; (रा० ४२) । आलु-न० आरोग्गिअ-वि० (दे०) खाया हुआ; (सं० आल-छल> प्रा० आल) (दे० ना० मा० १,.६६)। दोषारोपण; (रा० २६) । अरोयतय-पुं० (सं० आरोग्यतनु> आलई-न० (सं० प्रा० आलय) घर; प्रा० मारोगतणु) नीरोग शरीर; (जंबू० (व० १०, २५, २)। आलउ (सि० १, १०, १, १६)। २५) । आलय-पु०१- घर, (भ०) ।२. मारोवण-न० (सं० आरोपण) संभा- नीड़ (सं० रा०) । वना; (दे० ना० मा० १, १७४) । मालग-वि० (सं० आरोसिय-वि० (सं० आरोपित) रुष्ट मालग्ग) लगा हुना; संयुक्त; (प० च० किया हुआ; (भ०)। ५, ११, ७; १०२, ३, ३)। मारोह-पु. (सं० प्रा० आरोह) सवार, भालण-खम्भ-पु० (सं० आलान-स्त- महावत (जंबू० ६, ११, ५)।-नर हाथी, म्भ> प्रा० मालाण, आणाल खंभ, घोड़ा आदि पर चढ़ने वाला, (जंवू० ६, क्वंभ) जहाँ हाथी बांधा जाता है वह ११, ६)। स्तम्भ; (प० च० २५, १५, १०)। आरोहण-न० (सं० आरोहण>प्रा० मालत्त-वि० (सं० आलपितः) १. आल्हण) ऊपर बैठना; (जत० १, २४, संभाषित, बांभाषित; (भ०) । २. माल- प्त, (जंबू० ६, २, ३)। मालत्त-भू० आलंकिन-वि० (दे०) पंगु किया हुआ; का०, कहा; (रि० ४, ३)। जालन्त>प्रा० - आनत्य ( ८२ ) आलिह पालत्य-पुं० (दे०) मयूर; (दे० ना० मालास-पुं० (दे०) वृश्चिक, विच्छु; मा० १, ६५)। (दे० ना० मा० १, ६१)। मालवण-न० (दे०) शव्या-गृह; (दे० /प्रालिंग-(सं० आ+लिङ्ग, मालि- ना० मा० १, ६६) । गति >प्रा० वालिंगइ) मालिंगन करना; मालावद-फि० (सं० वा+लापQ> (उ० व्य० प्र० ५-४)। आलिगिउ-क्रि० प्रा० यालब) वातचीत करना; (जंबु० मू० का०; (महा०) । नालिगिवि-यू० ४, १७, १८)। का० कि०; (जंवू० ६,१२,१३)। आलवणु-न० (सं० आलापनं>प्रा० आलिगण-न० (सं० मालिङ्गन >प्रा० आलवण) वार्तालाप, संभाषण (हे. आलिगण) आलिंगन, भेट; (जस० २, ४२२, १६; दे० ना० मा० १,५६) । ५, ५; म०)। यालवनी--स्त्री० (सं० मालापिनी> दिगिम- वि० (सं० आलिङ्गित) प्रा० बालावणी) वाद्य-विशेष, (सि० २, जिसका आलिंगन किया गया हो वह; ४) । (जा ४, १७, २) । आलिगिय; आलस-न० (सं० आलस्य >प्रा० बाल (भ०) । स्स) बालस, सुस्ती; तुल० गु० पाळस; आलिगियंगु-स्त्री० (सं० मालिङ्गित (संधि० १०, ३, ३) । आलसि-आलस्य; अङ्ग) अर्धांगिनी; "सिरमइदेवी बालिंग- (सं० रा०)। यंगु," -उसकी अर्वांगिनी थीमती देवी मालाम-पु० (सं० आलाप>प्रा. श्री, (ण० १,१५, ६) आलाव, आलाय) संभाषण; (जस० २, मलिन मा.लि. (सं० अलीक>प्रा० अलिय) ५, १०)। १- मिथ्या; (प्रा० गु० १६, ७३) । २. मालाणखम्न-पु० (सं० मालानस्तम्भ व्यर्थ; तुल० गु० एळे; (संधि० १०, ३, >प्रा० बालाण, आणाल+खंभ, खंभ) १६) । वि० दुर्विलसित; (प्रा० गु० ३८, जहां पर हाथी बांधा जाता है वह स्तम्भ; ४६)। (प० च० १६, १४, ३)। मालि'स्त्री० (सं० प्रा० आली) वय- आलाव-० (सं० बालाप) १- संभा स्या, सखी; (सुदं० १२, २, १५) । पण, बातचीत; २. शब्द, "हणइ सवण आलिद्ध-वि० (सं० आश्लिष्ट) आलि. रंधा कोइलालावबंधा, कोयले का गित; (जस०; १० च० २२, ८, २) । बालाप कानों के रंध्र में मार . रहा है; आलियर-क्रि० भू० का० बांधा; (५०. (प्रा० पं० २, १६५)। च० १६, १४, ३) । मालावगि, विणी-स्त्री० (सं० बालीपिनी /आलिह-(सं० आ-लिख>प्रा.आ. प्रा० आलावणी) वाद्य-विशेष, वीणा- लिह)लिखना । आलिहिवि-पू०का०क्रि०, विशेष; (ण ३, ६, ४; प० च० १, ५, लिखकर, “आरत्तहिं दबहिं आलिहिवि" ८) । आलावाणी; (जंबू ६, ६, ११) । -लाल द्रव्यों से लिखकर; (क० ७, ली (८३) आव . जाग १२, १०) (जंबू० ५,२, १०)। प्राली--स्त्री० (सं० प्रा० आली) सखी; मालोय-पु० (सं० आलोक>प्रा० (प्रा० गु० २०, १)। आलोअ) तेज, प्रकाश; (भ०) । आलोढ-वि० (सं० प्रा० आलीड) आस आलोयर-न० (सं० आलोकन>प्रा० पत; (जंवू० ४, ५, १३)। आलोअणं) विलोकन, दर्शन (ण० ८, ४, 'मालोरण-वि० (सं० आलीन>प्रा० ७) । आलोयंत-कृ० (सं० आलोकयत्) आलीग) लीन, "झाणालीणु , णिरुत्तर जस० ४, १३, २)। अच्छमि," -ध्यान में लीन होकर मैं मौन आलोयणिय स्त्री० आलोकनी (विद्या); बैठता हूँ; (जस० ३, २१, ५) । (ण० ६, २, ११)। आलोल-न० (६०) समीप का भय; आनंग-पु० (दे०) वृक्ष-विशेष, अपा- (दे० ना० मा० १, ६५) । मार्ग, लटजीरा, एक जंगली पौधा जो आलीवण-न० (सं० आदीपन) दवा के काम में आता है; (दे० ना० मा० लगाना; (दे० ना० मा० १.७१)। १, ६२)। आलोषिय-वि० (सं० आदीपित>प्रा. प्रायंडुर-वि० (सं०' बा+पाण्डुर> आलीविय) आग से जलाया हुआ, (प० प्रा० भावंडुर) मोड़ा सफेद, फीका; (. च० १७, १४, ८)। २, ८, ११)। आलुख-क्रि• (प्रा० बाद-पु(सं० लायुष्>प्रा० अप० करना; (ण० ५, २, ११). माउ >अ० प्रा० हिं० आव) मायु, मातुं खिप-वि० (दे०.) आस्वादित, चूसे जीवन-काल; (को० ३, १४८) । गए, "गोवालमुहा लुखियफलाई", ग्वालों Vआव-(सं० आयाति, ला/या> के मुखों से चूसे गए फल; (जस) १, ३, प्रा० आव) आना, आगमन करना; (उ० आलु-न० (सं० अलीक>प्रा० अलिय व्य०प्र० ११, २३) ।-इ(को० ३, ११०; रा० ५; हे० ४१६; प० च०५, ११, ; न०) झूठ; (हे० ३७६, १) । भालुञ्चिय-वि० (सं०, आलुञ्चित) -थि, क्रि०, आता है (को० २, ११३) । जिसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गए हों; आवंतउ-कृ० आते हुए; (ण० ५, ३, १) (प० च०१३, ४, ६) । -हि, कि, आते हैं (को०, २, २१६) । /मालेह-(सं० आलिब्) आलेखन -हि, क्रि०, नाना (प०,च०७, १२, करना । बालेहिवि-पू० का कि ० आलेखन ५; सि० १, २५) । -हूँ, क्रि०, आगमन करके; "आले हिवि जो मारंतु वेणु" करना (प० च० २, १५, २) । आवेउ- 'जों राजा वेणु लोगों को आलेखन करके क्रि० आ०, आवें; (ण ८, १४, ८)। मारता था; (जस० २, २५, १३) । -प्पिणु पू०का क्रि० (६० ७, ११, १५)। आलोइणिविज्जा-स्नी० (सं० अवलो- आवसई- क्रि० स० आ-+यास्यति) किती विद्या) ज्ञान प्रदायिनी विद्या; आयेंगे; (सि २, १४)। आलुख) स्पर्श ...
आवई ( ४ ) आवत्त 4 आबइ-स्त्री० (सं० . आपद>प्रा० (सं० रा०) । -~-न्तय कृ० घूमते हुए, सावई) आपत्ति, विपत्, संकट; (प० च० - फिरते हुए; (प० च० १७, ३, ४) १३, ५, १०)। आवट्टिउ-कि० भू० का० पहुंचा दिया; प्राग--वि० १- आरुड़, चना हुआ; (प० च० ७, ६, ६.)। (० ७, ६, १०) । २. अधीन;(प० ० /आवट्ट- (सं० आ+ वृत्>प्रा० आक- ११, २, ७)। टशोपण करना) विलीन होना; -इ, क्रि०, व०(हे.प्रा०व्या० ४१६,४)। माक्ट्ट आवम्गउ-वि० (६० आपद्गत:) विपत्ति में फंसे हुए; "तो पर सरणु मरणु -विलीन, नष्ट; (प०च० २६, ६, ६)। आवट्टइ-क्रि० (सं० या+वत् >प्रा० आवग्गउ"; (भ० ७, ११, ६)। आवत) औटना; (हे० ४१६, ४)। आवग्गी--वि० (दे०) स्वावीन, समस्त- प्रावट्टिय-वि० (सं0 आवर्तित) घूमता 'कण्टक-रहित; (प० च० २१, ८, १) । .हुआ; (जंबु०६, ६, २) । /आवज्ज- (सं० आपद्यते, आ+पद् आवट्ट वट्ट-पुं० (सं० आवतं+वत्य >प्रा० आवज्ज) प्राप्त होना; (भ०)। >प्रा० आवत्त+वट्ट) दाएं धूमने --ज्सक० (सि० १, ३०) । वाला मागं; (की०, २, ८४) । . .आवज्जिअ-(आ+ वृज्) इकट्ठा करके; आवट्टिया-स्त्री० (दे०) १- दुलहिन, "धणु आवज्जिअ धम्मक अप्पिस''-धन २. परतन्त्र स्त्री; (द० ना० . मा०१, को इकट्ठा करके धर्म के लिए अर्पण कर ७७)। 'दिया,(प्रा० ५० १, १२८)।-ण न० आवट्टिय-वि० (दे०) नष्ट, "भिक्खा- (सं० आवर्जन) उपयोग; (जंवू० ११, १४, तुज्झ पेटि मह-भड आवट्टिय। १) । आवज्जिय-वि० (सं० आगद्यित) मानाससि कढिसु ति अज्नु आपणा अजित;(जंबू० २, ५, १२.) । मांटिय," (प्रा० गु० १२, ३८) । आवज्जिम-वि० (सं० आवर्जित >प्रा० /प्रावड-(दे०) रुचना, अच्छा लगना। आवज्जिय) १- प्रसन्न किया हुआ, अभि- - सक० . "भल्लु वि भल्लउ महु मुख किया हुआ; (५० ३, ८, १३)। आवडइ," (जस० २, ३२, १)" आवज्जिय-वि० (सं० मावर्जित) १. प्रावडिल-वि० (दे०) १. संगत, दृष्ट; (प० च० २६, १, १)२- त्याग संबद्ध; २- सार, मजबूत; (दे० १,७८): किया हुआ; (व० १, १५, ४) ।. आवण-पुं० (सं० आपण>प्रा० :/आवट्ट-- (सं० आ+/वृत्.>प्रा० आवण) हाट, दुकान; (ण० ७, २, ८)। आवट्ट) चक्र की तरह घूमना-फिरना। आवणि-स्त्री० वाजार; (सि०१, ३३) । :-३ अक० (सं० आवर्तते) (क)। प्रावण्ण-वि० (सं० आपल>प्रा० -वट्ट पुः (सं० आवर्त. वत्मन्) दाएं आवण्ण) आपत्ति-युक्त, प्राप्त; (जंवू०.५, घूमने वाला मार्ग; (को० २, ८४)। -य १, ३) । वि० (सं०मावर्तित) पेरा हुआ; (इक्षुरस) भावत-पु० (सं० आवर्त.> प्रा. यर जे आवत-दिवत्त (८५) माविलुपिज , -- आवत्त चक्राकार परिभ्रमण) १ चक्र, आवाण-न० (सं० आपानक>प्रा० समूह; (को० ४, १०४) । २. चक्राकार आवाणय) मद्यगृह या चषक; (जंबू० . . 'परिभ्रमण; (ण ६, २०, १६)। ४, २, ७)। मावस-विषत्त-पु० (सं० आवर्त-विवर्त आवाल, मावालय-म० (दे०). जल के >प्रा० आवट्ठ-विवट्ट) चक्राकार आगे- निकट का प्रदेश; (दे० ना० मा०२, पीछे घूमना; (को०४, ११२) । ७०) प्रायन्ता मन्ता-कृ० (सं०. आ+या+ आवास-पुं० (सं० प्रा० आवास) वास. शतृ>प्रा० आव+अन्त (शतृ प्रत्यान्त); स्थान; (भ०; नंबू० १०, १४, २) । सं० या>प्रा० जा) आने जाने वाले; आवांसिय–वि० (सं० आवासित >प्रा० (को० २, २२७)। आवासिय) पडाव डाला हुआ; (१०:५० आवय--स्त्री० (सं० आप >प्रा० ३, ६, ३) । आवासिअ; (जंबू ५, १०, आवया) आपदा, विपत्ति, दुःख; (भ०)। २५)। आवया-स्त्री० (जस० ४, २१, ५) । आवाह-पु० (दे०) इक्षुगटी (sugar- आवरेड्या-स्त्री० (दे०) मद्य परोसने cane plantation) (प० च० ३१, ६, का पात्र-विशेष; (दे० ना० 'मा०:१, ७१)। आवि-न० (दे०) १. प्रसव पीड़ा; २- • आवर्ज-क्रि० . (सं० आवर्जति, सं० वि०.नित्य, शाश्वत; ३. दृष्ट; (दे० ना० आवर्ज प्रा. आवज्ज) संमुख करना, मा० १,७३)।-य, आगत; (जंवू० प्रसन्न करना; (उ० व्य० प्र० ७-७) । ७, ४, १६) । ''मावर्त-विवर्त-पुं० आना-जाना, प्राग- आविअ-पु. (दे०) १. इन्द्रगोप; मन-निर्गमन 'आवर्त-विवतं रोलहो, नभर क्ष द्रकीट-विशेष; २- वि० मथित, आलो- नहि समुद्रभो,' (को० २, ११२)। डित; ३. प्रोत-सिला हुआ, बंधा हुमा, आवल-वि० (सं० आकुल>प्रा० जड़ा हुआ; गुजरा हुआ; (दे० ना० मा० आउल) व्यग्र, व्याकुल; "कवणु इत्थु १, ७६)। मरिण आवलउ, (भ०.)। प्राविप्रजमा-स्त्री० (दे०) दुलहिन, म्याकुल; (सं० रा०)। पराधीन-स्त्री; (दे० ना० मा०१, 'प्रावलि-स्त्री० (सं० प्रा० आवलि) ७७).। . श्रेणी पङ्क्ति; (भ९; जस० :१, २, आविद्ध-वि० (दे०) प्रेरित; (दे० ना० १३) । रोमालि; (रा० २५) । मा० १,६३)। आवसी-स्त्री छन्द-विशेष; (सुदं० ८, प्राविल-वि० १- (सं० प्रा० आविल) २६, १२)। मलिन, अस्वच्छ। अविलु; (रा० ८)। आवागमण-पु. गमनागमन; तुल० गु० २. व्याप्त; (व०४, १२, ३)। भावगमण; (प्रा० गु०.६, ६).। माविलुपिन-वि० (दे०) आकाक्षित, -३, वि० विव (६) 0 प्रा० अभिलषित; (दे०. ना० मा० १,७२) । ना० मा० १, ६६) Vमआबिहव-(संदिर > प्रा०, मान-स्त्री० (मं० मामा>प्रा० आदिव) प्रकट होना । माविहति-कि० आना) उम्मीद; (की० ३, ११) १० का०, बायोग; (मं० न०) । का आमाहतः (जं० ६, ७, १६): यापोलिय-कृ० (मं० आ, पीड़>प्रा. मास--न० (सं० आस्य>प्रा०' आस.) नावाड, दावील) १- पोड़ते हुए, २० मुख, मुंह, (५० ब० १४, १३, ४) । दवाते हुए; (५० च० १८, १, ७) । वि० प्रास'-० (२० अद>प्रा० आस) (#मापीडित) दवा हुना; (म.) । अश्व, छोड़ा; तुम० म० आस; (संधि आवृष्ण-वि० (सं० मापूर्ण) पूर्ण, भर, २३, ६, ४) चार, पृ० वृह-सवार; पूर;(दे० ना० मा० २,१०२) । (नधि० २,७)। साबलण-न० (सं० आवर्तन) मनी/ 1 लाम-अक० (मं० आस्) बैठना; को मटकाना; (सुदं० ११, ११, ५) (म.)। Wश्वास-(सं० बादासयति) बावा मासर-पुं० (सं० वादद्र>प्रा० सन देना, (३० व्य० प्र० ९-१)। मानव) बाथर-जैन मत के अनुसार /मासक--(सं० मा+ग> मन,वाणी और शरीर से किए हुए कर्म यासंक) संदेह करना। यासंकद्र-सक० का संस्कार दिले जीद ग्रहह करके बद (सं० आगंकते) (भ०)। होता है। यह दो प्रकार का होता है-- आसंका-स्त्री० (२० दाशका>प्रा० पुच्यायत्र, २- पापायद; "भासर दुविहु मासंका) संगय, शङ्का; (जस० ४, ८, सुहामुह भएं," -गुभ-अशुभ . के भेद से ११; भ०)। सायद दो प्रकार का है; (३० ३०, ३६, जासंग-यु० (२० आसन) गयन-कन्न, २०)। अव्या-गृह; (६० ना० मा० १, ६६) । यासउल-पु. (मं० मायययुज) मातंगि-शयन-कक्ष में; (सं० रा०)। बनौज; (प्रा० गु० २८, ४) । आसंघ--ग्री० (दे०) भागंमा, इच्छा, १/मासङ्घ-(मं० माथि) महारा अभिनापा; (भ०)। लेना, बाधित होला !-नि, कि०, द. मासंबड-कि० १- (प्रा० दासज्ज (भा-प्रयति); (प. ३० ४०, १४, प्राप्त करके) नामिलना, भेंट करना; २)। "को जमकरण जंतु यासंबड, कोत माडिय-दि० (सं० माङ्कित>प्रा० जाते हुए यम के दूत से मेंट करता है, माफिय) १. संदिग्ध, २. संभावित (म० २, २२, २) 1 २. वनिता होना; (१० ३०१, १२, ५). "पुषकमु सप्युरियन लंयहि, कन्न आसरा-म० (सं० दाजन>प्रा. इत्तरतर आसंघहि," (द, ८, ३, ७)। मामय) जिस पर का जाता है वह साधा-स्त्री० (दै०) . इच्या (दे० चौकी आदि; (म०)।
आसणत्य (८७) आसवार है वह प्रा० - आसणत्य-वि० (सं० आसन-+-स्थित >प्रा० आसण+थिम) आसन पर बैठा हुआ; (प० च० ७, २, ८)। आसण्ग -न० १- (सं० आसन >प्रा० आसण) जिस पर बैठा जाता चौकी आदि; (ण० १, ४, १)। २. न० (सं० आसन्न>प्रा० आसण्ण) समीप, पास; वि० समीपस्थ; (प० च० ७, ४, २) । -भव्व वि० (सं० आसन्न भव्य) नजदीक में रह कर सुंदर लगने वाले; (प० च० १८, ४,४)। आसण्णीहूउ-क्रि० (सं० आसन्नीभूत) निकट पहुंचा; (प० च० १, ८,५) । प्रासत्त-वि० (सं० आसक्त>प्रा० आसत्त) लीन, अनुरक्त; (भ०; जस० २, १, १७)। आसत्तिय-वि०, आसक्त; (भ० २२, ८, ११)। आसत्ती-स्त्री० (सं० आसक्ति>प्रा० आसत्ति) अनुरक्ति; (जस० २,२६,६) । आसत्य-वि० (सं० आश्वस्त) १. आश्वासन-प्राप्त, स्वस्थ; २-विश्रान्त; (दे० ना० मा० ७, २८) । आस्थाम- पुं० (सं० अश्वत्थामन्) १. अश्वत्थामा २. (सं० अश्वत्प पीपल का गाछ (जंबू० ५, ८, ३२) । प्रासत -न० (सं० आसन्न >प्रा० आस- पण) समीप । वि० समीपस्थ; (भ०; सं० रा०)। आसपास-पुं० (सं० आशा+पाश आशा का जाल, आशा की श्रृंखला; (जस० ३, ८३, ३)। आसम-पु. (सं. आश्रम>प्रा० आसम) तापस आदि का निवास स्थान; (भ०)। आसय--पु. (सं० आशय>प्रा० आसय) अभिप्राय; (क० १०, २६, ६)। न० (दे०) निकट, समीप; (दे० ना० मा० १, ६५) । पुं० (सं० आश्रय > आसय) आधार, अवलम्बन (भ०)। आसरित्र-वि० (दे०) सामने आया हुआ; (दे० ना० मा० १, ६६)। आसव-पुं० (सं० आश्रम>प्रा० आसम) तापस आदि का निवास-स्थान, तीर्थ-स्थान; (प० च० ६, १, ६) । आसव-पुं० (सं० आश्रव>प्रा० आसव) कर्मों का प्रवेश-द्वार; जिससे कर्म- बन्धन होता है वह हिंसा आदि; (ण० १, १२, ६)। 1/पासव-(सं० मा+ A-sravaflow, discharge >प्रा० भासव) धीरे-धीरे झरना, टपकना; (जस० ४, १५, ३)। -इ अक० "रयणायरें जल- संघाउ जेव, कम्माण णिवहु आसवइ तेव" -जिस प्रकार समुद्र में जल का समूह एकत्र होता है, उसी प्रकार जीव के साथ कर्मों के पुंज का आस्राव (वहाव) होता है; (क० ६, १२, १)। आसवण-न० (दे०) वास-गृह, शय्या- घर; (दे० ना० मा० १, ६६) । आसवाई-न० (सं० प्रा० आसव) आसव, मद्य; (विला०)। आसवार-पुं० (सं० अश्ववार) अस-, वार, घुड़सवार; (भ०; ण. ८) । आसवारु-० अश्वारोही; (रि० । .. .
आसा (८८) आसेअणय प्रा० ५० १, . प्रासा-स्त्री० (सं० आशा>प्रा० प्रासासिय-वि० (सं० आश्वासित > आसा) उम्मीद । -चक्कु पु० आशाचक्र आसासिअ) आश्वासन-प्राप्त; (व० २, २१, ६)।-सवाहा स्त्री० (सं० (भ०)। सर्वाशा) सब आशाएँ'; (प्रा० आसि-कि० (सं० आसीत् >प्रा० ११६)। आसि, अस-होना) था; (सुदं० १० ६, आसाइ-स्त्री० आसाई नगरी; (क० ६; ण० ६, ८, ११; प० च० १, १२, १०, २८, ४) । वि० सं० आसादित) ८)। पूर्व काले में; (जस० २, ८, ५) । प्राप्त, लव्ध; (प० च ४४, ६, ४)। -काल पु० (सं० आसीत् +काल, भूतकाल आसाऊरिय-वि० (सं० आशापूरित) (सुदं० ६, ४, ११) । आशावान; (क० ७, ८, ११)। आसा- आसिम-वि० (सं० आश्रित>प्रा० करिय-वि० आशा से पूरित, (प० च० आसिअ) आश्रय-प्राप्त, (ण० ६, २०, १, ५)। १५)। -अ, वि० (दे०) लोह-निमा; आसाढ-० (सं० आषाढ>प्रा० (दे० ना० मा० १, ६७) । आसिय वि० आसाढ) आपाढ़ मास; (भ०) । आश्रित स्थित; (जबू० ११, ६, २)। आसाय-न० (सं० आस्वाद) स्वाद आसीण- वि० (सं० आसीन) बैठा हुआ; (जस०) । –ण, न० (सं० आस्वादन (सं० आस्वादन (जंबू० १०, २४, २) । >प्रा० आसायण) स्वाद लेना; (जस० आसीवअ-पुं० (दे०) दरजी, कपड़ा ३, १, १२)। आसावरि-पु. आसावरी देश-विशेष, सीने वाला; (दे० ना० मा० १, ६६)। 'जिणि आसावरि देसा दिण्हउ' -जिस आसीवान-न० (सं० आशीर्वाद >प्रा० राजा ने आसावरी देश दे दिया, (प्रा० आसीवाय) आशीर्वाद; (क० ८, ७, ३; पं० १, १२८)। जस० ३, ८, ११) । आसीवाउ; (सि. Vासास--(सं०आ+/श्वासय् >प्रा० १, ८). आसास) आश्वासन देना । आसासेवि- आसीविस-पु० (सं० आशीविष>प्रा० पू० का० क्रि० आश्वस्त कर; (व. २,१, आतीविस) विपैला सर्प; (भ०) । -सप्प १३)। पुं० (सं० आशीविष-सपं>प्रा० आसी- विस सप्प) विपैला साँप; (प० च० ११, आसास-न० (सं० आश्वासन >प्रा० मासासण) आश्वासन; (सं० रा०) । ३,८) । आसासण-न० (सं० आश्वासन >प्रा० आसीस-पुं० (सं० आशिष् >प्रा० आसासण) तसल्ली, दिलासा, आसीसा, आसी) आशीर्वाद; (भ०) । प्रदान; (सुदं० १,१०, ३) । आसु-अव्य० (सं० आशु>प्रा० आसु) पासासय-पु० (सं० आश्वासक >प्रा. शीघ्र, तुरंत; (जस० १, ८, ७) । आसासम) ग्रन्थ का अंश, सर्ग, परिच्छेद, आसेअरणय-वि० (सं० आसेचनक) अध्याय; (प० च० १, २, ५) । जिसको देखने से मन को तृप्ति न होती . आशा- आसोज (८६) आहास . नीच कर्म; . (म० २, वध हो वह; (दे० ना० मा० १, ७२) । आहव-भूमि) युद्ध का क्षेत्र; (प० च० आसोज-पु० (सं० आश्वयुज>प्रा० २०, ५, ८)। आसोम) बासीज, आश्विन मास; तुल आहाकम्म-पु० (सं० अघः कर्म) १. गु० भासो; (संधि० १७, ५, १)। ७२, ६) १२. माहंडल-पु० (सं० बाखण्डल) इन्द्र; हिंसा; (जस० ३, २१, ७) । (जंवू० २, ४, ७; ति० १, ३२)। /आहारण-क्रि० (सं० बा+हन्>प्रा० पाह-स्त्री० (सं० आभा) चमक-दमक, आहण) आघात करना, मारना । माहणेइ- कान्ति; (भ०)। नि० जीत लेना, "सो वयणई सुरगुरु /आहण-(सं०आ-हन् >प्रा० मा आहणेइ," -वह अपने वचन से वृहस्पति हण -मारना, करना) प्रहार को भी जीत लेता है; (क० ९, २४, करना। -इ सक०; तुल० म० हणणे ४)। (भ०) । आहणहों-क्रि०, व० २०, माहाणन-न० (सं० आख्यानक >प्रा० मा०, (तूर्य-वाद्य) वजाए; (प० ३० आहाणय) उक्ति, वचन; (सुदं० ७, १२, १६, ३, १०) । आहणन्ति-क्रि० (स्त्री- ६)। लिंग में प्रयुक्त । (प० च० १८, ११, माहाणय-पुं० (सं० आभानक) कहा- ५)। वत; (प० च० ४३, ६, ६)। (सं० आहत>प्रा० आहारंगु-पुं० (सं० आहारक अङ्ग) आय) आघात-प्राप्त; (भ०; जं०८, लाहारक शरीर, जैनशास्त्रानुसार एक ७, १२) । प्रकार की उपलब्धि जिसके द्वारा चतुर्दश १/आहर- (सं० प्रा+ह) छीनना, पूर्वाधारी मुनिराज अपनी शंका के समा- खींच लेना। -इ सक० (सं० बाहरति) धान के लिए हत्त मान शरीर धारण कर (भ०)। तीर्थकरों के पास उपस्थित होते हैं; (व० आहरण-पुं० न० (सं० आभरण> १०, ६, २)। प्रा० भाहरण) भूषण, अलंकार; (ण० १, 1/माहार-(सं० आहार > १६, ५; प०सि० १०१,१४, ७६; आहार) भोजन करना । -इ सक० सुअंध २,४,२; क० २, १७, २; सि० (महा० ६८, २)। १, १४); आहरणे; (रा० ५) । आहार-०१- (सं० प्रा० आहार) /आहल्ल-(सं० आ+चल्) हिलना, खुराक, भोजन; (भ०) । २- (सं० चलना । -इ अक० (सं० आत्फालयति) आधार) बाश्रय; (जत० ३, २१,७, (भ०)। ११)।-ण पुं० आहार; (व० .१०, माहव-पु. (सं० प्रा० आहव) युद्ध ७,११)। (को० ४, २३७) । -भूमि स्त्री० (सं० /माहास- (सं० ना+भाष्>प्रा० प्रायवि० प्रा० आहासिन (६०) इंघिय . याभास, माहान) कहना, संभाषण २.सिसकारी, सी-सी का शब्द; (दे० करना; (रण० १,१,२)।-इसक० ना० मा० १,७४)। (सं० यामापते); (भ०)। माहुडिय-वि० (दे०) गिरा हुआ, (दे० यावासिम-वि० सं० ना+मापित) ना० मा० १, ६६)। संभाषित; (ण० ८, २, २)। माहुत्त-न० (दे०) अभिमुख, सम्मुख, Vाहिंढ--(सं० मा हिण्ड >प्रा० सामने; "रणाहुत्तकाले"; (भ०) । माहिंड) घूमना, परित्रमण करना; पाहूय- वि० (सं० माहूत>प्रा० (जस० ४, १८, १४) । बाहिण्डइ-क्रि०, आहूज) बुलाया हुआ; (क. ७, १२, व० (प० च० १०, १२, ६)। ५)। प्राहि-स्त्री० (सं० नाघि>प्रा० बाहेडय-पुं० (सं० आवेट+क>प्रा० आहि) मन की पीड़ा; (क० १, १६, बाहेडग) शिकार; (प० च. २७, ३, ३)। १)। माहिन्दोलन-पुं० सं० प्रलोमणम्; आहोय-पुं० (सं० प्रा० आभोग) उत्तेजना, क्षोम; (प० च० ४१, १, ४)। विस्तार; (रण० ६, ४, ८)। आहिन्दोलित-वि० प्रक्षोभित, उत्ते- जित; (प० च० २५, १८, १२)। प्राहीर-पु. (सं० बाभीर >प्रा. याहीर) यहीर जाति विशेष; (क० ७, ३, ६; १० च० ३०, २, ११)। ई. अन्य० (सं० एव) निश्चय ही, बाहूंजेइ-क्रि० (सं० मा+/मुज्) समानता; (उ० व्य० प्र० १६- २३) । खाना; "सुहिबंधवनणेहिं परियरियर आहुंजेइभोयणं"; (सुदं० ५, ६, २)। इंगल-पु० (सं० अङ्गार>प्रा० अंगार, इंगाल) जलता हुवा कोयला; (सुदं० ६, याहृदुर, माहुंदुर-पुं० (दे०) बालक, १५, ७)। इंगाल-कोयला; (ण० ६, पच्चा; (दे० ना० मा० १, ६६) । ६, १०)। माह-पु (दे०)..उल्लू (दे० ना० इंगाली-स्त्री० (दे०) इंगारी, अंगारी, मा० १, ६१) । इक्षुतण्ड, ईख का टुकड़ा; (दे० ना० मा० माहृछ--वि० (सं० अध्युप्ठ>प्रा० १, ७६) मड्ड्ढ>प्रा० बढुट्ठ, अधुट्ठ) इंगिय-न० इंगिय-न० (सं०. इङ्गित >प्रा० अत्रि, साढ़े-तीम; तुल. इंगिअ) संकेत, अभिप्राय के . अनुरूप उ; (रि० ८, १; 4० ६, ६, ३)। चेप्टा; (ण० ४, ७, १)। पाहड-क्रि० (दे०) गिरना; (दे० ना० इंघिय-वि० (दे०) सुंघा हुआ; (दे० मा० १, ६६)। न०१- ' विक्रय, १,८०)। tur गु० में, (६१) इंदाअण - . M ... . -वज्जा, इति-नि. (सं० यन्ती,/या) आती इंदजाल-न० (तं० इन्द्रजाल>प्रा० है; "माउर इति गिह्वण-कएण"; (व० इंदजाल) माया-जाल, छल; (ण० ३, १, ४, १२)। १, १२)। इसीए-वि० (सं० यन्ती) आने वाली, इंदड्ढलभ-पु० (दे०) इन्द्र का उत्था- "अहमेंतीए तीए सामी' -मैं ही उस पन (जगाना, ऊपर उठाना); (दे० ना० आने वाली प्रेयसी का प्रेमी हूं; (जस० मा० १, ८२)। १, १२, १६) । इंद-गंदरण-पु. (सं० इन्द्र+नन्द -नन्दन) इतु-भू० का० कृ० (सं० यात, या+ इन्द्र का नन्दन वन; (व० ३, ६, २)। क्त) ग़या हुआ; "इतु ण दीसइ जीउ इवणील-पु० न० (सं० इन्द्रनील > पहंतरि,"-कि जीव तो शरीर से पृथक प्रा० इदरणील) नीलममणि मणि-विशेष; मार्ग पर जाता हुआ दिखाई नहीं देता; (ण०. १, १४, ३) । इंदनील; (जंबू० ३, जस० ३, २१, ७)। ३, १०)। ईद-पु. १- (सं० इन्द्र > प्रा० इद) इदभूइ-पु.० (सं० इन्द्रभूति) गौतम गणपर; (५० १०, २, ३)। १- देव-राज, देवताओं का राजा (सि १, ३४; भ०) । २. इद्रवजा इंदमंदिरं-पु. नामक (सं० इन्द्र + मन्दिर) छंद; (प्रा. पं० २, ११८) । इन्द्र-भवन; (महा० ६८, ४) पु० (सं . इन्द्रवज्रा) इंद्रवज्रा छंद; इंद्रवज्रा छंद; इंदमह-वि० . (दे०] १. (प्रा० ५०२, ११४)1-वाय पु० उत्पन्न; २- कुमारता, यौवन; (दे० ना. (सं० इन्द्रवात >प्रा० - इंदवाय) एक मा० १,८१)। माण्डलिक राजा; (भ०)। इदमहकामुम-पु (सं. इन्द्रमह- ईदगाह-पु० (दे०) साथ में संलग्न कामुक) कुत्ता, श्वान; (दे० ना० मा १, ५२)। रहने वाले कीट-विशेष; (६० ना० मा० इंदयालु-न । (सं० इन्द्रमाल >प्रा. १,८१)। ईदजाल, याल) माया कमी छल, कपट इंदगोनय-पु० (सं० इन्द्रगोपक) इंद्र की विद्या; (व० ५, १३, १६) । गोप, खद्योत, वर्षा ऋतु में होने वाला इंवाएस-पुं० (सं० - इन्द्र आदेश) रफ्त मर्ण का क्षुद्र . :'जन्तु-विशेष; "पिय इन्द्र का आदेश; (जंबू०१, १६, ३). पेक्खु इंदगोवयविरेणु ।' प्रिये इस विरेणु इंदारिण-स्त्री० (सं० इन्द्राणि>प्रा० अर्थात् 'रजरहित निर्मल इंद्रगोप (खद्योत) इंदाणी) इन्द्र की पत्नी; (व० ६, १२, को देखो'; (जंबू० ४, १८, ६) । १०)। इंदग्गि-पु० (दे०) बर्फ, हिम; (दे० इंदासण-पु० (सं० इन्द्रासन) पंचकल ना० ० मा० १,६०)।-धूम न.० (दे०) गण का नाम (छंदशास्त्र में प्रयुक्त); 'बर्फ; (दे० ना मा० १, ८०)। (प्रा० ० १, १६)। कुमारी में .... - इंदिदिर (६२) इअर - इंदिदिर-पु० (सं० इन्दिन्दिर>प्रा० इंदयाल) मार्या-कर्म; (प्रा० गु० ५, इदिदिर) भ्रमर; (जंवू० ८, १३, ६)। ११; संधि० १४, १, २)। इंदिदिरि-स्त्री० (सं० इन्दिन्दिरः) इंदीयर-(सं० इन्दीवर>प्रा० इंदी- भ्रमरी; (ण० ३, ५, १२) । वर) कमल, पद्म; (भ०) । इदिय-पु० न० (स० इन्द्रिय >प्रा० इंदु-पु० १- (सं० इन्दु>प्रा० इंदु) इंदिय) १. वह शक्ति जिससे बाहरी चन्द्र, चन्द्रमा; (भ०) । २. पुं० इन्दु विपयों का ज्ञान होता है, २- ज्ञानेन्द्रिय नामक दूत; (व० ३, ३१, ८) । ३- -आंख, कान, जीभ, नाक और त्वचा; रोला छन्द का एक भेद; (प्रा० ५० १, कर्मेन्द्रिय-जिनसे कर्म किये जाते हैं, ६३) । ४- पट्कल गण का नाम (छंद यथा-हाथ, पैर आदि; (सा० ६५) । शास्त्र में प्रयुक्त); (प्रा०५० १, १२५) । -वल पुं० (सं० इन्द्रियवल) इन्द्रियों इंदोम-पु० (दे०) इन्द्रगोप, कीट- का बल; (जस० २, १३, २०) । -सुह विशेष; (सं० रा०)। पु० (सं० इन्द्रियसुख) इन्द्रियों का सुख; इंदोवत्त-पुं० (दे०) इन्द्रगोप, कोट- जस० ३, २०, ७)। विशेप; (दे० ना० मा० १, ८१) । इंदियगिदि-स्त्री० (सं० इन्द्रियगृद्धि) इंधण-न० (सं० इन्धन). जलावन, इन्द्रिय प्रलोभन; (जंबू० ११, १४, ७)। ईधन; (उ० व्य० प्र० २१-३०; की० इदियदप्प-पुं० (सं० इन्द्रियदर्प) ३, ६८) । इंधणु (परमा०)। -पाणि इन्द्रिय-अहंकार; (जंबू० ३, ६, २) । न० (स० इन्धन+पानीयम्), इन्धनोदकम् इदियदमरण-पुं० (सं० इन्द्रिय+दमन) (उ० व्य० प्र० २१-३०)। इन्द्रियों का दमन; (जंबू० २, १८, ३) । इहां-अव्य (सं० प्रा० इह) . .यहाँ; इंदियफडालु-पुं० (सं० इन्द्रिय+फणा (उ० व्य० प्र०, २०-५)। +ल (स्वार्थे प्र०) इन्द्रिय रूपी फणा, इ-अव्य० १-(सं०. एव) ही (रा०३)। फ़ण (भोग) "इंदियफडालु चउगइवयणु"- २- (सं० अपि) भो; (प० च० ३, १३, इन्द्रियों रूपी फण, चतुर्गति रूपी मुख; ७)। पुं० (सं० प्रा० इ) अपभ्रंश वर्ण (जंवू०)। माला का तृतीय स्वर-वर्ण । इदियविति-स्त्री. (स० इम-अव्य० (सं० इतः) यहाँ; (सं० इतः) यहां; (की० २, वृत्ति) इन्द्रिय-प्रकृति या का; (जंवू० २२६) । २- सर्व० (सं० इंदम्) यह; (क० ११, ८, २)। १, १०, १०) । ३- अव्य० इव; (सं0- रा०)। इंदियवि-पु. (सं० इन्द्रिय+ इअर-वि० (सं० इतर>प्रा० इयर) विषय) इन्द्रियों के विष . (अर्थात् भोग अन्य; (को० ३, ७०)। इयरा-वि. वासना); "नासह इंदियविसय वर"; स्त्री० (सं० इतरा) अन्य; (प्रा० ५० १, (जं० २, २०, ६)। ८३) । इमरी-वि० अन्य; . (को० . १, इंदियाल-न० (सं० इन्द्रजाल >प्रा० ४६)। ... इन्द्रिय+ इआलिस (६३) इन्गारह एक्क, 1 इआलिस-वि० (सं० एकचत्वारिंशत) (दे० ना० मा० १,८०)। इकतालीस, चालीस और एक; (प्रा० इक्कल्ल-वि० (सं० एकल) अकेला; पं० १, १५६)। तुल० गु० एकलु; (संधि० १४, १, ४)। इ-अव्य० (सं० इतस् >इओ) इस -अवि० अकेला; (जंबू० १०,२६,११) । लोक में, यहाँ; (रा० २८)। इक्कल्लिय-वि० (सं० एकल) अकेली; इउ-सर्व० (सं० इदम्) यह; तुल० गु० (सं० रा० १६०)। आ; (संधि० १६, ६, १३)। इवकासी- सं. (सं० एकाशीति) · इप्रो--- प्रव्य० इतने में; "इओ तत्य इक्यासी; तुल० गु० एकाशी, पं० ईसाणचंदस्स धूया"; (विला०)। इकासी; (संधि० १६, ३, १)। इक-वि० (सं० एक>प्रा० इक्किक्कि-वि० (सं० एक-एक) एक- इक्क) एक; "इक-गुणी पूज किय कुवरि एक; (सं० रा०)। कंत"-कुमारी भौर कान्त ने पहले दिन इक्कुस-न० (दे०) कमल; (दे० ना. एक गुनी पूजा की; (सि० १, १७, मा० १, ७६)। २६)। इक्ख-पुं० (सं० इ>प्रा० इक्खु इकठ्ठ-अव्य० (सं० एकत्र) इकट्ठा, ईख, ऊख; (सं० रा०) । इक्खु; (क० ४, सारा; (सं० रा० १८०)। १०, ५)। इकलि-वि० स्त्री० (सं० एकला) इक्खक्कु-० (सं० इक्ष्वाकु>प्रा० अकेली; (प्रा० पैं० २, १६३)।-य; इक्तागु) एक प्रसिद्ध क्षत्रिय राजवंश; अकेली (सं० रा०)। (प० च० ३८, ११,७)। इक-सथ-स्त्री० (सं० एक संस्था) एक इक्खरण-न० (सं० ईक्षण) अवलोकन, रूप या आकार, "इक-संथ... बि-संथिय प्रेक्षण; (भ.) । बाला जंति-संथिय जंपर। वररुचि रूठउ इक्खा-स्त्री० (सं० प्रा० इच्छा) इच्छा; रामो, रोसिहि मणु कंपई"; (प्रा० गु० (सि० १, ३)। १६, ६)। - इक्साउ.-पु० -(सं० इक्ष्वाकु>प्रा० इक्क-वि० (सं० एक>प्रा० एक्क, इक्खागु) इक्ष्वाकु नामक वंश; (महा० इक्क) इकाइयों में सबसे छोटी और ६८, ६, ६)। पहनी पूरी संख्या, एक; (ण? २. .१, ६; इगसठि-वि० (सं० एकषष्ठि>पा० जंबु० १, ५, १७; पाहु० १७७) ।-ति एकसट्टि) साठ और एक; तुल० गु० एक- वि० एक ही, एकन; (सं० रा०).... सठ; (प्रा० गु० ४०, १३) । इक्कइया-अव्य० (सं० एकदा>प्रा० इग्ग-वि० (दे०) भीत, . डरा हुआ; एक्कइया) एक समय में, एक बार; .(दे० ना० मा० १, ७६); (जस० ४, २४, २६)। इग्गारह-वि० (सं० एकादशन् >प्रा० इक्कण-वि० (दे०) चोर, चुराने वाला; एक्करह) ग्यारह; (प्रा० १० १, ६३)।
इंग्घि (६४) इत्यंतरि !.. "इग्घिम-वि० (दे०) तिरस्कृत; (दे० इडिका-स्त्री० (सं० एडक>प्रा० ना० मा० १,८०)। एडक्क); भेड़ (की ० ४, ११४) । Vइच्छ- (सं० इप् >प्रा० इच्छ) इच्छा इडिढवंत-वि० (सं० ऋद्धिमत् >प्रा० करना; (उ० व्य० प्र० १३, १) । -इ इड्ढ़िमंत) वैभव या शक्ति, सामयं सक०, ए० व० (सं० इच्छति) (भ०) । वाला; (सुदं० २, ६, ६)। -त कृ० (सं० इच्छन्) (उ० व्य० प्र० इणं-सर्व ० (सं० इदम्) यह; (ण० २, १२-२७)। -मि क्रि.०, २०, ए. ३, १; दे० ना० मा० १, ७६)। व० (प० १० १४, ८, ४)। हु क्रि० इणि, -सर्व० (सं० एतत्) इस; (सं० 'व० चाहना, (हे० ३८४) । रा०)। इच्छ-स्त्री० (सं० प्रा० इच्छा) अभि- लाषा; (प० ५० १४, ८, ४)। इण्णि-सवं० (सं० एतानि) यह; (प्रा० इच्छिय-वि० (सं० इच्छित >प्रा० पं० २, १६०)। इण्णे-सर्व० (सं० एते) इच्छिय) जिसकी इच्छा की गई हो वह; ये; (प्रा० ५०.२, २८)। (भ०) । इण्डिं-अव्य० (सं० इदानीम्) इस इच्छु-वि० (सं० प्रा० इच्छु) इच्छुक, समय; (दे० ना० मा० १, ७६)। अभिलाषी; (सि० १, २१)। इत-अध्य० (सं० इत्यम् >प्रा० इत्यं) इच्छेवय-वि० (सं० एषतव्य) इच्छा; इस तरह, इस प्रकार; (को० '३, "होउ मज्झु इच्छेवय-संपइ," (जस० १४८) । ४, २७, १२) । इत्त-वि० (सं० एतावत् >प्रा० Vइछ-(सं०/इष् > प्रा० इच्छ) इत्तिय) इतना; (हे०, ३६१) । इच्छा करना, चाहना। -इ सक० (प्रा० इत्तलउ-वि० (सं० एतावत्, इयत् > पैं० २, १६३)। प्रा० इत्तिय) इतना; (प्रा० गु० १२, इट-स्त्री० (सं० इष्टका>प्रा० १३)। इट्टा) ईट; तुल० गु० ईट; . (प० च० 'इत्तहि-अव्य० (सं० अन्न) यहां पर; ३३, ६, ४) । इट्टा-स्त्री० - ईंट (संधि (भ०) । ३, १२, ४) । इट्ठाल-वि० इण्टकामय इति--स्त्री० (सं० इयत्ता) सीमा, परि- इंटों से युक्त; (प० च० २५, ७, ३)। मिति; (को० ४, ११)! इ8 - वि० (सं० इष्टं>प्रा० इट्ठ) इत्तिम-वि० १. (सं० इयत्, एतावत् > अभिप्रेत, प्रिय, अभिपित; (भ०)। प्रा० एत्तिम) इतना; (क० ३, ७, ६) इटछु (हे० ३५८, २)। -च्छर-स्त्री० इत्तिय (भ०) । '२. इत्वर, चपल; (सं० इष्ट-+अप्सरा) (जंबू०२, २, जस०)। ७) । --देवो पु० (सं० इष्टदेव:) प्रिय इत्यंतरि-अव्य० (सं० अत्र+अन्तर) देवता; (प्रा० ५० १, ३४) । इसी वीच; (सं० रा०)। - :
इत्प (६५) इयराउत्त १३, ७, - . इत्थ-अव्य० (सं० अत्र>प्रा० एत्य) इन्दिन्दिर-पुं० (सं० इन्दिन्दिर>प्रा० यहाँ, यहीं पर; (भ०) । (जस० १, इंदिदिर) भ्रमर; (प० च० १८, २०; म० १, २३, ५)। इत्यि- इत्यि- ४)। अव्य० यहाँ (प्रा० पैं० १, ६) । इत्थु; इन्म-० (सं० इभ्य >प्रा० इभ) (भ०)। धनी, धनवान; (जंवू० ३, १०, १२) । इत्यन्तरे-अव्य० (सं० अत्रान्तरे) यहाँ पु० (दे०) वणिक, व्यापारी; (दे० ना० इसके बाद; (प० च० १, १४, १)। मा० १, ७६)। इस्थिम्म अव्य० (सं० एतस्मिन्) यहां, इम-सर्व० (सं० इदम् >प्रा० इम) "इत्थम्मि हवेसइ तित्थवरु," यहां एक यह; (जंबू० २, ३, १); इमम (म०) । बड़ा तीधं बनेगा; (क० ५, ६, ६) । इम-क्रि० वि० (सं० एवम्) ऐसा ही, इत्थिरज्ज-पु.० (सं० स्त्री+राज्य) इस प्रकार; तुल० गु० 'एम; (संधि० देश-विशेप; (जंबू० ६, १६, १२) । ११, १, २) । २- यह, ऐसा; ऐसे; (प्रा० इत्यो-स्त्री० (सं० स्त्री>प्रा० इत्थि, पं० २, ७४)। ३. इस प्रकार; (सं० इत्यो) महिला, औरत; (विला०) । रा०)। इथ्थि-अव्य० (सं० अन>प्रा० इत्थ) इमराहिमसाह इबाराहीमशाह; यहाँ; (की० ४, १२)। (को० २, १५३)। इथेन्तर-क्रि० वि० (सं० अन्नान्तर) इनु-सर्व० (सं० इदम् >प्रा० इम) इस बीच में; (की० ३, ६३)। यह; (प० च० १५, ११, ६)। इदंड-पु० (दे०) मधुकर; (दे० ना० इय-अव्य० (सं० इति>प्रा० मा० १, ७६)। इस प्रकार, एवं (ण० १, १०, १२)। इन--सर्व० (सं० एतत्) यह; (रा० सर्व० यह; (सं० रा०) । १२)। इयर-सर्व० (सं० इतर>प्रा० इयर इन्द-पु० (सं० इन्द्र) सूर्य; (को० २, स्त्री० इयरा, पाठी एक व० इयरुहु, २६)। इयस्सु, दूसरा; तुल० पुरानी म० येर, इन्दत्तणु--पु० (सं० इन्द्रत्व>प्रा० येरु; (भ०; जस० ३, ३२, ४)। -ह इंदत्त) इन्द्र का असाधारण धर्म; (प० अव्य० (सं० इतरथा) अन्यथा, अन्य च० ३, ६, ११)। प्रकार से; (जस०) । इयरा-वि० (सं० इन्द-दिस-स्त्री०, (सं० , इन्द्र-दिशा). इतरा स्त्री०) दूसरी; (जंबू० ८, ११, पूर्व-दिशा; (प० च० २४, १४, ६). १)। इन्दवह-पुं० (सं० इन्द्रमह>प्रा० इंद.. इयराउत्त-पु० (सं० इतर+आयुक्त) मह) इन्द्र की आराधना : के लिए किया. अन्य (लोगों के) मुखिया, जाता एक - उत्सव; . (प० च०. ८, ६, महंत थिय सेणिउ, इयराउत;" (जंबू० ५, १, १०)। इय) "पुणु सामंत.. ६)।
इरमंदिर (६६) ईंधण कुछ भी - । इरमंदिर-पु० (दे०) करभ; ऊंट; इसि- पु० (सं० ऋषि>प्रा० इसि) (दे० ना० मा० १, ८१)। मुनि, साधु, ज्ञानी, महात्मा; (ण० १, इरावय--पु. (सं० ऐरावत > प्रा० १२, ३)। इराव) हाथी; (ण० ६, १३, ५) । इह-सर्व० (सं० प्रा० इह) इस लो० इरि-पु० (सं० प्रा० गिरि, प्रा० इरि) -'इह भूरि पुण्णवंतर्ह जराहँ कि पि वि पर्वत; (प० च० ३, ८, ७) । ण असज्मु मणोहराई'-महान् पुण्यशाली इरिण-न० (दे०) कनक, सुवर्ण; (दे० पुरुषों के लिए इस संसार में ना० मा० १, ७६)। असाध्य नहीं है; (व० ८, ५, २)। इरिया--स्त्री० (दे०) कुटी, कुटिया, इहदह-वि० (सं० एकादश) ग्यारह; (दे० ना० मा० १, ८०)। प्रा० .० १, ८६) इल-स्त्री० (सं० प्रा० इला) पृथ्वी, इहरत्त-अव्य० (सं० इह +अत्र) इस भूमि; (प० च० १२, ११, ६) । इला; संसार में; (संधि० १२, ७, ५) । (जस० ४, १७, ११)। इहलोय-पु० : (सं० इहलोक >प्रा० इलरक्त--वि० (सं० इला+रक्षक > इहलोग, इहलोअ) मनुष्य-लोक, (प० प्रा० इला+प्रो० रक्खअ) खेत का रख- च०४, १३, ४) वाला; (संधि० २, १३, ५)। इहां-अध्य० (सं० इह) यहाँ, इस स्थान इल्ल-पु. (दे०) १ प्रतिहार, चप- में; (उ० व्य० प्र०, २०-३;रा० २८)। रासी; २- दाँती, ३- वि० दरिद्र; ४. इहिकारा- (सं० इहिकाराः) इकार कोमल,.५- काला; (दे० ना० मा० १, तथा हिकार वर्ण; (प्रा० ५० १, ५)। ८२) । इहु-अव्य० (सं० प्रा० इह) यहाँ, इस इल्लि-पु. (दे०) १- व्याघ्र; २- सिंह; जगह; (भ०) । २-सर्व० (सं० ईदृक) यह; ३- छाता; (दे०. ना० मा० १, ८३)। "ऍहु दीसइरिउवले 'विजउसाहु" -यह इल्लीर-नं० (दे०) १- आसन-विशेष; शत्रु-सेना में विजय का उत्साह दिखाई दे २- छाता; ३- दरवाजा, गृह-द्वार; (दे० रहा है; (जंवू० ७, ३, ७)। ना०. रा० १,८३)। इव-अव्य ० (सं.० प्रा० इव) इन अर्यों का सूचक-१- उपमा, २- सादृश्य, इंधण-न० (सं० इन्धन >प्रा० इंधण) ३. उत्प्रेक्षा; (प० च० ५, १३, ८) । इधरण, लकड़ी आदि जलाने की वस्तुः इत्यहि -अव्य०. (दे०) सं० इदानीम; (उ० व्य० प्र० १५, ४) अभी; (म.०.२, २८, ६)। ई-सर्व० (सं० एतत् प्रा० ईअ) यह; इस-वि० (सं० ईदृश) ऐसा ।-उ (संधि (की० १, २६) । पुं०-अपभ्रंश वर्ण- माला का चतुर्थ वर्ण; स्वर-विशेष । ई . १७, २, ५; रा०१०)।
ईच्छ (६७) ईसास हुआ भी या बड़ा 1/ईच्छ-(सं० इच्छति) इच्छा करना; +वाय) ईश्वर में विश्वास संबंधी तत्त्व- (उ० व्य० प्र० ५२-११) । विचार; (ण० ६, ७, १०)। ईर—सक० (सं० प्रा० ईर) कहना। ईसरसंगउ-(सं० ईश्वरसंगतः) महेश्वर ईरिय क्रि० भू० का० कहा; (महा० का साथी, 'जो सामि वि णउ ईसरसंगउ ६६, १६, ६)। वह स्वामी होता स्वामी ईरिम-वि० (सं० ईरित, /ईर= (कात्तिकेय) के समान महेश्वर का साथी कहना) १- कथित; (सुदं० २, १, ८) । नहीं था, (सुदं० २, ४, ६) । २-प्रेरित (जस० २, १८, १६)। ईसरसरि-पु. (सं० ईश्वर स्वर > ईश-पुं० (सं० ईश >प्रा० ईस) ईश्वर; प्रा० ईसर+सर) काम पीड़ित स्वर; (को०.१, १०३)। (सं० रा०)। ईसंति-क्रि० (सं० दृश्यन्ते) दिखाई ईसरहि-पु. (सं० ईश्वरम्) प्रभु देना; (ण० ६, १७, ३२)। मालिक, राजा, शासक, धनी ईस'-सक० (सं० ईर्ष >प्रा० ईस) आदमी; (उ० व्य० प्र० ५०-१७) । ईर्ष्या करना, द्वेष करना। ईसाइवि-पू० ईसा'-स्त्री० (सं० ईर्पा>प्रा० ईसा) का० कि० (जंवू० ८, १४, ७) । ईर्ष्या, द्रोह; (म० १, १४, ४; प्रा० ५० ईस-न० (सं० ईर्ष्या>प्रा० ईसिअ) २, २०१)। द्वेष; (जंवू० ६, १३, २)। न० (दे०) ईसा-स्त्री० (सं० ईषा-हलस) हल खूटा, खोला, कीलक; (दे० १, ८४)। का एक काण्ठ; (दे० ना० मा० २,६६)। ईस-पु० (सं० ईश>प्रा० ईस) 1/ईसाअ-(सं०/ईर्ष >प्रा० ईस) ईश्वर; (म०)। ईर्ष्या करना, द्वेष करना। ईसाऍवि-पू० ईसम -पु० (दे०) हरिण का० क्रि० (प० च० ५५, १०, ७) । जाति; (दे० १, ८४)। ईसारण-पु० (सं० ईशान >प्रा० ईसर -पु० (सं० ईश्वर>प्रा० ईसर) ईसाण) स्वर्ग-नाम; (जस० ४, २८, १. परमेश्वर, प्रभु; (भ०) । २. ईश्वर २८)। -सग्गि (सं० ईशान-स्वर्ग) नामक विद्याघर योद्धा; (व० ४, ६, ६)। देवलोक-विशेष; (व० २, १०, १०)। ३. कामदेव (सं० रा०) । ४. समृद्ध, ईसाणिद-पु० (सं० ईशान इद्र) देव- "धरि-घरि गोरिउ सीमंतिणिउ सक्कु लोक का इन्द्र; (व०६, १२, १२) । धणउ ईसरु जणु," -वहां घर-घर में ईसालुअ- -वि० (सं० ईर्ष्यालु+क>प्रा० गोरी सीमंन्तिनियां (स्वर्ग में एक ही ईसालुअ) द्वेषी; (जंबू० ३, ११, ५) । गौरी है) तथा शक और धनद-कुवेर ईसास-वि० (सं० ईर्ष्यालु) ईर्ष्या करने जैसे धनी या समृद्ध लोग हैं, (जंबू० १, वाला; "सुलहउ ईसासे जणे कसाउ"- • ६, १०)। ईर्ष्यालु व्यक्ति में कसाय सुलभ है, ईसरवाअ--(सं० ईश्वरवाद>प्रा० ईसर (सुदं० ८, ३२, ६)। की एक ईसासिह (६८) उदेस मा० (सं० ईसासिहि-० [सं० ईर्ष्या+शिखिन् संपन्न; २. उत्कृष्ट, श्रेष्ठ, ३. समृद्ध 'पु०>प्रा० ईसासि हि] ईया की अग्नि; ४. तेजस्वी, ५. गंभीर; (जस०) । (जस० २, १०, १३)। उंनु-वि० (सं० ऋजु-प्रा० उजु) सीधे; ईसि-अव्य० (सं० ईपत्>प्रा० इसि) 'सोमजुअंगयाइँ -सौम्य और सीधे थोड़ा, अल्प; (भ०)। अंग वाली; (जस० ३, २, १२) ईसिम-वि० (सं० ईर्ण्यित) जिस पर उंट-पु० स्त्री० (सं०. उप्ट्र>प्रा० ईर्ष्या की गई हो वह; (दे० ना० उट्ट) ऊँट, “खसपीडिउ अडविहि उटु २, १६)। मुक्कु" -खारिश (व्याधि) से पीड़ित ईसीसी--अव्य० ईपत् >प्रा० ऊंट को अटवी में छोड़ दिया; (जंवू० ईसि) थोड़ा, अल्प; हल्का सा; (ण० ५, १०, ७, १)। ६, १; प० च० ४, १३, ८)। उठ-क्रि० (सं० उत्+स्या>प्रा० Vईह-(सं० ईक्ष् >प्रा० ईह =देखना, उट्ठ) उठ गया हो, (को० २, १०५) । विचारना) देखना; (संधि० १३, १४, उंड-वि० (दे०) गहरा तुल० राज० ६) । -इ सक० (सं० इप्>प्रा० इच्छ) उडाण (गहराई); (दे० ना० मा० १, चाहना, "साचइ जम्मण-मरण जु बीहइ, ८४) । सिवकुमार जिम सो सिवु ईहइ"; (प्रा० उडल-न० (दे०) १. मञ्च, मचान, गु० १, १२३) । -हि, सक०, चाहना, उच्चासन, २. निकर, समूह; (दे० ना० "हियवइ ईहहि" -हृदय से चाहती है; मा० १, १२६)। जंवू(० ६, १५, २)। ईहतिय-कृ० (ईह उतालीस--वि० (सं० ऊनचत्वारिंशत्) +शतृ (स्त्रियाम्) समझकर, विचार उनतालीस; (प्रा० ३०) । कर; (जंवू० १, १०५)। उद-पु० (दे०) वाद्य; (सुदं० ७, ६, ईहां--अव्य० (सं० प्रा० इह) यहाँ ५)। (उ० व्य० प्र० १४-२८) । ईहां हुत- उदरं-पू० स्त्री० (सं० उन्दुर>प्रा० सं० इतस् (उ० व्य० प्र० १४-३०) उंदुर, उदर) मूषक, (व० ६, ११, इधर से। १)। उदर (दे० ना० मा० १, १०२) । उंदुर'-पु० स्त्री० (सं० उन्दुर>प्रा० उदुर, उदर) मूपक, चूहा; (जस० ४, १६, ७) 1 उदुरु (व० १०, ८, १६) । उंछअ-पु. (दे०) वस्त्र छीपने का उदुर-पुदोहा छंद का एक काम करने वाला शिल्पी, छीपी; जो (प्रा० ५० १, ८०)। कपड़ा छापता है या छोट बनाता है; (दे० उंदुरअ-पुं० (दे०) लम्बा ना० मा० १,६८)। (दे० ना० मा० २, १०५) । उजिय-वि० (सं० ऊजित) १. शक्ति उदेस-पुं० (सं० उपदेश >प्रा० उव- . भेद; दिवस;
(६६) उजआर - हुआ गेहूं; एस) शिक्षा, वोध; (सि० १, २) । उन-वि० सं० ऊन) न्यून, हीन; (रा० ३०) । उंबर'-पुं० (सं० उदुम्बर>प्रा० उंबर) १. उदुम्बर, गूलर का वृक्ष, वृक्ष. विशेष; गु० बरो; (जंवू० ४, २१, २; संधि० २, ५, ६) । २. न० उदुम्बर का फल (सुदं० ६, २, १)। ३. देहली, द्वार के नीचे की लकड़ो; (दे० ना० मा० १,६०)। उंबर'-वि० (दे०) बहुत, प्रचुर; (दे० ना० मा० १, १०) । उवा-स्त्री० (दे०) बंधन; (दे० ना० मा० १,८६)। उंबी-स्त्री० (दे०) पका (दे० ना० मा० १,८६) । उस-स्त्री० (सं० अवश्याय>प्रा० उससा) बोस; (जंवू० १०, ७, ६) । अआरे- (सं० उपकार>प्रा० उसआर) परोपकार; (कील २, ३६)। उगर-पु. (सं. उत्कर>प्रा० उक्कर) समूह; (को० २, १०८)। उछल-क्रि० भू० का० (सं० उत्+शल >प्रा० उच्छल) उछला; (को० ३, ३७)। उठ-क्रि० (सं० उत्+स्था>प्रा० उठ) उठ गया हो; "कोलाहल, कान भरन्ते मर्यादा छांडि महार्णव उठ," (की० २, १०५)। जण-नय० (सं० पुनर्>प्रा० पुणो, पुरण, उग) पर, फिर; (की० २, ४५) । उद्धार-पुं० (सं० प्रा० उद्धार) बचाव; (को० २, १६)। उपताप-पु० (सं० उत्ताप-पीड़ा, कण्ट) दुःख; (की० ३, ५२) । उपास-पु० न० (सं० उपवास >प्रा० उववास) उपवास, अनाहार; (को० ३, ११, २)। उपति-स्त्री० (सं० उपपत्ति >प्रा० उववत्ति) उत्पत्ति, जन्म; (को०३, ११०)। उप्पर-अव्य० (सं० उपरि> प्रा० उप्परि) ऊपर; (को० २, १३०) । उलटि-क्रि० भू० का० (दे०) बदली; "कुरुम उलटि करयट्ट दे" -- 'कूर्म ने करवट बदली; (को० ४, ६७) । उदार-स्त्री० (सं० उद्+7>प्रा० अप० उव्वर-वच जाना, सुरक्षित रहना) रक्षा; (को० ३. ८८) । उ-पु० (सं० उ) अपभ्रंश वर्णमाला का पञ्चम अक्षर, स्वर-विशेष । मध्य० (सं० अपि) भी; (उ० ग्य० प्र० ६, २६) । उअंत्रण-न० (२० उदञ्चन) १.ऊँचा फेंकना, २. ढकने का पात्र; (दे० ना० मा० ४, ११)। 1/उप-(लोट् लकार) (सं० अव+लोक >प्रा० अवलोअ) देखो, देख, विलोकन करो; (हे. ३६७: दे० ना० मा. १, ८६)। -है अक० देखो देखिए; (दे० ना० मा० १,६८)। 1/उम–(सं० उत्+ गम् >प्रा० उग्गम, उग) उगना। -इ अक० -इ अक० (प्रा० ५० २, ३७)। (दे०) ऋजु, सरल, (दे० ना० मा० १, ८८)। उमआर-० (सं० उपकार>प्रा० उअग्र-वि० सीधा;
उअक्किा ( १००) उकड्ढ । ७)। च० ५, उअआर) उपकार; (की० १, ३२; प्रा० उआलि- स्त्री० (दे०) अवतंस, शिरो- पैं० २, १४६)। भूपण; (दे० ना० मा० १, १०)। उअक्किम-वि० (दे०) पुरस्कृत, आगे उपासीण-वि० (सं० उदासिन् >प्रा. किया हुआ; (दे० ना० मा० १,१०७) । उआसीण) उदासीन, तटस्थ, जो विरोधी उअचित्त-वि० (दे०) १. अपगत, पला पक्षों में से किसी की ओर न हो; (प्रा० यित, भागा हुआ, पलटा हुमा, हटा पै० १, ३५)। हुआ; दूरीभूत; २. निवृत्त; (दे० ना० उप्रासे-वि० (सं० उदास>प्रा० मा० १, १०८)। उआस) दुःखी, खिन्न चित्त; (प्रा० ५० उअय--पु० (सं० उदय >प्रा० उअअ) १, ३७)। उन्नति, अभ्युदय; (भ० ; जंबू० ११, ६, उइंतरण-न० (दे०) उत्तरीय वस्त्र, उअर-न० (सं० उदर>प्रा० उअर) चादर; (दे० ना० मा० १, १०३) । उदर, पेट; (जस०)। उइअ-पु० विद्याधरवंशीय राजा, (प० उअरी-स्त्री० (दे०) शाकिनी, देवी- १६६)। -परक्कम पुं० विशेष; (दे० ना० मा० १, ६८) । इश्वाकुवंशीय राजा; (प० च० ५, ६)। उअसंझहि-अव्य० (सं० उपसंध्य) उइउ-कि० भू० का० (सं० उद् + इ संध्या के निकट आने पर; सायंकाल के >प्रा० उइ) उत्पन्न हुआ; 'सुउ चंदचूलु समय, "तो उअसंझहि मज्जु पुर विप्पघ चंदु व उइउ'; (महा० ६६, ४, ११) । रहिं करु वास;" (को० २, २५१) । उइय-वि० (सं० उदित>प्रा० उइय) उअहारी-स्त्री० (दे०) दोग्ध्री, दोहने १, उदय-प्राप्त, निकला हुआ, उद्गत; वाली स्त्री; (दे० ना० मा० १, १०८) । (ण ० ५, ३, ८; जंबू० ८, १५: ४)। उअहि-पुं० १. (सं० उदधि>प्रा० २. उगा हुआ, ऊपर चढ़ा हुआ, उत्पन्न उवहि, उअहि) समुद्र; (भ०) । २. पु० हुआ; (प० च० १, १६, ६) लो०-उइय विद्याधर वंशीय राजा; (प० च० ५, चंदि किं तारियहँ अर्थात् चंद्र के १६६)। हो जाने पर तारों से क्या ? (प० सि० उआप्र-पुं० (सं० उपाय>प्रा० १०)। उवाय) हेतु, साधन; (दो० को०)। उएस-पुं० (सं० उपदेश>प्रा० उव- उआय–वि० (सं० उपागत) समीप में एस) उपदेश, शिक्षा, वोध; आया हुअा । उआया; (रा० ३५) । उआर-पु० (सं० उकड्ड (कट्ठ)- (सं० उत्+कृप) उअआर) १. परिचर्या, २. अनुग्रह; (स० निकालना, डालना; उक्किट्ठ (प्रा० ५० दो० को०)। २, १६); उक्किट्ठा (प्रा० पै० २, उदय (सं० दो० को०)। उपकार>प्रा० किल (१०१) उक्कम "संविरा कापडु । के द्वारा व्य० १५०); उविकट्ठाआ; (प्रा० पै०१. गणे नीलनियंसणिहि घणथणरमणुक्कं- १४४)। तिहिं । पहि किज्जइ गमणविलंबु जहिं उफिल-अक० (सं० उत्किलति) क्रीडा गोविहिं रासु रमंतिहिं । ---उस देश में करना; उकिल" -मु गोकुल के आंगनों में नीले वस्त्रों को (उ) किलति । 'उकेल'-उत्केलयति । धारण करने वाली तथा अन्य घने स्तनों 'संकेल' -संकेलयति । किल श्वत्य व विलास क्रीड़ाओं के भार से आक्रान्त क्रीडनयोः । (उ० व्य० प्र०, ५२-१२) । रास खेलती हुई गोपियों उष्१-वि० (सं० उत्कृष्ट) श्रेष्ठ, (पथिकों के लिए) पथ में गमन करने (सि० १, २८)। में विलंब कर दिया जाता है, (जंबू० १, उकेल-अक० (सं० उत्केलयति) क्रीड़ा ७, १०)। करना; (उ० उपकंदरु-वि० (दे०) ऊंचा; (रि० ५, प्र०; ५२- १२) । ६)। उकोल-कि० (सं० उत्कोलति) गर्म उपकंदि, उफ्फंदी-स्त्री० (दे०) कूप- करता है; (उ०, व्य• प्र० ४६-८) । तुला; (दे० १, ८७)। रवकसिरिय-वि० स्त्री० (सं० उत्क- उपमंत-कृ० (दे०) धनुप पर डोरी ण्ठित >प्रा० उत्कंठिय, उक्कंठिर) उत्कं- चढ़ाते हुए; (जंवू० ६, ७, ११) । ठिता, उत्सुक; (सं० रा०)। उक-पु० विद्याधरवशीय राजा; (प० उक्कंठ-वि० (सं० उत्कण्ठ) उत्सुक; च० १०, २०)। (जस० ३, ३३, ७)। उफ्फच्छ-स्त्री० (सं० उत्कच्छा>प्रा० उक्कंठा-स्त्री० (सं० उत्कण्ठा>प्रा० उक्कच्छा) छन्द-विशेष, रसिका छन्द का उक्कंठा) उत्कंठा, उत्सुकता, औत्सुक्य; दूसरा नाम; (प्रा० ५० १, ८८) । (विला०)। उपकड-वि० (सं० उत्कट>प्रा० उफ्फठि---स्त्री० (सं० उत्कण्ठा>प्रा० उक्कड) तीव्र, प्रचण्ड, उक्कंठा) उत्सुकता, औत्सुक्य; (व० ४, उक्कड-मयण वियारयाए," तव उत्कट २, ३)। कामदेव से विदारित; (विला०) । उपर्फठिउ-वि० (सं० उत्कण्ठित>प्रा० उक्फत-वि० (सं० उत्क्रान्त) ऊंचा उक्कंठिय) उत्कंठित, (व० २, २०, ५)। गया हुआ (भ०)। उक्कंठिय-वि० उत्सुक; (ण० ५, १२, उपकत्तिय–वि० (सं० उत् +कर्तित > २)। उपकठिव; (व० २, ४, ७) । प्रा० उक्कत्तिय) काटे हुए, “उक्कत्तिर- उपकंडा--स्त्री० रिश्वत; चित्तयशवधराई" काटे हुए चीतों के शव (दे० ना० मा० १, ६२) । पड़े हुए थे; (जंबू० ५, ८, २६) । उपकंति-स्त्री०, विशेषण के 1/उपफम-(सं० उत् + प्रम> प्रा० प्रयुक्त (सं० आनान्त) माकान्त, "गोटु उत्कम) ऊँचा जाना, उलटे क्रम में । प्रखर; "तो . (दे०) घूस, (१०२) उक्कोइय उक्कर उठा हुआ; 'उकसने' का . पानी में डूब की वायु, रखना । -वि० पू० का० क्रि० (जंबू० ६, टि०-हिंदी में ७, ८)। का अर्थ उकेलने के अर्थ में मिलता है, उक्कर--पुं० (सं० उत्कर>प्रा० इसे अर्थ-विस्तार माना जा सकता है; उक्कर) समूह, संघात; (सं० रा०)। (दे० ना० मा० १, ११४) । उक्कराउ-पू० का० क्रि० दोनों हाथ उक्किख-स्त्री० (सं० आकांक्षा >प्रा. ऊपर कर; "वुड्डउ उक्कराउ महए कंखा) इच्छा, चाह, अभिप्राय; (सं० विउ," दोनों हाथ ऊपर कर महादेवी रा०)। गई; (प० च० १४, ५, उक्कि-स्त्री० (सं० उक्ति >प्रा० उत्ति) ५)। वचन; (प्रा० पै० २, २११) । उक्करिसिय-वि० (सं० उत् + कर्षित) उत्कीरअ-~(सं० उत्+कृ> प्रा० उल्लसित; 'सव्वंगुक्करसिय करिसणेहि'- उक्किर).खोदना, उकेरना । -मि सक० (फूली हुई) खेती से मानो सर्वांग उत्क 'कुलनामुक्कीरमि चंदफलए" -मैं चन्द्र पित अर्थात् उल्लसित हो रही है: (जंबू० मण्डल पर अपने कुल के नाम को १, ८, ५)। उकेरूंगा;' (जंबू० ८, ८, ११) । उक्कलि-स्त्री० (सं० उत्कलिका>प्रा० उक्कीरिय-वि० (सं० उत्कीर्ण >प्रा० उक्कलिया) उत्कलि नाम उक्कीरिअ, उक्करिअ) खोदा हुआ; "उक्कलि मंडलि आइ करतउ, मरुण (जंबू० २, १५, १)। ठाइ दिसि विदिसिहिं जंतउ" उत्कलि, उक्कुक्किरिय-वि० (सं० उत्क+उत्क मण्डलि आदि करती हुई (सांय-साँय +कृतः) ऊपर उठे हुए; (जंबू० ४, १३, करती हुई) जो वायु ठहरती नहीं, १२) । दिशा-दिशाओं में चली जाती है, वह वायु उक्कुट्ठ-न० (सं० उत्क्रुष्ट>प्रा०. कायिक जीव है; (व. १०, ७, ७)। उक्कुट्ठ) ऊचे स्वर से रोदन; (दे० ना० उक्कलिय-वि० (सं० उत्कलिक) उत्क मा० १, ४७)। ण्ठित; (जस० ३, ५, १०) । उक्कुरुड-पु० (दे०) राशि; तुल० म० उक्कस्स-पु० (सं० उत्कर्ष>प्रा० उकिरडा; (जस० ३, १३, १८; ' दे० उक्कस्स, उक्कस) उन्नति, उदय, उत्कृ- ना० मा० १, ११०)। ष्टता; (भ०)। उपकुरुडी-स्त्री० (दे०) धूल, कूडे का उक्का-स्त्री० (दे०) कूप-तुला; (दे० ढेर; (दे० ना० मा० १, ११०)। ना० मा० १,८७) । -मुह पु० महुरा उक्केर-पु० १. (सं० उत्कर>प्रा० का राजपुन, व्यक्ति-नाम, (प० च० उक्कर) समूह; (ण० ५, ६, ४) । २. १६, २०)। —लंगूल पु० वानरयोद्धा; पुं० (दे०) उपहार; भेंट (दे० ना० मा० (प० च० ५४, २३)। १, ६६)। उक्कासियं---वि० (सं० उत्कर्प) उत्थित, उवकोइय--वि० (दे०) उत्पादित; ܚ ܙ ।
उक्कोडा (१०३) उक्खा - - से शन्नु उत्पादक उक्स- (जस० ३, २३, ५)। १५, ४, ६)। उक्कोडा--स्त्री० (दे०) घूस, रिश्वत; उक्खणण-१० (दे०) खडना, भूसी (दे० ना० मा० १, ६२)। से वियुक्त करना, निस्तुषीकरण; (दे० उक्कोडी-स्त्री० (दे०) प्रतिशब्द, प्रति ना० मा० १, ११५)। ध्वनि; (दे० ना० मा० १, ६४) । उपखरिणअ-वि० (दे०) खण्डित, भूसी उकोयण-गारय-वि० (सं० उत्कोपन से वियुक्त; (दे. ना० मा० १, ११५) । कार) उद्दीपक; (प० च० ४१, १०, Vउक्खन्ध-क्रि० (सं० अवस्कन्द >प्रा० ३) । उक्खंद) आक्रमण करना, छल उक्कोयणु-वि० (सं० उत्कोपन >प्रा० सैन्य को मारना । उक्खन्धु- भू० का, उक्कोवण, उक्कोयण =उद्दीपन, उत्तेजन) घेरा डाल दिया; (प० च० १०,६, "चोज्जुक्कोयणु" -आश्चर्य ६)। उक्खंधे-कृ० घेरा डालकर, उत्पन्न करने वाला; (ण० ४, १२, ६)। आक्रमण कर; (रि० ४, ५) । उकोल-० (दे०) घाम, धूप, गरमी; न्धे वि—पू० का० कि०; (प० च० ५, (दे० ना० मा० १, ८७) । १६, ७)। उक्को-(सं० (सं० उत्कोपय्) उत्तजित उक्खय-वि० (सं० उत्खात>प्रा० करना, क्रोधित होना; (प० च० ३६, उक्खय=उखाड़ा हुआ, खुला हुआ) ११, ६)। १. उठाये हुए; (प०.च० १, १४, ७)। उक्कोवरण-न० (सं० उत्कोपन) उद्दीपन, २. उखाड़ा हुआ, उन्मूलित; (जस० १, उत्तेजन; "मयणुक्कोवण"; (भ०) । १६, १६) । ३. उखड़ी हुई; (प० च० उपखंड-पु० (दे०) संघात, समूह, १३, ३, १)। २. विपमोन्नत प्रदेश; (दे० उक्खय-वि० (सं० उद्गत) १. निकला १, १२६)। हुआ, उत्पन्न, २. प्रकट; ३. गया हुआ; उाखंडिअ-वि० (दे०) आक्रान्त, (प० च० २१, ८, ७) । हुआ; (दे० ना० उक्खल-पुं० न० (सं० उदूखल>प्रा० ११२)। उक्ख, उक्खलग, उऊखल, उऊहल) उलु- 1/उक्खण-(सं० उत्+खन् > खल; (प० च० १७, १३, २) । उक्खण) उखेड़ना, उच्छे 'न करना । -इ उक्खलिया, उत्खली-स्त्री० . (दे०) सक० (सं० उत्खनति) तुल० म० उख- थाली, पात्र-विशेष, (दे० ना० मा० १, गणे; (भ०) । २. खांडना, : कूटना, ८८)। मुशल आदि से धान आदि का छिलका उपखली-स्त्री० (दे०) थाली, पान- दूर करना; (दे० ना० मा० १, १.१५)। विशेष; (दे० ना० मा १/८८)। उखेवि-पू० का० क्रि० (सं० उत्खनितु) उक्खा-स्त्री० (सं० इक्षु >प्रा० इवखु "तहो पुत्तु तुम्ह उक्खे वि आउ" (भ० पु०) ईख, ऊख; (सि० १, ११)। ना० मा० दवाया मा० १, प्रा० ..
उखाय (१०४) उग उत्खात>प्रा० हुआ; (दे० ना० उगना। उग्गे (प्रा० हुआ, डाला य. उखाय-वि० (सं० मा० १, १०५ उक्खाय, उक्खय) उखाड़ा हुआ, उन्मू १११)। लित; (ण० ८, १२, १)। Vउग-(सं० उत् +गम्) 1/उपिखण-(सं० उत् + खन्> प्रा० उगो (प्रा० ० २, ५५); उक्खण) उखेड़ना, उच्छेदन करना, पै० २, २०५)। काटना; -मि सक० (भ०)। उगसेण-पुं० उग्रसेन, नाम-विशेष; उक्खिण्ण-वि० (दे०) १. अवकीरणे; (संधि० १५, ३, १०)। ध्वस्त, चूणित; २. गुप्त; ३. एक तरफ उगाहिय-सक० (सं० उदग्राह>प्रा० से ढीला; (दे० ना० मा० १, ३०)। अप० उग्गाह) कर वसूल करना, उगा- उदिखत-वि० (सं० उत्क्षिप्त) १. फेंका हना, ग्रहण करना, "...घरिब छत्त तिर. हुआ; (प्रा० पं० १, हुति उगाहि" छत्र धारण करके तिर- १६८) । २. उखाड़े हुए; (जंबू० ५, १४, हुत से कर ग्रहण करता है; (को० ३, १)। २२)। उखिप्त-वि० (सं० उत्क्षिप्त >प्रा० उगिल-सक० (सं० उद्+-गू, सं० उक्खित्त, उक्खित्तय) उन्मूलित, उत्पा- उद्गिलति) निगलना; "पुणि उगिल- टित; (भ०)। उद्गिलति । निगरणे"; (उ० व्य० Vउपिखव-(सं० उत्+क्षिप्> प्रा० प्र०, ५१-२५)। उक्खिव) १. फेंकना, २. ऊँचा फेंकना, उगंठिय-वि० (सं० उत् + ग्रथित) खुली ३. उठाना। -इ, सक० (सं० उत्क्षि- हुई, “उग्गंठियविसरिसकुचधरु,' खुली पति > उक्खियेइ; (भ०) । उक्सेविउ- हुई विसदृश (असमान या अद्भुत) कूर्चा भू० का० (सं० उत्+क्षेपित) को धारण किये; (जंबू० ६, १८, ४)। (जंबू० ७, १०, १५)। 1/उग्ग---अक० (सं० उत्+ गम्) उदित उक्खु-पु. (दे०) १. मसाल, होना; उग्गामिउ-भू० का० कृ०, उगा २. समूह, ३. अञ्चल, वस्त्र का एक रवि सहसकिरणु'- अंग; (दे० ना० मा० १, १२५) । उगा हुआ हजारों किरणों वाला सूर्य, उखुरुहुचिम-वि० (दे०) फेंका हुआ; (महा० ६६, १२, २) । २. उदित (दे० ना० मा० १, ४)। हुआ; (प० सि० च० ३, २) । उग्गिह- उक्लेव-पु० (सं० उत्क्षेप> भू० का० उदय हुआ; (को० २, १२५)। उक्वेव) उन्मूलन; (जंबू० ८, १३, ४)। उग-वि० (सं० उग्र >प्रा० उग्ग) उक्खेविस-वि० (सं० उत्क्षेपित) जलाया तेज, तीव्र, प्रवल; (ण० २, ६, १३) । हुमा; (भ०)। पुं० १. राजपुत्र; (प० च० ८८, १६) । उक्खोडिअ-वि० (सं० उत्खोटित) २. विद्याधरयोडा; (प० च० १२, १८)। १. उत्क्षिप्त; उडाया हुआ; २. उखाडा --णाम पु० राक्षस योघा; (प० च० - फेंका; . हुआ; 'उग्गमिउ प्रा० - - उगम ভলি (१०५) -सेण पु० २ " -- प्रा० ५६, २६)।-तब पुं० (सं० उन च० २५, १४, ८)। तप) कठोर तपस्वी; (व० ३, १७, १)। उग्गार-पुं० (सं० उद्गार>प्रा०. -सिरी पुं० र क्षतवंशीय राजा; (५० उन्गारं) वचन, उक्ति; (जंदू० ६, १२, च० ५, २६४)। रावण २) मंत्री; (प० च०८, १६) । उन्गु- -वि० उग्गाविर-वि० (सं० उद्गमक) ऊपर उन; (व० ३, १३, १; जसं० १, उठा हुमा, उत्थापित (raisirs); (प० १३, १)। च० ४८, ८, २)। गर-दि० (सं० उद्गत >प्रा० उग्गाह-पु० (सं० उद्गाथा>प्रा० उन्गल) उत्पन्न, उदित; (जत० २, उग्गाहा स्त्री०) उद्गाचा छंद, मात्रिक १०)। छंद; उग्गाह (प्रा० 4० १, ५७); उगम-पु० (सं० उद्गम > उग्गाहो, (प्रा० पै० १, ६८) । उग्गम) उत्पत्ति, उद्भवः तल० म० गु० उन्गाहिल-वि० (सं० उग्राहित) उगम; (भ०)। उग्गनु; (६० ४,६, १. गृहीत, लिया हुआ; २. फेंका हुआ, ५)। ३. प्रवर्तित; (दे० ना० मा० १, उगमाण-वि० (सं० उदीयमान) जिस १३७)। का उदय हो रहा हो; (० ६,१७, १)। जग्गाहिज-कि० (सं० उद्+घाटय > जगनिय-वि० (सं० उद्गमित >प्रा० प्रा० उघाड, उग्घड) उद्घाटित किया; उग्गमिय) उद्गत, उत्सन्न, (५० च० १६, ५, १०)। (ण० २, १२, ६)। उग्गिज-कि, भू० का (सं० उत+1/ उन्गय-वि० (स० उद्गत> गम् >प्रा० उग्ग। उदित हुआ, "घरे-घरे उन्गय) स्ने हुए, "जहि सरवरि उग्गय अग्गिा चंद"; (को० २, १२५) । पंकयाई"; जहां के सरोवर में कमल जगे उग्गिण-वि० (सं० उद्गीर्ग>प्रा० हुए हैं; (क० १, ३, ६)। उन्गिण) १. उत्क्षिप्त, उगला हुआ; (प० उमायरोतर--पु० (सं० उद्गत+ -दिने- च० ५१, ११, २)। २. उक्त, कवित; ३वर) उदित हुआ सूर्य; (ण ६, १३, (भ०) ३. उठाये हुए; (जस०१,११,४) । उग्गिन्न-वि० उक्त, कषित; (भ०)। उग्गहिन्न-वि० (दे०) बन्छी तरह उगिल-कि० (सं० उद्+> लिया हुआ; (६० ना० मा० १, १०४)। उन्गिल) १. कहना, बोलना, २. उकार 1/जग्गाम-(सं० उत्+/गम् >प्रा० करना, ३. उलटी करना ४. उठाना। उगम) ऊपर उठाना, उत्यापन करना, -ई (सं० उगिलति) उगालना, तुल० ऊँचे उठाना; उन्नत करना; तुल० गु० म० उगाळा; (भ०) [उन्गिलंत-कृ० उग- उगामवें। -इ. कि०,० (प० लता हुआ; (सं० रा०)। उगे हुए प्रा० >प्रा० उग्गीय (१०६) उच्च उच्च ऊपर किया सक० उग्गीय-वि० (सं० उद्गीत) उग्घाडणु-पुं० (सं० उद्घाटन) स्वर से गाया हुआ; (दे० ना० मा० १, १. खोलना, उवाड़ना, २. प्रकट करना १६३) । >प्रकाशित करना; (सि० १, ३७).! उग्गोरिय-वि० (सं० उद्गीर्ण>प्रा० उग्घाडिय-वि० (सं० उद्घाटित >प्रा० उग्गिण, उग्गिन्त, उग्गीरिअ) १. उक्त, उग्घडिअ) खुला हुआ, उघडा हुआ; (ण० कथित २. उठाया हुआ, २, १० १०)। हुआ: (प० च० ४, १३, ४) । 1/उग्घोस--(सं० उद्+घोपय>प्रा० उग्गीव-वि० (सं० उग्रीव >प्रा. उग्घोस) घोपणा करना, ढिढोरा उग्गीव) उत्कण्ठित, उत्सुक; (ण० ७, पीटना । -इ सक० (सं० उद्घोपपति) २, २)। (भ०) । उग्गुलु छि-स्वी० (दे०) भावोद्रेक; उग्घोसिय-वि० (सं० (सं० उद्घोपित) (दे० ना० मा० १, ११८) । घोषित; (भ०)। /उग्गोव-(सं० उद्+गोपय >प्रा. उघाडे-वि० (सं० उद्घाटय >प्रा० उग्गोव) प्रकट करना। ~इ उग्घाड) खुला हुआ, अनाच्छादित । "पंचवीस भावण उग्गोवई" --पच्चीस आघूघाडे; (रा० १७)। भावनाओं का उद्गोपन करता है; (सुदं० उचरु-पुं० (सं० प्रा० उच्चार) उच्चा- ११, ४, १५)। रण; (सि० १,३६) । उग्घटि, उग्घट्टी-स्त्री० (दे०) अवतंस, Vउचल-अक० (सं० उत्+चल्, सं० (दे० ना० उच्चलति, प्रा० उच्चल) चला जाना, मा० १, १०)। सरकना; (उ० व्य० प्र० ५२-१४)। उग्धवियय-वि० (प्रा० अग्यवियय) उचास-कि० (सं० उच्चायते) ऊँचा पूर्ण; (उग्धव हे० प्रा० व्या० ४, १६६; करना, 'टोप उचाअस्तूपकमुच्चायते; अग्धव हे० प्रा० व्या० ४, ६)। (उ० व्य० प्र०, ४६-२५) । उग्घास-पुं० (दे०) १. समूह, २. विप- उचिम-वि० (सं उचित>प्रा० मोन्नत प्रदेश; (दे० ना० मा० १, उचिय, उच्चिय) योग्य; (प्रा० .० २, १२६)। १२९)। उग्घाड-(सं० उत्+घाटा>प्रा० उच्चंत-व० कृ० (सं . उच्च + शत) उग्घाड) खोलना, प्रकट करना, वाहर ऊंचा करके; (जंबू० ७, ६, १५) । करना । उग्घाडइ-सक० (सुदं० ४, १०, उच्चंपिक्ष-वि० (दे०) दीर्घ, आयत; ६) । तुल० म० गु० उघाड । उग्घाडिउ- (दे० ना० मा० १, ११६) । कि० भू० का० उघाड़ा; (व० २, १३, उच्च-वि० (सं० प्रा० उच्च) १, ऊंचा, ८) । -डेवि पू० का० क्रि० (क० १०, २. उत्तम, उत्कृष्ट; (भ०)। ३..न० १३, ८)। नाभि-तल; (दे० ना० मा० १,८६) । शिरो-भूषण; ।
उच्चत्तण (१०७) उच्चारिम ३०१, १०, का० ऊपर - ५६)। -3 वि० ऊँचा, वड़ा (प्रा० उच्चल्लरप-पु. (सं० उत्+शल्> १७४)। प्रा० उच्छल) उछलना; (सुदं० ३, ११, उच्चत्तण-न० (सं० उच्चत्व>प्रा० . १२) उच्चत्त) ऊंचाई; (जंवू० ११, उच्चाम-(सं० उच्चय) उठाना। ११)। उच्चाइउ-कि० भू० का० उठा लिया, उच्चत्तवरत्त-न० (दे०) दोनों तरह का उठाया; (प० च० २, ११, २; प० च० स्थूल भाग; २. अनियमित भ्रमण; (दे० १२, १०, ६) । उच्चाइयउ-भू० ना० मा० १, १३६)। (प्रा० उच्चाइय=उठाया हुआ) ऊपर उच्चत्य-वि० (दे०) रढ़; (दे० ना० उठाया; (M० २, १०, ६) । उच्चाइव- मा० १, ६७)। भू० का० ऊँचा उठा दिया; (महा०)। उच्चप्प-वि० (दे०) आरूढ़, उच्चाइवि-पू० का० क्रि० ऊँचाकर; बैठा हुआ; (दे० ना० मा० १, १००)। (व० २,१०, ६); उठाकर; (जंबू० ६, उच्चय-पू० (सं० अवचय) इकट्ठा १४, ७) । उच्चाऍवि-पू० का० कि० करना, एकत्रीकरण; (दे० ना० मा० २, (सं० उद्+/चि=एकत्र करना+णिच्) उठाकर; (क० ५, ७, ५) । उच्चायिउ- 1/उच्चर--(सं० उत् + चर्> प्रा० कि.०, भू० का० (सं० उद्+चायित) उच्चर) कहना, बोलना। -हिं सक० उठा लिया; "उच्चायिउ ते सो णियक- उच्चारण करते हैं; (सं० रा०)। उच्च- रेण," (क० २, १, ७)। रेवि-पू० का० क्रि० (जंपू० ६, १७, उच्चाइय-वि० (मं० उच्च कृतः, ४)। उच्चायित) उत्यापित, उठाया हुआ; उच्चरिय-वि० (सं० उच्चारित >प्रा० भ०) । २. ले जाया गया; (प० च० उच्चारिअ) कथित, उच्चारण किया २५, ११, २)। हुआ; (जस० १, २७, ६) । उच्चाड-वि० (दे०) विपुल, विशाल; 1/उच्चल-(सं० उत्+चल) उछ (दे० ना० मा० १, ६७) । लना । -इ अक०, ६० (सं० उच्चाडणु-न० (सं० उच्चाटन >प्रा० लति) ऊपर उठाना, उचलना, तुल० म० उच्चाडण) उखाड़ा जाना; (हे० ४३८, उचलणे (भ०) उच्चलंत-व० कृ० (सं० ३)। उत्+चल+शत) (जंबू० ४, २१, /उच्चार-(सं० उत्+चारय >प्रा० ११)। उच्चार) वोलना, उच्चारण करना। उच्चलिय-वि० (सं० उच्चलित>प्रा० -इ सक० (सं० उच्चारयति । (भ०)। उच्चलिय). १. चलित, गत; (भ०)। वि० (दे०) विमल, स्वच्छ; (दे० ना० २. समीप में माया हुआ, ३. गया हुआ; मा० १,६७)। (प० च० ६, १३, २०)। उच्चारिम-वि० (दे०) गृहीत; (दे०- उच्च- उच्चारिय (१०८) उच्छ , . .. को ऊपर ना० मा० १,११४)। २. आरूढ़, ३. डरा हुआ; (दे० ता० उच्चारिय-वि० (सं० उच्चारित) मा० १, १२७)। कथित; (जंवू०.१, १७, 5) ! उच्चेडिय-कृ० भू० का० (सं० उच्चा- 1/उच्चाल-(सं० उत्+चालय >प्रा० टित) हटाकर, उचाट कर, "उच्चेडिय- उच्चाल)-१. ऊँचा फेंकना, २. तोड़- फेडिय-मुहवडाइ" जिनके . - मुखपटों को फोड़ डालना -इ सक० "वहुमंडव मडउ उचाट कर फेर दिया गया था; (जंबू० ल्ल उचालइ" -बहुत से :..मण्डपों तथा ६, ४, ६)। चवूतरों को तोड़-फोड़ डालता था; (ण० उच्चोल-पुं० (दे०) गोट, "उच्चोलिहि ३, १५, ११) । उच्चालिउ4-क्रि०, भू० पुणु वइसारियउ,” (रि० १, १०) । का० (सं० उत्+चालित) ऊपर उठाया, उच्चोलि-स्त्री० (दे०) स्त्री के कटि- "इय भणिवि विमाणुच्चालियउ"-ऐसा वस्त्र की नाडी, (प० ८० ६, ३, १) कहकर जव उसने विमान उच्चोलिउ-पु० (दे० उपानह, जूते 'जो उठाया; (जंवू० ५, ४, १०) । परपयउच्चोलिउ वहा,' जो दूसरों के उच्चासण-पु० (सं० उच्चासन) बैठने जूते भी पहन लेता था; (जस० २, ६, के लिए ऊचा आसन; (जस० १, ६, १६)। २४) । उच्छंग-पु० (सं० उत्सङ्ग >प्रा० उच्चिट्ठ-वि० (सं० उच्छिष्ट>प्रां० उञ्छग) क्रोड, गोद; (सुदं० - ६, १८, उच्छि8) जूठा उच्छिप्ट; (प० च० ४) । उच्छङ्गि-स्त्री० गोद; (हे. ३३, ११, ५; जस० ३, ३५, ८) । ३३६, १)। उच्छ ग स्त्री० गोद तो सा मई ग्य-उच्छगि लेवि'; (विला०) । Vउच्चिण-~-(सं० उत्+चि> प्रा० उच्छंगिन-दि० (दे०) आगे किया उच्चिण) पुष्प आदि तोड़ कर एकदित हुआ, आगे रखा हुआ; (दे० ना० करना । -इ सक० (सं० उच्चिनोति १, १०५) । प्रा० उच्चिणाइ) (भ०)। उच्चिणंति उच्छर-० (दे०) झड़प से की हुई (वहु व०) (जंवू० ८, १५, १२) । चोरी; (द०. ना० मा० १, १०१) । उच्चुंच-वि० (दे०) अभिमानी; (दे० उच्छ-पु० (सं. इ>प्रा० "इक्खु ना० मा० १, ६६) । ईख; (प० च०.२६, १७, २) । २. पु. उच्चुप्पिन-वि० (दे०) आल्ढ़, ऊपर (दे०) आंत का आवरण; (दे० ना० चढ़ा हुआ; (दे० ना० मा० १, १००.) । , मा० १, ८५)। .. उच्चुलउलिन-न० (दे०) कुतूहल से उच्छअ-पुं० (सं० ; उत्सव>प्रा० शीघ्र-शीघ्र जाना; (दे० ना० मा० १, उच्छा) मंगल कार्य, मंगल - समय १२१) । (जस० १, २६, ६) । उच्छहु; (सि०.१, उच्चुल्ल-वि० (दे०) १. उद्विग्न; ४७)। - मा० १ - उच्छ (१०६) उच्छाह गया . 'एहु संजमु उत्तव> प्रा० उच्छट्ट-पु० (दे०) चोर, डाकू; (दे० उच्छलिय-वि० (सं० उच्छलित>प्रा० ना० मा० १,१०१)। उच्छलिब-उछला हुआ, उचा उच्छडिम-वि० (दे०) चुराई हुई चीज, हुआ) झिलमिल, "उन्छल्लिय सिय- चोरी का माल; (दे० ना० मा० १, छत्त-समाणी, सुद्ध सिद्ध संदोहे माणी," ११२)। झिलमिल-झिलमिल करती हुई श्वेत छत्र उच्छण्ण-वि० (सं० उत्सन्न>प्रा० के समान शुद्ध सिद्ध-समूहों से युक्त सिद्ध उच्छन्न) छिन्न, खण्डित, नष्ट; (भ०) । शिला है; (व० १०, ३१, ११) । उच्छ- वि० (सं० बाच्छन्न) १. ढका हुआ, ल्लिया-वि० स्त्री० (सं० उच्छलिता) २. तिरोहित; (व० २, १२. ७) । उछली हुई (सुदं० ११, १८, १८)। १/उच्छल-(सं० उत्+शल्> प्रा० उच्छल-वि० (सं० उच्छलत) उछलने उच्छल, उल्छन्न) उछलना, ऊँचा वाला; (भ०)। जाना । उच्छलत-कृ० (सं० उत् + शल् उच्छतिम-वि० (दे०) जितकी छाल +शतृ) उछल-कूद करते हुए; - (व० २ काटी गई हो वह; (भ०)। ३, ८) । उच्चरिउ-क्रि० उच्छव-तुं० (स० उच्छरिउ,' -यह संयन उछल रहा है। उन्छव, उच्छा) उत्सव; तुल० म० (म० २, ३०, २)। उच्छलिज-भू० उच्छव, उछाव; गु० ओछत्र; (प० १० का० (सं० उत्नृ) उत्पन्न हुई; (फो०४, १६, ११, ७; जस० १, ४, ६; की० ३, २५४) । उल्लिय-अक०, ३१३; संघि० १७, २,८)। उन्छन्द उछल उठे, तहो वलेण तिष्णि वि उच्छ (प्रा० ५० १, ११६)। ल्लिय," (म० २, ३७, १)। उच्छवि उच्छविन-न० (दे०) शव्या, विछोना; -पू० का० क्रि० तुल० उसळगें, गु० (दे० ना० मा० १, १०३) । उछलवु; (५० च० १७, ६, १०)। 1/उच्चा-(२० उत्+सह,> प्रा० उछलि-मू० का०, निकल उच्छह! उत्साहित होना। -३ अक० "उलि डमरु डकार वर" -डमरु से (सं० उत्तहते) (प० च० १६, ३, १०) । डरकार शब्द निकल रहा था, (को० ४, उच्छहंत-६० ०: (भ०)। २१२) । उच्छनिय-वि० (मं० उत्साहित >प्रा० उच्छलस-न० (सं. उच्छनन) उछ- उच्चहिय) उत्साह-युक्त; (जंबू० ७, ६, लना; (दे० ना० मा० १, ११८) । १३)। उच्छलिय-दि० (सं० उच्चलित >प्रा. उच्छाडिय-वि० (सं० लवच्छादित) उच्छलिज) उछला हुआ, ऊंचा गया ढका हुआ; (भ०)। हुआ; (ण० २, ६, ७) उ छलियं-वि० उच्छाह-पु० (सं० उत्साह>प्रा० उछला हुला, ऊंचा गया हुआ; (प० च० उच्छाह) १. उत्ताह: तुल० म० मच्छाह; १३, ५, ७)। (ज० ५, १०, १; की० ६, .५७), भू० का० रहा था उच्चाहिन (११०) रजोली मा० १, मन; - -- विवर; . २. सूत का डोरा; (२० ना० उन्टुरण-न० (दै०) १. ईख का संत; १२)। ३. गीत-प्रकार विशेष, उत्साह २. ईव; (दे० १, ११७)। नामक छंद में गाया जाने वाला गीत उच्छुल्ल-पुं० (दे०). १. अनुयाद; (प० ३० ३१, १६, ८)।-मण वि० २. वेद, उद्वेग; (दे० ना० मा० १, (सं० उत्साह+मनम्) उत्साहित १६१)। (जंबू० ३, ५, ३) उच्छेवण-न० (दे०) घृत; (दे० ना. उच्याहिम-वि० (सं० उत्साहित>प्रा० मा० १, ११६)। उच्चहिय) उत्साह-युक्त; (जंबू० ५, ८, उच्छेह-पुं० (सं० उत्सेघ) ऊँचाई; ३८)। (दे० ना० मा० १, १३०; जं० ३, उच्छिष्ण-वि० (सं० रच्छिन्न>प्रा. १, १२) । उच्छिष्ण) उन्मूलित; मृलोच्छेद किया उछित्त- उछित्त-भू० का० कृ० (उ क्षिप्त) हुवा, नष्ट किया हुआ; (प० २० १७, फेंका हुंआ, बिसेरा हुआ, उडाला हुआ; ५, ७)। डाला हुआ; (सं० रा.) उच्छिल्ल-न० (दे०) छिद्र, उजडल-शि० (दे०) उजड़ी, (दे० ना० मा० १, ६५)। हुई; (को० ३, ४०)। उच्टुडिय-वि० (दे०) १. वाण आदि उजाम-क्रि० (दे०) बहामओ; (हि० से, २. अपहृत; (दै० ना० मा० १, का०, च० ३८)। १३५) । उजाल-० (स० औज्ज्वल्य) उज्ज्व- उच्छु-पुं० १. (सं० इनु>प्रा० इक्खु) लता, उजालापन । उजालु (भ० ईल, ऊस; तुल० म० ऊस; (म० १ ५, २५)। २; प० ६, १, ४)। पु० (दे०) वायु; उजु-वि० (मं० ऋजु >प्रा० उजु) (दे० ना० मा० १, ८५) । -वण (सं० सरल, सीधा, निष्कपट; (च० ३२) । इक्षुवन) गन्ने के खेत; (जत० उजुञ-क्रि० (सं०/उज आर्जवे, सं० १०) । २. पुं० (सं० इपृ>प्रा० इसु) उजति) सीधा करना; "उनुबं"-उज्ज वाण; (जंबू० ३, १०, १४)। (ज) ति । उजु (ब्ज) आर्जवे," (३० उच्छुअ-न० (दे०) डरते-डरते की हुई व्य० प्र०, ५१-२६)। चोरी; (दे० ना० मा० १, ६५) । उजुआर-क्रि० (सं० उब्जयति) सीघा उच्छुप्ररण-न० (दे०) ईल का खेत; करना, 'सलु उजुबार'- सेल्लमुज्ज (दे० ना० मा० १, ११७) । (ब्ज) यति;" (उ० व्य० प्र०.५१- उन्टुभार-वि० (दे०) २६)। (दे० ना० मा० १, ११५)। उजुवालिया-स्त्री० (सं० ऋजुवालिका) उच्छुच्छु-वि० (दे०) अभिमानी; (दे० नदी-विशेष; (संधि० २, १६, ८)। ना० मा० १, ६६) उलोली स्त्री० (सं० ऑज्ज्वल्य>प्रा० , दुका हुआ .
লাল (१११) उज्जालिय । तैयार, . उज्जल्ल) प्रकाश; मगही अंजोर; (भूसु. ५)। कुपा, चर्यापद)। उज्जमित--वि० (सं० उद्यमित) प्रयत्न- उज्जंगल-न० (दे०) १. बलात्कार, शील; (भ०)। जबरदस्ती; २- वि० दीर्घ; (दे० ना. उज्जय-वि० (सं० उयत) उद्योगी, मा० १, १३५) । प्रयत्नशील; (भ०)। उज्ज-पुं० रावणमंत्री; (प० च० ८, उजर-वि० (सं० उज्ज्वल प्रा० १६)। निर्मल, स्वच्छ; प्रा० ५० १, १८५) । उज्जम-वि० (सं० उद्यत) उज्जल-वि० (स० उज्ज्वल >प्रा० तत्पर, प्रस्तुत; (क० ७, १२, १) । उज्जल) निर्मल, स्वच्छ; तुल० म० उज्जउ-पु० (सं० उद्यापनम्) धर्मों उजळ; (ण० १, १०, ११, प्रा० ५० १, द्योग, व्रतादि का पारण; 'रइवेयएं १८५; जंवू० १, १४, ३) । उउजउ कियउ ताव' -तब रतिवेगाने उज्जलिय-वि० (सं० उज्ज्वलित> धर्मोद्योग (व्रतसाधन) किया; (क० ७, प्रा० उज्जलिअ) १. उद्दीप्त, प्रकाशित; १२, १)। २. ऊँची ज्वालाओं से युक्त; (प० च० उज्जगउ-पु० (दे०) जागरण; (सं० १४, ६, ६)। रा०)। उज्जल्ला-स्त्री० (दे०) बलात्कार, (दे०) स्वच्छ, जवरदस्ती; (दे० ना० मा० १,६७) । निर्मल; (दे० ना० मा० १, ११३)। उज्ज्वण-न० (सं० उद्यापन>प्रा० उज्ज-वि० (दे०) ऊजाड़; (सुदं० २, उज्जावण,उज्जवण) व्रत का समाप्ति- १४, ७; दे. ना० मा० १/६६)। कार्य; तुन० म० उजवणे; (ण० ६, २१, उज्जण-पु० (सं० उद्यापन) किसी १६)। व्रत की समाप्ति पर किया जाने वाला उज्जाडिय-वि० (दे०) उजाड़ किया कृत्य, जैसे यज्ञ, गोदान इत्यादि; (सि० हुआ; (भ०)। २, ३३)। उजाग-न. (सं० उद्यान>प्रा० /उज्जम---(सं० उद्+यम्) उद्यम उज्जाण) उद्यान, बगीचा, उपवन; (ण० करना।-मेइ-अक० (क० १०, १७, १, ८, ११)। उज्जारणु; (महा० ६८, १)। २; जस० ४, १७, १५)। उज्जम-पुं० (सं० उद्यम) उद्योग, उज्जारिणअ-वि० (दे०) नीचा किया प्रयत्न; (भ०; संधि १०, ४, ११) । हुआ; (दे० ना० मा० १, ११३) । उज्जमण-न० (सं० उद्यापन) व्रत /उज्जाल-(सं० उत्+ ज्वालय) समाप्ति कार्य; (भ०)। उजाला करना, जलाना। -इसक० उज्जमि-वि० (सं० उद्यमिन्) परि• (जंबू० ८,८, ४)। श्रमी, अध्यवसायी; (जस० ३, ३१, उज्जालिय-वि० (सं० उज्ज्वलित) उज्जगुज्ज-वि० उज्जित (११२) उज्जोमिआ , . - । जलाया हुआ, सुलगाया हुया; (भ०)। प्राप्त करना, “सोलहमउ तासु जु उज्जु- उज्जित- (सं० उज्जयन्तु>प्रा० वेइ".-उपवासों का उद्यापन करने उज्जयंत) गिरनार पर्वत; (ण० ७, १, वाली को सोलहवाँ स्वर्ग प्राप्त होता है; २)। (व० १०, १६, ८)। उज्जीर--पु. (अ० वजीर) · अमात्य, उज्जैणय-स्त्री० (सं० उज्जयनी-यिनी, मंत्री, सचिव; (की०' ३, ६)। प्रा० उज्जेणी, उज्जइणी) उज्जयिनी, उज्जीरि-वि० (दे०) अपमानित, नगर-विशेष; (प० च० २५, १७, २) । तिरस्कृत; (दे० ना० मा० १, ११२) । उन्जेणि-स्त्री. (सं० उज्जयिनी>प्रा०. उज्जीविय-वि० (सं० उज्जीवित >प्रा० उज्जइणी, उज्जेणी) नगरी,-विशेप; उज्जीविय) पुनर्जीवित, जिलाया हुआ; (ण० ७, ३, ८; जस० १, २१, १२; हे०. (प० चं० १६, १५, २)। ४४२, १)। उज्जु-वि० (सं० ऋजु+क>प्रा० 1/उ.जोअ-(स० उद्+द्योतय् >प्रा. उज्जु) सरल, निष्कपट, सीधा; तुल० म० उज्जोव, उज्जोअ) प्रकाश करना उजू; (भ०) । उज्जुय वि० (सं० ऋजु+ सक० (सं० उद्योतयति >प्रा० उज्जो-- क) सोधे; (जस० ४, १०, ११)। एइ) उद्द्योत करना; (भ०) । उजोइ- उज्जुयत्त-पु० (सं० ऋजुकत्व) सीधापन याउ -भू० का०, उद्योतमान करती थी; (जस० ३, ३५, ५) । उज्जुव-वि० (सं० (सुग्रंव० २, ४, ४)। उब्जोर्वतिय-कृ० ऋजु+क) सीधी, उज्जुवहिं णासाहि, प्रकाशित करते हुए; (प० ..च० :७, ३, (जस० १, १७, २५)। ८)। (सं० उद्+युक्त) उज्जोइस-वि० (सं०. . उद्योतित>प्रा० १. संयुक्त, २. सहित; (ण. ७, १४, उज्जोइस) प्रकाशित, (जं० : १, १५, १) । ६).। उज्जोइय; (प० : च० १५, १४, उज्जुरिय-वि० (दे०) १. क्षीण, नष्ट; ५.)। २. शुष्क; (दे० उज्जोत्तिय-क्रि० भू० का० (सं० उद् ११२) । +योक्तिताः) जोत उतार उज्जुव-वि० (सं० ऋजु+क>प्रा० संदण उज्जोत्तिय जोत्तारहिं" उज्जु) "सीधी; परलोयकज्जे उज्जुवग योक्ताओं ने रथों के जोत उतार : दिये; ईहि," -परलोक कार्य में . सीधी गति से (जंबू० ५, १०, २०)। वि० घोड़े आदि चलने वाले; (क०, ३, १, ९)वई परं विना साज के होना, "नव मेल्लिय स्त्री० (सं० ऋजुमति) दाशरथी भरत उज्जोत्तिय तुरङ्ग;" (प० च० ५६, १५, की प्रणयिनी; स्त्री-नाम-विशेप; (प०- ३)। च० ८०, ५२)। उज्जोमिआ-स्त्री० (दे०) रश्मि, उज्जुवेइ-सक० (सं० उद्+यापय) किरण; (दे० ना० मा० १, ११५)। उन्जुय-वि० ना. मा० १, दिये गए, .. - उज्जोय (११३) ਚ है उज्जोय--पुं० (सं० उद्योत>प्रा. १, २, ८)। उज्जोअ) प्रकाश; उजाला; (ण० ६, १, उन्निखिअन० (दे०) १. लोकापवाद, भ०)। उज्जोयंत-कृ० (सं० उद्यो. २- वि० निन्दनीय; ३- कयनीय; (दे० तय+शत) (जंबू० ३, १३, ३) । ना० मा० ० ३, ५५)। उज्जोव-पु० (सं० उद्योत प्रा० उज्झिम-० वानरं योधा; (प० च ० उज्जोअ) प्रकाश; (प०व० ३५, २, ५७, १२) । ८)। उज्झ्यि-वि० (सं० उज्झित >प्रा० उज्जोविय-वि० (सं० उयोतितं> उज्झिय) परित्यक्त, विमुक्त; (ण०.७, प्रा० उज्जोइय) प्रकाशित; (व० ५, ११, १; प० च० ३, १०, ६)। १८, ३)। उट्ट-पु० स्त्री० (सं0 उष्ट्र>प्रा० उज्न-पु. (सं० अयोध्या) अयोध्या उट्ट) उष्ट्र, ऊंट; (५० च० २५, १०, नगर; (प० च० २३, १, १०) । ८)। उज्झमण-नं० (३०) पलायन, भागना; उण-पुं० छंदों की उद्वर्तनी या (दे. ना०मा० १, १०३) । उट्टवरिणका, “तुलउ छंद उट्टवण अत्थ उमरपुं० (सं उद्+क्षर् >प्रा० विणु दुब्बल कहिअउ" उट्टवणिका से उज्भर) पर्वत से गिरने वाला जल- रहित (अर्थात् जहाँ मनमाने गणों का प्रवाह, निर्झर; (५० च० १४, १०, प्रयोग कर पट्कल गण के स्थान पर पंचकल या निकल का प्रयोग कर दिया उज्हरिअ - वि० (३०) टेढ़ी दृष्टि से गया हो; (प्रा० ५० १, ११६) । देखा हुआ, २- विक्षिप्त; ३- फेंका हुआ; Vउट्टिय-क्रि० भू० का० (सं० आ+ ४. परित्यक्त; (दे० ना० मा० १, वृत्>प्रा० आवंट्ट, आवत्त) ओटे, १३३)। चरखी द्वारा कपास से बिनौले उज्झस-~-पु(दे०) उद्यम, उद्योग, किये; "चीमणु वुणणहँ जाइ.. वढ, विणु प्रयत्न; (दे० ना० मा० १, ६५)। उटिय ई कपासि,", (पाहु०)। उज्झा--पु० १- (सं० उपाध्याय>प्रा० उन्ट'-पु० (सं० ओप्ठ) होठ, अधर; उज्झाय) ओझा, तुल• गु० ओंझा; तुल० गु० म० ओठ; . (भ०) ।-उड (भ०) । २- स्त्री० (स० अयोध्या) सूर्य पुं० सं० ओप्ठ+पुट (क० . २, १४, वंशी राजामों की राजधानी; (जस)। ६)। -चम्म पु (सं० ओप्ठ+चर्म) -हिउ पु० (सं० अयोध्या+अधिप) अधर का चर्म; (जंबू०.६, १, १०) । अयोध्या के राजा; (जस० २,१०, /उट्ठ-(सं० उत्+स्था>प्रा० उट्ठ; २) । उहाव) उठना, खड़ा होना, उठाना । उज्झाय-पु० (सं० उपाध्याय >प्रा० - अक० (सं० उत्तिष्ठति) (भ०)।. उज्झाय) ओझा, विद्यादाता गुरु, (ण० उद्वैत-कृ० (उत्+स्या+शत) उठते हुए अलग का० हुआ, उठ - विशेप; तुल० गु० अडद; (संधि० उदृद्ध-उद्धय (११४) ਫਿਰ (ण० ८, ३, ६) तुल० म० उठणे-विअ उट्ठभइ तो कुहइ अह डज्झइ तो छारु" वि० (सं० उत्यापित >प्रा० उट्ठाविअ) . यदि इसे ढका जाय तो दुर्गन्ध आने लगे, उठाया हुआ, खड़ा किया हुआ; (जंबू० यदि जलाया जाय तो राख हो जाए; १०,१३, ६) उट्ठि-पू० का० क्रि० (को० (हे० ३६५ ३) ३, ५) । उट्टिमउ-भू० (सं० उहंग-वि० (सं० अर्लाङ्ग) उन्नत, उत्थितः) उठा; (हे० ४१५, १)। "उड्ढंग-णिविट्ठ मणो सयावि, जहिं उटिर-कृ० (सं० उत्+स्था+तुमुन् - सोहहिं पवर सुहावियावि," -जहां उन्नत उत्यातुम) उठने में "उट्टिउन पारए एवं मन को निरन्तर सुन्दर लगने वाली तरट्टि खोट्टिया"-धक्का दिये जाने पर सुशीतल जलवाली वापिकाएं सुशोभित राजमार्ग से उठने में भी समर्थ न हो रहती हैं; (व० ६, २, ६) । सकी; (जंवू० ४, २१, १२) । उट्ठिउ- उहावियप्र-वि० (सं० उत्यापित > भू० का० (व० ३, २५, १३) । उट्ठिय प्रा० उट्ठाविभ) उठाया भू० का० उठी; (सं० रा०); उठ खड़ी खड़ा हुआ; (जस० २, ६, १७) । हुई; (जस० २, २३, ४) । उहि- उट्टासउ~-वि० दुष्टाशय,. "कहिं सो कि० • आ०, उठो "वसुभूइ भणइ उ8 हि सरोसु णारियण-इठ्ठ युज्जउ उद्यासउ मित्त, (विला०)। उठेवि-पू० का. रिउ तिविठ्ठ" -उसने रोपपूर्वक पूछा क्रि० उठकर; (प० च० ६, ६, ७)। -"नारी जनों के लिए इष्ट, दुर्जय दुप्टा- उठाइउ-भू० का० (सं० उत्थापित) शय (वह) शुनु त्रिपृष्ठ कहाँ है ? (व०, उठाया, तुल० गु० उठाव्यु, (संधि १२, ५, २१, ८). ६, १६)। उटिन - वि० (सं० उत्थित >प्रा० उदि- उट्ठद्ध. उट्ठद्धय - वि० (दे०) नियन्त्रित; ठय) खड़ा हुआ; (ण० १, ६, २)। (प० च० २५, २०, ७)। उट्टिय्-वि० (सं० उत्थित) (जस० ३, ३, उद्ध-वि० (सं० अवष्टब्ध आवृत, १५). आवेष्टित) परिपूर्ण, "णव-विवरहिं जुत्त उडद-पुं० (प्रा० उडिद) माप, उडद, असुइ सुरालि-णिवद्ध । किम कुल-संपुन्नु खइ मलेण उदृद्ध, ॥" अर्थात् 'यह काय १६, ५, ११)। नौ-छिद्रों से युक्त, अपवित्र, शिरा-समूह उडास-क्रि० (सं० उद्दासति) देना, से भरा हुआ, विनश्वर तथा मल से परि "पा (खा) ट डास, उदास'-प (ख) पूर्ण रहती है;' (व० ६, १४, १२) । ट्वां दासति, उद्दासति । दास दाने ।" उठवण-न० (सं० उत्थापन) ऊँचा (उ० व्य० प्र० ४६-२७) । करना, उठांना; (दे० ना० मा० १, उडिउ-पु. (दे०, प्रा० उडिद) उरद, . ८२)। माप, धान्य-विशेप; (दे० ना० मा० १, उभइ-कि०, व० ढकना; १८) । --- "ज * उडिद (११५) उडिर. जूठा; (दे० उडिद-पु० (दे०) उडिद, माष, धान्य ३, १५, ११)। विशेष; (दे० ना० मा० १, ९८)। उड्डमर-पु० (सं० उग्र भय) अत्य- उडु-न० (सं० प्रा० उडु) नक्षत्र; धिक भय; "डिब-डमर उड्डमर-मारि; (जस० २, २, ११) । -यण पुं० (सं० (प्रा० गु० १२, ६)। उडुगरण) नक्षत्र-समूह; (भ०) । -वइ उड्डस-पुं० (दे०) उड़िस, खटमल; पुं० (सं० उडुपति) नक्षत्रराट्, चन्द्र; (दे० ना० मा० १, ६६) । (जस० १, १७, २६)। -हिम न० उड्डहण-पू०(दे०) चोर, डाकू; (दे०- (दे०) विवाहित स्त्री का कोप, २. वि. ना० मा० १, ६१)। उच्छिष्ट, ० १, १३७)। उड्डाण-न० (सं० उड्डयन) उड़ान; 1/उड्ड-(सं० उद्+डय) उड़ना। (सुदं० २, ६, ६) । पुं० (दे०) १-प्रति- -इ नि.० ३० (प० च० १, ५, ४)। शब्द, प्रतिध्वनि; २. पक्षी-विशेष; उड्डत-कृ० (सं० उत्+डी+ शतृ) ३. विष्ठा, पुरीप; ४ अभिलाषा, (जं० ६, ७, २) । उड्डन्त-भू० का० ५- वि० अभिमानी; (दे० ना० मा० १, उड़ जाते थे (को० ४, १९७) । उड्डि १२८)। पू० का० नि.-उड़कर (को० ४, Vउड्डाव-(सं० उद्+डायय>प्रा० १३०) । उड्डिज्जइ- उड़ने लगा, वाय उड्डाव) उड़ाना। -इ सक० (सं० उड्. सेण, उड्डिग्जइ दीर्णे- वह दुःखी डापति), तुल० गु० उडाना, म० उडवणे; कौआ उड़ने लगा (जंदू० ६, ५, ८) । (० ३, १५, ८)। उड्डियाइ-क्रि० (सं० उद् + डी>प्रा० रुड्डाविय-वि० (सं० उड्डायित उड्डी) उड़ना; "उड्डियाई णाणाविहवि- प्रा० उड्डाविअ) उड़ाया हुआ; (ण० ३, तई" जहां नाना प्रकार के धन उड़ रहे ६, १४; जस० १, २१, ४)। हैं; (ज० ३, १२, ६) । उड्डे वि-पू०- उड्डास-पु० (दे०) उड़ास, संताप, का० कि० उड़कर, (प० च० १०, रिताप; (दे० ना० मा० १, ६९)। उड्डिाहरण-न० (दे०) छुरी पर को पांव की दो उँगलियों उड्ड---वि० (दे०) कुआ आदि खोदने वाला; खनक; (दे० ना० मा० १, ८५)। से लेते हुए चलना; (दे० ना० मा० १, उड्डण -पुं० (दे०) वैल, १२१)। दीर्घ; (दे० ना० मा० १, १२३)। उड्डिय--वि० (सं० उड्डित) ऊपर किया उणसीला-वि० (सं० उड्डनशील हुना, जवीकृत; (जस० २, ३३, उड़नशील, "उड्डणसीला तंबोललग्ग, ६) । जहिं हरि खज्जता कहि मि भग्ग" -जहाँ उड्डिर-वि० (सं० उद्+डी>प्रा. उड़नशील हरित शुक ताम्बूल की लता से उड्डी+इर कर्त्त त्व बोधक प्र०) चिपटकर अन्यत्न भाग जाते हैं; (जस० उड़नशील; (जस० २, २७, ८)। रक्ते हुए फूल सांड़ । वि०. - ਚੜ੍ਹੇ (११६) उण्णाविय दो०) .. । . उड्डं-न० (सं० ऊर्ध्वम् >प्रा० उड्ढ). (जंवू० ७, ६, ६)। ऊपर, ऊँचा; (जस०, २, ३२, ७)। उण्णइवंत-वि० (सं० उन्नतिमत्). उढण-पुं० (दे०)उत्तरीय, ऊपर पहिनने. उन्नत; (जस० ४, २७, २३) । का कपड़ा, तु० गु० ओढणु, ओढणी । उग्णम-वि० (दे०) समुन्नत, उचा;- (५० च० १४, ३, ३)। (दे० ना० मा० १, ८८) उढल, उड्डल्ल-पु० (दे०) उल्लास; उण्णय-स्त्री. (सं०उन्नति.> प्रा० (दे० ना० मा० १,६१) । उण्णइ) उन्नति, अभ्युदय; (दै० सा० उड्ढिय-वि० (सं० उर्चीकृत) ऊपर । दि०. (सं० : उन्नत >प्रा० . . की ओर किया हुआ; (ण० २, १२; उण्णय) ! (० ३, ४, ८; जस० ४, २, ५)। २०)। -कंधर वि० (सं० उन्नत+स्क- उढक्फिय-क्रि० (सं० उद्+ ढोक) चल न्य) ऊँचे कन्धों वाले; (जस०.४, २७, देती है; (प० १० १७, १३, ७) १९)। उडण-पु० (दै०) १- उत्तरीय, ओढनी, उग्णापिपीलिया-स्त्री० (सं० कर्णा+ ओड्ढण। उडणु; (रा० २६)। पिपीलिका) जन्तु-विशेष; . (दै० ना०- २- परिधान; (प्रा० गु० २६, ५)। मा० ६, ४८)। उरणंदी-वि० (सं० उन्निद्र) उनींदी, बहुत जागने के कारण अलसायी हुई; उच्णामय-दि० (सं० ऊर्गामय) ऊन से (सं० रा०)। वना हुआ, "उण्णामय-कंकणवद्धकर" . उण-क्रि० वि० (सं० पुनः) फिर, -हाथ में ऊन से बना हुआ कंकण बंधा है; (जं० २, १०, ५)। अनेकशः, पुनः; तुल० राज०, गु०, म० पण (को० २, ४३; प्रा० ५० १, ७)। उण्णामिय-वि० (सं० उन्नमित >प्रा० उणो; (प्रा० ५० १, १२७) । उग्गामिय) उन्नत, उन्नति किया हुआ, उणाइ-पु० (सं० उणादि) उणादि, उत्कषित; (व० २, ७, १०)। -भाज उण प्रत्यय से शुरू होने वाले शब्द; (स० उन्नमित+भाल) उन्नत माल; व्याकरण का एक प्रकरण; (प० च०१, (व० २, ३, १६)। ३, ६)। उण्णालिय-वि० (दे०): १. कृश, उण्णइ-स्त्री० (सं० उन्नति >प्रा० उन्नति >प्रा०, दुर्वल; २- ऊँचा किया हुआ; (दे० उण्णइ) अभ्युदय, उन्नति; (क० १, मा० १, १३६)। १६, १०) । अव्यात्मपरक उक्ति. उण्णाविय-- वि० सं० उन्नमित >प्रा. 'उण्णइ ण करइ कहाँ मुणियवणु'-कहिए उण्णामिय), ऊपर किये हुए, ..ऊँचा कि मुनि-वचन किसकी उन्नति नहीं किया हुआ, 'विण्णि दि उण्णाविय-मत्या,' करते ? (व० ६, १६, ११)। (तुम लोग अपने दोनों हाथ ऊपर कर), उगइय-वि० (सं० उन्नयित) उदित; . (प० च० २, १४, ६). ई - ना० !
उण्णाह (११७) उत्तम्मि ऊष्णीकृत, च० उण्णाह-० (दे०) तीव्र प्रवाह, व ढ़ उत्त-वि० (सं० उक्त >प्रा० उत्त) (जंवू० ६, १०, १)। कथित; कहा गया; (ण० उण्ह-वि० (सं० उष्ण>प्रा० उण्ह) १०) । पु० (सं० पुत्र>प्रा० पुत्त, उत्त) गरम; (ण० १, ५, ५)। पुत्र (वाणिउत्त); (भ०)। उण्हउ-वि० (सं० उष्णं) गर्म; (हे० उत्तट्टिया-वि० स्त्री० (सं० उत्प्रस्ता) ३४३, १)। भयभीत, चकित डरी हुई, कांपती हुई; उण्डविअ -वि० (सं० ऊष्णापित) (सं० रा०)। गर्म किया हुआ; (प० उत्तत्त-वि० (सं० उत्तप्त) देदीप्यमान; २८, ३, ६); उन्हविय; (जंवू० ८, १३, क० ३, २, १०)। ५)। उत्तद्ध-पु० (सं० उत्तरार्ध) पिछला उप्हिआ-स्त्री० (दे०) कृसरा, तिल भाग, पीछे का आधा भाग; (प्रा० पैं० चावल आदि की खिचड़ी; (दे० ना० १, ५२)। मा०.१,८८) उन-पडुत्तियए---स्त्री० (सं० उक्त उहिया-स्त्री० (सं० उष्णिका) छन्द प्र-उक्ति) उक्ति-प्रति-उक्ति, क्षणिक विशेष; (सुदं० ८, २३, ११) । स्त्री० उत्तर, व्यंग्य उक्ति; (प० च० १२, (दे०) कृशरा; खिचड़ी; (दे० ना० मा० ६, १०)। १, ८)। उत्तपत्ती-स्त्री० (सं० उक्त+ प्रत्युक्ति) उन्होदयभंड-पु० (दे०) भ्रमर; (दे० अभिहित या कथित उत्तर; (ण० ३, ७, ना० मा० १, १२०)। १०)। (सं० उत्तान>प्रा० उत्तप्प-वि० (दे०) १ गवित; उत्ताण) पिछले पैरों पर खड़े होकर मुह २- अधिक गुणवाला; (दे० ना० मा० १, ऊँचा कर लिया; (की० ४, ११६) । १३१) । उतरथि-क्रि० (सं० उत्+त.>प्रा० उत्तम-वि० (सं० प्रा० उत्तम). श्रेष्ठ, उत्तर) बाहर निकलना, ऊपर सुन्दर; (भ०; जस० १, १४, ३) । पु० (की० ४, ११६)। राक्षस वंशीय राजा; (प० च० ५, उतिम्म–वि० (सं० प्रा० उत्तम) उत्तम, २६४) । 'उत्तमंग-न० (सं० उत्तमाङ्ग श्रेष्ठ; (संधि० ११, ४, ४)। >प्रा० उत्तमंग) मस्तक, सिर; (जत. उत्तंग-वि० (सं० उत्तु ग) ऊँचा; (सं० १, २६, २२; सि० १, २)। -खम रा०)। स्त्री० (सं० उत्तम क्षमा;>प्रा० उत्तम उत्तपिअ-वि० (दे०) खिन्न, उद्विग्न; खमा) उत्तम क्षमा; (जंबू० (दे० ना० मा० १, १०२) । २)। उत्तस-पु. (सं० अवतंस) शिरोभूषण; उत्तम्मिअ-वि० (दे०) खिन्न; (दे० (दे० ना० मा० २, ५७) । ना० मा० १, १०२)। उतए-कि० उटना . ११, १४, (११८) उत्तावलि प्रा० Vउत्तर-(सं० उत् +3.>प्रा० उत्तर) ६, ४) । बाहर निकलना, पार करना; (जस० २, उत्तरत्तर-कि० वि० (सं० उत्तरोत्तर) १४, ६)। -इ कि०, २० (सं० उत्त एक के अनंतर दूसरा; दिनोदिन; (व० रति) पार उतर जाना; तुल० म० उत्त ४, ३, ७)। रणे; (हे० ३३६, १; भ०)। उत्तरिम- उत्तलहम-पु० (दे०) विटप, अङ्कुर; भू० का० उतरे, (की० ३, ८६) । उत्त (दे० ना० मा० १, ११६) । रिवि-पू० का० कि० (जंबू० १०, २०, उत्तासिय-वि० (सं० उत्तस्त>प्रा० ७) । उत्तरेवि-पू० का० क्रि० (जंबू० ७, उत्तसिय) भयभीत; (सुदं० १, १, ६)। १३, ५)। उत्तह-अव्य० (दे०) तत्र, संघर; उत्तरगइ~-पुं० राक्षसवंशीय राजा; (प० (सुदं० ८, ३, १०)। च० ५, २६४)। उत्तागपत्तय-वि० (दे०) एरण्ड संबंधी उत्तरायण-पु० (सं० उत्तराव्ययन) पत्ती आदि; दे० ना० मा० १, १२०) । आगमग्रन्थ-विशेष; (संधि० 1/उत्तार--(सं० उद+तारय् १)। उत्तार) पार पहुंचाना; (प० च० ३३, उत्ततरण-न० (सं० प्रा० उत्तरण १२, ६; जस० ४, ७, २६)। उत्तरितु- १. उतरना, पार करना, २. अवतरण कृ० (सं० अवतरत् उतार कर; (संधि० (म०)। ५, ४, ८)। उत्तरह-० (सं० उत्तरार्ध) पीछे का उत्तारय-वि० (सं० उत्तारक>प्रा० अर्ध भाग, पिछला बाधा; (प्रा० १० १, उत्तारय) पार उतारने वाला; (प० च. ५२)। १, १,१)। उत्तरफागुण (सं० उत्तारिय-वि० (सं० उत्तारित >प्रा० फाल्गुनी) उत्तराफाल्गुनी नामक नक्षत्र, उत्तारिज) पार पहुंचाया हुआ; (भ०, बारहवां नक्षत्र; (व० ६, ८, १)। जंबू० ७, ८, १)। उत्तरयल-पु. (सं० उत्तरतट) उत्तर उत्ताल-वि० (दे०) उतावला; (जंबू० तट; (व० २, १३, ३)। ५, २, ११) । उत्तालिया-वि० (स्त्री०) उत्तरसेणि-स्त्री० (सं० (सं० उत्तरणि उत्तरणि उतावली; (जंवू० ४, ११, ६) न० पर्वत की) उत्तर की श्रेणि या शृंखला; (दे०) निरंतर रुदन, अन्तर-रहित क्रन्दन (व० ४,४, १२)। (दे० ना० मा० १,.. उत्तरावह-पुं० (सं० उत्तरापथ>प्रा० १०१)। उत्तरापह) उत्तर दिशा-स्थित देश, उत्त उत्तावलय--वि० (प्रा० उत्तावल) रीय देश; (म०)। जल्दी मचाने वाला, बल्दवाज; (सं० उत्तरिय-वि० (सं० उत्तरित) उत्तीर्ण, रा०) । उतरा हुमा, नीचे आया हुआ; (व० २, उत्तावलि-वि० स्त्री० (प्रा० उत्तावल) - की आवाज;
उत्ताविय (११६) उत्यल्ल - त्वरा- उद+तापित) त्वरणशीला, उतावली; तुल० राज० उत्तओ-पुं० (सं० उत्तेजाः) काव्य. तावलो, म० गु० उतावल (शीघ्रता के छंद का भेद; (प्रा० ० १,११३)। अर्थ में), कन्नड उत्ताल (जल्दी के अर्थ उत्फुल्ल-वि० (सं० उत्फुल्ल) प्रसन्न, में); (सं० रा० २६)। -अ, वि०, (भ०)। जल्दवाज, तुल० गु० उतावली; (प० च. उत्यग्ध-० (३०) सम्मद, भीड़भाड़ ३६, १५, २)।-हूअय वि० (दे० ना० मा० १, ६३)। युक्त; (प० च० ५६, १५, ८) । उत्यहि-वि० (सं० उच्च स्थित) उच्च उत्ताविय-वि० (सं० स्थल में स्थित; (व० ६, ६, ८)। तप्त; (जंबू' ५, १०,४) । /ज्यर-(सं० आ+क्रम, प्रा० उत्थर उत्ताहिय-वि० (दे०) फेंका हुआ; (दे० =आक्रमण करना) लड़ना। -इ सक० 'ना० मा० १, १०६)। (भ०) । -न्ति बहु १० (प० च० ४३, उत्ति-स्त्री० (सं० उक्ति>प्रा० उत्ति) १५, ७) । उत्थरहों-भू० का०, "तो वे वचन, वाणी; (सि० १, ६) । - वि० वि परोप्पर उत्यरहों, जों को वि जिणइ (२. उक्त) कहा गया; (जस०) । जयकार तहाँ" (जो आपस में लड़ लो, उतिराउ-क्रि० भू० का० (सं० उत् + जो जीतेगा उसकी जय-जयकार होगी); तीर्ण>प्रा० उत्तिण्ण) उतरा, 'जवुकुमा- (५० च० १२, ६, ३) । रुत्तिण्णउ;' (जंबु० ५, ११, २१)। उत्थरिया-क्रि० भू० का० (सं. उत्तिस्य-पु० - न० (सं० उत्तीर्थ) आक्रम्, प्रा० उत्यर) बाक्रमरण किया; कुपथ, अपमान; (भ०)। 'जो जस उत्यरियड सो तें धरियां' उत्तिम-वि० (सं० प्रा० उत्तम) श्रेष्ठ; अर्थात् जिसने जिस पर आक्रमण किया, (जस० ३, १५, १२)। उसने उसको पकड़ लिया, (प० च०१७, उत्ती-स्त्री० (सं० पुत्री) लड़की, बेटी; १७, १०)। (ण० २, २, १६)। /उत्थर-(सं०अव+स्तृ).१. आच्छा. उत्तुग-वि० (सं० उतुग> प्रा० दन करना, ढकना, २- पराभव करना। उत्तग) ऊंचा, उन्नत; (जस० ४,७, उत्थरंत-कृ० (सं० अव+स्तृ+-शत), ६)। (सुदं० ६, १५, ७)। उत्त रिद्धि-स्त्री० (३०) १- गई, उत्यरिय-वि० (प्रा० उत्परिज) आका- २- वि० गर्वित; (दे० ना. त; (जंवू० ७, ८, ६)। ९६)। उत्यल्ल-क्रि० (सं० उत्+शल्>प्रा० उत्त हिय-वि० (दे०) छिन्न, नष्ट; उत्यल्ल) उछलना, कृदना । -इ (दे० ना० मा० १, १०५) । लना, (भ०; प० च० ३१, ३, २)। उत्त ह-पु० (दे.) तट-भुन कुप; -त्तय, कृ०-उछलते हुए, कूदते हुए; (दे० मा० मा० १, ६४) 'पेखें वि उत्यल्लन्तई छत्तई' अर्थात् मा० १. ज्य- उत्थरिउ (१२०) उछाल. . .. का० उछलते हुए छन्न देखकर; (प० च० १७, गिर, उदयाचल, पर्वत-विशेष; "(जस ३, ५) । उत्थरिउ-भू० का० उछल पड़ा; ३, २५, ३)। त वयणु सुणेप्पिणु विजयसीहू, उत्थरिउ उदयरह-पु.० इक्ष्वाकुवंशीय राजा; पवर-भुव फलिह-दीहु', अर्थात् यह वचन (प० च० २२, ६७) । सुनकर प्रवल और विकसित .बाहुओं उदयतुंदर-~-पुं० राजपुन नागपुर का; वाला विजय सिंह उछल पड़ा; (प० च० (प० ब० २१,४५) । ७, ५, १)। उदहिकुमार-पु० भवनवासी देव; उत्यल्ला-स्त्री० (दे०) परिवर्तन; (दे० (प० च० १, ४३)। ना० मा० १, ६३)। उदिअ-~-पु० दूतपुत्र; (प० च० ३६, उत्यल्लिय-वि० (सं० उच्चलित >प्रा० ४०) । उत्थल्लिअ) उछलना हुआ; (प० च० १. उदिट्टा--वि० (सं० उद्दिष्ट) कथित; ३, १३) । २. भू० का०, कूदा; (प० (जंबू०.६, ४, १३)। . च० ३०, ४, ७) । उद्दंड-वि० (स० उद्दण्ड->प्रा२. उद्- उत्थाइ-वि० (स० उत्थायिन्) उठने दड); प्रचण्ड, उद्धत; (जस० . १, २६; वाला; (दे० ना० मा०८; १६) । ५) । उद्दण्ड (प० च०.३, ३, ६). उत्याइयई-क्रि० भू० (सं० उदंडा-वि० स्त्री० प्रवल (प्रा० पं० २ उत्यापित >प्रा० उत्थाइय) उठवाये; ३४)। (जस० २, २५, १६) उद्दन्तुर:-वि० (सं०>प्रा० उद्दतुर) उत्थामिय-वि० (स० उत्यापित) जिसका दान्त वाहर बाहर आया हो वहा उठाया हुआ; (भ०)। (प० च० ६, ७, ६). उद्दम-पु० (उद्यम) उद्योग; (की० २, उत्धि-क्रि० वि० सं० तत्र>प्रा०तत्य) वहाँ; (की० २, २३४)। ७५).। उद्दाम-वि० (सं० प्रा० उद्दाम) प्रचण्ड, थि-क्रि०. : वि०. (सं० तत्र>प्रा० प्रखर; "जुझंती उद्दामे उद्दामे कालिक्का तत्थ) वहाँ; (की० २, २३४) । उथिय । संगामे । णचंती हम्मारो दूरित्ता कि० वि०, वहाँ (को० २, २३४) । (प्रा० पै० २, ४२)। पुं०. उदंभो-पु. (सं० उद्दम्भः) काव्य-छंद वानरयोद्धा; (प० च० ५७, ७६) । का भेद; (प्रा० ५० १, ११४) । 1/उहाल.-(प्रा० उद्दाल) खींच लेना, उदए---पु० न० (सं० उदक >पा०, हाथ से छीन लेना । --इ उग) उदक, जल; (सि० २, ३१) । (भ०) हो कि आछीन लो, 'उहा- उदय-पु० (सं० प्रा० उदय) अभ्युदय, हो वहु वरइत्त हणहो' -~-अर्थात्, वधू उन्नति; (भ०)। छीन लो और वर को मार डालो; (प्र० उदयगिरि-पु. (सं० उदयगिरि) उदय च० ७, ४, ७) । उद्दालिउ-भू० का. । . संहारो तक० उद्दालिय (१२१) उद्धद्धएं - - उद्+दारित) (सं० उद्दालित) छीन लिया; (रि० ८, ७)। १) । उद्दालिप्पिणु-पू० का० क्रि० अप 1/उद्देस (सं० उद् + दिश् > हरण कर; (ण० ३, ११, ५)। उद्दा- प्रा० उद्दिस) नाम निर्देशपूर्वक वस्तु का लेवि-पू० का० क्रि०; 'एयहाँ उद्दा निरूपण करना; (जस० १, ६, २६)। लेवि जेमि तिय, कइयहुँ-माणेसहुँ राय- -हि सक० (विधि०) (सं० उपदेशय्) सिय' अर्थात् इसको उखाड़कर, मैं स्त्री के (जंवू० १०, १४, ८)। समान कब राज्यश्री मानूगी ? (प० च० /उद्देहिया, उद्देही-स्त्री० (सं० ६, ६, ५)। उपदेहिका) दीमक, जंतु-विशेप; (दे० उद्दालिय–वि० (सं० ना० मा०१, ६३)। माच्छिन्न, छीना हुआ, खींच लिया गया । उद्धत-वि० (सं० उद्धत >प्रा० उद्धअ) भू० का० उड़ा लिया;(क० २, ८, ८)। गर्वित; (म० २, ४, २)। उद्दिा-वि० (सं० उद्दिष्ट) कथित, उद्ध-वि० (सं० अर्ब>प्रा० उद्ध, प्रतिपादित; "उद्दिट्ठा जाणहु," (प्रा० उड्ढ) ऊँचा, सीधा खड़ा, ऊपर का; पैं० १, ३६)। - वि० उपदिष्ट; (भ०; जंवू० ५, १४, १२, जस० १, (जबू० १०, २, ५)। ६, ७)। उद्दित्त-वि० (सं० उद्दीप्त) प्रज्वलित; उद्धच्छवि-वि० (दे०) अप्रमाणित; (जंत्रु० १, १८, १०)। (दे० ना० मा० १,११४) । Vउद्दिस-- (सं० उद् +दिश् >प्रा० उद्धच्छविअ-वि० (दे०) सज्जित, उद्देस, उद्दिस) १- नाम निर्देशपूर्वक तैयार; (३० ना० मा० १, ११६) । वस्तु का निरूपण करना, २ देखना, उद्धच्छि.---वि० (दे०) निपिद्ध; (दे० ३- लक्ष्य करना, ४, उपदेश देना। ना० मा० १, १११)। उद्देसइ-सक० (सं० उद्दिशति); (भ०)। उद्धत्तणु-पुं० (सं० उद्धतता) उद्दण्डता; उद्दिसिअ -वि० (दे०) अनुमानित; (व० ८, ७, ३)। उत्प्रेक्षित, वितकित; (दे० ना० मा० १, उद्धत्थ-वि० (दे०) वञ्चित; (दे० १०६)1 ना० मा० १, ६६)। उद्दीविय-वि० (सं० उद्दीपित) प्रदी- उद्धदिट्ठी-स्त्री० (सं० उर्व दृष्टि) पित, प्रज्वालित; (भ०)। माँले उठाकर देखना; (जंवू० १, १५, उडुमरग-वि० (सं० उद्+दुर्मनस्) ६)। उदास, "उर्दु मण अच्छहिँ जा मणम्मि, उदएँ-कृ० छीन लिये जाने पर, वे अपने मन में इस प्रकार उदास 'उद्धद्धए रज्जे णिविस वि जिज्जइ ताय खड़े थे; (क० २, २१, २) । किह'; अर्थात् हे तात, राज्य के छीन लिये उद्देस (सं० उद्देश>प्रा० उद्देस) जाने पर एक पल भी किस प्रकार जिया लक्ष्य; (की २, ५८ जस० ३, २१, जाता है; (प० च०७, ११, ६) । । - .
(१२२) उद्विरसण हुआ; (की. . -व्रत का । /उद्धर- (सं० उद् + /ह > उद्धहत्य-वि० (सं० उर्च +हस्त) हाय प्रा० उद्धर) फंसे हुए को निकालना; ऊपर उठाये हुए या हाथ ऊपर किये हुए; • ऊपर उठाना । -इ सक० (सं० उद्ध- "कयउद्घहत्यणारीगरेहिं" -हाथ ऊपर रति) उद्धार करना; (भ०)। –उ भू० किये हुए नर नारियों ने; (जस० २, का० उद्धार २, २)। २६, ७)। -नो-क्रि० उद्घारूं'; (की० २, ४३) । उद्धाअ-पु. (दे०) १. विपमोन्नत. -णु भू० का० उठा रखा था; (प० च० प्रदेश; २- समूह ३- थका हुआ; (दे० १३, ६, २)। उद्घारिअउ-क्रि० उद्धार ना० मा० १,१२४।। किया गया; (की० १, ५४) । - उद्धाइय-क्रि० (स० ऊर्वाय >प्रा० उद्यापन करे, ,उद्धखुवउ' उद्धाअ = ऊँचा होना) उठे, 'उद्धाइय उद्यापन करेः (जस० २, १८, १४)। मच्छर-मलिय-कर, भीसावरण-पहरण- उद्धरि-क्रि० आ० उद्धार करो; (जंवू० णियर-धर, अर्थात् मत्सर से हाथ मलते ७, ३, १३).। उद्धरि पू० का० क्रि०- हुए भयंकर हथियारों का समूह धारण चुका कर, (की० १,६४); उद्धार करके, करने वाले वे उठे, (प० च. (की० १,६८); उत्पन्न करके (की० १, ५)। -उ उठे हों 'दीसइ विझ महीह- १०२)। रहो', मेहउलु. गाई उद्धाइयउ' ऐसा उद्धरण-वि० (दे०) उच्छिष्ट, दिखाई देता है जैसे विन्ध्याचल से महा- जूठा; (दे० ना० मा० १, १०६) । मेघ उठे हों; (प० च० ८, ३, ६) । उद्धरियलि-वि० (सं० उद्धृता) जिस उद्धाइय-वि० (स. उद्+धावित) का उद्धार किया गया हो, 'गउ अणहिल- दौड़ते हुए; (ण० ४, १४, ६) । पुरि जेसुल राउ जिणि उद्धरियलि पुहवि उद्धारगणु-वि० (मं० उर्व + आनन, सयाउ'; (प्रा० गु० ५, ४४) । मुंह उठाये हुए, 'विहलंबलु उद्घाणणु उद्धवंत-वि० (स० उद्धत) गर्वित, गवित, भभइ'-विह्वल रूप से मुंह उठाये इधर- उदंड, (ण० ४, १०, ३)। उधर फिरता था; (क० ६, १, १२) । उद्धवअ-वि० (दे०) फेंका हुआ; (दे० उद्धार-पु० (सं० ना० मा० १, १०६) । व्याज का ऋण) उधार, "काहु देल उद्धविन-वि० (दे०) पूजित; (दे० ना० उद्घार;" (की० २, ६६)। मा० १, १०७)। उद्घाविउ-क्रि० भू० का० (सं० उद्+ उद्धसिय-वि० धंसे हुए; (सं० रा०) । धावित) दौड़ पड़ा; (क० ५, १४, ३) । उद्धसिय-क्रि० भू० का० (सं० उत् + उद्धिरसरण -वि० पराभव करने वाला हसित) हंस उठे;"उद्धसिय नपति णहे "अद्विरसणभीपणरूवधारि"; अर्थात् परा- समि-दिणिद, आकाश में चंद्र और सूर्य करने वाला और भीपण रूप धारण करने तत्काल हँस उठे; (सुदं० १, १, ८) । वाला; (रि० २, ३)। - उद्घार =विना ऋण .
(१२३) जरभोय . प्रा० ऊपर हुआ, उद्बुद्ध-वि० (सं० उर्व + उर्ध्व) ऊपर; उन्नय-वि० (सं० उन्नत>प्र.० (ण० २, १२, ४)। उग्णय) उन्नत, ऊँचा; (भ०) । उद्धय-वि० (सं० उद्धृत > उन्नयरण-पु० (सं० उन्नयन) उद्धृय) १- पवन से उड़ा की ओर उठाना या ले जाना; (जंवू० २- फैला हुआ, 'पवणुधुयउ जडाउ ११, १, ६)। रिसहहों रेहन्ति विसालउ' । सिहिहे उन्हत्त-पु० (सं० उप्णत्व) उष्णता, वलन्तहों णाई धूमाउल-जाला-मालउ', गर्मी; (सं० रा०) । अर्थात् ऋषभ जिनकी हवा में उड़ती हुई उन्हय-वि० (सं० उष्ण>प्रा० उण्ह) विशाल जटाएं ऐसी लगती थीं मानो गरम; (सं० रा०)। जलती हुई आग की धूमाकुल ज्वालमाला उन्हाला-पु० (सं० उष्णकाल) ग्रोप्म- हो,' (प० च० २, ११, ६)। ३- प्रक काल, उष्ण काल; तुल० म० उन्हाळा, म्पित; (ण० ४, ८, १३)। गु० उन्हाळो; (भ०)। उधुसिय-वि० (सं० उधुपित) उपइल- -वि० (सं० उत्पतित) ऊँचा, रोमाञ्चित, पुलकित; (जं० १०, १३, उन्नत, ऊपर का । उपइले; (रा० ३५) । ६)। उपफरति-क्रि०, व० (सं० उप+:/ उद्धयमाणु--कृ० (सं० उद्+धू>प्रा० कृ) उपकार करना, "ते गुण जाणि उप- उद्ध) (चामर) चलाते हुए, (५० च० जति जे सवहि न उपकरति' (उ० व्य० १, ७, ५)। प्र० १०-१०)। उद्यूलिउ-वि० (सं० उद्घ लिय>प्रा० उपकारिआ-वि० (सं० उपकर्त) उप- उद्धृ लिय) धूलि से लपेटा हुआ; (प० च० कारी; (उ० व्य० प्र०, १०-८) । २, १३, ५)। उन-वि० (सं०. ऊन) कन, उगार-पु० (सं० उपकार) हीन (रा०)। सहायता, अनुग्रह, आभार; (प० ० १२, ११, ४)। उनाउ-क्रि० (सं० उन्नयति) ऊपर चढ़ना, ऊपर उठना; (उ० उपजति--क्रि० (सं० उत्+पद् >सं० ४६-५)। उत्पद्यन्ते, प्रा० उत्पज्ज) उत्पन्न होना; उन्न-वि० (सं० विषण्ण) विपाद- (उ० व्य० प्र०.१०-६)। उपजु-भू० प्राप्त, खिन्न (पड्)। का०, उपजी, (की० ३, ७४)। उप्प- उन्नइउ-क्रि० भू० का० (सं० उन्नीत) ज्जिउ-भू० का० उत्पन्न हुआ, (जंवू० 'उन्नत ०७, ६, ६)। ४, ३, ३)। उन्नमियय, उन्नवियय-वि० (सं० उन्न- उपटि-पू० का० कि० उपट कर, उछल मित) उनए हुए, उन्नत किया हुआ, कर (की० ४, १७३)। बढ़ाया हुआ; (सं० रा०) । उपभोय-पुं० (सं० उपनोग) किसी . सेवा, व्य० प्र० - हुआ; (जंवू० (१२४) उप्पत्ति या गुण . वस्तुक व्यवहार का सुख; (क० ६, २२, उपित्य-वि० (दे०) कृषित; (जेकोबी १०)। द्वारा संपादित प०३०८, १७५) । उपमा-स्त्री० (० उपमा) साय, उपेल्लिम-कि० मा हो जाती थी; समानता, किसी वस्तु, व्यापार या गुण (क्री० २, १४०)। को दूसरी वस्तु, व्यापार उपेप्सह-शि० देखभाल करता है। नमान प्रकट करने की क्रिया; (प्रा० ५० (क्री०३, १३२)। २,१५३) । उप्यम-स्त्री० समा; (जन उपइम-वि० (ទី០ उत्सतित ८, २३, १७)। गया हृभा, २. उपमान-न० (सं० उपमान>प्रा. (भ०)। उवमाण) हटांत, वह वस्तु जिससे उपना उपङ्क्षिय-वि० (दे०) पंक, कीचड़ या दी जाए । उपमानुः (रा० ३६) । पंक में लिप्त; (५० १० उपमिज्जा--त्रि० (६० उपमीयते) तुलना करना; (प० ३०१, Vउप्पज-(सं० उत्+/पद्>प्राः म०)। उप्पन)उत्पन्न होना, यजना ।-इ अक० उपयाण-न० (मं. (नं० उप+दान) वाम (सं० उत्पति) (परम० १, ६८; प. (नीति), सामनेयवयायहि मग्गिय च० १,१२, ८ ०३, तंण कुमार," उसने साम, भेद द दाम से उप्यन्जति; (जं०-१, १, १०)। उप- उस कुमारी को मांगा; (वृ० ५, ३, ज्जवि-पू० का० क्रि० उम्पन्न होकर; ८)। (५० ३०६, ३,६)। उप्पज्जेसइ-मा- उपन-श्रव्य (मं. उपरि>प्रा० का उत्पन्न होग; (रि० ८, २)। उबर) ऊपर (को० २, २०५)। उपग-वि० (सं० उत्सल>प्रा उपरवद्ध-वि० (दे०) अधिक; तुल० उपन्य) उत्पन्न, उदभूत; (म०; असा गु० उपरबट; (प्रा० गु० २६,२२)। ३,३४, ५)। उपलु-वि० ० का० (० उत्सत > प्रा० अप० उम्पलु) निकला; (को०८, उलल उपमाहा--त्री (सं. ८)। साभा>प्रा० उध्यश आमा) उपसत्रो-अव्य० उपसंग, साय; (को० हुई आमा; (रि० १, १) । ४,१०३)। उपन-क्रि० नृ० उपसम-पुं० (२० उपशम) मृत्युः उत्पन्न:) उत्पन्न हुना; (महा. ६६ (की०४, १०१)। १४६; की० २, २)। उपसोहनी (सं० उपशोमा>प्रा० उप्पत्ति-स्त्री (सं० उत्पत्ति>प्रा० स्वताहा) शोभा; (५० उम्पत्ति) उत्पत्ति, जन्म, उवादन, उद- ४)। गन, प्रादुर्भाव; (ज० १, १२, १०) । का० उप्पन्नमति (१२५) उपाय . - . - % 3D उप्पन्नमति-वि० व्युत्पन्न वुद्धिवाला का० क्रि० (जं० ४, ३, १२)। उप्पा- (को० १, ६६)। यमि -क्रि०, व० (जंबू० १, १३, ८)। Vउपय-(सं० उत्+पत्) कूदना। उपायहि-भ० का० (सं० उत्पादयि- उप्पएँ वि-पू० का० क्रि० उछल कर; यति) उत्पन्न करेगा; (जंबू० ६,४, (५० व० १७, ८, ६)। १४)। उपर--अव्य (सं० उपरि>प्रा० उप्पाइय-वि० (सं० उत्पादित >प्रा० उप्परि) ऊप; (प्रा) पैं. १, १०६) । उप्पाइय) उत्पन्न किया हुआ; (जंवू० उप्परन्ते--अव्य० (सं० उपरान्त) अन- १०, १, १३)। न्नतर, पीछे, तुल० गु० उपरांत; (प० उप्पाड-पु० (सं० उत्पाट>प्रा० च० ४४, १२, ६)। उप्पाउ) उन्मूलन; (म० २, २२, ३; उप्परि-अव्य. (सं० उपरि>प्रा० प० च० ३३, ७, ३)। -ण न० (सं० उवरि) ऊपर, उर्व; (ण १,१३, उत्पाटन >प्रा० प्पाडण) उन्मूलन; १०; प० च० १, ३, ३; हे० ३३४, १; (जस० ४, २, १२) । को० २, १२३; भ०) २- वि० श्रेष्ठ । Vउप्पाड--(सं० उत+/पत् >प्रा० उम्परियां--पु० (स० उपरितन उप्पड, उप्पाड) उपाड़ना, उखेड़ना, उपरनी, ओढनी; ऊपर का वस्त्र: तुल० उन्मूलन करना ।-तु व० कृ० उखा- म० उपराणा; (ण० ३, ८, १०; जस० ड़ता हुआ; तुल० गु० उपाडवु; (प० च० २, ३२,,११)। ६, ३६) । उपाडिय-क्रि० भू० का० उप्पल-न० (सं० उत्पल>प्रा० "उप्पाडिय कुतल कुडिलवंत" --उसने उप्पल) पद्म, कमल; (ण० ३, ८, १३)। अपने धुंघराले केशों को उखाड़ डाला; -खेडि पु० (सं० उत्पलखेटी) उप्पल (क० १०, २३, ६); "णिहि दक्खाले वि खेड़ नामक नगर; (क० ६, ११, २) । मझु पई लोयण पुणु कि उप्पाडिय",- उप्पल्लाणे वि-कृ० (सं० उद्+पर्याण तूने मुझे एक निधि दिखला आंखों को क्यों उपाड़ डाला; (सुदं० ८, >उप्पल्लाण) उतर कर, 'तहिं लय- मण्डवे उप्पल्लारणे वि'; अर्थात् वहां लता ४१, १२) । वि० (सं० उत्पादित) मण्डप में उतरकर, (प. च० ५,४, उत्पन्न किया हुआ; (व० ३, १५, १०)। ५)। उप्पा.वि-पू० का० क्रि० निकालकर; उप्पलिआ-स्त्री० वणिक स्त्री, मित्तमई (प० च० ८, ६, २) । की सखी; (प० च० ४८, २१)। उत्पाडण-पु० (सं० उत्पादन) उत्पत्ति; उप्पास-पु (सं० उपाय>प्रा० (जंबु० १०, २०, ४)। उवाय) साधन; (प्रा० पं० २, १२०) । 1/उपाय--(सं० उत्+पाद्य>प्रा० Vउप्पाअ- (सं० उत् + पादय् > प्रा० उपाय, उप्पाएहि (सं० उत्पादयति) उप्पत्य) उत्पन्न करना। -इवि पू० उत्पन्न करना, बनाना ]-इ सकः (ण. कर मेरी उप्पायन (१२६) उप्फालण च० - - ३, १५,83; प० १, १४, ४) । 1/उप्पेदख-१. (सं० उत् प्र+ई > उप्पायमि (प० च० ६, ११, ३)। प्रा० उप्पेरख). संभावना करना, कल्पना उप्पायन-वि० (सं० उत्पादित >प्रा० करना । -इसक० (सुदं० ८, १५, १०)। उप्पाइय) उत्पन्न क्रिया हुआ; (जंबू० -मि० सक०, ऊपर देखना; (५०च०)। ६, १४, ३)। २. (सं० उप+ईल > प्रा० उविक्स) उपायण न० (सं० उत्पादन >प्रा० उपेक्षा करना, अनादर करना । उप्पे- पायण) उत्पादन, उपार्जन; (भ०) । क्खण-उपेक्षा करना, “पाविठ्ठजीव- /उप्पाल- (सं० उत्+प्लावय > उपेक्खएण"-जो पापी जीवों की . प्रा० उप्पाव=उड़ाना) उड़ना; उप्पा उपेक्षा करता है; (ण० ४, २, १३) । लेवि. -पू० का० क्रि०, "अक्खउ मयण उप्पेक्खिस- वि० (सं० (सं० उत्प्रेक्षित) मग्गे उप्पालेवि, बाइ खणखें सिल संभावित, विकल्पित; (दे० ना० मा० संचालवि"; (प० च० ५२, ५, ३) । १, १०६)। उप्पिंगलिआ- स्त्री० (दे०) हाथ का उम्पेत्य- वि० उन्मत्त; (ण० ८, ८, मध्य भाग; (दे० ना० मा० १, ११८)। २)। पिजल न० (दे०) १. सभाग, उप्पेल्लिय-वि० (सं० उत्प्रेरित) जो २. रज; ३. अपयश; (दे० ना० मा० प्रेरित हुए हों; (जस० ३, ३, १३) : १, १३५)। उपेहड-वि० (दे०) उद्भट, आडंबर- /उप्पिड- (सं० उन्+ पन् >प्रा० वाला; (दे० ना० मा० १, ११६) । उप्पड) कूदना ---इ अ० उछल-कूद , 1/उप्फड-(दे०) हवा में उड़ना; (क० करना; (जंवू० ५, १०, १४) । ४, २१,२)। उप्पित्य-वि० (दे०) विधुर, आकुल उफटइ-कि० (सं० उत्पाटय >प्रा० (दे० ना० मा० १, १.६)। उफ्फाल) उठना, छिटकना; उखाड़ना; उप्पीलु-पु० (दे०) १. संघात, संयोग, (की० ४, १८२) । उफरि-पू० का०. २. उत्पीड़न, दबाना; 'जहिं मणि सिला क्रि० उखाड़ कर; (को० ४, २०८)। यलुप्पीलु फुटुं'; अर्थात् जहाँ उत्पीड़न /उप्काल- (सं० आ + स्फालय से शिला-तल फूट चुके थे; (प० च० १३, अथवा उद्+ पाटय >प्रा० उत्फाल) ६, ३)। उठाना, उखेड़ना। उप्फालिवि-पू० प्पुछिय-वि० (सं० उत्प्रोञ्छित > का० कि० उछाल कर; 'हत्थे प्रा० उप्पुसिअ) प्रोञ्छित, मसृरण, (ऐसा लिवि गहइ चंड', हाथ से उछाल गाढ़ा तरल जिसमें चिकनापन और तीव्रता से ग्रहण कर लेता था; (जस लायमत हो), "उप्पुछियनिजंघजु १, ६, ५)। "-'उसकी जंघाए स्निग्ध और उप्फालण-न० (सं० उत्फालन) उछा- णः थीं; (जंवू० १०, १६,२) । लना, "जुभिरमयरकरिकरुप्फालणतसि- उम्फा- कर .
उप्फुकिआ (१२७) वानर . यतडत्यवाणरा",-उसके जल में जो ५. भीत, डरा हुआ, ६. उद्भट; ' (० मकर और हाथियों का युद्ध हो रहा है ना० मा० १, १२७) । उसके कारण हारियों द्वारा अपनी सूड़ों उबबल न० (दे०) कलुपं जल. से उछाले हुए जल से तटवर्ती मैला पानी; (दे० ना० मा० १,१११)। अस्त हो रहे हैं; (जस० ३, १, १५)। उटिववर- वि (दे०) फीका, खिन्न; उप्फुकिआ-स्त्री० (दे०) कपड़ा धोने (सं० रा०) । वाली; (दे० ना० मा० १, ११४) । उन्यूर-वि० (दे०) १. अधिक, २. पुं. उप्फुडिअ-वि० (दे०) विछाया हुआ; समूह; ३. विपमोन्नत प्रदेश; (दे० ना०- (दे० ना० मा० १, ११३) । मा० १, १२६)। उप्फुण-वि० (दे०) आपूर्ण, भरा हुआ, उभंड-न० (सं० उद्भाण्ड) कुत्सित व्याप्त; (दे० ना० मा० १, ६२) । वचन, गाली; "उन्भंडवयण" -(भ०)। उप्फुल- वि० (सं० उत्फुल्न >प्रा. उभंत-वि० (सं० उद्भ्रान्त) आकुल, उप्फुल्ल) विकसित; (जस० ४,१७, व्याकुल, खिन्न; (द० ना० मा० १, १३) । १४३; जस० ४, १७, १४) । उफोडिय-- क्रि० भू० का० (दे०) /उन्न- (सं० ऊर्ध्वय >प्रा उभ) ऊँचा करना । संवारी हुई थी; 'उस्फोडियदाढिय-वाम- -इ सक० (सं० ऊर्च- कह'--उसकी दाढ़ी खूब सुदरता से यति) तुल० प्राचीन म० उमवणे; गु. सँवारी हुई थी; (जंबू १०, १६, ६) । ज करवु (भ०; प्रा० गु० २, २, 1/उवल-(सं० उद्वलति) सांस लेना, २-) 1 -हो-क्रि० मा० सजाओ, जीना; 'आंग उबल'-अंगमुद्वलति । 'उहाँ मणि-कञ्चण-तोरणई' अर्थात् बल प्राणने ।" (उ०व्य० प्र०, ४६-७)। मणिस्वर्ग के वन्दनवार सजाओ; (५० उबरइ-कि० वचता था; 'खाणि खेदि च० १६, ३, ६)। सुन्दि घिसि मारइ जीवहु जन्तु न उब- उनवि-पू० का० कि० (सं० उत्+धु) रइ'-वहीं-वहीं खोद कर खेद कर, खूद उठाकर; (व० १, १२, १३) । उभारि- कर और पकड़ कर मनुष्य र पशुओं पू० का० कि०, उभारकर (की० २, को मारा.जाता था, कोई भी वचता न १३७) ! था, (को० ४, १३३) । उन्भउ-वि० (सं० प्रा० उभय) दोनों; उन्बस-वि० (दे०) ऊजड़; (परमा०)। (सि. १, ३६)। उन्बाहुल-पु (दे०) उत्कण्ठा; (भ०)। उम्भड- वि० (सं० उद्भट>प्रा० उन्नाहुलिय- वि० (दे०) उत्कण्ठित; उम्भड) १. भयंकर विकराल; (५० च. (भ०) । ४, ८, ५) । २. योद्धा, "ते जिणसेपिण उबिव-~-वि० (दे०) १. खिन्न, उद्विग्न; मिलिय पंच वि जण तह णिग्गंव २. शून्य, ३. कान्त, ४, प्रकट वेप वाला उमड", उसी प्रकार पांचों निग्रन्य योद्धा - .
उन्भन्ती (१२८) उन्मुभ - . भी आकर सम्मिलित हो गए; (म० २, उभासिणि-वि० (सं० उद्+भासिनी) ५, २) । ३. प्रचण्ड, महान् “पइसरइ प्रकाशित करने वाली; (ण० ११, ६, दुक्खभारुम्भडउ'--- दुःख का महान् ६)। भार आ पड़ता है; (ण. २, ४, ७)। उन्भासिय-वि० (सं० उद्भासित) प्रका- ४. अत्यंत वेगवान, फुर्तीला; (जंवू० ६, शित; (जंबू० ८, १३, २) । ७, ८)। उमासुअ-वि० (दे०) शोभा-हीन; उमन्ती--वि० १. (सं० उद्भ्रान्ता) (दे० ना० मा० १. ११०)। आकुल, व्याकुल); (प० च० २६, ५, Vउभि-(सं० उत्+धू)। -वि० पू० ७)। २. उह्यमाना (सं०/उह = का० क्रि०, ऊठा-उठाकर; 'सरलंगुलिउ- पीड़ित करना); (प० च० २६, ५, ७) भिवि जंपिएहिँ'- सरल अंगुलियों को उमम्- वि० (सं० ऊर्ध्वम्) ऊँचा; उठा-उठाकर बोलने वाले, (जंवू० १, ८, ऊपर का, ऊपर की ओर किए हुए; १२)। (भ०) । उभा-वि० ऊँचे, "पुवकारहिं उभि-कि० (सं० उद्+भृ-भरणे उभा कर करेवि', ॐचे हाथ करके to support) थामना, सहारा देना पुकार मचाने लगे; (क० ५, १५, ६) । उन्भिज्जइ "दोहिँ वि घहिँ असमु उम्भमिय- वि० (सं० उद्+भ्रमित) तोरणु उभिज्जइ", दोनों ही घरों में । उद्घान्त, व्याकुल, भ्रान्तियुक्त, (जस० अनुपम तोरण लगाए गए, (सुदं० ५, ४, १, २२, ११)। उमरिय-भू० का० कृ० (सं० उद्+ उभिण्ण- वि० (सं० उद्+भिन्न > भृत-धारण किया हुआ) भरा हुआ, प्रा० उभिण्ण, उभिन्न) रोमाञ्चित्; "उभरियसुहासुहफलगरलु"-- शुभाशुभ (५० च० १७, १६, १) । उभिन्न; कर्मफल रूपी गरल से भरा हुआ है; (भ०) । (जंबू० ३, ७, १४)। उभिय-- वि० (सं० उवित >प्रा० पुं० (सं० उद्भव >प्रा० उभिय) ऊँचां किया हुआ, ऊर्वीकृत; उभव) जन्म, उत्पत्ति, उद्गम, मूल (पं० च० १, ७, ८; जंबू० ७, २, ६; (सं० रा०; जस० ३, ५, २) । सुदं० ५, ५, ३)। उन्मविप्र-~-पू० (सं० उद्भव) उत्पत्ति, उन्भुआरण-वि० (दे०) उवलता हुआ; प्रादुर्भाव; (जंबू० ६, १२, ७)। (दे० ना० मा० १, १०५) । उन्भास-वि० (दे०) शांत, ठंडा; (दे० उन्भुग्ग-वि० (दे०) अस्थिर; (दे० १, ६६) । ना० मा० १, १०२)। उत्भाविअन० (दे०) संभोग, उन्भुन्भ वि० (सं० ऊर्ध्व ऊर्ध्व) सुरत, क्रीड़ा; (दे० ना० मा० १, उत्तरोत्तर, उत्तरोत्तर, "उन्भुन्भउ णं ' जालहिँ ११७) ।. जलइ"" उत्तरोत्तर ही ज्वाला से जन्मव- - रमण, उन्भूय (१२६) उम्मणदुम्मण . उमात- - %3- जलता है; (जस० २, १०, १४)। उमागि-उन्मार्गे; (प्रा० गु० १, ७५) । उन्भूय- वि० (सं० उद्भूत) उत्पन्न उम्मग्गे- पुं० उत्मार्ग या कुपथ में (जस० ४, १७, १४)। (को० १, ६७) । उन्भूसिउ-क्रि० भू० का० (सं० उद् उमत्त-वि० (सं० उन्मत्त) मस्त; (प्रा० भूपित) शोभायमान हुआ, "उन्भूसिउ पं० २, ६७)। काहे वि तणु विहाइ", 'किसी का उमा-स्त्री० (सं० प्रा० उमा) गौरी, भूपा (वस्त्राभूषण विलेपनादि) रहित पार्वती; (सुदं० ४, ४, ५) । शरीर ऐसा शोभायमान हो रहा था; वि० (सं० उन्मत्त.> प्रा० (जंबू० ४, १६, १३) । उम्मत) उन्मादयुक्त । उमौतउ; (रा० उन्मे- अव्य० (सं० उभतस् > प्रा० १२)। उभओ) दोनों ओर; 'उन्भे तोरण-मय- उमालिवि-पू० का० क्रि० भूतकाल के गल-गुलीउ' दोनों ओर तोरण बांधे रूप में प्रयुक्त (सं०/माल, प्रा० माल गए; (सि० २, २५, २) । =शोभना, वेप्टित होना) सुसज्जित उन्भेइ-क्रि० भू० का० (सं० ऊध्वंय> किया, 'जिण सरीरु कुसुमहिं जमालिवि' प्रा० उन्भ; उन्भेउ) उठाई, "दलउ जिनेन्द्र के पार्थिव शरीर को पुष्पों से चप्पिवि वाह उभेइ", भाट ने अपने सुमज्जित किया; (व०१९,४९, १६) । ओंठ चवाकर वाह ऊपर उठाई; (म० उमुक्क-वि० (सं० २, १५, १) । उन्भे वि-पू० का०क्रि०उठा उम्मुक्क) बंधन रहित, आजाद; (सं०- कर; (प० च० १०, १०, ६) । उन्भेखि- रा०)। पू० का० क्रि उठा कर, "मुक्कधाहमुन्भेवि उम्मंड-पु० (दे०) १- हठ; २- वि० करयले, अंसुवाह णिवडंति धरयले" वृत्त; (दे० ना० मा० १, १२४) । वे धाड़ देकर हाथ उठाकर धरातल पर उम्मग्गिम-पु. (सं० उन्मार्ग+इमन्) आंसू बहा रहे थे; (ण० ६, १८, १८)। विपप्रगमन; (प० २० ३३, ३, ६)। उभय- पुं० (सं० उभेद) उद्गम, उम्मच्छिम-वि० (दे०) १- रुष्ट; उत्पत्ति; (भ०)। २. व्याकुल; (दे० ना० उभउ-वि० (सं० प्रा० उभय) दोनों; १३७)। (सि० १, १४)। उम्मड्डा-स्त्री० (दे०) बलात्कार, उभय-वि० (सं० प्रा० उभय) युगल, दो, दोनों, (प० च० ४, ७, १०; सिः जवरदस्ती; (दे०.ना मा० १, ६७) । २, २२)। उम्मण-वि० (सं० उन्मनस्) उत्कण्ठित, उमग- पु.० (सं० उन्मार्ग > प्रा० उत्सुक; (प० ४, ८, ८)। उम्मग्ग) कुपथ, उलटा मार्ग; (जंबू० ४, उम्मणदुम्मण-वि० (सं० उन्मनस् > ११, ११, प० च० २१. ७,८)। दुर्मनस् >प्रा० उम्मण+दुम्मण) उत्क- उन्मुक्त >प्रात - मा० १, ". 14 - (-१३०) उम्माहिय च. .. तृष्णा; (दे०- ण्ठित तथा खिन्नमनस्क; . (प० २, ५७, २) । -उ वि० उन्मादित; १६, १३, १)। (सुदं० ६, ७, ७)। उम्मत्त-पुं० (दे०) १- धतूरा, वृक्ष उम्मायण-(पु.)(सं० उन्मादन) विशेप; २- एरण्ड, वृक्ष-विशेष; - (दे०. कामाधीनता, विषय में अत्यंत आसक्ति, ना० मा० १, ८६)। कामदेव के तीरों में से एक, . (प० च. उम्मत्य-वि० (दे०) अधोमुख, विप २७, ३, ६)। रीत; (दे० ना० मा० १, ६३) । उम्मालिय- वि० (सं० उन्मालित) उम्मर-पु. (दे०) देहली द्वार के सुशोभित; (भ०)।. नीचे की लकड़ी, (दे०.ना. मा० १; उम्माह-पुं० १- (सं० उन्माय - प्रा० ६५)। उम्माह) विनाश; (म० १, ४, ५)। उम्मरिस-वि० (दे०) उत्खात, उन्मू २- पुं० (सं० उत्साह >प्रा० उच्छाह) लित; (दे० ना० मा० १, १००) । उत्साह, (सुदं०.४, ३, १)। उम्मल,-वि० (दे०) स्त्यान (ढेर किया उम्माहय-पू० (सं० उन्माथ) विरहो. हुआ, गाड़ा, कोमल, ध्वनिकारक, स्नि- स्कण्ठा; (प० च० २७, १५, १)। ग्ध); (दे० ना० मा० १,६१) । वि० १- (सं० उन्माथक) विनाशक; उम्मला-स्त्री० (दे०) (भ०)। २- व्याकुल, वहु-दिवसें हिं ना० मा० १, ६४)। उम्माहय-जणणु । णिय-साउल पेक्खेंवि उम्मल्ल-पुं० (दे०) १. नृप, :, मेघ, गमण-मणुं' अर्थात् बहुत ३- बलात्कार, ४, वि० पुष्ट; (दे० ना- पिता के लिए व्याकुल अपने साले को मा० १, १३१)। जाने के लिए इच्छुक; (प० च० ६, ४, उम्मल्ला:-स्त्री० (दे०) २)। मा० मा० १, ६४)। उम्माहिय-वि० (सं० उन्माथित) /उम्मह-सं० आ+मुच्, त्याग देना, उन्मत्त, उमाहा हुआ; (सुदं० ११, ६, छोड़ देना; --इ “जो घई णिसि-भोयणु २०)। उम्महइ विमलत्तणु विमल-गोत्तु लहइ" (प० च० ३४, ८, ८)। उम्माहिम-वि० (दे०) उत्साहित; उम्माइय-वि० (सं० उन्मादित) उन्मत (जंवू० १० १६. १२)। किया हुआ; (भ०)। उम्मा हिज्जन्तय-विक वियोग में आकु- उम्माइलु-वि० (सं० उन्मीलित>प्रा० लित होना (being made to yearn in (सं० उम्मिल्लिय) खुला हुआ, विक separation); (प० च० २४, १, सित; (भ०)। १)। उम्माय-पु. (सं० उन्माद>प्रा० उम्माहिय-वि० सं० उन्माथित) उस्माय) चित्त-विभ्रम, उन्मादन; (म० विनाशित; (भ०)। दिनों के पश्चात् तृष्णा (दे०.
उम्माहिया (१६१) उम्मोहिय उम्माहिप-वि० (दे०) उत्साहित; च्छित) मूटित हो गई; (रि० ७, (जंबू० १०, १६, १२) । १२)। उन्हाविस-० (दे०) सुरत, सम्मोग, उम्मुह-वि० १. (सं० उन्मुख>प्रा मैयुन; (दै० ना० मा० १, ११७) । उम्मुह) संमुख, जल-मुख; (भ०)। 1/उम्मिल्ल-(सं० उद्+मोल >प्रा० वि० (दे०) अभिमानी; (दे० -१, जम्मिल्ल) विकसित होना, खिलना। ६६)। उम्मीलइ-अक० (२० उन्मीलति) उम्मूढय-वि० (सं० उद्+मूढ) नष्ट खोलना; (हे०३ ५४)। उम्मीलन्त-व.. मोह; (प० ० ४४, ४, ३)। कृ० विकसित होते हुए, खुलते हुए; /उम्मल-(सं० उद्+मूलय) उखे. 'सलीत-तरन्तहुँ उम्मीतन्तहुँ मुह-कम ड़ना, मूल से उखाड़ फेंकना। -मि लहुँ केइ पचाइय'; अर्थात् 'लीलापूर्वक 'लीलापूर्वक सक०, ३० (जंकू० ६, ४, ११) तंरते हुए और विकसित होते हुए मुख- उम्मूलिउ-कि.० भू० का० (सं० उन्मू- कमलों के लिए कितने ही (भौरे) दौड़े'; लित) उखाड़ लिया; (५० च० १३, (प० २० १४, ५, ६)। ४२) । उम्मूले वि-पू० का० क्रि० मूल सम्मिल्ल-वि० (सं० उन्मीलित) से उखाड़ फेंकते हुए; (५० ५० १३, ३, उदित; (प० च० ३२, ६, ६)। १०)। उम्मी-स्त्री० (सं० उमिः) लहर; उम्मूलिय-वि० (सं० उन्मूलित >प्रा० (सुदं० २, १२, ६) उम्मूलिअ) मूल से उखाड़ा हुआ, (जस० उम्मीलग-२० (सं० उम्मीलन >प्रा ४, २२, १७) उम्मिल्लण) विकात, उल्लास; (जंवू उम्मेद्वय-वि० (सं० उद्+मेण्ड= ५, २, १७)। महावत) हत्तीपक-रहित, महावत- उम्मीलिय-वि० (सं. उन्मीलित>प्रा० रहित, निरंकुश, (प० २० ८६, ५, उम्मिल्लिय, उम्मीलिय) १- विकसित, ६)। २. खुन्ना हुआ; (प० ० ६, ५, ४) । उम्मोहरिणया-वि० (सं० उन्मोहनिका) उम्मोसिय-वि० (सं० उन्मेपित >प्रा० मोहित करने वाली; (१० उम्मिसिय) विकसित, प्रफुल्ला (जंबू० ११)। १, ६, ६) उम्मोहिउ---कि० भू० का० (सं० उन्मो- उम्मुच्छिउ-पू० का० कि० (सं० उन्मू- हित) मोह से विरक्त हो गए, 'चार . छित) मूर्दा हटते ही, "उम्मुन्छिः "उम्मुन्छिः देवसंई उम्मोहिउज'; हे देव, बहुत धाहावंतु राउ" -मुन्छ हटते ही वह सुंदर जो आप स्वयं मोह से विरक्त हो राजकुमार पाड़ मार कर रोने लगा; गए; (प० ० २,१०, ४) । (जस० २, २५, ४)। उम्मोहिय-वि० (सं० उन्मोहित) जो उम्मुच्छियर--भू० का० (२० उन्मू मोहित हुआ हो, (म० ६, १६, ७)।
उलुडिअ १४)। - (१३२) उयपट्ट उयपट्ट-पुं० वस्त्र-विशेप; (सधि० ४, उरस--पु. (सं० उरस्) छाती, वक्षः ४, ७)। स्थल; (प० च० १.०, ११, ८)। उयय-पु० (सं० उदय) उदय, (काल); उरसर्प-पुं० (सं०. उरसर्प) सर्प का (ण० १, ८,८; महा० ६८, ४; सु० एक प्रकार; (व० १०, ८, १५) । ६-८) । उयरु-पु० (सि० ४, १०)। उरि--अव्य० (सं०. उपरि > 'प्रा०. उययाचल-पुं० (सं० उदयाचल) उप्परि, उवरि) ऊपर; (चं० २,. १०)। पर्वत-विशेष; (जंवू० १०, १८, उरिण-वि० (सं० उऋण) उऋण, ऋण-रहित, ऋण-मुक्त; (सि० १, उयर-न० (सं० उदर>प्रा० उअर) २६)। पेंट; (ण० ३, ५, १२)। उरिधाने-पु. एक प्रकार का चावल; उयहि-पु मुनि, आठवें वासुदेव के (को० २, २०६)। पुर्वजन्म गुरु; (प० च० २०, १७७) । उरु-वि० (सं० प्रा० उरु).. विशाल; उर-पु० न० (सं० उरस्>प्रा० उर) (जंबू० ८, १६, ८)। वक्षःस्थ न, छाती; (ण० २, ३, १७; उरुन्न उरुन्नय-वि अधिक रोए,' भ०) । पुं० (सं० पुर) नगर, शहर, रुआसे; (सं० रा०)। (ण० ३, १३, ४)। उरे उरे-अव्य० संबोधन का शव्द, उर-पु० (सं० प्रा० अरे-अरे; तुल० गु० ओरे ओरे; (प० उरअ) १- सर्प, सपि; (जस० २, ३६, च० १७,१४, २) ।। ११) । २- मुनि पिंगल की उपाधि; उल-पु० न० (सं० प्रो० (प्रा० .० २, १६०) । उरय-पु. (सं० उल.) १. वंश, कुल, जाति; २- कुटुम्ब; उरग) (प० च० १०, १२, ४) । (सि० १, २७) । -ई समूह (हे. उरगमण-पु. (सं० प्रा० उरग) उरग, ३५३, १) 1 -हँ (ण १, १२, १०)। साँप, (प० च० २१, ६, ६)। उरभुययर-पु० (सं० उर+भुज+चर) उलट्टो पलट्टी-पू० का० क्रि० सर्प या उरग जाति; (जस० ४, १६, पुलट कर; 'उलट्टो-पलट्टो कबन्धो पल- ६)। न्तो-कबन्धों को उलट-पुलट कर उरयल-पुं० उर+स्तल) खाते थे; (की० ४, २०३) । १- वक्षः स्थल; (जस० १, ६, उल्लसित>प्रा० ३)। उलसु-वि० (सं० २- हृदयतल; (व० ८, १३, ४)। उल्लसिस) प्रसन्न; (प्रा० पं० २, उरयारि-पु० (सं० उरगारि) (व० ५, ६, ३)। उलित्त-न० (दे०) ऊँचा कुआ; (दे० उररि-पु० (दे०) पशु वकरा; (दे० ना० मा० १, ८६). ना० मा० १, ८८)। उलुउंडिअ-वि० (दे०) विरेचित, दस्त उरग>प्रा० -- कुल, प्रा० उलट- (सं० उरुड़ २१३) । :
उलुखंड (१३३) उल्लव - कराया हुआ; (दे० ना. मा.० १, कने, श्वासें छोड़ने व भागने लगी, जिस ११६).। प्रकार की नव वधू भयभीत दिखाई देती उलुखंड:-पु० (दे०) अधजला काठ या है; (सुदं०६, ४, ६) । २. प्रभा फैलना, लकड़ी, जलता हुआ काठ या लकड़ी, शोभित होना; "जहिं चंदकति माणिक्क- उल्मुक (अंगारा), लूका. . जलती हुई दित्ति उल्लइ गणि" --उस उज्जयिनी लकड़ी); (दे० ना० मा० १, १०७) । नगरी में चन्द्रकान्त और माणिक्य रत्नों उलुहंत --पु० (दे०) काक, कौआ; (दे०- की प्रभा आकाश में फैल रही थी; (जस० ना० मा० १,१०६)। १, २२, १)। ३. उछलना, "पेल्लइ, 1/उलुह-(सं०/लुट् (लुठ) संश्लेपणे दलइ, मलइ, उल्ललइ महाणरु घायवे- >लुटति; लुठति, (सं० उल्लठति) वियं" -वह महाशूर वीर व्याल अपनी लुढकना, 'पाणि वरिसें विडवा. उलुह'- मार से कम्पायमान शत्र ओं को पेलता, पानीये वृष्टे विटप उल्लठति । पुट लुट दलता, मलता और उछालता था; (ण संस्ले (श्ले) पे," (उ० व्य० प्र०.५२ ४,१५,१)। २२) ।... उल्ललग-न० (सं० उत्+Vलल्> उलुहलिअ-वि० (दे०) . तृप्ति-रहित, प्रा० उल्लल्ल) उछलना-कूदना; “गयणु- (दे० ना०मा० १, ११७) । ल्ललवलण परियत्तण लंघियवारि- उलोव-पुं० (सं० उल्लोच) वितान या विन्भमो" -आकाश में उछलने-कूदने, शामियाना, चंदोआ तिरपाल; (ण० ६, परावर्तन करने तथा जल की भौंरों को २:१, ३४)। लांघने में वह कुशल हो गया; (जस० ३, उल्लंघिय-वि० (सं० "उल्लधित) २, २)। लांघा हुआ, अतिक्रमण किया हुआ; (ब० १, ६, ६) । उल्लंधिवि-पू० का० :क्रि०, उल्ललिय-क्रि०.भू० का० (सं० उल्ल- उल्लंध्य (व० २, ७, ७) । लित) विकीर्ण किया, “पवणपेल्लणुल्ल- किया 'उल्लट्ट-वि० (दे०). खाली लियभप्परं भग्गमाणविक्खित्तप्परं" -वहां हुआ; (दे० मा० ७, ८१)। पवन की प्रेरणा से चित्ताओं की भस्म उल्लल अक० (सं० उत् + लल्>प्रा० उड़ रही थी और फूटे-टूटे कपाल इधर- उल्लल=चलित होना, चञ्चल होना) । उधर विखरे दिखाई दे रहे थे; (जस० १. कांपना "तो उल्लइ चलइ १, १३, ८)। कृ०-पीटते हुए "उल्ल- खलइ तसइ ल्हसइ णीससइ लिय वइल्लु"-वैल को पणास। णिसियरवलु णिवसाहणहाँ णवंवहु. जेम (जंवू० ५, ७, १६)। ससज्झय दीस" -तव राजा के सैन्य Vउल्लव-(सं० उत्+लप्> प्रा० के समक्ष वह निशाचर की सेना ..कांपने, · उल्लव) कहना । -इ सक० (भ०) । चलने, स्खलित होने, त्रस्त होने, खिस-. -वेइ, "उल्लवेइ सिरिगोत्तमु गणहरु" - . . पीटते हुए;
उल्लस (१३४) उल्लोल. -श्री गौतम गणधर कहते हैं, (सुदं० २, ४, ११, ६)। १, ३) उल्लिय-वि० (सं० आद्रित>प्रा० उल्लस-पुं० (सं० प्रा० उल्लास, प्रा० उल्लिब) गीला किया हुआ; (जस० १, उल्लस) आनंद, हर्प; (व० ४, ३; जंवू० ६, १५, ११)। ४)। उल्लियउ-क्रि० (सं. आर्द्रय >प्रा० /उल्लस-(सं० उद+लस>प्रा० उल्ल, उल्लेइ गीना किया, 'मद्र उल्लस) उल्लसित होना, खुश होना; किया; (ण० ६, २, ५) । -इ अक० (रण० १, ७, २) । /उल्लिह-(सं० उद्+लिख्:>प्रा० उल्लसिय-वि० (सं० उल्लसित >प्रा० उल्लिह) १- रेखा करना, २ लिखना, उल्लसिस) हर्पित; (विला.) । ३- खिसना । -इ सक० लिखती है, उल्लाल-पुं० न० (सं० प्रा० उल्लाल) कुरेदती है; (सं० रा०)। छंद-विशेष; उल्लाला छंद; (प्रा० ५० १, उल्ली-स्त्री० (दे०) चूल्हा, अलाव (दे० १०५)। ना० मा० १, ८७) । उल्लालिय-वि० (सं० उन्नमित >प्रा० उल्लुक्कइ-कि० (सं० नि+ली>प्रा. उल्लालिम) केचा किया हुआ, उठाए णिलीअ, णिलुक्कु, णिलुक्कइ) णिलुक्कइ) छिप हुए; 'किय-अङ्गई उल्लालिय-खग्गई जाना; (प० च० १५, ३, ६) । अर्थात् कवच पहने और खड्ग उठाए उल्लुट-वि० (६०) (६०) असत्य, मिथ्या; हुए; (प० च० २०, ६, १) । वि०.. (दे० ना० मा० १, ८६)। उछाला हुआ, लात खाया हुआ; (जंवू ५, /उल्लुर-(सं० तुड़ का धात्वादेश) ७, २३)। तोड़ना । -इ स60 (भ०)। Vउल्लाव-(सं० उ+लप्, लापय) उल्लुव्ह-वि० (दे०) छोटा शत; १- कहना, बोलना, २- बकवाद करना, (दे० ना० मा०.१, १०५) । ३- बुलवाना, ४. बकवाद करना । - (दे.) १ आरुढ़- सक० (म०)। २. अंकुरित; (दे० ना० १, उल्लाव-पु० (सं० उल्लाय>प्रा० १००)। उल्लाव) १- उक्ति, कथन, २. संभाषण, उल्लेव-पुं० (दे०) हास्य; (दे० ना० वार्तालाप; (प० च० १३, ६, ४)। मा० १, १०२) । उल्लावरण-न० (सं० उत्+लापन उल्लेहड-वि० (द०) लम्पट, लुब्धः आलाप, संभाषण; (जंबू०. ८, ११, (दे० ना० मा० १, १०४) । १४)। उल्लोच-पुं० (दे०) चंद्रातप, चाँदनी; उल्लिच्चण-न० (सं० . उद्+रिच्> (दे० ना० मा० १, ६८) । 'प्रा० उल्लिंच-खाली करना) घटी यंत्र, डल्लोल-पु० (६०) कोलाहल; (प० २- रहर, जल उलीचने वाला; (जंबू० च० २४, २, ५)। . उल्लूट-वि० मा० उल्लोल (१३५) उवइस सल- /उल्लोल-(सं० उद् -लुल > प्रा० आग को बुझा देना; 'हउँ पुणु वरुणु उल्लोल, लेटना उछलना; "जं जलु वरुणु फलु दावमि, पई दहमुह-दवग्गि खलइ वलइ उल्लोलइ। रसणा-दामु तं उल्हावमि' मैं वरुण हूं और तुम्हें वरुण जि णं घोलइ।' अर्थात् जो जल फल दुगा, तुम्हारे दस मुखों की आग को बल हुआ करता और उछलता है वही शान्त कर दूंगा', (प० च० २०, ६, ३)। रसनादाम की तरह शोभित है, (प० ० उल्हावियउ-कि०मू० का० शांत कर दिया; १४, ३, ४)। (प० १० १७, १४, ६) -हि अक० १/उल्लोल-(दे०) माह भरना; 'मणु "आणि जुत्राणु को वि गलि लावहि उल्लोले हिँ जाइ णग्न्दिहो' (प० १० संदीवउ वम्महु उल्हावहि,” किसी जवान २६. ८, २)। को लाकर गले लगाओ, और संदीप्त मन उल्लोच-पु० (सं० प्रा० उल्लोच) को वुझाओ; (जंवू० १०, १५, ८) । १. चंद्रातप, चांदनी, २ बाच्छादन; उल्हावयरु-वि० विध्मायक, घोककर (भ०)। प्रज्वलित करने वाला, (सं० रा०)। उल्लोत्य-पुं० (सं० उल्लोच>प्रा० 1/उवअ-(1/सं० उदय) उवइ-क्रि० उल्लोय) चंद्रातप, चांदनी (वितान व० का० १. प्राप्त होना; "पक्कउ फलु मित्यर्थः) (जस० १, १६, १४) । तले निवडियउ विटें पुरण वि जेम नउ 1/उल्हद-~-सं० वि+ध्मापय;” ठंडा लन्गइ । कम्मु वि निज्जरसाडियउ पुणु करना, बाग को बुझाना। -इ सक० विन उवइ नाणे जो जगई। "अह रिउरुहिरें उल्हवइ अह पका फल नीचे गिरकर जिस प्रकार पुनः भन्ति" -या तो शत्र के रक्त से उसे डंठल में नहीं लगता, उसी प्रकार जो ठंडा कर देगा या अपने, इसमें कुछ भी कर्म निर्जरा (संचित कर्म का तप द्वारा भ्रति नहीं है; (हे० ४, १६, १)। निर्जरण या क्षय करना) द्वारा दूर कर Vउल्हस - (सं० उत्+/लत्) हुल- दिया गया हो, वह भी व्यक्ति को पुनः सना । उल्हसंत-व० कृ० तुल० राज० प्राप्त नहीं होता जो ज्ञान में अर्थात् हुलसवो; (प्रा० १० १, ७) । उल्हसिउ- ज्ञानाराधना में निरंतर जागरूक रहता भू० का० उल्लसित हुई, तुल० मगही . हैं। (जंवू० ११, ६, १०) । २ (सं० हुलसइ (भूसुकुपा, पर्यापद)। उप-+इ>प्रा० अव० लवे) समीप आता उल्हसिम-वि० (दे०) उद्भट, उद्धत; है; (को० १, २२) । (दे० ना० ना० .१, ११६) । उवइह-वि० (सं० उपदिष्ट>प्रा० Vउल्हाव-सं० वि०+मापय>प्रा० उवइट्ठ) कथित, जिते उपदेश दिया उल्हव वुझ जाना; गु० ओलवर्नु, होल- गया हो; ज्ञापित, निर्दिष्ट; (भ०) । व; -इ क्रि०,व० (प० च० २४, /उवइस-(सं० उप+दिश्>प्रा० १, ६)।-मि क्रि०, उ०पु०शांत कर देना; उवइस) उपदेश देना, दिवाना । उवए- अर्थात् अप्पणे न उवउज्ज उवण्णी समि-'मपहु न जाणइ सई. उवएसमि', (जस० ४,१४,१४)। यह नहीं जानती, अतः मैं स्वयं इसको उवगह-पुं० (सं० उपग्रह-कृपा> अनु- शिक्षा देता हूँ; (जंबू०,१०, १४, ७) । ग्रह) उपकार, "उवगह सत्ति हवंति सुप- उवउज्ज-पुं० (दे०) उपकार; - (दे०. यडइँ" --उपकार करने की शक्ति भी ना० मा० १, १०८)। उनमें स्पष्ट रुप से रहती है, (व.० १०, उवएइआ-स्त्री० (दे०.) शराब परोसने ३२, ७)। का पात्र; (दे० ना० मा० १, ११८) । उवजाइ-स्त्री० (सं० उपजाति) उप- उवएस-पु० (सं० उपदेश>प्रा० उव जाति छंद, छंद-विशेप; (प्रा० . ०.२, एस) शिक्षा, सीख, दीक्षा(भ०) । उवएसु, ११८) । (सु०.८, ८)। उवझाय-पु० (सं० उपाध्याय >प्रा० उवएसिय-वि० (सं० उपदेशित) उप उवज्झाय, उवज्झय) अध्यापक, पढ़ाने दिष्ट; (जंवू० ११, २, १०) । वाला; २- सूत्राध्यापक जैन मुनि को दी उवएसु-पु० (सं० उपदेश >प्रा० उव जाती एक पदवी, "नीलवन्न उवझाय एस) शिक्षा, वोध; (व० २, ६, १३) । सीस पाढंता पच्छिम"; (प्रा० गु० ४०, उवओगा-स्त्री० (दे०) दूतपत्नी; (प० ६)। च० ३६, ३६)। उवटि-पू० का० कि० (सं०. उद्वर्तय उवकण्ठ - वि० (सं. उपकण्ठ>प्रा० >प्रा० उव्वट) चलते-फिरते हुए; (की० उवकंठ, उवअंठ) समीप का, आसन्न २, ६४)। (भ०)। उवठवियई-क्रि० (सं० उप+स्थापय् उवकय–वि० (दे०) सज्जित, तयार; >प्रा०. उवट्ठव उपस्थित करना) (दे० ना० मा० १, ११६) । सम्पन्न की;. "उवठवियइँ भोयणभूपण उवकसिअ.---वि० (दे०). संनिहित -भोजन-भूपण आदि विधियाँ सम्पन्न २. परिसेवित, ३. सजित, ४- उत्पादित; की; (ण० ५, ८, १७) । (दे० ना० मा० १, १३८)। उडिडिम-स्त्री० (सं० डिण्डिम>प्रा० उवकिइ, उवकिदि-स्त्री०. (सं० उप डिडिम) डुगडुगी, चमड़ा मढ़ा हुआ एक कृति) उपकार; (दे० ना० मा०४, वाजा; (सि० २, २२)। ३४) । उणिय-वि०, (सं० उपनीत >प्रा० उवगय–वि० (सं०, उपगत) प्राप्त, उवणीय, ज्वणिय =समीप में "सुरकीलाथाणहो उवगयम्मि," -देवों के हुआ) लिए हुए; (ग० २, १०, ३) । क्रीडा स्थान को प्राप्त; (क. उवण्णी-क्रि० भू०, का० (सं० उप+V ज़न् >प्रा० उवजा उत्पन्न : होना) उवगरण-न० (सं० उपकरण>प्रा. उत्पन्न हुई; “सहउयरि... उवणी तुझु वगरण) साधन, सामग्री, साधक वस्तु; राय," (जस० ४, २६, १८) । .. .. - - लाया। २)। • .
उपस्थि (१३७) उवयासिउ . ЯТо उपस्थि-स्त्री० सेणापुर की एक स्त्री, "उत्यागउ भावसरुवें," उदयागत भाव स्त्री-विशेष का नाम; (प. च० ३१, (कर्मों) के अनुसार; (जंबू० ५)। १८)। उवदाण-न० (सं० उपदान) नजराना, उवहि-पु० (सं० उदयाद्रि) उदया- भेंट, (भ०)। चल, पर्वत-विशेष, जहाँ सूर्य उदित होता उवदीव-न० (दे०) द्वीपान्तर, अन्य है; (व० १, ५, ४) । द्वीप; (दे० ना० मा० १, १०६) । उबरंभा-स्त्री० विद्याधर नलकुव्वर की उवद्दव-पु. (सं० उपद्रव >प्रा० उव स्त्री०; (प० च०प १, ५७) । दव, उवद्दव) १ ऊधम, दंगा, /उवयर-(सं० उप+कृ> २. उत्पात, आकस्मिक बाधा; (भ०) । उवयर, उवयरेइ =उपकार करना)-इ 1/उवभुज-(सं० उव + भुज् >प्रा० सक० वचना- "छत्ते छायउ कि उवय- उवहुंज) उपभोग करना, कार्य में रई" -क्या छत्र से आच्छादित होकर लगना । -इ सक० (जंबू० २,१३, मृत्यु से बच सकता है; (ण ६,४, ६)।-हि (जंबू० १०, ५, ५) । २)। उपभोय-पु० (सं० उपभोग>प्रा० उवयरियउ-क्रि० भू० का० उतर पड़ा; उपभोग, उवभो । १. किसी के (ण० ५, २, २)। व्यवहार का सुख, २- व्यवहार में लाना; उवयायल-पु० (सं० उदयाचल >प्रा० (भ०)। उदयायल) उदयाचल, पर्वत-विशेष; उवम-स्त्री० (स० उपमा) समरूपता, (व० ६, ८, ८) व्यावहारिक लोकोक्ति समता, साम्य; (सं० रा०)। -- --"उवयायल-कडिणि परिट्टि ओवि रवि (उवमा) उपमा; (जस०४, १४, २) । परियरियइ तेएण तोवि" -उदयाचल उवमच्चु-पुं० पुरोहित; (प० च० की तलहटी में स्थित रहने पर भी रवि ३१, २१)। क्या तेज से घिरा हुआ (व० ६, ८, ८)। उबमिअइ-कि० (सं० उपमीयते) उपमा उवयार-पुं० १- (सं० उपकार >प्रा० देना; (हे० ४१८)। उदमिज्जइ क्रि० उवयार) भलाई, हित; (प० च० १२, उपमा देना (व० २, १६, ३)। ११, ४) । २. (सं० उपचार>प्रा० उवयंठएस-पु० (सं० उपक ठदेश) उवयार) चिकित्सा, शुश्रूपा; (भ०) । समीप प्रदेश; (जस०)। उवयारि--वि० (सं० उपकारिन् >प्रा० उवय-पुं० १, (सं० उदय) उवयारि) उपकारक; (ण० ५, ३, १)। उन्नति, उत्पत्ति (भ०) । २. (सं० उदक अ- वि० (सं० उपकारिन्) (जस० ४, >प्रा० उदग, उदय) जल, (भ० १६, ३०, ४)। ४, ५)।-आगउ (सं० उदयागत) उवयासिउ--सक०, भू० का० (प्रा० नहीं रहता ? प्रा० उवर (१३८) उवलद्ध बैं०१, अवयास आलिंगन करना) आलिंगन उबरोहिउ-पु० (सं० पुरोहित >प्रा० किया; "राहव चन्दें पुणु उवयासिउ;" पुरोहिअ) पुरोहित, "अहं तर्हि मंत्यि (प० च० ३५, २, ६) । तासु रायहीं हिउ कविलभट्टु णाम उचर--पुं० (सं० उदरम्) पेट; (सं० उवरोहिउ' -उसी नगर में कपिल भट्ट रा०; प० च० १३, ४, ५; प्रा० गु० ५, नाम के राजा का प्रिय पुरोहित रहता ६) । अच्य० (सं० उपरि>प्रा० उवरि) था; (सुदं० ११, ५, ६)। ऊपर, कर्व; (जं० ७, ३, ३६)। उवल-पु० (सं० उयल >प्रा० उवल) उवरल-वि० सं० उपरि+ल) उद्वृत्त, पापाण; (ण. ३, १६, १)। वृद्धि को प्राप्त, जोड़ वाला, "उवरल उवलंम-० (सं० उपलम्म>प्रा. अंक लेक्सि कहु आगहुँ" -जोड़ के अंक उवलंभ) १. उपलब्धि, प्राप्ति; (जं० को लिखकर लामो; (प्रा० ८, ७, १३) । २- उजालम्भ, (जं० २, ३६) १६, ६)। उबराउ-पु. कोढ़ का एक भेद; (सि० /उबलम-(सं० उप+लम्) उलाहना १, १०)। देना। -इ सक०; (जंबू० उप-अव्व० (सं. आरि>प्रा० ७)। उवरि) ऊपर, उछ; (प० च० १७, ८, Vउबलख-(मं० उप-+लक्षय >प्रा० १०) । उवरि;(ण २, १, ५; सं० रा०; उक्स) जानना, पहिचाना। ---इ, म०; प० च० २, २, ६, सु० ८, ६)। सक० (सं० उपलक्षयति>प्रा० उवल- उचरिम-वि० सं० उपरिम) पर का, क्लेइ) गु० ओळख; (भ०; प्रा० गु० ऊध-स्थित; (जंवू० ११, १२, १)। २, ४, २६)। उवलहि-उपलक्षित उरिल्ल-वि० (सं० उपरि इल्ल की हैं; (व० १०,४,४) । उबलक्खिया- (पप्ठायथ) ऊपर का; (जंवू० ११, १२, इ-क्रि० भू० का०, अवलोकन किया (जस० १, २४, ७)। -क्खिवि, पू०- उरिल्लिय-वि० (सं० उपरितन> का० क्रि० (जंवू० १०, ८, ८) । प्रा० उवरि+ल) ऊर्व स्थित, ऊपर की; उवलक्खण-न० (सं० उपलक्षण>प्रा० 'वरिल्लियर विसालए भिउडि-करा उवलक्खण) पहिचान; (भ०)। लए हेछिम दिट परज्जिय', अर्थात् भौहों उक्लविलय-दि० (सं० उपलक्षित> से विकराल ऊपर की विशाल दृष्टि से प्रा० उवल क्खिय) लक्ष्य किया हुआ, नीचे की दृष्टि पराजित हो गयी ; (प० संकेत से बताया हुभा; (भ०) । च० ४, ६, ६) उवालग-वि० (सं० उपलग्न) उत्ररोह-पुं० (सं. उपरोध>प्रा० हुया; (भ०)। उबरोह) बड़चन, वाचा; (जस० ४, उक्लद्ध-वि० (सं० उपलब>प्रा० २६, ६; भ०)। उबलह) प्राप्त; (जं० ६, १७, १५)। - लगा उवलद्धिय (१३६) उवसग जरायुज और उपलद्धिय-कि० भू० का० (सं० उपल वताए हैं। टि०-पोतज, ब्ध >प्रा० उवला) प्राप्त की, "उवल अण्डज नामक जीवों का गर्भ जन्म होता द्धिय बहुविहकयमहिमा," नाना प्रकार है। देवों और नारकियों का उपपाद की महिमा से युक्त एक जिन प्रतिमा जन्म होता है । शेप जीवों का सम्मूर्छन प्राप्त की; (क० ५, ६, २) । जन्म होता है; (व० १० १२, ४) । उवलनता, उवलयभग्गा-स्त्री० (दे०) उववास-पु० न० (सं० उपदास) उप- वलय, कंगन; (दे० ना० मा० १, वास, अनाहार; तुल० म० उपास; (ण. १२०)। ६,१७, ३३; (भ०)। उवललय-न० (दे०) सुरत, मैथुन; उववातिय-वि० (सं० उपवासित (दे० ना० मा० १,११७) । उपवास किया हुआ; (भ०) । उपदण-न० (सं० उपवन >प्रा० उव- उचिट्ठ-वि० (सं० उपविष्ट>प्रा. वण) वगीचा; (ण० १,१३, ६) । उवविठ्ठ) बैठा हुआ; (ण. २,१२, उववरण-(सं० उपपन्न) उत्पन्न; ७)। (जंतू०)। उवविस-अक० (सं० उप+विश्) उववाणु-पु० (सं० उपप्रदान =राज- बैठना । उवविठ्ठ- भू० का० बैठ गया; स्व, रिश्वत, प्रा० उव+पदाण) दाम, (दिला०) । उवविसंत-कृ० (सं० उप+ 'कि सामु भेउ कि उववयागु, कि दण्डु विश्+शतृ) (जंवू० ५, १, २१)। अदुझिव- परिपमाणु' अर्थात् क्या उवविसिवि-पू० का क्रि०, साम, दाम और भेद ? क्या दण्ड जिसका (विला०)। परिणाम अज्ञात है ? (प० च० १६, ५, उवसंतु-पु० (सं० उपशान्त) उपशांत (मोह) (गुणस्थान); (व० १०,३६, ४)। उववस–० (सं० उपवास>प्रा० उव ६)। वास) उपवास, बनाहार; (प० च० ३०, 1/उवसप्प-(सं० उप+/सृप) समीप में जाना । उवसप्पिवि-पू० का० क्रि० १०, ६) उपसिउ-वि० (सं० उपवासित).उप- पास जाकर; (विला०) । वास किये हुए; (जंबू० २, १५, ७)। /उवसंधर-(सं० उपसं+ह) उपसं- उदवाय-पुं० (सं० हार करना । -इ सक० (सं० उपसंह- उवाय), हेतु, साधन उपाय; (संधि १६, रति) (भ०) । उपसंत-वि० (सं० उपशान्त>प्रा० ५, १३) 1 २-पु० (सं० उपपाद), जन्म, जीवों की उत्पत्ति, "तिविहु जम्मु उवसंत) क्रोधादि- विकाररहित; भासिउ जिणुराएँ, गभुववाय समुच्छण (भ०) । भेए" -जिनराज से गर्भ, उपपाद और उवसग्ग-वि० (दे०) मंद, मालती; सम्मूर्छन के भेद से तीन प्रकार के जन्म (दे० ना० मा० १, ११३)। बैठ कर; उपाय>प्रा० उदमाग (१४.) स्ववियं का भाव उवणु-पुं० (. उपसर्ग>प्रा० उसनमण-पुं० (सं० उपशम मना) वसण-उपद्रव, वावा) विन; "उव. उपशान्तमन, मन में कोव सुगु विहवंतु पासिज्जई"; विघ्न के होना; (जंदू० ३, ६, १५)। उत्पन्न होते ही उसका विनाश निश्चित उक्सन-सिरि-स्त्री० (सं० उपशम: है, (म० ३, ३, १०) १२. पुं० उपवर्ग श्री) उपशमत्री, शांति के प्राचुर्य या (व्याकरण संबंधी); (३० ६, १, १४) । लालित्य; (द० २. १०, १७) । वसप्पिणि-वि० (सं० उपसपिन्) उसमहरु-२० (मं० उपशम पर समीप में जाने वाला; (म०) । स्त्री० उपशमवारी, क्रोध-रहित; (०६, १५, (सं० उत्सपिणी) कालक्र, "मरहेराव- ११)। एसु स्वसप्पिणि विहि मि पवत्तइ तह उयनिय-वि० (सं० उपशमित) उप. सबसप्पिणि," -मरत और ऐरावत दोनों सम-प्राप्त, मांति-प्राप्त; (भ०) । केन्द्रों में काल के उत्सपिणी व क्वपिनी उवसामग-न० (मं० उपशमन >प्रा. दारों का प्रवतं न होता है; (जं० ११, स्वतामण) उपशांति, उपशम; (जं? ११, ७)। ८, १०, १४)। उवसम-० (सं० चशम>प्रा० उसामित्र-वि० (८० उपशमित) स्वसम) १- इन्द्रिय-निग्रह, निवृत्ति, शांत किया हुआ उपसामिउ-मू० का, पांति क्रोध का अभाव; (म०) । मुक्ति- उपशांत हो गया; (जंतु०६, ५,११) । "व्वसम विणयहि पणिय पणयहि । Vउवसाव--(सं० उपशम्, शामय् भूमिट पुरिसो विगयामरिमो" । अर्थात >प्रा० उवसाम) क्रोध रहित होना, उपसम एवं विनय द्वारा प्रकटित प्रेम से यांत होना। -मि (जं० २,२, भूपित पुन्य कोव-रहित हो जाता है, १०); (३० ४,१३, १-२)। उवसाहिल-वि० (मं० उपसावित> 1/उबसम-(मं० उप+शमय) ऋोष प्रा० दवसायि)तैयार किया हुआ; (क० रहित होना, शांत होना; (जं० २, १८, ५, २,७)1 ४) 1 उपसमित-दुका. बत लिया उवजे-पु. (सं० उपदेश>प्रा० उव- "महदबाई को वि को अगुवयई, को वि एस) उपदेश, शिक्षा, बोध; (सि० १. सिक्खावयाई गुणबयई । को ४३) । सम्मत लएवि थिट, पर रावणु एक्कु ण उचसेर-वि० (६०) रति-योग्य; (दे० उत्समिट, अर्याद कोई महाव्रत और ना० मा० १, १०४) । कोई अगुजत ! कोई शिनावत और गुण ज्यसेवय-वि० (सं० उपसेवक) सेवा ऋत । कोई दृढ़ सन्यकल लेता हुआ देखा करने वाला; (म०)। गया, परन्तु रावण ने एक भी द्रत नहीं स्वसेदियं-वि० (सं० उप सेदित) लिया; (प० २००१८, १,६)। सेवित; (रि० १, १२)। -- वि दिदु उवसोवणि (१४१) विदवज्जा - उबसोवणि-पू० का० क्रि० मोहित कर; समुद्र, सागर, (णं१, ५, २; जंबू० ४, "सव्व जणहाँ उबसोवणि उवसोवणि देप्पिणु," १६, १३; सि० २, ५; प० च०२, १०, (प० च० २, २, ७)। ५; १३, २, ६)। उवतो:-स्त्री० (स० उपशोभा>प्रा० उपहुंजिय-वि० (सं० उपभुजित) उवसाहा) शोभा; (भ०) । उपमुक्त; (जंपू०४, ६, १२)। उसोहिय----वि० (सं० उपशोभित > उवास-पु. (सं० उपाय>प्रा० प्रा० उवसोभिय, उवसोहिय) सुशोभित; उवाय) हेतु, साधन; (म० २, १६, ५) । (भ०)। उवाउ-पु. (व० ३, १३, ५) । उवाय- Vउवहस-(सं०. उप+हस्) उपहास पु० उपाय (प० ६, १७, २०)। करना, हंसी करना। -इ सक० (सं० उवाइउ-न० (सं० उप+याच्>प्रा० उपहाति); (भ०) । उवाय मनौती करना; सं० उपयाचित उहसिउ---वि० (सं० उपहसित >प्रा० प्रा० उपयाइय-मनौती) मनोती, किसी उवह सिम) जिसका उपहास किया गया किसी काम के पूरा होने पर देवता को हो वह, उपहास करने योग्य; (जंवू० विशेष आराधना करने का मानसिक १०, ३, ११) । उवहसिय; (क० ६, ४, संकल्प, “उवाइज किज्जइ घरि जि १)। घरे"; (रि० १, ८)। उहाण-न० (सं० उपधान =धार्मिक उवास-पु० न० (सं० उपवास>प्रा० अनुष्ठान) तप-विशेष; (सधि० १६, १, उववास) उपवास, अनाहार; (प्रा० गु० १)। ३७, १)। उवहाणई-न० (सं० उपाख्यान) उपदें- उपाहि-पु० स्त्री० (सं० उपाधि) कर्म- शात्मक दृष्टांत; "जाणामि ह उवहा जनित विशेषण, "नीसेसनिरत्योवाहि गई कि तुहुँ चवहि बहुत्त , सहइ जंगमेण अजंगमुजेम वहइ," प्रत्येक उपाख्यान जानती हूँ। तू क्या बहुत शरीरी जीव सर्वथा अनात्मस्वरूप कर्म- बतलाती है; (सुदं० ८, ६, ३) । जनित शरीर से सुख-दुःखात्मक उपाधि उपहाणय-न० (सं० उपधान>प्रा. को उसी प्रकार सहन करता है, जिस उवहाण) तकिया; (प० च० २४,१, प्रकार जंगम (सजीव) बलीवादिक १०)। प्राणी अजंगम (निर्जीव) शकटादि वस्तु उवहासइ-सक० (सं० उपहसति) उप को ढोता है; (जंबू० २, १, ७)। हास करना, (भ०)। विद-पुं० (सं० उपेन्द्र) उवहासण-पु० (सं० उपहासन) उप (जस० १, ६, २०) । विंदु-पु. नारा- हास करने वाला; (जंबू० ११, १, यण, (व० ३, २६, १)। १०)। उविदषज्जा-स्त्री० (सं० उपेन्द्रवज्रा> उवहि-पु. (सं० उदधि>प्रा० उवहि) प्रा० उविदवज्जा) ग्यारह अक्षरों के पाद बहुत्त,"-मैं भी विष्णु;
उविउ (१४२) उखरिअ - ना० बैठे; (महा० वाला एक छंद; (प्रा० ५० १, ११६) । सक० (सं० उद्वल्गति) (भ०)। उविउत० (दे०) शीन, जल्दी; (दे० उच्च-वि• (दे०) १. रोग-रहित, ना० मा० १, ८६) २. गलित; (दे० मा० १. उविठ्ठ-कि० भू० का० (सं० उप+/ १२६)। विश्-वैठना) ६८,८, Vउच्वड-(सं० उत्+प> प्रा० १)। उप्पड) कूदना, ऊँचा जाना; उड़ना; Vउविड-(सं०/बिल भेदने to bre -~-इ अक० "उब्वडइ भिडइ पाडइ तुरak, वेलयति; सं० उद्विब्लति) . तोड़ना ग महि कमइ भमइ भामइ रहङ्ग" 'गोल उवेल' --गोरूपाण्युवेलयति । (प० च० २६, ६, ५)। 'उविड' -उद्विलति । बिल भेदने । Vउव्वम-सक० (सं० उद्दम् (उ० व्य० प्र०, ५२-१५) । प्रा० उव्वम) उलटी करना, “णं मेइणि उविय-वि० (सं० उपेत >प्रा० उदेय) भीए उब्वमेइ" -मानों मेदिनी भय से सहित, युक्त; (भ०)। वमन करने लगी; (क० ४,१४, ४) । 1/उदिस-(सं०/विश् प्रवेशने, सं० उन्बर-० (दे०) धर्म, ताय; (दे० उद्विशति) प्रवेश करना; 'खांत उविस' ना० मा० १,८७)। खाद्यमानमुद्रिशति। विश प्रदेशने । Vउबर-सं० उद्+वृ>प्रा० उब्बर (उ० व्य० प्र० ५२-५)। -शेप रहना, वच जाना) -इ अक० मरने से वचना, “मरणदिणे उबरई" (सं० उद्वेग) १. क्षोभ, उत्तेजना, २. कांपना, हिलना; (सं०- वचना; (महा० ६६, ६, २; ण० ६, ४, रा०)। ३) । उच्चरहि-बचेंगे; (म० १, २६, ४) । उव्वरिया-भू० का० अवशिष्ट रहे. ज्वेल-सक० (सं० विल भेदने to वत्र गए. (प० च० ५, ११,. ३)। break, वेलयति, सं० उद्वेलयति शरण में रख लिया। उन्ब रेमि-यक० तोड़ना; (उ० व्य० प्र०, ५२-१५) । उवर जाना; "सुहृदंसणु चितइ उ वरेमि उस-पुं० (सं० उद्देश) नाम-निर्देश- अभया चितइ सुंदरु धरेमि-सुदर्शन पूर्वक वस्तु-निरूपण; (रा० २७) । सोचता, मैं उवर जाया बच जाउं; उवोवरपट्ट-पु. नाटकों के उपकरण अभया सोचती, इस सुंदर को पकड़ (वस्त्र, मुकुट आदि); (ण० ६, २१) । रखू, (सुदं ८,३१, ३) । उचरिउ-कि. उन्न-क्रि० वि० (सं० पूर्व) पहले; भू० का० उवर गया. निकल गया, “जइ (सं० रा०)। कहमवि उवरिउ हउँ," (सुदं० ८, 1/उन्बग्ग-(सं० उप + वल्ग>प्रा० २४, १७)। ओवग, उव्वग्ग) आक्रमण करना । ---इ उन्यरित्र-वि० (दे०) अधिक, वचा उवेउ-पुं० उवरिआ (१४३) उदाहुल (दे० ना० मा० १, पीछे हुआ, अवशिष्ट; (प० च० ११, ५, ६)। उन्वहन्ति- १३२)। कि० व० उठाना, 'किह वाणर, गिरिवर उध्वरिमा-वि० (सं० उद्वृत्त>प्रा० उवहन्ति, अर्थात् वानर पहाड़ उठा उबरिआ) वाम भाग 'सरिस सरिसा सकते हैं ? (प० २० १, १०, ६)। पंति, उबरिआ गुरुलहु देहु समान पंक्ति उन्वहरण-न० (सं० उद्वहन>प्रा० में उद्धृत (वाम भाग) में क्रमशः गुरु उन्वहण) १. धारण, २. उत्यापन लघु देना चाहिए; (प्रा० पं० १, (म०) । ३. महान् आवेश; (दे० ना० १४)। मा० १, ११०)। उन्दरिय-वि० (दे०) गयशेप, “उव उमा-स्त्री० (दे०) धर्म, ताप; (दे०- रियपुण्णदेवीरएनु' देवी के प्रति भक्ति ना० मा० १,८७)। का पुण्य अवशेष है; (जस० ४, २०, उदास, उन्बाइम-वि० (दे०) खिन्न, १)।-य अवशिष्ट; (प० च० ४०, परिश्रान्त; (दे० ना० मा० १, १०२)। ३, १०)। उन्बाउल-५० (दे०) १. गीत, २. उप- 1/उवल-(सं० उद्+वल) वन; (दे० ना० मा० १, १३४) । लोटना । उन्दलंत-कृ० (उद्+वल स्वाह-दि० (दे०) १. विस्तीर्ण, शत); (जंबू० ४, २१, ११)। विशाल; २. दुःख रहित; (दे० ना० मा० उत्वति--स्त्री० (सं० उर्वशी>प्रा० १, १२६)। उव्वसी) एक अप्सरा; (१० ५, ६, ३)। 1/उधार-(सं० उद्+वर्तम्) त्याग वि० (सं० उद्स>प्रा० उन्दस) उजाड़; करना, छोड़ देना। उव्वारिज्जइ-सक० (क० ८, ११, ८)। (सं० उद्धार्यते) छोड़ देना; (हे० ४३८, उच्चसी-स्त्री० उर्वशी नामक चंद; १)। "सहइ छंदो इमो उकसी भासिओ"; (सुदं० ७, ७, १०)। २. 1/उ+वास- (उद्+वासय्) दूर स्त्री; (प० च०७४, ८)। करना, देश निकाला देना, उहासित Vउधह-(सं० उप-वह) करना। -इ सफ० (प्रा० पै०१, धारण १४४) । करना, उठाना। --इ सक० उद्वेलित होना, 'जाणमि करि खन्धारहणु अञ्च- उच्वाह-पु. (द०) धर्म, ताप; (दे०- न्तु होइ भय-भासुरउ । पर पहत्य ना० मा० १,८७)। मज्नु मणहों, उन्बहइ पवल्लु णाई उन्बहइ णवल्लु णाई उचाहिन-वि० (दे०) उत्साहिप-वि० (दे०) फेंका हुआ; सुरउ', अर्थात् मैं जानता हूं कि हाथी के (दे० ना० मा० १, १०६) । कंधे पर चढ़ना अत्यन्त खतरनाक होता उन्बाहुल-न० (दे०) १. उत्सुकता, है, फिर भी है प्रहस्त ! मेरा मन नए उत्कण्ठा। २. वि० अप्रीतिकर; (दे० सुरति-भाव से · उद्वेलित हो रहा है ; ना० मा० १, १३६)। रावण की विविर (१४४) वेदादियाउ % 3D उदाहलिय-वि० (दे०) उत्सुक, उत्क उन्मुण्ण- -वि० ०१. (सं. उलवण, रल्वण ण्ठित; (भ०)। =४) उद्भट, प्रबल (दे० ना० मा० उदिवविर-दि० (सं० उद्विग्न+हर) १२३) । २. (३०) उद्विग्न, उत्सित्त उहिग्न, विह्वल; "उविविन सो णि (अभिमानी, बोधी, चंचल, विकल); धुगइ अंगु-विह्वल होकर अपने अंग को (३० ना० मा० १२३)। ऐसे छटपटाने लगे; (मुदं० २, १४, उच्चअ-वि० कामोहिग्न; (जंबु० ६, ६)। ३, ६)। उबिडिम-वि० (दे०) १, अधिक उपविरु-वि० (सं० उद्विग्न+इर.) प्रमाण वाला; २. मर्यादा-रहित, निर्लज्जा उहिग्न, खिन्त्र, "उदविरु उम्मग्गें उविडिमो अविक प्रमाणो विमुक्तमर्याद घावई" -कोई उहिग्न होकर उन्मार्ग से चति व्यर्थः;" (दै० ना० मा० १, भागा; (जंवू० ६, १,१०)। १३४) । उध्वे-शि० (सं० उपति >प्रा० उवि, उम्विन्न-वि० (सं० उद्विग्न>प्रा. उवे; उवेइ निकट आना, प्राप्त होना) उविन्न) संतप्त, पीडित, शोकग्रस्त, पास आना; (को० ३, ४०) । चितितः (सं० रा०)। उत्वेअ-पु० (सं० उद्वेग>प्रा० उन्वेग) 1/अविल्ल-(स० उद्+देल) चलना, मनोवेग, चित्त की व्याकुलता; (को० ३, कांपना, फैलना, पसरना। -इ फैलना, ५६) । पसरना; (भ०)। उज्वेल्लइ-कि० व० उन्वेइय-दि० (सं० उद्वेजित) उद्विग्न, नृत्य कन्ना, नृत्य की तरह तेजी से "संसारहों उवेइयर्ड" संसार से उद्विग्न चलना; (प० २०३४, , ८) उन्वें- हो गया हूँ; (जंबु० २, १६, १०)। ल्लवि-पू० का० क्रि० घूमने के लिए; उपेक्षित> उज्वेक्खिय-वि० (सं० (प० च०६, २, ४)। उवेल्लिड-भू० का० प्रार-म किया, उप्पेक्खिय) जिसकी उपेक्षा की गई हो, 'केहि मि उन्वेल्लिर भरहुत्तन,' किसी ने तिरस्कृत; (प० च० २६, २, ४) । भरत नाट्य प्रारम्भ किया; (५० च०२, उव्वेह-वि० (सं० उद्वेष्टित >प्रा० ४,५)। उवैडिअ) उन्मुक्त, वंदन रहित किया उविश्विर--वि० (दै०) उद्विग्न; हुआ; (प० २० १८, १०, ४) । "हुमओ उाि व तासु पियाउ" (सुदं० Vउन्वेढ-(/सं० उनक वेष्ट) ११, १, १०)। १. वाँधना, २. पृथक् करना, बंदन-मुक्त उयोड-वि० (दे०) सौदा हुआ; (दे० करना। उब्वेढावियउ-सक०५० का०> ना० मा० १,१००)। वन्वन मुक्त किया, 'रणन्हें पइसन्त उन्बीरण-पुं० (दे०) विदारण, चूर्णन; वइरि वहन्ते रावणु वइरि वहन्तें रावणु उच्वेडावियउ' अर्थात् (१० च० ४७, ४, ५)। युद्धमुख में प्रवेश कर, कुश्मनों को खदेड़ उव्वेढाविय (१०५) उस्सस लपेट कर, . कर रावण को मुक्त किया,' (प० च० ना० मा० १, ११८)। २०, ७, ६) । उव्वेढिवि-पू० का० कि० उसभ-पु. प्रथम तीर्थकर; (प० च. बांध कर, (ण. ३,१७, १, ३५)। १०)। उससंतिया-वि० (सं० उत्+श्वस्) रवेढाविय--वि० (सं० उद्वेष्टित) उसांसे लेती हुई; (सं० रा.)। बंधन-मुक्त किया हुआ (freed from Vउस्सत्त-(सं० उत्+श्वस् >प्रा० siege); (प० च० २१, ७, ४) । उस्सस) उच्छ्वास लेना, सांस लेना। उच्वेहिअ-वि० (सं० उद्वेष्टित) उसइ-अक० " "उसइ करहो." करभ १. बंधन-रहित किया हुआ, २. परिवे. श्वांस लेने लगा, (सुदं० १, ३, ६) । ष्टित; (दे० ना० मा० ४, ४६) । उसह-न० (सं० औषध>प्रा० ओसह) उज्वेताल-न० (दे०) निरंतर रोदन; औषध, दवाई, भैषज; (क० ६, १०, (दे० ना० मा० १, १०१) । १२) । पु० धायईसंड अरिंजयपुर का उज्वेलरं-न० (दे०) १. ऊपर भूमि, राजा; (प० च० ५, १०६)।-सेण २. जघन (कटि देश, नितंव) स्थानीय पुं० उसह-जिन के गणधर; (प० च० केश "उन्वेलरं खिलभूमी जघनरोमाणि ४, ३५) । च;" (दे० ना० मा० १, १३६) । उसार--न० (दे०) कमल-दण्ड, विस; उद्वेल्लिम-वि० (सं० उद्वेल्लित> (दे० ना० मा० १, ६४) । प्रा० रवेल्लिअ) उद्वेलित; "तह उसास-स्त्री. (सं० उच्छ्वास >प्रा० खिल्लहि किल्लिउ उ उव्वेल्लिगयकु उस्सास) श्वास; साँस अन्दर खींचना, मरु"-उसी प्रकार गजकुमार खीलों से सांस बाहर निकालना; (सं० रा०)। कोले जाने पर भी उद्वेलित नहीं हुआ; उसिणीस-पु० (सं० उप्णीष) फेंटा, (सुदं ११, ६, १०)। साफा, पगड़ी, मुकुट, पहचान का चिह न उच्वेव-पु० (सं० उद्वेग>प्रा० उज्वेग) (प्रा० गु० १३, १३)। १. चित्त की आकुलता, २. मनोवेग; उसीसइ-पु. (सं० उच्छीर्षकम्) सिर; (भ०)। "विहि विद्धाता वसइ उसीसइ," तुल० • उत्वेविरु-वि० (सं० उद्+वेप्+इर) गु० उशीसु; (प्रा० गु० ५, ३४) । कांपता हुआ, "उव्वेविरु हिंडइ महिहे उसुभ-पुं० (दे०) दोष; (दे० ना०- दीणु" -(वह) कांपता हुआ हीन भाव से मा० १, ८६)। पृथ्वी पर भ्रमण करने. लगा; (क० ५, उसूर-पुं० (सं० उत्सूर) सायंकाल १५, २) । २. वि० (सं• उद्विग्न >प्रा० । संध्या; तुल० गु० असूर; (प्रा० गु० १६, उन्विग, उम्विग्गिर) उद्विग्न, उद्वेग करने १४)। वाला; (सुदं० ४, ३, ७)। 1/उस्सस--(सं० उत् + श्वास्) उच्छ्वास उसणसेरण-पु० (दे०) बलभद्र; (दे० लेना, ऊंचा श्वास लेना। उससंतिया- - उस्सा (१४६) ऊभव .. , निर्मल, उसाँसे लेती हुई; (सं० रा०)। उसस्से- ॐआ-स्त्री० (दे०) यूका, जू; (दे० ना०- पु० (सं० उच्छवास); (की० (की० ४, मा० १, १३६)। २०५)। ऊपास-पु० न० (सं० उपवास >प्रा० उस्सा-स्त्री० (सं० उस्रा>प्रा० उस्सा) उववास) अनाहार, वह व्रत जिसमें भोजन गैया, गौ; (दे० ना० मा० १, ८६) । छोड़ दिया जाता है; (प्रा० गु० ६, ६) । ऊखल-पु० न० (सं०. उदूखल >प्रा० उस्से-निस्से--पुं० (सं० उच्छवास- निश्वास) श्वास-प्रश्वास; (की० ४, उऊखल, उऊहल) उलुखल, ओखली; तुल० गु० उखळ; (संधि० ११,६, २०५) । ६) । उहय-वि० (सं० उभय >प्रा० उहय) ऊगट-पु० (सं० उद्वर्तन) उबटन; तुल० दोनों; (प० च० ४, ११, ६; रण० ७, गु० ऊकटो; (प्रा० गु० २२, १०) । ६, १४)।--मई वि० (सं० उभयमति दोनों प्रकार की प्रतिभा से संपन्न (काव्य- स्वच्छ; (रा०८) । ऊजल-वि० (सं० उज्ज्वल) रचना व व्याख्या करने की); (जंवू० १, ऊणदिअ-वि० (दे०) आनन्दित, २, १०)। उहर-पु० जलचर-विशेष, सुसुयार; हर्षित; (दे० ना० मा० १, .१४१) । ऊण-वि० (स० ऊन) न्यून; .हीन; (प० ५० १, २, २, ३, ५, ६) । (प० च०) । -वीसइम वि० (सं० ऊन- बहु-अव्य० (सं० प्रा० अहो) 'हे' विंशतितम) उन्नीसवां; (प० च०) । सम्बोधक शब्द; (प० च० ७, ३, ५) । ऊणय-वि० (दे०) उत्सुक; (प० च० संकेतवाचक सर्व०-वह (प० च० २६, ४५, १०, १०)। १२, ६)। ऊणुरायउ-क्रि० भू० का०, अनुरक्त हुआ; (ह.)। Vऊतर- (सं० अव+तृ>प्रा० उत्तर) उतरना, उतरना। ऊतरिअउ, -० (सं० प्रा० ऊ) अपभ्रंश वर्ण "सोइर वानाहं सवहं ऊतररिअउ' स्वर-वर्ण; जिसका (उसके वर्ण से ) सब वर्णों का . सौंदर्य उच्चारण ओष्ठ से होता है। उतर गया है, (रा०.३१) । ऊंचउ-वि० (सं० उच्च) ऊंचा; (रा. ऊपर-अव्य. (सं०. उपरि>प्रा० १२)। उप्परि, उवरि) ऊपर; (रा० .:२१) । ऊँपत्ति-स्त्री० (सं० उत्पत्ति) जन्म; ऊपरि; (रा० २६)।.: (की० ३, ११०)। ऊबाहुल-वि० (दे०).उत्कण्ठित; (प्रा० ऊमग्गे-स्त्री० (दे०) जोश; उमंग, चित्त गु० २३, ३८)। का उभाड़, (की०.४, १७७)। ऊभव-वि० (सं० ऊर्ध्व >प्रा... . उद्ध) ऊ माला का षष्ट ऊभाहउ (१४७) ऊसर उत्प- उठा हुआ, ऊँचा; खड़ा हुआ; तुल० गु० (संधि० १८, ३, ४)। उभो; (प्रा० गु० १२, ३१) । ऊमाह उ-पु० (दे०) उत्कण्ठा; (प्रा० (चं० २, १०)। वि० (सं० ऊरु-पु० (सं० प्रा० ऊरु) जंघा, जांघ; पूर्ण) गु० २३, १६)। पूर्ण; (भ०)। -व पुं० (सं० ऊमाही-वि० (दे०) (दे०) उत्कण्ठिता, ऊरु); (प० च० ५५, १, १५)। "प्रिय-ऊमाही गइ गिरिनारि"; (प्रा० गु० २३, ३६)। जन-पुं० (दे०) गति-भंग; (दे० ना०. कमितिअन० (दे०) दोनों पाश्वों में मा० १, १३६)। आघात करना; (दे० ना० मा० १, ऊवडीय-कि० भ० का० (सं० १४२)। तित) उतर पड़े, "तहों उवरि खणद्धे अम्माहियउँ-क्रि० भू० का० (सं० ऊवडीय" क्षणार्द्ध में वे उस पर्वत के उत्कण्ठितः) उत्कंठित हुआ; (प्रा० गु० ऊपर उतर पड़े; (क० ५, ४, ७)। १०,५३)। करें--पुं० (सं० उष्मन्) गर्मी, गर्माहट, ऊरं-पु० न० (सं० उरस् >प्रा० उर) ग्रीष्म ऋतु; (उ० व्य० प्र० ५१-१६) । छाती, वक्षःस्थल "किं तुरएँ ऊरं ढंकि ऊस-स्त्री० (सं० अवश्याय >प्रा० एण," --और वह तुरंग कैसा, जिसका उस्सा, ओसा) ओस; (म० १, १४, उरस्थल ढका हुआ हो, (सुदं० ११, ६, ८)। ऊसण-० (दे०) गति-भंग; (दे० ना०- कर--पु० न० (सं० अरस् >प्रा० उर) मा० १, १३६)। उरस्थल, छाती; (की० ४, ३२)। ऊसत्य-पु० (दे०) १. जम्भाई, २. पुं० (दे०) १. ग्राम, २. संघ, समूह; २. वि. आकुल; (दे० ना० मा० १, (दे० ना० मा० १, १४३) । १४३)। ऊरणी-स्त्री० (दे०) मेष, भेड़; (दे०- Vऊसर- Vऊसर-(सं०+ उत्+सृ) १. खिस- ना० मा० १, १४०) । कना, २. दूर होना; ३. त्यागना । -इ कर पूर-वि० पूर्ण रूप से भरा हुआ; अक० (सं० उत्सरति>प्रा० ऊसरइ) (को० ४, ३३)। भ०) । ऊसरि-क्रि० मा० (सं० अपसर ऊरय-वि० (सं० पूरक) पूर्ति करने =हटना) हट जाओ; "जइ वीहेहि वाला; (भ०)। मयण तो ऊसरि," -यदि डर लगता है ऊरिण-वि० (सं० उऋण) ऋण-मुक्त; तो हे मदन ! यहां से हट जाओ; (म० (प्रा०. गु० ५, ४३)। २, २२, ८)। ऊरिया-वि० स्त्री० (सं० पूरित) भरी असर-न० (सं० ऊपर). .. क्षार भूमि, हुई, पूरिता; (जंबू)। वह भूमि जिसमें रेह अधिक हो और कुछ ऊरीकय-वि० (सं० अंगीकृत) अंगीकृत; न पैदा होता हो; (जस० १, १६, २) । ८)। % 3D (१४८) (सं० मा० १, श्वास ले -वि० (दे०) मोल-भाव, --छेत्त न० (२० ऊपरक्षेत्र>प्रा० कसाप्त-पुं० (सं० उच्छ्वास >प्रा० कसर+छेत्त) क्षार-भूमि, जिसमें बीज सास) लंबी सांस, ऊपर को चढ़ती हुई नहीं पैदा होता हो; (सुदं० श्वास; (भ०)। ६)। कसिय–वि० उत्सुक>प्रा० ऊसल-वि० (दे०) पीन, पुष्ट; (दे० उसुब) उत्सुक, उत्कण्ठित; (प्रा० गु० ना० मा० १, १४०)। १४, २७)। ऊसविस-वि० (दे०) १. ऊंचा किया कभिन-न० (दे०) रोदन-विशेष, हुआ; २. उद्भ्रान्त; (दे० ना. गला बैठ जाय ऐसा रुदन, (दै० ना० १४३) । मा० १, १४२)। 1/असस--(सं० उत् + एक्स्) उच्छ्वास नुरुसुमिन-(दे०) देखो असुभित्र; लेना, ऊँचा श्वास लेना। -इ (३०६, (दे० ना० मा० १, १४२) । ६, ४) । ऊससेइ-नि०, २०, सह- उपहसित; (दे०. पाना, "तहाँ भीए' को वि ण ऊससेइ," ना० मा० १, १४०)। उसके भय से कोई ग्वास भी नहीं ले ऊहणुन० (सं० उहन) पाता; (क० २, ११, २) । तर्क-वितर्क; "किल ऊहा ते सहुँ टक्क- ऊसह-न० (सं० प्रौपष>प्रा० ओसह) एण" -उस टक्क (पंजाव देशवासी) के दवाई, भैपज; (क० ६, २३, ५)। साथ मोल-भाव किया; (क० ऊसासंत-वि० (दे०) खेद होने पर २)। शिथिल; (दे० ना० मा० १, १४१) । कहसिय वि० (सं० उपहसित) जिसका ऊसाइल-वि० (दे०) विक्षिप्त, उपहास किया गया हो वह; (दे० ना०- २. उभिप्त; (दे० ना० मा० १, १४०)। १४१) । /सार--(सं० उत् + सारय्) हटाना, दूर करना, त्यागना। -इ, सक० (सं० उत्सारयति) (भ०)। ऋ-(संऋ) -संस्कृत या नागरी ऊसार-पुं० १. (सं० उत्सार) परि वर्णमाला का स्वर । इसका उच्चारण- त्याग; (भ०) । २. पुं० (दे०) गर्त स्थान मूर्द्धा है। वैदिक ओर लीकिक विशेष; (दे० ना० मा० १, १४०) । संस्कृत में इसका स्वल्प ऊसारिय-वि० (सं० अपसारित) दूर इसका उच्चारण प्राकृतों में समाप्त हो किया हुआ; (म०)। गया। अपभ्रंश में प्राकृतों की अपेक्षा कसारिय-वि० (सं० अपसारित) दूर कुछ अधिक प्रयोग मिलते हैं। हेमचंद्र ने किया हुआ, दूर-दूर हटाया हुआ; (जंबू० तणु और तृणु, सुकिदु और सुकृदु, गृह- ७, ७, १२)1- पणइ, घृण आदि में ऋकार रखा है। प्रयोग हुआ।
ऋतु (१४६) एईदिय । अर, रि में रिण) मन करना। " ए कीतिलता में 'ऋण, शृंगार, श्रृंगाटक' ११, ५)। ६. एउ-सर्व० (सं० एतत्) और 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण' में 'ऋतु' यह; (भ०)। -जि (सं० एतदेव) यह का प्रयोग उपलब्ध है। वस्तुतः अपभ्रंश ही, (भ०) । ७. एउ-सर्व० (स० एतत्) में ' का अ, इ, उ, ए, यह; 'एउ ण जागहुँ कहि गउ सन्दणु' वयं-विकार हो गया है। आजकल लोग अर्थात् यह भी पता नहीं लगा कि रथ इसके वास्तविक उच्चारण को भूल गए कहाँ गया; (प० च० १७, ७, २; रा० है और 'रि' की तरह उच्चारण करते २६; प्रा० ५०२, १०)। 'एउ नाम जं मुणिणा लइयउ,' (जंबू० २, १३, ऋतु-पु० (स० ऋतु) मौसम; (उ० व्य० ०. १५-२४)। ए-सक० (सं० आ+इ) आना, आग- मण-न० (सं० ऋण>प्रा० ऋण, कर्ज; (फो० २, ६६)। एइ-क्रि० व० (सं० आयाति, सं० आ +इ>प्रा० ए, एह; भ० का०-एहिइ) भाना; "णवजोवणु णासइ एइ जरा,' नए यौवन का नाश होता है. और बुढ़ापा ए-पु० (सं० प्रा० ए) स्वर-वर्ण भाता है, (ण० २, ४, ५, हे० ४०६)। विशेप । इसका उच्चारण स्थान कण्ठ एज्ज-कि० माना; (प० च० ३७, १३, मोर तालु है । एन्ह--सर्व० (सं० एषाम्) उनको; एत-व० कृ० (स० आ+इ>+शतृ (उ० व्य० प्र० १६-३०) । >प्रा० ए, एंत =आना, आगमन एरंडु-पुं० (सं० एरण्ड>प्रा० एरंड) करना) आते हुए; (ण० ६, ३, ७, जस० एरण्ड का वृक्ष, वृक्ष-विशेष; सुभापित- ३,२२, ३, २२, १) । एन्तउ-कृ० "कप्पतरु तोडि एरंड से वव्वए" अर्थात् (प० च०८, ६, ७)। एन्तु-भू० का०, 'कल्पवृक्ष को तोड़कर ऐरंड को वोता है; आता, (हे० ३५१, १)। -(भावना संधि प्रकरण)। ऍअदह-वि० (सं० एकादशन् >प्रा० ए.--१. सर्व० (सं० एतत् >प्रा० एअ) एआरह) ग्यारह; (प्रा० ५० १, १६)। यह; (प्रा०प० २, ११; उ० एआईसेहि-वि० (सं० एकविंशति) १६-१८)। २. अव्य० (सं० प्रा० ए) इक्कीस; तुल० राज० अक्कीस, इक्कीस, आह्वान सूचक अव्यय, "सुसाहूण जो देइ (प्रा० पै०) । ए मच्चलोए" (भ० १२, ३, १८)। एआरह, एआरहहि, एआरहि-वि० ३. अव्य० (सं० एव) हो । सोए (रा० संख्यावाचक (सं० एकादशन्) ग्यारह; २४) । ४. एअं-सवं० यह; (प्रा० ५०)। २, ६६) । ५. एअ-सर्व० पह (क० १, एई दिय-वि० (सं० एकेन्द्रिय एक) आते हुए; व्य० प्र० (प्रा० ५० .
एई (१५०) - एक इन्द्रिय वाले जीव; (व० १०, ५, किनी (भ०) । एकल्लु; (सि० २, ६) १४)। एइ-सर्व० (सं० एते) ये, (हे०, एकवींसती-वि० (सं० एकविंशतिः) ३३०, ३)। इक्कीस; (प्रा० ५० १, १८७)। एकविसा-वि० (सं० एकोनविंशत्) एकहा-वि० (सं० एकशः) एक-एक; उन्नीस; (प्रा० ५० २, १८६) । (को० ४,८८)। एए-सर्व ० (सं० एतत् >प्रा० एअ) एकवि० (सं० एकमेव) एक ही; यह; (ण० १, १७, ४)। (सं० एते) (उ० व्य० प्र० ३७, ३०) । ये; (जंवू० १,१८, १०) । -ण वि० • (सं० एक्कंग-वि० (सं० एकाङ्ग) अकेना; एतेन) अकेला; (जंबू० ५, ५, ७) । (भ०) । न० (दे०) चंदन, सुगधि एक-वि० (सं० एक>प्रा० एक्क) काप्ठ-विशेष; (दे० ना० मा० १, (की० १, ३६; भ०)। एकु-वि० एक ४४)। (रा० २८) । एक्क, एक्का, एक्का, एक्कंत-पु० (सं० एकल >प्रा० एक्कउ, एक्के, एक्क, एक्कं; सविभक्ति- एक्कंत) निर्जन स्थान; तहिँ अंघकूम करूप एक्के, एक्केक्के, एक्केण; (प्रा०. एक्कंति ठीउ, “वहाँ एकांत में एक ५०) । -चूड पुं० विद्याधर,वंशीय अंधकूप था; (क० ७, ४, ४) । राजा; (५० च० ५, ४५) एक्कंतर-वि० (सं० एकान्तर) एक का एकक्के रंगे-पु० (सं० एकक+रङ्ग) अंतर देकर पड़ने या होने वाला; एक के एक के साथ एक का युद्ध, तुमुल युद्ध; वाद होने वाला; (भ०; क० ५, १०, २; की०४, १७८)। जंबू० ३, ६, १२)। एकञ्चोई-पुं० एक चोव पर खड़ा होने एक्क-वि० (सं० एक >प्रा० एक्क) वाला तम्बू, (को० ४, १२०) । एक, प्रथम संख्या (ण. १, १४, ६) । एकट्ट-क्रि० वि० (सं० एकत्र) एकट्ठा, -इ वि० (सं० एकाकिन्) अकेला; एक जगह; (म० २, २४, ३)। (भ०)।-सि अव्य० (सं०. एकशस् > एकत्थ---वि० (सं० एकस्थ) एक साथ; प्रा० एक्कसि) एक वार; (सुदं० ७, १३, (की० १, ६४) । ८)। -णउय वि० . (सं० एकनवत) एकलडइ-वि० (सं० एकल+डह (प्र०) ६१ वा; (प० च०)! -सीय वि० एका किन्, अकेला; तुल० गु० - एकलडे; एकलडे; (सं० एकाशीत) ८१ वां (१० च०) (संघि० १३, ५, २)। एकलडउ-वि० ोत्तरसय वि० सं० एक्कोत्तरततम एकाकी; (प्रा० गु० १, ३८)। १०१ वा (प० च०) । लो०-'एक्के-हत्वं एकल्ल-वि० (सं० एकिकन् >प्रा० एक ताल कि वज्जई' -एक हाथ से ताल. लिय) अकेला, तुल० म० एकला; (क० नहीं वजती; (सु० च०) । ७, १०, १० भ०) एक्कल्लिय-एका एक (हे० ४२२, १; सि० १, २२) । एक्कु-वि० -- एक्क (१५१) एक्करयणि - एकक-वि० (दे०) प्रेम-तत्पर; (दे० ८)। ना० मा० १, १४४)। एक्कतहे--अव्य० (सं० एकत:) १. एक एक्कइया--अव्य० (सं० एकदा) एक ओर से, एक ओर, २. एक एक करके; वार; (जस० ४,. ३०, ३)।. (प० च० १८, ४, ३)। एक्फई-वि० (सं० एकाकिन्) एकाकी, एदकत्थ-वि० (सं० एकस्थ) एकत्र; अकेला; (भ०)। (की० १, ५०)। वि० (सं० एकस्थ) एक्कओ-वि० (सं० एक+अपि >प्रा० एक व्यक्ति या स्थान पर केंद्रित, एकत्र; एक्क-+-अवि) एक भी; . (की० ३, (जपु० १०, १०, १३)। ११८)। एएफन्त- वि० (सं० एकान्त >प्रा० एक्कखंधु-पु० (सं० एक+स्कन्ध) एक्कंत) एकांत; निर्जन; (भ०) । खंड, विभाग, प्रदेश; "णहि ठिउ एक्क एक्फ:सती-वि० (सं० एकविंशत्) खंधु तिल्लोक्कु वि चउदहरज्जुमाणओ" इक्कीस; (प्रा० ५०)। एअबीसत्ता, -यह न लोक तो आकाश में चौदह रज्जु एआईसेहि; (प्रा० ३०) । प्रमाण एक स्कंध के समान स्थित है। एक्कमण-वि० (सं० एक+मनस् > टि०-इस समस्त लोक को एक महास्कंध प्रा० एक्कमण, एगमण) एकाग्रचित्त, कहा जाता है, उसके अधंभाग को जिनेन्द्र तल्लीन, एकाग्रमन; (प० च० १२, १२, देश कहते हैं, और आधे के भी आधे भाग ६)। को प्रदेश कहते हैं; (जस० ४, १२, एकमित्त-वि० (सं० एकमात्रम्) एक २)। ही, केवल एक, अकेला; "एक्कमित्तएहिं एक्कखुर-वि० (सं० एकक्षुर) एक खुर कस्स दिज्जए सुविभमम्,' (भ०) । वाला पशु; (सींग वाले चौपायों के पर एक्कमुह-वि० (दे०) १. धर्म-रहित, का निचला भाग जो बीच २. दरिद्र, ३. प्रिय, इण्ट; (दे० ना०- होता है); (जवू० ४, १६, ७)। मा० १, १४८) । एक्कपरिल्ल-पु. (दे०) देवर, पति एक्कमेक्क-वि० (सं० एकमेएक >प्रा० का छोटा भाई; (दे० ना. मा० १, एक्केक्कम) १. परस्पर, अन्योन्य; तुल• १४६)। गु० एकमेक; (प० च० १७, १४,१; एक्कचित्त-पु. (सं० एक+चित्त). जंबू० १, ६, २) । २. वि० प्रत्येक एकाग्र चित्त; एक्क चित्त जइ सेविअइ एकक; (जस० ३, २, २०) । धुअ होसई परकार' (की० ३, ६२) । एक्क-यल-स्त्री० एक-कला, (प० च० एक्कठाण-० (सं० एक स्थान) एक १४, ११, ६)। स्थान; (जस० ३, ३०, १६)! एक्कया--अव्य० . (सं० एकदा) . एक एकत्त-क्रि० वि० (सं० एकन) एक बार; (व० ३, ६, ४)। ठा, एक जगह;. (जंवू० ११, १२, एक्करयणि-स्त्री० (सं० एक+अरनि) में से फटा .. ..
एककल्लं (१५२) एग - एक अरलि प्रमाण, मीमांसा शास्त्र के २, १५, १४)। अनुसार एक माप । विशेप-इससे प्राचीन एक्का-वि० (सं० एक>प्रा० एक्क) काल में यज्ञ की वैदि आदि मापी जाती एक; (को० ३, २५)। । -उय वि० थी। यह माप कुहनी से कनिष्ठा के सिरे (सं० एकनवत्) ६१ वा; (प० च०) । तक होती है; (व० १०, २०, ६)। -सीय वि० (सं० एकाशीत) ८१ वां (प० एवकल्ल-वि० अकेला; (जवू० ५, ८, च०)। १७)।-उ अकेला; (जंबू० ९, १०, एक्कासिय-वि० (सं० एकाधित) एक. १६) । -वीर वि० अकेला बहादुर पक्षीय; (सुदं० ५, १, ११)। जिसकी कोई सहायता न कर रहा हो; एक्कूणासी-वि० (सं० एकोननवति) तुल० गु० एकलवीर; (प० च० ५५, नवासी; (महा०)। एक्केक्क-वि० (सं० एकक>प्रा० एक्कल्लय-वि० (सं० एकल >प्रा० एक्कक्क) हर एक, प्रत्येक; (प० च. एक्कल्ल) अकेला, एकाकी; तुल० गु० १७, १४, १)। -म वि० परस्पर, एकलु, एकली; (प० च० १७, १४, अन्योन्य; (दे० ना० मा० १, १४५) । १)। एक्केक्कमेक-वि० (दे०) परस्पर; एक्कवयकपण-पु० (सं० एक+पद+ (जंबू० ६, ४, ६)। कर्ण) एक चरण व एक कान वाली एक्को-वि० (सं० एक>प्रा० एक्क) जाति; (जंबू० ६, १६, ६) । एक; (जंवू० ५, १; सि० २, १०)। एक्कवार-~अय० (सं० एकवार >प्रा० एवकोयरु-पू० (सं० एकोदर) एक एक्कवार, एगवार) एक बार या समय; उदर से उत्पन्न, सहोदर; (रि० ७, तुल० गु० एकवार; (प० ३० १८,८, एक्कोवर; (प० च० ३१, १, ६; भ०)। ३)। एक्कवीसम-वि० (सं० एकविंशतिम्) एग-वि० सं० एक>प्रा. एग) एक; इक्कीस, बीस से एक अधिक; (ण०८, (सं० रा०)। कण्ण पुं० राजा-विशेष . . ८, ६) का नाम, लंपाग देश का राजा; (प० च० ... एक्कसाहिल-वि० (दे०) एक स्थान में १८, ५६) |-चूड पुं० (सं० एक- रहने वाला; (दे० ना० मा० १, १४६)। चूड) विद्याधर वंश का एक राजा; (प० एक्कसिवलो-स्त्री० (दे०) शाल्मली च०)।---ट्ठं अन्य० (सं० एकत्र) पुष्यों और नूतन फलों से एक स्थान में; (प० च०)। -पन्नास ना० मा० १, १४६)। वि० (सं० एकपञ्चाशद) पचास और एक्कसि-वि० (सं० एकशः) एक एक -पन्नासईम वि० (सं० एक करके, अकेले; (प० च० २, १४, १)। -पञ्चाशतम्) ५१ वा; (प० च०)। अव्य० (सं० .एकदा) एक वार; (जंवू० -वीसइम वि० (सं० एकविंशतितम्) । - युक्त; (दे० एक।
एगारह (१५३) एत्त्यन्तरि एगचत्ताल-वि० इक्कीसवा; (प० च०)।- वि० (सुदं०७, ४, ८) । २. (२० एत्तावति) (सं० एकपट) ६१ वा; (प० ३०)। इस, "एत्तहिं महुमानहो बागमणु (म -सत्तर वि० (सं० एकसप्तत) ७१ वा; ८,८, ६)। ३. यहां; (म० २, २, १)। (प० च०)। -दिसुत्तरतय वि० (सं० एत्तहि -अव्य० (सं० इतस्) यहाँ से; एकादशोत्तरशततम) १११ वां; (प० (जं० ३, १०, ४) १२. इवर; (जं. च०)। एगुणचालीस-वि० (सं० एकोन- ४, ३, १) । चत्वारियात्) उनतालीस । एगुणवीस- एत्तहे-अव्य० (सं० अत्र>प्रा० इतहे, वि० (सं० एकोनविंशति) उन्नीत । एत्तहे) इधर; यहां पर, (सुदं० एगारह एगारहि, एग्गाह, एगाराहा- १०) । एत्तहें (प० २०८, ११, ३; है। वि० (नं० एकादशन् >प्रा० एक्करह) ४३६, १)। ग्यारह; -तुल० ग्यास, गु० एत्ता-वि० (सं० एतावत्>अप० एत्तए अग्यार, (प्रा० ५० १, २१)। >अव० एत्ता) इतना; (को० ३, (सं० एकचत्वा- रिया) उनचालीसवां, (प० ३०)। एत्तिअ-वि० (२० इयत्, एतावत्) एमविश-वि० (सं० अपगुण-विशति इतना; (जंबू० ८, ६, ४; क० ४, १७, (पिशेल का प्राकृत व्याकरण, ४४४) । ७; जस०)। उन्नीस। एत्तिउ-अव्य० (सं० इयत्) इतना; एण-सर्व० (सं० एतेन) इसके द्वारा; (हे०, ३४१)। (जं० २, ४, ५)। एनिय-वि० (सं० इयत् एतात) एणुवातिन-पु० (दे०) मेंडक; (३० १. इतना; तुल०म० इत; (प० ३. ना० मा० १,१४५) । ५, ६, २)। २. इस, (प० २० १२, ७, एहि-अव्य० (सं० इदानीम् >प्रा० ३)। एहि) अधुना, संप्रति; (सुदं० ११, १८, एत्तिएँ-अन्य० बक, इस समय, इस ६)। विषय में, जमी, अब भी; (प० १० १०, एत-वि० (सं० इयता) इतना; (उ० १, ५)। व्य० प्र० २३-१६)। एत्तल-वि० (२० एतावत् >प्रा० एत्त-वि० (सं० इयर) इतना; (५० एत्तिल) इतना; (हे० प्रा० ४, ४०८)। च०३६, ५, २)। एत्ते-वि० (सं० एतावर) एत्तडय-वि० (सं० एतावद) 'इतना; (को० १, ४५)। (५० च० १०, १०, जंबू०७, ७, एत्तोन-अव्य० (दे०) यहां से लेकर; ५) । एत्तडिय; (प० १० (दे० ना० मा० १, १४४) । ७)। एत्यन्तरि-अव्य (सं. बत्रान्तरे) इस एत्तहि-अव्य० (सं० इतस्) १. धर; बीच में; (भ०)। इतने;
एत्यंतर (१५४) एयारसंग अन्तर>प्रा. . एत्वंतर--अव्य० (सं० अन्नान्तर) इसी धागे को फेंक दिया जाता हैं; (दे० ना० वीच; (जंबू० २, ५, ११)। एत्यंतरि; मा० १, १४५)। (विला०; २० ३, १६, ६)। एमेव-अव्य० (सं० एवमेव >प्रा० एत्य--अव्य० (सं० अन >प्रा० एत्य) एमेव, एमेअ) इसी तरह, इसी प्रकार; यहाँ, यहां पर; (जस०३, १५, ५)। (भ०) । एत्यि-अव्य० यहां; (प्रा० पैं० २, १४४)। एम्बइ-अव्य० (मं० एवमेव) इसी तरह, एत्यु; (ण० १, १३, ३, जस० १, ११, इस प्रकार; (हे० ४२०) । टि०सं० एक- ७)। -त्यि (सं० अन्न + अस्ति); (क० मेव को अपभ्रंश में एम्बइ आदेश होता है। १, ३, ५)। एम्दह-अव्य० --अव्य० (स० इदानीम् को एत्थु-अव्य० (सं० अत्र>प्रा० एत्थ) एम्बहि आदेश होता एम्बहिं आदेश होता है) इस समय; (हे. यहाँ; (५० च० १६, ८, ८) । ४२०, २)। एथु-अव्य० (सं० उत्र>प्रा० एथ) एयं-सर्व० (सं० एतत्) यह; (जंबू० यहाँ, यहाँ पर (रा० १५)। ४, १८, ४)। एय-सर्व० यह; (सं० एथ्यातर-क्रि० वि० (सं० अत्र>अप० रा०)। एत्थ, अव० एथ्य+सं० एयंतन-पुं० (सं० एकान्त+नय) अंतर) इसके बाद; (को० ३, ४७) । इस सांख्यमत, "अह एयंतनएण अवद्धउ, बीच में; (को० ३, ४५)। अच्छउ परएं जीउ सुविसुद्धउ" एकांतनय एम-अव्य० (सं० एवं>अप० एम) (सांख्यमत) से जीव अवद्ध है. और पूर्णतः ऐसा; (की० ४, २५२)। विशुद्ध रहता है; (जंवू १०, ५, १)। एम-अव्य० (सं० एवम् >प्रा०एम) एय-(सं० एक>प्रा० एक्क) एक; १, इस तरह, ऐसा; (ण० १, ३, १२) । (०)। २. इस प्रकार "एम भणह मुणह छप्पअ एयचक्क -पुं० (सं० एकचक्र) नगर- इस प्रकार छप्पय में छः चरणों विशेष; (सुदं० ६, ३, ८)। को समझो; (प्रा० ५० १, १०५); एयमण-पुं० (सं० एकमनस्) एकाग्र "एम पेप्सिम दूर दारपोल" -इस मन; (क० ५, २, १०)। प्रकार राजद्वार दूर से दिखाई पड़ता था, एयहों-सर्व० (सं० एतस्य) इसी की, (को० २, २४८) । -ई अव्य० (सं० "एयहाँ पियहाँ विणयगुणधामहो" एवमेव) ऐसा ही; (जंबू० २, १८, १६) । (जंवू० ४, १,८)। -हि अव्य० इस समय, अब; (भ०; एयार-सर्व (सं० एता:, स्त्रीडिंग जंबू० ८, १०, ७)। प्रथम पुरुप, व० व०) ये; (जं० ४, एमिणिआ-स्त्री० (दे०) वह स्त्री, १२, ७)। जिसके शरीर को, किसी देश की प्रथा के एयारसंग-० (सं० एकादश+अङ्ग) अनुसार, सूत के धागे से माप कर, उस ग्यारह अंग, "अह सवणसंघसंजुउ - पवरु पअ एयारस (१५५) एवर पं० १, एयारसंगधरु विज्जुबरु । विहरंतु तभेण ११, ११,७)। विराइयउ पुरि ताम लत्ति संपाइयउ।" एरावइ-पु. ऐरापति; छंद शास्त्र में इसके अनंतर ग्यारह अंगों के धारी, एवं आरि लघु पंचकल, (आदि लघु पंचकल तप से सुशोभित श्रेठ विद्युच्च र महामुनि के नाम सुनरेंद्र, अहित कुंजर, गज- विहार करते हुए अपने श्रमसंघ सहित वर, दंत, दंती, मेघ, ऐरावत, तारापति, ताम्रलिप्ति नामक नगर में आए; (जंबू० गगन, झम्प, लंप; (प्रा० १०, २४, १३)। २८)। एयारस-वि० (सं० एकादशन्) ग्यारह एरावण-पु. १. देवेन्द्र का हाथी; (प० (क० १०, १६, ६)। च० २, ३८) । २. विद्याधर इंद का एयारसमो-वि० (सं० एकादशम्) ग्या हाथो; (प० च० ७, १०) । रहवीं !"... " एयारसमो संधि समत्तो;" एरिस-वि० (सं० ईदृश>प्रा० एरिस) (जंवू० ११, १५)। ऐसा; (प्रा० ५० १, १६४)। २. इस एयारति-स्त्री० (सं० एकादशी) तिथि प्रकार; (सं० रा०)। -हि (प्रा० ५० विशेष, प्रत्येक चांद्र मास के शुक्ल और २, १७०) एरिसि; (प्रा० ५०१, १६४)। कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि; (क० तिथि; (क० एरिसिअं; (प्रा० ३० २, १५४) । १०, १६, ६)। एल-वि० (दे०) कुशल) निपुण; (देल- एयारह-वि० (सं० एकादशन्) प्रा० ना० मा० १, १४४) । एक्कारह) ग्यारह; (ण० १, १२, ६)। एलविल-वि० (दे०) १. धनी, २. पुं० --म वि० (सं० एकादशम्) ग्यारहवां; वैल; (दे० ना० मा० १, १४८) । (भ०) । एला-स्त्री० (सं० प्रा० एला) एला- एयारहमि.-वि० (सं० एकादशम्) ग्या- यची का पेड तथा इसका फल (भ०; रहवें; (क० १०, १६, ६)। 'एयारहि विला०) । दिणि वहु फल-फलीय,' (सि० १, १७) । एल्ल-वि० (दे०) दरिद्र; (दे० ना० एयारहमें-वि० (सं० एकादशम्) ग्या मा० १, १७४)। रहवें, (जंबू० १, १८, १५)। -इ वि० एव-अव्य० (सं० प्रा० एव) हो; (व० ग्यारहवें (जस० ४, ६, १०)। १, १५, ५) । २. इस प्रकार (को० ३, एयारिस-वि० (सं० एतादृश) ऐसा; १०३)। -ञ्च अव्य० इस प्रकार (जस०)। (को० ४, १३४)1-विह वि० (मं. एराणी-स्त्री० (दे०) इंद्राणी, इंद्राणी एवम् + विध) इस प्रकार; (क० २, १२, व्रत का सेवन करने वाली स्त्री; (दे० ७)। १, १४७)। एवड-वि० (सं० ऐतावत् ) इतना: एराषम-पु. (सं० ऐरावत) जंबूद्वीप तुल० गु० एवडे; (प्रा० के अन्तर्गत ऐरावत नामक क्षेत्र; (जं० १३; सुदं०८, ३६, ४)। - (१५६) अव्य० - रीति से, एक-दि० (सं० एतावत) इतना है. ३३२, १; ५० च० १६, ७,५; अधिक, तुल० म० एवडा; (२०५०३४, प्रा०प० १,१६, क.० १, ११, ३)। ३, ६) वि० (मं० इंडक) ऐसा, इनके जैसा; एक्माई वि० (० एवमादि>प्रा. (भ०)। एह-० यह (रा. एकमाइ, एमाइ) इत्यादि, वगैरह; ३६)। एहत्तरि-वि० (सं० एकसप्तति) इकह- . एवहि-अव्य (० इदानीम्) इस तर, स्त्री० संत्र्या-विशेष } तुल० राजा नमय; (न० २, ५५, १०)। इगत्तर; (घा० ५० १, ११३) । एहत- (सं० एवम्) इस तरह, इस रिहि; (प्रा० पं०)। इस प्रकार; (क० १,१०,१०) । एहि-(वै० सं० एमिः) इन, (को० २, एवहि-अव्य० (२० इदानीम्) इस १६); इससे (प्रा०५० १,१२४)। एही- समय; (५० १० १, १२, ७)। एबहि यही (को० २, २४१)। एहे सर्व० (भ०)। एवहि-अव्य० इस समय (जंबु. तृतीया एक व० (सं० एतेन>प्रा० ३, १३, ७) । एबहि-अय० अधुना एहण) इसके द्वारा। इस समय; (बई)। एसी.-सर्व० (सं० एपा) यह, “नयु एवाप-अव्यः (दे०) यों, (की० २, एही का कहि कासु कः" -म ना कहो २४७) । तो नही यह कन्या कौन है और किसकी एवि-मत्रः (मं० एतद) यह "जनु पलइ पुत्री है; (ज० १, १५, ४)। का अहद विक । चमत वेवि एक-सर्व (मं० एप:) १. यही, (दे० महुभार एव" -जिस छंद में (प्रत्येक सार दो०; जं. ३,१०,२) १२. व्हा वरण) में दो बातुर्मात्रिक पड़े तथा यंत (मा० पै० १,३०, की० २. २३७) । में चतुर्माधिक गप्न जगण हो, यह मधु- भार छंद है; (प्रा० ५० १, १७५)। २. (सं० आगन्य) पू० काकि०,नाकर; ऐ-इसका उच्चारण कण्ट और तालु से (जं० ७, ८,३)। होता है । महाभाष्यकार ने इस सन्ध्यवर एस-सर्व (मं. एपः) यह; (जंबू (अए) बताया है। प्राकृत १,१३, ५) ! एपा-सर्व० (सं० एपा ह्रस्वीकरण की प्रवृत्ति के कारण ऐ> स्त्रीलिंग) यह; (प्रा०६० २,६६० मए>अइ उचारण होने लगा। 'कीति- २, २,१२)। लता, में 'एं के प्रयोग-सो, देव, पे, एसो-म० (२० एपः) यह; (प्रा० पैकि, परि और लं' तया उक्ति व्यक्ति पं० २,८४) २. अव्य० इस प्रकरण में कसहि उपलब्ध है। (को० ४,१०२। ऐतो-नि० वि० इस प्रकार; (डॉ० एह-सत्र (सं० एपः) यह; (सं० रा०; वासुदेवधारण अग्रवाल ऐ काल में प्रकार द्वारा संपादित ओ (१५७) ओआवल - मा० कीर्तिलता, ४, १०२) । वि० (सं० ओअरवि--पू० का क्रि० उतरकर; ईदृश) ऐसा; (डॉ० शिवप्रसाद सिंह द्वारा 'ताहिं गयणहों भोअरेंवि अञ्जणहें संपादित कीतिलता ४, १०५) । वसन्तमाल मिलिय' अर्थात् इतने में आकाश से उतरकर वसन्तमाला अंजना से मिलती है। (प० च० १६, ८, प्रो १०) प्रो-पु० १. (सं० प्रा० ओ) स्वर ओअरिय-वि० (सं० अवतीर्ण>प्रा० वर्ण-विशेप; इसका उच्चारण ओठ ओअरिअ) उतरा हुआ; (प० च० १६, और कंठ से होता है । २. सर्व० (स २, १०)। एतत्) यह; (प्रा. पं० १, ७६)। ओसल्ल-० (दे०) १. कम्प, कांपना; ३. वह; "ओ परमेसर सेहर सोहइ"-वह (दे० ना० १, १६५; पड्)। (चंद्रमा) शिव के मस्तक पर सुशोभित २. खराव आचरण । ३. गोओं का होता है , (को० १, २५) । वाड़ा । ४. वि० प्रक्षिप्त । ५. लटकता ओंडल-न० (दे०) केश-गुम्फ; केश हुआ; (दे० ना० मा० १, १६५) । रचना; (दे० ना० मा० १, १५०) । प्रोग्रल्लअ-वि० (दे०) १. जिसे चाही प्रोनक-पु० (दे०) गजित, गर्जना; हुई वस्तु न मिले; २. जिसे धोखा दिया (दे० ना० मा०; १, १५४) । गया हो; (पड्०)। ओअ-न० (दे०) वार्ता, कथा, कहानी; श्रोग्राअ-पु० (दे०) १. ग्रामाधीश, (दे० ना० मा० १. १४६) । गांव का स्वामी; २. आदेश; ३. हस्ती ओअक्ख-सक० सं० दृश् देखना। -इ आदि को पकड़ने का गड्ढा; ४.वि० (पड़)। (दे० ना० मा० १, ओअग्गिन-वि० (दे०) १. अभिभूत १६६)। (१. पराजित, २. पीड़ित, ३. वशीभूत, ओमाअव-पु० (दे०) अस्त-समय; ४. चकित), २. न० केश आदि को एक (दे० ना० मा० १, १६२) । त्रित करना "ओअग्गिअं अभिभूतं केशा प्रो आइय-क्रि० भू० का० (सं० आ+- दीनां पूजीकरणं च," (दे० ना० मा० -आना, करना) वापिस १, १७२)। आए; (को० ३, ४४)। ओअघिअ-वि० (दे०) घ्रात, सूंघा ओआरा पार-अव्य० (दे०) वार-पार, हुआ; (दे० ना० मा० १, १६२) । इस तरफ से उस तरफ तक; (की० ४, ओअम्मअ-वि० (दे०) अभिभूत परा १८०)। प्रोल-पुं० (दे०) छोटा प्रवाह; (दे० 1/ओअर-सक० (सं० अव+.>प्रा० ना० मा० १, १६१)। ओभर) जन्म-ग्रहण करना, नीचे उतरना। ओमावल-पु० (दे०) सुबह का सूर्य- छीना हुआ; या आगमन भूत; (पड्)।
ओइणी (१५८) ओच्छिा . छोटा प्रवाह; लटकता ताप; (दे० ना० मा० १, १६१) । शिथिल; (दे० ना० मा० १, १३०) । ओइणी-पु० कीतिसिंह का राजवंश, ओख-पुं० (सं० ओष = जलन) दाह; वंश-विशेष, (की० १, ४६)। (रा० ७) । ओइष्ण-वि० (सं० अवतीर्ण>प्रा० ओग्गर-पु० (सं० ओगर) एक प्रकार ओइण्ण) अवतीर्ण, उतरा हुआ; (जस० का चावल; धान्य-विशेप; (प्रा० पं० २, ४, १७, १२)। ६३)। ओइत्त, ओइत्तए-न० (द०) परिधान, ओग्गाल-पु० (दे०) वस्त्र; (दे० ना० मा० १, १६५) । (दे० ना० मा० १, १५१)। ओइल्ल-वि० (दे०) आरूढ; (दे०- ओरिगल-वि० (दे०) अभिभूत, परा- ना० मा० १, १५८)। भूत; (दे० ना० मा० १, १५८) । ओल्लिय-वि० (दे०) पुरस्कृत, आगे ओरतील -पु० (दे०) हिम, बर्फ; (दे०- किया हुआ; (पड्)। ना० मा० १, १४६)। औऊल-न० (सं० अवचूल) मोबउ-१० (दे०) उपकरण-विशेष; हुआ वस्त्राञ्चल; (प० च०)। गु० ओघो (जैन० परि०) (संवि० ११, ओए.--सर्व० (सं० एते) वे; (प० चः ३, ६) । ३८, ७, ८) । Vओचुंब-(सं० अव+चुम्ब>प्रा. ओकरा-सर्व० (दे०)उस, 'ओकरा काजरा ओचुब) चुवन करना । ओचुम्बइ-कि० चाँद कलंक', उस धुएँ के .काजल के (सं० अवचुम्वति); (भ०) । कारण ही चंद्रमा में कलंक है; (को० २, प्रोचुल्ल-न० (दे०) प्रोचुल्लन० (दे०) चुल्हे का एक १३१)। भाग; (दे० ना० मा० १, १५३)। ओक्कंदी-स्त्री० (दे०) कूपतुला; (दे०. ओच्चेल्लर-न० (दे०) ऊपर-भूमि, ना० मा० १, ८७) । जधन (१- पेड़ २- चूतड) के रोम ओकणी-स्त्री० (द०) यूका, जू; (दे०. (रोआँ); (दे० ना० मा० १, १३६) । ना० मा० १, १५६)। ओच्छंदिन-वि० (दे०) ओविकसन० (दे०) १- वमन, उल्टी; १- अपहृत, २- निवास, अवस्थान (जगह); (दे०. २- पीड़ित, (पड्)। ना० मा० १, १५१) ओच्छत्त-न० (दे०) दंत-धवन, दत- प्रोक्खंडिल-वि० (दे०) आक्रान्त; (दे०. वन; (दे० ना० मा० १, १५२) । . ना० मा० १, ११२)। /ोच्छाय-(सं० अव+ . छादय) ओक्खली-स्त्री० (दे०) थाली, पान- आच्छादन करना। औच्छाइवि-पू० का० विशेष; (दे० ना० मा० १, १७४) । क्रि० (सं० अवच्छाद्य); (भ०) । ओविखण्ण-वि० (दे०) १- अवकीर्ण; ओच्छिअन० (दे०) केश-विवरण; २- खण्डित, ३- ढका हुआ; ४- पार्श्व में (दे० ना० मा० १, १५०) ।
ओछप्पिणी (१५६) ओटण . ० पं. १, ० ओछप्पिणी-स्त्री० (सं० उत्स पैणी) उवज्झाय, उवज्झाय> उअज्झा> काल-चक्र; (जं० ३, १, १०)। ओझापंडित; (को० २, १९६; उ० भोज्जर-वि० (दे०) भीरु, डरपोक; व्य० प्र० १३-२८)। ओंमाउलु -पु. (सं० उपाध्यायगृहम्) ओज्जल्ल-वि० (दे०) बलवान्, प्रबल; पंडित का घर; (उ० व्य०प्र० २२-२)। (दे० ना० मा० १, १५४)। प्रो- (सं० ओष्ठ>प्रा० ओज्जा-पु० (सं. ऊर्जा) ओज, ओट्ठ) ओठ; (प्रा० पै० २, "पक्खि समूहह ओज्जाहारो"---पक्षी जस० ३,६,१६) । ओठई (रा० ३५) । समूहों का ऊर्जा अथवा ओज का आहार ओद्धय-वि० (सं० ओष्ठ + आबद्ध) होता है, (व० १०, ३५, ३) । नियन्त्रित; (प० च० ४६, ११, १०)। ओज्जाअ-पु (दे.) गजित, गर्जारव; ओडु-स्त्री० (दे०) अंट, आड; (रा० (दे० ना० मा० १, १५४) । ३३)। ओझ-वि० (दे०) मला, अस्व न्छ; ओं ड्ड-पु. (सं० ओड>प्रा० ओड्ड) (दे० ना० मा० १, १४८) । ओड्र देश का राजा; (प्रा० ओझर (to निर्झर>प्रा० १२६) । ओड्डा; (प्रा० ५० १,१६८) । ओझर) झरना; (प० च० ३१, ३,७)। ओड्डिआ; (प्रा० पैं० २, १२८) । ओझरउ-क्रि० भू० का० (सं०अव+क्षर = प्रोडवएँ- भू० का० (सं०/ अर्पय् संबनने to flow) निर्झर प्रवाहित हुआ; > प्रा० अप्णि =अर्पण करना) अर्पण 'ताव-गलिय दागोज्नरउ, कण-चमर-हय किया, "परिवलु दल जो ओडवएँ, जिणि महुयरउ । जिग वन्दण-गवगंमगउ, परि- पेलिउ सुरिताणु । राजु करइ अन्नय वड्ढि उ अइरावणउ ।' अर्थात् 'इतने में तणओं जासु अंगजिउमाणु ।" (प्रा० गु० जिससे मरजन का निर्झर बह रहा था ७, १२)। ओडिअ-वि० (सं० ओडीय > और जिसका मन जिनभगवान् की वन्दना के लिए व्याकुल था, ऐगा ऐरा- ओड्डिअ) उत्कल देशीय; (रा० ३०) । वत महागज आगे बढ़ा।' (प० च० ३, ओडिय-वि० (सं० उद्धृत) उठाने वाला, "धम्ममहारहओडियकंधरु," धर्म प्रोज्झरिअ-वि० (दे०) १- टेडी दृष्टि रूपी महारथ (की धुरा) को कंधों पर से देखा हुआ; २- विक्षिप्त; ३. फेंका उठाने वाला है; (जं० १, ११, ८) । हुआ; ४- परित्यक्त (दे० ना० मा० १, ओडड्ढ-वि० (दे०) अनुरक्त; (दे०. १३३)। ना० मा० १,१५६)। ओझा-पु. (सं० ओड्ढण-न० (सं० उपवेप्टन > प्रा० उवज्झाय) उपाध्याय; 'गय मग चतुर ओवेड्ढण) ओढ़न, ओढ़नी, उत्तरीय ओझा भवेस'; उपाध्याय भवेश नय मार्ग चादर, (दे० ना० मा० १४१५५ । के विद्वान् हैं; (को० ३, १४१) । टिo--गु०, म०, राज० में इसका ओढ़ने ओझा-पु० (सं० उपाध्याय>प्रा० तथा उत्तरीय अर्थ में प्रयोग उपलब्ध है। प्रा० उपाध्याय>प्रा० ओढ (१६०) भोमंस अल- टकना) अवनत /ओढ (दे०) मोड़ना। ओढि ना० मा० १. ११६) । -सक० भू० का० (पूर्णभूत) ओढ़ा; प्रोत्थम-वि० (सं० अवस्तृत) आरछा- "धवलर कापड ओढिसल कइसे,"-जो दित; (दे० ना० मा० १, १५१) । धवल कपड़ा ओढा वह कैसा; (रा० २६, ओत्यर---पु० (दे०) उत्साह; (दे० ना०- २६)। मा० १, १५०)। Vओणल्ल--(सं० अव+लम्ब्) अवनत प्रोत्यल्लपत्यल्ला-स्त्री (दे०) दोनों पाश्वों होना, लटकना; "स्कन्ध केसकलाउ से परिवर्तन, उथलपुथल; (दे० ना० मा० खन्धि ओणलइ,” (भ० १६,४,६)। १, १२२) । ओणल्लन्त उ-व० कृ० (सं० अव+ ओत्यविअ--वि० (सं० अवस्तृत >प्रा० लम्ब>प्रा० ओणल्ल लटकना) योच्छइअ>ओत्थइअ, योत्थअ) आच्छा- होते हुए, विनष्ट होते हुए (प० च० १७, दित; (को० ४, १८८)। १५, ४)।. ओत्याडिअ-वि० (सं० अवस्तृत) ओणल्लय-वि० (सं० अवनत) पतित; विछाया हुआ; (भ०)। (प० च० २६, ५, ५)। औन्या प्रोत्थी -कृ० (सं० उत्+स्था ओरगल्लिया-वि० (दे०) भिदा हुआ; >प्रा० उट्ठाव) उठ-उठकर, (प्रा. सुदं० ११, २१,३)। 4० १, १४५)। ओणाविय-वि० (सं० अवनमित >प्रा० ओत्याडिय-वि० (सं० अवस्तृत) विछाया ओणामिय, ओणाविय) अवनत किया हुआ; (भ०)। हुआ; (जस० ३, ३५, ११, भ०)। ओंदन-न० (सं० ओदनम् >प्रा० ओरिणव-(दे०) वल्मीक, चींटियों का ओदण) भोजन, भात; (उ० खुदा हुआ मिट्टी का ढेर; (दे० ना० १, १३-२१)। १५१)। ओईपिन-वि० (दे०) १. आक्रान्त, ओणीवी-स्त्रो (दे०) कटि-सूत्र, नीवि २. नष्ट; (दे० ना० मा० १, १७१) । (वह डोरी जिससे स्त्रियाँ लहंगे की गांठ प्रोप्प-वि० (दे०) ओप (चमक) दिया बांधती हैं; (दे० ना० मा० १, १५०) । हुआ; (दे० ना० १४८,)। ओणुरगअ-वि० (दे०) अभिभूत, परा टि०-गु०म० पं०. बं०, राज० में भूत; (दे० ना० मा० १, १५८) । चमक देने के अर्थ में प्रयुक्त । कन्नड में ओणुल्लउ--भू० का० लुढ़क गया; "भूरी• स्वच्छ, सुंदर, ठीक, पालिश अर्थ में सउ णियरहे ओगुल्लउ;" (रि० ३, प्रयोग मिलता है। ११)। प्रोप्पा-स्त्री० (दे०) शाण आदि मोण्णिह---न० (सं० औन्निद्रय) निद्रा मणि आदि का धर्पण करना; (दे० ना०. का अभाव; (दे० ना० मा० १, ११७) । मा० १, १४८) । ओत्तलहम--- (दे०) विटप; (दे०. ओमस-वि० (दे०) १. मृत; २. नष्ट, - व्य० प्र० मा० १, पर ओमल्ल (१६१) ओरुम्भे वि दीर्घ मधुर - ३. भागा या हटा हुअः; पड्)। किसी देवता की विशेष आराधना करने ओनल्ल-न० (सं० निर्माल्य) देवोच्छि का मानसिक संकल्प; (दे० ना० मा० ४, प्ट द्रव्य, किसी देवता पर चढ़ा हुना २२)। पदार्थ; (पड्) । वि० (दे०) घनीभूत, ओरल्ली-स्त्री० (दे०) कठिन, जमा हुआ; (पड़) । ध्वनि; (दे० ना० मा० १, १५४) । /ओमाल-(सं० उप+माल्) शोभना. Vओरस-(सं० अव+तृ.) नीचे उत- शोभित होना-इ (स० अवमा नयति) रना । -इ सक० (सं० अवतरति) (भ.)। "अवतरेरोहओरसौं" (भ० ४, ८, ५)। ओमालिय–वि. (सं० उपमालित) ओराए-भू० का० बीतती; (की ३, १. शोभित, २, पूजित; (भ०) । १४८) । उरइ समाप्त होना बीतना। ओनालिय-वि० (सं० उमालित> 1 ओराल-(दे०) गर्जना, ओराले वि- प्रा० ओमालिअ) विभूषित, शोभित; पू० का० कि० (प० च० ३८, ६, ५) । (प० २० २५.७, ६) । -य (प० च० ओरालिउ-न० (सं० औदारिक,>प्रा० ३६, ३, ४)। ओरालिय) शरीर; (व० १०, ६, ११) । प्रोमुछिया - वि० सं० उन्मूच्छिन, ओरालिय–वि० (दे०) १. बहुत जोर अवच्छिन) मूर्छा को प्राप्त; (जंवू ३, की आवाज या चिल्लाहट से युक्त; ७,७) । प्रोमुच्छिय-वि० स्त्री० (सं० उन्मू- "आसन्न विहुर उल्लावइहिं ओरालिउ गहिं निज्जावइहिं"; च्छिता) मूर्छा को प्राप्त; (जं० ८, ७, (भ० ७, ११, ११)। –य वि० उन्मूच्छित, (प० च० १०) । २. पोंछा हुआ, "मुहि करयलु देविपुणु ओरालिउ मुहकमलु,” (भ० २७, ३, ७) । १५, १०, १२) । ३. फैलाया हुआ, भोपशु-ज० (सं० ओदन >प्रा० ओदण) प्रसारित," दसदिसि वहकयंबु ओरा- भात, र घे हुए चावल; (महा० लिओ," (भ०)। ११, ७)। ओयरइहि-स्त्री० (सं० अपवरक>प्रा० ओरिल्ल-पु० (दे०) दीर्घकाल; (दे० अववरक) उपवरक, तंग कोठरी, अवधी १, १५५)। ओवरि, (सं० रा०) ओरुज-न० (दे०) क्रीडा-विशेप (दे० ओयरिउ--कि० भू० का० (सं० अव+ ना० मा० १, १५६) । तृ>प्रा० अवयर) नीचे उतरा, नीचे शोरुंजइ-अक० (दे०) गरजता है, आया; (ण० ५, ५, १५) । "णं केसरि-किसोर ओरुंजइ," मानो सिंह ओयाइय-वि० (सं० उपयाचित> का नवजात शिशु गरजता है; (रि० ५, प्रा० उवयाइय) १. प्राथित, २. न० २)। मनौती, किसी काम के पूरा होने ओरुम्भे वि-पू० का० कि० (सं० अव- , . - , पर ओल्हा (१६) । द>प्रा० ओख) क कर, (०. मेवक गु० राजा योगायो, ६९) ओलगाना स्त्री० सेविका "ता ओल- बोल-१० (२० अवरोहर) गामा," (प्रा० गु० २६,१०)। उतरना; (६० च०) डॉलगि-वि० सं० अबलागि>zi० बोलंबिय-वि० (अब लम्बित> ओलग्गि) सेवा करने वाला; प्रा०बोलंविध) आयित, जिसका अवलन्द्र मुद्धि आहोत माय -अवलय मुखी लिया गया हो वह; (न. १, २, ३)। भवियति वा, तो वैति,' बोलम्बिन, अवलम्बित; नं० (३० व्य०० ११-१३)। २५)। 1/ोग- अवलन् >प्रा. सोल-वि० (सं० अतुल >zi० अउन लग-इनक० मा करना; (६० मुंदर, अनुसन; (की० , १२६) ! ३०७, ६, ३)। ओलगिट-क० २. वि० (० आई) गांला हुला, (नमः पछि लगा, "ऑलमिहट-अवलगि- १,४,३)। -बोल वि (नि,(उ०प० प्र० २०-१३) । आदि) ओत-प्रोत ललललिजीह नहि. ओनल-श्री० (मं० अवला>प्रा० गोलबाल"-उसकी पत्नपाती हुई बीम आचा, बोलणा) संवा; "मरगा रक्तबोड-प्रांत श्री; (जस० १, ६, थिए, आलमएं" -नरपति ५.)। उपकी सेवा में स्थित हुए; ओलन-मुं० (३०) १. मंन पक्षी, १६, ८; पर २. आपलाय; (६० , -एनी संवा; 'तिहुल-गुन्हें जाहि ऑलगए अर्थात विनुवन स्त्रानी की ओलसनी-बी० (६०) नवोडा, दुल- मंत्रा ने जाओ; (प. ३०२, ६, ६) । हिन; (६० नानाः १,१६०) । ओलन, ओलण-वि० सं० अदलग्न बोलहन-वि० अवलगित) >प्रा. ओलग्ग) १. सबक; नौकर; १. जनर में सटा हुआ, ३० ना० मा० २. निस्तेज, निल; (दे० ना० माः १, १,१६२) । १६८) । वि० अनुलग्न, पीछे लगा हुना; /बोलवल- (२० उलझ) देवना; (म०) । (संवि २,१४,१)। सौं लगि-० का कि० (० व सोलस्त्रिय-वि० (६० उरलक्षित> लगित, क्या लग्नपीछे लगा हुआ) प्रा० झोक्ति) रहिवाना हुआ; तुल० उलटें ही हो कर "हाति तुरंगम रहु न० कोटद; (50) मुरगत हाहाकार करंदह! बोलागि सोनगी (, प्रा० औलगा) विलगा नयगयर सुरणवरह नियंत ।" डवा, चाकरी, भक्ति; (०१८)। विद्यावर सहना ही दुरंगन-रय छोड़ पोलगाण:-गु (३०, प्रा. ओलुग्न) छोकर हाहाकार करते हुए, दवा और (सुदं०६, O .
ओलग्गिज (१६३) ओवक मा० लल; सं० लाँघ कर; किया हुआ; मनुष्यों के देखते-देखते ही उलटे होकर ६, १, २१)। गिरने लगे; (व० ५, १७, २०)। लोत्ल-वि० (सं० आर्द्र>प्रा० उल्ल) ओलग्गिअ-वि० (सं० बव+लग्न> गीला, आद्र; (प० ५० ४, ८, ८)। 'प्रा० अवलग्ग) संलग्न, लगा हुआ, ओल्लगी-स्त्री० (दे०) दही में चीनी सहित; "अोलग्गिउ भावें दिणि जि और मसाले डाल कर बनाया गया स्वा- दिणे ..."; (ण० १, २, ६) । दिण्ट पदार्थ; (दे० ना० १, ओलम्विय-वि० (सं० अवलम्बित) २४५) । किसी के आधार या सहारे पर ठहरा या ओल्लरण-न० (दे०) निद्रा, सोना; टिका हुआ; (प० च० ४, १२, ८)। (दे० ना० मा० १, १६३) । ओंलर-(सं० लल्>प्रा० ओल्लरिम-वि० (३०) सुप्त, सोया अवललति) विलास करना, मौज करना, हुआ; (दे० ना० मा० १, १६३) । "सेज ओलर-श्य्यायामवललति" (उ० प्रोल्ला-पु० (अ० मुल्ला) मुसलमान व्य० प्र० ६-२०)। सुल्ला, मौलवी, या मुसलमान एलची; ओलांघि-पू० का० क्रि० (प्रा० ५० १,१४७) । "पर्वत ओलाँघि पार क मारिअ," (को० प्रोल्लिय-वि० (सं० आद्रित>प्रा० ४, ४५)। सोल्लिस, उल्लिञ) गीला ओलावभ-पु० (दे०) श्येन, वाज पक्षी; तुल० म० बोलें; (भ०; प० च० ११, (दे० ना० मा० १, १६०)। ८, ३)। ओलिभा-स्त्री० (दे०) उपदेहिका, प्रोल्लु-वि० (सं० आर्द्र>प्रा० उल्ल, दीमक; (दे० ना० मा० १,१५३) । ओल्ल) गीला; (ग० ३, ८, ६)। ओलि-स्त्री० (सं० आवलि, लीक देखा, प्रोव-न० (दे०) हाथी आदि को बांधने पंक्ति, श्रेणी; (भ०)। ओली; (सं० के लिए किया हुआ गड्ढ़ा; (दे० ना०- आवलि) (जस०)। मा० १, १४६)। ओलुट्ट-वि० (दे०) १. असंगत, 1/ओवग्ग- (सं० उप+ वल्ग्) २- मिथ्या; (दे० ना० मा० १, १६४) । १. पराभव करना, २. आक्रमण करना। ओलेहड-वि० (दे०) १ अन्यासक्त, -इ (भ०) । ओवग्गिवि-पू० का० कि० '२- प्रवृद्ध (१. पूरा बढ़ा हुआ, वृद्धि को (भ०) । प्राप्त, २. विस्तारित, ३. घमंडी, ओवग्गिय-वि० (सं० उपवल्गित) ४. प्रचण्ड, ५. पूरा, गहरा) ६. तृष्णा. आक्रान्त; (प० च० ४, ११, ३)। पर, लोभी, प्यासा; (दे० ना० मा० १, Vओवक-(२० लप+वक) घृणा के १७२)। कारण चेहरे का फेर लेना या मोड़ लेना; पोलोअण-न० (सं० अबलोकन>प्रा० (turn away face in dislike) --हि मोलोयण) १- देखना, २- दृष्टि; (संधि० कि०, आ० (प० च०)।
ओवच्च (१६४) ओसर - ओवच्च-सक० (सं० उज्) पास ओवाग्रस -पु० (६०) आपातप, जल- जाना; (भ०)। समूह की गरमी; (पड्)। लोट्टिन-न० (दे०) खुशामद, काप मोवास- (सं० उपवास) उपदास; लूती, मधुर तथा प्रिय वचन, मीठी बात; (प० च०)। (दे० ना० मा० १, १६२) । लोविज-वि० (६०) १० आरोपित, 1/ बोबड--(सं० अव:-पत्) गिर २- परित्यक्त, ३- टोना हुआ, ४. न० पड़ना, गिरना, नीचे पड़ना; -इ अक० 'बुशामद, ५- रोदन; (दे० ना० मा० १, (प० २०५३,१,७)। १६७)। प्रोवडिय-कृ० (सं० नवपतित) म.पट ओत-स्त्री० (मं. अवच्याय>प्रा० कर; "तपसणे ओवडिय पेविखवि भिडिय उस्माव>प्रा० उत्सा, ओसा, ओस) रहकरितुरंग संविणाई" -उस समय तुपार, शवनम; (सं० रा०)। 'उन दोनों को एक दुसरे पर अपटकर सोसट्ट-वि० (दै०) विकसित, प्रफु- भिड़े हुए देखकर रथ, हाथी और तुरंगों ल्लित; (पड्)। से संकीर्ण'; (जंबू० ६, १२, १०)। योसडिन- वि० (दे०) व्याप्त; ओवड्डा--स्त्री० (दे०) ओढ़नी का एक (पड्)। भाग; (३० ना० मा० १, १५१) । सोसण-न० (दे०) उरुंग, खेद; (दे०- सोव्यात-पु० (२० उपचार>प्रा० ना० मा० १, १५५.) । उवयार= पूजा, मेवा, आदर, भक्ति) जोस प्पिणि-स्त्री० (मं० अवपिणी) उपचार (नमस्कार); 'पमिड विणएण दश कोटाकोटि सागरोपम परिमित काल- सणंकुमार । तेण वि सो दिहि किमोव- विशेप, जिसमें सर्व पदार्थों के गुणों की यार' -उससं विनय से सनत्कुमार को क्रमशः हानि होती जाती है; (प० ३० प्रणाम किया । उसने भी, वह १, ११,१)। उपचार (नमस्कार) किया; (विला०)। मोसर- (सं० अप + मृ>प्रा० ओवर-पुं० (दे०) निकर, समूह; (दे० आंसर-१-पीछे हटना, २-सरकना, विस- ना० मा० १, १५७)। कना) -5 अक० हटना; 'छु धीरत्तणु बोवरो-बी० (सं० दपवरक) एकांत होइ मणूसहाँ, लच्छि कोत्ति बोसरहण गृह, छोटा घर, कोठरी; (को० २, पासही,' अर्थात् यदि मनुप्य में थोड़ा ६७)। वर्य हो, तो उसके पास से लक्ष्मी और मोबसेर-न० (६०) चंदन, १- सुगं कीर्ति नहीं हटती; (५० च० ८, ३, वित काप्ठ विशेप; २- वि० रति-योग्य; -मि व० संपसरण करना; (सुदं० ११, (दे० ना० मा० १, १७३) । १६, २४) । भोसरहि-कि० मा० हद ओवहि-० (सं० उवधि) सागर; जाओ; (जंवू० ५, ७, २४) । ओसरंत- (व० १०, ६, २)! व० ० (सं० अप++शत); (जंबू० किया गया ओसरिअ ओसारिस . . ६, १२, ११)। ओभरतु-कि० आ. मोतिउ-वि० ओससिक्त, उच्च्वसित हट जा, "लविपं सुकंग मा मासु ओस- (सं० रा०)। रतु" -इस पर सुकण्ठ ने कहा-अरे मरो प्रोतह-न० (सं० ऑपघ>प्राओसह) मत, यहाँ से हट जा,', (ण० १- दवाई, भैपज; (ग० ३, १, १४) । ७) । ओसरु-क्रि० आ०, हट; 'ओसरु लो–'ओसहु निरु मिळं विज्जुइट्ठ दु दारें, अर्थात् 'हे दुष्ट स्त्री, हट; अहुजण कासुन होई पिउ'-अतिशय (प० च०१८, १०, ८) । ओसारि-कि. मधुर वैद्य निर्दिष्ट ओपव किसे प्रिय आ० हटा लीजिए; (प० च० १३, २, नहीं, (प० सि०च०)। ६) ओसारिवि-पू० का० क्रि० हटाता हुआ, मार्ग से बचाता हुला; (ग० ४, ओसहत्यु-पु० (सं० औषध+अर्थ) १२, १३) । ओसारेप्पिणु पू० का० कि० औषधि के लिए; "ओसहत्यु लुउ पुन्छ- हटाते हुए, (प० च० २०, ४, ३)। सकण्णउ" -'औषधि के लिए उसकी ओतरिस-वि० (दे०) १. बाकीर्ग, पूंछ व कान काट लिये'; (जं० ६, व्याप्त; २. आँख के इशारे से संकेतित; . ११, ८) । (एड्) ।३ अधोसुख, अवनत; ओसहि-स्त्री० (सं० मोपधि>प्रा० ४. आँख का इशारा; (दे० ना० मा० १, ओसहि, ओतही) जड़ीबूटी, वनस्पति; १७१)। (प० २० ४.६, १०)। असरिय-वि० (सं० अपमृत>प्रा० ओता--स्त्री० (सं० अवश्याय>प्रा० ओसरिज) पीछे हटा हुआ; (जंबू० ७, ओताअ) ओस; (दे० ना० मा० १, ६, १०)। १६४; ण० ४, ८, १६) । -सित्त वि० ओतरिया-स्त्री० (सं. अपसार - (२० अवश्याय+तिक्त) भोत से तिचे निकात, प्रा० ओसार । अथवा सं० उप हुए; (जस० ४, ४, १६) । शाल) आंगन, अलिन्दक, बाहर के दर- ओसार--पुं० (सं० उत्सार>प्रा० वाजे का प्रकोप्ठ; तुल० राज० ओसारो (दालान, वरामदा), गुजोसरी (वरा- असार, ओसार) परित्याग; (भ०) । मदा, मकान के सामने का भूभाग) (दे०. 1/ओसार-(२० अप+सारय >प्रा० ना० मा० १, १६१)। ओसार) दूर करना। -इ सक० (सं० ओतविय-वि० (सं० उच्छृित, अपसारयति) (भ०)। उद्+ श्रि+कत) उत्यापित, ऊंचा किया हुआ; ओसारित्र-वि० (सं० अपसारित > (प० २०)। प्रा० ओसारिअ) १- दूर किया हुआ, प्रोसविस-वि० (दे०) १ शोभा (प० च० ४, ६, ३)। २. उत्सारित, रहित; २- न० अवताद, खेद; (दे० ०. हठाए गए; (२० रा०)। ओसारिय मा० १,६८)। (ण० १, ८, १२)। बोसारिय-पेसणु- ओसास (१६६) ओह्ट नष्ट किया वि० जिसने आज्ञा को टाल दिया हो हुआ; (प० च०)। ऐसी; (रि० ३, १५)। मोसुद्ध- वि० (दे०) विनपतित प्रोसास- पुं० (सं० उच्दवास) (१- विनाशित; हुआ, १. साँस, साँस अन्दर खींचना, साँस २- मारा हुआ, ३- फेंका हुआ); (दे०. वाहर निकालना; तुल० म० उसासा; ना० मा० १, १५७; जेकोबी द्वारा संचा- (भ०)। २- पु० (सं० अवकाश>प्रा० दित प० च० १, १५७)। ओवास) अवकाश; (भ०)। श्रोतुविणायई-क्रि०, व० (सं० उत्स्व- मोसिघिम-वि० (दे०) प्रात, सूघा नाय) स्वप्न देखना; (प० च० १७, १५, हुआ; (दे० ना० मा० १, १६ः) । ३)। ओसिम-वि० (दे०) १ वल-रहित, ओतोवरिण-स्त्री० (सं• अवस्वापनी> २- अपूर्व, असाधारण; (पड्) । प्रा० ओसोयणी, ओसोवणिया, ओसो- ओसिक्खिअन० (दे०) १- गति-व्या. वणी) विद्या-विशेष, जिसके प्रभाव से घात; २- अरति-निहित; (दे० ना० मा० दूसरे को गाढ़ निद्राधीन किया जा सकता १, १७३) । है; (प० च० १०, ६, ८) । ओसित्त-वि० (दे०) उपलिप्त (besm- मोहंक-पु० (दे०) हास, हँसी, हँसने eared) -(१) आलेपन किया हुआ, की निया; (दे० ना० मा० १, १५३)। चिपचिपे या चिकने पदार्थ से लेप किया ओहंस-पु० (दे०) १- चंदन, २- जिस हुआ, पोता हुश्रा, लेसा हुआ, अपमानित पर चंदन घिसा जाता है वह शिला, किया हुआ; (२) अभिपिवत, (anoi- चन्द्रौटा; (दे० ना० मा० १, १६८) । nted); (द० ना० मा० १, १५८) । ओह-० (सं० प्रा० ओघ; प्रा० ओह) ओसिरग-न० (दे०) व्युत्सर्जन, परि ममुह, संघात; (जस०)। त्याग; (पड्)। ओहन्छमि-वि० (सं० अव या अप+ ओसीअ-वि० (दे०) अधोमुख, अवनत; आस्) (देखिए अच्छ) वैठना; (ण० ८, (दे० ना० मा० १, १५८) । १४, ८)। /ोसीस-अक० (सं० अप+ वृत्) ओहह-क्रि० (सं० अवघटते, सं० अप+ १. पीछे हटना, २- घूमना, फिरना; Vघट्ट>प्रा० >प्रा० ओहट्ट) कम होना, (दे० ना० मा० १, १५२) । ३. स्त्री० ह्रास पाना, ह्रास होना; "धर्म वाढत अपवृत्त (ह्रास reduction पापु औहट" -धम्म वर्द्धमाने पामवधcommon measu asure); (दे० ना० मा० टते; (उ० व्य० प्र० ५-२४) । १, १५२)। ओहट-वि० (दे०) १- अपमृत, पीछे ओसुखिम-वि० (दे०) उत्प्रेक्षित, हटा हुआ; तुल० म० ओहटी; (भ०)। कल्पित; (दे० ना० मा० १, १६१) । २. नास को प्राप्त; तुल० मोदक-वि० (सं० अवशुप्क) सूखा, (प० च० ४२, ११, ८)। पु(दे०) to a गु० ओट;
ओहट्ट (१६५) ओहालिम पिधानी, - १. अवगुणन; २. फटि-वस्त्र, नीवी, ओहसिअ-चि० (सं० उपहसित) ४- वि० पीछे हटा हुआ, (दे० ना० मा० जिसका उपहास किया गया हो वह; १, १६६)। (दे० ना० मा० १, १७३) । 1/ओहद-(सं० अप ब>प्रा. ओहाइज-वि० (दे०) अधोमुख; (दे० ओहट्ट) कन होना, ह्रास को प्राप्त ना० मा० १, १५८)। होना। -३ (० अवघटने) कि.६० मोहाडणी-स्त्री० (दे०) गिरिगडपुरु व ओहट्टइ बलु,” अर्थात् चादर, एक प्रकार की ओडनी; (दे० ना० वल गिरि नदी के पूर के समान हाम को मा० १, १६१)। प्राप्त होता है; (जंकू ८,७,७)। ओहानिय-वि० (सं० अधम+कृत) -मि० ए०, पीले हटना (प० लज्जित; "णियणेत्तोहामियहरिणणेत्त- च०४६, २. ६) । ओहदन्तव-या "जिसने अपने नेनों की शोभा से हरिण कृ.० (सं० अप+ घ>प्रा० बोहट्ट के नेत्रों को भी लज्जित कर दिया था, कम होना, हास पाना) नष्ट होती (ण० १, १४, ७) । २- वि० तिरस्कृत हुई; (५० च० १७, ३, ४) । (सुदं० ४, २, ४)। मोहट्टिस-वि० (दे०) दूसरे को दवा ओहानिय-वि० (३०) १. तिरस्कृत, फर हाथ से गृहीत; (दे० ना० मा० १, २- अभिभूत; "चरणोंहामिय-कोमलक- १५६)। मलं" -अपने चरणों की शोभा से मोहद-पु० (दे०) हास, हंसी; (दे० कोमल कमलों को तिरस्कृत करने वाली; ना० मा० १, १५३)। वि० (म० अ (जंबू० ८, ५, ५) 1२- स्थगित वृष्ट) चिता हुआ; (५० च०)। (जेकोबी द्वारा संपादित प० च०४६, मोहनी-~-त्री० (दे०) वर्गला; (दे० ६) ३- क्षीण, "देहि ताम जोहामिय ना० मा० १,१६०)। छायहाँ" अर्थात जिसकी कान्ति क्षीण हो ओहत्त-वि० (दे०) अवनत; (दे० ना० गई, (प० च० ११, १३, ६) । बाहो- मा० १, १५६)। मिया; वि० स्त्रो० (सं० अधःता) तिर- मोहर जलचर-विशेष, भोघर स्कृता, (सुदं० ७, ७, ६) । नामक जलचर जीव; (५० च० २३, ओहार-पु. ओहार-पु० (दे०) १ कन्छप; १३, ६, २०१०, ८, १२) । २- द्वीप, ३- अंश, विभाग; (दे० ना०- ओहरण-न० (दे०) १ हिंसा, मा० १,१६७)। २. असंभव अर्थ की संभावना; (दे०- ओहालिय-वि० (सं० अवलिप्त) ना० मा० १, १७४) ३. वि० आनात; १- लगा हुआ, २- सना हुआ; "धाएं (पड्०)। गयणगइ हुउ वियलमइकीलालोहालिय- ओहरिस-वि० (दे०) माघ्रात, घा देहउ," माघातों से गगनगति विकलमति हुआ; (दे० ना० मा० १, १६६)। (विह्वल) और लोहु-लुहान शरीर हो - - , ओहाव (१६८) - न० - 'औ' का गया; (जंबू० ६, १०, १३) । ओहाव- सक० (सं० आ+क्रम का धात्वादेश आक्रमण करना; (पड्) । श्रो ओहादरण (सं० अवभावना) औ-इसका उच्चारण स्वर अ+ओ के अनादर, तिरस्कार, अपमान; (प० च० मिलाने से बनता है। संस्कृत वर्णमाला. ३७, ८, ५)। का वारहवाँ वर्ण 'ओ' प्राकृत काल में श्रोहासिय-वि० (सं. उपहासित) उपलब्ध नहीं होता है। 'कीर्तिलता' में जिसकी मज़ाक या हंसी उड़ाई गई हो, औकार के प्रयोग औका, चौदिस, चौपट, वह; (सुदं० ४, ३, ६)। चौस, चौहट्ट, ती, तीन, तौलन्ति, दौरि मोहित्य-न० (३०) १- विपाद, खेद; आदि उपलब्ध हैं, जिनको प्रस्तुत कोश २- वेग; ३- विचारित, (दे० ना० मा० में समाविष्ट किया गया है। प्राकृत काल १, १६८)। में 'औ' सन्ध्यक्ष रत्व से विघटित होकर, 'अ' में परिणत हो गया ओहोरिम-वि० (३०) १- खिन्न, था, परन्तु २- ऊँचे स्वर में गाया हुआ; (दे० ना०. चौदहवीं शताब्दी के कवि विद्यापति के मा० १, १६३)। अवहट्ट भापा के काव्य में प्रयोग मिलता है। इसका उच्चारण /ोहुंज-(सं० उपभुक्ते, उप+। स्थान कठ और ओष्ठ है। भुज् >प्रा० उवहुंज) उपभोग करना, नौका-वि० अओक, दूसरे 'एक हाट के -इ सक० (भ०)। ओर औका हाट के कोर' (डॉ. शिव- ओहु-सर्व० वह, "ओहु पास दरवार प्रसाद सिंह 'कीतिलता और अवहट्ट स एल महि मण्डल उप्परि," (की० ३, ५८)। भाषा २, १२६) । ओहुअ-वि० (३०) अभिभूत, पराभूत; औको-स्त्री. (सं० अवक्रीता>प्रा० (दे० ना० मा० १, १५७) । अवक्किआ) पण्य स्त्री; (की० २, ८१ ओहुड-वि० (दे०) निष्फल, विफल; तथा २, १२६)। (दे० ना० मा० १, १५७) । औकीहाट-(सं० अवक्रीता हट्ट) पण्य मोहुर-वि० (दे०) १- अवनत, स्त्रियों का वाजार, शृंगारहाट); (की० २- खिन्न, ३- ध्वस्त; (दे० ना० मा० २, १२६) । १, १५७)। ओहुल्ल-वि० (सं० अवफुल्ल, उत्फुल्ल का विलोम) अप्रसन्न, खिन्न, . "जाम न दइरिमुहई ओहुल्लई; (भ० १४, ११, क-पु० (सं० प्रा० क) १ अपभ्रंश वर्णमाला का प्रथम व्यञ्जनाक्षर, जिस ५). ओहुल्लिय-वि० (दे०) प्रा०.. ओहुल्ल) का उच्चारण-स्थान कण्ठ है। ब्रह्मा; नीचा किए हुए, (प० च० ५, २, २) । (ण० ८, २, ५; दे० ना० मा० ५, (१६६) कंचरण किसी तरह २६) । ३. न० जल, पानी; "एक्कमेक्क ११)। धारि वि० कंकालधारी; सिंचयंति पंजलीहिं कं घिवंति'; (जस० (जंबू० १०, २५, २)। ३, २, १८)। ४- सर्व० (सं० कस्य) ककिल्लि-पु. (सं० कङ्केल्लि >प्रा० किसका; (उ० व्य० प्र० १५, १) ५-५० कंकेल्लि) कंकेल्ली, अशोक का पेड़, वृक्ष- काल, संबंध की विभक्ति, (की० २, विशेष; (व० १, ६, २)। १०७) । टि०-कारक विभक्तियों के कंकेल्लि-पु० (सं० ककेल्लि) अशोक लोप की प्रक्रिया अपभ्रंश काल से दिखाई वृक्ष; (जस० २, १२; दे० ना० मा० २, पड़ती है । अवहट्ट भाषा तक आते-आते १२) । कंकेली; (सुदं० ४, ३, २) । प्रायः विभक्तियों का स्थान परसों ने ले कंकोड-न० १- (दे०) वनस्पति-विशेष, लिया था। ६- सर्व० (सं० क:=क्या) ककरल, एक प्रकार की सब्जी जो वर्षा- कौन, कोई; (सं० रा०)। काल में होती है; (दे० ना० मा० २, कं--१-० (सं० काम्) जल; (प० च० ७) । २. पु० (सं० कर्कोट>प्रा० ५३, ६, ५; जंब० १०, २, ६) । कंकोड) एक नागराज, आठ मुख्य साँ २- अव्य० (को० ४, में से एक; (पड़)। २४७)। कंख-सक० (सं० काङ>प्रा० कंख) के कं--पू० (ध्व०) कांव-कांव; (जंबू० चाहना; (जस० २, २१, ८)। २, ५, १०)। कंख-स्त्री० (सं० काङ्क्षा>प्रा० कंक -पुं० (सं० कक >प्रा० कंक) कंखा) चाह, अभिलापा; (ण. पक्षी-विशेष, बक पक्षी; (जस० १, १०, ४)। ५; जंबू० ४, १८,७)। कंखिर-वि० (सं० काङ् भित) चाहने कंकड़-पुं० (सं० ककट>प्रा० कंकड) वाला, अभिलाषी; (जस० ३,७, ७; रक्षा-कवच, वस्तर; (जंबू० ११, ३, भ०) । वि० स्त्री० आकांक्षा वाली; २)। पुं० राजा; (प० च० ३२, ३२) । (सं० रा०)। कंकरण--न० (सं० कङ्कण >प्रा० कंखिरु-पु. (सं० काङ्क्षा>प्रा० फंकण) १-हाथ का आभरग-विशेष, कंखा) आकांक्षा, (जंबू० ८, ११, १४) केंगन; (भ०) । २- गुरु वर्ण; (प्रा० पै० कंगु-स्त्री० न० (दे०) घान्य-विशेष; २, १८०)। ३- चक्र (जंवू० १०, २०, (दे० ना० मा० ७, १)। कंचरण-पु० (सं० काञ्चन>प्रा० कंकर-पु. (सं) कर्कर) कंकर, कौड़ी; कंचण) सोना, सुवर्ण; (व० १, ६, ६; (जंबू० ४, २, ८)। भ०)। -गुह; स्त्री० (सं० काञ्चन+ कंकाल-न० (सं० गुहा>प्रा० कंचण+गुह) कांचनगुफा, कंकाल) शरीरास्थि, चमड़ी और मांस गुफा-विशेप; (ण० ६, १, ६)। -पुहइ, रहित अस्थि-पञ्जर; (जंबू० १, स्त्री० काञ्चनपृथिवी; (भ०) । -महि, - . कङ्काल>प्रा० कंचणार (१७०) कंजिउ ७६)। स्त्री का स्त्री० काञ्चनमही (भ०) । --माला, कपड़ा, "तो उज्झिऊण लज्जा (लज्ज), स्त्री० काञ्चनमाला, नाम-विशेप, ओइंघई कंचुयं सरीराओ," (प० च० भ०) । कंचणाभा- स्त्री० रानी-विशेष ३४, १५)। का नाम, पियवय की पत्नी; (प० च० कंचुइ-स्त्री० (सं० कञ्चुक >प्रा० ३६, ७७) । कंचुअ) कंचुकी, चोली; : (विला०)। कंचणार-पुं० (सं० कञ्चनार>प्रा० २- पु० (सं० कञ्चुकिन्) अंतःपुर का कंचणार) वृक्ष-विशेष; (प० च० ५३, प्रतीहार, चपरासी, (प० च० ८, ३६) । कंचुलिय-स्त्री० १- (सं० कञ्चुलिका कंचना-पु. (सं० काञ्चन) सुवर्ण; >प्रा० कंचुलिआ) चोली, कंचुकी; (की० ३, ११६)। (जस० २, ३२, १०) । २ (सं० कंचाइणी--स्त्री० कात्यायनी नामक कञ्चुक >प्रा० कंचुअ) केंचुली, साँप की स्त्री, चामुण्डा, (सुदं० ६, १५, २, जंवू० काँचली; (पाहु० १५)। ७, ६, ८)। कंचुलो-स्त्री० (सं० कञ्चुलिका>प्रा० कंचि-स्त्री० (दे०) लहंगा, धोती; (व० कंचुलिआ, कंछुल्ली) चोली; ८, ६, ७)। स्तनाच्छादक वस्त्र; तुल० म० कांचोळी; कचिपुर-पु० (सं० काञ्चीपुर) नगर (भ०) । विशेप; (जवू० ६, ११, ३)। कंचू-पु० (सं० कञ्चुक >प्रा० कंचुम) कंचिवाल-- वि० काञ्चीदेशोत्पन्न; चोली; (प्रा० गु० २६, १७) । (जंबू० ८, १२, ११)। कंछल्लो-स्त्री० (दे०) हार, कण्ठा- कंची-स्त्री० १- (दे०) मुशल के (धान भरण; (भ०) । कूटने का मूसल) मुह पर रखी जाने कंज-पुं० (सं० कञ्ज) कमल; (जंवू० वाली लोहे की एक वलयाकार वस्तु; ४, ११, ५)। -केसर पुं० (सं० कम- (दे० ना० मा० २,१)। २ स्त्री० लकेसर) बाल को तरह पतले-पतले वे (सं० काञ्चि, "ञ्ची>प्रा० कंचि, सीके कमल के बीच में रहते हैं; (व० २, कंची) कटिमेखला, कमर का आभूपण, ३, ११)। कांचीदाम; (ण० १, १६, १०)। कंजिअ-पुं० (सं० काजिक>प्रा० -~~~-कलाव' पु० (सं० काञ्ची+कलाप) कंजिअ) एक प्रकार का खट्टा रस जो "कंचीकलाव गुप्यंतियाउ" --कटिमेखला कई प्रकार से बनाया जाता को दूर करती हुई; (जस० ४, २, जिसमें अचार और बड़े आदि भी पड़े १८)। रहते हैं; (जस० ३, ३१, १)। कंजिय; कंचुअ-पु. (सं० कञ्चुक>प्रा०, (जंबू० ३, ६, १३)। कंचुअ) १- चोली (रा०)। कंचुय-- कंजिउ-पु० (सं० काञ्जिक) कांजी; चोली; (जंवू०४, ११, ८) । २- वस्त्र (सु० ८, ८)। है और • कंट (१७१) कंडु - . . कंटअ (सं० कण्टक >प्रा० कंटग) कंठदोणार-० (दे०) छिद्र, विवर; काँटा; (सं० रा०)। कंटय; (भ०) । (दे० ना० मा० १, २४) । कंटइय-वि० (सं० कण्टकित >प्रा० कंठमल्ल-न० (दे०) १- ठठरी, मृत- कंटिय) केटीला; कण्टक-युक्त; (ण० १, शिविका; २- वाहन; (दे० ना० मा० २, ६, २)। २०)। कंटउच्चि-वि० (दे०) कांटे से विद्ध कंठागहणउ-क्रि० आ० (सं०कण्ठ+आग्र- किया हुआ; (दे० ना० मा० २, १७) । हरण) कंठ को ग्रहण करो, "का वि भगइ कंटक-पुं० (सं० कण्टक>प्रा० पिय कंठागहणउ, करि लइयमेरउ कंठाह- कंटग) कांटा; (की० ३, ६४) । कंटय रणउ"-कोई कहती है हे प्रिय, मेरे कण्ठ ० कांटा, (जंबू० ५, ८, २४) । को ग्रहण करो और मुझे अपना कण्ठा- कंटयतरु-पु० (सं० कण्टकतरु) कंटीला भरण बना लो; (ण० ३, १०, ३) । वृक्ष; (जस० २, २८, ५) । कंठाल--पु० (दे०) कडाह, भार, कांठी; कंटिवोरी-स्त्री० कंटीली वेरी, (जंबू० (जंबू० ४, ११, ८)। ५, ८, ६)। कंठाहरण-पु० न० (सं० कण्ठ+आभ- कंदुल्ल, कंटोल-न० (दे०) वनस्पति रण>प्रा० कंठ+आहरण) कंठ का विशेप, ककरैल; (दे० ना० मा० २, आभूषण; (ण० ३, १०, ३)। ७)। कंठिअ-पु० (दे०) चपरासी, प्रतीहार; कंठ'-पुं० (दे०) १- (दे० ना० मा० २, १५) । सूकर, सूअर; कंड'-पु० न० (सं० काण्ड>प्रा० २- मर्यादा, सीमा; (दे० ना० मा० २, कंड) १- वाण; (जस० १, १६, १)। ५१)। कं-पु. (सं० कण्ठ>प्रा० कठ) २- धनुर्दण्ड; (जस० १, १२, १२)। गला; (प्रा० ५० १, ६८; जस० २, ३, ३- खण्ड (जस० ४, २५, ३)। कंड'--' (दे०) १ फेन; २. वि० ३)। -अ पुं० कण्ठा, कण्ठाभरण; दुर्बल, ३- विपन्न; (दे० ना० मा० (जंबू० ३, १४, १३) । --दलि स्त्री० (सं० कण्ट+कन्दल) गला २, ५१)। कंडपंडवा-स्त्री० (दे०) तथा कनपटी, "त रसइ कंठ-कंदलि स. कोउ दंसाणिउ विसहर इव सुभोउ,' परदा; (दे० ना० मा० २, २५) । अर्याद किसी ने उस शव -भट की कण्ठ- कंडवइ-पु० (सं० काण्डपति) कर्णधार, कंदल में इस प्रकार काटा, जिस प्रकार नाविक; तुल० म० काण्डरी; (भ० ७, कि सर्प अपने फण से (अपने शत्रु को) ३, ४)। काट लेता है; (व० ५, १४, ६) । कंडवडु-पु० (सं० काण्डपट) एकांत कंठकल-पु. (सं० कण्ठ+कल) कण्ठ विभागीय पर्दा; (व० ४, २४, १०)। १, १२, कंडु-पु० (सं० कन्दुक) खेलने के लिए , - और गाल यवनिका, कूजन, (जंवू० केंडुअं (१७२) कंती - - (जम० २, , कान्तार>प्रा० गेंद; "भिय कंडु कइय णेराइय," कंत-स्त्री० (सं० कान्ता>प्रा० कंता) (भ०) । स्त्री, नारी, सुंदरी; (ए० १, १७, ३)। कंडुम'-पुं० (सं० कन्दुक) गेंद; (दे०. कता-स्त्री०,१. स्त्री ना० मा० ३, ५६)। १०)। रावण की एक पत्नी का नाम; कंडुम' सक० (सं० कण्डूय) खुजवाना। (प० च०७४, ११)। कंडुयंत-व० कृ० (सं० कण्डूय +शत); कंतारि - न० (सं० (जंवू० १०, २६, ७)। कतार) अरण्य, वन; (जस० २, २१, 1-1० (सं० कण्डूयन >प्रा० कंडु- २)। कन्तार-जंगल; (की० ४, १२६) । यण) खुजली, खाज, रोग-विशेष; (ण. कंताबसाण-वि० (सं० कान्ता+वशा- ८, ६, ४) । कंदुवण- (जंबू० ८, १६, नाम्) कान्ता के वशवर्ती; (जंबू० ४, ६)। १८, १०) कंडुरु-पुं० (सं० कण्डुरु) एक प्रसिद्ध कंतासोग-पु० (सं० कान्ताशोक) राजा, जिसने रामचंद्र के भाई भरत के राजा-विशेष का नाम, विजयावती के साथ जनी दीक्षा ली थी; (प० च० ८५, समीपवर्ती मत-कोकिलरव नामक ग्राम का ५)। राजा; (प० च० १०३, १२६) । कंडू-स्त्री० (सं० कण्डू>प्रा० कंडू) कंति-स्त्री० १- (सं० कान्ति>प्रा० १- खुजलाहट, २. रोग-विशेप; (जस० कंति) कांति, सौंदर्य, चमक, दीप्ति, प्रेम २, १०, ७)। के कारण बढ़ा हुआ सौंदर्य, शृंगार कंडूअण-न० (सं० कण्डूयन>प्रा० (सं० रा०; ण० १, १४, ३) । २. गाथा कडूयण, कंडयण) खुजली, खाज; (जस० का भेद; (प्रा० पं० १, ६०)।-बंतु २,१०, ७)। वि० (सं० कान्तिवान् >प्रा० कतिवंत) कंडूर-पु० (दे०) वक, वगुला; (दे० कान्ति-युक्त; (व० २, ३, ५) 1-विणि- ना० मा० २, ६)। ज्जिय वि० (सं० कान्ति-+-विनिजित) कंडोहिय-वि० (दे०) मथित; (जस० कान्ति से जीतने वाला; (व० २, ४, ३, ३, १२)। ६)। कंढ–० (सं० कण्ठ) गला; कंदि; कतिउर-पु० (सं. कान्तिपुर) एक (रा० १६)। कस्वा जो कि ग्वालियर के उत्तर में २० कंढो-स्त्री० (सं० कण्ठिका) गले का मील दूरी पर स्थित है और अब कोट- आभरण; (रा० १६) । वाल कहा जाता है; (भ०) । कंत'-- (सं० कान्त >प्रा० कंत) कं तिल्लु-वि० (सं० कान्ति+मत् > पति, स्वामी; राज० गु० कंत; (प्रा० प्रा० कति+ल्ल) कान्ति-युक्त; (रि० ८, पं० १,. . ६) । कन्त; (की० ३, १) । कन्तु; (हे० ३४५, १)। कंती-स्त्री० (सं० कान्ति>प्रा० कंति) .
कंतु (१७३) कंदुल्ल - , शोभा, सौन्दर्य; "रूपेग कामु कंती कंदल-पु. (सं० कन्दल >प्रा० कंदल) चंदु;" (जस० १, ११, २)। -इ स्त्री० अङ्कुर; (जस० १, १७, २१)। २. न० कांति 'कंतीइ चंदु तेएण भाणु' -वह (दे०) कपाल; (दे० ना० मा० २, ४) । कांति में चन्द्रमा और तेज में सूर्य था; ३- पुं० न० (सं० ० कन्दल) कलह, झगड़ा; महा०६८, ६, ६)। (जंवू० ४, २, १६) । शोरगुल; (व० ४, कंतु-पु० (दे०) काम, कामदेव; (दे०. ३, ११) । कन्दल-पुं० (सं० कन्दल) ना० मा० २, १)। लड़ाई-झगड़ा; (की० ४, ६३)। कंथारी-स्त्री० (सं० कन्थारी) वन- कंदलि-स्त्री० गर्दन के चारों ओर पहने स्पति-विशेष; (संधि० ५, ६, ५) । जाना वाला एक आभूषण, "कंबु कंठकं- कंद-पुं० १- (सं० कन्द >प्रा० कंद) दलिए खन्न;" (भ० ६, १७, ४)। मूल, जड़; (प्रा० पै० १, ९८; १० १०, १६, ६)। २. पुं० (दे०) मेघ; 'पमायणासु कंदावरण-वि० (सं० क्रन्दापन) रुलाने कंदमासु संजओ दयावरी," - (वे) प्रमादों वाले, "णं तियसिंदविंदकंज्ञवणे रावगं" के विनाशक, मेघ के समान गंभीर-ध्वनि, कुद्ध सुरवलं" -अर्थात् जैसे कि देवगणों को रुलाने वाले रावण के क्रुद्ध होने पर संयमी व दयापरायण थे,' (सुदं० १०, देवों की सेना की दशा हुई थी; (ण० ४, ३, १७)। कंद'--वि० (दे०) १- हा, २. उन्मत्त, ११, २) कंदाविय-वि० क न कराने वाला, ३- न० आच्छादन; (दे० ना० मा० २, रुलाने वाले, (जंबू० १०, १, १२)। ५१ ) । 1/कंद'-(सं० कंद) कदिन० (सं० क्रन्दित>प्रा० रोना । -इ, कि० व० (सं० नन्दति) कंदिय) रोदन; (ण० ३, १६, १०)। कंदियं-वि० (सं० क्रन्द्रित>प्रा० (भ०)। -हि (विधि०) (जंबू० २, २, ६)। कंदिय) आक्रान्त; (रि० १, १२) । कंदण-पु० (सं० क्रन्दन) विलाप, कंदिर-वि० (क्रन्द+इर; सं० क्रन्दिन् रोदन; (जंवू० ४, २१, ११)। >प्रा० कंदिर) क्रन्दन करने वाला; कंदप्प-~ -० (सं० कन्दर्प>प्रा० कंदप्प) (भ०)। १- कामदेव, अनंग; (ण० २, ६, १३)। कदिवसु-अव्य० किसी दिन; (प० च० २- प्रेम; (सं० रा०)। २२, ३, ४) । कन्दिवमु -अव्य० किसी कंदर-न० (सं० कन्दर>प्रा० कंदर) दिन; (प० च० ४७, ३, ५)। गुहा, गुफा, कंदरा; "भरंतरुंदकुडकूवंक- कंदुट्ट-न० (सं० कन्दोट) नील कमल; दर;" (जस० ३, १६, ३) । कंदरी- (सं० रा०)। स्त्री० (सं०कन्दरा>प्रा० कंदरा, कंदरी) कंदुल्ल-[सं० कन्द+उल्ल (प्र०)] कंदरा; (व० १, १३, ३) । कंद; "कंदुल्लगहरगहन्भु जेत्यु," जहाँ कन्द>प्रा० कदोरेंट (१७४) कंस युंक्त वनअटवी में विशेष का नाम, 1 (जंबू० ६, वनगर्दभ कन्दों से ४)। दिखाई पड़ता है; (जस० २, २७, कपिरंग-० (सं० कम्पित+अङ्ग) १०)। कांपने वाला अंग; (जंबू० १०,१७, कंदोट-न० (सं० कन्दोट:) नील १६)। कमल; (दे० ना० मा० २, ६; जस० ४, कंपिर-वि० (सं० कम्पित >प्रा० १७, १३; भ०)। कपिर) कांपने वाला; (क० १०, १६, कंच-पु. (स० स्कन्ध >प्रा० कंध, १०)। खंध) कन्धा; (को० ४, ३०) । -र, पुं० कंपिल्ल-पु० (सं० काम्पिल्या) शहर- कन्धा; (ण० ६, १६, १०) । (भ०)। -पुर न० कंप-अक० (सं० कम्प्>प्रा० कंप) (सं० काम्पिल्यपुर) नगर-विशेष; (प० काँपना। -इ; (हे०, प्रा० व्या० १, च० ८, १४३)। ३०)। कंपंत-व० कृ० (/कम्प+ शतृ); कंव-स्त्री० (सं० कम्बा>प्रा० कंवा, (जंवू० ७, ८, ११) । कंपंता-वर्तमान; कंब) यष्टि, चाबुक; ४. कालिक कृ० एक व० (सं० कम्पत्) ५)। काप रहा; (प्रा० ५० २, ८६)। कंपा- कंबर-पु० (दे०) विज्ञान; (दे० ना०- वइ-क्रि० (सं० कम्पयति); भ० । मा० २, १३)। कंपिआ-क्रि० भू० का०, कवी-स्वी० (मं० कम्बी-वांस की (की० ३, ६७)। कम्पइ-क्रि०, व० गांठ) यष्टि; (संधि० २, ११, ६) । काँपता है; ० २, २२६) । कम्पा कंबु-पु० (सं० कम्बु>प्रा० कंवु) कांपती है; (की० ४, ११०) । शङ्ख; (जंवू० ५, १२, १४) । २- इस कंपड-पु० (दे०) पथिक, मुसाफिर; नाम का द्वीप; (५० च० ४५, ३२) । (दे० ना० मा० २, ७)। ३- पर्वत-विशेष; (प० च० ४५, कंपण-न० (सं० कम्पन>प्रा० कंपण) ३२)। कम्प, हिलन, कंपकंपी; (व० २, २१, कंबोय-पुं० (सं० कम्बोज) देश-विशेष; १) । (प० च० २७, ७)। कंपावण-न० (सं० कम्पन>प्रा० कंययडिअ-स्त्री० (देशज) कान का एक कंपण) कपावन । वि० (सं० कम्पिन् > आभरण । -हि; (रा० १९)। प्रा० कपि) कॅपाने वाला; (जंबू० ५, कंवल-पुं० न० (सं० कम्बल >प्रा० १३, ६)। कंबल) कामरी, ऊनी कपड़ा; (जस० ३, कपि-स्त्री० रसिका छंद का भेद; (प्रा० १६, ४)। पं० १, ८६) । कंस-पु० (सं० प्रा० कंस) श्रीकृष्ण का . कंपिय-वि० (सं० कम्पित>प्रा० मातुल, पुरुष-विशेष; (ण० ४, ६, ११)। कंपिअ) कांपा २, १३, राजा का नाम; (प्रा० पं० २, ७१) । काँप गया; (की० हुआ; (व० कंसार (१७५) कइदिण - - थोडा, कंसार-(दे०) कसेरा, ठठेरा; (जंबू० कुल) कविजन; (की० २, १४)। ५, ७, १७)। -केय, पुं० (सं० कपिकेतन) कपिध्वज, कंसाल-पुं० (सं० कांस्याल>प्रा० वानर-द्वीप के एक राजा का नाम; (प० कंसाल) वाद्य-विशेष; (प० च० २४, २, च० ४८, १३, ६)। -यण पुं० (सं० ३; प्रा० गु० ३२, ३)। -य पुं० (सं० कविजन) कवियों; (सुदं० २, ३, २) । कांस्यतालक) वादिन, वाध-विशेष, (५० -रव न० (सं० करव>प्रा० कइरव) च० ५७, २३)। कमल; "वियासाविय-कइरख-कलिय कॅसेरी--स्त्री० (सं० कांस्यकार>प्रा० करव-कलियों को विकसित करने वाला; कंसयर>अप० कंसेर+ई प्र०) कसेरौं (व०६, ६६) वय,-वाह वि० (सं० का बाजार; (को० २, १०१)। कतिपय) कई एक; (प० च० ११, कस-वि० (सं० कृत >प्रा० कड, कय) १६) । कईसा-पु (सं० कवीश >प्रा० किया हुआ, बनाया हुआ; (ण० १, १८, कईस) श्रेष्ठ कवि; (प्रा० पं० २, १)। १४५)। का-पु० (सं० प्रा० काय) शरीर, कइअंक, कइअंकसइ-पु० (दे०) निकर, देह; (प्रा० पं० २, ६४)। समूस; (दे० ना० मा० २, १३)। कईद-पु० (सं० कवीन्द्र) नाम-विशेष; कइउल्ल-वि० (दे०) अल्प; (ण० ५, २. ४)। (दे० ना० मा० १, २१)। कइ-वि० (सं० कति >प्रा० कइ) कई, कइगई-स्त्री० (सं० कैकयी) राजा कितना; "कइहिं दिरणे हि परिणाविउ दशरथ की रानी; (प० च० ६५, २१) । देविउ, मन्दसुणन्दाइज सिय-सेयित," कइत्त-पु० (सं० कवित्त) १- कविता, अर्थात् कई दिनों बाद, उन्होंने नन्दा पद्य; (प्रा० ५० १, १५२)। २- पुं० सुनन्दा नामक श्री से सेवित दो देवियों से (सं. कवित्व १- काव्य विवाह किया, (प० च० २, - काव्य-रचना शक्ति; (जंबू० १, ५, पुं० (सं० कवि>प्रा० कइ) कवि (ण० १३) । - पुं० (सं० कवित्व) १, २, १०; की० २, १४) । प० (सं० १- काव्य-रचना-शक्ति, २- के> कइ) की; (को० ४, २७) । पुं० गुण; (जस० ४, १४, १५)। -धाम पुं० (सं० कपि) बंदर; (व० १०, १८, १)। (सं० कवित्वधाम) कवित्व से संपन्न प० -के (संधि १२, ४, ८) । क्रि० वि० (जंवू० ११, १, १)। (सं० कदा>प्रा० कया) कभी; (की० १, कइत्य-वि० (सं० कृतार्थ) कृतज्ञा १३९) । -अरो पु० (सं० (सं० कविवरः) (सुदं० ११, ११, १)। श्रेष्ठ कवि; (प्रा० ५० १, २०) । कइदिरण-पु० (सं० कतिपय+दिनम् ----कुल, पु० (सं० कविकुल) बंदरों का प्रा० कइस+दिण) कई दिन; (जंबू० समूह (जंबू० ५, ८, ३४)। (सं० कवि १०, २१, ६)। . का गुण; ८,७)। काव्य का इंद (१७६) कउडी (paneg. कैसा; कहां से कइअ-पुं० वानरवंशीय राजा; (प० कइवार-पुं० स्तुति पाठ च० ६, ८३) । yric); तुल० प्राचीन गु० कइवार; (प० कइमइ-स्त्री० (सं० कवि+मति >प्रा० च० ३५, ८, ६) कइ+ मइ) कवि की बुद्धि; जस० १, कइवित्त-० (सं० कवित्व) कविपन; २३, १०)। (ण० ६, ६, ८)। कइयल रिंग-क्रि० वि० कब से; (सं०- कइस-वि० (सं० कीदृश) रा०)। (रा०) । कइसीi (रा० १४)। कइसउ कइय?--अव्य० (सं० कदा) कव; (प० (रा० २४) । कइसे; (रा० २०; की. च० ६, ६, ५)। २, १४६)। कइयह-अव्य० (सं० कदापि) कभी; कई-वि० (सं० कति>प्रा० कई) (भ०) । - (कइयहा) (सं० कदा) कितना-कितनी; (प्रा० ५० १, ४६) । कव, किस-समव (सण०; जस० १, ५, कउ-क्रि० भू० का० (सं० कृत) किया १२)। "रिणग्गन्थु णिऍवि उवहासु कउ," अर्थात् कइरव-न० (सं० करव>प्रा० कइरव) 'निग्रन्थ देख कर उसने तुम्हारा मजाक कमल; (जंब० ८, १४, १५) । उड़ाया'; (प० च० ६, १५, ४)। कइराअ-पु० (सं० कविराज) श्रेष्ठ फउ-अव्य० (सं० कुतः) कवि; (जस०)। 'कउ दीसन्ति पडीवा उज्झहिँ एक्कहि- कइलास-पु० (सं० कैलाश>प्रा० कइ. मिलिया" अर्थात् 'कहाँ से वे एक साथ लास) कैलाश पर्वत; (प० च० १३, ६, मिलकर अब अयोध्या में दिखाई देंगे, २)। --गिरि (सं० कंलाश गिरि) (प० च० ५, १२, ६; हे० ४१६, १)। कैलाश पर्वत; (जंवू० ६, ६, १)। २- (सं० कथं) कैसे; (हे०. ४१८, १)। कइल्लबइल्ल-पुं० (दे०) स्वच्छन्द- कैसा, "अण्णु वि एत्तिउ सोहग्गु कउ । चारी बैल; (दे० ना० मा० २, २५) । कङ्कणु कुमाए तउ' अर्थात् 'और कइसिय–वि० (सं० कपिवंशिक) तुम्हारा इतना सौभाग्य कैसे हो सकता है कपिध्वजी; (प० च० १२, २, ७)। कि कुमार तुम्हें कंगन दे, (प० च० ११, कइवइ-पुं० (सं० कवि+पति >प्रा० २, ३) । ३. प०, को; "हर कउ भगत कइवइ) श्रेष्ठ कवि, कविराज; (जस० हरदत्त नाम"; (की० ३, १३७)। २, १०, ३)। कउप-वि० (द०) प्रधान, मुख्य कइवय-वि० (सं० कतिपय) कई एक; २- चिह न; (दे० ना०. मा० २, ५६) । (ण० ४, ७, १०)। कउच्छेअय--पु. (सं० कोक्षेयक) पेट कइवयं-पु. (सं० कैतव) कपट, झूठ, पर बँधी हुई तलवार; पड्) । धोखा, चालबाजी; (ण. ८, १२, कउडी-स्त्री० (सं० कपदिका) कोडी; गु० कोडी, (प्रा० गु० १६, ४०) । में देइ - १०)।
कउण (१७७) करकर सत्तुहि मित कउण-सर्व० (सं० क:+पुन:>प्रा० का कुबड; (पड्)। कवण) कौन । कउणु; (रा० ४१) । क उमहाग-पुं० (सं० ककुभ+मार्ग> कउतिग-पु० (सं० कौतुक) आश्चर्य; प्रा० कउहा+मग्ग) दिशा-मार्ग; (प० (संधि० २, १, ६)। च० १०, १, ८)। कउतुकमङ्गल-पु० (सं० कौतुकम- कए'-१० (स० कृते) लिये; (प्रा० ५० ङ्गल) नगर-विशेप; (प० च० २१, २, १,६७)। १)। फए-क्रि० भू० का० (सं० कृत>प्रा० फउत्तल-पुं० (सं० कुन्त >प्रा० कुंत) कए) किया, "अन्तरिख अप्सरा विमल भाला; (क० ३, १३, ६)। कए वीजए अञ्चल," अर्माद आकाश में कउल-पु. (सं० कौल) कापालिक, अप्सराएं पुण्यात्मा वीरों के ऊपर अंचल शव मत का तांत्रिक साधु, कुलानार्य; कुलानार्य; से पंखा झलती थी, (को० ४, २, १६) । (जस० १, ५, २१) । २- ३० संप्रदाय. व० कृ० करके; "तुम्हे विशेप; (ण० ६, ६, २) । ३. न० सूखा कए भुजह तिरहुत राज," तुम्हे शत्रु को गोबर, करीप; (दे० ना० मा० २, ७) । मिन्न बनाकर तिरहुत का राज भोगना ४- पुं० (सं० कपोल) गाल; (संधि० चाहिए; (को० २, २७) । २, १३, ३)। -उल पुं० (सं० कौल कओज-पु० (सं० कमोलः) गाल; +कुल) कापालिक आदि दुष्ट धार्मिक (मं० रा०)। समूह; (जस०)। ककु:-पु० इक्ष्वाकुवंशीय राजा; (प० कउलेवउ-वि० (सं० दलित >प्रा० च० २२, २६)। कवलिअ) कवलित, भक्षित; 'काले कउ. करकड'-वि० (सं० कर्कश>प्रा० लेवउ हउ मि तेम' - उसी प्रकार मैं भी करकस, कस्कसड) कठोर, परुप; (प० काल से कवलित होऊँगा; (महा० ६८, च० ३५, १, ५३)। ११, ३)। करकड-० (सं० कउसंवि--स्त्री० (सं० कौशाम्बी) नगर ककार) कर्कराशि (कर्क नक्षत्र); "जिह विशेप; (क० १, ७, ६)। गयणु तेम सो मीणजुत्तु जिह गयणु तेम कउसीसे -पु. (सं० कपिशीर्ष>प्रा० कक्कडविचित्तु" -वहाँ मछलियां भी थीं कविसीस) कंगूरा; "मरिणमय तोरण दंड और अतः वह मीन राशि युक्त गगन के धज कउसीसे नव घाट, तुल० गु० समान था। वह कर्कश और विचित्र था, कोशीसु; (प्रा० गु० १०, १६) । अतएव कर्कराशि और चिता नक्षत्र से कउह-पु० - (स० ककुम) ककुभ वृक्ष, युक्त गगन के समान था; (सुदं० २, अर्जुन का पेड़; (जंवू० ५, ८, १२)। १४, २)। न० (दे०) नित्य, सदा; (दे० ना० मा०. कक्कर-वि० (सं० कर्कर>प्रा० २, ५)।पु० न० (सं० अकुद) वैल के कंधे करकर) कठोर; (ण० ७, १०, ८; प० --- कर्कर>प्रा० --- ..
- कक्कस (१७८) कच्दासण च० ८, १०, ८) । पु. (सं० कर्कर> मुख विकसाती;' (मृदं० ८, २८, ८)। प्रा० कक्कर) कंकर, कंकड; तुल० गु. कारखडंगी--- ० (दे०) सखी, सहेली; कांकरी; (प० च० २४, ३, ६)। (३० ना० मा० २, १६)। करकर'-वि० (सं० कर्कश >प्रा० कगलंत उ-पुं० (सं० कङ्काल >प्रा० कक्कस) कटोर; (भ०; जस० २, ३१, कंकाल) चमड़ी और मांस-रहित अस्थि- २)। पञ्जर; कंकाल; "वंदिणु आवंतट णं कवकत', कक्कसार-० (दे०) करम्ब, कगलंतउ खुडियसीसु विगुत्तउ" वन्दी दघ्योदन; (दे० ना० मा० २, १४)। को मुंडे सीस व विकृत अवस्था में कंकाल कक्केसण-पुं० न० (सं० कर्केतन) रत्न जैसे आते हुए; (म० २, १६, ११)। की एक जाति; (प० च० ३,. ७५) । कग्घाड-पुं० (दे०) १ चिरचिरा; करखंतर-पु० (सं० कक्ष+अन्तर) २- दूध की मलाई; (दे० ना० . मा० २, पेट, कुक्षि; "कक्खंतर कहेइ क वि कवणे ५४) । मउलिनयणकण्णकंडुवणे," -कोई आंखे कचोर--१० सूखा हुआ और भूना हुआ बंद करके कान खुजलाने के वहाने से या छींका हुआ अचार (drid and अपनी कुक्षि को वतलाने लगी; (जंवू० fried pickles); तुल० गु० . काचरी, ८,१६, ६)। भ० कच्चरा; (प० च० ५०, ११, कक्ख-वि० (सं० कर्कश>प्रा० १)। कक्कस) कटोर; (जस० १, ५, १६)। कच्च-न० (सं० काच>प्रा० . कच्च) पु० (सं० कक्ष>प्रा० कक्ख, कच्छ) शीशा, कांच; (प० च०. २२, १०, ८) । कमरा; तुल० म० काख; (प० च० १६, लो०-कच्चे, पल्लटइ को रयणु, पित्तलह १५, ३) । -ड (पु० सं० कक्ष) लतावृक्ष हेम विक्कह कवणु-अर्थात् 'कांच से रत्न आदि गुल्म (ऐसा पौधा जो एक जड़ से को कौन बदलेगा? पीतल से .. सोने को कई तनों के रूप में निकले, जैसे ईख, कोन वेगा? तुल० पं०: पं०: कच्च; वाँस आदि); (जस० ३, ३२, ६)। (जस०) । २- न० (सं० . कृत्य) कार्य; कक्खड-वि० (सं० कर्कश>प्रा० (दे० ना० मा० २, २)। कक्कस, कक्खंड) १- कठोर, परुस; (प० कच्चरा-स्त्री० (दे०) कचरा, कच्चा च० १३, ८, ४) । "पहुआएसु सकक्ख खरबूजा २- कचरा को. सूखाकर, तल डमाण;" (भ०.१०, ४, १)। कर और मसाला डालकर बनाया हुआ २- तीक्षण; (प० च० १३, ८, ४)। खाद्य-विशेप, एक प्रकार आचार; तुल० ३- पीन, पुष्ट; (दे० ना०. गु० काचरी, म० काचन्या, कचोत्या, ११)। "पुणो कच्चरा पप्पडा दिण्णभेया," (भ० कक्खर-पु. कटाक्ष; "कक्खउ दावइ १२, ३, ८). वियसावई"--अर्थात्" कटाक्ष देती; कच्चासण -पु.ल. (सं० कपण+अशन) मा० २, - (१७६) कच्चा भोजन, आंच पर न पका हुआ ५०)। भोजन; (सा० १४)। कच्छी-मी० कटिवस्त्र, कच्छा; (जंबू० कच्चे-न० (सं० काच>प्रा० कच्च) ५, १०, ८) । कांच, शीशा; (जं० २-१८) । कच्चरिम -वि० (दे०) ईपित, जिसके कच्चोल-० (प्रा० कच्चोल, कच्चो साथ ईर्ष्या की जाए वह; (दे० ना०- लय) पात्र-विशेष, प्याला, कटोरा; तुल० मा० २, १६) । म० कंचोलें; (जस० २, २३, १०; प० कन्छुरी-स्त्री० (दे०) कपिकच्छु, च० २५, ११, ३)। अ (नुद०८, केवांच; (दे० ना० मा० २, ११)। १७, १०)। कच्छेल्ल-पु. कच्छ देश; (जंबू० ६, कच्छ'–० (सं० कच्छप) दोहा छंद १६, ४)। का भेद; (प्रा० १० १,८०) । २- पुं० का सर्व० (सं० कश्चित्) कुछ; (की० (सं० प्रा० कच्छ) (१.) लंगोट: (प. २,४१)। च. ४, ११, २) । (२.) देश-विशेष; कज्जत:-पुं० (सं० कार्यान्तर) कार्य (भ०)। -डंअ (य) कछौटा, कछौटक; का अंतर; (जंदू० ८, ६, ११). (जंबू० ५, ७, १३)। -व, पुं० कच्छ, कज-पु० (सं० कायं >प्रा० कज्ज) देश-विशेप; (भ०)। -अवणीतु पु० १- काज, अदालती फर्याद या दरवारी कच्छ देश का राजा; (व० ३, ३०, २)। अर्शस (परिभाषिक शब्द), (की० २, -णरेसर पुं० (स० काछनरेश्वर) कच्छ ११५) । २- काम; (ण० १, ३, १०, देश का नृप; (व० ३, ३०, २)। प्रा० ५० १, ३६) । -कज्जि; (व० १, कन्छ'-पु० (सं. कन्छप>प्रा० ७, १२) । १ज्जु (व० १, १६, १)। कन्छभ) कन्हुआ; ' तुल० ५० -उड पु० (दे०) अनर्ध; (दे० ना० (रि० २, २)। मा० २, १७)। -गइ (सं० कायंगति) कच्छप-पुं० (सं० कच्छप>प्रा० (जं० ६, १६, ५)।-त्थिय वि० कच्छम) कूर्म, कटुवा; (व० (सं० कार्यार्थी+क) किती पदार्थ. की १२) । कच्छव-पु० (सं० कच्छप); (सं० कच्छप); प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील; (जंवू० ६, (जं० ४, ६, ५)। १२, ३)। -बंध पुं० सं० (कार्य-बन्व) कच्छर-पु० (दे०) पङ्क, कंच, कार्य का बंधन, (प्रा० ५० १, ३७)। कर्दम; (दे० ना० मा० २, २) । -लुद्ध वि० (सं० कार्यलुब्ध); (जंबू० कच्छरिच्छ-पु० (सं०. का+ऋक्ष) ४, १७, ५)। -कज्ज-पु. (सं० नक्षत्रमाला; (ण० ३, ६, १५) । कार्य+अकार्य) (जंदू० ५, १३, १६) । कच्छा-पु० (सं० प्रा० कच्छ) कच्छ -णुराअ-पु० (सं० कार्यानुराग); देश; (व०८, १, २)। स्त्री० (सं० (जस ० १, ८, १)। कज्जु-पुं० (सं० कक्ष्या) विभाग, अंश; (प० च० १६, कार्यम्) कार्य; (विला०; हे. ३४३, . १०८, .कज्जल (१८०) कट तक देने प्रा० २) । कज्जे-० कारण, हेतु, के लिए, फटक-पु० (मं० कटक) सेना, राजगि- "सिरिकण्ठकन्जे थिउ देवि सिन" दात् विर; (को०३, १२)। -बाल पुं० 'श्रीकण्ठ के लिए अपना सिर (म० कटकपाल) सेनापति; (उ० व्य० को तैयार घा'; (प० च० १२,५, प्र० ५१-११)। ५)। कटकाई-स्त्री० सेना की यात्रा, फौज कज्जल न० (सं० कज्जल) की कूच; (की० ३, १५६) । काजल; (को० २,८९) । कटकानी--स्त्री० कटकाई, कटक वा कज्जलध्वज-पु० (सं० कज्जलध्वज) कज्जलध्वज) सेना का प्रयाण; (को० ४, १०६)। दीपक; (की० १,८)। कटरि---अव्य० आश्चर्य, आश्चर्योद्गार; कन्जद-पु० (दे०) विष्टा; (प० च० (सधि० १, ८, ५) २, ११)। फटाक्ष-पु० (सं० कटाक्ष) १- तिरछी फज्जे)-१० (सं० कार्य) के लिए । चितवन, २- किसी पर आक्षेप करने के कत्रोण-सर्व० (सं० क:+पुनः>प्रा० लिए कही जाने वाली कोई व्यंग्यपूर्ण कवण) कौन; (की० ३, १६)। वात; (की० २, १५१)। कञ्चण-न० (सं० काञ्चन>प्रा० कटारिय-न० (दे०) कटारी, क्षुरिका; कंत्रण) सोना; (प० १० १, ५, ८)। (मि० २, २४)। २- पुं० कंचन नामक वृक्ष; (प० च. कट्टारी-स्त्री० (दे०) कटारी,. हुरी; ३, १, १०)। (दे० ना० मा० २, ४) । कञ्ची-स्त्री० (सं० काञ्चि, ची> /कट~(सं० कृत् >प्रा० कट) प्रा० कंची) काञ्ची नगर, (प० ३० काटना, छेदना । ~, क्रि० (सं० कर्त- ४६, ८, ६)। यति) तुल० म० काटणे, गु० कावु कञ्चु-(सं० कञ्चुक >प्रा० कंत्रु, (म०) । कट्टि-पू० का० कि० कट कर; कंबु) चोली, स्त्री का स्तनाच्छादक (की० ३, ७) । कट्टिअ, (प्रा० ५० १, वस्त्र; (५० च० २६, ११, ६)। १३४)।-ट्टिवि पू० का० क्रि० (क० कञ्चुझा-स्त्री. (सं० कञ्चुकं>प्रा. ८, १२, ६) । कद-वि० (सं० कतं.) कत्ता; (पड्)। कंचुआ, कंत्रु) कञ्चक, चोली; (हे. काटण-न० कत्तंन>प्रा० ४३१,१)। कत्तण) काटना; (रि० ६, १५)। कञ्चुय-पु० (सं० कञ्चुक>प्रा० /क'- (सं०/कर्प). काढना, कंचुअ, कंचु) कवच, वक्षस्नाण, जिरह- निकालना कठ्ठिएउ; (प्रा० पै० २, बस्तर; (प० ० ४, ७, १०)। ७१)। कञ्ज-पुं० (सं० कञ्जः) कमल; (प० कठ्ठ-न० (सं० काष्ठ) काठ लकड़ी; च०१८, ६, १). तुल० म० काठी; (ण० ५, १२, १०) । - (सं० कट्ठ (२८१) कडक्यि - - गला; कट्ठाइ (काष्ठ+आदि); (जंबू० ११, क-न० (सं० कष्टम् >प्रा० कट्ठ) १५, ६) । - कम पु न० (सं० काष्ठ दुःख, पीड़ा, व्यथा; (उ० व्य० प्र० ४६- +कर्म) काठकर्मन्, काठ का काम, ११)। व्यापार; (जस० १,२४, ४)।-मअ-वि० कडंतर-न० (दे०) पुराना सूर्प (छाज) (सं० काष्टमय) लकड़ी-युक्त; (ण० ६, आदि सामग्री; (दे० ना० मा० २, ७, १०) । कठ्ठिय-धर-वि० (सं० १६) । काठिका-धर) लकड़ो को रखने वाले; कडंतरिअ-वि० (दे०) विदारित, विना- (प० च. ३, ५,१०) । कट्ठियवाले शित; (दे० ना० मा० २, २०) । पु० (सं० काष्ठिका+पाल) दण्डधारी; कडंभुअ-न० दि०) १- कुम्भत्रीव-नामक प० च० ३, ६, ६)। कट्टीहर-वि० पान-विशेप, २- घड़े का कण्ठ-भाग; (सं० काण्ठ+घर>कट्ठ+घर) काष्ठ (दे० ना० मा० २, २०) । धर, पहरेदार "कट्ठीहरम्मि आउच्छि कडअ-पु. (सं० कटक) छावनी; यए," यष्टिधारी पहरेदार ने पूछा; (जंबू० ६, १, १८)। कडअल्ल. (सुद० ८, १२, ५)। पुं० (दे०) द्वारपाल, प्रति- कट्ठ-पु० (सं० कष्ट>प्रा० कट्ठ) हार; (दे० ना० मा० २, १५)। दुःख, पीड़ा, व्यथा; (को० ४, १२३) । कडअल्ली-स्त्री० (दे०) कण्ठ, -डा पु० कष्ट (दे० सा०. दो०)। (दे० ना० मा० २, १५) । -भार पुं० कष्टभार; (जंबू० १०, १३, कडइअ-पु० (दे०) वढई, स्थपति; १)।-मय वि० कष्टमय; (जंवू.० ६, (दे० ना० मा० २, २२) । १, ६)। -वृत्तपु० (सं० कप्ट+ कडइल्ल-पु० (दे०) प्रतिहार, दरवान; उक्त) (ण० ६, १७, २७)। कट्टे-पु. (दे० ना० मा० २, १५)। कष्ट; (को० ३, १०५) । कडउ-पु० (सं० कटक) कड़ा, कंकण, कट्टि-० (दे०) चपरासी, द्वारपाल, चूड़ा; (जंवू० ३, १४, १३) । प्रतिहार; (दे० ना० मा० २, १५)। कडउल्ल-पु० न० (सं० कटक+उल्ल कट्ठियधर-वि० (सं० काष्ठधर) काष्ठ (स्वार्थे)] सेना के रहने का स्थान; "को को धारण करने वाला, दण्डधर; (जंवू० रक्खइ एवहिं कडउल्लउ" -ऐसी अवस्था ७, ७, ११)। में कौन कटक की रक्षा करे; (ण० ३, कठिण वि० (सं० कठिन>प्रा० १६, १०)। कट्ठिण, कढिण) १- कठिन; (सं० रा०; कडउल्ला-पु० (दे०) आभूषण-विशेप, भ०) । २- कठोर; (प्रा० 4०१, कटिसूत्र; तुल० गु० कडलु; (प० च० ७६)। १४, ५, ७)। कठिणि-स्त्री० (सं० कटिनी) मेखला, कडक्यि-वि० (सं० कडकडकृत) कडक- करघनी; (रि० ६,१)। डायित (ध्वन्य०); (जंवू० ७, ८, १२) । . - कडक्ख (१८२) कडह भ०)। कडप्यु संकेत, /कडक्स--सक० (सं० कटाक्षय) कडन्तरिय-वि० (दे०) दारित., चौरा कटाक्ष करना । -इ, कि० (सं० कटा- हुआ; (भ०)। क्षयति) (भ०; जंबू० ११, १४, कडप्र-पुं० (दे०) कलाप, समूह, ११)। निकर; तुल० गु० कडपलो, म० कडप्पा; कडपख-पुं० (सं० कटाक्ष>प्रा० कड प० च० १३,६,१; वख) कटाक्ष, तिरछी चितवन, आँख का (प० १० १३, ८, ४)। भावयुक्त दृष्टि; तुल० म० कडमण-पुं० विनाश, विध्वंस; (प० कडाखा; (सं० रा०; प्रा० ५० १, ४, च० ३६, ५, ३) । विनाशक; (प० च० ण० ६,१४, २; म० २, ७८, ३)। ३७, १३, १)। फडक्खरण-० (सं० कटाक्षण) कटाक्ष कडय-पु० न० (सं. कटक>प्रा० करना; (भ.)। कडग, कडय) १- शिविर, सेना का रहने कडकिसय-वि० (सं० कटाक्षित) जिस का स्थान; (ण ० ७, १०, ३)। पर कटाक्ष किया गया हो वह; (जंत्र १- सेना; (सि० २, १४)। ३- आभूषण; २, २०, ११)। (व० १०, ३१, १६) । ४. कड़ा; (जंबु० कडच्छ-पु० (सं० कटाक्ष>प्रा० कड २, २०, २१)। ख) कटाक्ष, तिरछी चितवन; . (जंबू । फड़यडत~० कृ० (सं० कडकडाय। ६, १३, ५)। शत) (वन्या०) कड़कड़ की. आवाज फडच्च-स्त्री० (दे०) चमची, करछुल, करते हुए; तुल० गु० कडकडतु; (जंबु० की; तुल० पं० कड़छी; (दे० ना० मा० ११, १५, ६)। २, ७)। कडण्ड-पु. (सं० कडकड>प्रा० कड- कडतल--न० (सं० कहितल>प्रा० यड) कटकट या कड़-कड़ . की आवाज; कडियल) कटितल, कटि-प्रदेश; (सि० २, (म० २, ८१, ७; ण० ४, १५, ६)। २४)। कडडिय-वि० (सं० कडकडायति, कडतला-स्त्री० (दे०) लोहे ध्वन्या०) कड़-भाड़ की आवाज करने प्रकार का हथियार, जो एक धार वाला वाला; (जं० ७, ५, ६)। तथा वक्र होता है; (दे० ना० मा० २, कडविमद्दण-पु० (सं० कृत+विमर्दन) १६)। १- रौंदना, कुचलना, २. कडत्तरिअ-वि० (दे०) . विदारित, "पत्तमोह-पडिय- जोह- "पत्तमोह-पडिय- जोह- कडविमद्दणे", विनाशित; (भ०)। मूच्छित होकर, पड़े हुए योद्धाओं का फंडत्ति--पू० का० क्रि० कड़-कड़ करके; मर्दन हो रहा था; (जंवू० ६, १०,४)। (रि० ५, ८)। कडसी-स्त्री० (दे०) श्मशान; (दे० झडहरिय-वि० (दे०) १- छिन्न, काटा ना०मा० २...६)। हुआ; २. न० छिद्रता; (पड्) । सह-पु० (सं० कटभु>प्रा० कडहू) का एक नाश, ध्वंस, कडाय (१८३) कडिसुत्त -विशेष, फलक, का घुमाना- वृक्ष कटहल; (जंबू० ५८, 'तस्ता या धू तफलक; "कि १०)। कडित्तु णं णं गयणंगणु" अर्थात् द्यूतफलक कडाय--पु० (सं० कटाह>प्रा० कडाह) क्या है मानो गगनरूपी आंगन है; (ण० कढ़ाही; (व० ४, २१, १३)। ३, १२, ५) । कडार-न० (दे०) नारियल; (दे०- फडिदोरय-पु० (सं० कटिदोरक) कटि- ना० मा० २,१०)। सूत्र; (सुदं० ३, ७, ८)। कडाह-पु० (सं० कटाह >प्रा०कडाह) कडिपरिहाण-पुं० (सं० कटि+परि- कहाह, लोहे का पात्र, लोहे की बड़ी धान) कमर पर पहने जाने वाला वस्त्र; कड़ाही; तुल० म० कढई, वडे; (जस० (जंबू० ६, १२, १३)। २, २८, ३; भ०)। २- वृक्ष-विशेष; कडिबिंद-पुं० (सं० कटि+विम्ब)कटि- (प० च० ५३, ७६)। तल, "वियडकडिविबखिन्नाएँ थक्कि- कडाहपलहत्यियं-न० (दे०) 'दोनों ज्जए" - 'जहां अपने कटितल की विशा- पाश्वों का पलटाव या उलट-फेर, पाखों लता से क्लान्त हुई'; (जंवू० ५, ६, -फिराना; (दे० ना० मा० २, ११)। २५)। कडियल-न० (सं० कटितल>प्रा० कड-१. स्त्री० (सं० कटि>प्रा० कडियल) कटी-प्रदेश; (भ०) । कडि ( कमर, कटि; (जस० १,१६, कडिल्ल-(दे०) १. वन (प. च० २, ३)। -हत्य पु० (सं० कटि+हस्त) ५२) । २- वि० छिद्र-रहित; (दे० ना०- कमर पर रखा हुआ हाथ; (दे० ना० मा० २, ५२) । ३- न० (दे०) कटि- मा० २, १७) । २- स्त्री० तलहटी, वस्त्र, कमर में पहनने का वस्त्र; (भ०)। "उवयायल-कडिणि परिटिओवि"-उदया ४- विपक्ष, ना०मा० २, चल की कटमी-- तलहटी में स्थित होने ५२) । कडिल्लई-न० कटिवस्त्र (रि० पर भी; (व० ६, ८, ८)। ६, ७)।-य (प० च० ४६, ५, ६; कडिअ-वि० (दे०) प्रीणित, प्रसन्न दे० ना० मा० २, ५२)। किया हुआ; (षड्)। कडिसरउ-न० (सं० कटिसूत्र >प्रा० कलिखंभ-पु० (दे०) कमर पर रखा कडिसुत्त) करधनी, मेखला, हुआ हाथ; (दे० ना० मा० २, १७)। पहनने का एक गहना; (प० च० १३, २- कमर पर किया हुआ आघात; (दे० ना० मा० २, १७)। कडिसुत्त-न० (सं० कटि-+सूत्र>प्रा० फडित्त-पु. (मं० कटिन १- करधनी, करिसुत्त) कमर का आभूषण, मेखला, मेखला, २- धोती, कमरबंद; (म० २, (ण० ३, १०, ५; भ०) - -य (सं० १५, २)। कटिसूत्र+क) मेखला; (जस० १, ६, कडित-न० (दे०) जुआ ६)। शन्नु; (३० कमर में खेलने का (१८८) कढ कमर भ० । (ण० ४, कडिहार-न० (सं० कटिहार) -मि क्रि०, व०. निकालना, पर पहने जाने वाला आभूपण; "कडिहा- खींचना; (प० च० १५, २, ७)। कंड- रदोरकुंडलधरहो,” अर्थात् . कटिहार, ढंत-व० कृ० (कृप्+शतृ) (जंबू ० ४, कटिसून और कुण्डलों को धारण करने १५, १६)। कडतउ-कृ० खींचते. हुए; वाली; (जंबू० ३, ३, १४) । (विला०) । कड् ढि-भू० का० निकाल कडु-वि० (सं० कटुक >प्रा० कडुअ) ली; (को० ३, ७२) । कढिज्जइ-क्रि०, तिक्त रस वाला, कडुआ;. (M० ३, १४, व० सीव लिया जाना, काढ़ लिया जाना २; हे० ३३६, १)। यस वि० कटु; "वच्छु पियंतु खीरु कढिज्जइ" बछड़े (जस० ३, १२, १५) । -यसर पुं० के पीते-पीते ही गाय का दूध काढ लिया (सं० कटुक+स्वर) कटु स्वर; (जस० १, जाता है, (ण० ६, ६, २)। कढिवि- १४, ७)। पू० का० क्रि० निकाल कर कडुमाल-पु० (दे०) घण्टा; (दे० ना.. ११, ३) । कड्डेवि पू० का० क्रि० खींच सा० २, ५७)। कर; (सुदं० ८, १८, ४)। तुल० म० कडुआविय-वि० (सं० कटु+वृत> काढणें । प्रा० कडुइय) १- कड़आहट से पूर्ण, (प० कडण-न० (सं० कर्षण>प्रा० कल- च० ११, १२, ५) । २. चिन्तित, भारी ढण) आकर्षण; (जब० ७, ६, २६)। विपद् में फंसा हुआ, खराव; (भ०)। कणिय-वि० (स० कर्पणीय) निक- ६- पीडित, पराभूत; (प० च० २५, १५, सनशील; (जंबू० ५, ७, २४) । ७)। फड्ढय-वि० (सं० कर्षक) खींचने कढुक्क-वि० (सं० कटुक >प्रा० कडअ) वाला; (जस० ३, २२, १ )। कडुआ, तिक्त; (जंबू० ७, ६, १०) । कटाकइढि---स्त्री० (सं० कर्यापपि) कड्डय-वि० (२० कटुक >प्रा० कडुअ) खींचतान करते हुए लड़ना; (fight कडुवा; तुल० गु० कडवु, Hogy; involving mutual tugging and (५० ५० १२, ७, १)। pulling) (प० च० ५२, ६, ५) । कडुरडिय-पु. (सं० कटु+ रटित) कढिणु-वि० कठिन; (व० ५, १, कटु रुदन; (जंब० ४, २२, १८)। १)। वडुबयण-० (सं० कटु+वचन) कड्डिये-वि० (सं० कृष्ट>प्रा० कड्- कड़वे वचन; (जंबू० ६, १२, ६)। ढिय) निकाला हुआ, कडेवर-न० (सं० कलेवर>प्रा० कडे ५, १,६; प० च० १४, १३, ६)। वर) पालेवर, शरीर, देह; (प्रा० गु० कड्डिय-क्रि० भू० का०, (सं० कृष्ट> ३६, २८)। प्रा० कड्डिय) आकर्षित किया; (रि० 1/कड्छ---(सं० कृष>प्रा० कडढ ३, १)। खींचना। -इ सक० (सं० कर्पति); कढ-सक० (सं० क्वथ्); ? . खत्रा हुआ; हुआ; (ण क्वाथ ..
कए (१८५) कणई ई गरम करना २- उबालना, ३. तपाना, निष्ठुर; (प० ० २३, १५, ६) । पु. करना। कउंत-व० कृ० (स० क्वय् + इस नाम का एक राजा; (प० च० ३२, शत); (जं० २, २, २)। २३)। कढए-पु० न० (सं० कटक>प्रा० 1/कण-क्रि० (सं० क्वण्>प्रा० कण) कडग) पर्वत का मूल भाग; (प० च० शब्द करना, आवाज करना। -इसक० ७, १,२)। (ण० १, ७, ३) । व० कृ०-कणंत (ण० कढन्ता-कृ० का० वर्तमान में प्रयोग ८, १, ४)। कणेइ-व० ध्वनि करना; - क्रिया की तरह हुआ है सं० कृष् का . "सरिकमलु धुगइ दीहरु कणेइ; (क० ४, धात्वादेश प्रा० कड्ढ=पढ़ना, उच्चारण, १५, ६)। करना, (हे० प्रा० च्या० ४, १८७) + कण-पु० (सं० प्रा० कग) १. धान्य; 'अन्त' (शतृप्रत्यान्त);(को० २, १७२) । (व० २, ११, १०) । २ कन, कण, /कढकढकढ—कड़-कड़ की आवाज के लेश, अंश; तुल० पुं० कणी (a small साथ उवलना (boil intensely)| particle) (व० २, १७, १२; सं० रा०, -न्ति-नि० व०, व० (प. च. जस० १, ३, ११)। -भर वि० कण- २७, ५, ६)। भर (धान्यभार); (जस० ४, २३, ८) । कडकढकत-वि० सं० कडकडायमान) कगअ-पु(सं० कनक >प्रा० कणग) कड़-कड़ आवाज करता; (प० च० २१, सोना; (प्रा० ५० १, १०)। २- प्रथम ५०)। द्विकल गण (5) का नाम; (प्रा० १० १, कढकढन्त-व० कृ० (सं० क्वथन्) क्रोध १३३) । ३- राजा जनक के भाई; (प० से जलते हुए; (भ०)। च० २७, २५) । ४. राक्षस योद्धा; (प. कढिआ-स्त्री० (दे०) कढ़ी, भोजन च० ५६, ३२)। विशेष; (दे० ना० मा० २, ६७) । करगइर-कंव-न० सं० कर्णिकार। कढिरण-वि० (सं० कठिन >प्रा० कम्ब) कणिकार-यष्टिका, कनेर के वृक्ष कढिण) कठिन, कर्कश, कठोर; (ण०७, की लकड़ी; तुम० गु० कणेरनी कांब ७, ६)।-तु पु० काठिन्य; (व० ३, (प्रा० गु० २, ३, २५)। २३, ११)। कणइलु-पु० (सं० कर्णफूल) करनफूल, कढियल-न० (सं० कटि+तल>प्रा० कान का एक आभूषण; (पुष्पदंत, आदि- कडियल) कटी-प्रदेश; (ण० ३, १०, पुराण)। कणइल्ल-पुं० (दे०) शुक, तोता; (दे०. कढियाइ-स्त्री० कढ़ी, एक प्रकार का ना० मा० २, २१)। खाद्य पदार्थ; (दे० ना० मा० २, ६७)।, कणई-स्त्री० (दे०) लता, वल्ली; (दे०- कढोर-वि० (सं० कठोर) कठोर, ना० मा० २, २५) । :
कणउज्ज (१८६) कणयावली विद्याधर राजा; वृक्ष-विशेष, कण उज्ज-पु० (सं० कान्यकुब्ज) नगर --प्पह स्त्री० (सं० कनकप्रभा) कन्या; विशेष; (क० २, १०, ४) । (व० ७, ३, १०) | --प्पहु पुं० (सं० कणएं-पु. (दे०) वाण; (प० च० कनकप्रभ) राजा-विशेप, (व० ७, २, ११, ८, ४)। १)। -मइ स्त्री० (सं० कनकवती) करणओयरी--स्त्री० रानी-विशेप का स्त्री-विशेप का नाम; (क० ६, १४, नाम; (प० च० १७, ५५) । ६) । -मय वि० (सं० कनकमय) फरणकाणिय-वि० (सं० कणक्वणित) सोने से युक्त; (जस० २, १३, १)। कण-कण आवाज वाला; (सुदं० ७, ६, -माल स्त्री० (सं० कनकमाला) स्त्री- ३)। नाम-विशेष; (व० ३, १६, २)। कणग-पुं० मत्तियावई का एक वणिक्; -माला स्त्री० (सं० कनकमाला) कुस (प० च० ४८, १६)। --प्पह पुन की स्त्री; (प० च० ६८, ४)। -रह विद्याधर राजा; (प० च० १०३, १०८)। पुं० कंचण नगर का करणयंदी-स्त्री० (दे०) (प० च० १०६-१, २) । पाढल; (दे० ना० मा० २, ५८) । कणय-डोर-स्त्री० (सं० कनक+दोर करणय-न० (सं० कनक >प्रा० कणग, >प्रा० कणग, कणय+दोर) सोने की (कणय) सुवर्ण, सोना; (ण० १, ६, करधनी; तुल० गु० कन्दोरो; (प० च० १३; सं० रा०; सा० २११) । पु० ७, २, ७)। (दे०) शर, वाण, तीर, इषु, (प० च० कणयदीद-पु० (सं० २, ५, ६) । पु० राजा जनक के एक द्वीप या देश का नाम; (भ०) । भाई का नाम, (प० च० २८, १३२)। रावण का इस नाम का एक सुभट; (प० करणयसिरी-स्त्री० विद्याधररानी; ( च० ५६, ३२) -वनी स्त्री० कणया च० ६, २४१)। वली; एक राज-पत्नी; (प० करण्या-स्त्री० (सं० . कनक >प्रा० ४५) । -उरु पुं० (सं० कनकपुर) कणग) सोना; (सि० २, १८)। -भा नगर-विशेष; (व० ७, १ १२) । -कूट स्त्री० १- सोदास की रानी; (प० च० कनककूट (व० १, १२, ७)।-कूला २२, ७६); २- सत्तु दमण की रानी; स्त्री० (सं० कनककूला) नदी-विशेष; (प० च० ३८, २७); ३- पियवय की (व० १०, १६, ३) । -देवि स्त्री० पत्नी; (प० च० ३६, ७६); ४- अयल (सं० कनकदेवी) दिक् कुमारी। (व० (प० च० ८८-१७); ६, ५, १०)। -द्धउ पु० (सं० कनक- ५- विद्याधर रानी; (प० च०१०३, ध्वज) राजकुमार; (व० ७, १२, १०)। ५८) । —प्पभा स्त्री० रावण-स्त्री; राजा मरुअ कणयावली-स्त्री. १. विद्याधर राज- को पुत्री; (प० च० ११, १००)। पुत्री; मालवंत की स्त्री; (प० कनकद्वीप) एक च० ७, की माता; च०६, कणरणंति (१८७) कण्डुइय का शब्द करणा-स्त्री० तुल० म० कणिस cornear; सुणेवि . २४१) । २- लोकपाल कुबेर की माता; कणियार-० (सं० कर्णिकार) कनेर (प० च०७, ४५)। का वृक्ष; (जंबू० ५, ८, ११)। कणरणंति-क्रि० कन-कन करिबर-वि० (सं० ववणित) आवाज होना, कनकना उठना, "कणरणंति कडि करने वाला; (भ०)। क्वाणित; (जंवू० यलकिकिणियउ," (ण० ७, १४, ११)। कणिस-न० (स० करिणश) घान की ' कन्या (प० च० १२, ४, बाल, धान्य का अग्रभाग; १) । कणालगउ कृ० (सं० कर्ण+आल- (दे० ना० मा० २, ग्न) कान से लग कर; (ण० ३,१७, ६; ण० १, १३, ५) । न० (दे०) सस्य १२)। (अन्न, किसी किसी वृक्ष के केल का अग्रभाग) करिगप्रारिज-वि० (दे०) १. कानी "धान्यशीर्षवाची तु कणिस शब्दः संस्कृत- आंख से जो देखा गया हो वह, २- न० भवः"; (दे० ना० मा० २, ६)। कानी नजर से देखना; (दे० ना० मा०. कणेड्डिा-स्त्री० (दे०) गुञ्जा, २,२४)। घुघची; (दे० ना० मा० २, २१)। कणिउ-नं० (सं० क्वणित) ध्वनि कणोवन-न० (दे०) गरम किया हुआ "किकिणकणिउ विहसंतउ," जल, तेल आदि; (दे०ना० मा०२, १६)। घंटियों की ध्वनि सुनकर हंसने लगा; कण्ठाई-न० (सं० कण्ठिका>प्रा० (सुदं० ३, ७, ८)। कठिआ) गले का आभूषण, तुल० गु० कणिका--स्त्री० (सं० कणिक) रोटी के . कंठी; (प० च० ७, २, ६) । लिए पानी से भिगोया हुआ आटा; (दे०- कण्ठि-स्त्री० (सं० कण्ठ >प्रा० कंठ) ना० मा० १, ३७)। कण्ठ, घांटि; (हे० ४४४, १) । कणिक्य-स्त्री० (सं० प्रा० कणिका) कण्ठिय-स्त्री० (सं० कण्ठिका >प्रा० गुघा हुआ आटा लोई; (dough); कठिा) कंठा, गले का एक आभूषण; तुल० गु० कणक, कणेक । कारिणका, (प० च० १, ४, ३)। कणिक्का दे० ना० मा० १, ३७) । (प० कण्ड-पुं० न० (सं० काण्ड>प्रा० कंड) च० ४५, १२,४)। बाण, शर; (की० ४, १७२) । करिगट्ठ----वि० (सं० कनिष्ठ>प्रा० कण्डाकण्डि-स्त्री० काण्डाकाण्डि (a कणिट्ठ) लघु, छोटा; (ण० ४, ७, ६) । fight employing arrows); (90- -अ वि० (सं० कनिष्ठ+क) लघु; च० ५२, ६, ३)। (जस० ४, २४, ४)। कण्डुइय-कि० (सं०. कण्डूय्>प्रा० कणिय-स्त्री० (सं० कणी) कणी, कनी, कंडुम, कंडुअइ) खुजवाना, "लङ्गूल- कणिका; "हीरयकणिय दण्ड कण्डुइय- सिरु" अर्थात जो पूछ के पावइ," (जंदू० ११, १३, २) । दण्ड से अपने सिर को खुजला रहा है, - कवणु फिर (१८८) करणउम -माणु (प० च० १६, ७, १०)। ४; की० ३, १) ! --पवित्त (सं० कण्डर-पु. काण्डोर, दाशरथी भरत के कर्णप+मात्रम्) कान का आभूषण (ण. साथ दीक्षित राजा; (प० च० ८५, ३, १३, ५) । -पुड पुं० (सं० कर्ण- ५)। पुट; (जंवू० ३, १, २)। वि० करणं नलि-स्त्री० (सं० कर्णाजलि) (१) विनयशील, लज्जायुक्त, (२) कणं कर्ण रूपी अंजलि, "जिण वयणु-रसायणु +मरन (सम्मान); (सुदं० २, ३, ३) । पविरलुवि, कणंजलि-पुडहि पियहि खलु -रअ पुं० (सं० कर्ण, रव) कानों में वि," अर्थात् दुष्ट स्वभाव होते हुए हुए भी होने वाली आवाज; (क० ४, ६, ५)। उस सिंह ने जिनवाणी रूपी रसायन का -रवा स्त्री० सं० कर्णरवा, नदी-विशेष; अपने कर्ण रूपी अंजलि-पुटों से पान (प० च० ४०, १३) । -वडिल वि० किया; (व० ६, १६, २) । (सं० कर्ण+ पतित) शोर के कारण कान कपणंत-पु० (सं० कणं+अन्त >प्रा० में पड़ी हुई या भायी हुई आवाज सुनाई कण्णंत) कानों का सिरा; "कण्णंतपत्तन न पड़ना; (जंवू८, ७, १३)। -मूल यण जि घवला सिरभार पुप्फमाला पुं० (कणंगल) कान की पीड़ा; (जस० विमला,"- उसके नेत्र कानों के सिरे ४, ६, ३)। -हीण वि० (सं० कर्ण । तक पहुंचे हुए हैं, तथा धवन पुष्पमाला होन) बहरा; (जं० ६, २, ६)। उसके सिर पर भारमान है'; (जंबू० ५, कम्राउ-स्त्री० (सं० कन्या>प्रा० २, १९।। कण्णा) कन्या, लड़की; (सि० २,११, कणंबाल-न० (दे०) कान का आभू रि० १, १३)। पण-कुण्डल आदि, (दे० ना० मा० २, कण्णउज्न-पु (सं० कान्यकुञ>प्रा० २३)। कण्णउज्ज) कन्नौज नगर; (जंवू०. ६, कण्ण-० (सं० कर्ण) राजा का नाम, १६, १३)। कुन्तीसुत (प्रा० ५० १,६६, जस० १, कण्णजाउ-पु० (सं० कर्ण -जाप > ५, १)। स्त्री० (सं० कन्या>प्रा० प्रा० कण्ण+जाव) मन में देवता का स्म- कण्णा) कन्या, जस० १, १५, १) । पुं० रण; कान में मन्त्र का जाप या जप, द्विगुरु चतुष्कल गण का नाम (s), "मुणि कण्णाजाउ दिण्ण वरेण,” मुनि (प्रा० पं० २, ८८)। १- पुं० (सं० ने कान में णमोकार मंत्र का जाप दिया; कृष्ण>प्रा० अप० कन्ह) कृष्ण; (की० (क० ८, २०, ८) २,५१) । २- (सं० प्रा० कग्णड-पु० कर्णाट>प्रा० (सुदं० ३, ८, ४)। पुं० कर्णराज, कण्णाड). कर्नाटक प्रदेश, कन्नड़वासी (जंबू० १०, १, ६)। पुं० किनारा, किनारा, व्यक्ति; (सि० २, ६) । (जंबू० ५, १०, २४) । पुं० न० (सं० करण्डय-पुं० (सं० कणं>प्रा० कण्णा) कर्ण>प्रा० कण्ण) कान; (ण० १, १५, १. कर्ण, कान, २. काना, वस्तु के छोर . कण) कण, (सं० कण्णदान (१८६) कण्ह . का एक अंश (हे० प्रा० व्या० ४, ४३२) । ७, १३, ६)। कण्णवान-पु० (सं० कन्यादान) विवाह कण्णावतंस-पु० (सं० कर्ण + अवतंस) वर को कन्या देने की रीति; (व० ४,४, करनफूल, कान की बाली, बालीनुमा एक ६)। आभूषण; (जंबू० ४, १५, ६)। करणला-पु० (सं० कर्णाट>प्रा० कपणास-पु० (दे० ) पर्यन्त, अन्त- कण्णाड) कर्णाट देश के लोग; (प्रा० पैं० भाग; (दे० ना० मा० २, १४) । २, १२८)। कप्णिमा-स्त्री० (सं० करिणका) कमल कष्णस्सरिय-वि० (दे०) १. कानी का बीज-कोष; (दे० ना० मा०६, दृष्टि से देखा हुआ २. न० कानी १४०)। दृष्टि से देखना; (दे० ना० मा० २, कणिय-स्त्री० (सं० काणिका >प्रा० २४)। कण्णिा) वाण-विशेष; (जंवू० ७, १०, करणा-स्त्री. (सं० कन्या>प्रा० ५)। कण्णा) कन्यारत्न; (व० ८, ४, ४)। कण्णुप्पल-न० (सं० कर्णोत्पल) कान कण्णाउज-० (सं० कान्यकुब्ज नगर का आभूषण-विशेष; (व० ४, ६, ३)। विशेष; (ण० ५, २, ११)। 1 कपणे-कान देना; (प० च० १२१६ कण्णाड-पुं० (सं० कर्नाट >प्रा० २)। कण्णाड) प्रदेश-विशेष, जो आजकल कण्णोच्छडिआ -स्त्री० (दे०) दूसरे की कर्नाटक नाम से प्रसिद्ध है; (जंबू० ६, बात छिपकर सुनने वाली स्त्री; (दे० ना० ६, ११)। मा० २, २२)। कण्णाडि-स्त्री० (सं० कर्णाट>प्रा० कण्णोड्डिा-स्त्री० (दे०) स्त्रियों का कण्णाड, पुं०) कर्णाटि स्त्री, कर्णाट पहनने का वस्त्र-विशेष; (दे० ना० मा० (आजकल ककिट) देश की स्त्री, कर्ना २, २०)। टक वासिनी, कर्नाटी; (जं० ४, १५, कपोल्ली-स्त्री० (दे०) १. चञ्चु, ६)। कण्णाडी; (सुदं० ४, ६, ६) । २. चोंच; भूपण-विशेष, शेखर; (दे० ना० /कण्णारय-(सं० कर्ण+आर) आंकुस मा० २, ५७)। या पंना चुभोना (to goad); (प० च० कण्णोवगणिमा-स्त्री० (सं० कर्णाक- ४३, ६, ११) कण्णारिउ-भू० का० णिक) कानाफूसी, चर्चा, कानाकानी; कानों के पास अंकुश लगाया, (प० च० (दे० ना० मा० २, ६१)। १६, १४, २) कण्णारियय-भू० का० कण्गोस्सरिस-(दे०) देखो कण्णास्स- पैना चुभोया (goaded); (प० च० रिअ; (दे० ना० मा० २, २४) । २७, १०, १)। कण्ह-० (सं० कृष्ण >प्रा० कण्ह) कण्णारयण-पुं० (सं० कन्या+रत्न) श्रीकृष्ण, माता देवकी और पिता वासुदेव कन्यारत्न, कन्या रूपी रत्न; (जंबू० ते उत्पन्न नवा वासुदेव; (ण० ७, १५, - - कण्हवपण (१९०) कत्ती गन्धर्व, -- च० २०, ३)। -डणंदण पु० (सं० कृष्ण+ कर्ता, करने वाला; (व० २, ६, ८)। नन्दन) कृष्ण के पुत्र "गंधव्वें कत्तरि-स्त्री० सामरिक या युद्ध संबंधी कण्हड गंदणेण"; (जस० ४, ३०, १४) । साहसिक कार्य; "ढोक्करकत्तरिकरणप- -~-पुत्त पु० (सं० कृष्ण+पुत्र) कृष्ण वंचई," (भ० २, २, ७)। का पुत्र पण्डित ठाकुर; "हो पंडियठक्कुर कत्तरी--स्त्री ० (सं० कर्तृ >प्रा० कण्हपुत्त; (जस० ४, ३०, ४)। –राय कतरी) कतरनी, कैंची; (ण. ६, १८, पुं० (सं० कृष्णराज) पुरुष-विशेष; (ण. १२) । १, १, ११) । कत्तविरिय-पुं० सावत्थी नरेश; चक्र- कण्हवण्ण-स्त्री० (सं० कृष्णववर) वर्ती सुभूम वे पिता; (प० नदी-विशेष; (प० च० ३६, १, ३)। १३६)। कण्हायणु-न० (सं० कृष्ण+अजिन) कत्तार--वि० (सं० (कर्तृ) कर्ता, करने कृष्ण-मृगर्च, काले हिरन का रोंएदार वाला; (जस० २, १६, १३) । चमड़ा; (ण० ६, ६, ५)। कत्ति-स्त्री० (सं० कृत्ति>प्रा० कत्ति) कण्हु-पु० (सं० कृष्ण >प्रा० कण्ह) चर्म, चमड़ा ध्याघ्र आदि का चर्म); श्रीकृष्ण, माता देवकी और पिता धासु (जस० १, १६, १४)। देव से उत्पन्न नववां वासुदेव; (महा.)। कत्ति अ—पु० (सं० कात्तिकेय) महा- कत-वि० (सं० कति) कितने अनेक; देव का चक पुत्र, पडानन; (दे० ना०- (की० ३, ६६) । अव्य० (सं० कुत्र) मा० ३, ५)। कहाँ; (रा० १६) । अव्य०-क्यों; (को० कत्तिग-पु० (सं० कात्तिक >का० ३, १४८); कोन; (की० ४, ५८); कत्तिय) कार्तिक मास; (प्रा० गु० २३, कैसा; (को० ४, ८४)। –न्हिक वि. ११)। (को० ४, ८८)। कत्तिय-स्त्री० (सं० कर्तृ>प्रा० अव्य० (सं० कुत्र) कहीं; (रा० १९) । कत्तरी) कटार; (M० ६, ६, ७) । पु. -हुँ कहीं; (की० २, १९४) । कतेहु (सं० कार्तिक) कार्तिक मास; (भ०)। वि० सं० कति) कितने ही; (की० २, -मासि कार्तिकमास; (व० १०,४०, ७४)। १२)। कतवार-पु० (दे०) कूड़ा करकट कतियसाढ-पुं० (सं० कात्तिक (दे० ना० मा० २, ११)। अषाढ >प्रा० कत्तिय + आसाढ) कार्तिक कत्त-अव्य० (सं० कुतः>प्रा० कत्तो) एवं अषाढ़ मास; (ण० ६, २१, २०)। कहाँ तक; (की०३, १३६) । वि. कत्ती-स्त्री० (सं० कतिका (सं० कियत् >प्रा० >प्रा० कित्त) कितनी; कत्तिया) कतरनी,कची; क० १०, (की० ३, १३८)। १६, ८)। कत्तउ---वि० (सं० कर्तृ>प्रा० कत्त) कत्तीम-पुं० (सं० कात्तिक>प्रा० कितनों का; . >प्रा० कत्थ (१६१) कन्न कत्थ-अ य० अथवा कत्तिय) कार्तिक मास; (ण. ६, २०, कद्दमिअ-पु० (दे०) महिप, भैसा; ४)। (दे० ना० मा० २, १५) । (सं० कुन >प्रा० कत्थ) कद्दमि-वि० (सं० कर्दमित) कीच- कहाँ; (म० १, २१, २)। कहीं-कहीं, युक्त, पंक-युक्त; (व० ४, १४, ३)। (प्रा० ५० १, ४) -ई, अव्य० (सं० कद्दमिल्ल-वि० (सं० कदमं+इल्ल) कुत्रचित् >प्रा० कत्थइ) कहीं, किसी कीचड़-युक्त, "वंकरहिं पंकएहिँ कद्दमेल्ल- जगह; (सुदं० ७, ५, १०)। -ए, कुल्लतल्लपूरिया," बांके पंकजों से छोटी अव्य० कहीं (सुदं० १०, ६, ६)। नदी (अथवा नाले) के कर्दम-युक्त तल कत्यइ-अव्य० (सं० क्वचित् को पूर दिया; (जंवू० ४, २१, ६)। सं० कुत्रचित्) कहीं, किसी जगह; (भ०; क द्दविय-वि० (सं० कर्दमित >प्रा० जंबू० ७, १, १६)। कद्दमिअ) पंक-युक्त, कीच वाला; (अंबू० कत्थवि-अव्य० (सं० कुत्राषि) कहीं ४, २२, ३)। भी; (प्रा० ५० १,७६)। कद्दिउ-अव्य० (सं० कदा) कब; तुल० कल्यूरिय-स्त्री० (सं० करिका> गु० कदी (किसी दिन); (प० च० २६, प्रा० कत्थूरिया) कस्तूरी, एक सुगंधित २, ६)। पदार्थ जो एक प्रकार के नर हिरन की कद्दिवसु-अव्य० किसी दिन; (प० च० नाभि के पास की गांठ में उत्पन्न होता ४५, ७, १०) । है और दवा के काम में आता है; (जंबू० कनप्र-पुं० (सं० कनक>प्रा० कणग) ८, १४, १६)। स्वर्ण; (की० २, ८६)। कथकेस–पु० (सं० ऋथक शिक) जनपद कनवास-पु० (सं० कणं+पाव) कान नाम; (जस० १, २५, १)। का एक आभरण। -ही; (रा० ३४)। कथा--स्त्री० (सं० कथा>प्रा० कहा) कनिक-पु० (सं० कणिक) गेहूं; (की० हाल; (की० २,६८)। ३, १००)। कनिष्ठ>प्रा० कथिअ-सक० (सं० कथय>प्रा० कह) कनिट्ठ-वि० (सं० बखान करना; (की० ४, १४५)। कणिट्ठ) लघु, छोटा; (की० १, ६०)। कदंबअ-पुं० (सं० कदम्ब)कदंब के कन्ता-स्त्री० १. रावण की स्त्री; (प० फूल; (प्रा० ५० १, १८८)। च०७४, ११) । २. दाशरथी भरत की कदिहि-अव्य० (सं० कदापि कभी; गु० प्रणयनी; (प० च० ८०, ५०)। कदी; (प्रा० गु० ४०, ५)। कन्द-पु वानर योद्धा; (प० च० कद्दम-पु० (सं० कर्दम>प्रा० कद्दम, ६१, २७)। कद्दमग) कीच; (ण० ४, १०, ६; जस० कन्द-पुं० न० (सं० कर्ण>प्रा० कण्ण) १, ६, ५)। ४, २३, सि० च० कान; (को० ४, २३६; ५० ३)। ३, ७, ६६) । स्त्री० कन्या; (विला०; कद्दमु; (व० ' - कन्नपंगुरणे (१६२) कप भ०) ।-वारी वि० (सं० कर्णधारी); कप्पे वि - पू० का० क्रि०, "खणे (भ०)। तिलु तिलु कप्पेवि मारहु,” (सुदं० ८, फन्नपंगुरण-पु० (सं० कर्णप्रावरण) ३७, २२)। पर्वतीय जन-जाति; (भ०) । /कप्प'--(सं०/कल्प> प्रा०कप्प) कन्नाड-पुं० (सं० कर्णाट>प्रा० कल्पना करना, (प्रा० पं० २, २०७) । कण्णाड) प्रदेश-विशेप, जो आजकल 1 कप्प'-(सं०/कम्प्>प्रा० . कंप) 'कर्णाटक' नाम से प्रसिद्ध है; (भ०)। कांप गई, "पाओ पहारे पुहवि कप्प' कन्नाडी-स्त्री० (सं० कर्णाटी) कर्नाटक गिरि सेहर टुट्टइ," -पैरों के आघात से देश की स्त्री; (संधि० ६, ५, १०)। धरती कांप गई और पहाड़ों की चोटियां फन्नारिय-वि० (विभूपित, अलंकृत; टूटने लगीं, (को० ४, १६२)। कप्पंत- (भ.) । कृ० (सं० कल्पमान्) काँपते हुए; "के कन्या-स्त्री (सं० कन्या>प्रा० वि कोवेण धावंति कप्पंतया" -कितने कण्णा) अविवाहित लड़की या पुत्री; ही कोप से काँपते हुए दौड़े; (क० ३, (उ० व्य० प्र० ५१-३)1 १४, ६)। कन्ह-० (सं० कृष्ण >प्रा० कण्ह) कप-पु० (दे०) १. प्रमाण, प्रमाण, तुल्य श्रीकृष्ण, कान्ह; तुल० गु० कहान; (प्रा० "अट्ठवरिस कप्पेण कुमार" -आठ वर्ष . गु० १८, १७; प्र० चि०)। की आयु होने पर, (जंवू०.४, ६, ४) । कपासि-स्त्री० (सं० कर्पास >पा० प्रा० २. वन्दी का उद्धार मूल्य, मुक्ति-मूल्य; कप्पास) कपास, रूई; तुल० पं० कपाह; "मो नात्थि जो न महु देह . कप्पु, (परमा०)। (भ०) । ३. (सं० कल्प>प्रा० कप्प) कपूर-पुं० (सं० कपूर>प्रा० कप्पूर) काल-विशेप, काल का एक विभाग, जिसे सफेद रंग का एक प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य ब्रह्या एक दिन कहते हैं और जिसमें १४ जो दारचीनी की जाति के पेड़ों से निक मन्वंतर या ४३२००००००० वर्ष होते लता है; (की २,१८५; सि० २, हैं; (जस० ४, २७, १८) । -जाय पु. ३१)। (सं० कल्पजात) देव; (१०, १३, १० कप्पंधिव-पुं० (सं० कम्प+आंघ्रिप:) -तरु पु० (सं० कल्पतरु) . कल्पवृक्ष; कल्पवृक्ष; (जव० १, १,८) । (को० ३, १५७) । -दुमु पुं० (सं० कप्पंत-पुं० (सं० कल्प+अन्त) काल कल्पद्रुम) कल्पवृक्ष; (व० २, १२, ८)। विशेष का अंत; (जंवू० ५, ५, ५) । ----यह ० (सं० कल्पतरु) कल्पवृक्ष; कप्प'-(सं०/कृप् >प्रा० कप्प) (सा० २१६; वा १, ६)। – रुक्ख काटना। -इ, (सं० कृन्तति) ० (सं० कल्पवृक्ष) कल्पवृक्ष; (क० २, दिया गया है; तुल० म० गु० १, ३)। -वच्छ पुं० कल्पवृक्ष; (क० कापवु'; ' (प० च० २६, ८, ५)। ७, ५, १०)। -वास पु० (सं० कल्प- - काट कापणे, कापड . (१९३) कचुरिय वास) स्वर्गवास; (व० ६, १, ११)। कप्पुरिस-पुं० (सं० कापुरुषः) डरपोक; -~-विक्त पु० (सं० कल्पवृक्ष) कल्पतरू; (प० च० ३६, ४, ८)। (जस० ४, २५, ६)। विडउ पुं० कापूर-पु० (सं० कपूर>प्रा० कप्पुर) (सं० कल्पविटप) कल्पवृक्ष; (सि० १, कपूर, सुगंधित द्रव्य-विशेष; तुल० म० ३१) । कप्पामार-पु. (सं. कल्पामर) कापुर, गु० कपूर; (ण० ७,५,८; की० देव; (व० १०, १, २)। २, ८६)। -फार पुं० (सं० कर+ कापड--- (सं० कपट> प्रा० स्फार=आधिक्य) कर्तृर की सुगंध, कप्पड) कपड़ा, वस्त्रः (भ०; जंबू० ११, "कप्पूरफारमहुयरमिलतु"; (जस० ४, ७, ४, महा० ३६, ८, ६); कप्पडु (क० ७, ८)। १०, २०, ६)। तुल० म० कापड़। कप्पूरायर-पु० (सं० कपूर अगर) कप्पण (सं० कल्पन>प्रा. कपूर व अगर "सुमहुरु कप्पूरायरु कप्पण) कतरना, काटना; (जंबू० ७, डज्य, सुगंधित कर्पूर व अगर ६. ११)। जलाया; (जंबू० ८, १६, ५) । फप्पम-पु. (सं० कल्प म> फफाड-पुं० (दे०) गुफा, गुहा; (दे०. प्रा० कप्प+ दुम, दुम) कल्पवृक्ष, मनो ना० मा० २, ७)। वाञ्छित फल को देने वाला वृक्ष-विशेप; कवंघ-० १. (सं० कवन्ध>प्रा० (६० ५, १२, ६; जंव० ३, ३, ११) । कमंघ) घड़, कबंध नामक दैत्य; (प्रा० कप्पधारि-वि० (स० कल्पधारिन्) देह पं० २,१८३) । २. कवच, (जंवू० ६, को नवीन और नीरोग करने की क्रिया १४, ३) । कवन्धो-पु० विना सिर का को करने वाला व्यक्ति; "ह जरई ण घड़; (को० ४, २०४)। घिप्पमि कप्पधारि' -फिर भी मैं जमा- कदावा--पु. (अ. कवाव)-गोश्त के प्रस्त नहीं हुआ, मैं कल्पधारी जो व्हरा; भूने हुए दुकड़े; (की० २,.१७८) । (जस० १, ६,६)। कन्न--1० (सं० काव्य >प्रा. कव्व) कप्पयरु-पु. (कल्पतरु) कल्पवृक्ष; (संदेशरासक प्रक्रम १, छंद. १७) । (जं० ४, १६, ८)। फपरिस-वि० (दे०) विदारित, चीरा कन्वाड-पु० (दे०) कबाड़ीपन; "किसि कबाडु सेव मणइ वरु," कृषि, फबाड़ हुआ; (दे० ना० मा० २, २०) । कप्प- कराड़ीपन) व सेवा को ही अच्छा मानते रिय; (प० २०३६, ६, ६)। हैं। (सुदं० ६, २३, ५)। कप्पवासि-पुं० (सं० कल्प+निवासिन्) कल्पवासी देव; (जंदु० १, १६, ६)। (सं० कंचुर>प्रा० कप्पिय–वि० (सं० कत्तित) कतरा कब्बुर, कबुत्य) कबरा, चितकबरा, हुमा; (प० २०३६, ७, चित्तला; (ण०२, १४, ३)। फन्बुरिय-वि० (सं० करित>प्रा० . - कन्बुर-वि० हा, काटा - कभ (१६४) कमलगभ एक गाढ़ी, मा.. - . काष्ठ का १४) । विक्षेपे, कबुरिअ) अनेक वर्ण वाली, चितकबरा कमठायो; (प्रा० गु० ७, ३०)। 'किया हुआ; (भ०)। कमढ-पु० (दे०) १- दही की कलशी, कम-पुं० (सं० कफ) २- हंडी, हँडिया, मिट्टी की रिकाबी; लसीली चीज जो प्रायः खांसने से बाहर ३. बलदेव; ४. मुख; (दे० ना० आती है, श्लेष्मा, बल्गम; (षड्) । २, ५५)। कमंडलु-पुं० न० (सं० कमण्डलु>प्रा० कमढि--स्त्री० (सं० कमठ>प्रा० 'कमंडलु) संन्यासियों का एक मिट्टी या कमढ) कमठ, कछुआ, (प्रा० गु० १२, पात्र; (जस० ४, १५, १६)। कमण-सर्व० (सं० कः पुनः>प्रा० कम-पु० (सं० क्रम>प्रा० कम) कवण) कौन; (को० २, ५३; प्रा० ३० पद, पाँव, चरण; (ग० ३, ४, १०; सं० २, २६)। कमन-कौन; (की० ४, रा० भ०)। -ग पु० (सं० क्रमाग्र) २४३) । कमने-किसने; (की० २, २२, चरणाय, (प्रा० गु० ३५, ११) । ७)। 1/कम'-(सं०/क्रमु पाद कमण'-० राक्षस योधा; .(प० च० कामति) चलना, पदार्पण करना। -इ ७१, ३६)। "कइया वि तुरइ आरुहिवि भमइ धर कमणी-स्त्री० (दे०) सीढी; (दे०ना०- खुदिवि खरखुरखण्णु कमइ, मा० २, ८)। तो वह राजा घोड़े पर सवार होकर कमल -न० १- (सं० प्रा० कमल) भ्रमण करता और घोड़ों के तीक्ष्ण खुरों अरविंद, पद्म; (भ०) २. . षट्कलगण से धरा रो रौंद कर खोद डालता था; का नाम; (प्रा० ५० १, १५)। –ई, (जस० १, ५, १२)। न०, व० (सं० कमलानि) कमलों; (हे. कम-(सं० कम् प्रा० कम) चाहना, ३५३, १)। -कता स्त्री० साध्वी; (प० वाञ्छना । कमंत; (जंबू० ५, १४, २) । च० ३०, ६७)। -दलच्छि वि० (सं० कमट्ठ-पु० (सं० कमं+अष्ट) अष्ट कमलदल+अक्षि) कमलदल के समान कर्म, आठ कार्य; "विउलइरिसिहरि कम- नेन वाली; (जंबू० ३, ३, १)। ठ्ठचत्त, सिद्धालय-सासयक्खपत्त," -सण पु० (सं० कमलासन) ब्रह्मा, विपुलगिरि के शिखर पर अष्ट कर्मों को विधाता; (दे० ना० मा० ७, ६२) । त्याग मोक्ष के शाश्वत सुख कमल-पु. (दे०) १- स्थाली, हंडि, किया; (जंवू० १०, २४, ६)। हँडिया, २. ढोल, पटह, ३. हरिण, कमठ-पु० (सं० कमठ>प्रा० कमढ) ४- मुख; (दे०. ना० मा० कूर्म, कछुआ; (प्रा० ५० १, ६२)। ५- कलह, झगड़ा; (षड्) कमठाय-पु० (सं० कर्मस्थान) कार्य कमलगडम - मुनि; (प० च० ३१- करने का स्थान; तुल० गु० कमठाण, १६, २४)। स्त्री० वानर " कभी - को प्राप्त २, ५४), . -नामा कमलप्पह (१६५) भरत की उज्ज्वल, सहश उज्ज्वल सुग्रीव की पुत्री; (५० च० ४६, १४) । २-पु. कमलाकर, मुनिराज; (व०६, कमलप्पह-स्त्री० (सं० कमलप्रभा) १७, ६)। स्त्री-विशेष का नाम; (ण. ७, ११, कमलाहारो-पु. (सं० (सं० कवलाहार) अन्न या भोज्य पदार्थ की वह माना जो कमलबंधु-पु० इक्ष्वाकुवंशीय राजा; खाने के लिए एक बार मुंह में डाली (प० च० २२. १८) जाए; (५० १०, ३५, २)। कमलमई-स्त्री० दाशरथी कमतु-पु. (सं० कमल) रोला छंद का प्रणायिनी; (प० २०८०, ५१) । भेद; (प्रा० १० १,६३)। कमलमहासिरि-स्त्री० (सं. कमलम- कमतुज्जल-वि० (सं० कमल+ हाश्री) स्त्री-विशेष का नाम; (भ०)। उज्ज्वल) कमल के समान कमलमाला--स्त्री. राजा आनन्द की "कमलुज्जलसरोरा," रानी; (प० च० ५, ५२)। शरीर वाली; (जंदू० ३, ३, कमलरुह-पु० ब्रह्मन्; (ण० १, ५, २)। १०)। कमतुल्ल-न० [सं० कवल+उल्ल कमलसिरो-स्त्री. (सं० कमलश्री) कमलश्री) (स्वार्थ)] कमल; (०५, ६, ६) । १- स्वी-विशेप का नाम; (ण० ७, ११, कमलुस्सवा-स्त्री. राजपुत्री; देशभूषण ८) । २. विद्याधरी, लक्ष्मण की स्त्री; और कुलभूषण की भगिनी; (प० च० (प० च० ५४,४२) । ३. ३६, ६४)। स्त्री; (प०.०७४,६)। कमवह-पुं० (सं० क्रम+पधिन् >प्रा० कमता-स्त्री० (स० प्रा० कमला) कत यह) पैरों का रास्ता; (रि० ३, १- लक्ष्मी; (जंबू० ३, ३, २)। ३)। २. रावण की एक पत्नी; (प० च०७४, कमान-स्त्री० (फ़ा० कमान) धनुप; ६)। (को० ४,८०)। कमलाजर-पु. छप्पय छंद का भेद; वि० (सं० क्रमागत) (प्रा० ५० १,१२३)। १- क्रमशः किसी रूप को प्राप्त, २- जो कमलायर-० (सं० कमल+नाकर सदा से होता नाया है, परंपरागत; (जंबू० प्रा० कमलालर) कमलाकर, सरोवर, २, ४, ८)। तालाब, पुष्कर; "कमलायरो ब्व गोवि- कमित्र-वि० (द०) पास आया हुआ; सनिहाणु मंडलषइ व्व महिसोपहाणु" (दे० ना० मा० २, ३) । वह जल (गो) बौर पद्मिनी (विस) के कम्म-पु० (सं० कर्मन् >प्रा० कम्म अंकुरों के निधान कमलाकर के समान कर्म, काम, क्रिया; (ज०१, १२, ६ अनेक गायों (गो) और वृपभों (विस) की० २,१८) । तुल० पं० कम्म। का निधान था; (जंबू० --इ, न० २०-कमों (महा० ३८, १)। रावण की कमाया - .
(१९६) कम्मायन कम+पाग) -कर पु० (सं० कर्मकर) मेहंतर, १३)। 'प्राचीन काल की एक जाति जो सवं फम्मपास-० सं० सेवा-कर्म करती थी; (जंबू० १०, १७, कम-बंधन; (जस० ४, ७, १४)। ७)।-यर वि० (सं० क मंकर >प्रा० फम्मफल-० (सं० कर्म फल) पूर्व कम्मयर) नौकर, चाकर; (भ०)। जन्म में किये गए कर्मों का फल, दुःख- कम्मिय -वि० (२० कमिन् >प्रा० सुत्र आदि; (जं० ११, ४, ६) । कम्मित्र) कर्म करने वाला; (म०) । कम्मबंध-पु० (सं० कर+बन्ध, कम्म--सक (सं० कृ.) १. हजामत बन्धन) अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार जन्म करना, नौर-कर्म करना । -इ, (पड्)। और मृत्यु का बंधन; (जस० १, २२, २. (1/भुज) भोजन करना । -३ २)। (पड्) । कम्मभूमि-त्री (सं० कर्मभूमि) कम- कम्मकिम-वि० (सं० कर्मक्रीत) का क्षेत्र; (3० १०, ६, १०)। का रास; (जंवू० १०, ६, ८)। फम्ममल-पुं० (सं० कमल) कर्मों कम्मकिस-वि० (सं० कर्म+कृश) क्षोण का मल अर्यात् पाप; (जस० २, ५, कर्म वाले; (जं० २, ३, ६)। १)। कम्मक्खय-० (सं० कर्मलय) कर्मों कम्मरइ-स्त्री० (सं० कर्म+रति प्रा० का विनाश । टि०-भूतकाल में किये गए कम्मरइ) कर्म में यासक्ति; (जं० १०, पापकर्मों का विनाश उनके विपरीत पुण्य ५, १२)। कर्म करने से प्राप्त होता है; (जं० ११, कम्मवस-वि० (सं० कर्मवश) कम के १४, ८)! वशीभूत; (जं० ११, ३, १)। कम्मट्ठगठि-स्त्री० (सं० कर्म+अप्ठ कम्मविवाय-पु. (सं० कम+विपाक) ग्रन्थि) अप्ट कर्म रूपी ग्रन्यि; (क० ३, पूर्व जन्म में किए हुए शुभ २२, ६)। कर्मों का भला मोर कुरा फल; (जस० कम्मरहण-वि० (सं० -~-वि० (सं० कर्म+दहन) ३, २२, ११)। कर्मों का दहन करने वाला, "अणसणु कम्मसत्ति-स्त्री० (सं०. कर्म+शक्ति) पहिलारउ कम्मडहणु, , नियमियदिणेसु >प्रा० कम्मसत्ति) कार्य करने की माहारचयणु" सर्वप्रथम कर्मों का दहन शक्ति, "नाणु वि कम्मतत्तिसंवलियर, करने वाला अनशन नामक तप है, जायइ मिच्छादसणे मिलियउ"; (जंवू० जिसमें नियमित दिनों (अष्टमी चतुर्दशी १०,४,११)। आदि) में आहार त्याग किया जाता है; कम्माण-पुं० कमान) धनुप; (जंवू० १०, २१, ८): (की० २, १६०)। कम्मपडि-स्त्री०. (सं० कम+प्रकृति) कम्मायत्तर-वि० (सं. कमं+आयत्त कार्य की प्रकृति; (जस० ३, २२, आधीन) कर्म के वशीभूत, "संभु वि और अशुभ . (फ़ा० -- कानांवर्णि (१९५) कये हाय ऊंचा , बुभु वि वि कंम्मायत्त" -शम्भु और नमंत्कार के लिए जिसने सुह्मा जी भी कर्म के वशीभूत है; (जस० किया हो वह; (ण० ३, ७, ४; जस० ३, ३, २२, ११)। ५, ४)। पम्मादणि-स्त्री० (सं० कमं+अवनि, क्यंत- १. रानस योषा; (प० ५० नी>प्रा० कम्न अवणि) कर्मभूमि; ५६, ३१) । २. दाशरथी राम का सेना- (व० १०, ६, १०)। पति; (प० ८६, ४७)। पुं० (२० कम्मासय-पु. (सं० कम+आसव) कृतान्त >प्रा० कयंत) पाप-कर्म, "क्रलि. १. कर्मास्त्रत्र, कमों के विकार या दोप; विलतियदुरिय कयंतएण," कलिकाल के (जंवू० २, ७, ११) । २. कर्म का विलास रूप पानों का विनाश करने वाले वहाव; "जय रुभियकाम्मामववहंत," (ण० १, ३, २) । २. यमराज; "जीवि- -आपने कम के प्रवाह को जवल्द्ध कर यंति सोणिहउ कयंते;" (व० २,१६, डाला है; (क० ४, १०, ६)। ५) । ३. रावण का इस का नाम का कम्मिघण-पु० (सं० कर्मन्यन >प्रा. एक योद्धा; (प० च० ५६, ३१)। कम्म इंघण) कर्म रूपी इंधन; "कम्मि- -मुह पुं० (सं० वृत्तान्तमुख>प्रा० धण भाव हो कम्मुवि तिह" -कर्म रूपी कयंतमुह) रामचंद्र के एक सेनापति का ईंधन कर्म कर्म-भाव से परिणमन को नाम; (प० च० ६४, ६२)। -वयण प्राप्त होता है; (व० १०, ३६, १६) । पुं० (सं० कृतान्तवदन>प्रा० कवंतव. कम्मोवहि-स्त्री० (सं० कर्म+उपाधि) यण) राम का एक सेनापति; (प० च० कम की वह स्थिति जितके संयोग से ६४, २०) । कयंपु-पुं० (सं० कृतान्त) कोई वस्तु लौर की और अथवा किसी यम; (सि० २, २१)। विशेष रूप में दिखाई दे; "मासु वि तड. यंद-पु. १. (सं० कदम्ब>प्रा० यडंतु तुतउ पैक्सइ कम्मोवहि खुट्ट- कलंब) वृक्ष-विशेश; (भ०) । २. समूह; तउ," -मांस के तह-तड़ करके टूटने को "तुछ पइछ दिछु मुहत खद्ध वह महामुनि कर्मोपाधि के खंड-खंड होने फाडिवि नलिकयं," -प्रसन्न होकर के समान देखता; (जंवू० ११,१५, वहाँ लाल मुह वाले नकुत समूह ने उसे देखा, और फाड़कर खा लिया ? (जंबू० कम्बूदीप-पु० (सं० कम्बूद्वीप) द्वीप ६, १०, २०)।-विडव पुं० राक्षस विशेष का नाम; (५० च० योता; (५० ५० ५६, ३८) । कयः-(१) वि० (सं० कृत >प्रा० कड, कम्हिा.-० (दे०) माली, मालाकार; कय) किया हुआ, बनाया (दे० ना० मा० २, ८)। ३, ४, ६) । (२) संयो० अथवा, कि, कयंजलि-वि० (सं० कृत+अञ्जलि तुल० गु० तुल० गु० के, (प्रा० गु० ३७, ४)। >प्रा० कय जति, 'लो) कृताञ्जलि २. पु० (सं० झर्य>प्रा० कय) खरी- हुला, (० , %3D (१६%) कपरोल दना, (म०) । -आयर पुं० (मं० कृत कपत्य-विल (सं० कृतायं>प्रा० +आदर) प्रदगिन बादर, (१० १, ४, कयत्य) सफल मनोरय, कृतकृत्य; (जं १०)1-उज्जम पुं० (० कृतोद्यम) ६.१,२)। किया हुआ प्रयत्न, की हुई महनत, (व० कयत्यकिय-वि० ० काल, कृतार्थ ४,३, =)। -विता स्त्री० रावण-पुत्री; किया; (नि० ४, १२) । (५० उ०११. १०१)। -म्म पुं. कन्यय-वि० (सं० कृतार्य) - कृत- करिल्लपुर का राजा, नीर्यकर विमल के त्य, जिसका अभिप्राय पूरा हो चुका हो; दिना; (५० ३० २०, ३६)। २. संतुष्ट; (म०)। कयटन–० (सं० कृतपुण्य) किया कयदोष-वि० (सं० कृतदोप) दोष गया पुण्य, (म०)। करने वाले, अपराधी; "कयदोलमु रोग कयग्गह-३० (सं० कृत+आग्रह वंत्रिमई" -चोप यपराध करने वालों लाग्रह करके, "बोलइ परिणि कयगह के प्रति रोष का त्याग करना चाहिए पृशु पुष" प्रहिणी आग्रह करके पुनः (वृ० ११, १४, २)। पृनः कहने लगी, (नं० ६, ४, ३)। कयपयन्ज-वि० (० ‘कृत प्रतिन) कडिल्ल-० (३०) कटिवस्त्र, कमर जिसने प्रतिज्ञा कर ली हो; (जंदृ०८, में पहनने का वस्त्र, (जंव० ६, १८, ३, ४,१)। दे० ना० मा०२, ५, २)। कयपारण-वि० (सं० · का पारण) करणाएं-मुं० (सं० कृतनाद) आवाज जिसने उद्धार किया हो; (उम०) । करना; "मारित ताम डाण कयनाएं"; कयपुमय - वि० (सं० · कृतपुत्रक) (नं० ६, ११, १४)। पुलकित; (नस० १, १५, १३)। कर्याणच्छ्य-वि० (सं० कृत-निश्चय) कयबंध-पुं० (सं० कच: बन्य) कंग- जिसने निश्चय कर लिया हो, कृत बंद; (जं० ८, ११, २५) । संकल्प, दृढ प्रतिन; (जस० २, २६, कयमण-वि० (सं० . कृतमनस्) कृत- मना, निसने मन में निश्चय कर लिया कयनीर-न० (० कृतनीह>प्रा० हो; (जं०८,४,१)। कय+पिड्ड, पीड) कयर-वि० (सं० कृत रूप) रूप बनाये घॉनला, "कयनोडई दीडई दुशियाई, हुए; "पासष्टमो वि तहमोनियन माइ विस्तीर्ण घोंसलों में रहने वाले पलियों वहिपुंज कयर," अर्याद पास में को भी भयमीत कर दिया गया; (नं० स्थित तल्ली-समूह को वह रूप बनाये ५,३,१२) । हुए व्याषिपुंच के समान मानने लगा; कपतविदि-पुं० (सं० कृत-+-विपिन् (पं० ३, ६, ६) >प्रा० कय विवि) समृद्धि रूपी वृन; कयरोत-यु० (सं० कृत स्वग) किया (जं०)। गया कोलाहल; (मुदं०,४, १२, ६)1 दृढ़ बनाया गया :
कयल (१६६) कर अभय- मा० २, कयाइ) किसी कयल-पु. (हे -पु० (दे०) अलिंजर, पानी भी; (विला०; प० ० ४, ३,३; रखने का मिट्टी का घड़ा, सुराही आदि; भ०)। (दे० ना० मा० २, ४)। कय्यल-पु० (सं० कज्जल) काजल; कलि-स्त्री० (सं० कदली>प्रा० (रा० १६)। कलि, ली) केले का पेड़; तुल० गु० करंक-० (सं० करङ्क नारियल केळ; (प्रा० गु० १३, ४२) । कयली; का बना पान) १. भिक्षापात्र । २. (दे०) (ण० ८, ११, ८)। अशोक वृक्ष; (दे० ना० मा० २, ५५) । कयवन्नउ-पु० (सं० कृतपुण्य >प्रा० ३. पुं० न० (सं० करक>प्रा० कय+पुण्य, पुण) कृतपुण्य, किया गया करंक) अस्थि, धड़; (जंबू० ६, ६, पुण्य कर्म, "भणइ कयवन्नउ १०)। कुमारु"; (प्रा० गु० २५, १) । करंज-पु० (सं० करञ्य) १. वृक्ष- कयवर-पुं० (सं० कृतिकर) मायावी, विशेष, कंजा, एक प्रकार का छोटा नट; (सं० रा०)। जंगली पेड़; (दे० ना० मा० १, १३) । कयाइ–अव्य० (सं० कदाचित् >प्रा. २.. सूखी त्वचा; (दे० ना० समय भी, कभी भी; ८)। (भ०)। करंड-पु० (सं० करण्डक >प्रा० कर- कयारण-पुं० ब्राह्मण, व्यक्ति-विशेष डग, करंड) करंडक, बांस का बना छोटा नाम; (प० च० ३०, ६, १)। पिटारा या पेटिका; (जस० २, ३४, कयाण-न० (सं० क्रयाणकम् >प्रा० ३)। कयाण) बेचने योग्य वस्तु; तुल० गु० करंव-पु० (सं० करम्ब) दही और करियाणु; (प्रा० पु० ३२, ३) । भात का बना हुआ एक खाद्य पदार्थ कयापर-वि० (सं० कृत+आदर- (दे० ना० मा० २, १४) । प्राप्त, "पडिपुच्छियकुसलकयायरेण माया- करंबिय-वि० (सं० करम्बित) मामेण विज्जुच्चरेण, अर्थात् कुशल १. व्याप्त; (भ०) । २. मिश्रित; (जस० समाचार-पृच्छा आदि के द्वारा प्राप्त ४, १७, २५)। विद्युचर; । (जंवू० १०, कर-पुं० (सं० प्रा० कर) हाथ; १)। (भ०) । लो०-"करे कंकणु कि आदि से कयार-पुं० (दे०) तृणाद्य त्कर, कवाड, दीसई" हाथ कंगन को आरसी क्या कचरा, कतवार, कूड़ा, मैला; (प० च० अर्थात् जो चीज़ सामने हो उसके लिए ५४, ११, १; भ० दे० ना० मा० २, की क्या आवश्यकता है, ११; क० ६, १८, ७)। (सुदं०) २. किरण, अंश, (सं० रा०) कयावि--अव्य० (सं० कदापि>प्रा० ३. शुण्डा; (जंबू० ४, २२, ७)। कयावि, कयाइ) कभी भी, किसी समय ४. टैक्स; (को० १, ३८)। -अल पुं० छद्म मामा किसी प्रमाण (२००) करजोडण . + -उ आ.. करो, प्राचीन गु० व०७ कित्तिअ भू० . । . अंतगुरु चतुष्कल (115) (प्रा० ५० १, (हे० ४१४, ४) । करेन्जसु-व० करना, १७) । -अलु पु० छप्पय छंद का भेद विणउ करेज्जसु" विनय · करना, (प्रा० ५० १, १२३)। --यल पु० (सं०. (ण० ५, १३, ६)। काउ'-कृ०, सं० करतल) हथेली। कृत्वा करके; (भ०)। तुल० राज Vफ र-(सं० क> प्रा० कर) करना। करवो-बो, गु० करवू । फिज्जइ-कर्म- -इ, सक०व० (सं० करोति >प्रा. वाच्य कराया जाता है, (जस० १, २०, कर इ) करना (ण० २, १, ११) --उ १) । विध्यर्थ, किया जाय, (ण० ३, २, • (सं० करोमि); (उ० व्य० प्र० १६, ७)। १०; हरिवंश पुराण ५१/७) । विध्यर्थ, (सं० कुर्यात्) करे, कर (महा० ६८,, ७) । करना चाहिए (उ० व्य० प्र० १०, १, की० १, ७७, (सुअंध २, ११) तुल० ०६८, ८, १५)। ~ओ करता है; महा० (की० ३, २५) । --हं आ० करो; मगही कोजे । . किज्जइ-कर्मवाच्य करहु (भूसुकुपा, च०) । करस-क० (सं० (प्रा० ५० १, ५२) । कुर्वत) करते हुए; (जस० १, ५, २०) । का०, किया; (की० १, ६६) । कियउ- करतहों -भू० का० कर रहे थे, "सरि भू० का० (स० कृतम्) - किया; (हे० जल कील करतहों; (ण० २, १, १२) । ३७१, १) । कुरु-विध्यर्थ (जंबू० १०, "करति-क्रि०व०, करती है, (ण १, १, १४, १३)। ५)। करन्ता -कृ० व० के रूप प्रयु- करअडी-स्त्री० (दे०) स्थूल वस्त्र, क्त, करते हैं, (की० २, २२, ७)। मोटा कपड़ा; (दे० ना० मा० २, १६) । करि-करो" । म सोउ करि-" शोक करकंकण-न० (स० कर+कङ्कण > मत करो; (विला०)। करि-कृ० प्रा० करकंकण) करकंगन; (सि० २, (कृत्वा) करके; (हे. ३५७, ३)। १७)। करिअ-भू० का०, · किया; (की ३, करकट्ट-पुः (३०) ले जाने योग्य ८५)। करिअइ-कीजिए; (को० २, वस्तुएँ; (जंवू० ५, ६, ५) । २४) । करिअउ-भू० का० किया; करकत्तिया--स्त्री० (सं० करकतिका) (को० १, ४१) । करिज्जइ-व० करना कैची; (जंवू० ७, ६, १४) । चाहिए; (की० ३, ५७) । करिवि-पू० करटि-पु० स्त्री० (दे०) जंतु-विशेप, का० कि० करके; (गहा० ६६, ६; १)। करकंटा (जंबू० ६, १०, १४) । करिहंसि-भ० फा० (सं० करिष्यसि) फरग्ग---पु० (सं० कराग्र) उँगलि; करेगा; (उ० व्यं० प्र० २०-१३) । जिस० ३, १०, ७)। करु-क्रि० आ० सं० कुरु-क) करो, करघायल-पु० (दे०) दूध की मलाई; (उ० व्य० प्र०६, ३०; हे० ३३०, २) । (दे० ना० मा० २, २२)। करेइ--क्रि० (सं० कारयति) कराता है; करजोडण-पु० (सं० कर+योजन) । -- करत (२०१) कंस करट> (ण० ७, . हाथ मिलाना; (सुदं० ४, ५, ११)। करडत-व० ३० (ध्व०) करड-करड ध्वनि करते हुए; (जंबू० १०, १२, ७) । करड-पुं० (सं० प्रा० करड) हाथी का गण्ड-स्थल; १३, २) । वि० (दे०) कठिन; (जस० १,१६, ८) । पु० वाद्य-विशेप; (सुदं० ३, ४, ३)। -~-डाह पु० (स० करट+ओघ) वाघसमूह; (सुदं० ७, ६, '६) । पु० (दे०) श्राद्ध-विशेष; (दे०- ना० मा० २, ५५) । वि० (दे०) चित- कवरा; (दे० ना० मा० २, ५५) । फरडयल-० (सं० करट+स्थल) हाथी के गाल की जगह, कुम्भस्थल, हाथी का गण्ठ-स्थल; (जंवू० ७,५, ३)। करडि-स्त्री० (दे०, प्रा० करडी) वाद्य- विशेष; (प्रा० गु० ३२, ३)। पुं० (सं० करटिन् >प्रा० करडि) हस्ती; (जंबू० ६, ६, १०)। फरडिम्ब-पु. कानों में पहना जाने वाला एक आभरण; (रा० ११) टि०- करट अर्थात् गण्डस्थल पर लटकते रहने के कारण इसका यह नाम पड़ा होगा। फररणन० (सं० प्रा० करण) क्रिया, विधान; (जस० १, ७, २)। २. राजसाधन, पैंतरा, ३. मयुन-विधि; (जंबू० ६, १३, १२) । -गाम पुं० (सं० इन्द्रियग्नाम) इन्द्रिय-समूह, (जंवू० २, १, ११)। करणाहिवइ-पुं० (सं० करणाधिपति >प्रा० करणाहिवइ) जेल का अध्यक्ष; (भ०)। करणि-स्त्री० (दे०( रूप, आकार; (दे० ना० मा० २, ७)। करणिय-वि० (सं० करणीय) करने योग्य; (भ०)। करणु-न० आज्ञा, "पणवई णियमिच्चहु करहि करणु" --अपने इस सेवक को आज्ञा दीजिए, (ण० ८, ६, १२) । करतक्कड-पु० (दे०; ध्व०) करत- क्कड की ध्वनि का होना; (जंवू० १, १५, ५)। करतण-पु. (सं० कर्तृत्व) कर्ता का भाव, कर्ता का धर्म; (क० १०, १२, ८)। करतार-पु० (सं० कर्तार) सृष्टि करने वाला, ईश्वर; (प्रा० गु० ५, १६; की० २, २३७)। करघणु-पुं० (सं० कर+धनु) घनुप; (जबू० ७, १०, २)। करप्पियइ-क्रि० कर्मवाच्य, करपन्न (आरा) से चीरा जाता है; (सं० रा०)। करफंसरण-पु० (सं० कर+स्पर्शन) हाथ से स्पर्शन; (जंवू० २, १०, ३)। करम-वि० (दे०) क्षीण, दुर्वल; (दे०. ना० मा०. २, ६)। करमर-पु. (दे०) वृक्ष-विशेष; (जंबू० ४, १६, ५)। करमरी-स्त्री० (दे०) बांदी, दासी; (दे० ना० मा० २, १५) । करमुद्द स्त्री० (सं० कर+मुद्रा) मुद्रिका; (जंबू०४, १३,.७) । करम्विय-वि० सं० करम्बित) मिश्रित, हाथी, कृति, .
करयंती (२०२) कराईय करयत्यु- वि० मिला-जुला; (५० ३० २६, ६,') दतिदार औजार जिनसे लकड़ी काटी करयंदी-स्त्री० (दे०) मल्लिका, बैला जाती है; (सं० रा०; जम० २, ३१, का पड़; (३० ना० मा० २,१८) । (सं० करव्य) करवाल-पुं० (सं० प्रा० करवाल) करवे में रखा हुआ; (जंबू० खड़ग; (प्रा० ० १, २०६; १०० ११)। १२, ४, ५)। -हि करवाल से (को० /करयर (सं० करकराय) क ३,७८) । करवालु; (हे० ३७६,१)। कर आवाज करना; (सुदं० ११,१५, करवाबड-वि० (सं० कर+व्यात) १) । करवरंत-व० कृ० (सं० करकरत) व्याकुलहस्ता; (जं]० ८, १५, १०)। शब्दानुकरणे; (जस० १, १३, ३) । करसंगह-० (मं० कर+संग्रह) करयरिट-वि० [सं० करकरायित (ब- पाणिग्रहण, (जं० ८, १२, ५) । न्यात्मक)] किटकिटाता हुदा; "योवतरें करसाइ-स्त्री० (सं० कर शाखा) कट्यदुम णिविछ करन्डि रिछ,” उँगली; (मं० रा०)। (सुदं० ८, १५, ७)। करहंच-यु० करहंत्र छंद, (प्रा० ५० करयल-० (सं० करतल>प्रा० कर २, ६२)। यन) हथेली; (जं० ४, १७, २०) । करह-पु० (सं० करभ>प्रा० करह) करल्ह-पुं० (सं० करन्ह) पंजा; ऊँट, उष्ट्र; (सि २, १२; प० ५,८, "कसरि-करन्ह-दारिय मयगलि" -कहीं २)। -उल्ल (स्वाय) (ण० ७,२, सिंहों के पंजों से मदोन्मत्त हाथी विदा ३)। करहु-ऊँट; (ब०४, २१, रित हो रहे थे; (वी० १, २)। ६)। २. नख; (जं० २, १५, १५) । ३. पुं० क रहाड-पु० (सं० करहाटक) नगर- राजा-विशेष-नाम, पुप्पावतीर्ण नगर का विशेष; (जंवू० ६, १६, १०)। राजा; (प० १०)। करहाडह-पुं० (सं० करहाटक) देश- करवंद-यु० (सं० करमर्द, करमर्दक) विशेष; (प० व०)। करौंदा, फल-विशेष, करौंदा, वृक्ष-विशेय, करही स्त्री० रड्डा छंद का भेद; (जस० २, ३५, १२)। (प्रा० ५० १, १३६)। करवंदि-स्त्री० (सं० करमन्दी>प्रा० करह-पु० करमः, दोहा छंद का भेद; करवंदी) करौंदा वृक्ष; (जं० (प्रा० ५० १,८०)। १२) । करवंदी-स्त्री० लता विशेप, कराइणी-स्त्री० (दे०) शाल्मली-वृक्ष, एक प्रकार का पेड़; (३० ना० मा० ८, सेमल का पेड़; (दे० 'ना० मा०२, ३५)। १८)। करवत्त-पु० (सं० करपत्र>प्रा० कर कराइय-क्रि०, नू० का० (सं० कारा- वत्त) करपत्र, बारा, शस्त्र-विशेष, एक पित) किया; (व० २, १३, १०)। - ५,८, कराफोडि (२०३) करिसिरमुत्ताहल - - ८ फराफोडि-स्त्री० (सं० कर+स्फोट) हस्तनी का समागम, संभोग; (जस० ४, अंगुलिस्फोट; (व० ६, ११, ७) । १३, ३) । -राअ पु० (सं० करिराज) कराल--१. वि० (सं० प्रा० कराल) ऐरावत हाथी; (क० १, १६, ३)। भयंकर; (भ०; जंबू० १०, २६, १) । फरिआ-स्त्री० (दे०) मदिरा परोसने २. वि० (सं० कडार) कपिल, भूरा रंग; का पान, (दे० ना० मा० २, १४) । (जस०)। करिखंधरोह-पु० (सं० कर+स्कन्ध+ कराली-स्त्री० दे०) दतवन, दाँत आरोह) महावत; (जंवू० ६, ११, साफ करने का काष्ठ; (दे० ना० मा० ४)। २, १२)। करिघड-पु० (सं० करि+घटा) गज- करावलि-स्त्री० (सं० कर+अवलि) समूह; (जंवू० ५, ७, १)। किरण-जाल; (जस० १, ३, ३) । करिठाण-पु० (दे०) पैंतरा, दाव-पेंच; (जंबू० ५, १४, २१)। करावए-क्रि० कराता है; (को० ३, करिणि-स्त्री० (सं० प्रा० करिणी) २८)। करावहुँ-(सं० कृ+णिच्) १, १४, वनवायेंगे; "जिणविव करावहुँ तहि हथिनी, हस्तिनी; (जंवू० १०)। रएण"; (क० ५, ७, ३)। कराविय- करिणिया, करिणी-स्त्री० (सं० भू० काल. कर्मवाच्य करवायी; (सि० २, करिणी) हस्तिनी, हथिनी; (प० च० १३, ६)। कारविउ. -भू० का०, कर्म- ८०, ५३)। वाच्य, कराया गया; . "अन्र्भतरु सुदरु कारवीउ"; उसका भीतरी भाग सुंदर करिल्ल-न० (दे०) वास । कराया गया; (क० ५, ३, २)। कल्ला, कोंपल; (दे० ना० मा० २, करिंदु-पुं० (सं० करिन +इन्द्र) हाथी, १०)। .आयउ वणकरिंदु"; (ण० ३, १५, करिविसाणु-पु० हाथी दांत; (रि १३)। ६, ६) करि-पु० (सं० करिन् >प्रा० करि) करिसण-० (सं० कर्पण>प्रा० हाथी; (सं० रा०; वी० १, २, महा० करिसण) १. कृषि; (जंबू० १, ८, ५)। ६८, १०६)। पुं० (सं० कर) हाथ; २. आकर्षण, खींचाव; (ण० १, ६, (व० ५, २, १३)। -कर पुं० (सं० ८)। करिन् +कर) शुण्डा, सूड; (जस० १, करिसार-पु० (सं० करि+सार= ५, ३)। -दंत पु० (सं० करिन्+ अत्युत्तम) श्रेष्ठ हाथी; (जंबू० ५, १०, दन्त) गाजदंत (व० ४, ६, २) १)। -मिहुण पुं० (सं० . करि+मिथुन) (सं० . करि+मिथुन) फरिसिरमुत्ताहल-पु. फरिसिरमुत्ताहल-पु० (सं० करि। हाथी और हस्तिनी का जोड़ा; हाथी और शिर+मुक्ताफ़ल) गजमुक्ता, गज के + का नया - - करीर (२०४) कलइत्त - वाड, काटे मस्तक से निकलने वाला मोती; (जंबू० विशेष; (दे० ना० मा० २, ३) । ८, १५, १३)। करोह-पु० (सं० करोघ) किरण-समूह; फरीर-पु० (सं० प्रा० करीर) करील (व० १, १२, ८)। का पेड़, झाड़ी; (जं० १०, ७, ३) कर्मवियार---पु. (सं० कर्म + विकार) करीत-पुं० (सं० करीश) हाथियों में कर्म-दोष, कर्मों का बुरा होना; (जंबू० श्रेष्ठ, गजराज; (व० ४, २२, १)। ६, १३, १३)। करुमा-वि० (सं० कटुक >प्रा० कलंक-पु० (सं० कलक>प्रा० कडुअ) कडुआ; (की० ३, १०३) । कलंक) दाग, दोप, लाच्छन; (भ०)। करुण-वि० (सं० करुण>प्रा० कलुण) पु० (दे०) वाँस; (दे० ना० मा० ३, १. दया-जनक; (भ०) । २. कोमल; ८)।--वइ आदि से (जंवू० ४, १६, ५ भ०)। करुणि; घिरी हुई स्थानं-परिधि; (दे० ना० मा०. स्त्री० (सं० प्रा० करुणा) दया, करुणा. २, २४)। "हियउल्लउ करुणि कंपियउ"; (जस० २, Vकलंक-(सं० कलङ्कय) कलंकित १४, ५) । करुणु-वि० करुण; (व० २, करना। -इ क्रि० ब० (सं० कलक- २१, ३)। -वंत वि० (सं० करुणा+ यति) कलंकित करना; (भ०) । कलङ्- वत्) करुणावान् (क० ६, के - क्रि०, व० (सं० कलंकय्) दागी -~-~-सर पु० (सं० करुण+स्वर) करु करना; (की० ४, १६३) । णामय आवाज; (क० ७, १०, १४) । कलंबु-स्त्री० (दे०) १. वल्ली-विशेष, करुणायर-वि० (सं० करुणाकर) २. नालिका (पद्मदंड); (दे० ना० मा० करुणा उत्पन्न करने वाला; (जस० ४, २, ३)। २८, ६) । कल-पु. कर्दम, 'कीच; तुल० गु० करेड-पु० (दे०) गिरगिट; (दे० ना० कळ; (प्रा० गु० २०, ३)। मा० २, ५)। /कल-(सं० कलय्) १. संख्या करना, करेनो-प०, का; (फी० २, १०३)। २. आवाज करना, ३. पहिचानना, करेवअ-वि० (सं० कर्तव्य) करने ४. संबंध करना । कलइ-क्रि०, व० (सं० योग्य; (ण० ७, ४, १०)। कलयति) (सं० कलय् >प्रा० कल= करोड-पु० (दे०) १. नारियल, जान लेना, पहिचानना,) सुन लेना; २. कौआ, ३. वृषभ, वैल; (दे० ना० "बोल्लु कुमारहों कलु कल इ," कुमार के मा०. २, ५४)। मधुर वोल को सुन लेती है; (जंवू०४, करोडो-स्त्री. १. (सं० फरोटि .१७, २३; सुदं० ४, कटोरा या पात्र) कांस्य-पान विशेष; कलंत-कृ० (सं० कलय् + शत) जानकर; (दे० ना मा० ७, १५) । २. स्त्री० (जंबू० ६, १४, १)। (दे०) एक प्रकार की चींटी, क्षुद्र- जंतु . क लइत्तम--वि० (सं० कलायुक्त+क) - ६, २)।
कल (२०५) कलदाणी धान्य या अर्जुन वृक्ष; मा० २, कलायुक्त; (जंबू० १, ११, ७) । फलमसालि-पु. (सं० कलम/शालि) कजउ-पु (सं० प्रा० कला) किसी कलम और शालि किस्म के कार्य को भलीभांति करने का कौशल; चावल (जस० १,२१, १) । किसी काम को नियमानुसार करने की कलयं-पुं० (२० कल+कण्ठ> प्रा० विद्या; (क० २,१८, ६)। कल+कंठ) मधुर गला; (जंबू० ४, फलकंठ-पु० (सं० कल+कण्ठ) मनो १६, ७)। हर कं०; (० २, ८, ६)। कलयंति - स्त्री० (सं० कल कल कण्ठी> फलकला-पु० (सं० कलाकलाप) प्रा० कल-कंठी) कोकिला, कोकिल कला समूह; (जस० १, २३, ३) । (ण० २, १, १०; सं० रा०)। कलकलिए-न० (सं० कलकलित) कलयंदि-वि० (दे०) १. प्रसिद्ध, कोलाहल; (दे० ना० मा० ६, ३६) । विल्यात; २ स्त्री० दल-विशेष; पाडल; कलकोकिल--स्त्री० (सं० कल+ (दे० ना० मा० २, ५८)। कोकिल>प्रा० कल+कोइल) मधुर शब्द कलय-पु० (दे०) १. करने वाली या कलकंठी कोकिला; २. सुवर्णकार; (दे० ना० (जंबू० ३, १२, ६)। ५४) । -ज्जल न० (दे०) ओष्ठ-लेप, कलपोतु-पु. (सं० कल घोप) कल होठ पर लगाया जाने वाला, (भ०)। कल ध्वनि; (जस० १, २६, १५) । कलयल-पुं० (सं० प्रा० कलकल > कलचुलि-पु० कलचुरि वश का राजा, प्रा० कलयल) कलकल का शन्द; ध्वन्या- (प्रा० ५० १, १८५)। त्मक शब्द; (प० २, ६,७; जंवू० १, कलगुल्ल-पुं० (सं० कलनशब्द/ १५, १)। उल्ल (स्वार्थ) करुणाजनक, "णिविघरि Vकलयल-अक० (सं० कलकलाय > गिहिं कंदिउ कलुणुल्लउ," -तब राजा प्रा० कलकल) 'कल-कल' आवाज करना; के अन्त:पुर की स्त्रियों ने करुणाजनक (जस० २, १०, १४)। कलयलंत-कल- आनंदन किया, कल ध्वनि; "कलयलंत-कोइल खाउले," चिंता (ण० ३, १६, ८)। कोकिलों की कल-कल ध्वनि से आकुल कलत्त-न० (सं० कलन) पत्नी; स्त्री, था; (व० १,८, १०)। कलयलंति- भार्या; (भ०; प्रा० पं० २, ११७; हरि- क्रि०, ५० प्र०पु०, व० कल-कल शब्द वंश पुराण ५१, ७) । कलत्तु; (महा० करना; (विला०)। ६६, ६, २)। कलयलि-स्त्री० (दे०) कलरव; (वी० कलम-पु. स्त्री० (सं० प्रा० कलभ) १, २)। हाथी का बच्चा; (जसं०) । कलरव-पु० (संव कल+रव) 'कल- कलम-पु. (सं० कलम) चोर, तस्कर; कल' का शब्द; (जस० २, ३, ५) । (दे० ना० मा० २, १०)। कलरुदाणी-स्त्री० (सं० कालरुद्राणी) % 3D तुल० म० काळजी कलरोल (२०६) कलाधर - ३३)। करा रसिका छंद का भेद; (प्रा० ५० १, कलह उत्पन्न करने वाली; (प्रा० ५० १, ८६)। १६६)। कलरोल-पु० (सं० कल+रवण) कलहावणीय-(सं० कलभ+आपन्न = 'कलकल' ध्वनि; (जंवू० ६, १३, . प्राप्त) भू० का०, कलह हुआ; "चंदणहिँ ११)। चार कलहावणीय," चंद्रनखा के कारण कलल-न० (दे०) वीर्य और शोणित वहाँ कलह हुआ.था, (जंबू० ५, ८, का समुदाय, "पाइज्जति रडता सुतत्तत- वुतंबसंनिभं कललं" (प० च० ११८, कलहि-वि० (सं० कल हिन्) - भ.गड़ा- ८); "वसकल नसें भसोणिय"; (प० च० खोर; (दे० ना० मा० ५, ५४).। ३६, ५६)। कल होय-न० (सं० कलधौत >प्रा० कलवेणु-पुं० (सं० कल+वेणु) मधुर- कलहोय) सुवर्ण, सोना; (जंवू० १, १२, वंशी; (जंबू० ४, ८, ६) । ४) । कलस -पु० ० १- (सं० कलश) घड़ा: कला-स्त्री० (सं० कला) (छंदशास्त्र तुल० पं० कलस, म० कळशी; (रा०) । में) मात्रा छंद; (प्रा० ५० १, १२) । २. स्कंधक छंद का भेद; (प्रा० ५० १; कलायाण-पु० (सं० कला+स्थान > ७५)। -सर पुं० (सं० कल+स्वर) प्रा० कला+थाण) का धाम; मधुर स्वर; (क० २, ८, १२)। -हो "सयलविज्जा-कलाथाणु संपत्तओ" पुं० कलश; (सु० ८, ६) । (जंवू० ३, ४, ६)। कलहंस-पु० (सं० कलहंस) १. हंस, फलामरण-पुं० (सं० कला+भरण २. राजहंस; (भ०; महा० ६६, १०, धारण करने वाला) चंद्रमा; (प्रा० ५० १०)। कलहंसि-स्त्री० कलहंसिनी; (व० २,.१५५) । ८, १, ८)। कलायर-० (सं० कलाकर) कलाओं कलह'-पु० (सं० प्रा० . फलभ, प्रा० का आकर, कलाधर, चंद्र; (क० २, : कलह) हाथी का वच्चा; (ण० २,.१३, १६, ६) । टि०- पुराणों के अनुसार: २) । -मूल पु० (सं० कलह-+ मूल) चन्द्रमा में अमृत विद्यमान विद्यमान है, जिसे कलह का मूल, “रे रे वड्ढारिउ कलह देवता पीते हैं। चंद्रमा शुक्ल पक्ष में मूलु,” (जंबू० ६, १२, ६) । न० (दे०) कला-कला करके बढ़ता है और पूर्णिमा तलवार की म्यान; (दे० नां० मा० २, के दिन उसकी सोलहवीं कला पूर्ण हो : ५)।—य पुं० (सं० कलभक) हाथी . ' जाती है । कृष्ण पक्ष में उसके एकत्रित का बच्चा; (प० च० ७८, २८) । अमृत को कला-कला करके पी जाते हैं। कलह-पु. राजा-विशेप-नाम; (प. यह माना जाता है कि पहली कला को च० ३७, ७) । मग्नि, दूसरी कला को भानु, तीसरी को कलहारिणी कलहकारिणी) विश्वेदेवा, चौथी , को वरुण, पांचवी को % 3D . वि० (सं० - , कनाव (२०७) कली ४. शत्रुः दूध से - वि० (दे०) वषट्कार, छठी को इंद्र,. सातवीं को कलिज-त० (दे०) छोटी लकड़ी; (दे०- देव ऋपि, आठवीं को अजयएकपात्, ना० मा० २, ११)। नवीं को यम, दसवीं को वायु, ग्यारहवीं कतिजर-० पर्वत-विशेप; (क० १, को उमा, वारहवीं को पितृगण, तेरहवीं १२, ६)। को कुवेर, चौदहवीं को पशुपति, पंद्रहवीं फलि-१. पु० (सं० प्रा० कलि) युग- को प्रजापति और सोलहवीं कला अमाव विशेप, कलि-युग; (जम० १, १४, ३) । स्या के दिन जल और औपधियों में २. पटकल गण का नाम; (प्रा० ५० १, प्रवेश कर जाती है, जिनके खान-पान से १५)। ३. झगड़ा, कलह, पशुओं में दूध उत्पन्न होता है। (जंवू० ४, १, ११) । न० (सं० कल्य =: घी होता है और यह घी आहुति द्वारा आने वाला अगला दिन) कल; (वैराग्य- चंद्रमा तक पहुँचता है। सार)। 'कलाव -पु० १. (सं० कलापम् >प्रा० कलिअ--वि० (सं० कलित >प्रा० कलाव) समूह, “सुकलाकलाव" -सुदर कलिअ) १. युक्त, सहित; (क० १, २, कलाओं के समूह (ण० २, १०, १; उ० २)। २. प्राप्त, गृहीत ३. ज्ञात; (दे०- व्य० प्र० १२-६) । :. (सं० कलाप) ना० मा० २, ५६) । ४. मयूर (प० च० २७, गर्वित, गर्व-युक्त; (दे० ना० मा० २, ३. पुं० तरकश, तूणीर, जिसमें वाण रखे ५६)। जाते हैं; (दे० ना० मा० २, १५) । कलिम-न० (दे०) कमल, पद्म; (दे०- कलाहरु-पुं० (सं० कलाधर) चंद्रमा; ना० मा० २, ६)। (व० ८, २, ६)। फलिय -स्त्री० कलिका>प्रा० कलिग-पु. (सं० कलिङ्ग>प्रा० कलिआ) अविकसित पुष्प; (ण० ८, १, कलिंग) देश-विशेष, यह उड़ीसा से दक्षिण की ओर गोदावरी के मुहाने पर है, ६) । वि० (सं० कलित >प्रा० कलिअ) कलिंग देश; (जंबू० ६, १६, १५)। युक्त, सहित; (जस० १, २१, १३) । कलिया-स्त्री० (सं० कलिका>प्रा० -चार पु. १.. कलिङ्ग (राजा), कलिषा) सखी, सहेली; (जस० १, १२, २. आम्रवृक्ष धारक; (जंबू० ५, ८, २२)। —हिअ पु. (सं० कलिङ्गा- ३)। धिपं) कलिंग का राजा; (जस० ४, कलियारउ-वि० (सं० कलि+कारक) कलह करने वाला; (रि० ४, ४)। २७, २७) । कलिंगा-कलिंग देश; (प्रा० ३० १, १४५) । कलियारय-वि० (सं० कलिकारक) कलिंगवइ-पु० (सं० कलिंङगपति) कलह-कारक; (प० च० २१, १, कलिंग देश का राजा; (जस० ३, ३७, १७)। फलो-स्त्री० (सं० कलि) कलिका, विना (सं० कलुख (२०) कल्होडी विशेष का २,६६, खिला फूल; तुल० पं० कली; (सं० कल्लाण) मंगल-क्षेम; (भ०) । कल्लान; रा०)। (की० ३, १३) | -गुणवर पुं० मुनि- प्लुस-न० (सं० कलुप>प्रा० कलुख) विशेष-नाम; (प० च. १३, ४४)। वृद्धि; (की० ३, १४२)। -माला स्त्री. राजा वालिविल्ल की कलुण-वि० (२० करुण>प्रा० कलुण) पुत्री; (प० ३० ७६, ८)1-मित्त पुं० दया-जनक, करुण; (सुदं० ६, १२, १; (सं० कल्याणमित्र) पुरुष- जस०४, २४, १६; म० नाम; (जस० ३, ३८, ६)। -मुणि १०)। पुं० मुनि-विशेष; (५० च० ८८, १२) । कलुस-३० (सं० कलुप >प्रा० कलुन) य वि० (सं० कल्याणक) कल्याणका- पाप, दोष, मैल; (ण० १, ११, ६) रक; (क.० १, २, २)। -भाव पृ० (सं० कलुप+भाव) पाप कल्लाल-पू० (स० कल्यपाल>प्रा० पूर्ण विचार; (जस० २, २६, ६)। कल्लाल) दारु वेचने वाला; मद्य-विक्रेता; फलेर-पुं० (दे०) १. कंकाल, अस्थि (जस० २, जंबू० ५, ७, पञ्जर;। २. वि० भयानक; (दे० ना० २१)। मा० २, ५३)। कल्लिन० (सं० कल्य>प्रा० कल्ल) कलेवर-न० (सं० प्रा० कलेवर) कल, गया हुआ या आगामी दिन; (जंवू० शरीर; (प्रा० पै० १, १०६; जस० २, २, १३, ११) । २६, ४)। कल्लूरिय-स्त्री० (दे०) कान्दविकी, फलोह-पुं० (सं० कला+ ओघ) कला- मीठा बनाने वाली; पाक-स्त्री; (प० ३० समूह; (जस० १, १७, ७)। ४५, १२,४)। कल्लन० (सं० कल्य>प्रा० कल्ल) कल्लोल-पु० (सं० प्रा० कल्लोल) कल, गया हुआ या आगामी दिन; (सुदं० १. तरंग, ऊर्मि, लहर; (सं० रा०; की० ८, २४, १८) । -इसं० दवः, कल; २, १०४; जंदू० ७, ६, ६) । कल्लोलु; (जस० २, १२, १)। (सि० २, १२) । २. पुं० शन, दुश्मन; कल्ल-वि० (सं० कल्य) १. स्वस्थ, (दे० ना० मा० २,२)। रोग-रहित, २. दन, चतुर; (दे० ना०- कल्लोलिनी-स्त्री० (सं० कल्लोलिनी मा० ८, ६५)। कल्लविन-वि० (६०) १. आदित, >प्रा० कल्लोलिणी) नदी; (की० २, २. विस्तारित; (दे० ना० मा० २, १४४)। १८)। कल्होड-पु० (दे०) वत्सतर, बछड़ा; कल्ला-स्त्री० (दे०) मद्य, दाल; (दे० (जंद० ५, ७, २३; दे० ना० मा०२, ना०.मा० २,२)। ६) । कल्लाण-पुं० -पुं० (सं० कल्याण>प्रा० कल्होत्री-स्त्री० (दे०) बछिया जवान -- पावश्य (२०६) कवसो बस्तर नाम जो व्यायी या गाभिन न हो; (३०- १)। --हिं सर्व० (सं० कस्मिन्) फिस ना० मा०२,६)। (हे० ४२५, १); कवणु-सवं० कौन, पावइय-~-वि० (२० कानित) तुला मगही कउन, कोन; (सरह, दोहा- वाना, वनित; (प. २०७०, ७१)। कोश; प० च० १३, ५, १०, म० २, कपए---० न० (० पायन-प्रा० १६.६)। पावणे स० किस; म.यय) लोहो की कादियों का यह आव (विला०)। कयणे-सवं० किस (को० रण जो लड़ाई के नाम बोला पहनते थे; २. २२७) । कयण-रावं० (सं० कन) 120', ७, १५)। किस, (है० ३६७. ३)। ०२० ( फवच >प्रा० फाप-० न० (नं० कवच>प्रा० गर) गवन. (को० ४. फयय) लोहे की कड़ियों के जाल का बना हुआ पहनाया जिसे योद्धा युद्ध के पारद-न० ( पट>प्रात कया) मार पहनते थे। जिरह-वकतर; (जंयू० माया याम; (उम० ३,१८, ; जंदा ६, १३, ६) । २. न० (दे०) वनस्पति- १०. ८.४; भ०)। विगेप; (दे० ना० मा० २, ३)। फडकूर-- (मं वयूट प्रा. पवनी-स्त्री० (सं० कबरी, कवरी> कबरपर) गपट गुमत वा (नुद० २ प्रा० कवरी)। गुयी हुई नोटी, चोटी- बंद, केसपाय; (जंयू० ४, ११, १०)। सवडा--, ० (मं. कपईकान्) कवल-पु.० (सं० प्रा० कवल) कवल, यही कालियां; (उ० प्र० प्र०५१ ग्रास, भोज्य पदार्थ की वह माने के लिए एक वार मुह में डाली फायटी-स्त्री० (२० कपदिका प्रा० जाए; (जंबू० २, २०, ५) । कवलु फलिया) कौड़ी; तुल मगही कली; (१० १० १२, १०, ७)। (घोम्बिपा: चर्यापद)। (सं० कयलय >प्रा० पटि-अपए-पु. (सं० कपदियक्ष) कायल) मसना, हड़प करना । कवलिज्जा- जटाजूटधारी रक्षा "कयदि-जक्स तई ग्रसित किया जाता है (रि० ६,६)] धोनव संघ-पणु अवधारि"; (प्रा० गु० १६, १६)। कलिअ) ग्रसित, भक्षित; (जंवू० ८, कवट-पु. (सं० कपर्द) बड़ी कौड़ो; १४, २१; जस० २, २५, १४) । (दे० ना० मा० १, ११०)। फवसी-वि० (सं० कपिश) पीला-भूरा कावण-सवं० (सं० फ: पुनः>प्रा० या लाल-भूरा; "सिहि-सिहि-कयासु कवण) कौन, तुप्त० गु० कोण, (ण. कवसो कयासु"; --दिशाबों को लाल- ३, १३, १२; हे० ३५०; को० १, १३; भूरा (उज्ज्वल) वना देने वाला अग्नि- सं० रा०) । २. कौन-सी (जंबू० १,३, शिखर-समूह; (३० ६, ६, २६)। मात्रा जो - यरल- -सफ० कवह (२१०) कव्व कपाट>प्रा० म० कवाल- न० - . ८ की माला कवड-अव्य। १. कभी-कभी; (को० २, आंगन; (दे० ना० मा० २, ६)। २४) । २. कव; (प्रा० ५० १, २०२)। फवित्त-पु० (सं० कवित्व) १. काव्य, कवाड-पु० न० (सं० कवित; (प्रा० गु० २०, ६३)। २. कवि कवाड) किवाड़; तुल० कवाड का भाव; (सं० रा०) ३. काव्यप्रवंध (ण० ५, १०. १८)। (जंवू० ५, १, ३)। फवाण-पु० न० (सं० कपाट>प्रा० कवित्य-पुं० (सं० कपित्थ>प्रा० कवाड) किवाड़; (सि० २, ३२)। कवित्थ, कइत्य) १. वृक्ष-विशेप, कैथ का (सं० कपाल>प्रा० पेड़, २. फल-विशेप, कैथ; (भ०) । कवाल) खोपड़ी, खोपड़ी की हड्डी (ण० कविल-पुं० १. (सं० कपिल >प्रा० २, ३, १६; सं० रा०)। -कुट्ठ पुं० -कुट्ठ पु० कविल) वर्ण-विशेष, भूरा रंग; (ण० ७, (सं० कपाल+कोष्ठ) खोपड़ी; (जंबू० ७, ५, ८; प्रा० ५० २, ६७)। २. पुं० विप्र-बालक; (प० च० ३५, ५६)। कवालिय, कावालिय कावालिगी-पु. -केस पुं० (सं० कपिलकेश) कपिलकेश स्त्री० (सं० कापालिक:) शैव संप्रदाय के नामक राक्षस; (क० २, १२, ३)। अंतर्गत विशिष्ट संप्रदाय का अनुयायी कविस-न० (दे०) दारू, मद्य, मदिरा; जो मनुष्य की खोपड़ियों (दे० ना० मा० २, २)। धारण करते हैं और उन्हीं में खाते-पीते फवोय -पु० (सं० कपोत) म्लेच्छ देश- है; (सं० रा०)। विशेप; (प० च० २७, ७) । क वि--सर्व० (सं० किम् +अपि) कोई; कवोल-पु. (सं० कपोल:>प्रा० (जंबू० ४, १०, ६)। कवोल) गाल, गण्ड; (भ०; जस० १, कवि-पु० (सं० प्रा० कवि) कविता ६, ५)। -तय पुं० (सं० कपोल-+ करने वाला; (जस० १, १८, १०)। त्वचा) गाल का चमं ; (जंबू० २, १८, --गुण पु० (सं० काव्यगुण) काव्य को १२)। सौंदर्य प्रदान करने वाले तत्त्व । ओज, कन्वंग-पु. (सं० काव्य+अङग) प्रसाद, माधुर्य); (जंबू० १, ४, ४)। काव्य; के अंग; (जंदू० ८, १, ३)। -लहो भूदेव पु० (सं० कपिल-भुदेव) कव्व-पुं० (सं० काव्य >प्रा० कव्व) कपिल भूदेव नामक , ब्राह्मण, (३० २, काव्य; (की०, १, १७; प्रा० ५० १, ११; १६, ६)।-लाइय -पु. कपिल आदि; म० १, ३, ३; ण० १, ३, ४)1 --ह (व० २, २५, १०)। (कव्वह) काव्य; (को० १,३१) । -हीं कविठ्ठ-पुं० (सं० कपित्थ >प्रा० (कव्वहीं) काव्य; (की० २, ६१) । कवित्य,कइत्थ)वृक्ष-विशेष, कैथ का पेड़; -कला स्त्री० काव्य-कला; (की० १, (प० च० ४२,६)। ७)। –पिसल्ल वि० काव्य- धुरंधर कविड-न० (दे०) घरं का पिछला (ण० १, २, १०) । , . 5 कव्वड (२११) कसकस ५, ७, काव्य के फल, कबड-पु० न० १. (सं० कपाट> कुमारों के कों (चादुकों) से आहत प्रा० कवाड) किवाड़ (ण ३, १५, होते हुए अश्वों; (जंबू०० १०) । २. (सं० कर्पट>प्रा० कप्पड़) ११)। कपड़ा; (भ०)। ३. खराव गांव; (सि० कस-वि० (सं० किश>प्रा. कोस) १, ३)। कैला; (उ० व्य० प्र० ३२-१)। सर्व० कम्वत्य-पु० (सं० काव्यार्थ) (सं० कस्य) किसका; (संवि० १५, २, का भावार्थ; (जस० १, २३, १०)। ६)। पुं० (सं० कष>प्रा० क्स) कन्वपीऊस-पु. (सं० काव्य-पीयूप) कसोटी; (जंदू० १, ४, २) । काव्य रूपी अमृत; (जंबु० ३, १, १) । कसई-स्त्री० (सं० कशुक) फल-विशेष, कन्वअ-पुं० (सं० काव्य+भेद) काव्य+भेद) गवेषुक या कशुक नामक पौधे काव्य के भेद; (जंबू० १, ३, ४)। जो कि गोल लंबोतरे और एक ओर नुकीले कत्ववर-पुं० (सं० काव्यवर) श्रेष्ठ- होते हैं; (दे० ना० मा० २, ६) । काव्य; (प्रा० पं० २, १६०)। कसण-वि. (सं० कृष्ण>प्रा० कसण) कन्वाई'-पु० (दे०) दाहिना हाय; कृष्ण वर्ण, काला; (ग० १, १३, १०; (दे० ना० मा० २, १०) । प० च० २७, ८, २)। कन्वाड-पुं० (दे०) कबाड़ीपन; कसण पदिख-स्त्री० (सं० कृष्ण पक्ष) "होसइ कव्वाण वि भोयगु," अपना १. वह पक्ष जिसमें चंद्रमा का हान हो; भोजन तो कबाड़ीपन से भी २. अंधियार पक्ष; (०)। रहेगा; (जंबू० ६, ८, १६) । कसरणाणण-पुं० (सं० कृष्णानन) कवाडिअ-पु. (दे०) कबाड़ी; कृष्ण मुख; (व० २, २, १२) । "संसिणि नाम को वि कबाडिउ," कतणोरय-पुं० (सं० कृष्ण+उरग) संखिणी नाम का कबाड़ी रहता था; कृपण वर्ण का सर्प, (व० १,४,१२) । (जंवू० ६, ८, २)। -आलि (म० बाली) कृष्ण वर्ण के बड़े कस्वामय-० (सं० काव्य अमृत; या लंबे सर्प; (व० १, ४, १२) । (जंबू० ७. १, १)। -न० (दे०) १. कर्म-स्थान; कसताडणु-पु० (सं० करा=चाबुक । कार्यालय; २. घर; (दे० ना० मा० २, ताडनन् =मारना-पीटना) कोड़ा मारना; "णरणाहे तुरयहाँ सुयछलेण कसताडणु ५२)। (सं० कर्बुर>प्रा० किउ कोहलेण,” -राजा ने कौतूहलवश सूए की आंख बचाकर घोड़े को एक कन्चुर) कबरा, चितकबरा; (सुदं० ८, १,७)। कोज्ञ मारा; (क० ८, ६, ५)। कस-पु० (दे०) कश, चाबुक, अंकुश; कसमस-स्त्री० (दे०) कसमसाहट, "सामंतकुमरकस हयहरिल्लु," -सामंत समसाना; (म० २, ५५, १०)। चलता - कमाल- करं-वि० - कसमसत्ति (२१२) कहतर । कसु-सर्व की किसका; - अट्ट) कसनसति-स्त्री० (सं० कृशं+शंक्ति) या नज मं, जिसमें प्रायः किसी की स्तुति दुर्वल; (जस० ३, १४, १२) । या निंदा हो । उसमें किसी महान् पुरुप कसमीर-पु० (सं० कश्मीर >प्रा० की प्रशंसा की जाती है परंतु उस प्रशंसा कसमीर, कम्हीर) प्रदेश का नाम; (जंव० में यथार्थता कम पाई जाती है; (को० २, ६; १६, १०)। १७२)। कसर-पु० (दे०) गरियार, अधम बैल; फसीस-स्त्री० (फा० कशिश) बिचाव; मट्ठर (बैल) २. (दे० ना० मा० २, ४; (की० ४, ६५)। (जंबू० ७, ३, १३) । (सं० कस्य) कसरक्फ-पु० (दे०) कुड्मल, फूल (जंबू० ४, २२, २५) । कली; (जंबू ० ७, १, २)। कसेर-पु० न० (सं० कशेरु>प्रा० फसवट्ट-पुं० (सं० कपपट्ट>प्रा० कस कसेरु, कसेरुय) जलीय कंद-विशेष, तृण- कसौटी का पत्थर; तुल० विशेष; (ण. १, ६, १२)। कसेरु; गु० कसोटी, (की० ३, ११६) 1 -उ (महा० १, ३, १२)। -दल पुं० (सं० पुं०; (प्रा० गु० ३८, ६)। कशेरु+दल) जलीय कद-विशेप का फसाइयंत-कृ० (सं० कपायमानः) समूह; (जस० २, ३५, ११) । कसैला बनाता हुआ; (जंबू० ४, १५, फस्स-पु० (दे०) कर्दम, पङ्क, कीचड; १४)। (दे० ना० मा० २, २)। फसाय-पु. (सं० कपाय >प्रा० फसय) कस्सीर-पु० (सं० कश्मीर) चतुर्विध कसाय-क्रोध, मान, माया, और विशेप; (ण० ५, ७,७)। -य, पुं० लोभ; (ण० १, १२, ५)। (सं० कश्मीरज) केसरु; (सुदं० ८, २६, कसार-पु० (सं० कृसर>प्रा० कंसार) ३)। कसार, चीनी मिला हुआ कस्सु-सर्व० (सं० कस्य) किसका; (हे० तथा सूजी; (भ०)। ४२२, ६)। कसिट-वि० (सं० कृष्ट) खींचा हुआ, कप-बट्टइ-स्त्री० (सं० कर्प-पट्टिका आकृष्ट, चासा हुआ; (पड्) । >प्रा० कसवट्टिा) एक प्रकार का कसिण-वि० (सं० कृष्ण>प्रा० कसण) काला पत्थर जिस पर रगड़ कर सोने की कृष्ण वर्ण वाला; (जंबू० १०, २५, परख की जाती है; तुल० पं० कसवट्टी; १०)। पुं० वर्ण-विशेष; (सं० रा०)। (हे० ३३०, १)। (प्रा० कप्तिव-पु० (सं० काशी+अधिप) कहं-अव्य० (सं० कथं) १. कैसे; काशी का राजा; (प० च० १०४, पं० १, ६९) । २. क्यों, किस लिए; ११)। कसीदा -पु० (अ० क़सीद:) उर्दू या कहतरं-पु. (सं० कथान्तर) पूर्व जन्मों फ़ारसी भाषा की एक प्रकार की कविता की कथा; (जस० ४,४, १)। नगर- भुना आटा (षड्) ।
केहंतर (२१३) कहा २७; सं० - . १,७, कहतरु-० (२० कथा+अंतर) दूसरी कहकह-० (सं० प्रा० कहकहकह) घटना; (ग० ४, १, ५; संधि० ६८, हंती की आवाज; (प० २० २८, १२, १)। १)। कह-स्त्री० (सं. कया>प्रा० कहा) 1/कहकह-अक० कहकह आवाज कथा, वार्ता; (ण ६, ६, करना, (संधि० १२, २, ८) । कहकहत- रा०; म० १,३,३)। कह रहे थे; (जस० १, ६)। कह-अव्य० (सं० कथम् >प्रा० कह) —न्ति क्रि०व० जोर, से हंसना; (प० कसे, किस तरह; (भ०)। कह व-अन्य० च० ३२, ६, २) । (सं० कयम् + अपि>प्रा० कह+अवि) कहण-न० (सं० कथन >प्रा० कहण) कैसे भी, किसी तरह भी; (ण० ३, ६, कथन, उक्ति; (जंबू०७, १,६)। कहनी-स्त्री० (सं० कयानिका) हाल- कह-सक० (सं० क्वथ्) क्वाथ करना, जालना । -ई; (पड्)। चाल, वार्ता; तुल० पं० कहाणी; (की० ३, १६)। 1/कह-(सं०१/ कथ् >प्रा. कह) वोलना। कहबंध-पुं० (सं० कथा प्रवन्ध) कथा -इ सक० व० (सं० कथयति की गठन या वंदिश; >प्रा० कहइ) कहना, बोलना; (महा० (जंवू० ६८, ८; ण० १, ५, ४)। कह-क्रि० कहय-वि० (२० कथक>प्रा० कयग) व०, कहता हूँ (की० १, ५०)। कहए- व० कहता है (को० ३, १९) । कहो- कहने वाला। पु० कयाकार; (दे० ना. मा० १, १४५)। कहूँ; (की० ३, १३६) । कहणह, कहणु -कहने के लिए: (सं० रा०) । कहमि- कह व-अव्व० कयम् वा) कि०, व०, कहना (म० १, ३, ३)। १. किसी तरह; (जंबू० २, १६, ७)। -वा कहूं (को०, १,६८)। -सि २. (सं० कथम् अपि) किसी प्रकार भी; कहो, बखान करो; (की० १, ४०); कदापि, कभी (क० १, २, ६) । २. (क० २, १४, १)। -हु आ०, कहो, बखान करो; (को० २, ३) । तुस० राज० कहबो, गु० कहे; कहा-स्त्री० (सं० कया>प्रा० कहा) (प्रा० पै० २, १६६) । कहत-कृ० (सं० कथा; (जन० ३, ११, १४; कथय+श); (जंबू० ५, ४, ६)। २३५; विला०)।--वसेन पु० (सं० कहने लगे; (संधि० कथा+अवशेष) कथा का १२, ८,२३)। कहत-कि० भू० का० -दिराम पुं० (जंवू० ६, १४, ५) बतला दिया, "काहु वाट कहल सोझ" (सं० कथा+विराम) कथा का रुकना; -अर्थात् किसी ने सीधा रास्ता बतला (जंवू० ४, ४, ६)। दिया; (को० ० २, ७२) । कहा-अन्यः (सं० कयम्) क्या; (रा० . , की०४, शेप भाग; कहण लन्ग-क्रि० (२१४) २६) मं कोई, " (को०२, ११)। निदि न कहों अच्छानिबाद,” किन्तु कहियंतर-मुं० (० कथित अतर) वह देखकर कोई आन्त्रयंचकित नहीं था; कहा हया नर; (नंदू० ४, ५, ६) । (०१, ५, ६) कडे-क्रि० दि० (सं० कुतः) १. कही ने कहागन-२० (सं० कथानक>प्रा० भी, (की ४, १८:)। २. कहां; (प्रा. कहानग, कहाणय) कथा, वानां; (सुदं० पं० १, १९) 1 ३.३० कृ० (० ७, १०, ६) कहानय (म०)। तुल० कृत्वा>का>क, कह) करके; म. कहानी। (क्री० १,५७)। कहानी-स्त्री० (मं० कयानक>प्रा० कह-2. मं० (मं० कस्य) किडता; क्या कहाण्य) १. पूरी वार्ता या हाल (वृ०, १, १६)। कहो-म० बाल; (को०४, १४१) । २. कहानी; किसका; (जंबू० ३, ६, ८)। २. त्रि०. (क० २,१६,१)। वि० (२० कुतः) किसी तरह, कहीं में व्हार-युं० (सं० स्क्रन्त्र भार:क> भी; (को०४, २२३)। २. कहां से प्रा० काहार) टीम, एक हिंदुओं की (पइ) ! ३. किम से; (म०) ४. किमने जाति जो पानी भरने और डोली उठाने (महा० ६६, १५, ८)। का कार्य करती है; "कन्हवलद्द-कहा- कहेड-वि० (६०) तकन, युबक; (६०- रियहि संदाहिय करकट,” ऊंटों; बलों ना० मा० २, १६)। व कहारो द्वारा जाने योग्य वस्तुएं ले कल-मुं० (सं० कृष्ण) कृष्णा, (की० नायी जाने लगी; (जंबू० ५, ६, ५, ३० १,२१)। व्य० प्र०८६-२६)1 कांइ-अव्य० कने, क्यों कर; (की०१, कहि-कि० वि(८० च>प्रा० कहि, १५) । कहिना) नहीं, कहां, किस स्यान में कांचिडा-स्त्री (६०) एक कामरण (सं० स०) । कहि-कहाँ (७०२, १, कांवडिऋत; (स० ११) । ५,हे० ३५म; महा० ६९,८, कांठ-० (० कण्ठ) गला; कांहि; १३) । कहि; क्रि० वि० (जं० १,६, (न० २६)। ११)। कहि मि-क्रि० वि० (सं० वापि) कहीं भी; (जं० कांठी-स्त्री० (मं० कठिका) गले का २)। एक नामरण (०६)। (मं० कवित>प्रा० कांड-मुं० (सं० काड) तीर, बाण; कहिय) कथित, उक्त; (H० १,१, (क्री०४, १६३) । ६) । कहिय; (जन. १, २५, ५० कांती स्त्री गाया छंद का नेत्र; (प्रा० २,२,१)। १०१, ६०)! कहिनी-स्त्री० (# कयनी) बातचीत; कांच-पुं० (० कांच-पुं० (२० स्कन्छ>प्रा० कंव, - १, कहिल-वि० कांवल (२१५) काए खंघ) कंघा, कांव; (उ० व्या थियउ," अर्थात् इस सदृश रूप तुम्हारे २१)। हृदय में कुटिल शल्य की भांति कैसे कांबल-पुं० न० (सं० कम्बलम् >प्रा० स्थित रहा? (जंदू० २, १८, १४)। कंवल) कामरी, ऊनी कपड़ा; (उ० व्य० काइ–सर्व० क्या, की० ४, १४५) । प्र० ५-१५)। काइ-पु० (सं० प्रा० काय) शरीर; काही-अव्य० (सं० कुत्र) कहाँ; (उ०- (सं० रा०; महा० ६८, ८, १२) । व्य० प्र० ३०-३)। काहणी-स्त्री० (दे०) गुजा, लाल का-५० का (की० २, १३) । रत्ती; (दे० ना० मा० २, २१).। कांधे-पु० (सं० स्कन्ध>प्रा० कंध) काउ-पु. (सं० प्रा० काक) कौआ, स्कन्ध, कंधा, (की० ४, ४४)। वायस, "हंसु व काउ न याणइ घूयडु का-१. सवं० (सं० क: या किम्) क्या; -उल्लू हंस के समान (दीखने वाले) तुल० मगही का; (सरहपा, चयपिद; की० कौवे को पहचान नहीं पाया; (जं० ८, १, २७) । २. ५० (सं० क:) संवोधक १५, १४) । ३० (सं०/कृ+तुमुन् = परसर्ग; (प्रा० पै० २, १२०) । ३. सर्व० कर्तुम्) कर; "एत्यंतरें पिय परियरिय सं० कस्य, किसका; (उ० व्य० प्र० १५ काउ रायहाँ धुर अप्पिवि सुअहाँ जाउ, १) ४. सर्व० स्त्री० (सं० का) कोई; (व० १, १२, १)। (जंबू० २, १४, ६)। काउरिस-पुं० (सं० कापुरुष>प्रा० फाप्र-पुं० (सं० प्रा० काय)) शरीर; काउरिस) कायर पुरुष; (जंबू० ७, २, (ण० १, ६, २)। पुं० (सं० प्रा० काक) १६)। कोना; (प० च० ८, ७६)।- स्त्रिी० काउल-पुं० (सं० प्रा० काक) काक, (२० काय) शरीर; (की० ४, १६४) । कौआ; (जस० १, १०, ६)। कामय-पु. (सं० कायस्थ) कायस्थ काउहाई-० (सं० प्रा० केवल) केवल नामक जाति; (फी० २, १२१) । ज्ञान; (क० ६,१३, ८)। काअर-वि० (सं० कातर) दीन; (की० काउल्ल-पु० (दे०) वक, बगुला; (दे०- २, ३६; प्रा० १५५) । ना० मा० २.६)। २- कायर; (प्रा० ५०.१, १९३) । काउसन्ग-पु० (सं० कायोत्सर्ग) काई-सर्व० न० (सं० किम् =कानि) १. जैन शिल्प में अहए की वीतरागाव- क्या; तुल० मारवाड़ी काई, स्था में खड़ी मूति, २. जैन धर्म के अनु- (प० च० ३४, १, १; हे० ३५७, ३; सार एक प्रकार की अन्ति। तपस्या; क० ४, १२, ६) काई-सर्व० न०, क्या; (संवि० १, ६, २)। काओसग्ग; (प्रा० ५० १, ६)। काई-सर्व, न० (भ०)। (सं० किम्) कैसे, "इय रूब-सरिन्छ काए-पुं० (सं० प्रा० काय) शरीर; हियउ तिरिच्छउ सल्लु काई तुम्हहं (विला०)। पै० १, गु० कां;
काएथ्य (२१६) काण पं० काणा; कानन>प्रा० काएथ्य-~(सं० कायस्थ) कायस्थ नामक काढिय-वि० (सं० कपित) खींची हुई; जाति; (को० ३, ११६) । (जंबू० ६, ४, ६)। काओल-पुं० देश-विशेष; (प० च० काण-वि० (सं० प्रा० काण) काना, ४६, ८, १५)। अक्षिविकल, एकाक्ष; तुल० कागलि-स्त्री० (सं० काकलि,-ली> (जस० २, १७, ३)। प्रा० कागलि, ली) मंद मधुर स्वर, काराच्छि-स्त्री० (दे० ( टेढ़ी नजर से स्वर-विशेप, सूक्ष्म गीत-ध्वनि; (क० ३, देखना, कटाक्ष; (दे० ना० मा० २, ६, ३)। २४)। कागोणंद-पु० (सं० काकोनन्द) काको- काणग-न (सं० नंद नाम की चक म्लेच्छ-जाति; (प०. काणण) १. जंगल; (जंबू २. १३, च० ३४,४१)। १२) । २. उपवन; (प्रा० ० १, काचले-वि० (सं० कृत्य>प्रा० कच्च) १३५)। काणद्धी-स्त्री० (दे०) परिहास; (दे०- कामदार या जड़ाऊ; (की० ४, ४२) । काछ-स्त्री० (सं० कक्षा) ना० मा० २, २८)। कमर पर बांधने का एक वस्त्र; (रा० २६) । (सं० कारणा-~~-वि० (सं० प्रा० काण) काना, कक्ष्या) पार्श्व भाग, (की०४, १६) । एकाक्ष; तुल० राज० काणू; (प्रा० ५० काजर-पुं० (सं० कज्जल) काजल, १, ११६)। कालिमा; तुल० पं० कज्जल; (को० २, काणि-स्त्री० (दे०) मर्यादा का ध्यान, १३१)। लोक-लज्जा, संकोच; (संधि० १, ३, काटिसक०, भू० का० (सं० कृत् > ५) । २. चिता; (प्रा० गु० ७, २३) । कट्ट) काटते थे; (की० ४, ७८) । ३. वि० काणी, अक्षिविकला, (जस० २, काठहून० (सं० काष्ठ >प्रा० कट्ठ) काठ, लकड़ी; (उ० व्य० कारिण-क्रि० भू० का० (दे०) छिद २१)। गए; "भक्खंतेण दंत-वणे काणिउँ, Vकाढ-(सं०/कृप्>प्रा० कड्ढ) (उसे) खाते-खाते उसके दाँत व मुख छिद खींचना; गु० काढवु; (संधि० . १६, ५, गए, (जंवू० ६, ११, ३) । ८)। काणीरग-~~-पु. (सं० कानीन>प्रा० काढल-क्रि० भू० का० (सं० कृप्> काणीण) कुवारी कन्या से उत्पन्न पुत्र, प्रा० कड्ढ) निकाले गए; "सिन्धु पार कुमारी-पुन, कन्याकाजात, (प० च० सम्भूत तरणि रथ वहइतें काढल,"-वे ३४, २, ७; जस० २, १७, ३)। सिंधु पार के देश में उत्पन्न हुए थे और काण्ण-पुं० न० (सं० कर्ण>प्रा० सूर्य के रथ को खींच कर निकाले गए थे; कण्ण) कान; मुहा० 'काण्ण समाइ (की०४, ५३)। अझिरस' -कानों में अमृत रस समाना .
काती (२१७) कामएउ पं० कन्न; अर्थात् श्रवण से आनन्द होना; १. पुराना, जीर्ण-शीर्ण या थेगली लगा (को०)। कपड़ा, २. कपड़े का टुकड़ा; (उ० व्या कातो-अव्य (सं० कुतः) 'कातौ प्र० ५२-१२) । कापड; (की २,६५)। पढि ककरें घर'-कुतः पठ्यते गृहे कापल-पु० (सं० कर्पट>प्रा० कप्पड) कस्य ? (उ० व्य० प्र० २८, ८) । वस्त्र, कपड़ा; (को० २, ६५)। कादम्बरि-स्त्री० (सं० कादम्बरो) एक कापि, कावि-सवं. (सं० कोपि) विशेष प्रकार की श्रेष्ठ सुरा; (की० ४, कोई, कोई, भी; (सं० रा०)। ७५)। कापि-पु० कापिष्ठ नामक विशेष कादी-पु. (अ० काजी) काजी, न्याय- कल्प; "कपिट्ठए कप्पि विसिट्ठए देवा- कर्ता, मुसिफ; (को० ४, ७) । णंद सुरूवउ," -देवों को आनंदित करने कान-पुं० न० (सं० कणं>प्रा० वाले कापिष्ठ नामक विशेष कल्प में स्व- कण्ण) श्रोत्र, कान; तुल० रूपवान् देव हुआ; (व० ७, ८, १२) । (उ० व्य० प्र० ५१-१२) । कामंदुहा-स्त्री० (सं० कामदुधा) काम- कानोड-पु० (सं० कर्णाट+ओड) घेनु; (प० च० ८२, १४) । मोनियर विलियम्स ने ओड्र शब्द का Vकाम-(सं०/कामय)इच्छा करना। अर्थ एस प्रकार दिया है--"of a co कामंती-वि० कामयमाना, (प्रा० ५० १, mtry (the modern Orissa) the ३)। inhabitants of that country, काम-पुं० (सं० प्रा० काम) १. छंद- कर्णाट से मिले हुए उड़ीसा प्रांत का विशेप; (प्रा० पैं० २, ३)। २. कामदेव निवासी। -उ; (रा० १०)। (सं०रा०); ३. इच्छा; (जबू० ११, १, ३; कान्ति-स्त्री० (सं० कान्ति>प्रा० की० १, ४०)। -गह पुं० (सं० कैति) सौंदर्य, शोभा; (को० १, ७१)। काम+गृह) कामाग्रह; (ण० ३, ६, ८)। कान्ह--पु० (सं० कृष्ण>प्रा० कण्ह) -जर पु० (सं० कानज्वर); (जस० कृष्ण; तुल० राज० कान्हु; (प्रा० ५० १, २, १०, १२)।-न, इच्छा (की० २, ६) । १३३)। ल्व पुं० (सं० कामरूप) कान्हइ--अव्य० समीप में; "कहिय वात स्थान-विशेष; (ण० ८, २, ६)।-लेह, कान्हइ वइसारिउ," तुल० गु० कने, पु० छंद; (सुदं० ७, ८, १६) । -वाण (प्रा० गु० ७, १८)। पुं० छंद (सुदं० ३, ६, १६) । कापड-पुं० (सं० कर्पट>प्रा० कप्पड) कामएउ-पुं० (सं० कामदेव) के दर्प, कपड़ा; (रा० २६)। मदन, कामदेव; (विला०)।-बंधु पुं० कापडी-पु० (सं० कार्पटिकः) तीर्थ (सं० कामदेव+वन्धु) वसन्त, "पत्तु यात्री; (उ० व्य० प्र०५-२५)। कामएव-बंधु उच्छलत-फुल्ल-गंधु"; (व० कापडु-पु० (सं० कर्पट>प्रा० कप्पड) २, ३, ८)।
कामकरि (२१८). कामार्थ. पै० २, . . कामकरि-पु० (सं० काम+करि) - पांडुटकवोला," अर्थात् कामोद्रेक पाण्डुर. मदन-हस्ति; (जंवू० ४, ११, ५) । वर्ण कपोल वाली (कामिनी); (जंवू० १, कामकरेगु----स्त्री० (सं० काम+करेणु) ६, ४)। कामोन्मत्त हस्तिनी; "दरिसावइ कामक फाम-भयहु-० (सं० काम + मद, रेणु कील,'' अर्थात् कामोन्मत हस्तिनी काममद); "काम-मयहु जोवाहहो," के समान क्रीड़ा दिखाने लगी; (जंबू० काममद को जीतने वाले; (व० २, ४, ४, ११, ५)। १३)। कास-कित्ति-स्त्री० (सं० काम+ कीर्ति कामरूप-तु० (सं० कामरूप> काम- >प्रा० काम-+कित्ति) काम रूपी कीर्ति; रूम) आसाम का एक जिला जहाँ काम- "जोण्हणाई काम कित्ति," वह काम रूपी ध्या देवी का स्थान है; (प्रा० कीति के लिए ज्योत्स्ना के समान था; १११) । पु० कामरूप नामक शत्रु; (व० (व० २, ३, १६)। ३, १०, ३)। कामकील-स्त्री० (सं० काम+श्रीडा) कामरूव-पु (सं० कामरूव>प्रा० रति-क्रिया, संभोग; (जबू० १०, १३, कामरूअ) असम-प्रदेश, प्रदेश-विशेष, ३)। (जंबू० ६, १६, १५.)। कामग्गि-पुं० राक्षस योद्धा; (प० च. कामलय-स्त्री० (सं० काम+लता) ५६, ३६)। वेश्या; (जंवू० ६, १२, ४) । कामदाइणी-स्त्री० (सं० कामदायिनी) कामवण्ण-पुं० राक्षस योद्धा; (प० च० ईप्सित फल को देने वाली विद्या-विशेष; ५६, ३५)। (प० च० ७, १३५)। कामवेअ-~-पु., (सं० काम+वेग) कामदेउ-पु० (सं० कामदेव >प्रा० कामोते जना; (जंवू०४, १६, १)। कामदेव, कामदेअ) मदन, कंदर्प रतिपति, कामस्थान--- (सं० काम+स्थान > स्त्री पुरुप के संयोग की प्रेरणा प्रा० काम+ठाण) कामक्रोडा का स्थल; करने वाला एक पौराणिक देवता, (जंबू० ६, १३, ६)। जिसकी स्त्री रति, साथी वसंत, वाहन कामाउर-वि० (सं० काम+भातुर> कोकिल; अस्त्र फूलों का धनुष वाण है; प्रा०काम+आउर) काम से पीड़ित;(ण, (व० १, ५, २)। ३, २, १५; जंवू० ६, ७, २)। कामधेणु-स्त्री० (सं० कामधेनु>प्रा० कामाखल~-वि० (सं० काम+आकुल कामवेणु) ईप्सित फल देने वाली गाय; >प्रा० काम+आउल) कामातुर; (जंवू० (जंबू० ४, १८, ६)... कामघेणू; २, ६, ६); (भ०) । कामार्थ-पु० (सं० काम+अर्थ) काम कामपंडुर-वि० (सं० काम+पाण्डुर) और धन, “धम्मकामत्थसेवासु"; (जंबू० कामोद्रेक के पाण्डुर वर्ण वाली "काम ५, ६, १५)। -- अंनंग, , कामालसु (२१६) कायम्बरि . - मा० २, -या मा० २, कामालसु-वि० (सं० काम+अलस) परिहार किया; (क० १०, २७, ७)। काम में आसक्त; (जस० २, १, १)। कानुच्छाह-पु० (सं० काम+उत्साह कामावार---पुं० (छंदशास्त्र में) कामा >प्रा० काम+उच्छाह) कामोत्साह वतार नामक छंद; (प्रा० पै० २, (जंबू० १०,२, २ ) ५०)। कानुय---- वि० (सं० कामुक >प्रा० कामिंजुल-पुं० (दे०) कामिजुल कामुअ, कामुग) कामी, विषयाभिलाषी; पक्षी-विशेष; (दे० ना० (ण० १, १७, २) । २६)। कामेसर-पु० (सं० कामेश्वर) कामे- कामिरिण-स्त्री० (सं० कामिनी>प्रा० श्वर नामक राजा; (को० १, ६६)। कामिणी) १. मनोहर और सुंदर स्त्री; कायंचुल-पु० (दे०) कामिञ्जुल, जल- २. सामान्य स्त्री; (सं० रा०)। पक्षी-विशेष; (दे० ना० मा० २, २६) । स्त्री० कामिनि (जस०) । •कायंदी-स्त्री० (दे०) परिहास, उपहास; कामिणी-स्त्री. (स० कामिनी>प्रा० (दे० ना० मा० २, २८) । कामिणी) स्त्री, कांता; (जबू० १, ६, कायंधुप्र-पु(दे०) कामिञ्जुल, जल- ३)1-जणावलि स्त्री० (सं० कामिनी- पक्षी-विशेप; (दे० ना० जन+अवलि) कामनियों की पंक्ति; २६)। (जवू० ५, १,८)। कायंवर-न० (सं० कादम्बर) कदम्ब के कामिनी-स्त्री० (सं० कामिनी>प्रा० फूलों की शराव; मद्य-विशेष; (प० च० कामिणी) कामिनी, कांता, स्त्री; (को० १०२,१२२)। १, १०५)। काय-पु. (सं० काक>प्रा० काय) कामिय-वि० (सं० कामुक>प्रा० १. कौआ; (भ.) । २. पुं० (सं० प्रा० कामुअ) प्रेमी, कामातुर; (सं० रा०)। काय) देह, शरीर; (जंवू० २, २०, ३) । कामी-वि० (सं० कामिन् >प्रा० ३. पु० (दे०) १. लक्ष्य, निशाना; कामि) विषयाभिलापी; (जस० १, १२, २. उपमान, जिस पदार्थ की उपमा दी १६)। जाए; (दे० ना० मा० २, २६) । कामुअ-वि० (सं० कामुक>प्रा० कायउल-पु. (सं० काफकुल) कोदों का कामुग, कामुअ) कामी, विपयाभिलापी; समूह; (जस० १, १३, ३)। (जंवू० ४, २१, ६) । कामुय; (जंबू० ३, कायपिउच्छा, कायपिउला-स्त्री० (दे०) १२, ४)। कोकिला, कोयल, पिकी; (दे० ना० ना० कामुक्कोयण-पु० (सं० काम+उत्को २,३०)। पन>प्रा० काम पुं० उक्कोवण, उक्को फापमाण-पु (दे०) बासन; (जंबू० यण न०) कामोद्दीपन; "परिहरियई कामु ८,१३, ३)। क्कोयणाई" -उत्तने -उसने कामोद्दीपन का कायन्वरि-स्त्री० (सं० कादम्बरी> - 1 कायर (२२०) कारु. . - मा० . . प्रा० कादंबरी) मदिरा; (प० च० ३८, कारण-न० (सं० प्रा० ....कारण) हेतु, ११,४)। कारण; (जंबू० ४, १२, १२) । कायर-वि० (दे०) प्रिय, स्नेह-पान; कारवस-पु. (सं० कारवश) देश- (३० ना० मा ० २, ५८) । २. (सं० विशेष; (भ०) । कातर) डरपोक; तुल० गु० कायर; (प० कारा-स्त्री० (सं० कारा) जेल, कैद- च० ३२, २, ७) । -णर पु० (सं० खाना; (दे० ना० २, २०.)। कातर नर>प्रा० कायर गर) डरपोक -गार पुं० न० (सं० कारागार.) कैद- मनुष्य; (व० २, १, १०) । खाना, (जस० ४, २७, ३०)। कायरी-वि० स्त्री० (सं० कातरा) कातरा) कारायणी-स्त्री० (दे०) सेमल का पेड़ अधीर, डरपोक; (जंवू० ६, १७, १) । (दे० ना० मा० २, १८)। कायर-वि० (सं० कातर>प्रा० कायर) कारावइ-वि० (सं० कारित>प्रा० डरपोक; (व० २, १, १०) । काराविअ) करवाया हुआ; (व० १, १२, कायल-पु० (दे०) १. कौआ; २. वि. ७)। प्रिय, स्नेह-पात्र ; (दे० ना० मा० २, कारावय-वि० (सं० कारक) , कराने ५८)। वाले; (महा० ६६, १५, ११) । कायाकिलेश-पु० (सं० काया+क्लेश) काराविक्ष-वि० (सं० कारित >प्रा० काया का कष्ट; (जंवू० १०, २२, काराविअ) करवाया हुआ, वनवाया ८)। हुआ; (ण० ३, १५, ६)। कारंकड-वि० (दे०) कठिन, कठोर; कारावियय-वि० (सं० कारित>प्रा० (दे० ना० मा० २, ३०) । कारिय) कराया हुआ, बनाया हुआ; (प० कारंड-पु० (सं० कारण्ड>प्रा. च० ३०, ११, ७)। कारंड) पक्षी-विशेष; (सि० १, ८; जस० कारिअ-वि० (सं० कारित>प्रा० १, १२, ७) । २. पुं० (दे०) मण्डल, कारिय) कराया हुआ, बनाया हुआ; नीड़; (सं० रा.)। (जंवू० २, .१६, ५)। कार-सक० (सं० कारय >प्रा० कार) कारिम-वि० (दे०) कृत्रिम, बनावटी; करवाना, बनवाना; (जंबू० ६, ३, ७) । (दे० ना० मा० २, २७; जस०४, १८, कारिवि-पू० का० क्रि० (जंबू० ३, १३, १)। १३)। कारें वि-पू० का० क्रि० (जंवू . कारिमय-वि० (दे०) कृत्रिम, रचित, ६, ३, ७)। निष्पादित; (प्रा० गु० ५, १६) । कार-वि० (दे०) कटु, कड़वा; (दे०. कारिय-वि० (सं० कारित) ना० मा० २, २६)। वि० . (सं० प्रा० हुआ, वनवाया हुआ; (भ०) । कार) करने वाला; (५० च० १७, कारु-पु० (सं० प्रा० कारु) कारीगर, ७)। शिल्पी; (संधि० २, १३, ७) । . कराया ' कारुण्ण (२२१) कालिग काला "सव्वु वि कारण-न० (सं० कारुण्य >प्रा० कालरणेव-पु. (सं० कालार्णव, काल+ कारुण्ण, करुन्न) दया, करुणा; (ण० ३, अर्णव>प्रा० काल+अण्णव ७, ११) । कारुन्न; (सं० रा०)। समुद्र; (व० १०, १०, १)। कारोहण-पु. (सं० कारु=पहाड़ी) कालदव्व-पू० (सं० कालद्रव्व>प्रा० वन, "कारोहणे गर वम्हणु वलेवि," कालदब्ब) काल-परिमाण; (क० १०, १६, ७)। कालदव्यु तहु तिणसमु जे संपन्ननाणसा, कालंगुलि-स्त्री० कनिष्ठिका उगली; परन्तु जो ज्ञान-लक्ष्मी संपन्न है, उनके (सं० रा० २, ८०-८१)। लिए तो समस्त कालद्रव्य (काल-परि- कालंजर-पु० (सं० कालिजर>प्रा० माण) भी एक दिन के समान है; (जंबू० कालिंजर) देश-विशेष; (प्रा० ५० १, ३, १, ८)। १२८)। कालभुयंग-पु० (सं० काल+भुजङग) काल-पु० (सं० प्रा० काल) समय; काल रूपी सर्प; (जंवू० ३, ८, १०)। (सं० रा०; जस० १, १, ६) । २. पुं० कालय-वि० (दे०) धूर्त, ठग; (दे०. मृत्युराज; (जबू० २, १६, १) ३. न० ना० मा० २, २८)। (दे०) अंधकार; (दे० ना० मा० २, कालरत्ति-स्त्री० (सं० काल+रात्रि) २६) । ४. पु० राजा-विशेप का नाम; अधेरी और भयावनी रात; (जबू० १०, (प० च० ८, १५६) । विभीपण का १३, ७)। मुख्य भट; (प० च० ५५, २३)। कालव-न० (सं० कालपृष्ठक) वानरयोद्धा; (प० च० ५७, ११)। धनुप; (दे० ना० मा० २, २८; जंवू० दाशरथी राम की प्रजा का अगुआ; (प. ५, १४, २१)। च० ६३, १७) । -गि पु० विद्याधर कालवेक्खा-स्त्री० (सं० कालापेक्षा) राज; (प० ० ७, ४६)। काल पर समय-समय पर दृष्टि रखना; काइल-कि० काला करती है; (महा० (जस०)। ५४, २, २-५)। काला-स्त्री० (छंदशास्त्र काल-वि० काली; (उत्तर पुराण) । माता 'चारी हारा अट्ठा काला, (जहाँ) कालकूड-न० (सं० कालकूट>प्रा० चार हार (गुरु) हों, आठ कलाएँ कालकूड) उत्कट विप विशेप; (जंवू० (मात्राएँ) हों, (प्रा० पै० २, २७) । १०, ५, ६)। कालाणल-पु० (सं० कालानल >प्रा० कालखर-पु० न० (सं० कालाक्षर) काल+अणल ) प्रलयकालीन मल्प ज्ञान; (ण० ३, १, ३)। (जस० १,२८, १)। कालगोयर---वि० (सं० कालगोचर) कालाहि-पुं० (सं० काल+अहि) यम-गोचर, यम से साक्षात्कार; (जस० कृष्ण सर्प; (जंबू० १, १८, ८)। १, १३, २)। कालिंग-वि० (सं० कालिग) कलि- में) कला, अग्नि;
कालिगी (२२२) कासग पेड़ या फूल; मा० २, ङग देश में उत्पन्न; (प० च०६६ श्याम वर्ण वाली) काली; "रुणु-मुणंति ५५)। भमरालि कालिया;" (व० १, ८, १) । कालिगी-स्त्री० (सं० कालिङ्ग>प्रा० कालि-सवरी--स्त्री० (सं० काल+ कलिंग पु०) कलिम देशवासिनी स्त्री; शवरी) काली नामक शवरी; "सवरु (सुदं० ४, ६, ६)। कालि-सवरी-भुव-लालिउ" (उन मुनीन्द्र कालिजए-न० (दे०) श्याम तमाल का ने) एक शवर को काली नामक शवरी (दे० ना० के साथ देखा; (व० १, १३, ३)। २६)। कालो-स्त्री० (सं० प्रा० काली) रसिका कालिंजर-पु० (सं० कालिञ्जर>प्रा० छंद का भेद; (प्रा० पैं० १, ६६)। कालिंजर) १- पर्वत-विशेप; (क० ६, २, कालेज्ज-न० (दे०) श्याम तमाल का ४) । २- जंगल-विशेष; (प० च० ५८, वृक्ष; (दे० ना० मा० २, २६) । ६)। झालिदी-स्त्री० (सं० कालिन्दी) एक कावडिल-पुं० (दे०) कावर अथवा इंद्राणी, शकेंद्र की एक पटरानी; (प० वहङ्गी से भार ढोने वाला; (प० च० च० १०२, १२९)। ७५, ५२)। कालि-पुं० (सं० प्रा० काल) समय, फावडिय-पु० दास-विशेप-नाम; (प० वस्त; "जाहि कालि ललिय भू-सुदरीएँ, च० ५, १०२)। कुसुमाउह-केसरि-कंदरीऍ," (व० १, कावालिय-पु० (सं० कापालिक> १३, ३) । पु० राक्षसयोधा; (५० च० प्रा० कावालिय) शैव मत का तांत्रिक ६१, २७)। साधु; (हे० ३८७, ३) । कावालिनी स्त्री० कालिप्र-पु० (सं० प्रा० कालिय) कापालिनी; (ण० ८, १४, ५) । कालिय नाग, इस नाम का एक सप; कावि-सर्व० (सं० कोऽपि) कोई; (व० (प्रा० ५० १, २०७) । १, ११, १०)। कालिमा-स्त्री० (दे०) १- शरीर, देह, कावेरि-स्त्री० (सं० कावेरी) नदी- २- कालांतर; ३- मेघ; (दे० ना० मा० विशेष, (प० च०.४८, १०, ४)। २, ५८)। कास-पु० (सं० काश >प्रा. कास) कालिवका-स्त्री० (सं० कालिका) १- कास पुष्प, कास का पुष्प जो सफेद चंडिका, काली, कालिका नामक देवी; और शोभायमान होता है; (प्रा० ५० १, "जुज्झती उद्दामे कालिक्का संगामे'. ७७)। २-० (सं० काश, कास> उद्दाम संग्राम में युद्ध करतो तथा नाचती प्रा० कास) खाँसी, रोग-विशेप; (जंवू० कालिका हमारे दुःख का नाश, करे, २, १३, ६)। ३- न० (सं० कांस्य > (प्रा० पं० २, ४२) । प्रा० कंस) धातु-विशेप, काँसा; (पड्) । कालिया-वि० (सं०>प्रा० . काला फासग-पु(सं० कायोत्सर्ग) १- जैन - i.
कासद्धय (२२३) काहलिय . शिल्प में अर्हत् की वीतरागवस्था में खड़ी .११)। मूर्ति । २- जैन धर्म के अनुसार एक प्रकार कासीस-पु. (सं० काशि+ ईश) की अग्नि । तपस्या; (प्रा० गु० २७, काशीराज; टि०-काशीराज की प्रशंसा ४)। करते हुए कवि ने कहा है कि काशीश, कासद्धय-पु० उवरंभा के पिता; (प० चंद्रमा आदि श्वेत पदार्थों ने उनकी च० १२, ७०) । कीति को जीत लिया है, (प्रा० पैं० १, कासय-पु० (सं० कृपक) किसान; ७७) । -र पु० काशीश्वर नामक (दे० ना० मा० १, ८७), राजा; (प्रा० ५० १, १४५) । कासव-पु० दाशरथी राम की प्रजा कासु-सर्व० (सं० कस्य) १- किसका; का अगुआ; (प० च० ६३, १७) । (व० १, ३, १४, हे० ३५८, २; ण० १, कासवगोत्त-पु० (सं० काश्यपगोत्र > १५, ४) । २- किसे; (महा० ६६, ६, प्रा० कासवगोत्त) काश्यप नाम का गोन; ६) । (जस० ४, ३१, २)। काष्ठा-स्त्री० (सं० काष्ठा) सीमा कासा-स्त्री० (सं० कृशा) दुर्बल स्त्री; चरम अवधि; (को० ३, १२०)। (पड्) । काह-क्रि० वि० (सं० कथम्) क्या; फासायपड -पुं० (सं० कापायपट> (को० ३, ५६) । काहु; (रा० २१) । प्रा० कासायपड) कपाय रंग से रंगा हुआ २- सं० किम् क्यों; (उ० व्य० प्र० १६- वस्त्रादि, (जस० २, १८, ४) । २३)। कासार-न० (दे०) धातु-विशेष, सीस काहणअ-न० (सं० कथानक >प्रा० पत्रक; (दे० ना० मा० २, २७) । कहाणग, कहाणय) कथा, वार्ता; (ण. कासिअ-न० (दे०) १- सूक्ष्म वस्त्र, ६, २०, १४)। वारीक कपड़ा; २- सफेद वस्त्र; (दे० काहल-पु. (सं० काहल-वाण ने हर्ष ना० मा० २, ५६)। की सैनिक यात्रा के समय पांच वाजों का फासिज्ज-न० (दे०) काकस्थल-नामक उल्लेख किया है-पटह, नांदीक, गुंजा, देश; (दे० ना० मा० २, २७) । काहल और शंख) बड़ा ढोल, कासिपुर-न० (सं० काशिपुर) काशी विशेष; तुल० म० कहळा; (सि० १, नगरी, बनारस शहर; (प. च०६. ११; की० ४,१५६%; सं० रा०, जस० १३७)। २, २०, ३) २- वि० लघु; (प्रा० ५० कासिय-पु० (सं० काशि>प्रा० १, ३१) । ३-० कोल, भील; (जंबू० कासि) काशी-देश; (प० च० ४६, ८, ५, ८, २१)। वि० (दे०) १. मृदु, १४)। कोमल; २. ठग, घूत; (दे० ना० मा० कासिव-पुं० (सं० काशि-अधिपः) २, ५८)। काशीदेश का राजा; (प० चः १०४, काहलिय-पु. (सं० प्रा० काहला- वाच- काहिली (२२४) किंधर -पि (सं० किमपि) कुछ, बड़ा ढ़ोल) १- काहली, वाद्य-विशेप; सरखें सिंचिएण' -सूखे वृक्ष को सींचने से (जस० १, २१, ५) । २- वि० कातर; क्या ? (जस०)। सुभाषित-"कि (सि० २, २२)। लोहई घडि हियं तुज्झ," क्या तुम्हारा काहलो-स्त्री० (दे०) तरुणी; (दे० हृदय लोहे का बना है ? (भावना, संधि ना० मा० २, २६)। प्रकरण)। काहा-अव्य० (सं० कुत्र) कहाँ; (उ० भी; (प्रा० ५० १, १०५) । व्य० प्र० २७-६)। किंकर--पु० (सं० किङ्कर>प्रा० काहार-० (दे०) कहार, एक हिंदुओं किंकर) नौकर, दास; (जस० १,८, की जाति जो पानी भरने और डोली उठाने का काम करती है; (भ०; दे० किकिम-वि० (दे०) सफेद; श्वेत; (दे०- ना० मा० २, २७)। ना० मा० २, ३१)। काहावण-पुं० (सं० कापण) सिक्का-विशेष; (पड्)। किकिणि-स्त्री० (सं० किङ्किणी>प्रा० काहि-० (सं० कस्या) किसकी; किंकिणी) क्षुद्र घण्टिका; (भ०; जंवू० (जंवू० ४, ११, १)। २- (सं० कम्म) २, ३, ७)। किचि-अव्य० किस के लिए; (उ० व्य० (मं० किचित्) कुछ; - प्र० २२. २७)। (विला०)। काहिती-अव्य० (सं०। (कृस्मात्) किस किंचूणा-वि० (सं० किञ्चिद् +ऊन > से; (उ० व्य० प्र० ३२-२)। प्रा० किचूण) कुछ कम, पूर्ण-प्रायः; (व० १०, ३८,२)। काहिल-पु. (दे०) ग्वाला; (दे०. ना०- मा० २,२८)। किंजक्ख-पु० (दे०) सिरस का पेड़; किसी ने; : (की० २, (दे० ना० मा० २, ३१)। किंणर-पु. (सं० किन्नर>प्रा० काहें-सर्व० (सं० केन) किस लिए किनर) देवों की एक जाति "लयाहरत्थ- 'देउ काहें धाए'- देवं केन ध्यायति, कीलमारणकिणरं," लतागृहों में स्थित (उ० व्य० प्र० २२-६)। होकर किन्नर क्रीड़ा कर रहे थे; (जस० काहे-क्रि० वि० क्यों, किस लिए; ३, १६, ६)। (प्रा० ० २, १४२)। किंतु-अव्य० (सं० किन्तु>प्रा० किंतु) काहेणु-स्त्री० (दे०) परंतु, लेकिन; (वैराग्यसार) । रत्ती; (दे० ना० मा० २, २१) । किंवुभ-० (सं० कन्दुक) कन्दुक, कि-सर्व ० (सं० किम्) १. क्या; (प्रा०- गेंद; (भ०)। पै० १, ६; जंवू० २, १४, ११)। किंधर-पुं० (दे०) छोटी मछली; (दे०. २- क्रि० वि०-क्यों; लो०-"किं. सुक्के ना० मां० २, ३२); काहु-सर्व० गुञ्जा, लाल किपय (२२५) किछु च० किंपय-वि० (दे०) कृपण, कंजूस; ८) । किउ-भू० का०, कि ए; (पाहु०) । • (दे० ना० मा० २, ३१)। किमा-भू० का० (सं० कृत>प्रा० किंपाग-पु० (सं० किम्पाक) वृक्ष कड, कय, किम) कि या; 'दुई कपोल विशेष; (प० च० ३३, ४२) । जैसे (विधाता) ने किए (बनाए); (रा० किपि-अव्य० (सं० किम् +अपि) कुछ, ३३, ३४)। कुछ भी; (सं० रा०; जंबू० ८,७, किउ-कि० भू० का० (सं० कृत>प्रा० १)। कड, कय, किअ) किया; (व० किंपुरिस- ० (सं० किंपुरुष) १०)। १- किन्नर, देव, २- नीच या हीन पुरुष; किक्कंडि-पु. (दे०) सर्प, साँप; (दे०- (जंवू० ६, १२, १०) । २. सिहिपुर का ना० मा० २, ३२)। नागरिक; (प० च० १३, २६)। किष्किंध-पु० (सं० किष्किन्धा>प्रा० किंवोड-वि० (दे०) स्खलित, गिरा . किक्किंधा) नगरी-विशेष; (जंवू० ६, हुआ, भुला हुआ; (दे० ना० मा० २, १६, ४)। ३१)। किष्किंधि-पु. (सं० किरिकन्धि) किसार-पु० (सं० किंशारु) सस्य या पर्वत-विशेष; (प० च० ६, ४५)। किसी भी पौधे के फल का अग्र भाग; २- विद्याधर राजा; (प० (दे० ना० मा० २, ६)। २०) । ३- वानर वंशीय नाम का नृप; किसुय-पु० (सं० किंशुक >प्रा० (प० च० ६, १५४) । -दंड पुं० किंसुअ) पलाश का पुष्प; (जंवू० ३, हाथी; (प० च० ६८, १)। —पुर न० १२, १३)। टि०-पलाश के फूल सुग्गे (सं० किष्किन्धिपुर) नगर-विशेष; (प० की चोंच की तरह कुछ टेढ़े और लाल च० ६, ४५)। होते हैं; इसी से पलाश का यह नाम किष्किन्ध-पुं० (सं० किष्किन्ध) पर्वत-विशेष; (प० च० ३१, १, ८) । किया-स्त्री० (सं० किंशुक >प्रा० —णयरि स्त्री० सं० किष्किन्धनगरी किंसुअ) पलाश, वृक्ष-विशेप; (विला०) । (प० च० ४३, ११, १)। कि-अव्य० (सं० (सं० किम् >प्रा० किं) क्या; मगही की, का; (सरहपा, दोहा किच्चिहर-पु० (सं० कृत्तिधर) महा- देव, शिव; (षड्)। कोश)। किम-वि० (सं०कृत> प्रा० कड्, कय किच्छ-न० (सं० कृच्छ>प्रा० किच्छ) किम) किया हुआ, बनाया हुआ; रचित; दुःख, कष्ट, (जंवू० ६, ४, १६) । (जस० १, ६, ७; ण० १, ५, १०)। किछु-अव्य० (सं० किञ्चित>प्रा० किमज---क्रि० भू० का० (सं० कृत> किंचि) अल्प, थोड़ा; (उ० प्रा० कड, कय, किअ) किया; (की० ३, १५-५) । सर्व०, वि० (सं० कश्चित्) पड़ा। . व्य० प्र० किछ (२२६) कित्तण । प्रा० क्या उसके कोई कुछ; (को० २, ४१; प्रा० ५० १, किणिअ-वि० (सं० क्रीत>प्रा० ३८) । किणिय) खरीदा हुआ; (जंबू० १०, ११, किछउ-अव्य० (सं० कीदृश) कैसा; २) । (प्रा० गु० २७, ४, १)। किरणीस-सक० (सं० शानय का धात्वा- किट्ठ-वि० (सं० कृष्ट >प्रा० किट्ठ) देश) शान निशाने to sharpen) तीक्ष्ण हल से जोता हुआ, "हल किट्ठछेत्तमा करना । -इ व० (प्रा० ५० १, १८८)। लेसु संदु"; हल चलायी हुई क्षेत्र-मालाओं किरणो-अव्य० (सं० किमित) क्यों, में खूब धना; (जंवू० ६, ६, १०) । किस लिए; (दे० ना० मा० २, ३१).। किडि-पु० (सं० किरि>प्रा० किडि) किण्ण-अव्य० (सं० किंनु> सूकर, सूअर; (ण० १, ४, ८; सुदं० किण्णं) क्या नहीं ? प्रश्नार्थक अव्यय; ११, २१, १०)। "जलहि-जलहों महत्त आहासइ किण्ण किडिकिडजन्त-कृ० सूखी हड्डी की तरंग संनइँ," -समुद्र की तरंग पंक्ति, आवाज करते हुए; emitting rattling जल की अति गंभीरता को sound (as of dry bones) (प० च० महीं बतला देतो ? (व० ५, १, ४)। ४७, ५, १)। किण्णरी-स्त्री० (सं० किन्नरी>प्रा० किणंक-वि० (सं० किणाङ्कित) चिह न- किंनरी) किन्नर देव की स्त्री; (ण० ३, युक्त, किणयुक्त; "परकज्जभारधुरधरण ६, २)। गरुयनिहसणकिणंकदिढखंधा," अर्थात् दूसरे किण्ह-वि० १- (सं० कृष्ण>प्रा० के कार्य भार के धुरे अर्थात् जूए को किण्ह, कण्ह) कृष्ण या काला धारण करने से उसके गुरुतर घर्पण से (जस० ४, ७, ११) । - न० (दे०) जिनके कंधे किणयुक्त हो गए हैं; (जंवू० वारीक कपड़ा, सफेद कपड़ा; (दे० ना० ७,४,७)। मा० २, ५६). किण-सक० (सं० की>प्रा० कोण) कितउ--अन्त० (सं० कियत्) कितना; खरीदना। -वि पू० का० कि०, खरीद (हे० ३६७)। कर; (जंवू० १०, ११, ५)।-ह कितव-पु. (सं० कितव-धूर्त, (विध्यर्थक म० पु०) (जंबू० ६, १, कपटी) जूआरी; (दे० ना. मा० ४, २)। कि (ग)-अव्य० सं० किं (न) क्या कितेवा-स्त्री० (अ० किताब) कुरान :: नहीं; (प० च० ३२, १४, ३)। शरीफ; "कितेवा तुरुक्का किरण-अव्य० (सं० किम्) क्या; (प० अनन्ता," (को० २, १७२) । च०.२८, १२, ५)। कित्त-पु० पासा (a stake at dice); किणइय-वि० (दे०) शोभायमान, (ण० ३, १२, ५) । विभूषित; (प० च० २, ३०)। कित्तण-न० (सं० कीतन>प्रा० रंग; - पढन्ता - किति (२२७).. कियंत - (ण० ४, ३)। च०७, -अव्य. कित्तण) वर्णन, "गुणकित्तणाई" गुणों कित्तिम) बनावटी, नकली; (जस० २, का कीर्तन; ३, २३, ४, की० २, १३२) । २- श्लाघा, स्तुति, "दियवरवरकइकि- कित्य-अव्य० (सं० कुन) कहाँ; तुल० त्तरिम पुज्जइ," द्विजवरों तथा कविवरों पं० कित्ये; (जंवू० १०, १०, ३) । के कीर्तन से पूजा होती है; (जस० ३, किवियम्मु-पुं० (सं० कृतिकर्म) किए २६, ६)। जाने वाले कार्य; (सुदं० ११, ३, ३)। कित्ति--स्त्रो० (सं० कोति>प्रा० किडउ-क्रि० भू० का० (सं० कृत) किति) १- विद्या-देवी; (प. किया; तुल० गु० कोधु', कयु; (संधि० १४१) । २- रावण की स्त्री; (प० च० १२, ६, ३)। ७४, ११) । पु मुनि, पांचवें वलदेव के किन्न (सं० किंनु>प्रा० (प० च० २०, २०५)। किण्णं) क्या नहीं ? (व० ४, १८, ३. सुख्याति, यश; (ण० ५, ७, ७) । १)। -धर पु० (सं० कीत्तिधर) १- इक्ष्व.कु किपाड-वि० (दे०) गिरा हुआ; राजा; (प० च० २१, ७८) । २- मुनि (षड्) । (प० च० ७४, ३४) । ३- एक जैन मुनि, किपिरण-वि० (सं० कृपण) कंजूस; द्वितीय बलदेव के गुरु; (प० च० २०, (जंवू० ७, ८, १४) । २०५) । -धवल पु० राक्षसवंशीय फिम-अव्य० (सं० किम् + इमं= राजा; (प० च० ५, २६६) । -नाम किमिदम्) क्या यह, (जस०) । पुं० वानर योद्धा; (प० च० ५७, ६)। किम अव्य० (सं० कथम्) क्यों, क्या, -मई स्त्री० वणिक् स्त्री; (प० च० कैसे; (जंबू० ५, ४,३; सं० रा०; भ०)। ५, ८३); अंजना की सास; (प० च० किमु-अव्य० (सं० किम्) क्या, तुल० १५, २७)। -लय स्त्री० (सं० कोति- गु० केम; (संधि० १८, ४, १६) । लता) यश को वेल; (जंवू० १०, १, १२)। -वल्लिं स्त्री० (सं० कीर्तिवल्लि किमि-पुं० (सं० कृति >प्रा० किमि) >प्रा० कित्तिवल्लि) कीतिलता; (को० कोट,विशेष, क्षुद्र-जीव; (जस० ३, १३, १, १५) । कित्ती-स्त्री० यश; (प्रा० ५० १२)। -उल पुं० (सं० कृमि+कुल) कीट-विशेप का कुल; (जस० २, २८, १, ५३)। फित्तिम-वि० (सं० कियत् >प्रा० ७) । अव्य० (सं० कपम्>प्रा० किम्) कित्तिय) कितना; (जस० २, २३, ४)। कैसे; (की० १, २८)। —प्राग, राय • (दे०) किरमीजी का रंग; (दे०- कित्तिय; (व० २, १५, ६) । ना०मा० २, ३२) । कित्तिउ केत्तिउ-वि० (सं०. - कियत्) कितना; (परम० २, १४१)। कियंत-पु० (सं० कृतान्त) पापकर्म, कित्तिम--वि० सं० , कृत्रिम >प्रा० "जहिं खयहाँ पवच्चइ कलिकयंतु," % 3D , किय (२२८) किरिय जाति; जहाँ कलिकृतान्त क्षय हो जाता है, (जंत्रु० ८, ८, १५)। किय-वि० (सं० कृत>प्रा० कठ, कय, किअ) किया हुआ; (जन० २, ३९, ५)। किय. स्त्री० (सं० दिल्या>प्रा० किरिया, किया) क्रिया, कृति, व्यापार, प्रयत्ल; (भ०)। वि० (सं० कृत) किया हुआ; (भ०) । -- (किया) स्त्री० (सं० क्रिया>प्रा० किरिया) क्रिया; (जंबु० २, १६, ६)। कियस्य-वि० (सं० कृतार्य) লিৰক্য अभिप्राय पूरा हो चुका हो, कृतकृत्य; (भ०)। किर-अव्य० (सं० किल>प्रा० किर) इन अर्थो का सूचक अव्यय १- संभावना, २- निश्चित कारण, ३-संशय, ४- अरुचि ५- असत्य, "णारीखई किर होय," -कौन ऐसे हैं जो नारी के रूप से विनष्ट न हुए;' (जस० २, ६, ६) । ६- निश्चयार्यक, निश्चय ही, देशक; (ग० ३, १०, ६; हे० ४१६, १; प्रा० ५० १, ६७) । ७- नंबोधनायें; (क० ३)। किर-पुं० (दे०) सूकर, सूबर; (दे०- ना० मा० २, ३०)। किरण-पु० न० (सं० प्रा० किरण) १. प्रभा (जंदू० १, ६, ७) । २. रश्मि; (जस० १, ३,३)1-मंडला स्त्री० विद्याधर रानी; (प० च० १०१, ५८)। किरणाहय-वि० (सं० किरण वाहत) किरणों को तिरोहित करने वाले; (जंवू० १, १७, १)। किरगोलि-स्त्री० (सं० किरणावलि किरण+आवलि) किरणों का समूह; (व० ५, ६, ६) किरणोह-पुं० (सं० किरणोघ) किरण- समूह; (जस० १, २, ६)। किराड-पुं० (सं० किरात >प्रा० किराड, किराय) भील, एक जंगली (ण० ६, २२, १०, ३० व्य० प्र० १०-१७) । किराय-किरात; (क. ८, १६, २)। किराण-पुं० (सं० ऋयानक) करि- याना, किराना; तुल० म० किराणा, गु० करियाणु, पं० करयाना fgrocery); (प्रा० पु० १४, १६)। किरि-अव्य. (सं० किल>प्रा० किर) निश्चय ही, निःसन्देह, बेशक; (संवि० १७, १, ३; सं० रा०) । २- पुं० (सं० किरि=सूबर) भालु की भालु की . बावाज, "कत्यइ हिरिति कत्यइ छिरित्ति कत्यइ छिरित्ति रिच्छाणं सद्दो,” (प० . ३० २४,४५)। किरिइरिमा, किरिकिरिया- स्त्री० (दे०) १. कर्णोपकार्णिक, एक कान से दूसरे कान गई हुई वात, गप, २- कुतू- हल; (दे० ना० मा० २, ६१)। किरिकिरिरि--क्रि० (ब्वन्यात्मक) किर- किर की नावाज करना; (सुदं० ७, ६ १२)। किरिमाल-पु० वृक्ष-विशेष; (जंबू० ५, ८, ११)। किरिय-स्त्री. (सं० किया>प्रा० के ण - किरिया (२२६) किवार्ड श्रांत, किरिता) क्रिया, कृति, प्रयत्न; (संधि० फिलाड-पु० (दे०) दूध का विकार- १०,४,४)। विशेष, मलाई; (दे० ना० मा० २, किरिया-स्त्री० (सं० क्रिया) कृति, २२) । प्रयत्न, क्रिया; "किरियागुणविवाज्जिओ" किलामिअ-वि० (सं० क्लमित) खिन्न क्रिया-गुण से रहित; (जस० ३, २३, किया हुआ, पीड़ित, हैरान किया हुआ; १)। -वर वि० (सं० क्रियापर) अनु- (प० च० १०३, २२)। प्ठान-कुशल; (षड्)। किलाविय-वि० (सं०/क्लमय >प्रा० किरिरि-स्त्री० वाध-विशेष; (जंबू० किलाम =क्लान्त करना, खिन्न करना) ५, ६, ११)। पीड़ित, "भुक्खाइ किलावियणिद्धणाह किरीड-पु वानरयोद्धा, (प० च० सो देहइ भोयणु विहिं जणाह;" वह ५७, ६)। भूख से पीड़ित व निर्धन हम दोनों को किरिस-वि० (सं० कृश) कमजोर; भोजन देगा; (क० ६, ५, ३) । (को० ३,१०६)। किलिट्ठ-वि० (सं० क्लिप्ट) कठिन, . किलंत-वि० (सं० क्लान्त) विषम; (भ०)। खिन्न; (भ०; षड्)। किलिण्ण-वि० (सं० क्लिन्न) आद्र', किल-१- अव्य० (सं० किल>प्रा० गीला; (भ०)। किर) निश्चयार्थक अव्यय; (प्रा० ५० २, १२०)। २- पु० किलित्त-वि० कल्पित, रचित; (पड्)। विशेष; (संधि० १०, २, ४)। किलीण-वि० (सं० ., क्लिन्न>प्रा० किलकिल-अक० (सं० किलकिलाय > किलिण्ण, क्लिन्न) आद्र, गीला; प्रा० किलकिल) खुशी से चिल्लाना, (भ०)। तुल० गु० किलकिलाट खुशी की किलेस-पु. (सं० क्लेश>प्रा० चिल्लाहट । किलकिलंति-क्रि० 'किल- किलेस) दुःख, पीड़ा; (जस० २, १, किल' आवाज करना; (ग० ४, १५, ८; सुदं० ११, १५, ४)। किलकिलंत-व० किव-स्त्री० (सं० कृपा>प्रा० किवा) कृ० (ध्वान्यात्मक) (सुदं०८, १६, ३)। दया, मेहरबानी; (ण० ६, १०, ११) । किलकिलंत-व० कृ० किलकिलाते हुए; . किवरण-वि० (सं० कृपण>प्रा० (जस० १, १३, ५)। किलणी-स्त्री० (दे०) किवण) कृपण, कंजूस; (दे० ना० मा०. रथ्या, दे० ना० मा० २, ३१)। २, ३१, सि० १, ३४)। किविण-दीन, किलाचक्क- कृपण; (जंवू० ३, १, ७) । क्रीडाचक्र) छंद का नाम; (प्रा० पं० २, १८२) । किवाड-पु. (सं० कपाट>प्रा० मनुष्य-जाति- - गली, -पुं० . (सं० किवाण (२३०) . किनि किसान; . कवाड, कवाल) किवाड़; तुल० गु० किसलय-० न० (सं० प्रा० किसलय कमाड, (प्रा० गु० ५, २३)। नव पल्लव, नया पत्ता; (जस० १, १२, किवाण-पुं० न० (सं० कृपाण>प्रा० ७)। किवाण) खड्ग, तलवार; (ण० ४, ११, किसाण-पु० (सं०. कृपाण) कृषक, ३; जस० १, २, १२)। (जंवू० ६, १३, १३)। किवालु-वि० (सं० कृपालु) दयालु; किसाणु; (सि० १, ३१) । (प० ज० ३४, ५०) । किसाणु-पुं० १- (सं० कृशानु>प्रा० . किवावन्न-वि० (सं० किवापन्न) कृपा- किसाणु) अग्नि; (ण० १, १४, ८)। प्राप्त; (प० च० ६५, ४७) । किसि-स्त्री० (सं० कृषि >प्रा० किसि) किवि-क्रि० वि०, वि० (सं० किम् + खेती; (जंवू०)। अपि) कुछ, कुछ भी; (सं० रा०)। किसिय-वि० (सं. कृशित >प्रा० किविड-न० (दे०) १ खलिहान, किसिअ) कृशता-युक्त; (भ०)। २- वि० खलिहान में जो हुआ हो वह; कि सोयरी-वि० (सं० कृशोदरी) पतले (दे० ना० मा० २, ६०)। पेट वाली; (क० ७, १३, १०) । किविडी-स्त्री०(दे०) १. किवाड, २. घर किसोर-पुं० (सं० किशोर) बाल्याव- का पिछला आँगन; (दे० ना० मा० २, स्या के बाद की अवस्था वाला बालक; ६०)। (जंबू० ५, १२, १४) । किविण-वि० (सं० कृपण >प्रा० किह-अव्य० १- (सं० कुत्र) कहाँ; किविण, किवण) कंजूस; (भ०) । (जस० ४, २६, १०)। २. अव्य० किग्विस–० (सं० किल्विष) पाप; (सं० कथं>प्रा० कहं, किहं, किह; (जंवू० १०, ५, ७)। (ण० ३, ११, २; हे० ४०१; ३)। किस-वि० (सं० कृश) दुर्बल; किहु-अव्य० कुछ; (सं० रा०)। (भ०); किस-वि० (सं० किदृशम्) कैसा; कोहु-सर्व० (सं० किम् > प्रा० कि) तुल० गु० केवु (संधि० क्या; (की० ४, १४५) । १३, ६, ४)। कोड-स्त्री० (सं०. क्रीडा>प्रा०. कीड, किसण-वि० (सं० कृष्ण) कृष्ण, काला; किड्ड) क्रीड़ा; (भ०)। पुं० (सं० (सं० रा०)। कीट>प्रा० - कीड) क्रीड़ा, क्षुद्र-जंतु; किसणु-पु० छप्पय छंद का भेद; तुल० पं० कोड़ा; (जंवू० ७, २, .१२) । (प्रा० ५० १, १२३)। . कोड़ी-स्त्री० (सं० फीटिका) पिपी- किसरा-स्त्री० (सं० कृशरा) खिचड़ी, लिका, ची टी; (दे० ना० मा० २, चावल-दाल का मिश्रित · भोजन-विशेप; ३)। (दे० ना० मा० १,८८)। कोनि-कृ० (सं० की>प्रा० कोण = .. .. - ( कीय (२३१) कीस -त्थ . . सुरत उरः खरीदना, मोल लेना) खरीदकर; (की. मा० मा० २, २१)। ३, ६५)। कोलण-न० (सं० क्रीडण>प्रा० कीय-वि० १- (सं० क्रीत) मूल्य देकर कीलण) क्रीडा, खेल; (भ०)।-अ न० लिया हुआ; (भ०) । २ वि० (सं० (सं० क्रीडनक>प्रा० कीलणअ) कृत) किया हुआ, अनुष्ठित, किर्यान्वित; खिलौना; (जंवू० ५, २, १६) । (क० १, २, ७)। क्रीडनार्थ; (क० ५, ४, २) । 1/कोर-(सं० कृ>प्रा० कर) करना; कोलणिया, कोलणी-स्त्री० (दे०) (जस०)। -इ (/कृन करणे, कर्मणि रथ्या, गली; (दे० ना० मा० २, ३१) । क्रियते) (भ०; विला०) । (सं० करोति) कीला-स्त्री० (दे०) १- नव-वधू, दुल- करना; (क० १, १०, १)। हिन; (दे० ना० मा० २, २३)। कीर-पु- (सं० प्रा० कीर) १- शुक, २- सुरत समय किया जाता हृदय-ताड़न तोता; (दे० ना० मा० २, २१; जस० विशेष; "कीला प्रहणन- १, ३, १२) । २- देश-विशेष; (जंवू० विशेष"; (दे० ना० मा० २, ६४) । ६, १६, १०)।-ल पु० कीरल, देश ३- स्त्री० (सं० क्रीडा>प्रा० कीला) विशेष; (प० च० ६८, ६४) । -आलि खेल; (जस० ३, ३, ४) -इस्त्री० (कीरालि) स्त्री० (सं० कीर+आवलि) क्रीड़ा; (महा० ६८, ६)। -घर पुं० शुकपंक्ति; (व० १, ८, १०)। (सं० क्रीडागृह) कीड़ा का स्थान; (क० कील'-स्त्री. (सं० क्रीडा> प्रा० ४, ४, ६)। कीला) कीड़ा, खेल, (ग० ६, ७, १०; कीलामहिहर-पु० (सं० क्रीडा+महि विला०)। (सं० कील:) खूटी; धर) क्रीडापर्वत, "मुणिवर-मंडियकीला- १०, २, १३)। महिहर," बाहर मुनिवरों से शोभायमान कोल'-पु. वानरयोद्धा; (प० च० ५७, क्रीड़ापर्वत हैं; (जंबू० ३, २, ७)। १२)। फीलाल-न० (सं० प्रा० कीलाल) रक्त, 1/फील' - अक० (सं० श्री >प्रा० रुधिर; (जस० १, १५, ६; जंबू० ६, कील) क्रीड़ा करना; (ण० २, ८, ५)। १०, १३) । -लीला कोलंत-व० कृ० (ण० ५, (जंवू० १०, २६, १)। कोलंति-व०, व० व०, क्रीड़ा करती हैं; कोलिय-न० (सं० क्रीडित >प्रा० कीलिअ) क्रीड़ा, रमण; (ण० ७, १०, (विला०)।-सि व० (प्रा० ५० १, ४)। १/कोल-(दे०) कीलना, मन्त्रादि से फीव-पु० (सं० कलीव>प्रा० कीव) किसी को जड़ कर देना; (सि० १, नपुंसक; (जंवू० ४, १५, १५)। १८)। कीस-वि० (सं० : (कीदृशं) किस तरह कील-वि० (दे०) अल्प, थोड़ा; (दे०- का, कैसा; (क० १०, १, ३)। ३)। - (संधि० - रुधिर-प्रवाह; ७)।
कुंकुम (२३२) कुंडलियंग 1 ३ . (कीता) कैसा; (प० च० २८, १२, २ छप्पय का भेद; (प्रा०, ५० १, १२२)। कुकुम-न० (सं० कुङ्कुम >प्रा० कुंट-वि० १- (सं० कुण्टक-मोटा, कुकुम) १- केसर, २ लाल रंग की स्थूल) कुब्ज, कुबड़ा; (जस० २, १७, बुकनी जिसे स्त्रियां माथे में लगाती हैं; . २) । २. वि० (सं० कुण्ट>प्रा० कुट) (जंबू० १, ६, ३; जस० १, ४, १०)। हस्त-रहित; (सुदं० ६, ११, ६)। —पिंडु पु० (सं० कुङ्कुम+पिण्ड) कुटिउ-वि० टूटी स्त्री (सुदं०- ६, १५, कुकुपिंड; (जस० २, १२, ७) । ६)। कुग-पु० (सं० कुङ ग) देश-विशेष; कुंठ-वि० (सं० कुण्ठ >प्रा कुठ) (भ०)। ठूठा, कुण्ठित, "वायाकंछ वंठु दप्पुभडु,' कुंच-पु० मनुष्य-जाति-विशेष; (संधि० जो वाणी से कुठित है, मूक है, अत्यंत १०, २, ६) । पु० न० (सं० कूर्च) अभिमानी है; (जस० ३, २४, ३)। दाढ़ी; (जंवू०)। कुंड'--न० (सं० कुण्ड > प्रा. कुचइय-वि० (सं० कुञ्चित >प्रा० कुंड) कुचिय) संकुचित; (जंबू० हौज, जलद्रोणी, जलाशय-विशेष; (जस० १, ६, ६)। वि० (सं० कञ्चुकित) १- कंचुतिक, जो ३, १६, ३; महा० ४-३-७) । उरि स्त्री० (सं० कुण्डपुर) ग्राम-विशेष; (व० कंचुक युक्त हों, २- जो कवच धारण ६, १६, २)। –पुर पु० (सं० कुण्ड- किए हों, "तहय कुसग्ग कुचइय-सिवरवि पुर) नगर-विशेष; (व० ६, १, १५) । दूण दीव देणंवुहि पुणरवि;" तथा पुनः कुसर्ग कंचुकित अर्थात् 'भूमि पर व्याप्त कुड'-० वानरयोद्धा; (प० च० दूने-दूने विस्तार वाले द्वीप ५४, २१)। हैं,' (व० १०, ६, ८)। कुंडयं-पुं० (दे०) कुंडा, छोटा पान- कुचरण-पु० (सं० आकुञ्चन) सिकुड़न, (दे० ना० मा० २, ६३) । संकोचन; (जस० २, १७, १३) । कुंडल-पुं० १- (सं० . कुण्डल>प्रा० कुंचल-न० (दे०) मुकुल, कलि, वौर; कुडल) कान का आभूषण; (भ०; जस० (दे० ना० मा० २, ३६) । २, १६, ४) । २- प्रथम द्विकल गण कुचिय-वि० (सं० कुञ्चित >प्रा० (s) का नाम; (प्रा० ५० १, २१)। कुचिय) सकुचित; (भ०) । ३- कुण्डल, द्वीप-विशेप; (व० १०, ६, कुंज-० क्रौंच; (सं० रा०)। ७) । ४. राजा-विशेष-नाम; (प० च० कुंजर-पु० (सं० - कुञ्जर>प्रा० २६, ६५) । कुंजर) हाथी; (जस० १, १०१; सं० . कुंडलिआ-स्त्री० छंद का नाम; (प्रा० रा०; जंवू० १,१४, २)। कुंजरु ५० १, १४६) । १- हाथी; (व० १०, २६, .७)। कुंडलियंग-पुं० (सं० कुण्डलित+ . और समुद्र दुनिय (२३३) कुंपल . -- अग) गोल आर याने संग; (जंबू० नामक आयुध; (जंब० ७, १०, १३)। १,१०, ८)। फुतो-स्त्री० (दै०) मजरी, बोर; मुदलियदि० ( कुटलिन) मण्ड (दे० ना० मा० २, ३४)। नाहन, कन्टनो मारे गए, गांजातार; पुतोपुत्त-० द्विगुरु चतुष्कल गण, (म० ०)। कण; (प्रा० पं० २.८०)। लो-पी. ( मंडली) पोडे पोडे पुतीपोटलय-वि० (दे०) चतुष्कोण, सोनारियामा पान; पार कोण वाला; (दे० ना. "गुगली मुगीको अति नाना गति ४३) । कारको भान"; (१०४, ४) । यु-१० (i० न्यु>प्रा० दुगत- महल, मंडल, गली, १. एक जिन-य, सरहा तोर्यकर; (वन); (ग)। (म०) । न्यनाय (तीयंगर); (२० १, गुडिर-10 () गोयना मुशिया; १, ११) । २. मान्पादि जीव; (८०१, १. ११)। हरिवंश का एक अमिरज-1 (३०) माहान-विष्टि, (१०२० २२, १८)। ४. अति सूक्ष्म PERIT शो मजदूतीया मगर बाला प्रापि-विजेप; (जा० ३, मंत्रा; (३० ना मा० २,४३) । २२, १४)। -पहुगिसत्य- वियु (३०) • गुन्दा, २. छोटा आदिमारीरधारी जीवों पर दया करने शासन (नामा ६,६३)। पान; (जम० १, २.६)। पुत-० ( कुन्तान पुद-० (सं० सुन्न) १. पर पुष्प, भाला, प्रामुमकिय, अस्त्र; (न० २. (प्रा० ५० १, ७४) । २- द नामक ::, 10.१४, ५.)। माना (70 वृक्ष(जंयु०४, ११, १४) । ३- रोला पं० २. १७१) ।. वानरयोक्षा; (१० का द; (मा० ५० १, ६२)। न ९,३८) र अनु कन ४. छप्पय छंद का भेद; (प्रा० पं० १, गाना नाग; (प्रा० ५० १.१७६)। ११२) । पुतान.--- (२०) नृ- पिता युदय-वि० (३०) कण, दुर्बल; (दे०. (2 नागां० २, ३)... (नं. मा० मा० २, ३०)। गगनातनकन, बाल; (जन. फुदलया-स्त्री० (सं० कुन्दलता) १.१७, २६) । -मर पुं० (२० माधवी लता; (५० च० २१, ४६) । पन्तलभार) गंगामाय; (जंबू० ४, फुदीर-न० (दे०) बिम्बी-फल, कुन्दरन १५, १०)। का पाल; (दे० ना० मा० २, ३६) । पुतली-ग्री० (दे०) पोगन का एक कुंघर-पुं० (दे०) छोटी मछली; (दे०- उपकरण; (२० ना० मा० २,३८)। ना० मा० २, ३२)। पुतारह- (म० कुन्तायुध) कोत फुपल-पुं० न० (सं० ड्मल >प्रा. - (२३४) कनक . पल) मुकुल, कलि, कलिका; तुल० ५) । गु० पळ; (प्रा० गु० ३८, ३४) । कुइज-वि० (सं० कुपित >प्रा० कुइय) कुंन-पुं० (स० कुम्भ >प्रा० कुंभ) कोप-युक्त, क्रुद्ध; (ग० ४, ८, १०) । १. घड़ा, कलग; (ण० १, १०, ५)। कुउ-पु० (सं० कूप) कुआँ, (सि. २, २- हाथी का गण्डस्थल; (३० ५, .१३, ५)। १४)। ३- स्कव का भे; (प्रा० पै० १, कुउपा~स्त्री० (दे०) तुबी-पात्र, तुंबा; ७५) १४- कुंभकर्ण का पुत्र; (५० च० (दे० ना० मा० २, १२) । ७१, ३६) । ५- मिथिलापुरी का राजा; कुल-न० (दे०) नीवी, १- वह डारी जिन्नल्ली के पिता; (प. च० २०, जिससे स्त्रियाँ लहेंग की गांठ बाँचती हैं; ४५)। कण्ण पुं० (सं० कुम्भकर्ण) .. साड़ी या चादर का सिरा, पल्ला; रावण का भाई; (प० ० ७५, ५) । (दे० ना० मा० २, ३) । कुंनत्वल-पु० (सं० कम्भ+स्थल) कुकइ-पुं० (२० कु+कवि>प्रा० कु हाथी का गण्ड-स्थल; (ण० +कइ) बुरा कवि; (ण० ३,११, ७) । १२) । -तण पुं० (सं० कुवित्व) कुंभवल-पु० (सं० कुम्भस्यल) हाथी खराद या कुत्सित काव्य; (जस० १, ३, का गंडस्थल; (जंदू० ४, २०, ८)' कुनयलोलोक्खल विदई-न० गंडस्थल कुकम्म-पु० (सं० कुकर्मन्) दुरा कार्य; रूपी चंचल ऊखल; (रि० ६, ११) । (जस० २, २७, १५) । भविलया-स्त्री० पनिहारिन, घटधा- कुकलत्त-२० (सं० कु+कलन>प्रा० रिणी; (जं० १, ६, १) । कुन कलत्त) बुरी पत्नी, दुष्ट चरित्र दुमि-पु० (सं० कुम्भिन >प्रा० वाली स्त्री, खोटी स्त्री; "कुकलत्तहि कमि) हस्ती, हाथी; (जंबू० ८, १५, अण्णासत्तहि चित्त ण केण वि घिप्पड़," किन्तु अन्य पुरुप में आसक्त हुई दुष्ट- मिल-० (सं० कुम्भिल) १. चोर, चरित्रा के चित्त को कोई नहीं जान पाता; २- दुर्जन; (दे० ना० मा० २, ६२) । (जस० २, १२, २२) । कुकलत्त ; (रि० दुनिल्ल-वि० (३०) खोदने योग्य; ३, १५)। (दे० ना० मा० २, ३६)। कुकवित्त-पु० (सं० कुकवित्व) निकृष्ट दुनी-स्त्री० (दे०) केश-रचना, केश काव्य; (सं० रा०)। संगम; (दे० ना० मा० २, ३४) । फुकुला-स्त्री० (दे०) नवोढ़ा, दुलहिन; कुंभो नव-घु (सं० कुम्भ। उद्भव) (दे० ना० मा० २, ३६) । घड़े में उत्पन्न पुरुष, अगस्त्य; (की० कुक्क-(प्रा० कोक्क) बुलाना, ४, २४)। मात्बान करना। कुक्कत्तिह-कुक्क कु-सर्व० को, कोई; (जं० १०, ७, इति शब्दानुकरणे (धातुः)] "दोहि मि १ .
कुकुड (२६५) खांडा, तड्ग; कुक्कत्तिएँ बाडियट," -हम दोनों ने कन्द्रिय-वि० (२० कुलित>प्रार कुकुड-कू की रट लगा दी; (जस० ३, कुछिय) १- सराब, निक्ति; (म० ४, १४, ५)। ३, ७)। २- खोटी। -मइ वि० खोटी कुरकुर-१- वि० (दे०) मत्त, उनत्त; बुद्धि वाला; (महा० ६८, ६)। (दे० ना० मा० २, ३७) । २- पुं० (२० कुच्छेय-पु० (२० कोषक तलवार, कुक्कुट>प्रा० कुक्कुड) मुर्गा; तुल० म० (दे० ना कुक्कुड; (म०)। -- पुं० (२० १६१)। कुक्कुट+क) मुर्गा; (जन०) कुक्कुडिला- जम्म-० (२० कुजन्नन्) कुलित स्त्री० (सं० कुकुटिका) मुर्गी; (जस० जन्म; "अन्धभि जाम कुन्नि पवन ३, १३, १८)। (जस · ३, ७, ५)। कुरकुर-पुं० (२० प्रा० कुकुर) कुत्ता; कुजउ-० (म कुजक) कुम्मक (५० च० ६, ४, ८०)। कुक्कुरी-स्त्री नानक संस्तान; "कुम्भः वामणु जन्मोह- कूकरी; (जस० २,३१, १)। गड तिरिय नरहं पियकन्न-वनंगड,"- कुरुड-पृ० (दे०) निकर, समूह इनी प्रकार तुजक, वानन, न्यनोद (नया (दे० ना० मा० २, १३) । स्वाति) नानक संस्थान तिर्यों व कुरकुत-० (दे०) अन्य आदि का न प्यों को जाने-अपने कर्मानुसार प्रान्त डिलका, भूता; (दे० ना मा० २, होते हैं; (२० १०.११, १२) । ६६)। कुग्जर- (स. कुम्भक) वृक्ष- कुदित-स्त्री० (सं० इजिप्रा० विशेष; (५० २०५३, ६) । कुन्छि, कुरिख) उदर, पेट; (म०; ० कुगिरि--स्त्री (सं० कुन्दिनी) ३, १६, ३)। पत्नी; (प्रा० ३०२, २५) । (#० कु- गति) कुट-नक ( कुट्>प्रा० कुट) १- दुर्गति; (ज ११, ७, ७) २. दुरी कुटना, पीटना, नाइन करना । कुटिए- चाल; (प्रा०प०१. ६) - पुं० ९० का दबाच्य, टे गए; (६०२, (२० कुगतिपय) दुर्गति वाला रास्ता; १०, ८). (जंबू० २, १६, २)। कुट-० (कुड>प्रा० कुट कुगुरु-पु० (नकुगुरु) =कुटना, पीटना, ताड़न करना) प्रहार; दुष्ट चरित्न वाला गुरुः (जसः ३,३१, ( स०)। १०)। कुटन-न न>प्रा. हद- कुन्छि-स्त्री (२० अधि>प्रा० प) १. वेदन. कुटना, कुन्छि) उदर, पेट; (क २०, २५, ताड़न; (जन०२, १३, १४) । २५)। नई स्त्री० (सं० कुक्षिमती) कुणि-स्त्री. (i० कुहिनी>प्रा गभिगी; (३० ना०मा० २, ४१)। कुट्टिनी) कूटनी. दूनी: (बंदु कुगइ-स्त्री बुरा या कुट्टा (२३६) कुडीर ११,७, २४) । कुट्टिणी-स्त्री० कुट्टिनी; (जंदू० शरीर; "कुडि दाझंती गंवि न यावइ,' ४, १६, २०)। (प्रा० गु० ५, १५) । स्त्री० (सं० कुटी) कुट्टा-स्त्री० (दे०) गौरी, पावंती; कुटिया; (जंबू० ६, १०, २) । (दे० ना० मा० २, ३५)। कुडिआ-स्त्री० (दे०) वाड़ का विवर; कुढ़ाय-पु० (दे०) चर्मकार, मोची; (दे० ना० मा० २, २४) । (दे० ना० मा० २, ३७)। कुडिच्छ-न० (दे०) १- बाड़ का छिद्र, कुट्टिम-पु० (सं० प्रा० कुट्टिम, प्रा० २- कुटी; ३- वि० त्रुटित, छिन्न; (दे०. कोट्टिम) पक्का फर्श; (क्री० २, ८०)। ना० मा० २, ६४)। वि० (सं० कृत्रिम) बनावटी; (व० ६, कुडिल-वि० (सं० कुटिल >प्रा. २, ३)। कुडिल) १- वक्र, टेढ; (ण. १,११, कुट्टोअरम-पु० (सं० कूटोदार) शाय ३) । २- कपटी, जालसाज; (सं० रा०)। नागार; (जस० २, ८, ८)। -त्तण, पु, कुटिलत्व (ण० १, १७, कुदळ-न० (सं० काप्ठ) लकड़ी; (ण. ५)।-भाअ पु० (सं० कुटिल भाव) ५, ८, १२) । २- पुं० न० (सं० कुप्ठ) कपटयुक्त भाव; (जव० रोग-विशेप, कोढ; (जस० २, ११, १)। ११) । पुं० (सं० कोष्ठ >प्रा० कुट्ठ) कुडिला-स्त्री० (सं० कुटिला) विद्या- कोठा, धान्य भरने का बड़ा भाजन; विशेप (प० च०)। (जंवू० ७, ६, ७)। -गइरव पु० कुडिल्ल-१- स्त्री० (सं0- कुटी>प्रा० वानरयोद्धा; (५० च० ५७, ६)। कुडी+इल्ल (स्वार्थे)] कुटिया; "विच्छि- कुडंग-पु० न० (सं० कुटङ्क) ण्णघणचम्मछाइयकुडिल्लम्मि," वहाँ की १- झाड़ी; (संधि० ५, ६, ५)। कुटियाँ काटे हुए सघन चमडों से छायी २- लता-गृह, लता से आच्छादित घर; गयी थी (जस० ३, १३, १३)। (दे० ना० मा० २, ३७)। -स्त्री० २- वि० (सं० कुटिल) वक्र टेढ़ा; (सं० कुटङ का) लता-विशेप; (प० च० (भ०) । ५३, ७६)। कुडिहर-पुं० कुटीगृह >प्रा० कुडीहर) फडंव-वि० (सं० कुटुम्विन् >प्रा० झोंपड़ा, पर्णशाला, कुटी; (जस० ३, २७, कुडेवि) कुटुम्बी; (जंबू० ४, ६, १)। २०)। कुड-पु० (सं० कुट) घड़ा, कलश; कुडी:-वि० (सं० कुटिल) कपटी; (दे० ना० मा० २, ३५) । (संधि० १६, ६, १०)। कुडय-पुं० न० (सं० कुटज>प्रा० कुडी-स्त्री० (सं० कपदि) कौड़ी; कुडय) कुटज वृक्ष; (जंदू० (रा० २२)। ११)। कुडीर-न० (सं० प्रा० कुडीर) कुटीर, कुडि-पुं० (सं० कुटि =देह, शरी.) कुटी, झोंपड़ा, (प० च० ३३, ८५) ।
कुडोरय (२३७) কুনাই -उन० कुटी (प्रा० गु० ३६, १४)। २२)। कुडे-क्रि० वि० पीछे, नीचे; "कुडे कुडीरय -न० (सं० कुटीर+क प्रा० लग्नउ जं रणियर-बलु,” (प० १० कुडीर+अ) तृणगृह, कुटीर; (प० २० १२, ३, ७) । २२, ६, ४)। कुरण-क्रि० (सं० क्वति > कुणइ) कुटुंग-पु० (दे०) लतागृह, लताओं से करना; (सं रा०) । उका हुआ घर; (पड)। - पुं० २. (२० कृ०, प्रा० कुण) करना। (दे०) लतागृह; (जस० १, २१, कुणइ-क्रि० (सं० करोति; भ०; १० ६, ४, १; ६, ३, १५)। कुणंत-ऋ० (सं० कुटुंबी-वि० (सं० कुटम्बिन्>प्रा० कुर्वत) (जस०)। कुडुबि) कुनबे वाला, गृहस्य; (जंबु० १, कुण-करना -इ (२० कृणोति, ८, ७)। पंचमगण का 'कृ' धातु। टि-वेदों में कुड्यु-न० (सं० कुटुम्ब >प्रा० कुटु) कृणोति, कृणुते लवेत्ता में अर्जनओ- परिजन, परिवार; (सुअंव० १, २, २; इति (प्राचीन फ्रा० 'अकुनवं') रूप पाया ०६, ६, ३)। जाता है; (प्रा० १० १, ३)। कुणंतउ कुडुल्ली-स्त्री० (सं० कुटी) कुटिया; कुटिया; कृ० (सं० कुर्वत्) करता हुआ, (क० १, (हे० ४२२, १२)। ६, ८) । कुणहु क्रि० ला० (प्रा० ५० १, कुड-पुं० न० (सं० कुतुप >प्रा० १४)। कुण्ड आ० (प्रा० कुतुव) तेल आदि भरने का चमड़े का ६४) । कुणिवि -पू० का० कि० पात्र; (सि० १, ६)। (जं० १०, १७, १२) । कुणेहि-क्रि०, कुड्ड-० (सं० कुड्य>प्रा. कुड्ड) आ० मध्यम पुरुष एक २० (प्रा० ५० १, भीत; "क वि लज्जएँ कुड्डतरिय यक्के," २३)। (सुदं० ३, १२, २) । कुड्ड न० भित्ति; कुणिना-स्त्री० (दे०) वाड़ का छिद्र; (जंबू० १, १६ ४)। (दे० ना० मा० २, २४)। कुड्ड, कोड्ड-न० (दे०) आश्चर्य; कुणिम-पुं० हरिवंशीय राजा; (५० (दे० ना० मा० २, ३३)। च० २१, ३०)। कुट-पुं० न० (दे०) १. चुरायी हुई कुतक्का-पुं० (सं० कुतक) गलत तर्क; वस्तु की खोज में जाना; (दे० ना० मा० (जस० ४, १४, १६)। २, ६२) । २. छीनी हुई चीज़ को कुतत्ती-स्त्री० (दे०) मनोरय, वाञ्छा; वापिस लेने वाला; (दे० ना० मा० २, (दे० ना० मा० २, ३६)। ६२).। कुतपस्वी-पु० (सं० कु तपस्विन्) कुढार-- (सं० कुगार>प्रा० खराब तपस्दी; (०४,२, १)। कुडार) कुल्हाड़ी, परता; (जः ६, १५. कुताई-न० (सं कुन्त >प्रा. हुत 4०१, - कुतित्य (२३%) कुवेर निपिव हो; ३,२०, क तुप) तेल . नाराज पुं०) भाला, हथियार-विशेष; (क०)। कुन्ध-~-पु० (० कुन्द >प्राः कुद) कुतित्य-पु० (सं० कु तीर्थ) कुलित पुष्प-विशेष; (को० १, ७५.) । स्थान; 'पंगुलउ कुतीयपंधगमणि नुअल कुपत्त-वि० (नं, कुपात्र) १. किसी विकहावण्णगइ"-कुतीर्थ-पथ में गमन विपय का अनविकारी, अयोग्य; २. वह करने में लंगड़ा एवं अवार्मिक कथा-वर्णन जिसे दान देना बास्त्रों में में भूक रहता हूँ (जस० (जस०४, २०, ११)। १४)। कुपह-~० (सं० कुश्य >प्रा० कुपह कुतुब-० न० (सं. कुरा मार्ग; (भ०)। यादि भरले का चमड़े का पाव; (दे०. कुपुरिपु-पु० (सं० कु + पुरुष) वना ना० मा० ५, २२)। व्यक्ति; (व० ० १,१०)। कृत्यर-२० (दे०) विज्ञान; (दे० ना० 1/कुप्प-(सं०/कुम> प्रा० कुप्प, मा० २,१३)। कुप्पइ) क्रोध करना, कोप करना । --इ, कुत्यिय-वि० (सं० कुत्सित) १. नीच, क्रि० (सं० कुप्यति >प्रा० कृप्पइ) (भ०; दुष्ट, अधम; २. निदित, वरात्र; (जस प० ५, ६, ६) कुष्पिम-~व. १,२८, ७)। होना; (प्रा० १०२, १३०)। कुत्युहवत्य-न० (६०) नीवी, इजार- कुप्प-सक० (सं०/भास का दावा- बंद; (दे० ना० मा० २, ३)1 देश) बोलना, कहना । ~~-इ; (भ०) । कुदिट्टि-स्त्री० (सं० कु० दृष्टि) बुरी कृप्पर-१. पुं० (सं० कुपर>प्रा० इप्टि; (०४, ३,३) । कुप्पर) कोहनी, हाथ का मध्य सुदेव-पुं० (सं० कुंदव) . १. बुरा १. बुरा 'अण्णोण्याप्पेल्लिय कुपरेहि” (सुदं० ६, देवता, २. राक्षस, ३. जैनियों के अनु- १०, ७) । २. न० (३०) सुरत के सार ऐसे देवता जो उनसे भिन्न धर्म के समय किया जाने वाला हृदय-ताड़न हाँ; (जस० १, ६, १२)। विशेष; ३. सदाचार, ४. हंसी, व्या; कुद्दाल-पुं० (सं० प्रा० कुहाल) कुदाल, (दे० ना० मा० २, ६४) । भूमि खोदने का लोहे का बना एक कुप्पास-पु० (सं० कूपत्तिक) बोली, औजार; (म० २, १६, २)। कञ्चुक; (सं० रा०)। कुद्ध-वि० (सं० >प्रा० कुद्ध) कुप्पिस-देखो कुप्पास; (दे० ना० मा. कुपित, क्रोव-युक्त; (जंबू० २, ४०)। १४)। कुबेर-पु० (सं० कुवेर) (सं० क्रुद्ध) क्रोषित; १. काञ्चनपुर के एक राजा का नाम; (महा० ६६, ८, ३)। (१० च० ७, ४५) । -कंत पुं० लन्य- कुद्धमण-पुं० (सं० क्रुद्धमनस्) क्रोधित णपुर (प्रा० बभण्णपुर) का राजा; (प० मन; (जंवू० ६, ७, ८)। २०६८, ५८)। दत्त पुं० इन्वाकुवं- प्रा० कुटर-वि० कुबेरी (२३६) कुमुयायर वाला पुत्र; खराव प्रा० १,१८, शीय राजा; (५० च० २२, ६८)। ११०) । २. युवराज, युवावस्था या कुबेरो-स्त्री० दाशरथी भारत की प्रण. उससे पहले की अवस्था यिनो; (५० च०८०, ५१) । (जस०)। --भाव पु० (सं० कुमार+ कुमोयधरा-वी० (स. कु+भोग+ भाव) कुमारावस्था; (जंवू० ४, १४, धरा) कुभोगभूमि (जिस भूमि पर सयम १३)। से भोगोपभोग न हुआ हो); (जस० ४, कुमारिया-स्त्री० (सं० कुमारिका) २०, १२)। कुमारी; (जंवू० ४, १२, ७) । क मति-० (सं० कु+मंत्रिन) वुरा मंत्री; (ण० ३, ६, ६)। कुमारिलभट्ट-पु० (सं० कुमारिल- भट्ट) नाम-विशेष; प्रसिद्ध मीमांसक कुमइ-स्त्री० (सं० कु: मति) और शबर भाष्य तथा अन्य श्रौत सूत्रों बुद्धि; (जंबू • ५,.१३, २३)। के टीकाकार; (जस० ३, २६, ११)। कुमग-पु० (स. कुमार्ग>प्रा० कुमारी-स्त्री० (सं. कुमारी) कुमग) तुरा रास्ता; (महा० अविवाहित कन्या; (जस० ११; जस० १, २७, ४)। ११)। स्त्री० गौरी, पार्वती; (दे० ना०- कुमणु-वि० (सं० कु-मनस्) तुरे मा० २, ३५)। विचारों से युक्त मन; (जस० २,१८, १६)। कुमात-पु० (सं० कुल्माप) १. कांजी, एक प्रकार का अनाज, २. कुलथी, कुमन्त-० (सं० कुमन्त्रणा) बुरा ३. उर्द, माप, ४. वोरो धान, विचार; (की० ४, १४४) । अन्न जिनमें दो भाग या दल हों, जैसे- कुमयेमग्गे -पु० (सं० कुमतिमार्ग> चना, उर्द, मटर आदि; (प्रा० गु० ६, प्रा० कु+म+मग्ग) सराव बुद्धि २६, ३०)। उत्पन्न करने वाला मार्ग; (व० २, १६, १)। कुमुअ-पुं० १. (सं० कुमुद>प्रा० कुमर-पु० (सं० प्रा० कुमार) कुवर, कुमुअ) कुमुदिनी, चंद्र-विकासी कमल; युवराज; (संधि० १, ८, ५)।-तण (प्रा० .० २, २०५) । २. वानरयोद्धा- कुमुयः पुं० (सं० कुमारत्व) कुआरापन; (क० प्रमुख; (प० च० ६२, ३०) । ६, ८, ६)। (प० सि० च० ३-२)। कुमरी-स्त्री० (सं० कुमारी) अविवाहित कुमुइणि-स्त्री० (स० कुमुदिनी>प्रा० कन्या; (जस० १, १८, ३१)। कुमुइणी) सफेद कमल का पौधा; (ण कुमाणुसत्त-पु० (सं०+मनुष्यत्व) ८, १,१०)। बुरा मनुप्य; (जंबू० ११, ७, ७)। कुमुय-न० (सं० कुमुद>प्रा० कुमुअ) कुमार-पुं० (सं० प्रा० कुमार) लाल कमल; (प० च० ४३, २)। १. स्वामिकार्तिकेय; (प्रा. कुमुयायर-पु० (सं० कुमुदाकर) सरो- पै० २, कुमुयावत (२४०) कुरुआ कुम्म) । पीठ पर ४०)। वर जो कमलों से भरा हो; (ण० ६, २, कुरंगि-स्त्री० (सं० कुरङ्गी>प्रा० १०)। कुरंगी) हिरनी; (सं० रा.)। कुमुयावत-पुं० वानरयोद्धा; (प० च० कुरणंकुर-पुं० (सं० किरणांकुर) ५७, ३)। प्रकाश की वह सूक्ष्म रेखा जो प्रज्वलित कुमुली-स्त्री० (दे०) चुल्हा; (दे० ना०. पदार्थ से निकलती है; (व० ७, १५, मा० २, ३६)। कुम्म-पुं० (सं० कूर्म>प्रा० कुरवय-पु० (सं० कुरवक) कुरवक कच्छप, कछुआ; (प्रा० ५० २, ५९ नामक फूल और उसका वृक्ष, लाल कट- जस० १, १०, ७)। कुम्मु-पु. कूर्म सरया; (प० च० ६२, ७) । जिसकी पृथ्वी स्थित है, कुरर-पु० (सं० प्रा० कुरर) पक्षी- (क०)। कुम्मायार पुं० (सं० कूर्म+ विशेप, कुरल-पक्षी; (वी० १, २; जस० आकार) कूर्म का आकार; (जंबू०४, १, १०, ५)। १३, १७)। कुररी-स्त्री० (सं० प्रा० कुररी) गाथा कुम्मरण-वि० (दे०) म्लान, शुष्क; का भेद; (प्रा० ५० १, ६१) । स्त्री० (दे० ना० मा० २, ४०) । (दे०) पशु, जानवर; (दे० ना० मा० २,. कुम्मी--स्त्री० (सं० कूर्मी) १. स्त्री- कछुआ, कच्छपी, २. नारद की माता का नाम; (प० च० ११, ५२) । कुरली-स्त्री० (सं० कुरली) कुरल- कुम्मागारु-पु० कच्छप, कछुआ; (प० पक्षी; (प० च० १७, ७६)। च० १३, ६, १०)। कुरवम-पु० (सं० कुरवक) १. कुरुवक कुम्मासण-वि० (सं० कूर्मासन+ वृक्ष-विशेष । २. वि० (सं० स्थ) योग के आसन में कुरत, बुरी बातों में रुचि स्थित । इस आसन में दोनों पैरों को तले (जंवू० ४, १७, २)। कुरवय-पु० कट ऊपर रखकर एंड़ियों से गुदा को दवाकर सरैया; (दे० ना० मा० ५, ६)। घुटनों के बल खड़ा होना पड़ता है। कुरु-पु० (सं० कुरु) आर्य देश-विशेष, (जंवू० ५, १४, २१)। जो उत्तर भारत में है; (भ०( 1-वइ कुम्मी-स्त्री० ब्राह्मणी-विशेष- नाम; पुं० (सं० कुरुपति) कुरु देश का राजा; (५० च० ११, ५०)। (भ०)। कुरंग-पु० (सं० कुरङ ग>प्रा० कुरुमा-पु० (सं० कुरुवक >प्रा. कुरंग) मृग, हरिण; (जस० ३, १, कुरुवस) कटसरैया, अडूसे की तरह का १४)। -सिसु पु० (सं० कुरङ्ग+ एक कांटेदार पौधा, जिसमें पीले, लाल- शिशु) हिरण का बच्चा; (जंवू० ५, नीले और सफेद कई रंग के फूल लगते १०, १५)। हैं। उसके दानों से बहुत ही घटिया तरह कु+रत) एक विशेष लेने वाला; . -- कुरुकुरिअं (२४१) 19 का तेल निकाला जाता है; (की० ३, का एक वंश; (भ०)। १०१)। कुरुवक-पु. (तुर्की कूरवेग). शस्त्रास्त्र कुरुकुरिअ-न० (दे०) औत्सुक्य; (दे०. और शाही झंडों का अधिकारी; (को० ३, ना० मा० २, ४२)। ४१)। कुरुचिल्ल-पु. (दे०) १. कुलीर; जल- कुरुविवा-स्त्री० (सं० कुरुविन्दा) इस जतु-विशेष; २. न० ग्रहण, प्राप्त करना; नाम की एक व्यापारी (वणिज्) भार्या; (दे० ना० मा० २, ४१)। (प० च० ५५, ३८)। कुरुड-वि० (सं० क्रूर) १. निर्दय, कुलंकर-पु० (सं० कुलङ कर) इस निष्ठुर; तुल० गु० करडु (कठोर); नाम का एक राजा; (प० च० ८२, (प० च० २५, १८, ७; दे. ना० मा०- २६)। २, ६३) । २. (दे०)निपुण, चतुर; (दे०. कुल-पु० न० (सं० प्रा० कुल) ना० मा० २, ६३)। १. वश (प्रा० ५० १, १८२)। /कुरुड-व०, (सं० कृत्) काटना । -हिं २. कूल, फिनारा (हिं का० च० ३८) । व०प्र०पु०,व० "कुरुडहिं सपयासं"-प्रयास- ३. पूर्वजः (को० १, १५४) । ४. कौल, पूर्वक काटर हे हैं, (सुदं० ६, १६, ६)। "मोक्खं वजोमां कुलमग्गलग्गा" -कुल कुरुदुम-पु० (सं० कुरुद्र म>प्रा० कुरु (कौल) मार्ग में लगे रह कर मोक्ष प्राप्त +दुम) कुरुवृक्ष; "चउ गुणिय पणरह करते हैं; (प्रा० ५० ११५)। —उत्तिया विहंग सरि पवहंति कुरु-दुमई दहवीस स्त्री० (सं० कुलपुत्रिका) कुलपुत्री; गयदंत दिप्पंति," १५ की चार गुनी (जस० ४, ३, ३)। –उत्ती स्त्री० अर्थात् ६० विभंग नदियां प्रवाहमान (सं० कुलपुत्री) कुलपुत्री, कुलीन कन्या; रहती हैं । कुरुवृक्ष १० तथा देदीप्यमान (जस० २, ७, १०)। -कम पु० (सं० .२० गजदंत है; (व० १०, १६, ६) । कुलपरंपरा; (जंवू० ५, ३, १५)। कुरुम-पु० (सं० कूर्म) -क्कम पु० (सं० कुलक्रम) कुल-परंपरा कछुआ नामक जतु; (को० ३, ३६) । (व० १, १५, ६) । -गुरु पु० (सं० कुरुल-पु० (सं० कुरुल =वालों का कुलगुरु) वंश या खानदान का गुरु; गुच्छा) कुटिल केश, वक्र . वाल; (दे०- (जस० २, १५, ११)। -दिनमरिण- ना० मा० २, ६३; जस० ४, २, १२) । पुं० कुल को सूर्य की तरह प्रकाशित (सं० प्रा० कुरर) कुरल-पक्षी; (स्त्री०- करने वाला व्यक्ति; (व० २, ७, ३) कुररी); (प० च० १४, १८) । पु० -दीव पु० (सं० कुलदीपक) वंश को (दे०) पर्वत; (जंबू० ५, १०, ११)। दीप की तरह प्रकाशित करने वाला भंग पुं० (सं० (सं० कुरुल+भङ्ग) व्यक्ति; (व० ४, -देवय केश-भगिमा; (जंवू० ४, १५, ८) । पुं० (सं० कुलदेवता) वह देवता जिसकी कुरुव-पुं० (सं० प्रा० कुरु) इस नाम पूजा किसी कुल में परंपरा · से होती - - कच्छप या - ६, ३) ।
कुलं (३४२) कुलाहले (ण० ३, ५, प्रथम पुरुष, व.. . आयी हो; (जस० १, ६, २) 1 -देवी श्रेष्ठ; (प्रा० ५० १, १०१)। -हर स्त्री० (सं० कुलदेवी) वह देवी जिसकी न० (सं० कुल+गृह>प्रा० कुलघर, पूजा किमी कुल में परंपरा से होती कुलहर) पिता का घर; आयी हो; (जस० २, १४, २) धम्म ६)। पुं० (सं० कुलधर्म) पूर्व पुरुषों द्वारा /कुलकुल- (सं० कुरकुराय>प्रा. पालित धर्म, वंश-परंपरा से आने वाला कुरुकुरु) कुलकुलाना, कुर-कुर की आवाज कत्तं व्य-कर्म; (जस० ३, ३२, ३)। करना; (जंबू० ५, १०, १६) । -इ; -मग पु० (सं० कुल-मार्ग) कोल- (भ०) । कुलकुलंति २०, मार्ग, कुल-क्रम से आगत मार्ग; (जस० (सुदं० ११, १५, १०)। १, ६, २)-पर पुं० (सं० कुल+ कुलख-पु. (सं० कुलक्ष>प्रा० कुल- परम) श्रेष्ठ कुल; (जंवू० ४, १, १२) । क्ख) मनुष्य-जाति-विशेष; (संधि० १०, -पहु पु० (सं० कुलप्रभु) कुल देवता; २, ५)। (जंबू० ६, १०, १४)। -बालिया कुलछल-पु० (सं० कुल+छल). कुल- स्त्री० (सं० . कुलवालिका) कुल की चातुरी; (जंबू० ७, ५, १५) । लड़की; (जंबू० २, ६, १४)। -भूसण कुल-भूसरण-पुं० मुनि, सिद्धत्यनगर पुं० न० (सं० कुल-+भूषण>प्रा० कुल का राजकुमार; (प० च० ३६-८७, +भूसण) कुल के शृंगार; (जंवू०)। ११२)। -मंगल न० (सं० कुल+मङगल कुलमंती-स्त्री० (सं० कुलवन्ती) कुलीन >प्रा० कुलमंगल) कुल का कल्याण; पतिव्रता; (प्रा० ५० १, ६३) । (जंबू० ४, ७, ११)। -मग्ग पु० (सं० कुलमइलण-वि० (सं० कुल+मलिन) कुलमार्ग>प्रा० कुलमग्ग) कुलमार्ग, कुल को मलिन करने वाला; (जंवू० ४, पतिव्रत धर्म, "विणु नाहें किह कुलमग्गे ३, ४)। ठिया," अर्थात् पति के विना क्या यह कुलवद्धण-पु० कुलवर्द्धन; मधु · राजा कुलमार्ग (पतिव्रत धर्म) में स्थित रही; का पुत्र; (प० च० १०५, १०६)। (जंवू० २, १७, ७) । -मग्गचारि वि० (सं० कुलमार्ग-चःरिन्) कुल के मार्ग पर कुलवयमालिणी-स्त्री० छंद का नाम; (सुदं० ११, १६, १८)। चलने वाला, : (जस० १, ६, २५)। -~यर पु? (सं० कुलकर) कुलसंतइ-स्त्री० (दे०) चुल्हा; (दे०- आदि. पुरुष; (जस० २, : २५, १४) । ना० मा० २, ३६)। -यार पु० (सं० कुल+आचार>प्रा. कुलाल-पुं० (सं० प्रा० कुलाल) कुभ- कुलायार) कुलाचार, वंश-परम्परा से कार, कुम्हार; (व० ५, ३, ७)। .. चला आता रिवाज; (जंबू० २, . १६, कुलाहल-पु. (सं० प्रा० कोलाहल) ३)। (सं० कुलसारः) कोलाहल, शोरगुल; (सि० १, ४०) । -- कुल का -सारु वि० कुलिन (२४३). कुवि -- . कुलिंग-वि० (सं० कुलिङ्ग) बुरे लिंग कुल्लरिअ-पु० (दे०) कांदविक, हल- का; (जस० १, ६, १२)। वाई; (दे० ना० मा० २, ४१) । कुलिर-पु० (सं० कुलिर) कर्कराशि; कुल्ह-पु० (दे०) शृगाल, सियार; (प० च० १७, १०८)। (दे० ना० मा० २, ३४) । कुलिस-पु० न० (सं० कुलिश >प्रा० कुवइ-कि० (सं० कुप्यति, कुप्)क्रोध कुलिस) वन, इंद्र का मुख्य अ'युध; करती है; (सं० रा०)। (ण० २, ७, ५)। -उदर पुं० राक्षस कुवत्तय-पु० (सं. कु+पान+क) योद्धा; (प० च० ५६, ३१)। -धार कुपान, अयोग्य व्यक्ति; ण० ४, ३, पुं० ,कुलिशधर नामक. विप्र, (प० च० १)। ८८, ७) । —मज्झ न० (सं० कुलिश- कुवरि-स्त्री० (सं० प्रा० कुमारी) अवि- मध्य) एक प्रकार की तपश्चर्या; (प० वाहित कन्या; (सि० १, ६)। च० २२, २४)। कुवलप्रच्छि--वि० स्त्री० (सं० कुवलय कुलीण-वि० (सं. कुलीन >प्रा० +अक्षि) नीलकमल के समान नेत्र कुलीण) प्रतिष्ठित, उत्तम कुल में उत्प वाली; (जंबू० ४, १२, ६) । न्न । अकुलीण-वि० अप्रतिष्ठित; (रि० कुवल घन्दु-पु० (सं० कुवलयचन्द्र) ७, ५).। चंद्र विकासी कमल; (सि० २, १४) । कुलीर-पुं० (सं० कुलीर) जंतु-विशेष; कुवलय-न० (सं० प्रा० कुवलय) (जस० ३, ४, ८; दे० ना० नीला कमल, २. पृथ्वीमण्डल, (ण० १, ४१)। १०, ७)।-चंद पू० (सं० कु+ कुलुत्तिय-स्त्री० कुल स्त्री; (भ०)। वलय+चन्द्र) पृथ्वीमंडल के.. के .. चंद्र; कुल्ल-पु. (दे०) १. ग्रीवा; २. वि० (जस० ३, ४, १२)। असमर्थ, ३. छिन्न-पुच्छ, जिसका पूछ कुत्राइ-वि० (सं० कुवादिन्) दूसरे कट गया हो. वह; (दे० ना० मा० २, दर्शनों के प्रवर्तक, कुवादी; "अणिहणहि ६१)। अणाइहि समिय-कुवाइहि पणविवि अरहं- कुल्ल-अक... (सं० कूर्द) कूदना । तावलिहिं," (जस० १, २, १४)। कुल्लंत-व० कृ० (प० च० ५३, कुवार पुकार मचाना। -रेवि ७६)। "तो पहाए कुवारेवि डंभण गंजा- कुल्लड-न० (३०) कुल्लड़, मिट्टी का विओ" फिर प्रभात होने पर पुकार बना छोटा पात्र; (दे० ना० मा० २, दंभ से तेरा अपमान कराया, ६३)। (सुदं० ११, ६, ५)। -पु. (दे०) कुल्लतल्ल-पु० (सं० ... कुल्या+तल) पुकार (सुदं० ८, ३५, १)। छोटी नदी या नाले का तल; (जंबू० ४,. कुवि-सर्व० (सं० कोऽपि) कोई भी; २१, ७)। (जंबू० ६, ५, ७, सं० रा०) । मा० २, . -क्रि० मचाकर ।
कुविध (२४) कुसुम १०)। ६)। । . कुंविभ-वि०, (सं० कुपित >प्रा० कुसलु-पु. (सं० कुशल) खैरियत, कुविय) क्रुद्ध; (जंवू० ७, ७, राजीखुशी, "कुसलत्तु कुसलु ता तेण कुविय; (भ०)। कहिउ" ~~~-कुशल प्रश्न पूछने पर अपनी कुटिवेय--पुं० (सं० कु+विवेक) दुष्ट- कुशल की बात कही; (जस० १,२५, तापूर्ण विवेक या ज्ञान; (जस० ३, १२, कुसलत्त-पुं० (सं० कुशलत्व) कुशल- कुवेर-पुं० (सं०. प्रा० कुवेर) धना- . वृत्त, क्षेम, मंगल; (जस० १, २५, ५)। ! धिप, एक देवता जो इंद्र की नौ निधियों -तण पु० (सं० कुशलत्व) कुसलता। के भंडारी और महादेव जी के मित्र कुसामि-पु. (सं० कु+स्वामी) माने जाते हैं, (व० ७, १०, ६)। पृथ्वीपति; (जंवू० ७,६, २५) । कुसंग-पुं० (सं० कु+सङ्ग) बुरे कुसासण -पु० (सं० कु + शासः) लोगों का साथ; (जस० ३, १२, ६) । १. बुरा शासन । २. (सं० कुश+अशन) कुसं-पु० न० (सं० कुश >प्रा० कुस) घास खाना या चरना; (ण ७, १, १. तृण-विशेष, कांस की तरह की एक ६)। पवित्र घास; "कुसुम-पत्त-कुस-पत्ती कुसी-स्त्री० (सं० कुशी=हल' की धारणु;" (व० २, १६, ६) । २. (सं० फाल) लोहे का बना हुआ एक हथियार; कुशा) लगाम, रस्सी; (ण. ३, १४, (दे० ना० मा० ८, ५) । ४) । पु० सीता का पुत्र; (प० च० कुसोलु-पु० (सं० कु+शील) कुत्सित १००, २) । -ग्ग पु० (सं० कुशाग्र> आचार; (ण० ४, ३, १)। प्रा० कुसग्ग) दर्भ या कुश का अप्र भाग कुशीस-पुं० (सं० कु+शिष्य) बुरा जो अत्यंत तीक्ष्ण होता है; (व० १० ६, शिष्य; (ण० ७, १, १६) । ८)। -द्धय पु० (सं० कुशध्वज) कुंश- कुसुभ-पु० (सं० कुसुम्भ >प्रा० ध्वज नामक ब्राह्मण; (प० च० कुसुभ) रंग-विशेष, कुसुम्भ के १०५) । बना रंग; (जंबू० ६, १४, १३) । कुसण-न० (दे०) आर्द्र करना; (दे०- कुसुमिल-पु० (दे०) पिशुन, दुर्जन, ना० मा० २, ३५)। चुगलीखोर; (दे० मा० मा० २, कुसमुग्गमु-पु० (सं० कुसुमोद्गम > ४०)। प्रा० कुसुम+उग्गम) कुसुम की उत्पत्ति; कुसुइ-पु० (सं० (सं० कु+श्रुति) झूठे (व० १, ५, ५)। शास्त्र; (ग० ४, ३, १)। कुसरीर-वि० सं० कुशरीर) बुरे कुसुमबर-न० (सं० कुसुम+अम्बर > शरीर वाला; (भ०)। प्रा० कुसुम +अंवर) पुष्प और वस्त्र कुसल-वि० (सं० कुशल >प्रा० कु सल) (व० ५, ८, १)। निपुण, दक्ष; (भ०)। कुसुम-न० (सं० प्रा० कुसुम) पुष्प; - १०३, पुष्प से - - -वाण - - कुसुमाउह (२४५) कुहाडी (प्रा० ५० १, ६७; जस० १, १२, १) - ५७, ६) । कुसुमंकिष-वि (सं० कुसुम+अकित) कुसुमाल -पुं० (सं० कुसुमाल) चोर; पुष्पों से सुशोभित; (जंबू० १, १७, २) । (प० च० २५, ३, २; जंवू० -चए पु० (सं कुसुमचय) कुसुम-समूह; (व० ३, २२, ११)। -दाम न० (सं० कुसुमालिअ-वि० (दे०) भ्रात-चित; कुसुमदामन् >प्रा० कुसुमदाम) फूलों की (दे० ना० मा० २, ४२) । माला; (जंबू० १, ६, ३) । कुसुमिम-वि० (सं० कुसुमित) पुष्पित, पुं० (सं० कुसुमवाण) कामदेव; (जस० खिला हुआ, (५० च० ३३, १४८) । ३, २६, ७)। -माल पु० १. वानर- कुसुमिय; (जस० १, ३, ७) कुसुमियउ; योद्धा; (प० च० ५७, ६)। २. पु० (परमा०) । (सं० प्रा० कुसुममाला) पुष्पमाला; (व० कुसुमो-पु० (सं० कुसुमं) (छंदशास्त्र २, १७, १०)।--सरु पु० (सं० कुसु- में) पंचकल गण के भेद का नाम (151); मशर) मदन, कामदेव, "तुहुँ देउ भडारउ (प्रा० ५० १, १६)। कुसुमसरु, तुहं सांमि महारउ हिययहरु," कुसुमोह-पु. (सं० कुसुमौद्य) फूलों का -मेरे तो आप ही पूज्य देव हो, कामदेव समूह; (सि० २, २७) । हो और तुम्हीं मेरे हृदयहारी स्वामी कुसुय-पु० (स०कु+श्रुत) कुश्रुति, हो," (जस०.२, ७, ६)। -सिरि -सिरि कुशास्त्र; (ण० ६, १२, ७)। स्त्री० (सं० कुसुमश्री) पुष्प-शोभा, कुह-(सं० क्रुध्) क्रोध करना; (व० ४, ११, १६)। -शय्या स्त्री० (जस०)। (सं० कुसुम-शय्या) फूलों की सेज; (की० Vकुह-(सं० कुथ्) सड़ना ।- २, २४५)। -आअरु (कुसुमाअरु) पु (सं० कुथ्यति > प्रा० कुहइ); दुर्गघि (सं० कुसुमाकरः) छप्पय छंद का भेद; करना; (हे० ३६५) । तुल० गु० कोहवु (प्रा० ५० १, १२३)। -सर पुं० -न्ति (प० च० ३३, ७, ६)। (सं० कुसुमशर) कामदेव; (सं० रा०) कुहड--वि० (दे०) कूबड़ा; (दे० ना०. -~ई न०, २० व०, (प्रा० ५० १, मा० २, ३६)। ६७) -उह पु० (सं० कुसुमायुध > कुहर-न० (सं० प्रा०. कुहर १: गुफा, प्रा० कुसुमाउह) काम, कामदेव; (क० पर्वत का अतराल; (प्रा० ५० १, १, १३, ३)। -लंकरिय वि० (सं० ६३५ जस० ३, ३, २) । २. पुं० देश- कुसुमालंकृत) पुष्पों से सुसज्जित; (व० विशेष; (प० च० ६८, ६७) । ३. न० २, १२, ६)। पवई स्त्री० (सं० गत, गड्ढा; (सं० रा०)। कुसुमावती) इस नाम की एक नगरी; कुहाड-पु० (सं० कुठार) कुल्हाड, (प० च० ५, २६)। फरसा; (प० च० ६६, २४) । कुसुमाउह-पु वानरयोद्धा; (प० च० कुहाडो-स्त्री० (सं० कुठारिका) छोटा - - - कुहिम (२४६) कूरंतरंगु हाथ का कुल्हाड़ा; (संधि० १४, ४, ८)। २. शिखर (ण० २, ३, ३; व० १, १३, कुहिम-वि० (दे०) लिप्त, पोता हुआ; ६)। (दे० ना० मा० २, ३५) । कूड-पु० न० (सं० कूट>प्रा० कूड) कुहिणि'-स्त्री० (दे०) मार्ग; (प० च० भ्रांतिजनक वस्तु, कूड़ा, बेकार वस्तु ३८, १०, ५; जस० ४, ८, ३)। (रा०) । २. छल, कपट, असत्य; (सि० कुहिणी'--स्त्री० (दे०) १. २, २; नस० ४, १६, ४)। पु० दास- मध्य भाग; २. रथ्या, मार्ग; (दे० ना.. विशेप का नाम; (प० च०५, १०२)। मा० २, ६२)। कूड-वि० (सं० कूटम् >प्रा० कुड) कुहिय-वि० १. (सं० क्रोधित) क्रुद्ध; भ्रमपूर्ण; "नवि कूडउं वचन न दोह (जस०) २. वि० (सं० कुथित>प्रा० कीव," तुल० कीव," तुल० , गु० कूडु (संधि० २०, कुहिअ) व्याधि दूषित, दुर्गंध वाला; ३, ७) । कूडउ-वि० (सं० कूट+क (जस० ३, २७, २०)। >प्रा० कुडअ) झूठे, छल-युक्त, “कूड कुहूरव-पुं० कोकिला की ध्वनि; (प्रा० दम्मु निएवि विमत्तिएँ," -झूठे (द्रम एक पै० २, १३४)। प्रकार का सिक्का) को देखकर खेद करते कुहेड-पु० (दे०) ओषधी-विशेष, गुरे- हुए; (जंवू० ६, १३, ४) । टक; (दे० ना० मा० २, ३५) । कूडमंतु-पुं० (सं० कूटमन्त्र) कूट मंत्र; कुहेडय-पु० (सं० कुहेट+क>प्रा० "महिलाकिउ सयलु वि कूडमंतु," यह कुहेडम) चमत्कार उपजाने वाला मत्र सारा (प्रपंच) महिला कृत कूटः मंत्र है; तत्रादि ज्ञान; (प० च० ५४, ११, (जंवू० ४, १७, १७)। ४)। कूडायर-पु० (सं० कूट+आदर> कूअ-पुं० (सं० कूप >प्रा० कूय) प्रा० कूड+आयर) झूठा या दिखावटी कूप, कुआ; (जंवू० १०, १७, ४) । आदर; (जस० ४, १६, ३)। कूइय-न० (सं० कूजित >प्रा० कूइय) कूणिअवि० (दे०) थोड़ा खिला हुआ; अव्यक्त आवाज; (जंवू० ४, ६, ३)। (दे० ना० मा० २, ४४)। कूकर- (सं० प्रा० कुक्कुर) श्वान, कूरंतरंगु-पु. (सं० क्रूर+ अन्तरंग) कुत्ता; (सि० १, ४४)। क्रूरता से बढ़ा हुआ अन्तरंग; "गल- कूच-पु० (सं० कूर्च) दाढ़ी; (प्रा० गु० गज्जिएँ बहिरंतउ दिसाउ, कूरंतरंगु ४, २८)। वड्ढिय-कसाउ;" अर्थाद गल-गर्जना फूजा-स्त्री० (फ्रा० कूजः) कूजः) सुराही; करता हुमा अपना बाह य रूप दर्शाता तुल० ० पं. कुज्जा (a small earthen हुआ तथा निर्दयता या कठोरता से बढ़े pot); (की०.२, १६२)। हुए कषाय वाले अंतरंग को दिखाता कूट-पु० न० (सं० कूट>प्रा० कूड) हुआ पंचाननसिंह उठा; (व० ३, २६, १. पहाड़ समूह; (को० ४, १६)। १०)।
कूर (३४७) दूसारे के साथ . फूर-न० (सं० प्रा० कूर) १. बोदन; निकालने का एक यंत्र; (दे० ना० मा०- (प० ० २५, ११, ७)। २. पुं० १, ६३)। रावण का इस नाम का एक योद्धा; (५० कूवयहं-पुं० सं० (कूपकः) कुएँ (सा० च० ५६, २६) । अव्य० थोड़ा; अल्प; ६६)। (पड्) ३. वि० (सं० - क्रूर>प्रा० कर) कूवल-न० (३०) जघन-वस्त्र, जघन निर्दयी; (जस० १,८, ६)। -गह (पुट्ठा, कूल्हा, चूतड़, २. स्त्रियों के पुं० (सं० क्रूर+ग्रह) अहितकारी ग्रह; पेड़) पर पहने जाने वाला वस्त्र, "कूवलं (जंबू० १०, २५, १०)। -भाव पुं० जघनवसनम्," (दे०ना०मा० २, ४३) । (सं० = रभाव) निर्दयतापूर्ण विचार; कूवार-पु. (सं० पूत्कार) करुण (व० २, ८, ८)। -णिणु वि० ० (सं० पुकार; किसी अत्याचार या कष्ट निवा- रानन>प्रा० फूर+आणण) क्रूर मुख रण के लिए प्रजा द्वारा सामूहिक रूप में वाला; (व० २,७,११)। -सिणु राजा के सम्मुख करुण पुकार वि० (सं० कर+मशन >प्रा० कूर+ किया गया निवेदन (रि० असरण) क्रूरभक्षी; (व० ३, २६, कूवारें-पु. 'गरणाहहु कय सासुद्धार ता पयगय सयल वि कूवारें,' (पुष्पदंत, कूरउरि-स्नी० (सं० कूलपुर) नगर- महा०)। पु० (सं० कू+ रव) विशेष; (३०६, २०, १२) । १. सकरुण विलाप कूल-न० (सं० प्रा० कूल) १. तट, सुणवि" (भ० ८, १४, १); "एम करेवि किनारा; (जस० ३, १,८)। २. राजा सुइरु कूवारउ" (भ० ६, १५, १२)। विशेष का नाम; (व० ६, २०, १३)। २. अत्यधिक मुसीबत में सहायता के ३. न० (३०) सैन्य का पिछला भाग, लिए की गई पुकार; (प० २० २३, ४, (दे० ना० मा० २, ४३)। -अवहि ११, ण० ७, ११, ७) । कूवारु-पु. (कूलावहि) (सं० कूल-+-अवधि) कूल (सं०क-रवे>कोनार>कूवार) पुकार; त, "लवण्णकूलावहि," लवणोदधि के (रि० ६, ६)। कूवार---पु० (सं० कूल तक; (जंबू० १,१०, १४) । कूपार) समुद्र, "तुमं पत्तसंसारकूवार- दूध-पु० (सं० कूप>प्रा० फूव) तीरो,"-आप इस संसार सागर के तीर कुआ; तुल० मगही कूआ, गु० कूवो; पर पहुंच गए हो; (जंवू०. . १,१८, (सा० ६८; सरह दोहाकोश; जस० ३, १)। १६, ३)। कूवि-स्त्री० (सं० कूप>प्रा० कूव) कूडिय-पु० (सं कूपिका) छोटा कुर्मा कुआं; (महा० ६६, ३, ११)। प्रा० गु० २२, १५)। कूसार---पु० (दे०) खड्डा, गर्त जैसा कूवतुला-स्त्री० (सं० कूप-+ तुला) स्थान. "कूसारो गर्ताकारः," (दे० ना०. ढकी, सिंचाई के लिए कुएं से पानी मा० २, ४४)। गतं कूवार क (२४८), केणिय माता व के सर्व० (सं० कः) कोन; (जंवू० ७, केकट्य-पु. (सं० प्रा० केकय) मनुष्य- ३, १०; रा० ३४) । जाति-विशेष (केकय देशीय); (संघि० कॅकाय-अक० (सं० केङ्काय) के-के १०, २,६) आवाज करना । केकायंतं-व० कृ० केकई-स्त्री० (सं० केकयी) राजा दश- "पेच्छइ तो जहागि केंकायंतं महीप रथ की एक रानी, केकय देश के राजा डियं," (प० च० ४४, ५४) । को कन्या; (प० च० २२, १०८) । के-4०, के लिए; (को० २, १६) । केकय-पुं० (सं० केकय) केकय देश फेअइ-स्त्री० (सं० केतकी>प्रा० का राजा; (प० च० २२, १०८) । केमइ) केतकी-पुष्प, पुष्प-विशेष; (प्रा० केकसी स्त्री० रावण की पं० २, ६७)। विद्याधर राजा वोविंदु की पुत्री; (प० केआ-स्त्री० (दे०) रज्जु, रस्सी; (दे०- च० १, ४६).। ना० मा० २, ४४) । केकाण-० अश्व-जाति-विशेप; (प्रा० केई-(सं० केन) किससे, किसके द्वारा; गु० ५, १३)। (उ० व्य० प्र० २१-३)। केइ (सं० केकई-देखो केकई (म० च० ७६, केन); (उ० व्य०. प्र० २७-४) । २६)। केइय-वि० (सं० केका-मोर की केक्कार--पुं० (सं० क्रेकार) पक्षियों वोली) शब्दित; (प. च० का शब्द-विशेप;: (जस० ५३, ६, १, २०, ७)। १२)। केउ-पु० (सं० केतु>प्रा० केगई-देखो केकई; (प० च०१, ध्वज, पताका; (जस० १, १, ६)। ६४) । राक्षस योद्धा; (प० च० ५६, २६)। केडुमाल-० (दे०) पतवार; (हिं -मइ स्त्री० (सं० केतुमती) स्त्री-विशेष का०, च ३८)। का नाम; (क० ६, १२, १); अंजना केढव-पु कैटभ, राजा-विशेप का की सास; (प० च० १५, २७)। नाम; (प० च० १०५,. १३) । फेउर-पु० न० (सं० केयूर>प्रा० केण-सर्व० (सं० केन). कौन; 'रइ- केउर) हाथ का आभूषण-विशेप; (सि० नाहह खंडिय आण केन'; (विला०)। २, ६) । २. दीर्घ अक्षर (s); (प्रा० ५० केरणय-पु० (सं० क्रीत>प्रा० किणिय) १, ३१) । केऊर; (ण० ३, १०, ६) । ऋय योग्य वस्तु; (जंबू० ५, ११, ३)। केऊरे; (व० ४, १, १६) । केरिणय-वि० (सं० क्रीत>प्रा० केऊ-पु० (दे०) कंद, , कांदा, कांदा, एक किणिय) खरीदे हुए; "कयकिरिणयहाँन जिसमें प्याज की गुल्म तरह गांठ पड़ती सोह इह हारहों," -मूल्य से खरीदे है, गांठदार या गूदेदार जड़, "केऊ य हुए हार की यहां . कोई शोभा नहीं है। कन्दमि," (दे० ना० मा० २, ४४) । (जंबू० ६, ३, ३)। , केउ) - - केत (२४६) केरिस पलाश का . केत-वि० (सं० कियत्) कितना -3; (रा. ३४)। केत्तडउ-वि० (सं० कियत्>क्तिब) कितना; (सुदं० ८, २५, ५) । केत्तडय-वि० (सं० कियत् >प्रा० केतिब) कितना; (प० २० २१, १)। केत्तहो-च० (सं० कुलचित्। कहीं; पुरानी हिंदी कितहूं (कहीं भी); (क० ६, ८, १०)। केत्तिम-वि० सं० कियद >प्रा० केत्तिम) कितना; (पड) । केत्तिय; (ण. २, १३,८; १० ब० २१, ११, १)। केत्धु-अव्य० (सं० कुत्र, कुतः) कहाँ, किस जगह; (भ०)। केदार-पु० (सं० केदार) केदार नामक वृक्ष; "जाचक सिद्धि केदार दाने पंचम वलि जानेल," यांचकों के लिए कल्प- वृक्ष (सिद्धि केदार) के समान मनोवांछित फल देने वाले थे और पांचवे वलि के समान दानी थे; (को (को० १, ७२)। केन–सर्व० (सं० केन) कित; "केन पारे निरसिअउ वड समच्च असलान," (की० ४,१४२)। केम-अन्य० (सं० कयम्) कैले, कित तरह; तुल० गु० केम; (भ०; जंदू० ,५ ४, २१)। केय-पु० (सं० केकिन्) मोर; (भ०)। केयई-स्त्री० (सं० केतकी) एक प्रकार का झाड़ या पौधा, केवड़ा; ५३, ५६)। त्यग--न० (सं० केतन) ध्वजा; (सुदं० १, ३,४)। केयइ-स्त्री० (सं० केतकी) एक प्रकार का छोटा भाई या पौवा; (जस० १, १२, ६)। केयरी-स्त्री० वृक्ष-विशेप; (प० २० ४२, ६)। केयार-० (२० केदार) १. वह खेत जिसमें धान बोया जाता है, "जहिं त्रुम- त्रुमंति केयारकीर, उस प्रदेश के खेतों सुफ चुन-चुनकर धान्य खाते हैं; (जस० १, २१, १) । २. क्यारी; (५० १, ३, ६)।-बाण पुं० (दे०) वृक्ष; (हे० ना० मा० २, ४५) । संबंचकारक परसर्ग जो 'का' और 'के' विभक्तियों के स्थान में लाता है; (जस०) अ प० संबंकारक परसर्ग; (जंबू० ६, २, ३; जस०)। २. वि० (प्रा० केर, केरय) संबंधी वन्तु; (ग० १, ३, १४।३. पुं० दि०) सेवा; (म० १, २२, ४)। केरल-पृ० (सं० केरल) दक्षिण भारत का एक प्रदेश; (जंबू० ६ १६, १)। -नयरि स्त्री कमलनगरी, केरलनयरि- पएनहीं, -केरलनगरी प्रदेश; (जंबू ५, ५, १७)।-पुरी स्त्री० केरलपुरी; (०५, ३, ६)। बल पृ० (सं. केरल+बल) केरल सैन्य; (जंबू० ६, १६, १)। केरलि-स्त्री० केरल प्रदेश की रहने वाली; (जंवू० ४, १५, ८) । केरा-१० का; (को० १,६८) । केरित--वि० (सं0 कीदृश) कता; (जंबू०४, १८,११)। दान में (१०० केरी (२५०) . के कवि , केरी-१० संबंधकारकं परसर्ग; (जस० न्दिनी) केवट की कन्या; "हारासरु चलि. १, ६, २)। यमणु मुवि लज्ज केवट्टिणं दिणि" केलास -पुं० (सं० कैलाश>प्रा (सुदं० १०, ६, २)। केलास) पर्वत-विशेप; (ण. फेवड-वि० (सं० कियत् >प्रा० केत्ति १३; प्रा० ५० १, ७३) । केत्तिल) कितना (पाईअ०, पृ० २६१)। के लि-स्त्री० (सं० केलि, ली>प्रा. केवल-वि० (सं० केवलिन्> प्रा० के लि, ली) क्रीड़ा, खेल; (भ०)। केवलि) सर्वज्ञ, केवल ज्ञान वाला "केवः २. स्त्री० (सं० कदली>प्रा० कयली, लेण तित्थयरें जाणिय," -केवली तीर्थ- कैली) केले का पेंड; (जंबू० ८,७, करों द्वारा ज्ञात है; (व० १०, १७, ६)। १२)। न० (सं० प्रा० केवल) ज्ञान-विशेष; (ण० केलिदंड-पुं० (सं० केलिदण्ड) कदली. ६, ३, १) । वि० अकेला; (भ०)। दण्ड, "उन्भिय चंदोवा केलिदड;" (जस० ~~~णाण पुं० केवल ज्ञान; (जस० १, १, २, २५, १७)। १२) । -दीपक पु० (सं० केवल+ केलिदत्त-पु. (सं० कदली+पत्र) दीपक) ज्ञान-दीपक; (जंबू० ४, ३, १४)। कदली पत्र; (सं० केलि+वृत्त) क्रीड़ा. -णाणि पुं० (सं० केवलज्ञानिन्) मुनि वार्ता; (ण० १, १०, ४) । -णााणि वि० (सं० (सं० केवलज्ञानिन्) केली-स्त्री० (दे०) कुलटा, व्यभिचा- भ्रांतिहीन या विशुद्ध ज्ञान वाला व्यक्ति; रिणी स्त्री; (दे० ना० मा० २, ४४) । (व० १०, ४०, ४) । -नाण न० (सं० केलीगिल-वि० (सं० कैलीकिल) केलो- केवल+ज्ञान > प्रा० केवल+णाण) किल स्थान में उत्पन्न; (प० च० ५५, संपूर्ण ज्ञान; (जंबू० १०, २१, ६)। १७) । पुं० वानरयोद्धा; (प० च० ५४, -बाह वि० (सं० केवल-+वाहक > '२१)। प्रा० केवल-+वाय) ज्ञानवाहक; (जंबू० केलीहर--पुं० (सं० केलिगृह >प्रा० १, १६, २)। केलिघर, हर) क्रीड़ागृह, "कुरु केलि केवलाअ-सक० आरम्भ करना। विउले केलीहरए,” विशाल क्रीड़ाघर में (षड्) । क्रीड़ा करो; (रि० १, १०)। केवलि-वि० (सं० केवलिन्) . सर्वज्ञ; केव-वि० (सं० कथम्) कैसे; (हे० "आहाकम्मुद्देसहिं चत्तउ पिडु लेमि जिह ३४३, १) । केव- वि० (सं० कथम्) केवलिवुत्तउ," मैं आधा कर्म और उद्देश्य (क० ४, १३, ७)। आहार लेता है जैसा केवट्ट-पु. (सं० क वर्त>प्रा० केव केवली भगवान् ने कहा है; (जस० ३, ट) धीवर, मच्छीमार; (जस० ३, ३, २१, ७)। ११)। केवि-सवं० (सं० कोऽपि) किसी ने; केवट्टिणदिणि-स्त्री० (सं० क वर्तन- की० ३, ८०)। से रहित शुद्ध केंसंतरे (२५१) केहउ लुलिउ सुइ केसंतरें-वि० (सं० केश+अन्तर> (च० च० ३७, ११) । प्रा० केस+अंतर न०) केशों में छिपा केसरिविट्ठर--पु. सिंहासन "पुणु केस. हुआ; "चक्कहरे केसंतरें" रिविट्ठर पुणु विमाणु," अर्थात् फिर मूलि णिहालिउ णव-पलिउ," अर्थात् सिंहासन, फिर विमान; (रि० ८, ५)। श्रु तिमूल (कान के पास) में केशों में केसलडी-स्त्री० (सं० केश+लट्वा) छिपा हुआ एक नवपलित-श्वेत केश केशों की लट, केश-पाश, वालों का देखा; (व० ८, ७, १२) । गुच्छा; (जंबू० ६, १८, ३)। केस-० (सं० केश>प्रा० केस) केसव-० (सं० केशव) लक्ष्मण; (प०- वाल; (म०) । पासाए-पु. (सं० च० ३२, २, ११) । २. नारायण; केशपाश) वालों की लट; (सणतु० (जंबू० ४,४,४) । ३. कृष्ण, नारायण; ४४.) । --बंध पुं० (सं० केशबन्ध) (व० १०, १६, ८)। वाल बांधने का फीता; "सियक सुमुव्भा- फेसि-पु० केशी नामक दैत्य; (प्रा. सियकेसबंधु," अर्थात् केशवंध श्वेतबंध पं० २,७१)। श्वेत क सुमों से उद्भासित; (जंवू ५, केसी-१. पुं० लक्ष्मण "अन्ने जंपन्ति १२, १८)। -भरु पु० (सं० केश+ भडा, सत्ती विहु रामकेसीणं," दूसरे भट भार) केशपाश; (जंबू० १०, १६, ५) । राम और लक्ष्मण की शक्ति के बारे में -रालु वि. केशर-जटाओं २०)। "भू-मोसणु भासुर-केसरालु," अर्थात् कह रहे थे; (प० च० ७५, २. स्त्री० (सं० केशी) सातवें वासुदेव भीषण भौहों वाला, भास्वर केशर- की माता; (प० च० २०, १८४)। जटाओं वाला; (व० ३, २६, ६)।-रोह पु० (सं० केशर-ओर) केपु-पु. (सं० किशुक) टेसू के फूल; (प्रा० ५० १, १३५)। (ण० ४, १०२)। केसुमड-वि० (सं० केसर-पु० (सं० प्रा० केसर) अयाल, केश+उद्भट) घोड़े और सिंह आदि की गरदन के भयंकर; (जस०)। के-क्रि० वि० कैसे; (प्रा० वाल; (को० ३, १५०)। २. पु केसर-तिलक, वृक्ष-विशेष; (जंवू० ४, १७)। १७, ३) । ३. पु. पराग; (प्रा० पं० केह-वि० (सं० कीदृश्) कैसा, किस २, १६३) । केसरु-पराग; (विला०) । तरह; (भ०)। -उ वि० कसा, किस केसरि' -पुं० (सं० केसरिन् >प्रा० तरह (सुदं० २, १, १५)। केसरि) केशरी सिंह; (हे. ३३५, १; फेहम-वि० (सं० कीदृश>प्रा० केह) भ०)। कैसा; (ण० ७, ११, १)। केसरि - ०१: विद्याधर योद्धा; (प० केहउ-वि० (सं० कीदृश) कैसा; (जस० च० १२,६८) । २. राजा-विशेष-नाम; ४, २३, १६)। वाला, केश-समूह पं० १, , - ..
'केहि (२५२) कोउना मा०. २, (ण० ४, ७, केहि-अव्य० लिए, वास्ते; (दे० ना० कोदुल्लु- पुं० (दे०) उलूक, उल्लू. मा० ४,४२५) । पक्षी-विशेय; (दे० ना० केही-वि० (सं० कीदृशी) के सी; (प्रा० ४६)। गु० ३८, १३)। कोत-पु० (सं० कुन्त >प्रा० कुत) कैसें-वि० (सं० कीदृशात्) के से, "कैसें हथियार-विशेप, भाला; काह करत;" (उ० व्य० प्र० ३२-१)। १५) । -कोडि स्त्री० (सं० कुन्त+ कोंकण-पु. (सं० कोङ कण>प्रा० कोटि) भाले की नोंक; (जंबू० ४, २१, कोंकण) प्रदेश-विशेप; दक्षिण भारत का ११)। ग पुं० (सं० कुन्तान) अस्त्र- एक प्रदेश जिसके अंतर्गत कनारा, रत्न विशेप; (जंवू०७, ६, १)। -आउह गिरि, कोलाव और थाना आदि हैं। (कोताउह) न० (सं० कुन्त+आयुष) टि०-प्राचीन काल में केदल, तुलव, शास्त्र-विशेप; (जंवू० ६, ६, ६)। सौराष्ट्र, कोंकण, करहाट, कर्णाट और कोअ-पु. १. (सं० प्रा० कक) चक्र- वर्वर मिलकर सप्तकोंकण वनाते थे; वाक पक्षी; (दे० ना० मा० ८, ४३) । (जंवू० ६, १६,४)। को-सर्व० (सं० क:) कौन; (म०; कोंकणवासिनी-स्त्री० (सं० कोकणक की० १, ५६) । +निवासिन्) , कोंकणवासिनी स्त्री; स्त्री; कोअंड-पुं० (सं० । कोदण्ड >प्रा० (सुदं० ४, ६, ८)। कोदंड, कोअंड) धनुप, धनु; (जस० १, कोंग-पु. कुर्ग देश; (जंवू० ६, १६, १६, १)। १४)। कोइ-सर्व० (सं० कः अपि, कोऽपि) कोंचा-ताल-० (सं० कुञ्चिक= (१) कोई; (परम० २, १८३)। ताली,कुंजी;+सं० तालकम् = क ण्डी) (२) किसी को; (की० १, २१) । ताला-ताली; मगही कुंजी-ताला; (गुण्ड- कोइल-स्त्री० (सं० कोकिल) कोकिला, रीपा, चर्यागीति)। कोयल; तुल० गु० कोयल; (ण० २, ६, कोंडिग्र-पु. (दे०) ग्राम-निवासी ७; जंवू० ५, १०, १६; सं० रा०)। लोगों में फूट करा कर छल से गाँव का २. रोला छंद का भेद; (प्रा० ५०१, मालिक बन बैठने वाला, "भेएण गाम- ६३)। भोत्ता य कोंडिओ,” (दे० ना० मा० २, (दे० ना० मा० २, कोइला-पु० (सं० कोकिलः जलती ४८)। हुई लकड़ी) काप्ठ के अंगार, कोयला; कोंडिण्ण-न० (सं० कौण्डिन्य >प्रा० (दे० ना० मा० २, ४६)। कोडिण्ण) वसिष्ठ गोत्र की शाखा रूप कोउ-सर्व० (सं० कोऽपि) कोई; (उ० एक गोत्र; (ण० १, ३, ३) । व्य० प्र० २१-१८) ! पु० (सं० कोप) कीडिल्ल-पु. (सं० कौणिडण्य) गोत्र क्रोध; (व० २, १०, १५)। विशेप; (जस० १, १, ३)। कोउमा-स्त्री० (दे०) करीपाग्नि, .
कोकइल (२५३) कोछु - . प० च० नौका, - र . 'जगली कडा या वन उपला की अग्नि; नदी-विशेष; (प० च० ३६, १, ६)। (दे० ना० मा० २,४८) । कोव्हि-वि० (सं० कोटि>प्रा० कोडि) कोऊहल--- पुं० (सं० कौतूहल) करोड़ों; (का० दो० को०)। १. जिज्ञासा, २. उत्सुकता, ३. आश्चर्य- कोट्ट-पुं० (सं० कोट) दुर्ग, किला; जनक; (सं० रा०; जस० १, ६, ७)। (जंवू० ५, ३, १३)। -वाल पु० -त्थ पुं० (सं० कौतूहल+अर्थ) कौत्- (दे०) कच्चे फलों का समूह; (जंबु०६, हुल औत्सुकय, (जंबू० ६, १२, १३) । ४, १)। -वाल पु० (सं० कोटपाल) .—यरु (सं० कौतूहल+कारक) कुतुहल कोतवाल ; नगररक्षक; तुल० गु० कोट- वर्धक; (व०४, २१, १०) । वाळ; (जंवू० ५, ११, ३; 1/कोक-क्रि० (दे० प्रा० . कोक्क) ५१, १२, ७)। बुलाना, आहे वान करना; (रा०)। कोट्टिव-पुं० (दे०) द्रोणी, कोकाविउ-भू० का बुलाया; "कोका जहाज; (दे० ना० मा० २, ४७)। विउ सो ते सुत्तधारि," (क० ४, १२, कोट्टिम-वि० (सं० कृत्रिम) बनावटी; ४) (प० च० ६६, ३६)। कोक-पु० (सं० कोक) चक्रवाक पक्षी, कोट्टी-स्त्री० (दे०) १: दोह, दोहन, (दे० ना० मा० ८, ४३) । दुहना, दुग्धपान, दूध दूहने का पात्र; कोकनदे-न० (सं० कोकनद >प्रा० २. लड़खड़ाने की क्रिया, सत्पथ से भ्रष्ट कोकणय) कमल; (को० ३, ३४) । होना; "कोट्टी दु दोहरखलणासु;" (दे० 1/कोक्फ-(प्रा० कोवक) बुलाना, ना० मा० २, ६४)। -इ (भ०)। कोटुंभ-० न० (दे०) हाथ से कोकणे।-3, क्रि०, भू० का० वुल- फेंका हुआ जल, "कोट दुर्भ कराहतं वाया; (ण० ३, १३, ७) । कोक्त- वारि," (दे० ना० मा० २, ४७) । व० कृ० 'को-को' शब्द करते हुए; (जस० २, २७, ५)। कोट्ठ-पुं० (सं० कोप्ठ>प्रा० कोळ, कोक्कासिय-वि० (दे०) विकसित, कठ्ठ) कोठा, कमरा। कोठो; (ण० १, १२, १)। -~~य, पु० प्रफुल्ल; (दे० ना० मा० २, ५०) । अपवरक; (सुदं० १, ६, ५)। कोच्छर--वि० (दे०) के सित; (सुदं० (कोट्ठा) (सं० कोठ+क) कोठा; ४, ६, ६)। (जंबू० १, १६, ४)। कोञ्च-पु० १. (सं० क्रौञ्च>प्रा० कोंच) पक्षी-विशेप; (प० च ० . कोटद्वार-पुं० न० (सं० कोण्डागार) भाण्डागार; (प० च० २, ३)। ५) । २. पु० कोंज नामक वृक्ष; (प० च० ३,.१, ११). कोछु-पुं० (सं० कोष्टु), गीदड़, कोचाइ--स्त्री० (सं० . क्रौञ्चनदी) शृगाल; (पड्) । कूकना। तुल० म० तुल० राज० कोडव (२५४) कोयल । 1 । -- कोडंब-न० (दे०) कार्य, काज; (दे०. (दे०. कोढिय--वि० (सं० कुष्ठिन् >प्रा० ना० मा० २, २)। कोढि) कुष्ठ रोग से ग्रस्त; (सुदं० ८, कोड-पुं० १. (म० कोड) गोद, -इं; ५, ८)। कोढिय-कोढ़ी; (सि० १, (रा० ३५) । २. कौतुक; (जंवू० ३, १४)। कोढिरह-स्त्री० (सं० कु प्ठिन्) कु प्ठ. ११,८) कोडि - स्त्री० (सं० कोटि>प्रा० कोडि) वती, क प्ठ-रोग से पीड़ित; (जस० ३, राशि; "कणयरयणकोडिहिं घडिउ" जो ११, ६). स्वर्ण और रत्नों की राशि से गढ़ा गया कोढियण-पु. (सं० कु प्ठिन्+जन) है; (ण० १, ६, १३) । २. किनारा, कोढ़ी जन; (सि० १, १५) । अग्रभाग; (जंबू० ६, ७, ४) । २. पु. कोणत-पु.० (सं० कोण + अन्त) दे० क क्कुट, (जस० २, १३, ६)। कोना, "संगामकालम्मि कोणंत दडिएहि, करोड़, कोटि (पाहु०) ४. कौतुक, युद्ध के समय इसमें चढ़कर डर से कोने (पाहु० १७७)। –य (दे०) दुर्जन, में जाने से क्या लाभ, (जंवू० ५, १४, चुगलीखोर; (सुदं० ३, १, ७) । १६)।-र ० (सं० कोण+अन्तर) कोडियं-न० (दे०) छोटा मिट्टी का एक कोना; (जंबू० २, १६, १३) । पान, लघु शराव, (द० ना० मा० २, कोण-वि० (दे०) १. काला, श्याम ४७) । वर्ण वाला; २. लकड़ी, यष्टि; "कोणो कोडिल्ल-पुं० (दे०) पिशुन, दुर्जन, कृष्णवर्णः । लकुट इत्यन्ये," (दे० ना. चुगलीखोर; (दे० ना० मा० २, ४०) । मा० २, ४५) । ३. वानरयोद्धा; (प० कोडिसिला-स्त्री० लक्ष्मण द्वारा उठायी च० ५७, १३) । गई शिला; (प० च० ४८, ६६) । (दे०) रेखा, लेखा, कोड-न० (दे०, प्रा० कुड्ड) कोतुक, लकीर; (दे० ना० मा० २, २६) । कुतूहल; (प० च० ३६, ११, ७) । कोड्ड-न० (दे०) कोतुक, कुतूहल, कोलो-पु० (सं० कोण) गृह-कोण, तुल० घर का एक कोना; (दे० ना० मा० २, कोड; (व० ५, २१, १, जंवू० ३, ११, ४५)। दे० ना०- ८, मा० २, १६)। कोतलंका-स्त्री० (दे०) मद्य परोसने कोड्डावरणय-वि० कोतुकोत्पादक; (प० का एक पात्र (दे० ना० मा० २, च० ३६, १) । कोड्डावणिय-वि० कौतु. १४) । ककारक (प० च० २६,५, कोत्थर-न० (दे०) विज्ञान; (दे० ना.. ९; जस० ३, २६, १४)। मा० २, १३)। कोढ-पु. (सं० कुष्ठ>प्रा० कोड्ठ, कोत्थल-पु० (दे०) १. कोष्ठ, कृशून, कोढ) कुष्ठ-रोग; (सुदै० ८, ५, ८) । अन्न भरने का कोठार; (दे० ना० मा०- कोणू-स्त्री. - . आश्चर्य; ० म० कोत्धुंह (२५५) कोलाहलं २. थैला; (की० ४, १. शरद के समय कोदव, २,४८) । कोमारो-स्त्री० (सं० कौमारी) विद्या- ८६)। विशेष. (प० च० ७, १३७) । कोत्थुह-पु० (सं० कौस्तुभ >प्रा० कोमुई-स्त्री० (सं० कौमुदी) कोत्थुह) वासुदेव के वक्षस्थल का मणि ऋतु की पूर्णिमा; (दे० ना० मा० २, (रि० ८, १)। ४८) । २. नगरी-विशेष; (प० च० कोत्युहमणि-स्त्री० (सं० कौस्तुभमणि ३९, १००)। -नंदण पु वानरयोद्धा >प्रा० कोत्थुभ, कोत्थुह) पुराणानुसारं (प० च० ५७, १८) । एक रत्न जो समुद्र मथने कोयंड-पुं० (सं० कोदण्ड >प्रा० निकला था और जिसे विष्णु अपने वक्ष कोदंड) घनुप; (सं० रा०)। कोर-वि० स्थल पर पहने रहते हैं; (व० ५, १०, (सं० केवल) कोरा, जो वरता न गया १)। हो, अनुपभुक्त (वस्त्र); (क० १०, १७, कोद्दव-पु. (सं. कोद्रव >प्रा० ४)। कोदव, कु द्दव) धान्य-विशेष, कोरयंकुर-पु० अंकुरित कोरकवृक्ष; कोदों; (व० ८, ५, १०) । (व० २, ३, ११)। कोध-पुं० (सं० कोध) इस नाम का कोरिटय-पु० (सं०कोरण्ट+क> प्रा० राजा; जिसने दाशरथि भरत के साथ कोरंटग कोरंट, कोरिट, कोरिटय, कोरेंट) जैन दीक्षा ली थी, (प० च० ८५ वृक्ष-विशेष; (प० च० ५३, ७६) । ४) । कोल-पु० १. (सं० प्रा० कोल) शूकर, कोप्प-पु० (दे०) अपराध, गुनाह वराह, सूअर; (प्रा० पं० २, १०७, ० (दे० ना० मा० २, ४५)। १, ६, २, की० ४, ६७) । २. (सं० कोपिस-वि० (सं० कुपित) क्रोधित; क्रोड>प्रा० कोल) गोद; क्रि० वि० (को० ३, ३२)। भीतर, अभ्यंतर, (को० २, १२६)। कोबेरी-स्त्री० (सं० कोवेरी) विद्या. कोलं (क्रोड); (उ० व्य० प्र० ६-२०)। विशेष; (प० च० ७, १४२) । ३. पु० (सं० कोल) देश-विशेष; (प० कोमल-वि० (सं० प्रा० कोमल) मृदु, च० ६८, ६६)। सुकुमार; (भ०)। कोमालय-वि० (सं० प्रा० कोलंब–पु० (दे०) १. स्पाली, मिट्टी कोमल) की रिकाबी, हँडिया; २. गृह, (दे० ना० कोमल; (क० ८, १६. ६)। मा० २, ४७)। कोमाणय-वि० (दे०) म्लान, शुष्क; विद्याधर राजा, (प० च० २५, १६, ६) । कम्मण; (दे० कोलावसुदर-पु. ना० मा० २, ४०)। (प० च० १०, २१)। कोमार-वि० (सं० कोमारः) कुमारी से कोलाहल- पुं० (सं० प्रा० कोलाहल) शोरगुल; (जस० ३, ३, १४)। उत्पन्न; (दे० ना० मा० १,८१)। - कोलिअ (२५६) कोसट्टहरिआ मा०- ७)। . पं० २. पक्षी की आवाज; (दे० ना० से लाल होकर; (जंस० ३, ३६, २) । २, ५०)। कोवि--सर्व० (सं० कोऽपि) कोई; तुल० कोलिअ-पु. (दे०) जाल का कीड़ा, मगही कोइ; (सरहपा, (सरहपा, दोहाकोश)। मकड़ा; (दे० ना० मा० २, २५) । को वि (कोऽपि); (प० च० २५, १५, कोलिय--पु० (सं० कौलिक >प्रा० कोलिअ) जुलाहा, तंतुवाय, कोरी; (सं०- कोविआ-स्त्री० (दे०) शृगाली; (दे.. रा०)। ना० मा० २, ४६)। कोलोर-न० (दे०) लाल रंग का एक कोविय-वि० (सं० कुपित > प्रा० पदार्थ, कुरुविद; (दे० ना० मा० २, कोविय) ऋ ध; (जंबू० ६, ४, ६) । ४६) । कोविलडो-स्त्री० (सं० कोकिल >प्रा. कोल्लर-पु० (दे०) स्थाली, पिठर कोइल) कोकिला; तुल० गु० कुवेलडी; (बटलोई, देगची); (दे० ना० मा० २,. (प्रा० गु० ३८, १) । ४७)। कोविला-स्त्री० (सं० कोकिला>'प्रा० कोल्हा-पु० (दे०) कोल्हू, चरखी, कोइला) स्त्री-कोयल; (व० ऊख से रस निकालने की कल; तुल० १०). कोल्हू, (दे० ना० मा० २, ६५) । कोवीणुन० (सं० कोपीन). लंगोटी; कोल्हुय-पुं० (दे०) शृगाल, सियार; “कोवीणुं कमंडलु भिकखपत्त, (जस० (प० च० २, ६५; दे० ना० मा० २, ४, १५, १४)। कोसंब-~पु० (सं० कोशाम्र>प्रा० कोवंड-पु० (सं० : (सं० : कोदण्ड >प्रा० कोसंब) फल वृक्ष-विशेष; (जंबू० ५, ८, कोदंड) कमान, धनुप; (ग० ८, ६, १; १३)। म० १, ५, २)। कोस-पुं० (सं० क्रोश >प्रा० · कोस) कोय--पुं० १.. (सं: कोपम्>प्रा० कोस, २ मील, मार्ग की लम्बाई का कोव) क्रोध; (ण० ८, १५, १३; उ० परिमाण; तुल० ५०. कोह (a distance व्य० प्र० ६-३१) । २. राक्षसयोद्धा; of two miles); (ण० ६, ६, ६) । (प० च० ५.६, १४)। कोसु; (सुअंध १, ८, ·१) । २: (दे०) कोवग्गि-स्त्री० (सं० कोपाग्नि >प्रा० कुसुम्भ रंग से रंगे वस्त्र; ३. समुद्र; (दे० कोवग्गि) क्रोधाग्नि; (जस० १, ४, १४; ना० मा० २, ६५.) । ४. (सं० कोश, प व० ३, २६, २)। >प्रा० कोस) खजाना, भण्डार; (जं. कोवण्ड-पु० कोदण्ड>प्रा० ८, १४,५.)। कोदंड) कोदण्ड, धनुष, धनु; (प० १० कोसटइरिआ-स्त्री० (दे०) पार्वती, गौरी, शिव-पत्नी; (देना० मा० २, कोवारुणु-वि० (सं० कोपारुण) क्रोध ३५) । 1 , (सं०. -- ३२, २, ११)।
कोसयं (२५७) कोहाणा - वस्त्र, रेशमी कोसयं-न० (सं० कोशक==drinking १२)। vessel) कोसा, लघु शराव (सं० शराव कोसेय-न० (सं० कोशेय>प्रा० >हिं सराव), कसोरा, कटोरा, मद्य कोसेब) रेशमी वस्त्र, कपड़ा; पीने का प्याला (दे० ना० मा० २, (क० १, ४, ४)। ४७) । कोहंडो-स्त्री० (सं० कूष्माण्डी) कुम्हड़ा कोसल-न० (दे०) नीवी, नारा, इजार- नामक वृक्ष; (दे० ना० मा० २, बद; (दे० ना० मा० २, ३८) । पु. ५०)। इक्ष्वाकुवंशीय राजा; (प० च० २२, कोह-(सं० कुप्>प्रा० कुप्प; सं० कुप्यति) कोप करना, क्रोध करना; (उ० कोसलणन्दरण-पु० (सं० कोसलन्दन) व्य० प्र० ८-४)। राम; (प० च० २२, १)। कोह-पु० (सं० क्रोध>प्रा० कोह) कोसलपुरि-स्त्री० (सं० कौशलपुर) कोप, गुस्सा (की० २, २४; ण. ३, ३, नगर-विशेष; (व० २, १६, ६) । १४; रा०)। कोहाइ. -क्रोधादि (क० कोसलि-स्त्री. (सं० कोसल पुं०) ६, १०,८) कोहाणल-पु. (सं० क्रोधा- कौशल देशवासिनी स्त्री; (सुदं० ४, नल) क्रोध रूपी अग्नि; (क० २, ४, ३) । ७) । कोहे; (की० २, २५) । कोसलिस-न० (सं० कोशलिक) उप- कोहण-वि० (सं० क्रोधन) क्रोधी; (प० हार; (दे० ना० मा० २, १२) । च० ३५, ७)। २. पु. इस कोसल्लिम-न० (सं० कोशलिक) भेंट, रावण का एक योद्धा; (प० च० ५६, उपहार; (दे० ना० मा० २, १२) । ३२) । कोसिय-न० (सं० कोशिक>प्रा० कोहली-स्त्री० (सं० कूष्माण्डी) कोहले कोसिय) मनुष्य का गोत्र-विशेष; (भ०)। का वृक्ष; (दे० ना० मा० २, ५०)। स्त्री० (सं० कौशिकी) कौशिकी नाम की कोहल्ल-न० (सं० कामिनी या पत्नी; "तहो कोसिय कुऊहल, कोहल) कौतुक, उत्सुकता; कामिणि . जण-मोहण;" (व० २, १८, (पड्) । ११) । स्त्री० केकसी की भगिनी; (प० कोहल्ली-स्त्री० (सं० कूष्माण्डी>प्रा० च० ७, ५४)। कोहंडी) कोहले का गाद्द; (षड्) । फोसिया--स्त्री० (सं० कोशिका) इस कोहाए-क्रि० (सं० क्रोध>प्रा० कोह नाम की एक विद्याधर-राज-कन्या; (प० >नाम धातु कोहाए । सं० क्रुद्ध >प्रा० च० ७, ५४)। कुज्झ से 'कोहाना' नहीं बन सकता) कोसिल्ल-पु. [सं० कौशली (=उप- =उप- क्रोध करना, (को० २, १७५) । हार, चढावा>प्रा० कोसल्लिअ) उपहार, कोहाणा-वि० (सं० क्रोधन>प्रा० भेट; (सं० रा०, दे० ना० मा० २, कोहण) क्रोधित; (की०४, १८०)। नाम का कुतुहल>प्रा० कौडि (२५८) । । कौडि-स्त्री० (सं० कपदिका>प्रा० क्षेन-न. (सं. म>प्रा० .. नन) कड्डिा) कौड़ी, धन, द्रव्य; 'बहुल कुशल, कल्याण, नंगल, हित; (उ० व्य.. कोहि कनिक बाई' -कौड़िया अधिक प्र० २१-१२)! और गेहूँ के दानं थोड़े थे;. तुल० पं० कोडी; (की०६, ३६) टि:-हिन्दू युग ख-पुं० (सं० प्रा० ख) व्यञ्जन-वर्ण- बार मुसलमानी काल में मंडी में फुटकर विशेप, इसका उच्चारण-स्यान कल क्रय-विक्रय के लिए कोड़ियों का प्रचलन है। २. न० आकाश, गगन; (जं० २, ७)। कौतुक-यु० (० कौतुक) विनोद नेत्र- खं० (२० व) आकाश; (बं० ५, तमाशा; (की० २, ३२) ७,४)। कौसील-० (मं० कपिनी>प्रा० खंच-लक (० कृप) १. खींचना, कविीत) कंगर; (की० २, ६} | २. वा में करना। -इकि०. (सं. विक्रय-वि० (सं० कृi>प्रार कथ) किया हुआ, बनाया हुआ, नचिन; कति) (म० ।-हिदिवि० (ए. ५, ११, २६) त्रवि-पू० काः कि: (५० ३० ४, ६,२)। (सुदं० २, १५, ६) तुल. पवालिय-वि० सं० आलित) व या वेंत्रणे । वं-बीचना; तुल० गु. हुमा, साफ किया हुआ; (जं० १,१६, 3g; (प्रा० गु० १२, ३०) । त्रि क्रीडानल-० न० (सं० श्रीडाल) का० कि०- वित्र कर; गीहा-पर्वत; (की० २, २४८) । (प्रा० गु०३५, ४)। के बार--पुं० कार व्यनि, "बव्वानु खंचण- पुं० (सं० कपंग / कृष) घटना वाङ्गारे कसरी पतरां कांस्य बचना । दंवगु<सिंचने लगे, "रहबर- के ङ्गार," बाटवातु के घड़ने की टंकार बंचणु', बड़े-बड़े रथ खित्रन लगे, (जर और कंसेरों के स्थान में फैले हुए कांस के ५, ४, १३)। बत्तनों की कार ध्वनि हो , रही थी, वंचिय-वि० कृष्ट, स्त्रीचा हुआ; (क (की० २,१०१)। ३, ८,६)! क्षमा-स्त्री० (० अमा>प्रा० सुमा) वन-वि० (सं० ख>प्राईज) चित्त की एक प्रकार की अति. जिसने लंगडा, लूला । संजयाई-३० लंगई; व्यक्ति इसरे के द्वारा दिए गए कष्ट को (ऋ० १, ५, ६) सहन कर लेता है और बदला लेने की खंजरा- ० (२० खजन>प्रा. इच्या नहीं करता है; (७० खंजण) १.दंजन, पी-विशेष; (प्रा० ५. १, १६२, द० ना० मा०, २७०)। झुण-वि० सं० शुष्ण>प्रा० सुज) २.० (६०) कर्दम, कोत्र; (६० तार- दलित; (की १, ६६) मा० २, ६९) करि---पू० खंजर (२५६) खंचंत - - खंजर- पु० (दे०) सूखा हुआ पेड़; खडा- पु० (सं० खङ्ग) खड्ग; (दे० ना० मा० २, ६८)। (परम० १, १२१)। खंजा-स्त्री० छंद का नाम; (प्रा० ५० खडाविय-क्रि० भू० का० (सं० खण्डा- १, १५८) । पित) कटवा लिया, "ता एक्कहि दिणि खंड- पु० (सं० खण्ड>प्रा० खंड) ते वंस तेण, खंडाविय तिण्णि वि तुरिय- १. खांड; तुल० २० खंड (sugar); एण", अर्थात् तब किसी एक दिन उसने (प०सि० च० ४, ७, ८६) । २. टुकड़ा, शीघ्रता से उन तीनों बांसों को कटवा अंश; खण्ड, भाग; (जस० १, १२, ७; लिया; (क० २, ८, ६)। भ० १, ५; प्रा० ५० १, १०८) । खडिनी- वि० खंडिनी, खंडन करने Vखंड- (सं० खण्डय >प्रा० खंड) वाली; (प्रा० पं० २, ३४) । तोड़ना, टुकड़े करना, दिच्छे: करना । खंडिय-वि० (वि० (सं० खण्डित > संडिआ; (प्रा. पं. २, ७.) । -इ प्रा० खंडिअ) छिन्न, विच्छिन्न; (ण० (सं० खण्डयति >प्रा० खंडइ) तोड़ना, १, ६, २)।-उंवि०खंडित "महु एक्कु खण्डित करना; (भ०)। खण्डइ; (हे० तं पि मुहूं खंडियउं".---'मेरा एक ही मुख ३६७)।-मि० (जंवू० २, १५, १५) । है और वह भी खंडित', (महा० ६६, खंडिज- कि० भू० का०, नष्ट कर १)। खडिर- वि० (सं० खण्डित >प्रा० दिया; (की० १, ६५) । खंडिउ--- खंडिअ) खण्डनशील; (जस० ३, १५, भू० का० १. उखाड़ डाला, (सा० ४)। २१६) । २. काट लिया, "खंडिउ विवा खंडो- वि० (सं० खण्डिन्) खंडिनी, हर; अर्थात उसके विवाधर को काट खंडन करने वाली; . (प्रा० ५०, २, लिया; (जस० २, ६, १२) । खंडी- ३४) । भू०का खण्डित किया; (सिं० १, ३१)। खत-वि० (सं० क्षान्त>प्रा०, खंत) खण्डते-कि०, भू० का०, काटती थीं; क्षमा-शील; (जस० १, १५, १५) । (की० २, १३६)। खंतव्य- वि० (सं० क्षन्तव्य) क्षमा खंडई-स्त्री० (दे०) असती, कुलटा; करने योग्य; (भ०)... (दे० ना० मा० २, ६७) । खतव्य वि० (सं० क्षन्तव्य >प्रा० खडणु-न० (सं० खण्डन >प्रा० खंडण) खंतव्य) क्षमा-योग्य; (जंवू० ० ७, १२, विश्छेद, भञ्जन; (पाहु० १३५) । १२)। खंदयंद-पु० (सं० खण्ड+चन्द्र) चंद्र खति- स्त्री० (सं० क्षान्ति>प्रा० कला; "गिरिसुय-जड-कंदल-खंदयंद", खंति) क्षमा; (भ०; ण० २, ८, १४)। अर्थात् वे (महादेव) पार्वती, जटाओं एवं खंदग पुं० (सं० स्कन्दक) मुनि- कपाल पर खंडचंद्र (चंद्रकला) से युक्त विशेष; (संधि० ३, ११, ५) । हैं, (जंबू० ५, ८, ३६)। खधंत-पु० (सं० स्कन्ध अन्त) कंधे - खंचं (२६०) खगणा? . (क० ८, का सिरा; (जंवू० १०, १६, ५)। खंभा, थंभा; तुल० म० खांभ; (सुदं० खघ- पु० १. (सं० स्कन्ध >प्रा० ७, ३, २; ण० ६, ५, ५; जंवू० १,१०, कंध) कंघा; तुल० म० खान्दा; (ण० १२) । ८, ७, १, म० २, ५२, १३)। २. खं माइत्त-पुं० (सं० स्कम्भावती> समूह; (जंबू० ७, ४, ७)। खंघा- खंभादत्त) १. खंभात, स्तम्भतीर्थ, (गुज- स्त्री० (प्रा० ५० १, ७३) । रात के पश्चिम प्रांत का एक राज्य जो खघमस- पुं० (दे०) भुजा, हाथ; इसी नाम के एक उपसागर के किनारे (दे० ना० मा० २, ७१)। है) २. इस राज्य की राजधानी, ३. खधमसी-स्त्री० (दे०) हाय, स्कंघ अरवसागर को एक खाड़ी; (सं० यष्टि; (पड़)। रा०)। खधयट्ठि- स्त्री० (दे०) भुजा, हाथ; खभायच्च- पुं० खम्भायत नामक (दे० ना० मा० २, ७१)। नगर, "तहों वारिणि मणोहर विहिवसई खधाण- पु० छंद का नाम; (प्रा०. णिय खंभायच्चहों पट्टणहो", पैं. १, ७५)। १२, १०)। खंघार-पु. (सं० स्कन्धावार) देश ख मायति--स्त्री० (सं० स्कम्भावती) विशेष; (जस० ४, २४, २६) !-- पु० खंभात, गुजरात के पश्चिमी प्रांत का देश-विशेष; (प० च० १८, ६६) । एक राज्य जो इसी नाम के उपसागर के खंघावार-पु० (सं० स्कन्धावार> किनारे पर है, "खंमायति वर-नयरिविवु प्रा० खंबावार) छावनी, सेना का पड़ाव; निप्पज्जए"; तुल० गु० खंभात; (प्रा०- (सि० २, १८)। गु० ७, ७)। संघीधारो पुं० (दे०) बहुत गरम खस-पु० (सं० क्षय) नाश; (जस० १, जल की धारा; (दे० ना० मा० २. १, ८; जंवू० ६, ७, १५, को० १, १८)। ५५)। खघोह- पु० (सं० स्कन्ध+ओघ) खइअ-वि० १. (सं० खादित>प्रा० स्कंघ-समूह, “पाणु वि खंघोहि गलि. खइअ) खाया हुआ; (भ०)।. २. (सं० यएण", प्राण भी स्कंघ-समूह में गलित क्षयित) क्षय-प्राप्त (भ०; जंवू० ३, ५, हो जाता है; (जस० ४, १०,४) । ८) । ३. (सं० खचित) १. जटित, 1/खप---सं० सिच, सींचना, छिटकना, २, मण्डित; (जंवू० ७, १०, २३) । याद करना ।- (भ०)। खइर-पुं० (सं० खदिर) खैर का वृक्ष, खपण न०१०) क्षति, लाञ्छन; वृक्ष-विशेष; (जंबू० ५, ८, ६)। तुल० तुल० गु० खांपण, खोड; (प्रा० खए- पुं० (सं० क्षय>प्रा० अप० गु० ५, ५०) । खय) विनाश. (को० ४, ६३).। संभ--पु. (सं० स्तम्भ >प्रा० खंभ) खगरणाहु-० (सं० खगनाथ) गरुड़, - खगविज्जा (२६१) खजूरय - . ''खगणाहु परिसरिउ सुरराउ घरहरिउ", व्य० प्र० ७-१३)। अर्थात् 'खगनाथ खिसक गया और सुर- Vखज्ज- (सं० खिद्; खिद्यते) राज घर्रा उठा; (क० ३, १८, ६)। खीझना; (व० २, १, २)। खगविज्जा- स्त्री० (सं० खगविद्या) सज्ज-न० (सं० बाध) खाद्य-विशेष; (आकाशसंचारसामध्यमित्यर्थ:) आकाश (भ०)। में चलने की सामर्थ्य (जस० १, ७, Vखज्ज–सं० खाद्>/खा का कम. १५)। वाच्य passive te eaten । खज्जेसहूँ; खगामिणी- स्त्री० (सं० खगामिनी) (प० च० ३२, ६, ६)। -इ (सं० विद्या-विशेष; (प० च०) । खाद्यते) खाना; (हे० ४२३; जंबू० २, खगिद-पुं० (सं० खगेन्द्र) गरुड़; (जस० २, २)। खज्जत- कृ० (सं०/खा+ १, १८, १)। शतृ) (जंबू० ६, १, १०)। खरगंक- पु० (सं० खड्ग+अङ्क) खज्जय-देखो खज्ज खाद्य; (प० च० खड्ग की गोद, "धाराखंडणभीयव्व जय. ६६, १६)। सिरि वसइ जस खग्गंके", (जंबू० १, खज्जा-न० (सं० खाद्य >प्रा० खज्ज) ११, १०)। खाद्य-विशेष; खाजा; (सुदं० ५, ६, ६)। खग्ग- पु० (सं० खङ्ग) तलवार, तुल० म० खाजा। खांडा, खड्ग; (प्रा० ५० १, ११; सि० खज्जिम-वि० (दे०) १. जीर्ण; सड़ा २, १८; हे० ३३०, ४; जंबू० ६, ३, हुआ; २. जिसको उलाहना दिया गया ४)।-ग पु० खड्ग का अग्र भाग हो वह; (दे० ना० मा० २, ७८)] (को० ४, ७१)।-फरु पुं० (खड्ग- खज्जिर- वि० (सं० खाद्यमान) जो फलक) जंवू० ६, १४, ९)। खगो- खाया गया हो वह; (सण०) । पु. (सं० खड्ग) तलवार; (को० ३, खुज्जुल्लिय-वि० (सं० कुब्ज+उल्ल २८)। +क (स्वार्थे) कुबड़ी; "खुज्जुल्लिय अम्ह लग्गिन-पुं० (दे०). गांव का मुखिया; उवरि पडिय", (तभी) एक कुबड़ी मेरे (दे० ना० मा० २, ६६)। ऊपर आ पड़ी; (जस० ३, २, २०)। खच्चल्ल- पु. (दे०) भालू; (दे०- ना० मा० २, ६६)। खज्जूर--न० (सं० खजूर) खजूर-फल; खच्चोल~. पु० (दे०) व्याघ्र, शेर; तुल० पं० खजूर, (प० च० ४, १, ६)। (दे० ना० मा० २, ६६) । खज्जूरी-स्त्री० (सं० खजूरी>प्रा० खजुहाव-क्रि० (सं० खजति) मांजना, खज्जूरी) खजूर का वृक्ष; (प० च० ५३, झाड़ना-पोंछना, पवित्र ७६)। सफा करना, करना, "दु हाथें खजुहाव'-द्वाभ्यां हस्ता- खज्जूरय-पु० (सं० कर्ण+खजूरक) भ्यां खजति । खज्जं माजने"; (उ० लगभग एक वलिश्त का एक विषला 4 खज्जो (२६२) खडहडी कीट; तुल० गु० कानखजूरो; (सिंध० खली; "गाइ पइण्णइ खडभुसंइ"; गाय ११, ५, ५)। को खली-भूसा खिलाया जाता है, (दे० खज्जोअ- पु० (दे०) नक्षत्र; (दे० सा० दो०)। ना० मा० २, ६६)। खडइअ-वि० (दे०) संकुचित; (दे०. खज्जोय- पु (सं० खद्योत>प्रा० ना० मा० २, ७२)। खज्जोअ). जुगगू; (सं० रा०) ।—य पु० खडक्क-पु. पर्वत; तुल० गु० खडक; (सं० खद्योतक >प्रा० खज्जोयय) कीट (प० च० ३१, ३, ६)। विशेष, जुगनू; (जंवू० ७, २, १३) । खडक्कउ -पुं० (सं० खटत्कृत) खड़- खटंग- १. (सं० खट्वांग>प्रा० खड़ आवाज; "णिसुणेवि खडक्कउ णिरु खटंग) चारपाई का पैर, कापालिक डरंति" (सुदं० २, १० १०)। की एक धारणीय वस्तु. (सं० रा०)। खडविका, खडकी स्त्री० (दे०) २. न० (दे०) छाया (दे० ना० मा० २, खिड़की; (दे० ना० मा० २, ७१) । ६८)। खडक्किय-क्रि० भू० का० (सं० खट- खट्ट-न० (दे०) तीमन, कढ़ी; (दे० स्कृत) ध्व०, खड़खड़ा उठे,..."खडक्किय- ना० मा० ३, ६७)। वीरकरवाल", वीरों के करवाल खड़- खट्टा--. स्त्री० (सं० खट्वा खट्वा, खड़ा उठे; (जंवू० ७, ६, ५) । खाट, चारपाई; (ण० ७, ६, ११; प० खडक्को- स्त्री० (सं० खटक्किका) च० ३६, ६, ६; म० २, ५५, ७)। खिड़की, दरीचा, झरोखा (दे० ना०. खट्वाहिंडोल- झूलती हुई शय्या; मा०.२,७१) । (को० २, २४५)। खडखडिय-वि० (सं० खटत्कृत, ध्व०) खट्टावरण पुं० खट्टे स्वाद वाली खड़खड़ाती हुई, "रणं घडिय-खडखडिय- कढ़ी (curry) का प्रकार; (प० च० तिक्खासिधारं", वह आपस में मिलकर ५०, ११, ११)। खड़खड़ाती हुई तीक्ष्ण असिधारा से युक्त खट्टिन- पुं० (सं० खट्टिक>प्रा० था; (जंवू० ६, ७, ३)। खट्टिअ) खटीक, कसाई; (दे० ना० मा० खडफड-क्रि० (दे०) छटपटाना; (म० २, ७०)। २, ५५, १३)। खड-न० (दे०) १. तृण, घास; (जस० खडयासी--वि० (सं० तृण+आशिन्) ३, १४, ४; दे० ना० मा० २, ६७) । घास खाने वाले; (ण० ३, १५, ११, यासी वि० (सं०तृण+आशिन) घास-फूस दे० ना० मा० २, ६७)। खाने वाले पशु "खडयासीखेडय उछा खडहड-- पुं० छंद-विशेष; (प० १० लड़"-अर्थात घासफूस खाने वाले पशुओं २३, १, ७) । के खेटकों को (वह हाथी) .नष्ट कर खडहडी-स्त्री० (दे०) गिलहरी, गिल्ली, डालता था; ण० ३, १५, ११) । २. जंतु-विशेष; (दे० ना० मा० २, ७२) । - खडा (२६३) खणिय -- १५)। अक० खन खन खडा-वि० (सं० पद) छह; (प्रा० ० . खोदना । -इ, क्रि० (सं० सनति); २, ५१)। तुल० म० खणणे; (म०) । खणखणंत- खडिया-स्त्री० (सं० खटिका>प्रा० व० कृ० (सं० खनखनाय+शत) (जंवू० खडिआ) खड़िया; (जं. ६, १४, ५, १०, ७) । खणन्त-व. कृ. खोदते हुए; (प० च० १२, ८, ५)। खडुआ-स्त्री० (दे०) मोती; (दे० ना०- खणखण, खणखणखण. (सं० मा० २, ६८)। खणखणाय) 'खण-खरण' आवाज करना; खड्ड, खड्डग- न० (दे०) श्मश्रु, (प० च० ३६, ५३)। दाढी-मू छ; (६० ना० मा० २, ६६) । खणखेव-० वानरयोधा; (प० च० खड्डा-पुं० १. (सं० खात) पर्वत का ५७, १४)। खड्ड, गड्ढा; (दे० ना० मा० २,६६)। २. स्त्री० (दे०) खानि आकर; (दे०. खणखण–पु० (सं० खणखणाय् >प्रा० खणवखण) ना० मा० २, ६६)। की ध्वनि; "खेल्लिवि खणखणस वलियाँ जित्तई खड्डाग-वि० (सं० क्षुल्लक) थोड़ा, आहरणई मंडलियह, " खन-खन ध्वनि के हलका; तुल० गु० हलकु; (संधि० ८, साथ पासा खेल कर बलवान माण्डलिकों १, ६)। के आभरण जीत लिये; खणंतर-पु. (सं० क्षणान्तर) क्षणमात्र; (ण० ३, १२, १०)। "विप्फुरइ खणंतरि विज्जसिद्धि", मेरी विद्यासिद्धि क्षणमात्र में स्फुरायमान हो खणखणाकार-पुं० (ध्वन्यात्मक) तल- वारों के टकराने से होने वाली खन-खन जाती है, (जस० १, ७, १)। की ध्वनि; (प० च० ४६, ४, ३) । खण पुं० (सं० क्षण>प्रा० खण) लमहा, निमेष, एक सैकंड से ४/५ भाग खणण:-न० (सं० खननः) के बराबर समय की माप, काल-विशेष, (जंबू० ६, ७,.६)। वहुत थोड़ा समय; तुल०. म० खिण, खणाव-वि० (सं०. खानयति) खोद- मगहीं छन, खन; (तिलोपा, दोहाकोश; वाना, खुदवाना; "सरणाव-सानयति । सन सि० १, ४१)। खणंतर-पु० क्षणान्तर; अवदारणे," (उ० व्य० प्र० ४६- (जंबू० २, १६, १३)। -दि- वि० (सं० क्षण+दृष्ट) (जंबू० ६, १२, ६) । खरिण-स्त्री० (सं० खनि) खान; (जसः -द्ध पु० (सं० क्षण+अर्द्ध)क्षणार्ध (जंबू० ३, १, १७)। ५, ५, १५) । खणा-क्षण; (प्रा० ५० सरिणत्त--न० (सं० खनिन) खोदने का १, २०४) । खां-पु. क्षणः यंत्र; (दे० ना० मा० ४,४). (महा०)। खणिय-वि० (मं० खणित) खुदा हुया; 1/खण-(सं० ' सन् >प्रा० सन् >प्रा० खण) (क० ४, ८,७)। खोदना; .. २२)।
संगुन (२६४) खर्प धद्रिय>प्रा० सगुस-स्त्री० (दे०) मन का दुःख या न० (दे०) गड्ढा, गतं; (३० ना० मा० पीड़ा । -ई; (रा० ३४) । २, ६६)। खणसा-स्त्री० (सं० खिन्न-मनस्) मन खत्तवम्म-० (सं० क्षत्रवर्म) मत्रिय का दुःख, मानसिक पीड़ा, (दे० ना०. धर्म; (जस० १,२३, २) । मा० २,६८)। सत्ति-मुं० स्त्री (सं० क्षत्रिय>प्रा० खण्ड-पयार-पु० (सं० खण्ड-प्रकार) खत्ति) क्षत्रिय नामक जाति; (प्रा० पं० मिष्टान्न-भेद; (प० च० २५, ११, १, ११७)। ३)। खत्तिम-पुं० स्त्री० (सं० क्षत्रिय> खण्डय-पुं० (सं० खा) तलवार; प्रा० खत्तित्र) लत्रिय वर्ण, हिंदुओं के तुल० गु० खांडे (प० च. ५२,१, चार वा में एक वरा; (की० १, ६)। ५५)। खण्डसोल्ल-पुं० शक्कर से तैयार की खत्तिणी-स्त्री० (सं० क्षत्रियाणी) गई मिठाई का एक प्रकार, गुडसोल्ल क्षत्रिया, अत्रिय जाति की स्त्री; (प्रा. (सोल=पक्च); · (प० च० ५०, ११, पं०१,६४)। खत्तिय-पुं० (मं० खनिया-स्त्री० छोटा गुप्त द्वार; खत्तिय) क्षत्री, मनुष्य की एक जाति; "सोपान तोरण यन्त जोवण जाल जाल (म० २, ७, १०)। योप खण्डिया,” अर्थात् नगर के विभिन्न खत्तीम-पुं० स्त्री० (सं० क्षत्रिय) भागों में सीढ़ियां बड़े हार, यंत्रधारागृह क्षत्रिय नामक एक जाति; (प्रा० पं० २, और गुप्तद्वार थे; (को० २, ८५) । २०७)। खप्ण-वि० (दे०) खोदा हुवा; (जस० (दे०) १. वाया हुमा, १, ५, १२; दे० ना० मा० २, ६६) । मुक्त, भनित, २. हत, "लम्वपकत्व खण्णु-पुं० (सं० स्थाणु>प्रा० वाणु) सद्धलंकेसउ" -वह लक्ष्मण के ठा वृक्ष; (दे० ना० मा० २, ६६) । समान था जो लंका रावण को खा गया खण्णुप्र-पुं० (सं० स्थाणुक) कीलक, था, (१०३, १४, ५, दे० ना० मा० २, खोटी; (दे. ना० मा० २, ६८)। ६७; जस० १, १२, २)। खत-पु. (म० खत, त्त) फरमान, खन्षय-पुं० (सं० स्कन्धक) छंद- शाही हुकुम, परवाना; (की० ४, विशेष; (प० ब० २३, १, ६)। ८)। 1/खप- (सं० क्षय) नष्ट स्वत्त-वि० (सं० क्षात्र>प्रा० खत्त) खपिअर (रा० ३४)। खप्पिल-निक क्षत्रिय-संबंधी, क्षत्रिय का; (ण. १, (सं० क्षपित) "की कुमन्त पहु १४, ६) । पुं० (सं० क्षत्र>प्रा० खत्त) होन वयण का समज खप्पिन," दिवाना क्षत्रिय, मनुष्य-जाति-विशेष; (भ०)। चाहिए; (की० ४, १४८) । खद्ध-वि० हार के होना। पहु करित सप्पर (२६५) सयरवइ च० १६, १६)। .. सप्पर-० (सं० सपर>प्रा० खप्पर) तय-अक० (सं० क्षि) क्षय पाना, नष्ट खोपड़ी; तुल० म० खापर; (भ०)। होना । खउ-क्रि० आ० नष्ट हो; (प० २. घट आदि का टुकड़ा; (प० च० २०, च० १२, ६, ५)। टि० हेमचंद्र ने , १६६) । वि० (दे०) निष्ठर, रूखा; ४, ३८७ में विध्यर्थक क्रिया में इ, उ, ए (दे० ना० मा० २, ६६)। का विवान किया है। खन्नालई-कि० (सं० क्षोभय् >प्रा० खय-पु० (सं० क्षय>प्रा० सय) खोभ) विचलित करना, क्षोभित करना; १. क्षय, विनाश; (सि० १, ४१; ण (सुदं० ८, २७, १०)। ३, २, ६) । २. रोग-विशेष; (भ०)।' खम-सक० (सं० क्षम् >प्रा० सम) ३. खग; (जस०)। क्षमा करना; (जस०) । समंतु (विधि०) खयकरि-वि० (सं० क्षयकारी) नाश (जंबु० ८, १, २) । खमाविमल-क्रि० या तबाही करने वाला; (जं० ८,७, भू० का० क्षमा मांगी; (५० १४, १) । खयकालु-पु० (सं० क्षयकाल>प्रा० खम-१. वि० (सं० क्षम) उचित, योग्य, खयकाल, गाल) प्रलयकाल, अवनति का पर्याप्त सक्षम; (सि० २, समय; (सि० २, १)। २. स्त्री० (सं० क्षमा>प्रा० खमा) क्षमा, सयचियउ-वि० (सं० क्षत+चित्) "जय खमदमसमजमरिणवहणिलय," आप क्षतयुक्त; "णं नहतयचियउ निठुरहियउ क्षमा, दम, शम और यमादि गुणों के कण्णाऽविलासिणिजोव्वणु;". (जंबू० ६, समूहों के निधान हैं; (ण. १, ११, ३) । ६, ११)। -वह पुं० (सं० क्षमापघ) खयर-पु० (सं० खचर>प्रा० खयर) मार्ग; (जस० ४, १५, ७)। विद्याधर, विद्या बल से आकाश में चलने खमा--स्त्री० (छंदशास्त्र में) गाथा का वाला मनुष्य; "सुरणरविसहरवरखयरत- भेद; (प्रा० ५० १, ६०)। रणु, कुसुमसरपहरहरसमवसरणु” -राजा समिय-वि० सं० क्षमित) क्षमा किया ने तीर्थकर के उस समोसरण में प्रवेश हुआ; (जंबू० ८, ७, १०)। किया जहाँ देव, मनुष्य, नाग और विद्या- सम्भ-पु० (व० सं० घर विराजमान थे, (रण० १, ११, १)। खंभ) खंभा, घंभा, तुल० गु० खांभो; -कुल; पु० (सं० खचरकुल) विद्याधर- (प० च० ७, ५, ४)। कुल; (जस०४, २६, १७) । सम्मक्खम-पु० । (दे०) १. संग्राम, सयरतंज-वि० (सं० वेचर+बन्तक- लड़ाई; २. मन का दुख; (दे० ना० मा० मारक) खेचरों के कालस्वरूप; (जंबू० २,७६)। ७, ११, १४) खयंकर-वि० (२० क्षयकर) नाश खयरवइ-पु० (सं० खेचरपति) विद्या- कारक; (ण० ४, १४, २) । घर (विद्या बल से आकाश में चलने क्षमा का .... ... स्कम्म>प्रा. ..... - खयरवि (२६६) खरहिम - . -खर, . ७: प्रा० वाला मनुष्य, आकाशचारी.) "वलिउ खयाण-पुं० खदान, खड्डा; .... (जंबू० खयरवइ तट भिडिउ रण मणिसहो," ५, १०, ७)। वह खेचरपति रत्नसेन वापिस लौटा खयाल-पुं० कंदरा...... निवसई और रण में भिड़ गया; (जंबू० ७, ५, सिहरिखयालहिँ," -जो सिंह गिरिकंदरा १०)। में (जाकर) रहता है; (जंबू० ५, १३, खयरवि-पु. (सं० क्षय+रवि) प्रलय ३२) । सूर्य; (जंवू० ५, १३, १४) । खर---पु. १.सर पृथ्वी; "खर वालुआइ खयराउ-पु० (सं० खगराज) गरुड़; भिज्जइ णमहिणिभर सलिल पवाहहिं (वा० १, ६)। वालुका आदि (नरक-) - पृथि- खयरामर-पु० (सं० खचरामर) विद्या वियाँ निरंतर जलप्रवाह से भेदी नहीं जा घर एवं देव; (व० १, १२, १०) । सकतीं; (व० १०, ६, १३) । २. पुं. खयराहिव - पु० (सं० खचराधिप) (सं० प्रा० खर) गधा; (सि० १, १३) । ज्वलनजटी नामक व्यक्ति; (व० ४, २, ३. छप्पय छंद का भेद; प्रा० १०१, ३) । १२२)। ४. तिनका, तृण; (को० ३, खयर-पु. (सं० खेचर) खेचर-विद्याधर ६०) । ५. वि० (सं० प्रा० खर) कठोर, (जाति) (जंवू० ५, ४, १२)1 २. खेचर, तीक्ष्ण, प्रखर, - (महा० ६८, "इउ करिवि खयरु विज्जावलेण णिय. -किरण पु० सूर्य; भवणु गयउ पुणु णयलेण", अर्थात् यह (जस०)। सव करके, वह खेचर विद्या के वल से खरडिप्र-वि० (दे०) १. रुख.; २. भग्न, नभस्तल द्वारा अपने भवन नष्ट; (दे० ना० मा० २, ७६)। खरदूं- (क० २, २१, ८)। सण-पुं० रावण का वहनोई; (५० खयरूव-पु० (सं० क्षयरूप) विनाश का च० १, ७४) । रूप; (जस० ३, ४०, १४) । खयरेश-पुं० (सं० खचरेश) ज्वलजटी खरमुही-स्त्री० (सं० खरमुखी) वाद्य- विशेप, (प० च० ५७, २३) । नामक व्यक्ति; (व० ४, ४, ७)। पृथ्वीखण्ड; खयरोग-पु० (सं० क्षयरोग) रोग- खरबहुल-पु० खरवहुल, विशेप; (जंवू०३, ११, ३) । (व० १०, २२, ८). खयरोरय-पु० (सं० खचरोरग) विद्या खरसयरण-पु० (सं० खरशयन) कठोर घर और नाग; (५०.२, १४, ८) । शयन; (व० १०, २५, १६) । खयसमए-पु० (सं० क्षय-समय) प्रलय खर-सिल–पु० - (सं० खरशिला) काल; (व० ४, २०, ८)। आधारशिला; (प्रा० गु० ७, ३२) । खयहि-अक० (सं० क्षयति, क्षि क्षये) खरहिम-पु. (दे०): पोता, क्षीण होती है; (सं० रा०)। (दे० ना० मा० २,७२)। पं० १, को गया; पौत्र;
सरिय (२६७) तला करना सर मा०- खरिय-वि० (दे०, प्रा० वरिल) भुक्त, खल-खल की अावाज करना। खलखल- भक्षित; (भ०)। खलन्ति -खल-खल की जावाज खरी–वि. (सं० तीक्ष्ग) (gurgling); तुल० गु० खळखळती; बिल्कुल, पूरी; तुल० मगही खरी; (प० २०३१, ३, ६)। लखलिय- (विनयचंद्रसूरि, नेमिनाथ, नेमिनाथ, चतुप्पा- क्रि० भू० का० (सं० खललित) बल- दिका)। खला ऊ, "तपरल सलतलिय"- बल्ल-वि० (दे०) १. कठिन, कठोर; खेचर समूह खलखला , (सुदं० ६, २. विपम और ऊंचा; (दे० ना० १२, ६)। २, ७%)। ततसलिय- वि० (खलखलायित) खत-वि० (सं० प्रा० सल) १. दुष्ट, खल-सल की ध्वनि करने वाले "कहिं दुर्जन; (प्रा० ५० १, १६९, जस० १, परियखलतलिपजलवाहला, १७, २८) । २. खलिहान; (द० ६, १, कहीं खल-खल करके मरते हुए जल के ११)। ३. स्त्री० (सं० खलि, बलो> छोटे-छोटे प्रवाह थे; (जंदू० ५, ८, प्रा०खलो) तिल-पिण्डिका, तिल जादि का २१) । तेल रहित चूगं, खल –भक्तणि तासु खलगंडिस-वि० (३०) मत्त, उन्मत्त; कि चित्त जाइ; (संधि० २,१०, (दे० ना० मा० २, ६७)। ४) । खतरण-१० (सं० स्वतन) निपतन, खिल-(सं० स्तल् >प्रा० खल) गिर जाना; (बंदू० ४, १५, १०)। १. तिसकना, स्खलित होना । -इव० खलपा-स्त्री० (सं०. स्खलना) गिर (सं० स्खलति >प्रा० सलइ) (प्रा० १० जाना, निपतन; (दे० ना० मा० २, १, १६०)। २. पड़ना, गिरना। -1; ६४)। व० (५० च० १४, ३, ४) । तुल० म० खलनल-पुं० (द०) क्षोम, खलभलाहट खळणें । खलंत-२० कृ० (सं०५/स्तल् । (म० २, ५२, १५)। शत) गिरते हुए, पड़ते हुए; (जं०३, ८, खलनलिय-वि० दि०) सुब्ध, सोम- ३) । खलंतु-व० कृ० मटकता हुला; प्राप्त; (भ०)। (क० २, ३,१)। खले-नि० स्तलित खलहल-१. वि० (प्रा० खलभलिय) होना; (की० ४,१६२)। खीलिउ सत्य, क्षोभ-प्राप्त; तुल० गु० तळमळवू क्रि० ० का स्खलित हो गया, गिर (प० २० १३, ५, २)। २. पुं० (२० गया; (प० १० १३, १, ३) । प्रा० खलखत, प्रा० सलहल) (ध्व०) खलइयं-वि० (अ० खानी) खाली, जो जल-प्रवाह के कारण उत्पन्न तलखत का भरा न हो, रिक्त (दे० ना० मा० २, शब्द; (जम०४,७,४)। खला-अक० (दे०) सराव करना, खतक्तल-अक० (सं० खलखलाय) नुकसान करना; (भ०)।
खलाई (२६८) संबंध मा० २, - . -- १. वायां हाथ, खलाई-न० (सं० खलान्) खलों को, ३८) । दुष्टों को; (हे० ३३४, १)। खल्लइम-वि० (३०) १. संकुचित, खलिम-वि० (सं० स्खलित >प्रा० २. हर्ष-युक्त, (दे० ना० खलिम) १. गिरा हुआ, पतित, २. रुका ७६)। हुआ; (ग०६, ४, ६; जस० २, २१, खल्ला-स्त्री० (सं० खल्ल>पा० खल्ल ५) । खलिय; (क० ३, १२, ४) । >प्रा० खल्ला) शरीर का ऊपरी. माव- खलिम'--वि० (सं० खलिक) खल से रण, चर्म, चमड़ा, त्वचा; तुल० पं० व्याप्त; (दे० ना० मा० ४, १०)। खल्ल; (दे० ना० मा० २,६६) । खलिज्जइ-क्रि० (सं० (सं० स्खल >प्रा० खल्लिरा-स्त्री० (दे०) संकेत; (दे०- खल) स्खलित करना, "तुह पोरिसु किर ना० मा० २, ७०)। केण खलिज्जइ," तुम्हारा पौरुष कौन खल्लिहडउँ-पुं० (सं० खल्वाट>प्रा० स्खलित कर सकता है; (ण० ७, ६, खल्लीड) जिसके सिर पर बाल न हों, ८)। गंजा; (हे० ३८६, १)। खलिण-पु० (दे०) (दे०) लगाम; (व० ४, खव-पुं० (दे०) २४, ७)। २. गर्दभ; (दे० ना० मा० २, ७७)। खंलियार-पु० (सं० खलीकार-१.चोट /खव-(सं० क्षपय्). १. नाश करना, पहुँचाना, २. दुव्यवहार, ३. अनिष्ट) २. डालना, प्रक्षेप करना, ३. उल्लंघन तिरस्कार, निर्भत्सना; (प० च० ३६, करना। -इ क्रि० (सं० . (सं० क्षपयति > ११६) । टि०-प्रा० में खलियार (सं० प्रा० खवेइ) (जंवू० २, १, १५)। खली-कृ) धातु भी है, जिसका अर्थ तिर -न्ति क्रि०, व०;(प०.च०. ३०, १०, स्कार करना, घूत्कारना है। ६)। खलियारिअ-वि० (सं० खलीकृत) खवओ-पु. (सं० स्कन्ध >प्रा० खंव) तिरस्कृत; (प० च० ६६, २)। खवा, कन्धा; (दे० ना० मा० . २, खली-स्त्री० (स० खली) तेल की तल- छट, तिल-पिण्डिका; तुल० पं० खल्ल; खवडिअ-वि० (दे०) स्खलित; (दे०- (दे० ना० मा० २, ६६) । ना० मा० २, ७१)। खलु-वि० (सं० प्रा० खल) दुर्जन खवरण-न० (सं० क्षपण>प्रा० . खवरण (भ०; हे० ३३७, १, महा० ६६, ३, >खवण) क्षय, नाश; (जस० ३, ४)। १८, ५) खल्लन० (दे०) १. उपानह, जूता; खवणय -पु. (सं० क्षपणक>प्रा० (संधि० १२, ४, ८) । २. वाड़ का छिद्र, खवणय) जैन भिक्ष क; (सि० १, ६) । ३. विलास; (दे० ना० मा० २, ७७) । खदय-पु० (दे०) स्कंध, कंधा; (दे०- ४. खाली, रिक्त; (दे० ना० मा०१, ना० मा० २, ६७; भ०)। ६७)। .
खेवलं (२६९) खाण उत्पन्न - खवल-पुं० (दे०) क्षोभ, खलबलाना; पड़ना । -हु स्खलित हो; (वैराग्य- (म० १, ३०, ४)। सार)। खवलिअ-वि० (दे०) कुपित, क्रुद्ध; खांटि-वि० सुदर; (हिं० का०, च० (दे० ना० मा० २, ६७)। ३८)। सवालिउ-क्रि० (सं० क्षोभय>प्रा० Vखा-(सं० खादति, प्रा० खासइ) खोभ) क्षोभित करना, क्षोभ भोजन करना, भक्षण करना; (उ० व्य० करना; "जइ वि खवालिउ, तइ वि ण प्र० ११, १६)। -इव० खाना; (प० चालिउ" यद्यपि उसने क्षोभ उत्पन्न च० १६, ३, २)।-उ, भू० का० करने का प्रयत्न किया, तो भी वह चला (ण० ७, ६, ६)। -ए (प्रा० .० २, यमान नहीं हुआ, (सुदं० ८, २८, १८३)। -हि (प्रा० पै० २, १२०)। १३)। खज्जत, खज्जमाण-व० कृ०, (प० च० खविअ-वि० (सं० क्षपित) १. विना २२,४३; १७, ८१; ८२, ४०)। शित; (जस० २, ८, ५)। २. पीड़ित; खा-कृ० (सं० खादितुम्) भोक्तुम्, (जस०.१, १२, १३)। खाने के लिए; (जंवू० १०, २६, ५)। खविउ-क्रि० (सं० क्षपित>प्रा० खाहु-क्रि० आ० खाओ; तुल० मगही सविस) खपाया जाना, "भणु किं ण पाउ खाहु; (सरह, दोहाकोश)। धम्में खविउ" कहिए, ऐसा कौन सा पाप खान-वि० (सं० खादित) भुक्त, है, जो धर्म के द्वारा न खपाया जा सके; भक्षित; (भ०)। (ण० ६, ५, ६)। खाइआ-स्त्री० (सं० खातिका>पा० खवियारि-पु वानरयोद्धा; (प० च० 'खाअ>प्रा० खाइआ) खाई, परिखा; ५६, १२-१४) । (दे० ना० मा०, २, ७३) । तुल० गु० खव्व-पु० (दे०) १. खाई । खाइय; (व० १, ४, ५; प० च० २. गधा; (दे० ना मा० २, ७७)। २३, ६, ६) । खातिका; (दे० ना०मा० खग्वुल-न० (दे०) मुख, मुंह; (दे०. २, ७३)। ना० मा० २, ६८)। खाट-स्त्री० (सं० खट्वा>प्रा० खस-पु. (सं० प्रा० खंस) १. खस खट्टा) खाट, चारपाई; (उ० व्य० प्र० देश में रहने वाला मनुष्य; (भ०) । मनुष्य; (भ०)। ४६, २७; शवरपा, चर्या० २८) । २. वर्तमान गढ़वाल और उनके उत्तर- खाडइअ-वि० (दे०) प्रतिविम्बित, वर्ती प्रांत का प्राचीन नाम; (प० च० प्रतिफलित; (दे० ना० मा० २, ७३) । ६८, ६६) । ३. खश; खुजली (व्याधि); खाण-न० (सं० खादन >प्रा० खाण) (जदू० ६, १६, ७)।-! पुं० जन भोजन, भक्षण; (प० च० २, ८, ४) । पद-विशेष; (प० च०६८, ६६) । २. पुं०-(तुर्की खान) पठानों की उपाधि, (दे०) खिसकेना, गिर खान, खां साहब; ३. पुं० (सं० स्थाणु बांया हाथ, - - Pr ' खस---अक.
खाण (२७०) खिखिणी मा० >प्रा० खारगुं) "तसु अछए मन्ति आनन्द खामोपरिय-स्त्री० (सं० क्षामोदरी) खाणु,” अर्थात् उस माता . के पास दुर्वल पतली कटिवाली; (सं० रा०) । आन देश्वर नाम का मंत्री है; (की० ३, खाय-वि० (सं० · खादित > प्रा० १२६) । टि-नाम के अंत में 'खाण' खाइअ) खाया हुआ; (भ०) । शब्द का अर्थ शिववाची ईश्वर शब्द से खारंफ़िडी-स्त्री० (दे०) गोधा, गोह, है। -पाण पु० खान-पान; (सि० १, जंतु-विशेप; (दे० ना. २, ३७)। ७३)। खाण-पु० (सं० खानि >प्राखाणि) खार-पु० (सं० क्षारक >प्रा०. खार) खान, खदान; (सि० १, ४४) । खाणि खार, रेह; तुल० पं० खार, (सं० रा०)। । स्त्री० (सं० खानि) खान; (दे० ना० -दूसण पुं० खरदूषण का मंत्री; (प० मा० २, ६६)। च० ४५-१५)। -समुद पुं० (सं० । खाणाविउ-क्रि० भू० का० खनायित क्षार समुद्र) खारा सागर (जंवू० ६, १, खनवाया, "खाणाविउ करकंडे खणेण, १३)। करकण्ड (राजा) ने क्षणमात्र में उस खारय-न० (दे०) मुकुल, कली; (दे०. वामी को खुदवाया; (क० ना० मा० २, ७३)। ५)। खारिय-वि० १. चिढ़े हुए; (प० च० खाणि-स्त्री० (सं० खानि>प्रा० ६, १, ६) । २. (सं० क्षारित) खारे खाणि)। खान, निधान; (जंवू० १०, पानी में से टपकाया हुआ; (भ०)। १८, ८)। खाणी; (ण० २, ३, १३) । खाणेक्कु-पु० (सं० क्षणक) एक क्षण; खाविय-वि० (सं० खादित) भक्षित; "मुडखंडखावियचामुडइँ," -मुण्डों के (व० १, १६, ३)। खाति-स्त्री० (सं० ख्यातिम्) प्रसिद्धि; टुकड़े-टुकड़े होने लगे, और उन्हें चामु- ण्डा खाने लगी; (ण० ७, (उ० व्य० प्र० १०-१७) । खानी.-स्त्री० (सं० खानि>प्रा० --उ, भू० का० भक्षण किया (प० च. ६, ११, २)। खाणि) खदान, खान, आकर; (सि० २, ११)। खासण-वि० (सं० : का सिन् >प्रा० खाम-वि० (सं० क्षाम>पा० खाम) खासि) खांसी का रोग वाला; (सुदं० ८, १. क्षीण, २. दुर्वल, ३. पतला; (दे०- ..५, ३)। पु० (सं० कास>प्रा० खास) खांसना; (सुदं० ६, १६, ६) । ना० मा०.६,४६; जस० १,२५, खिखिरणी-स्त्री० १. (दे०) . शृगाली; खामियम-वि० (सं० क्षमित+क) । (दे० ना० मा० २, ७४) । २. (सं० जिसके पास क्षमा मांगी गई हो वह; किङ्किणी) वाद्य-विशेष; (प० च० १७, (जंवू०.२, ८, ५)। ११४)। . . .. . ३ खिविखंड (२७१) खिल्ल अथवा , . , - खिपिखंड-पु० (दे०) गिरगिट; (दे०. (सं० क्षेत्र) कृषि-भूमि, खेत, (संधि० २, ना० मा० २, ७४)। ७, १; जंवू० १०, २०, ८)। -क्रम खिखिरी-स्त्री० (दे०) डोम आदि के पु० . क्षेत्रक्रम (जंबू० ११, ११, स्पर्श के परिहार रोकने की १०)। लकड़ी; (दे० ना० मा० २, ७३)। खित्तय-न० (दे०) १. अनर्थ, नुकसान, खिच्च-पु० न० (दे०) कृसरा, खिचड़ी, २. वि. दीप्त, प्रज्वलित; (दे० ना०. एक में दाल मिलाया या मिलाकर पकाया मा० २, ७६)। हुआ चावल; (दे० ना० मा० १, खित्तम्भउ-पु० (सं० क्षेत्रोद्भव) १३४) । "खित्त ब्भव ताणउँ माणसिउ अवरुवि १/खिज्ज- (सं० खिद् >प्रा० खिज्ज) असुराईरिउ अन्नोन्नाइउ इय पंचविहु दुहु १. खेद करना, अफसोस करना, २. उद्वि, नारइयहँईरिउ," अर्थात्-क्षेत्रोद्भव दुःख, ग्न होना, थक जाना । (सं० रा०) मानसिक दु:ख और असुरों द्वारा प्रेरित तुल० गु० खीजवु; (प्रा० गु० ६, १२, दुःख परस्परकृत दुःख तथा नारकियों सं० रा०) । खिज्झइ-क्रि०, व० (सं० द्वारा प्रेरित दु.ख इस प्रकार नारकियों के खिद्यते) खीझना, (रि० १, ७) । पाँच प्रकार के दुःख कहे गए हैं; (व० खिज्जइ-क्रि० (सं० क्षयति, क्षि क्षये) १०, २७, २६)। १. क्षीण होना "दिणि दिणि रयणीमाणु खिन्न-वि० (सं० खिन्न >प्रा० खिण्ण) जहं खिज्जइ, --दिन प्रतिदिन जैसे खिन्न, श्रांत; (जंवू० ५, ६, ११) । रात्री का परिमाण घटता जाता है, (जंबू० खिन्नि-वि० (सं० खिन्न >प्रा० खिण्ण) ३, १२, सुदं० ५, २, १)। '२. (सं० अवसाद प्राप्त, खिन्न, कष्टग्रस्त, खि>प्रा० खिज्ज) खेद करना; तुल० उदास, दुःखी, पीड़ित (सं० रा०)। म० खिजणे; (ग० ५, १,११)। /खिर- अक० (सं०/ क्ष) खिज्जिम-न० (दे०) उपाल भ; (दे०. १. गिरना, गिर पड़ना, २. टपकना; ना० मा० २, ७४)। -~~-इ व० (जंबू० १, १३, ७) । खिरंत- खिड्ड-न० (सं० खेल) -क्रीड़ा; व० कृ० (प० च० १०, ३२) । (भ०) । खिलिहिलन्त-कृ० हिनहिनाते हुए (प० खिरिण--स्त्री० . फल-विशेष, च०४०, १६, ५)। खिरनी; (क० ६, २१, ५)। खिल्ल-अक० (सं० खेल्) खेलना, गु० खितिघर-पु वानरयोद्धा; (प० च० खेल; (प्रा० गु० ६, १८)। खिल्लतय ५७, ११)। कृ० ग्रीड़ा करते हुए; (सं० रा०)। सित्त-वि० १. (सं० क्षिप्त >प्रा० खित्त) १. फेंका हुआ, २. प्रेरित (सं० खिल्ल-स्त्री०. (सं० कील) खूटी; रा० जस० २, २६, १३) । २. पुं० (सुदं० ६, १८, ६)। खिल्लिअ-वि० , खिन्नी, खिव (२७२) खुटण नाश कर (सं० कीलित) बंधा हुआ, बद्ध; (सुदं० क्षीर-सागर; (जंदू०.८, १५, ६)। E, १८, ६)। -~-समुह पु० (सं० क्षीर+समुद्र) क्षीर /खिव-(सं० क्षिप् >प्रा० खिव) सागर; (प० च० ३, १०७)। १. फेंकना, २. डालना, ३. प्रेरना। खीरोदहि-पु० (सं० क्षीर+उदधि) -इ व० (सं० क्षिपति >प्रा० खिवइ, क्षीरसागर; (प० च० २, २५) । खिवेइ) (म०)। खीरोयसायर-पुं० (सं० क्षीरोदक+ खिसिय -क्रि०, भू० का० (दे० प्रा० सागर) क्षीरसागर; (प० च० ३, खिस)खिस पड़ा, गिर पड़ा; (सं० रा०)। ६३)। खीण-वि० (सं० क्षीण >प्रा० खीण) खोरोवरु-पु. श्रीरवर नामक द्वीप, क्षय प्राप्त, “घणु खीणु वि विहलिय पोष- (व० १०, ६, ६) । णेण" -धन यदि निर्धनों के पालन खीलय-० (सं० कीलक:) १. कील, पोपण में व्यय हो; (ण० ८, १३, ८; काँटा, मेख, २. खंबा, स्तंभ; "खीलय- म० १, २३, २) । -कसाय पुं० (सं० कारणि देवउलु णउ जुत्तउ णासेवि"; एक क्षीणकपाय) गुण-स्थान; (व० १०, ३६, खीले के लिए देवालय का ६)। डालना उचित नहीं, . (सुदं० ८, ६, खीना-वि० (सं० खिन्ना) उदास, अव १६)। साद-प्राप्त; (प्रा० गु० २३, ६)। खीलिय-वि० (सं० कीलित) pinned खोनि-वि० (सं० क्षीण >प्रा० खीण) down स्थिर कोल से गड़ा हुआ; (प.. १. क्षय-प्राप्त, २. दुर्बल, कृश; (को० २, च० २५, १७, ८)। १४६)। खीव-पि० (सं० क्षीव) मदोन्मत्त, मत- खीरंतुहि-पु० (सं० क्षीराम्बुधि) क्षीर- वाला; (दे० ना० मा० ८, ६६)। सागर; (व० ६, १४, ७) । खोसण-पु० (दे०) खींसना, भूरना; खीर-न० (सं० क्षीर>प्रा० खीर) (सुदं० ८, २४, १०)। दूध; (सि० १, १५, प० च० २, ५८)। -स्त्री० (दे०) रथ्या, मुहल्ला; पुं० (छंदशास्त्र में) स्कंध छंद का भेद; (दे० ना० मा० २, ७६) (प्रा० ५० १, ७५)। खीरकयंत्र नामक ब्राह्यण; खुखुणय-पु. (दे०) नाक का छिद्र; (दे० ना० मा० २, ७६)। (प० च० ११, ६)। . कूवारि पु क्षीर-सागर; (व० ६, २०, ८) 1 ~णीर खुट-पु० (दे०) खूटा, "णारीखुटई पुं० (सं० क्षीर-नीर) दूध और जल; पसु पुरिसु;" (जस० ४, १०, १२) । (व०.२, १५, ५)! खुटण-पुं० (सं० नोटण) काटना, किंपुरिस की स्त्री; (प० च० १३, २६)। खण्डित करना "णिरहु वि अयसिर खुंट -~-महण्णव पुं० (सं० क्षीर+महार्णव) पडियउ" -निरीह (निस्पृह) होवर अज खुखणी ~कयंव पुं० वसु राजा के O U ८ खु (२७३) खुड -इ कि० का०; (ब्रह्मा) का सिर काटने में प्रवृत्त हो Vखुट्ट-सक० (सं० न द) तोड़ना, सकता है; (ण० ६, ७, ५) । खण्डित करना । -इ; (जंबू० ३, ८, खुंटु-० (दे०) खूट, ठुठ (वह पेड़ ६) । खुट्टत-कृ०ट+शत (जंबू० जिसकी डालें, पत्तियां आदि न रह गई ११, १५, ५)। हों) "खुटु वि तहाँ कम्मे हुउ पलासु," खुड-वि० विनाशक; (प० च० ४४, उसके कम से वह ठूठ भी मांस-भक्षी १३, ६)। राक्षस बन गया, (सुदं० २,१४, Vखुड--(सं०/क्षुट्) खण्डित होना, ५)। चोट पहुंचाना । खुडि-भू० कृ० खुडय-वि० (दै०) स्खलित; (दे०- (सं० खुटित > खुड + अ) खण्डित ना० मा० २,७१)। होना; (प्रा० १० १, ११)। /खुड खुद-पु० (दे०) खुदा, वाद्य-विशेष; (सं०/तुड्>खण्डित करना; (जस० २, (जं० ५, ६, १२) । १०, ११, प्रा० खुट्ट, खुड) ताड़ना, Vखुद--(सं०/क्षुद्) खोदना, खुदि; ०व० (सं० वट्यति >प्रा. (प्रा० ५० १, २०४)। खुडइ) (भ०)। खुडिउ-भू० खुपा-स्त्री० (दे०) वृष्टि को रोकने के खण्डित कर दिया, काट डाला "खुडिउ लिए बनाया जाने वाला एक तृणमय सुकंठहों सीसु" --उसने सुकण्ठ के सिर उपकरण; (दे० ना० मा० २, ७५) । को काट डाला; (ण० ७, १४, १३)। खुज्ज-वि० कुन्ज, कूबड़ा, वामन २. टूट गया, 'कालेण खुडिउ अइपक्कु "जई खुले ससिहरु तोडिज्जइ," यदि पडिउ" -जो यथाकाल अपरिपक्व होकर कुब्ज मनुष्य चंद्रमा को तोड़ सकता हो; टूट गया; (सुदं०.५, ७, १५) । तुल० (म० १, १४, ६)।-य वि० (सं० म० खुडणे खुडन्त-व० कृ० (प० च. कुज+क) कूबड़ा; (प० च० २६, ४ ४१, ७, ६) । खुडिउ -क्रि० ० भू० का० ८; जस०.२, ६,६)। (सं० खण्डित १. काट लिया लोड़ लिया, खुज्जिया-वि० (सं० कुजिक) दासी; खोंट लिया, "णं खुडिउ सरोवरसिरु (जस० २, ३४, ७)। खणेण," -मानो एक क्षण में ही सरोवर खुज्जुल्लिय-वि० [सं० · कुब्ज+उल्ल का सिर काट लिया गया हो, (क० १०, +क (स्वार्थ)] कूबड़ा; (जस० ३, २, २, ८) । २. फोड़ दिया, 'इय भाणि २०)। तहो सिरु चक्के खुडिउ उच्छलंत-सोणिय खुट्ट -वि० (सं० त्रुटित). ). टूटा हुआ। जलु," -इस प्रकार कह कर उस (ह्य- खुट्टी =वालकों की एक क्रिया जिससे ग्रीव) के सिर को चक्र से फोड़ दिया, वे परस्पर संवन्ध विच्छेद करते हैं, जिससे शोणित (रक्त) रूपी जल उछल कुट्टी। (दे० ना० मा० २, ७४) । तुल. पड़ा, (व० ५, २३, २१) । खुडियउ- म० खुटलें। क्रि० (सं० तुड>प्रो० खुट्ट) तोड़ा; - - खुडक्क (२७४) खुम्भ क्षण्ण; (प० च० १३, १०, १०) । खुडें वि- १४, ७, ६). । २. आसक्त, पू० का० क्रि० (सं० तुड्>प्रा० खुट्ट) सुदं० ८, ६, ६)। काट कर, खण्डित कर; (प० च० १७, खुत्तउ-वि० (दे०) निमग्न, डूबा हुआ; "धरइ मोहु संसारि खुत्तउं;" तुल० गु० ७, २)। खुडक्क-अक० (दे०) १. शल्य की तरह वुत्यो, (प्रा० गु० ६, १७) । चुभना, २. नीचे उतरना, ३. स्खलित खुद-वि० (सं० क्ष द्र) . तुच्छ, नीच, होना; ४. क्रोध से मौन रहना । खुडु अधम; (ण० ४, ६, १२) - वि० क्किउ-क्रि० भू० का०, खटकी; "खर: (सं० क्ष द्र+क) १. क्ष द्र जन २. (सं. खरीहिं णिरु णिठुरु मुक्किड, काणणहरि- क्ष द्राः) वेश्याजन; (जंबू० ६, १२, णहँ कण्ण खुडुक्किउ" गधा-गधी की १६)। -जंतु पु० (सं० क्ष द्रजंतु) लयु निष्ठुरं रेंक वन के हरिणों के कानो में जंतु; (जंवू० ६, १०, १२) । खटकी; (ण० ७, २०, १०) । खुदु-वि० (सं० क्षुद्र) तुच्छ, . नीच, खुडिय-वि० (सं० खण्डित>प्रा० दुष्ट, अधम; (जंबू० ३, ११, ६) । खुडिअ) व टित, खण्डित, विच्छिन्न; (प० खुप्पइ-क्रि० (प्रा० खुप्प) खपना, निमग्र च० १७, १२, ५)। होना, "चंचलु. खुप्पइ. कुच्छियरंगई" खुड्डं-वि० (सं० क्षुद्र) लघु (दे० ना०. चंचल मन खोटी रंगरेलियों में खपता मा० २, ७४) । (ग० ७, ६, ८)। खुप्पन्त-वृ०० खुड्डय-वि० (सं० क्ष ल्लक) लघु, (प० च० २३, ६, ७)। -उ व० कृ. छोटा; (जस०४, १७, २४) । निमग्न, डूवा. हुआ; गलिय-धुसिण कद्दमें खुणुक्खुडिआ-स्त्री० (दे०) नाक, (दे०) नाक, खुप्पन्तउ". अर्थात् गलित केशर की नासिका; (दे० ना० मा० २, ७६) । कीचड़ में निमग्न; (प० च० २०,१०, खुणखुर्णति-क्रि० खुनखुनाने की ध्वनि ५) । खुप्पन्ति--कि० ब०, गड़ गए, रह होना; (ण ८, ३, ८)। खुप्पन्ति," अर्थात् 'रथ · गड़ गए.' (प० खुण्ट-(सं०/तुड्) तोड़ना, खुण्टेवि- च० १७, २, ६) । पू० का० क्रि०; (प० च० ४०,६, खुप्पाविय-वि० मज्जित, निमग्न; ११)। "रुहिर-कुसुभएँ सव्व वि. राइय; रस- खुग्ण-वि० १. (सं० क्ष ण्णं > प्रा० वस-नसकद्दमे खुप्पाविय," उनके पैर खुण्ण) भग्न, (सुदं० ७, १७, १०)। काट लिये जाने से (बाहर निकली हुई) २. क्षण्ण:, मर्दित; (जंवू० ४, २१, ८)। आँतों के गुल्फ बन गए एवं विद्याधर ३. परिवेष्टित; (दे० ना० मा० २, सैनिक वसा एवं नसों के कम में निम- ग्न कर दिए गए; (जंबू० ६, १४, खुत्त-वि० (दे०, प्रा० खुत्त) निमग्न, १२) । डूबा हुआ; तुल० गु० खुतवू; (प० च. Vखुम्भ-(सं० क्षुभ्>प्रा० खुभ) उरना, -- गुम्म (२७५) सेआलु वि० (सं० सुपर-मि० दूर करती पड़ाना । -ए (सं० शुन्यते) दुप्ट, छोटा; तुल० ० राज० खोळ्ळो, (प्रा० पं० १, ७)। पुग्न-वि० (सं० शुब्ध) अशांत, भीत; युल्सिरी-स्त्री० (दे०) संकेत; (दे०. (ज० ३.१४. ६)। -य ना० मा० २, ७०)। शुरूप) (बुडितायें) (जस० ४, है; (सं० १६, १)। रा०)। पुहिमप-वि० (सं० भन्य) क्षोभ-युफ्त; गुवय-पुं० (दे०) तृण-विशेप; (दे०- (प० ४, २४, १)। ना० मा० २, ७५) पुर- (मं० प्रा० पुर) पोड़े के सुह-अक० (सं० शुम्) क्षुब्ध होना, गुर; (प्रा० ५० १, २०४)। पबड़ाना; मुहिन; (प्रा० ५० १, १५१) । गुरप्प-पु. (म० भुरप्र>प्रा० गुरप्प) मुहिउ~मि.० भू० फा० (सं० हुम् > १. गुरपा, घास काटने का लोहे का प्रा० सुभ, खुभइ) क्षुभित हुआ, क्षुब्ध खोटार, (महा० ११.१-६) । २. शस्त्र हो गया; (प०१० १५, ४, ६; जंबू० चिमेष, "तिकाप्पि गणि दोहापित," ४,१०, ८)। उन्होंने अपने तीन ग्रङ्ग से क्षरणमाव में गुहिय-यि (सं० शुभित) क्षोभ-प्राप्त; दो टुकड़े कर दिया; सुल० म० गुर; (१०४, ६, १२)। (जस० ३, ७, ११) । भ-fr.० (सं० सुम्) क्षोभ सरसाप-पु० (सं० गुरगान) देश का शुभित होना । -६ व० (रा० ३२) । नाम; (प्रा० ५० १, १५१) । सूट-कि० (दे० सुट्ट) खूटना, कम सरहनुष्टी-स्त्री. (दे०) -श्री० (द०) प्रणय-कोप; पढ़ना । -3; (रा० ३४) । (पद)। सूचो. भू० का० क्षुब्ध हुई, जहि गुराग-देगो गुरण; (५० ०१७, आवंति रति आपण हिअइ यति सुठु सूघो-जिसके आते ही अपने हृदय में गुसुह-० (दे०) पर की गांठ; (दे०- रति अत्यंत गा, मा० २.७५)। १४)। गुल्ल-वि० (सं० शुल्ल+पा) घोटा खेम-पु० १. (सं० द>प्रा० सेअ) ल; (जम०) - वि० (सं० शुल्लक) मेर, उद्वेग, शोक (सं० रा०; जंबू० १०, क्षुद्र; (मि० १, २)। ~त पु० (सं० १६, ८) । २. पु० वानरयोद्धा; (प० शुल्लकल) मपृता; (जस० ४, २८, च० ५७, १५)। २०)। सेअरिंद-पु० (सं० सेचरेन्द्र) खेचरों गुल्ल-न० (दे०) कुटी, गुटीर; - (दे०. का राजा; (प० च० ६, ५२) । ना० मा० २, ७४)। रोनालु-वि० (दे०) १. मंद, आलसी; सुस्लणा -वि० (मं० क्षुल्लक) क्षुद्र, २. असहिष्णु, ईष्र्यालु; (दे० ना० मा०- पाना, - क्षब्ध हुई, (रा० ४४, खेउ (२७.६) खेमंधरं - ! २, ७७)। वरुणकुमारों के साथ उसी प्रकार क्रीड़ा खेउ-पु.० १. (सं० खेद >मा० खेव) करने लगा जैसे बैल जलधाराओं से, उद्वेग, खेद, क्लेश, खिन्नता; (प० च. (व० च० २०, ७, ६) १०,,१०, ७; रि० २, , ६) । २. पुं० खेतं-पु० न० (सं० क्षेत्र >प्रा० खेत्त) [काल) क्षेपः] काल का व्यतीत होना; कृषि-भूमि, क्षेत्र; "खेतं हंसिएं "खेतं हंसिएं व्रीहिं (प० च० ३१, १६, ७) । ३. क्षेम तुल० लविति कमार" -क्षेत्र दान ण व्रीहलो प्राचीन म० खेक; (भ०)। लूयन्ते कर्मकरेण इत्यंन कर्मकरः; तुल० खेए-पुं० (सं० खेद>प्रा० खेअ) शोक; पं० खेत; (उ० व्य० प्र०.१३-२२) । (व० २, २, ३)। खेतल-पु. (सं० क्षेत्रपाल) क्षेत्ररक्षक, खेड-न० (सं० खेटक >प्रा० खेडय) खेत का रखवाला; (प्रा०, गु० १२, १. खेड़ा, गाँव; (सि० १, ३)। २. न० ५८)। (सं० खेल) खेल, कीड़ा; (जंवू० ४, खेद्ध-पुं० न० (सं० क्षेत्र >प्रा० खेत्त) १.९, १६)।--य न० क्रीड़ा, खेल; (हे० खेत, कृषि-भूमि; 'सि० २, १८, ण० १, ४२२, ६)।-य न० (सं० खेटक > १३, ६)। -कम पु० (सं० क्षेत्रक्रम) प्रा० खेडय) छोटा गांव; तुल० म० खेड; क्षेत्रसंख्या; (जंबू० ११, ११, १०) । (ण० ३, १५, ११) । न० (सं० खेट+ -वाल पुं० क्षेत्रपाल; (जस० ३, ३६, क=मूसल) आयुध-विशेष; (प० च० ६)। ७१, २१)। खेत्ती-स्त्री० (सं० क्षेत्रिय >खेत्तिय) खेडामगाम-पुं० (सं० कृषि, खेती, खेत में अनाज 'वोने का खेड़ें-गांव; (ण० १, ६, ३)। कार्य; (सा०.५५)। खेडिअ-वि० (दे०) हल-से विदारित; खेदि-~-पू० का० क्रि० पीछा करके; "एहु (दे० ना० मा० १, १३६)।. . पाए दरमलिअ ओहु सच्चान खेदि खा, खेड-न० (सं० खेल >प्रा० खेड्ड, वे (खरगोश और चूहे सैनिकों के) पैरों खेड्डय) क्रीड़ा, खेल; (प० च०.६, ७, से कुचले जा रहे थे और आकाश के १) । खेड्ड-न० खेल, कीड़ा; (सुद० पक्षियों को वाज झपट कर खा रहे थे; ८, १८, ६)। (को० ४,१३१)। खेड्ड, खेड्डयन० (सं० खेल) खेल, खेमंकर-पु० १. तृतीय कुलकर; (प० क्रीड़ा; (भ०; प० च० ३१, १६, ७) । च० ३, ५२) । २., मुनि-विशेष-नाम; खेड्ड-अक० (सं० खेल >प्रा० खेड्ड, (प० च० २१,८०) । ३. राजा-विशेष- खेड्डय) कीड़ा. करना । (भ०). । खेडिय नाम; देशभूषण व कुलभूषण के पिता; -भू० का० क्रीड़ा करने लगा, ''खेडिय (प० च० ३६, ८६) । अणडुह व्व जलधारहिं, ताम दसाणणु खेमंघर-पु० चतुर्थ कुलकर; (प० च० वरुण-कुमार हिं" अर्थात् तब तक दशानन . ३, ५२) । खेट+ग्राम) " । .
सेम (२७७) खेल्ल का० सेम-न० (सं० क्षेम>प्रा० सेम) सेरि-स्त्री० (दे०) १. कलुषता, उद्वेग; १. कुशल, कल्याण; (भ०)। २. प्राप्त (प० च० १३, १०, १०)। २. द्वेष, वस्तु की देखभाल (लब्धस्य रक्षणम्); (ण० ८, १५, १३) । ३. क्षोभ, चिंता, (जस० ३, ३६, ३) । ३. द्वीप-विशेष; बेचनी; (प० च० ४०, (१० च० ६. ३३)। सेमु; (व० ३, ४, ४. वैर, (जस० ४, १, ५) । १३) । १. दाशरथी राम को प्रजा का 1/खेल-अक० (सं० खेल्>प्रा० खेल) अगुआ; (प० च० ६३, १७) । खेलना; (उ० व्य० प्र० ५२-१७)। समजलि-स्त्री० (सं० क्षेमाञ्जलि) सेल्लइ; (की० २, ६३)। खेलंत--३० नगर-विशेप; (प० च० ३१, ४, १)। कृ० (प्रा. पं० १, १५७) । खेलन्त सेमा-त्री० (सं० क्षेमा) क्षेमपुरी नामक -व. कृ० तेलते हुए; (प० च० ६, नगरी-विशेष; (प० च० २०, १०) । ४, १)। खेलन्ते-क्रि० भु० रोमापुरी-स्त्री० (सं. क्षेमापुरी) "सिकार खेलन्ते, तीर मेलन्ते," वे नगरी-विशेष; (व० ८, १,३)। शिकार करते और तीर फेंकते चल रहे खेयर--पु० (सं० खेचर>प्रा० खेअर, थे; (को० ४, १३६) । खयर) विद्याधर, विद्यावल से आकाश में सेलरुइ-पु० स्त्री० (दे०) खिलाड़ी; चलने वाला मनुष्य; (सि० २, २)। (व० ५, १३, ४)। -त पुं० (सं० सेपरत्व) आकाश- खेला-पु. १. खेला नामक पुरुष, गमन की सामध; (जस० १, ७, ४)। पुरुष-नाम-विशेष; (जस० ४, ३०, १) । नरिंद पु. वानरवंशीय राजा; (प० २. स्त्री० (सं० खेलन+क) खेल, क्रीड़ा च० ६, ८४)। तुल० गु० खेल; "सालिभद्द-मुरिण-रासो सयरा-पु० विद्याधर "कीलमाण निरु जे खेला दिती, तेसिं सासरण-देवो जणयउ पायरा णरा, पउ सरंति णिय-णिउल सिव-संती," (प्रा० गु० १४, ४२)। सेयरा," -जहां नागरजन बहुत क्रीडाएँ खेलत्तणे खेल के लिए, हंसी के बहाने; किया करते हैं तथा विद्याधर अपने घर (को० १, १८)। (वापस लौटकर) नहीं जाना चाहते; सेलाखेली-स्त्री० पुनः पुनः (व० १, ८, ११)। टि०-अपभ्रंश में "ताह होउ सवि-वार, खेलाखेलि खेम- यद्यपि दोघं स्वरांत शब्द स्वी लिंग में कुशल;" (प्रा० गु० १२, ५७) । प्रयुक्त होते हैं, परन्तु लोक-व्यवहार में /खेलाव-(सं० खेलयति खिलाना; 'संयरा' शब्द 'सेयर' के अर्थ में ही प्रयु- "पुतली पे (खे) लाव" -पुत्रिकाभिः क्त है । अपभ्रंश में आकारान्त शब्द पु० खेलयति; (उ० व्य० प्र० ५२-१७) । भी हैं, यथा -अम्भा (बादल)। /खेलिअ-(सं० खेल्यते) खेलना; (उ० सेर-पुं० (दे०) द्वेष, नाश; (व० ३, व्य० प्र० २०-५) । २४, ११)। /सेल्ल-(स० खेल् >प्रा० खेल) क्रीड़ा खेलना, - खेल्लंण (२७८) खोमण । करना; (जस० २, ३२, ६)1-5; व० खोडी-स्त्री० (दे०) गर्दभी; "दिष्णव- खेलना; (की० २, ६३) । खेल्लन्ति (हे. ल्लिगल-खोडीसंगम संचारिय मंदुरहिं ३८२) । बेल्लिवि-पू० का० कि०, तुरंगम," अर्थात् गले में वेलें डालकर सेलकर; (ण० ३,.१२, १०) । बांबी हुई गवियों के संगम के लिए धड़- खेल्लण-न० (सं० खेलन+क>प्रा० सालों में घोड़ों का संचार कराया गया; खेलण) खिलोना; (संवि० ३, ६, २)। (जंबू० ५, १०, २२) । खिलोना (जंवू० १, ३, खोरिण-स्त्री० (सं० क्षोणि>प्रा० खोणि) पृथ्वी; (को० ४, ३७; सुदं० ७, खेल्लिन-प्र० (दे०) हंसी, व्हा; (दे० ६, २; प० च०६, १०)। खोणी; ना० मा० २, ७६)। (जंबू० १, १५, ३; भ०, जस० १, १८, खेव-पुं० (सं० क्षिप्र) शीघ्र; "जाणा- ६)। वहि पइसारहि खेवें," खबर दो और खोणिरय-स्त्री० (सं० क्षोणीरज >प्रा० शीघ्रता से हमारा प्रवेश कराओ; (म० खोणिरय) पृथ्वी की धूल; (व० ५, ७, १, २३, ६)! २. वेद; (क० २, १४, १२)। २) । तोरिपयल-पुं० (सं० क्षोणीतल > खेवइ-क्रि० (सं० लेपयति) फेंकना; प्रा० खोरिणयल) पृथ्वीतल; (जस० ४, (भ०) । ३, ११) । खेविय-वि० (सं० खेदित) खिन्न किया खोणीरह-पुं० (सं० क्षोणोल्ह) वृन; हुआ; (भ०)। (जंबू० ४, १६, ३)। खेह-० न० (६०) रज, चूस; (प्रा० खोदालम्ब, खोदालम्म पु० (फ़ा० पं० २, ११:१; प्रा० गु० १२, १८) । खुदा+म० बालम) संसार के अधिपति;.. खोट्टिया-स्त्री० (सं० खोटि:-चालाक (की० ३, ११)। और चतुर स्त्री) दासी; (जंवू० ४, २१, १२)1 खोन-० (सं० क्षोभ) इस नाम का खोट्टी-स्त्री० (दे०) दासी, च० ५६, रावण का एक योद्धा; (प० रानी; (दे० ना० मा० २, ७७)। ३२)। खोड-वि० (दे०) १. धार्मिक, खोन–सक० (सं० क्षोभय्) १. विच- २. लंगड़ा; (दे० ना० मा० २, ८०)। लित करना; २- माश्चर्य उपजाना; ३. रंज पैदा करना। खोभंत-व०. कृ० - वि० (दे०) लँगड़ा; तुल० राज० खोड्यो (प्रा० ५० १, ११६) । (प० च० ३, ६९)। खोडि-स्त्री० (दे०) क्षति; "एह ज खोमण-न० (सं० क्षोभण) क्षोभ उप- सम्हह खोडि जं घर-सूरत्तणु वहइ;" तुल० जाना, विचलित करना; (प० च० २, गु० खोड; (प्रा० गु० ३८, ५५) । ८२)। चाक- खोयण (२७६) गंज ११, खोयण-० (सं० खनन) खोदना; खोहिय-वि० (सं० क्षोभित>प्रा० (जंबु० ६, ८, १६)। खोभिय, खोहिय) विचलित किया हुआ; खोर-न० (दे०) पान-विशेष, पिटारी; (सुदं० ११, २, ६) । खोर, "पच्छएँ जं घणु लद्ध, चउन्गुणु, नियसोहग्गखोर निक्खई पुणु,” -पीछे जो चौगुना धन, मिला, उसे अपनी शृंगार-पिटारी में डाल लिया; (जंबू० ग-पुं० (सं० प्रा० ग) व्यंजन-वर्ण- ६, १३, ६) । विशेष, इसका उच्चारण-स्थान कण्ठ है । खोल-पुं० (दे०) १. छोटा गधा; (दे०- गंग-स्त्री० (सं० गङ्गा >प्रा० गंगा; ना० मा० २, ८०) । २. वस्त्र का एक गंग) गंगा नदी; (क० १, ३, ३)। देश; (दे० ना० मा०-२, ८०)। -दत्त पु० मुनि-विशेष-नाम; नवम खोलिर-वि० क्रीडनशील, खेलते हुए; वासुदेव का पूर्वजन्म-नाम; (प० च० (जस० ३, १, १७)। २०, १७२)। सोल्ल-वि० (दे०) गम्भीर; तुल० गंगा-स्त्री० (सं० गङ्गा>प्रा० गंगा) म० खोल; (जस० ३, १, १७)। नदी-विशेष; (भ०; जंबू० ६, ५.. खोसलय-वि० (दे०) लम्वे और बाहर प्रा० १० १, २२)। -वाडी स्त्री० गंग- निकले हुए; दांत वाला; (दे० ना० मा०. राजाओं की राजधानी (आंध्र प्रदेश में)। २, ७७)। -सअरु पु० (सं०. गङ्गा+सागर): खोसला--स्त्री० (दे०) दंतुल स्त्री, लम्बे प्रसिद्ध तीर्थ-विशेष, जहां गंगा समुद्र में और निकले हुए दांत वाली स्त्री मिलती है; (दो० को०)।-सरि स्त्री०. (सुदं० ४, १४, ८)। (सं० गङ गा+सरित) गंगा नदी; खोह-पु. (सं० क्षोभ>प्रा. खोम, (जस० २, ३०, ८) । —हर पु खोह) विचलता, संभ्रम; (ण० १, ६, धर राजपुत्र; (प० च०.८, १९५)। ६) । खोहु; (सुअंध० १, ६, ४; जंबू० . गंगोवहि (पुं० (सं० गङ्गा+उदधि) ६, ११, ४)। गंगासागर; (जंबू० ६, ११, १५) । Vखोह-(सं० क्षोभय >प्रा० खोभ) गंगेअ-पु. (सं० गाङ्ग य>प्रा० १. विचलित करना, २. धैर्य से च्युत् गंगेअ) भीष्मपितामह; (ण० करना, ३. आश्चर्य उपजाना, ४. दुःख ४)। पैदा करना। (सं० क्षोभ- गंछ, गंछय-पु० (दे०) वरुड, इस नाम यति) (भ०, क० १०, २६, ७)। एक म्लेच्छ जाति; (दे० ना० मा०- खोहण-वि० (सं० क्षोभणक>प्रा० २, ८४)। खोभण, खोहण) क्षुभित करने वाला; Viज-हरा देना । गंजिअ भू०.का. (को० ४, ३१)। कृ० मारा, (प्रा० ५० १, १२६)। बाहर ० विद्या- । -इसक० गंज (२८०) गंडय ग्रन्थि>प्रा० गठि+म) पं० २, गंजिआ-भू० का०, मार दिया, (प्रा० मार दिया, (प्रा० गंठि-पु स्त्री० (सं० पं० २, १२८)। गंठि) १. गांठ, जोड़ २. नांस. आदि की गंज-पु० (दे०)गाल; (दे० ना० मा० गिरह; (सं० रा०) । २. छल (जंबू० ५, २, ८१)। ६, १६)। गंजण-न० (दे०) विनाश; (सि० २, गंठिम-वि० (सं० ग्रयित) गठा हुआ, १)। गूया हुआ; गंठिा; (रा० २३) । गंजा-स्त्री० (सं० गञ्जा) सुरा या मद्य गंठिा--स्त्री० (सं० ग्रन्यि+क>प्रा० की दुकान; (दे० ना० मा० २, ८५) । गाँठ; (प्रा० गंजिल-पु० (सं० गाजिक) कलाल, ७७)। दारू वेचने वाला; (दे० ना० मा० २, गंड-पु० न० (सं० गण्ड >प्रा० गंड) ८५) । गंडस्थल, गाल, कपोल; (जस० १, ३, गंजिउ-क्रि० भू० का० (सं० गञ्जन १; सं० रा०, जंबू० ५, १३, १०)। =पराजित करना( मदित, पराजित - यल पु० (सं० गण्ड.+तल) गण्ड- हुआ; "कण गंजिउ मुवणि महिलाह" स्थल; (जंबू० ४, २२, १६)। भुवन में महिलाओं द्वारा कौन पराजित गंड-पु० आदि गुरु चतुप्कल (l); नहीं हुआ, (म० १, ७, १)। (प्रा० ५० १, २७)। गंजिल्ल-वि० (दे०) १. वियोग-प्राप्त, गंड'-पुं० वियुक्त; २. भ्रांत-चित्त, पागल; (दे०- कोतवाल, ३. छोटा हिरण; (दे०) १. वन, जंगल; ४, नाई; ना० मा० २, ८३)। (दे० ना० मा० २, ६९) गंजोल-वि० (दे०) व्याकुल; (पड्) । गंडम-न० (सं० गण्डुत्) तृण-विशेप; गनोल्लिय-वि० (दे०) १. वश में करने (दे० ना० मा० २, ७५)। वाला; "ता पणभइ वाणि गंजोल्लियमणु, गंडा-स्त्री० गंडका, छंद का नाम: णग्गड दु धुलिवूसरतणु,” अर्थात् इस (प्रा० पै० २, १९८)। परं वणिक वोला-अहो, मन को वश में गंडक-स्त्री० करने वाला रुद्र भी तो नग्न और घूलि. (सं० गण्डकी) नदी- विशेष, एक नदी जो गंगा में गिरती है घूसरित शरीर होता है, (जस० ३, ३६, ५) । २. रोमांचित; (दे० ना० मा० २, और नेपाल में हिमालय से निकलती हैं, परि तुरंगम पार भइल गंडक के पानी; १००; भ०) । ३.न० गुदगुदी, गुदगुदा- हट, हंसाने के लिए किया जाने वाला (को०४, १५६)। अंग-स्पर्श; (दे० ना मा० २, १००) । गंडपमालण-पुं० (दे०) गंठ-सक० (सं० प्रय>प्रा. गंठ) (रोग); (जंवू० ८, ७, ८) । १. गूथना, २. बनाना,३. गठना; गंडय--पुं० (सं० गण्डक >प्रा० गंडय) गेंडा, जानवर-विशेप, जलमहिप; तुल० गण्डमाला गंडयलुल्ल (२८१) गंधवंतु - या गन्ने म० गेंडा; (ण ६, २५, १०; सि० १, गंध'--स्त्री० (सं० गन्ध >प्रा० गंध) ६; जस० १, १०, ३)। वास, महक; (जस० १, २, १०; जंवू० गंडयलुल्ल-पु० न० (सं० गण्ड+तल ४, ६, १)। -लुद्ध वि० (सं० गन्ध+ +उल्ल (स्वार्थे)>प्रा० गंड+यल+ लुब्ध) गंध का लोभी; (जंवू० ६, ६, उल्ल) कपोल-तल; (ण ५, ६, २)। गंध'---पु.० १. लघुवर्ण (1) २. दैत्य गंडोरी-स्त्री० (सं० गण्डिका>प्रा० का नाम; (प्रा० १० १, १०१)। गंडिया, गंडीरी) गंडेरी, ईख गंधक-स्त्री० (सं० गन्धक) एक खनिज का छोटा टुकड़ा; (दे० ना० मा० २, पदार्थ जो वैद्यक में उपधातु माना जाता ८२)। है; (सि० २, २१)। गंडीव-न० (सं० गांडीव =अर्जुन का गंधषकरसि-स्त्री. (सं० गन्धोत्कर्ष> धनुष) धनुष (अर्थ विस्तार), मूल शब्द प्रा० गंध+उक्कोस) गंध का प्रकर्ष या अर्जुन का धनुष; (दे० ना० मा०२, अतिशय; (सं० रा.)। .८४)। गंधगए-० (सं० गन्धगंज) गधहस्ति, गंडो-पु० काव्य छंद का भेद; (प्रा० दह हाथी जिसके कुंभस्थल से मद निक- पै० १, ११३)। लता है; (व० ४, १७, ६)। गंथ-पु० (सं० ग्रन्थ>प्रा० गंथ) गंधगिरि-पु. (सं० गन्ध+गिरि) पुस्तक; (जस० ४, १७, २२) । पर्वत-विशेष-नाम; (जस० ४, गंथि, गंथि--स्त्री० (सं। ग्रन्थि+ १०)। प्रन्थि) ग्रन्थ-प्रथि, एक प्रकार का रोग गंधजुत्त-वि० (सं० गन्धयुक्त) गंध से रक्त विगड़ जाने के कारण होता है और युक्त; (जस० ४, २३, १०) । जिसमें गोल गांठों की तरह (दे०) गान्धिक जाती है, ये गांठे प्रायः पक जाती हैं। (१. गंधी, २. गंधद्रव्य, ३: गांधी नाम ग्रन्थ-गांठ, रोग-विशेष; 'काई गंथि गंथि का कीड़ा); (दे० ना० ना० मा० २, वि मरह' -तुम लोग ग्रन्थ-ग्रन्धि में क्यों ८७)। मरते हो; (प्रा० ५० १, १०७) । गुंजरपवय-पु० (सं० गुज+पर्वत) गंयुद्धरिउ-वि० (सं० ग्रन्थ+उद्धृत) पर्वत-विशेष; (प.च० ८, ८८)। ग्रन्थों में उद्धृत; (जंबू १, ५, ४) । गंधमोम-पु० (सं० गन्ध+आमोद > गंवीणी-स्त्री० (दे०) ' क्रीडा-विशेष, प्रा० गंव+आमोअ) गंध से प्राप्त हप जिसमें आंख बंद करके खेलते हैं; (दे०. या खुशी; (सं० रा०) । ना० मा० २,८३)। गंधलया-स्त्री० (दे०) नासिका, प्राण; गंदुस-पु(सं० कन्दुक >प्रा० गेंदुन) (दे० ना० मा० २, ८५)। गेंद; (पड्)। गंधवंतु-वि० (सं० गन्धवत्) गन्धवान्, २३, - सूजन हो गंवपिसाय-पु० संधवहि (२८२) गंपि १२,४) । गंधीय -पुं० "तं छंधवंतु तं स्वतु;" (जस० ४, च० ५, २४३) । गघिधिर-वि० गंध से आसक्त; (जंबू० गंधवहि-वि० गंध वहन करने वाला, ५, १०, ६)। 'सुगंधित, (सं० रा०)। गघि-स्त्री० (सं० गन्ध>प्रा० गंध गंव-न० (सं० गान्धर्व>प्रा० पुं०) गंध; तुल० म. गंध; (प्रा० गु० 'गंधव) गान-विद्या; (ण०३, १,६)। ५, १५)। पुं० (सं० गन्धर्व) १. विद्याधर राजा; गंधि-वि० (सं० गन्धिन् >प्रा० गंधि) (प० च० ५१, १२). । २. कवि-नाम; गंध-युक्त; (भ०) । -अ वि०. दुर्गध- (जस० १, २७, २३) । पु० जनपद युक्त; (दे० ना० मा० २, ८३)। विशेष; (प० च० १७, ८२)। -गीय- (मं० गान्धिक>प्रा० 'नयस स्त्री० जनपद-विशेष; (प० च० गंधिअ) गंधी, अतर फुलेल वेदने वाला, ५५, ५२)। -लच्छी स्त्री० गन्धर्व- गंध-द्रव्य-बेचने वाला; (संधि० १७, १, 'लक्ष्मी, (जस० ४, २४, ७) । -सिरी २)। स्त्री० (सं० गन्धर्वश्री).स्त्री-विशेष-नाम; गंधु-पु० (दे०) घ्राणेंद्रिय; (व०.१०, (जस० ४, २३, २०)। -सेन पुं० ८, ५)। (सं० गन्धर्वसेन) नाम-विशेष; जस० गंधुतमा-स्त्री० (सं० . गन्धोत्तमा) ४, २३, १८) । - स्त्री०. जनपद- (दे० ना० मा० २, विशेय; (प० च० ७, ५०.) । ५६)। गंधवा--स्त्री० विद्याधर राजकुमारी; गंधुद्धंत-वि० (सं० गन्ध+उद्धा + (५० च० ५, २४३)। शत) गव से प्राकृप्ट; (जंबू० ८, १२, गंधध्यागुलग्ग-वि० (सं० ४) । अनुलग्न) गंधों के समान; (जंबू० १, गंधेल्ली-स्त्री० (दे७) : १ छाया; १०, २)। २. शहद की मक्खी; (दे० ना० मा० २, गंघहरिण-पु. (सं० गन्वहरिण >प्रा. १००)! गंधहरिण) कस्तूरिकामृग, कस्तुरिया- गंधोल्ली-स्त्री० (३०) १. इच्छा, अभि- हरिण (जस० ४, २३, ११) । लापा; २. रजनी; (दे? ना० मा०:२,. गंधाणा-स्त्री० (सं... गन्धान >प्रा० २६)। गंधाण), मात्रिक छंद का नाम; (प्रा० गंधोवउ-न० (सं० गंधोवउ-न० (सं० गन्धोदक >प्रा० पै.०..१,४६४)। गंधोदग, गंधोदय) सुगधित जल; (मि० गंधारि-स्त्री० (सं० गान्धारी>प्रा० १, ८, १८)। गंधारि) स्त्री-विशेष; (ण. ८, १२, गंपि—पू० का० क्रि० (सं० गमय >प्रा० गम) जा कर; (म० ण० ३,.१२, ६)। गधारीजस्वी विद्याधर, राजवधू; (५०, गम्पि, गत्वा (प० च० २, ७, ५)। मदिरा, सुरा; गन्धर्व+ ८) गंभीर (२३) गउड भेद; (प्रा० गु० पं० २, गम्मिणु-पू० का. कि जा कर (प० विशेष, "गअवाल तिथि आतिन्ह जुड"- च० १, १५, ६)। गयापालस्तीर्थयात्रिकान् जुडति । जुड गंभीर-वि० (सं० गम्भीर>प्रा० शुन गती; (उ० व्य० प्र०५१-२८)। गंभीर) गहरा; (जस० १, १७, १८, गा-वि० (सं० गत >प्रा० गम, गय) की० २, १०४)। -तण पुं० (सं० गया हुआ, गुजरा हुआ, मरा हुआ; गम्भीरत्व) गंभीरता; (भ०)। (को० ४, १९८)। गंभीरा-स्त्री० रसिका छंद का गइंद-पुं० (सं० गजेन्द्र >प्रा० गइंद) (प्रा० ५० १, ८१)। २. नदी-विशेष; श्रेष्ठ हाथी; (ण० ३, १७, १४) । (प० च० ३२, ११, १६)। गईवर-पु० (सं० . गजवर) प्रधान गंभीमा रव-पुं० (सं० गम्भीर रव) हाथी; तुल० राज० गेमर; गम्भीर स्वर; (व० २, १२, ४) । . ११, ११)। गंमोरि-वि० (सं० : गम्भीर >प्रा० गई-स्त्री० (सं० गति>प्रा० गइ) गंभीर) गम्भीर; (व० १, २, ८) 1 १. लोकोत्तर में गमन या स्वर्ग प्राप्ति; गम-वि० (सं० गत >प्रा० गय) गया (को० ३, ४२) । २. गति; (जस० १, हुआ; (जस०)। २८,४; ण० २,१,१७; पाहु० १६६)। : ग-पु. (सं० - गज>प्रा० गय) गई स्त्री० दशा, गति; (प्रा० हाथी; (प्रा०. ०. १, १३२) । । १२०)। २. राक्षस-योद्धा; (प० च० ५६, २) । ग.ठाण-पुं० (सं० गतिस्थान>प्रा० -जूह पु० (सं० गजयूथ) हाधियों का गइ 1 ठाण) गति व स्थिति; (जस० ४, समूह; (प्रा० ५० १, १२) । १३, ७)। गअगंग-पुं० गगनांग, एक मात्रिक छंद गइय-क्रि०, भू० का० (स० गताः) का नाम; (प्रा० ५०. १, १५०)।। चली; (प० च० १२, ६, ६)। गप्रण-न० (सं० गगन >प्रा० गगरण) गइवेयउ-न० (सं० ग्रं वेयक) हार; १. आकाश; '२. आदि लघु, पंचकल (ण० १, १७, १३)। (iss)। (प्रा० ५० १, ३४) । गअणु गउ--क्रि०, भू० का० (सं० गत >प्रा० -पु० गगन स्कंधक का भेद; (प्रा० गय) गया; (परम० १,६; जंबू० ३, पै०१, ७५) । १२, २१) । २. समाप्त हुआ, (ह.) । व० कृ० जा कर; (प० च० १२, २, गअणाराए-पु० (सं० गणेशराय) गणे. शराय नामक राजा; (को०३, १७) । ३) । गउँ-भू० का० गया; (को० २, गअरोस-पु. (सं० गणेश्वर) लणेश्वर १५)। गया-भू० का० गया; तुल० नामक राजा का नाम,' (को० १, गु० गया; (भ०)। गर-पु. (सं० गोड>प्रा० गज्ड) गअवाल-पुं० (सं० गयापाल) नगर. गौड़ देश; (ण० ४, ७, १३ )। .. -- ५६) ਤੋਂ (२८४) (ण० ५, -अ स्त्री . गउडी-स्त्री० (सं० गोडी) ग. देशीय गरिगर, गगर) १: हकलाने वाला, स्त्री; (संघि० ६, ५, १०) । अव्यक्त एवं अस्पष्ट-वात कहने वाला; गउर-वि० (सं० गौर) गौर) : गौर वर्ण (सं० रा०) । २. गद्गद आवाज वाला; वाला; (ण०.१, १६, १०)। (भ०)। गउरव-पुं०(सं० गोरख >प्रा० गारव, गग्गिरगिर-स्त्री० (सं० गद्गद+गिर गउरव) १. बड़प्पन, महत्त्व, २. सम्मान; >प्रा० गगार+गिरा) गद्गद स्वर; (भ०; जंवू० ६, १६, १३) । "अम्माएविएँ गग्गिरगिरए, जं भासिउ गउरविय - वि० (सं० गौरवित) गौरव- दिट्ठपरंपरए," अर्थात् परम्परा को युक्त किया हुआ; ६, १२; जानने वाली मेरी मम्मा देवी ने गद्गद : जस० २, ६, १८)। स्वर में कुछ कहा; (जस० २, १३, गउरि-स्त्री० (सं० गौरी>प्रा० ६)। गउरी) पार्वती, "णं गउरि महेसहो गङ्ग-स्त्री० (सं० गङ्गा>प्रा० गंगा : कामरूव,” अर्थात् जो महेश. . को देवी गंगा नदी; (प० च० २३, ६, ३)। गौरी के समान सुदरी थी; (क० २, २, गङ्गाहिसेय-पु० (सं० गङ्गाभिपेक) ७)। (सं० गौरी) पार्वती; शङ्कर; (प० च० ४३, ६, ६)। : (प्रा० .० २, ४८) । /गच्छ-(सं०/गम् >प्रा० गच्छ) गए-क्रि० भू० का० (सं० गताः). गए; जाना, गमन करना; · · (जस० २, १, (उ० व्य० प्र० २०-१७) । गओ-भू० १०.) । -इ व० (जंवू०२, ८, १८)। • का० गया; (पाहु०). -ह (विधि०) (जंवू.० ६,४, १२) । गगनपय-पु० (सं० गगन--पथ) गच्छि--विधि० (जंवू० १०, ८, ११) । आकाश-मार्ग; (को० ३, ६८) । गच्छंत-व कृ० (सं० गच्छत्) जाते गग्गर-वि० (सं० गद्गद >प्रा० हुए; (जस०.४, १०, ८) । गच्छमाण- गग्गर). गद्गद आवाज वाला, 'पुणु व० कृ० (सं० गच्छत्) (जस० ४.१२, किय. गरहण गंग्गर-गिरेण" अर्थात गद् ६)। गद स्वर में अपनी निंदा करने लगा; गच्द-० (सं०. गच्छ) (प० च० १३, ८, ७, सणतु० ४५६) । गाछ, छोटा पेड़; (प्रा० ५०.२, १३)। गग्गर-सर-० (सं० गद्गद . स्वर) गजवडि-स्त्री० (सं० गज+पटि, गद्गद आवाज वाला स्वर; (रि० ४, पटी) गजपटी, गजचित्रयुक्त वस्त्र; (प्रा० ७) 1 गु० २४, ७)। गग्गरी-स्त्री० . (सं० गगरी>प्रा. /गज्ज-(सं० गर्ज >प्रा०.. गज्ज) गग्गरी) छोटा घड़ा, जलपान, गगरी; गर्जना करना, गरजना, . धड़धड़ाना; (दे० ना. मा० २, ८६) । (प्रा० पै० २, १८१; सं० रा०)।- गगिर-स्त्री० (सं० . गद्गद >प्रा० कि०, २० गरजना, . (जंवू० ५, १३, . वृक्ष, पोषा, .
ម (२९५) गह . . सुनकर अन्य विछौना; : २३)। -हि क्रि० व० गरजनी; तुल० गु० तुल० गु० गाजवीज; (प्रा० गु० २३, "त्तिउं गजहि सुहडभन्तरे," अर्थात् ३५)। सुभटों के बीच में कितना गरज रहा है; गज्जिउ-क्रि० पीड़ित किया; तुल० (५० च० २०, ६, ४)। गज्जंत-व० मराठी गांजणे; (हे० ४१०) । कृ० (सं० गर्ज+शतृ); (जंबू० ५, ८, गजोल्लिय-वि० पुलकित, रोमाञ्चित १४)। -माग व० कृ० (सं० गर्ज + (प० च० १७, ११, १०) । शानच); (जंबू० ७, ४, १५) । गज्जु गम-न० (दे०) स्तनों के ऊपर की व० चिल्लाना; (हे० ४१८) । गज्जे वि- वस्त्र-ग्रंथि(दे० ना० मा० २, पू० का० कि० गरज कर; (प० च० ६३)। १०, ८)। गडयडइ-कि० (दे० 'प्रा० गडतड- गज्ज-न० (सं० गर्जन >प्रा० गज्जण) गर्जन करना) गिड़गिड़ाना; (जंबू० ६, गर्जन, भयानक ध्वनि; "पलअ घण गज्ज १४, ४)। सुनि इअर रव लुक्किा;" अर्थात् प्रलय- . गडारउ:-पु. (सं० : गतं>प्रा० गड्ड) काल के मेघों का गर्जन गड्ढा, गड़हा, खड्ड; तुल० गु० गडारो; शब्द छिप गए; (की० ३, ७०) । (प्रा० गु० ७, ३२)। गज्जणा-स्त्री० ( (सं० गर्जन > प्रा० गड्ड-न० (दे०) शय्या, गज्जण, न०) गर्जना, भयानक ध्वनि; (दे० ना० मा० २, ८१) । (प० च० १७, ११, १०)। गड्डरी-स्त्री० (दे०) छागी, अंजा, गज्जन्ता-क्रि० भू० का० गरज रहे थे, वकरी; (दे० ना० मा० २, ८४) । "हुङ कारे वीरा गज्जन्ता;" अर्थात् हुंकार गड्डा-पु. (सं० गत >प्रा० गड्ड) करते हुए वीर गरज रहे थे; (को० ४, गड्ढा, गढ़ा; तुल० गु० खाडो; (संधि० १७४) । १४, ३, ६)। गज्जर-पु० (सं० गृजन>प्रा० गड्डिवि-पू० का० क्रि० (दे०) गाड़ गज्जर) कन्द-विशेष; गाजर; (संधि० कर; (जंवू० ६, ८, १७)। . १४,४,५)। गड्डी-स्त्री० (सं० गन्त्री>प्रा० गति, गज्जिय-वि० (सं० गजित>प्रा. गंती, गड्डिआ) गाड़ी, यान, शकट; गज्जिअ) जिसने गर्जन किया हो वह, (दे० ना० मा० २, ८२) । तुल० म० गाजणे; (भ०)। गड्डुय-स्त्री० (सं० गन्त्री>प्रा० गज्जिख-पु० (सं० · गर्जि+रव) गड्डिा, गड्डी) शकट, गाड़ी; तुल० गु० गर्जन; (जंवू० ४, २०,:१२) । गाडु (संधि० ३-२, ६)। : गज्जु-विज्जु-स्त्री० (सं० गजित+ /गढ--(सं०/घट>प्रा० घड, गढ़) विद्युत >प्रा० गज्जित्तु, गज्जिर+ गड़ना, बनाना; (प्रा० ५० ३, १६७) । विज्जुआ).गर्जन करने वाली विजली; गढइ; (हे० प्रा० व्या० ४, ११२) ।' . - पढ (२८६) गणियारि 1 गठ-पुं० (दे०) दुर्ग, किला; (दे० ना० कवणु गहणु किर रावणु;" अर्थात् मा० २, ८१) । गढ़; (प्रा० चि०) । 'युद्ध में प्रवृत होने पर उसे रावण को गण-कि० (सं० गणय् >प्र० गण) पकड़ना कौन-सी बड़ी बात है,' (५० गिनना, गिनती करना (रा.) 1 -३ च० १२, ६, ६)। व०; ए० (सं० गणयति) गिनना; (हे. गणणाइमा-स्त्री० (सं० गणनायिका) ३५.८, जंबू० ६७, १४) । -हि व०, पार्वती, चण्डी; शिव-पत्नी; (दे० ना.. म० पु०, ए०; (प० च० ६, १०, ४)। मा० २, ८७)। गणंति-क्रि०; व० गिनना; (पाहु०) । गणायमह-पु. (दे०) विवाह-गणक; गणन्ता-व. कृ. सोचते हुए; (की० २, (दे० ना० मा० २, ८६)। २२६) । गणन्तिए-व० कृ० (सं० गण- गणाहिषइ-पुं० . (सं०. गणाधिपति) न्त्याः) गिनते हुए; (हे. ३३३, १)। जिनदेव का प्रधान शिप्य; (प० च० २६, गणिज्जे-आज्ञार्थक, गिनी जाएं; (प्रा० ४) । पं० १, १०७)। गणिनो-क्रि० (सं० गणि-स्त्री० (सं० प्रा० गण पुं०) गणय् >प्रा० गण) बार-बार अनुभव समूह, समुदाय, यूथ; (वी०. १, २) । करना; (को० ३, ५२)। गणित्तिया-स्त्री० (दे०). अक्षमाला, गरण-पु. (सं० प्रा० गण) समुदाय, रुद्राक्ष की . माला; (प (५०. च० ११, समूह; (जस० २, ३६)। ४.) । २. वार्षिक या मात्रिक गण (प्रा० गणिय-न० (सं० गणित >प्रा० गणिय) पै० १, १२)। १. गणित शास्त्र; (ण० ३, १, ३)। गणण-न० (सं० प्रा० गणण) गणना, गिनती; (जबू० ८, ८,४)। स्त्री० (सं० गणिका>प्रा० गणिया) गरणसम-वि० (दे०) गोष्ठी-रत; (दे०- वेश्या, (ण० ५, २, १०)। 1--उं स्त्री० गणिकाजनाः, वेश्याएं; "नउलुन्म ताउ ना० मा० २, ८६)। गणियउ;" (जंबू० , १२, गणहर-पु० (सं० गणधर) एक प्रकार के जैनाचार्य जो तीर्थंकरों के शिष्य होते ७)। हैं, ये लोग तीर्थकरों के उपदेशों का शिष्यों गणियाणण-वि० (सं० गणित+ में प्रचार करते हैं; . "गणहरयमुहसवण गणितज्ञ; (व० १०, १, ठिय एक्कहि," -एक कोठे में. गणधर १४)। को प्रमुख करके सब श्रमण वैठे थे; गणियार-पुं० गणिकार, वृक्ष-विशेष; (प्रा० गु० ५, ४२; जंबु० १,१६, ५)। (जंवू० ५, ८, ११)। गौतम; (व० १०, १, १) गणियारि-स्त्री० (दे०). (दे०), करिणी, गरगह-न० (सं० ग्रहण >प्रा० गहण) हस्तिनी, “णहाइ गइन्दु व सहूँ गणिया- पकड़ना "तासु वियोहों अभिट्टाहों रिहि;" -जैसे हाथी अपनी हथिनियों सि० १, ज्ञानिन्) गणेसह (२८७) गन्न ना० मा० , - के साथ नहा रहा हो;' (प० च० ५, विशेष; २- गाने वाली स्त्री; (दे० ना.. १४, ७, २६, १३, ८)। मा० २, ८२)। गणेसर-पु० (सं० गणेश्वर>प्रा० गद्दम-पु० (सं० गर्दभ>प्रा० गद्दभ) गणेसर) छंद-विशेष; रोला छंद का भेद; गधा; (जस० २, २७, १०)। (प्रा०प० १, ६३)। गद्दह-पुं० (सं० गर्दभ >प्रा० गद्दह) गष्ठि-स्त्री० (सं० ग्रन्धि >प्रा० गंठि) गधा, खर; (दे० ना० मा० २,८० गांठ; (हे. ४२०, ३)। की. ४, ११४) । न. (दे०) कुमुद, गष्ठिवाल-वि० (सं० ग्रन्यिपाल) चंद्र-विकासी कमल; (दे० भाण्डागारपालका (प० च० १४, २, २,८३)। गद्दिम-वि० (दे०) गवित, गर्व-युक्त; गाड-पु.० (सं० गण्डक >प्रा० गंडय) (दे० ना० मा० २, ८३) । गेंडा, जानवर-विदोप; (प० च० ३,५, गन्तय- कृ० (सं0/7>प्रा. गा, ५)। गाअ; (सं० गायत्) गाते हुए; (प० च० गण्ड-वि० (सं० गण्डक>प्रा०गंडम) २९, ११, ६) । चार की गिनती; (फी० ३, ११२) । गन्दा-पुं०, ३० २०, कर्ताकारक, गण्यास---पु० (सं० गणपाव>प्रा. (फा० गोयन्दः) : गुप्तचर; (को० २, गंड -- वास) गाल का पारवं-भाग, गण्ड १६०) । पु० (सं० कन्दुकः) गेंद; (को० वास (surface of the checks); २, १६१)। (प० च० १३, १२, ७)। गन्दुप-पुं० (सं० कन्दुक>प्रा. गेंदुआ, गग्ण-न० (सं० गणन >प्रा० गणण) गंदुअ) गेंद; (प० १० १८, ३, ६) । गिनतो, गणना; (प० च० २७, २, ६)। गन्धव-० गन्धर्व>प्रा० गप्पु गणना; (व० ३, १४, १०) । गंधव) गन्धर्व, एक प्रकार की देव- गत्त'-० (दे०) १. चौपाई को लकड़ी. जाति; (प० च० २५, १८, ८)। विशेष; २. पंक, कर्दम; (दे० ना० मा० गन्धार-पु० (सं० गान्धार>प्रा०. २, ६६) । ३. वि० गया हुआ; (पड्) । गंधार) स्वर-विशेष, रागिनी-विशेष; गत्त'-० (सं० गान >प्रा० गत्त) (प० च० १३, ६, ६)। गरीर; (प्रा० पं० २, १२३, जस०.१, गन्धुक्कड-वि० (सं० : गन्धोत्कट>प्रा०. उत्कट गध १४, १; जंबू० ६, ७, ६) । गत्ता; (40 गंध+उक्कड) तीव्र या १, १४, १३)। वाली; (प० च० १,१५, ३) ! गतरपरव-वि० (सं० गात्ररक्षक>प्रा० गन्धोवय-न० (सं० गन्धोदक >प्रा० गत्त + रक्खम) अंगरक्षका; (प० च० १६, गंपोदग, गंधोदय) सुगंधित जल; (५० १५, ४) । च..२२, १, २२) । गवाहो-यो (दे:). १... वनस्पति. गन्न--न(सं० गणन >प्रा० गणण) : (सं०. - .
- गम (२८८) गभण तुल० म० गर्भ से उत्पन्न; गिनती; "सारासारपरिक्खणणगन्नई,". समाणु परम गम्भेसर, दिवसई, ठिय (भ० २, २, ८) । पुं० (सं० गण्ड> चउरासी णरवर" अर्थात् उनके साथ प्रा० गंड) गाल, कपोल; (रा० १६) । । अत्यंत गलिचौरासी राजाओं ने दीक्षा गन्म-पु. (सं० गर्भ>प्रा० गम्भ ली," (प० च० ३, १०, २)। गर्भाशय, उत्पत्ति-स्थान; गन्नेसरि-वि० गर्भवती; (प० च० गाभा; (भ०; जस० २, २८, १)। १६, ६, ५)। -मंतर पुं० (सं० गर्भ+ आभ्यान्तर) गम्भोरुय–वि० (सं० गर्भ+उरु+ज) (जंबू० ४, ७, २) । "रंभागम्भोरुयरइरा- गम्भवई-स्त्री० (सं० गर्भवती) गभिणी महों,' (जंवू० ४, १३, १६) । स्त्री; (जंवू० ४, ७, ८) । गमीरणास-पुं० राक्षस-योद्धा; (५० गन्नावयार-पु० (सं० गर्भावतार) च० ५६, २८)। गर्भावतरण, "जसु गम्भावयारे संजा- गम-पुं० (सं० गमनम् >प्रा० गमण, यउ;" (व० २, १२, १) । गम) गमन; गति, चाल; (भ० ७,३, गन्मासय-पुं० (सं० गर्भाशय) स्त्रियों ६, प० च० १, २६) । के उदर में वह स्थान जिसमें वच्चा रहता /गम-(सं० गम्>प्रा० गम) जाना, है, वच्चादानी; "गभासइ महु अवलोइ चलना । गमिझ; 'गमिअ दिण · पुणु ण यई अळंगई कंपंतई," अर्थात् राजा ने मिलु'-गए दिन फिर नहीं मिलते; (प्रा० गर्भाशय में मेरे आठों अंगों को कांपते पं० २, १६१)। गमिही-क्रि० (सं० (छटपटाते) हुए देखा; (जस० ३, ७, गमिष्यति) वीत जायेगी; (हे० ३३०, १३)। २)। गम्पि–पू० का, कि० (सं० गम्भिरण-वि० (सं० गभित>प्रा० गत्वा) जाकर; (टि.-अपभ्रंश में गम् गन्मिय) गर्भ-युक्त; (प० च० २५, २, धातु से परे एप्पि प्रत्यय में एकार का ४) । विकल्प से लोप (हे. ४४२; है. गम्भिरपी-वि० सं० गाभणी>प्रा० ४४२।१)। गम्प्पिणु-पू० का० कि० गभिण) गर्भवती, जिसे गर्भ हो; (क० सं० गत्वा, जाकर; (टि-अपभ्रंश में/ ८, २,१)। गम से परे जो एप्पि और एप्पिणु प्रत्यय गन्निय-वि० (सं० गभित>प्रा० के एकार का विकल्प से लोप होता है, गन्मिय) गर्भ-युक्त; (भ०)। हे०, ४४२; हे० ४४२ ॥१; (प० च० गम्भुन्भुम--- वि० (सं० गर्भ+उद्भूत) २७, १४, ६)। गर्भ से उत्पन्न; (जंवू० १, ५, ८)। गमण-न० (सं० गमन >प्रा० गमण) गन्मेसर-वि० (१) (सं० गर्भेश्वर) गमन, गति, चलना, "भोमण भतण जन्म से विशिष्ट गुण वाला; (soverei- छाड नहि गमणे न हो परिभूत," अर्थात् gn by birth) (२) गर्वीला, "तेण भोजन और भक्षण उन्हें किसी समय गमणि (२८६) गय च० छोड़ता न था, और न चलने से ही वे ३. देश-विशेप; (प० च० ३०, २, थकते थे; (को० ४, १०३; प० १०)। १०, ३)। -मणु वि० (सं० गम्भीरसत्तण-स्त्री०सं०गम्भीरत्व)गम्भी- गमन+मनस्) जाने के लिए इच्छुक, रता, गहराई, "णव-जोयणाई तुङ्गत्तणेण, (५० ५० ६, ४, २)। वारह सप्पासङ्गत्तणेण । अट्ठोयर गम्भी- गमणि-वि० स्त्री० (सं०/गम् >प्रा० ररत्तणेण......।" अर्थात् ऊँचाई में नौ गम) गमनी, जाने वाली; (जंः १०, योजन, लम्बाई-चौड़ाई में बारह योजन, ८, १)। गम्भीरता में आठ; (प० १० ४, ६, गमय-वि० (सं० गमक >प्रा० गमग) ८)। वोधक, निश्चायक; (५० च० ५, . १५, गम्म-वि० (सं० गम्य >प्रा० गम्म) २)। जानने योग्य; (ण० १, २, ८)। गमागम-पु. (सं० गम + आगम) गम + आगम) गम्म-(सं० गम् >प्रा० गम) जाना; गमनागमन; (जंवू० ५, १३, २७) । -इ, (सं० गम्यते); (पाहु० २१३)। गमार-वि० (सं० ग्राम्य >प्रा० गमार, गम्बारिव-स्त्री० (सं० ग्राम+पाल+ गवार) असम्प, गवार, मूर्ख, "का मन इमा) ग्रामीणता, ग्राम्यता; (रा. है)। गाड, गोवोलि गमारन्हिछाड;" (प्रा० गयंद-पृ० (सं० गजेन्द्र) श्रेष्ठ हाथी; गु० २३, १६)। (जंवू० ४, २१, १३)। गय-वि० (सं० गत) १. गुजरा हुआ; गमारि-वि० गवार; (दे० ना० मा० १, ५६) । २, पूर्णित गमार; (विनयचंद्रसूरि, नेमिनाथ, चतु- घुमाया गया; (दे० ना० मा० २, ६६) । पादिका)। ३. मृत, निर्जीव; (दे० ना० मा० २, गमिन-वि० (सं० गमित>प्रा० ६६) । क्रि० भू० का० चले गए; (महा० गमिय) गत, गुजारा हुआ; (जस..)। ६६, १४, २) । गई; (विला०)। गमु- (सं० गमन >प्रा० गमण) स्त्री० (सं० गता>प्रा० गया) गमन, "तं णिसुणे वि पवर-कइडएहि । लोहे का मुग्दर या लाठी, लोहे का. गमु सज्जिउ. किक्किन्धन्धएहिँ," अर्थात् पापाण का अस्त्र-विशेप पाषाण का अस्त्र-विशेष; (प० च० ११. यह सुनकर किष्किन्ध और अन्धक दोनों ८, ५) । वि०-(सं० गत >प्रा० गय) प्रवल कपिध्वजियों ने जाने की तैयारी प्राप्त "जय दसदिसिगयजसपसरधवल,"- की; (प० च० ७, १, ६) । जय हो आपकी, जिनकी कीति के प्रसार गम्भीर-पु. १. गम्भीर नामक राक्षस से दसों दिशाएँ उज्ज्वल हो रही हैं; योद्धा; (प० च० ५६, ३) । २. विद्या (ण० १, ११, ७); गया हुआ, (प० १० धर राजा; "चन्दहो गम्भीरो, विराहिओ १, ८, २); रहित 'गयरूवउ; रूप-रहित, चेव दढसत्तो;" (प० च० ११४, १६)। (महा० ६८, ८, १४) । न० (सं० गद) तुल० मगही गदा, है . १ गयर (२६०) गयणाणंद - 23 सं० ६,८, ३, १२, का एक प्रकार का रोग, व्याधि (ण० ६, ६, गयण-न० (सं० गगन >प्रा० गयण) ८) । न० (सं० गत >प्रा० गय) गति, गगन, आकाश, अंबर; (हे० ३६५, ४, गमन; (सं० रा०) । पुं० (सं० गज > भ० १, ५, प० च०१२, ७, प्रा० गय) हाथी; (प० च० ६, रा०)। गयणंगण-न० (सं० गगन+ है० ३३५, १)। -उल पुं० (सं० गज अङ्गन) गगन रूपी आंगन, "किं कडितु +कुल) (ण० ३, १७, ५)1 -काल णं णं गयणंगणु;" छुतफलक क्या है मानो पुं० (गतकालः) बीता हुआ समय; (व० गगन रूपी आंगन है; (ण. १०, ३६, ३)। -कुम्भई न० (सं० ५)।-यल न० (सं० गगन तल गज+कुम्भ >प्रा० गय+कुंभ) हाथी (सुदं० १, ८, १०)। गण्ड-स्थल (हे. ३४५, १)। गयणगई-पु० (सं० गगगगति) व्यक्ति -पिओ वि०, प्रिया रहित (सणतु (सणतु नाम-विशेप, विद्यावर; "गयणगइसमाणु ४४६)1 -पुर पु० नगर-विशेष; (५० विमाणवंतु निविसेण जि केरलनयरि च० २०, १२४) । -वइ स्त्री० (सं० पत्त ;" अर्थात् गगनगति के साथ विमान गज+गति >प्रा० गयगइ) हाथी का में बैठकर निमिपमात्र में वह केरल गमन; (प० १४, २, ८)। -सालउ नगरी को प्राप्त हुना; (जंत्रु० ५, ११, स्त्री० (सं० गज+शाला>प्रा० गय+ है)। साला) गजशाला; (भ० ४,१०, गयणचंद-पुं० मुनि-विशेष-नाम, वालि ४)। (सुग्रीव के ज्येष्ठ भाई) के दीक्षागुरु; गयउर-पुं० (सं० गजपुर>प्रा० गय (प० च० ६, ४६)। उर) नगर-विशेप, कुरु देश गयगतढि-पु रावणमंत्री; (प० च० नगर, हस्तिनापुर; (भ०) । ८, १५)' गयतेव-पु० (सं० गतक्षेप) गतकाल, गयणयल-पुं० (सं० गगनतल>प्रा० समय; (जंबू० ३, गयण+यल) आकाश-मण्डल (व० २, ५) । १२, १) गयगंड-पु० (सं० गज+गण्ड>प्रा० गयरण्यलवडिय-वि० (सं० गगनतल- गज+ गंड) हाथी का गंडस्थल; (जंवू० पतित) आकाश-मण्डल से गिरा हुआ; ५, ७,८) .(जस० २, २३, १०)। गयधाय-पुं० (सं• गदाघात) गदा का गयविज्जू-पु० विद्याधर राजा; (५० प्रहार; "गय-धायं गज्जते वलेण;" (व० च० ८, १३२) । ५, २०, १०)। गयणाप्र-पुं० राक्षसयोद्धा; (प० च० गयणंगण-पुं० (सं० गगन+आङ्गन) ५६, ३८)। गगनांगन, "गयणंगणे जंतहो जणघणउँ; गयणाणंद-पुं० वानरवंशीय राजा; (प० (जंबू० ५, ४, ७)। च०६, ८४)। का प्रधान बीता हुआ गयणि (२६१) गयसारि जंति, गणि-स्त्री० (सं० गगन >मा० गयण अमूल्य; "गयमोल्लई जणणयणहें पियाई, न०) आकाश, "जहिं जल-खाइयहि तरंग तहि वणिणा ताहें समप्पियाई;" (क पंति, सोहइ पवणाय गणि २, १७,३)। अर्थात् जहां जल-खाति की तरंग-पंक्तियाँ गयराउ-वि० (सं० गतराग) वैराग्य- पवन से आहत होकर आकाश में जाती युक्त, वीतराग; (० १, १६, १४)। हुइ-सी प्रतीत होती है; (व० गतराय; (क० ५, ६, ६)। गयवइ-स्त्री० (सं० गत+पति>प्रा० गर्याणदु -पु० विद्याधर राजा; (प. गय+4, वइ) विधवा, वह स्त्री जिसका च० ५, ४५)। पति मर चुका हो; (विला०)। -य गयणुज्जल-पु ० राक्षसयोद्धा; (प० च० स्त्री० (सं० गतपतिका) स्त्री-विशेष- १२, ६२)। नाम; (जंबू०८, १५, ४) । गयत-पुं० (सं० गजदन्त >प्रा० गय गयवरण-वि० (सं० गज+वन>प्रा० +दंत) हाथी का दांत; (व० १०, १६, गय+वण) गज-युक्त वन; (व० १, ३, ८)। गयदप्प-वि० (सं० गतदपं>प्रा० गय गयवर-पुं० (सं० गजवर >प्रा० गय दप्प) मान से मुक्त, "दोसुज्झिउ गयद वर) श्रेष्ठ हाथी; (जस० १,४, प्पु असंकिउ;" मर्यात् दोपों से रहित, ३)। मान से मुक्त व निश्शंक था; (जस० ४, गयवरघोष-पु० किसी वानरयोद्धा का २४, २) । नाम; (प० च० ५४, २१)। गयपमाय-वि० (सं० गतप्रमाद>प्रा० गयवरतास-पु० वाररयोद्धा का नाम; गय+पमाय) प्रमार-रहित; (व० १, ४, (प० च० ५७, १०)। ६)। गयवल्लभा-स्त्री० जनपद-विशेष; (प० गयपवर-पु० (सं० गज+प्रवर>प्रा० च० ५५, ५२) । गय+पवर) श्रेष्ठ हाथो; (क० ३, १८, गयवाहण-पु० (सं० गजवाहन) गज- १०)। वाहन नामक राजा; (प० गयपुच्छ-वि० (सं० गत= रहित+ ६४)। पुच्छ) पुछ कटे - हुए; (व० गयसाउल, गयसाउल्ल-वि० (दे०) ५)। विरक्त, वैरागी; (दे० ना० मा० २, गयमंदगमणि-वि० (सं० गज+मन्द ८७)। +गामिन् >प्रा० गय+मंद+गामि) गयसारि-स्त्री० (सं० गज+शारि- गज के समान मंदगामिनी; (जस० ४, हाथी का पलान या मूल) युद्ध के लिए १८, ६)। हाथी का प्रयाण; (जंवू. ७,११, गयमोल्ल-वि० (सं० गत+मूल्य) २)। ४,७, %- जयसुड (२६२) गुरुङक (प्रा० ५० २, १३४) !! गदा>प्रा० गया गदा, लोहे की - गयसुड-पुं० (सं० गत्+शुण्डा >प्रा० ७) । गरुहण (गर्हण); (जस० ३, गय+सुडा) गजशुण्ड नामक सीधे खड़ा ३६, २)। होकर किया जाने वाला आसन, "गयसु. गरहा-स्त्री० (सं० गाँ>प्रा० गरहा) डयगोदुह आसणेहिँ,” अर्थात् 'वे स्थित निंदा, घृणा; (की ४, ६६)। होते थे तो गजंशुण्ड (सीधे खड़े) या गरहिय-वि० (सं० गर्हित >प्रा० गर- गोदुह (उकई आसन) से;' (जस० ४, हिअ) निदित, घृणित; (प० च० ५, १, १६, २)। गरास-पु० (सं० ग्रास) निवाला, कौर; गयसुडय-पु० (सं० गुज+शुण्डा> प्रो० गय+सोंडा, सुडा) हाथी की सूड; गरिठ-वि० (सं० गरिष्ठ>प्रा० (जस० ४, १६, १२)। गरिटठ) अति गुरु, बड़ा भारी, श्रेष्ठ, गया-स्त्री० (सं० (सं० रा०; जंबू० १०, २६, ६)। मुगदर, आयुव-विशेष; श्रेष्ठ; (की० १,६०)। (प० च० ५२, ७)। गरिल-वि० (सं० गरिष्ठ >प्रा० गरि- गयारि-राक्षस राजा, राजा-विशेष. ट्ठ) १. सबसे भारी; २. अत्यंत महत्त्व- नाम; (प० च० ५६, २८)। पूर्ण; (जंबू० ७. ११, १)। ग्यास-वि० (सं० गत+आशा>प्रा० गरुअ-वि० (सं० गुरु+क>प्रा० गय+आसा) आशाहीन, निराश; (क० गरुम) १. वड़ा, महान्, गुरु; (प० च० ५, ६, ६)। १६, ६, ४; की० १, ८१) । २. श्रेष्ठ; गरल-न० (सं० प्रा० गरल) विष, (की० १, ७६)। -ओ वि० श्रेष्ट; जहर; (प्रा० .० २, १३८; जसं० ३, (को० ४, ५)। गरुउ-वि० वड़ा, ३६, १२) । गरलु; (व० ३, ७, (क० २, १०, १)। गरुआरउ-वि० ३)। (सं० गुरुतर) विशुद्ध; (क० १०,५, गरलुल्लन० . (सं० गरल+उल्ल ३) । गरुएं-वि० गौरवशाली, (व० (स्वार्थे प्र०) विप, जहर; (जस० ३, ६, ४, ४, ११) । गरुय-वि० · गुरु, वड़ा, १५) । टि०-उल्ल> उल का रूपांतर महान्, तुल० गु० गरवी, (सं० रा०)। है; करम-+-उल जैसे प्रयोग से यह तथ्य गरुवय -वि० बड़ा; (प० च० ५५, १) पुष्ट होता है । इसका स्त्री० उल्ली है। गरुने कि० (सं० गुरुकाय् >प्रा० गरह-(सं०/गहं, >प्रा० . गरह) गरुअ, गरुआ) वड़ा बनाना, गुरु करना; निंदा करना, घृणा करना; (जस० २, "गब कए गरुने दापे,' ७, ३) । गरहन्ति-व० क्तियों द्वारा दर्प को और अधिक बढ़ा रहे हैं; (प० च० २, १४,.५) । रहे थे; (को० ४, ६५)।, गरहण-न० (सं० गर्हण >प्रा० गर गुरुडंक- पु. (सं० : गरुडाङ्क) हण) आत्म निंदा; (प०. च० १३, ८, १. विष्णु, वासुदेव; २. इक्ष्वाकु वंश के " अर्थात् गर्वो- निदा: कर.
गरुड (२६३) गलगंडरोव - . एक राजा का नाम; (प० च० ५, गलिया--स्त्री० शस्त्रविद्याभ्यासस्थल; (प० च० ८८, २५)। गरुड-पुं० (सं० गरुड>प्रा० गरुल) गरुलोबलथल-पुं० हरिन्मवणि पन्ना १. गरुड़वाण; (व० ५, २२, ७)। द्वारा निर्मित स्थल; (व० ३, २१, २. विष्णु का वाहन, गरुड़ पक्षी, पक्षी- ५) । राज; (प्रा० ३०२, ७५; जम० २, ३६, गरुगउ-० गौरवांग नामक पर्वत; १०)। ३. छप्पय छंद का भेद, (प्रा० (व० २, ७,६)। पं० १, १२३)। –केउ पु० गरुडकेतु गावि-वि० (सं० गुर्वी) गरवी, बड़ी, (त्रिपृष्ठ), नाम-विशेष; (व० ५, २३, श्रेष्ठ; (की० २, १८६)। -जाखरी ४) । गरुड्ड–० गरुड़; (व० ४, ७, स्त्री० राजनर्तकी; (की० २, १८६) ! ७)।-त्य न० (सं० गरुडास्त्र) अस्त्र- विशेप; (प० च० १२, १३०) । 1/गल-(सं० गल्>प्रा० गल) गलना, गरुडा--स्त्री० गरुडा, विद्या-विशेप; गल जाना; (सं० रा०)।-इव० (सं० (प० च० ५६, ८४)।-हिव पुं० (सं० गलति>प्रा० गनइ) गलना; (को० ३, गरुडाधिपति) गरुड देवों का अधिपति; ७३) । गलंत-व० कृ. (सं० गलत), व राजा खेमंकर का पुनर्भव नाम; (प० (क० ६, ४, ११)। गलन्तएँ-कृ०. च० ५, ७)। (सं० गल् >प्रा० गल=समाप्त होना) गल्यचंदाभ-० वानरयोद्धा का नाम; बीतने पर, "काले गलन्तएँ" अर्थात् समय (प० च० ६६, ७)। के बीतने पर, (प० च० २, ७, . ६)। गरुयत्त-पु० (सं० गुरुत्व) उत्कृष्टता गलन्ति-क्रि० (सं० प्रा०. गल्) गलना (ण० १, ४, ८)।-ण पु०, विज्ञा (हे० ४०६)। गले वि-पू०का क्रि गलकर लता, "कडिय लगल्यत्तणु तं पहाणु" (ण "कहें वि कसण रोमावलि दिठी। १, १७, ६) | ~~यार (गरुवार) वि० काम-वेणि णं गले वि पइट्ठी" · बर्याद (सं० गुरुतर) भारी; "जसु पय-भाणरें किसी को काली रोमावली दिखाई दी गरुयारेण हउँ किउ कुम्मायारउ," अर्थात् मानो कामवेणी ही गलकर वहां प्रवेश कर जिनके पदभार से मैं कछुए के आकार गई; (प० च० १४, ७, ७)। का बना दिया गया था; (प० च० १५, गल-पु० (सं० प्रा० गल) गला, ग्रीवा, ६, १०)।-चारी (गरुयारी) वि० कण्ठ; (प्रा० ३०१,१११; सि०.२, ६, (सं० गुरुतर) जेठी; (M० -३, ६, ३)। जस० १, ६, ६)। गरवत्तणय -पु० गुरुत्व; (प० च० ३४, गलगंडरोय-पुं० (सं० गलगण्डरोग) ४;६)। गले का एक रोग, गलगंड, कंठमाला, गल्यपवास-पु० (सं० गुरुप्रवास) दीर्घ एक रोग जिसमें गले में छोटी छोटी बहुत प्रवास; (जस०)। सी फुड़ियां लगातार माला की तरह एक : .. - गलगंज्ज (२६४) गलियसर . पंक्ति में निकलती हैं, (सुदं० १२, ७, प्रा० गल+त्थिर, थिर) गले में स्थित ७) । (सं० रा०)। /गलगज्ज-(सं० गल+गर्ज >प्रा० गलत्यियउ-क्रि०भू० का० १.प्रेरित हो गल+गज्ज, गज्जई) गरजना; (गले की गया, "हा कम्मे केण गलत्थिवउ;" अर्थात् गर्जना का होना) (म० १, ७, ५)। हाय, मैं किस कम से प्रेरित हो . गया; -इ (प० च० १७, १०, ३)। गलग (क० ४, १५, ८) । गलत्थियउ-क्रि० ज्जे वि-पू० का० कि. गरजता हुआ; २. सं० कथित, विडम्बना में पड़े (प० च० २०, ३, ६) । गलगज्जन्तऍ- "सयलु वि कम्मेग गलत्यियउ," सभी गरजना करने लगा; "तहिं अइरावणे कर्मों की विडम्बना में पड़े; (ण० २. गलगज्जन्तएँ,” (प० च० ३, ६, ६) । १, ११) । ३. पीड़ित हुआ; (महा० ६६, गलगज्जि-स्त्री० (सं० गल+गजि > १)। प्रा० गल+गज्जि) गलगर्जन; (व० ३, गलय-पुं० (सं० गल+क) कण्ठ; २६, १०)। (जस० १, १५, ८)। गलगज्जियन (सं० गल-+गजित> गलरव-पु० (सं० कलरव) शोर; (ण. प्रा० गलगज्जिय) गल-गर्जन; (प० च० ३, १७, ५)। २०, ५, ७; सुदं० ११, ६, १६)। गलवेविय-वि० (सं० गल+वेपित> गलघोस-पुं० (सं० गल+घोषः) प्रा० गल+ वैविय) कण्ठ में काँपते हुए; गलगर्जना; (व० ६, ६, ८) । कम्पित कण्ठ; (ण०८ १५, ५)। गलच्छिय-वि० (दे०) पीडित, प्रेरित; गलिम-वि० (सं० गलित>प्रा० (जस० ३, १, ६)। गलिअ) गला हुआ, (जस० २, ३, १)। गणालि-स्त्री० (सं० गल+नालि) वि० (दे०) याद किया हुआ, स्मृत; गले की नाली; (जस० ३, ६, १)। (दे० ना० मा० २, ८१)। गलिय- गलत्यह-क्रि० (सं० गल+हस्त>गल- वि० नष्ट, नाश-प्राप्त, वीता हत्य >गलत्य) फेंकना, गले में हाप द्वारा ६, २, ७)। डालना; (भ०)। गलियंगछ-वि० (सं० गलितगर्व) निर- गलत्यण-न० (सं० प्रा० गलत्थइ) हंकारी; (व० १, ६, ३)। क्षेपण; (गलत्यिम=क्षिप्त, गलिय+छम्म-पुं० (सं० . गलित+ मा० २, ८७) । (प० च० ४१, १, छद्म) नाश-प्राप्त या नष्ट हुआ कपट; क० ७, १६, ६). गलत्यस्लिम -वि०. (दे०) फैका हुआ; गलियदेस-पुं० (सं० गलित+द्वेष) २. प्रेरित; (दे० ना० मा० २, नष्ट हुआ द्वेष; (क० २, १२, ३)। ८७)। गलियसर-पु० (सं० गलित+शर) गलत्पिय-वि० (सं० गत-+-स्थित > स्खलित वाण; (क० ३, २१, ८)। . हुआ; (ण० दे० ना० गलेलगी (२६५) गस . . गलेतगो-क्रि० भू० का० गले लगी; गविठ्ठ-वि० (सं० गवेपित) खोजा (व० ४, ७, ४)। हुआ; (भ०)। गल्त-पु. (सं० गल्ल) १. गाल, गिधेस-सं० गवेषय् >प्रा० गवेस कपोल; तुल० गु० गाल; (प्रा० गु० ३३, (सं० गवेषयति>प्रा० गवेसइ) गवेसइ- ५; दे० ना० मा० २, ८१) । २. हाथी कि० गवेपण करना, क्रि० गवेषण करना, खोज करना; (हे. का गण्ड-स्थल; (पड्) । ४४४, प० च० ११, १३, २, ण० ७, गल्ल-फोड- (दे०) डमरु, दाद्य २, २)। गविट्ठ-कि०, भू०का० (सं० विशेष, चमड़े से मढ़ा जाने वाला एक गवेपित > प्रा० गविठ्ठउ) खोज छोटा बाजा जो बीच में पतला होता है कर ली; (प० च० ३, ११, १०) । और हिलाने पर उसमें लगी घुडियों से गवेसन्त- व० कृ० (प० च० १६, बजता है, (दे० ना० मा० २, ८६) । १७, ६) 1 गवेतु-कि०, मा०, खोजो गवस-पुं० (सं० गवाक्ष>प्रा० गव (पाहु०) । टि०- मूल शब्द, गवेषणा वस) गवास, वातायन, झरोखा; (जंवू० का अर्थ गाय खोजना है। 'अन्वेषण' में ८, १५, ६)। -य; (प० च० १८, ६, अर्थ-विस्तार हुआ। ७) । तुल गु० गोख । गवेसय-वि० (सं० गवेपक >प्रा० गवे- गरण-न० (२० गमन>प्रा० गमण) सग, गवेसय) खोज करने वाला; (प० चाल; (को० ४, ५३) । च० १४, १०, १)। गवत-न० (दे०) घास, तृण; (दे०- गम्भु-पु० (सं० गर्भ>प्रा. गम्भ) ना० मा० २, ८५)। गर्भ, पेट के अंदर का बच्चा, भ्रण; गवय--पुं० (सं० प्रा० "धारिउ तहो मज्जएँ गन्भु;" (व० २, गाय; (जंवू० ५, ८, १५)। २,११)। गवल-पुं० (सं० गवल) जंगली भैसा, गव्व-पु. (सं० गर्व>प्रा० गन्व) जंगली पशु-विशेष, (प० प० ८८, अहंकार, अभिमान; (की० ४, ६५) । ६)। गवि-वि० (सं. गविन्) अभिमानी, गवा-स्त्री० (सं० गो) गाय; (प० च० गवं-युक्त; (दे० ना० मा० ७, ६१)। ८०, १३)। गग्विट्ठ-वि० (सं० गर्विष्ठ) विशेष गवाख-पुं० (सं० गवाक्ष) झरोखा; अभिमानी; (दे० (सि० १, ३४)। १२८)। गवायपी-त्री० (सं० गवादनी= गवीआ.-वि० (सं० गर्विताः) गवित; १. गोचर भूमि, २. नांद जिसमें गौनों (प्रा० पं० २, १५७)। को सानी खिलायी जाती है) वनस्पति- /गस-(सं० प्रस्>प्रा० गस) खाना, विशेष; (दे० ना० मा० २, ८२) । निगलना, -इव० गविप्र-वि० (दे०) निश्चित; (पड्) । (जंबू० १०, १२ १०)। गसेइ-कि० गवय) नील ना० मा० १, भक्षण करना।
सिं (२६६) गहवा अर्थात् शन्न - व० (सं० ग्रसते>प्रा०. गसइ) (भ०)। गहलोम-पु० राक्षसवंशीय राजा; (प. गसंत-व० कृ० (सं० प्रस्+शत) निग. च० ५, २६६)। लते हुए, भक्षण करते हुए; (ण० ७, ५, 1/गहगह-अक० (दे०) हर्प से भर २)। जाना। -इ व० (भ० ३, १, १२) । गसिम-वि० (सं० ग्रस्त >प्रा० गसिस) गहगहणुल्ल-पुं० (सं० ग्रह + ग्रहण भक्षित; (जंवू० १०, १३, १३) । उल्ल) ग्रहों की गति; ; (स्वार्थे प्र०) गसिर-वि० ग्रसनशील; (जस० २, (जस० ३, २८,१०)। १८, १०)। गहचक्का--स्त्री० ग्रहचक्रा, प्रासादभूमि- गह--पु० (सं० नाम-विशेप; (जस० २, ४. ८)। ग्रह>प्रा० गह) तल्लीनता, आसक्ति; (की० २, १७४) । गहलो-क्रि० (सं०/ग्रह,>प्रा० गह) २. सूर्य, चंद्र, तारे आदि ज्योतिष्क देव, पकडूंगा; "पर पुर मारि सत्रो गहलो," को उसके नगर में मार कर "मयण-गह पीडणेण; (विला०) । ३. भूत आदि का मैं अकेला ही उसे पकडू गा;(को०२,४१) आक्रमण, आवेश; "तं पेक्खें वि सस तुम्हहें केरि । काम- टि०-'गहलो' कि० भविष्यकाल में उ० प्र०, ए० में प्रयुक्त हुई है । "को'. वाला गहेण हूम विवरेरी"; अर्थात् उसे देख रूप मैथिल भापा के प्रभाव से हुआ है। कर तुम्हारी वहन कामग्रह से पीड़ित हो मूल रूप 'गहो' है । उठी; (प० च०५, ५,३; ण० २, ६, गहल-न० (सं० ग्रहण>प्रा० गहण) १)। टि०-अवांतरण से रिशाच । अर्य १. आदान, स्वीकार, (ण. १६.१३, संकोच से बुरा ग्रह । ४. ग्रहण, निरोध; २) । ३. लेना; (जं० १०, १०, ८) । (जस० १, २३, ५)। ४ भाग्य (प० च०)। ५. आमंत्रण, गह-सक० (सं० ग्रह >प्रा० गह) "जूएण पसिद्धी कित्ति जाहें, देवाविउ ग्रहण करना; (जस० १, ६, ५) गहिअ गहण उ तेग जाहे," अर्यात् उसने जिसकी क्रि० भू० का० पकड़ लिया; (जस० १, जूए में कीर्ति प्रसिद्ध थो, २४, ३) । गहिउ-क्रि०, भू० का० (आमंत्रण) दिलाया; (क० ८, १५,६) । ग्रहण कर लिया, वणु, जाइवि राएं तवु गहण-वि० (सं० गहन>प्रा० गहण) (महा० ६६, गहन (वन), १०, १)। दुर्गम, दुर्भेद्य; (जस० १, गहिवि-पू० का० क्रि० (सं० गृहीत्वा) १४, ३) । न० (दे०) जल-रहित प्रदेश; (दे० ना० मा० २, ८२)। पकड़कर; (सं० रा०)। गहती-स्त्री० (दे०) जबरदस्ती हरण गहकल्लोलु-पु. (सं० ग्रह >प्रा० गह की हुई स्त्री, दासी, वांदी; (दे० ना.. +दे० प्रा० कल्लोल =शन) ग्रहरी मा० २, ८४) । राहु, ग्रह-विशेष; (प० च० ११, ४)। गहर-पुं० (दे०) गीव पक्षी, गिद्ध कल्लोल=वैरी (दे० ना० मा०.२, (गृधः) (दे० ना० मा० २, ८४)। २)। गहवइ-पु. (दे०) १. चांद, उसको ग्रहण . गहिउ, गहवरिओ (२६७) गहिलिलय -. २. ग्रामीण; (दे० ना० मा० २, १००)। घोष करते हुए; (जंबू० १, १४, २) । पु० (सं० गृहपति) गृहस्थ, कुटुम्बिन्; गहिरसर-पु० (सं० गम्भीर+स्वर) (५० च० २५, १, २, जस० १, ३, गम्भीर स्वर "नियवि पुत्ताणणं गहिरसर १२)। वाइणा;" (जंबू० ३, ४,४)। गहवरिओ-वि० (दे०) क्षुब्ध, व्याकुल; गहिरिमा-स्त्री० (सं० गभीरिमन् > "देखि कुमरि मन गहवरिओ, मइ मेल्हिवि प्रा० गहीरिम) गाम्भीर्य; गम्भीरता; गउ नेमि-कुमारो;" तुल० गु० गभरावु; (क० १, १६, ६)। (प्रा० गु० २४, ५.)। गहिरु-वि० (सं० गम्भीर >प्रा० गहिस-वि० (दे०) १. टेढ़ा किया गंभीर) गहरा, तुल० म० गहिरा, मगही हुआ, मोड़ा हुआ; (दे० ना० मा० २, गहिर; (प० च० १, ५, ३)। गहीरु- ८५) । २. वि० (सं० गृहीत) ज्ञात, वि०, गहरा; (ण० १, ३, १) । उपलब्ध, विदित; (षड्) । गहिल-वि० (सं० ग्रहिल >प्रा० गहिआ-स्त्री० (दे०) काम-भोग के लिए गहिल) भूतादि से आविष्ट; (सुदं० ४, जिसकी प्रार्थना की जाती हो वह स्त्री; ४, ६)। (दे० ना० मा० २, ८५) । २. ग्रहण गहिलत्तणं-पु० (सं० अहिलत्वं) पाग- करने योग्य स्त्री; (षड्) । लपन, व्यर्थ हठ; तुल० गु० धेली; (प्रा० गहिय-वि० (सं० गृहीत) ग्रहण किया पं० १, ३)। हुआ; (ण० ७, १३, ३)। क्रि०, भू० गहिलिय, गहिल्ल-वि० (वे०( आवेश- का० पकड़े (विला०)। --ण (सं० युक्त, पागल, भ्रांत । टि०-उपयुक्त शब्द गृहीत+अन्य) अन्य ग्रहण किए "गहिय- (सं० ग्रहिल (१. लेने वाला, स्वीकार ण्णरूवजुयलो," अर्थात् अन्य युगल रूप करने वाला, २. अटल, कठोर) से व्यु- निर्माण किए; (जंबू०, संधि० १, त्पन्न नहीं है। गहिली-वि० स्त्री० (सं० ग्रहिल > गहियाहर- वि० (सं. गृहीत+अधर) प्रा० गहिलं) उन्मत्तः; तुल० गु० घेली; काटे गए होठ," क वि पियगहियाहरु (प्रा० गु० २, ३, ३६) । वहइ वयणु, छिज्जंतरोसु पसरंतमयj; गहिल्ल-वि० (सं० महिल>प्रा० गहिं- कोई प्रिय से काटे हुए अधरयुक्त मुख ल्ल) १. गृहोते; (म० १, १४, २)। को धारण कर रही है, जिसका रोग क्षय २. आवेश-युक्त, पागल, भ्रांतचित्त; हो रहा है, और मदन बढ़ (भ०)। (जंवू० ४, १७, १४)। (सं० ग्राहिल+क) गहिरक्सर-पु० (सं० गम्भीर+ १. उन्मत्त, पागल, २. मूर्ख, गवार (सं० अक्षर) गम्भीर घोप; "जय-जय गहिर- रा०) । ३. ग्रसित (ण ६, ७, क्खरभासणेण;" जय-जयं : का गम्भीर - १०)। . -- रहा है। . गहिल्लिय-वि० गहीर (२६८) गाड ६, २२, गीजे । ६) । तुल० प्राचीन म० -- ग्रह >प्रा० . गहीर-वि० (सं० गभीर>प्रा० गहिर, २) । गिज्जंत-व० कृ० गीयमान; (ण० गहीर) गहरा, गम्भीर; (जस० १, १८, १३; दे० ना० मा० १, १०१) । /गह ण -सक० (सं० गा-क्रि० (सं० गतः) गया; (उ० य्य. गह) १. ग्रहण करना, लेना; २. जानना प्र० १४-३०)। ---१२० (षड्)। गाम-न० (सं० गान प्रा० गाअ) शरीर, गां-पु. (सं० ग्रामम् >प्रा० गन्म) देह; (प्रा० पं० २, ८६)। गांव; (उ० व्य० प्र० ११-२१)। गाइ-स्त्री० (सं० गो>प्रा० गाई) गांग-स्त्री० (सं० गङ्गा) गंगा नदी । गया; गाय; (प्रा० ५० २, ६३; ण० ६, (उ० व्य० प्र० ५-२३); गांगहि; (रा० २५)। ६, २)। गा-सक० (सं० गै० >प्रा० गा) गाना, गाइम-न० (सं० गीत >प्रा० गाइम) अलापना । -६ क्रि०, व०; (प्रा० ३० गीत, गाना; (ण० ७, १२, १) । २, १६२)। -इज्जइ कर्मवाच्य, गाइ गाइत्ति-स्त्री० (सं० गायत्री) स्त्री- ज्जद मंगलु धवलसार," अर्थात् धवल व विशेष; (ण० ८, १२, ६) । श्रेष्ठ मंगल गाए जाने लगे; (जंवू० ४, गाइय-न० (सं० गीत>प्रा० गाइम) १५, १) । गाइज्जत-व० कृ० (जस०) । गीत; गाइयाई- न०, न०, द. (क. गाइज्जमाण-कृ० (क० ३, १, ६)। ३, ८, ५)। --उ नि० व०; (प्रा० ० २, १६२) । गाई-स्त्री० (सं० गो) गाय, गया; गायइ-व० (सं०१/ गै) गाना; (जस० (दे० ना० मा० ४, १८)। १, ५, १७)। गायंत-व. कृ० (सं० गाउँ-पुं० (सं० ग्राम >प्रा० गाम) गै+शतृ) गायत्; (जंवू० ५, १, १९)। गांव; (उ० व्य० प्र० १६-१४) । गायंती-व० ० गाती हुई; (प० च० गाएक-उ~पु० (सं० . गीत>प्रा० १४, १०,८)। गाव-क्रि०व० गान गाइम) "गाएव्वउ नच्चेव्वउ करना, "मत्त पताका पिंगल गाव' पिंगल सचितु;" अर्थात् विविध प्रकार का गाना इस मात्रा पताका का गान करता है; व नाचना सीखा; (जंवू० ४, १२, (प्रा० ५० १, ४८)। गाविज्जए-कम- १३)। वाच्य गीत गाए जाते थे, "नीलनेसणत- गोवीएँ गाविज्जए," नीले वस्त्रों वाली गागेज्ज-वि० (दे०) मथित, आलोहित; गोपी द्वारा गीत गाए जाते थे; (जंबू० (दे० ना० मा० २,८८) । ५, ६, ११)। गिज्जइ- कर्मवाच्य गागेज्जा-स्त्री० (दे०) नवोढ़ा, दुल- (सं० गीयते) गया जाता है, "गिज्जइ हिन; (दे० ना० मा० २,८८) । नच्चिज्जइ न पढिज्जइ;" अर्थात् (जंवू- पाछ-पु० (सं० गच्छ) . वृक्ष; पेड़; स्वामी का नाम लेकर) गाया, नाचा (प्रा० पं० २, १४४; को०४, १६) । व पड़ा नहीं जाता; (जंवू० ४, १०, /गाउ-(दे०) गड़ जाती थी; "कां गाना, गडिआ (२६६) गामा ग्राम>प्रा० गाढ-वि० . मन गाड गोवोलि गमारन्हि छाड;" गामंतर--पु० (सं० ग्रामान्तर) दूसरा अर्थात् र्गवार ग्वालों को छोड़कर नाग गांव; (जस० ४, ११, ४, क० ५, १०, रिकों के मन में गड़ जाती थी; (को० २, ४)। १५१) । गाम-पु. (सं० गाम) गडिअ-वि० (दे०) विधुर, वियु- गांव; तुल० म० गांव, गु० गांम; (ण० क्त; (दे० ना० मा० २, ८३) । जस० १, ३, १५)। गाडू-पु. (वै० सं० कद्र क (ऋ० १०॥ -लग्ग वि० (सं० ग्राम+लग्न) ग्राम १४११६) > कद्दुअ> गड्डुअ> गाडुअ) के निकट; (जंबू० २, १६, १०)। गामो--०, ए, (की० गडुआ लोटा, अधिकरण कारक; बधना; २, गांव में; (की० २, ६३) । १८३) । (सं० प्रा० गाठ) दृढ़ गामउड, गामऊड-पुं० (दे०) ग्राम का (जस० २, ८, १; जंयू० ६, ४, ६)। मुखिया, (दे० ना० मा० २, ८६; प०- —त्तण पु० (सं० गाढत्व) दृढ़ता; च० ६६, ८)। (जंवू० ८, ११, ६)। -य वि० (सं० गामगोह -पुं० (दे०) गांव का मुखिया; प्रा० गाढ) १. गाढ़ा, जो पानी की तरह (दे० ना० मा० २, ८६) । पतला न हो, २. विकट, ३. घनिष्ठ, गामणह-न० (दे०) ग्राम-स्थान; ग्राम- गहरा; (सं० रा०)। प्रदेश; (पड्) । गाढिम-वि० (सं० प्रा० गाढ) गाढ़, गामणि, गामणी-पु० (दे०) गांव का गाढ़ी, दृढ़; (जंबू० १०, १४, ३)। मुखिया; (दे० ना० मा० २, ८६)। गाढिम-वि० (प्रा० गाढ =ढ़, मज- गामणी-वि० (सं० ग्रामणी) १. श्रेष्ठ, बूत, अत्यत, अतिशय) तेज, प्रधान, नायक; (षड्) २. पुं० तृण- "जोअण्णा घावहि, तुरय णचावहि वोलहि विशेष; (दे० ना० मा० २, ११२) । गाढिम बोला;" अर्थात् युवक सैनिक गामरोड-पु० (दे०) छल से अथवा घोड़ों को दौड़ाते हुए नचा रहे थे और ग्राम के लोगों में फूट उत्पन्न कर गांव जोर की बोली में बोलकर उन्हें डपट रहे का मालिक या मुखिया बन बैठने वाला; थे; (की० ४, ११०)। (दे० ना० मा० २, ६०)। गारग-वि० (सं० गायन) गवैया; (दे० गामहण-न० (दे०) ग्राम-स्थान, गांव ना० मा०२, १०८)। का प्रदेश; (दे० गाणी-स्त्री० (दे०) वनस्पति-विशेष; ६०)। (दे० ना० मा० २, ८२) । गामा-स्त्री० (सं० ग्राम>प्रा० गाम) गाध-वि० (सं० प्रा० गाध) उथला, गांव; "मायंग धणासु कला भवरणा गामा जो गहरा न हो; (दे० ना० मा० ५, रंग रिणरंतरे,” (यह भारतवर्ष) मातंगों २४)। (हाथियों), धन-धान्यों, सुंदर कलापूर्ण जोर से, ना० मा० २, गांमार (३०.) गालि-मसूरा १,१०, - भवनों एवं रंग-बिरंगे गांवों से निरंतर गाय-पु० (सं०. ग्राह>प्रा० गाह) मंडित रहता है; (व० ६, १, २) । मगर, घड़ियाल; (जस० गामार-वि० (दे०) ग्रामीण; (जंवू० ५, ७)] ६, १)। गायअ-वि० (सं० गीत>प्रा० गाइस) गामि - वि० (सं० गामिन्) गामी, जाने गाया हुआ; {ण० १, ३, १४) । वाला; (जंबू० ३, ५, २) । गामी-वि० गायण-पुं० (सं० गायन>प्रा० जाने वाली; (जंबू० १, १८, ७)। गाउण) गाने वाला, गवैया; (प. च. ग्राम; (व० २, १७, १)। ८, १, ७, सि० १, २६) । स्त्री० गाने नामिन-वि० (सं० ग्रामिक) देहाती, वाली; (जस० १, २७, २) । गायणु- गंवार; (दे० ना० मा० २, १००) । पुं० गायक; "वर गायरा कवि देपालू गामिणि-वि० स्त्री० (सं० गामिनिका ए,” (प्रा० गु० २६, ७)। >प्रा० गामिणि) गमन करने वाली, गायरी-स्त्री० (दे०) गर्गरी, कलशी, "रे धणि मत्तमअंगगामिणि, खंजलोअणि छोटा घड़ा; (दे० ना० मा० २, ८६)। चंदमुही;" (प्रा० ५० १, १३२) । गार-वि० (सं० कार) कार्य करने गामिनी--वि स्त्री० (सं० गामिनिका> वाला, कारक, कता; (भ०)। प्रा० गामिणिआ) गमन करने वाली गारउ-पु. (सं० गौरवम् >प्रा० स्त्री; (भ०)। गारव) १. महत्त्व, वहप्पन; (भ०)। गामिय--वि० (सं० (सं० गामिन् >प्रा० २. अभिमान; (प्रा० गु० ५, ३५; सुदं० गामि) जाने वाला; (भ०) । १२, २, ४) । गारव; (म० २,१६, गामिल्ल, गामिल्लुम, गामीण-वि० १०)। (सं० ग्रामिक) ग्रामीण, गॅवार; (प० च० गारह-वि० (सं० एकादश >ऍग्गारह ७७, १०८; दे० ना० मा० ८, ४७) । (प्रा० ३०), इगारह (प्रा० ३०)> गामोजण-पुं० (सं० ग्रामीण जन> गारह) ग्यारह; (प्रा० ५० १, १७७)। प्रा० गामीणजण) गांव के निवासी लोग; गारि-वि० (सं० कारिन्) करने वाला; (जंबू० ३, १, १६)। (भ०) स्त्री० गाली; (को० २,१८६)। गामणी-स्त्री० छागी, अजा, बकरी; गारि-क्रि० (दे०) गारता है, गिराता (दे० ना० मा० २, ८४)। है; (की० २, १८३)। गामेल्ल-भास--स्त्री० (सं० ग्रामीण+ गारी--क्रि० (सं० गालय >प्रा० गाल, भापा>प्रा० गामिल्ल, गामिल्लुअ+ गालयइ) गारना, छानना, गिराना, पीना; भासा) ग्रामीण भाषा; (प० च० १, ३, (की० २, १८३) । गालिम-पुं० (अ० गिलमानं) नौजवान गामेश-पु० (सं० ग्रामेश) छोकरे; (की० २, २१६)। राजा; (दे० ना० मा० २, ३७) । गालि-मसूरा-स्त्री० (दे०) सं० गण्डो- - ११)। गाँव का गाली (३०१) गि. गया हुआ, गाहु) छंद- पधान; तकिया, मसकद; "सोहई जासु (सं० गाह >प्रा० गाह) गाहना, ढुंढनां । कपोल-पालि जणु गालि -मसूरा;" तुल० गाहंतउ-कृ० प्रविष्ट होने पर; (जस० गु० गालमसूरिजं; (प्रा० गु० २२, ४, २६, ३) । गाहंते -कृ० प्रवेश करके, १४)। "दुग्गम गाहंते कर चाहते वेरि सथ संह- गाली-स्त्री० (सं० प्रा० गालि) गाली, एइ जम;" अर्थात् दुर्गम स्थानों में प्रवेश अपशब्द, असभ्य वचन; (सुदं० ६, २०, करके कर वसूल करते उसने वैरियों ६)। के समूह का यमराज के समान संहार गाव-वि० (दे०) गत, किया; (की० ३, ८२)। गुजरा हुआ; (पड्)। गाहा--स्त्री० (सं० गाथा>प्रा० गाहा) गाव-पु. (सं० गर्व>प्रा० गव्व) छंद का नाम; (प्रा० ५० १, ५७) । अहंकार, धमण्ड; (भ०)। गाहिणी-स्त्री० (सं० गाहिनी>प्रा० गावि-वि० (सं० गवित >प्रा० गाहिणी) गाथा का भेद; (प्रा० पै० १, गविय) गर्व-युक्त, जिसको अभिमान हो ५१) । गया हो वह; (भ०)। गाहुलि-पु० स्त्री० (दे०) ग्राह, मगर, गावि-स्त्री० (सं० गो>प्रा० गावी) घड़ियाल; (दे० ना० मा० २, ८६)। गया, गः; (उ० व्य० प्र० १३-२७) । गाहू-स्त्री० (सं० प्रा० -उ व० (सं० धेनवः) गाएं विशेष, मात्रिक छंद का नाम; (प्रा० "गाविउ खीर खिरंति अमोहउ," (जंवू० ५०, ५१)। १, १३, ७)। गिदू -स्त्री० (सं० कन्दुक >प्रा० गास-पु० (सं०. ग्रात>प्रा. गास) गेंदुअ) गेंद; (प्रा० ५० १, १५७) । कवल, ग्रास; (भ०; जस० २.७, गिभ-पु० (सं० ग्रीष्म >प्रा० गिम्ह) १३)। गरमी का मौसम ग्रीष्म; (ण० ३, १४, गाह-पु.० (सं० गाथा >प्रा० गाहा= १०; जस० ४, १६, ७; सुदं० ११,४, १. छद-विशेष, आर्या, २. १; सं० रा०)। -आगम (गिभागम) ३. निश्चय) १. स्तुति, २. कथा, वृत्तांत; पु० (सं० ग्रीष्मागम) ग्रीष्म ऋतु का (सं० ग०) । पु० (सं० ग्राह) आग्रह, आना; (सुदं० ६, १७, ४) । पूर्वाग्रह, हठ; (म० १, १६, ५)। पु गिभयाल-पु० (सं० ग्रीष्म+काल) (सं० प्रह) कुग्रह; (जंबू० ६, २, ७)। ग्रीष्मकाल; (क० १, ११, ४) । माहु-पु० (दे०) स्नेह, "तव चरणहों गिमारी-पु. ग्रीष्म+अरि) उवरि णिवच , गाहु;" (जस० ४, २, ग्रीष्मकाल रूपी शव ; "गिभारिहि रूट्- ६)। ठउ सुरडु जिह;" (जस० २, ३२, ८) । गाह-सक० (सं० ग्राड य>प्रा० गाह) गिज्ज-पुं० (सं० गीत>प्रा० गीय) ग्रहण करना; (जंबू० १०, . १४, ६)। गेय, गीत, पुरउ प्रतिष्ठा, - . - - "कइया कि गिज्झ (३०२) गिरिनंद ग्रहण करने ४,८, गीउ- अप्पणु गायइ रहसि अभीउ;" अर राम गिरि लहिअउ वेवि तुरङ्ग," अर्थात् कभी वह अपने सम्मुख होते हुए अर्थात् दोनों भाइयों ने सुलतान से कह- गीत को स्वयं अकेले में निर्भीक होकर कर दो घोड़े प्राप्त किए; - (की० ४, गाता; (जस० १, ५, १७)। ६०)। -गयर पु० (सं० गिरिनगर) गिज्झ–वि० (सं० ग्राह्य>प्रा० गिज्झ) नगर-विशेष (ण० १, १५, ६)। योग्य; (जस० -सिहर पुं० (सं० गिरिशिखर) नगर- ८)। विशेष; (ण० ६, ८, ६)। /गिह-(सं० ग्रह >प्रा० गह) ग्रहण गिरा-स्त्री० (सं० गिर् >प्रा० गिरा) करना; (जस० ४, १५, ११) । गिन्हइ वाणी, भापा, वाक्; (जस० ३, ३०, -क्रि०, व० (सं० (सं० गृहाति>प्रा० ६) । गिण्हइ) ग्रहण करना; (भ०)। गिरिद-पुं० (सं० गिरि+इन्द्र) हिमा- गिद्ध-पु० (सं० गृध्र>प्रा० गिद्ध) लय; (जंवू० ४, १०, ५) । गीध, पक्षी-विशेष; (प० च० १७, १३, गिरि-पुं० (दे०) वीज-कोश; (दे०- ८)। ना० मा० ६, १४८)। गिद्धि-स्त्री० (सं० गृद्धि>प्रा० गिद्धि) गिरि-पु० (सं० प्रा० गिरि) गिरि, आसक्ति, लम्पटता; (सि० १, ६) । पर्वत; (जस० १, १७, ६; प्रा० ५० १, गिम्ह-पु० (सं० ग्रीष्म>प्रा० गिम्ह) ७४) । –कडणि स्त्री० (सं० गिरिक- गरमी का मौसम; (सं० रा०; जस० २, गिरिमेखला; (जंबू० ५, ८, २८, ११)। -याल पु० (सं० ग्रीष्म १४)। काल>प्रा० गिम्हकाल) गरमी का काल; गिरिकंदर-पु० (सं० गिरिकन्दरा) (प० च० १३, १, ७) । पर्वत की गुफा; (व० २, २, ७)। गिम्हि-स्त्री० (सं० ग्रीष्म>प्रा० गिरितणय-स्त्री० (सं० गिरितनया) गिम्ह) ग्रीष्म ऋतु; (सणतु० ४४७) । पार्वती; (जंवू० ५, ६, १४) । गियउ-क्रि० भू० का० गया; 'एहु जम्मु गिरितुल्ल- गिरितुल्ल-वि० (सं० गिरितुल्य) गिरि नग्गहं गियउ' यह जन्म नागा (व्ययं) के समान; (जंवू० ६, ४, १०) । गया; (प्र० चि०)। गिरिररि-स्त्री० (सं० गिरिविवर) गिर-स्त्री० (सं० गिर्>प्रा० गिरा) पर्वत की दरार; (जंबू० ९, १०, वाणी, भाषा, वाक; (सं० रा०; जंबू० १६)। ५, १३, १३)। गिरिदारिणी-स्त्री० (सं० प्रा० गिरि- /गिर--(सं० गृ>प्रा० गिर= दारिणी) विद्या-विशेष; (प० च० ७, कहना) बोलना उच्चारण करना, कहना, १३६)। निगलना; (षड्) । गिरि-पू० का० क्रि० गिरिनंद-पु० वानरवंशीय राजा; (प० कहकर; (की• ४, ६०)। "वेवि सहो च० ६, ८४)।. टनी) .
गिरिनइ (३०३) गिहवार - उस , गिल)गु० गिरिनइ-स्त्री० (सं० गिरिनदी) गिरि- गिलिअ-वि० (सं० गिलित>प्रा० नदी; (जंबू० ८, ७, ७)। गिलिअ) निगला हुआ, ग्रसित, भक्षित गिरिमूई-पु० विप्र-विशेष-नाम; (प० (जंवू० ६, ५, ८) गिलिय; (ण० ७, ३, च० ५५, ३५)। २)। गिरिवइ-पुं० (सं० गिरिपति) पर्वत; गिल्ल-वि० गीला, आर्द्र; (ण ८, "गिरिवइ-संठिउ अइ-उस्कंठिउ;" (व० १५, १; महा० २६-५-३)। २, २०, १५)। गिल्लगंडु-वि० गीले गंडस्थल वाला; गिरिघरि-पु० (सं० गिरिवर) गिरि- (सं० गिरिवर) गिरि- "तहिं हाउ गाउ णं गिल्लगंडु." राज, पर्वत, (व० २, ७, ८) (सरोवर) में उन्होंने स्नान किया, जैसे गिरिसिंग-न० (सं० गिरि+शृङ्ग> गीले गंडस्थल वाला हाथी हो; (रि० ६, प्रा० गिरि+संग) पर्वत के ऊपर का भाग, शिखर; (जंवू० ७, ८, ७)। गिव-पु-(सं० प्रीवा) गला; (प्रा० गिरीस-पुं० (सं० गिरीश>प्रा० पं० १,६८)। गिरीस) १. हिमालय, २. शिव; (प्रा० गिल्वाण-पुं० (सं० गीर्वाण>प्रा. पं० १, २०६)। गिव्वाण) सुर, देव; (जंवू० ७, ११, ३)। 1/गिल-(सं० गू.>प्रा. -पुरी स्त्री० (सं० गीवणिपुरी) स्वर्ग- गळवु। -इ निगलना; (प० च० १६, पुरी; (व० ७, १०, २)। –सेल पुं० ३, २; जस० २, २०, ८)। गिलंत (सं० गीर्वारशैल) सुमेरुपर्वत; (व० ६, व० कृ० गिलत् (जस० ३, ३०, १)। १३, ५)। गिलति-क्रि० निगलना; (सुदं० ६, ६, गिह-क्रि० (सं० गृह णति) ग्रहण करना; ८)। गिलती-क्रि० स्त्री० निगल रही (उ० व्य० प्र० ७.२६)। थी; (क० ३, १७, १०)। गिलिउ- गिहथ हि-स्त्री० (सं० गृहस्थम्) गृह- भू० का निगल लिया; (महा० ६८, १०, स्थी, गृही; (उ० व्य० प्र० ४६-२०)। १२) । गिलिज्जद्द-नि० गिहवइ-पु० सं० गृहपति) गृहपति निगल गया; (सुदं० ५, ७, २१) । रल (कोषागारामात्य), "कण्णा-सेणा- "णिसिरक्खिएँ ताम गिलिज्जइ," निशा- वइ-थवइ-मंति गिहवइ-तुरंगु-करि विहिय- राक्षसी ने उसका निगल लिया, (सुदं० सति," अर्थात् कन्यारत्न (रानी), सेना- ५, ७, २१)। गिलिज्जइ-कर्मवाच्य (स० पति रत्न, स्पलपतिरल (शिल्पी) मन्त्री गिल्यते) निगली जाती है; (हे० ३७०, रत्न (पुरोहित), गृहपति रत्न (कोषागा- २) । गीलेसि-व० निमलता है; (सरह, रमात्य), तुरंग रत्न और करि रत्न चर्यापद)। (मातंग-गज), (व० ८, ४, ४)। गिलण-न० (सं० गरण) प्रसन, निग गिहवार-न० (सं० गृह+द्वार) गृह- लना; (जस० १, ६, १०)। द्वार; (ण० ६, २०, १६)। . भु० का. . , गिहवास (३०४) गुजा गि सिम गिहयास-पु० (सं० . गृहवास>प्रा० गीयपुरा-न० (सं० गीतपुर>प्रा० गिहवास) घर में निवास; (व० २, १६, गीयपुर) जन द-विशेप; (प० - च०-५५, १.)। ५३)। -पुं० (सं० गृहाश्रम>प्रा० गीव-स्त्री० (सं० ग्रीवा >प्रा० · गीवा) गिहासन) गृहस्थ-आश्रम; (भ०; जंबू० गरदन; (ण० १, १७, ३) । २, ६,३)। गोवा-स्त्री० (सं० ग्रोवा>प्रा० गोवा) गिह वरण-पु० ग्रहण, "माऊर इंति कण्ठ; (क० ३, १५, ६)। गिह्वण-कंएण;" अर्थात् मयूरी उन्हें वार- गुछ-पु० (सं० प्रा० गुच्छ) गुच्छा, बार पकड़ने के लिए आती है; (व० १, स्तवक; (जस० १, २३, १२). ४, १२)। गुंछा-स्त्री० (दे०) १. विंदु; २. दाढ़ी- गीम-स्त्री० (सं० ग्रीवायाम्) कण्ठ; मूछ; ३. अधम, नीय; (दे. ना० मा०. (उ० व्य० प्र० ६-२२) । २, १०१)। गोम-न० (सं० गीत >प्रा० गीय) गुजकियं-क्रि०, भू० का० (सं० गुञ्ज- गीत; (जस० १, २७, २; की० २, कृत) गूंज उत्पन्न कर दी; (जंबू०.१०, ६१)। १६, ४)। गीअउ--पु० (सं० गीता>प्रा० गीआ) /गुज--(सं/गुञ्>प्रा० गुज) छंद-विशेष; (प्रा० पं० २, १६६) । गुन-गुन करना। गुजंत-व० कृ० (सं० गोडु-क्रि० (सं० गृहीत >प्रा० गाहिम) गुञ्+शतृ); (जबू० ४. २२, ४)। उठाए है, "जब कुम्में धरियउ धरणिवीद्रु, गुजरिया-क्रि० भू० का० (सं० गुञ्जा- तो कुम्मु पडन्तउ केण गीदु" अर्थात् यदि रिता) गुजारित हो रही थी; "कहिँ मि धरती की पीठ कछुए ने उठा रक्खी है हयदंडवग्घेहि गुजारिया;" (जंबू० ५, तो तिरते हुए कछुए को कौन उठाए है," ८, १५)। गुजिय-क्रि०, भू० का? (प० च० १, १०, २) । (सं० गुञ्जित) गुजार करते थे, "मुहम- गीति-स्त्री० [सं० गीति>प्रा० गीइ) रुमिलंतगुजियभमरु;" अर्थात् मुख की गीत, गान; "गंधव्य गीति दुन्दुहिल वर सुगंधित आश्वास से आकृष्ट होकर एकत्र परिमल परिचए जान को;" (की० ४, हुए भौरे गुंजार करते थे; (जंबू० १, २१८) । १२, ५)। गीय--१० (सं० गीत >प्रा० गीय) गुजरी माला-स्त्री० सं० : गुजा+ गानं, ताल और बाजे के अनुसार गाना; माला>प्रा० . गुंजा+माला) गुजा (ण० ६, १५, ५) । बि. जो गाया जा माला; (हिं का० च०.२८)। जा सके; (प० च० १६, ६, १; जस० गुजा-स्त्री० (सं० गुञ्जा>प्रा० १, ५, १७)। -सद्द पुं० गीतशब्द; गुजा) १. गुजा, फल-विशेप; (जस० (जस० ४, १७, १२)। १, ६, १०)। २. गुंजा वृक्ष-विशेष;
गुंजाविहाणनयर (३०५) गुर्जर , गुण्डक- 1 ऊपर "सिरिसु सेवन्नि-सेहालिया-सिसमी सज्ज- गुथइ-क्रि० (सं० प्रथ) गूंथना, गर्वना; गुंजा-सभी-" अर्थात् कहीं सिरीप, (ण० ५, ८, १४)। सेवाणि, शेफामिका, शीशम, सर्ज, गुंजा गुदा, गुंपा-वि० (सं० और शमी के वृक्ष थे; (अंबू० ५, ८, मलिन) १. दुव', पापी, कुमागी, बदमाश १०)। २. छला; (दे० ना० मा० २, १०१)। गुंजाविहाणनयर-पु. नगर-विशेष; ३. स्त्री० (दे०) बिंदु; (दे० ना० मा० (प० च० १०१, ५६)। २, १०१)। गुमुज्जल-वि० (सं० . गुजा+ गुफ'-पु० (सं० गुम्फ्) १. रचना, उज्ज्वल) गुजा के समान -- उज्ज्वल, २. गूथना, ग्रन्थन; (दे० ना० मा० १, दाहरु गुजुज्जललोयणु;" ओठों को १५०) । २. गुप्ति, कारागार, जेल; काटते हुए गुजा. के समान चमकीले (दे० ना० मा० २, ६०)। लोचन; (जंबू० ५, १३, ११)। गुंफर--पु. (सं० गुल्फ एड़ी के गुजेल्लिक स्त्री०, (फ़ा० गुंजलक) की गांठ, टखना, घुट्टी; "गूढ़ेहिं गुफेहि, १. गुंजलक, गेंडुली, २. कपड़े आदि की ‘णं मंतगुफेहिं," इनके गुल्फ गूढ़ है मानों शिकन ! टिप्पणी-दे० ना०मा० में इसका कोई गम्भीर मंत्रणा कर रहे हों; (जस० अर्थ 'पिण्डी कृतम' दिया है, अर्थात् सूत, १, १७, १४)। रस्सी आदि का गोल लच्छा (दे० ना०. गुंफो-स्त्री० (दे०) क्षुद्र कीट-विशेष, मा० २, ६२)। करखजूरा; (दे० मा० २, गुजेल्लिम-वि० (दे०) इकट्ठा किया ६१)। हुआ; 'दे० ना० मा० २. ६२) 1. गुआल-पु० (सं० गोपालक>प्रा० गुंठ-पुं० (दे०) अधम अश्व, दुष्ट गोवल) ग्वाला, गौ पालने वाला; (उ० घोड़ा; (दे० ना० मा० २, ६१) । वि० । व्यं० प्र० ५-१४) । (दे०) कपटी, मयावी; (जंवू० ४ २१, गुग्गुल-पु. (सं० प्रा० गुग्गुल) सुगंधित ११)। द्रव्य-विशेष; (सुदं० ६, १०, ६)। गुठिअ-वि० (सं० 'गुण्ठित=घिरा गुणु रावत-पु० (सं० गुलगुलायित > हुआ, ढका हुआ) '१. धूसरित, २. व्याप्त; प्रा० गुलगुलाइय) गम्भीर गर्जन करने का "३. आच्छादित; (दे० ना० शब्द; गड़गड़ाहट, हाथी का हपित गर्जन; .८५)। (की० २, १०४)। गुठी-स्त्री० (दे०) स्त्री० का वस्त्र- गुर्जर-पु० (सं० गूर्जर>प्रा० गुप्जर) विशेष; (दे० ना० मा० २, ६०)। १, गुर्जर देश का राजा, २. गुजरात के गुंड-न० (दे०) मोथा (एक प्रकार की निवासी, ३. गुर्जर जाति, (प्रा० १० १, घास) से उत्पन्न होने वाला तृण-विशेष; १५१) । ४. गुजरात प्रदेश; तुल० म० (दे० ना० मा० २,६१)। गुजर; (भ०)। ना० - - मा० १, m - गुजरि (३०६). मुण ७)। . ३६, ३) । .. गुज्जरि-स्त्री० (सं० गुर्जरी) गूर्जर देश भिण्ण-भिण्णभुवलंभो;' गुड़ आदि से. (गुजरात) की स्त्री; (सुदं० ४, ६, जहां-जहां भिन्न-भिन्न माधुयं की उपल ब्धि होती है; (जंवू० १०, ६, ३) । गुज्जलिअ-वि.० (दे०), संघटित; गुडिआ-जी० (सं० । गुटिका->प्रा०. . (षड्) । गुडिआ) गोली, गुलेल; (प्रा०. पं० १,. गुज्झ-वि९ (सं० गुह,य>प्रा० गुज्झ) ६७) । गोपनीय, छिपाने योग्य; (५०, च, १४, गुडिउ-वि० (सं०. गुडित) कवचयुक्त; ७, ६; सुदं० ४, ११, ७ जस०.३, "करि ढुक्कु सपहरणु सरिउ. गुडिउ," अर्थात् वहाँ स्मरण करने से कवच एवं गुज्झयत्त-पु० (सं० गुह,यवार्ता>प्रा०. शस्त्रों से युक्त हाथी उपस्थित हुआ;; गुज्झ+वत्त) गोपनीय बातचीत; (सि०. (जंबू० ६, ११, ३) । १, २०)। गुडोलद्धिा-स्त्री०. (दे०) चुंबन (दे०-. गुज्झहर-वि० (सं? गुह यधर) रहस्य.. ना० मा० २, ९१.) ।। भेदी; गुप्त वात को सबके सामने कह देने गुड्डिया-स्त्री० (दे०), पताका, तुल०, वाला; (दे० ना० मा. ३, ६३) । गु गूडी; (प्रा? गु १५, ६) । गुड-० (सं? प्रा०. गुड) कवच:- गुउ-पु० (दे०.). गोड़, पार्व, पैर, विशेष; (प० च० ४०, ६, १.०)। चरण; तुल० गु०. गूडो; (प्रा०, गु: ३६. गुड, शक्कर, "गुडसक्करलड्डु व लेवि खणे;" (क०.२, ७, १) | सारि २६) 1,गोड्डा (प्रा० गु० १२,४१) । कवच; (व० ५, ७, १,१)। गुड्ड-पु.० (सं0 गौड>प्रा. गोड), गुड़-सक० (सं? गुड्>प्रा० गुड़) हाथी गौडदेशवासी, ब्राह्मणों का एक वर्ग, को होदा आदि मनुष्य-जाति-विशेषः, (संधि०. १०, २,. लगा, कर सजाना, 'हाथि गुड' – हस्तिनं गुडति । गृह रक्षा याम् । गुडंति-क्रि०, व० व, (जंबू० ५.. गुड्डर---पु.० (दे०) तंबू, डेरा; (जंबू० . ६, ४)। ५, १०,२३) ।, गुडवालिप-वि.० (दे०) इकट्ठा , किया, गुड्डर-पु., (दे०) : गुहार (युद्ध में . हुमा; (दे० ना० मा०.२, ६२) । प्रयाण करने हेतु की गई.ध्वनि) "गुड्डर . गुडसोल्ल-पु० (सं०: गुड़+सोल्ल= उम्भिय, रियणं खुभिय,' अर्थात् अस्-ि पक) गुर से तैयार की गई., एक प्रकार . जनों को क्षुग्ध कर देने की मिठाई; (५० च० ५०, ११, ध्वनि , कर दी गई; (७०.४,.. २४, , १२)। १), गुड़ाई-स्त्री० (सं० गुर- आदि). दाख.. /गुण-(सं० गुणय > प्रा० गुण), आदि, "जत्थ गुडाईण जहा . महुरत्त.. गिनना । -इव० (संगणयति) गिनना;, २. ३)। वाली गुहार गुण (३०७) गुणाणिके - ७; प्रा० ३० ग्राम वि० -- . . गुणवान; "पिय महों;' -घर (प्रा० ५० १, १०७) । गुरिंण-पू० का० गुणवान; (प्रा० ५० १, १७१)1-बई कि०; (प्रा० पं० २, २१४)। स्त्री० वानररानी; (प० च० ६, ६९) । गुण-पु. न० (सं० प्रा० गुण) -सीला वि० (सं० गुणशीला) गुणों से १. धनुष की प्रत्यंचा; (जंबू० ५, १४, युक्त; (जंवू० २, ११, ७)। -हार ११) । २. गुण अच्छाई; (जस० १, २, पुं० हार की लड़; (जंवू० १, ६५)। ६)। गुणों का आगार; (की १, ८५)। गुणंति-कि० डोरी चढ़ाना; 'गुणंति -जुत्त वि० ० गुण, स्वभाव, धर्मयुक्त; धणु' धनुष पर डोरी चढाना; (महा० (जंबू० ४, ६, ११) । -टंकोर पु ६६, १३, ६)। धनुष की टंकार; (व० ५, १०, ७)। गुणस्खय-पु० (सं० गुण+क्षय) गुणों --ठाण पु० (सं० गुणस्थान); (क० ६, का क्षय; (ग० ६, १४, ३)। -ठान १६, ८)। -थाण वि० (सं० गुण- (गुणठान-पु० (सं० गुण+स्थान) स्थान) गुणों के निधान; (जंबू० ४,४, आत्मा की उन्नति की चौदह अवस्थाएँ ५)। -थाम वि० (सं० गुणस्थान) बतायी गई है, जिन्हें गुणस्थान कहा जाता गोत्तवइ तासु गुणथा- है; (ण० १, १२, ११)। -धम्म (गुण- (जंबू० ४, २, ३)। धम्म) पु० (सं० गुण+धर्म) पुरुष- पुं० वणिक पुत्र का नाम; (प० च० विशेष; (ण० १, २, ४)। -वइ स्त्री० १०३, ८)। -निलउ वि० (सं० गुण- (सं० गुणवती) स्त्री-विशेष (ण० ७, ४, निलय) गुण-निधान; (जंवू० २, ५, २) । ६)। -निहि पु० गुणनिधि, मुनि-विशेष- गुणगुणति-क्रि० (सं० गुनगुनाय) ध्व- नाम; (प० च० ८२, ६५)।-परिमिअ न्यात्मक, गुनगुनाना; "चाउद्दिसु मसया वि० (सं० गुणपरिमित) गुणों से वेष्टित; गुणगुणंति, चारों दिशा में (जंबू० ३, ६, १)। -बंध पु० मेख- (मच्छर) गुनगुनाए; (सुदं० ११, १५, लावन्ध, रस्सी, डोरी; (जंबू० १०, १८, ७) । ११)। -भाय वि० सं० गुण+भाग) गुणग्गल-वि० (स० गुणार्गला) गुण- गुणभाजन; (जंबू० ५, १३, ३०)। शालिनी, "मरिवि जसोहहों पत्ति गुण- ---मंत वि० गुणवान्; (प्रा० ग्गल हुई चंदलच्छि चंदुज्जल," , अर्थात् १४६) । -मन्ता वि० गुणवान् (की. वह जीव मरकर यशोध राजा २, १३४) । -मंदिर वि० (सं० गुणम- शालिनी, चंद्र के समान उज्ज्वल चंद्र- न्दिर) गुण-निधान; (जंबू० ३, २, १२)। लक्ष्मी नामक पत्नी हुई; (जस० ४, २७, -~-वंत वि० (सं० गुणवत् >प्रा० गुण- ३) । वंत) गुणी, गुण-युक्त; (प्रा० पं० २, गुणाणिकेअ-वि० सं० गुणानिकेत) ४४) | --वंति वि० (सं० गुणवती) गुणों का घर; (क० २, २, ८) । मशक 4०२, की गुण- गुणाणियरें (३०८) गुणाल रानी-विशेप नाम; ७)। गुणारिणयर-~-वि० (सं० गुणनिकर) १,१५, ४) । गुणों का समूह; (क० ५, १८, ४)। गुणवय-न० (सं० गुणव्रत >प्रा० गुण- गुणणिलअ--वि० (सं० गुणनिलय) गुणों व्वय) जैन गृहस्थ को पालने योग्य व्रत- का निधान; (क० ३, १६, ६) । विशेष; (भ०)। गुणणिहाणु-वि० (सं० गुणनिधान) गुणवल्ली-स्त्री० गुणागार, गुणी; (व० १, १०, (प० च० १३, २६)। ११)। गुणविणीय-वि० (सं० . गुणविनीत) गुणमरिय-वि० (सं० गुणभृत) गुणों से गुणविनीत, विनम्र (क० ५, १६, भरपूर; (क० १, १५, ११) । गुणमह-स्त्री० (सं० गुणमति) १. दाश गुणसम्मुद्दा-स्त्री० : दाशरथी भरत की रथी भरत की प्रणयनी; (प० च० ८०, प्रणयिनी; (प०. च० ८०, ५२) । ५) । २. वणिक पुत्री का नाम; (५०. गुणसायर-वि० (सं० गुणसागर) गुणों च० १०३, ६)। का समुद्र, गुणों से भरा; (जस० ४, २७, गुणमाला-स्त्री० विद्याधर राजपुत्री; १.)। पु मुनि-विशेष-नाम; (प० च० (प० च० ५४, ४२)। २१, ७१). -गुणसायरु वि० गुणों गुणमेलम-वि० (स० गुणमेलक) गुण का सागर; (व० २, १, १०)। समूह; (जस० १, २३, ३) । गुणसिंधु-वि० (सं० गुणसिन्धु) गुणों गुणमोयण-वि० (सं० , गुणमोचन) का समुद्र; (जस० ४, २८, १)। गुणों का अपहरण करने वाले, "तं गुणसेढि-स्त्री० (सं० गणश्रोणि) गण भोयणु गुणमोयणु पिसुणसमानउ दीसइ; की सीढ़ी "गुणसेढिठाणेण, , जोइ व्व (जस० २, २३, १३)। णाणेण," अर्थात् गुण की सीढ़ी पर चढ़ने गुणरसाइ-पु० (सं० गुण+रस+ से योगी का अज्ञान दूर हो जाता है; आदि) रसादि गुण; (जस ४,.१३, (जस० १, १७, ४)। ४)। गुरगहणणि-वि० (सं० गुणहननी) गुण- गुणराइय-वि० (सं० गुण+राजित) धातिक, (जस०)। गुणों से शोभायमान; (जस० ४, २४, गुणाणुरत्त - वि० (सं० गुणानुरक्त) गुरणों में अनुरक्त, "विहिय गुणाणुरत गुगलच्छि-स्त्री० (सं० गुणलक्ष्मी) मेइणि-वहु,” अर्थात पृथ्वी रूपी वधु को गुणों रूपी लक्ष्मी; (व० २, ५, १५)। . गुणों से अनुरक्त कर लिया; . (व० २, गुणवंत-वि० - (सं० . गुणवत् >प्रा० २, ४)। गुणवंत) गुणी, गुण-युक्त, गुणवान् (म०; गुणायर-वि० (सं० गुणाकर) गुणों की महा०६६, १३, १२)। खान; (क० ३, ३, ११) । गुणवमाल-वि० गुणों से भरपूर; (क० गुणाल-वि० (सं० गुणवतु >प्रा० गुणि- २५)।
गुंणांसिउँ (३०६) गुप्पं प्रवृत्ति से ल्ल) गुणी (पुरुष), गुंण-युक्त; (ण० ३, वचन और शरीर को अशुभ ३, ६; क० १०, २७, १)। रोकना; (जंबू० १०, २०, ७)। गुणासिउ-वि० (सं० गुणाश्रित) गुती-स्त्री० (सं० गानी, गानिका) गांती, वह चद्दर जिसे प्राचीन काल में गुणाश्रित; (व० ४, २२, १३) । लोग अपने सिर पर लपेटते थे और अब गरिएम-वि० (सं० गणित>प्रा० भी साधु लोग अपने गले में बांधे रहते गणिअ) पठित, शिक्षित; (ण. हैं। स्त्रियां वच्चों के गले में अब भी बांधती हैं, (दे० ना० मा० २, गुणिय-वि० (सं० गणित) अभ्यस्त; १०१)। (जस० १, २४, ६) । गुत्यंड-पुं० (दे०) पक्षी-विशेष; (दे०- गुगु-पु० म० (सं० प्रा० गुण) उप- ना० मा० २,६२)। कार, भलाई; (प० च० गुत्य-वि० (सं० प्रथित>प्रा० गुत्थ) १२, ५, गूधी हुई, गुम्फित; (विला०)। ११)। गुद-पुं० स्त्री० (सं० गुद न०) गुदा, गुण्डा--पुं० (फा० गुदः) खमीरी आटे मलद्वार; (दे० ना० मा० ६, ४६)। का फूला हुआ गोला; (को० २, १७४) गुन-पु० न० (सं० प्रा। गुण) गुण; गुत्त-पु० न० (सं० गोत्र>प्रा० गोत्त, (की० १, ७६) । गुत्त) गोत, वंश, कुल, जाति; (जंवू० ८, गुनिन-कि० (सं० गुण्य >प्रा० गुण) १०, १२) । वि० (सं० गुप्त>प्रा० स्मरण करना, सोचना, चिता करना; गुत्त) गुप्त, प्रच्छन्न; (जंवू० ८, १६, ६; (को० ३, ५२) । ण० ६, २५, १६)। गुन्तइ-क्रि० (सं० गुणय् >प्रा० गुणइ >अप० गुण्णइ) आवृत्ति करना, याद गुत्तण्हाण-न० (दे०) पितृ-तर्पण; (दे०. करना; (को० २, १७)। ना० मा० २, ६३)। गुप्पंत-न० (दे०) १. शय्या २. वि. गुत्तायर-पुं० (सं० गोत्राचार) खान- रक्षित; ३. संमूढ़, घबड़ाया हुआ, व्या- दान का आचरण; (जंबू० कुल; (दे० ना० मा० २, १०२)। गुप्पन्त-वि० (दे०) · स्त्री० गुप्पन्ती; गुत्ति--स्त्री० (सं० गुप्ति >प्रा० गुत्ति) व्याकुल; (प० च० ४६, ३)। कैदखाना; (ण० १, १२, ४) । ४)। स्त्री० --उ वि० ढका हुआ, "रसणा-हार-दाम- (दे०) १. बंधन; २. सिर पर पहनी गुप्पन्तउ" अर्थात् 'करधनी, हार और जाने वाली फूल की माला; (दे० ना० मालाओं से ढका हुमा,' (प० च० २०, मा० २, १०१)। १०, ५)। गुत्तित (सं० गुप्तिनय) मन, /गुप्प-(सं० गुप्>प्रा० गुप्प) व्या- . .
गुप्पवित्र (३१०) गुरु - गहरा; प्रस्खलित, . , मूढ़, मूर्ख; पैर काट से उखड़ा कुल होना; -इ व० (ण० ५, ६, ८)। २. गहन, ३. गुप्पमाण-कृ० (सं० गुप्पमान); (ण० ८, ४. आपूर्ण, भरपूर; (दे० ना० मा० २, १५, ८)। १०२)। गुप्पविअ-वि० (सं० गोप्य>प्रा० गुम्म-पु० न० (सं० गुल्म) सेना- गुष्प) गोपित, छिपाने योग्य; (क० १०, विशेप, जिसमें २७ हाथी, २७, रथ, ८१ . १३, १)। घोड़ा और १३५ प्यादा से ऐसी सेना; Vगुप्प-(दे०) निकलना "अंताई (प० च० ५६, ५)। गुप्पंति, रुहिरेण थिप्पंति," अर्थात् आते गुम्मइअ-वि० (दे०) १. निकल रही हैं, रुधिर से सन रही हैं; (दे० ना० मा० २, १०३)। २. पूर्ण (क० ३, १५, ८)। किया हुआ; ३. स्खलित, ४. मूल से हटा गुप्फाविय-क्रि०, भू० का० (सं० गुल्फा हुआ; ५. विघटित, वियुक्त; (दे० ना०- यित) गुल्फ बन गए; "चलणलुलंत-अंत मा० २, १०३)। गुप्फाविय," अर्थात् उनके गुम्मिअ-वि० (दे०) मूल लिये जाने से आंतों के गुल्फ बन गए। हुआ, उन्मूलित; (दे० ना० मा० २, (जंवू० ६, १४, १२)। ६२)। गुफगुमिअ-वि० (दे०) सुगंध-युक्त; गुम्मी-स्त्री० (दे०) इच्छा, अभिलाषा; (दे० ना० मा० २, ६३) । (दे० ना० मा० २, ६०)। गुमगुम-क्रि० (सं० गुमगुमाय् >प्रा० गुम्मु-पु० न० (सं० गुल्म>प्रा० गुम-गुम, गुमगुमाअ) गुमगुम आवाज गुम्म) लता, वल्ली, वनस्पति-विशेष; करना, (ण० २, १४, १०) । (सुदं० (व० ४, २२, ३)। ११, १२,६; जस० २, २७, ५)। गुरु -वि० (सं० प्रा० गुरु) बड़ा, महान् गुमगुमंत-व० कृ० गुनगुनाते हुए; (ह. (सं० रा०)। २. शिक्षक (उ० व्य० प्र० १७, ३)। गुमगुमंति---गुन-गुन करना; ५०-२३) । ३. द्रोणाचार्य; "गुरु आस- (विला०) । गुमुगुमुगुमंत-व० कृ० गुन -व० कृ० गुन त्थाम-कलिंगचार," (भारत रणभूमि) गनाते हुए; (ण० २, १४, ३)। गुमुगु- गुरु (द्रोणाचार्य) अश्वत्थामा और कलिंग- मुगुमन्त -व० कृ० (ध्वन्यात्मक) गुम राज के संचरण से युक्त थी; (जंवू० ५, गुम करते हुए (humming); (प० च. ८, ३२) ४. वृहस्पति; (व० १०, ३४, ४०, १६, ६)। १७) । ~लोए पुं० गुरुजन; (को० २, गुमगुमिय-वि० (सं० गुमगुमायित> २३)। गुरव-देखो गुरुः 'जो 'जो गुरवे प्रा० गुमगुमाइय) जिसने गुम-गुम साहीणे धम्म साहेइ पोढबुद्धिओ,' (प० आवाज किया हो वह; (सुदं० ६, ११, च० ६, ११४)।- ४)। १, २१)। -अर वि० (सं० गुरुतर) गुभिल-वि० (दे०) १ मूढ़, मुग्ध, तुलनात्मक रूप से अधिक भारा; (प. गुरुक; (प्रा० ५० (३११) गुलिये मुलखेड- गुल च० ४,१०, ६)। -कमारूढ वि० गुल-न० (दे०) चुंबन; (दे० ना० मा० (सं० गुरुक्रमारूढ) गुरु परंपरा-प्राप्त; २, ६१)। जस०) 1-क वि० (सं० गुरु+क) -पुं० ग्राम-विशेष; (जवू० १, महत्; (जस० १, १४, ४)।-कउ ४, १)। वि० [सं० गुरु+क (स्वार्थ.)>प्रा० Vगुलगुल-(सं० गुलगुलाय् >प्रा० सुरु] महान्, बड़ा; (सुदं० ११, १३, गुलगुल) हाथी का हर्ष से गरजना, गुल- १२) --क्किय वि० (सं० गुरुकृत.) गुल आवाज करना । -इ अक० (भ०)। महान्; (सुदं० ८, ७, ३)। -कको वि० गुलगुलंति-क्रि० (सुदं० ११, १५, (सं० गुर्वी>प्रा० गरुई, गरुगी) बड़ी १०) । गुलगुलंत-व० कृ० (सं० गुलगु- "जाय जिणहो ता सङ्क गुरुक्की," अर्थात् लाप+शत) कृ० (सुदं० ६, १६, जिनको बड़ी शंका हुई; (प० च० २, २) । गुलगुलायंत- कृ० (ध्व०) (१० १०, १),। -जुअल पुं० (सं० गुरुयुगल) च० १०२, २०)। गुलगुले वि-पू० कां० (छंदशास्त्र में) द्विगुरु चतुष्कल (s) का क्रि०, गुलगल' आवाज करते हुए (प.. नाम; (प्रा०.५०)। -ता स्त्री० गुरुता च० १०, १०, १।। तुल० म० (प्रा० १० १,,४१) -दक्खिण्ण स्त्री० गुल। गुरुदक्षिणा (रि० ४, ५)। -पंथःपुं० गुलामा-Ji० गुलाम, सेवक, नौकर-- (सं० गुरुपथ). दीर्घयाना चाकर; "गोहन नहि पावहि वथ्थु नचा- (जंबू० १०, ८, १२)-11-यण पु गुरु- वहि भूलल मुलहिं गुलामा;" अर्थात् जन; (जस० २० १६, १०)। अपने घरों या डेरों को पहचानने में भूले वि० (संp गुरुतर) (व०.१, १७, १६)। हुए गुलाम या'सेवक इधर-उधर घूमते रह -व पु० विवाह-भोंज, तुल० गु० गोरव; जाते थे; (को० ४,११७)" ग सामो (प्रा० गु. ११, १७) । २. वि. (सं० पुं०, कर्ताकारक (की० २,. गुरुक) भारी, "गरुवपवाहपडिउ गउ १६६)। सायरे;" (जंवू०.६५, ७)।-हर गुलिन–वि० (दे०) मथित, विलोड़ित; पुं० (सं० गुरु-भर):भारी वजन या (पड, दे० ना० मा २२ १०३, सुदं ६, बोझ; (प० च०.७, १०, ८) —हार १६, १२)।' वि० (सं० गुरुभारा=किसी भी भार गलिआ-स्त्री० (दे०) १: गेंदे, कंदुक; को धारण करने वाली स्त्री) गर्भवती, २: गुच्छा; (दे० ना० मा०२, १०३)। "गुरुहार हूझ एत्तहें विसइ''' अर्थात् गुलिया स्त्री (दे०) कंदुक, पत्थर की 'यहां वह सती गर्भवती हो गई, (पं०. गेंद; (क० ७१५, ११)।। च० १६१, ६) टि०-मूल अर्थ में-परि- गुलियउ-पु० (संठ • गु लच्छ>गुलु वर्तन । २. वि० सं० गुरुभार), अधिक च्छ) गुच्छा, स्तवक; "जहिं दक्ख रसा- भार; (जं० ४, ७, ३)। लउ । गुलियउ अमरेहि मि ईहि (य)। लंबा पथ; यह व6.. - '. गुलिया (३१२) गूणि .. " . । '५०, ११, - . उ;" अर्थात् जहाँ मीठी द्राक्षा लताएं है, वती स्त्री; (प्रा० ५०:१, ६५) । जिनके गुच्छ देवों के द्वारा चाहे गए हैं। ग सुव-पु० (सं० गो+सुत) बछड़ा; (१०:च० ६, ५, ६)। (सि० १,६)। गुलिया-वि० (सं० ग ल पु० =गुड) /गह-(सं० गुहू. संवरणे, /गुह, > मधुर, "गुल नामिहिँ पिययम लियइ, प्रा० गुह; सं० गृहति) छिपाना, गुप्त कि मुह ग लिया हुंति;" (प्रा० । गु० ६, रखना; (उ० व्य० प्र० ४६-२८) । ': १६)।-रअ वि० मधुरतर; तुल० गु० गुह-पु. (सं० प्रा०. गहा), गफा, गळयुमिठाई; (प० च. कंदरा; (प० च० १६, ६, ६; जस० १४)। ४, १६, ११)।-मुह पु० (सं० गुफा- गुलियाठाण-पु० (सं० ' गुलिका+ मुख) गुफा का प्रवेश-द्वार; (व० २, ८, स्थान) गुटिका रखने का स्थान, "गुलि- ६)। याधुणु विणोएँ कामें किउ, गलियाठाणु गहिर-वि० . (सं० : गम्भीर>प्रा० नाहिमंडल किउ;", अर्थात् उनका नाभि- गु हिर) गहरा, सघन, रहस्ममय, कठि. मंडल ऐसा प्रतीत होता था, मानो काम. नता से समझने योग्य । (सं० रा०)। देव ने विनोदपूर्वक गुलिया-धनुष (गुलेल) बनाया हो, जिसमें उनका गुहिलं-वि० (दे०, प्रा० गहिर) गहन, नाभिमंडल तो गुलिया था; (जंवू० ४, गहरा; (प० च० २७, १४:१)। १३, १३)। गु हिलु-वि० व्याप्त, "पवलंङ्कुरू इन्द- गली-ग हाडा-पु० (दे०) हल्ला; तुल णील-ग हिलु"; अर्थात् 'प्रवालों और मगही गुलं-गुहाड़ ( (शबरपा, चर्यापद)। इंद्रनील से व्याप्त हैं,' : (१० गुलुछ-पु० (सं० गुलुञ्छ>प्रा० ५, ३)। गु लुछ) गुच्छ, गुच्छा; (दे० ना० मा०. गूफ-(सं० ग न्फ ग्रन्थे to . string २, ६२)। together) वांधना, गूथना; (उ० च्य० गुलुगु छिम-वि० (दे०) वाड़ से अंत प्र० ५१, २७) । रित या ढका हुआ या पृथक् किया हुआ; गूमा-पु. (सं० गुवाक=the betel (दे० ना० मा० २, १३) । nut. tree), एक प्रकार की सुपारी; /गुलुग्गल-चिंघाड़ना; -न्ति व०, (रा० २२) । व० (प. च० ३२, ३, ७).. गूगुलिमा-स्त्री० ब्राह्मण-जाति-विशेष, गु लुच्छ--वि० (दे०) भ्रमित घुमाया तुल० गु० - गूगळी; (प्रा. गु० ७, हुआ फिराया हुआ) (दे० ना० मा० २, ५)। ६२) गूजरुदेसु-पु. (सं० गूर्जरदेश) गुजरात; गुबिगि-स्त्री सिं पा विशी) गर्भ (प्रा० गु० ७, १०)। म . 1- 'च० ६, .
गूढ (३१३) गेरुम -ल न० . ना० मा० - प्राप्त गृह णाति) - गूठ-वि० (सं० प्रा० गूठ) गुप्त, गेज्ज-न० (सं० ग्रेवेयक) हार, कंठा; प्रच्छन्न; (भ०)।-तण पु० (सं० गूढ- (प० च० २६, १३, ३)। त्व) गहनता, जिससे कोई अर्थ छिपा हुआ ग्रीवा का आभरण; (दे० ना० मा० २, हो; (ण० १, १७, ५)। -पुरिस पु ६४)। (सं० गूढपुरुष) जासूस, भेदिया, गुप्तचर; गेज्म-वि० (सं० ग्राह्य >प्रा० गेज्झ) (प० च० १६, १, १)। -मंदिर पु० ग्रहण-योग्य; (जस० ३, २२, ४) । (सं० [गूढमन्दिर) मंत्रणाकक्ष; (व० ४, गेड्ड-न० (दे०) १. पंक, कोच; ११, १२)। २. यव, अन्न-विशेष; (दे० गरिण-स्त्री० (सं० गाणिक>प्रा० गोण) २, १०४)। गौन, एक प्रकार का बौरा; (म० १, गेणिहम-न० (दे०) स्तनाच्छादक १४, ७)। वस्त्र; (दे० ना० मा० २, ६४)। गूतउ-वि० (दे०) व्याकुलीकृत; "ससि /गेह-(सं०/ग्रह, > प्रा० गह) वयणि-गूतउ, मेह-कलि खूतउ, रंगि निर -इ क्रि० व० (सं० गृह्वाति) गेण्हंत- खइ निखूतउ;" (प्रा० गु० २०,३)। व० कृ० (सं० गृह णत्) ग्रहण कर; Vण्ह-(सं० ग्रह उपादाने) (ण० ५, ७, २)। गेण्हिवि-पू० का० करना । -इ सक० (सं० क्रि०; लेकर; (ण० ३, ८, १५)। गेण्हें वि ग्रहण करना; (हे. ३३६, १)। पू० का० कि० (प० च० २, ११, ६)। गठि-स्त्री० (सं० ग्रन्थि>प्रा० गेंट्ठि) गेण्हेविणु-पू० का० क्रि० (सं० ग्रह+ गोठ; (की ३, ३३)। गेंदुस्त-न० (दे०) कञ्चुक, चोली; एविणु (व० २, १६, १०)। गेण्हु-भू. कर्म कृ०; (प्रा० पं० २, १२७) । (दे० ना० मा० २, ६४) । गेहण-न० (सं० ग्रहण>प्रा० गेण्हण) गॅई-स्त्री० (दे०) क्रीड़ा, खेल; (दे०. भादान, ग्रहण; (प० च० २५, १७, ना० मा० २, ६४)। ३)। गेम-न० (सं० गेय >प्रा० गेअ) गीत; (जंवू० १०, ८, ६)। -रव पु० (सं० गे -पु० (सं० गृध्र>प्रा० गिद्ध) गेय+रव) गीतरव; (जंबू० ६, २, ६)। गिद्ध, पक्षी-विशेष; (व० ५, १२, गेग्गदुः -पु० (ध्वन्यात्मक) ढोल के १३)। पीटने की आवाज; (प० च० ५६, १, गेय-० (सं० गेय>प्रा० गेअ न०) ११)। गीत; "गोवालगेयरंजियमणेण;" गेज्ज-न० (सं० गीत >प्रा० गीय) अर्थात् वहां ग्वालों के गीतों से मनोमुग्ध गीत, "मणोज्ज गेज्ज पन्तिणो," जैसे होकर; (जस० १, ३, १४) । सुंदर गीत पंक्तियां हों, (प. च० १७, गेयाइ–न० (सं० गेय >प्रा० गेअ) गान; १६, ८) । वि० (दे०) मथित, विलो (प० च० २, ४, ३)। ड़ित; (दे० ना० मा० २, ८८)। गेरुन-वि० (सं० गैरिक>प्रा० गेरिअ) गान, गेले (३१४) गौ गेरुआ, गेर रंग का; (व० ५, १३, वौर; (दे० ना० मां० २, ६५) । १०)। गोंड-ज० (दे०) कानन गोंड देश का गेल-~भू० का० (सं०/गम>प्रा० जंगल, तुल० ते० कोन्ड; (दे० ना० मा०- गच्छ) गया, गए; तुल० मगही गेल २, ६४)। (कुक्कुरीपा, चर्यापद; की० ३, ३६) । गोंडी-स्त्री० (दे०) मंजरी, वौर; (दे०- टि०-अवहट्ट भाषा में 'ल' प्रत्यय का ना० मा० २, ६५) । प्रयोग भूतकाल में किया गया है । इसके में किया गया है । इसके गोंदल-पु० (सं० · गुन्दल =मृदंग का दो रूप मिलते हैं, १. कहल, चलल आदि; शब्द; प्रा० गुदल खुशी की मावाज) २. गेल, भेल आदि । आनंद, घोर संग्राम; "सुहडगोंदलुद्दाम. गेवज्ज-न० (सं० ग्रंयक>प्रा० कलयलं" -घोर संग्राम में अच्छे-अच्छे गेदिज्ज, गेवेज्ज, गेवेज्जय) ग्रेवेयक देवों योद्धाओं की पंक्तियां टूट गई; (ण० ४, का विमान; (जंवू० ११, १२, ५) १०, ७) । गोन्दल-न० १. आनंद २. स्वर्ग; (व० १०, २०, १६) । ध्वनि; (प० च० २४, २,२)। गेवेज्जिम-न० (सं० ग्रंयक >प्रा० २. सुरत (संभोग) व्यापार संग्राम; गेविज्ज, गेवेज्ज, गेवेज्जय) ग्रं वेयक देवों (प० च० २६, ५, ८) । ३. अव्यवस्थित का विमान; (जंबू० ११, १२, २)। जनसमूह; (प० च० ४०, ७, ३)। गेह-न० (सं० प्रा० गेह) घर, मकान; (प० च० १, १६, ५; प्रा० पैं० २, ६६; गोंदलिय-वि० (सं० गुन्दल>पा० जस० १,२६, १७)। गेहु, (सा. गुंदल) खुशी में लीन, "हिँ मणहरमर- १८४)। गयहरियपिंछ, मायंदगोंछि गोंदलिय रिछ" गेहत्य-पुं० (सं० गृहस्थ) ब्रह्मचर्य- और जहाँ मरकत मणि के समान मनो- हर हरे पंखों से युक्त शुक आमों के विवाह करके दूसरे पश्चात् आश्रम में प्रवेश करने वाला, गृही। गुच्छों पर आनंद-मग्न दिखाई पड़ते हैं; घर-वार वाला; (ण० ६, २०, १६) । (ण० १, ६, १२)। गोहालु-वि० (सं० गेहवत्) घरवाला, गो-स्त्री० (सं०.प्रा० गो) १. धेनु; गृहस्थ, गृहस्थाश्रमी; (प० च०३१, (जस० १, ३, , ६) । २. जल; (जंवू० २, ८३)। ५, ३) । ३. नेन; (प० च० २६, १०, गेहिणि-स्त्री०. (सं० .गहिनी>प्रा० १०) । पुं० (सं० गः) गुरु वर्ण (5); रोहिणी) गृहिणी, स्त्री; (जस० ३, २७, (प्रा० पै० २, १)1-इल्ल वि० (सं० गो+मत्) गो-युक्त, जिसके पास अनेक गोंछ-पु० (सं० प्रा० गुच्छ) · गुच्छा, गाय हों वह; (दे० ना० मा० २, स्तवक; (ण० १, ६, १२)। १८)। गोंजी, गोंठो-स्त्री. (दे०) मंजरी, (दे०) मंजरी, गोअंट-पु. गोअंट-पु० (दे०) गी का पालन के - १२)। . चरण, गोअग्गा (३१५) गोडं. पं० १, तीन चार मा०- गोयान, . २. स्थल में होने वाला शृङ्गाट का वृक्ष; वरों को चलाने के समय मारते हैं; (दे० ना० मा० २, ६८)। प्राजन-दण्ड (कोड़ा, चाबुक, अंकुश); गोअग्गा-स्त्री० (दे०) रथ्या, मुहल्ला; (दे० ना० मा० २, ६७) । (दे० ना० मा० २,६६)। गोच्छ-पु० (सं० प्रा० गुच्छ, प्रा० गोअला-स्त्री० (सं० गोपालक>प्रा० गुच्छ्य) गुच्छा, मंजरी; (प० च०६, गोवालअ) दूध बेचने वाली स्त्री ग्वालिन; ६, ५)। (दे० ना० मा० २, ६८) । गोच्छा-स्त्री० (सं० प्रा० गुच्छ>प्रा० गोआ-स्त्री० (दे०) गर्गरी, कलशी, कलशी, गुच्छय) मंजरी, बौर; (दे० ना० मा०- छोटा घड़ा; (दे० ना० मा० २, ८६); २, ६५)। गोआल-पु० (सं० गोपाल) मध्यगुरु मध्यगुरु गोज्ज-पु० (३०) गवैया, गायक; चतुष्कल (151); (प्रा० (प० च० ८५, १६)। २५)। गोट्टओ-पु० (सं० गोष्ठी>प्रा० गोट्ठि गोआलिया-स्त्री० (दे०) >अव० गोट्ठ, गुट्ट) समूह; (की० २, अंगुल लंबा एक बरसाती कीड़ा जिसे २१२)। घिनौरी या गिजाई भी कहा जाता है गोठ-पु. (सं० गोष्ठ>प्रा० गोट्ठ) (प्रावृपि कीट-विशेषः) (दे० ना० गायों के रहने का स्थान, २,६८) गोवाड़ा; (जंबू० ८, १५, ११)। गोट्- गोआसण-स्त्री० गोशाला; (सं० ठंगण-० (सं० गोष्ठ+आङ्गन) रा०)। गोठ-प्रांगण; (जंवू० १, ७, ६) । "जिह गोइ-वि० गुप्त "राम चरित रसाल "राअ चरित्त रसाल गोट्ठङ्गणे मणि-रयण-वत्थु;" अर्थात् एहु गाह न राखहि गोइ (की० १, 'जिस प्रकार गोठ प्रांगण में मणि, रत्न ५८)। और वस्त्र; (प० च० ४, १, २) । गोउर--न० (सं० गोपुर>प्रा० गोउर) गोटि-स्त्री० (सं० गोष्ठी>प्रा० नगर का दरवाजा; (प० ५० १,७,७; गोट्ठी ( मण्डली, समान वय वालों की जंवू० १, ६, १)। सभा; (सुदं० १०, ६, १)। गोउल-न० (सं० गो+कुल >प्रा० गोठिय-पु० (सं० गोष्ठिक>प्रा० गो+उल) गौओं का समूह; (ण० ८, गोदिल्लय) एक मण्डली के सदस्य, १६, ६)। समान-वयस्क; "अम्हि धुरि गोठिय आव- गोचरिअ-क्रि० गोचर करना, साक्षात युह आगे अछह निवाणु;" (प्रा० गु० ७, भेंट करना; (को० ३, ६)।-उँ भू०. २३)। का० भेंट की; (को० ३, १५२) । गोडं-पु. (दे० प्रा० गोड) पाद, गोच्चय--पु० (दे०) कोड़ा, चाबुक, चरण, पर; 'गोडं घरि वह बटे हुए चमड़े की डोर जिससे जान अभेड' -चरणे धृत्वा श्वानं भित्तावा- - : कूकुरु भिति गोड (३१६) गोमंडल वरी, दक्षिण पं० २, किया जाता दिन. या एक . म्येड्यति; (उ० व्य० प्र० ५०-१८) । १८, १०)। गोड-पुं० १. (सं० गौड>प्रा. गोड) गोदा-स्त्री० (सं० प्रा० गोदा). गोदा- देश-विशेष; (भ०)। २. गौड देश का भारत की । एक नदी; राजा (प्रा० पं० २, १३२) }-राअ (पड्) । गोड देश का राजा, (प्रा० गोदाण-पुं० (सं० गोदान) गाय का १११) । -हिवइ पुं० (सं० गोडाधि दान; (जस० ३, ६, ३)। पति) गौड देश का राजा; (प्रा० ५० १, गोदुह–पुं० [सं० गोदोह=गाय का १२६)। दोहन (जो उकड़ बैठकर गोण-पुं० (दे०) सामी; (दे० ना० है)] उकडू सासन, "गयसुडयगोदुहा- मा० २, १०४) । सणेहि, दिणपक्तमासकयपारणेहि;" गोणा-स्त्री० (दे०) गाय, गया; अर्यात् वे स्थित होते थे तो गजगुण्ड (पड्)। (सीधे खड़े) या गोदुह (उकडू, आसन) गोरिणक-पु० (दे०) गायों का समूह; से । वे आहार करते थे. एक (दे० ना० मा० २, ६७) । पक्ष या एक मास के अंतर से; (जस० गोती-वि० (सं० गोविन्>प्रा० गोत्ति) ४, १६, १२) । समान गोत्र वाला, कुटुम्बी; "जे साजण गोवण-पु. (सं० गो+घन) गायों ते खल थियई गोती चूका गोताचारा; का समूह; (जंदु० १, ६, १२)। .. (प्रा० गु० ५, ३०)। गोधूम-पु० (सं० गोधूम>प्रा० गोतंकली-स्त्री० (सं० गोत्र-कलह) गोहूम) गेहूं; (जंवू० ५, ८, २९) । वंश, कुल अथवा जाति की फलह; (सुदं० गोपय-न० (सं० गोप्पद) गौ का खुर; ३, १,६)। (५० च० ४६, २, ४)। गोत्त-पुं० न० (सं० गोत्र>प्रा० गोपुर-पुं० नगर का प्रधान हार; गोत्त) गोत, वंश, कुल जाति; (जस० (को० २, ६७) । १, १, ३; जंबू० ८, ७, १६) |-वंधव गोप्पय-पुं० गोपद, गाय के बुर से. वि० (सं० गोन-बान्वव) अपने गोत के जमीन में पड़ने वाला गड्ढा, "जं अन्तरु लोग, सगोत्र वांघव, (प्रा० ५० १, ३, गोपयसायराहुँ,” 'जो अंतर गोपद और ७) । -~~वइ स्त्री० (सं०. गोत्रवती) समुद्र में; (प० च० १८, ७, ५)-1 गोत्रवती .. नामक स्त्री; (जंबू० ४, २, गोनूइ-मुं० विप्र-विशेष-नाम; (प० च० १) ।.. ५५, ३५) । गोत्तका-पु० (सं० गोत्र+क्रम) वंश, गोमंडल-पु० (सं० गौ (पृथ्वी)- गोत का क्रम; (ग० ६, ८, ६)! मण्डल) १. गायों का संघात या समूह, गोसमु-पुं० (सं० गौतम) व्यक्ति २, पृथ्वीमंडल; (जंबू०... १, ११ नाम-विशेप, गोतम (हिज); (व० २, १३) । .
गोमठ गोरा (३१७) - मार्ग या गौर+ गोमठ-पु. (फ़ा० गुम्बद, गुम्बज) गोयम-पु. (सं० गौतम) गौतम, गूमठ, गुम्बज, मकबरा; (की० २, व्यक्ति-विशेष-नाम; (प्रा० गु० १०, २०८)। ७)। २. महावीर के गणधर इदभूइ; गोमहा-स्त्री० (दे०) रथ्या (वह स्थान (प० च० २०, ६३)। जहां कई एक सड़कें एक दूसरे को काटती गोयर-वि० (सं० गोचर) भूमि में हों, रथों के आने जाने का विचरने वाला, "मंसरतफेक्कातरक्ख- सड़क); मुहल्ला; (दे०. ना० मा० २, साण गोयरं," अर्थात् मांस के लोभ में विचरने वाले राक्षस फे-फे करते वहां गोमय-पु० (सं० गोमय). गोबर, गौ फिर रहे थे; (क० १, १७, ६)। का गू; (जंवू० २, ६, २)। गोरंगी-वि० स्त्री० (सं० गोमाउ<पु० (सं०. (सं०. गोमायु>प्रा० अङ्गी) गौर अंग वाली; (जंवू० ३, ३, गोमाउ, गोमाअ) गीदड़; (प० च० ६६, ६)। १३)। गोरंफिडी-स्त्री० (दे०) गोधा, गोह, गोमिरिण-स्त्री० (सं० - गोमिनी) गोपी; जंतु-विशेष; जंतु-विशेष; (दे० ना० मा० २, (जस०.३, ३, ३)। १८)। गोमुह-पु० (सं० गो+मुख) गौ का गोर-वि० (सं० गौर) श्वेत वर्ण वाला। मुंह; (सि०१, १७)। गौरी; (रा० १५)। गोमेय-पु० (सं० गोमेघ>प्रा० गोमेह) गोरड-स्त्री० (सं० गौरी >प्रा० गोरी) शुक्ल-वर्णा-स्त्री; "अरे आगए तुह वलि यज्ञ-विशेष, जिसमें गौ का वध किया जीतज्यो गोरड-करउ वालंभु । अरे इसई जाता है; (सि० १, ३४) । रलिय वचतु निसुणेविणु आणयउ गोमेह-पु० (सं० गोमेध) गोसव यज्ञ, वसंतु;" तुल० गु० गोरडी; (प्रा० गु० यज्ञ-विशेष, जिसमें गो का वध किया २१, ४)। जाता था, अश्वमेघ के प्रकार का एक गोरडित-वि० (दे०) ध्वस्त; -(षड्)। यज्ञ । टि०-इस यज्ञ में गो से यज्ञ किया गोरविअ.-वि: (सं० गौरवित.) . सम्मा- जाता था। इसका अनुष्ठान कलियुग में नित; (दे० ना० मा० ४, ५) । वजित है । मनु के अनुसार ब्रह्महत्या के • गोरस-पु.० न० (सं० प्रा० गोरस) प्रायश्चित के लिए गोभिल गृह्यसूत्र के दूग्ध, दूध; (जंबू० ८-१२)। –वियार अनुसार पुष्टिकामना से इस यज्ञ का अनु- पु. १. (सं० गोरस+विकार) दही, ष्ठान होता है। मठा आदि २: गो (वाणी) +रस+. गोयंगण-स्त्री० (सं० गोपाङ्गना) गोप विचार) वाणी का विचार; (जंबू० १, जाति की स्त्री। पु० गौओं.. का समूह; ३, ३)। (सं० रा०)। गोरा-स्त्री० (दे०) १. लाङगल (हल गोरि (३१८) गोविट्टि । वाला के आकार का शहतीर या लट्ठा) रेखा; छिपाना । -इ सक० (सं० गोपायति) २. आँख, ३. ग्रीवा; (दे० ना० मा० २, छिपाना; (हे० ३३८)। १०४) । गोवड्ढण-पु० (सं० गोवर्धन) व्यक्ति- गोरि'--स्त्री० (सं० गौरी>प्रा० नाम-विशेष, श्रोण्ठिनाम; (जस० ४, गोरि) १. गौर वर्णा स्त्री; (जंबू० ४, २३, २)। १८, १२)। २. पार्वती; तुल० राज० गोवद्धण-० (सं० गोवद्धं न>प्रा० गु० गोरी; (प्रा० ५० १, ३) । २, गाथा गोवद्धण) पर्वत-विशेप; (महापुराण; ण. का भेद; (प्रा० ५० १, ६०) । ३. स्त्री ३, १७, १५) । २. नगर-विशेष; (प० विशेप-नाम; (ण० ८, १२, ८)। च० २०, ११५)। गोरि'---स्त्री० (फा० गोर=कब्र, मृतक गोवयण-पुं० (सं० गोवदन) गोमुख; समाधि) कब्र; (को० २, २०८) । (जंवू० ६, १६, १२)। गोरू-० (सं० गोरूप) सींग गोवर-पुं० १. (सं० गोमल>प्रा० पशु । गाय, बैल, भैस इत्यादि चौपाया; गोव्वर) गोवर, गाय, बैल आदि का मल "गोरू उवेल गोरूपाण्युद्वेलयति;" (उ० (दे० ना० मा० २, ६६) । २. पु० व्य० प्र० ५२-१५ की० ४, ८५) । (सं० गोपुर), नगर का द्वार, शहर का गोल-पु० (दे०) साक्षी; : (दे० ना०. फाटक; (सं० रा०)। मा० २, ६५)। गोवाल-पु० (सं० गोपाल) १. पृथ्वी गोलच्छ--वि० (दे०) पुछकटा; (व० पालक राजा; २. गायों का पालक, ४, ७, ५)। ग्वाला; (जंवू० ५, ६, ५)। गोला-स्त्री० १. गोदावरी नदी-विशेप; गोवि-स्त्री० (सं० (गोपी) ग्वालिनी; (पं० च० ३१, ३, २; दे० ना० मा० २, (जस० २, २, ६)। (सं० १०४) । २. स्त्री० (दे०) गौ, गया; गोपिका>प्रा० गोविआ) गोपांगना, (दे० ना० मा० २, १०४)। अहीरिन; (ण० ८, १६, ६)।-हि गोली-स्त्री० (दे०) मथनी, दही मथने स्त्री० गोपी; (उत्तरपुराण) । की लकड़ी; (दे० (दे० ना० मा० २, गोविअ-वि० (दे०) नहीं बोलने वाला; ६५)। गोल्ली-स्त्री० (सं० गोल्य>प्रा० गोल्ल (दे० ना० मा० २, ६७)। पुं०) गौल्य देश की स्त्री; (सुदं० ४, ६, गोविउ-वि. (सं० · गोपित) गुप्त, ६)। छिपाया गया; (व० १०, ६, १२) । गोल्हा-स्त्री० (दे०) विवी, वल्ली, गोविट्टि-स्त्री० (सं० गो (भूमि)+ विशेष; कुदरुन का वृक्ष; (दे० ना०- पृष्ठ) भूमितल; "गोविट्ठ णिविट्ठ परिंद मा० २, ६५)। सव्व," अर्थात् वे सभी नरेंद्र भूमितल पर ./गोव-(सं० गोपय>प्रा० बैठ गए; (जस० २, १३, ११) । -उ स्त्री० गोव) गोविल्ल (३१६) गोहण व० गो का ९)। लो०- . गोविल्ल-न० (दे०) कञ्चुक, चोली; (दे० ना० मा० २, ६४) । गोवी-स्त्री० (सं० गोपी) गोपिका; (जंबू. ५, ६, ११) । २. (दे०) कन्या, कुमारी, लड़की; (दे० ना० मा० २, ६६)। गोवोलि-पु० (सं० गो+सं० गम् का धात्वादेश वोल-चलना, गमन करना, हेम० ४/१६२) गायों को हांकने वाले, गायों के साथ घूमने वाला; (की २, १५१)। गोस-पु० (दे०, प्रा० गोस) प्रभात, सुबह; (सं० रा०; संधि० २, २०, ६)। -किरण स्त्री० (प्रा० गोस+सं० प्रा० किरण) प्रभात किरण; (व० ४, ६, ५)। गोसग्ग-पु० न० (दे०) प्रात:काल, प्रभात; (दे० ना० मा० २, ६६) । गोसप्ण-वि० (दे०) मूर्ख, '(दे० ना०- मा० २, ६७; पड्)। गोसवि-वि० (सं० गो+स्वामिन्) गोस्वामी, इंद्रियविजयी, "गोसदि जण- णीगमणु विचिंतिउ" -इद्रियविजयी होकर भी जननी गमन की बात सोची%B (ण० ६, ६, ६)। गोसाउनि-पु. (सं० गो+स्वामी) स्वामियों को; (को० २, ११)। गोसामि-पु० (सं० गो+स्वामी) गोपालक, "बीएण वलहें दामिएण पडि- भारिउ बोज्झु गोसामिएण;". अर्थात् दूसरे वश में किए हुए (अभ्यस्त) बैल पर गोस्वामी ने पुनः बोझ लादा; (जंवू० ५, ७, १५)। गोसामिणि-स्त्री०, (सं० गो +स्वामिनी) गोपियाँ; "घरे घरे जहिं नेउररवभामिणि, दावइ हंसहो गइ गोसा- मिणि;" अर्थात् जहां घर-घर में नपुर ध्वनि करती हुई गोपियां हंसों को चलना सिखलाती है; (जंवू० १, १०, ३)। गोसाला--स्त्री० जनपद-विशेष; (प० च० ६८, ६५)। गोसिंग-न० (सं० गोशृंग) सिंग; (जस० ३, २१, गोसिंगई कि दुद्धई सवंति-~-गोशृंग से क्या दूध झरता है ? (जस०) । गोसीर-न० (सं० गोशिरस् . अथवा गोशीप गोसीस) चदन-विशेष; (प० च० ३४, १२, ६)। गोसुय-पु० (सं० गोसुत) बैल; (जस० २, २६, १६)। गोह-स्त्री० (सं० गोधा>प्रा० गोहा) गोह, एक जंगली जंतु जो आकार में नेवले से बड़ा होता है, प्राणि-विशेष; (जस०४, १६, १)। पु० (दे०) पुरुष; (जस० १, ५, ४) । पु० (दे०) १. गाँव का मुखिया; २. (दे० ना० मा० २, ८६; सुदं० ७) । ३. जार, उपपति; (प० च० २६,. ५, ८)। -डिय स्त्री० गोधा; (प्रा० गु० ४,१८)।-य स्त्री० गोधा; (जस० १, १०, ७)। -याह, पु० (सं० गोधा +ग्राह) गोह की पकड़; (सुदं० ८, ८, ११)। - (गोहा) पुं० (दे०) ग्राम प्रमुख, योद्धा, पुरुप । (रा० ६)। गोहण-पु. (सं० गो+धन) १. गाय, रूपी धन, पशु धन; (ण० १, ६, ७)। . . भट, योद्धा;
. गोहत्तण (३२०) घंघल पुरुषत्व, पौरुष; ग्रास- २. पृथ्वी-धन; (जंवू० ण, ६, ५)। गोहुर-न० (दे०) गोमय, गो-विष्टा; --णाह . पु० (सं० पुं० (सं० गोधन+नाथ (दे० ना० मा० २, ६६)। ग्वाला; (क० ८, ३, ५)। गोहूम-पुं० (सं० गोघूस>प्रा० गोहूम) गोहत्तण-पु० (दे०) (दे०) पुरुषत्व, गेहूँ, अन्न-विशेष; (व० ८, ५, १०)। (जंवू० ५, ४, ४)। गोहेर-पुं० (सं० गौवेर, अमरकोश गोहन-पु० (दे०) संग, साथ; ' गोहन द्वितीय काण्डम् श्लोक ६) जंतु-विशेप, नहि पावहि," पुकारना; अर्थात् वे साथ साँप की तरह का जानवर; (प० च० नहीं पकड़ पाते थे; (की० ४, ११७) । ४८, ६२)। /गोहराव--(सं० गो+ आह वयति) गौरव-न० (सं० गौरव >प्रा० गौरव) आह्वान करना, बुलाना, पुकारना; (उ०. १. गुरुत्व, २. सम्मान; (की० २, व्य० प्र०७-६) १३४) । 'गौरवे मान'- गौरवितान् गोहा-स्त्री० (सं० प्रा० गोधा) गोह, गोह, मानयति, मानति वा, (उ०, व्य० प्र० छिपकली की जाति का एक जंगलीजंतु ४२, २०)। जो आकार में नेवले से कुछ बड़ा होता ग्घविय- स्त्री० (दे०) शोकसूचक है। टि०- इसकी फुफ्कार में बहुत विप ध्वनि; (जंवू० २, ५, १६) । होता है । इसके काटने पर मांस गलने पुं० (सं० ग्रास>प्रा० गास) लगता है और फिर शरीर में विष फैलने ग्रास, कवल, आहार; "न. पिर वभग के कारण मर जाता है; (दे० ना० न थोर ग्रास"; अर्थात 'न तो बात का २, ७३) । थलचर जीव; (व० १०, ८, पक्कापन था, न आहार का संयम था; १५)। (को० ४, ६८)। गोहाणिय -पु० (सं० गोधानिक) गोधा- निक नामक वणिक-विशेप; (प० च० घ ७७, १११)। गोहारि-स्त्री० [सं० गो+आकालयति घ-पु० (सं० प्रा० घ) कण्ठ-स्थानीय (=गायों की रक्षा के लिए बुलाना)> व्यंजन वर्ण-विशेप । गो माआरयइ>गोहारअइ>गोहारइ) घंघ-पु० (दे०) गृह, मकान; (दे०. रक्षा के लिए पुकार; (को० ४, ना० मा० २, १०५)। १५१)। घंघल-न० (दे०) झगड़ा, कलह; (दे०. गोहु-क्रि० (सं० गुह >प्रा० गुह) ना० मा० २, १०५; जस० २, ३१, छिपाना, "तें वोल्लिउ किं महु अत्थि ५) ! २. दंगल; (व० ४, ३, १३)। गोहु"; तव उसने -साल ० ( सं० शाल > प्रा० अपना मर्म छिपाती हो; (ण०. ८, १३, साला) अनाथालाय; (संघि० ५, २, २)! ८)। मा० - कहा-मुझसे क्यों .
घंधलं (३२१) घट - - घंघल-वि० (दे०) मंधन करने वाले घघर-पु० (सं० घर्घर >प्रा० घग्घर) "परवल जलघंघल बलमंहत" -शनुवल शब्दानुकृति, घर्घर; (प्रा० . ० १, रूपी जल को मंथन करने वाले महान् २०४)। बलशाली थे; (ण० ४, १, १०)। घङ्घल-० (दे०) उजड़ी हुई भूमि; घंघोर-वि० (दे०) भ्रमणशील, भटकने (4० च० ४५, ७, ८)। वाला; (दे० ना० मा० २, १०६)। घञ्चर-पु० (सं० घर्घर>प्रा० धग्घर) शब्द-विशेष, घर्घर (ध्वनि); (सुदं० ३, घंट-पुं० स्त्री० (सं० घण्ट>प्रा० घंट) ७, ७)। घण्टा, वाद्य-विशेष; तुल० राज० घंटो; घट-पुं० (सं० घटा) घटा, मेघ, बादल (प० च० ३, ७३; जंबू० "जसु जय-सिरि दाहिण-बाहु-दंडि, निव- सइ गय-घड-चूरण-पयंडि;" अर्थात् गज घंटा-पु० (सं० घण्ट>प्रा० घंट) रूपी घटाओं को दूर करने में प्रचण्ड उस घण्टा, कांस्य-निमित वाद्य-विशेष; राजा के दाएं वाहुदण्ड में जयश्री विरा. (भ०)। जमान रहती थी; (व० ३, २२,२)। घम-न० (सं० घृत >प्रा० घिम) घी; /घट-(दे०) घटना, कम होना। (ण० ५, ८, ११)। -इ क्रि०, व०. प्र०, पु०ए०; (प्रा०५० घअअंद-न० (दे०) दर्पण; (पड्) । १,८८)। घई-अव्य० (दे०) १. शीघ्रतावाची, घट- सं० घट > प्रा० घड (जस० २. वर्तमान समय संबंधी; (प० च० २८, १, २६, ११) । रचना करना । घडिर- ८, ४)। भू० का० । घग्घर-पु. (मं० घर्घर) १. खोखला घटना-स्त्री० (सं० घटन >प्रा० घडण) गला । २. न० (दे०) घघरा, लहंगा, घड़ना, कृति, निर्माण; तुल० राज० स्त्रियों के पहनने का एक वस्त्र तुल० घड़ण; (की० २,१०१)। राज० घाघरौ; (दे० ना० मा० २, घटपिड---पु० (सं० घटपिण्ड) घर- १०७)। ३. पु० क्षुद्रघण्टिका; (प० पिण्ड; "रहिउ सतेल्ल दसीएण दीवउ कि च० ४६, १, ३) । ४. घग्घर की न उणीवइ घड-पिड-दीवउ;" अर्थात् घर- आवाज, शन्द-विशेष; (प० च० ६, ११, पिण्ड को प्रकाशित करने वाला दीपक ५)।- स्त्री० (घग्घरा) किङ्किणी; स्नेह-तेल रहित होने पर भी क्या बत्ती (जस० ३, २, ७)। के बिना बुझ नहीं जाता? (व०.४,१५, घग्घरियगिर-स्त्री० (सं० घर्षरित+ घरित+ ५)। गिरा) खोखली. वाणी; (जंवू० २, १८, घटित-वि० (सं०१/घटय् >प्रा० घड १०) =मिलाना, जोड़ना) जटित, जड़ाऊ; घग्घरोली-स्त्री० (सं० घग्घर+मोली) .(को० २, २४२)। किणीपंक्ति; (जस० १, १६, ५) । घट्ट-अक० (सं०/भ्रंश का धात्वा. .
घट्ट (३२२) घडहर व०, १. संसर्ग घर-पुं० देश) १. भ्रष्ट होना। -1; (पइ) २. बनाना, निर्माण करना, ३.संचालन २. घटित होना। -इ; (प० १० १५., करना । -इ सक० (मं० घटयति) गह १३, ६)। देना, गढ़ना; तुल० म० घडण; (विला०; घट्ट-पु० (दे०) १. कुसुम्भ रंग से भ०)। -उ गढता हूं, "आगम-जुक्ति रंगा हुआ वस्त्र; २. वेणु, वंश; (दे० का वि घडऊ,,' अर्थात् 'आगम-युक्ति को ना० मा० २, १११)। ३. पुं० (२० गढ़ता हूँ, तुल० घटवु, (५० च० १, ३, घट्ट) घाट; नदी, सरोवर या किसी जला. १०) । —दि (सं० घटयति) बनाता है; शय जहां लोग पानी भरते या नहाते (हे० ४०४) घोते हैं; (दे० ना० मा० २, १११) । व० ब, (प० च० ७, ५३)। घडिअ घट्टण-न० (सं० घट्टन) क्रि० भू० का० (मं० घटित) बनाया, २. स्पर्श करना । न० (सं० घण>प्रा. गढ़ा गया; (हे. ३३१)। घडिज-भू०- घमण) घिसन, रगड़; (सुदं० ८, २८, का० घडिवि-पू० का० क्रि०; (न० १, १०)। ६, १३) । (जंवू० ४, १२, १५) । घट्टियई-न० :-न० (सं. घट्टन >प्रा० (सं० घटा) घटा; "निग. घट्टण) घर्षण; "घण-घट्टियई विज्जु- मन्द-भद्द-मंकि ग-गएँहि । घड विरऍवि विप्फुरियई," अर्थात् 'मेघों का घर्षण, पञ्चहि चाव-महि," अर्थात् मृग-मन्द- विद्युत का स्कुरण; (प० च० ५, १२, भद्र और संकीणं गजों और पांच सौ ७) । धनुधारियों से घटा की रचना कर, आगे- घट्टिपउ- कि०, भू० का० (सं० पोछे भद्र समूह बैठ गया', (५० च० घाटयति घट संघाते>प्रा० घट्टइ) १६, १५, १) । २. समूह; "वनकरिघ- विघटित कर दिया; (ण. ४, ७, व्ह"; वनगजों के समूह; (जंबू५, १०, ४)। घट्ठ-वि० (सं० घृष्ट>प्रा० घट्ठ) घड-पु० (सं० घट>प्रा० घड) घिसा हुआ; (जस० २, ४, ५)। घड़ा, कुभ; तुल० राज० घड़, घड; पति-वि० (सं० घड>प्रा० घड= (१० १, ६, ७; सा० ८१) घड़ा) पड़ा होना; "जलु फड्ढंतहं कूव घडइय वि० (दे०) संकुचित; यह अवसई सिरउ घडंति" -'कुएं से (पड्)। जल निकालने वालों के सिर पर अवश्य घापावर-कि०, भू० का० (सं० घट+ घड़ा होता है;" (सा० १६)। /स्या, स्थापयति) घट स्थापन किया घड-वि० (दे०) गया, "सुक्कझाणु पृडयावउ किज्जइ"- (पड़)। शुक्ल ध्यान रूप घटस्थापन किया गया; पर--सक० (सं० घटय >प्रा० घड) (म० २, ७८, ६) १. मिलाना, जोड़ना, संयुक्त करना; घडहर-पु. (ध्व०) घड़घड़, वादल १५)। - - बनाया हुआ;
घडाघडी (३२३) घणसार काले, - गरजने या गाड़ी चलने आदि का घड़घ घराघरण-वि० (सं० घन+धन) अति ड़ाने का शब्द; (म० २, ६, ५) । निविड़, अति अविरल; (ण. ५,४, घडाघडी-स्त्री० (दे०) गोष्ठी, सभा, १४)। मंडली; (पड्)। घणणील-वि० (सं० घननील) अत्यंत /घडावम-(सं० /घट, घटापय् > "भिंगालिसरिसघणनीलवाल;" प्रा० घडाव) बनवाना । - क्रि०, व० अर्थात् तुम्हारे बाल भृगावलि के समान (जंबू० ८, ६, ६)। अत्यंत काले हैं; (जंवू० १०, १, घडिअ-वि० (सं० घटित>प्रा० ११)। परिम) निर्मित, कृत; (जस० २, ५, घणणेह-पु० (सं० घन+स्नेह >प्रा० २) । घडीय-वि० घटित; (छंद के कारण घण+णेह) अत्यधिक प्रेम; (जंवू० ११, दीर्धीकरण) (क० ४, ६, ४) । ५, ५)। घरिमघडा-स्त्री० (दे०) मण्डली, घणत्त-पुं० (सं० घनत्व) सघनता; गोष्ठी; (दे० ना० मा० २, १०५) । (ण० ७, १५, १०)। घडिआ, घडी--स्त्री. (दे०) गोष्ठी, घणथण-पुं० (सं० घन-+स्तन>प्रा० मण्डली; (पल्; दे० ना० मा० २, घण+पण) अत्यंत घने स्तन; (जंवू० १, १०५)। ७, ६)। -तड पुं (सं० घनस्तनतट) घरिय-वि० (सं० घटित>प्रा० घने स्तन तट, "हय निप्फंद चडवि घण- घरिम) निर्मित, बना हुआ; (सं० थणयड;" (जंबू० ८, ११, ११) । रा०) । घडीय-वि० घटित; (क० ४, घणपणिया-वि० (सं० घन+स्तन > ६, ४)। प्रा० घण+यण) सघन स्तनों वाली; घठी-स्त्री० (सं० घटी>प्रा० घटि, (महा० ६६, १६, ५)। घरिआ) घटी-यन्त्र, घडी यन्त्र; (ण०.६, घणपडल-पु० (सं० धन+-पटल> १७, ३०) । २. लघु घट; (संधि० १२, प्रा० घण+पडल) मेघपटल, अभ्रपटल; ६, १४)। (जंबू०६, ६, ८)। घरण-पु. (सं० धन >प्रा० घण) घणयालि-स्त्री० (सं० घन+काल > १. मेघ, बादल; (प्रा० ० .. १, १६६, प्रा० घण+याल पुं०) वर्षाकाल; (ण. ण. १, १३, ५; सं० रा०)। २.हथौड़ा; ४,२,१४)। तुल• राज० घण; (दे० ना० मा० ६, घणलोम-पुं० (सं० घनरोभ) नभचर ११) । वि० निविड; (जस० १, ११, जीव; (व० १०, ८, १३)। ११) । सघने, घना; (महा० ६८,३; घणवाहि-पु. (दे०) इंद्र, स्वर्ग-पति जंवू०४, १६, २)। - वि० घना, (दे० ना. मा० २, १०७) । निविड, सांद्र तुल० गु० (प्रा० घणसार-० (सं० घनसार) कपूर, गु० २, ४.७; जंबू० ७, १, २२) । (सं० रा०; भ०)। . . घणो, घणसूई (३२४) घमोई ". घत्तानन्द>प्रा० घेणसूई-स्त्री० खड़ी सुई; (व० १०, पत्ता-स्त्री० (सं० प्रा० घत्ता) छंद- ६,७) विशेप; (प्रा० ५०:१, १००)।- घणाघण-पु. (सं० घनाधन) (वरसने पत्ताणंद-न० (सं० वाला) वादल; (प्रा० ५० १, घताणंद) छंद-विशेप; (प्रा० .० १, १८८)। १०३)। घणाघरिण-स्त्री० घन युद्धः जिसमें घत्तिय-वि० क्षिप्त, फेंका हुआ; त्यागा हथौड़े का प्रयोग किया जाता है (a हुआ; (जस० २, २०, ६; ण० • २, १३, fighting using large hammers) ५)। -हिं फेंके गए; "कोमलकरयलघ- (प० च० ५२, ६,४)। त्तियहिं कुसुमहिं" अर्यात् कोमल हाथों से घणुक-जल-पु. (सं० घन+कज्जल फेंके गए पुष्पों के द्वारा; (महा० ६८, >प्रा० घण+कज्जल) घना काजल; ७)। (व० २, २२, १५)। घत्य-वि० (सं० ग्रस्त) मक्षित, निगला घणुच्चस्यणी-वि० स्त्री० (सं० घन+ हुआ, कवलित (प० च० ७१, ५१; उच्च+स्तनी) घने व ऊंचे स्तनों वाली; जंबू० २, ५, १२)। -—य वि० (सं० (जंबू० ४, ५, ६)। ग्रस्त) प्रभाव पड़ा हुआ; आक्रांत; (प० घरपोह- (सं० घन+ओघ) वारिद- च० ६, १२, ४)। समूह, वादलों का समूह; (जंवू० ६, ६, घन -वि० (सं० घन>प्रा० घण) अनेक; ६)। (की० ३, ३८) । घने--वि० अनेक, घण्टउ-पुं० (सं० घण्ट>प्रा० घंट) (की० २, १११)। घंटा; (प० च० २, १, ५) । घम्म-पु० (सं० धर्म>प्रा० घम्म) घण्ण-पु. (दे०) १. उर, वक्षस्, घाम, गरमी, संताप; (जंवू० ८, १३, १; छाती, २. वि० रक्त, रंगा हुआ; (दे०- दे० ना० मा०, १, ८७) । घम्मु-पुं० ना० मा० २,१०५)। घूप; (व० २, ३, १२)। घत्त'-पु. (सं० प्रा० (सं० प्रा० घत्ता) घत्ता घम्मण-पु० वृक्ष-विशेप; (जंकू० ५, नामक मात्रिक छंद; (प्रा० १० १, ६६)। ह (घत्तायाः) संबंध कारक, घम्मवारि-न० (सं० घर्म+वारि) स्वे- ए०; (प्रा० ५० १, १०२) । दजल; (जस०४, १६, २) । घत्त'-पुं० (सं० घात>प्रा० घाय) घम्मा-स्त्री० (सं० धर्मा>प्रा० धम्मा) चोट, प्रहार; (हे०४१४, ३)। प्रथम नरक नाम: (जस० ५, १६, /चत्त'-(प्रा०/. घत्त) १३)। डालना। -मि; (प० च० ८, १०, घम्मोइ-स्त्री० (दे०) . तृण-विशेष, ८) । पत्तिउ-भू० का०, फेंक दिया; घमोय (गण्डुत्संज्ञ तृणम्), टि०-एक (प. च० ६, ११, ४)। छोटा पौधा जो गोभी की तरह का होता . ८, ६)। फेंकना, धम्मोडी (३२५) घरट्ट घर का . है। इसके पत्तों के पीछे तथा कटाव की --भार पु० (सं० गृह+भार) गृहस्थी नोकों पर कांटे होते हैं । तुल० राज. की जिम्मेदारी; (जस० ४, २८, २)। घनोय; (दे० ना० मा० २, १०६) । -लंजिया स्त्री० (सं० गृह लञ्जिका घम्मोडी--स्त्री० (दे०) '१. मध्याह न =वेश्या, रंडी) गृहदासी; (जस०)। काल; २. मच्छर, क्षुद्र जन्तु-विशेप; -वइ पुं० (सं० गृह-पति) ३. ग्रामणी नामक तृण; (दे० ना० मा०- स्वामी; (जस० ३, ३१, ५)।-वय २, ११२) । पुं० (सं० गृह+व्रत) गृहस्यों के अणुव्रत; घय-न० (सं० घृत>प्रा० घिम) (ण० १, १२, ३)।-बार पुं० (सं० घी; (व० १०, ७, ५; क० ३, ८, ८) गृह+द्वार) घरेलू संपत्ति, निज की सारी -महुँ पुं० (सं० घृतमुख) द्वीप-विशेष; संपत्ति; तुल० गु० घरबार; (प० च० (व०१०, ६, ६)। २४, १२, ८; सि० २, २६)। -वास घर-पु० न० (सं० गृह>प्रा० घर) पुं० (सं० गृहवास) गृहस्थाश्रम, गृहवास; घर, मकान, गृह, तुल० गु० घेर; (हे. तुल० राज० घरवास (जस० २, ७, ३४३, २; प्रा० ५० १, ८४; जस० १, ५)। -सिरि स्त्री० (सं० गृह+श्री) १, ३)।-कज्ज पु० (सं० गृह+ गृहलक्ष्मी; (ण० १, ३, १३) । घरि- कार्य) घर का काम; (जंबू० ३, ६, ७)। स्त्री० घर; सुभाषित:-"घरि पलितमि -गोली स्त्री० (सं० गृह+गोली) छिप- खणि सकइ को कूवए," अर्थात् घर के कली, जंतु-विशेष; (दे० ना० मा० २, प्रदीप होने जाने पर कौन १०५) ।..-गोहिआ स्त्री० (सं० गृहगो सकता है ? (भावना संवि प्रकरण) घरु- घिका) छिपकली, (दे० ना० मा० २, पु० घर; (महा० ६८, ५; उ० व्य० प्र० १६)।-णि स्त्री० (सं० गृहिणी> २२.२)। प्रा० घरिणी) पत्नी, तुल० राज० घरणि; घरघंट-पु० (दे०) चटक, गौरया (प्रा० ५० १, ३८)। -णिय . स्त्री० पक्षी; (दे० ना० मा० २, १०७)। (सं० गृहिणी>प्रा० घरिणी) स्त्री, भार्या; घर-घरणी-स्त्री० (सं० गृहिणी>प्रा० (सं० रा०)। -स्थ पु० (सं० गृहस्थ) घरिणी) घरवाली, स्त्री, भार्या; (प्रा. ब्रह्मचर्य पालन के पश्चात् दूसरे आश्रम में गु० ५, २८) । प्रवेश करने वाला, गृही, घरवार वाला; घरट्ट-पुं० (सं० प्रा० घरट्ट) सिल, (जस० ३, ४, ४)1 -दार स्त्री० (सं० चक्की, खरल, पेपणी (a grinding गृह+दारः) कलन, पत्ली; (जस०)। stone); "ता सन्वह वीरह उपरवटू -दासि स्त्री० (सं• गृह+दासी) मयण-घरट्टू आसं वदंतु | ता पूजहु गृहिणी, भार्या, पत्नी; (जस०)। पूजहु नेमिकुमार निव्वइकंतु;" तुलं० गु० --पंगणु पु० (सं० . गृह+प्राङ्गण) घंटी; (प्रा० गु० २६, २२; क० ३, २२, घर का आंगन; (ण० ५, २, . १)। ७)। कुमा खोद घरट्ट (३२६) घल्ल वड । .व्रत, /घरट्ट-टकराना, . "समूह कली; तुल०. गु० घरोली; (दे० ना० मा० णिविड गय-घड घरट्ट;" अर्थात् सामने २, १०५)। पताकाएँ थीं और गजघटा टकरा रही घरोली--स्त्री० (सं० घटिका>प्रा० थी; (प० च० १३, ११, ४) । घडिआ) घरिया (गृह-गोलिका) घड़ियां, घरट्टी-स्त्री० (सं० घरट्टी) शतघ्री, पानी का मटका, मिट्टी का बरतन; (दे०- तोप; (दे० ना० मा० ३, १०)। ना० मा० २, १०५)। घरप्फरि-स्त्री० (दे०) धरपटक; (म० /घल-(सं० क्षिप् का धात्वादेश प्रा० २, २२, ८)। घल्ल) फेंकना, स्थान बदलना, · डालना, घरयंद-पु० (दे०) दर्पण, शीशा; (दे०- घालना; तुल० राज० घलणी, घलबौ; ना० मा० २, १०७)। (की० ४, १६०)। घरवय-पु० (सं० गृह+व्रत) गृहस्थ घलहल-वि० (दे०) प्रभूत; (प्रा० गु० अणुव्रत, "घरवयइ जईसरसंठि ५, ३२)। याई;" अर्थात् एक गृहस्थव्रत और दूसरे घल्ल-वि० (३०) अनुरक्त, प्रेमी; मुनिव्रत (महानत); (क० ६, २२, (दे० ना० मा० २, १०५)। -२)। Vघल्ल-(सं०/क्षिप् का धात्वादेश घरसंठिय-वि० (सं० गृह+संस्थित) प्रा० घल्ल) घालना, फेंकना; तुल० म० घर में रहते हुए, "घरस ठिओ वि घरक- घालणे i ---इ; (सुदं० ५, १, ३)। ज्जचुऔ"; (जंवू० ३, ६, ७) । घल्लंत-कृ०; (सुदं० ३, ७३) । घल्लंति घरहरिअ-पु० (ध्व०) घरघराहट; -क्रि०, ब० (हे० ४२२)। -सि २०, (जंबू० १, १५, ४) । म० पु०, ए०, तुल० राज० घालवे- घरासउ-पु० (सं० गृहाश्रमम्) गृहस्थ गु० घालवु (प्रा० ५० १,-७; जस० आश्रम; (प० च० २२, ११, ३) । ३, १८, ८) । घल्लहु क्रि०, आ० बाहर धरिणी-स्त्री० (सं० गृहिणी>प्रा० निकाल दो, फेंक दो; (ग० ६, १३, परिणी) घरवाली, स्त्री, भार्या; तुल० २१)। घल्लाविय---भू० का०, गु० घरुणी, राज० घरिणी, म० घरनी; दिया; (प० च० ११, ६, ८) । घल्लि- (ण०२, १३, २; म० १, १३, ५) । ज्जइ-छुड़वा देना; (सुदं० घरिय-वि० (सं० घारित) विह वल; १०) । घल्लिय-क्रि०, भू० का० (प्रा. (जंबू०.७, ४, १४)। = फेंकना) निकाल दिया, "केउमइएँ धरिल्ली-स्त्री० (दे०) गृहिणी, पत्नी; . घल्लिय कुलहरहो" अर्थात् केतुमती ने (दे० ना० मा० २, १०६)। उसे कुलगृह से निकाल दिया, (५० च० घरोल-न० (दे०) गृह भोजन-विशेष; १६, १२, ५)।-- (घल्लिय) (दे० ना० मा० २, १०६)। डाल दिए; (रि० १, घरोलिया, घरोली-स्त्री० (दे०) छिप- पू० का० क्रि०; (जंबू०.६, ६, ६) , बो, - ८, ३३, १३) । घल्लिवि - पति: (३२७) घ.उ - सं० पास्य-वि० (२०) पका हमा, तामा प्रहार, गोट, पार; तुल० म० पाय (न. मा; (जंयु० ६.१४.७: १, ४, ६; जस० १, ५, २) । घाइऍहि- २)। पतिप-वि०, हामी हुई; (सं० पात, हत्या (प० प० १२, ६, ६)। रा०)। पाउ; (प्रा० पं० २, १७३) । पयरक-शि० (दे०) उद्दीप्य, "सपर पाइम-वि० (सं० पातित>प्रा० महिमि परिहरित कहिं भरित पं पाइभ) विनागित, प्रहारित, (ण० ३, पुसिहि माया" सार जिस १४, १२; जस० २,२०, ५) । दिम प्रकार रिमी पूतं स्त्री का कपट पाउ-० (सं० पात >प्रा० पाय) भरा होणम उगे भोग पर घोट, पाय, प्रहार; (प० ५, ५, १०)। दिया जाता है; (जंबू. ८, १३, १५)। पाए-० (सं० पात>प्रा० घाय) 1/पथपष-(० पचपयय ध्वन्यात्मक) पातिपाकम; (५० ६, ५, ८) । घय घय का शद करना; (मुदं० ३,७, 1/पाप-(सं० घातप>प्रा घाय, ७) । परापयंत -T० (० पवषयम् । पात्वते) विनाश करवाना, मरवाना। म) तुल० म० पमरमाट; (गुदं० ११, पाइग्जद-गमयाच्य; (भ०) । पाइज्ज- १२. ३)। पपपवासि-fr.० नदी न्तु-१० (प्रा० पाय =मारना) पीटे जाते की धाराको गर्जन मा शब्द होना, (प. हुए; (५०प० ६, १०, ३) । घाइयउ- १० ३१, ३, ५)। पवयन्ति-कि भू० का०, मारा गया; (प० च० ६, ११, पपप या मन्द होना; "पवषयन्ति जे १)। जन-सम्मारा," जो नसमें जस के प्रवाह पारिय-स्त्री० (सं० घरिकाः का पवषय गम हो रहा है; (५० १० घूघरू, एक प्रकार का बाजा) किरिणी; १४,३,२)। (प्रा० गु० ६, २२) । पयपव-घोसु-पु, पन-पन मा शर, "पपरे हि मि पयपय-पोमु पत्त, घाट'-पु. (सं० घट्ट) नदी तीर पर बनी हुई सीढ़ियां और चबूतरे; (को० २, अर्थात् 'पण्टियों ने भी. पन-धन भन्द ६७)। घोर दिया; (१० १० १३, १, ७) । परिय-वि० (३०) तृप्त; (जंबू० ६, घाट'-पु० (दे०) कोसुम्भ वस्त्र; "गोपीय उढाणि घाट ए, घर-आगलि ६.९). 1/पस-(मं० पृए) १. घिसना, रग- बोलई भाट ए। सिरवरि लकई धान एना; २. मान करना, साफ करना। ए, वर-आगलि नाचई पान ए ।" तुल० - सम० (पद)। गु० घाट; (प्रा० गु० २६, ५)। /पा-(दे०) अधाना, तृप्त करना; घाठउ-वि० (दे०) पञ्चित; "तउ (जस० २, ३०, ६)। पंडितु कोपानलि चडियउ पाठउ हिडइ पाप-पुं० (सं० पात>प्रा० पाय) सूनउ पियउ, तउ चेलुको पिराया पोस .
घाई (३२८) पिछे - नंदु हाणि सिरियउ राउ होसइ;" १०८) । (प्रा० गु०.१६, १२)। धारिउ-वि० (दे०) जो विप के वेग से Vघाड-सं० भ्रंश; भ्रष्ट होना, च्युत मूच्छित हुआ हो; तुल० गु० धारण; होना । -इ अक० (पड्) । (प्रा० गु० २०, १३)। घाण-पु० न० (सं० घ्राण) दुर्गध; धारिय-वि० (सं० घृत).. धृतपूर्ण; तुल० म० घाण; (भ०)। (म०)। घाय-पुं० (सं०. धात>प्रा० घाय) घारिया -स्त्री० (दे०)-मिष्टान्न-विशेष; प्रहार, चोट, वार; (प० च० ५६, तुल० गु० घारी; (म०)। २५)। धारी-स्त्री० (दे०) शकुनिका, पक्षी- Vघाय-सं० हन्; मारना, मार डालना विशेप; (दे० ना० मा० २, १०७)। विनाश करना। -इ क्रि०, व० (रा० घारी'-स्त्री० (दे०) छंद-विशेप; (प्रा० ३, १५, ६) । धाएंत-व० कृ०; (प० पं० २, २६)। च०१०, १७) । 1/घाल-(सं० क्षिप् का धात्वादेश प्रा० /घाय-(सं० घातय>प्रा० घाय) घल्ले । प्रा० घल्लिय, प्रा० अप० घल्ल) मरवाना, विनाश करवाना; घाइयब डालना, फेंकना । घालिंउ; (रा० ३३) । कृ०; (प० च० ६६, ३४) । घास-पुं० (सं० प्रा० घास) तृण, पगुओं घाय-चउक्क-पुं० (सं० घातक+चतु- के खाने का तृण; (दे० ना० मा० २, प्क) घातिया-चतुप्क घातक व्यक्तियों का ६५)। चार का समूह; "तव तेएँ घाय-चउक्क 1/घास-(सं०. ग्रस्>प्रा० घिस) हणि केवलणाणेण तिलोउ सुणि;" अर्थात् ग्रसना, भक्षण करना । -ए (घासए) अपने तप-तेज से उसने घातिया-चतुष्क "पियेइ मयतण्हिया कुलिससूइ को का हनन कर केवल ज्ञान द्वारा विलोक घासए," कौन ऐसा है, जो मृगतृष्णिका को सुना; (व० ६, १०, ११) । को पीये वज्र की सूई को खावे; (सुदं० घायण-पु० (दे०) गायक, ८, ३७, १३)। (दे० ना० मा० २; १०८)। विदिणि-स्त्री. रास-नृत्य-विशेष; (प्रा० धारत-पु.० (दे०).. घृतपूर, वेवर, गु० ३१, ३)। मिष्टान्न-विशेष; (दे० ना० मा० २, पिम-न० (सं० घृतम् >प्रा० घिम) .१०८) । घी; (ण० ४, ६, १२, संधि०१६, ७, घार-पु० (सं० गृध्र) १. गृघ्रजातीय १०; ७० व्य० प्र० ४६-२६) 1. घिउ-- पक्षी-विशेष; चील; तुल० न० घृत; (भ० २, ७,८), (दे०) वि० (जस० २, २७; १२; रण० ४, १०,७; तिरस्कृत; (दे० ना० मा० २, १०८) । जंदू०७, १, १२) 1 घार-पु० (दे०) घि8-वि० (दे०) कुब्ज, कूबड़ा; (दे०- किला, दुर्ग; . (दे० ना० मा० .२, ना० मा० २, १०८)। गया; म० घार;
घिद्वत्त (३२६) घुग्घुच्छण १०७, ११)। - घिद्वत्त-पुं० धृष्टता; घिद्वत्तें- घिद्वत्तें- देना; (पाहु० १५१) । धृष्टता से; (महा० ६६, १)।' घिय-न० (सं० घृत>प्रा० घिअ) धी; घिणावण-वि० (सं० घृणा+आनयन) तुल० राज० घिरत; (सि० २,३१) । घृणास्पद, घिनौना; (जंबू० -ऊर पुं० (सं० घृतपूर) मिष्टान्न- ११)। -उ (परम० २, १५१) । विशेष; तुल० गु० घेवर; (प० ५० ५०, घिणि-स्त्री० (स० घृणा>प्रा० घिणा) ११, ६)। घिन, घृणा; तुल० राज० घिरणा; (ण घिरिहोल-स्त्री० (दे०) मक्खी, "घिरि- ६, १७, ४५)। होलपमुह जइ पइसयंति," (सुदं० ६, ६, घिणिहिणन्त-कृ० गुंजार करते हुए, १०)। भनभनाते हुए; (humming); (प० च० घिव-(सं० क्षिय्) डालना, फेंकना। ३६, ६, ६)। -इ क्रि० (सं० क्षिप्यति>प्रा० खिवइ) पित्त-वि० १. (सं० क्षिप्त>प्रा० "जो घणलुधु घिवइ घणकज्जें हुयवहें चित्त) फेंका हुआ, डाला हुला; (प० च० धिवइ इंधणं" -जो राजा धन संबंधी १६, ७, २) । २. गृहीत (ण० ३, ६, कार्य में धन के लोभी पुरुष को नियुक्त व वि० गृहीतव्य (जंवू० ६, करता है वह अग्नि में ईंधन डालता है; १०, १)। (ण० ३,३, १; जस० २, १८, घित्ता-स्त्री० (सं० घृत) घो; (प्रा० ३)। पैं० १,१३०)। घिवरण-न० (सं० क्षेपण>प्रा० घित्तिउ-भू० का० (सं० गृहीत) खींच खिवण) फेंकना; (ण० ३, १७, ४) । लिया, "घित्तिउ सो भीमे भीम-सत्ति;" घिवहु-पु० (दे०) वृक्ष; (सा० ४०)। अर्थात् भीम शक्ति वाले भीम ने उसे घुघुरुड-पु० (दे०) उत्कर, समूह; खींच लिया; (व० ५, १८, ५)। (दे० ना० मा० २, १०६)। /धिप्प---१. (स०/ग्रह >प्रा० पत्त) /घुग्घु-(सं० घुघुघुघाय् >प्रा० मुत्रु- ग्रहण करना। -इ सक० (सं० ग्राह• घुघुघुघ) 'धुघु' ध्वनि करना। -वंति यति) ग्रहण करना; "गुणणिहिपुरिसु अक० धू धू करने लगे, "चाउद्दितु धूवड परिक्खिवि घिप्पई" -जो घिप्पइ" -जो गुणों का घुग्घुवंति," (सुदं० ११, १५, ८) । भण्डार है ऐने पुरुष को परीक्षा कर घुग्घुइय-वि० (सं० घूघूयित) घू घू नियुक्त करना चाहिए; (ण० ३, ३, ५)। ध्वनि करते हुए; "कहिं मि घुग्घुइयघूय- घिप्पए (आत्मने);(सुदं० ४, १०, ३०)। उसया रोसिया वायसा वासिया;" अर्थात् २. गलना। धिप्पंत कृ० (सं० विगलत्) कहीं धूग्धू-धूग्धू करते हुए सैकड़ों घूयडों गलते हुए; (प्रा० थिप्प=वि०+गल्, के स्वर से रुष्ट हुए वायस कांव-काव कर हे० ४, १७५); (प० च० ३७, ३ ४)। रहे थे; (जंबू० ५, ६, १६)। ३. फेंक देना। घिप्पंति-क्रि० फेंक धुग्घुच्छण-न० (दे०) वेद, तकलीफ, - घुग्धुरि (३३०) पुरु मेहनत; (दे० ना० मा० २, ११०)। ना० मा० २, १०९)। घुग्घुरि-पु० (दे०) मण्डूक, मेढ़क; Vघुम--(सं० . .घूर्ण>प्रा० धुम्म) (दे० ना० मा० २, १०६) । घूमना। --इ; (प्रा० ५० १, १६०) । घुग्घुस-पुं० धू-धू की ध्वनि; (जस० घुमघुम-न० (ध्व०) घुम -धुम ध्वनि २, २७,४)। (जंवू० १, १४, ६)। घुग्घुस्सुअ-वि० (दे०) निःशंक होकर Vघुम्म- (सं०/घूर्ण>प्रा० घुम्म) गया हुआ; (पड्)। घूमना। -इ अक० (सं० घूर्णते) तुल० घुग्घुस्सुसय-न० (दे०) आशंका-युक्त म० घुमणे; राज० घुमणी; (पड्; जस० वचन; (दे० ना० मा० २, १०६) । २, १६, ११)। -माण व० कृ० (सं० घुघुघुघुघुघ-अक० (सं०Vघुघुघुघाय) घूर्ण+शानच्) धूमता हुआ; (जंवू० ४, 'घुधु' आवाज करना, घूक का बोलना; ११, ७; म० २, ३७, ६) । घुम्मिवि- घुघुघुघुघुघेत-व० कृ० (प० च० १०५, पू० का० कि०; (ण० ५, ६, १३)। ५६)। घुम्मट्य-वि० (सं० . पूर्णित >प्रा० घुट्टधुणिम-न० (दे०) पहाड़ की बड़ी घुण्णिअ) घूमा हुआ, चक्र की तरह फिरा शिला; (दे० ना० मा० २, ११०) । हुआ; (प० च० २१, ६, २) । घुमन्त - घुट्टिवि-पू० का० क्रि० घोंटकर, घूट व० कृ० (ध्वन्यात्मक) धू-धू की आवाज धूंट पीकर; (सं० रा० १६२) । करते हुए (प० च० २४, २, २) । घुट्ठ-वि० (सं० घुष्ट >प्रा० घुट्ठ) घुम्माविय-वि० (सं० घूर्णायित) घूमा घोपित, ऊंजी आवाज व्यक्त किया हुआ; हुआ; (जंबू० १, १४, ६)। (ग० ६, १३, ५; जस० ४,३०, चुम्मय-वि० (सं० घूणित >प्रा० घुम्मिय) घूमा हुआ; (जंबू० ८,६, घुटुक्क-अक० गरजना, गर्जारव करना, २)। तुल० राज० घुड़कणो, घुड़कबो; (प्रा० घुम्मिर-वि० (सं. घुम्मिर-~-वि० सं० पूर्णितृ>प्रा० गु० २४, २)। घुम्मिर) १. घूमने वाला; (महा० संधि घुण-पू० (सं० प्रा० घुण) , काष्ठ ६८) । २. वूमते हुए, "मयधुम्मिरेहि भक्षक कीट; (सुदं० ८, ४०, ७) । गइमंथरेहिं आरुहहिं सलक्खणगयवरेहि," घुणहुणिमा, घुणाहुणी- -स्त्री० (दे०) -वै मद से धूमते हुए मथरगति, सुल- कानाकानी, कर्णोपकाणिका; (दे० ना.. क्षण गजवरों पर आरूढ़ होते हैं; (सुदं० मा० २, ११०)। ६, १३, ७)1 धुणिम-वि० (सं० धूणित) भ्रांत, /घुर--(सं० धुरुधुराय >प्रा० घुमघुर) भटका हुआ; . (दे० ना० मा० धुरघुराना; "णर-मारण-सीलु, दारिय- ४६)। पीलु घुरुहुरंत-मुहु जाम;" अर्थात् मनुष्यों घुत्तिम-वि० (दे०) गवेपित; (दे० को मारने के स्वभाव वाला तथा पीलु- १०)।
धुरुग्घुर (३३१) घूय पंचानन, आवाज गजों को विदारने वाला वह के समान काला कर डाला था; (क० १, जब अपने मुख से घुरघुरा रहा था; (व० ६, ४) । घुलंति-कृ० फहराती हुई; ३, २६, ११)। "करि धय पंतिहिं गयणे धुलंति हि," 1/घुरुग्घुर- (सं० घुरुघुराय>प्रा० अर्थात् गगन में फहराती हुई ध्वज-पता- धुरुधुर) पुर-धुर आवाज करना (gru- काएं; (व० ४, २०, १)। घुलेप्पिणु- nt); तुल० गु० घूरक। -न्ति अक०, पू० का० कि०; (प० च० ३८, १७, व० (प० च० ३२, ३, ८) । 1/घुरुधुर-(सं० घुरघुराय > प्रा० घुलकि-स्त्री० (दे०) हाथी के चलने धुरुधुर, घुरहुर) 'धुर घुर' का शब्द; (प्रा पं० १, २०४) । करना; घुरहुरइ-अक० घोर गर्जन करता घुलिय-वि० (सं० पूर्णित>प्रा० है, घुरघुराता है; (सं० रा०)। घुरहु- घुलिस) चलित, घुलित (म० २,७८, रंति-क्रि०, २० (सुदं० ११, १५, ५)। २. घूमती हुई; "अलिवलयधुलिय- ६) । घुरुहुरंति-कृ० (सं० धुरुघुराय+ अलयई कहंति" घूमती हुई भ्रमरावली शतृ) (सुदं० ८, १६, १)। घुघुरुहुर- रूपी अलकों सहित (उनके गुजार के रूप न्ति-कि० निरंतर घुरघुर की ध्वनि में) बोल रही थी, (सुदं० २, १२, १) । होना; (प० च० ३१, ३, ७) । ३. वि० (सं० घुलित) चंचल; (जस० घुरघुरि-पु० (दे०) मण्डूक, मेढक; १, ३, १७)। (दे० ना० मा० २, १०६)। . घुसण-न० (सं० घुसृण>प्रा० घुसिण) घुरहुरिय-वि० (व.) (सं० घुरघुरा- कुकुम, केसर, सुगंधित द्रव्य-विशेष; यित) धुर-धुर की आवाज (प्रा० गु० २६, १७) । धुसिण-न० (जंयू० ५, ८, १६)। केसर; (प्रा० गु० ३५, ८; जस० ३, १, 1/घुल-(सं०/पूर्ण, सं० घूर्णते) ५)। -इ अक० (सं० घूर्ण >प्रा० घुम्म, /घुसल-मथना, विलोड़न घुल) घूमना, चक्राकार फिरना, " का -इ व० (प० च० ३७, १, ४) । वि वे रइसलिलें सिधिय, वेषइ वलइ घुसिण-पु. (सं० घुसृणम् >प्रा० घुलइ रोमचिय"--कोई वेश्या, रति के घुसिण) कुकुभ, केसर, सुगंधित . द्रव्य- जल से सिक्त हुई, ऊपती, बलखाती, विशेष (सं० रा०; सुदं० ५, ४, ७; ण. घूमती और रोमांचित होती; तुल० म० १, ६, १०)। घोलणे; (ण० १, १८, ६)। घुलंत घुसिरिगम-वि० (दे०) गवेषित, ढूढ़ा कृ० (सं० घूर्णत्) डोल-डोल कर; "घुलं हुआ; (दे० ना० मा० २, १०६) । तई तेण थणाहं मुहाइ सकज्जलवगणई घुसिम-न० (दे०) कुकुम; (पड्) । ताई कयाई!" अर्थात् उसके हार ने भी घूय-पुं० स्त्री० (सं० घूक>प्रा० डोल-डोल कर स्तनों के मुखों को काजल घूम) उलूक; (जस० १, १०, ६) । से युक्त; करना । .
धूयर्ड (३३२). घोर परस्पर क घोटते थे; (ण. -- घूयउ-पु. (सं० घूक >प्रा० घूअ) मोडंति, लोट्टति घोट्टति," वे उलूक, उल्लू, पक्षी-विशेष; (जंवू० ५, एक दूसरे को धराशायी करते, मोड़ते, ८, १६)। ~ऊ पुं० उल्लू (जि०)। लोट-पोट करते और घूवड-पु, उल्लू, (सुदं० ११, १५, ५, ५, ५)। मि व०, उ० पुल; (प० ८) । च० ३८, ६, ३) । घोटिर-भू० का० 1/घे-(सं० /ग्रह >प्रा० गह) ग्रहण पी लिया; "घोटिउ दुद्ध व कसणे कर लेना; घेइ; (षड्) । घेत्तु, घेत्तण सप्" अर्थात् दूध को काले सांप ने पी कृ० (प० १० ११८, २४; हे० प्रा० लिया, (महा० ६८, १०, १३) । व्या० ४, २१०) । घोट्ट-पु० (प्रा० घुण्ट हे० प्रा० व्या० /-(सं० ग्रह, >प्रा० गह) ग्रहण ४, ४२३) । धूट; तुल० गु० धूट, कर लेना; (जस० २, ३४, ७)। -प्पइ धूटडो; (प० च०३८, ६, ३)। क्रि०, व० (सं० गृह्मते) ग्रहण करना; २. पीने वाला; (प० च०४६, १०, (हे० ३४१, १) । घ-कृ० पकड़ कर; ६) (की० २, १८४)। घोड, घोडग, घोडय-पुं० स्त्री० (सं० घेउर-पुं० न० (सं० घृतपूर>प्रा० घोट+क>प्रा० घोडय) घोड़ा; (दे०. घेउर) घेवर; तुल० गु० घेवर (प्रा० गु० ना० मा० २, १११)। घोडम; (क० ७, २४, ७)।-य पुं० घेवर; (संधि० २, ६)। ११, १,६)। Vघोण-(सं० /घूर्ण) चक्कर देना; घेठा--भू० का० कृ० (प्रा० ५० २, १८६)। "आनिकु वान् जो एथु घेठा" अर्थात् घोग-कियपु० (सं० वक्रितघोणा) वांका वर्ग जो यहाँ धषित हुआ; (रा० नाक मुड़ा हुआ होना (with the nose ८,७)। turned away); (प० च० ४६, ५, घेतल-वि० (सं० गृहीत) पकड़ा हुआ। ७)। घुतले; (रा० २०)। घोणस--पुं० (सं० धोनस) एक प्रकार . धेवर-पुं० न० (सं० घृतपूर) घेवर, का सांप; सरीसृप-विशेष; (प० च० ३६, मिष्टान्न-विशेष; मैदे, घी, चीनी के योग १७; जस० १, ६, ६)। से बनी एक मिठाई; (दे० ना० मा० २, घोरंधार---पु० (सं० घोरोन्धकार) १०८)। घोर अंधकार; (व० ५, २२, ४) । घोंटि-स्त्री० (सं० घोण्टी) वृक्ष-विशेष; घोर-पु. (सं० मोट>प्रा० घोड) (जंबू०.५, ८, ९) घोड़ा; (को० २, २०५)। (२) वि० घोट्ट-क्रि० (दे०, प्रा० घोट्ट) (सं० प्रा० घोर) भयंकर; (भ०; जस० पान करना। -इ; (सुदं०.६, २, ५)। २, १०, १५)। घोट्टति-क्रि० घोटते थे, "पाउंति /घोर-(सं० . घुर्, सं० धुरति) घषित हुआ; : - पीना, घोरि (३३३) चंगेडा अप० dil प्रा० - १. शब्द करना, कोलाहल करना; जैन मुनि; (प० च० २०, १७६) । २. निद्रा में घुर-घुर आवाज करना; घोसालई, घोसाली-स्त्री० (दे०) शरद् (उ० व्य० प्र० ५२-१०)। ऋतु में होने वाली लता-विशेप; (दे०- घोरि-पुं० (दे०) शलभ-जंतु की एक ना० मा० २,१११)। जाति; (दे० ना० मा० २, १११)। घोसिम-वि० (सं० घोषित>प्रा० घोल-पु. (सं० घोट>प्रा० घोसिअ) व्यक्त किया हुआ; (जंबू० ७, घोड) घोड़ा; (की० ३, ८५)। - ११, ४)। (घोला) पु० घोड़ा; (की० २, २४३)। घोलें-पु., ब० घोड़े; (को० ४, ७६)। 1/घोल-(सं० घूर्ण>प्रा० घुम्म, घोल) घूमना; ध-पु. (सं० प्रा० च) तालु-स्थानीय -इ अक० (ग० ३, ८, व्यंजन-वर्ण-विशेष । संयो० (सं० १०) । घोलंत-कृ० (सं० घूर्ण+शतृ); च) और, तथा, (सं० रा.)। (ण० ७, २, ७)। चंग-वि० (सं० घोलिर-वि० (सं० घृणितृ> प्रा० चङ्ग>प्रा० चग) घोलिर) १. घूमने वाला; (ण. ४, १३, चंगा, चारु, अच्छा, सुंदर; तुल० राज० ११) । २. घोलनशील; (जस० १, १२, चंगो, (दे० ना० मा० ३१) । चंग- वि० १. चारु (ण० १, १५, ११)। ६)। घोस-पु. (दे०) सं० गुच्छ, गुच्छा; २. अच्छा, (महा० १४)। चंगउ-वि० सुंदर (जस० १, २१, तुल० म० घोस; (जस०)। १०)। तुल० पं० चंगा, म० चांगला, 1/घोष-(सं० घोपय् >प्रा० घोस) चांग । ३. स्वस्थ; (जंबू० १०, १७, घोपणा करना; - सक० (प० १० १४)।-तण पुं० (सं० चङ्गत्व) १, १२, ७; ण० ५, १०, २१)। घोसे- सौंदर्य; (जंवू० १, १५, १)। -म प्पिणु-पू० का० क्रि० घोषणा कर; अच्छा; (जंबू० ११, ६, (प० च० १६, ४, १०)। १)। घोस-पु. (सं० घोष>प्रा० घोस) चंगएष-पु. (सं० चङ्गदेव) नाम- ऊँची आवाज; तुल. राज० विशेष, (म० १, २, १) । (जस० १, १६, ४)। घोसण-न० (सं० घोषण>प्रा. घोसण) चंगिम-पु. स्त्री० (दे०) सुंदरता, ऊँची आवाज; तुल० राज० घोसणा, सौंदर्य; (प्रा० गु० १०, ४)। (भ०)। चंगेडा-स्त्री० (दे०) डलिया; तुल० घोससेण-पुं० (सं० घोषसेन) सातवें (सं० घोषसेन) सातवें राज. चंगेड़ी (मिठाई आदि रखने का वासुदेव का पूर्व जन्म का धर्मगुरु, एक पात्र); (कण्ह० चर्या० १०) । - वि० सुंदर, घोस;
चंचरीय (३३४) चंडेसरवर राज (प्रथम गुरु में १६ चंचरीय-पुं० (सं० चञ्चरीक >प्रा० चंचरीम) भौंरा, भ्रमर; तुल० राज० चंडउत्त-पु. चन्द्रगुप्त, पुरुष-विशेष; चंचरी; (जंवू० ४, २१, ५)। चंचरी- (ण० ६, १, ८)। स्त्री० भ्रमरी; (व० १, ६, ७) । चंडकुंड-पुं० राक्षस योद्धा; (प० च० चंचल-वि० (सं० चञ्चल>प्रा० ५६, ३३)! चंचल) चपल, चंचल; तुल० चंडदिकय-वि० (सं० चण्डिवियत> चंचळ; (जंबू० २, ६, ८) । पुं० राक्षस प्रा० चंडिक्किम) रोप-युक्त; (संधि० २, योद्धा; (५६, ३६)। यस वि० (सं० ११, ६)। चञ्चलतर) अधिक चंचल; (व० १,१३, चंडपनोर-पुं० (सं० चण्ड-+प्रद्योत > १०)। प्रा० चंड+पज्जोअ) पुरुष-विशेष; (ण० चंचला-स्त्री० (सं० चञ्चला) छंद ७, ५, २१)। विशेप, वणिक छंद; तुल० राज० चंचळा चंडमुड-वि० (सं० चण्डमुज>प्रा० फिर लघु इस क्रम चंड+भुय) प्रचण्ड भुजशाली; (ण० ६, वर्ण का एक वर्ण वृत्त (प्रा० पं० २, १७२) । चंटमारी-स्त्री० चण्डमारी कात्यायनी चंचु-स्त्री० (सं० चञ्चू>प्रा० चंचु) देवी; (जत्त० १, ६, २)। चोंच; तुल० रान० चंचु; (जस० १, चंडवालु-पु० (सं० चण्डपाल) छंद- १२, १) । -क्खय वि० (सं० चञ्चु+ विशेप; (सुदं० ८, २६, ४) । क्षत) चंचु से खंडित; (जंवू० ४, ७, चंडा-स्त्री० (सं० चण्डा) क्रोवी स्त्री, ७)। मानवती; तुल० राज. चंडा; (प्रा० पं० चंचुय-पुं० (सं० वञ्चुक) बनायं देश २, १०७)। विशेप की मनुष्य-जाति-विशेप; (सवि० चंडाल-० (सं० चण्डाल >प्रा० १०,२,६)। चंडाल) वर्णसंकर जाति-विशेष, शुद्ध और चंचूजीविय-पु० (सं० चञ्चूजीविक) ब्राह्मणी से उत्पन्न; तुल० राज० चंडाळ; पक्षी; (जस० ४, १६, १०)। (जस० २, ६, १)। चंडंसु-पुं० वानरयोद्धा; (प० च० ५७, चंडिया-स्त्री० (सं० चण्डिका>प्रा० चंडिया) पार्वती, गौरी, - शिव-पत्नी; चंड-वि० (सं० चण्ड>प्रा० चंड) (प्रा. पं० २, ६९)। १, प्रवल, उग्र, प्रखर; (जंबू० चंडियसमाण-वि० (सं० चण्डीसमान) २जस० १, ६, ५) । २, क्रूर स्वभाव देवी तुल्य; (जस० १, ७, ११) । का; (प्रा० । पै०. २, १६५) । पुं० चंडम्मि-पुं० वानरयोद्धा; (प० च० १. विद्यापरवंशीय राजा; (प० च० ५, ७१, ३८)। २६४) । २. वायु; (० १०, २४, चंडेसरवर-पुं० (सं० चण्डेश्वरवर) चंडेसो (३३५) चंदप्पह । च० चंडेश्वर, व्यक्ति-विशेष-नाम; (प्रा० ५० १७)। -क्खा स्त्री०. रावण-भगिनी3B १, १०८)। (प० च० ७, १८)।-छप्पय पुं० छंद चंडेसो-पु० (सं० चण्डीश) महादेव; का भेद; (प्रा० पै० १, १२२)।-पु. तुल० राज० चंडीस; (प्रा० पं० २, (सं०चन्दन+माद्र)हरे चंदन वृक्ष (जंवू० १२)। ४,२१, २)। -पायव पुं० वानरयोद्धा; चंदंक-पु० विद्याधरवंशीय राजा; (प० (प० च० ५७, ६)। -भ पुं० राक्षस च० ५, ४३)। योद्धा; (प० च० ६१, २७) । --लित्त चंद-पु. (सं० चन्द्र>प्रा० चंद) वि० (सं० चन्दनलिप्त) चंदन से लिप्त; चंद्रमा, चांद; (जस० २, ६, १; ण. (जंबू० ८, १२, ५)। -साह स्त्री० ३, १, ६)। पुं० राक्षस योद्धा; (प० (सं० चन्दनशाखा>प्रा० चंदण+साहा) च० ५६, २) । वानरयोद्धा; (प० च० चन्दन वृक्ष को शाखा; (जंबू० १, १०, ७१, ३८) । दाशरयो भरत का पूर्वभव ६)।-ह पु० राक्षस योद्धा; (प० च० नाम; (प० च० ८२, १२८) । लक्ष्मण- ५६, ३१)। पुन; (प० च० ६१, २०) । चंदरगलया-स्त्री० (सं० चन्दनलता) चंदकता-स्त्री० दाशरथी भरत की प्रण वनस्पति-विशेष; (प० ५३, यिनी; (प. च० ८०,५२) । ६७)। चंदकंति-स्त्री० (सं० चन्द्रकान्ति) रत्न- चंदरणह-पुं० चंदन वृक्ष; स्त्री० चंद्र- विशेष; (जस० २, ४, ८)। नखा रावण की वहन; (जंवू० ५, ८, चंदकला-स्त्री० (सं० चन्द्रकला) चंद्रमा ३३)। की ज्योति; (व० ६, ६, १२)। चंदणहि-स्त्री० (सं० चन्द्रनखी) शूर्प- चंदरक-पु० (सं० चन्द+अर्क>प्रा० नखा; (महा०)। चंद+अक्क) चंद्र और सूर्य; (ज० १, चंदणोल-वि० (सं० चन्द्रना) चंदन १६, ५) । २. राक्षस योद्धा; (प० च० के समान शीतल; (व० ४, २, २)। ६१, १०)। चंदन--स्त्री. चंदना नामक चंदगइ-पुं० विद्याधर राजा; (५० च० (व० १०, ४०, ६)। २६, ८०)। चंदनह-पु० विद्याधर राजा; (प० च० चंदवूड-पु० विद्याधरवंशीय राजा; ११४, १६)। (प० च० ५, ४५) । चंदनोइ-पु० वानर राजा; (प० च० चंदपह-पुं० (सं० चन्द्रप्रभ) लाठवें ५४, २०)। तोर्यकर; (५० च० ९५, ३२)। चंदण-० न० (सं० चन्दन>प्रा० चदमह-पुं० (दे० चन्द्रप्रभ>प्रा० चंदण) सुगंधित वृक्ष-विशेष,. चंदन का चंदप्पभ, चंदप्पह) साठवें जिन देव पेड़, तुल० राज वंदण; (जं० १, ११, (तीर्यकर) का नाम; (ण० ५, ११,.६; आयिका; ० चंदफलम (३३६) चंदिण । . जस० १, २, ४) । २. चंद्रमा की प्रभा; १६)। (व० १, १, ६)। चंदसिरि--स्त्री० (सं० चन्द्रश्री) स्त्री- चंदफलम-पुं० (सं० चन्द्रफलक) चंद्र नाम; (जस० ४, २३, ४)1 मंडल; (जंवू० ८, ८, ११)। चंदसूर-पुं० (सं० चन्द्रसूर्य) चंद्रमा चंदमंडल-पुं० (सं० चन्द्रमण्डल) चंद्र- और सूर्य; (जंबू० १, १८, १०)। मंडल; (जंवू० १, १२, २) । चंदहासु-पुं० (सं० चन्द्रहास) रावण चंदमई-स्त्री० (सं० चन्द्रमती) यशोष की तलवार; (महा०)। रजननीनाम; (जस० १, २३, ६)। चंदाइच्च-पु. (सं० चन्द्रादित्य) चंद्रमा चंदमई-स्त्री० चंद्रवती, स्त्री-विशेप का और सूर्य; "चंदाइच्चहँ केम भाऊ बावइ नाम; (ण० ६, १, ६)। आथवाणु । ता दाणव ता देव जा विहि चंदमणि-स्त्री० (सं० चन्द्रमणि) चंद्र- जोइ सामुहउँ" । (प्रा० गु० ३८, कांत मणि; (व० ५, १, ८)। ४१)। चंदमल-पुं० (सं० चन्द्रमाला) वाणिक चंदाणण-वि० (सं० चन्द्रानन) चंद्रा- छंद का नाम;. (प्रा० पं० २, नना, चंद्रमा के समान मुख वाली; (क० १९०)। ८,१६, १०)। चंदमुहि-वि० (सं० चन्द्रमुखी) चंद्रमा चंदायणं-पु. (सं० चान्द्रायण) व्रत- के समान मुख वाली, (प्रा० पं० १, विशेष, चान्द्रायण व्रत, महीने भर का १३२)। -य वि० चंद्रमा के समान एक कठिन व्रत जिसमें चंद्रमा के घटने- मुख वाली; (जंबू० ७, १२, ७)। वढ़ने के अनुसार भोजन घटाना बढ़ाना चंदरासि-स्त्री० (सं० चन्द्रराशि) नाम पड़ता है; (जंवू० ४- १४, १२; जस० २, विशेष; (भ०)। ५८, १२) । चंदलेह-स्त्री० (सं० चन्द्रलेखा>प्रा० चंदारिसि-पु० (सं० चन्द्र +ऋपि) चंदलेहा) १. स्त्री-विशेष, एक राज गोत्र-विशेप; (क० १०, २८, १) । पत्नी; (जस० ४, २४, २; ण० ८, १२, चंदाहवत्त-वि० (सं० चन्द्राभावद) ६) । २. छंद-विशेप; (सुदं० ५, ७, पूर्णिमा के समान मुख चंद्र की आभा से १६)। युक्त; (जस० १, २, ४)। चंदवयण-वि० (सं० चन्द्रवदन) चंद्र चंदाहा- चन्द्र + आह्वा) मुख, चंद्रमा की तरह सुंदर मुख वाला; चन्द्रा नामक कन्या; (ण० ७, ११, (जंवू० ३, ३,४)। चंदवेभ-पुं० (सं० चन्द्रवेव्य) शस्त्र चंदि-स्त्री० (सं० चन्द्र) चंद्रमा; (प० विद्या; (सुदं० ३, ६, ११)। सि. च०१,१०, ३३)। चंदसरिस-वि० (सं० चन्द्रसदृश) चंदिण-स्त्री० (सं० चन्द्र) चांदनी, चंद्रमा के समान; (जस० ४, १७, चंद्रिका; (जंबू०८, १५, १५) । -स्त्री० (सं० २)।
चंदिणी (३३७) चइतालय . चंदिणिो-स्त्री. चन्द्रिणी नामक स्त्री; (ण० ८, १२, ६)। चंदिम---स्त्री. (सं० चन्द्र) चंद्रिका; (प्रा० गु० १२, ४)। चंदु---० (सं० चन्द्र>प्रा० चंद) चंद्रमा; (महा० ६८, ५)। -गम पुं० (सं० चन्द्रोदगम) चंद्रमा का उद्गम; (व० ७, २, १२)। चंदुज्जल-वि० (सं० चन्द्रोज्ज्वल) चंद्रमा के समान उज्ज्वल; (जस० ४. २७, ३)। चंदो--० चन्द्र, (छंदशास्त्र में) पट- कल गण का नाम; (प्रा० ५० १,१५) । चंदोव-न० (सं० चन्द्रोपक>प्रा० चंदोवग= संन्यासी का एक उपकरण) चंदोवा; (सा० १९८)। --य न० चंदोवा; (जंबू० १, १५, ७) । चंदोवडंबर--पु. (सं० चन्द्रोपक+ आडम्बर) चंदोवा युक्त; (सुदं० ११, १२, ८)। चंद्रमा-पु० (सं० चन्द्रमस्) चांद; (प्रा. पं० १, ३४)। V चंप-(दे०) चांपना, दवाना । सक० (जस०.१, १५, ८; जंबू० १,६, रन का >प्रा० चंपय) वृक्ष-विशेष, चपा का पेड़; (प० च० ४६, ७४)। -य पुं० (सं० चम्पक >प्रा. चंपय) चंपा का पेड़, चम्पा का फूल; (५० च० प्रा० गु० १५, १६) । तुल० गु० चंपो। -हुल्ल पु० (सं० चम्पक+फुल्ल > प्रा० चंपय+फुल्ल) चम्पा का पुष्प; (ण. ३, ४, १५)। चंपाणयरि-स्त्री० चंपानगरी (जंवू० ३, १०, ११)। चंपापुर-पु. (सं० चम्पापुर) विशेप; (जंबू० १०, २४, ११)। चंपारण-पु. (सं० चम्पराण्य) १. देश-विशेष, चंपारन, तिरहुत कमि- श्नरी (बिहार) का एक जिला, २. चंपा- निवासी; (प्रा० ५० १, १४५)। चंपाहिअ-पु० (सं० चम्पाधिप) चंपा- धिप, राजा-विशेप; (क० ३, १४, ६)। चपिय--वि० (दे०) आक्रान्त, चांपा हुआ, दबाया हुमा; (सुदं० ६,२१, ५)। चमा -स्त्री० (सं० त्वक्) त्वचा; (षड्) । बइअ---देखो चविश; (प० च० १०३, १२६)। चइ.अ--देखो चेइअ; (षड्)। धइतालय-पुं० (सं० चैत्य+आलय चैत्यालय, देवालय; "सुखर-वन्दिएँ धवल- विसालएँ, गम्पिणु सिद्ध कूडें चइतालऍ;" (प० ० २४, ६, १)। चम्पक>प्रा० . चंप-न. १. (सं. चंपय) चम्पा का फूल; (प० च० ४२, ८) । २. चम्पा एक पर्वतीय शहर, चम्पा नगरी; (भ०; रि० २, ६)। -~-अ पु० (सं० चम्पक >प्रा० चंपय) पुष्प-विशेष; (प्रा० पं० २, १६३) । -एल पुं० (सं० चम्पक + तेल >प्रा. चंप+तेल) चम्पा का तेल; (सं० रा०)। - पुं० (सं० चम्पक - च (३३८) चउदिस - चउ~-वि० (सं० चतुर्>प्रा० . चउ) . (सं० रा०) । -गुणिय -रगुणिय .. वि० (सं० चार, संख्या-विशेष; तुल० म०. चौ; चतुर्गुण) चौगुनी; : (प० च० ८, ७ राज० चउ; (ण०,३, १७, १० सं० )| ~~-चूड पु०. (-चूड) विद्याधर रा०)। -अण्ण वि० (सं० चतु: पंच वंश के एक राजा का नाम; (प० च० शत्) चौवन; (प्रा०. . ० १, ५७)। ५, ४५) । –णउइ वि० (-जवति) -आलह वि० (सं० चतुश्चत्वारिंशत् > चौरानवे। -णज्य वि० (---नवत' प्रा० चउआलीस) चवालीस; (प्रा०.५० चौरानहवा; (प० चौरानहवा; (प०. च० ६४, १०६) १, १४६) । -कसाय पुं० (सं० चतु- -णिकाय पुं० (सं० --निकाय) चतु प्कषाय) क्रोध, मान, माया और लोभ; निकाय के देव; (व० ६, १२, ५) (जस० ३, १७, ७)। --क्क वि० (सं० तीसइम देखो , तीसइम; (प० च. चतुष्क) चार; "कण्णचउक्कु जाउ लक्ख- ३४, ६१)। ताली वि० (-चत्या 'णधरु," -लक्षग संपन्न चार कन्याएँ रिश) चवालीसवाँ; (प० । च०.४४ उत्पन्न हुई; (जंवू० ४, १४, १७)। . ६८) । -त्तीसइम वि०{-निश) चौं। न० चार वस्तुओं का समूह, चौकड़ी; सवा । —त्य वि० (सं० चतुर्थ) चाया (भ०) । पुं० (सं० चतुष्किका>प्रा० तुल० गु० चोयु; (प्रा०, पैं० १, १३७ चउक्किआ) चौक; (ण० ६, २१, २; संधि० १८, ४, १०)।-त्थी . स्त्री दे० ना० मा० ३, २) । -क्कन्ध पुं० (सं० चतुर्थी) चीय, किसी पक्ष की चौथ चतुः स्कन्ध; (भ०) । -क्कय पुं० तिथि; (जस० २, ४, ३)। -थिय वि (सं० चतुष्क >प्रा० चउक्क) आंगन, (सं० चतुर्य) चौथा; (क० एक प्रकार की सजावट; चौक, तुल० गु० ४) । ~यो वि० (सं० चतुर्थः) चौया चौक; (सं० रा०; १० २८,६, तुल० राज० चौथा, (प्रा० ५० २,६६) ६)।-कलु पु० (छंदशास्त्र में) चतु -~-दस वि० (--दशन्) चौदह; (जसं • एकल गण; (प्रा० ५० १, २०८)। ४, ११, ४)। -दसि स्त्री० (-दशी -गइ स्त्री० (सं० चतुर्गति) नरक, तिर्यग् , चतुर्दशी, तिथि-विशेष; (जस० ३, ३. मनुष्य और देव की योनि; (ण० २, ६, १५) । -दह वि० (सं. चतुर्दश । -~-गइवयण पु० (सं० चतुर्गति 'चौदह; (ण० १, १, ६)।-रह-रया +वदन) चतुर्गति रूपी मुख, "इंदियफ- पु० सं० (चतुर्दशन्+रल;) चौदह रत डालु चउगइवयणु,' --इद्रियों --इद्रियों रूपी (व० २, १३, १) । —दार पु० (सं फणा, चतुर्गति रूपी मुख; (जंवू० ३, ७, चतुर्झर),चार ' दरवाजे १३)। गुण, गुण वि० (-गुण) (जस० १, ४, ८) । -दिस स्त्री० (सं चौगुना; (पड; जंबू० ६, १३, ६)। चतुर्दिशम् > च उद्दिसि) चा गगी वि० (सं० · चतुर्गुण>प्रा० दिशाओं में; तुल० गु० चोदश; (ण० : चउगुण) चार वार और उतना ही; ६, ११) । चउदिसु; (प० च० २, १६ - च० १६)। वाला घा प्रा० घउछसम (३३९) चज्वार - . - ६)।-इसम वि० (-दश) चौदहवा; सोह-गुफ कूय-निन्नासयं । गुरुहू बुतु (५० च० १४, १५८) । -इसि स्त्री० मुणिहि तिथु किया चउमासयं ॥ तुल. (सं० चतुर्दशी>प्रा० चउदसी) तिथि गु० चोमासु; (प्रा० गु० १६, २८)। विशेष; (व० १०,४०, १२) । -पइया यालीस, चोप्रालीसह (वि.) (सं० स्त्री० चोपइया छंद, मात्रिक छंद; "चउ- चतुश्चत्वारिंशत्.) चवालीस; (प्रा० पया-छदा भणइ फणिदा;" (प्रा० पै. ५०)।-रंग पुं० (सं० चतुरङ्गिणी) चार अंकों वाली सेना; (ण. ७, १०, १,६७)। -पाण पुं० (-प्राण) १)।-रंग-वलं पुं० चतुरंगिणी सेना; इंद्रयादि; (जसः ४, १८, १८)। (व० २, १४,४)। –रंगाणीया स्त्री० --पास क्रि० वि० (--पाश्र्व) चारों (सं० चतुरङ्गिणी) चार अंगों वाली नौर; (ण० ४, १४, १४; जस० ३, १२, सेना; (रि० ७, ६)। -रग वि० १३)। -पासिय वि० (-पार्वक) (सं० चतुरङ्ग>प्रा० चउरंग) चार चारों ओर का; (भ०) । -प्पय वि० अंगों वाला; (प० २० १६, ५, ११) । पुं० (सं० चतुप्पाद-द) चौपाया; (भ०; पुं० शतरंज का तेन; (प० च० ३८, जस० १, १०, ४)।-पह पुं० (सं० १, १०)। -रद्ध वि० (२० अर्धचर) चतु पयः) चौराहा, वह स्थान जहाँ चार साढ़े चार; (प०१० २४, १४, ६)। सड़कें मिलें; (जंबू० ४, ८, ३)।-फ -~रय पु० (सं० चकोर) चक्रवाक पक्षी; लिय वि० (सं० चतुप्फलिक) चार भागों (जस० १,१०, ५)। वाला; (प० च० ३६, ८, ७) । -बीस -रासम पु०सं० चतुराश्रम चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रत्य, संन्यास) वि० (सं० चतुर्विशति) चौवीस; (प्रा० पै० १,६१)।-बोल पु० चौबोला (ण० १, 5, ३)। -रासी वि० (सं० चतुरशीति) चौरासी, (जस० ४, ११, छंद, छंद-विशेष; (प्रा० २० १,१३१) । ६)।-रि स्त्री० (सं० चत्वरी) लग्न- -भुन वि० सं० चतुर्भुज>चउन्मुअ) मण्डप, चौकी; तुल० गु०. चोरी; (जस० चार हाय वाली; (प० च० १२, १०, १,.२७, ६)। --रिय स्त्री० . (सं० २) 1--भेय पुं० (सं० चतुर्भेद) चतु- चमरी) चौरी; "गुरुवरिय हेमे णिम्म- विध, चार प्रकार; (जसः ", ८, १५)। विय;" स्वर्ण-निर्मित बड़ी-बड़ी चौरियां -भाणथम पु (स० चतुर्मानस्तम्भ) लटकायी गई; लटकायी गई; (क० ५, ७, १०)। चार मानस्तंभ, "चउमाणथंभ जिणकेय- -~-रूण वि० (सं० चतुर उन) चार से गाई परिहा वल्ली वणवतपाई" कम; (५० ५० ११, ४, ८)।--वर्ग चार मानस्तंभ, जिनकेतन, परिखाक्लय, पुं० (सं० चतुर्वर्ग) धर्म, (सुदं० १, ६, ४)। मोक्ष, (सुदं० १, १,४)।-वण्ण पुं० -मासयं पु० (सं० चातुर्मासकम्) वर (सं० चतुर्वर्ण) चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, सात के चार महीने, अपाढ़, सावन, भादो वैश्य और शुद्र; - (ण० १, ७,८)। और कुआर का चौमासा; 'सप्प-विल --वार पु. (सं० चतुरि) चार दर- , अर्थ काम, वन, उपवन - , चंउवाह (३४०) चक्कघर गइ स्त्री० . चोट वाजे वाला घर; (प० च० १६, ११, वि० सं० चतुःशास्त्रीय) चार - श हों ७) । -वाह पु० (सं० चतुः पार्श्वम्) (सं० चतुः पार्श्वम्) 'का; (क० ८, १७, ८)। -सय वि० चारों ओर; तुले० गु० चोपास; (प्रा० (सं० चतुर+शत) चार सो; (व० ३, गु० २४, २)। -विह वि० (सं० चतु ५, ६)।-हत्तर, हत्तरि वि० (स० विध) चार रूपों वाला; (जस० १, १, चतुः सप्तति) चौहत्तर; (महा.)। १०; ण० १, १२, ५; भ०)। -विह- 'चऊ-वि० (सं०. चतुर् >प्रा० चउ (सं० चतुर्विधगति) चार चार; (प्रा० ५० २, १५८) । प्रकार की गतियां; "ए जिणवर । चकमक-पु० (तुर्की चक्रमाक - एक णिज्जिय-रइवर विणिवारिय-चउविह प्रकार का कड़ा पत्थर जिस पर गइ;" अर्थात् उक्त समस्त जिनवर रति- पड़ने से पड़ने से बहुत जल्दी आग निकलती है) वर-कॉमदेव को जीतने वाले हैं, चतुर्विध चमक, जाज्वल्यमान होना; "धर चकमक गतियों का निवारण करने वाले हैं; (व० कर बहु दिसि चमले,' अर्थात् घोड़ों के १, १, १५) । टि०-हिंदू शास्त्रों के अनु- चंवर बहुत सी दिशाओं में चकमक करते सार जीव की तीन गतियाँ हैं-उर्व हैं; (प्रा० ५० १, २०४)। गति (देव योनि), मध्यगति (मनुष्य चक्कंक-पु० व्यक्ति-विशेष-नाम; (प० योनि); अधोगति (तिर्यक् योनि) । जन च० १०, ३). शास्त्रों के चक्क-पु. (सं० चक्र >प्रा० चक्क) गतियाँ कही गई . हैं.-१. नरकगति, कुम्हार का चाक; तुल० म० चाक; २: तिर्यक गति, ३. मनुष्य गति, ४: देव (भ०)। २. समूह, "इमो पक्खिरायस्स गति और ५. सिद्धगति । -वीस वि० चक्कस्स चक्को;" अर्थात् यह (बालक) (सं० चतुविंशति) चौबीस; पक्षिराज (गरुड़) के समूह के लिए भी चौवीस, चोवीस; (भ०; सुअंध० १, चक्र (सुदर्शन) के समान है; (जंबू० ५, १)-वेइ पुं० (सं० चतुर्वेदिन) ५, ६)। २. आभूषण-विशेष, (संधि० २, १. चतुर्वेदी, चौबे, ब्राह्मणों की ३; ७) । ३. न० पहिया; (प्रा० पं० १, या शाखा, २. मथुरा का . पंडा; (सं० १, ६) । ४. न० गाड़ी का पहिया; (ण. रा०)।--विह वि० (सं० चतुर्विध) ७, १, ७) । ५. आयुध-विशेष; (प० पार रूपों वाला, चौतरफा; (जंबू० १०, च० ७१, २१; जस० १, २, ११)। २६, १०) । -सठि वि० (सं० चतुः ६. सुदर्शन चक्र; (जंबू० ५, ५, ६) षष्ठि> अधं मा०, जैन म० जैन म० चउसद्धि -चिक्कार पु० (सं० चक्र + चीत्कारः) चौसट्ठी-चउढ़ि, पिशेल) चौसठ; तुल. चक्र का शब्द ; (क)।-घर पु० राज० चोसम; (प्रा० ५० १, ५१)। (सं० चक्रधर) चक्रवर्ती, "नवनिहिरयणा- सण्या स्त्री० (सं० चतुः संज्ञा) आहा हिउ चक्कधरु, "छक्खंडवसुधरि धरिय- रादि; (जस०-३, १७, ८)।-सस्पिय करु," अर्थात् (वह मंत्री.) : आदि नी अनुसार पाँच प्रकार की . तुल० म० -- एक जाति - चषकणाह (३४१) चक्काई चकवर्ती था; मध्य पक्षी; वाल नामक निधियों का रत्नाकर तथा पखंड वसु. चक्क वई'-० (सं० चक्रवर्तिन् > 'धरा से कर लेने वाला प्रा० चक्कवइ) छह खण्ड भूमि का अधि- (जंबू० ३, ३, १२)। पति राजा, सम्राट्; (ण० ४,४,१३) । चषकणाह-पु० (सं० चक्रनाथ) चक्र -विहूइ पुं० चक्रवर्ती विभूति; (जंबू० वर्ती; (जस० २, २५, १४) । ३, ३, १६)। चराद्ध-० चक्रपुर (चक्कपुर) का चक्कवइ'-० (सं० चक्रपति) राजा; (प० च० २६, ४)। गुरु चतुष्कल जगण (it); (प्रा० ५० १, चररुपम-~-पु. (सं० चक्रपद) (छंदशा. २५-६६) । स्त्र में) वणिक छंद का नाम (प्रा० पं० चक्कट्टि-वि० (सं० चक्रवतिन्) चक्र- २, १५२) ।. वर्ती, आसमद्रान्त भूमि पर राज्य करने चाकपाण-पु. (सं० चक्रपाणि>प्रा० वाला; (जस० ३, २६, ६)। चक्कवट्टी चक्कपाणि) चक्रवर्ती राजा, सम्राट -वि० चक्रवर्ती (जंबू० ३, ८, ७)।' (व० ४, १२, ५)। चक्कवाय-पुं० (स० चक्रवाक) चकवा; चक्कय-पु० (सं० चकवाक>प्रा० ,(जंवू० ५, ७, ३) च किवाग, चक्कवाय) चक्रवाक चक्कवाल-पु० (सं० चक्रवाल) चक्र- (५० च० १८, ११, ४)। नगर; (क० ५, २, चक्करे-स्त्री० (सं० चक्राकार) चक्रा- १)। कार भौंरी; (को० ४, ३२) । चक्कह-पु. (सं० चक्र>प्रा० अप० चकल-वि० (सं० चकक>प्रा० चक्रुत) १. गोलाकार, वतुल; (प० च० चक्क) समूह; (को ४,१४)। चक्कहय-पुं० (सं० चक्रवाक) चक्रवाक २६, १०, ७) । २. चक्राकार, विशाल; चक्रवाक पक्षी; (प० च० (सुदं० ३, १०, १३; जंबू० १, १२, ५)। --य वि० गोलाकार; (प० च० ३)। २३, १, ६)। चषफहर-वि० (सं० चक्रघर) धक्कलत-पुं० (सं० चक्रत्व) परिधि, धारी; "वलएउ चक्कहरु सुरणाहु पहे "चक्कलत्तु जोषणाई, पंचवीसदूणियाई;', खयरु;" अर्थात् वलदेव, चक्रधारी नारा- अर्थात् उस पवंत की परिघि पचीस के यण, सुरेंद्र, आकाशगामी खेचर; (क. दुगुने अर्थात् पचास योजन है; (क० ५, ६, ७, ९)। चक्कहरा-वि० पक्रधारी १, ६)। "तह चक्कहराणय-वोमयरा; (व० २, अपकलिय-वि० (सं० चक्रवत्) भ्रांत; १५, ३)। (भ०)। चक्का-पु० (सं० चक्र>प्रा० चक्क) चवकलु (छंदशास्त्र में) चतुष्कल व्यूह-रचना; (को० ४, १७४) । गण; (प्रा० ५० १, ८५))। चपकाई- स्त्री० (सं० चक्रवाकी>प्रा० २४, १, चक्काउँह (३४२) चच्चरि । पक्षी; ... " . चक्कवाई) चक्रवाक पक्षी की मादा; चक्खिज्जइ. आ+स्वादय (कर्मणि) .(प० च० १६, ५१)। .(जंवू० १, ८, ६)। चक्खिवि-पू.. चक्काउहपु० (सं० चक्रायुध) श्रीवि का० क्रि०; (ण०,६,. २, ११)। तुल० ष्णु; (व० १०, १६, ८)। राज०. चखणी, चखबा; चाखणी, चक्काय-पु० (सं० चक्रवाक >प्रा० चाखवौ। चक्कवाग, चक्कवाय) चक्रवांक चक्खु-पु० न० (सं० चक्षुप>प्रा० (५०. च० ३४, ३२)। चक्खु) नेत्र, आँख; तुल० राज०. चख्खु; चक्कार-पु० विद्याधरवंशीय राजा; (प्रा० १० २,१५१) । -गम्म (सं० (प० च० ५, २६३)। , चक्षुर्गम्य) दृष्टिगोचर;, (जस० ४, १७, चक्कालंकियकरु-पुं० (सं० चक्र+ १७)। -नाम पुं० आठवें कुलकर; अलङ्कृत+कर) चक्र से अलंकृत हाथ; (प० च०:३, ५३.) । (व० २, १२, ११)। चङ्गय-वि० (दे०. चङ्ग>प्रा०' चंग) चक्कावट्ट-पु० (सं० चक्रावर्त) चक्र चारु, सुदर, मनोहर; (प० च०१४, की तरह गोल आकार का; (सं० रा०) । ३, ५)। चक्कि-पु. (सं० चक्री) त्रिपृष्ठ नामक चच्चं कयं-वि० (सं० चर्चा अङ्कित) नृप; "चक्किहे कमलमलपुरा णविया;" चचित; (जस० २, ११, ५) । (व०.६, ७, ११)। /चच्च-(सं० चर्च ) चचित करना; चक्की-स्त्री० १. (सं० चक्रवाकी> (स० रा०)। प्रा० चक्कवाई) चक्रवाक पक्षी की मादा; (प० च० १६, ५४)। २. स्त्री० (सं० चच्चर--न० . (सं० (सं० चत्वर >प्रा० चक्री) गाथा छंद का भेद; (प्रा० ३० चच्चर) १. चौहट्टा, चौरास्ता; (महा० .१६१.) । ३. 'पु० (सं० चेंक्रिन्) चक्र- ६८, ३; जस० ४, २१, १४) । २. चौक; वर्ती; (जंवू० ३, ४, ७) । तुल० गु० चोक; (सुदं० २, १०, २७) । चक्केसर-पु० --(सं० चक्र+ईश्वर) ३. रास-स्थान; (प० च० ५६, १४, चक्रेश्वर, चक्रवर्ती, चक्र या: मंडल का ६) । चच्चरु -न० (सं० चत्वर) चबू- राजा; (जंवू० ३, ७, १०),। तरा; (रि० १, ८) -वंत वि० (सं० चक्कोरप्रच्छि--वि० (सं० चक्को- चत्वरवत् अथवा. चर्वरी: दत् sport- राक्षी). चकोर पक्षी. के समान नेत्र वाली; ive) चौराहों सहित; "भमेविणु पट्टणु (क० ७, ४, ८) चच्चखंतु" (क० २, २०, ७) । 'चक्ख-(दे०) आस्वादन करना, चच्चरि-स्त्री० (सं० चर्चरी>प्रा० स्वाद लेना, चखना। -इ सक०, (ण. चच्चरी) १ गीत-विशेष, एक प्रकार का ४, २, १६; महा०.२, .. १६,.. १४)। गान; सं०रा०) । २. एक प्रकार नृत्य; चत्रखंत - कृ०; (जंबू: ६, ५, १२)। (सुदं० ७, ५, ६) | -यबंध पु० (सं० ।
चच्चरी (३४३) चड .. " धीरे-धीरे नख घट्टन . चर्वरी+-वन्ध) चच्चरिया नामक छंद; चेलो; (संधि० ३, ६, ६)। (जंबू० १, ४, ५)। चट्टण-वि० (दे०) नाशक, भक्षक; चच्चरी-स्त्री० (सं० चर्चरी) चर्चरी (जस० ४, २३, १४) । नामक वणिक छंद का नाम; (प्रा० ५० चट्टणु-क्रि० भू० का० (दे० प्रा०/ चट्ट=चाटना) चाटना "दरणहपट्टणु २, १८४)। २. (सं० चञ्चरीक) भ्रमरी; (व० २, ३, १४)। अहरसुचट्टणु, करती, व अघर चाटती; (सुदं० ८, २८, चच्चिम-वि० (सं. च.चत) जिसकी १०)। चर्चा हो, विचारित; (क० ४, चट्ठय-पु० न० दे०) यष्टी. चटुला, जस० २,११, ५)। चच्चिय–वि० लाठी, छड़ी, डंडा, गदा; "चालुय चट् चर्चित; (जस० १, १४, १; जं० ६, टुयचूरियन;" अर्थात् तब उसे झारी और २, ५)। चटुए से कुचला गया; (जस० ३,५,१४)। चविकिय-वि० (दे० प्रा० चच्चि चडक्क-पुं० न० (दे०) शस्त्र-विशेष%3; क) विलिप्त, चंदन आदि सुगंधित वस्तु (प० च० ७, २६) । २. चक्र; (प० च. : का लेप किए हुए; "चच्चिकको" (पड्; ७, २८) । ३. विद्युत; (प० च० ४३, प. च. ४०, २, ७) । २. विभूषित १५, ६)। मण्डित; (प० च० ३४, १०, ४) । चिड-(प्रा० चड) आरुढ़ होना चचिक-पु० न० (दे० प्रा० चच्चि- चढ़ना; (सं० रा०)।-इ अक०-(हे. ४२१; महा० २, १६, १; सं० रा०)। क्क) विलेपन, चंदनादि सुगंधित वन्तु चति-फि०, २०,व० चढ़ रही है; (ण० का शरीर पर लेपन; (प० च० ५१,४, १, १८, ३)। -न्ति कृ० चढ़ती हुई; ३)। २. वि० विभूपित, मंडित; (दे० "दीसइ रोमावलि छुडु चडन्ति" अर्याद ना० मा० ३, ४)। 'धीरे-धीरे चढ़ती हुई रोमावलि ऐसी चच्चिविकय–वि० (सं०. चर्चा कृत) दिखाई देती है'; (प० च० १०, ३, ४)। चचित, चर्चा किया गया; विचार किया चडन्तहों-कृ० चढ़ते हुए, (प० १० गया; (जस० १, ६, ५) । ३, २, ८) वडाइयइ-(कर्मवाच्य) चच्चिय-वि० (दे०) त्यक्त; (व० १, चढ़ाया जाता है; (सं० रा० १२. १३)। चडाविय-पू० का० क्रि०, सं० आ+ चञ्चलु-वि० (सं० चञ्चल>प्रा० /ह.+कत्वा; चढ़कर; (सुदं० १०, चंचल) चपल, चंच न; (हे. ४१८, १०, १२) । चडिड-भू० का० चड़े; ३)। (सं० रा० १४४); वडाहुँ-भू० का० चञ्चरिय-० (सं० चञ्चरीक>प्रा चढ़ेगे; (हे. ४३९) । चडि-क्रि, चंचरीअ) भ्रमर; (प० च० ४०, १६, १०, चढ़ता है; (पाहु०) । तुला चढ़णें । चडिउ-पू० का० कि०, चढ़- चट्ट-पु० (दे०) शिष्य; तुल० गुग कर; (जंकू० ७, ५, ७)। बडियो- ५२) । म० - चंडचंडच. (३४४) - आ०, अनुप को ०३, कि० ० भू का० चढ़ चंया; "समसीस- चढयर-पुं० (दे०) समूह;. (प० च. दाणो विमाणं वडिण्णो;" (राजा द्वारा) २, ४८)। भाशीर्वाद देने के साथ ही विमान में चढ़ /चडाव-(दे०) चढ़ाना; (उ० व्य० गया; (जंबू० ५, ५, १४) । चडियउ प्र० ६, २२) । तुल० राज० चढ़ाणौ। क्रि०, भू० का० (प्रा० चड) १. आपढ़ -वि पू० का० कि०, चढ़ाकर; (५० हुआ; "सो गवजोवण चडिय" -वह च० १६, १); स्थापित कर; (प० च० नव यौवन में वारुढ़ हुआ; (सुदं० ३, १४, ६, २)। -हि कि०, मा०, चड़ा- ६, २०) । २. प्राप्त हुआ; "पुरिससीहु इए, "तं तुहुँ मि चडावहि णिययकबि;" णवजोवणे चहियउ"-~-वह पुरुपसिंह (ण० १,४, १) चहाविइ-क्रि०, नव यांवन को प्राप्त हुआ, (ण०, ३, व०, चढ़ाना; (महा० ३०, १२, ६)। ४,२)। चडीणा-कृ० चढ़कर; (क० चहावियउ-भू० का०, चढ़ाया हा; ३, ६२)। चड-कि०, चड़ो; "इसउ कम्ब करउ (ब) णुहुं चडावि- "हय जोत्तें महारहवी चडु"-अर्थात् यज;' अर्थात् 'जैसे कामदेव ने कर में घोड़े जोती और महारथ की पीठ पर चड़ाया हो;' (रा० ३१)। चड़ो; (प० च० १६, २, ५; चडावए-क्रि०, व० चड़ाता है; (को० ६, १४)। चडेइ~-कि०, २०, चढ़ना; २, २०३) । चडाविड-क्रि०, भू० का० (परम० २, ४६) । चडेप्पिणु-पू० का० चड़ा लिया, "अङ्क चडाविड तिहुमण- क्रि० भारुद्र होकर, प० च० ३, १२, पाह" -त्रिभुवननाथ को इंद्र ने ६)। च. वि-पू० फा० कि० चढ़ गोद में ले लिया; (५० च० २, ३, १)। कर; (प० १० ११, ३, ६)। चडाविय--पू० का० कि० चढ़ाकर, "तो /चढचडचड-(सं० चहचहाय्) 'चड- सिरसिहरि चडावियहत्य;" अर्थात अपने चड' आवाज करना । चडचडचडन्त-कृ. सिर पर हाथ चढ़ाकर; (जस० ३,२६, (प० च० २६, ५१)। ६) । वडाविवि-पू० का० कि० चढ़ा- चडण -न० (दे०) आरोहण; तुम० गु० कर; (व० ४,१०,६)। चडाण; राज० चडणी, चडबौ; (संवि० चहावाल्ल-वि० चंद्रावती, स्त्री-नाम; १२, ५, २२)। वदणं-न चढ़ना; (प्रा० गु० ५, ४८)। (सु० ६-८)। चाविय-वि० (दे०) आरोहित, घडफडत-कृ० (दे०) तड़फड़ाते हुए; बढ़ाया हुआ, ऊपर स्थापित; (क. १, (जंबू० १०,१४, १३; क. ८, २०, १२, ४)। ५)। चडि-पू० का० क्रि० (सं० मृदु का घडयम्म-पुं० (सं. चण्डकर्मन्) राज धात्वादेश चढ़-मर्दन करना, मसलना) पुरुषनाम-विशेप;- - (जस० (जस० १, ११, मसल कर, (को० ४, ६) १४६)। मदन कर;
चडि (३४५) चन्दधु -अवि० - चडिम-वि० आरुड़, चढ़ा हुआ; (क० चना, अन्न-विशेप; (म० २, ५५, १०; ३, १, ३)। भावना संधि-प्रकरण)। चडिउत्तरिय-पुं० (दे०) आरोह+ आरोह+ चतारि-वि० (सं० चत्वारि>चत्तारि अवरोह; चढ़ाई (ऊपर की ओर बढ़ना) (प० च०) चतारि, चार; (भ० क०) । और उतार (ऊपर से नीचे की ओर बत्त-वि० (सं० त्यक्त>प्रा०चत्त) 'माना); तुल० गु० चहऊतर; (प्रा०. छोड़ा हुआं, परित्यक्त; (प० च० १७, गु० २३, १)। १३, १; ण० १, ४,५; म० १,१, चडिपण-वि० (दे०) आरूढ़, चढ़ा ४)। हुला; (सुदं० ५, ५, ३)। वत्तयं-वि० (सं० त्यक्त+क) अपान; आरूढ़; (क० ३, १, ३); "कुसुइ कुसीलु कुतवसिहि रत्तउ तं चडिय-वि० (दे०) भारुढ़, चढ़ा हुमा; जाणसु कुवत्तयं," अर्थात् जो झूठे शास्त्रों, (सुदं० ६, १०, ५)। कुत्सित आचारों तथा कुत्सित तपस्वियों चडिर-वि० (दे०) आरोहणशील; में अनुरक्त रहता है उसे कुपान्न जानो; (जत्त० १, ५, १३)। (ण० ४, ३, २)। चडुय-वि० (सं० चटुल>प्रा० चडुल) चत्तारि-वि० (सं० चत्वारि) चार; चंचल, चपल; (ण० २, ११, ११)। (१० १, ८, ६; जस० ३, ५, २) । -म्म पुं० (सं० चाटुकर्म) खुशामद; चत्वरि--स्त्री० (दे०) हास्य, विनोद; "इविभल चत्वारि रयइ जाम रिगवद- (सुदं० ८, १९, ५)। चडुलंग-वि० (दे०) अति इएं दिटिय-द्ध ताम;" अर्थात् जब वह वाले "पछ तुरंगो अइ चडुलंगो;" .काम-विह्वल होकर उस देवर से विनोद (व० ४, २२, २)। चडुलङ्ग-वि० कर रही थी, तभी उस दुष्ट को उसके चंचल (घोड़ा); (प० (घोड़ा); (प० . ० ५, ३, पति ने देख लिया; (जस० ४, २५, ६)। 'चड्डण-न० (दे०) मर्दन; (भ० प० चन्दकांत शिला-स्त्री० (सं० चन्द्रकान्त च० ५१, ६, ५)। . शिला) गृहोचान में बैठने या लेटने के चड्डिय-वि० (दे०) बारूढ़; (प० च. लगाई : जाने वाली शिला; (को० २, २६, ११, ४) । २. पिष्ट, मुदित; (प० २४५). .३७, , ५)। चन्दरणहा-स्त्री० (सं०. चन्द्रनखा) शूर्प- 1/चढ-(दे० प्रा० चड) चढ़ना। पला, स्त्री-विशेष का नाम, (पत्र० -इकि०, व० (दे० सा० दो०)। ४०, १८, १)। चडिले-भू० का० चड़ा; तुल० मंगही चन्दधु-पु० (सं० अर्धचन्द्र), चंद्रमा चढल; (कमरिया, पर्यापद) 1. जव नावे-बाकार का दिखाई पड़ता है। परणय-पु० (सं० चणक >प्रावणल) : (१०व० १४, ५, ३)। चपल संग *- - - चन्दमसु (३४६) चमक्क . चन्दमसु-पु० (सं० चन्द्रमस >प्रा० चंदम) चंद्रमा, चांद; (प० च० १५, ११, ४६, १०, : . चन्दहासु-पु० (सं० चन्द्रहास) चमच- माती तलवार, रावण की तलवार का नाम; (प० च० १०, १, १)। चन्दिरणय-न० (दे०, प्रा० चंदिण) चंद्रिका, चंद्रप्रभा; तुल० गु० चांदरणु; (प० च० ११, १, ६)। चन्दिय-स्त्री. (सं० चन्द्रिका>प्रा० चंदिया) चंद्र को प्रभा. ज्योत्स्ना; (प० च० ६, ७,४)। चन्द्रचूड-पुं० (सं० चन्द्रचूड) शिव, शंकर; (को० १, ८६) । /चप्प-(प्रा० चप्प) दवाना, कुचलना; (जस० २, १८, ७)। ~मि कि० व०, ए... (प० च० २६, ४, ३)। -रि पू० का० क्रि० (सं०/आक्रम का धात्वादेश चप्प-आक्रमण करना, दवाना) १. दवाकर; (की० २, १२२) । २. आक्रमण करके; "चोर चप्परि घर लिज्झि," -अर्थात् चोरों ने आक्रमण करके घर ले लिए (अथवा उन पर अधिकार जमा लिया); (की० २, १०)। -वि पू० का० क्रि० आक्रमण करके; (ण• ३, १६, २)।-हि (विधि०) पदार्पण कीजिए; "जिह मणु तिह घर पंगणु चप्पहि" -जिस प्रकार आपने मेरे मन में प्रवेश किया है, उसी प्रकार घर के आंगन में पदार्पण कीजिए; (ण०.५, २, १) । चप्पिउ-भू. का० चांप दिया; (३० ५, ६, ६)। चप्पिलिऊ-भू. का० भांप लिया, दवा । लिया; "महराअन्हि चप्पिलिऊ; (को० ४, २३६) । चप्पेवि- पू० का० कि.०; (प० च० १०)। /चप्प--(दे०) चवाना; (म०२, १५, १). चप्प-० (सं० चाप) : धनुष, कमान; (क० ३, १८, ३)। 1/चप्पड-पु० (दे०) घी, तेल इत्यादि पदार्थ,-जो चुपड़ा जा सके (लाम्पङ्ग); (जस०)। चप्पण---न० : (दे०) · आक्रमण; (जंवू० ७, ६, १०)।-य पुं० ।-य पुं० दवाना, कुच- लना; (प० च० २१, १, १०)। चप्परि-क्रि० वि० (सं० ' चपल) चप- लता से, फुरती से, तेजी से; (जस० ४, २४,८) । शीघ्रता से; "चारि दिसि चप्परि छुट्टइ;" -चारों दिशाओं को दवाते हुए शीघ्रतर चले; (को० ४, ६२)। चप्पिय-वि० (दे०) सं० भाक्रान्त, प्रा० चप्पिय; दवाया हुआ; तुल० म० चापणे, चोपणे; (प० च० ४, १३, ६; क०८, २०,८)। चप्पिलिम-क्रि० (सं० आक्रम् का धात्वादेश प्रा० अप० चप्प) चाप लिया, दवा लिया, भाक्रांत कर लिया; (को० ४, २३६)। चमक-स्त्री० (सं० चमत्कृत) प्रकाश, ज्योति; (को० ४, ७१)। चमक-पुं० (सं० चमत्+कृ.) चम- स्कृति, चमत्कार, तुल० म० चमक;(भ०; जस० १, ८, १).। -प्र.पुं० विस्मय, चमत्कार; (संधि०१७, ३, २)। .
चमक्क (३४७) चय ६) । वाली; . 1/चमक-(सं० चमत्+कृ>प्रा० क्रि०; (प० च० ३०, ८, ४)। चमक्क, चमक्कार) आश्चर्यान्वित करना। चम्पयन० (सं० चम्पक >प्रा० चंपय) -इ सक० विस्मित करना; (ग० (० ३, चम्पक कुसुम, चम्पा का फूल; (ह. १३, १; सुदं० ७, १२, १६)। ४४४, ४)। अक० चमकना, चोकना; (क० ८, ६, चम्पिज्जइ-क्रि० (कर्मवाच्य) चाप ली ३)। जाए, ग्रहण कर ली जाए, (हे. ३९५, चमरक्य-वि० (सं० चमत्कृत>प्रा० चमक्किअ) विस्मित; (सं० रा०)। चम्म-न० (सं० चर्मन् >प्रा० चम्म) चमक्करि-वि० (सं० चमत्कृत>प्रा० चर्म, चमड़ा; खाल; तुल० म० चमड़ी; चमक्किम) चमत्कृत कर देने (प्रा० ० २, १०७; महा० ६८, १०, (सं० रा.)। २)। -इन० चाम; (ण. ४, १५, चमरिफय-वि० (सं० चमत्कृत >प्रा० ६)।-चक्खु पुं० न० (सं० चर्मन+ धमक्किम) विस्मित, चमत्कृत; (ग० २, चक्षुप्) चर्म चक्षु, "उज्झउ माणुसु जं चम्मचक्खु;" सर्वात् धिक्कार है इस चर्म- चमट्टि-न-न० स्त्री० (सं० चर्मन् चक्षुओं से दिखने वाले मनुष्य को; (जस० +अस्थि-प्रा० चम्म अद्वि) चर्म ४, १, ७)।--जठि स्त्री० [सं० चर्मन् और अस्थि; (ण. ४,४, १०)। +यष्टि) चाबुक, चर्मयष्टि; (जंबू० ४, -सेस पुं० (सं० चर्मास्थिशेष) चर्म २१, ७)। —पडलि स्त्री० (सं० चर्म और अस्थि का बचा हुआ भाग; (जस० पटल) चर्म के रूप में आवरण रूप वस्तु- १, ६, ७)। (व० ६, १५, १)। -यर पुं० (सं० चमर-पु० न० (सं० चामर>प्रा० चर्मन्+कर>प्रा० चम्मयर) मोची, चमर) चामर, चंवर; (जस० १, १२, चमार; (दे० ना० मा० २, ३७) । ६; जंबू० १, १२, ५) । २. गुरु अक्षर; चम्मयाई-न० (सं० चर्मन् +क) चमं (प्रा०प० २, १३६) । ३. प्राणी-विशेष; "फाडियाई चम्माइय;" (क० ७, १०, (पं० च० ३, ८२)। ४. पूछ, पुच्छ; )। (जस० २, ३, ६)। 1/चय-(सं०/त्यज्) छोड़ना, त्याग चमरापिल-पुं० (सं० चामर+ करना। -इ सक० (सं० त्यजति); अनिल) चर की वायु: (जंबू० ३, ७, (भ०)। चइवि-पू० का० कि० (सं० ५)। त्यज्>प्रा० चय, चइअ) त्याग कर, ---पु० न० (सं० चामर) चंवर, छोड़ कर; (सं० रा०)। चएप्पिणु- चामर; (प्रा० ५० १, २०४) । पू० का० कि० च्युत होकर; (ण० ६, /चम्म--(प्रा० चप्प) कुचलना, दवाना; १६, १३); "एव हि सत्तमदियहें चए- तुल० गु० चापवु, चम्पे वि-पू० का० प्पिणु," अर्थात् अव यहाँ से सातवें दिन चेय (३४८) चरित । चार; च्युत होकर; (जंबू० ३, १०, ७)। चरड-पुं० (सं० चरट>प्रा० चरड चएवि-पू० का० क्रि०, "वत्थुसरूउ चोर; (भ०)। चएवि जहिच्छएँ;" अर्थात् वस्तु के स्व चरण-न० (सं० प्रा० चरण) भक्षण; रूप को छोड़कर; (जंवू० ६, १, १४) । (प० च० ३७, ४, ३) । २. पद, (जस चएसइ-भ० का०, “घरवासु चएसइ १, १, २).1 ३. छंद का चरण, आदि- दिक्ख लएसइ,” अर्थात् जो गृहवास छोड़- गुरु चतुष्कल, भगण (sil); (प्रा० ५० कर दीक्षा लेगा; (जंवू० ४, ६, १५) । १०, २) । ४. व्रत आदि अनुष्ठान, चयंत-कृ० (सं० त्यज्+शत) (जंवू० (जस० १, १, १२)।--ग पुं० (सं० २, ७, ११)। चरण-+अग्र) पैरों का आगे का भाग, Vच्य-(सं०/च्यु) मरनां । -इ (जंवू० १, १, १)। -जुयल पु० (सं० अक० (सं० च्यवते); (भ०) । चरण + युगल) पैरों का जोड़ा; (जस० चयरण-न० (सं० त्यजन) त्याग, परि १, १, २). -सेव स्त्री० (सं० चरण त्याग; (जंवू० १०, २१, ८) । +सेवा>प्रा० चरण+सेवा स्त्री०) चयारि-वि० (सं० चत्वारि) चरणों की सेवा; (की० १, ८६) (ण० ६, १२, ६; क. ६, २३, ३; प.. चरमतणु-पुं० (सं० चरम+तनुस्) च० २१, ४, ८)। चरमशरीरी, जंबूस्वामी; (जंबू० ७, १, चर-पु. (सं० प्रा० चर) दूत; 'एरिसु २१)। भणवि चर-लोयणेहि,' (विला.)। चरमसरीर-पु० (सं० चरमशरीर) चर-(सं०/चर्>प्रा० चर) गमन अंतिम शरीर; (जंवू० ४, ३, ८) । करना, चलना, जाना; (जस० १, २१, चरपनाच पुं० फा० चर्ख-मुसल- २)। -इ सक० (सं० चरति >प्रा० मानी दरवेशों में घूमधूमं कर किया जाने चरइ) भक्षण करना; :१० च० १, १०, वाला घिन्नीदार नृत्य; आकाशमण्डल 5) । चरंत-कृ० (सं० चर+शतृ); आकाश के चरवं के समान घूमने की जस० ३, १६, ६) । चरन्तहों-कृ.. कल्पना की गई थी, +नृत्य) नृत्य-विशेष आचरण करते हुए; (प० च० ३, २, चक्राकार घूम-घूमकर किया जाने वाला . ८) । चरिज्जइ-(कर्मणि) पालन किया नृत्य; (की० २, १८७)। जाता है; (जंवू० २, २, ११) । चरिवि चरिअ-~त. (सं० चरित्र>प्रा० -पू० का० क्रि० (सं० चरित्वा) चर चरित्त) चरित्र, आचरण; (जंवू० १, कर; (परम० २, १३६) । चारी-भू० १८, २२)। का० परिभ्रमण करने लगे, चक्कर काटने चरिउन० (सं०. चरित्र>प्रा० लगे; (को० ४, १७०) । चारीमा-भू० चरित) चरित; (व० १, १, २) । का० गमन कमते थे, घूमते थे; (को० २, चरित्त-न० (सं० चरित्र>प्रा० २१८)। चरित्त) स्वभाव, प्रकृति, व्यवहार; (को० चरिम (३४६) चलरमण " . . १, ५८; प्रा० ५० १, १४४) । २. आच चलिब, 1/सं० चल् >प्रा० चल, चलंत) रण; (जस० १, ३१). चलती हुई; (सं० रा०)। चलंतु-कृ० चरिम-वि० (सं० प्रा० वरम) अंतिम, (२० चल+शत; विधि०); (जंबू० ६, अंत का; (भ०)। १४, १) । चलन्ता-कृ० चलने वाली; चरिय-पुं० (सं० चरित्र>प्रा० "ललन्ता चलन्ता पझालन्त पाआ; चरित्त) चरित्र, आचरण; (जस० ३, अर्थात् विलासपूर्वक चलने वाली (अप्स- १७, १६)। -करण पुं० चरित्र-रचना; राओं के) पैर रक्त में सन गए; (को० (जंबू)। -सय पुं० (सं० चरित्रशत) ४, १६५) । सैकड़ों चरित्र; (जंबू० ४, ४, ६)। चल-वि० (सं० प्रा० चल) अस्थिर, चरिया-स्त्री० (सं० चर्या>प्रा० (जस० १, ३, १७) । २. चंचल; (की० चरिया) अनुठान, "मज्झण्णहों चरि ४, २२३)। पुं० १. वानर योद्धा; (प० याएँ पईसइ;" -मध्याह्न में उन्होंने चर्या च० ५७, ११) । २. राक्षस योद्धा; (प० के लिए (नगर में) प्रवेश किया; (जंबू० च० ५६, ३६)। ३, ६, ६)। चलचति--क्रि० (ध्व०) चरचराती थी, चरोय--स्त्री० (सं० चर्या>प्रा० चर-चर की ध्वनि होना "अंतई णिग्गं- चरिया) अनुष्ठान; (ण० ६,२, १, तई चलचलति," -आंतें और अंतड़ियाँ २४)। निकल-निकलकर चरचराती थीं, (ग. चर-पुं० (सं० चरु+क) नैवेद्य, देवता ४, १५, ५)। को समर्पित की जाने वाली भोज्य वस्तु; चलझलक्क-स्त्री० (सं० चञ्चल+ (जस० २, ७, ७३)। -अ; (जस० २, झल्लिका) चंचल झलक; (सुदं०३, १५, १)1-व नैवेद्य; (०७, १३, १२, २)। ३)। चतरण-पु० (सं० प्रा० चरण) पाद, चरुवई-न० (सं० चर) चरुआ, वरुवा, पांव; (ण० १, ११, ५; सं० रा०)। मिट्टी के चौड़े मुह का पान या वर -ग पुं० (सं० वरणान) पैर का अन- तन; (व० ४, २१, १४)। भाग; (प० च० १, ५, ६)। -छवि /चल-(1/चल्) चलना। -३ स्त्री० (सं०वरण+वि) पैरों की शोभा, अक० (सं० चलति) (प्रा० पं० २, (जंवू० ४, १४, ५)।-युग न० (सं० १९३)। -उ (विधि०) (जंवू०५, · चरण+ युगल> प्रा० चरण+ जुबल) १२, १२) । चलंति; (प्रा० पं० २, चरणों का जोड़ा; (जंवू० ४, ४, १३)। १७१) । चलंत-कृ० (प्रा० पं० २, चलयर-वि० (सं० चल+तर) अधिक १७१)। चलंता-कृ० (सं० चल+ चलायमान या अस्थिर, चंचलतर; (व. शत) चलते-चलते; (व० ३, ११, १)। १. १४, ३)। चलंति कृ० (सं० चलित>प्रा० चलरमण-वि० स्त्री० (सं० १ञ्चलर- चललोयण : (३५०) चल्ल ... चंचल; मणा) चंचल सुंदर तरुण स्त्री; (जंवू० चलायमान वाल या केश; (जस० २, ४, १६,)। ३१, ३)। चललोयण-पु० (सं० चल+लोचन) चलसिह- स्त्री० (सं० चञ्चल+शिखा) अस्थिर या चंचल नेत्र (व० ५, २, चंचल शिखा या चोटी, "पालंवहिं झपिर १०) । चलसिहकपिर वाणरु व्व कील हिं.वडुय," चलवल-वि० (सं० प्रा० चलाचल) अर्थात् अपनी (पूछ के समान) चंचल अस्थिर, चंचल; (ण० ६, १८, ३)। शिखाओं को नचाते हुए व टुक वानरों के /चलवल-(ध्व०) चलवल होना, समान क्रीड़ा करते हैं; (जंबू० . २, ४, "कामिणिकरचामरचलवलंतु," अर्थात् १२)। टि०-चोटी और यज्ञोपवीत द्विजों कामिनियों के हस्तगत चामरों द्वारा चल के प्रधान चिह न है। वल हो रहा था; (जस० ४, ७, ५)। चलालि-वि० (सं० चलित) - कृ० चिलविलाता हुआ, "अहवाइ बलाता हुआ, "अहवइ (रि० ८, ५) । चलवलइ भुअङ्ग-थटु" -चिलविलाता चलाव-कि० (सं० चालयति) चलाना- हुआ सांपों का समूह हो; (प० च० १३, फिराना, हिलाना, डुलाना, चलनी में रख ४, ७)। चलवलंत- कृ० चंचल; कर छानना; (उ० व्य० प्र०४६-१)। तुल० गु० चळवळतु; (संधि० ४, ८, चलाविय--भू० का० (सं० चालित) ४)। चला रहा था; "लुलावियसुंडु चलावि- चल-(सं० चल>प्रा० चल) यकण्णु;" अर्थात् वह हाथी चलना । चलल-भू० का० चला, (की० रहा था और कान चला रहा था, (क० २, १७६) । चलिअ-भू० का० चला; २, २०, ४)। (को० ३, ६५)। चलिय-क्रि० भू० चलिअ-वि० (सं० चलित) का० (सं० चल्) चली; (सं० रा०)। जस०;जंबू० १, ११, ६) । -उ भू० का० चला; (जंवू. ७, १३, चलिय-वि० (सं० चलित) चंचल; २)। (जस० १, ३, ६)। चलण-पुं० (सं० चरण>प्रा० चलण) Vचल्ल-(सं० /चल्) चलना, गमन चलना, गति; (क० २, ४, ५) । करना; तुल० राज० चलणी; (जस० ३, चलवलय-वि० (सं० चलित) चंचल; २१, ३)। -इव० (सं० चलति> तुल० गु० चळवळ; (प० च० ४०, १६, प्रा० चल्लइ) चलना; (प० च० १६ ५)। १७, १०; ण०.३, १७, १४)। चल्लिउ चलवलिय-वि० (सं० चलित) चौंचल; · क्रि०, भू० का० (सं० चलित >प्रा० (जंबू०.१, ६, ८; म० ५२, चलिअ) चलं पड़ा; (ण० १, ६, ६). १५)। चल्लिय-भू० का चल पड़े, "चल्लिय चलवाल-पुं० (सं०. चलित-वाल) हय गय रह सुहड जेत्यु;" अर्थात् घोड़ें, सूंड डुला ... चंचल; . । २, चल्य (३५१) चोरा . - - चपेटा, . । हाथियों, रषों व सुभर्टी सहित चल पड़े; १, ८, ३)-वेग पुं० व्यक्ति विशेष- (जस० १, २६, ७)। नाम; (प. च० २८, २६) । चहल-१. वि० (सं० प्रा० चल) चंचल; चंविअ-वि० उक्त, कथित, कहा हुआ; (सं० रा०) । २. पुं० (दे०)- कटिवस्त्र; (जंवू० ५, १३, १३) । (सं० रा०)। चवेड-पुं० (सं० चपेट) चढण-पुं० (दे०) भयंकर आक्रमण, तमाचा, चांटा, (सुदं० ४, ५, २१)। चपेट; (प० च० १३, ८, १) । 'चवेडा-स्त्री० (सं० चपेडा>प्रा० चवेला, चवरण-पु. (सं० चर्वण) १. 'चदाना, चविला, चविडा) थप्पड़ (संधि० ३, खाना, २. चखना; (सं० रा०)। चव-(सं०/वच्>प्रा० 'वच) कहना चठिवम-वि० (सं० चर्वित) चबाया वोलना; तुल० राज० चवणो, चवी। हुआ; (जंबू० ५, ११, ५)। -इसक० (क० १०, ८, ३; रि० २, चसअ-पु० (स० चशक >प्रा० चसग, ४) । चवन्त व०- कृ० (प० च० ११, चसय) दारू पीने का प्याला; (जंबू० ४, १४, ८)। चविय-वि०, कहा हुआ १७, ५)। (ण० ६, १, ६; प० च० ४, ५, ८)। चहरी-वि० (दे०) कुचली हुई, रौंदी चप्पिणु-व० कृ० (५० च० ८, ११, हुई, मदित, "कोलिरसबरनियंविणिच- ७) । चव्वंति-कृ० (सं० चर्व + शत, हरी;" अर्थात् क्रीडा करती हुई शबर स्त्रियाम्) कहती हुई, (जंवू० ७, १, सुंदरियो से वह थोड़ी सी मदित हो ६)। रही थी; (जंबू० ५, १०, १०) । चवरण-न० (सं० च्यवनप्रा० चवण) चहु-वि० (सं० चतुर्) चार; (संधि० च्युत होना, चुआव, टपकाव, गतिशीलता, १३, १, १)। गति, "अण्ण वि जे हवंति सुरसुंदर /चहट्ट (दे०) निमग्न होना, चपेटा कंदहि चवरणसमऍ दुक्खाउर;" अर्थात् फसा हुआ होना, "दुबलढोरिव दूसरे भी जो सुंदर देव होते हैं, वे भी पंके चहुट्ट;" (जंबू० ८, ११, देवलोक से ज्युत होते.समय दुःखातुर १०)। होकर क्रंदन करते हैं; (जंवू० २, २, चहुट्ट-वि० (दे०) निमग्न, लीन; ६) । (सुदं० ८, ६, ५). बवल-वि० (सं० चपल >प्रा० चवल) चहोर-पुं० (दे०) १. पिशुन, चुगल. चंचल, अस्थिर; (क० ६, १८, ३)। ३)। खोर; २.. एक मनुष्य नाति; तुल० म० -गइ पु, व्यक्ति-विशेष-नाम; (प०. चहाड; (भ०) । 'च० २८, २५)। -च्छी : वि०. चंपल चांग-~-वि० (दे०) रम्य, सुदर, मनो- नेत्र वाली; (व० ४, ११, १५)।-य हर । चांगड, (रा० ४); चांगिम्व (रा. वि० सं० चपल+क) चंचल; (जंवू. ६); चांगा, (रा० ६)। जाना, ; चौगुरे (३५२) चाणूर 3 -- चांगुरे-वि० (दे० प्रा० चंग) १. सुदर गिणी सेना; (क० ४, २, ५; जंवू० ५, २. वि० . (दे० चक्कल).. विशाल, ६, १५)। विस्तीर्ण; "कटक चांगुरे चांगुरे;" अर्थात् चाउल-पु० : (दे०) तंडुल, . चावल; अश्व सेना सुंदर और विस्तीर्ण थी; (को० तुल० गु०. चावल; राज , चाउळ; (प० ४, ४२)। च० २४, १२,६; दे० ना० : मा०३, चांद-पुं० (सं० चन्द्र>प्रा० चंद) ८)। चंद्रमा । चांद; (रा० ३५) । चांदहि रा० चावण्णहलई-न० (सं० चातुर्वर्ण्यफ- २१);. चांदा (रा० २५); चांदु (रा० चांदु (रा० लानि) चार वर्णों के फल; : (रि० ४, ३३)। ४)। चांदन-न० (सं०. चन्दन >प्रा०. चं,ण) चाओ-पु... पंवकल गण " : का नाम; चदन की लकड़ी," चांदन क मूल इंधन ; (प्रा० ५० १,, १६).। विका;" (की०.३, ६८) । चाख-क्रि० . (संचष् । खाना; तुल० चांद्राउ-न० (सं० चन्द्रिका.) चंद्रका, राज० चाखणी; (उ० व्य० प्र० ६-६)। चंद्र-प्रभा; तुल० गु० चांदरणु; राज० –त सक० (सं० चपति) खाना, चबाना; चांदणू, चांदणी; (प्रा०.. गु. १२, (उ० व्य० प्र० ६-११)। -३२) । चाखु-पु० (सं० चक्षुम्) - आंख, नेत्र; चासः-पु० (सं० त्याग) १. त्याग; (रा०)। (सुदं० १, १, १४)। २. औदार्य; चाचरि-स्त्री० (सं० चर्चरी) चाँचर, (जस०) । ३. चाप; (जंवू०:४, १३, फाग, हर्ष-क्रीड़ा; (प्रा० गु० : १६, ५)। • २६)। चाइ---वि० (सं० त्यागिन्) : १. त्याग चाट-क्रि० (दे० चट्ट) : चाटना, मिटा करने वाला;-(ण० ३, १२, ४)।-उ देना; तुल० राज० चांटणी; : (को०,२, वि० त्यागी; ...(सुदं० ३,. २,४)। २०४) । २: पु० त्याग; (दे० सा० दो०)। चाड्यः पुं० (सं. चटके>प्रा० चाउडरावण-पु. विद्यापर, वंशीय चाडुअ) प्रशंसा; खुशामद; (सुदं० १, ८, राजा; (प० च० ५, २६३).। .५; भ०)। चाउ-पुं० (सं० चाप). “धनुष; (व० चाणउरि-पु० (सं० चाणूर) : मल्ल .५, १०, १, प्रा० १०.२, १६१):। विशेष, जिसको श्रीकृष्ण ने मारा था, चाउत्थ-वि० (सं०. चतुर्थ) चौथा; "संख-चक्क-गय पहरण-धारा; कंस- नरा- (ण० ६, २०, ३)। हिव:कय-संहारा। जिणि चाणउरि मल्लु चाउद्दिसु-पु० (सं० चातुर्दिशम्) चार वियारिउ; जरासिंधु वलवंतउ धाडिउ;" दिशाएँ (प० च० २६, ८, ९)...: (प्रा० गु. ८, ४)।, . चाउरंग-पु० (सं.० चतुरङ्ग) चतुरं चाणूर-पु० : (सं० चाणूर > प्रा० । .
चाण्डाल (३५३) चमरों के समूह, (को० २, चाणूर) दैत्य का नाम, जिससे श्रीकृष्ण >प्रा० चामरगाहिं) चामरग्राहिणी, ने मारा था; (प्रा० पै० १, २०७) । चामर वीजने वाली स्त्री; (भ०) । चाण्डाल पुं० (सं० चाण्डाल) चाण्डाल) चामरोह-पु. (सं० प्रा० चामर+ १. अत्यंत नीच जाति, डोम; २. कुकर्मी, ओघ) चंवर अथवा पतित मनुष्य; "ब्राह्मण क यज्ञोपवीत "सया चामरोहेण विजिज्जमाणो" चाण्डाल हृदय लूर;" आर पर सदैव चमरों के समूह डुलते ११०)। रहते हैं, (ण० २, ११, २) । 1/चाप---(सं० आक्रम का धात्वादेश चामियर-न० (सं० त्रामीकर>प्रा० प्रा० चप्प) आक्रमणं करना; "फणिवइ चामीभर) सोना, सुवर्ण; (प० च०२६, लागु गोहारि चाप जमराए कोप कइ;" १६, ४)। चामीयर-न० सोना, स्वर्ण; अर्थात् चाहे शेषनाग उसको गोहार पर "पं दीणहं चामीयरणिबंधु," अथवा मानो क्यों न आ जाए और चाहे यमराज भी दीन-जनों के लिए स्वर्णदान का प्रबंध क्रोध करके आक्रमण क्यों न कर दे किया हो, (जस० १, ६, २)। (को० ४, १५१) । : चापन्ते-कृ० दवाते चामुंडचंड-वि० (सं० चामुण्डचण्ड) हुए, (को० ४, १६)।चापि-पू० का० भयंकर; (जस० १, १६, १०) । कि.० (सं० आक्रम् >प्रा० अप० चप्प= चाय-पु. (नं० त्याग) त्याग, "चाएण आक्रमण करना, दवाना) दवा कर, कप्यु जणदिण्णवाउ;" त्याग में वे कर्ण बाग्रह पूर्वक; (को० ३, १४.)। तुल० के समान लोक में दानशील हैं: (ण० १, राज० चापड़णी, चापड़ो। च.प-क्रि० (सं०1/चम् सान्तवने) चायय-पुं० (सं० सांत्वना देना, ढाढस देना; (उ० व्य० वायग) पती-विशेष; (जस० ३,१, प्र० ६-२३)। चापि-कि० वि० आग्रहपूर्वक; "चापि चार-पुं० (दे०) १. कहलो सुरुतान के छोटे करो उपाए;" लापा; (भ०)। २, नाचरण, २. प्रियाल अर्थात् मैं आगहपूर्वक सुलतान से कहूंगा वृक्ष; पियार का पेड़ जिसके फलों के वीज कि शीघ्र कोई उपाय करें; (की० ३, को चिरौंजी कहते हैं; (उंबू०- ५, ८, १४७)। चामर-० न० (सं० प्रा० चामर) चारग-पुं० (सं० चारक>प्रा० चंवर; (जस० २, ५, ७)। चारग) कारागार; (संधि० २, ११, चामर; (३० १, १२, १०)। २. (छंद १; दे० ना० मा० ३, २१)। शास्त्र में) प्रथम द्विकल गण (5) का चारण-पुं० (सं० प्रा० चारण) ऋद्धि- नाम; (प्रा० १० १, २१)। विशेष धारक; मनुष्य-जाति-विशेप; चामरगाणिही-वि० सं० चामरग्राहिन् (जंबू० ३. २६, ६) । चारणाइ-चारणं चातक>प्रा० इन्दा, अभि- - चारत (३५४) १६)। (को० ४, . +आदि; (जंवू० ३, ६,४)। -रिद्धि का पुत्र; (प० ० ११३, स्त्री० चारणऋद्धि; (जंवू० ३,५, -कला स्त्री० सुंदर कला; २) । २२६)।-चक्षु पुं० न० सुंदर नेत्र; चारत्त-पु० (सं० चारुत्व) सुंदरता; (व० ३, ३, २)। (ण० १, १७, ४)। चारुपयपंति-स्त्री० चारुपदपंक्ति छंद; चारमड-पु० (सं० चारभट>प्रा० (सुदं० ८, २५, १७)। चारभड) शूर पुरुप, योद्धा, सैनिक; चारुसिरी-स्त्री० सुग्रीव की पुत्री का (भ०)। नाम; (प० च० ४७, ५४) । चारहडी--स्त्री० (सं० चारभटी) शौर्य- चारसेरिग-रड्डा छंद का भेद (प्रा० वृत्ति, शौर्य; (संधि० २, १, ६; जंबू० पैं० १, १३६) । ७, ७, ५; म० १, ३७, १०) । 1/चाल-(सं० चालय >प्रा० चाल) चारि-वि० (सं० चत्वारि) चार; चलना, हिलाना; (भ०)। चालिअ-- (प्रा० ५० १, ४७; की० ४, २५५) । भू० का० चला दिया; (को० ४, ४) । चारी; (प्रा० पं० २, २७) । २. क्रि० (सं० चल्) चलना, गमन चारिउ-पुं० खादापित, भोजन; (जस० करना; (रा० १४)। ३, ६, १५) । चालण-न० (सं० चालन) चलना, चारित्त-न० (सं० चारित्र>प्रा० हिलाना; (जस० २, १७, १५) । चारित्त, चरित्न) १. आचरण, २. व्यव- चालिय-वि० (सं० चालित >प्रा० हार, (जंवू० १, ३, ५)। चारित्त ; चालिय) चलाया हुआ, हिलाया हुआ; (महा० ६८, ८)। (प० च० १, ७,१; जस०२, २४, चरित्तगुत्ति-स्त्री० चारित्नगुप्ति, स्त्री- १)। विशेष; (ण० १२, ८)। चारित्तण-० (सं० चारिन् +त्व > चालिस-वि० (सं० चत्वारिंशत्)चालीस, प्रा० चारि+त्तण) विचरण; (५० ३, (प्रा० ५० २, २१४); चालीस (प्रा० ३, १२)। पं० १, ११०)। चारिदहा--वि० (सं० चत्वारि+दशन्) चालुय--पु० (दे०) चलनी, भारी; चौदह; (प्रा० ५० १, ३१) । "चालुयचट् टुयचूरियउ,” अर्थात् तब चारिम-वि० (सं० चतुर्थ) चीया; उसे झारी और चटुए से कुचला .. गया; (प्रा० १० १, १३३)। तुल० म० चाळणी; . (जस० ३, ५, चारिया-क्रि० भू० का० (सं० चारित) १४)। चराया (fed); (क० ८, २, २)! चाव-पुं० (सं० चाप) धनुष, मायुघं- चार-वि० (सं० प्रा० चार) सुंदर; विशेप; (प० च० ५३, १०६; प्रा० ५० (प्रा० पं० २, १५३) । पुं० राक्षस सुंद २, १६६; ण०७, १२, ८)। - - - चाव (३५५) चिघ का० कि० चावर-स्त्री० (सं० चातकी) चातक की; (जंबू० ६, ११, १०) । पक्षी का स्त्री०; (सं० रा०) । चिचइय-वि० चचित, भूपित; (जस० चास-स्त्री० (दे० चासा) चास, जोत, ४, ७, १७)। मण्डित; (जंबू० १,६, वाह (हलस्फाटित भूमि रेखा); (दे०- ८)। ना० मा० ३१)। 1/चिंत-(सं० चित्) चिता करना; चास-पुं० (सं० चाप >प्रा० चास) (प्रा० ५० १, २०७)। -इ, व० (सं० पक्षी-विशेष; (जस० ३, १, १०)। चिन्तयति) चिता करना; (भ०) 1 Vचाह-चाहता है, इच्छा करना; चिन्तइ-व० (की० १, २१) । चिन्त- (उ० व्य० प्र० १२, २६) । -३ वइ-क्रि० चिन्तयति (भ०) । चिति- चाहना, वांछना; (सुदं० ७, १४, ४)। विध्यर्थक चिंता, करो; (रि० ५, १३) । -इ (भ०) । तुल० म० चाहणें । —हि चितिवि-पू० का० क्रि; (जंवू० ६, आ०, म०, ए०, तुल० राज० चाहवो ५, १)। चिन्तेप्पिणु-पू० वो; (प्रा० ५० १, ६)। चितन करके; (प० च० १३, ४, 1/चाह-दि०) देखना; "हियडइ आंखि २)। घरेविणु चाहह;' (प्रा० गु० ५, ४) । चिता -स्त्री० (सं० चिन्ता) किती दुःख -इ. सक०; (रा० १३) । की आशंका से उत्पन्न होने वाली सोच, चाहणा--वि०, कर्ताकारक, ए०, इच्छा फिक्र; (भ०) । रत्न, (व० १,१०, करने वाला, चाहने वाला; तुल० राज० १४)।-मणि पुं० व्यक्ति-नाम (प० चाहणी; "गरुडवखाहणा वलिभुअणचा च० २०, १४२)। -वण्ण वि० चिता हणा," अर्थात् गरुड के श्रेष्ठ वाहन (पर पन्न; (प० च० २३, ३, १)। –सल्ल वैठने) वाले, दलि नामक दैत्य के भुवन न० (सं० चिन्ता+शल्य) चिता का (राज्य) की इच्छा करने वाले; (प्रा० कोई भी कारण जो हृदय दहलाने वाला पं० २, ७५) । या दुःखप्रद हो; (जंवू० ६, १५, ८)। चाहन्ते-वि० चहेते, प्यारे; (की० २, -सायरु पु० (सं० चिन्ता+सागर) २१६)। चिता का समुद्र; (व० ४, ४, ६)। चाहि-स्त्री. खवर; (कहा मानसर चहा -सिहि स्त्री० (सं० चिन्ता+शिखि) सो पाई; पद्मावत ६५, १) । “फरमाण चिता रूपी अग्नि; २, २१, भेल- 'कोण चाहि;" अर्थात् वादशाह ५)। का आदेश हुआ-'क्या खबर है' ? (को० चितिय–वि० (सं० चिन्तित>प्रा० ३, १८)। चितिय) चिंतायुक्त, जिसे चिंता हो; चाहिउ-भू० का० कामन की, "सवि- (सं० रा०, पड्; जस० २, ८, ५)। सेसु मियंके चाहिउ;" अर्थात् मृगांक ने चिघ-न. (सं० चिह न >प्रा. चिंच) विशेष रूप से (उसके लिए शुभ) कामना ध्वजा, पताका, केतु; (ण १,७,८, (व० u चिघइय (३५६) चिट्ठ ध्वजवंश, ध्वजा का रहे थे, जस० १, ३, १७) । २. वस्त्रखण्ड; तुल० व० (प० च० २६, ४, ८) । म० चिवी; राज० चिवपट्ट (निशानयुक्त चिक्कार-पुं० (सं० चीत्कार>प्रा. पट्टा); (जस० १, १६, ३)। ~~-वंस चिक्कार) चिल्लाहट, हल्ला, शोर, गुल; पुं० (सं० चिह न+वंश) (क० ३, १४, २) । चिक्कार का शब्द, बाँस; (व० ५, १६, "रहवर चलिय चक्कचिक्कार" -रथ ४)। चक्रों की चिक्कार सहित चल चिघइय-वि० (सं० चिह्नित >प्रा० (ग० ७, १,७)। चिधिय) निशान लगा हुआ, संकेतित; चिक्कारियं-स्त्री० (सं० चीत्कृतं) (सुदं० ८, २६, १२) । चीत्कार, अनुकरणमूलक शब्द; "तेण चिघण-न० (सं० चिहन >प्रा० चिव) आसागरेहिं पडतेहिं चिक्कारिय” इससे चिहान, निशानी; (सि० २, २२) । सागर पर्यंत गिरते हुए दिग्गजों ने चिधाल-वि० (सं० चिह नवत्) चिह न- चीत्कार छोड़ी; (सुदं० ११,१८, युक्त; (प० च० १०६, ७) । वि० (दे०) १६)1 १. रम्य, २. मुख्य (दे० ना० मा० ३, चिक्खअण-वि० (दे०) सहिष्णु; २२)। (पड्)। चिधिय-न० (सं० चिह न>प्रा० चिंध) चिखल्ल-तु० (दे०) कीच; (दे० ना०- वस्त्राखण्ड (पटच्चर); (क० १, १७, मा० ३, ११)। ८)। चिक्खिल्लन० (दे०) कर्दम, पंक, कीच चिक्कमइ-पू० का० क्रि० (सं० चङ् (जस० ३, १, १७)। क्रम>प्रा० चंकम) चंक्रमण करता हुआ, चिच्च-वि० (दे०) चिपटी नाक वाला; इधर-उधर घूमता हुआ; (ण० १, १०, (दे० ना० मा० ३, ६) । २. न० रमण, १३)। संभोग, रति; (दे० ना० मा० ३, चिक्का-स्त्री० (दे०) १. थोड़ चीज़; १०)। २. हलकी मेघ-वृष्टि; (दे० चिच्चर-वि० (दे०) चिपटी नाक ३, २१)। वाला; (दे० ना० मा० ३, ६)। चिक्क-वि० (दे०) १. थोड़ा, अल्प; चिच्चि-पुं० [सं० अचि. (आग की) २. न० छींक; (पड्)। ज्वाला] अग्नि; (जस० १, १३, ६) । चिक्कण-वि० (सं० प्रा० चिक्कण) -जाल पु० (सं० अचि+जाल) अग्नि स्निग्ध, चिकना; तुल० राज. चीकणी; को ज्वाला; (क० १, १७, ७) । (सं० रा०)। चिञ्चइय-वि० (दे०) अलकृत; /चिक्कम-चलना, (walk move (चिंचअ मण्डय है. प्रा० व्या० ४, about)-इव०, प्र० पु०, ए०, (प० ११५) (प० च० ३२, ३, १३) । च० ५६, १४, ४)। -न्ति प्र० पु०, /चिट्ठ~(/तिष्ठ) ठहरना । चिट- ना. मा० . . . चिड (३५७) चित्तमास ठन्ति; (प्रा० पै० २, १५१)। २. बैठना; ८)।-य चित्रांगद (विद्याधर); (व० (हे० ३६०)। ५, २०, ३)। चिड-पु० (सं० चटक:) चिडिया, चित्त-वि० (सं० चित्त>प्रा० अप० पक्षी; तुल० राज० चिड़ी (स्त्री० चिड़ी); चित्त) विविध, नाना प्रकार के, अनेक (संधि० ११, ५, ६)। प्रकार का; (सं० रा०; की० २, २४०) । /चिरण-(सं० चिन् चिन् चयने >प्रा० न० (सं० प्रा० चित) मन अन्तः करण चिण) १. इकट्ठा करना, फूल आदि (पाहु० )। न० छद-विशेष (सुदं तोड़कर इकटठा करना, चुनना। - ८, २४, ६) । न० (सं० चित्र>प्रा० सक० (सं० चिनोति >प्रा० चिणइ); चित्त) तस्वीर, आलेख्य; (ण० (ण० १, १०, ६) । चिणिऊण, चिणे- ११) । -यार पुं० (सं० चित्रकार) ऊण-संबंधक कृ०; (षड्) | -णेवि पू० चित्र बनाने वाला; (ण० ८, ५, १०)। का० क्रि०; (क० ४, १३, ५) । तुल० -साल स्त्री० चित्रशाला (सि० १, राज० चुणणी, 'चुणवौ। २२) । चित्त -० चित्त (जस० २, चिणित-क्रि०, भू० का०, चिनवाया, १२)। -हरो १२)।-हरो वि० (सं० चित्त को "पई सुदरु कीयउ महों मणिउ । जं हरने वाला; (प्रा० ५० २, ६४)। लयणु णरेसर पई चिणिउ;" अर्थात् तूने चित्तकूड-पु० (सं० चित्रकूट) पवंत- मेरे मन की सुंदर बात की, जो नरेश्वर, विशेष; (प० च० ३३, ४)। तूने लयण को चिनवाया; (क० ५, १३, (क० ५, १३, चित्तगय-पु. चित्रगत नामक राजा; २)। (व० ३, २५, ८)। चिष्ण-वि० (सं० चीर्ण =कृत, संपा- चित्तदाउ-पु० (दे०) मधु-पटल, शहद दित) १. पुष्ट; (जस० १, ११, ५) । की मक्खियों का छत्ता; (दे० ना० मा० २. अनुष्ठित, आचरित; (मुदं० ३, १२, ३, १२)। ६) । चिन्न; (भ०)। चित्तधया-वि० चित्त को हरण करने चिण्ह-न० (सं० - चिह्न) आदि लघु वाली "उत्तउ कोमलवाएँ छंद चित्तध- विकल गण का नाम (is); (प्रा० ५० याएँ;" अर्थात् चित्त को हरण करने वाली १, १८) । -धउ न० (सं० चिहन+ कोमल वाणी से कहा; (क० ८, ३, ध्वज) निशानी वाला ध्वज; (क० ३, १६, ६) । चिन्हे-न० चिह न; (को० चित्तप्पभ-पु. खरदूषण का मंत्री; ४, १०६)। (प० च० ४४, १२)। चित्तंग-पु० (सं० चित्राङ्ग) नाम- चित्तभाणु-पु० विद्याधर राजा; (प० विशेष; (भ०)।- (सं० चित्राङ्गद) च० १७, १०२) । नृप-नाम; (जस०.४, २७, ६)। --उ -पुं० (सं० चैत्रमास) चैत पु. चित्रांगद नामक योद्धा; (व० ४, ५, मास, फागुन के बाद और वैसाख से - ८)। चित्तमास- चित्तय (३५८) चिर में उप- पहले का महीना; (प्रा० गु० ३५, सिक आहार, "चं रविह देवह चित्ता. ६)। हारो;" अर्थात् 'चतुनिकाय' देवों का चित्तय-पु. व्याघ्रजाति-विशेप; तुल० मानसिक आहार होता है; (व० १०, म० चित्ता; (जस० १, १०, ४) । ३५, ३)। चित्ताहिलासु-पु. (सं० चित्तयर-० (सं० चित्रकार) चित्र चित्त+अभिलापा) मन की अभिलापा; वनाने वाला; (जस० १, २०, ७) । "चित्ताहिलासु जसु णाय-हीणु;" -जिसके चित्तरह-पु० सीता-स्वयंवर मन की अभिलापाएँ न्याय-नीति विहीन. स्थितराजा-विशेप का नाम; (प० च० हैं; (व० ५, ५, ३)। २८, १०१)। चित्तस्सवा-स्त्री० सीता-पूर्वभवनाम; चित्तल-वि० (दे०) १. विभूषित, (प० च० ३०, ७०)। २. रमणीय; (दे० ना० मा० ३, ४)। चित्रशाली-स्त्री० (सं० चित्र शालिका, पुं० (दे०) अस्त्र-विशेष; (व० ४, ५, चित्रशाला) वासभवन में भित्ति-चित्र ८)। बनाए जाते थे, इसी से वह स्थान चिन्न- चित्तलिय-वि० (सं० चित्रलिप्त) चित्र शालिका कहलाता था; (की० २, मय; चित्रित, "महुराउरि मणिचित्तलिय- २४५) । हम्म," अर्थात् जहाँ के भवन मणियों से चिद्दविक्ष-वि० (दे०) विनाशित; (दे०- चित्रित हैं; (क० ६, ४, ८; १,४, ना० मा० ३, १३)। चिभड-न० (सं० चिभिट) खीरा, चित्तलेहपद्धडिया-स्त्री० चित्रलेखापद्ध- ककड़ी; तुल० गु० चीभडु (दे० ना०- डिया छंद; (सुदं०.२, ६, १२).! मा०६, १४८)। चित्तविश्रम-वि० (दे०) परितोपित; चिमिण-वि० (दे०) रोमाञ्चित, पुल- (पड्) । कित; (दे० ना० मा० ३, ११) । चित्तसेण-पु० (सं० चिन्नसेन) व्यक्ति- चिय-पु० (सं० चिता>प्रा० चियका, नाम-विशेष; (जस० ४, २७, २५) । चियगा) मुर्दे को फूकने के लिए चुनी चित्ता-स्त्री० चित्रा नाम की प्रथमा हुई लकड़ियों का ढेर; तुल० गु० चेह; पृथिवी; (व० १०, २२, ७)। (प्रा० गु० ५, १५) । चिया--स्त्री० चित्तारिख-पु० मुनि-विशेष-नाम; चिता; (जसं० १, १३, ६)। चौदहवें तीर्थकर के पूर्वभव गुरु (प० च० चियानि--वि० (सं० चत्वारि) चार; २०, १६)। (संघि० ११, १, १०)। चित्तावहारी-वि० (सं० चित्तापहारी) चिर-न० १. (सं० चिरम् >प्रा० चित्त का आहरण करने वाला; (व० ३, चिर) दीर्घ काल तक; (जस० २६, ३)। ६; की० १, ६१)। चिरु-न० चिर- चित्ताहार-पुं० (सं० चित्राहार) मान काल; (व० २, १६, २) । २. (छंदशास्त्र + चिरडी (३५६) चिलिसावण का नाम आलस्य -- में) आदि लघु त्रिकल गण /चिराव-(सं०/चिरय) १. विलम्ब (15) (प्रा० ५० १, १८)। -कव्व न० करना, २. करना; (सं० चिरकाव्य) प्राचीन काव्य; (जंवू० (भ०) -इ अक० (सं० चिरा- ६, १, ३)। -गउ वि० (सं० चिरगत यति) देर करता है; (रि० ५, १)। >प्रा० चिरगय) जिसे गए बहुत दिन चिरावेह; (काल) । "मा णे चिरावेहि; हो गए हो; (सं० रा०)। -जम्म पु० (प० च० ३, १२६)। न० (सं० चिर+जन्मन् >प्रा० चिर+ चिराविय-वि० (सं० विरायित) जम्मण) पूर्व जन्म; (जंबू० २, ५, १२)। जिससे विलम्ब किया हो वह; २. विल- -ज्जिउ पाउ पुं० (सं० चिराजित म्बित, रोका गया; ३.न० विलम्ब; (प० पाप) चिर संचित पाप; (व० १,६, व० १०५. १०१)। ६)। जीविअ वि० (सं० चिरजीवित चिरिचिरा-स्त्री० (दे०) जलधारा, >प्रा० चिर+जीविअ) दीर्घकाल तक वृष्टि; (दे० ना० मा० ३, १३) । जीवित; (जस० १, ६, १३) । चिरिफा-स्त्री० (दे०) १. मशक, चिरडो-स्त्री० (दे०) वर्ण-माला; (दे०. २. अल्प वृष्टि; ३. प्रात:काल; (दे०- ना० मा० १, ६१)। ना० मा० ३, २१)। चिरया-स्त्री० (दे०) कुटी, झोपड़ी; चिरिचिरा-(दे०) देखो त्रिरिचिरा; (दे० ना० मा०३, ११) । (दे० ना० मा०३, १३)। चिरयाल-न० (सं० प्रा० चिरकाल) चिरिडिहिल्ल -न० (दे०) दही, दधि; दीर्घ काल; (भ०)। (प० च० ३४, ११, ३) । चिरिडिहिल्ल; चिरहिल्ल-पु० वृक्ष-विशेष; (जंबू० ५, (५० ३० ३७, १, ४)। चिलाउ-पु० किरात, किरात देश में चिराउस-पु० (सं० चिर+आयुस्) रहने वाली म्लेच्छ जाति, भिल्ल; (ण. दीर्घकालीन जीवन की मवधि; (जस० ५, १२, २)। ४, ३१,११)। चिलाय-पु० (प्रा० चिलास) किरात, चिराणम-वि० (सं० चिरन्तन) चिरा- मनुष्य-जाति-विशेष, (संधि० १०, २, तन, पुरातन, पुराना; (क० ७, ३, ४)। ५, जस० २, २६, ७) । चिराणउ-वि० पुराना, "भासइ परवरु चिलिच्चिल--वि० (दे०)। बार्द्र, कहहि चिराणउ;" (जस० गीला; (जंबू० ५. ७, ८) । ७) चिराणय-वि० पुरातन, प्राचीन; विलिसावण-वि० (दे०) जुगुप्साकर, (भ०)। जुगुप्सनीय; "चिलिसावरणु परघिउ थाणु चिरालअ-पु. चिरालय; आदि लघु तेहि;" अर्थात् जुगुप्सनीय चिह न मात्र निकल गण का नाम , (15) (प्रा० ५० १, शेष रह गए; तुल० म० चिळसवाणे; १८)। (जंबू० २, ५, १३)। ८, ८)। o चिलिसिंज्न (३६०) चीरि बच्चा, लड़का; (दे० उसके साथ मच्छर, चिलिसिज्ज-क्रि० (दे०) घृणा करना। अथवां भलं अदने ।" (उ० व्य० प्र० ६. -इसकं० (सुदं०६, ४,३)। है)। चल्ल-पुं० (दे०) १. वाल, चोणं-पु. कोचीनपत्तन "सिरिप- ना. मा. ३, १०)। व्वयं गंगावाहीसमें पंडि-दविडंब-र्च २. पुं० वृक्ष-विशेष; (प० च० ६६, सकाण्णाड-कंचीपुरं कुतलं;" अर्थात् १६) 1३ पुं० (सं० प्रा० चिल्ल) पुष्प- श्रीपर्वत, गंगवाडी, और विशेष; (प० च० ६६, १६) । पांड्य, द्रविड़, मांध्र देश एवं चीन चिल्लणदेवि-स्त्री० चेलनादेवी, स्त्री- (कोचीनपत्तन), कर्नाटक, कांचीपुर और विशेष; (ण० १, ७, ६)। कोतल का भ्रमण किया; (जंबू० ६, १६, चिल्लिरी-स्त्री० (दे०) २) । चीण-पु० २ देश का नाम;(प्रा० चिल्लर, जू; "चिल्लरी मशकः" (दे०- ५० १, १९८) । चीण-पुं० मनुष्य-जाति- ना० मा०३,११)। विशेष; (सवि० १०, २, ६) 1 चीण- /चिव-(सं० चीवते) १. ढाँकना, पह चीर (सं० चीन-चीर) चीनाशक, चीनी नना, मोढना, २. लेना, ग्रहण करना, रेशमी वस्त्र; (संधि० ४, ६, २)। ३. पकड़ना; (उ० व्य० प्र०४३- चीणय-वि० चीनदेशीय; (प० ० २३)। ४२, ६, ६)। चिविडा-स्त्री० (दे०) गंव-द्रव्य- /चीन्त-(सं० चिति स्मृत्याम्; चिन्त- विशेष, (दे० ना० मा० ३, ७१) । यति) चिंता करना; (उ० व्य० प्र० ८, चिविल~वि० (दे०) परित्याज्य; ३)। (जंबू० ६, १, १०)। चीन्तत:-वि० (सं० चिन्तावत्) चिता- चिट्ठ-वि० (सं० चतुर् >प्रा० चउ)चार; पर; चिन्तवंतह; (रा० ७) । "आसि पास-जिण भवण-पसिद्धउ । तासु चीयर-न० (सं० चिता) मुर्दे को सीसु चिहूँ नाण-समि;" जलाने के लिए बनाया हुआ लकड़ी का १, ३) । ढेर; (रि० ७, १२)। चिहर-पु. (सं० चिकुर>प्रा०चिउर) चोया-स्त्री० (सं० चिता) शव को वाल, केश; (ण० १, ११, ३) । चिहूर चोया-स्त्री० (सं० (सुदं० ४, ११, ११)। -भार पुं० जलाने के लिए ऊपर-नीचे रखा गया (सं० चिकुरभार) जूड़ा; (जस० २, ७, लकड़ियों का ढ़ेर; (जं० ..१०,२६, ४)। ८)। चीकि-स्त्री० (दे० चिक्का) हलकी चौरंत्रल-पु० (सं० चीराञ्चल) सेना वृष्टि, फुहार, सूक्ष्म छोटा; (की० ४, में युद्ध सूचक झंडा; "गयणगइणा भमा- १८५)। डेइ चीरंचलं;" अर्थात गगनपति ने सेना चीख-(दे०) मास्वादन करना; "जी में युद्ध सूचक झंडा घुमाया, (जंवू०.७, चाख" -जिह्वया खादति । खाद्द भक्षणे, ४, १४)। (प्रा० गु० चोरिया (३६१) चुंबियासु चौर–न० (सं० प्रा० चीर) वस्त्र का २. न० तृष्णा, सस्पृहता; (ई सहित) हुपड़ा; (जस० २, ५, ८)। -खंड (दे० ना० मा० ३, २३)। पु० (सं० चीर+खण्ड) चुचुलिपूर-पु० (दे०) चुल्लू; (दे०. टुकड़ा; (जस० ४, १५, १३) । ना० मा० ३, १८)। चारि-कि०, आ० मारो-काटो "ौरि चुंछु-वि० (दे०) परिशोपित, सुखाया चीरि जिउ रित;,' अर्थात् दंडो, मार. हुला; (दे० ना० मा० ३, १५) । काटो, जीवित पड़ो; (की० २, चुंधल-वि० (दे०) चुधापन (लक्षि. .१८१)। रोग) युक्त "चुंधलणेत्तउ दोहरदंत" चौरिया-स्त्री० (सं० चीर+क) वस्त्र, -चौंवे नेत्र, लंबे दांत; (सुदं० ६, १५, "कडिवद्धचलचीरियाधिजालाई;"अर्थात् ६)। उनकी कमर पर वस्त्र के टुकड़ों की ध्व चुपालय-पु० (दे०) गवाक्ष, वातायन; जाएं बंधी हुई थीं; (जस० १,१६, (प० च० २६, ८०)। ३)। 1/व-सक० (सं० चुम्ब>प्रा० चीवर-न० (सं० प्रा० चीवर) वस्त्र, चुब)-इ व० (सं० चुम्बति)चुंबन लेना; कपड़ा; (जस० २, १८, ५) । (भ०)। -वि० पू० का० क्रि०;(जंबू० चुचु-स्त्री० (सं० चञ्चु>प्रा० चंचु) ७)। बुवंत-कृ० (सं० 'चोंच; (ण० २, ११, १२) । चुम्वत); (जस० १, १२, ८)। विज्ज- 'चुंचुन-पुं० (दे०) शेखर, मस्तक का न्त-कृ० (सं० चुम्व्यमान) (भ०)। आभूपण; (दे० ना० मा० ३, १६) । चुवें वि-पू० का० क्रि० चुंबन लेकर; (प० ७० ६, १४, ६)। चुचुणिआ-स्त्री० (दे०) १. गोष्ठी की प्रतिध्वनि, २. रमण, रति, संभोग; चुवा-(सं० चुम्बक) चुंबक ३. इमली का पेड़, ४. धुत-विशेप; पत्यर (क० ६, १२, २) । यूका, क्षुद्र कीट-विशेष; (दे० ना०मा०. चुंबण-न० (सं० चुम्बन >प्रा० ३, २३)। चुवण) चुंबन, चुवा; (जस० १, १२, 'चुंचुमालि-वि० (दे०) बालसी, प्रत्येक १) । चुंवणु; (सं० रा०)। कार्य को देर से करने वाला, देर लगाने चुविध-वि० (सं० चुम्बित) १. चुंबा वाला, टालने वाला; (दे० ना० मा० ३, लिया हुआ; (जस० २, १३, १६)। २३)। २. न० चुम्बन; (दे० ना० मा०६, चुंचुलि-पुं० (दे०) १. चोंच, ८)। २. चुल्लू; एक हाथ का संपुटाकार; (दे०. बियासु-वि० [सं० चुम्बित+नास्य ना० मा० ३, २३)। (मुख)] मुख को चूमने वाला; (बंबू० ३, चुंचुलिस-वि० (दे०) १. १२, २)। निश्वित, चुबिर (३६२) चुण गिरे हुए; चुबिर-वि० (सं० चुम्बित) चुम्बन चुम्बन चुपका-वि० स्त्री० भ्रष्टा, (जबू० २, करने वाला; (भ०)। १६, ३)। चभल-पु० (दे०) शेखर, अवतंस चुक्किह-वि० (सं० भ्रंश् का धान्वादेश शिरो-भूषण; (ण० ४,१०,७; दे० ना० चुक्क, चुक्कइ=चूकना, भ्रष्ट होना। मा० ३, १६) । चुम्भल; (प० च० ४६, भ्रष्ट हुआ, चूका हुआ; 'कालहि चुक्किह ४, ६)। कज्ज;" अर्थात् समय पर चूका हुआ चुअ-वि० (सं० च्युत >प्रा० चुअ) काम; (की० ३, ४६)। क्षरित, "कवोलचुएण मएण झरंतु;" चुक्कु-वि० (प्रा० चुक्क) भ्रष्ट, चूका अर्थात् (वह) कपोलों से मद बहा रहा हुआ, भूला हुआ; (प० च० १०, ६, था; (क० ४, ६, ५) । २. १) । (जस० १, २२, १०)। चुपकुड-पु० (दे०) बकरा, अज; (दे०. चुअमाला-स्त्री० चूतमाल, (छंदशास्त्र ना० मा० ३, १६)। में) आदि लघु त्रिकल का नाम (15); /चुचुकार-(ध्व०) सं० चुटचुटकार. (प्रा० ५० १, १८)। यति; अव्यक्तानुकरणम् । चुट-चुट का चुक्क-पु० (दे०) मुट्ठी, मुष्टि; (दे० शब्द होना; (उ० व्य० प्र० ७-८) ना० मा० ३, १४)। चुडुआ-पु० (दे० चुडुप्प) खाल; /चुक्क-(सं० भ्रश का धात्वादेश (की० २, २०३)। चुक्क) (संधि० ३, ११, ६)।-इ सं० चुडुपर-न० (दे०) खाल उतारना; (दे०. भ्रश्यति; चूकना; (भ०)। तुल० गु० ना० मा० ३,३)। चूकवे, म० चुकणे; (महा० ४, ८, ५; क०, २, ८, ५)। -जो चूकना, भ्रष्ट चुल्ल-० (दे०) चूडाबंध, चोटी या शिखा का बंधन, चोटी होना; (की० २, ४३) । चुक्किम-भू०. फीता; (सूदं० ८, १७, का० साथ छोड़ा; (की० ३, ११६) । चुक्की-क्रि०, भू० का०, चूक गयी, १)। "परवस तंतीवज्जउ चुक्को" -इस प्रकार चुल्ली-स्त्री० (दे०) उल्का (रात में परवश होकर वह तत्री-वाद्य में चूक से टूटकर गिरने वाला प्रकाश- गई; (ण० ५, ६, १०)। मय पिंड या तारा), अलात (अंगार, चुक्क-वि० (दे०) १. च्युत; (म० २, लुकाठी); उल्मुक (मशाल, लुक); (दे०- ३७, ११)। २. त्यक्त, दूर, परे; ना० मा० ३, १५)। "अविहि चुक्क;" अन्याय से दूर या परे; Vचुण-(दे०) पक्षियों का खाना, (व० १, १, ७) । ३. भ्रष्ट (जंबू० २, चुगना, चिड़ियों का चोंच से दाना उठा. ६३; सुदं० ११, ८,८)। चुक्किय - कर खाना; (जस० १, ३, १२)। वि० भ्रष्ट; (सुदं० २, ७, ११)। चुणंत-कृ० (सं० चिन्वत्) चुनते हुए, - के बाल बांधने का आकाश - चुण (३६३) चुव छंद, इच्छा; . भनभनाते हुए चुण्णइअ-वि० "चुणंतइँ कीरई अंसुवमाल;" (क० ८, चुप्प-वि० (दे०) स्निग्ध; (दे० ना०- १५,१)। मा० ३, १५.)। चुरगअ --पु. (दे०) १. चांडाल, चुप्पल-पुं० (दे०) शेखर, अवतंस, २. बाल, बच्चा, ३. आभूपण-विशेष; (दे० ना० मा० ३, ४. अरुचि, ५. व्यतिकर, संबंध; ६. वि० १६) । अल्प; ७. मुक्त, त्यक्त; ८. सूधा हुआ; सूधा हुआ; चुप्पलिअ-न० (दे०) नया रंगा हुआ (दे० ना० मा० ३, २२)। कपड़ा, (दे० ना० मा० ३, १७) । चुणिन्न-पु० न० (सं० चूर्ण>प्रा० चुप्पालय-पुं० (दे०) कवाक्ष, वातायन; चुण्ण) चूना; (ण० ८, २, ६) । (दे० ना० मा० ३, १७)। चुण्ण-पु० न० (सं० चूर्ण>प्रा० /चुमचुम-(ध्व०; कीर शब्दानुकरणे) चुण्ण) चूर, बुकनी, चूर्ण; (प० च० १६, चुर-चुन कर धान्य ख.ना; "जहिं चुम- ११,८; ण० ४, १०, ११)। २. धूली, कुमंसि केयारकीर;" जहाँ खेतों में शुक रज, रेणु; (दे० ना० मा० ३, १७) । चुन-चुन कर धान्य खाते हैं; (जस० १, ३. पु० चूर्णा; (छंदशास्त्र में) गाथा का २१, १)। भेद; (प्रा० ५० १, ६०)। चुमुचुमुचुमन्त-कृ० (दे०) जिस पर चूर्ण (humming), "सिरे गुमुगुमुगुमन्त, फेंका गया हो वह; (दे० ना० मा० ३, चुमुचुमुचुमन्त, चञ्चरिया;'' (प० च० १७)। ४०, १६, ६)। चुण्णाआ-स्त्री० (दे०) - कला, विज्ञान: चुय-वि० (सं० च्युत) (दे० ना० मा० ३, १६) । "तप्पइ वियरकंताणलेहि, णीवइ सस- चुण्णासी-स्त्री० (दे०) दासी, नौक हरमणिचुयजलेहि;" वह नगर सूर्यकांत रानी; (दे० ना० मा० ३, १६) । मणियों से तप्त होता और चन्द्रकांत चेरिण-वि० (सं० चूणित) धूली से मणियों से झरते जल के द्वारा आद्र व्याप्त; (दे० ना० मा० ३, १७) । होता है; (ण० १, १४, १)। चुण्णु चुण्णु-क्रि० भू० का० (सं० बुलसी-वि० (सं० चतुरशीति) चौरासी, चूर्णय >प्रा० चुण्ण) टुकड़े-टुकड़े कर अस्सी और चार; (प्रा० गु० १३, २५)। दिया, चूर-चूर कर दिया, "किउ स-रहु -३; (प. च० २०, १०२)। स-सारहि चुण्णु-चुण्णु;" अर्थात् रथ तथा चुलिअ ला-स्त्री० मात्रिक सारथि के साथ चूण-चूर्ण कर दिया; नाम; (प्रा० ५० १, १६७) । (प० च० १०, १०, ४)। चव-वि० (सं० च्युत) सवित; (व. चुप-वि० [सं०/चुप् (चोपन)] तुल० ५, १३, ६)। -संग पु० (सं० च्युत आवाक् मौन; "खण यक चुप भै रहइ;" +सङ्ग) साथ छोड़ना; (व० २, १०, राज० चुप; (को० २, १८३) । १४)। झरता हुआ, छंद का - चे व (३६४) चूर च० ५३, या पैरों में Vब-(सं० त्रुम्ब्) बन करना, चूय-पुं० (सं० चूत >प्रा० चूब) वृक्ष- चूमना; (उ० व्य० प्र० ६-१९)। विशेप, आम का वृक्ष; (प० दूझ-पु० (सं० चूत>प्रा० चूअ) याम ७६; क० १, १४, ६) । का पेड़; (प्रो० ५० २, १४४; की० २, चूर-वि० (सं० चूणित >प्रा० चूरिअ) ८१)। चूउ-पु. आम; (व० ८, १७, क्षुब्ध, त्रुणित; "वैश्यान्हि करो पयोधर २)। जती के हृदय चूर;' अर्थात् वेश्या के चूड-पुं० (दे०) हाथों पयोधर से टकराकर यती का हृय चूर पहना जाने वाला वलय, चूडा; तुल० म० हो जाता था; (को० २, ११०) । चूड़ा; (रा०, भ०)। Vचूर-(सं० चूरय. हर्णय>प्रा० चूड़ा -स्त्री० (सं० चूडा) चोटी, शिन्त्रा चूर) चूर-चूर होना; "......"पर चक्कह "संडासी चूडा उनाड" -संदंशेन संदि- चूरइ;" शत्रु का चक्रव्यूह चूर-चूर हो शकया या चूडकमुन्नडति. उन्नयति वा; रहा था; (को० ४, १६६)। तुल० राज० चूड़ (सिर के वाल); (उ० Vचूर-(सं० चूरय्) खण्डन करना, व्य० प्र० ४९-५)। तोड़ना टुकड़े-टुकड़े करना । "घने चूडामगि-पु. (सं० चूडामणि) सीस- सञ्चर घोल हाथि बहुत वापुर चूरि फूल या सीस में धारण करने के लिए जाथि;" अर्थात अनेक हाथी-घोड़ों के मणि जटित आभूपण-विशेप; तुल० राज० चलने मे वहुत से वेचा चूड़ामणि, (प० च० ४६, ३५) । स्त्री० (की० २, १११) । -इ सक० (ण० रानी-विशेष-नाम; (प. च० २१, ३, १५, १०) । चरन्त-कृ० चूर्ण करते ४३) । पुं० रत्न (व० १, ११, "अवरोप ६)। चुरन्त;' अर्थात् एक दूसरे को धक्का देते चूडारयण-न० (सं० डारल) सीस में हुए; (प० च० ३, ७, २)। चूरियउ-- धारण करने के लिए मणि जटित याभू भू० का० (सं० चुन्य) चरित करता था; पण-विशेष; (जस० २, १२, ५) । "छुडु कि.मिउलु चचुइँ चूरियउ;" अर्थात् चूडल्ल-पु० (दे०) चूड़ा कलाई ही कृमिकुल को चोंच से चूरित करता था, आभूषण, "दंतिमु चूडुल्ल चुण्णु चुण्णु;" (जस० २, २८, ७) 1 चूरिवि-पू० का० (जंवू० ४, ११, २) । -उ पु० (दे०) क्रि० चूर-चूर करके; (ण० ४, १५, २)। कंगन; (हे० ३६५, २, दे० चूरीआ-भू० का० "पज ३, १८)। चूरीआ," अर्थत् पैरों के बोझ से पत्थर चूतडं-पुं० [सं० चूत (= भग, योनि) चूर-चूर हुए जा रहे थे। (की० २, +तल) चूतड़ नितंब, कमर के नीचे २१७) । चूरेयो-भू० का०, चूर किया; और जांघ के ऊपर गुदा के वगल का (की० १, ६३)। टि०-'कीलिता' में भू० मांसल भाग; (उ० व्य० प्र० ६.२३) । का० के कृदंत रूपों में 'इआ' रूप में व्य. कुचल जाते थे; हुए, धक्का देते हुए; - ना. मा. भरे पत्थर - दूरण देका । निय-विक क्त करने की प्रवृत्ति परिलक्षित हेती है। ज्पर गिर रहे थे; (को० २,०) । चूरेवि-पू० का० वि० (सं० चूरय ! चेलइ-कि०, ३० (संचित् देतयते) कत्वा); (नुद० ६. १२, ७)। स होना; चेतता है, (ह. ३६६)। चरण-० न० (सं० चूर्ण>प्रा० इ-१० (२० वेदि) देश-विशेष; तुल. चुल्ग) वर्ण, बुकनी, चूर; (व० ३, २०, गजल । ० (सं० दि+ पति २)। >प्रा० विड) चेदि देश का राजा; (नं. वर्णित >प्रा० रि० ३.१)। चुरिय) चूर-चूर किया हुआ, टुकड़े 1/चई-- चिद, केतयते-सचेत कड़ा किया हा; तुल० न० चुरल होना) जागना; "एस्तु वेइ अपेक दि (१० ४, १०, ११)। सोजइ;" (जस० ३, २५. १०) । चल-पु० (सं०. चूडा>प्रा. चूला) चे अ-पु० न० (२० चैत्य>प्राचेह, चोटी, शिसा; (व०६, ५, ६)। बेइज) यन-न्यान, मनुप्यों का विधान- चूला-स्वी० (सं० डा>प्रा० चूला) स्थल; (पड। -घर न० (सं० चैत्य- चोटी, शिखा; (व० २.१६, २) । गृह) जिन मंदिर; (प. चूतावइ-स्त्री० चलावती नामक दिक- १२)। कुमारी; (३० ६. ५.८)। चेहर-० (२० चैत्यगृह >प्रा. चूलि-स्त्री० (दे०) कुकरची, मुर्गी; वेल. ई. हर) जैन मंदिर; (जंदू० भणइ महीमंत परमेसर किनिमलिमा- २, १६.११) । ईहर; .(जसः ४, रण;" (जन०४,२२, १) । २६, २३)। बेईहरी-स्त्री० बैलगृह; चूलिय--पु. (सं० चूड+क) चोटी; (२०३.२०, ५)। (० १०, ३०, ७)। चे-7० (चेतत् >प्रा० चैत्र) चूव- (सं० चूत>प्रा० जून) चित्त; दुनः राब० देतो; (प्रा० ५० १. काम, काम का वृक्ष; (म०)। -नु ७)। पुं० (२० चूतम) आन-वृक्ष; (व० चंउल्ल-पु० देश-विशेप; (जंद०६ १, ६, ३)! -मंजरी स्त्री० (सं० चूत +मजरि, मजरी) आन-मंजरी; (द. १६, ४)। २, ३, १३) । साह पुं० (सं० चूत+ 1/-(सं0 चेप्ट) प्रयत्न शाखा) बान्न वृक्ष की शाखा; (१०३, चेप्टा करना, लाचरण करनाः अ0 (10 ८, ३, ६)। 1.चूह-फेंकना, डालना; -इ सका चेक देखो चिळ-स्था; (दे० नाo- (पड्) । मा० १, १६४)। चह-पुं० (६०) चुना, तोता, भरना; वेदका-स्त्री० (सं० चेप्टा> प्रा० "वह उप्पर बारिजा;" अर्यात् झरने चेना) प्रयत्न; (म६, १७, १६) । करना -३ चे . चेल्लु क०४, चेल) वस्त्र; - चेड-पु० (दे०) बाल, कुमार, शिशु; चेर-पु० चेर नामक राजा; (दे० ना० मा० ३, १०)। १, ५)। चेड-पु. (सं० चेट+क>प्रा० चेल-न० (सं० प्रा० चेडग, चेडय) दास, नौकर; (जंवू० १०, (जस० ३, ७, ३)। चेलुक्खेव-पु० १४, १)। (सं० चेलोत्क्षेप) वस्त्र उठाना या उछा- चेडिअ-स्त्री० (सं० चेटिका>प्रा० लना, या ऊपर फेंकना; (संधि० २, १५, चेडिआ) दासी; (क० २, १५, ७)। चेडिय-स्त्री० दासी, "ववरिया-चेडिय. चेल-पु० (सं० चोल) चोली; (उत्तर संगयाए;" तुल० राज० चेटिका, चेटी; पुराण)। (विला०) । । चेलिका--स्त्री० (दे०) संतान, "लिका चेण-स्त्री० (सं० चेतना>प्रा० पोस-अपत्यानि पोपयति;" (उ० व्य चेयणा) ज्ञान, चेत, चैतन्य; (भ०) । प्र० ५१-१३)। चेतना-स्त्री० (सं० चेतना>प्रा० चेलियन० (सं० प्रा० चेल, प्रा० चेयणा) होश; (की० २, ८४)। चेलय) वस्य, कपड़ा; (५० च० ६, १३, 1/चेय-(सं० चित्) जानना, अनुभव ११) । "सा लइय णिवंधिविचेलियहि;" करना । -इ सक० (प० च० २६, ८, अर्थात् उसने उसे कपड़े में बाँध लिया; ८)। (जस० २, २८, ६)। चेय-न० (सं० चेतस् >प्रा० चेअ चेती-स्त्री. (सं० चोरि आँख ढांपने चेतना, ज्ञान, चैतन्य; तुल० म० चेव; का घूघट-विशेप) वस्त्र, "णउ तह (भ०)। लज्जण णिवसणचेली;" अर्थात् वहाँ न चेयण-पु. (सं० चेतन>प्रा० चेयण) तो लज्जा है और न वस्त्रों का आच्छा- आत्मा, जीव, प्राणी; (जस० ३, २६, दन;' (जस० ० ३, ७, ३)। ३) । न० (सं० चैतन्य >प्रा० चेयण्ण) चेलुप-न० (दे०) मूपल; (दे० ना०. ज्ञान, सुध, ख्याल; (विला०)। मा० ३, ११)। चेयणाल-पु० (सं० चेतना+आलय) चलुफां-स्त्री० (दे०) शिशु; "तउ चेतना का घर, "पुग्गल सावयासु परि. चेलुका पिरायाँ पोसइ;" तुल० गु० णामिउ अवरु वि चेयणालओ;" अर्थात् चेलका, (प्रा० गु० १६, १२) । पुद्गल द्रव्य का स्वभाव अवकाश को चेल्ल, चेल्लन-देखो चिल्ल; (दे०), रोकने का है। वह परिणामी है और चेतना का गृह भी है; (प० च० ६७, १३)। जस० ४, १३, १)। चेल्लु-पु० (सं० चेटक >प्रा० चेडअ) चेयारि-वि० (सं० चत्वारि) चार; चेला, शिष्य; तुल० राज० चेली; मगही (प० च० ५१, ६, ८)। चेला; (सरह दोहाकोशः) - पुं० . - - - चेव (३६७) चोपड ८८)। शिशु, (चिल्ल दे० ना० मा० ३, १०)। -कोयण वि० (सं० चोद्य+ उत्कोपन) (संधि० ५, ११, ६)। आश्चर्य उत्पन्न करने वाला; (ण० ४, चेव-अव्य० (सं० च+एष, चैव) १२, १६)। अवधारण सूचक अव्यय, निश्चय दर्शक चोट -स्त्री० (सं० चुट-काटना) शब्द, ही; "अहवा एक्को तुमं चेव," धाघात, प्रहार, मार; (की० ४, अथवा अकेला त् ही है; (जंबु० ७, ४, १७३)। ८)। २. पाद-पूरक अव्यय; (प० च०८, पोट्टी-स्त्री० (सं० चूडा) चोटी, शिखा, चुंदी; (दे० ना० मा० ३, चेतु-कृ० (दे०) (सं० चित्>प्रा० १)। चेअ-सावधान होना) जागते हुए, चोड-पुं० चौड़ नामक देश; (क० २, (सुदं० २, ७, २) । १०, ५) । २. पु० (दे०) चूड़ा, चोटी; चो-वि० (सं० चतुर्>प्रा० चउ) (जंबू० ६, १३, ५)। -देस पु चोल चार; (प्रा० ५० २, १४५) । देश; (जंबू० ६, १६, १) । टि०- इसका /चोअ-(सं० चोदय >प्रा० चोम- विस्तार कोयंबतूर, त्रिचनापल्ली और प्रेरणा करना) चोऍवि-पू० का० क्रि० संजौर आदि से मैसूर के आधे दक्षिणी ले जाकर; "आसणे चोऍवि विगय- भाग तक था। रामायण और महाभारत भउ;" अर्थात् 'विगत-मद अपने हाथी को में चोल देश का उल्लेख आया है। निकट ले जाकर,' (प० च० १५, ५, ८) चोडी-स्त्री० चोली, चोलदेशीय स्त्री; चोआलीत-वि० (सं० चतुश्चत्वारि- (संधि० ६, ५. १०)। शत्) चवालीस; (प्रा० चोढ-(दे०) विल्व, बेल का पेड़; १८६)। चोइउ-वि० (सं० चोदित>प्रा० ना० मा० ३, १६)। चोइअ) प्रेरित; (व० २, ५, २१)। चोत्त, चोत्तम-पुं० न० (दे०) प्रतोद चोइय; (ण० ५, ४, २१, भ०)। (लंबा चाबुक, चुभोने वाला उपकरण, चोक्ख-वि० (सं० चोक्ष) चोखा, मनो. अंकुश); (दे० ना० मा० ३, १६) । हर; "चोक्खु स-रागर सिङ्गार-हार चोत्यी-स्त्री० (सं० चतुर्थी) चौय दरिसावणु;" (प० तिथि; (ण० ६, २०, ४) 1 च० २६, १५, चोदह-वि० (सं० चतुर्दश>प्रा० चउ- चोज्ज-न० (सं० चोघ>प्रा० चोज्ज) दह) चौदह; (प्रा० पै० २, १०२) । कौतुहल, कौतुक, आश्चर्य; चोप्पड-न० (दे०) स्निग्ध द्रव्य; घी, चोज; (ण० २, २, १; ५० च० २३, तेल आदि स्निग्ध वस्तु; (संधि० ३, ८, ८, ५; महा०८-७-२३) । चोज्जु (सि० ६)। २, ३) । २. चिंता; (क० ६, ६, २)। Vचोप्पड-(दे०) स्निग्ध करना, धी- पं० २, तुल० म० चौफुच्च (३६५) चौसा (सं० - तेल आदि लगाना । चोप्पंडि-त्रि०, आं० चौर्य, चारी, (जंबू ३, १४, १७), चुपडो; (परम० २,१४८) । चोग्धिर्म-वि० (सं० चोरित>प्रा. चोप्फुच्च-वि० (दे०) प्रेम-युक्त; (दे० चोरिअ) चुराया हुआ; (जंबू० १०, , ना० मा० ३,१५)। १०)। चौबिह-वि० चतुर्विशति)। चोर' (सं० प्रा० चोर)चौर, चोरी चौबीस; (प्रा० पै० २, २१०) । करके वाला; (उ० व्य० प्र०४९- चोयमान - कृ० (सं० चोदयन्) प्रेरित २३)। करता हुभा; (ण०४, १२, ११) । चोरेवइ-मू० का० क्रि० (सं० चौरम् । चोर-पुं० (सं० प्रा० चोर) दूसरे का तुमुन्.) चोरी करने के लिए, "विज्मुच्चर वन चुराने वाला; (भ०)।-उल पुं० चोरेवइ पुरे परिभमइ;" अर्थात् विद्युच्चर (सं० चोरकुल) चोरों का समुदाय; (जस० नामक चोर चोरी करने के लिए नगरी में १, १३, ४)। -त्तण पुं० (सं० चोर- परिभ्रमण कर रहा है; (जंदू० ६, ११, त्व) चुरानेका भाव; चौर्यत्व; (जंबू० ६, १७)। १४, ४) । चोल-वि० (दे०) वामन, कुन्न; (दे०. चोरइ-क्रि०, व० (सं० चोरयति) ना० मा० ३, १८)। पुं० देश-विशेय; चुराना; (भ०) । -मि; तुल० राज० "तेलंगा वंगा चोल कलिंगा राआ पुत्ते चोरणी, चोरवा; (जंबू० ९,१५, मण्डीआ;" (की० २, २२७) 1-वइ ५)। पुं० (सं० चोलपति) चोल देश का राजा; चोरण-न० (सं० प्रा० चोरण) चोरी, (प्रा० ५० २, १५१)। चुराना; (भ०)। चोल्ल-पुं० (दे०) अंगवस्त्र, तुल० स० चोरली-स्त्री० (दे०) श्रावणमास की चोळी (केवल स्त्रियों की); (भ०) । कृष्णचतुर्दशी, (दे० ना० चोल्लय-पु० चालक, चंदोवा; (सुई० १६)। ३, ८, ८)। जोरिम (सं० चौर्य>प्रा० चौदिस--स्त्री० (सं० चोरिस) चोरी, अपहरण; (क० ६, २२, चारों दिशा; (की० ४, ११८) । चौपट-पुं० [सं० चतुप्पट चापड़ के बोरिवक-न० (सं० चौरिक्य >प्रा० तेल का चार भुजाओं गला कपड़ा)> जोरिक्क) चोरी, अपहरण; तुल० राज० प्रा० चउपड) चारों खानों चित्त, मुहा० चोरिक्क; (संधि० ३, ५, ८)। चौपट गिरना=इस प्रकार गिरना कि चोरी पेम-पुं० (सं० चौर्य+प्रेमन्) चारों खाने नीचे की और चोरी से किया गया प्रेम, छिपा हुआ जाना। (को० ४, १५२) । प्रेम;(की०२, १२०) । चौसा-स्त्री० . (सं० चतुर>प्रा० चढ़ बोरियन० (सं० चौर्य >प्रा० चोरिअ) +सं० अन्न >प्रा. अस्स-उस्म> मा० ३. न० चतुर / दिग) या पट हो चोहट्ट (३६९) छंद , . , वेश्या; चौसा) चार सूट या चार दिशा; (को० पा० दो०) छह; तुल० राज० छ, छइ, ३, ८१)। गु० छ, (प्रा० ५० १,१५; ण. १, १२, चौहट्ट-पुं० (सं० चतुहट्ट) चौराहा, ५; संधि ३, ५,३; जस०)। चौहट्टा; (की० २,८८)। छंकार-० (दे०) जलकण; (जंबू० १, च्चरण--न० (सं० अर्चन) अर्चना, पूजा; १, २)। (जंबू० ८, ४, १)। छंकुई-स्त्री० (दे०) केवांच, वृक्ष- चिय-अव्य० (सं० चैव>प्रा० विशेष; (दे० ना० मा० ३, २४) । च्चिअ, चिअ) अवधारण सूचक अव्यय, छंगुलअ-पु० (सं० षड्+अगुल) छह निश्चय प्रकट करने वाला शब्द; (ण अंगुल; (जस०) ६, १५, १; जंबू० ४, १८, ७) । छंगुलमिअ-पु० (सं० षडङ्गुलिमित) च्छह-क्रि०, व० (सं० अस्ति) है; (प० छह अंगुल प्रमाण; (जस० ४,१६, च० ४१, ५, ६)। च्छउ---क्रि०, आ० १४)। (सं० अस्तु) रहें, "तावच्छउ," तब तक छंट-पु० (दे०) जल का छींटा; रहें; (जंबू० ६, २, ६)। २. वि० शीघ्रतापूर्वक कार्य करने वाला; च्छरा--स्त्री० (सं० अप्सरा) १. परी, (दे० ना० मा० ३, २३)। २. स्वर्ग की (जंवू० ६, २, 1/छंट-(सं० सिच्), छिड़कना; तुल० गु० छांटवु (संधि० १, ५, ८) । च्छि-स्त्री० (सं० अक्षि) नेत्र; (जंबू० 1/छंड-(प्रा० छड्ड) छोड़ना, -३ ३, १, २)। सक० (क० ३, ५, ३; महा० १,१४, च्छोड:-क्रि० व० (स०/छर्दय> ३) । तुल० राज. छंडणी, छंडवौ; गु० प्रा० छड्ड) छोड़ना; तुल० म० सोडणे, छांडवू; म० लांडणें। छडि-पू० का०- गु० छोडवु, (भ०)। क्रि० छोड़ कर; (पाहु.)। छंडिवि- च्यारि-वि० (सं० (सं० चत्वारि) चार; पू० का० क्रि० छोड़कर; (सुदं० ८, ३५, तुल० राज० गु० च्यार; (प्रा० गु० २५, ६; यो० ३२)। छंडेविणु--पू० का० क्रि० (परम० १, ७४; पाहु० १५१) । १३; प्र० चि०)। छंडिअ-वि० (सं० छदित >प्रा० छडिम) मुक्त, परित्यक्त, छोड़ा हुआ, (सुदं० ८, २३, २) । छडिआ; (ण० ४, ८, २)। छ छंद-पु० न० (सं० छंदस्>प्रा० छंद) छ–० (सं० प्रा० छ) व्यंजन वर्ण- १. छंद; तुल० राज० छंद, (प्रा० ५० विशेष, तालु-स्थानीय । वि० (सं० पट, १, १०) । २. अंतलघु निकल का नाम पप्>प्रा० छ, अप० छउ (प्रा० पै०; (1); (प्रा० ५० १,१६) । २. स्वच्छं- भ०), छअ (प्रा० ०), छह (प० च०, दता, अभिप्राय-विशेष, "छंदें विरज्जइउ - । . ० छंदाइत्त (३७०) छक्वड ०१, - छल, करइ कम्मु, -इस प्रकार वह स्वच्छं- दता से मनम ने काम करता था; (जस० १, ५, १६) ।२. (सं० छन्द:) छंद शास्त्र, "छंदलंकारई जोइसाई;" छंद, अलंकार और ज्योतिप; (जस० १, २४, 1 ३. वि० आच्छादित; "तिणयणतणु व्वं दावणछंद;" अर्थात् विध्याटवी दारु- वनों से आच्छादित थो; (जंवू० ५, ६, ३६) । ४. वि० उन्मुक्त; "रूब-छंद- लायण्णहि सोहड़;" वह अपने रूप और उन्मुक्त सौंदर्य से शोभित थी; (सि० १, ४६)। -अ पु० न० छंद; (प्रा० ५० २, १३५)। छंदाइत्त-वि० (मं छन्दवत्) स्वैग; मनमाना आचरण करने वाला; (भ०) । छा-वि० (सं० पप्>प्रा० छ) छह; (प्रा० ० २, ४३)। छइम-वि० (सं० छादित) आच्छादित; (ण० ५, २, १६)। छइमत्य-वि० (सं० छद्मस्य>प्रा० छउमत्य) संपूर्ण ज्ञान से वञ्चित; (ण. .८, ८, १०)। छइय-वि० (सं० आच्छादित) हुया; (पड्) । २. छादित; (जंबू० ५, १२, १६) । ३. शोभित; (जस २, ३, २)। छइल-वि० (दे०) विदग्ध, चतुर; (दे०- ना० मा० ३, २४)। छइल्ल-वि• (सं० छविमत् >प्रा० छविल्ल, छयल्ल) निपुण, चतुर, छल, विदग्ध (दे० ना० मा० ३, २४; सुदं० ७, ११, ७, हे० ४१२, १)। २. काव्य- रसिक, नागर; (की० १, ३१)। ३. रसिक, छैला; (प्रा० ५० १०५) । छउ-वि० (सं० पट् >प्रा० छ) यह; (प्रा० पं० २, ४३)। छउस-वि० (दे०) कृश, दुबला; (दे०. ना० मा० ३, २५) । छउत्तरसय-वि० (सं० पप् + उत्तरश- ततम) एक सौ और छठवा; (प० ३० १०६,४६)। छउम-पु० न० (सं० छद्मन्) वहाना; तुल० राज० छउम; (पड्) । छक्क-वि० (सं० पट्+क>प्रा० छक्क) छह का समूह; (भ०) । -मु पुं० (स० पट + कर्म) छह कर्म, "जो संयभु छक्कम्म-छइल्लउ;' जो (ऋपभ- देव) पट-कर्मों के निरूपण में निपुण एवं स्वयंभू थे, (व० २, १२, ६)। टि- छह प्रकार के कर्म १. शम, २. दम ३. विषय से विराग या विरति, ४. सहि- प्णुता या क्षमा, ५; श्रद्धा और ६. चित्त की शांति के लिए मन को ब्रह्मा में लगाना। ढका छक्का-वि० (सं० पट्+क) छह; तुल० राज० छको (छह को संख्या का अंक); (प्रा० १० २, ४७) । छक्कारय-पु० (सं० पट्कारक) छह कारक; (प० च० १, ३, ५) । छक्खर-पुं० (सं० पखण्ड) छह खण्ड, (व० ८, २, ३) । छक्खण्ड; (प० च० १, ११, ८)| - वाणि स्त्री० (सं० पद खण्ड-+अवनि) पट् खण्ड भूमि; "छक्वं. डावणि मंडल-सामिड;" अर्थात् पृथ्वी के छखंड (३७१) छडय - + - समस्त छह खण्डों का स्वामी; (व० २, (सं० पष्ठ+क) छठा; (सि० २, १२) । १२, १०)। छड-वि० (सं० पप्) (भ०)। छखंड-पु० (सं० पट्+खण्ड) छह छठ्ठम-वि० (सं० पप्ठ+ अप्ठम) खंड; (क० १, ३, ४)। -वसुंधर छठ्ठा और आठयां, "एक्कंतरि छट्ठ- (सं० पट्खण्डवसुन्धरा) छह खंडों वाली मएँ दिणे;" (जंबू० ३, ६, १२)। पृथिवी; (जंबू० ३, ३, १२) । छट्टि-स्त्री० (सं० पष्ठी) छट्ठी तिथि; छगल-पु० स्त्री० (स० छागी) बकरी; (व० ६, ७, १४)। तुल० राज० छगळ, छगल, छगल्ल; सुभाषित "छगलगहणट्ठ मेरावणं छट्छु-पु० (सं० पष्ठोपवास) छह दिन का उपवास; (व० ६, २०, ५) । विक्कए;" बकरी को लेने के लिए ऐरावत 1/छड-(दे०) सं० ला+रुह, बाढ़ को वेचता है, (भावना संधि.प्रकरण)तुल० अवधी छमडी । होना, चढ़ना। -इ अक० (पड्) । छच्चरण-पु०(सं० पट+चरण)भौंरा, छड-स्त्री० (सं० छटा>प्रा० छड़ा) भ्रमर; (व० ६, ६, ५)। शोभा, छटा "कुकुमछडएं णं रइहि रंगु" 1/छज्ज-(सं० सरज् >प्रा० छज्ज) कुंकुम की छटाओं से जान पड़ता था शोभित होना, शोभना, शोभायमान जैसे वह रति की रंगभूमि हो; (ण० १, होना। -इ अक० (प० च० ३, ७, १०; भ०; महा० १,१४, ३; सुदं० १, ३, छडउ-पु० (दे०) छडउ-पु० (दे०) १. छिड़काव "अम- ६) । छन्जेइ; (म० १, ६, ४) । तुल० म० साजणें। रराउ मज्जणउ भरावज । छज्जमारण-वि० शोभायमान; "उच्छ- घगे हिं छडउ देवावउ"; अमराज नहाने लंतु पक्खलंतु छन्जमाणु," (क० ७, ६, का पानी भराए और मेघों से छिड़काव कराए। (प० च० १७, १८, ६)। छज्जीवसिकाय-पु० (सं० पड्जीवनि. २. छटा; (जंबू० ७, १२, २)। अकेला काय, जीवनिकाय; पृथिव्यप्तेजोवायुवन- छडउ-वि० (दे०) एकाको, स्पतित्रसकाया) छह "धिरु छज्जीवरिण- "छडउ पयाणउ;" एकाको प्रयाणम्; तुल० कायदयावरु," इन छह जीवनिकाय गु० छडे परियाणे; (प्रा० गु० ५, १४)। जीवनिकायों पर स्थिर रूप से दयावान छडक्खर-पु० (दे०) स्कन्द, कात्तिकेय; थे; (जस० ३, १७, ११)। (दे० ना० मा० ३, २६)। छटा-स्त्री० (सं० छटा) शोभा; (को० छडपडु-क्रि० वि० (दे०) शीघ्र; (प्रा० २, १५१)। गु० २७, ३, ६) । हुडुपुडु; (प्रा० गु० छ--वि० (सं० षष्ठ) छठा, छठवा ६, २०)। (प्रा० ५० १, ५६; जस० २,४,५, छडय - १. स्त्री० (सं० छटा) जबू० ६, १४, १८; भ०)।-उ वि० (क० १,४,७) । २. पुं० समूह; (प० अण्णु वि " शोभा;
घडास (३७२) घणघणमण छोड़ते हए, तुल० म० छाडल पाटि - वमन का च० ४०, १६, ७) 1३. पुं० पु० (दे०) (की० ४,१०३)।-ल पू० का० कि. उपलेप;"णवकु कुमरसघडयारणाई” नए; के रूप में प्रयुक्त "बद्दल केसर-रस के लेप ने लाल, पांतरे। वसने पात्रेल सहा; (जस० १, ४, १०) । मांतरे;" (को० २, ६१, ६२) । छाहि- छब्या-स्त्री० (सं० छटा) शोमा; पू० का० कि.० (सं० मुच् का धात्वादेश (जस) छड्डु) छोड़ कर; (को० ४, २०६, २० छडा-स्त्री० १. (दे०) विद्युत; (दे०. व्य० प्र० १, ३१) । याई-आ०, ना० मा० ३, २४)। २. (सं० सटा) छोड़ो; "पराई वर्षं डीव छाड़," अर्थात् जटा; (व० ५, ५, १)1 'परकीये वस्तुनि त्रि (४) प्णां चिन्धि' । छडाल-वि० (सं० छटावत्) छटा वाला; (उ० व्य० प्र०६-३१) । (पच० ३५, १८)। छड्डवय-वि० (सं० छर्दक) त्याग छरिय-वि० (दे०) सिंचित; तुल० करने वाला, त्याजक; (दे० ना० मा०- गु० छांटेल; (संधि० ४, ६, ६)। २, ६२) । /छड्ड-(सं० छर्दय>प्रा० छड्ड) छडि-स्त्री० (सं० दि) छोड़ना; (जम० ३,३७, २; सं० रा०; रोग; (पड्) । संधि० १, १३, ६) । तुल० गु० छोडवू छड्डिय-वि० (सं० यदित) त्यक्त, मुक्त; -~-इ व० (को० ४, २३४)। —हि व० (प० च० १५, ११, ३) । छोड़ना; (हे० ३८३)। छड्डंत-कृ० छड्डिय, छड्डियल्लिय-वि० (सं० छदित) सं० मुञ्चन्; (ण० ६, १२, २) । छड् १. वमन किया हुया; २. मुक्त; (दे०. इंतु-कृ० 'एत्तिउ छलु छड्डंतु ण ना० मा० १, ४६)। लज्जमि;' (म० २, २८, ३)। छड्डाविऊ एण-पु० (सं० क्षण) १. क्षण; सि० -मू० का० छुड़वा दिया; (जंबू० ६, १,१६, सं० रा०)। २. ७, १०)। छडि-पू० का० क्रि०, छोड़- "ठणइंदविवसण्णिहमुहैण,” पूर्ण कर; (की० ३, ७८)। छड्डय-भू० विम्ब सदृश उज्ज्वल मुख, तुल० राज० का० छोड़ा; (की० २, ५४) | ऊण छण; (ण० १, ३, १)। पू० का० क्रि• छोड़ कर; (सुबंध २,३, छणद-पु० (सं. क्षण+ इन्दु) पूर्ण १) । छड्डिवि-पू० का० कि०, (जंबू० चंद्र; (जंबू० १०, १, ८)। ६, ५, २) । यण्डहों-आ० छोड़ो, त्याग घण-बन्द-पु० (सं० क्षण+चन्द्र > करो; (प० च० २, १३, १४)। छण्डे वि प्रा० छणचंद) शरद ऋतु की पूर्णिमा का -पू० का० कि० (प० च० ११, १, ७)। चंद्रमा; (प० ५० १, ३, १४) । बाड-३० त्यागना; (उ० व्य० प्र० ६, छरछरपसछ-पू० (५०) किसी वस्तु २)। भू० का०, छोड़ता था; "भोअण के पकाने से उत्पन्न हुआ शब्द; (प० ३० भाखण छार नहि गमणे न हो परिभूत;" ११, ६, ६) । वि०, पूर्ण .
छणदिण (३७३) छछव्वाई . छणदिण-पु० (सं० क्षणदिन) उत्सव छत्त-न० (सं० छत्र>प्रा० छत्त) दिवस; (जंबू० ६, ८, १२) । छाता, छत्र; तुल० म० राज० छत; छणयंद-पु. (सं० छण+चन्द्र) (जस० १, ४, १; की० ३, २२; ण० १, पूर्णिमाचंद्र; (जस० १, १७, २२) । १६, ६; सि० २, १८, प्रा० पै०१, छणवासर-पु० (सं० भण (पूर्णिमा) १८२)। +वासर) पूर्ण, "छणवासरससहरआण छत्तच्छय-पुं० (सं० सप्तच्छद) वृक्ष- णीय, पावेसइ पुणू इह कामणीय," विशेष, सतीना, छतिवन; (सण०) । अर्थात् तभी आप अपनी पूर्ण चंद्रमुखी छत्तछाय-पुं० महापुर के राजा का कामिनी को प्राप्त करेंगे, (क० ५, १६, नाम; (प० च० १०३, ३६) । स्त्री० ५) । (सं० छन+छाया) छत्र की छाया; छणवासर-पु० (सं० क्षणवासर) (जस० २, २५, ५)। उत्सव का दिन, "मेहल-तोरणाहँ छण छत्तरिय-वि० (दे०) विस्तारित, अंत- वासरु"; मेखलाओं और तोरणों से उत्सव रित; (प० च० ५६, २, ४)। का दिन है; (प० ० १४, १२, छत्ताई-न० (सं० छत्र>प्रा० छत्त) ४) । छन्न ; (रि० ७,६)। छरएससहर-पुं० (सं० क्षण शशधर) छत्ताइमारण--वि० (सं० छत्रायमान) पूर्णिमा का चाँद; (महा० २०, ६, १- छत्र के समान शोभायमान; "छत्तायमाणु ७) । तहों सहइ सप्पु;" अर्थात् सर्प उस पर छरणससि-पु० (सं० क्षण+शशि) पूर्ण- छत्र के समान शोभायमान था; (क० ४, चंद्र; (जंबू १०, १, ८)। ६, २) । छरिणदु-पु. (सं० क्षण+इन्दु) पूर्ण- छत्तायार-वि० (सं० छन+आकार) मासी का चंद्रमा; (व० ३, २२, छाते के आकार का; (जंबू० ११, १२, ३)। १०)। छण्ण-वि०. (सं० छन्न >प्रा० छष्ण) छत्तीस-वि० (सं० पष् +त्रिंशत) आच्छादित, छादित; (जंबू० २, १२, छत्तीस; (सि० १, १७)। ६)। २. गुप्त, प्रच्छन्न; छिपाया हुआ, छतीस सि० १, २२) । -इम वि० (सं० (भ०)। o आच्छन्नः (प० च० पष् +त्रिंशत्तम) छतीसवाँ; (प० च. १४, १, १)। ३६,४३)। छण्णवइ-वि० (सं० षट्नवति) छिया- छद्दसण [-पु० (सं० षड्दर्शन) छह नवे; (जस० ४, २०, १२; जंबू० ३, ३, दर्शन; (जस० ४, २७, २०) । १४)। छण्णवेआ-वि० (सं० पटनवति) (पण्ण- छइब्वाई-स्त्री० (सं० षड्द्रव्यादि) छह वति) छियानवे; (प्रा० ० २, १२२)। प्रकार के द्रव्य । जैन छह द्रव्य मानते हैं -उ वि० - वि० - .
छछी (३७४) छम्मांस . लगते ही जीव, धर्म, अधर्म, पुद्गल, आकाश और यालि;" अर्थात् कानों के झपाटे से काल; (व० १०, ३, ७) । पदों को झड़पता हुआ; (जंबू० ४, २०, छद्दी-स्त्री. (दे०) विछौना, शय्या; १०)। (दे० ना० मा० ३, २४)। छब्बीसा-वि (सं० पटविंशति) छन्न-वि० (सं० प्रच्छन्न>प्रा० छब्बीस, तुल० राज० छब्बीस; (प्रा०.५० पच्छण्ण) ढका हुआ; (सं० रा०) । १, १५०) । छन्नवइ-वि० (सं० पण्णवति) छिया- छमछमं-(ध्व०)सं० छमच्छमा छम- नवे; ; तुल० गु० छन्नु; (प्रा० गु० १२, छम करना 1-छमेइ, “काहि वि हरियं- २१; व० ८, ५, ४)। दणरसु रमेइ, लग्गंतु अंगे छमछमछमेइ, छप्पति--स्त्री० (दे०) नियम-विशेप, अर्थात् किसी ने लाल चंदन का लेप जिसमें पद्य लिखा जाता है; (दे० ना० लगाया जो उसके शरीर में मा० ३, २५)। (विरह ताप के कारण) छमछम करके छप्पए-पुं० (सं० पट्+पद) भीरा; चटक गया; (जंबू० ४, ११, ३) । (व० ३, ५, ८)। छमलय-पु० (दे०) सप्तच्छद, वृक्ष- छप्पण, छप्पणास-वि० (सं० पट्पञ्चा- विशेष; (दे० ना० मा० ३, २५) । शत) छप्पन; पचास से छ: अधिक; छमासीवेयण-स्त्री० (सं०- पड्+मासि तुल० राज० छप्पन; (प्रा० पैं० २, +वेदना) छह मास तक व्याधि की १३३) । वेदना; (जस० ३, २६, ३)। छप्पण्णय - वि० (दे०) - वि० (दे०) विदग्ध, (प० छमाहर---पु० (सं० क्षमा+घर) पर्वत; च० ३०, ४, ५; दे० ना० मा० ३, (पड्) । २४)। छमुडवारी-पु० (सं० पण्मुण्डवारी) छप्पन्न-~-वि० (सं० पप् + पञ्चाश) स्वामी कार्तिकेय; (प्रा० छप्पनवा; (प. च० ५६, ४८) । १२०)। छप्पम-न० (सं० पट्पद) छप्पय, छंद छम्म-पुं० न० (सं० छद्मन् >प्रा० विशेष; (प्रा० ० १, १२५) । छउम) पाखंड, कपट, शठता, छल; (क० छप्पय--पुं० (सं० पट्पद >प्रा० ७, १६, ६,म० १,१६, १२) । छप्पय) भ्रमर मधुकर, भौंरा; तुल० छम्मयल-पुं० (सं. क्षमा+तल> राज० छप्पय; (जस० १, १२, ३; ण. प्रा० छमा+तल) पृथ्वीतल; (सं० ८, १,६; प० च० २, १, ७) । रा०)। छप्यार-पुं० (सं० पट्+प्रकार) छह छम्मास-पुं० (सं० पण्मास) छह मास; प्रकार; (जंबू० १०, २२, ११) । (जंवू० २, ४, १)। -अवहि पण्मासा- छप्पयालि-पुं० (सं० पट्पद+अलि) वधि; (जंवू० ८, ५, ३)। उ पुं० भ्रमरों पटादों; "चलकण्णझडप्पियछप्प. (सं० पट+मास+आयु) छह मास की पं० २, .
छम्मिय (३७५) छांड . आयु; (व० ६, ५, १)। छवि-स्त्री० (सं० प्रा० छवि). कांति, छम्मिय-वि० (सं० छमित) छलित; तेज; (भ०) । (मुदं० ११, २, १०)। छन्वग्ग-पु० (सं० पड्+वर्ग) छय-पु० (सं० क्षत>प्रा० छय) व्रण, वर्ग, "अरिछन्वग्गहु जो हुउ कयंतु" घाव; (सं० रा०)। उसने अपने षड्वर्ग रूपी रिपुओं का छयासो-वि० (सं० पडशीति) छियासी; विनाश किया था; (ण. १, ८, ५)। (महा०)। छन्वासय-पु. (सं० पडावश्यक) पड् छरहरिय-वि० छरहरित, धर्राकर; आवश्यक जैन गृहस्थी के लिए छह बातें "छरहरियमणू कंपंततणु," मन में थर्रा- आवश्यक हैं-देव पूजा, गुरुपास्ति, स्वा- कर शरीर से कंपते हुए; (सुदं० २, ११, ध्याय, संयम, तप और दान; "छन्वासय १०)। किल णिम्मूलियखलु" खलों का निर्मूलन छल-न० (सं० प्रा० छल) कपट, माया; करने वाले पडावश्यक है । (म० १, २१, तुल० राज० छळ; (प० च० १२, ६, ८; क० ६, २०, २०)। छावासइ; (व. ७; प्रा० .० २, २०७) । २. बहाना; ८, १४, १२)। (जस० २, १०, ११)। छलु; (व० ३, छविहु-पु. (सं० पट्+विध) छह १८, ३)। प्रकार; (व० ८, १४, १०) । 1/ छल-(सं० छलय >प्रा० छल) छह-वि० (सं० पट्>प्रा० छ) छह; -इ सक० (सं० छनयति) तुल० राज० छह; (जस० ४, १३, ७; (भ०)। व०१,१२, १३; छलय-पुं० (सं० छलिन्) जुआड़ी; ११८)। (जंवू० ४.२, १०)। छहत्तर-वि० (सं० षट्सप्तति) ७६ वां छलि-वि० छलने वाले; (प्रा० पैं० २, छिहत्तरवा, तुल० राज० छहत्तर, छह- २१५)। त्तरि; (प० च० ११३, ५४) । छलिन-वि० (दे०) विदग्ध, चालाक, छहत्तरि, छेहत्तरि-वि० (सं० पट्स- चतुर; तुल० राज० छळिया; (दे० ना०. प्तति) छिहत्तर; (प्रा० पै०)। भा० ३, २४)। छहि-वि० (सं० पट्) छह; (सि० १, छल्लि-स्त्री० (दे०) त्वचा; (ण० ३, ३७) । ८, १०)। छांड-(दे० छंड) छोड़ना; छाड़ी, छल्लो-स्त्री० (सं० प्रा० छल्लि) त्वचा, (रा० १०)। तुलं० राज० छांडणी, छाल, छिलका; (दे० ना० मा० ३, छाडबौ । छोडि-पू० का० क्रि०, छोड़ २४) । कर; (की० २, १०५)। छाड-पू० छवडी-स्त्री० (दे०) चर्म, चाम, चमड़ा; का० कि० छोड़कर, "का मन गाड, (दे० ना० मा० ३, २५)। गोवोलिगमारंन्हि छाड; अर्थात् जो ठगना। प्रा० पै० १, छाँटे (३७६) छानि % 3D (को० कंचन- कलश - गवार ग्वालों को छोड़ कर नागरिकों छाई-स्त्री० (दे.) माता, देवी, देवता; (रसिकों) के मने में गड़ जाती थी; (दे० ना० मा० ३, २६) । (की० २, १५१)। छाज-अक० (सं० सज्ज >प्रा० छज्ज छोटे-अव्य० (दे० छन्टो) शीघ्र; = शोभना, चमकना) शोभना, सुशोभित ३, १४७)। -हें अव्य० शीघ्र, होना; "ताहि प्रासादन्हि करो वज्रमणि जल्दी से; 'छांटहें काहें विद्या आवड' घटित काञ्चन कलश छाज,' अर्थात् उन सत्वरं कया विद्या आपद्यते; (उ० व्य० महलों के ऊपर हीरों से जटित प्र० २२-११)। सुशोभित थे; (को० २, छाम-स्त्री० (सं० प्रा० छाया) दीप्ति, २४२) । प्रभा, कांति; (जंबू० २, १३, २) । छाटसि-क्रि०, व०, म० पु०, त्यागना, छाअगन. (सं० छादनं>प्रा० छोड़ना; 'सत्त माग्गु जणि छाटसि" छायण) आच्छादन, छाजन; (प्रा० ५० सन्तं मागं मा त्यजः," (उ० व्य० प्र० १, १७४) । १०-११)। छापा--स्त्री. छाया, (छंदशास्त्र में) छाटेहि -अव्य० (सं० झटिति) तुरंत, गाथा के सत्ताईस भेदों में से एक; (प्रा० फोरन, जल्दी से; (उ० व्य० प्र० ५१- पै० १, ६०) । टि०- गाथा के २७ भेद १६) । निम्नलिखित हैं-लक्ष्मी, ऋद्धि, बुद्धि, छाण-न० (दे०) १. धान्य आदि का लज्जा, विद्या, क्षमा, देवी, गौरी, धात्री, मलना; (दे० ना० मा० ३, ३४)। चूर्णा, छाया, कांति, महानाया, २. गोमय, गोवर; (दे० ना० मा० ३, सिद्धि, मानिनी, रामा, गाहिनी, विश्वा, ३४) । ३. वस्त्र, कपड़ा; (दे० ना० मा० वासिता, शोभा, हरिणी, चत्री, सारसी, ३, ३४) । ४. विष्ठा, "भोयणु मुऍवि कुररी, सिंही, हंसिका। (प० च० ४४, ११, छाइअ-वि० (सं० छादित>प्रा० ६)। छः इअ) आच्छादित, ढका हुआ; (प० छारणवइ-वि० (सं० षण्णवति) छिया- च० ११३, ५४) । छाइय-वि० आच्छा- नवे; (प्रा० ५० १, ११७) । दित; (ण० २, ४, ४; सुदं० ७, १६, ६, छाणी -स्त्री० (दे०) १. धान्य आदि वी० १, २)। का कुचलना या पीसना; २.वस्त्र, कपड़ा; छाइल्ल-वि० (सं० छायावत्) कांति- (दे० ना० मा० ३, ३४)। ३. गोमय, युक्त, छाया वाला; (षड्) । पु० (दे०) गोबर; (दे० ना० मा० ३, ३४) । प्रदीप, दीपक; (दे० ना० मा० ३, ३५) । छात्रु-पु० (सं० छात्रः) १. , शिष्य, वि० १. सदृश, समान, २. अधूरा; (दे०- २.विद्यार्थी;"छात्रु गाउं या-छानो ग्राम ना० मा० ३, ३५) । ४. रूपवान्, गच्छति; (उ० व्य० प्र० १६-१२) । सुडौल; (दे० ना० मा० ३, ३५) । छानिस-पू० का० कि०, छान कर कीत्ति, छाणु असिउ;"
छाय (३७७) छासठ्ठ "पीवए परो कापडे छानिम;" पीने के छार'-पुं० (सं० क्षार>प्रा० छार) समय उसे कपड़े में छान कर पीते थे; राख, भस्म, कोयला; तुल. मगही गु० (की० ३, ६६)। राज० छार; (प्र० चि० प्रा० ५० १, Vछाय-(सं० छादय >प्रा० छाय) १६५; जस० १, २८, २, परम० २, आच्छादन करना, ढकना । छाइज्जइ- ६०; सं० रा०)। -ड पु० भस्म; अक० छाया होना, 'छाइज्जइ छत्तहँ (प्रा० गु० ३६, २१) । पन्भारें" जहां ऊपर तने हुए छत्रों की छार'-पु० (दे०) भालू, रीछ; (दे०. छाया हो रही थी; (ण० ३, १२, ६)। ना० मा० ३, २६) । छायंत-व० कृ० (प० च० ७, १, ४)। छारय-न० (दे०) १. मुकुल, कली; छायंती-कृ० ढकती हुई; (सं० रा०)। २. ऊख की छाल; (दे० ना० मा० ३, छायउ-सक०, भू० का०, ढंका; (सं० ३४) । रा०)। छारय-पु० (सं० ऋक्ष) ऋक्ष, रीछ; छाय-वि० (दे०) १. बुभुक्षित, भूखा; "कहिं जि दिट्ठ छारया, लवन्त मत्त- २. दुर्बल; (दे० ना० मा० ३, ३३)। मोरया । कहिं जि दिट्ट सीह-गण्डया, स्त्री० (सं० प्रा० छाया) १. प्रकाश के धुणन्त-पुच्छ-दण्डया"; (५० च० ३२, अवरोध से उत्पन्न अंधेरा, छाया, तुल० ३, ५)। राज० छाय; (रा० ४३; क. १, ७, छारहडि-स्त्री० (सं० क्षारघटी) छार ६)।२. कांति, प्रभा, दीप्ति; (प० च० का पात्र; (प० च० ६, १०, ७)। ३,४, ७)। छाला--स्त्री० (दे० छल्ली) चर्म, (सं० प्रा० छाया) "बग्घछाला," अर्थात् व्याघ्रचमं; (प्रा० प्रकाश के मार्ग में किसी व्यवधान के पं० २, ७७)। कारण उसके आगे होने वाले प्रकाश का छाली-स्त्री० (सं० छागी) अजा, अभाव या इसके कारण उत्पन्न होने वकरी, तुल० राज० छाळी; (जस० ३, वाला कुछ हल्का अंधेरा; (जंवू० ६, ६, ६)। १४, ६)। छाव-पु० (सं० शाव>प्रा० छाव) छाया-पेक्खणय-न० (सं० छाया-प्रेक्ष- वत्स; तुल० राज० छावउ (शावक, णक>प्रा० छाया-पे खणग, पेक्खणय) युवक); (जस० ३, ७, ११) । छायानाटक; (प० च० ५२, ८, १०)। छावड-पु० (सं० चपेट>प्रा० चपेटा) छायाभंगु-पु० (सं० छाया+भङ्ग) छाया+भग) चपेटा, थप्पड़; (सं० रा०)। कांति-भंग, सौंदर्य या आभा के नष्ट होने छावत्तरि-वि० (सं० षट्सप्तति>प्रा० का भाव; "आयहो छाया-भंगुण किजइ," छावत्तरि) सत्तर और छह; (प० च० अर्थात् इनकी कांति-भंग न की · जाए; १०२, ८६)। (रि० ३, १२)। छासठ्ठ-वि० (सं० षप्+पष्टि, पटप- - छाया-स्त्री० छाती (३७८) छिछी राज० छेरना; ष्टि) छियासठवा; (प० च०६६, (सुदं० ४, १४, ४)। ३७) । छिछय-पु. (दे०) १. देह, शरीर; छासी-स्त्री० (सं० छच्छिका) मट्ठा, २. जार, उपपति; ३. न० फल-विशेष; छाछ, सारहीन तक, मथा हुआ दही; (दे० ना० मा० ३, ३६) । तुल० राज० छासि; (दे० ना० मा० ३, छिछोली-स्त्री० (दे०) छोटा जल- २६)। प्रवाह; (दे० ना० मा० ३, २७) । छासीइ-वि० (सं० पडशीति) छियासी, छिड -न० (दे०१ १. चूडा, चोटी; -~-म वि० (स० पडशीतितम) छिया २. छाता, छन्त्र, ३. धूप-यंत्र; (२० ना०- सीवां; (प० च० ८६, ७४) । मा० ३, ३५)। छाह-स्त्री० (सं० छाया>प्रा० छाहा) १/छिद--(सं० छि>प्रा० छिद) छांह, छाँव; तुल० छाह; छेदना, विच्छेद करना; (जस० १, १५, (भ०)। ७)। छिन्इ-सक० (सं० छिनत्ति) छाहर-वि० [सं० छाया(=कांति, विच्छेद करना; (भ०)। छिन्दन्ति-व० शोभा) >प्रा० छाया, छ'हा>अप० प्र० पु०,व० तुल० गु० छाह+ड, छाहर) सु दर; (को० २, छोंदवू, (प० च० ७, १४, ४)। २१६)। छिदण-न० (सं० छेग्नं) खंडन, छेर, (सं० छाया>प्रा० कर्तन; (जस० १, २, १२; फ० ४, १०, छाहा) छांह, आतप का अभाव; (जस० ३)। ४, १२, १५)। छिअ-स्त्री० न० (सं० क्षुत >प्रा० छाह-स्त्री० (सं० छाया >प्रा० छाहा, छीम) छींक; (दे० ना० छाहिया, छाही) छह, छाया; (सुदं० १, ७२)। ९, १०; प० च० २६, १३, ७; जस० छिक्क-स्त्री० (सं० छीत्कृत>प्रा० . ३, २१, ६)। छिक्क) छींक; (सुदं० ८, १५, १; दे०. छाहो-स्त्री० (दे०) गगन, आकाश । ना० मा० ३, ३६)। -मणि पु० सूर्य; (दे० ना० मा० ३, छिपकोमण-वि० (दे०) असहिष्णु; २६)। (दे० ना० मा० ३, २६)। छाहु-पु. (सं० उत्साह>प्रा० छिक्कोट्टती-स्त्री० १. पैर की उच्छाह) उत्साह; (णे.)। आवाज, २. पांव से घान्य को कुचलना; छिक-स्त्री० [सं० क्षुत (क्षु-छींकना, (दे० ना० मा० ३, ३७)। क्षौति-छींकता है)>प्रा० छिक्क) छिपकोलिअ-वि० (दे०) पतला, कृश; छींक, (महा० २६, ४, २; म० २, ४२, (दे० ना० मा० ३, २५) । २) । छिछी-अव्य० छी-छी, धिक् धिक्, अनेक छछ इ-स्त्री० (दे०) असती, कुलटा; धिक्कार; (पड्)। छाहा--स्त्री० . मा०८, छिज्ज (३७६) छिन्नुच्छाह कर्मणि, . " च० /छिज्ज-(सं० क्षीयते) छीजना। (दे० ना० मा० ३, २७) । -इ व० (प्रा० पै० १. ३७)। -इ छिण्णालिआ-स्त्री० (सं० छिन्ना+ व० [सं० छिद् (कर्मणि) सं० छिद्यते) नारी>.प्रा० छिण्णा+ णरी> अप० नष्ट होना; (सुदं० ८, ३, ३, हे० छिण्ण लिआ, छिण्णाली) छिनाल, व्यभि- ४३४, १; ण० ७, २, १२) । छिज्जंत- १२) । छिज्जंत- चारिणी स्त्री; चारिणी स्त्री; (दे० ना० मा०३, कृ० (सं० छिद्+शतृ) (जव० ४, १७, २७)। १४)। छिज्जति-छिद्धातो: छिरिणअ-वि० (सं० छिन्न) खंडित, "छिज्जति सीताई णिवडंति भीसाइँ,' छेद-युक्त; (क० ३, १६, ६)1, वहाँ पशुओं के सिर कट-कट कर भीपण छिण्णोमवा-स्त्री० (दे०) दूर्वा, दाभ; रूप से गिर रहे थे; (जस० .१, १६, ६)। (दे० ना० मा० ३, २६) । छिज्जंतु-भू० का० (सं० छिद्यमान्) कट छित्त-वि० (सं० क्षिप्त) १. फेंका गया; (ण० ८, १५, ११) । हुआ, विखेरा हुआ, डाला हुआ, २, त्यागा छि ड्ड-न (सं० छिद्र) १. छिद्र, हुआ; (मं० रा०; जस० १, १२, ३) । विवर; (प० २०, १६२) । ३. वि० (दे०) स्पृष्ट, छूत; छुआ हुआ; २. दोप; (संधि० १०, १, १८) । (ण० ३, ७.. ६; सा० १३१)। पु० छिण गुलि-स्त्री० (स. छिन्याङ्गलि) (नं० क्षेत्र >प्रा० खेत्त, खित्त, छित्त) कटी हुई अंगुली; (जस० २, ६, कृषि-भूमि; क्षेत्र, (भ०) । .१८)। छिद्द --पु. (दे०) १. छोटी मछली; "/छिण्ण--(सं०/छिद्) छिन्न-भिन्न (दे० ना० मा० ३, २६) । २. पुं० (सं० कर देता है । -इ व० (रि० ३, १४) । छिद्र) हुँद; (सं० रा० भ०; जस० ३, -हुँ आ०, काटो; (क० ८, ७, ८)। २७, २०)। च०६४, छिण्ण-पु० (दे०) जार, उपपति; (दे० छिद-देखो छिड्ड (प० ना० मा० ३, २७) । वि० (सं० छिन्न) ६)। १. पृथक्; (ण० ३, १५, ६; जस० २, छिन्दाछिन्दि-स्त्री० .(सं० छेदन) हथि- २६, ८) । २. कटा हुआ; "चक्केण यारों से परस्पर काटते हुए. संघर्ष या छिण्णु;" अर्थात् चक्र द्वारा कटा हुआ; लड़ाई (a fight involving on both (व० ५, १२, ७)। sides piercing with weapons); छिण्णच्छोउण-न०.. (दे०) (प० च० ५२, ६, ५)। तुरंत, जल्दी;, (दे० . ना० मा० ३, छिन्न-वि० (सं० प्रा० छिन्न, प्रा० २६)। छिण्ण) खडित, त्रुटित; (भ०; जंवू० छिण्णा-स्त्री० (दे०) असती, कुलटा; ८, २, ४)। (दे० ना० मा० ३, २७)। छिन्नुच्छाह- वि० (सं० छिन्न-+ छिण्णाल-पु० (दे०) जार, उपपति; छाया) कांतिहीन; "छिन्नच्छाद्व पईवउ शीघ्र, छिपती (३८०) छोटी किज्जई;' अर्थात् प्रदीपों की शोमा मंद छिल्लर-न० तालाव, "तउ तउ सहि- फर दी गई; (जंवू० ८, १६, ४) । रहो छिल्लर भरइ;" (५० च० १६, ६, छिप्पंती-स्त्री० (दे०) १. व्रत-विशेष, ५)। २. उत्सव-विशेष; (दे० ना० मा०३, /दिवस्पर्श करना, छूना। - ३७)। सक० सं० स्पृशति; (सुदं०७, १६, ८; छिप्पंदूर-न० (दे०) १. गोबर-खंड, महा० ४, ५, १३) । छिवंति; (मुदं० २. वि. विषम, कठिन; (दे० ना० मा० १०, १०, १२)। ३, ३८)। छिविम-वि० सं० स्मृप्ट; छुआ हुआ; छिप्प-न० (दे०) १. भील, २. पुच्छ, (दे० ना० मा० ३, २७) । न० ईस का लाशूल; (दे० ना० मा० ३, ३६) । टुकड़ा; (दे० ना० मा० ३, २७) । इहिप्प-(दे० प्रा० छिव) स्पर्श छिब्ब-वि० (दे०) कृत्रिम, बनावटी; करना; (जस० ३, २२, ६)।-इ (दे० ना० मा० ३, २७) । सक्र० (ण० १, ७, ५; महा० ६६, १७, छिबर-वि० (दे०) चपटी, ३)। तणुएण पईपरगत्तै । छिन्वर-णासें पवि- छिप्पाल-पुं० (दे०) खाने में लगा रल-दन्त" अत्यंत दुबला, लम्बा शरीर, हुआ बैल; (दे० ना० मा० ३, २८) । चिपटी नाक और दूर-दूर दाँत, (प० च० छिप्पालुस-न० (दे०) पूंछ, लाशूल; १, २, ११)। (दे० ना० मा० ३, २६)। छिन्योल्ल-न० (दे०) अरुचिप्रकाशक छिप्पिंडी-स्त्री० (दे०) १. व्रत-विशेष; मुख-विकार-विशेष; निंदार्थक तिरछी २. उत्सव-विशेप; ३. पिष्ट, पिसान; चितवन या कटाक्ष वाला मुख; (दे०. (दे० ना० मा० ३, ३७) । ना० मा० ३, २८)। छिप्पोर-न० (दे०) १. तृण, २. पूआल, रिहंडम-पुं० (दे०) दही का बना भूसी; (दे० ना० मा० ३, २८)। हुआ मिष्टान्न; तुल० गु० सिखंड; (दे०. छिमिछिमिछिम-अक० (सं० छिमछि- ना० मा० ३, २६)! माय) छिम-छिम आवाज करना । छिमि- /छिह-सं० स्पृश; छिमिछिमंत; (प० च० २६, ४८) । छना । छिहतु-कृ० छूते हुए, स्पर्श छिरि-पु० (दे०) भालूक की आवाज; करते हुए; (सं० रा०)। (प० च० ६४,४५)। चिहिरिनिल्लन० (दे०) दधि, दही; छिल्ल-न० (दे०) १. छिद्र, विवर; (दे० ना० मा०३, ३०)। २. कुटी, छोटा घर; ३. वाड़ का छिद्र; छोंडी-स्त्री० (दे०) छिपाव के लिए (दे० ना० मा० ३, ३५)। छिद्र; "अइ-भयेण कि-वि खाल के वि छिल्लर-न० (दे०) छोटा तालाब, छींडी जोयाविय;" (प्रा० गु० १२, जोहर; (दे० ना० मा० ३, २८)। ४१)। स्पर्श करना, छीदु (३८१) छुरमडि छिद्द) । मा० छोदु-पु. (सं० छिद्र >प्रा० (भ०)। छेद; (सि० १,४१)। छुहु-अव्य० (दे०) १. यदि "छुडु चीर- छुछुई- -स्त्री० (दे०) कपिकच्छु, केवाच त्तणु होइ मणूसहो" यदि मनुष्य में का पेड़; (दे० ना० मा० ३, ३४) । थोड़ा धैर्य हो; (प० च० ८, ३, ७) । छुद-वि० (दे०) बहुत, प्रभूत; (दे० २. क्षिप्र, शीघ्र, "छुडु उयरहों तउ ना० मा० ३, ३०)। णीसरिउ;" (क० ३, १६, १; जस० २, Vछुअ---(सं० छुप स्पर्श) स्पृश करना; २८, ४) । ३. तुरंत; तुल० राज० छुडु (उ० व्य० प्र० ६, १६)।-ए (सं० (तुरंत); (म० १, २४, ५) । छुडु छुडु- छुपति) स्पर्श करना; "रख एक छुअरु अव्य ० १. क्रमेण; (प० च० २४, ८, न पाइअ," अर्थात् एक तृण का स्पर्श ५)। २. शीघ्र-शीघ्र; ३. पुनः पुनः भी कोई नहीं कर सकता था; (की० ३, (जबू० ४, २०, २)। ६०)। छुद्दहोर-पु० (दे०) १. शिशु, छुई-स्त्री० (दे०) बक-पंक्ति; (दे०- २. चद्रमा; (दे० ना० ३, ना० मा० ३, ३०)। ३८)। छुट्ट-वि० (सं० छुटित >प्रा० छुट्ट) छुद्ध-वि० (सं० क्षुब्ध>प्रा० खुद्ध, मुक्त, बधन-मुक्त; (सुदं० ८, १५, २, छुद्ध) क्षोभ-प्राप्त; (सं० रा०) । २. वि० जंबू० १०, १७, १८)। (दे०) क्षिप्त, प्रेरित; (सुदं० Vछुट्ट-अक० (सं०/हट च्छेदेन > ६; ण० ४, ७, १५) । छुद्ध ; (भ०)। प्रा० छुट्ट) छूट ना, बंधन-मुक्त होना। ३. क्षिप्त, निमग्न; (म० २, ३४,३; -इ (सं० छुटति) छूटती है; (रि. ५, जंवू० १०, ६, ७) । ११; सुदं० ६, १७, ६)। -ए; (म० छुद्धउ-भू० का० (दे०) सं० क्षिप्त; २, १३, ८) । तुल० गु० छुटवू, म० डाल दिया; (जंबू० ५, १३, १५)। सुटणे, राज० छुटणौ, छुटबौ। छुडवि छुद्ध -डाल दिया; (रि० ५, ४)। पू० का० क्रि०, छूट कर, (सं० रा० Vछुन्म-(सं० क्षुभ्>प्रा० छुन्भ) २६)। क्षुब्ध होना, विचलित होना । --हिं छुट्टकेस-पु० (सं० छुटित+केश> अक०; (सुदं० ८, १४, ४)। प्रा० छुट्ट+केस) खुले खुले हुए बाल; छुन्मत्य-दे०) देखो छोन्भत्थ; (दे०. सुदं० २, १०, ८)। ना० मा० ३, ३३)। छुट्टहीरा-पु० मणिजटित हीरा; छुर--सक० (सं0/छुर्) (सुदं० ७, ७,५)। करना, लीपना; २. छेदन करना, छेदना; छुट्टिय-वि० मुक्त; (क० ३, २०, ३. व्याप्त करना; (प० च० २८, १०)। २८)। छुट्ट-वि० (दे०) क्षिप्त, फेंका हुआ; छुरमडि-पु० (दे०) नापित, नाई, ११,८, १. लेप छुरहत्य (३८२) छूट शरीर को डाल कडउ हज्जामः तुल० राजे० छुरमड्डि; (दे०- (म० २, ५५, ५)। -इ सं० क्षिपति; ना० मा० ३, ३१)। (भ०) । उ डाल रखो, “पंजरहि तणु छुरहत्य-पुं० (दे०.) नापित, नाई; छुहउ;" -पिंजड़े में (दे० ना० मा० ३, ३१)। रखो; (क० ६, ७, ५)। -हिवि पू०. हुरिअ-स्त्री० (सं० क्षुरिका) छूी, का० क्रि० "ते राएं छुहिवि मंजूसियाहे चाकू; (क० ३, १३, ७)। -तव राजा ने पुत्री को पेंटी में वंदकर; छुरिआ-स्त्री० (दे०) मिटटी; (दे० (क० १०, १२, ६) । छुहेवि-पू० का० ना० मा० ३, ३१)। क्रि० ले जाकर; (ण० ६, २१, २) छुरिय-वि० (सं० छुरित) १. व्याप्त, Vछुह-सं० स्पृश्, स्पर्श करना, छूना । २. लेप किया हुआ, पुता हुआ; (प० च० -इ सक० (सं० छन् >प्रा० छव) २२, २८)। स्पर्श करा, छूना; "किं जारहों गाहिं छुरिय-स्त्री० (सं० क्षुरिका) छुनी; सुवष्णु घरें जें घडावेवि तुल० राज० छुरि, छुरा, छुरिका, छुहइ करें" -- अर्थात् 'क्या यार के घर छुरिगा, छुरिया, छुरी; (जस० २, ६, में सोना नहीं है, जो कड़े गढ़वाकर हाथ ८) । . में पहन सकता है,' (प० च० १६, २, हुरिया-स्त्री० (सं० क्षुरिका>प्रा० २) । छुन्तु-व० कृ० (सं० छप्> छुरिगा, छुरिआ) छुरी, आयुध-विशेष; प्रा० छ ब) स्पर्श करता हुआ, छूता (प. च० ७१, २५)। हुआ; “करयलु छहन्तु मुहें पण्णयहुँ, छुरी-स्त्री० (सं० क्षुरी>प्रा० छुरी) कभी साँपों के मुखों को करतल से छूता छुरी, चाकू; (दे० ना० मा० २, ४) । हुआ; (प० च० ६, ३, ६)। छुल्लुच्छलय-यि० (दे०) अधीर; "पई छुहा-स्त्री० १. (सं० क्ष धा) बुभुक्षा, विरहिउ छुलुच्छलउ;" (प० च० ४५, भूख; राज० छुहा; (दे० ना० मा० २, १०, १०)। ४२) । २. (सं० सुधा>प्रा० छहा) छुह-स्त्री० १. (सं० सुधा>प्रा० छुहा) चूना; (ण० ६, १५, १०; प० च० ६, अमृत, पीयूष, तुल० राज० छुहा; (क० १४, ५) । -रस पु० (सं० सुधारस) ५, ४, ८) । २. (सं ० क्ष धा) भूख; चूने का रस; (व० ७, १३, ७) । छह- (जंबू० १, ७, ७)। ३. चूना, सुधा, चूना (प० च० ११, १, ६). (चूर्ण); (जस० १, १८, ३१)।-चुण्ण -चुण्ण छुहिम-वि० (सं० सुधित) लिप्त, पुं० न० (सं० सुधा+चूर्ण) चूना; (प० पोता हुआ; (दे० मा०३, १, ५, ६)।-तण्ह स्त्री० (सं० क्ष घा ३०)। +तृष्णा) क्षुधा की अभिलाषा; (क० छुहिय-वि० (सं० क्ष घित) भूखा; ५, १०, ४)। (प्रा० गु० २३, २४) । Vछुह-सं०/क्षिप् डालना, फेंकना । Vछूट-(सं०छुट्>प्रा? छुट्ट) छूटना, . ना० छु h0 (३८३) छेय . बंधन-मुक्त होना, "अन्धार कूट, दिगवि. छेउ;" तुल० गु० छेडो; (रि० २,५; जय छूट;" अर्थात् राशीभूत अंधकार के प्रा० गु० १६, २२)। समान थे और दिग्विजय के लिए उसी छेग-वि० (सं० छेक) निपुण, चतुर; समय बंधन से मुक्त किए गए थे; (की० (दे० ना० मा० ३, ४७) । ४, १६) । टेसि-भक०, २०, म० पु० छेज्जई-न० (सं० छेद्य) काटना- मुक्त हो, "कसे तो तो छुटेसि," कथं छांटना; "पत्तपुप्फारणाफलछेज्जई;" (ण. तस्या मुक्तोऽसि; (उ० व्य० प्र० २३ ३, १८)। १८)। छेञ्छ:-स्त्री० (दे०) वेश्या, रंडी; छूट-वि० (दे०) क्षिप्त, प्रेरित; (प० "जो जो को वि जुवाणु, तासु तासु कुल- च० ३२, १२, ६; भ०)। उत्ती । मेइणि छेञ्छइ जेम, कवणे णरेंण छुहु-वि० (सं० क्षिप्त) पड़ा हुआ; ण भुत्ती;" (प० च० ५, १३, ६) । "भयकूवि छुडु णउ णिद्दभुक्खु पावेइ छेत्त-पु० न० (सं० क्षेत्र >प्रा० छेत्त) मूड" -~-वह मूर्ख भय के कूप में पड़ कर खेत; (क० १, ३, ३; जंबू० ५, ६, ६)। न नोंद पाता है और न भूख, (सुदं० २, -माला स्त्री० क्षेत्रमाला; (जंबू० ६, १०, २५)। ६, १०)। झेंडा-स्त्री० (दे०) १. शिखा, चोटी, छेद-पु. (सं० छेद)वलि; "कतहु मिसि- २. लता-विशेष; (दे० ना० मा० ३, मिल कतहु छेद;" कहीं (मुसलमानों में) ३६)। विसमिल्ला कहकर पशुओं को छेडी-स्त्री० (दे०) छोटी गली, छोटा जाता था; (को० २, १६५) । रास्ता; (दे० ना० मा० ३, ३१)। छेध-पुं० (दे०.) १. चंदनादि सुगंधित 1/छेप्र--(सं० छेदय >प्रा० छे भ) वस्तु का विलेपन; २. चोर, चोरी करने छिन्न करना । छेवर-सक० (सं० छेद- · वाला; (दे० ना० मा० ३, ३६) । यति) काटता है; तुल० मगही छेवइ, छेभय-पु. (दे०) चंदन (कण्हपा, चर्यापद) । छवि-पू० का०. विलेपन; शरीर पर सुगंधित लेप करना; कि० (सं० छिद् + त्वा) (जस० १, ६, . (दे० ना० मा० ३, ३२) । छेय-पुं० (दे० प्रा० छेअ) पर्यंत, प्रात; छेअ-वि० (सं० छेक >प्रा० : छेअ) . "दोहर-छेयई अत्याणाई व;' (प० च० विदग्ध, रासिक; . (प्रा... पं० १, २६, १७, ३)। २. छेद; (भ०).। ११६)। छेय-पुं० (सं० छेद >प्रा० छेम) छहल्ल-वि० (दे०, प्रा० छइल, छइल्ल) काटना, चुकाना, "अवसर अज्जु सामिरि- विदग्ध, चतुर, (सुदं० ७, १०, ७) । णछेयहो;" अर्थात् स्वामी के छेउ-पु. (दे० प्रा० अछे) अंत, से काटने (चुकाने) का आज ही अवसर है; "सेनुजि सिद्धा के-वि मुणि ताहं कु जाणइ (जंबू० ६, ३, ५) । २. नाश, विनाश; मारा आदि का ऋण को छे उ (३८४) छोड किया जाए। , (प० च० १, ६, ५) । ३. क्षय; छोइअ-पु. (दे०) दास, नौकर; (दे०- "छेयकाले दीवय-सिह णावइ," क्षयकाल ना० मा० ३, ३३)। की दीपशिखा की भांति कन्या स्वभाव से छोक्करण---पु० (सं० छूत्कार) छुछ- मलिन होती है; (प० च० ६, ३, कारने की ध्वनि; (जस० १,३, ६)। १३)। छेयउ-वि० (सं० छेदक >प्रा० छेदअ) छोक्कार-पु० (दे०) छोक्कार शब्द; कष्टकर; (हे० ३६०, १)। (जंबू० ५, ६, ६)। छेयर -न० (सं० छेदन >प्रा० छेअण) छोटा-वि० (सं० क्षुद्र) तुच्छ, ओछा; कर्तन काटने का काम; "चलणछेउ "बडि साति छोटाहु काज," अर्थात् छोटे किज्जइ सिरछेयणु;' -पैर काटे जाएँ से काम के लिए बड़ी शक्ति का प्रयोग; और फिर सिर का छेदन (को० ३, ६१)। (जस० ४, २७, ३२)। छोट्टिम-वि० (सं० क्षुद्र) छोटी; Vछर-(दे०) चिल्लाना। -इ अक० (सुदं० ६, १५, ६)। (सुदं० ६, २, १२)। छोटी-वि० (सं० क्षुद्र) लंबाई, विस्तार छेरअ-पु. (सं० आश्चर्य>प्रा० अच्छ में कम, "पुहवी भए जा छोटी," अर्थात् रिअ.) विस्मय; (जंवू० १, १०,४, धरती छोटी हुई जा रही थी; (की० ४, ११५) । छेल-पुं० स्त्री० (दे०) अज, छाग, छोटेओ-वि० (सं० क्षुद्र) लंबाई, बकरा; तुय० राज० छेल (छेली स्त्री०); विस्तार या डील-डोल में कम, छोटा; (दे० ना० मा० ३, ३२; जस० १, १०, "छोटेओ तुरुका भभकी मार;" अर्थात् १)। छोटा भी तुकं क्रोधित होकर ताड़न करता छेल-वि० (सं० छेक >प्रा० छेग, छेअ) है; (को० २, २११). चतुर, निपुण; "समीहए छेलहए वणि- /छोड-(सं० छोटय >प्रा० छोड) दओ;" 'वह वणीन्द्र चतुरों के बीच मनो- छोड़ना, बंधन से मुक्त वांछित क्रीड़ा करता'; (सुदं०.७, १, सक० (सुदं. ४, १०, ६)। छड्डए- १२)। भू० का० छोड दिया; (प्रा० पं० २, छेलि-स्त्री० (दे०) बकरी तुल० राज० १७३) । छोडो-पा०, छोड़ दो; तुल० छली; (उ० व्य० प्र० ५०-३) । राज० छोडणौ, छोडबो; (प्रा. पं० २, छेली-स्त्री० (दे०) थोड़े फूल वाली १५७) । २. (सं० छुर्) बंधन मुक्त माला; (दे० ना० मा० ३, ३१)। करना । छोडि-पू० का० क्रि० (रा० छेहि-~-स्त्री० (दे०) अंत; "छेहि जई ४०)। . छोड्ड-भू.. का०, उन्मुक्त : आपणि सही होसिउ तुल्ला बेउ;' (प्रा० किया; "परणि धूलि अन्धार छोड्ड;" गु०.१०, ४४)। अर्थात् पृथिवी ने धूल के द्वारा अंधेरे को करना। +7 छोडण (३८५) ज १०, वंधन-मुक्त; क्रोध, - उन्मुक्त किया; (की० ४, १२४); छोलिज्ज-सं०। तक्ष (कर्मणि) छोड्डिअ---पू० का० क्रि० छोड़कर; छीलना । --इ सक० (जंबू० १, (को० २, ५७) । छोड्डिओ-पू० का० ५)। छोल्लिज्जन्तु-छीला जाता; (हे क्रि० छोड़कर; (की० २, ५७४ । छोलि ३६५/१)। ले-भू० का० छुड़ा लेते थे; (को० ४, छोल्लिय-स्त्री० (दे०) छोटी सी ५६) । लकड़ी; (सुदं० ५, ५, १२) । छोडण-पु.० (सं० छोटय >प्रा० छोड) छोह-पु. छोह-० (दे०) १. समूह, यूथ; छोड़ना; (सुदं० ६, १०, ७)। २. विक्षेप; (दे० ना० मा० ३, ३९) । छोहाविय-वि० (सं० छोटित >प्रा० छोह-पु० (सं० क्षोभ >प्रा० खोभ) छोडाविय) छुड़ाया हुआ, गुस्सा; तुल० राज० छोह; (प्रा० तुल० गु० छोडाव्यो; (प० च० ११, ६, गु० २६, १४) । छोहु-क्षोभ; (सि० १, ६)। २१)। छोडि-वि० (सं० क्षुद्रा) छोटी; (प्रा० Vछोह-(सं० क्षिप्) डालना। -इ पं० १, ६)। सक० "आसीविसमुहि को करु छोहइ"- छोडिअ-वि० (सं० छोटित>प्रा० कौन अपना हाथ सर्प के मुख में डालता छोडिअ) त्यवत-मुक्त, वंधन-मुक्त किया है, (म० २, ५५, ५)। हुआ; (सुदं० ५, १०, ६)। छे हार- छोहार द्वीप; द्वीप-विशेप; छोति-स्त्री० (दे०) छुत, अस्पृश्य का (जंवू० ६, ११, ६; क० ८, १०, छूने का भाव; महु ३) । पहें छोत्ति हुआ," मेरे मार्ग में छूत हो छोहिय-वि० (सं० क्षोभित) क्षोभ- गई, (सुदं० ८, २२, ७)। प्राप्त; (जस० २, २७, ३)। छोन्म-पु० (दे०) पिशुन, खल, दुर्जन; तुल० राज० छोम; (दे० ना० मा० ३, ३३)। छोन्भत्य-वि• (दे०) अप्रिय, अनिष्ट; वर्ण- (दे० ना० मा० ३, ३३) । ज-पुं० (सं० प्रा० ज) व्यंजन छोन्माइत्ती-स्त्री० (दे०) १. छूने के विशेष । अल्पप्राण, सघोष, यह निरनुना- अयोग्या, २. अप्रीतिकर स्त्री; (दे० सिक स्पर्श संघर्षी ताल स्थानीय व्यंजन ना० मा० ३, ३६)। है । प्राकृत काल में शब्द के प्रारंभ में छोम-(दे०) देखो छोन्भ; तुल० राज० य का ज उच्चारण होता रहा है। अप- छोभ; (दे० ना० मा० ३, ३३)। भ्रंश में मूल ज और य परिणत ज उप- Vछोल्ल-(दे०) छोलना, छाल उता लब्ध हैं । सर्व० (सं० यः) जो, (प्रा० ५० रना । -ई सक० (जंवू० ५, २, ८)। १, १) । लो०-'ज जसु मणिठ्ठ तं तासु संसर्ग, ........ ज .
जं (३८६) जं जि ताही के का भाग; स्यान; लग्गु,' द.पति जो जाही को भावना सो शब्द नङ्गल का अर्थ 'एकांत निर्जन स्थान पास; (प० सि० च०)। है, परन्तु वन में शिकार से प्राप्त मांस को २. अव्य० (सं० यदि) यदि; तुल० भी जंगल कहा गया। यहाँ अर्थ संकोच प्राचीन म० जई; (उ० व्य० प्र० ६, १४; द्रष्टव्य है। पाहु १७७, सं० रा०, हे० ३४३; प० च० जंगा-स्त्री० (दे०) पशुओं के चरने की १, १०, २)। जगह; (दे० ना० मा० ३, ४०)। जं-वि० १. (सं० यः>प्रा० जं) जिस जंगुलिय-पुं० (सं० जाङ्गुलिक) गारु- प्रकार; (महा० ६६, १६, १)। जिस; डिक, विप-मंत्र का जानकार; (प० च० (की० ३, ७३) । २. जो (महा० ६६, १०५, ५७)। २, ६; जंबू० २, १३, ७; हे० ३६५, जंघ-स्त्री० (सं० जङ्वा >प्रा० जंघा) २)। ३. सर्व० जो कोई; । की० २, जंघा, जाँघ, जानु के नीचे १२४) । ४. अव्य० जैसे; (प० च० १२, (प्रा० ५० १, २६; जंबू० १०, १५, ६, १) । (सं० यत्) जब तक, जो, यदि; ७) । वाक्यांतर का संबंध सूचक अव्यय (सं० जंघतराल पुं० (सं० जङ्घा+अन्त- रा०); जितना; (प० च० १२, २, १(; राल) जंघाओं का मध्यवर्ती (सं० यावत) जब, (प० व० १५, १०, (जंबू० ४, ११, १२)। १)। —दिवसु, जिस दिन से (प० च० जंघयामु-० (सं० जङ्घा+स्थामन् १६, ५, २)। शक्ति) दौड़ने व युद्ध करने की शक्ति; जंकयसुका-वि० (दे०) थोड़े उपकार (जंबू० ५, ८, २८)। से अधीन होने वाला; (दे० ना० मा०- जंघा-स्त्री० (सं० जवा>प्रा० जंघा) ३, ४५)। जाँघ; (जस० १, १७, १५) । -बलु जंगम-वि० (सं० जङ्गम >प्रा० जंगम) पुं० (स. जङ्घा+वल)) जंघावल; चलने वाला, जिसे एक से दूसरी जगह ले से दूसरी जगह ले (जस० २, २१, १)। जा सकें, जीवित; (व० ० १,४,६; जस० जंबाच्छेअ-पुं० (दे०) चत्वर, चौक; २, ३७, ७)। जंगमु; (वी० १, २)। (दे० ना० मा० ३, ४३) । २. छप्पय छंद का भेद; (प्रा० ५० १, जघामय, जंघालुप्र-वि० (दे०) द्रुत- १२२)। गामी, वेग से जाने वाला; (दे० ना०- जंगल-न० (सं० जङ्गल >प्रा० जंगल) मा० ३, ४२; पड्)। मांस; (ण ० ६, ६, ५) । जंगलु; "जंगलु जं जं-अव्य० जहाँ-जहाँ; (की०४, असंतु वणु. रक्खसु मारिउ गरए पत्तु, १३२) । मांस का भोजन करने वाला वन राक्षस जंचि-स्त्री० (दे०) स्त्री; (सं० रा०) । मारा गया और नरक को प्राप्त हुआ, जंजि-अव्य० जव; (प. च० २,७, (सुदं० २, १०, ११) । टि०- मूल सं० ८)। - . " जंत (३८७) जंपाण - -अ णिसुणि पयत्ते मणु थिरु जंत-न० (सं० यन्त्र >प्रा० जंत) क्रिया के लिए व० कृ० का प्रयोग (सं० १. यंत्र मशीन, वह उपकरण जो कोई जल्प+शत) 'जिंगल अं जंपंत मणे; विशेष कार्य करने अथवा कोई वस्तु बनाने ऐसा पिंगल शास्त्र के वेत्ता मन में कहते के लिए हो; (ण० १, ६, ११; सि० १, हैं; (प्रा० ५० १, १७८)। जंपहि-बात ११५; व० ६, १२, ५)। २. यान; कीजिए; "महु सहु जंपहि तुहुँ एक्कल्लउं" (क) १, ३, १०)। (म० १, १७, ६)। जंपिअई-जल्पना जंत-कृ० सं०/या+शतृ, यान्त, करना, जप करना, (दे० सा० दो०)। य.त) चलते-चलते; हउँ थंभमि रविहि जंपिउं-भू० का०, कहा; (विला०) । विमाणु जंतु," -मैं चाहूं तो सूर्य के जंपिज्जइ-जल्प (कर्मणि); (सुदं० ८, विमान को चलते-चलते थाम दू; (जस० ८, ३)। जंपियई-व. कहना; (सा० १, ६, १४) । जाते हुए; ण० १,६, १०४) । जंपेविणु-पू० का० क्रि० (सं० ११, व० १,१७, ५; जंबू० ३, ६, जल्प+एविणु) कहकर; (व० २, ७, १३) । कृ० (सं० गम् + शत) १)। जम्पइ-व० बोलना, कहना; (जंतू० ११, ८, ३)। (को० २, २२६; प० च० ५, १६, ४) । जंत उवलि-स्त्री० भ्रमणावलि; 'सा जम्पउ-क्रि०, व0 कहता हूँ, "तें तैसन सीह हियत्तं जम्पउ अवहट्ठा;" (को० १, करि जंतउ वलि;" अर्थात् हे सिंह, धैर्य- जम्मिअ-भू० का० (सं० जल्पित > पूर्वक सावधान होकर तथा मन को स्थिर प्रा० जप्पिअ) कहा, निवेदन किया; करके उस भ्रमणावलि को सुन; (व० २, (की० ३, ६)। ६, २०)। जंपण-न० (दे०) १. मुख २. अपयश; जंता-न० (सं० यन्त्र >प्रा० जंत) (दे० ना० मा० ३, ५१) । जम्पण न०- कल, युक्तिपूर्वक शिल्प आदि कर्म करने (दे०) मुख; (प० च० २५, १६, के लिए मशीन विशेष; (व० ०३, १, १)। ५)। जंपणिया-वि० (सं० जल्पिका) बातूनी, जंति-कृ० (सं० गम् + शतृ स्त्रियाम्) बक्की; (ण० ६, ६, ६) । (जंबू० ६, २५)। जंतीय--कृ० (सं० गम् + शतृ) स्त्री०, जंपारण-न० (सं० जम्पान >प्रा० ब० । जंपाण) वाहन-विशेष; झापी, पालकी; जंतु-पु० (सं० जन्तु>प्रा. जंतु). "वर तुरय जंपाण धय चमर छत्त मयमत्त जीव, प्राणी; (जंबू० ८, १४, ४) । मयगल," उत्तम घोड़ों, पालकियों, ध्वजा, Vजप-(सं०/ जल्प् > प्रा० जंप) चामर छन तथा मदोन्मत्त हाथियों का बोलना, कहना । -इ सक० (क० २, उपभोग करें; (म० १, २६, ३)। -अ १६, ७)। जंत-वर्तमान कालिक न० पालकी; (जंवू० ११, १, ६)। - - .
जंपाय (३८८) जंवूम लि (सं० . . याचना जम्पाण न० मृतक-यान, शव-यांन; (प० पुं० (सं० जम्बूक) शृगाल; (जंवू० ६, च० १०, ११, ३)। ११, ८) । जम्वु-पु० शृगाल; (व. जंपाय-न० जम्पान >प्रा. ५, ५, २)। जाण) वाहन-विशेष; (सि० १, १५) । जबुदीन--- (सं० जम्बूद्वीप>प्रा० जपिच्छय-वि० (दे०) जिसको देखे उसी जंबूदीव) द्वीप-विशेप; (ण० १, ६, १)। को चाहने वाला; (दे० ना० मा० ३, जंबूदीउ; (जंपू० ६, १, १२) । जंतु- ४४)। दीव; (क० १, ३, १)। जंपिय-वि० (सं० जल्पित>प्रा० जंबुमालि-पु० रावण का पुत्र; (प०- जंपिय) उक्त, कथित; (ण. २, ५, च० ५६, २०)। १)। जंबुल-पु० (दे०) १. वानीर (वेंत या जंपिर-वि० जल्पितृ>प्रा० जंपिर) सरकंडा) का वृक्ष; २. सुरा-पात्र; (दे०. बोलने वाला, भापक; (सुदं० ८, ८, ३)। ना० मा० ३, ४१)। २. वाचाल, वातूनी; (दे० ना० मा० २, जंतुसामि-पुं० जम्बूस्वामी; (जंवू० ४, ९७)। १०, २)। जपेक्खिरमग्गिर, जपेच्छिरमग्गिर-वि० जंवुहल-न. (सं० जम्बूफल) जंबू वृक्ष (दे०) जिसको देखे उसी की का फल; (ज० ४, ८, २७) । (दे० ना० मा० ३, जंवू-न० (सं० जम्बू>प्रा० जंबू) वृक्ष- ४४)। विशेप, जामुन का वृक्ष; (प० च० २०, जंवाल-न० (दे०) १. सवाल, शेवाल, ३, ६) । पुं० राक्षस योद्धा; (प० च० मोथे की भांति हरे रंग का पदार्थ जो ५६, ३०)। -दीव पु० जम्बूद्वीप, एक L.पानी के ऊपर उग आता है, काई, २. एक विशाल जैन और पौराणिक क्षेत्र । हिंदू प्रकार का पौधा; (दे० ना० मा० ३, पुराणों के अनुसार भारतवर्ष; जंवू० ३, ४२)। २, ३)। जबीर-न० (सं० जम्बीर) नींबू का जंबूअ-पु० (सं० जम्बूक >प्रा० जंबूअ) वृक्ष; (जंवू० ४, १६, ४)। शृगाल; (जंबू० १०, १०, ८) । जंबु-पु० (सं० जम्बु>प्रा० जंबु) जंबूरणय-न० (सं० जाम्वूनद) १. सुवर्ण, सियार, प्राणी-विशेप (प० च० १०५, सोना; (प० च० ५, १२६; जस० २, ५६) । न० वृक्ष-विशेप, जामुन; (जंवू० ४, ६)। २. राजा-विशेष-नाम; (प० च० ४, २१, २)। -अ पुं० (दे०) ४८.६८)। १. वेतस वृक्ष २. पश्चिम दिशा के रक्षक; जंवूमालि-पुं० (सं० जम्बूमालिन्) (प० च० १०५, ६४)। -इ न० वेंत एक पुत्र, रावण का एक का वृक्ष; (जंबू० ५, ८, १३)। -उ सुभट; (प० च० ५६, २२) । करने वाला; रावण का जंभ (३८६) जइविहु - जम--पु० (दे०) तुष, धान्य आदि का २, ४;प्रा० ५० १,६; जंवू० २, १८, छिलका; (दे० ना० मा० ३, ४०) । ४) । २. यदि, चाहे; (की० १, २६)। जमणंमरण, जंभणमरण, जंभरणय -वि० ३. (सं० यत्र) जहां, जिस स्थान में; (दे०) स्वच्छंद-भाषी, जो इच्छा में आवे (पड्) । पु० (सं० यति) संन्यासी, जति; वह बोलने वाला; (दे० ना० मा० ३, जितेंद्रिय; (संधि० २, ६, १; जस० ४, ४४)। १६, १५)। -वर पु० (सं० यतिवर) जभणी-स्त्री० (सं० जम्भणी) तंत्र श्रेष्ठ संन्यासी; (क० ६, २, ८; प० २, प्रसिद्ध विद्या-विशेष; (प० च० ७, ७, १०)। १४४)। जइउ--अव्य० (सं० यदा>प्रा० जइ) जंभल-पुं० (दे०) जड़, सुस्त, मद; जब, जिस समय; (प० च० ४०, ४, (दे० ना० मा, ३, ४१)। ७) । जंमा, जंभास-अक० (सं० जृम्भ) जइच्छ-वि० (सं० यथा-+ इच्छा) स्वे. जंभाई लेना; (षड्)। जिम्भइ-वा छाचारी; "जो किर होइ जहिच्छहों (सं० जृम्भते); (प० च० १७, १५, दूसहु;" अर्थात् स्वेच्छारी के लिए जो ३)। दुःसह होता है; (जंवू० १०, २२, जमाइय--न० (सं० जम्भित>प्रा० जंभिय) जंभाई, जृम्भा; (सुदं० ४, ११, जइणि-स्त्री. जयनी, विश्वभूति की पत्नी; (व० ३, ३, ७) । जमायउ-० (सं० जामातृ) जामाता, जइयकालि-अव्य० (सं० यदा+काल) दामाद; (सि० १, ३)। जिस काल से, जिस समय से; (सं० जअ-न० (स० संसार; "दो तिण्णि जए पुरिसा," अर्थात् जइयहुं--अव्य० (सं० यदा) जव; (ण० ऐसे लोग जगत् दो ही तीन हैं; (जंबू ३, १५, ७) २. ज्यों ही; (क० २, ८, ७, ४, ८) । पुं० (सं० प्रा० जय) जीत, १०) । जइयहूं-अव्य० जब; (प० च० पराभाव; (प्रा० पै० १, १६, ४, ३; जंबू० २, २, १) । जइयहु- ३७)। अव्य० जब; (जस० २, ३३, ६)। 1/जअ-(सं० जि) जीतना, जय होना। जइवि-अन्त० (सं० . यद्यपि>प्रा० --इ व० (सं० जयति) (प्रा० ५० १, जइवि) जो भी; (जंवू० ५, ४, १; प०- १)। च०२, १४, १)। जअल-वि० - (दे०) आच्छादित; (षड्)। जइविहु-अव्य० (सं० यथा+विष> जइ-अव्य० (सं० यदि >प्रा० जइ) प्रा० जह+-विह) जिस प्रकार; (सु०८, अगर, यदि; तुल० मगही जे; (क० १, ४)। जगत् >प्रा० जग) रा०)। शत्रु का - जइस (३०) जेक्ट यादृश>प्रा० १ जइसर-वि० (मं० जउणंदण-पू० (सं० यदुनन्दन>प्रा० जरिस) जैसा; (को० १, १७) । जउणंदण) श्रीकृष्ण; (रि० ६, ६)। मइसा-हव्य० (सं० यादृश>प्रा० नउण-स्त्री० (सं० यमुना> प्रा० जइस) जैसा, जिस तरह का; (भूसुकुपा, जणा) यमुना नदी; (रा०; भ०; जं० र्यापद)। ६,१६, ५; १० च० १२, ४,३)। नहि-अन्य० (सं० च्याविष>प्रा० जउणा-स्त्री० यमुना नदी; (क० १२, जह+विह) जिस प्रकार; (महा० ६६, १२, ६) १४,१)। जउणदत्त-पु. (सं० यमुनादत्त) मथुरा जई-पु. (सं० यति >प्रा० जइ) राजकुमार का नाम; (प० च० ८८, संन्यानी; (क० ५, ६, १)। १६)। नईसर-पु० (सं० यतीश्वर) मुनिव्रत, जगदेव-पु० (सं० यमुनदेव) व्यक्ति- "विहि भेयहिं ताई समानियाई, घखयई विशेष-नाम; (१० १० ८८, ४)। जईसरसंठियाई," अर्थात् ये व्रत सक्षेप में लउपा~स्त्री० यमुना, वणिक स्त्री का दो प्रकार के कहे गए हैं। एक गृहस्यव्रत नाम; (प० च० ३३, ६५) । (अणुव्रत) और दूसरे मुनिव्रत (महाव्रत); जउलगि-अव्य० (सं० यावत् + लग्नम्) (क० ६, २०, २)। जब तक, जब लग, (क० ८,२, ६); नट-अप्र० (सं० यन्त्र >प्रा० जइ) लमो-अव्य ज्यों, समान; "नलिनि जहाँ; (प० च० ६, १०, ८) । सर्व० पत्त जो महि चलइ;" कमलिनी के पत्ते (सं० यः) जो; (की० १, १६)। पुं० के समान धरती डोलने लगी; (को०३, (सं० नव) वेग, शीव्रता, तेज, फुर्ति; ६४)। (जंबू० ६, १०, १)। पु० विजय; नक्ख-पु. -~-पु० (सं० यन>प्रा० जक्स) "विणएं इंदियजट संपन्जई;" विनय से देवयोनि विशेप, प्राचीन म० जक्त; (क. इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है, (ण १, ३, ७; (जंबू० ४, १,६; जस० १, ३, २, ८) । व्य० (सं० यावत) जब; २१, ७)। २. मध्यलधु (क० २, २१, ३)। पुं० (सं० जेयः) रगण (s15); (प्रा० ५० १, २६). जीतना; "न पवत्तइ कम वि० पुत्तु तउ ३. पुं० एक विद्याधर राजा, जो रावण बहुबोल्ल-महल्ल नए-ण-जड," अर्थात् का मौसेरा (प० २०८, तुम्हारा पुत्र किसी भी तरह संसार में संसार में १०२) 1 कद्दम पुं० (मं० यन प्रवृत्त नहीं होगा, यह वधुओं के बड़े-बड़े कर्दम) केसर, अगर, चंदण, कपूर और बोलों के न्याय से जीता नहीं जा सकता; कस्तूरी का समभाग मिश्रण; (भ०)। (जंबू० ६, १६, ४) । जउ जउ-अन्य० -हिनइ पुं० (सं० यताविपति) (सं० यत्र यत्र) जहाँ-जहां; (प० १० १. एक विद्याधर राजा; २. कुबेर, यल- २५, ६, १०)। राज; (प० ब० ८, ११६) । ० . पंचकल गण, भाई था;
जक्सकद्दम (३६१) जगडिअ . जक्खकद्दम-पुं० (सं० यक्ष कर्दम > जग-न० (सं० जगत् >प्रा० जग) प्रा० जक्खकद्दम) सुगंधित लेप; केसर, विश्व, संसार; (जंवू० २, १४, १०)। अगर, चंदन, कपूर और कस्तूरी का -रवि वि० (सं० जगत् + रवि) संसार समभाग मिश्रण; (प० च० १, १४, ८; के सूर्य अर्थात् ज्ञान को प्रकाशित करने ण. ६, १८, १३)। वाले; (जस० ३, ३६, ६)। जक्खरण-अन्य० (सं० यत्+क्षण> जगकण्ट उ-वि० (सं० जगत् +कण्टिक प्रा० ज+खण) जिस क्षण; (प्रा० २० १, >प्रा० जग+कटिय) जगत् के लिए १६०). कण्टक स्वरूप, जगत्-पीडक; (प० च० जपखयाण-पु० (सं० यक्ष-+स्थान > ६, ३, ४) । टि०-मूल संस्कृत शब्द प्रा० जवख+ ठाण, थारण) नगर-विशेष; 'जगत्कण्टक,' गोणी लक्षणा और अलंकार ५० च० ३३, १, १)। का परिणाम अर्थातर के रूप में द्रष्टव्य जश्खदत्त-पु० यक्षदत्त, कुचपुर का है। राजकुमार; (प० च० ४८, ११) । जगजग-अक० (सं०१/चकास्) चम- जाखसेरण-पु० (सं० यक्षसेन) यक्षदत्त कना, उज्ज्वल होना, दीपना । जगजगंत, के पिता; (प० च० ४८, १४) । जगजगेंत-व० कृ०, (प० च० ७७, जक्खामर-पु. (सं० यक्ष-+अमर) २३)। यक्षदेव; (जंबू०)। जगजत्त-पुं० (सं० जगत्-+याना> जक्साहिव-पुं० (सं० यक्षाधिप) यक्षों प्रा० जग+ जत्ता) संसार की याना; के राजा, यक्षों के स्वामी, कुवेर; (व० (ण० ६, ६, ११)। ८, ३,८)। जगज्जुइ-पुं० व्यक्ति-विशेप-नाम; जरिखद-पुं० (सं० यक्षेन्द्र>प्रा० (प० च० ८२, ६५) । जक्खिद) यक्षों का स्वामी; (जस० ४, 1/जगड-(दे०, प्रा० जगड) झगड़ना, १७,१२)। कलह करना । -इसक० (प. च० जनिखिरपी-स्त्री० (सं० यक्षिणी>प्रा० १०,७,५) । जगडत-व० कृ० (सं० जविखिणी) यक्ष की स्त्री; (ण० १, १३, युध्यन्) झगड़ा करते हुए; तुल० म० झगगडणे; (ण० ३, १५, १२) । जगड- जखिलदेव-पु० यक्षदेव; (रि० १०, न्त-~-३० कृ०, (प० च० १०, ८, ५)। २) । जगडिज्जंत-व० कृ० (५० च०८२, ३)। जक्खी-स्त्री० (सं० यक्षी) यक्षिणी जाडण-न० (दे०) कदधन, पीडन; (जस० १, १२, १३)। (जं० १, १०, ११)। जक्खेसर-पुं० (सं० पक्ष-+ईश्वर) जगडिअ-वि० (दे०) १. विद्रावित यक्षेश्वर (जंबू० १, १७, ३; सि० १, ( (पराभूत किया हुआ, भगाया हुआ, १७)। तितर-वितर किया हुआ, पिघलाया - . - जगणे (३६२) जच्चंत्र मा० ३, हुआ), तिरस्कृत; (दे० ना० चंद्रमा उग आया मानो, जग रूपी घर में ४४) । २. पीड़ित; (संधि० १०, ३, दीपक जल उठा हो; (प० च० १५, ६, १०)। ४) । जगण-पु. (छंदशास्त्र में) मध्य गुरु Vजगाव-(सं० जागरयति) जगाना, कणिकगण (151); (प्रा० ५० १, ३६) । "गोहारि घालि सूत जगाव;" घूत्कारं जगत्कुमुव-वि० (सं० जगत् +कुमुद) कृत्वा सुप्तं जागयति; (उ० व्य० प्र० जगत् में फैले हुए कुमुद के समान; (की. ५०, २०)। ३, १६२) । जगि-पुं० (सं० जगत् >प्रा० जग) जगतिलउ-पु० (सं० जगत् +तिलक) संसार, "जगि धम्ममूलु वेउ जि क हिउ;" जगतिलक नामक देव; (क० ४, १५, तुल० राज जगि, जगी; (महा० ६९, १०)। १६, ३)। जगत्तर-पु० (सं० जगत् +त्रय) तीन जगीस-पु० (सं० जगत् + ईर्पा>प्रा० जगत्, "रण अत्यि जयत्तएँ तेत्तिय वाणि;" जग+ ईसा) जग से ईर्ष्या; (व० ४, ४, (क० ५, ६, ३)। ३)। जगद्दरण-पु० (सं० जनार्दन) विष्णु, जगु-पुं० (सं० जगत् >प्रा० जग) परमेश्वर; (संधि० ३, १३, १)। संसार; तुल० राज० जगु, जगू; (हे. जगन्तकर-वि० (सं० जगत+अन्तकरण ३४३, १)। -तम वि० (स० जगदु- >प्रा० जग+अंत+करण) संसार का त्तम) रासार में उत्तम; (जस० ४, २८, विनाशक; (प० च० १७, ६, १०) । ३०)। जगपरमेसर-पु० (सं० जगत्परमेश्वर) /जग्ग- (सं०१/जागृ) जागना।-इ जगत्स्रप्टा; (जस०)। वि०; (जंवू० १०, २२, १) । जग्गंत-कृ० ! जगप्पणास-वि० (सं० जगत् + प्रकाश) (सं० जागृ+शत) जागते हुए; (जबू० जगत् का प्रकाश करने वाला; (प० च० ३, १४, १३)। जग्गंती-व० कृ. २२,४७) । (प्रा० ५० १, ७२) ।, जगर-पु. (सं० जगर) कवच, वर्म; जग्ग-पु० (सं० यज्ञ >प्रा० जण्ण) (दे० ना० मा० ३, ४१) । याग, यज्ञ; (प० च० १६, ८, ९)। जगल-न० (दे०) १. ईख की मदिरा जग्गिम-वि० (सं० जागृत >प्रा. का नीचला अंश, २. मदिरा का नीचला जग्गिय) जगा हुआ; (सुदं० १,१, भाग; (दे० ना० मा० ३, ४१) । ८)। जगहर-पु० (सं० जगत् + गृह>प्रा० जच्चंजण-न० (दे०) १. अगरु, सुगंध- जग घर, हर) जगत् रूपी घर; "ससि युक्त द्रव्य-विशेप; २. कुकुम, केसर; उग्गंउ सुठ्ठ सुसोहियउ । णं जग-हरे, जग-हरें. (दे० ना० मा० ३, ५२) । दीवउ वोहिय" .-'अत्यंत सुशोभित जाचंध-वि० (सं० जात्यन्ध) जन्मांध, जच्च (३६३) जडमइ शन्न, जन्म के अंधे; "जच्चंधहें अंधहें भुक्खि जा) जाओ; "जज्जाहि वप्प देदेहि माहि, याह;" जो-जन्म से अथवा रोग से अन्धे ससुरहों रिउ मारिवि लच्छि सहि, हो गए थे, भूखे थे; (जस० २, २६, अतः हे भ्रद्र तुम जाओ और को १८)। जच्चन्ध-वि जन्मांध; (प० च० मारकर श्वसुर की भूमि व राज्य-लक्ष्मी २७, १२, ४) । इन्हें दिला दो, (ण० ६, १२, ११)। जच्च-वि० (सं० जात्य >प्रा० जच्च) जन-क्रि० वि० (सं० यः इव) ज्यों, उत्तम जातवाला, कुलीन, (प० च० १४, समान, जैसे; "तरुण तुरुक असवार वाँस १०, ४) । पु० (दे०) पुरुष, आदमी; जने चावुक फुट्टइ;" अर्थात् तुरुण तुर्क (दे० ना० मा० ३, ४०)। उन घोड़ों पर सवार थे और उनके जच्चास-पु० (सं० जात्यश्व, जात्या चाबुक बांस के समान फूटते या आवाज श्व) उत्तम जाति का अश्व; (प० च० करते थे; (को० ४, ६३) । ५४, २६)। मजो-अव्य० (सं० यतः>प्रा० जओ) जच्छंद-वि० (दे०) स्वच्छंद; (दे० क्योंकि, जिस कारण से, जव; (को० २, ना० मा० ३, ४३; षड्) । १६०)। /जज्जर-(सं० जर्जरय) जीर्ण करना, जोन--सर्व० (सं० यः) जो एक संबंध खोखला करना । जज्जरिआउ भू० का० वाचक सर्वनाम जिसके द्वारा कही हुई (सं० जर्जरिता) जर्जरित हो गई; (हे. संज्ञा या सर्वनाम के वर्णन में कुछ और ३३३, १)। जज्जरिउ-भू० का; (प० वर्णन की योजना की जाती है; (की०२, च० १५, ४, ५)। ७६)। जज्जर-वि० (सं० जर्जर>प्रा० जट्ट-पुं० (सं० जत>प्रा० जट्ट) जज्जर) जीर्ण; (जस० ३, २७, २०) । देश-विशेष; (भ०)। जज्जराई-वि० जर्जर; जटि-स्त्री० (सं० यप्टि>प्रा० जट्ठि) ६) । . आयुध-विशेष, लकड़ो; (प० च० ५६, जज्जरिउ-वि० (सं० जर्जरित>प्रा० १५)। जज्जरिय) जीर्ण किया हुआ; (जंवू०, ४, जड-स्त्री० (सं० जटा>प्रा० जड़ा, १६, २१)। जड) १. जटाएं, उलझे और परस्पर जज्जरिय-वि० (सं० जर्जरित >प्रा० चिपके हुए बाल; २. जड़, मूल; पुं० जज्जरिय) जीणं किया हुआ, छिद्रित, जडत्व; (जस० ३, २१, १६)। -धारि खोखला किया हुआ; (सं० रा०;जस० पुं० (सं० जटाधारिन्) जटाधारी १,.१२, १). संन्यासी; (ह० च० ३६, ७५) । जज्जल्ल-पु० हम्मीर के जडमइ-वि० (सं० जडमति) जड़मति, .नाम; (प्रा० ५० १, १०६)। विवेकहीन बुद्धिवाला; (जंवू० १, ६, जज्जाहि-क्रि०, आ० (सं० या>प्रा० ११)। . (रि० ३, '. मंत्री का जयण (३६४) जण च० ४१, ८)। जण, करना। - जडयण-पु. (सं० जडजन>प्रा० ४)। जंडयण) मूर्ख व्यक्ति; (व० २, १५, जड्डः-स्त्री० (सं० जाड्य) जाड़ा; १४)। (प्रा० पैं० २, १६५)। जंडा-स्त्री० (सं० जटा>प्रा० जडा) जहर-तु राक्षस योद्धा; (प० च० उलझे और आपस में चिपके हुए वाल; १२, ६२)। (जस० ४, १६, १३)। जहराणल-न० (सं० जठर+अनल) जडाइ-(सं० जटायु>प्रा० जडाउ) जठरज्वाल, जठराग्नि; (जस० २, ३६, गृध्र पक्षी-विशेष; (प० ७५)। /जण-(सं० जनय् >प्रा० जडाउ-० (सं० जटायु>प्रा० जणेइ) उत्पन्न करना, पैदा जडाउ) गृध्र पक्षी-विशेष; (प० ब० ४४, -इ व० (सं० जनयति >प्रा० जणेइ) ४०) । --ण पुं० ग्रध्र पक्षी-विशेष; (प० च० ७, १२, ३; भ०) । जणंत- (प० च० ४४, ५५)। कृ० (सं० जनय+शत).(जंवू० ४, २२,. जडागि-पु० (सं० जटाकिन्) गृध्र पक्षी-विशेष; (प० च० ४१, ६५) । १३)। -वि पू० का०. क्रि०; (जंवू० जडिअ-वि० (दे०) (सं० जटित >प्रा० २, १७, १) । -हि (विधि०) (जंवू० ८, १०,. १७) । /जणिज्ज-(सं० जाडअ) जड़ा हुआ। -इल्ल (स्वार्थ); (जंवू० ५, ७, ७)। जनय (कर्मणि) -इ व०; (जंबू० ११, ५, ४) । जसइ-भू० का० (सं० जनि- जडिउ-क्रि०, भू० का० (सं० जटित > प्यति) उत्पन्न करेगा; (ण ७, ३, प्रा० जाडअ) जड़े गए, (ण. १,१३, ६)। १०)। जडिय-वि० (सं० जटित >प्रा० जण-पु(सं० जन>प्रा० जण) जाडअ) जडित, मनुष्य, व्यक्ति; तुल० (जस० १, २६, युक्त; राज० जणू; ११)। (भ०; सं० रा०; प्रा० ५० १, ४७)। पुं० न० (सं० यान >प्रा० जाण) वाहन; जडिल-वि० (सं० जटिल >प्रा० जडिल) खचित, जड़ दी गई हो; (जंबू० (क० २, २, ४)। ६, ६, १२)। "दीहरोमावलिजडिल जणअ, जरणय-पुं० (सं० जनक) सीता गलु;" अर्थात् उनका गला लंबे वालों से के पिता, मिथिला के हरिवंशीय राजा; जटिल था; (जस० २, ३१, ३)। (प० च०)। जडिल-वि० (सं० जटिन्) जटाधारी; जणअ- -वि० (सं० जनक >प्रा० जणय) (जंवू० ५, ७, ७)। उत्पन्न करने वाला, "नीसल्लु अवरु जडी--वि० (सं० हियवउ जणउ;" अर्थात् हृदय को और जाडम) जड़ा हुआ; (क० ४, ६, नि:शल्य उत्पन्न करने वाले मेरे इस प्रति- . जटित>प्रा० जणउत्त (३६५) जणय रुपको १४)। । पै० २, देखिए; (जं० २, १८, वि० (सं० जनातिहर) लोगों की आपत्ति का हरण करने वाला, (जस० ३, ३५, जणउत्त-पु. (दे०) १. गाँव का १४)। मुखया या प्रधान पुरुप; २. विट, भाण्ड; जणदाण-पुं० (सं० जनदान) सुपात्र (दे० ना० मा० ३, ५२) । दान; (जंबू० ३, २, ६)। जणकम्मरण-पु० (सं० जन+कर्मन्) जणद्दणा-पुं०, कर्ताकारक, ए० (सं० लोगों का वशीकरण या वश में करना; जनार्दन>प्रा० जणदण) विष्णु; (प्रा० "जणकम्मण-धमण-मो णयं;" अर्थात् पं० २, ७५) । लोगों का वशीकरण, स्तंभन व मोहन जगनंदणी-वि० (सं० जननन्दिनी) करने वाले; (जंवू० ६, १६, ८)। लोगों को आनंद देने वाले (जंवू० १०, जणकिण-वि० (सं० जन+आकीर्ण) १६, १३)। जन-विस्तीर्ण; "भणइ जिणंदु भरहें /जणम-(सं०१/जम् >प्रा० जम्म; जणकिणी चंगानयरि अत्यि वित्थिण्णी;" सं० जन्म) जन्म लेना। -उ भू० का०- अर्थात् भारतदेश में जनसंकुल और कृ० रूप, जन्म लिया; (प्रा० विस्तीर्ण चंपा नामक नगरी थी; (जंबू० १४६)। ३, १०, ११)। जणमरण-पु० (सं० जनमनस्) लोगों जणजाणिय-वि० (सं० जन+ज्ञात) का मन; (जंवू० ४, १५, ५) । लोक-प्रसिद्ध; (जंबू० ८, ४, ४)। जणमेजअ-पु० जनमेजय, चंपापुरी का जणण-वि० (सं० जनन>प्रा० जणण) राजा; (प० च० ८, १५६)। जनक, उत्पादक; (जंवू० १०, २४, १०; जए.यंगया-स्त्री० (सं० जनकाङ गजा) प० च० ५, ६, २) । –उल्लउ (जण; जानकी, राजा रामचंद्र की पत्नी; (प० गुल्लउ) वि० पिता; (जस० ३, ३६, च० ४१, ७८)। १४)। जण्य-पुं० (सं० जनक) राजा जनक, जणणायर--पु (सं० जननागर) नाग सिता के पिता, (प० च० २१, ३३) । रिक जन; (जंबू० १०, १६, १२)। -दुहिया, धूआ स्त्री० (सं० जनक+ जणणि-स्त्री० (सं० जननी>प्रा० दुहित) जानकी, सीता; (प० च० २३, जणणि, जणणी) माता; (प० च० ६,६, ११) । –णंदिणी-स्त्री० (सं० जनक ६; जंबू० ४, २२, २६) । जणणी; (जस० +नन्दिनी) जानकी; (प० च०६४, १, २३, ११) । ४६) । -निवतणया स्त्री० (सं० जनक जणणिका-स्त्री० (स० जननि, नी> +नृपतनया) सीता; (प० च० ४८, प्रा० जणणि) जननी; (उत्तरपुराण)। ६०)। -सुम (सं० जनक+सुत) जणत्ति-स्त्री० (सं० जन+आति) जनक राजा का पुत्र, भामण्डल, (प० लोक-व्याधि; (ण० ६, ८, २)।-हरु च० ६५, २८)।
जंणयाणुराउ जग जनित>प्रा० - जरणयारपुराउ-पु. (सं० जनकाराग) प्र० १०-८) । प्रजा-जनों के प्रति अनुराग; (व० १, जणय-वि० (सं० १५, १२)। जणिअ) उत्पादित, उत्पन्न किया हुआ; जगवइ-पुं० (सं० जनपद >प्रा० जण (प० च० ३, १, १३; ण. १,१५, वय) जनपद; "आणाविउ जरगवई ताउ १०)। देव," तब, हे देव, मुके जनपद में लाया जणिहार-कृ० सं० गमियन् गमिष्य. गया; (क० ६, १६, ८)। न्ती गमिष्यद् वा; जाते हुए; "जणिहार जणवउ-पु.० (सं० जनपद) साधारण दीस;" (उ० व्य० प्र० १२-११) । लोग, “जइ जणवउ णीरसु मलिण- जरणी-स्त्री० (सं० जनो) स्त्री, नारी; चित्त ;" अर्थात् जनपद (स.धारण लोग (प० च० १५, ७३)। नीरस और मलिन) चित्त हैं; (क० १, जणु-अव्य० (प्रा० जणु) इव, तरह, २, ४)। माफिक, जैसा; (प० च० ६, १६, ६)। जणवय-पु. १. (जानपद >प्रा० जण मानो; (रा०, सं० रा०)। पुं० (सं० वय) पौरजन, देश का निवासी; (जंवू० जन - प्रा० जण) मनुष्य; (हे० ३३६, २,६, १३) । २. (सं० जनवज) १)। मनुष्य-समूह; ३. पु० (सं० जनपद) बसा जणे--अव्य० नहीं, मत; (उ० व्य० प्र० हुआ स्थान, जन-स्थान, राष्ट्र (ण० १, १०-६)। ११, ३)। जणेर-वि० (सं० जनयित) जरणवर--पु० (सं० जन्तुवर) जानवर; उत्पादक (प० च०.२२, ६, ८; संधि (क० ८, ७, ६)। ५, ११, ७) । पुं० पिता; (भ०) । जणवल्लह-पु० दाशरथी भरत के साथ जणेरि-स्त्री० (सं० जनयित्री) माता, दीक्षित राजा, जो राज्य का परित्याग माँ, (भ.) । जणेरी-स्त्री० जननी, कर श्रमण हुआ; (प० च० ८ण, (ण० ५, ८, १५) । जणेरीणंदणु-पु० ४)। (सं० जनयिनी+नन्दन) जननी का पुत्र; जगविंद-पु० (सं० जनवृन्द) जन- (रि० ३, ११)। समूह; (जंवू०.४, २२, २४) । जरोव-पु. (सं० यज्ञोपवीत>प्रा० जणाणंद-पुं० (सं० जन-आनन्द) जण्णोवईय) जनेऊ; (की० २, २०४) । लोगों का आनंद; (जंवू० . ४, ८, जरगोह-पु. (सं० जन+ओघ) जन- ११)। समूह; (विला०)। जणाविन-वि० (सं० ज्ञापित) जताया जण्ण-पुं० (सं० यक्ष>प्रा. जण्ण) हुआ, सूचित; (क० २, ६, ६)। यज्ञ, (ण ६, ६, ७; सि० १, १५)। जणि अव्य० प्रतिषेध बोधक या वर्ज --विहाण पु० (सं० यज्ञविधान) यज्ञ नात्मक अव्यय, नहीं, मत; (उ० व्य० अनुष्ठान; (व० २, २२, ८) जपणोइय- जनक, . . .
जणहर (३९७) जन्त यात्रा का - ० यज्ञादिक; (व० २, १६, ७) । पुं० (सं० याना+कार्य) जष्णहर-पु० (दे०) नर-राक्षस, दुष्ट कार्य; (जंबू० ३, १२, ११)। मनुष्य; (पड्)। जत्ता-स्त्री० (सं० यात्रा>प्रा० जत्ता) जण्णोहण-० (दे०) राक्षस, पिशाच; यात्रा; (जस०) । -ए (ण० २, २, (दे० ना० मा० ३, ४३) । १५)। जगह-न० (दे०) छोटी स्थाली (मिट्टी जत्त, जेत्य-अव्य० (सं० यत्र>प्रा० का घड़ा या हाँडी, रांधने का वर्तन, जत्थ) जहाँ; (हे० ४०४, १)। कड़ाही; २. वि० काले रंग का; (दे०. जत्तुच्छ्व-पुं० (सं० यात्रा+उत्सव> ना० मा० ३,५१)। प्रा० जता+उत्सव) यात्रा का उत्सव; जाहली-स्त्री० (दे०) नीवी, नारा, (जंबू० ३, १३, २)। इजारबंद; (दे० ना० मा० ३, ४०)। जत-वि० (सं० यावत्) जितने; (प्रा. जण्हविपुत्त-पु० (सं० जाह्नवीपुत्र) पै०१, १२४) । व्यक्ति-विशेष-नाम; (प० च० ५, अत्य--अव्य० (सं० यन्न >प्रा० जत्थ) २०१)। जहाँ; (प्रा० ५० १, ४१; जंवू० १, ६, जण्हवी-स्त्री० (सं० जाण्हवी) १) । १. सगर चक्रवर्ती को एक पत्नी, भगी- जदो-अव्य० (सं० यतः>प्रा० जत्तो, रथ की जननी; (प० च० ४१, ५१)! जओ) क्योंकि, कारण कि; (की० १, २. गंगा, नदी-विशेष; (१० च० १०२, ४६)। १०७)। जन-पु० (सं० जन>प्रा० जण) लोग; जण्हुय-पुं० [सं० जानु+क (न०)> "देसिल वयणा सव जन मिट्ठा;" (की प्रा० जण्हुआ (स्त्री०)] जानु, घुटना; १, ३५)। (ण० १, १७, ७) । जण्हुव-पु० जानु; (५० च० ३८, ११, ७) जनधण-- (सं० जनधन) सार्वज- जत-अव्य० (सं० यावत्) जितना; निक धन; (जंवू० ५, ४, ७) । (प्रा० ५० १, ४१)। जननि--स्त्री० (सं० जननि>प्रा० जती-पु० (सं० यति) संन्यासी; (की० जणणि) माता; (को० २, ५६)। २, ११०)। जनि-अध्य० इव, मानो, जैसे; "जनि जत्त'-पु० (सं० यल>प्रा० जत्त) दोसरी अमरावती का अवतार भा; उद्योग, उद्यम, चेष्टा; (प० च० ६, १०, (की० २, ६६)। ८)। मानो; (की० २, जत्त'-स्त्री० (सं० याना>प्रा० जत्ता) १४५) । देशांतर-गमन, देशाटन; (प० च० १६, जन्त-न० (सं० यन्त्र>प्रा० जंत) कल, १०,७)। जत्ता; करने के ' (भ०) । -कज्ज युक्तिपूर्वक शिल्प आदि कर्म जनु- अव्य० जन्तिय (३६८) जमकरण अलग- लिए पदार्थ-विशेप; (५०.च० १५, १०, च० ५६, ३३)। जय-अव्य० (सं० (सं० यावत् >प्रा० याव, तिय–वि० (सं. यान्त्रिक>प्रा० जाव) जभी, जव ही; (सरह, दोहा- जतिम) कल चलाने वाला, यन्त्र पर कर्म कोश) । करने वाला, (प० च० १४, ६, जम --पुं० (सं० यम>प्रा. जम) ५) । १. अहिंसादि पाँच महाव्रत, साधु का जन्नत्तह-पु. (सं० जन्या-यात्रा) व्रत, २. देव-विशेप, ३. मृत्यु-मौत जनेत, वारात; "सौम सरूव धूव परि ४. आत्म-नियंत्रण, संयमन,नियंत्रण (सं० णाविय जायवि तहि जन्नत्तह आविय;" रा०; ण० १, ११, ८)। टि-यमों की तुल० गु० जान; (प्रा० गु० ८, १२) । संख्या भिन्न-भिन्न लेखकों ने जन्नवा-पु० धनदत्त का मित्र, विप्र अलग दी है, यथा-ब्रह्मचर्य, दया क्षान्ति- विशेप-नाम, (प० च० १०३, ८) । दर्शनं सत्यम्कल्कता, अहिंसाऽस्ते-यमाधुर्य जन्य-पु० (सं० यज्ञ>प्रा० जण्ण) दमश्चेति यमाः स्मृताः-याज्ञ० ३, यन; (प्रा० गु० १०, ६)। ३१३) । यम पाँच भी बताए गए हैं- जन्हि-सर्व० येषां>प्रा० येसानं) अहिंसा, सत्यवचनं. ब्रह्मचर्यमकल्कता, जिनके; "जन्हि के निर्माण वि.वकर्महु अस्तेयमिति । (जस० १, १२, १८) । भेल वड प्रआस;" अर्थात् जिनके निर्माण ५. मृत्युदेव; ( (जस० १, ५, २)। में विश्वकर्मा को भी वड़ा परिश्रम करना ३. विद्याधर राजकुमार, (प० च० १, पड़ा होगा; (की० २, १२८) । ५३) । ४. किष्किन्धा नगरी जन्हिसाहि-पु० जोनाशाह; (को० ३, राजा; (प० च० ७, ४६) । -करण १८)। पुं० (सं० यमकरण) मरण या रोग; जपिर-वि० (सं० जपितृ) जाप करने (महा०)। -लय न० (सं० यमालय) वाला; (पड्)। यमराज का घर, मृत्यु-स्थान; (प० च० /जप्प-(सं०/जल्प्>प्रा० जंप) ४५, १०)। -उरी स्त्री० यमपुरी; वोलना, कहना। -इ सक० (की० १, (जंवू० १०, १४, ८)। -णिह वि. ३६)। (सं० यम+निभ) यम सदृश टि०-'जम- जप्प-वि० (सं० याप्य) गमन कराने करण' में अर्थातरण द्रप्टव्य योग्य । -जाण न० (सं० याप्य+यान) शब्द 'यमकरण' का अर्थ 'मृत्यु के देवता वाहन-विशेप; (दे० ना० मा० ६, की क्रिया है। १२२)। जमअ- (सं० यमक >प्रा० जमग, जववंत, जंबव, जंबुवंत- पुं०. वानर जमय) यमक नामक छंद, छंद-विशेप; सुग्रीव का मंत्री; (प० च०) । (प्रा० पं० २, ३६)। जबूणयपुत्त- जववंत का पुत्र ; (प० जमकरण-पु.० (सं० यम+करण> का एक है । मूल जमक (३६६) राज का जल्पन>प्रा० प्रा० जमकरण) १. यम का विधान १३)। अंथवा क्रिया; (प० च० ८, ४, १)। जमसातररा--पुं० (सं० यमशासन) यम- २. मरण; (प० च० ३६, ३, ५) । शासन; (जस० जमक-पु. (सं० यमक>प्रा० जमग) यमक, तुक; वृत्त; (प्रा० ० १, जमहर-पुं० (सं० यमगृह >प्रा० जम १२७)। +घर, हर) यमगृह; (प० च० १५, जमण-पुं० (सं० यवन >प्रा० जवण) ८, ६)। यूनान देश का निवासी, मुसलमान; जमाइट्ठ-वि० (सं० यम+आदिष्ट) (को० २,१८०)। यम के द्वारा आदिष्ट, "जमाइयाणु- जमदंड-पुं० रावण का मंत्री; (प० रूवा पयंडा;" अर्थात् यम से भादिष्ट च० ६६, ३२)। दूतों के समान प्रचंड; (जंवू. १०, ६, जमदग्गि-पु. जमदग्नि; परशुराम के २) । पिता; (प० च० २०, १४०) । जम्परणय-न० (सं० जमद्य-पुं० (सं० यमदूत) यमराज का जंपण) जनप्रवाद, गपशप (publ!c दूत; (जंबू० ११, २, १)। gossip); (प० च० ४६, ३, १०)। जम्मंतर-पु० (सं० जमपुर-पु. (सं० यमपुर) जम का जन्मान्तर) अन्य नगर, मौत का स्थान; (जत० २, ३१, जन्म, दूसरा जन्म; (जंवू० २, ८, २)। जम्मतरु-जन्मान्तर; (सि० २, २७) । जममहिस-पुं० (सं० यममहिष) यम- जम्मंबुहि-स्त्री० (सं० जम्मावुधि) जन्म-मरण राज का भैसा; (जंवू० ५, ५, १)। रूपी समुद्र; (व० १, १४, ६)। जमराय-पु. (सं० यमराज) यमों का स्वामी; (व० ४, ७, ८)। ---यूउ पुं० जम्म-पु न० (सं० जम्मन् >प्रा० (सं० यमराज-दूत) यमराज जन्मण) जन्म, उत्पत्ति; (प्रा० पै० २, व० ३, १०, ३)। १०, १; १० १, १६८)। –ण पु० न० जमल-न० (सं० युगल >प्रा० जमल) (सं० जम्मन्) जन्म; (व० २, १२, २)। युगल, जोड़ा; (जंवू० १०, १६, २; प्रा० जम्मु–१. पुं० न० जन्म; (वं० १, ३, पं० १, १८०)। ७) । २. वि. जन्म देने वाला; "जल- जमलगिरि-पु० पर्वत-विशेष; (प० यर-जीव-जम्मु;" यर-जीव-जम्मु;" -जलचर जीवों को च० ३, २८)। वाला; (रि० जमलज्जुण-पु० (सं० यमलार्जुन) —उच्छव (जम्मुच्छव) पु० (सं० जन्मो- अर्जुन के दो पेड़, नलकूवर; (प्रा० पै० १, त्सव) किसी के जन्म के स्मरण २०७)। -रुक्ख पुं० न० (सं० यम उत्सव; (व० ६, १२, २)। लार्जुन वृक्ष) वृक्ष-विशेष; (रि० ६, 1/जम्म-१. (सं० जम्>प्रा० जम्म) का दूत; जन्म देने का जम्मा (४००) जयएव -- " उत्पन्न होना। - अक०, ६०; (जंबू० जम्मिन-भू० का०, उत्पन्न हुआ; "जज्जाम्मिा उत्पन्न मति कामेसर सण राए; बत जिसमें कामेश्वर नामक व्युत्पन्नमति राजा ने जन्म लिया; (की० १, ६६) । जम्मि- अइ- जन्म लिया गया है; (की० १, ३९) । २. (सं०/जम्) खाना, भक्षण करना । -इ सक०; (पड़) । जम्मडा-पुं० न० (सं० जन्मन् >प्रा० जम्म) जन्म; (परमा०)। जम्मण-न० (सं० जन्मन् >प्रा० जम्मग) जन्म, उत्पत्ति; (संवि० १४,४, १६; जं० ११, ६, १)। जम्मदिवस-पू० न० (सं० जन्म- दिवस) जन्मदिन; (जंबू० २. स्त्री-विशेष- नाम; (प० १०८६, ३४)। जय-यु० (सं० प्रा० जय) १. सीतास्व- वंबर में उपस्थित राजा; (प० च०२८, १०१)। २. वानरयोडा; (५० च० ५७, १४) । ३. मेघेश्वर, नाम-विशेष; "नाहेय बाहुबलि-भरह-जया बरहंत-सिद्धि-चक्का- वइ सया;" अर्थात् वहां नामेय जिन, बाहुबलि तथा भरत और मेघेश्वर ये बरहंत सिद्ध एवं चक्रवर्ती सदैवं विद्यमान रहते हैं; (जंबू० ३, १, ११)। ४. पर्वत-विशेप (प० च० ३३, ३, १)। ५. नृप-विशेष, (प० च० ३०, २, ६)। ६. जीत; (व० १, १, ३) । ७. जयकार का शब्द; (जस० १, २, १) न० (सं० जगत् >प्रा० नग, जय) संसार; (भ०)। -लच्छि स्त्री० जयलक्ष्मी, स्त्री-विशेष. नाम; (ण० ८, १२, ७) | ~~णंद वि. (सं० जगतानन्द) जगत् को आनंद देने गला; (प० १० ११७, ६)। /जय-(सं० यज् >प्रा० जय= पूजा करना, याग करना) जाप करना; "पुण भाइय सोलह-अक्खरिय । जय (?) कोडि सहास दुहुत्तरिय" -फिर उन्होंने सोलह अक्षरों वाली विद्या का ध्यान किया, उसका दस हजार करोड़ दस वार जाप किया; (प० च० ६, ७, ८)। /जय-(सं० जि> प्रा० जय) जीतना । ~ सक०, वं० (सं० जति >प्रा० जयई) जीतना; ( च० १, ६, २)। --उ (विधि०) (जं० १,१, ३)। जयएव-प्० जयदेव, पुरुप विशेष नाम; जम्मावयार-पुं० (सं० जन्मावतार व्रत-विशेष "तह पंचमि दिणि जम्मावयार; अर्थात् तत्पश्चात् पंचमी के दिन सारभूत लन्मावतार व्रत किया; (क० १०, २६, ११)। लम्मावहि-स्त्री० (सं० जन्माववि) माजन्म; (जंबू०)। जम्माहिसेर-पु० (सं० जन्माभिपेक) जन्म के समय कपर से जल छोड़कर स्नान; (जंबू० १, १,२)। जम्मि-अव्य० (सं० यस्मिन्) जहाँ; (क० ५, ११, ६)। जयंत--पु० विद्यावर इंद्र का पुत्र, (प०. च० १२, १००)। नयंती-स्त्री० जयन्ती नामक पुरी, नगर-विशेप; (क० ६, १०,३)।
जयखिर (४०१) जय-वेरि - . (क० १, २, ६)। जय+थोत्त) विजय-स्तव या स्तुति; जयखिर-वि० (सं० . जय+का+ (जंबू० १०, १, १३)। इर) विजय की आकांक्षा करने वाला; जयनंदण-पु० जयनन्दन नाम-विशेप; (जंबू० १, १०, ८)। (भ०) । जयकंत-पु. राजकुमार, रावण का जयप्पह-पु. आगामी -विशेप का राजकुमार- जन्म-नाम; (प० १० ११८, ६६)। नाम; (प० च० ११८, ६६)। 1/जयकार-(सं० जय+कारय्) जय- जयभद्द-स्त्री० जयभद्रा, श्रेष्ठि पत्नी, कार करना। जयकारिइ-व० (सं० (जंवू० ३, १०, १३)। जय करोति) जयकारे करना; (भ०)। जयमंत-पु० सप्तर्षि मुनि; (प० च० जयकारिउ-भू० का० जयकार किया; ८६, २)। (५० च० १६, ६, ६)।-रिवि पू०- जयमंदिर--न० (सं० जगत् + मन्दिर का० कि०, जय-जयकार करके; (जंवू० >प्रा० जयमंदिर) जगन दिर, लोक रूपी ५, २, ७) । जयकारे वि-पू० का० क्रि० मंदिर; (जंवू० १, १७, ६)। जय बोलकर; (प० ५० १७, ६, १) । जयमित्त-पु० १. सप्त ऋपि मुनि जयकारेप्पिणु-पू० का० क्रि०,-जयकार (प० च० ८६, २) । २. वानरयोद्धा; करके (प० च० २,१३, ८)। (प० च० ५७, ३)। जयकारिअ-वि० (सं० जयकारित) जयलच्छि-स्त्री० (सं० जयलक्ष्मी) स्त्री- जयकार किया हुआ; (जस० १,६, विशेप-नाम; (जत० २, १६, २) । १४)। जयकारिनो-वि० (सं० जयकारित) जयवत्त-पु० (सं० जयवार्ता>प्रा० जयजयकार करने वाले; (जंबू० ३, ४, जयवत्ता, वत्त) विजय-वृतान्त; (म० १, ८)। जयवल्लह-वि० (सं० जगत् +वल्लभ जयकारु-पु० जयकार; (प० च० १२, >प्रा० जग, जय+वल्लह) सर्वलोक- ६, १)। स्नेह-पान; (जंवू० ४, ७, जयवंट-पु० स्त्री० (सं० जय+घण्ट >जय+विजयघण्टा); विजय का सूचक ११)। वाद्य-विशेष; (जंबू० ५, ६, ६)। जयविजइ-वि० (सं० जगत् +विजयिन् जयचंदा-स्त्री० विद्याधर राजकुमारी; . >प्रा० जग, जय+जयिण, जइण) जग- विजयी, (ण० ६, १७, १) । (प० च० ८, १८७}। जय-वेरि-वि० (सं० जित वैरि) जयण-न०.(दे०) घोड़े का वरूतर; (दे० ना० मा० ३, ४०)। शव ओं को जीतने वाला; (व० १, १५, जयथोत्त-न० (सं० जय + स्तोत्र >प्रा. १३)। . प्रिय या ।
जयसिरि (४०२) जरासिंधु बूढ़ा बैल, का पुत्र; । जयसिरि-स्त्री० (सं० जयश्री) विजय १,१०,१; जस० १,६, ६) वि० लक्ष्मी; विजय की अविष्ठात देवी; (जस० (सं० जरत् >प्रा० जर) १. जीणं, १, ७, १३; जंवू० १०, १, १४)। पुराना; (भ०; दे० ना० मा० ३, ५६) । २. विजयश्री; (व० १, १,१)।-ह २. वृद्ध; (जंबू० ६, ७, ६)। पुं० रावण स्त्री० (सं० जयश्री+ईश) विजयलक्ष्मी; का एक सुभट; (प० च० ५६, ३, ६)। (ण०४, १, ११) । -गु पु (दे०) १. जयसेण-पुं० १. वानरयोद्धा; (प० च० २. स्त्री० बूढ़ी गाय . (प० च० ३३, ६७, १२) । २. ग्यारहवें चक्रवर्ती राजा; १६) । --गुण्ण वि० बुढ़ापे के कारण (प० च० ५, १५३)। दुबल; (जंवू० १०, १४, ३) । जया-स्त्री० १. स्त्री-विशेश-नाम; (प० जरड-वि० (दे०) वृद्ध; (दे० ना०. च० ५, ११७) । २. विद्या-विशेष; (प० मा० ३, ४०) । च० ७, १४१)। जरद-वि० (सं० प्रा० जरठ) जीणं, जयाणंद-पु० वानर सुग्रीव वृद्ध, "जरढ-मियकु व थिउ विदाणउ;" (प० च० १०, १०)। (प० च० २४, ७, २) । टि०-छिपते हुए जयादेवी-स्त्री० वीर कवि की चौथी चंद्रमा को वृद्ध (eged) कहा गया है । पत्नी; (जंवू०)। जाणु-पु. (सं० जरण) नाश; (रि० जयावइ-स्त्री० (सं० जयावती) जया- ७, २)। वती नामक रानी; (व० ३, २२, जरदासी-स्त्री० जरा रूपी दासी; ६)। (जस० १, २७, २७)। जयावई-स्त्री० (सं० जपावती) एक जरलद्धिन, जरलपिस-- वि० (दे०) भृत्य की माता; (प० च० ५, १०६)। ग्राम्य; (दे० ना० जयास-स्त्री० (सं० जय+आशा) ४४) । विजय की आशा; (जंबू० ४, १४, जरहरि-स्त्री० (सं० जलहर = मेघ की २२)। तरह एक दूसरे पर पानी उछाल कर जयासय-पुं० (सं० जय+भाशय) क्रीड़ा करना) जल-क्रीड़ा; (की० ४, विजयाभिप्राय, विजय प्राप्ति का आशय; २११)। (जंवू० ६, १३, ६)। जरा-स्त्री० (सं० प्रा० जरा) बुढ़ापा, जरंड-वि० (दे०) वृद्ध, बूढा; (दे० ना०. वृद्धत्व; (भ०)। मा० ३, ४०)। जराउज-० (सं० जरायुज) गर्भ- जर-पु० (सं० ज्वर>प्रा० जर) रोग स्थान; (व० १०, १२, ७)। विशेष, बुखार; (प० च० ११,२,३; जरासंधु-पु० नवम प्रतिवासुदेव ; (प० क. ३, ४, ११; ण० ३, १६, ५) । पुं० च० २०, २०४)। (सं० प्रा० जरा) बुढ़ापा, वृद्धत्व; (व० जरासिघु---पु. (सं० जरासन्ध>प्रा० ग्रामीण, मा० ३, - जरि (४०३) जलजल कायिक जीव, जरासंध) महाभारत के अनुसार मगध देश जल-न० (सं० प्रा० जल) १. पानी, का एक राजा । वह वृहद्रथ का पुत्र और उदक; २. विदु; (जंवू० ४, १८, ७)। कंस का श्वसुर था, "जिणि रणि जरा- ३. पुं० मरु-महि- सिंधु विद्दारिउ अहि दाणवु बलवंतउ जल तेयह;" अर्थात् वायु कायिक, पृथ्वी मारिउ । कंस केसि चाणूरु वहि-", कायिक, जलकायिक और तेजोकायिक (प्रा० गु० ५, ३६)। जीव; (व० १०,४, ३)। जरि-वि० (सं० जरिन्) बूढ़ा, वयो- /जल-(सं०/ज्वल >प्रा० जल) वृद्ध; (दे० ना० मा० ३, ५७) । १. जलना, दग्ध होना, २. चमकना; जरुल्ल-पु० (सं० ज्वर+उल्ल (स्वार्थे) (सं० रा०)। -इ व० (सं० ज्वलित > ज्वर; "णारिहे पेम्मजरुल्लउ लाइउ" प्रा० जलइ); (प्रा० ५० १, १६०; भ०; नारियों को प्रम का ज्वर चढ़ आया; हे० ३६५)। जलंत-कृ० (सं०/ज्वल (ण० ५, ८, ६)। +शतृ) (प्रा० पैं० २, १७७; जंबू० ४, 'जलंजती-स्त्री० (सं० जल+अञ्जलि) ६, २)। १. पानी भरी अंजुली, २. तिलाञ्जलि; जलअ समुद्द-पुढीप-विशेप, (प. प. मुहा०-जलांजलि देना=त्याग देना, कोई ६, ३१)। संबंध न रखना । "विहवेण रायनियडत्त- जलकंत-पु० (सं० जलकान्त >प्रा० ऐण कलहेण जत्थ कन्वगुणो। कव्वस्स जलकंत) १. वरुण, इंद्र का पश्चिम दिशा सत्य कइणा वीरेण जलंजली दिण्णा;" का विद्याधर लोकपाल; (प० अर्थात् जहाँ ऐश्वर्य से राजा के (निरंतर) ४४) । २. स्वर्ग-विमान; (जबू० ८, २, नैकट्य से अथवा कलह से काव्यगुण उत्प- २५) । न्न होता है, वहाँ उस काव्य के लिए जलकांत-पु० (सं० जलकान्त >प्रा० वीर कवि ने जलांजलि दे दी है; (जंवू० जलकंत) एक स्वर्ग विमान; (जंबू० ६, १०, १, २; की० ३, २४) । २, १३)। जलंत-वि० (सं० ज्वलन्त) जलता जलकोल-स्त्री० (सं० जलक्रीडा>प्रा० हुआ, प्रकाशमान्, देदीप्यमान्; "देव- दिन्नु जसु चक्कु जलंतउ;" अर्थात् तब जलकीला) जल-केलि, पानी में की जाने देवों ने उसे ज्वलंत चक्र प्रदान किए; वाली क्रीड़ा; (जंबू : ४, १६, ३; ३० २, २०, १३)। (व० ३, २०, ७)। जलंक्यि-वि० प्रज्ज्वलित (सं० रा० २, . जलजंत-पु० (सं० जलयन्त्र). नौका; १०७) । (भ०) । जलंती-स्त्री० (सं० ज्वलन्ती) जलन्ती 1/जलजल-(सं० ज्वल>प्रा० जल) नामक अटवी; अटवीनाम (ण० ७, १, तेजी से जलना (burn furiously)। १०)। (सुदं० ११, १५, च० ७ जलजन्नति. -अक० जलजलेजलजलजल (४०४) जलय १३)। -जलन्ति (जलजलजलन्ति) जलदेक्य-पु० जलदेवता; (भ०) । सक० (प० च० २७, ५, ७) । जलदो-पु० (सं० जलद) मेघ; (को० जलजलजलजलजल- स्त्री० (ध्व०) १, ४७)। जलती हुई वस्तु से निकली हुई ध्वनि; जलद्द-वि० (सं० जल+आर्द्र जल से (प० च० २८, २, ५)। भीगा हुआ; (ण० ३, ६, ११; प० च० जलण-पुं० (सं० ज्वलन>प्रा० जलण १५, ११, ७)। अग्नि; म० जळणे; (ण० १, ११, ५, जलन-पु० (सं० ज्वलन>प्रा० जलण) जस० १, ६, ४) । २. जलना; (सि० १, अग्नि; 'अरितेयजलणजालासंजलिया २४) । ३. ज्वलन नामक नागदेव, “करइ घरणि काणणे सयले;" अर्थात् अरि के जत्त नायहाँ जणु जलणहों;" अर्थात् तेज रूपी ज्वलन की ज्वाला समस्त ज्वलन नामक नागदेव की यात्रा के लिए घरणी रूपी कानन में संज्वलित थी; लोग चले; (जंवू० ३, १२, १६) । (क० २ १४, ७)। जलणजडि-पु० (सं० ज्वलन जटिन जल-निज्झर-वि० (सं० जल-निर्झर) >प्रा० जलजडि) ज्वलनजटी, विधा जलस्रावी, "वियलिय मयजल-निज्झर. घर वंशीय राजा; (प० च० ५, ८६) । वारण, पडिवारण-मण-दप्प-णिवारण; मलणजडी; (व० ३, २६, १४) । अर्थात् प्रतिपक्षी-हाथियों के मन के दयं जहणरोह-पु० (दे०) उरु, जंघा, जाँघ; का निवारण करने में समर्थ मद-जल- (दे० ना० मा० ३,४४) । स्रादी हावी पीलवानों के वशीभूत होकर जलणसिह-पु० १. पुरोहित (प० च. ही निकले; (व० ४, २०, ८)। ५, ३१) । २. विद्याधर राजा; (प० च० जलपाणु-पु० (सं० जलापान) जल १०, २)। पीने का बर्तन; "भरइ जलपाणु पहि- जलणिहि-पुं० (सं० जलनिधि) समुद्र; याण;" अर्थात् पथिकों के जलपानों को (जस० ४, १६, ८) । जलनिहि; (जबू० भरती थी; (जंवू० ५, ६, १०)। ६, ५, ८) । जलनिही; (सणतु० ४४६)। जलबुब्बुय-पु० (सं० जल+बुद्) लो०-"जल णिहि-सलिलु ण परताविज्जइ पानी का बुलबुला; (जंवू० २, १८, तिणहउ;" अर्थात् समुद्रं का क्या फूस की ११) । अग्नि से उष्ण किया जा सकता है ? जलमा-वि० १. जलमय, २. जडमति; (व० ४, १४, १२)। (सुदं० २, ४, १)। -वि० (सं० ज्वलन वत्) जलय-न० (सं० जलज) कमल; (प०. अग्निशिखावत् अग्नि शिखा के समान; च० १२, ३७)। पुं० (सं० जलद) (व० २,१६, ६) मेघ; (रा०)। -माल स्त्री० (सं० जलयंभिणी-स्त्री० (सं० जलस्तम्भिनी) जलद्+माला). मेघमाला; (सणतु० विद्या-विशेष; (प० च० ७, १३, ६)। ४५५) । जलयंतरगय--(सं० जलादा- - जलयुव-वि० जलयर (४०५) जलोयर जल ढोने सि० १, - । न्तर्गत) मेधों के मध्य में; (व० १, ४, हिणी-उत्तरयले;" अर्थात् - जलवाहिनी सीतानदी के उत्तर तट पर; (व० २, जलयर-पुं० (सं० जलचर) पानी में १०, ३) । २. पनिहारिन, रहने वाला जंतु; (रि० ८, ५; जंबू० वाली; (जंवू० १, ६, २०) । ११, ४, ५)। -बल पु० (सं० जल- जलवीइ-पु० पर्वत-विशेष; (प० च. घर+बल) जलचर समूह; (जंबू० ७,५, १६, १४)। ११)। जलहत्थि-पु० (सं० जलहस्तिन्) जल- जलयवाहण-पु० वानरयोद्धा; (प०. हस्ती; पानी का एक जंतु; (प० च० च० ५७, १६)। ३४, ३३)। जलरिट्ठ-पु० जलकाक, जलकोआ जलहर-पु. (सं० जलधर) १. वादल; नामक पक्षी; (महा० :१२-७)। (प्रा० ५० १, १८८) । २. एक विद्याधर जललोल-पु० (सं० जल+लोल) जल सुभट; (प० च० १२, ६५; में ऊँची उठती हुई लहर; (जंबू० ६, २, २४) । ४)। जलहरण-न० (सं० प्रा० जलहरण) जलवइ-पु. (सं० जलपति) मकर; मानिक छंद का नाम; (प्रा० ५० १, (जस० ३, ३, १)। टि:-मूल संस्कृत २०२)। शब्द 'जलपति' का अर्थ, १. समुद्र, जलहि-पु० (सं० जलधि) समुद्र; २. वरुण का विशेषण' है, परंतु अर्थ- (जंबू० ६, १४, २; क. १, २, ५)। संकोच की प्रक्रिया में इसका अर्थ 'मकर' जलिस-वि० (सं० ज्वलित>प्रा० हो गया। जलवम्म-पु० (सं० जलवम) नौका; जलिभ) जला हुआ, प्रदीप्त; (क० ३, ८, ८)। जलिय-वि० जला हुआ; (भ०) । तुल० गु० जळवू (जंवू० ५, ८, २, ३; जलवास-पु० पुष्पांजलि, "पुप्फई महा० ६८, ४)। अक्खयाउ वलि दीवा, धूव-वास जल-वास जलियख-पु० विद्याधर योद्धा; (प०- पडीवा;" (प० च० २, १७, ३) । टि०- च० ५६, ३७)। संसर्ग के कारण अर्थातरण द्रष्टव्य है। 'जलवास' का अर्थ 'जल में वसना' है; जलूग-पुं० (सं० जलौकस्) जंतु- परंतु यहां साहचर्य के कारण अर्थ में विशेष, जोंक, जल का कीड़ा; (प० च. परिवर्तन हुआ। १, २४)। जलवाह-पु० (सं० प्रा० . जलवाह) जलूगा, जलूया-स्त्री० (सं० जलौकस्) जतु-विशेष; (प० च० ८८, ६) । जंतु-विशेष, जोंक; (प० च० १, जलाहिणी-स्त्री० (सं० जल+वाहनी) २४) । जलवाहिनी, नदी, नहर; "सीया जलवा जलोयर-त० (सं० जलोदर>प्रा० जलोल्ल (४०६) जदिय १) जलीयर) रोग-विशेप; जलंधर; (जंवू० (जंवू० अनाज-विशेप, (३० ८, ५, १०)। ३,११,३)। -खेत्त; (ण० ३, १४, ५) । ~णाली जलोल्ल-वि० (सं० जलार्द्र) जल से स्त्री जी की नाली; "जवणाली- भीगा हुआ; (ण० ३, ८, ६)। सन्निह," जो की नाली के सदृश (थव- जलोल्लिय-वि० (सं० जल+आर्द्र) जेन्द्रिय का आकार); (व० १,११, जल से भीगा हुआ; (क० ६, १, २) । ८) । जलोह-पु० (सं० जल + ओघ) जल जवण-न० (दे०) हल की चोटी; (दे० समूह (प० २, ८, ६)।-र पुं० जल ना० मा० ३, ४१)। न० (सं० जपन) समूह, ल की धारा; "हाइ व ससि जाप, पुन; पुनः मंत्र का उच्चारण;(प.. कंत-जलोहरेहि," चंद्रकांत मणि की जल च० ८६, ६०)। पुं० (सं० यवन) धाराओं से ऐसा लगता है, जैसे नहा १. म्लेच्छ, देश-विशेष; (प० च०६८, रहा हो; (प० च० १, ५, ५) । ६४) । २. मनुप्य-जाति-विशेप; (संवि० जल्ल-पु० (दे०) पसीना, "जल्लमल १०, २, ३)। विलित्तसरीरएहि;" अर्थात् उनके शरीर जणालत्त-पु० (सं० यवनाल+त्व) पसीने के मल से विलिप्त थे; (जस० ४, जौ (अन्न-विशेष) के दाने, (ण० ६,७, १६, १४)। जल्लोसहि -स्त्री० (सं० जल्लोषधि) जणिना-स्त्री० (सं० यवनिका>प्रा. ऋद्धि या आध्यात्मिक जवणिमा) परदा; (दे० ना० मा० ४, शक्ति, जिसके प्रभाव से शरीर के मल १)। से रोग का नाश होता है; (जस० ३, जवणी-स्त्री० (सं० यवनी>प्रा० ३७,३)। जवणी) परदा, आच्छादक /जव -- (सं० जप्>प्रा० जव) जाप ना० मा० २, २५) । करना, बार-बार मन ही मन देवता का स्मरण करना। जविउ जवय, जवरय-पुं० (दे०) -सक, भू० का० जाप किया, ".. मंतु तेण जविउ" (ण० अंकुर; (दे० ना० मा० ३, ४२) । ४) । जवेइ-जाप किया, जवल-वि० (दे०) सदृश; "अरे कम- "जवेइ मंतु;" (जस० ४, २६, ५) । मानस-जवलि लहिं कुमुदिहिं सोहिया जव-अव्य० (सं० पदा) जब; (प्रा० तलाय;" (प्रा० गु० २१, ६)। पं० १, २०४; रां० ३६) । जवे--अव्य० जबालउ-० (सं० जव (वा) जद; "हिण्डए जवे भावथि;" वूमने के सालअ (मत्वर्थीय) गति; (जस० :, ३५, लिए जव आते थे; (को० २, ११३) । २) । पुं० (सं० प्रा० जव) १. वेग, शीव्र वेग, शीघ्र जब्यि-वि० (सं० जपित) जाप किया गति; (जंबू० ५, ५, १५) । २. जौ, हुआ; (क०७, १२, ८) । एक प्रकार की पर; (दे०- यवका + - जब्वेल (४०७) जिस समय मे कूच जवेल -अव्य० (दे०) जब, (at the जसनायरण-पु० (सं० यश भाजन time when, when (प० च० ३७, >प्रा० जस+भायण) यश का पान; १३, ३)। (ण० ७, ८, ७)। जषणे-कि० वि० जिस समय; "जषणे जसमइ-स्त्री० यशमती, श्रेण्ठि पत्नी; चलिअ सुरुताम;" अर्थात् (जंवू० ३, १०, १३)। सुलतान किया; (की० ४, जसमई-स्त्री० चक्रवर्ती जयसेन की १२२)। माता; (प० च० २०, १५३) । जस-वि० (सं० यादृश) जैसा, समान; जसरह-पु० इक्ष्वाकुवंशीय राजा; (प०- (की० १, ७५)। च० २२, ६६)। जस-पुं० (सं० यशत् >प्रा० जस) जसरासि स्त्री० (सं० यशस्+राशि> कीति; (व०१, ५, ६; प्रा० ५० १,८७; प्रा० जस+राशि) यश का पूज; (ण० ण० १, २, १०)। ---उज्जल वि० (सं० ७, ६, ८)। यश+उज्जवल) धवल यशस्वी; (जंवू० जसवंत-वि० (सं० यशस्विन्) यशस्वी; ७, १२, १६)। -कित्ति स्त्री० (सं० (०६, २, १०) । यशः+कीति) यश-प्रसिद्धि; (ण० ६, २, जसवइ-स्त्री० यशोमती, स्त्री-विशेष- १०)। --लंपड वि० (सं० यशलम्पट) नाम; (प० सि० च० १, १३) । यश का लोभी; (जंवू० ६,७, १०)। जसवई-स्त्री० चक्रवर्ती सगर की माता, -लुद्ध वि० (सं० वि० (सं० यशोलुब्ध) यश के यशोलुब्ध) यश के (प० च० २०, १०६)। लोभी; (क० ८, १८, १०)। जसहद्द-० (सं० यशोभद्र) मुनि; जसइ-पु० जसई; वीर कवि का तीसरा (क० २, ७, ५)। अनुज; (जंबू०)। जसहर–पुं० (सं० यशधर) १. राजा- जसघंट-पु० (सं० यश;+घण्टा) यदा विशेष-नाम (५० च० ५, ११७)। का घण्टा, "चाइचाय-वज्जियजसघंटहे" २. सगर के पूर्व जन्म गुरु, मुनि-विशेष- दानियों के त्यांग के यश का घंटा वजाया नाम; (प० च० २०, १०८) । २. यशो- जा रहा था; (ण० ३, १२, ४) । धर मुनि, मुनि-विशेप; (क० ५,८, जसणिरंव-० (सं० यश--निकुर- १०)। म्व, निकुरुम्ब) यश का पुज; (ण० ५, जसालउ-वि० (सं० यशः+ आलय) ११, ६)। यशस्वी; (ण० २, ८, १३) । जसपटह-पु० (सं० यश+पटह>प्रा० जसु-सर्व (सं० यस्य >प्रा० जस्स) जस०+पडह) यश का डका; (जंवू० १, जिसके, जो का वह विकारो रूप जो उसे '५, ३)। विभक्ति लगने के पहले प्राप्त होता है; जसवंघुर-पु० यशोबधुर, राजा-नाम (महा० ६६, १५, २; सं० रा० २, विशेष; (जस० १, २३, १)। ७०) । वि० जिस, जो का वह रूप जो जसोयरे (४०८) ३८६, १ः तहिं अव्य० - . D यथेच्छम्) इच्छा . उसे विमक्तियुक्त विशेष्य के साथ आने जहि, जहिं) जहाँ; (हे० ३४६; महा० से प्राप्त होता है; (णे० ३, २) । ६८, ७; ण० १, १३, ६)। जहि; जसोयर-० वानरयोद्धा; (प० च० (प० च० १३, ६, ४; हे० ५७, १६) 1 प० च० २,७, ३)। जसोह-पु० सं० यशोह, यशोधं, यश (सं० यत्र-तन्त्र) जहां-तहाँ; (सरहा, ओघ, यशोधर के पिता का नाम; (जस दोहाकोश)। १, २३, २) जहिच्६-~-वि० (सं० जतोहणा-स्त्री० यशोधना, रानी का या कामना के अनुसार; (प्रा० १० १, नाम, (जस० ३, ३, २)। ६६)। जसोहर-पु० मुनि-विशेप-नाम (प०- जहिच्छा--अव्य० जहिच्छा--अव्य० (सं० यथा-+ इच्छा) च० ३१, ११)। इच्छा या मन के अनुकूल; (जंबू० ६, १, जस्स--सर्व०, वि० (सं० यस्य >प्रा० १४)। जस्स) जिसका; (की० १, ४८) । जहिच्छिय-वि० (सं० यथेच्छित) यथे- जह-अव्य० (सं० यथा>प्रा० जह) प्सित, इच्छानुसार; (भ०)। जैसे; (प्रा० ५० १, ३४; क० ३, १, जही-अव्य० (सं० यथा>प्रा० जहा, १२)। जह) जहाँ; (प्रा० पै० २, १२६)। Vजह-(सं० जहाति, /हा) छोड़ना जां लगि-अच्य० (सं० यादत्); ..जब त्यागना, परिहार करना; (उ० व्य० प्र० तक; तुल० गु० ज्यां लगि; (संधि० २०, ७-२६)। २, ४)। जहणूसव, जहणूसुअ-न० (दे०) स्त्री 1/जा-(सं० जन् >प्रा० जा) उत्पन्न को पहनने का वस्त्र-विशेष; (दे० ना.. होना, पैदा होना । -इ अक० । जापा -मा० ३, ४५)। (जाता) -~-भूत कर्म० कृदंत हुई, पैदा जहन्न-वि० (सं० जघन्य >प्रा० जह- हुई; (प्रा० ५० १, ६२) । जाइअ-भू०- पण, जहन्न) निकृष्ट, अधम, (व० १०, का० उत्पन्न किया; (को० २, ६३)। १६, ११)। जाउ-भू० का० (सं० जात) उत्पन्न जहां-अव्य० (सं० यत्न >प्रा० जत्थ) हुआ; (व० २, ३, ३)। जहां; (उ० व्य० प्र० १५-३) । /जा-(सं० या>प्रा० जा) जाना, जहा-अव्य० (सं० यथा>प्रा० जहा, गमन करना, (सं० रा०)। -इ अक०, जह) जैसे, जिस तरह से; (जस० १०, व० (सं० यापय् >प्रा० जाव) गमन १, ३; की० ४, २०६) । करना, गुजारना; (क० १, १२, ६ जहानाय-वि० (सं० यथाजात) दिगं की० २, १८२) । २. (सं० याति/या वर, नग्न; (ण० २, ३, ८)। प्रा० जाइ) जाना; (ण० १, १०, १; उ० जहि-अव्य० (सं० यत्र>प्रा० जह) व्य० प्र० ५, २४) । :-इज्जइ कर्मवाच्य क (४०६) जाउं "णं सग्गा जाइम-वि० कृ० (सं० यायते) चला जाए; (हे० ४१६, जाआ-स्त्री० (सं० जाया) पत्नी, (प्रा० २)। -इआ कर्मवाच्य (सं० यायते) पं० १, ११९) । (उ० व्य० प्र० १६, १४) । जन्ति- जाना-स्त्री० छंद-विशेष; उपजाति छंद जाना; (हे०३६५) । -इवि पू० का० का भेद; (प्रा० पं० २, १२१) क्रि० (क० २, २, ६)।-उ लोट जाई जाई-सर्व० (सं० यान्, यत् लकार (सं० यातु) जाए; (हे० ४२०)। (जो) की द्वि० वि०, व०) जो-जो; --ए व० जावे; (ण० ४, ५, ८)।-ए (जंबू० ४, १२, १४) । पू.का० कि०, जाते हुए, जाइ-स्त्री० (दे०) सुरा, मदिरा, दारूं; मग्गा जाए आगा लुज्ञा उखा हेरंता;" (द० ना० मा० ३, ४५) । अर्थात् स्वर्ग की इच्छा से ऊपर जाते हुए जार-स्त्री० (सं० जाति >प्रा० जाइ) ऊपर (मेनकादि को) ढूंढ रहे हैं; (प्रा० १. जन्म, उत्पत्ति (को० ४, ८४; क० ६, पै० २, १७५)। -एसइ भू० का०; ८, ४) । २. जाति; (ण० ३, ६, ४)। (प०५० १६, १०,६)।-एसमि भ० ३. पुष्प-विशेष (ण० १, १०, १)। का०, (जंबू०.१०, ११, ५) । जन्तें २०. (सं० याचित>प्रा० जाते हुए; (प० प०च० ५, १,८)। जाइअ) मांगा हुआ; (भ०)। जन्तिएँ-व० कृ०, स्त्री के लिए प्रयुक्त; जाइमा-वि० (सं० याचक>प्रा. (प० च० १४, ३, १)। जाघि--40, जायग) जायज, जाइस, मांगने वाला; अन्य . पु०, २०.. जाते है; (: (को० २, "सागर गिरि अन्तर दीप दिगन्तर जासु १११)। जायतु जाय-(सं० यात >प्रा० निमित्तै जादा;" अर्थात् समुद्र, पर्वत, जाय= गत) जाय तो जाए; (वैराग्य- द्वीप और देशांतर से जिसके कारण सब सार)। -यवि पू० का० क्रि० (जंवू० लोग याचक बनकर एकत्र हुए थे; (को० १, १५. ४)।-हि विघ्यर्यक, म० पु०, २, २२४)। ए०; (जंबू० २,. १५, ६) । हु ना०, जाईसर-पु० सं०>जाति+स्मर पूर्व व०; (प० ३, ४,१०)। के अस्तित्वको स्मरण करना, पूर्व-भव- जा-अव्य० (सं० यावत् >प्रा० जाव, स्मरण; (ए०च० ३५, २.-१; प्रा० गु० जा) जव; (प० च० १२, ३, २; क० १, १४, ३२)।. १२, १)। जाईहल-पु० (सं० जातिफल >प्रा० जा-वि० सं० यद) जो, (रा० ५; की० जाइफल) जायफर, २, ४१)। विशेष, फल-विशेष, एक गर्म मसाला; जाअ-वि० (सं० जात>प्रा० जाय) (सं० रा०) जनमा हुना, उत्पन्न; (ण० ४, ५, ८; जा-वि० (सं० पावत्) जितने भी; जंबू० ५, १, ४; जसं०.१, ८, १)। (रा० २८) । जाउँ-अव्य० (सं० 1 जातिफल, वृक्ष- .
(४१) जामती वाला; व्य० प्र० . यावत्) जब तक; (ह० ४०६, २) । जाटर-पुं० (६०) कपित्य वृन; (द०. ना० मा० ३, ४५)! जाव्हाण-पुं० (मं० यातुधान) रानस; (सुदं० ६, १६, ५)। जाख-पुं० (सं० यम>प्रा० जक्व) यन; (प्रा० गु० ७, ५१) । /जाग—(सं० /जागृ>प्रा० जग, जागति) जागना, जागते रहना; (उ०. ५०-२१) । जागतिय-कृ० जागती हुई; (सं० रा०)। –रवि पू० का०शि० (क० १०, १७, ६) जागु-० का०, जागा, जाग उठा; "पितृवैरिकेसरि जागु;" अर्थात् पितृ वैरी के लिए सिंह जाग उठा; (की० २, २६)। जागोल-० (सं० जागन्ति+इल्ल प्र०) पहरेदार; (जं० ५, ७, २३) । जाचंध-वि० (६० जात्यन्ध, जाति+ अन्य) जन्म से बंधा; (प्रा० गु० ४०, ४)। जाचक-वि० (सं० याचक>प्रा० जायग) मांगने वाला; (की० १, ७२)। जाडो-स्त्री० (६०) मुरमुट, वृक्षों का मुंड; (दे० ना० मा० ३, ४५) । जाडें-० (सं० जाड्येन) १. बालस्य से २. वेदकृप्ती में, निष्क्रियता से, "ना. सलुह" जायेन संलुवति, (उ० व्य० प्र० ५२-२१) । नाल-मुं० (सं० यान >प्रा० जाण) स्यादि वाहन, सवारी; (ण० १, १५, ६; पन० १,२६, ६) जाल'-मुं० (स० यन>प्रा० जन्म) यन; (मि० १, १५)। जाग'-वि० (सं० जानिन् >प्रा० अप० नाणि>अद० जाग) जानने तुल० गु० जाण;(को०३, १६०; २०१, १, १०) । वि० जात (म०)। जाण-(सं०/जा, सं० जानाति > प्रा० जाणइ) जानना नान प्राप्त करना; (सं० रा०) । -इ, ३० (ह०. ४०१, ४)। -3, भू० का० सम; (हं० ६६१)। -3, जाना, जानी गया (पाहु०४८, ० ३, ४, ६) । -नि, १०, कि०, ए०.जानना; (प० १० ११, ५, ५) । -विउ भू० का० जताया; (द० २, ४, ५)1 -सि व०, म० पु० (ट० व्य० प्र० १९-३०)। -मु, जानी (०४, ३, १)। -हि, व० ए० (न. ६, १३, ८)। -हु, व० क्रि०,० (प० च०२, १६, ६) है,३० क्रि०, मा० (५० च० ४, ५, २)। -तहाँ व० कृ०, जानते हुए; (प० ३० ३, २, ७) । जाणवि-पू० का० क्रि०, जान कर (५० च० ५, ५, ७)। पुं० (सं० ज्ञान) ज्ञान, बोध (सं० रा०)। जाणेहु-बाना, (प्रा० ५०..१, ८) । तुल० राज० जाणवो, गु० जाणवू। जागई-स्त्री० (सं० जानकी) सीता, राम-पत्नी; (प० च० १०६, १८)। जाणएँण-वि० सं० नातृ>प्रा. जाणग, जाणय) जानकार, ज्ञानी, जानने वाला; (५० १०६, ३, २)! जागको-स्त्री० जानकी, जनक की पुत्री जाणय (४११) जोम -न० सीता; (प० १० ११७, १८) । वार्ता के जान;" अर्थात् 'महल के भीतर जाण्य-वि० (सं० ज्ञात) बुद्धिमान् की वात कौन जान सकता है; (को० २, पुरुप, (भ०)। २४७)। जाणवत्तु-० (सं० यानपात्र) जहाज; /जान-(सं०/ज्ञा>प्रा० जाण) "हा हा जाणवतु किज्जउ पिरु;" अर्थात् -इव, सक० जानना; "दान खग्गको अरे अरे जहाज को रोकिए ! (जंवू० १०, मम्म न जानइ" अर्थात् खड्ग दान के ११, ७)। रहस्य को नहीं जानता; (की० २, ३८) । जाणायरु-पु० (सं० ज्ञान+आकर) जानन्ता- भू० का०, परिचय रखते थे; ज्ञान की खान; (जस० ३, १७, १२) । (को० २, २२२)। जानत-भू० का०, जाणावण (सं० ज्ञापन>प्रा० जानो, (को० १, ७२) । जानलि-भू०- जाणावण) ज्ञापन, बोधन; (प० च० ११, का०, जाना; (की० २, २४१) ! ८८)। जान-पुं० (सं० जन्ययात्रा>प्रा० जाणाविय-वि० (सं० ज्ञापित >प्रा० जण्ण-जत्ता, जन्नता) जनेत, वरात, वर- जाणाविय) विज्ञापित, जनाया, निवेदित; यात्रा; "हरख धरता जानई चलिया (प० च० ५, १२, ४)। वाजई ढोल-नीसाण;" (प्रा० गु० ११, जारिणअ-वि० (सं० ज्ञात >प्रा० ११) । -उनि स्त्री०वरात; "सोल सहस जाणिअ) जाना हुआ, विदित; (क० १, गोपी मिली ए जानउनि चालइ मन- २, २; म० १, ४, २)। जाणिय; (ण० रुली;" (प्रा० गु० २६, ४) । २, ६, १)। जान्त-पु० न० (सं० यान् >प्रा० जारिणय-वि० (सं० ज्ञात) १. प्रसिद्ध, जाण) वाहन, यान; 'जान्त आछ' (जस० १, १२, १३)। २. विदित; –यानास्ते, स्त्री तु यान्ती, कुलं यात्; (जंबू० ४, १७, २)। (उ० व्य० प्र०७-१७)। जाणु-न० (सं० जानु) जानु, घोंटू, जाम –क्रि०वि० (सं०यावत् >प्रा० जाव, घुटना; (भ०) । -य न० (सं० जानु जाम) जब तक; (ण० १, ३, १२; सं०- +क) घुटना; (जस० ४, २२, १६) । रा०; जस० ३, १३, ११) । -हिं जव; जात-(सं० यात्रा>प्रा० जत्ता) देशां- (हे० ४०६, ३)। -हि जब; (जंबू० ६, तर-गमन, देशाटन; (प्रा० गु० ७, ५, ६) । अव्य० जैसे ही, "उब्भिय चउ ४५)। माणथम्भ जाम," -जैसे ही चार मान जादर-पुं० (दे०) बाहुमूल्य वस्त्र स्तंभ बन कर तैयार हुए; (प० च० १, प्रकार; "पहिरणि जाकर-चीरू;" (प्रा०. ७, ८)। पुं० (सं० याम>प्रा० जाम) गु० ११, ७)। प्रहर; (जंबू० ४, ५, १५) । न० (सं० जान-पु० (सं० ज्ञान >प्रा० जाण) जन्मन् >प्रा० जन्म) जन्म; (हिं० का०, ज्ञान, जानना;" एवाप अभ्यन्तर करी च० ४०)। .
जाम (४१२) जाल ५)। - . - /जाम-(सं० जम>प्रॉ० जम्म; सं० जायते) उत्पन्न होना; (उ० व्यं० प्र० जायवेत्र-पु. (सं० जातवेदस्) अग्नि; १५-२०)। (ण० १, १६, ७)। जायवेउ-पु. जामाइय, जामाउय-पु० (सं० जामातृ (सं० जामातृ अग्रि; (व० १, ५, ३) । +क>प्रा० जामाउय, जामाउ) जायसकुल-पु० जैसवाल कुल, आश्रय- जामाता, लड़की का पति; (भ०)। दाता नेमिचंद्र का; (व० १, २, ३)। जामाएँ (प० च० ११, ११,६). जाया-स्त्री० (सं० प्रा० जाया) पत्नी; जामाय, (ण० ५, ८, ११) । जामाय (जंवू० १०, ६, ४)। पु० (सं० जामातृ) जामाता; (ण० ५, जार-पु. (सं० प्रा० जार) १. व्यभि- ८, ११; क० ७, ८, ५)। चारी; (जंवू० १०, १०, ५)। २. उप- जामिणि-स्त्री. (सं० यामिनी >प्रा० पति; (जस० २, ८, १)। ३. विट; जामिणी) रात, रात्रि; (सं० रा०; जंबू० (सि० १, ४५) । -सत्त (जारासत्त) ३, ४, १०) । जामिणी-स्त्री० रात्रि; वि० (सं० जार+आसक्त) जार पर (व० २, ३, १५; क० १, ८, ५) । आसक्त हुए (नेत्रों के तारे); (जस० ३, /जाय--(सं०/या>प्रा० जा) उत्प १०, ६)। न्न होना । -~-इ व०; (जंवू० ११, १, जारिस-वि० (सं० यादृश>प्रा० १३)। --हि (विधि०) (जंवू० ४, १४, जारिस) जैसा, जिस तरह का (जंबू० ६, १४)। १६, ७)। जाय-वि० (सं० जात) जन्मा हुआ, जालंधर---पु० (सं० जालन्धर>प्रा० उत्पन्न; (ण० ६, ३, १; क. १, १७, जालंधर) उड़ीसा में नगर-विशेष, "महा- १०; जस० ३, १०, ६)। उड्डियाणं च जालंधरं;" (जंबू०६; १६, जायअ--वि० (स० १५)। जायग) माँगने वाला; (जस०) । जालंधरि-स्त्री० कदली, केला; (सं०- (सं० याचना>प्रा० रा०)। जायणा, जायण) मांगना; (जंबू० ६, जाल--पु० (सं० ज्वाल>प्रा० जाल) १३, १४)।. ज्वाला; अग्नि शिखा; तुल० . म० जाळ; जायमित्त -पु० जातमिन, इंद्रमित्र, (उ० व्य० प्र०.१५, २३; जस० १, ६, (व०८, १७, ६)। ४) । २. न० (सं० प्रा० जाल) समूह; जायर---पुं० (सं० जागर) १. जागरण, (जंबू० ७, ६, १०) । ३. जाली; "जाल २. जागृत अवस्या को मन सृष्टि; (जंबू० जालओष;" अर्थात् जाली के झरोखे; ६, १६, ६) (की० २, ८५)! -ओष न० जाल- जायव-पु. स्त्री० (सं० यादव>प्रा० गवाक्ष; (को० २,८५). जायव) यदुवंश में उत्पन्न; (ण० ६, २२, /जाल-(सं०/ज्वालय्) जलाना, । - . याचक>प्रा० जायण-न० । - जालउर (४१३) जि जाखडी, दग्ध करना। -इ व० (जंवू० ११,१३, शिखा; (५० च० ८, २, ६)। ६; जस० ३, १२, १३) । जालेवि जाव-अव्य० (सं० यावत्) जितना, पू० का० कि०, जलाकर, दाह संस्कार जव; (क० १, १३, १; प्रा० पै० २, कर; (व० १०, ४०६; प० सि० च० २, १६९; जंवू० २, १, १२)। -हिं अव्य० १, ४६)। जैसे ही; (प० च० ३, ४, ८) । --हि जातउर-पु० जावालिपुर, तुल० राज० अव्य० (२० यावत् + हि, यावधि)। जब जालोर; (प्रा० गु०१२, ४८) । तक; (म० १, ३१,१०)। जालगवदख -न० (सं० जालगवाक्ष) जावय-पु० जपा-कुसुम; (व. ७, १४, गवाक्ष-विशेष, कारीगरी वाले छिद्रों से १०)। युक्त छोटी खिड़की; (जस० ३, २६, जायरी-स्त्री० (सं० यक्ष>प्रा० जक्स १६)। >अव० जात+डी प्र०, जालघडिआ-स्त्री० (दे०) चंद्रशाला, जाखरी) नट्टिनी, नाचने वाली, अट्टालिका; (दे० ना० मा० ३, नर्तकी; (की० २, १८६) । ४६)। जास--सर्व० (सं० यस्य) जिसका; जाला -स्त्री० (सं० ज्वाला>प्रा० (व० १.१६, ६) जासु-सर्व० जिसकी; जाला) अग्नि की शिखा; (ण० ७, १३, (की० १, ४३)। ६;व० ५, २२, ६; सि० १, १७) । ' जासवण-पुं० (सं० जपासुमनस् >प्रा० जालाकलाव-पुं० (स० ज्वाला+ जासुमण, जायण) सातौन या गुडफल कलाप) ज्वालावलि, "लग्गग्गिजालाक नामक पुस्प; "मणि जासवणहेउ कि लावेण," अर्थात् उस अग्नि ज्वालावलि के दिज्जइ," अर्थात् क्या कोई जासवन लगने से; (जस० ३, १३, १०) । (जासोन या गुड़फल) के पुष्प के लिए जालामुख-पु० (सं० ज्वालामुख) मणि देता है; (जस० ३, २५, १३) । अग्निमुख, वैताल; (जंबू० ७, ६, ८) । जासि--सर्व० (सं० यत्या जिसका;. जालाबलि-वि० स्त्री० (सं० ज्वाला (व० व० १, ६, ८)। आवलि) ज्वालामुखी, "धूमाविल- जासु-सर्व० (सं० यस्य >प्रा० जत्त) जालावलि हुआसु;" अर्थात् घूम से व्याप्त जिसके; (हे० ४२०, ३)। ज्वालामुखी अग्नि से युक्त; (व० ५, जाहां--अव्य० (सं० यन) जहां; (उ०- २२, १०)। व्य० प्र० १५-२) । जालिय-वि० (सं० ज्वालित>प्रा० जाहे-सर्व० (सं यस्मै) जिसके लिए; जालिय) जलाया हुआ, प्रकाशित; तुल० (उ० व्य० प्र० १५-१) । म० जालला; (जंवू० ८, १५, ४) । जिव-अव्य० (सं० यया) जिस प्रकार; जालोलि-स्त्री० (सं० - ज्वाला! तुल० म० जेवि०; (भ०; विला०)। आवलि, आवली) ज्वाला, अग्नि की जि- अव्य० (पादपूरणार्थमव्ययम् जिअ (४१४) जिणदेमण . (प० च० - उ० पु०, पू० जिअ) १. एव, निश्चय ही, खनु, चैव, एक जिण-पु० (सं० जिन >प्रा० जिण) निश्चयार्थक शब्द, ही, २. भी; तुल० म० बुद्ध देव, बुद्ध भगवान्; जिन, जिनेद्र; चि, च; गु० ज; हे० ४, ४२०; सं0 (व० १, २, २; जंवू० ३, ३, ५; दे.. रा०; जंवू० १, १४, ५, ण० १, ५, ना० मा० १, ५) । -दत्त पुं० (सं० २)। जिनदत्त) जैनाचार्य-विशेष; जिस-वि० (सं० जित) जीता हुआ, २०, ११६)। -वर पुं० (सं० जिनवर) पराभूत; (रा० ४२; जंवू० ७, ८, अर्हन, देव, (प० च० ११, ४)। १४)। 1/जिण~ (सं० जि०, प्रा० जिण) १/जिम-(/जि) जीतना । जिणइ- जीतना; वश में करना; (सं० रा०) । व० (प्रा० १, १५७)। -इसक०,व० (सं० जयति,>प्रा० जिअ-पुं० (सं० जीव >प्रा० जिम) जिण, जिणइ); (जंवू० ५, ६, १४; के० प्राणी, आत्मा; (प्रा० पैं० २, ६१) । ८, १३, ४)। -मि व०, जिइ दिय, जिएं दिय-वि० (सं० जिते- ए०, (प० च० १६, १२, ६)। -पंति न्द्रिय) इंद्रियों को वश में रखने वाला; व०, ब० (ण० १, ४, २)।-णिवि (प० च० १४, ३६)। का० क्रि०; (जंबू० ६, १४, १)। जिणे- जिउ-पु० (सं० जोव>प्रा० प्पि-पू० का० कि०, . जीतकर; (हे. जानवर, (जंबू० ६, १, १७; की० २, ४४२)। जिणे वि-पू० का० क्रि०;(प०. १८१)। च०४, १०, १)। जिके--सर्व० (सं० यत्) ये "केवलि- जिरण कित्तण-पु० (सं०जिन+कीर्तन) भासिय- रीति जिके नवकारु अराहहिं, जिन भगवान का कीर्तन; (जंबू०. ८, ८, तुल० राज० जिके, (प्रा० गु० ४०, ६) । २)। जिगण-वि० जीतने वाला; (सं० जिगीषु-वि० (सं० जिगीषु) विजयेच्छु, रा०)। विजयार्थी; (की० ३, ६०)। जिरगणाहपु० (सं० जिननाथ>प्रा. जिगीसए-स्त्री० (सं० जिगीपा) जीतने जिणनाह) जिन-देव, अहंन देव; (व० २, की इच्छा; (व० ६, १, ४) । ४, १०; जंवू० ३, १३,. १३).। जिग्विअ-वि० (दे०) सूघा हुआ; जिगण्हवण-~० (सं० जिन+स्नपन (दे० ना० मा० ३, ४६) । >प्रा० जिण <ण्हवण) जिन भगवान् का जिछ-पु० (सं० ज्येष्ठ>प्रा० जिट्ठ) स्नान; (जंबू० ३, ३, १७) । ज्येष्ठ मास; (जंवू० ४, ३, २) । जिणतअ-पु० (सं० . 'जिन+तपस्) जिणंद-पु. (सं० जिनेन्द्र) जिनेंद्र, एक तपस्या; (ण० ६, ५, १)। वुद्ध, एक जैन संत; (व० २,६, जिएदसण-पु. (सं० जिनदर्शन) जिन- १)। धर्म; (जंबू० २, १८, २) । - - - जिणदत्त (४१५) जिणवयधर - " जिणदत्त-पुं० श्रावक, गृहपति (प० च० ८)। २०, ११६)। जिणमंदिर-पु० (सं० जिनमन्दिर) जिण दिख-स्त्री० (सं० जिन-+दीक्षा जिन या अर्हन् देव का मंदिर; (जस० ३, >प्रा० जिण+दिक्खा) जिन-देव के ३१, २)। द्वारा दीक्षण, प्रव्रज्या देना; (व० १, जिण मइ-स्त्री० (सं० जिनमती) स्त्री- १५, ३; जस० १, १३, १२) । नाम-विशेष; (जंवू० ४, ७, २)। जिणदिछ -वि० (सं० जिन+उप- जिण नई-स्त्री० वानर सुग्रीव की पुत्री; दिष्ट).जिन द्वारा उपदिष्ट; (जंवू० ३, (प, च० ४७, ५४)। ६, १६)। जिणनग्ग-पुं० (सं० जिनमार्ग) जैन जिणधम्म-पु० (सं० जैनधर्म) जैनधर्म धर्म का मार्ग; (जस० १, २६, (व० २, ५, ३) । २. जिन धर्म; (जस० ३) ।। ४, ६, ५)। जिणमय--पु वानरयोद्धा; (प० च० जिणनाम-पुं० वानरयोद्धा; (प० च० ५७, १६)। ५७, १६)। जिणयत्त-पु० (सं० जिनदत्त) पुरुष- जिणनाह-पु. (सं० जिननाथ >प्रा. नाम; (जस० ४, २६, २) । जिणणाह) जिन-देव, अर्हन् देव; (व० १, जिणयास-पु० जिनदास, पुरुष-नाम- ७, ३)। विशेष; (जंबू० ४, २, ५)। जिणपउमरुइ-पुं० श्रेष्ठिपुत्र; (प० च० . जिणवंदरण--न० (सं० जिन+वन्दन > १०३, ३८)। प्रा० जिणवंदण) जिन-वन्दना या स्तुति; (सं० जिन+ (जंबू० १, १४, ११)। प्रतिमा) अर्हन देव की मूर्ति; (जंबू० ५, जिणवइ-स्त्री० जिनवती. स्त्री-विशेष- १०, १५)। नाम; (जंबू० ४, २२, ८)। ~णाह पु. जिणपय-पु० (सं० जिनपद) भगवान् (सं० जिनमतीनाथ) वीरकवि; (जंवू० १, जिन के चरण; (जंबू० १, ४, ६) । जिणपुंगम-पु. (सं० जिनपुङ्गव) जिणवइरसेण- जिणवइरसेण-पु० पुंडरीगिनी का जिनश्रेष्ठ; (जंयू० ४, १, ५)। राजा; (प० च० २०, १०७) । जिणपेम्म-पु. वानर योद्धा; (प० च० जिण वयण-पु० न० (सं० जिनवचन) ५७, १६) । जिन की उक्ति या कथन; (जस० २, जिण मत्ति-स्त्री० (सं० जिनभक्ति) जिन १५, ७)। भगवान् की . भक्ति; (व० २, ५, जिणवयधर-वि० (सं० जिन+वद+ २०)। धर>प्रा० जिण+वय+धर) जिन- जिणभवन-पु. (सं० जिनभवन) जिन वचन को धारण करने वाले; (जंबू०.४, भगवान् का मंदिर; (जंबू० ३, १३)। . ६, १)।
जिणवर (४१६) जिप्प - जिणवर-पुं० (सं० जिनवर) अहंन् जिसर.-पु (सं० जिनेश्वर) जिन देव; (जंबू० ३, ७, १५; जस० ३, ३०, देव; (प० च० २, २३; जंवू० ४, ४,३; ४)। व० १, ११, ४)। जिणेसुर-पु. जिणवरिद-पु० (सं० जिनवरेन्द्र> जिनेश्वर; (जंवू० ४, ४, ३) प्रा० जिणवरिंद) अर्हन् देव; (जंबू० ४, जिण्ण-वि० (सं० जीर्ण>प्रा० जिण्ण) १, १३)। पुराना, जर्जर; तुल० गु० राज० जूनू; जिणसुत्त-. (सं० जिनसूक्त) जिन- (प्रा० ५० १, ३; ण० ३, ११, १)। सून, जिनभाषित, (जस० १,१५, जिण्णोन्मवा-स्त्री० दि०) दूर्वा, दूभ; १४)। (दे० ना मा० ३, ४६)। जिणसेन-पु० (सं० जिनसेन) पुरुप- जित्त-वि० (सं० जित>प्रा० जिअ) विशेप-नाम; (जंवू० १०, २१, ३)। जीता हुआ, विजित; (क० २, ११, २; जिणहर-न० (सं० जिन+गृह >प्रा० २, ३, १५, ण. जिमघर) जिन-मंदिर; जैन-मंदिर; (ण० जंबू० ३,६, २, ७, ६; जंबू० ८, ३, २४; प्रा० गु० १)। जित्तउ-क्रि०, भू० का० (सं०/जि) ६, ३५; व० १, १२, ७) । जिणाल-पु० (सं० जिनालय) जिन- जीत लिया; (महा० ६६, ४,८) । देव का घर; (प० च० ६, २, ५) । का० क्रि०, जीत कर; जिणाहीस-पु० जिनाधीश; (व० ८, (की० ४, २१३)। १०, ८)। जित्तवेरि-वि० (सं० जित+वैरिन्) जिणिद-पुं० (सं० जिनेन्द्र) जिन भग- वैरियों को जीतने वाले; ' (ण० १, ६, वान् (जस०३, २६, ११) । -चंद ४)। पुं० (-चन्द) जिन-देव; (प० च० जित्तसिरि-स्त्री० (सं० जितश्री) श्रेष्ठि- ६५, ३६)। जिणि-सर्व० जिसने; (प्रा० ५० १, कन्या; (जंवू० ८, १०, ११) । २०७)। जितिउ-वि० (सं० यावत्) जितना जिणिय-वि० (सं० । जित) पराभूत, बड़ा, जहां तक व्यापक . हो; (परम० २, वशीकृत; (के० ८, १३, ५)। ३८)। जित्य-अन्य० (सं० यत्र) जहाँ; (व० जिगुत्त-वि० (सं० जिनोक्त) जिन द्वारा कहा गया; (जस० ४, १७, १, ३, ७) । जित्यु; (जंवू० . २, ११, ६; २२)। म० १, ३७, १०)। जिशुद्दि-वि० (सं० जिन+उप- /जिप्प-(सं/जि कमणि) जीतना, दिष्ट) जिन द्वारा उपदेश दिया हुआ; (जस० १, २१, ८; व० १, १४, ११) । (जंवू०४, ५, ५)। -इ व० सं० जयति, प्रा० जिणइ) जित्ति-पू० जिम (४१७) जीआ . उत्पन्न खाना, अप० जीतना; (जस. २, १२)। -पंति (सं/जी+-शतृ) (जंवू० ७, १, १५)। (जिप्पंति) व०, ब० "मंत अंतरंग जिय-भू० का०, जीता; (चं० २, बहिरंग वि, रिउ जिप्पंति विइण्णकुसंग १०)। वि" -मत्र द्वारा कुसंगति से जियकुसुमाउहु-पु. (सं० जितकुसुमा- अंतरंग और बहिरंग शन्नु जीते जाते है; युध) कामविजेता; (व० २, ८, ११) । (ण० ३, २, ५)। जियपउमा -स्त्री० लक्ष्मण की स्त्री, 1/जिम-(प्रा०/ जिम्) राजा शनुदमन (सत्त दमण) की पुत्री; जीमना, भोजन करना। -इ सक०; (५० च० १, ७२)। तुल० ० म० जेवणे, गु० जमवू; (जस० १, जियमाणु-पु० विद्याधरवंशीय राजा; २१, ८; जंबू० ३, ६, १४) । जेमन्त- (प० च० ५, २५६) । कृ० खाते हुए; (प० च० ४८, १०, जियसत्त -पु० जितशत्रु (जस० ४, ६) । जेम्मइ-(सं० जेम्यते) कर्मवाच्य; २४, ३)। (प० च० २१, २, २)। जिवं, जिह-अव्य० (सं० यथा >प्रा० जिम-अव्य० (सं० यथा>प्रा० जिध) जैसे, जिस तरह से; (हे० ३३६, जिध) १. जैसे, ज्यों; (सं० रा०; पाहु० षड्)। १७७) । २. जिस प्रकार, जिस तरह से; /जिव-जीना। जिवउ-भू० का०, (पाहु० १७६; प्रा० ५० १, ८६) । जीवित रहें; (की० १, ६१) । जिवि- जिमि-वि० जैसे; (प्रा० ज्जइ-कर्मकाच्य, व०, पु०, एक २०७) । (प्रा० ५० १, ५५)। जिमिअ-वि० (सं० जिमित) १. जिसने जिह-अव्य० (सं० यथा>प्रा० जिघ, भोजन किया हो वह; (जस० ३, १३, जिह) जैसे, जिस प्रकार; (महा० ६६, ३, ८; १० च० २०, १२७) । २. भक्षित; १३; प० च० २, ११, ८; हे० ३३६; (दे० ना० मा० ३, ४६)। जिमिय; ण० १,१०,७)। (जस०)। जिह-सर्व० जिसको, जिसमें, जो; (हे. /जिम्म-(सं० जिमु अदने, प्रा० ४, ३३७; सं० रा०)। जिम) खाना; (जस० १, २१, ८)। जी-पु० (सं० जीव >प्रा. जिय-वि० (सं० जित>प्रा० जिअ) जीअ>अव० जी) प्राण; (को० ४, जीता हुआ, पराजित; (ण० २, ५, १४; १५३)। जंवू० ८, ५, ६; क० २, ११, २) । जीअ-० न० (सं० प्रा० जीव /जिय-(सं०/जीव) जीना, प्राणी; (क० २, १५, ४; जस० २, १५, धारण करना; (जस० १, ११, १)। ६)। --इ व० (सं० जीवति >प्रा० जीवइ); जीआ-स्त्री० (सं० ज्या) १. पृथिती; (ण० ३, ७, ६) 1 /जियंत-२० कृ० २. माता; (पड्)। पै०१, प्र० अप० . o प्राण - (४१८) जीवन जीवंश-कृ० भ० का० - जो 3-पु० न० (सं० प्रा० जीब) प्राणी; (जंदु० ३, १, १२) । (व० १, १५, १; जंबू० १०, २, १०; जस० ३, २०, ६) । जीव उ--भू० का० हे० ४३६, २.) । (सं० अजीवत्) (उ० व्य० प्र०,8, जीउगुण-पु(जीवगुण) जीव का २७) । जीविज्जइ (कर्मणि) (जंबू० ११, धर्म; "अण्णु जि निरवहिजीउगुणु कवणु. २, ७) । जीवेसइ-भू० का ० (प० च० ममत्तिभाउ तुणकारणे." अर्थात् जीव ८, ४, ६)। जीवेसमि- का निरवधि ज्ञान गुण भी इन सब बाह.य (जं० ६, ११, ६)। जीवंत-व० कृ० वस्तुओं से अन्य ही है । अत: इस शरीर (सं० (सं० जीव-+शत); (जंबू० के लिए ममत्व ही क्या ? (जंवू० ११, ३५)। ५, १०)। जीव-पुं० (सं० प्रा० . जीव) प्राणी; जीभ-स्त्री० (सं० जिह वा>प्रा० (व० २, ११, १.) । -उल पू० (सं० जिव्भा) जवान, रसना, जिह वा । जीभे; जीवकुल) प्राणी-वंश; (जस० २, ३७, (उ० व्य० प्र० ६, ६)। ७)। - तत्त पु० जीवतत्त्व; (जंबू० २, जीमण वार-पु. भोज, ज्योनार; तुल० १, २) । जीवाइ-जीवादि; "जीवाइत्तु गु० जमणवार; (प्रा० गु० २८, ६)। तं कहइ मुणि;" अर्थात् उसे अपनी दिव्य जोमुत्तनायक-पुं० राक्षसयोद्धा; (प०- वाणी से जीवादि तत्त्वों को मुनि बतलाते च० ६१, १०)। थे; (जंवू० २, ६, ७)। जीय--पु० (सं० प्रा० जीव) आत्मा, जीवगाह-पु० (सं० जीवद्ग्राह) जीवित जीव, प्राण, चेतना, प्राणी; (सं० रा०; को पकड़ना (capture while प० च० ७, ८, ६) alive); (प0 च० २५, १८, १)। जीय-वि० (सं० जीवित>प्रा० जीवण-त. (सं० जीवन>प्रा० जीविअ) जो जिंदा हो; (प० च० ७, जीवण) जिंदगी; (जंबू० २, ६,६ १२, ७; भ)। जीया-स्त्री० (सं० प्रा० जीवा) धनुष भ०) । जीवणु; (विला०)। की डोरी, प्रत्यंचा; (ण० २, ६, ८)। जीवदय-स्त्री० (सं० प्रा०. जीवदया) जीयासा-स्त्री० (सं० जीव+आशा > जीवदया; (जस० २, १८, १५)। प्रा० जीव+आसा) जीवन की आशा; जीवधके-वि० प्राण हरने वाले को, (ण० ३, ६, १३)। प्राणनंतक; (को० ४, १५३) । जीर--न० (सं० जीरक >प्रा० जीरय) जीवन-पु० (सं० जीवन) जीना, जीरा, .: मसाला-विशेष; तुल० म० "मानिनि जीवन मान सउं वीर पुरिस जिरें; (जस० ३, ५, १५) । अवतार;' अर्थात हे . मानिनी ! मान. /जीव-(सं० जी > जीव) सहित जीना और वीर पुरुष जीना, प्राण धारण करना। -इ.व. लेना, यही सार है; (की० १, ३८) 1. रहते हुए . . का जन्म जीवभाउ (४१६) کرا जीने की आशा; जीभ, . जीवों का जीवभाउ-० (सं० जीवभाव) जीव (जस०२,१६, ३)। स्वरूप; (जं० १०, २४, ४) । जीवियास-पु० (सं० जीवित+भाशा जी-मित्ती-स्त्री० (सं० जीवमैत्री) (जंबू० ९, ११, प्राणियों में परस्पर मैत्री; (जस० ४, ६, १२) । ४)। जीह--स्त्री० (सं० जिह वा>प्रा० जीप्रसरणु---वि० (सं० जीवशरण) जीवों जीहा) जीभ, रसना तुल० म० के लिए शरणाभूत; (जं० १, १, (सं० रा०; क. १, १७,६; प०१, १३, २; सि० २, २३)।-हा जिह वा; जोक्सहाल-पु(सं० जीवस्वभाव) (जंबू० ८, ७, ७) । स्वभाव; (जस० ३, २८, जोहा--स्त्री० (सं० जिह वा) जीभ; ३) । (जस० १, ६, ५; प्रा० ५० १, ८)। जीवहित-न० (सं० जीवहिंसा) जीवों जोहादल-० (सं० जिह वादल) बड़ी- की हिंसा; (जस० २, १४, १०) । बड़ी जिह्वाएँ; (जस० १, १६, १२) । जीवावहारी -वि० (सं० जीवापहारिन्) जोहालंपडु-वि० (सं० जिह वा+लम्पट जीव संहार करने में प्रवृत्त; (जस० ४, >प्रा० जीहा+लंपड) जिह्वा का लोलुप १७, ३)। या लोभी; (ण० ६, ८, ७) । जीवासउ-पु० (सं० बीव+आश्रय) जोहाल-वि० (सं० जिह वा+वत्) जीव के आश्रय; (जंवू० लंबी जीभ वाला; (प० च०७, २) । १२०)। जीवासा-स्त्री० (सं० जीव (जीवन)। Vजुज-(सं० युज् >प्रा० जुज्ज) आशा) जीवन की आशा; (जंवू० २, ५, जोड़ना, युक्त करना। -इ व० (क० १४)। ६, २०, २१) । जुजेइ; (सुदं० २, ११, जोगहार-पु० (सं० जीवाहार) मांसा- १६) । जुजहि; (सुदं० ११, २, १४) । हार; (जस० २, ३०, १)। सुजिभ---वि० (सं० योजित) जोड़ा जीविउ--यि० (सं० जीवित). जीवित; हुआ; (क० ६, २, ६)। (व० १, १४, २; जंबू० ८, ७, ७)। जुपुरूड-वि० (दे०) परिग्रह-रहित; २.जिलाने वाला; (जंवू० ७, ११, (दे० ना० मा० ३, ४७)। जु-अव्य० (सं० यत्) जो; (हे० ४१७, जीविय-वि० (सं० जीवित>प्रा० २)। जीविअ) जो जिंदा हो; (भ०)। जुम-वि० (सं० युत>प्रा० जुभ) जीवियन्तु-पु. (सं० जीवितव्य) युक्त, संलग्न, सहित; (दे० जीवन, "मह जीवियन्वु धुउ मम्मि जइ; १, ८१; क० ३, १६, ४)। जोड़ा, दो; भले ही मेरा जीवन समाप्त हो जाए; (प्रा० पै० १, १७)। ११, ७, - . ० ना० मा० जुअय (४२०) GG जुअय-न० (सं० युतक) जुदा, पृथक्; लड़ना, जूझना। युद्ध करना।-इवयुद्ध (दे० ना० मा० ७, ७३) 1 करना; (की० १, ६२; जंबू० जुअराय-पु. (सं० युवराज) युवराज; ३) । जुझंति; (सं० युध्यते); (व० १, (भ०)। ४, १६) । जुज्झंतिय-कृ० (सं० युध्+ जुअल-पुं० (दे०) तरुण, जवान; (दे० - शतृ) (जंबू० ७, ३, ६)। जुज्झतु- ना० मा० ३, ४७)। न० (सं० युगल क्रि०, भू० का०, लड़े; (प्रा० पं० २, >प्रा० जुअल) दो, जोड़ा; (प्रा० ५० १३२) । जुज्झत-कृ० (सं० युध+ १, ३६; जंवू० १, ११, १५) । जुअलु; शत); (प० च० ३, १३, ८) । जुज्झन्ता (प० च० १३, १०, १०)। --भू० का०, युद्ध कर रहे थे; (की० ४, . जुआं-पु० (सं० चूत>प० जूत>प्रा० १८०) । जुज्झमाण-कृ० (सं० युध+ जूअ) जुआ, किसी घटना की संभावना शानच्); (जंबू० ७, ४, ११)। जुज्झिवि पर हार-जीत का खेल; (की० २, . पू० का० क्रि० (ण० ३, १७, १३) । १४६)। जुज्झु-क्रि०, आ० (प० च० ७, १२, जुइ-पु मुनि-विशेष-नाम; (प० च० ५)। ३२, ५७) । स्त्री० (सं० द्युति>प्रा० जुज्झ-न० (सं० युद्ध >प्रा० जुज्झ) जुइ) कांति, तेज, प्रकाश; (व० २, २२, लड़ाई, संग्राम; (प० च० ४, ५, ६; क. १०) । २. ज्योतिरङ्ग नामक कल्पवृक्ष; २, ६, ६; प्रा० .० १, ३७) । जुज्झु- व० १०, १८, १२)। -जुत्तिय वि० न० युद्ध; (महा० ६६, २, ११)। (सं० धतियुक्त) (जस० १, १६, जुज्झए-न० (सं० योधन) युद्ध, लड़ाई; १३)। (म० २, ५५, २) । जुइपह-स्त्री० (सं० द्युतिप्रभा) स्त्री- जुझणमणहों नाम-विशेष; (व० ६, ४, २) । मनस्) युद्ध की इच्छा रखने वाला; Vजुउच्छ-(सं० जुगुप्स्) घृणा करना, (प० च० ४, ५, ६)। निन्दा करना । -इ सक० (षड्) । जुज्झवंत-पु वानरयोद्धा; (प० च० जुगंधर-पुं० (सं० युगन्धर) एक जैन ५७, १८)। मुनि आठवें तीर्थंकर के पूर्वजन्म गुरु; जुझिअ-वि० लड़ा हुआ; (जंबू० ६, (प० च० २०, १८)। ५, ५)। Vजुज्ज-(सं0/युज् >प्रा० जुज्ज) जुझवा-वि० (सं० जोड़ना, युक्त करना; किसी कार्य में जुज्झवय) युद्धवाला या युद्ध लगाना। -इ सक० (सं० योजति > (की० ४, १०१)। प्रा० जुज्जइ, जुज्जइ); (ण० ३. २, जुट्ठ-पु० (सं० जुष्ट.>प्रा० , झुठ) १३; जस० १, १२, १८)। असत्य; तुल० गु० जूठ; (संधि० ११, ८, Vजुज्झ-(सं०/युध्>प्रा० जुज्झ) १५)। -वि० (सं० योधन- . युद्धवत् >प्रा० संबंधी; .
जुड (४२१) जुवराम . प्रा० जुड-पुं० (सं० जूट) कुंतल, केश उचित कार्यशील, उचित आचरण करने कलाप; (दे० ना० मा० २, २४) । वाला; "अवसणु सच्छु मस्तणु सूरउ, 1/जुड--(सं० जुड वन्यने; सं० जुडति) पवरवलालउ जुत्तायारउ," व्यसनहीन बांधना; (उ. व्य० प्र० ५१-२८)। स्वच्छ, कोष-रहित, शूरवीर, महावल- जुग्ग-वि० (सं० जीर्ण>प्रा० जुण्ण) शाली, उचित कार्यशील, (ण० ३, ४, पुराना, जीर्ण; (जस० ३, ३८, ३; प०- ४) । च० ४, ८,३) । २. घिसा हुआ; फटा जुत्ति--स्त्री० (सं० युक्ति>प्रा० जुत्ति) हुमा; (प० च० १४, ७, ४) । वि० उपाय, कौशल; तुल० म० जुगत; (ण. (दे०) विदग्ध, निपुण, दक्ष; (दे० ना०. १, १५, ३)। मा० ३, ४७)। पुं० (दै० सं० यून> जुत्ये-पु. (सं० यूत्थ> प्रा० जुण्ण) जूना; (क० १, १०२; जुत्थ) सेना; (को० ४, १६६) । सुदं० ८, १, १६)। जुन-पुं० पुत्रा (उ० व्य० प्र० १०- जुण्ण-जोत्त-पु० (सं० जीर्ण-योकन) ७)। पुरानी या जीर्ण जोत (रथ की) "लुअ- जुम्न-वि० (सं० जीर्ण>प्रा० जुग्ण) जुण्ण-जोत खण्डिय-धुराई"-'जीर्ण जोते पुराना; (सं० रा०)। ज्योत्सना>प्रा० (रथों की) कट गई, धुरे टुकड़े-टुकड़े हो जुन्ह-स्त्री० (सं० गए; (प० च० ४, ८, ३)। जुण्हा) चांदनी, चंद्रिका, चंद्र का प्रकाश; जुत-वि० [सं० युक्त >प्रा० जुत्त) (सं० रा०; प्रा० गु० १३, ४४)। युक्त, संगत, उचित, योग्य; (सं० रा०)। 1/जुप्प-(सं०/युज्) जोड़ना, युक्त जुत्त-वि० (क० १, १२, ५); जुत्तउ जुप्पंति-व० (जंवू० ५, -वि० (प्रा० १० १, १६९); जुत्तु- ६, ४) । वि० (प० च० ११, १३, ५; व० २, ३, जुम्मु-न० (सं० युग्म>प्रा० जुग्ग) ११); जुत्तो-वि० (विला०) । -उ युगल; (प० च० १३, ८, ३) । (जुत्तउ) वि० उपर्युक्त, "जुत्तउ अवेक्ति जुप-वि० (सं० युत) संसग्गु;" अर्थात् उपयुक्त संसर्ग को देख युक्त; (जस० २, १, २७; क० २, ६, कर; (व. ५, ३, १४) । २)। जुत्ताजुत्त-वि० (सं० युक्तायुक्त) संगत जुय-पु. (सं० युग>प्रा० जुग) एवं असंगत, अच्छे-दुरे; "रज्जमएण पम- १. काल-विशेष-सत्य, श्रेता, द्वापर त्तउ ण सुणइ जुत्ताजुत्तउं;" अर्थात् राज और कलि ये चार युग, २. पांच वर्ष का मद में पागल होकर व्यक्ति अच्छे-बुरे का काल; (सं० रा०; ण० ३.१०, १०; विचार नहीं करता; (महा. ६६,६, जस० १, ६, ६)। १४)। जुवराम-पु० (सं० युवराज) युवराज; जुत्तायारउ-वि० (सं० युक्त+आचार) (ण० ५, ६, १२)। करना। मिला हुआ, जुयन (४२२) जुहार . ६; सं०- जुपल-न० (सं० युगल >प्रा० जुगल) वह राजकुमार जो राजसिंहासन के लिए जोड़ा, युग्म, उभय; (जंबू० १, १, १२; मनोनीत कर लिया गया हो; (व० १, ण० १, २, १०; सं० रा०)। ~य न० १०, ६) | -पट्ट पु० (सं० युवराज. (सं० युगल+क) युग्म; (भ०) । पट्ट) युवराज का मुकुट अथवा पगड़ी जुगलुल्ल्लन० [सं० युगल+>प्रा० या सब कपड़ों के ऊपर पहिनने का वस्त्र; जुअल+उल्ल (स्वार्थे) युग्म, जोड़ा; "महु जुयरायपटु वझसइ;" अर्थात (ण० ३, ६, ३; जंबू० ४, १३, मुझे युवरामपट्ट बांधा जायेगा; (जस० १७) । ३, ३४, ११)। /जुर-(सं० क्रुघ्) क्रोध करना । -~-इ जुवल-न० (सं० युगल) युग्म, जोड़ा, अक० (पड्) । २. सं० खिद्; खेद उभय; (जस० ३, ३४, ७; क. ७, १५, करना, अफसोस करना; (पड्) । ६; प० च० ३२, ७, १०) । - ७, १०) | ~~य (सं० जुरुमिल्ल-वि० (दे०) गहन, निविड़ा युगल+क) तुल० म० जुळें । (दे० ना० मा० ३, ४७) । जुवाण-वि० (पु स्त्री०) (सं० युवन् जुम्मिलय-वि० (दे०) गहन, निविड़, > युवान>प्रा० जुवाण) जवान, तरुण; (दे० ना० मा० ३, ४७) । तुल० म० जवान; (ण० ४, ६, १५; सि० जुलिअसं/जुड) जुड़ गए, युक्त हो २, ३५, प. च० ५,१३, गए; (प्रा० ५० १, १३५) । रा०। टि०-मूल संस्कृत युवा, युवान जुव-पुं० (सं० युवन् >प्रा. जुव) पुरुषवाची है, किंतु अपभ्रंश में 'जुवाण' युवा, जवान, तरुण; (सि० २, १२) । पु० भोर ती० का भेद नहीं रखता। (सं० युवति >प्रा० जुवारी-स्त्री० (सं० युवति >प्रा. जुवइ) तरुणी, जवान स्त्री; (ण० ३, जुवइ) तरुणी, जवान स्त्री; (प० च० ११, ४) । -~~ण युवतीजन; (सि० १, ८, १८४)। ३२) । -यण युवतीजन; (जंबू० १, जुबार---पु. (सं० चूतकार) कार) जुआरी: १६, ६, क० ७, ७, ४)। (जंकू० ४, २, ८).. जुवई-स्त्री० (सं० युवति >प्रा० जुवइ) जुवि-स्त्री० (सं० द्युति) शरीर की तरुण स्त्री; (जस० १, ४, ४)। यणु सहज कांति, आभा, छवि; (व० ४, १८, स्त्री० (सं० युवतीजन >प्रा० जुवइ, १२)। जुअइ-+जण) जवान स्त्रियाँ; (प० ज० जुठवण-न० (सं० यौवन >प्रा० १४, ४, ६)। जोव्वरण, जुन्बण) तारुण्य, जवानी; (ग० जुबईस-~-पु० (सं० युवति+ईश>प्रा. ७, १५, ६; प्रा० ५० १, १३२) । जुवइ+ईस) युवती का स्वामी; (ण० जहार- (सं० : जयकार>प्रा. '५, ११, १३)। जेक्कार>अप० जोक्कार>जोआर> जुबराय-पु. (सं० युवराज) राजा का ओहार) जुहारना, नमस्कार करना; जुव-स्त्री.
जुहिडिर (४२३) जूचार १०)। तुल० गु० जुहार; (प्रा० गु० २५, 1/जूर-(सं० />प्रा० जूर) जलना, क्रोध करना । -इ १० (सं० जहिटिठर-पु. (सं० युधिष्ठिर) जूर्यते) (ण० ३, ६, १२)। "दुज्जरणु जो पाण्डुराज का ज्येष्ठ पुत्र; (प्रा. पं० २, पूरइ सो जूरउ," अर्थात् जो दुर्जन जले १०१) । जुहिट्ठिल; (जस० १, ६, १२; सो जले, (प० ३, ६, १२) । सुदं० २, १०, ६)। (सुदं० ८, ८, ८)। जूरंत-कृ० (सं० जुअ---न० (सं० धन>प्रा० जूभ) जूजा, जूर+शत)। जूरंतिय- (स्त्रियाम्); द्यूत; तुल० म० जुआ (वा); (ण० ३, (जंवू० ६, १३, ३)। १३, ८) । पुं० (सं० धुतकार) जुवाड़ी; जुरण-न० (सं० प्रा० जूरण सूखना, (व० २, २२, ४)। झुरना) व्याकुल हो उठना; "वरिमा- जूअअ-पुं० (दे०) चातक पक्षी; (दे०- णिणीहिययजूरणं;" अर्थात् शव ओं की ना० मा० ३, ४७)। भानिनी स्त्रियों के हृदय व्याकुल हो उठे; जूलार-वि० (स. धूतकार) जूआरी; (ण० ४, १०, १४)। तुल० गु० जुआरी, म० जुगार, जुवार; जुरवणी-वि. वेदयिनी; "लच्छि व (प० च० ४२, १०, ५) । तिय-हवें जूरवणी;" (प० च० ४१, ४, जून-- (सं० युद्ध>प्रा० जुज्ज्ञ) ४) । लड़ाई; (रा० ३८)। पूट-पु० (सं० जुष्ट >प्रा० जुट्ठ) जुरावण-पुं० (सं० जूरण>प्रा० जूरा- वण = शोषण) सताने वाले; "एत्यन्तरें उच्छिष्ट, सेवन जम-जूरावणे" -इसके अनतर, यम कर लिया गया हो, जिसमें से कुछ ले कर को सताने वाले;' (प० च० १२,५, खा लिया गया हो; "सव को जूठ सव्वे १)। ला;" (को० २, १८८) । जूड-पु० (२० जूट) कुंतल, केश- जूरिअ—(दे०) खेद-प्राप्त, खेदित; (जस० कलाप; (दे० ना० मा०४, २४; १, २२, ६)। भ०)। जुरिय-वि० (सं० ज्वरित) ज्वरबुफ्त, युक्त >प्रा० जुत्त) जिने ज्वर चढ़ा हो; (क० १,१७, संगत, उचित, योग्य; तुल० गु० जूत्यो; ६)। (प्रा० गु० २०, ३)। जूब-न० (सं० चूत>प्रा० जूब, जून) जून-वि० (सं० जीर्ण>प्रा० - जुण्ण) जुण्ण) . जूआ, धूत; (क० ८, १३, ४) । ---फल वुड्ढा, पुराना । - वि० वृद्ध; (रा० पुं० (सं० धूतफल) चूत का परिणाम; ३०)। (जं० ४, ३, ८)। न्यारत्तरा--पु० (सं.० चूत+आरक्त- जूवार-वि० (सं० छु तकार>प्रा० जूझ- त्व) तानुराग; (ण. ३,३, १६)। कार) जुआरी, जूए का खिलाड़ी; (ण. जूठा, वह जिसका जूत -वि० (सं० :
जूंसम (४२४). जेत्तह फेंका हुआ; जूह-न० (सं० ३, १३, ४; जंवू, ८, ३, १३; क० ८, /जैव-(सं०/जिम् > प्रा० जिम, १५, २)। जिम्म) जीमना, भोजन करना । -- जूसअ- -वि० (दे०) व० (सं० जिम्वति); (महा० १८, ७, (षड्)। ११) । जेवि जैवि-पू० का० कि० यूथ >प्रा० जूह) (सं० जिमित्वा) (उ० व्य० प्र० २०, १. समूह, जत्था; (भ०)। २. झुड; २०)। (प्रा० पं० २, ११३; जंबू० ८, १०, जेवण-न० (सं० जेमन >प्रा० जेमण) ४)।-वई पु० (सं० यूथपति) किसी (सं० यूथपति) किसी जीमन, भोजन; (उ० व्य० प्र० ११. टोली या दल का नायक, अगुआ; (जंवू० २४) । ६, ७,१)। जे-वि० (सं० यः) जो; तुल० राज० जूहाहिम-पु० (सं० यूथाधिप) किसी ज्यों, (प्रा० ५० १, ६; रा०६; हे० टोली या दल का नायक, अगुआ; (जस० ३७६, २; उ० व्य० प्र० १०, १०)। ३, ८,४)। २. जिन्होंने; (की० १, ७७)। ३. जव; हिंद-पुं० (सं० यूथेन्द्र) यूथनायक, ( (को० २, ४)। किसी टोली या दल का नायक; (जस० ई-सर्व० (सं० येन) जिससे, जिसके ३, ४०, ६)। द्वारा, जिस लिए, जिस कारण से; (उ०- -स्त्री० (सं० यूथिका>प्रा० व्य० प्र० १५-४)। जूहिया) जूही का पेड़; तुल० म० जुई; जेठ—वि० (सं० ज्येष्ठ>प्रा० जेठ) (ण० ८, १, १४) । जूहिया-स्त्री० (सं० यूथिका) महान्, बड़ा; तुल० गु० जेठो; म० जेठा; (भ०) । २. जेठी, वड़ी; (व० ३, ३, विशेष, जूही का पेड़; (प० च० ५३, । ३. ज्येष्ठ मास; (व० १०,४१, ७६)। जूहेस-पुं० (सं० यूथेश) झुड का ६; की० २, ४२)।-उत्त -उत्त पुं० (सं० ज्येष्ठ+पुत्र) बड़ा पुत्र; क० ८,४, नायक; (जस० ३, ६, १३)। ज-सर्व० (१) जिसने, (प० च० १, ८)। १०, ६) । २. जो; (ण. १, १६, जेरण-अव्य० (सं० येन >प्रा० जेण) १)। १. जिससे; (विला०; परमा०)। जेई-सर्व० (सं० येन) जिससे, जिसके २. जिन्होंने; (महा० संधि० ६८) । द्वारा, जिस लिए; (उ० व्य० प्र० १५ जेता-वि० (सं० यावत् >प्रा० जेत्तिम) ७)। जितना, तुल० गु० जेटलु (प्रा० गु० -(सं०/जिम् >प्रा० जिम) ३६, २६)। जीमना, भोजन करना; (उ० व्य० प्र० जेत्तह-अव्य० (सं० यत्र) जहाँ; (जंबू० १५, १६)। ३, ४, ११)। जेत्तहि-अव्य० जहाँ; जूहिय- लता- Vजेम- .
जेत्तिउ (४२५) जो . जे.) (जस० ३, १२, ६)। जेत्तहे -अव्य० वह; (सुदं० ५, ७, ३)। जहाँ; (ण० ५, २, २)। जेवं. -अव्य० (सं० यथा) जैसे, जिस जेत्तिउ-वि० (सं० यावत् >प्रा० तरह से; (प० च० ३५, ६, ४) । जेत्तिम) जितना; (प० च० १६, १५, जेवड-वि० (सं० यावत् >प्रा० ६)। जेत्तिल) जितना । जेवडु; (हे० ४०७) । जेतिय–वि० (सं० यावत् >प्रा० जेवणवेलइ-स्त्री० (सं० जेमन (भोजन) जेत्तिअ) जितना; तुल० म० जितकें; +वेला>प्रा० जेमणवेला) भोजन या (भ०)। जीमन की वेला, "जेवणवेलइ महमहइ जेत्थ-अव्य० (सं० यत्न) जहाँ; (जंवू० सह;" (जस० २, २३, ११) । १, ३, २) । जेत्यु-अव्य० (व० ३, १, जेवा-वि० (प्रा० जेव) समान; तुल० १३; जस० १, ५, १०, महा० ६८, गु० जेवा; (प० च० २५, ७,१)। जेह-वि० (सं० यादृश >प्रा० जेथु-सर्व० (सं० यस्मै) जिसके लिए; सदृश, जैसा; (भ०; जंबू० १०, ५, ८)। (उ० व्य० प्र० १४, ३०)। -अ वि० जैसा; (ण० ३, ११, १२) । जेन्ने-सर्व० (सं० येन) जिससे; (को० –य वि० जैसा; (प० च० ५, ६, १, ६२)। ४)। जेन्ह-सर्व० जिन्होंने; (की० ३, जेहउ-बि० (सं० यादृश)१ जिस प्रकार; १४६) । (सुद० ८, १२, १२; जेमाई-स्त्री० (सं० जृम्भिका) जंभाई; परमा०) । २. जैसा, (जस० ४, २३, (व० ६, ६, ५) । १६)। जेम---अन्य जैसे, यथा, जिस प्रकार; जेहे-वि० (सं० यस्य) जिस (विभक्ति- तुल० गु० जेम; (व० १, १४, ६; जस० युक्त विशेष्य के साथ 'जो' का रूप); १, ३, १, महा० ६८, ११, ३)। (की० २, ६३)। जेमण-न० (सं० जेमन) जोमन, भोजन; जो-सर्व० (सं० य:) १. जो; 'जो एथु (संधि० ४, २, ६) वूझइ' सो एथु वीरा; तुल० मगही जे; जेमणय-न० (दे०) दक्षिण अंग; तुल० (कुक्कुरीपाः चर्यापद; उ० व्य० प्र० १०, गु० जमणु; (दे० ना० ३, ८; १० १, ४, ११)। २. जिस; (प०- ४८)। च० १२, ६, ४)। जेमणय--न० (दे०) दक्षिण अंग, दक्षिण /जोप्र—(सं० दृश् का धात्वा० प्रा० (---कर); तुल० गु० जमणो, जमणु; जो, जोअ) देखना; (सुदं० ६, २०, ५; (प० च० ५१, २, १०)। जस० ४, ४, १५)। -इ व० देखता है; जेमिय-वि० (सं. जेमित>प्रा० (की० २, ३६)। जेमिय) जीमा हुआ, जिसने भोजन किया जोअ-पुं० (दे०) १. चंद्र, चंद्रमा; यो० ५०; . मा० . 1 - ओअण (४२६) जोइस । . (दे० ना० मा० ३, ४८) । पुं० (सं० १, १६, १)। -ज्जउँ हूँढ़ा जाना; योग) जोग, ध्यान, मन का संकेद्रीकरण; (हे० ३५६, १)। (जंवू० ११, ४,८)। जोइप्र-वि० दृप्ट, देखा हुआ, अवलो- जोअण–न० (दे०) लोचन, नेत्र, चक्षु; कित; (भ०; क० १, ७, ५) । जोइय- (दे० ना० मा० ३, ५०)। पुं० (सं० वि० दृष्ट; (ण० १, १४, ११.) । योजन) योजन; (हे०, ३३१) । जोइक्ख-पु० (सं० ज्योतिप्क>प्रा० जोअण्णा—वि० (सं० यौवनवत्) जवान; जोइवख) प्रदीप, दीपक, तारा; (सं०- (की० ४,११०)। रा०)। जोआ-स्त्री० (सं० द्यो) स्वर्ग, आकाश; जोइणिपुज्ज-स्त्री० (सं० योगिनीपूजा) (पड)। योगिनी की पूजा (जस० २,१५, जोइंगण-पुं० (सं० ज्योतिस्+इङ्गण ३)। >प्रा० जोइंगण) १. जुगनू, कीट-विशेष; जोइणिपुर-पुं० (सं० योगिनीपुर) (जंबू० ८, १४, २१) । २. इंद्रगोप (वीर नगर-नाम; (जस० ४,३०, १०)। वहूटी); (दे० ना० मा० ३, ५०)। जोइणी-स्त्री० (सं० योगिनी) संन्या- ३. तारा; (सं० रा०)। जोइङ्गण-पु० सिनी; (जस० १, १६, ११) । खद्योत; (प० च० १८, ७, ५) । टि० जोइप्पह-स्त्री० (सं० धु ति प्रभा) मूल शब्द ज्योतिस्+इण स्त्री-विशेष-नाम; (व० ६, ८; १३)। 'जुगनू है । अर्थांतरण से 'जोइंगण' शब्द जोइप्पिन-पु. वानर योद्धा; (प० च० का अर्थ है 'तारा हुआ । ५७, ४)। जोइ-वि० (सं० योगिन्>प्रा० जोगि, जोइमई-स्त्री० रानी-विशेप- नाम; जोइ) १. चित्त निरोध (प० च० १२, ३२)। २. पुं० मुनि, यति; (ण० १,४,६)। जोइय-वि० दृष्ट; (जस० २, ३१, १०; ३. रामचंद्र का स्वनाम ख्यात एक सुभट; जंबू० ४, ६, २) । (प० च० ६७, १०)। ४. स्त्री० (सं० जोइर-वि० (दे०) स्खलित; (दे० ना०- युवति>प्रा० जुवइ) तरुणी; (उ० व्य० मा० ३, ४६)। प्र० २१-२८)।-उ पु० (सं० योगिन् जोइस—पु० (सं० ज्योतिप>प्रा० >प्रा. जोगि) योगी; (परमा०)। जोइस) १. सूर्य, चंद्र आदि देवों की /जोइ--(प्रा०/जो) देखना; (परम० एक जाति, "जोइस-भवणन्तरें जि १,८६; हे० ३६४)। - भू० का० अहिट्ठिय । भीसण-सीहणिणाय समुट्टिय" देखा; (महा० ६६, १६, १)। -ज्जइ 'ज्योतिप देवों के भवनों में भीपरण सिंह- व० पता लगाना; "दूवें पढम सत्ति जोइ नाद होने लगा, (प० च० २, १, ४) । ज्जइ" दूत के द्वारा पहले (शत्रु की) २. शास्त्र-विशेष, ज्योतिषशास्त्र; (ण. शक्ति का पता लगा लेना चाहिए; (म० ३, १, ५)। पुं० (सं० ज्यौतिप) ज्यो- का अर्थ करने वाला;
जोइसिय-चक्क (४२७) जोड -- तिप शास्त्र; (जस० १, २४, ५) । न० किया; (प० च० ५, ५, ८) । जोक्का- (दे०) नक्षत्र; (दे० ना० मा० ३, ४६)। रिय-भू० का० जयजयकार किया, पु० ज्योतिप् (देव) ज्योतिष नामक देव; (hailed); (प० च० २४, १०, १)। (व० १०, १, ३; जंवू० १, १६, ८)। जोक्ख-वि० (दे०) मलिन, अपवित्र; -गण पु० (सं० ज्योतिष् +गण) सूर्य, (दे० ना० मा० ३, ४८) । चंद्र, ग्रह आदि; (जंबू०) । जोइसू-पु. जोक्खइ-सक० (1/प्रा० जो, जोञ) ज्योतिप; (वि०)। तोलना; (महा० ४-५-५) । जोक्सन्तय जोइलिय-चक्क-पु० (सं० ज्योतिश्चक्र) -६० कृ० देखता हुआ; (प० १० १०, प, चंद्र आदि का चक्र या मार्ग; (५० १,६)। च० २६, १४, ८)। जोग-वि० (सं० योग्य) कादिल, किती जोई-स्त्री० (दे०) विद्युत्, विजली; कार्य को करने के लिए उपयुक्त; (जंबू० (दे० ना० मा० ३, ४६; पड्) । पुं० ११, १४, ६)। २. पुं० (सं० योग) (सं० योगिन् >प्रा० जोइ) योगी, यति, जोग; तुल० म० गु० जोग; (भ०)। साधु; (प्रा० पैं० १, १०४) । -वट पुं० (सं० योगपढ़) योगो का जोईस -पुं० (सं० योगीश>प्रा० वस्त्र; "गलि जोगवटु सज्जिर जोईस) योगीश्वर, बहुत बड़ा योगी; विचित्तु;" (जत० १, ६, ६) । (जस० १, ८, ५)। जोगेसर-पु. (सं० योगीश्वर>प्रा० जोईसर-पु० (सं० योगीश्वर) योगींद्र, जोगीसर, जोईतर) योगिराज; (प० च० वहुत बड़ा योगी; (जतः १, ६, ५, १५, २) । जोगेसरु-पु. योगीश्वर; २१)। (प० ५० १३, ६, ५) । जोए-स्त्री० (सं० युवति>प्रा० जुवई, जोगेसो-स्त्री० (सं० योगेशो) विद्या- जुउइ, जोइ>जोय) स्त्री (की० २, विशेष; (प० ३०७, १४२) । १६१)। टि०-कीर्तिलता में 'ए' स्वर से जोग्ग-वि० (सं० योग्य>प्रा० जोग) अंत होने वाले प्रातिपदिक शब्द पुं० योग्य; (प० च० २, २, ६; १० १, १५, तथा स्त्रीलिंग दोनों में मिलते हैं, यया ११; प्रा० पैं० २,१५१; जस० १,१४, पलए (प्रलय) ए०, पुं० । राए ए०, ६) । जोगु-योग्य; (महा० ६६, १८, पुं० । माए ए०, स्त्री० नादि । ६) । पुं० (सं० योग) चित्त-निरोध, जोएसर-पु० (सं० योगेश्वर) योगींद्र, "तिहें जोगकम्मपरमाणुबंधु, परिवढि- योगीश; (भ०)। यमहमिय-बुद्धिबंधु;" (जंबू० २,१, जोक्कार-पुं० (सं० जयकार>प्रा० १०)। जेक्कार) 'जय-जय' की आवाज, स्तुति; जोगा-स्त्री० (दे०) खुशामद, चाट; (जंवू० ५, १, २१)। (दे० ना० मा० ३, ४८) जोक्कारिउ-क्रि०, भू० का०, जयकार /जोड-(संयोजय) जोड़ना, संयुक्त ।
जोड (४२८) जोय -- करना। -वि० ० पू० कां० क्रि०, (जंबू० मा० ३, ५०)। १, २, ६)। -डिवि पू० का० क्रि०; जोण्ह-स्त्री० (सं० ज्योत्स्ना>प्रा० (क० २, १, १२)।-हि (विध्यर्थक) जोण्हा) चंद्र-प्रकाश; (व० २, ३, १६; प्रा० पैं० २, २०१; जस० १, ६, १४) । जोड़ दो; (म० १, १६, ३) । जोडिऊण कृ० जोड़कर; (व० ८, १०, १)। -1 (जोण्हा) स्त्री० ज्योत्स्ना; (जंबू० जोड-पु० न० (दे०) नक्षत्र; (दे०- ४, १०, ३) । जोहा -रखोलिर चाँदनी का विस्तार; "जोण्हा-रङ खो- ना० मा० ३, ४६)। जोडणय-वि० (सं० योजनक) जोड़ने लिर-हार-भार;" (प० १० १३, १२, ८)। वाला; (जंवू० ६, १६, १०)। जोत्त-न० (सं० योक्व >प्रा० जोत्त) जोडि-स्त्री० (/युज) जोड़ी, युग्म; जोत, रस्सी या चमड़े का तस्मा; (प०- "कुसुमेहिँ जोडि;" अर्थात् कुसुमों की च० ४, ८, ३)। जोड़ी; (व० १, ६, ६) । जोत्तार-पुं० (सं० योक्तृ) योक्ता, जोडिअ-पु० (दे०) व्याध, बहेलिया; रथवान, “संदण उज्जोत्तिय जोत्तारहि; (दे० ना० मा० ३, ४६)। वि० (सं० अर्थात् रथवानों ने रथों के जोत उतार . योजित) जोड़ा हुआ, संयुक्त किया हुआ; दिए; (जंबू० ५, १०, २०) । (जंबू० ४, २, १७)। जोडिय-वि० जोतिउण-कृ० (सं० योजयित्वा) जोत- योजित; तुल० गु० जोडयु; (संधि० ३, कर; (ण० ६, १३, ११)। १०, २) । जोत्तिय-न० (सं० योक्न >प्रा० जोडिया-वि० (सं० योजित >प्रा० जोत्तय) जोत, रस्सी या चमड़े का तस्मा जोडिअ) जोड़े हुए; (दे० सा० दो०)। जिससे वैल या घोड़ा, हल या गाड़ी में जोगापुर-पु० जौनपुर, नगर-विशेप- जोता जाता है; (व० ४, २०, १२) । नाम; (की० २, ७७)। जोन्ह-स्त्री० (सं०. ज्योत्स्ना>प्रा० जोरिण-स्त्री० (सं० योनि) प्राणियों की जोहा) चंद्रमा का प्रकाश; "नहि निम्मल जातियां जिनकी कुल संख्या ८४ लाख जोन्हाणिए विणु मंडले ण को विप्पइ;" कही गई है; “तियस-जोणि-संपुडहों-मणो- अर्थात् किंतु आकाश में निर्मल ज्योत्स्ना रम;" अर्थात् देवयोनि-सम्पुट अत्यंत को देखकर क्या कोई उस पर मल-मूत्र अनुपम एवं मनोरम है; (व० १०, ३२, फेंकता है; (व० ५, ३, १५) । -हि; ८; जंवू० २, २, ३)। (रा० २७)। जोणी -स्त्री. (सं० योनि>प्रा० जोयंगण-पु (सं० ज्योतिस्+-इङ गण जोणि) उत्पत्ति-स्थान; (जस० १,. १८, >प्रा० जोइंगण) जुगनू; (भ०) । ६)। Vजोय-(सं० दृश्, प्रा० जो, जोअ) जोग्गलिआ---स्त्री० (सं० यवनाल) -इ व० (जंवू० ६, ५, ६)। जोन्हरी, ज्वार, धान्य-विशेष; (दे० ना० —ह (विधि०)। देखना।
जोय (४२६) जोह जारहो,' इस प्रिय कर /जोय-(सं० योजय >प्रा. जोअ) ६)।--हि आ० देखिए; "जोवहि घर- जोड़ना, युक्त करना। जोइवि-पू० णियइ पियधरिणि जंति धरु का० क्रि०, (सं० योजयित्वा) जोड़ कर; अर्थात् हे पृथ्वीपति, अपनी (भ०) । जोएइ. -सक० (सुदं० ६, २०, गृहिणी को शृंगार की सामग्री ले ५) । जोलि-पू० का० कि०, जोड़ कर जार के घर जाती हुई देखिए, (ण० ३, (की० ४, ६४)। ८, १८) । जोयहों-क्रि० आ०, देखो; जोय-पुं० (सं० योग>प्रा० जोग) (प० च० २, ३६) । जोऍवि—पू० का० व्यापार, मन, वचन और शरीर की क्रि०, (प० च० ६, २, १)। चेष्टा; (जंबू० ११, ३, २)। –उ पु० जोवण-न० (सं० यौवन >प्रा० योग, चित्त-निरोध; (ण. ६, ४, जोवण) तारुण्य, जवानी; (जंबू० २, ८)। १५, ३) । जोव्वण-न० यौवन; (जंबू० जोपण-न. (सं० योजन>प्रा० २, १४, ६)। जोअण) १. परिमाण-विशेष, चार कोस जोवरण इतिअ---स्त्री० (सं० यौवनवती) क० १, ३, २; सं० रा०)। -सय न० जवान स्त्री; (सुदं० ११, २, ८) । (सं० योजनशत) सौ योजन; (जंवू० ५, जोवारि-स्त्री० (सं० यवनाल>प्रा० ४, १३)। जोवारि) ज्वार, धान्य-विशेष; (दे०- जोयण-न० (जोअण=लोचन; दे० ना० मा० ३, ५०)। ना० मा० ३, ५०) दृष्टि; (प० च०. जोविन-वि० दृष्ट; (सुदं० २, १३, ६, ११, ६)। ७)। जोयणगंधा-स्त्री० गंधार के राजा जोवणइत्ती-वि० (सं० -वि० (सं० यौवनवती) रानी; (प० च० यौवन वाली; (प० च० ४, ६, ६)। २३)। जोधणणोर, जोवणवेअ-न० (दे०) जोयलीण-वि० योगलीन; (जंबू० १०, बूढ़ापा; (दे० ना० मा० ३, ५१) । २६, ६)। जोवणोवय-न० (दे०) बूढ़ापा; (दे०- जोले-पू० का० कि०, चढ़ाकर, "वेलक ना० मा० ३, ५१)। काटि कमानहि जोले;' अर्थात् धनुष जोसिआ-स्त्री० (सं० योषित्) चढ़ाकर वेलक नाम के दुर्फकी तीर से महिला; (षड्) । निशाना काटते थे; (को०४, ७८) । जोह-पु० (सं० योध>प्रा. जोह) जोव---पु० (दे०) १. विदु; २. स्तोक, सुभट, यौद्धा; तुल० म० जोधा; (ण०७, थोड़ा; (दे० ना० मा० .३, ५२) । ५, ५; १० च०८, ६, ४) । 1/जोव -(प्रा० जो, जोभ) देखना। 1/जोह-(सं०1/युध्) लड़ना। -इ -इव० (पाहु०; प० च० ७, १०, अ६० (भ०)। भूरिण को स्त्री, .
जहिय (४३०) झंखर झनझन का मा० ३, जोहिय-भू० का०, जूझ गए, "के वि ७, १, ८; जंवू० ५, १, २२; जस० २, जोह जोहियाई;" अर्थात् कितने ही योधा ३, १०) । झङ्कार; (प० च० १४, ३, जूझ गए, (क० ३, १७, ७) । २) । झङ्कारिएसु-ध्वनि, “भमर झङ्- जोहणय-वि० (सं० योधिन्) लड़ाने कारिएसु;" (प० च० ७, २, ३) । वाला; (जंवू० ६, १६, ८)। Vझंकार-(सं० भङ्घ) जोहणार--पु० योधनद्वीप; (जंबू० ६, शव्द उत्पन्न होना । -इ व०. तुल० १६, १६)। राज० झंकारणी, झंकारवी; (जंबू० ४, जोहल-पृ० (छंदशास्त्र में) रगण १३, ८)। (s); (प्रा० ५० १, १५६)। झंकारिम-न० (दे०) अवचयन, फूल जोहार-पुं० (सं० ज्योक भाकारयति आदि का आदान; (दे० ना० >प्रा० जोक्कारइ>जोहारइ) नमस्कार, ५६)। अभिवादन; तुल गु० जुहार; (प्रा०- संकोलिय-वि० झकझोरित, झकझोरा गु० १६, २१)। हुआ; (सुदं० ११, १८, २०) । जोहेयअ-पु० (सं० यौवेय+क) जनपद झंकोलिर--पुं० झोंका; वेग से चलने नाम-विशेप; (जस० १, ३, ४) । वाली किसी वस्तु के स्पर्श का आघात; जो-अव्य० (सं० यदि) यदि, जो; "झंकोलिरपरिहणपडिविहाउ;" अर्थात् (की० २, १८५) । हवा के झोंकों से परिधान के उड़ने से; ज्ञातु-वि० रसज्ञ; (की० १, १३) 1 (जंवू० ४, १५, १३)। ज्जे--वि० ० एव, “दीसइ सो ज्जेणाई झंख-वि० (दे०) संतुष्ट, प्रसन्न; परि- ऍहु वम्भणु;" तुल० गु० ज; (प० च० तृप्त, परितुष्ट; (दे० ना० मा०.३, २५, १६, ६)। ५३)। ज्झहुराविअ-वि० (दे०) निर्वास-प्राप्त; Vशंख-झखना, परेशान होना, संतप्त (पड्)। होना, संताप करना; (जंवू० ८, ११, १४) । /झल-- १. सं० प्र०+लप्; वड़वड़ करना, वकवाद करना (prattle); झलहि; (प० च० ५२, २, ३)। २. कहना; झलहि; (हे. अप० व्या०, झ-पुं० (सं० प्रा० झ) व्यंजन वर्ण- ३७६) । ३. रोना; झंखणे; (की० ३, विशेप । तालव्य, नाद, घोष, महाप्राण, निरनुनासिक, स्पर्श संघी ध्वनि । झंखड-पुं० (दे०) आँधी; (सं०- झंकार-स्त्री० (सं० झङ्कार>प्रा० रा०)। झंकार) झनझन की ध्वनि, नूपुर आदि झंखर-पु० (दे०) शुष्क तरु; (दे०. की नावाज; तुल० राज० झंकार; (ण० ना० मा० ३, ५४; सं० रा०)। . ७४)।
शंखरिअ (४३१) झक्किम का० क्रि० भण- के वाल, ' शंखरिल-न० (दे०) पुप्पादिकाचयन, ढंक कर; (सुअंध० २, ६, १) । झंपिआ तोड़कर इकट्ठा करना; (दे० ना० मा० -क्रि० (सं० आच्छादय का धात्वादेश ३, ५६)। झंप) झांपना, ढकना; (को० ३, ६८)। झंझं-पु० (झन् झन् से अनु०) ध्वनि; झंपिय-भू० का० ढके हुए; (परम० २, (जंबू० ५, ६, १०)। १६, ६)। इंपिवि-पू० Vझंझग-(सं०1/झंझणाय्) झन-झन आच्छादित कर; तुल० म० झापणे, करना। झिझिंत-कृ० झनझनाते हुए; (भ०) । (सुदं० ७, ६, १०)। संपड-वि० (दे०) विकराल, विशाल; Vझंझणक्क-(सं० झञ्झन) (सुदं० ८, ४४, ५)। झण का शब्द करना -इ सक०; (प्रा०- झंपडिय-भू० का०, झाड़ा-झटका; 4० २, १८५)। "मुक्कट्टहासाईं झंपडियकेसाई;' वे झंटलिपा-स्त्री० कुटिल गमन, इधर- अट्टहास कर रहे थे और अपने केशों को उधर घूमना; (दे० ना० मा० ३, झाड़-झटक रहे थे; (जस० १,१६, ५५)। ६)। झंटी-स्त्री० (दे०) छोटा किंतु ऊंचा झंपण-पुं० (दे०) आक्रमण; (संधि० किया हुआ केश-कलाप; छोटे और उठे १२, १, १६)। हुए बाल; "लघूर्व केशा; (दे० ना.. झंपणी-स्त्री० (दे०) आँख मा० ३, ५३)। बरौनी; (दे० ना० मा० ३, ५४) । 1/शंप-~~ (सं० झंपाण-पू० मांपना; झम्पः-उछल, कूद आच्छादन, छलांग) १. गोता लगाना; (सुदं० २, (जंवू० ४, १७, ६)। झंपिअ-वि० १४, ४) । २. कूदना; (जंवू० २, ४, (दे०) १. त्रुटित; ७ को० ३, १४६) । तुल० म० झाप, झेंप २. बाहत; (दे० ना० मा० ३, ६१)। (leap) Vझंष-(सं० विलप का धात्वादेश> भरना, कूदना । २. -इ सक० (सं० प्रा० अप० झंष) विलाप करना, रोना- धात्वादेश >प्रा० झंप) धोना या आच्छादय का संतप्त होना; (की० ३, झाँपना, आच्छादन करना, ढकना; (सं० ५६) । रा०,सुदं० ४, ११, १२) झंपिअ- झंती-पु० वृक्ष-विशेष; (जंबू० ५, ८, झांपना, ढांकना; (प्रा० पैं० १, १२)। ७) । संपंत-अक०, भु० का०; (सं० त्रुटु+ Vझकोल-(दे०) वस्तु को पानी में शतृ) टूट रहे थे, "संपंत फारक्कफार;" डूबोकर गंदा करना; तुल० गु० झको- बड़े-बड़े शस्त्र टूट रहे थे; (जंबू० ६, ळ दु; (प्रा० गु० २४, ६)। ७, ३) । झपउ-भू० का० आँखे बंद की झक्किम-न० (दे०) लोक-निंदा; (दे०- (महा० ११, १२, ५)। इंपऊण-कृ० ना० मा० ३, ५)। राज० । झापणों; छलांग झखं (४३२) भणभण - शतृ) झपटते ६,७, - Vझख-(सं० वि+लेप् प्रलापे; व्यर्थ टना, झपट मारना, छीनना; तुल० म० बोलना, बकवाद करना; (प्रा० गु० २३, झडपणे, गु० झडपवु; (महा० ३०-४- ६) । झणप्पंत-कृ० (आ०+छिद्+ झगमग--वि० जो जगमगाता हो, प्रका- हुए; (जंबू० . शित, चमकीला; "झगमग-झगमग-झगम ३)। गए कानिहिं वर-कुडल;' तुल० गु० झडप्पण-० (दे०) दो जीवों की पर- झगमग, राज० झगमग, जगमग; स्पर मुठभेड़; तुल० म० झडप; (जस० (प्रा० गु० २२, ११)। २, ३३, ५)। झज्झरी-स्त्री० (दे०) दूसरे के स्पर्श को झडप्पसाल-वि० झपटने वाला; (जंवू० रोकने के लिए चांडाल लोग जो लकड़ी ७, २, १४)। अपने पास रखते हैं वह; (दे० ना० मा० झडप्पिम-पुं० (दे०) झड़प, झपट; ३, ५४)। (सुदं० १, ७, १२) । झड-पु० (प्रा०Vझडप्प= झपट झडप्पिय-वि० (दे०) छीना हुआ; मारना, गिराना) आघात, "कक्खड झड- (जंबू० ४, २०, १०)। णिसुढिय-फड-कडप्पु' -कर्कश आघात झडा-स्त्री० (दे०) झड़प, झरट; (सुदं० से नष्ट हो गया है फन-समूह जिसका, २, १३, १; जंबू० ६, ६, ५) । (प० च० १३, ८, ४; जस० ३,८, झडि-स्त्री० (दे०, प्रा० झडी) निरं- ४) । क्रि० वि० (दे०) झट, शीघ्र; तर वृष्टि; (सं० रा०). (म० २, १३, ५) । स्त्री० (दे०) निरंतर वृष्टि, झड़ी, तुल० गु० झडी; (प्रा० गु० झडिअ =वि० (दे०) झड़ा हुआ, गिरा ३, २२; १० च० १३, ८, ४)। हुआ; (प० च० ६६, १५) । झडक-पु० अचानक झपटना (sudd- झडी-स्त्री० (सं० क्षर >झर > झड> en rushing); "को वि जुज्झविउ प्रा० झडी) निरंतर वृष्टि; तुल० गु० मेस-झडक्कएँ;" (प० च० झडी; (दे० ना० मा० ३, ५३) । २५, १५, ७)। सडुअ-पु० (दे०) गेंद, (दे० ना० मा०- झडझडझडझड-पु० भाड़-झड़ की ध्वनि ३, ५६)। होना; (प० च० २८, २, ७)। Vझण-(दे०) घृणा करना। -इ झडति-अव्य० (सं० झटिति) शीघ्र, व० (षड्) । जल्दी; म० झट; (जस० १, ६, १७; Vझणझण झगझणाय् >प्रा० जंबू० ७, ८, ७)। झणझण) झन-झन आवाज करना; (ण० Vझडप्प-१. पकड़ना, -इ १, १३, ५)। झणझणंत-कृ० (सं० व०; झडपिप्य (caught with in); झणझणाय् + शतृ); (जंबू० १,१४, (प० च० ३२, १२, ६) -इ; २. भ.प ७)। (सं० क्रि०, झणझणिय (४३३) झलक्किर - झरती हुई; शरणझरिणय-वि० झणझणित; (सुदं० १५, ५; क. ३, १, ३) । झरन्ति व० ३, ७, १२)। (जंबू० ७, १, १०)। झप्ति-क्रि० वि० (सं० झटिति >प्रा० झरय-पु० (दे०) -पुं० (दे०) सुवर्णकार; (दे०- झत्ति) झटपट, शीघ्र, जल्दी, तुरंत; ना० मा० ३,५४)। (क० १३, ४, ३; प्रा० पं० २, १११; झरि-(दे०) झाड़ी; (जंवू० ५, २, जस० २, १३, ५; व० ३, ७, २)। २४)। झत्थ-वि० (दे०) १. गत, गया हुआ; झरिह-वि० क्षरणशील, २. नष्ट; (दे० ना० मा० ३, ६१) । (जंवू० ६, ६, १०)। शपिअ—वि० (दे०) पर्यस्त (१. इधर- झरुअ-पु० (दे०) मच्छर; (दे० ना०- उधर फेंका गया, बखेरा गया; २. घेरा मा० ३, ५४)। हुआ; ३. उलटाया हुआ, ४. पदच्युत, एक ओर रखा हुआ; ५. प्रहार किया झल-स्त्री० (दे०) १. उष्मा; तुल० म० हुआ; उत्क्षिप्त (ऊपर को १. फेंका हुआ, झल; (जस० ३, ५, ११)। २. ज्वाला; (प्रा० गु० २४, १३)। ३. (प्रा० झला उछाला हुआ; २. पकड़ा हुआ, सहारा दिया हुआ, ३. आहत, ग्रस्त, ४. गिराया मृगतृप्णा; (सं० रा०)। झल- Vझल-(२० जाज्वल् >प्रा० हुआ); (पड्)। झल) झलकना, चमकना, दीपना; (सं.. Vझबक्क- (प्रकाशस्पन्दे) झव-झव करना, ज्योति सी उठना; तुल० गु० रा०)। झवक (प्रा० गु० २२, ६)। झलकंत--वि० झालर वाला (छन) झमाल-न० (दे०) इंद्रजाल, "सत्ति अमोह छत्तु झलकंतउ," अर्थात् जाल; (दे. ना० मा० ३, ५३) । अमोघ शक्ति, झालरवाला (व० झम्प-पु० (दे०) कूदना; तुल० ३, २०, ७)। गु० झंपलावतुं (कूदना, झपटना) (प०- झलक्क-(सं० जाज्ज्वल्) झलकना, च०१७, १७, ४)। आभा देना; (सं० रा०; जंवू० ४, १६, झय-० स्त्री० (सं० ध्वज>प्रा० ७) । झय) ध्वजा, पताका; (सणतु० ४५४)। झलक्क-स्त्री० बौछार, छींटा, धारा; झरंक, झरत-० (दे०) तृण का (splash); "पमुक्त झलक्क सहोयरासु। बनाया हुआ पुरुष, चञ्चा (पुआल का ण वेल समुद्दे महिहरासु —"भाई पर बना हुआ पुतला, गुड्डा, गुड़िया); (दे० जल धारा छोड़ी, मानो समुद्र की वेला ना० मा० ३, ५५)। महीधर पर छोड़ी गई हो; तुल० गु० Vझर--(सं० क्ष>प्रा० झर) झरना, झालक, छालक; (प० च० ४, १०, टपकना, चूना, गिरना; (सं० रा०)। ४)। झरंत- व० कृ० (सं० क्षरत्), (ण० ६, झलक्किर-वि० (दे०) दीप्त, जलता माया- छत्र; - झलक्किय (४३४) झस " झलझ- हुआ, चमकता हुआ; तुल० झळकतु; /झलहल-(सं० जाज्वल्) देदीप्यमान संधि० ५, १, ५)। होना; तुल० गु० झळहळवू; राज० झळ- झलक्किय–वि० झयझलायित; झूलसते हळणी; (संधि० १२, ६, २७) । हुए, "उट्ठति झलक्किय जलहिमंद;' झला-स्त्री० १.. (सं० ज्वाला>प्रा० अर्थात् मंद (शांत) जलधि झुलसते हुए झला) चमक, चमचमाहट; (को० ४, ऊपर उठने लगे; (जंवू० ७, ८, ११) । २३०) । २. (दे०) मृगतृष्णा, मृगमरी- 1/झलझल-(सं० जाज्वल >प्रा० चिका, व्यर्थ तृष्णा; (दे० ना० मा० ३, झलझल) झलझलाना; (जंवू० ७, ५, ५३)। १२)। झलाझल (ध्व०) झलाझल का स्वर; Vझलझल-(सं० जाज्वल् >प्रा० झल (क० ४, ६, ५)। झल) झलकना, चमकना; (ण० ७, ५, झलुकिअ, झलुसिअ-वि० दग्ध, जला १६)। -इ व० (महा.)। झलझलंत हुआ; (दे० ना० मा० ३, ५६) । -व० कृ० दीप्यमान; म० झळ कणे, Vझल्ल-जड़ देना; -उ क्रि०, व० झळाळणे; (भ०)। झलझलिउ-भु० उत्तम पुरुप, ए°, "खग्ग रिउसीसहि का०, झलझलाया; "मयरहरु झल्लउ;" अर्थात् शत्र के सिर पर तल- लिउ;" अर्थात् सागर झलझलाया; (क० वार जड हूँ; (प्रा० ५० १, १०६) । ३, १८, ८)। झल्लरि-स्त्री० (सं० प्रा० झल्लरी) झलझलिय–वि० (सं० जाज्वलित) जग वलयाकार वाद्य-विशेष, झालर, झाँझ, मगाया हुआ; (सुदं० ६, १२, ७) । मजीरा; तुल० गु० झालर; (प० च० १, झलझलिया-स्त्री० (सं० झौलिक > ११,४; व०६, १४, ११; ण० ७,१, प्रा० झोल्लिऊ) कोथली, झोली; (दे०- ५)। झल्लरी-स्त्री. वाद्य-विशेप; ना० मा० ३, ५६)। (जंवू० १०, १६, ३)। झलमल -(सं० जाज्वल्) चमच झल्लिर-पु० (दे०) धारा, "विसहिय- जगमगाना; -इ व० (सुदं० ११, पाउसजलझल्लिरेहि;" अर्थात् वर्षा ऋतु १७, १३) । झलझलंति; (सुदं० ११, की जलधारा या वृष्टि को झेला था; १५, १२)। (जस० ४, १६, ७)। Vझलवज्जिअ-भू० का० कृ० (कर्मवा झल्लोझल्लिउ-वि० क्षुब्ध; (भ०)। च्य) झल् प्रत्याहार से रहित, "झलव झस--पुं० १. (सं० झप>प्रा० झस) ज्जिम तह बहिर अंध लंकारह रहिअउ;" मत्स्य, मछली; '(प० च० १,१५, ४; अर्थात् झल् प्रत्याहार (अर्थात् झ, भ, ध, व० १०, ८, १२; जस०१, १०, ७)। ढ, धं आदि वर्गों, से रहित छप्पय वहरा, २. पु० (दे०) आयुध-विशेप, शस्त्र- है तथा अलंकार से रहित अंधा है; (प्रा० विशेष; "असिवर-झस-मुसण्डि-णारा- पैं. १, ११६)। ऍ हिं," (प० च० ११, ८, ५) । कटारी; माना, ससय (४३५) झाणजाइ च० झाड- - झाडल-न० (ण० ५, ४, ३) । ३. पुं० (दे०) ध्यात्वा) ध्यान करके; (हे० ४४०, १)। १. अयश; २. तट । ४. वि० तटस्थ, झायइ-व० (सं० ध्यायति) ध्यान मध्यस्थ; दीर्घ और गहरा; टांकी (छेनी. करना; (प० १, ७,६) । कुल्हाड़ी) ने छिन्न; (दे० ना० मा० ३, झायउ-भू० का ध्यान किया; (म० २, ६०)। ६८, ५) । ध्यान करने लगे; “परिपु- ससय-पु. (सं० सपक) छोटा मत्स्य; ज्जिउ झायउ आयरेहि;" (क० ५, ५, (दे० ना० मा० २, ५७) । ८) । झायन्त-व० कृ०; (प० च० १६, भसर-पु० न० (दे०, प्रा० झसर) १४, ७) । सायमाण-कृ० ध्यान करते शस्त्र-विशेष, आयुध-विशेप, "झसर हुए; (जंवू० १, १८, १३) । तिसत्तिपरसु इसु-पास हुँ" -'झसर-विश- -न० (सं० झाट:-वृक्षों का मुर- क्ति,-फरसु और इपुपातों से;' (प० च० मुट) १. निकुज, झाड़ी, झाड़; (दे०- १७, ६, ६)। ना० मा० ३, ५७) । २. वृक्ष; (दे०- झसिम-वि० (दे०) १. पर्यस्त, उत्क्षि. ना० मा० १, ६१)। प्त, गलित; (दे० ना० मा० (दे०) कपास का वृक्ष, जंबू० २, ५, १८) । २. जिस पर आक्रोश कास-फल; (दे० ना० मा० ३, किया गया हो वह; (दे० ना० मा० ३, ५७)। ६२)। झाण-पु० न० (सं० झसुर-न० (दे०, प्रा० भसुर) १. पान, झाण) किसी के स्वरूप का चिंतन ध्यान, ताम्बूल, नागवल्ली; (सं० रा०)। २. अथं, (दे० ना० मा० ३, ६१)। विचार, उत्कण्ठापूर्वक स्मरण, (ण० ६, संतप्त होना, Vझांख-(प्रा० शंख) ५, ५) । २. चिंता; (प० च० २६, १, निःश्वास लेना। -इव०, अक० (रा० ११)। -गि स्त्री० (सं० ध्यान+ अग्नि > प्रा० झाण+अग्गि) ध्यान रूपी १०)। अग्नि; (ण० ६, २०, १०)।-जुयल Vशा-(सं०/ध्ये>प्रा० झा) चिता पुं० (सं० च्यान+युगल) धर्म व शुक्ल; करना, ध्यान करना। झाइय-भू- का०, ध्यान किया; "पुणु झाइय सोलह- "जंतुपीडविरहिउ वयविद्धिहि, कारणु अक्सरिय । जय (?) कोहि----सहास दहु- झाणजुयलनयसिद्धिहि;" अर्थात जंतु पीड़ा से रहित होने से यह तप व्रतों एवं त्तरिय" फिर उन्होंने सोलह अक्षरों वाली विद्या का ध्यान किया, उसका दस हजार ध्यान-युगल रूपी पर्वत की सिद्धि (आरो- करोड़ दस जाप किया, (प० च० ६, ७, हण) का कारण है; (जंवू० १०, २२, ८) । झाइउँ–कि. भू० ध्यान किया; ७)। झाणजोइ-पुं० (सं० ध्यान+योगिन् (ण० १, १०, १०)। -एवि पू० का० क्रि० (क० ७, १२, १०; जस० ३, १६, >प्रा० झाण+जोइ) ध्यानलीन योगी; ७)।-एविणु-पू० का० क्रि० (सं० (क० ६, १३, ८)। ध्यान>प्रा० झाणट्टिय (४३६) झीणी -- प्राप्त च० २३, - झापट्ठिय-वि० (सं० व्यान+स्थित) झिक्किरि-स्त्री० (दे०) वाद्य; (सुदं० ध्यान में स्थित; (क० ३,२,१)। ५, ६, १०)। झाणागम-पु० (सं० व्यान+आगम) /झिज-(सं० लि, क्षये) -इव० ध्यान व ज्ञान; (जं० १०, २१, ६)। (सं० क्षयति) छीजना, क्षय को बारणाणल-पुं० (सं० व्यान अनल) होना; (सुदं० १०, ६, १५; क० ६, ८, व्यान रूपी अग्नि, "झाणाणले नालिवि ७)। झिज्जिवि-पू० का० क्रि० (सं० कम्मलखु;" अर्थात् कर्म रूपी वृक्ष को नि+क्त्वा) (सुदं० ४, ५, १६)। व्यानाग्नि में ऐसा जला दिया; (क० 1 भिन्न -(दे०) क्षीण होना; (सं०- १०, २७, ५; जंबू० १, १, ६)। रा०)। झाणाढ-वि० (सं० व्यानाढ) ध्यान झिन्दुअन० के दुक; (प० में लगा हुआ; (जस० ३, १७,४)1 ४,८)। झाणिम्गि-स्त्री० (सं० व्यान+अग्नि) झिमिझिमिय-वि० झिमझिमित (व्व- व्यान रूपी अग्नि; (जंबू० १०, २३, न्यात्मक) झमकता हुआ; (सुदं० ७, ६, ७) । १३)। झामर-वि० (दे०) वृक्ष, बूढ़ा; (दे०. झिरिडन० (दे०) जीर्ण या पुराना ना० मा० ३, ५७)। कूप; (दे० ना० मा० ३, ५७) । झामल-वि० (दे०) निष्प्रभ; (प्रा० गु० झिल्लिरि-स्त्री० (सं० झिल्लिका) ३६, २६)। झींगुर, प्राणी-विशेप; (जस० २, २७, झामिल-वि० (दे०) दव, प्रज्वलित; ५)। (दे० ना० मा० ३, ५६) । झामिय झिल्लिरिआ-स्त्री० (दे०) १. चीही वि० दग्ध; (संधि० २, १८, ६) । नामक तृण; २. मच्छर; (दे० ना० मा० झारुआ-स्त्री० (दे०) चीरी, क्षुद्र जंतु ३, ६२)। विशेष; (दे० ना० मा० ३, ५७) । झीण-न० (दे०) १. अंग, शरीर; झाल-स्त्री० (सं० ज्वाला) अग्निशिखा, २. कीट; (दे० ना० मा० ३, ६२)। लपट; तुल० गु० झाळ; (सं० रा०; प्रा० वि० (सं० क्षीण>प्रा० मीण) १. दुर्बल, गु० १, ६४)। कृश; (सं० रा०) । २. नीना; (सं० रा० झालियर-भू० का०, गृहीत, ग्रहण १७१; ण० ४,७,८; क० २,६, किया; "रवतह गांगह तोरि, दडउ जेव है)। उच्टालियट । घाउ म होउ सरीरि, पड मीणपह-पुं० क्षीणप्रभ; पर्वत-विशेप; तउ दयकरि झालियर;' (प्रा० गु० ४, (प० च० २७, २, २)। १५)। भोरणी-वि० स्त्री० (सं० मीणा>प्रा० झिखिम-न० (दे०) लोकपवाद, लोक- झोण) दुर्बल, कृश; (सुदं० ७,४, निदा; (दे० ना० मा० ३, ५५) । ११)। - झीरा (४३७) , , झोरा-स्त्री० (दे०) लज्जा, शरम; (दे०. झुम्वुक्क-न० (सं० स्तवक) समूहः ना० मा० ३, ५७)। "वर-पवाल-माला-पलम्बिरं मोत्तिएक्क- झुझुमसय-न० (दे०) मन का दुःख झुम्वुक्क झुम्विरं;" (प० च० ५५, ५, (दे० ना० मा० ३, ५८) । झुपडउ.-० (दे० प्रा० झुपडा स्त्री०) झुलुक्क-पु. वायुलहरी; तुल० म० कुटी, झोपड़ा, तुल० पु. पडू; (प्रा० झुलुकू; "मुत्ताहलमाल मुलुक्कइहि;" गु० ३८, १७)। (भ० ४, १०, ११)। झुबुक-न० (दे०) झूमका; (जंबू० ४, झुक्किय-वि० (सं० ज्वलित) झुल- साया गया, जलाया गया; तुल० म० झल झुट-वि० (दे०) झूठ, असत्य; (दे० लागणे; (प० च० ४६, ५, ७) । "विर- ना० मा० ३, ५८; ण. ६, १३, हदवग्गिभुलुक्कियकायउ" (भ० ३, २०, १५)। झुट्ठी-वि० स्त्री० (दे०, प्रा० झुट्ठ) झुलुश्कियंग-वि० (सं० ज्वलित+ झूठी, असत्य; तुल• गु० जूठी; (प्रा०- अङ्ग) झुलसते हुए अंगों वाला; (जंबू० गु० ५, १०)। १०, १३, ११)। झुरा---पु० (सं० ध्वनि >प्रा० झुणि) झुलुषको-(दे०) झुलस गई; (जंबू० शब्द, आवाज; (व० १, ८, १)। १०, १५, ४)। 1 झुण-(सं० घ्वन्) ध्वनि करना; /भुल्ल-(सं० आन्दोल का प्राकृत (सं० रा०; जस० २, १३, ४)।-इ धात्वादेश झुल्ल) झूलना; (सं० रा०) । व०; (जंबू० १०, २, ६)। झुणन्ति- --इ अक० झूलना, (महा० १४, ५, व०; (जंवू० ४, १५, ३) । झुणिज्जइ- १२) । कर्मवाच्य, (सं० ध्वन्यते) (प० च० २४, अल्लणा-स्त्री० (छंदशास्त्र में) झूलना १३, ८)। नामक छंद; (प्रा० ५० १, १५६) । झुणि-स्त्री० (सं० ध्वनि >प्रा० अणि) झुल्लुरी-स्त्री० (दे०) गुल्म, लता, वृक्ष; ध्वनि, शब्द, आवाज; (सं० रा०प० (दे० ना० मा० ६, ५८) । च० ३, ११, १; हे० ४३२, १; रा०; झूझ---न० (सं० युद्ध>प्रा० जुज्झ) प० २, ७, १)। लड़ाई; (प्रा० गु० २६, ११)। झुणिय-वि० (सं० ध्वनित) शब्दाय भूठ-स्त्री० (सं० जुष्ठ>प्रा० झुट्ठ) मान; (५० ६, १५, ६)। १. जूठन; (उ० व्य० प्र० ५२-३)। झुत्तो-स्त्री० (दे०) छेद, विच्छेद; २. वि०, असत्य (ण० ६, १३, १५) । (दे० ना० मा० ३, ५८) । झूर--वि० (दे०) कुटिल, टेढ़ा; (दे०. मुम्मुक्क-न० (दे०) भूमका; (सुदं० ना० मा० ३, ५६)। ११, १२, ८)। /भूर--(सं० क्षि>प्रा० अर) झूरना, - . - झूरिय (४३८) टंक - , - । सूखना, क्षीण होना, . बिसूरना, क्लेश झोडिअ-पु० (दे०) शिकारी, बहेलिया; पाना; (स० रा०) । --इ अक० सं० (दे० ना० मा० ३, ६०)। स्मरति; स्मरण करना; (भ.)। -वइ ज झूरना, क्षीण होना (ण० ५, ८, १०)। तुल० म० झुरणें। भूरिज्ज-कर्मवाच्य; म-पु० व्यंजन-वर्ण-विशेप । संस्कृत ---इ, 'केत्तिउ वार वार झूरिज्जइ' और प्राकृत में शब्द के आदि में न का कितना वार-बार भूरा जाय; (सुदं० २, प्रयोग उपलब्ध नहीं होता है। पालि में १०,१)। अकार का प्रयोग मिलता है । अपभ्रंश में झूरिय-वि० (दे०) स्मृत, चितित; भी न का अभाव है। 'कीतिलता' में (जंवू० ७, ६, ३०)। अकार का प्रयोग मिलता है । 'कीर्ति- झूल-पु० (सं० आन्दोल का धात्वादेश लता' की नैपाली प्रति में न का वाहुल्य झुल्ल) शोर; (की० २, १०४) । । देवनागरी वर्णमाला का यह दसवाँ Vझुल्लंत-झूलना, लटक कर वार-वार व्यंजन है । च वर्ण का पाँचवाँ वर्ण हैं। इधर-उधर हटते बढ़ते रहना; "झुल्लंत इसका उच्चारण स्थान तालु और नासिका तरुसाहागयाई; अर्थात् वृक्षों की है। शाखाओं पर चढ़कर झूलते हैं; (जस० बेजोन-अध्य० (रीतिवाचक क्रि० वि०) २, २७, ७)। सं० एवम्; और भी ऐसी बात है। नो- (दे०) १. अत्यंत सं० एवं; (की० २, २३९) । २. स्वच्छ, निर्मल; (दे० ना० मा० ३, अहॉ-अव्य० यहाँ; (की० ३, १६) । ६२)। जुरग-अव्य० पुनः; (नेपाली प्रति, की -~-न० कदुक, गेंद; (जंबू० १, २, ४३)। ६, ६)। झेन्दुलिय--स्त्री० (दे०) सं० पुश्चली; रंडी, वेश्या; "सव्वङ्ग-समुट्ठिय-रोम-रइ, ट-पु. (सं० प्रा० ट) व्यंजन वर्ण- तहे पुत्त वि भत्तारु वि मरइ । कडि विशेष । मूर्धन्य, अघोप, अल्पप्राण, निर- लञ्छण भउँहावलि-मिलिय, सा देव रिगरु नुनासिक स्पर्श ध्वनि है । इसके उच्चारण तउ झेन्दुलिय;"(प० चं० ३६, १५,५) ! में तालू से जीभ लगानी पड़ती है। झोंडलिआ-स्त्री० (दे०) रासक के टंक-पु० (दे०) १. तलवार; २. खात, . समान एक प्रकार की क्रीड़ा; (दे० ना० खुदा हुआ जलाशय; ३. जाँघ; ४. भित्ति, मा० ३, ६०)। भीत; ५. तट; ६. खनिन, कुदाल; (दे०- झोउप्प-पु. (दे०) १. अन्न-विशेष; ना० मा० ४, ४)। छिन्न, सूखे चने का शाक; (दे० ना० मा० छेदा हुआ, काटा हुआ; (दे० ना० मा०- . ४, ४)। झूसरिअ-वि० hu ७. वि० ३, ५६)।
टंकार (४३६) टरइ ८)। किया हुआ; टंकार--पुं० (सं० टकार>प्रा० से अंग का आघात, ठोकर; (ण० ६, टंकार) धनुप का शब्द; (ण ७,१, १४, ३; महा० ३१/१६/४)। ८) । टङ्कार; (की० ४, १६८) । टङ् टक्कारी-स्त्री० (दे०) अररिण-वृक्ष का कारव, टंकार का शब्द (tinkling फल; (दे० ना० मा० ४, २) । sound); (प. च० २४, २, ५) । टगण-पु. (सं• टगण) (छंदशास्त्र में) 1/टंकार- (सं० टड्कारय) टंकार पट्कल गण । मात्रिक गणों में से एक । करना; -इ व० "घणुगुणु मयरचिंधु यह छह मात्राओं का होता है। जैसे sss, टंकारइ;" अर्थात् मानो मकरध्वज धनुप ।।s, इत्यादि । (प्रा० ५० १, १३) । की टंकार कर रहा हो; (जंवू० ४, १३, टटटगिदि-स्त्री० (दे०) शब्दानुकृति; प्रा० ५० १, २०४)। टंकारित-वि० (सं० टङ्कारित) धनुष टटट्इआ-स्त्री० (दे०) नवनिका; (दे० की डोर खींचकर शब्द ना० मा० ४, १)। (जंबू० ८, ७, ८)। टट्टरी-स्त्री० वाद्य-विशेप, " काहलं टंकिअ-वि० (सं० टङ कित) टांकी से टट्टरी-झल्लरी मद्दलुल्लोल-वजन्त;" काटा हुआ; (दे० ना० मा० ४, ५०)। (प० च० ४०, १७, ४)। टंकु-पुं० (सं० टङ्क) परिमाण-विशेप, टणक्किय-भू० का० (सं० टङ कारित) आधा छटाँक; टका भर; तुल० राज० टंकार की; "टणक्किदोर;" उन्होंने डोरी टका भर (वजन); (प्रा० ५० १, की टंकार की; (जंबू० ६, १३, ४)। १३०)। Vटणटण-(सं० टणटणाय; अनुध्व०) टंटं-पु० ध्वनि-विशेष; (जंवू० १०, टणटण की आवाज करना; टणटणटणंत- १६, २)। कृ० टनटनाते हुए; (ण० ६, १५, १०)। टवक्क-न. तंवक्क, वाद्य-विशेष; टणटणन्त कृ० (प० च० ४६, १, (प्रा० गु० ३६, ६)। २) । टण्टन्त-कृ० टणटन्त की ध्वनि टंबरय-वि० (दे०) भारवाला, भारी; करते हुए वाद्य-विशेष को पीटना (bea- (दे० ना० मा० ४, २) । ting tabor); "टिविल-टण्टन्त-घुम्मन्त- टका-पु० (सं० टक्क) चाँदी का एक वरमन्दलं;' (प० च० २४, २, २)। पुराना सिक्का; (को० ३, ६७)। टपु-पु (सं० स्थापन, थाप) घोड़े की टक्क-पु. (सं० टक्क) टाप, घोड़े के पैरों के जमीन पर पड़ने का (झेलम और सिंधु नदियों के बीच का) शब्द; (प्रा० ५० १, २०४)। टप्पु; देश-विशेप; (भ०; प०च० ३०, २, (प्रा० ० २, १११)। 1/टरइ-व० (सं० टल्) हटना; "गिरि ११; जंवू० ६, १६, १०)। २. जाति- विशेप; (क० ८, १६, १)। टरइ महि पडइ नाग मन कंपिआ;" टक्कर-पु० (दे०, प्रा० टक्कर) अंग अर्थात् (सेना के धक्के से) पर्वत अपने १. पंजाव ७ टरटर (४४०) टालइ कूजन किया, टंकार, - टापे-पुं० % 3D स्थान से हटने लगे, धरती एक ओर (दे० ना० मा० ४, २)। गिरने लगी, शेपनाग का मन काँप गया; टहकउ---भू० का० (सं० कूजितम्) (की० ३, ६७)। "कोयल टहकउ;" तुल० टरटर-टरटराना, टर-टर करना; गु० टहुको; (प्रा० गु० १०, ५६)। -रंति सक० (सुदं० ८, १६, १) । टाङ्गार-पु. (सं० टङ्कार) /टरपर-तड़कना, फटकना; टरपरिअ टंग-टंग का शब्द; (की० २, १०१) । -भूत, कर्म, कृदंत; (प्रा० पं० १. टारगअ-क्रि, आ० (सं० ताक =फैलाव, ६२)। खिचाव) खींच, खींचो; (हिं० का०, च. टरि-भू० का० गिर गए; "टरि टोप्परि ३८)। टूटि सरीर रहे;' अर्थात् उनेक टोप टाप-पु० (सं० स्थाप्य >प्रा० ठप्प- गिर गए और शरीर टूट गए; (की० ४, स्थापनीय, स्थापना के योग्य) घोड़े का २३१) । पैर; (की० २, २४३)। Vल-(सं० टल विचलित होना) टाप; "विमुद्ध दापे मार टापे चूरि जा अपने स्थान से अलग होना, हटना, वसुन्धरा; (को० ४, ३५) । मिटना, न रह जाना। -इव० "टलइ टापू-पु. (दे०) १. द्वीप, टापू; स्थल नहु पुब्व कयदेवगुरु-सुमरणं;" तुल० गु० का वह भाग जिसके चारों ओर जल हो टळवु; (प्रा० गु० २, २, २४) । २. टप्पा, टापा; (सि० १, ४५) । टलटल-कम्पने (अनु०) कंपित होना। टार-पु० (दे०) अधम अश्व, हठी "टलटलिया कुल-सेल सन्वि सायर झल- घोड़ा; (दे० ना० मा० ४, २) । झलिया;" तुल० गु० टळटळहुंः (प्रा०- टारिआ-भू० का० (सं० त्वरयति) गु० १२, १६)। टाल दिया; (शिवप्रसाद सिंह, कौतिलता टलटलइ-क्रि०, व० (सं० टलटलाय > और अवहट्ट भाषा, २, ८०) । प्रा० टलटल) टलटल आवाज करना; (ण० ७, ५, १५) । टालइसक० (सं०/टल) अपने स्थान टलटलिउ-भू० का० (ध्व०) टलट- से अलग करना, हटाना, चलायमान लाया; "भुवणयलु खलभलिउ गिरिपवर करना; तुल० गु० टाळ; (प० च० टलटलिउ;" अर्थात् भुवनतल खलभ १२, २, २) । टाल-(सं० टाल- लाया। प्रवर गिरि टलटलाया; (क० ३, यामि) टरना, टालना; "हउं "हउं . पर्वत उ १८, ७) । टलटलियउ-टयटलायित; टालउं" --अहं पर्वतमपि' टालयामि, (सुदं०.१, १, ६)। (उ० व्य० प्र० ६-३०) । टालिउ~भू० टसर-न० (दे०) मोड़ना;, (दे० ना० का०; मिटा दिया, न रहने दिया; "के मा० ४, १)। महि-मण्डलु वाहहिं टालिउ;" (प० १० टसरोट्ट-न० (दे०) शेखर, अवतंस; २३, ७,७)।
टिंट (४४१) टोप्पी , हुए; "धरा खेलने का टिट-स्त्री० (दे०) चू त-स्थान, जूभा- (को० ४, १७५) । दुटि-भू. का०, खाना; (टेण्टा, दे० ना० मा० ८,३; टूट गए :(की० ४, २३१) । प्रा० गु० ३५,३; ण० ३, १२, ४)। टन्न-वि० खण्डित होते हुए; टिटाउत्त-पु० टेण्टापुत्र; (भ०) । धूरि लोहन्त दुट्टन्न का;" अर्थात् टिटा-वि० (दे०) निःसत्त्व, दुर्बल, खण्डित होते हुए शरीर पृथ्वी की धूल में सत्त्व-रहित; भट्टा टिटा पडियत लोट रहे थे; (की० ४, १६४)। प्राण;" (प्रा० गु० २६, १२) । टेंट-पु० (दे०) टेंटा, चतग्रह (जंबु० टियर--० न० (दे०) वृक्ष-विशेष; ४, २, १०) । टेण्ट; (प० च०५६, तेंदू का पेड़; (जंबू० ५, ८, ६)। टिबर, १४, ७)। टिंवरुभ; (दे० ना० मा०४, ३)। Tar-स्त्री० (दे०) जूना टिक्क-न० (दे०) १. टीका, तिलक; अड्डा; (दे० ना० मा० ४.३)। २. सिर का स्तवक, मस्तक पर रखा टेक्कर-न० (दे०) स्थल, प्रदेश; (दे०- जाने वाला गुच्छा; (दे० ना० मा० ४, ना० मा०४,३)। टेल्ल-पु. निलिंग-निवासी, तिलंगा। टिग्घर-वि० (दे०) वृद्ध, बूढ़ा; (दे० टेल्ल; (रा० १८); टेल्लि; (स० १५)। ना० मा० ४,३)। टेवंत-कृ० पैनी बनाते हुए; "टेवंती टिप्पी-स्त्री० (दे०) तिलक, टीका; कत्ती णिवंकरणे", अपने हाथ से कटारी (दे० ना० मा० ४, ३)। को रेतते हुए; (क० १०, १६, ८)। टिविल-न० वाद्य-विशेप; (sort of टोकण, टोकणखंड-न० (दे०) दारू tabor) (जस० २, २०, ३; सुदं० ३, नापने का वरतन; (दे० ना० मा० ४, ४, ३; प० च० २४, २, २)। ४) । टोली स्त्री० (सं० तिलक) विंदी, लघु टोप-पु. (सं० स्तुपम्) पावन अवशेषों तिलक; तुल० राज० टोली; (प्रा० गु० को रखने के लिए एक प्रकार का स्तंभ- ११, १५)। सदृश स्मृति-चिह्नः (उ० व्य० प्र० ४६- टोह-पु० (सं० दिवस >प्रा० दीह) २५)। दिन, टोहा; (रा० १५) । टोप्परि-स्त्री० (देवाज टोप्पर, प्राकृत छैट-वि० (सं० न टि) हुँडा, जिसका पंगलम् में प्रयुक्त) शिरस्त्राण, टोपा; हाथ कटा हुआ हो वह; (दे० ना० मा० (की०४, २३१)। ४, ३)। टोप्पर-० न० (३०) टोप, शिर- 1/दुट्ट-(सं०/त्रु > प्रा० दुट्ट) स्वाण-विशेष; (प्रा० पं० २, २०६)। -इ कि०, ३० (सं० वदति) टोप्पो-स्त्री० प्रा० टोपिा (दे०) टोपी, (प्रा० ५० १, ७६; की० ४, १६२; दृद् पुष्पदन्त के 'आदिपुराण' में उन्ता--भू० का० .."तोड़ हरचरिउ में प्रयुक्त 'टोपी, 'सुपानह - टूटना। प्रयुक्त, जस- रहे थे।
टोलव (०४२) ठव चरिउ' में प्रयुक्त : 'टोपिला शब्दमणि तालू में लगाना पड़ता है । सं र्पण (रचना-काल १२६ ई०) में स्था>प्रा० ठा) बैठना, स्थिर होना, 'टोप्पिंगे' का प्रयोग, प्रबन्ध कोश (रचना- गति का रुकाव करना; (सुदै , कॉल १३०८ ई.) में 'टोप्पर' (शिर- १३) । स्त्राणवाची) प्रयुक्त । - टोपी, सिर पर ठइ-वि० (दे०) १ऊपर फेंका हुआ; रखने का सिया हुआ वस्त्र; तुल० म०, २. पुं० अवकाश; (दे० ना० : मा०४ ५) । राज० टोपी; (जस०-१, ६, ४) । ठक-पु (सं० ठक) धूर्त, वंचक; टोलंब--पु० (दे०) मधूक, महुमा का (की २, १०). " पेड़; (दे० ना० मा० ४,४)। टोल-पु० (दे०) १. शलभ, जंतु- ठक्कुर-पु. (सं० प्रा० । ठक्कुर) वंश- विशेप; २. पिशाच; (दे० 'ना० मा० ४, नाम; (जस०.४, ३०, (४) २. ठाकुरी योद्धा; (जंबू० ७, ६, १९). ढग-पु० (सं० स्थग>प्रा० ठग) ठग, ठग-पुं० (सं० ठक) ठग, धूर्त, वंधक; गुडा, वेईमान (सि० १, २४) । (दे० ना० मा० २, ५८; सुदं० ८, ४२)। रह-लक्ख,-वि० अट्ठारह लाख गण-पु० (सं० ठगण) (छंदशास्त्र (सिं० २, २०, १)। में). पञ्चकल गण, मात्रिक छंदों. के गणों ढाउ-पु. (सं० स्थान >पा० ठान, प्रा० में से एक । यह पाँच मात्राओं का, होता .ठाण) ठाँव, स्थान, ठोर; तुल अवधी है और इसके ८ उपभेद हैं; (प्रा० ५०.१, ठाउँ; (सि० १,१५) GE ट्ठाणापुसं० स्थान>प्रॉ० ठानः> ठट्ठ-पु. (दै० थट्ट) झुण्ड; (को० प्रा० ठारण) स्थान; (सि० २, ११) । २, ९४) । ठट्ठा-समूह, भट्टा ठट्ठा ट्ठिय-वि० (सं० स्थित प्रा० ठिय) पेप्खीआ;" अर्थात् भाटों के समूह दिखाई यवस्थित; (व० ५, १०, १५)। पड़ते थे; (को० २, २२६)। इरिस-वि०-(दे०) जर्व-स्थित; (देः ना० मा०४,६) ठल्ल-वि० (दे० 'निर्धन, निठल्ला hta (दे० ना०मा० ४,३५) 5 ठ-पु. (सं० प्रा० ) मुर्ध-स्थानीय वन(संस्थापय् >प्रा० ठव) स्था- यंजन वर्ण-विशेप। मूर्धन्य, श्वास, पन करना । -वंति (सुदं० १२, १; अघोप; महाप्राण, निरनुनासिका स्पर्श १०) --इ, क्रि०, रखना (हे०-३५५) । व्वनिः । टवर्ग का दूसरा, वर्णः। इसकाः ठइज्जइ-कर्मवा० स्यापि :-(रि०९, उच्चारण स्थानः मूर्द्धा है। इसका उच्चा १५)न्ते स्थापना की,.: (की ०.२; श करते समय जीभ का मध्य भागः ९५)।ठविउ, क्रि० भू० स्थापित करः । १३).. :- ठवलु (४४३) दाम 7. -- १॥ ० मं० दिया; (प.० च.० २, ३, 5) । ठवेप्पिणु ठाई- (सं० स्थान >प्रा०. ठाण) जगह; -पू० का० कि०, स्थापित करके (ण० (प्रा० पैं० १,. १३३.)।- ठाइ; (सं. ७, १५,२ )। ठवेवि—पू० का० क्रि०, रा.)। खड़ा करके, (ण० ६, २१, २)। तुल० ठाइस-वि० (सं० अष्टाविंशत्) अट्ठा- म० ठेवणे to puti ठाइऊण-कृ० ईस; (प्रा० .० १, १६१)। (सं०१/ठा+ऊण्) खड़े होकर; (व० ठाउ-० (सं० स्थान >प्रा० ठाण) ३; '११, ८) । ठिअउ-स्थित है; (हे जगह; तुल० म० ठाम; (हे० ३३२, १; ४१५, .१) । ठियाई-स्थित है; प्रा० गु० १०, ५५; प्रा० पैं० १ '(पाहु०) । २०८)। ठवलु-पु० (दे०) दाव; (जुए में पासा 'फेंकने का दर्वि); (ण. ठाकुर-पुं० (सं० ठक्कुर) ठाकुर लोग, ३, १२, पूज्य व्यक्ति, नायक; (की० २, १०)। ६)। ठविअ-वि० (सं० स्थापित >प्रा० ठाण-पुं० न० (सं० स्थान >प्रा० ठविअ) रखा हुआ, संस्थापित; तुल० ठाण) स्थान; (प० च० ५, १०, ६; ण ठिव, ठेव; (पड्) । ठविय; (ण० १, १८, १, १२, ११; सि० २, २६)। पुं० २)। (दे०) अभिमान, गर्व; (दे० ना० मा० ४, ५)। ठविआ-स्त्री० (दे०) प्रतिमा, : मूर्ति, ठाणा-० (सं० स्थान >प्रा० ठाण) प्रतिकृति; (दे० ना० मा०.४.५):।। वाण चलाने की विशेष मुद्रा में खड़े ठविया-वि० (सं० स्थापिता) संस्था- होकर युद्ध करना, स्थान; (को०:४, रखा हुआ; (सुदं० ११, १८०) । टि०-धनुयुद्ध में पाँच स्थान १)। कहे गए हैं -वैशाख, मण्डल; समपद, Vठा-(सं० स्था>प्रा. ठा) स्थिर आलीढ, प्रत्यालीढः। (देखिए रघुवंश ३, रहना, वैठना, ठहरना, गति को रुकाव ५२.पर- मल्लिनाथ की टीका)... होना; (क० ६, २०, ५; सं० रा०)। ठाणिज्ज-वि० (दे०) गौरवपुक्त, -इ अक० (ण०८, १३, ११) सम्मानित; (दे० ना. मा. 'आ० ठहरे; (५० च०१६, १३, २. न० गौरव; (पंड्)। हु- (विधि०) ठहरिए; (जंवू० ३, .६) । तुल० म. ठाकतोठाम-पु. (सं० स्थान > प्रा डाय, ठाण, ठाम) जगह; (की (को०-२०१५ ठाप-पुं० (सं० स्थान >प्रा० ठाण) प्रा० ५० १, १३३.) १.२ बल इअर ठांव, स्थान; क० ३,२, २)। ठाव, वपुरा की करओ वीरत्तण निन ठाम ::FE स्थान; (जस० ३.१०६) । अर्थात् दूसरा वेचारा अपने वीरत्व और पित, . - -- OTA iTIF ठाय (४४४) डंबर किया जाता वल को लेकर क्या करेगा; (की० ३, ठोक्कर -पुं० [सं० ठक्कुर) ठाकुर; ३१) । --- T (ठामा) पु० स्थान; (की० (सि० २, २४) । ४, ११६)। गय-पु० (सं० स्थान >प्रा० ठाण) १. स्थिति, अवस्थान २. पद, ३. आश्रय, आवार; (सण०)। ड-० (सं० प्रा० ड) मूर्घ स्थानीय Vठाव-(सं०/ स्थापय्) स्थापना व्यंजन वर्ण-विशेष । मुर्धन्य, नाद, घोप, करना, ठहराना; ठवइ (प्रा० पै० २, अल्पप्राण, निरनुनासिक, स्पर्श वर्ण । १६१)। टवर्ग का तीसरा वर्ण । इसका उच्चारण ठाव-पु०(व० सं० स्थाम) स्थान; तुल० आभ्यंतर प्रयत्न द्वारा तथा जिह्वामध्य गु० ठाम, ठेकाणु; (संधि० ३, ८, को मूर्द्धा में लगाने से ६)। ठिअ-वि० (सं० स्थित >प्रा० ठिय) Vडंक-~(सं० दंश्>प्रा० डंस) डसना, स्थित, अवस्थित; (जंवू० १, ११, १६)। ठिय-वि० स्थित; "दाणेमहाँ धरि ठिय डंक मारना, काटना। -इ (सं०दशति) तुल० म० डांक; (भ०; सुदं० ८, २८, रिसिपंति व" -दानशील व्यक्तियों ३)। डङ्कइ; (प० च० को घर में स्थित ६)। तुल० म० ठी; (ण० ६, २, डंगुरउ-पु. (सं० वादनदण्डः, वाजा. ७)। वजाने का डंडा; "अभउ देउ डंगुरउ ठिअअ-न० (दे०) ऊर्च, ऊँचा; (दे०- वजाविउ..";" गु० डंगोरो; (प्रा० गु० ना० मा० ४, ६)। ६, ११)। ठिउ~-वि० (सं० स्थित >प्रा० ठिय) अवस्थित; (व० १, १६, १२) । डंडत-कृ० (अनुध्व०) डमडमायमान; ठिक्क---न० (दे०) पुरुप की जननेंद्रिय (सुदं० ७, ६, ८)। उंड-न० शिश्नम्); (दे० ना० मा० ४, ५) । (दे०) वस्त्र के ठिविअ-न० (दे०) १. हिक्का, हिचकी; टुकड़े; (दे० ना० मा० ४, ७) । २. वि० ऊंचा, ३. निकट; (दे० ना०- डंडय-पु० (दे०) पगडंडी (रथ्या), मा० ४, ६)। मुहल्ला, (दे० ना० मा०४, ८) । Vठेल्ल- -(दे०) ठेलना । ठेल्लि-पू० डंबर-पु० न० (दे०) प्रस्वेद, गरमी, का० कि०, बलपूर्वक खदेड़ कर; (की० धर्म; (दे० ना० मा० ४, ८) । पु० न० ४, १४७) । ठेल्लि पेल्लि-पू० (सं० आडम्बर>प्रा० आडंबर) ऊपरी कि०, ठेल-पेल कर; (प्रा० पं० १, दिखाव, दिखावट; "अक्खर डंबर सरिस १०६) । छंद इय सुद्ध भणिज्जइ;" अर्थात् यह छंद २०, २, पंक्ति; मुनियों की ० प्रा० . सीए हुए - का- (४४५) उड्ड की तरह डक-डक अक्षराडंवर सदश होने पर शुद्ध कहलाता (सं० दशति); तुल० गु० उंबवु (प०- है; (प्रा० ५० १, १०७) । डम्बरई ३० २१, ६, ६)। न०, व० सं० आडम्बरापि) आडम्बर; डपकाइ-कि०, व०, शोर करना, डका- (हे० ४००, १)। रना; (को० ४, २१२)। डक्करन्तो- डंभ-पु० (सं० दम्भ >प्रा० दंभ) कृदंत का वर्तमान में क्रिया मन्ना, माया, कपट; तुल० म० इंभ प्रयोग; उकराती है; (को० ४, २०१)। (जस० ३, २०, १२) । २. दाह, तुल०. टि०-कृदंत का वर्तमान में प्रयोग वाले गु० दाह; (नंधि० १४. ३, १६)। रूप धातु में 'अन्त' (शप्रत्ययान्त) डम्भ-पु० दम्भ; (म० १, ६, ३)। लगाने से बनते हैं। -लील वि० (सं० दम्भशील) कपटी; डाकार-~-पुं० (अनुव०) (सुदं० ३, ६, ५)। शब्द; (की० ४, २१२) । डंणिया-स्त्री० (मं० दम्भनिका) डाण-पु० (२० डगण) चतुष्कल गुण, विद्यानाम; (ण० ६, ६, १८) । पिंगल में भार मानाओं का एक गग; डंमधारि-वि० (सं. दम्भधारिन्) (प्रा० ५० १, १३) । दम्भी, कपटी; (जस० १, ६, ३)। डगमग वि० (वन्यनुकरणात्मक) डंमिञ-पु० (दे०) जूए का खिलाड़ी; हिलता जुलता; "अरेरे वाहहि कान्ह (दे० ना० मा० ४, ८)। डगमग कुगति ण देहि डंभिया-वि० (सं० दम्भिता) (प्रा० पै० १, ६)। छलिता, मायावी; (मुदं० ७, १०, डगल-पुं० (दे०) घर के २)। भूमि-तल; (दे० ना० मा० ४, ८) । 1/डंस---(सं०/दंश्) डसना, काटना। 1/डज्ज्ञ-(सं० दह >प्रा. डह) दन्ध ----इ. ए; ० (पड्)। करना, दहना, जलाना; (व० ३, ८, २; डउंड-पु० (दे०) वाद्य-विशेप मं० स०; जस० २, १, ६)। —ई व० 'डमरू' के वजाने से उत्पन्न आवाज; (सं० दहति >प्रा० उहइ) तुल० मगही (प० च० ५६, १, ८)। डह; (डोम्बिपा, चर्यापद) । उज्झन्तु- डक्क-न० (दे०) डक्का, वाद्य-विशेष; कृ० जलाये जाने पर; (प० १० १०, ७, (सुदं० ३, ४, ३; जंबू० ४, २, ७)। ६)। डलमाण-कृ० दह्यमान (दह २. युद्ध का शोर (battle cry) "उहय +भानच्) (क० १, १७, १०, जंबू० बलई रुहिरोल्लिय-गत्तई, हल्का डनक ४, १४. ८) । लल्लक्क मुअन्तई;" (प० २० २५, ६, डज्म-वि० (सं० दग्ध >प्रा० डड्ड) ८) । वि० (दे०) दंत-गृहीत; (दे० ना० जला हुआ; (ग० २, ४, २) । मा० ४, ६)। डड्ड-वि० (सं० दग्ध) प्रज्वलित, जला उक्क-(सं०1 दंश) डसना। -इ व० हुआ; (जत० २, २४, ३)। पाव, छोडि कपटी, जपरका + - डहाडी ((४४६) - डव - - . - डड्ढाडी-स्त्री (दे०) आर्ग': का मार्ग; ८, १०,२०)। अग ० न० (सं० (दे० ना० मा० ४, ८) : :: -डमेरु:-क) (वाद्य-विशेप, कापालिक -डिड्डिअ- वि० सं०-दग्धः>प्रा० अप० योगियों के बजाने का वाजा; (दे० ना.. -डड्ढ) जलाए । ' हुए, दग्ध ; (को०. ३, मा० २, ८६; प० च०.५७,२३) न्य ११.१४)। पुं० न० : (सं० डमरु+क) डमरु;-(40- डम्फन० (दे०) कुत, आयुध-विशेप; च० ५७, २३) :- (दे० ना० मा० ४, ७)। डर-पु(सं०. दर: प्रा० डर) नास, (/डबोल-- (अनु० डुव डुब) सं०. निम- डर, भय, भीति, तुल गुडर; (क. ज्जने, डुबोना; तुल० गु० , 'डवोळवु; ७,०५,४; सुदंगा२, ११४६-५० च० (प्रा० गु० ३८, ५७)। १५, २, ३) २. वृपंभ-विशेप; (प०. डन्भ-पु. (सं० दर्भ) डाभ, कुश, तृण च० २७, २, ३; २६, (१, १०) . विशेप । 1/डर-(सं० त्रस्) भय होना, डरना, डमडक-पुं० डमरु ध्वनि; (जंवू० ५, भयभीत होना । "काणणि विसदंसह हउँ ६, ६)। डरमि;" (जस०.२, २८, ६) डेराविय- (Vउमडम--(सं०. डमडमाय) 'डम-डम' पू० का० क्रि०, "डराविंयवईरिः हिणंति आवाज करना । डमडक्किय-भू० कॉ०, पयंड;" अर्थात् वैरियों को डराकर प्रचंड डमडमक्क-डमडमक्क आवाज की; "डेक्क मार करने लगे;: (जंबू. ६, १३, डमडक्कियं;" अर्थात् डक्का डमडेक्क- ५) । डमडक्क करके बजने लगा; (जंबू० १०, डरिय-वि० [सं० दीर्ण= (फटा हुआ, १६, ३.)। चिरा हुआ, भयभीत), प्रा० डरिअ] डमडमिय--वि० सं० डमडमायित) श पतित, पड़े हुऐ "जय चउंगइडरिय- जिसने डम-डम आवाज की हो वह; डम जणेक्कसरण," अर्थात 'जो चारों गतियों 'डमायित ध्वनि; (सुदं० ७, ६, ८) । में पड़े हुए प्राणियों के लिए --शरणंमात्र डिमर-पु० न०(सं० प्रा० डिमर) राष्ट्र हैं। (क० १,१, ६)।२: भयभीत, डरा -का आंतरिक अथवा बाह्य विप्लव; हुआ; तुल० गु डयु; (पच०६, १८, (प.० च०१३९१०, ६)ी २: वि० भयं- ३. त्रस्त (सुदं० , १२,४) । कर (जंबू० ४, २२, ४) ३.० न० डल-न० (सं० डलक >प्रा० डल्ले) कलंह, लड़ाई; । (दे०ना (मा० ८, डाली, डलिया; बांस का विना हुआ: फल- ३२)। -फूल रखने का पान; पिटिका (दे ना.. डमरकरु-वि० भयंकर (प०-च०.६, मा०ः४,७) । पु' (दे)- लोप्ट, ढेला, ३, ४) ।। 5. om :: ‘डला; (नामा ४, ७)।। डिमरु, पुन (सं) प्रा. डमरु) Vडव- आरंभ करना बाद्य-विशेष; एक प्रकार का बाज़ा; (व.० (पड्)... ETTE (T }- ... . . ४.
सव्व (४४७) डामरिय ० सत्त;"स -- डव-पु० (द०) वायाँ हाथ; तुल छोटा, क्षुद्र 1-3; (२०११) गु० डावो; (दे० ना० मा० ४, ६)। उहरी-स्त्री० (दे०) मिट्टी का घड़ा; 1/उत-(सं०/ दंग्>प्रा० डंस) (दे० ना० मा०४,७)। डसना, काटनाः तुल० गु०-उसवु। उहाला- पु० डाहल, स्थान-विशेष, उसंत-कृ० (1/डस+श); (वै०४, जबलपुर; (जंबू०६, १६, १५)। ५, १०) । उनिउ-भू० का० उस लिया; डहु-वि० (दे०) लघु, छोटा; "एवहि (क० ७, ४, ६)। उसिया-भू० का० बहु मोर तेण तीइ कर लायमि," चबाए. "डसियाहरु;" अर्थात (उन्होंने और अव छोटा सा मोर होकर मैंने उसके अपने) होंठ चवाए; (क० ३. १३, १०)। ऊपर हाथ चलाया; (जस डसे वि—पू० का० क्रि०, (जस० ३, १०)। डॉडिअ-क्रि० (सं० दण्ड>प्रा० डंड उसन-पु० (सं० दशन >प्रा० डसण) दण्ड देना, डांड़ना; "सरवत डांडिा दाँत; (सं० रा; जस० प्रकार से मान्न ओं को दंड ६)। दिया; (की० ३, ८५) । उसिय–वि० सं० देष्ट >प्रा डसिस) डाअल-न० (६०) बांख, नेत्र; (दे० डसा हुशा, काटा हुआ; (ण ८,३, ना० मा० ४,१)। १४) । उसियाहर-पु. (सं० दप्ट+ अवर >प्रा० डसिन बहर) दांतों से डाइणि-स्त्री० (सं० डाकिनी > प्रा० डाकिनी; जुड़ ल, ओठ चबाना; (ण० २, १०, ११)।' : डाइणी) डायन, 1/डह-(सं०१/ · दहे, >प्रा० उह) प्रतिनी, प्रेतपिशाचादि स्त्री-विशेष; जलाना, दन्ध करना। ..ईचत (०.४, १५, (ज०४, १५, ८; उत्स०-- दहति>प्रा० उहइ) तुल० ० म० डाह; १)। डाउ-पु० (दे०) १. फलिहंसक वृत, (जस०८२, २४, :-३; प० १०:२१, ६, वृक्ष-विशेप; २. गणपति की एक प्रकार की ९) । उहंत -(सं दहशत; - दहत) (जंबू० ७, ९, ६) । डहन्त व कृ. (१०. मूर्ति; (दे० ना० मा०.४, १२) । च० ३, २, ३)। डहहि-जलाइए: (नं. डाकिनि स्त्री०. (सं० डाकिनी>प्रा० ४६, २)। उहँति-व०, क्रि०, ८० डाइरिण) डायन, जुला प्रतिनी; (प्रा०- पै० १, २०६) (ण० ८, १, १०)। डहेविंपू का.. किल; दग्ध करके; (परमा०). डानर-१. वि० (सं० प्रा० डामर) भयं-: उहण-न० (सं० दहन >प्रा डहण): कर; (प० च० १७, १७, १०) । २. पुं० दहन, अग्नि; (सुदं० ६, ४, ६)। :: स्वनाम-त्यात एक जैन मुनि; -(प.च० डहर-१. पु. (दे०) शिशु (दे० ना... २०,२१) 1 मा०-४, ६) । २. वि० (दे) लघु; डामरिय-वि० (सं० डामरिक) विग्रह- - ". C डाल (४४८) डिप्प - डाळी, . . डाह-पु. ८, २) । डिम्ब>प्रा० "डिव-डमर-उड्डमर- (प्रा० गु० " कारक (revolter); (प० च० डिडिल्लिअ-न० (दे०) १. तैल-किट्ट से व्याप्त कपड़ा; २. स्खलित हस्त; डाल-स्त्री० (दे० प्रा० डाल) शाखा, (दे० ना० मा० ४, १०)। टहनी; तुल० गु० डाळ, म० डिफिस-वि० (दे०) जल में गिरा हुआ; ढाळी; (ण० १, ८, ११; क० १,६, (दे० ना० मा० ४, ६)। ५) । -इं न० शाखा; (हे० ४४५, डिव'--पुं० १. विद्याधर राजा; (त०- ३) । डालु-पु० (दे०) लता, शाखा, च० १०, २०)। २. समूह, "दलिअति- (व० ३, २, ४)। मिरडिवो; ' जिसने अंधकार के समूह का डाव-पु० (दे०) वाया हाथ; तुल०- नाश कर दिया है; (प्रा० ५०. २, गु० डाबो; (दे० ना० मा० ४, ६)। ७३)। (सं० दाह >प्रा० डाह) डिव-पुं० न० (सं० १. ताप, जलन; (ण० ८, डिव) विप्लव, डाहु-पु० ईर्ष्या; (प० च० ७, १२, मारि वित्थरिय अंधारय;' ४) । जलन; (सुदं० ८, ३१, ५) । १२, ६)। Vडाह-(सं० दह्यते) जलाना, “जालें डिभ-पु० (सं० डिम्भ>प्रा० डिंभ) डाह," ज्वालेन वा ज्वालया दाते, (उ० शिशु, बालक; (जस० १, १७, १०)। व्य० प्र० १५, २४)। डिम्भ; (प० च० ४, १२, ५)। -अ डाहररज्जा--पु० (दे०) डाहरराज्य, पु० लड़का; (प्रा० पैं० २, ४६) । -य देश-विशेष का राज्य; (प्रा० पु० (सं० डिस्भका:, ब०) वालक; १२८) । (सुदं० ६, २१, ८)। डाहुत्तार-वि० (सं० दाह+ उत्ताप) डिअली-स्त्री० (दे०) स्थूणा, खूटी; अग्नि में तपाया हुआ; "डाहुत्तारु चारु (दे० ना० मा० ४, ६)। चामीयरु,” अर्थात् ताप से तपाया हुआ /डिक्क-(प्रा० ढिक्क) साँड का गर- श्रेष्ठ सोना; (जंबू० ८, १२, ६)। जना । ---३ अक०; (पड्) । डिंड-पु. (दे०) फेन, झाग 'चलवलि डिठि-स्त्री० (सं० दृष्टि) दृष्टि; यअंत डिंडहँ भरिय," चलवलाती हुउ आँतों (को०)। रूपी डिंड से भरी, (सुदं० ६, ६, डिड्डर-पु० (दे०) मेढ़क; (दे० ना०. ४)। मा. ४, ६)। डिडव-वि० (दे०) जल में पतित; डिण्डीर-पु० न० (सं० डिण्डीर>प्रा० (पड्) 1 डिंडीर) समुद्र का फेन; (५० ५० १४, डिडिम-न० (सं० डिण्डिम) ३, ७)। विशेष; (क० २, २, ६; जस० १, २०, /डिप्प--(सं०/दीप्) दीपना, चमकना -~-इ, -ए; (पड्। २. (सं० वि- पै० १, . . वाद्य- - डिभासण (४४६) डेरउ - पार रहा है। गल्) १. गल जाना, सड़ जाना; २. गिर डविय-पु० (दे०) एक प्रकार का सांप; पड़ना; (पड्)। (संधि० १२, ५, ३४)। डिभासण -पुं० (सं० दिव्यासन) एक डुंव-पु० (सं० डोम) डोंव, अस्पृश्य आसन; (व० १०,३३, ८)। नीच जाति; (प्रा० गु० ५,३५) । डिविडिपिकय-वि० (दे०, प्रा० टिवि हुड्ड-पुं० (दे०) मनुप्य-जाति-विशेष; डिक्किय) अलंकृत, "चंदन-अगरु-गन्ध (संधि० १०, २, ३)। डिविडिक्किय, इन्दगोव-कुङ्कुम चञ्चि. डुबिउ-क्रि०, (अनु० डुव डुव) डूबना; क्किय;" (प० च० ३४, १०, ५) । (प्र० चिं०)। डोठि-स्त्री० (सं० दृष्टि>प्रा० डुम्भिय-वि० (३०) विदोलित, आंदो- डिट्ठी) दृष्टि; (को० २, १७७)। लित; "कारण्ड-डिम्भ-डुम्भिय-सरोह, वर डोण-वि० (दे०) अवतीर्ण (१. नीचे कमल करम्विय-जलपोह;" (प० च०. आया हुआ; २. पार गया हुआ, २३, १३, ५)। किया हुआ; (दे० ना० मा० १,१०)। 1/डुन--(सं०/दोलय > प्रा० डुल, डोणोवय-न० (दे०) ऊपर; (दे० ना० डोल) डोलना, हिलना, कोपना। -इ मा० ४,१०)। व०, प्र० पु०, ए० (सं० दोलायत्ते) डीव-पु० (दे०) तृष्णा, "पराई वधु "हिमअ डुलइ;" हृदय डोल (उ० व्य० प्र०६- (प्रा० पैं० २, १६३) । ३१)। डुल्लसिय-वि० (दे०) दोलायित, डुगर-पु. (सं० तुङ्ग=पहाड़) शैल, क्ष भित; (सुदं० ६, ६, ३) । पर्वत, गिरि; तुल० गु० डुगर; (प्रा०. डुहुडहुडुह-अक० (सं० डहडहाय्) गु० १६, ८; मा० ४, 'डुह-डुह' आवाज करना, नदी के वेग का ११)। खलखलाना । डुहडुहन्ति; (प० च० ३१, डुघ-पु० (दे०) नारियल का बना ३, ३) । डुहुडहुडुहंत-व० कृ०; (प०- हुआ पान-विशेष जो जल निकालने के च० ६४, ४३)। काम में आता है; (दे० ना० मा० ४, डेकुण-पु० (दे०) खटमल, क्षुद्र कीट- ११)। विशेप; (पड्)। डुडुअ-पुं० (दे०) पुराना घंटा; (दे०- डेड-पु. (दे०) ढेड, कौवे के समान ना० मा०४,११)। दुष्ट पुरुप; (सुदं० ३, १, ७)। 1/डुडुल्ल—(दे०) घूमना, फिरना, डेड्डुर-पु. (सं दर्दुर) मेंढ़क; तुल० -इव० (पड्)। राज० डेडरौ; (पड्)। डुब-पु० (सं० डोम) चाण्डाल; अत्यंत डेरउ-वि० (दे०) डेरा, टेढी, बाख नीच जाति का पुरुष; डोंब (दे० ना० वाला; "डेरउ हटुक्तरहिं होइ काणा गुण मा० ४, ११; संधि० १२,५, २४)। सवहिँ रहिल;" अर्थात् हठाक्षरों (जवर- डीव छाडु दे० ना० १ चक्कर लगाना।
डेंव (४५०) डोला द्वारा डेरा डोल उठे, -धर- ७, ५) । गु० डोल । दस्ती जोड़े गए) अक्षरों के डोंमणियं-स्त्री० डोमिनी, डोम जाति (टेढ़ी आँखों वाला) होता है तथा सर्व की स्त्री; (सि २, ३)। गुण रहित छप्पय काणा होता है; (प्रा०. डोय-पुं० (दे०) डोई, कलछुल, काष्ठं पै० १, ११६) । का बना हुआ बड़ा चमचं (wooden /डेव-(दे०) सं० उत् + लङ्घ; ladle); (प० च० ४६, १०, ७) । उल्लंघर करना, कूद जाना। डेवन्ति- डोयहों-कि०, भू० का० क्रि०, व०,व० (प० च० २५,६, "धरणिन्दहाँ सहासफड-डोयहो" ५) । णेंन्द्र के हजारों फन डोल उठे; (प० च० डेविय-वि० (दे०) प्रीणित, तृप्त, ५, ११, १) । रुडपिंडडेवियभेरुंडई;" अर्थात् रुडों के डोर-स्त्री० (दे०, प्रा०. डोर) सूत्र, पिंडों से भेरुण्ड तृप्त हो रहे थे; (ण० ७, रस्सी; गुण; तुल० म० दोर; (प० च० १६, ६, ८; जस० २, २६, ५)। डोंगिली--स्त्री० (दे०) १. तांबूल रखने /डोल-(सं०। दोलय) डोलना, का भाजन-विशेष, २. पान वेचने वाले हिलना; झूलना। तुल० की स्त्री; (दे० ना० मा० ४, १२) । (सवि० १३, १०, २) । -इ अक० डोंगी-स्त्री० (दे०) पान रखने का १. डोलना; (क० ४, १५, ५) भाजन-विशेप; (दे० ना० मा० ४, २. काँपना; (महा० ४, १८, २)। १३)। डोलिज्जइ-कमंवा० (सुदं० ७, डोंब'-पु० (दे०) चांडाल जाति- १२) । (कीर्तिपताका)। -०, ३० विशेष; (जस० २, १७, ७) । डोल रहे हैं; डोल्लिय-भू० का० (सं० डोअ-पु० (दे०) दाल, शाक, आदि दोलित) डोलने लगी; (सुदं० ११, १४, परोसने का काष्ठ का पान-विशेष; तुल०- ३; जंवू० १०, १५, ५) । गु० डोयो; (दे० ना० मा० ४, ११)। डोलहरि-स्त्री० (दे०) डोला, "डोल्ल- डोअण-न० (दे०) लोचन, ओख; हरि व लग्गी कंठह;" अर्थात् डोले के (दे० ना० मा० ४, ६)। समान लटकर कंठ से लगी हुई; (जंवू० डोकरि-स्त्री० ० वृद्धा; तुल० राज० ४, १६, ११)। स्त्री) (प्रा० गु० ६, २८) डोला-स्त्री० (दे०) शिविका, डोली, डोड-स्त्री० (दे०) दुष्टा ब्राह्मणी; पालकी; (दे० ना० मा० ४, ११)। (सुदं० ८, ३३, २)। डोलिअ-पु. (दे०) काला हिरन; (दे०- डोम-पु० (सं० डम) डोम, एक नीच ना० मा० ४, १२)। जाति; (पाहु०)। डोमु; (सि० २, डोला--स्त्री० (सं० दोला>प्रा० डोला) ३)। हिंडोला, झूला; (प० च० १४, २, १) । डोकरी (वृद्ध डोलाविय (४५१) टंक । ११. जोली, गंभीर; -रूडी वि० --हिंडोले पर बैठी हुई; हिया;" अर्थात् कहीं बड़ी दीपिकाओं में (प० च०१७, १५, ८)। घुसकर; (जंबू० ४, २१, ४) । डोहिय- डोलाविय-वि० (सं० दोलित) कंपित, पू० का० कि०, अवगाहन कर 'डोहिय- हिलाया हुआ; (प० ५० ३१, १२४) । जलवाहिणीजलतरिल्लु;" अर्थात् (स डोलिया-वि० (सं० दोलिता) कंपित, सेना ने एक जलवाहिनी का अवगाहन हिलाई हुई; (सुदं० करके उसके जल को पार किया; (जंबू० १७)। ५, ७, १२)। 1/डोल्ल--(सं० दोलय>प्रा. डोल) डोहलन-पु. (सं० दोहद) गभिणी डोलना। -इ अक० (जंबू० ८,७,६)। स्त्री की प्रबल रचि (संधि० ४, ३, डोल्लंत-कृ० (सं/दोल -+-शतृ) दोला- ४) । यमान; (जंबु. ६, १८, ६)। दोल्लन्ति डोहहों-क्रि०, मा०, पीसो; "फलई म -नि०, ३०, व०, हिलते हैं, कूलते है; तोडहाँ जलु मा डोहहों, अर्थात् फल (प० २० ६, ७, ३)। मत तोड़ो, पानी मत पिलो; (५०० डोल्लिय--स्त्री० शिविका, २, १३, ४)। पालकी; (सुदं० १, ६, १२) । डोहिय-वि० (दे०) गहरा, डोव-पु० (सं० उम) डोम, एक नीच (म०)। जाति; (जंदू० ५, ११, ४) । डोहियाइ-वि० (६०) प्रकंपित; “मत्त- जोतिकी-स्त्री० (दे०) ज्योल्ना, चंद्र- हत्यि-डोहिवाई;" अर्थात् मतवाले हाथियों प्रकाश (पड्)। से प्रकंपित; (रि० २, २) । डोहंत-वि० (सं० गम्भीर अन्त) गहरा (पानी) 'तहिं उन्हंतु जलु;" (क० द १, १३, १०)। 1/डोह-(३०) १. काम को विगाड़ ढ-पुं० (सं० प्रा० ) व्यंजन वर्ण- देना, चौपट कर देता, गड़बड़ करना, विशेप, इसका उच्चारण मूर्धा से होता खराब कर देना, गड़बड़ाना, विना क्रम से है । मूर्धन्य, नाद, घोप, महाप्राण, निर- मिलाना, गड्डमड्ड कर देना । डोहेवि नुनासिक, स्पर्श वणं । स्वर्ग का चौथा ----पू. का० कि, "जो बरि-करिहिं वर्ण। ण डोहेवि सविकउ;" (प० ३० २६, ढंक- (दे०) कोजा, वायस (दे०- ११, ३)। २. मलिनीकरणे, किसी द्रव्य ना० मा०४, १३; संधि १४,५, में किसी वस्तु को मिलाकर गंदा कर देना; तुल० गु० डहोळ, (प्रा० गु० 1/डंक-(प्रा० ठक, डरकइआन्छा- २६, ७) । जोहिलण-पू० का० कि, दन करना) वाचता है, ढकना । - वृतकर, "कहिं पि डोहिम दीहदी. व० (नुदं० २, १३, ; महा० १,१३, ६) ।
ढंकण (४५२) ढक्करिवन्तय १०) । ढंकिज्जइ-कि० ढक जाना (ण० विशेष; (दे० ना० मा० ४, १३) । ६, ५, १) । किवि-पू० का० क्रि०, ढंढर-पु(दे०) १. पिशाच; (ण० ६, ढंक कर, (ण० ४, १३, १)। ढङकेवि ७, १०; दे० ना० मा०४, -पू० का० क्रि० (प० च० २३, ११, २. ईर्ष्या; (दे० ना० मा० ४, १६) । १)। ढंढरिअ-पु० (दे०) कर्दम, पंक, कीचड़; ढंकण-न० (दे०) छादन, ढकना; (सुदं० (दे० ना० मा० ४, १५) । ८, ६, १८)। ढंढसिअ-पु. (दे०) १. ग्राम का यक्ष, ढंकरणी-स्त्री० (दे०) ढकनी, ढकने का २. गांव का वृक्ष; (दे० ना० मा० ४, पात्र-विशेप; वह वस्तु जिसे ऊपर डाल १५)। देने या बैठा देने से नीचे की वस्तु छिप Vढंढोल-(सं० टुण्ड्) खोजना, तलाश जाए; (दे० ना० मा० ४, १४) । करना; (दे० ना० मा० ४, १५) । ढंकणु-पुं० (दे०) खटमल; (दे० ना०. ढंसइ-क्रि०, व० (दे०) चक्कर खाना, मा० ४, १४) । इधर-उधर लुढ़कना, पीछे लुढ़कना ढंकिउ-क्रि०, भू० का० ढक लिया; (विवर्तते); (दे० ना० मा० ४, १४)। (महा० ६८, ११, १)। ढंसय-न० (दे०) अयश, अपकीति; ढंकिय-वि० (प्रा० ढक्किम) आच्छा- (दे० ना० मा० ४, १४)। दित, वद किया हुआ; (ण० ५, १०, ढउह-पु० (दे०) ढौह वृक्ष, (जंबू० ५, १६; जस० २, ५, ८)। ढकियय ८, १२)। आच्छादित; (प० च० ढवक-१. पुं० (सं० आपाटक- ४) । पलाश) ढाक का पेड़; (सं० रा०)। ढंख-पुं० (दे०) शुष्क वृक्ष; "लुखरुक्ख २. पुं० (सं० प्रा० टक्का) वाद्य-विशेप, सुक्खेहि णिप्फलं," (जस० १,१३, (ण० ८, ६, १३) । ३. पुं० (सं० प्रा० ३) । ढक्क) देश-विशेष । देश-विशेष में रहने ढंखर-पु. (दे०, प्रा० ढंखर) फल-पन्न वाली एक जाति; (भ०)। से रहित वृक्ष; (सं० रा०) । Vढक्क-(प्रा० ढक्क) सं० छादय् । ढंखरी-स्त्री० (दे०) वीणा-विशेप; ढकना, आच्छादन करना, ढांकरा; तुल० (दे० ना० मा० ४, १४) । म० ढांकण। -इ व० (दे० ना० मा० ढंढंत-कृ० (अनु:०) ढमढमाता हुआ; ४, १४; भ० १, १०, २)। (सुदं० ७, ६, ५)। ढवकय-न० (३०) तिलक; (दे० ना०- ढंढ-० (दे०) पंक, कीच, (दे० ना०. मा० ४,१४)। मा० ४, १६) २. वि. निरर्थक, निक- ढक्करिवन्तय-वि० (दे०, प्रा० टक्करि म्मा; (दे० ना० मा० ४,१६; भ०) । =अद्भुत, आश्चर्यजनक) चमत्कारवादी, ढंढरपी-स्त्री० (दे०) केवाँच, वृक्ष "जगे लोऍहिँ ढक्करिवन्तएहिँ । उप्पाइ % 3D .
ढक्कसार (४५३) ढिड्ढिस । . भंतिउ मन्तएहिँ" -दुनियाँ में चमत्का १२)। २. ढलना;(to wane); (ण० २, रवादी और भ्रांत लोगों ने भ्रांति उत्पन्न . ४, १०) । ढलक्किय-भू० का०, दुलक कर रखी है, (प० च० १, १०, १)। गए; (जंवू० ७, ८, १०) । ढलिअ--भू० ढषकसार-पु. (दे०) वाद्य-विशेष; का० ढुलक गए; (जंवू० १०, १४, (जंबू० १, ४, १८)। ढपका-स्त्री० (सं० ढक्का = बड़ा ढोल ढलवाइक-वि० (सं० ढालवाहक) ढाल वाद्य- विशेष; (जस० ४, ३, ५)। लिए सैनिक; (की० ४, ६६)। ढगरण-पु० (सं० ठगण) निकलगण; ढलिय–वि० (दे०) टीला; (महा० ८, पिंगल में एक मात्रिकगण जो तीन ६, १२)। मानाओं का होता है; (प्रा० पै० १, ढारिआ-भू० का० गिर रहे थे, डर रहे १३)। थे; "चूह उप्पर ढारिआ;" अर्थात् झरने ढड्ढ–० (दे०) भेरी, वाद्य-विशेप; ऊपर गिर रहे थे; (की० २, ८०)। (दे० ना० मा० ४, १३)। टि०-कीतिलता में भूतकाल के कृदंत रूपों ढढ्ढर-पुं० (दे०) राक्षस, पिशाच, में 'इ' को 'इआ' रूप में व्यक्त करने प्रत आदि (सुदं० ६, १३, १५) । की प्रवृत्ति उपलब्ध होती है। ढड्ढस-पु० (दे०) धैर्य; तुल० गु० Vढाल-(दे०) १. ढालना, जैसे जल ढाढस; (पं० च० ४६, १७, ३) । ढड्- से भरे घड़े का ढालना, (सुदं० ६,१४, ढसु-पु० ढाडस, साहस; (सुदं० ११, ६) । २. नीचे गिराना। पांसा ढालना २, १२) । (to throw the dice)। -हि; (ण० ढपडण-पु. (अनुध्व०) रोने की ३, १३, १०) । ढालेसहि-भ० आवाज; "ढणहण तउ रोएई;" (प्रा०- ढालेगा; (क० २, १६, १०) । तुल० गु० गु० १४, ३७)। ढाळवु। ढालिज्जइ-कर्मवा० ढाला ढण्ढर-पु.० १. पक्षी-विशेप २. राक्षस, जाता है; (जंवू० १०, १४, ११) । (दे० ना० मा० ४, १६=पिशाच) (प०. ढाल'-पु० (दे०) गति; तुल० गु० च० ५१, ३, ६)। ढाळ; (संधि० १२, ४, ४)। ढमर-न० (दे०) १. स्थाली, बटलोई ढिढय-वि० (दे०) जल में पतित; २. गरम पानी; (दे० ना० मा० ४, (दे० ना० मा० ४, १५)। १७)। 1/ढिक्क-(दे०) सांड का गरजना। ढयर-पु० (दे०) १. पिशाच; (दे० ना० मा० ४, २. ईर्ला, द्वेष; (दे० ना० मा० ४, १५)। १६)। ढिक्कय-अव्य० (दे०) सदा, हमेशा, ढलइ-क्रि०, व० (दे०) १. गिरना, सदैव; (दे० ना० मा० ४, १५) । नीचे पड़ना, टपकना; (महा० ८, ६, ढिड्डिस-न० सं० पिप्ट; आटा, वेसन का० . -इ अक० दिल्ल (४५४) ढेक्कार - का०, - व० (धान्यादीनां पिष्टमिति) “ढिड्ढिसु (प० च० ५, ४, ८; ण० २, ४, ६) । गिलंति पलु संभरिवि, (जस० २, २०, ढुक्कमाण-~-कृ० (प० च० १०, ११, ८) । ५) । ढुक्कंत-कृ० (ण० ३, ८, ११)। हिल्ल~वि० (सं० शिथिल) ढीला, दुक्क्रय-भू० का० पहुंचा, दुका; (सं0- (पाहु०) । ढिल्ली-वि० शिथिल; रा०) । ढुक्कु-भू० का० पहुँचा, (रि० (महा० ३२, ३, ५)। २, ५) । दूकउ-भू० समीप हिल्लई-वि० (सं० शिथिल >प्रा० पहुंचा, तुल० गु० इक्यो; (प्रा० गु० २६, ढिल्ल) ढीला, शिथिल ; (प० च० १८, १८)। ६, ६) । ढिल्लु; (सु. ६, २१) । दुक्काढुक्कि-स्त्री० (दुक्क =पहुँचना) डिल्लि-पु. दिल्ली; नगर-विशेष, जो निकट से लड़ना (fight at close qur आजकल भारतवर्ष की राजधानी है; arters); तुल० गु० ढूक; (प० च० (प्रा० १० १, १४७)। ५२, ६, २)। ढीलीहोत्तयः -वि० (सं० शिथिल+ दुमइ, दुसइ- क्रि०, घूमना भवत् (वि०) --होने वाला) ढीले-पोले; (भ्रमति); (दे० ना० मा० ४, १५) । (५० च० ८, ५, ११)। दुरदुल्लिय-कि०, ढुलढुलाना; (पाहु०)। ढुंढ लइ-क्रि०, व० (सं० ढुण्ढ्) ढंका-स्त्री० (प्रा० ढेंका) १. हर्प; हूँढना, खोजना, पता लगाना; (दे० २. सिंचाई के लिए कुएँ से पानी निका- ना० मा० ४, १७) । लने का एक यंत्र, ढेकली, ढेकुली; (दे०. (सं० ढौकित) पास लाया ना० मा० ४, १७) । हुआ, उपस्थित किया हुआ; (क० ४, ५, ढको-स्त्री० (दे०) वगुती (बलाका), ४) । वक-पंक्ति; (दे० ना० मा० ४, १५) । ढुक्क-वि० (सं० ढोकित) १. प्राप्त, ठेकुण-पुं० (दे०) मत्कुण, खटमल; आगत; (म० २, ६६, २) । अव्य० पास; (दे० ना० मा० ४, १४)। (प० च० १२, ८, ७) । /दुक्क-(सं० ढोक) मिलना, पिल ढेंच-वि० (दे०) अपाहिज । ---3; पड़ना; तुल० राज० ढोक । ढुक्कंतउ- (रा० ३०) । क्रि०, भू० का०; भिड़े; (प्रा० .० १, ढेंडिअ-वि० (दे०) धूपित, धूप दिया १५५) । -इ २० १. भेंट करना, अर्पण हुआ; (दे० ना० मा० ४, १६) । करना; (ण० २, ४, ६) । २. प्रविष्ट ढेक्कार-पु. (दे०) वृपभशब्दानुकार होना; (जंवू० १०, २५, १)। ३. (सं० शब्द, डकार का शब्द, "जहिं वसंह मुक्क- ढोकते ढोक गतौ>प्रा० दुक) पहुंचना ढेक्कारधीर जीहाविलिहियणदिणिसरीर," "किर सहुँ सहियहि ढुनकइ सरवरु,” वह अर्थात् वहाँ बैल डकार छोड़ते हुए तथा सहेलियों के साथ सरोवर पर पहुँचती है, अपनी जीभ से गायों के शरीर को चाटते हुक-वि० , .
(४५५) ण - करना, भेंट - हुए दिखाई देते हैं; तुल० म० ढेकर; सकते, (प० च० १६, ५, २)। ढोयन्ति (जस० १, २१, ३)। -व०,व० (प० च०६, ३,३) (२)(सं० डेल्ल-वि० (दे०) निर्धन, दरिद्र; (दे०- ढोक्.>प्रा० दुवक) अर्पण ना० मा० ४, १६)। चढ़ाना; (ण० ३, ८, ६) । ढोइवि-पू०. घर-वि० (दे०) भ्रमणशील, घूमने का० क्रि, (ण० ४, ६, १)। ढोएप्पिणु वाला; (दे० ना० मा० ४, १५)। -पू० का० क्रि० (ण० १, १७, १)। Vढ अ-(सं० दौकय) वहन करना, ढोएवि-पू० का० कि०, ढोकर; (व० ढोना । ढोइवि-पू० का० क्रि०, "सो ४, ७, ५) । टोयंतु-कृ० (सं० ढोकय् वयणई सुद्धई णं घयदुद्धई सप्पहों ढोइवि +शतृ) (जंवू० १, ३, ८)। णासइ," अर्थात् वह अ.ने शुद्ध वचनों को ढोयण-पु. (सं० ढोकन >प्रा० ढोवण, मानों सर्प को घृत और दूध देकर स्वयं ढोवणय) उपहार, भेंट; "पाहुड-पडिपा- नाश को प्राप्त होता है; (जस० १, १६, हुड-ढोयणेण" उपहार प्रत्युपहार रखने में; १०) । ढोवइ-नि.०, २० लाना; (ण (प० च० १६, २, ५)। १,१४,६) । ढोयरपोआ-स्त्री० (सं० ढोकन >प्रा० ढोइन-वि० (सं० ढंकित) अर्पित; ढोवण) उपहार, भेट; (संधि० (सुदं० ११, १, ५)। ४) । ढोइउ-भू० का० (सं० ढोंकित) उप ढोर-पु. (२० धवल = अत्युत्तम वैल स्थित हुआ; (रि० ३, १४) । >घोल >घोर) ढोर, पशु; "टुब्बल ढोर ठोइर-वि० (सं० टोकित)) इव पंके पडिय ण उढिवि सक्कइ," तुल० किया हुआ, २. उपस्थित गु० ढोर; (रि० १, ७; सुदं० ५, ५, ६; (जस०, १२, ६)। प० च० ३३, ११, ७) । ढोरि; (व० ७, ढोइय-भू० का०, (सं० ढोकित) निकट ३, ८) । लाया; (प० ५०३१, ६, २)। -इ ढोल्ला-तु० (दे०) वाद्य-विशेष; ढोल, (सं० हूँ कितानि) उपस्थित की गयीं; दमामा, (प्रा० ५० १, १४७) । (रि० २, ७) । ढोल्ला-पु. (सं० दुर्लभ >पा० दल्लम 1/ढोय- (सं० ढोक्) ढोना । -इ >प्रा० दुल्ह) दुल्हा, दूल्हा, वर, नौशा; १० ढोकर लाना, १."जाव न तुल० बु० टूया; (हे० ३३०, १)। तावह ढोय;" (प्रा० गु० १३, ४२)। २. "को वि अमुल्लाहरणई ढोयह;" कोई अमूल्य आवरण ढोकर लाता है; (प० च० ग २, १६, ५) । ढोउ-ले जाना, "जहिं सुअ-सारियहुँ विणाहिं ढोउ" -जहाँ रण-पु० (सं० पा० न>प्रा० ण) शुक और सरिका को भी नहीं ले जा वर्ग का पंचम वर्ण। इसका उच्चारण १. भेंट किया हुभा; - अप्पउ ण (४५६) णदिणि नन्दत्) - में यह शिव, ब्रह्मा, स्थान मूर्द्धा है । मूर्धन्य, नाद, घोप, महा वास; (व० ३, २०, ६)। प्राण, सानुनासिक, स्पर्श वर्ण । प्राकृत के Vणंद-(सं०/नन्द >प्रा० णंद) आनं- प्रारंभ से अपभ्रंश भाषा की उन्नति तक दित होना, खुश होना; (जस० १,. २०, (दूसरी शताब्दी ई० पू० से १० वीं शता ११) । णदंत-कृ० (सं० ब्दी तक 'न' को 'ण' को उच्चारण करने (जस०)। की प्रवृत्ति सर्वत्र प्रधान रही। १० वीं णंद-पु. (सं० नन्द) आनंद, हर्प; शताब्दी के बाद जी णत्व की प्रमुखता (जस० १, ८, ८) रही। गु०, राज० और. पं० गंदउ-पु. (सं० नन्द) (छंदशात्र में) प्रवृत्ति सुरक्षित रही। संस्कृत भाषा में स्कंधक का एक भेद; (प्रा० .० १,७५) । 'ण' से प्रारंभ होने वाले शब्दों का अभाव टि०-स्कंधक के सत्ताइस भेद होते हैं- है, किंतु धातु पाठ में कुछ धातु ऐसी हैं नंद, भद्र, रोष, सारंग, जिनका प्रथम अक्षर ण है । वस्तुतः धातु वारण, वरुण, नील, मदनताटंक, शेखर, को ण से लिखे जाने से यह सूचित होता शर, गगन, शरभ, विमति, क्षीर, नगर, है कि 'न' कुछ उपसर्गों के पूर्व आने से नर, स्निग्ध, स्नेह, मद्कल, भूपाल, शुद्ध, 'ण' के रूप में भी परिवर्तित होता हैं। सरित, कुभ, कलस, ससि । अव्य०- निपेधार्थक अव्य०, नहीं, मत; णंदण-पू० १. (सं० ०१. (सं० नन्दन) पुत्र; (ण० १, ४२; १, १०, लड़का; (जस० १,२३, २) । २. राजा; ८)। (व० १, ७, ४) । ३. (दे०) भृत्य, णं-अव्य०,१.न, मानो नौकर; (दे० ना० मा० ४, १८)। वि० (उत्प्रक्षार्थक) (सं० रा०; महा० ६८, आनंददायक; (व० १, १, ४)। ३; प० च० १, ८, १३)। २. ननु- गंदणवरण-न० (सं० नन्दनवन >प्रा० एक अव्यय जिसका व्यवहार कोई बात णंदणवण) उद्यान-विशेप; (जस० १, पूछने, सदेह प्रकट करने में या वाक्य के ११, ११) । णंदणवणु; (पाहु०) । आरंभ में किया जाता हो; (ण० १, ७, गंदा'-स्त्री० नंदा, रड्डा छंद एक भेद; ६; जंवू० १, १०, १)। (प्रा० ५० १, १३६) । टि०-रड्डा छंद जंगल-पु० न० (दे० चञ्चू, चोंच; के सात वस्तु भेद हैं-करभी, नंदा, (प० च० ४४,४०) । मोहिनी, चारुसेना, भद्रा, राजसेना, णंचु-न० (सं० नृत्य >णच्च) ताटंकिनी। नृत्य; (सि० २, २)। णंदा-स्त्री० (दे०) गो, गैया; (दे०. गंग-न० (सं० ज्ञान >प्रा० णाण) ना० मा० ४, १८)। ज्ञान; (सि० १, २)। णंदिक्ख-पु० (दे०) सिंह, मृगेंद्र; (दे०. गतेउर-पु. (सं० अन्तःपुर) जनान ना० मा० ४, १६)। खाना, जनाना या भीतरी महल, रनि- गंदिरिण-स्त्री० (सं० नन्दिनी) गो, धेनुः प.च. . २. इव, - दिय (४५७) णक्क . - (जस० १, २१, ३; दे० ना० मा० ४, रहने लगे, (प० च० १२, १२, १८)। १०)। णंदिय-वि० (सं० नन्दित) आनंदप्रद; णइ-स्त्री० (सं. नदी>प्रा० णई) (जस० १, २, २)। का नदी; (क० १, ३, ३; जस० २, ६, णदिवद्ध शु-पु० (सं० नन्दिवर्धन) ६) । -बाह पुं० (सं० नदी प्रवाह) नदी राजा-विशेप-नाम; (व० १, ५, १)। प्रवाह या बहाव; (जस० ३, ४, णविसरु -पु० नन्दीश्वर, द्वीप-विशेष. १४) । नाम; (व. १०, ६, ६) । रगमासय-न० जल में उत्पन्न कोई गंदी-स्त्री० (दे०) गौ, गैया; (दे० फल (जलोद्भवः फलभेद:); (दे० ना०- ना० मा० ४, १८)। मा० ४, २३)। णं दीयइ-क्रि०, व० निद्रा आती है; णईस-पुं० (सं० नदीश) समुद्र; (व० (सं० रा०)। १, ११, ११)। णंदु-पु० (सं० नन्द) राजा नद को णईसरा-पु० (सं० नदीश्वर) महास- पुत्र; (व० २, ३, ३)। मुद्र; (व० १, ६, १)। रणअ-वि० (सं० नव>प्रा० णव) नया, एउ-अव्य० (सं० न तु) नहीं; (प०- नूतन; (प्रा० ५० २, १४४; क० ४, १३, च० १, ३, ६; ण० १, ४, २)। ६) । वि० (सं० नत>प्रा० णय) प्रणत, णउ-(सं० नृप) राजा; (सि० २, ७, जिसने नमन किया हो वह; (क०) । २६)। णअण-न० (सं० नयन>प्रा० णयण) णउइ(१)-वि० (सं० नवति) नन्वे । नेत्र, आँख; (प्रा० 4०१, ६६)। णउल-पुं० (सं० नकुल) न्यौला; णअणाई-न०, २०; (प्रा० 4० १, (जस०)। ६९)। णउरहिउ-वि० (सं० नयरहित) नय णअर-पु.० (सं० नगर) कस्बे से बड़ी विहीन, नीतिनिहीन; (व० और समृद्ध वस्ती, पुर, शहर, (प्रा० ५० १४)। १, ५५; की० २, ६)। उसालि-स्त्री० (सं० नाट्यशाला) अरु-पु० (छंदशास्त्र में) स्कंधक का नाटकगृह; (व० ६, २३, २) । एक भेद; स्कंधक के सत्ताइस भेदों में से णए-० (सं० नय>प्रा० णय) एक भेद 'नगर'; (प्रा० पं० १, नीति; (व० १, १३, १)। ७५)। णक-पु० (दे०, प्रा० एक्क) नाक, गई-अव्य० निश्चयसूचक अव्यय, नासिका; तुल० म० नाक; (ण० ६, ६, "थियई रयण (इ) गई वेण्णि वि जणई १, दे० ना० मा० ४,४६; सं० रा०) । रज्जु स ई भुञ्जन्तई"-दोनों ही दिन एक्क-पुं० ० रावण का एक स्वनाम रात राज्य का स्वयं उपभोग करते हुए ख्यात सुभट; (प० च०५६, २८) । २,६, - णकुड (४५८) णज्झर न्यग्रोव>प्रा० . . -न० णवकुड-पु नकुट, छंद-विशेप; (प०- जग्गोह-० (सं० च० २३, १, ७)। णग्गोह) वृक्ष-विशेप, बड़ का पेड़; (ण. णक्ख-पु. '-पु० (सं० नख>प्रा० णक्ख) १, १३, ७; जस० १, १२, १४) । नख, नाखून ; तुल० गु० नख; (प० च० Vणच्च-(सं०/नृत् >प्रा० णच्च) १४, ५, ७; जस० १, १७, १३) । नाचना; (सं० रा०)। -इ व० (सं० णक्खत-पु० (सं० नक्षत्र >प्रा० णक्खन नृत्यति >प्रा० णच्चइ); (प्रा० ५० १, पुं० न०) कृत्तिका, अश्विनी, भरणी १६६; ण० १, ७, १)। णच्चंत-कृ० आदि ज्योतिप्क विशेष; (प० च० १३। (सं०/नृत् + शतृ); (व० ४, ३, १४) । १२॥ ६; जस० २, २३, १०) । णक्खत्तु; णच्चावइ-प्रेरणार्थक क्रि०, (सं० नर्तय) (व० ६, ६, १२)। नचाना; (जस० १ ५, १८) । रएक्खत्तनगेमि-पु. (सं० नक्षत्रनेमि रगच्चरण (सं० नर्तन >प्रा० विष्णु; (दे० ना० मा० ४, २२)। रगच्चण) नाच, नृत्य; जस० २,१०, णक्खत्तराइ-पु० (सं० नक्षत्रराज) ६)। चंद्रमा; (व० ० १, ३, ४)। रगच्चवियय-वि० (सं० नतित>प्रा० राग-पु. (सं० नग>प्रा० णग, णय) णच्चाविअ) नचाया हुआ; (ण० २, ६, पर्वत, (प० च० १८, ७, ७)। ६; प० च० ११, ७, ६)। णगरण-पुं० नगण, (सर्वलघु वणिक णच्चि-वि० (सं० नतित>प्रा० (1); (प्रा० ५० १, ३५) । गच्चाविअ) नचाया हुआ; (१० ५, १२, णगणिआ-स्त्री० नगणिका, छंद का १२) । णच्चिय; (जस० १, १४, नाम; (प्रा० ५० २, ३१) । १०)। णग्ग-वि० (सं० नग्न >प्रा० णग्ग) च्चिर < वि० (सं० नृत्-+इर) रमग- नंगा, वस्त्र-रहित (जस० २, १८, ८)। शील; (क० १, १७, ६; दे० ना. मा० णग्गी--वि० स्त्री० नग्ना, नग्न स्त्री; ४, १८)। (जस० १, ६, ६)। णच्छिउ-क्रि०, आ० (सं० नश्यतु) नाश रगन्गुड-वि० (सं० नग्न >प्रा० णग्ग) करे; (भ० १०, ४, ७)। नगोड़ा; "धणु दितउ भंडहँ गुडाह;" / रणज्ज-(स०/ज्ञा>प्रा० णज्ज) अर्थात् भाँड़ों और नगोड़ों को धन बाँटता -इ (सं० जानाति) १. जानना, हुआ; (क० ८, १५, ५) । सीखना; (सुदं० २, २, १०) । २. ऐसा गग्गुडि-पुबदी जन, भाट; (जस० मालूम होता है; (सं० रा०) । १, २७, १)। णज्जर-वि० (दे०) मलिन, मैला; णग्गोग्ग-वि० (सं० . नग्न + उग्र) नग्न (दे० ना० मा० ४, १८) । और तीव्र, "णग्गोग्गखग्ग" एज्झर-वि० (दे०) निर्मल, विमल; तीन तलवार; (ण० १, ६, ७) । (दे० ना० मा० ४, १६)। - नग्न और णट्ट (४५६) णताहं नामक . ण-न० (सं० नाट्य >प्रा० णट्ट णडिअः-वि० (दे०) वचित, विप्रता- न०) १. नृत्य, गीत और वाद्य, नटों का रित, खेदित; (सुदं० २, ११, ४) । काम; (ण० ६, ६, ६)। २. नाट्य; णडिय-वि० (दे०) वञ्चित) (ण० २, (जस० १, १६, २) । ३. कूटद्युत; (प० १२, ११)। णडिओ-वि० वचित च० ४५, १२, ८)। (दे० ना० मा० ४, १८)। वि० (प्रा० रगट्टमालि-पु० णट्टमालि Vण्ड =व्याकुल होना) व्याकुलीकृत; देव-विशेष; (व० २, १३, ६) । (प० च० ३३, ११, ३)। णट्टारम्भ-पु० (सं० नाट्यारम्भ) णडुअ-वि० (दे०) छलित, वंचित; (व नाटक का आरम्भ; तुल० गुरु नाटारम्भ; २, ६, ४)। (प0 च० २, ६, ६)। णडुली-स्त्री० (दे०) कच्छुआ, कच्छप; पट्टावय-वि० (सं० नर्तक>प्रा० (दे० ना० मा० ४, २०) । णट्टावअ) नचाने गला; (प० च० ११, गड्डरी-स्त्री० (दे०) भेक (१. मेढक, ७, ६)। २. डरपोक मनुप्य) ३. बादल; (दे०- रगट्टावयघर-पुं० (सं० नाट्यगृह > ना० मा० ४, २०)। प्रा० पट्टघर) नृत्यशाला; (प० च० णड्डुली–देखो णडुली (दे० ना० मा० १४, १२, ८)। ४, २०)। ण-वि० (सं० नप्ट>प्रा० णट्ठ) णगगिदि-स्त्री० शब्दानुकृति; (प्रा०- नाश-प्राप्त, नष्ट, अपगत; (ण० ३, १४, पैं० १, २०४)। ४; सं रा०)। नाशित; णण्डिक्क-पु० व्याध; (प० च० ३०, (ण० ६, ७, १०)। २, ३)। रगट्ठासणिल्लु-वि० [सं० नष्ट+आसन णण्ण-वि० (सं० न+अन्य >प्रा० ण +इल्ल (मत्वर्थे)] जो सिंहासन से च्युत +अण्ण, अण) अन्य कोई नहीं, कोई हो गया हो; (ग० ४, १३, ५)। दूसरा नहीं; (जस०)। णण्णु; (ण० ८, /गड - (सं०/नृत्) नाचना, अभिनय ५, ६) । पु० नन्न, पुरुष-विशेप-नाम; करना।-इव० (सुदं० ११, १२, ६)। (जस० १, १, ४)। णडेइ-व० (सुदं० २, १०, १३)। णम्ह-वि० (दे०) सूक्ष्म; "णण्हरोमा- गडंति-कृ० स्त्री० में (सं० नट् + शत) वली-कण्णसंसग्गओ;" अर्थात् उसकी (सुदं० २, १२, ४)। रगडभाण-कृ० रोमावली सूक्ष्म थी और कानों का पर- (सं० नृत्+शानच्) नृत्य करती हुई; स्पर संसर्ग हो जाता था; (क० ८, २, (व० २,१४, ३) णड-पु० (सं० नट>प्रा० णट्ट) नट; णतिसिर-स्त्री० नतशिरा, दिक्कुमारी, नर्तकों की एक जाति; (सं० रा०; महा० स्त्री-विशेष-नाम; (व० ६, ५, ७)। ६६, १६, ११)। पत्ताहं-न० (सं० नक्त+अहन् >प्रा० - -मअ वि० - पति (४६०) णम्मय ऊपर का अन्य नस्त % 3D नाका नथ, पं० - णत न०+ अह न०) दिन-रोत; (ण० ५, (प. च० ४५, ४, ६)। १०, १६)। णमग-न० (सं० नभः+अग्र>प्रा. णत्ति-स्त्री० (सं० ननी>प्रा० णत्ती) णम अग्ग-आकाश का नाती, पोता; (जस० ३, ८, ३)। वि० भाग) आकाश, "भोयसएहिं णमग्गो, (सं० न+अन्य) कोई नहीं; कंतहें गेहई लग्गो;" अर्थात् वह याकाश (जस०)। में उड़ता और अपनी कांता के स्नेह में णत्य-स्त्री० (सं. लगकर; (क० ८, ३, २)। छेद) नासारज्जु; तुल० ओ० Vणम-(/सं० नम्>प्रा० णम, नत्य, गु० नथ (nose-ring), (प० च० णव) नमना, नवना। -इ व० (सं०- ४७, १, ११)। नमति) राज० नम्वो, नववो, नमवो- णत्यदंड-पु० (सं० अनयंदण्ड) त्रुटि- नम्बो; (प्रा० ५० १, ६) । णमन्त-व. पूर्णदण्ड; (प्रा० गु० १८, १०)। कृ०; (प० च० १, ८, १२) । णमेइ- णत्यि--अव्य० (मं० नास्ति>प्रा० व० झुक जाना; (रि० १०३, १५)। गत्यि) अभावसूचक अव्यय, तुल० गु० णवयारिवि-पू० का० क्रि०, नमस्कृत्य; नथी, (प० च० १६, १२, ३; ण०१, (जस० १, २७, १०) । णविवि-पू०- १३, ६; सं० रा०)। का० क्रि०, नमन करके; (ण० णदि-स्त्री० (सं० नदी>प्रा० णई) १२; महा० ६८, ६, १०) । णवेप्पिा- नदी; (प्रा० ५० १, ६)। पू० का क्रि०, नमस्कार करके; (सुगंध ण-पु० (सं० नाद) शब्द, ध्वनि, १, १) । णाविकण- आवाज; (क० ६, २, २; की० ४, ३७; झुकाकर; (व० ८, १० ११) । ण० ७, १२, २) । णमसिम-न० (दे०) मनौती; (दे०. द्दिम-वि० (दे०) दुःखित; (दे०- ना० मा० ४, २२)। ना० मा० ४, २०)। णमि-पुं० नमि, नृप-विशेप; (व० २, णन्दण-पु० (सं० नन्दन >प्रा० णंदण) १३, १०) । २. नमिनाथ नामक तीर्य- पुन, लड़का; (प० च० ३, १३, ३)। कर (व० १, १, १३) । --राय पुं० स्त्री०-णन्दणी (प० च० १०, १, नमि राजा; (व० ४, ७, ८)। ५)। पमिय-वि० (सं० . नमित>प्रा० णन्वणवणिय-वि० (सं० नन्दनवनिक) नमिअ) नमाया हुआ; (प० च० २, ६, उद्यानपाल, वनपाल; (प० च० ३३, ३, ६; क० ३, २०, ८)। ७)। णमोक्कार-पुं० (सं० नमस्कार>प्रा० गन्दावत्त-पु० नन्दावर्त, नगर-विशेप- णमोक्कार) नमन, प्रणाम; (प० च० ६, नाम; (प० च० ३०, १, ३०)। १०, १)। गन्दुखारी- पुं० नगर-विशेष-नाम; णम्मय-स्त्री. (सं० नर्मदा>प्रा० -पू० का० नि णय (४६१) पर - - ~ (की० ३, . एम्मया) नर्मदा, नदी-विशेष-नाम; (प०- नयनों को आनंदित करने वाला; (व० च० २७, १, १)। - (णम्मया) १, ७, १२)। स्त्री। नर्मदा नदी; (प० च० ४८, ६, णयणाणंदयरु-वि० (सं० नयनानन्दकर) ४) । नेत्रों को आनद देने वाला; (रि० २, गय-पुं० (सं० नय>प्रा० णय) १)। न्याय, नीति; (प० च० १, ६, १)। णयणामेलय-पु. (सं० नयन+मेलक) २. (सं० नद) नदी; (व० ३, ८, १३)। दृष्टि मिनन; (प० च० ३१, १२, ३. नीतिशास्त्र; (जस० २, ५, ६)। १०)। ४. पु० राजपुवनाम-विशेष; (जस० ४, ४, णयणि-वि० (सं० नयन+इष्ट) ८, १)। वि० (सं० नत >प्रा० णय) नेत्रों के लिए प्रिय; (जस० २,१, प्रणत, नमा हुआ; (ण० १, ११,३; १८)। जस० १, १, २)। -मग्ग पु० (सं0- -मग पुं० (सं०- णयमगु-पु० (सं० नय+मार्ग) नीति- नय+मग्ग) नीतिमार्ग; मार्ग; (व० १,१७, ४) । १४.१) । रणयर-पु० (सं० नगर>प्रा० णगर) णपणंजण-पु. (सं० नयनाञ्जन) नेत्रों शहर, पुर; (सं० रा०; जस० १, ३, में लगाया जाने वाला अंजन; (जस० ४, १५; ण० ४, ६, ५)। णयरु; (प० च० २, १६)। १२, ३, ८)। णयणं-पु. (सं० नयन+अश्रु) नेत्रों ० नयन+अश्रु) नेत्रों णयरि-स्त्री० (सं० नगरी>प्रा० के आंसू, (जस० ४, १, २)। णयरी) नगरी, शहर, पुरी; (सुअंघ० २, रायण-पुं० नयन >प्रा० णयण) नेत; १, १३; व० १, ४, १)। नयन, आँख; (जस० १, ६, १०; व० १, णयरोह-पु० (सं० नय+रोध) दुर्नय; १, १३) । --उल्ल (स्वार्थे प्र०) (जस० (जस०)। २, ६, ५) । णयणु; (व० १०८, णयाणय-पु. (सं० नय+अनय) नीति और अनीति, न्याय और अन्याय; (जस० जयणकडक्ख-पु० (सं० नयन+ ४, ६, ६)। कटाक्ष) तिरछी नजर, (look at with णरंग-पु० (सं० नर+अङ्ग) शरीर; a side glarce)! -इव० (प० च० "पइँ जिण णिदिउ विट्टलु णरंगु" ३८, १३, ६) । णयणकडखे वि-पू०. आपने इस दूषित शरीर की निंदा की है। का० कि०, (प० च० ३७, ७, ७)। (ण० ८, १०, ४)। णयणकडक्खिय-वि० तिरछी चितवन णर-पु(सं० नर>प्रा० णर)मनुष्य; से देखा हुआ; (प० २३, १३, (प० च० १६, १५, ७; ण० १,६, ६)। ११) । -नाह, पु० (सं० नरनाथ) णयणाणंदण-वि० (सं० नयन+नन्दन) राजा; (भ०)। -मय मनुष्य रूपी मृग च० - परब (४६२) गरोह (व० १, ५, ६) | -वंइ पु० (सं०- वाले की आत्मा पाप का फल भोगने के नरपति >प्रा० परवइ) राजा (प० च० लिए भेजी जाती है, दोजख; (जस० २, ४, १,६;व०१,४, १७, ग६, २, १६, २७) । ६) 1 छंदशास्त्र में जगण (151); (प्रा०. परयबिल-न० (सं० नरकदिल) छिद्र; पं० १, ८७) 1 -वर पुं० (सं० नर (जस० ३, ४१, १२)। वर) राजा; (भ०)। वरिद, पुं० णरयाल-पु० (सं० नरकालय) नरक (सं० नरवरेन्द्र) राजा; (भ०)।-हिय का घर या स्थान; (क० ६, ८, २)। पुं० (सं० नराधिप) नरेश; (भ०)। परवरिंदु-पृ० (सं० नरवरेन्द्र) राजा; णरअ-पु० (सं० नरक >प्रा. जरय) (जस० १, ६, २०) । नारक जीवों का स्थान; (जस० २, ४, णराम-पुं० न० (सं० नाराच>प्रा० १०) । णरउ; (सुदं० ८, ५) । पराच, पराअ) छंद-विशेप, वणिक छंद ण कंत-पु० गरकन्ता नामक नदी; का नाम; (प्रा० १०२, ६८) । १ि०- (व० १०, १६, ३)। नाराच छंद में एक-एक लघु के पश्चात् णरकेसरि--पु० (सं० नरकेसरिन्) एक एक गुरु होता है तथा प्रत्येक चरण विष्णु का चौथा अवतार; (भ०) । में १६ अक्षर होते हैं। परलम्म-पु० (सं० नरजन्मन्) मनुष्य गरावण-पु० (सं० नारायण>प्रा० का जन्म; (जस० ४, १६, ३)। णरायण) विष्णु; (प्रा० गरण त्यि-स्त्री. (सं० नरास्थि) मनुप्य २०७)। की हड्डियाँ; (व० ३, २६, ३) । णराहिव-पु० (सं० नराधिप>प्रा. णरणाह-पु० (सं० नरनाथ) ऋषभदेव; एराहिव) राजा, (क० २, १६, ३) । (व० १, १३, ६)। गरणाहु-पु° गरिद-पुं० (सं० नरेन्द्र >प्रा० गरे८) राजा; (जस० १, १६, १६)। राजा, नर-पति; (क० १, २, ३) । णरत्यि-स्त्री० (सं० नर+अर्थ) पुरुष परि-स्त्री० (सं० नारी) स्त्री; (सि० को कामना, "सुपसत्यिं परत्यिं अगुज्ज- यहाँ, गय दुछ पासि सा खुज्जयहाँ;' १, ३६)। अर्थात सुमसे अधिक प्रशस्त जरु-पु. छप्पय छंद का भेद; (प्रा०. कामना से वह दुष्टा एक टेढ़े-मेढ़े कुबड़े पै० १, १२३)। के पास गई; (जस० २, ६, ६)। गरेस–पु० (सं० नरेश>प्रा० गरी) णरयंघ-कूब-पु(सं० नरकान्ध-कूप) राजा; (भ०)। अंधकूप; (व० १,१६, णरेसर-पु० (सं० नरेश्वर>प्रा० १०)। परीसर) राजा; (क० १, १०,७)। परय-पु० (सं० नरक>प्रा० परग, णरेसर; (महा० ६६,१४, १३) । परय) वह स्थान जहाँ बुरे कर्म करने गरोहु-पु० (सं० नर+ओघ>. पं० २, पुरूप की नरक का णल (४६३) धावर - गर+ओघ, ओह) नर समूह; (ण० ८, णमोक्कार, णवकार) नमोकार मंत्र १६, ३)। "णवकारई मुणिरणा दिण्णएण;" (क० पल-पु. (सं० नल) राजा-विशेप- ५, १८, ८)। नाम; "णन पहुस वेणु मंधाय जे वि;" रणवजुक्ष्वणी-स्त्री० नवयौवना; (सं०- (जस० १, ६, १०)। रा०)। णल-न० (मं० नड) तृण-विशेप, खस गवणवोत्तर-पू० (सं० नव-नवोत्तर) का तृण; (दे० ना० मा० ४, १६) । नो अनुदिश स्वर्ग; (व० १०, ३०, गलिण--१० (मं० नलिन>प्रा० १७) । णलिण) रक्त कमल; (जस० १, २३, णवगिय-पु० न० (सं० नवनीत >प्रा. ६) । णवणीअ) मक्खन (जस० ६, २१, ४) । लिणी--स्त्री० (सं० नलिनी>प्रा० णवणीय; (व० १०, ३, ८)। पलिणि) कमलिनी; (सु. ८, ४)। णवतरु-पु० (सं० नव तरु) नवीन -बइ पु० (सं० नलिनीपति) सूर्य; (व. वृक्ष; (व० २, ११, १०)। ७, १४, ५)। णयदह, णवरह-वि० (सं० नवदश) पति-० (दे.) गृह, घर, मकान; उन्नीस। (दे० ना० मा० ४, २०) । णव-पलिउ-पु० (सं० नव पलित) सफेद पलो-पु० (सं० नल:) (छंदशास्त्र में) या शुभ्रकेश, (व० ८, ७, १२) । स्कंधक का भेद; (प्रा. णवनालिय-स्त्री. नवमालिका, दिक्कु- ७४) । मारी, स्त्री-विशेप-नाम; (व० ९, ५, राव-(० नव>प्रा० णव) नया, नूतन; (प्रा० ५० १, १३५)। णवमासु-पुं० (सं० नव+मास) .--रंग पु० छप्पय छंद का भेद; (प्रा० असाढ़ मास, वर्ष का चीया महीना; (व० पं० १, १२३)। ६,८,६)। णवमि-स्त्री० गाव-(सं०/नम् >प्रा० गम, णव) (सं० नमन गरना; (जस० १,८,६) - णवमी) नवमी, तिथि-विशेष; "णवमिहि व० (सं० नमति >प्रा० णवइ) (क० ३, दिणि भइ दह-गुणि तुरंत" नवमी के २, ६) । णवन्त-कृ० (प० च० ७, ६, दिन वह पूजा दस गुनी हो गई; (सि० १, ६)| -बेवि पू० का० कि०; (क० ३, १७)। ६. ५) । गाविज्जइ-कर्मवा०; (ण० णवमेह-पु० (सं० नव +मेघ>प्रा. णवमेह) नए ८, १०, ७)। ६, २२, णवइ, णदि-वि० (सं० नवति) ७)। नव्ये; (महा०) । णवर-अव्य० (दे०) १. केवल, (प०. णवकार-पु.० (सं० नमस्कार>प्रा० घ० ११, ५, ४) । २. तथापि, 'तउ पै० १ नवीन, ७) । नवमी>प्रा० , मेघ (ण.
णवराज (४६४) पहयल १३)। ६ णवलया-स्त्री० करहुँ णवर दइवें खलिब,' (मैं वहाँ) तप ढ्य, भोगी; ३. नियोगी का पुत्र; (दे०. करूगा, तथापि देव ने इसमें भी बाधा ना० मा० ४, २२)। डाली, (जस? २, २१.५) । ३. अनंतर, Vणस-(सं० नश्यते) नष्ट होना; वाद में; (ण० ४, १२, १)। (प्रा० .० १, ३७)। णपराउ-पु. नवराग; (सि० १, णहंत-न० (सं० नभस् +अन्त) आकाश गवरि-अव्य० (दे०) अनंतर, वाद में; का अखीर; (जस० १, १६, १४) । (दे० ना० मा० ४, २०) । णह-पुं० (सं० नभस् >प्रा० णह) णवरिम-न० (दे०) सहसा, जल्दी, आकाश, गगन; (प्रा० ५० १, १०६ तुरंत; (दे० ना० मा० ४,२२) । की० ४, १८६) । पुं० (सं० नख>प्रा० णयल-वि० [सं० नव >प्रा० णव+ णक्ख) नख, नाखून; (सं० रा०; जंबू० ल्ल (स्वार्थे प्र०)] नूतन, नया; तुल० ८, १३; ण० १, ११, ३)। म० नवळ; (क० २, १७, १०)। णवल्ल णहगु-पु० (सं० नमस्+अग्र) आकाश -वि० (जस० ३, १३, १८) । का अग्र भाग; (व० १, ४, ८) । जिसमें (दे०) वह व्रत, पति का नाम पूछने पर उसे नहीं बताने णहणिय-स्त्री० (दे०) नटिनी, नतंकी; वाली स्त्री पलाश की लता से ताड़ित (सं० रा०)। की जाती है; (दे० मा०४, णहथल-पुं० (सं० नमस्तल) आकाश २१)। का निचला भाग; (जस० ४, १२, णवतियं-न० (दे०) सं० उपयाचित- (दे० ना० मा० ४, णहमणि-स्त्री० १. (सं० नभस् + २२) । टि०-वसियं को सं नमस्या मणि) सूर्य; (प० च० २, ६, ८) २. (सं० (पूजा, अर्चना, श्रद्धा, भक्ति) से व्युत्पन्न नत्र+मणि) नख रूपी मणि; (व० १, नहीं माना जा सकता। णवि-अव्य ० (सं० नापि>प्रा० णवि) ६, ५)। वपरीत्य सूचक अव्यय, निषेधार्थक णहमुह-पु० (दे०) उल्लू; (दे० ना०- अव्यय; (दे० ना० मा० ४, १८)। मा० ४, २०)। णधिय-वि० (सं० नमित>प्रा० णहयर-वि० (सं० नभश्चर) आकाश- णमिञ, णविअ) प्रणत, जिसने नमन गामी; (ण० १, १७, ३; जस० १,७, किया हो वह; (ण० १, १६, ७)। ६)। णवोद्धरण-न० (दे०) उच्छिष्ट, जूठा; णहयल-पु० (सं० नख+तल >प्रा. (दे० ना० मा० ४, २३)। णक्ख-+तल, यल) नावन का अधोभाग; णयाउत्त-पु० (दे०) १. ईश्वर, धना- (ण० १, १७, ३) । पु० (सं० नभ- ता० कम् । मनौती; , - , पहर (४६५) শি प्रा० पं० २, स्तल) आकाश की निचला भाग; (जत० एक प्राचीन इक्ष्वाकुवंशीय राजा का नाम १७; क० २, २१, ८) जो अंबरीष का पुत्र और ययाति को याभिजिउ वि० (-गामिनी) आकाश पिता का; (जस० १, ६, १०) । तलगामिनी; (रि० १०, २) । 1/णा-(सं० ज्ञा>प्रा० णा) जानना, णहर-पु० (सं० नसर>प्रा. णहर) समझना; (जस० १, १५, १)। -य नाखून; (२०१०, ३२, ४)। भू० का०, ज्ञान प्राप्त किया; (रि० १, पुं० (सं० नखरन्ध्र) नाखून का छेद; २)। (व० ३, २६, ४)। पा-अन्य० (सं० न>प्रा० पा) निषेध. णहरो-स्त्री० (देशी सूचक अव्यय, नहीं; (प्रा० णहरी) सुरिका, छुरी (दे० ना० मा० ८६)। ४, १८)। णार-पुं० (सं० न्याय) नीति, आचि- पहरण-पुं० (सं० नतव्रण>प्रा० त्य; (जस०३, २५, १४) । मह वण पु० न०) नाखुन का घाव; पास-पुं० (सं० नाग>प्रा. जाग) (० ३, ११, ४)। सर्पः (प्रा० ५० १, ६१)। णहल्लिय-स्त्री० (सं० नभवल्ली> पासक-पु० (सं० नायक>प्रा० प्रा० महवल्ली) विद्युत्, बिजली; (सं०- णायग) नेता, मुखिया, बगुआ; (प्रा०- रा०)। पै० १, ३८)। एहतिरि-स्त्री० (सं० नमः+श्री) पालर-वि० (सं० नागर) नगरवासी, आकाश की प्रभा; "णं पहसिरि उग्गय विदग्ध, प्रवीण, रतिक; (को० १, २६)। कुभएण मानो कुम्न राशि के उदय से २. सम्य व्यक्ति; (प्रा० भाकाश चमक उठा हो, (ण० १, १०, १०५)। ५)। णाअरि-स्त्री० (सं० नागरी) नगरवासी पहाग-न० (सं० स्नान >प्रा० पहाण) स्त्री; (प्रा० १०२, १०५)। नहाना; (प्रा०प० २, १८६) । --ड्ढ णाई-अव्य० १. इव, पाई-अव्य० १. इव, मानो; (महा० वि० नहाए हुए; (प० २० ६६, १२, १४) । २. नाई, समान; (क० ७)। १, ६, ६)। पहि-अव्य० (सं० नहि>प्रा० पहि) पाइ-अव्य० (दे०) १. समान, उपमा- निषेधार्थक अन्य० नहीं, (प्रा० पै०१, वाचक शब्द; तुल० राजा नाई; (प्रा. ३७)। पं० २, १३६) । २. मानो, इव, (. पहु-अव्य० (सं० न खलु) निषेधार्थक ३, १२, ६)। अव्यय, नहीं: (को०३, १०८; सं०- पाइणि-स्त्री० (सं० नागिनी>प्रा० रा०)। पाणी) नागिन, पिणी; क० १०, णहुत-पु० (सं० नहुष) अयोध्या के १२, १)। पै० २, - णाइय . (४६६) णाणा अपना . । नाग> णाइय-वि० (सं० ज्ञात >प्रा० णाय) णाडि-स्त्री० (सं० नाडि>प्रा० णाडि) जाना हुआ, विदित, ज्ञात, "जा जल नाड़ी, नस, सिरा; (सि० २, ६)।. कील तेण उप्पाइय, सा अमरेहि मि णाडिज्जन्ति-क्रि०, ब० अभिनय करना, रमे वि ण णाइय" उसने जो जल-क्रीड़ा "वम्मह-णड णाडिज्जन्ति (?) के वि" की है, वैसी क्रीड़ा देवताओं को भी ज्ञात वामन और नट की तरह कोई नहीं; (प० च० १४, ११, ४; रि० १, अभिनय कर रहे थे; (प० च० ७,२, १२)। गाउ-पु० (सं० नामन्) नाम, शब्द णाणंकुसिउ- णाणंकुसिउ-न० (सं० ज्ञान+अंकुशित जिससे किसी व्यक्ति, वस्तु या समूह का >प्रा० णाण न० +अंकुसइय न०) ज्ञान ज्ञान प्राप्त हो; (प० च० २, १७, ८; का अंकुश; "मणवारणु ते णाणंकुसिउ," ण० ४, १३, ६) । पुं० (सं० उसे ज्ञान के अंकुश से रोका, (ण० ६, प्रा० णाग, णाय) सर्प; (रि० ४)। ५, ३)। णाण -न० (सं० ज्ञान >प्रा० णाण) गाय हों; (दे० ना० मा० ४, २३)। ज्ञान, बोध; (प० च०.०, १०, ६; म० णाओ-वि० (दे०) अत्यधिक अहंकारी २, ७, ७; ण० १, १२, १०)। —तेज (गर्विष्ठः); (दे० ना० मा० ४, २३) । पुं० (सं० ज्ञान+तेजस् >प्रा० णाण+ णाग-पुं० (सं० नाग>प्रा० णाग) तेउ) ज्ञान का प्रकाश; (ण० १, ६, ३)। सर्प; (व०८, १६, २)। णाणु; (सि० १, १७)। णागदत्त-पु. नागदत्त, व्यक्ति-विशेप- णाणत्तए-पु. (मं० ज्ञानत्रय) नास; (जस० ४, २८, २) । श्रुति और अवधि रूप तीन प्रकार का णागपास-पु० (सं० नागापाश) ऐंद्र- ऐंद्र- ज्ञान; (व० ६, ८, ७) । जालिंक फंदा, जो युद्धकाल में शत्रु को णाणमश्र-वि० (सं० ज्ञानमय) ज्ञान से फंसाने के लिए व्यवहृत किया जाता था; युक्त; (जस० ३, २८, ११) (प० च० २०, ५, २)। णाणा-वि० (सं० नाना>प्रा० णाणा) णागय-वि० (सं० न+आगत) नहीं अनेक, अनेक प्रकार के, विविध; (जस० आया हुआ, (जस० २, ७, २)। ४, ७, ४)। (-विध) णाडउ-न० (सं० नाटक >प्रा० णाडग, विविध, अनेक प्रकार का; (जस० १, णाडय) नाटक, (सि० १, १०, १०)। -हिणाण पु० (सं० नाना १७)। +अभिज्ञान प्रा० णाणा+अहिणाण) णाडय-न० (सं० नाटक >प्रा० णाडग, अनेक ज्ञान रूप; "महापंचकल्लाणणाणा- णाडय) अभिनय, नाट्य-क्रिया; (ण० २, हिणाणो," आपके पाँच महाकल्याणक रूप ६, ५) । २. नर्तन; (प० च० २७, १२, हुए हैं। आप ज्ञान रूप हैं,' ८)। ११, २)। मति, . -विह वि० अभिनय; (ण० २, णाणि (४६७) णारओ - पति हुआ; पैं० १, णाया णाणि--वि० (सं० ज्ञानिन् > प्रा० णायकुमार-पु. नागकुमार नाम का णाणि) ज्ञानी, जानकार; (जस० २, १२, देव; (क० १०, ३, १)। २०) । णाणी; (ण० २, ३, १३) । णायदत्त--स्त्री० नागदत्ता नामक स्त्री; णातियउ-पु० (सं० नप्ती>प्रा० "सो णायदत्तरिणिएँ सणाहु; अर्थात् णत्ती) नाती, लड़की या लड़के का वही नागदत्ता गृहिणी का लड़का; (सि०. २, ३)। (क० १०, १०, ६)। णाभि-पु० (सं० नाभि >प्रा० णाभि) णायभंगु-पुं० (सं० न्याय भंग) न्याय नाभि, पेट का मध्यभाग; (सि० १, का उल्लंघन; (महा० २२-३) । १)। णायर-वि० (सं० नागर>प्रा० णागर, णाम:-न० (सं० नामन् >प्रा०णाम) नाम, णायर) १. नागरिक, नगर का निवासी आरव्या, अभिधान; (जस० १, २, १३)। २. नगर संबंधी; (सं० रा०; ण० १, ६, णामाई-न०, व०; (प्रा० ११)। –णरा पु० (सं० नागर-नर> ८६)। प्रा० णायरणर) नागरजन; (व० १, ८, णामोक्किसियं-न० (दे०) कार्य, काम; ११)। (दे० ना० मा० ४, २५) । णायचंत -पु० नागवन्त, नागों का -पु० (सं० नाग>प्रा० णाग, निवास; "अह्वा पायालु प णायवंतु;" णाय) १. नाग, सर्प, साँप; (ण० ३, ५, अतएव वह उस पाताल के समान था, ३; सं० रा०) । २. हाथी; (प० जहाँ नागों का निवास है; (सुदं० २, ३, १६,४,६,१२, ३, ७) । ३. (सं० ७)। न्याय >प्रा० णाय) न्याय, नोति; (ण. णायवासु-पु० (सं० नागपाश) शत्र ६, २, ६) । ४. (सं० नाद>प्रा० णाय) को बाँधने के लिए एक प्रकार काबंधन या शब्द, आवाज; (ण. ६, १८, ४)। फंदा; (रि० ३, ८)। -पास पुं० (सं० नागपाश) शत्रु को णायवेल्लि-स्त्री० (सं० नागवल्ली) बाँधने के लिए एक प्रकार का बंधन का नागवेल, पान की बेल, तांबूल-लता; (व० फंदा; (व० ४, ७, १२)। १, ३, १०)। णायन-वि० (सं० ज्ञायक) जानकार; णायसंडु-पु. नागरखण्ड नामक वन, (ण० ४, २, ११)। "वणु णायसंड णामेण एवि;" (व० ६, णायकण्ण-स्त्री० (सं० नागकन्या) नाग २०, १)। जाति की कन्या; (जस० १, २५, णार इय-वि० (सं० नारकीय) नरक . १०)।. संबंधी; (जस० २, २८, ३) । णायकु--पु. नायक>प्रा० णारओ-पु० (सं० नारक>प्रा० णायग) नेता, मुखिया, अगुआ; णारग, णारय) नरक के जीव, प्रेतात्मा; (परमा०)। (की० २, १६०)। . ० च० + . - (सं० णारय (४६८) णासिया , । णारय-वि० (सं० नारक >प्रा० णारग, णालिच-पुं० (दे०) नालिच, एक प्रकार णारय) नरक में उत्पन्न; (ण० १, १२, की हरी साग; (प्रा० ० २, ६३) । १०) । पु नरक-लोक; (क० ६,८, णाच-स्त्री० (सं० नौ>प्रा० णावा) २)। नौका, तुल० गु० राज० नाव; (प० च० णाराय--पु० न० (स ० नाराच>प्रा० १३, १२, ५; परम० २, १०५)। णराच, णरा) लोहमय बाण; (व० ५, णावइ-अव्य० १. मानो, इव (उत्प्रेक्षा- १६, ८)। -राइ स्त्री० (सं० नाराच- र्थक); (सुदं० २, ११, १७; ण० १, ७, राजि) वाण पंक्ति; (व० ५, ५, ६, ५० च० २, २, ६) । २. निश्चय १२)। (हे० ३३१) । कि० (सं० न+आयाति); णारायण-पु० (सं० नारायण>प्रा० (ण० २, ५, १४)। णारायण) राजा-विशेष; (ण ७,८, Vणास-(सं०/नाशय >प्रा० णास) ७) । णारायणु-पु० श्रीकृष्ण; (रि. नाश होना; (जस० १, १०, १०)। १, ३)। णारि-स्त्री० (सं० नारी>प्रा० णारी) -इ व० (सं० नश्यति>प्रा० णस्सइ) स्त्री, औरत, महिला; (व० नष्ट होना; (प० च० २, ६, ४)। २, १०, णासन्त-कृ० (प० च० ३, २, १०)। २)। णारियर-० णासाहों-~आ०, व० (प० च० ८, ११, (सं० नालिकेर>प्रा० णारिएर) नारियल; (सि० १, २) । १) । णासिज्जइ-कर्मवा० (ण० ३, णारी-स्त्री० (सं० नारी>प्रा० णारी) ३, १०)। (1) स्त्री; २. सर्वलघु विकल गण (1) णास-पु० (सं० नाश >प्रा० णास) का नाम णरीअं (नारीणं); (प्रा० ५० १, नाश, ध्वंस; (जस० २, १७, १६; क. २०) । ३. नारी नामक नदी; (व० १०, २, २६, ५) । पु० (सं० न्यास>प्रा. १६, ३) । णास) स्थापन; (म० २, ४, १३)। णारोट्ट-पु. (दे०) विल, विवर, सांप स्त्री० (सं० नासा>प्रा० णासा) नाक, आदि के रहने का स्थान; (दे० ना० घ्राणेंद्रिय; (प० च० १४, १३, ७)। मा० ४, २३)। "णिवेसिय लोयण णासपएसि;" अर्थात् णासंद-पु. (सं० नालन्दा) नगर- उनके लोचन नासिका-प्रदेश पर निवेशित विशेष; (क० १०, १०, ६)। थे; (क० २, ३, ६)। -उडि स्त्रों णालंपिम-न० (दे०) आनंदित, आनंदित, नासापुटी; (जस० ३, ६, ११) । आनंद-ध्वनि; (दे० ना० मा०४, णासिय–वि० (सं० नाशित >प्रा० २४)। णासिय) नष्ट किया हुआ; (क० २, णालंवि-पु० (दे०) २१, ३)। कलाप; (दे० ना० मा० ४, २४) । णासिया--स्त्री० (सं० नासिका>प्रा० कुंतल, केश- णाह (४६६) णि - . . - णासिगा) नाक, घ्राणेंद्रिय; (ण० ७, १३, गिदमग-पुं० (सं० निन्ध+मार्ग) ३)। निंदनीय रास्ता; (जस० १, ६, णाह-पु० (सं० नाथ>प्रा० णाह) ६)। स्वामी, मालिक; (सं० रा०; म० १, गिवायर-वि० (सं० निन्दाकर) निंदक, १६, ५; ण० १, १२, १)। णाहु "कइणिदायरि;" कवियों के निदक; (महा० ६८, ५)। (जस० ४, ३१, ७)। णिसियर-पुं० (सं० निशाचर) राक्षस; णाहल-पुं० (सं० लाहल अरण्य चांडाल, एक जाति; (जस० ३; २७, ६) । महा० ६६, २, ६)। णिधरण-न० (दे०) वस्त्र; (दे० ना०- णाहि-अव्य० (सं० नहि) नहीं, नाहीं; मा० ४, ३८)। तुल० गु० नाहि, म० नहिं (प० च० १, /णि-सं० दृश् । देखना । -इव० ३, १) । णाहि -अव्य० नहीं; (सरहपा, (दे० ना० मा० ४, ३८)। णिइवि-पू० दोहाकोश)। का० क्रि०, देखकर; (भ०)। -एइ णाहि-स्त्री० (सं० नाभि>प्रा० णाभि, सक० "वणरिद्धि कारणु सो णिएइ' णाहि) सूडी, तुदी, पेट के मध्य में वह (वनपाल) वन की ऋद्धि के कारण की चिह्न या गड्ढा जहां गर्भावस्था में जरा खोज लगाने लगा; (क० १, १५, १)। युनाल जुड़ा रहता है; (क० णिक्खियउ-भू० का०, प्रकट हुआ; ६)। पुं० १. गाड़ी का एक अवयव, "णरत्तव कदंउ णिक्खियउ;" अर्थात् जैसे २. मुख्य, प्रधान; ३. स्वनाम ल्यात एक कहीं वोया हुआ लाल अंकुर के रूप में कुलकर पुरुप, भगवान् ऋषभ का पिता; प्रकट हुआ हो; (जस० २, (सं० रा०)। णियन्ति-कि.०, (प्रा० णिय, णाहिदाम-न० (दे०) वितान के बीच णिअइ) देखना, "ता सयल वि सुहउ जा की रस्सी (उल्लोचमध्यदाम); (दे० ना० समर-ज्झड णउ णिएन्ति दहवयणहों- मा० ४, २४)। वे सारे यौद्धा, रक्त कमल के समान नेत्र वाले रावण की युद्ध की चपेट नहीं देख णाहिविच्छेम-पु० जघन, कटी के नीचे सकते, (प० च० १२, २, ६)। णियन्त का भाग; (दे० ना० मा० ४, २४) । -कृ० (प० च० १०, २, ५) । णिव-स्त्री० (सं० निद्रा>प्रा० णिद्दा) णिअ--वि० (सं० निज>प्रा० णिअ) निद्रा, नींद; (जस० ३, २०, ६) । आत्मीय, स्वकीय; (प्रा० पें० २, १४७)। 1/णिद-(सं०1/निन्द्>प्रा० शिंद) -कुल पु० निजकुल; (प्रा० ५० १, निंदा करना; (जस० २, ६, १०)। २०७)। णिवण-पु० (सं० निन्दन) निंदा करने णिम-(सं० नृप) राजा; (क० १, १२, का काम; (जस० ३, ३६, २) । ५) । व० णिक्कल (४७०) णिक नामः (मं० पिनक्कल-वि० गोल, कुंडलाकार, (सं० निपुणतर) अधिक कुशल; (जस० मंडलाकार, वर्तुल; (दे० ना० मा० ४, ३,३४, १०)। ३६)। पिगम-दि० (सं० निपुणमति >प्रा० नियतय-वि० . (२० (सं० निवृत्त>प्रा० पिउणमइ) निपुण बुद्धि वाला; (ण० ६, मिनट, गिअत्त) १. पीछे हटा हुआ, १, ११)। लौटा हुआ, वापिस आया हुआ, २. इस णिरत-दि० (सं० नियुक्त >प्रा० संसार से विखत, ३. समस्त; (सं.. णिउत्त) कार्य में लगाया हुआ; (जस० रा०)। ३, ६, ११) । णिउत्त; (ण. ६,१५, गिपिन-पुं० (सं० निज प्रिय) छंद- १०) । शास्त्र में हिल धुट्टिकल (u) का णिउत्त-वि० (सं० निर+वृत्त= (प्रा पं० १, २२)। पूर्णता को प्राप्त) निष्पन्न, सिद्ध, दक्ष, गिलम-पुं० (सं० नियम) विवि या चतुर; "सबल-कला-विष्णाणाणिउत्तहे; निश्चय के अनुकुल प्रतिबंध; (प्रा० ५ १, अर्थात जो समस्त कलाबों और विज्ञान १२६)। में निपुण थे; (प० ५० ५, १०, ४)। गिबल-क्रि०, वि० निकट) टि-निर उपसर्ग वातु से पहले लग कर समीप; (प्रा० ५० १, १६३) । उपर्युक्त अर्थ प्रकाशित करता है। णिज-(सं० नि+युञ्) जोड़ना, संयु- गिम्भ-वि० (सं० णि उद्धृत) क्त करना, किसी कार्य में लगाना; क्षुब्ध; (ण० ३, १४, ६)। (जस० ३, १६, ८) । णिजिवि-पू०- गिउदम्ब-न० (सं० निकुन्नम्ब>प्रा. का क्रि०, वाँधकर; (ण. ६, १, णिव) समूह, जत्या; (प० १)। १०, ६)। गिलिय–वि० (सं० नियुक्त) नियो- णिऊरण-वि० (सं० निपुणम् >प्रा० जित, लगाया हुआ; (जस० ३, १०, णिण) ऋतुर, कुशल; ६, १७, १४)। गिटक्क-वि० (द०) तुप्णीक, मौंन गिोत्र-० (सं० नियोग> प्रा० रहने वाला; (दे० ना० मा० ४, णिओग, णिोअ) १. नावश्यक कर्तव्य, २. तप, संयम, त्याग, “पाण जन्ति जइ शिटड्ड - (सं०नि:)दुबकी लगाना, एण णिोएं" 'यदि इस तप में प्राण ज.ते गोता लगाना, स्नान करना । —5 अक० हैं,' (प० १० २, १२,७) । (दे० ना० मा० ४,४०)। णिोइय-वि० (स० नियोजित >प्रा० जिउप-वि० (सं० निपुण>प्रा० णिोजिय, णिोइअ) नियुक्त किया हुमा, पिण) दक्ष, चतुरं; (महा० ६६, १६, किसी कार्य में लगा हुबा; (सं० २०)। १०; जस० २, ३१, ११) । -यर वि० णिक-वि० (फ्रा० नीकह) नीका, तुल० च०८, णिकाय (४७१) णिक्खय - . राज० नीको; (प्रा० ० २, १६१)। रहित, निर्दय; (जस० ३, २४,१०) । णिकाय-पुं० (सं० निकाय >प्रा० णिक्कसाओ-वि० (सं० निर्+कपाय णिकाय) संगटन, श्रेणी, समूह, "चउ कपायरहित; सांसारिक पदार्थों में आस- दिसु चउ देव-णिकाया" (प० च० २, क्ति रहित होना; (वी० १, १)। १०, ६)। णिक्काम-वि० (सं० निष्काम) वह णिकिछ-वि० (सं० निकृप्ट) दुरा, कार्य जो विना कामना के किया जाए; अधम, नीच; (क० ६, ६, ८)। (जस० २, १७, ५)। णिकेअ-पु. (सं० निकेय>प्र० णिक्कारण--वि० (सं० निष्कारण> णिकेय) गृह, निवास-स्थान, आश्रय; प्रा० णिक्कारण) कारण-रहित, हेतु-शून्य; (ण० १, २, ६; क० ३, ३, ३)। (प० च० १६, १५, ७)। णिक्कउ-वि० (दे०, प्रा० णिक्क) णिक्किा-वि० (सं० निष्कृपः) कृपा. सुनिर्मल, सर्वथा मल-रहित; (प० च० विहीन; (प० च० ३०, १)। १७, १८, ४)। णिक्किट्ठ-वि० (सं० निकृष्ट) नीच; णिवकज्ज-वि० (दे०) अस्थिर, परिव (जस० २, १६, १८)। तित, असंयत, अनियंत्रित; (दे० ना० मा० णिक्किवासु-वि० [सं० नि:+/कृप् ४, ३३)। (=कल्पना करना, रचना करना) + णिवकड-वि० (दे०) कठिन, (दे० ना० असु] प्राणियों के प्रति क्रूर; (व० ३, मा० ४, २६)। २७, १)। /णिक्कम-(सं० निस्+क्रम्) बाहर णिक्खज्ज-वि० (सं० निखाद्य) अखाद्य; जाना, निकलना । णिक्कंता-निकालना; (जस० २, ३६, ४) । (प्रा० ५० २, ६७)। णिक्करन्तो-कृ० 1/णिखण-(सं० निप+खन्)खोदना । वाहर खींचकर, निकालकर; (को० ४, -णिवि पू० का० क्रि०, खोदकर; (क० १९८) । ५, ८, ८)। णिक्खणेवि-पू० का०- णिक्कमय-वि० (सं० नि कर्मन्) जो कि०, (प० च० ५६, १५, २)। कार्य में लिप्त न हो; "णिक्कसाय-णिवि णिवखन्त-वि० (सं० निष्क्रान्त>प्रा० साय णिक्कमय;" (व. १०, णिक्कंत, णिक्खंत) निर्गत, बाहर निकला हुआ; (प० च० १५, २, ३)। णिक्कम्पिरउ-वि० अविचल; (प० च० णिक्खय-वि० १. (सं० निक्षत>प्रा० ६, ६, २)। णिक्खय) प्रहार किया हुआ, निहत, मारा णिक्कल-वि० (सं० निप्कल) निःशरीर, हुआ; "तो भणइ सुकेसु, संसउ णाह जिए- जिसका कोई अंग या भाग नष्ट हो गया वाहों। सिरेणिक्खएँ खग्गे, अवसरु हो; (जस० ३, २४, ११)। कवणु रुएवाहो"-तब सुकेश कहता है, णिकलुण-वि० (सं० निष्करुण) करुणा "हे स्वामी, जब जीने में संदेह हो और , णिक्खर्वण (४७३) णिग्गमण रखे हुए, - सिर पर तलवार लटक रही हो, तब रोने जीव संसारी कहलाते हैं । नित्य निगोद, का यह कौन-सा अवसर है; (प० च० इतर निगोद, वायुकाधिक, पृथ्वीकायिक ७, ८,८%; दे० ना० मा० ४. ३२)। जलकायिक और तेजोकामिक, जीव । २. (सं० निखात) गड़ा कर णि गंय-वि० (सं० निर्ग्रन्थ >प्रा० गाड़ा हुआ; (जस० ३, २४, २)। णिअंठ) निर्ग्रन्थ, जैन मुनि, णिक्खवण--म० १. (सं० निष्क्रमण > "जायउ णिग्गंथु महत्थु मुणि,” वह परा- प्रा०णिक्खमण, णिक्खवण) निर्गमन, मर्थ हेतु निग्रन्थ मुनि बन गया; (ण० आगे या बाहर जाना; (प० च० २, ११, ६, १५, ३)।-पह पुं० (सं० निर्ग- ४) । णिक्खवणु; (व० १, १६, १२) । न्थपथ) जिन भगवान् के द्वारा प्रदर्शित २. (सं० निक्षेपन) स्थापन, डालना; मार्ग; (म० १, १७, १)। -वित्ति (क० १०, २६, १४)। -वेल्ल स्त्री० स्त्री० (सं० निर्ग्रन्थवृत्ति) जिन भगवान् (सं० निष्क्रमण+वेला>प्रा० णिवखवण का तौर-तरीका या आचरण; (जस० ४, + वेला) निर्गमन का समय; (व० ६, २२, ५)। १६, १)। णिक्खसरिअ-वि० (दे०) ठगा /मिगच्छ-(सं० निर्+गम्) हुआ, बाहर निकलना । -इ व० (ण० ६, १४, ४)। जो लूट लिया गया हो; (दे० ना० मा० णिग्गंत-कृ० (निर्गच्छत्); (क० ४, ४, ४१)। णिवखुड-वि० (दे०) स्थिर; (दे० ना०- १४, ५) । णिग्गन्त-कृ० (प० च० ७, ७, ४) । णिग्गउ-भू० का० मा० ४, २८)। (सं०- निर्गतः) निकल गया; (व० १, १, ७, णिरखुत्त-वि० (दे०) निश्चित; (प०. १२) । णिग्गमेइ-"पढमउ च० १८, ३८)। भुभुक्कइ णिग्गयेइ;' अर्थात् पहले भुक-भुक करती णिक्खुरिअ-वि० न हो, हुई निकली; (क० ४, १४, ५) । णिग्गय अस्थिर; (दे० ना० मा० ४, ४०) । णिगढ-पु० (दे०) धर्म, घाम, गरमी; भू० का० (सं० निर्गत:) निकल . पड़ी, "ता णिग्गय तक्खणि सलिलधार;" (क० (दे० ना० मा० ४, २७)। ३, १४, ६) । निकल आए; (महा० णिगूढ पुरिस-पु० (सं० निगूढ+ ६६, १२, १४)। पुरुष) गुप्तचर, भेदिया; (प० च० १६, ३, २)। णिग्गम-पु० (सं० निर्गम >प्रा. णिगोय--पु० (सं० निगोद) नित्य णिग्गम) १. उत्पत्ति, जन्म, २. बाहर निगोद नामक जीवों का निकलना, ३. द्वार,४. जाने का बाहर एक प्रकार; (व० १०, ४, ३)। टि-सिद्ध और रास्ता, ५. प्रस्थान, ६. निकास; (जस० संसारी के भेद से जीव दो प्रकार के होते ३, ७, ७; सं० रा०)। हैं । अपने कर्मों के भार को ढोने वाले णिग्गमण-न० (सं० - निर्गमन >प्रा० जो दृढ़ - . णिग्गय (४७३) णिच्चेलत्तण निर्गत >प्रा० निरंतर, णिग्गमण) निःसरण, बाहर निकलना; २, १, ३)। (जस० २, ६, ६)। णिचिट्ठ-वि० (सं० निश्चेष्ट) चेष्टा- णिग्गय–वि० १. (सं० रहित; (क० ८, ८, २) । णिग्गय) निःसृत निकला हुआ, बाहर णिच्च-वि० १. (सं० नित्य>प्रा० निकला हुआ; (सं० रा०; ण० १, १२, णिच्च) अनश्वर, शाश्वत । २) । २. (सं० निर्गज) हाथी रहित; सर्वदा; (सं० रा०; ण० १, १०, २)। (प० च० २६, १६, ८; भ०)। २. (सं० नीच>प्रा० णिच्च, णीय) णिग्गह-पु. (सं० निग्रह >प्रा० निकृष्ट, अधम; (क० २, १४, २)। णिग्गह) नियमन, नियंत्रण, दमन; (क० णिवा-अव्य० निश्चयपूर्वक; (की० ६, २१, ३)। णिग्गहु; (ण० ३, ३, १, २६)। ६) । णिच्चल-वि० (सं० निश्चल>प्रा० णिग्गहण-न० (सं० निग्रहण) निग्रह, णिच्चल) स्थिर, दृढ़, अचल; (ण० ६, दमन, नियमन; (सि० २, ४) । ६, १०; जस० १, २०, ६)। -मई जिग्गा-स्त्री० (दे०) हरिद्रा, हलदी; वि० (सं० निश्चलमति) स्थिर बुद्धि (दे०ना० मा० ४, २५) । वाला; (जस० २, १३, २१)। णिग्गुण-वि० (सं० निर्गुण>प्रा० णिच्चा--वि० (सं० नित्य>प्रा० णिग्गुण) गुण-हीन; (जस० ४, २५, णिच्च) शाश्वत, सर्वदा; (प्रा० ५० १ ३)। ३५)। णिग्घंट-पु० निघण्दु निघंटु, वैदिक रिणच्चालोक-पु. नित्यालोक शब्दों का संग्रह; (ण० ३, १, ५)। नगर; (प० च० १३, १) । णिग्घंटु; (सि० १, ७; ण. ३,१, रिगच्चितउ-वि० (सं० निश्चिन्त >प्रा० णिच्चित) चिता-रहित; (व० १, १२, णिग्घट्ट-वि० (दे०) कुशल; (दे० ना० २) । णिच्चिन्तउ; (प० च० १७,६, मा० ४, ३४)' ७) । णिग्घण-वि० (सं० निर्धन) मेघ रहित; णिच्चूयय-वि० (सं० निः+चूचुक) "णिग्धण-गयणयलु;" (प० च० १३, १०, चूचुक-रहित, (चूअ =स्तनशिखा, दे०. २)। ना० मा० ३, १८); (प० च०४७, णि ग्घिण-वि० (सं० निघृण>प्रा० ४, २)। णिग्घिण) निर्दय, करुणा-रहित; (जस० णिच्चेयण-वि० (सं० निश्वेतन >प्रा० ३, ६, ७)। णिच्चेयण) चेतना-रहित; (प० च० १७, णिग्घोसई-न० (सं० निर्घोष>प्रा० ७, ५)। णिग्धोस) महान अव्यक्त शब्द, "दस रिणच्चेलत्तण-पु० (सं० निश्चलत्व) दिसिवह-णिग्गय-णिग्घोसई," (प० च. स्थिरता; (ण० ६, २५, १)। नामक - .
णिच्चोरमारि (४७४) णिज्जो . १३)। - णिच्चोरमारि-स्त्री० (सं० निस्+चोर णिज्जर-पु. निर्जर, देव-विशेष नाम; +मारी) चोरी या मारी; "णिच्चोर- (व० २, ११, ३) । मारि णिल्लुत्तदुवख" अर्थात् वहाँ चोरी णिज्जलहरउ-वि० (सं० निर्जलघर) या मारी महामारी का भय नहीं था; मेघ रहित, "णं ससहरु णिज्जलहरउ" जस० १, २२, ८)। मानो मेघ रहित चंद्रमा ही हो, (प० च० णिच्छअ-० (सं० निश्चय) ऐसी ३, ३, १)। धारणा जिसमें कोई संदेह न हो; (क० णिज्जाय-पुं० (दे०) उपकार, (दे०- १,१०, १०) । णिच्छव; (व० ५, ८, ना० मा० ४, ३४) । णिज्जिण- (सं० निर्+/जि) णिच्छेदिय- वि० (सं० निश्छिद्र) जीतना, पराभव करना। --इ व० (सं० सुंदर, "णिच्छेदिय सुंदर जा घडीय;" निर्+जि, निर्जयति) जीतना, पराभव अर्थात् सुदर रूप से गढ़ी गई थी; (क० करना; (भ.)। १०, १३, २)। णिज्जिय-वि० (सं० निर्जित) जीता णिच्छवि-स्त्री० (सं० निश्छवि) निस्तेज, हुआ; (जस० १, १५, ३) । -मइय छवि-रहित; (जस० २, ६, ३)। वि० (सं० निजितमति) जीत का विचार 'णिज्जंतु-वि० (सं० निर्जुन्तुक) जंतु- रखने वाला; (जस० ४, १५, १५)। रहित (स्थान); (व० ८, १४, ८)। णिज्जियारि-वि० जीतने वाला; गिजप-वि० (सं० निर्जन >प्रा० महा० ६८, ६, १)। णिज्जण) जन-रहित; (जस० ३, २०, णिज्जीव-वि० (सं० निर्जीव>प्रा० णिज्जीव) जीव-रहित, बेजान; (जस० गिज्जन्तिय-वि० (सं० नियन्त्रित) ३, २६, ४)। नियंत्रित, नियमित, अंकुशित; (प० च० /णिज्जुज-(सं० नि+/युज्> ३५, १३, ५)। प्रा० णिउंज) जोड़ना, संयुक्त करसा । णिज्जर-पु. निर्जरा; संचित कर्म का -जिवि पू० का० क्रि०, "णिज्जु जिवि तप द्वारा क्षय करना, कर्म-क्षय, कर्म अप्पर परमाणाणि, "अर्थात् परम ज्ञान में 'विनाश; "अविवाय सो णिज्जर जणु अपने को योजित करके; (क० १०, २७, वहेइ;" वह मनुष्य अविपाक निर्जरा ८) । करता है, (क० ६, १४, १)। णिज्जूह-पु. (सं० नियुहः=१. कंगूरा णिज्जरा-स्त्री० (सं० . निर्जरा) जैन निर्जरा) जैन 'मीनार, बुजं या कलश .जो स्तम या दर्शन का पारिभाषिक शब्द ; . “ संचित दरवाजों पर बनाया जाता है) कर्म का तप द्वारा निर्जरण या क्षय 'छत का किनारा, गृहाच्छादन; (दे० ना. करना । (Eradication of the karm मा० ४, २८)। ic energies); (ण० १, १२, ६) । णिज्जोन-पु० प्रकर (ढेर, समूह, गुल- .८)। - . . -- णिज्जोमी (४७५) णिठुर - - . दस्ता, सहायता, मंत्री, चलन, प्रथा, अगर 1/णिठ्ठय-(नि+/स्थापय्) समाप्त की लकड़ी) "णिज्जोओ प्रकरः । पुष्पाव करना। पिट्ठइ-विस्थापित किया कर इत्यन्ये," (दे० ना० मा० ४, जाता है; (रि. ६, ६)। पिट्ठहों- ३३)। कि०, आ० (सं० नि+स्यापय >प्रा० गिज्जोमी-स्त्री० (दे०) डोरी, रस्सी, पिट्ठव =समाप्त करना) नष्ट करो; रज्जु; (दे० ना० मा० ४, ३१) । (५०च० ६, २, ८) । णिविवि-पू०. मिजार-पुं० (सं० निर्भर) सरना; का० कि०, नाशकर; (महा० ६८, तुल० म० निसरणे; (प० च. ११, ३, १)। ६)। ~ण निर्भर; (प. च० २१, २, पिठ्ठयणायर-वि० (सं० निष्ठापन ३) । (विनाश)+कर) समाप्त करने वाला; 1/णिकर-क्षीण होना, नष्ट होना; (जस० ३, १७, १२) । अपा० (दे० ना० मा० ४, ४०) । मा० ४, ४०)। णियिउ-वि० (सं० निष्ठापित> पिझरत-4० ० (प्रा० णिज्झर -- प्रा० पिट्ठविअ) समाप्त किया हुमा, क्षीण होना)ीण होते हुए, (प० च० विनाशित; (प० च० १७, १४, २) । ८,७,१)। णियिय-घि० (सं० निष्ठापित) मृत; पिरमर-वि० (दे०) जीणं, पुराना; (जस० २, २६, १)। (दे० ना० मा० ४.२६)। गिनाइय-भू० का० (सं० नि+ध्यात) णिहइ-क्रि०, ३० घुलना, पिघलना; ध्यान से देखा, ध्यान लगाया, "णिट्टहइ विगलति;" (दे० ना० मा० "णिज्ज्ञा. ४, ४०)। इय देव घिरमणिय;" (उसने) स्थिर णिहिम-न० (दे०) खखार, धूक की मन में देवता में मन लगाया; (क० ७, ध्वनि, जो थूकने की क्रिया करते समय १२, १०) । ध्यान करता था; (व० १, होती है; (दे० ना० मा० ४, ४१) । ५, २)। निष्ठा>प्रा० णिग्गुण-वि० (सं० नियंनि) आवाज के; (म०)। णिटठा) विःवास, श्रद्धा-भक्ति; (जस०) -~-वस वि० (सं० निष्ठावरा) पूज्य बुद्धि णिज्नूर-यि० (दे०) जीणं, पुराना; या श्रद्धा-भाव के साथ; (जस० ४, २७, (दे० ना० मा० ४, २६)। २२)। पिट्ठ-वि० (सं. निष्ठित>प्रा० णिट्टिय -वि० (सं० निष्ठित >प्रा० णिट्टिय) समाप्त किया णिट्ठिय) समाप्त किया हुआ, (जस० हुआ; (ण० ५, ६, ७)। ३, १, १६; ण० १, ५, १०)। गिट्ठवण-न० (सं० निष्ठापन>प्रा० पिट्ठवण) समाप्ति, अंत करना; (क० णि/र-वि० (सं० निष्ठुर>प्रा. ३, २२, ६)। णिठुर, णिठुल) निष्ठुर, परुप, कठिन; , विना गिटा-स्त्री. (सं. हुआ, पूर्ण किया .
णिठ्ठह (४७६) णिणे, णिळूह ६, ३, . भाल, निर्नष्ट >प्रा० कि०, (जस० ३, १, १६; f० ३, १४, णिगाइय-वि० (सं० निनादित) २)। शब्दित, ध्वनित; (जस० १, १३, ५)। -वि० (दे०) स्तब्ध, निश्चेष्ट; णिणाय-पु० (सं०. निनाद >प्रा० (दे० ना० मा० ४, ३३)। णिणाय) शब्द, आवाज; (ण. णिड-पु. (दे०) पिशाच; (दे० ना० ३)। मा० ४, २५)। णिणाला-स्त्री० (दे०) -स्त्री० (दे०) चोंच; (दे०. णिडालन० (सं ललाट) ना० मा० ४, ३६)। ललाट; (प० च० १०, ३, ८)। णिण्णट्ठ-वि० (सं० णिड्डरिय-वि० (दे०) भयोत्पादक; गिण्णट्ठ) नाश-प्राप्त; (ण० ६, ६, (प० च० २५, २, ६)। ८)। /णिड्डह—(स० निर+दह, >प्रा० णिण्णाण-पु० (सं० निर्ज्ञान) अज्ञान; णिडुह) दग्ध करना। -इ व० (सुदं० (जस० ४, १८, १५) । ३, २, ७)। -इवि पू० का० णिण्णाम-वि० (सं० निर्नाम) विना जलाकर; (व० ६, २२, १)। नाम का, अज्ञातनामा; (जस० २, १७, णिड्डहण-न० (सं० निर्दहन) जला। ५) । देना; (ण० ८, १०, १२) । /णिण्णास- (सं० निर्+नाशय > णिड्डार-(दे०) आँखें फाडना। -रेवि णिण्णास) विनाश करना। णिण्णासणु पू० का० क्रि०, (सुदं० ६, १६, १) । -~-भू० का० (सं० निर्+नाशनम्) णिइवओ-पु० (दे०) अविभिन्न गृह; विनाश किया था। "चउसण्णाविसेस (दे० ना० मा० ४, ३८) । णिण्णासणु,” अर्थात् आहार, निद्रा, भय णिड्वमण-० (दे०) घर के जल का और मैथुन इन चारों संज्ञाओं का उन्होंने प्रवाह, (दे० ना० मा० ४, ३६)। विशेप रूप से विनाश किया था; (जस० णिड्वमामओ-पु० (दे०) अविभिन्नगृह; ३, १७, ८) । णिण्णासन्तहो-व० कृ० (दे० ना० मा० ४, ३६) । विनाश करते हुए; (प० च० ३, २, ५)। णिड्वमो-पु० (दे०) अविभिन्नगृह; णिण्णासिय-भू० का०; नष्ट कर डाला; (दे० ना० मा० ४, ३८) । "णिण्णासिय-दुट्ठ-जरा-पउत्ति;" अर्थात् णिणद-पु० (सं० (सं० निनाद >प्रा० दुष्ट वृद्धावस्था ने उसकी प्रवृत्ति को नष्ट णिणाय) ध्वनि, शब्द, आवाज; (जस० कर डाला; (व० ३, ४, ८)। १,२६, २७, प० च. ३२, १२, णिण्णासयर-वि० (सं० निर्नाशकर) नाश करने वाले; (क० ५, ६, ६)। णिणा---पु० (सं० निनाद >प्रा० णिण्णासिय-वि० (सं० निर्णशित) णिणाय) शब्द, आवाज; (जस० १, ४, विनाशित; (भ०) । १३)। णिणेह--वि० (सं० निःस्नेह >प्रा० ।
णित्तं (४७७) णिद्दलेवि ६)। च० ७, णिण्णेह) स्नेह-रहित; (जस० १, १६, णित्थार--पुं० (सं० निस्तार>प्रा० णिस्थार) छुटकारा, उद्धार; (सुदं० २, णित्त-वि० (सं० नीत) प्राप्त; (जस० ७, ५)। २, २५, १)। /णि+दंस (सं० नि +/दर्शय्) णित्त-पुं० (सं० नेत्र>प्रा० णेत्त, दिखाना, दृष्टांत दिखाना। णिदंसेइ- णित्त) नयन, चक्ष ; (सं० रा०)। व० (सं० नि+दर्शयति) (प्रा० पैं. १, णित्ता-(सं० नित्य) सर्वदा, शाश्वत; ५३)। (प्रा० ५० १, १३०)। णिव-स्त्री० (सं० निद्रा>प्रा० णिहा) णित्ति-स्त्री० (सं० नीति >प्रा० णीइ) नीद; (सं० रा०)। -वस वि० निद्रा- न्याय, उचित व्यवहार; (प० वश; (व० ८, १, १०)। १२, १; क० २, १८, १०)। णिदु-वि० (सं० निर्द्वन्द्व) द्वंद्व-रहित; णित्तिरडिअ-वि० (दे०) त्रुटित, टूटा (व० ३, १, १४)। हुआ; (दे० ना० मा० ४, ४१) । णिद्द-स्त्री० (सं० निद्रा>प्रा० णिद्दा) णित्तिरडी-क्रि०, वि० (दे०) निरंतर; नीद; (जस० २, ६, ४; ण० १, ११, (दे० ना० मा० ४, ४०) । १०)। णित्तु-वि० (सं० नित्य >प्रा० णिच्च) णिय - वि० (सं० निर्दय >प्रा० णिय) १. शाश्वत, २. हमेशा, निरंतर; (सं०. दयाहीन, करुणारहित; (सं० रा०; प्रा०. रा०)। पं० २, १३४)। णितुलउ-वि० (सं० निस्तुल्य) अनुपम; णिद्दयर-वि० (सं० निर्दयतर) तुलना- (व० २, ६, १७)। २. निश्चित; (प० त्मक दृस्टि से अधिक निर्दय; (सं०- च० १८, ६, ३)। रा०) । णित्तुलिय-वि० (सं० निस्तुलित) अनु णिद्दरमलिउ-भू० का०, परिमृदित, पैरों पम; (क० ६, ११, ११) । क्रि० वि० तले रौंदा; "णिद्दरमलिउ जेण सो निश्चय से, निश्चयपूर्वक; (सुदं० ८, २, रावणु;" (प० च० ५०, ६, ३) । ८)। णिद्दरिसु-न० (सं० निदर्शन >प्रा० णितुल्ल-वि० (सं० निस्तुल्य >प्रा० णिदसण) उदाहरण, दृष्टांत; (प० च० णित्तुल) असाधारण, अनुपम, निरूपम; १३, १)। (सुदं० ३, २, १४)। णिद्दलिय-वि० (सं० निर्दलित) मदित, णित्तय-वि० (सं० निस्तेजस्) तेजहीन; विदारित; (जस० ३, ६, ३; ण० ७, ७, (जस० २, १७, ६)। ६)। गित्याम-वि० (सं० निःस्थामन् >प्रा० णिद्दलेवि-पू० का० क्रि०, (सं० निर् + णित्थाम) कांतिहीन; (जस० २, १७, दलय) नष्ट करना, उखाड़ना, "सक्कमि ५)। गिरि-मंदरुणिद्दले वि"; मंदराचल को - जिंदहं (४७८) णिप्पसर निधन>प्रा० ५, ३; . । , उखाड़ सकता हूँ, (प० ० १८, २, १८, ६)। ६)। गिद्धण-वि० १. (सं० गिद्दह-(सं० निर्/दह, > प्रा० णिद्धण) धन-रहित; (क० ६, णिह) जला देना, भस्म करना। -इ जस० १, १६, ५) । २. भार्या-रहित; व० (महा० ६६, ६, ६) । णिड्डहइ- (प० च० ३९, ११, ८)। फ्रि०, व० (सं० निदंह >प्रा० णिड्डह) गिद्धम्म-वि० (सं० निधर्मन् >प्रा. जलाना; "णिड्डहइ अगुवई अगङ्ग गिद्धम्म) अधर्मी; (जस० ४, १,८; ण. यनंग उसके संग-प्रत्यंग को जलाता ३, १२, १३)। (प० च० १८, ५, ६)। णिहाड-वि० (द०) निष्कासित; गिद्दायइ-क्रि०, व० (सं० नि+द्रा> (जस० ३, ४, ६)। प्रा० गिद्दा, णिहाइ) निद्रा लेना; (प०- /णिद्धाड-(सं० नि:+V) वाहर च० १७, १५, ३)। निकालना । -डिवि पू० का० कि०, गिद्दाखिप्णउ-वि० (सं० निर्दाक्षिण्य) निकालकर; (क० ५, २, ४) । अनुदार; "अम्हें किं पहु णिहानिण्ण,” णिद्धाडिग्र—वि० निष्कासित; (क०.१०, -हे स्वामी हमारे प्रति अनुदार क्यों है; १,६) (प० च० २,१४, २) । रिणाम-वि० (सं० निर्धामन्) गृहहीन; णिहिट्ठ-वि० (सं० निदि>प्रा० (जस० २,१७, ५)। पिद्दिष्ठ) कथित, प्रतिपादित; (जस०४, गिट्टय-वि० (सं० निर्धूत>प्रा० ६, १०)। पिद्धय) नष्ट किया हुबा, विनाशित, णिटुरिय-भू० का०, (सं० निर+ "विर जिगु णिधुव-कम्म-र;" जिन्होंने दुलित) आँखों से ओझल हो गया; “अई- कर्म रूपी रज को बो दिया है, (प० च० सणे हयएँ करिवरई णिरियणयां सो २,३,१)। तक्षणिण,” अर्थात् कवि के जाने पर वह राजा तत्मण आंखों से पिढ्यग्गयई-न० (सं० निर्वृत+ बोझल हो गया; (क० ५,१४, ६) गात्रम्) परित्यक्त शरीर, "तामरसाई व णि यगायई" 'और हैं नियंत शरीर णिद्दोस-वि० (सं० निर्दोष >प्रा० गिद्दोस) दोप-रहित, निष्कलंक; (सं०- कमलों के समान,' (प० च०) । रा०)। णिन्नसण-पू० नाशक; (सं० २०)। गिद्ध-० (सं० स्निन्ध>प्रा० णित) णिप्पइन-वि० [सं० निस्+प्राप्त) स्नेह, रस-विशेष, (प० च० ११, ४, रहित; (जस० ४, १८, ११)। ४)। २. छंदशास्त्र में स्कंधक का भेद; णिप्पट्ठ-वि० (दे०) अविक; (दे० ना०- (प्रा० ५० १, ७५) । वि० स्नेह-युक्त, मा० ४,३१)। चिकना; (क० ४, १०, १०; ण०१, रिगपसर-वि० (सं० निष्प्रसर>प्रा० अदृष्ट हो णिप्पह (४७६) णिभच्छ - कसा हुआ, - - प्रणीत, "कह णिप्पसर) प्रसर-रहित, जिसका फैलाव बांधना, “सा लइय णिबंधवि चेलयहि, न हो; (प० च० १२, ३, ८) । हउँ पुणु घल्लिउ उच्चोलियहि;" उसने णिप्पह-पु० निष्प्रभ नामक पर्वत- उसे कपड़े में बांध लिया और फिर उसने विशेष, (प० च० २७, २, २)। मुझे भी पिटारी में डाल दियाः (जस० णिप्पह-वि० (सं० निष्प्रभ) निस्तेज, २, २८, ६)। फीका; (ण० ६, १४, ११) । णिवद्ध-वि० (सं० निवद्ध >प्रा० णिप्पहु-वि० (सं० निस्पृह) लालच या णिबद्ध) १. बांधा हुआ, कामना आदि से रहित; (व० ६, १७, २. संबद्ध, ३. निर्मित, ४. जड़ा हुआ, ६)। खचित; (जस० १, २१, ७)।-य; णिप्पहरण-वि० (सं० निष्प्रहरण) (सं० रा०)। अस्त्र-शस्त्र हीन; "जो जीवदयावरु णिप्प- णिद्धी-वि० (सं० निवद्धा) विरचित, हरणकरु वंभयारि हयजरमरणु;" (जस धम्मणिवद्धी का वि ४, ३०, १६)। कहमि;" अर्थात् अब मैं धर्म संबंधी विर- णिप्पाण-वि० (सं० निष्प्राण) प्राण चित कथा कहूं; (जस० १, १, ६) । हीन; (जस० २, १७, ६) । णिविमिष्ण-वि० (सं० निविभिन्न) जो /णिप्पील-(सं/ निष्पीड) निचोड़ना, भिन्न-भिन्न न हो; (भ० ३, २३, -लंति व०, प्र० पु०, व०, १)। (सुदं० ६, ४, २)। णिब्बाण--पु० (सं० निर्वाण) शांति, णिफंद-वि० (सं० निष्पन्न) जिसकी मुक्ति, मोस; (स० दो० को०)। निप्पत्ति हो चुकी हो; (प्रा० 1/णिवुड-(दे०) (सं० नि+ मस्ज्, १३६)। २. (सं० निस्पन्द) स्पंदन- प्रा० णिब्बुड) निम्मजन करना, डूबना; रहित; (ण० ३, १७, १४) । (जस०)। णिप्फल-वि० (सं० निष्फल) निरर्थक, णिभंत-वि० (सं० निर्धान्त >प्रा० फल-रहित; (जस० १, १३, ३)। णिभंत) संशय-रहित; (व० २, १०, णिप्फेस-पु० (दे०) आवाज या शब्द ७) । -उ; (प्रा० ० १, १०५) । निकलना; (दे० ना० मा० ४, २६)। णिमा-वि० (सं० निर्भय>प्रा० णिबंध-पु० न० (सं० निवन्ध >प्रा० णिभय) निडर; (प्रा० णिबंध) निबंधन, बंधन, मर्यादा, व्यव- ३७)। "जय मुणिसुव्वय सुव्वयणिबंध,' णिन्मग-न० (दे०) उद्यान, बगीचा; अर्थात् जय हो मुनिसुव्रत की जिन्होंने उत्तम व्रतों की मर्यादा बांधी है; (जस० (दे० ना० मा० ४, ३४) । १, २, १०)। 1/णिन्मच्छ-(सं० निर्+भर्स ) तिर- /णिबंध-सं० नि+बन्ध वन्धने स्कार करना; (म० २, ११, १)। दवाना। पं० १, पं० १, स्था, . .
णभच्छि (४८०) णिमीलियच्छि - णिन्मच्छिम-वि० (सं० निर्भत्सित> इल्ले संचियदविणं;" अर्थात् भोग न करने प्रा० णिभच्छिअ) अपमानित, तिरस्कृत, वाले मनुष्य का संचित द्रव्य; (जस० १, (क० ४, १, ८) । णिभच्छिय; (प० च० १६, ६) । ४, १०, ५; जस० ४, ३, ४)। निभंति-वि० (सं० निर्धान्त) भ्रमहीन; णिमय-वि० (सं० निर्भय>प्रा० (सं० रा०)। णिभय) निडर, निरापद; (सं० रा०; णिभंतु - कृ. निर्धान्त होकर; ण० ६, ४, ५)। (परमा०)। णिब्मरु-वि० (सं० निर्भर > प्रा० /णिम-सं० नि+/अस्, स्थापना णिन्भर) पूर्ण, “करि धरणहुँ णिभरु करना । णिमइ-व० डालना, फेंकना, कियउ चित्तु;" अर्थात् हाथी को रोकने लिटाना, नीचे रखना; (दे० ना० मा० में पूर्ण रूप से अपने चित्त को लगाया; ४, ३८) । (क० ५, १४, ५)। णिमण्ण-वि०. (सं० निमग्न>प्रा० णिब्भासण-वि० (सं० निर्+भाषण) णिमग्ग) डूबा हुआ; (प० च० १०, ३, भाषा-रहित, गूंगा; (व० १०, १७, ८)। १४) । निमन्तणउ-न० (सं० निमन्त्रण>प्रा० णिभिच्च-वि० (सं० निर्भीक >प्रा० णिमंतण) न्यौता, निमन्त्रण; (प० च० णिविभीअ) भय-रहित; (प० च० १७, १६, १३, ६)। १७, ६)। णिमत्तिय-वि० (सं० नैमित्तिक >प्रा० णिभिट्ट-वि० (दे०) आक्रांत; णिमत्तिम, ऐमित्तिअ) कारणिक, निमित्त (भ०)। से होने वाला; (सि० २, १०)। णिमिण्ण-वि० (सं० निभिन्न) विदा- णिमियवि० (सं० न्यस्त) स्थापित, रित, "दंतग्गणिभिण्णहरिणरवरंगेहि;" निहित; (प० च० ३३, १०, ६)। वे (हाथी) अपने दांतों के अग्रभागों से घोड़ों और मनुष्यों के अंगों को फाड़ रहे णिमिस-पु० (सं० निमिष>प्रा० अक्षि- थे; (जस० १, १२, १०; ण० ७, १३, णिमिस) अक्षि-संकोच, पलक, ४) । मीलन; (सं० रा०)। २. क्षण, "णीस- णिभुग्ग-वि० (दे०) भग्न, टूटा-फूटा, रिय वीर णिमिसन्तरेण;" (प० च० (दे० ना० मा० ४, ३२)। १२, ७, ८; क. ६, १५, ५)।-द्ध क्षण; णि मूसण-वि० (सं० निभूषण) भूषण- पुं० (सं० निमेष + अर्ध) आधा विहीन; "तणएँ जणाणि दिट्ठ णिभू- (ण० ६, १६, ८)। णिमिसिधु-पु. सण;" (ण०३, ११, ११) । (सं० निमिष+अर्ध>प्रा० णिमिस+. णि मोइल्ल-वि० (सं० निर्+ भोग+ अद्ध) आधा निमेष; (सं० रा०) । इल्ल प्र०) भोग न करने वाले; "णिभो- .णिमीलियच्छि-स्त्री० (सं० निमीलित । . ..
णिमेण (४८१) रिमम्मिय - वि० (सं० - +अक्षिन्) पलक बंद की हुई आंख; (ण. १३, १)। ३, ५, ११)। णिम्मन्तिय–वि. (सं० निमन्त्रित > णिमेण–न० (दे०) स्थान, जगह; (दे० प्रा० निमंतिय) जिसको न्यौता दिया गयां ना० मा० ४, ३७)। हो; (प० च० १६, १३, ५) । गिमेल-न० (दे०) दांत का मांस; (दे०- णिम्मय-वि० गया हुआ, वीता हुआ, ना० मा० ४, ३०)। गुजरा हुआ, मृत । (दे० ना० मा० ४, • गिमेस-पुं० (सं० निमेप>प्रा० ३४)। णिमेस) पलक मारने भर का समय, णिम्मल-वि० (सं० निर्मल>प्रा० पलक के स्वभावतः उठने और गिरने के णिम्मल) स्वच्छ, शुद्ध, पवित्र, जिसमें बीच का काल; "णयण निमेसो विरह मल न हो; (सं० रा०; ण० १, ३, ११; किलेसो;" अर्थात् नेत्रों के निमेष-मान क० २, ११, ७)। -परु काल का विरह कष्टदायी हो जाता था; निर्मलतर) अधिक विमल; (व० २, १३, (जस० २, १, ७)। णिम्मंस-वि० (सं० निर्मास>प्रा० णिम्मविय-वि० (सं० निर्मित >प्रा० णिम्मंस, मांस-रहित; (जस० १, ६, णिम्माणिअ) रचित, रचा हुआ, बनाया ७)। हुआ; (सं० रा.)। हिम्मंसा-स्त्री० (दे०) दुर्गा देवी का णि मदिउ-वि० (सं० निर्मापित >प्रा० एक भयानक रूप, चामुण्डा; (दे० ना०- णिम्माविय) बनवाया हुआ; (प० च० मा० ४,३५)। ३, ४,१)। णिम्मंसू.-वि• (सं० निःश्मश्रु) तरुण, /णिम्मह-(सं०/गम्) जाना, गमन जवान; (दे० ना० मा० ४, ३२)। करना। -इ ३०; (दे० ना० मा० ४, णिम्म-पु. (सं० नियम) विधि या ४०)। निश्चय के अनुकूल प्रतिबंध; (प्रा० ५० णिम्महण-न० (सं० निर्मयन>प्रा० १, १८६)। णिम्महण) विनाश; (प० च० १, ६, ४; /णिम्म- (सं० निर्+मा> प्रा० जस० १, १४, ८)। णिम्म) बनाना, निर्माण करना । णिम्म- णिम्महिउ-भू० का० (सं० वीउ-भू० का० (सं० निर्मापित) बन मथित) उन्मूलन कर दिया; (व० १, वाया; "थं माण सहासहिं णिम्मवीउ;" १७, ५)। अर्थात् उसका निर्माण सहस्रों स्तंभों णिम्महिय-वि० (सं० निर्+मथित) सहित किया गया; (क० ५, ३, २)। विनाशित; (ण० ४, ४, ७)। णिम्मिउ-भू० का० (सं० निर्मित) णिम्मित्ति-पु. (सं० नैमित्तिकः) ज्यो- निर्मित किया; (क० ७, २, ६)। तिषी; (प० च० १६, ३, ६)। णिम्मिवि-पू० का० क्रि०, (व० १, णिम्मिय-वि० सं० निर्मित) रचित, निर्+ . .
णि मुक्क (४८२) णियड्ढ नियति> प्रा० मुक्त हो गया ६ - क्रि०, देखता हुआ; बनाया हुआ; (जस० ४, १७, ६; व० २, ...-यंति व० (ण० २, १, ६)। २१, ८)। णियइ-स्त्री० (सं० हिम्मुक्क-~-वि० (सं० निर्मुक्त) जो णिअइ) भवितव्यता; (ण. ७, ३, हो; (जस० १,२०, ४) । /णियच्छ-(सं० निर्+ईक्ष) देखना। हिम्मुक्पताण-वि० (सं० निर्मुक्तताण) -इ व० (दे० ना० मा० ४, ४०)। शरण से जो मुक्त न हो; (मस० ३, -च्छिवि पू० का० क्रि०, (सुदं० ४, १३, ३)। ३, १४) । -च्छेवि पू० का० णिम्मोह-वि० (सं० निर्मोह >प्रा० (सुदं० ८, २०, १)। णियंत-कृ० णिम्मोह) मोह-रहित; (जस० ४, २१, (व० २, २.१, ४)। ११) । ----विणु पू० का० कि० देखकर; (म० णियंब-न० (सं० नितम्ब>प्रा० १, ८, १)। णिअंब) कटि का पिछला उभरा हुआ णियच्छिअ-वि० (सं० नि+/यम् का भाग, चूतड़; (क० १,१६, ४; ण० १, धात्वादेश णिअच्छ =नियमन करना) ८, १३)। नियमित; (ण० ५, ७, ५)। गिविणी-वि० स्त्री० (सं० नित- गियच्छिय-वि० (सं० निरीक्षित>प्रा. म्बिनी) सुंदर नितंबवाली; (सि० १, णिअच्छिअ) देखा हुआ, जाँच किया १७)। हुआ; (जस० १, १३, १२) । णियंसण-पु० शिरोवस्त्र; (सं० रा०)। णियड-क्रि०, वि० (स० निकट >प्रा० निवसन; (ण० ३, ११, ११) । णिय-वि० (सं० निज >प्रा. जिअ) णिअड) निकट, समीप; (सि. २, १६) । उ (सं० निकट+क) निकट; (जस० आत्मीय, अपना, स्वकीय; (क. २, १, ३, ३२, ५) ४; १० १, ८, १)। —कुल (सं० निज +कुल) अपना कुल; (व० १, १७, २) । नियहि-स्त्री० (सं० निकृति) दंभ, -णिणय वि० (सं० निज+-निज+क) कपट; (प० च० १४, २६) ! णियडी- घराया नहीं; (ण० ३,१३, १)।-त्तण स्त्री० दंभ; (दे० ना० मा० ४. पु० (सं० निजत्व) स्वामित्व; (ण० ७, ६, ७)। णियड्ढ-(सं० नि+/कृष्) खींचना, णिय-वि० (सं०. नीत>प्रा० णिअ) उखाड़ना । -ए (सुदं० ५, ६, ३) । ले जाया गया; (जस० १, १५, २० णियढिय उ--भूः का० (सं० निकर्पित) क० २, ११, १) उखाड़ लिया;"वारणखंभु णिवढियउ;" /णिय-सं० दृश्; प्रा० णिअ । देखना अर्थात् एक हाथी बाँधने का. खंभा उखाड़ -~-इ व०; (क० ८, १२, ३)। –एइ, लिया; (ण० ४, ६, १४) । . - १ -णियइंडियं (३) णिरक्स २१, णिअत्त) पूरा किया हुआ, .. . - कायदा, .. गियडिय-वि० खींची हुई; ( ३, “णियाण-न० (सं०. निदान>प्रा० णिआण) कारण, हेतु; (जस० ४, २५, णियत्त-वि० (सं० निवृत्त>प्रा० णिअ- २३) । णियाणु; (भ०) । ट्ट, जो पूरा ‘गियार-न० (दे०) शत्रु का घर; (दे०- हो गया है, जिसकी निष्पत्ति हो चुकी हो; ना० मा० ४, २६)। (ण० ६, १६, १२)। णियासण-पु. (सं० नृपासन) नृपासन; णियत्थु-वि० (दे०, प्रा० णिअत्य) (प० ० ६, १४, ४)। पहना हुआ (प० च० ११, ६, १)। णियांसम-न (सं० निज-+आश्रम) णियपुण-पु. (सं० नैपुण्य) निपुणता, अपना आश्रम; जैसे गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ (म० १, २, ३)। आदि; (ण ६, २१, १७) । मियम-पु. (सं०. नियम >प्रा० णिरंकुस-वि० (सं० गिरंकुस–वि० (सं० निरङ्कुश>प्रा. णिअम) चलता हुआ विधान, णिरंकुस) अंकुश-रहित, स्वच्छंदी; विधि के अनुकूल प्रतिबंध; (जस० ३, (भ०) । १५, १२)। वास पु० (णियमो. णिरंगी-स्त्री० (दे०) सिर का पर्दा या वास) नियम + उपवास; (ण० ६, १६, अवगुंठन, पूंघट; (दे० ना० मा०४, १०)। ३१)। रिणयय-वि० (सं० निज+क>प्रा० गिरंजण-वि० (सं० 'निरञ्जन) निर्लेप, णिअअ) आत्मीय, स्वकीय; (प० च० लेप-रहित; (जस० ४, ३०, १७) । १२, १२, ७)। निरंतर-वि० (सं० निरन्तर>प्रा० णियय-वि० (सं० नियत) १. दमन णिरंतर) १. व्यवधान-रहित; (भ०)। किया हुआ, नियंत्रित, २. संयमी, २. सदैव; (प्रा० ५० १, १८६)। ३. स्थायी, ४. निश्चित, ५. विचारणीय गिरंतरिय-वि० (सं० निरन्तर >प्रा० विषय; (सं० रा०)। णिरंतर) लगातार होने वाला, जिसके णियर-० (सं० निकर>प्रा० णिअर) बीच में कोई व्यवधान न हो; (सं०. - समूह; (नस० १,२,११; ण. १, ६, रा०)। ११)। गिरंस-वि० (सं० तिरंश) अखण्ड, णियरुइ.--स्त्री० निजरुचि; (सि०-१, संपूर्ण; (जस० ३, २६,.८)। ३१)। णिरअ-वि० (सं० निरत) किसी कोम रिणयल'-न०. (दे०) नूपुर; (दे०.ना०- - में लगा हुआ, तत्सर; (जस० .३,२८, मा० ४, २८) १२)। णियल'-पु... (सं०. निगड.>प्रा० ./णिरक्ख-(सं० निर्+1/ईक्ष् >प्रा० णिअल) शृंखला, वेड़ी, सांकल; (प० च० णिरिक्त, णिरक्ख) निरीक्षण १, ५, ६)। देखना । णिरक्खियउ-भू० का० निरी- करना, णिरक्खर (४८४) णिरामइ - १६,५, प्रकार . - क्षण किया, देखा; (प० च० ६) । ५) । णिरिक्खयउ-भू० का०, देख णिरलङ्कारिय-वि० (निरलंकृत) जो लिया; (प० च० ८, ८, ६)। अलंकृत न हो; (प. च० मिरवखर-वि० (सं० निरक्षर>प्रा० णिरक्खर) अपढ़, गवार, मूर्ख; (सं०- हिरवज्ज-वि० (सं० निरवद्य) निर्दोप, रा०)। निरपराध; (ण० ८, ६, १३) । णिरम्गल -वि० (सं० निरर्गल) रुकावट हिरवसेस-वि० (सं० निरवसेस>प्रा० से रहित, "आहारिय पुग्गल णिहिल णिर- गिरवसेस) सव, सकल; (प० च० २०, मंगल परिणवहि;" अर्थात इस १०, ४; जस० ३, ७, ६)। समस्त पुद्गलों का हार कर वे निर- णिरस-वि० (सं० नीरस) रसहीन, गंल परिणमन किया करते हैं; (व० १०, शुष्क; (जस० १, १५, १६) । २५, १३)। णिरसिय-वि० (सं० निरस्, निरसित) णिरञ्जण-वि० (सं० निरञ्जन) पाप परित्यक्त; (जस० १, ६, ६)। रहित; (प० च० २७, १३, २) । णिरह-वि० (सं० निर्+अघ) धातिया णिरति-स्त्री० (सं० निरति) दृढ़ आस कर्मों से रहित; (ण० ४, १, १४; व० स्ति, अनुरक्ति; (सि० १, १७) । १, १, १३)। णिरत्य-वि० १. (सं० निरर्थ>प्रा० गिरहरिउ-भू० का० (सं० (सं० निहत) णिरत्थ) निरर्थक, निष्प्रयोजन; "हुउ णिरत्थउ सो हु वाणु (ऋण) चुका दिया, "तिहिं फल हिँ मज्झे जाव;" अर्थात् ज्योंही वह वाण निरर्थक हुमा, (क० ३, एक्कहाँ फलासु, णिरहरियउं रिणु मई १६, ५) । २. (स० निर्+अर्थ) व्यथं; मइवरासु;" अर्थात् उन तीन फलों में से (महा० ६६, २, १; ण० २, १०, ५) । एक फल का ऋण मैंने मतिवर मंत्री का ३. (सं० निर+अस्त्र) जिसके पास हथि- चुका दिया; (क० २, १८, २) । यार न हो, निश्शस्त्र, "मुणिवरतवसाम- णि उल-वि० (सं० निराकुल) जो त्थिं णिरत्था, सयल वि थिय ओणाविय- न हो, अनुद्विग्न, मत्था;" अर्थात् मुनीश्वर के तप के "वसइ विणीया णयरि णिराउल;" (व० प्रभाव से वे सभी निश्शस्त्र होकर सिर २, ११, ५)। झुकाकर खड़े हो गए; (जस० ३, ३५, गिराउह-वि० (सं० निरायुध) निरस्त्र, ११)। निहत्था; (व० १०, ३८, ६) । णिरत्योकिय--वि० (सं० निरर्थीकृत) णिराद-वि० (दे०) नष्ट, विनाश- निष्फलीकृत; (प० च० २०, ४, ७)। प्राप्त; (दे० ना० मा० ४, ३०) । णिरलंकार-वि० (सं० निरलंकार) णिरामइ-वि० (सं० निरामय) नीरोग, अलंकार शून्य, सादा; (जस० ३, ६, (पाहु.)। क्षुब्ध या डांवाडोल . , णिरायां (४८५) णिरुद्ध - राजा सगर का णिरायउ-वि० (सं० नितराम्) अत्यंत; णिरु-वि० (दे०, प्रा० णिरुत्त) १. निरं- (रि० ५, २)। तर; (सुदं० १, ११, १६) । २. निश्चित, णिरारिउ-अव्य० (सं० नितराम्) चोक्कस; (प० च० १४, १०, ६)। १. निरंतर, सदा, लगातार, २. सर्वथा, ३. नितांत; (सं० रा०)। णिरुत्तउ- ३. निश्चय ही; "जहिं रमई णिरारिउ क्रि० वि० १. निश्चय ही, निश्चित रूप चिरु खयरि;" अर्थात् जहाँ दीर्घकाल से से, "ऍउ तं सयरागमणु णिरुत्तउ;" नित्य ही खेचरियां रमण करती है; तुल० निश्चय ही यह उसी म० निरुतें (certainly); (क० १०, ६, आगमन है, (प० च० ५, २) । २. निश्चित, (प० च०४८, २. पूर्ण रूप से पूरी तरह से; (ण० १, ३. नितांत; (व० २, २, १, ८) । तुल० म० नि: । ७)। /णिरुज्झ- (सं० नि+/रुध्) निरिक-वि० (दे०) नम्रीभूत, झुका निरोध करना, रोकना। -इव. हुआ, प्रणाम करता हुआ; (दे० ना०. (कर्मणि) (ण० १, १३, ६) । मा० ४, ३०)। णिरुत्तउ---वि० (सं० निश्चितम्) णिरिक्क-पु.० (दे०) १. चोर; (जस० निश्चितं; (दे० ना० मा० ४, ३०; ण. ३, १८, ६) । २. समूह; (प० च० १४, २, १३, ११)। १, ७)। णिरुत्तर-वि० (सं० निरुत्तर) जिसका णिरिक्खिय–वि० (सं० निरीक्षित); कुछ उत्तर न हो; (जस० ३, १८, ७) । आलोकित । --उ भू० का० आलोकित णिरुद्ध-पु० निरुद्ध नामक मंत्री; (व० किया, वर्णन किया; (ण० २, ६, ३, १२, ६)। १)। णिरुद्ध उ-भू० का० (सं० नि+रुध्) णिरिक्खिग-न० (सं० निरीक्षण) अव. रोक लिया, "दूरहों जि णिरुद्धउ वइरि- लोकन; (व० २, ७, ७)। वलु। णं जम्बूदी उवहि-जलु" --उसने /णिरिग्ध-छिपना (निलीयते)। -इ दूर से ही शत्र बल को उस प्रकार रोक व० (दे० ना० मा० ४, ४०)। लिया, जिस प्रकार जवूद्वीप समुद्रजल णिरिण-वि० (सं० निऋण) ऋण- को रोके हुए है, (प० च० १५, ३, ८) । मुक्त; (प० च० २२, १२, ३) । णिरुली–पु स्त्री० मगर की आकृति /णिरिणज्ज-पीसना। -इ व० (दे०. वाला एक जंतु; (मकराकृति ग्रहिः) (दे०- ना० मा० ४, ४१)। ना० मा० ४, २७)। /णिरूभ-(सं० नि+रूध्) निरोध णिरुवक्कय-वि० (दे०) नहीं किया करना, रोकना । -भेइ व० (सुदं० ११, हुआ; (दे० ना० मा० ४, ४१)। १४, ५) । गिम्भे वि-पू० का० कि०, गिरवद्ध उ-वि० (सं० निरुपद्रव) विना (प० च०२८, ४,४) । किसी उपद्रव के; (व० ३, २, १२) । - - - - णिरुवर्म (४६६) णिवं . - णिरुवम-वि० (सं० "निरुपम) उपमा ४, ४०)। रहित, बेजोड़; (जस० ३, ४१, ३) । /गिल्लस-(सं० उत्/लस्) प्रसन्न णिरुवमु-वि० जिसकी उपमा न हो, होना; - अंक०, व० (दे० ना० मा० अनुपम, (महा० ६६, १६, १०)। ४, ४०) । /णिरुवार-ग्रहण करना ।-इव० 1/णिलुक्क (दे०) सं०/तुड। तोड़ना। (दे० ना० मा० ४, ४१) । "णिल्लुक्कके " अर्थात् (वह अपने) णिरूत्तिय-क्रि० वि० (दे०) निश्चित केशों का लुञ्चन करता है; (ण० ४, ४, रूप से; (सुदं० ७, ८, १५) । १०)। णिरूव-वि० (सं० निरूप) रूप-हीन, णिल्लुण्ण-न० (दे०) छेदन; "तं जणं- (क० २, ३, ८)। भयजणणं सिरणिल्लुणणं णाऊणं;" अर्थात् णिरूविय-वि० (सं० निरूपित) निरू 'उस लोकभयकारी सिर-छेदन की बात पण किया हुआ, जिसकी विस्तृत विवेचना जानकर;' (जस० १, १५, १) । हो चुकी हो; (जस० ३, १५, ११)। पिल्लुत्त--वि० (सं० (निलुप्त) विना- णिरोह-पुं० (सं० निरोध) रुकावट, शित; (जस० १, २२, ८)। रोकना; (ण० ६, २४, १४) । णिल्लुद्ध-वि० (सं० निर्+लुब्ध) णिरोहिअ-वि० (सं० निरुद्ध) विशेप. निर्लोभ, जिसे लोभ न हो; (ण० ४,३, रूप से रुका हुआ; (जस० १, २७, ४)। १२)। णिरोहिय; (ण० ६, ५, ४)। /णिल्लूर--सं० छिद् । विनष्ट करना। णि उ-०. (सं० निलय>प्रा०, विभक्त करना; (दे० ना० णिलय) घर, स्थान, आश्रय; (व० १ ४०)। -रिवि पू० का० क्रि०, विनष्ट ८, ११) । णिलय; (भ०)। कर; "खगगें · वइरिवग्गु णिल्लूरिवि; णिलज्ज-वि० (सं० निर्लज्ज>प्रा० अपने खड्ग से शत्र -समूह को विनष्ट कर; णिल्लज्ज) लज्जा-रहित; तुल० मगही (ण० ६, २४, ३)। निलज्ज; (सरहपा, दहा कोश)। "णिल्लूरिय-वि० (प्रा०.. णिलूरिय) णिलाड-न० (सं० ललाट) छिन्न, काटा हुआ, .."णिल्लरिय 'कपाल; (जस० २, २, १०)। वाणे हि," (प० च० ११, ६,७)। णिलीण-वि० (सं० निलीन) वंद, णिल्लोह.-वि० (सं०. - निर्लोभ>प्रा० छिपा हुआ, घिरा हुआ; "जाहि वि पुणु णिल्लोभ, णिल्लोह) लोभ-रहित; (भ०) । हउँ गभि णिलीणउं;' अर्थात् जिसके जिसके णिव-पु. (सं० नृप>प्रा० णिव) गर्भ में मैं पुन: निलोन था; (जस० जस० ३, राजा; (ण) १, ६, १; जस० १,३, ७,७)। १)। -चिंधह पु० (सं०. नृप-चिह्न) /णिल्लंछ-हरकत करना, नाना, (व० २, ६, ६)। -वयणु पु नृप. धोखा देना। -इ व० (दे० ना० मा० वचन; (व० २, ५, ५)।-सिरि स्त्री० मा० ४, भाल, णिव (४८७) णिवसण - उभरे हुए; (सं० नृपश्री) राजा का गौरव, राजसी णीयले णिवडिय तणु घुणेवि; पुणेवि; अर्थात संपत्ति; (३० २, २, १०)। शरीर को धुनकर घरणी तल पर गिर णिव-वि० (सं० निज>प्रा० णिम) पड़ी; (क० ३, ६, ४) । स्वकीय, अपना; (क० १०, १६, णिवडण-न० (सं० निपतन) अधः पतन; (ण० ३, ६, ३)। रिगवइ-पुं० (सं० नृपति>प्रा० णिवडभर-वि० निपट णिवइ) राजा; (क० ३, २, ६; ण० १, (सं० रा०)। १२, २)। णिवडिय-वि० (सं० निपतित >प्रा० रिणवच्छण-न० (दे०) अवतारण, उता णिवडिअ) नीचे गिरा हुआ; (प० च० रना; (दे० ना० मा० ४, ४०) । २, ७, ८)। णिवजस-पु. (सं० नृप+यशस्>प्रा० णिवत्याण-न० (सं० नृप+आस्थान णिव+जस) राज की मुख्याति या कीत्ति, राजा का सभाभवन या दरवार; (ण० (ण० ७, ६, ५)। ६, १३, ३)। गिवस्ज-पु० (सं० नैवेद्य) वह भोजन गिवन्धुण -न० (सं० निवन्धन >प्रा० की सामग्री जो देवता को चढ़ाई जाय, णिवंधण) शर्त; (प० च० १७, १८, देवबलिः (क० ६, २०, १७)। ३)। Vणिवज्झ--(सं० नि+वं > प्रा० 1‘णिवत-(सं० निर्/पद>प्रा० णिबंध) बंधना। -इ "सोएण णिव- णि-वल) निप्पन्न होना। णिविलिअ- ज्झइ गुरुउ कम्मु;" अर्थात् शोक से बड़ा गया, चुक गया, कर्म बंधता है; (क० ६, ४, २) । "सम्बर णिलिअ किरिस तनु अम्बर णिड-वि० (सं० निविड>प्रा० भेल पुरान," अर्थात् साथी सामग्री णिविड) गहरा, घना, कठिन; (सं०- २.माप्त हो गई, शरीर कृश हो गया, रा०)। दस्त्र भी पुराने हो गए; (की० ३, णिवड-(सं० नि+/पत् >प्रा० १०६)। णिवड) नीचे पड़ना, नीचे गिरना । Vणिस-(सं० नि+/वस्) निवास -डंति व०प्र० पु०, व०; (ण० ६, करना, रहना । -इ ६० (प्रा० ५० १, १६, १७, १८)। णिवडन्ति-क्रि०, व० १११; महा० ६६, ११, १०)। णिवसंत (सं० निपतन्ति) नीचे गिरना, नीचे -कृ(सं० निवसत्); (ण. १, २, पड़ना; (प० च० १५, ४, ४) । णिवड. २) । -सेविगु पू०का० क्रि०, (सं० नि नाय-व० ० (प० च० १, ५, २) । +वस्---एविणु) निवास कर; (व० २, निवडिआ-क्रि०, भू० का०, पड़ गई, २२, ३)। -हि व०, म० पु०, ए० । (प्रा० ० २, १५१) । णिवडिय-भू णिवसण-10 (स० निवसन का० (सं० निपतित) नीचे गिरा; "धर कपड़ा; (जस० १, १६, २) । भू. का०, निवट - वस्त्र, णिवसियय (४८८) णिवित्ति निवारण करने वाला; (जस० ४, १२, १५)। णिवारणिम-वि० (सं० निवारणीय) निवारण करने योग्य; (जस० ४, ६, १४)। णिवारिय-वि० (सं० निवारित>प्रा० णिवारिय) निपिद्ध; (प० च० ४,६, - . णिसियय-वि० (सं० निवसित >प्रा० णिवसिय) जिसने निवास किया हो वह, प्रवसित; (सं० रा०)। णिवसुत-पु० (सं० तृपसुत) राजा का पुत्र; (सि० १, १०)। णिवसुया-स्त्री० (सं० नृपसुता) राजा की पुत्री; (जस० ४, २५, १२) । णिवह-पु० (दे०) समृद्धि, वैभव; (दे० ना० मा० ४, २६)। णिवहु-पु० न० (सं० निवह>प्रा० णिवह) समूह, राशि; (प० च० १२, ११, ३)। णिवा-स्त्री० (सं० निपः) जल का घड़ा, कुंभ, घट; (ण, ७, १०, १)। गवाण-पु० (सं० निर्वाण) विश्राम; (ण० ७, १०, १०)। णिवाय-पु० (दे०) स्वेद, पसीना; (दे० ना० मा० ४, ३४) । (ण० ४, ६, १३)। /णिवार--(सं० नि+वारय >प्रा० णिवार) निवारण करना, निषेध करना। -इ क्रि०, व० (सं० निवारय >प्रा० णिवार, णिवारेइ) मना करना; (प० च० २, १२,६) । णिवारउ-क्रि०, भू० का० निवारण हुआ; (प० च० १७, २, ४)। णिवारि-क्रि० मा०, ए० (प० च० १०, ७, ८); ब० णिवारहों; (प० च० १०, ८,१)। णिवारण-न० (सं० निवारण>प्रा० णिवारण) १. रोकने की क्रिया, २. हटाने या की क्रिया, "उण्हणिवारणु" अर्थात् निपात; णिवाल-० (सं० नृपाल) . राजा; (जस० १,५,१५, प्रा० ५० १, १६८)। णिवास-पु० (सं० निवास>प्रा० णिवास) वास-स्थान; (जस० १, २, ३)। णिविट्ठ-वि. निविष्ट>प्रा० णिवि. ट्ठ) स्थित, बैठा हुआ; (जस० ३, १७, ५) । णिविठ्ठ; (प० च० १, ८, ७) । "तह मज्झि णिविठ्ठउ सो. सहेइ;" अर्थात् उनके बीच बैठा हुआ वह ऐसा शोभता था; (क० ८, १५, ३)। रिणविड-वि० (सं० निविड>प्रा० णिविड, णिविड) घना, गाढ़ (जस १, १७, १६) | --त्यवंत वि० (सं० निविड +अर्थवत) सघन अर्थयुक्त काव्य; (जसं० २, १३, ११)। गिविष्ण-वि० (सं० निविण्ण) पतित; (जस० ४, ११, १०)। णिविति-स्त्री० (सं० निवृत्ति) संतृप्ति; "महों अत्यि णिवित्ति परिग्गहासु;" अर्थात् परिग्रहों से मेरी से मेरी निवृत्ति है, (अर्थात् मैं इनका त्याग कर दूंगा); (क० ४, १, ११)। दूर करने उष्णता का णिविसाय (४८६) णिव्वह - कट सिर कट कर णिविसाय-वि० (सं० निविषाद) ४. व्यवस्थित; (सं० रा०)। विपाद-रहित; (व० १०, ३८, ६) । णिवट्टिय-वि० (सं० निष्पादित, णिविसु-पु. (सं० निमेष=क्षण) पल, बनाया हुआ; (ण० ५, २, ३) । क्षण; (प० च० ७, ११, ६)। णिवसिद्ध णिन्वट्टिय-भू० का०, कट गई; "णिव्व- -पु. (सं० निमेषार्धम्) भाषा निमिष; ट्टिय-भुअ-पाडिय-सिराई" -भुजाएँ (प० च० ४, ३, ४)। णिविसन्तर गई, सिर गिरने लगे; (प० च० ४, न० (सं० निमेपान्तरम्) एक क्षण का ४) । णिव्ववि-पू० का० क्रि०, कट अंतर; (प० च० ६, ८, ६)। कर, "करि-सिरु णिव्वे? वि" हाथी का णि+Vवुत्त-(नि+वृत्) निपटना । (प० च० १०,१०, रिणवुत्तउ-कहा, (प्रा० ५० १, १०७)। ३)। तुल० राज० निमटवो-नमटवो। णिव्वु- /णिवड-(सं० निर्+पद्> प्रा० त्तम्-(सं० निर्वृत्तम्, रेफ का सावर्ण्य, णिव्वड, णिवल) निप्पन्न होना, सिद्ध ऋ का 'उ' में परिवर्तन) "तरुणिकड- होना, प्रकट होना। --इ व० "कज्जन्ते क्सम्मि णिन्वुत्तम;" (प्रा० णवर णिव्वडइ छेउ;" अर्थात् कार्य के ४)। समाप्त होने पर ही इसका रहस्य प्रकट णिवेश्य-वि० (सं० निवेदित>प्रा० होगा; (प० च० १६, ५, ६) । णिवे इय) सम्मानपूर्वक ज्ञापित; (जस० 1/णिव्वड-(दे०) पृथक् ३, १०, १०)। होना; (दे० ना० मा० ४, ४० गिवेएँ- न० (सं० नैवेद्य >प्रा० णेवि- णिवढ-वि० नग्न, नंगा; (दे० ना०. ज्ज, णेवेज्ज) देवता के आगे धरा हुआ मा० ४, २८)। अन्न आदि; (प० च० १४, ६, ४)। णिवण-वि० (सं० नि+वण) घाव या णिवेज्ज; (क० ७, १२, ७)। णिवेय; व्रण-रहित; "णिवाणि मच्छियउ ण (सि० १, १६)। णिबेतिउ--भू० का० (सं० निवेसित) भिणिहिणंति;" अर्थात् जहाँ व्रण (घाव) नहीं होता, मक्खियाँ नहीं भिनभिनाती; प्रतिष्ठित कर दिया; "लियणे णिवेसिउ (जस० ४, २१, ११)। ते णिवेण परिपुज्जिवि अच्चिवि चंद- णिण;' अर्थात् राजा ने जिन भगवान् को णि वमिन-वि० (दे०) खाया हुआ, लयण में प्रतिष्ठित कर दिया और फिर प्रयोग में लाया हुआ; (दे० ना० मा० ४, उनकी पूजा करके व चंदन से अर्चना ३६)। करके; (क० ४,११,६)। /णिवह-(सं० निर्+वह > प्रा० गिवेहिय--वि० (सं० निविष्ट >प्रा० णिव्वह) निभना, निर्वाह करना। -इ णिविट्ठ) १. स्थिन, कार बैठा हुआ, व० (सं० निर्वहति) (प० च० २. सिकर, ३. संकेन्द्रित, नियंत्रित, १०; सुदं० ८, ४, ६)। णिव्वहंत-कृ. या स्पष्ट ) णिबहत (४६०) णिचूद ( , का- या खड़ा (सं० निर्द) (4. ६, १३, विवाहण-वि० (सं० निर्वाहन, निर्वाहन) वाहन-रहित; (प० २०२३, शिवहण-न० (दे०) विवाह; (६०-६, =) ! न० (सं० निर्वहणम्, निर्वाह- ना० मा० ४.६६)। पम्) निर्वाह: "समणे सनिन्छिय-सुंदर- पिबाइल-० का० कि०, पसार कर, वाहण, डिवि झति रण-नर-णिबाण" "बटुजीरमरिवलवहाँ जलिण णिवाइर अपने मन में इच्छित सुंदर वाहन पर मुहु पूरियर; बाद बहुत से जीरे, बढ़कर वह हिपृष्ठ भी मीत्र ही रण के निरत्र और लवंग के जल से मेरा नुन भार का निर्वहन करने हेतु चला; (क. पसार कर भर दिया गया; (जस० ३, ८, २०,१६) । मिकण-वि (मं० निविण्ग) मोगों Vणिवाड-(६०) चुनना; तुल० म० म) निर्विण, निवेद-युक्त, खिन्न; (क० णिवाडणे मियाप्पिा-पू० १०, २५, १)। क्रि०, चुनकर; "णिवाईप्पिणु वन्मु जिवित्त-सोकर ला हुआ जिह, जं भावः तं गम्हहि मित्ता," धर्म हुा; (६० ना० मा० ४, ३२) । की तरह. इनमें से एक बुनकर, हे मित्र, पिरियड-वि० (सं० निर्विकट) निदि- जो अच्छा लगे वह लेलो; (प० २०, कार; (जस० ३,३०,१६)। ४,६) 1 पिबाडेवि-पू० का० कि०; णिविडि-स्त्री० (६० निविकृति (प० २० २१,१३, ४)। निविकार; (सुदं० ६, ७,४) । मित्रारम्-न निर्माण, उंदगास्ट में पिम्बियप्प-वि० (नं. निविकल्प >प्रा. संतल निकल का नाम (s1); (प्रा० ५० णिबिक्रप्प, णिविगप्प)जो विकल्ल, परि- १,१६)। वर्तन या प्रभदों आदि ने रहित हो; जिवाण-० (मं० निर्वाण>प्रा. (जस. १,७, ५)। णिबाण) मुक्ति, मोक्ष, निवृत्ति; (जसः गिर-स्त्री० (सं० निवृति) निर्वाग, ३, १६, ९)1-ईन, ३० निर्वाण- मोम; (प. ६, ५, ११)। स्थान, "वनुहु दखवा णिबाणाई;" Vपिच्छुड-( नि/इ>प्रा. दसमुख निर्वाण-स्थानों को दिखाने लगा; गिबुड्ड, णिचुड) बना, निमज्जन (५० ३० १५. ६, =)-ठान न० करना; (जस० १, २,१६)। (# निर्वाणसान) मुक्ति का स्थान; गिनुत्त-दि० (सं. निन>प्रा० (३० १,६,१०)। पियन) निपल, रचित, निमित्त; (प्रा० 1/गिवाह-(मं० निर वह >प्रा. पै०१,४)। गिबह) निर्वाह करना, निनाना; (जस० निधुंड>प्रा० ४, २५, २६) 1-३ व०; (सुदं० ११, पिड) १. त्यस्त (नमः २.६, ११)। २. जिसने निर्वाह किया हो व निवड-वि० -- णिवे (४६१) णिसियर निवेद>प्रा० श्वास; - . (प० च० २२, १२, ७)। वि० (दे०) १२; क० ६, २१, १०)। स्तब्ध; (दे० ना० मा० ४, ३३) । न. णिसायरि-स्त्री० (सं० निशाचरी) (दे०) घर का पश्चिम आंगन; (दे०- राक्षसी, कुलटा; (जस० ३, ४१, ना० मा० ४, २६)। ६)। णिवेअ-पुं० (सं० णिप्तास-पु. (सं० निश्वास) नाक या णिवेअ) विरक्ति; (म० १, १७, ८) । मुह से बाहर निकलने वाला णिन्नय-वि० (सं० निर्वेग) वेग-रहित; (प्रा० पैं० २, १३४) । (ण० ६, २४, १)। णिसि-स्त्री० (सं० निशि>प्रा० णिसंक-वि० (सं० निःशंक) शंका- णिसि) (प० च० १३॥ १२॥ ६; भ०)। रहित; (प्रा० ५० १, ४४) । --भोयण न० (सं० निशि+भोजन> णिसंग-वि० (सं० निःसंग) संगति प्रा० णिसि+भोअण) रात्रि में किया रहित; (जस० ४, २५, १५) । जाने वाला भोजन, (क० ५, १५, २) । णिस-स्त्री० (सं० निशा>प्रा० णिसा) -वा पुं० (निशि+व्रत); रात्रि का रात्रि; (जस०)। व्रत; (क० १०, १२, २)। णिसम्गड-वि० (सं० नैसर्गिक >प्रा० णिसिचार-पु. (सं० निशिचार) रात्रि णिस ग्गिय) स्वाभाविक; (व० ४, २, २) में किए जाने वाला आचरण, "णिसि- निसढ-पु० (सं० निपध) पर्वत-विशेष चारु जेण उवलक्खियउ;' (जस० २, ६, नाम; (व० १०, १५, १०)। १४)। णिसप्ण-वि० (सं० निपण्ण>प्रा० णिसिद्ध-वि० (सं० निषिद्ध>प्रा० णिसण्ण) वैठे विराजमान; (व० ३, णिसिद्ध) जिसका निषेध किया गया हो, १, १२; जस० १, ३, ६)। (जस० ३, १७, १४)। -अत्यु पु. णिसत्त-वि० (दे०) संतुष्ट; (दे० ना०- (सं० निषिद्ध+अर्थ>प्रा० मा० ४,३०)। अत्य, अछ) निषिद्ध अर्थ; (प० च० णिता-स्त्री० (सं० निशा>प्रा० णिसा) १६, १०, २)। रात्रि; (जस० २, १३, १५, णिसि-पहरणु-न० (सं० निशा-प्रहरण) २, १७७)। निशास्त्र; (रि० १०, १६) । णिसाण-न० (फ़ा० निशानः) चिह न, णिसिपालआ-स्त्री० निशिपाल छंद; लक्षण जिससे कोई चीज पहचानी जाए; (प्रा० ५० २, १६०)। (सि० २, १२)। णिसाय-वि० (दे०) णिसियर-पु० (सं० निशाचर>प्रा० सोया हुआ; (दे० ना० मा० ४, ३५) । णिसा, गिसि+अर) राक्षस; (प० च० णिसायर--पुं० (सं० निशाचर>प्रा० ८, १०, ४) । २. भूतप्रेतपिशाच आदि; णिसाअर) राक्षस; (सं० रा०; रि० १, (जस० १, ६, ११; क० २, १३, ६)। . णिसिद्ध+ प्रा० ५० . प्रगाढ़ निद्रित, - मिसिया (४६२) णिस्साहार --- - - -- . जिंसियरु-पु. (सं० निशिकर), चंद्रमा; रा०)। ~णंत कृ० (०. ५, ११, (५०३, ३, ५)। १५)।मि व०, उ० पु०, ए०, सुनना; णिसीसु-पु. (सं० निशीश) चंद्रमा; "जीवन्तिहे णिसुणमि वत्त जई'' ---यदि (व० २, ३, ५)। उसके जीने की खबर सुगा; (प० च० णिसीह-पु० (सं० नृ+ सिंह) श्रेष्ठ १६, १८, २)। णिसुणिउ-क्रि० मनुष्य; (ण० ३, ३, १३) । सुनाई पड़ा (सुअंध० -१, ६, ३) । णिसु. 1/णि भ-(सं० नि+शुम्भ) मार णिवि-पू० का० क्रि०; (ण १,8. डालना; (जस० २, १५, ७)। -३ १)। णिसुणिप्पिणु-पू० का० कि०; सक० (सुदं० ११, ४, ५) । -इवि पू० (प० च० ६, ५, ३)। णिसुणेवि-पूo. का० क्रि०, (ण० ५, २, १४) । का० कि०; (म० १, ८, १) । णिसुय - णिसुभ-पु० (सं० निशुभ) दैत्य का भू० का० (सं० नि+श्र त) सुना; ण. नाम; (प्रा० पैं० २, ६६) । वि० (सं० १, १२, २)। निशुम्भनः) विनष्ट करने वाले; "भयम णिसेज्ना स्त्री० (सं० निषद्या>प्रा० यणिसुभाइँ;" भय और मद को विनष्ट णिसज्जा) आसन-विशेप, पद्मासन; (णo करने वाले; (जस० १, १७, ६)। ६, २५, १)। णिसुभण-वि० (सं० निशुम्भन >प्रा० णिसेणि-स्त्री० (सं० निःश्रेणी>प्रा० णिसुभण) नाश करने वाला, मार डालने णिस्सेणि, णिसेणि) नसेनी, सीढ़ी; तुल० वाला; (सुदं० ३, ३, १०)। णिसुम्भण गु० नोसरणी; (प० च० २२, ४, -वि. विनाश करने वाला; (प० च० ३)। ५, ३, ५)। णिस्मरि-वि० गिरा णिसुभिय-वि० (सं० निमुम्भित) हुआ, नीचे पड़ा हुआ (दे० ना० मा० ४, १. निपातित, व्यापादित; (सुदं० ११, ४०)। २२, २) । २. विध्वस्त; (ण. ७, ८, मिस्संक-वि० (सं० नि.शंक>प्रा० ६)। णिस्संक) शंका-रहित; (प्रा० ५० १, णिसुअ-वि० (सं० निश्रुत) श्रुत; (क० ४६)। १०, २६, ४)। णिस्संक-वि० (दे०) निर्भर; (दे० ना० णिसुढिय-वि० (सं० निशुम्भित >प्रा० णिसुटिअ) भग्न, नष्ट. "कक्खड झड- मा० ४, ३२)। णिसुढिय-फड-कडप्पु,” कर्कश आघात से णिस्संकिय-वि० (सं० नि: शकित> नष्ट हो गया फन-समूह जिसका; (प.. प्रा० णिस्संकिअ) शंका-रहित; (व० ७, च० १३, ८, ४)। ४, २) । /गिसुण- (सं० नि + / श्रु, णिस्ताहार-वि० (सं० निस्साधार) शृणोति >प्रा० णिसुणइ) सुनना; (सं०. निराधार, वेसहारा; (सं० रा०) । हुआ, खिसका णिस्सेस (४६३) णिहाल (व० २, घर्पण, णिस्सेस-वि० (सं० निःशेष) समस्त, चिरकियहिं णिहम्मइ वइरएहि;" अर्थात् सकल; (व० १, १४, ३)। नरक लोक में उसे उसके पूर्व के वैरी णिहंतु-वि० (सं० निहन्त) निहंता, नारकी मारते हैं; (क० ६, ८, २) । विनाशक; "सो हवेइ वंचणाविसो णिहय-वि० (सं० निहत >प्रा० णिहंतु;" अर्थात् वह वचना रूपी विष णिहय) मारा हुआ; (प० च० १६, ४, का निहंता हो जाता है; (क० ६, १३, ८)। ४)। मियतम-वि० (सं० निहततम) अंध- णिह-वि० (सं० निभ'>प्रा० णिह) कार का नाश करने वाला; समान, तुल्या (प० च० ११,४, ११, ६) । ४)। /णिहस-(सं० नि+घृष्) घिसना णिहइ-क्रि०, व० निहारती है, देखती णिहसिज्जइ-कर्मवा० (प० च० २१, २, हैं; (सं० रा०)। ५)। णिहठ्ठ-वि० (सं० निघृष्ट) घिसा लिहस-पु० (दे०) वल्मीक, सर्प आदि हुआ; (प० च० ३७, ८, ३) । का बिल; (दे० ना० मा० ४, २५) । पि.हण-वि० (सं० निर्धन) दरिद्र; (क० णिहसण-न० (सं० निघर्षण) ६, ५, १०)। पु० (सं० निधन) मरण; रगड़; (ण० ७, ७, १०) । (क० २, १४, ८) । न० (दे०) कूल, णिहाप्र-पु० (सं० निघात) अभिघात, तीर, किनारा; (दे० ना० मा० ४, प्रहार; (क० ४, १५, ३) । २७) । णिहाउ-पु० (दे०) समूह; (प० च० णिहणण-न० (सं० निहनन) घातक २)। "महु णिहणणसीलउ मिच्च मिच्च जिह;' णिहाए-पु० (दे०) समूह, "कुसुमिय- खिली लया-वेल्लि-पल्लव-बिहाएहि;" अर्थात् जैसे मानो वे मेरे घातक भृत्य हों; (जस० २, २४, ६) ! २. विध्वंस; (व० हुई लताओं, पल्लवों ओर बेलों के समूह १, ७, ७) । से युक्त; (प० च० ३, १, २) । णिहाण-न० (सं० णिहणिय-वि० (सं० निहनित) घातक; निधान> प्रा० (व०-२, ६, १८)। णिहाण) खजाना, निधि; (क० णिहणु-न० (सं० निधन>प्रा० णिहण) ४; व० ८, ४, ८)। णिहारा--न० विनाश; वहुपहरहिं णिहणु जि संभवइ,' निधान; (व० ३, २, १)। अर्थात् अनेक पहरों के (दिन के ४ पहरों) /णिहाल-(स० निभालय > प्रा० पश्चात् उसका भी अस्त होना निश्चित णिभाल) अवलोकन करना, निहारना। है; (जस० २, २, २)।, - व० (ण० ३, ८, १०)। -हि /णिहम्म -(सं० नि+हन्) मारना। व०, म० पु०, ए० तुल० म० निहाळणे -इ सक०, "णरयालई णाणाणारएहि, (ध्यानपूर्वक देखना);(क० ५, ६, १०) । १३, ८, .
णिहाल (४६४) णिहेलण ० च. ४, ५, - (सं० पैं० १, णिहालियंउ-भू० का० (सं० णिहियउy० का० (सं० निहित) लित) देख लिया, (जस० २, २१, ७, वैठाया; "उवयारु महंतउ जाणएण, वणि महा० ६६, १२, ६)। णिहाले -क्रि०, णिहियउ मंतिपयम्मि तेण;" अर्थात् उसके आ०; देखें, "माउ णिहाले मुहु तं, आओ महान् उपकार को जानकर राजा ने उसका मुख देखें (प० १२, ५, वणिक् को मंत्री पद पर बैठाया; (क० १४)। २, १६, ८)। णिहालअ-वि० (सं० निभालक) णिहिल-वि० (सं० निखिल>प्रा० (१) दृप्टिवाला, (२) देखनेवाला, णिहिल) सव, सकल; (क० १०, २५, (सुदं० २, ४, ३) । णिहाली-वि० ६; व० ८, ३, २)। स्त्री० देखने वाली; (सुदं० णिहीण-वि० (सं० निहीन) नितांत १६)। हीन; तुच्छ; (क० ५, १६, ६, जस० २, णिहालण-न० (सं० निभालन>प्रा० ८, १२)। णिहालण) अवलोकन; (सुदं० १, १०, णिहुअ-वि० निभृत >प्रा० ८)। णिहुअ) चुपचाप; (प्रा० णिहालिय-वि० (सं० निभालित >प्रा० १०८)। णिभालिय, णिहालिअ) दृष्ट, निरीक्षित; णिहुण-न० (दे०) व्यापार, धंधा; (दे० (प० च० ३, ६, ५)। ना० मा० ४, २६) । गिहि-स्त्री० (सं० निधि >प्रा० णिहि) णिहुय-वि० (सं० निभृत >प्रा० खजाना; (सं० रा०; व० २, १३, १; णिहुअ) १. गुप्त, २. रखा या धरा हुआ, जस० १, ४, १५)। २. भरपूर, ४. एकांत भाव से, ५. संभ्रम त्ति-वि० (सं० निहित>प्रा० रहित; (सं० रा०) । ६. शांत; (जस० णि हिअ) स्थापित, रखा हुआ; (प्रा० ५० १, २०, ६)। २, १६४)। णिया-स्त्री० (दे०) संभोग के लिए णिहित्त-भू० का० स्थापित कर अभिलपित स्त्री; "णिहुया कामिता;" दिया; "कण्णइ गुण संदोहे हियवउं सयरि (दे० ना० मा० ४, २६) । णिहित्त" कन्या ने गुणों के समूह राजा /णिहुव-(दे०) संभोग की अभिलापा सगर में अपना हृदय स्थापित कर दिया; करना । -इ सक० (दे० ना० मा० ४, (महा० ६६, १७, ११)। ४०)। णिहिप्प--सक० [सं० नि+धा+णिच् णिहूयं-न० (सं० निधुवन >प्रा० णिहु- (कर्मणि)] स्थापना करना । (जस० ३, वण) महान् आनन्द या खुशी, सुरत, ३०, १०; ण० ३, ३,५)। संभोग (दे० ना० मा० ४, २६) । णिहिय-वि० (सं० निहित >प्रा० गिहेलण-न० (दे०) गृह; (जस० ३, णिहिम) स्थापित; (ण० १, १, ११) । ३४, १; दे० ना० मा० ४,५१)।
णिहोडण (४६५) णीलाउलि उनके - ६)। णिहोडण-न० (सं० निपातन) नाश; कमल; (व० १, १, १३) । "संसारणिहोडणु खणे करहिं जं चितिउ णीरस-वि० (सं० नीरस>प्रा० णीरस) तं पावहिं सयलु;" अर्थात (वे) एक क्षण रस-रहित; (जस० १, ११, २)। में संसार का नाश करते थे। णीरु-न० (सं० नीर>प्रा० णीर) जल; दर्शकगण जो चितन करते वह सब वस्तु (सा० ८१; सि० १, ३)। पा जाते थे; (क० ५, ५, १०)। णीरुअ-वि० (सं० नीरुज) व्याधि- Vणी--(सं०। नी> प्रा० णी) ले रहित; (ण० ५, १, ३)। जाना । णिज्जइ-कर्मवा० (सुदं० ४, १०, णीरोयत्तण-पुं० (सं० नीरोगत्व) स्व. ८; जस० २, २६, १२)। णीय-भू०. स्थ होना; (जस० ४, १०, ६) । का० नीत, "णं पावपडलु पावपडलु णिण्णासु णिण्णासु णीलंजण-स्त्री० नीलांजना, ज्वलनगटी •णीउ;" मानो पाप का पटल नाश को की रानी; (व० ४, ४, १४) । प्राप्त किया गया हो; (क० ४,८, णील- -पु० (सं० नील) नीला रंग; णीयद्-व०; (व० १, १३, ६)। (प० च० १३, ३, ३)। ऐवावि-पू० का० कि०, (क० ८, १३, णील-पु० छंद का नाम; (प्रा० ५० २) । णेवावियई-ले जाए गए; (रि० ६, २, १७०)। णोल-पुनील, वानरराजकुमार, वानर णीइ-स्त्री० (सं० नीति >प्रा० णीइ) सैन्य प्रमुख; (प० च० ६८, २) । पुरुप- आचारपद्धति, लोकमर्यादा के अनुसार नाम, (क० ५, २, २)। व्यवहार; (क० २, १४, ३)। णीलकंठी-स्त्री० (दे०) वृक्ष-विशेष, णोणिय--बि० (सं० निर्णीत) निर्णय वाण-वृक्ष; (दे० ना० मा० ४, ४२) । किया हुआ; (जस० १, २१, १४)। णीप-पु० (सं० नीप) कदंब का फूल; णीलकंतु-पु० नीलकण्ठ नामक योद्धा; (प्रा० ५० २, ८६)। (व० ४, ५, १४)। णीय-स्त्री० (सं• नीति >प्रा० णीइ) गोलमणि-पु० नीलकांतमणि, नीलम; आचारपद्धति; (व० १०, ३, ८) । (व० ३, २, ५)। णीयाण-पु० (सं० निदान) कारण; णोलरहु-पु० नीलरथ (विद्याधर); (क० ६, ४, ५)। (व० ५, २०, ४)। णीर-न० (सं० नीर>प्रा० णीर) जल, णीलसेल-पु. (सं० नीलशैल) नील पानी; (जस० ३, २, १२)। -निके पर्वत, पर्वत-विशेष नाम; (व० १०, १५, तना न० जलग्रह; (को० २, ८३) । णीरय-वि० (सं० निर्मल) विमल, स्व णोलाउलि-स्त्री० (सं० नील+आवली च्छ; (महा० ६६, १२, ७)। २. कर्म --कतार) नीलमणि की कतार; (प०- रजरहित; (व० १, १, १३)। ३. पु० च० ६, ७, ६) ।
णीलालय (४६६) णीसस ना. मा. निःशब्द >प्रा० - णीलालय-० (सं० नील+अलक) प्रा० णीसेणि) सीढ़ी; (दे० काले केश; (ण० ५, १, ६) । ४,४३)। णीलि-पु० नील, (पर्वत); (५० १०, णीसणिय-वि० (सं० निः+स्वनित) १४, १०) । शब्द-युक्त; (ण० ६, १, ८)। णोलु-पु० नीस, (छंदशास्त्र में) स्कंधक णीसवूय-वि० (सं० का भेद, (प्रा० ५० १,७५)। णीसह) शब्द-रहित; (प० च० १४, १, णोलुप्पल-न० (सं० नील+उत्पल) ६)। नील रंग का कमल; (ण० २, ५, १३; णीसद-वि० (सं० निःशब्द) व० ३, ३, ८) । णीलोप्पल; (सि० १, रहित; (भ०)। ३)। णीसन्दण-पु० (सं० निःस्यन्दन) विना णीव-पु० (सं० नीप>प्रा० णीव) रथ के; (प० च० २, १३, ७)। कदंव का फूल; (प्रा० ५० १, ६७) । णीसन्धि-स्त्री० (सं० निःसन्धि) Vणीव-(सं० निर्+वा) शांत होना वियोग; (प० च० १८, १२, ६)। (become tranquil) | -इ व० शीत- 'णीसर- (सं० निः+सृ>प्रा० लता को प्राप्त होना; तुल० म० निवणे; णीसर) वाहर निकलना । --इव० (क० (प० च० ५५, ८, ६; ण० १, १४, १)। ४, १३, २)। णिसरिय-भू० का० गोवि-स्त्री० (सं० नीवी>प्रा० णीवी) निकले; (प० २० १२, ७, ८) । -रिवि नारा, इजारवंद; (क० १० ७, पू० का० क्रि०; (क० ६, ६, ८)। ५)। णीसावि--पू० का० कि०; (प० च० णीसंफ-वि० (सं० निःशंक>प्रा० ५, १६, ७)। णिस्संक, णीसंक) शंका-रहित; (प्रा०- णीसरिप्र-वि० (सं० निः+सृत) निर्गत; पं० १, ४७)। (ण० १, १०, १२)। णीसंपाय--वि० (दे०) जहाँ णीसरिअ-वि० (सं० निःसृत) निर्गत; परिश्रांत हुआ हो वह; (दे० ना० मा० (जस० २, २, ४)। ४, ४२)। Vणीसस-(सं० निर्+श्वस्) ३वास णीसङ्ग-वि० (सं० नि+शृङ्ग) विना लेना। -इ मक०, व० (सं० निर्+ सींग के या विना रज्जुबंधन के; (संगा श्वासय् >प्रा० णिस्सास, णिसास, =वल्गा दे० ना० मा० ८, २)। (प०- णीसास); (महा० ६८, २, ११) । णीस- च० २४, १३, ४)। संत-कृ० (सं० निः+श्वसत्); (क० णीसग-पु० (सं० निःस्वन>प्रा० ३, ५, ३) । णीससंती-कृ० [निः+श्व- णीसण) आवाज, शब्द, ध्वनि; (प० च. सत् (स्त्रियां)] (ण० २, ६). १७, १६, ७)। णीसासन्त-कृ०; (प० च० ६,७, णीसणि प्रा--स्त्री० (सं० निःश्रेणी> ३) । जनपद .
पीसार (४६७) वर णीसार'-वि० (सं० निःसार) सार- (दे० ना० मा० ४, २५)। रहित, निकृष्ट; (जस० २, ३३, ६) । उर-न० नूपुर; (छंदशास्त्र में) प्रथम णोसार'-० (दे०) मण्डप (दे० ना०. द्विकल गण (5) का नाम; (प्रा० १० मा० ४, ४१)। १, २१)। Vणीसार-(सं० निर्+सारय>प्रा० रोउर'-न० (सं नुपूर >प्रा० णेउर) णीसार) बाहर निकालना। -इव स्त्री के पांव का एक आभूपण; (प० च० (भ०) । णीसारिउ-कि.० (सं० नि.सा- १,१३,०१,१७,५; जस०१, रित > प्रा० णीसारिय) निष्कासित, ४, ४) । णेउरु; (व० २, १८,६) । निकाल भगाया; (क० १०, २२, ४) । णेत्त -पु० न० (सं० नेत्र>प्रा० णेत) णीसारिउ; (५०. च० १०, ६, १)। १. वस्त्र-भेद, उत्तम रेशमी कपड़ा; (प०. णीसारिय; (० ८, १०,६) । च० ४५, ४, १०; ण. ६, २१, ३३)। जोसावाण-वि० (सं० निःसामान्य) २. आँख; (क० ७, ३, १; प्रा० .० २, अनन्य; (प० च० ४, ५, ४)। असामा- ६७)। न्य, "जिहं तु तिह अण्ण वि णीसावण्ण रणेत्य-पु० न० (सं० नेपथ्य) आभरण, वि० गरुयई गज्जिय वहुय पर," (प० भूषण; "कणयकत्तरीगाढणेत्यओ रविसु- च० ३१, ६, ६)। दित्तिदित्तीपहत्यओ:" अर्थात् सुवर्णमय णीसास-पुं० (सं० निःश्वास>प्रा० कटिसूत्र से गाढी कमर वाघे सूर्य सदृश गिस्सास, णिसास, णीसास) नाक से सांस कांति से जगमगाता हुमा; (ग. ६, १८, वाहर निकालना; (० १, १०, १२)। १३) । रोमि-पुं० (सं० • नेमि >प्रा० णेमि) णीसाहण-वि० (सं० निःसाधन) बाइसवें तीर्घकर का नाम; नेमिनाथ; १. संन्य रहित, २. प्रसाधन-रहित, अन (व० १, १, ३; जस० १, २, ११)। लंकृत; (प० च० २३, ६, ८)। २. रथ के चक्र की नेमि; (जस० १, २, णोतुण्णु-वि० (सं० निःशून्य) सूना; ११)। (प० २०१६, १२, २) । रोय-अव्य० (सं० नैव >प्रा० व) गोसेस-वि. (सं० निःशेष>प्रा० नहीं हो; (सं० रा०) । २. वि० अनेक; णिस्सेस, णीसस) सब, सकल; (जस० २, (विला०) । ६, १७; १० १, १,६)। ऐयार-वि० (सं० नेतृ) नेता, नायक; गोहरियं-न० (दे०) शब्द, आवाज, (जस० २, १६, १३)। ध्वनि, (३० ना० मा० ४, ४२) । उतारना, पाहार-पु. । (सं० रऐवच्छण-न० (दे०) नीचे नीहार>प्रा० णीहार) हिम, तुपार; (० १, १६,१०)। अवतारण; (दे० ना० मा० ४, ४०)। गुवाण-वि० (दे०) सोया हुआ, सुप्त; रणेवर-पु० (सं० नूपुर>प्रा०, गूपुर, - सप्पु (४६८) ण्हा (णवक्खी पाइअ०) निधान; (व० ०० कराना। . - उर) पाजेव, पैरों का आभूपण; (सं० णोखी-वि० (दे०) अपूर्व, अनोखा; रा०)। तुल० गु० अनोखा ऐसप्पु-पु० (सं० नैसर्प>प्रा. णेस प० च० ३१, १२, ३)। प्प) निधि-विशेष, चक्रवर्ती राजा का एक णोमी-पु. रस्सी, डोरी, रज्जु; (दे०. देवाधिष्ठित ८, ५, ना० मा० ४, ३१)। णोलइया-स्त्री० चोंच; (दे० ना० मा० रणेह-० (सं० स्नेह > प्रा० णेह) ४, ३६)। णोलग्ग-वि० (सं० न+लग्न) नहीं राग, अनुराग, प्रेम; (प० च० ९, १४, लगा हुआ; "णोलग्गकंठाउ," (जस० ३, ६; क० १, ३, ७) । अव्य० (सं० न०+ २७, ८)। इह) यहाँ नहीं; (प्रा० १, ५६)। -ज्जिअ वि० (सं० स्नेहाजित) स्नेह से गोलच्छा-स्त्री० (दे०) चौच; (दे०- ना० मा० ४, ३६)। अजित; (ण० २, १४, ६)। पहल-वि० [सं०, स्नेह+ल (मत्वर्थे)] हव-(सं० स्नपय्) स्नान हाइ-व० (सं० स्नपय>प्रा० हव, स्नेह-युक्त; (क० ६, ११, ६)। ण्हवेइ) नहलाना, स्नान कराना; (५०. गेहलु-पु. (सं० स्नेहलः) स्कंधक का च० १, ५, ५)। पहाऍवि-पू० का.. भेद; (प्रा० ५० १, ७५) । २. प्रेम, क्रि०, (५० च० ५, ४, ५) । हाहो- स्नेह; (प्रा० ५० १, १८०)। क्रि०, आ०; (प० च० १४, ५, ४) । ऐहो-पु० (सं० स्नेह >प्रा० णेह) ण्हवरण-न० (सं० स्नपन >प्रा० ण्हवण) राग, अनुराग, प्रेम; (सुदं० ८, ४) । स्नान, (क० १०, २६, २) । २. अभि- रोहवंत-वि० [सं० स्नेह (तैल)+वत्] षेक; (व० ६, १४, ७)। चिकना; "णेहवंता खाणाइँ सा ण्हवणवीढ-पु० न० (सं० स्नान+पीठ चारिया," अर्थात् चिकना घास-दाना >प्रा० पहाण+पीढ) स्नान करने का चराया; (क० ८, २, २) । आसन (चौकी) या स्थान; स्थान; (प० २० १, णोकसाय-पु० (सं० नो+कषाय) १६, २) । जैनदर्शन का पारिभाषिक शब्द; क्रोध, ण्हवल्ली--स्त्री० (दे०) विजली, विद्युत; लोभादि विकार जैसे कषाय दोष, सांसा. (दे० ना० मा० ४, २२) । रिक पदार्थों में आसक्ति आदि; जैन विन-वि० (सं० स्नपित >प्रा० ण्ह- दर्शन के अनुसार ६ कषाय निम्नलिखित विअ) जिसको स्नान कराया गया हो हैं-हास्य, रति, अरति, शोक, भय, वह; (जस० २, २१, ४) । जुगुप्सा एवं स्त्री० पु० नपुसकवेद; (ण० /हा-(सं०स्ना) स्नान करना, नहाना; १, १२, ५)। (जस० १, २६, २२)। हिंत-कृ. णोक्खा-वि० (दे०) अच्छा, अनोखा, (सं० स्ना-+-शत); (जस० ३, अपूर्व; (प्रा० .० २, १०५) । १)। -इवि पू० का० क्रि०, (क० ४, 1 .
पहाव (४६६) तंतं ११, ७)।-एवि पू० का० क्रि० २, ७६) । ६. पु० वाक्य-उपन्यास, वाक्य (जंबू० ६, ८, १५)। का उपक्रम; (पड्)। पहाअ--वि० (सं० स्नात>प्रा० ण्हाय) तंजिया-पु० तंजिका, देश-विशेष-नाम; जिसने स्नान किया हो वह; (जस० २, चोल राजाओं की राजधानी, मद्रास से ३, १)। २१८ मील दक्षिण-पश्चिम में प्राचीन व्हाण-न० (सं० स्नान >प्रा० ण्हाण) तंजौर स्थित है; (जंबू० ६, १६, नहाना; (क० ५, ३, ४) । २)। पहाणड्ड-न० (सं. स्नान>प्रा० तंट-न० (दे०) पृष्ठ, पीठ; (दे० ना०. णहाण) स्नान, नहाना; (प० च० १३, मा० ५, १)। ६, ७) । तंड-न० (दे०) १. लगाम में लगी हुई /प्हाव- (सं० स्नपय्) नहलाना, लार; २. वि० मस्तक-रहित; ३. स्वर स्नान करना। ---इ सक० (जंबू० ५, से अधिक; "तंडं कविकालालकं शिरोवि. १०, १५)। हीनं स्वराधिकं चेति त्रयर्थम्;" (दे० ना० व्हिालण-न० (सं० निभालन) अवलो मा० ५, १६)। कन, प्रेक्षण; (क० ६, ८, ६; ण० ३, तंडउ-न० (सं० ताण्डव) तांडव नृत्य; २, १५)। (क० ४, ११, ६)। तंडव-पुं० (सं० तांडव) १. नाच, नृत्य; २. तांडव, विशेप कर शिव का त उन्माद नृत्य या प्रचण्ड नाच; (सं०- रा०)। त-पु० (सं० प्रा० त) व्यंजन वर्ण- 1/तंडव- (प्रा० तड्डव) विस्तार विशेष । दंत-स्थानीय, अघोष, अल्पप्राण, करना। -हु; (भ०)। निरनुनासिक । छंदशास्त्र में यह तगण का तंडविय-वि० (प्रा० तड्डविञ= संक्षिप्त रूप माना जाता है । सर्व० (सं० विस्तृत) विस्तीर्ण; (जंवू० ५,७, तत्) वह; (भ०) । अव्य० (संततः) तव; ६)। (प्रा० ५० १, १०५)। तंणयर-पु० (सं० तद्+नगर) वह तं-सर्व० (सं० तम्) १. उसको, वह; नगर; (जस०)। (सं० रा०) । २, उस; (की० २, ७७)। तं तं-सर्व० (सं० तत् तत्) वह; ३. उसे, 'अक्खमि धम्मक्खरु तं सुणेहु,' (जंबू० ३, १४,१०) । (विला०) । लो०- खज्जिइ जं परिणइ तंतं-न० (सं० तन्त्र >प्रा० तंत) पावई' -वह खाओ जो हजम हो जाए; झाड़ने-फूकने का मंत्र या शास्त्र; (सुदं०) । ४. अव्य० वैसे; (की० ४, ० २, १२५) । तंत; (जस० ५७) । ५. अव्य० (सं०ततः)वहाँ; (की. १५; क० २, ६, ४)। (प्रा. - तंतवाल (५००) तंव च० मा० तंतवाल-पुं० (सं० तन्त्रपाल) राष्ट्र- वाळ; (संवि० १२, ६, २६) । पाल, सेना में विशिष्ट पद; (जंबू० ५, तंबचूल-पु० (सं० ताम्रचूट) सूर्गा, ६, २)। कुक्कुट; (जस० ३, १५, १३)। तंति-स्त्री० (सं० तन्नी) वाद्य-विशेप; तंवरत्ती-स्त्री० (द०) गेहूं में कुकुम (जंबू० ४, १५, ३)। (केसर, रोली) की छाया; (दे० ना०- तंतिवन्जु-न० (सं० तन्त्रीवाद्य) वीणा, मा० ५, ५)। वाद्य-विशेष; (रि० २, ७)। तंवा-स्त्री० (दे०) गौ, बेनु; (दे० ना०. तंतु-अव्य० तब तो। वि० तप्त; (सं० मा० ५, १; जंबू०४, १८, १३) । रा०)। तंविर-वि० (दे०) ताम्र वर्ण वाला; तंतु-पुं० (सं० तन्तु>प्रा० तंतु) सूत, (म०) । धागा, तागा; (व० १,१४,८; प० च० तंदिरा-स्त्री० देखो तंवरत्ती (दे० ना०. १, १३) । -अ, --ग (सं० तन्तु+क) मा० ५, ५)। जलजंतु-विशेष; (प० १४, तंव्ही-स्त्री० (दे०) वृक्ष-विशेप; शेफा- १७)। लिका; (दे० ना० मा० ५, ४) । तंतुक्खोडी-स्त्री० (दे०) तंतुवाय का तंबोल-न० (सं० ताम्बूल> प्रा० एक उपकरण; (दे० ना० ५, तंबोल) पान; तुल० म० ताम्बोळी; ७)। (जस० १, २२, १०)। तंबोलई; तंतुय-पु० (सं० तन्तुक >प्रा० तंतुग) (विला०) । - लन्ग वि० (सं० ताम्बूल जलजंतु-विशेष; (प० च० १८, +लग्न) तांबूल की लता से चिपके हुए; १७)। (जस० २, २७, ८)। -वत्त न० (सं० तंद-० (सं० तन्द्रा) वह अवस्था जो ताम्बूलपत्र) पान का पत्ता; (विला०) । नींद के आने के बारंभ में होती है, ऊँच; तंबोलिय-पु. (सं० ताम्बूलिक) (क० १, ६, ७)। तमोली, पान वेचने वाला; तुल० गु० तंबुल-पु० (सं० तण्डुल) तंदुल, चावल; तंबोळी; (संधि० २, १६, ३)। (व० ८, ५, १०)। तंबोलीं-स्त्री० (सं० ताम्बूली) पान तंव-न० (सं० ताम्र>प्रा० तंब) धातु का गाछ; (पड्)। विशेप, तांबा; (जस० १७, २४) । तंबोल्लवल्ली-स्त्री० (सं० ताम्बूलव- त प्रकिमि (दे०) कीट-विशेष; ल्ली) पान की वेल; (प० च० ४६, (दे० ना० मा० ५, ६; पड़) । ७२)। तंबकुसुम-पु० न० (६०) कटसरया, तंम–पु० (सं० स्तन्म>प्रा. यंभ) कुस्वक, वृक्ष-विशेष; (६० ना० मा० ५, यंभा; (पड्)। १; पड़) । २. कुरंटक वृन; (पड्) । तंव-न० (सं० ताम्र>प्रा० तंव) तंवग-न० वाद्य-विशेष; तुल० गु० तांबा, धातु-विशेय, "तव तंत्र-मणि- तंवार (५०१) तउ । . रुप्पय-कंचण खर-पुहवी पभणंति विवं -ज्जी वि० (सं० तृतीया) तीसरी; चण;' अर्थात् शीशा, तांबा, मणि-चांदी (हे. ३३६, १) |-य वि० (सं० एवं सोने को विचक्षण पुरुष खर-पृथिवी तृतीय) तीसरा; (भ०)। -य अव्य० कहते हैं; (व० १०, ७, ४) । तब; (सं० रा०)। -यह अव्य० (सं० संवार-पु० तंवार, नरक-नाम; (जस० तदा >प्रा० तइ) उस समय; (भ०) । २, ११, १३)। तइयहूं-अव्य० तब (प० च० १६, ४, तंदिर-वि० (प्रा० तंविर) ताम्र वर्ण ८) । तइयहु-अव्य० तव; (जस० २, वाला; तुल० म० तांवेरा, तांवडा; ३३, ६) । तइयहें-स्त्री० (सं० वयो- (म०)। दशी) तेरस; (व० ६, ६, ८) । तइयहाँ तंवोल-न० (सं० ताम्बूल > प्रा० अव्य० उस समय; (प० च० ८, ८, तंवोल) पान; (व० ५, ८, १) । २)। -या वि० (सं० तृतीया) तीसरा; तअ-न० (सं० तपस्) तपस्या, तप; (जंबू० १, १, ४)। --लोक्क न० (सं० (क० ५, ६, १०)। न लोक >प्रा० तइलोक्क) तीन लोक- तआर-पु० (सं० तकार) तगण; (प्रा०- स्वर्ग, मर्त्य और पाताल । -लोकणाह 4. २, ११४) । पु० (सं० लोक्य-नाथ>प्रा० तइलो- तई-सवं० (सं० त्वया) तुम्हारे, तुल० क्क-णाह) तीन लोक के स्वामी; (प०- मगही तोहि; (प्रा० ५० १, ६; गुण्डरीपा, च० १८, ४, ५) । -लोय न० (सं० चर्यागीति)। त्रैलोक्य >प्रा० तइलोक्क, तइलोय) उसमें; तीनलोक-स्वर्ग, मर्त्य तइ-अव्य० सं० तत्र; वहाँ, (षड्) । (सं० तदा) तब; (जस०)। स्त्री० (भ०) । -वि अव्य० (सं० तथापि) (सं० त्रयी) तीन का समूह; (जस० ४, तो भी; (व० १, ११, १)। –स वि० ६, ५)। वैसा; -अ वि० (सं० तृतीय) तीसरा; (सं० तादृश) उस तरह का, -सना वि० उस प्रकार का; (प्रा० वि० (सं० (रा०)। त्वया) (को० ३, ५०) ।-सो वि० तैसा; तु हारा; (भ०)। -अहा अव्य० (सं० तुल० मगही तैसन; (सरहपा, दोहा तदा) उस समय; (भ०)। -उ अव्य० (सं० तदा) तब; (प० च० ७)। -ए वि० (सं० तृतीय) तीसरा; तई-अव्य० (सं० तदा >प्रा. तया) (जंबू० २, २०, १०)। -काल पुन उस समय; (जंवू० ४, ८, १४) । (सं० काल+य, वयो>प्रा० काल+ तउ-सर्व० (सं० तव) तुम्हारा, ".""तड तई) भूत, वर्तमान, भविष्य; (प० च० माणुसजम्मु ;" तुम्हारा मनुप्य-जन्म; ६, १४, २)। --ज्जअ वि० (सं० (प० च० १८, ७, २)। तृतीय) तीसरा; (सधि० ३, २, १०)। तउ-अव्य० (सं० तन्त्र)वहाँ, "गउ तउ -~-जउ(१) वि० (सं० तृतीयक:)तीसरा । जउ तरुवर-मूले जइ;" (प० च०६ और पाताल; पै०)। ४०, ४, कोश)। .
तर (५०२) तक्खण (सं० लघु वर्ग १०, ८) । (सं० तदा>प्रा० तया) तव; तवकरणा-स्त्री० (दे०) इच्छा, अभि- (सं० रा०)। लापा; (दे० ना० मा० ५, ४)। तउ-न० (सं० तपस्) उष्णता; (जस० तक्कर -पुं० तस्कर>प्रा० २, १८, १४) । २. (सं० तप) तपस्या, तक्कर) चोर; (सुदं० ८, ४४, २)। "तउं चिर कालु करेइ,' (व० २, १७, -कम्म पु० तस्करकर्म (जंवू० ६, १५, ६) । -धम्म पु० (सं० तपधर्म) (जंवू० २)। -विति स्त्री० तस्करवृत्ति; (जंबू० ८, १०, १४)। ३, १४, २३)। -यार पुं० (सं० तउलगि-अव्य० (सं० तावत् --- लग्नम्) तस्कर+आचार) तस्कर का आचरण; तब तक, तवलों; (क० ८, २, १०)। (जबू० १०, १८, ६ तउव-न० (सं० नपु) राँगा, शीशा, तक्कार-पुं० (सं० तकार) तगण; धातु-विशेप; (व० १०, ७, ४) । पहले दो गुरु और तब एक तए-नर्व० (सं० तव) तुम्हारा; (जंबू० (551) का समूह या गण; (प्रा० पं० २, १,१८,१०)। १६)। तमो-अव्य० (सं० ततः) तव; (विला०; तक्काल-क्रि० वि० (सं० तत्काल) जंबू० ४, ५, १६)। शीघ्र, उसी समय; (व० २, ५, १६)। तकत-पु० (फ़ा० तर त) राज-सिंहा तक्किसतविकत-स्त्री० (ध्व०) संगीत सन; "तकत चह्नि सुरुतान वइठ;" के यंत्र से उत्पन्न 'तक्किस' की आवाज; ०४, १४०)। (प० च० ५६, १, १०)। तकतान-पु. ( (फ़ा० तख्तेरवां) सुलतान ताकु-पु० (सं० तः) सूत बनाने का का वह सिंहासन जो यात्रा में तकुआ; (दे० ना० मा० ३,१)। जाया जाता था; (की० ३, ६४) । तक्कुव-पुं० (सं० तर्कक) याचक, तक्क-न० तर्क (शास्त्र) (म० १, ४, मांगने वाला; (प० च० २८, ८, ३)। २) । २. तर्क, नव्यन्याय; (को० १, तख-पु० (सं० तक्षन्) १. लकड़ी ६०)। वढ़ई; २. विश्वकर्मा, तपक- (ध्व०) 'तक्क-तक्क' की शिल्पी-विशेष; (पड्) शब्दानुकृति; (प्रा० १० १, २०६)। /तक्ख-(सं० तक्ष्) छीलना, काटना; 1/तषक-(सं० तर्क>प्रा० तक्क) तर्क -इ सक०; (पड्)। करना, अनुमान करना; ताकना । तक्केइ तक्खड-वि० (दे०) अक्खड़, -~-व० (सं० तर्कयति) ताकना; (हे. (सुदं० ६, ६, १) । २० पुं० तक्खड ३७०)। नामक श्रेप्ठि; (जंबू० १, ५, ३)। तक्ककक्कश-~~-वि० (सं० तर्ककर्कश) तखण-- अव्य० (सं० तत्क्षण>प्रा० तर्क या नव्यन्याय में प्रौड़ (की० १, तक्खण) उसी समय, उस क्षण, शीघ्र; ६०)। (५० च० १५, १५, ७; क. १, १०, (को० साथ ले यंत्र; काटने वाला; - उद्धत;
तक्खर (५०३) वी २) । तखणि---क्रि वि० (सं० तत्क्षणे) ६३) । तेज्जइ-क्रि०, २० "मंजरि तव; तुल० वं० तखन; (प्रा० गु० ६, तेजइ चूआ," आम वौर छोड़ रहा है, ११)। तक्खणे-अव्य० उम समय; तुल० (प्रा० ० २, २०३)। मगही तखनी; (कहाणपा, दोहा कोश)। जा-स्त्री० (सं० त्वच्>प्रा० तया) तक्खन-तत्क्षणे; (कोतिपताका)। त्वचा, छाल, चमड़ी; (दे० ना० मा० १, तपखंय-पु० तक्षक गीध; (रि० ३, १११) । १)। तजान-पु. (फ़ा० ताजियानः) चाबुक; तक्खर-पुं० (सं० तस्कर>प्रा० (की० ४, ३८)। तक्कर) १. चोर, लुटेरा, २. जघन्य, तज्ज-(सं० तर्जय>प्रा० तज्ज) घृणित; (सं० रा०)। तरजना, डांटकर बोलना, घुड़कना; तरखारण-देखो तक्ख =तक्षन्; (पड्)। (सं० रा०)। -इव० (सं० तर्जयति); तखिखितखितक्खि-स्त्री० वाद्य ध्वनि; ध्वनि; (भ०) । तज्जु-क्रि०, भा० (सं० तर्जय (जंवू० ५, ६, १२)। >प्रा० तज्ज) तर्जन करो, भलन करो; ततखिखें-स्त्री० तक्खा वाद्य ध्वनि; (प० च०७, १२, ३) । तज्जेवि-पू०- (सुदं० ७, ६, ११)। को० क्रि०, (प० च० १७, ३, १०)। तग्ग-न० (दे०) धागे का कंकण; (दे०- तज्जिय-वि० (सं० বলির>সা ना० मा० ५, १)। तज्जिअ) भर्त्ताित; (प० च० 1/तग्ग-१. सोचना. विचारना, ६)। २. तागा तागना; (सं० रा०)। तमो-क्रि० वि० तभी; (की० ३, तन्गय-वि० (सं० तद्गत) तल्लीन; ७) । "तग्गय मणेन," तल्लीन मन होकर; तटखुद-२० (दे०) वाद्य; (सुदं० ७, (प० च० १,६,८ ६. १२)। तकिरिकिरिरि- स्त्री० (ध्व०) तच्च-न० (सं० तत्त्व >प्रा० तच्च) किरिरि-किरि-तट्टकिरि की आवाज; सार; (क० ६, २१, ३) । तच्चु; (जंवू० (जंबू० ५, ६, ११)। १, १०, ४)। तद्ध-वि० टूटे हुए; (प० सि० च० ४, Vतन्छ-(सं० तम्) छीलना, काटना; ८, ६२)। (संधि० १५, २, ११)। तट्ठ-वि० (सं० वस्त) डरा हुआ, भय- तच्छिड-वि० (दे०) भयंकर; (दे०. भीत; (म० २, ६१, ४) । ना० मा० ५, तप्र- -वि० धृष्ट; तुल० ताठ तच्छिल-वि० (दे०) तत्सर; (षड्) । (जस० २, ३४, ४)। 1/तज-(Vत्यज) छोड़ना। -उ तट्ठी-वि० (सं० नस्ता) डरी हुई, क्रिः,व० त्याग करना; (प्रा० पै० २, भीत; (५० च० २५, ८, ५) । क० . - ०म० - तकीय (५०४) तडिकेस च्य०प्र० कुल होना। तकीय-वि० (सं० तत् स्थिता) वहाँ +इह) तडसे; "तडत्तीह तुझे महामोह- स्थित; (क० ३,१८,१) । जाले;" मर्यात उसका मोहजाल तड़से तड-पुं० (सं० तट>प्रा० तड) कूल, टूट गया, (जं० २, १६, १)। किनारा, तीर; तुल० म० तड (लावणे); तडत्य-वि० (सं० तटस्य) १. मध्यस्य, (सं० रा०; मु० २-१२; उ० पक्षपातन्हीन; २. समीप में स्थित; (६०- १५-२४)। ना० मा० ३,६०)। Vतड-(सं० तन्>प्रा० तड) विस्तार Vतडफड द०) १. तड़फड़ाना, व्या- करना । -इव० (जंतु० ६, ५, २) । (पाहु.)। सडकडिश-वि० (दे०) अनवस्थित; २. हिलना या प्रयत्न करना । -३ व. (हे० ३६६)। तब्यक-वि० (दे०) मंजक, विनाशक; तडफडिल-दि० (दे०) व्यावुल; तड़प- "लोक-भुवग्गल भड-तहक्क, दुरिसण डाया हुआ; (दे० ना० मा० ५, भीलण जम-झटक;" (प० २० ३७, ६, है)। ८)। Vतडपिड--(दे०) तड़पड़ाना । तति- Vतडबक-(व्व०) तड़तड़ करना; (सं० इवि-पू० का० क्रि०, (जंबू० ७, ५, रा०) । तडक्किय-भू० का० (सं० तट १२)। स्कृत) तड़तड़ किया; (भ०)। तडमड-वि० (दे०) क्षुभित, सोम- Vतडतड-(सं० तडतडाय) प्राप्त; (दे० ना० ना० ५, ७) : नावाज करना। -इंति (सुदं० ११, तब्यड-स्त्री० (सं० प्रा० तडतडा) १५, ६) । तडतडतडत्ति-२० (प० १० 'तड़तड़' की आवाज; (सं० रा०) । ११, ११२) । तडतडतडन्त कृ० तड़. Vतडयड-(सं० तहतडाय) तड़ की आवाज करते हुए; (प० ३० आवाज करना; (संधि० १४, ५, १०)। ५०, १, ६)। तडताडिय-भू० का०, तव्यत- कृ० (सं० तडतडाय+शत) ताड़न करके बजाया गया; (जं० ५, ६, (जंबू० ११, १५, ५)। १३) । तड्यड-३० (प० च० २८, तवडा--स्त्री० (३०) वृक्ष- विप, याउली का पेड़; (दे० ना० मा० ५, तडतडप-० (ब) नड़-तड़ का ५.)। शब्द; (जंदू० १, १४, ६) 1 तडि-स्त्री० (सं० तडित्) बिजली; तत्ति-क्रि० वि० (सं० तड्+इति) (प० च० १२, ७, ७) । तड़ से, तडाक से; "दोत्तडिहिं परंतहों तडि-स्त्री० (सं० तंटे) समीप में; गउ इत्ति, तल्लियहाँ सयडु मोडिर "आरोहिवि पह-तह उघडियह;" (प्रा०० तडत्ति;" (जं० ५, ७, १६) । गु० २, ३,३४)। तडत्तीह-क्रि० वि० (सं० तह इति तडिकेस-पुं० (सं० तहित् + केश) तडतड तडिकेसि (५०५) तणमुद्दिआ का एक - राक्षसवंशीय एक रांजा, एक लंका-पति; च० ५, २३३)। (प. ० च० ६, ६६)। -वेअ पु० (सं० तडिय-वि० (सं० तंत) विस्तीर्ण, फैला तडित् + वेग) विद्याधर वंश हुआ; (जंबू० ६, १०, ८) । राजा; (प० च० ५, १८) । तडियतडि-स्त्री० (ध्व०) तड़-तड़ का तडिकेसि-पु० विद्याधर वंशीय राजा; शब्द; (जंबू० १०, १६, ३) । (प० च० ६, ६६)। तडिलया-स्त्री० (सं० तडित्+लता) तडिखरतडि-स्त्री० (ध्व०) तडि-खर- विद्युल्लता; (व० १, ६, ४) । तडि का शब्द; "खडतड-तडिखरतडि तडिवडण-न० (सं० तडित+पतन तरडखोहु;". अर्थात् खर-तड, तडि-खर विद्युत-पतन; (जंवू० ५, ६, ७) । तडि करते हुए तरड वाद्य क्षोभ अर्थात् तडिवाह-पु० वानरयोद्धा; (प० च० आश्चर्य पूर्ण हलचल उत्पन्न करने लगा; ५७, १६)। (जंबू० १, १४, .७)। तडिविलतिस-पु० राक्षसयोद्धा; (प०- तडिच्छड-स्त्री० (सं० तडित् +छटा) च० २३, २१)। विद्युत की शोभा; (प्रा० गु० १३, तडिवेअ, तडिवेग-पु० विद्याधरवंशीय ३७)। राजा; (प० च० ५, १८, ६, २०५) । तडिजीह-पु० राक्षस योद्धा; (प० च० तरण-(सं० तन) शरीर; (सं० रा०) । ५६, ३२)। न० (सं० तृण>प्रा० तण) घास; (जंवू० तडिणि स्त्री० (सं० तटिनी) नदी; ६,१३,६; जस० १, ३, ६) । न० (व० ४, २३, १०)। (दे०) उत्पल, कमल; (दे० ना० मा० ५, तडिनय-पुं० (ध्व०) तड़ से, १)। -भूमि स्त्री० (सं० तृणभूमि) थप्पड़ मारने या कड़ी चीज तोड़ने की आवाज; पृथ्वी का ऊपरी तल; (जंवू० १, ६, ४) । तणु-न० (सं० तृण) तिनका (स० रा०)। (हे० ३३४, १)। तडिपिंग-पु० विद्याधरयोद्धा; (प० च० तरणप्र-पु. (सं० तनय >प्रा० तणय) १२, ६५)। पुत्र; (जंबू० ४, ७, ११) । तडिप्पमा-स्त्री० विद्याधर रानी; (प०- तणउ-अध्य० (संबंधवाचक) प्रति, च० ६, १६६)। संबंधी; (जंबू० १, ११, १६) । तडिमाला-स्त्री० १. कुंभकरण (अप० तणउ-वि० (सं० तनु>प्रा० तणु) कुभकण्ण) की स्त्री; (प० लघु. छोटा, "गउ णियघर णंदणु तणउ ५५) । २. रावण की स्त्री; (प० च० लाव;" अर्थात् उस छोटे से बालक को `७४, १०)। लेकर वह अपने घर चला गया; (क० २, तडिमाली-पु.० (सं० तडित् +माली) विद्युन्माली देव; (जंबू० ४, ७, २) । तणमुद्दिमा-स्त्री० (दे०) अंगुठी; (दे०. दडियंगय-पु० विद्याधर राजा; (प.. ना० मा० ५, ६)। च० ८, तर्णय (५०६) ताहै . वृक्ष; (दे०. तणय-० (सं० तनय >प्रा० तणय) तगुइस-वि० (सं० तनुकृत) दुर्वल पुत्र; (जस० २, २१,६; व० १, १७, किया हुआ; (प० च० १६, ४) । ३)। तणुकंचु-स्त्री० आवली की पुत्री; (प.. तणरासि, तणरासिम-वि० (दे०) प्रसा च० ६, ११)। रित, फैलाया हुआ; (दे० ना० मा० ५, तणुतावप्र-वि० (सं० तनुतापक) शरीर ६)। को गरम करने वाला; (जस० ४, १६, तणवरंडी-स्त्री० (दे०) छोटी नौका; १०)। (दे० ना० मा० ५, ७)। तणुफंस- (सं० तनुस्पर्श) शरीर का तणसोल्लि, तणसोल्लिया-स्त्री० (दे०) स्पर्श; (जस० २, ५, १२) । मल्लिका, वेले की जाति का एक सफेद तणुदनव-वि० (सं० तनु+उद्भव> और सुगंवित पुष्प वाला प्रा० तात्मव) शरीर से उत्पन्न । ना० मा० ५, ६) पुं० लड़का; (भ०)। तरिगया -अव्य० पप्ठि (संबंधसूचक) तगुरुह-पुं० (सं० तनु ह>प्रा० अव्य. (स्त्री०); (जंबू० २, १६, तणुल्ह) लड़का; (भ०; जस० १, २३, ३)। १०)। तणु-स्त्री० (सं० तनु, तनू स्त्री० > तगुलुहरण-न० (दे०) तौलिया; (प०- प्रा० तग्गु स्त्री०) देह, शरीर; (प्रा० गु० च० २६, ६, ३) ३८, १) । -अंगि वि० (सं० तन्वङ्गी) तणुवन-न० (सं० तृण+वन) तिनको दुबली-पतली; (जस० ४, २३, ६)। का वन; (क० २, ४, ७) । -अ वि० (सं० तनुक) क्षीण; (जंवू० तसि-पु. (दे०) तृण-राशि; (दे०- ४, १८, ११)। -ई स्त्री० (सं० ना० मा० ५, ३)। तन्वी) पतले शरीर वाली; (पड्)। -कति स्त्री० (सं० तनुकान्ति) शरीर तण्डव-पुं० (दे०) समूह; तुल० म० (जंबू० ३, १३, ३)। तांडा; (भ०)। -चेट्ठा स्त्री (सं० तनुचेप्टा) शारी तण्डव-अक० (सं० ताण्डवय>प्रा० रिक प्रयत्न या सेवा; (जंदू० १०, २३, तंडव) नृत्य करना। -इ (सं० नृत्यति) ३) ।-ताण पुं० (सं०तनु+त्राण)रक्षा- (म०)। कवच; (जंबू० ६, ७,४)। -पह स्त्री० तण्डविय-वि० (प्रा० तड्डवित्र) (सं० तनु+प्रभा) देहकांति; (जंबू० ३, विस्तीर्ण, फैला हुआ; (प० च० १६, १०, ६) | -भव वि० (२० तद्भव) १७, ६)। शरीर से उन्यन्न; (जंबू० ८, ६, ६) तपाय-वि० (३०). आद्र, गीला; -ह पुं० (सं० तनुन्ह) पुत्र; (जंबू० (दे० ना० मा० ५, २)। १०, ३,३)। तरह-स्त्री० (सं० तृष्णा>प्रा० ताहा) । की शोभा; - तण्हां (५०७) तन्ह । . तन्त्र>प्रा. प्यास, पिपासा; (जस० ४, १४, ६; क. ५, ३)। २, १६, ५)। तत्तु, तेत्यु- -अव्य० (सं० तन) वहाँ; तण्हा-स्त्री० (सं० तृष्णा) प्यास, अभि (हे० ४०४)। लापा, लालच; (व० १, १४, ६)। तत्तुडिल्ल-न० (दे०) संभोग, काम- -उर वि० (सं० तृष्णातुर) प्यास से क्रीड़ा; (दे० ना० मा० ५, ६)। बेचैन; (क० ४, ७, ३)। तत्तुरिअ-वि० (दे०) रंजित; (पड्)। तत-सर्व० (सं+तत्) उसकी; (की०४, तत्थ-~अव्य० (सं० तन) वहाँ; (प्रा०. ६६)। पं० १, १०८)। -त्थि (सं० तनास्ति) तत-वि० (सं० तावत्) उतना; (प्रा०- वहां है; (व० १, ३, ६) । 4०१, ४१) । तय्थ-स्त्री० (फ़ा० तश्त) तश्तरी; ततत-वि० (स तप्ततप्त>प्रा० (की० २, १६२) । तत्तत्त) गरमागरम; (की० २, १७८)। तश्यि-क्रि० वि० (सं० तत-वि० (सं० तप्त) तपाया हुआ, तथ्थ) वहाँ; (की० २, २२५) । गरम किया हुआ; (भ०; दे० ना० मा० तदिदिबुदिखुद-न० (ध्व०)तदिदि खुदि १, १०५.) । न० (सं० तत्त्व) १. सार खुद आदि का स्वर; (जंबू० ५, ६, वस्तु, २. वास्तविक बात, गुण। असलि- १२)। यत; (भ०)।-त्य पु० (सं० तत्त्वार्थ) तहव्व-पु० (सं० तत् + द्रव्य) वह धन; सागर्थ तत्त्वार्थ, वास्तविकता हेतु; (जंबू० (जंबू० १०, ६, ८)। १०, ३,११) । तद्दिअचय-न० (दे०) नृत्य, नाच; (दे०. तताहो-वि० संतप्त; (महा० ६८,७) । ना० मा० ५,८)। तत्ति-त्री० १. (सं० तृप्ति.>प्रा० तद्दिअस, तद्दिअसिअ-न० दे०) प्रति- तत्ति) तृप्ति, संतोप; (प० च० १, ३, दिन; (दे० ना० मा० ५, ८)। ३) । २. (दे०) आदेश; (दे० ना० मा० तद्दिण -अव्य० (सं० तक्दिन) उस दिन; ५, २०) ३. (दे०) तत्परता; (प० च० (भ०)। ७, ८७) । ४. (दे०) चिता; (म० १, तद्दिवस-अव्य० (सं० २६, १)। उस दिन; (जंवू० ३, ६, ६) । तत्तिय-वि० (सं० तृप्त) संतुष्ट; तवण-वि० (सं० तद्विगुणित) वह दो (जस० १, २१, ६)। गुना; (प० च० २७, ३, २) । तत्तिय-स्त्री० (दे०) तत्परता, चिंता; तनय-पु० (सं० तनय >प्रा० तणय) (सुदं० ८, २२, ५)। पुत्र; (की० १, ७६)। ततिल-वि० (दे०) तत्पर; (दे० ना० तन्ह-स्त्री० (सं० तृष्णा>प्रा० तहा) मा० ५, ३) । तत्तिल्ल-वि. (दे०) प्यास, पिपासा; तुल० म० तहान; तत्पर; (५० च० १, २६; दे० ना० मा० (भ.)। तत् +दिवस) , तन्हाविय (५०८) तमिस्स तप्पइ पुरणु १. हाथ, ६०२, तन्हाविय-वि० (सं० तृप्णायित) तमकुण्डा--पुं० (सं० ताम्रकुण्ड) ताव प्यासा; म० तान्हवलेला; (भ०) । का कुंड या चौड़ा वर्तन, (को० २, १७५)। तप्प-वि० (सं० तप्त) गर्म; "मणि तमण-न० (दे०) चूल्हा; (दे० ना०- जंपइ ताएं विणु किह मा० ५, २) । जिज्जई," अर्थात् वह अपने मन में तृप्त तमरणाम-~पु. (सं० तमस्नाम>प्रा० होकर वार-बार कह उठता कि पिता के तमणाम) तम:प्रभा नरक भूमि; (जंबू० विना कैसे जिया जायेगा; (जस० २, ११, १०, ८)। २५, १६)। तमणासण-वि० (सं० तमनाशन) /तप्प-(सं० तप्) तपना। -इव० अंधकार को नष्ट करना। (जंवू० १०, प्रा० ५० १, ७२) । तप्पे-भू० का०, २३, ३)। संतप्त किया, 'कुल खत्तिम तप्पे,' क्षत्रिय तमणि-पु० स्त्री० (दे०) २. भूज, वृक्ष-विशेष की छाल; (३०. कुल की संतप्त किया; (प्रा० ना० मा० २, २०)। २०७) । तमणियर-पुं० (सं० तमस्+निकर) तप्पणदेवय-पु० (सं० तर्पण देवता) अंधकार का समूह; (जंवू०) । तर्पण किया जाने वाला देवता; कर्मकांड तमतदपह-० (सं० तमस्तमःभ) की एक क्रिया, जिसमें देव को तुप्ट करने सप्तमनरकनाम; (जस० २, १६, ३०)। के लिए हाथ से या किसी पात्र से पानी तमनिवहत्य-न० (सं० तमनिवहात्र) देते है; (जंवू० ४, १५, १३)। प्रक्षेपास्त्र; (५० च० १२, १३०)। तप्पर-वि० (सं० तत्पर) आसक्त; तमपह-० (सं० तमःप्रभ) छठा (दे० ना० मा० ५, २०)। नरकनाम, नरकभूमि; (जस० २, १६, तप्पवेसु-पु० तपस्वी का वेश या रूप; ३०; २० १०, २३, २) । ५० च० १८, ६, ६)। तमस-न० (सं० तमस्) अंधकार; (प०. तबह-अव्य. च०३६, ८)। (की० २, १८५) तमारि-पु० (सं. • तम-+अरि) सूर्य; तमंधमार-- (सं० तमोन्धकार) प्रवल (जबू० ५, ११, १६) । संवकार; (प० च० १७, १०)। तमाल-पु. (सं० प्रा० तमाल) वृक्ष- विशेष तथा उसका फूल; (जस० ३, १, तम-पुं० (दे०) शोक, ग्लानि, १८)। सोस; (दे० ना० मा० ५, १;प० च. तमालि-स्त्री. अंधकार का समूह १८, ५, ७)। पु० (सं० तमस्) अंघ- (जंवू० १०, ६ ४)। कार; (भ०)। तमिस्स-न० (सं० तमित्र> प्रा० तो भी; अफ- तमी (५०६) तरट्टि ' - तमिस) अंधकार; (दे० ना० मा० २, १, २८, ८)। २६)। तरंगतिलअ-पुं० वानरयोद्धा; (प० च० तमी-स्त्री० (सं० तमी) रात्रि, रात; ५७, १२) । (जंबू. ४, ५, २२) । तरंगमाला-स्त्री० गंधर्व (गंधव्व) राजा तमोह---पु० (सं० तमस+मोघ) अंध की पुत्री; (प० च० ५१, १३) । कार का समूह; (जस० २, २, ७)। तरंगिरिण-स्त्री० (सं० तरङगिणी) तम्बारु-पु० (सं० ताम्र+वारक) नदी; (जस० ३, १, २०; व० ३,१, तवे का घड़ा या लोटा; (की० २, ७) । १६८)। तरंड-पुं० न० (सं. तरण्ड>प्रा० तम्बोलु-पुं० ( (सं० ताम्बूल>प्रा० तरंड) नौका; (व० ७, ६, १०) । तरंडो तंबोल) पान; (प० च० १,१४, नाव; (प्रा० १० १, १)। ५) । 1/तर-(सं०/तृ >प्रा० तर) तरना, तम्मइ-वि० (सं० तन्यय), तिरोहित; पार करना। -इ व० (सं० तरति) (व० २, १, ४)। प्रा० ५० १, ३६)। तरंति-व० तम्विर-वि० (सं० ताम्र) तांबे के रंग (जंबू० ७, १, १०) । तरंत-कृ० (सं० का, लाल; (प० च० १६, १७, ६)। Vतृ+शतृ.) (जंबू० ६, ६, ८)। तम्बरम-पु. (सं० स्तम्वेरम>प्रा० तरन्त-व० कृ० तैरते हुए; (प० च० तंवेरम) हस्ती, हाथी; (प० च० ११, ५, १४, ५, ७) । तरवि-पू० का० क्रि०, (जंबू० १०, १०, २) । तुल० म० तरणें, तम्बोल-न० (सं० ताम्बूल >प्रा० गु० तरे। तरिय-पू० का० कि०, (सं० तंबोल) पान; (प० च० तृ.+कत्वा) (जंवू० १०, १०, २)। तरिल्लु-भू० का० (सं० तृ.+इल्ल) तय-वि० (सं० तत) विस्तारयुक्त; पार किया; (जंबू० ५, ७, १२) । (दे० ना० मा० १, ४६) । न० (सं० तरच्छ-पु० स्त्री० (सं० तरक्ष>प्रा० तत) वीणा आदि, तारों वाला बाजा; तरच्छ) प्राणि-विशेष, ध्याघ्र (व० ८, ६, ५)। जाति; तुल० म० तरस; (जस० २, ३७, तयसार-पु० (सं० स्वच्+सार>प्रा० २)। तया+सार) त्वचा का मूल भाग; (व० तरट्ट-वि० (दे०) प्रगल्भ; (जंबू० ६, ५, १३, ८)। ३, ८)। तों-कि० वि० (सं० ततः>प्रा० तरट्टि-स्त्री० (दे०, प्रा० तरट्टी) प्रग- तओ) तभी; (की० ३, ७) । ल्भ स्त्री; (प० १० ११, तरंग-स्त्री० (स० तरग> प्रा० २. प्रोढ़ा नायिका; (सुदं० ५, ४, तरंग) कल्लोल, पानी की लहर; (जस० ११)। ५). . की एक तरकतरडक (५१०) तरुणि १०२)। २४, ८, ७)। (सं० तरह की . तरडकतरटक-पु. (ध्व०) संगीत के तरवारिधारा-स्त्री० (सं० तरवारि+ यंत्र द्वारा तड़क-तड़क की आवाज निका धारा) तलवार की पार; (को० १, लना; (प. च० ५६, १, ८)। तरणि-पु० (सं० तरणि) सूर्य; (५०. तरवाल-वि० (सं० त्वरा>प्रा० अप० च० १, ४, २;प्रा० ५० १, ६२; व० २, तरा) त्वरायुक्क्त, वेगयुक्त; (को० ४, २०, १६)। ५१)। तरण्डय-पुं० न० (सं० तरण्ड+क) तरस-न०. (दे०) मांस; (दे० ना० मा० डोंगी, नौका; (प. च० ५, ४)। तरसा-स्त्री० (सं० तरस्) वेग, चाल; तरल-वि० (सं० प्रा० तरल) चंचल, (जस० ४, २७, ३०)। बदह(भ०; जंवू० ३, १, १७)। तरसि-पू० का० क्रि०, (सं०१/नस्) -च्छि स्त्री० तरल+अक्षि) डर कर; (की०४, १३०) । चंचल नेत्र; (जंवू० ४, ८,४)। –तर तरिअन्ध- -न० (दे०) एक वि० अधिक चंचल; (की० १,६६)। छोटी नौका; (द० ना० मा० ५, ७) । -दल पुं० (सं० तरल+दल) चंचल तरिय-वि० (सं त्वरित) शीघ्र; (व० पत्र; (जंबू० ४, १६,३)। ६, १२,८)। तरल-पु० वानरयोद्धा; (प० च० ५७, तरियहु-पु० तैरने वाले, तैराक; १३)। (जंवू० १०, ११, ७)। तरलगमणि-स्त्री० तरलनयनी छद; तरी-स्त्री० (सं० तरी) नौका, होगी, "तरलअणि सव कर लहु;" 'तमल नयनी (दे० ना० मा० ६, ११०) । छंद में सब वर्गों को लवृ करो;' (प्रा०- तरीअ-स्त्री० (सं० तडित) विजली; पं० २, १३७)। तरलाविन-वि० (सं० तरलित) चंचल (रा.)। तरु-पुं० वृन; (जस० १,११, ६; व० किया हुआ, चलायमान किया हुया; (भ०) । तरलाविय-वि० चलायमान; २, ११, ४)। (भ०) । तरुकाय-पु० -पु० वनस्पतिकाय; (जस० तरलिअ-वि० सं० तरलित) चंचल ४, १८, १४)। किया हुआ; (क० १, १४, ११)। तरुण-वि० (सं० प्रा० तरुण) जवान; तरवट्ट-पु (दे०) वृक्ष-विशेष; चक (प० च० ५, १९८) । -त पु० (सं० वड, (दे० ना० मा० ५, ५) । तरुणत्व) जवानी; (प्रा० .० २, ८५) । तरवार-स्त्री० (सं० तरवारि) तलवार -तण पुं० (सं० तरुणत्व) तारुण्य; एक प्रसिद्ध धारदार हथियार; (जंवू०७, (जवू. २, १८, ३)। ६,७)। तरुणि--स्त्री० (सं० प्रा० तरुणी) तरुराई (५११) तलार युवति, जवान स्त्री; (प्रा० ० १, ४)। पंत-कृ० उछल कर आते हुए; (जंबू० तरुणी; (जस० १, १६, ३)। ५, १४, ६)। तरुराई-स्त्री० (सं० तरुराजि) वृक्षा Vतलप्फ-कांपना, तडफना । -इव० वलि; (व० २, ७, १२)। (प्रा० ५० १, १०८)। तरुवर---पु. (सं० तरुवर) १. वृक्ष; तलप्फल-पुं० (दे०) शालि, चावल; (व० १, ८, १३) । २. लकड़ी; "णि- (दे० ना० मा० ५, ७) । तरुवरे-गिरिवरि पियणवरें समरंगणि तलवट-न० सं० उपत्यका। पर्वत के उक्कंठिउ;" (व० ४, १०, १४)। नीचे की भूमि, पहाड़ की तलहटी; तुल० तरुवेल्लीहल-न० (सं० तरु+वल्ली+ गु० तळेटी; (प्रा० गु० ७, ४०)। फल) वृक्ष की बेल का फल; (जस० २, तलवत्त-पु० (दे०) १. कान का आभू- २७, ६)। पण-विशेष; २. वरांग, उत्तमांग; "तल- /तर्प-(सं० तप) तृप्त होना, (उ०. वत्तो कर्णाभरणविशेषो वराङ्गं च;" व्य० प्र० ५१-२०)। (दे० ना० मा० ५, २१)। तहि-अव्य० (सं० तर्हि) १. उस समय, तलवर-पु० (दे०, प्रा० तलवर) नगर- तव, २. उस विषय में, (उ० व्य० प्र० रक्षफ कोटवाल; (प० च०१७, १८, २१, २१)। ४) । १/तल-(सं० तल्) तलना, तेल आदि तलवायह-पु. (दे०) तलस्पर्शी गति मे भूनना । तलिज्जइ-कर्मवा० (जंबू० से तैरना; (जंबू० ४, १६, १०) । २, २, २)। तलसारिम-वि० (दे०) १. गालित तल-न० (सं० तल) सतह, निम्न भाग, (छाना हुआ, चुआया हुआ, सींचा हुआ) नीचे का भाग, (उ० व्य० प्र० ६-२३; २. मुग्ध, मूर्ख; (दे० ना० व० ३, ६, ३) । पुं० (सं० ताल>प्रा० ६)। तल) वृक्ष-विशेप; ताड़ का पेड़; (प०- तलाउ-न० (सं० तडाग>प्रा० तलाग, च० ५३, ७६) । न० (दे०) १. शय्या, तलाव) तलाव, तडाग; (सा० १७०) । बिछौना; २. पुं० गाँव का मुखिया; (दे०. तलाउलिव-पु. (सं० तलाउलिव-पु. (सं० तडागिका) ना० मा० ५, १६)। बावड़ी; तुल० गु० तळावडी; (प्रा० गु० तलआगत्ति-० (दे०) कूप, इनारा; ६, १७) । (दे० ना० मा० ५, ८)। तलाएँ-न० (सं० तडाग>प्रा० तलाग, 1/तलप्प--(सं० तप् का घात्वादेश तलाय) तालाब, सरोवर; (प० च० २, तल्लपतपना, गर्म होना) तड़पना; २, ३) । (को० ४, ३१) । तलाय-न० (सं० तडाग>प्रा० तलाय) तलप्प-पु० (दे०) प्रहार . (stroke, तालाव; (जंवू० ४, ६, ४) । slap); (प० च० ३१, ६, ६)। तल तलार-पु. (दे०) कोतवाल, भा० ५, तलार (५१२) तवं यु हुआ फर्म मा० रमक; (६० ना० मा० ५,६;संवि० दे० ना- मां० ५, ३) - वि० १२, ३,१७; प० २०३५, ६, ६) । इन्टुक; (प्रा० गु० ३, १८)। तलारट-पुं० (दे०) नगर-रक्षा का तल्लूविल्लि-स्त्री० (दे०) तडफडाहट; कार्य; (प्रा० गु० ५, ३७) । (जंबू० ६, १०, ५)। तलि-० (सं० तल) तल, तली; (हे० तवंग-पुं० १. उच्चप्रदेश; (जस० १, ३३४,१; भ०)। २९, १७) । २. गृहविभाग-विशेप; (प०. तलिए-वि० (सं० तलिन) सूक्ष्म, च० ५५, ५, ४) । ३. प्रासाद; (जंव वारीक; (दे० ना० मा० ५, ६) । ४,१६, १६)। तलिण-वि० (दे०) कोमल, चमकदार, तवंत-वि० तप्यमान; (जस०) । चिकना, मनोहर; "नील-तलिण-कंचुलिय- तवंतर-पू० (सं० तप+अन्तर) तय- अलंकिय तहिं वर-कैस कलाविण चंगिय;" प्रकार; (जं० ३, १०, १०)। (प्रा० गु० १३,३८)। तद-अव्य० (सं० तदा) तब; (३०. तलिम ० न० (३०) १. नय्या, व्य० ३०६-१४)। विछोना; २. पत्थर जड़ा १/तक-(सं०/तप>प्रा० तव) गर्म ३. घर के ऊपर की भूमि; ४. शय्य गृह, होना, तपना । -इव० (सं० तपति) ५. भूनने का भानन; (दे० ना० तप्त होना; तुल० म० ताव; (प्रा० पं० ५, २०)। २, ४०; हे० ३७७, १)। तबठ-कि० तलिमा-स्त्री० (सं० तलिमा) तिमिला, मा० (२० तप>प्रा० तव) तपे; (५०. वादित्र-विशेष; (प० च० ६१, २)। च० १७, १८, ७)। तलिय-३० (सं०. तलित) तला हुआ तवन० (सं० तपस्) तपना; (सं०- म.स; (उम०३, ६,३)। रा०)। तलेर-पुं० (द०) नगर-रक्षक, कोत तबए-पुं० (सं० तपन >प्रा० तवण) वाल; (म०)। सूर्य; (सं० रा०; जंदू० . ८, १४, ताल-न० (दे०) १. छोटा तालाब; ४)। २. तृण-विशेष; ३. विछीना; (६० ना०. तव सर्व० (सं0 तब) तेरा; (जंबु० ४, मा० ५, १६; पड़)। ६, १४)। तलल्ट-न० (दे०) शव्या,. विद्यौना; तव-पुं० न० (सं० तपस्>प्रा० तब (द० ना० मा० ५, २)। तप, तपस्या, तपश्चर्या; "णिय-जत्तिए गुह- तल्लोल्ल-पुं० (दे०) व्याकुलता; यर-नत्तिए तब सिरिहरमुणि पंदिर;" तुल० गु० तालावली; (५० च० ३८, ५, अर्थात् अपनी शक्तिपूर्वक तथा गुन्तर ८) । भक्तिपूर्वक तपत्री के गृहस्वल्प 'श्रीधर तलिच्छ,-वि० (सं० तत् + लिस्म) मुनि द्वारा नंदित बने रहो; (ब० १,१७, तल्लीन, तत्पर; (प० ० ११, ६७, १६)1-गहण पु तप-ग्रा; (ज ..
तवय (५१३) तसि तत:>प्रा० ३, ८, १)। -चरण न० (सं० तपस् हुआ; (दे० ना० मा० ५, २) । +चरण) तपस्या, तपश्चर्या; (क० २, तविअ-वि० (सं० तप्त) तपा हुआ, १३, ७) । -तविय वि० (सं० तपस्+ गरम; (जस० २, २२, २)। तपित) तप से तपाए हुए; (जंबू० ८, ४, तविआ-स्त्री० (सं० तापिका) तवे का १०)। –पहाअ पु० (सं० तपः प्रभाव) हत्था; (दे० ना० मा० १, १६३)। तप का प्रभाव; (जस० १, २३, ३)। तवु-न० (सं० त्रपु>प्रा० तउ, तउअ) —पहाव पु० (सं० तपः-+-प्रभाव) तप की धातु-विशेष, सीसा, राँगा; (प० च. शक्ति; (व० २, १०, १०)। --फल न० ११८, ८)। (सं० तपः+फल) तपस्या का परिणाम; तवे-क्रि० वि० (सं० (जबू०१०, २६,६) । –यरण न० (सं० तओ) तब; (की० २, ४६) । तपश्चरग) ताश्चर्या; (जस०२,२१, ८)। तबेल्ला-न० (दे०) कूडा; (की० २, -लच्छी स्त्री० (सं० तपः+लक्ष्मी) १६२) । तपोलक्ष्मी, तप रूपी धन, ऐश्वर्य; (जस० तवोधर-पु० (सं० तपस् +धर) तप- ४, २८, ७)।-सत्ति स्त्री० (सं० तपः स्वी, मुनि; (प० च० २०, १६५) । शक्ति) तप की शक्ति; (जस० ३, ३८, तवोवण-न० (सं० तपोवन) ऋषि का १२) । -साहिअ वि० (सं० तप+ आश्रम; (जंवू० ८, ११, २)। साधित) तप द्वारा सिद्ध किया हुआ, तप तवोहणु-पु० (सं० तपोधन) तपस्वी, द्वारा दमन किया हुआ; (जंबू० ३, १३, "तहिं दिठ्ठ तवोहणु कसणु एक्कु;" १५)। -सि वि० (सं० तपस्विन् > (क० ६, ६, ८) । प्रा० तवस्सि) तपस्या करने वाला; (प०- तवे- कि.० वि० तब; (को०६३, च०७,४,४; क० ६, ५, ६)। ८)। -सित्तण पु० (सं० तपस्वित्व) तपस्वी- तव्वेल-क्रि०, वि० सं० तदा; तव; पन; (जस० ३, २३, ३) । -सिप (प० च० ३७, १३, ३)। स्त्री० (सं० तप-श्री) तपश्री, "तव-सिय- तस—पु० (सं० त्रस >प्रा० तस) जीव; वहुयलय सई हत्य;" तपश्री रूपी वधू (व० २, २२, ४) । का पाणिग्रहण कर लिया; (प० च० ६, Vतस-(सं०/त्रस्> प्रा० तस) १५, ६)। -सिरी स्त्री० (सं० तप; डरना, त्रास पाना; (जस० २,११, श्री) तप रूपी कांति या चमक, "तवसि ६) । -इ अक० (सं० त्रस्यति) (जंबू० रिभूसियंगु;" अर्यात् तप:श्री से भूपित ३, ६, १४)। अंग; (जस० ४, ६, २; जंबू० ३, ६, तसि-सर्व० (सं० तस्य) उसके; १) । तवु-पु० न० तप; (महा० ६८, (णे०) । तसिअ-वि० (सं० तृपित) तृषातुर, तवय -वि० (दे०) किसी कार्य में लगा पिपासित; (दे० ना० मा० ५, २)। . .
तसु (५१४) तांति ११,५; - उसका; गु० पै० १, . तसु-सर्व० (सं० तस्य) १. उसका; तहिं) वहाँ; (प० च० १, (की० १, १५) 1 २. उसे; (हे० ३४३, जंवू० ७, ६, १३)। १)। तहि-सर्व० सं० तस्य; तसुफेरा-सर्व० उनके; (की० २, तेनु; (संधि० १७, ७, ८) । १२५) । तहि तहि -अव्य० (सं० तन्न तन >प्रा० तस्स-सर्व० (सं० तस्य) उसके; (वी. तहि तहि) वहाँ-वहाँ; (की० ४, १, १) । तस्सु; (हे० ४१६, ३)। १६०) । तस्सेय-वि० (सं० तत् श्रेयस्) वह तही-स्त्री० (सं० तापिका) तई, थाली अपेक्षाकृत अच्छा, श्रेष्ठतर; (भ०) । के आकार की चौड़ी कड़ाही; (को० २, तह-अव्य० (सं० तन) वहाँ; (रा०)। १६२) । टि०-सं० तापिका शब्द हपं- तह; (प्रा० .० १, ११८)। चरित में प्रयुक्त हुआ है (तलक-तापक- तह-वि० (सं० तथा) १. उस प्रकार तापिका-ताम्र-चरु-कटाह- संकट- पिटक- का; (रा०)। २. वैसे; (प्रा० भारिकः, सप्तम उच्छ्वास, पृ० २११)। ५०) । ३. वहाँ; (सं० रा०) । ४. तथा; तहु-अव्य० (सं० तत्र) वहाँ; (महा (जंबू० २, ६, १२)। ६८, २) । सर्व० (सं० तस्य) उसका; तहरी-स्त्री० (दे०) पंकवाली सुरा; (महा० ६६, १८, १२) । (दे० ना० मा० ५, २) । तहे-सर्व० सं० तस्या; उसका; (हे. राहल्लिआ-स्त्री. (दे०) ३५६, १)। वाड़ा; (दे० ना० मा० ५, ८)। तहेय, (सं०. तथैव) उसी तहवि--अव्य० (सं० तथापि) तरह, उसी प्रकार; (पड्) । (जंबू० २, ६, १०)। तहेव-अव्य० (सं० तथैव>प्रा० तहेव, तहा--अव्य. (सं० तथा >प्रा० तहा, तहेय) उसी तरह, उसी प्रकार; (५०. तह) उसी तरह, "तहा वत्थुरूवं अहंबु च० १६, १२, ८)। द्धिलुद्धा;" (जंबू० १, १८, १२)। तहों-अव्य० (सं० तत्र) वहाँ, उस में; २. वहाँ; (की० ४, २०७) । (प० च० १२, २, १)। तहाभूय-वि० (सं० तथा+भूत >प्रा० तांडव-पुं० सर्वलघु त्रिकल गण (1) तहा, तह+भूय) उस प्रकार का; (प० का नाम; (प्रा० ५० १, २०) । च० २२, ६५) । तांतण-पृ० (सं० तन्तु>प्रा. तंतु) तहि-अव्य० (सं० तत्र) वहाँ ही, तुल० सूत, तागा, धागा; तुल० गु० तांतणो; मगही तहि, (सरहपा, दोहाकोश; महा० (प्रा० गु० २७, ४, ३) ६८, ८)। २. तव; (की० ४, --अव्य० (सं० तनव) वहाँ पर २२७)। ही, (उ० व्य० प्र० २०.१०) । तोह-अव्य० (सं० तत्र >प्रा० तहि, तांति-स्त्री० (सं० तन्तु) चमड़ या गौओं का -अव्य. तो भी;
.. ता (५१५) ताडिय - ० नसों की बनी हुई डोरी; भेड़, बकरी की ताए-सर्व० (सं० तया) उसके द्वारा; अंतड़ी या चौपायों के पुट्ठों को बटकर (जंवू० २, १७, ६) । क्रि० वि० (सं० बनाया हुआ सूत, तांत; (कण्ह० चर्या० तदा>प्रा० तया) तब, उस समय; (व १०)। १, १४, ७)। ता'-अध्य० (सं० तावत् >प्रा० ताव) ताक-पुताकना;स्थिर दृष्टि से देखना; इन अर्थों का सूचक अव्यय १. तब तक, (सं० रा०)। २. तव, उस समय; (प० च० २, १०, १; ताकि-पू० का० कि०, देखकर, भांप- जंबू० १०, ५, १२)। कर; (की० २, १८४)। ता'--सर्व० (सं० तद्) उस; (को० १, ताग-पु० (पह० ताक, फ़ा० ताग) धागा; (रा०)। ता'-अव्य० (सं० तदा) तब; (क० १, ताजी, ताजि-पु० एक अरबी घोड़ा; ११, ४; महा० ६८, ३) । (की० ४, २८, ४, ६२) । ता-पु. तात, आदि गुरु चतुष्कल ताडंक--पु० (सं० ताडक) कान में गण (Sil); (प्रा० ५० १, २६) । पहनने का आभूषण-विशेष; कुडल, ता-० (सं० तात) पिता, वाप; ताटक; (दे० ना० मा० ६, ६३; सं०- क० ३, १६, ८)। रा०)। ताई ताई सर्व० (सं० तानि-तानि) 1/ताड-(दे०) विस्तार करना, गुणा- उनका-उनका; (जंबू० ४, १२, १४) । कर करना; २२, १३) । ताइमि-सवं० (सं० तानि+अपि) ताडिज्जइ-कर्मवा० तानना; "अंगणि उनका भी; (जंबू० ४, ४, ६) । चंदोवउ ताडिज्जइ;" आंगन में चंदोवा ताइय-पु० ताजिक, पाशिया, पारस या तानना चाहिए; (सुअंध १, १२, १)। फारस देश, देश-विशेप-नाम; (जंवू० ६, Vताड-(सं० ताडय् >प्रा० ताड) १६, १०)। ताड़न करना, पीटना । -इ सक० (सं० ता-~-अव्य० (सं० तावत्) उस समय ताडयति); (भ०; जंबू० ६, ८, २०) । तक; (रा.)। २. आघात करना, बजना। ताडिय- ताउँ'-अव्य ० (सं० तावत्) तभी तक; भू० का०; बजी; (प० च० १२,१०, (हे. ४०६, २)। ८)। ताउ-अव्य० (सं० तावत् >प्रा० ताव) ताडण-न० (सं० ताडन>प्रा० ताडण) तब तक, उस समय; (क० ताड़न, पीटना; (जस० ४, ६, ११)। ताडिप्रय-न० (दे०) रोदन, रोना; ताउ-पु. १. (संताप) उष्णता, (दे० ना० मा० ५, १०)। गर्मी; (जंबू० ८, १४, ८) । २. (सं० ताडिय--वि० १. (सं० ताडित >प्रा० तात) पिता; (विला०)। ताडिअ) जिसका ताडन किया हो वह; (प्रा० गु० १,६, ताग (५१६) तार : पीटा हुआ; (जस० २, ७, ३) ! २. वि० (उ० व्य० प्र० १४-२८)। (दे०) विस्तारित; (प्रा० गु० २६, ताम-१. पुं० (सं० ताम्य>प्रा० अप० १७)। तम्म) खेदयुक्त क्रोध; (की० ४, ३७) । तारण-सर्व० (सं० तान्) उन्हें; (हे० २. सर्व० (स्त्री०) (सं० ताम्) वह; ३३१, १)। (वी० १, २) । अव्य० (सं० तावत् > ताणन्नरें-अव्य० (सं० तदनन्तरम्) प्रा० ताव) १. तब तक; (भ०)। उसके अनंतर; (प० च० १५, १, २. तव; (व० १, १०, १)। --हि, हिं ७)। तब तक; (सुदं० ६, १६, ६; जंवू० २, ताण-मुक्कु-वि० (सं० मुक्तत्राण) २, ११)। संत्रास से मुक्त; "पयिञ्चेवि वन्द वि तामर-वि० (दे०) रम्य, सुदर; (दे०- ताण-मुक्कु" -वहाँ सन्त्रास से मुक्त ना० मा० ५, १०)। जिन की प्रदक्षिणा और वंदना की; तामरस-१० (दे०) जल में (प० च० १०, २, ८)। होने वाला पुष्प; (दे० ना० मा० ५, तारण्य-न० (सं० त्राण >प्रा० ताण) १०)। शरण, रक्षण; (भ०) तामलित्ति-स्त्री० (सं० ताम्रलिप्ति) ताणावलि-स्त्री० (सं० तान (स्वर- पुरी (+नगर)-विशेष; एक प्राचीन ताल)+आवलि) स्वर-लहरी; "नं नगरी; (क० १०, १०, ५) । अणंगमंगुलिताणावलि;" अर्थात् मानो तामस-वि० (सं० तामस) तमोगुण अनंग की अंगुलियों से उत्पन्न होने वाली वाला, (प० च० ८, ५०) । पुं० पाप, स्वर-लहरी हो; (जंवू० ४, १३, ३)। तामस (भाव); (जस०. २, ११, ३) । ताणु-न० (सं० त्राण>प्रा० , ताण) तामसत्य-न० (सं० तामसान) कृष्ण रक्षणकर्ता; (प० च० १३, १०, ३)। वणं का अस्त्र-विशेप; (प० च० ५६, लइय-ताणु-(त्राण, कवच और तान) ६३)। (प० च० १३, १०, ३)। तामिच्छ-० (दे०) कज्जल; (सं0- तात-वि० (सं० तप्त) गरम; (की० रा०)। ३, ३६) । ताय-पु० (सं० तात) पिता; (क० ७, तातडी-स्त्री० (दे०) चिता; (प्रा० गु० १५, २)। ३८, ४६)। तारंकिय–क्रि०, भू० का० (सं० तारा- तातल-वि० (सं० तप्त>प्रा० तत्त) कित) तारे निकल आए; (व० ५, १२, गरम; तुल० मैथिली तातल; (की० २, २)। १७५) । तार-स्त्री० (सं० प्रा० तारा) १. मांस तातो-अव्य० (सं० ततः) उससे; "तातो की पुतली; (प० च०१, ४, ६)। अम्हे ईहां आछ' –'ततो वयमिहास्महे; २. तारा, नाम-विशेप; (भ०; व० १, ५, - तार (५१७) ताल का०, तारेगा; प्र० २१, - ८) । पु० असुर देवता; (क० २, २, तारिय-वि० (सं० तारित) पार उतारा ३) । वि० (सं० प्रा० तार) विशाल, हुआ; (भ०)। उच्च; (जंवू० ७, १, ५)। तारुण्ण-न० (सं० तारुण्य >प्रा० तारु- Vतार-(सं० तारय्) तारना। -इ पण, तारुन्न) यौवन; (प्रा० पै० २, व० (जंबू० ११, २, १०)। २. सफल १८७)। -कंदपु० (सं० तारुण्य+कन्द > बनाना; (को० ४,३३)। तारिह-भ० प्रा० तारुण्ण+कंद) तारुण्य रूपी वृक्ष; (उ० व्य० (जंवू० ४, १६,१३)। -य (सं० तारु- २०)। ण्य+क); (जस० १, २४, ८) । तारुन्न; तारअ'-पू० (सं० तारक>प्रा० (व० ३, २०, १०; की० २, १३३) । तारग) ग्रह-नक्षत्र; (रा०) । तारोह-० (सं० प्रा० तारा+ओघ) तार'-पु० तारक छंद, एक वर्णिक नक्षत्र-समूह; (जंवू० १०,१८, १०) । छंद; (प्रा० ५० २, १४३) । तालंक-पु० (सं० ताडङ्क) छंद- तारग-पुं० तारक, द्वितीय प्रतिवासुदेव; विशेप, ताटक, स्कंधक का भेद; (प्रा० ५० (प० च० ७०,३७)। १, ७५)। तारजसु-पु. (सं० तार+यशः) यशो- तालंकि-पु स्त्री० (सं० तालकिन्) गान, "गाइज्जइ संतिउ तारजसु;" अर्थात् छंद-विशेष, ताटंकी, रसिका छंद का भेद; शांतिनाथ का महान् यशोगान (प्रा० पैं० १, ८६)। (जंवू० १, ४, ५)। तारय-वि० (सं० तारक>प्रा० तारग) ताल-पु० (सं० प्रा० ताल) ताल वृक्ष तारने या पार लगाने वाला; (प्र०- का फल; (दे० ना० मा० ६, १०२)। चि०)। स्त्री० वाद्य-विशेप; (प्रा० गु० ३२, ३) । सारा-स्त्री० (सं० प्रा० तारा) पु० (सं० तालः) (छंदशास्त्र में) अंत १. नक्षत्र (व० १०, ३४, ३)। लघु निकल; (प्रा० २, ११०)। २. मोती; "विलंवंतहारावलीतेयतारा, न० विशाल तालवृत (पंखा); (व० ६, अति उसकी लटकती हुई हारावली के १३, २)। -अ न० ताला, द्वार बंद मोती दीप्तमान हो रहे थे; (जस. ४, करने की कल; (जंवू० ३, ११, ६)। १७, २०)। -णियर (सं० तारानि -प्फली स्त्री० (दे०) दासी, नौकरानी; कर) तारा-पुज; (जस० २, २६, २)। (दे० ना० मा० ५, १)।-वत्त न० (सं० -यण पु० सं० तारागण, नक्षत्र-समूह; तालपन) ताड़ का पत्ता; (प० च० २६, (सं० रा०; व० ३, २१, १०)।-वलि १६, ७)। -हल पुं० (दे०) शालि, स्त्री० (सं०तारा+आवलि)तारों की पंक्ति; चावल; (दे० ना० मा० ५, ७) । तालु- (जस० २, २, ५)। -हिवइ पुं (सं० पुं० वाद्य-विशेष; (जस० ताराधिपति) चंद्रमा; (सं० रा०)। १८)। किया; ० ० ० ताला (५१८) तासिम धान का तापित>प्रा० तापित>प्रा० ताला-स्त्री० (दे०) खोई, नदी-विशेष; (५० च० २७, ११, लावा; (दे० ना० मा० ५, १०) । ७)। तालिय-वि० (सं० ताडित >प्रा० ताविन-वि० (सं० तालिअ) आहत, पीटा हुआ; (प० च० ताविअ) तपाया हुआ, गरम किया हुआ; १३, ८, १; जस० ३, १२, १३) । (क० ६,१२, ५)। ताली-स्त्री० एक बणिक छंद; (प्रा०. ताविच्छ-पुं० न० (सं० तापिच्छ) प० २, १७)। तमाल का वृक्ष या फूल; (दे० ना० मा० तालु-न० (सं० प्रा० तालु) तालु, मुह १, ३७) । के ऊपर का भाग; (जंबू० २, ताविय-वि० (सं० ११) । “तालू सुक्कइ जेरण;" (पाहु०) । ताविअ) तप्त, तपाया हुया; (जत० ३, तालुर-पु(०) १. फेन, २. कपित्य- ३, १६; व० १,१४, १३)। वृक्ष; ३. पानी का आवर्त; (दे० ना०. ताविर्याड-स्त्री० ताप्ती-तटी, ताप्ती मा० ५, २१)। तटवासिनी स्त्री; "तावियडिवियडचुंवि- ताव-अव्य० (सं० तावत् >प्रा० ताव) यनियंवु;" अर्थात् ताप्ती तट की तलणियों तब तक, उसी समय तक; (प० च०६८, के विस्तीर्ण नितंबों को चूमने वाला; ५०; जबू० ८,१४,३;क० १, १३, (जंबू० ४, १५, १२) । २) ; ता; (को० ३, १५३)। -हिं तावी-स्त्री० (२० तापी) नदी-विशेष; अव्य० १. तव तक; (प० १० २, २, (प० च० ३५, १)। पुन .न. १) । २. वैसे ही; (प० च० ३, ४. (सं० ताप्ती- तट>प्रा० तावी तड ८)। ताप्ती नदी का तट; (जंवू० ६, १६, Vताव-(सं० तापय् >प्रा० ताव) ८)। तपाना, गरम करना । --हि (विधि०) । तास-पु० (सं० वास>प्रा० तास) (जं० १०, २,६)। भय, डर; (संधि० १२, ३, २७) । ताव-पुं० (सं० ताप>प्रा० ताब) ताप, तासमो-सर्व० (सं० तस्य) उनसे; गरमी; (जस० १,१३, १)। (की० २, ११७)। तावण-पु० (सं० तापन) इक्ष्वाकु वंश तासण-वि० (सं० का एक राजा; (प० च० ५, ५)। तासण) वास उत्पन्न करने वाले; "सीह तावलिप्पि-पुं० (सं० ताम्रलिप्ति) व करितासणु दादाभीसगुः" (जस० १, नगर-विशेष-नाम, तमलुक (बंगाल)। १६, १५)। (जवू. ६, १६, ६) तासिम-वि० (सं० त्रासित) नस्त किया तास-पुं० (सं० तापस) तपस्वी, हुआ, डराया हुया; (भ०) । योगी; (भ०; क०८, ८,३)। (व० २, ६, ५) 1 तासिय; (जस० १, ताविस-स्त्री० (सं. तापी>प्रा० ताबी) ६, ८)। -यड वासन>प्रा० तासिउ, -- तासु (५१६) तिक्ख तासु-सर्व० तिअल-पुं० कर ८, (व० १, ०- (सं० तस्य) उसकी, योग से बने पदों को तिङन्त पद कहते हैं; (विला०; परमा०) । उसका; (णे; हे० (प० च० ४, ११, ३) । ४०१, ४) । उससे; (विला०)। (सं० निकल) तीन तासे वि -पू० का० क्रि०, (सं० त्रास) मात्राओं का शब्द, निमात्रिक; (प्रा० ५० संत्रस्त (प० च० १६, १, ११८)। तिआ-वि० (सं० त्रि) तीन; (प्रा० ५० ताहं.-सर्व० (सं० तेषाम्) उन्हें; (हे. १, १३)। ४०६, १)। तिइल्लु-पुं० (सं० त्रैलोक्य) स्वर्ग, मर्त्य ताहां-अव्य० (सं० ततः) वहां, वहाँ से, और पाताल ये तीनों लोक; तव; (उ० व्य० प्र० १४-२६)। १०, १०)। ताहि कर-सवं० उसका, उसके; (को० तिउरिणय-वि० (सं० विगुणित) तिगुना; १, ८४)। टि- -की० में कर, केर (भ०) । आदि परसों का प्रयोग द्रष्टव्य है। तिउणु-वि० (सं० त्रीणि) त्रीणि) तीन; Vताही-(सं० वास्यति) त्रस्त करना; (महा० ६८, २, ६)। (भ०) । तिराउमुह-पु० विद्याधर राजा; (प०- ताहे-सर्व० (सं० तस्या) उसके लिए; च० १०, २१)। (व० १, ६,१०)। तिउल-पुं० वाद्य; (सुदं० ७, ६, निगिआ-स्त्री० (दे०) कमल-रज; ५)। (दे० ना० मा० ५, १२) । तिउली-स्त्री० वाद्य-विशेष; (प्रा० गु० तिगिच्छ-स्त्री० (दे०) कमल-रज, ३२, ३)। पद्म-रज; "मरुद्ध्यतिगिच्छविच्छड्ड- तिफाल-पुं० (सं० विकाल) तीन काल- पिंगं," अर्थात् वायु में उड़ती हुइ पुष्परज वर्तमान, भूत, भविष्य; (भ०) । के विखराव से सब ओर पीलापन दिखाई तिकूट-पु० (सं० त्रिकूट) पर्वत-विशेष- दे रहा था; (जस० ४, १७, १३; दे०. नाम; लका के समीप का एक पहाड़, ना० मा० ५, १२) । ति-वि० (सं० त्रि>प्रा० ति) दो और सुवेल पर्वत; (प० च० ५, १२७)। एक, तीन; (प्रा० ५० १, १२; जस० १, - पव्वय पु० पर्वत-विशेष; (प० च० ४, ६) । अव्य० इति; (प्रा पै०१, ४८, ५१) । विकूटसिहर-पु० पर्वत- २२; सुदं० ३, १०, २०) । सर्व० (सं० विशेष; (प० च० ८५, २५) । ते) वे; (हे० ३३०, ४)। तिक्खंकुड-पु० (सं० तीक्ष्ग+अकुड) (सं० त्रि>प्रा० ति) तीन; (हि० का०, फाली; (जंबू० ६, ४, ८)। च० २८) । तिक्खुकुस-पुं० (सं० तीक्ष्ण+अङ्कुश) तिमन्त-पु० (सं० तिडन्त) धातुओं के पना अंकुश; (जंवू० ७, ८, ३) । आगे 'तिङ् विभक्तियां लगती हैं । उनके तिक्ख-वि० (सं० तीक्ष्ण >प्रा० तिक्ख) - . -अवि० तिक्ख (५२०) तिवा ४, २६, १४)। (जंबू० १, तीनों जगत् के तीखा; (प्रा० पं० २, १२६; २० २, तिगुत्ति--पु मुनि-विशेष-नाम; (प०- २०, ३; क० २, ३, ३)। -कडक्खउ च० ४१, १६) । २. स्त्री० त्रिगुप्ति वि० (सं० तीक्ष्ण + कटाक्ष + वत्) तीखे (कायवाङ्मनोगुप्ति); (जस० कटान वाली; (जंवू० ३, १०, —क्खर पु० न० (सं० तीक्ष्ण + अक्षर) तिछत्त-पु. (सं० विक्षन >प्रा० ति+ सूक्ष्म अक्षर; (जंबू० २, १३, ४)। छत्त) तीन छत्र या छाता; -सिङ्गापु (सं० तीक्ष्णशृङ्ग) "कहि १७, २) । जि तुङ्ग-अङ्गया हयारि- तिक्खसिङ्- तिजग-न० (सं० त्रि+जगत्) स्वर्ग, गया," (प० च० ३२, ३, ११)। - मर्त्य और पाताल लोक; (जस० ४, (तिक्खा) वि० (सं० तीक्ष्णान्) तीक्ष्ण; १३, १०)। . मंतर अव्य० (सं० त्रि (हे० ३६५, १)। +जगत् + अभ्यंतर) /तिक्ख-(सं० तीव्णय >प्रा० तिक्ख) भीतर; (झस० ४, १३, १०)। तीक्ष्ण करना। तिक्तेइ-सक० (स० तिजड-पुं० (सं० त्रिजट) विद्याधर तीक्ष्णयति); (हे० ३४४)। वंश के एक राजा का नाम; (प० च० तिक्ख-वि० (सं० तिक्त) नीम या १०, २०) । चिरायते के-से स्वाद वाला, (जस० २, तिजय-न. (सं० त्रि+जगत्) तीनों २४, ५)। लोक स्वर्ग, मर्त्य और पाताल लोक; तिखालिम-वि० (दे०) तीक्ष्ण किया (जंवू० १, १२; व० २, ११, १२)। हुमा; दि० ना० मा० ५, १३)। -हिव (तिजयाहिव) पु० (सं० विज- तिखंड-पु० (सं० त्रिखण्ड) तीनों गदाधिप) तीन लोकों का अधिपति; खण्ड; (व० ६, १, ६) (व० २, १५, १)। तिखंड.हि इ—पु० (सं० निखण्डाधि तिजंच-पु० (सं० तिर्यञ्च >प्रा० पति >प्रा० तिखंडाहिवइ) अर्वचकब । तिरिअंच) पशुगति; (जंबू० १०, १७, राजा वासुदेव; (प० च० ६१, २६) । १६)। तिगाम-पु० विगाम, स्वरों का समूह तिज्ज-वि० (स० तृतीया) तीसरी; "तं पुज्ज करें वि आढत्तु गेउ । मुच्छण- (सु०) । -अ वि० (सं० तृतीय+क कम-कम्प-तिगाम-भेउ;" वह गान मूर्च्छना तीसरा; (म० १, २, ४) । क्रम,कप और त्रिगाम, पड्ज, ऋषभ, तिढ़-वि० १. (सं० वस्त) त्रासदा- गांधार, मध्यम, पंचम, धवत और यक; (जस० ४, १०, ११) । निपाद इन सात स्वरों से युक्त था, (५०. तिट्ठ-वि० (सं०तिष्ठ)विद्यमान, खड़े च० १३, ६,८)1 हुए; "लइ सुन्दरि ताव तिठ्ठ णयरें; तिगुण-वि० (सं० त्रिगुण) तिगुना; (प० च० ३०, ३, ८)। (प्रा० ५० १, २०२)। तिळा--स्त्री० (सं० वृषा>प्रा० तिड (५२१) तित्ययर . % 3D धूप (प.. , तिसा) तृष्णा, प्यास, पिपासा; (महा० का छत्ता; (दे० ना० मा० ५, ११) । संधि०६८)। तिण्ण-वि० (सं० नीणि) तीन; (दो०. तिडइ-क्रि०, २०; तिड़कती है, टूटती को०)। है; (सं० रा०)। तिण्णि-वि० (सं० त्रीणि) तीन; (प्रा० तिडिक्क-स्त्री० अग्निकणिका तुल० गु० पै० १, ८; जस० ४, १७, १६)। तणखो-चिगारी, तडको -आ वि० (सं० त्रीणि+क) तीन; च०४८,६, ३; सुदं० ११, १८, (प्रा० पं० २, ७६)। ---तीस वि० (सं० त्रीणि+त्रिंशति) तैतीस; (जंवू० तिडिदिकयं-वि० (दे०) छींटों से युक्त; ११, १०, ६)। (जंवू० ७, २, ६)। तित्त-वि० (सं० तृप्त>प्रा० तित्त) तिडिपिडन्त-कृ० तड़फड़ाते हुए; (म० संतुष्ट; (भ०)। २, ३७, २)। तित्तहि-अव्य० (सं० तत्र) वहाँ; तिड्ड-पु स्त्री० (दे०) शलभ, तुल० (जंबू० ३, ८, २)। गु० तोड; (संधि० ११, ५, ५) । तित्ति-स्त्री० १. (सं० तृप्ति>प्रा० तिण-न० (सं० तृण>प्रा० तिण) तित्ति) तृप्ति, संतोष; (प० च० २, ७, तृण, घास; (जस०. १, २१, ११)। २; सुदं० १, १, ५; क० १०, १०, ५)। तिणु-तृण; (क० ८, १६, ८; व० २, २. (दे०) तात्पर्य, सार; (दे० ना० मा० १४, ६)। -मय वि० (सं० तृणमय) ५, ११)। तृण-युक्त; (जंबू० ८, १३, ३)। तित्तिरिम-वि० (दे०) स्नान ते आर्द्र; -वन्त वि० (सं० तृणवत्) तृण-समान; (दे० ना० मा० ५, १२) । (भ०)। -सम वि० (सं० तृणसम) तित्तिल-वि० (सं० तावत्) उतना; तृण-समान; (जंबू० ३, १, ८)। (षड्)। तिरण-पु(सं० त्रिनयन) शिव; तित्तुम-वि० (दे०) गुरु, भारी; (दे०- (प्रा० पै० २, १३८) । तिणयण; (प०. ना० मा० ५, १२)। च० १, ६, २)। तिणयणु; (व० ३, तित्य-न० (सं० तीर्थ>प्रा० तित्य) २२७७)। तीथं; (जस० ४, २७, १०, हे० ४४२, तिणाणी-वि० (सं० त्रि+ ज्ञानिन्) २) । तित्यइं-न० तीर्थ; (पाहु.)। तीन ज्ञानों से युक्त; (रि० ८, ६) । -वर न० बड़ा तीर्थ; (क० ५, ६, तिणि-न० (सं० तृण>प्रा० तिण) ६)। तृण, घास; (व०४, १०, १४)। वि० तित्यंकर-पु. (सं० तीर्थकर) तीर्थ- (सं० त्रीणि) तीन; (प्रा० ५० १, कर भगवान महावीर; (सुअंध० १, ४८) । ३)। तिणिस-न० (दे०) शहद की मक्खियों तित्ययर---पु० (सं० तीर्थङ कर) तीर्थ- तित्ययरत्तणाई (५२२) तिमुण्ड मा० ५, - व० १०, फर, शास्त्रप्रवतंक; (जस० १, २, ८) । तिम-अव्य० १. इसी प्रकार; (पाहु.)। तित्ययल (व० २, ११, १२)। -त २. वैसे, त्यों; (सं० रा०; पाह०) । पुं० (सं० तीर्थकरत्व) तीर्थकरत्व; ३. तथा; (भ०)। (जं० ११, ७, ८)। तिमरारि-पु. (सं० तिमिरारि) तित्ययरत्तणाई-न० (सं० तीर्थकरत्व (सं० तीर्थकरत्व चंद्रमा; (व० ७, १५, ७) । >प्रा० तित्ययरत्तण) जिन देव के प्रव तिमिगल-पुं० (सं० तिमिङ्गिल) मत्स्य चन या मत का भाव; (प० च० ३,११, की एक जाति; (दे० ना० १)। १३) । तित्यु-अव्य० (सं० तत्र) वहाँ; तिमिगिलि-पु० (सं० तिमिङ्गिलि) (जस०)। मत्स्य की एक जाति, (प० च० २२, तिय--अव्य० (सं० तन्न) वहाँ; (प्रा०. ८३) । गु० २७, २, २)। तिमि-पु० (सं० तिमि) मत्स्य को एक तिथिमानिल-पु० (सं. तीर्थयात्रि- जाति; (प० च० १४, १७, कान्) तीर्थयात्री; (उ० व्य० प्र० ५१- १०, ४)। २८)। तिमिच्छय, तिमिच्छाह-पुं० (दे०) तिदंड-न० (स० विदण्ड) निशूल, पथिक, (दे० ना० मा० ५, १३) । "चूलासहिउ दिदंडु बारेविणु;" अर्थात् तिमिरण-न० (दे०) गौला काष्ठ; चूला (शिखा-जटा) सहित त्रिशूल धारण (दे० ना० मा० ५, ११) । कर; (द० २, १६, २)। तिमिर-न० (सं० प्रा० तिमिर) अंध- तिनयण-पु० (सं० त्रि+नयन) महा कार; (व० १, १७, ७; प्रा० देव; (जंवू० १, १०, ८) । -तणु पु० ७३) । (सं० त्रि+नयन+तनु) महादेव; (जंबू० तिमिरावरिउ-वि० (सं० तिमिरावृत्त) ५, ८, ३६)। संधकार से ढका हुआ; (व० २,२१, तिनि-वि० (सं० त्रीणि>प्रा० तोणि) ६)। तीन; (को० १, ६०) । मिरिच्छ-पुं० (दे०) वृक्ष-विशेप; तिपंचासइय-वि० (सं० त्रिपञ्चाश) करंज का पेड़; (दे० ना० मा० ५, तिरपनवां; (५० च० ५३, १५०) । १३)। 1तिप्प-(सं०/तृप्> प्रा० तिष्य) तिमिल-स्त्री० न० (सं० तिमिल) वाद्य- तृप्त करनाः (जस० ४, ३१, ११)। विशेष; (प० च० ५७, २२) । तिप्पंति व०, व०, तृप्त होते व०, तृप्त होते हैं; (सं०. तिमुण्ड-पुं० (सं० द्विपुण्ड) त्रिपुड रा०)1 चंदन, राख या गोवर से बनाई हुई तीन जिनंगी--पु० (सं० त्रिभंगी) छंद- रेखाएँ, “के वि तिमुण्ड-धारि वम्भा- विशेष; (प्रा० पैं. १, १६४) । रिय;" (प० च० २३, १५, ४) । पं० २, तिम्मई (५२३) तियसोवास % 3D तिम्मइ-क्रि० (सं० तिम्यति) भीगना, को घेल कर छौंक दिया; (जस० ३, ५, भींजना; (हे० ४१८)। ११)। तिम्मण-पु० न० (सं० तेमनम् = तियमयः पुं० (सं० निकमय) निक चटनी, मिर्च मसाला, जो भोजन को (अधर, रमण व नितंव); "एरिस-तिय- रुचिकर बनाए) चटपटा खाद्य; अचार मय पोग्गलखंधएँ अप्पउ नाणवंतु को चटनी; (संधि० ११, १, २०; सुदं० ५, वंघऍ;" अर्थात् ऐसे (जुगुप्सनीय) त्रिक ६, १०; जस० २, २४, ५)। (अधर, रमण व नितंब) -मय (स्त्री तिम्मरणय-पु० (सं० तेमनम्) एक रूपी) पुद्गलस्कंध में कौन ज्ञानवान् प्रकार की कढ़ी; (प० ० २५, ११, अपने को बांधता है; (जंवू० ६,१, ८)। १३)। तिम्मिज-वि० (सं० स्तिमित) तर, ति-यण-स्त्री० (सं० तिय जन) स्त्री आर्द्र, गीला; (द० ना० मा० १, जन; (प० च० २६, ४, २) । ३७)। तिलिय-गुज-पु. वाच-विशेप की तिम्मिर-वि० (सं०/तिम् + इर) गूज; (सि० २, २२) । आर्द्र, लथपथ; (सुदं० ६, ६, ६)। तियतंगण-स्त्री० (सं० त्रिदशाङ्गना) तिय-स्त्री० (सं० तिय) औरत, स्त्री; देवांगनाएं, (व० १, ११, ८) । (व० १, ४, १६)। -ख पुं० (सं० तियसंजय-पु राजा-विशेप-नाम; (१० नि+अक्ष) महादेव; (जंवू० ७, ४, च० ५, ५१)। १३)। -डड्ढ पुं० स्त्री का साहस तियस-पु० (सं० विदश) देवता; या ढाढम; (सुदं०८, ३०, ७)।-तण (जंबू० २, ४, १)। पुं० स्त्रीत्व; (जंबू० ६, १, १५)। तियतगेहु-न० (सं० विदशगृह) स्वर्ग -दब्द पुं० स्त्री रूपी धन, (जंबू० ६, विमान; (व० ३, २, ५)। १, १५) । -मइ स्त्री० (सं० तिय+ तियसणाह-पु० (सं० त्रिदशनाथ) इंद्र; मति) स्त्री-मति; (जस० २, ९, (व० १०, ३, ११)। तियसपत्ति-स्त्री० (सं० त्रिदशपत्नी) तियडय-पु० (सं० त्रिकडुक) त्रिकदु देवी; (जस० ४, २१, १७) । अर्थात् सोंठ-मिरच और पीपल, "तेल्ल तियस राउ-पुं० (सं० त्रिदशराज) इंद्र; काहि कढंति णिणिनउ;" तियडुयतोय- (व० ८, १७, ७) । सक्कि सित्तउ;' अर्थात् फिर उन्होंने तियसालय-पु० (सं० त्रिदशालय) उत्सकतापूर्वक लौटकर अग्नि की ज्वाला स्वर्ग; (व० २, २१, ७) । से संतप्त उबलती हुई तेल की कड़ाही में तियतावास-पु. (सं० निदशावास) मुझे डाल दिया और मुझ पर निकदु तीन स्थितियों में रहना; (व० अर्थात् सोंठ-मिरच और पीपल इन तीन ७)।
तियां (५२४) तिरोहित तिया--स्त्री० (सं० तिये) स्त्री; (महा० )। १, १५, ४)। तिरिष्छ–वि० (सं० तिर्यक्) तिरछा; तियाल-पु० (सं० निकाल) १. तीनों (जंबू० २, १८, १५) । समय-भूत, वर्तमान और भविष्य; तिरिच्छो-वि० (सं० तिर्यक) तिरछी; २. तीनो समय प्रात:, मध्याह्न और (हे० ४१४, ४) । सायं; (व० ३, ६, ३; जस० तिरिड-पुं० (दे०) वृक्ष-विशेष, तिमिर ७) । वृक्ष; (दे० ना० मा० ५, ११) । तियासी-वि० (सं० यशीति) अस्सी तिरिडिन-वि० (दे०) १. तिमिर- और तीन, तिरासी; तुल० गु० त्यासी; युक्त; २. खोजा, तलाशी ली गई; (दे०- (संधि० १, ४, १; महा०)। ना० मा० ५, २१)। तिरच्छ-वि० (सं० तिया) तिरछा; तिरिडिक्किया-स्त्री० (०) वाद्य- (सं० रा०)। विशेप; (प० ३० २४, २, ४) । तिरयण-पुं० न० सं० निरत्न ज्ञान, तिरिड्डि-पु० (दे०) उप्ण वात, गरम दर्शन और चरित्र; (जस० ३, १७, ७) । वायु; (दै० ना० मा० ५, १२)। —विवाज्जियन वि० स्त्री-रत्न से रहित; तिरिय-स्त्री० (सं० स्त्री) औरत; (रि० १०, २)। "वारहमए तिरिय णमन्त दिळ" बारहवें तिरयणु-पु० (सं० नियं) तींद्रिय में नमन करती हुई स्त्रियां,' (प० च० गोम (महन्त्र पाद वाला कानखजूरा); १, ८, १२) । पुं० (सं० तिर्यक) तिर्यच (द० १०, ६, १३)। योनि; तिर्यंच योनि, पशु-पक्षी की सृष्टि; तिरयह-पुं० (सं० तिर्य) पशु, पक्षी; "तिरिएसु णरएतु मणुएसु रुक्वेसु दुक्खाई (व० १०, ४, ५)। भुंजंति सम्गं कहं जंति,' अर्थात (वे) तिरहुति-पु० तिरहुत का राज्य; तिर्यत्र योनियों में, नरकों में मनुष्यों में (की० २,२७)। नौर (वृक्षों में जन्म लेकर भोगते हैं; तिरिगिच्छि-० वृक्ष-विशेप; (जंवू० (जस० २, १७, १७) । -लोम पुं० ५, ८,७)। (सं० तियंग्लोक) मनुष्यलोक; (जस० १, तिरिएख-पुं० (सं० दिय) जानवर ३, २)। (जो मनुष्य की भांति सीधा न चलकर तिरोड-पु० न० (सं० किरीट) मुकुट; टेड़ा चलता है), निम्न जाति बाभूषण-विशेष; (प० च० २, ३६; क. बुद्धिहीन जानवर; "पारउ पुणु हुउ जल ४, १०, २)। वरु यलयरु, गहयरु पुणु तिरिक्खु बहुअ- निरोवइ---वि० (दे०) वाड से वियुक्त यरू," अर्थात् नरकवासी होकर फिर जल किया हुआ "तिरोवइ वृत्यन्तरितः"; चर हुआ, यलबर व नभनर हुआ और (दे० ना० मा० ५, १३)। फिर तिर्यच हुआ; (जस० ३, २०, तिरोहित-वि० (सं० तिरोहित) छिपा का या तिलंगि (५२५) तिलिगसमण किया जाता हुआ, लिप्त, अंतहित; (को० २, तिलमेत-अव्य० (सं० तिलमात्र) तिल- २, १५)। भर, थोड़ा सार; "सक्कइन तिलमेत्तु;" तिलंगि-स्त्री० तेलङ्गी, तेलंग-तेलंगाना अर्थात् (वह) तिलभर भी नहीं चल (हैदराबाद) वासिनी स्त्री; (जंबू० ४, सका; (जंबू० ४, २२, १६)। १५, ८)। तिलय-पु. (सं० तिलक>प्रा. तिलग, तिल-पु० (सं० तिलः) तिल के पौवे तिलय) १. वृक्ष-विशेष; (प० च० ४२, का वीज, (उ० व्य० प्र० ५१, १; व० ६) । २. धनिक पुत्र; (प० १० ११८, ८, ५, १०) । तिल्ली का दाना (प्रा०- ४६) । पुं० (सं० तिलक>प्रा० तिलय, पं० १, १०)। –मेत तिलमान; (प०- तिलग) टीका, ललाट में १० ३, ११, १०)। चंदन या उवटन आदि से किया गया तिलप्र-पु० (सं० तिलक>प्रा० चिह्न (प० च० १३, १०, २)।-छेउ तिलग, तिलय) टीका, वह चिह्न जिसे पु० (सं० तिलक+छेद) राजतिलक का गीले चंदन केसर आदि से मस्तक, बाहु विनाश; "का वि भणइ हुवउ पियतिलय. आदि पर सांप्रदायिक संकेत के लिए छेउ," अर्थात् कोई कहती . है, प्रिय के लगाते हैं; (प्रा० पैं० २, १३८; क० १०, राजतिलक का उच्छेद हो गया; (जस० २५, १०; जस० १, १४, १०)। ४, २, ८)। -भूय पु० तिलकभूत; तिल-जंत-पु. (न० तल-यन्त्र) घाणी; (जंबू० ३, २, ३)। (संधि० ३, ११, ५)। तिलयदीउ-पु० (सं० तिलकढीप) द्वीप- तिलजलंजलि-स्त्री० (सं० तिलजला विशेप-नाम; 'खणि निलयदीउ सो जलि) तिलांजलि, मरने पर अंजुली में णियउ ताएँ;" (क० ७, १५, १)। जल और तिल लेकर उसके नाम से उसके नाम से तिलयतिरि-स्त्री० कुंघुजिन की माता; छोड़ना; "चिट्ठति ते तिल जलंजलिदाण (प० ० २०, ४३)। जोग्गा;" अर्थात् वे तिलजलांजलि देने के तिलयतुंदरी-स्त्री० रानी-विशेष-नाम; योग्य है; (प्रा० पै० २, १५१)। (प० २० २०, १२१)। जिलजद-पु० (सं० तिल+यवस्) तिलरिण-पु० तैलत्व, स्नेह; "अवरु- तिल और जौ; (जं० २, ६, १) । प्पर विरइग्लिरिणाह;" (क० ६, १०, तिलतार-पु० (दे०) स्नेहा "जिहिं ५) । सहुँ जसु तिलतारु सो ततु आजम्मु वि तिलहुगनि, तिलहमजि-पु० [सं० तिल हवइ;" (प्रा० गु० ३८, २३) । +हु(=हवन करना)>प्रा० तिलपिड-पु० (सं० तिल-+पिण्ड) हुण] तिलहोम, तिलदान, तिलांजलि; तिलों को खली, "तिलपिंडखंडेतु;" अर्थात् (की० ४, १५२) । तिलों को खली के टुकड़े (जस० ३, तिलिगसमण-पु० मुनि-विशेष-नाम; २७, ८)। (प० च० २०, १५५) । नप० तिलिमा (५२६) तिविठ्ठ - . . तिलिमा--स्त्री० (दे०) वाद्य-विशेप; तिल्लुक, तिलोक्क) स्वर्ग, मयं और (प्रा० गु० ३६, ६)। पाताल लोक; (म० १, ७, ४; जस० ३, तिलोअ-न० (सं० त्रिलोक>प्रा० १७, ६)। तिलोक्क, तिलुक्क) स्वर्ग, मर्त्य और तिल्लोकणाहु-पु० (सं० त्रैलोक्यनाथ) पाताल लोक; (प० च० ३, ११, १) । राम; (व० ६, १४, ४)। तिलोअण-पु० (सं० त्रिलोचनः) शिव; तिल्लोकाहिउ-पु० (सं० त्रिलोकाधिप) (प्रा० पैं० १, ७७)। राम; (व० १०, ४०, १३)। तिलोय-पु० (सं० त्रिलोक >प्रा० तिल्लोक्क-न० (सं० त्रैलोक्य >प्रा० तिलोक्क, तिलुक्क) स्वर्ग, मर्त्य और तिलुक्क, तिलोक्क) स्वर्ग, मयं और पाताल लोक ; (क० ५, ६,४)। -ग्ग पाताल लोक; (जस० १, १७, २१)। पुं० (सं० त्रिलोकअग्र) त्रिलोक का अग्र- तिव-अव्य० (सं० तथा>प्रा० तहा, भाग, अर्थात् भव्य जीवों के लिए निर्वि- तह) १. उसी तरह, २. और, तथा घ्न एवं समग्र मार्ग; (जवू. १,१८, ३. पाद-पूर्ति में प्रयुक्त किया जाता है; ७)। (हे० ३, ६७)। तिलोयग्गामी-वि० (सं० त्रिलोक+ तिवग्ग-पु. (सं० त्रिवर्ग) धर्म, अर्थ, गामिन् >प्रा० तिलोक्क + गामि) त्रिलोक काम; (व० १, १३, ५; जंवू० ४, ६, के अग्रभाग पर चलने वाले अर्थात् मोक्ष ६)। को प्राप्त कराने वाले मार्ग पर चलने तिवय-वि० (सं०:त्रि+पद) तीन पाँव वाले; (रि० २, १०)। वाला; (दे० ना० मा० ८, १)। तिल्ल-१. न० (सं. प्रा० तिल्ल) तिवलि-स्त्री० (सं० त्रिवलि, वली, तिल्ल नामक एक वर्णिक छंद; (प्रा० पै० बलि, बली) नाभि के ऊपर उदर ही की २, ४३) । २. न०. (सं तल>प्रा० तीन रेखाएँ या सिमिटनें । ये स्त्री के तिल्ल) तंल, तेल; (भ०)। सौंदर्य का चिह्न मानी गई हैं; (भ०; सं० तिल्लायरु-पु० (सं० तैलादर: अथवा रा०; रा०)। तेलाचरः) विवाह से कुछ समय पूर्व होने तिवार-अव्य० (सं० त्रिवारम्) तीन वाला संस्कार, जिसमें तैल और हलदी मर्तबा, तिवारा, तीन वार; (भ०; प०- का प्रयोग उबटन के रूप में च० २, २, ५)। दुलहिन के द्वारा किया जाता है; तिविठ्ठ-पु. (सं० त्रि+पृष्ठ, विष्टु) (भ०)। भरतक्षेत्र में उत्पन्न प्रथम अर्ध चक्रवर्ती तिल्लिय-पु. (सं० तैलिक) तिलों से राजा का नाम; (प० च० ५, १५५) । तेल निकालने वाला, तेली; (जं० १०, तिविद टु-पु० (सं० त्रिपृष्ठ) नारायण; ४, १५)। (व० ३, २३, १०) । २. प्रथम वासुदेव; तिल्लोअ-न० (सं० त्रैलोक्य >प्रा० (प० च० ५, १५५)। . दुलहा और ।
तिविडो (५२७) तिसूल को नष्ट " तिविडा-स्त्री० (दे०) सूई; (दे० ना०. संगीत-यंत्र; (प० २० २, ४, ८)। मा० ५, १२)। तिसरिय-न० (सं० विसरिक) वाद्य- तिविडी-स्त्री० (दे०) पुड़िया, विशेष संबंधी; (प० च० १०२, पुड़वा; (दे० ना० मा० ५. १२) । १२३)। तिविह~-वि० (सं० त्रिविष) तीन प्रकार तिसता-स्त्री० महावीर महावीर स्वामी को का, तिगुना; (भ०)। माता; (प० च० २, २२) । तिच्व-वि० (सं० तीव) १. दुःसह, जो तिसल्ल-० (सं० त्रिशल्य) मिथाय- कठिनता से सहन हो सके; २. अत्यंत, त्व, माया और निदान; "परियतिमुडु (दे० ना० मा० ५, ११)। २. तीव्र; तिदंडविहंडणु, छितिसल्लु तिलोयहु (जस० १, १६, ४)। मंडणु,” अर्थात् उन्होंने मिथायत्व, माया तिध्वप्पो-पुं० (२० त्रिवर्ग:) तीन और निदान इन तीनों शल्यों वर्ण "ताली ए जाणीए । गो कणो करके अपने को दैलोक्य का अलंकार बना तिव्वण्णोः अर्थात् यह ताली समझी लिया था: (जस० ३, १५, ६) । जानी चाहिए; (जहाँ) गुरु तथा कर्ण तिसा-स्त्री० (सं० तृपा>प्रा० तिता) (दो गुरु) अर्थात् तीन गुरु (सर्वगुरु) वर्ण पिपासा; (व० ६, १६, ३)। हों; (प्रा० पं० २, ११)। निसाइय - वि० (सं० तृपित > प्रा० तिब्बतम-पुं० (सं० तीव्र+तप> तिसाइय) तृषातुर, प्यासा; (पृ. १० प्रा० निवताव) व दाह या ताप; २६, ६, ४)। (जंवू० ६, १४, ३)। निसायन--वि० (सं० तृषित>प्रा० हिस-स्त्री० (H० तृपा>प्रा० तिता) तितिय) प्यासा; (जंबू० ६, ७, प्यास, पिपाता; (प० च० २, १२, १५)। ३)। तिसाहय-स्त्री० (सं० तिसठ्ठ-वि० (सं० त्रि+पप्ट) तिर- तिमा) प्यास; (महा० १२, ७) । सव्वां; (प० च० ६३, ७३) । निसिय-वि० (२० तृपित>प्रा० तितद्वि-स्त्री० (सं० त्रिपप्टि) तिरसठ तिसिय) प्यासा; (जंबू० ६, ७, ११) । की संख्या; (भ०)। तिसिर-पु. (सं० त्रिशिरस्) १. देश- तिसत्ति-पु० (सं० विशक्ति) एक विशेष; (प० २०६८, ६५) । २. राक्षस प्रकार का हथियार; (प० ५० १७, ६, योद्धा; (प० २०८, २७४) । ३. दाश- रथी राम का मित्र राजा; (प० २०६६, तिसरय-० (सं० त्रि+सरक>प्रा० ४६) । निमरय) वाद्य-विशेष; (प. व०६६, दि.सूल-पुं० (सं० निशूल) एक प्रकार ४४)। का बस्त्र जिसके सिरे पर तीन फल होते तिमि-त्री वीणा, एक प्रकार का है। यह महादेव जी का कृपा>प्रा० अस्त माना तिसूलिणि (५.२८) तीर गीला करना; प्र० ५१- जाता है; (व० १०, २५, १०)। -धर तिहुवन; (रा०)। पुं० (सं० त्रिशूलघर) शिव; (प्रा० ५० 1/तींव-(सं०५/स्तीम् >प्रा० तिम्म) २, १३८)। -पाणि पु० (सं० त्रि+ तर करना, आद्र करना, शूलपाणि) १. महादेव, शिव; २. त्रिशूल "मेघु वरिसत तींव मेघो वर्षन् तिम्वति । को हाथ में रखने वाला सुभट; (प० च० तिमू आभावे । (उ० व्य० ५६, ३५)। ६)। तिसूलिरिण-स्त्री० त्रिशूलिनी, कात्या ती-वि० सं० वि>प्रा० ति) तीन; यनी; (जस० १, १५, २०)। (प्रा० पै० २, ६४)। तिह-अव्य० (सं० तथा>प्रा० तहा) तीअ-वि० (सं० तृतीय) तीसरा; (प्रा० १. उसी तरह, २. और; (प० च० पं० १, ५४)। ३, १३, ८) । २. (सं० तत्र) वहाँ; तीखें-वि० ० पतला; "अटले अटले बाँधे, (जस० ३, १८, ७)। तीखें तरले काँवे;" (घोड़ों का) वंवदेश तिहत्तर-वि० (सं० त्रि+सप्तत) तिह- अट्टालक के समान ध्रुव था और ग्रीवा त्तरवा; (प० च० ७३, ३६) । प्रदेश पतला और चंचल था; (को० ४, तिहास-पुं० (सं० विभाग) तीसरा ४४)। हिस्सा; (प्रा० पं० २, १५१) । तोजउ-वि० (सं० तृतीय-+क) तीसरा; तिहिं-वि० (सं० त्रिपु) तीनों; (हे. अत्थि;" (प्र०- ३४७, १)। तिहिवार-पु० (सं० तारीखवार जैसे रविवार आदि; (जंवू० तीणि-वि० (सं० त्रीणि >प्रा० तोणि) तीन; (प्रा० पै०२, १२५.) । ३,४,१)। तिहुयण-पु० (सं० त्रिभुवन) तीन तीय-न० (सं० तीर्थ>प्रा० तित्य) लोक; (प्रा० गु० १४, ७; व० कोई पविन्न स्थान जहाँ धामिक भावना २,६, २) । से लोग यात्रा, पूजा या स्नान आदि के तिहुयणतिलअ-पु. (सं० त्रिभुवनति- लिए जाते हैं; (प्रा० गु० ७, १७) । लक) व्यक्ति-विशेष-नाम; (जंवू० २, तीमण-न० (सं० तेमन) कढ़ी, खाद्य- १८, २)। विशेष; (दे० ना० मा० २, ३५) । तिहुयरगाणंद-पु० पुंडरीय विजय का तीय-वि० (सं० तृतीया) तीसरा; चक्रवर्ती राजा; (प० ६३, (जस० ४, २८, १६) । स्त्री; (सं० रा०, रा०) । तिहुवरण-पुं० (सं० त्रिभुवन) तीन तीसरा; (सं० रा० २, ११२) । लोक-स्वर्ग, मत्यं और पाताल लोक; तीर-पुं० (सं० प्रा० तीर) किनारा; (प० च० १, ८, १३; क० ६, १, ६) । तट; (भ०; जं० १०, १०, ६, ६, ८)। " " तीजउ मागुन चि०)। तिथि+वार) च० ३४)। २, ४० सं० -उवि० .
तीरिय (५२६) तु .in ना. मा. ग्रहण कर २. (फ़ा तीर) बाग (को० २, पन; (प० च० ४, ६, ७)। १६३) । तुगिम-पु० स्त्री० (सं० तुङ्गिमन् > तोरिय-पु. (फ़ा० तीर) वाण, शर, प्रा० तुगिम) ऊंचाई, उच्चत्व; (जंवू० एक प्रकार का तीर; (प० च० १७, ६, १, १५, ११)। ३)। तुंगो-स्त्री० (दे.) रात्रि, रात; (दे०- तीरत्तार-पु० (सं० तीर+उत्तरण) ५, १४७ सुदं० ६, ६, तीर पर उतरना; (जंबू० ११, ८, ७)। ४)। तुंड-(दे०) स्त्री० न० तुण्ड, मुखः तीवण-न० (सं० तेमन) भोजन-विशेष; 'गिज्जति गेयाई चामुंडचंडाई, गहिऊण (भ०) । तुडेण रुंडस्स खंडाई;' अर्थात् वे अपने तीसंति-वि० (सं० त्रिंशति) तीस; निशति) तीस; मुख में रुण्ड के टुकड़ों को (प्रा० ५०) । चामुडा देवी के प्रचंड गीत गा रहे थे; तीस-वि० (सं० विंशत्) तीस; तुल० (जस० १, १६, १०)। गु० नीश; (प्रा० ५० १, ५७) । तुडोर-न० (दे०) मधुर विबी फल; सीतइम-वि० (सं० विश) तीसवाँ; (दे० ना० मा० ५, १४) । (५० च० ३०,६८)। तुडूअ-पु० (दे०) पुराना घड़ा; (दे०- तीसक्खरा-पु० (सं० त्रिंशत् +अक्षर) ना० मा० ५, १५)। तीस अक्षर; (प्रा० ५० १, ५८) । तुतुक्खुडिअ--वि० (दे०) त्वरा-युक्त; तीसम-वि० (सं० विश) तीसवां; (दे० ना० मा० ५, १६)। (भ०)। तुद-न० (सं० तुन्द >प्रा० तुद) उदर, तीसा()-यि० (सं० त्रिंशत्) तीस । पेट; (दे० ना० मा० ५, १४) । तुंग-वि० (सं० तुङ्ग>प्रा० तुंग) तुवत० (सं० तुम्ब>प्रा० तुब) ऊँचा, उच्च; (महा० ६६, १३, ६; सं० लौकी, तुंबी, अलावु; (प० च० २६, रा०; जस० २, ६, ३) । २. एक वणिक २४) । छंद; (प्रा० ५० २, ७२)। --उ वि० तुंबर-पु० (सं० तुम्बर) तबूरा; तान- ऊँचा; (व० १, १२, १२) । --ता पूरा, सितार की तरह का पुं० (सं० तुगत्व >प्रा० तुगत्तण) कुछ बड़ा एक बाजा; देवताओं की सभा ऊंचाई; (हे० ३६०)। -त्यणि वि० का एक गायक; (सं० रा०) । (सं० तुङ गस्तनी) उन्नत स्तनों से युक्त; तुबुरु'-पु० (सं० तुम्बुरु) वृक्ष-विशेष, (जस० ४, १७, २२) । तुगु; (महा०)। टिंबरु का वृक्ष; (दे० ना० मा०४, तुङ्ग-वि० (सं० तुग>प्रा. तुग) ऊँचा; (प० च० १३, ३, १)। ---त्तण तुंबूर-पु० आदि लघु त्रिकल ' गण का पु० (सं० तुङ्गत्व >प्रा० तुगत्तण) ऊँचा नाम; (प्रा० ५० १, १८)। - . परंतु उससे तु (५३०) तुहिक्क ना० टूटना। तु-अव्य० (सं० प्रा० तुं) तो; (रा०)। १४, १२)। तुल्खार---पु० (सं० तुष्कार) एक उत्तम तुढि--स्त्री० (सं० तुष्टि>प्रा० तुट्ठि) जाति का अश्व; तुल० गु० तोखार; खुशी, आनद; (सणतु० ४६०; जस० २, (भ०) । १६, २)। तुच्छ--वि० (दे०) अवशुष्क, सूखा हुआ; तुडि-स्त्री० (सं० त्रुटि>प्रा. तुडि) (दे० ना० मा० ५, १४) । २. तुच्छ; १. संशय, संदेह; तुल० म० तुटि; (प०- (जंवू० १, ६, ११)। च० ६, ३, ६) १२. न्यूनता, कभी, तुच्छइअ, तुच्छय-वि० (दे०) अनुराग स्पर्धा; "तसु थूलभद्दह सरिसु तुडि करि प्राप्त; (दे० ना० मा० ५, १५)। मयण-मल्लु विगुत्तओ; (प्रा० गु० ३०, तुज्झ-सर्व० (सं० तुह्यम्) आपकी; ३, ७)। (हे० ३७२, १)। तुडिअग-पु० (सं० नटिताङ ग) वाद्य तुम्()-सर्व० (सं० तुह्यम्) तुझ, तुझे; देने वाला कल्पवृक्ष; (प० च०१०२, (व० १०, १६, १) २. तुम्हारा; (प०. १२३)। च० १५, १४, ३)। तुडिन-वि० (सं० त्रुटित) टूटा हुआ, तुट्ट-(सं० त्रुट् > प्रा० तुट्ट) विच्छिन्न; (दे० मा० १, -इ व० (सं० त्रुट्यति) (जंवू० १५६)। १०, ४, १३; परम० २, ११) । तुटटंत- तुडिआ-स्त्री० (सं० तुटिका) आभरण- कृ० (सं० त्रुट+शतृ) टूटते हुए; (जंबू० विशेप; (५० च० ८२, १०४) । ४, ८,४) । -टंति ब०; (सुदं० १०, तुडिय-वि० (सं० त्रुटित) विच्छिन्न; ३, ४)। उ भू० का० (सं० त्रुटयतु) (जस० ३, १४, ४)। टूट गया; (हे० ३५६) । तुटवि-पू०. तुडि-वसिण-अव्य. अकस्मात् (प्रा०- का० क्रि०; (प्र० चि०) । तुट्टी-भू०. गु० १२, २६) । का० टूटी; (सं० रा०)।-ट्टेवि पू०- तुगय-पु० (दे०) वाद्य-विशेष; (दे०- का० क्रि० टूटने पर; (क०८, १, ६)। ना० मा० ५, १६)। ----ट्टन्त कृ० (प० च० तुणव-पुं० (दे०) वाद्य-विशेप, भेरी; २)। (प० च० २६, १४, ३; दे० ना० मा० तुट्ट-वि० (सं० त्रुटित) टूटा हुआ, ५, १६)। छिन्न, खंडित; (दे० ना० मा० १, ६२) । तुहि-पुं० (दे०) सूकर, सूअर; (दे०.. त्रुटित; (सुदं० ना० मा० ५, १४)। १५)। तुहि --वि० (सं० तूष्णीम्) चुपचाप, तुट्ठ-वि० (सं० तुप्ट) संतुष्ट; (जस० विना वोले या शोरगुल किए; (भ०)। १, ६, २३)। -मण पुं० न० (सं० तुहिक्क-वि० (दे०) मृदु- निश्चल ; तुष्ट+मनस) संतुष्ट चित्त; (जंबू० १, (दे० ना० मा० ५, १५) । - , अ. वि० - .
तुण्हिक्कियं (५३१) तुरमाणे -वि० (सं० मा० - तुहिविकय- तूष्णीक) मौन तुम्हे -सर्व० (सं० तुष्मे ) तुम सब, रहा हुआ; (सुदं० ८, १२, १)। उ० व्य० प्र० १४, २८)।-दुई सर्व० तुप्प-पु० (दे०) १. कौतुक, २. विवाह, (-द्वि) तुम दोनों; (उ० व्य० प्र० १६, ३. सरसों, धान्य-विशेष; ४. कुतुप, घी ६) । आदि भरने का चर्म-पान; (दे० ना-० तुरं-न० (सं० तूर) तुरही, वाद्य- मा० ५, २२) । ५. वि० चुपड़ा हुआ, विशेष; (व० २, १४, १) । घी आदि से लिप्त; ६. स्निग्ध, स्नेह- तुरंग-पुं० (सं० तुरङ ग) रामचंद्र का युक्त्त, प्रक्षित; (दे० ना० एक सुभट; (प० च० ५६, ३८)। २२) । न० (दे०) घृत; "अण्णेक्कहिं तुरंगकन्धर-पु० चक्रवर्ती अश्वग्रीव; हयारिपलकवलपथिप्पिरतुप्पधारयं । दाउं (व० ४, ११, ५)। भोज्ज मज्ज सुअ बहुरस विणियछुहवि- तुरंगम-पु. (सं० तुरङ्गम्) तुरंग, यारयं;" अर्थात् राजा ने अनेक विप्रों को अश्व; "मणगमणतुरंगमहिलिहिलंतु,' भैसे के मांस को प्रचुर घी की धारा अर्थात् मन के समान तीव्रगामी तुरंगों के सहित तथा मद्य, सूप आदि बहुत रस जो रूप में हिनहिना रहा था; (जस० ४, ७, क्षुधा को भलीभांति निवारण करने वाले ७) । तुरंगु; (व० ८, ४, ४)। हैं, ऐसे खाद्य-पदार्थ प्रदान किए; (जस० तुरंत-क्रि० वि० (सं० तुर) त्वरित, ३, ६,१)। शीघ्र; तुल० म० तुरुत; (क० २, १५, तुमा-सर्व० (सं० त्वम्) तुम; "सई उमा ३)। -उ कि० वि० तुरंत; (व० २, रखो तुमा,' सती उमा तुम्हारी रक्षा ४, ३) । तुरंतु; (ज० १, ६, २४) । करे; (प्रा० ५० २, ८) । तुम्हा; (प्रा०. तर, तुग-स्त्री० (सं० त्वरा) शीघ्रता; पै० २, १२३)। (दे० ना० मा० ५, १६)। तुमुल-वि० (सं० प्रा० तुमुल) भयं- तुरअ-पु० (सं० तुरग >प्रा० तुरय) कर; (प० च० १५, १५, ६) । अश्व; (जस० १, ५, १२) । तुम्ह-सर्व ० (सं० त्वम्) तुम; (उ०- तुरउ-पु० (सं० तुरग>प्रा० तुरय) २१, २०; रा०)। वि० घोड़ा; (क० ७, २, ७)। तुम्हारा; (की० ३, १६) । तुरप्रो-पु० (सं० तुरग) काव्य छंद का तुम्हती-सर्व० (सं० युष्मत्) तुम, आप; भेद, छंद-विशेष; (प्रा० (उ० व्य० प्र० १४, २७)। ११४) । (सं० तुमत्कार्यकः) तुरक्फ-वि० तीक्षण; (सं० रा०)। तुम्हारा, तेरा; तुल० गु० तमारा; तुरन्त-अव्य० (सं० त्वरित>प्रा० (भ०)। तुरिअ, तुर्) शीघ्र; तुल० गु० तरत; तुम्हारिस-वि० (सं० युप्मादृश) (प० च० ४, ३, ४) । तुम्हारे जैसा; (क० ८, १०, ६) । तुरमाण-अव्य० (सं० त्वर>प्रा० तुर) . - व्य ० प्र० ३० १, तुम्हार-वि० - - तुरय (५३२) तुलियं - . ना० मा० अनंतर, इतने में; (प० चं० १३, ४, स्तान; (जंबू० ६, १६, १०) । २. तुर्कि- १)। स्तान का निवासी; (को० २, १७)। तुरय-पु० (सं० तुरग>प्रा० तुरय) तुल० मगही तुरुक । अश्व, घोड़ा; (प० च० ३, ७४, मंहा० तुरुतुरिय-वि० (सं. तुरुतुरित) ६८, १०, ६; की० ४, ११०)। -विद ( (ध्वन्या०) । तूरध्वनि-युक्त; (सुदं० ७, पुं० • (सं० तुरंगवृन्द) अश्वों का समूह; ६, १५)। (जंवू० ७, ८, ३)। Vतुल-(सं०/तुल्) तौलना । -इ तुरय-वि० (सं० त्वरित >प्रा० तुरिअ) व० (सं० तुलयति) तुल० राज० तोलवो- स्वरायुक्त, उतावला; (म० २, ५.७, वो, तुलिअ; (प्रा० ५० १, १०) । तुलि- ४)। अउ-भू० का०, बराबरी की; (को० १, तुरयगलु-पु० चक्रवर्ती अश्वग्रीव (हय- ८०)। ग्रीव); (व० ४, १०, ६) । तुलकूड-पु. (सं० तुलाकूट) झूठे तुरिअ-अव्य० (सं० त्वरित प्रा० तराजू; (जस० ४, १६, ३)। तुरिय) शीघ्र, जल्दी; तुल० राज० तुरत; तुलग्ग-न० (दे०) १. काकतालीय (प्रा० पैं० १, ८; क० २, १०, ७)। (अचानक या इत्तिफाकिया होने वाला) तुरिउ-वि० (सं० स्वरित >प्रा० न्याय; (दे० ५, १५)। सुरिअ) उतावला । क्रि० वि० शीघ्र २. यदृच्छया, स्वेच्छा; (प० च० ४८, (प० च० २, १४, ८; जस० ४, ७, १३, २)। १२)। तुल-लग्ग-वि० (सं० तुलालग्न) तुला तुरिय-अव्य० (सं० त्वरित >प्रा० से चिपटा हुआ या लगा हुआ; (प० च० तुरिअ) त्वरित, शीघ्र; (सं० रा०)। ३०, २, ५)। तुरियणाणि-पु० (सं० तुर्य+ज्ञानिन् तुलसी-स्त्री० (सं० तुलसी) लता- >प्रा० तुरिअ+णाणि) चतुर्थज्ञानी, विशेष, तुलसी; (दे० ना० मनः पर्ययज्ञानी, "तुरिय णाणि पंचसय १४)। दियंवर;' अर्थात् पाँच सौ मनः पर्ययज्ञानी तुला-स्त्री० (सं० प्रा० तुला) तराजू, दिगंबर मुनि थे; (व० १०, ४०, ३) । तौलने का साधन; (प्रा० ५० १, तुरी-स्त्री० (दे०) १. पीन, पुष्ट १०)। २, शय्या का उपकरण; (दे० ना० मा० तुलाकोडि-स्त्री० (सं० तुलाकोटि,- ५, २२)। कोटी) नूपुर; "तुलाकोडिझंकारणच्चंत- तुरकाण-पुं० (तु० तुर्क का बहु व० मोरा,' अर्थात् उसके नूपुरों की झंकार से तुरुकाण) तुर्कमान, तुर्क; (की० २, मयूर नाचने लगे थे; (जस० ४, १७, १५७) । २१)। तुरुक्क-पुं० (तु० तुर्क) १. पूर्वी तुर्कि- तुलिय-वि० (सं० तुलित >प्रा० मा० ५, तुलुक (५३३) तुलिअ) उठाया हुआ, "रोस तुलियासि- तुहार-सर्व० (सं० तुहकार्यकः) हत्थो तो बोलए;" (जंबू० ७, ४, तुम्हारा; (क० २, १८, ५; जस०३, ६)। ३६, १०) । तुहारी-सर्व स्त्री० (प०- तुलुक-पु. (तु० तुकं) तुर्किस्तान का च० २१, ११, ३)। निवासी; "जिणइ णहि कोइ तुह तुलुक तुहारउ-सर्व० (सं० तुहकार्यकः) हिंदू;" (प्रा० ५० १, १५७) । तुम्हारा तुल० गु० तारु; (संधि० २, तुल्ल-वि० (सं० तुल्य >प्रा० तुल्ल) १६, ५)। समान, सरीखा; (क० ८, ६, १०; भ०)। तुहारय-वि० (सं० तुहकार्यक: --य, वि०, तुल्य (सं० रा०) । तुल्लु, प्रा० तुहार) तुम्हारा; (प० च० ४, १३, (सु. ६, २१)। ८) । तुहारी-वि० स्त्री० (प० च० ४, तुव–सवं० (सं० तव) तुम्हारा; (५०. च० १६, १५, ६)। तुहि- सर्व० (सं० त्वमेव) तुम ही, तुवर-पु० न० (सं० तुवर) रस (उ० व्य० प्र० २१, २१)। तुहीं-सर्व० निशेष, कपाय रस; (दे० ना० मा० ५, तुम ही (उ० व्य० प्र० २२, ५) । १६)। तुहिण-न० (सं० तुहिन् >प्रा० तुहिण) 1/तुस-(सं०/तुष् >प्रा० तूस, तोस) हिम, तुषार, वर्फ; (सं० रा०)। –कर खूश होना, संतुष्ट होना; (उ० व्य० प्र० चंद्रमा; (प्रा० पै० २, २०१)। -यल ११, १८) । तूस-(उ० व्य० प्र० ८, (तुहिणायल) पु० (सं० तुहिनाचल) ७)। -इ अक० (सं० तुष्यति) संतुष्ट हिमालय; (जंबू० ४, १०, ५) । होना; (षड्)। तुहुं-सर्व० (सं० त्वम्) तुम, तूने; तुल० तुस-पु० (सं० तुष) धान्य का छिलका, गु० तु; (क० १, १०, ३; महा०) । भूसी; (दे० ना० मा० २, ३६; नस० ३, तुहुँ-सर्व० तू; (प्रा० ५० १, ७; हे० २७, ८)। ४०२, १)। तुतार-न० (सं० तुषार>प्रा० तुसार) तुहु-सवं० (सं० त्वत् >प्रा० तुह) (१) सूक्ष्म वृष्टि, बौछार; २. जलकण, तुझ, तुम; (सं० रा०)। वृष्टिकण, "तोय तुसार-धवल;" 'जल के तूं-सर्व० (सं० त्वम्) तुम; तुल मगही तुषार धवल कण,' (प० च० ४, १०, तूं: गु० तू; (उ० व्य० प्र० १०, ५) । ६)। ३, हिम, वर्फ; (सं० रा०)। तू; (कण्हपा, चर्यापद)। तुसार; (व० १०, २०, ४) । तूअ-पुं० ईख का काम करने वाला; तुसेअजम-न० (दे०) लकड़ी, काठ; (दे० ना० मा० ५, १६)। (दे० ना० मा० ५, १६) । तूर-पुं० न० (सं० तूर्य>प्रा० तूर) तुह-सर्व० (सं० तव) तुम; (हे० ३७०, वाद्य, बाजा; (क० १०, १०, ६; जस० १, २६, २७, पड्)। २. सूर्य; (सं०- , - तूरा (५३४) तेअस्सि . रा०)।--सद्द पु० (सं० तूरशब्द) वाजे पवित्र जगह; (प० च० १, २, ५) । का शब्द; (जंबू० ५, ६, १५) । तृण-पुं० (सं० तृण) तिनका। तृणाई तूरा-पु० (सं० तूर्य+क>प्रा० तूर -ब० (सं० तृणानि) तिनके; (हे. +अ) वाजा-विशेष; (की० (की० ४, ४२२, १५)। १५६)। तृप्त हो- क्रि० (सं० तृप्यति) तृप्त तुरिए-पु० (सं० तूर्य+वादक >प्रा० होना; (उ० व्य० प्र० ५१-२०) । तूरिअ+वायग) तूर्यक, वाद्य-विशेष तूर्य ते, ते--सर्व०, व० (सं० ते) वे; (रा. को बजाने वाला; (प० च० २६, ६) । अव्य० इस लिए; (की० १, १७)। तूरिय-पु० (सं० तूर्य) तुरही; तेंडुअ--न० (दे०) वृक्ष-विशेष; टीवरु (भ०) । का वृक्ष; (दे० ना० मा० ५, १७) । तूल-न० (सं० प्रा० तूल) रुई; (व० तेंदु, तेंदुअ, तेंदुग-पु० (सं० तिन्दुक.) ८, ५, ८; भ०)। १. वृक्ष-विशेष, टीवरू का वृक्ष, तेंदु का तूलिआ-स्त्री० (सं० तूलिका) रुई से पेड़; (प० च० ४२, ७) । पु० न० (सं० भरा मोटा गद्दा या विछौना; (दे० ना०- कन्दुक) गेंद; (प० च० १५, १३) । मा० ५, २२)। ते-सर्व० (सं० तत्) १. इसको (प्रा०- तूतिपल्लंक-पु० (सं० तूलपल्यंक) पैं० १, ३९) । २. (सं० ते) वे; (उ०- पलंग; तुल० म० गु० पलंग; (भ०) । व्य० प्र० १०, ६) । अव्य० १. इसलिए; तूलियक-न (सं० तूलकम्) गद्दा; (की० १, १७) । २. तो; (की० २, (जंबू० ४, ५, २३)। ४८)। तूली-स्त्री० शय्या; तुल० गु० तळाई; (संधि० ४, १०, ८)। तेअति-वि० (सं० तेजस्विन्) तेजवाला, तूस-क्रि० (सं० . तोषय) १. प्रसन्न तेज-युक्त; (५० च० १०२, १४१)। करना, संतुष्ट 'करना (रा०)। -इ व० तेअ-पु० (सं० तेजस् >प्रा० तेम) (सं० तुष्यति) (भ०)। प्रकाश; (की० ४, १२३; क० १, ६, ३; दिखाना "पर किं वलि वि खलाह ण रुसइ जस० १, २६, १४) । पणवंतहँ सज्जणहँ ण तूसइ," तेअ -- सक० (सं० तेजय) -इव० '. (जस० ३, ३७, ८)।-सेवि पू० का०- तीक्ष्ण करना; (पड्)। क्रि०, संतुष्ट होकर; (क० २, १४, ६; Vतेअव- १. दीपना, चमकना; प० च० ५, ५, ६)। २. जलना । -इ अक०; (षड्)। तूस-वि० (सं० तुष्ट) प्रसन्न; (व० तुष्ट) प्रसन्न(व० तेअविन-विः (सं० तेजित) तेज किया ४, ४, ११) । हुआ; (दे० ना० मा० ८, १३) । तूह न० (सं० तीर्थ >प्रा० तित्थ, तूह) तेअस्ति-पु. (सं० तेजस्विन्) इक्ष्वाकु २. प्रसन्नता . तेज करना, . -- तेआलीसइम (५३५) तेत्तिम उसके द्वारा; . वंश के एक राजा का नाम; (प० च० ना० मा० ५, २३)। ५, ५)। तेण-सर्व० (सं० तेन) उसने; (व० तेलीसइम-वि० सं० त्रिचत्वारिंश) १, १७, १३) । २. उससे; (को॰ २, तैतालीसवा; (प० च० ४३, ४६)। २) । तेई-सर्व० (सं० तेन) तेता-अव्य० (सं० तावद) तितना, (उ० व्य० प्र० ५१, २०) । तुल० गु० तेठलु; (प्रा० गु० ३६ तेइय-वि० (सं० तेजित) द्योतित, २६)। प्रकाशित; (प० च० ५३, ६, ७)। तेतीस-स्त्री० न० (सं० त्रयस्त्रिंशत् > तेइल्लउ-वि० (सं० तेजस्विन्) तेजस्वी; प्रा० तेतीस, तेत्तीस) तीस और तीन; (व० २, १८, १३)। तुल० म० तेतीस, गु० तेत्रीश; (भ०) । तेइस--वि० (सं० त्रयोविंशत्) तेईस; तेतीसोवहि-स्त्री० (सं० त्रयस्त्रिंशत+ (प्रा० ५० १, २००)। उदधि) आयु प्रमाण; (जंबू० ११, १२, तेउ-न० (सं० तेजस्) तेज, सर्वोत्कृष्ट ६)। आभा; (व० १०, ६.२) । तेतुली-सर्व० (सं० तावती>प्रा० तेगच्छिण-पु० (दे०) चिकित्सक; तेतुली) उस; (की० २, २८)। (संधि० १६, ४, ६)। तेतड-अव्य० (सं० तावत्) उतना; तेज-पु० (सं० तेजस्) प्रताप, पराक्रम; जंवू० ६, १, १८)। (की० १, ७१)। तेत्तडय-वि० (सं० तावत् >प्रा० तेजमन्त-वि० (सं० तेजोवान्) तेजस्वी, तेत्तिम) उतना; (प० च० २२, ५, (की० ४, ५१)। १)। तेजि-पु (फ़ा० ताजी) तेजि जाति तेतहि-अव्य० (सं० तन>प्रा० तत्थ) का घोड़ा, घोड़ों की एक जाति; (को० वहाँ; (जस० ३, १२, ६; सुदं० ७, ४, ४, २८)। ८)। तेत्तहे--अव्य० वहाँ; (प० च० १, तेग्जिन-पू० का० कि० (मंत्वकत्वा) १४, २)। छोड़कर; "परिपूजउ तेज्जिअ लोभ मणा तेत्तीसइम-वि० (सं० त्रयस्त्रिंश) तेती- भवणा," अर्थात् 'मन में' लोभ और घर- सवां; (प० च० ३३, १४८) । वार छोड़कर सदा आपकी पूजा करू;' तेत्तहे-अव्य० (सं० तत्र >प्रा० तत्प) (प्रा० ५० २, १५५) । वहाँ; (व० २, ४, ३)। Vतेड--सं० आकारय, बुलाना; तुल० तेत्ता-अव्य० (सं० तावत्) उतना; गु० तेडवु; (संधि० ६, ३, ११; प्रा० गु० (प्रा० ५० १, ७७)। २, ३, १३)। तेत्तिउल-अव्य० . (सं० तावत् >प्रा० तेड्ड-पुं० (दे०) १. शलभ, तेत्तिअ) उतना; (प० च० १६, १५, ६; नाशक कीट; २. पिशाच, राक्ष:; (दे० वा० १, ६)। . - अन्न- तैत्तियं (५३६) तेरायणरु , १. उसी तंत्तिय-अध्य० (सं० तावत्) उतना; रिपूरियादियंतय;" (नंदू० प्राचीन म० तेतुलें; (भ०) । २) । तेत्य-अध्य० (सं० तत्र>प्रा० तत्य) तेयाविद्धी-वि० (सं० तेजस्+आविद्धा) वहाँ; (जस०)। तेज से लिप्त, "भूमि चउत्थी तेयाविदी;" तेत्यु-बन्ल० (सं० तन>प्रा० तत्व चतुर्थ भूमि तेज से लिप्त दिखाई देती वहाँ; (जस० १, ५, १०; प० चं० २, थी; (जस० २, ४, ३)। ७, ४)। -वि० अव्य० (सं० तत्रापि) तेयस्सि-पु० इक्ष्वाकुवंशीय राजा; वहाँ भी; (प० च० १, ११, ४)। (प० च० ५,५)। तैयु -अव्य० (सं० तन) वहाँ; (रा०)। तयासीति-वि० (सं० त्र्यशीति) तेन्हि-सर्व० उससे; (की० २, ४३) । तिरासी; (महा०)। तेम-अव्य० तथा प्रकार तेर-सवं० (सं० तब) तेरा; (क० ३, "णज्जइ जेमतेम जगि जीउ वि बहुजो २१, ५)। णीकुलंगयो," अर्थात् उसी प्रकार जगत् तेरय-वि० (सं० तव) तुम्हारा; (प०- में नाना योनियों में जीव की गति होती च० १६, ७, १)। है; तुल० ब्रज, अवधी, तिमि; गु० तेम; तेरस-वि० सं० त्रयोदशन्) दस बोर (जस० ३, २२, २; प्रा० ५० १, १०) । तीन । पुं० दस और तीन का योग; २. तथा; (सं० रा०) ! तुल० गु० तेम; (भ०)। ३. और; (प० च० ४, ५, ८) । तेर्रास-स्त्री० (सं० त्रयोदशी) तिथि- (सं० तेजस्>प्रा० तेय) विशेष; (क० १०, १६, ७) । १. कांति, प्रकाश, प्रभा; (सं० रा०; तेरसुत्तरसय-वि० (सं० त्रयोदशोत्तर) जस० १, ५, ७) । २. अग्नि, कायिक एक सौ तेरहवां; (प० जीव ; (व० १०, ४, ३)।-णिहि वि० ७२)। (सं० तेजोनिधि) तेज के खजाने; (क० तेरह-वि० (सं० त्रयोदशन् >प्रा० अर्ध- ३, १, १२)। —पूर वि० (सं० तेज- मागधी तेरस) (सुयगडंग, उवासगदसा- पूर) तैजपूर्ण; (जंबू० १, १८, २) । उनो) दस और तीन, तुल० राज० तेर, तेयमाल-वि० (सं० तेजवान्) तेज से तेरा (उच्चा० थेरा), गु० तेर; - (प्रा० वेष्टित या व्याप्त; "बालक्ककिरणतणुते- पै० १, १३; जस० ३, १७, १६)। यमाल," अर्थात् वालसूर्य की किरणों के -उ वि० (सं० त्रयोदशम्) तेरहवां; समान तुम्हारा शरीर तेन से वेष्टित है; (क० १०, १६, ७)1-सय वि० (सं० (जंवू० १०, १, ११)। त्रयोदशशत) तेरह सौ; (जस० ४,३०, तेयवंत-वि० (सं० तेजोवान्) तेजस्वी; ११)। (व० १, १०, ११)। तेरायणर-पु० तेरानगर, नगर-विशेष- तेयवारि-वि० तेजस्वी, "फुरंत तेयवा. नाम; (क० ५, २,.६)। - तेय-पुं० च० - तेलंगा (५३७) तो तीसरा; - मा० ७, (हे०४, तेलंगा-पु. (सं० तैलंग) तैलंग देश; (प्रा० गु० ३३, २) । "भम भन्जिआ वंगा भंगु कलिंगा तेलंगा तेसरा-वि० (सं० तृतीय) रण मुक्कि चले;" (प्रा० पै० १, (की० २, १४०)। १४५) । तेह -वि० (सं० तादृश्) तैसा, उसके तेलाडी-स्त्री. (सं० तैलाटी) कीट- जैसा, वैसा; (रा०)। विशेप, गंधोली; (दे० ना० तेह-अव्य० (सं० तथैव) उसी प्रकार; ८४)। (जंवू० ८, १३, ८)। तेलुक्क, तेलोअ, तेलोक-न० (सं० तेहई-वि० (सं० तस्मिन्) उसी; "तहिँ त्रैलोक्य) तीन जगत् स्वर्ग, मर्त्य और तेहई अवसरि हिंसावासरि पत्तु सुदत्तु पाताल लोक; (प० च० ८, १६; पड्) । ससंधु मुणि;" (जस० १, ११, १०) । -णाह पु० (-नाथ) तीनों जगत् का तेहत्तरि-वि० (सं० त्रिसप्तति) तिहत्तर; स्वामी, परमेश्वर; (षड्) । -मंडण न० (महा०)। (-मण्डन) तीनों जगत का भूषण; तेहय-वि० (सं० तादृश्) उसके जैसा, २. रावण का पट्ट-हस्ती; (प० च०८०, वैसा; (प० च० २, १३, १)। ६०)। तेहि-अव्य० वास्ते, लिए; तेल्ल-न० (सं० तैल >प्रा० तेल्ल) ४२५)। तेल, तिल का विकार; (जस० १, १६, तेहु -वि० (सं० तादृश) तैसा; (हे. १३)। ४०२,१)। तेल्लोका-(सं० बैलोक्य) तीन लोक- तेह्न-सर्व० (सं० तेषाम्) उनमें; (उ०- स्वर्ग, मार्य और पाताल लोक; (प्रा० व्य० प्र० १०,१५) । तेह नु; (उ० व्य०- 4० २, ३४) । प्र० १०, १७)। ते-अव्य० (सं० तथा>प्रा० तह) तैल--न० (सं० तैल >प्रा० तेल) तेल, उसी प्रकार; (हे० ३४३, १)। तिलका वि कार; 'तैलें चोपडा निरुख;' तेवडु-वि० (सं० तावत्) उतना; (हे. (उ० व्य० प्र० ४७, ६)। ३६५, ७)। तैसन-वि० (सं० तादृश) इस तरह का, तेवण, तेवन -वि. (सं० त्रिपञ्चा. वैसा; (की० १, ३५) । शत्) तरेपन, पचास और तीन; (षड्)। तसना-वि० (सं० तादृश) उसी प्रकार, तेवीस-वि० (सं० त्रयोविंश) तेईसवाँ; वैसा; (को० ३, १२०) । (प० च० २०, ८२)। तहा-सर्व० (सं० तस्मिन्) उसमें; तेसंझ-न० (सं० त्रि+सन्ध्य) प्रातः, "यहा यहा धमुचड, तैहा तैहा पापु मच्याह्न और सायंकाल का समय; (प०. खस;" (उ० व्य० प्र० ३३, १६) । च० ६६, ११)। तो-सर्व० (सं० त्वम्) तुम; "गोल्ले ना तेसट ठि-वि० (सं० त्रिपष्टि) तिरसठ (न) दिअ तुझचि देसु. आनिक तेंह चा - - तो (५३८) तोणार (वेप) से । . - तो वेस;" अर्थात् गोल्ल (गोदावरी क्षेत्र पू० का० क्रि० (क० १०, २७, २)। के निवासी) आनंदित (होकर) तुझसे -हु आ०, म० पु०, ए०, तोड़ो; मगही कहते हैं कि तेरा वेप उनके तोड़हु; (सरह, दोहाकोश) तोहि-भू०- वांका है; (रा०६) कि० वि० (सं० का०, तोड़ डाला, “पाउ तोडि;" अर्थात् ततः>प्रा० तमओ) १. उसके वाद, उससे पापों को तोड़ डाला; (व० १, ६, ६)। आगे, "कहहु विमखण पुनु कहह तो तोडि-पू० झा० कि० (पाहु०)। अग्गिम वित्तम्त;" अर्थात् हे चतुर स्वामी तोडिय-भू० का० (सं० नोटित) टूट उससे आगे का वृत्तांत फिर कहो; (को० गए; (क० ८, १२, ८) | तोडे वि-पू०. ३, २) । २. तव, (क० १, २, ८)। का० क्रि० तोड़ कर; (प० च० ७, ५, ----वि० अव्य० (सं० ततः+अपि) तो ८) । तोडेप्पिणु-पू० का० क्रि०, तोड़ भी; (प० च० १, ३, ६)। कर; (प० च० २, १२, ८)। तोरि- तोम-न० (सं० प्रा० तोय) जल; (क० पू० का० कि० तोड़कर, अपनी पंक्ति से २, १४, ८)। अलग होकर; (को० ४, १६६) । तोअय-पु० (दे०) चातक पक्षी; (दे०. तोड-पुं० (सं० त्रुटि) त्रुटि; (म० १, ना० मा० ५, १८)। १४, ६)। तोखार-वि० (सं० तुपार>प्रा० अप० तोडण-वि० (दे०) असहिष्णु; (दे० - तुसार) श्वैत; (को० ४, ४७)। टि०- ना० मा० ५, १८)। हिम का सफेद (गौर) वर्ण होने के तोडगम-न० (सं० बोटनक) त्रोटनक कारण 'तुपार' से व्युत्पत्ति दिखाई गई नामक छद; (सुदं० २, १३, ८)। तोडण्य-वि० (सं० त्रोटक) तोड़ने तो-सवं ० (सं० त्वम्) तु; "जइ रण वाला; (जंवू० ६, १६, १०)। भग्गसि तइ तोने काअर;" अर्थात् यदि तोडणी--वि० (सं० त्रोटक) भेदन करने तू रण से भागता है तो तू कायर है; वाला; (सुद० १०, ३, १८) । (को० ४, २४६)। होडिअ---वि० तोडिअ). तोटम-न(सं० बोटक) त्रोटक नामक (सुदं० ११, १४, ४; जस० ३, १०, छंद, एक वणिक छंद; (प्रा० ८)। १२६)। तोण-पु० न० (सं० तूण>प्रा० तोण) Vतोड-(सं० तुड्>प्रा० तोड) भेदन तूणीर, भाथा, तरकश; तुल० गु० भाथो; करना, तोड़ना; (सं० रा०)।-इव० (प० च० १८, ६, ७)। तोणा; (प०- (सं० नोटयति) तुल० म० तोडणे, च० २६, १३, २)। तोडवु; (भ०)। -मि व० (क० ४, तोणा-नतोणक छंद; (सुदं० ६, १७, २) । तोडत कृ० (सं० १५, २४) । शतृ) (जंबू? ४, ७, १३)। डेविगु तोणीर-पु० न० (सं० तूणीर >प्रा० तोड़ा हुआ; पं० २, 4 गु० । नुद+ -- तोतरे (५३६) तोलं बनाया हुआ - १. आदि तोणीर) तूणीर, आयुध-विशेप, भाथा; तोर-वि० (सं० तुपर) कपाय, कसैला; (प० च० २४, ३०)। तुल० गु० तूरु (प० च० ३५, १४, तोतर-वि० (दे०) तोतला, जिसमें ८)। उच्चारण स्पष्ट न हो; "तु तारा तोतर तोर-वि० (सं० तव) तुम्हारा; (उ०- भैरव चंडि, सोलस विज्जादेवि तुहुँ," व्य० प्र० १६, ३०) । (प्रा० गु० २८, २५) । तोरण-न० (सं० प्रा० तोरण) बहि- तोद-स्त्री० (सं० तुन्द) तोद, पेट के रि, किसी घर या नगर का वाहरी आगे का बढ़ा हुआ भाग; (महा० २०, फाटक; अस्थायी रूप से २३, ३)। फाटक, मेहरावदार द्वार; (भ०; जस० १, तोमर-पु. (सं० प्रा० तोमर) ४, ८) । बड़े द्वार; (की० २, ८५) । लघु विकलंगण का नाम ( (15) तोरणालु-पु० तोरण से संयुक्त शाला; (प्रा० ५० १, १८) । २. एम वर्णिक छंद; (भ० च०) । (प्रा० पै० २, ८६) । ३. आयुध-विशेष; तोरन्ते-कृ० रूप का वर्तमान काल से (जस० १, ४, ६)। ४. वाण-विशेष; क्रिया की तरह प्रयोग (सं० तोल का (प० च०)। धात्वादेश तुल = १. उठाना, २. तोलना, तोमरिअ. -पु० (दे०) १. शस्त्र का ठीक-ठीक निश्चय करना) ऊंचा उठाते प्रमार्जन करने वाला; (दे० ना. मा. हुए, "तोरन्ते बोल," (वे सेना के) ५, १८) । २. शस्त्र-मार्जन; (पड्)। कोलाहल को और अधिक बढ़ा रहे थे; तोमरी-स्त्री० (दे०) वल्ली, लता; (को० ४, १७)। (दे० ना० मा० ५, १७) । तोरविय-(दे०) उत्तेजित; (जंबू० ५, तोमरेह-पु तोमरेख छंद; (सुदं० ६, १०, ५)। तोरा-वि० (दे०) तुम्हारा; (जंबू० ४, ३, १२)। तोय-न० (सं० प्रा० तोय) पानी, जल; १८, १)। (भ०)। तोरि'-अव्य० (सं० ततः अपर) उसके तोयजाण-पु० न० (सं० तोय+यान) वाद; (को० ४, १३)। जलयान; (क० ७, ६, ८)। तोरि-पू० का० क्रि० (सं० तोलय> सोयवलोस-पु. द्वीप-विशेप; (प० च० प्रा० तुल, तोल =ऊँचा उठाना, ऊपर ६, ३.) । उठाना) ऊँचा उठा कर; (की० ४, तोयावलीदीव- पु० तोयावलीद्वीप; ३४) । (जंबू० ६, १६, ६)। तोरी-वि० (दे०) (सं० तव) तुम्हारा; Vतोर-(सं० तोड) (म० २, २२, ७)। तोड़ना; (को० २, २०४) । तोरउ; Vतोल-(सं० तोलय >प्रा० (रा० २७)। तोलना । तोलंती, तुल० गु० तोळवु तुड़>प्रा० तुल) तौल (५४०) त्ति (प्रा० पं० १,१११; संधि० १८, १, संतोपित (भ०; १० च० ७७,८८)। २०)। तौलन्ति-३० (की० २, तोसावरण-पुं० (सं० तोपण) संतुष्ट १६५) । करने की क्रिया या भाव; (प. च० २५, तोलण-० (दे०) पुरुष, आदमी; (दे०. १७, ५)। ना० मा० ५. १७)। तोसिम-वि० (सं० तोपित) खुश किया तोलादंड-पुं० (सं० तुलादण्ड) तराजू हुआ; (जस० १, २१, ११) । की डाँही या इंडी; (क० २, २, २) ! तोहर-सवं० (प्रा० तोहार, तुहार) तोलिय-वि० (सं० तोलित) तौला तुम्हारा; (प्रा० ३० २, २४) । हुआ; (जंबू० ८, ३, १०)। तोहि-सर्व० सं० त्वामेव, तुझको, तुझे; तोबट-० (६०) १. कान का मामू- (उ० व्य० प्र० २२, ४) । पण-विशेष, २. कमल की कणिका; (दे०- तोहोर-सर्व० (प्रा० तोहार, तुहार) ना० मा० ५, २३)। तुम्हारा; तुल० मगही तोर3; (कण्हपा, तो वि~-अव्य० (सं० तथापि) तो भी; चर्कपद) । तो-क्रि० वि० (सं० ततः>तड>तो) तोषार-पु० (सं० तुपार) घोड़ा; (की० १. उसके बाद; (की० २, २१)। २, १७६) । टि०-संस्कृत साहित्य में २. फिर, तब; (की० ३, २०)। ३. तो तुपार देश के घोड़े के लिए यह शब्द भी; (की० ३, १०७)। विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ। बाद में तोतो-सर्व० सं० तस्या, उसका; (३०- प्राचीन हि० में घोड़े के पर्याय अर्थ में व्य० प्र० २३. १८)। प्रयुवत । तौन-सर्व० (सं० तेन) उसने; (की० तोत-पु(सं० तोप >प्रा० तोस) ३, २१)। आनंद, सतोप;(जस० ३, ३१, ६)। न० तय-वि० (सं० वय) तीन; (५० ५० (३०) धन, दौलत; (दे० ना० मा० ५., १, ७, ३)। १७) 1 ताडिल-वि० (सं० ताडित) मारा हुआ, Vतोस-(सं० तोपय् >प्रा० तोस) खुश जिस पर प्रहार पड़ा हो; (जंदू० ५, ५, करना, संतुष्ट करना। -इ सक० (सं० तापयति) (जंवू० ११, ८, ५)। तोसिय तार-वि० (सं० तार-ऊँचा) विशाल; -संतुष्ट करती है; (विला०)। (जंव० ८, १२, ६) तोसल-पु० सं० कोशलक, त्तास-पु० (सं० वास) डर, भय, शंका; तोशल (देश) दक्षिण कोसल या गौंड- (जंबू० १, १५, ४) । वाना; (जं. ६, १६, १) । ति-अव्य० (सं०, इति) समाप्ति, हेतु, तोसविन-वि० सं० तोपित>प्रा० "लइ लहु लेहु ति बापत्तभिन्त्रण," तोसिम, तोसविस) तुश जवृ० ५, १४, ८)। १०)। कोसल, किया हुआ; - स्थवण (५४१) पउड्ड . स्तब्ध स्थवण-न० (सं० अस्तमन) अस्त होना; ब्ध होना; "हउँ थंभमि रविहि विमाणु (सूर्य का) डूबना; (जंबू० ६, ६, जंतु चंदस्स जोण्ह छायमि तुरंतु;" अर्थात् २) । मैं चाहूं तो सूर्य के विमान को चलते- त्याणु-न० (सं० आस्थान) स्थान, चलते थाम दूं तथा चंद्र की चांदनी को जगह; (जंवू० ६, १, १६) । एकदम ढांक दूं; (जस० १, ६, १४) । वक्क-पुं० वाद्य-विशेप; तुल० गु० -इ व० (सं० स्तम्भते) (भ०)। नंबाळु (प्रा० गु० ३३, ४) । थम्भिउ-भू० का०, रुक गया; (प० च० वितिय-वि० (सं० तृतीय) तीन; (की० १३, १) । थम्भेवि-पू० का० क्रि०, २, १४८)। रोककर; (प० च० १४, १३, ८) । त्रीखउ-वि० (सं० तीक्ष्ण>प्रा० थंभण-न० (सं० स्तम्भन> प्रा० तिक्त) तेज, तीखा, पैना; तुल० गु० थंभण) रोक-थाम, स्तब्ध-करण, थभाना; तीखो; (प्रा० गु० २६, २८)। तुल० म० थावरों; राज० थंभण (रुका- ट्टि- (सं० त्रुट्>प्रा० तुट्ट) वट, ठहराव); (म० २, ५७, २; सि० टूटना; तुल० गु० तूटवु; (संधि० १६, १, ४१; ण० ३, १, १२)। ५, १३)। थंभिय-वि० (सं० स्तम्भित) किया हुआ, थमाया हुआ; (सुदं० ६, १, ६) । थ थ-पु० (सं० पा. Vथं -(सं० स्तम्भ) रोकना, थामना; प्रा० थ) दंत्य, श्वास, अघाप, महाप्राण, निरनुनासिक थंहिरं (स्तम्भितं); "तं तं लीलाइ णलो स्पर्श वर्ण । वामकरत्थंहिअं रएइ समुद्दे;" अर्थात् नल उसी पर्वत को लीला से बाएँ हाथ में थंडिल्लन० (दे०) मडल, वृत्त प्रदेश; (दे० ना० मा० ५, २५) । थामकर समुद्र में विरचित कर देता है; (प्रा० ५० १, ७४)। थंतुः-वि० (सं० स्था>प्रा० था, स्थित (व० ५, १०, ६)। Vथ-(सं० स्था) थंव-पु० (सं० स्तम्ब) तृण आदि का होना; (सुदं० १०, ६, ६) । थन्ति क्रि, गुच्छ; (दे० ना० मा० ८, ४६) । व० ठहरना; (हे० ३६५)। यंभ-० [सं० स्तम्भ >प्रा० थंभ (हे. विषम या थउड-न० (सं० स्थपुट) प्रा० २, ६)] थंभा; तुल० राज० थंभ; नीचा-ऊंचा प्रदेश; (दे० ना० मा० २, (व० ३, १५, ७; ० १, १७, ८)। ७८)। थम्भ; (क० ४, ४, ३)। थउड्ड-न० (दे०) भल्लातक, वृक्ष Vथंभ-(सं० मा० ५, स्तम्भ >प्रा० थंभ विशेष, भिलावा; (दे० ना० रुकना, निश्चत होना, स्थिर होना, स्त २६)। . थंत) रहना, स्थिर ० थक्क (५४२) थड्ढ संधि० १४, ६,८; आवरण यक (दे०) अवसर, प्रस्ताव, यक्किय–वि० (सं० स्थित>प्रा० समय; (दे० ना० मा० ५, २४) । थक्क) स्थित, एक स्थान पर ठहरा घषक-वि० (सं० स्थित) स्थित हुए, हुमा; (सं० रा० रहा हुआ; "सत्तमघाउ जीउ विणि वि संघि० १६, ६, ८)। सह थक्कई माउपोट्टए । अप्पड अप्पएण थगण-न० (सं० स्थगन), मइँ जणियउ दुविहभवे पयट्टए;" अर्थात् ढक्कन, बाच्छादन; (दे० ना० मा० २, इस सप्त धातुमय जीव की भी केसी ५३)। विचिन्नता है ? इस दूसरे जन्म मैं तथा यग्गया-स्त्री० (दे०) चंचु, चोंच; (दे०. मेरे द्वारा उत्पादित जीव दोनों साथ ही ना० मा० ५, २६) । माता के पेट में स्थित हुए; (जस० ३, थग्घ-पु० (दे०) थाह. गहराई का ७, १) । वि० स्तब्ध, स्थित, पड़ा हुआ; अंत, तला, पानी के नीचे की भूमि; (दे०. तुल० म० थक्क (स्तब्ध); (म० १, २३, ना० मा० ५, २४)। ३; व० ५, ४,१)। २. रहा हुआ; यट्ट-पु० न० (सं० (सुदं० ३, ६. १८) । स्थात>प्रा० Vथक्क-(सं०/ स्था/ फरक =to थट्ट) १. समूह, "वरणयर-थट्ट" वनचर move slowly) थकना, श्रांत होना । समूहः तुल० गु० ठठ; म० थट, थड; -इ अक०, व० तुल० राज० थक्कणी, (प० च० १३, ६, ४)। २. ठाठ, सज- थक्कवी; (प्रा० १४६; हे. धज; (म० १, ३५, १.१) । ३७०) । "धण-दामिण जे नेह धणि थट्टि-स्त्री० (दे०) पशु, जानवर; (दे०. थक्कइ ते उवसमहि;" (प्रा० गु० ना० मा० ५, २४)1 २६) । थक्किअ-ठहरना; (प्रा० ५० १, यड-पु० न० (दे०, प्रा० थड) ठठ, १६०)। समूह; (प० च० १६, ३, १०; सुदं० १०, Vथवक-अक० (सं० स्था>प्रा० ५, ५) । तुल० कानडी थटट =समूह । धक्क) रहना, बैठना, स्थिर होना। -इ २. कतार, पलटन, सैन्यदल; (प० (प० च० व० सं० तिष्ठति (भ०; ण० ३, १३, २५, ५, ८)। ३. ढेर; (पाहु०)। ३)। "गयणे अणंतागंतऍ ४. भीड; तुल० म० गु० थड, थट; (ग० थक्कड," (यह जगत्) अनंतानंत आकाश ४, ७, १२)। के बीच स्थित है; (सुदं० २, १, ६)। यडा-पु० (दे०) यूथ, दल; (सुदं० २, -हि कि०, व० स्थित होना, स्थिर १३, १)। होना; (प० च० १७, १४, २)। यडि-स्त्री० (सं० स्थली) बैठने की धक्का--भू० का०, स्थित हुए (क०)। जगह; (पाहु०)। थक्के वि --पू० का०, त्रि.०, (प० च० चड्ढ---वि० (सं० स्तब्ध>प्रा० थड्ढ) २२, ५, ७)। निश्चल, जो निश्चेष्ट हो गया हो, स्तं 4० २, .
थड्ढत्त' (५४३) घप्प सो से लिपटे हुए थे; थन> १६)। - स्तन का भित; (सुदं० ७, १६, ७; सं० रा०)। (जस० १, ६, २. गवित; (भ०)। -तण पु० (सं० ४)। स्तब्धत्व) (ण० १, १७, १२) । थणि-स्त्री० (सं० स्थली>प्रा० अप० थड्ढत्तणु-पु. (सं० स्तब्धत्व) धृष्ट- थडि) स्थान; (सि० २, १४) । त्व; "थड्ढत्तणु तरुणीयण-थणेसु;" अर्थात् थरिणय-पु स्तनितकुमार नामक देव; यदि दृष्टता कहीं थी तो मात्र तरुणीजनों (व० १०, २६, ७) । न० (सं० स्तनित) के स्तनों में ही थी; (व० ६, १, मेघ की गड़गड़ाहट; (दे० ना० मा० ५, १२) । २७)। थण-पु० (सं० स्तन >प्रा० थति-स्त्री० (सं० स्थिति) १. स्थिति; प्रा० थण) १. मादा पशुओं का वह अंग (सुदं० १०, १०, १२)। २. विश्राम; जिसमें दूध रहता हो; (सुअंध० १, ३, (थत्तिअ दे० ना० मा० ५, ८)। २. कुच; स्तन, पयोधर; (प० च० ३. स्थिरता; (सि० १, १) । ४. स्थान; १४, ७, ८; सं० रा०; सुदं० ८, २६, (ण० १, १५, ३; जस०३, १८, ४) । ७; ण० १, १७, १२) । तुल० राज० थत्तिअ-न० (दे०) विश्राम; (दे० ना०. थण। -हर पु० (सं. स्तन+भर) मा० ५, २६)। वोझ; (प्रा० गु० ३८, थनवार-पु० (सं० स्थानपाल) घोड़े के थान का अध्यक्ष, कर्मचारी; (की० ४, थरणद्धउ-पु(सं०स्तनंधय)पुत्र; "आयएँ २७) । जणिउ गद्धउ केहउ एवं जो मयरद्धउ थप्प थप्प-पु० (ध्व०) ठप्प-ठप्प का जेहउ;" अर्थात् इसने एक पुत्र को जन्म शब्द; (की० ४, २७)। दिया जो कैसा था मानो रूपधारी मकर. थप्पड-पु० (अनुध्व० थर-थप) चपेटा, ध्वज ही हो; (जस० ४, २३, १६) । थप्पड; तुल० म० थप्पड; (म० २, १६, थगवट्ट-पु० (सं० स्तनपट्ट>प्रा० थण+पट्ट, वट्ट) स्तन पर पहनने का थप्पणा-वि० (सं० स्थापन) स्थापित वस्त्र; (सं० रा०) । "मयरद्धयझाणपहा- करने वाला; (प्रा० पै० २, ६७) । यरुद्ध णिवकण्णाहि पुणु थणव१ थणव१ /थप्प-(संस्थापयति)स्थापित करना वधु." अर्थात् (राजकुमारी अभयमति -हु क्रि०,आ०,स्थापित करो. (प्रा० पं०१, ने) कामध्यान के प्रघातों का अवरोध ४८) । थप्पि-स्थापित करो, 'कोप्पि- करने वाला स्तनपट बाँध लिया; (जस० पिअ जाहि तह थप्पि जसु विमल महि, ४, २८, २१)। हे प्रिय तुम क्रुध होकर वहां जाओ, पृथ्वी थणाल-० (सं० स्तन+आल == बड़ा) में निर्मल यश स्थापित करो, (प्रा० ५० दी और लवे स्तन; "फणिवद्धदीहलवि १, १५७) । थप्पिअ-क्रि०, भू० का रथणाल,' अर्थात् दीवं एवं लंवे स्तन (सं० स्थापित) स्थापित कर दिया; ५)।
थमि (५४४) थर्व मा० ५, थळ, ऊपर की - . ए विर- पक्ख. (को० ३, ८०) । प्पिआ-भू० का०, यरु-पुं० (सं० सरु) तलवार की मूठ, स्थापित किया; (की० ३, ८०) । टि०- खड्ग-मुष्टि; (दे० ना० 'कीतिलता' में भूतकाल के कृदंत रूपों में २४)। 'इअ' को 'इआ' रूप में व्यक्त करने की यल-न० (सं० स्थले >पा० प्रा० थल) प्रवृत्ति मिलती है । थप्पिउ-भू० का०, भूमि, सूखी जमीन; तुल० गु० म० राज. स्थापित किया; (सि० २, ३६, १) । थळ; पं० बं० थल, ओ० सि थरु, थमिम-वि० (दे०) विस्मृत; (दे० ना० ने० थल, (क० १, ३, ६; जस०४, मा० ५, २५)। १६, ५)| ---कमलपत्त न० स्थल-कमल थर-पु० (दे०) दही के का पत्ता; (की० २, ८७) । ~यर वि० मलाई; (दे० ना० मा० ५, २४) । (सं० स्थलचर) स्थलचर जीव; (जस० Vथरथर--(दे०) कांपना । थरथरथर १, ७, ६; व० १०, ८, १४)। न्त-कृ० काँपते हुए; (प० च० २७, ६, यल-गम्म-पृ० (सं० स्थल+गर्भ) गर्भ २)। से उत्पन्न थलचर जीव; (व० १०, १०, Vथरहर--(दे०) काँपना, थर्राना, 'थर १३)। थराना; 'थरहर थरहर थरहर थलमाण-पुं० न० (स० स्थल+मान) हिणी-मनु कंपइ,' तुल० गु० थरथर, म० स्थल का प्रमाण, "अण्णेक्कहिँ थरथरणे, राज० यरहराणी, थरहरावौ; पसरु करइ, थलमाणु य पक्खिणि वज्ज- (प्रा० गु० २२, ६)। थरहरंत. -कृ० रइ;" अन्य एक ने अपने नेत्र-पक्ष्मों का कंपायमान; (म० १, २७, ८)।. ३ ऐसा प्रसार किया मानो वह विशाल अक०, ३० (सुदं० ४, ६, ४; भ०); पक्ष्मों वाली उस स्थल का प्रमाण ही कह तुल० म० थरथरणें । ---रेइ व० (सुदं० रही हो; (ण० २, १, ११) । ३, ११, ७) । - -रेवि पू० का० कि थलय-पुं० (दे०) मंडप, तृणादि- (सुदं० ११, १३, १)। (दे० ना० थरहरिम-वि० (सं० थरथरायते; प्रा० थरथरेदी, थरथ्थरइ; अप० थरहर) थक्लिया--स्त्री० (सं० स्थालिका) छोटा कंपित; (ण० ५, ५, १५; दे० ना० मा० याल, भोजन करने का पात्र; (प० च. ५, २७)। २०, १६६)। थरहरिय-वि० (दे०, प्रा० थरहरिअ) /थर-(सं० स्थापयति) स्थापित कंपित; (सं० रा०)। करना । विउ-भू० का० स्थापित थरिमद्दि-स्त्री० (ध्व०) तवले या किया; (क० ६, १६, १०) । (व० ३, ५, डफली की विशिष्ट आवाज (particu ३) । थविज्जइ-कर्मवा० (ण० ० ३, २, . lar sound of tabor); (प० ५० ५६, १४) । थविवि-पू० का० त्रि.०; (ण. १, १०) । ७, १०,१)। निमित गृह; मा० ५.. २५) ।
भव (५४५) घाम - मा० ५, प्रा० गु० फूल आदि थव-पु० (दे०) पशु, नानवर; (दे०- ५, २, ७) । -एवि पू० का० कि० ना० मा० ५, २४)। (क० १०, १७, ३; ण. ६, १, ६)। थवइ-पु० (सं० स्थपति >पा० थपति) -हि व० (सुदं० १०, २०, ४) । बढ़ई; (दे० ना० मा० २, २२)। थाट-पुं० न० (सं० स्यात) समूह; थवइल्ल-विक (दे०) जांघ फैला कर तुल० म० थाटो स्त्री० (समूह); राज० बैठा हुआ; (दे० ना० थाट; (प्रा० गु० २६, ६) । २६) । Vयाड-(दे०) ढकेलना; थाडंति; (म० थवषक- (सं० स्तवक>पा० २, ५२, १२)। थवक) समूह, थोक; (भ०; थाह-वि० (सं० स्तब्ध >प्रा० थड्ढ) २२, १३) । निश्चल; (रा०)। थवय-पु० (सं० स्तवक) थाढा-भू० का० कृ० खड़ा; "आनिकु का गुलदस्ता या गुच्छा; (दे० ना० मा० जोवणु उरू थाढा;" वांका यौवन खड़ा २. १०३)। है; (रा० ८, १६) । थविआ-स्त्री० (दे०) वीणा के अंत में थाग-न(सं० स्थान >प्रा० थाण) लगाया जाने वाला छोटा काष्ठ-विशेष; जगह; तुल० म० थान; (प० च० १३, (द० ना० मा० २, २५) । ५. १०व०६,१६,८;क० थविय-वि० (सं० स्थापित) १. राख ७) । "थाणहो चुक्की;" अर्थात् स्यान से या डाला हुआ, (भ०)। २. जिसकी चूकी हुई; (रि० ३, १)। स्थापना की गई हो, निर्दिष्ट किया हुआ, थाणिज्ज-वि० (दे०) सम्मानित; (दे०- निश्चित किया हुआ; (म० १, २१, ना० मा० ४, ५)। थाणु-पु० (सं० स्थाणु) वृक्ष का ठ, थविर-वि० (सं० स्थविर) वयोवृद्ध "दवदड्ढ-थाणुसंकासतणु;" अर्थात् उस अनुभवी एवं कुशल, परिपक्व वुद्धि वाला; का शरीर अग्नि के जले हुए वृक्ष के ढूंठ तुल० राज० थविर; (व. ६, १०, के सदृश था; (जस० २, ६, १०) । अमानत, थवी-स्त्री० (दे०) देखो थविआ; (दे०- थाती-स्त्री० (सं० स्थातृ ना० मा० २, २५)। धरोहर; (भूसुक० चर्या० २१) । थापे-मि० (सं० थह-पु० (दे०) आश्रय, स्थान, निलय स्थापय >प्रा० (वास-स्थान); . (दे० ना० मा० ५, थप्पिस) स्थापित करना; तुल० सिं० २५)। थापणु, गु० थोपवू, पं० थापणा, (उ०. 1/था-(सं० स्था>प्रा० था) - व्य० प्र० २१- १७)। व० ठहरती है (क० ६,७,५; सुदं०८, थाम'-वि० (दे०)विस्तीर्ण; (दे० ना०. १८, ६)।-इवि पू० का० क्रि० (क० मा० ५, २५)। । - घाम (५४६) थिर - ना० मा० (सं० न० थाम-न० (सं० स्थामन् <प्रा० थाम) थाहर-पुं० (सं० स्थान >प्रा० थाण, १.वल, 15.म; (२६०६, १६ :) । ठाण) स्थान; तुल० गु० ठार; (प्रा० गु० सामर्थ्य; (ण० ६, १३, २) । ३. न. ७, १६)। (सं० स्थान >प्रा० ठाण, थाम) स्थान; थिअ-वि० (सं० स्थित) एक स्थान पर तुल० गु० ठेकाणु (संधि० ३, ३, ३)। ठरा या टिका हुआ; तुल० गु० थयु; ३.स्तंभ; (क० १, १७, ८) । क० ३, ४, १२; जस० १, २७, १७; थार-पु० (दे०) घन, मेघ; (दे० ना० संघि० १७, ३, ६; सुदं० ८, २५, १)। मा० ५, २७)। थिउ-स्थित; (प० च० १२, ३,६; थारे-वि० (सं० स्तब्ध >प्रा० थड्ड > महा० ६, ८, ७) । "तहाँ दाहिणदिसि थड्ड>याड>थार+=थारा, थारे) थिउ भरहखेत्तु;" (ण० १, ६, ३) । गर्वीले, गर्विष्ठ, रोवदाववाले; (की० थिण्ण-वि० (दे०) १. स्नेह-रहित दया- २, २२०)। वाला; २. अभिमानी; (दे० थाल-पुं० न० स्थाल>पा० ५, ३०)। प्रा० थाल) वड़ी थाली, परात; (दे०- Vथिप्प- -सं०/विगल ; गल जाना। ना० मा० ६, १२; सुदं० ५, ६, ३, उ०- -पंति (जस० ३, ६, १; क० ३, १५, व्य० प्र० ५०, १५) । थालु-पुं० ८)। थाल; (क० ६, २, ६)। थिमिम-वि० (सं० स्तिमित) स्थिर, थाला-स्त्री० (दे०) बारा; (पड्) । निश्चल; (दे० ना० मा० ५, २७) । थाली-स्त्री० लधु घट; (संधि० ४, १३, थिय–वि० (सं० स्थित >प्रा० थिअ) ८) । रहा हुआ, एक स्थान पर.व्हरा या टिका थावर-वि० (सं० स्थावर>प्रा० रा०; क० हुआ; (सं० थावर) ४, १७, वर) स्थिर रहने वाला, अटल, अचल; ६)। तुल० राज० यावर; (वी० १, २; जस० २, ३७, ७) । २. स्थावर जीव; (व० थियउ-भू० का०, स्थित हो गया, "तेउ १०, ६, ३)। अतेउ होवि थियउ;" तेज अतेज (प्रकाश थावर---पुं० स्थावर नामक विप्र पुत्र; अंधकार) हो कर स्थित हो गया; (रि० (व० २, २२, १०)। ६, १७)। थाह-पुं० (सं० स्थाघ>प्रा० थाह) थिर-वि० (सं० स्थिर>प्रा० थिर) १. थाह, तला, गहराई का अंत, तुल० १. निश्चल, २. स्थायी, ३. निश्चित, सिं० थाहु. पं० थाह, वं० था; अस० ४. उद्वेग, चंचलता आदि से रहित, तुल० थाइवा, (हे० ४४४, २) । २. स्थान; म० थीर, राज० गु० थिर; (भ०; सं०. ३. वि० गहरे जल वाला; ४. विस्तीर्ण, रा०)। थिर; (महा० ६८, ५. दीर्घ; (दे० ना० मा० ५, ३०)। थिरो; (वी० १, १)।-यर वि० (सं० ७, ३)।
थिरणाम (५४७) थुत्त , थुक, पं० स्थिरतर) अधिक स्थिर; (व० २,२, प्रा० युइ) प्रशंसा; (ण० ६, ८, ६; क० ३, २०, ६; सुदं० १०, १, १७)। थिरणाम-वि० (दे०) चंचल मनस्क थुई-स्त्री० स्तुति (सि० १, १२)। या चित्त वाला, (दे० ना० मा० ५, -वण पुं० न० स्तुतिवचन >प्रा० थुइ २७)। +वयण) प्रशंसा का कथन; (जस० १, थिरपणेस-वि० (दे०) अस्थिर, चंचल; २६, १४)। (पड्) । युक-पुं० (सं० थूत्कृत >प्रा० थुक्क) थिरत्त-पुं० (सं० स्थिरत्व) स्थिरता; थूक; (की० २, १७७)। (ण० १, ४, ६) | -ण पु० स्थिरता; थुक्क-न० (सं० धूत्+कृत) थूक; (हे० ४२२, ६)। (दे० ना० मा० ४, ४१) । थिरसीस-वि० (दे०) १. निर्भीक, २. निर्भर, ३. जिसने सिर 1/थुक्क-(सं० यूत+कृ>प्रा० थुक्क) पर कवच वांधा हो वह (दे० ना० मा० ५१ थूकना । थुकिज्जइ-कर्मवा० (सुदं० ६, ३१)। ४, ४) । तुल० म० धुक (णे), थुक थी-स्त्री० (सं० स्त्री>पा० प्रा० थी) (में); नि० ब० थुक, लो. स्त्री, महिला; (संधि० ६, ४, १६; सुदं० थुक्क। ४,१२,१८3. क० १०, २२, ६)। थुक्किा-वि० (दे०) ऊंचा; (दे० ना०- -यण पु. स्त्रीजन, स्त्री जाति, 'रहति मा० ५, २८) । वि० (सं० थूत्कृत) थूका पूरिउ थीयणहं काउ, अर्थात् सभी हुआ; (दे० ना० मा० ५, २८)। स्त्रियों का शरीर उल्लास से परिपूर्ण हो धुड्डहोर-न० (दे०) चंवर, चामर; गया; (जस० १, २६, २१)। -यण (दे० ना० मा० ५, २८) । पु० (सं० स्त्री+रत्न) श्रेष्ठ स्त्री, स्त्री 1/थुरग-(सं० स्तु>प्रा० थुण) स्तुति रूपी रत्न (ण० ३, ७, ८) । करना; (जस० १, ६, ८) । थुगंत-कृ० योल्वंक-वि० (सं० स्त्री+रूप- (सं० स्तुश); (सुद० ७, १, ४) । अडक) स्त्री के चित्र से अंकित (पट) थुणंतु-कृ० (द० २, १३, ४)। -६ (ण० १, १४, ६)। सक० (सं० स्तौति); (भ०; ० १,११, थोवेउ-पु०. (सं० (सं० स्त्री+वेद) स्त्री २)। -उभू० का० ज्ञान; "धीवेउ णिहम्मइ जेण एहु;' सच्चउन्हें मंडणु पाव-तिमिर-दुह-कम्म जिससे इस स्त्री ज्ञान का विनाश हो; (क० विहंडणु," (प्रा० गु० ५, ४८) । -हिं १०, ५, ५)। व०, प्र. पु०, व०; (सुदं० ८, ११, ७)। थुन-वि० (सं० स्तुत) प्रशशित; (भ०; थुणेइ- थुणेइ-व० (सुदं० ६, २१, १२) । ण० २, ११, १)। धुत्त-न० (सं० स्तोत्र) स्तुति-पाठ; थुइ-स्त्री० (सं० स्तुति >पा० थुति स्तुत्ति; (भ०)। "धुणउ वीरु ..
युत्ति (५४८) थेग तंतुवाय का एक राज० यूळ; । युत्ति-स्त्री० (सं० स्तुति) गुण-कौन; ११)। जस० ४, २३, १३)। पूर-(सं० स्थूल >प्रा० धूल, थुल्ल) थुत्युक्कारिय-वि० (सं० थुत्थुत्कारित) मोटा, वड़ा; तुल० राज० धूर; (प्रा०- थुतकारा हुआ, तिरस्कृत; (भ०)। पं० २, १८५)। युय-वि० (स० स्तुत >प्रा० शुम) धूरी-स्त्री. (दे०) जिसकी स्तुति की गई हो वह; (जस० उपकरण; (दे० ना० मा० ५, २८)। ३, ३६, १)। थूल--वि० (सं० स्थूल >पाः थूल > शुरुगुल्लणय- न० (दे०) शय्या, प्रा० थुल्ल, थूल) मोटा; विछोना; (दे. ना० मा० ५, २८)। (सं० रा०; क० ७, १०, ६; २०७, १६, मूलघोण-पुं० (दे०) वराह, सूअर; १२) । (दे० ना० मा० ५, २६) । थूललक्ख-वि० (सं० स्थूल + लक्ष्य) थुलम -पु० (दे०) तंबू, वस्त्र-गृह; (दे० जिसका लक्ष्य महान् हो, उदार एवं ज्ञानी; ना० मा० ५, २८)। "सोमु अजिभचित्तु कयदाणउ थूललक्यु थु ल-वि० (दे०) परिवर्तित; "थुल्लो पुरिसोत्तमु जाणउ;" अर्थात् वह सौम्य, परिवत्तितः;" (दे० ना० मा० ५, सरल चित्त, दानी, उदार एवं ज्ञानी पुरु- २७)। पौत्तम बन गया; (ण० ३, ४, ६) । युव-वि० (सं० स्तुति >प्रा० थुअ) धृलाहल-पु. (सं० स्थूलफल) स्थूल या जिसकी स्तुति की गई हो बड़े आकार का फल; (भ०)। सुमण-युव वासुपुज्ज," अर्थात् सुमन- यूह'-पु० (दे०) १. प्रासाद का शिखर; देव तथा सुमन-ज्ञानीजनों द्वारा स्तुति २. चातक पक्षी; ३. वल्मीक; (दे० ना० वासुदेव की जय हो; (व० १,१, मा० ५, ३२)। ८)। धूह'-पुं० (सं० स्तूप >प्रा० थूम) युवा--न० (सं० स्तवन > प्रा० युवण) थूहा, दूह, टीला; (सुदं० ११, १२, ३; स्तुति; (सि० १, १६)। व०९, २३,८)। युव-सक० (सं० स्तु) थेघ-पुं० (दे०) रोक, टेक, “सङ्गाम करना । --इ (सुदं० १२, १, १२) । येघ, भूमिट्ट मेव," अर्थात् वे (हाथी) पूर्ण'-० (दे०) अश्व; (दे० ना० युद्ध को टेक थे और पृथ्वी पर उतर कर मा० ५, २६)। आए हुए काले मेघ से जान · पड़ते थे; श्रूण-० (दे०) वृक्षों ठूठ; (को० ४, १८) । टि०-प्राचीन युद्ध कला "पंचांसहिं थूणई दारियई जहिं भिल्लिं में हाथी युद्ध की टेक माने जाते थे। हरिणई मारियई," जहां शेर वृक्षों के हिंदी में ठेगना, ठेघना का अर्थ टेकना, ठूठों को विदारित करते हैं । जहाँ भील रोकना, सहारा लेना है। हरिणों को मारते हैं; (जस० २, २७, येल-पु० (सं० स्तेन >पा० येन > वह, “जय गुण-वर्णन - ० म० प० च० थेणिल्लिन (५४६) थोत्तुं प्रा० घेण) चोर, लुटेरा; (ण योगददग-पु० (अनुध्व०) अश्व- २)। गति की शब्दानुकृति अथवा नादानुकृति; थेगिल्लिम-वि० (दे०), १. छीना धिक्कदलण थोंगदलण तक तरुण रिंगए, हुआ, २. डरा हुआ; (दे० ना० मा० ५, णं ण णु कट विंग दुकट रंग चल तुरंग ३२)। ए । अर्थात् युद्धभूमि में ये घोड़े धिक्- थेर---पु. (स० स्थविर) ब्रह्मा, विधाता; धिक्, तक्-तक्, शब्द करते, ण-ण, कट- (दे० ना० मा० ५, २६) । कट ध्वनि करते चल रहे थे; (प्रा० १० थेर-वि० (सं० स्थविर>प्रा० थेर) १, २०१)। बूढ़ा, वृद्ध; तुल० राज० म० थेर, (म० थोअ-पु.० (दे०) १. रजक, २. कंद- १, ६, २; सि० २, ३; जस० १,२८, दिशेप; (दे० ना० मा० ५ ३२) । २)। थोम-वि० (सं० स्तोक>पा० थोक > थेरा-इसि-स्त्री० (सं० स्थविर-वसति) प्रा० थोव) अल्प, थोड़ा; तुल० उपाश्रय, बूढ़ों का वास; (संधि० १७, थोड़ा, गु० थोडू; (भ०; जस० ४, २८, ८, २)। १७)। थेरासण - न० (दे०) कमल; (दे० ना० थोउवि-अव्य० (सं० स्तोक+ अपि > मा० ५, २६ ३६, १४, प्रा० थोव+अवि) थोड़ा भी; "थोउवि १)। पयडिय दूसह-पयासु;" (३० थेरि-स्त्री० (सं० स्थाविरा>प्रा० ८)। थेरि) वृद्धा; (जस० २, १६, ६)। थोट्ट-वि० (दे०) छिन्नहस्त; डूंठा; थेरिव-वि० (सं० स्थाविरा+इव) "महियलि लोट्टयोट्टदुग्घोट्टई;" अर्थात् वृद्धा के समान, दीर्घ नारी के समान; सूड व पैर कट जाने के कारण ठुठे हाथी (चं० १, ६)। भूतल पर लोट-पोट होने लगे; तुल० म० थेरोसण-न० (दे०) संवुज, कमल; थोटा; (ण० ७, ७, ६; जस० (पड्)। थेव-पु० (दे०) बिंदु (दे० ना० मा० थोछु-वि० (दे०) टूटा, जिसके हाथ ५, २६)। ६,१०, थेव-दण्ड–पु सहारे की यूनी, टेकने टूटे हुए या खराव हों; (सुदं० का खंभा; (की० ४, १७३) । थोड-वि० (सं० स्तोक>प्रा० थोव) थेवरिम-न० (दे०) जन्म के समय थोड़ा; तुल गु० थोडो; (को० ३, ६६)। बजाय जाने वाला वाद्य; (दे० ना० मा० ---उ वि० (प्रा० गु० १६, २१; सा० ५, २६)। २३)। थोडिलउ; (प्रा० गु०३७, Vथेन्व-(सं० विगल का धात्वादेश २)। थिप्प, थेप्प>अव० थेव) विगलित होना थोत्तु-त० (सं० स्तोत्र >प्रा. थोत्त) या गिरने से बचाना; (को०)। स्तुति; (व० १०, २, १२) । ३,४, १)।
योरंसुय
(५५०)
थोवा
योरंसुय-न० (सं० स्थूल+अश्रु+क २, ५५) ।
>प्रा० थोर+अंसुय) बड़े-बड़े आँसू; थोल-पु० (दे०) वस्त्र का एक देश;
"पुणु रुण्णउ मई थोरंसुयहि;" अर्थात् (दे० ना० मा० ५, ३०)।
फिर मैं रो उठा और बड़े-बड़े आंसू थोवंतर-न० (सं० स्तोकान्तर>प्रा.
वहाने लगा; (जस० २, ३३, २) । थोव+अंतर) थोड़ा सा फर्क या भेद;
थोर--वि० (सं० स्तोक >प्रा० योव) (क० ४, ८, ७)। योवंतरि -थोड़े
थोड़ा, कम;
"लप्त संख
आनु
घोर
जासु अंतर पर; (रि० ६, ६) ।
मूलें मेरु थोर;" अर्थात् लाखों की संख्या थोव-वि० (सं० स्तोक >पा० थोक>
में घोड़ों को लाया गया जिनके मूल्य के प्रा० थोय) थोड़ा, तुल० म० बं० ओ०
सामने सुवर्ण का पर्वत मेरु भी कम जान पं० थोडा, गु० बोडू, ने० थोर, सिं०
पड़ता था; (की० ४, ४२)। –य वि० थोरो; (जस० ३, २०, ८) ।
थोड़ा; तुल० मगही थोर, म० थोड़ा; थोवन-वि० (सं०
स्तोक>प्रा०
(क०)।
थोवाग, थोव) थोड़ा, अल्प; (सुदं० २,
घोर-वि० (सं० स्थूल>प्रा० थुल्ल, १३, ६; क०८, २, ६) ।
थोर) मोटा; तुल० गु० म० थोर, (भ०; थोवड-वि० (सं० स्थूल >प्रा० थुल्ल,
सं० रा०; जस० १, ५, ३; क० २, १२, थोर) मोटा, तुल० म० थोर; (सुदं०
१०)।
११, ६, ११)।
थोल-वि० (सं० स्थूल >प्रा० थुल्ल) थोबा -सं० स्तोक >प्रा० थोव) थोड़ा;
अधिक, पर्याप्त; तुल० पं० थोल्ह; (की०
० पं० थोल्ह; (की० तुल० म० थोडा; (हे० ३७६, १) ।