Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Jagran Ke Swar
Front matter
No text on this page.
जागरण के स्वर
(सेनयू काव्य संग्रह)
सिद्धेश्वर
साहित्य
पटेल
प्रकाशन
दिल्ली
सरदार पटेल साहित्य प्रकाशन
दिल्ली
समर्पण
उन सभी मनीषियो और महापुरुषों को, जिनकी विचारधाराएँ
व्यक्ति को आत्मचितन के लिए प्रेरित करती हैं,विवेक
का प्रकाश फैलाती हैं और वही आत्मचिंतन एवं
विवेक व्यक्ति को जीवन की वास्तविकता का
बोध कराता है, क्योकि जिंदगी महज एक
सपना नहीं, महज चाँदनी-सी शीतलता
नहीं, जो कभी धूल से अटी, कभी
ओस से पटी कच्ची-पक्की सड़क
से गुजरती, गिरती और संभलती है,
बल्कि वह भूख से बिलबिलाते
बच्चे का पेट भी है और ईंट
भट्ठों पे कडकडाती गर्मी
में ईटें ढोते मजदूरों
का पसीना
भी।
सिद्धेश्वर
स्वर जागरण के (सेनयू काव्य संग्रह) : कृतिकार : सिद्धेश्वर प्रकाशक सरदार पटेल साहित्य प्रकाशन, 'दृष्टि, यू. 207,शकरपुर, विकास मार्ग, दिल्ली-110 092. दूरभाष 011-22059410, 22530652 : सिद्धेश्वर E-mail sidheshwarprasad@hotmail com प्रथम संस्करण . वर्ष 2004 ई शब्द-सयोजन : सोलूसंस प्वायंट, 'दृष्टिः, यू 207, शकरपुर, विकास मार्ग, दिल्ली-110092. मुद्रक : बुकमैन प्रिन्टर्स, दिल्ली-110092 फोन : 30945590, 55257458 वितरक : सुधीर रजन 'दृष्टि, यू 207, शकरपुर, विकास मार्ग, दिल्ली-110092. दूरभाष 011-22059410, 22530652 मोबाइल 9811281443,9899238703 फैक्स 011-22530652 मूल्य 125 रुपए .. .. : .. Jagran Ke Swar: Sanryu poems by Sidheshwar Price Rs 125.00 संग्रह के संदर्भ में वर्ष 1998 ई मे प्रकाशित पतझर की साझ मेरा प्रथम हाइकु काव्य संग्रह था। फिर जापानी विधा हाइकु के ही दूसरे रूप सेनरयू में 'सुर नहीं सुरीले काव्य संकलन वर्ष 2004 आया और इसी वर्ष तीसरे पड़ाव पर है आपके हाथ 'जागरण के स्वर सेन्यू काव्य संग्रह। कर कहाँ और कैसे मिली मुझे प्रेरणा 'जागरण के स्वर में मनुष्य और उसकी कमजोरियो पर उभरी अपनी अनुभूतियो को शब्दों में बाँधने की इसे स्पष्ट करना मेरे लिए यहाँ लाजिमी है। यो तो मेरी पीढी तक मेरे परिवार के सभी सदस्य शुद्ध रूप से शाकाहारी रहे हैं और अहिंसा में सभी का विश्वास रहा है फिर भी भगवान महावीर व महात्मा गाँधी के बताए रास्ते अहिंसा पर अपने भाव व्यक्त करने का नशा मुझ पर तब चढा जय 16 एव 17 नवंबर 2002 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय विचार मच द्वारा वैचारिक क्राति को केंद्र मे रखकर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के सिलसिले मे डॉ. धर्मेंद्र नाथ अमन के सौजन्य से मैं मुनिश्री लोकप्रकाश लोकेश के सान्निध्य मे आया और अहिसा के बारे में मुझे कुछ और अधिक जानने का अवसर मिला। सच मानिए अहिंसा यात्रा के प्रवर्तक आचार्यश्री महाप्रज्ञ के विद्वान शिष्य मुनिश्री 'लोकेश जी की विलक्षण क्षमता और वक्तृत्व कला का जैसे मुझ पर जादू चढ गया। उनके आचरण, वेश-भूषा, सादगी और देश की वर्तमान समस्याओ पर उनके विचारों से मैं दिन-ब-दिन रू-ब-रू होता रहा। इस बीच राष्ट्रीय विचार मंच और राष्ट्रीय चेतना के वैचारिक उसके मुख-पत्र विचार दृष्टि' के उद्देश्यों को भी मैंने अणुव्रत आदोलन के अनुरूप पाया। मुनिश्री 'लोकेश जी तथा अणुव्रत महासमिति के अध्यक्ष प्रो धर्मेंद्रनाथ अमन के आमंत्रण पर अणुव्रत आदोलन के कई कट 'सयममय जीवन हो अथवा 'सुनो सुनो ये कहानी भगवान की.. ' गीतों को सुमधुर स्वर मे सुनकर मैं काफी अभिभूत हुआ। मुझे प्रसन्नता यह देख-सुनकर हुई कि जिस उद्देश्य को लेकर मच तथा पत्रिका के हम सभी सदस्य सक्रिय हैं उसे अणुव्रत महासमिति और अणुव्रत न्यास द्वारा भी मूर्त रूप दिया जा रहा है। इस प्रकार मैने देखा कि दोनो का लक्ष्य एक- वैचारिक क्राति का अलख जगाना। दोनों का मानना है कि वैचारिक क्राति के विना आचार क्राति संभव नहीं। फिर चल पडे उसी रास्ते, जिस पर चलकर देश व समाज की मौजूदा समस्याओ का समाधान सामने दिख रहा हो। इस सदर्भ मे यह उल्लेखनीय है कि आचार्यश्री तुलसी के द्वारा जीवन मे मूल्यो की प्रतिष्ठा के लिए प्रतिपादित अणुक्त आदोलन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए आचार्यश्री महाप्रज्ञ द्वारा वर्ष 2001-2006 की अवधि में अहिंसा यात्रा जारी है. जो मात्र एक पद-परिक्रमा ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की समस्याओ को समझने-समझाने का भी क्रम है। यह जन-जन की चेतना का एक प्रयास है। देश की सवेदनाओ को जगाने का अभियान है। आचार्यश्री महाप्रज्ञ का यह अभिक्रम निरंतर - जागरण के स्वर/ () गतिमान है। मुझे इस बात की खुशी है कि उनकी इस अहिसा यात्रा के दौरान सूरत में आयोजित चातुर्मास के सम्मेलन में अणुव्रत महासमिति के आमंत्रण पर मुझे भी हिस्सा लेने का अवसर मिला जिसमे 'अहिसक समाज की सरचना में लेखको की भूमिका विषय पर हुई संगोष्ठी की अध्यक्षता करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुझे लगा कि अहिसा यात्रा की इस पावन अवधि मे ही महावीर के दर्शन और अहिसा के सबंध उमड़ रहे अपने भावो को सेनरयू छंदो मे बाँध उसे एक काव्य-संग्रह मे सजोऊँ ताकि अणुव्रत आदोलन का मैं भी एक हिस्सा बन सकूँ। इसी का परिणाम है यह सग्रह 'जागरण के स्वर। भारत सहित पूरे विश्व मे तनाव, आतक, हिसा एव बर्वादी के चलते हो रही तबाही से पूरी मानव जाति को बचाने का आज एक ही रास्ता है कि हम लौट चले अहिसा की ओर। इसके लिए भगवान महावीर और महात्मा गाँधी के बताए रास्ते पर चलकर एक ओर जहाँ सयममय जीवन जीना होगा वहीं दूसरी ओर असत्य पर विजय पाने के लिए सघर्ष भी करना होगा, क्योकि अधकार के विरुद्ध संघर्ष भी जरूरी है। जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्रीयता और धर्म का भेदभाव न रखते हुए मनुष्य को भी सदाचार की ओर आकृष्ट कर बचाया जा सकता है। इसी प्रकार का प्रयास अणुव्रत आदोलन के माध्यम से आचार्यश्री तुलसी ने किया और आचार्यश्री महाप्रज्ञ अहिसा यात्रा द्वारा जन-जन मे यही सदेश पहुंचा रहे हैं। आज की भयावह परिस्थिति में नैतिक मूल्यो का विकास और अहिसक चेतना का जागरण जरूरी है। वैसे भी देशवासियो के समक्ष सदा से त्याग, सयम और सघर्ष का आदर्श रहा है। देश की आजादी भी तो हमने इसी के बल पर हासिल की। इसलिए मनुष्य के भीतर जो हिसा और असत्य भाव है उसकी सफाई करनी होगी, अहिसा के प्रति गहरी आस्था जगानी होगी क्योकि हिसा स्वयं तो एक समस्या है ही, साथ ही अनेक समस्याओं की जननी भी है। बापू ने कानून और कलम से काम करके अहिसक जीवन शैली का प्रयोग किया और सत्याग्रह के बल पर जनता मे राष्ट्र चेतना की भावना जगाई। उनके पूर्व भगवान महावीर ने हिसा के बीजो को जागृत करने का सदेश दिया। इस क्रम मे उन्होने इच्छाओ का सयम, पारिवारिक एव सामाजिक समस्याओ के मूल मे बैठे सयम का सहिष्णुता, उदारता, सहृदयता और त्याग-भावना को आधार माना। बल्कि सच तो यह है कि उनका व्यावहारिक जीवन समभाव और विषमता को दूर कर समता के भाव को प्रश्रय देता है। इसलिए उनका सदेश हर इसान, हर जमाने के लिए है। भगवान महावीर के इन्हीं भावो से प्रेरित होकर इस 'जागरण के स्वर मे “महावीर' एवं अहिसा' शीर्षकातर्गत उनके सदेशों को सजोया गया है। आजादी के बाद देश के समुचित सचालन के लिए जब हमने लोकतात्रिक ससदीय प्रणाली अपनाई तो लोकतत्र हमारी राजनीतिक व्यवस्था का मूल आधार हुआ। प्रारभ मे तकरीबन तीन दशक तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चला, पर उसके बाद त्रासदी पर त्रासदी आती गई। वास्तव में इस त्रासदी के मूल मे हमारे मूल्यो और चारित्रिक दृढता का हास ही सर्वोपरि है। आज जनता मे नेताओ की निष्ठा और जागरण के स्वर/M ईमानदारी के प्रति तरह-तरह की आशंकाएँ उठ रही हैं। जनता के प्रति उदासीनता दिखाना ससदीय प्रणाली के लिए घातक है। देश की राजनीतिक व्यवस्था अपनी वास्तविकता से विचलित है। इसकी खामियो को अपनी खुली आँखो से जन सामान्य आज देख रहा है। खेतो-खलिहानो की खुली हवा में सास लेनेवाले और सरहदों पर खून बहानेवाले जवानों सहित अन्य देश-वासियो को यह आभास है कि उन्हें अपनी रक्षा के लिए स्वतंत्रता की एक और लडाई लडनी होगी। मैंने इन देशवासियों की डबडबाई आँखो को देखने और समझने का प्रयास किया है और सेनयू की पंक्तियो मे अभिव्यक्त किया है। कारण कि आज के राजनीतिक एवं सामाजिक परिवेश से कोई भी सहृदय साहित्यकार सर्वथा तटस्थ होकर घटनाओ का मूकदर्शक बना नहीं रह सकता और नहीं तो अपनी कलम को तो तलवार बना ही सकता है। कलम के द्वारा जन-चेतना जागृत करने के लिए आज वैचारिक पहल जरूरी दिखता है। इस बीच अमेरिका और ब्रिटेन की गठबंधन सेना ने इराक पर हमला कर दिया। आरोप यह लगाया गया कि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अपने यहाँ जैविक व रासायनिक हथियार जमा कर रखे हैं। अमेरिका ने दुनिया को यह आश्वस्त करने की कोशिश की कि वह केवल सदाम की तानाशाही से इराक की जनता को मुक्त कराकर वहाँ लोकतत्र बहाल करना चाहता है। पर सच तो यह है कि एक ओर जहाँ वह इराक के अकूत तेल भण्डार पर कब्जा करना चाहता था तो दूसरी ओर दादागिरी की धौंस दिखाकर अपनी विस्तारवादी नीति को अमलीजामा पहनाना चाहता था और उसकी प्राथमिकता फिलहाल एशिया की उभरती हुई ताकतों को वश में करना था। जो हो, बुरे इरादो से लैस जॉर्ज बुश और टॉनी ब्लेयर ने इराक पर हमला कर उसे बुरी तरह नेस्तनाबूद करने का प्रयास किया और आश्चर्य तो यह कि पूरी दुनिया देखती रह गयी । गठबधन सेना इराक मे फैली अराजकता और लूटपाट की घटनाओं का मूकदर्शक बनी रही। उल्लेख्य है कि इराक मे न तो घातक रासायनिक और जैविक हथियारों का पता चल सका और न ही लोकतंत्र की बहाली हो पाई। हाँ, हजारो साल की अत्यत प्राचीन सभ्यता का विनाश जरूर हुआ और हजारो की संख्या मे निर्दोष और निहत्थे इराकी नागरिको की जाने गई। इसमे दो राय नहीं कि सद्दाम हुसैन एक क्रूर किस्म के तानाशाह थे, लेकिन क्या किसी तानाशाह को सत्ता से हटाने का एक मात्र तरीका उसके देश पर हमला बोलना ही होता है ? यदि हाँ, तो पाक के तानाशाह राष्ट्रपति परवेज मुशरफ की बारी कब आएगी? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब भारत को अमेरिका से पूछना चाहिए। इराक युद्ध की इन सारी घटनाओं को संग्रह के खाड़ी युद्ध' और 'आतंकवाद' शीर्षक की सेनरयू पक्तियो मे मैंने अपने शब्दों मे बाँधने की चेष्टा की है ताकि अमेरिका विरोधी भावनाओं का बेहतर प्रतिनिधित्व हो सके। एक बात और मैं अपने पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि मैंने अपने पिछले सेनरयू काव्य संग्रह 'सुर नहीं सुरीले में भी मानव जीवन की विद्रूपताओ को प्रमुखता दी है और व्यग्यात्मक शैली मे मनुष्य की कुरूप यथार्थताओं एवं कमजोरियों को प्रस्तुत किया है। हालाकि हाइकु के सशक्त हस्ताक्षर डॉ भगवतशरण अग्रवाल ने इसके पूर्व जागरण के स्वर/ (M के मेरे सेनयू काव्य-सग्रह सुर नहीं सुरीले की अपनी भूमिका में स्पष्ट सकेत दे रखा है कि हाइकु और सेनरयू के बीच पूर्णरूप से अभी विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती। पर पता नहीं क्यो, प्रकृति के चित्रण से अलग मानव जीवन की कमजोरियो पर चित्रित कविताओं को सेनरयू की कोटि मे रखने से मुझे आज भी कोई गुरेज नहीं। यही कारण है कि चिंतन सहित मानव की पीडा और संवेदना से भरपूर इस संग्रह को भी मैंने सेनयू काव्य-सग्रह कहा है। हॉ, डॉ. भगवतशरण अग्रवाल के संपादकत्व मे अहमदाबाद से प्रकाशित हाइकु त्रैमासिकी हाइकु भारती में प्रस्तुत डॉ. सुधा गुप्ता के नवीनतम हाइकु सग्रह 'धूप से गपशप की समीक्षा में डॉ. शैल रस्तोगी के इस विचार से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि मात्र हाइकु छंद की शर्ते पूरा करने से ही हाइकु कविताएँ उत्कृष्ट नहीं होती और न कोरी वर्णनात्मकता काय्य की परिधि मे आती हैं। अगर वह आती है तो कविता कहीं न कहीं से आहत अवश्य होती है। इस दृष्टि से 'जागरण के स्वर की सेनरयू रचनाओं मे उससे भरसक बचने का प्रयास किया गया है, किंतु हम कितना बच पाए हैं, यह तो समीक्षक ही बता सकते हैं। मैंने हाइकु एवं सेनरयू कविताओ के माध्यम से जीयन को अनेक रूपों में जीया है। प्राकृतिक छटाओं से लेकर खण्डित होते सामाजिक मूल्य-मर्यादाओं और मानदण्डों की विदूपता एवं आतंकवाद के साए मे पनपती विसंगतियों को सेन्यू की इन पंक्तियो के माध्यम से चित्रित करने की मैंने कोशिश की है पर मुझे नहीं मालूम कि संयदेनहीनता के इस दौर में हमारी इन रचनाओ के मूल मर्म को लोग कितना पहचान पाएँगे। पर इतना अवश्य है कि कविता के अभीष्ट के हिसाब से आज के टूटते-बिखरते समाज. लुप्त होती सवेदनाओं की दुनिया और तरह-तरह से शून्य होती भावनाओं में प्राण चेतना भरने का प्रयास नितांत प्रासगिक है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इधर हाल के वर्षों में लघु कथा, क्षणिका जैसी लघुविधाओ के साथ-साथ हाइकु अथवा सेनरयू कविताओं की पठनीयता बढ़ी है, और उसका कारण है महानगरीय जीवन में समय का अभाव । फलत. इधर पाँच-सात-पाँच के क्रम में सत्रह वर्णीय त्रीपदी हाइकु छंद रचनाकारों और पाठको की सख्या में आशातीत वृद्धि हुई है। यही नहीं देश की विभिन्न भाषाओं में लगभग एक सौ पत्र-पत्रिकाएँ भी हाइकु कविताओं को प्रश्रय दे रही हैं। साथ ही प्रत्येक वर्ष कई हाइकु संग्रह भी प्रकाशित हो रहे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आज के तनावपूर्ण और भाग-दौड़ वाले परिवेश मे हाइकु जैसी लघु कविताएँ भी लोगो के मन-मस्तिष्क पर अपना प्रभाव छोड रही हैं। जबकि हाइकुकार गोविंद सेन के मतानुसार हाइकु लिखना शब्दों की चिमटी में क्षण की अनुभूति को पकड़ने जैसा ही है। सत्रह अक्षरों के जाल में क्षणों को फसा लेना आसान नहीं है। जापान के प्रसिद्ध हाइकुकार यशुदा ने तो इसे एक श्वासी काव्य (One breath poem) कहा है। जहाँ तक सेन्यू कविताओं का सवाल है. मेरा मानना है कि सेनरयू में मनुष्य और सामाजिक जीयन का शायद ही अब कोई भी पक्ष उपेक्षित मिलेगा। दरअसल लघु आकार की सेनयू या हाइकु कविताओ में जो कुछ कहा जाता है, 'यह तो संकेत मात्र है। जो जागरण के स्वर/ (vi) ।
मूल कथ्य है. वह पाठको की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है। इस नई विधा मे काव्य के प्रतिमानो ने मानवीय चेतना के सामने एक सवाल खड़ा कर दिया है। उसके शाश्वत स्वरूप को प्रज्ज्वलित करना हमारा दायित्व है। जागरण के स्वर अहिसा की ओर लोगो को प्रोत्साहित करने का सर्जनात्मक प्रयास है जो आज आपके हाथो मे है। फैसला आपको करना है कि मेरी अनुभूतियाँ आप तक पहुँचकर किस हद तक आपको आदोलित कर सकीं। यदि मेरी अनुभूतियो के स्वर आपके स्वर बन सके और पाठको को सामाजिक सवेदना से जोड़ सके तो मैं अपने इस प्रयास को सार्थक समयूँगा। जैसा कि मैंने पूर्व मे कहा कि जापानी विधा के इस सेनरयू काव्य सकलन मे महावीर के दर्शन और अहिंसा पर काव्य सृजन क्षमता को जगाने की प्रेरणा मुझे अहिसा-यात्रा के राष्ट्रीय प्रवक्ता कवि मुनिश्री लोक प्रकाश लोकेश' के सान्निध्य से मिली। यही नहीं अपितु मेरे आग्रह पर उन्होने अपनी शुभाशसा लिखकर इस सकलन की गरिमा को बढ़ाया है, मैं उनके प्रति उनकी हार्दिकता के लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ और आशा करता हूँ कि भविष्य मे भी उनका मार्गदर्शन हमे मिलता रहेगा। प्रस्तुत काव्य यात्रा मे राजधानी कॉलेज, नई दिल्ली के प्राध्यापक एव अणुव्रत महासमिति के अध्यक्ष प्रो (डॉ) धर्मेंद्र नाथ अमन ने बड़ी आत्मीयता से इस सग्रह के सवर्द्धन मे सहयोग कर अपने अभिमत दिए हैं, मैं कृतज्ञ हूँ उनका। 'जागरण के स्वर को भाषा-शिल्प एव कथ्य की दृष्टि से परिमार्जित कर उसपर अपना अभिमत प्रदान करने में भाषा के मर्मज्ञ और काव्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर डॉ देवेन्द्र आर्य का अपेक्षित सहयोग न मिला होता तो शायद मेरी अनुभूतियाँ इतने अच्छे ढग से प्रस्तुत न हो पाती। डॉ आर्य ने इस सकलन की भूमिका भी लिखी है जिसके लिए मैं उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ। समय-समय पर डॉ अनिल दत्त मिश्र, अरुण कुमार भगत, सजय सौम्य, सुधीर रंजन आदि शुभेच्छुओं ने मेरे स्वर को गति प्रदान करने में अच्छी भूमिका अदा की जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। कप्यूटर पर अक्षर-सयोजन मे बेटी अजलि, अनुज कुमार तथा दीपक कुमार ने काफी परिश्रम कर इसे पूरा किया। साधुवाद । - -सिद्धेश्वर 22 फरवरी, 2004 'दृष्टि', यू-207, शकरपुर, विकास भार्ग, दिल्ली-110 092. दूरभाष 011-22059410, 22530652 जागरण के स्वर/ (vi) भूमिका बेबस जिंदगी को काव्य का परिधान पहनाती कविताएँ जापानी विधा के इस सेनृत्यू काव्य की मूल चेतना भगवान महावीर के अहिंसा दर्शन पर आधारित है। कविवर सिद्धेश्वर नाम के अनुरूप सिद्धहस्त कवि हैं। जीवन को बहुत करीब से देखनवाले इस कवि ने समर्पण मे ही अपने कवित्व के उदात्त स्वरूप के दर्शन करा दिए हैं। वह कहता है, 'जिंदगी महज एक सपना नहीं, महज चाँदनी सी शीतलता नहीं जो कभी ६ पूल से अटी, कभी ओस से पटी कच्ची-पक्की सडक से गुजरती, गिरती और संभलती है, बल्कि वह भूख से बिलबिलाते बच्चे का पेट भी है और ईंट भट्टो पे कडकडाती गर्मी मे ईंटे ढोते मजदूरों का पसीना भी है।' समर्पण के ये शब्द अपने आप मे महाकाव्य की आत्मा को समेटे हुए हैं जो चाँदनी की शीतलता के साथ-साथ भूख से बिलबिलाते बच्चे के पेट और मजदूर के पसीने की वकालत करता है। महलो के सुखों में तो जिंदगी कोई भी जी लेगा पर गरीबी और भूख की मार मे जीवन जीना कोई खेल नहीं है। कवि सिद्धेश्वर ने इसी बेबस जिदगी के काव्य का परिधान पहनाया है। वैसे तो प्रत्येक रचना का अपना एक विशेष उद्देश्य होता है, सो इस रचना का भी है। इस रचना को कवि ने विशेष रूप से महावीर की अहिसा से सजाया है। इस संग्रह मे दस शीर्षक हैं। महावीर' और 'अहिसा' शीर्षक के अतर्गत जितने भी हाइकू (सेनयू) छंद है, उनमे महावीर के उपदेश हैं, 'अहिसा' का वैचारिक दर्शन है, सिद्धांत कथा। सिद्धात कथन की रूक्षता को कवि ने काव्य की चाशनी मे लपेटकर स्वीकार करने योग्य बना दिया है। वह कहता है- अनुशासन अपरिग्रह परिग्रह तो होगा निज पर ही वह नहीं जिसे न आग्रह से रहित हो धन-धान्य दृष्टिकोण है शासन कर मूल्य न होता जब तक दर्शन मौन रहे वे अहिसा को रमने हेतु आत्मा मे घातक माना वैचारिक हिसा को महावीर ने जीया न जाता जागरण के स्वर/ (ix) पुकार रही गी-मजल की तरह हाइकु में व्यक्त करने की ज्यादा गुजाइश नहीं होती। यह तो सकेत मात्र है, अनुभूति का हल्का-सा स्पर्श मात्र है, पूरी भाव-यात्रा पाठक को स्वय ही करनी पड़ती है। सिद्धेश्वर जी ने भी सिद्धांत कथन मे चिमटी से क्षण को पकड़ा है। "महावीर' और 'अहिंसा शीर्षक में कवि के हाथ बँधे हुए हैं, यह चाहकर भी ऊँचा उड नहीं सकता। महावीर की विशेषताओं और अहिंसा का सिद्धात कथन आडे आ जाता है। इसीलिए कवि चाहकर भी अपनी ओर से ज्यादा कुछ नहीं कह पाया है, हा, 'आतंकवाद, खाड़ी युद्ध जैसे शीर्षको में कवि का स्वतंत्र चिंतक-बोध विशेष रूप से उभर कर आया है। अहिसा और आतंकवाद दो विपरीत किनारों पर हैं। अहिसा निर्माण करती है आतंक विनाश करता है। 'अहिसा में कवि कहता है-- थकने लगे निखरने दो जब पांव मेरे, तू का बस मानव सादा मानवता को छाँव दे देना सब एक हैं बच्चों की चीखें लेकिन आतंकवाद 'अहिंसा की सारी पवित्र, कल्याणमयी भावनाओं को पुणे-पुर्जे कर देता है। लाल खून, चाहे जिस किसी का हो, बहता तो है, सारी भावना भराह उठती है, सवेदना चौराहों पर दम तोड़ देती है, चारो ओर जलती आग में मानवता पिघल-पिघल जाती है, नील गगन मे खरोंचे उभर आती हैं. नफरत का अजगर सारी शालता को निगल जाता है। बेवास हवा चिता की राख को मुटिठ्यो मे चुप बंद कर लेती है। कवि कहता है- घर हमारे आतंकवादी आखिर जले, घर पूरी मानवता पे चिराग से ही हावी है आज इस बिफरते आतकवाद को क्या यू ही खुला छोड देना चाहिए ? कवि आक्रामक मुद्रा मे खडा है. वह पुरजोर आवाज मे कहता है- आतंकवाद हिसा रोकने को समाप्त करना आतंकवाद पर प्रहार मे कठोर कदमों अपरिहार्य कड़ा प्रहार की जरूरत कवि के विरोध का स्वर प्रखर है। आज भारत ही नहीं, एक प्रकार से सारा विश्व ही आतकवाद की गिरफ्त में है। विश्व जनमत से ही इस समस्या से निपटा जा सकता है। देखा जाए तो खाडी युद्ध भी आतंकवाद का दूसरा घिनौना रूप है। एक शक्तिशाली राष्ट्र डडे के बल पर दूसरो को अपने आधार पर चलाना चाहता है। अमेरिका और ब्रिटेन जैविक और रासायनिक हथियारों का बहाना बनाकर इराक पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पडते हैं. वस्तुत उनकी दोष नजर तो इराक के अकूत तेल भंडारो पर थी। जागरण के स्वर/ (x) करना होगा
धूल में मिली
बगदाद के
हजारों-हजारों निरपराध नागरिक मारे गए पर आश्चर्य कि पूरा विश्व
चुपचाप देखता रहा, गठबंधन सेना इराक में फैली अराजकता और लूटपाट
घटनाओ की मूकदर्शक बनी रही। खाडी युद्ध पूरी मानवता के सामने एक
विराट प्रश्न चिह्न बनाकर खड़ा है। कवि ने इस पूरे प्रसग पर अपनी तीखी
प्रतिक्रिया जाहिर की है, उसकी आत्मा विकल है, वह कहता है-
विश्व के सभी
राष्ट्र मूक दर्शक
आदिम की धरती बेगुनाहों की चीखो
खाड़ी युद्ध मे
में दर्द भी था
कविवर सिद्धेश्वर की यह कृति अनेक विषयो को समेट कर
चलनेवाला एनसाइक्लोपीडिया है। एक बात जरूरी है-कवि ने जिस किसी
भी विषय को उठाया है, उसे अपने प्राणो से सींचा है, हृदय का अमृत
पिलाकर उसे जवान किया है, अनुभव का हरा-भरा प्रांगण देकर उसे
मरजीवा बनाया है। मैं कवि को एक अच्छे संकलन की बधाई तो देता ही
हूँ, भविष्यमे अन्यान्य साहित्य रत्नो की आकांक्षा भी करता हूँ।
खाडी युद्ध मे
-डॉ. देवेन्द्र आर्य
16 मार्च 2004
वाणी सदन, बी-98, सूर्य नगर,
गाजियाबाद-20101.
दूरभाष : 95120-2622563
जागरण के स्वर/ (xi)
अभिमत धर्म रोशन कलम जारी सिद्धेश्वर जी से मेरा परिचय नवम्बर 2002 में हुआ जब वह दिल्ली में राष्ट्रीय विचार मच के वार्षिक अधिवेशन के आयोजन की तैयारी में व्यस्त थे। उनकी सादगी, कर्मठता और दूसरो को अपना बनाने की कला से मैं प्रभावित हुआ। विचार दृष्टि पत्रिका का संपादन और प्रकाशन वह अकेले दम पर ही कर रहे थे यह जानकर आश्चर्य हुआ। लेकिन उनकी जिस बात ने मेरे मन पर सबसे अधिक प्रभाव डाला वह थी उनकी काव्य प्रतिमा। इतनी भाग-दौड, झझटो. बखेडो के बावजूद न केवल उनके भीतर का कवि जागृत है अपितु काव्य प्रवाह भी जारी है। सिद्धेश्वर जी भी कमाल के आदमी हैं। मुझे हसरत मोहानी (सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता और स्वतत्रता सेनानी) की एक उर्दू काव्य पक्ति याद आती है जो उन्होने जेल मे चक्फी पीसते हुए कही थी : है मश्के-सुखन जारी, चक्की की मशकत थी। इक तुर्की तमाशा है हसरत की तबीयत भी।। कलम के धनी सिद्धेश्वर जी के लेख पत्र-पत्रिकाओ में प्रकाशित होते ही हैं पुस्तके भी छप रही हैं। उनके लेखन का कैनवस बहुत बड़ा है। लेखो मे केवल सम-सामयिक मामलो, सामाजिक समस्याओ, साहित्यिक विषयों पर ही सारगर्मित व्याख्या, विवेचन और समीक्षा ही नहीं होती बल्कि रचनात्मक सुझाव भी हो हैं। उनकी लेखन शैली पाठको के हृदय को झकझोर देती है और नव चेतना का प्रचार-प्रसार करती है। उनके साहित्य में लोकहित को सदैव दृष्टि में रखा गया है मैं इसे ही साहित्यकार की पहचान मानता हूं क्योकि साहित्य (स+हित) में हित नहीं तो फिर पका है? इसे सिद्धेश्वर जी अपने लेखो और कविताओ के माध्यम से वैचारिक क्राति का सदेश दे रहे हैं जो एक सच्चे साहित्यकार का धर्म है। 'जागरण के स्वर सिद्धेश्वर जी का तृतीय काव्य संग्रह है। उनका प्रथम सग्रह था पतझर की साझ' जिसको पाठको ने पसद किया। दूसरा काव्य पुष्प था 'सुर नहीं सुरीले' और अब जागरण के स्वर' प्रस्तुत हैं जो कभी बेसुरे नहीं होते क्योकि यह स्वान्त सुखाय भी है और बहुजन सुखाय ही नहीं बल्कि सर्वभूत हिते रता है। प्रथम सग्रह मे हाइकु थे तो अन्य दो मे सेनयू हाइकु मे प्रकृति वर्णन होता है तो सेनयू मे मानव सबधो पर विचार व्यक्त किये जाते हैं। यह विधा अब हिंदी जगत में लोकप्रिय होती जा रही जागरण के स्वर/ {xt है, पाठक अब इसे समझने और पसंद करने लगे हैं तथा अब और अधिक कवि भी इस ओर आकर्षित हो रहे हैं। जापानी कविता की इस विधा को अपनाए जाने का एक कारण यह भी है कि आज की स्विच बटन सभ्यता में प्रत्येक कार्य को तुरंत करने और उसका परिणाम पाने की होड़ लगी है अर्थात् जीवन की तनावपूर्ण व्यस्तता और भाग दौड़ किसके पास समय है कि लंबी कविताएं पढे। तलाश है हर क्षेत्र में शार्टकट की। थोड़े समय मे, थोड़े शब्दो मे बड़ी बात कहना बहुत कठिन कार्य है इसीलिए हाईकु वास्तव मे गागर मे सागर भरने का प्रयास है। जापान के सुप्रसिद्ध हाकुकार यशुदा ने इस एक खासी काव्य' का नाम दिया है। थोड़े में बहुत कहना कितना कठिन होता है इसका निर्णय स्वयं किसी बात को लिखकर कीजिये। हाइकु 17 अक्षरीय बंद है इसमे तीन पंक्तियाँ (5+7+5) होती हैं जिनमे बात इस तरह कहनी है कि इसमे आकर्षण भी हो और संदेश भी, कलात्मकता भी हो और पढनेवाले को आनंद भी मिले और उसके भीतर तक विचार भी पहुंचे तभी हाइकु के प्रयोग को सफल माना जा सकता है। सिद्धेश्वर जी ने जागरण के स्वर मे क्राति की अलख जगाई हैं महावीर को श्रद्धासुमन अर्पित किये तो अहिसा. शाकाहार जैसे विषयो पर हाइकु के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किये। लोकतंत्र की वर्तमान दशा और गाँव की बदहाली को दर्शन के लिए अपनी लेखनी का उपयोग किया। उनका उद्देश्य आलोचना नहीं सुधार है। व्यंग्यकार एक कुशल चिकित्सक की भांति समाज के फोडो को चीरा लगाकर, जख्मो को कुरेदकर मरहम लगाता है। सिद्धेश्वर जी ने यह कार्य बहुत सलीके के साथ किया है। आतंकवाद और खाडी युद्ध मे अमरीकी नीति की आलोचना निष्पक्षता के साथ की है लेकिन उसमे भी सृजनात्मकता झलकती है। कवि ने आदमी के अंतर्द्वव और बेबसी को बडी निपुणता के साथ काव्य रूप दिया है- हैं असदिग्ध अर्थ दिया महावीर ने युग दृष्टाओ ने ही जड को पकडा व सार्वभौमता सारे शब्दो को बीधा लक्ष्य को अहिंसा को जीवन की अंतर्यात्रा, आत्म चेतना की स्वीकृति और गनुष्य की तृप्ति और विस्तार बताते हुए उन्होने लिखा है- अहिसा सदा अपने जीवन की सारी मानवता को आत्म चेतना की ही है अतर्यात्रा बच्चों की चीखे स्वीकृति होती महावीर के स्वर अहिसा यात्रा पुकार रही जागरण के स्वर/ (xiu) आतंकवाद से धधे चौपट कोष खाली एक धरती एक आसमाँ हम ही दो क्यो झील थी शांत कैसे बहने लगी खून की नदी अलग ही थी शवों पर ही आदमी जिंदा अमरीका के सयम अमरीकी फसल मोक्ष के लिए नहीं की परिभाषा लहराई है रोटी के लिए यह यथार्थवादी दृष्टिकोण है लेकिन आंशिक या अर्धसत्य है क्योकि 'Man does not live by bread alone'1 मैं भवानी प्रसाद मिश्र जी के विचार से सहमत हूँ। रोटी और रामायण दोनो। यही दाहिये कोनो कोनो।। लेकिन रोटी बुनियादी जरूरत है यह सत्य है। शाकाहार के समर्थक सिद्धेश्वर जी एक प्रश्न पूछते हैं- जो व्यक्ति पर शाकाहार गाँव आज भी हिसा नहीं करते उत्कृष्ट जीवन की जिंदा है, जिंदादिली उसे हिसा क्यो है एक नीव मैं यह काव्य सग्रह पढकर यह दुआ देता हूँ कि सिद्धेश्वर जी का धर्म (कर्तव्य निष्ठा) रोशन रहे और कलम जारी रहे और फैलाये आज/जागरण के स्वर/शाति के लिए। मुरझा गई 16 मार्च 2004 अणुव्रत भवन, 210, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110 002 दूरभाष 23233345, 23239963 डॉ. धर्मेन्द्रनाथ अमन अध्यक्ष : अणुव्रत महासमिति जागरण के स्वर/ (savil शुभाशंसा कविताओं में मानवीय विवेक की झलक कवि सिद्धेश्वर जी समय के कवि हैं। समय के साथ कदम ताल मिलाकर चलनेवाले कवि हैं। प्रतिस्पर्धा व आपाधापी के युग में आदमी हर कार्य को फटाफट करना चाहता है। स्वल्प समय में, छोटे रास्ते से मजिल प्राप्त करने की पाठक की ललक ने साहित्यिक जगत को भी प्रभावित किया है। हाइकु और सेनयू कविताओ की बढती मांग इसी का प्रमाण है। सन् 1998 मे जापानी विधा हाइकु में “पतझर की सांझ" तथा सन 2004 मे सेनयू विधा मे “सुर नहीं सुरीले" काव्य सग्रह के बाद "जागरण के स्वर" कविवर सिद्धेश्वर जी का तीसरा काव्य संग्रह है। सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक पुरुष सिद्धेश्वर जी एक प्रखर वक्ता, मौलिक लेखक और ओजस्वी कवि हैं। वक्ता के रूप में वे श्रोताओ को अपने साथ बहा ले जाते हैं और अपनी बात गले से उताकर हृदय मे विठाने का सामर्थ्य रखते हैं। लेखक के रूप मे जब वे बुराईयो पर कलम चलाते हैं तब कलम को कुदाल ही बना डालते है। कवि के रूप में हाइकु और सेनयू विधा में स्वल्प शब्दो के माध्यम से असीम भावों को प्रकट करने का सामर्थ्य पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ के हर पेरे मे परिलक्षित हो रहा है। प्रस्तुत ग्रंथ मे ‘महावीर' खण्ड के अतर्गत उनके गूढतम तत्व दर्शन को जिस पर पूरा एक-एक ग्रंथ लिखा जा सकता है। सीमित शब्दो मे प्रस्तुत करने में कवि ने सफलता पायी है। जैसे- अपरिग्रह वह नहीं, जिसे न महावीर धर्म में हो धन धान्य वर्णवाद का महत्व नही अहिसा खण्ड के अंतर्गत कविवर सिद्धेश्वर जी समस्याओं के मूल पर प्रहार करते हुए लिखते हैं- मिटा दो हिसा की जड इंसान की मुस्कान मनुष्य की लालसा फिर लौटा दो आतंकवाद से आज केवल भारत ही नहीं समूचा विश्व प्रभावित और भयाक्रान्त है। उसके विविध पहलुओ पर प्रकाश डालते हुए वह कहते है- भौतिक-सुख जागरण के स्वर/ (xv) आतकवाद से धंधे चौपट व कोष खोखला एक धरती एक आसमां फिर हम ही दो क्यो ? जनतत्र मे शाकाहार के बारे मे वे लिखते हैं- क्यो अधिकार बनाने का भोजन अन्य प्राणी को जनतत्र की खूबिया कुछ यू प्रकट हुई हैं उनकी कलम से- रक्षा की जाती होती जनता विचार स्वातत्र्य की शक्ति का उद्गम जनतत्र मे कविवर सिद्धेश्वर जी के प्रस्तुत सग्रह मे नैतिक चेतना एवं मानवीय विवेक की झलक मिलती है। यह विवेक ही समाज को सत्य पथ की ओर ले जाता है। कवि ने जीवन मूल्यो की केवल पड़ताल ही नहीं की बल्कि उन्हे जीया है। यही कारण है कि उनकी कविताओ में आदर्श और यथार्थ का अनुपम समन्वय देखने को मिलता है। अनुभूति और अभिव्यक्ति की उनमें अपूर्व क्षमता है। आशा है सेनयू विधा मे कवि सिद्धेश्वर जी का यह प्रयत्न गागर मे सागर की उक्ति को चरितार्थ करता हुआ प्रतिस्पर्धा व भाग दौड के युग मे सुधी पाठको को स्वल्प समय मे अधिक वैचारिक खुराक प्रदान करेगा। मुनिश्री लोकप्रकाश लोकेश 18 मार्च 2004 अणुव्रत भवन, 210, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110 002 दूरभाष . 2323 3345, 2323 9963 जागरण के स्वर/(xvi) अनुक्रम संग्रह के संदर्भ मे... (iv) भूमिका. ..(ix) अभिमत.. ..(xii) शुभाशंसा.. ..(xv) .....(xvii) ..................................................... अनुक्रम. महावीर.. .18 अहिंसा... .35 आतंकवाद...... .65 खाडी युद्ध.. .73 आदमी. .81 शाकाहार. .90 गॉव.. .93 स्त्री.. .96 जनतंत्र. .99 आँसू. 110 जागरण के स्वर/(xvii)
महावीर
महावीर ने
आत्मतुल्य समझा
सभी जीवो को
जागरण के स्वर/18
महावीर महावीर थे सामाजिक चेतना महावीर के धर्म में क्रिया काडो का स्थान नहीं के अग्नदूत प्राणी मात्र ही धर्म आचरण था महावीर का है असंदिग्ध महावीर के स्वर सार्वभौमता होता हमेशा तृष्णा से ही अधिक सुखों का नाश जगह नहीं सार्वभौम धर्म मे जातिवाद की गंध भी नहीं अस्पृश्यता का भी प्रणयन में महावीर थे मानव के मसीहा करुणा-भरे महावीर के प्रधान शिष्यों मे थे इंद्रभूति जी समाज सुखी आत्मसात किया, जो महत्त्व नहीं महावीर धर्म में वर्णवाद का नैतिक गुण जागरण के स्वर/19 मिथ्या दृष्टि से लेकर सम्यगट्ट उनकी दृष्टि विश्व के लिए गाय हो जैन धर्म महावीर का D महावीर ने आत्म तुल्य समझा सभी जीवो को उपासना की उलझन नहीं है महावीर मे परिग्रह से वर्ग-भेद बनता उन्होने माना माना उन्होने आवश्यक हिसा भी हिसा ही होती आचरण भी गौण होता जा रहा सभी धर्मों मे अपरिग्रह वह नहीं, जिसे न हो धन्य-धान्य महावीर थे सामाजिक चेतना के अग्रदूत अनुशासन होगा निज पर ही शासन कर प्राप्त हो गई आत्मिक ऋद्धियां भी महावीर को जागरण के स्वर/20 महावीर थे संस्कृति के प्रतीक तप प्रधान महावीर थे आत्मिक साम्य के ही उन्नायक भी अहिंसामय बनाया जीवन को महावीर ने प्रचुरता से पडा प्रभाव महात्मा गांधी पर महावीर का मिले, जिसे तब भी वह त्यागे ही महावीर ने ही पॉच महाव्रतो की शिक्षा भी दी महावीर ने सत्य के आग्रह को पहला माना करते सदा घोर तिरस्कार वे वर्ण-भेद का वश मे किया इद्रियो व मन को तप करके द्वैतपरक उनका दार्शनिक दृष्टिकोण था परिग्रह तो आग्रह से रहित दृष्टिकोण है जागरण के स्वर/21 अपनाया था संयम का मार्ग भी महावीर ने महावीर का हिसा के विरोध शस्त्रन उठा मान्य नहीं था उन्हें शरीर-भेद से आत्म भेद सजल हुआ पियूष सरोवर सद्गुणों का बनाना होगा अपनी चेतना को प्रशिक्षक भी वस्तु स्वामित्व न वस्तु का सग्रह है परिग्रह बल दिया है जीव-दया पर भी महावीर ने महान होता त्यागी, जो वह मित स्वाधीन वृत्ति चूर हो गए एकता के तार ही पूरे विश्व मे इसीलिए तो जीव आत्मा मात्र मे महावीर ने ब्रह्मका अश कहा जीव आत्मा को एकता मति जागरण के स्वर/22 न सप्रदाय साप्रदायिकता ही परिग्रह है है बड़ी बात मानना व जानना महावीर को रुचि नहीं भी अपने वैभव मे महावीर को अर्थ दिया है युग द्रष्टाओ ने ही सारे शब्दो को महावीर की साधना मे औरतें बाधक नहीं मूल्य न होता जब तक दर्शन जीया न जाता वह जीवन क्या है, जो दुखियो का दुःख न हरे महावीर का खुद शरीर पर भी नियंत्रण जरूरी होता आर्थिक संयम व इच्छा संयम तीर्थकर ने लोक चेतना को भी नई दिशा दी महावीर ने मन, वचन, कर्म पे बल दिया P जागरण के स्वर/23 अकेले रहे महावीर अपने साधना-काल तीर्थकर के मन की डोर सदा रही हाथ मे बारह वर्षों मे तीन सौ पचास दिन ही खाए महावीर ने साढे बारह वर्षों की साधना की जीवन जीया स्वयं साधना का ही महावीर ने महावीर ने दास प्रथा की जडे भी हिला दी महावीर की साधना का जीवन पहले से था भोजन का सयम महावीर का दर्शन बना महावीर का मन पूरी तरह अनुशासित महावीर ने प्रत्येक आत्मा को भी महावीर का वाणी-सयम बेजोड माना जाता है स्वतंत्र कहा जागरण के स्वर/24 सीखा ही नहीं विचलित होना भी कभी लक्ष्य से महावीर ने जगाया अनेकात अपरिग्रह कैवल्य प्राप्ति के बाद महावीर बोलने लगे तीर्थकर का एक्का मनुस्सजाई उद्घोष भी रहा महावीर थे सास्कृतिक क्रांति के सूत्रधार भी महावीर मे ज्ञान और क्रिया का समन्वय है सिद्धांत भी हो महान विभूति का विश्वजनीन महावीर ने कहा, कोरा ज्ञान भी सूखा ज्ञान है कहते थे वे ज्ञान पुरुष पथ- भ्रष्ट न होते ज्ञानवादी थे मानते थे अत्राण मौन रहे वे अहिसा को रमने हेतु आत्मा मे शुष्क ज्ञान को जागरण के स्वर/25 अकेले रहे महावीर अपने साधना-काल तीर्थकर के मन की डोर सदा रही हाथ मे बारह वर्षों में तीन सौ पचास दिन ही खाए महावीर ने साढे बारह वर्षों की साधना की जीवन जीया स्वयं साधना का ही महावीर ने महावीर ने दास प्रथा की जडे भी हिला दी महावीर की साधना का जीवन पहले से था भोजन का सयम महावीर का दर्शन बना महावीर का मन पूरी तरह अनुशासित महावीर ने प्रत्येक आत्मा को भी स्वतत्र कहा महावीर का वाणी-सयम बेजोड माना जाता है जागरण के स्वर/24 सीखा ही नहीं विचलित होना भी कभी लक्ष्य से महावीर ने जगाया अनेकात अपरिग्रह कैवल्य प्राप्ति के बाद महावीर बोलने लगे तीर्थकर का एक्का मनुस्सजाई उद्घोष भी रहा महावीर थे सास्कृतिक क्राति के सूत्रधार भी महावीर मे ज्ञान और क्रिया का समन्वय है सिद्धांत भी हो महान विभूति का विश्वजनीन महावीर ने कहा, कोरा झान भी सूखा ज्ञान है कहते थे वे ज्ञान पुरुष पथ- भ्रष्ट न होते ज्ञानवादी थे मानते थे अत्राण मौन रहे वे अहिसा को रमने हेतु आत्मा में शुष्क ज्ञान को उगरपके स्वर/25 ज्ञानी पुरुष समल भी जाता है गर गिरे तो महावीर की चेतना पर राग के स्पदन थे 0 महावीर ने जीवनावधियो मे की मौन साधना सभी के लिए महावीर का मन खुला हुआ था घातक माना वैचारिक हिसा को महावीर ने रहता दवा कोरे ज्ञान-भार से पाप-कर्म मे अहिसा दूढा जो, न्यूटन से बड़ा अविष्कारक थे पारंगत आत्मवेध विद्या मे महावीर भी . उन्होने कहा साधना है समय ज्ञानी पुरुष महावीर मे क्राति का दर्शन भी देता दिखाई कालचक्र का आदि और न अत है होने वाला जागरण के स्वर/26 विचार ऊँचे भावना हो पवित्र तभी महान प्राणी के नाते समस्त जीवन है एक समान महावीर ने जनता की भाषा में कही है बाते उदारता से महावीर दर्शन की मीमांसा हो निःस्वार्थ होना जीवन का चरम लक्ष्य मानिए जो भी आएगा वह कुछ होकर है दृष्टिकोण अनेकात दर्शन महावीर के ही आ पाएगा आगे बढाता चरम लक्ष्य-ओर निःस्वार्थ कर्म जोर दिया है आत्म निरीक्षण पे महावीर ने जरूरत है तटस्थ मीमासा की महावीर की जो स्वार्थी होता वह अनैतिक है यही सच है जागरण के स्वर/27 पवित्र होता अपने विचारो से ही कोई व्यक्ति ढूँढने होगे अब हमें अपने शाति-औजार अनिवार्य है सुखी जीवन जीने के लिए क्षमा उदारता ही बनाती है आदत क्षमाशीलता महावीर थे बडे घोर विरोधी अस्पृश्यता के 'छोड़ो जाने दो अपनाकर स्वयं बचे घातों से D नकारात्मक प्रदर्शन से सदा बचे आप भी ऊँचा नहीं है जो अपने को उच्च मानता सदा उनकी बाते सुने. जिसने ठेस पहुचाई हो हमेशा करे छोटी गलतियो की अनदेखी ही जो दूसरे को प्रतिबिंब मानता ऊँचा नहीं है जागरण के स्वर/28 जात्य वह है, जो गुण संपन्न है कुलीन वह कभी न किया उन्होने व्यक्ति पूजा का समर्थन महावीर थे दीर्घ तपस्वी और साधक भी थे महावीर ने जड को पकडा व बींधा लक्ष्य को महावीर ने जन्म को श्रेष्ठता न माना कभी भी तत्व मीमांसा मिलती है उनकी सुलझी दृष्टि महावीर ने व्यक्ति स्वातंत्र्य की सूझ भी दी है प्रवर्तक थे अनुशासन के वे हृदयग्राही भरा पडा है योग-पद्धति में भी सारस्य शाति स्वर्ग नरक मनुष्य ही के हाथ होता हमेशा महावीर तो लोक आचार को भी काफी समझे जागरण केस्वर/29 झकझोरा है रुढि परपरा को महावीर ने तीर्थकर की चेतना के तल पे सभी का दुःख मास-पिता की मृत्यु, महावीर थे अट्ठाईस के जन्म लिया था त्रिशला के गर्भ से महावीर ने माता-पिता ने 'वर्द्धमान रखा था इनका नाम महावीर ने निग्रथ मुनि होने को घर त्यागा महावीर ने ढाई हजार पहले जन्म लिया था 'वर्द्धमान' का प्राणी ग्रहण हुआ कन्या यशोदा महावीर ने विचारको को सही दिशाए दी हैं करना पडा निर्जल उपवास छह मास की तीस आयु मे दीक्षा ग्रहण की थी वर्द्धमान ने जागरण के स्वर/30 तीर्थकर ने विचार-जड़ता को दी नई क्राति अग्नि लगा दी जंगली अमीरो ने उनके पैरो भोजन किया तपस्या के दौरान चौंतिस बार दिया विश्व को संदेश अहिसा का महावीर ने किया प्रारभ सर्वज्ञता की सिद्धि उग्रताप भी विन भी आए उनकी तपस्या मे अनेक बार एक वर्ष मे ढेर स्वर्ण मुद्राएं पिता के वंश से ज्ञात पुत्र नाम पडा उनका दान मे दिए प्रारंभ किया संचित द्रव्य-दान दीन-दुखियो महीनो खडे होकर ध्यान मग्न रहते थे वे उनकी माता विशाला नगरी की वैशालिक थी जागरण के स्वर/31 विख्यात हुए मौन रहने से ही मुनि नाम से सत्य, अहिसा हमने नाता जोडा प्रेम-भाव से देव आर्य थे महावीर देवार्य भी कहलाए महावीर की मति सत्य स्वरूप अतः सन्मति सिखलायी थी 'जियो और जीने दो महावीर ने महावीर को ग्यारह नामों से भी लोगो ने जाना उन्होने कहा महातिवीर महात्रिमान धर्म की वजह से प्यार से गले लगो दीन-जनो के महावीर ने जो पथ दिखलाया चले उसी पे कश्यप गोत्र के कारण उनका नाम काश्यप फैलाएँ आज जागरण के स्वर शाति के लिए जागरण के स्वर/32 हम खाते हैं ग्रहण किया थोडे से लाभ हेतु शिष्यत्व इंद्रभूत- झूठी कसमे सा विद्वानों ने अविचल था हिमालय की भांति उनका तप सत बने थे ठोक दी गई उनके कानो में भी अनेकों कीले बडे-बडे राजा भी उपदेश से इंद्र देव ने उन्हें 'महावीर कहा धैर्य को देख उनको दिए असहनीय कष्ट सर्प, बिच्छू ने चातुर्मास की राजगृह वैशाली जैसे नगरो प्रारंभ किया कल्याणमय धर्म का उपदेश प्रयास हुआ लू, वर्षा, ओलो द्वारा उन्हे डिगाने अगाध प्रेम मगध बिहार की प्रजा के प्रति जागरण के स्वर/33 उनके शिष्य बिम्बसार, चेटक अदीन-शत्रु समाज सुखी आत्मसात किया, जो नैतिक गुण सहज गुण समण-श्रमण भी उनका नाम गोलोकवासी बहत्तर की आयु पावापुरी मे होता हमेशा तृष्णा से ही अधिक सुखो का नाश विदेह कुल की थी माता त्रिशला विदेह नाम महावीर के जन्म के साथ धन बढता गया अक्रोध को ही कहा जाता रहा है तप की शोभा वर्द्धमान को महावीर बनाया सेवा भाव ही उनका नाम वर्द्धमान कारण बढता धन जीवन शुद्धि सूत्र अणुव्रत का है कहा जाता जागरण के स्वर/34
o
अहिंसा
फैलाएँ आज
जागरण के स्वर
शाति के लिए
जागरण के स्वर/35
अहिंसा यह सच है रेखाएं मैंने खींची पचशील की हिसा हो रही धर्म और कुप्रथा के नाम पर मिटा दो अहं इंसान की मुस्कान फिर लौटा दो दिन व दिन हो रहे तिरोहित जन-स्पंदन कभी न करो कहता धर्मशास्त्र हिसा कभी भी छितरा गई हवाओं मे आस्थाएं मैं दूढ रहा महल बने हिसा की जड मनुष्य की लालसा कितने कुबेर के कहाँ रहे हैं? भौतिक-सुख मिटे राह मे कलुष व कालिमा दीप जलाओ मेरे द्वार से खाली हाथ न जाए नहीं करूँगा क्रूर व्यवहार भी प्राणी के प्रति दुआ चाहिए जागरण के स्वर/36 अहिसा यात्रा अपने जीवन की है अंतर्यात्रा सत्य मा गए जिनके पाव जमीं पे टिके रहे साकार करें आओ सब मिलके बापू का स्वप्न अहिसा वास्ते गहन प्रशिक्षण आवश्यक है जिसका राग सुन तम हटता राग सुनाओ भटक रही आज है मनुजता कौन बचाए हिंसा होती है पीड़ा भी पहुँचाना किसी प्राणी को बिरवे बोए मैंने अनगिनत मानवता के मिलती सदा हिसा को उत्तेजना विषमता से पावन नीर क्या खोज रहा निधिया अनमोल जियो और जीने दो फिर से ला दो कुछ तो बोल जागरण के स्वर/37 सहनशील सब सहता गया जग आएगा आज नहीं तो कल आज का सच यह भारत बेहतर है जग टलती रहे शाति के लिए बेहतर है राक्षसी-प्रवृत्ति से हम नादान छूना चाहते हमें पांव जिनके पाव नहीं हैं जोड सके तो चलो, दिलों को जोडे घायल दिल गुनगुना दे अनजाने ही सही वेदना-स्वर प्यार के लिए शमां जलती रहे बेहतर है दिखाए दीप अधकार में राह चलते-चलो न ले जाएगे न लेकर आए थे हाय हाय क्यो? ईमान जब अमीरो ने खरीदा रही बची क्या? जागरण के स्वर/38 सही इंसान बनेगे, घृणा-द्वेष को त्याग कर घर से ही हो अहिसा का प्रारम ले संकल्प भी शाति आएगी हिंसक भावनाएं जब भी त्यागो दिल की पीर अविरल बनके नीर बहाएं अहकार का दूसरा रूप होता स्वाभिमान है दीपक ने दी चमकीली रोशनी पी के जहर कर जाएगे देश के लिए कुछ रहता व्यक्ति अधिकाश क्षणो मे संतोष होगा हिंसा से दूर जहाँ जीवन आजीविका की खोज वहीं हिसा है सुदृढ बनाते हमारे संबंधो को सारे रिश्ते ही बूझने लगे जब, मेरे दीपक स्नेह दे देना जागरण के स्वर/39 आज अंधेरी जल रही है रात है, माना, कितु व्यक्ति के हृदय मे कल सबेरा आग द्वेष की सलामत है आखें उजडी तो क्या सपना सही उर्वरा रही भू हमारी त्याग व बलिदान की कोई आदमी हर क्षण हिंसा मे प्रवृत्त नहीं बडा कठिन वस्तुत: जीवन में नौन रहना अहिसा-यात्रा जन की चेतना का एक प्रयास खुशी बढती वाटने से लेकिन घटता दुःख चल पडे हैं पैर टेढी राह पे हाथ दे देना जरूरत है देश को इसानो की बौनो की नहीं अहिंसा सदा आत्म चेतना की ही स्वीकृति होती जागरण के स्वर/40 जुडी हुई है अहिसा वास्तव मे मनोभावो से पग की धूल पर्वत टकराए तो पथ भूल न जाने कहाँ गए इस धरा के अनुराग भी पैदा करती हिसक प्रवृति को भूख-अशाति छोटी कलियाँ बडे फूल के लिए मत तोडिए सांस तोडता सौहार्द व प्रेम भी गलियारों मे निखरने दो भाव बस मानव सब एक हैं मातृभूमि की उपासना करना कर्तव्य मेरा दूर रहा मैं अक्सर तुम्हारे संग रहकर भी लेता जा रहा अहं का वट वृक्ष अपनी छाँव चुनौतियां हैं। समाज के समक्ष विचार की भी जागरण के रदर/41 फैली जा रही उर्वरा करो पुन धरा को प्रेम के बीजो से ही घृणा की जड़ें गांव-शहर क्या कोई अभी नहीं बचा पाएगा छोटी कलियाँ ? लेकर खडा रग-रग मे नफरत जिनके तलवार आदमी हर डगर उन्हे मनाए राष्ट्र पे दृष्टि सांप्रदायिक दृष्टि सेन उचित नष्ट होती है झूठ बोलने से ही किसी की निष्ठा परखे कभी नहीं मरते जैसे पीपल-बीज पुकार रही सारी मानवता को बच्यो की चीखे हिसा का नाच करेन आप अहिसा की कल्पना शाति के बिना यहा मजर नहीं धर्म के नाम जागरण के स्वर/42 कर्म करता जो पवित्र मन से पूरी दुनिया नफरत की आधी वही धार्मिक से है तबाह सत्य य-अहिसा आज के संदर्भ मे सफल सिद्ध रिश्तों को कहाँ गइराई से आज समझा जाता संकल्प नहीं विश्व मानस में भी शाति के लिए एक हाथ से ताली नहीं बजेगी शाति के लिए यह सच है छवि बनाना किसी कलाकार के हमारी साधुगोई महगी पड़ी बस मे नहीं लीन होता है अपनी साधना मे साधक सदा हैं उतरते प्रेम पाने के लिए प्रेम मे हम साधक नहीं समय बलवान होता है सदा जागरल के स्दर/43 स्वच्छ जीवन राष्ट्र को भी उन्नत बनाता सदा अहिसा सार सभी धर्मों का आज इसे जानिए 0 तलाशते हैं कुर्वानी की बकरे हार के बाद कालक्रम में होती है फलवती शुद्ध साधना बन सकता नहीं महान कोई अहिसा विना खडा करता खड़ा होने वाला ही कभी किसी को मौन हो हम अगर सायुज्यता चाहते आज सबसे बड़ी अहिसा जीवन की है उपलब्धि व्यक्ति की शाति से समाज मे शांति आती हमेशा उतरे आप धरातल पे आप चाहते शाति सबसे ज्ञानी वही होता किसी की हिसा न करे जागरण के स्वर/44 अहिसा नाम तीन पहलू प्राकृतिक साधनो अहिसा के, भौतिक विचार, वाणी की सरक्षा का 3 अहिसा से ही विश्वासो का सृजन भी होता सदा दूसरा बड़ा स्वयं समझें चेष्टा करें अन्य को समझने की रोग है संक्रामक आज सग्रह किसी प्राणी को दुःख न देना, अर्थ अहिसा का ही न करे हत्या और न कराएं ही स्वाद के लिए सग्रह वृत्ति आर्थिक विषमता की उत्प्रेरिका अहिसा एक व्यावहारिक शब्द है कहा जाता बना महान अहिसा का आश्रम लेकर वह अहिसा देती है मनुष्य की तृप्ति और विस्तार जागरण के स्वर/45 अहिसा आज मानवीय जीवन की है कुंजी भी अपनाते हैं ज्ञान की राह छोड दुर्गुण हम बडा खतरा इच्छाओ का विस्तार विश्व शाति का कहा गया है जीवन का विज्ञान अहिसा को ही महापुरुषो की वाणी मे, जग है झूठा सपना संग्रह वृत्ति से क्रुरता-सस्कार जागृत होता स्वार्थ के मित्र यहां पर और न अज्ञानी वह हिसा मे अनुरक्त जो ज्ञानी होता कोई अपना द्योतक नहीं अहिसा का सदेश कायरता का बाध्य करता सस्कारो का हनन हमें सोचने धन सम्मान वातावरण आज का होता विषाक्त जागरण के स्वर/46 -- सयम से ही भटक रहा शाति की खोज मे ही सारा ससार कटेगी समस्याए हमारी सारी हर सकल्प सकाम साधना का उद्घोष होता दु.ख की बेला याद करे, सुख में काफी साम्य है जीवन और नदी के प्रवाह मे मुह को मोडा वडा घातक आर्थिक प्रलोभन बुराईयो का जागृत करे अहिसा के बीजो को जीवन होता अस्तित्वहीन मृत्यु को पाकर ही प्रसुप्त हिसा असमानता भी अनेक हिसा को देती है जन्म असम्म ही बढती समस्या का मुख्य कारण वही चेतना कारगर होती. जो समाधान दे जागरल के स्पर/47 काम करती बुराई की जड मे धन-प्रवृत्ति उचित नहीं धन उपासना भी धन-वैभव भूले हैं लोग जिंदगी की अदा व अपनी दोस्ती जो समझता हृदय कर लेता कर्मवाद को उभारती है प्रदर्शन-प्रवृत्ति यही लालसा बडा पतन स्वय के नजर से गिर जाना भी समाज आज धन के आधार पे मूल्य आकता बंद करे भी सम्मान ज्यादा देना धनवालो को प्रयोग किया अहिसक जीवन शैली बापू ने पास जिसके ऐशो आराम-चीज सम्मान पाए पारस्परिक प्रगाढ़ता बढाता विचार साम्य जागरण के स्वर/48 महात्मा गांधी सत्य व अहिसा के पोषक ही थे जरूरी आज स्वयं के संरक्षण हेतु अहिसा है उपयोगी वही दीप मिटाता जो अंधकार तन भले ही राष्ट्रपिता ने कानून-कलम से काम किया था विभाजित, मन न हो विभाजित वस्तुएं कम सम्मान समाज मे है होता कम जगाएं हम अपने हृदय में सेवा भावना अंधा बनाया अपने स्वार्थ ने ही विचारों को भी चौंकते नहीं घटित अघटित देखकर वे राष्ट्र चेतना अच्छे कर्म का कर्मवाद का सूत्र अच्छा ही फल जनता में जगाई सत्याग्रह से जागरण के स्दर/49 सत्य का प्राण अहिसा, व्यक्ति पशु उसके बिना अहिसा हेतु जरूरत है आज सयम की भी न जुल्म करो और न जुल्म सहो यही हो धर्म परिग्रह ही कारण है असली विषमता का विचार-क्राति समय का तकाजा इस देश मे प्रबुद्धजन भी खामोशी अपनी जल्द ही तोडे मत फेको तू हर तस्वीर पत्थर, रहते हो शीशे के घर का दूसरा पहलू भी होता सदा मेरे घर से सस्कृति-हवा बहे बापू ने कहा बदल गई मूल धाराएं आज इस देश की धर्म हो गया है आज संकुचित संप्रदाय से जागरण के स्वर/50 बुझानी होगी नफरत की आग हर हाल मे नहीं यांटिए टुकडों मे समाज आवाज यही वह दान, जो निस्वार्थ दिया जाए सर्वश्रेष्ठ है लहू का रंग सिर्फ लाल ही होता तलाशता हू स्वर्णिम भविष्य की राह मे सदा समझे हम खून की धार से करुणा चित्कार बापू की आत्मा हिसा का जन्म असमानता और विषमता से बनना होगा हमें स्वयं स्वर भी इस हाल का लहू के प्यास इंसानी मुहब्बत को ही बुझा दी करे न आप अनावश्यक हिसा किसी प्राणी की हैवानियत की आग मे झुलसा गांधी का धाम जागरण के स्वर/51 हिसा की आग गुजरात की भूमि मे धधक उठी नहीं निभाया अपने दायित्व को राजधर्म ने नए सिरे से बोध कराना होगा वर्तमान को एक हम हैं जो दुश्मन को सद गले लगाते देश के लोग हाथ नहीं मिलाते कभी दिल से . बनाता सदा बेहतर समाज अच्छा सस्कार मिटा दीजिए नफरत दिल से हर हाल मे बडा कठिन समझाना, हिसा में लिप्त लोगों को इसानियत गुजरात की हिंसा मे खत्म हुआ इतिहास का धनी भारत देश क्या हुआ इसे ? व्यवधान तो कुछ न कुछ आते ही निर्माण में जागरण के स्वर/522 हमे हताशा से उबरना होगा हर हाल में अहिसा होती जीवन की समस्या का समाधान मिटाएं आप घृणा और जलाएं प्यार के दिये करने लगे धर्म को अलविदा दंगा पीडित जगाना होगा अहिसा के प्रति ही अपने भाव हो न सकते देश के वफादार दंगायी कभी गांधी की भूमि हिसा-प्रतिहिसा से लहूलुहान हिसा बढती विषम दृष्टिकोण से ही हमेशा सजग बने अपने प्रति होने वाली हिंसा से बेगुनाहो का कत्ल किस धर्म का सिद्धात होगा अहिसा हेतु व्यक्ति का दृष्टिकोण देखना होगा जागरण के स्वर/53 जोड़-तोड से अधिक व्यक्तियो का जीवन जाता अग्रसर हो आत्म-संयम-पथ की ओर सदा बुरे लोगो से बड़ी आसानी से मैं होता किनारे नाम न लेता हिसा का भूत कभी राष्ट्रपिता को अहिसा से साक्षात चंपारण मे उतरने का हिसा का नाच धर्म के नाम पर अमानवीय मनुष्य स्वय सुख-दुःख का होता उत्तरदायी लोक चेतना अहिसा यात्रा द्वारा जागृत होती सुरक्षित है कल की बागडोर आज के हाथ हिसा हो रही बढती विषमता के कारण भी कभी न टेके हिसा के सामने भी घुटने आप जागरण के स्वर/54 कभी न सूखे मानवीय करुणा समानता ही सभी के जीवन का एक लक्ष्य हो का रस पिये वाणी-संयम रखने वाला व्यक्ति ही बड़ा होता अविश्वास ही असली कारण है हिसाओ का भी शाति प्रयासों को आचार्य तुलसी ने एक दिशा दी दिखते आज पूरक अपने मे स्त्री व पुरुष जनता तक पहुंचाना जरूरी अहिंसा-स्वर युद्ध व हिसा चिता का विषय है पूरे विश्व में जहां हो अहं हिसा का प्रादुर्भाव वहां तय है वाणी-सयम रखनेवाला व्यक्ति अहिंसा-स्वर भरे संस्कार शांति व अहिसा के नई पीढी मे जागरण के स्वर/55 घातक होता मनुष्य के लिए ही हिंसा का भाव आदमी के अंदर घुले भी वह कोरा अध्यात्म बन रहा है वर्तमान समाज युद्ध का क्षेत्र कोरा विज्ञान विनाश की ओर ले जा सकता है हिंसा जुडी है व्यक्ति की आक्रामक मनोवृत्ति से गिरते मूल्य ले जा रहे लोगो को निराश-पथ अध्यात्म बढे जागृत करने को विश्व चेतना दरअसल हिसा करता व्यक्ति खुद की सदा व्यक्ति की आस्था खण्डित हो रही व्यवस्था से भी उतारे आप पवित्रता के रास्ते स्वय जीवन हिसा की चिंता करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है जागरण के स्वर/56 निर्दोष पर हो रहे अत्याचार होता अहित जिससे दूसरो का बचे आदमी पर मौन क्यों? रोक न सका समय को भी कोई हम ही रूके करुणा-दया सभी धर्मों के अंग यह न भूलें दिखला सकें धर्म का सही रूप तो दिखलाएं की है जिसने समय की भी कद्र उसने पाया करे प्रयास घेर लिया है समाज को बाहो मे कुरीतियो ने समाज मे पाने का सम्मान आप सांप्रदायिक असहिष्णुता सदा बढ़ती जाती बांध न सका समाज को दे सही दिशा आप भी गर सके तो समय को भी कोई हम ही बंधे जागरण के स्वर/57 न पहचाना जिसने समय को उसने गंवाया तडपाएंगी जाने कब तक भी ये चोटे हमें ठहर गया यात्रा का सिलसिला काले द्वीप पे कायम करे भाई-चारे को कैसे सोचना होगा आदमी हूं मैं क्योकि प्यार करता आदमियो से इस माटी की सुगंध में असली बाकी नकली धर्म के नाम चारो ओर पाखड क्रंदन होता सबके जीवन में मन अपना का बोलबाला राहे अपनी जो आप बनाते हैं शीश चढाऊं जगा देना तू जग जाए अगर जो भी तुमसे एक समान डाल के हर फूल राह के शूल जागरण के स्वर/58 आती बहार तभी जब भीतर बदलाव हो आए न काम वह जीवन क्या है, जो सकट मे शाति-चेतना आघार स्तभ होती विश्व शांति का बढा दिया है मनुष्य की व्यथा ने मेरे दर्द को मानव जाति आज अहकार व स्वार्थ से भरा हवा से पूछो ये कौन जलता है दहलीज पे डूबेगी पृथ्वी यदि मानवता का अत हुआ तो मिलता सदा हिंसा को उत्तेजना विषमता से हो सकती है सदैव क्षमा से ही हिसा पे जीत मॉग के लिए दमन-बंदूक से निकली हिसा अहिंसा-बिना शांति की कल्पना नहीं सभव जागरण के स्वर/59 गुनगुना दे अनजाने ही सही वेदना-स्वर प्यार के लिए शमां जलती रहे बेहतर है दिखाए दीप अंधकार मे राह चलते-चलो न ले जाएंगे न लेकर आए थे हाय हाय क्यो ? ईमान जब अमीरो ने खरीदा रही बची क्या? जग आएगा आज नहीं तो कल आज का सच सही इसान फैलाएँ आज जागरण के स्वर शांति के लिए बनेगे घृणा -द्वेष को त्याग कर छूना चाहते हमे पांव जिनके पाव नहीं हैं जोड़ सकें तो चलो, दिलो को जोडे घायल दिल दिल की पीर अविरल बनके नीर बहाएं जागरण के स्वर/60 भूले हैं लोग चल सकता न तो विश्व न व्यक्ति मात्र अहिंसा जिंदगी की अदा व अपनी दोस्ती बडा घातक आर्थिक प्रलोभन बुराईयों का अहिंसा सदा व्यक्ति के जीवन की उपयोगिता बडा पतन स्वयं के नजर से गिर जाना भी हिंसा करती अपना ही हमेशा अकल्याण भी व्यक्ति ही होते अहिसा के केद्र मे बहुत बार हिसा-अहिंसा दोनों का भी अस्तित्व समाज मे है असंतोष ने धकेला मनुष्य को आसुरी-वृति करना होगा सूक्ष्म प्रयोग सदा अहिसा वास्ते अहिसा एक सार्वभौम मृत्यु है शाश्वत सत्य जागरण के स्वर/611 उभारती है प्रदर्शन-प्रवृत्ति यही लालसा कोटि-कोटि भी दीप जले तमिसा चीर-चीर के हिसा करना रामसुख ने कहा अर्थशास्त्र है बद करे भी सम्मान ज्यादा देना धन वालो को नहीं जलती कभी कोई तिल्ली ही अचेतन में अपेक्षित है उपशम-साधना हिसा से मुक्त विदेह अवस्था नामदेव थे अहिसा के महान चितक-संत चरम उपलब्धि है अहिसा की काम हो रहा आज अहिसा पर खड-खंड मे अहिसा-यात्रा उपदेश ही नहीं प्रशिक्षण भी अस्तित्व वास्ते अहिसा अनिवार्य व्यक्ति के लिए जागरण के स्वर/62 नहीं चलता अंतर्यात्रा के बिना नहीं करूँगा आक्रामक प्रवृति का समर्थन सच का पता प्रत्येक प्राणी अहिसा के केंद्र मे होना लाजिमी जीना चाहता प्रयुक्त होता हर एक प्राणी.भी अपने दग औजारो की खोज मे बौद्धिक शक्ति फलदायक अंतश्चेता, न कि मंत्र जाप से सच्चा जीवन निरकुशता से होती है लड़ाई न्याय की सदा अहिसा का पालन और सयम सात्विक बल प्राचीन सस्कृति मे धर्म-प्राचीन अहिंसा मात्र अनिवार्य है साधना ही नहीं है पारलौकिक वस्तु अपरिग्रह सत्य जीवन जागरण के स्वर/63 दुलन देगे भोग विलास आज की संस्कृति में तामसी सत्ता कव तक जुल्मों की मंदिरा आप? अहिसा बीज व्यक्ति के मस्तिष्क मे हिसा की भाँति शाति प्रयास अपरिग्रह दिव्य तत्व ज्ञान का मार्ग है सही सफल नहीं होता सकल्प-बिना अहिसा यात्रा रुपांतरण की भी चेतना-यात्रा लूटा जा रहा खिचडी-बीच हाथ डालने से तो आँखो की इज्जत जलेगा हाथ इस बचाएँ एकार्थक है शाति और अहिसा जानिए आप करे प्रयास सीमा करेगे अपने स्वामित्व का जाग्रत करने का शाति-चेतना हम सदैव जागरण के स्वर/64
आतंकवाद
आतकवादी
जबडे चबाते हैं
जनता के ही
आतकवाद रहे उजाड अधा बन स्वार्थ मे अपना घर संवारे आप संवदेना, जो आज दम तोडती बह रहा है जिसने भी हो मारा लाल ही खून रहा उन्माद जिस खडहर मे द-बसा नहीं जलती चेतना की आज भी सुलगाना ही इंसानियत कत्ल हो रही, चाहे जो भी हो मरा अराजकता उन्माद निरकुश छाव तले है लाल हो गए इतिहास के पन्ने गॉधी आहत है पाकिस्तान जरखेज जमीन आतकियो का उभर आई हैं जल रही है आग चारो तरफ सभी खडे हैं नील गगन पर कुछ खरोचे जागरण के स्वर/66 बिखर जाते थोडी सी कटुता मे सही नहीं है वह धर्म, जो फूट डलवाता है सारे रिश्ते ही मागी भीख मैं सूर्य से, किरण दो मन चगा हो झुक रहे हैं जाति, धर्मों के झगडे छोडकर हैं रिश्ते खोए धन कुबरो आगे पडे भी सारे लूटता रहा धर्मावलबियो को धर्म की आड पूरे विश्व मे उठ रहा तूफान शाति खातिर मारे जा रहे मंदिर-मस्जिद के नाम इंसान धर्मों के नाम आज खुद को हम छल रहे है अजगर ने आकर शीतलता मेरी पी डाली चिता की राख कैद है मुट्ठियों में चुप हवा की जागरण के स्वर/67 आतंकवाद रहे उजाड अधा बन स्वार्थ मे अपना घर संवारे आप संवदेना, जो आज दम तोडती बह रहा है जिसने भी हो मारा लाल ही खून रहा उन्माद जिस खडहर मे विषाद-बसा नहीं जलती चेतना की आज भी सुलगाना ही इसानियत कत्ल हो रही, चाहे जो भी हो मरा अराजकता उन्माद निरकुश छांव तले है लाल हो गए इतिहास के पन्ने गॉधी आहत है पाकिस्तान जरखेज जमीन आतकियो का उभर आई हैं जल रही है आग चारो तरफ सभी खडे हैं नील गगन पर कुछ खरोचे जागरण के स्वर/66 बिखर जाते थोडी सी कटुता में सारे रिश्ते ही सही नहीं है वह धर्म, जो फूट डलवाता है मागी भीख मैं सूर्य से, किरण दो मन चंगा हो झुक रहे हैं जाति, धर्मों के झगडे छोडकर हैं रिश्ते खोए धन कुबरो आगे पंडे भी सारे लूटता रहा धर्मावलबियों को धर्म की आड पूरे विश्व मे उठ रहा तूफान शांति खातिर मारे जा रहे मदिर-मस्जिद के नाम इसान धर्मों के नाम आज खुद को हम छल रहे हैं अजगर ने आकर शीतलता मेरी पी डाली चिता की राख कैद है मुदिठयों मे चुप हवा की जागरण के स्वर/67 हिसा की आधी आज पूरे विश्व मे है फैल रही आतंकवाद से धधे चौपट व कोष खोखला बढती हिसा ससार मे मानव है परेशान पाकिस्तान ही आतंकवादियो का लूट के अड्डे मदिर-गस्जिद में देवता ऐसे गढ पुराना घूम रहा है अमेरिका का भूत जीत का नशा मौलवी पडे भी भ्रष्ट, अभिशाप आतंकवाद की चपेट में चढा अमेरिका भी बने हैं आज जब घर से लूट ले जागे नींद से गए डाकू घर हमारे आतकवाद ने खेला दरिंदगी का खुला खेल आखिर जले, घर चिराग से ही जागरण के स्वर/68 पहुंच चुका हिसा की पराकाष्ठा पर मानव भारी भूल की पाक को गले लगा जार्ज बुश ने जम्मू-कश्मीर आतंकवादियो का बना निशाना पहुँच गया असभ्यता की सीमा तक आतंक काम करता अत्याचार के पीछे धन का लोभ असामाजिक तत्त्वो ने खुलकर गोटी लाल की सभव नहीं बदूक की नोक पे समस्या-हल आतंकवाद से परेशान आज पूरी दुनिया बर्बादी वाद पैगाम भी आया, तो किसी काम का आतकवाद ने हमारी नींद को भी आतकवाद ने खत्म कर दिया भाई-चारे को हराम किया जागरण के स्वर/69 धार्मिक स्थल भी आतंकवाद से बच न पाए आतकवाद विश्व व्यापी चुनौती बना है अब खेली जा रही धर्म के नाम पर खून की होली आतंकवाद मे मानव का शत्रु मानव बना हिंसा के दर्द के बाद अहसास अमेरिका को अमेरिका मे मलते रहे हाथ खुफिया तत्र आतकवाद नयी सदी का नया आयाम हुआ उन्माद से ही उपजता है आज आतकवाद प्रदूषित है भारतीय संस्कृति आतंकियो से आतकवादी पूरी मानवता पे हावी है आज आतंकवाद युद्ध पिपासा का ही इजहार जागरण के स्वर/70 क्यो लड रहा इंसान से इंसान घातक सदा लोकतंत्र के लिए दंगा-फसाद हर देश मे आतकियो से स्वयं को न बचाया अमेरिका भी मूक दर्शक सुरक्षा एजेसियाँ आसान नहीं अविश्वास की आग को बुझा पाना अमेरिका की आतंकवाद जबडे चबाते हैं जनता के ही आतकवाद जेहाद की आड मे खतरनाक सभ्य समाज कलकित हो रहा आतकियो से धरे-के-धरे रहे अमेरिका के सुरक्षा तंत्र आतकवादी का दंश दो दशक से झेल रहे आतंकवाद पर विश्वव्यापी दृष्टि आज जरूरी जागरण के स्वर/71 आतंकवाद धार्मिक कट्टरता साबरमती का गाधी आश्रम भी वचन पाया का प्रतिफल खतरनाक प्रवृत्ति का वढना चिताजनक गुजरात में आतंकवाद समाप्त करना अपरिहार्य दंगे की घटनाए लोमहर्षक पडोसी जुटा हिंसा भडकाने मे हार के बाद करना होगा आतंकवाद पर कडा प्रहार क्यो भूल गए हम धार्मिक ग्रंथ के मूल्यो को ही झील थी शात कैसे बहने लगी खून की नदी शून्य मे नहीं पुन. कोशिश जन की संवेदना उभारने की पनपता कभी भी आतकवाद जागरण के स्वर/72
खाड़ी
युद्ध
.........
.....
ध्वस्त हो गई
इराक की सभ्यता
खाडी युद्ध मे
जागरण के स्वर/73
खाड़ी युद्ध कर देता है मद इसी प्रकार धराशायी भी ध्वस्त हो गई इराक की सभ्यता खाडी युद्ध मे समाज से भी बुरे व बेईमान बहिष्कृत हो ताक पर रखा प्राचीन सभ्यता को अमेरिका ने धज्जिया उडी संयुक्त राष्ट्र संघ खाड़ी युद्ध मे घट रहा है अमीरो पर कर अमेरिका में विफल रहा अपनाया है दोहरे मानदड अमेरिका ने एक भी साक्ष्य देने मे अमेरिका अमेरिका ने दुनिया को ही मूर्ख बनाया सदा खाडी युद्ध ने सभी सरकारों को हिला रखा था अमेरिका ने इराकी अतीत को बर्बाद किया जागरण के स्वर/74 इराक पर सारी दुनिया खडी देखती रही खाडी युद्ध को अमेरिकी हमला दुनिया दंग विश्व के सभी राष्ट्र मूक दर्शक खाडी युद्ध मे मॅहगा पड़ा राष्ट्रपति बुश को इराक युद्ध सामने आया अमेरिकी चेहरा मे खाडी युद्ध बुझती नहीं इसानियत की लौ कभी हिसा से हैवानियत का भूत सवार था फैलती हिंसा कट्टरपन से ही अधिकाशत खुश-टोनी पे अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सघ की उपेक्षा की इराक युद्ध करोडो विरोधियों का युद्ध बना जन सहार को शौर्य समझता है अमेरिका जागरण के स्वर/75 अमेरिका के आघात व आतक पूरे विश्व मे क्या भूल चूके अफगानिस्तान का नर सहार? धूल में मिली आदम की धरती खाडी युद्ध से अंत हो यदि रावण का तो क्यो न अमेरिका का? अमेरिका की अपनी मनमानी इराक पर आज बना है अमेरिका दोनो का खून का प्यासा अलग ही है अमेरिका के सयम की परिभाषा सच है यह तानाशाही सत्ता की समाप्ति हुई सद्दाम को भी आखो पर था बिठाया अमेरिका ने होठो से पूर्व फिसल सकती है प्याली हाथो से अमेरिका को क्या है उसकी सीमा सीखना होगा जागरण के स्वर/76 फतह बाद बन गए हैं बुश हिटलर के समान आज अमेरिका भी युद्ध है हार चुका किसी शेर ने कभी किसी कुत्ते का आदेश माना कैसा असर अर्थव्यवस्था हुई है प्रभावित सहमे सब लोग खाडी युद्ध से पूरा शहर अमेरिका ने इराक को क्या मुक्ति दिला पाई है ? दुर्वल देश नहीं चलती अमेरिका के आगे आज किसी की मनमानी-शिकार महाशक्ति का इराक देश प्राचीन सभ्यता का मालिक रहा बगदाद के बेगुनाहों की चीखो वरगलाई जिंदगी क्यों दर्द का ले के सहारा मे दर्द भी था जागरण के स्वर/T7 वापस लौटा अरमानो की चिता पारकर मै अमेरिका ने इराक को श्मशान मे बदल दी शवों पर ही अमेरिकी फसल लहराई है वह कत्ल भी करते है तो कहा होती है चर्चा जिनके लिए लडे थे हम उन्हीं से मात खाए सबको साफ सुखियो का चेहरा दिखाई देता विरोध हुआ हासिल हुआ नाजायज युद्ध का पहली बार कहा किसी को कभी मारधाड से दिखाई पडे जलाया हुआ दिया झांके तो सही मर मिटते लहू-लुहान इराक की धरती दादागिरी से वे आन-बान पर पैर न पीछे जागरण के स्वर/78 जिदगी बस अंधरे के सहारे अपनी सत्ता सद्दाम ने भी खो दी हेकड़ी मे ही बालू रेत सी पूरा होता है अमेरिका का स्वार्थ पाकिस्तान से नहीं आते है सूत्रधार मोर्चे पे कभी युद्ध के सदैव होता तानाशाह का हश्र इसी तरह थपथपाता अमेरिका सदैव पाक की पीठ सद्दाम कभी अमेरिका की ऑखो के तारे भी रहे जंग उसे ही जो कभी न चखा हो अच्छी लगती बदलता है न इतिहास और न गति व नीति होती रहेगी संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था की हत्या जिदा या मुर्दा अमेरिका के लिए लादेन दर्द जागरण के स्वर/79 समझे हम भारी विरोध सभी महाद्वीपो मे खाडी युद्ध का दोहरी नीति को भी अमेरिका की सद्दाम को भी पहचान नही थी जनता-नब्ज जायज होता युद्ध और प्रेम मे इराकी जन दो तानाशाहो-बीच तबाह हुए सब कुछ ही बढावा दिया विस्तारवादी नीति हिटलर ने शांति के लिए अमेरिका के बुश असख्य मन अवसाद से भरे खतरनाक खाडी युद्ध से रोक न सकी विश्व बिरादर, भी इराक युद्ध खाडी युद्ध में युश व ब्लेयर ने ले जाता सदा सातवे आसमान सत्ता कामद जो चाहा, हुआ जागरण के स्वर/80
आदमी
.
आदमी जिंदा
मोक्ष के लिए नहीं
रोटी के लिए
जागरण के स्वर/81
आदमी हर हमेशा असहिष्णुता बनाता अह व्यक्ति का जहां गडी है पैनी दृष्टि तुम्हारी छल-गठरी गली तो वही भीड भरी शायद मैं ही बदला खुद लेना है एक क्षण भी समन्वय के बिना जीवित नहीं मॉगने से कुछ भी नहीं मिलेगा बात न मेरी मानी तुमने, राह गही निराली होना हमे है आत्म विस्मृत और परप्रिय ही होनी चाहिए ताकत हममें भी कुछ लेने की तुम क्यों खफा जब हम खड़े हैं हाशिए पर प्रयास करे कहां दीखता आज के जुलूसों मे आम आदमी संबंध को बनाए रखने का ही जागरण के स्वर/82 कैसे काटता रोता मनुष्य आम आदमी दिन पत्थर के सामने पत्थर बना उससे पूछो बहाया तूने क्यो डेढ चुल्लू पानी खुद ईमान बन गया है आज व्यक्ति खुद भी नियत्रित है व्यक्ति का जीवन भी जींसो के द्वारा जींस सुंदर वह टूटेगा हर क्षण चौक पे रोटी के लिए कहाँ मिलते खोजने के बाद भी सज्जन कहीं छिछला होता जीवन व्यक्ति का, जो ज्यादा बोलता जीता मनुष्य सदैव भविष्य के इंतजार मे जानता हूँ मैं बुढापा मे अपना है कोई नहीं पटा लिया है आदमी की आत्मा को येईमानी ने जागरण के स्वर/83 व्यक्ति को कुछ मनुष्य-तन भीतर ही भीतर खाता जा रहा मनोयोग से रचा प्रकृति ने भी भरोसा नहीं आज है मनुष्य को मनुष्य पर जो विनम्र है शाति और खुशी से जीवन जीता सोने नहीं दे अतीत के सपने व्यक्ति को आज अधिक होती उसकी कीमत, जो कम बोलता कहाँ से कहाँ आया आदमी आज रोटी के लिए चाहे आदमी किसी भी कौम का हो चैन चाहता द्वद्वो से भरा मानव का जीवन इस युग मे बने रहना आदमी का आदमी गुस्सा कैसा भी वडा कठिन आपसी संबधो को बिगाड़ता है जागरण के स्वर/84 गुस्सा बढाती रोटी ही सच परमार्थ-स्वार्थ का झमेला नहीं नकारात्मक सोच किसी व्यक्ति की व्यक्ति चाहता सुख का विस्तार ही सारी जिंदगी सबसे अच्छा न मुसलमा न हिदू, मेरे दोस्त लाश तो लाश मनुष्य का जीवन कर्म चलते व्यक्ति चाहता जीना, रोजी-रोटी बच्चो के लिए है धनवान वही जो गलत लाभ आदमी जिदा मोक्ष के लिए नहीं रोटी के लिए उठाता नहीं वृद्ध आदमी आदर्श संजोकर युवा रहता महंगा न्याय सस्ती जान, क्या करे आम आदमी कट रही है साझ-संग जिदगी लडखडाते जागरण के स्वर/85 नहीं दीखता दुःख का साथी कोई सुख व दुःख जीवन मे सभी के आते रहते सुख के सभी वही सुखी है जो मनुष्य स्वयं शुद्ध द्वेष रहित जब गिरता होता ताण्डव आदमी की लाश पे राजनीति में आदमी भूलकर तो मुस्कुराता गुस्सा आए तो ध्यान केंद्रित करे दूसरे कार्य तय होती है आदमी की कीमत पद से नहीं निश्छल प्रेम दापत्य जीवन मे शाति के लिए शब्द का तार सिसकता ही रहा स्वर अधूरा नहीं आने दे नकारात्मक सोच नहीं देखता अपने से बाहर स्वार्थी पुरुष अपने मन जागरण के स्वर/86 क्या देखेगे वे ससार का सौंदर्य रहता सदा दुनिया मे अकेला अहंवादी ही जो चितायुक्त नहीं किसी को आमजन की चिंता इस देश मे बुरे लोग भी महिमामडित हो आहलादित हैं संभव होता समाज का हित भी अच्छे लोगो से दिखाई देता केवल अपना ही हर व्यक्ति को बाध्य करता साथ चलते वह हर समय सूखी मे जीने इंसान और वृक्ष हर समय टिकाऊ होता पति-पत्नी सबंध प्रेम पे टिके हर मौसम करता है अनुभव मेरे मन का क्या वह कभी खिलखिला पाएगा औरों की भाति जागरण के स्वर/87 तौलता सदा प्रेम का होता व्यक्ति के जीवन मे दूसरो की नजरो काफी महत्त्व व्यक्ति का मन दिखाई देती हरियाली न कभी उसके दिल समझें आप अधीर होता दूसरों की नजरो एक दूसरे को भी प्रेम-सहारे व्यक्ति का मन रहता साक्षी हमसफर वृक्ष हर पल का व्यक्ति बनता स्वार्थी आदमी सबको समझता अपना शत्रु दुनिया का सेवक स्वयं को भूल युवक हारे लेकिन यौवन तो कभी न हारा लक्ष्य होता है अपने से बाहर दूर की वस्तु जो अग्नि मे है और है जल में भी व्यक्ति-भीतर जागरण के स्वर/88 मालूम नहीं दिखाई देती नागिन की तरह लबी सडक कौन नजर आए पथ पे हमे व्यक्ति का अह कर्तव्य निर्वाह मे बाधक होता आम आदमी जूझता संकटो से सुरक्षा हेतु मिलता नहीं परिचित चेहरा इस गली मे क्यों भूला व्यक्ति उसका जीवन है शक्ति का ऋणी क्या बिगाडा था तूने बदला लिया नासमझी में क्या पाया तूने छीन कर ही मेरे सुख-सपने सफल नहीं संकीर्ण भावना में रमनेवाला क्यो करता है दूसरों के सुख से हो सकता है दुख मेरी कथाएं लबी सुखो से ईर्ष्या मनुष्य जागरण के स्वर/89
....
........"
शाकाहार
शाकाहार भी
उत्कृष्ट जीवन की
है एक नींव
जागरण के स्वर/90
शाकाहार विश्व शाति का सरल तरीका है शाकाहार भी शाकाहार ही शांति की स्थापना का उपाय अब हिसा नहीं हो न्याय पद्धति मे भी यही सही है पाए जाते हैं भोजन-तंतु ज्यादा शाकाहार भी उत्कृष्ट जीवन की है एक नींव शाकाहार में घट रहे है पाश्चात्य देशो मे भी मासाहारी ही यह सच है हानिया नहीं होती शाकाहार से कम खाता मैं पसंद-नापसंद मेरी अपनी प्रचार करें शाकाहार-प्रसार गाव-नगर शाकाहार से फैलने वाले रोग का नाम कहाँ ? क्यो अधिकार बनाने का भोजन अन्य प्राणी को? जागरण के स्वर/91 सर्वश्रेष्ठ है भोजन पद्धति मे शाकाहार ही मांसाहार है आतो के कैंसर का मुख्य कारण जो व्यक्ति पर हिसा नहीं करते उसे हिसा क्यो ? कम हो जाती कैसर संभावना शाकाहार से हार्ट अटैक नहीं के बराबर शाकाहार से ठोस कदम भोजन की पद्धति में आदोलन कम होता है शाकाहारी व्यक्ति को आत-कैंसर सस्ता पडता आर्थिक दृष्टि से भी शाकाहार ही बड़ी तेजी से आहार पद्धति मे परिवर्तन पौष्टिकता है आम व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण उच्च कोटि के अधिकांश खिलाडी शाकाहारी हैं जागरण के स्वर/92
.
गाँव
गॉव आज भी
जिंदा, हॉ जिदा दिली
मुरझा गई
जागरण के स्वर/93
गाँव गाँव-शहर पीपल-पेड़ बरगद की छाँव उदास गॉव जब भी जले, मरे येकसूर ही हवा के साथ चल देती आसमां धरा की धूल रिश्ते-नाते व रोटी-बेटी के रूप कहाँ गाँव में? हँसता था मैं जिनके बल पर वो हँसी कहाँ ? सूना ऑगन लौट न सकता गाँव डूबी न आस गॉव-दालान आज हैं सिरहाने बदूके पड़ीं गॉव प्यारा सा अभी भी याद मुझे खेत-सरसो जाने क्यों कोई गीत नहीं बनता दर्द के मारे वह चेहरा सूनी ऑखो मे सवाल ही सवाल नजर आते अनाहत आश्वस्त अभी भी वही जागरण के स्वर/94 अब गाँव मे लौटें, छोड़ शहर की चकाचौध को गाँव आज भी जिदा, जिदादिली तो मुरझा गई गोटे विछती गंदी राजनीति की आज गाँव मे गाँव वही है पर इसकी मिट्टी में गध नहीं पी गया गाँव सय खराविया ही शहर की भी आज गाँव मे दूध के स्थान पर शराव छायी नष्ट हो गई एकता-सहिष्णुता आज गाँव में कंधे पर से बाला की चुनरिया उडी गाँव में मर रही है आज गाँव की मस्ती एकता विना पोखरी सूनी पनघट वीरान गाँव वही है सदभाव व रिश्ते न जाने कहाँ ? गाँव का आज जागरण के स्वर/95
स्त्री
.
कहीं न कहीं
छाया है एक स्त्री की
हर व्यक्ति में
जागरण के स्वर/96
स्त्री नारी कहती नखुद खुदा बनो ने मुझे देवी विडम्बना है माँगती स्त्री मर्द से अपना हक हर चौराहे विज्ञापन में आज नारी बिकती निकली पजूद ढूँढने को स्त्री नहीं चुकी भूखे मुँह को देने मे स्वयं छाती चौखट पार होती खड़ी हैं किसी की परेशानी में औरते ही दहलीज के पार स्त्री, चोटे लगी नारी जीवन उसकी फलसफा समझना है पुरुषत्व को कदम रखे स्त्री बाहर, पुरुष नहीं चाहते जागरूक है अधिकारों के प्रति महिला आज कहीं न कहीं छाया है एक स्त्री की हर व्यक्ति मे जागरण के स्वर/97 रचना हूँ मैं हूँ सृष्टि की रचना फिर भी दुःखी किसे सुनाएँ विधवाएं अपन व्यथा कथाएँ नहीं चाहती नारी, सिर्फ भोग की वह वस्तु हो विधवा-पीड़ा सुलगती आग सी मन ही मन फूल चढाऊँ पूजा का जिस पर पाषाण कहाँ ? असलियत स्त्री की सामने होगी झाको तो मन होता बेचैन बादलो के आते ही प्रेयसी-मन दहेज और उत्पीड़न से नारी आज तबाह राह बनाती सर्जनात्मक नारी हिसा के बीच किसी के कानो पहुँचती है कहाँ आह नारी की औरतें ही हैं जीवन का उत्स भी पुरुष माने जागरण के स्वर/98
..
जनतंत्र
....
सत्ता किसी की
विरासत नहीं है
जनतत्र मे
जागरण के स्वर/99
जनतंत्र उगने लगे जय रहवर ही खुदा मालिक जनतंत्र के सारे मधुर स्वप्न बिखर गए समझें आप अपनी जिम्मेदारी राष्ट्र हित में है सर्वोपरि जनता की सोच ही जनतंत्र मे अपना राष्ट्र पताका भी अपनी परन भाषा पोले तो क्या गुजर नहीं रहा पानी सिर से? काफी गिरी है राजनीति की साख सत्ता के लिए चेतना की ही जलाएँ सब ओर मसाल हम अदालत से भले ही छूटे, पर जन से कहाँ? सिसक रहा कोर्ट की कोठरी मे न्याय बेचारा हम आजाद नहीं किसी के हम होगे अधीन जागरण के स्वर/100 तय हो गया जनतंत्र गिरना गाँधी के बाद नेता अमीर पर हमारा देश आज गरीब हो रहा आज जघन्य अपराध सत्ता की आड दुःख बीमारी लोकतत्र मे आज कुर्सियाँ श्रेष्ठ कहाँ आदमी प्रजा मारी जा रही लोकतत्र मे नेता मानते स्वार्थ-सिद्धि का लक्ष्य अपनी जाति लोकतंत्र मे हर प्रणाली-भाँति कमजोरियाँ किसी देश की पद्धति बाहर से ठीक क्यो होगी? चारों अंगो ने दफनाया मर्यादा जनतंत्र के क्या लोकतंत्र सद्दाम की हार से बढ पाएगा? दम तोडता जनतंत्र दिखता आज देश मे जागरण के स्वर/ 101 हो सकता है हिसा से खतरा भी लोकतत्र मे विक सकता निर्धन अधिकार रोटी-टुकडे एक विशिष्ट जीवन पद्धति है इस राष्ट्र की बावले आज राजनीतिक दल कुर्सी के लिए विचलित है जनतंत्र-प्रणाली सच से आज नेता ने किया लोकतत्र की आस्था को मटियामेट रह गयी है सरकारो की इच्छा फर्जी होकर प्रश्रय देते नई दासता आज देशी चेहरे उठता जाता जनता का विश्वास जनतत्र से खुदा मालिक खेत का, जब बाड ही खाने लगे बर्दाश्त नहीं कोई भी अत्याचार रोटी के लिए जागरण के स्वर/102 रक्षा की जाती विचार स्वातंत्र्य की जनतंत्र में कम न पाए मनोबल जन का सवाल आज तीव्र हो रहा जन का आकर्षण अस्मिता हेतु होती जनता शक्ति का उद्गम लडना होगा एक और युद्ध ही जनतंत्र मे स्वतंत्रता का जनतंत्र भी स्वाभाविक रूप से धनी के पास बढ रहा है सरकार व जनता में अलगाव तैयार होते प्रतिकार के लिए आज निर्धन लुभाते रहे प्रतिनिधि सदैव वायदे से ही देख रहा है अपनी खुली आँखो से जन सामान्य भेडो की भॉति नहीं हो आचरण जनतत्र में जागरण के स्वर/103 बढ रही है घटनाएँ देश में भ्रष्टाचार की जनतत्र की क्या है असलियत जन से पूछो आजादी पायी देकर बलिदान पर मिला क्या ? मुख्य प्रश्न है देश की एकता का व्यक्ति का नहीं अधिकार का होता है जन्म सदा कर्तव्य से ही कौन कहता देश का जनतत्र जीवित नहीं ? कर्तव्य छोड अधिकारों की ओर लोग दौडते सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा चला न सका सता किसी की विरासत नहीं है जनतत्र में उसे क्या मिला? कहाँ सुनती सरकार, जनता की बातो को भी? जनतंत्र पाकर जन हैरान जागरण के स्वर/104 देश के नेता जमाकर वैभव रखेगे कहाँ ? जन अक्सर पिटते ही रहे हैं जनतत्र में बोली कौन सी बोलती सरकार लोकतत्र मे मजदूरो ने माँगा हक तो मिली हवालात ही मजाक बनी दुलमुल नीतियाँ जनतत्र मे जन दे कर जन प्रतिनिधि को ऐशो आराम जनतत्र मे आज कहाँ दिखता दूध का धुला यह ठीक है जनतत्र मे कमी फिर भी ठीक आसान नहीं बचाए रखना भी जनतत्र को मुझसे पूछो कैसे मैं काटता हूँ दिन अपना होता नहीं है भ्रष्टाचारी का आज बाल भी बाँका जागरण के स्वर/105 जिंदगी जीता चैन से धन के बल घोटालेबाज सवाल खडा नीति-नीयत पर सरकार की झाके गिरेवां देश के नागरिक वे कहाँ खडे जिसके पास पैसा आज, कानून उसकी मुट्ठी अब क्या बचा जनतंत्र सरकार में? मडरा रही बिचौलियो की छाया हर क्षेत्र में कहाँ से लाएं ईमानदार नेता व प्रशासक? मतदाता तो गतिशील जीवन जीना चाहता कम हो रहा जनता का विश्वास जनतत्र से जनतत्र मे सोचने की मनाही नेता ने कहा आज हो रही भारत की गिनती भ्रष्ट देशो मे जागरण के स्वर/106 मजबूर है जाँच एजेंसी भ्रमित कर रही जनता को भी सच खडा आज भी कठघरे में जनतंत्र मे आज सारा समाज बँट गया है सरक्षण है भ्रष्टाचारियो को ही सरकार से लूट ले रहा देश की जनता को खेवनहार दिन व दिन कटुता बढ़ रही दलों के बीच भरोसा किया जनता जिस पर निकम्मे हुए जोर से और न वादे से मिटता देश का दर्द हनन होती लोकतत्र-मर्यादा छीटा-कसी से विदेशी क्यो है जनप्रतिनिधि की जीवन शैली? राजनेता की गिरती साख, पर बचाए कौन? जागरण के स्वर/107 पड़ रहा है कटुता का प्रभाव समाज पर तुम लो कुर्सी पर जनता को दो दो रोटियाँ भी भ्रष्टाचार की गंगा बहती यहाँ जनता मौन बचाऊँ कैसे डूवती कश्ती को मैं चिता यही है नारे से न तो कुछ बदला है और नचादे से ही राजनीतिक उल्लू सीधा करते सभी पार्टियाँ सियासी लोग कर रहे कुकर्म कुर्सी के लिए जा रही गर्त देश का जनतत्र सभाले कौन? सत्तासीन हैं जो लहू पीते रहे इनसान का सदैव ठगा दंभ छोडिए जगाए जनता को जो सोई आज जन प्रतिनिधि ने मतदाता को जागरण के स्वर/108 सच कहना आज चाहता कौन जनतंत्र मे नेता के लिए कालीन के नीचे है लोक-कल्याण हम लाएँगे प्रतिनिधियों को भी सीधे रास्ते पे किसी दल को सिद्धात व नीतिया ही निखारती सीखाएँ आप देश प्रेम, लडे जो कुर्सी के लिए मिलते आज कोरे आश्वासन ही मतदाता को कौन सुनता ओत-प्रोत है नेता की अंतरात्मा भ्रष्टाचार से आज का पूरा सच भीडतंत्र मे कुर्सी के लिए समझौता करते आज के नेता जकडकर बैठ गई जडता मेरी नजरे वीमारियों पर भी जनतंत्र की जनता को ही जागरण के स्वर/109
आँसू
..............।
खोल देते हैं
सच्चे मन के आँसू
मन की गाठे
जागरन के स्पर/110
आँसू खोल देते हैं सच्चे मन के आँसू मन की गाठे ऑसू तो मानो स्त्री के पास गिरवी रखे होते है प्रेम केवल ऑखो और दिल मे बसता सदा अखियाँ प्यासी कैसे गाऊँ मैं गीत वेदना वही असहाय कदम उमडती जो तुम्हारे बिना मिलते जहाँ धरती व आसमा प्रतीक्षा करो घुस जाती है दहकती निगाहे मेरे भीतर होती रही है वक्त की आँख पर आँख मिचौली पिघला जाती मेरी आह की गर्मी उसको अब ऑसू बहाए सहमी सी जनता भ्रष्टाचार पे मेरे शव पे वे रोएँ. आह भरे जिसके ऑसू जागरण के स्वर/111
आँसू
.
........
खोल देते हैं
सच्चे मन के आंसू
मन की गावे
जागरण के स्वर/110
आँसू खोल देते हैं सच्चे मन के आँसू ऑसू तो मानो स्त्री के पास गिरवी रखे होते हैं मन की गाउँ प्रेम केवल आँखो और दिल मे बसता सदा वेदना वही असहाय कदम उमडती जो अखियाँ प्यासी कैसे गाऊँ मैं गीत तुम्हारे बिना मिलते जहाँ धरती व आसमा प्रतीक्षा करो घुस जाती है दहकती निगाहे मेरे भीतर होती रही है वक्त की आँख पर आँख मिचौली पिघला जाती मेरी आह की गर्मी उसको अब ऑसू बहाए सहमी सी जनता भ्रष्टाचार पे मेरे शव पे वे रोएँ, आह भरे जिसके आँसू जागरण के स्वर/111 गिन सकता ऑसू की चूदों की जो निधियाँ मेरी अधूरी छोडी कह रही कहानी आँखो का पानी दर्द मिटाया तेरे आँसूओं ने ही यही बया कम? वहा देता हूँ ऑसूओ में अपने सारे गम को क्यों कहलाती यादे, यदि मिटाने से मिट जाती जब से गए नमी-नमी सी रहीं नजरे मेरी तलाशे हम दूसरो की हँसी मे अपनी हँसी अपनी आँखे औरो के सपने से तुम जोडो तो आँखे खुली थीं पर मन की आँखे बुझी-बुझी सी मुर्दो के ऑसू गहरे दुख मे ही गिर पाते हैं पोछ दे आप दूसरे के ऑसू को अपने हाथ से जागरण के स्वर/112
No text on this page.
No text on this page.
कवि परिचय पूरा नाम . संक्षिप्त नाम : सिद्धेश्वर : सिद्धेश्वर प्रसाद जन्म : 18 मई, 1941 ई. जन्म स्थान : ग्राम+पत्रालय वसनियावाँ, जिला-नालंदा (बिहार) शैक्षणिक योग्यता : एम.ए., पटना विश्वविद्यालय, पटना विशेष योग्यता : एस. ए. एस., भारतीय लेखा एवं लेखां परीक्षा विभाग सरकारी सेवा : भारतीय लेखा एवं लेखा परीक्षा विभाग में 36 वर्षो तक सेवा स्वैच्छिक सेवानिवृत्तिः वरिष्ठ लेखा परीक्षा अधिकारी के पद से सन् 2000 ई. में स्वेच्छा से सेवा निवृत्त प्रकाशित रचनाएँ : गद्य और पद्य की एक दर्जन रचनाएँ प्रकाशित अन्य रचनाएँ : देश व समाज के ज्वलंत मुद्दों पर एक सौ से अधिक रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारित सम्मान : देश के विभिन्न सामाजिक एवं साहित्यिक. संस्थाओं से अबतक एक दर्जन से अधिक. पुरस्कारों से सम्मानित रुचि : समाज, साहित्य सेवा एवं पत्रकारिता संप्रति : संपादक, "विचार दृष्टि' एवं राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय विचार मंच संपर्क : 1. 'दृष्टि', 6, विचार विहार, यू.-207, शकरपुर, विकास मार्ग, दिल्ली-92 दूरभाष: 011-22059410,22530652 2. 'वसेरा', पुरन्दरपुर, पटना-800001, दूरभाष : 0612-2228519