Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Mulak Raj Aanand
Front matter
मनुप्प प स चमार होता है न कि जम से। यह बहार
मिक्यु पाग बढ़ चला।
यनितून मुझे पसारिया ता तरी जान ले गा! -सजनू ने
पिल्लावर पहा । तनी ही देर म लामहा का वाला दयाराम
माला महा और भगा पास का रामनिवास मा अपना जगह स नीचे
पूदार मित्र रास्त म पा सह हुए। महत उन लोगा व निश्चय
पी दृवतारा जानता था। उम यह मा पता था कि अगर वह पाग
यह गया ता उनम लहन का हिम्मत न हागी पर दखना क्या है कि
उमना मी जिगर लिए उपन यह मव करन का माहम किया पा पहले
ही पाये मुह चुकी था और उ7 पुकार रही पावग भिक्वेटा
सोर प्रा।
पर भिवतु यह माचन कि मान ता ता उमन या अपमान
राहा नाता माज हा या मह ? उन्होंने म गांव वा मिट्टा पर चलन
म मना नहा पिया चाह बट मतिर म भ नहा जा मरा और उमा
मा मया दुग उटा बम इसलिए दि उसन लहर र लिए पत्थर मार
है अब उमन निचय पर प्रिया पि महर बनाना चाह दूगर उसकी
समयता सरें या न करें। उगमा प्रति म हावा जो तत्व पा और
বা শন গণি বিন হা হা আ ন হ য়শা মা যু
भगाय मगनापूर गाहा म भर पा । वह प्रपन पर म भान
मारा भाग पाता रहा मौर व सव दात हायोग उपाधपाल
मर बट। -नमा धोय पहा जग हा उमन दागिमिका
में उनका एपा और य गब 37 परन रह है।
घुनारि गरारा मना जिमन मा का पाप अपन भोगन
मन लो यारर बाहर पा गया। डोटरर बाला--
'तू माहे पान र रही है तुझे ममा पता चल जाएगा कि
गया हो रहा है। हम परि मनही जान देगे और निमापीर मोगा
१४ नहीं । -~-लक्ष्मण यह कहकर अपने पिता को दुनान चना गया। जब तव पकौडा जसी नाक वाला लक्ष्मणमिह घटनास्थल पर पचा भिवम्बु सजातीय हिंसा को ऊँचे पत्थर की चौकी तक पड चका था और यह सब उनके घस और तमाचोक ग्राममण के हात हुए भी हुआ । लबर दार धूलोमिह तक्ष्मी व पाम खटा हुअा इस मव सधप को मत्र मुग्ध सा देखने लगा । भिक्खु का माँ ने उससे पार स्वर में कहा- इह अलग कर दो वरना य उमे मार डानेंगे। उम क्षमावर दो क्योकि वह मेरे हो कारण नड रहा है। पौडी नाव दात न वहा- कराहना वरवर और वह मदिर पत्थर की और चिरुनाता हुआ आगे बटा। प्रा मख लागा। सजनू ने चीसकर उत्तर दिया। अपन सरक्षित को वापिस बुला-टस गौ भक्षक चमार की । सडक पर पत्थर फूटने के लिए भेज दे इसको। पूनीसिंह ने कडक्सर कहा- अरे दुष्टा और उसकी यह से उन सब के चेहरो का रग बदल गया। घलीसिंह ने कहा- भिस नौट प्रा- इनकी जान मत ल य सब कायर हैं । चार चार अकेल का मुकाबला करत हैं-और पिर मार खाते हैं। आ जा हम क्स भा हो सडक जरूर बनाएंगे। लक्ष्मा बोली- भिक्षु वटा--यदि तू इह प्रम करे तो ये भी स्वीकार करेंगे कि इन तोगा ने कितना अनुचित व्यवहार किया है। यह सुनार जम हा भिक्खु पापल के पट स वापिस लौटन लगा लाल टमा टर जस मुह वाले जमीदार ठाकुरसिंह की तीखी और साफ आवाज सुनाई 'टहर जाप्रो दोना-~-दिन-दहाडे चोरी। यह गांव धरोहर थी जो मरे बुटव का देवतामा स मिती यो और तुमन इम सान स पत्थर चुराकर दूपित कर दिया। 'यह भिक्षु अपनी मां के साथ मंदिर को अपवित्र करने चला
या। म्बन न चिन पिया।
र नादिर ना मान मन पर नेपाहा पा
टनर रिया-न मद व वा नतमन दात करना चाहता
दन ना चाणता-मर तुन निजात हा साठा वाउचौत का
हामुकाम भी दाउर दन
मि कमन न पुनन्दिा पगडना न प्रति का
मान्य-नदा मचिगनगन्य मात्र चल दिया।
१४ नहीं। -क्ष्मण यह कहकर अपन पिता को युगान चना गया । भव तक पकौना जमा नाव वाना लक्ष्मणमिह घटनास्थल पर प'चा भिक्खु सजातीय हिंदुप्रा को ऊचे पत्थर का चौकी तक सदड चका था और यह मव उनक घसे और तमाचो व माक्रमण के हात हुए भी हुआ । लवर दार धूलोमिह लक्ष्मी के पास सटा हुआ दम मव मघप का मत्र-मुग्ध मा दखन लगा। भिवव का मा ने उमसे पान स्वर में बग-रह अलग कर दो वरना य उसे मार डालग। उस क्षमावर दो क्याकि वह मेरे ही कारण पड रहा है। पौडी नाप वाने न कहा- क्रान्ता वदर और वह मदिर में पत्थर की और चिल्लाता हुअा भाग बना। यो मूख लागो। सजनू न चीखकर उत्तर दिया । अपन सरक्षित को वापिम बुना न--स गो भक्ष चमार को । सडक पर पत्थर कूटन के लिए भेज दे सको। घनीमिह न कडकर कहा- अरे दुष्टा और उसकी कडक से उन मब व चेहरा का रग बदल गया। घलीसिंह ने कहा-भिन्सू नोट प्रा--नकी जान मत ल य सब वायर हैं । चार चार अकेने का मुकाबना परते है-और फिर मार खाते हैं। प्रा जा हम क्स भी हो मडक जर बनाएंगे। लम्मा बानी-भिक्षु बटा-यदि तू रह प्रम कर तो ये भी स्वीकार करेंगे कि न लागा न क्तिना अनुचित व्यवहार किया है। यह मुनकर जम हा भिवसु पापत्र पड से वापिस लौटन तगा लाल टमा टर जस मह वाने जमीदार ठाकुरसिंह की तीखी और साफ मावाज सुनाई दी- 'टहर जाम्रो दोना--गिन-दहाडे के चारा। यह गांव धरोहर यी जो मर बुटव का दवताना म मिनी यो और तुमन इमे खान म पत्थर चुराकर दूपित कर दिया। 'यह भिक्नु अपनी मा व साय मनिर को अपवित्र करने चला था। सजनू न सूचित किया। लपरदार धूलीसिंह ने जो अपने सरपण म उसे परे ले जा रहा पा उत्तर दिया- मैं इन मर के बारे म तुमस बात करना चाहता हूँ-- अगर तुम भी चाहो तो पर अगर तुम चिल्लात ही रहोगे तो बातचीत क्या होगी? सडक तो क्से भी हो जरूर बनेगा। भिक्षु के मन म धूनीमिह की पौडी सरीखी नाक के प्रति जा सौंदय सबधी अचि थी उसका दवाकर वह उसके आगे-आगे चल दिया।
दो कहत क्वीर सुनो भई साधो भिक्सु मन-ही मन में बडावडाया—जसे हो वह गाँव स चुपक स क्लिकर उन पत्यरो के ढर की ओर चला जो वह और उसके अछूत भाई खान से लाए थे। जुनाहे और सत कवि क्वीर को गावधन क अछूत पूजते थे। उसके दोहे भिवखु को सवेरे उठते ही स्वाभाविक रूप से याद हो आते थे क्योकि धध जो खेतो का ढक लती थी मनुष्य को प्राथना करने पर बाध्य करती थी और फिर भिक्सु क दिल म टमाटर जसे मुह वाल ठाकुरसिंह से सभावित मुकावल के भय स कुछ उत्तजना भी थी। दीवान स्प कृष्ण के भविष्य द्यात विचार सजातीय हिंदू अछूतो द्वारा पत्थर उगन और तोग्न विस्त क्वन टमलिए ही नही थ कि व अछूता द्वारा खादे हुए पत्थरा को छूना नहीं चाहते थे बल्कि इसलिए भी वि व इस वात स भी रप्ट थे कि अस्त लाग सरकारा ठेका पर काम कर क रुपया कमाए-जस बिजली के तारा के लिए खभे लगाने से । उच्च वग लोग निम्न जाति वाला क माथ अपना श्रम नही जाडना चाहत थे । उन्होंने आज तक अहता का सेतो पर तो काम करने दिया पर अनाज के वदन म और भूमि उनको एक-दूसर स जोन्ती रहा पर यह एक्ता आज नष्ट हो गई क्यापि वतन धन के रूप मे बन गया। अपनी सासा म दवडाता हुअा चोरी स इधर उघर दखता हुआ और प्रात' की भूमि की माठा-मीठी सुगध के प्रति सचेत भिक्खु अपन से पूछ रहा या आखिर क्वीर अपन अनुयायियो । को क्या समभाना चाहता था ? और उस पवार २ शिक्षात्मक नन्द उस गीत म याद आ गए। भक्ती साधा-साधा अध्याम यहा है दिममार म ईम्बर को प्रत्यर अभिव्यक्ति का प्राचय स दवा और नवत रहा। इस पृथ्वी का दवा जिस पर ग्राम की बू] एम चमकती हैं जस जवाहर । नान पावा का दया जिस पर मूरज य हाता है और दूर जाना है और वह जा मावार प्रकार है उसका पूजा करो। भिवायु व सुप्त कवि हृदय म न विचाग म मरमति थी पर अपना तक बुद्धि का विश्वास कर और ईयर का विचार मस्तिष्क म दूरवर उमन जुनाह मन का एक और वाणा दारा । काम-ही-वाम कान जाग्रा भवता क्याषि काम म मार पाप धुन जात है--मिट्टी और पमान म । इस प्रकार मोचत हा वह तेजा म धनोमिह स म पट पत्यरा वरत पहुँचन नियत चना जर्ग उगन अपन माथिया का मिनन व लिए कह दिया था । वह माहम का अभिनय ता कर रहा था पर उसे अपन एवायापन का भी प्राभाम था-उम पृथ्वी पर हा निमका वह प्यार पग्ला था और जिमयी यह मतान था। क्यापि वह जानता था दि पृथ्वा माता उगवा-पट नहीं भर मगा यति भजन महा और रामनिवास मजदूरी २ वार म बदान का प्रयत्न नना छान्नें और पभा भी भाडिया म उस पर टूट पड़ेंगे । करा उमत्रा यार बन और उमा भाई ही उगवो बचा सक्त हैं । उम इस बात म पाई सरह नही था वि मजातीय निए उनका पत्थर ताने का वाम गुरु नहा रन अपन पर पन म उमको प्रखें चारा भार घूम गद और जम वर उमा बार में अपना वपना वा ययायना की पुष्टि कर रहा ग उमरी प्रो कुरा पर गरी तान स्त्रिया म जमादार ठाकुर मिह का सडवा स्वमणा का जिमा २ग गहू वा तरह भूग या हमारन लगी और वहाँ नजर पहन ही उसन रहें दूमरो तरफ कर लिया ययारि उसे पता था कि यदि उसके प्रति उमका अधचतन कायमय प्रम कही उसकी पासा की कारा पर उनक पडा ता उस द य मनना होगा। वह एसा विचार मन म जान का माहस हा कस कर सकता था पर उत्ताना वे उम चरम क्षण म उसन अपन मन स पूछ हा तो निया- एसा क्या नहीं हो सकता ?--अवश्य हा मरता है। फिर भिक्नु न बुए के साथ पडे खार पू के ढर में चारों तरफ चक्कर नगाकर लवरटार धूनीसिंह का जमीन पर उठी एक काटदार भाडी उठा ता । वह पकौडी जसी ना वान घूलामिह की जमीन पर पर रखते हा मुरमित अनभव पर रहा था क्यादि दोनो पहाडिया की खान से लाए हा पत्थरो के ढर नवरतार धनोसिंह व खत म हा पड़ थे। बस एक बार मारे अहत विमो नी चान स वहा पहुच भर जाए । मव-क-सव पष्ठ कुन वान हिंदुओ की हिसा स वच जाग। घनासिंह न सात हाय चौनी जमीन मक बनान के अपनी जमीन म से दो था इस लिए व किसी भी प्रारमण के डर स सुरक्षित थ क्योकि अपा सरक्षक क संत म ही तो काम करेंग । सारी अतृत बिरारी यौवन की शक्ति और स्फूर्ति स उफ्न रही थी इस आगा म वि सडक पर काम करके व अपन पतन की गहराई से उठकर जावन + घराता पर आ मा-गाव का अहत ग्रावाना नरक से ऊपर। जम ही उसन घनीसिंह की जमीन पर पर रखा और रा देसा कही कोइ उस देख तो नग रहा उसका दृष्टि पन्ति सूरजमनी की मफ्ट गावी पर पडी जा अपना पीता की गडवो म पानी भर रहे थ और हरि प्रोम हरि अाम बडबडा रह थ। फिर दुर्भाग्य वि पुजारी जो न उस देख लिया क्यादि व उसे नाम कर पुवार रह थे । प्रा भिक्खु--पर ग्रा भिक्षु । और उमने मामन पथ पत्थरी वर-मून और वीरान । जिन माथिया न उसके साथ पत्थर तान की प्रतिना की थी उनम स का भी प्रभा तक वहा नहा पहुँचा था। उमका मा न हमेगा उसे बताया था कि सवरे-सवरे ब्राह्मण का मुह १६ दसना पुरा गान होता है। जर्म-जस पर कुए १ पास जा रहे ये चमकात्री छाटा गडवी पडित मूरजमनी क हाथ म चमक रही थी। उन्हान औरता में कहा-- राम राम राम जो का बी मुझ थाना पाना तो द। जमीनगर ठाकुर सिंह की लडका स्वमणी जसे ही वह अपन पातन में घडा का अपन मिर पर रखन वाली थी एक क्षण स्की। उसने ब्राह्मण के कुए के पास प्रान ची प्रतीक्षा की। पन्ति सूरजमनी न निप्टा स जनऊ को कमर स निकाला और कधे से ल जाकर वाय कान पर ठीक्कर के रख लिया जहा वह पहने से ही गौच के लिए लपटा हुआ था । इतन समय म उनको इतना प्रव मर मिन गया जितना कि स्क्रमणी गरीर की बनावट को परखने के लिए प्रावश्यक था। जम ही उमन कुए का एक अोर से अपने घडे का पति जी पातन वतन म पानी डानने के लिए रढा किया पण्डित जी प्राग्यो म हल्की बनावटी मुम्कराहट निए उसे देखते रह । रुक्मणी मॅप-मो गई। अपन पिता को कह देना कि भिक्षु धूलीमिह के खेत को गया है। उन्हान पहा । य चमार लड रारत पर तुल हैं। रकमणी ने अपन घूघट से अपना आपा का ल जा स ढक लिया और अपन घडा की प्रार मुह गई। पण्डित सूरजमनी की पाखों ने युक्ती गरीर की रखामा को पदावस्था का एकाग्र कामुक्ता स बड़े प्यार स म्पा किया और फिर सुनात हुए मुह में बडबडान लगे- "ज राम जी की। दो बूटी औरतो ने जो वहां पर यो पण्डितजी को वहां स चतता करन के लिए तपार में बहा क्योकि उनकी औरतों का पाछे से कनखियो स ताक्न या प्रान्त तो गाव वे सब लोगों के बीच म ऐसे प्रसिद्ध यी जम पोई पौराणिक कथा ! पण्डित जी पर उनये विदा करने के हज का कोई प्रभाव न पहा पर उहें निधारित रीति पर धरने की चिंता थी इसलिए धोती 4 मिरे को पकड मिर २० को ढक वे चल दिए क्योकि जगल पानी को जाने हुए गरीर के इस श्रादरणीय भाग को प्राकृतिक तत्वो के स मुख खुला क्स छोड सक्त थे? सहज बुद्धि से उन्होने कुए के किनारे से अपने आप को बचाया। छोट जोहड से भी जहाँ जानवर पानी पोते थे जिसस कि उसका छाया पवित्र पृथ्वी पर न पडे जो कि हरे रंग की तो न होगी पर पेडो से परे और जगली झाडिया के बीच में के रग को जरूर होगी । उनको चाल का गति से उनकी काय की शीघ्रता पता चलती थी और वे अपने पुर्तीने नगे पावो से जल्दी-जल्दी चल रहे थे-अपने परा के तना म छोटा-घाटा घाम पर पडी पास की बूदा का अच्छा अच्छा स्पश अनुभव करत हुए। मायद उनका आसा का दष्टि कुछ तोव हा जाय यदि क्वल व एक-दो मान नगी घास पर चन सकत क्योकि उहान सुना था वि बुझती पाख प्रोस व स्पश और सूर्य का प्रयम किरणा स शक्ति प्राप्त करती हैं। सूय को पहती किरणो की उपादेयता का विचार आते हो उहान मुह सूर्य की ओर उठाया जो कि पूर्व क छार स उदय हो रहा था पर अचा नक उनको ध्यान आया कि गौच जात हुए सूय मा च मा को दखना एक धम भ्रष्ट काम है । उनका यह विश्वास हा चना कि उनकी बात सो मुसीबतें अपना कमकाण्ड छोडन के कारण हैं । वे पुराहित थ उनको तो दूसरों के समक्ष एक उदाहरण बनना चाहिए था । व धार्मिक पद्धति को भूल क्स मक्त थे । फिर उह याद आया कि पिछले कुछ दिना स उन्होंने विचार पवित्र रखने की कोई चिंता नही की-जस उह भिक्व का नाम लेकर नही पुकारना चाहिए था अथवा कुए पर स्त्रियो से नही वानना था-क्योकि खता म प्रात गमन समय तो पूण गाति हानी चाहिए । कलियुग + समय म जब धम नियम खपित किए जा रह हैं विशेषतया नाची जाति के लोगा द्वारा का व्यक्ति भी हर समय इम धम सपन्न स ना वच सक्ता । दुभाग्य स कमकान की अवहेलना दिना दण्ड के तो की हा नहीं जा सकता-और अछूत तो अभिगप्त हाग हो । दुजन भिक्खु और उसा चवर भाई उनकी धम में प्रति २१ अत्यत सावधान पूर्ण आस्था को जानत थे और इसके पहले दिवे उनके पूजा को देवतानो के कोप का भय दिखाए व उन पर पत्थर पंक दते । पण्डित जी मे शारीरिक बन इतना न था कि उन धूर्तों से लह सकें पर देवतामा के डर से वह अपनी शरारत गेप देते थे। पण्डिन जी ने चारों तरफ देखा कि कही उनमें म तो काई वहां नहीं है। कोई नहीं था मदान साफ था बस एक ऊट कांटोंटार माडी को दातों से कुतर रहा था--सत के बाँई तरफ जहाँ सडक बनाने के लिए मिट्टी जमाकर के रखी गई थी। पण्डित जी को उम महक के लिए जमा की हुई मिट्टी मे एक लाम दिवाई रिया। वे चीटिया के घासल को नमन को और चाहे के बिला वी मिट्टी के प्रयोग म बच सकते थे और इस प्रयोग के कारण अप वित्रता से। पर उह यह भी पता था कि यह मिट्टी अछूता द्वारा इसही की गई है और उन सा से अपवित्र हा चुकी है । अपने काम से उठकर उह काई अच्छी मिट्टी ही दूरना चाहिए। वह अपने बायें हाय म अभी कुछ अच्छी मिट्टी क्या न उठा ल चलें । बस तब हा बह हाथ गौच काय वे अय अगा के पाम न पा सपगा पयाकि उनका विन्याम था कि यदि यो हाय परार म मन माफ करने के काम म लिया गया तर उमवा वोर लग जाएगा। वे अच्ची मिट्टी अपने पास जमा पर रप लेंगे-अगर उह वह मिन जाय । पर चारा तरफ रेत-ही रेत इतनी थी विगही प्रकार का मिट्टी दूर तक नजर नही पाती थी-वस सिवाय उस स्थान में जहाँ मडर बनन वानी थी। पति ना था दिल मिट्टी के ढर म म अपने वायें हाथ की मुट्ठी भर लने का सरचाया । उस समय उह कोई नहीं देख रहा था---पर व जमे ही उस पर भव दि उहाँने हाप साच निया, पयारि उनका दिल तजा स घडवन लगा, और अपन घडवन हुए दिल वा लिए वे मधाधुध माहिया की मार भागे~-उस घमभ्रष्ट कार से परराते हुए जा भव"यमानी या और घाटी-छोटी बाता से बचने के प्रति विस्मृत, व खासी ती से दौड पड । उनको वह मव जल्दी हा करना चाहिए था जिसके लिए व यहाँ आए थे और कुए पर जाना चाहिए था स्नान करने को-गरीर श्री वावा मर मिटाने का। उनक बतन म इतना पानी था कि अपने परो पर विधिपूर्वर छोटे दे सकें। अरे दांना म चबाने और उह साफ करन क लिए वह दातून ता भून हो गए। पर नही उनक पास इतना ममय कहा था कि वोकर या नीम पड से एक टहनी तोड सकें । अचानक व एक करकट की। तरह जो अपनी हो छाया स डरता हा भाटिया के पीछे भाग पड़े। उन माडिया को जा उनकी सफद दाटी और मिर को छिपा सकता थी।
तीन रक्मणा व चेहर का भालापन घबराहट के गम-गम लाल रग म रग गया था और इमा अवस्था म वह अपा घर को पार चली जा रही थी। वह असमजस म थी कि अपने पिता का एकदम वह सब कुछ जो पग्नित सूरतमनी न उमस बहन के लिए कहा था कम बना सबगा। उसका गाव नौजवाना का नाम जबान पर लाना ठीक न था और प्रछूत नोजवाना का ता रिसा भा अवस्था म नहीं । फिर क्मणा की कल्पना न उमका भिक्षु का दवा-उसको जिमन रक्मणी वो कभी नही चाहा। जिसका गरार लचीला और जवान था और जिमका रग पक्का और चेहरा ममतन था। उस हाठ कापन लग। उमा अवल मन म र हल्की-मो व्याकुलता की प्रतिध्वनि उठी जसे वह भिवन्दु वी उसक प्रति अवाक विचार स जन पडा हो । कमणा वा अपन चेहर को वह छाया ना उसका पिता व छोर दपण म तिखाई देता या याद आई पीर वह अपन प्रति ही कामल-मा अनुभव करने लगा । विगतया अपनी बडी-बडा पोखा व प्रति उसन साचा-ग्राज वह चरह पर वे तवे की नानिमा थोड तेत्र म मिलावर अपना पलका म लगाएगी और उसन अपने पारीर का चरत-चपन एक प्रार मुवाया जिमम उमम एव नृत्य की सी लय-तान प्रा जाय । इम क्षण उम मान हुआ कि उसवी धमीज का पीला रंग पोका पड गया है और उसके साल बाहर से मन नहीं खाता पोर ना ही नील से रग 4 पन्न् से। इन १.योरगरेन व पाम भेजना होगा पर यह सब तभी हो सक्गा जव उसके पिता उसकी सगाई के बारे म मोघे। पर इन मव पडो में इम समय सराहे जाने म क्तिना पानद है जारि वह सत्रह साल की है । जवान है न कि तीस साल का बुद्धिपा । अपने समुर क पर फिर उनकी वल्पना 4 मायन रिसा का जल्स में घूमता चित्र पाया जो रात के समय उससे जबरदस्ती कर रहा है और मन ही मन मन नित्रय कर लिया कि वह कभी विवाह नहा करेगी। पर पौग्न उमे यह सोचना पड़ा कि वह तो एक बकरी है जिमा हतात हान का दिन निश्चय हो एस आ जाएगा जसे गिन का मूय उन्या है। आज तक उसका हाथ किसी के हाथ म बस इमलिए ही नहा निया गया कि उस पिता के पास दहेज लिए पर्याप्त बन न था। उसने अक्मर रात का अपने माता पिता का आपम म इस बारे म बातें करत मुना था जब वह बरामन की सुगा रमाई में बतन माफ कर रहा हाती था और उना यह नि"चय था कि पहले उसस एक मान छोट भाइ हा गादी होगा क्याकि उसकी बहू अपने साथ जो दहन ना वह हो रवमणा की गला के साथ चला जाएगा। समथा के हा? अपन होन बार पति के विराध के विचारदा क्स गए और फिर उमन अपनी गात ठहरी हुई दृष्टि के सामन भिक्ष का मति माकार करने का प्रयत्न किया। मन बुद्धि से उमन अपनी आय बनपरा और उम जगा जम कि एक रहस्यमय मुमराह उसक होने पर उतर पा' हो। वह हल्की हल्ला हो आई और महोगी को मा अवस्था म पाग बर चनो जम कोई मोरनी हो जिमका चतना पसा मे आकाश में धीरे वारे उड रहा हा अचानक उमरा दाया पर एक बरे पर मजा टरराया। उमको क्मनाय चान टूट गई पातन में घड मिर पर नि उ. और थाग पाना छा गया। वह डर स पीती हो गई-उन गानिया का विचार प्रात हा जा उम पर पडना यदि घर वास्तव म गिर जान और उनम गठे पड जान। और फिर उमम उस ग्रहन नड व प्रतिकार उभर पाया जिमन उसको तबाह ही कर दिया हाता। उमको मा में प्राटगा - त्मद गर उस कान में गरज उठे.-'इन गदे बालमियों की नजरो में बचो। मत भूलो कि तुम गोवधन गांव व जमीर का लहकी हो। हम प्रोर क्षत्रीय जाति वे हैं--राजपूत हैं भगवान कृष्ण के वज और हमन भी मुसलमान या पिरगी व मामन मिर नहा मवाया। म्यो र पाम एक बहमून्य उपहार है और यह दम दन के लिए बचा रमना हाना है जो उमे धर्मानुसार पाएगाहर का औरतों के चरित्र वानर नहीं जो बाजाग म बह्न वाती वामना का पनी म रक्ट को तरह पत्र दी जाती है। पर उमा प्रपन मन म पूया कि वह उनको दम दवावर रर जो कि दापहरी वात को नींन म गरीर की गम प्रमत्तता म याद हो पाता है और जा मवरे जागन म पहन के मपना म सताता है। जब टडी ममीर Tरार स निपटती है नो हाप अपन माप ही तक्यि को पकडनर लिए पर जात हैं और स्तनों व कापन हुए मांग को दवान के लिए उस पनग पर उटी अवस्था म लटना पड़ता है। अब तक स्वमणी अपन म बहुन दोन चुका थी । उमन उठता हुई मूरज की किरणा को दवार प्राय भाबाट हागा मिवाडा पोर निश्चय म कहा- वह ए हरिजन मैं ता उमरा कल्पनातक वा नहीं टू माती। परीक्षण उसको नि दूध गया-इम निराला विचार स कि उमन किमी एमे पुग्पको अम्बावार किया है जिसने भी मांग उठावर रमपी पार का तब नही । पर प सब ता नाच हैं भार हैं जो मुग जानवरा की गाराप करत * और रम्पिया बनात हैं। दिन।नगी भी तो हैं । वस पवन भिादु हो ता प्राता है तो गाता है और वित्त एजधार पिर उमन उमरे प्रति प्रान विचार या पिराध रिया बार अपन निश्चय वा और पसारनान ६ निमित्त कहा- अपन मन ममें पवित्र जमार का नया जा है। इन मिका व चहर ना वहन परेशान दिया है। वह अमर मामा वगार माम खडा दिखाई दिया है अपनी बांहें क्से गहरे भूरे रंग के चेहरे पर चमक लिए और अपनी आखें भुकाए उस अफमर दीवान स्प कष्ण क सामने जिसने पिछले साल से गाव में आना शुरू किया है । अपने घर का दहलीज पारकर उसने देखा कि पिता जी चारपाई पर ब० दुवका पी रहे हैं । उसे पता था कि पिताजी यह सब अपन पट के भीतरी तत्त्वा को गतिगील करने के लिए ऐसा कर रहे हैं क्योति व हुक्कै वे धरा तल से उठी गडगुडाहट के विना कहा टस से मस होत हैं। पिता के हुक्का गुडगुडाने की आवाज ने रक्मणी को कुछ गाति पहुँचाई पर उसने देखा कि व उसे कनखियो से देख रहे है-जसे-जसे वह आग बट रही है। सजनू को मा-इस लडकी को अब कुए पर मत जाने देना। रुक्मणी के पिता ने उसकी मा से कहा- खुद जाम्रो मा क्सिी और को क्सिको भेजू ? -मा ने पूछा। पर जमीदार ठाकुरसिंह के पास कोई उत्तर न था । व हुक्का गुड गुडाने लग। हो सकता है कुए पर कुछ झगडा हो जाय अगर यह चमार लडा पत्थर तोडन पर अडे रहे। रक्मणो ने एक एक करके सारे घडे लक्डी ये स्टड पर बरामदे म रख दिए । फिर उसने अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पाछा मोर विल्कुल साफ आवाज मे कहा- पडित मूरजमनी ने कहा है कि अपने पिता से कहना दि भिक्षु धूनासिंह के खत पर गया है। उसे गा जसे जितनी गुस्स की प्राग उम गरीर में भिक्खु के विरुद्ध थी वह एक एक कण उसने उगन दी है । वह हाय-परो को ढोनाकर रसोई म अपनी मां के पास सुविधा से वठ गई पर फौरन उसे ही वह बठी उसे अनुभव हुमा जसे उमका मिर मूर्धा में चकरा रहा हो और उसका चेहरा तम तमा गया-एक अपराध की भावना से-उस व्यक्ति के विरुद्ध शिका । -
२७
यत स जा निर्दोष था । और जब कि उसे यह तक मालूम न था कि
सरजमना क्या उसस ऐसी बात कहलाना चाहता था। उसकी आत्मा
का हनन उसकी इच्छा के विरुद्ध हो गया क्यानि भिक्खु तो सारे
अटता म मर्वोत्तम गिना जाता था-
मौजी और सुचरित्र ।
ये सब दीन मनुष्य हैं और हमेशा अपनी नजर हमारे सामन
भुकाए रखते हैं। -स्वमणी ने कहा ।
मैं भी आज तक इसी भ्रम,म रहा हू ।' ठाकुरसिंह ने कहा। आज
य हमारे मुह से रोटी छीन रहे हैं। धूलीसिंह की सहायता से पत्थर
तोडकर ये लोग सरकार का खुा करने की माशा करते हैं और पर्याप्त
धन कमान को भी जिससे में श्रेष्ट जाति के स्तर को खरीद सकें। पहले
हो पास मावश्यकता से अधिक धन और हमारे पास धन
बम होता जा रहा है।
-और जम इन TT से उसे स्वय ही प्रेरणा मिली हो वह
हुक्का छाड घर से बाहर निकल गया।
तीन पकौडी जसी नाक वाना लबरदार धूलीसिंह अपने खत के गांव के कुए वाने सिरे पर सता अपनी खिजाब नगी मूछा स खल रहा था कुछ घबराहट वारण और कुछ अपन राजपूत पूर्वजो के साहस को बताने लिए और उस संघप + लिए जो कुए पर शुरु होने वाला था। अब तक उमन देवन औरतो को आते जाते देखा था-सिवाय एक पति सूरजमनी क जो खत से मुए पर नहाने वापिस आ रहा था पर उसको धूनीसिंह को-दसकर जिसने अपनी दिशा पलट दी थी और घर की पोर चल पडा था। धूनीसिंह का पता था कि यह धूत ब्राह्मण कुत्ता ही सार भगडे की जड था । वह साचने लगा यह बगुला भगत है जिमर हाय म माना रहती है और जो गाव में किसी भी प्रादमी से दुगना खाता है । जो गाव वाना का मत्यु की वषगांठ पर-जो हर दिन किसी न विमा घर अनन्य हा होती है-दावत उडाता है और दो प्रयों वानी बातें कहता है । यह मस्कार ब्राह्मण २ रूप में लोमडी धूलीसिंह के प्राग मर चुका है पर दूसरी तरफ टमाटर से लान नाम ठाकुरसिंह कमाय मिनकर पन्यत्र रचता है। काग कि गाव की औरतें तनी प्रामानी स धोष मन पाती। तो उसर सत स्वभाव की पथ साता है। गाव क का न एक बार उमका पार हाया लिया था। उन्होंने मर हए वन की हरिया उमा चौक म डाल दा जर कि वह योगा की तरह गमाधि नगार बगहा था। पर मुजातीय का न भिवग और दूसर मत नपा का नाम लगा दिया और सूरजमनी २६ ने उनका शिकायत पचायत सकी। य उच्चवर्गीय नौजवान कायर थे--- स्वय मूरजमनी के नडर भी पत्थर तोडन और सडर बनान में काई कठिनाई न होती। वे अछून नडका के साथ वे खेलते थे-जब उनके घर के बडे न दख रह हा पर जहाँ काम या परिश्रम वा प्रन प्राया ये मव पवित्र हिंदू बन जात थे। जम मैं एव पवित्र हिंदू न होऊँ। सार शारीरिक और नतिक कायर जल्दी ही पिछ जाएंगे। वेवर वे एक जो भिवायु का तरह शरीर और मन स स्वस्थ हैं प रहगे और प्राग बटेंगे। और अब उसके मामन एक पूय था। सूय ऊपर चरत, पा रहा था। पूनीसिंह की इच्छा थी कि ठाकुरसिंह पाए और एक्दम डवर पमना हो जाय या फिर वह महायता करने का वचन दे। उसन एक ऊंचे स्थान में पीछे देवा भिक्तु और दूसरे अटून पटक काम पर जुटे हैं। उनके डोडा की चोट की गूज पाम की छोटी पहा डिया स टकराकर नौट पाती थी। वे सर एक महीने से कम समय म ही काम समाप्त पर गे और सडक को समतल करने वाला इज्जन प्रा जाएगा उनक मारे पत्थर तोडने से पहल-पहले ही और फिर पत्यर तोपन और इन्जन का वाम माय-माय चत मवेगा। पर वे तो वेदन सात प्राणा जब कि दीवान स्पक्प्ण और इजीनियर तुलसीराम का बहना था कि उन्हें तीस वे लगभग बाम करन याना की पावत्यवता है यानि या प्रारभ हान से पहन काम ममाप्त करना है। उसकी भा, मावा को पार उठ गइ पोर उमने वायु-मडन को गम-गम हवा वा माम से प्रदर सीचा जमे यह जांच रहा हो कि मूय म इतना ताप यस समा सरता है। उम गर्मी के तत्वा को परपकर जो अप्रल म प्राकाम नीचे गिर रही थी वह बता मक्ता था कि मानगून मी जल्ली ही माने याती है। प्रात ये मूय की मुगध उमरी मोटी नाक के नयनों में भारी भारी पुएँ की धुडनी बनाकर चढ़ गई। गर्मी म कुछ विशेष चिनगारा रियाई न दी। इसमे ता मानमून जली शुरु होने वाली मासूम होतो यो। जून से पत में या जुलाई के गुरू-शुरू
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भाएगी। मुना जाता है वह-बड़ मणु वमा ने मौसमा का उलट-पुलट
पर दिया है।
मुझे आवाज दे ना--अगर तुम्ह दो मजबूत वाहा का जरूरत
हो। भिक्षु न पुकारवर वहा–जम हा हथौडा उठान हुए उसको
बांहो म गक्ति का प्रसार हुआ।
और मुझे भी - वावू चिल्लाया। वाबू वह जो पनि म भिक्षु
से होड करता था-सुदर था। ठाडा स दुवा लगता हो यह बात
दूसरी है।
यदि मक्खियां तुम्ह तग करेंगी जबरदार धूनीसिंह तो मैं बुहारी
उठाऊगा। दारथ ने चिटाते हुए कहा जा औरो स अधिन कोमल
सुस्त और चानाक था।
नवरदार धलीसिंह ने कहा- और तुम क्या कहते हो पाटबत
काने शिवराम बूरे बापू और गराबी गर-मव चुप हो? और धूती
सिंह न सोचा कि कुछ आदमी तो केवल आगे बढने को सन्सार म पाए हैं
वे
'भाग्य म पीछे रहना ही वा है। भिक्नु के सिवा वारी
सर अनपट हैं और पीछ रहा । भिक्सु गा सकता है पर सक्ता है
वातचीत कर सकता है और साथ-माथ काम भी। धूनीसिंह न मन-ही
मन साचा कि कहीं नाम के पड को गीतलता के नीचे य नाद की गाद
मन लुक पढ़ें।
नवरदार जी तुम पाग हम चमारा का खत म काम देते पाए
हा। वाबू ने गुस्ताखी से कहा ' हम रूखी खान के कुत्त जो हैं ।
दारय न वहा- क्या वहुमूल्य गद है ।
नवरतार न सहमत होकर कहा- 'वार के प्रयोग में काम
करन म अधिक दम है । पुजनाए कुत्त की बात पर तो यह अनुचित
समय पर भार रहा है ? दखना है यह जमागर टाकुरसिंह का स्वागत
कम करता है।
भिक्सु बाला-निचय ही कहेगा-मापका हो सवा किसी और
और कुछ
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का दास नही!'
बरदार ने टिप्पणी की- यह जानता है कि जो काम करता
है वादगाह यी नाइ साता है और इसी म इमकी शक्ति है न कि इसके
मर हाथ-परो मे।
मवन कहा--"हा हाँ।
'ये सारे-के-मारे काहिल हो वन रहते हैं----जव तक कि य तुम्हारे
ममक्ष न पाए---तुम जो उनके मालिक हो। दारय वोना।
इस बात को सुनकर वावू उठ खडा हुग्रा और हथौड को हाथ में
पायातात्मक ढग से उठाए दारय पर झपटा
पोह बदमाग अपनी सारी खी बदर । पकौडी नाव वाले
न चित्लावर वहा। उसे मत छेड दुष्ट । क्सिी ऐम को क्या नहा
तलवारता जो तेरे बरावर हा ? ठाकुरसिंह का पडका तुझ कुश्ती मे
पल भर म चित कर दे।
वातू अपने पत्थरो के ढेर को नोट पड़ा ऐमी मुद्रा म जसे वह उल्टा
नौटने पर प्रोधित हो । उसकी समझ म न आता था कि वह प्रौरा से
इतना ऊँचा होने पर भी सबवा घणा-पात्र क्या है।
नवरदार पूनीमिह ने वायू के दिल म असताप को पहचान
निया और उसे सात्वना देने का प्रयत्न क्यिा दा प्रकार के
इमान हाते हैं। एक वे जो बहुत कम बोलत हैं-अपना काम करते हैं
पर जिनके मन में गहराई है । दूसरे वे जो बहुत बोलत हैं और काम
क्वल इसलिए करते हैं कि उहें रुपय-पसे का हिसाव नगाना है। यह
सडर एक नया वाय है जो बिना ज्याा वेतन के करना है पर यह
हम सब का इम्तिहान भी है।
पर मोर क्या नाम है यदि पतन क्म है ? बाबू
ने साने के
सहज महा।
पोह गधे गांव का दूध शहर में ले जाया जा सकेगा पोर गांव
वाला के पास प्रधिक पन माएगा। लबरदार ने कहा । 'मैं अपनी
उन यात्रा के बा पर जो मैंने दीवान स्पक्ष्ण को मजबूत जीप मार
म देहती तक की हैं कह सकता हूं कि सहक और अधिक सड और
बिजला ही हैं जो खुशहाली लाएगी।
निश्चय ही । -भिक्षु ने कहा । तुम्हारी बुद्धि तो एक अपूर्व
वस्तु है-अमत का तरह-पर ये सब नडर ता अपना वाही म नकर
पमो स खरीदे तावीज़ पहनते हैं । यह चाहिए मोटी माटी मजदूरा-
अव और नसा समय-न कि दूध पर आर्थिक नाम जो नाम होगा।
बाबू वाता- अब हम मिट्टी में गोटन वान खत वे मजदूर नहा हैं।
लबरदार न कहा- तुम लागी को हाथ म आई एक वररी टर
की भस की अपेक्षा अधिक प्रिय है। पर मैं नहीं चाहता कि तुम
अधिक अधिव वतन का खोज म खता से दूर वन जाओ।
इतन म ही ठाकुरमिह की आवाज सुनाई दो- तुम कुछ समय के
बार हा इनकी पो। जान जाग्राग । तुम जिसे मक्खन समझ हो वह रत
निरलगा।
ओ हो नवरदार न सोचकर कहा और वह टमाटरी रग के
ठाकुरसिंह का भाग पार स सामना करन को
ठाकुरसिंह ने नाकारकर कहा-- अपने खेत स निकन श्रा और
मुझ वता कि कहीं आग और ई भी साथ-साथ रखे जा सकते हैं ?
वरदार धूनीसिंह ने अपनी मूछो वे एक सिरे को चबाते हुए--
जम वह इट का जवाब पत्थर से देने मे जान-बूझकर थो। सकोच कर
रहा हा उत्तर दिया- भया ठाकुरसिंह मह काम तो करना ही होगा।
मक बनगी-और य नह हो य काम करेंगे। तुम तो जानत हा कि
का मा ऊर पर बठकर घाटे स दरवात म नहीं जा सकता।
अर धूनी उट चने का और मुर्गा खान को-तुमने हम
सवको धावा दिया है। ठाकुरसिंह न कहा । अभा उस दिन ता तुम
दावान साणा गाडी म माए थे-ग्राय थे न? और गांव आने
स पहले-पहत उससे उतर गए। हमारा गाँव स्वावलवा था मम
मुडा।
पहले कि सरकार के अफसरो न यहा दखलंदाजी गुरु की। पहले ये चमार हमारे लिए काम करते थे और अव य मजदूरी कमाते हैं और हमारी सारी सुजातीय विरादरी के कलेजे पर मूग दलत है। क्या तुम्ह इतना मान है कि तुम्हे अपनी लडकी की गादी एक चमार म करनी पडेगी और लडके की एक भगन से ...अगर तुम इसी रास्त पर अट रह तो । दिया। मरा बटा ता तुम्हारी तरफ है। नवरदार धूलोसिंह न उत्तर गायद उस ता तुम अपनी बेटी ही दोग । रही तडकी का बात सो वह गिरे हुग्रो से प्रम क्या करने लगी और मैं तुम्ह यह मम भाता हूँ कि नई सरकार की तुम्हे इमलिए महायता चाहिए कि बाजार म अनाज के दाम न गिरें। धनीसिंह मन में जानता था कि ठाकुरसिंह को उसने खरी खरी मस्त वातें कही हैं पर उम अपना उम शक्ति वापान भी था जिमका सात उसका स्वाभाविक प्रत्यक्ष भावनामा म था पौर जिसकी पवित्रता बन पर वह ससार सार छल कपट का सामनार सकता था। वह भगड को अच्चा समभना था-ठाकुरसिंह की तरह मन म बुरे विचारा को वसावर अदर अटर जनन की अपक्षा। जमीदार ठाकुरसिंह जिसका चेहरा चमक रहा था पागे वढा । उसन कहा- ता तुम इन नीव लोगो की कार करते हो? भिवन्तु अपना धोडा छाडवर भाडी तक आ गया । और अछूत भी पीछे पीछ पा गए। सब के गव पीछ हर जामो -धूलोसिंह चिल्लाया। कोइ भगा नही होगा। और यह कहकर ठाकुरसिंग का प्रार मुडा और वाता- तुम्ह अपने वछ के दांत भी तो मुनगेटिवा देत हैं। मुझ मद है तुम दुप्प पर और तो माधिया पर । ठाकुरसिंह ने कहा- तुम्ह दवतानों का नाप लगंगा-धर्म के मानकत्ता और इम सुखी गांव में फूट ५ वीज वान वाल 'ठाकुरसिंह तुम चाहते हो कि जब मर्जी पाए सोमो और जब जी - चाहे उठो। पनौडी नाक वाले धूलीसिंह ने कहा। और तुम्हे इस बात की स्वतत्रता हो ता समझते हो कि सारा गांव सुखी है पर इन चमाग 4 सोचन का ढग दूसरा है क्यानि इनके पाम कोई जमीन नही और सान म क्वन चार महीन काम मिलता है। यह कहकर धूनीसिंह अपने खेत की ओर मुडा। जमान ताप स कराह रही थी। मूय की चकाचौंध रागनी ने उसको अघा-मा कर दिया और उस गा जस भनसाने वाली गर्मी से उसके शरीर क राम रोम म मिचों की भनभना हट भर गई हो। अछा तो ने एक बदजात औरत की तरह अपनी डयोटी के पाछ गरण ल रखा है पर अाखिर तो तुझे इसी गाँव म रहना है- जात विरादरी साथ । ठाकुरसिंह न रहा । मुझे तो पचायत न पहले ही दोषी ठहरा दिया है। घीसिन्न उत्तजित हावर कहा-जमे कि वह ठाकुरसिंह के गाटा के निणायक महत्त्व का जान गया हो। पर मैं यह जानता हूँ कि जब कि हमारा मजाताय विगदरी थोडा बहुत खा नती है इन चमारा म म बहत स एम जा दा बार अचार स भा राटी नहीं खा सकते । तुम्ह इन गधा को अपना मत नव साधने के लिए जररत तो है । ठाकुरसिंह न चना चनने चोट करते हुए कहा पर याद रखना गधे गधे ही होत हैं पार नहीं। और वह कुए की तरफ धीरे धीरे चल दिया- जहाँ पोरतें यह सब दखकर पाना भरत भरत बीच में ही रक गई थी और ठाकुरसिंह और घीसिंह के बीच तक्रार पर चिंतात्मक ढंग स ठाडिया पर हाय रखकर कानाफूमा कर रही थी। ठाकुरसिंह औरता की महानुभूति से और भी व्याकुन हो उग। उसकी प्रांखें क्रोध से गाली हा गइ और दांत पीसता हुमा और अपनी मूछ के बाएं सिरे पर हाय परता हुप्रा ठाकुरसिंह-जिसका तरह-तरह + सदहा और चिगने वाल विचारा न मा दवाचा या-पाव वा चोरी गती म स्थित अपनी हबली का पार पर लिया।
जमींगर ठाकुरसिंह का चेहरा पके हुए टमाटर की तरह चमकता था-तभी तो उसका नाम टमाटर में मधित कर लोगा ने रखा था। उमकी या मुका मुका थी और चान म अस्थिरता थी। उस इसका पश्चाताप था कि वह नवरदार धूनीसिंह और अछूत लहवाम वात करन गया ही क्या? वह मोचता था उन सबन उसको नीचा दिखाया। तकरार म उचित ही अनुचित-मा नगन लगा। या ता धूनामिह सरकार व बन पर ही ऐंठ रहा था। इस बात पर कि वह लबरदार था और दीवान म्पकृष्ण जो नया सामूहिक विकास-वह अधिकारी या उमका पीठ पर था। बल्कि पुलिम भी धूनीसिंह की रक्षा के लिए बुनाई जा मक्ती थी। धूनीसिंह का इही सवका भरोसा था। और फिर मरकार न गाँव का मह्योग नन लिए क्यिा ही क्या है अपमर पाए अग्रेजी जवान म बातचीत की-पापम म हा-जस मारे विचार उनके मस्तिष्क म हा हा । और पचायत स क्वल मम्न दाम पर मजद्रो की माग की और उन सब के लिए नवरतार सब कुछ था। लवरदार ने भी जरूर डाग मारवर कहा होगा कि मारा गाँव चमक पीछे हैं । व धाम म मा गए और रास्त स भटक गए और जब परत नहमान वेवन नाम मात्र के वतन पर काम करने का मान निया तो उद विश्वास पा गया होगा कि उच्च जाति श्रमिक भी पाप-ही पाप रास्त पर पा जाएंगे। वाली मां का अभिशाप उस मोटी नाक वार पर पड। लामडी मगमे मुह वाल दयाराम ने कहा पर इस समय क्या भगहा है ? यह मध्य प्रणी का किसान जमीगर ठाकुरसिंह का एक तुच्छ चापलूम या मिलिए वह भी उसकी तरफ ज्यादा ध्यान न दता या। मनुष्य को अपने देवतामो को नही भूलना चाहिए क्वा इसलिए वि राजा उमस खुश है। टाकुरसिंह न समिप्त रूप से वहा । गती म यही पौरता ने अपने धूपट याद लिए मोर दुपट्ट के नीचे बहवहाने लगी। वह-धूलोमिह ता भगरा के साथ उत्ता-चटता है। जवाहर 7 चाहे उठो। पकौडी नाक वार धूलोमिह ने महा। और तुम्हें इस बात की स्वतत्रता हा तो समझत हो कि सारा गांव सुखी है पर इन चमारो में सोचने का ढग दूसरा है क्यानि इनके पास कोई जमीन नदी और सात म बवन चार महीन वाम मिलता है। यह कहकर धूनीसिंह अपने खत की पोर मुडा । मीन ताप स कराह रही थी। मूय पी चकाचौंध रानी न उसको अधा-सा कर दिया और उसे गा जस भलसाने वाली गर्मी स उस गरीर व रोम रोम म मिर्गों की भनभुना हट भर गई हो। मदा तातून एक वजात औरत का तरह अपना डयौटा में पाछ गरण ल रपा है पर पाखिर ता तुझ इमा गाव म रहना है- जात विराटरा साथ । ठाकुरसिंह न कहा । मुझ ता पचायत ने पहले हो दोपी ठहरा दिया है। पासिंह ने उत्तजित हाकर कहा-जस कि वह ठाकुरमिह गा व निणायव महत्त्व को जान गया हो। पर मैं यह जानता हूँ कि जर वि हमारी मजातीय बिरादरा थोडा बहत सा रती है इन चमारा म में बहुत म एम हैं जो दा वार प्रचार से भी रोग नहीं खा सक्त । तुम्ह इन गधा को अपना मत तब साधन के लिए जरूरत ता है। ठाकुरसिंह न चना चनन चोट करते हुए कहा पर याद रखना गधे गधे हो हात हैं या नहीं । और वह कुए की तरफ धीरे धीरे चत रिया- जहाँ भारतें यह सब दलकर पाना भरत भरत बीच म ही रख गई थी और ठाकुरसिंह और धूलोसिंह व बीच तकरार पर चितात्मक ढग से ठारिया पर हाय रखकर कानाफूमा कर रही थी। ठाकुरसिंह औरता की महानुभूति मे और भा व्याकुन हो उठा। उसको प्रखें कोच मे गाना हा गर और दांत पीसता हुमा और अपनी मूछ में दाएँ सिरे पर हाय फ्रता हुमा टाकुरसिंह-जिसका तरह-तरह के सदेहा और चिराने वाल विचारानमा दवाचा या-गांव का चौडी गती म स्थित अपनी हवा का भार चल निया।
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सिंह ने कहा। उसके पास डढ सो बीघा जमीन था और वह पाच आदमियो की सभा का सभासद था जिनका पच ठाकुरसिंह था । ग्वाल महेश ने टिप्पणी करत हुए कहा- माग स स रहा है--- मुर्ग जसरी आँस वाने रामनिवास ने जिसकी पचाम वीघा जमीन था और जो अपनी ऊपर उठी मूघा और मुधम स उसकी अछी रसवाला करता था-कहा वह नरक की वाला म जलगा। जमीदार ठाकुरसिंह ने कहा पर इम ममय ता उसने अपने गांव में सारे रिनो म आग लगा रखी है। गावधन तो सुनहती धूप म नहा रहा था और उसका जीवन गाति स चल रहा था कि वह अपनी गुमता दुनपा और नाक-नाक की वक्वाम ले माया और चमारा दिमाग म 'पय का जहर भर दिया । और य अछूत और सेत म काम करने वाल मजदूर जिनके प्रति हम इतन उदार रहे है-अब किसी की नहीं सुनत । इन्होंने हमारा घम नष्ट कर दिया है । वह इन अहता को छूकर काटी न हो जाय तो कहना। उसके पडके सजनू ने का। उमन चहरे पर वेचर के निशान एसे चमक रह थे जस एक एक निशान गुस्म म मरा एक एक प्रखि हा । ता धम का आदर करता हूँ। जमीदार ने कहा । मुभ इमी मवर का वरदान मिलता है। वम उमका हुकमा-पानी बत करना है अब। और यह कहकर वह प्रौरता के बीच म मचा दिया। उसक पाद औरता ने अपना हल्ला-हल्या कानाफूसी को गानिया तक पहुँचा दिया और जागर ठाकुरसिंह अपना ही घृणा को आग के धुए म से जिमम गाव को गरिया की धूप भी मिल गई थी गुजरता हुआ मानिस वी पार जा रहा था। गोव पावारा कुत्त छाटा-छाटा छनोगें लगाते हुए और अपनी दुम हिलाते हुए उमा पीछहा लिए पर जमीदार की मन स्थिति ऐसी महाँ यो दि कुत्तों को प्रोमान दता । उमने उन सबको जोर से 'हर्ट चिलाकर तितर बितर कर दिया। इस हि सात्मक वातावरण ने ठाकुरसिंह के होश-हवास अस्त-व्यस्त कर दिए और उसकी कल्पना शक्ति को धुंधला दिया। उग्र व्याकुलता + धुए से वह लगभग प्रधा हो गया और अपन मकान वाली गली के किनार बधी बकरा की रस्सी स टकरा गया। उसकी पगडी अपन स्थान से हिल गई और उसने गीघ्रता से उस ठीक क्यिा । वही ऐसा न हा कि ऐसी सम्मानहीन अवस्था म कोई उस देख ले । अपनी इज्जन का वचाए रखन के प्रयत्न म वह भूल गया कि वह कही जा रहा था और अपने घर के दरवाजे म ही घुस चला । डयोढी म पर रखते ही उम हाग पाया कि उसे ता मदिर जाना है यदि धूलीसिंह के विरुद्ध धर्मा नुसार कायवाही करनी है। वह भटका-सा पोछे मुडा पर उसक लडा सजनू न उसे देख ही निया। बापू । -बट न बाप का पुपारा-बाप जो गहर सताप म था। लक्नि तब तक वह उस चौक की ओर मुड चुका था जो मदिर माग की ओर था। सुती रसाई म स कमणी ने पूटा- बापू ये क्या लस्सी तपार है उनको ठण्डा परन को बुला ल न उह । गच्या को मक्खिया ने तगकर दिया और उमने अपनी पूछ फरकारा । देख क्मे लगी है मेर पाकर। हमेगा बकरी की तरह में मैं करती रहती है। सजन न कहा यापू ता मोघ वो ज्वाला मे भलस रहे हैं और तुझे अपा चेहरे की पडी है। और वह अपन बूढ़े पिता के पीछ-पछि गनी मचा दिया । विष्णु भगवान के मटिर व अदर पवित्र ग्राश्रय-स्थान म पन्ति सूरजमनी । एक घाटा माटा-सा धप का कुण्ड जनाया हो था। उमा शरीर-वन गाटी से ढकाहान वा अपराधी गरीर-पमीन म भीगा था। महनव उच्च स्थान पर गवाक्निमा भगरान की रगीन कपडो म सुमति मूर्ति सुगामित थी पोर वातावरण म धूप बी मुगम भरा थी। ?
३८ जमीर ठाकुरसिंह ने उस सुगध और अपन विषानयुक्त मन स्थिति के वा होकर मति के प्रागपूय भाव स हाय जोड दिए और उम कडवे घुए में एक वास भरा-इम प्राम कि गायर उमा मन मजा असतोप था वह कुछ गात हो जाय । दीप वास से उसका कुछ जा-सा मिचाने लगा पर वह अपन थूक का निगल गया और आपत्ति को टान-मा गया। जमीदार ठाकुरसिंह को मदिर के अधियारे वातावरण म नाति तो अवश्य मिलती थी पर विष्ण की मूर्ति उसम कोई विश्वास या साहम की भावना उत्पन न कर सकती थी। महाराज कृष्ण जो सामन दावार के चित्र में अपनी प्रमिका राधा को बाँहो म वाह डाल थे उसको अमर अपनी ओर खीचते थे और जब कभी वह मदिर में माता तो कृष्ण को ही विष्णु के अवतार के रूप में अपने मन म वमाकर लाता । अपनी युवावस्था में हर-हर महादेव की ध्वनि पर उसका मन बडा भक्ति भाव से भर जाता था-वह महादेव जो प्राधिया के देव गिव ये जब कि उसकी ग्रहणी काली-महाकाला विकराल शिव को प्रागिनी को पूजा करती रहती । पर पूवजा दे धम के अनुसार तो विष्णु को ही सर्वोपरि देवता का स्थान था और इसी धम म वह पला । फिर पडित मूरजमनी भी वणव भजन ही गाता या इसलिए विवश होकर उसे अपनी मां मारेग मानने परते। सारे अवतार उम परम पिता परम वर का अभिव्यक्ति हैं । हम तो उसी देवता को करनी चाहिए जो हमारे मन को भाता है-और पाखिर ता पो कम हो हैं जो कुछ प्रय रयत हैं न कि पुराहित का पाठ । पडित मूरजमनी ने अपनी पूजा प्रारभ की। मूति चरणा पर पुष्प बनाए और पौतर की थाली में रस तक लिए स मूर्ति के चारा पार पटियां बजा चनावर भारती उतारा और मुह से मारतो मारता र उच्चारित किए। हम सब कायम का देखर मन्दिर एकाको मन टापुरसिंह का बडा उक्ताह अनुभव हान लगा और उक्ताहट भी कसी? निस्सीम | क्यापि वह जिस काय के लिए मदिर म माया था उस कस भूल सकता था? मोटी नान वाल धूलीसिंह को जाति स निकालन का निश्चय करना था पर फिर भी हर बीतन वाल क्षण के साथ क्रोध की लपटें उसके शरीर म पसान की वूदा के रूप म परिवर्तित होकर च रही था। एक क्षण ता धप की सुगध और धुए से उसकी विचार गवित अस्त-व्यस्त हो गई और वह अपनी आत्मा के भीतर चिल्ला उठा- 'चाहे कुछ भी हो मुझे अपना उद्देश्य नही भूनना है । सूरजमनी ही क्या न सदा की तरह बुराई के साथ समझौता कराने का प्रयत्न करे मैं चन स न बठूगा। उसने अपने प्रात्मवल को और ठोस वनान क लिए अपना ध्यान दवता की मूर्ति पर केंद्रित करने का प्रयास किया पर विष्णु + चारा मोर तो सब कुछ बडा दयापूण, सहनशील और दार रहित था इसलिए उसका जी चाह रहा था कि वह हर हर देव महा देव का जयकार पर सके और उस ताडव देव शिव + नाम म जो उमा है अपने पाप म भर सके । पर अचानक उसके हृत्य र मधकार म एक विचार का प्रकाश कौंध गया। उसने सोचा सारे जीवन भर तो उसने धम स सबध जोडा नहीं और भव पूलीसिंह को नीचा दिखाने के लिय देवतामा की सहायता मांग रहा है । यद्यपि पुरोहित जो नि अपने जीवन निर्वाह के लिए उच्च जाति के कुटुवा पर निभर है उनकी पोर हो जाएगा और लवरदार का जाति से निकलवाने पर राजी हो जाएगा–देवता ता उस साप न होगे ? यह साचकर वह कुछ दोला पड गया । मरकारो अफमर और देवता दोनों का प्राश्रय एक माय छोड देने से वह प्रता रह जाएगा इसलिए उमे सभवत धूलोसिंह से पुछ-न-कुछ समझौता कर लना चाहिए । भव वह मूरजमनी से उन विरादरी से निकालनक लिए न देगा पल्लि कहगा कि उसे मममाए नि लवरदार अपने जाति वाला ये साप रहे न कि प्रएता दे माप, और तर यह सरकार के साथ भी बातचीत चला सकता है । पत्थर भी कुछ धार्मिक रीति से गुद्ध किए जा सरते हैं और दयाराम और रामनिवास अपने लडका और दूसरे किसाना को उनको तोडने लिए कह सकते है। वे सब वेतन कमा मक्त हैं और अछूत खेतो में काम कर सक्त हैं-अगर वे चाह तो। चरणामृत ल लो। पडित मूरजमनी ने अपन पाठ के बीच म ही कहा और वह अपने दाए हाथ में पीतन के चम्मच में पवित्र जल को लिए भक गए। जमादार ठाकुरसिंह ने अपने दोना हायो की ये नियां फनाइ और पुरोहित से चरणामृत नेकर पी लिया । ठाकुरसिंह न अवसर पाकर कहा- मैं धूनीसिंह के सबंध म यहाँ आया था। पति सूरजमनी ने अपनी प्राखा का प्राधी मूद निया और अपनी प्राथना गो का उच्चारण करन के माय-माय सिर को ऊपर-नीचे हिनाने लगे। ठाकुरमिह कुछ न समझ सका कि पुरोहित क्या अपना सिर हिना-डला रहा है पर यह समझपर कि उसने अनुमति दे दी है कि वह अपने हृदय की बात करे उमने कह्ना गुरु क्यिा-- जसे कि आप जानत हैं पति जी पति जी ने अपना हाथ ऊपर उठाकर प्रार्थी को गात होने के लिए मादा किया और उन पीतन की यारिमा की और पारा दिया जिन पर मछली क्छुपा सूमर और परक चित्र खुटे थे। पूजा करन पाना समझ गया कि य मव तो विष्ण क प्रतीक है और पूजा भी चर रही है। एम ममय म काई भी वाधा उस धार्मिक कृत्य म कम हा सकती है ? प्रचार जमोटार ठाकुरसिंह का मन उस भारा वातावरण स जिमम पुराहित का कार बडरडाह और धूप बी गाना और गभार दुगध मरा थी घदरा उग। व हताश हार मतिर स तेजा म बाहर निरन याया महामन म कामना हुग्रा- य म सार तो प्राय को प्राप्त हा जाय तादा। म कियन प्राजकन चल रहा है-अब ना कतियुग पा गया है। धमनिष्ठ व्यक्ति भी अव भएने स्थान स गिर चुके है। उधर उसका पुत्र सजनू अपने मित्र लवरतार धूलीसिंह के लडके लछमन स मिरन निकल गया। उसके हृदय में अपनी चाल में पूर्ण विश्वास स उत्पन हुई उग्रता थी। गोवधन गांव के इन दो वडे खान दाना में इस बारे म कभी काई बातचीत न हई पर यह वात स्वयसिद्ध माना जाता थी कि दोनाखानाना मनडविया का आदान प्रदान एक न एक दिन अवश्य होगा। दोना पडके अपनी पारस्परिक मित्रता का लाभ उठा एक-दूसर के घर चले जात और अपनी हाने वाली दुल्हनो का झलक पान का प्रयत्न करते। नडकियां कई बार अनजान ही सामन या जाती । उनव शरीर म कई वार नहरें होती जसे कि वे जानती हों कि मि प्रकार के मवध-सूत्र म उह बंधना है। दूसरी ओर इस याजना में प्रनि थाटो असहमति भी थी क्योकि इस प्रकार का विनिमय हिंदुआ की अधिकारी जातिया म त्रूटममाट की तरह ही घणा को दृष्टि में लेगा जाता है । पर फिर भा लडक ता मनी ममय में जुड़ थे और साय ही हान वाले बनायो की तरह भी। यहा तक कि उह एक दूसरे वा माना विपण वे बुनान म पानट पान नगा। उनके माता पिता अवश्य यह कहत 4 दि इम पान वाल मस्कार का अधिक पुना प्रशन न करें--पर व मुनत किमकी थे ? माता पिता को कुदुव की नीवा व कमजोर पड जान का नान भी न था जिसके मन में लया या भा-यभा मिामा जाना था। चीटिया या गहत वी मविप्रो की तरह य नौजवान अपन पिनापो का मारकर मौत की गोद म सुना दन को उद्यत थे । मजनू ने दवा वि लघमा धूलोसिंह के घर में पगुणों के छार कोठे म गउपा के लिए चारा काट रहा है। वहाँ मे पा रहा है और विधर चल दिया? लक्ष्मण सिंह ने बुल्हो! को उपर उठावर मजनू की ओर देखकर वहा । मजनू ने उत्तर दिया- अरे मामी हो मामी के पास पाता है। पहाड पोहे ही पहाड तक चलकर जाता है।'
४० साथ भी बातचीत चला सकता है। पत्थर भी कुछ धार्मिक रीति से गुद्ध किए जा सक्त हैं और दयाराम और रामनिवास अपने लहको और दूसरे किसाना का उनको तोडने के लिए वह सकते हैं। वे सब वतन कमा सकते हैं और अछूत सेतो में काम कर सक्त हैं-अगर वे चाह तो। ही कहा चरणामत ले लो। पडित मूरजमनी ने अपने पाठ के बीच म और वह अपने दाए हाथ म पीतन के चम्मच म पवित्र जन का लिए भक गए। जमादार ठाकुरसिंह ने अपने दोना हाथो को हये नियां फनाइ और पुरोहित म चरणामत तकर पी लिया । ठाकुरसिंह ने अवसर पाकर कहा- मैं धूनीसिंह के सबघ म यहां आया था। पडित सूरजमनी ने अपनी पाखा को आधी मूद लिया और अपनी प्रायना के गन्ग का उच्चारण करन के माय-साय सिर को ऊपर-नीचे हिनान लग । ठाकुर्रासह कुछ न समझ सका कि पुरोहित क्या अपना मिर हिना डना रहा है पर यह समझकर कि उमन अनुमति दे दी है कि वह अपने हृदय की बात कहे उमने कहना गुरू किया- जसे कि आप जानते हैं परित जी परित जी ने अपना हाथ ऊपर उगकर प्रार्थी को गात होने के निए मादा किया और उन पीतन की यानिया की और मारा किया जिन पर मदली का मूअर और गेर के चित्र पर थे। पूजा करने पाना ममझ गया कि य मव ता विष्ण र प्रतीक है और पूजा अभी चत रही है। एम ममय म वाइ भा वाघा उस धामिक कृत्य म कम हा सकता है । अचानर जमानार ठाकुरमिर का मन उस भारी वातावरण से जिगम पुरादित को कठार वरडार और को गाला और गभीर दुगध भरा या घबरा उग । वह हतार हार मशिर म तजा म बाहर निरन माया मागमा म कामता हुग्रा- यह मसार ता प्रनय वा प्राप्त हा नाय ता प्रदा । तम किया प्राजक्त चल रहा है-अरना करियुग मा गया है। घमनिष्ठ व्यक्ति भा मद मान स्थान में गिर
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लक्ष्मण ने नई फुर्ती से कुल्हाडा चलाते हुए कहा- तेरी कमजोर
आवाज से मुझे गक्ति मिलती है।
सजनू ने पीडा से विरोध करते हुए कहा- राक दो इसे माल ।
लक्ष्मण ने कुल्हाडा गिरात हुए कहा- मनुष्य की सतरता भातर
की होती है और पशु की वाहरी।
हा -सजनू न कहा। पकौडी नान वाला चला गया है और ।
और क्या? लक्ष्मण ने गात स्वभाव से कहा ।
और वह भिक्खु का माथ 7 गया है और लडका का भी-
अपनी जमीन पर वे सब सान से लाए पत्थरा का ताड रह है। वह
हमारे घम का खडन कर रहा है और तुम्ह नष्ट । अव मेर पिता स्वमणी
का विवाह तुम्हार साथ करन को भा राजी न हाग
अच्छा पर तू एसे अशुभ पर क्या वागता है ? क्षमण न वात
काटकर कहा। मैं जाता है और वापू वा समभाता हूँ ।
यह मब इसलिए कि इन चमारा का तो ईश्वर या मनुष्य का कोई
भय है नहीं। मेरे बापू न भो वडा प्रयत्न क्यिा-तुम्हार दापू का राह
पर लान का पर वह माटी नान वाना ता अपनी बात पर अडा है
पौर उन अछूता का उत्तजित कर रहा है।
बूटा ता पागन हो गया है।
मात्मा म पाप का हाना-भूमे में अग्नि की तरह है --मजनू ने
उपदेशात्मक तहज से कहा। तुम्हारे वाप को भिक्व और अछूता स सस्ती
मजदूरी मिल जाती है और इस प्रकार वह सरकार का सावर
सकता है।
'नहा वह इतना धूत नहा जितना कि उतार और अवे हदय का
है। और फिर बापू ग्वना कमठ है कि उस ता हर क्षण कुछ-न-बुद्ध करना
हा है। वह ता मडर बनाकर हा रहेगा ।
अपनी जाति और दूसरा का धम यावर भी यदि उसन यहा माग
अपनाया है तो वह माता का भी मिक्स क्या न व्याह दे ।
लक्ष्मन ने अपने मित्र को भयपूण विस्मय से देखा। उसकी चुनौती म कोई दुराव न था और जो मत्य कहा गया वह उस अपमान मे जा इस ताने में निहित था। अधिक गभोर था कि सजनू अब उसकी बहन से विवाह की अभिलाषा न करता था। रक्मणी तो उमसे छिन हा जाएगी प्रोर अब वह । 'क्या कुटुव है तुम्हारा ? तुम स्वय ही पति सूरजमनी मे घृणा करते रह हो । तुमने अपनी मां की सिल्ली उडाई जब वह प्राथना कर रहा थी और अब तुम जानि विरादरी के नाम पर पाट आठ पासू बहा रह हा। मृर भी बुद्धिमान समझा जा सकता है यदि वह न बोल ता। - गरज ने ताना क्मा। लक्ष्मण ने उत्तर दिया 'तब ता बुद्धिमान का वह काम पहल ही पर लना चाहिए तो वह मूख स वाद म करा लिए रहता है। 'लकिन यहाँ ता मूर्यो की पमल बिना मीचे 47 रहा है. पकोडी नाक बार पी पीर तुम्हारी। सजनू ने घणा स कहा। सम्मण जो कि अपने पिता के प्रति वफादारी और वाणी का पान की हल्की-गी आशा ये वीच सधप में फ्मा या माला उठा। मोह । चुप हा जा । अगर तून मरे पानदान की धुरा भला कहा ता में भी तुभे गानी दूगा । यह मत समझ दि मैं अपन कठार पिता को मामाना म ठोप पर मक्ता हूँ जब कि तू अपन पिता व सामन अपनी आवाज भी ऊची नही कर सकता।' पोरी नार वारा अपनी मति मा दया है।' सजन न पहा । में जाता है यदि मेरा यह विचार है पितू उमा अस्पृश्यता म धम की पोर रा गरता है। यह पक्की बात ममम पि हम उमे जाति से निवाग और फिर एक चीज रह जाता है--उम छोडवर अपनी मा और माना के साथ हमारी तरफ चल पाना। यह कहकर उसने लक्ष्मण को हाथ से ऊपर उठाने का प्रयत्न क्यिा । अपने मानसिक प्रतद्वद के वेग से भडक हुए नक्ष्मण ने तडवकर कहा-मेराबाह छाडद। तो जा तू भी अछूतों म मिल जा। सजनू ने कहा-उसका पीला चेहरा उस निरागा में चमक रहा था जो उसे लक्ष्मण से हमेगा के लिए विदा होन पर होती। उसने अपने शरीर से चलने को कहा। अरे ठहर--जरा मैं मां से तो बात कर लू । लक्ष्मण ने कहा। सजनू चतते-चनत वोला मेरा जाना मरे पाने से अच्छा है । तू अपना रास्ता चुन ले ।' अर की कोठरी के झिनमिनाते अधेरे मे से लक्ष्मण की उदास आँखें अपने मित्र को देखता रह गइ । उन पाखा म बोई भाव न था-बस मूनो यो। दो बछने पास खडे अपनी जुगाली करते हुए अपने ही ढग से धीरे धीर चारा चवान की आवाजकर रह थे और श्मण यो देस थे स्क्मणा क "वास म जो भय की नहरें थी वह भवर-सा बनाकर अब उमर वन म उतर गइ थी। उसका दम घुटने तगा। वह उस भीतरी अनाज का काटरा से उठकर बाहर प्रा गई जहां वह अपन पिता के लिए स्मा और मां के लिए मक्वन बना रही थी। उसन अपना झकी पलको को रखामा नाच स वापू को बडी चिता म वाहर जात दसा था और उमा अाजा था कि वह उसका बापू-उस माई के मित्र के पिता + वार म चितित या-जिसरा नाम वह अपनी जुबान पर न ला सक्ती थी यादि उमा सानान म हा तो उसकी सगाई जगभग हो चुकी यो। पर उमर निटोंप चेहरे पर पिसी ऐस सत्य के नान वा चिह्न न था जिसका सबघ हाने वाल मानवी क्लह व चवहर से हो और जो उमा पिता के चहरे पर पूरी तरह घाया था। रुक्मणी को मार सबका - ४५ व्यवहार अच्छा था बस देवल उसकी मां कभी कभी अपनी टी येथे स्वतत्र मन को किसा अरुचिकर बाह्य अभिव्यक्ति से रप्ट होकर डाट देतो- तेरे मिर स तेरा पल्लाहमेशा हटा ही रहता और इन बेहूदा चमारो यो चाई पाखें तुझे घूरती रहती हैं । रुकमणी को पता था कि रात को देर तक उसके माता पिता उसी दे भविष्य के बारे में ही बात करते रहने । पहले तो दहेज का प्रश्न था। महीनो तर वे यह निश्चय न कर सके कि स्क्मणी का विवाह शिकोहपुर के जमीलार क' देव साय से करें क्यादि नड २ मा वाप पांच हजार रुपये मागते थ। फिर एक दिन अचानक सजनू ने लहान म अपने मित्र लछमन के नाम का प्रस्ताव राव दिया और दोनो परानो को लडविया का लेन-देन कुछ ऐसा गुम वाय लगा कि दोना परा म यह विचार जम-मा गया। पर अब । दोना कुटु वाम मापस मतभेना का विचार उसके दिल म दगती मा काटता हुमा मालूम हुआ। "अपने हामश्रा जा रकमणी। मां न चिल्लाकर कहा । परम एक टका परावर तो है पर अपने पिता तथा भाई का कप्ट दे रही है। हम नहीं मानूम कि पिछने जम के पौन-स पाप ग्राम मा गए कि हम धुनौसिंह के लड़के का तरे लिए लना पड़ा और उसकी नवी यो तेरे भाई निए । दितना पतन है हमारा। हमन कभी सरकार के मामन सिर नही भुगाया और अब इस धूलासिंह से नोचा देखना पहा-यह पूनोमिह जा मत हो है । एक्मणो न एवं पटन वहा । वह बाहर की रमाई 4 बरामदे । मुकडी-मी यठा रहा। मां के पे वाक्य उसे अविश्वसनाय लगत ५। उसकी गाँस र गई और उमे लगा जसे सारी सृष्टि एवं तेजी में घूमने वाला पसर हा जिसवे वाच म वह सटवी है । उमका निर्गेप जमी हुई दृष्टि के सामने दातान म रखी हुई चारपाइयो तरन लगी। 'पा विस्मत की मारी। अपने हाथ हिला। बुध वाम पर ४६ पान तो काट ले। ---मां न कहा । पौरन हा रक्मणी न दरांतीनुमा चाकू को उठाया जा तक्डी के पायदान पर गा था और पालक का माग काटन नगो और जस वह एक मगीन की तरह चाकू के पने सिरे पर बार-बार हर पालक का लाती थी बन सोचता जा रही थी। उसे अपनी मां समझ म न पाती थी। कल तक ता घर म विमा कनह का चिह्न न था। आपस म इधर उधर की बातचीत होती थी फ्मला की रुपये की । हमेगा की तरह सजनू उनके साथ घर में पाम स गुजरा था। उसी उह चारी स देख ही लिया था। उनकी आंखा मे उमकी नजर टकरा गई थी पर अब उमरी मां के या न उसर चेहरे पर ऐसा पर्दा डावा रिया कि वह दालान की गार देसन का भी साहम न कर मक्ता थी। सूय आकार म ऊचा चरता जा रहा था और उसकी उष्णतापूण चकाचौंध से टकरा कर रकमणी को गूय दृष्टि नौट आती थी।
चार प्राथना की पहनी घडी व वाद पडित सूरजमनी को आमाम हुआ कि आज उसे जमीदार ठरसिंह जसे महान व्यक्तित्व की अवहेलना करनी पड़ी जब कि व मदिर म आए थे इमनिए उसने अपनी मफेट दाटी वा उचित वभवपूर्ण अवस्था म किया और दायें हाय म छडी और बायें म माला नकर मदिर म वाहर चन दिया। मूय ससार पर अग्नि उगन रहा था जस-जम वह समतल भूमि से उन पहाडियो की पोर गुस्म में लाल होकर जा रहा था जो प जाव को राजस्थान में अलग करती हैं। पति सूरजमनी ने सूर्य को एक क्षण दया फिर अपनी दृष्टि जस्टीस पृथ्वी को प्रोर लौटा ली और मूयरव म त्या की प्राथना की । लकिन जमे हो मूय की लपलपाती हुई गर्मी न उसके चेहरे को मुलमाया उन्हें नान हा गया कि इस देवता के हृदय म दया न थी। इमका गेप ता मदा में अधिक था। इम दवना ये मन को कडवाहट तो इम पाप मे भरे सन्सार को बस निगनना ही चाहती थी। निश्चय ही पौराणिक पवित्र पुस्तकों म लिया था कि पलियुग में सूप का ताप बहत बट जाएगा और मन्मार का जलाकर राख कर देगा ययाकि सब पाप-वर्मों का पन तो मिलगा ही। पडितजी ने जो अफवाहें मूय को सविन विस्फोटर प्रौर उपम विषाक्त हाने वाले समुद्र के पानी के बारे में सुनी थी उनसे उनका विश्वास इस भविष्यवाणी में पौर जम गया मोर एमा क्या न हो लबरदार घूलीसिंह और उसके 7 ४८ कहा बेटा तलवाचट्टो द्वारा धम का खडन इस अधियारे युग के फलते पाप का एक चिह्न ही तो था । पुरोहित का चहरा ताप को विगारिया से जल उठा और पाप में डूवे मानव के प्रति घृणा की भावना से उसका भौंए तन गइ । जमीदार ठाकुरसिंह और उसका लडका सजनू पीपल पड के नीचे वठे ये-कुछ एस जसे कि उह कुछ पूर्व प्रात्मिक नान हो कि देवता उनकी हो ओर हो । व दवा कृपा ६ दूत पडित सूरजमना की वाट जोह रहे थे। पडितजी -सजन ने जोर से चिल्लाकर बात शुरू करनी चाही- पेड के नीच पडफडाती हुई चिडिया को पत्थर से मारकर भगाते हुए। सूरजमनी न अपना हाथ उठाने हए नडब को गात करत हुए और वह पीपल के नाचे पत्थर की चौकी पर घठ गए। मुझे सारा झगडा पता है । मैंन इस बारे म थाडा सोचा भी है। अव तू जा लड मुभ तर पिता स बातें करना है। लनिन । मजनू ने अपमानित-सा होकर विराध किया। वह खडा हो गया और अधिा म हिनन वान वक्ष को तरह कापने लगा। फिर यह कहता हुमा वहां से चला गया खुद तो तुम डवोग ही पोरों को भी न डूवागे। जमीदार ठाकुरसिंह ने अपने बेटे क उत्तजनात्मक व्यवहार को रोक्न का प्रयत्न अपन दायें हाय का धुमाकर किया और उसकी पोर से वात भाकर पुरोहित म बाता यह लडका ता हिनहिनाने थाना पोग है--वमिजाज । थोरी दर की चुप्पी के बाद फिर बोना पतिजी उम धूनीसिट वा हक्का-पाना वर किया जा सकता है । जहाँ तक उन चमारा का सबध है व उन भौडिया म रहत हैं जो उम जमीन पर बना हैं जिस हमारे घर ने उह इस गांव में दी है। उनसे वर्ग म निकन जान व लिए कहा जा सकता है । धूलोमिह प्रार सरकार उन लिए गौव से बाहर घरा का प्रबंध कर लें न ४६ निश्चय ही यह लोग पापी हैं और उस मवके पात्र हैं जो आप रहने हैं। सूरजमनी न बहा। पर य तो अपना कम हो कर रहे हैं। उसका फल चलेंगे। करने दा इह जा चाह-वगर्ने मन तुम्हारे भाथ हा-यूसिंह और वह अपमर दीवान रूपकृष्ण । जमींदार ठाकुरमिहने उत्तर दिया। पूनौमिह तो कभी हमारी तरफ न होगा। प्रोरो वो ता में समझा सकता है पर वह तो अपने सरकारी अोहरे के गुमान में है. अपनी लवरदारी है । और भून जाता है कि मैं पचायत या सरपच जनता द्वारा चुना हुमा । दोवान रूप वृष्ण उसकी सहायता कर रहा है और उसे बरा काटेका दिला रहा है जा गांव और गुडगावें के बीच चना गया। तभी तो वह सडक का बनाना चाहता है। यह ही क्यो उमवा बेटा लछमन भी हमारा विराधी है। सजनू ने अपन मित्र की मानसिर अनिश्चितता या नकारात्मक दृष्टिकोण का रग चढावर प्रस्तुत किया। तुम्हारा भोलापन हो तुम्हार और उसक बीच में साई बन रहा है बेटा। पुरोहित न मयारी से यहा। जा और उसके लडवे वा यहा घुनाना। जमीदार पति सूरजमनी का बुद्धिमत्ता स वडा प्रभावित हुमा और अपने उठे हुए हाय से इशारावर सजनू का धूलोसिंह के घर जान फो रहा। पुरोहिन और जमादार ठाकुरसिंह पिर एक बार दर तक चुप बठे रह, और इतन समय मे दाना अपने मन में मात्र रह था कि कम धूली गिह और माता को चकमा लिया जाय और साथ-साथ दीवान रूप पास कार भी न हो-जो सड़क बनवाने पर तुना था। कुछ देर याद ठाकुरसिंह ग यह शाति सहन न हुई । वह मूरतापूर्ण जनी म यह गया पाहे वसा उगवा मारामन या-- हम बहुत छ र सकते हैं. मगर चाहे तो। जिम भूमि पर चमार रहत हैं वह मेरी है । थोडा सा भाग धूनिसिंह का है पर जमा के कहत है कुछ तो करना ही है । सरपच ठाकुरसिंह। पुरोहित ने सुगामदी बहन से कहा। पचा यनका प्रधान होन व नाते तुम्ह बुद्धिमानी से काम लना होगा ! य लोग ता अपन वर्मों से ही अपन अशिष्ट की ओर जा रहे हैं—अपनी भाप पिया की मविपया और धल म लथपथ । रनको फ्म वाली छता म निक उता हुआ धुप्रो और दम घोटन वाली गर्मी दन लिए पयाप्त दान है । और मरा विचार ता यह है कि हमार लोगो को गाती थी कि उहाँने हरिजना कए हए पत्थर को तोड़ने में इकार कर दिया। तुम्हारे लिए आग म मे बचकर निकल जाना अधिक प्रासान है-इनर अपने दुरकम से बचन को अपना । य लोग तो अपनपिछन कर्मों से दूपित रहग पर तुम ता अप्ठ-कुन क हो । अब ता एक शुद्ध बग्ने वाती पूजा को प्राव यक्ता और तुम्हार कुटुव पर तो बरे नथना का जो छाया है उमरा तो एक विशिष्ट पूजा म ही टाला जा सकता है । जमीनार न पुराहित २ चहरे को एकटक देखा जम उम विश्वास न पा रहा हो कि मूरजमनी एमी परिस्थिति को भी अपन हि के निए प्रयाग कर सकता है। वह पुरोहित की चतुराई तो जानता था पर यह युद्ध करन वागी पूजा का प्रस्ताव तो किमी नरक के देवता क मुग म आया गता था । पनि मूरजमनी न जमीदार के गान मुख पर एक चोट खाई हुई निर्दोष छाया देखो। मनिए उमन करणा और मनभावना का पाठ पढ़ाने का प्रयत्न क्यिा और कहा रखो कि हर पुरुष और स्त्री म दवी याति होती है-चाह वह स्तिना नी छोटा हो और लोग अपन पिछर पापा का पर्याप्त रड भागत हैं। निचय हा उहें दर भोगन चाहिए क्यापि इसम ही तो व प्रगत जम म उच जाति का पाएंगे या ईवर को पहचानेंगे। मरि उहें धम सिखाता है। पर व दर के निवाम-स्थान के भीतर नहीं जा मस्ते । मैं उहें कमा नहीं जान दूगा । लक्नि य धमकी माद १ रक्षा के हेतु जो उह बधना से छुडाएगा मूबी भेंट बिना मंदिर की पूजा किए चढा मक्त हैं। इनकी स्त्रियाँ बडी धम निष्ठ होती हैं और जो कुछ दे सकता हैं देती है। गांव की गति और सारी प्रात्माना की उन्नति हम पर निमर है। कोई भी मुखतापूण काय कलियुग का प्रत और ममाप ला भक्ता है। और उससे उन सबका अनिष्ट होगा जिनके ग्रह आपस में टकराएंगे। जमीनगर ठाकुरसिंह पुरोहित व स चतुर तर यो मुनकर और भी गुमसुम मा हो गया । पर यह मूरजमनी का यह न कह सकना था कि वह थन कर रहा है। अच्छा पपिन्त जा अमीर न बहा। दखें आप धूनीसिंह वही पडद में म निवरत है। वह मा गया ग्रानो बटा। यमन न नो बुजुर्गों का हाथ जा और दुवा-गा प्राग का या गया। यो बैदा। पति मूरजमना न बना भारभ दिया। रहरा पाता है क्या बात है? कुछ दर स्त्रपर फिर कहा पाठ पम र मारे मिद्धात जो मैंन तरे पिता को मिखास वह भूल धुवा है। वह अब धन प्रोहदे और मरवार या दीवाना है । तेग पिता लगतार हो सो हो पर उस ईश्वर के पाप और धार्मिक ध्यनिया TNT का तो डर हाना शहिए हो । उधमन न पति जी के प्रारमण से बचत हुए स्वीकार किया-- पति जी बूते का निमाग पराव हो गया है। यह नहका तो अपनी धार का हो सट्टा बना मक्ता है। मूरजमनी न रहा। सजनू जो लघमन मा जान पर वही पा गया था यात म बात जाडपर मोला रविन वरदार तो दूसरी यो यदि स दाम मेता है।' पुराहित ने जार पर कहा यदि वह धम के माग से मटर रहा है तो लघमन और उसकी मां को उगरेपर मकाई स्थान न रहेगा।' R-
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पडित जी मैं तो घर छोड दूगा। - लछमन ने सहमति से कहा।
'क्या रहता है । जब मैंने समझाया तब क्यों नहा माना
?
जमादार ने सजनू को गात करते हुए कहा-
"विटा-इसे मत छेड।
परित सूरजमनी ने कहा
में तुम्ह एक या दूसरी बात करने की
सनाह नहीं दे रहा हूँ। हमम से हर एक अपन भाग्य का अपने कर्मों
द्वारा बना रहा है। तुम अपना भविष्य चुन सकते हो और अपना
माग निणय कर सक्त हो। निश्चय ही तुम्ह चमारा का दिखाना
पडेगा कि व सब तो अपने कर्मों द्वारा हा अभिशप्त हैं और हमारे
वरावर नहीं हैं। मैं जानता हूँ तरी मा तो ईश्वर की सच्चा भक्त है
और वह तुम्हारे पिता को ठीक राह पर न पाएगी।
और हम ता अपन दाना घराना म होने वाले जान की प्रतीक्षा
म हैं। जमीदार ठाकुरसिंह न वात म ऐड नगाते हुए कहा ।
दाना लहका न यह सुनकर कुछ कृत्रिम नम्रता और कुछ विवाह
क अप्रत्यक्ष वधन का विचारवर अपन सर भका लिए । यही-एक की
बहन का दूसरे स गठजाड ही तो एक मूक सूत्र था जो उन दोना को
भापस मबाधता था।
वह घर मर लिए नहीं है। यमन ने कहा और सिवा मा के
मुझे वहीं राज कौन सकता है ? मैन उसम बातचीत की है वह भी
मानता है कि पिताजी हम सबका भुमावत म डाल रह हैं ।
'अव तूपात का वात कर रहा है। सजनू न कहा ।
मुमादतें किस लिए प्रदा? पुराहित ने कहा । तुम और
तुम्हारा मां जब जा चाह मरिर म रहन वा पा सक्त हैं यदि घर पर
निमा प्रशर का दुरा हो । तुम्हारो मा मटिर घमानावातमाग को
एक मोर कमरा दान दना चाहता है सा वह दे सकती है।
में साचता है कि प्राप मममत है कि मैं बुरा हूँ। पर जसा कि
माप कहत है कि उन चमारा का ता सवर दना ही है । सजनू ने कहा ।
नछमन और मैं दोना अभी जाकर उनके कुटुबा से वहा से जाने
के लिए वह सकते हैं क्योकि वह भूमि जहा उनकी भापडियां पडी हैं
हमारे घरानो की सपत्ति हो तो है।
पुरोहित न उत्तर दिया पर उनकी औरता की चीख-पुकार तुम्हारे
मिर पर अनिष्ट ल पाए गएयर निश्चय ही यदि तुम अपने निणय के
औचित्य के बारे म मतुष्ट हो तो तुम जो चाहो वह पड उन चमारा को
दे सकते हो। भगवान कृष्ण ने भी तो अजुन का युद्ध के लिए अनुमति
दी थी यदि वह याय के लिए हो ।
इसका फसता तो हम ही करना है। जमीदार ठाकुरसिंह ने
ग।
पति मूरजमनी और ठाकुरसिंह न दाना नोजवाना को रोका नही
पाह उहाँने काई सोधी कायवाही करन का वचन भी नहीं दिया।
मत्य तो यह है कि उस समय पहित जा ने एक क्षण के लिए अपनो आँखें
बद कर त्री और मावधान करत हुए कहा नाति नाति नाति ।
इस पर जमीनगर वाकुरमिह उपाधै मन और ढील-ढार म्वर म
जरा जोर से कहा- हको कोई काम जल्वाजा म मतकर बठना ।
पीपा पड म से गुजरते हुए बा व भाव एक खुनी भट्टी में
निकली सुनसाने वाला लपटा क थप स लग रह थ और पडित
सूरजमनी छाया का और दापहरी म पहन धाराम का महत्त्व भनी माति
समझते थे। अ गमजी की। पडितजी न जमीदार स कहा और
वहाँ स चल दिए।
पडित जी मैं तो घर छोड दूगा। - लछमन ने सहमति से कहा। क्या कहता है । जब मैंने समभाया तब क्यो नहीं माना ? जमीदार न सजनू को शात करते हुए कहा- बटा-इसे मत छेड। पडित सूरजमनी ने कहा मैं तुम्ह एवं या दूसरी बात करने की सनाह नहीं दे रहा हू । हमम से हर एक अपन भाग्य को अपने नमो द्वारा बना रहा है। तुम अपना भविष्य चुन सकते हो और अपना माग निणय क्र सक्त हो । निश्चय ही तुम्ह चमारा को दिखाना पडेगा कि वे सब तो अपने कर्मों द्वारा हा अभिशप्त हैं और हमारे बराबर नहीं हैं। मैं जानता हू तरा मा तोर्टवर की सच्ची भक्त है और वह तुम्हारे पिता को ठीक राह पर आएगी। और हम तो अपन दोना पराना म हाने वान जान को प्रतीक्षा म हैं। -जमीनगर ठाकुरसिंह ने बात म ऐड गात हुए कहा । दाना तडका न यह मुनकर कुछ कृत्रिम नम्रता और कुछ विवाह + अप्रत्यक्ष वधन का विचारखर अपन सर झवा लिए । यही~-एक को बहन का दूसर म गठजाड ही ता एक मूक सूत्र था जो उन दाना को मापस मबाघता था। वह भर मर लिए नहीं है। तहमन न कहा और सिवा मां व मुझे वहा रार कौन सकता है ? मैन उमस बातचीत की है वह भी मानता है जिपिताजा हम सबको मुमावत म डान रहे हैं। अब तू अकन की बात कर रहा है। सजनू न वहा । मुमावतें क्सिर लिए अदा है ? पुरान्ति न वहा । तुम और तुम्हारा मां जब जा चाह मनिर म रन का आ सकत हैं-यदि घर पर निमा प्रकार का दुख हा । तुम्हारा माँ मदिर व घमनाला चाल भाग को एक और कमरा दान दना चाहता है सा वह दे सकती है। मैं माचता हूँ कि प्राप समभत हैं कि मैं बुरा। पर जसा कि माप कहत है कि उन चमारा का ता सबर दना ही है। राजनू न कहा ।
लछमन और मैं दोना अभी जाकर उनके कुटुवा से वहां से जाने के लिए कह सकते हैं क्यारि वह भूमि जहा उनको भापडिया पडी हैं, हमारे घरानो की सपत्ति हो ता है । पुरोहित ने उत्तर दिया पर उनकी औरता की चीख-पुकार तुम्हारे सिर पर अनिष्ट ले पाए गाय । निश्चय ही यदि तुम अपने निणय के प्रौचित्य क बारे म मतुष्ट हो तो तुम जो चाहो वह दड उन चमारा को ने सक्त हो । भगवान कृष्ण ने भी तो अजुन का युद्ध के लिए अनुमति दी थी-पदि वह याय के लिए हो । इसका फ्मना तो हम ही करना है । जमीदार ठाकुरसिंह न कहा। पति मूरजमनी और वाकुरसिंह न दोना नौजवाना का रादा नहीं पाने उन्हाने कोई मीधी कायवाही करने का वचन भी नहीं लिया । सत्य ता यह है कि उस समय प िडन जो न एक क्षण के लिए अपना आँखें वद कर लीं पोर मावधान करल हुए कहा नाति नाति पानि । इम पर जमींदार ठाकुरसिंह न प्राधे मन और दीन-तम्बर में जरा जोर मे बग-लडका वाइ काम जल्वाजा म मनुवर दरता।" पीपन क पड म म गुजरत हुए हवा व भाव एक मानहा: निकली सुनसान वानी लपरों व थप म ग रह य पौ7 सूरजमनी छाया का और दापहरा म पहल पागम काम- मममत थे। ज रामजी वा। पतिजा न जनींगरकर वहाँ मे चल दिए।
पाँच
भिक्व की मां दमा शिव का पत्ना काना की मति पास सबसे
निचना सीट पर बठा थी। उसका चेहरा निश्चन था। उसकी आखें
उन उपक्ती हुइ लपटी का टकरका नगाकर देख रही थी जो फूस के
छतो स उट रहा था। उहा के बाच तो उसकी एक कमरे का भापडी
पडून चमारो छ दूमरे टट-फूरे घरो के बीच म भी खडा थी।
उसक गरीर पर पसीना-सा आ गया जब उसने दा कबूतरा का अपने
घासल से उठते हुए दपा-और फिर उनका जनकर गिरन हुए
भी । आग अपन प्रॉचन म उसके घर क चौअदर उग
नीम पेट को लपेटन नगा। हर वार पटो थे और ऊचा उन
व साथ वह उस तान दवा की पोर मुट जाता-अपने गीत को
अपने हाथा पर भगाए पर दवी अपनी बाहर निकलती नान जीभ
+ साथ मव कुछ बम दबती रही । कान कोयन 4 रग के पत्थर म
सदी ई वह मनि । गाय? क्याकि वह हू का भेंट का पानी थी-
उस कुछ चिता न थी पर भ्मी अब भा क्सिा चमत्कार की प्रास म
बना रही।
वडा नदमा का प्रयाय और प्राचय न मूक-मा बना दिया और
वह सुनमा हा ग पर फिर भा उम अपना जाति को औरता को
इक्का-दुक्का चायें सुनाई र रहा या जा उसम नाच वठी थी-पापस
म गुयमगुत्या सा । उना वच्च डर और प्याम स चिल्ला रहे थे और
प्रपना माया के सिर व पल्ल अगिया और कमीजा का सीच
रहे थे। लक्ष्मी यह मय देख और सुनकर और भा गिडगिडाकर प्राद-स्वर म प्राथना करती मा हमारी रक्षा करा--माँ। नेक्नि ज्यो हो पटो न नीम के पेड़ का जलाना शुरू किया और कबूतर मर कर जमान पर गिर पह तो औरता का राना चोलारा का एक सामू हिन स्वर बन गया और लक्ष्मी अपने अनुयायिया को भयानक विपत्ति के प्रति जागरूक हा गई । उनकी धम गुरू हाने के कारण उसन दवी के आगे माप्टाग दण्वतकर उसमे उनको आग से मुक्ति क लिए प्रायना पी आर जमे ही औरतो के चीत्कार न उसकी पाखा क सयम दुवन भाग को स्पा किया व अश्रुविंदु जो बाहर पान का मना कर रहे 4 उमकी अाँखा म छना पड। वह मतिर म हजार वार आई थी । उस अपना भक्ति की गहराई म पूर्ण विश्वाम था इसलिए उम यह भी भगमा था कि देवी उमर बटे और उसकी पिरादरी की अवश्य रक्षा करगी। उसक वेट न उसकी इस अधी भक्ति की कइ वार हमी उडाइ पर फिर भी वह अपना श्रद्धापूर्ण स्वप्निल पास को कहाँ छाडती था । वह उस पिराल दवी का मिठाई तल और भोजन म जो गाव व आवारा कुत्तो को डाल पिया जाता था प्रसन्न करन का प्रयत्न करती और कभी-कभी पाली २ लान मु म दूध भा डान दती । पर इम हताश अवस्था में जब उमन अपन प्रापवा देवी १ चरणा पर समर्पित कर दिया था दगी बिल्कुन नि'चन यो । नपटें अब भी भापडिया से ग्राकार की प्रार लपक रही था-चिरमिर वरता । चटग और प्रकाश था उनम और सिरा पर यह काली काली नपटें थी। मव कुछ उनक गरीर स लिपटकर राय हुना जाता था। गाय काली माई इमलिए एप्ट था कि मूयास्न का यह समय ता वह था जव लक्ष्मी का माई के चरणो म दीप जनाना या मोर जिस जनान म लक्ष्मी वोपाज दर हा गई बल्कि पिधर गिना म दर हो रहा यो। इतिए हो पाना न भापडिया को जगावर एक विशाजीप मजा लिया था जिस प्रकाराम वह अपने स्वग स्थान का
जा सके।
अपनी भूत के इस अतर्ज्ञान पर और उस दड का विचारकर जा
उसे इसने फलस्वरूप मिना लक्ष्मी कह उठी हाय माँ तून हम क्या
त्याग दिया है ? हम पर दयावर । इन औरतो और बच्चो को जो रो रहे
हैं एक नजर तो देख मां-
पर कातो मा ने जो अब काले धुए के पिनाचो म परिवर्तित हो
गई प्रतीत होती थी और नाचती और उडती हुई आकाश से ऊपर
चनी जा रही थी उत्तर गिया-
मैं
तुम सब को भस्म कर दूगी जसे कि उन पनिया का किया है।
तुम्ह अप्ठ कुल वाता का विरोध करने का दाड भगतना पगा । मैं तुम्हे
तव तक जनाती रहूँगी जब तक कि तुम्गरी आत्माए रास म म पृथ्वी
या प्रोता म न उतर जाए और तुम्हारे पुत्र और दूसरे का क दुपर्मों
व पत्र का उचित दर न भोग । और जव तुम कापी दुयभर चुकाग
विरोर साप तुम्ह डस चुग दानव वाह का गम समासा का रार
पर लगाएंगे तन निकारन को भगान म तुम्ह कुचना जा चुरगा
सब मैं एक कान परित का तरह पाऊँगा पोर तुम्हारी प्रात्मा का प्रता
की तरह जागन क लिए पुपारूगी । तुम जिन बन जापाग और भूम
प्रभाव-मलप्त और अभिगप्त गांव के वायुमरल म मररात रहाग ।
रान और सुग्रा कम पारित और पानिमय वातावरण में
भिम का मौकाण चाख निकन गर्न हाय-हाय मेरी बारा तो वरी
रह गई। पोर मर वहार उमन अप|| माया पाट दिया। एक मिरे
म दूमर मिरे तर उसका शरीर कांप गया और वह बहाा हाकर गिर
एगा वह पाता पर गई या और उस मह स भाग निस्त रहम।
उमरा चोपन जार कीया दिौर औरतो न अपना राना बत
कर दिया और उमको चार सावर गिरते देख व मद उसर चारा
भार जमा हो गई।
'इमरे पास भीड जमाकर, उसका दम न घाटा । भिक्षु न कहा, उस कुछ हवा लगन दा। और वहा वह अपनी मा का देख भाल के लिए रवन या वक्री का वचान के मानसिक सघप म ग्रस्न खडा था। पशु का मल्य उससे भी अधिक था-उमका मा की दृष्टि म क्यादि उपर दूध का बचकर हा तो जम्मा राटिया का गुजारा करती था। फिर वह वरी को वचान के प्रयल म जो सतरा था उसक वार म भी मोचना था। लपटें घुए वादना म से चक्कर लगाकर ऊपर उठ रहा था और उम चौक म विल्कुन प्रघा मा बनकर पर रखना होगा । फिर यति बकरा हाथ से जाती रहा तो मा की लगातार मित्कन का आवाज उमर पाना म गूज उठी। यह सहजभाव स अपनी मा का पोर हो पा गया और उमन उस सांस के आने-जान की आवाज सुनो। फिर वह अपनी माँ व भापड + गांव के चीक वाल सिर वा चना गया और परिस्थिति का समभान का प्रयल किया। धुए 4 बात और गाढ हा गए थे और भापडिया बीच घाट चौक पर महग रह थे । वन नीम कपट की हरी पत्तियां लपटा का मगाना व ममक्ष चमक रहा थी-वनपर्ने जा छता सपाका की पार जा रहा था । उसन जग कान लगावर सुनना चाहा कि वक्री प्रभा में में कर रहा है और जिला है या वि नहीं । काई अावाज सुनाई न दो । उसको रग रग प्राप-हा प्राप कापन नगा और वह एक पार भर गया। वह कांप गया जस कि अपना इन्धा-गस्ति का नगर रहा हा । उमी क्षण-इमम पहा कि वह कमजार हा जाय--उमन स्वच्छ वा म एद गगप्वामभरा और फिर माम गार वह धुएँ म मरा गली व खुन भाग म घुम गया घुए न उमर नयना सिर और गन पर प्रारमण रिया। वह दम गजनी माग गया हागा । उमन अपना प्रांगा को बर कर दिया । अव वह धौर मया । जम हा भापष्टिया व मम वा मूगा धाम चक्का जती घोर उमन नपरा का दखा-पल भर के लिए चार म पयाप्त प्रकाशहा गया था। उमन या वरा बद्दी पापल व नाच, जा वह साधारणतया रस्मी से बांधी जाती थी-पडी है। वह मत प्रतीत होता थी। उसन सोचा मत बकरी को बचाने के लिए उसन व्यय यहां पान का कष्ट किया। अपन जीवन में प्रति प्राकृतिक प्रम न उसका या देवाचा और उमे अपने पर गम-सी आई कि क्या वह अपनी मां की मिक्यिा के डर से यहाँ या गया। नविन क्याकि अर वह यहाँ आ गया था उमन सोचा कि क्या न बक्री जिना हो या मरी उस वाहर ल चलू । वह तजी से रम्सी की तरफ लपका और अपनी पुर्तीनी उगरिया स उस गांर को साना जिसमे बकरी का गला रस्मी से बधा था। फिर उसन पशु का उठा लिया। उमको प्रगती टाँगें एक हाथ म और पिदना दूसरे म और वररी का अपन क्या पर डान लिया । अाख वट रिए साम म घटन निए और जब सिर चकरा रहा था वह मत गरीर का कर जिम माग स पाया था उसा पार भाग पड़ा। हर पोर धुप्रौ और भी गाढा हा चुका था और उसम गर्मी भी पहले में अधिक यो । भिक्षु न निश्चय किया कि वह चिनगारिया की चमन और धुए की पावाज करती हुई और झमान वाल दुगध का सहेगा–धय मोर प्रात्म-बन क उम अवोप कोप की सहायता स जिममे उसने माज तक अपने लक्ष्य को प्राप्त किया है । पर हृदय क किसी कोने म वह जावन के लिए और मृत्यु के विरुद्ध मिभत मांग रहा था और यह वि'वाम र नि उमकी प्रायनामा न हा उम बचाया है उमने फिर स्वछ वायु म सौम लिया । जसे ही वह गांव चौक म दोबारा दिसा- रिया वा शिवराम और वापू उसका इतजार कर रहे थे। नटखट वच उनर माय थे। हा-हा बरी। वच चिनाए। बुटिया इम भूल गया। वाव् न भिक्य का वाहा म जकडरिया। चरह। मिक्व न कहा में यह म यवान वकरी मां का टेन जा रहा-वह ता बकरी का लना चाहगा चाह मरा जान चली जाय । उघर बुरिया भ्मा अपन नहक के पतर को जान गई थी जब १६ उमे औरतों से पता चला कि वह बकरी को बचान चल दिया है। वह अपने वेट की ओर चल दी । भिक्षु ने अपनी धुघली पाखों का खोला और मत ववरी को अपनी मां के पागे पटक दिया। उसन कहा यह ले अपनी अनाखो बकरा-इसन अपने वोम से मुझे ही मार दिया होता और यति थाहारेर और हो जाती तो मैं वापिस भी नहीं प्राता मरे वट---मरे लाल-तू मुभस पूछ विसा क्यों चला गया ? तो तुम पर हजारा वरिया योछावर कर देती। उदमी ने भावावेश म कहा-चाहे कहत-बहत वह उस मृत ववरी को प्यार कर रही था। भिक्षु तो इस कटिन परीक्षा से सहम गया था । वह चपकर खाकर गिर पड़ा। मैं मरा नहा हूँ मां-मुझे बस एक धूट पानी दे दे।' भिक्खु ने बेसमी से कहा। में धूलीसिंह के घर से अभी ले पाता हूँ। बाबू वाला। लक्ष्मी के गरीर के सारे तत अप्रत्यक्ष पोडामा स कांप रहे थे। अपने और अपनी सापिना अभिलप्त विजातीय होने नाते वे काली मां का निणय स्वीकार कर रहे थे । ईश्वर दया पर । -धूलीसिंह न कहा। भगवान उन पर कृपा 'तू वूग ही हमारे अनिष्ट का कारण है । भिक्षु की मां न लबर दार पर प्रपराध लगाया । मां का राक्ने का प्रयत्न करते हुए भिक्ग्य न पहा-मां। नहीं-नही। धूनीसिंह न भिक्षु का हाय उठाकर शात करते हुए पहा । 'यह सत्य बह रहा है । पर ऐसा किया क्सिन भाग क्सिन लगाई? जो मौरतें सामन सगी उन्हाने ठाकुरसिंह घर को भोर
६०
अस्पष्ट इशारे दिए । वे अब नहीं रो रही थी क्याकि जो उनकी समझ
मे न पाता था वह वे भाग्य पर छोड दती थी । मुर्गे की आँख वाले
दयाराम का लडका किशार चटपट वोल उठा
चाचा- लछमन और
सजनू ने भिक्खु के घर के पीछे भूम के दर लगाए और उह प्राग लगा
दी। लछमन और सजनू ने मुझे पीटने की भी धमकी दी थी अगर मैं
यह भेट खोन तो।
दू
हैं । -धूलीमिह छोट मे बच्चे की बक्वास को गभीरता से न ले
सवा। विमने क्यिा ? वह जोर से चिल्लाया ।
छोट नकेन दाहाया नछमन और सजनू ने ।
धूलीसिंह सडा-खडा अपनी मोटी नाक म धुओं सूघ रहा था-
उसकी आँसो मामू छलक पडे और भावातिरेक म वह भिक्व की
मां के चरणो पर झक पडा-यह बत हुए- मा मुझे क्षमाकर
दो-यह सब मरा ही दोप है।
?
: थप्ठ जाति हिंदू इम भाव प्रगान पर भिक्षु की मां की आँखों सासू दुलक पह और उमवे गल म सिमवियाँ वध गा। बटा मरी सारी प्राथनाए नरे खेत के कांटा म मरकर रह गई हैं।" भिक्ख गभीर खडा या बोलने की इच्छा न थी पर अब वह उस सोमन दृश्य को घुधनाई अखिा मे देस मुह मोट चुका था और लपटा पर से उठने वाल घुए वारे म सोच रहा था। वह मजबूत ईमानदार पर ात व्यक्ति या और पारमा म इतना पवित्र कि किसी का घृणा न कर मरे । वह उच्च जाति वाला द्वारा वा गई हिन्मा और अयाय सहन का बहुन भादो हो चुका था-विना विरोध व 1 उम बस यह पाया थी कि परिश्रम और अधिक परियम से उम मुक्ति मिल जाएगी पर कम यह यह न जानता था। जो गिरे हुभो वे सिरा पर चढेगा वह अवश्य ही गिरगा' उमन घडवाहट से पहा। वह हरामजाना मरा बटा लघमन धूलोसिंह दहाहा । ' वह पर म कभी कम न रप सकगा । चला जाय यह ठाकुरसिंह के घर । धूल चाट यहाँ की । प्रपन मायी मजनू के पास निमको गुलामी का जहनियत है । गुस्ताख लरका कहीं का। मैं इन लड़या को सदर सिम्बाऊँगा। "सवरार तुम्हारा भी घर कहाँ है ? भिक्षु की मान बहा । 'तुम्हारी परवासी घर से पनी गई है और उसने पति सूरजमना के .
मदिर में गरण ले ली है-और नछमन अपनी होने वाली दुल्हन को तुमसे अपने अधिक निकट समझता है । शिवजी का कोप गिरे इन पर धूलीसिंह न कहा। मैं वहाँ स्वय ही नहीं जाऊगा। और वह वही खड़ा रहा । गस्से से उसका चहरा और लाल होता जा रहा था। 'मामो-मरे सारे बटो प्रानो।हम सब यहा रहेंगे और काम करेंगे। प्रानो और जो मेर पर म है सब उठा नो । हम रात को पूम पर सोएंगे और क्ल में गुडगांवे जाऊगा और सरकार से तना रपया ले पाऊगा जिसमे यहाँ की भोपडियों बन सकें। बाबू ने हलक से कहा~अपना विरोध मन हा-मन दवात हुए । उमका चहरालाल था। उन अछूता की जिना घर-बार को उसके वे और सजनू ने जला दिया था सहायता की प्रतिज्ञा करने के बाद भी उन मभिाप्त मात्मामा की पीडा का बोझ उसके सर पर था। साथ-साथ हिंट धम पाचोम भी जो उसरेजम का धम था। उसन कभा न साचा था जिजाति-पाति के वे नियम जिनका पालन वह करता पाया था एक दिन यह विपत्ति नाएग क्यानि रीति या रिवाज मा वह एभ मानता पाया था जस कि अछूत अपनी गिरी हुई अवस्या का और यद्यपि वह अपना उच जाति म जा उसमा स्थान पा उमको न छाड सकता था उस हृदय में प्रपन बट के द्वारा घरो म आग लगान + अपराध को स्वीकार करन की भावना थी। माथ माय स्वत अपना दापनि वह प्रस्तों को महक पर काम करने के लिए मर चन पग था जिमस वर विक्ट अवस्या पहुँची थी। यह देख रहा पा-चाबू का भाता चमरता हुया चहरा जो उसा भी निगा म देग रहा था। उमरा घर माती या जमे ही यह वहाँ पहुँचा । बम-पापा की हकार मुनाइ दती पा । उम अपन भालपन म मोर भी उगाहमा मालुम मा क्यादि वह जानता था कि वह पचायत या विरादरी के पास सहानुभति के लिए न जा मक्ता था । उसने दातान व पास खड़ी चारपाइ वा विद्याया और उस पर बट गया। फिर उसने अपने पापको मूख-सा अनभव किया । दहा वट व० और अचतन अवस्या म वह हुवरा तला। वरन लगा जो कि उसकी पत्ना राज ने आता थी जब वह घर वापिम प्राता था। पर तुरत ही अपने घर से बाहर गला म अपन पीछे चलन वाला की उपस्थिति का उस विचार आया-अछूत औरता व रान कराहन और चीखन का । व मव उसका ना ये वामो मासूम हुए जिहें उन पिचर पापा को सजा दा जा रहा हो। उसकी मानमिक प्रतिक्रिया पहल ता चिडन की हुई क्याकि उम रिमी का दुख म राना अच्छा न लगता था। वम अव चुप करा।' वह दरवाज पर पाकर चिल्लाया। पर जम हा उसन उनको अपनी इयाा पर रेंगत हुए दवा उसर हृदय में अपन प्रति हो ग्लानि भर गई । क्योकि व सव वही ता प जिना वह दनदार था। जिनका घर वार तुर जान की क्षति उम पूरी करना पी। पौरता ने नम्रता से अपनी निगाह नाचा कर ली और जल्दी स अपन चहर पूघट स ढक लिए । व उमम टू फूट म प्रायनाकर ररी थीं और बच्चे दूध के लिए चोप रह थे जब कि लडक सह ये या नाम पोईवटे थे। स्त्रिया वा रान की आवाज मवमी करुणा और उनव दम्ब की प्रमा प्रवरथा न उमे पागन-मा बना दिया और उसन चिन्नान लिए अपना मुह बोला । तय उमन देखा कि भिक्दु न उम सार दृश्य म मुह पर लिया है और अचानद उम उम नहर पर दया-सी आ गई जिमकी दशा उमम भा बुरी हागी । उमने भावारण म कहा- भव मवाजामा--घर मचा यो। वह भगवान का पलीता अपन उचित स्थान को चला गई- भरिका! वह दुए सम्मण मेरा सहा हा नहीं है । मैं भी हमार लिए जाति से निकल गया । इसलिए यह घर तुम्हारा है भागो मेरे बेट बटियो। यह करकर उसने घर का दरवाजा पूरा खाल दिया। उसन एक विशालकाय देव की तरह लबे-लबै डग भरे और अपनी अनाज की मुख्य कोठरी की ओर प्राया जसे नि कोई हृदय के भीतर रोप का ज्वालामुखी फटना चाहता हा । एक क्षण उसने वोठरी अधियारे मरधर उधर देखा-उसकी पाखें अधेरे में देखने की प्रादी थी। उम अपना घरवाना की कमीज और सर का कपडा एक खटी पर टगा नजर आ गया--उमने उन पिडा को भपटवर उठा लिया और वह काफी तजी से दोडकर दरवाजे पर पहेचा क्योंकि अटूत घर में न आए । प्रायो-और इह ले ना। उसन पुकारकर वहा और उसन पड औरता को प्रोर उछाल दिए। अब उसर मन का शाति हुई। उमन अपना सदूक खाना और अपन नोना हाथो म कपडो को उठाकर यह फोडगे म स बाहर भागा-जस रास्त म चोरी करने वाता कोई तुटराहा। वह फिर वापिस पाया । कपरे जस तसे उठाए और गोटी म भर भरवर गती म उछान दिए । उसका दित ढोल को तरह बजन गा पर वह कपड़ फेंक्ता गया जब तक कि मदूक सानी न हो गया। पापा पापा मेर बट वटिया-पापा सब कुछ तुम्हारा है अब मुझे अपन पाप धान के लिए गगा जान की आवश्यकता नही । प्राग्रा-जो जा तुम्हारा साया है वह यहां न ता । रडको क लिए तो कुछ नहा पर औरता के लिए काफी है। वह कह रहा था और उसका सास फूलता था । वह चि नाया तुम मुझे वा नो में सजा + याग्य अपराधा हैं। मैं अपन जम धम स दुपित ह । तुम चाहो तो मरा भोजन बना ला। और जस हा उसन य गर कर उसकी पांग्रा स ान मुद्रा कर चहर का रेखामा पर प्रा गिर उमका मोटी नाव को भरिया का नानियो म वह गए और वह मिर लटकाए चारपाई पर बट गया।
सात भूय डूब चुका था और नाम का अधियारा खता पर फ्लता जा रहा था। भिवष धूलीसिंह को जमीन की ओर अपन साथिया सहित चुपक चुपके जा रहा था। वह और लडका स थाडा और अलग हो गया और उन पत्यरा ढेर पर 4ठ गया जो उसन उम दिन तोडे थे । वह गांव के वाहर था। उसन अनुभव किया कि यह जमीन उसकी भी उतनी ही पी जितनी कि हिंदुनो म स किमी की भी क्यापि वह उसका विना दूपिन किए हुए पाठ मरता था। यह वही पृथ्वी थो जिस पर वह बचपन म खेला काम किया और जिस पर वह युवावस्था तक पहुँचा । ऐसी पृथ्वा स सपक-मात्र बडा वि वासोत्पा-प था । पर फिर उसे यह काटन वाला विचार पाया कि इम सवण हिंदुओं द्वारा प्रदता पर नादी गई नहाई म उसका इम पृथ्वी स सवध टूट गया । इस विचार से उमक कान लान हो गए और उसकी नसें ऐसी उत्तजित सना की पवितयां उन गइ जो विवाह की भावारी उत्तजित हो । उमन लजा और हार के प्रध-पतन का भावना से सिर झुका लिया। वह अपने साथियों को प्रख स प्रौख न मिला मकना था पर फिर उसकी दृष्टि अपनी नार मे परे ची ही गई और भाही पर टिक गई । भूरे रंग की छिपकली वहां तार म बठी थो-मूवत हुए गोवर पर बठी हुई मविषयो र भण्ड को यान के लिए । दिपफ्ली में अपना सिर ऊपर उठा लिया था भीर प्रपने मुह को नौच मै माक्रमण करन .
को बिल्कुल तयारकर रपा था । बस एक बार एक मक्खी एक क्षण
के लिए बट भर जाय । वह छिपकली वार करेगी और मक्खा का
निगल जाएगी। पर भिनभिनाता हुई मविश्वया सतरे म अनभिन थी।
भिकातु की विचार-व्यवस्था गडबड थी। उस इस समय व मव
अपमान क्षण याद आ गए जो उसने आज स पहन जब तक उहाने
उनकी भापडिया म आग भी न लगाई-बिताए थे । हम सजनू पोर
नदमन ने उसस तरह-तरह के नाच काम कराए चाह व मब साथ
माय सतत थ । वह ता उनका एक भूमि रहित चमार नौकर था।
पडित सूरजमना न एक बार उम वचन दिया था कि वह उसको मदिर
वसूल म दाखिन कर लेगा यदि वह पाए पोर उम पवित्र मोगन के
बाहर ही बठा-वठा पाठ दाहाता रह । इमनिए उम पढना सिना
मीखन लिए दो मील दूर शिकारपुर गांव जाना पडा । वहाँ उसका
मस्त भाई डाराम जो स्वयं भी एक छाटा माटा कवि था उमे पदाता
था। वास्तव में उडाराम न भिवसु का भी एक कवि बना दिया था
जव कि जमीदार और तबरदार के लन्क वीस तक गिनती भी न गिन
मात थे । पर व सर तो अपन घरा इतन समीप थे जितना विभब
व कभा न हा सकता था । उमका घर ही रहा था अव? रवमणी
का मूर्ति उसका प्रावा क सामन हमणा एर घूमती हुई फिरवी की तरह
धपती-मा नजर आता क्यादि वह उसका अपन हृदय के दपण म दखने
का भा माग्म न कर सका था-टम प्राय म वि वह उग नही छ
मकता। राम न भिवगु का बताया था कि रामायण मौर महा
भारत व युग म वन पहले भा यहाँ एक युद्ध हुना या जिमम उच
जानि हा जाना या पौर अब कोई प्राम न यी-मिवाय इम कि धूली
मिह उनका मायना करन पर तुना था-इम गत पर विय भी मुछ
करन को तमारा।
ला। वह पा रहा है पोग नार वाता-गर कुछ नष्ट हान में
वा' राजा प्रा । -चाब् न ३४वाहर म कहा।
६७
चल मूमर'---तारय ने बालू को पटवारा।
एक प्रांव वाल गिवराम न वरटार की ओर अपनी नजर डाली,
जम वह उसे एक पाप-पूण राचक्ता से देखना चाह रहा हा।
बूढा बापू और गरावो गवर उकडू और सहम-स वठे रहे और
उहोंने अपनी पादत के अनुसार हा लवरदार का हाथ जाड दिए।
लडका अब चल पाया -धूनामिह न कहा। हमार पाम और
अधिक समय नहीं है । रात को गरण लन के लिए हम कुछ-न-कुछ तो
बनाना हा है । मैंन औरतों को एक पुराना क्नात द दा है जा व अपन
माय ला रही हैं। गिवराम गवर---तुम जाकर चार वास ता ल
पापा । वे मेरे घर के बाहर गती म पडे हैं ।
भिक्षु न धूलीसिंह का वृतनता मे दखा । फिर उमन अपनी पाखों
म भर प्रामुप्रा से अपना ध्यान हटाकर उन दो लहका की पार सेवा
जा गांव की प्रार चल जा रह थे ।
घूनोमिह समझ गया कि हट्टा-बट्टा भिवग्नु भा विपत्ति से भुक गया
है। उमने कहा-
इन मूख नागा क कम दबकर भक्त कबीर रा दिए ?
जो जी चाह वहाँ -वाबू ने ताना देन हुए कहा । नविन तुम
ता उन्हीं म म हो।
उन पाप तो धुन जाएंगे हमार ही पादिया तक चनने हैं।
भिक्षु न पहा ।
धूलोमिह ने अपने मह म भागा का विधान हा और अपना मूछा
नीच पात्रा को पामत हुए कहा-
यह तुम क्या वहन हा? उनके पार हमारे बी वात वमौ ।
जम व गडद न चाहते हा और हम चाहते हैं। वे भी सडक बनाना
पाहत च । वरा व य नहीं चाहता कि तुम वाम बरा और रोजा कमाना।
और मारी बातें झूठ हैं। मैं उनमें से उतना ही अधिक या मम
जितना कि तुम । जब धन का प्रान पाता है हम इतना प्रदाय कमाना
पडता है कि मूख और अकाल से अपनी जीवन रक्षा कर सकें। मैं तो
नए धम का अर्थ यह ही समझा हूँ। प्रायनाए बनार हैं । सोचो तो
एक मेर जसा किसान जिसके पास दस एकड भूमि है कितना कमाता
है ? यह जमीन पर काम करना कितना कठिन काय है । हम नगपन
को अपनी धन रहित अवस्था को नग्न सत्यता का देखना चाहिए ।
हमारे दा मे ता भगवान को भी रोटी के रूप म ही साकार अवतरित
होना चाहिए।
जमीदार वाकुर सिंह के पास तुमसे अधिक संपत्ति है -बानू ने
कहा।
यही कारण है कि उसर और मेरे बेटे ने तुम्हारे घरो को आग
नगा दी । -धूलीसिंह ने उत्तर दिया ।
निचय ही। -बाबू बोना।
धूनामिह चुपचाप बता रहा यस प्राा म वि भिवतु जान जाएगा
दि वह क्या करना चाहता है। पर अछूता का नेता भिक्षु तो बिना
ध्वनि किए सोम ले रहा था । वह उस डूबत मूरज के बारे म साच रहा
था जा ताल पोर नारगो रग को पृष्ठभमि से उभर रहा था जमे
ग्रामिरे पर किमी क्त्त के बाद।
पासिर वरटार उठा और उसन धीमी आवाज में कहा-
हम कुछ रण-स्थान टहनिया और चाइया बनान
लिए हम यहा क्वन साचत -ए न बठे रह ।
अच्छा -भिवतु अपन क्धे भारत हुए बाता। फिर उमन अपनी
वहिं पता और उट गया ।
उमन कहा- मब कुछ जर राख हा गया
मद कुछ सिवाय
नहाया।
पूनासिंह ने अपनी माटी ना हितावर सहमनि प्रकट की और
अपना हाथ मिक्नु क पधे पर हल्क स रख दिया
,
।
।
आठ
घूनीसिंह की परवाली सप्ति और उमकी लड़की माला मदिर
+ भीतर मूर्ति के चारा भार अधेरे मे परिक्रमा कर चुकी थीं। फिर
उन्हाने विष्णु भगवान की प्रतिमा को हाथ जोड पडित सूरजमनी को
नमस्कार किया और वापिस लौटने लगी।
मेरा सिर तो बार-बार परित्रमा करने स चक्राने लगता है।
सप्ति ने कहा।
'किन तुम यहा प्राना जो चाहती थी। -माना न अपनी मा
का हाथ पकडकर बाहर को पार ले जाते हुए कहा ।
मफट धुओं परा को छता पर स उड रहा था और छोटी छोटी
नपटें पिणाची की तरह चौक में में रह रहकर उपर को उठ रही थी।
याघ्र ही हम पर पहुंच जाएंगे'-माला की माँ न आराम की
सांस लकर कहा । मुझे पाया है कि रियो के लिए मीठा तल तो काफी
है। तब तो मैं एक और अरदासकर सकती हूँ कि तेरे पिता अपने धम
माग पर फिर मा जाए।
पर लरकी की प्राने ता धुएं और आग मे उठनी हुई सपिल कुड
लियो पर जमी थीं 1 उमने अपनी मां को पवित्र कामना की कोई पर
वाहनानी।
अचानव माता को चमारा की भापडिया को प्रोर से प्राती हुई
सगातार रान चिल्लान की प्रावाजें सुनाई दी।
उमे पूरा पता था कि यह घुमा विस प्रोर से पा रहा है । वह तो
7 । उन गतियो मे अछूत बच्चो के साथ खेल चुकी थी। वह उस पूर दृश्य की अच्छी तरह कल्पना कर सकती थी जो धुए के जगमगाते हुए बाटना ने--जो उस समय उसके सिर पर स गुजर रहे थे-~-रचा था। मा नछमन और सजनू न चमारो क घरो को आग लगा दा है। ---उसने चिल्लाकर कहा ! है 1-क्या वाती है पगली व कह रहे थे कि वे एमा रगे और वापू-वह क्या कहगा सप्ति पीपन पेड़ के नीचे एस बठ गई जसे वह वहा दर हा गई हो । उसन अपन माथे को गपने हाथ से पीट निया और हाय हाय करके रोने लगी। माला का भी जो भर पाया पर वह रो न सकी। वह गूगी-सी सडी रही और उसका मह लाल मा हा पाया । वह उम सरना की कल्पनाकर रही थी जो उसके घर को अपन में समा लगा क्याकि उसका कठोर पिता अपने खान्दान को अछूतो के विरुद्ध ठाकुरसिंह के खान्दान से मिल जाने पर कभी क्षमा नहा करेगा । वह जानती थी कि उसका हाय मजन के हाय म दिए जाने का वचन दिया जा चुका है और उसक बल म लछमन को रुक्मणी मिलनी है। यह विचार इस समय जो पाया ता उसकी मतरात्मा विना प्रावाज किए चिल्लानगी । उसका रगें पवने गा । उसकी ना कान और मां जनन ग और त्वचा वजन लगी । उम यह भी प्राभास हुआ कि या अवमर तो या कि वह "म पटन-बान के व्यवयान स मुक्ति पाए मौर व मजन को न गौंपी जाए--मजनू जिमको वह उमके यम और उनपन र वारण पृणा करना था। उसका हाय प्रसृत औरता के प्रति महानुभूति म मर गया चाहे वह हतप्रभ-मा खडी थी और यह न जानता पादि वह मपनी हमी काम प्रगत पर। पद माजा मा। उमन अपना मा मप्ति का टेलते हुए कहा । हम
७१
चतर दग्दना चाहिए कि कहीं प्राग हमार घर तक तो नहीं फ्ल
रही है।
मप्ति के बात चहर पर झुरिया की मस्या और वर गइ। वह
बोला--यह हमारे बुरे कर्मों के पल हैं और अपनी आँपा का दुपट्टे क
एक सिर म पारते हुए वह वहीं वठ गद । उम चक्कर आ गया ।
माला का हृत्य तेजी म घरकन नगा और वह अपनी मां सप्ति
पर नट गई । एमा लगता या कि वह बूटा औरत माता का मा मप्ति-
चिरकात म एम ही नटी हा-माता का हाय अपन मिर पर रखे
थाहा दर वाद वह उठा । डबडाता दुइ गिरता हुई और ग्राह भरती
हुइ । फिर उमन अपना हाथ अपना बटी के क्ये पर रख लिया और
उमर पीछ-पोथेचन दी।
अत औरतें माला के पिता घर व वाहर गली म एम पिच पिच
बाथी जस कि व मरा हनों का मातम कर रहा हो।
हम तो तबाह हा गए । भिवावु को माँ ने चीखकर कहा । बम
तुम्हाग पिता ही हमारा रक्षर है । खो न उमन हम वस्त्र दिए हैं।
उगन बांटे हुए कपडे गिवान का गा खोन दी। फिर कहा-
मा बाता माई। हमारी इम विपनि का रानि म सहायता
कर । माना हमारा सब कुछ जाता रहा । वस तुम्हार उच्च-चरित्र वाल
पिता को उतारता का सहारा है।
वहिन हम तुम्हारे पाव पडत हैं। दूसरी चमार गौरा न माला
वा हाय जोडन हुए का।
माना अपन पहा की क्षति पर अपन मन का मममान का प्रयत्न
वरन लगी। उमको माया थी कि उमर न्याह क्पड हा वाटे गए
हाग 1 उमा गेर के विमी यमय भाग में यर मामा माता लगा
वि मजनू पर कमा भी उम न पा मकेगा । पर फिर भा उस यह विचार
पाया रि यह उन कपडा को पहनकर बाजार हाता ।
वह अपनी मां का प्रार मुडा जा भव गना तक पच चुका था।
૭૨
लकिन अपनी मा तक पहुंचने म पहले ही उसने देखा कि भिक्बु की मां
और दूसरी चमार औरतें मप्ति के सामने दौडकर उसके चरणा पर लट
गई हैं।
न-न सप्ति न चिल्लाकर कहा। मैं अभी-अभी मंदिर स
पाई है।
औरतें पीछे हट गइ-पर उकडू वठ गइ । हाय जोडकर गात
नम्रतापूण और भेड की तरह मिमयाई हुन् ।
मा-हम क्षमा कर दा! उनम स एक ने कहा।
तुम्हार पनि न हमार साथ बहुत भनाइ को। लक्ष्मी ने जोर देकर
वहा । हमारे पर जन गए पर व तो त्यातू वर-सा बनकर पागया।
उमन क्तिना दान दिया हम । बाबू की मां मजोगता न कहा ।
सप्ति पत्थर की मति बनी खडी रही । उसक सारे अधिकार-बोधन
भाव उमर चेहर पर उट पाए और उसको गर्वीले ताल रग म रग दिया।
फिर उमन कहा- इन सब लुटरा को धरती निगर जाए । इनव
सारे पाप कम कतियुग की अग्नि म भस्म हो जाए ।
माता न विरोध करत हुए कहा- किन मां। हमारे नयमन
न हा ता ना परा म प्राग गाई है । बापू न इनको जो
कुछ
वोटा है
वह मिनिए कि इन मावा मडक बनान के लिए बता वाल
गया था। सनि चक्ति और प्टि-मा खडी रहा।
फिर उमका प्रात्मा ३ अधार म स एक दींनी चीन निरन
पग । एमा चाख जा खाए हुए कपडा पाए हुए धम खाए हुए पति
माए हुए पुत्र और माइ हुई बा पर मातम वा चाख थी और स्मी
चीवन उमा ति का एया-उम ति का जा मामुग्रा में नगर
भरा या मिप्ति का हिचका वध गई। माता न अपना माँ का थामा पर
उमरा मिर एक तरफ का गिर गया और उमन माना म कहा-
मा-वर्ग चर जहाँ तर पिता हैं । हम वहां एक पर ना नहा
टहर मकन जहाँ घर का वाई यानि न हा।
नौ गांव का वह भाग जा उस पवित्र कुए में उगता या जा ठाकुरसिंह व पूजा व मान व किनारे या--बिलकुन त था। एमा त जस दि वे मृत गात अजिनकी राय छोट-छोट गुवरों की समाधि के नार दवा या ! नीम के हर पहा का मुरमुर जा मवम पुराना ममाधि पर पडा था-वह भा गोधूला व भयादगे प्रकाश मस्त घ था। उसमन मोच रहा था कि वही जमादार रादुर्गसंह व मत पूवजा की प्रनात्माएं वहां विचरण करती हुई उसे देख न रहा हो। अब उसका यह मोचन या मन दिया कि वह मजनू का साथ छोडकर न पाता और म भो यहाँ ल पाता ना अच्छा था। पर वह ता एकात चाहता था पौर नव दक चरत रहना जब तक कि वह पर न जाय । यह न हुमा वन्धि जमे-जसे वह वान्छित स्थान के पास पाने लगा उमकारवमुर स्वर में बजने गों। उमका गरीर दापन लगा और उसका इवाम जलजल्ग बनन रमा जम कि वह काई पूय को भरने का प्रयनकर रहा गे।एक क्षण वह मान पार पहाडियों को दखने के लिए व गया । दमा हाम बुरे वाम का तरह बुर प्रचूर गुरु निकल गए। तुम पपा शात हो । तुमन उनस' प्रपन प्रापका क्यों हुमा जान पिया क्या माग्निर क्यों? पर पथरान बाई उत्तर न लिया। वह महानता का उमन भएता परा का भाग उगाने के समय अनुभव वा यो पहले हा म हा चुका था और अब उस पर और प्रामा म काइ जीवन-युत शक्ति न था उसो ति तय था जब कि वह]
गाव स वाहर गया था। वह अपन म कोई और विचार न लाना
चाहता था-इस डर स दि कही उसम कोई अपराधी ठहरान वाना
विचार न आ जाय । पर उसके शरीर की गक्ति ता नष्ट हो चुकी
थी। वह कवन खडा रह सकता था और गय म देख सकता था।
उसका आगे बटन म थाडा-थोडा डर भी लगता था और उसका दिल
उम अनुभूति क बोझ से वठता जा रहा था जो कि बाघ के स्वय का
क्षय करन के पश्चात होती है।
मुझे क्या हो गया? मेरे भाग्य म क्या ददा है ?
जम ही उमक मह से य र निक्ल उम ऐमा नगा जस वह
प्रना न हो और उल शला की प्रतिध्वनि न उमग्री प्राकृति को
धाया काम्पल लिया हो ।
वह एकदम तेजी स पाछे मुडा कि वहा कोई भूत तो नही है ।
'नहीं वह मन मन मैं बहबहाया पर फिर भी वह इस स्थान
पर पान पर अपन आपका कोस रहा था। वह गांव के कुए पर नहीं
नहा सकता था क्योकि कोई उमे ऐसा करते दस लेता-जो वह नहीं
चाहता था।
प्रद वह 'राब के मेनगे म झमन गा और प्राग चन दिया।
मैं
बहुत कुछ कर मक्ता - 1 उसन अपन मन म कहा। गायद
मैंन पिता । इच्छा के विरुद्ध वाय कर क मूखता की । लकिन यह तो
धम भ्रष्ट हो चुका है। जव कि मैं
य नाटकीय ट ग म यह हुए T? वातावरण में खा गए । मैं पर
न उमरा पृषा म भर दिया। उम दम बात का चतना थी कि उसने
कभा भागपना मां व धार्मिक पिग्वाम या परित मूरजमना + प्रति
का माग नाव न रखा था। जाभा वह वा चुका था उमा काग्न
वार विचार न कम उमका मानमिर उयन युयन का कर दिया
मोर उम क्षण को गाति म उम नगा वि यह मर तो रकमणा व लिए
हमा है-कमाति मजनू न उमरी मगा तोग्न का धमका दी थी यति
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छमन उम साथ न हुआ तो।
वह एक वर पत्थर से टकरा गया जमे वह अपना मतुलन खो
यह अपने आपको मपावर खप रपने का प्रयल परत-परते यह
माधन लगा कि अब सजन क्या करेगा? उमका पिता ता जो कुछ
उमन दिया है उसी मगहना ही बरगा। इमलिए उमक लिए मव कुछ
प्रामान हो । पर समणी तो हमेशा अपन पिता स सहमत न होती
यो । श्या यह अब उससे घृणा करन वा जाएगी? और फिर उसकी
अपनी मांग क्या वह उसका माथ दगा या पिताजी पाम ची
जाएगो पर ये मब तो बहुत दूर हैं फिर चिता करने का क्या लाभ?
वह नीरता से सोदिया वाले कुए । पानी म अपन गरीर को नहलापर
पवित्रार लेगा।
अचानप उस लगा जसे कि उमर भागे वान का विरोध हो ।
हवा बोभिल थी और मध्या या अदृश्य चोम उसको बुचलता-मा
मालूम होता था। मृत पूजा की प्रेतात्माए उसका मां + मिरम
पादक ममय पीडा का कारण बन जाती थी इमनिए उमन सोचा कि
गपुरसिंह व पूना वा प्रतारमा मान उमा गतान प्राई है । लेकिन
व पूर्वज ता गव उच्च जाति व प्रच्छ हिंद थे जिना मात्माना को
उरावे कृप पर प्रगान होना चाहिए था।
मागबर गया और बडबामा- मैं ता सिद्धात म भाभा
नहीं रिगा।'
जग हा यह माप और नीम के पेडा पा धना हा घाया नीचे
पमा उमा गोचा कि इमी म्यान पर बएर उतार रगा और फिर
मीनिया ग होकर दुरों पर पच जाता। पर उस बडा ममाधि मी
भयावह निपटान जिसम ठाबुरामह ६ रायम पहा पूचना का राय
दची भी उमरा दिया।
धारे धौर मागे पढ़ा-मावित प्रतामामो विद माहम
७६ । का प्रदशन करता हुमा जिससे वह अपनी दष्टि म ही कायर प्रतीत न हो। के मुह के पास पहुँचकर वह फिर व गया। कुए का मुह वाया प्रदा स्थान जिमवे दोनों ओर दीवारें थी और सीरिया जमीन के पेट के प्रदर चली गई थी उमे ऐसा लगा जसे कि नरक का भया नकद्वारहा। - एक्दम उसको एक घबराह ने प्रा दबोचा जसे वह डब रहा हा- मर रहा हो । क्या न वह इस सबका प्रत कर दे? मीधा पानी म भागता चना जाय और उसमें अपने पापको डवाद । लेग्नि उम पता था वि वहतर मक्ता है। कुछ चीटियाँ कुए की पहता सीटी पर काम करता हुई चावन क दाना तक पहेचना चाह रही थी। ये चावल पवित्र कुए के सामने गांव की औरता न बिखेरे थे। उसने अपन दाए पाव से चीटिया की एक पूरी लाइन को कुचन रिया । पर हत्या की गई चीटिया व कुच नन की पावाज मे जो उसके जून २ तले के नीच हुई उसका मन पूणा म भर गया। बम-और वह काफी तेजी स नीच की ओर दौटा । वस अव ता वह अपन आपको कुए के पानी म भिगाएगा। उमम उमक दाप घुगे जाति प्राएगा और अपन पिता को अवहनना बरन क अपराध के लिए वह अपन प्रापको क्षमावर मगा । उसका यह भी विचार आया कि गाय चमार घरा को औरतें अब भी रा-धीस रहा है और काना -वी का सहायता के लिए पुकार रही हैं। उमन एक गातावार को सी दक्षता र अनुरूप अपन कपड उतार परे। वह नगा हा गया । उमन अपन वानागार पट को घृणा-पूण विरुप दृष्टि रा दवा अजीव उयन-पुयत या वहां-जम काई पाग भातर भातर उबन रहाहा । वह अपन हाय वा पर 7 गया और दखा कि उसका हत्य वाए हाय का बना व नाच जार म घटक रहा है।
उसके माय पर पसीना आ गया । वह उत्तजित हो उठा यहा तक
वि अपनी छाया से भी उसे डर लगन लगा। फिर वह कुएं की सीढियों
स नाचे उतर गया जा पाना म डवा थी और वही वठकर पानी के
छोर दना हा भगवान का नाम स्मरण करन लगा!-- ईश्वर ।
-
ईश्वर ।
पर ईश्वर तो प्राकारा से उतरता दिखाई न दिया। मिफ एक
मटर पहला सीढा के एक सिरे पर टरा रहा था जिससे उस रागटे
वह हो गए और उस ऐसा गा जस कोई साप पानी म से निकलन
वाला हा । वह सांप उस इस गा और उसके पाप-कर्मों का दाह उमे
मारकर देगा।
परमश्वर -उसने फिर उच्चारण किया और अपन मिर और
मोने पर पाना डाला । फिर उसन मुह का दोना हाया स ढक लिया ।
यह माचन लगा। 'यदि भिक्खु यहाँ मा जाय और मरी हत्या कर दे
तब ही मेरे पाप का प्रायश्चित हो सकता है-मरे खून स हो-नकि
इस पानी में
-
दस प्रगल दिन सूय निकन स पहा दीवान रूपवृष्ण गाव ६ चोक तर अपना जीप-गाडी चलाता हुआ पहुँच गया । वह गठील गरीर का मजबूत व्यक्ति अता को जती हुइ भापडिया की प्रार चर रिया- भारी भारा दिल में चेहरे पर परगाना को गांठ बाधे । चाहे धूनासिह पिदनी रात का घरवाटी का हार बता चुरा था फिर भी जब तक उमन अपना प्रामा म ना देख लिया तब तक उसे उच्च-जाति वाला दाराता र सवना या विश्वास न पाया। उसन मारी वरपारीक दृश्य को बा जमा दष्टि म त्या । पर वह दृष्टि भावाय थी और उमा कोर निप्रिय या वयाकि वह गाव वीरूटिबद्धता क मामने अपन प्रापको गवना चाहता था~स विचार म कि उस अभा स-व बनवाना है और उम अपना गाम-काय चनाए रखना है। उस उम घणा वा भावना वा मा उमन हृत्य म जमीदार ठाकुरमिह के लिए उट रग या कुछ नियत्रण में रखना पना और यह वह कर सका-- अपन प्राप को यह मान दिनावर नि म्वय उमका माई जा अमतसर म था हिंदू महासभा के राजनतिर त को पार मना था। अयाय के पागलपन के उत्तर म पा नहा हानी चाहिए वह जानता था। फिर भा उमन हर कोर वाकवाह ममूम की । नाम क पा को हरियाना जा माग + चगुत मन पमा थी उमका टक द रही था पौर वह पानाच चबूतर पर जा विष्णु 4 मदिर के पास या पच गया।
५
जमीदार ठाकुरसिंह जिसको अफमर के आने को सदर बच्चो से
लगी थी उसके पास पाखडी भाव से नमस्कार करता हुमा पा गया ।
जस ही दीवान म्पकृष्ण के चेहरे की चमक जमीदार की आखो मे
घुसकर जाने लगी उसके चेहरे कारग उतर गया और वह सरपच के
प्राग भुन-सा गया।
ठाकुर सिह ---अफ्सर न लापरवाही जताते हुए कहा ।
फिर उसन मिगरेट जला ली-अपने आपको वह आवश्यक समय
देन + लिए जिसमें वह उस भाव-वना का पक्ड सब जिसकी सहायता
से वह और लोगो स सफलतापूर यवहार करता था। वह सहज नान
उसक मानमिक धरातल पर एक"म पा गया और उमन कहा-
क्या तुमने मरा भी हुक्का-पानी चट करा दिया है या घर में
चिलम भरने के लिए कह दिया है ?
जमीर की अतिथि-सन्वार की भावना को जसे रेस लगी हो
उसने कहा-
गरीव-पर-निचय हो तुम्हारे लिाहुपमा तयार किया जा
-~और उस गनी की पार मुडकर जो उमर घर की ओर जाती
पी, यह पिल्लाया।
'मो मजनू । दीया माहर लिए हुवा ताल मा ।
मजनू ता पत्तो को गया है। नड) में से एक ने उत्तर दिया।
इम पर जमीदार ठाकुरसिंह अपने घर को मोर एस भागा जस
कोई घसीटा जाने वाला मुगा हो जा बिल्ली से डर गया हो।
गयान पकृष्ण न कुछ बच्चा को जा जोप मचा रहे थे और
हॉन का ऐड रहे ५ तात मारकर भगा दिया । फिर वह चारपाई पर
बठ गया या कहो उन पर गिर पड़ा । अपने भीतर उसे खोसलापन
सा लगता पा क्याषि उमे पता था कि वह उन्व-जाति वाला वो
दस अगन गिन मूय नि स पहा दावान स्पकृष्ण गार ६ चौक तक अपना जीप-गाडी चलाता हुअा पहुँच गया । वह गान नगर का मजबूत व्यक्ति अहता का ती " भापडिया की प्रार चत रिया- भारी भाग लिन स चेहरे पर परमाना की गाठ वाधे । चाह धनाहि पिटना रान की वरवादी का हाल बता चुका था फिर भा जब तक उमन अपनी भाषा म नहीं देख लिया तव तक उम उच्च जाति बाना द्वारा पहना सवना का विश्वास न आया। उसने मारा वरवाला व दृश्य का बरा जमा हुष्टि स रखा । पर वह दृष्टि भावय था और उसका पोध निप्जिय था क्याकिदह गाव काटिन्बद्धता क मामन अपन आपको राकना चाहता था- स विचार से कि उस अभी मक बनवाना है और उम अपना याम-वाय चनाए रखना है । उम उम घणा की भावना का जो उमर हृदय म जमादार ठाकुरसिंह व लिए उठ रहा यी कुछ नियत्रण म रमना पड़ा और यह वह कर मका- अपन पाप को यह या दिनाकर दि स्वय उसका भाई जो अमनमर म था हिंदू महासभा व राजननिर दन की और भुवा था । अन्याय के पागलपन के उत्तर म पणा नहीं होनी चाहिए वह जानता था। फिर भा उमन टट श्रीध की कवाह महसूस की। नीम के पत्रका हरियाला जा आग व चगुन मन फ्सी थी उमा ट द रही या और वह पीपन नाच चबूतरे पर जो विष्णु व मलिर के पास था पहुंच गया।
।
ठाकुर सिंह
?
जमीदार ठाकुरसिंह, जिसका अफसर के धान की खबर वच्चा स
लगी थी उसके पाम पाखडा भाव स नमस्कार करता हुआ पा गया।
जस ही लीवान म्पकृष्ण के चेहरे की चमक जमींदार की आवा म
घसकर जाने लगी उसके चहरे का रग उतर गया और वह सरपच व
मागे मुक्-सा गया।
-~अफ्मर ने लापरवाही जतात हुए कहा ।
फिर उमन सिगरेट जला तो अपन आपको वह प्रावग्यत्र समय
दने के लिए जिसम वह उस भाव-वला को पक्ड सर जिसकी सहायता
स वह और लोगा स सफलतापूर्वक यवहार करता था । वह सहज नान
उसा मानमिर धरातन पर एक्रम पा गया और उमन नहा--
क्या तुमने मरा भी हुक्का-पानी बंद करा लिया है या घर म
चितम भरने के लिए कह दिया है
जमीदार की अतिथि मत्कार की भावना को जम टेस लगी हो
उसने कहा-
गरीव-पर निश्चय हो तुम्हारे लिए क्या तयार किया जा
रहा है।
-पौर उस गला को पार मुडकर जो उमर घर की पार जाती
थो वह चिल्लाया।
'मो सजनू । दीवान माहब के लिए हुक्का तो ल मा'
मजनू ता यता या गया है। लडवा म स एक ने उत्तर दिया ।
इम पर जमीर ठागुर्गमह अपने घर को ओर ऐम भागा जम
कोई घमीर जाने वाला मुगा हा जा दिल्ली में डर गया हो।
भावान रूपकृष्ण न कुछ बच्चा को जो जीप मे चर रहे थे और
हॉन को घेर रह थे सात मारकर भगा दिया। फिर वह चारपाई पर
बैठ गया या यू पहो उस पर गिर पड़ा । अपने मातर उमे सोपलापन
सा समता या घोषि उमे पता था कि यह उच्च-जाति बाला का
7 गव-पूण महानता की भावना को किन्ही गन्ना से भी जो यह प्रयोग कर सकता है, नष्ट न कर सकता था। कुछ भी हो उसे कोई बलि दान के वर का खोज नहीं करनी थी । न ही वह एक विरक्त दान का तरह अपन प्रापको नियत्रण म रस एक सुरक्षित दूरी मे सब कुछ दखता रह सकता था प्रासा और निदाता किसी चतुर ढग स दानी थी। जसे ही वह वठा और सिर को पीछेकर अपना बहा का अपन पोछ फलाया उस अचानक लवरदार धूलीसिंह व लहब लछमन का उप स्थिति का आभास हुग्रा । तछमन हाय म वही हुक्का लिए या जो वह दीवान साहब के लिए जब वह पिछली बार पाए थ-नाया गया था । तू बहुत दिन जिए बटा। अफमर ने कहा । य सिगरेट तो गावर से भरी मालम होती हैं और फिर सवेरे-सवेर सब से पहले हुवर की गुडगृडाहट स अच्छा सगीत क्या हो सकता है । वह तो भरवी राग से भी अच्छा है नडका मुस्वरा दिया और उसे इस बात से सतोप हुया कि उसको स्वीकार कर लिया गया है। उसने हुक्का नीचे रख दिया और बडी मानसिक खिचाव की अवस्था म प्रतीक्षा करने लगा। उसे मब भी माता थी कि दीवान रूपकृष्ण भारी गरीर म से गोध का बारूदी गोला थोडी देर म अवाय फटेगा। पर अफ्सर उठकर बठ गया। उसन हुबके के धुए को वास से हवा म उडाना प्रारभकर दिया। वह उस समय एक प्राकृतिक वातावरण म काय करन वाले व्यक्ति जसी मानसिक पुर्ती का परिचय दे रहा था-- एस स्थान पर भी जहाँ बिना अयाह कठिनाइया में कुछ न हो सकता हो । वास्तव म उस अपनी स्थिरता पर स्वय प्राचय था। इस समय जमीदार टाकुरसिंह यह कहता हुमा वापिस पा गया- 'हजूर हुबका पा रहा है। पर यह लडका तो मुझमे भी तज निकला।
१
'वह तो दानव है।'-दीवान पकृष्ण ने कहा।
प्रवनयमन और जमींदार दोना अफ्मर द्वारा वात प्रारभ करन
का प्रतीक्षा करने लगे।
बस अफमर न यहा कहा-
अच्छा तुम लोगा न होती का त्यौहार इम वप दोवाग मनाया
।
-
दोना गांव वाल एक पल ता असम जस म आ गए और निदा-पूण
वाता का इतजार करने लग-इस असबधित वाक्य के बाद ।
उहान चारी से एक-दूसरे पर नजर डालो और दीवान रूपकृष्ण
का हाली के बारे में जिन करन का भय समझ गए। वह हाली जिमम
उरतास-मय लापरवाही से दूसरा पर रग फैन । अतिरिक्त कुछ भी
पहा या भी किया जा सकता है।
जनाब । हाती ता कभी की वात चुपी। जमीदार ठाकुर सिंह
ने पहना आरम क्यिा। अब तो हम सब वर्षा पाने की प्रतीक्षा
कर रह हैं । क्तिनी तज गर्मी है और
दीवान रुपकृष्ण को जमींदार व वात करन क ग से अपने लिए
एक खुला माग मिल गया। उसने कहा-
कुछ दिनो की बात है कि गुडगांव जिल एक गांव में एक तारा
दूमरे तारे की दुम म दियाई दिया और अगर दिन मोरता का एक
ममूह मेरी स्त्री से पूछने पाया कि कौन मी तिथि प्रधान-मत्रो की
जावित समाधि बनान व लिए निश्चित हुई है क्याकि व ता इनन मज्जन
और दयालू हैं कि स्वय उनका मृत्यु कभी न पाएगी । इमलिए स्वग
जाने का प्रबंध करने + लिए उन्हान पाप ही पारेर लिया है । मैंन
बहें ठीक तारी तो नहीं बताई पर विश्वास दिलाया कि प्रधान-मत्री
ममर हैं।
दोना प्रौद-व्यक्तिया ६ मस्तिष इस कथा का मुनकर चक्कर म
चन कहा ? मेरी आंख का दाप मरी परराव सामने है। यदि मजनू जिमन यह सब मेरे साथ मिलकर किया है मान जाता तो हम दाना इकट्ठ बापू के पास जाते और उमक माथ मिलकर काम करने का वायदा परत । पर सानू का हुल्य तो अंभा तर चमारा का भवना करने पर तुना है । बस एक मैं ही मानसिक पीडा म हूँ। जमादार ने काफी देर तक को उत्तर न रिया । वस उसका चहरा पीना पार लात हाता जा रहा था । उसने गम स सिर फसाए रवा और दीवान रूपप्ण से अपनी नजरें मिान न दी। दीवान रूपकृष्ण उठा और धूनीसिन के खेत की और यह कहता हुआ चना गया- मुझे काम पर चलना है । मनि मनुष्य काम न करे तो वह नष्ट हो जाय ।
"वह तो दानव है।'दीवान रूपाण ने कहा। अब लछमन और जमीदार दोनो अफ्मर द्वारा बात पार करने को प्रतीक्षा करने लगे। बस अपनर ने यही पहा- अच्छा तुम सागा ने होली का त्योहार इस वप दावारा मनाया 7 दोना गांव वाले एर पल नो प्रसम जस मे आ गए और निंदा-पूण बाता का इतजार रन लगे---इस असबधित वाक्य के बाद । उहान चोरी से एक दूसर पर नजर डानो पोर दीवान रूपकृष्ण का होनी के बार में जिक्र करने का प्रय समझ गए । वह हाली जिमम उल्लास-मय लापरवाही से दूमरो पर ग कन के अतिरिक्त कुछ भी कहा या भी रिमा जा सकता है। अनाब । होली ता कभी को बीत चुकी। जमीदार टाकुर सिंह ने बहना प्रारम किया। अब तो हम मब वर्षा के प्रान की प्रतीक्षा कर रह हैं । क्तिनी नेज गर्मी है और दीवान रूपहष्ण को जमींदार वे बात करन वे उग में अपने लिए एक गुला माग मिल गया । उसने कहा- कुछ गिनी की बात है कि गुडगांवे जिन के एक गांव म एष तारा दूमरे सारे पी दुम मे दियाई दिया पोर अगले गिन पोरता का ममूहमरी स्त्री से पूछने पापा दि फोन मी तिथि प्रधान मत्री की जोषित समाधि बनाने लिए निश्चित हुई है, पोषि दे तो इतन गजन और दयालू हैं कि स्दय उनकी मृत्यु कभी न पाएगी। इसलिए म्वग जाने का प्रवप वरन ६ लिए उन्होंने पाप हो मादेश दिया है । मैंन यह टीर शारीप तो नहीं बताई पर विश्वास दिलाया कि प्रधानमत्री दोना प्रौद-व्यक्तियो रे मस्तिष इस प्रपाको मुनार चकर म
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बेटा।
आ गए । उनका विचार या वि अवय इम क्या म कोई नतिक शिक्षा
छिपा है।
दीवान रूपकृष्ण ने लछमन में चेहरे क जस्मी पीलपन का दसा
और उसका मन किया कि अपने अफमरी पद का गान छोडकर नछमन
को गल नगा ते। पर उसका मह ऊपर उठा रहा थाँखें अधमदी रन।
और हाठ कापते रहे जसे उस नड से कुछ कहना चाहते हा। बहा
उसको ईमानदारी का यह क्षण यू ही न बीत जाय । अफमर ने सहर
यता से कना-
वा-तु अपन पिता के पास चना ना और जो कुछ बात गया
है उस भला । तून उपनिपट में इस सत्य को सिद्धकर दिखाया कि
चोर के भी प्रात्मा होती है।
तू मेरी तडका का उसका विवाह होने स पहन ही विधवा
नहीं बना सकता। जमीदार ने छमन से करारी आवाज म कहा ।
'हमारा जाति और कुल तो श्रष्ठ हैं । चाहे दीवात माह कुछ भी कह
हम अदता म नही मिन मक्त ।
लेकिन छमन ने जमीदार व गदा “ी पार बिलकुन ध्यान न
दिया। वह उग और बच्चो से अपनी आँखो के प्रामू छिपात हुए वहाँ
स दौड पडा । जाते हुए उसने धीर से कहा- मैं वहा जा रहा है जहा
मेरा कुतुब है।
जमीदार ठाकुरसिंह ने कडवे तान के स्वर म कहा-
मरा वेटो | आमू ता मसार की सारी वस्तुग्रो से पहले सूस जात
हैं। यह उसन एसे कहा जम म्क्मणी पास हो वह उससे बात कह
रहा हा और उमा दर टूट जान पर उस मात्वना दे रहा हा ।
दीवान स्पवृष्ण ने हुक्क मे तनिक प्रदान करते हुए घूट मारा । फिर
उसने सांसा और अपना वाया हाथ जमीनार ठाकुरसिंह के कये की
तरफ फलाते हुए कहा-
सब से काम लो सरपच ठाकुरसिंह | तुम अपने मन से तो पूछो
पा तुम
पि यया तुम मुगल-राहगाह मानमगौर मी तरह मरना चाहते हो ? मरन
के बाद न मापढी हा न चल्हा हो न घढे म ए वद पाना ।
वर्षा प्रारभ हान स पहा हा हा में मय बनवाका तयार करा
समागे
'हजूर । निश्चय हो। जमादार न रक्षा मर भाव स बहना
भारभ किया। हमारी विरादरा नो गमा है जो पत्र में कुछ नत्रा
व जाड क अनुसार ही जावन विना रही है | मरा एक जवान वटा है
जिमवा मगाइ लछमन स हा चुका है । दूसरा पार धूतामिह उसका
स्था और उसयी वटी अछूता माय रहन कर लिए और इस सवध
का भग कर गए । बटुन दिन पहन मैन अपना घरवारी म स्वमणा
और इस लडर का विवाह रचान ये कि था बयान नषत्र उम
ममय उचित मयोग म य । यदि वह विवाह हा ना ना आज जमी
अवस्था क्या हाती?
नदमन का चहरा मेंप और अपर दिए हुए पाप का भावना स
गर्ग ना हो पाया । वह जानना था विपित्री गत जब म उमको
मो और बनिन उमा पिता व पाम रहने वन दिए य उमने और
ठाकुरसिंह + पुरव व वीच म्यापित माया वा माय सनर म पह
गया है। व स्वर मागे गन ना मोया था और चमारा को माप
डिया का माग लगाना-नगाता बनुन थर चुका था। उसका मम म
या नपामा पात या उगव सारे नायगरा म पार कामा दन ना
रहा है जिमग त्राण बदल गुद हावर और ईमानारी का जादन
विनावर ही मिल मयता या न विचार की मौत मरकर- एम
मान पी मौत जिगन गग । घरों म आग लगाई हो।
फिर तीना प्यक्ति दर ता धापन में कुछ न बान । धमन ने
गानि भगवरल हुए टूर पर य म कहा- हजर में क्या कहूँ'
क्या जो दुध मैंने रिया है उसके बग्न व यार मैं भापो परण इन का
साहगार गाता है इस अग्निाड वा पाप मुक पर है। मुझे
१
१
चन रहा ? मेरी आँख का दोप मेरी पनका सामन है । यदि मजन् जिमने यह सब मेरे माथ मिलकर किया है मान जाता तो हम दोना इकट्ठे बापू ५ पाम जाते और उसव माय मिलकर काम करने का वायदा करते । पर सजनू का हृदय ता अभी ता चमाराका सवनाश वरन पर तुता है । बस एव में ही मानसिक पीग म हूँ। जमीर ने काफी देर तक कोई उत्तर न दिया । बस उसका चहरा पीला और लात होता जा रहा था । उसन गम से सिर झुकाए रखा और दीवान रूपकृष्ण स अपनी नजरें मिनन न दीं। दीवान रूपकृष्ण उठा और धूनीसिंह के सत की पोर यह कहता हुप्रा चला गया- मुझे काम पर चलना है । यदि मनुप्य काम न कर तो वह नष्ट हो जाय' ग्यारह रकमणी न अपने पिता की ग्राखा म विपाद देखा और वह जान गर्न वि जो अफ्सर बाहर से पाया था उमन उमः पिता का भला सुरा वहा है । उसका यह भी अनुमान था कि इसके अतिरिक्त भी खुछ हुआ है-पर वास्तव म क्या हुआ है यह वह न जानती थी। चमार औरतो के रोन और चीखन के गार में वह समझ गई या कि उन पर तो सारा समार ही टूट पड़ा है । उस यह भी आभास था कि उसका भाई मजनू और उसके वो क्सिीन विमी ग स इस जुम को ढान क उत्तरदायी ५। उसन अपन पुरव का ही पन लिया- उस धूलोमिह के विरुद्ध जो अहता के साथ हो लिया था। बल्कि वह ता अपनी हान वाली मास और ननट के भी विराध म हा गई क्याकि व दोनों पर छोडकर वरदार के साथ सेत पर मिल गइ और उम मन ही-मन इस बात पर बडा उल्नास था कि उसके वो तो घर पर हो रहे । नायद उमर ही कारण । अछूत तो हमेशा से रात-चीखत पाए हैं और यह अपन ऊँचे घर की पवित्रता म रहार सतुष्ट थी। लक्नि प्रव अपन पिता पो सर लटकाए दम्ब उसके गरीर की कठोर और होरे जमी गीतता उत्तजना की गर्मों के रग की भनक दन लगी। उसकी मां न उम छाछ म भरा पीतल का गिलास पकडा दिया इसलिए कि वह उम अपन पिता जमादार ठाकुरसिंह को द द । रुक मणी जहां उसका पिता सहा था गिगाम ले गई। वह उस हुन म चूंट भर रहा था जो दीवान स्पष्ण के लिए तयार किया गया या-- पर देर से।
६
मुझे प्याम नहीं है । --उमरे पिता ने कहा और स्वमणी को
हाथ हिलाकर चला जान के लिए याग करता हुअा वह बरामद म
चारपाई पर बठ गया।
स्क्मणी की मा न विरोध करत हुए कहा-
गर्मी तुम्हारे दिमाग का चर जाएगी। इसलिए छाछ पी तो और
बाहर जाने से पहले थोड ठढ हा तो।
यह अपने बेटे को दो। जमीदार ने उत्तर दिया। वही ता
एक बार है जा यह सब बना मर सिर पर ले पाया है ।
अरे । हुअा वया? वो तुम्हारे सिर पर क्या ने पाया है ?
स्वमणी की मा न पूछा।
जसे ही उसकी मा ने चिल्लार य ग ने छाछ का गिलास
स्क्मणो के हाथ से छूट गया।
ठाकुरसिंह ने गरजकर कहा-
'उमीसे पूछो--और उसक सायी नछमन से । जहाँ तक उसके मित्र
और जुम म भागीदार होन का सवाल है उसका दिमाग ता फिर
गया है। अपने दगाबाज़ खाटान के और प्रादमिया की तरह वह भी
सडक पर काम करन चल दिया है।
उसकी यह मजान कसे हो सकती है ? सारे समय मेरे साथ रहते
हुए भी। सजनू चिल्लाया ।
तो तुम्ही न अाग सुनगाई थी? ठाकुरसिंह न पूछा।
निश्चय ही वाप
रेक्नि
सजनू न उत्तर लिया।
मूग तुम उनकी ओर यान न देत तो अच्छा था उनकी भाप
डिया वरवाट न करत । उना ही नगाट पर उनकी अपना ही नय उह
मिखाना-हम गोभा न देना था।
अच्छा--पर बापू । क्या तुमने नहीं कहा था एमा करने को?
सजनू वाता।
जमीदार ठाकुरसिंह को म जुम म अपन याग की पूरी चेतना
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थी। वम वह स्वयं प्राग लगाने वाना न बनना चाहता था। फिर भी
उम नडव की अाँखा मजा उगती उगन वाली दप्टि थी उसमे
वह झुक गया। बाप और बटे के मध्य थाडी देर के लिए एक भयानक
नाति छा गई।
एक भिनभिनाते हुए वह काल वर के गोर न बरामते की
गूयता र भार को और अधिक्कर दिया और वह खाइ जा पिता
और पुत्र का एक दूसर से अलग करती थी और चौडी हो गई।
समणी 'अपन पर दानों आदमिया या चोरी मरेवती
हुई मां के पास बठी अपन प्रापकी गति करन के लिए जोर-जोर से
माँस लेने गी क्योकि पिता और भाई के प्रति उमक जी म जितना
भोप था उसम उसका दम घुट रहा था। इन दोना न ही ता इम मुसी
बत वा ढाया था, और उनका अपन पिता के पास जान के लिए विवा
दिया था।
अपन पिता और भाई म कहा अधिक उसके भाव उनकी पना
में महीनों तक भनटेमे बधे रहे~वो जो विसी दिन उसको गने
नगाएंगे । उसब जीवन म इमस मयुर कल्पना क्या हा सक्ती थी कि
नीघ्र ही एक पुरुप उमको अपने इम घर से ले जाएगा । किन वह जिम
को उगता बान्न चाहता था खुट हा चला गया । अव उप वह
अपनी
पपना मे सता पर पाम करता देख मक्ती थी-अपन प्रटर माग पर
पसन हुए-उमम दूर-अपन अभिशप्त पिता के माय चमारा म बठे
हए। उम लगा वह अबसी है निस्महाय और प्रभावपूण
स्त्री का विवाह में पहल ही विधवा हा गई ।
मान ने चीपवर कहा-
यह गूपर लछमन !
हम दोगा माय थे। भव भी मर कुछ माय ही भुगत लत । गार
एक एमी
पहाँ वा!
उम बुरा भला मत कही। इस मूबनायूग काय में यह माना
६ T पपारापी मा उमन दापन महर के सामने Her Ex Afriही नहीं करना पाहर पा। girl गोगो महा- सोरेको गाराबरो। In पिनारगार Hि- लागारातो पयापित पवित्र है ना रानीपमजोरी रक्मणी को पनि देती प्रतीत जो उगोपाई और 'उहोंने दिया था उसका प्रवणनीय * जो मौकी प्रपने पुष ये प्रति पाकि भावना के साथ उम पर उगे नगा जसे हमेशा सहसा की ही हिमायत की जाता रही हो। मग्नि से कुछ हो गया है वह उसको अब सब मर्दो स दूर रा। उमरा भाग्म हो ऐसा था। अपने पिता की ऊनी हवेली की परपर दो दीवारोर पोधे रहने के पोडा-युक्त विचार की अग्नि उस भस्म करने लगी। उसको मांसो स चमकती हुई चिन्गारियां-सी निक मन सगा-~-बिल्लुन वसी ही जमी कि चमारो की झोपडिया से उठा थी। उसन अपने दुसये ज्वालामुखी को फटने से बचान के लिए अपना सिर तनिर हिनाया । पर जसे ही उसरा मुह उसकी मां क मोरपूण पीने चहरे की तरफ हुमा उमकी मासे मश्रणा से भर गई और उसने उसकी गोद मे सिसकियो भरते हुए अपना सिर दिपा लिया। मेरी बच्ची! रो मत -मां ने तसल्ली दी। 'तू ता हमारा बची है-नन्ही-सी । जान दे उसे धमार दिरा-रोम मौर कर लन दे शादी उन्ही को किसी लडकी से। हम तरे लिए और उचित वर सोज लगे। भाजा मेरी मुन्नो। मोर उसने रकमी सिरकोने और हरा डाल लिया। जर दातकोमा मो मोर तनिक लाज स उसरा एक पुरन सच . ।
बारह
नवी मक का पार जात हए मजन् न अपन प्राप का अना
अनुभव पिया। वम क्वा भुनमान वान और मिर पर चमकन वान
मूय प्रवाम उसका छाया ही उमर पीछ गिर जाता थी।
वह अपन घर स बाहर निकल पाया था क्याकि म समझ म या
गया कि उसक पिना पहन ता उम अपना जाति पर टिक रहन के लिए
प्ररिनकर रहे थ नेविन आज व उमम घृणा करत थ। दूसरी पार
उमरी मां मणी के मगेतर नछमन क माय छार जान का तापी
उस हा ठहराती थी।
गना म म गुजरते हुए उम लगा जस बच्चे भी उसस क्तग रह
हा । औरतें अपना घपट एस ग्वीच ता नमे वह काइ अजनवी हा
और खुजलाए पुत्त भा एम भागत जम वह उट पोटन जा रहा हो ।
उमर पाग पाग गर्मी और घुध के छार छाट वव पर उठन और
वियर जाल । वर जार म साम लता और थाडा हाफ जाता ।
वया उमद पग के नीच का धरता पर जाएगा और उम निगल
पर धरता न एसा नहा क्यिा । धरती का बडोरला की
अनुभूति मात्र म ही उसन अपन पाए का मुरथित अनुभव पिया।
नविन उमा भीतर एक भावना या प्रनारमा जिमका काय आवार
न था उममी मी उहा रही था। यह भावना उग टभ म पर था
जा उगम पूर्वजो 4 उच्च जाति म मवर रसन कारण या । यह
उस नुपम पर भूरे माभिमान में भा पर थी जो कि उमन धमन व
गा
६
साथ मिलकर क्थिा था। पारमा म एक पॉम की तरह इस भावना न
उसे धूनीसिंह क खेत की जान मदिर की ओर जान के लिए उक्माया ।
मदिर म केवल मूरजमना अपनी ना म कठिनता स भजन गात हाग ।
यह गाना इतना उवान वाना होगा कि वह भगवान की मनि क पास
प्राथना के लिए भी न जा सकगा। और फिर उस समय उसकी चाह
यह न थी कि यह प्राथना करे बल्कि यह दि वह विमा मे ना बात
करे। क्नि सार मसार म कौन था जिमस वह एक गर भा कह
सकता था?
उम या हो पाया कि एक दिन वर कुए का अओर जाता हु गाव
की डक्यिा के पीछ हो लिया था। वर उनर वन छना चाहता था
लदिन व भाग उठा था और वह अवे ना रह गया था। और वहा
चट्टान पर बव० उसन अपन आप को यह स्वाकार करन के लिए
मजब्रर कर लिया था कि वह उन साय बत्राकार करना चाहता
था।
।
उस नगा जस वह आज भी ऐसी ही मानसिक अवस्था महा।
एक बहुत बड़ी खाइ उमके और गार के हर एक यविन के बीच म
थी । जसे ही अपन एकाकीपन को वीरानी वा भावना उस पर पूरी
तरह छा गई उस नगा वि मत्यु को छोटकर और सब अच-बुरे म
उसका भाग्य गाव के माय ही बघा है ।
एकम उमने निश्चय किया कि वह अपने मित्र के पास जाएगा।
उमम माथ छोड देन की शिकायत करेगा और उसे अपनी पार जान
का प्रयत्न करगा । या फिर अगर नछमन न उसम विनय की तो वह भी
उमक हा साथ हा नगा।
जम हा उसन यह साचा उसका स्वाभिमान लौट आया और वह
चिल्ला पटा-माटर गद्दार । -और घनसिंह व संत से सौ गज
कादरा पर पड एक वन पयर पर बठ गया।
वहा वह ह्योग स परयर तोन की सपाट आवाज ता सुन सस्ता
६१
था, पर उम ग्रामी निखादैन देत थे ।
धूनीसिंह का काम की दख रेख करत हुए सजनू का एक भरक
निवाइ द गई और यह कल्पनाकर कि यह लडका अपन मित्र का
खाज म पाया है उमन अपना मिर एकदम नाच कर लिया और मननू
की यावृति को माडी की भानी भीनी पत्तिया म म दवा ।
अभी वहा वह कुछ पर ही बरा था कि मजनू का प्रतीत हुआ
कि मूय ता उसका एष पवत की तरह दवाए पर जा रहा है और
उमरी न्यिा का पमाना वनाएर घुता रहा है। यहा तक कि उमा
नगर विल्लुत हल्ला-फुल्का-सा हा गया और इधर उधर भमन लगा ।
और दम तज गर्मी के प्रभाव म उप नगा माना उमर अपराध का
नै
वर उमदडद रहा । इतिए इस वष्ट क्रिया का उमन एक
व्याधि म मुक्न करन वानी तपस्या व प म स्वाकार पिया और
वायु का अपन गरार म म एम जान दिया जस दिन म यम क
दूता नारा चलाए जान वाला आग उमा दाटुकडकर रहा हो।
या या टग्य है। -धूलासिंह कह रहा था। प्राना सजनू ।
तग नाम्न मन यही है।
मजनू का मुर उतर गया। एक क्षण वह दृढता स पत्थर पर वटा
रहा । उसका मन किया कि वह वहाँ म भाग जाय ।
उमन देवा विमत कापार करता हश्रा नछमन उमका हा पार पा
रखा है। सजनू न माचा क्या न घर लछमन पर यूक ६। अविन
उमर पाग यम यहा अवसर था जो फिर क्भा न पाएगा। पूनामिह का
वाती व नम रज न क्षमा वी उग प्रागा पहन हा वधा दाया। वह
चुपचाप घटा रहा-यहरवा माने पर पकाए हुए । दमन माया
और पीछ म मन पिसवाह परत हुए वहिं डाल दा और उम पर
उग लिया। फिर प्रधित म प्रधिर अगम्य भाषा म मवाधिकार
बहने उगा---
माजा' मजनू कवच । सान इधर प्रा
मरा बापू तुझे
हमारी ओर पाने के लिए कह रहा है ।
सजनू ने अपने आप को बचात हुए कहा-
तुम्हारा बापू क्या गाव के सर्वाधिकार रखता है
लेकिन
यह तो मेरे या तर बाप की बात नहा-मरा और तरा
सवान है।
मैं अपने आप को तेरे नए मित्रा में मितवर पित न बगा।
सजनू बोता
नमन ने कहा-
तू ता पहन ही दूपित हो चुका है क्यादि व ना मुझ तू चा हैं
और म तुझे छ चका हू-सक इनावा उहान ता मरे साथ बहत
अच्चाई की है।
अछा तो हर जगह है। कपनी क्ही क क्या तुम तुम्हार
पिता और चमारा में अच्छा नहा है ।
पर पुलिस वाल अछे आरमी नहीं है । यति उर पता चत
जाय दिम दाना न धमागे की झापडिया म अाग लगाइ थी ता
हम दाना ही को जैन की हवा खानी परगी। -छमन बाना
सजन ने अपने मिन की ओर नासमभी से दखा और प्रात्म
समपण कर दिया।
तेरह
-
कुए की सारिया पर खड हावर मूरजमनी ने अपने सिर
पर वह पानी की बालटी उ7 दी जो उसन खीची थी और प्रत्यक
स्वर - माय ईश्वर के विभिन्न नाम उच्चारण किए
हरि मोम परमेश्वर परमात्मन्
फिर बिना अपना गरीर पाछे हुए उसने वालटी का लरडी की
चरसा पर पड़ी रस्सी म कुए म नटवा दिया। पानी उनक पवित्र गरीर
से अमृत और पसीन का मम्मिश्रण बनकर वूद-चूद नीचे कुए में गिर
रहा था और चाहे यह तज गर्मी का एक प्रभात था वह कांपता
जा रहा था। उसकी गतिमय पावाज लडपडा रही थी क्याकि वह
जानता था कि पवित्र पर ता वम उमा प्रकार मामानी से उच्चारित
किए जा सकते हैं । मत्रा ने उमे एतनी गक्ति प्रदान की कि वह अपन
निर्जीव हाय-परा स वालटी कुए स खींच ल । और वह पानी को अपन
गरीर पर डालता हुआ माय माथ भजन गाता जाता था।
जब कि वह वाफा ठडा हो चुका ता उसन साचा कि यह स्नान
भय समाप्त हाना चाहिए। लक्नि उम प्रागा थी कि एक या दो
गांव की औरतें पानी लन जर भाएगा और उसे नहाता हुमा देख
गी क्याकि उसका शरीर ता मनमल वी लगारी म पारदर्गी IT
की तरह चमर रहा था । सदिन औरतें गली म वहाँ से पचाम गज
दूर पापस म पिच पिच सडी थी और उन हाथ-परा का दखकर हम
रही पा जो गोनी पोती की चिपटती हुई वहा म स साफ नजर मात
थे। वे अपो भैपी सी खिसिया रही थी और कुए तक जान + लिए एक दूसरे को धक्ल रही थी। उह लाज भी आ रही थी चाह वह वह नाराज भी बठी थी क्याकि बूटे प्रात्मी क दर लगान क कारण उन को कुए स पानी तान के काम म दर हो रहा थी। यह एक एसा मजाक था जो राज हा दोहराया जाता। पर राज रोज हान पर भी उसका आनद नहीं गया। और ग्राम तौर पर उसका अत यह होता कि औरतें एक बचे को भेजकर पडित सूरजमनी को याद दिलाती कि वह लौट आय क्योकि चाची कुए पर आना चाहती हैं । वह अडियन ब्राह्मण उस समय इशारे को माफ समझ जाता और कुए से चन देता। पर आज सवर तो वह औरा क कष्ट का एक दूसरे ही कारण से बना रहा था न कि अपन गरीर का प्रदान करन क निमित्त । वह जानना चाहता था कि धूलीसिंह के रात मैं क्या हो रहा है। वह जानता था कि दमन और सजनू न प्रायश्चितकर दिया है और व दावान रूपकृष्ण के गाव म आने के बाद चमार रडका के साथ काम करने चन दिए हैं। और यह भी कि लवरदार को जमीदार ठाकुर सिंह के ऊपर जिसका उसने सहायता की थी विजय हुई । अब यह आव यक था कि किसी प्रकार गाव म दोनो दना म समझौता कराया जाय । निश्चय ही ज़मीनार ठाकुरसिंह ता आसानी स न मानगा- अपा वर नारा नाद गए अपमान के कारण ! लक्नि मूरजमनी ने भन म मोचा कि सौभाग्य से उसन स्वय दाना तडको को अछूता के घरा माग गाने की सीधी कायवाहा की सलाह नही दा थी। वलि उमन जान-दूझ कर एस गटाक प्रयोग स अपन आपको बचाया जो उम दोना पभा का ममथर दए । सलिए गाया वह वीच-बचाव परा सके। उमन अपन बाए हाय की हथेली का ऊपर उगकर प्रसो पर छाया करते हुए वगुन की तरह गान उपका और देखन का प्रयत्न
किया कि क्या हो रहा है। उसे बस यहाँ दिखाई दिया कि धूलौसिंह
व ऊपर उठे हाथ ग्राम व पडा की शाखा स उलम हैं और पाल ठोई
रह हैं। अब उमे एक काम करना था-वह जाएगा और लबरदार से
मदिर के लिए कुछ ग्रामा की भट मागर र वातचीत गुरु करेगा। मच
ता यह है कि उम धूलासिंह को पिछल निना को उतारता के आधार
पर यह विश्वास था कि यह भेंट तो विना मांग ही मिल जाएगी।
आमा की प्राप्ति के प्राक्पण-वा पटित मृग्जमना कुछ गज की
दूरा पर नाम के पह के नीचे रसी हुइ अपना मूगी गोटी पह्नन के
लिए घन दिया। उमन इम वस्त्र-परिवतन म समय न निया-हर दिन
की तरह जब वह अपनी एक गाटा वडी देर म बाधता या जिमम
औरतें उसक नग गरार दान कर सकें। आज उमन नीघ्र ही गरीर
पाठा धाता पहना गीली नगाटो या निचाग और अपना सामान
लवर प्राग चन पड़ा।
जय तक पडित मूरजमना भाडा तक न पहुँचा था वह निश्चित
पर वहाँ पहुँचा नहा 14 उमरा हृदय घडवन नगा।
विमो का उमक पागमन का पता न चला क्यापि धूलामिह की
उमरी पार पीट था। व अग अग ढग पर पत्थर तोर रह थ,
और पोरन पाम व पय मुरमुर ६ नीच अपन प-मूस घरह का
प्राग मुनगा रही था।
पनि मूरजमना का अयपूण ग म खांगना पड़ा।
महज मान ग घूलीमिह का मिर मुटा। उमन पुरोहित के रगडकर
चमका" हुए गरीर का दवा और फिर मुम्बराता हया उसका मोर
दयन नगा।
प्रो । मामा परिख मूग्जमनी जा भापकी ही तो कमी थी।
1 राम जी वो भाई ।' पुरोहित न उत्तर गिया ।
उमा वा पागदर तर नाति रहा। इन क्षणो म दाना ऊपरी
पावभगत पलामा समौत की-मौ बातचीत शुरु कग्न के लिए
था
--
-
अवसर टटोलन नगे।
पाइय-हम आपको मटिर के लिए कुछ प्राम अवय न
वाहिए | -~धलीसिंह क क्या वह प्रकृति से उदार था इसलिए
उमन निचय दिया था कि विरोधी दर के प्रत्यक व्यक्ति का अपन
हृदय का विशालता दिवाकर अपनी ओर जीत लेगा।
लबरदार नीमिह क वक्षा का पन ता माग ही होगा
सूरजमनी न उतर लिया।
मछा | तो पायो और देवताग्रा के लिए चगवा ता लत
जाना। -धनामिह न कहा।
पुरोहित क पाव रयन का जमीन तयार हो ग’ था।
निश्चय हा तुम ता यहाँ मार गाव का जीवित किए हुए हो ।
भगवान दरिनारायण मावार हो गया है-इन चमारों में
धूनीसिंह न क्वन मिर हिना दिया।
ब्राह्मण न कृतिमता म कहा- हर एक को यहा काम करत तय
स्तिनी प्रसनता होती है।
अव धलीसिंह वाता- तुम्हारी दया से टक वा अछा काम
कर रहे हैं । भिकर वाय छविराम और कर-य तक कि कात्ति
दसरय न भा काम करन की पादत मीख ती है। और मजनू और
लछमन भी रह । यह बीमारी तो छूत से फनती है। ग्वाना गजराज
भा पा गया । मामराज चपरामा जा दहता स घट्टा पर आया है
वह भी काम पर लगा है। और मिव वाई गरसिंह को भी नहीं भून
सक्त हैं।
अचानक पति सूरजमना ने मुजातीय हिंदया और विजातीय
अहता व एक साथ काम करन अदभुत दृश्य को शास्त्रा की मापी
दसर मराहना प्रारम कर दी।
तुम वास्तव में घय हा नवरदार धूलामिह । जस गीता म
श्रीकृष्ण न कहा है-~जो भी मर पास पात हैं उन सब का में ग्रहण
कर लेता हूँ। तुमने भी इन लडका का अपने म समावेशकर लिया
है और काम में प्रति अपने अनुराग के द्वारा तुमने सिद्धकर लिया
है कि तुम सच्चे कभ-योगी नो। तुम्हारी घरवानी नियम म मदिर
आती है और अपने कर्मों व फलस्वरूप उमने परमेश्वर का आगीवाट
पाया है। प्राज मब में अधिक आवश्यक्ता इसी बात की है कि हम
अपनी सरकार को अपना जीवन निर्माण करन म सहायता करें। हम
दीवान म्पवृष्णमाय बम बंधा मिलाकर बनना चाहिए ।
पूजा के लिए भेंट लेकर फिर माऊगी --माप्ति ने थोडी दूर में
कहा। वह उन अामा म मे जा उसके पति ने अभी इक्टठे किए थे
प्रोर जिह उमने और भिक्खु का मा ने एक ढेर म जमा कर रखा
था-एक टोकरी भरकर ले आई।
पडित सूरजमनी का आँमा म चमक आ गई। उमन टावरी का
पामते हुए दहा--
ई-वर पर तुम चिरजीवा हा । तुम्हें भगवान राजी रखें
सप्ति ।
यह कहकर वह मुटन ही वाला था वि धनासिंह न उम जान से
नहीं-नही । वह टावरी तो तुम अपन माय ले जा मते हा पर
बुध पर हमारे माय यर्ग वरपर भा खा ना । पाया लडका । योडा
चलाना बरवर पहत ग्राम पाता।
वा पेर म बात दर म च ह लाट-पोट हो रहे पर वह काम
न छाडत थ क्यापि होना की चोट की लय और तात न उनको कणी
भूतकर रखा था। सविन भिवरा नवरार व बुनान का प्रय समझ
निस्तावर योता-
मरे । पाजामा कुछ लाग तो पान प्राय नाकर मुन
पात हैं पौर कुछ भाग्य सेवास तौर पर यदि कोई धर्मामा इनका
तरप मा निवले तो।
१८
टूट पगा
व सब भी आ गए-पुरोहित का कृत्रिम पार से हाथ जाडत हुए
और एक-दूसरे की ओर मुह छिपाकर मदिर में पूजा करने वाले पुनारी
की हमी उडान हुए।
धूनीसिंह ने सारन हुए का-
मानो डका
और यह वहकर वह अपने व वह हाथा सामा व पचायना ढर
पर पिन पग।
ना जाना-प्राग वर आग्रा पति मूरजमनी वरना उम
भबस वरिया ग्राम हम से पहत हल्प गे ।
चाहे पुराहित न ढर में हाथ तो नहा डासा फिर भी उस लबरदार
हाथा स पन स्याकार करना पडा। कुछ भी हो छुआछूत का प्रति
मध ता टट मा गया क्यादि प्रसृत के स्पा किए हुए ग्राम ब्राह्मण को
सान पड़ गए।
धूतासिंह स्वय भी म छुपात के वधन को ताडन + लिए इमी
प्रमार की धार्मिक ग्रनमति चाहता था।
प्राह भिक्षु । काम करने म राम |~-प्राजा । य डब तर
निए कुछ न छारेंग। --वह चिल्लाया।
उमरा सहन्य भिकर अब भी होना चला रहा था।
मार बोतन मिल जाय ता यह सर 4 वन भागा चना
पाएगा। --बाबू न यग्य विमा।
भिवन उत्तर दिया--
यह ता परा वात है कि मैं पान म तुर्भे मात दे सकता है।
फिर उमन यौटा पर रिया पनि जी का हाथ जोड और हाथ
धान के लिए उम पाना का पार चा रिया जिम उसका मां गत्वा में
निए बना थी।
वाबू न व्यग्य परत हुए पति मूरजमनी व बहे हुए बावपाना का
दाहाया-~
नवरदार धूलोसिंह के खेत के पाम मोठे हैं ।
निश्चय ही। -दसरथ ने कहा ।
भगे गिवराम न टिप्पणी की-
दुमुहा साप कही का।
नहा-माप नहीं मढक । तभी तो कुए मे भाडी पर फुक्ता
हुअा यहाँ तक आ गया | ~वा ने कहा।
पाश्चय की बात है-चीटिया के भी पर निकल आए हैं। -
यूने गावर न अपनी दाढी पर गिर पाम व पोल रो का हाथ स माफ
करते हुए कहा।
बानून हल्वे से कहा-
अब तो तू चिडिया की तरह ची चीर रहा है। पहर कभी
उमने सामन एकर भी न वान सकता था।
जा जा चुरढ | तूने अपना मुह सिवाय ईश्वर से एक और डका
मांगन के कभी और भी खाता है ?-चाह नर पहल हा छ वट हैं ।
भिवायु न गवर का ग करन के लिए कहा-
अरे | मान । परिश्रम म धन मिलता है।
निश्चय हा। छमन ने कहा । धूलासिंह का वटा अन लडको
म ग्राह्मण वा निरादर परन यो भावना का भोत्माहन न देना चाहता था।
हा-हाँ । ठीक ता है। मजनू न भी रक्षात्मर ढग में कहा ।
सप्नि मी वान उठा- आखिर ता वह बुजुग है।
भिवय की मो नमी न परामा टेन हुए कहा-
यह चागत चौरडा बुढाप का वह पार यहाँ करती है नम कि
हमारे जमान म लोग वरन थ।
पूनौमिर ने चटगारा न हुए कहा-
वावई-मरी पाठ पौधे य मुझे पारी नाक वाला कह्न हैं । और
मैं तो हरपन दाग भामू का पूरा सम्मान रनवे पण महूँ। बम
पत्त य्य या विमान हा ए एमा पाठ हैजा हम मौवना है। निठल्ले
1
व सब भी आ गए-पुरोहित वा कृत्रिम पार से हाथ जाइत हुए
और एक-दूसरे की ओर मुह छिपाकर मतिर म पूजा करने वाले पुतारा
की हसी उडात हुए।
धूलोसिह न सकारत हुए कहा-
ग्रामो लडका । टर पो।
और यह कहकर वह अपने बट बड हाथा मामा व पचायना दर
पर पिन पडा।
या जाग्रा--प्राग वर आमा पत्रित मूरजमनी वरना सडक
सवस यरिया गाम हम स पहल हडप तंगे।
चाह पुराहित न ढर म हाथ तो नही डाना फिर भी उमे लबरदार
व हाथा से पर स्वीकार करना पड़ा। कुछ भा हा मारून का प्रति
बध तो टूट-सा गया क्यानि अत के स्पा किए हुए ग्राम ब्राह्मण को
मान पड गए।
धूनामिह स्वय भा रम ग्राहत वचन का तान के लिए इमी
प्रकार की धार्मिक अनुमति चाहता था ।
ग्राह भिवन्दु । काम करन म ग स | -पाजा
लिए कुछ न छाडेंग | -~-वह चिल्लाया।
उममा सहृत्य भिवर अव भी होना बता रहा था।
पार वातन मिल जाय ता यह सर व मन भागा चना
पाएगा। --वावू न यग्य दिया।
भिक्ष न उत्तर दिया-
या ता पसा बात है कि मैं पान म तुझे मात द सकता है।
फिर उमन हयोग पर गिया पति जी का हाथ जाड और हाथ
घोन के लिए उम पानी वा मार चन पिया जिम उमरी मा गडवा में
लिए खना थी।
वाद् न व्यग्य करल हुए परित मूरजमनी व वह हुए वाक्याएको
दाहराया--
यडक तरे
म तो हवपन द्वारा मायूवा पूरा मामान बE1 'लबरदार धूलीसिंह के खेत के पाम मीठे हैं । निश्चय हो।'-दसरथ ने कहा । भगे शिवराम न टिप्पणी की- दुमुहा साप हा का। नही-माप नही मत्व । तभी तो कुए से भारी पर फुक्ना हुआ यहाँ तक आ गया ! ~वाबू ने कहा। प्राश्चय की बात है-चीटिया के भी पर निकल पाए है। बूटे गाकर न अपनी दाढी पर गिरे आम क पोन रेरा को हाथ स माफ करते हुए कहा। वावू हल्वे से कहा- अब तो तू चिडिया की तरह ची चीकर रहा है। पहन कभा उमक मामन एक भी न बान सकता था। जा-जा बुड्ढे । तूने अपना मुह सिवाय ईश्वर से एक और तहमा मांगन के सभी और भा खाता है ?--चाह तरे पहल ही छ पर हैं। भिक्षु न गकर का खुरा करने के लिए कहा- अरे । गात । परि नम म धन मिलता है। निश्चय हा। लछमन ने कहा । धूनौमिह का वा यात सध्या म ब्राह्मण का निरादर करन की भावना वो प्रात्माग्न न ना बाता था। हो हो । ठाव ता है। मजनू न भी रक्षात्मक ढंग ग पड़ा। सप्नि भी बात उठी-प्रापिर तो यह युजग है। भिवप वी मां लक्ष्मी न परामा देते हुए कहा- यह चादान चौपडी बुढाप का यह पार पापना पनि हमार जमाने म लोग परत । धूनीमि न चटवारा मन हा पग- याई–मरी पाठ पीछे य मुभै पोरी नाक दास मान । बत घ्य या विनाा ही एव "गा पार है । म पाशित
१००
हाय बसे बडी-चडी भाव भगिमाकर सरत हैं पर दौड वाल हाय पूरे
के पूरे पवता को ताड सकते है ।
इन अतिम गा को सुन पर अपन काम पर लौट पाए।
लवरदार उनकी पति से भरी हरक्ता को दख रहा था और
साथ साथ वह शक्ति भा जिसस व हयोग चला रह थे।
उसन उनकी गति पर हा ध्यान केंद्रित रखा । उसा ढग स जस
उसने उनी जागरकता का अपन म समो लिया था। उन परत
नवयुवका को बस एक बार प्रोत्माहिल करना होता है फिर ता उनम
कभी न समाप्त हान बाली शक्ति का गुप्त खोत खुल जाता है। अपने
अधे- गरार को दख लवरदार को उनस इहोन लगी।
वह उनको सुनाकर कहना चाहता था-
या | मर बढिया साथिया । श्रा मरे वहादुर दोस्ता ।
निश्चय ही तुम पुरुप हो और पुरष भा इस कठोर मिट्टी में
।
।
चौदह शि भिर को प्रोग्राम प्रकार की झनक पाई-जमे ही वह वाम पर पाकर जुटा । किसी नई चिंता से उत्पन हुए मानमिव तनाव की वह छाया थी। घोडा चनात हुए तडका और उमा म य अत्ताना का भाव रखा भूम रही थी चाह दूसरी पार यह बात भी सहा थी कुछ भा न कर सक्ने की पराजित भाव को भी वहां कोई स्थान न या। सम क्या चाहिए वह न जानता था। उमरी तनी हुइ भौंहो से वेवर पमीने और शक्ति का जन्म होना था। उसकी प्रात्मा म उल्लाम या-वि वह रतने ही जाग से सहक पर भी काम कर सका जिम जा स उमन अक्सर अपने पापा राव म डुवाया था या जिस जानून में वह गांव म एक मिर म दूसरे मिर तक निहाय पूमता पिरता था। अग्नि उम यह भी पता था कि उमवो नई उम्र को स्वच्छता और नापग्वाहा ता कभी को खो चुकी है और गांव का नई पाट माता-महब म उमव पौरपकी क्षिा और परीक्षा हो रही है । मुछ ममय तक यह यू ही तनाव म पोर अवारण परेशान-सा बठा रहा । फिर उग पारी की तरह माफ दिपाई दिया कि मुद्री भर ग्रामिया पपयर ताटन म तो मदव अपा निश्चित समय म न बित्युन बन मागी । भविष्य का यह प उमको प्राया म एक पता हटान समान था और इस गाय ग मापानवर उसने अपन प्रापवा स्वम्य-गा महमूम रिया, जग वि वह बडा दर म विमो दौरे मायचित हो गया हा, और पद म हात पाया है। कर अपनी प्रांगा व भवर मड़वा रहापोर उनव मार पर पाई टालन मगा--पाची धगतल उममा जो कि
१०२
आने वाला समय ही बता सकता था। भिक्षु ने कहा-
लबरदार ! अगर औरतें हमार साथ मिल जाए ता गांव के
बाहर क रास्त पर क्क बिछाए जा सक्त है और साथ साथ पत्थर
भी टूटत रहा।
धनीसिट बहुत दर तक स्त ता की गय अवस्था में वटा रहा ।
उम अवस्था म जिसम स्वय उसका आत्म बनाटत हुए पत्थर की घल
की तरह धराशायी हा गया था। वह और मानसिक उथल-पुथन न
सहमता था।
सप्ति न भिवानु के गट सुन लिए थे और उस हाठ हिल जस
कि वह कुछ क्गा । पर पकोगे नाव वान धूनीसिं का उनमन का
गाठ म बधे दस वह अपने आपको बानन म रोष गई। अपन स्वामा
और वणधार में सामने वह और क्या वरती ?
अपन अविश्वासा की चाट म बिलबिनाता धूनासिंह स्वयं ही सप्ति
वो ओर मुडा । उसन उस एस देवा जस अपनी पूरी यथा का उसक
राम राम म समाव करना चाहता हो ।
इस पर वह एक हतामुटा म उसका आर दसन गा और
कहा- एक और एक दा होत है और दा और दो चार हाथ । हम टाक
रियो द दो और हम सडक बिस्तर पर लडको द्वारा तो हुए पत्थर
विद्या दंगा।
निग्चय हो। क्ष्मी न कहा- लक्नि हम ता टोकरियां भी
बना सकते हैं । आखिर हम चमार माग उम करत या हो रह हैं ?
और यर कहर वह अत औरता का एक-दूमर स राटी प्राकृतिया का
और दग्वन नगा जो ग्राम के झुरमुट के नीच अपनी भापहिल्या में बाहर
बठा थी।
उन जा वाझ म दया स्त्रिया न अपनी सहमति देन के लिए
भारी घूघटा क नीच अपन मिरा का हिलाया और अपन वचा को
पड स वधे मना मारियां दकर सुनाती रहा।
मजनू का नगा कि भूय का जलाने वाना पाप उमका सापडी स उतार उमयी मुगी जाभ पर आ गया है । उम और दिना क मूय की अग्नि की प्रच टता की पूण ग्राभति थी ययानि वह अपन पिता की ममता का माफ करने और फरकने के ममय कई वार मता पर गया था। गड गडा करता हुआ पानी वा धूट उम मुह को रमा का दूर कर दता पर अपने मुह की स्वारहानता के कारण वहाँ कडवाहट के चिह्न थ~~-जमे घूलीसिंह न उम धून पान को विवा दिया हो । पट व गाती-पानी हान की चतना वे अतिरिक्त उमर गल म कुछ ततुप्रा का खिंचाव महसूम हाता था । पडिन मूरजमनी व जान के बहुत समय बात तब उसन अपनी पीडाका वावर रमा था। अपन गरार के बुमार का उसन जोर-जोर स सांग लपर लात न पिया था जिसम कि उमर हाय वा यौटा अपना काम करता रह और वह पसीन म एम नाटता रहा म वि वह नरख की पाना नदी के अमत जल म नहा रहा हो जिसस पि वह धुनकर पवित्र हो जाय । पौर तब ही उस गा गि जसे यमदूत उमक प्राण दवाच रह हा। वह महारा माजन गा उम मधुर और विचित्र भार का ना माना व लिए उगकी कामना का रपा था। वह माना जो लछमन का बहिन और उमको मगेतर थी। पवल मानाहा ता था जिमन अपना पीठ माने रपा जब तक कि वह वहाँ रहा । एव क्षण का भी उसन प्रपन निन्चन * का प्रचित न छोडा, जर वि पल मुनहरी दिना म अपना घूघट
१०४
डानन स पहत उस अपना चहरा प्राधा निवाकर इस नातानता की
लाहे की दीवार म छेकर दता थी।
दोडे से ऊपर और ऊपर और उठार उमकी आसे वितिज का
टटोनन नगी । वहां की चकाचौंध न उम हग मा दिया ।
और उस ग्राभाम हुअा कि अछूत काम करने के साथ-माय एक
गीत भी गात जा रहे है। वे अपन पाप म मम्त और वाह्य जगत के
प्रति अचेत हैं और अपना इछा व दिग्द्ध उमने अपन मन म यौन का
पनि माटगी और उनकी आवाज का मराहना की।
वह सोचन नगा कि काग।
सरा पिता भी इतना उतार हाना
जितना कि उसके मित्र छमन का पिता धनीमिह था। स्वय उमा
वह्नि उमक मित्र को पार अधिक अनुराग रखती थी-जिनना कि
माना हृदय म उमक प्रति नहा था। फिर उमरी मा भी तना
विशान हृदया कहाँ थी जितनी कि सप्ति । जम-जस मजनू अपन भावा
निरव व माग पर बटना जाता सय उमरे मस्तिष्क पर अपनी बाती
चादर डानता चल रहा था।
वह साच रहा था--जावन ने मुझ कर बनाया है-इसलिए कि
गाव क जमीनार का तडका हाने के नात मुभ औरा पर गासन करना
है और यह काम कठारता स हो हो मक्ता है। विप तौर पर न
नागा पर गामन करना जा मख भने हा पर काम करना और अपनी
रोजी माना जानत हैं।
एस ही कुरन्धर उधर की वाता व मिवाय उम चमारा के विस्त
अपन दष्टिकाण म वन खाखनापन नजर पाया। क्या नहीं। उन
सवका धूलासिंह व नाच गरण मिना और आज भा व जावित - चार
उनक घर नकर राख हो गए और मरवार उनका पाठ पर थी।
उनका सारा मपत्ति नष्ट हो गई पर पिर भा कुछ बच गया । वह था
उनका बाचन
मजनू का यकायक एमा उगा जम जीवन व उसका तत्व उस
।
पाम से ही गुजर जाएगा और वह उसक स्परा मात्र के लिए तडपता
रह जाएगा। उससे इसकी पूर्व सूचना जब मिना जव कि दूमर पुष्प
अपने रहम्य उमको इस डर स न मौंपते कि कहा उनका सम्मान नष्ट
न हो जाय ।
माम मम्मान 7 इस मत्रानि-वान म वह माता की प्रतिच्या
को पार पातर मा भुना अपन मन म वह जादुर नस्वा दाहराता जो
पपित सूरजमनी ने उसे विमी भी स्त्री का प्रम जीतन के लिए बताया
था । मजनू न पुरोहित को नहीं बताया था कि वह क्सि के लिए यह प्रम
वनीकरण मत्र माग रहा है पर वह जान गया था कि यह माना की
अपनी ओर पावपित बरन के लिए था। उमन बिना श- उच्चारण
विरा य चमत्कारिख मत्र दोहराया--
मैं तुम तक युगा को पार करता चला जाऊगा।
और वह अपनी प्राग्वा म उस दिन । सचार की प्रतीक्षा करन
नगा जा माला का अपना मह या अपनी पार्शी ही उसका पार फग्न
व लिए बाध्यबर ६ । एक क्षण ता उस अपना हृदय मत्र एक एक
T 4 माथ ऊपर उडता दिखाई दिया।
किन माता न भुडी और सप्ति के पाम वठा रही। वह पाना म
व वरा यो ममूर का दाल स मगर रहा यी ।
माना उगी है। इस विचार म जितना भावावण था उसर
प्रभाव म मजनू वी प्रात्मा उतनी ही भूखा तडप रहा था। उमन अपन
हायक एक जन्म व बारे म सावा और उसका मन चाहा कि
वह विरह-गात गाए। पर यह हास्याम्पट हागा-उसरा उमर
पाभिमान न विश्वास दिलाया । वह माह भरकर रह गया। उसर
मित्र रमन ने कहा-
यति माम सेन म पुछ मुश्किल हा ता अपनी पगरा का सिरा अपन
मुर पर बांध ला पोर अपना दम पार ना।
मनन न विरोध किया-'ता तुम्ह मरा मरना पमर है
2
जीजा जी-तुम तो अपने पिता की जूता की मार से उरते हो।
सजनू न अपने आपको बचाते हुए कहा ।
बको मत । तुम्हारी सातिर मैंने अपना सब कुछ खा दिया। व
दूसरे लोग हम पर हस रहे हाग और
और क्या? नछमन ने पूछा।
और यह हमारा न देन का मवध समाप्त-यदि माना मुभम
रुष्ट ही रही । तू उस भिक्सु को सौप दना।
अगर तून मरी बहिन को एम गाती दी तो मैं तुझे यही प्री-
अभी कत्ल कर तगा। -दमन चिल्लाया।
बस बम 1वम घनीमिह की अावाज पनी पर चनता
वोभित बायु पर तरती हुई आई । उस समय माता ममूर म स क करा
को बीनता हुई ऐसो मुना म वठी रही जस कि वह सिद्धाथ हो ना
पिना रात के बुर सपन 4 वार म चिंतित है।
कभी-कभी वह ऊपर दम तेती और अपना बड़ी बड़ी आसा स
पडा नीच काम करत पुस्प और स्त्रिया का अपना कल्पना में उता
रती । उम थारी योडी ममम ग्राती कि यह मब उसके पिता की गति
और उदारता का परिणाम है फिर भी उस य म जो उह और
नछमन का हरिजना म अजग करता था उस लगा जसे नछमन और
व दाना ही बुरे हैं और उस झरमुट गे गाति म उमे यह भी आभास
हाता कि आग तगान वाला और मकनिए पत्थर तोडने वाता की
धा-क्तिया म क्तिना विराध है। यही कारण है कि उस पिना
चिल्ला पडे थ- बस ' वस बस-उमद भाई और उनके बीच म।
बापू को प्रावाज स उमका अतरात्मा कॉप उठी थी और उसकी
दरियों का अस्तित्व वजित विचारा स रट गया। उमन मन म प्राया
का कि भविष्य म वा प्राग वह चिल्लाना माती-गलौज और धम
पिया न भगा।
।
और अपने हाथ के काम स भटकर उसने सोचा कि वह 'उनकी
मोर कभी भी न दस सरेगी क्यापि दे तो शोध और मिथ्याभिमान
मठोरतम हा गए हैं।
वह अपने माथे पर घर ठीक करन के लिए रवी और फिर अपनी
द बीनन म लग गई । उमने सोचा कि धूघट गिराकर उसन अपन
और उस आदमी के बीच जिसम उमका विवाह होना था एक दीवार
-
अपन पिता की सराहना की भावना से उसन मन-ही मन म बम ।
वर। वर वा और फिर उसने अपनी प्रायो स परे उस प्रभा
पो देखा जो उसन अपन और उनए वीच मडानिया था।
अचानक एर स्वप्न न जा उसन पिछी रात का दसा था मताना
सुपर दिया । उस याद पाया कि स्वप्न में यह पाना माग रही
थोगही जस वि वह जब यच्ची थी प्यास होने ६ समय मांगनी
थी। मां दूर तक भी रिवाइ न देता थी । दस वा यौहें फ्ला। उस
गर लगान का यह हुए थे । उमन अपने हाथ पानी व नि ना पर
उन्नि पानी न दिया वल्लि चुवन की कामना की और वह प्यान म
मर गी गई-~-एर भोर पानी के लिए मुह व नीच हाथ लगाए जब
पिका पाए और उहाने उमा गिर स दुपट्टा हागिया।
सजा की महज भावना म स्वप्न के बीतन ने इतनी दर वा भी
उमन मुह पर घूघट पिर हार रिया जमे वह कह रहा हो-नहीं
नहीं
उग यह भी यह पाया कि स्वप्न म बिजतीन प्रकार को
चीर दिया था। उसन दिसी भी वस्तु स चिपटन के लिए अपना हाय
तालिया था और प्रापिर एव पड को पकट निमा था।
1
सोलह गकुरसिंह क गरीर का तापमान ग्रीष्म ऋतु के मध्यकाल और गाव का तनाव की स्थिति से भी ऊपर उठ गया । उस तज बुसार हा गया। अपन वर के माथ चार जाने पर उसे सतह हुआ कि शायद वह स्वय ही वडा जिद्दी रहा है । पर इश्वर न जो जसा ह उस वमा ही बनाया था इसलिए वह कम स्नाकारकर न कि नाच जानि वान चमार सुजातीय रिटमा क समान है । वह चिरकान म अपन विश्वस्त सत्य को पक्डे था। उसन अपनी या मा को उत्तर दिया कि पोरियो म उसक पूरज क्म म विग्वाम करते चले आए है—कम वह तो पिटत जमा के कर्मों के फ7 अनुसार इस जम का निणाया है। वह काप उठा जम वह बफ की तरह ठना है चारे उगका गरीर सतना गम था जितना कि गणसिंह लुहार + कारमान वी का जनता हुई ना की सतास । यह सब इस कारण स था कि देश्वर के काप वा भय उमकी एक साम को आ दवोचता ता सरकार का यातक दूसरो को । पर जा तराजू उसने अपनी कल्पना को आखा के मामन नटका रखी थी उमम यह पाता उस चिता व वाम स हल्ली थी जा उमगो मरपच या पाच पामिया का सभा का प्रधान पद छिन जान स थी। उमा मामन दो माग थ। उनम स एप सही माग चुनन की समस्या उन मव पनाडियो म मूत हा उटी जिनम चमार नहर पथर ना रहे थे और दूर क्षितिज पार दहना गर को जान वानी मय फ्ता दिखाई देता था। फिर यति यह बात सच था जस कि बच्चो न उसे बताया कि पडित मूरजमना बरदार म मिनन गए 4 ता का भी मनुष्य बिना प्राणा मग विए ता म धम पटन की घटना का सुन नहा माता और यति उमकी स्त्री का खबर कि पुराहित न चमार नडबा म प्राम लकर खाए मच १०६ है ता पृथ्वा का फ्यर पुर गांव का निगल जाना चाहिए क्यापि इमा प्रय ता यह हुआ नि त्रियुग पा हा गया । इन सब विचारा न ठाकुर मिह का चकग रिया जम कि यह रहाा हान वाना हा । उमन परपाट म वचन वे जिस पर मार लिया । उम पसाना मान लगा। वह हैगन था वि हा क्षण उमा गर्मी और ठप क्या वापू नहा नहा। उमकी स्त्री ने मणा हाय छाछ का गिलाम भा का तरह भन गिया। उमन हाय मिनावर स स्पष्ट भाव म दूर हाया और मूय क प्रकाश पाभनय म अपन प्राप का बचान लिए प्रायें वद रो। तुम्गरा मिर दया दू क्या ? ~~-हत्री ने पिता पर भक्त हुए यहा। जा अपना सामवर।-उमन बमरा स उतर लिया । नहाटा म निव तन निरन उगका चहा पीता पड़ गया और उमवा मा चमक उग जग कि गम-गम ग्रास रिजा यो करें प्रधाना पूर पहा हा ! और नमन आवाज बुर पा-धूढा य निरार धाराना और पणा जोम और मदिरा-पान १ विपद वह चिल्ला पग- तुम गवना मौत मा जाय। भगवता न यात वाटन हरी पहा हाय ई-वर प्रकापम दरो। एमागमी गालियां + रह हो। ग्यमणा यापू पा गिर दान के लिए जरा टहरा रहा-~-मा ममिवा घतावनी व वा य? यापू ढीला पड़ जाएगा। मदिन यापून बराम१ गिर पर महा मफ्नो स्त्री वा पार दर परपरता मे पहा 'उग सतान स जिसका इतन वट मर पाता है और क्या भाग हा गरती है। यह भी हम हा एस छोड जाएगा जम नि यह ,
छाड गया है।
भगवता बोली- नहकी तो घर म पाहुनी होती है ।
उमने कहा- पगती माता पिता सतान दूमरो के लिए नहीं पारत
बल्कि इसलिए कि वह उनको बुटाप म सवा कर । --और वह एक
वीमार गर का तरह पाडा स ऐंठ गया और कराहता हुआ पीठ वल
लट गया।
स्क्मणी बूटे वापू को उस समय की मसता भनी भांति समझती
थी और उम उमको 'प्या स उत्पन हुई भयानक व्याकुलता स घणा
था। यहा तो उसकी पीडा का कारण था।
अभी उसन लटवर एक क्षण हा पाराम दिया था कि उमन मन
म बडवाहट को नहर फिर उपर आ गइ और वह साचन नगा कि
यहा तक नौवत पहुँच गई है कि स्वय उसकी स्त्रा उसकी वात कार
रही है। उसन अपन अाप का कुहनिया पर उठाया सूस मुह म स
चौक म बनगम थूका और फिर चिल्लाकर बाना-
ना मरा हुक्या ना । जानवरा वा चारा तो डाल दिया होगा?
रकमणा वापू के अचानक हिन्मर यवहार को दस अनि या मे
काप उठा और ट्विास के लिए मा की और दखने लगी।
भगवता न निराश स्वर म नटकी से कहा- दनक हुवा की
चितम तापा।
ठाकुरसिंह का इस बात पर क्रोध या गया कि उसका स्वा न उम
को मीधा उत्तर न दिया । वह उठकर बहन नगा--
मारी दुनिया मरे सिताफा गई है । जा बीज मैन बाया था
उमस जहान पोधे हा फू है। यह मर रमलिए हुमा कि उनका वर
का कार भय नही । पर न्हें एक न एक दिन भगवान दार दगा-
अवय । एक धमपरायण मनुष्य का पाप है तुम सब पर । जस ग्राह्मण
पर जा एक जगह बना है और दूसरा जगह मूनता है । उम मर कर
सजनू पर भा। और का तुम दाना मा विधवा हो जामो । कुत्त
? - मूमर रही है । वहाँ है वे सद मा विराग के प्रादमी-रामनिवाम, श्यागम गतराज और ते रम रापपूर्ण करन बाद वह एक हुक्का पान वार का खासी के र म उलझ गया रिम बीच-बीच म उम बरगम यवना पडा। फिर वह ट गया-~~प्रपन गरीर या गर्मी और पमान मायपथ । मन ही मन गानियाँ और अस्पष्ट 7 वोरता रहा में अब ना हा रह गया ह इन मर म सहन का लागवर । विन अबना। भागबनी नी सोम लसर कहा- पग्मवर हम पर प्यार मावाद वह पीतन दनना का सब स माप करने गा जिमग य अपन रागा पति के लिए लाल बावन वा पननामा खिचहा बनान का तयार हो गई। पनि पूजा सजन और रखमणा व पिना र प्रति वफादारीम पर उम अपनी प्रतडिया म विचार-मा महमूम हुअा। उप पर म गया था जा उसा करपा वादन का तरह घिर प्रा । इमन Tय या पार दृष्टि डा पर मय निरयव--यादि उम अपन बर को वर नजरमप्राद। उग इगम रादह था कि मजन न पना द्वारा प्रति दिन का तरह पी ली थावान उग पिए मृत मुन म राटा पराएगा पना नया दि उमर पाम एष माप पानी और कमाज मा है या नग-महान व वा परनन व दिए । निचय हा मजिसका अपन वो तर हा दम गप करेगा क्योंदि जितना पाचपर धूमिह को म्या कर मरनो या यह सजन और माता का जोहा बनाए ग्यगा--- भगवता का यही विचार था। सरिन उगम पर जीम पर मावान नाम की रट या पौर उमस में थी रमणा व भविष्य का चिता---उमा वह मार रहा यो वि क्या कभी उगा पति--- १-म यह भा मापिर यथा हागा
जिसके नाक कान पांसें और जवान मवरे प्राग जगन चक है-
कभी भोठी छाछ पी मकेगा और रक्मणा का हाथ लरमन के हाथ
में देगा? छमन वह जी अपने पिता म जाकर मिन गया जबकि
उमन सजन पिता का अंत तक माथ दन का वचन दिया था। यही
नही सजनू को भी दूसरे दन म वहकार ल गया ।
भगवता भावाय दृष्टि से एसे मोचती रहा तम वह अपर
वो एक मुर्गी हा और उमका चेहरा चिंता का एक्-पर एक जमी परत
के कारण पीना पड गया । उस ग्रान वानी पर अनजान विपत्तिया का
गम खाएं जा रहा था। उमर हाथ यात्रिक रूप स वतना पर चन रह
थ और उगनिया स गप चर चर होकर गिर रहा थी। उसकी आँखा
म सार पासुमा को क्टवाट जो घुन गई थी।
मासिर उमकी त्वचा न अनमनियम की अतरात्मा का स्पा विमा।
वह मुडी और पाम म वठी रवमणो की उपस्थिति के प्रति चतन हा
गई । स्वमणा खोय-सी थी और छाछ का भरा गिनाम वस का
वसा वराम व मान म रखा था । सूर्य की किरणें उमर चहर पर
गिर रहा थी जिमम उमका माफ गहुँप्रा रग काना पड गया-जम
उम पर गेट पर गए हा या नम उसके जम अधिष्ठाता दर मगर
का अनिष्टमय आमा का धाया मा चेहरे पर अपना पूरा प्रभाव दान
रहा हो।
जा और जानवरा वा रखवानीकर -भगवती ने उमस चीन
कर वहा । वरना वापू चिलाएगा।
स्वमणी तमार म पायमान युवा दक्ष का तरह एक तान में
प्रनम्प मा धर उधर लिन गा! पिर उसन अपना वाहा को हिला
डुनाकर कमीज को टोक टार किया और पापा क कटघरे की पार
चन दी । उमा सिर मन का वेन्ना के भार स भुका था।
अपना वटी के गम म मक चहर का दखकर भगवता को स्वामा
११२ विद भाव मे भगवान का नाम स्मरण हो पाया। अव उसे यह सलेह हुआ कि कही वह पिछले महीना म मगलवार को तन देना तो नहा भूल गई और तव पडित मूरजमना का मरे पति का छोड जाने का अधम काय उसी मगनदेव की आत्मा को प्ररणा होगा। उस उमको मना का उचित दड पिया गया है गायर इन पूजा सववी स्मतिया में डूबे हुए उसे अचानन याट हा पाया नि रमणा की ज म पत्रा नो अपाना से भरी हर्ट यो और निश्चय ही यह पत्री नछमन को पत्री स न मिना थी । अनिष्ट की पाका म दबी और अमरय दर और दावा कापन मामन मूत हाते हुए रखता हुई भगवती माचा कि यदि वह एक चमगे की पति चा उसे चमारा म बांट पाए तो एक बार उसक पनि वा राप जाता रहेगा और दूसरी ओर गायद र नागा के मध्य जा धम या मानते हैं और जो अपन क्मा वा पन भोग रह है सम्भावना उत्पन हा जाय । निश्चय ही धम ने अनुमार नीची जाति व नाग दरिद्र नारायण हैं-भगवान + frम्नतम अवतार जिनम रवी तत्व तो हैं पर जिह अनगिनत पापिर और मानवीय प य चाा पारन पटत है- इगर्ग पहन कि वे पूर्णता का प्रान भाग मक और मवण और मुजा ताय हिंदु वन मरें। उम अब यह पियाम-मा हा गया कि पति सूरज मना भी पता पी आर इतिए चने गए क्यानि वह भी अपन प्यारयान म चमाराया वर वा-निम्नम्तर का महोग्र-वतार बतात थ-देयात्मा पी वस्त्र की गरम निम्न काटि की दुनापट । क्या न यह सभा ही भल्ह पर पिचड़ी चार मरि घनी गाय बकरा पी पति से पहले की आवश्यक पूजा तो कर मवगी वह । वह पपन परावे वन जल्ली से गरी हा गइ । मिट्टो व वतन को जिमम दाल-चावर बरे पर परा और गाय-साय ईश्वर है। ईपर परमात्मन् । बहता रहो ।
सत्रह
पर समणा + परा का चाप सुा डसरन लग। नडा न विगान
काय दिट्ट और मिट्ठ वनो की पीठ का कोमलता से थपथपाया और उमी
समय गाय पावता को भी गन नाचे स आवाज लगा दी । दम पर
पावता वट न रम्मा का योचा और स्क्मणी का पार अपना गिर
जार स उठाया। वर वच्च को तरह रा रहा था। रमणा वह 4
पाम गर और उमा नार का हल्क स मना । उमन दसा बटर की
पाखें अधेर म दीप मी चमक रही थीं।
बद्धा गाय और बन सब अब एक साथ रभान ग । व स्क्मणा के
प्यार का प्राप्त करा लिए आपस म हार रहे थे और मत वी
पार छाड जान का बचन य । मनिए वह उनम स ह सक
ऊपर जाम का कुडमुडाटह की आवाज म वात्री।
मा ग्वान का जा टन मागिया का बाहर न जाता था पान म
दर हा गया क्यापि बाहर सूय पापी चर चुका था। उसने साचा नि
यह पशुमा व सालन का और वार रहन का अदा बहाना है-
-उग
ममय तक जब तक कि वह ढारा का महा का न सौंप द।
पनि ढारा टवारन और उमा उत्तर स दूर उम पता था कि
उनका मादा का पुतिया खुनता थी और वर हाता थी। उगर हाट
पर रह य और उमका राम राम प्रान हान वाल पति का मन की
र"छा म उक्ति था।
अवेर म उम मतिभम म जा उसका टक्टकी गावर दस रहा था
उमे गा जमे 'वो उमको पार देख रहे है---उस अनाज की वानी पर मे जो कि उमकी पार नहरा रही थी और उमके लिए उनका चाह का मदे ला रही थी। उस यार आया कि राधा और कृष्ण के युग म कद कवियों न एव पडकी की कहानी को गीता म कहा है जो अपन प्रमी ग मिलन बाहर जाता है। उन्होंने माग व खतरा का वर्णन किया बिजली की कटक जिमने नटर व हृदय को टक्ड टक्कर दिया और चमकन वाना विद्युत की धारिया जो उमको मापा की तरह पार-उन मवरा । लकिन यह भा उहान कहा कि यदि वह नवी इन सब अग्नि पराभाया म पार उतर जातीता स्वग मा उमा प्रम की शक्ति के प्राग भूब जाता और उस प्रभाट प्रमा का दवता उगा पाम त पात । गात वी प्रतिछाया उस कुएं को पार याच रही थो-जम जादू भरी वामुरी की पुवार उमय गरीर का वुना रहा हा जमे हा य मराचिका रचित दृश्य उसकी पापा म ह उमका वायुगेन पशु-ग्रह म होम की मुगध प्राइ और वह वहात हान नगा। वह अपन प्रापका चेतनाहीन हान स वचान के लिए नीच वर गइ । पमीन मानिया विद उसकी पतता नार और माथ पर भगवन ग और उसने अपन दुपट्ट ये पल्त से अपना चेहरा गाफ पिया-जार जार ग सौम न हुए क्यापि वपना व पखा को उडान एव यात था और पृप्पा को ययायता जिग पर यह यटी थी दूमगे। उम मामन था मिहरिया का नाद वागतायें जिनग उम एमा गा-जम वह पिजर उगता चोरी गवाहर निाना हागा यति यह योगदर के लिए भी पर का मनहमियत म रट्याग चाहती है। इगप लिए माहम की प्राव यपता है।--उमन मोचा। गमणी न अपनाता का बटक्टाया मोर उबर बटन की मोची यह जानो यो कि जमे हा यह या माहिती दार फिर मारेंगे और अपनी पिननियाँ दोहगएँगे और उगा मा उनसे शिकायत मुनगा।
इसलिए वह नि'चा रहा। क्वर अपना अाखा म गना म उतरत
हुए ढारा के उत्सुर वदमा की कल्पना करती रहा जो महाक चिल्लान
की भा परवाह नहा करत जब तर कि सता का निजनता म व मर
गति से प्रविष्ठ न हो जाए और दनात की गीतनता को पार न चन
दें। वर पड सीग वा 7 ऊचे हिगार व वर सिर उठाकर कम धाम की
चरागाह की पार चल दिए। गाय और वर- गानाकर रह व पीर
प्रातमिया का घुटी घटी आवाजें जा विसी दिन स दिल की बातचात
की सुगर देती थी सुना दरही था।
रुतमणी को आत्मा उसको यका जवान के माध्यम म चिना
उटी-
क्या? आमिर क्या-मों को जाति को रतन विप अधिरार
प्राप्त है?
-
टमा बाट फिर वह गाति की चेतनाहीन अवस्था म तान हा गइ
और उमा मिर उसकी गोट म डूब गया ।
नहीं । नहा गम-गम घाम का मोत वायू उमा निरा न था।
वह ता घर के चौक म काम करन के लिए Tमा थी। पवन कुए में
पाना नान लिए--वह भी उमी गता म म जहाँ वह रतन माता से
रहती पा है । पर गाय- यनि मा दयाराम की वटी सुमिया और
क्सिान रामनिवास को नया दववी आ जाता ता व सब रात हान व
बाट मता का पार जा मक्ती था। तब वह कूह मटकाती हुई मच
रता हर चना नाता या अपनी सगिया बचचर परा की चान स
चार मिनाक रमता स भागती। और व हर एक मव टर्रान को
आवाज सुनन व भय स या जगनूमा का बार-बार चमक कादप चाप
पडनी । जव एक-दूमर हाया म बघर दौडता ता हमारट्टा करता
चरती और व सब तब तक स्वतत्र था जब तक कि उनकी माए
उर पाच स न पुरारती और कहता कि व सता में बहुत दूर न भटर
जाएं। पर वह जिम समय यह सव साच रहा यो अचाना उस भारी
भारी वदमा की आवाज सुनाई दा। उमन देखा कि महा एक विगर हुए सा' का तरह अदर आ गया और उमन ढोरा वा खाल दिया और जस ही वह वापिम जान को मुडा उसकी नज़र रवमणा पर पड गई । उमन वा- अरी जादूगरना रुक्मणी ' तुझ वाल लटकाए वठ देखा तो मैं दर गया । चल सिमर यहाँ स । क्या यहा वठार चाट देवन व मिया तुझ कुछ और काम नहीं है?
दि बापू
प्रठारह
मैं
सुनता हूँ
बीमार हैं।
--मजनू न अपन पिता के चौर म पर रखत हुए कहा ।
स्वमणा न मिर हिला दिया ।
सजनू वरामद में अपने पिता का घुर्राट त हुए सोन दबकर पजा
पर चनन लगा और चकाचौंध स अधा मा हारर अपना मां का टटा
जन नगा।
बमणी न उसकी मन की बात जानन हुए कहा- वह तो मदिर
गई है।
जिम दरवाज को मजनू खुना घाट अाया था उसम हारर गम तू
का एक या अटर पा गया और बमणा ने साचा वि उमा भाइ
का प्रवन्य प्याम नगी होगा। टमनिए उसन पीतन की थाली में भाग
गूधना बदार अपने हाथ धोए और नक्डी की रई स सस लिए दही
विनोना गुरवर दिया।
सजन क्व म घर वापिम लौटना चाहता था। उमने चारा तरफ गया
और फिर निराशा होकर बठ गया। कोई उमक मन की बात मुनन का
न था चाह उमना अपना जो या कि वह घटा वस वान हा करता
जाय । मगा का तरह उमन अपनी बहिन को ट्मक याग्य न समभा
क्यापि उमक विचार म वह पुष्पा क सार वारतापूर्ण कार्यों और साग
गह्म नावाना का वर्गममा सरना मा?
वमान अपन भाई का ना गायावा बारामदया। वह
म पदाम दुवा दिना निया शायद उम अग्नि परीक्षा ने जिमम म यह गुजरा है उसु पवित्रा दिया है-रकमणी न सावा। 'क्या वापू का तबियन बहुन बराव है ? उमन जरा भारा पात्रान म पूछा। उम उपार चला है। -डका न उत्तर दिया। पच्या-वह अव परत म टाव हा जाएगा अगर उस पना वर जाय कि मैं पिम मा गया। मैं उन मरवा मला नि छार पाया हूँ। मजनू की पावाज म गुम्मा या पार विमणी का जाय साचता था कि वरदान गया है उम ममय का मजनू पहन दा? मनन म मिनल गाम मल्यूम या परावरी~दा नहीं। मजन वाना-- गाव मता विराजत है और नीष जानि सता म रटत * ! मैंन दावि जिनता पाम हम परत हैं उसका मज दूग या कम है। तामिह का ता गया की जात है और वह भा पाना मनगर गापा वरन त्रि। पिन बिमणी वग यह जानना चाहना या दिग्पर बा भा* व गाय और पाए हैं या नहीं। गगन अपनी बहिन । मन 47 विचारा का गाना म ममम जापा।उमन देश- व मदद गय गधे और उन्हैं। यह विना विमा मगर बार वो मया वरत र मदत है पर हमारा पागन नहीं जिमन भार तर विमा व प्राग मिर नर्गमवाया। मजनू में चला ग न पिता का प्रचानर गारिया। भ रमाउन लिपा- मैं = वा मजनू । वहा और चार पापाग द्वारा माया। गन ? शिना न न नुस् १२० भगवान | तुझे वही उम्र रे ग । -गकुरमिह न बठ हुए गल स कहा । फिर वह पांमा बाम थूका और य कहता हुया' पोछ लट गया- तो तुम नौट पाए। वापू व ता छनकर रह हैं। पत्यग व तान्न की मजदूरा यन्त थानी है। वटा-मैं ता जानता - वि वा चार धूतामिह ता औरा का दौलत बन पर राजा बना है। टाकुरमिह न कहना शुरू किया और कहता रहा- वटा यह मरकार ता नाच नागा की है न कि म जमादाग का। मारा दती गर म वे और करत क्या है ? विधान पर बम और कम हरिजना की ऊची जाति वाला म रक्षा की जाय । पल जमान म रत म और ढाबो म बातचात हाती थी-वपा मून और याम यार म । पर आज य नाचा जाति के लोग घमप- म पूने और जम्हाई त हुए वर रहन है क्यावि म वर कलियुग म मनुष्य न ई वर म वि वाम रखत है न अपन स ऊच जागा म । अछा हुमा उना घर दवी प्रकाप स जनकर राख हो गए। अब एक रिन सार चमारा और जाति बिहीना पर बिजली टूट परगा। वटा तून ठार किया। आग म मे बचकर निकन पाना प्रामान है । पर दुष्टता म बचकर भागना मुरित है। रतन म भगवती मा गर्न। घर म घमत हा मजन या दप घर चिल्ला पग- यः क्रता वह तेजी से काम बार सजन की पार भागा। वर न मा परा का धून ती और उमर चरण पक्ड पिए | पर भगवती प्रपन पति व पतंग किनार बठ गर और रोन मरावटा. गी।
'बारा की तरह मैं-मैं मतकर । यह तो उन दुप्टा स पिंड छुडा
कर पाया है। ठाकुरमिह न डाँटते हुए कहा ।
उमन कहा- मैं ता सुगी व प्रामू रा रहा हूँ। और वह
रापढी।
मां 1 ~-मजनू न दिलासा दिया। मां-बाप और बर ३ बाचम
बहता हुई थम महानुभूति की गगा को धारा का दम रुक्मणी की प्रति
मा प्रामुमो स भीग गई।
जस हा रुक्मणी न अपन आपका सभाला उस माँ न चिल्लाकर
कहा-
'इम टाछ द द । तुझे क्या हुप्रा रा?
गाय यह लछमन ६ लिए रो रहा है। मजनू वाला।
जर तर मैं जिलद वह इसका न व्याह सरगा।'
रमणा बडी सावधानी से भाग पाइ उमरे शों पर दिटका
और फिर दाद का गिलासर लिया। किन अव उसके पर लवडा
गए और वह टूर-सी गर्द। उसने अपने सिर को और अपना मिक्यिा
का अपनी मां को गाम शुपा लिया।
पर
अतिम भिक्यु के दोनो गातो पर गम गम 7 थप्पड मार रही थी। बिल्कुन वस हा जस उसकी मा उसका जब वह छोटा बच्चा था अक्मर मारता थी। लेकिन वह पत्यरों के आखिरी ढर को तोडन पर डटा था। उन पत्थरा का जिनको वडे पेट का धुआँ छोडन वाला गज कायी इजन सडक के रपम बटन रहा था। वटे तो ममतापूण और कुरबानीकर देन वाने होत हैं और उह जमा कहा जाय मान त हैं। नक्ष्मी न अपनी फम की भापडी के पास टोकरी बनाते बनाते अपनी बात को दोहराते हुए कहा। और फिर तग तो ऐसा नाम है जिस पर बट्टा नही लगना चाहिए ।हम जमीदार क सेवक हैं और अब अगर उसन तुझे बुनाया है तो तुझे जाना चाहिए। पत्थरी व वड-चड ढर पर वठा हुआ मि तु योडे को एक कम से चला रहा था। उस उदान वानी छोटी छाला कडिया की कोई चिंता न थी क्यादि पिछले दिना म उमन सफाई म पत्थर तोडन की बना म दक्षता प्राप्तकर ना थी। बस वह अपनी मां के दावे जहरीने विच्या स दूर भागना चाहता था और माथ-साय मई के मूय की भयानक अग्नि से जो कि उसका खापडी की सात वा भस्मार रही यी-क्यादि कीवर व पह और उमत्री पगी की भीनी छाया उमी रक्षान पर मक्ती थी। हमारी इन्जत और भनाइ इन ऊची जाति वाला पर निमर है।
मां न शिर उमाया। हम केवल धूलीसिंह स हा अन्वे सबध नहीं
रखन हैं दधि जमादार ठाकुरमिह स ना रखने हैं।
मिक्खु न धूल और बलगम म भरा गम सास अदर सोचा और
फिर गस्त व गढे म अपनी भावनामा का विप उगल दिया । फिर भा
क्डवाहर का पाप वचा रहा और उमन कना-
लाग हो यह वही वि तु न सिप लवरदार घुलासिंह का
रखल हो बल्कि मरपच ठाकुरसिंह की भी।
भिक्षु भगवान तुझ ऐम ग बन पर मोत दे। तू कभा न
पनप। मां बोली।
भिक्खु उठा अपनी कमीज दी धूल भाडी और उम बड पत्थर को
हान लगा जिम वह ताडना चाह रहा था।
प्रगत ढर स दमरथ ने पुकारा-
अरे तू तो सत्मार चुका । मुझे पोछे मन छोड जाना । मैं तरे
माय पा रहा है।
प्रो भिक्षु ! और मैं भी आ रहा है। बाबू भी चिल्लाया--
मुहम पिचकारी छोडन की मी आवाज करत हुए ।
भंग शिवम न बीच म बात काटी-लेकिन अभी तो दिन रुपन
म एक पटा बाकी है।
जवाहर लाल का नाम सामौर वाम करत जानो) भिक्षु न
जवाब दिया और इस पवित्र वाक्य म भर जोगमाय उसन अपने
सामने व परयर को उठाया और उम वहां से दूर फेंक दिया । वह उम
स्थान स जरा परे गिरा जहां उसको हासना था इमलिए उमने पथर
का प्रपन छान और गांठ पड़ी हपलिया से हिलाकर ठीक क्यिा । फिर
वह बठ गया अपने हापा पर थूका हयौडा उठाया और अपन वाम पर
लग गया।
एर राम उसन मूय वो पनी धुध म से गुहगवि को भोर देवा ।
गुहगांवा जिमम परे धो देहली-सात मिट्टी को भूमि का यमुना के
किनारे बसा मगर। अगर तू अपना धम त्यागेगा तो तुझ पर ईश्वर का प्रकोप गिरेगा। लक्ष्मी ने हारकर कहा । एक ऐसी मुर्गी की तरह-जो अपने बच्चे का चोच मारकर विवा करने का प्रयत्न करे कि वह दाना तलाश करे और आस-पास कुछ भी न हो । नगी रेतीली मिट्टी पर अपनी मां से परे बठे हुए उसने उसके गानों की गूज अपने कानो म सुनी और वह झझला पडा । उम लगा कि क्रोध की चिनगारियाँ उसके शरीर से उठ रही हैं। कहत कबीर सुनो भई साधो --उसने अपने मह म गुनगुनाना शुरू कर दिया पर उसने नय को आगे न बढाया। बस गुनगुनाने से उसम और जोश पा गया और उसने पत्थर पर और ज्यादा जोर से चोट लगाई। वाह वाह । वह स्वय ही अपनी अधूरी तय पर हसा । वहाँ बठे-वठे उसे यह भी महसूस हुआ कि पत्थर उसके गुस्से मे अधिक और उसकी श्रद्धा से कम प्रभावित हो रहा है और आत्मसमपण कर रहा है। उसी समय इजीनियर तुलसी के इजन की सीटी सुनाई दी तो उसका चेहरा गव से चमक उठा । आखिर सडक बन गई और सरपच ठाकुरसिंह न भी शायद समझ लिया है कि प्रत भी उतना अछा कामकर सक्ते है जितना कि सुजातीय हिंदू । उन लोगा का जीवन जिनके घर जना दिए गए ये सेता म-उन्ही के खेता म-बनाई हुइ नई फूस की भोंपनियो में प्रगडाई ल रहा था। बच्च चीख रहे थे और मामा का खान के लिए राकर बुना रहे थे। दूसरी ओर प्रौरता के गीता की कोमल लय उन हयोडो की सनसन म सो जाती जो सहक के लिए पत्यरा की काया पनकर रह थे। और धक धक करती मगीन की चीखें और सीटियां एक रेलवे इजन के निमत्रण जसो सुनन वाल का दूर-वही दूर-जाने का मदा देती । कहत कबीर । उसन फिर वाम म बोला का प्रयत्न किया १२५ पर उसके गुप्क मुह से काई श्वाम न निकला। उसकी खापडी विचारां को चाट स इतनी तजी स टुक्डे-टुकडे हो रही थी जितना कि पत्थर की पारमा भी नहीं । उमने पत्थर के सिरे पर हयोड को हाशियारी से टिकाया उसक किनारा में पटाव वा दखा और समझ गया कि इसका प्राकृतिक Fप ता अपने प्रतिम क्षणा म है। फिर उसने उसे पलटा प्रोर एक धारी पर पार-पार घोट मारी। कुछ चाटें और और पत्थर न हथियार डान दिए। वह खड़ा हो गया हयाँड का जमीन पर डाल दिया गौर अपने पांच पुर छ इन्च र द फलाव म पल गया। अब वह गोवरधन तक या सौ हाथ का फासला तय करने लगा। भिक्षु प्रो भिकायु । -बाबू न उसके पीछे पुकारा। लक्नि भिषावु गम, रेतीली और रगिस्तानी मिट्टी पर जो सता वर्णित जनत हुए नरक को धरातन की तरह पी-भागा जा रहा था। उसने सोचा यदि यम के राय को काई पारकर लता गावरधन का मामा पर पहुँचता है। गावरपन-वह गांव जा देवताग्राम भी सब प्रेष्ठ देवता न बनाया था । उमका लहू रामान्च स बजने गा--मूख खून को कुछ ही ही तो बचा पी, जिस धन से उसका जीवन का जन जमीवार पर तब पहुँचन तर बनाना था। क्यापि सरपन्त्र न उगे युनाया है वह भी अपना बत्तव्य निभाएगा। वह जाएगा मौर उमम मिलगा और यह उसकी मां ने लिए माश्चय का कारण होगा। जमे हो वह छोटो गला व पास पहुँचा जिस किनारा पर बोट दार माडियों पी जो जमीर पर की रक्षाय बनाई गई थीं उस एक मास्मिर प्रत प्राणा हुई। वह उम यही हवेला म पानी भी मांग लगा मोरि वह तो मात्र इतना प्यासा था जितना पहले कभी न था। प्रगर बहाने पीन को पानी देरिया ता उस निश्रय हो जाएगा कि जमीदार ठाकुरसिंह का घर उसके प्रति कसा अनभव करता है-अब जब कि सडक लगभग पूरी बनकर तयार हा चुकी है। और फिर उम उस रकमणो के दान भी हो जाएगे जिसना गरार सूरजमुखा के फल की भाति था जिसकी उस बनी हवेती के पिछल भाग म सावधाना से रखवाती की जा रही थी भिक्खु नक्काशी किए हुए बड दरवाजे स जमीदार की हवला म घस गया। बड़ कमरे मकाई न था। उसने माचा भाग्य उसके साथ है। कहत कबीर सुनो | वह गुणगुनाने लगा जसे कि सन कवि के नाम नन से हो वह हर व्यक्ति में टक्कर लेन में समय हो जाएगा। कौन है वहा 7 फिर उसने दरवाज का कुडा खटखटाया और आवाज नगाई- ठाकुर्रासह जी । सरपन्च जो । मैं हूँ जिसस आप मिनना चाहते थे । --अदर की कोठरी से एक मारा भरवम आवाज पाई। मैं हू भिक्खु-हरिजन । -उसन उत्तर दिया । मुझ पान का पानी चाहिए । भिक्खु जान गया था कि रुक्मणी को माँ भगवता अटर में बोल रही थी। इमे कुछ पाना दे दा। -एक थकी पर सहानुभूति से भरा मरी आवाज ने कहा । अब भिक्षु समझ गया कि यह जमादार ठाकुर सिह का आवाज यो । फिर भिक्षु ने सुना आकुरसिंह कह रहा था-- बटा । मैं अभी पाया। रुक्मणा भातर का रमाइ को छाया म रख घडा का पार गई और पोतन का एक प्याना पानी से भरकर बड पमरे म तपाई। पिछ महाना म भिक्षु का कमा साहस न हुआ था कि जमोटार वा सत्का ६ चहा को एक नजर भी देख सा । उमन पोतन का प्याला ल लिया । व भू-मा गया कि वह क्या स्वीकारवर रहा है बल्लि उमन रुखमणी का पोर टकटकी लगाकर दवा । रसमणी भिक्षु को
उपस्थिति के प्रति सचेत थी। उसका सपाट चेहरा चहे. के पाम बठने
व कारण ताप स लाल था। उसने भिवस्तु को अपनी बरी-बडा भाषा
मरदाना, और जमे ही उसने पहचाना कि यह तो भिवातु है, वह गमा
गई और अपनी प्रांगा पर दुपट्ट का घूघट ग्बोच लिया।
उमो समय यादी मामन वाली कोठरा में से एक और मावाज
हम पीन का पानी चाहिए।' एवमणा न उत्तर दिया।
है!-भिक्षु चमार ? ~ठाकुरसिंह का लहका सजा दीडता
हमा प्राया और वाला। उस हाथ म ताग की बाजी थी।
और तुन इम पोतन क प्याले म पानी दे दिया। मूस वही की।
और उसन पककर मिक्क हाथ म पपई प्याल का ठार मार दी।
प्पाला उधनकर यहे कमरे म गिरा और उसका पानी प्रत
भिवातु + मुह पर सफा गया उस पर परिश्रम के बाद पमीना ।
तू पीनस का प्याला वमे छ यकता है ? क्या तुझे अपनी प्रीवात
वा कोई ध्यान नहीं।
मैं
मूर गया था ! भिक्षु न दव स्वर से उत्तर दिया ।
मजनू ने अपनी यहिन का डोटन हुए कहा-- क्या इमको पाप म
पानी नही बार सबनी थी तू
इतने म उसकी मां भी बारी से निकल भाई और कहा- हाय।
हम परयाद हो गए।
हम तो मारा पर गुद करना पडगा। -एजनू मातम करने
हए था। उमा समय पर म मजनू 4 मिन दयागमन चिल्लावर
पहा-मारा माल का जान से मारा हमको।
'योगया क्या मारिया है इनर मिग पाममान पर चढ़
गए हैं। रामनिवाम की मावाज सुनाई दी। पर मह बोला-
'भर ! मैंन इस पहाँ युनाया है। मैं इसमे बात पता चाहता हूँ।
१२८ 7 सजनू ने फिर कहा- ठहर जाप्रो-मैं बताता हूँ बापू का कि इसने क्या किया है । इसको तो गांव से मारकर भगा दिया जाएगा- पागल कुत्त की तरह ! प्याना दूपितकर दिया है। भिक्खु जो अब तक चुपचाप था उठ खडा हुअा। उसने अपन हाथ ऊपर उठा लिए । वह क्दम मजनू की ऊचाई तक उठ गया और उसे लगा कि वह तो जमीदार के लडके से उच्चतर है । उमन सजनू को सबोधितकर कहा- क्योकि तून अपनी जिंदगी में भी काम नहीं किया-तुझे क्या पता प्याम क्या हाती है ? उस क्षण भिक्षु का मन किया कि वह सजनू पर वरम पड । पर एक दम उसे याद हो पाया कि वह तो एक अहत है चमार है । उसन अपने आप को गाम लगा ली। देवा तुमने इस बदमाग को? गुस्ताखी देखी तुमने इसकी सजन अपने साथिया को सबोधितकर बोला। यह सुनना था कि भिक्षु फिर अपन पूरे कद को ऊचाई तर फल गया-इतना कि जमादार का बेटा भय से पीछ को दुबक गया। तब भिक्षु के मन न उसे ममझाया कि उस एक हाथ से वार करने से पहले ही पीछ लोट जाना चाहिए । उसने अपने क्टे हुए होठ पर से नहू का दाग पाछा और स्व छा से पीछे मुड गया। फिर वह अपना थक निगल गया और बड कमरे से बाहर निकल आया। उस समय उसके पाव अपने घर को पोर न ५ । वह सहज-बुद्धि से उस सडक की दिगा मे चल गिया जिसके बनान म उसका योगदान था । पर उसको प्रात्मा की गिा दूसरी ही थी। वह यी गांव के बाहर गुडगाँवें की और जहाँ से देहनी जान का रास्ता है । वही देहली जो हिंदुस्तान की राजधानी है । जहाँ काई नहीं जानता वह कौन है और जहाँ कोई न सुजातीय हैं न कोई जाति विहान प्रछूत । सव बरावर हैं ।
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